ईश्वर अतंतः है−क्या व किस प्रकार की सत्ता? कैसे उसे जाना जाय व कैसे यह माना जाय कि उसके ही कारण यह सारा क्रिया व्यापार−जगती के क्रिया कलाप चल रहे हैं, शब्दार्थ के नाते ऐश्वर्यवान −सर्व शक्तिमान सत्ता का नाम है। “ऐश्वर्य “ से यहाँ तात्पर्य उस वैभव से है जो समूची सृष्टि−इकोसिस्टम में विद्यमान नजर आता है। हम प्रार्थना द्वारा ऐश्वर्य−समृद्धि भगवान से सतत् माँगते हैं। पर कभी हमने विचारा कि ऐश्वर्य सही मायने में होता क्या है? संपूर्ण सृष्टि ही जिसका कार्यक्षेत्र हो तथा जिसका अस्तित्व इसके रोम−रोम में, कण−कण में समाया हो, ऐसी अधीश्वर सत्ता को ही ईश्वर मानकर उसकी आराधना−पूजा−उपासना द्वारा स्वयं को आस्तिक बनाया जाता हैँ उस सत्ता के क्रिया−कलापों को आगे बढ़ना, सृष्टि के उद्यान को सुरम्य बनाना और उसके ऐश्वर्य में सतत् निरन्तर वृद्धि करते रहना ही आस्तिकता है−ईश्वर की आराधना है।
ईश्वर शब्द से एक और अर्थ निकलता है−हम उस सर्वोच्च शक्तिमान सत्ता को जो ईश के रूप में सर्वव्यापी है, अचिंत्य −अगोचर−अगम्य है, का वरण करें। वरण उसी का किया जाता है जो सर्वश्रेष्ठ है, आदर्शों का समुच्चय है, समस्त सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों का समूह है। ईश्वर हमें उतना ही प्रिय लगे, जितना कि वरण करने वाले स्त्री के लिए उसका प्रियतम पति। समर्पण उसके प्रति हमारा वैसा ही हो जो भाव−संवेदना से भरी −पूरी किसी स्त्री का होता है। ईश्वर को यदि सही अर्थों में जीवन में ओत−प्रोत किया जा सके, उसका तत्त्वदर्शन हमारे कर्तृत्त्व में दृष्टिगोचर होने लगे तो समझना चाहिए कि ईश्वर उपासना किसी आस्तिक द्वारा सच्चे मायनों में संपन्न की गयी।
धर्म प्रचार के लिए समर्थ रामदास ने अपने प्रिय शिष्य कल्याण को भेजते हुए आशीर्वाद देकर कहा−” वत्स! संसार बड़ा दुःखी है, लोग अज्ञानवश कुरीतियों में जकड़े पड़े हैं, जाओ उन्हें जाग्रति का सन्देश दो। इससे बढ़कर और कोई पुण्य नहीं कि तुम उन्हें आत्म कल्याण का मार्ग दिखाओ”।
कल्याण ने समर्थ गुरु की चरण−रज मस्तक से लगाई और वहाँ से विदा हो लिए। दिन छिपने में अभी देर थी। कल्याण महाराष्ट्र के एक छोटे गाँव पहुँचे। उसमें अनेक लोग कृशकाय बीमार पड़े थे। बच्चों के शरीर सूखे थे। लगता था, इनको न भर पेट अन्न मिलता है और न बीमारियाँ से लड़ने को औषधियाँ। शिक्षा की दृष्टि से उनमें कोई चेतना दिखाई नहीं दे रही थी। सब म्लान, मलीन और क्लाँत दिखाई दे रहे थे।
कल्याण को अपनी सेवा का स्थान मिल गया। एक झोपड़ी के सहारे अपना समान टिकाकर वह विश्राम की मुद्रा में बैठ गए और सारे गाँव में समाचार फैल दिया−”समर्थ स्वामी रामदास के शिष्य कल्याण तुम लोगों के दुःख दूर करने आए हैं, मुक्ति का मार्ग बताने पधारे है।”
बिच्छू का विष जिस तेज गति से फैलकर चुभन, तड़पन, बेचैनी की अनुभूति कराता है, उसी तेजी से यह बात सारे गाँव में फैल गई। ग्रामीणों के हर्ष का ठिकाना न रहा−चलो अब हमारे दुःख दूर हुए। किसी को तो भेजा विधाता ने हमारा त्राणदाता बनाकर। सबने कल्याण के विश्राम के लिए सुन्दर स्थान की व्यवस्था कर दी। रात बड़ी शाँति और प्रसन्नता में बीती।
प्रातःकाल कल्याण जब तक ध्यान, पूजन समाप्त करें,
तब तक द्वार ग्रामवासियों की भीड़ से भर गया। कल्याण बाहर निकले। अशिक्षा, रूढ़िग्रस्तता और दरिद्र से ग्रसित चेहरे देखते ही उनके मन में घृणा फैल गई पर उन्होंने उसकी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कीँ आखिर धर्मचर्चा करने आए थे। इतनी सहिष्णुता भी न होती तो समर्थ उन्हें इस कार्य के लिए कैसे भेजे देते?
सबको सामने बैठाकर कल्याण ने प्रवचन प्रारम्भ किया। कभी ब्रह्म सूत्रों की तात्त्विक व्याख्या सुनाते, तो गीता के सुललित श्लोक उनके मुख के झरने लगते। पांडित्य और विद्वता उनके मुख से झरने लगी। पर आश्चर्य −भीड़ के चेहरे पर उदासी और गहरी हो गई, दुःख सघन हो गया, वेदना तीव्र हो उठी, आकुलता बढ़ने लगी। लगा−उन सब पर अनेकों प्रहार हो रहे हैं−और वे सब सहने में असमर्थ हैं। बेचारगी, असहायपन का भाव लिए, एक−एक कर उठने लगे। मैदान खाली हो गया।
अब कल्याण के निराश होने की बारी थी। इतना पांडित्य, इतनी प्रतिभा, इतना कौशल, जिसके सामने काशी के पंडितों को अनेकों बार मुंह की खानी पड़ी। न जाने कितने दिग्विजयी शास्त्रज्ञ उनके सामने नतमस्तक हुए। पर आज−−−−−−−−।
वे हताश हो समर्थ के पास लौट आए−बोले “निष्फल भगवान्! हमारा उपदेश कुछ कामा भी न सुनी।” समर्थ हँस पड़े−बोले−”वे अनपढ़ हैं और तुम कुपढ़ हो कल्याण।” कल्याण आश्चर्य से गुरु का चेहरा निहार रहे थे। समर्थ कह रहे थे−”तुम उनकी विवशता, उनकी भावना को नहीं पढ़ सके−तब तुमको और क्या कहें।” देखो तुम उस ग्राम में जाओ -औषधि और शिक्षा का प्रबन्ध करो।”
समर्थ का आज्ञा शिरोधार्य कर दोनों चल पड़े। तब कल्याण ने पूछा। “आपने तत्त्वज्ञान की बात ही नहीं की।” समर्थ कुछ देर चुप रहे, अन्तःकरण की करुणा विगलित हो वाणी से फूट पड़ी −”औषधि बिना अनुपान के लाभदायक नहीं होती। ज्ञान का अनुपान संवेदना है। समाज के हृदय को स्पर्श किए बगैर उसकी प्राथमिक जरूरतों को पूरा किए बिना तत्त्वज्ञान की चर्चा संभव नहीं। आज की आवश्यकतानुसार −मुरझाए जीवन को संवेदना से सींचना है। अभी जीवन के प्रति आशा जगानी होगी, साहस पौरुष को प्रकट करना होगा। यही युग धर्म है।”
कल्याण को अब यथार्थता का बोध हुआ। अब वे पांडित्य का मोह त्याग कर समाज में नव प्राणों का संचार करने लगे।
तत्त्वदर्शन का अर्थ कोई एक शब्द में पूछे तो कहना चाहिए आत्म−निर्भरता, आत्म−संयम।
आध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा को सर्वोपरि आत्मिक शक्ति बताया गया है। मानवी व्यक्तित्व और कुछ नहीं, वरन्, श्रद्धा की ही परिणति है। यह कोई अन्धविश्वास, मूढ़ मान्यता या कल्पनालोक की उड़ान अथवा भावुकता नहीं, वरन् एक प्रबल तत्त्व है। भौतिक जगत में विद्युत शक्ति की महत्ता एवं उपयोगिता से जिस तरह अगणित प्रकार आत्मिक जगत में श्रद्धा की महत्ता है। मनोयोग और भावनाओं से सम्मिश्रण से जो सुदृढ़ निश्चय एवं विश्वास विनिर्मित होता है उसे भौतिक बिजली से कम नहीं वरन् अधिक ही शक्तिशाली समझा जाना चाहिए।
आत्मनिर्माण का विशालकाय भवन उच्च आदर्शों के प्रति समर्पण की चट्टान पर ही खड़ा किया जाता है। जिसे उत्कृष्ट−दिव्य जीवन की गरिमा पर परिपूर्ण श्रद्धा न होगी, वह छुट−पुट प्रयत्न करते रहने पर भी आत्मिक प्रगति के मार्ग पर दूर तक एवं देर तक चल न सकेगा। उपासना, साधना, तपस्या, देव−अनुग्रह, वरदान, स्वर्ग−मुक्ति आदि आत्मिक उत्पादनों के पीछे जो तथ्य काम करता है उसे श्रद्धा का ही परिपाक समझा जाना चाहिए। यदि श्रद्धा न हो तो यह समस्त क्रिया−कलाप मात्र कर्मकाण्ड बनकर ही रह जायेगा और उनका परिणाम नगण्य जितना ही दिखायी देगा।
जिन्हें मन की सत्ता और महत्ता का ज्ञान है उन्हें यह भी विदित है कि चेतना जगत में जिस प्राणशक्ति की अजस्र महिमा मानी गायी जाती है, वह अंतरिक्ष में संव्याप्त विद्युत, चुम्बक, ईथर, विकिरण आदि सामान्य भौतिक संव्याप्ति की श्रद्धा−समन्वित संकल्पशक्ति के आधार पर विनिर्मित एक अद्भुत ऊर्जा ही है। प्राण और कुछ नहीं भौतिक प्रकृति और चेतनात्मक संकल्प शक्ति का समन्वय ही है। प्राणधारियों को जीवित रखने और उनकी मानसिक हलचलों को प्रखर बनाये रहने का कार्य ‘प्राणशक्ति’ द्वारा ही संपन्न होता है। यह एक तथ्य है कि जो जितना श्रद्धावान है वह उतना ही प्राणवान होगा। बौद्धिक तीक्ष्णता से मस्तिष्कीय लाभ मिल सकते हैं, किंतु प्रतिभा, व्यक्तित्व, आत्मबल, जीवट जैसी विशेषतायें श्रद्धासिक्त प्राप्त शक्ति ही उत्पन्न करती हैं। महामानव देवदूत ऋषिकल्प एवं नर-नारायण के रूप में सामान्य व्यक्ति को परिणत कर डालने की क्षमता केवल श्रद्धाशक्ति प्राणशक्ति में ही निहित रहती है।
श्रद्धा का अर्थ है− आत्मानुशासन “इन्टीग्रेटेड−माइन्ड”। शरीर में इन्द्रिय सुखोपभोग की वासना, लिप्सा भरी रहती है। मन में तृष्णा और अहंता की लालसायें−कामनायें उफनती रहती हैं। इन्हीं की माँग पूरी की करने के लिए प्रायः हमारे सारे क्रिया−कलाप होते रहते है। औसत आदमी की गाड़ी इसी ढर्रे पर लुढ़कती है। ऐसे कम ही लोग हैं जो अन्तःकरण से भाव अन्तरंग में परमात्मा की सत्ता प्रतिष्ठित है जो निरन्तर उन उच्च आदर्शों को अपनाने के लिए अनुरोध करती है। आत्मा की पुकार, आत्मा की प्रेरणा, आत्मा की दिशा का यदि अनुगमन किया जाय तो उस तत्परता के साथ संलग्न हो जाती है कि वासना और तृष्णा उपहासास्पद बालक्रीड़ा मात्र प्रतीत होने लगती हैं। तब मन के चंचल एवं चित्त के उद्विग्न होने का कोई कारण शेष नहीं रह जाता।
आत्मबोध, आत्मानुगमन, आत्मोत्कर्ष की सम्मिलित मनःस्थिति का नाम ही श्रद्धा है। यों किसी मन्त्र, आदर्श, व्यक्ति, धर्म के प्रति निष्ठ को भी श्रद्धा कहते हैं, पर उसकी रज्जू श्रेष्ठता के अनुगमन की दिशा से ही जुड़ी रहती है। जो इस स्तर की प्रेरणा उत्पन्न कर सके, भावना उमगा सके, उसकी ही सच्ची श्रद्धा है। इसको सदुद्देश्य के लिए नियोजित कर देने का नाम ही आत्मशक्ति है। आत्मबल की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया उन सिद्धियों के रूप में तत्काल देखी जा सकती है जो न केवल अपने को ही महान बनाती हैं, वरन् संपर्क में आने वालों को भी इतना लाभ पहुँचाती हैं, जितना आर्थिक और शारीरिक प्रचुर सहयोग देने पर भी संभव नहीं हो सकता।
आत्मिक क्षेत्र की उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ श्रद्धासिक्त, उत्कृष्ट मानसिकता की ही देन कही जा सकती है। वैराग्य का अर्थ प्रायः लोगों ने घर−बार छोड़कर शिक्षा माँगना, सफेद कपड़े छोड़कर लाल−पीले पहन लेना मान लिया, पर वस्तुतः वह एक मनःस्थिति है जिसमें कर्तव्य कर्म पूरे उत्साह से करते हुए भी मन असंग, राग, द्वेष रहित बना रहता है। अनासक्त कर्मयोग की गीता में सुविस्तृत चर्चा है। स्थितप्रज्ञ और निर्विकल्प स्थिति का वर्णन है। इसी को वैराग्य कह सकते हैं। खिलाड़ी की भावना से जीवन की खेल की तरह खेलना और नाटक में अपने जिम्मे का अभिनय पूरे मनोयोग से संपन्न करना−यही कर्म योग है। हानि−लाभ और असफलता को बहुत महत्त्व न देकर केवल करना, यहीं है अनासक्त मनःस्थिति। शरीर को आहार−विहार और मन को चिन्तन के लिए उत्कृष्ट सामग्री प्रदान करना, यहीं है सन्तुलित जीवनक्रम की रीति−नीति। इसे जहाँ अपनाया जाएगा वहीं आन्तरिक स्थिरता की वह पृष्ठभूमि बन जायगी जिसमें ध्यानयोग, लययोग जैसी ब्रह्मसान्निध्य की साधनायें सफल हो सकें। ध्यानयोग के लिए जिस शरीरगत− अंतःशांति की नितान्त आवश्यकता होती है, वह श्रद्धा, समन्वित मनःस्थिति से ही संभव हो पाती है।
भौतिक जीवन की अनेक समस्याओं को हल करने के लिए तर्क, आशंका, अविश्वास, सन्देह, काट−छाँट, प्रमाण, परिचय, तथ्य−अतथ्य आदि अनेक कारणों की विवेचना करनी पड़ती है और तब भी मन शंका−शंकित बना रहता है तथा पूर्व निर्णय के सही सुनिश्चित होने में सन्देह बना रहता है। यह मनःस्थिति लाभ−हानि एवं उचित−अनुचित के बीच के उपयोगी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए आवश्यक है, पर यह स्थिति आध्यात्मिक क्षेत्र में भी बनी रहे तो अनिश्चित विश्वास के कारण वह शक्ति उत्पन्न न हो सकेगी जिसके आधार पर आत्मबल बढ़ाने −उच्च आदर्श अपनाने की श्रद्धान्वित पृष्ठभूमि बनायी जाती है। कहना न होगा कि यदि आत्मिक प्रगति का भवन खड़ा ही न हो सकेगा।
आत्मिक प्रगति के लिए हमें श्रद्धा को जगाना पड़ता है, आत्मानुगामी बनना और अंदर के गुरुतत्त्व की शरण में जाना पड़ता है। जो इतना साहस कर सकता है, अपनी आकाँक्षाओं को उत्कृष्टता की दिशा में नियोजित कर सकता है, उसे वासना और तृष्णा की तूफानी आँधियों का सामना नहीं करना पड़ता और शक्ति का निरन्तर होते रहना वाला अपव्यय सहज ही बचना आरंभ हो जाता है। आत्मिक पूँजी इसी प्रकार जमा होती है। भौतिक विक्षोभों से विरत रह सकना कठिन लगता भर है, पर वस्तुतः वैसा है नहीं।
यदि अपने अंतरंग में प्रवेश करते रहने वाले विचारों का वर्गीकरण मात्र करते रहें, उनके विश्लेषण विवेचन के लिए सजग तत्परता प्रदर्शित करें तो सहज ही वे अवाँछनीय विचार पलायन करने लगेंगे जिनके झमेले में अशान्त अन्तःकरण कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने में वंचित ही बना रहता है।
श्रद्धा की स्थिरता के लिए मानसिक परिष्कार का होना जरूरी है। इसका प्रथम चरण यह है कि मस्तिष्क की स्थिति, रुचि, रुझान का वैसा ही निरीक्षण किया जाय जैसा कि एक कुशल चिकित्सक रोगी का विविध प्रकार से परीक्षण करके शरीर की वस्तु स्थिति समझने का प्रयत्न करता है। आत्म विश्लेषण इसी स्तर का प्रयास है। मन−मस्तिष्क में जड़ जमाकर बैठी हुई विकृतियाँ ही मानवी पतन का प्रमुख कारण होती हैं। चोर का साहस वहीं होता है जहाँ उसे यह भय नहीं रहता कि कोई देख रहा होगा। सेंध लगाने से पूर्व चोर यह पता लगाते हैं कि कहीं किसी की दृष्टि उनके कुकृत्य पर है तो नहीं। यदि पता चल जाय कि लोग जाग रहे हैं या देखभाल कर रहे हैं, तो फिर चोरी करने का साहस ही न पड़ेगा और वह उलटे पैरों लौट जायेगा। अवाँछनीय विचार उसी मस्तिष्क में प्रवेश करते तथा जड़ जमाते है जहाँ आत्म निरीक्षण एवं आत्म विश्लेषण की दृष्टि से बेखबरी छायी रहती है। जहाँ जागरूकता होगी−देखभाल, ढूंढ़–खोज चल रही होगी, वहाँ कुविचार अपने आप ही लज्जा, भय और ग्लानि अनुभव करते हुए अपनी हरकतें बन्द कर देंगे।
जब हम यह सोचते हैं कि मस्तिष्क हमारा घर है। इसमें किसे प्रवेश करने देना है, किसे नहीं, यह निर्णय करना हमारा काम है, तब मन की स्थिति ही बदल जाती है। आत्म विज्ञानी ईश्वरीय सत्ता के प्रति श्रद्धा के माध्यम से यहीं लाभ उठाते हैं। वह सत्ता केवल मानने और जानने योग्य ही नहीं है, वरन् श्रद्धा करने योग्य भी है। उसके क्रिया −कलापों, प्रकृति प्रांगण में यत्र−तत्र बिखरी उसकी प्रेरणाओं का अध्ययन किया जाय तो यह भी विदित हो जायगा कि वह उच्चस्तरीय श्रद्धा ही वह तत्त्व है जो मानवी व्यक्तित्व को महान बनाती, देवत्व प्रदान करती है। आत्म−शक्ति इसी की देन है।
जिस घर में स्त्रियाँ सुसंस्कारी, मृदुभाषी एवं परिश्रमी होती हैं उस घर में न दरिद्र प्रवेश करता है न विग्रह।
जनमानस को श्रेष्ठता दिशा−धारा अपनाने के लिए अतीत के स्वर्णिम युग में ऋषि−मनीषियों ने आत्मिकी की समर्थता एवं प्रक्रिया के सहारे लोक मान्यताओं में शालीनता के तत्त्वों भर देने में सफलता पायी थी और मनुष्यों में देवत्व का उदय तथा धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव करके दिखाया था। तब आत्मिकी सर्व समर्थ थी। पर आज भौतिक का ही बोलबाला है। उसकी सामर्थ्य प्रत्यक्ष है। वर्तमान में भौतिक विज्ञान की सैकड़ों धाराओं का प्रशिक्षण होता है और उसके सहारे यह बताया जाता है कि प्रकृति क्या करती है और क्या चाहती है? मनुष्य उससे क्या लाभ उठा सकता है? इस संदर्भ में अब तक जो निष्कर्ष निकाले गये है वे उच्छृंखलता अपनाने की आस्थाओं का ही समर्थन नहीं करते, वरन् उच्छृंखलता अपनाने की प्रेरणा देते है। इस आधार पर कुबेर जितनी सम्पदा और इन्द्र जितनी सुविधा बटोर लेने पर भी आंतरिक निकृष्टता मनुष्य को दुख−दारिद्रय की नारकीय आग में जलाती रहती है। इन प्रेरणाओं को उलट सकना तनिक भी कठिन नहीं है। यदि आत्मिकी और भौतिक के सही स्वरूप को समझा और दोनों महाशक्तियों में सुनियोजित बिठाया जा सके तो सुखद परिस्थितियाँ सहज ही विनिर्मित हो सकती है।
ऋषियों का समस्त चिन्तन, प्रतिपादन और समर्थन इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए हुआ, इसलिए इस समस्त विचार परिकर को ऋचा या मंत्र कहा गया और आत्मिकी को माँत्रिकी के नाम से जाना गया। उनका लक्ष्य सदा अध्यात्म और विज्ञान−आत्मिकी और भौतिकी के समन्वय का एवं उस समुद्र मंथन से प्राप्त नवनीत से जन मानस को लाभान्वित कराने का रहा है। यांत्रिकी और माँत्रिकी−दोनों ही विषयों में मनीषियों ने गंभीरता−पूर्वक अनुसंधान किया था। एक का क्षेत्र स्वयं का काय कलेवर तथा दूसरे का पदार्थ जगत था। उन्होंने यह जान लिया था कि यान्त्रिकी की तरह ही मान्त्रिकी भी समर्थ है।
याँत्रिकी एवं मान्त्रिकी के कार्यक्षेत्र अलग−अलग होते हुए भी दोनों के उद्देश्य एक है। प्रकृति के अन्तराल में छिपी हुई भौतिक शक्तियोँ को प्रत्यक्ष करने तथा प्रयोग में लाने के लिए विभिन्न उपाय−उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। इन्हें ‘यंत्र’ कहते है और प्रयुक्त करने की विद्या यांत्रिकी कहलाती है। चेतना के अन्तराल में छिपी हुई दिव्य शक्तियों के प्रकटीकरण एवं प्रयोगों के लिए जिन माध्यमों को अपनाया जाता है उसे ‘मंत्र कहते है। यन्त्र हर प्रयोजन के लिए अलग−अलग प्रकार के बनाने पड़ते है, पर मंत्र में अपना शरीर और मन ही पर्याप्त माना जाता है। इन दोनों की संरचना बड़ी रहस्यमय है। साधारणतया शरीर अपने जीवन धारण और निर्वाह साधन का परिश्रम करने में लगा रहता है, पर यदि उसकी सूक्ष्म संरचना पर ध्यान दिया जाय तो एक नये विलक्षण प्रकार का ढाँचा उसके भीतर फिट किया हुआ परिलक्षित होता है। षट्चक्र, ग्रंथि संस्थान, उपत्यिकायें, प्राण प्रवाहिनी दिव्य नाड़ियों जैसी अगणित विलक्षणतायें एवं विशेषतायें उपलब्ध करते है जिन्हें अध्यात्म की भाषा में सिद्धियाँ कहा जाता है।
शरीर की संरचना पंचतत्त्वों एवं विभिन्न रसायनों के सम्मिश्रण से हुई है। इसलिए इसमें पदार्थ जगत में पायी जाने वाली शक्यों का समस्त तारतम्य बीजरूप में विद्यमान रहता है। चिनगारी को प्रयत्नपूर्वक प्रचण्ड ज्वाला में प्रकट किया जा सकता है। इसी प्रकार काया में समाहित प्रकृति−शक्तियों के प्रकटीकरण में शरीर साधना के रूप में बने हुए अनेक उपचार काम दे सकते है। आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा, नेति, धौती, वस्ति, उपवास, तप−तितिक्षा आदि साधनों का उपयोग इसी क्षेत्र को निरोग, समर्थ एवं विशिष्ट बनाने के लिए किया जाता है। माँत्रिकी का यह एक पक्ष है।
आध्यात्म में माँत्रिकी का दूसरा क्षेत्र है मन। यों मस्तिष्क को भी शरीर के अंतर्गत ग्यारहवीं इंद्रिय माना गया है, फिर भी इसकी स्थिति ऊँची है। चेतना का घोंसला इसी में है। वह उन्मुक्त आकाश में उड़ने वाले पक्षी की तरह समस्त काया में और उसके बाहर भी अपने प्रभाव पुरुषार्थ का परिचय देती है। इसलिए घोंसले की रचना और क्षमता अन्य अवयवों से भिन्न एवं विशिष्ट मानी गयी है। मूर्धन्य मनोवैज्ञानिकों एवं मस्तिष्कीय विद्या में निष्णात वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान निष्कर्षों में बताया है कि मस्तिष्कीय क्षमता की अभी मात्र तेरह प्रतिशत ही जानकारी मिल सकी है और सामान्य मनुष्य उस क्षमता का 6 प्रतिशत ही उपयोग करता है। शेष सब कुछ प्रसुप्त एवं अविज्ञात स्थिति में पड़ा है। यदि उसे जाना, जगाया और सक्रिय किया जा सके तो आज की तुलना में मानवी सामर्थ्यों में अनेक गुनी अभिवृद्धि हो सकती है।
अतींद्रिय क्षमताओं की आश्चर्य भरी चर्चा आये दिन होती रहती है। परामनोविज्ञानवेत्ता भी अब इन विलक्षणताओं को परीक्षण की कसौटी पर कस कर वास्तविकता स्वीकारते और उनके आधार पर तथा कारण प्रस्तुत करते हुए कहते है कि मनःक्षेत्र की समग्र क्षमता एवं विलक्षणता उससे कहीं अधिक है जितनी कि जानी जा सकी है। ऋषि युग के तत्त्वदर्शी और प्रयोक्ता इस रहस्यमय क्षेत्र की सूक्ष्म जगत की जानकारी प्राप्त करने में बहुत आगे तक बढ़ गये थे। उनने शरीर और मन की रहस्यमयी परतों को खोजने और प्रत्यक्ष प्रयोग में लाने के लिए ढंग से प्रयत्न किया था। इस पुरुषार्थ को सूक्ष्म जगत की खोज, व्यक्ति की विलक्षणताओं का प्रकटीकरण तथा सामर्थ्य के विशिष्ट स्रोतों की उपलब्धि कहा जा सकता है। अध्यात्म की भाषा में इसे ‘साधना’ कहते हैं जिसमें काय−कलेवर में सन्निहित प्रसुप्ति को जाग्रत एवं निष्क्रिय को सक्रिय किया जाता है।
भारतीय अध्यात्मवेत्ताओं ने विज्ञान के इस क्षेत्र को महत्त्व दिया था कारण कि काया का एक यंत्र ही जड़ चेतन जगत के रहस्य लोक में प्रवेश करने के लिए क्यों न आत्मिकी को अपनाया जाय? ऋषि युग को संक्षेप में साधना एवं तपश्चर्या का युग कहा जा सकता है। इस युग की महान उपलब्धियाँ आत्मिकी के विशिष्ट प्रयोगों का ही प्रतिफल है। आत्मिकी का प्रत्यक्ष परिचय साधनात्मक उपचारों में मिलता है। साधना में मंत्र शक्ति की प्रमुखता है। इसलिए उसे “माँत्रिकी” कहते है। याँत्रिकी और माँत्रिकी का उद्देश्य एक ही है−गुहा रहस्यों का उद्घाटन और अनुपलब्ध पर आधिपत्य।
भौतिकी उत्पादन भर कर सकती है, पर उसका उपयोग करने के लिए दूसरे बुद्धिमान की आवश्यकता पड़ती है। यह कठिनाई आत्मिकी में नहीं है। प्रयोक्ता अपने शरीर और अपने मन के सदा साथ रहने वाले और बिना खर्च और झंझट के यंत्रों का विशिष्ट उपयोग करके उच्चस्तरीय सामर्थ्य हस्तगत करता है। उन्हें उच्चस्तरीय इसलिए कहा जाता है कि उससे प्रयोक्ता का व्यक्तित्व देवोपम बनता है और उस सामर्थ्य से दूसरों की चेतना तक को प्रभावित परिष्कृत किया जा सकता है, जबकि भौतिकी की समर्थता इन दोनों में से एक भी काम नहीं कर सकती। यंत्र अपने आपको प्रयत्न से उच्चस्तरीय नहीं बना सकता और न वह अपने निजी प्रयत्न से दूसरे यंत्रों को अपने समान बना सकने में समर्थ होता है।
आत्मिकी का सर्वोपरि उपचार मंत्र है, इसलिए उसे माँत्रिकी कहा जाता है। इसके बिना अन्य साधनायें शारीरिक−मानसिक व्यायाम भर कर रह जाती है। चेतना के गहन अन्तराल तक पहुँचने और कुरेदने−उभारने में मंत्रोपचार का आश्रय लिए बिना काम नहीं चलता। मंत्र मात्र शब्द गुच्छक की रटन−पुनरावृत्ति तक सीमित नहीं है। यह कृत्य करना तो पड़ता है, पर उसके साथ और भी बहुत कुछ रहता है। साधक को आहार-विहार में विशेषतायें संपन्न करके शरीर को उन उपचारों के उपयुक्त बनाना पड़ता है और मनःशक्ति को प्रखर करने के लिए उस पर लदी हुई दुर्बुद्धि का निराकरण करना होता है। मंत्रोच्चार में साधक के चरित्र, चिन्तन और स्वभाव की उत्कृष्टता उभारना भी एक अनिवार्य अंग है। इसी प्रकार उस प्रयोग उपचार में एकाग्रता और तन्मयता का समावेश करने के लिए ध्यान, धारण एवं श्रद्धा−भक्ति का−समर्पण का अभ्यास करना पड़ता है। व्यक्ति सत्ता के प्रत्यक्ष पक्ष को उभारने में तपश्चर्या का और परोक्ष पक्ष को परिष्कृत करने में ‘ब्रह्म विद्या’ का आश्रय लेना पड़ता है। इसके अतिरिक्त विधान, अनुशासन एवं उपकरणों की इस परम्परा का ध्यान रखना होता है जो अध्यात्मिकता तत्त्वदर्शियों ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों और प्रयोग द्वारा निर्धारित की है।
अतीत की गौरव गरिमा के साथ ‘आत्मिकी’ की उपलब्धियाँ ही जुड़ी हुई है। भौतिकी की महिमा सर्वत्र बिखरी पड़ी है, इतने पर भी सामंजस्य के अभाव में दोनों संकट बनकर रह रही है। आत्मिकी के विधान ही लुप्त नहीं हुए, उसे प्रखर बनाने वाली तत्परता और तन्मयता का अभ्यास भी घट गया। दूसरी ओर भौतिकी पर से आत्मिकी का अंकुश उठ जाने से उसने मदोन्मत्त हाथी की तरह स्वेच्छाचार बरतना आरंभ कर दिया। अतः दोनों ही अपनी गरिमा और महिमा गँवाती चली जा रही है।
पदार्थ के बिना प्राणी का निर्वाह नहीं और प्राणी के बिना पदार्थ की उपयोगिता नहीं। दोनों कि समन्वय से ही जीवन और जगत का महत्त्व बना एवं सौंदर्य निखरा है। पिछले दिनों भ्रांतियों ने भौतिकी और आत्मिकी को परस्पर विरोधी सिद्ध किया। एक को समग्र और दूसरी को व्यर्थ बताया गया। इस विग्रह ने जहाँ भ्रान्तियाँ पैदा की वहाँ असहयोग के कारण प्रगति अवरुद्ध होकर अवगति की और मुड़ गयी। आज की अनेक विपन्नताओं, विपत्तियों एवं विभीषिकाओं का यही सबसे बड़ा परोक्ष कारण है। इस भ्रान्ति को मिटाया जाना चाहिए साथ ही साथ आत्मिकी का उपचार अनुशासन एवं उत्तरदायित्व निखरकर सामने आना चाहिए। इसी प्रकार अनुशासन अनिवार्य माना जाना चाहिए जिसमें सामर्थ्यों का कोई दुरुपयोग न कर सके। विश्व में वही दो प्रमुख सत्तायें हैं यदि वे आपस में लड़ती रहीं अथवा लूली लंगड़ी पड़ी रहीं तो विनाश सुनिश्चित है और यदाकदा अपना-अपना उत्कर्ष करती हुई सहयोगी रहीं तो विकास क्रम चरम सीमा तक उसी प्रकार जा पहुँचेगा जैसे कि पुरातन काल में मनुष्य देवता बनकर रहते थे और इसी धरती को स्वर्गीय परिस्थितियों से भरापूरा रखते थे। आज भी अध्यात्म व विज्ञान, आत्मिकी एवं भौतिकी, माँत्रिकी एवं याँत्रिकी में उपयुक्त समन्वयात्मक तालमेल की सफलता पर ही उज्ज्वल भविष्य की नवयुग के अवतरण की संभावना टिकी हुई है।
“नहीं, नहीं मरुत! श्रेष्ठता का आधार वह तपश्चर्या नहीं, जो व्यक्ति को मात्र सिद्धियाँ और सामर्थ्य प्रदान करे। ऐसा तप तो शक्ति तपस्वी तो वह है जो अपने लिए कुछ चाहे बिना समाज के शोषित, उत्पीड़न, दलित और असहाय जनों को निरन्तर ऊपर उठाने के लिए परिश्रम किया करता है। इस दृष्टि से महर्षि कण्व की तुलना राजर्षि विश्वामित्र से नहीं कर सकते। कण्व की सर्वोच्च प्रतिष्ठा इसीलिए है कि वह समाज और संस्कृति, व्यष्टि और समष्टि के उत्थान के निरन्तर घुलते रहते है।” देवराज इन्द्र ने सहज भाव से मरुत की बात का प्रतिवाद किया।
पर मरुत अपनी बात पर दृढ़ थे। उनका कहना था-”तपस्वियों में तो श्रेष्ठ विश्वामित्र ही है। उन दिनों विश्वामित्र शिवालिक शिखर पर सविकल्प समाधि अवस्था में थे और कण्व वहाँ से कुछ दूर आश्रम में जीवन यापन कर रहे थे। उनके आरण्यक में बालकों को ही नहीं बालिकाओं को भी समानान्तर धार्मिक एवं साधनात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।”
मरुत ने फिर वहीं व्यंग करते हुए कहा-”देवेश! आपको तो स्पर्धा का भय बना रहता है किंतु आप विश्वास रखिए विश्वामित्र त्यागी सर्व प्रथम हैं तपस्वी बाद में। उन्हें इन्द्रासन का कोई लाभ नहीं, तप तो वह आत्म कल्याण के लिए कर रहे हैं। उन्होंने न चुकने वाली सिद्धियाँ अर्जित की हैं। उन सिद्धियों का लाभ समाज को कभी भी दिया जा सकता है। “
“विश्वामित्र की सिद्धियों को मैं समझता हूँ मरुत। “ इन्द्र ने पुनः अपनी बात को प्रतिष्ठापित करते हुए कहा-”किन्तु सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के बाद यह आवश्यक नहीं कि वह व्यक्ति उनका उपयोग लोक कल्याण में करे। शक्ति में अहं भाव का जो दोष है, वह सेवा में नहीं। इसलिए सेवा को मैं अहं भाव का जो दोष है, वह सेवा में नहीं। इसलिए सेवा को मैं शक्ति से श्रेष्ठ मानता हूँ। इसी कारण कण्वत्त्-विश्वामित्र से श्रेष्ठ हैं।”
बात आगे बढ़ती किन्तु महारानी शची के आ जाने से विवाद रुक गया। रुका नहीं-एक नया मोड़ ले लिया। शची ने हँसते हुए कहा-”अनुचित क्या है? क्यों न इस बात की हाथों हाथ परीक्षा कर ली जाय।”
बात निश्चित हो गई। कण्व और विश्वामित्र की परीक्षा होगी यह बात कानों-कान स्वर्गपुरी में फैल गई। देव गण उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगे, देखें सिद्धि की विजय होती या सेवा की।
निशा देवी ने पहला पाँव रखा। दीप जले-स्पष्ट की आरती से उनका स्वागत किया गया। दिव्य ज्योतियों से सारा इंद्रपुर जगमग-जगमग करने लगा। ऐसे समय देवेन्द्र ने अनुचर को बुलाकर रूपसी अप्सरा मेनका को उपस्थित करने की आज्ञा दी। अविलम्ब आज्ञा का पालन किया गया। थोड़ी ही देर में मेनका वहाँ आ गई। इन्द्र ने उसे सारी बातें समझा दीं। वह रात इस तरह इन्द्रपुर में अनेक प्रकार की मंत्रणाओं में ही बीती।
सवेरा हुआ। ऊषा की लालिमा ढलने लगी। सूर्य देव प्राची में अपनी दिव्य प्रभा के साथ उगने लगे। भगवती गायत्री की आराधना का यह सर्वोत्कृष्ट समय होता है। तपस्वी विश्वामित्र आसन बन्ध और हृदय में वैराग्य की धारा अहिर्निशि बहा करती थी। जप और ध्यान में कोई व्याघात नहीं होता था। बैठते ही बैठते चित्त भगवान सविता के भर्ग से आच्छादित हो गया। एक प्राण आद्यशक्ति गायत्री और राजर्षि विश्वामित्र में दिव्य तेज फूट रहा था उनकी मुखाकृति से। पक्षी और वन्य जीव भी उनकी साधना देखकर मुग्ध हो जाते थे।
उनकी इस गहन शान्ति और स्थिरता को देखकर पक्षियों को कलरव करने का साहस न होता। जन्तु चरमर नहीं करते थे, उन्हें भय का कहीं ध्यान न टूट जाये और तपस्वी के कोप का भाजन न बनना पड़े। सिंह तब दहाड़ना भूल जाते वे दिन के तृतीय प्रहर में ही दहाड़ते और वह भी विश्वामित्र की प्रसन्नता बढ़ाने के लिए क्योंकि उस समय वन विहार के लिए आश्रम छोड़ चुके होते थे।
किंतु आज उस स्तब्धता को तोड़ने का साहस किया किसी अबला ने। अबला नहीं अप्सरा। मेनका। समूचा इंद्रपुर जिसकी छवि पर दीपक की लौ पर शलभ की भाँति जल पाने के लिए आतुर रहता था। आज उसने अप्रतिम श्रृंगार कर विश्वामित्र के आश्रम में प्रवेश किया था। पायल की मधुर झंकार से वहाँ का प्राण-पूत वातावरण भी सिहर उठा। लोध पुष्प की सुगंध सारे आश्रम में छा गई। जहाँ अब तक शान्ति थी, साधना थी, वहाँ देखते-देखते मादकता, वैभव विलास खेलने लगा।
पर विश्वामित्र की समाधि निश्चल, अविचल। अन्तरिक्ष में गए प्राण जिस सुख और शान्ति की अनुभूति में निमग्न थे, यह नयापन उसकी तुलना में नगण्य था। लेकिन जैसे-जैसे मेनका के पावों की थिरकन, कण्ठ का संगीत और अंगराग वहाँ तीव्रता से बिखरने लगा, विश्वामित्र की चेतना में आकुलता बढ़ने लगी। रूप और सौंदर्य के इन्द्रजाल ने आकाश में विलीन तपस्वी की एकाग्रता को आश्रम में ला पटका। मेनका नृत्य में खो गई और विश्वामित्र की स्थिरता खो गई उसके अंग सौष्ठव, रूप सज्जा में।
दण्ड और कमण्डलु ऋषि ने एक ओर रख दिए। कस्तूरी मृग जिस तरह बहेलिये की संगीत ध्वनि से मोहित होकर काल-कवलित होने के लिए चल पड़ता है। सर्प जिस तरह वेणुनाद सुनकर लहराने लगता है। राजर्षि विश्वामित्र ने अपना सर्वस्व उस रूपसी अप्सरा के अंचल में न्यौछावर कर दिया। सारे भारतवर्ष में कोलाहल मच गया कि विश्वामित्र का तप भंग हो गया।
एक दिन-दो दिन, सप्ताह, पक्ष और मास बीतते गए और उनके साथ ही विश्वामित्र का तप और तेज स्खलित होता गया। तपस्वी का अर्जित तप काम दो कौड़ी दाम बिक गया और जप तप के साथ उनकी शाँति, उनका यश और सिद्धि वैभव भी नष्ट हो गया, तब उन्हें पता चला कि भूल नहीं अपराध हो गया। विश्वामित्र प्रायश्चित की ज्वाला में दहकने लगे।
क्रोधोन्माद में ऋषि ने मेनका को दण्ड देने का निश्चय किया पर प्रातःकाल होने तक मेनका उनके आश्रम से जा चुकी थी। इतने दिन की योग-साधना का परिणाम एक कन्या के रूप में छोड़कर। विश्वामित्र ने बिलखती आत्मजा के पास भी मेनका को नहीं देखा तो उनकी देह क्रोध से जलने लगी, पर अब हो ही क्या सकता था? मेनका तो इन्द्रपुरी पहुँच चुकी थी।
रोती-बिलखती आंसुओं से भीगी, क्षुधा से कलपती कन्या को देखकर भी विश्वामित्र को दया नहीं आयी। पाप उन्होंने किया था, पश्चाताप भी उन्हें ही करना चाहिए था। लेकिन उनकी आँखों में तो प्रतिशोध छाया हुआ था। ऐसे समय मनुष्य को इतना विवेक कहाँ कि वह यह सोचे कि अपनी भूलें सुधार भी सकता है और नहीं तो अपनी संतान, अपने आगे आने वाली पीढ़ी के मार्ग दर्शन के लिए तथ्य और सत्य को उजागर ही रख सकता है। विश्वामित्र को तो बस अपने आत्म कल्याण की चिन्ता सता रही थी, इसलिए उन्हें इतनी भी दया नहीं आयी कि वह बालिका को उठाकर दूध और जल की व्यवस्था करते। बालिका को वहीं बिलखता छोड़कर वे वहाँ से चले गए।
दोपहर के समय ऋषि कण्व लकड़ियाँ काटकर लौट रहे थे। मार्ग में विश्वामित्र का आश्रम पड़ता था। बालिका के रोने का स्वर सुनकर कण्व ने निर्जन आश्रम में प्रवेश किया। आश्रम सूना पड़ा था। अकेली बालिका दोनों हाथों के अंगूठे मुँह में चूसती भूख को धोखा देने का असफल प्रयत्न कर रही थी।
कण्व ने भोली बालिका को देखा, स्थिति का अनुमान करते ही उनकी आंखें छलक उठीं। उन्होंने बालिका को उठाया, चूमा और प्यार किया और गले लगाकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े। पीछे-पीछे उनके सब शिष्य चल रहे थे।
इन्द्र ने मरुत से पूछा- ”तात! बोलो, जिस व्यक्ति के हृदय में पाप करने वाले के प्रति कोई दुर्भाव नहीं, पाप से उत्पीड़ित के लिए इतना गहन प्यार, कि उसकी सेवा माता की तरह करने को तैयार वह कण्व श्रेष्ठ हैं या विश्वामित्र?”
मरुत आगे कुछ न बोला सके। उन्होंने लज्जावश अपना सिर नीचे झुका लिया।
फार्म 4
1−प्रकाशक स्थान - मथुरा
2−प्रकाशन अवधि - मासिक
3−मुद्रक का नाम - मृत्युंजय शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है) - भारतीय
पता-जन जागरण प्रेस वृन्दावन रोड, मथुरा
4−प्रकाशक का नाम -मृत्युंजय शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है?) भारतीय
पता - अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा
5− सम्पादक का नाम-माता भगवती देवी शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है?) भारतीय
6− जन व्यक्तियों के नाम व पते जो समाचार-पत्र के स्वामी हो तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हों। - अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
मैं मृत्युंजय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण सत्य हैं।
प्रकाशक के हस्ताक्षर
दिनाँक 28-2-93 -मृत्युंजय शर्मा
मनुष्य के तीसरी आँख होती है, यह विज्ञान में भले ही विवाद का विषय हो;पर सम्पूर्ण अध्यात्म जगत इस बात पर एकमत है कि मनुष्य का एक तृतीय दिव्य नेत्र भी है, जिसे प्रयासपूर्वक आध्यात्मिक उपचारों के माध्यम से खोला और जगाया जा सकता है।
इस संदर्भ में अनेक पौराणिक आख्यान भी है। एक के अनुसार भगवान शंकर ने कामदेव को अपने इसी नेत्र द्वारा जला कर भस्मसात् किया था। इसी के कारण भगवान शंकर के चित्रों में तृतीय चक्षु को भी चित्रित दिखाया जाता है। कहा जाता है कि जब उनका चक्षु खुलता है, तो संसार में हाहाकार मच जाता है। इसलिए उन्हें “महाकाल” कहा गया है, अर्थात् जो काल से ऊपर हो प्रकृति में जरा भी व्यतिक्रम आने पर प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न कर दे। उनका एक नाम प्रलय ही मचाता रहता है। वास्तविकता तो यह है कि इसमें दो प्रकार की शक्तियाँ हैं-एक “शिव” शक्ति कहलाती है और दूसरी “रुद्र। जब विश्व का कल्याण करना होता है, तो उनके उक्त नेत्र के ‘शिव शक्ति’ वाला पक्ष काम करता है और जब अवाँछनीय तत्त्वों को हटाना-मिटाना अभीष्ट हो, तो इसका दूसरा भीषण और विनाशकारी पक्ष ‘रुद्र शक्ति’ का काम करता है। इन दिनों महाकाल की यह दोनों शक्तियाँ साथ-साथ काम कर रही हैं, इसलिए एक ओर जहाँ कुहराम की वीभत्स दृश्य दिखाई पड़ता है, वहीं दूसरी ओर सृजन की सुनिश्चित संभावना भी अग्रगामी होती हुई प्रतीत होती है। यह शिव का पौराणिक प्रसंग हुआ।
इसके ऐतिहासिक उदाहरण भी देखने को मिलते है। संजय के बारे में कहा जाता है कि उनने मीलों दूर लड़े जा रहे महाभारत युद्ध के पल-पल का वर्णन 18 दिनों तक धृतराष्ट्र को सुनाया था। वह ऐसे ही दिव्य जागरण का परिणाम था विवेकानन्द ने अपने इसी दिव्य नेत्र का प्रयोग करते हुए जमशेद जी टाटा को बिहार के उक्त स्थान में कोयले का पता बताया था। सूरदास के संबंध में प्रचलित है कि वे यदा-कदा नवनीत प्रिया के दर्शन करने अपने निवास गोवर्धन (पारसोली) से गोकुल जाया करते थे। एक दिन वहाँ के पुजारी के पुत्र गिरधर ने किसी के बहकावे में आकर उनकी परीक्षा लेनी चाही। उस दिन उसने मूतँ को निवँसन कर मात्र मोतियों की मालाओं से श्रृंगार किया और सूरदास से उसका वर्णन करने को कहा। सूर ने एक पद रचकर उसका यों उल्लेख किया-
“देखे री हाि नंगम नंगा। जलसुत भूषन अंग बिराजत, बसनहीन छबि उठत तरंगा॥”
वर्णन सही पाकर पुजारी का पुत्र बड़ा लज्जित हुआ और क्षमा-याचना की। वे गोवर्धन के श्रीनाथ जी की प्रतिमा के दर्शन प्रायः प्रतिदिन इसी दृष्टि से करते थे और न केवल करते थे, वरन् हर रोज उनकी अद्भुत साज-सज्जा का वर्णन पद-रचना द्वारा औरों को भी सुनाया करते थे।
विज्ञान इस संबंध में क्या कहता है? यहाँ यह भी विचारणीय विषय है, अतः इसका लेखा–जोखा भी आवश्यक है। तृतीय आँख के अस्तित्व के बारे में वह सर्वथा इनकार तो नहीं करता; पर मनुष्य में ऐसी कोई अलौकिक दृष्टि है, इसकी स्पष्ट शब्दों में कभी स्वीकारोक्ति भी नहीं की। इसके कई कारण हो सकते है। प्रथम, तो यह स्थूल विज्ञान है; पंचभौतिक तत्त्वों से बने पदार्थों और प्राणियों की संरचना तक ही पिछले दिनों उसके शोध और अनुसंधान सीमित रहे हैं। दूसरे, सूक्ष्म की गहराइयों तक पहुँच पाना कदाचित् अगले दिनों उसके द्वारा संभव हो सके; पर अब तक तो वह इस क्षेत्र में लगभग असफल ही रहा है, अस्तु यहाँ उसके विगत की उपलब्धियों की तनिक चर्चा कर लेना अनुचित भी न होगा। मानवेत्तर प्राणियों में से कइयों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए शरीर शास्त्र कहता है कि उनमें तृतीय नेत्र अथवा इससे मिलता-जुलता कोई अंग पूर्व में कभी विद्यमान था, जो अब अनावश्यक व अनुपयोगी होने के कारण अवशेष के रूप में उपस्थित रहकर जन्तु की राई-रत्ती जैसी जरूरत की ही पूर्ति करता रहता है। प्रमाण के रूप में जीव विज्ञानी न्यूजीलैण्ड के निकट के द्वीपों में छिपकली सदृश्य बहुतायत में पाया जाने वाला जन्तु ‘तुआतारा’ का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और कहते है कि यह विश्व के उन कतिपय प्राणियों में से एक है, जिसमें ‘तीसरी आँख’ के अवशेष खोजे जा सकते है। ज्ञातव्य है कि इस विलक्षण प्राणी के सिर में में आँख जैसी एक संरचना होती है। आँख के लेंस की तरह का ही एक लेंस एवं उसके पीछे दृष्टि पटल जैसी एक बनावट विद्यमान होती है। सामान्य जन्तुओं में आँख को सुरक्षा प्रदान करने के लिए जिस प्रकार पलकों की व्यवस्था है, वैसे ही यह संपूर्ण संरचना एक पतली झिल्ली से ढकी होती है। इससे मिलता अंग “लेम्प्रे” नामक मछली एवं मेढ़कों की कुछ विशेष प्रजातियों में भी पाया जाता है। इस अंग के संबंध में जीव विज्ञानियों का कहना है कि उक्त अवयव आँख जैसा दीखते हुए भी आँख का कार्य नहीं करता और मात्र फोटो रिसेप्टर-प्रकाश संग्राहक की आवश्यकता भर पूर्ति करता है। जानने योग्य तथ्य यह है कि सामान्य आँख भी एक प्रकार से प्रकाश ग्रहण करने वाली संरचना है; पर वह इससे आगे एक अन्य कार्य भी करती है, वह यह कि वस्तु का प्रकाशचित्र ज्ञान-तन्तुओं के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचा देती है, जहाँ उसका अध्ययन-विश्लेषण कर पहचानने का कार्य संपन्न होता है। उपरोक्त जन्तुओं की तथाकथित “तीसरी आँख” यह कार्य नहीं कर पाती।
उल्लेखनीय है कि जब किसी प्राणी का कोई अंग विशेष आवश्यकतानुसार अनुपयोगी सिद्ध हो जाता है, तो धीरे-धीरे उसका डिजेनरेशन (अपविकास)आरंभ हो जाता है, ऐसा विकासवाद का मत है। उनके अनुसार प्रारंभ में मनुष्यों में नर के भी नारियों जैसे विकसित स्तन थे; पर कालक्रम में उनकी उपयोगिता समाप्त होती गई, अतः आज वे पुरुषों में मात्र दो काले धब्बों के रूप में अवशिष्ट है। इसी प्रकार आदि मानवों में विद्यमान पूँछ अब केवल एक अस्थि के रूप में उसकी गाथा गाती देखी जाती है। इस दृष्टि से विचार किया जाय, तो ‘तुआतारा’ एवं उस जैसे अन्य जन्तुओं में आज का “फोटो रिसेप्टर” आदिम काल में ‘तीसरा नेत्र’ रहा होगा, ऐसा माना जा सकता है। मानने में कोई हर्ज भी नहं। यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि जब तुआतारा जैसे निम्न श्रेणी के जन्तुओं में तीसरे नेत्र का प्रतिमान फोटो-रिसेण्टर के रूप में आज भी मौजूद है, तो मनुष्य जैसे अति विकसित प्राणी में उसका वह अस्तित्व अचानक कहाँ व क्यों लुप्त हो गया?
उत्तर “एण्डोक्राइनोलाँजी” से मिलता है। शरीर-शस्त्र की इस शाखा के अनुसार निम्न स्तरीय जन्तुओं में फोटो-रिसेप्टर अंग मानवी मस्तिष्क की पीनियल ग्रन्थि का ही एक प्रकार है, और लगभग वही आवश्यकता पूरी करता है, जो विकसित प्राणियों में पीनियल ग्लैण्ड। मनुष्य के मामले में उसकी यह ग्रंथि खोपड़ी के भीतर मस्तिष्क में स्थित है और बाहर वह ललाट में त्रिकुटी के आस-पास स्थित पिट्यूटरी से जुड़ा बताया जाता है, जहाँ आज्ञा-चक्र स्थित है। सन् 1919 से पूर्व इस ग्रंथि को फालतू और बेकार अवयव माना जाता था; पर उसी वर्ष टिलने और वारेन नामक जन्तु–शास्त्रियों ने “अमेरिकन एनाटामिकल मेमायर्स” पत्र में इस पर आधारित अपना गहन शोध निबन्ध प्रकाशित किया, जिसके उपरान्त ही यह जाना जा सका है कि इस छोटे- से अध्ययनों से भी इसी तथ्य की पुष्टि हुई। 1966 में एम.एच. स्नीडर एवं जे. एक्जेलरोड ने चूहों पर प्रयोग कर यह सिद्ध किया कि यदि उनकी आंखें फोड़ दी जाती है, तो यह रहस्यमय ग्रंथि उसकी खोपड़ी के माध्यम से प्रकाश अवशोषित करने लगती है। जब खोपड़ी भी ढँक दी गई तो उसका स्पष्ट प्रभाव पीनियल की क्रिया पर पड़ता देखा गया। इस प्रकार इन अध्ययनों से यह साबित हो गया कि जिसे छिपकली प्रभृति प्राणियों में तीसरी आँख की संज्ञा दी जाती है, वह अवयव मानवी मस्तिष्क में भी विद्यमान है और दृश्य तथा प्रकाश से उसका सीधा संबंध है।
तो क्या आध्यात्मिक पुरुषों की दिव्य दृष्टि का निमित्त कारण भी इसी अंग अवयव को मान लिया जाय? उत्तर ‘हाँ’ में दिया जा सकता है। जिस प्रकार इस विश्व-ब्रह्मांड में अनेकानेक प्रकार के सूक्ष्म संदेश उगड़ते-घुमड़ते रहते है; पर उन्हें स्थूल कान से नहीं, सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय से ही सुना और समझा जा सकता है, वैसी ही बात इस ग्रंथि के संबंध में भी है। नेपोलियन के बारे में कहा जाता है कि एक दिन आधी रात के समय वह अपने सेनापतियों के साथ विचार विमर्श में तल्लीन था, तो शिविर में उसे दूर से आती हुई किसी महिला के रोने की आवाज सुनाई दी। इस संबंध में जब उसने अपने साथियों से बात की, तो उन्होंने किसी प्रकार की आवाज से अनभिज्ञता प्रकट की। बाद में जब इसका पता लगाने के लिए निर्दिष्ट दिशा में सैनिकों को भेजा गया, तो बात सच सिद्ध हुई। ऐसे ही पीनियल व पिट्यूटरी द्विदलीय तृतीय नेत्र का प्रतीक प्रतिनिधि तो है; नर उनकी सूक्ष्म शक्ति को जाग्रत किये बिना वह विभूति हस्तगत नहीं की जा सकती, जो दिव्य दृष्ट के रूप में सिद्ध पुरुषों में पायी जाती है।
अध्यात्म विज्ञान के अनुसार हर पदार्थों के तीन स्तर होते हैं-स्थूल, सूक्ष्म व कारण। स्थूल के अंतर्गत पदार्थ के आकार-प्रकार और बनावट आते हैं। सूक्ष्म वह स्तर है, जिसमें उसकी संरचना संबंधी बारीक अध्ययन-विश्लेषण और रसायनों की जाँच पड़ताल की जाती है। कारण सत्ता वह है, जिसमें उसके गुण और शक्तियों सम्मिलित है। भौतिक विज्ञान ने अपने प्रकार से इन तीनों भूमिका और में पहुँचने का प्रयास तो किया; पर है वह पदार्थ स्तर का ही; जबकि अध्यात्म, चेतना का विज्ञान है; वह चेतना स्तर की सूक्ष्म शक्ति का प्रतिपादन करता है। उसके तृतीय नेत्र-दिव्य चक्षु-दिव्य दृष्टि इसी परिधि में आते हैं, अतएव पीनियल की चेतनात्मक शक्ति को जगाये बिना, उसका दिव्य उन्मीलन संभव नहीं।
मूर्धन्य अन्तःस्रावी विज्ञान विशारदी रसेल जे. रीटर एवं सैण्डी सोरेण्टीनो (रोचेस्टर यूनिवर्सिटी, न्यूयार्क)”दि पीनियल ग्लैण्ड” नामक पुस्तक के “फैर्क्टस इन्फ्लुएन्सिंग पीनियल “ नामक निबन्ध में लिखते है कि तप-तितिक्षा-उपवास का इस ग्रंथि पर महत्त्वपूर्ण असर पड़ता है और उसकी क्षमता इससे बढ़ने लगती है। लगभग इसी प्रकार का मन्तव्य जे.क्रेसेक एवं वी. पैलैटी ने अपनी पुस्तक “जनरल कम्पैरिजन ऑफ एण्ड्रोक्राइन सिस्टम” में प्रकट किया है। इससे अध्यात्म उपचारों में उपवास की महत्ता विदित होती है। फ्रांसीसी शरीर विज्ञानी जी. राउसी तथा एम. मोसिम्जर अपनी पुस्तक “टे्रटे डी न्युरोएण्डो क्राइर्नालाँजी “ में मनुष्यों पर किये गये पीनियल ग्रन्थि संबंधी अध्ययनों का उल्लेख करते हुए लिखते है कि विचार तंत्र भी पीनियल को सर्वथा अप्रभावित नहीं रहने देता। भले-बुरे विचारों का उसके स्राव व शक्ति पर तदनुरूप असर पड़ते देख गया है।
इन सब अध्ययनों से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि अध्यात्म विज्ञान में विचार और आहार पर नियमन-नियंत्रण की जो बात कही गई है, वह अकारण नहीं है। इसके सुनिश्चित सत्परिणाम है, इसे अब विज्ञान भी स्वीकारने लगा है। आने वाले समय में मनुष्य आहार और विचार ही नहीं, अपितु मानवी मूल्यों व मर्यादाओं के संदर्भ में भी अत्यंत संयमशील एवं जागरूक बनने जा रहा है, अतः इस आधार पर वह पीनियल ग्रंथि की सूक्ष्म शक्ति को, जिसे अध्यात्म विज्ञान में तीसरा नेत्र, दिव्य चक्षु, आज्ञा चक्र जैसे नामों से अभिहित किया गया है, जाग्रत कर ले, तो इसे आश्चर्य नहीं माना जाना चाहिए, वरन् एक ऐसा सत्य समझना चाहिए, जो अगले दिनों साकार होने ही वाला है।
चार साधकों ने एक सप्ताह तक मौनव्रत पालन की प्रतिज्ञा ली और किसी एकान्त आश्रम में साथ-साथ रहने लगे।
दूसरे दिन दीपक का तेल चेकने लगा तो एक ने नौकर से कहा-”तेल डाल दे।’ दूसरे ने देखा तो व्रत तोड़ने का उलाहना देते हुए बोला-”प्रतिज्ञा के अनुसार तुम्हें बोलना नहीं चाहिए था।” तीसरे ने दोनों को डाँटा और कहा-”व्रत निभाते हो या चें-चें करते हो।”
यहीं है आज की स्थिति। लोग दूसरों के दोष बताते तो है, पर यह भूल जाते हैं कि स्वयं भी तो वहीं गलती कर रहे हैं।
एक व्यक्ति को कुआं खोदना था। उस भूमि में पानी 30 फुट गहरा था। उतनी ही खोज-बीन आवश्यक थी।
खोदने वाला उतावला था। उसने सोचा दस-दस फुट के तीन गड्ढे करके तीस फुट का गणित तीन आदमी लगाकर क्यों न पूरा कर लिया जाय। उसने तीन व्यक्ति एक-एक गड्ढे खोदने के लिए लगाये। तीनों दस-दस फुट खोद गये, पर पानी एक में भी लेशमात्र न था।
किसी जानकर से उसने इस असफलता का कारण पूछा तो उसने कहा-’एक व्यक्ति के एक कार्य को एक ही दिशा में करते रहने से सफलता मिलती है। यदि तुमने गड्ढे न खोदकर एक ही जगह एक ही दिशा में खुदाई की होती तो आसानी से कुआँ बन जाता।”
उतावली में काम को खण्ड-खण्ड कर देने से श्रम निरर्थक जाता है।
औरों की बुराइयाँ देखने के लिए ललचाने वाले बहुत है, परन्तु अपनी ओर देखने का अभ्यास बहुत कम लोगों को होता है। थियाँलाजियन मेस्टर एकहाँर्ट ने इसी मानवीय दुर्बलता को इंगित करते हुए कहा था-”बहुत कम लोग मौत के पहले अपने आपको पहचान पाते हैं। बहुत कम व्यक्ति अपने जीवन में सभी शक्तियों को प्रकट करते है; बाकी तो उन्हें साथ लिए ही मर जाते है। हममें से अनेकों ईश्वर के संदेश को संसार को दिए बगैर यहाँ से चल देते है।”
पच बात तो यह है कि हमारे अन्दर ढेर की ढेर गुप्त शक्तियाँ सोई पड़ी है और हम है अपनी इन योग्यताओं-क्षमताओं का पता तक नहीं करते। इन विभूतियों के जखीरे की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखते। यह ठीक है कि बाहर की अनेकों चीजों जानकर हम ज्ञानवान कहलाए, पर यह भी कम जरूरी नहीं कि हम अपने को पहचानना भी सीखें। जो खुद की ओर नजर डालने की कोशिश करता है, वहीं महान बनता है। ऐसा व्यक्ति कठिनाइयों तथा बाधाओं पर विजय पाकर सतत् उन्नति करता है।
महापुरुषों का जीवन निहारें। उनकी हर भूल उन्हें कुछ नया सुधार करने की सीख देती रही। यदि आप में भी महान बनने की ललक लगे, चाहत उठे तो दूसरों को तुच्छ समझने की, उनमें छिद्रान्वेषण करने की नजर का परित्याग कर दीजिए। दूसरों को तुच्छ समझने वाला मनुष्यत्व खो देता है। अच्छा हो औरों की गलतियाँ खोजने की अपेक्षा अपनी कमियाँ ढूंढ़े। उन्हें दूर करने के लिए प्राण-पण से जुट जाँय। अपनी शक्तियों को पहचानने और उनका सदुपयोग करने में ही मनुष्य जीवन की शान है।
अगणित विभूतियों की विरासत सौंपते समय परमात्मा ने विश्वास किया था, कि इनका दुरुपयोग न होगा। उदर पूर्ति और सन्तान वृद्धि में अपनी अलौकिक सामर्थ्य को खो बैठने के लिए उतारू हो जाना न केवल स्पष्ट के प्रति विश्वासघात है, बल्कि यह आत्मघात भी है। आप जो भी काम कर रहे हैं, उससे हजारों गुना ज्यादा काम करने की ताकत आपके भीतर है। जरूरत है तो केवल इस बात की कि खुद की महत्त्व समझें, शक्तियों को पहचानें तथा समय का सदुपयोग करें। जीवन का एक-एक पल बेशकीमती है, उसे बरबाद न जाने दें।
जिस शुभ काम की इच्छा जगे, उसे आज और अभी शुरू कर दीजिए। अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा वह क्षण, जिस पल आप यह अनुभव कर पायेंगे कि विश्व-वसुन्धरा को आपकी आवश्यकता है। आपके भीतर एक और व्यक्तित्व से अनेकों गुना महान है। जिस क्षण व्यक्ति अपनी इस गरिमा की झलक पा लेता है, उसके पाँव मानव से महामानव बनने की डगर पर चलने के लिए मचल उठते है।
हो सकता है-आपका वर्तमान कठिनाइयों-बाधाओं कसे पूरी तरह घिर गया हो। आपत्तियों ने आपके व्यक्तित्व को विकसित न होने दिया हो। पर इसमें घबराने की क्या बात है? अग्नि की बढ़ती तपन का मतलब है सोने की और अधिक चमक। चन्दन की और अधिक घिसाई का अर्थ है-सुगंध का प्रतिफल नया विस्तार। मानव व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही है, जब तक विपत्तियां इसे आक्रान्त न करें, इसकी विभूतियों की चमक तीव्र नहीं हो पाती। अतएव आत्म निरीक्षण के द्वारा अपने आप की गरिमा को पहचानिये। जैसे किसी प्रतिभा का अंकुर आपको अपने अन्दर दिखलाई पड़े, उसको पुष्पित पल्लवित होने का अवसर दीजिए। कौन जाने कल के समुज्ज्वल भविष्य में आप संसार के महान कलाकार बन जाँय, विश्व प्रसिद्ध लेखक होने का गौरव प्राप्त करें। भावी समाज आपको दार्शनिक या राजनीतिज्ञ के रूप में पा कृतकार्य हो। करना सिर्फ इतना है कि स्वयं की शक्तियों को पहचानिये-और सतत् बढ़ते रहिए।
जो स्वयं के तत्त्व को जान लेता है, परम तत्त्व को जानना उसी से संभव है। ऐसे महान व्यक्तित्व ईश्वर के सृजन संदेश को प्रसारित करने के लिए ईश दूत की भूमिका निभाते है।
कर्मवीर उदास नहीं देखे जाते। खीजते वे रहते हैं, जो आलस में समय गँवाते और जिम्मेदारियों से जी चुराते हैं। हो सकता है कि परिश्रमी को कठिनाइयां झेलनी पड़े; पर चैन तो निठल्लेपन में भी नहीं मिलता।
मनुष्य की समूची प्रगति उसके व्यक्तित्व की उत्कृष्टता पर निर्भर है। यदि व्यक्तित्व ही निकृष्ट या विखण्डित स्तर का हुआ तो व्यावहारिक जीवन में अनेकानेक विकृतियों, असफलताओं का सामना करना पड़ेगा। सारी उपलब्धियों एवं बौद्धिक प्रगति के बावजूद आज जिस तरह मनुष्य अपने को व्यथित, असुरक्षित, उद्विग्न एवं असफल महसूस कर रहा है, उसके मूल में उसके व्यक्तित्व का विखण्डन ही दृष्टिगोचर होता है। मूर्धन्य मनोविदों ने इस समस्या को गंभीरता से लिया है और व्यक्तित्व को अविभाज्य बनाने के सम्बन्ध में शोध प्रयास भी आरंभ किये हैं। इस दिशा में उन्हें आँशिक सफलता भी मिली है।
मनुष्य को व्यक्तित्ववान बनाने के जितने भी पाश्चात्य प्रयत्न हुए हैं वस्तुतः वे सभी मानसिक स्तर तक ही सीमित रहे हैं। जब तक आत्मिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं मिलता, व्यक्ति को अधूरा ही कहा जायेगा। इस तथ्य का विस्तारपूर्वक विश्लेषण करते हुए सुप्रसिद्ध मनीषी डॉ. आई. वी. पंचदेवा ने अपने ग्रंथ “योग एण्ड साइको एनालिसिस” में कहा है कि व्यक्तित्व को अखण्डित बना सकना मानसिक स्तर से गहरे जाने पर ही संभव है। जहाँ इसको सर्वांगपूर्ण बनाया और समस्त व्यथाओं से छुटकारा पाया जा सकता है, वह आत्मिक स्तर ही है। जब तक इस समस्या के समाधान के लिए किये गये प्रयास वृक्ष की जड़ों को छोड़कर पत्तों को सींचने जैसे ही होंगे। सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान आत्मिक क्षेत्र से ही संभव है।
इस तथ्य का स्वीकरण प्रख्यात मनोविद् लारेन्स हाइउ ने भी अपनी कृति “आइसिस एण्ड ओरिसिस” में किया है। उनका कहना है कि मनोवैज्ञानिक विधियों की अपनी सीमाएँ हैं जिनके द्वारा मनोरोगों से ग्रसित रोगियों को इस परिध में तो लाया जा सकता है, पर व्यक्तित्व विखण्डन जैसी गंभीर समस्याओं का समाधान इसके द्वारा संभव नहीं हो सकता। उनके अनुसार जीवन को आत्म केन्द्रित बनाए बिना किसी भी तरह व्यक्तित्व तथा जीवन के बिखराव की परिसमाप्ति नहीं हो सकती। मनुष्य समाज को आत्म केन्द्रित बनाना भी तभी संभव है जब अध्यात्म का सहारा लिया जाय।
धर्म एवं अध्यात्म का जो प्रचलित है उसको देखकर मनोवैज्ञानिकों का वैज्ञानिक मन एक वितृष्णा से भर उठता है। वे नहीं सोच पाते कि जो धर्म मनुष्यों को भेड़-बकरियों का झुण्ड में शामिल करने को ही अध्यात्म का सर्वस्व मान बैठे हैं, जिनकी सारी आध्यात्मिक इसी फेर बदल या परिवर्तन में सिमट गई है। उससे भला व्यक्तित्व को सर्वांगीण कैसे बनाया जा सकता है। धार्मिकों का एक अन्य समुदाय भी है जो बसत-बात पर जिहाद छेड़ता और दंगे कराने, काफिर -मारने के नाम पर मनुष्यों की हत्या करने ही अपनी शान समझता है। इस धर्म बनाम अखाड़े से भी कोई समाधान निकलने वाला नहीं है।
वस्तुतः आज मानव समाज आध्यात्म के उस स्वरूप की अपेक्षा रखता है, जो प्रथा-परम्पराओं या लोक प्रचलनों पर आधारित न होकर पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक हो। यह कार्यक्षेत्र अध्यात्म मनोविज्ञान का है। वर्तमान समस्याओं का समाधान कर मनस्-शास्त्रियों को एक सशक्त आधार प्रदान कर सकना इसी के सहारे संभव हो सकेगा।
अध्यात्म का मनोवैज्ञानिक स्वरूप भारतवर्ष के ऋषि चिंतन की अपनी विशिष्टता है। ऋषि–मनीषी कहे जाने वाले यहाँ के मनोवैज्ञानिकों ने मानव के व्यवहार एवं अन्तराल का भली-भांति विश्लेषण कर उसके व्यक्तित्व को परिपूर्ण बनाने-तथा जीवन को आत्म-केन्द्रित करने की एक ऐसी प्रणाली विकसित की थी-जिसे अध्यात्म मनोविज्ञान नाम दिया जाना सर्वथा युक्ति संगत है। इस मनोवैज्ञानिक प्रणाली को सुसम्बद्ध रूप से स्थापित करने का प्रमुख श्रेय महर्षि पतंजलि को है। उन्हें पूर्वार्त मनोवान के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकारा जा सकता है। सुविख्यात मनोविशारद कार्ल रोजर्स ने इसी प्रणाली से प्रेरणा ग्रहण कर एक ‘नॉन डायरेक्टिव थेरेपी’ नामक पद्धति भी विकसित की है। जो पूर्णतया अध्यात्म विज्ञान को अपना आधार मानती है।
अध्यात्म भी मनोविज्ञान हो सकता है। यह बात मनोविज्ञान नूतन अध्येताओं को कुछ कौतुक जैसी भी लग सकती है। पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से ऐसा लगना स्वाभाविक भी है। किन्तु आध्यात्म को मनोवैज्ञानिक ढंग से परिभाषित करने पर तथ्य सहज ढंग से समझ में आ सकता है। इस प्रणाली के द्वारा चेतन मन को अचेतन मन में तब तक केन्द्रित करते हैं, जब तक दोनों मिल न जाँय। फिर इन दोनों को अति-चेतन में विलय कर दिया जाता है। यह समूची मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया ही आध्यात्म है।
इस तरह जीवन का संचालन मनःक्षेत्र से न होकर अतिमन के क्षेत्र से होता है। इस स्थिति में हम अपने मन पर उसी तरह अधिकार कर लेते हैं, जैसे अभी शरीर पर है। तभी सूची मानसिक शक्तियों का पूरी तरह सदुपयोग करना भी सम्भव बन पड़ता है। विश्रृंखलित व्यक्तित्व सहज ढंग से सुसम्बद्ध एवं अखण्डित हो जाता है।
व्यक्तित्व के अखण्डित स्वरूप को प्राप्त करने की इस भारतीय प्रणाली की मनोवैज्ञानिक विवेचना अपने समय के उत्कृष्ट चिंतक स्वामी प्रभवानन्द ने अपनी कृति “हाऊ टृनो गाँड” में गंभीरतापूर्वक की है। तथ्य को स्पष्ट करते हुए उनने बताया है कि मनोचिकित्सक अपने मरीजों का मनोशारीरिक स्तर तक ऐ सन्तुलन भर बिठा सकते हैं, पर इसके परे उनकी पहुँच नहीं हो पाती। जबकि इसके परे ही है व्यक्तित्व का ऊर्ध्वमुखी तथा अखण्डित होना। यह कार्य आध्यात्म करता है। अतएव यह भी कहा जा सकता है कि जहाँ से आधुनिक मनोविज्ञान की परिसमाप्ति होती है, वहीं से आध्यात्म मनोविज्ञान का प्रारम्भ होता है।
मनोविशारद इरा प्रोगाँफ ने भी अपनी कृति “साइकोलॉजी ऐज ए रोड टू फिलॉसफी” में उक्त मत का समर्थन करते हुए बताया है कि कोई भी मनोवैज्ञानिक प्रणाली मानव जाति की सेवा तभी पूरी तरह कर सकती है, जब वह वैयक्तिक दर्शन के रूप में भी उभर सके। यहाँ वैयक्तिक दर्शन से तात्पर्य उस विद्या से है जो व्यक्ति के चिन्तन को सँवारे तथा परिष्कृत बनाए।
आध्यात्म मनोविज्ञान अपने को इस कसौटी पर भी पूरी तरह से खरा सिद्ध करता है। महर्षि पतंजलि के सूत्र न केवल एक सर्वांगपूर्ण मनोवैज्ञानिक पद्धति है, बल्कि सदियों से उसे भारतीय षड्दर्शनों में मुख्य दर्शन के रूप में भी स्वीकारा गया है। यह वैयक्तिक दर्शन की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्णतया सक्षम है।
यह पद्धति सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों ही पक्षों को पूरी तरह से सन्तुष्ट करती है। इसका अवलम्बन जहाँ मूर्धन्य मनोविदों को, प्रयोगों को नयी गति देने वाला सिद्ध होगा, वहीं सामान्य जन इसकी प्रविधियों को व्यवहार में लाकर अपनी समूची मनोव्यथाओं से मुक्ति भी पा सकेंगे। आधुनिक मनःचिकित्सकों का भी यह पुनीत दायित्व है कि इस पद्धति को अपनाकर व्यवहार में लाकर मानव तथा मानवता का हित सम्पादन करें।
इटली के पोम्पियाई नगर में एक बार भयंकर ज्वालामुखी फटा। नगर पूरी तरह ध्वस्त हो गया। इन प्रलय जैसी घड़ियों में जिससे जिस प्रकार जान बचाना संभव हुआ, वह भाग खड़ा हुआ। लावा का बहाव इतना भयानक था कि उसमें बैठे, चलते-दौड़ते लोग जैसे के तैसे दब गये।
अब जब उस ध्वस्त नगर की खुदाई हुई, तो किले का प्रहरी दरवाजे पर यथावत् पहरा देने की मुद्रा में खड़ा पाया गया। वह उस भयानक समय में भी अपनी ड्यूटी छोड़ने के लिए तत्पर न हुआ।
खुदाई में उस प्रहरी का कंकाल बड़ी द्वार पर उसे काँच से बन्द अलमारी में सुरक्षित रखा गया। उसके नीचे लिखा हुआ है-”वह प्रहरी जिसने मौत की चिंता कर्तव्य की प्रमुखता दी।”
दो बुढ़िया पड़ोस में रहती थीं। एक थी उदार, दूसरी ईर्ष्यालू। दोनों ने लम्बे समय तक तप किया। देवता प्रसन्न हुए। उनसे वरदान माँगने के लिए कहा।
उदार बुढ़िया ने माँगा-”मुझे जो कुछ भी आप दें, उससे दूना पड़ोसियों को अवश्य दें।” उसके सभी पड़ोसी संपन्न हो गए और अहसान मानते रहे।
ईर्ष्यालू बुढ़िया ने माँगा कि-”मरे शरीर के जो दो अंग है, उनमें से एक-एक नष्ट हो जाय। साथ ही पड़ोसियों के दोनों नष्ट हो जांय।”
बुढ़िया ने अपना एक हाथ, एक पैर, एक कान, एक आँख नष्ट करवा दी। फलतः पड़ोसियों के दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों आँखें नष्ट हो गयी। वह स्वयं तो दुःखी रही ही, साथ ही पड़ोसियों को भी भारी विपत्ति में फँसा दिया।
उदारता और ईर्ष्या के ऐसे ही परिणाम होते हैं।
शरीर के कोमलतम अवयवों में ‘मस्तिष्क ‘ है। प्रकृति ने उसकी सुरक्षा के लिए मजबूत हड्डी की ऐसी खोपड़ी का आवरण चढ़ाया है कि उसमें किसी बाहरी वस्तु का प्रवेश तो दूर ऋतु प्रभाव तक कठिनाई से प्रवेश कर सके। ऐसे आच्छादन से सृजेता का उद्देश्य यह है कि उसे अधिक से अधिक सुरक्षित और सन्तुलित रखा जा सके।
मस्तिष्क पर ऊपरी चोट तो कभी कदाचित ही बाहर से लगती है तो उसकी गहराई हड्डी वाले आवरण को ही यत्¨चित आहत कर पाती है। मानसिक विवादों का सिलसिला आन्तरिक दबावों तनावों और अस्त–व्यस्तताओं के कारण ही होता है। वे ही उसे असाधारण रूप से प्रभावित करते है। उन्हीं का असन्तुलन चिन्तन को गड़बड़ाता है। फलतः मानसिक रोगों के चित्र-विचित्र रूप सामने आते और उभरते हैं।
इन दिनों छोटे-बड़े प्रकट और अप्रकट मानसिक रोगों की भरमार है और वह महामारी या दूत की तरह निरन्तर बढ़ती जाती है। स्वस्थ मस्तिष्क वाले ढूंढ़े नहीं मिलते। हर पाँच के पीछे एक आदमी या तो सनकता रहता है या पागलाने की मनःस्थिति में रहकर जीवन की गाड़ी को किसी प्रकार धकेलता है। नित्यकर्म के दैनिक क्रिया-कलाप सामान्य रीति से चलते रहते हैं। शकल सूरत भी वही रहती है और अजनबी के लिए सामान्य व्यवहार, शिष्टाचार भी पूर्ववत्। इसलिए वस्तुस्थिति ठीक तरह समझी नहीं जाती पर यदि गंभीरता-पूर्वक उसके चिन्तन और चरित्र का पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि अन्तराल में कोई प्रकार की सनकें तथा विक्षिप्ततायें अपना-अपना काम करती रहती है। बाहर से साधारण प्रतीत होने वाला मनुष्य प्रायः असाधारण होता है। उसे कितनी प्रकार की कुत्सायें, कुण्ठायें घेरे रहती है। आवेश अवसाद छाये रहते हैं जिस प्रकार समुद्र में ज्वार-भाटे आते रहते हैं उसी प्रकार कभी मनुष्य उत्तेजित, आवेशग्रस्त होता है और कभी अपने को असहाय, दीन−दुर्बल अनुभव करने लगता है।
चिंतन का असन्तुलन एक तो शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। दूसरे उसकी योजनाओं, गतिविधियों में ऐसे तत्त्व भर देता है जो उसकी क्षमता, आवश्यकता एवं परिस्थिति को देखते हुए अटपटे और बेतुके लगते है। इससे संपर्क में आने वाले को उसका व्यक्तित्व ऐसा लगता है मानो वह विक्षिप्तता की दिशाधारा अपना रहा है और अस्वाभाविक कृत्रिम, अनगढ़ बनता जाता है। इस प्रकार की विसंगतियाँ निकटवर्ती लोगों की पकड़ में आसानी से आती है और उन्हीं को उस कारण हैरानी, परेशानी भी अधिक होती है।
मनुष्य स्वाभाविक शान्तिमय प्राणी है, उनकी आवश्यकताएँ सीमित है। उपार्जन के निमित्त सुविधा संपन्न शरीर और पैनी सूझबूझ वाला शरीर मिला हुआ है। ऐसी दशा में उसे न तो आवश्यकताओं की पूर्ति में में कोई कठिनाई पड़नी चाहिए और न अभाव असंतोष से ग्रसित होना चाहिए। सीधी-सादी जिन्दगी अतीव सरल होती है। उसे सामान्य निर्वाह में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यदि कोई कमी रहती भी हो तो उसका परिवार, परिकर समुदाय थोड़ी सहानुभूति दिखाकर, नगण्य-सी सहायता देकर उसे आसानी से सरल बना सकता है। परन्तु यदि इच्छाएँ असंगत है और ऐसी है जिसका सामान्य परिस्थितियों के रहते पूरा होना संभव नहीं तभी व्यक्ति विसंगतियाँ अपनाता है। चिन्तन और प्रयास जब भिन्न-भिन्न दिशाओं में चलते हैं तो भीतरी खींचतान शुरू होती है और ऐसी स्थिति बनती है जिसकी हैरानियों सवार रहने लगें। यह बाहर से तो कठिनाई से ही पहचानी, पकड़ी जाती है पर आन्तरिक स्थिति ऐसी है जिसे आवेशग्रस्त कहने में अत्युक्ति नहीं समझी जानी चाहिए।
असंतुष्ट व्यक्ति एक प्रकार से ज्वर पीड़ित समझा जा सकता है। उसकी कामनाएं तो अनियन्त्रित होती हैं। कल्पनाओं पर कोई रोक प्रतिबंध नहीं है। उस उड़ान को बिना पंखों के भी सुविस्तृत अन्तरिक्ष में उड़ा जा सकता है, फिर उपयुक्त साधना के अभाव में वह उड़ान थकान और निराशा देने के अतिरिक्त और कुछ भी उपलब्ध नहीं करा पाती।
संसार में अनेकों समुन्नत स्थिति वाले संपन्न, सम्मानित और वर्चस्वयुक्त भरे पड़े हैं। उन्हें देखकर यह सोचने लगना कि हम भी तुर्त−फुर्त इसी स्थिति को प्राप्त कर लें, यह भूल है। हर व्यक्ति की प्रतिभा और परिस्थिति भिन्न-भिन्न होती होती है। उसको साधन और अवसर भी भिन्न प्रकार के मिले होते हैं। ऐसी दशा में यह सोचना कि उस प्रकार के प्रावधान जुटाये बिना इतनी दक्षता और क्षमता न जुट पाने पर भी हम असाधारण उन्नति प्राप्त कर सकेंगे यह एक भ्राँति है। इस भ्राँति के मन में रहते अभीष्ट मनोरथ तो पूरा हो नहीं पाता, असफलता जन्य खीज और मन में उठती है। उसके प्रकट होने के दूसरे रास्ते निकलते हैं और मनुष्य खीजने, झुंझलाने लगता है। इस मानसिकता में मस्तिष्क के कोमल तन्तु चलते हैं जो सूझबूझ अपनाकर किसी उपयुक्त मार्ग पर चलते हुए अच्छी खासी सफलता अर्जित कर सकते थे।
महत्वाकाँक्षा देखना उचित है पर उसका सीमा-बन्धन होना चाहिए। अपनी आवश्यकता, दक्षता एवं परिस्थिति को देखते हुए यह अनुमान लगाया जाना चाहिए कि उसकी चाहनाएं किस सीमा तक संगत और किस सीमा तक विसंगति है। विसंगतियों को हटा देने में ही कल्याण है। भौतिक जीवन की समग्रता से इतना ही काम लिया जाना चाहिए कि सामान्य साधनों के सहारे औसत भारतीय स्तर का जीवनक्रम अपनाया और उसे प्रसन्नता कायम रखते हुए शान्तिपूर्वक चलाया जाय। यह नीति अपना लेने पर सीमित समय और शक्ति से अपना क्रम चलता रह सकता है। साथ ही इतना समय भी बच सकता है जिसमें समुन्नत स्थिति प्राप्त करा देने वाली योग्यता हस्तगत हो सकें और क्रमशः आगे बढ़ने का अवसर मिलता रह सके।
असाधारण महत्वाकांक्षाएं सँजोने वालों में से उन्हें पूरा कर सकने वाले तो कोई विरले ही होते हैं पर असफलता-जन्य असंतोष अनेकों को रहता है और फिर जिस प्रकार भरे हुए खेत का पानी मेड़ के जिस-तिस भाग को तोड़कर इधर-उधर बहता रहता है, उसी प्रकार इस स्थिति में फँसा हुआ व्यक्ति कभी अपने को दोष देता है, कभी दूसरों को। कभी अपने भाग्य को कोसता है, कभी भगवान के विधान को। समाज की संरचना भी दोषारोपण के बिना छूटती नहीं। किन्तु महत्वाकांक्षाएं ओढ़कर असंतुष्ट बनना एक ऐसी भूल है जिसके कारण अनेकों को अपना मानसिक संतुलन गँवाकर मूर्खता की स्थिति तक जा पहुँचना पड़ता है।
कितने ही व्यक्ति अनीति को देखकर उदास तो होते है, पर उसके प्रतिकार के लिए कुछ नहीं करते।
बंगाल के राजा राम मोहन राय उनमें से न थे। उन दिनों सती प्रथा का प्रचलन था। परिवार वाले विधवा के भरण-पोषण के उत्तरदायित्व से बचने के लिए उसे सती हो जाने के लिए जोर देते थे। राजा राम मोहन राय की भाभी को इसी प्रकार बल पूर्वक सती कर दिया गया था। वह करुण दृश्य वे कभी भूल न सके।
राजा साहब ने प्रतिज्ञा की कि वे इस कुप्रथा का अंत करा कर रहेंगे। उनने सरकार की सहायता से सती प्रथा विरोधी कानून पास कराया। विधवा विवाह को भी न्यायसम्मत बनाने के लिए उनने शक्ति पर प्रयत्न किया। प्रयास किया और कानून बनवाया।
अन्याय के प्रति रोष की सार्थकता तभी है, जब उसके उन्मूलन के लिए कारगर प्रयत्न किया जाय।
उन दिनों श्री जाकिर हुसैन जामिया-मिलिया के अधिष्ठाता थे। छात्रावास की भी वे ही देखभाल करते थे।
उस दिन उन्हें छात्रावास निरीक्षण के लिए जाना था। दरवाजे में प्रवेश किया तो देखा लड़के भोजनालय में हैं। दरवाजे पर सभी के जुते अस्त-व्यस्त पड़े हैं। सबसे पहले उनने जूते लाइन से लगाया और पोंछकर ठीक किये।
इसके बाद भीतर घुसे, तो देखा कि लड़के रसोइये से लड़ रहे हैं। रोटी केकच्ची-जली होने की शिकायत कर रहे है। दासल को पतली बता रहे हैं। उनने बीच में एक थाली रख रखी थी, जिसमें रोटियों का नापसंद भाग और दाल का ऊपर का पानी जमा करते जा रहे थे फेंकने और अफसरों को दिखाने के लिए। लड़ रहे थे सो अलग।
जाकिर साहब पहले तो एक कोने में खड़े होकर यह सब देखते-सुनते रहे। पीछे वे बीच वाली थाली के पास पहुँचे और बैठकर उस फेंके गये सामान को खाने लगे।
लड़के स्तब्ध रह गये। जाकिर साहब ने कहा-”बच्चो! हम लोग जिस देश में रहते हैं। उसमें करोड़ों को ऐसा भी नहीं मिलता, जितना कि तुमने फेंक दिया है। खाना बरबाद करने से पहले यह भी तो सोचना चाहिए।”
लड़कों ने माफी माँगी और भविष्य में सादगी से काम चलाने का आश्वासन दिया।
ब्रह्मवादिनी पत्नी का सान्निध्य प्राप्त कर राजा शिखिध्वज को भी ब्रह्मविद्या की प्राप्ति और आत्म-साक्षात्कार की प्रेरणा हुई। शिखिध्वज को लम्बा समय हो गया था राज्य सुख और ऐश्वर्य का उपभोग करते हुए किन्तु इससे उन्हें किसी भी प्रकार तृप्ति नहीं मिली थी। जबकि उनकी पत्नी सामान्य स्तर की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भी विलक्षण शान्ति और अद्भुत तृप्ति का आस्वादन करती थी। ब्रह्मवादिनी राजमहिषी के मुख-मंडल पर इस शान्ति और अक्षय तृप्ति के कारण अलौकिक तेज छाया रहता था। नेत्रों में अद्भुत आभा चमकती और शरीर अनुपम कान्ति से दमकता था।
इसका कारण पूछा तो रानी ने बताया कि त्याग से यह शक्ति प्राप्ति हुई है। इस उत्तर को सुनकर और ब्रह्मविद्या की प्राप्ति का उपाय जानकर शिखिध्वज ने भी उसे पाने का निश्चय किया। उन्होंने देखा कि साँसारिक सुखों के भोग से वासनाएँ तृप्त होने की जगह बढ़ती ही जाती हैं। कोई प्रतिकूलता न होने पर भी चित्त अशाँत ही रहता है। यह सब विचार कर वे राज्योपभोग से खिन्न हो गए। उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत-सा धन दान दिया। अनेकानेक तप अनुष्ठान किए चित्त को फिर भी शान्ति नहीं मिली।
विचार उठा कि राजपाट छोड़कर अरण्य में जा बैठा जाय और वहीं जप-ध्यान तप-उपवास द्वारा आत्मोपलब्धि की जाय। शिखिध्वज ने अपना यह विचार राजमहिषी को बताया और कहा-”भद्रे! तुम प्रजा का पालन करो और मुझे तपश्चर्या के मार्ग पर जाने दे।”
रानी ने समझाया “हर काम का समय होता है। यदि आत्मोपलब्धि ही ध्येय है तो उसे कहीं भी रहते हुए सिद्ध किया जा सकता है। आप अपने कर्तव्य का पालन करते हुए यहीं रहें। यथा समय हम दोनों ही वानप्रस्थ लेंगे और अरण्यवास कर लोकमंगल के लिए तप करेंगे।”
शिखिध्वज को यह परामर्श गले नहीं उतरा। वे वन को चले गए। किन्तु वर्षों तक कठोर साधनाएँ करने के बाद भी जब चित्त को सच्ची शान्ति नहीं मिली तो वे निराश से रहने लगें। परन्तु जिस मार्ग को उन्होंने अपनाया था उससे वे वापस लौट भी नहीं सकते थे। लौटने का कोई अर्थ भी नहीं था, क्योंकि जिस जीवन को छोड़कर उन्होंने यह मार्ग अपनाया था वह जीवन भी तो क्लान्ति, अतृप्ति और अशान्ति के संताप से भरा हुआ था।
उनकी व्यथा आकुलता अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचती जा रही थी। वे निश्चय नहीं कर पा रहे थे कि क्या करें और क्या न करें? तभी उन्होंने एक ऋषि कुमार को सरिता तट से अपनी कुटिया की ओर आते हुए देखा। उन्होंने ऋषिकुमार का दौड़कर स्वागत किया। प्रमाण कर अर्घ्य आदि दिया तथा परिचय आदि के लिए वार्तालाप का आरम्भ करते हुए ऋषिकुमार ने पूछा-”आप कौन हैं? “ “संसार-रूपी भय से भीत होकर मैं इस वन में रहता हूँ “ राजा ने अपना परिचय देकर कहा-”जन्म-मरण के बन्धन से मैं डर गया हूँ। कठोर तप करते हुए भी मुझे शान्ति असहाय हूँ आप मुझ पर कृपा करें।”
‘जन्म-मरण से मुक्ति और कर्म बन्धन से निवृत्ति तो एक मात्र ज्ञान के द्वारा प्राप्ति होती है।’ ऋषिकुमार ने कहा ज्ञानी कर्म करते हुए भी अकर्ता ही रहता है। कर्म-बन्धन उसे लिप्त नहीं करते क्योंकि वह कर्म और कर्मफल के प्राप्ति अनासक्त रहता है। यह आसक्ति ही है जो मनुष्य को इन भयावह संसार कर्म बन्धनों से बाँधती है। आप ज्ञान को शस्त्र बनाकर कर्म बन्धनों को काटिए।”
“उस ज्ञान की प्राप्ति के लिए ही तो मैं यह तप अनुष्ठान कर रहा हूँ। उसी के लिए मैंने दण्ड और कमण्डलु धारण किए हैं। फिर भी अभी तक कोई सफलता नहीं मिली।”
शिखिध्वज ने दुःखी मन से कहा।
“अपने अन्तःकरण पर चढ़े मल, विक्षेप और आवरणों को हटाने के लिए तप, अनुष्ठान आवश्यक हैं, पर इतने मात्र से ही ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती। ज्ञान प्राप्ति के लिए आत्मतत्व का श्रवण, मनन, निदिध्यासन भी चाहिए।”
शिखिध्वज ने उन ऋषिकुमार को ही तत्त्वोपदेश का आग्रह किया और कहा-”मैं आपका शिष्य हूँ, आपका अनुमत हूँ अब आप कृपा करके मुझे ज्ञान का प्रकाश दें।”
“ज्ञान को ग्रहण करने के लिए आवश्यक है कि साधक अपने चित्त को सब ओर से भी साधनों से मुक्त कर दे सब आश्रय और अवलंबनों का परित्याग कर दें।”
‘यह वन ही मेरा आश्रय है, मैं इसे छोड़े देता हूँ। अब मैं इस कुटिया को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा-शिखिध्वज ने व्रत लिया।
परन्तु कुटिया की सब सामग्री समेटकर उस कुटिया को भी छोड़ देने की तैयारी करने लगे। इस पर ऋषिकुमार ने कहा-”राजन यह तो सर्वत्याग नहीं हुआ। आप इस वन और कुटिया को छोड़ रहे हैं तो अन्यत्र कहीं जाकर रहने लगेंगे। क्योंकि आपने अपनी सब सामग्री तो अपने साथ ले जाने के समेट ली।”
इस पर उन्होंने कुटिया में से एकत्र की गई सब वस्तुओं को अग्नि में समर्पित कर दिया। आसन, कमण्डलु दण्ड आदि सभी कुछ एक-एक करके आग की लपटों में धधक उठे। वे सोचने लगे कि अब तो ऋषिकुमार के इन वचनों ने उनकी आशा को निर्ममता से चूर-चूर कर दिया उन्होंने कहा-”राजन्।़ आपने अभी तो कुछ भी नहीं छोड़ा है। जो कुछ छोड़ा वह तो सर्वत्याग की अभिनय मात्र था। आपने जो कुछ जलाया, उसमें आपका अपना था ही क्या? वे तो सब प्रकृति विनिर्मित वस्तुएं थी।”
वे विचार करने लगे कि “यह शरीर तो अपना है। इसका परित्याग कर दिया जाय तो सम्भवतः सर्वस्व त्याग हो जाय।” यह सोचकर बोल पड़ा-”आप ठीक कहते हैं महात्मन्! अभी कुछ नहीं छोड़ा है, क्योंकि इसमें मेरा कुछ नहीं था किन्तु अब मैं सर्वत्याग कर रहा हूँ।” यह कहकर वह अपने शरीर की आहुति देने की उद्धत हुए ही थे कि ऋषिकुमार ने कहा-”तनिक ठहरिए आप फिर गलती कर रहे हैं। आप क्या समझते हैं कि शरीर आपका है। शरीर भी आपका नहीं। इसे तो प्रकृति ने बनाया है। उसे नष्ट करने से क्या होगा?”
“तब मेरा क्या है?” अब नरेश थक चुके थे। उन्हें अब ऐसी कोई वस्तु नहीं दिखाई दे रही थी जो मेरी कही जा सकी।
“यह जा पूछ रहा है कि मेरा क्या है, केवल यही आपका है और आपका कुछ नहीं है-”ऋषिकुमार ने कहा” आप उसी का परित्याग कर दीजिए।”
शिखिध्वज कुछ न समझे से अवाक् देखते रहे ऋषिकुमार ने उनकी कठिनाई को समझा और कहा-”यह जो विचार करता है कि यह मेरा है। यह त्याग करने योग्य है। इसी का नाम “अहंकार” है अहंकार को कि यह मेरा है-छोड़ दीजिए। वास्तव में आपका कुछ भी नहीं है। न वस्तुएँ न सम्बन्ध अपने है। वस्तुतः अपनी सत्ता को मैं में बांध लेना ही अहंकार है। अपनी सत्ता को उस विराट चेतना का ही एक अंग उसी का एक अंश बल्कि मूलतः वही है-इस सत्य का बोध तभी होता है जब व्यक्ति अपनी ही बनाई अहं की कारा को तोड़ देता है।
इतना कहकर ऋषिकुमार घने जंगल में प्रवेश कर गए। उनके कहे शब्द शिखिध्वज के समक्ष ब्रह्मविद्या के समस्त रहस्यों को अनावरित करने लगे। उन्हें अपना अस्तित्व ही तिरोहित शून्य-सा होता रहा प्रतीत होने लगा। वे गहन समाधि में उब गए। एक अद्भुत शान्ति के अमृत स्पन्दन वातावरण में चारों और बिखरने लगे।
क्षण, पल, दिवस किस तरह बीते कुछ पता नहीं। एक दिन समाधि खुलने पर उन्होंने देखा-”महारानी चूडाला सामने खड़े उनसे कह रही थी महाराज! अहंकार चला जाय तो कर्त्तव्य कर्मों का भलीभाँति आचरण करते हुए इसी संसार में सक्रिय जीवन व्यतीत करते हुए निर्लिप्त, अनासक्त और मुक्त रहा जा सकता है।”
“तुम ठीक कहती तो महारानी-”गहरी शान्ति को बंधता हुआ शिखिध्वज का स्वर उभरा। वे महारानी के साथ चल पड़े। रास्ते में पता चला कि राजकीय कार्यों का भली-भाँति संचालन करते हुए महारानी चूडाला किस तरह बीच-बीच में ऋषिकुमार का वेश धारण कर उन तक पहुँच कर उनके तत्वबोध में सहायक बनती रहीं। रहस्योद्घाटन पर वे हँसे बिना न रह सके। तुमने ठीक ही किया महारानी”ऐसी दशा में वह बेचारा ग्रहणशील बने तो कैसे? ऋषिकुमार का वेशधारण किए बगैर भला तुम मुझे कैसे सर्वस्व त्याग का रहस्य समझा पातीं।” दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और एक मुक्त हास्य फूट पड़ा जिससे ब्रह्मविद्या के रहस्य कण झर रहे थे।
सुखी जीवन के लिए सहयोग जरूरी है और सहयोग के लिए यह आवश्यक है कि दूसरों की भावनाओं की समझें।
निकटवर्ती वस्तुएँ बड़ी एवं महत्वपूर्ण लगती हैं और दूरी का फासला बढ़ने पर बड़ी वस्तु भी नगण्य जैसी लगने लगती है। उदाहरण के रूप में अपने चारों ओर फैले हुए ब्रह्मांड पर दृष्टि डालने और उसकी सत्ता का पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अत्याधिक विशालता भी दूरस्थ होने के कारण छोटी-सी प्रतीत होने लगती है।
पृथ्वी के अति निकट होने के कारण छोटा-सा चन्द्रमा भी इतना महत्त्वपूर्ण लगता है कि उसे सूर्य के बाद दूसरे नम्बर का खगोलीय पिण्ड माना जाता है, जबकि उसका स्तर मात्र पृथ्वी के उपग्रह जितना भर है। खुली आँख से देखने पर विशालकाय तारे छोटे-से लगते हैं और चन्द्रमा तुलनात्मक दृष्टि से छोटा आकार का होते हुए भी रात्रि में चमकने वाला सबसे बड़ा आकाशीय पिण्ड जैसा लगता है।
समस्त आकाशीय पिण्डों में चन्द्रमा हमारे सबसे समीप है। आधुनिक विज्ञान और तकनीक के विकास से चन्द्रमा के विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो चुकी है। पृथ्वी से इसकी औसत दूरी ढाई लाख मील से कुछ कम है। यदि 300 मील प्रति घंटे की रफ्तार से एक वायुयान शून्य में भी चल सकता हो, तो हम एक माह में चन्द्रतल तक पहुँच सकते हैं।
क्षेत्रफल में भी चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी की अपेक्षा अत्यन्त छोटा है। इसका व्यास लगभग 3160 मील है। चाँद की तुलना यदि पृथ्वी से करें, तो 49 शशि मिलकर एक पृथ्वी बना पायेंगे। भार की दृष्टि से अपना ग्रह अपने उपग्रह से 89 गुना भारी है, अर्थात् यदि तराजू के एक पलड़े पर पृथ्वी रखी जाय, तो दूसरे पलड़े पर 89 चाँद रखने पर उनका कुल भार एक पृथ्वी के बराबर होगा।
चन्द्रतल की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अत्यन्त कम है। पत्थरों के भार से यह अन्दाज मिलता है। ऊपर से गिरने वाली वस्तु जिस गति से पृथ्वी पर गिरती है,चन्द्रमा पर उसकी रफ्तार 6 गुनी कम हो जायेगी। इसी प्रकार पृथ्वी पर 6 किलो भार वाली वस्तु चन्द्रमा पर पहुँच कर 1 किलो किलो जितनी हो जायेगी।
चन्द्रमा के संबंध में पूर्व संचित जानकारी और मान्यता से आधुनिक पर्यवेक्षण सर्वथा भिन्न है। वह निशानाथ एवं तारापति नहीं है, जैसा कि मान्यता के अनुसार उसका यशोगान होता रहता है। सौर-मण्डल के अन्य ग्रह गोलक विशालता की दृष्टि से पृथ्वी की तुलना में अत्यधिक बड़े हैं, किन्तु वे दूर होने के कारण लगण्य जितने भासते हैं।
सत्य केवल वहीं नहीं है, जो अब तक जाना जा चुका है अथवा जिसे जानने के करीब है। शक्तिशाली रेडियो दूरबीनों के द्वारा दूरस्थ तारों के रेडियो सर्वेक्षण से उनके आकार, उत्पत्ति, विकास व विनाश चक्र में उनकी वर्तमान स्थिति तापक्रम गुरुत्वाकर्षण शक्ति आदि का पता चलता है। इन्हीं की सहायता से सौर-मण्डल के दसवें ग्रह का पता चला है। नवें ग्रह यम (प्लूटो)के आगे इस दसवें ग्रह का द्रव्यमान पृथ्वी 300 गुना है यह सूर्य के चारों ओर 511 वर्षों में एक परिक्रमा पूरी करता है। इस ग्रह की सबसे विचित्र विशेषता यह है कि इसकी सूर्य-परिक्रमा की दिशा अन्य नौ ग्रहों के एकदम विपरीत है।
सौर-मण्डल की अधुनातन खोजों से पता चला है कि समस्त ग्रहों में प्लूटो की दूरी सर्वाधिक है, किन्तु नवीनतम अनुसंधानों के अनुसार नेपच्यून को सबसे दूरस्थ समझा गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्लूटो और आगे-पीछे भागने की प्रक्रिया पिछले 20 वर्षोँ तक निरंतर चलती रही है। इसके पश्चात् अब प्लूटो अपनी पूर्व स्थिति में आ गया है। इन दोनों ग्रहों की इस तरह की विलक्षण गतिविधियों विगत जनवरी 1969 से 1999 तक अनवरत चलती रहेंगी। इसे अन्तरिक्ष विज्ञानियों ने ब्रह्मांड की विलक्षणता का एक अद्भुत उदाहरण कहा है।
नेपच्यून को सूर्य की अण्डाकार परिक्रमा करने में 164 वर्ष लगते है। ज्योतिर्विद् श्री लाँवेल ने कभी भविष्यवाणी की थी कि सूर्य से 4 अरब मील की दूरी पर नवम् ग्रह भी हो सकता है, जो सूर्य की परिक्रमा 284 वर्ष में पूरी करता हो। इस अपूर्ण जानकारी को उपलब्ध कराकर सन् 1916 में लाँवेल तो दुनिया से कूच कर गये, पर 14 वर्ष बाद अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक क्लाहब टाँमबफ ने उनकी भविष्यवाणी को सत्य सिद्ध करते हुए प्लूटो नामक नवें ग्रह को खोज निकाला।
प्लूटो और सूर्य के मध्य दूरी 3,66,00000 मील है और 248 में इसका परिक्रमा-काल पूरा होता है, किन्तु इसका परिक्रमा पथ व्यवस्थित नजर नहीं आता।
प्लूटो-नेपच्यून जैसे नये ग्रहों के उपरान्त अब ऐसे अन्य और ग्रहों की संभावना अपने सौर-मण्डल में मानी जाने लगी है, जो दूरी की अधिकता के कारण विशाल दूरबीनों से नहीं दिखने पर भी विशालता के आधार पर काफी बड़े और महत्वपूर्ण हैं।
अखिल ब्रह्मांड की असीमता को देखते हुए अपना सूर्य एक नन्हा-सा टिमटिमाता हुआ तारा भर है। ब्रह्मांड में असंख्यों संसार अविज्ञात तथा अनखोजे अस्तित्व में हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे.बी.एस. हेल्डेन ने इस कल्पनातीत ब्रह्मांड के बारे में अपनी कृति दि वर्ल्ड बियाँण्ड अस” में कहा है-ब्रह्मांड का विराट व विलक्षण है, जिसकी हम कल्पना नहीं कर पाते हैं।”
अमेरिकी खगोलविद् शैपले ने पाया कि आकाश गंगा के रूप में दिखने वाले झुण्डों की पृथ्वी से दूरी 20,000 से 2्र00,000 प्रकाश वर्ष तक है उसने यह भी पता लगाया कि ये झुण्ड एक विशाल घेरा बनाते हैं और उन्हें लकड़ी के तख्ते की तरह विभाजित करती हुई एक आकाश गंगा गुजरती है। इस घेरे का केन्द्र आकाश गंगा में है। यह केन्द्र सूर्य से 50,000 प्रकाश वर्ष दूर है। इस प्रकार शैपले ने यह सिद्ध किया कि सूर्य आकाश गंगा के केन्द्र पर नहीं है, जैसा कि पूर्व के अन्य वैज्ञानिकों ने कहा था।
अन्तरिक्ष में अनेक आकाश गंगाएँ मिलकर समूह बनाती हैं। इनको विज्ञानियों ने आकाश गंगा श्रृंखलाएं कहा है। प्रत्येक श्रृंखला में हजारों आकाश गंगाएँ रहती है। कोमाकखला एक ऐसी ही विशाल आकाश गंगा समूह है, जिसमें 11,000 आकाश गंगाएँ हैं। प्रत्येक के बीच करोड़ों प्रकाशवर्ष की दूरी है।
निकटवर्ती चन्द्रमा की विशालता और ब्रह्मांड भर में बिखरे सूर्य तारकों की स्थिति तुच्छ जितनी दिखने का कारण एक ही है-निकटवर्ती को महत्व मिलना और दूरवर्ती के प्रति उपेक्षा दर्शाना। आँखें कुछ भी देखती हों, मस्तिष्क कुछ भी निष्कर्ष निकालता हो, पर कई बार तथ्य, सत्य जैसे लगते हुए भी सर्वथा विपरीत होते हैं। सत्यान्वेषी इस बात से भिज्ञ रहते हैं, फलतः वे दूरवर्ती और निकटवर्ती के संबंध में किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व उसकी गहराई से पड़ताल करते हैं कि जो कुछ भी दिखाई पड़ रहा है, वह सच्चाई के कितना करीब है। इसे परखने के पश्चात् ही वे किसी प्रकार की धारणा और मान्यता बनाते और अपनाते हैं।
इस संदर्भ में ऊपर के उदाहरण इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि जो निकटवर्ती है- प्रत्यक्ष दृश्यमान है, जरूरी नहीं कि वे सही ही हों। मिथ्या होने की संभावना उनमें भी शत-प्रतिशत हो सकती है। वर्तमान अतिसमीप होने से उसके लाभ सर्वोपरि प्रतीत होते हैं, जबकि भविष्य दूरवर्ती होने के कारण उपेक्षित बना रहता है। स्वार्थ साधना का प्रतिफल तुरन्त मिलता है, और परमार्थ की परिणति कालांतर में होती है। इसी भ्रान्ति में मनुष्य यह सोचने लगता है कि तात्कालिक स्वार्थ-साधना में ही बुद्धिमत्ता है। तथ्य इसके विपरीत है। दूरवर्ती एवं चिरस्थायी उज्ज्वल भविष्य की महत्ता समझने की यदि टेलिस्कोप जैसी दूरदर्शिता हस्तगत हो सके, तो प्रतीत होगा कि श्रेय साधना ही महत्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर है। चन्द्रमा की विशालता एवं आकाश गंगा की लघुता सध्यान्तर के कारण उत्पन्न हुई, भ्रान्तियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसी प्रकार स्वयं को बड़प्पन में विशालता का दीख पड़ना और क्षुद्रता जैसी लगने वाली महानता को लात मार कर निरन्तर उसी ओर बढ़ते चलना, ऐसी अदूरदर्शिता है, जिसे इन दिनों बुद्धिमान समझे जाने वाले दृष्टिधारी भी करते प्रायः देखे जाते हैं। इससे बच निकलने वाले ही सत्य तक पहुंचते और श्रेय साधने में सफल होते हैं।
नारद जी किसी शिला पर बैठे सुस्ता रहे थे। उन्हें आसमान में एक देवदूत कोई बड़ी पुस्तक ले जाते हुए देखा। नारदजी ने निगाह जाने पर उसे रोका और बुलाया। साथ ही पूछा कि इस पुस्तक में क्या लिखा है? देवदूत ने कहा-इनमें उन लोगों के नाम हैं जो भगवान की भक्ति करते हैं।
नाम पढ़े गये उसमें नारद का नाम नहीं था, उन्हें दुःख हुआ कि निरन्तर भगवान के काम में ही लगा रहता हूँ पर मुझे भक्तों की गिनती में भी सम्मिलित नहीं किया गया? वे खिन्न हो गये।
कई दिन बाद एक दूसरा देवदूत छोटी पुस्तक बगल में दबाये आसमान से गुजरता हुआ दिखाई दिया। नारद ने उन्हें भी बुलाया और पूछा, इस पुस्तक में क्या लिखा है? देवदूत ने कहा- इसमें उन लोगों के नाम हैं जिनकी भक्ति भगवान करते हैं। उनमें नारद का नाम प्रथम पंक्ति में था।
देवदूत ने समझाया कि जो लोग भगवान का काम करते हैं उनकी भक्ति भगवान स्वयं करते हैं।
संपूर्ण संसार एक होकर विरोध करने के लिए खड़ा हो जाय, हमारे अपने पराये बन जायें, मित्र शत्रुता पर उतर आयें, जीवन के भिन्न-भिन्न प्रलोभन अपने महारौद्र रूप में हमारी परीक्षा करने लगें, हमें फाँसी के तख्ते पर चढ़ा दिया जाय अथवा हमें रत्न सिंहासन पर कोई क्यों न बिठा दें, पर फिर भी हम अपने आप को नहीं भूलें। हम अपने मन को शान्त और बुद्धि को निर्मल बनाये रखें। कितनी ही विकट और भयानक स्थिति हो हम उसमें भी आनन्द से रह सकें।
हमें अपना व्यक्तित्व प्यारा है। उसे हम वासनाओं-कामनाओं की भीड़ में क्यों खो जाने दें। ईश्वर के ईश्वरतत्व के आगे भी उसकी प्रखरता क्यों घटें? दिव्य-क्षमता उसमें प्रतिबिम्बित होकर उसे और प्रखर क्यों न बना दे? हमारा निजत्व,हमारे व्यक्तित्व का अस्तित्व हमारा अपना स्वत्व है। उसमें अन्य किसी का हस्तक्षेप क्यों हो? अपना स्वरूप निर्धारण तथा उसके अनुरूप लक्षणों के विकास की स्वतन्त्र क्षमता उसमें होनी चाहिए। मित्रों की मित्रता, शत्रुओं की शत्रुता, प्रियजनों की प्रीति, पूज्य और सम्मानित व्यक्तियों का आदर सम्मान तथा अधिकारियों के अधिकार उसके विकास में बाधक क्यों बनने दिये जायें? उन सबका अस्तित्व और वर्चस्व बनाए रखकर भी आत्म विकास की इस महान स्वावलम्बी प्रक्रिया को गतिशील बनाये रखना सम्भव क्यों नहीं?
हम अपनी सम्मति प्रकट करते समय केवल सत्य और न्याय को देखकर चलें। किसी के आदर और तिरस्कार की हमें परवाह न हो। बाहरी मान-प्रतिष्ठा, लोकमत एवं नेतृत्व हमारे लिए अधिक महत्व न रखें। हम केवल अपने आत्म विकास और आत्म सन्तुलन पर दृष्टि रखें। मनुष्य के समाज में, देवताओं की सभा में राक्षसों के संग्राम में भी हम अपनी स्वतन्त्रता और स्वतन्त्र व्यक्तित्व के लिए दृढ़ एवं संघर्षशील रहें, और उनकी प्राण-पण से रक्षा करें। यदि किसी असत्य को सारा संसार सत्य घोषित करता हो तो भी हम संसार तथा जन समुदाय की चिन्ता न कर सत्य को सत्य और असत्य को असत्य कहें।
परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम औरों की संपत्ति का सम्मान नहीं करें। उचित परामर्श और सुझाव भले ही वे किसी शत्रु अथवा विपक्षी कहे जाने वाले द्वारा ही क्यों न दिये गए हों, उनका लाभ उठाने और सम्मान करने की क्षमता विकासशील व्यक्तित्व का एक बड़ा गुण है। हम सबकी अपने सम्मान ही प्रतिष्ठा समझें और करें। हम सत्य को सुनने और सुनने और समझने के लिए सदैव तैयार रहें।
अपने मन और बुद्धि की शान्ति और विचारशीलता को भावों के आवेश और मनोवृत्तियों की चंचलता से भंग नहीं होने दें। प्रत्येक वस्तु की निर्णय उसके गुण, दोष देखकर सत्-असत् विवेक की कसौटी पर कसकर करें। हम हर एक के अच्छे से अच्छे स्वरूप को पहचानने का यथाशक्ति प्रयत्न करें। जो हमारे विरुद्ध है या जिसके विपरीत हम सम्मति रखते हैं उनके भी सद्गुण और सदुद्देश्यों का आदर करना अपना कर्तव्य समझें। परन्तु जो सत्य और न्याय संगत है उसका समर्थन और प्रचार करने में हम स्वयं को पूर्ण स्वतन्त्र और सदा निर्भय बनाये रखें।
दुर्बलों का हित साधना-संरक्षण तथा मात्र आदर्शों मर्यादाओं का सम्मान हमारा महत्वपूर्ण कर्तव्य है। दूसरों की सेवा हम अपना धर्म समझें। सेवा हम किसी को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मीय भाव से प्रेरित होकर करें। सत्कार्य किसी की नकल के रूप में प्रेरित होकर करें। सत्कार्य किसी की नकल के रूप में नहीं वरन् अन्तःकरण की स्वाभाविक भूख, न दब सकने कोई हमारे पास आने से कतरायेगा? हमें इस कार्य में कष्ट क्यों अनुभव होगा, जबकि हम सदा रस विभोर ही रहेंगे। हमें कार्य करते-करते थकान क्यों आएगी जबकि हमारे लिए वही साधना है-शक्ति प्राप्ति का स्रोत है। क्यों सोच-विचार में समय बितायें? ऐसे प्रखर व्यक्तित्व के विकास में तथा ऐसी आनन्द निर्झरणी में साधना में करेंगे आज से ही करेंगे अभी से करेंगे। हमें कोई बाह्य साधन तो चाहिए नहीं जिनके लिए प्रतीक्षा करें। सब कुछ अन्तःकरण की गहराइयों से ही तो निकलना है। फिर देर क्यों? चिंतन की लय को क्रिया को स्वर में भरने दें।
राष्ट्र जागरण की बात बहुत लोगों द्वारा बहुत अवसरों पर बहुत बार दुहराई जाती है। क्यों? राष्ट्र की सारी गतिविधियाँ चल रही है। नए-नए ढंग नित्य प्रति अपनाए जा रहे है। समस्याओं के समाधान की खोज-बीन में अगणित प्रतिभाशाली हैरान-परेशान हैं। तो क्या यह सब सोते हुए ही किया जा रहा है-इतना सब होते हुए राष्ट्र जाग्रत क्यों नहीं है?
यह स्थूल दृष्टि की विवेचना है। समस्या का स्थूल नहीं सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया जाना चाहिए तथा उसी आधार पर समाधान खोजे जाने चाहिए। यों तो हर ‘मनुष्य’ कहलाने वाला प्राणी बराबर कुछ-न कुछ कर रहा है, सक्रिय दिखाई दे रहा है पर मनुष्यता के अभाव की न जाने कितनी दुहाई दी जा रही है, वह गलत भी नहीं। सतत् दृश्य दिखाई दे रहा है पर मनुष्यता के अभाव बुरी तरह खटकता है। इसी प्रकार कथित राष्ट्र की गतिविधियों के बीच राष्ट्रीयता है और उसके निवारण के प्रयास सार्थक होते न दिखाई देने से हर राष्ट्रप्रेमी व्यक्ति का अन्तःकरण चीत्कार कर उठता है। हानियाँ पर हानियाँ हो रही हैं-होती जा रही हैं पर हम बेखबर है। राष्ट्रीय चरित्र राष्ट्रीय गौरव राष्ट्रीय मर्यादा, राष्ट्रीय आत्मीयता, राष्ट्रीय समृद्धि आदि की वृद्धि और उत्कर्ष की बात क्या की जाय-उसका कोई न्यूनतम स्वरूप भी निर्धारित न हो सकना चिन्तनीय बात है। यह स्थिति देखकर लगता है कि राष्ट्र सचमुच साया पड़ा है, वह भी सामान्य निद्रा में नहीं मूर्छा जैसी गहन अचेतनता के गर्त। उसे चैतन्य, जाग्रत, सक्रिय बनाने के लिए विशेष प्रयास किए ही जाने चाहिए।
पर यह प्रयास कौन करे? राष्ट्रीय चेतना को कौन उभारे, उसे कैसे विकसित किया जाय उसे कैसे सजाया सँवारा जाये? घूम-फिर कर हमारी आदत प्रशासन का मुँह ताकते रहने की पड़ गई है। पर यह बड़ी भारी भ्रान्ति है। प्रशासन कुछ भी क्यों न हो-है तो वह भी उसी सुप्त समाज का अंग-सोया हुआ अंग, सोये हुए शरीर को कैसे जगा सकता है? जिनकी दृष्टि स्वयं में सीमित है उनमें विस्तृत दृष्टिकोण की कामना करना निरर्थक है। यह स्थिति लाई तो जा सकती है पर है नहीं।
राष्ट्र जागरण का यह कार्य तो जाग्रत अन्तःकरण वाले प्राणऊर्जा संपन्न व्यक्तियों का है। ऋषि संस्कृति ने इन्हीं को पुरोहित की संज्ञा से आभूषित किया है। वेद ज्ञान, कोश में इन्हीं के संकल्प स्वर ‘वय’ राष्ट्रें जाग्रयामः पुरोहिताः’ का मंत्र बनकर गुँजित है। प्रचलित मान्यताओं के परे जिनका मस्तिष्क सोच सकता है, चालू ढर्रे से हटकर जो काम कर सकते है उनके सिवा और कौन राष्ट्रीय चेतना के जागरण में समर्थ है? जिनके जीवन की गतिविधियाँ किन्हीं अंशों में स्वार्थ की सीमा के बाहर भी सक्रिय है। व्यक्तिगत स्वार्थों की अपेक्षा सामूहिक हित चिन्तन जिनके स्वभाव में है तथा उसके अनुरूप जीवन प्रक्रिया चलाने के जो थोड़े बहुत अभ्यस्त हैं वे ही इस कार्य में आगे आ सकते हैँ। तात्कालिक लाभ की मृग-मरीचिका में भटकते नागरिकों को जो दूरगामी परिणामों का स्मरण दिलाकर अपेक्षाकृत अधिक स्थाई लाभ प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दे, ऐसे विकसित दृष्टिकोण तथा व्यक्तियों का यह कार्य है।
पुरोहित शब्द में यही सब भाव समाया है। इस शब्द का अर्थ ही है जो सामने का लाभ नहीं, आगे का दूरगामी हित समझकर उसकी प्राप्ति की व्यवस्था बना सकें, हीन स्वार्थों के स्थान पर महत् स्वार्थों की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए परमार्थ तक लोगों को गति दें सकें वही पुरोहित। पुरोहित में चिन्तक और साधक दोनों गुण अनिवार्य है। जो चिन्तन विश्लेषण द्वारा सही परामर्श दे सके तथा आदर्श जीवन पद्धति से मूर्तिमान प्रेरणा रूप बन कर जिए उसी से पुरोहित का दायित्व निभा सकना सम्भव है।
ऐसे व्यक्तित्व विचारकों एवं बुद्धि-जीवियों में ही नहीं सामान्य जन-जीवन में भी हैं। अपने जीवन में आदर्श का अभ्यास करने के साथ-साथ व्यक्तिगत हित के साथ समाज हित की कल्पना जो कर से, ऐसा व्यक्ति इस वर्ग में आ सकता है। समाज निर्माण राष्ट्र जागरण का कार्य प्रमुख रूप से ऐसे ही प्रकाशवान व्यक्तियों का है।
भोजन की भाँति व्यक्ति में मनोरंजन की भी आवश्यकता पड़ती है। पशु-पक्षी कामना प्रधान होने के कारण अपने दृष्टिकोण को मात्र शरीर तक ही सीमित रखते है, जब कि मनुष्य भावनाशील प्राणी है। उसका समग्र चिन्तन भावनात्मक स्तर के ही कला है जिसमें व्यक्ति के भावनात्मक स्तर का परिष्कार परिमार्जन होता है। इसी के फलस्वरूप समय-समय पर लोगों ने मनोविदों के उपक्रमों को चलाया है।
मनोविद की परम्परा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। भारतीय धर्मग्रन्थों का अवलोकन किया तो स्पष्ट हो जाता है कि संगीत और नृत्य के जन्म-दाता नटराज शिव है, जिनके लयबद्ध एवं तालबद्ध संगीत और नृत्य से ग्रह से ग्रह-उपग्रहों का जन्म हुआ। भगवान कृष्ण को तो नटनागर के नाम से पुकारा जाता है। गणेश के नृत्य की चर्चा पुराणों में विस्तारपूर्वक देखी जा सकती है। सरस्वती को संगीत की देवी के नाम से सभी जानते हैं। संगीत, वाद्य यंत्र तथा और भी विभिन्न प्रकार के उपकरणों का उल्लेख शास्त्रों में खूब देखने को मिलता है। वीणा, वंशी, मंजीरा आदि वाद्य यंत्रों को कौन नहीं जानता?
मनुष्य को आह्लादित अभिप्रेरित करने का एक मात्र साधन मनोविनोद को ही समझा जाय तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अब प्रश्न सामने यह आता है कि मनोरंजन किस प्रकार का हो? उसका स्तर कैसा हो? इसके लिए मानव-बुद्धि को ही निर्णय लेना होगा, क्योंकि मनोरंजन जैसी प्रतीत होने वाली हलकी-फुलकी क्रियायें कभी-कभी इतनी खतरनाक बन जाती है कि मनुष्य को पतन-पराभव के गर्त में सीधा जा धकेलती है। मद्यपान, नर्तकियों के अश्लील प्रदर्शन, जुआ, सट्टा शिकार आदि ऐसे घातक व्यसन हैं जो व्यक्ति को सीधे कुमार्गगामिता की ओर ले जाते हैं। मनुष्य को आदर्शवादी एवं उत्कृष्ट चिन्तन एक पहुँचाने की शक्ति तो मनोरंजन में विधेयात्मक दृष्टि रखने से ही प्राप्त हो सकती है।
राजा-महाराजाओं के शासनकाल में मनोरंजन विद्या का ज्ञान तक्षशिला एवं वाराणसी में कराया जाता था। इतिहास के पृष्ठों को उलटने ज्ञात होता है कि प्रत्येक राजा अपने साथ एक विदूषक इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए रखता था। विनोदी स्वभाव वाले विदूषक न केवल राजाओं की ऊब को ही दूर करते थे, वरन् संकट के समय में उचित समाधान भी करते थे, वरन् संकट के समय में उचित समाधान भी ढूंढ़ निकालने में सहयोग देते रहते थे। बौद्ध साहित्य में राजा उद्यन के विदूषक बसन्त ने हँसने-हँसाने में ख्याति अर्जित की थी। तब के विदूषक मात्र हँसने-हँसाने वाले ही नहीं वरन् प्रतिभा एवं चरित्र के भी धनी होते थे।
मनोवैज्ञानिकों को कहना है कि विभिन्न प्रकार के खेलकूदों तथा पुरस्कार वितरण आदि की परम्पराओं का प्रादुर्भाव मनोविनोद की आवश्यकता को पूरा करने की वजह से ही हुआ है। अनेकों प्रकार के खिलौने बनाने बनाने के पीछे भी यही तथ्य सन्निहित है। व्यायाम, कुश्ती, नटकला, जादूगरी, बाजीगरी, नौका विहार, उद्यान विहार, सैर-सपाटे तथा तैराकी जैसी स्वास्थ्य-वर्धक प्रतियोगिताओं का प्रचलन चन्द्रगुप्त के शासनकाल में पनपा। गायन-वादन का दौर भी उन्हीं दिनों विस्तृत हुआ। रणभूमि में थके-माँदे सैनिकों का उत्साह उभारने-बढ़ाने के लिए तरह-तरह की रणभेरियाँ तथा शंखध्वनियाँ बजती थीं। जब कोई सैनिक वीरगति को प्राप्त हो जाता था तो महिलायें एकत्रित होकर उसकी पत्नी के वियोग की पीड़ा को दूर करने के लिए प्रेरक गीत गाती थीं। सम्राट अशोक के छठे शिलालेख में स्पष्ट रूप से अंकित है कि वह नियमित रूप से संगीत सुनता था।संगीत के बिना उसे नींद नहीं आती थी।
जातक-कथाओं में मनोविनोद की अनेकानेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है जिसमें निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी अपनी प्रसन्नता का अनुभव करता था। लकड़हारों की बालायें जंगलों में लकड़ी एकत्रित करते समय गा उठती हैं। इसी तरह प्रायः देखन को मिलता है कि महिलायें पुष्प चुनती, मालायें गूँथती हुई गा रही हैं। पूजा-पाठ के फूलों को जब नदी में विसर्जन के लिए किशोरियाँ निकलती तो सलिल भाव में आकर खूब गाती बजाती थीं। राजकुमारों के दीक्षा-संस्कार के सुअवसरों पर नृत्य संगीत तथा अभिनय जैसे प्रदर्शन भी किये जाते रहे हैं जिसके परिणाम स्वरूप उनकी विवेक−बुद्धि के विकसित होने का मौका मिलता था। सम्राट चन्द्रगुप्त को तो विश्व का माना हुआ संगीतज्ञ कहा जाता है। वीणावादन में उसकी गहरी अभिरुचि थी। फलतः सिक्कों पर भी उसने वीणा बजाती हुई स्वयं की मूर्त अंकित करायी।
कहीं-कहीं चित्रकला को भी मनोरंजन का दर्जा दिया गया है। कालीदास की प्रख्यात कृति “मेघदूत “ में विरही पक्ष अपनी प्रियतमा का चित्र खींच कर ही आत्मसंतोष पाता देखा जाता है। अजन्ता तथा एलोरा जैसी गुफाओं की दीवारों पर बने चित्रों से प्रतीत होता है कि नारियाँ मनोरंजन में तो पुरुषों का साथ-सहयोग देती ही रहीं, साथ ही साथ अन्यान्य प्रकार के सृजनात्मक कार्यों में भी उनकी अभिरुचियाँ बुनना, सूत कातना, महिलाओं के लिए मनोविनोद ही था फलों को सुरक्षित रखना, वृक्षारोपण, जड़ी-बूटी के बीजों का संग्रह करना तथा उपयुक्त ऋतुओं एवं अनुकूल मौसम में बीज बोने का कार्य भी महिलाओं के सुपुर्द किया जाता था जिसे वे अपनी रुचि का विषय समझकर खेल-खेल में उन कार्यों को प्रसन्नतापूर्वक संपन्न कर लेती थीं।
सुविख्यात चीनी यात्री फाह्यन ने अपने भारत यात्रा के संस्मरण में लिखा है कि तब भारत में अमीर-गरीब सभी वर्ग के लोग अपने जीवन में स्वस्थ मनोरंजन के कुछ न कुछ साधन अवश्य सम्मिलित रखते थे। आज जैसी पुनीत पर्व पूर्णिमा की धक्ल रोशनी में बड़े हर्षोल्लास के साथ धूम-धाम से मनाये जाते थे। आज जैसा विकृत स्वरूप उनका तब नहीं था। अश्लीलता, कुरूपता एवं शराबबाजी जैसा दौर तो बहुत बाद में पराधीनता के समय से चला। पतंग उड़ाने, सैर-सपाटे शतरंज और जुआ खेलने, कबूतर और बटेरबाजी तथा मुर्गा, बकरे एवं साँड़ लड़ाने जैसे प्रचलन भी इन्हीं दिनों बढ़े। स्वास्थ्यवर्धक खेलों का स्थान ताश, गंजीपों, चौसर आदि ने ले लिया। साहित्य, संगीत और कला जैसे गंभीर एवं प्रेरणाप्रद मनोरंजन के पक्ष को स्वार्थी लोग सस्तेपन का स्वरूप प्रदान करके उसे हेय स्तर का बनाते चले गये। मानव समाज पर युवा पीढ़ी पर आज उसके दुष्परिणाम स्पष्ट दिखायी पड़ रहे हैं।
सिनेमा और वीडियो फिल्मों का एक नया दौर और चल पड़ा है। उससे अधिक सस्ता मनोरंजन का साधन लोगों को और कोई नहीं जँचता। पुराने समय में फिल्में लोकप्रिय उपन्यासों, उत्कृष्ट व्यक्तियों के आधार पर ही बनती थीं, लेकिन आज इसके ठीक विपरीत स्थिति को देखा जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के स्थान पर पाश्चात्य धुनों पर पॉप–जॉज की उत्तेजक धुनों पर आधारित संगीत की ही सर्वत्र भरमार है। मनोरंजन के इन उथले, गुदगुदाने वाले एवं कुत्सित भावनायें भड़काने वाले जाल-जंजाल में फँसने से सब प्रकार की हानियाँ उठाते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। इसलिए समझदारी इसी में है कि अपने घर-परिवार के सदस्यों को इस कुचक्र में फँसने और दुर्गुणों का पिटारा बनने से रोका जाय। इसके लिए आवश्यक है कि घर के वातावरण में ही इतने आकर्षण बढ़ा दिये जांय जिनमें हर किसी का मनोरंजन होता रहे। हँसते-हँसाने का माहौल बना रहे और प्रत्येक के मन को संतोष मिलता रहे।
घध्र का वातावरण सरस एवं उल्लासमय बना रहें, इसका उपाय एक ही है कि घर में ढूंढ़ खोज करके परोक्ष प्रशिक्षण के, आकर्षक मनोरंजन के कार्यक्रम प्रचलित किये जांय। संगीत, खेल, स्वाध्याय, कथा-कहानी जैसी प्रतिष्ठापनायें अवकाश वाले क्षणों में चलती रहें तो हर किसी का मन उस वातावरण में उल्लास का अनुभव करता है। जहाँ तक महत्वपूर्ण प्रश्न नवीन आकर्षणों के आरंभ करने का है, इसके लिए अधिक आकर्षक विनोद खेल-कूद का है। जहाँ उछल-कूद की गुंजाइश हो, वहाँ कई प्रयोग घर में ही किये जा सकते हैं संगीत, सहगान कीर्तन, कथा चर्चा जैसे प्रयोग भी ऐसे है जो घर में ही मनोरंजन के साथ उपलब्ध कराते हैं। यह सभी साधन ऐसे हैं। मनोविनोद का उद्देश्य व्यक्ति की वासना की पूर्ति करना न रहे, वरन् उसकी भावनाओं को परिष्कृत करने, आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाने का प्रयोजन भी उसके साथ जुड़ा होना चाहिए। मनोरंजन की सार्थकता इसी में है।
वह ज्ञानी जो किसी की पीड़ा पर रो न सके। जो प्रसन्नता की घड़ी में भी हँस न सके। जो इतना आत्म केन्द्रित हो जाय, जो दूसरों की चिन्ता ही न करें, अज्ञानी से भी बढ़ कर है।
वर्तमान से भूत में प्रवेश कर सकना संभव है क्या? विज्ञान का बुद्धिवाद तो यही कहता है कि यह न सिर्फ असंभव है, वरन् अकल्पनीय भी। जो समय बीत गया, जो व्यक्ति नहीं रहे अथवा जिस वस्तु की सत्ता समाप्त हो चुकी है, उनके बारे में बिना किसी माध्यम के स्वयमेव जानकारी प्राप्त कर लेना बालू की दीवार खड़ी करने के समान है, पर अध्यात्मवाद की इस संबन्ध में सर्वथा विपरीत मान्यता है। वह तो यहाँ तक कहता है कि भविष्य के गर्भ में प्रवेश कर सकना शक्य है। दिक्-काल से परे जाकर कभी-कभी सुदूर अतीत में भी मन जा ही नहीं सकता,उस समय की घटनाओं को हस्तामलकवत अपने सामने देख सकता है
यदा-कदा घटने वाली कुछ घटनाक्रम इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। 10 अगस्त 1901 का दिन। इंग्लैण्ड के आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सेण्ट हम्स महिला कॉलेज की प्राचार्या एनी मोबरली एवं उप प्राचार्या एलीनर जोरडैन फ्राँस के “पैलेस ऑफ वर्सेल्स” के उद्यान में घूम रहीं थी। दोपहर का समय था। पुष्पों की सुगंध से वातावरण सुवासित हो रहा था। रंग-बिरंगे फूलों की छटा और मनमोहक वृक्षों की पंक्तियाँ वहाँ की सुषमा को चार चाँद लगा रही थीं। इतने पर भी न जाने क्यों वे कुछ विचित्र और विलक्षण अनुभव कर रही थीं। प्रतीत ऐसा हो रहा हो, जबकि प्रत्यक्ष जीवन और वर्तमान क्षणों में एसी कोई बात दीख नहीं सके। मन का भ्रम समझ कर वे दोनों इसे टालती रहीं और घूमती भी रहीं। इसी बीच बातचीत के दौरान उन्होंने “पेटिट ट्रायनन” देखने का निश्चय किया। यह विशाल महल के उस भाग का नाम है, जो फ्रांस के तत्कालीन शासक लुईस 16 वें एवं रानी मेरी एण्ट्वायनेट का निजी निवास था। गहरी वार्तालाप में संलग्न तुरन्त उन्हें यह ज्ञात हुआ कि वे मार्ग भटक चुकी हैं। उन्होंने नये सिरे से खोज आरंभ की, किन्तु यह .या। अनुभूति यथार्थता में परिवर्तित होती जान पड़ने लगी। दोनों को ऐसा महसूस होने लगा, जैसे वे नींद की स्थिति में स्वप्नवत् टहल रही हों। अभी कुछ पल बीते थे कि प्रतीति बदली। जो बगीचा कुछ समय पूर्व तक वीरान नजर आ रहा था, अब उसमें चहल-पहल दिखने लगी। वे चौंकी। इसके साथ ही उन्हें सामने खड़े दो व्यक्ति दिखाई पड़े, जो संभवतः माली थे। उनका पहनावा सदियों पुराना लग रहा था। वे लम्बे कोट और विशिष्ट प्रकार के हैट लगाये हुए थे, जिनका प्रचलन उन दिनों फ्राँस में बन्द हो चुका था। उन दोनों ने माबरली और उसकी उप-प्राचार्या को सीधे आगे बढ़ जाने का संकेत किया। थोड़ी दूर आगे जाने पर उन्हें एक पेड़ के नीचे एक व्यक्ति बैठा दिखाई पड़ा। वह भी एक विचित्र ढंग का लबादा एवं हैट पहने हुए था और शक्ल-सूरत से दष्ट जान पड़ता था। उसे देख कर दोनों भयभीत हो गई। सामने ही एक अन्य व्यक्ति खड़ा मिला, जिसने “पेटिट ट्रायनन”का पता बताया। यह व्यक्ति भी फ्राँस में अति प्राचीन समय में पहने जाने वाले लिवास में सुसज्जित था। उसके बताये रास्ते से दोनों कुछ दूर बढ़ी, तो निकट ही घास के मैदान में बैठी एक महिला मोबरली को दिखाई पड़ी, जो जमीन में कोई चित्र बना रही थी। अचानक उसकी दृष्टि मोबरली पर पड़ी। उसने विचित्र ढंग से उसे घूरा, जो मोबरली पर पड़ी। जो मोबरली को भीतर तक हिला गया। जल्द ही वे राजमहल के अन्दर प्रवेश कर गयी। इसके साथ ही उनका अवसाद न जाने कैसे कहाँ गायब हो गया। कुछ ही क्षणों में वहाँ एक वैवाहिक दृश्य उपस्थित हुआ, जिसमें उनकी पूर्व की दुःखद अनुभूति सदा-सदा के लिए तिरोहित हो गई।
यह सब कुछ थोड़े ही समय में घटित हो गया था। लौटते समय वहाँ न तो वह महिला दिखाई पड़ी न मार्ग बताने वाले व्यक्ति। उद्यान और महल एक बार फिर पूर्णतः जनशून्य थे। इस भ्रमण के एक सप्ताह उपरान्त मोबरली अपनी एक मित्र को पत्र लिखने बैठी, तो एक बार फिर वह वैसा ही अवसादग्रस्त अनुभव करने लगी, जैसा राजमहल और बगीचे के अवलोकन के दौरान इतनी प्रबल थी कि वह अपनी उप-प्राचार्या से इस संबंध में चर्चा करने के लिए विवश हो गई। चर्चा से पता चला कि मोबरली की सहयोगी को भी भ्रमण के दौरान लगभग वैसा ही अनुभव हुआ था, जैसा स्वयं मोबरली को। भिन्नता मात्र इस बात की थी कि जो चित्र बनाती नारी मोबरली को दिखाई पड़ी थी, जोरडैन को उसके दर्शन नहीं हुए थे। उन्होंने तभी यह निश्चय कर लिया था कि स्वदेश लौटने पर वे इस बात की गहराई से खोजबीन करेंगी कि वर्सेल्स में जो कुछ उन्हें अनुभव हुआ, वह मात्र भ्रम था या सत्य।
एक महीने की फ्राँस के इतिहास के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि ठीक उसी दिन जिस दिन प्राचार्या एवं उप-प्राचार्या ने”पैलेस ऑफ वर्सेल्स” की यात्रा थी, उससे 119 वर्ष पूर्व अर्थात् 10 अगस्त 1792 को फ्राँस के तात्कालीन शासक लुईस 16 वें एवं उनकी रानी मेरी एण्ट्वायनेट को पेरिस में कैद कर ऐ छोटे कमरे में बन्द कर दिया गया था। इस दौरान राजा-रानी को असह्य वेदना सहनी पड़ी थी। संभवतः इसी वेदना की अनुभूति मोबरली एवं उप-प्राचार्या को मानसिक अवसाद के रूप में हुई हो।
फ्राँस के प्राचीन इतिहास को पढ़ने से यह भी विदित हुआ कि 1789 में राजमहल और उद्यान बिल्कुल उसी रूप में थे जैसा कि भ्रमण काल में उन्होंने देखा था। यह भी पता चला कि उन दिनों की पोशाक ठीक वैसी ही थी, जैसी कि भ्रमण उनने पेटिट ट्रायनन में विवाह समारोह में देखी थी। मोबरली के आश्चर्य का तब कोई ठिकाना न रहा, जब उन्होंने इतिहास के पन्नों को पलटत् हुए मेरी एण्ट्वायनेट का एक चित्र ढूँढ़ निकाला। अब उन्हें मालूम हुआ कि यह तो वह महिला है, जिसे उनने जमीन पर चित्र बनाते देखा था, अर्थात् तत्कालीन राजमहिषी-मेरी एण्ट्वायनेट।
इस खोज एवं यात्रा के मध्य हुए विलक्षण अनुभव से दोनों की जिज्ञासा बढ़ी, तो दो वर्ष पश्चात् उन्होंने पेरिस की पुनः यात्रा की। वे एक बार फिर “पैलेस ऑफ वर्सेल्स” एवं उसके उद्यान में पहुँची, पर उन्हें यह देखकर भारी आश्चर्य हुआ कि दो वर्ष के इतने स्वल्प अन्तराल में यहाँ इतना बदलाव कैसे आ गया। न तो महल अब उस स्थिति में दिखाई पड़ रहा था और न बगीचे का ही वह चित्ताकर्षक स्वरूप रह गया था। लोगों से इस विषय में जब पूछताछ की गई तो पता चला कि वर्षों से यह भवन और उपवन इसी रूप में हैं, जो वर्तमान में दिखाई पड़ रहा है। विभिन्न इतिहासकारों और प्राचीन ग्रन्थों के माध्यम से ही यह सुनिश्चित हो सका कि दो वर्ष पूर्व इस राजप्रसाद और उपवन का जो दृश्य दिखाई पड़ा था, वह 112 वर्ष पहले के इनके स्वरूप से बिल्कुल मिलता-जुलता है।
इस अनुभव व शोध के आधार पर दोनों अध्यापिकाओं ने एक पुस्तक लिखी-”एन एडवेन्चर”। इसके अन्त में वे विभिन्न प्रकार की संभावनाओं व साक्षियों का वर्णन करती हुई इसी निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि दो वर्ष पहले उक्त महल के अवलोकन के दौरान वे थोड़े समय के लिए एक भिन्न आयाम में पहुँच गई थी, जिसने उन्हें एक शताब्दी पीछे धकेल कर महल और उद्यान के उस समय की झाँकी दिखायी थी।
तो क्या ऐसा संभव है? या यह एक कल्पना मात्र है? समय से पीछे जाकर उस वक्त की सभ्यता और संस्कृति की जानकारी प्राप्त की जा सकती है क्या? विज्ञान और बुद्धिवाद की दृष्टि से विचार किया जाय, तो असंभव जैसा प्रतीत होगा, किन्तु अध्यात्म में इसका सुनिश्चित उत्तर “हाँ” में दिया जा सकता है। उसके अनुसार न सिर्फ समय से पीछे जाकर किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना की विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकना संभव है, वरन् समय से बहुत आगे निकल कर भवितव्यता को भी जाना जा सकता है। योगी लोग इसी आधार पर भूतकालीन घटनाओं और भविष्य की संभावनाओं को सरलता से बता देते है।उनके लिए दिक्−काल (टाइम एण्ड स्पेस) का सीमाबन्धन समाप्त हो जाता है। वे फिर इनसे परे उन्मुक्त विचरण कर सकते हैं, किसी भी लोक अथवा कालखण्ड में प्रवेश कर उसकी जानकारी अर्जित कर सकते है। अध्यात्म-अवलम्बन से कम में ऐसा संभव नहीं। भूतकाल में भी ऐसा आध्यात्मिक सिद्धान्तों को जीवन में उतार कर ही संभव हो सका था। वर्तमान में यदि किन्हीं विरलों में इस प्रकार की शक्ति दिखाई पड़ती है, तो उसकी पृष्ठभूमि में अध्यात्म साधना के अवलम्बन को ही प्रमुख माना जा सकता है। हर किसी के द्वारा ऐसा अध्यात्म उपचारों का प्रयोग करना शक्य है, इसे एक सुनिश्चित तथ्य मानना चाहिए।
उधार लेने और देने की आदत न डालो अन्यथा सभी मित्रों को गँवा बैठोगे। ऋण करना सर्प पालने समान सदा चिन्तित रहने और तिरस्कार सहने का फूहड़ तरीका है।
कई बार मनुष्य नकली भाव-भंगिमा बना कर असली भाव संवेदना को छिपा ले जाता है, जैसे वह बिल्कुल सच्चा अभिनय कर रहा हो, पर कोई उसकी आँखों में झाँक कर देखे, तो पता चलेगा कि कुछ भी उससे छिपा नहीं। वह सच-झूठ को सदा उसी प्रकार प्रकट करती रहती है, जिस प्रकार मुकदमें का कोई चश्मदीद गवाह अपराधी की सत्यता का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
पिछले दिनों आँख और पुतलियों पर हुई शोध से ज्ञात हुआ है कि अनेक अवसरों पर जहाँ व्यक्ति की बनावटी मुखमुद्रा सत्य पर सामान्य रूप से पर्दा डालने में सफल हो जाती है, वहीं उसकी पुतलियाँ भेद खोलती रहती है। इस रहस्य को जानने वाला कोई भी व्यक्ति तथ्य को देख कर सत्य का पता लगा सकता हैं, भले ही उस पर बनावटीपन का कितना ही मुलम्मा क्यों न चढ़ा हो। आमतौर पर देखा यह जाता है कि जब किसी व्यक्ति को वर्षों का बिछुड़ा उसका प्रियजन मिलता है, आकस्मिक संपदा अथवा मनोवांछित वस्तु प्राप्त होती है, किसी ऐसे कार्य में सफलता मिलती है, जिसमें आशा नगण्य जितनी की गई थी, तो वह भाव-विभोर हो उठता है, प्रसन्नता से उसकी आँखें चमक उठती हैं। इस दौरान उसकी पलकें थोड़ी चौड़ी हो जाती है और आंखें कुछ बड़ी दिखने लगती है। आश्चर्य और प्रसन्नता दोनों स्थितियों में यह क्रिया समान रूप से होती है। इसी प्रकार जब कोई बुरी खबर, प्रतिकूलता, भय, विषाद जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है, तो आँखें निस्तेज, बुझी-बुझी-सी दिखाई लगती हैं। यह अनुकूलता-प्रतिकूलता, प्रसन्नता, विषण्णता के अभिव्यक्ति पाने का स्वाभाविक ढंग है, पर अनेक बार व्यक्ति सच्चाई का ढोंग रच कर तथ्य को सामने वाले से छिपाने का प्रयत्न करता है। अभिनय में वह बहुत हद तक सफल भी हो जाता है, इतने पर भी उसकी पुतलियाँ उसके अन्दर के भाव को बिना किसी दुराव-छिपाव के, सही-सही बताती रहती हैं। इस दृष्टि से यह एक प्रकार की “लाई डिटेक्टर “ है। इसी कारण इन दिनों इनका इस्तेमाल अपराध-जगत में सही-गलत अपराधियों को पहचानने, परखने में किया जा रहा है।
यों शरीरशास्त्र में पुतलियों का कार्य उपयुक्त परिमाण में प्रकाशन के प्रवेश करने और अनावश्यक को भीतर जाने से रोकने तक ही अनावश्यक को मनोविज्ञानवेत्ता बताते हैं कि यह तो इसका अत्यन्त स्थूल कार्य हुआ। सूक्ष्म और महत्वपूर्ण तो वह है, जो पक्ष पर अनुसंधान हो रहे हैं, जिसमें अन्वेषणकर्ता यह जानने का प्रयास कर रहे है कि पुतलियाँ इस कार्य को किस प्रकार कितनी दक्षता से करती हैं।
एक प्रयोग के दौरान देखा गया कि जब कुछ छात्रों को गणित संबंधी जटिल प्रश्न हल करने को दिये गये, तो पाया गया कि उनकी पुतलियाँ फैल गई है और तब तक इसी अवस्था में बनी रही जब तक छात्रों ने सवाल हल न कर लिये। इसके अतिरिक्त अन्य ऐसे शारीरिक लक्षण भी उस दौरान उनमें देखे गये, जो प्रकट करते थे कि छात्र घबराहट की स्थिति से गुजर रहे हैं।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि स्वाद और गंध भी पुतलियों को समान रूप से प्रभावित करते है। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह कथन किस हद तक सही है। शोध के दौरान उन्होंने कुछ लोगों को मृदु पेय पीने को दिया। उसके प्रथम घूँट के साथ ही स्वाद के संबंध में लोगों की भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ सामने आयीं। यह प्रतिक्रियाएँ, उनके बोलने से पूर्व ही उनकी पुतलियों ने फैल और सिकुड़ कर जाहिर कर दीं। उल्लेखनीय है कि खुशी, अच्छे स्वाद अथवा सुगंध की स्थिति पुतलियाँ फैल कर इसकी अभिव्यक्ति करती हैं, जबकि दुर्गंध, बेस्वाद, एवं विषाद अथवा भय के अवसर पर वह अत्यन्त सिकुड़ जाती है, जो इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति अच्छा अनुभव नहीं कर रहा है। मनःशास्त्रियों का कहना है कि पुतलियों का अध्ययन कर और भी गहरी और सूक्ष्म जो कि गहन अन्तराल में अवस्थित हो और जिसकी स्थूल अभिव्यंजना छिपायी जा रही हो, किन्तु यह अवयव अन्तस् के उस भाव को भी पकड़ने और प्रकट करने में सक्षम है। आवश्यकता इस आशय के विस्तृत अन्वेषण की है, ताकि यह जाना जा सके कि किस भाव को प्रकट करने के लिए यह कैसा प्रदर्शन करती है। मनोविशारदों का कहना है कि चूंकि मनुष्य का अपनी पुतलियों पर कोई नियंत्रण नहीं है, अस्तु इस माध्यम से उन संवेदनाओं को भलीभाँति समझा जा सकता है, जो उनके स्थूल अवयव गुप्त रखने में सफल हो जाते है। इस अध्ययन से पूर्व तक मान्यता यह थी कि नारी की पुतलियाँ पुरुषों के प्रति कोई भाव प्रकट नहीं करतीं। अतएव एक प्रयोग द्वारा इस बात की जाँच करने का निश्चय किया गया कि उपरोक्त कथन किस सीमा तक सत्य है। प्रयोग के दौरान जब एक महिला के समक्ष एक आकर्षक व्यक्ति का चित्र रखा गया, तो पुतलियाँ अचानक फैल गई, यद्यपि उसने प्रकट रूप में इस प्रकार का कोई भाव व्यक्त नहीं किया था, जिससे तत्सम्बन्धी किसी मान्यता पर पहुँचा जा सके, पर पुतलियों का फैलना इस बात की साक्षी थी कि नारी को तस्वीर देखकर खुशी हुई है। निष्कर्ष को और अधिक स्पष्ट और पुष्ट करने के लिए दूसरी बार उसी नारी के सम्मुख एक अन्य नर का चित्र प्रस्तुत किया गया, पर इस बार की तस्वीर एक ऐसे व्यक्ति की थी जो बड़ा ही कुरूप भौंड़े नाक-नक्शा युक्त और डरावना था। तस्वीर के सामने आते ही उसकी पुतलियाँ सिकुड़ कर अत्यन्त छोटी हो गई, जो इस बात को सिद्ध कर हरी थी कि महिला के मन में घृणा उपज रही है। इस प्रकार उस संबंध में प्रयोगार्थी के बिना कुछ कहे भी उसकी आंखें बहुत कुछ कह रही थीं।
भय के संदर्भ में पुतली की प्रतिक्रिया कैसी होती है? यह जानने के लिए प्लास्टिक के एक नकली व्यक्ति के सामने अचानक रख दिया गया। उसकी चीख निकल गई, साथ ही आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ कर संकीर्ण बन गई।
मनोविज्ञानियों का मानना है कि यदि इस कला में निपुणता हासिल की जा सके, तो अनेक मौकों पर ऐसे करतब दिखाये जा सकते हैं, जो जनसाधारण को चमत्कार जैसा लगे। उदाहरण देते वे बताते हैं कि अनेक तमाशेबाज ऐसे होते हैं, जो अपनी विद्या में निष्णात नहीं होते, फिर भी ताश के खेल में वे कई बार ऐसे कौशल दिखा जाते हैं, जो सामने वालों को चमत्कृतकर जाते हैं। उनका कहना है कि ऐसा बाजीगर ऐसे क्षणों में पुतली की हलचलों द्वारा ही ऐसा कुछ कर सकने में सफल होते हैं। इस दौरान वे सामने वाले की आँखें पर अपना अधिकाँश ध्यान केन्द्रित रखते हैं, और बड़ी सूक्ष्मता से पुतलियों की गतिविधियों का अध्ययन करते रहते हैं। उनके अचानक फैलने संकुचित होने के आधार पर ही वे भविष्यवाणी करते हैं। जब वे सही सिद्ध होती, तो तरह-तरह के नाम-उपनाम दे डालते हैं-बहुत बड़ा जादूगर मान बैठते हैं, पर यथार्थता इतनी है है कि आँख की वह खिड़की ही सब को देखती-दिखाती बोलती-बताती रहती है। उससे कुछ भी तो छिपा नहीं है।
जो समय के साथ नहीं चलता वह पिछड़ जाता है। जो समय की माँग को नहीं जानता वह अनुपयुक्त सोचता है और ऐसा कुछ करता है जिससे पश्चाताप करना और उपहास सहना पड़े।
मनुष्य को सहज रूप में स्वच्छंदता प्राप्त है। सोचने और करने के लिए वह बाधित नहीं है। कोई दूसरा इसके लिए विवश नहीं कर सकता, किन्तु ईश्वर प्रदत्त एक मार्गदर्शक सदा उसके साथ उसके साथ रहता है जो औचित्य की दिशा में इंगित करता रहता है। इतने पर भी अंदर की इच्छा शक्ति प्रबलता और भी अधिक है, वह चाहे तो विवेक को यदि सक्षम रह सकता है कि कुत्सित इच्छाओं का दमन कर सके, साथ ही सरल, सौम्य और निरोग जी सके।
इन दिनों मनुष्य की कुत्साएँ दो दिशाओं में भड़की है, जिसे वासना और तृष्णा कह सकते है। सही अर्थशास्त्र अपनाने पर कमाई का एक अंश में उन श्रमिकों को भी भागीदार रखना पड़ता है, जिन के पसीने से वह उपार्जन संभव हो सका। साथ में मुनाफे का उतना ही अंश रखना उचित है जो लागत से बहुत अधिक बढ़ कर न हो। फिर साथ ही पिछड़े लोग सह जाते हैं जिनकी परिस्थितियाँ दुर्बल सही और गुजारे का, प्रगति का समुचित साधन न प्राप्त कर सकें। अभावग्रस्त रहकर अनेकानेक कठिनाइयाँ सहन करते हैं। इस वर्ग को मात्र परामर्श की ही नहीं, साधनों की भी आवश्यकता पड़ती है। उनका भी अंश उस कमाई में है, जिसे संतोषजनक या औसत भारतीय से अधिक कहा जा सकता है।
अधिक कमाई के दो ही उपयोग हो सकते है-सुविधा संवर्धन एवं अहंकार प्रदर्शन। वासना और अहंता से ही तृष्णा की अतिवादिता अपना कर जो कमाया है, उसे लगाया जा सकता है। बड़प्पन की यही निशानियाँ मानी जाती है। जो दूसरे नहीं उपयोगकर सकते, उसे अपने पास पाकर मनुष्य का अहंकार बढ़ता है। वह अपने को अपेक्षाकृत चतुर, भाग्यवान, गौरवशाली अनुभव करता है।
अहंता की अभिवृद्धि किसी समय में लोगों को प्रभावित करती थी, उसका बड़प्पन स्वीकारा जाता था। अमीरी को पुण्यफल का प्रताप माना जाता था तब लोग अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए ऐसे खर्चीले काम करते थे, जिनके आधार पर उनका बड़प्पन स्वीकारा जा सके और अमीरों का-सा सम्मान किया जा सकें।
किन्तु अब समय ने पलटा खाया है। संपन्न लोगों के बारे में जन साधारण का दृष्टिकोण बदल गया है। अधिकाँश लोगों की चोरी, मुनाफाखोरी और श्रमिकों के शोषण के सहारे संपन्नता बढ़ती है,ऐसा माना जाता है। ऐसा न भी हो तो पिछला समाज यह अपेक्षा करता है कि उनकी उन्नति में यदि संपन्नों ने श्रम या व्यवसाय के निमित्त सहयोग दिया होता, तो उनकी स्थिति इतनी बुरी न होती। यह आरोप किसी सीमा तक सही भी है। यदि पूँजी का एकत्रीकरण न हो और उसे बहुतों को समुचित पारिश्रमिक देने में लगा दिया जाय, तो कुछ आरय मिलने पर निश्चय ही गरीबी का अनुपात घट सकता है।
एक हद तक यह भी सही है कि आलसी अव्यवस्थित और दुर्व्यसनी लोग अपनी आजीविका को अस्त-व्यस्त करके उतने कष्ट सहते हैं जितने कष्ट सहते है जितने कि सुव्यवस्थित क्रम अपनाने पर उन्हें न सहने पड़ते, किन्तु लोगों में आत्म निरीक्षण की दृष्टि कम और गरीबी का जन्मदाता कहा जाता है और कहा जाता है कि ऊँची मीनार खड़ी करने के लिए कहीं-न-कहीं उतना ही गहरा गड्ढा बनाना पड़ता है। अमीरी तभी जमा होती जब अनेकों को अनावश्यक रूप से गरीब देती है।
कहा जाता है कि प्रतिभा और तत्परता के सहारे संपदा कमाई जाती है, पर उन्हें एकाकी क्यों माना जाय? जब अध्यापक और चिकित्सक अपनी योग्यता का लाभ अनेकों को मिलने देते हैं, तो प्रतिभाशाली और कौशलता के धनी उन विशेषताओं को जन-साधारण के हित में करें, तो एकाकी धनवान होने की अपेक्षा उससे अनेकों की संपन्नता में अभिवृद्धि कर सकते हैं।
तृष्णा को इसलिए बुरा कहा गया है कि वह अपनी उपलब्धियों को, एकाकी उपयोग को सीमित कर लेती है। यदि उसे इस दोष से बचाया जा सकें, तो उसका स्वरूप बढ़े-चढ़े लोकमंगल के रूप में विकसित हो सकता है, जिस महत्वाकाँक्षा में अनेकों का हित साधन होता हो, उसे सराहा ही जाएगा।
प्रशंसा प्राप्त करने के लिए जो अपव्ययी ठाट-बाट जुटाया जाता है, उससे उपार्जित धन एक प्रकार से निरर्थक चला जाता है मूल उद्देश्य अहंकार उभर कर ऊपर आ जाता है और प्रतीत होता है कि यह सब बड़प्पन प्रकारान्तर से दूसरों का अपमान है, उन्हें छोटा सिद्ध करता है। यदि उसके स्थान पर नम्रता की द्योतक सादगी अपनाई जाय, तो उससे दूसरों को सम्मान मिलता है और इनके बदले जो छाप ग्रहण की जाती है उसमें अपेक्षाकृत अधिक सौजन्य और सद्भाव जुड़ा होता है। यदि वह प्रदर्शन में लगने वाला धन सार्वजनिक हित साधन के सेवा कार्यों में लगाया जाय, तो जितने यश की आशा की गई थी, उससे कही अधिक मात्रा में बिना प्रयत्न के ही मिल जाता है।
वासना का अर्थ है-उपभोग। यह संयम से ठीक उलटा है। संयम द्वारा शक्तियों का संचय होता है और उस आधार पर शरीर जीवन भर सुदृढ़ बना रहता है। इसके विपरीत असंयमी अपनी स्वास्थ्य सम्पदा और बुद्धि -वैभव को धीरे-धीरे चुकाता चला जाता है। खजाना खली हो जाने पर जिस प्रकार व्यवसायी को दिवालिया बनना पड़ता है, उसी प्रकार कायिक सुस्थिरता भी वासना के फूटे बर्तन से होकर टपक जाती है। सुन्दरता, सुदृढ़ता का ही दूसरा नाम है। कुरूपता काया की भीतरी शक्ति के जर्जर हो जाने का दूसरा नाम है। ऐसे व्यक्ति वस्तुतः दुर्बल होते है। यह दुर्बलता ही कुरूपता के रूप में प्रकट होती है। उसकी मात्रा बढ़ जाने पर स्थिति ऐसी बन जाती है कि काया का भार वहन करना भी कठिन पड़ता है, उसके लिए दूसरों की सहायता लेनी पड़ती है। बात-बात में जब दूसरे की सहारा तकना पड़े, तो सेवा करने वाले भी खीजने लगते है। विवशता में जो सेवा करनी पड़ती है, वह भार रूप हो जाती है, वह भार रूप हो जाती है, भारभूत लगती है। ऐसी सेवा लेते हुए कृतज्ञता का भाव उत्पन्न नहीं होता, वरन् अपने ऊपर खीज आती है। अवज्ञापूर्वक की गई सेवा सुहाती नहीं, वरन् कंटक की तरह चुभती है।
बढ़ी हुई दुर्बलता का नाम ही रुग्णता है। शारीरिक अवयव या तो उपयोगी बनकर रहते हैं या अनुपयोगी। जब उनकी स्थिति अनुपयोगी स्तर की होती है, तो पीड़ा, कसक, सृजन आदि के रूप में अपना परिचय देते है कि निरर्थकता की स्थिति में अपना काम समेट लेने की उत्सुकता और आतुरता प्रकट कर रहे हैं। जर्जरता ही रुग्णता मरण की पूर्वावस्था है। दुर्बल मरता है, पर घिसट-घिसट कर। इसके विपरीत जिसकी जीवनी शक्ति बनी हुई है, वह प्राण त्याग भी सरलतापूर्वक कर लेता है, उसका मरण काल अधिक लम्बा और अधिक कष्ट-कारक नहीं होता।
यह सब शरीर और मन को विसंगतियों में डाल देने का ही परिणाम है। वासना, तृष्णा और अहंता इसी असंयम के रूप है। निश्चित ही मन ही मनुष्य लाकन कर सकें तो बंधन्मुक्त मोक्ष की स्वर्गोपम मनःस्थिति में रहकर जीवन का वास्तविक आनन्द ले सकते हैं, जिसके कि हम हकदार है।
एकाकी मत रहो, अन्यथा अशक्त रहोगे। मिलजुल कर रहने वाले तृणों से हाथी को बाँधने वाला रास्ता बनता है।
दो संस्कृत विद्वान एक गृहस्थ के यहाँ अतिथि बने।गृहस्थ ने उनका बड़ा सत्कार किया।
जब एक विद्वान स्नान घर में गए तब गृहस्थ ने दूसरे विद्वान से स्नान करने को गये हुए विद्वान के संबंध में पूछा। उसने उत्तर दिया कि ‘वह मूर्ख बैल है।’ जब वह स्नान करके आये हुए विद्वान के सम्बंध में पूछा तो वह बोला ‘यह क्या जानता है-पूरा गया है।’
जब भोजन का समय हुआ तो गृहस्थ ने एक गट्ठर घास और एक ढलिया भूसा उनके सामने ला रखा और बोला-”लीजिए महाराज! बैल के लिए भूसा और गधे के लिए घास उपस्थित है।” यह देख सुनकर दोनों ही बड़े लज्जित हुए।
विद्वान होकर भी दूसरों के प्रति ईर्ष्या, द्वेष के भाव रखना बड़ी घृणित प्रवृत्ति है। ऐसे विद्वान भी निस्सन्देह पशु श्रेणी में रखे जाने योग्य हैं।
“मेरी साधना विफल हुई।”गुर्जर राजकुमार ने एक लम्बी श्वास ली। वे अपने विश्राम कक्ष में एक चन्दन की चौकी पर धवलवस्त्र डाले विराजमान थे। ग्रन्थ पाठ समाप्त हो गया और जप भी पूर्ण कर लिया था उन्होंने। ध्यान की चेष्टा व्यर्थ रही और वे पूजा स्थान से उठ आए।
राजकुमार ने स्वर्णाभरण तो बहुत दिन हुए छोड़ रखे थे। शयनगृह से हाथी दाँत के पलंग एवं कोमल बिछौने कब के दूर हो चुके हैं। उनकी भ्रमर कृष्ण घुंघराली अलकें सुगन्धित तेल का स्पर्श न पाकर इधर-उधर उउ़ करती हैं। रेशमी कपड़ों की जगह-सफेद रंग का हल्का मलमल ही उनकी धोती एवं उत्तरीय बनता है।
चिन्ता ने उस भव्य भाल पर हलकी लकीरें डाल दी थीं। अरुणिमा लिए गौरवर्ण के मुख पर किंचित मलिनता आ गई थी। पतला शरीर और भी क्षीण हो गया था। उनकी बड़ी-बड़ी आंखों में जल-कण झलमलाने लगे थे।
सुबह का दुग्धपान छूट चुका था दोपहर में थोड़ा शाक और कुछ फल मात्र। रात्रि को तो कुछ लेते ही न थे। गान-वाद्य में पहले ही रुचि न थी और सखा-सहचरों में अब रहना अच्छा नहीं लगता था। राजोद्यान का मालती कुँज, सरोवर तट तथा अपना विश्राम कक्ष। सदा उदासीनता टपका करती थी। एकाकी दिन और एकाकी रात्रि।
सेवक-सेविकाएँ समीप आते सहमती थीं। एकान्त उदासीन, मुद्रा देखकर जो समझाने या हँसाने जाता, वह स्वयं आँसू बहाता और खिन्न मन लौट आता। उस उदासीनता में व्यापक शक्ति थी, क्योंकि सच्चाई थी उसमें। बढ़ती जाती थी वह उत्तरोत्तर और विस्मृत होते जा रहे थे उनके भोजनादि कर्म।
महाराज का अपने एकमात्र पुत्र पर अपार स्नेह था। इसी स्नेह के कारण महारानी का स्वर्गवास होने पर भी उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया। आजकल उनका हृदय चिंता से सूखता जा रहा था। युवराज की उदासीनता, शोकाकुल मुद्रा उन्हें मर्म व्यथा देती थी।
“मैं नहीं चाहता कि वह राज्योपभोग ही करे।”
महाराज ने राजकुमार की आध्यात्मिक अभिरुचि में कोई भी बाधा नहीं डाली। उनके साधन के संबंध में कभी प्रश्न नहीं किया। यहाँ तक कि राजकुमार ने भोग-सामग्रियों का त्याग कर राजसदन को ही वन बना लिया, तब भी महाराज शान्त रहे, “वह वीतराग हो तो मुझे आपत्ति नहीं। मेरा सौभाग्य होगा, यदि वह परम सिद्धि के मार्ग में आगे बढ़े। कुछ भी हो, वह प्रसन्न रहे। उसका क्लेश मैं नहीं देख सकता।”
आज व्यथा सीमा पर पहुँच गयी थी। युवराज के प्रधान परिचारक ने समाचार दिया था कि राजकुमार की आँखें सूज गई है। ऐसा लगता है कि वे रातभर जागते रहे और रोते रहे हैं। महाराज तिलमिला उठे। उन्होंने एकान्त में परम धार्मिक मंत्री को बुला लिया। “चाहे जैसे भी हो, राजकुमार की चिन्ता का कारण ज्ञात करना होगा।” महाराज ने भरे कण्ठ से कहा-”मुझे तुम्हीं जीवनदान दे सकते हो। कुछ भी करो, किन्तु उसे प्रसन्न करो।” स्वर में आज्ञा नहीं, अनुनय था।
“महाराज आकुल न हो।” मस्तक झुकाकर बूढ़े मंत्री ने प्रार्थना की-”मेरी जितनी बुद्धि या शक्ति है, कोशिश करूंगा। आप विश्वास रखें यह सेवक अपने प्रयत्न में भगवान की कृपा से असफल नहीं हुआ है।”
“मैं समझता था कि वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली है।” महामात्य को राजकुमार ने अभिवंदन के अनन्तर आसन दे दिया था और वे बैठ गए थे। जितने स्नेह-स्निग्ध स्वर में पूछा था, उसकी उपेक्षा सम्भव नहीं थी। राजकुमार खुल पड़े थे-”मेरी धारणा व्यर्थ सिद्ध हुई। देखता हूँ कि मेरा तो और भी पतन ही हुआ है।” दोनों आँखों से अश्रुधारा चलने लगी।
“आश्वस्त हो युवराज!” महामात्य ने अपने उत्तरीय से राजकुमार की आँखें पोछीं। वृद्ध आमात्य का युवराज से पुत्र की भाँति स्नेह था और वे भी उनका आदर महाराज की ही भाँति करते थे।” मैं अन्तःसंघर्ष में न तो कभी पड़ा हूँ और न मेरा ज्ञान ही कुछ है। इतने पर भी सम्भव है कि मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूँ। आप अपनी स्थिति स्पष्ट करें तो कृपा होगी।”
“युवराज ने बताया कि किस प्रकार साधना के आरंभ काल में वासनाएँ विलीन हो गई थीं। मन एकाग्र हो जाता था अब यह स्थिति है मन एक क्षण को भी टिकता नहीं लक्ष्य पर। जिन वासनाओं को वह अत्यन्त हेय समझते रहे है, वे भी अब विक्षिप्त किए रहती हैं। पाठ और जप के समय भी मन विषयों-वासनाओं की उधेड़-बुन में लगा रहता है। पता नहीं कहाँ थे, भोग लिप्साएँ एवं भौतिक महत्वाकांक्षाएं उभर-उभर कर आ जाती हैं।
“बस?” मुस्कुराए महामात्य-”अभी आप बालक है।” अरे इतना तो मैं भी बता सकता हूँ कि शत्रु प्रथम आक्रमण में मस्तक झुका लेते हैं, किन्तु यदि आक्रमण प्रचण्ड हो और देख लें कि उनके मूलोच्छेदन की कोशिश हो रही है तो उद्धत हो जाते हैं।उनका वेग प्रबलता की सीमा पर पहुँच जाता हैं।”
“तब क्या मैं असफल ही रहूँगा?’ महामात्य के हास्य ने तनिक आश्वासन दिया था। एकटक उनके मुख की ओर भरे दृगों से राजकुमार देख रहे थे। बोले रोग का निदान ठीक कर लिया गया तो निदान ठीक होने पर चिकित्सा में कठिनाई नहीं हुआ करती। धैर्यपूर्वक प्रचण्ड आक्रमण एवं शत्रु के एक-एक अंग का उच्छेदन-दुर्बल अंगों पर प्रथम प्रहार। यदि यह नीति काम में ली जाय तो विजय सुनिश्चित है।”
आमात्य की बातों से युवराज का मन कुछ हलका हुआ। आमात्य ने उन्हें स्नेह के साथ वन भ्रमण के लिए तैयार किया। दोनों कुछ सैनिक अश्वारोहियों के साथ वन मार्ग की ओर चल पड़े। सघन वन प्रान्त में पहुँचते ही उनकी नासिका मधुर सुरभि से भर गई। मन्द-शीतल वायु से मिलकर बह रही सुरभि ने उन्हें चौंका दिया। सबने लम्बी सांसें-खींचकर उस पवित्र गन्ध को भली प्रकार ग्रहण करने का बार-बार प्रयास किया।
सुगन्धित जितनी व्यापक थी, उसे देखते हुए उसका उद्गम कहीं समीप होना चाहिए था। पवन मार्ग का अनुसरण करने से सौरभ में अभिवृद्धि हो रही थी। सहसा सौरभ प्रान्त संकुचित होने लगा। सुगन्धित की तीव्रता एक निश्चित केन्द्र को सूचित करने लगी। पूरे एक योजन चले होगे वे। अश्वारोही सैनिक और वनवासी भील अचकचा कर खड़े हो गये। उन्होंने झुरमुट की ओर राजकुमार को देखने का संकेत किया।
एक सूब सघन तमाल का वृक्ष था। नीचे पारसीक कालीन की भाँति कोमल हरित दूर्वादल फैला था। एक हाथ की कुहनी पृथ्वी पर टेककर उसी की हथेली पर मस्तक रखे कोई महापुरुष लेटे थे। पूरा लम्बा शरीर मांसलकाय, विशाल भुजाएँ-क्षीण कटि तथा विस्तृत वक्ष। उनकी हथेलियाँ तथा फैले हुए पैरों के तलवों की लालिमा एवं कोमलता किसी सद्योजात शिशु का स्मरण कराती थीं।
प्रकाश का एक मंडल बन गया था चारों ओर। यह उनकी अंग कान्ति का प्रकाश था। घुंघराली काली रूखी अलकें धूलि से भर गई थीं और मुख मण्डल के चारों ओर बिखर रही थीं। सम्पूर्ण दिगम्बर थे वे और शरीर धूल छाई थी। मन्द-मन्द मुसकान प्राणों में वह मादकता फैला रही थी, जिससे युवराज-वृद्ध आमात्य और अपने सभी साथियों के साथ मंत्र मुग्ध हो रहे थे। जिस सुगंध का अन्वेषण करते वे यहाँ तक पहुँचे थे, वह उनके शरीर से निकल रही थी।
आश्चर्य से सभी ने पृथ्वी पर उण्डवत की अश्व से उतर कर। पर उन्होंने जैसे न कुछ देखा और न कुछ सुना। राजकुमार अपने अन्तर में विस्मयकारी परिवर्तन अनुभव कर रहे थे। थोड़ी देर यक सभी वापस चल पड़े।
रास्ते में युवराज ने वृद्ध मंत्री को ओर प्रश्नभरी निगाह से देखा। आशय समझते हुए मंत्री बोल पड़े-”हमारा सौभाग्य है कि वीतराग होकर अवधूत वेश में भारत सम्राट भगवान ऋषभदेव अपने श्री चरणों से हमारी वनभूमि को आजकल पावन कर रहे हैं।”
“भगवान ऋषभदेव? राजकुमार और भी चौके “एक सम्राट में यह शक्ति इतनी शान्ति इतना व्यापक प्रभाव?’’
“सम्राट तो अब उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत हैं। थे तो अब-साधन-साध्य और सिद्धि के जीवन्त रूप हैं।”
“मैंने अनुभव किया-उनके पास उपस्थिति होते ही वासनाएँ स्वतः विलीन हो गई। हृदय स्निग्ध प्रकाश और शान्ति से भर गया। मन चंचलता भूल गया। पर मेरा दुर्भाग्य” एक दीर्घ श्वास ली युवराज ने। उनके स्वर में असमंजस उभर आया-”यदि उनके पास अधिक जाऊँ तो न पाठ हो सकेगा न जप। समस्त दैनिक कृत्य अव्यवस्थित हो जाएँगे।”
“यह पाठ और जप, नियम और संयम धारण और ध्यान आखिर किसलिए?” स्नेह स्निग्ध कण्ठ था अमात्य का-”ये सब मनोनिग्रह के लिए स्वयं को सुसंस्कारित बनाने के लिए ही तो हैं। इन सबके द्वारा प्रयत्नपूर्वक दीर्घकाल में भी जो नहीं होता, उसे महापुरुषों संग कुछ ही क्षणों में ही सम्पूर्ण कर देता है। इन महापुरुषों के अस्तित्व और सत्संग से संस्कार झरते और साधना उफनती है। संस्कृति की गरिमा इन्हीं में प्रतिष्ठित है। अतः आपको इस प्रपंच से परित्राण पाना चाहिए। दृढ़ होना चाहिए। उसी (महत्संग) की साधना कीजिए।” राजकुमार को जीवन की नयी दिशा मिल चुकी थी।
शरीर और परिवार के निर्वाह हेतु धन की आये दिन सभी को आवश्यकता पड़ती है। इसे शारीरिक और मानसिक श्रम के आधार पर सहज ही जुटाया जा सकता है;पर इन दिनों आर्थिक तंगी की पुकार सर्वत्र सुनाई पड़ती है, उसके दो प्रमुख कारण हैं-एक आलस्य-प्रमाद से ग्रस्त अनगढ़ता। दूसरा है-विलास संग्रह और बड़प्पन जताने के लिए निमित्त उभरी महत्वाकाँक्षा। यह दोनों ही मानसिक विकार हैं। यदि इन पर नियन्त्रण स्वीकार किया जा सके तो अभावों की जो त्राहि-त्राहि सर्वत्र मची हुई है उसमें से 10 प्रतिशत का सहज समाधान हो जाय। लोगों को अधिकाधिक मात्रा में धन अर्जित करने की ललक है। भले ही वह किसी भी उचित-अनुचित तरीकों से उपलब्ध क्यों न किया गया हो। इस प्रचलित चिन्तन में आमूल चूल परिवर्तन किये बिना अर्थ संकट से छुटकारा पा सकना किसी भी प्रकार संभव नहीं हो सकता।
उपार्जन करते समय ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह कठोर परिश्रम-पूर्वक, ईमानदारी के सहारे उन माध्यमों से अर्जित किया गया है या नहीं, जो समाज का किसी भी प्रकार अनर्थ नहीं करते। औचित्य ही ग्रह होना चाहिए। न्याय नीति का सर्वदा ध्यान रखा जाना चाहिए। इन उपायों से निर्वाह के योग्य धन सरलतापूर्वक कमाया जा सकता है।
कमाने से भी अधिक बुद्धिमत्ता के उपयोग की आवश्यकता उसके खर्चने में पड़ते है। दुर्बुद्धि के आवेश में यदि धन का दुरुपयोग क्रम चल पड़े तो उसकी हानि दरिद्रता की अपेक्षा कहीं अधिक भारी पड़ेगी। निर्वाह के साथ परिश्रम और कौशल के सहारे कोई भी व्यक्ति कहीं भी जुटा सकता है। कठिनाई तब पड़ती है जब मनुष्य बड़प्पन की लम्बी-चौड़ी महत्वाकाँक्षाएँ बटोर कर सिर पर लाद लेता है। वे सहज रीति से पूरी नहीं हो सकती। उनके लिए ललक के अनुरूप ही लम्बी छलाँग लगानी पड़ती है। कहीं गड़ा धन मिलने लाटरी खुलने के दिवा स्वप्न देखने वाले तो प्रायः रंगीन उड़ाने भरकर ही रह जाते हैं; पर व्यावहारिक तरीका अनाचार पर उतरने का ही सूझ पड़ता है। इसके लिए चोरी ठगी से लेकर अनाचार,अत्याचार के वे उपाय अपनाने पड़ते है जो अपनी योग्यता और परिस्थिति के साथ तालमेल खाते हों। देखा गया है कि जिनके पास अधिक धन संग्रहित है उनमें से कम ही ऐसे मिलेंगे जिन्होंने न्यायोचित नीति से सम्पदा जमा करने में सफलता पाई हो।
परिश्रमपूर्वक, ईमानदारी से किये गये उपार्जन के साथ यह बुद्धि भी उत्पन्न होती है कि इस श्रम साधना को किसी उपयोगी कार्य में ही नियोजित कार्य में ही नियोजित किया जाय। यदि कमाई अत्यधिक मात्रा में संग्रह हो रही है तो उसके सदुपयोग का विवेक फिर रह नहीं जाता। कमाई में प्रयुक्त हुआ अतिवाद व्यय करने की घड़ी में फिजूलखर्ची बनकर उभरता है। बढ़े हुए धन का पिछड़ों को उठाने और उठों को उछालने जैसे महान प्रयोजनों में लगा सकने की उदार दूरदर्शिता आतुर लोगों के पास रह नहीं जाती, वे विलास, संग्रह और प्रदर्शन के अतिरिक्त और कोई राह ऐसी खोज नहीं पाते, जिसमें आवश्यकता से अधिक धन का नियोजन बन पड़े। परमार्थ उनके लिए पर्वत उठाने की तरह भारी पड़ता है। अनीति उपार्जन प्रायः दुर्व्यसनों में ही खर्च होता है। दुर्व्यसन अपने आप में अभिशाप है, जो जिसके भी पीछे लगते है उसे अनेकानेक दुर्गुणों के शिकार बना लेते हैं। उद्धत आचरण करने के लिए उकसाते रहते हैं। इन प्रेरणाओं को चरितार्थ करने वाला अपनी ओर दूसरों की दृष्टि में अप्रमाणिक, तिरस्कृत एवं घृणास्पद ही बनाता चला जाता है। पतन के मार्ग पर चलने वाला पग-पग पर ठोकरें खाता है और आन्तरिक विक्षोभ तथा असहयोग-अपमान के सहते-सहते व्यक्तित्व की दृष्टि से इतना गिर जाता है जिसके कहीं ऊँचे मध्यवर्गी औसत गुजारा करने वाले होते हैं। हराम की कमाई किसी को हजम नहीं होती। न उसके रहते उपार्जनकर्ता चैन से बैठ पाते हैं और न उत्तराधिकार में उसे पाने वाले ही उसका सदुपयोग कर सकते है। हानि इन उपभोक्ताओं को भी कम नहीं होती।
अपनी शारीरिक, मानसिक शक्ति को समग्र तत्परता और तन्मयता के साथ हाथ में लिए हुए कामों में पूरी तरह लगाये रहना चाहिए। उसके किए हुए काम का स्तर ऊँचा रहता है। इसका मूल्य भी अच्छा मिलता है। कर्त्ता की प्रमाणिकता और कुशलता पर विश्वास करते हुए लोग उसे श्रेय देते हैं। ऐसों को सहयोग देने और सहयोग पाने के लिए विचारशील वर्ग सदा तैयार रहता है, फलतः ऊँचे उठने, आगे बढ़ने का पथ सहज ही प्रशस्त होता जाता है। सफलताएँ निकट से निकटतम आती-जाती है। महानता ऐसों के ही पल्ले बँधती है।
अर्थ संतुलन को महत्व देने वाले व्यक्ति को अपने ऊपर असाधारण भार नहीं बढ़ाना चाहिए। सन्तानोत्पादन के संबंध में अत्याधिक संतान की होना सौभाग्य माना जाता रहा होगा; पर आज की स्थिति में वह अत्यधिक बोझिल, खर्चीला और अगणित समस्याओं से भरा-पूरा है। इस दिशा में लापरवाही बरतने पर बच्चे बढ़ जाते है और वे अपनी संख्या के अनुरूप माता-पिता तथा परिवार के हर सदस्य की समस्याओं में कटौती करते जाते हैं। माता का स्वास्थ्य, पिता का अर्थ संतुलन बुरी तरह गड़बड़ा देते है। अभावग्रस्त परिस्थितियों के बीच पलकर वे समुचित देख-रेख के के अभाव में दुर्गुणी बनते जाते है और अंधकारमय भविष्य के कीचड़ में क्रमशः धँसते ही चले जाते है। व्यापक परिस्थितियों को देखते हुए तो यह उचित प्रतीत होता है कि पचास-चालीस वर्ष तक तो कोई इन परिस्थितियों में बच्चे उत्पन्न करने की बात ही न सोचे। सोचे भी तो एक पर्याप्त माना जाता चाहिए। बहुत कुछ तो दो। अधिक बच्चों वाला परिवार अब कदाचित ही कोई समुन्नत और सुसंस्कारी रह सके, कदाचित ही सुख-चैन के दिन बिता सके।
कोई समय था जब परिवार का एक सदस्य कमाता था और सारा घर मजे में गुजारा करता था, पर अब इस घोर महँगाई के जमाने में स्थिति सर्वदा बदल गई है। अब घर के हर सदस्य को अपनी-अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुरूप कुछ न कुछ कमाने की-बचाने की बात सोचनी चाहिए। अच्छा हो हर परिवार में कोई गृहउद्योग चले, जिसमें अर्थ लाभ से ही अपना कौशल बढ़ाते रहना और व्यस्त रहने की सुविधा प्राप्त होती रहे। ठाली बैठे रहने वाले आमतौर से कुसंग में अपने लिए जगह बनाते हैं, आवारागर्दी में घूमते रहते है। बुरी आदतों के शिकार बनते है और अन्ततः अपने को, संपर्क -क्षेत्र को अपार हानि पहुँचाते है। इसलिए आत्म विकास की, परमार्थ की ललक न जगा सके तो भी अधिक उपार्जन को आगे रखकर हर वयस्क सदस्य को कुछ कमाने में, उत्पादन बढ़ाने में संलग्न रहना चाहिए। खाली समय में ही शैतान का आक्रमण होता है इस उक्ति को ध्यान में रखते हुए सफाई से लेकर आजीविका बढ़ाने तक के किसी न किसी सृजनात्मक कार्य में लगे रहने का अभ्यास डालना चाहिए। जहाँ यह बोध होगा कि पैसा किस प्रकार कितने परिश्रम से कमाया जाता है, उनका फिजूलखर्ची के लिए हाथ बढ़ेगा नहीं, कुमार्ग पर पैर बढ़ेगा नहीं। अर्थ संतुलन की दृष्टि से इस प्रवृत्ति का पनपना हर दृष्टि से श्रेयस्कर है। घर के हर सदस्य को स्वावलंबी और सुसंस्कारी बनाने का समुचित ध्यान रखा जाय, तो बड़ी पूँजी छोड़ मरने की अपेक्षा कहीं अधिक दूरदर्शिता की बात होगी।
उचित तरीकों से अधिक कमाने में हर्ज नहीं। हानि तो अपव्यय में है। अधिक कमाई राशि को
पुण्य-परमार्थ में लगाना चाहिए। इन दिनों सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन व्यक्ति और समाज के हित को देखते हुए नितान्त आवश्यक है। इन प्रयोजनों में जितना अधिक लगाया जा सके उतना ही कम है।
खर्च की सीमा निर्धारण उस अनुपात में होना चाहिए जितनी आमदनी है। खर्चे में यदि आमदनी बढ़ाना संभव न हो, तो खर्चे तो निश्चित रूप से घटाये जा सकते है। भोजन, वस्त्र जैसी भौतिक आवश्यकताएँ यदि औसत नागरिक स्तर पर नियन्त्रित रखी जा सकें तो उतनी राशि से काम सकता है, जिसे समर्थ लोग समग्र लोग समग्र परिश्रम के सहारे आसानी से जुटा सके। कठिनाई तब खड़ी होती है जब संपन्नों की नकल करने का मन चलता है और वैसे ही ठाटबाट खड़े करने के लिए जो मचलता है। खर्चीली रीति-नीति अपना लेना तो अति सरल है; पर उसके लिए आवश्यक साधन जुटाने का मानस भी तो बनना चाहिए। अनीति से कमाने और ठाट-बाट में खर्च करने की अपेक्षा और कहीं अधिक अच्छा है कि सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाई जाय। जितना संभव है उतने उपार्जन को ध्यान में रखते हुए खर्च करने की सीमा मर्यादा निर्धारित की जाय। बुद्धिमानी और दूरदर्शिता इसी में है।
काम की गति धीमी होना, लापरवाही बरतना, समय को ज्यों-त्यों गुजारना, अन्यमनस्क रहना, काम को कम महत्व देना, आलस्य और उपेक्षा अपनाये रहना जैसे दुर्गुणों के रहते कोई सुसंपन्न नहीं बन सकता, उसेस दरिद्रता घेरे रहेगी। साथ ही पिछड़ापन भी सिर पर चढ़ा रहेगा। जिन्हें आर्थिक स्थिति सही रखने का सचमुच ही मन है। उन्हें अपनी अनगढ़ आदतें सुधारनी चाहिए। सही स्तर का व्यक्ति अपनी स्थिति हर क्षेत्र में सही बनाये रहता है। आर्थिक क्षेत्र में तंगी उन्हें उठानी पड़ती है जो उत्पादन में उपेक्षा और फिजूलखर्ची में उत्साह दिखाते रहते है। आदतें सुधर जाने पर हर किसी का आर्थिक स्थिति सही बन सकती है। न उसे किसी के आगे हाथ पसारना पड़ेगा और न चोरी ठगी जैसी अनीतियों पर उतरना पड़ेगा। औसत स्तर का निर्वाह किसी भी परिश्रमी और सुनियोजित जीवन जीने का निश्चय किए हुए व्यक्ति के लिए तनिक भी कठिन नहीं पड़ना चाहिए दरिद्रता मनुष्य पर कोई लादता नहीं है। वह तो दुर्गुणी द्वारा निमन्त्रण देकर बुलाई हुई अतिथि भी होती है। स्मरण रहे दरिद्रता की तरह अमीरी भी इन दिनों अभिशाप मानी जाती है। दोनों की ही गणना असंतुलित परिणतियों में की जाती है। दुर्बलता बुरी है; पर शरीर का असाधारण रूप से फूलकर भारभूत बन जाना भी तो कम बुरा नहीं है। इस संदर्भ में शास्त्रकारों का वह परामर्श पूरी तरह सटीक बैठता है जिसमें कहा गया है कि कमाने की अपेक्षा खर्चने में सौगुनी बुद्धिमत्ता चाहिए। किसी व्यक्ति के खर्च करने का ढंग देखकर चरित्र और स्तर का अनुमान कोई भी सरलतापूर्वक लगा सकता है।
अर्थ को धुरी मानकर जीवन के अनगिनत संदर्भों को भी उसके साथ जोड़ा जा सकता है और सर्वतोमुखी प्रगति का अभ्यास किया जा सकता है। अर्थ संयम सध सके तो इन्द्रिय संयम, समय और विचार संयम भी सध सकता है। इस आधार पर सामान्य जीवन में सरल जीवन सधने का उपक्रम चलाया जा सकता है। समय की बरबादी और दरिद्रता का सीधा सम्बन्ध है। जो नियमित दिनचर्या बनाकर व्यस्तता को अपना प्रिय बनायेगा, उसका उत्पादन समग्र प्रगति को ढाँचा खड़ा करता रहेगा। सुविकसित व्यक्तियोँ ने इसी आधार पर अपनी जीवनचर्या का ढाँचा और अनेकानेक अवाँछनीयताओं से बचते हुए ऐसी प्रगति का सरंजाम जुटाया है जिस पर अपने को गर्व और दूसरों को हर्ष की अभिव्यक्ति का अवसर मिल सके।
पतन और पराभव के अनेकानेक निमित्त कारण उन दुर्गुणों की ही उपज है, जिन्हें अनगढ़ लोग आलस्य और प्रमाद से ग्रस्त रह कर उत्कर्ष के खेल में विषबेल की तरह उगाते है और फिर समयानुसार उनके कारण अनेक अनर्थों का सामना करते है, इस जिए पिछड़ेपन की तरह उद्धत अपव्यय को भी समान रूप से ‘निन्दनीय’ माना गया है। दरिद्री और अर्थ संयमी में अन्तर है। आदर्शवादी लोकसेवी दरिद्री नहीं, संयमी होते है। अर्थ दैनिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है उसके लिए आवश्यक उत्पादन और साथ ही श्रेष्ठतम सदुपयोग का ध्यान रखकर योजनाबद्ध जीवन-चर्चा अपनाने वाले अन्य क्षेत्रों में भी सद्गुणी बनते है। उनकी शालीनता हर दिशा में, हर घड़ी बढ़ती ही जाती है। नाड़ी देखकर रुग्णता और स्वस्थता की जाँच की जाती है। किसी के कमाने और खर्चने का ढंग बारीकी से देखने पर यह जाना जा सकता कि इसका व्यक्तित्व रुग्ण है या स्वस्थ। इस का भविष्य उत्कर्ष की ओर चला रहा है या आये दिन अधःपतन के गर्त में गिर रहा है।
चम्पारन जिले में सत्याग्रह चला रहा था। गाँधीजी उसके संचालक थे। कलक्टर का दफ्तर कुछ दूर था। गाँधी जी को आये दिन कई आवश्यक सूचनाएँ कलक्टर तक पहुंचानी पड़ती थी।
डाक ले जाने वाले चपरासी का काम प्रो. कृपलानी करते थे। उनकी शिक्षा, चतुरता और सूझबूझ की कलक्टर बहुत प्रशंसा सुन चुका था। पर उसे यह पता न था कि डाक लाने वाला व्यक्ति ही कृपलानी है।
संयोगवश एक दिन उसने कृपलानी जी को पहचान जिया। उनसे शिक्षा, विद्वता आदि के बारे में प्रश्न करने लगा।
कृपलानी जी ने सहज नम्रता और मुस्कान के साथ कहा-”मैं तो गान्धीजी का मुस्तैद चपरासी भर हूँ। यही मेरी योग्यता है।”
हातिम को अपने वैभव और दान का बड़ा अहंकार था। एक दिन उनने किसी तत्वज्ञानी सन्त को अपने यहाँ, बुलाया और उनके मुख से अपनी प्रशंसा सुनने की आशा रखी।
सन्त ने महल पर तो एक बार ही उड़ती नजर डाली। पर आकाश को और धरती को बड़ी बारीकी से कई बार देखा।
हातिम ने आश्चर्यपूर्वक इसका कारण पूछा। सन्त ने कहा-”मैं ऊपर इसलिए देख रहा था कि इस विशाल आकाश के नीचे तेरे जैसे कितने मनुष्य हो सकते हैं। तेरा क्षेत्र तो छोटा-सा है।”
“जमीन को इसलिए देख रहा था कि इसमें तेरे जैसे करोड़ों की कब्र बन चुकी है और आगे भी न जाने कितनी बनेंगी।” हातिम का गर्व गल गया, उसने सन्त से निरहंकारिता का पाठ पढ़ा।
क्रान्ति की निरन्तरता ही धर्म है। हमें अपने विकास के लिए-इस जीवन के माध्यम से ही-अपने धार्मिक होने का प्रमाण देना होगा। सामाजिक आदर्शवादी लोग, आदर्श और वास्तविकता के बीच दा व्यवस्थाओं के संघर्ष में विश्वास रखते हैं- जो सारे धर्मों का सार है। आवश्यक परिवर्तन और संघर्ष का यह क्रान्तिकारी क्रम चलता ही रहता है। बुद्ध ने संसार के दुःख और कष्टों को देखकर उन्हें संसार से समाप्त करने का प्रयत्न किया। उनने उसकी उपेक्षा या व्याख्या भर नहीं कर दी, बल्कि एक पक्के क्रांतिकारी की तरह उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न किया। ईसा ने अनुभव किया कि स्वर्ग का साम्राज्य इस संसार के मुकाबले पर डटा है। सेण्टपॉल की दृष्टि में इस संसार की शक्तियाँ आत्मा की शक्तियों के मुकाबले में सन्नद्ध है। आंगस्टाइन की नजर में पार्थिव शक्ति परमात्मा के नगर के विरुद्ध युद्ध कर रही है। धर्म संसार की सत्ता आत्मशक्ति को ला बिठाने के लिए एक चुनौती है। यह सब तथ्य मनुष्य का इसलिए आह्वान करते है कि वह परीक्षण करे और अभियान का क्रम अपनाए।
स्वयं परमात्मा एक सर्वोच्च क्रांतिकारी है। वह स्पष्ट और पालनकर्ता के साथ एक विनाशकर्ता भी है। सृजन और विनाश दैवी शक्ति के परस्पर आश्रित गुण है। यदि एक नई और अपेक्षाकृत अच्छी व्यवस्था खड़ी होनी हो तो पुरानी व्यवस्था को तोड़ फेंकना होगा। हम न केवल आध्यात्मिक जगत में अपितु राजनीतिक, सामाजिक, औद्योगिक जगत में भी ऐसी रूढ़ियों से घिरे हैं, जो कभी जीवित थीं,परन्तु अब निर्जीव हो चुकी हैं। अब केवल शासकीय उपायों से काम नहीं चलेगा। इस समय आवश्यकता एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की, आमूल-चुल उथल-पुथल की है। थोड़ी-सी भी फसल के लिए भूमि की जुताई करनी पड़ती है। वांछित उपलब्धि के लिए समाज की बौद्धिक, नैतिक और भौतिक अनेक जुताइयाँ आवश्यक है। इस प्रकार की जुताई के साधन, जिनके द्वारा प्रगति होती है, वही है जिन्हें विद्रोह, विप्लव या क्रान्ति कहा जाता है। इसके स्वरूप को समयानुसार बदला भले जाता रहे, पर विशाल परिवर्तन के लिए इनसे बचा नहीं जा सकता। बल्कि इसके इसके लिए एक संतुलित व्यवस्था का ताना-बाना अदृश्य शक्तियाँ बुन रही है।
सब सुधार उन आन्दोलनकारी, विद्रोही और क्रान्तिकारी लोगों द्वारा किए गए है, वे नए पाखण्डों के जगत के खिलाफ युद्ध करते रहे हैं। आन्दोलन शुरू करते हैं। नए धर्म विज्ञान का प्रतिपादन करते है। नए संविधानों की नींव डालते है। धर्म इस महत्वपूर्ण कार्य को अपनी महान सामर्थ्य के द्वारा सदा से करता आया है। ईसा ने पुरोहितों के पाखण्ड के विरुद्ध साम्राज्यवादी रोम की दूषित परम्पराओं के विरुद्ध और अपने समय की रूढ़िवादिता, भ्रष्टाचार के विरुद्ध विद्रोह किया।
वह सामाजिक आवेश जो इन महान नेताओं को बल और प्रेरणा देता है, धार्मिक उत्साह के विपरीत नहीं है। बल्कि इसे तो धार्मिकता का स्वाभाविक परिणाम कहना होगा। सही अर्थों में धार्मिक-चेतना अनीति, अनाचार, अन्याय सहन नहीं कर सकती। धार्मिक सन्त, पैगम्बर,महापुरुष जिनकी आत्माएँ अत्याचार, अन्याय देखते ही भड़क उठती हैं, वे लोग हैं, जिन्होंने मानवता के प्राण-तत्व पर सबसे गहरी छाप छोड़ी है।
केवल इसलिए कि हमारी रुचि सामाजिक है, यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हमें स्वयं को आध्यात्मिक क्षेत्र से अलग कर लेना चाहिए। आध्यात्मिक सजगता और सामाजिक दक्षता न केवल परस्पर संगत है, अपितु एक-दूसरे के पूरक भी। आध्यात्मिक पक्ष की उपेक्षा करना, सुचारु रूप से कार्य करने की अपनी क्षमता को सीमित कर लेना है। जब तक मानवता निष्कृष्ट, कठोर और अपरिष्कृत है, उसे पिघलाया और ढाला नहीं जा सकता। ईश्वर पर विश्वास करने वालों की श्रद्धा ही वह स्थिति पैदा करती है, जिसके प्रभाव से कठोर हृदय व्यक्ति भी पर दुःख द्रवित हो उठता कराती रही है। विचार-क्रान्ति का तत्वदर्शन यही है। जिसकी प्राण-ऊर्जा कल के परिवर्तित समाज का जीवनाधार बन रही है।
सुनो अनेकों की। पर अपनाओ उन्हीं की जो न्यायोचित दीखे। लोगों का अविवेकी बकवाद तुम्हें भ्रान्त-धाराओं में न उलझा दे। इसलिए हर कथन की उपयोगिता का विवेक बुद्धि से परीक्षण करो।
मानव विकास की समस्त संभावनाओं का उद्गम स्थल उसका अपना मन है। अध्यात्मवेत्ता इसे ही बन्धन-मोक्ष का कारण बताते है। मनोविज्ञानी भी अब इस तथ्य को स्वीकारने लगे है और मनःसंस्थान की गहन खोज में निरत है। उन्होंने इसे सचेतन, अचेतन और अतिचेतन के स्तरों में विभाजित किया है। सचेतन वह स्तर है जिससे जाग्रत अवस्था में रोजमर्रा के सारे कामों का संचालन होता है। अचेतन में संस्कार आदतें समायी होती है। सोते-सोते अंतरंग की गतिविधियों का संचालन भी इसी से होता है। इन दोनों से परे सबसे गहरी और आखिरी परत को अति चेतन कहा गया है।
इस अतिचेतन की मूल प्रवृत्ति उत्कृष्टता से भरपूर है। श्री अरविन्द ने अपनी अनुभूतियों के आधार पर इसे पाँच भागों में निरूपित किया है। पहला है, ‘उच्च मन,’ जो ज्योतिर्मय चिन्तन के माध्यम से प्रकट रूप से संसार में समाये सत्य को अनुभव कराता है। दूसरी ऊँची ‘परत प्रबुद्ध मन’ है जिस के द्वारा शान्ति, शक्ति, ज्योति एवं सत्य प्रतिफलित होता है। इसके द्वारा सत्य को देखा या सुना जा सकता है। इसके ऊपर तीसरा स्तर है। ‘प्रज्ञामानस’ का, जहाँ ज्ञान-ज्ञाता व ज्ञेय में कोई भेद नहीं रह जाता है। व्यक्ति सत्य के साथ गहन तादात्म्य स्थापित कर लेता है।
इसके भी ऊपर जो स्तर है-अरविन्द ने उसका नाम रखा है-’अधिमानस’ (ओवर माइण्ड) यहाँ तक विकास करने पर पहले अनुभूति में-फिर उपलब्धि में परम तत्व का साक्षात होता है। इस समीपता के बाद सायुज्यता का भाव आता है। इस एकता के बाद चेतना के सबसे गहरे स्तर ‘अतिमानस’(सुप्रामेण्टल)की ओर बढ़ा जाता है। इस स्तर को पाने पर सभी कुछ सत्य व संगीतपूर्ण है इसका साफ-साफ अनुभव होने लगता है। वैदिक ऋषियों ने इसी स्तर में पहुँच कर “सर्व खिल्विदं ब्रह्म” का अनुभव किया था।
भारतीय चिन्तन में बताये गए मानसिक विकास के इस क्रम को अब पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे है। उन्होंने सचेतन-अचेतन के उलझाव से परे अतिचेतन के उच्चस्तरीय स्तरों की बात को भी स्वीकारा है और इस उपलब्धि को जीवन का ध्येय भी माना है। वस्तुतः कार्य कौशल से लोक-व्यवहार बनता है। बुद्धि विवेक से ठीक-ठीक निर्णय होते है। पर अन्तराल तो समूचे व्यक्तित्व का अधिष्ठाता है। इसकी परिष्कृत और विकसित स्थिति सामान्य मनुष्य को ऋषि देव मानव स्तर तक पहुँचने में समर्थ होती है। अपने भीतर विद्यमान इस देवलोक का महात्म्य अध्याक्त्ता सदा से बताते चले आ रहे हैं। उन्होंने उसकी अनुकम्पा उपलब्ध करके जीवन लाभ देने वाले अनेक प्रतिपादनों को समझाया है। सिद्धान्त और प्रयोग दोनों की उन्होंने गढ़ा, परखा और प्रचलित किया है।
तत्व विज्ञानी-नीतिशास्त्री-मनोविज्ञानी सभी इस मिले-जुले निष्कर्ष पर पहुँच रहे है कि पतन-पराभव से छूटने वरिष्ठता-उत्कृष्टता को उपलब्ध करने के लिए अति-चेतन की उच्चस्तरीय परतें खोजी-कुरेदी जानी चाहिए। पैरा साइकोलॉजी आदि माध्यमों से पिछले दिनों अचेतन की महत्ता बखानी गई है। विशेषज्ञों ने उसे जगाने-उभारने के लिए तरह-तरह के प्रयोगों की चर्चा की है। दूर-दर्शन दूरश्रवण, विचार संचालन, भविष्य ज्ञान जैसे कितने ही कला-कौशल इस संदर्भ में खोजे और परखे गए है। इस दिशा में प्रयास करने वाले परामनोविज्ञान वेत्ता इस स्तर की सीमा-बद्धता और अल्पता को समझ गण् है। आज वे इस बात पर जोर दे रहे है कि अचेतन से असंख्य गुना क्षमता वाले अति चेतन को नए सिरे से समझा और खोजा जाय। उसके अभ्युदय-अभिव्यक्ति का प्रयास किया जाय। वे मानने लगे है कि उक्त क्षेत्र की उपलब्धियाँ व्यक्ति और समाज में उच्च स्तरीय परम्पराओं का समावेश और नूतन युग का सूत्रपात कर सकने में समर्थ हो सकती है।
‘साइकोलॉजी ऑफ इंट्यूशन” नामक अपनी कृति में प्रख्यात मनोविज्ञानी ए.मिली-माइकाल्ट ने बताया कि अतिचेतन मन शरीर एवं व्यक्तित्व की चेतना का अति सूक्ष्म एवं तर्क बुद्धि से जो निष्कर्ष निकाले जाते है उनसे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण समाधान उच्च-चेतन मन की सहायता से मिल सकता है। इस तन्त्र की उजागर करने का मतलब है एक ऐसे देवता का साथ पा लेना जो सिर्फ सलाह ही नहीं देता, वरन् सहायता भी करता है।
ख्यातिलब्ध हैम्फ्री अपने ग्रन्थ “वेर्स्टन एप्रोच ट्र मैन” में कहते है कि “बुद्धि-वैभव से इस संसार की जो सेवा हुई है, उसकी तुलना में उच्च चेतन की सहायता से थोड़े से लोगों ने जो काम किया है, उसकी तुलना नहीं हो सकती। एक महामानव हजार प्रवक्ताओं से बढ़कर होता है। इसी प्रकार एक महामनस्वी के द्वारा बनाया गया वातावरण हजारों अधिकारियों तथा अध्यापकों की तुलना में अधिक प्रभावोत्पादक सिद्ध होता है। मनीषियों का दायित्व है कि जिस तरह प्रकृति के रहस्यों की खोज कर सुविधा-संपन्नता में वृद्धि की गई है, उसी प्रकार वे अन्तराल की उत्कृष्टता को खोजने-बढ़ाने तथा लाभान्वित होने के लिए जन साधारण का मार्ग-दर्शन करें।”
सुप्रसिद्ध दार्शनिक हेनरी बर्सो का कथन है-समय की जटिलताओं को न सुविधा सम्वर्धन से-न दाव-पेंच से और न बुद्धि चातुर्य से सुलझाया जा सकेगा। प्रस्तुत जटिलताओं कर समाधान पाने के लिए उस महाप्रज्ञा को जगाने की जरूरत है जो अन्तःकरण की गहराइयों में बसती है और ईश्वरीय प्रेरणाओं से मनुष्य को अवगत कराती है।
विलियम मैकडूगल के मतानुसार-अचेतन से भी ऊँची परत-अतिचेतन या उच्च चेतन की अभी जानकारी भर मिली है। अगले दिनों उसे अच्छी तरह जाना-समझा जा सकेगा। तब यह समझ में आ सकेगा कि सामान्य जीवन क्रम का सूत्र संचालन करने वाले अचेतन की कुँजी इस अंतःचेतना के पास ही है। अगले दिनों जब उच्च चेतन का स्वरूप व उपयोग ठीक प्रकार समझा जा सकेगा तब व्यक्तित्वों के प्रतिभाओं के क्रान्तिकारी परिवर्तनों के सम्बन्ध में वैसी कोई कठिनाई न रहेगी जैसी आज है।
मानव-जीवन में विकास की उच्चस्तरीय सम्भावनाएँ मन की उच्चस्तरीय परत अतिचेतन की असीम क्षमता को आज जिसे पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक खोजने में लगें है, ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व अपने अनुभवों और प्रयोगों के आधार पर जान लिया था। आधुनिक युग में मानसिक विकास की उन अवस्थाओं की सिलसिले वार व्याख्या श्री अरविन्द ने अपनी कृतियों “लाइफ डिवाइन” “सिन्थेसिस ऑफ योग“ आदि में करके ऋषि चिन्तन को एक वैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित किया है। उनके अनुसार मन में निहित विकास की इन उच्च अवस्थाओं को प्रकट करने के लिए शारीरिक, मानसिक एवं व्यावहारिक परिष्कार करने की जरूरत पड़ती है। गुण, कर्म स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश करना पड़ता है। महर्षि अरविन्द की सहयोगिनी श्री माँ के शब्दों में इसके लिए सरल तरीका है-अपनी एकाग्रता को प्रगाढ़ बना लेना। काम-छोटा हो या बड़ा उसे समूची एकाग्रता पहले अचेतन की शक्तियोँ को प्रकट करती है। धीरे-धीरे इसके अन्तर्मुख होने पर अतिचेतन की एक-एक परतों के रहस्य उजागर होते जाते है।
इस तरह प्रत्येक क्षण का उपयोग विकास के साधन के रूप में किया जा सकता है। जीवन के सामान्य कार्यों में भी इसकी पवित्रता प्रखरता की झलक आने लगती है।
परमात्मा ने हमें उच्चस्तरीय मानसिक एवं आत्मिक चेतना के जिस अगाध सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बन पाया है, उसे यों ही कुसंस्कारों की मिट्टी धूल से ढँका रहना ठीक नहीं है। इसके लिए ऋषियों -महामानवों द्वारा बताए गए कारगर, परिष्कार उपायों को सतत् अभ्यास उपयोग उपयोग में लाकर देव-मानव स्तर का विकसित जीवन प्राप्त किया जा सकता है नर से नारायण बनने का जीवन लक्ष्य साधा जा सकता है।
निर्माण का महल त्याग की नींव पर खड़ा किया जाता है व्यक्ति हो या राष्ट्र जो भी बड़े बने है उन्हें त्याग करना पड़ा है।
एक खेल में चिड़िया का घोंसला था। बच्चे बड़े हो चुके थे। किसान रोज खेत पर आता और उस पके खेत को काटने की योजना बनाता। पर चिड़िया बच्चों को सान्त्वना देती रहती कि अभी डरने की कोई बात नहीं है। खेत नहीं कट सकता।
एक दिन फिर किसान का फेरा लगा। उस दिन पत्नी भी साथ थी। बैठ कर सलाह करने लगे। न नौकर मिलता है और न पड़ोसी सहायता करने को तैयार होते है। अब हम दोनों को ही मिलकर खेत काटने पर जुटना चाहिए।
चिड़िया को बच्चों ने सूचना दी तो उसने बच्चों को अन्यत्र ले जाने का प्रबन्ध किया।
इस पर बच्चों ने पूछा आज तुमने तत्काल प्रबन्ध क्यों किया? चिड़िया ने कहा जब तक कोई दूसरे के भरोसे रहता है तब तक उसे निराशा का सामना करना पड़ता है पर जब वह स्वयं कटिबद्ध हो जाता है तो काम पूरा हो जाता है।
हमें यह भली भाँति समझ लेना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी-नारी युग का संदेश लेकर आ रही है। अंधकार युग के दिन अब अपनी अन्तिम सांसें भी तोड़ने लगे है। नारी की वर्तमान दुर्गति भरी स्थिति देर तक बनी रह सकती। विश्व का जाग्रत विवेक अनौचित्य का सार्वजनिक प्रचलन स्वीकार नहीं कर सकता। राजतन्त्र, सामंतवाद आदि के आतंक और शोषण पर आधारित प्रचलनों का अन्त हो गया। दास प्रथा इसलिए नहीं चली कि गुलामों ने मालिकों को लड़कर हराया था। बल्कि विश्व के जाग्रत विवेक ने पीड़ित पक्ष की हिमाकत की और शोषकों के खूनी पंजे बेहतर रख दिए। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में दास प्रथा विरोधी और समर्थक गोरों के बीच ही इस प्रश्न को लेकर गृहयुद्ध हुआ था और उस प्रचलन की कानूनी मान्यता समाप्त हुई थी।
आवश्यक नहीं कि शोषित वर्ग स्वयं ही समर्थ शोषकों को परास्त करे। उनकी हिमायत और वकालत के लिए युग विवेक की क्षमता दिनों दिन उभरती बढ़ती चली आ रही है। विस्मार्क, क्रोपाटिकिन, नेहरू आदि शोषित वर्ग के नहीं थे तो भी उनने शोषकों के पैर तोड़ने में डट कर मोर्चा लिया था। अपने देश में ही हरिजनों को आदिवासियों को, गई गुजरी स्थिति से उबारने में उनका प्रतिरोध संघर्ष नहीं, जनमानस का न्याय समर्थन ही उभरा है। बाल विवाह, कन्या विक्रय, वर विक्रय, बंधुआ मजदूर, बेगार प्रथा, आदि का अन्त पीड़ितों को पराक्रम ने नहीं, जाग्रत विवेक ने किया है। रंग भेद की कलुषित नीति बरतने वाले गोरे अब कालों के सामने उखड़ते चले जाते है। इसका कारण सामर्थ्यों की कमजोरी नहीं वरन् न्याय समर्थक लोकमत का प्रबल दबाव ही प्रधान कारण बन रहा है।
नारी के प्रति बरती गई अनीति में पुरुष का अहंकार और शोषक दृष्टिकोण ही निमित्त रहा है। समय आ गया है कि उस राह को छोड़ा जाय और पिछली भूलों का प्रायश्चित्त किया जाय। पिछले दिनों गिराने में जितना चातुर्य, कौशल और उद्धत पौरुष लगा है। अब उससे सदाशयता भरे उत्साह से क्षतिपूर्ति की बात सोची जानी चाहिए।
क्षतिपूर्ति का दायित्व पुरुषों को ही उठाना पड़ेगा। सवाल विवाहित-अविवाहित का नहीं हैं, सम्बोधन पुरुष मात्र को है। इसी में उसकी सज्जनता, सद्भावना एवं समय को पहचानने वाली दूरदर्शी विवेकशीलता का परिचय मिल सकता है। पाप का प्रायश्चित्त और अनीति का परिमार्जन इसी में है। नारी को समुन्नत बनाने में पुरुषों का असामान्य उत्साह के साथ प्रयत्नरत होना चाहिए। इसी में उसका स्वार्थ और परमार्थ जुड़ा हुआ है।
स्वार्थ इसलिए कि समुन्नत नारी के सहयोग से अभीष्ट में अधिकाधिक लाभ उठाने का अवसर उसी को मिलेगा। समर्थ-सहयोगी, गृह–व्यवस्थापक, पारिवारिक स्नेह, सौजन्य के संस्थापक पीड़ितों के उन्नायक साथी की उपलब्धि उसे ही होती है। गले में बँधे हुए पत्थर को देव प्रतिमा के रूप में बदलने और सघन वरदानों से लदने का लाभ उसे ही मिलना है। अस्तु उसका दूरगामी स्वार्थ इसी में है कि पत्नी को ही नहीं पूरे परिवार की, परिवार ही नहीं पूरे समाज की नारी को समुन्नत बनाने के लिए जो कुछ बन पड़े, उसे पूरे सद्भाव, मनोयोग, श्रम-समय, प्रतिभा आदि के समस्त अनुदानों को उसमें नियोजित कर दिया जाय।
परमार्थ इसलिए कि दुर्भिक्ष पीड़ितों से भी अधिक दुखी-मानवी अधिकारों से वंचित रहने की प्रताड़ना सहते हुए सुविस्तृत जनसमूह को समुन्नत बनाने का प्रयास बड़े धर्म, पुण्यदान-अनुदान से बढ़कर है। इसमें पीड़ा निवारण और सुविधा सम्वर्धन के दोनों तत्व पूरी तरह जुड़े हुए है। रोटी-कपड़ा बाँटने की तरह दृश्यमान दान-पुण्य तो यह नहीं है और न पाने वाले द्वारा जय जयकार सुनने को मिलेगा। फिर भी परिणाम की दृष्टि से इसकी तुलना संसार के श्रेष्ठतम परमार्थ से ही की जा सकती है।
प्रायश्चित के लिए अनिवार्य रूप से परमार्थ करना पड़ता है। पाप की निवृत्ति पुण्य के सम्वर्धन से ही सम्भव होती है। हजारों सालों से पुरुषों द्वारा स्त्रियों का जो शोषण-क्रम चला है उन संचित पापों की निवृत्ति के लिए वर्तमान पीढ़ी को उसी प्रकार तप करना चाहिए जैसा कि भगीरथ ने अपने पुरखों के पाप-निवारण के किया था। सगर के सौ बेटे महर्षि कपिल के शाप से नष्ट हुए थे और वे नरक की अग्नि में जल रहे थे। भगीरथ ने तप करके उनका उद्धार कराया था।
पिछले दिनों नारी को पराधीन-पददलित करने के समर्थन में बौद्धिक जाल जंजाल बुनने वाले लेखक प्रतिपादक,दार्शनिक भी कुंभीपाक, नरक में पड़े जल रहे होंगे। इसी प्रकार जिनने उस उन्नति को कार्यान्वित करने के लिए अग्रिम कदम उठाए, दुष्ट मान्यताएं प्रचलित करने में आगे रहे थे। वे सबके सब निश्चित रूप से परलोक में दुर्गति के भागी बने हुए है। इनके उद्धार का प्रयत्न अपनी भागीरथी पीढ़ी को करना चाहिए। ऐसा तप करने में निमित्त जो भी भी बने हों, हमें तो उत्थान के प्रचलन की ही भूमिका निभानी है। महाकाल ने यह काम हम सबके कंधे पर डाला है, तो उसमें पीछे हटने,कायरता बरतने में शोभा नहीं है।
पुरुष हो या स्वयं स्त्रियाँ जिनमें तनिक-सी भी जाग्रति है। जिनके कान परमात्मा की वाणी को सुन समझ रहे है उनमें से प्रत्येक का यह उत्तरदायित्व है। अनीति करने वाले की तरह अनीति सहने वाले को भी दोषी ठहराया गया है। रिश्वत लेने की तरह रिश्वत देना भी अपराध है। अन्याय इसलिए बढ़ता है क्योंकि उसके विरोध में सिर उठाने वाला साहस मूक, बधिर,पंगु बना पड़ा रहता है। असहयोग, विरोध संघर्ष के छोटे बढ़े कदमों में से जिनसे जो बन पड़े उसका उपयोग करना चाहिए। सहन करने में तो अत्याचारी का साहस बढ़ता है। उसे और भी बढ़ी-चढ़ी अनीति करने का साहस मिलता है। संसार में अनीति इसलिए नहीं बढ़ता है। उसे और भी बढ़ी-चढ़ी अनीति करने का साहस मिलता है। संसार में अनीति नहीं बढ़ी कि दुरात्माओं की ताकत अधिक थी। बल्कि उसका विस्तार इसलिए हुआ क्योंकि उत्पीड़कों में विरोध प्रतिरोध का साहस नहीं रहा।
बकरियाँ पालतू बन गई पर हिरनों पर यह प्रयोग उतना सफल नहीं हुआ। दोनों की जाति और स्थिति में थोड़ा-सा ही अन्तर है। कुत्ते और सियार एक ही जाति के है। बिल्ली और बन-बिलाव में नाम मात्र का अन्तर है। एक ने मनुष्य की दासता स्वीकार कर ली। दूसरे ने नहीं की। समर्थ होने के कारण प्राझा तो लिए जा सकते है पर वशवर्ती नहीं बनाया जा सकता। अतएव दुष्टों की तरह दुर्बल भी दोषी माने गए है। यह बात दूसरी है कि किसी का पाप भारी किसी का हलका माना जाय।
आज की स्थिति में अशिक्षा, व्यस्तता, आत्महीनता और प्रतिबंध की बेड़ियों से बँधी जकड़ी नारी को समर्थन सहयोग की सख्त जरूरत है। थोड़ा-सा सहयोग पाते ही वह स्वयं अग्रिम मोर्चा सम्भाल लेगी। फिलहाल तो इस काम में पुरुषों को स्वतः पहल करनी होगी। अच्छा हो शुरुआत अपने घर से हो और दायरा बढ़ता हुआ समाज को भी समेट ले।
अभियान के सभी कामों की पृष्ठ भूमि बनाने से लेकर साधन खड़े करने तक के सारे सरंजाम उसे ही जुटाने पड़ेंगे। अच्छा हो वह सरंजाम जुटाकर अपनी घनिष्ठ आत्मीय महिलाओं को आगे कर दें। मोर्चे पर लड़ते तो सैनिक है पर उनके लिए खाना, कपड़े, संचार, वाहन, उपकरण, दवादारु, प्रशिक्षण मार्गदर्शन आदि सारे साधन सरकार जुटाती रहती है। पुरुषों को भी पीछे रहकर अभियान का सूत्र संचालन करना चाहिए और अपने प्रभाव क्षेत्र को नारियों को अग्रिम मोर्चा सम्भालने का प्रत्यक्ष काम करने के लिए समाज के नव निर्माण के क्षेत्र में उतारना चाहिए।
इसमें उनमें दायित्वबोध बढ़ेगा आत्म विकास के अंकुर फूटेंगे। धीरे-धीरे वे सारी क्षमताएँ जन्म लेंगी जिसके आधार पर वे नारी शताब्दी का सशक्त नेतृत्व कर सकें। पुरुष भी युगनियन्ता द्वारा निर्देशित इस प्रायश्चित तप को करके, श्रेय के भागीदार तो बनेंगे अनुदानों-वरदानों का भरापूरा जखीरा उन्हें उपहार में मिलेगा।
बुढ़ापा मन की वह दशा है, जिसमें सब कुछ हाथ से जाता दीखता है। जवानी वह है जिसमें कमाने और बढ़ाने की उम्मीदें उछलती रहती है। आयु से बुढ़ापे और जवानी की नाप-तोल करना व्यर्थ है।
समर्थ गुरु रामदास उन दिनों किशोर थे। घर वालों ने विवाह की तैयारियाँ पक्की कर लीं। समर्थ असमंजस में थे कि वे किस प्रकार अपना जीवन परमार्थ में लगा सकेंगे। विवाह हो जाने के बाद तो वे फिर नाम मात्र के ही परमार्थ के लिए समय निकाल सकेंगे।
संकोचवश वे अपने मन की बात ,खगोल कर कह भी नहीं पा रहे थे। पर जब देखा कि समय हाथ से निकला जा रहा है और विवाह कृत्य कराने वाला पुरोहित भी ‘सावधान कहकर कड़ी चेतावनी दे रहा है उनने उस संकेत का अभिप्राय मुख्य रूप से अपने लिये समझा और सचमुच ही सावधान हो गये। विवाह होने से पूर्व ही वे भाग खड़े हुए और परमार्थ प्रयोजनों में निश्चयपूर्वक लग गये।
बुद्ध का एक शिष्य था-श्रोण। जब वह राजकुमार था, तो उसका जीवन अन्य कुमारों की भाँति ही विलासितापूर्ण था; किन्तु बाद में कुछ ऐसी प्रेरणा उमगी कि सारी सुविधा-सामग्री को लात मार कर वह तथागत की शरण में आ गया। आते ही कठिन तपश्चर्या आरंभ कर दी। ठाट-बाट में पले युवक द्वारा इतना कठिन तप! संघ के वरिष्ठ स्थविर भौंचक्के रह गये। धीरे-धीरे बात भगवान बुद्ध के कानों तक पहुँची। उन्होंने शिष्य को बुलाया और पूछा-”श्रोण! तुम्हारे वीणा-वादन की चर्चा बहुत सुनी है। शायद बहुत अच्छी वीणा बजा लेते हो? किंतु वह स्वर-लहरी उभर सकेगी, जो मनुष्यों को मोह लेती हैं।” अस्वीकृति में शिष्य का सिर हिल गया “और यदि अधिक कसे हों तो?” उत्तर में पुनः नकारात्मकता का पुट था। अब तथागत का समाधानकारक उत्तर निःसृत हुआ-”जीवन में भी ऐसी ही रीति-नीति अपनाओ। अति का अतिक्रमण न कर मध्यम-मार्ग का चयन करो। वही श्रेष्ठ व हानिरहित है।”
नींद के संबंध में अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों ने भी अब यही तथ्य ढूँढ़ा है कि इस बारे में बीच का रास्ता अपनाना ही ज्यादा उचित और निरापद है। सर्वविदित है कि यदि किसी व्यक्ति को निद्रा से वंचित कर दिया जाय, तो उसकी दशा पागलों जैसी हो जाती है। अब मनोविज्ञानियों ने इस संदर्भ में सर्वथा नवीन तथ्य खोज की है कि आवश्यकता से अधिक सोने वालों में अनेक शारीरिक अनियमितताओं के अतिरिक्त मानसिक गड़बड़ियाँ भी उत्पन्न हो सकती है। इस विषय पर शोध करने वाले आस्ट्रिया के मनःशास्त्री आस्टिन फा्रस्ट एवं सहयोगियों का कथन है कि जो व्यक्ति लम्बे समय तक सोता रहता है, उसमें चयापचय उदर, वृक्क संबंधी विकृतियों के अतिरिक्त अंतःस्रावी ग्रन्थियों के रस-स्रावों पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। ज्ञातव्य है कि शरीर एवं मनःसंस्थान संबंधी महत्वपूर्ण क्रियाओं पर नियन्त्रण हारमोन ही करते है। अतः उनके संतुलन में किसी प्रकार का व्यतिरेक अगणित तरह की शिकायतें पैदा कर सकता है। अध्ययन दल का कहना है कि एक युवक के लिए 6-7 घंटे की रात्रि नींद पर्याप्त है। इतने से ही शरीर-मन की उस खुराक की पूर्ति होती रह सकती है, जो उसके लिए अभीष्ट आवश्यक है। उनके अनुसार इससे अधिक सोना एक प्रकार से अपने लिए व्याधियों को न्यौता-बुलाना है। वे एक अत्यन्त चौंकाने वाले तथ्य का प्रतिपादन करते हुए कहते है कि बैठे-ठाले रहने वालों, ऑफिस में काम करने वालों को तो इस क्षेत्र में अत्यन्त सावधानी बरतनी चाहिए कि नींद उतनी ही ली जाय, जितने से काम चल जाय। अधिक निद्रा लेने से शरीर और मस्तिष्क को अधिक आराम मिलता है-इस प्रकार का भ्रम पालने वालों का यह जान लेना चाहिए कि इससे उलटे जटिलताएँ पनपती और अस्वस्थता बढ़ती है। जन्तुओं पर किये गये अध्ययन के आधार पर आस्टिन कहते हैं लम्बी निद्रा के दौरान अन्तरांगों एवं रसस्रावी ग्रन्थियों की सक्रियता प्रभावित होने लगती है और जब यह क्रिया दैनिक दिनचर्या में सम्मिलित हो जाती है, तो उनकी क्रियाशीलता अत्यन्त न्यून हो जाती है। इसका स्पष्ट प्रभाव धीरे-धीरे शरीर एवं मनःसंस्थान पर पड़ने लगता है, जो व्यक्ति को तन व मन से बीमार बना देता है।
इसके विपरीत कठोर शारीरिक श्रम करने वालों के संबंध में शोध दल का कहना है कि ऐसे लोग तनिक लम्बी अवधि तक बिस्तर में पड़े रह कर लम्बी निद्रा ले लें, तो कोई हर्ज की बात नहीं; पर यह अवधि एक डेढ़ घण्टे से किसी प्रकार ज्यादा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा उन्हें भी वे दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते है, जो नियमित रूप से मानसिक श्रम करने वालों को झेलने पड़ते है। इसका सींवित कारण बताते हुए दल का कहना कि शारीरिक श्रम करने वालों के लिए नींद की थोड़ी लम्बी अवधि भी इसलिए निरापद होती है; क्योंकि उनके कष्टसाध्य श्रम से शरीर के अन्तरांगों एवं बहिरांगों का नियमित व्यायाम लम्बे समय तक होता रहता है, अस्तु विश्राम थोड़ा लम्बा हो जाय, तो भी इसका प्रतिकूल परिणाम सामने नहीं आता, जबकि ऑफिस ड्यूटी करने वालों इसका सर्वथा अभाव रहता हैं, इसलिए जटिलताएँ उनमें जल्दी जन्म लेने लगती हैं।
शोधकर्मी विशेषणकर्मी विशेषज्ञों का कहना है कि नींद अपनी आवश्यक मात्रा निद्रा के आरंभिक दो-तीन घंटों के भीतर ही ले लेती है। विशेष परिस्थितियों में तो 5-10 मिनट के अन्दर भी उस आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है; पर लम्बे समय तक इस ढर्रे को नहीं चलाया जा सकता। इससे गंभीर समस्या उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत करत हुए वे कहते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कितने ही सैनिकों को दिन-रात कई-कई घण्टे जागरण की स्थिति में बिताने पढ़े थे; पर बीच-बीच में पाँच-पाँच मिनट के लिए भी यदि उन्हें “रेम-स्लीप” मिल जाती, तो उनकी बेचैनी समाप्त हो जाती और वे ताजगी अनुभव करते प्रतीत होते। इससे स्पष्ट है कि “रेम-स्लीप” से नींद की अधिकाँश खुराक पूरी हो जाती है। अनुसंधान के दौरान इसी तथ्य की पुष्टि मनोविज्ञानियों न भी की है। उनका कहना है कि “रेम”‘ स्तर की थोड़ी नींद से भी बिगड़ते मानसिक संतुलन को सँभाला जा सकता है। है। अध्ययनों के दौरान उन्होंने पाया कि नवजात शिशुओं में “रेम” स्तर की निद्रा का प्रतिशत 60 के आस-पास होता है। उनने यह भी देखा है कि जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, इस श्रेणी की नींद में भी तदनुरूप गिरावट आने लगती है। आयु 30 वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते यह 35 प्रतिशत रह जाती है। 50 वर्ष के करीब उम्र होने तक यह घटकर 20 प्रतिशत रह जाती है। आगे की आयु में “रेम”तेजी से घटता है। 60 वर्ष के लोग 10-15 प्रतिशत “रेम” नींद लेते है। शोधकर्ताओं का कहना है कि “रोम” यदि 5 प्रतिशत से भी कम रह जाय, तो बुढ़ापे से संबंधित मनःकायिक अनेक उलझनें पैदा होने लगती हैं।
किन्तु यह तो बुढ़ापे की बात है, जो स्वाभाविक ही है। अस्वाभाविकता तो तब पैदा होती है, जब जवान लोग भी बिस्तर पर पड़े-पड़े अधिक नींद लेने और आराम फरमाने के फेर में अपना स्वास्थ्य गंवाते देखे जाते है। इसीलिए “अति” को वर्जनाओं में गिना गया है और उससे बचने की सलाह दी गई है। भोजन बिल्कुल नहीं के बराबर लेना और जरूरत से ज्यादा ले लेना-यह दोनों ही आदतें खराब है और सीमा का अतिक्रमण करती है। फलतः ऐसे लोगों को हानि भी कम नहीं उठानी पड़ती। अब यही बात वैज्ञानिकों ने नींद के संबंध में सिद्ध करके उस उक्ति को सही साबित करने का प्रयास किया है, जिसमें कहा गया है-”अति सर्वत्र वर्जयते।”
गाँधीजी काश्मीर जा रहे थे। थर्ड क्लास के डिब्बे में वह यात्रा कर रहे थे, उसमें वर्षा का सारा जल भर गया ओर डिब्बा पूरा गीला हो गया गार्ड ने यह देखा तो गाँधी जी से जाकर बोला वह-”आप डिब्बा बदल लें, आपके लिए अन्यत्र व्यवस्था कर देते हैं।”
“फिर इस डिब्बे का क्या होगा?” गाँधी जी ने पूछा। तो गार्ड बोला-”इसमें दूसरे यात्रियों को बिठा दिया जायगा।”
“अपने आराम के लिए दूसरों को यहाँ बैठाने की बात सोचना भी मेरे लिए कठिन है।” यह कह कर गाँधी जी ने डिब्बा बदलने से इनकार कर दिया। समाज सेवियों द्वारा अपनी सुख-सुविधा की चिन्ता उनके लिए अशोभनीय है।
स्वामी विवेकानन्द के प्रवचनों से प्रभावित होकर किसी ने कहा-”लगता है आपकी पहुँच ईश्वर तक है। आप मुझे उस तक पहुँचा दीजिए। उसको मिलने का स्थान बता दीजिए।”
स्वामी जी ने कहा-”आप अपना पता मुझे लिखा जाइये। जब ईश्वर को फुरसत होगी तब उसे आपके घर ही भेज दूँगा।”
वह व्यक्ति अपने मकान का पता लिखाने लगा।
स्वामी जी ने कहा-”यह तो ईंट चूने से बने घरौंदे का पता है। आप स्वयं अपना पता बताइये कि आप कौन हैं? किस प्रयोजन के लिए नियत थे और क्या कर रहे हैं?”
व्यक्ति इनके प्रश्न में छिपी दार्शनिकता का संकेत समझा और इस नतीजे पर पहुँचा कि पहले आत्म सत्ता के स्वरूप और उद्देश्य का पता लगाना चाहिए। बाद में ही ईश्वर से मिलने की बात बनेगी।
वसन्त पर्व बसंती रंग, विकास और त्याग बलिदान का प्रतीक बन गया है। ‘बसंती ‘ शब्द एक मस्ती लिए हुए है। एक चहक और महक उसमें है। यह मस्ती लौकिक भी है और अलौकिक भी। इसका रस तो अनुभव करने वालों को ही आता है। पर कुछ समय से लगता है ‘बसंती’ प्रभाव कम हो गया। वसन्त तो हर वर्ष आता है। बसंती हवा बराबर बहती रहती है-पर अब उसके प्रभाव से देश के लिए, समाज, संस्कृति और धर्म के लिए कुछ कर गुजरने की, इस राह में कुछ चढ़ा देने की, कुछ लुटा डालने की मस्ती अन्तःकरण में पैदा होती नहीं दिखती।
तो क्या बसंती हवा बेअसर हो गई? उसकी रस संचार की क्षमता समाप्त हो गई? त्याग बलिदान अन्तःकरण की संपन्नता से ही सम्भव होता है। विपन्न और दीन दान समझता है तो माँगने या छीनने झपटने की ही कोशिश करेगा। इसके विपरीत अपने को भगवान का अंश, प्रतिनिधि समझने वाला फक्कड़ भी समाज को बराबर कुछ देता ही रहता है। यह आन्तरिक संपन्नता अब बसंती हवा क्यों नहीं पैदा करती? इस हवा के प्रवाह के साथ वह रस अन्तःकरण में क्यों नहीं प्रवाहित होता जो हर ‘अँखुवे’ में से एक फुगनी, जवन के हर कदम पर एक अनुदान पैदा करने के लिए समर्थ हो सकें?
किन्तु प्रकृति में तो वह क्रम चला रहा है। बसंती हवा की मस्ती ज्यों की त्यों बनी हुई है। कोयल की कूक में उसकी मस्ती, आम के बौर में उसकी महक, जंगल में पलाश-टेसू के फूल से लेकर खेतों की सरसों तक में उसकी रेंगत स्पष्ट झलकती है। जंगली औषधियाँ, जड़ी-बूटियाँ अब भी अपनी रोग निवारण तथा पोषण की क्षमता इन्हीं दिनों चरम सीमा तक बढ़ा लेती है। सब ओर से प्रकृति का एक मूक आह्वान सुना जा सकता है-”आओ हमारे रस से जीवन की नीरसता, हमारी उमंग से जीवन की उदासी, हमारी संपन्नता से अपनी दीनता दूर करो। सरस -उत्साहपूर्ण और गौरवमय जीवन जियों−−−−−−लो कुछ तो ले लों..........।” फिर मनुष्य का अंतर्मन प्रकृति के साथ तरंगित क्यों नहीं हो उठता? क्यों वह दुःख के दीनता और हीनता के रोने रोता है। क्यों नहीं वह स्वयं मस्त होकर, महक कर औरों के जीवन में सुख, सुवास नहीं भर देता?
लगता है गड़बड़ी अन्दर है। रस प्रवाहित नहीं हो पाता। रस का प्रवाह निर्विकार नली में होता है। रस की जगह कुछ धूल–धक्कड़ उसमें भर जावे तो रस उसमें कैसे बहे? शिकायत की जाय तो क्या फायदा?रस के अटूट भण्डार से जुड़ी रहकर विकारों से अवरुद्ध नली में रस संचार कैसे संभव है?
हमारा मन करता है-बसंती हवा बहे और हमारे मनों में गुदगुदी पैदा करे, हलचल मचा दे, हम भी महक उठें आम के बौर की तरह, चहक उठें चिड़ियों की तरह। अन्तर में एक हूक उठे जो कोयल की सी कूक बनकर वातावरण में मस्ती पैदा कर दे। सरसों के पौधों की तरह झूम उठें और नव पल्लवों की तरह थिरक उठें। सारा अवसाद बह जाय-उल्लास उमड़ पड़े। पर वह सब हो तब, जब रस संचारित हो सके? रस है कभी रस के धोखे में कुछ नहीं होने पाता? लगता है कभी रस के धोखे में कुछ ओर प्रवेश पा गया। वह वहीं जम गया..... रास्ता रोक कर। आत्म-विकास के धोखे स्वार्थ घुस गया, इसीलिए सेवा की जगह अहसान की इच्छा होती है, आत्मीयता सेवा अहंकार ने घेर ली। आत्मीयता की जगह अहंकार ने घेर ली। हम धोखा खा गए ......।
तो हम सावधान हो जांय। समर्थ बसंती हवा की कामना करते हुए बैठे न रहें। वह तो सदा समर्थ है और अपना काम करेगी। कामना करें बसंती ज्वाला की, शोलों की जिनके ताप से विकार जल जायें। जिसके संसर्ग से बसंती मस्ती खरी हो जाय और हौसला-पसती गलकर बहे, रस पैदा करे-स्वागत है उसका। पर उसके स्वागत थाल सजाये ही न खड़े रहे। बसंती बयार को प्रभावशाली और सार्थक बनाने के बसंती अंगार भी प्रज्वलित करें, जो विकारों को जला दें पर जिसमें से काला धुआँ नहीं बसंती चमक लेकर-फिर बसंती बयार का मजा लें, प्रकृति से तादात्म्य कर जीवन धन्य बनाएँ।
युवराज भद्रबाहु अपने समय के सभी युवकों में सर्वश्रेष्ठ, सुन्दर और सुगठित काया का स्वामी था। उसे अपनी सुन्दर काया और अतुल रूप यौवन का गर्व भी था। इस गर्व के कारण वह अन्य राजकुमारों के सामने दर्प भरी बातें कहता रहता था। एक दिन युवराज महामंत्री के पुत्र सुकेशी के साथ बजरा से बाहर सरिता के तट पर भ्रमण कर रहा था। भ्रमण करते हुए युवराज और मंत्री नगर से कुछ दूर चले गए।
एक स्थान पर जहाँ सरिता के दूसरे तट पर श्मशान था, कुछ लोग शवदाह कर रहे थे। युवराज ने मंत्री से पूछा-”वहाँ क्या हो रहा है?”
वहाँ खड़े लोगों का कोई स्नेही जन मर गया है सुकेशी ने कहा-”वे लोग उसके मृत शरीर का दाह संस्कार कर रहे हैं।”
“अवश्य ही वह कोई कुरूप व्यक्ति रहा होगा।” भद्रबाहु यहाँ भी टिप्पणी किए बिना नहीं रह सका-”यदि वह सुन्दर होता तो कोई क्यों जलाना चाहता। अपने पास नहीं रखता।”
“नहीं ऐसी बात नहीं है, शरीर सुन्दर हो या असुन्दर, मर जाने पर सभी शरीर सड़ने-गलने लगते हैं। अतः उन शरीरों को जला देना पड़ता है।” सुकेशी ने कहा।
यह बात युवराज के न जाने किस मर्मस्थल को स्पर्श कर गयी। उसे अपना रूप, यौवन, सौंदर्य का दर्प टूटे हुए काँच के टुकड़ों की तरह बिखर गया प्रतीत होने लगा। लौटकर आने पर वह उदास रहने लगा। उदासी ने उसे इस बुरी तरह आ घेरा कि उसका सुन्दर चेहरा म्लान दिखाई पड़ने लगा। राजा ने अनेक प्रकार युवराज की उदासी और म्लानता का कारण जानना और उसे दूर करना चाहा पर कोई परिणाम नहीं निकला।
युवराज को इस प्रकार चिन्तित और उदास देखकर मंत्री पुत्र सुकेशी भी व्यथित हुआ। वह भद्रबाहु को हर तरह से बहलाने का प्रयत्न करता, पर युवराज के चेहरे पर छायी रहने वाली म्लानता मिटती ही नहीं थी। राजगुरु कालाचार्य को एक विधि सूझी और वे भद्रबाहु को अपने गुरु महाचार्य के पास ले गए।
सिद्ध योगी अपने योग बल से युवराज की मनोव्यथा, खिन्नता का कारण जान लिया और कहा-”भद्र! तुम इस शरीर के अन्तिम परिणाम की चिन्ता करते हो।”
लगा किसी ने दुःखित रोग को पहचान लिया हो। भद्रबाहु ने अपनी सारी व्यथा उड़ेल दी। महाचार्य ने कहा-”अच्छा बताओ! आज तुम भवन के स्वामी हो-उस भवन में निवास करते हो। कल को वह भवन रहने योग्य नहीं रह जाता तो उस भवन को छोड़कर किसी अन्य भवन में जाओगे अथवा नहीं।”
“सो जाना ही पड़ेगा महात्मन्!” भद्रबाहु ने कहा। कालाचार्य बोले-”इसके बाद वह भवन गिर जाता है या उसमें आग लग जाती है, तो इससे तुम्हारा क्या बिगड़ा?” “कुछ नहीं गुरुदेव।”
वही नियम शरीर के लिए भी लागू होता है। इसमें निवास करने वाली आत्मा के लिए जब तक यह रहने योग्य है, तभी तक यह सुन्दर है। जराजीर्ण हो जाने पर आत्मा द्वारा इसका त्याग और इसका नाश स्वाभाविक ही है। शरीर नहीं सुन्दर तो वह आत्म तत्व है, जिसके कारण इसकी प्रतिष्ठा है, इसलिए आत्मा के प्रीत्यर्थ उसके हित व विकास के लिए शरीर को एक उपकरण मात्र समझो। उसके लिए चिंतित मत होओ।”
बगदाद का खलीफा उतना ही दैनिक वेतन लेते थे जितनी कि एक साधारण मजूर को मिलती थी। परिवार खर्च उसी सीमा में चलाने की चेष्टा बन पड़ी थी।
एक दिन खलीफा की बेगम ने कहा-”तीन दिन का वेतन पेशगी मिल जाता तो त्यौहार पर बच्चों के लिए कुछ पकवान बना लेती।”
खलीफा ने कहा-”इन तीन दिनों में मैं मर गया तो कर्जदार होकर संसार से जाना पड़ेगा। ऐसी जोखिम कैसे उठाई जाय?” बेगम चुप हो गई।
प्रयोजन बड़ा होते हुए भी उसका समाधान सरल है, यदि प्रतिभाओं का परिष्कार क्रम चल पड़े। उनके आविर्भाव का उपचार बन पड़े तो समझना चाहिए कि इन अनुदानों के सहारे एक विश्व-व्यापी महत् कार्य सध सकता है। सामाजिक और क्षेत्रीय समस्याओं को सँभालते रहना और अधिक सरल लग सकता है।
हर महत्वपूर्ण कार्य में तदनुरूप ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। उसके बिना तो छोटे-छोटे कार्य भी पूरे नहीं होते। फिर युग का नवनिर्माण जैसा विश्व-व्यापी और अत्यधिक भारी काम तो वरिष्ठ प्रतिभा संपन्नों के कंधा लगाये बिना पूरा हो सकने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। नवनिर्माण की विश्व-व्यापी संरचना जिसने सोची और खड़ी की है, उसने इस पुण्य प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्राणवान जीवन के धनी व्यक्तियों की अच्छी खासी सेवा खड़ी करने की आवश्यकता अनुभव की है और उसे समय रहते जुटा लेने की तैयारी की है। यह उल्लेख उद्बोधन उसी के लिए है। प्रतिभा परिष्कार का सुयोग उपयुक्त मात्रा में बन पड़ा तो फिर अपनी दुनिया का स्वरूप और परिवेश बदल डालने में नियन्ता को और कोई बड़ी कठिनाई शेष न रहेगी।
भूतकाल में भी मनस्वी लोगों ने एक से एक आश्चर्यजनक कार्य किये है। इनमें अगस्त्य का समुद्र सोखना, हनुमान का पर्वत उठाना, विश्वामित्र के तत्वावधान में राम राज्य की स्थापना होना जैसी घटनाएँ ऐसी है जो बताती है कि करने मरने पर उतारू व्यक्ति के लिए क्या कुछ ऐसा है जिसे संभव करके नहीं दिखाया जा सकता। स्वर्ग से धरती पर गंगा उतारने वाले भागीरथ अपने कार्य में सफल हुए थे तो फिर कोई कारण नहीं कि नवनिर्माण में जुटे भागीदारी की मंडली भ्रमजंजाल से निकल कर सीधे से और सरल काम कर सकने के लिए समर्थ नहीं बन सकती।
प्रतिभाओं का निखार दूसरे क्या किसी की कृपा अनुकंपा के ऊपर निर्भर नहीं है। वह तो पूरी तरह अपने बस की बात है। शरीर से इच्छानुसार काम लिया जा सकता है। उस पर पूरा नियंत्रण अपना रहता है। जो लोग संसार के वर्तमान प्रचलनों की बातों को ही सब कुछ मानते है; उन्हें क्या कहा जाय। अन्यथा अपने मनोबल और प्रयास को यदि दिशाबद्ध किया जा सके तो हर व्यक्ति अंतःप्रेरणा से न जाने क्या-क्या कुछ करके दिखा सकता है। यह नया प्रयोग नहीं। भूतकाल में ऐसे ही परमार्थकारी प्रयोग होते रहे है। युग बदलते रहे और मनुष्य अपनी प्रथा–परम्पराओं में आमूल–चूल परिवर्तन करता रहा है। इस बार की महाकाल द्वारा दी गई चुनौती को अस्वीकार करते न बन पड़ेगा।
गाँधी, बुद्ध, ईसा आदि के धार्मिक आँदोलनों को सफल बनाने के पीछे भगवान की इच्छा कार्य करती रही है। इस बार प्रतिभाओं के पूर्ति का सरंजाम जुटी रहा है। समय रहते वह पूरा भी होगा। यह संभावना अधूरी न रहेगी।
जिसे असंभव कहा जा रहा है वहीं संभव हो सकता है। प्रतिभावानों में हुँकार जब भी उठी है उसने विशिष्ट स्तर की प्रतिभाओं को विकसित किया है। यह प्रतिभाओं की विशेषता रही है। इसके लिए शरीर बल, साधन बल, बुद्धिबल की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी कि गान्धी, बुद्ध, बिनोवा जैसे प्रतिभावानों की। समय स्वल्प हो तो भी अपने संपर्क क्षेत्र में प्रतिभा का परिचय देने वाले मनस्वी तो हर किसी को उभार सकते है और गीध, गिलहरी, शबरी भील जैसे चमत्कार प्रस्तुत कर सकते है, जो छोटों के लिए भी संभव हो सकते है।
इक्कीसवीं सदी आन्दोलन की भागीदारी स्वीकार करने के लिए भाव संवेदना के धनी वर्ग का आह्वान किया गया है। आरंभ की दृष्टि से हल्के काम सौंपे गये है। युग सन्धि पुरश्चरण के अंतर्गत जप, साधना, समयदान, अंशदान, साप्ताहिक सत्संग, झोला पुस्तकालय आदि। इन्हें हलके दर्जे के स्काउट व्यायाम स्तर का समझा जाय जिससे अभिरुचि और आस्था की परिस्थिति बढ़ चले।
पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव निखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त पदार्थ सम्पदा में से अपने लिए आवश्यक तत्व खींचता रहता है। वही धरती की विविध आवश्यकतायें पूरी करते है। जो निरर्थक अंश बच रहता है वह पदार्थ दक्षिणी ध्रुव मार्ग से कचरे की तरह बाहर फेंक दिया जाता है। यही क्रम मनुष्य शरीर का है। वह अपनी रुचि और प्रकृति के अनुरूप चेतन तत्व आकाश में से खींचता और छोड़ता रहता है। उसी पूँजी से अपना काम चलाता है। क्या ग्रहण करना क्या है क्या बहिष्कृत करना, यह मनुष्य के मानसिक चुम्बकत्व पर निर्भर है। यदि अपना मानस उच्चस्तरीय बन चुका है तो उसका आकर्षण विश्व-ब्रह्मांड से अपने स्तर के सहकारी तत्व खींचता और भण्डार करता रहेगा, पर पूँजी अपने मनोबल के अनुरूप ही जमा होती रहती है। वैसे मनुष्य को जन्मजात रूप से विभूतियों का वैभव प्रचुर मात्रा में मिला है, पर वह प्रसुप्ति की तिजोरी में बंद रहता है ताकि आवश्यकता अनुभव होने पर ही उसे प्रयत्नपूर्वक उभारा और काम में लाया जा सके। सभी जानते है कि भूगर्भ में विभिन्न स्तर के रासायनिक द्रव्य से निरन्तर धरती पर प्राणतत्व की वर्ष होती रही है। वनस्पतियों और प्राणियों का गुजारा इन्हीं उभय पक्षीय अनुदानों के सहारे चलता है। मानवी व्यक्तित्व के संबंध में भी यही बात है। वह इच्छित प्रगति के लिए अपने वर्चस्व का कितना ही महत्वपूर्ण अंश उभार सकता है और अपने बलबूते इच्छित प्रगति कर सकता है। उर्वरता भूमि में होती है, पर उसे प्रगट होने के लिए ऊपर से जल बरसना भी आवश्यक है अन्यथा उर्वरता हरीतिमा का रूप धारण न कर सकेगी। मनुष्य को अपने में सन्निहित विशेषताओँ को भी ऊर्ध्वगामी बनाना चाहिए और साथ ही अदृश्य जगत के विपुल वैभव का अंश भी अपनी आकर्षण शक्ति से खींच कर अधिकाधिक सुसंपन्न बनना निजी उर्वरता का अभिवर्धन है और ईश्वर सान्निध्य स्थापित करके व्यापकशक्ति से अपने लिए उपयुक्त से खींच बुलाना। यह दोनों ही क्रियायें अपने ढंग से नियमित रूप से चलती रहे तो समझना चाहिए कि प्रगति का सुव्यवस्थित सरंजाम जुटाने की समुचित व्यवस्था बन गई। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए चिन्तन, चरित्र और स्वभाव को, गुण कर्म और भाव संवेदना को दिनों दिन अधिक उत्कृष्ट बनाते चलने की आवश्यकता को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है। साथ ही आवश्यक यह भी है कि इस विराट विश्व की कामधेनु की अनुकूलता प्राप्त करके अमृत भरे पय पान का लाभ उठाते रहा जाय।
प्राण अपना है, प्रतिभा भी अपनी है, पर वह अनगढ़ स्थिति में झाड़-झंखाड़ों से भरी रहती है। उसे सुरम्य उद्यान में बदलने के लिए कुशल माली जैसे अनुभव और सतर्कता भरा प्रयत्न चाहिए। जो उसे कर पाते है वे ही देखते है कि “ईश्वर अंश जीव अविनाशी” का प्रतिपादन सोलहों आने सच है। उसमें किसी प्रकार की अत्युक्ति नहीं है। घाटे में वे रहते है जो अपनी उपेक्षा आप करते है। जो अपनी अवमानना, अवहेलना करेगा वह दूसरों से भी तिरस्कृत होगा और स्वयं भी घाटे में रहेगा।
विशेषतया इस शताब्दी में प्रखर में प्रखर प्रतिभाओं की बड़ी संख्या में आवश्यकता पड़ेगी। पिछली शताब्दियों में प्रदूषण फैल, दुर्भाव बढ़ा और कुप्रचलन का विस्तार हुआ है। उसमें सामान्य जनोँ का कम और प्रतिभाशालियों द्वारा किये गये अनर्थ का दोष अधिक है। अब सुधार की बेला आई है तो कचरा बिखरने वाले वर्ग की ही उसकी सफाई का प्रायश्चित करना चाहिए। नव निर्माण में लगाई जाने वाली प्रतिभाओं की दूरदर्शिता, कुशलता और तत्परता अधिक ऊँचे स्तर की चाहिए। उनका अन्तराल भी समुज्ज्वल होना चाहिए और बाह्य दृष्टि से इतना अवकाश एवं साधन होना चाहिए कि अनावश्यक विलम्ब न हो। नये युग की नई क्षतिपूर्ति का निर्माण विश्वकर्मा जैसी तत्परता के साथ कर सके। जो एकाँगी न सोचे वरन् बहुमुखी आवश्यकताओं के हर पक्ष को सँभालने में अपनी दक्षता का परिचय दे सके। यही निर्माण आज का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। सृजेता की सृजन कार्य सम्पन्न कर दिखते रहते है। मूक दर्शक तो खड़े-खड़े साक्षी की तरह देखते रहते हैं। ऐसी भीड़ में असुविधा ही बढ़ती है। गंदगी और गड़बड़ी फैलाते रहना ही अनगढ़ लोगों का काम होता है।
सृजेता की सृजन प्रेरणा किस गति से चल रही है और उज्ज्वल भविष्य की निकटता में अब कितना विलम्ब है। इसकी जांच पड़ताल एक ही उपाय से हो सकती है कि कितनों के अन्तःकरण में उस परीक्षा की घड़ी में असाधारण कौशल दिखाने की उमंगें उठ रही है। स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ अपनाना कितना अधिक श्रेयस्कर लग रहा है। किन का अन्तःकरण सतयुगी ब्रह्मकर्मियों की तरह आकुल-व्याकुल हो रहा है, और उसका प्रतिफल कितने न्यूनतम निर्वाह में बन पड़ने का निश्चय क्रमशः अधिक सुदृढ़ होता चला जाता है। समय की सबसे बड़ी आवश्यकता नव सृजन के लिए सोच तो कोई कुछ भी सकता है, पर क्रिया रूप में कुछ कर पड़ना उन्हीं के लिए संभव हो सकता है जो निजी महत्वाकाँक्षाओं में कटौती करके उस अधिक से अधिक समय, श्रम, मनोयोग एवं साधनों को नियोजित कर सकें? भवन खड़ा करने के लिए ईंट, चूना, लकड़ी, लोहा आदि अनिवार्य रूप से चाहिए। युग सृजन भी ऐसे ही अनेकों साधनों की अपेक्षा करता है, उन्हें जुटाने के लिए पहला अनुदान अपने से ही प्रस्तुत करने वालों को ही यह आशा करनी चाहिए कि अन्य लोग भी उनका अनुकरण करेंगे। ऐसा समर्थन सहयोग देने में उत्साह का प्रदर्शन करेंगे।
कहा जा चुका है कि युग सृजन जैसा महान उत्तरदायित्व पूरा करने में स्पष्ट की उच्चस्तरीय सृजन शक्तियाँ ही प्रमुख भूमिका संपन्न करेगी। मनुष्य की औसत बिगाड़ता अधिक है। पर जहाँ बनाना ही बनाना एक मात्र लक्ष्य हो वहाँ तो स्रष्टा की सृजन रोना ही अग्रिम मोर्चा सम्हालती दिखाई देगी। हर सैनिक के लिए अपने ढंग का अस्त्र-शस्त्र होता है। युग सृजन में आदर्शों के प्रति सघन श्रद्धा चाहिए और ऐसी लगन जिसे किन्हीं आकर्षणों या अभाव से विचलित न किया जा सके। ऐसे व्यक्तियों को ही देव मानव कहते है और उन्हीं के द्वारा ऐसे कार्य कर गुजरने की आशा की जाती है। जिनका विचार करने तक की तथा कथित के ठज्ञग्रस्त, मायाग्रस्त लोगों को सुनने विचारने तक की फुरसत नहीं होती, उनसे तो कुछ बन पड़ेगा ही कैसे?
ईश्वर का स्वरूप न समझने वाले उसे मात्र मनोकामनाओं की पूर्ति का ऐसा माध्यम मानते है, जो किसी की पात्रता देखे बिना आंखें बन्द करके योजनाओं की पूर्ति करता रहता है, भले ही वे उचित हो या अनुचित। किन्तु जिन्हें ब्रह्मसत्ता की वास्तविकता का ज्ञान है, वे जानते है कि आत्म परिष्कार और लोक कल्याण को प्रमुखता देने वाले ही ईश्वर भक्त कहे जाने योग्य है। इसके बदले में अनुग्रह के रूप में सजल श्रद्धा और प्रखर प्रज्ञा के अनुदान मिलते है। उनकी उपस्थिति से ही पुण्य प्रयोजन के लिए ऐसी लग उभरती है, जिसे पूरा किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। उस ललक के रहते वासना, तृष्णा और अहंता की मोह निद्रा या तो पास ही नहीं फटकती या फिर आकर वापस लौट जाती है। नर रत्न ऐसों को ही कहते है। प्रेरणाप्रद इतिहास का ऐसे लोग सृजन करते है। उनके चरण-चिह्नों का अनुसरण करते हुए ही सामान्य सामर्थ्य वाले लोग तक परम लक्ष्य तक पहुँच कर रहते है। यही उत्पादन यदि छोटे-बड़े रूप से उभरता दीख पड़े तो अनुमान लगाना चाहिए कि भावभरा बदलाव आने ही वाला है। कोपलें, निकलीं तो कलियाँ बनेंगी, फूल खिलेंगे, वातावरण शोभायमान होगा और उस स्थिति के आते भी देन न लगेगी, जिसमें वृक्ष फलों से लदते और अपनी उपस्थिति का परिचय देकर हर किसी को प्रमुदित करते है।
आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा है। बड़े वहाँ किसी देवमानव के आविर्भाव हो रहा है। बड़े वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है। बड़े काम बड़े लोग ही कर पाते है। हाथी का वजन हाथी ही उठाता है। गधे की पीठ पर यदि उसे लाद किया जाय तो बेचारे की कमर टूट जाय। क्षुद्र कृमि, कीटक मात्र अपना अस्तित्व बनाये रहने की परिधि में क्षमताओं को खपा देते है। उनसे यह बन नहीं पड़ता कि आदर्शोँ की बात सोचे, उत्कृष्टता अपनायें और विश्व कल्याण के क्रिया-कलापों में रुचि लेकर कुछ ऐसा करें जिसकी युगधर्म में पुकार लगाई और गुहार मचाई है।
अगले दिनों योजना, प्रेरणा, दक्षता, व्यवस्था और समर्थता भगवान की काम करेगी। श्रेय वे लोग प्राप्त करेंगे जिनकी अन्तरात्मा में युग के अनुरूप श्रद्धा और लगन जग गई है। मुर्गा जग कर अपने जागने की सूचना देता है, पर उस बाँग को सुनकर असंख्यों को ब्रह्म -मुहूर्त की सूचना मिलती है और वे भी अरुणोदय बेला का लाभ लेने के लिए कार्यक्षेत्र में कदम उठाते हुए दृष्टिगोचर होंगे।
हरिबाबा समाज सेवी साधु थे। वे गंगा तट के एक छोटे से गाँव “गँवा “ में रहते थे। उस गाँव में हर साल गंगा की बाढ़ आती थी और किसानों के खेत तथा झोंपड़े बहा ले जाती थी। हानि उठाने वाले रोते, कलपते रह जाते।
हरिबाबा ने एक दिन स्वयं ही फावड़ा-टोकरा लेकर बाँध बनाने के लिए मिट्टी डालना आरंभ कर दिया। प्रयोजन सुनकर उस गाँव के नर-नारी भी उस प्रयास में साथ देने लगे। दूसरे गाँवों में समाचार पहुँचा तो सभी वयस्कों ने सप्ताह में एक दिन का श्रम देना आरंभ कर दिया। यह क्रम अनवरत रूप से चला। स्वामी जी का उत्साह देख कर सभी को पीछे रहने में संकोच करते न बन पड़ा।
बाँध प्रायः एक वर्ष में बनकर तैयार हुआ। उस श्रमदान की कीमत लाखों रुपये कूती गई। इसके बाद उस गाँव को फिर कभी बाढ़ का त्रास नहीं सहना पड़ा।
प्रिय! कुछ ऐसा करो कि, प्राण पुनः यह संस्कृति पाये। अगली पीढ़ी नित्य नमन में, वेद ऋचाएँ गाये॥
सभी बीज बोने से पहले, उसे जाँच लेते हैं। जैसा जहाँ चाहिए पानी, और खाद देते हैं॥
हम भी अगली पीढ़ी को, शुभ संस्कारों से भर दें। प्रज्ञा, मेधा जाग्रत हो, कुछ ऐसा ज्ञान प्रखर दें॥ फिर से कोई उठे, विवेकानन्द बने, यश पायें॥
दे सम्मान बड़ों को, छोटों की विनम्रता, हँसकर। हों निश्चित बड़े भी, रहे न उन्हें अवज्ञा का डर॥
फिर से गत रामत्व जी उठे, हर घर बने अयोध्या। क्यों चरित्र का पुष्प खिलेगा, आज नहीं यदि बोया॥ ऐसा हो यदि घर और शाला, गुरुकुल ही बन जाये॥
आज बनाएँगे जो आकृति, वही कड़ी कल होगी। होगा जब उपचार तभी, जीवन पायेगा रोगी॥
आज हुआ है जितना हनन, चरित्र नाम के बल का। उससे बचा रहे जीवनक्रम, आने वाले कल का। हर माली यह सब सोचे, तब अगली फसल उगाये॥
विकसे निज अध्यात्म, श्रेय दें फिर सब पर-सेवा को। छिलकों को दें मान, तजें दुर्योधन की मेवा को॥
बतला चुका, शरीर भेद-विज्ञान-हमारा भाई। किंतु महत्ता आत्मतत्व की, संतों ने ही गायी॥ पड़ी जरूरत-इन दोनों को, आज मिलाया जाये॥
-माया वर्मा
ऋग्वेद 10-71-3 में उल्लेख है कि एक बार ऋषि बृहस्पति के पास जाकर कुछ जिज्ञासुओं ने पूछा भगवान।़ हमारी प्रज्ञा और भावी संतति यदि आप जैसा ज्ञान, बल, सिद्धि, स्वर्ग और समृद्धि प्राप्त करना चाहेगी, तो वह किस प्रकार प्राप्त करेगी। उत्तर मिला-
“यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टम्। तामाभृत्या व्यदधुः पुरमा ताँ सप्तरेभा अभि सं नवन्ते॥
अर्थात्-है शिष्यों। वह वाणी गायत्री आदि सात छन्दों में विभक्त होती है। अब और किसी भी काल में जो बुद्धिमान लोग उस वाणी अर्थात् गायत्री मंत्र द्वारा यज्ञ करेंगे, उन्हें ऋषियों के अन्तःकरण में स्थापित ज्ञान मिलेगा। ऐसे छात्रगण उस ज्ञान को सभी देशों में विस्तार करेंगे और जब उस विद्या को गायत्री आदि छन्दों में बद्ध कर गीत रूप में उसका गुणगान करेंगे-तभी मनुष्य समाज में कल्याण की वृद्धि, अशाँति का ह्रास, अन्याय-अनाचार का विनाश और यज्ञ कर्ताओं को सुख समृद्धि और धन-धान्य की प्राप्ति होगी।
वेद,पुराण, उपनिषद् एवं अन्याय शास्त्रों में बताये गये इस कथन को क्त” यह यज्ञ तुम्हारी हर कामना को संतुष्ट करेगा” अब विज्ञान की कसौटी पर भी कसा और सत्य पाया गया है। अब यज्ञ शक्तिवर्धक वस्तुयें जला देने वाला एक अन्ध विश्वासी कर्मकाण्ड मात्र नहीं रह गया है। भूल तभी तक होती रही, जब तक यज्ञ के विज्ञान को नहीं समझा गया।
यज्ञ के इस विज्ञान को समझने के लिए पृथ्वी और ब्रह्मांड की जिन शक्तियों के अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है, वह है-(1)शब्द सामर्थ्य-मंत्रशक्ति (2)अग्नि तत्व और उसका प्रकीर्णन (3)सूर्य और उसकी सहस्रांशु शक्ति (गायत्री यज्ञों के परिप्रेक्ष्य में ) (4)पदार्थ परिवर्तन के मौलिक सिद्धान्त और (5)भावना विज्ञान। इनमें सम्पूर्ण या कुछ की आंशिक जानकारी से भी यज्ञ सम्बन्धी भारतीय दर्शन को अच्छी प्रकार समझा और उसका भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।
शब्द की सामर्थ्य की माप कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के मूर्धन्य भूगोलवेत्ता डॉ. गैरीलेन की। उन्होंने स्फटिक के प्राकृतिक क्रिस्टल और स्फटिक की ही बहुत पतली पट्टिका के माध्यम से एक ऐसा यंत्र बनाया एवं उसकी अश्रव्य ध्वनियों के माध्यम से ऐसी शक्ति का निर्माण किया, जिसके द्वारा शल्य-चिकित्सा, रोगाणुओं का विनाश, मोटी-मोटी इस्पात की चादरें को काटना, धुलाई, कटाई आदि भारी से भारी काम और नाजुक से नाजुक कार्य भी संपन्न करने में देशों में औद्योगिक क्षेत्रों एवं चिकित्सकीय कार्यों में कर्णातीत ध्वनि के उपयोग ने क्रान्ति मचा दी है।
शब्द की दूसरी विशेषता उसकी संवहनीयता है। वह ठोस माध्यम से भी चल सकता है और विद्युतचुम्बकीय तरंगें के रूप में सारे ब्रह्मांड का भ्रमण भी कर आता है। इन सब बातों का अर्थ होता है कि शब्द की सामर्थ्य अपरिमित होती है। पृथ्वी पर अनेक हलचलें शब्दशास्त्र तो और भी वैज्ञानिक है उनसे एक प्रकार की ऐसी ध्वनि उत्पन्न कर सकती है।
गायत्री महामंत्र की ध्वनि शक्ति तो इन सबसे विलक्षण है। गायत्री यज्ञों में जब सामूहिक रूप से सस्वर मंत्रोच्चारण किया जाता है, तो अव अपने सामान्य सिद्धान्त के अनुसार कुंडलानुसार गति से ऊपर की ओर तरंगें बनाता हुआ बढ़ता है। यज्ञों में प्रज्वलित अग्नि के इलेक्ट्रान उन तरंगों को वहन कर लेते है और उनकी पहली प्रतिक्रिया तो उस क्षेत्र में ही फैलती है, अर्थात् यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले घृत आदि पदार्थ स्थूल से गैस रूप में फैलते है। आग की गर्मी से उन औषधियों के इलेक्ट्रॉन्स अपने-अपने पथों पर इतनी तीव्रता से दौड़ने लगते है कि आपस में लड़खड़ा जाते है और छितर कर स्थूल पदार्थोँ से अलग होकर वायुमंडल में फैल जाते है। यज्ञ के समय फैलने वाली धूम सुवास उसी का एक स्थूल रूप है।
अग्निहोत्र और मंत्रोच्चारण के उससे भी सूक्ष्म विज्ञान को समझने के लिए ‘अयन मण्डल’ आयनोस्फियर का अध्ययन आवश्यक है। धरती की सतह से 35 से 45 मील तक ऊँचाई वायुमण्डलीय भाग को आयनोस्फियर कहते है। अपनी पृथ्वी वायु के समुद्र में डूबी हुई है, अयन मंडल उसका सबसे अधिक ऊँचा और विशाल क्षेत्र है, लेकिन वहाँ हवा की कुल मात्रा वायुमंडल की तुलना में दो-सौवें भाग से भी कम है। यथार्थ में पृथ्वी पर प्राकृतिक परिवर्तनों और ब्रह्मांड के अदृश्य लोकों से संपर्क का मूल अध्याय यहीं से आरंभ होता है। कुछ दिन तक अयन मंडल वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली था, लेकिन अब यह पता लगा लिया गया है कि बहुत ऊँचाई पर अंतरिक्ष में ऐसे बहुत से गुण है जो धरती की हवा में नहीं होते।
उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव प्रकाश, प्रचण्ड चुम्बकीय, आँधी, बंतार तरंगों के परावर्तन जैसी घटनायें आयनोस्फियर से ही आरंभ होती है। सूर्य और चन्द्रमा आदि की अनेक नियमित क्रियाओं का भी पता वैज्ञानिकों ने लगा लिया है और कहा है कि इन प्रक्रियाओं के फलस्वरूप पृथ्वी के आकर्षण वृत्त में परिवर्तन होते है।
यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि हवा में मिश्रित गैसें छोटे-छोटे अणुओं से बनी होती है? यह अणु परमाणुओं में विभक्त होते रहते है जो स्वयं भी इलेक्ट्रान, प्रोटान न्यूट्रान जैसे छोटे कणों से बने होते है जिन्हें शक्ति तरंगें कहा जा सकता है। इनका सूक्ष्म अयन मण्डल भी पृथ्वी की जलवायु एवं वातावरण पर असर डालता है और यहाँ के शब्द प्रवाह को कर्णातीत बनाकर आकाश की ओर फेंकता है। सूर्य का विकिरण भी इस अयन मण्डल को प्रभावित परिवर्तित करता है। परिवर्तन की यह स्थिति अच्छी बुरी गैसों के अनुरूप होती है, वह स्थूल दृष्टि से प्रकृति और जन स्वास्थ्य पर बड़ा अनुकूल प्रभाव डालता है। यज्ञ से उत्पन्न हुई प्राण वर्षा में ही वह शक्ति है जो आज के परमाणु विस्फोटों से विषाक्त वातावरण का परिशोधन कर सके। इसलिये वर्तमान समय में यज्ञों की अनिवार्यता असंदिग्ध है।
यजुर्वेद 23-42 में कहा है-”ब्रह्म सूर्य समज्योतिः” अर्थात् वह सूर्य ब्रह्मत्व ही है, उन्हीं की शक्ति और बाहरी महिमा से जीवन का विकास हो रहा है। पृथ्वी में आँधी तक सूर्य की इच्छा से आती है। इसे सूर्य की तापीय व्यवस्था कहें या प्राण-प्रक्रिया, पर निश्चित है कि यज्ञ और मंत्र की ध्वनि शक्ति उस प्राण या ऊष्मा में खलबली मचाकर अधिक मात्रा में जीवन यज्ञ होते है, वहाँ प्रकृति बहुत अनुकूल रहती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। यह एक तथ्य भी है कि पृथ्वी सूर्य से ही सर्वाधिक प्रभावित है।
मंत्र का भावना विज्ञान उससे भी विलक्षण शक्ति वाला है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-”कि संसार में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है, भले हम उसे जानते हो।” यह ज्ञान इतना समर्थ है कि विश्व के किसी भी भूभाग में विलक्षण हलचल उत्पन्न कर सकता है। प्राचीन ऋषि मनीषी इस तथ्य से भली−भांति परिचित थे। कि यज्ञों के माध्यम से प्रकट होने वाली भावना शक्ति सामान्य भावों की अपेक्षा शब्द शक्ति और अग्नितत्व से प्रेरित होने के कारण सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फैलकर अपने अनुरूप शक्तियों को खींच लाती है। हम यह समझ नहीं पाते कि अदृश्य सहायता या इच्छापूर्ति कैसे हुई, पर यह सब भावनाओं द्वारा एक प्रकार के तत्वों के अणुओं के आकर्षण की ही वैज्ञानिक पद्धति है, उसमें रहस्य जैसी कोई बात नहीं है।
भावना वस्तुतः अल्ट्रा एवं इन्फ्रासोनिक ध्वनि तरंगों का और भी सूक्ष्म स्वरूप है, क्योंकि हम जो कुछ सोचते है, वह आत्मा या चेतन सत्ता द्वारा एक प्रकार बोलना ही है। इसलिए कर्णातीत ध्वनि की समस्त शक्तियों से उसे ओत−प्रोत होना ही चाहिए। यज्ञ तो एक प्रकार से उस यंत्र की तरह है जो अभीष्ट इच्छा के गन्तव्य तक उस शक्ति को पहुँचाने और वहाँ से आवश्यक परिस्थितियाँ खींच लाने में मदद करता है।
अग्निहोत्र का प्रतिफल अन्न आदि के उत्पादन, अयन मण्डल में शक्ति तत्वों का विकास और जलवायु तथा वातावरण की अनुकूलता के रूप में दिखायी देता है, तो यज्ञ कर्ताओं की श्रद्धा भक्ति भावनात्मक स्तर पर मनोवाँछित सफलतायें प्रदान करने वाली होती है। स्थूल की प्रतिक्रिया स्थूल तो सूक्ष्म भी हाथों हाथ देखने को मिलती है। यद्यपि यह दोनों ही बातें मिली-जुली है, इसलिये भावना को विज्ञान विज्ञान को भावना के माध्यम से जाग्रत और प्राप्त किया जा सकता है।
एक समय था जब अभीष्ट प्राकृतिक आवश्यकताओं, सामाजिक परिवर्तनों और व्यक्ति की निजी इच्छाओं के लिए प्रयुक्त होने वाले विशाल महायज्ञों की बहुतायत से लोगों को जानकारी थी, पर उस विद्या का लोप हो गया लगता है, प्रयोग और परीक्षण के तौर पर ही उन रहस्यों की पुनः जानकारी प्राप्त की जा सकती है। प्रस्तुत दस अश्वमेध यज्ञ उसी श्रृंखला की एक कड़ी है जिन्हें सूर्य की अदृश्य किरणों, अयन मण्डल एवं प्राकृतिक परिवर्तन के रूप में समझा जा सकता है।
गीताकार ने योगीराज श्री.कृष्ण के हवाले से अध्याय दो में कहा है-”
“तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत् मुत्परः। बशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता”॥
अर्थात्-”साधक को चाहिए कि वह उन संपूर्ण इन्द्रियों को वश करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती है, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।” यहाँ श्रीकृष्ण शिष्य अर्जुन को स्थितप्रज्ञ योगी के लक्षण बताते हुए आदर्श साधक के रूप में परमपूज्य गुरुदेव के जीवन का व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में अनुशीलन करते है तो पाते है कि ब्राह्मीस्थिति में स्थिति ब्रह्मानंद को प्राप्त उस महायोगी का जीवन गीता के स्थितप्रज्ञ का साकार रूप है। जिसे हम जिस पहलू से देखने का प्रयास करते है, पाते हैं कि बहिरंग की हलचलों से तनिक भी प्रभावित न हो वे सतत् साधना में ही निमग्न रहते थे।
यह कार्य विशुद्धतः ताँत्रिक स्तर पर किये गये प्रयोगों के समकक्ष था व अभी भी उनकी कारण सत्ता के माध्यम से प्रबलतम वेग से संपन्न हो रहा है।
परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि “हर उस व्यक्ति का लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश का इच्छुक है साधक पहले बनना चाहिए। साधना के बिना उसका व्यक्तित्व उस स्तर का बन ही नहीं सकता जो सेवा कार्य के मानव-जीवन प्राप्त हर जीव के लिए अनिवार्य है क्योंकि “परमसत्ता यह चाहती है कि भगवत् चेतना उसके माध्यम से इसी साधना पुरुषार्थ द्वारा झरे, परमात्मा मानवी व्यक्तित्व के माध्यम से पूरे ऐश्वर्य के साथ प्रकट हो सके।” वे अध्यात्म को जिन्दगी का शीर्षासन बताते हुए समय-समय पर कहते रहते थे कि “साधना पुरुषार्थ व्यक्तित्व की सबसे बड़ी क्राँति है। जैसे समाज परिकर में संव्याप्त सारी गड़बड़ियाँ एक व्यापक स्तर पर हुई क्राँति से ठीक हो जाती है, वैसे ही व्यक्तित्व की अनगढ़ता- आत्मक्षेत्र की गड़बड़ियाँ साधना द्वारा ठीक हो जाती हैं।
साधना कैसे की जाय। उसका स्वरूप क्या हो? इसका स्पष्टीकरण वे समय-समय पर करते रहते थे। गुरु को समर्पित एक शिष्य उनके बताए निर्देशों पर चलता रहे तो उसके व्यक्तित्व गठन की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है तथा यह प्रक्रिया उसके आध्यात्मिक विकास हेतु एक प्लेटफार्म तैयार करती है। कभी-कभी शिष्य अतिवादिता के व्यूह जाल में फँसकर अनेक प्रकार के उपक्रम करने का प्रयास करता है किन्तु उससे हाथ कुछ लगता नहीं, उलटे जो एक विशिष्ट अवसर सामीप्य के नाते मिला था, हाथ से चला जाता है। एक घटना से इसे समझाने का प्रयास करेंगे कि गुरुकृपा अभीष्ट हो तो अपनी मन की न करके वही करना चाहिए जो कहा जा रहा है या निर्दिष्ट है।
चाँद्रायण साधना सत्र शाँतिकुँज में चल रहे थे। बड़ी जिद थी कि बाहर से तो लोग आकर साधना कर रहे हैं, हम यहाँ रहकर भी नहीं कर पा रहे। पूज्यवर से पूछा कि यदि वे आज्ञा दें तो एक सत्र कर लें। प्रत्यक्ष मना तो नहीं किया, हाँ भी नहीं की। बोले “यहाँ रहकर तुम जो भी कुछ कार्य हमारा मिशन के हित में कर रहे हो, वही तुम्हारी साधना है। हाँ साधना की दृष्टि से -न्यूनतम तीन व अधिकतम ग्यारह माला के लिए एक घण्टे का समय तुम चौबीस घंटे में तय कर लो तथा एक या दो खण्डों में इसे पूरा कर लो। बस इतना भर तुम्हारा करना पर्याप्त है, शेष हम सँभाल लेंगे।” होना तो यही चाहिए था कि जो भी कुछ उनने कहा उस पर विश्वास करते हुए अपनी कर्मठता का स्तर और बढ़ा देना चाहिए था। किन्तु कहा गया कि “आपकी आज्ञा हो तो सवा-सवालक्ष के पाँच अनुष्ठान पाँच चान्द्रायण के साथ करने की बड़ी तीव्र इच्छा है। यदि आज्ञा मिल जाय तो कृपा होगी।” सबका मन रखने वाली स्नेह से भरी पूरी गुरुसत्ता ने मना नहीं किया, पर हाँ भी नहीं किया। मात्र मुस्कुरा कर रह गए।
उचित तिथि देखकर साधना आरंभ कर दी गयी, साथ में अनुष्ठान भी। निश्चित ही प्रातःकाल जल्दी उठकर साधना पहले करनी पड़ती थी, फिर अध्ययन-लेखन व अन्य क्रम आते थे, जिनका मिशन से प्रत्यक्ष संबंध था। चार-पाँच दिन यह क्रम ठीक से चलता हरा। छठे दिन पुनः गुरुसत्ता ने प्रातःकाल निर्देश नोट करने को बुलाया। बैठ तो गए उनके समक्ष पर ध्यान इसी में लगा था कि इतनी माला हो गयी, इतनी बची है। बात-बात में गुरुदेव ने उपस्थित सभी कार्यकर्ता बनना चाहिए। जप की गिनती करके माला यदि तुम सभी करने लगे तो यहाँ भजनानन्दी बाबाओं का अखाड़ा बन जायेगा, जहाँ समाज के नव-निर्माण की योजनाएँ तो या बनेगी, भगोड़ों का जमघट इकट्ठा हो जाएगा।” तुरंत मन की दौड़ पर रोकथाम लगायी कि मन इस समय माला की गिनती में नहीं, जो कुछ भी पूज्यवर कह रहे हैं, उसमें लगना चाहिए। थोड़ी देर चर्चा चली-समापन के बाद सब उतरे। पीछे से आवाज देकर रोका व बोले-”तुम ऐसा करो। आज ही लेबोरेट्री के लिए नये उपकरण लेने चण्डीगढ़ अम्बाला चले जाओ। साथ में वीरेश्वर को भी ले जाओ।” अनुष्ठान से सिद्धि के रँगीले स्वप्नों में मग्न क्या यह कार्य एक माह बाद नहीं किया जा सकता। तब तक तो अनुष्ठान समाप्त हो जाएगा। आदेश मिला कि “नहीं तुरंत जाना होगा। यह निर्णय हो चुका है, वे अभी ही लाने है।” सिर झुकाकर “करिष्ये वचनं तब” कहते हुए नीचे आ गए। फिर भी आशा की एक किरण थी कि शायद वंदनीय माताजी गुरुदेव को मना लें। उनने रात्रि में चर्चा करने को कहा व बताया कि कल सबेरे बतायेंगे। रात्रि बीत गयी। नियमित जप आदि क्रम चला। ऊपर प्रणाम करने पहुँचे तो पूज्यवर बोले-”क्यों भई। तैयार नहीं हुए? जल्दी निकलना होगा, तभी तो काम करके दो दिन में आ पाओगे और देखो! जप की चिन्ता मत करना। तुम्हारा शेष जप हम कर लेंगे। आहार का क्रम जैसा पहले लेते थे, वही वहाँ रखना, नाटक मत करना।” अब तो निर्णय हो चुका था, जाना ही पड़ा।
बस में अम्बाला जाते हुए सोचा कि ऐसे विघ्न आते ही रहते है। सामान लाकर व्यवस्था बनाकर पुनः अगली पूर्णिमा से यह क्रम आरंभ कर देते है। अम्बाला-चण्डीगढ़ का पूरा कार्य 5 दिन में पूरा हो पाया। लौटकर पूज्यवर को चरण वंदन किया व आज्ञा माँगी। उनने कहा पूर्णिमा आने दो, देखेंगे। पूर्णिमा के पूर्व ही बनारस जाकर पुस्तकें ब्रह्मवर्चस् की लाइब्रेरी हेतु लाने की योजना मीटिंग में पूज्यवर बनाने लगे थे। आशंकित से हो जाते थे कि यह योजना एक माह बाद बने तो अच्छा है व यदि बने भी तो अपना नाम न आए। कोई और चला जाय। बात आई गई हो गयी। पूर्णिमा पर वंदनीय माताजी से कलावा बँधवाया व पूज्यवर को जाकर नमन किया तो तिलक देखकर पूछ बैठे कि “क्या जन्मदिन है आज तो तिलक लगवाया है?” हमने तुरंत कहा-”नहीं गुरुदेव आज पूर्णिमा है व हम आज से पुनः वह अनुष्ठान आरंभ रहे है, जो पिछली बार अधूरा छूट गया था।” स्थित के साथ बोले”अच्छा-अच्छा! ठीक है करो।” सोचा-आशीर्वाद मिल गया, जब कोई दिक्कत चला नहीं है। अनुष्ठान आरंभ होने के बारह दिन बाद पता चला कि आज या कल में ही बनारस जाना होगा। ऊपर की कोर्ट में पुनः अपील की कि हो सके तो बीस दिन बाद यह निर्णय लागू हो। किन्तु उसका कोई असर नहीं हुआ। वे बोले “यह काम जरूरी है, अतः इसे पहले करना होगा। बाकी हम पर छोड़ दो।” बरबस बनारस यात्रा करनी पड़ी दस दिन लगे पर साहित्य की एक बहुमूल्य संग्रह सामग्री एकत्र करली गयी। इस बार भी अनुष्ठान में विघ्न आ गया यह सोचकर पुनः तीसरी बार यह क्रम आरंभ करने को सोचा।
तीसरी बार, चौथी बार भी यही पुनरावृत्ति हुई। लगा कि पूज्यवर चाहते नहीं हमारा आत्मिक उत्कर्ष हम तप साधना करना चाहते हैं, वे जबरदस्ती हमें कर्मयोगी बनाने पर तुले हुए हैं। स्वयं तो उनने चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण संपन्न किए, हमें क्यों टोकते है। ऐसा ही मंथन चल रहा था कि ऊपर से बुलावा आया। बिठाकर बोले “क्यों इतना पीछे पड़े हो जप-तप करने के। जो हमने कहा, उस पर विश्वास नहीं .या? केवल तीन माला कर लिया करो। ज्यादा से ज्यादा ग्यारह। साल में दो नवरात्रियाँ आती हैं, उनमें अनुष्ठान कर लो। वर्ष भर गुरुवार का अस्वाद निभाओ पर खाने पीने में अनावश्यक कटौती न करो। नियमितता-निरन्तरता ही साधना में जरूरी है। अतिवादी तप-तितिक्षा नहीं।” हमने कहा कि “हमें गायत्री महासत्ता के दर्शन करने हैं-माता के रूप में या प्रकाश के रूप में। इसीलिये हम अनुष्ठान श्रृंखला करना चाहते थे, पर आपने पूरे नहीं होने दिए। कोई न कोई प्रारब्ध हमारा रहा होगा।” हँस पड़े व बोले-”अरे अरे! तुम्हें गायत्री महासत्ता के दर्शन करने थे। तो बोले क्यों नहीं? इतना कहकर वे चुप हो गए। देखते-देखते उनका सारा शरीर प्रकाश पुँज में बदल गया-आंखें सहज ही बंद हो गयी। इतना तीव्र प्रकाश कि सहन न हो, फिर साक्षात माँ गायत्री वहाँ विराजमान् दिखी और कुछ ही क्षणों बाद गुरुदेव स्वयं बैठे मुस्कुरा रहे थे। बोले “और कुछ चाहिए? हमने कहा- बस! आपने हमारी सारी इच्छा पूरी कर दी, मन के विभ्रमों-शंकाओं के जाल को दूर कर दिया। अब समर्पण उस सत्ता कभी न कम न होगा, जो साक्षात आद्यशक्ति का ही रूप है। आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करेंगे।
किसी को यह घटना अतिशयोक्ति लग सकती है व किसी को मन का भ्रम भी। परंतु जिनने परम पूज्य गुरुदेव को समीप से देखा व समझा है, उनको किसी भी प्रकार की शंका न होगी। गूँगे के गुड़ की तरह यह जीवन की बहुमूल्य निधि बन गयी। वस्तुतः गुरुसत्ता वही बताना चाहती थी जो गीताकर ने बार-बार अर्जुन को समझाने का प्रयास किया है-
न तु माँ शक्य से दृष्टमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम्॥ (8/11)
और आगे कहा है-
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय (8/12)
अर्थात् - “तू मेरे में ही मन को लगा व बुद्धि का निवेश भी मेरे प्रति ही कर, इधर उधर नहीं।”तथा
आगे अठारहवें अध्याय में कहा है -
“मन्मना भव मद्भक्तों मद्याजी माँ नमसकुरु।” (65/18)
अर्थात्-”हे अर्जुन! तू मुझ में मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझ को ही प्रणाम कर।
साधना क्षेत्र की परमपूज्य गुरुदेव की समस्त उपलब्धियाँ, जिनने उन्हें साक्षात् सूर्यमय बना दिया, इसी समर्पण की तो देन थी। अपनी सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता को उनने वसंत पंचमी 1926 को स्वयं को सौंपा तो योगक्षेम के वहन की चिंता उन पर छोड़कर स्वयं एक निमित्त मात्र बन कर वे गायत्री जयन्ती 1990 तक उन्हीं का कार्य करते हुए माँ गायत्री की गोद में ही समा गए। समर्पण इस स्तर का हो तो साधना निश्चित ही फल देती है। चाहे वह अत्यल्प ही क्यों न हो, पर वह ईश्वरीय कार्य के निमित्त, उनकी योजना के अंतर्गत तो निश्चित ही सफलता मिलती है। “हमारी वसीयत और विरासत” पुस्तक, जो पूज्यवर की आत्म कथा आधिकारिक जीवनी है, से हम सबसे बड़ा शिक्षण साधना विज्ञान का जो पाते है, वह है सघन श्रद्धा व पूर्ण समर्पण- आराध्य से-इष्ट से। यही यदि भलीभाँति निभ जाय तो जीवन साधना सफल होती चली जाती है। फिर व्यक्ति सिद्धियों की तलाश में नहीं जाता। वे उसके पीछे भागती रहती है व वह उनसे दूर भागता रहता है।
परमपूज्य गुरुदेव ने जीवनभर साधनाएँ की व करायी। दुर्गम हिमालय से लेकर उत्तरकाशी एवं ऋषिकेश की छोटी-सी कुटिया से लेकर सप्तऋषि आश्रम परिसर में बनी विश्वामित्र कुटीर तथा अखण्ड-ज्योति संस्थान का साधना कक्ष, उनके कठोर तप−साधना के क्षेत्र रहे हैं। गायत्री चर्चा स्तंभ 40 वे दश्याक में प्रारंभ कराने बाद क्रमशः पंचकोशी साधना, कल्प साधना, प्राण−प्रत्यावर्तन साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है। इसलिए प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशोधन का आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी भी न सुनने का दुस्साहस किया गया था।” (पृष्ठ 61−62)
किंतु पवित्रता संवर्धन एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। पूज्यवर ने इसी प्रक्रिया को सरल बना दिया एवं कहा कि आत्मशोधन कर पवित्रता को रोम-रोम में उतार कर हर कोई साधना क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है। गीताकार की तरह उनने आश्वासन भी दिया−
अपि चेन्तुदाचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तय्यः सम्यम्य्यवसितो हि सः॥ (33/9)
अर्थात् −”यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।” यहीं संकल्पशीलता व कण-कण में समा जाने वाली पवित्रता हम यदि माँगे तो गुरुदेव की कारण सत्ता निश्चित ही हमें देगी और फिर साधना सार्थक सिद्धिदात्री हो जाएगी।
भवन अमंगल-मकड़ियों ने जहाँ-तहाँ जाले बुन रखे है। शिशुओं की शौच दुर्गन्ध फैला रहा है पशुओं ने सर्वत्र गोबर फैला रखा है। सब ओर अस्वच्छता अमंगल ऐसे घर में रहना तो नरक में रहता है। दिन भर यही विचार उठता रहता, श्रुतिधर बेचैन हो उठे। यह भवन अमंगल है कहकर एक दिन उनने गृह परित्याग कर दिया और समीप के एक गाँव में जाकर रहने लगे। ग्रामवासी निर्धन है, अशिक्षित है, मैले कुचैले वस्त्र पहन कर सत्संग में सम्मिलित होते है। गाँव की गंदगी ने पुनः उनके मन में अकुलाहट भर दी। ग्राम भी अमंगल है इस अमंगल में कैसी जिया जाय? श्रुतिधर ने उसका भी परित्याग किया और निर्जन वन में एक वृक्ष के नीचे एकाकी कुटी बनाकर रहने लगे।
रात आनन्द और शान्ति के साथ व्यतीत हो गयी। लेकिन प्रातःकाल उठते ही पक्षियों का कलरव कुछ जंगली जानवरों ने कुटी के बाहर आखेट किए हुए वन्य पशुओं की हड्डियां बिखरा दी थी। इधर-उधर रक्त के छींटे पड़े हुए थे। आशंका से ओत−प्रोत श्रुतिधर के अन्तःकरण को हैरान-परेशान करने के लिए इतना काफी था। उन्हें वन में भी अमंगल के ही दर्शन हुए। अब क्या किया जाए इसी चिन्ता में थे तभी सामने बहती हुई श्वेत सलिला सरिता दिखाई दी। लगा जैसे आनन्द प्रवाहित हो रहा है। वह विचार करने लगे यह नहीं ही सर्व मंगल संपन्न है।सो कानन कुटी का परित्याग करके उस पयस्विनी के आश्रय में चल पड़े।
शीतल जल के सामीप्य से उन्हें सुखद अनुभूति हुई। अंजलि बाँध कर उन्होंने जल ग्रहण किया तो अन्तःकरण प्रफुल्लित हुआ। पर ये तृप्ति के क्षण अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हो पाए थे कि उनने देखा एक बड़ी मछली ने आक्रमण किया और छोटी मछली को निगल लिया। इस उथल-पुथल से नदी के तट तक हिलोर पहुँची जिससे वहाँ रखे मेढ़कों -मच्छरों के अंडे-बच्चे पानी में उतरने लगे। अभी यह स्थिति स्थिर भी न हो पायी थी कि ऊपर से बहते-बहते किसी कुत्ते की लाश उनके समीप आ पहुँची। यह दृश्य देखते ही उनका हृदय घृणा से भर गया। उन्हें उन्हें उस नदी के जल में अमंगल नजर आने लगा।
अब कहाँ जाए? इस सवाल ने श्रुतिधर को झकझोरा। वन, पर्वत, आकाश सभी तो अमंगल से घिरे है। उनका हृदय उद्वेलित हो उठा। इससे अच्छा तो यही है कि जीवन ही समाप्त कर दिया जाये। अमंगल से बचने का यही एक उपाय उनकी नजर में शेष रहा।
श्रुतिधर ने लकड़ियाँ चेनी। चित्ता बनायी, प्रदक्षिणा की और उस पर आग लगाने लगे तभी उधर कहीं से महर्षि वैशंपायन आ पहुँचे। यह सब कौतुक देखकर उनने पूछा−तुम यह क्या कर रहे हो। दुख भरे स्वर में उन्होंने अपनी अब तक की सारी व्यथा कथा सुना डाली। रुआंसे होकर कहने लगें “सृष्टि में चारों ओर अमंगल ही अमंगल है। इससे घिरे रहने से मर जाना बेहतर।”
महर्षि हंस पड़े −फिर एक क्षण चुप रहकर बोले “वत्स। तुम चित्त में बैठोगे। तुम्हारा जलेगा, शरीर में भरे मल भी जलेंगे उससे अमंगल ही तो उपजेगा। ऐसे में क्या तुम्हें शान्ति मिल सकेंगी?”
“तात।़ सृष्टि में अमंगल से मंगल कहीं अधिक है। घर में रहकर सुयोग्य नागरिकों का निर्माण, गाँव में शिक्षा संस्कृति का विस्तार, वन में उपासना की शान्ति और जल में प्रदूषण का प्रच्छालन-प्रकृति की प्रेरणा यही तो है। सृष्टि में जो मंगल है उसका अभिसिंचन परिवर्द्धन विस्तार हो। जो अमंगल है उसका शेचि -संस्कार किया जाय। यदि तुम इसमें जुट पड़ो तो अशान्ति का सवाल ही शेष न रहेगा। श्रुतिधर को यथार्थ का बोध हुआ वे घर लौट गए और मंगल की साधना में जीवन बिताने लगे।
परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी
ब्रह्मतेजस् के अभिवर्धन की साधना
चैत्र नवरात्रि पर्व पर उपासना संबंधी मार्गदर्शन हेतु परम पूज्य गुरुदेव द्वारा केन्या की राजधानी नैराबी में 11 दिसम्बर 1972 को दिया गया प्रवचन इस अंक में प्रस्तुत है।
गायत्री मंत्र जिन लोगों को याद हो, कृपाकर मेरे साथ कहें−
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
नारद पुराण का अनुवाद जिन दिनों मैं कर रहा था, उन दिनों एक बड़ी सुन्दर कथा पढ़ने को आयी। कथा थी एक लड़की की। राजा अश्वघोष की एक सुन्दर लड़की थी जिसके गुण ऐसे कि जो कोई भी उसको वरण कर ले, साथ रहे−उसको धन और यश की कमी न रहे, सारी की सारी शक्तियों से विभूषित हो जाय। नाम था उसका ‘सावित्री’। जब वह बड़ी होकर ब्याह लायक हो गयी तो संसार भर से माँग आने लगी कि लड़की का हमारे राजकुमार के साथ ब्याह कर दिया जाए। पिता विवाह की तैयारी कर रहे थे। कन्या ने एक दिन पिता से कहा, पिता जी? लड़के जिसे चाहे उसी के यहाँ कन्या को जाना चाहिए या लड़की की भी इच्छा होती है। पिता ने कहा, लड़की की इच्छा होती है और तेरी इच्छा के बिना मैं तेरी शादी नहीं करूंगा। सावित्री ने कहा−तो मुझे इजाजत दीजिये मैं स्वयं अपने लिए लड़का तलाश करूंगी। राजा अश्वघोष ने एक रथ मँगाया, लड़की को बिठाया और कहा बेटी तू कहीं भी जाकर अपने लिए लड़का ढूँढ़ ले।
लड़की रवाना हो गयी। कई राज्यों में पहुंची, बड़े−बड़े राजकुमारों को देखा और सबको मना करती गयी। एक दिन एक जंगल में एक लकड़हारे को देखा जो लकड़ी सिर पर रखे कहीं जा रहा था। उसने लड़के की ओर देखा और उससे कहा−लड़के! तेरा नाम क्या है? लड़के ने कहा−मेरा नाम है सत्यवान! तेरे चेहरे पर तो बड़ी चमक मालूम पड़ती है? उसने कहा−यह जो चमक है− ब्रह्मतेजस् है। ऐसा ब्रह्मतेजस् जिसे मैंने अपनी सुख−सुविधाओं को एक कोने में रखकर और माता-पिता सेवा में संलग्न रहकर प्राप्त किया है। लड़की ने उसको देखा, पहचाना और पहचान करके गले में वरमाला पहना दी। उसने कहा−मैं सत्यवान की तलाश में थी और तू सत्यवान मुझे मिल गया। बाद में क्या हुआ? एक साल बाद उसकी मृत्यु हो गयी और मृत्यु को परास्त करने के लिए सावित्री यमराज के पीछे−पीछे गयी और अपने पति का प्राण छुड़ा करके लायी।
यह कथा आप सबने जरूर सुनी है। यह किसकी कथा है? यह कथा आप सब ब्राह्मणों की है। ब्राह्मण माने−सत्यवान। सावित्री माने −वह माँ जिसके चरणों में हम और आप रोज मस्तक नवाते हैं। जिसको हम ब्रह्मशक्ति कहते हैं, आद्यशक्ति कहते हैं। जिसको हम वेदमाता और विश्वमाता कहते है। वह माता सावित्री है जो तलाश करती रहती है कि किसको वरण करूं? किसके साथ चलूँ? किसका पल्ला भारी करूं? किसके साथ रहूँ? उसको आदमी की जरूरत है जो सत्यवान हो। सत्यवान् माने ब्राह्मण। यह ब्राह्मण किसी वर्ण का नाम नहीं है, किसी कौम का नाम नहीं है, किसी जाति का नाम नहीं है। जिन्होंने ब्रह्म के तत्व को समझ लिया है, ब्रह्म के कर्तव्यों को जान लिया−वह ब्राह्मण है ऐसे ही ब्राह्मण व्यक्ति को वरण करने के लिए, उनके साथ होने के लिए, उनके प्राण बचाने और रक्षा करने के लिए माँ गायत्री तलाश करती रहती है कि ऐसा कौन व्यक्ति है जिसके गले में जयमाला पहना दी जाय। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण होना चाहिए।
गायत्री मंत्र शक्ति का पुँज है जिसकी प्रशंसा करते हुए वेद थकते नहीं। अथर्ववेद में वेदमाता गायत्री के बारे में कहा है−
“स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयान्ताँ......।’
सात ऋद्धियाँ,सात विभूतियाँ सात सिद्धियाँ दिया करती है गायत्री किसको? ब्राह्मण के अलावा और किसी को नहीं देती। कोई भी जाय वह हर एक को मना कर देती है। आप लोग यही सुनते भी है कि गायत्री का अधिकार ब्राह्मण को है। उसे गायत्री का जप करना ही चाहिए। यहाँ ब्राह्मण का अर्थ किसी वर्ण विशेष से नहीं है। यह विश्वमाता है। यह ब्राह्मण के लिए है, क्षत्रिय के लिए है, शूद्र के लिए है, हिंदू के लिए है, मुसलमान के लिए पारसी के लिए है, यहूदी के लिए है, खाली लोगों के लिए है और सबके लिए है। विश्वमाता एक की नहीं हो सकती। सूरज एक का नहीं हो सकता, चन्द्रमा एक का नहीं हो सकता। हवा एक की नहीं हो सकती। पृथ्वी एक की नहीं हो सकती, भगवान एक का नहीं हो सकता और गायत्री भी एक की नहीं हो सकती। वह सबकी है। लेकिन यह कैसे कहते है कि वह ब्राह्मण की है? ब्राह्मण की इसलिए कहते है कि शक्ति को धारण करना, शक्ति को ग्रहण करना, शक्ति से ओत-प्रोत होना हर आदमी का काम नहीं है। इसके लिए भूमि चाहिए। भूमि अगर मनुष्य के पास न हो तो वह लाभ नहीं मिल सकता जो मिलना चाहिए।
गायत्री का लाभ प्राप्त करने के लिए क्या करना पड़ेगा? गायत्री का जप करना पड़ेगा। पुरश्चरण करने पड़ेंगे। ध्यान करना पड़ेगा। गायत्री चालीसा का पाठ करना पड़ेगा। नवरात्रियों का अनुष्ठान करना पड़ेगा। परन्तु इतना ही काफी नहीं है। तब एक और भी काम करना पड़ेगा कि जो व्यक्ति इस शक्ति को धारण करना चाहता हो उसको अपने भीतर ब्रह्मतेजस् उत्पन्न करना पड़ेगा। कोई जमाना था जब इस देश में ब्रह्मतेजस् जगमगाता था क्षत्रिय विश्वामित्र, वन में गये। सेना सहित भूखे एक तालाब के किनारे बैठे थे। गुरु वशिष्ठ को मालूम पड़ा तो वे उनके पास गये और कहा−राजन् हूरे यहाँ अतिथि सत्कार स्वीकार कीजिए। उन्होंने कहा−महाराज! हम दस हजार व्यक्ति है। आपकी कोठरी में तो कंदमूल होगा और इसके अतिरिक्त क्या हो सकता है। वशिष्ठ बोले राजन्! हमारी कोठरी में कंदमूल ही नहीं और भी बहुत कुछ होता है। तो आप सबको भोजन करा देंगे? हाँ सबको कराया गया।
भोजन करने के पश्चात् विश्वामित्र ने कहा−महाराज यह शक्ति कहाँ से आयी? वशिष्ठ ने कहा−कामधेनु हमारे पास है। यह देवताओं की पुत्री नन्दिनी है जिसके माध्यम से मैं आपको भोजन कराने में समर्थ हुआ, ब्रह्मतेजस् धारण करने में समर्थ हुआ। विश्वामित्र ने कहा −इस गाय को तो आप हमें दे दीजिए जिससे हम मनोकामना पूर्ण करेंगे। गुरु वशिष्ठ ने कहा यह गाय और किसी के यहाँ जा नहीं सकती, केवल ब्राह्मण के यहाँ रहेगी, दूसरा कोई से ग्रहण नहीं कर सकता−धारण नहीं कर सकता। विश्वामित्र बलपूर्वक छीनने लगे तो नन्दिनी अकेली खड़ी हो गयी। ब्रह्मास्त्र नाम है इसका। ब्रह्मास्त्र माने−ब्राह्मण का हथियार। हथियार बहुतों के पास होते हैं, पर ब्राह्मण का हथियार बहुत जोरदार है और उसका नाम है −गायत्री। दोनों में संघर्ष हुआ, विश्वामित्र की सारी सेना परास्त हो गयी। वशिष्ठ की नन्दिनी जीत गयी। तब विश्वामित्र ने एक ही शब्द कहा− ”धिक्बंल क्षत्रिय बलं ब्रह्मतेजो बलम् बलम्।” क्षत्रिय का बल, भुजाओं का बल, पैसे का बल, विद्या का बल, ज्ञान का यह बल− यह सभी धिक् अर्थात् छोटे हैं राई-रत्ती के बराबर हैं। ब्रह्मतेज ही असली बल है।
मित्रो! एक जमाना याद आया जब ब्राह्मण जगद्गुरु था।। ज्ञान देने के लिए विश्व में वह जाता नहीं था, वरन् सारे संसार के लोग शिक्षायें लेने के लिए हमारे पास आते थे। नालंदा और तक्षशिला के विश्वविद्यालय सारी दुनिया के लिए ज्ञान के केंद्र बने हुए थे। ईसामसीह के बारे में जो नयी खोज की गयी है उसके अनुसार यरुशलम से चलकर एक बालक तक्षशिला के विश्वविद्यालय में आया और कई वर्षों तक पढ़ा। पढ़ने के बाद में उसने रोम और दूसरों देशों में घूम−घूमकर सत्य और अहिंसा का शिक्षा देना शुरू किया। वही बालक पीछे ईसामसीह कहलाया। सारे विश्व के लोग इन विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए आते थे जिनके शिक्षक, अध्यापक, डीन, व्यास, चान्सलर ब्राह्मण होते थे−ऋषि होते थे और वे साधारण नहीं होते थे। मैं अनेक गुणानुवाद गा रहा हूँ जिन्होंने गायत्री की शक्ति को जाग्रत करके अपने भीतर धारण किया था। यह वर्ग यदि अपने उन्हीं कर्तव्यों पर टिका रहा तो आज विश्व कि दिशा कुछ अलग ही रही होती।
पूर्व पुरुष अपने पीछे अपनी संतानों को धन−दौलत देकर जाते है−चीजें देकर जाते है, लेकिन जिम्मेदारियाँ भी देकर जाते है। पूर्वज ऋषि हमको अपनी जिम्मेदारियाँ देकर गये है कि हम विश्व का संरक्षण, विश्व का मार्गदर्शन और दिशा देने का वजह अपने ऊपर लें। जनेऊ संस्कार जब कराया जाता है तब हर ब्राह्मण को एक प्रतिज्ञा करनी पड़ती है, कसम खानी पड़ती है कि −”वयं राष्ट्र जाग्रयाम पुरोहिताः” −हम पुरोहित−हम ब्राह्मण राष्ट्रों को जिन्दा रखेंगे। राष्ट्र को देश को जीवित और जिन्दा रखने की जिम्मेदारी−जो पूर्व पुरुष छोड़ गये है, कदाचित् हम उसे निभा सके होते तो हमने भी सिर ऊंचा उठा करके उन्हीं बातों को कहा होता जिनकी की प्रशंसा हमारे शास्त्रों और ग्रन्थों में ब्राह्मण की महानता के आगे सिर झुका कर की गयी है। हमको उन जिम्मेदारियों को निभाना चाहिए जो ब्राह्मण करते है। प्राचीन काल में ब्रह्मतेजस् धनी चाणक्य ने देखा कि राष्ट्र में अव्यवस्था फैल रही है भारत छिन्न−भिन्न हो रहा है उन्होंने चन्द्रगुप्त को बुलाया और कहा−इनको संभालने के लिए तुमको आगे बढ़ना चाहिए। चन्द्रगुप्त के सिर पर चाणक्य का हाथ था। वे लड़ने नहीं गये तो क्या, लेकिन ऐसी शक्ति भर दी जिससे वह न जाने क्या से क्या कर सका। यह काम आप भी कर सकते है यदि आप के पास गायत्री की शक्ति हो तब। लेकिन उस शक्ति को हम भूल गये। प्राचीन काल में सारा विश्व आपके चरणों में इसलिए सिर झुकाता था कि हम शासन नहीं करते थे, पर शासनों पर नियंत्रण करते थे। रामराज्य में राम का राज्य हुआ, उनके पिता दशरथ का राज्य हुआ, उनके पिता रघु का, अज का, दीलिप का राज्य हुआ। पीढ़ियां होती चली गयी, लेकिन गुरु वशिष्ठ का नियंत्रण बना रहा। शासन चलते थे पर उन्हें चलाते थे ब्राह्मण। कब? तब, जबकि वे उसकी उपासना करते थे जिसकी की आराधना करने के लिए आप लोग हजार कुण्डों का दीपक जला करके आरती उतारने चल रहे है। उस ब्रह्म शक्ति की जिस शक्ति से हम जगमगाते थे किसी जमाने में राष्ट्रों का नियंत्रण करते थे, शासकों को उत्पन्न करते−पैदा करते थे। शासकों को उतारते थे और चढ़ाते थे विभूतियाँ हमारे चरणों के अंतर्गत रहती थी, क्योंकि ब्रह्मतेजस् हमारे पास था।
गायत्री आपकी माता है आपकी माता वही नहीं है जिसने जन्म दिया, वर्ण आपकी माता शक्ति की पुँज विश्वमाता है। गायत्री को आपकी माता को हम भूल गये। जो आदमी अपनी माता को भूल जाएगा दूध कहाँ से पीयेगा? शक्ति का पुँज है यह गायत्री मंत्र। लेकिन हमारे मंत्र न जाने क्यों चमत्कार नहीं दिखा रहे हैं? इसलिए नहीं दिखा रहे है क्योंकि एक हिस्सा हमारा बाकी रह गया है। जमीन को हमने सँभाला नहीं और बीज बो दिया। चरित्र जमीन है और मंत्र बीज। बीज वहीं उगेगा− फलेगा, जहाँ जमीन होगी। जमीन नहीं होगी तो बीज कैसे फैलेगा? मनुष्य का चरित्र सबसे बड़ा है। चरित्रवान की वाणी जो वचन कहे जायेंगे जो मंत्र बोले जायेंगे वे सत्य होते चले जायेंगे मिथ्या नहीं हो सकते सिंनगारी ऋषि द्वारा राजा दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ की कथा आपने सुनी है अब मैं आपको अपनी जिन्दा आदमी की गवाही पेश करता हूँ। अभी 50 लाख व्यक्ति मेरे है। उस आदमी इसमें से एक लाख भी नहीं है जो गायत्री मंत्र विद्या सीखने, उसकी सुविधायें प्राप्त करने के लिए आते हैं। फिर 49 लाख कौन है? 49 लाख वे हैं जो दुःखी हैं, कष्ट में हैं, मुसीबत में हैं, जिनको साँसारिक मानसिक कठिनाइयों ने घेर रखा है। वे भी आते रहे हैं और कहते रहे हैं मेरी यह दिक्कतें हैं आप कोई सहायता कीजिए। मैंने कहा भगवान से प्रार्थना करूंगा और भगवान से प्रार्थना सही होती चली गयी इस तरीके से कितने आदमी दुःखों को दूर करने के लिए आते हैं। यह कैसे सम्भव हो गया? गायत्री मंत्र की सिद्धि कैसे हो गयी? जप करने महत्व क्या है क्या मैं अकेला ही जानता हूँ? दूसरे किसी ने जप नहीं किया? बहुतों ने जप किया फिर फल क्यों नहीं मिला? पर इसलिए नहीं मिला कि लोगों ने अपनी जीभ को जला दिया। झूठ बोला जीभ जल गयी पराया अन्न खाया−कुधान्य खाया जीभ जल गयी। सत्य−असत्य भाषण किया, दूसरों पर क्रोध किया−जीभ जल गई। जली हुई जीभ द्वारा किस तरह मंत्रों का उच्चारण हो और मंत्रों को सफलता मिले? जीभ जले नहीं, इनके लिए हमारे चरित्र और आचरण उच्च कोटि के होने चाहिए।
मंत्र कारतूस के तरीके के हैं और मनुष्य का व्यक्तिगत बन्धु के तरीके से। कारतूस का अपना महत्व है, पर उससे भी ज्यादा कीमती बन्दूक है जो बढ़िया लोहे की बनी और ढली हुई हो हमें अपने चरित्र को, जीवन को उच्चकोटि बनाना पड़ेगा। आपने आपको स्वयं ही ब्रह्मचारी, ईमानदार, नेक और सरीफ बनाना पड़ेगा यही तो ब्राह्मण की परिभाषा है ब्राह्मण जन्म से नहीं कर्म से होता है। कर्म ही हमारे ब्राह्मण जैसे होने चाहिए। अभी ब्राह्मणत्व खण्डहर हो गया है, टूट फुट गया है जिसने फिर से ‘रिपेयर’ करने की जरूरत है फिर हमको चरित्रवान विद्वान, सेवा भाव ही और ईमानदार बनने की जरूरत है। ऐसे व्यक्ति यदि हम अपनी साधना से पैदा कर सकते हैं तो हम ब्राह्मणत्व की सेवा कर सकते हैं और उस चमत्कार को देख सकते हैं जो गायत्री मंत्र के साथ जुड़ा हुआ है। जो यज्ञ के माध्यम से जुड़ा हुआ है।
यज्ञ की महत्ता असाधारण है। राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ की कथा प्रसिद्ध है। रावण जब पराजित होने लगा तब उसने राम चन्द्र जी शक्ति का मुकाबला करने के लिए एक आयोजन किया। राम और लक्ष्मण को जब पता चला तो उन्होंने कहा −यदि यज्ञ पूरा हो गया तो हमारी विजय मुश्किल हो जाएगी। हनुमान जी गये और यज्ञ को विध्वंस किया। यज्ञ की शक्ति बहुत बड़ी है यह कोई समारोह आयोजन नहीं, वरन् शक्तियों का आह्वान है। उन शक्तियों का आह्वान है जिसके द्वारा मनुष्य क्या से क्या बन सकता है। ब्राह्मण पैदा नहीं होता, वह यज्ञ की अग्नि में पकाया जाता है। घड़ा पैदा नहीं होता−अग्नि में आवों में पकाया जाता है। “महायज्ञेश्च यज्ञेश्च ब्राह्मीयाँक्रियते तनुः”− ब्राह्मण पैदा नहीं होते, यज्ञों के द्वारा −महायज्ञों के द्वारा पकाये जाते हैं। चन्द्रोदय, अभ्रक पकाया जाता है खिचड़ी कहीं बनी बनायी नहीं मिलती पकायी जाती है। ब्राह्मण भी पैदा नहीं होते, उन्हें यज्ञ के आवे में बनाये व पकाये जाते हैं।
प्राचीनकाल में पहले हम यज्ञ पिता को भोजन कराते थे तब भोजन करते थे। अग्निहोत्र हमारे जीवन का अंग था। गायत्री तपोभूमि में अखण्ड अग्नि स्थापित है। अखण्ड जप हमारे यहाँ होता है। उसका परिणाम है यह ब्रह्मवर्चस जिसकी आप उपासना करते है। आज की परिस्थितियों में यज्ञ की बहुत जरूरत है जिसका कि आप लोग आयोजन कर रहे है इसे मानव समाज की बड़ी सेवा होने वाली है। इससे लोगों की मानसिक दुख दूर हो सकते हैं। आप प्रयोग करके देखिए। जो लोगों हवन में सम्मिलित हो उनके शरीर के बिमारियों के बारे में इम्तहान लेकर करके देखिये हवन पर बैठने वाले की बीमारियां दूर हुई कि नहीं। मानसिक बीमारियां जिसमें क्रोध काम विकार, असंतोष, झल्लाहट, सनकीपन, से लेकर पागलपन तक शामिल है− ऐसे लोगों को हवन पर बिठा कर देखिये कि शरीर और मन की बिमारियों को वह दूर करता है कि नहीं यह व्यक्ति की बात है।
अब मैं व्यक्ति की नहीं सारे विश्व की कल्याण की बात करता हूं। भगवान राम जब लंका विजय करके घर तब गुरु वशिष्ठ ने पूछा−अब क्या करना चाहिए? उन्होंने कहा राम।़ अभी स्थूल शरीर वाला रावण मारा गया है पर सूक्ष्म रावण जिन्दा है जो आकाश में फैला हुआ है। रावण ने जो बुरे कर्म किये थे, जो हवाएँ फैलायी थी, जो गन्दे विचार फैलाये थे उससे सारा आकाश क्षुब्ध हो गया है, उसे शान्त करो। राम ने कहा−स्थूल रावण को तीर मार दिया, पर यह कैसे मारा जायेगा? गुरु वशिष्ठ ने कहा−अश्वमेध यज्ञ से। रामचन्द्र जी ने दस अश्वमेध यज्ञ किये। बनारस के जिस स्थान पर दस अश्वमेध या किये गये, उस स्थान का नामा दशाश्वमेध घाट पड़ा। गुरु वशिष्ठ जी ने कहा−अब वह रावण मरा गया, क्योंकि जिस आकाश में इतनी हाय, विध्वंस और हिंसा फैली हुई थी− उसका निवारण हो गया।
पिछले दिनों दो विश्वयुद्ध हो चुके है। उसमें कितनी आत्मायें मारी गयी, कितने जीवों की हत्यायें हुई, कितनी गोलियाँ चली, कितनी बारूद आसमान में फैलायी गयी। अंतरिक्ष दूषित और गर्हित हो गया। अब जो बच्चा पैदा होता है वहीं संस्कार ले करके आता है गंदे आसमान में से। जो भी वृष्टि होती है, जो भी अनाज पैदा होता है, जो भी वनस्पतियाँ और प्राणी पैदा होते हैं− जन्म से ही सह संस्कार लेकर आते हैं। माता−पिता रोते हैं−अच्छी सन्तान हुई इससे न होती तो अच्छा रहता’। यह संस्कार इस आसमान में फैले हुए हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी यही किया था। पाण्डवों में फैले हुए है। भगवान श्री कृष्ण ने भी यही किया था। पाण्डवों ने कहा−भगवान्। राजगद्दी मिल गयी अब हम शान्ति से बैठेंगे। आप बताइये हमको अब क्या करना है? कृष्ण ने कहा−सूक्ष्म दुर्योधन अभी मारा गया। सूक्ष्म कंस, सूक्ष्म जरासंध सूक्ष्म शिशुपाल अभी नहीं मरे। केवल शरीरधारी मरा। शरीरधारी कौरव मारे गये, पर सूक्ष्म कौरव मारने बाकी है। ये कैसे मरेंगे? राजसूय यज्ञ किया गया।
उस यज्ञ से आकाश-अंतरिक्ष की शुद्धि की गयी। अंतरिक्ष की शुद्धि के लिए और उन सबसे लिए जो नयी पीढ़ी के लोग पैदा होने वाले है, जो समस्याओं से उलझे हुए है, जो संकट और कठिनाइयों से भरे हुए है− उस सारी मानव जाति का कल्याण करने के जो यज्ञ कर रहे है− यह सबसे बड़ा परोपकार है। इससे बड़ा परोपकार और कुछ नहीं हो सकता। यह सारे मनुष्य जाति के लिए ब्रह्मभोज और दूसरा हो नहीं सकता। सारे विश्व के समस्त प्राणियों, वृक्ष−वनस्पतियों की इससे पुष्टि होती है। सब बलवान और निरोग होते है। सबके कषाय−कल्मष दूर होते है। सबको शान्ति मिलती है। यज्ञ से असंख्य मनुष्यों के रोग, शारीरिक−मानसिक विकार दूर होते है। इससे विश्व में शान्ति होती है। दो महायुद्धों के द्वारा,गन्दे गीतों के द्वार जो आकाश प्रदूषित हो गया है, इसको वेद मंत्रों द्वारा यज्ञ से दूर किया जा सकता है। इसमें सारे विश्व का कल्याण छिपा हुआ है और आप लोगों का कल्याण भी जिन्होंने यज्ञ का संकल्प किया है। आप लोग जो यज्ञ करने जा रहे हैं उनके बारे में वेद भगवान ने ही विश्वास दिलाया, जिम्मेदारी उठायी−कसम खायी और कहा−’जिन लोगों ने मुट्ठी भरकर सामग्री लायी−हवन कर दी, हमने उनकी मुट्ठियों को भर दिया। तुम घी का एक चम्मच भर कर दिया। यह बैंक में जमा करने के बराबर है। यज्ञ चीजों को जलाता है, वरन् जम जो चीजें हवन करते है उससे लाखों गुनी चीज इस सारे आकाश को मिल जाती है। यह एक वैज्ञानिक उपाय है। यज्ञ ब्रह्मतेजस् जगाने की विधि है। यह वह कर्मकाण्ड है जिसे ने केवल हम और आप ब्रह्म समाज के लोग अपना कर्तव्य पालन कर सकेंगे। वरन् सारी मनुष्य जाति के प्रति भी अपने कर्तव्यों का पालन कर सकेंगे।
गायत्री मंत्र जिसकी आप उपासन करते, जिसको ब्रह्मास्त्र कहते हैं−यह ब्राह्मण का हथियार है। इसे कामधेनु कहते हैं, अमृत और पारस कहते हैं जिसको छूकर लोहा सोना हो जाता है। यह गायत्री वेदमाता है। उसके प्रति आपके कर्मकाण्ड सराहनीय है, लेकिन उससे भी अगला कदम आपका यह होना चाहिए कि जो भी गायत्री की उपासना करते हैं उनको सत्यवान बनना ही चाहिए, ताकि वह सावित्री जो गायत्री का ही दूसरा नाम है, आपके गले में विजय माला पहना सके। यह गायत्री शक्तियों का पुँज है, देवत्व की देवी है। ब्रह्मवर्चस्। यह सब कुछ है। कोई भी ऐसी चीज नहीं जो इसके पास न हो। यह सतयुग में भी फल देती है और कलयुग में भी फल देती है, पर शर्त एक ही है कि जिन-जिन लोगों ने गायत्री उपासना के प्रति कदम बढ़ाये हैं उनको दूसरा कदम यह बढ़ाना चाहिए कि उत्तम बनायें उज्ज्वल बनाये बनाये। सदाचारी, विवेकवान्, शिष्ट, पवित्र और परोपकारी बनायें। जैसे-जैसे अपने आपको साफ करते चले जायेंगे। जीवन पवित्र और शुद्ध होता चला जायेगा वैसे-वैसे ही भगवान के नाम का रंग, गायत्री माता का रंग आप पर चढ़ता हुआ चला जायेगा। यह रहस्य है−चाबी है गायत्री मंत्र की और अन्य सारे अध्यात्म की।
मित्रो! मैं इसी राह पर अब तक चलता हुआ चला आया और यह अनुभव निकालने में समर्थ हो सका कि यह ब्रह्मतेजस् जिसकी कि आप उपासना करते हैं और मैं उपासना करता रहा, एक शक्तिपुँज है। इसके बराबर उपासना करते हुए जो लाभ उठाया जा सकता है कोई दूसरा व्यापार, दूसरा लाभ और दूसरा परमार्थ नहीं। आप लोगों ने अनेक तरह के व्यापार और कार्य किये हैं। मेरा व्यापार से कितना लाभ उठाया जा सकता है कितना लाभ उठाया गया। मैं चाहता हूँ कि मेरे तरीके से आप लोग भी लाभ उठायें और उसी तरीके से लाभान्वित हो जैसे कि आपके पूर्व पुरुष लाभान्वित होते रहे हैं।
आज हम युगसंधि काल में इतिहास के जिस मोड़ पर खड़ा हुए है, वह निश्चित ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय है। यह परिवर्तन का विराट व्यापक स्तर पर क्रान्ति का समय है। बदलाव लाने के लिए हमेशा परमात्मा की अवतारी सत्ता प्रखर प्रतिभाओं का उपार्जन करती एवं उनसे वह सब करा लेती है जिससे वे युग−परिवर्तन के श्रेयाधिकारी बन सकें। आज की विनाशकारी घटाटोप भरी परिस्थितियों में हमारा मार्गदर्शन परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखी सम्पादकीय में व्यक्त वे भावनाएं करती है, जिनमें महाकाल की माँग के रूप में प्रतिभाओं से वे आह्वान करते है। प्रस्तुत अंक में समय के अनुकूल मार्गदर्शन हेतु पूज्यवर की 1990 की लिखी एक ‘अप्रकाशित ‘अपनी बात’ हम प्रकाशित कर रहे हैं।
झोपड़ी का छप्पर बनाने में कई श्रमिक, सहयोगियों, कारीगरों की आवश्यकता पड़ती है। बढ़े कारखानों, मिलों में तो हजारों की संख्या में कुशल कारीगरों की आवश्यकता होती है। अपने देश के रेल तंत्र में ही लाखों प्रशिक्षित कर्मचारी कार्यरत रहते है; फिर एक देश का ही नहीं वरन् समूचे विश्व के क्रिया−कलापों का दृष्टिकोण, चिंतन, चरित्र, व्यवहार में लगभग आमूल–चूल परिवर्तन करने में किस स्तर की, कितनी बड़ी सृजन सेना चाहिए। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। आगरे का ताजमहल, मिश्र के पिरामिड चीन की दीवार जैसे भव्य निर्माणों को जिन्होंने निकट से देखा है उन्हें यह अनुमान भी लगाते बन पड़ा होगा कि कठिन परिस्थितियों में जटिल संरचनाएँ खड़ी करने में कितने संसाधनों और कितने श्रमिकों, कितने योजनाकारों का इनमें नियोजन हुआ होगा, और वे कितने दिनों के कठिन परिश्रम से विनिर्मित हो सके होंगे। युग−निर्माण ऐसी संरचनाओं की तुलना में हजारों लिए किस स्तर की कितनी बड़ी सृजन सेना चाहिए, इसका अनुमान लगाना मूर्धन्यों के लिए कुछ बहुत कठिन नहीं होना चाहिए।
लंका दमन और नवयुग के संस्थापन में तत्कालीन मनुष्यों की उपेक्षा भीरुता आड़े आने पर रीछ−वानरों को प्राण हथेली पर रखकर उस प्रयोजन के लिए आगे बढ़ना पड़ा था। गोवर्धन उठाने और महाभारत के विशाल भारत संरचना कार्य में भी अनेकों उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ कार्य क्षेत्र में उतरी थी। बुद्ध ने धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए लाखों परिव्राजक देश−देशान्तरों में भेजे थे। गाँधी को भी सत्याग्रह आन्दोलन में कितने जीवन्त मनस्वी उस अमृतपूर्व युद्ध में मोर्चा संभालने के लिए मनस्वी उस अभूतपूर्व युद्ध सृजन के लिए भी उन सबके सम्मिलित योग से भी बड़ी कार्यवाहिनी चाहिए। कारण कि लक्ष्य दुहरा है−एक अवाँछनीयताओं से भरे विशालकाय समुद्र को अगस्त्य की तरह सोखने का, दूसरा भगीरथ द्वारा गंगावतरण संपन्न करने की तरह शुष्क भूमि में हरीतिमा के व्यवस्था विस्तार का। अस्तु समय की माँग पूरी करने के लिए दूने मनोबल वाले, दूने पराक्रम कर दिखाने वाले सृजन शिल्पियों की अगले ही दिनों आवश्यकता पड़ेगी। उनके उत्पादन में लम्बी प्रतीक्षा नहीं की जा सकती। यह कार्य युद्ध स्तर पर संपन्न करना होगा। 600 करोड़ मनुष्यों के मानस में जमी हुई प्रतिगामिताओं को बदल कर उनके स्थान पर प्रगतिशीलता की प्रतिष्ठापना करनी है। लाँण्ड्री कुछ ही लोगों के कपड़े धो पाती है; पर यहाँ तो धरती के कोने−कोने में बिखरे हुए लोगों का ब्रेन वाशिंग करना लक्ष्य है। चल रही गतिविधियों में से अधिकाँश ऐसी है जो अपनी उपयोगिता खो चुकी उनके स्थान पर अभिनव प्रचलनों का प्रवाह बहाना है। मनुष्य के पूर्वाग्रही, हठवादी, प्रतिगामी स्वभाव को देखते हुए यह कम कठिन नहीं है, पर जो करना है वह तो करना ही ठहरा। अग्निकाण्ड, बाढ़, भूकम्प, महामारी, किसी भयंकर दुर्घटना की विभीषिका मूक दर्शक बनकर भी तो नहीं देखी जा सकती। मानवी गौरव और वर्चस्व ऐसी विपन्नता निरपेक्ष होकर देखता भी नहीं रह सकता। प्राणवानों को समय की चुनौती आगे बढ़कर स्वीकार करनी पड़ती है। अगले दिनों चिंतन का स्वरूप और गतिविधियों का परिवर्तन इतने बड़े रूप में आवश्यक होगा, जिसे समय का कायाकल्प हुआ कहा जा सके। युग परिवर्तन ऐसी ही प्रत्यावर्तन को कहा जाता है।
आरंभ कहाँ से हो? यह विचारणीय है। अनभ्यस्त का मार्गदर्शन कौन करे? अनदेखी रहने पर अग्रगमन कौन करे? इसके लिए हनुमान जैसे लम्बी छलाँग लगाने वाले और नल−नील जैसे पानी पर पत्थर तैराने वाले साहस के धनी और पैनी सूझबूझ वाले चाहिए। वे कहाँ मिले? उन्हें कहाँ ढूँढ़ा जाय? नये सिरे सिरे से भर्ती करने और लक्ष्यबेध में प्रवीण, पारंगत बनाने के लिए कितनों को किस प्रकार प्रशिक्षण दिया जाय, यह टेढ़ी खीर है। बिल्ली के गले में चूहे पेजों द्वारा घंटी बाँधे जाने की योजना की तरह जटिल और कठिन भी। इतना सब होते हुए भी महाकाल की चुनौती किन्हीं को तो स्वीकार करनी होगी। महाविनाश की ओर दौड़ी जा रही उन्मीद भीड़ को किसी न किसी प्रकार रोकना ही होगा? भटकों को लौटाने और उपयुक्त मार्ग पर चलने के लिए बाधित करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प भी तो नहीं है।
प्रस्तुत प्रयोजन के लिए शान्तिकुँज ने अपनी थोड़ी सामर्थ्य और छोटी सीमा का अनुमान लगाते हुए भी यह दुस्साहस किया है कि युग संधि के आगामी आठ वर्षों तक चलने वाले पर्व पर कोई कहने लायक उपलब्धि प्रस्तुत करके दिखानी है। अपना परिवार, परिकर लम्बे समय से आदर्शवादिता अपनाने के लिए प्रशिक्षित और प्रोत्साहित किया जाता रहा है। अब वह इतना परिपक्व हो गया है कि कोयल की खदान से कुछ रत्न निकलने की आशा की जा सके। लम्बे समय तक पलते और बढ़ते रहने के उपरान्त वृक्ष इस स्थिति में भी तो पहुँचता है कि उसकी डालियों को सुहावने मधुर फलों से लदा हुआ देखा जा सके। रुग्ण और दुर्बल काया के लिए शक्तिदायक आहार की तरह उनका उपयोग हो सके।
बड़ी योजनाएँ बनाने, बड़ों से बड़ी आशा करते रहने की अपेक्षा यह अधिक व्यावहारिक है कि जो अपने हाथ में है, उसी का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर गुजरा जाय। मिशन की पत्रिकाओं के प्रायः पाँच लाख स्थायी पाठक है। हर पत्रिका को नियमित रूप से पढ़ने वाले पाँच−पाँच ग्राहक भी। निष्ठावान पाठक भी इसी परिवार के साथ जुड़े हुए हैं। इन पच्चीस लाख अनुमानित परिजनों में से यह आशा करने के पीछे तथ्यों का बल है कि इनमें से एक लाख व्यक्ति ऐसे निकलें जो नव सृजन के महाकाल को पूरा या आँशिक समय लगाकर महापरिवर्तन के भागीदार बन सके।
युगसंधि के सात वर्ष चलने वाले पावन पर्व पर एक लाख सृजन शिल्पी विनिर्मित करे युग देवता के चरणों में उपस्थित करने का संकल्प उभरा है। परम्परा के अनुरूप समर्थक संकल्प जन्मते ही बढ़ने और चलने भी लगते है। संकल्प के अनुरूप व्यवस्था भी चल पड़ी है। परिवार के प्राणवानों को क्या करना है, यह तो साहित्य के माध्यम से भी बताया जा चुका है। अब बात इतनी भर है कि निजी मनःस्थिति और स्थानीय परिस्थिति के साथ तालमेल बिठाते हुए किये क्या, किस प्रकार, कहाँ कब क्या कुछ करना है इसका निर्धारण किया जाय। इसके लिए उपयुक्त विधि व्यवस्था का प्रकाश, मार्गदर्शन प्राप्त किया जाय। साथ ही पहुँचाया जाय, जहाँ तक पहुँचने पर कुछ बिना रुका ही नहीं कहा जा सकता।
युगसंधि पुरश्चरण के साथ−साथ चल पड़े है। समय कम आवश्यकता बड़ी को देखते हुए इस प्रशिक्षण प्रक्रिया को एक महीने की अवधि में सिकोड़ा गया है। जो अत्यधिक व्यस्त है वे न्यूनतम नौ दिन तक जो इन प्रेरणा सत्रों में सम्मिलित होकर अपनी बैटरी नये सिरे से चार्ज करा ही सकते है। यही शिक्षार्थी इन सात वर्षों की अवधि में संख्या की दृष्टि से एक लाख से कम न रहेंगे और वे अपनी−अपनी स्थिति के अनुरूप अपने क्षेत्र में कुछ न कुछ ऐसा किये बिना न रहेंगे, जिसे सराहनीय ही नहीं, अनुकरणीय और प्रेरणाप्रद कहा जा सके।
नालन्दा, तक्षशिला विद्यालयों में प्रायः तीस−तीस हजार छात्र एक साथ पढ़ते थे। इस प्रयोजन के लिए बौद्ध विहारों में, वानप्रस्थ आरण्यकों में, साधना आश्रमों में भी बड़ी संख्या में ऐसी प्रतिभाएं विनिर्मित होती थी, जो मनुष्य समाज से सम्बन्धित अगणित पक्षों में से किन्हीं थोड़े से को अपनाकर अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व की बढ़ी−चढ़ी महानता का परिचय दे सकें। उस महान परम्परा को फिर से पुनर्जीवित करना कठिन तो अवश्य दीख सकता है; पर निश्चय ही वह असंभव इन परिस्थितियों में भी नहीं है। विश्वास को प्रत्यक्ष में परिणित करने के लिए इन दिनों ऐसे प्रचण्ड प्रयत्न चल पड़े है, जिन के साथ प्राण−पण की बाजी लगी हुई समझी जा सकती है।
जिन्हें परिवार का आर्थिक दबाव नहीं है उन्हें पूरा समय देने के लिए कहा गया है। जो कुछ वर्ष ही पूरा है। जो शिक्षित पति−पत्नी बिना बच्चे पैदा किये सेवा कार्यों में जुट सके, उन्हें गृहस्थ जीवन का शुभारंभ इस प्रकार करने के लिए कहा जा रहा है। जो व्यस्तता और अभावग्रस्तता के घेरे में घिरे हों, उन्हें हर दिन दो घंटे एवं सप्ताह में छुट्टी का एक दिन पूरा लगाने के लिए कहा जाय। समय, श्रम, मनोयोग और संकल्प के समन्वय से ऐसी शक्ति उभरती है जिससे हजारों किसान जैसे साधारण लोग भी निरन्तर कार्यरत रहकर अपने जीवन में हजार आम्र उद्यान लगा सकने में सफल हो सकते है। अपना उदाहरण असंख्यों को प्रेरणा प्रदान कर सकने वाले शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।
संसार में कोई भावनाशील ऐसा नहीं, जो अपनी स्वल्प शक्ति के सहारे भी सृजन का मनोरथ होने पर कुछ न कुछ ऐसा महत्वपूर्ण काम न कर सके जिससे आत्म संतोष, लोकसम्मान और दैवी अनुग्रह के त्रिविध लाभ किसी न किसी रूप में प्राप्त न हो सके। इन दिनों प्रवाह अनुकूल है। वसन्त की तरह फलने−फूलते की ऋतु है। अदृश्य शक्ति की बलवती इच्छा शक्ति का प्रवाह इन दिनों इतने प्रचण्ड वेग से अग्रगामी हो रहा है कि उसके साथ चल पड़ने वाले हर दृष्ट से नफे में ही रहेंगे।
मानवी जीवन में सबसे बड़ा लाभ है− प्रतिभा परिष्कार। यह बन पड़े तो समझना चाहिए कि मनुष्य हर क्षेत्र में हर प्रकार की सफलताएं प्रचुर मात्रा में सरलतापूर्वक अर्जित कर सकता है। इस व्यक्तिगत लाभ में नवसृजन का परमार्थ जुड़ा होने से उसकी उपयोगिता अनेक गुनी अधिक बढ़ जाती है।
कहना न होगा कि प्रचण्ड आन्दोलन वरिष्ठ प्रतिभाओं द्वारा आरंभ किये जाने पर सामान्य मानस वाले लोग भी उसका अनुसरण करते है। विचारशीलों द्वारा सामयिक एवं सही होने पर नये प्रतिपादन भी उत्साहपूर्वक अपनाये जाते है। पिछले दिनों साम्यवाद, प्रजातन्त्र की मान्यताएँ नवीन होने पर भी असंख्य जनों द्वारा उत्साह पूर्वक अपनाई गई। कभी साधु−ब्राह्मण परम्परा अपनाकर धर्म प्रचारक, परिव्राजक बड़ी संख्या में उभरते थे और भरपूर जन सहयोग तथा सम्मान पाते थे। उन की उपयोगिता सर्वत्र सराही जाती थी। अगले दिनों शान्तिकुँज की प्रशिक्षण प्रक्रिया एक लाख तक ही सीमाबद्ध होकर न रहेगी। उसे विभिन्न भाषाओं और देशों में अपने−अपने ढंग से विकसित होते और प्रगतिशील वातावरण बनाने में बढ़−चढ़कर योगदान देते देखा जा सकेगा। एक से पाँच, पाँच से पच्चीस बनाने वाली प्रक्रिया यदि एक लाख को एक करोड़ तक पहुँचा दे और नवसृजन की, युग परिवर्तन की प्रक्रिया में संलग्न दिखाई पड़े, तो इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं माना जायेगा
लक्ष्मी जी का वैभव दैत्यों के यहाँ बढ़ता जाता था। देवताओं का प्रताप और भण्डार घटता जा रहा था।
एक दिन देवताओं ने लक्ष्मी जी से प्रार्थना की कि−”आप हम लोगों से क्यों रुष्ट हो? और दैत्यों पर क्यों अनुग्रह करती हो? हमारा पक्ष पुण्य का है और दैत्यों का पाप का।” आप यह विचार भी नहीं करती।
लक्ष्मी जी ने कहा−”पाप−पुण्य का लेखा−जोखा भगवान करते हैं। मैं तो पराक्रम, साहस और लगन देखती है। जिनमें यह गुण होता है, उनके यहाँ जा पहुँचने का मेरा सहज मन होता है।”
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जैक्सन सदा सादे लिबास में रहते थे। एक दिन वे प्रवास पर थे। रात हो गई तो एक होटल में अपने बिस्तर स्वयं लेकर पहुँचे।
होटल बड़े लोगों के लिए बना था। सीधे−सादे ग्रामीण से दिखने वाले व्यक्ति को होटल मालिक ने ठहराने से इनकार कर दिया।
जैक्सन दूसरे सस्ते होटल में जाकर ठहर गये। वहाँ उनने अपना पूरा नाम−पता भी लिखवाया।
अमेरिका के उपराष्ट्रपति को जिस होटल वाले ने ठहराने से इनकार कर दिया था। वह उन्हें नाराज करने पर होने वाली हानि का विचार करके बहुत घबराया और तुरन्त क्षमा माँगने और वापस लाने के लिए चल दिया।
जैक्सन ने छोटे होटल में ही रात बिताई और बड़े होटल वाले को यह कह कर मना कर दिया कि “जहाँ अमेरिका का एक साधारण नागरिक सम्मानपूर्वक नहीं ठहर सकता, वहाँ मेरे लिए जगह निकालने की भी जरूरत नहीं है।”
*समाप्त*