सूर्य को सृष्टि का प्राण कहा गया है। सूर्य के कारण ही धरित्री पर जीवन है। सूर्य नारायण यदि एक दिन न निकलें तो धरती पर त्राहि-त्राहि मच जाय। सूर्य का प्रकाश समस्त जीवधारियों में उल्लास एवं प्राण का संचार करता है, इसलिए सूर्य की इतनी महत्ता है। किंतु सूर्य मात्र आग का जलता गोला नहीं है , जिसमें हाइड्रोजन, हीलियम की पारस्परिक प्रतिक्रिया से आग के शोले तथा ऊर्जा भँवर उठते रहते हैं। यह तो सूर्य का दृश्य आधिभौतिक रूप है। आधिदैविक रूप में वह विचारों का नियंत्रक, ग्रहों का अधिपति तथा भावों को सुँदर प्रेरणा देने वाला है तथा जातक की आत्मा के रूप में विद्यमान है। इसमें भी गहरे चलते हैं तो आध्यात्मिक रूप में वह विराट पुरुष की ज्योति है, अतिमानसिक ज्योति है। सुर+इर-इस अर्थ से सुँदर प्रेरणाएँ जो दे, वह सूर्य है।
सूर्य की उपासना भारतीय संस्कृत के अध्यात्म पक्ष का मूल मर्म है। आदित्य हृदय का रहस्य जानकर ही भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध संभव हो सका। युधिष्ठिरादि पाँचों भाई मुनि धौम्य द्वारा सूर्योपासना की दीक्षा द्वारा ही उस शक्ति को प्राप्त कर सके जिसने उन्हें अजेय बनाया। सूर्य की स्तुति से हमारा आर्ष-वाङ्मय भरा पड़ा है। ऋग्वेद के पाँचवे मंडल के 71वें सूक्त के पहले श्लोक में आता है “मही देवस्य सवितुः परिष्तुतिः” अर्थात् “महान है सविता देवता की व्यापक स्तुति”
सूर्य सविता है अपने सृजनात्मक-प्रकाशक सौर रूपों वाली दिव्यसत्ता के रूप में। जो रचयिता है, सत्य रूप में स्तुत्य है, मानव मात्र का पोषक है, मनुष्य के अहंभाव से निकाल कर विश्वव्यापी बना देता है, वही सविता है। सविता-सूर्य, स्रष्टा-पापनाशी सत्ता जो गायत्री का देवता है जिससे एकाकार हो हमारे पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मसत्ता विश्वव्यापी बन चुकी है, को यह सूर्य अंक समर्पित है।
एक परमाणु-सौरमण्डल की सूक्ष्म अनुकृति है। उसका मध्यभाग केन्द्रक-हमारे सौरमण्डल के सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है। परमाणु के इस केन्द्रक सूर्य के चारों ओर इलेक्ट्रान उसी तरह घूमते रहते है जिस तरह कि सौरमण्डल के घेरे में जिस प्रकार बहुत बड़ा आकाश रहता है, उसी तरह परमाणु मण्डल के बीच भी पोल रहती है। विभिन्न सौर मण्डलों की स्थित में एक-दूसरे से पर्याप्त भिन्नता होती है। इसी प्रकार परमाणुओं के वर्गों के भीतरी भाग में भारी भिन्नता रहती है। यद्यपि वे बाहर से एक जैसे दिखते है। यूरोनियास्क के एक परमाणु में 12 इलेक्ट्रान होते है। कार्बन में उनकी संख्याएं केवल छः होती है।
प्रत्येक मनुष्य एक ब्रह्मांड है। उसकी आत्मा सूर्य के समान है, जिसके इर्द-गिर्द परमाणु भ्रमण करते रहते हैं। मानवी काया में भ्रमण करने वाले अणु जीवाणु एक विशेष प्रकार की विद्युत उत्पन्न करते है। उसी विद्युत से प्रभावित होकर मस्तिष्क से लेकर इंद्रियां तथा अन्य अव्यय अपना काम करते है। जड़ में चेतना उत्पन्न होने का माध्यम यही है। साधारणतया अणुओं में हलचल ही रहती है। चिंतन तथा अनुभूति उनमें नहीं है, पर मानवीय विद्युत जिसे ‘प्राण’ कहा जाता है। जड़ अणुओं के समूह में चेतना, विचारणा और अनुभूत उत्पन्न कर देती हैं, और सजीव जीवन आरम्भ कर देती हैं। निर्जीव अनुभूति रहित जीवन तो पत्थर, चट्टानों में भी रहता है।
पृथ्वी के ध्रुवों के आस-पास चुम्बकीय आंधियां चलती रहती है। अस्थिर रंग बिरंगा प्रकाश “आरोरा बोरिएलिस” के रूप में छाया रहता है। यही ध्रुव स्थान अन्य ग्रहों के विकरण प्रकाश एवं प्रभाव को पृथ्वी पर लाता है और यहाँ की विशेषताओं को अन्य लोकों तक ले जाता है। इस ध्रुवीय क्षेत्र के ब्रह्मांड का संपर्क सूत्र कह सकते है। इन ध्रुव केन्द्रों के माध्यम से चलने वाले अंतर्ग्रही प्रत्यावर्तन के बलबूते ही धरती अपनी वर्तमान परिस्थितियों में बनी हुई है। इतना ही नहीं अन्य ग्रहों की वर्तमान परिस्थितियों में भी इन भू-ध्रुवों में चलने वाले अनवरत प्रत्यावर्तन का महान योगदान है। यदि किसी कारण ये महान आदान-प्रदान बंद हो जाये तो पृथ्वी की स्थिति में इतना विषम परिवर्तन होगा कि तब यहाँ जीवन का अस्तित्व ही संदिग्ध हो जायेगा। साथ ही ग्रहों की कक्षाओं एवं स्थितियों में परिवर्तन होने से सौर मण्डल की प्रस्तुत गतिविधियों में भारी उलट-पुलट हो जायेगी। भू-ध्रुवों के माध्यम से होने वाला प्रत्यावर्तन ही अपने सौर मण्डल की वर्तमान परिस्थिति बनाये हुए है। तनिक से क्षेत्र में होने वाला तनिक-सा क्रिया−कलाप पृथ्वी, सौरमण्डल और उस सौरमण्डल के महासूर्य के प्रदक्षिणा क्रम में कितना भारी योगदान कर रहा है इस तथ्य पर जितनी गहराई से विचार किया जाये उतना अधिक मार्मिक रहस्योद्घाटन होता चला जाता है।
मनुष्य का अन्तःकरण भी ऐसा ही चेतना का ध्रुव संस्थान है। उसके भीतर इच्छा शक्ति, भावना शक्ति, संकल्प शक्ति, आकर्षण शक्ति, विकर्षण शक्ति जैसी अगणित ज्ञात और अविज्ञात क्षमतायें भरी पड़ी है। यदि उन्हें जागृति किया जा सके, उनका उपयोग करना सीखा जा सके तो विश्व ब्रह्मांड में समस्त शक्तियों का प्रवाह मानवीय सत्ता के भीतर उमड़ता-प्रकट होता, अनुभव किया जा सकता है। मानवीय अन्तःकरण सौरमण्डल का कार्य करने का पथ प्रशस्त करते रहने वाले आकाश की तरह ही असीम है और उसमें जो कुछ भरा पड़ा है उसे अंतरिक्ष आकाश से कही अधिक शक्तिशाली समझा जाना चाहिए। इतना सब होते हुए भी पता नहीं किस कारण हम अपनी करतल गति संपदा से अपरिचित बने हुए है। यदि इसी प्रकार अपने मूल ऊर्जा स्रोत से संपर्क स्थापित किया जा सके तो नाभिकीय महासागर की तरह चैतन्य ऊर्जा से जुड़कर व्यष्टि सत्ता से असंभव से असंभव भी संपन्न कर दिखाया जा सकता है। सूर्य सविता मानव का उपास्य या इष्ट है। उपास्य से एकाकार होना ही जीवात्मा का लक्ष्य है। कैसे ये संभव हो, यही सूर्य विज्ञान हमें बताता है।
श्रुति का अधिकार पूर्वक कथन है कि इस संसार , जिसमें हम सब रहते हैं, कि उत्पत्ति के पूर्व सर्वत्र अंधकार ही अंधकार व्याप्त था। “तमःआसीत्” इस वाक्य में भाव यही है कि सम्पूर्ण दिशाएं अवर्णात्मक तम से व्याप्त थी। किंतु पूर्व में उदित होकर अनन्त आकाश में अपनी सम्पूर्ण आभा के साथ विचरण करने वाले परम तेजस्वी भगवान सूर्य इस धरती व सृष्टि में जीवन प्रकाश व प्राण के कारण बने। छान्दोग्योपनिषद् में ऋषि कहता है-
“य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्यमयः पुरुषौ दुश्यते हिरण्यश्म श्रुर्हिरण्यकेश आप्रणरश्वार्त्सव एव सुवर्णः “ (1-6-6)
इस प्रकार इसी सर्वशक्तिमान परमात्मा हिरण्यगर्भ के परम उत्कर्ष के रूप में उसके दिव्य तेज के दिग्–दिगन्त व्यापी-अंधकारमयी निशा में आत्म प्रकाश के रूप में उदित होने की बात कही गयी है। तात्पर्य यह है कि इस दिव्य अध्यात्म प्रकाश के आविर्भाव के साथ ही सम्पूर्ण दिशाओं का अंधकार समाप्त हो गया व सारा संसार प्रकाशित आलोकित हो उठा। भारतीय संस्कृति आदि संस्कृति है-सबसे पुरातन संस्कृति है। अति प्राचीनकाल से लेकर अब तक किसी ने भी मानव जीवन के समस्त आयामों को इतना आकृष्ट-प्रभावित , चमत्कृत नहीं किया है जितना कि भगवान भानु भास्कर ने। इसी कारण “आदि देव मनस्तुभ्यं” कहकर सृष्टि के प्रारम्भ में मानव के विकास के कारण बने हमारे पूर्वज ऋषिगण इसी आदित्य की सूर्य के तेज की अभ्यर्थना-अभिवंदना करते दिखायी देते हैं। सूर्य वस्तुतः संस्कृति के विकास में एक महती भूमिका निभाते देखे जाते हैं। समय की कल्पना, दिन और रात का आना-जाना, मासों व ऋतुओं का क्रमिक विभाजन तथा चंद्रमा जो सूर्य का ही एक भाग है के क्षय व वृद्धि द्वारा कृष्ण व शुक्ल पक्षों में बँटी मास व्यवस्था जैसे व्यवहारिक पक्ष जो मानव जीवन को आदिकाल से निरंतर प्रभावित करते आये हैं, सूर्य की उपस्थिति के कारण ही संभव हो पाये हैं। मनुष्य की दैनन्दिन दिनचर्या का निमित्त कारण ही आदि काल से सूर्य बना। जिस जलते आग के गोले के पिण्ड के रूप में सर्वप्रथम मानव ने सूर्य भगवान को देखा उन्हें प्राण का, शक्ति का, पुँज व भगवत्सत्ता का स्वरूप माना। उनके उदित व अस्त होने के साथ ही उसकी सुव्यवस्थित जीवनचर्या बनी। इस प्रकार मानवी सभ्यता व संस्कृति के विकासक्रम में सूर्य भगवान को एक अति-महत्वपूर्ण भूमिका निभाते देखा जा सकता है।
हमारे ऋषि वैदिक काल के आरंभ से ही “भूमा वै सुखम्।” छान्दोग्य 0-7-23-1. 7/24/1) “भूमा तद अमृतम् “ की दृष्टि वाले रहे हैं। आर्ष ऋषियों की यह “भूमा “ वाली दृष्टि उन्हें ससीम से असीम की ओर बढ़ने तथा उससे तादात्म्य स्थापित करने की प्रेरणा देती रही है। इसी क्रम में एक तरफ जहाँ सृष्टि के नियामक रूप में उन्हें अनेक देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं, वहीं तीनों लोकों में अपने को समाहित करने व त्रैलोक्य के नियंता के साथ तादात्म्य स्थापित करने की उत्कट अभिलाषा भी उनमें जाग्रत हुई। ऋषियों के इस दृष्टि से किये गये प्रयास ही हमारी उपासना पद्धति के मूल आधार बने। इस उपासना क्रम में सूर्योपासना का देव-संस्कृति में एक विशिष्ट व अति महत्वपूर्ण स्थान है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि सौर-मण्डल में सूर्य, चंद्रादि नवग्रह, मरुतगण, सप्तर्षि च तैंतीस कोटि देवताओं का निवास बताया गया है। इन सब देवशक्तियों का प्रतिनिधित्व हमारे ऋषि, मनीषियों के अनुसार भानु भास्कर सूर्यनारायण ही आदि काल से करते आये है। इसलिए “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” कहकर ऋग्वेद का ऋषि शाकल संहिता 1-115-1 में यह कहता है कि “जंगम तथा स्थावर सभी प्राणियों की आत्मा भगवान सूर्य ही हैं। “
गीता में जहाँ भगवान श्रीकृष्ण विभूति वर्णन के प्रसंग में “ज्योतिषाँ रविरंशुमान्” (10-21) कह कर सूर्य देव की महत्ता प्रतिपादित करते हैं, वहाँ सुप्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य की तेजःशक्ति की उपासना से मानव मात्र के सन्मार्ग पर चलने की बात कहता है तथा इसे ब्रह्मविद्या बताता है। (शुक्लयुग 3-35-22-9 एवं ऋग्वेद संहिता 3-62-10) । “आकृष्णेन रजसा” के माध्यम से ऋग्वेद शाकल संहिता 1-35-2 में वेदों में सूर्योपासना का प्रथम संकेत मिलता है। कृष्ण यजुर्वेद में तद्भास्कराय विद्महे प्रभाकराय धीमहि। तन्नोः भानु प्रचोदयात् (2-9-9) में सूर्योपासना की महत्ता बतायी गयी है। सूर्य की हमारी संस्कृति में कितनी ऊँची स्थापना की गयी है यह आदित्यो ब्रह्म ( छांदोग्योपनिषद् 3-19-1)”ब्रह्म ही प्रतीक रूप में आदित्य हैं” तथा असौ यः स आदित्यः ( शत. ब्राह्मण 50-5-1-4)। इन उद्धरणों का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है।
ऋग्वेद के एक मंत्र में ऋषि स्तुति करते हैं कि “हे सूर्यदेव हम सभी उसी प्रकार परस्पर मिलते रहें व कल्याण पथ अनुसरण करते रहें जैसे आप एवं चंद्रदेव हमें दिग्दर्शित करते हैं।” (स्वास्ति पंथामनु चरेम् सूर्याचंद्रमसाविव-ऋ.5-51-15) अर्थात् जैसे सूर्य व चंद्रमा लाखों वर्षों से नियमित रूप से बिना किसी आलस्य प्रमाद के काम करते आए हैं, हम सभी अपने विलास की भावना (चंद्रमा प्रतीक रूप में ) को विवेक भाव (सूर्य प्रतीक रूप में) के अधीन मर्यादित रखें। जब आवश्यकता पड़े तो अनीति से लड़ने हेतु सूर्य जैसे उग्र-प्रखर भी बनें तथा उत्तेजना की स्थिति में चंद्र जैसे शाँत भी बने। यही नहीं “हे सविता देव ! आप सब प्रकार के कष्टों पापों को दूर करें और जो कल्याण कारक हो, वही हमारे लिए करें, उत्पन्न करें व हमें दें-” ‘विश्वानि देव सवितार्दुरितानिपरासुव। यद् भद्रं तन्न आसुव ऋग. 5-82-5) इस मंत्र में श्रेष्ठ विचारों को सब ओर से सूर्य के माध्यम से आमंत्रित किया गया है ताकि मानव चिंतन सदैव सही विवेक युक्त बना रहे। उपरोक्त सभी उद्धरण यह बताते है कि सविता देवता की स्तुति को ऋषियों ने क्यों इतना महत्वपूर्ण माना तथा दैनन्दिन जीवन में श्रेष्ठतम स्थान दिया। “सविता सर्वस्य प्रसविता” सविता सबके उत्पादक जन्मदाता हैं कहकर यह प्रतिपादित किया है। सूर्य देवता ही समस्त प्राणी जगत को जीवन व प्राण देने वाले हैं।
देव संस्कृति के प्रणेता महामानवों ने अपनी दिव्य दृष्टि से अंतःस्फुरणाओं के रूप में जो भी कथन कहे वे श्रुति बन गये तथा जो भी प्रतिपादन अंतर्जगत में स्वानुभूति प्रयोग संपन्न करके किये वे जीवन व्यवहार के सूत्र बन गये। अग्नि प्रज्ज्वलन, जो मानव जाति का प्रथम अनुसंधान था, का प्रेरणा स्रोत भी सूर्य ही है। वहाँ से लेकर सूर्य रश्मियों से चलने वाले रथों के अनुसंधान तथा सूर्य द्वारा आरोग्य प्राप्ति के प्रयोगों से लेकर सूर्य किरणों के संवेग से चलने वाले कणों की खोज तक तथा मूलबलों के एकीकरण के प्रयोगों तक सभी में सूर्य की प्रधानतम भूमिका रही है। ऋषियों ने ही सर्वप्रथम जाना व कहा है कि सूर्य से ही साँसारिक सृष्टिचक्र प्रवर्तित व संचालित है। सूर्य से ही प्राणी मात्र की उत्पत्ति होती है। सूर्य के कारण ही कृषि कार्य संपन्न हो पाता है। सूर्य से ही वृक्ष, फूल, फल वनस्पति औषधि और अन्न की उत्पत्ति संभव हो पाती है। सूर्य न हों तो साँसारिक सृष्टिचक्र चल ही नहीं सकता, इस प्रकार इस संसार चक्र के मूल में सूर्य ही है, यह हमें ऋषियों ने बताया व इसी कारण हम सूर्य देव को आदि देव मानकर अपना साँस्कृतिक विकास उसी क्रम से करते आए हैं।
पृथ्वी के व्यास में लगभग 108 गुना बड़े प्रायः आठ लाख चौसठ हजार मील के व्यास वाले प्रकाश मंडल की आभा लिए सूर्य को स्वयं संभवतः यह अनुमान न होगा कि ऊष्मा के पुँज उस दिनमान ने चौदह करोड़ से भी अधिक किलोमीटर दूरी पर स्थित पृथ्वी पर सभ्यता के विकास की प्रक्रिया में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। ऋतु विभाजन व दिन-रात की सीमा निर्माण से लेकर वर्षा, अति वर्षा, सूखा यहाँ तक कि जीवन के सभी उपक्रमों में सूर्य की ही प्रमुख भूमिका है। पृथ्वी पर जल भी सूर्य की ऊष्मा के कारण ही है तथा वृष्टि का भी जल सूर्य के कारण ही है। सूर्य की ऊष्मा ही पृथ्वी पर प्राप्त अग्नि तथा विद्युत का मूल कारण है। इस प्रकार सूर्य मानव के उद्भव से लेकर प्राणी मात्र के अस्तित्व का मूल कारण है, यह तथ्य सुनिश्चित है। इसी कारण सूर्योपासना अनादिकाल से न केवल भारत वर्ष में, जहाँ वैदिक संस्कृति का विकास सर्वप्रथम हुआ, बल्कि समस्त विश्व के विभिन्न भागों में भक्ति व श्रद्धापूर्वक की जाती रही है। विश्व संस्कृति ही कभी भारतीय संस्कृति ही थी, यह तथ्य सूर्य मंदिर विश्वभर में स्थान-स्थान पर पाये जाने पर सुनिश्चित लगने लगता है। अमेरिका के रैड इंडियनों द्वारा आबाद क्षेत्रों में सूर्य मंदिर प्रचुर संख्या में पाये गये है। कालाक्रम में ऋषि चेतना से संपर्क टूट जाने पर सभ्यता के विकास क्रम में वे संभवतः आगे बढ़ नहीं पाए किंतु उपासना उनके दैनंदिन जीवन का अंग बन गयी। कई प्रकार की सूर्य गाथाएँ हवाई द्वीप, जापान, दक्षिण अमेरिका तथा कैरेबियन द्वीपों में प्रचलित हैं जो बताती है कि सूर्य सबका उपास्य रहा है। चीन के विद्वानों ने तो सूर्य को आधार मानकर अपना समग्र खगोलशास्त्र तथा ज्योतिर्विज्ञान स्थापित किया है। वहाँ सूर्य को “याँग“ तथा चंद्रमा को “यिन” मानते हैं तथा इनकी प्रतिनिधि धाराएँ इड़ा-पिंगला के रूप में शरीर में संव्याप्त मानते हैं। जापान सूर्यपूजक राष्ट्र है तथा दिनमान का आगमन सूर्य प्रथम उसी देश से हुआ माना जाता है। बौद्ध जातकों में सूर्य का प्रसंग वाहन के रूप में स्थान-स्थान पर आया है तथा अजवीथि, नागवीथि और गोवीथि नाम के मार्गों के आधार पर तीन गतियाँ उसकी मानी गयी है।
फारसी अरबी में सूर्य के आफताब कहा गया है। इस्लाम में “सूर्य” को “इल्म अहकाम अननजूम” का केन्द्र माना गया है अर्थात् सूर्य इच्छाशक्ति को बढ़ाने वाली चैतन्य सत्ता के प्रतीक है। ईसाई धर्म में न्यूटेस्टामेंट में सूर्य के धार्मिक महत्व का विशद वर्णन है। सेण्ट पाल ने इसीलिए रविवार का दिन पवित्र घोषित कर इस दिन प्रभु की आराधना, दान दिये जाने आदि का अत्यंत फलदायी पुण्य माना है। इसी कारण सारे विश्व के ईसाई रविवार को नियमित रूप से पूजाघरों में जाकर सामूहिक प्रार्थना करते है। ग्रीक और रोमन विद्वानों ने भी इसी दिन को पूजा का दिन स्वीकार किया है।
उपरोक्त संदर्भ तो विश्वभर के धर्म-मत-संप्रदायों व अन्यान्य सभ्यताओं के सूर्य के संबंध में दिये गये है। किंतु भारतीय संस्कृत तो विशुद्धतः वैदिक संस्कृति को सूर्य संस्कृति के रूप में मानती व अपना आदि देव सूर्यदेव को बताती चली आयी है। हमारी संस्कृति के अनुसार सूर्य ही ब्रह्म है(उत्पत्तिकर्त्ता), सूर्य ही विष्णु है (पालनकर्ता) तथा सूर्य ही महाकाल है अर्थात् काल के समय का निर्धारणकर्ता। महाकाल को मृत्यु का देवता माना जाता है। सूर्य की ऊर्जा अर्थात् प्राणाग्नि जब तक शरीर में रहती है , तब तक प्राणी जीवित है। इसके निकल जाने पर वह नष्ट हो जाती है। यही नहीं सूर्य को गणपति भी कहा गया है। ग्रहों में सबसे प्रमुख होने के कारण सूर्य गणपति है तथा सभी ग्रह इसकी परिक्रमा प्रमुख होने के कारण ही करते हैं। सूर्य को इंद्र अर्थात् देवताओं का राजा भी कहा गया है। हमारे कण्ठ अर्थात् स्वर इसमें ‘इ’ प्रत्यय लगाकर रवि स्वर उत्पन्न करने वाला या देने वाला यह सूर्य का नाम बनता है। उच्चारण प्रदाता होने के कारण सूर्य को उद्गीथ भी कहते हैं। महाभारतकार ने पाण्डव श्रेष्ठ युधिष्ठिर के मुख से सूर्य की स्तुति इस प्रकार करवायी है-
“त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः। त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम्॥”
“हे सूर्य! आप इंद्र, रुद्र, विष्णु, प्रजापति, अग्नि, मन प्रभु और ब्रह्म है।” वस्तुतः देव संस्कृति सूर्योपासना के माध्यम से-माहात्म्य के प्रसंगों के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिक जीवन का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करती है। “सत्यं तातान् सूर्यः”(ऋग्वेद 1-105-12) आध्यात्मिक जीवन शैली का प्रतीक वाक्य है। वैदिककाल से ही सूर्य को आचार्य रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। वैदिक युग में ही उपनयन में अपनी और विद्यार्थी की अंजलि जल से भरकर आचार्य के मंत्र पढ़ने की विधि रही है। (श्रेष्ठ सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि-ऋग्वेद 5-82-1) एवं आचार्य शिष्य को आश्वासन देते रहे हैं कि जिस प्रकार सूर्य प्रकाश देकर जगत् का अंधकार निरंतर दूर करते है, वैसे ही आचार्य शिष्य का अज्ञानांधकार दूर करते रहेंगे।
मानव व सूर्य के आदिकाल से अब तक गहन भावनात्मक संबंध रहे है। वह मात्र जलता आग का गोला नहीं है अपितु मानवमात्र के लिए प्राणदाता-जीवन संरक्षक व उसके साँस्कृतिक विकास का परिचायक भी है। सूर्य का प्रत्येक गुण मानव के क्रमिक आध्यात्मिक उत्थान का द्योतक है। यहाँ तक कि हमारी चिरपुरातन देव संस्कृति के जो भी महत्वपूर्ण प्रतिष्ठित तत्व हैं, उन सबके मूल में सूर्य देवता का ही प्रधान भूमिका मानी जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।
संभवतः यही कारण रहा है कि यजुर्वेद में “सूर्यो ज्योतिज्योतिः सूर्यः स्वाहा” (3-9) से लेकर प्रश्नोपनिषद् (1-7) में “प्राणः प्रजानामुत्दयत्येष सूर्यः” के माध्यम से सूर्य की महिमा व स्तुति का गायन हुआ है। सूर्य मार्तण्ड भी कहलाते है क्योंकि ये मृत अण्ड (ब्रह्मांड) में से होकर सारे जगत को अपनी ऊष्मा तथा प्रकाश से जीवन दान देते है। ऐसे आदि देव की जितनी महिमा गायी जाय उतनी कम है।
देवः किं बान्धवः स्यात्प्रियसुहृदधवाँऽऽचार्य ओहोस्विदयों । रक्षावर्क्षुन दीपो गुरुरुत-जनको जीवितं बीजमोक्षः ॥
एवं निर्णीयते यः क इव न जगताँ सर्वथा सर्वदाऽ सौ । सर्वाकारोपकारी दिशतु दशशतमीषुरभ्यर्थितं नः ॥
जिन भगवान सूर्यनारायण के विषय में यह निर्णय हो नहीं पाया कि वे वास्तव में देवता हैं या बाँधव, प्रिय मित्र है, आचार्य हैं अथवा अर्च्य स्वामी। वे क्या हैं, रक्षा नेत्र है? अथवा विश्व प्रकाशक दीपक। धर्माचार्य गुरु हैं अथवा पालनकर्ता पिता। प्राण हैं या जगत के प्रमुख आदि कारण बल हैं अथवा और कुछ। किंतु इतना निश्चय है कि सभी कालों, सभी देशों और दिशाओं में वे कल्याण करने वाले हैं। वे सहस्ररश्मि (भगवान सूर्य) हम सबका मंगल मनोरथ पूर्ण करें।
शरीर के किसी भाग पर आघात पहुँचता है तो उसकी प्रतिक्रिया से शरीर का रोम-रोम काँप उठता है। मन मस्तिष्क भी उद्विग्न और बेचैन हो उठते है। समूचा ध्यान शारीरिक पीड़ा पर केन्द्रित हो जाता है। मनःसंस्थान असंतुलित हो तो शरीर भी स्वस्थ और निरोग नहीं रह पाता। शरीर में प्रत्येक अवयव मनःसंस्थान एक दूसरे की स्थिति से प्रभावित होते हैं। यह शरीर की चैतन्यता एवं एकता का प्रमाण है। दृश्य और अदृश्य प्रकृति समूचा सौर-मण्डल भी इस तरह एक दूसरे से गहरे भावनात्मक आकर्षण से जुड़ा हुआ है। इसके एक सिरे पर जो कुछ भी घटित होता है तो अन्यान्य स्थानों पर उसकी प्रतिक्रिया परिलक्षित हुए बिना नहीं रहती।
इस तथ्य को प्रतिपादित करने एवं रहस्योद्घाटन करने का जो विज्ञान भारत में प्राचीन काल से प्रचलित था उसे ज्योतिष विज्ञान के नाम से जाना जाता है। इसका लक्ष्य था सौर मण्डल के सदस्यों के पारस्परिक संबंधों की वैज्ञानिक विवेचना करना तथा एक दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराना। फलतः इस विद्या के सहारे पृथ्वी से इतर ग्रह नक्षत्रों के अनुदानों से लाभ उठा सकना एवं दुष्प्रभावों से बचाव कर पाना सुलभ था जो आज के विकसित विज्ञान द्वारा ही संभव नहीं है। कालाँतर में यह विज्ञान विलुप्त होता गया और उसका स्थान मूढ़मान्यताओं एवं भ्राँतियों ने ले लिया। जिन्हें देखकर विज्ञजनों द्वारा इस विद्या की उपेक्षा हुई। इसके बावजूद भी विज्ञान ने जब से प्रौढ़ता की ओर कदम रखा है उसका ध्यान अंतरिक्ष की खोजबीन की ओर आकर्षित हुआ है। साथ ही ग्रह-नक्षत्रों, सौर-मण्डल की गतिविधियों, आपसी संबंधों एवं परस्पर एक दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों को जानने के लिए छुटपुट प्रयास भी चल रहे हैं। प्रकारान्तर से भौतिक विज्ञान अब उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँच रहा है जिस पर सदियों पूर्व तत्ववेत्ता ऋषि जो ज्योतिर्विज्ञान के मर्मज्ञ भी थे पहुँच चुके थे।
ज्योतिष विज्ञान के आचार्यों ने सौर-मण्डल के सदस्यों को देव शक्तियों के रूप में प्रतिष्ठापित किया था। नौ ग्रहों की नौ देवशक्तियों के रूप में प्रतिष्ठापना की गई है। ज्योतिर्विज्ञान की यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि सौर मण्डल की अधिपति सूर्य मात्र अग्नि का धधकता पिण्ड नहीं है अपितु जीवन प्राण और सक्रिय अग्नि का पुँज हैं, जो पल-प्रतिपल अपने सौर-मण्डल के सदस्यों को अपनी गतिविधियों से प्रभावित किया करता है। सूर्य के साथ ही मंगल, बृहस्पति, बुध आदि भी पृथ्वी के वातावरण को प्रभावित करते हैं।
इस तथ्य को विश्व के प्रसिद्ध भौतिकविद् भी स्वीकार करने लगे हैं कि सौर मण्डल की गतिविधियाँ पृथ्वी के वातावरण एवं जैविक परिस्थितियों के प्रभाव डालती है। यूरोस्लाविया के नाभिकीय भौतिकविद् प्रो. स्टीनवेन डेडीजर जैसे विद्वानों का कहना है कि विज्ञान को अपनी अंतरिक्षीय खोज की सफलता के लिए प्राचीन ज्योतिर्विज्ञान का अवलंबन लेना होगा। प्राकृतिक घटनाओं की अभी भी कितनी ही गुत्थियाँ ऐसी हैं जिसको सुलझा पाने में आज का विकसित विज्ञान भी असमर्थ है। आधुनिक विज्ञान अंतरिक्ष एवं सबन्यूक्लियर क्षेत्र में अपनी शानदार सफलता के बावजूद भी ब्रह्मांड संबंधी घटनाओं की व्याख्या कर पाने में अपनी अक्षमता व्यक्त कर रहा है क्योंकि इसका क्षेत्र सीमित है। इसके विपरीत ज्योतिष विज्ञान का सूर्य संबंधी ज्ञान-ब्रह्मांड की सूक्ष्म गतिविधियाँ और सूर्य के प्रभावों की जानकारी अंतरिक्षीय रहस्यों का उद्घाटन करने में पूर्णतया सक्षम है।
भौतिक विज्ञान के सिद्धाँतानुसार हर पदार्थ का कण इस ब्रह्मांड में एक-दूसरे के सापेक्ष गतिशील है। वे अपना स्थान भी परिवर्तित करते रहते है। फलतः जिस पर्यावरण में वे गतिशील रहते हैं वह बदलता रहता है और एक अविच्छिन्न ब्रह्मांडीय श्रृंखला में बँधे होने के कारण कणों का संदोह विशेष प्रभाव उत्पन्न करता है। जो अन्यान्य ग्रहों तथा पृथ्वी, चर, अचर पदार्थों एवं खगोलीय पिण्डों को प्रभावित करता है। इस तथ्य से परिचित होते हुए भी विज्ञान ग्रह-नक्षत्रों की गति स्थिति और प्रभावों की स्पष्ट जानकारी देने में असमर्थ है। उपरोक्त टिप्पणी देते हुए भौतिक विज्ञानी स्टीवेन डेडीजर का कहना है कि समग्र जानकारियों के लिए ज्योतिर्विज्ञान के विलुप्त ज्ञान को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
प्रख्यात आस्ट्रियाई वैज्ञानिक ‘एरनेष्ट मैक’ का मत है कि ब्रह्मांड के अनन्त कण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं तथा उनमें परस्पर बड़ा घना संबंध है। सौर लपटें जो कि ग्रहों की निकटता एवं चंद्रमा की गति से किसी न किसी प्रकार से संबंधित है। पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के व्यतिरेक उत्पन्न करती हैं। ग्रही योग पृथ्वी एवं जैविकीय चुम्बकत्व पर अपना प्रभाव डालते हैं। ग्रहों के असंतुलन से उत्पन्न होने वाली चुम्बकीय आँधी प्रकृति प्रकोपों एवं पृथ्वी के जीवधारियों में अनेकों प्रकार के मानसिक एवं नर्वस-सिस्टम के रोग उत्पन्न करती है। भू चुम्बकत्व में होने वाले हेर-फेर से मानवीय आचरण एवं स्वभाव भी अछूता नहीं रहता है।
रूस के विज्ञानवेत्ता चीनेवस्की ने इस क्षेत्र में लम्बे समय तक खोजबीन करने के उपराँत महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं। उनका कहना है सौर-मण्डल की हलचलों से पृथ्वी के वातावरण एवं घटनाक्रमों का घना संबंध है। हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य में आणविक विस्फोट होता है। इन वर्षों में पृथ्वी पर युद्ध और क्रान्तियाँ जन्म लेती है। प्रकृति-प्रकोप एवं महामारियाँ बढ़ती हैं।
जियोजार जी गिआरडी नामक वैज्ञानिक ने ज्योतिर्विज्ञान से प्रेरणा लेकर विज्ञान की नवीन शाखा को जन्म दिया-ब्रह्मांड रसायन शास्त्र (कॉस्मोबायोलॉजी) गिआरडी का कहना है कि समूचा ब्रह्मांड एक शरीर है इसका कोई भी घटक अलग नहीं वरन् संयुक्त रूप से एकात्म है। इसलिए कोई भी ग्रह कितना भी दूर क्यों न हो, पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करते अवश्य है।
प्रो. ब्राउन का मत है कि पृथ्वी सौरमण्डल का ही एक सदस्य है और चंद्रमा उसका ही एक उपग्रह। वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी और चंद्र की उत्पत्ति सूर्य से हुई है। न केवल चंद्र और सूर्य वरन् मंगल, बृहस्पति, शुक्र और शनि की गतियाँ भी पृथ्वी को प्रभावित करती है। उन्होंने अन्तर्ग्रही प्रभावों को समानुभूति नाम दिया है।
तीसरा अन्तर्राष्ट्रीय विषुवतीय वायु गोष्ठी विज्ञान गोष्ठी के उद्घाटन के अवसर पर अहमदाबाद भौतिक अनुसंधानशाला के दो वैज्ञानिकों प्रो. के. आर. रामनाथन एवं डॉ. एस. अनंतकृष्णन ने यह घोषणा की है कि पृथ्वी सौर मण्डल की अभिन्न घटक है। आकाशीय पिण्डों के स्पंदन धरती को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। अपनी एक खोज में इन वैज्ञानिकों ने पाया कि वायु मण्डल के डी क्षेत्र में शक्तिशाली एक्स किरणों के स्रोत स्कोर्पियो 11 के गुजरने से वनस्पति एवं जीव-जगत की हलचलें बढ़ जाती हैं तथा उनका हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
परमाणु ऊर्जा आयोग के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं विश्व के जाने-माने भौतिक विज्ञानी डॉ. साराभाई विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों की एक गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहते है कि सूर्य के अतिरिक्त भी अन्य आकाशीय पिण्डों का प्रेक्षीय प्रभाव धरती पर आता है यदि ज्योतिर्विज्ञान के सूत्रों को ढूँढ़ा जा सके और अन्तरिक्षीय ज्ञान में प्रयुक्त किया जा सके तो अनेकों महत्वपूर्ण जानकारियाँ हाथ लग सकती है।
रूसी वैज्ञानिक ब्लादीमोर देस्यातोय ने इस संबंध में व्यापक शोध कार्य किया है। उनका कहना है कि पृथ्वी पर समय-समय पर आने वाले चुम्बकीय तूफानों से धरती के निवासियों में स्नायविक एवं मनोरोगों की बहुलता देखी जाती है। धरती पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता या फ्रीक्वेंसी का बदलना आकाशीय पिण्डों के ऊर्जा प्रवाह के परिणाम हैं। अपनी आरंभिक खोजों में ब्लादीमोर ने यह पाया कि जब सूर्य पर एक विशेष प्रकार का ज्वाला प्रकोप (फ्लेयर) फूटते हैं तो धरती पर प्रचण्ड चुम्बकीय तूफान आते हैं। जिनसे प्रभावित तो सभी होते हैं पर कमजोर मनःस्थिति वाले व्यक्तियों पर उनकी प्रतिक्रिया अत्यधिक दिखायी पड़ती है। आत्महत्याएँ, हत्याएँ एवं असंतुलन के फलस्वरूप सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि मस्तिष्कीय क्रिया-क्षमता का मूलभूत स्रोत अल्फा एनर्जी धरती के चुम्बकीय क्षेत्र से जुड़ा हुआ है और भू चुम्बकत्व का सीधा संबंध आकाशीय पिंडों से है। इसलिए मानवी जीवन अंतरिक्षीय घटनाक्रमों एवं शक्तियों से विलक्षण रूप से संबंधित है। अतएव अंतरिक्ष में पैदा होने वाली हर हलचल पृथ्वी, मानवी प्रकृति मन, बुद्धि चेतना को प्रभावित करती है।
खगोल शास्त्री पास्कल के शोध निष्कर्षों के अनुसार सूर्य और चंद्रमा के द्वारा होने वाले सशक्त खिंचाव न केवल समुद्रों-सागरों में ज्वार भाटे उत्पन्न करते है बल्कि जीवधारियों पर भी अपना प्रभाव छोड़ते है। पास्कल के अनुसार समस्त जीवधारी कम्पायमान है फिर विभिन्न ग्रहों से उत्सर्जित होने वाली ऊर्जा तरंगों में यह तथ्य अगले दिनों सप्रमाण पुष्ट होगा कि पृथ्वी पर विद्यमान जीवन का अंतरिक्ष के ग्रह-नक्षत्रों से घना संबंध है और अविज्ञात होते हुए भी सूक्ष्म आदान-प्रदान का क्रम चलता रहता है।
प्रौढ़ता की ओर बढ़ रहे आधुनिक विज्ञान के कदम शनैः-शनैः उन्हीं निष्कर्षों की ओर गतिशील है जिन्हें सहस्राब्दियों पूर्व भारतीय तत्ववेत्ता ज्योतिर्विदों ने पाया था। समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर है। सूर्य प्रभावित करता है, जिसका प्रत्येक स्पंदन हर घटक को प्रभावित करता है। जिसमें पृथ्वी और संबंधित वातावरण वनस्पति एवं जीवधारी भी सम्मिलित है। प्राचीन काल में ज्योतिर्विज्ञान इसी दिशा में अनुसंधान करने प्रमाण जुटाने और अंतर्ग्रही तथ्यों की खोज बीन करने में सचेष्ट था, जिसकी अनेकानेक उपलब्धियों से समय-समय पर मानवजाति लाभान्वित होती रहती थी।
विज्ञान का ध्यान भी इस ओर आकृष्ट हुआ है और अंतर्ग्रही टोह लेने का सिलसिला शुरू हुआ है। यह शुभ लक्षण है। फिर भी ज्योतिर्विज्ञान के बिना अंतरिक्षीय खोज-बीन करने में विज्ञान उतना सक्षम नहीं है। इस दिशा में प्राचीन भारतीय ज्ञान मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है। आर्य भट्ट का ज्योतिष सिद्धाँत और उस पर नारदेव ब्रह्मगुप्त के संशोधन, परिवर्धन, भास्कर स्वामी का महाभास्करीय आदि दुर्लभ और अमूल्य ग्रंथ अनेकानेक रहस्यों एवं निष्कर्षों से भरे पड़े हैं। अपने पंच सिद्धाँतिक में वाराह मिहिर ने पॉलिश, रोमक, वाशिष्ठ सौर और पितामह नामक पाँच ज्योतिर्सिद्धाँतों का वर्णन किया है जो ज्योतिर्विज्ञान पर विस्तृत प्रकाश डालते हैं।
हो ज्योतिष विद्या का कलेवर भर है। इस कलेवर में समाहित वास्तविक तत्व ऊर्जा प्रवाहों का दैवीय विज्ञान है। जिसे समझकर न सिर्फ इनसे स्वयं को ऊर्जस्वी बनाया जा सकता है बल्कि वर्तमान और भविष्य को अपेक्षित दिशा में गढ़ा और ढाला जा सकता है।
हो ज्योतिष विद्या का कलेवर भर है। इस कलेवर में समाहित वास्तविक तत्व ऊर्जा प्रवाहों का दैवीय विज्ञान है। जिसे समझकर न सिर्फ इनसे स्वयं को ऊर्जस्वी बनाया जा सकता है बल्कि वर्तमान और भविष्य को अपेक्षित दिशा में गढ़ा और ढाला जा सकता है।
पुषन्नेकर्षे यम सूर्यप्राजापत्यव्यूह रश्मीन् समूह । तेजो यत्ते रुपं कल्याण तमं सत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः योऽहमस्मि ॥16॥ -इशावास्य-उपनिषद्
हे जगत का पौषड़ करने वाले, एकाकी गमन करने वाले संसार का नियमन करने वाले प्रजापति नंदन सूर्य ! आप अपनी किरणों के समेट लें क्योंकि जो आपका कल्याणतम रूप है उसे मैं देख रहा हूँ। यह जो आदित्य मण्डलस्थ पुरुष है वह मैं हूँ।
हे जगत का पौषड़ करने वाले, एकाकी गमन करने वाले संसार का नियमन करने वाले प्रजापति नंदन सूर्य ! आप अपनी किरणों के समेट लें क्योंकि जो आपका कल्याणतम रूप है उसे मैं देख रहा हूँ। यह जो आदित्य मण्डलस्थ पुरुष है वह मैं हूँ।
सविता-अमृत तत्व का स्रोत है। इसकी उपासना साधक के जीवन में प्राण भरती-मन में उल्लास तरंगित करती और आत्मा को उसके अमृत स्वरूप का बोध करा देती है। इसकी ओर से साधक का ध्यान हट न जाय ऐसी सतर्कता रखते हुए अध्यात्म विद्या के अन्वेषक मनीषियों ने जगह-जगह पर उसके अर्थ, गुण, कर्म एवं स्वरूप को प्रतिपादित किया है।
छान्दोग्य-उपनिषद् में वर्णित मधुविद्या इस रहस्यमयी तत्व का सर्वांगीण विवेचन है। स्थान-स्थान पर बिखरी उपासना की रहस्य रश्मियाँ एकत्रित होकर यहाँ प्रकाशित है। इस उपनिषद् के प्रथम खण्ड के प्रथम बारह श्लोकों में मधुविद्या एवं सविता साधना को मनोरम ढंग से समझाया गया है। इसके अनुसार आदित्य देवताओं का मधु है-
ॐ असौ वा आदित्यो देव मधु तस्यद्यौरेव । तिरश्चीनवँ शोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्रः ॥ (छा.उ.3-1-1)
अर्थात् “ ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओं का मधु है। द्युलोक ही वह तिरछा बाँस है। जिस पर यह मधु लटका है। अंतरिक्ष छत्ता है और किरणें मधुमक्खियों के बच्चे के समान है।”
इस मंत्र में जहाँ तत्वदर्शी ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत परम तत्व की अनूठी अभिव्यंजना की गई है वहीं उनकी वैज्ञानिक जानकारी का भी परिचय मिलता है। आदित्य का आधिभौतिक रूप परमाणु है। आधुनिक विज्ञान पदार्थ विद्या मात्र होने के कारण मात्र पदार्थ तत्वों का विश्लेषण करता है। इसलिए इसकी पदावली मात्र भौतिक द्रव्य के लिए निर्दिष्ट होती है। आमतौर पर आधुनिक परिवेश में पले और पढ़े लोग इसे ही एकमात्र सही वैज्ञानिक विधि मान बैठते हैं, क्योंकि वे मस्तिष्कीय क्षमताएँ जो कि चिंतन प्रणालियों का निर्धारण करती हैं, वे अभ्यस्त क्रम का ही विचार करने में सुविधा का अनुभव करती हैं। यही कारण है कि मनुष्य अपने प्रिय एवं परिचित विषय को ही बार-बार सुनना-देखना एवं अनुभव करना पसंद करता है और थोड़े हेर-फेर से उसी अनुभव को दुहराने को वह नयापन-नवीनता आदि कहता समझता रहता है। उस प्रचलित ढर्रे से भिन्न सोचने करने वाले को सामान्य मनुष्य न समझ पाते और न सह पाते हैं। वे उसे अप्रामाणिक , अशास्त्रीय, अवैज्ञानिक आदि कहने लगते है। बाद में कालक्रम में जब वह नया प्रतिपादन उनके लिए जाना-पहचाना हो जाता है तब वे उसे तो स्वीकार कर लेते हैं किंतु अगले नये प्रतिपादन, नये अन्वेषण के प्रति पुनः वैसी ही प्रतिक्रिया करते हैं।
यह सब यहाँ इसलिए स्मरण करना आवश्यक लगा क्योंकि इन दिनों जो वैज्ञानिक पदावली चली है उसमें सिर्फ पदार्थ तत्व का निर्देशन रहने से लोग उसे ही एक मात्र वैज्ञानिक अभिव्यक्ति मानने लगे है। किंतु प्राचीन भारतीय चिंतक वैज्ञानिकों की अभिव्यक्ति प्रणाली भिन्न थी। वे मात्र पदार्थ विद्या के जानकार नहीं होते थे अपितु देवतत्व तथा आत्मतत्व के भी मर्मज्ञ होते थे। अपनी हर समग्रता के कारण उन्होंने अभिव्यक्ति की ऐसी प्रणाली का आविष्कार किया था जिसमें एक ही पदावली एक साथ आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक तीनों ही अभिप्रायों-अर्थों को अभिव्यक्ति करती थी। ऐसा करना जहाँ आज की अभिव्यक्ति शैली से बहुत अधिक जटिल-कठिन कार्य था, वहीं सामान्य जन के लिए वह आधुनिक शैली की तुलना में अधिक उपयोगी एवं लाभकारी था। उनका एक साथ ही तीनों स्तरों पर परीक्षण होता चलता था। स्पष्टतया इस अभिव्यक्ति प्रणाली के लिए अनुपम मेधा की आवश्यकता है, जो ऋतम्भरा प्रज्ञायुक्त ऋषियों में ही संभव है।
उपरोक्त मंत्र भी उसी महान भारतीय शास्त्रीय शैली में सविता तत्व का विवेचन है। आदित्य का आधिभौतिक रूप है परमाणु, आधिदैविक रूप है ग्यारह प्रमुख देवगणों में से एक आदित्य देव तथा आध्यात्मिक रूप है चेतना-आदित्य, सर्वव्यापी सविता ब्रह्म। यत्पिण्डे-तत ग्रह्मण्डे की अद्भुत शैली में ही सृष्टि संरचना होने के कारण ही ऐसा प्रतिपादन संभव हो सका है क्योंकि जो अणु में है वही विराट रूप में विभु में है।
यहाँ पर मंत्र में आदित्य का जो वर्णन है, वह परमाणु पर भी लागू होता है। तिरछे बाँस की तरह का द्युलोक परमाणु में इलेक्ट्रान की भ्रमण कक्षा वाला बाह्य स्तर है। आर्बिटल्स से युक्त परमाणु-कलेवर ही मधु का छत्ता है। परमाणु के इन अन्तस्थ कोष्ठकों में जो फोटान कण होते हैं वे ही मधुमक्खियों के बच्चे रूपी मरीचि है। भौतिक सूर्य पर भी यही विवरण लागू होता है, क्योंकि वह ऐसे ही परमाणुओं की एक विशाल, विराट “मास” ही तो है। फोटान में विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा भरी रहती है और वे सूर्य किरणों की तरंगों से समाहित रहते हैं।
फोटान प्रकाश कण हैं, यह अब सर्वविदित है। मरीचि सूर्य की रश्मियों का ही नाम है। सूर्य का भी एक नाम मरीचि या मारीचि है। यहाँ अभिव्यंज्जित दृश्य यानि प्रकाश विकिरण ऊर्जाओं के स्तर पर सक्रिय चेतना शक्तियाँ है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह आदित्य सर्वव्यापी सविता ब्रह्म है। वह देवताओं का मधु है। चेतन देव सत्ताओं की अमरता और मधुमयता का उद्गम स्रोत सविता ही है। “सविता वा देवानाँ प्रसविता” शास्त्रीय कथन है। सविता ही देवों का प्रसविता है। उसी से मधु रस ग्रहण कर देव सत्ताएँ बलवान बनती हैं। यह मधु संपूर्ण अंतरिक्ष में संव्याप्त है। अंतरिक्ष या आकाश तत्व, ब्रह्मांडव्यापी अमूर्त मौलिक तत्व है। उसमें जो चेतना का मधु भरा है, वही आदित्य-सा सविता है। देव ऊर्जाएँ उसी से शक्ति या प्राण-रस , मधु -रस ग्रहण करती रहती है।
उपनिषद्कार में इससे आगे सूर्य से चारों ओर विकीर्ण होने वाली रश्मियों को मधु नाड़ियाँ कहा है। इन मधु नाड़ियों से भिन्न-भिन्न दिशाओं में प्रवाहित मधु की चर्चा की गयी है। इस संबंध में जहाँ तक आधुनिक भौतिकी का प्रश्न है, वह सृष्टि के मूल कणों की खोज के क्रम में इस तथ्य तक तो पहुँच चुकी है कि परमाणु नाभिक के परितः ऊर्जा स्तरों में इलेक्ट्रान का परिभ्रमण करते रहते हैं। यह परिभ्रमण गति आवर्तक होती है। किंतु इस गति को दिशा और उसके सापेक्ष वेग का निर्धारण आधुनिक भौतिकी के द्वारा अभी संभव नहीं हो सका है। कारण यह है कि इलेक्ट्रान की ठीक-ठीक स्थिति एवं उसके वेग का वैज्ञानिक अध्ययन प्रयोगशाला में प्रकाश रश्मि के ही उपयोग से किया जाता है और स्वयं प्रकाश रश्मि में फोटान कण होते है जो सृष्टि के मूल कणों में से एक हैं और अजर अमर हैं।
प्रकाश वेग से चलने वाले ये कण इलेक्ट्रान से टकराकर उसके संवेग और उसकी स्थिति एवं दिशा में अंतर उत्पन्न कर देते है। इस प्रकार जिस वैज्ञानिक इलेक्ट्रान की गति एवं स्थिति की जानकारी पाना चाहते हैं। वह खुद भी अपनी सूक्ष्मता एवं प्रखरता के कारण इन सूक्ष्म इलेक्ट्रॉन कणों को प्रभावित कर देता है और सही-सही अध्ययन, परीक्षण-निरीक्षण, विश्लेषण-असंभव हो जाता है। जबकि मधु विद्या के ज्ञाता एवं विवेचक आचार्यों ने चैतन्य विकिरण ऊर्जाओं की गति एवं दिशा का भी विवेचन किया है। जिसमें उसकी वैज्ञानिक क्षमता के भी अति विकसित होने का पता चलता है।
आदित्य से निकलने वाली विकिरण ऊर्जाओं का यह विश्लेषण इस प्रकार किया गया है।
“तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्योमधुनाऽयः।
ऋच एष मधु कृत, ऋग्वेद एवं पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एवा ऋचः।
एवम् ऋग्वेदमभ्यस्तयाँ स्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इंदियं वीर्य सन्नाय्व रसोऽजायत।
तद्धयक्षस्त्तदादित्यमभितोंऽश्रयत्तद्धाएतद्यदेतदादित्यस्य रोहित रुपम।” (छा.उ.3-1-5.314)
अर्थात् उस आदित्य की पूर्ववर्ती दिशा की किरणें ही इस अंतरिक्ष रूपी छत्ते के पूर्व दिशावर्ती छिद्र हैं, ऋचाएँ ही मधुकर हैं। ऋग्वेद ही पुष्प हैं, सोम आदि को अभितप्त किया। अभितप्त ऋग्वेद से यश, तेज, इंद्रिय, वीर्य एवं अन्न का आद्य रूप ‘रस’ उत्पन्न हुआ। वे सब जाकर आदित्य के पूर्व भाग में आश्रय पाकर वहीं उस आदित्य के लाल रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसी तरह इसी अध्याय के दूसरे खण्ड में कहा गया है “अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाडय़ो यजूँ प्येव मधुकृतो यजुर्वेद एवं पुष्पं ता अमृता आपः” (छा. 3-2-1)
अर्थात् इस आदित्य की दक्षिण दिशा की किरणें ही इसकी दक्षिणा दिशावर्ती मधु नाड़ियां हैं। यजु श्रुतियाँ ही इसकी मधुकर हैं। यजुर्वेद ही पुष्प हैं, सोमादि जल हैं। आदि।
आगे तीसरे खण्ड में “अथयेऽस्य प्रत्यञ्चो रश्यमयस्ता एवाच्य प्रतीच्यो मधुनाडय़ः” आदि कहकर पश्चिमी छिद्र से प्रस्तुत पश्चिम दिशावर्ती किरणें ही पश्चिमी मधुनाड़ियाँ कही गई हैं। साम श्रुतियाँ उनके मधुकर एवं सामवेद पुष्प बताये गए हैं। (छा. 3-3-1)
चौथे खण्ड में उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित किरणें उत्तरी मधुनाड़ियां बताई गयी हैं। अथर्वाडिंःरस उनके मधुकर और इतिहास पुराण ही पुष्प है। (छा.-3-4-1)
पाँचवे खण्ड में ऊर्ध्व रश्मियों का वर्णन है। “अथ येऽस्योध्वी रश्मयस्ता एवास्योध्वी मधुनाडय़ो गुह्य एवादेशा मधुकृतो ब्रह्म वै पुष्पं” अर्थात्-”इन ऊर्ध्व नाड़ियों के मधुकर गुह्य आदेश ही हैं और ब्रह्म ही इनका पुष्प है” आदि। (छा. 3-5-1)
इन प्रतिपादनों के सूक्ष्म आधिभौतिक स्वरूप की पुष्टि तो आधुनिक भौतिकी के भावी शोध निष्कर्षों पर निर्भर है। यों स्थूल भौतिक स्वरूप तो स्पष्ट ही है। सूर्य चारों ओर किरणें फेंकता है। ऊर्ध्वारोही किरणों का रहस्य अभी भौतिकी की नजर में ओझल है। पहले खण्ड में आदित्य के रक्त वर्ण का संकेत है, दूसरे खण्ड में शुक्ल वर्ण का, तीसरे में कृष्ण और चौथे में अतिकृष्ण का। सूर्य उगते समय रक्त वर्ण का रहता है। थोड़ी देर बाद शुक्लोज्वल हो जाता है। पीछे जहाँ छाया रहती है अर्थात् पृथ्वी के जिस हिस्से में सूर्य प्रकाश नहीं पहुँच रहा होता है, वहाँ की दृष्टि से उसका तेज कृष्ण यानि की सायंकाल के उपराँत की आभा वाला तथा और गहरी रात्रि में व्यतीत होने वाली गहरी कालिमा, अधिक काली आभा वाला कहा गया है। आधिदैविक स्वरूप इन पाँच विकिरण ऊर्जाओं की चेतना के मूल में सक्रिय पाँच देवगण हैं। वसुगण, रुद्रगण, आदित्यगण, मरुद्गण एवं साध्यगण। इनकी पर्याप्त भौतिक ऊर्जाएँ क्रमशः रेडियो विकिरण ऊर्जा, अवरक्त विकिरण ऊर्जा, दृश्य विकिरण ऊर्जा, एक्स विकिरण ऊर्जा एवं गामा विकिरण ऊर्जा हैं। ये पाँच विकिरण ऊर्जाएँ इन पाँच देवगणों की वाहन हैं। इनके मूल में सक्रिय चेतना प्रवाह ही देवगण हैं।
उपनिषद् में विवेचित मधु विद्या का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष इसका आध्यात्मिक अर्थ है। इसमें सविता के प्रवाह के माध्यम पाँच अंतरिक्षीय छिद्रों को बताया गया है। इसी छान्दोग्य उपनिषद् के तीसरे अध्याय में आगे तेरहवें खण्ड में उनका विवेचन है। उन्हें पाँच देव ऋषि कहा गया है और उनसे प्रवाहित पाँच प्राण प्रवाहों प्राण, अपान, व्यान समान एवं उदान का उल्लेख स्पष्टतः किया गया है। प्रकट है कि सर्वव्यापी चेतना सूर्य सविता जो समष्टि प्राण है, उससे प्रवाहित पाँच प्राण धाराएँ ही अंतरिक्षीय छिद्रों से बहने वाली पाँच प्रकार की किरणें है। इनमें से चार प्राण प्रवाहों से क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद पुष्पित बतलाए गये हैं। यहाँ वेद से तात्पर्य ग्रंथ रूप में उपलब्ध वैदिक संहिता से नहीं है। अपितु चेतना में परा एवं पश्यंती वाक् के रूप में स्फुरित ज्ञान प्रेरणाओं से है क्योंकि इन्हीं पुष्पों से मधुकर रस ग्रहण करते हैं। ऋचाएँ यजुः श्रुतियाँ साम श्रुतियाँ एवं अथर्वाडंरस श्रुतियाँ मधुकर कही गई है। अर्थात् वे श्रुतियाँ मूल ज्ञान चेतना का वाहक है। उनमें वही ज्ञान चेतना प्रकाशित है। मधुकरों का सत्व पुष्परस है। श्रुतियों का सत्त्व वहीं परा वाक् तथा पश्यंती वाक् है, जो समस्त ज्ञान-विज्ञान की आधार है। इस प्रकार मूल ब्राह्मी चेतना ज्ञान विज्ञान, इतिहास पुराण आदि विविध ज्ञान रूपों में अभिव्यक्ति होती रहती है। ये सभी ज्ञान रूप सविता की ही किरणें है। ऐसा यहाँ स्पष्ट विवेचित है। ऊर्ध्व दिशा में प्रवाहित होने वाली किरणोँ में ऊर्ध्वमुखी प्राण प्रवाह का वर्णन है। ऊर्ध्वगामी चेतना के लिए चारों वेदों का सारभूत बोध ही महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि वह आप्त काम स्थिति है। गीता कहती है।
भावानर्थ उद्पाने सर्वतः संप्लुतोदके । तादान, सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥ (गीता 2-43)
अर्थात्-”सब ओर से परिपूर्ण श्रेष्ठ जलाशय को छोटे-छोटे कुओं-ताल तलैयों आदि से जितना लेना-देना होता है (यानि कि कोई विशेष प्रयोजन नहीं होता) उतना ही लेना-देना परम तत्वविद् ब्रह्मवेत्ता को समस्त वेदों से होता हैं। “
सविता साधना के क्रम में विभिन्न दार्शनिक मतों का गम्भीर अनुशीलन, वेदों का अध्ययन, स्वाध्याय आवश्यक होता है। साधना की उच्चतम स्थिति में समाधि की अवस्था में जहाँ परमतत्व में एकात्म होता है, उस समय इन ग्रंथों से प्रत्यक्ष प्रयोजन नहीं रहता। यद्यपि चेतना के उत्कर्ष का आधार उनके स्वाध्याय से ही विनिर्मित होता है। साधना की प्रक्रिया के निर्देशक ग्रंथों का एवं मार्गदर्शक सद्गुरु की आवश्यकता तो पग-पग पर पड़ती है। किंतु सविता संपर्क की प्रत्यानुभूति के क्षणों में आत्मसत्ता ही वेद और गुरु बन जाती है।
कुण्डलिनी साधना के समय सुषुम्ना प्रवाह में जब प्राण ऊर्जा प्रविष्ट होकर ऊर्ध्वारोहण करती है, तब अति चेतन में जो प्रकाश संव्याप्त हो जाता है। सूक्ष्मदर्शियों ने उसका ध्वनिमय प्रतीक ॐ को ही बतलाया है। उन्हें गुह्य आदेश कहा गया है। ये आदेश प्रणव रूपी पुष्प से ही प्राप्त होते है। आनंद और उल्लास से भरी जो प्रखर सक्रियता उस समय उत्पन्न होती है, वही केन्द्रवर्ती मधु है। पूर्ववर्ती चार मधु नाड़ियों से प्रवाहित जो मधुरस साधक को प्राप्त होता है-उससे अन्न आदि रस यानि पौष्टिकता, इंद्रियों की स्वस्थ सक्रियता, तेजस्विता, वीर्य एवं यश प्राप्त होता है। ये ही चार प्रकार के मधुरस हैं। किंतु जो पांचवां मध्यवर्ती मधु है, वह रसों का भी रस है।
ते वा एते रसानाँ रसा, वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानिवा एतान्यमृतानाममृतानि, वेदाह्यमृतास्तेषा मेतान्यंमृतानि (छा.उ.3-5-4)
अर्थात् वहीं रसों के रस हैं। (वे दिव्य अनुभूतियाँ ही सर्वोत्तम मधु हैं) वेद ही रस है, ये (दिव्य अनुभूतियाँ) उनका भी रस हैं। वेद ही अमृत है और ये उनका भी अमृत है।
पंचकोशी साधना की दृष्टि से इस तत्व को यों समझना होगा कि अन्न आदि रस की उत्पत्ति का मतलब है अन्नमय कोश की पुष्टि। जिससे प्रखरता उत्पन्न होती है। प्राणशक्ति बढ़ती है तथा प्राणमय कोश की इस प्रकार हुई सक्रियता से यश वृद्धि होती है। इंद्रियों का अधिपति मन है। अतः उनकी उत्पत्ति का अर्थ है मनोमयकोश की सिद्धि। वीर्य की पुष्टि विज्ञानमय कोश की सिद्धि का आधार है। तेज की उत्पत्ति से अक्षय आनंद, उल्लास की उपलब्धि होती है। यही आनंदमय कोश की सिद्धि है। ये सिद्धियाँ सविता की चतुर्मुखी चतुर्वर्गी किरणों से संपर्क का परिणाम होती है। सविता की ऊर्ध्वगामी किरणें उस अनुभूति का बोध कराती हैं जो अमृतों का भी अमृत है। जिसे योग की भाषा में निर्बीज समाधि, धर्ममेध समाधि, स्वरूप प्रतिष्ठा, जीवन्मुक्ति आदि के रूप में कहा गया है। सविता के मध्यवर्ती मधु का पान इसी स्थिति में होता है। सविता साधना की सर्वोच्च उपलब्धि चरम परिणति यही है। वशिष्ठ पद पाने पर यह संभव होता है।
सविता के उस अमृत साक्षात्कार करना ही उसका पान है। यही समष्टि प्राण है, प्राणों का आधार है जीवनों का जीवन है। अपने अमृतसर से परम तृप्ति देने वाले यही सविता देवता समष्टि चेतना, परमब्रह्म गायत्री साधकों के उपास्य व इष्ट हैं।
सूर्यार्घ्यदान करके उसकी दृष्टि किनारे खड़े याचकों पर घूमी। सभी की जरूरतें पूरा करने के बाद उसने सामने खड़े ब्राह्मण देवता को प्रणाम करते हुए पूछा आपकी क्या सेवा करें देव? प्रश्न के उत्तर में ब्राह्मण ने कहना शुरू किया। महात्मा कर्ण! मैंने तुम्हारी दानशीलता की बड़ी प्रशंसा सुनी। मैं भी कुछ माँगने आया हूँ, दे सकोगे । कर्ण ने मुस्कुराते हुए कहा-मेरे आराध्य भगवान भास्कर समूचे विश्व ब्रह्मांड को जीवन प्रकाश, प्रेरणा, ऊर्जा सभी कुछ देते हैं। देना ही उनका व्रत है और आराधना का रहस्य देवो भूत्वा देवं यजेत्-अर्थात् देवता बनकर देवता की आराधना करने में है। फिर मैं क्यों अपने उपास्य से पाये दान के सद्गुणों को खोने लगा। विप्र तुम निर्भीक होकर माँगो।
कवच और कुण्डल जो सूर्य की कृपा से तुम्हें प्राप्त हुए हैं। जिनके कारण तुम अजेय हो। बस इतना ही, कर्ण हँसा यश, प्रतिष्ठा राज्य वैभव के लोभ से कही अधिक प्रिय आराध्य की सद्गुण सम्पत्ति है, देवराज इंद्र। कर्ण की दिव्य दृष्टि से ब्राह्मण वेशधारी इंद्र का रहस्य छुप न सका। संकुचित भाव से कवच कुण्डल को स्वीकारते हुए भाव विह्वल कण्ठ से कहे जा रहे थे धन्य हो तुम और धन्य है तुम्हारी सूर्योपासना।
सूर्य के दृश्य अनुदान प्रकाश, ऊर्जा, शक्ति आदि के रूप में अनुभव होते है। इन दृश्य अनुदानों से कहीं अधिक बड़ा अनुदान अदृश्य प्रेरणा प्रवाह है। जो सूर्य और सौरमण्डल की गतिविधियों से उमगता रहता है। स्वयं के अन्तःकरण को यदि ग्रहणशील बनाया जा सके तो स्पष्ट बोध हो सकेगा कि सूर्य न केवल जीवनदाता है, बल्कि जीवन जीने की कला का कुशल प्रशिक्षक भी है। यदि हम सौरमण्डल और उससे संबद्ध ग्रह-नक्षत्रों की गति विधियों पर दृष्टिपात करें तो न केवल विश्व की विशालता और उसके निर्माता की महानता समझने का अवसर मिलेगा वरन् यह भी सूझ पड़ेगा कि जीवन की रीति-नीति का शिक्षण किस तरह संपन्न हो रहा है।
समस्त ग्रह-नक्षत्र निरंतर क्रियाशील हैं। इन गतिशीलता पर ही उनका जीवन निर्भर है। समस्त पिण्ड अपनी धुरी पर परिक्रमा करते हैं और साथ ही उस केन्द्र का भी ध्यान रखते हैं जिसके साथ वे जुड़े हुए है। जिससे शक्ति प्राप्त करते हैं और जिस परिवार में बँधे रहने के कारण उन्हें सुरक्षा और स्थिरता प्राप्त है। वे उस केन्द्र सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं।
इस प्रक्रिया पर ध्यान दिया जाय तो परम नियंता की उस इच्छा का आभास मिलेगा जिसका पालन करने के लिए सबको सहर्ष तत्पर रहना पड़ता है। ग्रह-उपग्रह अपनी धुरी पर नियमित रूप से घूमते हैं। व्यक्तिगत जीवन की सुव्यवस्था, सतर्कता, नियमितता और क्रमबद्धता को ग्रहों के अपनी धुरी पर घूमने के सदृश समझना चाहिए। यदि यह गति न हो तो फिर उन्हें घोर दुर्गति में पड़ना पड़े। मनुष्य के लिए भी यही बात है यदि वह अकर्मण्य अव्यवस्थित और अनियमित गतिविधियाँ अपनाये तो यह स्रष्टा की इच्छा का उल्लंघन ही होगा और उसका दण्ड मिले बिना न रहेगा। क्षुद्र ग्रह कीटकों (एस्टे राइड्स) की एक ऐसी श्रृंखला भी इस ब्रह्मांड में मारी-मारी फिरती है जिन्होंने निर्धारित मर्यादा का उल्लंघन करने का दण्ड अपने अस्तित्व को छिन्न-भिन्न करने के रूप में भोगा है।
अपनी ही धुरी पर घूमते रहना-अपने ही गोरख धंधे में उलझे रहना पर्याप्त नहीं। समाज रूपी केन्द्र का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। सभी ग्रह-अपने केन्द्र सूर्य की परिक्रमा में प्रमाद रहित तत्परता बरतते हैं। समाज के प्रति अपना कर्तव्य पालन करने के लिए मनुष्य को भी सजग और सक्रिय रहना चाहिए। सौर-मण्डल के ग्रह सूर्य से बहुत कुछ प्राप्त करते हैं-यदि वह उपलब्धि बंद हो जाय तो उन्हें मृत स्थिति में जाना पड़े। समाज का अनुदान बंद हो जाय तो मनुष्य का एक दिन भी जीवित रहना कठिन है। सुख-सुविधाएँ व्यक्ति की एकाकी उपलब्धियाँ नहीं हैं। समाज के ही सहयोग से ही व्यक्ति का विकसित सुखी और समृद्ध रह सकना संभव है। अतएव उपलब्धियाँ प्राप्त करने के साथ-साथ उसे केन्द्र के पोषण का उत्तरदायित्व भी उस पर आता है। सौर मण्डल का सहयोग न हो तो फिर सूर्य का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा। इसलिए नियति की व्यवस्था यही है कि ग्रह-सूर्य की परिक्रमा करके उसकी क्षमता को बनाये रखे और सूर्य इन ग्रहों को अनेक अनुदान देकर पोषण करें। यह अन्योन्याश्रित प्रक्रिया ही सौर मण्डल की स्थिरता की रीढ़ है, जिसके टूटने का खतरा होने पर यह सारा सुँदर सौर परिवार ही बिखर जायेगा।
व्यक्ति और समाज के बीच ऐसी ही सुदृढ़ विधि
व्यवस्था चलनी चाहिए। समाज का ढाँचा-व्यक्तियों को विकसित करने में समर्थ रहे और व्यक्ति समाज को प्रखर और सशक्त बनाने में निरंतर योगदान करें। यही क्रम व्यवस्था सौर-मण्डल में चल रही है-और यही क्रम व्यक्ति और समाज के संगठन में ठीक तरह बरता जाना चाहिए।
इसे हम सभी का सौभाग्य ही अनुभव किया जाना चाहिए कि हम चारों ओर बिखरी जीवनहीन या स्वल्प जीवन वाली ऊबड़-खाबड़ ग्रह परिस्थितियों के बीच अपनी इस सुँदर धरती पर रह रहे हैं, जिसमें जीवन का अमृत ही हिलोरे नहीं ले रहा वरन् प्रकृति प्रदत्त ऐसी सुविधाओं का भी बाहुल्य है जो अन्य ग्रहों में उपलब्ध नहीं हैं। इसी पृथ्वी के वासी सुख-सुविधाओं के उपभोक्ता होने के नाते हमारा और भी अधिक कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व हो जाता है कि अपने उदार एवं सहृदय निर्माता की इच्छा का पालन करते हुए व्यक्ति एवं समाज की महान मर्यादाओं को बनाए रखने में पूरा-पूरा सहयोग करें।
वैज्ञानिकों ने सूर्य और सौर मण्डल की स्थिति का अध्ययन करके बताया है कि पृथ्वी से सूर्य की दूरी सवा नौ करोड़ मील है। इस दूरी का अनुमान हम इस आधार पर लगा सकते है कि एक आदमी बैठ कर दो सौ अंक प्रति मिनट की रफ्तार से गिनती गिने तो सवा नौ करोड़ गिनने में उसे 11 महीने लगेंगे। शर्त यह है कि वह अन्य कोई काम न करे न सोये, न खाये-पिये, दिन-रात गिनता रहे।
एक अन्य वैज्ञानिक ने इस दूरी की कल्पना इस प्रकार की है कि यदि हमारे हाथ इतने लम्बे हो जायें कि हम सूर्य को छू सकें और सूर्य की गर्मी हमारी अंगुलियों पर लगते ही अपने स्नायु तंतुओं को उसकी सूचना मस्तिष्क तक उसी रफ्तार तक पहुँचानी पड़े जिस रफ्तार से वे पहुँचते हैं तो इस कार्य में कुल 160 वर्ष का समय लगेगा। अर्थात् 160 वर्ष बाद अंगुली जलने की सूचना मस्तिष्क को मिल सकेगी। इसी प्रकार वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि सूर्य पर कोई घोर शब्द हो और वह ध्वनि उसी वेग से चले जिस वेग से धरती पर चलती है तो उसे पृथ्वी तक आने में 14 वर्ष लगेंगे।
सूर्य का डील–डौल भी कुछ कम आश्चर्यजनक नहीं है। इस संबंध में वैज्ञानिकों ने कुछ महत्वपूर्ण आँकड़े इकट्ठे किये है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास का 109 गुना है और इसलिए उसका घनफल पृथ्वी की अपेक्षा 109×109×109 गुना है। तेरह लाख पृथ्वियों को एक में मिला दिया जाय तब कही सूर्य के बराबर गोला बन सकेगा। पर सूर्य का घनत्व पृथ्वी की तुलना में अपने आप में बहुत कम है। यदि पृथ्वी की ही नाप का पानी का गोला लें तो पृथ्वी उससे तुलनात्मक दृष्टि से साढ़े पाँच गुना भारी होगी जबकि सूर्य अपनी घनता के बराबर पानी के गोले से मात्र सवा गुना भारी होगा।
इसी सूर्य के आकर्षण से बँधी 7900 मील व्यास वाली पृथ्वी लट्टू की तरह अपनी धुरी में अधर आकाश में लटकी तेजी से घूम रही है। 23 घंटे 56 मिनट में वह अपनी धुरी पर एक परिक्रमा कर लेती है जिसके फलस्वरूप दिन व रात होते हैं। किंतु हम हैं पृथ्वी के वासी, जो सिद्धाँततः तो यह बात मानते हैं, पर प्रायोगिक तौर पर पृथ्वी घूमते हुए देखने में आती नहीं। अतएव मानना पड़ेगा कि केवल दृष्टिगत व्यवहार ही सत्य नहीं है-विवेक और विचार की कसौटी पर खरे उतरने वाले सिद्धाँतों की भी सत्यता स्वीकार करनी चाहिए।
संसार का अणु -अणु गतिमान है। गति केवल वहाँ नहीं होती जहाँ इच्छाएँ और अभिलाषाएँ जड़ और मृत हो जाती हैं। फिर यदि संसार में हर वस्तु गतिशील हो तो हमें उस अदृश्य सत्य के कारण और गन्तव्य की भी जान-पहचान करनी ही होगी। पृथ्वी अपनी परिक्रमा करके ही संतुष्ट नहीं। वह सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बँधी है और उसी के फलस्वरूप स्वयं नाचते हुए वह सूर्य की भी परिक्रमा करती है। यह परिक्रमा वह 365 1/4 दिन में पूरी करती है। दिन का 1/4 भाग परिक्रमा में अधिक लग जाने के कारण ही हर चौथा वर्ष लीप इयर मनाया जाता है, जिसमें फरवरी 28 के बजाय 29 दिन की होती है।
अपनी पृथ्वी के आगे बढ़ चले तो सूर्य के समीप नवग्रह में सबसे छोटा 3000 मील वाला बुध दिखायी देता है। सूर्य से 36000000 मील दूर से सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। अपनी परिक्रमा वह 88 दिन में करता है, थोड़ा सुस्त है न! अर्थात् बुध का दिन पृथ्वी के 44 दिन के बराबर है और रात्रि 44 दिनों के। अर्थात् 528 घंटों के बराबर। हम एक परिस्थिति में रहने के आदी हो गये हैं। इसलिए दूसरी परिस्थितियों को भी ध्यान में लाये तो इतनी लम्बी रात और इतने लम्बे दिन पर कौतूहल हुए बिना न रहे और फिर विचार भी उठे बिना न रहे कि क्या संसार में कोई ऐसा बिंदु भी है जहाँ न कभी रात होती है न कभी दिन-संपूर्णतः दृष्ट बिंदु।
बुध की तरह शुक्र भी अन्तर्ग्रह है। अन्तर्ग्रह का अर्थ है जो सूर्य और पृथ्वी के मध्य हो। शुक्र भी एक गतिशील पिण्ड है। रूढ़िवादी जन समुदाय के समान अंध परम्पराओं में बँध कर जीना नहीं चाहता। अपनी धुरी में 30 दिन की और अपने शक्तिदाता सूर्य की वह पृथ्वी के पूरे 225 दिन में एक परिक्रमा करता है। कल्पना कीजिए वहाँ 112.5 दिनों की अर्थात् तीन माह-साढ़े बाईस दिनों की रात कितनी भयंकर होती होगी। भगवान ने पृथ्वी वासी के लिए कितना उपयुक्त वातावरण बनाया है, प्राकृतिक सुविधाएँ दी हैं यह कल्पना करते ही श्रद्धा से सिर झुक जाता है, बावरे तो वे लोग हैं जिनकी दृष्टि में सृष्टि की इस व्यापकता की कोई कल्पना नहीं है वे अपने स्वार्थों से ही दबे मरे जा रहे हैं।
अब थोड़ा अपनी पृथ्वी से बाहर की ओर चिंतन को गति दें। कदाचित हवा से दूर उड़ कर चलना संभव हो और हम सूर्य से विपरीत दिशा में उड़े तो पृथ्वी से 49000000 मील दूर एक ग्रह मिलेगा। इस ग्रह से कोई एक हजार मील ऊपर ठहर जायें तो देखेंगे कि वह भी अपनी धुरी पर घूम रहा है। अपने आपकी परिक्रमा वह 24 घंटा 37 मिनट में करता है। अर्थात् वहाँ के दिन व रातें लगभग पृथ्वी के ही समान हैं।
यह मंगल है जो सूर्य की प्रदक्षिणा 687 दिन में करता है। इससे आगे वाला भीमकाय ग्रह बृहस्पति है। जिसमें अपनी पृथ्वी की तरह की हजारों पृथ्वियाँ भरी जा सकती है। सूर्य की परिक्रमा करने में यह 12 वर्ष का समय लेता है। इन बारह वर्ष में वहाँ का मौसम, अर्थात् हरियाली रहती होगी तो पूरे 4 वर्ष तक गर्मी और 4 वर्ष तक घनघोर घटाओं की धूम तथा चार वर्ष का जाड़ा संभव है।
इतना विशालकाय ग्रह किंतु उसका वेग इतना तीव्र है कि कुल 9 घंटे 40 मिनट में ही अपनी धुरी पर एक बार घूम जाता है। कुल 4 घंटे 55 मिनट का दिन और इतने ही समय की रात। पर वह छोटी-सी रात भी कितनी विचित्र की 12-12 चंद्रमा एक साथ ही वहाँ उजाला फैलाते हैं। शनि बेचारा बुरा ग्रह माना जाता है। किंतु ऐसा है नहीं। वह तो सार्वभौमिक नियमों का पालन करता है। 10 घंटा 14 मिनट में अपनी धुरी पर घूमने के अतिरिक्त वह साढ़े उन्नीस वर्षों में सूर्य की भी परिक्रमा करता है। यूरेनस पृथ्वी की 84 वर्ष में, तो अपनी निज की 10 घंटा 48 मिनट में नेपच्यून 165 वर्ष में एक बार सूर्य की प्रदक्षिणा करता है तो अपनी 15 घंटा 48 मिनट में। प्लूटो अपनी परिक्रमा साढ़े छह दिन में करता है लेकिन उसकी गति कुछ ऐसी मंद है कि अपने जीवनदाता की परिक्रमा करने में उसे पूरे 248 वर्ष लग जाते है।
महान सौरमण्डल के इन महान सदस्यों के अतिरिक्त कुछ ऐसे क्षुद्र ग्रह भी हैं जो ओछे और छोटे होने का परिचय निरंतर देते रहते है। कभी कक्षा बदल देते हैं कभी गतिविधियाँ। नियम और मर्यादाओं के उल्लंघन करने की चेष्टा में इन्हें अपनी चतुरता अनुभव होती है पर पाया इनने क्या? अस्त व्यस्त और अव्यवस्थित प्रतिक्रिया ही इन्हें भुगतनी पड़ती है। उपहासास्पद बनते हैं और क्षुद्र कहलाते हैं। प्रकृति इन्हें रखती तो नियंत्रण में ही है अन्यथा वे अपने को नष्ट करें और दूसरों को संकट पैदा करें। इसलिए उन्हें छूट भी एक सीमा तक मिलती है। इस उपलब्ध स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके ये क्षुद्र ग्रह किस तरह अपनी गरिमा खो चले। महानता से च्युत होकर क्षुद्र परिस्थितियों में रहने लगे। इस तथ्य को यदि समझा जा सके तो मनुष्य महानता की गरिमा को ही स्वीकार करे और ग्रहों जैसी दुर्दशा में पड़ने से बचा रह सके।
खगोल शास्त्रियों ने क्षुद्र ग्रहों की पहचान के लिए इनके नंबर नियुक्त कर रखे हैं। ये हैं भी वस्तुतः बहुत वाचाल, चंचल और शरारती। 433 नंबर का क्षुद्र ग्रह ईरोस कई करोड़ मील दूर है पर घूमते-घूमते यह पृथ्वी से डेढ़ करोड़ मील पास तक चला आता है। 15.66 नंबर के इकारस जिसने सन् 1967 में पृथ्वी में तहलका मचा दिया था कहा जाता है कि उसके पृथ्वी से टकरा जाने की संभावना है। यह इतना दुस्साहसी ग्रह है कि सूर्य और बुध के मध्य वाले अत्यंत भीषण गर्म स्थान की भी परिक्रमा कर आता है।
हर्मेस नामक ग्रह भी इकारस की तरह सन् 1937 में पृथ्वीवासियों को डरा गया था। अब न जाने कहाँ चक्कर काट रहा होगा। वेस्टायों पृथ्वी से औसतन 22 करोड़ मील दूर का बौना ग्रह है पर वह भी शाँत नहीं-सूर्य की परिक्रमा करते हुए वह पृथ्वी के दस करोड़ मील पास तक चला आता है। यह सूर्य भगवान के आस-पास साढ़े तीन वर्ष में चक्कर काट लेता हैं, जबकि अपनी ही धुरी पर वह 10 घंटे 45 मिनट में घूम लेता है। घूमने में हाइडाल्गो को अपनी शान है वह कभी-कभी 9 चंद्रमा वाले शनि देवता से भी बिना डरे उनके आकाश तक घूम आता है। सूर्य स्वयं भी अपनी परिक्रमा कर अपने स्वत्व की रक्षा करता है, साथ ही विराट परमात्मा के प्रति अपनी निष्ठा की अभिव्यक्ति के लिए वह अपने समस्त परिवार के साथ दण्डवती परिक्रमा के लिए निकला हुआ है। यह विराट की परिक्रमा वह 25 करोड़ वर्ष में पूरी करता है। इसके लिए उसे प्रति सेकेण्ड दो सौ मील की गति से चलना पड़ रहा है, जबकि वह अपनी धुरी का चक्कर भी 25 दिन 7 घंटे और 48 मिनट में लगाता चल रहा है।
न केवल सूर्य वरन् विराट ब्रह्मांड का हर पिण्ड गतिशील है। हर कहीं में कर्ममय जीवन का उद्बोधन झर रहा है। हमारा सूर्य जिस आकाश गंगा से संबंधित है, वह और उससे दूर की आकाश गंगाएँ भी प्रकाश की सी भयंकर गति से कहीं जा रही है। समस्त सृष्टि का उद्गम किसी एक ही बिंदु से हुआ वहीं अनंत ब्रह्मांड की नाभि होगी। विराट चेतना भी उसी का अंश है। उस सार्वभौमिक सौर चेतना के दर्शन ही जब निर्जीव ग्रहों का लक्ष्य है तो मानवीय चेतना उसे जानने पहचानने की चेष्टा क्यों न करें? आकाशस्थ सूर्य और उसका परिवार अपने सहयोगी ग्रह-नक्षत्रों के साथ मात्र हीरे-मोती जैसी शोभा सुषमा ही नहीं बिखेरते बल्कि जीवन विद्या का महत्वपूर्ण शिक्षण भी देते हैं। हम यदि सूर्य के अलौकिक-आध्यात्मिक स्वरूप को समझ पाने में असमर्थ हैं तो कम से कम उसकी प्रत्यक्ष हलचलों से दृष्टिगोचर हो रही दैनन्दिन जीवन का मार्गदर्शन देने वाली इन गतिविधियों व घटनाक्रमों से यह शिक्षण ले सकते हैं कि हमारा जीवन कैसा सुगढ़-सुव्यवस्थित होना चाहिए। सूर्य ब्रह्मांड का अधिपति है, इसलिए सारे ग्रह-नक्षत्र तारे उसके चारों ओर भ्रमण करते हैं। किसी भी ग्रुप-लीडर जन सामान्य को मार्गदर्शन देने वाले सृजेता स्तर के व्यक्ति में क्या विशेषताएँ होनी चाहिए, इनका परिचय हम सूर्य भगवान के क्रिया–कलापों से मिलता है। कोई भी यूँ ही स्तुत्य आराध्य नहीं बन जाता। इसके लिए अपना जीवन क्रम व अपनी गतिविधियों को भी उस स्तर का बनाना पड़ता है जैसा कि भुवन-भास्कर का है। यदि हम यह शिक्षण हृदयंगम कर लें तो हम भी एक ज्योतिर्मय पिण्ड की तरह अपना लौकिक जीवन सफलताओं- कीर्ति–गाथाओं से भरा बना सकते हैं।
भूख पीड़ित पाण्डव-द्रौपदी सहित बन में भटक रहे थे। जब स्वयं की ही क्षुधा शाँत होने की गुँजाइश न हो, ऐसे में महाक्रोधी ऋषि दुर्वासा और उनके दस हजार शिष्यों के आतिथ्य सत्कार के संदेश ने उन्हें और व्याकुल कर दिया था। आसन्न संकट की घड़ी थी। वे और अधिक सोचते इतने में महर्षि धौम्य का आगमन हुआ। स्थिति को समझकर महर्षि ने कहा-राजन्! देवाधिदेव भगवान सूर्य की आराधना करो। सूर्य उपासना सभी संकटों से त्राण दिलाने वाली इस लोक में यश-वैभव की प्राप्ति कराकर मोक्ष प्रदाता है। धर्मराज युधिष्ठिर सपरिवार सूर्य आराधना में तल्लीन हो गये। भगवान सूर्य युधिष्ठिर की इस आराधना से प्रसन्न होकर सामने प्रकट हरे गए और उनके मनोगत भाव को समझकर बोले-
यत्तेऽभिलषितं किञ्चित्तत्वं सर्वमवास्यसि।
धर्मराज ! तुम्हारा जो भी अभीष्ट है, वह तुमको मिलेगा। इतना कहते हुए उन्होंने उन्हें अक्षयपात्र दे दिया। पाण्डवों के जीवन में उल्लास बिखर गया।
वैदिक वाङ्मय सूर्यदेवता के महात्म्य, उनकी विश्व संचालन में चेतनात्मक भूमिका तथा सूर्योपासना के लाभों के विवरणों से भरा पड़ा है। वेद सूर्य को विश्व में जीवन और गति के महान प्रेरक के रूप में अपनी पृथ्वी को अपने गर्भ से उत्पन्न करने वाले सृजेता के रूप में तथा समग्र संसार की चलायमान चैतन्य वस्तुओं में प्रमुख ग्रहाधिपति उन्हें मानता है। न केवल सूर्य वैदिक ऋषि की दृष्टि में चराचर विश्व का संचालक है, वह घटी, पल, अहोरात्र, मास व ऋतु आदि समय का के महात्म्य, उनकी विश्व संचालन में चेतनात्मक भूमिका तथा सूर्योपासना के लाभों के विवरणों से भरा पड़ा है। वेद सूर्य को विश्व में जीवन और गति के महान प्रेरक के रूप में अपनी पृथ्वी को अपने गर्भ से उत्पन्न करने वाले सृजेता के रूप में तथा समग्र संसार की चलायमान चैतन्य वस्तुओं में प्रमुख ग्रहाधिपति उन्हें मानता है। न केवल सूर्य वैदिक ऋषि की दृष्टि में चराचर विश्व का संचालक है, वह घटी, पल, अहोरात्र, मास व ऋतु आदि समय का प्रवर्तक भी है। ऋग्वेद में सूर्य की व्याख्या इस प्रकार है-
“सरति गच्छति वा सुरयति प्रेरयति वात तत्तद् व्यापारेषु कृत्स्नं जगदिति सूर्यः। यद्धा सुष्ठ ईर्यते प्रकाशपवर्षगादि व्यापारेषु प्रेर्यते इति सूर्यः” (9/114/3 ऋग्वेद सायण भाष्य) यह नाम की व्युत्पत्ति का द्योतक भी व प्रवृत्तियां का परिचायक वर्णन है। सूर्य को समर्पित चौदह सूक्तों में ऋग्वेद के ऋषि हमें बताते हैं-
“अग्नेरनीकं बृहतः संपर्य दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य” 10/7/3 अर्थात् “आकाश में सूर्य का ज्वलंत प्रकाश मानो अमूर्त अग्निदेव का मुख है। तथा “शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु” (7/35/8) अर्थात् वे दूर द्रष्टा हैं तथा “सूराय विश्व चक्षुसे”(1-50-2) अर्थात् वे सर्व द्रष्टा हैं। “विश्वस्य जगतो वहन्ति” कहकर विद्वान ऋषि उन्हें इस जगती का पालक-सर्वेक्षक बताते हैं।
सूर्य को आदिकाल से ही चर और अचर विश्व सभी की आत्मा तथा उनका रक्षक माना गया है-”सूर्य आत्मा जगस्तस्थुषश्च”(ऋ1-115-1 यथा यजु. 7-42) इसी बात को दूसरे शब्दों में अन्य स्थान पर “विश्वस्य स्थातुर्जगतच्श्र गोपाः”(ऋग्वेद 7-60-2) में भी प्रतिपादित किया गया है। ऋग्वेद के पाँचवे मण्डल के सूक्त 81 की प्रारम्भिक पाँच ऋचाओं की व्याख्या करते हुए श्री अरविंद अपनी ऐतिहासिक कृति वेद रहस्य में लिखते हैं कि वैदिक ऋषियों का सूर्य सत्य का अधिपति है, आलोक प्रदाता है, रचयिता है-’सविता’ के रूप में तथा ‘पूषा’ के रूप में पुष्टि प्रदाता है। उसकी किरणें अंतःप्रेरणा व अंतर्ज्ञान की तथा प्रकाशपूर्ण विवेक की अति मानसिक क्रियाओं का द्योतक हैं। बड़ी ही सुँदर व्याख्या सविता देवता की शक्ति-प्रक्रिया की तथा सूर्योपासना से संभावित उपलब्धि ऋग्वेद की इस ऋचा में है-
उतेशिषे प्रसवस्य त्वमेक इदुत पूषा भवसि देव यामभिः । उतेदं विश्वं भुवनं वि राजसि श्यावाश्वस्ते सवितः ॥ -स्तोममानशे
ऋग्वेद मंत्र 5 सूक्त 81/मण्डल 5 इसका भावार्थ इस प्रकार होता है-”देवाधिपति सूर्य रचयिता, पोषक सविता है, समस्त लोकों को यह आलोकित करता है। इस प्रकार अत्रिकुल का श्यावश्य सविता को आत्मसत्ता के अंदर एक ऐसे आलोक प्रदाता सत्य के रूप में प्रतिष्ठित करने में सफल हो चुका है, जो रचयिता है-प्रगतिशील है-मानव मात्र का पोषक है-मनुष्य को अहंभाव की सीमा से निकालकर विश्वव्यापी बना देता है, ससीम से असीम कर देता है।” (वेद-रहस्य प्रथम भाग -पृ. 376) वैदिक ऋषियों के विचार में सत्य और प्रकाश पर्यायवाची शब्द हैं जैसे कि उनके विलोम अज्ञान व अंधकार भी पर्यायवाची हैं। यह सत्य है सूर्य की ज्योति, उसका शरीर। यह सूर्य वह है जो सत्य के रूप में अंधकार में-अवचेतन की गुप्त गुफा में अवस्थित है। किंतु प्रयासपूर्वक उसका साक्षात्कार किया जा सकता है। वस्तुतः वेदों का अलंकारिक वर्णन उन्हें उन पवित्र धार्मिक ग्रंथों के रूप में प्रकट करता है, जिनमें सूर्य की पूजा अथवा (सत्यम सूर्यम) सत्य के सूर्य को जो अज्ञानरूपी अंधकार से ढँका है, प्रकाशित करने की प्रक्रिया समझायी गयी है “सत्यं तदिन्द्रो दशभिर्दशग्वैः सूर्य विवेद तमसि क्षियंतम्” - ऋ 3.39.5 का उत्तरार्ध
वेदों में स्थान-स्थान पर सूर्य के महात्म्य के भिन्न-भिन्न उद्धरण मिलते हैं। ऋषि लिखते हैं-”पश्येम् नु सूर्यमुच्चरंतम (ऋ 6-52-5) अर्थात् जीवन का अर्थ ही सूर्योदय का वर्णन करना है। इस प्रकार सूर्य धरती पर जीवन के प्रकटीकरण के प्रतीक है। वे यह भी कहते हैं अभी प्राणी उन पर अवलंबित हैं। “सूर्यस्य चक्षू रज सैत्यावृतं तस्मिन्नार्पिता भुवनानि विश्वा” ऋ.1-164-14 । यही नहीं वैदिक मनीषी के अनुसार सूर्य विश्वकर्मा हैं-सृष्टि रचयिता हैं-येनमा विश्वा भुवनान्याभृता विश्वकर्मणा विश्वदेव्यावता (ऋ. 10-170-4)। यही नहीं, वे उस सहस्रयुग का आदि और अंत हैं, जो ब्रह्म का दिन कहलाता है।
यदहो ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुग सम्मितम्। तस्य त्वमादिरंतच्श्र कालज्ञैः सम्प्रकीर्त्तितः ॥ -5/170 महाभारत
सूर्य व सविता की भ्राँति को वेद स्पष्ट करता है। सविता
अर्थात् संपूर्ण ब्रह्मांडों के सूर्यों में समान विराजमान , प्रेरक, दिव्यशक्ति रूप परब्रह्म परमात्मा। ऋषि के अनुसार प्रत्येक सूर्य सविता हैं।
सविता सर्वस्य प्रसविता । सविता अर्थात् सबका प्रेरक। शतपथ के अनुसार सविता देवानाँ प्रसविता सविता देवों का भी पालन करने वाले प्रेरक है। ऋग्वेद के चौथे मण्डल के चौदहवें सूक्त के दूसरे श्लोक में वर्णन आया है-
ऊर्ध्व केतु सविता देवो अश्रेज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वन। आप्राद्यावापृथिवी अंतरिक्षं वि सूर्यो रश्मि भिश्चेकिदानः
अर्थात् सविता देव ने अपनी ज्योति को ऊँचा उभारा है। और इस प्रकार उनने समस्त लोकों को प्रकाशित किया है। सूर्य प्रखरता के साथ चमकते हुए आलोक, पृथ्वी और अंतरिक्ष को अपनी किरणों से आपूरित कर रहे हैं।” इसका अर्थ यह है कि “सूर्य भौतिक सौर मण्डल के अधिपति हैं जबकि सविता उनमें अन्तर्निहित दिव्यशक्ति का ध्यानावस्थित महर्षियों के अंतःकरण में प्रादुर्भाव आध्यात्मिक रूप का वर्णन ही सविता देवता के रूप में है, कोई अलग रूप में नहीं।”
वेद कहता है-”संपूर्ण विश्व का प्रसव करने वाले सर्वप्रेरक, सविता देवता ही अपने नियमन साधनों से वृद्धि प्रदानादि उपायों से पृथ्वी को सुखमय बनाकर रखते हैं तथा वे ही आलंबन रहित प्रदेश में द्युलोक को दृढ़ रखते हैं जिससे नीचे न गिरे। वे ही अंतरिक्षगत होकर वायवीय पाशों से बँधे हुए मेघमय समुद्र को दुहते हैं। “
सविता मन्त्रै पृथिवीय रम्णा दस्कम्भने सविता द्यामहंडत्। अश्वमिवा धुक्षद्धु नियंतरिक्ष मतूर्त्ते बद्धं सविता समुद्रम्॥ (ऋ. 10-149-1)
इस सूक्त में सूर्य के विराट स्तर पर क्रिया–कलापों की
एक झलक है। सूर्य को पापनाशक माना गया है। उनका भर्ग ब्रह्मतेजस् पापनाशिनी शक्तिवाला है। यह स्तुति बड़े ही सुँदर ढंग से ऋग्वेद के चौथे मण्डल के 54 वे सूक्त। तीसरे श्लोक में अभिव्यक्ति हुई है-”हे सविता देव! आपका जीवन दिव्य गुणों से भरा हुआ है। हम अज्ञानवश आपके प्रति अपराध एवं श्रद्धा निष्ठा में प्रमाद कर देते हैं। हम अपनी चतुराई, ऐश्वर्य एवं पौरुष के मद अन्य देवों या मनुष्यों के प्रति अपराध कर देते हैं। आप उन सब अपराधों को क्षमा कर हमें संपूर्ण पापों से मुक्त कर दीजिए। हमारी यही अभ्यर्थना है। “ इसी बात को 1-115-1 में -”हे प्रकाशमान सूर्य रश्मियों। सूर्योदय के समय प्रकट हो तुम हमें पापों से निकाल कर बचालो, जो निन्दित है, उससे हमारी रक्षा करो।”
(अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरहंसः पिपृता निरपद्यात्)
इसीलिए पापों से मुक्ति व सद्बुद्धि की याचना वाला गायत्री मंत्र सविता के ध्यान के साथ जपा जाता है तथा उद्यते नमः उदायते नमः उदिताय नमः (अथर्व 17-1-22) एवं “अस्तं यते नमोऽस्तमेष्यते नमोऽस्तमिताय नमः।” सूक्तों में सूर्य उदय-प्रकट व अस्त तीनों दशाओं में नमन के साथ प्रार्थना वेदों का ऋषि करता है। सूर्य देव मानसिक शाँति प्रदान करके वे सब प्रकार का सुख प्राप्त कराते है। जो मानव को अभीष्ट हैं और व्रतों की पूर्ण करने की सामर्थ्य देते हैं-
व्रतानि देवः सविता भिरक्षते (ऋ.4-53-4)
यजुर्वेद कहता है कि “सूर्य स्वयंभू है, इस सौर जगत में श्रेष्ठ है, सारे जगत को प्रकाशित कर रहे है। सबको वर्चस और ज्योति देते है। जो भी सूर्य के नियमों का अनुसरण करेगा, वह उनके ही समान वर्चस्वी बनेगा।’
स्वयंभू श्रेष्ठो रश्मिर्वद्योदा असि बचों में देहि। सूर्यस्यावृतमन्ववर्ते(पजु.2-26)
सूर्य देव कर्मयोगी को वाँछित अनुदान देते है। “सूर्य की प्रेरणा लेकर मनुष्य जिस मात्रा में कर्म करता है, उसी मात्रा में पदार्थ अथवा अर्थ लाभ लेता है”-यह भाव ऋग्वेद की इस उक्ति में आया है।
नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता अयन्न्थानि कृणवन्नपाँसि। (7-63-4)
वेदों के उपरोक्त उद्धरण एक ही तथ्य का उद्घाटन करते हैं कि मानव का आदर्श-लक्ष्य सूर्य सविता हो तो वह ब्रह्म का दर्शन ही नहीं उन्हें प्राप्त भी कर सकता है।
विज्ञान वेत्ताओं ने इस संसार में ऐसी शक्ति का अस्तित्व पाया है, जो पदार्थ का हलचल करने के लिए और प्राणियों को सोचने के लिए विवश करती है। यही वह मूल प्रेरक शक्ति है जिससे निश्चेष्ट को सचेष्ट और निस्तब्ध को सक्रिय होने की सामर्थ्य मिलती है, वस्तुओं और प्राणियों की तरह-तरह की हलचलें इसी के प्रभाव से संभव हो रही हैं। समस्त अज्ञात और विज्ञात क्षेत्र के मूल में यही तत्व गतिशील है और अपनी गति से सबको अग्रगामी बनाता है। वैज्ञानिकों की दृष्टि में इसी जड़-चेतन स्तरों की समन्वित क्षमता का नाम प्राण है। पदार्थ को ही सबकुछ मानने वाले प्रैविटी, ईथर,मैगनेट के रूप में उसकी व्याख्या करते हैं अथवा इन्हीं की उच्चस्तरीय स्थिति बताते हैं। चेतना का स्वतंत्र अस्तित्व मानने वाले विज्ञानी उसे “साइकिक फोर्स” या “लेटेन्ट हीट” कहते है।
ऋषियों ने इन तत्व की गहराइयों का अन्वेषण करके इस चेतन की जीवनी शक्ति के रूप में अनुभव किया है। उनके अनुभव के अनुसार जीवन का सार तत्व प्राण है। यही प्रगति का आधार है। समृद्धि उसी मूल्य पर खरीदी जाती है। यह प्राणतत्व अपने भीतर प्रचुर परिणाम में भरा पड़ा है। उसका चुम्बकत्व बढ़ा देने पर विश्व प्राण से भी उसे अभीष्ट मात्रा में उपलब्ध और धारण किया जा सकता है। मानवीय सत्ता में सन्निहित यह प्राण भण्डार सामान्यतया प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है। उसे साधना विज्ञान के आधार पर जाग्रत किया जा सके तो सामान्य में से असामान्य का प्रकटीकरण हो सकता है।
ऋषियों और वैज्ञानिकों के शोध प्रयासों की व्यापकता और गहराई में अंतर भले हो पर दोनों ने निर्विवाद रूप से विश्व में जीवन चेतना के स्पंदन फैलाने वाले प्राण तत्व का उद्गम स्रोत सूर्य को माना है। 1973 ई. के अगस्त में विख्यात अमेरिकन पत्रिका “न्यू सायन्टिस्ट” में आणविक जीव विज्ञानी डॉ. फ्राँसिस डॉ. फ्रिक और डॉ. लेसली ने अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है विश्व में जीवन और प्राण के स्पंदन सूर्य से ही प्रकट हुए है।अपनी इस स्वीकारोक्ति के बावजूद वैज्ञानिक इस तत्व की गहनता में प्रवेश नहीं कर पाते। जबकि भारतभूमि के पुरातन वैज्ञानिक तत्वदर्शी ऋषियों ने यह रहस्यमयी प्राण विद्या आविष्कृत की। जिसके आधार पर की गयी सूर्य-साधना व्यक्तित्व के अलौकिक क्षमताओं, सामर्थ्यों को विकसित करने वाली होती है।
इस संदर्भ में उपनिषदों के एक विवरण के अनुसार प्राण तत्व की शोध में संलग्न सुकेशा, सत्यकाम, गार्ग्य, कौसल्य, वैदर्मी तथा काबंधी यथार्थ समाधान पाने के लिए महर्षि पिप्पलाद के पास गये। जिज्ञासा एक ही थी-प्राण का उद्गम स्रोत क्या है? जिज्ञासा का समाधान करते हुए पिप्पलाद ने गंभीर स्वर में कहा-
“आदित्यो हं वै प्राणो रयिरेव चंद्रमा रयिर्वा एतर्त्सव द्यन्मूर्त च तस्मान्मूर्तिरेव रयि॥ अथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान रश्मिषु संनिधत्ते॥
यद्दक्षिणाम......सहस्ररश्मि शतधा वर्तमान प्राणः प्रजानाँ मुदत्येष सूर्यः ॥” प्रश्नो. 1-5-8॥
“निश्चय ही आदित्य ही प्राण और चंद्रमा ही रयि है। सभी स्थूल और सूक्ष्म मूर्त और अमूर्त रयि ही है अतः मूर्ति ही रयि है। जिस समय उदय होकर सूर्य पूर्व दिशा में प्रवेश करते हैं, उससे पूर्व दिशा के प्राणों को सर्वत्र व्याप्त होने के कारण अपनी किरणों में उन्हें प्रविष्ट कर लेते है। इसी प्रकार सभी दिशाओं को वे आत्मभूत कर लेते है। इसी प्रकार सभी दिशाओं को वे आत्मभूत कर लेते हैं। वे भोक्ता होने के कारण वैश्वानर, विश्वरूप प्राण और अग्नि रूप में प्रकट होते हैं। ये सर्वरूप ज्ञान संपन्न, समस्त प्राणों के आश्रयदाता सूर्य ही सम्पूर्ण प्रजा के जनक हैं। “
सूर्य के माध्यम से प्रस्फुटित होने वाला महाप्राण परब्रह्म परमात्मा का वह अंश है जिससे इस विश्व ब्रह्मांड का संचालन होता है। एक से अनेक बनने का ब्रह्म संकल्प ही महाप्राण बन का फूट पड़ा है। यह निर्झर जिस दिन तक झर रहा है उसी दिन तक सृष्टि है। जिस दिन परम प्रभु उस संकल्प को समेट लेंगे उसी दिन महाप्राण शाँत हो जायेगा और फिर महाशून्य के अतिरिक्त और कुछ भी शेष न रहेगा। यह ब्रह्म संकल्प महाप्राण-परब्रह्म की सत्ता असीम है उस अनंत, असीम, अचिंत्य का भाग जो सृष्टि के संचालन में उसकी समस्त प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित रखने में लगा हुआ है। उस महाप्राण को ही सूर्य की आत्मा-सविता देवता समझना चाहिए। प्राणी की जीवधारी का सीधा संबंध उसी से है।
जीवन की बाह्य और आँतरिक सुव्यवस्था के लिए प्रगति और शाँति के लिए परब्रह्म की महाप्राण सत्ता को अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करना प्राणी को अभीष्ट होता है। इसी प्रयोजन की पूर्ति प्राण-विद्या के माध्यम से सविता देवता की उपासना से की जाती है। यह प्रक्रिया सूर्य की आत्मा सविता शक्ति के साथ उपासक के साथ संबंधित करती है। जिसके द्वारा वह परब्रह्म महाप्रयाण को अपने शरीर और अन्तःकरण में आवश्यक मात्रा में धारण करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शाँति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
यह महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य आयुष्य, तेज, ओज, बल, उत्साह, स्फूर्ति, प्रफुल्लता, साहस, एकाग्रता, स्थिरता, धैर्य, संयम आदि सद्गुणों के रूप में देखा जा सकता है। जब उसका अवतरण अध्यात्मिक क्षेत्र में होता है तो त्याग, तप, श्रद्धा, विश्वास, दया, उपकार प्रेम विवेक आदि के रूप में दिखायी देता है। तीनों ही क्षेत्र उस महाप्राण से जैसे-जैसे भरते जाते हैं, वैसे ही मनुष्य अपूर्णता से पूर्णता की ओर लघुता से विभुता की ओर तुच्छता से महानता की ओर बढ़ने लगता है।
श्रुति में प्राण को प्रत्यक्ष ब्रह्म मानकर उसका अभिनंदन किया गया है।
“वायोत्वं प्रत्यक्ष ब्रह्मसि” (ऋग्वेद)
“हे प्राणवायु आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं”
प्राणायनमो यस्य सर्व मिदं वशे यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन्त्सर्व प्रतिष्ठितम् (अथर्व.)
“उस प्राण को नमस्कार है जिसके वश में सब कुछ हैं जो सबका स्वामी है, जिसमें सब समाये हुए है। उपनिषदों में भी ऐसे वर्णन मिलते है।”
प्राणो भवेत् परब्रह्म जगत्कारणमव्ययम् प्राणो भवेत् तथा मंत्र ज्ञान कोश गतोऽपिवा॥ -ब्रह्मोपनिषद्
“प्राण ही जगत का कारण परब्रह्म है। मंत्र ज्ञान तथा पंचकोश प्राण पर आधारित है।”
प्राणाग्नय एवास्मिन ब्रह्म पुरे जाग्रति। -प्रश्नोपनिषद्
“इस ब्रह्मपुरी में प्राण की अग्नियाँ ही सदा जलती रहती है।”
आरण्यक और ब्राह्मण ग्रंथों में प्राण को प्रजा आयु और अमृत कहा गया है-
प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्या। तं भामायुरमृत भित्युपास्स्वाऽऽयुः प्राणः प्राणो वा आयुः। यावद्स्मिञ्छरीरे प्राणो वसति तावदायुः। प्राणेन हि एवास्मिन् लोकेऽमृतत्वमाप्नोति। शंखायन आरण्यक 5-2
“मैं ही प्राण रूप प्रज्ञा हूँ। मुझे ही आयु और अमृत जानकर उपासना करो। जब तक प्राण है, तभी तक जीवन है। इस लोक में अमृतत्व प्राप्ति का आधार प्राण ही है।”
अमृतमु बै प्राणः -शतपथ 9-1-2-32
प्राण ही निश्चित रूप से अमृत है। सात प्राण ही सात ऋषि हैं। सप्त ऋषियों को ज्ञान, तप और अध्यात्म बल का प्रतीक माना जाता है। यह ऋषि सप्त प्राणों के रूप में हमारे अंदर मौजूद हैं। प्राण-विद्या के द्वारा इन्हें अपने अंतस् में जाग्रत करके साधक ऋषि तत्व को धारण का अधिकारी बनता है।
ऐतरेय ब्राह्मण में आता है कि हिरण्यइन नामक ऋषि के प्राण के स्वरूप को जाना और उपासना की। फलस्वरूप उन्हें विपुल सत्परिणाम प्राप्त हुए। प्राण स्वयमेव ऋषि है। मंत्र द्रष्टा ऋषियों का ऋषित्व उनके शरीर पर नहीं वरन् प्राण पर अवलंबित है। इसलिए विभिन्न ऋषियों के नाम से उसका ही उल्लेख हुआ है। इंद्रियों के नियंत्रण को कहते हैं गृत्स। कामदेव को कहते है “मद”। यह दोनों ही कार्य प्राणशक्ति के द्वारा संपन्न होते हैं, इसलिए उसे “गृत्समद” कहते है।
विश्वं मित्र यस्य असौ विश्वामित्रः। प्राण का यह समस्त विश्व अवलंबन होने से भिन्न है, इसलिए उसे विश्वामित्र कहा गया है। वंदनीय, सेवनीय, भजनीय और श्रेष्ठ होने के कारण उसे वामदेव कहा गया है। सर्वं पाप्यनोऽत्रायत इति अत्रिः। सबको पाप से बचाता है इसलिए वही अत्रि है। इस वाज रूप शरीर का भरण करने से भारद्वाज भी वही है। विश्व में सबसे श्रेष्ठ विशिष्ट होने से वशिष्ठ भी वही हुआ। इसी प्रकार प्राण के अनेक नाम ऋषि बोधक है।
प्राणा वा ऋषयः। इमौ एव गौतम भरद्वाजौ। अयमेव गौतमः अयं भरद्वाज। इमौ एव विश्वामित्र जमदग्नी।
अयमेव विश्वामित्रः अयं जमदग्निः इमौ एव वशिष्ठ कश्यपौ। अयमेव वशिष्ठः अयं कश्यपः। वागे वात्रिः।
सात प्राण ही सात ऋषि हैं। दो कान गौतम और भारद्वाज। दो आंखें विश्वामित्र और जमदग्नि हैं। दो नासिका छिद्र वशिष्ठ और कश्यप हैं। वाक् अत्रि है।
इन सातों प्राणों का स्रोत महाप्राण सविता देवता स्वयं है। इसकी आराधना से ऋषित्व उपलब्ध होता, विभूतियाँ व्यक्तित्व को सौंदर्य मण्डित करती है। इसी तत्व का स्पष्टीकरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर विस्तारपूर्वक किया गया है।
प्राणो वै अर्कः - शतपथ 10-4-7-23
प्राण सूर्य है।
स एष वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणेऽग्नि रुदयते -प्रश्नोपनिषद् 1-7
सूर्य के उदय होने पर सारे विश्व में प्राणाग्नि का संचार होने लगता है।
योऽसौ तपःन्नुदेति स सर्वेषाँ भूतानाँ प्राणानाँ दायोदेति
“इस सूर्य से ही सब प्राणियों को प्राण प्राप्त होता है।”
स एष वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणाग्नि रुदयते।
“यह प्राण ही सर्वव्यापी अग्नि के रूप में प्रकट होता है।”
आदित्यो वै बाह्यप्राण उदयत्येषत्द्येनं चाक्षुष प्राणामनुग्रहणीते। -प्रश्नोपनिषद् 1-7
“बाह्य जगत में यह प्राण आदित्य रूप होकर दसों दिशाओं में विद्यमान है। “
विश्व रुपं हरिणं जातवेद सं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम्। सहस्र रश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामदयत्येष सूर्यः ॥ (शतपथ)
विश्वरूप, व्यापक, सर्वाधार, प्रकाशवान, तप्तकिरणों वाला सहस्र रश्मियों वाला यह सूर्य समस्त जीवों का प्राण होकर उदय होता है।
सूर्याद भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु सूर्ये लयं प्रान्पुवन्तियः सूर्यः सोऽहमेव च॥
“सूर्य से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं उसी से उनका पालन होता है, उसी में वे लय हो जाते हैं, जो सूर्य है, वहीं मैं हूँ।”
गायत्री का देवता-सविता सूर्य विश्व के जीवन का ज्ञान और विज्ञान का केन्द्र भी है। चारों वेद में जो कुछ है वह सब भी इस सविता शक्ति का विवेचन मात्र है। तप, श्रद्धा और साधना के द्वारा योगी जन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते है। नाम-रूप सुविधानुसार कोई माना जाय-वस्तुतः यह सविता देवता ही सबका उपास्य है। उसी को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है।
उद्यन्तं वादित्यामग्निसु समारोहति। सुषुम्नः सूर्यरश्मिः चंद्रमा गंधर्वः ॥
“इस सूर्य के अंतर्गत ही अग्नि, सुषुम्न, चंद्र, गंधर्व आदि हैं।”
अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मा नमन्विण्यादित्यमधिः जयंते एतद्वै प्राणानामाय तनमेतदमृतममतमे तत्परायण मेतस्यान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः।
“तपः ब्रह्मचर्य, श्रद्धा तथा विद्या द्वारा जो आत्मा की खोजकर उस आदित्य को प्राप्त करते हैं वे पुनः जन्म नहीं लेते यह आदित्य ही प्राणों का आश्रय है। वहीं मोक्ष है, वही पद है, जीव को उसी से परम आश्रय मिलता है। “
भवद्भूतं भविष्यं च जंगमंस्थावरं चयत्। अस्यैकं सूर्यर्मेवैकं प्रभवं प्रलयं विदुः॥
असतश्व सतश्चैव योनिरेषा प्रजापतिः। तदक्षरं चाव्ययं च यच्चैतद ब्रह्मशाश्वम्॥
कृर्त्वैवहि मिधात्मान्नेषु लोकेषुतिष्ठति। वेदान् यथायथं सर्वान निवेश्य स्वेषु रश्मिषु ॥ क्त सूर्योपनिषद्
जो जड़ चेतन पदार्थ इस संसार में अब मौजूद हैं भूतकाल में थे या भविष्य में होंगे वे सभी सूर्य से उत्पन्न हुए और उसी में लीन होते हैं। यह सूर्य ही प्रजापति है। यह सत् और असत् की योनि है। अक्षर, अव्यय शाश्वत ब्रह्म यही है। यह तीनों लोकों में व्याप्त है। समस्त देवता इसी की किरणें है।
आदित्योह्यदि धूतत्वात प्रसूत्या सूर्य उच्यते। परं ज्योतिः तमः पारे सूर्योऽयं सवितेति च॥ -सूर्य सिद्धाँत
“वह समस्त जगत का आदिकारण है इसलिए उसे आदित्य कहते हैं। सबको उत्पन्न करता है इसीलिए सविता कहते हैं। अंधकार को दूर करता है, इससे उसे सूर्य कहा जाता है। “
अथादित्य उदयन्य प्राची दिशं प्रविशति तेन प्रच्यान् प्राणान रश्मिषु संनिधत्ते। यद्दक्षिणाँ यत् प्रतीची यदुदीची यदधो यदहर्थ यइन्तरा दिशो यर्त्सव प्रकाश यति तेन सर्वान् प्राणान रश्मिषु संनिधत्ते। -प्रश्नोपनिषद्
“पूर्व में उदय होता हुआ सूर्य अपनी किरणों से पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण नीचे ऊपर तथा उनके कोणों की सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है। उसकी किरणों में समस्त जगत का प्राण धारण किया जाता है। “
अपश्यं गोपायमनि पद्यमान् माच पराच पथिभिश्चरंतम् स सन्धीचीः स विषूचीर्वसान आनरीवर्ति भुवनेष्वन्न्तः - ऐतरेय
“मैंने प्राण को देखा है। साक्षात्कार किया है यह प्राण सब इंद्रियों का रक्षक है। यह कभी नष्ट नहीं होता। यह नाड़ियों द्वारा शरीर में दौड़ता रहता है। मुख और नासिका द्वारा यह आता और जाता है। यह शरीर में वायु रूप है, पर ब्रह्मांड में सूर्य रूप है। “
तेन संसार चक्रेऽस्मिन भ्रमतीत्वेच सर्वदा। तदर्थ ये प्रवर्तंते योगिनः प्राण धारणे॥ तत एवालिखा नाड़ी निरुद्धाचाष्ट वेष्टनम्। इयं कुँडलिनी शक्ति रंध्रंत्यजति नान्यथा॥ - गोरक्ष
इसी को ही शक्ति से जीवधारी इस संसार में गतिमान रहते है। इसी से ही योगी लोग दीर्घ जीवन प्राप्त करते हैं। इसी प्राण के कारण ही इंद्रियाँ सशक्त और निरोग रहती हैं। प्राण के अभ्यास से ही नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं और तभी कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है।
इसका एक अत्यंत महत्वपूर्ण विज्ञान है। सूर्य साधना से इस विज्ञान को प्रत्यक्ष किया जाता है। गायत्री महामंत्र सूर्य की रहस्यमयी प्राण विद्या ही है। जिसके द्वारा प्राण को जगाया और उसके रहस्यों को अनुभव किया जाता है। जिसने अपने प्राण को जगा लिया उसके लिए चारों ओर जाग्रति ही जाग्रति है। सब दिशाओं में प्रकाश ही प्रकाश है। सोता वही है जिसका प्राण सोता है। जिसकी प्राणशक्ति जम गई, इस संसार में वही जाग्रत माना जाता है। उसी के सामने इस विश्व का वह रहस्य प्रकट होता है जो सर्वसाधारण के लिए छिपा हुआ है।
तदाहुः कोऽस्वप्नुमर्हति यद्वाव। प्राणो जागार तदेव जागरितम् इति॥ -ताण्डय़. 10-4-4
कौन सोता है? कौन जागता है? जिसका प्राण जागता है वस्तुतः वही जागता है।
य एवं विद्वान्प्राणं वेद रहस्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तयेव श्लोकः -प्रश्नोपनिषद् 3-11
जो विद्वान सविता की प्राण-विद्या के रहस्य को जानता है उसकी परम्परा कभी नष्ट नहीं होती। अमर हो जाता है। निश्चित ही सविता आराधना द्वारा प्राण का ज्ञान एवं जागरण ही अमृतत्व एवं मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग है। उसी से यह लोक और परलोक सुधरता है। इसी भौतिक और आध्यात्मिक विभूतियाँ प्राप्त होती है।
गलित कुष्ठ पीड़ा से भी कहीं अधिक असहनीय हो रही थी स्वजनों की उपेक्षा। द्वारिकापुरी के सात अतिरथी वीरों में भी प्रधान कहे जाने वाले साम्ब व्याकुल थे। सारे उपचार व्यर्थ हो चुके थे। हारकर वे अपने पिता श्रीकृष्ण के पास जाकर बोले- महाराज! कुष्ठ रोग से गलते जा रहे शरीर की पीड़ा अब मेरे लिए असहनीय हो गयी है। आपकी आज्ञा पाकर अब मैं प्राण त्यागना चाहता हूँ। आप मुझे इसकी अनुमति दें।
महायोगेश्वर श्रीकृष्ण क्षण भर विचार कर बोले-पुत्र! मैं तुम्हें रोग निवारण का उपाय बताता हूँ, सुनो। तुम श्रद्धापूर्वक सूर्य नारायण की आराधना करो। सारा जगत इन्हीं से उत्पन्न हुआ है इन्हीं में लीन हो जायेगा। तुम यदि अपना कष्ट मिटाकर संसार में सुख भोगना चाहते हो तो सूर्य भगवान की शरण में जाओ।
पिता की आज्ञा पाकर साम्ब चंद्रभागा नदी के तट पर भिन्न बन में उपवासपूर्वक सूर्य के मंत्र का अखण्ड जप करने लगे। साम्ब की अटल भक्ति, कठोर तपस्या, श्रद्धायुक्त जप और स्तुति से प्रसन्न होकर सूर्यनारायण ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये और बोले वत्स! तुम्हारा शरीर स्वस्थ हो जीवन ऐश्वर्यमय बने। साम्ब ने गदगद स्वर से कहा देव! यदि मुझ पर प्रसन्न हैं तो वरदान दें कि जो भी भक्तिभाव से रविवार का उपवास एवं आपके मंत्र का जप करें वह भी जीवन की इन विभूतियों को पा सके। एवमस्तु। भगवान सूर्य की परावाणी गूँजी। इसकी गूँज आज भी सूर्य आराधक अपनी उपासना में सुन सकते हैं।
विश्व रचना के दो प्रभाव तत्व है। पहला-प्राण दूसरा भूत। इन दोनों तत्वों का जहाँ भी मिलन हो जाता है, वहीं गतिमान या क्रियाशील जीवन के दर्शन होने लगते है। केवल भूत पदार्थ प्राण के बिना स्पन्दित नहीं हो सकता। इसलिए भौतिक जगत में जहाँ भी जीवन तत्व है, वह प्राण ही है इसे ही गायत्री कहते हैं ऐसी ऋषियों की मान्यता है।
मनुष्य में भूत व प्राण दोनों ही शक्तियाँ स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। बचपन में छोटा-सा पंच भौतिक पदार्थों का पिण्ड छोटा-सा प्राण धारण किये हुए था। तब उसकी शक्ति और तेजस्विता कम थी पर जैसे-जैसे शरीर का विकास होता है, प्राण की मात्रा बढ़ने के साथ शक्ति और क्रियाशीलता भी बढ़ती है। अवस्था के क्रम में बाल्यावस्था, यौवन और वृद्धावस्था को गायत्री की समिधा कहा गया है क्योंकि प्राण तत्व इन्हीं में जलता है। उसके बाद दोनों तत्व फिर अलग-अलग हो जाते है। प्राण निकल जाता है और पंचसूत्रों से बना निताँत प्राकृत शरीर पड़ा रह जाता है। इस छूटे हुए शरीर को ऋग्वेद में-
यद् गायत्रे अधि गायत्र माहितम्। 1-164-23
अर्थात् “पंचभूतों से बना शरीर मर्त्य मर्त्य गायत्री है। इसमें सोचने, समझने, सुख-दुःख अनुभव करने क्षोभ और विकलता व्यक्त करने वाली शक्ति प्राण थी। शरीर निस्पंद और अनुभवहीन होता है। इसलिए सुख-दुख ही नहीं मनुष्य जीवन की सारी हलचल, परिवर्तन, गति, उन्नति, अवनति का कारण भी प्राण ही है।”
अधिक सूक्ष्मता से विचार करने पर स्पष्ट होता है कि जो प्राण शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में क्रियाशील रहता है, वह भी भौतिक है। किरणें, ज्योति या अग्नि जैसा कोई स्थूल तत्व कह सकते हैं। उसे नियंत्रित और प्रेरित करने वाली एक तीसरी मनोनयन शक्ति है। इसी की इच्छा और संकल्प शक्ति से शरीरगत व्यापार चलते हैं। इसलिए गायत्री इस एक शब्द में ही पंच भौतिक प्राण में मन-त्रिक शक्ति का समग्र रूप आ जाता है। शास्त्रों में इसे भौतिक क्लेश और प्रपंच से मुक्ति दिलाने वाली विद्या कहा गया है।
गायत्री का आविर्भाव कहाँ से होता है? यह सवाल उठता है उपनिषद्कार कहते हैं-
“देवात्म शक्तिं स्वगुणे निगूढ़ः”
देव माया या इंद्र शक्ति ही वह सत्ता है जो विश्व गायत्री अर्थात् अनेक रूप में विकसित होती है। यह देवशक्ति या इंद्र कौन है-”तस्य दृश्यः शतादशः”
सूर्य ही वह इंद्र है जिसकी हजारों किरणें हैं। एक-एक किरण एक-एक रूप है। इन किरणों में प्राण शक्ति भरी होती है। सूर्य को त्रयी विद्या भी कहा गया है, अर्थात् सूर्य स्वयं भी एक वैसी ही गायत्री है जिस तरह की एक गायत्री शरीर प्राण और मनोनयन रूप में धरती में विद्यमान रहती है। इस तरह यदि सूर्य को एक विराट पुरुष की संज्ञा प्रदान करें जो एक व्यापक क्षेत्र में बिलकुल मनुष्य की तरह क्रियाशील रहता है। सोच-विचार भी कर सकता है, विकल और क्षुब्ध हो सकता है। दंड और पुरस्कार दे सकता है। हर्ष और शोक, संतोष और असंतोष व्यक्त कर सकता हैं तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
अब तक यह विषय हमारी श्रद्धा का रहा है। अर्थात् उसके हृदय में वैराग्य और श्रद्धा उत्पन्न होती थी वह यह मान लेता था कि “निखिल आकाश या किसी लोक में गायत्री नाम की कोई देवी बैठी होगी, जो हमारे आँतरिक भावों को सुन और समझकर अपने वरदान दे सकती होगी। “ पर अब उनके विराट पुरुष को विज्ञान ने इस तरह सिद्ध कर दिया है कि जिनके हृदय में उस रूप से भाव विह्वलता न हो तो वे भी इस प्राण पुरुष से अपना संपर्क स्थापित कर उसी प्रकार लाभान्वित हो सकते है जिस तरह बड़े बिजली घर से संपर्क स्थापित करके छोटा बिजली घर भी प्रकाशमान हो उठता है।
मनुष्य एक छोटी गायत्री है, सूर्य एक विराट गायत्री। छोटी गायत्री को जब विराट गायत्री के साथ जोड़ देते है तो वह भी वैसी ही शक्ति और संपन्नता अनुभव करने लगती है जैसे धनवान पिता का पुत्र पास में कुछ न होने पर भी अपने पिता की तरह ही धन का अभिमान और कुछ भी क्रय कर सकने का विश्वास कर सकता है। अर्थात् गायत्री के विराट स्वरूप को पा जाने पर मनुष्य भी उतनी ही क्षमता वाला हो सकता है जितनी सूर्य भगवान की क्षमता है। इसे ही सिद्धि कहते है।
यह जानना जरूरी है कि क्या सचमुच सूर्य मनुष्य की तरह त्रिकशक्ति वाला विराट पुरुष है जिसमें मनुष्य की तरह संवेदनशीलता हो सकती है? सूर्य रश्मियों के वर्णन में वैज्ञानिक यह कहते है कि यह तीन रंगों का (सात रंग इन रंगों के मिश्रण से बनते हैं मूल रंग तीन ही हैं) सम्मिश्रण है। स्पेक्ट्रोमीटर के द्वारा इन रंगों को अलग-अलग भी कर दिखाया जा सकता है। यदि मनुष्य और सूर्य में ऐसा कुछ साम्य है तो मनुष्य शरीर में भी इन रंगों को परिलक्षित होना चाहिए पर यहाँ तो रक्त का रंग भी लाल है। फिर साम्य कहाँ हुआ?
लेकिन विज्ञान के विद्यार्थियों को पता होगा कि रक्त का रंग लाल नहीं है। कई तथ्यों के सम्मिश्रण से वह लाल दिखायी देता है। अन्यथा रक्त के कोषाणु विशुद्ध पीले रंग के होते हैं। आजकल पूर्ण मृत्यु का पता लगाने के लिए त्वचा में यूरेनाइन नाम का इंजेक्शन दिया जाता है। यदि मनुष्य की मृत्यु नहीं हुई और रक्त संचार हो रहा होता तो त्वचा का रंग पीला और हरा हो जाता है। नीला रंग राल रंग की गहराई के कारण दृश्य नहीं हो पाता। अन्यथा इस विधि से शरीर की इस त्रिक शक्ति का स्पष्ट विश्लेषण हो जाता है। मृत देह में इंजेक्शन का कोई असर नहीं होता।
प्रत्यक्ष में निर्विकार दिखायी देने वाले सूर्य के संबंध में सर्वप्रथम इन्गोल स्टाड के पादरी क्रिस्टाफ शाइनर ने एक संदेश अपने अध्यक्ष पादरी को दिया था कि उसमें काले-काले धब्बे विद्यमान हैं। लेकिन अरस्तू के ग्रंथ में ऐसा कुछ न था। इसलिए बेचारे शाइनर की कड़ी डॉ.ट-फटकार सुननी पड़ी। किंतु सौभाग्य से उन्हीं दिनों गैलीलियो ने दूरदर्शक यंत्र की सहायता से इस बात की पुष्टि कर दी कि सूर्य में सचमुच विभिन्न वर्णों के धब्बे दिखायी देते हैं और यह धब्बे हलचल करते है। कभी फूट कर फैल जाते हैं कभी एक धब्बा लुप्त हो जाता है, उसके पास का धब्बा कौंधने लगता है। कई बार वे कई भागों में बँट जाते हैं। पहले ही इन हलचलों का कारण वैज्ञानिक नहीं जान सके थे, पर धीरे-धीरे पता चला कि यह सब तपी हुई गैसों के बहुत बवण्डर हैं और वे बिल्कुल मनुष्य की सी इच्छा शक्ति से मेल खाते हैं।
सूर्य की इस दमक के साथ जो प्रकाश फूटता है उसे फ्लेयर कहा जाता है और उस समय जो प्रकाश सर्पिलाकार लहरों में दौड़ता है-वह फिलामेण्ट कहलाता है। अब इनके संबंध में कई आश्चर्यजनक तथ्य सामने आने से वैज्ञानिक यह मानने को सहमत हो रहे हैं कि सूर्य के अंदर संवेदना व्याप्त है। अर्थात् यह हलचल विकलता, शोध, प्रसन्नता और क्रोध जैसी भावनाओं के स्थूल स्पंदन हैं और जिस तरह विचारों का प्रभाव मनुष्य के शरीर पर पड़ता है। उसी प्रकार यह विकलताएँ भी प्रकृति में भारी हलचलें उत्पन्न करती रहती है। विकलता की स्थिति में सूर्य विशेष प्रकार के सूक्ष्मकण और किरणों के अंबार छोड़ता है जो बड़े वेग से चलकर करोड़ों मील तक अपना प्रभाव डालते हैं। यहाँ तक कि चुम्बकीय क्षेत्र को भी मथ डालते हैं। ऐसे समय कुतुबनुमा की सुई तक काँपने लगती है।
इनका प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है तो उससे हिमपात ओले, अनावृष्टि, वृक्षों की वृद्धि, बाढ़, वर्षा झंझावात, ताप और शीत की मात्रा में तीव्रता से परिवर्तन आदि दृश्य उपस्थित होते हैं। इतना ही नहीं विगत दिनों इनके प्रभाव राजनीतिक आर्थिक, सामाजिक एवं भावनात्मक क्षेत्र में भी देखे गये हैं। कुछ महीने पूर्व “साँइटिफिक अमेरिकन” पत्रिका में प्रकाशित विज्ञानवेत्ता एम. ममफोर्ट के शोध पत्र “सनस्पाटः एक्खिनेस एण्ड इफेक्टस” के अनुसार सूर्य से एक प्रकार की आँधी चल पड़ी है और वहाँ इस समय तेजी से विकलताएँ परिलक्षित हो रही है। उनका पृथ्वी पर तेज प्रभाव होगा। प्राकृतिक हलचलें तीव्र होंगी। वायु दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ेगी मानवीय संकट बढ़ेंगे।
यह आपदाएँ 6-7 वर्षों तक बनी रह सकती हैं। सूक्ष्मदर्शियों के अनुसार ये हलचलें सूर्य की मनोमय क्राँति है और उनका यह विश्वास है कि इससे विश्व के भूगोल में कितने ही बड़े और भयंकर परिवर्तन क्यों न हों पर भारतीय संस्कृति को उससे संरक्षण ही मिलेगा। इसके अभ्युत्थान के मूल में उन विराट पुरुष की ही इच्छा काम कर रही है। चाहे इसे कोई वैज्ञानिक दृष्टि से मान ले अथवा श्रद्धापूर्वक स्वीकार कर ले। सूर्यदेव की इस मनोनयन प्रकृति के अलावा उनकी प्राणशक्ति और पंचभौतिक प्रकृति भी है।
शरीर में जितनी धातुएँ रासायनिक तत्व आदि हैं, वह सब सूर्य में ही है। मनुष्य का शरीर सूर्य और पृथ्वी के तत्वों के सम्मिश्रण से बना है। इसलिए शारीरिक और मानसिक दृष्टि से शरीर पृथ्वी से ही प्रभावित नहीं होते वरन् उन पर सूर्य का भी प्रचण्ड हस्तक्षेप रहता है। हम यदि शरीर पर विचार करें तो प्रतीत होगा कि अन्न जल आदि पृथ्वी का रस सेवन करने से हमारे शरीर में आक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, लोहा गंधक, सोडियम, कैल्शियम आदि विभिन्न तत्व उत्पन्न होते है। वहाँ उसमें इन तत्वों से भी सूक्ष्म प्राण शक्तियाँ भी क्रियाशील हैं। प्राण के द्वारा ही हमारे शरीर में स्पंदन है। छींकना, जम्हाई लेना, अपान, वायु का विसर्जन, निद्रा, पलक झपकना आदि क्रियाएँ प्राण के द्वारा ही संभव है। इस प्राण और पंचभौतिक प्रकृति को सूर्य विज्ञान के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है। मनुष्य की तरह प्राण पंचभौतिक प्रकृति और मनोमय क्रियाशील तीनों ही अंग सूर्यदेव में विद्यमान है।
हम उनको आत्मा के रूप में “गायत्री” के रूप में ध्यान और धारण करते हैं, चाहे तो उनकी कल्पना एक विराट पुरुष के रूप में भी कर सकते है। यह निश्चित है कि जिस तरह मनुष्य का एक छोटा-सा अहंभाव है, सूर्य का भी वैसा अहंभाव संभव है और जिस तरह हम किसी तेजस्वी महात्मा के वरदान द्वारा प्राण प्राप्त कर सकते हैं। इन प्राण पुरुष गायत्री के तत्व देवता-सविता से और अधिक विश्वासपूर्वक ऐसे आशीर्वाद और स्नेह प्राप्त कर सकते हैं। शर्त इतनी भर है कि यदि हम उनको अपनी श्रद्धा और निष्ठा से उसी तरह प्रभावित कर सकें, जिस तरह पुत्र अपने पिता को प्रसन्न करके स्नेह के साथ उनकी अन्य भौतिक वस्तुओं का भी अधिकार प्राप्त कर लेता है।
अभी यह रहस्य और विस्तृत होने वाले हैं। अभी वैज्ञानिकों को ध्यान की प्रणाली का पूरा-पूरा ज्ञान नहीं है। जिस दिन इस विद्या की वैज्ञानिक जानकारी देनी संभव हो जायगी उसी दिन उपासना श्रद्धा और भक्ति आदि का रहस्य भी प्रकट हो जायेगा और सिद्धियों सामर्थ्यों की बात भी सत्य साबित हो जायेगी। सूर्य भगवान का दृश्य और अदृश्य क्रिया क्षेत्र पृथ्वी ही नहीं अनेक ग्रह नक्षत्रों तक व्याप्त है। मनुष्य की दृश्य शक्ति उसकी आँखें ऐसी नहीं हैं कि वह उतने व्यापक क्षेत्र को देख सके। किंतु जब वह अपना संबंध सूर्यदेव के साथ जोड़ लेता है, तो वह भी उसी तरह ने केवल पृथ्वी की हलचलों और परिवर्तनों का जानकार हो जाता है वरन् उसे ब्रह्मांडों के भी रहस्य ज्ञात होने लगते है। यही नहीं वह एक अंश तक उन परिवर्तनों के साथ अपनी सम्पत्ति जोड़कर उन्हें कुछ कम या ज्यादा कर सकता है।
हजारों वर्ष पूर्व प्राण विद्या के आचार्यों ने कहा था-
तेजसा वै गायत्री प्रथमं त्रिरात्रं दाधार पदैद्वितीयमक्षरै स्तृतीयम्। ता. 10-53
तेजो वै गायत्री -गो.उ. 5-3
ज्योतिवैं गायत्री छंदसाम ता. 16-7-2
अर्थात्-गायत्री एक प्रकार का तेज है जो प्रकाश और ऊष्मा के रूप में विश्व का मूल है। सूर्य गायत्री तेज का सबसे बड़ा भंडार है और विश्व के निर्माण में सबसे बड़ा कारण भी।
इसी प्रकार गायत्री के मनुष्य जीवन में प्रादुर्भाव के स्वरूप को व्यक्त करते हुए शास्त्रकार ने बताया कि “मन एवं सविता” अर्थात् मन ही सविता है। तात्पर्य यह कि जब मन और सूर्यदेव का तादात्म्य करते है तो सूर्यदेव की भर्ग शक्ति मनुष्य के अन्तःकरण में प्रवेश करती है। इसी का नाम असत् संस्कारों का निष्कासन और सत्संस्कारों का विकास है। जब तादात्म्य की स्थिति ऐसी हो जाय कि सूर्य का ध्यान करते हुए मन की अग्नि और सूर्य का रूप दोनों एक हो जायें। कोई और तब गायत्री की सम्पूर्ण अनुभूति और शक्ति का स्वामी वह मनुष्य होगा और उन क्षमताओं से प्रकृति में परिवर्तन की शक्ति से विभूषित होगा, जिनकी ऊपर व्याख्या की गई है।
मैं अंतरिक्ष के रहस्य जानूँगा। छोटे से बालक की जिद पर माता पिता झुँझलाये। पड़ोसियों ने मजाक बनाया। पर बालक पर जैसे इन सबका कोई असर न था। वह सारे दिन ग्रह पिण्डों-नक्षत्रों के संबंध में न जाने कितनी अजीब-अजीब बातें किया करता। सभी सगे संबंधी परेशान थे। उन दिनों टेलिस्कोप जैसे वैज्ञानिक साधन भी न थे कि वे बालक की कुछ मदद कर पाते।
सारे दिन वह सूर्य की ओर टकटकी लगाये बैठा रहता। कभी उसके मुख से प्रार्थना के कातर स्वर फूट पड़ते। समय बीतता गया उसकी प्रार्थना प्रगाढ़ होती गयी। एक दिन सभी हतप्रभ रह गये जब उसने सूर्यदेव की कृपा से प्राप्त दिव्य दृष्टि के सहारे यथार्थ खगोल गणनाएँ करनी शुरू कर दीं। कहते है भगवान सूर्य प्रथम बार उसकी निष्ठा, निर्भयता, की परीक्षा लेने वाराह के रूप में आये। सूर्य (मिहिर) का वाराह के प्रथम दर्शन पाने के कारण बालक का नाम वाराह मिहिर हो गया। बिना किसी यंत्र उपकरण की सहायता से की गई उनकी खगोल गणनाएँ आज के बहुमूल्य उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशालाओं में काम करने वाले खगोल विज्ञानियों को हतप्रभ किये बिना नहीं रहती।
सूर्य हाइड्रोजन-हीलियम का चमकता गोला भर है, अथवा देवता जिसकी उपासना वैदिक ऋषियों ने की। जो आज भी गुह्य विद्या के मर्मज्ञों का उपास्य है अथवा यह स्वयं सर्वव्यापी परमात्मा है। गायत्री महाविद्या के साधक जिससे एकत्व की अनुभूति करते हैं। पहेली विचित्र है, जो एक है वह तीन कैसे हो सकता है? तीनों एक में किस तरह समाहित हो सकते हैं? सवाल जितना उलझा हुआ है जवाब उतना ही सरल है।
संसार के हर तत्व की तरह सूर्य तत्व भी त्रिस्तरीय त्रिआयामी है। ये तीन आयाम हैं आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक। देवसत्ता आधिदेवत रहस्य है। मूल कणिकाएँ और भौतिक ऊर्जा विकिरण उसके भौतिक पक्ष हैं। चेतनात्मक व्यापकता इसकी आध्यात्मिकता अभिव्यक्ति है। सूर्य की तरह अग्नि वरुण आदि के संबंध में भी यही बात है। भारतीय मनीषियों ने इसको समझते हुए तीनों ही स्तरों पर उनका विवेचन विश्लेषण किया है।
इन तीनों रूपों को समझने के साधन-उपकरण माध्यम और विधियाँ अलग-अलग होती हैं। सिर्फ भौतिक विज्ञान द्वारा इन तीनों स्तरों का ज्ञान संभव नहीं होगा। आजकल का विज्ञान आधिभौतिक स्वरूप की ही खोज-बीन में जुटा हुआ है। आधिदैविक रहस्य को समझने के लिए उपकरण भी आधिदैविक ही चाहिए। भौतिक पदार्थों से बने हुए उपकरण चाहे कितने सूक्ष्म हों वे पदार्थ के रहस्य की ही खोज कर पायेंगे। भारतीय तत्वदर्शन में वर्णित देवोपासना को विज्ञान इन्हीं आधिदैवत, रहस्यों को खोजने की विद्या है, जिसके द्वारा वरुण, अग्नि, इंद्र, सूर्य, गणेश, सरस्वती, सोम, उषा, सूर्य, धन्वन्तरि, बृहस्पति आदि देव शक्तियों से संपर्क किया जा सकता है। यही नहीं उनकी विशिष्ट शक्ति-सामर्थ्य से स्वयं को समर्थ और बलवान बनाया जा सकता है। काल के प्रवाह में यह रहस्यमयी विद्या गुप्त भले हो गयी हो पर लुप्त नहीं हुई है। सभी देवता परमात्मा की विभिन्न अलौकिक शक्तियाँ हैं। किसी के भी आश्रय से उस परम प्रभु को प्राप्त करने का विज्ञान था, उसे अब केवल कल्पना ही समझा जाता है।
कणोपनिषद् में नचिकेता यम से प्रश्न करता है-
स त्वमग्नि स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहिं तं श्रद्दधानाय-मह्यमे। र्स्वगलोका अमृतत्वं भजतं एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण॥
“हे यमराज! आप स्वर्ग की साधनभूत अग्नि को जानते हैं। 1-1-13
मैं श्रद्धाप्लावित होकर आपसे पूछता हूँ कि जिनके द्वारा स्वर्गीय पुरुष अमृतत्व प्राप्त करते हैं, उस अग्नि का वर्णन कीजिए।” यह सवाल सुनकर आचार्य यम कहते है-
प्रते ब्रवीमि तदुमे निबोध स्वर्ग्यमग्नि नचिकेतः प्रजानन। अनंत लोकाप्तिभयो प्रतिष्ठो, विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् -कठ 1-1-14
“हे नचिकेता! मैं तुझे अच्छी प्रकार अग्नि का उपदेश देता हूँ। वह अग्नि स्वर्ग को प्रदान करने वाली है। अनंत लोक की प्राप्ति कराने वाली है। उसका आधार बुद्धि रूपी गुह्य में निहित है। तू उसे अच्छी प्रकार समझ लें। “
इस मंत्र में निश्चित रूप से अग्नि के परमाणविक स्वरूप को स्थिर करने का प्रयास किया गया है। मैत्रायणी उपनिषद् में उसे और अच्छी प्रकार स्पष्ट करते हुए शास्त्रकार ने बताया कि अग्नि हृदय कमल में स्थित है, वह जो अन्न खाता है वह जो मोक्षधाम द्यौ में स्थित कालाग्नि नामक परमेश्वर रूप अग्नि है, जो प्रलयकाल में समस्त भूतों को खा जाती है, अपने आप में लीन कर लेती है।
उपरोक्त कथन में अग्नि का तात्विक विश्लेषण है। एक भौतिक आग है जो पदार्थों को जलाती है। लपट और गर्मी के रूप में जिसका अहसास होता है। दैविक रूप में अग्नि देव है-जिसकी सूक्ष्म शक्ति सर्वव्याप्त है। अर्थात् अग्नि एक व्यापक तत्व है, जो दृश्य भी है, अदृश्य भी। अदृश्य अवस्था वाली अग्नि की व्यापकता ही दैवी सत्ता का बोध कराती है। शरीर मन और वाणी की तेजस्विता इन्हीं की कृपा से विकसित होती है। कालाग्नि के रूप में यही परमेश्वर है।
ऋग्वेद के 7-87-2 मंत्र में वरुण देवता की स्तुति करते हुए मंत्र द्रष्टा कहते हैं-”समस्त नदियाँ वरुण के आदेश से ही बहती हैं। यह आकाश देव हैं, अन्य देव इनके अनुयायी हैं। इनका आदेश सर्वोपरि है। यह देव जिस व्यवस्था का संरक्षक है, उसे ऋतु कहते है, विश्व सृजन के पूर्व ही “ऋतु” था। इसके रहस्य को जानने वाला ऋताचारी होता है।”
वरुण ‘वर’ धातु से बना है, जिसका अर्थ आच्छादन करना होता है। एक तत्व जो समस्त लोकों में अवस्थानुसार परिवर्तित होकर ऋतु नियमन करता है। यदि ऋतुएँ न हो तो संसार शून्य हो जाये। यह बात प्लेटो के यूनिवर्सल सिद्धाँत से बहुत मिलती-जुलती है। वैज्ञानिक आज विस्तृत रूप से ऋतु विज्ञान की खोज कर रहे हैं। इस खोजबीन में वैज्ञानिकों को कहीं भी वर्षा करा लेने का सिद्धाँत ढूँढ़ निकालने में सफलता मिल गई है। यह वरुण विज्ञान की छोटी-सी स्फुल्लिंग मात्र है। यदि यह मालूम हो सके कि ऋतु का नियमन करने वाली ऐसी कोई अदृश्य सत्ता है, जिसे ऋषियों ने वरुण देवता कहा है, तो उससे संपर्क स्थापित कर कोई व्यक्ति ऋताचारी या मौसम विज्ञान का निष्णात् और नियंत्रक हो सकता है।
सोम, उषा, अदिति के बारे में भी विस्तृत विवेचन शास्त्रों में मिलते हैं। किंतु खेद है कि आज के पढ़े-लिखे लोग देवताओं की इन शक्तियों और स्वरूपों को बालकल्पना मानकर उपेक्षित कर देते हैं। फ्लीडरट और ब्लूम जैसे पश्चिमी चिंतकों ने देवताओं के संबंध में भारतीय तत्वविज्ञान का जो मजाक बनाया था पाश्चात्य से प्रभावित व्यक्ति उसी को ठीक मानते चले आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि आज का विज्ञान इन देवशक्तियों के भौतिक स्वरूप को समझकर भ्राँत धारणाओं को खण्डित कर रहा है। देवता किसी की प्रति-कृति नहीं वरन् विशिष्ट गुण या शक्ति के प्रतीक मात्र हैं और वह शक्तियाँ सूक्ष्म जगत में सचमुच क्रियाशील हैं। विज्ञान इनके दैविक रहस्य भले न पा सका हो, पर उसने इनके भौतिक स्वरूप से याँत्रिक संपर्क पाने में जरूर सफलता पायी है। उदाहरण के लिए गणेश को असाधारण स्मृति और लेखन वाला देवता मानते हैं। पौराणिक कथा है कि व्यास जी द्वारा बोले गये 18 पुराणों को सुनकर उन्हें शब्द बद्ध कर सकने का गुरुतर कार्य गणेश जी ही सम्पन्न कर सके थे इस असाधारण मानवीय स्मृति पर अर्धदग्ध मनुष्य शंका और संदेह कर सकते है, वैज्ञानिक नहीं। आज के कंप्यूटर युग में ऐसे-ऐसे कम्प्यूटरों का निर्माण हुआ जिसे दफ्तरों बैंकों आदि के काम में दस हजार गुना तेजी आयी है। सोलह सौ फाइलें रखने में कई अलमारियां लग सकती हैं, पर इसमें कुल तीन घन फीट में इतनी फाइलों की जानकारी को सँजोया जा सकता है। जब भी चाहे किसी पन्ने को खोलकर सारा ब्योरा प्राप्त कर सकते है।
मनुष्य हाथ से जब तक एक अंक लिखता है, तब तक
कंप्यूटर से 16 बड़े-बड़े अंकों के गुणन, लघुत्तम, महत्तम समापवर्तक निकाले जा सकते हैं। इंसान ज्यादा से ज्यादा पाँच हजार शब्द याद रख सकता है पर उसकी स्मरण क्षमता 60,000 शब्दों से भी अधिक है। मनुष्य कठिनाई से चार छः भाषाएँ सीख व एक बार याद रख सकता है। कम्प्यूटर के लिए 15-15 भाषाओं का ज्ञान रखना आसान बात है। यहीं नहीं इससे एक भाषण का एक ही समय में 15 भाषाओं में अनुवाद भी किया जा सकता है।
यह स्मरण शक्ति का छोटा-सा चमत्कार है। जो गणेश सत्ता के भौतिक अणु-परमाणुओं से याँत्रिक संपर्क साधकर वैज्ञानिकों ने संपन्न किया है। भौतिक रूप से परे गणेश सत्ता की दैवी शक्ति अनंत गुना शक्तिशाली है। इसकी सविधि उपासना किसी भी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमताओं में चमत्कारी परिवर्तन ला सकती है।
सूर्य की शक्तियाँ-इन सभी देव शक्तियों में भी कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हैं। इस समूचे कालचक्र का नियंता माना गया है।
सप्त युञ्जंति रथमेक चक्र मेको अश्वो वहति सप्तनामा।
त्रिनाभि चक्र यजर भनर्व यत्रेमा विश्वा भुवामाधि तस्थु (ऋग. 1-164-2)
सूर्य के एक पहिये के रथ में सात घोड़े जुड़े हुए हैं। वस्तुतः (घोड़े सात नहीं) एक ही सात नाम का या सात जगह नमन करने वाला घोड़ा इस रथ को चलाता है। इस रथ चक्र की तीन नाभियाँ है। यह चक्र शिथिल नहीं, अत्यंत दृढ़ है और कभी जीर्ण नहीं होता। इसी के आधार पर सारे लोक स्थिर है। यह हुआ सीधा शब्दार्थ।
इसके विज्ञान पर विचार करें तो सौर जग-मण्डल सूर्य किरण क्राँत ब्रह्मांड ही सूर्य का रथ है। संवत्सर इस रथ का चक्र माना गया है। वस्तुतः संवत्सर रूपी काल ही इस अखिल जगत को फिरा रहा है। काल के कारण ही जगत घूम रहा है। इस संवत्सर रूप चक्र की तीन नाभियाँ है। अर्थात् एक साल में तीन बार जगत की स्थिति बिल्कुल पटल जाती है। वे ही तीन ऋतुएँ (शीत, ऊष्ण, वर्षा) चक्र की नाभियाँ है।
सूर्यमण्डल किसी के आधार पर नहीं है इसलिए अनर्वम् है। यह अजर है अर्थात् जीर्ण नहीं होता और इसी के आधार पर संपूर्ण लोक स्थिति है। इस व्याख्या के अनुसार सूर्यमण्डल के आकर्षण से सब लोग बँधे हुए हैं एवं सूर्य अपने ही आधार पर है। वे किसी दूसरे के आकर्षण से बँधे नहीं है। निःसंदेह काल के ही आधार पर सब हैं। काल किसी के आधार पर नहीं है। फिर काल कभी बूढ़ा भी नहीं होता।
वैज्ञानिकों ने सूर्य देव के भौतिक रूप से संपर्क कर प्रकाश, ऊर्जा और यत्किंचित् काल ज्ञान प्राप्त किया है। इसका दैविक पक्ष कहीं अधिक सशक्त और रहस्यमय है। इसकी उपासना से पवित्रता-प्रखरता, वर्चस्, तेजस जैसी सिद्धियाँ पायी जा सकती है। ब्रह्मांड के रहस्य जाने जा सकते है। लोक-लोकाँतर के रहस्यों को प्रत्यक्ष किया जा सकता है।
इस सृष्टि से सूक्ष्म देवशक्तियाँ अनगिनत रूपों में संव्याप्त है। वैज्ञानिकों ने इनके भौतिक रूप से साधकर अनेकानेक करतब प्रस्तुत किये हैं। दरअसल इनकी दैवी क्षमताएँ भौतिक क्षमताओं से लाख गुना चमत्कारी हैं। देवशक्तियों का यह विधान अपने आप में वैज्ञानिक सिद्धाँतों से अलग नहीं है। इस विज्ञान को विकसित किया जा सके तो मनुष्य की शक्ति सामर्थ्य में अनंत गुनी वृद्धि की जा सकती है।
यह देव शक्तियाँ अंतरिक्ष में अनंतकाल से विद्यमान है और उनका सूक्ष्म प्रतिनिधित्व मानव शरीर में भी भरा है। भारतीय तत्ववेत्ता इन शक्तियों के साथ संपर्क करने का आध्यात्मिक स्तर पर प्रयत्न करते रहे हैं। उपासना एवं तपश्चर्या वस्तुतः एक ऐसे उच्चस्तरीय विज्ञान का ही प्रतिपादन करती है। जिसके लिए मशीनों की नहीं वरन् पवित्रता और सात्विकता से निर्मल बने व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। सूर्य देवाधि देव है। उनसे उपासनात्मक संपर्क मानवी व्यक्तित्व को अनंत अलौकिक शक्तियों का अधिपति बनाता है।
आदित्यो हवै बाह्यः प्राण उदयत्येष हीनं चाधुषं प्राणमनुग्रह्ननः। पृथिव्या या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्याँतरा यदाकाशः स-समानो वायुव्यानि॥ तेजो हवा उदानस्तस्यादुवशाँततेजाः पुनर्भवभिन्द्रि सै संपद्यमानैः। -प्रश्नोपनिषद् 3-8-9
निश्चय ही आदित्य बाह्य प्राण है। यह इन आँखों में स्थित प्राण पर अनुग्रह करता हुआ उदित होता है। पृथिवी में जो देवता हैं वे पुरुष के अपान वायु को आकर्षण किये हुए हैं। इन दोनों के मध्य में जो आकाश है वह समान है और वायु ही व्यान है। लोक प्रसिद्ध (आदित्यरूप) तेज ही उदान है। अतः जिसका तेज (शारीरिक ऊष्मा) शाँत हो जाता है, वह मन में लीन हुई इंद्रियों के सहित पुनर्जन्म के हेतु भूत मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
योगशास्त्रों में नाभि को सूर्य चक्र कहा है। यहाँ उसे उतना ही महत्व दिया गया है जितना वैज्ञानिक परमाणु में न्यूक्ल्यिस को अथवा सौरमण्डल में सूर्य को देते आये है। हो सकता है शरीर शास्त्री इसे पूरी तरह न समझ पाने के कारण उतना महत्व न दें पर आत्म विज्ञानियों के लिए इसका चुम्बकत्व आजीवन बना रहता है। अध्यात्म विद्या के मर्मज्ञों के अनुसार सबसे पहले मानवीय प्राण नाभि केन्द्र से स्पन्दित होकर हृदय से टकराता है। हृदय और फेफड़ों में रक्त शोधन करके सारे शरीर में संचार करने में सहायता करता है।
लेकिन यह तो प्राण की स्वाभाविक क्रिया है भर है। जब उसे मानसिक संकल्प एवं अंतश्चेतना के साथ जोड़ दिया जाता है तो वह अधिक चेतन और ज्यादा सक्षम होकर विशेष शक्ति सम्पन्न बन जाता है। जिस तरह सामान्य रूप से प्रवाहमान हवा में ज्यादा ताकत नहीं होती। किंतु जब इसे किसी गुब्बारे में बंद कर छोड़ दिया जाता है। तो वह ऊर्ध्वगामी बनकर अधिक शक्तिशाली बन जाती है। उसी प्रकार जब मन को शुभ संकल्पयुक्त चेतना से भरकर जब प्राण से जोड़ दिया जाता है, तब उसका स्वरूप आध्यात्मिक शक्ति में बदल जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी नाभि प्राण का उद्गम स्थान है। गर्भाशय में भ्रूण का पोषण माता के शरीर से होता है। बुलबुले की तरह अपने जीवन की शुरुआत करने वाला भ्रूण तेजी से बढ़ना प्रारम्भ करता है। निर्वाह एवं सतत् पोषण हेतु उसे जिस भंडार की आवश्यकता है, वह अनुदान शिशु को माता के शरीर द्वारा अपनी नाभि के मुख से मिलता है। पका हुआ आहार माता के रक्त के माध्यम से वह निरंतर प्राप्त कर अपनी विकास यात्रा प्रारंभ रखता है। प्रसव के समय जिस नाल रज्जु को काटकर माता व शिशु को अलग किया जाता है। यह नाल ही वह द्वार है जिससे माँ के शरीर से आवश्यक रस द्रव्य बालक के शरीर में आता रहता है। नौ मास की पूरी अवधि में अपनी सारी जरूरतों की पूर्ति वह नाभि मार्ग से करता है।
जन्मते ही बालक रोता हाथ पैर चलाता है और रक्त संचार आरंभ हो जाता है। हृदय से खून फेफड़ों में जा पहुँचता है और वे अपना काम शुरू कर देते है। प्राणवायु को अपने रक्त में वातावरण में खींचकर स्वावलंबन का पहला चरण नवजात शिशु पूरा करता है। अब माता के गर्भाशय में बैठे ‘प्लेसेण्टा’ रूपी फेफड़ों की उसे आवश्यकता नहीं रहती। माँ व बालक के बीच संबंध विच्छेद नाल को काट कर किया जाता है। नवजात शिशु की जीवन यात्रा अपने ढर्रे पर चलने लगती है। माता का सहयोग समाप्त होते ही उस केन्द्र की उपयोगिता को समाप्त हो जाती है। स्थूल दृष्टि से चिकित्सकों की नजर में इस केन्द्र की नजर में इस केन्द्र की उपयोगिता एक सामान्य गड्ढ के रूप में ही रह जाती है। कुछ बेकार-निष्क्रिय सूत्रों (लिगामेण्ट टेरिस) के माध्यम से नाभि लीवर से जुड़ी रहती है। शरीरगत विकास की दृष्टि से नाभि की भूमिका समाप्त हो जाती है। पर जब कभी भी लीवर पर दबाव पड़ता है उसमें रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है तब ये ही निष्क्रिय सूत्र जीवंत हो जाते हैं व केपट मेडयूसि के रूप में फूली शिराओं के स्वरूप में दिखायी देते हैं।
यह सारी कथा गाथा एक ही बात को बताती है कि नाभि एक सक्रिय केन्द्र है। जो अपनी उपयोगिता की अवधि में अपनी सामर्थ्य से भ्रूण के विकास में सहयोग देती है। बाद में वह निष्क्रिय नहीं हो जाती। जिस तरह सूक्ष्म शरीर का केन्द्र आज्ञा चक्र को माना जाता है। उसी तरह स्थूल शरीर का न्यूक्लियस नाभिचक्र अथवा सूर्यचक्र है। इस केन्द्र का सशक्त होना स्वस्थ शरीर का चिन्ह है। इसी की क्षमता से समीपवर्ती अवयव प्राणवान बनते है। नाभिकेन्द्र के क्रिस्टल में आदान-प्रदान की उभय पक्षीय क्षमता विद्यमान है। वातावरण में व्याप्त ध्वनि तरंगों को ट्राँजिस्टर का क्रिस्टल ही पकड़कर उन्हें श्रव्य ध्वनियों कस रूप दे देता है।
नाभि केन्द्र ब्राह्मी चेतना का न्यूक्लियस है। अनंत अंतरिक्ष से आवश्यक शक्तियों को आकर्षित करना और उन्हें धारण कर शरीर के समस्त अंगों में प्रवाहित करना योगविज्ञान के अनुसार इसी का कार्य है। शरीर विज्ञानी इसे भले ही उतना उपयोगी न समझे, परंतु योग विज्ञान की नजर में इसकी उपयोगिता सारी जिंदगी यथावत् बनी रहती है। इसके चुम्बकत्व को साधना प्रणालियों से जगाया जा सके तो अपनी प्रखर आकर्षक क्षमता के सहारे वह इतना कुछ अनुदान उपहार दे सकने में समर्थ हो सकता है जो स्थूल पदार्थों की तुलना में हजारों गुना अधिक उपयोगी है।
चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से नाभि के इर्द-गिर्द नौ अति महत्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथियाँ हैं। ये स्वचालित स्नायु संस्थान के वे केन्द्र हैं जो शरीरगत गतिविधियों, रक्त प्रवाह, पाचन में सहायक एंजाइम व अन्य रसों के स्राव का नियमन-संचालन करते हैं। लम्बर, सैक्रल एवं काक्सीजियल गैगलियान व इनके आपस के सूत्रों के रूप में विद्यमान प्लेक्सेज ही आमाशय पाचन संस्थान तिल्ली-गुर्दे-यकृत आदि महत्वपूर्ण अंगों का संचालन करते हैं। नये शरीर का निर्माण करने वाली प्रजनन प्रणाली (गोनेड्स) अपनी अद्भुत क्षमताओं सहित इन्हीं केन्द्रों के नियंत्रण में करती है। इन सबको फलश्रुति के रूप में दिखायी देने वाला हाड़-माँस का पुतला यह शरीर अन्नमयकोश की अधीनता में तो हैं, पर स्वयं कोश नहीं है। दिखायी न देने पर भी अन्नमय कोश में कुछ ऐसे अविज्ञात रहस्य समाए हुये हैं जिनका उद्घाटन सूर्य चक्र के जागरण से ही संभव है।
मनुष्य के प्राण शरीर में तीन नाड़ियाँ मुख्य है। जिनके माध्यम से प्राण-प्रवाहित होता है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना-इन्हीं के नाम हैं। इड़ा-पैरा सिंपेथेटिक, सिस्टम अर्थात् शामक संस्थान की प्रतिनिधित्व करती है। यह मनुष्य का शाँत अन्तर्मुखी मनोगत पक्ष हुआ। पिंगला सिंपेथेटिक सिस्टम अर्थात् उत्तेजक संस्थान का प्रतिनिधि है। यह जीव का सक्रिय बहिर्मुखी एवं शरीरगत पक्ष है। दोनों के परस्पर संतुलन सामंजस्य से ही सारी गतिविधियाँ क्रमबद्ध रूप से चलती हैं। पाचन क्रिया के लिए जिस ऊर्जा की जरूरत शरीर को होती है वह दोनों नाड़ियों के प्रवाह से बनती है।
नाभि के पीछे स्थित सूर्य चक्र (सोलर प्लक्सेज) वह केन्द्र बिंदु है जहाँ से सारी प्रमुख धाराएँ विभिन्न अंगों को जाती है। एक प्रकार से इसे जंक्शन स्टेशन की उपमा दी जा सकती है जहाँ से अनेकों रेलवे लाइनें विभिन्न दिशाओं में जाती हैं। सारे शरीर की स्फूर्ति इसी केन्द्र की सशक्तता पर निर्भर है। सूर्यचक्र न केवल प्राण प्रवाह का जंक्शन है, बल्कि अचेतन मन के संस्कारों तथा चेतना का सम्प्रेषण केन्द्र भी है। किंतु साधारणतया यह महत्वपूर्ण केन्द्र प्रायः लुप्त अवस्था में पड़ा रहता है। अतः इसकी शक्ति का न तो जनसाधारण को कुछ ज्ञान ही होता है और वे इससे कुछ लाभ ही उठा पाते हैं।
प्रत्येक चक्र किसी तत्व विशेष से संबंधित एवं प्रभावित होता है। उसको सक्रिय करने के लिए किसी विशेष रंग का ध्यान करना होता है। जैसे सूर्य चक्र अग्नि तत्व प्रधान है। उसे जाग्रत करने के लिए पीतवर्ण कमल का ध्यान किया जाता है। वास्तव में लाल-पीले हरे-बैगनी एवं सफेद रंगों का सूर्य ज्योति की सात किरणों का संबंध है। चक्रों में इनके मानसिक ध्यान मात्र से संबंधित तत्व में विशेष हलचल होकर हमारे ज्ञान तंतुओं एवं मस्तिष्क को प्रभावित करता हुआ शरीर स्थित व्यष्टि प्राण तथा चेतना से जोड़ देता है। जिस तरह बिजली की बैट्री की पावर समाप्त हो जाने पर उसे जनरेटर से चार्ज कर शक्ति सम्पन्न कर लिया जाता है अथवा किसी छोटे स्टोर में संगृहीत भंडार खर्च हो जाने पर समीपस्थ किसी बड़े स्टोर से उसकी पूर्ति कर ली जाती है। उसी तरह विश्व में अनंत शक्तियों के भण्डार समष्टि प्राण से व्यष्टि प्राण के केन्द्र मणिपूर चक्र (सूर्यचक्र) द्वारा वाँछित शक्ति को आकर्षित करके संचित किया जाना तथा आवश्यकतानुसार उसका उपयोग होना संभव है। जिस भी व्यक्ति ने इस केन्द्र को साध लिया उसकी इंद्रियाँ काबू में रहती हैं एवं नियत निर्धारित क्रम से अपनी सुव्यवस्थता कौशल का परिचय देती है। ऐसे सामान्य मनुष्य की तुलना में कई गुने परिणाम में उत्कृष्ट कार्य कर सकने में सफल होते है।
इसको जाग्रत करने के लिए प्रातः काल सूर्योदय से पहले और सायंकाल सूर्यास्त से पहले साधना करने का विधान है। किसी पवित्र एवं एकाँत स्थान में अथवा अपने दैनिक साधना कक्ष में पद्मासन में कमर सीधी स्थिति में बैठकर दस से बीस बार गहरी-गहरी श्वास लें अथवा तीन से पाँच मिनट तक नाड़ी शोधन प्राणायाम करें। इससे प्राण का सुषुम्ना नाड़ी में संचार प्रारंभ हो जाता है। इसके पश्चात रीढ़ की हड्डी को बिलकुल सीधा रखते हुए अजपा गायत्री (सोऽहम्) का श्वास के साथ पाँच मिनट तक मौन जप करना चाहिए। बाद में अपनी नाभि के पीछे मेरुदण्ड स्थित सूर्य चक्र में पीले चमकीले रंग वाले चमकीले कमल के मानसिक ध्यान में स्वयं को तन्मय कर देना चाहिए।
इस तन्मयता में यह भाव गहराई में समाहित रहे कि सूर्यचक्र जाग्रत हो रहा है। पीतवर्ण कमल से निकलती प्रकाश रश्मियाँ सारे नाभि संस्थान को प्रकाशित कर रही हैं। इस भावना की गहराई में स्वयं को खोते हुए अपनी श्वास को धीरे-धीरे हृदय में फेफड़ों में ले जाते हुए पेट में भर दे। इस प्रक्रिया के साथ यह भावना गहरी होती जाय कि “मैं आरोग्यता सुख शाँति, प्राणशक्ति, स्फूर्ति, सफलता एवं सिद्धि के परमाणुओं को समष्टि प्रकृति के भंडार से अपने भीतर आकर्षित कर रहा हूँ तथा सूर्य चक्र में उनका संचय और संग्रह हो रहा है। “ दस पाँच मिनट श्वास को सूर्य चक्र में ठहराने के पश्चात यह भाव गहरा करें कि “मेरा प्राण ऊर्ध्वगामी होकर शरीर के समस्त अंग प्रत्यंगों में व्याप्त हो गया है और उसका प्रकाश पहुँच रहा है।”
इस ऑटोसजेशन के साथ श्वास को बिलकुल धीरे-धीरे बाहर छोड़ दें और सूर्य चक्र से प्राण का स्पंदन मेरुदंड में ऊपर की ओर गति करता अनुभव करें। एक-दो मिनट के विश्राम के पश्चात फिर यही क्रिया पाँच से दस बार तक दुहराई जाय। श्वास अंदर भरने तथा छोड़ने का क्रम इतने धीरे-धीरे हो कि उसकी ध्वनि न सुनाई पड़े। सुखपूर्वक परम विश्राँति के साथ उपरोक्त क्रिया को दुहराने के साथ ही आत्म निर्देश पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ दुहराना जरूरी है। एक-दो महीने की नियमित साधना के पश्चात शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन समझ पड़ते है। इन परिवर्तनों में यह स्पष्ट अनुभूति होती है कि भावनाओं के अनुरूप ही मन व बुद्धि विकसित हो रहे हैं। इसकी दीर्घकालीन साधना द्वारा दृढ़ संकल्पपूर्वक चेतना का प्राण के साथ संयोग हो जाने पर साधक के मन व मस्तिष्क में चुम्बकीय विद्युत तरंगों का निर्बाध प्रवाह जारी हो जाता है। जो साधक के आस-पास एवं उससे संबंधित वातावरण को प्रभावोत्पादक बनाने में समर्थ होता है।
इस प्रकार के आकर्षक वातावरण का प्रभाव एवं उसकी अनुभूति हम उच्चकोटि के साधक संत महात्माओं के सान्निध्य में सहज ही कर सकते हैं। उपर्युक्त साधना से सूर्यचक्र एवं अनाहत चक्र में एक सुनियोजित सीधा संबंध स्थापित होकर साधक की सर्वतोमुखी उन्नति में जो स्वैच्छिक सहयोग मिलता है वह शीघ्र ही लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त कर देता है। साधना के प्रति उपेक्षा नाभि स्थित सूर्य के अमृत तत्व को पतनोन्मुख कर देती है। इसे फुलझड़ी की तरह जलाकर तनिक-सा विनोद भी खरीदा जा सकता है। जबकि साधना प्रक्रिया को अपनाकर उसे मधुमक्खी की तरह संचित करके अपना श्रेय और दूसरों का सुख बढ़ाया जा सकता है। आत्म विद्या के अनुसार सूर्य चक्र प्राण सत्ता का साहसिक पराक्रमशीलता का एवं प्रतिभा का केन्द्र बिंदु माना गया है। इस स्थान की ध्यान साधना करते हुए इस प्राण शक्ति को निग्रहित और दिशा को सुनियोजित किया जाता है। फलतः उसके सत्परिणाम भी ओजस्विता की वृद्धि के रूप में सामने आते हैं।
तू कैसे घुस आया यहाँ-शूद्र कहीं का? अपने ही समवयस्क बालकों की व्यंग भरी झिड़कियाँ सुनकर उसका बालमन बिलख पड़ा। गुरुकुल के आचार्यों के पास से रुइन के प्रत्युत्तर में उपेक्षा और अवमानना ही पल्ले पड़ी। आँखों में आँसू भरे, व्यथित हृदय हो चल पड़ा। कितनी आशा सँजोई थी उसने ऋषित्व पाने की परंतु....। झोंपड़ी में घुसते ही माँ कहकर अधेड़ उम्र की अपनी जननी से लिपट कर रो पड़ा। क्या हुआ बेटा? जवाब में हिचकियाँ लेते हुए उसने बताया सभी कहते हैं इतरा, दासी है शूद्र है उसका बेटा मंत्रज्ञ नहीं हो सकता।
बस इतनी-सी बात! इतरा ने बेटे को सान्त्वना देते हुए कहा “आकाश में भगवान सूर्य को देख रहा है न ये आदि गुरु परमात्मा हैं तू इन्हीं से प्रार्थना कर, इन्हीं का ध्यान कर, सब पा जायेगा। माँ के ये वाक्य धारणा में बदले, धारणा ध्यान में घनीभूत हुई। ध्यान−समाधि में बदल गया। मंत्र हृदयाकाश में प्रकाशित होने लगे। तत्वबोध की वीणा झंकृत होने लगी। इन स्वरों ने उपनिषद् का रूप लिया। सूर्य की उपासना से शूद्र इतरा का बेटा ब्रह्मर्षि ऐतरेय हो गया था। इनके आत्मबोध के स्वरों को अपने में समाहित करने वाली उपनिषद् ऐतरेय उपनिषद् कहलाई। भगवान सूर्य की उपासना से कोई भी मनुष्य ब्रह्मर्षि पद पाने में समर्थ हो सकता है। “
प्राणायाम का मतलब है-प्राणशक्ति का परिशोधन व अभिवर्धन। यों इसके अनेकानेक रहस्यों के अनुसार इसके प्रकार अनेकों हैं। पर सूर्यवेधन प्राणायाम में इस वैज्ञानिक प्रक्रिया का उत्कर्ष समाया हुआ है। इसके द्वारा प्राणशक्ति का जागरण सर्वाधिक सहज और सुगम है। सवाल यह भी उठ सकता है यह प्राणशक्ति है क्या? जिसका जागरण या संवर्धन इतना अनिवार्य है। आमतौर पर आज के जमाने में परमाणु शक्ति, विद्युतशक्ति की चर्चा सुनने को मिलती है। लेकिन शक्ति का स्वरूप इस छोटे से भौतिक दायरे तक ही सिमटा सिकुड़ा नहीं है। इन सब भौतिक दायरे तक ही सिमट-सिकुड़ा नहीं है। इन सब भौतिक शक्तियों की अपेक्षा कही अधिक सूक्ष्म व सामर्थ्यवान शक्ति और भी है, जिसे प्राण कहते हैं। तत्व की दृष्टि से प्राण एक है। वही प्राणशक्ति ब्रह्मांड में व्यापक रूप से संव्याप्त है और ब्रह्माग्नि कही जाती है। वही प्राण पिण्ड सत्ता में समाया हुआ है और आत्माग्नि कहलाता है। आत्माग्नि लघु ब्रह्माग्नि विभु है। एक बूँद है-दूसरा सागर।
इस तरह मूलतः एक होते हुए भी विस्तार भेद के कारण उसके दो रूप बन गये। तालाब में जब वर्षा का विपुल जल भरता है तो वह परिपूर्ण हो जाता है। वर्षा का यह अनुदान न मिलने से तालाब सूखता और घटता जाता है। पानी में मलीनता भी आ जाती है। इसलिए तालाब को भरा पूरा और साफ सुथरा रखने के लिए वर्षा के जल की आवश्यकता पड़ती है। ठीक इसी प्रकार आत्माग्नि में ब्रह्माग्नि का अनुदान सतत् पहुँचते रहना आवश्यक है। प्राणायाम के द्वारा यही प्रक्रिया संपन्न होती है।
यों गहरी साँस लेकर फेफड़े के व्यायाम को भी
आरोग्यवर्धक प्राणायाम कहते है। शरीर शास्त्र की दृष्टि से उसकी उपयोगिता और विधि व्यवस्था सुझाई गयी है। साथ ही महिमा का गुणगान भी किया जाता है। इससे अधिक आक्सीजन मिलती है और श्वास यंत्रों का व्यायाम होता है। पर सूर्यवेधन प्राणायाम मात्र डीप ब्रीदिंग वाली प्रक्रिया से भिन्न है। इसमें ब्रह्मांडव्यापी प्राण की अभीष्ट मात्रा आत्म प्राण तक पहुँचाई जाती है। इस प्रकार उसकी स्थिति और संपदा बढ़ती है। फलतः भौतिक सफलताओं और आत्मिक विभूतियों के समस्त अवरुद्ध मार्ग खुल जाते हैं।
ब्रह्म प्राण को आत्म प्राण के साथ संयुक्त करने के लिए जहाँ जीवन क्रम में शालीनता और उदारता की सत्प्रवृत्तियों का अधिकाधिक उपक्रमों को अपनाना कम महत्वपूर्ण नहीं है। आहार विहार से स्वास्थ्य की वृद्धि होती है, साथ ही दुर्बलता एवं रुग्णता को निरस्त करने के लिए विशेष चिकित्सा उपचार एवं व्यायाम आदि अपनाने की जरूरत पड़ती है। प्राण शक्ति के अभिवर्धन सूर्यवेधन प्राणायाम की जरूरत कुछ इसी प्रकार है-योगशास्त्रों में इससे होने वाले व्यष्टि प्राण और समष्टि प्राण के संबंध और समन्वय की चर्चा इस प्रकार की गयी है।
“प्राणा वै द्विदेवत्याः एक मात्रा गुह्यते। तस्मात् प्राणा एक नामात्ता द्विमात्र हयंते तस्मात्प्राण द्वन्द्वम।” -ऐत. उ. 2-27
अर्थात्-”प्राण एक है, पर वह दो देवताओं में-दो पात्रों में भरा हुआ है।”
मानवी सत्ता में प्राण का भाँडागार बीज रूप में विद्यमान है। ब्रह्मांड में इसकी व्यापक संव्याप्ति है। परमाणु के नाभिक में प्रचण्ड शक्ति भरी पड़ी है। पर वह दिखायी तभी पड़ती-उपयोग में भी तभी आती है जब एक निश्चित वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाकर नाभिकीय विखण्डन कराया जाता है। प्रक्रिया अत्यंत जटिल और खर्चीली होते हुए भी परिणाम की दृष्टि से प्रभावोत्पादक एवं आश्चर्यजनक तो है ही। सूर्यवेधन प्राणायाम के प्रयोग से कुछ ऐसी ही वैज्ञानिक प्रक्रिया सम्पन्न होती है।
इसके द्वारा ब्रह्मांडीय चेतना को जीव चेतना में सम्मिश्रित करके जीव सत्ता का अंतःतेजस जाग्रत किया जाता है। कुण्डलिनी साधना में इसी प्राण योग की आवश्यकता पड़ती है। सूर्यवेधन प्राणायाम करते हुए ध्यान−धारणा अधिकाधिक गहरी होनी चाहिए और प्रचण्ड संकल्प शक्ति का पूरा समावेश होना चाहिए। श्वाँस खीचते हुए महाप्राण को विश्व प्राण को पकड़ने और घसीटकर आत्मसत्ता के समीप लाने का प्रयत्न किया जाता है। श्वाँस के साथ प्राण तत्व की अधिकाधिक मात्रा रहने की भाव भरी मान्यता रहनी चाहिए। साँस में आक्सीजन की जितनी अधिक मात्रा होती है, उतना ही उसे आरोग्यवर्धक माना जाता है। आक्सीजन की न्यूनाधिक मात्रा का होना क्षेत्रीय प्रकृति, परिस्थितियों, एल्टीटय़ूड आदि पर निर्भर है। किंतु प्राण तो समान रूप से संव्याप्त है। उसमें से अभीष्ट मात्रा संकल्प शक्ति के आधार पर उपलब्ध की जा सकती है।
सूक्ष्म जगत में अध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा को ही सबसे प्रबल और फलदायक माना गया है। साधनात्मक कर्मकाण्डों का फल परिपूर्ण मिलना न मिलना अथवा स्वल्प मिलना कर्मकाण्डों के विधि विधानों पर नहीं साधक की श्रद्धा पर निर्भर रहता है। श्रद्धा की न्यूनता ही साधनाओं के निष्फल जाने का प्रधान कारण होता है। जो इस सुनिश्चित तथ्य को जानते हैं वे सभी साधना उपचारों में गहनतम श्रद्धा का समावेश करने के लिए प्रचंड संकल्प शक्ति का प्रयोग करते हैं।
प्राण के प्रहार से जीवाग्नि के उद्दीपन, प्रज्ज्वलन का उल्लेख साधना ग्रंथों में अनेकों स्थान पर हुआ हैं। यह वही अग्नि है जिसे योगाग्नि प्राणऊर्जा, जीवनी शक्ति अथवा कुण्डलिनी कहते हैं। अग्नि में ऐसा ही ईंधन डाला जाता है जिसमें अग्नि तत्व की प्रधानता वाले रासायनिक पदार्थ अधिक मात्रा में होते है। कुण्डलिनी प्राणाग्नि है। उसमें सजातीय तत्वों का ईंधन डालने से ही उद्दीपन होता है। सूर्य-वेधन प्राणायाम द्वारा इड़ा-पिंगला के माध्यम से अंतरिक्ष से खींचकर लाया गया प्राणतत्व मूलाधार में अवस्थित-चिनगारी जैसी प्रसुप्त अग्नि तक पहुँचाया जाता है, तो वह भभकती हैं और जाज्वल्यमान लपटों के रूप में सारी सत्ता को अग्निमय बनाती है। अग्नि का उल्लेख शस्त्रों में मूलाधार स्थित प्राण ऊर्जा के लिए ही हुआ है-
आदेहम ध्यकटय़ंतमग्नि स्थान मुदाहट। तत्र सिंदूर वणोऽग्निर्ज्वलनं दशपंच च॥ -त्रिशिखोपनिषद्
अर्थात्-”कटि के निम्न भाग में अग्नि स्थान सिंदूर के रंग का है। उसमें पंद्रह घड़ी प्राण को रोककर अग्नि की साधना करनी चाहिए। “
तडिल्ल्लेख तन्डीतपन शशि वैश्वानरमयी। तड़िल्लता समरुचिर्बिधुल्लेखेन भास्वती ॥
अर्थात्-बिजली की बेल के समान, तपते हुए चंद्रमा के समान अग्निमयी वह शक्ति दिखायी देती है।
नाभेस्तिर्यग धोर्ध्वं कुण्डलिनी स्थानम्। अष्ट प्रकृति रुपाऽष्टधा कुण्डलीकृता कुण्डलिनी शक्तिर्भवति।
यथा वद्वाय संचार जलान्नदीनि पंरितः स्कन्धपाश्व व निरुध्यैनं समावेष्ट्य ब्रह्यरन्ध्र योग कालेऽपानेनाग्निना च स्फुरति॥ - शाण्डिल्योपनिषद्
अर्थात्-”नाभि के नीचे कुण्डलिनी का निवास है। यह आठ प्रकृति वाली है। इसके आठ कुण्डल है। यह प्राणवायु को यथावत करती है। अन्न और जल को व्यवस्थित करती है। मुख तथा ब्रह्मरंध्र की अग्नि को प्रकाशित करती है।”
मूलाधारादा ब्रह्मरंध्र पर्यन्तं सुषुम्ना सूर्यभा। तन्मध्ये ताडित्कोटि सभा मृणाल तन्तु सूक्ष्मा कुण्डलिनी तत्र तमोनिवृत्ति। तर्द्दशनार्त्सव पाप निवृतिः॥ -ब्राह्मणोपनिषद्
मूलाधार से लेकर ब्रह्मरन्ध्र तक सूर्य के प्रकाश जैसी सुषुम्ना नाड़ी फैली हुई है। उसी के साथ कमल के तंतु में सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति बँधी हुई है। उसी के प्रकाश से अंधकार दूर होता है और पापों की निवृत्ति होती है।
देहमध्ये ब्रह्मनाड़ी सुषुम्ना सूर्य रुपिणी पूर्ण चंद्रमा वर्तते षा तू मूलाधारादाम्य ब्रह्मरंध्र गामिनी भवति। तन्मध्ये तटकोटि समान कान्त्या मृणाल सून्नवत् सूक्ष्मां्गी कुण्डलिनीति प्रसिद्धाऽस्ति ताँ द्रष्ट मनसैव नरः सर्वपाप विनाश द्वारा मुक्तो भवति। -अद्वयतारकोपनिषद्
देह में ब्रह्मनाड़ी सुषुम्ना परम प्रकाशवान है। वह मूलाधार से ब्रह्मरंध्र तक जाती है। उसके साथ सूक्ष्म तंतु में जुड़ी अति ज्वलंत कुण्डलिनी शक्ति है। उसका भावनात्मक दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से और बंधनों से छुटकारा पा जाता है।
प्राण का मूलाधार स्थित जीवाग्नि पर प्रहार तथा उद्दीपन। यही है- सूर्यवेधन प्राणायाम का लक्ष्य। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है-
किसी शाँत-एकाँत स्थान में प्रातःकाल अथवा सायंकाल की संधिवेला में स्थिर चित्त होकर बैठना चाहिए। आसन सहज हो, मेरुदंड सीधा, नेत्र अधखुले घुटने पर दोनों हाथ, यह प्राण मुद्रा कहलाती है? सूर्यवेधन प्राणायाम के लिए इसी मुद्रा में बैठना चाहिए।
दांए नासिका का छिद्र बंद करके बांए से धीरे-धीरे श्वास खीचना चाहिए। भावना यह हो कि वायु के साथ प्राण ऊर्जा की प्रचुर मात्रा मिली हुई है। इस प्राण ऊर्जा को सुषुम्ना मार्ग से वाम मार्ग के ऋण विद्युत प्रवाह इड़ा द्वारा मूलाधार तक पहुँचाना, वहाँ अवस्थित प्रसुप्त चिनगारी को झकझोरना, थपथपाना, जाग्रत करना यह सूर्य वेधन प्राणायाम का पूर्वार्ध है। उत्तरार्ध में प्राण को पिंगला (मेरुदंड के दक्षिण मार्ग के धन विद्युत प्रवाह) में से होकर वापस लाया जाता है। जाते समय अंतरिक्ष स्थित शीतल प्राण होता है। ऋणधारा भी शीतल मानी जाती है। इसलिए इड़ा पूरक को चंद्रवत् कहा जाता है। इड़ा को चंद्रनाड़ी कहने का प्रयोजन है। लौटते समय अग्नि उद्दीपन-प्राण प्रहार की संघर्ष क्रिया से ऊष्मा बढ़ती और प्राण में सम्मिलित होती है। लौटने का पिंगला मार्ग-धन विद्युत का क्षेत्र होने से उष्ण माना गया है। दोनों ही कारण से लौटता हुआ प्राणवायु उष्ण रहता है, इसलिए उसे सूर्य की उपमा दी गयी है। इड़ा चंद्र और पिंगला सूर्य है। पूरक चंद्र और रेचक सूर्य है। ऐसा ही प्रतिपादन साधना विज्ञान के आचार्य करते है।
साधना में क्रिया -कृत्यों की तुलना में भावना एवं संकल्प का महत्व अधिक है। साधक को इसके अनुरूप ही लाभ मिलता है। श्वास द्वारा खींचे हुए को मेरुदंड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुँचाने का संकल्प दृढ़तापूर्वक करना पड़ता है। यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से अंतरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और प्रसुप्त प्राणाग्नि कुण्डलिनी ज्वाला को अपने प्रचंड आघातों से जगा रहा है। प्रहार के उपराँत प्राण को सूर्यनाड़ी पिंगला द्वारा वापस लाने के उपराँत प्राण को सूर्यनाड़ी पिंगला द्वारा वापस लाने तथा समूची सूक्ष्म सत्ता द्वारा प्रकाशित, आलोकित करने की भावना परिपक्व करनी पड़ती है।
दूसरी बार इससे उलटे क्रम में अभ्यास करना पड़ता है। अर्थात् दायीं नासिका से प्राण को खींचना और बायीं ओर से लौटाना पड़ता है। इस बार पिंगला से प्राण को प्रवेश कराना तथा इड़ा से लौटाना पड़ता है। मूलाधार पर प्राण प्रहार तथा प्राणोद्दीपन की भावना करनी पड़ती है। एक बार इड़ा से जाना पिंगला से लौटना दूसरा बार पिंगला से जाना इड़ा से लौटना। यही है सूर्यवेधन प्राणायाम का संक्षिप्त विधि-विधान। कहीं-कहीं योग ग्रंथों में सूर्यवेधन प्राणायाम को अनुलोम विलोम प्राणायाम भी कहा गया है। लोम कहते है सीधे को विलोम कहते हैं उलटे को। एक बार सीधा-दूसरी बार उलटा, फिर सीधा उलटा चक्र ही लोम विलोम कहलाता है। कहीं-कहीं इसके एक हिस्से अर्थात् लोम को ही सूर्यवेधन की मान्यता प्राप्त है। पर प्रयोग की कसौटी पर कसने से लोभ विलोम दोनों चरण मिलकर ही ब्रह्मांडव्यापी सौर चेतना में समाहित प्राण तत्व को ग्रहण और अंतःस्थित प्राणाग्नि के जागरण की बात सत्य साबित होती है।
सूर्यवेधन प्राणायाम का शास्त्रों में असाधारण महत्व बताया गया है।
कपाल शोधनं वातदोष हनं कृमि दोषंत्हृतम। पुनः पुनरिदं कार्य सूर्यवेधन मुन्तमम्॥ -हठयोग प्रदीपिका
यह कपाल शोधन, वात रोग निवारण, कृमिदोष विनाशक है। इस सूर्यवेधन प्राणायाम को बार-बार करना चाहिए। शरीर दोषों के निवारण के लिए ही नहीं -बल्कि व्यक्तित्व के सूक्ष्म विकारों को दूर करने, स्वयं में आध्यात्म चेतना का जागरण करने के लिए इसका महत्व अवर्णनीय है। इसके निरंतर अभ्यास से प्राण ऊर्जा का अभिवर्धन साधक की भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करता है। सूर्यवेधन की प्रक्रिया सामान्य दीखते हुए भी असामान्य परिणाम प्रस्तुत करने वाली है।
रावण के कटे सिरों की बाढ़ को देखकर सारी वानरी सेना में दहशत भर गयी थी। असुर प्रबल होते जा रहे थे। इनकी प्रचंडता देखकर रीछ-वानर व्याकुल थे, तो देवगण भयभीत। समझ में नहीं आ रहा था, रावण का पैशाचिक आतंक किस तरह समाप्त होगा। अपने पराक्रम को असफल होते देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी चिंतित थे। तभी अपरिमित तेज को धारण किये ब्रह्मर्षि अगत्स्य का आगमन हुआ। आते ही उन्होंने राम के मस्तक पर हाथ फेरते हुए कहा-निराश मत हो वत्स! मैं तुम्हें शक्ति और सफलता के स्रोत भगवान आदित्य की रहस्यमयी उपासना की प्रक्रिया बतला रहा हूँ उसे धारण करो।
महर्षि ने आदित्य हृदय स्रोत और उसकी प्रयोग विधि समझाई। भगवान सूर्य की शक्ति जैसे समूची सेना में प्रवाहित होने लगी। सूर्य की कृपा का बल पाकर भगवान राम सूर्य की भाँति प्रज्वलित हो उठे। असुरता ध्वंस होने लगी, रावण की एक भी छल विद्या न चली उसका समूल नाश हो गया। भगवान श्री राम ने अपने इस अलौकिक कार्य के रहस्य को बताते हुए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से कहा-असुरता आँतरिक हो या बाह्य इसे पूरी तरह समाप्त कर सकना सूर्य की कृपा से ही संभव है।
सूर्य की किरणों की तरह मन की शक्तियों का भी सतत् बिखराव होता रहता है। जिसकी वजह से इनके प्रभाव बहुत थोड़ी मात्रा में ही समझ पड़ते हैं। इन्हें एकत्रित किया जा सके तो उसकी मूल शक्ति असाधारण रूप से शक्तिशाली हो जाती है। बिखराव का केन्द्रीकरण कर लिए जाने पर इस संग्रहित शक्ति के चमत्कार देखते ही बनते हैं। आतिशी शीशे पर सूर्य की किरणें एकत्रित कर ली जांय तो उनके केन्द्र बिंदु में आग जलने लगती है। भाप को एक सीमित छेद से होकर निकालने पर उसकी शक्ति से रेल का इंजन दौड़ने लगता है। बारूद का विस्फोट बंदूक की नली से घेर देने पर भयंकर आवाज और शक्ति के साथ गोली छूटती है। बाँध का पानी छोटे गलियारे से निकालने पर वहाँ बिजली घर चलने लगते है। विचारों का बिखराव एक सीमित केन्द्र पर इकट्ठे कर देने से मानसिक दक्षता कितनी अधिक बढ़ जाती है उसे हर कोई जानता है।
विचारों की एकाग्रता साधने का सरल और प्रभावी उपाय ध्यान है। ध्यान में केन्द्रीकरण के लिए कोई छवि निर्धारित करनी पड़ती है। ऐसी वस्तु जो आकर्षण भी हो और गुणवत्ता से भरपूर भी। इस दृष्टि से प्रकाश पुँज प्रभातकालीन स्वर्णिम सविता का चयन करना अति उत्तम एवं निर्विवाद है। सूर्य सर्वथा दोष रहित है। उसमें गुण ही गुण हैं। साथ ही शक्ति का भंडार एवं आकर्षण सुँदरता से भरा-पूरा भी उसे समझा जा सकता है।
इस दृश्य जगत में जो भी कुछ दिखायी दे रहा है, उसे सूर्य का ही चमत्कार कहना चाहिए। ताप-प्रकाश और ध्वनि की त्रिविध तरंगें ही प्रकृति के अंतराल में संव्याप्त हैं। इन्हीं के कारण तत्वों का प्रादुर्भाव हुआ है। अणु-परमाणुओं की संरचना बन पड़ी है। तीन शक्ति धाराओं में से दो का ताप और प्रकाश का सूर्य से सीधा संबंध है। उनका उसे उद्गम समझा जा सकता है। प्राणियों-वनस्पतियों का अस्तित्व सूर्य के रासायनिक संप्रेषण से ही संभव हुआ है। ऋतुएँ इसी में होने वाली हलचलों का दृश्य परिणाम है। इसी महापुरुष से पराग पाने के लोभ में पृथ्वी मधुमक्खी की भाँति उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाती रहती है। सूर्य के अभाव की कल्पना करने से ही मन सिहरन भरे सघन अंधकार में डूबने लगता है। निस्तब्धता भरा अंधकार जहाँ हलचलों का कोई आधार कारण शेष न रहा।
सृष्टि की हलचलों-वैभव के अभिवर्धन के साथ आत्मिक-विभूतियों का उद्गम स्रोत भी सूर्य ही है। ध्यान के माध्यम से इसकी सूक्ष्म चेतना से संपर्क साधने पर मनुष्य, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा जैसी आत्मिक विभूतियों का स्वामी बनने लगता है। बाहर में प्रकाशित होने वाले विश्वात्मा सूर्य अंतराकाश में साधक की आत्मा बन अलौकिक विभूतियों सामर्थ्यों, शक्तियों का प्रकाश बिखेरने लगते हैं। प्रसुप्त रूप से पड़े अनेकानेक संभावनाओं के बीज इस ध्यान प्रक्रिया से अंकुरित, पुष्पित, पल्लवित होते दिखने लगते है।
ध्यान-धारणा में सविता उपासना का सामान्य क्रम ग्रह है कि उषा बेला में उगते सूर्य को अधखुली आँखों से देखकर पलक बंद कर लिया जाय। भावना यही प्रगाढ़ रहे कि वह दिव्यसत्ता अपने किरण जाल समेत संपूर्ण शरीर में संव्याप्त हो गई। इस शुरुआत में जलाशय का निकट होना शक्ति आकर्षण की दृष्टि से अधिक लाभदायक है। इसी कारण बहुतेरे जलाशय में खड़े होकर सूर्याभिमुख स्थिति में जप तथा ध्यान करते है। कई उतने समय तक गीले कपड़े पहने रहते हैं। कुछ सूर्य को अर्घ्यदान करते हुए मानसिक जप के साथ अपनी संक्षिप्त साधना पूरी कर लेते है। यदि ब्रह्मबेला में यह आराधना करनी हो तथा बादल छाए रहने पर प्रत्यक्ष दर्शन न हो पा रहा हो तो उस ओर मुखकर के भी ध्यान किया जा सकता है। यह अनेकानेक प्रचलनों में कुछ एक की चर्चा है।
सर्वसुलभ ध्यान का उपाय यह है कि खुले स्थान पर बैठा जाय। सुबह का समय हो, जलपात्र दायीं ओर रखा जाय। प्रतीक उपासना के रूप में अगरबत्ती जलाई जा सकती है। स्वच्छ स्थान में शरीर, वस्त्र से ध्यान मुद्रा में बैठे। ध्यानमुद्रा की पंचसूत्री विधि है। (1) शाँत चित्त (2)स्थिर शरीर (3) कमर सीधी (4) हाथ गोद में (5) आंखें बंद। यह है ध्यान मुद्रा, जिसे प्रत्येक प्रकार के ध्यान में आवश्यक एवं उपयोगी माना गया है। इस स्थिति को बनाने में शुरुआत के पाँच मिनट लग सकते हैं। इसके बाद ध्यान की तन्मयता इन निर्देशों के साथ प्रगाढ़ करते चले जांय।
-प्रातः काल-पूर्व दिशा-अरुणिम आकाश-स्वर्णिम सूर्योदय।
-स्वर्णिम सूर्य सविता। सविता -तेजस्वी परब्रह्म
-सविता ब्रह्म। प्रकाश ज्ञान-प्रज्ञा सविता वर्चस्। अग्नि ऊर्जा-प्रखरता।
-सविता-ब्रह्मवर्चस्। उपास्य आराध्य। इष्ट। लक्ष्य
-साधक पर सविता शक्ति की अनंत अंतरिक्ष से शक्ति-वर्षा अमृत वर्षा।
-संव्याप्त आत्म सत्ता में समर्थता-सजगता-सरसता।
-साधक का सविता में समर्पण, विसर्जन-विलय, समन्वय, समापन, शरणागति।
-सविता शक्ति का आत्मसत्ता में प्रवेश। भाव चेतना में प्रखरता की अनुभूति।
-स्थूल शरीर में ओजस, सूक्ष्म शरीर में तेजस्। कारण शरीर में वर्चस्।
-निष्ठा, प्रज्ञा और श्रद्धा का प्रचण्ड उद्भव।
पवित्रता-प्रसन्नता विशिष्टता की दिव्य अनुभूति। प्रकाश पुँज की ओर अनवरत अनुगमन, अदम्य-उल्लास का अनुभव।
संकल्पपूर्वक अभ्यास करते रहने पर यह कल्पना चित्र सूक्ष्म नेत्रों से क्रमशः अधिक स्पष्ट होते चले जाते हैं। इस स्पष्टता से उत्साह बढ़ता है। फिर भी जानने योग्य बात है कि कल्पना चित्र की स्पष्टता होना न होना मस्तिष्कीय संरचना पर निर्भर है। बहुतों को सोने-जगाने में कल्पना चित्र सहज ही दिखने लगते है। बहुतों के मस्तिष्क में इस तरह के दृश्य देख सकने की तनिक भी गुँजाइश नहीं होती। अतएव दिखने न दिखने के आधार पर ध्यान की सफलता-असफलता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। मूलतत्व है भावानुभूति। यदि सविता देव के साथ सघन आत्मीयता बढ़ रही हो, श्रद्धा परिपक्व हो रही हो तो समझना चाहिए ध्यान-धारणा में अभीष्ट प्रगति हो रही है।
इस प्रगति का परिणाम सविता देव की अनुकम्पा के रूप में साधक के स्थूल सूक्ष्म-कारक शरीर में निहित ढेर की ढेर विभूतियों को जगाने वाला सिद्ध होता है। स्थूल शरीर में अनेक गुच्छक ग्रंथि समुदाय को शरीर विज्ञानी देखते है। सूक्ष्म शरीर को निखारने की जिनमें क्षमता है, वे षट्चक्र, पंचकोश, नाड़ी प्रवाह, उपत्यिकाएँ स्तर के सूक्ष्म अवयवों की उपस्थिति भी देखते है। मानसिक गतिविधियों के अलावा सूक्ष्म शरीर में अति महत्वपूर्ण केन्द्र और भी है। इन्हें हृदयचक्र और नाभिचक्र भी कहते है। नाभि चक्र स्थूल शरीर की हलचलों की अधिष्ठाता है। हृदय चक्र को सूक्ष्म शरीर स्वर्गलोक का केन्द्र माना गया है। मस्तिष्क मध्य में सहस्रार ब्रह्मलोक कारण शरीर का अधिष्ठान है।
सामान्य स्थिति में यह तीनों चक्र उपेक्षित अविज्ञात और अविकसित दशा में ही रहते हैं। पर जब इनमें ध्यान की प्रक्रिया से सविता के दिव्य आलोक का संचार होता है तो धीरे-धीरे ये तीनों विकसित होते जाते है। इनके विकास का अनुभव साधक को अपनी साधना की प्रगाढ़ता में स्वयं होने लगता है। उसे अनुभव होने लगता है कि सविता का अन्तःक्षेत्र में अवतरण अपना प्रभाव चमत्कार दिखा रहा है। तीनों शरीरों और उनमें सन्निहित अनेक घटकों में सूर्य शक्ति का अभिनय संचार हो रहा है। सौर चेतना साधक को सर्वतोमुखी अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त कर रही है।
क्षुब्ध मन में उन्होंने राजा दिवोदास ऋषि जमदग्नि सहित पास खड़े सभी आर्यों से पूछा आखिर क्यों ? यह गर्हित प्रताड़ना पशु से भी गया-बीता जीवन जीने के लिए इन्हें किसलिए विवश किया जा रहा है? तुम नहीं समझोगे विश्वरथ। ये दस्यु हैं, असभ्य , असंस्कृत और जंगली। इनकी आकृति भर मनुष्यों की है, प्रकृति नहीं। दिवोदास ने कहा।
उत्तर सुनकर वह कुछ सोचने लगे। आर्यों और दस्युओं के पीढ़ियों से चले आ रहे संघर्ष ने उन्हें व्यथित कर रखा था। अचानक उनकी करुणा ने संकल्प कर रूप लिया। संकल्प शब्दों में गूँज उठा-मानवीय चेतना में क्राँति हो सके इनसानी शरीर में दैवी प्रकृति सक्रिय हो सके मैं ऐसी विद्या की शोध करूंगा। संकल्प के स्वर सूर्य साधना में बदल गये। निरंतर गहरी होती जा रही सविता देव की साधना अनेकों रहस्य प्रकट करने लगी। आखिर एक दिन परम रहस्य प्रकट हुआ। चारों दिशाओं में खबर फैल गयी-विश्वरथ ने गायत्री महाविद्या की खोज की है। वह दस्युओं को भी आर्य बनायेंगे। स्वरों ने सक्रियता धारण की, दस्युनेता शम्बर की कन्या उमा के साथ अनगिनत दस्यु आर्य बनने लगे। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं...की मंत्र ध्वनि के साथ समूचे आर्यावर्त ने विश्वरथ को विश्व का मित्र विश्वामित्र स्वीकार किया। ‘
शक्ति स्रोत के बारे में जान लेना ही काफी नहीं है। उससे तब तक लाभान्वित नहीं हुआ जा सकता जब तक उससे संबंध स्थापित करने की तकनीक का अन्वेषण न हो। बिजली की पावर हाउस और पंखा, हीटर, कूलर आदि विद्युत उपकरणों के बीच वैज्ञानिक तकनीकों का लम्बा सिलसिला काम करता है। बिना इसके पावर हाउस भरे पूरे विद्युत भंडार के रहते हुए भी सारे विद्युत उपकरण निष्प्राण, निर्जीव और निरुपयोगी बने रहेंगे। अक्षय शक्ति के स्रोत परमदेव सविता के बारे में भी यही तथ्य सत्य प्रमाणित होता है। क्रियात्मक, विचारात्मक एवं भावनात्मक शक्तियों के इस अजस्र प्रवाह के रहते हुए भी मानवीय परिकर में निष्क्रियता मूढ़ता और निष्ठुरता का बने रहना यही स्पष्ट करता है कि हमारे संबंध सूत्र नहीं जुड़े।
ये संबंध सूत्र कैसे जुड़े और प्रगाढ़ हो, पुरातन वैज्ञानिक ऋषियों ने इसी संदर्भ में गहन शोध प्रयास किये थे। गायत्री मंत्र इन्हीं शोध प्रयासों का निष्कर्ष है। इसके मंत्र शिरोमणि होने एवं वैदिक वाङ्मय में सर्वश्रेष्ठ मंत्र घोषित किये जाने के पीछे यही कारण है। मंत्र में शब्दों का गुँथन इस वैज्ञानिक रीति से हुआ है कि उसके जप से साधक की अंत चेतना में प्रसुप्त सूक्ष्म संस्थानों पर आघात होता है। प्रसुप्ति जाग्रति में बदलती है। सौर चेतना का अविरल प्रवाह अस्तित्व में प्रवाहित होने लगता है। शक्ति स्रोतों के भंडार खुल जाते हैं। अंतःजागरण सूर्यदेव से संपर्क जोड़कर इतनी सामर्थ्य संचित कर लेता है जिसे असामान्य चमत्कारी कहा जा सके।
इस वैज्ञानिक एवं क्रियात्मक पक्ष के अतिरिक्त इसका वैचारिक पक्ष कहीं अधिक सामर्थ्यवान है। इसमें जीवन और जीवन से संबंधित छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान समाहित है। मंत्र के सन्निहित तत्वदर्शन में सृष्टि के उन सभी रहस्यों-तथ्यों का निरूपण किया गया है, जो ईश्वर जीव एवं प्रकृति के स्वरूप एवं आपसी संबंधों को व्यक्त करते हैं। मंत्र के 24 अक्षर में छुपे तत्वज्ञान के चिंतन-मनन द्वारा ज्ञान के उस स्रोत तक पहुँचा जा सकता है जिसे शास्त्रकारों ने आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान के नाम से वर्णन किया है।
वैज्ञानिक एवं वैचारिक पक्ष की तुलना में गायत्री महामंत्र का भाव पक्ष कही अधिक प्रेरणादायक, समर्थ और प्रभावशाली है। विश्व की किसी भी संस्कृत में मात्र 24 अक्षरों में ब्रह्म, विद्या एवं साधना विज्ञान का इतना एवं समग्र दर्शन नहीं मिलता। भाव संवेदनाओं की पराकाष्ठा का दर्शन यदि कहीं करना हो तो गायत्री महामंत्र में किया जा सकता है। इसके गंभीर प्रयोग न केवल साधक और सूर्य के भावनात्मक आदान-प्रदान के सिलसिले को आरंभ करते हैं बल्कि ऐसी सामर्थ्य प्रदान करते हैं जिससे समूचे विश्व में भाव-प्रवाह को आन्दोलित किया जा सके। गायत्री मंत्र सविता देव से स्वयं को एकात्म करने की गुह्य तकनीक है। सविता शब्द “षड् प्राणिगर्भ विमोचनेयाष प्रेरणो” धातुओं से बना है। ‘षड्’ धातु से बनाने पर यः सुते चराचर जगत उत्पादयति स सविता । अर्थात् जो सबको सद्मार्ग की ओर प्रेरित करता है वह सविता है। इन सभी अर्थों के अनुसार जड़-चेतन को उत्पन्न करने वाले तथा सबको पवित्र बनाने वाले एवं श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करने वाले भगवान सविता है। सूर्य का एक ही नाम सविता भी है। सूर्य स्वयं प्रकाशवान हैं तथा दूसरों को प्रकाशित करते हैं। इसी प्रकार सविता देव भी स्वयं प्रकाश के पुँज है तथा सबमें अपने प्रकाश का आलोक वितरित करने वाले हैं। गायत्री मंत्र को आधार बनाकर सविता की साधना करने वाला व्यक्ति भी इन्हीं उदात्त भावनाओं से सम्पन्न होता चला जाता है।
मंत्र के तीन चरण है। तीनों में दिव्य प्रेरणाएँ भरी पड़ी है। उन्हीं का आह्वान-अवगाहन साधक करता है तथा अपनी धारणा शक्ति का विकास करता है। प्रथम चरण है-’तत्सवितुर्वरेण्यं’। पृथ्वी में, अंतरिक्ष में, सुलोक में, अग्नि में विद्युत में, सूर्य में सर्वत्र भगवान सविता का तेज समाया हुआ है। अपने भाव नेत्रों से इष्ट की, परमात्मा की झाँकी सविता के प्रकाश पुँज के रूप में सर्वत्र करता हुआ साधक भाव-विभोर हो उठता है। सविता का उज्ज्वल पवित्र ज्योति एक अनिवर्चनीय आनंद में डुबोये रहती है। इस दिव्य का गुणगान उपनिषदों में भी मिलता है-
“न तत्र सूर्योयाति न चंद्रतारकः नेमा विद्युतो भान्ति कुतोंऽयमग्निः तमेव भान्त यनु भाँति सर्वे तस्य यासा सर्वमिद विभाति॥” (कठ, मुण्डक, श्वेताश्वतर)
अर्थात्-उसकी ऐसी दिव्य ज्योति है कि उसके समक्ष सूर्य, चंद्र, तारे सभी फीके पड़ जाते है। बिजली की चमक उसके आगे कुछ नहीं है अग्नि की बात ही क्या है। उसी महाज्योति पुँज से ही प्रकाश लेकर ये सभी आलोकित हो रहे है। उसी दिव्य ज्योति का अवगाहन, आराधना, सविता साधक करता है। उस वरणीय ज्योति को अधिकाधिक धारण करने की कामना करता है।
प्रथम चरण में सविता के रूप में उस परम सत्ता के दिव्य गुणों का वर्णन हुआ है। जिसकी स्तुति कर साधक फूला नहीं समाता। स्तुति के उपराँत प्रार्थना का क्रम है। सविता की प्रकाश स्तुति के उपराँत साधक कह उठता है-भर्गो देवस्य धीमहि अर्थात् जिन दिव्य गुणों की विशेषताओं का हम ध्यान करते हैं वह हमारे अंदर अवतरित हों। भक्त भगवान का, साधक साध्य का, उपासक उपास्य का, जीव ब्रह्म का, तादात्म्य, एकरूपता परस्पर के आदान-प्रदान इष्ट की दिव्यता के अवतरण से ही संभव है। मंत्र के द्वितीय चरण में प्रार्थना की गयी है। हे प्रकाश पुँज, पापनाशक , दिव्य आनंद दायक परमात्मा स्वरूप सविता देव आप हमारे अंदर धारण करते हैं। आप हमारे भीतर अवस्थित हो जांय जिससे आपके आलोक से हमारा अन्तःकरण जगमगा उठे। यही मूलतः अध्यात्म का मर्म है।
मंत्र के तृतीय चरण में इस तथ्य का स्पष्टीकरण हुआ है कि दैवीय गुणों की शक्तियों को क्यों धारण करना चाहिए? “धियो यो नः प्रचोदयात्” ताकि वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित कर दे। बुद्धि प्रसुप्त तमिस्रा के घोर अंधकार में सोयी पड़ी है। उसे अपने लक्ष्य का कर्तव्यों का बोध नहीं है। साँसारिक आकर्षणों में इस तरह भटक गयी है कि उसे अपनी गरिमा का भाव नहीं है। मंत्रों के तृतीय भाग में यही प्रार्थना की गयी है-”हे सविता देव अपने दिव्य गुणों के साथ हमारे अन्तः में अवतरित होकर बुद्धि को अंधकार की तमिस्रा से प्रकाश की ओर ढकेल दो।”
जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश प्रातःकाल अपने तेजस्वी स्वर्णिम किरणों के साथ आकर सोये हुए प्राणियों को जगा देता और कर्मों में प्रवृत्त करता है, उसी प्रकार सविता देव का प्रकाश भी गायत्री साधक के अन्तःकरण में आकर बुद्धि को प्रकाशित करता है। प्रसुप्ति जाग्रति के रूप में परिलक्षित होती है। बुद्धि में प्रज्ञा का अवतरण होता है। असत्य की जड़ता की तमिस्रा घटती है। सत का चैतन्यता का प्रादुर्भाव होता है। प्रज्ञा की ओर उन्मुख बुद्धि जड़ता के बंधनों लोभ-मोह के आकर्षणों में नहीं बँधती। उसके “स्व” की परिधि संकुचित नहीं रहती। “स्व का वसुधैव कुटुम्बकम” के रूप में विस्तार ही जीवन का प्रयोजन है। सविता की दिव्य प्रेरणाओं को गायत्री महामंत्र के माध्यम से धारण कर साधक इसी लक्ष्य की ओर तत्पर होता है।
सविता देव से भावनात्मक एकात्मता स्थापित करने वाली इस तकनीक के आशय से स्पष्ट है कि इसे इतना अधिक गौरवास्पद स्थान क्यों मिला है। इसमें किसी वस्तु की कामना नहीं की गयी है। की भी गई है सो बुद्धि को निर्मल, पवित्र बनाने वाले सन्मार्ग पर प्रेरित करने की। वह भी मात्र अपने लिए नहीं-समष्टि के लिए प्रार्थना की गयी है। “यो नः” अर्थात् हम सबकी बुद्धि श्रेष्ठ मार्ग की ओर अग्रसर करें, वह सविता देवता द्रष्टा ऋषि इस तथ्य से परिचित थे कि समष्टि के कल्याण में ही व्यक्ति का भी हित निहित है।
भगवान सविता की क्रियात्मक वैचारिक एवं भावनात्मक शक्तियों को ग्रहण धारण करने की यह तकनीक इतनी उदात्त पवित्र एवं मानव मात्र के लिए इतनी कल्याण कारक है कि उसके चिंतन मनन से ही अन्तःकरण की भावनाएँ स्वतः उमड़ने लगती हैं एवं साधक के व्यक्तित्व का कायाकल्प हुए बिना नहीं रहता। गायत्री मंत्र को आधार बनाकर किया गया, सविता आराधना आत्मोत्कर्ष के चरम शिखर पर हम सबको पहुँचा सकता है।
जिज्ञासु की दृष्टि लिए अपने सम्मुख बैठे अपने भावी आध्यात्मिक उत्तराधिकारी की ओर देखकर योगी ने कहा-”प्रकृति के आपूरण से एक जातीय वस्तु अन्य जाति की वस्तु में सूर्य की रश्मियों द्वारा परिणित की जा सकती है “, इस प्रकार “जात्यंतरपरिणामः प्रकृत्या पूरात” वाला पतंजलि का योग सूत्र सत्यापित किया जा सकता है। ऐसा अनुमान लगने पर कि संभवतः उनके इस कथन पर इस जिज्ञासु को अविश्वास हुआ है, उनने अपने आसन पर से एक गुलाब का फूल हाथ में लेकर पूछा “अच्छा ! तुम बताओ? क्या यह पुष्प अपनी जाति स्वतः बदल सकता है? नहीं न! किंतु सूर्य विज्ञान द्वारा इसकी जाति बदली जा सकती है। शिष्य ने कहा-”तो इसे जवा के फूल में बदल दीजिए।” बांये हाथ में गुलाब का फूल लेकर दाहिने हाथ से स्फटिक यंत्र द्वारा उस पर फैली हुई सूर्य रश्मियों को उनने क्रमशः संग्रहित किया। धीरे-धीरे गुलाब का फूल गायब हो गया, मात्र उसकी आभा वहाँ विद्यमान थी और धीरे से उसकी जगह एक ताजा हाल का खिला जवा पुष्प प्रकट हो गया। परमहंस स्वामी विशुद्धानंद नाम से प्रख्यात उस योगी ने सूर्य की शक्ति व आत्मबल से प्रकृति के नियमों में परिवर्तन कर एक दृश्य वस्तु की मूल प्रकृति ही बदल डाली थी। उनने अपने शिष्य गोपीनाथ कविराज को समझाकर बताया कि “यह सारा जगत प्रकृति की इस क्रीड़ा पर ही आधारित है। इस विद्या को योगी ही समझ सकता है एवं जिस प्रकार पतंजलि ने कहा है “भुवनं ज्ञानं सूर्ये संयमात” (योगदर्शनः विभूतिपाद 26), साक्षात स्वयं जीवन में सूर्य में संचय कर भुवन का सारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
पंडित गोपीनाथ कविराज के लिए निजी रूप में यह एक अलौकिक घटनाक्रम था। वे चमत्कार से नहीं सूर्य रश्मियों को माध्यम बनाकर योगबल से जड़ प्रकृति में किये गये परिवर्तन से अभिभूत थे। स्वामी जी ने उन्हें उस दिन विस्तार से बताया कि “योगबल एवं विज्ञान कौशल दोनों का प्रयोग कर कैसे ब्राह्मी सृष्टि की जा सकती है? सूर्य जगत का प्रसविता है-रचयिता-पोषक व सृजनकर्ता है। दो वस्तुओं को एकत्र करना योग कहलाता है। सूर्ययोगी जो रश्मियों के विज्ञान में सुपरिचित हैं-वर्णमाला (स्पेक्ट्रम) से भलीभाँति अवगत हैं। इन वर्णों को शोभित करके परस्पर मिश्रित कर पदार्थों का संघटन या विघटन कर लेता है। इस प्रकार पदार्थ की प्रकृति में परिवर्तन हो जाता है। जो अव्यक्त है दिखायी नहीं दे रहा-शून्य के गर्भ में समाया हुआ है, उसे भी अभिव्यक्ति इस सूर्य विज्ञान के द्वारा किया जा सकता है।” वे अपने शिष्य को बता रहे थे कि “चित्त की वृत्तियाँ, मनोविकार, भावना उद्वेग भी सीधे सूर्य की रश्मियों को प्रवाहित होते हैं। सूर्य-विज्ञान का मर्मज्ञ सूक्ष्म स्तर पर रश्मियों द्वारा संस्कारगत परिवर्तन कर व्यक्ति की चिंतन प्रक्रिया को ऊर्ध्वगामी मोड़ दे उसे अध्यात्मिक प्रगति की ओर प्रवृत्त भी कर सकता है। इस प्रकार सूर्य विज्ञान मात्र जड़ प्रकृति ही नहीं चैतन्य सृष्टि के साथ भी हस्तक्षेप करता है एवं दृश्य स्थूल परिवर्तनों से लेकर मानव की चेतनात्मक हलचलों को भी प्रभावित कर पापनाशक विकार शामक वृत्तियों को जनमानस में बढ़ाता है।”
महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज की गुरुदीक्षा इसी प्रारंभिक कथन के साथ हो गयी एवं तंत्र विज्ञान का मर्मज्ञ यह विद्वान इसके बाद सूर्य विज्ञान का अध्येता ही नहीं, एक शोध विद्यार्थी भी बन गया। पं. गोपीनाथ कविराज ने अपने गुरु के प्रति समर्पण कर अनेकानेक वृत्तांत सूर्य विज्ञान से जुड़ी अलौकिकताओं पर लिपिबद्ध किये हैं। इन्हें पढ़ने पर उस विलक्षण विद्या की जानकारी मिलती है जो चिरपुरातन देव संस्कृति की एक अति महत्वपूर्ण निधि है, हिमालय व तिब्बत क्षेत्र से ऋषि चेतना जिसका नियमन संचालन करती है। भारतीय संस्कृति की चंद्र विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, वायु विज्ञान, क्षण विज्ञान, शब्द विज्ञान व सूर्य विज्ञान जैसी विधाओं पर सतत् दुर्गम हिमालय में शोध कार्य चलता रहता है। मात्र कौतूहल दृष्टि रखने वाले उथले चिंतन वालों के लिए तो यह विधाएँ गुह्य व गोपनीय है। किंतु जो विशुद्धतः परमार्थिक भाव से अथवा आत्मशक्ति के जागरण के निमित्त प्रयोग करना चाहें, उनके लिए इसके सभी मार्ग खुले पड़े हैं, ऐसा परमहंस विशुद्धानंद जी ने जिन्हें सुगंधी बाबा के नाम से ख्याति प्राप्त थी, अपने शिष्य व उनके माध्यम से समस्त विज्ञ समुदाय को बताया।
सौर-विज्ञान या सावित्री विद्या वैदिक साधना पद्धति का आधार स्तम्भ मानी जाती रही है। श्री अरविंद ने कहा है कि आर्यों का इष्ट एक ही रहा हैं-स्वयं प्रकाशित एकमेव(तद् एकं, तत् सत्यं)-सूर्य। सविता, सृजेता, स्रष्टा सूर्य ही सत्य का अधिपति, आलोक प्रदाता एवं रचयिता है, पुष्टिदायक पूषा है जो उसका ध्यान करने वाले साधक में केवेलेशन (स्वतः प्रकाशित ज्ञान) इंस्पीरेशन (अंतःप्रेरणा), इंट्यूशन (अंतर्ज्ञान) तथा ल्युमीनस डिसर्नमेण्ट द्वारा विवेक दृष्टि प्रदान करता है, मन की त्रिविध लोकों वाली सृष्टि को प्रकाश प्रेरणा से अनुप्राणित कर देता है। भौतिक चेतना वाला, “भूलोक” क्रियाशील-प्राणमय चेतना वाला “भूषः लोक” तथा प्रकाशमान मन (विशुद्ध मानसिक चेतना वाला) लिए “स्वःलोक” उसी सविता से प्रेरित है जिसकी रश्मियों ने इस सृष्टि का सृजन किया है। इनके माध्यम से सृष्टि के किसी भी जड़ चेतन घटक की संरचना में परिवर्तन संश्लेषण-विश्लेषण सभी कुछ कर पाना योगी के लिए संभव है।
सुप्रसिद्ध इण्डॉ.लाजिस्ट व अपने समय का एक अनोखा ही प्राच्यविद् पाल ब्रण्टन अपनी भारत व्यापी शोध के दौरान तिब्बत, मिश्र, भारत के गुह्यज्ञान के विस्तार को जानने के निमित्त वाराणसी आया। उस दौर का विवरण उसने “ए सर्च इन सीक्रेट इण्डिया” पुस्तक में विस्तार से दिया गया है। उसमें सूर्य विज्ञान को समर्पित एक निबंध में उसने विशुद्धानंद कानन आश्रम मलदहिया बनारस में श्री गोपीनाथ कविराज के माध्यम से परमहंस विशुद्धानंद जी से हुई चर्चा का वर्णन लिखा है। चूँकि ब्रण्टन की दृष्टि कौतुक की थी, परमहंस ने उसे पहले स्फटिक के माध्यम से एक रूमाल में भाँति-भाँति की सुगंध संग्रहित करके दीं। यही नहीं उसने यह भी देखा कि शून्य से ताजा अंगूर, हवा से मिठाइयाँ कैसे पैदा की जा सकती हैं, मुरझाये फूल को फिर से ताजा हरा-भरा कैसे बनाया जा सकता है? इन सबका विज्ञान सम्मत आधार समझाते हुए उनने कहा कि सूर्य रश्मियाँ प्राणशक्ति का अजस्र स्रोत हैं। इनके मर्म को जानकर उनका संघटन या विघटन करना ही सूर्य विज्ञान कहलाता है। इस गुह्यविज्ञान से दुर्लभतम सिद्धि सृष्टि संरचना की शक्ति हस्तगत की जा सकती है। संभवतः विश्वामित्र द्वारा नूतन सृष्टि की उत्पत्ति इसी विधा के आधार पर हुई हो क्योंकि गायत्री मंत्र सविता देवता की अभ्यर्थना की ही प्रार्थना रूप में है तथा गायत्री का ऋषि उन्हें ही माना जाता है।
परमहंस विशुद्धानंदजी मात्र सुपात्र, पवित्र अंतःकरण वाले व्यक्तियों के समक्ष ही सूर्य विज्ञान की इन सिद्धियों का प्रदर्शन कर उन्हें सविता देवता की साधना की गायत्री अनुष्ठान व योग साधना के क्षेत्र में गहरे प्रवृत्त होने की प्रेरणा देते थे। कभी भी उनका प्रदर्शन ख्याति के निमित्त अथवा सिद्धि चमत्कार दिखाने के लिए नहीं रहा। यही कारण था कि वह एकाकी गहन शोध कर सूर्य विज्ञान विधा को तिब्बत की दुर्गम गुफाओं से लाकर पवित्र नगरी वाराणसी में प्रतिष्ठित कर सके। हीरा, सोना, मोती, मूँगा आदि सूर्य किरणों से विनिर्मित कर वापस उसे ब्रह्मांड में लौटा देने की क्रिया अनेकों व्यक्तियों ने अपनी आँखों से देखी है। यही नहीं सभी की नाभि में कमल होता है, यह उनने अपनी नाभि से नाल सहित कमल उत्पन्न कर अपने शिष्यों को दिखाया था । वे निज की काया में प्रयोगशाला के परीक्षण की तरह भाँति-भाँति के प्रयोग कर उनकी व्याख्या करते थे व जिज्ञासु साधकों को सावित्री विद्या में प्रवृत्त करते थे। एक दिन उनने एक सुपात्र शिष्य जोगेश वसु को व्याधिग्रस्त पाकर दो बेला के फूलों को सूर्य की किरणों द्वारा स्फटिक में बदल दिया तथा एक को उनके तथा दूसरे को गुरुभाई केदार भौमिक के शरीर में योगबल से प्रविष्ट करा दिया व कहा कि इससे तुम्हारे शरीर निरोग रहेंगे तथा परमाणु उत्तम बनेंगे। गोलाकार स्फटिक शरीर में प्रवेश भी कर गये व शरीर से रक्त की एक बूँद भी न निकली। दोनों भाई धर्मक्षेत्र की सेवा स्वस्थ जीवन जीकर काफी समय तक कर सके। (स्वामी विशुद्धानंद की जीवनी लेखक नंदलाल गुप्त, प्रकाशक विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी से उद्धृत)।
पंडित गोपीनाथ कविराज सूर्य विज्ञान के ऊपर पड़े रहस्य के पर्दों को अनावृत्ति कर लिखते हैं कि “यह विधा विशुद्धतः सूर्य रश्मियों के ज्ञान पर निर्भर है। इनके विभिन्न प्रकारों से संयोग व वियोग होने पर विभिन्न प्रकार के पदार्थों की अभिव्यक्ति होती है। विभिन्न रश्मियों का परस्पर सुनियोजित संगठन ही सूर्य विज्ञान का रहस्य है। इनसे सृष्टि भी की जा सकती है व संहार भी। इसीलिए सही विधा को जानना बहुत जरूरी है।” वे लिखते हैं कि विज्ञान की सृष्टि व योग बल से की गयी सृष्टि में अन्तर स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिए। उनके अनुसार योग सृष्टि इच्छाशक्ति से होती है। स्रष्टा की आत्मा व उसका आचवल ही इसमें मुख्य उपादान है। अपनी प्रबल इच्छा द्वारा आत्मा के अंदर स्थित स्वरूप को बाहर प्रकाशित करना ही योग सृष्टि है। साव़ी विधा के अंतर्गत यही ताँत्रिक परिभाषा के अनुसार बिंदु की विर्स्पलीला है।”
आघ श्रीशंकर कहते हैं कि समग्र विश्व का लीली व्यापार आत्मा के निज स्वरूप के अंतर्गत चल रहा हैं दर्पण के प्रतिबिंब रूप में दिखाई दे रही नगरी जैसे दर्पण के ही अंतर्गत है, पृथक नहीं, वैसे ही प्रकाशमान आत्मा में प्रतिभासित दृश्य आत्मा के ही अंतर्गत है, उससे पृथक नहीं जाती इसी रूप में विश्व को देखा करते है। ज्ञानी मायाशक्ति का आश्रय लेकर ही आत्मा की शक्ति का बाहर प्रकाशन करते है।”
योगी की विज्ञान की सृष्टि वह है जिसमें स्फटिकादि माध्यमों द्वार सूर्य रश्मियों के संघटन या विघटन द्वारा प्रकृतिगत पदार्थ के मूलभूत द्रव्यों का बनाया या बिखराया जा सकता है। प्रयोजन के अनुसार प्रकृतिगत संरचना में उस गुण को उभारा जा सकता है जो प्रयोगकर्ता चाहता है। जिस हम गुलाब कहते है वह बाह्य रूप में तो गुलाब है किन्तु उसमें विश्व सृष्टि के मूलभूत सभी द्रव्य विद्यमान है। इसलिए आवश्यकता पड़ने पर कमल के उपादान-द्रव्यगुणों का आकर्षण कर गुलाब में से ही कमल पुष्य का निर्माण किया जा सकता है। केवल पुष्य ही नहीं, जो भी वस्तु चाहें उसमें उस गुलाब के रूप को बदला जा सकता है। रूप बदलने पर भी गुलाब का वह फूल शून्य नहीं होता-अव्यक्त अवश्य हो जाता है। गुलाब सूक्ष्म रूप में रह गया एवं कमल स्थूल रूप में फूट उठा। सूर्य विज्ञान यह मानता है कि विज्ञान की सृष्टि का यह सिद्धांत संसार में जाये जाने वाले हर पदार्थ व चेतन घटकों पर लागू होता है।
प्रत्येक वस्तु की पृष्ठभूमि में अव्यक्त और स्थूल दोनों रूप में मूल प्रकृति रहती है। प्रकृति में परिवर्तन योगी ही कर पाता है।
सूर्य विज्ञान का प्रस्तुत प्रसंग अलौकिक भी है तथा अनेकानेक अद्भुतताओं के साथ संभावनाओं से भरा हुआ भी। यह बताता है कि सूर्य का सूक्ष्म व कारण रूप रचयिता व पोषणदाता वाला स्वरूप है तथा सूर्य रश्मियों के स्पेक्ट्रम के संकुचित ज्ञान द्वारा स्थूल रूप से स्फटिक-लेन्स आदि से अथवा योगबल से उनकी क्रम व्यवस्था में न्यूनाधिक परिवर्तन कर सृष्टि के घटकों के रूपों का बदला जा सकता है। यह विधा असीम संभावनाओं से भरी पड़ी है। भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ क्रांतिदर्शी ऋषिगण इन विधाओं में निष्णात् होने के कारण ही बिना किसी मंत्र की सहायता के विभिन्न प्रयोग संपन्न कर लिया करते थे। यदि आज उपलब्ध साधनों व ज्ञान का सही नियोजन किया जा सके तो अनेकानेक व्यक्तियों को विज्ञान की इस गुह्य विधा से लाभान्वित किया जा सकता है।
गायत्री परिवार शांतिकुंज के इस वर्ष के आगामी अश्वमेध
अब तक चार अश्वमेध भारत में संपन्न हो चुके-जयपुर, भिलाई, गुना एवं भुवनेश्वर। आगामी तीन माह में जब भारत में वर्षाऋतु होती है-भारत से बाहर इंग्लैण्ड में लेस्टर शायर में 9-10-11 जुलाई को , कनाडा में टोरोंटो में 23-24-25 जुलाई 1993 तथा अमेरिका (यू.एस.ए.) में लाँस एंजेल्स में 20-21-22 अगस्त की तारीखों में ये अश्वमेध उसी विराट स्तर पर आयोजित किये जा रहे है। तीनों में ही परम वंदनीय माता जी की उपस्थिति रहेगी। अक्टूबर 1993 में लखनऊ में 27-28-29-30 अक्टूबर की तारीखों में (शरद पूर्णिमा), नवंबर 1993 में बड़ौदा (गुजरात) में 26-27-28-29 नवम्बर की तारीखों। में (कार्तिक पूर्णिमा), तथा दिसम्बर 1993 में भोपाल (म.प्र.) में 11-12-13-14 दिसंबर की तारीखों में अश्वमेध यज्ञ घोषित हैं।
हम ‘सविता’ के अंश, ‘तपस्वी’ हमको होना चाहिये। हम ‘प्रज्ञा के पुत्र ‘मनस्वी, ‘हमको होना चाहिये॥ 1 ॥
ज्योति पुँज-सविता के अंशज, होकर क्यों सतेज रहें। प्राण-पंज-प्रज्ञा के वंशज, क्यों न प्राण सहेज रहें॥
प्राणवान होकर ‘ओजस्वी’, हमको होना चाहिए। हम ‘सविता’ के अंश ‘तपस्वी’ हमको होना चाहिए॥2॥
दिव्य चेतना के हम प्रतिनिधि, प्राणवान, चैतन्य है। प्रतिनिधि हमीं विराट ब्रह्म के, हम पावन हैं, धन्य है॥
ब्रह्म तेज-धार ‘वर्चस्वी’, हमको होना चाहिए। हम ‘सविता’ के अंश ‘तपस्वी’, हमको होना चाहिए॥3॥
जड़ चेतना के पोषक सविता हम उनका अनुकरण करें। प्राणिमात्र में अपने पनकी, क्षमता को, हम वस्थ करें॥
परम पिता के पुत्र ‘यशस्वी’, हमको होना चाहिए। हम ‘सविता’ के अंश तपस्वी, हमको होना चाहिए॥4॥
प्रखर-प्राण के साध बन हम, फिर जन-जन में प्राण भरें। और सजल श्रद्धा से विगलित, हो जन-जन का वाण करें॥
जन सेवा सा ही सद्धर्म्मी,’ हमको होना चाहिये। हम ‘सविता’ के अंश ‘तपस्वी’, हमको होना चाहिए॥5॥
हम प्रकाश के अंशज, जन-मन अंधकार से रिक्त करें। हम प्रज्ञा के वंशज, जगमो दुष्चिंतन से मुक्त करें॥
महाकाल के संग ‘श्रेयस्वी’, हमको होना चाहिये। हम ‘सविता’ के अंश ‘तपस्वी’, हमको होना चाहिये॥6॥
-मंगल विजय
मोटे तौर पर उपवास के लाभों से सभी परिचित हैं। इससे पेट का अपच ठीक हो जाता है। पाचन अंग नई चेतना के साथ दुगुना काम करने गलते हैं। आमाशय में भरे हुए उपक्व अन्न से जो विष उत्पन्न होता है, वह नहीं बनता।उपवास के ये लाभ ऐसे हैं जो हर किसी को मालूम हैं। डॉक्टरों का यह निष्कर्ष प्रसिद्ध है कि स्वल्पाहारी दीर्घजीवी होते हैं। जो बहुत खाते हैं पेट को ठूँस कर भरते हैं, कभी पेट को चैन नहीं लेने देते, एक दिन को भी उसे छुट्टी नहीं देते वे अपनी जीवन संपदा को जल्दी ही समाप्त कर लेते है। स्थिर आयु की अपेक्षा बहुत जल्दी उन्हें दुनिया से बिस्तर बाँधना पड़ता है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से इसके असाधारण महत्व को स्वीकार करते हुए आयुर्वेद शास्वनि निर्देश दिया है कि “बीमारी को भूखा मारो। भूखा रहने से बीमारी मर जाती है और रोगी बच जाता है। संक्रामक-कष्टसाध्य एवं खतरनाक रोगों में उपवास भी चिकित्सा का एक अंग है। मोतीझरा, निमोनिया, विसूचिका, प्लेग, सन्निपात जैसे रोगों में कोई भी चिकित्सक लंघन-उपवास कराए बिना रोग को आसानी से अच्छा नहीं कर पाता। प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में तो समस्त रोगों में पूर्ण या आंशिक उपवास हो ही प्रधान उपचार माना गया है।
लेकिन इतने तक ही इसका महत्व सीमित नहीं है। इसके अनेकों गुह्य और गहन पक्ष ऐसे भी हैं जिन्हें समझ लेने पर कहा जा सकता है कि उपवास सरल किन्तु समर्थ योग साधना भी है। गीता में-विष्या विनिवर्तन्तें निराहारस्य देहिनः” कहर इसी तत्व की ओर संकेत किया है। इसी तथ्य को भली प्रकार समझ कर ऋषियों ने हर महीने कई उपवासों का धार्मिक महत्व स्थापित किया था।
साधना विज्ञान में अन्नमय कोष की शुद्धि के लिए उपवास की विशेष आवश्यकता को स्वीकारा गया है। शरीर में कई जाति की उपत्यिकाएँ देखी जाती हैं जिन्हें शरीर विज्ञानी नाड़ी गुच्छक कहते हैं। देखा गया है कि कई स्थानों पर ज्ञान तन्तुओं जैसी बहुत पतली नाड़ियाँ आपस में चिपकी होती है। यह गुच्छक कई बार रस्सी की तरह आपस में लिपटे और बटे हुए होते हैं कई जगह ये गुच्छक गाँठ की तरह ठोस गोली जैसे बन जाते हैं।
कई बार यह समानात्र लहराते हुए सर्प की भाँति चलते हैं और अन्त में उनके सिर आपस में जुड़ जाते हैं।
कई जगह इनमें बरगद के वृक्ष की तरह शाखा प्रशाखाएं फैली रहती हैं। दस प्रकार के कई गुच्छक परस्पर संबंधित होकर एक परिधि बना लेते है। इनके रंग आकार एवं अनुच्छेद में काफी अन्तर होता है। यदि अनुसंधान किया जाय तो उनके तापमान,अणु, सरिकम्ण एवं प्रतिभापुंज-प्रभाव परिकर में काफी अन्तर पाया जाएगा।
वैज्ञानिक इन नाड़ी गुच्छकों के कार्य का कुछ विशेष परिचय अभी तक नहीं प्राप्त कर सके है। पर साधना विज्ञान के मर्मज्ञ जानते हैं कि यह उपत्यिकाएँ शरीर में अन्नमयकोश की बंधन ग्रन्थियाँ हैं। मृत्यु होते ही सब बंधन खुल जाते है। और फिर एक भी गुच्छक दिखाई नहीं देता। यह उपत्यिकाएं अन्नमय कोष के गुण-दोषों की प्रतीत हैं। “इन्धिका” जाति की उपत्काएँ चंचलता, अस्थिर, उद्विग्नता की प्रतीक है। नि व्यक्तियों में इस जाति के नाड़ी गुच्छक अधिक हों तो उनका शरीर एक स्थान पर बैठकर काम न कर सकेगा। उन्हें कुछ क्षटपट करते रहनी पड़ेगी। ‘दीपिका जाति की उपत्यिकाएँ जोश-क्रोध शारीरिक ऊष्णता गर्मी खुश्की आदि उत्पन्न करेगी। ऐसे गुच्छकों की अधिकता वाले लोग चर्मरोग, फोड़ा, फुन्सी, नकसीर फूटना, पीला पेशाब, आँखों में जलन आदि रोगों के शिकार होते रहेंगे।
भोचिकाओं की अधिकता वाले व्यक्ति के शरीर से पसीना लार-कफ, पेशाब आदि मलों का निष्कासन अधिक होगा। पतले दस्त अक्सर हो जाते है और जुकाम की शिकायत होते देर नहीं लगती। ‘आप्यायिनी’ जाति के गुच्छक आलस्य, अधिक निद्रा, अनुत्साह, भारीपन उत्पन्न करते है। ऐसे व्यक्ति थोड़ी-सी मेहनत में थक जाते है। उनसे कठोर शारीरिक या मानसिक कार्य नहीं होता।
‘पूषा’ जाति के गुच्छक काम वासना की और मन को बलात् खींच ले जाते है। संयम-ब्रह्मचर्य के सारे आयोजन धरे रह जाते है। “पूषा” का तनिक-सा उत्तेजन मन को बेचैन कर डालता है और वह बेकाबू होकर विकार ग्रस्त हो जाता है। शिवजी का शर संधान करते समय कामदेव ने अपने कुसुम बाण से उसे प्रदेष की पूषाओं को उत्तेजित कर डाला था।
‘चन्द्रिका’ जाति का उपत्यिकाऐं सौंदर्य बढ़ाती है। उनकी अधिकता के वाणी में मधुरता, नेत्रों में मादकता, चेहरे पर आकर्षण, कोमलता एवं मोहकता की मात्रा रहेगी। ‘कपिल’ के कारण नम्रता, डर लगना, दिल की धड़कन, बुरे स्वप्न आशंका, मस्तिष्क की अस्थिरता नपुँसकता वीर्यरोग, आदि लक्षण पाए जाते है। “घूसार्धि” में संकोचन शक्ति बहुत अधिक होती है। फोड़े देर में पकते है, कफ मुश्किल से निकलता है। शौच देर से होता है। मन की बात कहने में झिझक लगती है। “ऊष्माओं” की अधिकता से मनुष्य हाँफता रहता है। जाड़े में भी गर्मी लगती है। क्रोध आते देर नहीं लगती। जल्दबाजी बहुत होती है। रक्त की गति श्वास-प्रश्वास में तीव्रता रहती है।
“अमाया” वर्ण के गुच्छक दृढ़ता, मजबूती, कठोरता, गम्भीरता, हठधर्मी के प्रतीक होते है। इस प्रकार के शरीरों पर बाह्य उपचारों का कुछ असर नहीं होता। कोई दवा काम नहीं करती। ये स्वेच्छापूर्वक रोगी या रोग मुक्त होते है। उन्हें कोई कुपथ्य रोगी नहीं कर पाता, परन्तु जब गिरते है तो संयम-नियम का पालन भी कुछ काम नहीं आता।
चिकित्सक लोगों के उपचार अनेक बार असफल होते रहते है। कारण कि उपत्यिकाओं के अस्तित्व के कारण शरीर की सूक्ष्म स्थिति कुछ ऐसी हो जाती है कि चिकित्सा कुछ विशेष काम नहीं करती। “उद्गीथ” उपत्यिकाओं की अभिवृद्धि से संतान होना बन्द हो जाता है। वह जिस पुरुष या स्त्री में अधिक होगी वह पूर्ण स्वस्थ रहते हुए संतान उत्पादन के अयोग्य हो जाएगा। स्त्री-पुरुष में से ‘असिता’ कर अधिकता जिनमें होगी वही अपने लिंग की संतान उत्पन्न करने में विशेष सफल रहेगा। असिता से संपन्न नारी को कन्याएँ और पुरुष को पुत्र उत्पन्न करने में सफलता मिलती है।
‘युक्त हिस्सा’ जाति के गुच्छक क्रूरता, दुष्टता, परपीड़न की प्रेरणा देते है। ऐसे लोगों को आवश्यक धन-सम्पत्ति होते हुए भी अनुचित मार्ग अपनाने को मन मचलता है। कोई विशेष कारण न होते हुए भी दूसरों के प्रति ईर्ष्या, द्वेष और
प्रार्थना उपवास बिना नहीं होती, और उपवास यदि प्रार्थना काक अभिन्न अंग न हो तो वह शरीर को मात्र यन्त्रणा है, जिससे किसी का कुछ लाभ नहीं होता। ऐसा उपवास तीव्र आध्यात्मिक प्रयास है, एक आध्यात्मिक संघर्ष है। वह प्रायश्चित और शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। --महात्मा गाँधी
आक्रमण का आचरण करते है। ‘हिस्ना उपत्यिकाएँ अशांति की प्रेरक है। ऐसे लोग अपना सिर फोड़ लेते-स्वयं पर अकारण हिंसा करते, आत्महत्या करते बच्चों को बेतरह पीटते और कुकृत्य करते देखे जाते है।
योग शास्त्रों में इस तरह की 96 उपत्यिकाओं का वर्णन किया गया है। यह ग्रंथियां ऐसी है जो व्यक्तित्व को इच्छानुकूल रखने में बाधक होती है। मनुष्य चाहता है कि मैं अपने व्यक्तित्व को ऐसा बनाऊं वह उसके लिए कुछ उपाय भी करता है, पर कई बार वे उपाय सफल नहीं होते कारण यह है ये कि उपत्यिकाएँ भीतर ऐसी विलक्षण क्रिया एवं प्रेरणा उत्पन्न करती है जो यह प्रयत्नों को सफल नहीं होने देती और मनुष्य अपने को बार-बार असफल एवं असहाय अनुभव करता है।
उपवास का इन उपत्यिकाओं के संशोधन परिमार्जन और सुसन्तुलन से बड़ा गहरा संबंध है। योग साधना में उपवास का एक सुविस्तृत विज्ञान है। अमुक प्रकार से उपवास करने का अमुक फल देता है। ऐसे आदेश शास्त्रों में जगह-जगह पर मिलते है। ऋतुओं के अनुसार शरीर की छः अग्नियाँ न्यूनाधिक होती रहती है। ऊष्मा बहुवृच, हृवादी, रोहिता, आत्पता, व्याति यह छः शरीरगत अग्नियाँ ग्रीष्म से लेकर बसन्त तक छः ऋतुओं में क्रियाशील रहती है। इनमें से प्रत्येक के गुण भिन्न-भिन्न है।
एक उत्तरायण-दक्षिणायन की गोलार्ध स्थिति, दूसरे चन्द्रमा की घटती बढ़ती कलाएँ तीसरे-नक्षत्रों का भूमि पर आने वाला प्रभाव तथा चौथे सूर्य की अंश किरणों का मार्ग इन सभी का शरीरगत ऋतु अग्नियों के साथ संबंध होने से क्या परिणाम होता है इनका ध्यान रखते हुए ऋषियों ने ऐसे पुण्य पर्व निश्चित किए है जिनमें अमुक विधि से उपवास किया जाए तो उसका अमुक परिणाम हो सकता है। कार्तिक कृष्ण चौथे जिसे करवाचौथ कहते हैं उस दिन का उपवास दाम्पत्य प्रेम बढ़ाने वाला होता है। क्योंकि उस दिन की गोलार्ध स्थिति चन्द्रकलाएँ नक्षत्र प्रभाव सूर्य मार्ग का सम्मिश्रण परिणाम शरीरगत अग्नि के साथ समन्वित होकर शरीर एवं उनकी स्थिति को ऐसा उपयुक्त बना देता है जो दाम्पत्य सुख की सुदृढ़ और चिरस्थाई बनाने में बड़ा व्रत-उपवास है जो अनेक इच्छाओं आवश्यकताओं को पूरा करने में तथा बहुत से अनिष्टों को टालने में सहायक होते है।
उपवास प्रक्रिया के मर्मज्ञों ने इनके पाँच भेद किए है। पाचक, शोधक, शामक, आनस एवं पावक। पाचक उपवास वे है जो अपच अजीर्ण कोष्ठबद्धता को पचाते हैं। शोधक वे है जो रोगों को भूखा मार डालने के लिए किए जाते हैं। शामक उन्हें कहते हैं जो कुविचारों मानसिक विकारों, दुष्प्रवृत्तियों एवं विकृत उपत्यिकाओं का शमन करते है। आनस-वे है जो किसी विशेष प्रयोजन के लिए दैवी शक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किए जाते है। पावक वे है जो पापों के प्रायश्चित के लिए होते है। आत्मिक एवं मानसिक स्थिति के अनुरूप कौन-सा उपवास उपयुक्त होगा और उसके क्या नियमोपनियम होने चाहिए इसका निर्णय करने के लिए सूक्ष्म विवेचना की आवश्यकता है।
साधक का अन्नमय कोष किस स्थिति में है? उसकी कौन उपत्यिकाएँ विकृत हो रही है? किस उत्तेजित संस्थान को शान्त करने के लिए एवं किस मर्म स्थल को सतेज करने की आवश्यकता है? यह देखकर निर्णय किया जाना चाहिए कि कौन व्यक्ति किस प्रकार का उपवास कब करें?
पाचक उपवास में तब तक भोजन छोड़ देना चाहिए जब तक कि कड़ाके की भूख न लगे। एक बार एक दिन का या दो दिन का आहार छोड़ देने से आमतौर पर कब्ज पक जाता है। पाचक उपवास में सहायता देने के लिए नीबू का रस जल एवं किसी पाचक औषधि का सेवन किया जा सकता है। शोधन उपवासों के साथ विश्राम आवश्यक है। यह लगातार तब तक चलते है जब तक कि रोगी खतरनाक स्थिति को पार न कर ले। औटाकर ठण्डा किया हुआ पानी ही ऐसे उपवासों में एकमात्र अवलंबन होता है।
शामक उपवास दूध, छाछ, फलों का रस आदि पतले रसीले हल्के पदार्थों के आधार पर चलते है। इन उपवासों में आत्म चिन्तन, एकान्त सेवन मौन-जप-ध्यान आदि आत्मशुद्धि के उपचार भी होने चाहिए। उन उपवास में सूर्य की किरणों द्वारा अभीष्ट दैवी शक्ति का आह्वान करना चाहिए। सूर्य की सप्तवर्ण किरणों में राहु-केतु को छोड़कर अन्य सातों ग्रहों की रश्मियां सम्मिलित होती है। सूर्य-में तेजस्विता, ऊष्णता पित्त प्रकृति प्रधान है। चन्द्रमा-शीतल शान्तिदायक, उज्ज्वल कीर्तिकारक। मंगल-कठोर बलवान सहायक। बुध-सौम्य, शिष्ट, कफ प्रधान सुन्दर आकर्षक। गुरु-विद्या बुद्धि, धन, सूक्ष्मदर्शिता, शासन, न्याय, राज्य का अधिष्ठाता। शुक्र-वात प्रधान, चंचल, उत्पादक कूटनीतिक। शनि, स्थिरता, सुखोपभोग, दृढ़ता, परिपुष्ट का प्रतीक है। जिस गुण की आवश्यकता हो उसके अनुरूप दैवी तत्वों को आकर्षित करने के लिए सप्ताह में उसी का उपवास करना उचित है।
पावक उपवास प्रायश्चित स्वरूप किए जाते है। ऐसे उपवास केवल जल लेकर करने चाहिए। अपनी भूल के लिए प्रभु से सच्चे हृदय से क्षमा याचना करते हुए भविष्य में वैसी भूल न करने का प्रण करना चाहिए। अपराध के लिए शारीरिक कष्ट साध्य तितिक्षा एवं शुभ कार्य के लिए इतना दान देना चाहिए जो पाप की व्यथा को पुण्य की शान्ति के बराबर कर सके। चांद्रायण व्रत, कृच्छ चान्द्रायण आदि पावक व्रतों में गिने जाते है।
उपत्यिकाओं के शोधन परिमार्जन और उपयोगीकरण की साधना, तथा पाँचों पहर के उपवासों के सूक्ष्म तत्व जिसमें समाहित है, वह रविवार का सूर्य व्रत है। उस दिन सातों ग्रहों की सम्मिलित शक्ति पृथ्वी पर आती है जो विविध आयोजनों के लिए उपयोगी होती है। रविवार को प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्रों से उदय कालीन सूर्य के सम्मुख बैठना चाहिए। एक बार खुले नेत्रों से सूर्य नारायण को देखकर फिर नेत्र बन्द करके सविता के तेज पुँज का ध्यान करते हुए एक हजार गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। जप करते हुए ध्यान में यह भाव करें “इस सूर्य के तेजपुँज रूपी समुद्र में हम स्नान कर रहे है, वह हमारे चारों और ओत-प्रोत हो रहा है।” ऐसा ध्यान करने से सविता की ब्रह्म रश्मियां साधक, की आत्म चेतना की जाग्रता एवं सतेज करती है। बाहर से चेहरे पर सूर्य का ताप पड़ना और भीतर से ध्यानाकर्षण द्वारा सूक्ष्म रश्मियों को खीचना उपत्यिकाओं को सुविकसित करने में सहायक होता है।
जप और ध्यान के बाद अच्छा हो कि हवन की प्रक्रिया संपन्न हो। हवन करने से जप-ध्यान की ऊष्मा का शमन होता है। रविवार का उपवास अपने में गहन योग साधना है। बारह रविवार तक बिना नागा इस को करते रहने से साधक स्वयं में अपेक्षित परिवर्तन अनुभव कर सकता है। बारह रविवार लगातार सूर्य व्रत करने में द्वादश आदित्यों की उपासना का अलौकिक विज्ञान छुपा है।
इस संदर्भ में अनुभव ही साधक का स्वतः प्रमाण बनता है। इस दिन श्वेत या वासंती वर्ण की वस्तुओं का अधिक प्रयोग करना चाहिए। वस्त्र
तीव्रं निर्वाणहेतुर्यदपि च विपुलं यत्प्रकर्षेण चाणु। प्रत्यक्षं यत्पसेक्षं यदिह यदपरं नष्वरं शाष्वतं च।
यत्सवस्त प्रसिद्धं जगति कतिपये योगिनो यद्विदंति ज्योतिस्तदु द्विपकारं सवितुरवतु वो बाह्याभ्यंतरं च॥
जगत में सभी प्राणियों में प्रसिद्ध होने पर भी कुछ में योगियों द्वारा ज्ञानगम्य, नश्वर होते हुए भी नित्य, समीपस्थ होते हुए भी दूरस्थ, प्रत्यक्ष होते हुए भी, परोक्ष, विस्तीर्ण होते हुए भी अत्याधिक अणुरूप और तीव्र होते हुए भी, मोक्ष की हेतुभूत, सूर्य की बाह्य तथा अन्तः दोनों प्रकार की ज्योति आपकी रक्षा करें। -मयूर (सूर्यषतक, 29)
भी सफेद या वासंती पीले रंग के हों। श्वेत वस्त्र सप्त रश्मियों के समुच्चय श्वेत प्रकाश के प्रतीक रूप में तथा वासंती या पीला वस्त्र सूर्य व बृहस्पति के समन्नित के सुतीकात्मक रूप में पहना जाता है। दोपहर के बारह बजे तक कुछ न ग्रहण करना उत्तम है। बारह बजे के बाद जल अथवा तरल पदार्थ फलों का रस आदि लिया जा सकता है। सूर्य अस्त के बाद कुछ भी लेना वर्जित माना गया है। सूर्य तप के अधिदेवता हैं-रविवार का उपवास तप का प्रतीक जिसके परिणाम साधक को पवित्रता-प्रखरता तेजस्विता के रूप से अनुभव करने में मिलते है।
उपवास करने से चित अन्तर्मुख होता है, दृष्टि निर्मल होती है और देह हलकी बनी रहती है।
काका कालेलकर
सौर-मण्डल के ऊर्जा प्रवाहों से यों तो जीवन की लगभग सभी गतिविधियां प्रभावित परिवर्तित होती हैं। लेकिन इसकी सबसे गहरी सघनता मानवीय स्वास्थ्य के साथ जुड़ी हुई है। दस रहस्य को जानने के कारण ही आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली किसी समय में हर तरह की बिमारियों के उपचार में सक्षम थी। आज जैसे असाध्य नाम के कोई रोग न थे। न केवल रोग निवारण और स्वास्थ्य संवर्धन वरन् वृद्धावस्था में भी यौवन प्राप्त करने के कायाकल्प जैसे उपचारों उल्लेख आयुर्वेद में मिलता है।
आयुर्वेद की चिकित्सा प्रणाली, निदान, उपचार की विधियाँ आज भी प्रचलित हैं संबंधित महत्वपूर्ण ग्रन्थ भी उपलब्ध हैं। रोगोपचार की वनस्पतियाँ भी अविज्ञात नहीं है। फिर क्या कारण है कि कायाकल्प और असाध्य रोगों का उपचार तो दूर रहा सामान्य निदानों में उपचार में भी सफलता नहीं मिल पाती। गहराई से चिन्तन करने पर एक ही तथ्य उधर करे भ्रमक आता है कि प्राचीन आयुर्वेद के साथ सारे परिवार के ऊर्जा प्रवाहों का रहस्यात्मक ज्ञान धुला मिला था। आयुर्वेद की सफलता का श्रेय भी कभी इसी नियम को था।
आयुर्वेद के मूर्धन्य विद्वानों में चरक सुश्रुत वागभट्ट का नाम आता है। ये सभी न केवल चिकित्साशास्त्र के वरन् ‘ज्योतिर्विज्ञान के भी मर्मज्ञ थे। किंवदंती है कि ‘चरक’ वनस्पतियों के संग्रह के लिए वनों एवं पहाड़ों पर जाते थे तो जड़ी-बूटियां स्वतः अपनी विशेषताओं और गुणों को बता देती थी। साथ ही उन्हें किस वातावरण में और कब लगाने से क्या विशेषताएं पैदा होती हैं और किस तरह की मनोभूमि एवं रोग वाले व्यक्ति को लाभ पहुँचाती है, की जानकारी भी दे देती थी। कथानक की सत्यता और असत्यता पर ध्यान न देकर सन्निहित तथ्यों पर ध्यान दे तो पता चलता है रोग निवारण में मात्र औषधि का ही योगदान नहीं होता। उसे किस वातावरण में कब और किन ग्रह-नक्षत्रों की योगस्थिति में उगाए जाने से क्या प्रभाव पड़ता है यह जानना भी आवश्यक है।
मानवी स्वास्थ्य अन्तर्ग्रही गतिविधियों एवं परिवर्तनों से असाधारण रूप से प्रभावित होता है। इस तथ्य पर प्रकाश डालने वाले कितने ही सूत्रों का उल्लेख आयुर्वेद शास्त्र में मिलता है। ज्योतिष सूत्र के अनुसार “अष्टमी व्याधिनाशिनी” अर्थात् अष्टमी, जो चन्द्रमा का आठवाँ दिन होता है सम्पूर्ण व्याधियों का अन्त करने वाला दिन होता है सम्पूर्ण व्याधियों का अन्त करने वाला दिन है अर्थात् इस दिन जो भी औषधि ली जाएगी लाभकारी होगी। अष्टमी को सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरे से 10 अंश पर स्थिर होते हैं। इसलिए दोनों ही पृथ्वी के सभी द्रवों के प्रति अपना आकर्षण कम कर देते हैं। मानव शरीर में विद्यमान रक्त और जल में भी सूर्य और चन्द्र का अतिरिक्त आकर्षण कम हो जाने से इस अवधि में दी गई दवाएँ अधिक प्रभावकारी सिद्ध होती हैं।
“भैषजिक ज्योतिच” के अनुसार अनेकों बीमारियाँ विशेषतः चर्मरोग, पागलपन, मिरगी, मानसिक चिकित्सा शुक्लपक्ष में ठीक होती हैं। आधुनिक चिकित्साशास्त्र को इसकी कोई जानकारी नहीं है कि ऐसा क्यों होता है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार शुक्लपक्ष में सूर्य और चन्द्रमा आकाश में एक दूसरे के अधिक निकट होते हैं। ये दोनों ही पृथ्वी के वायु मण्डल में संव्याप्त गैस कणों को अधिक आकर्षित करते है। जिसका प्रभाव मनुष्य और पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। प्रायः ऐसा देखा गया है कि चतुर्दशी का जब सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरे से 160 अंश का कोण बनाते हैं- बीमारियों की उग्रता एवं भावनात्मक उद्वेग इन्हीं दिनों चरम बिंदु पर होता है।
आयुर्वेद की प्रसिद्ध त्रिदोष भी अपने सौर-मण्डल के ऊर्जा प्रवाहों के कितने ही सूक्ष्म रहस्यों को समाहित किए हुए हैं, जिन्हें समझा जा सके तो अनेक रोगों के उपचार में सहयोग मिल सकता है। ‘बात’ शब्द की उत्पत्ति ‘वा’ धातु से हुई है। पित्त शब्द का उद्गम ‘तप’ से हुआ है। ‘तप’ अर्थात् तापर्स तामे पित्तम अर्थात् उत्कान्तता, उत्तेजना, और शक्ति का परिचायक। कफ श्लेषम आलिंगने। टीकाकार चक्र पाणि ने इन तीनों की व्याख्या सारगर्भित रूप में की है। उनके अनुसार बात गति का पित्त शक्ति का और कफ .आकर्षण का प्रतीक है। लेकिन इतना ही जानना काफी नहीं है कि ये तीनों शरीर की मूल तीन रासायनिक प्रकृतियाँ मात्र हैं, वरन् इनकी सूक्ष्म विशेषताओं को जानना भी आवश्यक है।
आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत का मत है कि जिस प्रकार सूर्य चन्द्रमा और वायु की शक्तियाँ संसार को गतिशील करने के लिए आवश्यक हैं। उसी तरह वात्, पित् और कफ का संतुलन शारीरिक एवं मानसिक आरोग्य के लिए भी अनिवार्य है। इन तीनों प्रकृतियों पर सौरमण्डल के ग्रहों की गति, स्थिति, परिवर्तनों का समय-समय पर क्या प्रभाव पड़ता है यह जानना भी महत्वपूर्ण है। रोग का निदान और उपचार भलीभाँति तभी संभव है।
ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार तारा पुँजों की तीन समुदाय है। वे तीनों वात-पित,कफ की स्थिति का भी समय-समय पर प्रभावित करते है। इसी तरह ग्रहों का प्रभाव भी तीनों ही धातुओं पर पड़ता है। उदाहरणार्थ सूर्य अधिकांशतः पित्त पर, चन्द्रमा घात पर असर करता है। चन्द्रकला की स्थिति और सूर्य की गतिविधि के कारण दोनों ही तत्वों में उतार चढ़ाव आते हैं। ज्योतिष शस्त्र का मत है कि चन्द्रमा मन का, सूर्य आत्मा को बुध चेतन तन्तुओं को अपनी स्थिति से प्रभावित करते हैं। जिन जातकों में सूर्य और चन्द्रमा आग्नेय राशियों के नक्ष़ में होते हैं। ऐसी स्थिति में शुष्क, गर्म धूप वाली जलवायु में रहने वाले व्यक्तियों के चेतना तन्तुओं में विशिष्ट प्रकार की विकृतियाँ आ जाती हैं। जिनके कारणों से आज के चिकित्सा शास्त्री अपरिचित होते हैं। फलस्वरूप उनको निदान और उपचार में सफलता नहीं मिल पाती।
शरीर विज्ञान और चिकित्साशास्त्र के जिन गूढ रहस्यों पर सौरमण्डल के ऊर्जा प्रवाह असर डालते हैं उसके विषय में विश्व में ढूँढ़ खोज आरंभ हो गई है। रोगों की उत्पत्ति और उपचार में शारीरिक और मानसिक स्थिति में अन्तर्ग्रही परिस्थितियों का भी योगदान होता हैं। अव यह विश्व के ख्यातिनामा चिकित्सा शास्त्री अनुभव करने लगे हैं। डॉ. एडसन ने अपने अनेकों प्रयोगों के उपरान्त यह निष्कर्ष निकाला है कि रक्त स्राव की बयासी प्रतिशत घटनाएँ चाँद के प्रथम और तीसरे सप्ताहों में घटित होती हैं। प्रो. रिविस्ज का मत है कि मानव शरीर में विद्युतीय शक्ति की अधिकता पूर्णमासी की रात को होती है। ये विद्युतीय परिवर्तन मनुष्य को मनःस्थिति और स्वभाव को विक्षुब्ध करते हैं। डॉ. बेकर के अनुसार मानसिक विक्षिप्तता के कारण इन्हीं दिनों अपराध की घटनाओं में भी वृद्धि होती है। प्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक निकोल ससिउज का मत है कि सूर्य कलंकों में वृद्धि होने से मानव रक्त में पाये जाने वाले रक्षात्मक श्वेतकणों में कमी आ जाती है। फलतः रुग्ण होने की संभावना बढ़ जाती है।
प्राचीन ज्योतिर्विद्या में न केवल रोगों की उत्पत्ति के कारणों का वर्णन है वरन् निदान और उपचार पर भी प्रकाश डाला गया है। भैषजीय ज्योतिर्विज्ञान में रोग निदान का विस्तृत उल्लेख किया है। उसमें मात्र औषधि उपचार का ही नहीं अन्तर्ग्रही परिवर्तनों के साथ खान-पान में किस तरह हेर-फेर करना तथा उपवास एवं मंत्र चिकित्सा का प्रयोग अपनाना चाहिए का भी छुट-पुट वर्णन मिलता है। “अरिष्ट योग” में बताया गया है कि रोगी की क्षय हुई शक्ति को और नष्ट हो गई कोशिकाओं को मंच चिकित्सा द्वारा पुनः प्राप्त किया जा सकता है।
सौरमण्डल के विविध ऊर्जा प्रवाहों का मूल स्त्रोत सूर्य स्वयं है। अन्य सब इसी की शक्ति से अनुप्राणित संचालित हैं। इसी वजह से इसे ग्रहों का अधिपति भी माना गया है। सूर्य की उपासना मनुष्य में इन सभी अन्तरिक्षीय प्रवाहों को सन्तुलित करती और ग्रहों के दुष्प्रभावों को समाप्त करती हैं। अथर्व वेद में कहा गया है-
अपचित प्र पतत सुपणों वसतेरिव सूर्य कृणातु भषजं चंन्द्रमा वोडपोच्छतु !!
अथर्व 6-83-1
जिस प्रकार मरुण वसति से दौड़ जाता है- उसी प्रकार उपचनादि व्याधियाँ दूर चली जाएँगी। इसके लिए सूर्य औषधि बनाये और चन्द्रमा अपने प्रकाश से उन व्याधियों का नाष करें।
इस मंत्र में स्पष्ट है कि सूर्य औषधि बनाते हैं विश्व में प्राण रूप हैं तथा वे अपनी रश्मियों से स्वास्थ्य ठीक करते हैं। पद्मपुराण में भी कहा है- अस्योयासनमात्रेण सवरोगाप्रमुच्यते (सृष्टि ख. 79/17) भगवान सूर्य की उपासना मात्र से सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती हैं। सूर्य उपासना द्वारा रोगनिवारण का चमत्कारी रहस्य इसके द्वारा ब्रह्माण्ड के ऊर्जा प्रवाहों के संतुलन तथा अन्तर्ग्रही दुष्प्रभावों के निवारण में समाहित है। रोगों की उत्पत्ति में प्रत्यक्ष स्थूल कारणों को महत्व दिया जाता है। अदृश्य किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सौरमण्डल के देवीय ज्ञान को भी चिकित्सा अनुसंधान की कड़ी में जोड़ा जा सके तो रोगों के कारण और निवारण के आश्चर्यकारी सूत्र हाथ लग सकते हैं।
हे प्रातः काल के उगते हुए सूर्यदेव! टाप संपूर्ण शक्ति के प्राण हैं। आप वह प्रकाश भर जाते हैं, जिससे प्रजा का चेतना, आरोग्य और स्वास्थ्य मिलता है। सूर्यदेव की स्तुति में वेद भगवान-”स नो भूड़ाति तन्वेत्र जुगो सजन” “भाइयो, मित्रो! आओ देखो यह जो प्राची में प्रकाश पिण्ड के रूप में सूर्यदेव उग रहे हैं वह हमारे शरीर के दोष दूर करते हैं और आरोग्य शक्ति का गान करने वाले अनेकों मंत्र हैं। इनके अध्ययन से पता चलता है कि प्राचीन भारत में सूर्य चिकित्सा अपने सुविकसित रूप में थी। इसे विश्व की पहली चिकित्सा प्रणाली कहे तो अत्युक्ति न होगी।
आधुनिक चिकित्सा शास्त्री-विज्ञानवेत्ता भी सूर्य की स्वास्थ्यदायिनी शक्ति को अनुभव कर रहे हैं। सूर्य किरण चिकित्सा पर देशी-विदेशी चिकित्सकों ने अनेकों ग्रन्थों की रचना की है। एक अँग्रेजी कहावत है “लाइट इज लाइफ एण्ड डार्कनेस इन डेथ” अर्थात्-प्रकाश ही जीवन है और अंधकार ही मृत्यु है। जहाँ सूर्य की किरणें अथवा प्रकाश पहुँचता है वहाँ रोग के कीटाणु अपने आप मर जाते हैं और रोगों का जन्म नहीं होता। सूर्य रश्मियों द्वारा अनेक तरह के जरूरी तत्वों की वर्षा होती है। उन तत्वों की शरीर द्वारा ग्रहण करने पर अनेकों असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं। शास्त्र कहते हैं कि सूर्य के प्रकाश में सप्त रश्मियां लाल, हरी, पीली, नीली, नारंगी आसमानी और कासमी रंग विद्यमान हैं। प्रकाश के साथ इन रंगों तथा तत्वों की भी हमारे ऊपर वर्षा होती है। उनके द्वारा प्राणी और वनस्पतियाँ नव जीवन व नव चैतन्य प्राप्त करते हैं। यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि सूर्य के बिना हम जीवित नहीं रह सकते थे।
यही कारण है कि वेदों में सूर्य पूजा का विधान और महत्व है। हमारे प्राचीन ऋषिगणों ने सूर्य शक्ति पाकर प्राकृतिक जीवन जीने की बात कही है। आदिकाल के ग्रीक निवासी भी सूर्य चिकित्सालय बनवाने के साथ सौर उपासना करते थे। पश्चिमी चिकित्साशास्त्र का प्रणेता हिपोक्रेट्स भी इसी विधि से रोगियों को ठीक करता था। इसे अपने देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इसने आविष्कार तो बहुत किए, परन्तु बौद्धिक दासता ने सभी प्रयोगों का दबा दिया। मौर्य-गुप्त राजाओं के समय से यूनानी चिकित्सा आयी। अँग्रेजों के साथ एलोपैथी आयी। साथ ही प्राचीन शोध निष्कर्ष दबने लगे। आज के जमाने में प्रचलित सूर्य चिकित्सा को वर्तमान स्वरूप में ‘सर पलिझन होम’ लाए। उन्होंने अपनी किताब ‘आसमानी रंग और सूर्य प्रकाश में आसमानी रंगों एवं सूर्य किरणों से कई रोग समाप्त करने का वर्णन किया है। इसके बाद डॉ. येनस्काट ने ‘नीला और लाल प्रकाश’ तथा डॉ. एडबिन बेबिट ने ‘ प्रकाश और रंगों के नियम नामक पुस्तक में इस पद्धति पर प्रकाश डाला है और डॉ. रॉबर्ट बोहलेन्ड साहब द्वारा अनेक दुस्साध्य रोगों पर इसका सफल प्रयोग हुआ है।
पहले-पहल डॉ. नाईस फिसेन ने 1293 ई. में सूर्य प्रकाश के महत्व को प्रकट कर 1294 ई. में इस विधि से एक क्षय रोगी का स्वस्थ किया था। किन्तु तैंतालीस सोल की अवस्था में उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। दूसरे वैज्ञानिक इतने से सन्तुष्ट न हुए। उन्होंने ने नई-नई खोजें की। जिसके फलस्वरूप चिकित्सा संसार में सूर्य चिकित्सा अपना महत्व रखने लगी। डॉ. ए.जी हार्वे डॉ. एलफ्रेड वरालियर आदि ने बड़े-बड़े सेनेटोरियम स्थापित किए। सन् 1903 से डॉ. रोलियर ने अपनी इन पद्धतियों द्वारा आल्पस पर्वत पर लेसीन नामक प्राकृतिक सुसज्जित जगह में रोगियों की चिकित्सा का काम शुरू किया।
इधर हाल में हुए अनुसंधानों ने बताया है कि धरती के प्रत्येक कण एवं क्षेत्र में पाई जाने वाली शक्तियों का उद्गम केन्द्र सूर्य है। उसकी गुलाबी, नीली, हरी, पीली, नारंगी, लाल दिखने वाली किरणें वस्तुतः शक्ति तरंगें ही हैं। जो विभिन्न स्तर के उपहार लेकर धरती के प्राणियों और पदार्थों को देने के लिए अनवरत रूप से अन्तरिक्ष को चीरती भागी आती हैं। अल्फा, बीटा, गामा किरणों की चमत्कारी परतों का खुलना जैसे-जैसे शुरू हुआ है। वैसे-वैसे मालूम होता जा रहा है कि इन स्रोतों में सर्वशक्तिमान बनने के साधन मौजूद हैं अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड किरणों का जो थोड़ा बहुत उपयोग पता चला है उसी ने मनुष्य को विभोर कर दिया है। आगे जो परतें खुलने वाली हैं वे अप्रत्याशित हैं। उनकी संभावनाओं पर विचार करने पर मस्तिष्क जादुई तिलस्मी लोक में सैर करने लगता है।
सूर्य शक्ति प्रवाह में पदार्थों के साथ पहला स्पर्श अल्ट्रावायलेट किरणों का होता है। जहाँ भी यह स्पर्श होता है-वहाँ चमत्कारी-उपलब्धियाँ पैदा हो जाती हैं। खाने की चीजों को ही लें। उनकी परत सूर्य किरणों के ज्यादा संपर्क में रहती हैं। फल, शाक, अन्न, आदि का ऊपरी भाग जिसे चोकर या छिलका कहते हैं, सूर्य प्रकाश के संपर्क में रहने के कारण उसमें अन्य उपयोगी तत्वों के साथ विटामिन ‘डी’ विशेष रूप से पाया जाता है।
संसार के अनगिनत प्रकृति विशेषज्ञों ने भी उपेक्षित सूर्य रश्मियों के गुणकारी प्रभाव के संबंध में जन साधारण का ध्यान आकर्षित किया है और कहा है कि सूर्य किरणों के रूप में मिलने वाले बहुमूल्य प्रकृति के वरदान की अवज्ञा न करें। इस दिशा में अधिक शोध कार्य करने वाले विज्ञानियों में डॉ. जेम्स कुक, ए.बी गारडेन, वेनिट, फ्रेंकक्रेन, एफ.जी. वुल्ब जेम्स जेक्सन आदि के नाम अग्रिम पंक्ति में रखे जा सकते हैं।
सुबह को सूर्य किरणों में ‘अल्ट्रा वायलेट’ तत्व की समुचित मात्रा रहती है जैसे-जैसे धूप चढ़ती जाती है लाल रंग की किरणें बढ़ती हैं। उनमें अधिक गर्मी पैदा करने का गुण है। प्रातः कालीन सूर्य किरणों को नंगे शरीर पर लेने का महत्व शारीरिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से माना गया है। प्रातः कालीन वायु में टहलना भी इसीलिए अधिक उपयोगी माना गया है कि उस समय सूर्यदेव द्वारा निःसृत अल्ट्रा वायलेट किरणों के साथ जितना संपर्क स्थापित किया जा सकता है और जितना लाभ लिया जा सकता है वैसा अवसर फिर चौबीस घण्टे में कभी नहीं आता।
डॉ. वारनर मेकफेडन, वेनडिकट लस्ट, स्टेनली लीफ आदि प्रकृति विज्ञानी प्रभात-कालीन सूर्य किरणों के सेवर पर बहुत जोर देते रहे हैं। इन किरणों में विटामिन डी, विटामिन बी, विटामिन ए की प्रचूर मात्रा शरीर को प्रदान करने की शक्ति है। बलवर्धक आनिकों की अपेक्षा यह किरणें कहीं अधिक शक्तिशाली एवं निश्चित परिणाम उत्पन्न करने वाली हैं। इसी तत्व को शास्त्रकारों ने “सूर्यो हि नाष्ट्राणाँ रक्षा सम्पहान्ता”। सूर्य की किरणें रोग रूपी राक्षसों का विनाश करती हैं। कहकर स्पष्ट किया है।
सूर्य से आरोग्य लाभ की बात सर्वप्रथम शुक्ल यजुर्वेद में देखी जाती है-
तरणिर्विष्वदर्षतो ज्योतिष्कृदसि, सूर्य विष्वमाभासिरोचनम्॥ (यजु. 33/36)
सूर्यदेव! आप निरन्तर गतिशील एवं आराधकों के रोगों के अपहारक तथा संपूर्ण जीव-जगत के लिए दर्शनीय तथा आकाश के सभी ज्योतिर्पिंडों के प्रकाशक हैं।
अथर्ववेद में पाँव, जानु, श्रोणि, कंधा, मस्तक, कपाल, हृदय, आदि रोगों को उदीयमान सूर्यरश्मियों द्वारा दूर करने की बात कही गई है। (अथर्व. 9-8-19-21-22)। पुनः इसी वेद में उगते हुए सूर्य की रक्ताभ किरणों से रोगियों को चिरायु करने का वर्णन प्राप्त होता है। (1-22-1-2)। अथर्ववेद में ही सूर्य से पण्डमाला रोग को दूर करने की बात आयी है। ( अथर्व 1-83-1)। पुराणों में सूर्य से आरोग्य लाभ पाने की बात को मुक्त कण्ठ से स्वीकारा गया है -
आरोग्यं भास्करा दिच्छेद धनमिच्छेदुताषनात्। ईष्वरान्ज्ञान मिच्छेच्च मोक्षमिच्छेज्ज नार्इनात्॥ (मत्स्य पु. 67-71)
सूर्य चिकित्सा से ही भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब का कुष्ठ रोग दूर हुआ था। महाराज हर्षवर्धन के दरबारी मयूरभट्ट, जो बाणभट्ट के साले भूषणभट्ट के मामा थे, सूर्य चिकित्सा द्वारा दीर्घकालीन व्याधि से निवृत्त हुए थे। उन्होंने सूर्य की स्तुति में सूर्य शतकम् की रचना भी की।
यों सूर्य सफेद रंग का दिखता है और उसकी किरणें भी उजली ही लगती हैं। पर वस्तुतः उनमें सात रंगों का सम्मिश्रण होता है। वे परस्पर मिलकर तो अनगिनत संख्या में हलके गहरे रंगों का निर्माण करती हैं। हर किरण की अपनी विशेषता है। किस पदार्थ पर किस किरण का कितना प्रभाव पड़ा इसका परिचय उसके रंग को देखकर प्राप्त किया जा सकता है। विभिन्न वस्तुओं के विभिन्न प्रकार के रंग दृष्टिगोचर होते हैं यह अकारण नहीं है। उन पदार्थों ने अपनी विशेषताओं के कारण सूर्य शक्ति की अमुक किरणों को विशेष रूप से आकर्षित एवं संचित किया है। फलस्वरूप उनका वह रंग बना है जिसे हमारी आंखें देखती व पहचानती हैं।
रंगों का उपयोग मात्र उनकी पहचान करने तक सीमित नहीं है वरन् उन्हें देखने से उस विशेषता की सहज उपलब्धि हमें होती है जो सूर्य शक्ति से प्राप्त पदार्थों ने अपने भीतर जमा की है। हरियाली को ही लें। पेड़-पौधे घासपात हरे रंग के होते हैं। इन्हें देखने से आंखों को प्रसन्नता मिलती है। गर्मी के दिनों में हरियाली के समीप पहुँचने पर जो प्रसन्न होता है यह अकारण ही नहीं है। हरे रंग में वह गुण है जिससे गर्मी के आतप का समाधान हो सकें।
सर्दियों में गर्मी से दूर रहने पर उसकी दूरवर्ती सिन्दूरी आभा मन पर गरम प्रभाव डालती है। ठंड से बचने में उसका दर्शन भी बहुत राहत पहुँचाता है। आग के निकट पहुँचने पर उसकी गर्मी का लाभ तो मिलता ही है। उसका सिन्दूरी रंग भी कम उत्साह नहीं देता। सिन्दूरी रंग में सूर्य की ऊष्मा का बाहुल्य अनुभव होता है।
अमेरिकी डॉक्टर अर्नेस्ट ने मानव शरीर के विभिन्न अंगों में घटते-बढ़ते रंगों को देखकर उसकी आन्तरिक स्थिति जानने का विज्ञान विकसित किया है। कनाडा के डॉ. सेलिट ने भी इस संदर्भ में लम्बी खोज की है और रोगियों की त्वचा, आंखें, नाखून, जीभ, मल मूत्र का रंग देखने भर से यह जानने में सफलता प्राप्त की कि उनकी आन्तरिक स्थिति क्या है?
सूर्य चिकित्सा सिद्धाँत के अनुसार रोगोत्पत्ति का कारण शरीर में रंगों का घटना-बढ़ना है। रंग एक रासायनिक मिश्रण है। हमारा शरीर भी रासायनिक तत्वों से बना हुआ है। जिसके जिस अंग में जिस प्रकार के तत्व की अधिकता होती है, उसके उसी अंग में उसके अनुरूप उस अंग का रंग हो जाता है। शरीर के विभिन्न अंगों के विभिन्न रंग होते हैं, जैसे त्वचा का गेहुँआ, केशों का काला एवं नेत्र गोलक का श्वेत आदि। शरीर में किस तत्व की कमी है, यह रंग परीक्षा द्वारा जान लिया जाता है। सूर्य में सातों रंग विद्यमान रहते हैं। इसलिए विभिन्न रंगों की बोतलों में जल भर कर उन्हें धूप में रख कर उन रंगों को उन रंगीन बोतल के माध्यम से उस जल में आकर्षित किया जा सकता है। इस जल को औषधि के रूप में रोगियों को देने से वे स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हैं।
अथर्ववेद में सूर्य चिकित्सा के संबंध में यह उल्लेख मिलता है।
अनु सूर्य मुदयताँ हृद्द्योतो हरिमा च ते। गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परिदध्वसि॥
अर्थात्- “तुम्हारा पीलापन (पीलिया) तथा हृदय की जलन सूर्य की अनुकूलता से उड़ जाये। रश्मियों के तथा उस प्रकाश के लाल रंग को तुझे सब ओर से धारण करना हैं।” भाव यह है कि पीलिया और हृदय रोगों में सूर्योदय के समय सूर्य की लाल रश्मियों के प्रकाश में खुले शरीर बैठना तथा लाल रंग की गौ के दूध का सेवन करना बहुत ही लाभदायक होता है।
यही नहीं सूर्य चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि सभी प्रकार के रोगों में सूर्य की किरणों से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। भूख न लगना, पेचिश, खाँसी, फोड़ा, फुन्सी, नेत्ररोग मानसिक असंतुलन आदि सब में सूर्य किरणों की लाभदायक शक्ति का उपयोग हो सकता है। डॉ. स्किली का मत है कि रोगों से छुटकारा पाने, स्वस्थ होने के लिए रवि-रश्मियों का विधिवत् उपयोग किया जाये।
रश्मि चिकित्सा के इस क्रम में पीला रंग पाचक, नीला शीतल शांति दायक, लाल ऊष्मा प्रधान गरम माना गया है। यह तीन रंग मुख्य हैं। इन्हीं के सम्मिश्रण से अन्य हलके भारी रंग बनते हैं। शरीर की स्थिति एवं आवश्यकतानुसार रंगीन काँचों में छानकर रुग्ण अंग पर उसी रंग की सूर्य किरणें ली जा सकती हैं। सूर्य चिकित्सा की इस प्रक्रिया में सूर्य किरणों के उपयोग के अलावा सूर्य स्नान, सूर्य नमस्कार आदि क्रम भी उपयोगी और लाभदायक अनुभव किए जा सकते हैं।
सामान्यतया सूर्य के संपर्क में रहना ही अच्छा है। असह्य तेज धूप में फिरने की तो आवश्यकता नहीं है पर अपना निवास एवं कार्य क्षेत्र ऐसे स्थानों में ही रखना चाहिए जहाँ सूर्य किरणों का उन्मुक्त आवागमन होता रहें। खुली वायु और सूर्य किरणों के संपर्क में रहकर हम पौष्टिक भोजन से भी कहीं अधिक आरोग्य लाभ कर सकते हैं।
सूर्य और चन्द्र पर लगने वाले ग्रहण क्या हैं? इसके जवाब में इतना तो प्राथमिक शाला के विद्यार्थी भी बता सकते हैं कि चन्द्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ने और सूर्य प्रकाश को उस तक पहुँचने में बाधा पड़ने का दृश्य चन्द्र ग्रहण है। इसी प्रकार सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक आने देने में जब चन्द्रमा व्यवधान उत्पन्न करता है तो उसे सूर्य ग्रहण करते हैं। पर बात इतने तक सीमित नहीं है। ग्रहण की प्रक्रिया अपने में खगोल विज्ञान एवं ब्रह्माण्डीय हलचलों के चेतना जगत पर पड़ने वाले अनेकों रहस्य समेट संजोये।
खगोल विज्ञानियों के अनुसार पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घण्टे में एक पूरा चक्कर लगाती है। भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर उसकी गति भिन्न-भिन्न रहती हैं। विषुवत् रेखा पर यह गति 1040 मील प्रति घण्टा 300 अक्षांश पर यह गति 900 मील, 540 अक्षांश पर 73 और 600 अक्षांश पर 520 मील प्रति घण्टा रहती हैं पृथ्वी की दूसरी गति सूर्य की परिक्रमा है जिसमें 18.5 मील प्रति सेकेंड की गति से उसे 365 दिन लगते हैं। वस्तुतः इस अवधि की ठीक गणना का जोर तो वह 365 दिन 5 घण्टा 48 मिनट और 46 सेकेण्ड से कुछ कम होती है। पृथ्वी की धुरी जिसके चारों ओर वह प्रतिदिन घूमती है अपने परिक्रमा पथ के समकोण नहीं है वर 3 2050 झुकी हुई है।
आकाश में सूर्य का मार्ग 160 चौड़ा है। जिसमें सूर्य चन्द्र तथा अन्य ग्रह चलते दिखाई देते है॥ आकाश के इस मार्ग को- जोहिएक कहा जाता है। इसे पहचानने के लिए उसे 12 भागों में विभाजित किया गया है। जिन्हें राशियां कहते हैं। प्रत्येक राशि 300 की होती है। सूर्य को एक राशि से दूसरा में प्रवेश करने में दो घण्टे लग जाते हैं। इन राशियों को मेष,वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक धनु, मकर कुम्भ मीन नाम दिए गए हैं।
घूमता हुआ लट्टू जब गिरने को होता है तो अपनी कीली पर घूमता हुआ लड़खड़ाने लगता है। उसकी कीली भी घूमने लगती है। पृथ्वी की कीली भी अपनी कटि पर इसी प्रकार घूमती रहती है। यदि इसकी कीली को आषका में बहुत ऊँचे तक बढ़ाया जाय तो वह वहाँ पर एक अलग गोल चक्कर बना देगी। यह पृथ्वी की एक विशेष गति है जिसका ज्ञान सामान्य विद्यार्थियों को नहीं होता। इस पूरे चक्कर के पूरा होने में 2600 वर्ष लगते हैं। पृथ्वी की इस गति का ग्रहणों के क्रम पर भी प्रभाव पड़ता है।
चन्द्रमा 27 दिन 7 घण्टे 43 मिनट 11.5 सेकेंड में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है। इसे नक्षत्र मास कहते हैं। इस अवधि में चन्द्रमा अपनी एक परिक्रमा पूरी करके यथास्थान आ जाता है। किन्तु इस बीच पृथ्वी अपनी वार्षिक परिक्रमा में काफी आगे बढ़ जाती है। पृथ्वी के मान से चन्द्रमा को एक परिक्रमा पूरी करने के लिए आगे बढ़ना पड़ता है। इस तरह उसे कुल 21 दिन 12 घण्टे 44 मिनट 2.8 सेकेंड लग जाते है। इस अवधि को संयुति मास कहते हैं।
यदि पृथ्वी और चन्द्रमा के वृत्त एक ही तल पर होते तो प्रत्येक पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण और प्रत्येक अमावस्या को सूर्यग्रहण दिखाई देता। जब चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता होता है। तो उसका वृत्त अन्तरिक्ष में इसके समानान्तर रहता है। उन वृत्तों को काटने वाली रेखा वर्ष में कम से कम दो बार सूर्य के केन्द्र की दिशा की ओर इंगित करती है और तब सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में हो जताते है। यही ग्रहण का अवसर होता है। इससे यह भी स्पष्ट है कि वर्ष में कम से कम दो ग्रहण जो दोनों सूर्य के भी हो सकते है। अवश्य ही पृथ्वी के किसी न किसी भाग में दिखाई देंगे। वर्ष में ग्रहणों की अधिकतम संख्या 7 है जिनमें 4-5 सूर्य के शेष चन्द्रमा के होते हैं। प्रत्येक ग्रहण 18 वर्ष 11 दिन बीत जाने पर पुनः होता है। किन्तु वह अपने पहले के स्थान में ही हो यह निश्चित नहीं है, क्योंकि संपात बिन्दु चलायमान होता है।
साधारणतया सूर्य ग्रहण की अपेक्षा चन्द्रग्रहण अधिक देखे जाते हैं। पर सच तो यही है कि चन्द्रग्रहण से कहीं अधिक सूर्यग्रहण होते हैं। चन्द्रग्रहणों के अधिक देखे जाने का कारण यह होता है कि वे पृथ्वी से आधे से अधिक भाग में दिखलाई पड़ते हैं, जबकि सूर्यग्रहण पृथ्वी के बहुत थोड़े भाग में-प्रायः सौ मील से कम चौड़े और दो हजार से तीन हजार मील लम्बे भू-भाग में दिखलाई पड़ते है। बम्बई में खग्रास सूर्यग्रहण हो तो सूरत में खण्ड सूर्यग्रहण दिखाई देगा और अहमदाबाद में दिखाई ही नहीं देगा।
चन्द्रमा पृथ्वी से अधिकतम 2.53.000 और न्यूनतम 2.21.600 मील दूर रहता है। जब वह पृथ्वी के निकट होता है तो चाल बढ़ जाती हैं, दूर होता है तो घट जाती है। पृथ्वी और चन्द्रमा में अपना कोई प्रकाश नहीं होता है। सूर्य द्वारा पाए प्रकाश से ही वे चमकते हैं। पृथ्वी, चन्द्र और सूर्य की अपनी-अपनी अनोखी चालें हैं। इस चला−चली में वे जब एक ही, एक समतल पर सीधी रेखा में आ जाते हैं तब ग्रहण पड़ता हैं जब बीच में चन्द्रमा हो तो पृथ्वी पर से पूरे सूर्य को नहीं देखा जा सकता है। सूर्य का जितना हिस्सा चन्द्रमा के बीच में आने से पृथ्वी पर से नहीं दीखता वह सूर्यग्रहण होता है, सूर्यग्रहण मुख्यतः तीन तरह के होते हैं-(1) सर्वग्रास या खग्रास- जो संपूर्ण सूर्य बिम्ब को ढकने वाला होता है (2) कड्कणाकार या वलयाकार-जो सूर्य बिम्ब के बीच का भाग ढकता है। (3) खण्ड ग्रहण जो सूर्य बिम्ब के अंश को ही ढकता है। इसी तरह जब पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच आ जाती है और चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में होकर गुजरते हैं तब चन्द्रग्रहण होता है। चन्द्रग्रहण के समय यदि कोई व्यक्ति-चन्द्रमा पर ही हो तो उसे उस समय सूर्य ग्रहण दिखाई देगा।
ये खगोल शास्त्रीय गणनाएँ पश्चिमी जगत में भले सौ-दो सौ वर्षों से प्रचलित हुई हों, पर भारतीय तत्ववेत्ता इन रहस्यों से हजारों साल पूर्व परिचित थे। महर्षि अत्रि मुनि ग्रहण-ज्ञान के प्रथम ज्ञाता आचार्य थे। ऋग्वेदीय प्रकाश काल से ग्रहण के ऊपर अध्ययन अन्वेषण होते चले आये हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में यह चमत्कारिक वर्णन मिलता है कि “हे सूर्य! असुर राहु, ने आप पर आक्रमण कर अंधकार से जो आपको विद्ध कर दिया, ढँक दिया, उससे मनुष्य आपके रूप को समग्रता से देख नहीं पाए और अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में हतप्रभ से हो गए। तब महर्षि अत्रि ने तुरीय यंत्र से छाया का अपनोइन कर सूर्य का समुद्धार किया”।
यत त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसा विध्यदासुरः। अक्षेत्र विद्यथा मुग्धो भुवनान्यवीधयुः॥
स्वर्भानोरध यदिन्द्र माया अवो दिवो वर्तमाना अवाहन्। गुलं सूर्य तमसाप व्रतेन तुरीयेण-ब्रह्मणाऽविन्ददत्रि-ऋग्वेद 5-40-5.6
‘सिद्धान्त शिरोमणि’ के पर्व सम्भवाधिकार में श्री भास्कराचार्य ग्रहण की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहते है ‘भूमा विधुँ विधुरिनं ग्रहणे पिधन्ते’। यही बात ‘सूर्य सिद्धान्त’ के चन्द्र ग्रहणाधिकार प्रकरण में कहीं गई है-
छादको भास्करस्येन्दु धस्थो घनपद् भवेत्। भू छायाँ प्राड्गमुखश्रन्द्रा विषत्यस्य भवेद सौ॥
अर्थात्-नीचे होने वाला चन्द्र बादल की भाँति सूर्य को ढ़क लेता है। पूर्व की ओर चलता हुआ चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में प्रविष्ट हो जाता है। इसलिए पृथ्वी की छाया चन्द्रमा को ढ़कने वाली है। सूर्य सिद्धान्ताकार ने पृथ्वी की छाया को, राहु और चन्द्रमा की छाया को केतु
केतुकृण्बन्न केतवे पेषोमर्या अपेषसे। समुर्षद्धि जायथः॥(-ऋ 1/3/6)
हे मनुष्यों! अज्ञानी को ज्ञान देते हुए अरूप को रूप देते हुए ये सूर्य रूप इन्द्र किरणों द्वारा प्रकाशित होते हैं।
कहा है। यह छाया भी अपने ग्रहों के अनुसार सही गति से नियमबद्ध रूप से भ्रमण करती हैं इसलिए नवग्रहों में उन्हें भी सम्मिलित कर लिया गया है।
भारतीय तत्ववेत्ताओं ने ग्रहण ब्रह्माण्डीय रहस्य को पिण्ड में, स्वयं के शरीर में भी साक्षात्कार किया है जाबालोपनिषद् के चतुर्थ खण्ड में योगी के लिए शरीरस्थ चन्द्रग्रहण का स्वरूप बताते हुए उनका साधनात्मक मर्म बताया गया है।
महायोगी दत्तात्रेय जी अपने शिष्य साड्कति को अष्टाँगयोग का उपदेश करते हैं। उसी योगोपदेश के प्रसंग में इड़ा, कुण्डली-पिंगला इन नाड़ियों का वर्णन है। कन्द के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी हैं। जिसके चारों ओर बहत्तर हजार नाड़ियाँ हैं सुषुम्ना के बांये भाग में इड़ा नाड़ी है और दक्षिण में पिंगला नाड़ी है। नाभिकन्द से दो अंगुल नीचे कुण्डली नाड़ी है। इड़ा नाड़ी से जब प्राण कुण्डली के स्थान में पहुँचता है तब चन्द्र ग्रहण होता है। जब पिंगला से कुण्डली के स्थान में प्राण जाता है तब सूर्यग्रहण होता है। ग्रहण संबंधी यह पिण्ड परक प्रतिवादन स्वयं में अनूठा है।
किन्तु जिन देशों की मानवीय सभ्यताएँ-पिण्ड और ब्रह्माण्ड के इस रहस्य से अपरिचित थीं, उनमें ग्रहण को लेकर तरह-तरह की किंवदंतियाँ फैली थी। चीन देश में मान्यता थी कि आकाश के दोनों सिरों पर ड्रैगन दैत्य परिवार समेत बसते हैं। जब परिभ्रमण करते हुए चन्द्र-सूर्य उनके समीप से गुजरते हैं तब वे दैत्य उन पर टूट पड़ते हैं। मनुष्य लोक का शोर सुनकर ही वे डर कर भागते और इन देवताओं को मुख से उगलते हैं। यूनान में भी ग्रहण को दैत्यों का आक्रमण माना जाता रहा है। अमेरिकी रेड इण्डियन, अफ्रीकी हब्शी उस समय सूर्य चन्द्र के बीमार पड़ने की किंवदंती पर विश्वास करते हैं। अन्यान्य देशों में उन पर भेड़ियों, कुत्तों, बाघों, साँपों का आक्रमण होने की मान्यता है। प्रशांत के तराहती द्वीपवासियों की कल्पना इन सबसे अनोखी है। वे सूर्य को प्रेमी और चन्द्र को प्रेमिका मानते है और कभी सुयोग मिलने पर उनके मधुर मिलने की बेला को ग्रहण मानते हैं। उस दृश्य को देखने में वे लज्जा अनुभव करते हैं और मुँह छिपाते फिरते हैं।
किंवदंतियों एवं भ्रामक मान्यताओं का लाभ उठाकर कुछ बुद्धिवादी लोग ग्रहण का चतुरतापूर्वक उपयोग करने में भी सफल रहे हैं। अमेरिका के आदिवासियों का विद्रोह शान्त करने के लिए कोलवत ने ऐसी ही चतुरता से काम लिया। उसने बागियों के नेताओं को बुलाकर कहा तुम्हारे कृत्यों से देवता बहुत नाराज हैं। वे पूर्व सूचना के रूप में अमुक दिन चन्द्रमा को अपनी झोली में डालकर ले चलेंगे और तुम्हारे ऊपर विपत्ति बरसने का शाप देंगे। नियत समय पर आदिवासी एकत्रित हुए और उनके उस पूर्व कथन को सर्वथा सच पाया। फलतः वे बुरी तरह डर गए और कोलंबस का साथ देने लगे।
अपने में अनेकों किंवदंतियों, रहस्यों को समेटे ग्रहण की प्रक्रिया जितनी महत्वपूर्ण है, ग्रहण की बेला उससे कहीं अधिक कीमती है। वैज्ञानिकों ने सूर्यग्रहण को शोधों के निमित्त बड़ा अनुकूल माना है। खग्रास अथवा अधिक ढके सूर्यग्रहण के समय प्रकृति की विलक्षणताओं को अपेक्षाकृत आसानी से खोजा जा सकता है। भूतकाल में कितने ही महत्वपूर्ण अनुसंधान सूर्यग्रहण की अवधि में संभव हुए हैं।
ग्रहण बेला में न केवल प्रकाश ही घटता है वरन् वातावरण में और भी बहुत कुछ परिवर्तन हो जाता है। इसकी जानकारी पक्षियों को विशेष रूप से मिलती है। फलतः वे डरकर अपने घोसलों में जा छिपते हैं। जबकि उससे भी अंधेरा करने वाली बदली आसमान पर छा जाने के समय उनकी सामान्य-गतिविधियों में कोई अंतर नहीं पड़ता। वातावरण का यह विचित्र परिवर्तन सामान्य जीवन तथा पदार्थों पर भी विशेष रूप से पड़ता है। फलतः उसकी स्थिति में सावधानी रखने तथा सुरक्षा बरतने की आवश्यकता होती है। वातावरण में ग्रहण काल में होने वाले इस परिवर्तन का साधनात्मक दृष्टि से भी गंभीर महत्व है। अगस्त्य संहिता में का है-
सूर्यग्रहण कालेन समाडन्यो नास्ति कष्चन । तब यद् यत्कृत सर्वमनन्त फलदं भवेत् ।
सिद्विर्भवति मंत्रस्य विनाडयासेन वेगतः । कर्त्वव्य सर्वयत्रे! मंत्रसिद्विरभीप्सुभिः॥
सूर्याद् भविन्त भूतानिः सूर्येण पालितानि तु । सूर्यलयं प्राप्नवन्ति यः सूर्य सोडहमेव च ॥
सूर्य से ही समस्त प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
सूर्य से ही पालन होता है और सूर्य में ही लय होता है और जो सर्व है वहीं मैं हूँ।
अर्थात् तीर्थों और सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण में मंत्र दीक्षा लेने के लिए कोई विचार न करे। सूर्यग्रहण के समान और कोई समय नहीं है। सूर्यग्रहण में अनायास ही मँत्रसिद्धि हो जाती है।
गणपत्योपनिषद् के अनुसार-
सूर्यग्रहणे महानद्याँ प्रतिमा संनिद्यों का जपत्या स सिद्ध मन्त्रो भवति (गणपत्युपनिषद् मंत्र 8)
अर्थात्-सूर्यग्रहण में महानदियों या किसी प्रतिमा के पास मंत्र जपने से वह तुरन्त सिद्ध हो जाता है।
प्रायः हर वर्ष सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण की एक श्रृंखला बनी ही रहती है। इनके साथ होने वाले वातावरण के परिवर्तन हमारे व्यक्तित्व में सार्थक परिवर्तन कर सकें इसके लिए हमें अपने उपासनात्मक आधार को बढ़ाना और मजबूत करना चाहिए। अगले दिनों सौर ग्रहणों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने जा रही है चूँकि यह संधिकाल है। इस अवधि में की गयी साधना निश्चित रूप से भगवान भुवन-भास्कर की अनुकम्पाओं की निमित्त कारण बनेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।
नवयुग की नयी संभावनाओं-नयी योजनाओं के विचारों में निमग्न हर विचारशील मन के सामने यह ज्वलन्त प्रश्न है-कि भविष्य में ऊर्जा का स्त्रोत क्या होगा? आज का समाज जिस तरह बौद्धिक एवं आर्थिक दृष्टि से संपन्न होता जा रहा है। तद्नुसार उसकी आवश्यकताएं बढ़ रही हैं। पूर्ति के साधन जुटाने के लिए अनेक वस्तुओं का उत्पादन करना पड़ता है और अनेक प्रकार की व्यवस्थाएँ जुटानी पड़ती हैं। इस सबके लिए अतिरिक्त शक्ति चाहिए ऊर्जा उत्पादन के लिए ईंधन अनिवार्य है। क्रमशः ईंधन की खपत बढ़ती जा रही है। जनसंख्या वृद्धि ने उस खर्च को और भी अधिक बढ़ा दिया है।
सन् 1800 में प्रति व्यक्ति 2 अश्व शक्ति बिजली प्राप्त थी पर अब यह पाँच गुनी बढ़ गयी है। व अब 10 अश्व शक्ति का उत्पादन औसत आता है।
ऊर्जा संबंधी माँग संसार में बेतरह बढ़ रही है। हर साल यह माँग इतनी बढ़ जाती है जितनी 3000 लाख टन कोयले से पूरी की जा सकती है। सन् 1900 से लेकर 1900 तक यह माँग तीन गुनी हो गई थी। 1950 से 1970 तक बीस वर्षों में ही फिर तीन गुनी हो गई। अब सन् 1995 तक पहुँचते-पहुँचते फिर वह माँग तिगुने से अधिक हो जायगी। इसके बाद संभव है हर वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में यह आवश्यकता तीन गुने क्रम में बढ़ जाय।
अमेरिका की आबादी संसार की जनसंख्या का सातवाँ भाग हैं किन्तु उसकी आवश्यकता संसार में उत्पन्न बिजली का एक तिहाई भाग प्राप्त कर लेने पर ही पूरी हो पाती है। औसतन हर अमेरिकी इतनी बिजली खर्च करता है, जितनी 46 पौण्ड कोयला, 10 गैलन पेट्रोल आधे पिण्ट परमाणु शक्ति से उपलब्ध हो सकती है। संभावना यह है कि सन् 1995 तक वहाँ यह खपत दूनी हो जाएगी।
समस्त संसार में प्रस्तुत पर्यवेक्षण के अनुसार 48,656,000 लाख टन कोयले का भंडार है। इसमें भारत में प्रस्तुत घटिया-बढ़िया कोयले का कुल भंडार 1080000 लाख टन कूता गया है। यह कुल उत्पादन का 221 प्रतिशत है। जबकि अपने देश की जनसंख्या विश्व की आबादी का छठा भाग है। संसार भर में गैस भंडार 2300000 मेगाटन है, जिसमें भारत में केवल 41155 मेगाटन है।
संसार भर में जितना कोयला भंडार कूता गया है वह वर्तमान खपत क्रम को देखते हुए सौ वर्ष काम दे सकता है। किन्तु तेल के बारे में ऐसी बात नहीं। उससे पचास वर्ष का ही काम मुश्किल से चलेगा। भारत जैसे गरीब देश वन संपदा को नष्ट करके लकड़ी जलाते हैं और कृषि के लिए अत्यन्त उपयोगी खाद, गोबर को उपले बनाकर चूल्हा गरम करते हैं। यह अपने पैरों कुल्हाड़ी मारने की तरह है। वन काटने से वर्षा घटेगी और जमीन कटेगी। गोबर को जला लेने पर भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाएगी। रासायनिक खादों से तत्कालिक लाभ होता है, भूमि की उर्वरा शक्ति नहीं बढ़ती। अपने देश में भी घरेलू ईंधन के लिए दूसरे साधन ढूँढ़ने पड़ेंगे। साथ ही कल-कारखानों के लिए तेल, गैस, बिजली का उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। विदेशों से तेल कोयला मँगाकर हम अपनी गर्दन दूसरों के हाथ-सौंपते हैं और अनिश्चित संभावनाओं में भटकते हैं।
अमेरिका के पास कोयला काफी है, वे सोचते हैं कि इस भंडार से अगले 80-90 साल तक मजे से काम चल जाएगा। पर वर्तमान तेल भंडार 10 वर्ष में प्राकृतिक गैस भंडार और यूरेलियम 13 साल में ही चुक जाएगा। अगले दिनों नई खदानें निकलें तो बात अलग है।
अमेरिका के बाद ऊर्जा की खपत करने वाले देशों में जापान का नंबर आता है। विकास की वर्तमान रफ्तार जारी रखने के लिए उसे अगले वर्ष 3000 लाख टन तेल की जरूरत पड़ेगी और दस वर्ष में वह आवश्यकता दूनी बढ़ जाने की संभावना है। उसका अपना तेल उत्पादन मात्र एक महीने के लिए ही हैं उसे अपनी आवश्यकता अन्य देशों से पूरी करनी पड़ती है।
पश्चिमी यूरोप के 9 देशों ने तेल आयात के लिए निश्चित नीति अपनाने के लिए यूरोपी इकोनामि कम्यूनिटी (ई.ई.सी.) बनायी है। यह लोग 60 प्रतिशत तल प्रधानतया अरब देशों से तथा छुटपुट अन्यत्र से खरीदते हैं। इनकी जरूरत बढ़ रही है और अगले पाँच वर्ष में वे अबकी अपेक्षा दूना अर्थात् 8080 लाख टन तेल आयात करने के लिए विवश होंगे। फ्राँस की दशा तो और दयनीय है उसका कोयला भंडार क्रमशः चुकता जा रहा है। दस सालों पहले उसका कोयला उत्पादन 550 लाख टन था पर अब वह घटते-घटते 300 लाख टन रह गया है। आगे यह गिरावट और भी बढ़ेगी।
ब्रिटेन के अर्थशास्त्री स्टेनी जेवोन्स ने अपने ग्रन्थ “ द कोल क्कि ष्चन एम इन्क्वारी “ में लिखा है आज कोयले के आधार पर जो देश अपने उद्योग चला रहे हैं, उन्हें पीछे लौटना पड़ेगा और इस जस्टी समाप्त होने वाले ईंधन का आधार छोड़कर नए ऊर्जा साधन ढूंढ़ने पड़ेंगे।
विज्ञानविद् टोनी लोफटास ने गरीब देशों को सलाह दी है कि वे पनचक्की जैसे साधनों से छोटे बिजली घर बनाए। परावलंबी साधनों के आधार पर बनाई गई उनकी लम्बी चौड़ी योजनाएँ अन्ततः उन्हें पश्चाताप ही प्रदान करेंगी।
मध्य पूर्व और अफ्रीका में संसार के तेल भंडार का 66 प्रतिशत है। जब कि वहाँ खपत 4 प्रतिशत ही है। संसार की तेल आवश्यकता को देखते हुए यह देश अपने दाम बढ़ा रहे हैं, फलतः ऊर्जा महँगी ही नहीं अनिश्चित भी होती जाती है। तेल देशों ने अपनी अच्छी स्थिति को राजनीतिक सौदेबाजी का मुहरा भी बना लिया है। इसलिए उनका रुख कब किस देश के लिए क्या होगा, इस संबंध में कुछ भी कहा नहीं जा सकता।
ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं आस्टन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर जे. ए. पापा ने हिसाब लगाकर बताया है कि जिस गति से आजकल पेट्रोल खर्च हो रहा है, उसी गति से वह खर्च होता रहे तो अब तक उपलब्ध तेल स्रोतों का सारा भंडार पच्चीस वर्षों में समाप्त हो जाएगा। किन्तु यदि पेट्रोल के खर्च में थोड़ी-सी अर्थात् 5 प्रतिशत भी वृद्धि हुई तो वह पन्द्रह वर्षों में ही चुक जाएगा। आशा की गई कि अभी नए तेल स्त्रोत और मिल सकते हैं। इस संभावना को स्वीकार करते हुए डॉ. पापा ने कहा है कि यदि यह उपलब्धियाँ अबकी तुलना में 5 गुनी बढ़ जांय तो 50 वर्ष तक, दस गुनी बढ़ जाएँ तो 60 वर्ष तक और 20 गुनी बढ़ जांय तो 78 वर्ष तक ही धरती का पेट्रोल मोटरें चलाने में काम दे सकेगा।
औद्योगिक ऊर्जा में 97 प्रतिशत तेल, कोयला आदि अतिरिक्त ईंधनों का प्रयोग होता है। इनके जलने से जो कार्बन नाइट्रोजन, सल्फर डाई आक्साइड आदि बनते हैं, उनसे जहरीली हवा, पैदा होती है और वायुमंडल को खराब करती है। इसी प्रकार परमाणु
त्रिसन्ध्यमर्चयेत् सूर्य स्मरेद्भवस्या तु यो नरः। न स पश्यति दारिद्यजन्मजन्मनि चार्जुन॥
(भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं) हे अर्जुन ! जो मनुष्य प्रातः मध्याह्न और सायंकाल सूर्य की अर्घ्यादि से पूजा और स्मरण करता है वह जन्म-जन्मान्तर में कभी दरिद्र नहीं होता सदा धन धान्य से समृद्ध रहता है।
विस्फोटों में जो विषाक्त विकिरण पैदा होता है उनसे जल-थल और नभ में विचरण करने वाले प्राणियों के लिए अनेकों विभीषिकाएँ पैदा होती हैं। बड़ी भट्टियाँ पृथ्वी के वायुमंडल की लगातार गरम कर रही हैं। यह बढ़ती हुई गर्मी मौसमी संतुलन को बिगाड़ने, ध्रुव प्रदेशों की बर्फ पिघलाकर समुद्री बाढ़ में बहुत-सी धरती डुबा देने जैसी संभावनाएँ खड़ी कर सकती हैं। इन कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए विचारशील वर्ग द्वारा वृद्धि और विकास की सीमा निर्धारण करने की माँग जोरों से उठाई जा रही है, अन्यथा प्रगति के नाम पर चल रही अन्धी दौड़ कुछ ही समय में सर्वनाश के दृश्य उपस्थित कर सकती है।
ईंधन की बढ़ती माँग को प्रकृति के वर्तमान स्त्रोत पूरा नहीं कर सकते हैं। धरती के स जितना मसाला है वह बहुत दिन चलने वाला नहीं है। निकट भविष्य में कोयला खत्म होने को है। जलाऊ लकड़ी की कमी तो अभी ही पड़ रही है। तेल का दुर्भिक्ष अगल कुछ ही वर्षों में पूरी तरह उभर कर आ जाएगा। एक शताब्दी के अंदर तक तो तेल और कोयला कहीं दीख भी नहीं पड़ेंगे। उन्हें पूरी तरह धरती में से निकाल कर खत्म कर लिया जाएगा। बिजली का उत्पादन उन्हीं प्राकृतिक ईंधनों द्वारा चलने वाले यंत्रों से होता है। जल प्रपातों से उस उत्पादन में मदद तो मिलती है। फिर भी जरूरत तो प्राकृतिक ईंधन की बनी रहेगी। बिजली का उत्पादन सर्वथा स्वावलम्बी नहीं हो सकता, उसे तेल कोयला आदि की पराधीनता से सर्वथा मुक्त किया जाना बड़े पैमाने पर कठिन है। छुट-पुट बैटरियाँ बन जांय तो बात दूसरी है।
परमाणु ऊर्जा की समस्या पाँप-छछूँदर जैसी है, न खाते बनती है न उगलते। इतने बड़े शक्ति स्रोत की अपेक्षा कैसे की जाय? एक ओर यह लालच खाए जाता है, और दूसरी ओर उसकी विषाक्त राख जो बचती है उस जल-थल नभ में कहीं छोड़ने से खैर नहीं यह विभीषिका मुँह बांये खड़ी है। इसलिए पचास भी नहीं बनता। यों अणु भट्टियाँ बनाने और चलाने के दुस्साहसी कदम उठ चुके हैं, पर उत्साह से भी अधिक असमंजस छाया हुआ है। इसलिए परमाणु ऊर्जा अभी त्रिशंक की तरह अधर में लटकी हुई हैं उसके प्रयुक्त होने, बहिष्कृत होने की संभावनाएँ पचास-पचास फीसदी हैं। समय ही बतायेगा कि उसे पचाया गया या उगला गया। अभी तो उसे गले में अटकी हड्डी की तरह ही कह सकते हैं।
थक-हार कर विज्ञान और वैज्ञानिक अब इस ओर मुड़े है कि जब विश्व-व्यापी शक्ति का उद्गम स्रोत सूर्य है तो फिर सौर ऊर्जा का सहारा लेकर ही शक्ति की समस्त आवश्यकता क्यों न पूर्ण की जांय? अन्य स्रोतों की अपेक्षा वह अधिक निर्दोष और अधिक सुलभ है। ईंधन के लिए वैज्ञानिकों के मन में उठने वाली सविता आराधना की सोच कुछ गैर वाजिब नहीं है। जीवन उसी से मिला हैं धरती की समस्त जड़-चेतन हलचलें उसी की कृपा से चल रही है। भविष्य की ईंधन समस्या सहित अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें उन्हीं की शरण लेनी पड़ेगी।
पृथ्वी पर जितनी सूर्य शक्ति अवतरित होती है, उसका 99 प्रतिशत बेकार चला जाता है, केवल 1 प्रतिशत का ही कुछ उपयोग हो पाता है। सारी पृथ्वी पर जितनी शक्ति का व्यय होता है, उससे 20 हजार गुनी शक्ति सूर्य निरन्तर पृथ्वी पर भेजता रहता है।
सूर्य ऊर्जा अतुलनीय है। किसी राजस्थानी रेगिस्तान के सौ वर्ग मील टुकड़े की सूर्य शक्ति यदि वशवर्ती की जा सके तो उससे पूरे भारत की शक्ति आवश्यकता मजे में पूरी हो सकती है। सूर्य शक्ति और अणु ऊर्जा का स्तर एक ही है। पर सूर्य किरणें आठ मिनट की यात्रा करके जब धरती पर पहुँचती हैं तो वे इतनी हलकी हो जाती हैं कि प्राणी और वनस्पति उसका सुकोमल स्पर्श सुखपूर्वक कर सकते हैं और लाभ उठा सकते हैं। इसके विपरीत धरती पर उत्पन्न की गई अणु ऊर्जा किसी बलिष्ठ दैत्य के समान है, उसका उपयोग केवल ऐसे ही कामों में हो सकता है जो गर्मी का तीव्र दबाव सहन कर सके।
वैज्ञानिकों ने सौर-ऊर्जा का उपयोग करने का पहला सफल प्रयोग सोलर-बैटरियों के रूप में किया है। रूस, इंग्लैण्ड, अल्जीरिया, लेबनान, अमेरिका, जापान, इटली, फ्राँस आदि देशों ने छोटे पैमाने पर सौर-ऊर्जा
आदित्य के द्वादश नाम आदित्यःप्रथमं नाम द्वतीयं तु दिवाकरः। तृतीयं भास्करः प्रोक्तं चतुर्थ तु प्रभाकरः॥ पंचमं तु सहस्त्राँषुः षष्ठ त्रैलोक्य लोचनः। सप्तम हरिदष्वष्व अष्टमं च विभावसुः॥ नवम दिनकरः प्रोक्तं दषमं द्वादषात्मकः। एकादष दयोमूर्तिः द्वादश सूर्य एव च॥
उत्पन्न करने और उसका उपयोग ताप एवं विद्युत के रूप में करने के कारखाने बनाम हैं। इन प्रयोगों के परिमाण का अध्ययन दिलचस्पी एवं बारीकी से किया जा रहा है और पता लगाया जा रहा है कि सौर ऊर्जा को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक उपयोग के लिए किस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है।
तत्वदर्शी महामनीषियों ने शरीर को सूर्य संपर्क में रखकर जीवनी शक्ति प्राप्त करने और मनोभूमि सविता देवता की आराधना करके ओजस्वी-तेजस्वी एवं ब्रह्मवर्चस् संपन्न बनाने का साधना विज्ञान निर्मित किया था। अब भौतिक विज्ञानी भी हर दिशा से निराश होकर सूर्य देवता की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसे सही दिशा में उठाया गया सही कदम ही कहना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप-सुनिश्चित रूप से नवयुग की मानवी सभ्यता सविता देवता के अनुदानों को ऊर्जा संसाधन और शक्ति स्रोत के रूप में उपलब्ध कर सकेगी।
न्यूमैक्सिकों में अलबुकर्क के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा यन्त्र बनाया है, जो सौर ऊर्जा को एकत्र करता है। शोध कर्मियों ने अपने पहले प्रयोग में ही 4.5 मीटर लम्बी 1.8 मीटर चौड़ी व 1/4 इंच मोटी इस्पात की चादर को गला कर रख दिया। यह प्रयोग बहुमूल्य उपकरणों से सुसज्जित जिस प्रयोगशाला में किया गया, उससे कहीं अधिक अच्छी प्रयोगशाला मनुष्य का अपना शरीर है। यदि इसमें सोई पड़ी शक्तियों को पहचाना और विकसित किया जा सके तो बिना किसी याँत्रिकी-भौतिकी के भी अपार शक्ति संचय और उसके द्वारा विलक्षण चमत्कार तक दिखाए जा सकते हैं।
सितम्बर 1977 में एवरेस्ट विजेता एडमंड हिलेरी ने एक अभियान “समुद्र से आकाश तक” प्रारंभ किया जिसमें उन्होंने कलकत्ता से गंगा मार्ग द्वारा तक की यात्रा संपन्न की। जिस समय हिलेरी की मोटर बोट इलाहाबाद पहुँची उस समय एक 67 वर्षीय वृद्ध हठयोगी ने उनकी नाव को एक स्थान पर ही 10 मिनट तक रोके रखा। हजारों प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दो तीन हार्स पावर की माटर ने पूरा जोर लगाया बोट बुलबुले छोड़ती रही पर टस से मस न हो सकी। न्यूमैक्सिको के प्रयोग में तो सूर्य किरणों को केन्द्रित करने के लिए कम्प्यूटर नियन्त्रित दर्पण प्लेटें( हैलिपोस्टैट्स) प्रयुक्त की गई थी। जिससे दो मिनट में तीन हजार डिग्री फारेनहाइट ताप 1.8 मेगावाट विद्युत के बराबर ऊर्जा उत्पन्न हुई और उसने इस्पात की चद्दर को गला दिया। पर आत्म शक्तियों को केन्द्रित करने और उसका लाभ उठाने के लिए न किसी ऐसे जटिल उपकरण की आवश्यकता होती है न साधनों की। जिस तरह आतिशी शीशे में किरणों को एकाग्र कर उन्हें अकूत बना लिया जाता है, उसी प्रकार प्राण शक्ति के संलयन से वह अद्भुत शक्ति मनुष्य शरीर में ही प्राप्त कर ली जाती है।
जिस तरह हाइड्रोजन सर्वत्र बिखरा पड़ा है और किसी स्थान विशेष में दस करोड़ सेन्टीग्रेड ताप पैदा कर दे तो इस हाइड्रोजन की संलयन प्रक्रिया वहाँ स्वयमेव प्रारंभ हो जाएगी। उस स्थान पर कृत्रिम सूर्य पैदा हो जाएगा। जर्मनी के वैज्ञानिक इस संदर्भ में प्रयत्नशील है, भले उनकी कोशिश अभी पूर्णतया सफल न हो पाई हो। इसलिए अभी ऊर्जा का यह अकूत भंडार हमारे आस-पास बिखरा होने पर भी उसका उपयोग नहीं पाता। मनुष्य में से प्रत्येक के पास भी परमात्मा ने इस तरह की शक्तियाँ दी है। पर इतनी प्रचण्ड गर्मी वाला मनोबल या संकल्पबल किन्हीं बिरलों में ही जाग्रत हो पाता है जो कर लेते है वे योग साधनाओं विचारों आदि के मूर्तिमान शक्ति पुँज चलते फिरते बिजली घर बन जाते हैं और उससे वह सैकड़ों लोगों का भला कर सकते है। मात्र
येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विष्वसुदियर्षि भानुना। तेना स्मद्विष्वामनिरामनाहुतिमपामीवामय दुर्ष्यज्यं सुव॥ (ऋ 10/37/4)
हे सूर्यदेव। आप अपनी जिस ज्योति से अंधेरे को दूर करते और विश्व को प्रकाशित करते हैं, उसी ज्योति से हमारे पापों को दूर करे, रोगों और क्लेशों का नष्ट करें तथा दारिद्रय को भी मिटाएँ।
विचारों की ही एकाग्रता मनुष्य को कुशाग्र बुद्धि, साहित्यकार, इंजीनियर, वैज्ञानिक, और न जानें क्या बना देती है। आत्म शक्ति संचय के परिणामों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
प्रकारान्तर से प्राप्त ऊर्जा शक्ति चाहे वह प्राकृतिक रूप में हो या उसे साधन रूप में पाया गया हो, सूर्य ही चिर संग्रहित शक्ति होती है। सँभाल कर रखे गए पदार्थ कभी भी काम आ जाते हैं, इस तथ्य में यही सिद्धांत कार्य करता प्रतीत होता है।
भू–ताप विशेषज्ञ सी. गुलेमीन ने कुछ वर्षों पूर्व पेरिस में आयोजित एक ऊर्जा सम्मेलन में अपने निबंध।
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में बताया कि अकेले पेरिस के इलाके में 1500 से 2000 मीटर गहरे कुएँ खोदे जाये तो वहाँ उपलब्ध गर्म जल से इतना अधिक ताप मिल जायेगा, जितने के लिए एक करोड़ अस्सी लाख टन ईंधन जलाना पड़ेगा। पेरिस में मेलन नामक स्थान में 100 क्यूबिक मीटर प्रति घण्टे की गति से 70 डिग्री सेन्टीग्रेड तक गर्म पानी निकाल कर लगभग 1900 घरों को पहुँचाया जाता है।
हिमालय के अत्यन्त शीत प्रदेश स्थान-स्थान पर ऐसे कुण्ड उपलब्ध है, जिनमें 350 डिग्री सेन्टीग्रेड तक गर्म जल उपलब्ध है। रूस के उत्तरी ध्रुव क्षेत्रों में भी पृथ्वी के भीतर के गर्म जल का उपयोग करके दो करोड़ टन ईंधन की बचत की जाती है। टस्केनी के लार्डरेल्लो में एक ऐसा कारखाना चलाया जा रहा है। जिसमें इस भू–ताप से ही 390 मेगावाट शक्ति की भू-ताप बिजली तैयार की जाती है। कैलीफोर्निया में पहले ही दस भू ताप कारखाने है। इन सबसे 1000 मेगावाट बिजली तैयार की जाती है। जापान, मैक्सिको, आइलैण्ड न्यूजीलैण्ड, फिलीपाइन्स आदि में भी ऐसे भू-भाग कारखाने है। यह समग्र शक्ति और कुछ नहीं सूर्य तथा वर्षों से धरती के सघन अन्तराल में संचित की हुई है। उसका लाभ आज के मनुष्य समाज पूर्वजों द्वारा संग्रहित संपत्ति के रूप में लेता है। फ्राँस ने राँस नदी पर समुद्री ज्वार से 240 मेगावाट बिजली बनाने का कारखाना खड़ा किया है। वह भी सूर्य की ही उधार दी हुई सामर्थ्य है।
अपने देश की धरती में अनुमानतः 140 अरब टन कोयला है। उससे अगले दो सौ वर्ष तक 63.5 करोड़ टन प्रति वर्ष की दर से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है, वह भी सूर्य की चिर संचित पूँजी है। अनुमान है कि यह कुछ करोड़ वर्षों से संग्रहित शक्ति है जो कोयले में प्रसुप्त और शक्ति की माप भी असंभव है।
बरसात के दिनों में बादल अपने आप हवाई समुद्र बन जाते और सारी पृथ्वी को जल से सराबोर कर देते है। यह बादल उस भाप का परिणाम है, जिसे सूर्य अपनी गर्मी से प्रति सेकेण्ड 1 करोड़ 60 लाख टन पानी को पका कर भाप में बदलता है। सूर्य से पृथ्वी को मिलने वाली ऊर्जा शक्ति का दो तिहाई भाग इसी कार्य में प्रयुक्त होता है। नैसर्गिक शक्तियाँ विश्व व्यवस्था का भार इसी कार्य में प्रयुक्त होता है। नैसर्गिक शक्तियाँ विश्व व्यवस्था का भार कितने विवेकपूर्वक चलाती है यह इसी तथ्य से प्रकट है। यदि सृष्टि की प्रक्रिया किसी एक वर्ष ही रुक जाय तो न केवल मनुष्य जाति उन्नत उससे पड़ने वाले आकाल से सारा जीवन सुधर हो सकता है। कहाँ तुरन्त कितनी आवश्यकता है, मैं भविष्य के लिए संग्रह की आवश्यकता है? पृथ्वी में शीत-ताप का संतुलन किस प्रकार रखने का है? इस संबंध में प्रकृति की चिन्तन दृष्टि विवेकपूर्ण, सूक्ष्म और दूर दृष्टि न रहे तो यहाँ जो कुछ भी सौंदर्य और जीवन व्यवस्था दिखाई देती है कुछ भी न रहे। जो लोग अपने में भी यह दृष्टि और दूरदर्शिता बनाये रखते है। वे न केवल स्वयं सम्मान और ट और दूरदर्शिता बनाये रखते है। वे न केवल स्वयं सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करते है अपितु अपने परिवार परिजनों को भी प्रगति पथ पर अग्रसर करने में सफल होते है।
ऐतरेय ब्राह्मण (33/3/5) में इन्द्र ने रोहित को कर्म सौंदर्य का उपदेश देते हुए कहा है कि सूर्यस्य पष्य श्रेयाँर्ण सो न तन्द्रयते चरंष्चरैवेति। देखो सूर्य का श्रेष्ठत्व इसीलिए है कि वे लोकमंगल के लिए निरन्तर गतिशील रहते हुए तनिक भी आलस्य नहीं करते है, अतः सूर्यदेव की भाँति कर्तव्य पथ पर सदैव चलते रहो।
सूर्य शक्ति का यह विशाल परिमाण और उसकी सर्वव्यापक सक्रियता जगत में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है। यदि कुछ है तो वह मात्र मनुष्य का अज्ञान है उसको जड़ता है। अज्ञान और जड़ताएँ आगे बढ़ने नहीं देती, संकीर्णता में ही उलझाए रहती है। ऊर्जा के लिए ईंधन और कोयला स्थूल साधन है। बड़े परिमाण में मिले तो भी थोड़ी शक्ति मिलती है। उससे आगे भू-ताप है, उससे भी बढ़कर विद्युत शक्ति। इससे भी यदि आवश्यकताएं पूर्ण न हो तब फिर सूर्य शक्ति का अजस्र भंडार है। शक्तियों के एक से एक बुद्धि को चकरा देने वाले साधन प्रकृति के अन्तराल में भरे पड़े है। उन्हें यह करता एक क्लिष्ट प्रणाली हो सकती है यह वैज्ञानिकों ने वह तथ्य सम्मुख ला दिए है जिनसे शक्ति चले जाने की आशंका का पूर्ण निराकरण हो गया है। 61
सूर्य पृथ्वी से 149000,00,00 किलो मीटर दूर है। इतनी दूरी और पृथ्वी के क्षेत्रफल के अनुपात से वह अपनी कुल ऊर्जा का मात्र- 0.000.00.0005 वाँ अंश ही पृथ्वी को देता है। किन्तु यह शक्ति भी इतनी विशाल है कि उसकी बराबरी 2 अरब अणु विद्युत घरों से प्राप्त बिजली ही कर सकती है। उसे यदि विद्युत शक्ति में बदला जा सके तो 1 खरब 73 अरब मेगावाट विद्युत भार के बराबर होती है। अनुमान है कि प्रति वर्ग मीटर एक किलोवाट विद्युत भार के बराबर ताप पृथ्वी को मिलता है। इस विशाल परिमाण का अनुमान करना भी कठिन है। हमें यह अनुदान अजस्र रूप से मिलता रहता है। फिर कितना दुर्भाग्य है कि हम शक्ति-शक्ति चिल्लाते रहते है। जल में मीन पियासी वाली कहावत चरितार्थ करते है।
सूर्य की यह अजस्र ऊर्जा हमारा प्राण है। समस्त जीव-जगत और वृक्ष वनस्पति उसी से जीवन धारण करते है। शैवाल से लेकर सभी पौधे सूर्य की ऊर्जा सोख कर फोटो सिंथेसिस की प्रक्रिया संपन्न करते है और कार्बनडाइ आक्साइड तथा पानी से हमारे लिए शाकाहार तैयार करते है। पृथ्वी के पाँच अरब से अधिक लोग और इनसे करोड़ों गुना अन्त जीव-जन्तु भारतीय तत्वदर्शन की इस मान्यता का ही प्रतिपादन करते है कि सूर्य हमारी आत्मा है। तात्विक दृष्टि से हम उसी दिव्य ज्योति के प्रकाश कण है अतएव हमें उनकी ओर उन्मुख रहना उन्हें धारण किए रहना चाहिए। उनके न रहने पर फूल खिलना बन्द हो जाता है रोगाणु पनपने लगते है। हमारे जीवन में व्यास कषाय-कल्मषों का निवारण और प्रसन्नता का विकास इसी आधार पर संभव है कि हम उस आत्म तत्व को विस्मृत न करें।
किसी समय इसे कल्पनातीत मानते थे कि सूर्य शक्ति को पकड़ा, बाँधा और बड़े कार्यों में प्रयुक्त किया जा सकता है। किन्तु जब नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी की स्थापना की गई, उसने सूर्य ऊर्जा को बिजली में बदलने वाला सोलह सेल बनाकर उसे संभव बना दिया। फ्राँस के माउंट लुई और ओडिलो में रगेर भट्टियाँ बनाई गई। इनमें एक काला रोगन पुता रहता है।
जो शक्ति को सोख लेता है। पानी गर्म करने के यन्त्र, खाना, पकाने, कमरा गर्म रखने के लिए छोटा सौर ऊर्जा यन्त्र इसी आधार पर बने है। इजराइल में खारे पानी को इसी तरह शुद्ध किया जाता है। भविष्य में तो वैज्ञानिकों की योजना, सारे समुद्री जल को मीठा बनकर जल समस्या निवारण की है। शक्ति एक ही है उसका जहाँ भी उपयोग करें वही चमत्कारी सत्यपरिणाम उपस्थित हो सकते है।
दुनिया भर में यह प्रयोग चल रहे है। रूस ने आर्मेनियाँ घाटी में बिजली घर बनाया है जिसमें 1300 दर्पण ऊर्जा संग्रह करते है। यह बिजली घर पाँच एकड़ में है। 130 फुट ऊंची बुर्जी पर रखे बॉयलर पर सूर्य किरणें डालकर 25 लाख किलोवाट प्रतिघण्टे पैदा की जाती है। अब तक लोहे से 2800 डिग्री, टंगस्टन से 6100 डिग्री तथा किसी भी अच्छी से अच्छी ताप निरोधक धातु 6900 डिग्री पर भाप बनकर
ईश्वर निंदा- प्रशंसा से परे है। न उसे किसी का स्तवन सुनने में रुचि है न उपहार पाने की जरूरत। वह सिर्फ यह देखता है कि भक्त ने अनुशासन पाला या आडम्बरों के खेल खिलौनों से उसे फुसलाया।
उड़ जाती है। किन्तु अब सूर्य से 8000 डिग्री तक की ताप शक्ति मिल जाने से सर्वत्र औद्योगिक क्रांति की संभावनाएँ बढ़ गई है। विश्व के वैज्ञानिक इस दिशा में प्रयत्नशील है।
सौर शक्ति के द्वारा भौतिक उपलब्धियाँ ही नहीं आत्मिक उपलब्धियाँ भी अर्जित की जा सकती है। आवश्यकता-आत्मिक शक्तियों पर विश्वास नहीं, उनके विकास या जटिलता से सिद्धि पाने तक जूझते रहने के साहस की होती है। बड़ी बारीकी से आत्म निरीक्षण का साइज है। सौर ऊर्जा के संग्रह के लिए दर्पण वाले यंत्र लगते है। अपने मन को भी दर्पण बनाकर उसमें झाँककर मलीनताओं को निकालना पड़ता है अन्यथा प्रकाश के साथ अंधकार भी छनकर जाता रहे और शक्ति यंत्र निमार्ण करने पर ही सौर चेतना के साथ एकात्मता का दिव्य लाभ मिल पाता है।
पृथ्वी को जीवन-सूर्य से प्राप्त हुआ है। उसी की रोशनी और गर्मी से धरातल पर अगणित गतिविधियाँ चलती और अनेकों सम्पदायें उत्फा होती है। सौर मंडल के अन्य ग्रहों-उपग्रहों की अपेक्षा धरती के वातावरण, वनस्पति जगत तथा प्राणि समुदाय को सूर्य ही सबसे अधिक प्रभावत करता है। यह धरती का जीवनदाता प्राण है। उसके उदय-अस्त का, प्रभात-मध्याह्न का, पृथ्वी की उसके निवासियों की स्थिति पर कितना और क्या प्रभाव पड़ता है, इसे दैनिक जीवन की घटनाओं से जोड़कर हर कोई सहज ही अनुभव कर सकता है। ऋतुओं के प्रभाव-परिवर्तन में सूर्य की सामान्य परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है और सन्तुलन बिगड़ता है। इससे न केवल धरती की अनेक परिस्थितियाँ प्रभावित होती है, दीन प्राणियों की विशेषतया मनुष्यों की मनःस्थिति में भी अप्रत्याशित रूप से उथल-पुथल मचती है और वे अनिच्छित रूप से कुछ ऐसा सोचने और करने लगते हैं जिसकी कि कभी कल्पना तक नहीं की गयी थी।
इन दिनों सूर्य से कुछ ऐसी ही प्रक्रियायें उभर रही हैं जो घटना की दृष्टि से दूरवर्ती होने के कारण सामान्य कही जा सकती हैं, किन्तु उनकी परोक्ष प्रतिक्रिया ऐसी है जिससे जन-जीवन असाधारण रूप से प्रभावित होता है उनमें से एक है सौर-कलंकों-सौर स्फोटों की अभिवृद्धि, जिनका पृथ्वी के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता बताया गया है।
अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों के अनुसार जब भी सूर्य पर इस तरह ‘सनस्पाँट्स’ या कलंक-धब्बे उभरते हैं तो उसकी स्थिति असामान्य हो जाती है। उसके अन्तराल में भयंकर आँधी-तूफान उठते हैं और लाखों मील के दायरे में अग्नि ज्वालाएँ लपलपाती है तथा विद्युतीय-चुम्बकीय तरंगों का निर्माण इतनी तीव्रता के साथ होता है कि उससे सारा सौर-मंडल प्रभावित हो उठता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच आदान-प्रदान का विशिष्ट सूत्र संबंध जुड़ा हुआ है, इसलिए उस पर इस विषमता का प्रभाव भी अधिक पड़ता है। सामान्य स्थिति बदल जाती है और उत्पन्न विपन्नता ऐसे अदृश्य प्रभाव उत्पन्न करती है जिनसे हित कम और अहित अधिक होता है। ऋतुयें ठण्डी पड़ जाती हैं, भारी हिमपात होते हैं, आँधी, तूफान और चक्रवात आते हैं तथा दारभार ऊँचा हो जाता है। ओजोन परत में आक्सीजन के रूप में ऊर्जा आ जाती है। सूर्य-कलंकों का उभरना भारतीय ज्योतिष शास्त्र में भी परिवर्तन का परिचायक माना गया है जो शुभ-अशुभ कुछ भी हो सकता है। इस संदर्भ में विज्ञान भी पूर्णतया सहमत है।
सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक अलेक्जेंडर मारषेक ने अपनी कृति’ अर्थ एण्ड होराइजन” में लिखा है कि भले ही पृथ्वी पर घटने वाली घटनाओं का सूर्य के अन्तर्विग्रह से प्रत्यक्ष संबंध न जोड़ा जा सके किन्तु सांख्यिकीय दृष्टि से उनका पृथ्वी से संबंध निर्विवाद सिद्ध हो गया है। पाया गया है कि जब-जब यह सौर सक्रियता बढ़ती है वर्षा तथा तूफानों की बाढ़ आती है, वनस्पति में वृद्धि, ग्रीष्म की अभिवृद्धि के साथ-साथ कहीं-कहीं अकाल, सड़क दुर्घटनायें, वायुयान दुर्घटनायें युद्ध तथा रक्तपात बढ़ता है। इस अवधि में न केवल भीषण भू–चुंबकीय उत्पाद अर्थात् भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट होते हैं, वरन् मेरु प्रकार की असामान्य दिव्य चमक भी देखने में आयी है। इसका भी हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ता है। अमेरिका के मौसम विज्ञानी डॉ. वेक्सलर ने तो इन्हें मनुष्य के अन्तरंग जीवन में बड़े गहरे एवं विलक्षण स्तर के हस्तक्षेप की संज्ञा दी है।
सूर्य में होने वाले परिवर्तनों का पृथ्वीवासियों पर क्या प्रभाव पड़ता है? यह जानने के लिए रूस के मूर्धन्य वैज्ञानिक चिजोब्स्की ने विगत 400 वर्षों के इतिहास और सूर्य की पिछली गतिविधियों का गहन अध्ययन किया है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि विविध प्रकार की महामारियों एवं क्राँतिकारी परिवर्तनों का सौर कलंकों-(सन स्पाँट्स) से गहरा संबंध है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि प्रत्येक ग्यारह वर्ष पश्चात् यह धब्बे गहरे या उथले रहते हैं, उतनी अवधि तक उसी अनुपात से पृथ्वी पर हलके भारी परिवर्तन या उत्पाद होते हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य-कलंकों के कारण पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र भी लड़खड़ाने गलता है, रेडियो संचार में बाधा आती है तथा मौसम प्रभावित होता है। ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक माइकेल्सन का तो यहाँ तक कहना है कि इन परिवर्तनों से पृथ्वी विशेष अवसरों पर फूलती और पिचकती भी है जिससे भूकंप जैसे प्राकृतिक उपद्रव उठ खड़े होते हैं। प्रसिद्ध डॉ. एन्ड्र. ई. डगलस के अनुसार इन सौर न केवल मनुष्य एवं जीव जन्तुओं पर पड़ता वनस्पतियां भी इनसे प्रभावित होती हैं। प्रति ग्यारह वर्ष पश्चात् वृक्षों में बनने वाली वार्षिक वलय
64-(एन्युअल रिंग) कुछ मोटी हो जाती है। संभवतः ऐसा इसलिए होता है कि दिनों सूर्य धब्बों से उत्पन्न सूक्ष्म विकिरण से बचने के लिए प्रकृति उस वर्ष वृक्षों की खाल मोटी कर देती है।
अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग की अलकुकर्क स्थित साँटिया लैबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने सौर प्रभावों पर गहन अनुसंधान किया है। उन्होंने अपराधों एवं दुर्घटनाओं से संबंधित बीस वर्षों के आँकड़े एकत्रित किये और उनका अध्ययन किया, तदुपरान्त वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सौर-कलंक जब अपनी चरम स्थिति में होते हैं तो दुर्घटनाओं एवं अपराध प्रायः छः गुना अधिक बढ़ जाते है। न्यूयार्क के डॉ. बेकर ने भी पाया है कि तीव्र सौर सक्रियता के दिनों में मानसिक रोगियों की संख्या में असाधारण रूप वृद्धि होती है। इस संदर्भ में प्राचीन भारतीय ज्योतिर्विदों ने बहुत पहले ही यह खोज कर ली थी कि सूर्य मंडल में होने वाले विस्फोटों का क्या स्वरूप है? उनके क्या कारण है। तथा पृथ्वी के चराचर पर उससे क्या प्रभाव पड़ता है। महर्षि गर्ग, पाराष, कश्यप, देवल, नारेन्द्र तथा वशिष्ठ आदि में इन विस्फोटों के बारे में चेतना के स्त्र पर पर्याप्त अनुसंधान किया था।
अन्तरिक्ष विज्ञानी इन दिनों सौर मंडल तथा उससे ऊपर की ब्रह्मांडीय क्षेत्र का पर्यवेक्षण करने में निरत हैं। उनका कहना है कि वर्तमान सौर सक्रियता पृथ्वी के लिए संकटापन्न परिस्थितियां उत्पन्न करने वाली है। सभी जानते है कि पृथ्वी की निज की जितनी शक्ति और संपदा है, उसे उसने कही अधिक अनुदान लेकर अपना गुजारा करना पड़ता है। सौर ऊर्जा उसका प्राण है और इसी से आबद्ध है धरती का जीवन इस तथ्य का अति प्राचीनकाल से ही स्वीकारा गया है। मिस्र में सिंचाई के समय यह त्यौहार प्राचीनकाल से मनाया जाता है। यह उस दिन मनाया जाता है जिस दिन जुलाई माह में नी नहीं में एकाएक बाढ़ आ जाती है। लम्बे अध्ययन के बाद यह पाया गया कि बाढ़ ठीक उसी दिन आती है जिस दिन सूर्योदय के ठीक समय लुब्धक नामक तारा दिखाई देता है। इसका अर्थ हुआ कि नील नदी का परिवर्तन किसी न किसी तरह सौर प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।
अध्यात्मवेत्ता दिव्यदर्शियों का कहना है कि कालचक्र के अनुसार अगले दिनों बहुत अधिक तीव्र और शीघ्रातिशीघ्र परिवर्तन होंगे। किन्हीं अज्ञात कारणों से अगले दिनों नियमों को तोड़कर सूर्य पृथ्वी में परिवर्तन लायेगा। इसमें वृष्टि, अनावृष्टि, सूखा, अकाल, विश्वयुद्ध, महामारियों के प्रकोप ही नहीं होंगे, वरन् महाक्राँतियों का नया दौर भी शुरू होगा और मानवी दुर्बुद्धि पर अंकुश लगेगा। सूर्य केवल भौतिक जगत का ही प्राण नहीं, वरन् प्राणियों की प्राण चेतना का भी स्वामी है। ऋषियों ने उसे त्रयीविद्या कहा है अर्थात् उसमें स्थूल तत्व-जिसे शरीर बनते है, प्राण-जिनसे चेतना आती है, और मन जो चेष्टायें प्रदान करता है-तीनों तत्व विद्यमान है। गायत्री महामंत्र द्वारा उसी की शक्ति का संदोहन मानवी चेतनात्मक उत्कर्ष तथा समष्टिगत परिवर्तन के लिए पिछले कई वर्षों से किया जाता रहा है। इस प्रयोग को अगले दिनों और गतिशील किया जाना है।
कानपुर के एक सिद्ध पुरुष जो अब नहीं है इस धरती पर उनके द्वारा 1986 में कही एक बात आज सहज याद हो आती है, जब परमपूज्य गुरुदेव की सत्ता का ध्यान कर सूर्य साधना के संदर्भ में हंस उनको ही स्मरण कर रहे है। वे एक सिद्ध ताँत्रिक थे। जिसे आशीर्वाद देते, फल जाता। कभी-कभी शाँतिकुँज आते, यहाँ 5-6 दिन रहते, फिर कानपुर चले जाते। सशरीर किसी तीर्थ नहीं गए थे, किन्तु जब मित्र मंडली के साथ बैठते तो सभी का ऐसा जीवन्त चित्रण करते कि सभी ये समझते कि ये होकर अवश्य आए है। बताते, “जब सोता हूँ तो सूक्ष्म शरीर में एक -एक सारे तीर्थ घूम आता हूँ।” वास्तव में था भी ऐसा ही साधारण पोस्ट–ऑफिस के एक कर्मचारी किंतु साधना द्वारा सिद्धि तो इतनी प्राप्त करली थी कि जिसे जो देते बाँटते-वह तुरंत फल जाता। जब उन्हीं सज्जन ने हम से इच्छा व्यक्त की कि अब हमें गुरुदेव से दीक्षा दिलवा दो नहीं तो हम जन्म-जन्मान्तरों तक भटकते रहेंगे, बड़ा आश्चर्य हुआ।
हमने पूछा-”आपको दीक्षा को क्या जरूरत है? आप तो गायत्री अनुष्ठान काफी कर चुके है तथा सिद्धियाँ इतनी हस्तगत कर चुके है कि कोई कभी उस दृष्टि से नहीं, फिर अनायास ही यह इच्छा क्यों व्यक्त की?” बोले-”तुम समझते हो, मैं शाँतिकुँज घूमने के लिए आता हूँ। अरे ! यहाँ दैवीसत्ताएँ रहती है, स्वयं महाकाल यहाँ विराजते है। तुम्हारी गुरुसत्ता को मालूम नहीं तुमने कैसा देखा-समझा है पर जो मैंने देखा है, उससे लगता है, एक बहुत बड़ी परिवर्तन प्रक्रिया संपन्न करने युगों-युगों के बाद साक्षात् महेश्वर की सत्ता उनके व माँ पार्वती के रूप में धरती पर आयी है। हम उनसे दीक्षा ले लेंगे तो भवसागर से पार हो जायेंगे। फिर हमारे शरीर छोड़ने का समय आ गया है एवं गुरुदेव भी अब चार वर्ष बाद सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करने जा रहे हैं। यही उचित समय है।”
जिज्ञासा अभी शाँत नहीं हुई थी। हमने कहा-”आप भी तो एक सिद्ध पुरुष है, फिर दीक्षा अब क्यों?” भई ! अब भी नहीं समझे? हमारे पास जो ये सिद्धियाँ है, तंत्र के लटके-झटके है, ये तो सामाजिक है। किसी को भी प्रभावित कर सकते हैं किन्तु जो पूज्यवर के पास है, वह सहज ही किसी को बंधन मुक्त करने को काफी है। हम यदि एक छोटे से बल्ब है तो पूज्यवर सूर्य से भी बड़ी शक्ति वाले ऊर्जा के स्त्रोत है। अब तक का विश्व का सबसे बड़ा प्रयोग उनने मानवी चेतना पर किया है। उनने सूर्य से भी शीर्षासन करा लिया है तथा स्वयं उनकी सत्ता सूर्य से एकाकार हो सावित्री उपासना, सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया द्वारा सारे ब्रह्मांड में संव्याप्त हो गयी है। तुम देखना, यही सत्ता सूक्ष्मशरीर में जाने के बाद कैसे अपना प्रभाव दिखाती है। हम तो अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते है। ऐसे संदेश जो सहज ही हर किसी को नहीं मिलते युगों-युगों तक जिन्हें पाने को दैवी आत्माएँ तरसती रहती हैं, तुम सबको यहाँ मिल गए। तुम सब यहाँ आ भी गए उनके काम में भी लग गए। अब जरा उन्हें पहचान भर लो फिर देखो हमारी ताकत तो तुम्हारे समक्ष भी कुछ भी नहीं के समान है। बस तुम तो हमारा कल्याण करा दो, हमें दीक्षा दिला दो ताकि पुनः इस धरती पर ना आएँ-जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो। उनकी यह सहज अभिव्यक्ति, गुरुदेव से ली गयी उनकी दीक्षा, फिर उनका शरीर छोड़ना तथा कुछ वर्ष बाद ही पूज्यवर का ब्रह्मलीन हो सूर्य से एकाकार हो जाना सारा दृश्य आँखों के समक्ष घूम जाता है।
सुधी पाठकों को यह वृत्तान्त इसलिए लिखा है कि वे जान सकें कि एक उच्च स्तर की आध्यात्मिक प्रगति के लक्ष्य तक पहुँचे साधक की हमारी गुरुसत्ता के में क्या धारणा थी व किस गहन अंतर्दृष्टि से उसने कर्तव्य आध्यात्मिक स्वरूप को पहचाना था। स्वयं परम पूज्य गुरुदेव के कहे वे शब्द इन पंक्तियों को लिखते समय सहज की स्मृति पटल पर आ जाते हैं, जिनमें उनमें था कि “साकार ध्यान करो व सूर्य का ध्यान करना चाहो तो तुम मेरा ध्यान करो। मेरे ध्यान से तुम्हारा सूर्य का ध्यान हो जायगा।” वास्तव में ध्यान करते समय यही पाया, मानों गुरुसत्ता सूर्य में समायी हो। सूर्य मध्यस्थ गायत्री की तरह उनका ध्यान करते ही सहज ही लग जाता एवं सारी मन की ग्रंथियाँ, परेशानियां खुलती व समाधान सदा मिलता पाया। वस्तुतः गुरुदेव की सत्ता सूर्य से एकाकार हो गयी थी, इसमें कोई संदेह नहीं।
गायत्री साधना रम पूज्य गुरुदेव ने गहन स्तर की संपन्न की तथा उससे मानव मात्र की अंतःप्रकृति के परिशोधन की प्रक्रिया पूरी की। साथ ही सावित्री साधना का प्रयोग उनने बाह्य प्रकृति के परिशोधन के निमित्त किया व अभी भी सूक्ष्म कारण सत्ता से वही कर रहे हैं। सूर्य सम बन की कोई अवतारी स्तर की सत्ता युग परिवर्तन जैसा भागीरथी कार्य संपन्न कर सकती है। इससे कम में तो बात बन ही नहीं सकती। गायत्री व सूर्य हमारी संस्कृति के प्राण है। जब तक भारतवर्ष के देवमानव भगवान भास्कर की गायत्री मंत्र के माध्यम से उपासना करते रहें, तब तक भारत ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी, स्वस्थ-प्रसन्न एवं सर्वांगपूर्ण प्रगति के पथ पर अग्रगामी रहा। जब-जब अनीति व असुरता बढ़ी है तब-तब अवतारी लताओं ने सूर्य का ही आश्रय लेकर मानवी प्रकृति में व्यापक स्तर पर परिवर्तन किया है। -सूर्य में प्रखरता है, गति हैं, ऊर्ध्वगामी चिन्तन को गतिशील करने की सामर्थ्य है तथा विचारों को विकार मुक्त की भाव संवेदनाओं की परिष्कृति कर पाने की ताकत है। यही कारण है कि गुरुसत्ता, परिवर्तनकारी सत्ताएँ तत्कालीन परिस्थितियों में इष्ट का निर्धारण मानव मात्र के लिए करती रही है। कपिल तंत्र में एक उल्लेख आता है।
गुरवो योग निष्णाताः प्रकृतिं पंचधा गताम्। परीक्ष्य कुर्युः षिष्याणामधिकार विनिर्णयम्॥
अर्थात् “योग पारंगत गुरुओं को चाहिए कि वे शिष्यों की प्रकृति एवं प्रवृत्ति की तत्वानुसार (पंवधा) परीक्षा कर उनके उपासनाधिकार अर्थात् इष्टदेव का निर्णय करें। कौन-कान हो सकते हैं-आकाश के अधिपति विष्णु, अग्नि की अधिष्ठात्री महेश्वरी, वायु तत्व के स्वामी सूर्य, पृथ्वी के नायक शिव एवं जल के अधिपति भगवान गणेश, इनमें से कोई भी इष्ट हो सकता है, ऐसा श्रुति कहती है।
गायत्री व सूर्य में इन पाँचों ही सत्ताओं का समावेश हो जाता है तथा साधना सर्वांगपूर्ण बन जाती है, ऐसा परम पूज्य गुरुदेव ने युग-परिस्थिति को देखते हुए हम सभी को बताया। पूज्यवर करते हैं कि “यह सुनिश्चित है कि युग परिवर्तन होने वाला है व उसकी मूल धुरी अब भारतवर्ष है। सारी धरती का अध्यात्म अब सिमटकर यहाँ आ गया है व नवयुग का सूर्योदय स्वर्णिम आभा लिए यहीं से होगा।” इस उक्ति को सार्थक करने के लिए संभवतः विगत ढाई सौ वर्षों में पुनः सतयुग की वापसी करने व दो सहस्र वर्षों के अंधकार को मिटाने सर्वाधिक महामानव भारतवर्ष में ही जन्मे। जो कार्य इन ढाई सौ वर्षों में विगत सौ वर्ष में हुआ है वह विश्व के इतिहास में इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं हुआ। पूज्यवर लिखते हैं कि आगामी 8-9 वर्षों में जो कार्य होगा वह इससे भी विलक्षण होगा, जब मानव की प्रकृति सोचने की पद्धति तथा विश्वभर के सूक्ष्म वातावरण में अभूतपूर्व परिवर्तन होता देखा जाएगा। कैसे होगा यह सब? यही सारा मर्म सूर्यमय बनने वाली हमारी गुरुसत्ता हमें समझाकर गयी व इक्कीसवीं सदी के रूप में उज्ज्वल भविष्य वाणी कर गयी है।
आख्या संकट के निवारणार्थ-मानवमात्र में पवित्रता के अभिवर्धन हेतु आज जिस शक्ति की आवश्यकता है वह संहिता देवता ही है। तैत्तरीय संहिता में ऋषि कहते हैं -
“सूयौं विषष्चिन्मनसा पुनातु” अर्थात्” हे सर्वज्ञ
कृपापूर्वक मुझे अपने मन से पवित्र करें। संभवतः इसी कारण ऋषिगण आदिकाल से
थोऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्” (यजु. वा. स. 40/17)
के माध्यम से आदित्य मंडलस्थ पुरुष की चेतन सत्ता के रूप में अभ्यर्थना करते आए हैं। शुक्ल यजुर्वेद (31/18) में ऋषि का कहना है-
“वेदाहमेतं पुरुष महान्तमादित्य वर्ण ......... नान्यः पंथा विद्यतेऽयनाय। “में आदित्य रूप वाले सूर्यमंडलस्थ महान पुरुष को जो अंधकार से सर्वथा परे, पूर्ण प्रकाश देने वाले और परमात्मा हैं, उनको जानता हूँ। उन्हीं को जानकर मनुष्य को लाँघ जाता है। मनुष्य के लिए मोक्ष प्राप्ति का दूसरा कोई अन्य मार्ग नहीं है।” यह स्तुति अकारण नहीं है। ऋषियों ने प्राणरक्षक, रचयिता, पुष्टिप्रदाता के रूप में सूर्य की अवधारणा की व कहा है कि “हम दीर्घकाल तक सर्वव्यापी प्रकाश वाले सूर्य भगवान का सतत् दर्शन करते रहें, यही हमारी प्रार्थना है “ज्योगेव दृषेम सूर्यम्” अथर्वेवेद 1/31/4)
परमपूज्य गुरुदेव ने मार्च 1977 से मई 1977 तक चारमाह सतत् अखण्ड-ज्योति के विशेषांकों द्वारा
*समाप्त*