परस्पर एक सूत्र में जुड़ें हम सब

समुद्र अनेकानेक बूँदों तथा लहरों का समुच्चय है। प्रत्येक लहर का अस्तित्व अलग अलग दिखाई पड़ते है। उगते सूरज के समक्ष देखें तो हर लहर पर एक स्वतंत्र सूरज होता है इतने पर भी यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होता है कि इस भिन्नता के मूल में एक अविच्छिन्न एकता की सत्ता विद्यमान है। सारा समुद्र एक ही है वही एक सूर्य असंख्यों लहरों पर चमकता दिखाई दे रहा है। हवा और जल के संयोग उत्पन्न होते रहने वाले बबूल एक दूसरे से अलग दिखाई भले ही दें वे उस सुविस्तृत जलाशय से पृथक नहीं माने जा सकते।

मनुष्य धरती पर अरबों की संख्या में हैं। देह तथा आकृति-प्रकृति रंग सभी में अंतर है इतने पर भी वे सभी एक ही अनन्त सत्ता विश्वात्मा के अविच्छिन्न अंग अवयव हैं माला के मध्य पिरोय के सूत्र की तरह एक ही आत्मा सबको एकत्व के बंधनों में बाँधे हुए है। देखने में हम भिन्न-भिन्न लग सकते हैं पर हमारा अस्तित्व पूर्णतया एक दूसरे पर निर्भर है। एकाकी हमारा जी पाना एक क्षण के लिए भी संभव नहीं। दूसरी उपलब्धियों का उपयोग किए बिना हम अपने अस्तित्व की रक्षा कर ही नहीं सकते, प्राणिमात्र के भीतर काम करने वाली इस एकात्म चेतना अनुभूति ही अध्यात्म दर्शन का मूलभूत आधार है समष्टि की ईकाई ही व्यष्टि है। मनुष्य समाज का घटक मात्र मानकर अपना विकास करें तो वह जीवन लक्ष्य सहज ही प्राप्त हो सकता है जिसे ईश्वर प्राप्ति कहा गया है।


यह कैसी रीति-नीति

दूसरों को प्यार करना उचित है पर उस प्रेम की परिधि से अपने को अलग क्यों रखा जाय सेवा सहायता दूसरों की भी करनी चाहिए, पर उससे वंचित अपने को भी नहीं रखना चाहिए।

वस्तुतः हम औरों से प्यार और अपने शत्रुता रखते। वस्त्रों को हम जरूर साफ-सुथरा रखते हैं पर शरीर को रोगों से ग्रसित और टूटा-फूटा ही बनाये रखने के आदी हैं। वस्त्र भी अपने हैं उनकी साज-संभाल रखनी चाहिए, पर कम से कम उतना ही ध्यान शरीर और मन का भी रखना चाहिए। यही बात अन्तःकरण के संबंध में भी लागू होती है।अन्तःकरण की अनगढ़ता और मलीनता को दूर करना तो और भी आवश्यक है। कपड़े संबंधी सतर्कता और सुरुचि को यदि काया से आगे बढ़ कर मन और अन्तस् तक विकसित किया गया होता, तो जरूर उसकी उन्नति- प्रगति की विधि-व्यवस्था पर ध्यान जाता और वह ऐसी दबी-कुचली एवं मैली-कुचली न होती जैसी इन दिनों हो रही है।

बेटे-बेटी को सुखी-समुन्नत और सम्मानित रखने के लिए आवश्यक साधन जुटाना ठीक है। जिन्हें हम प्यार करें उनकी सेवा–सहायता भी करनी चाहिए और उनकी अच्छी स्थिति से संतुष्ट होना चाहिए इस दृष्टि से पुत्र और पत्नी के लिए किये गये प्रयत्नों को उचित ही ठहराया जाएगा पर मनरूपी पुत्री और बुद्धिरूपी पत्नी दयनीय स्थिति में रहें, दुख पाएँ असम्मानित-अभावग्रस्त और असंतुष्ट रहें, उनकी उनकी ओर ध्यान न दिया जाय, यह उपेक्षा वृत्ति कहाँ तक ठीक है?

पुत्र को आवारागर्दी से रोकते हैं, कुसंग से बचाते हैं, कुसंग से बचाते है, सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न करते हैं। पर क्या वे ही प्रयत्न हमने मन के लिए किए? पुत्र इसी जनम का साथी है-सो भी उसकी वफादारी संदिग्ध है? पर मन तो जन्म-जन्मांतरों तक अभिन्न साथी मित्र और पुत्र है। उसकी आवारागर्दी, कुसंगति क्यों सहन की जाती है? उसे रोकने का प्रयत्न क्यों सहन कि जाती है? उसे रोकने का प्रयत्न क्यों नहीं किया जाता?

बुद्धि से बढ़कर अर्धांगिनी और कौन हो सकती है? शरीर न रहने पर पत्नी बिछुड़ जाती है निरन्तर साथ रहने वाली अपनी समग्र चेष्टा एक ही केन्द्र पर नियोजित करने वाली पत्नी किसकी है? स्त्री को अपने बच्चे, शरीर, परिवार भविष्य को भी देखना पड़ता है। इन सबके साथ ही वह पति की सुविधा सँजोती है। पर बुद्धिरूपी पत्नी की तो समस्त चेष्टाएं अपने लिए ही समर्पित हैं। वह हर जन्म में साथ सती होती है और सच्चे अर्थों में अर्धांगिनी होकर रहती है। उसे सुयोग्य सुसंस्कृत, सन्मार्गगामिनी, सशक्त और साधन संपन्न बनाने के लिए जिस स्वाध्याय और सत्संग आदि जुटाने की आवश्यकता थी, विद्या से होता है, उसके लिए हमारा प्रयास कितना है? हाड़-माँस की पत्नी के लिए बहुमूल्य उपहार मिल यह ठीक है, पर यह बुद्धिरूपी अर्धांगिनी को दीन-दुखी, भूखी-प्यासी निर्वस्त्र-रुग्ण चिंतित रहने और जहाँ-तहाँ भटकने दिया जाय, यह भी तो शोभनीय नहीं। प्यार से उसे बेचारी को वंचित क्यों रखा जाय?

अहंकार कि तृप्ति के लिए सारा सरंजाम खड़ा किया गया। बड़ा ठाट-बाट जुटाया गया, पर आत्मा एक कोने में पड़ी खिसकती रही। उसकी इच्छा-आवश्यकता को कभी सुना-पूछा तक नहीं गया। गधे को शाही सज्जा के साथ सजाया गया, पर गाय प्यासी मर गयी। यह पक्षपात क्यों? एक एकाँगी असंतुलन क्यों?

लोक में यश-वैभव पाने के लिए भारी दौड़-धूप की जाती रही, परलोक की बात कभी सोची भी नहीं गई। सराय पर दौलत न्यौछावर कर दी पर घर की टूटी झोपड़ी का छप्पर तक न बना। वर्तमान ही सामने रहा, भविष्य तो आँखों से ओझल ही बना रहा। दिखावटी प्यार बिखेरें और भीतर निष्ठुरता बनी रहे तो बात कुछ बनने की नहीं। बाहर वालों की शिक्षा और अपनी उपेक्षा यह रीति-नीति कहाँ तक ठीक है? सोचें-विचारें और निर्णय करें।


सृष्टि की नियामक सत्ता- परमेश्वर

यह समूचा विश्व-ब्रह्मांड एक सुनिश्चित नियम और व्यवस्था के अंतर्गत चल रहा है। अब विज्ञानवेत्ता भी इस तथ्य को स्वीकारने लगे हैं कि इतने विराट्-जगत को घुमाने वाला कोई महान शक्तिशाली तत्व होना चाहिए और वह केवल ईश्वर ही हो सकता है। जब मानवकृत छोटे-छोटे उपदान बिना कर्ता के अभिव्यक्ति नहीं पा सकते, तो इतना सुन्दर संसार, जिसमें प्रातःकाल सूरज उगता और प्रकाश तथा गर्मी देता है। रात, थके–हारों को अपने अंचल में विश्राम देती है, तारे पथ-प्रदर्शन करते,ऋतुयें समय पर आती है और चली जाती हैं। हर प्राणी के लिए अनुकूल आहार जल-वायु की व्यवस्था, प्रकृति का सुव्यवस्थित स्वच्छता अभियान सब कुछ व्यवस्थित ढंग से चल रहा है। असंख्यों ग्रह-गोलक एवं तारागण किसी व्यवस्था के अभाव में अब तक न जाने कब के आपस में लड़ मरे होते। यदि इन सबमें कोई गणितीय नियम-व्यवस्था काम न कर रही होती तो अमुक दिन अमुक समय सूर्य चन्द्र ग्रहण मकर संक्रांति आदि का ज्ञान किस तरह हो पाता। यह सोद्देश्य कार्य और सुंदरतम रचना बिना किसी ऐसे सचेतन कलाकार के संभव नहीं था जो संपूर्ण ब्रह्मांड को एक रस देखता हो साधन जुटाता हो न्यायकर्ता हो और जीव मात्र को पोषण, संरक्षण प्रदान करता हो। विश्व विख्यात वैज्ञानिक अरस्तू के लिए सबसे बड़ा आश्चर्य था-ब्रह्मांड का स्वरूप और उसकी गति। उनका कहना था कि परमात्मा ही सृष्टि का संचालक है। उसके अतिरिक्त और किसी में यह शक्ति नहीं। दार्शनिक हर्बर्ट स्पेन्सर की दृष्टि में भगवान ही वह विराट्शक्ति है जो संसार कि सब गतिविधियों का नियंत्रण उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार मुखिया घर का, सरपंच गाँव का कलेक्टर जिले का, गवर्नर प्रदेश का और राष्ट्रपति सारे राष्ट्र की भोजन, वस्त्र, निवास सुरक्षा आदि की व्यवस्था करता है। उनके अनुसार-राज्य के नियमों का आदर इसलिए करते हैं क्योंकि राज्य कि शक्ति से हमें भय लगता है, जब कि हम उसके लिए पूर्ण स्वतंत्र होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि संसार में काई सर्वोच्च सत्ता काम करती है जिसके परिचय में हम कभी न कभी रहे हैं क्योंकि हम डरते हैं। निर्भीक व्यक्ति नैतिक व्यक्ति ही हो सकती है, इसलिए उसे संसार की व्यवस्था ईमानदारी और न्याय से करने वाला प्रजावत्सल होना चाहिए।

सुप्रसिद्ध दार्शनिक कान्ट ने हर्बर्ट स्पेन्सर के कथन को अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि ‘नैतिक नियमों की स्वीकृति ही परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण और पूर्ण नैतिकता ही उसका स्वरूप है। संसार का बुरे से बुरा व्यक्ति भी किसी न किसी के प्रति नैतिक अवश्य होता है। चोर-डकैत भी नहीं चाहते कि कोई उनसे झूठ बोले, छल या कपट करे, जबकि वे स्वयं सारे जीवन भर यही किया करते हैं। अपने भीतर से नैतिक नियमों की स्वीकृति इस बात का प्रमाण है कि संसार केवल नैतिकता के लिए ही जीवित है। उसी से संसार का निर्माण पालन और पोषण हो रहा है इसलिए भगवान नैतिक शक्ति के रूप में माने जाने योग्य है।’

हैब्रयू ग्रन्थों में ईश्वर को ‘जेनोवाह’ कहा गया है। जेनोवाह का अर्थ है- वह जो सदैव सत्य नीति ही प्रदान करता है। अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य एक दूसरे को ठगता देखा जाता है, पर पाया गया है कि ऐसा व्यक्ति कुछ ही दिनों में लोगों के आदर से सम्मान से वंचित हो जाता है। कभी-कभी तो ऐसे लोगों की इस जीवन में दुर्गति होते देखी गयी है। इस सबका अर्थ यह है कि विश्वास की संपूर्ण व्यवस्था किसी सत्य के आधार पर चल रही है। जो भी उससे हटने का प्रयत्न करता है वह पीड़ित और प्रताड़ित होता है, जब कि इन नियमों पर आजीवन आरुढ़ रहने वाले व्यक्ति साँसारिक दृष्टि से कुछ घाटे में भी रहें तो भी उनकी प्रसन्नता में कोई अन्तर नहीं आता।

सत्य और नीतिनिष्ठ द्वारा संसार का नियंत्रण करने वाली ऐसी शक्ति जो व्यक्ति की आकांक्षाओं में विद्यमान रहती है, वही ईश्वर है। दार्शनिक प्लेटो की मान्यता लगभग ऐसी ही थी। उनका कहना था-’ईश्वर अच्छाई का विचार है।’ संसार के प्रत्येक व्यक्ति-यहाँ तक की जीव-जन्तुओं तक को भी अच्छाई कि चाह रहती है। जहाँ अच्छाई होती है, वहीं आनंद रहता है। अच्छाई शरीर और सौंदर्य की जो संयम और सदाचारों के द्वारा सुरक्षित हो, अच्छाई शरीर और वस्त्रों की जो धोने और स्नान करने से सुरक्षित हो अच्छाई वातावरण की, घर, गाँव और नगरों की जो स्वच्छता और सफाई द्वारा सुरक्षित हो। अच्छाई प्रकृति की-जो हरे-भरे पौधों और खिलते हुए रंग-बिरंगे फूलों भोले-भाले पशु-पक्षियों के कलरव और उछलकूद से सुरक्षित हो। इस संसार में हम सर्वत्र अच्छाई का दर्शन करके प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। यही प्रभुत्व हैं, इन्हीं से आनंद मिलता है। यदि हम ईश्वर को मानें तो उसे अच्छाई का वह बीज मानना पड़ेगा जो आँखों को दिव्य, मनोरम और बहुत प्यारा लगता है।

न्यूटन और आइन्स्टीन जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों ने सृष्टि के प्रत्येक क्रिया कलाप में उस सर्वव्यापी परम चेतना के अस्तित्व को स्वीकारा है जो समय, स्थान गति और कारण से परे हैं। उनके अनुसार सृष्टि की समस्त व्यवस्था सुनियोजित रूप से उस चेतन सत्ता के द्वारा संचालित है जिसका अस्तित्व सिद्ध कर सकना भौतिकी के नियमों और वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा संभव नहीं। उसे ज्ञान के रूप में, विचार के रूप में अच्छाइयों के समुच्चय के रूप में ही जाना जा सकता है। मूर्धन्य मनीषी स्पिनोजा ने भी अविनाशी विचार को ही भगवान कहा है। उन्होंने विज्ञान और दर्शन-दोनों का अध्ययन करके बताया कि संसार में दो प्रकार कि सत्तायें काम कर रही हैं-एक दृश्य, दूसरी अदृश्य। एक का नाम प्रकृति या पदार्थ जो दिखाई देता है। यह दृश्य संसार-प्रकृति की ही रचना है अपना शरीर भी पदार्थ से ही बना है। इसमें भी धातुयें खनिज लवण, गैसें आदि भरी पड़ी हैं पर विचार उससे भिन्न हैं। यह दिखाई नहीं देता पर हम उसे हर घड़ी अनुभव करते हैं। हमारे जीवन की सारी क्रियाशीलता विचारों की ही देन है। विचार मरे कि शरीर भी मर गया। मृत्यु के अन्तिम क्षण तक विचार प्रक्रिया का बने रहना यह बताता है कि विचार ही विश्वव्यापी चेतना या ईश्वर है। विचार कभी नष्ट नहीं होते। या यों कहें कि भगवान का स्वरूप-गुण और विचारमय ही हो सकता है चाहे वह किसी शक्ति कणों के रूप में हो अथवा प्रकाश रूप में पर विचारों का अस्तित्व संसार में है अवश्य। हम सदैव ही उनसे प्रेरित, प्रभावित होते रहते हैं। विचारों को कोई भी व्यक्ति अपना नहीं कह सकता। मनोविज्ञानी फ्रायड को भी कहना पड़ा था कि विचार अवचेतन मन से आते हैं और मनुष्य का उस पर कोई नियंत्रण नहीं, वह कोई स्वतंत्र सत्ता है।’

प्रसिद्ध वैज्ञानिक हीगल ने भगवान को सामान्य इच्छाओं से ऊपर उठा हुआ, इच्छाओं को भी नियंत्रण में रखने वाला परम विचार ‘अब्सोल्यूट आइडिया’ बताया है जिस प्रकार प्रत्यक्ष में देखने से हमारा मस्तिष्क एक प्रकार से विचारों का पुंज है और इसी के किसी कोने से विचारों का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है, इसी तरह समूचे विश्व में फैले विचार किसी केन्द्रीभूत सत्ता से प्रस्फुटित हो रहे हैं। जिस प्रकार सूर्य में आक्सीजन जलती रहती और हीलियम के कण उछलते रहते हैं उसी प्रकार संसार के किसी भाग से नियमित विचारों का निर्झर झरता रहता है। उस केन्द्रीभूत सत्ता का नाम उन्होंने परमेश्वर बताया।

दार्शनिक इमर्सन और बर्कले के अनुसार सब आत्माओं में श्रेष्ठ शक्ति का नाम ही परमात्मा है। उनके मत में सारा संसार कहीं से उधार प्राण और चेतना ले रहा है। यह चेतना और प्राणशक्ति अपने मूलरूप में एक जैसी ही है। विचारग्रस्त होने के कारण वह अनेक जीवों के रूप में दिखाई देती है, पर आत्म चेतना के सभी लक्षण मनुष्य और पशु प्राणियों में समान हैं। जिस तरह बड़े विद्युत घर से विद्युत लेकर छोटे-छोटे बल्ब जलने लगते हैं, उसी प्रकार प्राणियों की चेतना भी किसी मूल तत्व से प्राण और प्रकाश लेकर अस्तित्व में आती है। जो सब आत्माओं का उद्गम है वही परमेश्वर है। यदि आत्माओं का स्वरूप प्रकाश है तो परमात्मा भी प्रकाश है। यदि ज्ञान या विचार है तो परमात्मा भी ज्ञान या विचार है। यह सारी विशेषतायें वस्तुतः एक ही हैं, कहने भर का अन्तर जान पड़ता है।

ख्यातिलब्ध मनीषी डॉ. ब्राँडले भगवान को जानने के लिए अनुभवों का रूप समझने की प्रेरणा देते हैं। उनका कहना है कि हमारे अन्दर जो अनुभूतिकोष है वह पदार्थ ही नहीं-प्रकाश ताप, चुम्बक, विद्युत कणों से भी भिन्न है। इसलिए उन्होंने भगवान को ‘परम अनुभव’ कहा है। यह सारी बातें मिलकर एक अध्यात्मवादी सृष्टि का निर्माण करती हैं। इसलिए यूकन जैसे विद्वान ने उसे आध्यात्मिक जीवन का आधार कहा। आद्यशंकराचार्य और उपनिषद् दर्शन उसे ही ‘अहं ब्रह्मास्मि’ ‘तत्वमसि’ ‘अयमात्मा ब्रह्म’ ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ ‘परमात्मा तत्व रूप हूँ’ ‘यह मेरी आत्मा ही ब्रह्म है’ आदि सूक्तों से संबोधित करते हैं। यह सारी विशेषतायें परमात्मा के स्वरूप के भिन्न-भिन्न विशेषण हैं। तत्वतः वह एक ही है जो सारी सृष्टि के क्रम को नियम और सुव्यवस्था के चला रहा है।


योगः कर्मसु कौशलम्

कर्म योग स्तर का हो इसके लिए दो बातें आवश्यक हैं-प्रथम तो कर्म के प्रति प्रेम होना चाहिए द्वितीय उस व्यक्ति के प्रति प्रेम होना चाहिए, जिसके लिए कार्य किया जा रहा हो। यदि कर्म के प्रति प्रेम हो, पर उसके निमित्त कारण व्यक्ति के प्रति श्रद्धा न हो तो किया गया कार्य स्तरीय न होगा और वैसा प्रतिफल उत्पन्न न कर सकेगा, जिसकी आशा-अपेक्षा की गई है। इसी प्रकार यदि व्यक्ति के प्रति श्रद्धा हो किन्तु कार्य के प्रति निष्ठा न हो तो भी कायार्रु संतोषप्रद न हो सकेगा। इसके लिए निष्ठा और श्रद्धा दोनों तत्वों का साथ-साथ होना नितान्त आवश्यक है।

अस्पताल में नर्स और मरीज दोनों होते हैं। नर्स का कार्य बीमारों की सेवा-सुश्रूषा करना होता है। इसमें उसे रस भी आता है पर जिस रोगी की परिचर्या में वह लगी हो उसके प्रति श्रद्धा न हो घृणा उपजती हो तो क्या वह उसकी सेवा में लगान से कर सकेगी जैसी अपने स्वजन संबंधियों परिवार-कुटुम्बियों की करती है? कदाचित नहीं। चूँकि रोगी की देखभाल करना उसकी स्वयं की जिम्मेदारी के अंतर्गत है, अतः यहाँ वह मात्र खानापूर्ति के लिए कार्य करेगी और जैसे-तैसी कर उसे किसी प्रकार निबटाना चाहेगी।

इसके विपरीत किसी माँ का पुत्र जब बीमार पड़ता है तो उसकी सेवा में वह रात-दिन एक कर देती है। चूँकि परिवार की परिचर्या करने में माँ को मजा आता है और पुत्र उसका सबसे प्रिय होता है, अतः इस दौरान वह दारुण-से-दारुण दुःख और बड़े-से-बड़ा कष्ट हँसते-हँसते सह लेती है। यदि इस समय उस माँ से कोई यह जाकर कहे कि आपने बहुत कष्ट उठाये। अब आप आराम कीजिए। बच्चे की देखभाल मैं करता हूँ, शायद ही माँ इसके लिए तैयार हो, क्योंकि बेटा हर माँ का सबसे प्रिय पात्र होता है, अरस्तू इस स्थिति में वह किसी भी हालात में बेटे से विलग होना पसंद न करेगी, भले ही उसे इस मध्य कितनी ही रातें जागनी और कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े, वह सरलतापूर्वक सब कुछ झेली लेती हैं।

उपरोक्त उदाहरणों में दोनों कार्य एक ही प्रकार के हैं पर एक में कर्ता के लिए वह भारभूत बन जाता है, जबकि दूसरे में संतोषदायक सिद्ध होता है।एक कार्य की दो प्रकार की परिणतियाँ हैं।इस अन्तर के लिए एक ही कारक जिम्मेदार हैं-वह है सेविका का बीमार के प्रति प्रेम का भाव। निश्चय ही यह’तत्व ‘ अच्छे परिणाम के लिए आवश्यक है।

ऐसे ही यदि ‘कार्य के प्रति समर्पण’ पर विचार करें, तो ज्ञात होगा कि कार्य में आनन्दानुभूति के लिए यह तत्व भी उतना ही आवश्यक है जितना श्रद्धा-तत्व, और क्रिया का परिणाम उत्कृष्ट स्तर का तभी होता है जब उसमें मन रम जाये। मन नहीं रमने से कार्य बोझ-सा और नीरस प्रतीत होता है। जिस पिता को पाठ पढ़ाना-समझना अरुचिकर लगता हो उससे यदि उसका पुत्र कोई प्रश्न पूछ बैठे तो वह उसका उत्तर लगन और मनोयोगपूर्वक न दे सकेगा व जैसे-तैसे समझा कर उससे पिंड छुड़ाने कि कोशिश करेगा। यद्यपि पिता का यपुत्र से अगाध प्रेम है, पर पढ़ाने ह संबंधी कार्य उसकी अभिरुचि का नहीं, अतः वह उसे भार-सा महसूस होगा। इसके विपरीत प्राचीन गुरुकुलों के आचार्यों का अध्यापन और विद्यार्थी के प्रति समान रूप में प्रेम होता था, अस्तु वे इस कार्य में असीम आनन्द की अनुभूति करते थे और इसमें ऐसे खो जो जाते थे कि समान क्या हो रहा है, इसकी भी सुध नहीं रहती थी। यह लगन और प्रेम का संयुक्त परिणाम है। इससे दो लाभ मिलते थे। एक ओर जहाँ आचार्य प्रत्यक्ष स्वर्ग के आनन्द की प्रतीति करते थे, वहीं दूसरी ओर तत्परतापूर्वक दी गई विद्या के कारण शिष्यगण हर प्रकार से योग्य होकर निकलते थे।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कर्म को रसमय बनाने उसे कर्मयोग बनाने के लिए व्यक्ति में निष्ठा और श्रद्धा के दोनों तत्वों विद्यमान होने चाहिए। यहाँ प्रश्न यही नहीं है कि कर्म छोटा है या बड़ा। महत्व इस बात का है कि उसे करते हुए कौन कितना, किस अनुपात में स्वयं को भुला पाता है? इसी में उसकी स्वर्ग मुक्ति का आनन्द है। रैदास को जूते सिलने में ऐसी मस्ती आती थी कि वह उनकी भक्ति बन गई। इसी भक्ति से प्रसन्न हो कर भगवान प्रकट हुए और रैदास निहाल हो गये। कर्म में भक्ति ऐसी ही होनी चाहिए। कर्त्ता का कल्याण इसी में निहित है। गोरा कुम्हार का प्रिय काम मटके बनाना था। इस कार्य में उसे बड़ा आनन्द आता था।मटके बना कर वह जिन लोगों को बेचता, दे उसे देवतुल्य लगते थे। उनके प्रति उसके मन में अगाध श्रद्धा थी। जनता में मानों उसे साक्षात ईश्वर की झाँकी होती। उन्हें धोखा देने का उसके मन में तनिक भी विचार नहीं आता था। घड़े बनाने में उसकी दृष्टि यह होती थी कि जो घड़े बनें, वे इतने मजबूत हों कि कई पीढ़ियाँ उसका प्रयोग करें। उसे इसका जरा भी पश्चाताप नहीं होता कि मजबूत घड़े बनने और लंबे काल तक सुरक्षित रहने से उसके धंधे पर इसका बुरा असर पड़ता वरन् उसे इससे असीम संतोष मिलता था। इसलिए जब वह घड़े की मिट्ठी रौंदता, तो उसमें ऐसे खो जाता था, जैसे विज्ञानवेत्ता अपने प्रयोग-परीक्षणों, में, गणितज्ञ अपने सवालों में और जिसके लिए यह किया जा रहा है, उसके प्रति मन में श्रद्धा हो, तो हर कोई हर किसी कार्य में स्वर्ग की प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त कर सकता है। कर्म, अकर्म तब बन जाता है, जब उसमें कर्ता का अहंकार घुस पड़ता है। ऐसे में ने तो उसे किसी सुख कि अनुभूति होती है और न क्रिया का काई कहने लायक परिणाम ही सामने आ पाता है। उलटे व्यक्ति और कार्य के मूल्य और स्तर दोनों गिर जाते हैं। अब यदि किसी ऐसे व्यक्ति की सेवा का मूल्यांकन किया जाय जिसे सेवा-कार्य करने का अवसर तो बहुत प्राप्त होता है, पर उतना ही अहंकार-प्रदर्शन भी करता है तो ज्ञात होगा कि उसकी सेवा अत्यन्त तुच्छ है। चूँकि सेवा कार्य और अहंकार दोनों की संख्या से भाग देने से भागफल ‘एक’ आयेगा। अस्तु उसकी कीमत एक के बराबर हुई। 1 कि रुपया-पैसा कोई भी ईकाई मानी जा सकती है। इस प्रकार उस व्यक्ति की सेवा का मूल्य 1 रुपया अथवा पैसा हुआ। इसी तरह माँ की सेवा का अनुमान करें, तो वह अनन्त मालूम होगी। अपने प्रिय पुत्र के लिए वह सब कुछ सहने को तैयार रहती है। कष्ट, कठिनाई, विपत्तियां कितनी ही झेल लेती है, फिर भी उसके रुझान में कमी नहीं आती और अहंकार तनिक भी नहीं। अभिमान हो भी कैसे? वह तो इसे अपने धर्म मानती हैं। इसका आकलन करने पर उसकी सेवा में पूर्ण निरहंकारिता (अर्थात् शून्य) का भाग देने पर भागफल अनन्त (1/0=0ष्)आता है, अस्तु उसकी सेवा का मूल्य रुपयों-पैसों में किसी भी प्रकार नहीं आँका जा सकता। वह अनन्त है। इस प्रकार अहंकार रहित भक्तिमय कर्म की ही सार्थकता है। हम जो भी कार्य करें, चाहे वह पड़ोसी का हो, समाज अथवा राष्ट्र का हो, कृषि संबंधी विद्यालय या ऑफिस संबंधी हो, छोटा या बड़ा हो उसमें समर्पण भाव होना चाहिए, पूर्ण मनोयोग जुड़ना चाहिए, तभी वह कार्य उत्तम, परिणाम उत्कृष्ट और कर्त्ता श्रेष्ठ कहलाता है।

पुँडलीक माता-पिता की सेवा में तल्लीन था। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर भगवान बिट्ठल प्रकट हुए, पर उन्हें देख उसने सेवा-कार्या बन्द नहीं कर दिया वरन् उनकी ओर एक इट बढ़ा कर उन्हें बैठने के लिए कह दिया और स्वयं सेवा में जुटा रहा।

एक साधु थे। उनकी झोंपड़ी में एक बिल्ली बस गई। साधु जब ध्यान भजन को बैठते तो बिल्ली उनके इर्द गिर्द घूमती और अपनी आदत के अनुसार उन्हें स चाटती।

साधु ने एक तरकीब निकाली। कुछ दूरी पर एक खूँटी गाढ़ कर बिल्ली को रस्सी से बाँध देते और निश्चिंतता पूर्वक भजन करते।

उनके पास अनेक भक्तजन आया करते। उन लोगों ने समझा कि बिल्ली पास बाँध रखने से साधना में सिद्धि मिलना कोई रहस्य है। उन लोगों ने भी बिल्ली पाली और उसी प्रकार बाँधना आरंभ कर दिया। कुछ दिन पश्चात् साधु तो न रहे पर उनके अनुयायियों ने बिल्ली की समीपता में साधना करने की एक परम्परा ही बना ली।

माता-पिता के आगे प्रत्यक्ष भगवान को भी इंतजार करना पड़ा क्योंकि पुण्डलीक को उन्हीं में साक्षात ईश्वर के दर्शन हो रहे थे और उनकी सेवा उसे अद्भुत सुख प्रदान कर रही थी। इसलिए समीप खड़े भगवान को भी प्रतीक्षा करने के लिए कह दिया। कर्म में यही भाव होना चाहिए। एक अभंग में संत तुकाराम ने भी कहा है कि चक्की, चरखा, कृषि, कारखाना, ऑफिस, प्रयोगशाला सब हमारा ईश्वर है। यह कार्य कर प्रकारांतर से हम ईश्वर की ही सेवा करते हैं। जब तक व्यक्ति के अन्दर यह भाव विकसित नहीं होता, तब कार्य कर प्रकारांतर से हम ईश्वर की ही सेवा करते हैं। जब तक व्यक्ति के अन्दर यह भाव विकसित नहीं होता, तब तक कार्य भारभूत लगते हैं। जब उसे ऐसा प्रतीत होने लगता है कि इनके द्वारा वह जनता-जनार्दन की, विराट् ब्रह्म की सेवा कर रहा है,तो कर्म का बोझ स्वतः समाप्त हो, वह भक्तिमय बन जाता है। यही निरहंकार की स्थिति है। अहंकार के मिटते ही भक्ति विकसित होती है। लकड़ी का लट्ठ बहुत भारी होता है। किसी के कन्धे पर रख किया जाय, तो वह बोझ से दब कर मर सकता है, किन्तु जब उसे जला दिया जाता है, तो वह भारी नहीं रह जाता। फिर साधु उसकी राख शरीर में मलते और उसके भार को खुशी-खुशी ढोते फिरते हैं। बोझ और भक्ति में यही अन्तर है। कर्म के साथ जब अहंकार जुड़ता है, तो वह वही भक्ति कहलाता है। अतः अहंकार रहित कर्म ही भक्ति का आनन्द दे सकता है। इसी ओर हमारी प्रवृत्ति होनी चाहिए।

कार्य उबाऊ और नीरस तब बन जाता है, जब हमारी संकीर्ण भावनाएँ उसके साथ जुड़ जाती है। हम कार्यों में विभेद करने लगते हैं। उन्हें अपने पराये के वर्गों में बाँटते हैं। कोई भी कार्य सम्पन्न करने से पूर्व हम यह देखते हैं कि प्रस्तुत कार्य अपना है या दूसरे का। पराया नाम सुनते ही मन-मस्तिष्क ढीले पड़ जाते है, उत्साह समाप्त हो जाता है। फिर यदि कार्य को पूरा करना जरूरी ही हुआ, तो उसी स्थिति में जैसे-तैसे करके बेमन से काम समाप्त कर दिया जाता है। दूसरों के कार्य करने में व्यक्ति की एक अन्य दृष्टि यह होती है कि इससे उसका अपना स्वार्थ कितना सधेगा उसे क्या लाभ मिलेगा? यदि कुछ इस प्रकार की गुंजाइश हुई, तो वह उसे लगन से करता है, अन्यथा औंधे-सीधे ढंग से पूरा करके टाल देता है।

यह स्वार्थपरायणता हुई। कार्य को भारभूत बनाने में इसकी भी महती भूमिका होती है। इससे उबरने के लिए आत्म विस्तार करना पड़ता है। दूसरों में स्वयं की और स्वयं में दूसरों की अनुभूति करनी पड़ती है। इस मनःस्थिति में जो कार्य बन पड़ता, वह अपना निजी प्रतीत होता है। फिर उसमें लाभ-हानि की दृष्टि नहीं रहती। तब कार्य यह मान करना पड़ता है कि भले ही इसमें अपना लाभ न हो पर समय, समाज और राष्ट्र के हैं एवं राष्ट्र व समाज हमारा है। उसकी उन्नति-प्रगति हमारी अपनी उन्नति प्रगति है और उसकी अवनति हमारी अवनति है। इस भावना से संपादित कार्य में कर्त्ता का उत्साह क्रिया के साथ सदा जुड़ा रहने से उसका प्रतिफल भी उच्चकोटि का सामने आता है। पिछले दिनों यदि ऐसा नहीं हुआ होता, स्वतंत्रता सेनानी अपना स्वार्थ त्याग आगे नहीं बढ़े होते, तो आज हम परतंत्र ही बने रहते। तात्पर्य यह है कि क्रिया के प्रति कर्त्ता में परायेपन का भाव उदित होते ही कार्य कि सरसता समाप्त हो जाती है। ऐसे में किया गया कार्य न तो वह परिणाम उत्पन्न कर पाता है, जिसकी आशा-अपेक्षा की गई थी और न योग की अनुभूति करा पाता है।

कर्म की गणना योग में की गई है। इसकी तीन प्रमुख धाराओं में एक कर्म भी है। योग का अर्थ होता है-समर्पण, विलय, विसर्जन। कर्म, कर्मयोग तभी बन पाता है, जब उसमें कर्त्ता का घनिष्ठ तादात्म्य जुड़ा हो। घनिष्ठता तब बन पड़ती है, जब कर्त्ता तल्लीनतापूर्वक कार्य में संलग्न हो, अर्थात् कार्य के प्रति उसकी गहरी अभिरुचि हो। तभी उसे कर्म में कुशलता भी प्राप्त हो सकती है और यह स्थिति प्राप्त करना ही योग है। इसी को गीता में ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ कहकर अभिहित किया गया है। यही वह स्थिति है, जिसमें योग का आनन्द और क्रिया का सत्परिणाम दोनों साथ-साथ प्राप्त होते हैं। सभी को इस ‘कर्मयोग‘ की साधना करनी चाहिए।


विवेक पर छोड़ दिया (kahani)

एक पादरी प्रोफेसर बाइबिल के बहुत भक्त थे ईसा के उस प्रसंग की प्रायः दुहराया करते थे कि कोई एक गाल पर तमाचा मारे तो उसके आगे दूसरा भी कर दो।

कुछ-कुछ गुण्डे इस कथन को ध्यानपूर्वक सुना करते उनने एक षड़यंत्र बनाया। दो मिल कर साथ-साथ गये। पादरी के एक गाल पर तमाचा मारा उनने बदले में दूसरा गाल भी कर दिया। दो करारे चपत लगाने के बाद वे उनके पास जो कुछ था उसे लुटने के लिए तैयार हो गये।

पादरी तगड़ा था उसने दोनों गुण्डों को दबोच लिया और अच्छी खासी धुनाई की। जान बचाकर भागते हुए उनने कहा आप तो बाइबिल के अनुयायी हैं फिर इस प्रकार व्यवहार क्यों करते हैं।

पादरी ने कहा बाइबिल में दो चपतें खाने भर की बात की है। इससे आगे का व्यवहार मनुष्य के अपने विवेक पर छोड़ दिया गया है। मैंने उसी का उपयोग किया है और तुम्हें मजा चखाया है।


असली पारस

‘अपनी सेवा आप करना ब्रह्मचर्य व्रत का पालन भूमिशयन, वल्कल वसन, उपवास और उपासना से बचे समय में धर्मग्रन्थों का स्वाध्याय, चिन्तन मनन यह साधना की प्रारंभिक आवश्यकताएँ हैं, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मंत्र दीक्षा संपन्न हुई। पूजन की सामग्री उपयुक्त पात्र, कुश आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करते हुए शुभ ज्योति स्वरूप निराकार गायत्री का ध्यान करना। जब तुम इस प्रारंभिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे, तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिए तुम्हें अग्नि दीक्षा भी देंगे।’ यह कहते हुए महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए। शिखिध्वज ने गुरुचरणों में प्रणिपात किया, महर्षि ने आशीर्वाद दिया और दोनों अपने-अपने पर्णकुटीरों की ओर चले गये।

श्रद्धा शिष्य की प्रारंभिक परख है। आत्म जिज्ञासा होना अलग बात है, श्रद्धा अलग। जिज्ञासाएँ तो नास्तिकों की भी होती है, किन्तु मानवीय दुर्बलताओं के विपरीत ऊर्ध्वगामी जीवन और कष्टपूर्ण साधनाओं में जिस धैर्य की आवश्यकता होती है, वह श्रद्धावान व्यक्तियों में ही संभव है। ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानं’ ‘श्रद्धया सत्य माप्यते’ श्रद्धावान ही ज्ञानार्जन करते हैं, श्रद्धावान ही सत्य को प्राप्त करते हैं। शिखिध्वज की श्रद्धा भावना के ही कारण महर्षि ने मंत्रदीक्षा दी थी। सामान्यतः हर किसी को वे दीक्षा नहीं दिया करते थे।

एक वर्ष में शिखिध्वज ने अच्छी तरह अनुभव कर लिया कि संसार जड़ और चेतन दो प्रकार के परमाणु इधर-उधर घूमते हुए अपना संसार-दृश्य जगत बनाए रहते हैं,उसी प्रकार चेतना भी आनन्द प्राप्ति के लिए यहाँ-वहाँ विचरण करती रहती है। जब तक मन जड़ परमाणुओं से बने संसार में सुख खोजता है, तब तक वह भूले हुए पथिक की भाँति वन और कंटकों में विचरण का-सा कष्ट पाता है। पर जब वह जान लेता है कि आत्मा की प्यास विराट् आत्मा बनने से बुझती है तो फिर वह जन्म-मरण के चक्र में आत्म,चेतना को भटकाता नहीं, वरन् भौतिक संस्कारों का प्रच्छालन करने और आत्मा को परमात्मा में घुलाकर असीम आनन्द की प्राप्ति की तैयारी में संलग्न हो जाता है।

साधना का यह द्वितीय द्वार सिद्धान्ततः जितना सरल है, व्यवहार में उतना ही कठिन। जन्म−जन्मांतरों का अभ्यासी मन लौकिक सुखों को सहज ही त्यागने के लिए नहीं तैयार होता है। बड़ी भारी संग्राम करना पड़ता है, तब कहीं मन की मलीनताएं दूर होती हैं। इस अवस्था में पहुँचे हुए साधकों को थोड़ी सी-भी चूक उन्हें पथ-भ्रष्ट कर सकती है। उन्हें पहाड़ जैसी उपलब्धियों से पल भर में नीचे गिरा सकती है। इसीलिए योग्य आचार्यों ने अग्नि दीक्षा उन्हीं को दी, जिन्हें पात्र समझा। हर किसी को अग्नि दीक्षा का अधिकारी घोषित करने की भूल उन्होंने की होती तो साधन तत्व नष्ट ही हो गया होता।

मंत्र दीक्षा की वर्षगाँठ बसन्त के पुण्य पर्व पर पड़ती थी। एक दिन पूर्व ही शिखिध्वज ने गुरुदेव के समीप जाकर प्रार्थना की भगवन्! आपकी कृपा से प्रारंभिक साधना का अंतिम चरण आज से पूरा हो रहा है। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि अब मैं उच्चस्तरीय साधनाओं में प्रवेश कर सिद्धियाँ प्राप्त करूं। पंचकोशों का अनावरण करते हुए आनन्दमय भूमिका में पहुंचूं।

महर्षि शिष्य की निष्ठा से प्रसन्न तो हुए पर उनकी प्रसन्नता उस पात्र की तरह न थी, जो हलकी आँच से गर्म और थोड़ी-सी शीत से ही शीतल हो जाता है। वे बड़े पारखी थे। बोले कुछ नहीं। भीतरी दृढ़ता को टटोलते बिना आगे का पाठ्यक्रम चलाने की अनुमति भी नहीं दी। अभी अग्नि-दीक्षा के उपयुक्त पात्रता की परीक्षा शेष थी, उसे परखे बिना स्वीकृति कैसे दी जा सकती थी?

उद्दालक महान तपस्वी थे उन्होंने अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की थी। लोहे को सुवर्ण में बदल देने वाला पारसमणि उनके पास था। उन्होंने चुप-चाप मणि निकाली, एक अन्य विद्यार्थी को भेजकर थोड़ा लोहा मँगवाया। शिखिध्वज को चिन्ता हो रही थी, गुरुजी कुछ कर तो रहे हैं, पर मेरी बात का उत्तर नहीं दे रहे। इस बीच वह शिष्य कई लौह शलाकाएँ लेकर आ उपस्थित हुआ। महर्षि ने पारसमणि को उन शलाकाओं से स्पर्श कराया। विस्मय! महान विस्मय!! वह शलाकाएँ स्वर्ण में परिवर्तित हो गई। शिखिध्वज गुरु का चमत्कार देखकर दंग रह गया।

‘धन...हां! धन से ही तो धर्म होता है धर्म से पुण्य से मुक्ति।’ मिल गया मुक्ति का मार्ग मुझे। शिखिध्वज के मन में पारसमणि का लोभ आ गया। चढ़ने में तो परिश्रम भी पड़ता है, समय भी लगता है फिसलते कितनी देर लगती है। साधना के द्वारा निर्माण किया गया मन एक ही क्षण में लोभ की कीचड़ में डूब गया। मुद्राध्यायी महर्षि मुस्कुराए इतनी कमजोर निष्ठा वाले शिष्य कहीं अग्नि-दीक्षा के अधिकारी हो सकते हैं। यह तो धन की बात रही अभी तो सौंदर्य, यश, प्रतिष्ठा के कितने ही आकर्षण हैं शिखिध्वज वित्तेषणा से ही मुक्त न हो सका तो यह ब्रह्मदीक्षा तक पहुँचने की कठिनाई कैसे झेल सकेगा? स्वल्प शक्ति, योग्यता और प्रतिभा का मनुष्य जो अपने कल के भविष्य के लिए भी निश्चित नहीं होता, उसे राज सम्मान के पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने में ही कितनी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। सर्वशक्ति ब्रह्म और उसका अनन्त ऐश्वर्य प्राप्त करने की कठिनाइयों का तो अनुमान ही कौन कर सकता है। परम पुरुषार्थ कहा है, इसीलिए आत्म प्राप्त को क्योंकि उसमें सिवाय दमन-दमन के और कुछ नहीं। मनुष्य को अपनी प्रकृति का स्वभाव का, इच्छा और अहंकार का दमन करने में कितना कष्ट होता होगा, इसकी कल्पना कर सकना भी सहज नहीं है।

हतभाग्य शिखिध्वज पहले ही चरण में ढेर हो गया। अभी तक महर्षि उद्दालक कुछ बोले नहीं थे। अपनी मंतव्य अपने आप बदलते हुए शिखिध्वज ने कहा-’गुरुदेव! आप सचमुच भगवान हैं सर्व समर्थ हैं, कितना अच्छा हो यदि आप यह पारसमणि मुझे दे दें। इससे प्राप्त सुवर्णराशि का उपयोग समाज की भलाई में यज्ञ कार्यों में करूंगा और इस तरह संसार से मुक्त हो जाऊँगा।’

महर्षि शिष्य के बचकानेपन पर मुस्कुराए। चाहते तो पारसमणि दे भी देते, पर मणि देने कि जगह उन्होंने गंभीर होकर कहा-’वत्स! पारसमणि तो तुम्हें दे दूँगा पर तुम इसे लेकर जाओ और इसका दुरुपयोग करो, इससे पहले तुम्हें इस सत्यता की घोषणा करनी होगी कि धर्म और साँसारिकता में कौन बड़ा है। आसक्ति और वैराग्य में कौन श्रेष्ठ है। कहीं ऐसा न हो तुम इसे लेकर जाओ और पाप-पंक में डूबकर धार्मिक मर्यादाओं को कलंकित कर डालो।’

‘इसलिए पहले तुम्हें मेरे साथ यात्रा में चलना होगा।यात्रा के बाद ही तुम्हें पारसमणि सौंपने का निश्चय किया जा सकता है।’ महर्षि और शिखिध्वज वहाँ से चल पड़े। रात्रि वहाँ से पाँच योजन दूर एक गाँव में डेरा डाला। इस गाँव में उच्चवर्ण के ब्राह्मण और क्षत्रियों का बाहुल्य था। महर्षि एक कुलीन गृहस्थ के घर टिक गए।

संध्या समाप्त कर उद्दालक ने गृहस्वामी को बुलाकर पूछा-’यदि आप रात्रि भर के लिए अपनी युवा पुत्री की हमारी पास रहने दें तो हम अपनी मंत्र-शक्ति से तुम्हारा घर में उपलब्ध संपूर्ण लोहे को स्वर्ण राशि में बदलकर दे सकते हैं। गृहस्थ को एक बार संन्यासी की धूर्तता पर क्रोध तो आया तो हाय रे दुर्बल मनुष्य! स्वर्ण राशि का लोभ, भविष्य में वैभव विलास के रंगीन सपनों ने उसकी प्रतिरोध की शक्ति नष्ट कर दी। उसने सोने के लोभ में पुत्री देना स्वीकार कर लिया।

महर्षि ने उसे घर की लोहे राशि को सोने में बदल दिया। उसने अपनी पुत्री महर्षि को समर्पित कर दी महर्षि ने बालिका की पीठ पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा’पुत्री! तुम्हारी पितृ भक्ति सराहनीय है किन्तु धन के लोभी पिता की आज्ञा के सामने अपनी धार्मिक मर्यादाएँ बड़ी है, आवश्यकता पड़े तो अपने माता-पिता का भी सामना करना चाहिए पर अविवेकपूर्ण निर्णय को स्वीकार नहीं करना चाहिए।’ शिखिध्वज ने यह सब अपनी आँखों देखा। इसके बाद महर्षि उद्दालक वहाँ रुके भी नहीं रात में ही आगे चल पड़े।

प्रातः होने तक गुरु-शिष्य पारावती नगर जा पहुँचे-नर्मदा के पुण्य तट पर स्नान, संध्या करने के उपरान्त वे एक धनी सेठ के घर मेहमान बने। धनिक ने उनका स्वागत सत्कार किया। इस स्वागत के बदले महर्षि ने कहा-तात! एक घण्टे में तुम जितना लोहा ला सको ले जाओ हम उसे स्वर्ण में बदल देंगे। वनिक का मन हर्ष से नाच उठा। सारे घर को इस काम में लगा दिया गया। आधे घण्टे में घर में उपलब्ध सारा लोहा खोज लिया पर उससे वनिक की इच्छा तृप्त न हुई। पड़ोस में लुहार का घर था, उसने अपने पुत्रों को भेज कर उसका भी बहुत सा लोहा चोरी करा लिया। यह भी ध्यान न रहा कि बेचारे लुहार की आजीविका छिन रही है।

लोहे का अंबार लग गया, महर्षि ने हँसकर कहा- धन्य है मनुष्य की तृष्णा! तू कभी पूरी न हुई पर मनुष्य पागल की तरह हर पल तेरे पीछे ही दौड़ता है। उन्होंने वह लोहे भी सोने में बदल दिया और चल पड़े।

अगली संध्या उन्होंने राजगृह में बिताई। राजा अपने पुत्र के विवाह की तैयारी में था। महर्षि ने उसे बुलाकर कहा-’यदि वह किसी नवजात शिशु को बलि के लिए ला सके तो उसके राजभवन की प्रत्येक वस्तु को सोने में बदला जा सकता है। लोभी नृपति ने पड़ोसी विधावा के बच्चे को गोंद से छिनवा मँगाया और महर्षि को भेंट कर दिया। पुत्र तो महर्षि ने पीछे से उसकी माँ को पहुँचा दिया पर लोभी मनुष्य समाज के लिए भी कितना घातक हो सकता है इसकी शिक्षा शिखिध्वज को मिल गई। इस तरह वे वहाँ से भी आगे बढ़ चले।

अगले दिन एक विद्वान ब्राह्मण के घर पहुँचकर महर्षि ने कहा-’यदि आप अपने संपूर्ण ग्रन्थों को मुझे बेच दें उनका स्वामी रचयिता सब मुझे बना दें तो मैं आपके घर प्राप्त सभी लोहे को सोना बना दूँगा।’ विद्वान का स्वाभिमान सोने के लोभ में ढेर हो गया। उसने भी प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। साँसारिक सुख के लिए मनुष्य अपने आदर्श और सिद्धान्त ही नहीं शान और स्वाभिमान तक बेच सकता है। इस तरह की शिक्षा देकर गुरु-शिष्य वहाँ से चल पड़े और संध्या होने से पूर्व अपने आश्रम लौट आए।

गुरुदेव का आगमन सुनकर सारे आश्रमवासी हर्ष विभोर हो गये। सब लोग उन्हें प्रणाम करने आने लगे। शिक्षार्थी-वानप्रस्थी जो अपना सर्वस्व त्याग कर तप-साधना के लिए आश्रम में आए थे,एक-एक कर महर्षि के चरणों में शीश झुकाते जा रहे थे और शिखिध्वज देख रहा था, इस अनुशासन में शाँति-संतोष आनन्द का भाव छलक रहा है। आज उसे अपनी दीनता पर बड़ा पश्चाताप हो रहा था।

सबसे निवृत्त होकर महर्षि ने शिखिध्वज को बुलाकर कहा- ’तात! यह लो यह रही पारसमणि, इसे ले जाओ और साँसारिक सुखों का जी भर उपयोग करो।’

किन्तु आज उसकी आसक्ति धुल चुकी थी। जो तृष्णाएँ मनुष्य से छल करा सकतीं, चोरी, हत्या और कुत्सित कर्म करा सकती हैं। उनसे निराहार रहकर जीना अच्छा। मनुष्य का जन्म तो निराहार रहकर जीना अच्छा। मनुष्य का जन्म मनुष्यता से पतित होकर पशुता में गिरना नहीं, अपने जीवन ध्येय को समझने और उसे प्राप्त करने के लिए बना है, इसीलिए धर्म बड़ा है, लोकाचार नहीं। उसने पारसमणि लौटाते हुए कहा-’देव! देव मुझे यथार्थ पारस तो अब मिला है, मेरी एक वर्ष की साधना बेकार गई, इसका मुझे हार्दिक दुःख है। अब आशीर्वाद दें कि इसी साधना का पुनः अभ्यास करूं, फिर से अग्नि दीक्षा की पात्रता उपलब्ध करूं।’


घर वापस लौट आये (kahani)

एक क्षेत्र में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। निर्धन परिवार ने कहीं सुविधा के अन्य क्षेत्र में जाने की तैयारी की आवश्यक सामान साथ में बाँध लिया।

रात में एक पेड़ के नीचे विश्राम किया। तीन लड़के थे। एक को आदेश मिला ईंधन ढूंढ़ कर लाओ। दूसरे को आग और तीसरे को पानी लाने का आदेश मिला तीनों ही तुरन्त चल पड़े और अपनी जिम्मे की वस्तुएँ ले आये। चूल्हा जलाया गया। पर प्रश्न था कि इसमें पकाया क्या जाय।

परिवार के स्वामी ने पेड़ की तरफ इशारा किया कि चढ़ जाओ और जो कुछ फल-फूल मिले उन्हें तोड़ लाओ।

तीनों लड़के पेड़ पर चढ़ गये। उस पर एक देव रहता था। उसने समझा यह अनुशासित परिवार मिलजुल कर हर काम पूरे कर लेता है तो मुझे पकड़ेंगे और चूल्हे में पकायेंगे। उसने डर कर पेड़ की जड़ में गढ़ा हुआ अशर्फियों का एक घड़ा दे दिया और कहा मुझे मत पकड़ो। इस धन से अपना गुजारा करो।

दूसरे दिन परिवार अपने घर लौट आया और प्राप्त धन के सहारे आनन्दपूर्वक अपना गुजारा करने लगा।

यह बात पड़ोस वालों ने भी सुन ली। पड़ोसी ने भी यह तरकीब काम में लाने का प्रयत्न किया। वह भी अपने परिवार को लेकर उसी पेड़ के नीचे आ बैठा। उसके भी तीन लड़के थे। तीनों को काम सौंपे तो वे जाने को तैयार न हुए आपस में लड़ने झगड़ने लगे। चूल्हा जलाने की नौबत न आई।

परिवार का स्वामी पेड़ पर देव पकड़ने चढ़ा। देवता ने कहा तुम लोगों में आपस में एकता तो है नहीं। मुझे पकड़ने पकाने की व्यवस्था तो कर ही कैसे सकोगे। धन मिल गया तो उसके लिए ही लड़ मरोगे।

यह कहकर देव ने उस परिवार को भगा दिया। वे निराश घर वापस लौट आये।


चरैवेति का संदेशः मृत्यु-घाटी से

प्राणियों के पैर होते हैं। उनका चलना-फिरना स्वाभाविक और सहज लगता है, पर जब चट्टान सदृश्य जड़ पदार्थ एक स्थान से चल कर लम्बी दूरी तय करने लगे तो इसे क्या कहा जाय? प्रकृति की विलक्षणता या जड़ के जंगम बनने की अदम्य ललक? अत्युक्ति न मानी जाय, तो इसे दूसरी श्रेणी में रखा जा सकता है और यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे भी किसी स्थान विशेष से चिपक कर नहीं रहना चाहते। परिवर्तन उनकी नियति है, फिर चाहे यह स्वरूप संबंधी हो, स्वभाव संबंधी या स्थान संबंधी उनमें भी यह प्रक्रिया चलती रहती है।

ऐसी ही एक विचित्र प्राकृतिक घटना कुछ वर्ष पूर्व प्रकाश में आयी है। कैलीफोर्निया (अमेरिका) में एक विशाल घाटी है-’मृत्यु घाटी’ (डेथ वैली) इस घाटी के चारों ओर पर्वत श्रृंखलाएँ हैं, जो चीड़ के पेड़ों एवं कुछ अन्य जंगली वृक्षों से आबाद हैं। यह समुद्र तल से 300 फुट नीचे है और अमेरिका का सबसे गर्म, नीचा एवं सूखा प्रदेश है। इसी कारण इसे मृत्यु-घाटी के नाम से पुकारा जाता है। यहाँ कई प्रकार के नैसर्गिक विचित्रताएं हैं, पर इनमें जो सबसे विलक्षण है, वह है यहाँ की चलती चट्टानें। घाटी में एक तीन मील लम्बी किन्तु सूखी झील है। इसी की समतल सतह पर बगल के पर्वत-श्रृंगों से चलकर शैल-खण्ड लम्हें फासले तय कर लेते हैं और अपने पीछे आकार-प्रकार के हिसाब से चौड़ी-सँकरी पट्टी बनाते चलते हैं। पहाड़ से पत्थर का लुढ़क कर झील की सूखी सतह पर पहुँचना तो समझ में आता है, पर ढाल रहित समतल पर बिना किसी बाह्य बल के इनका चलते चले

जाना अत्यन्त विस्मयकारी लगता है।

बुद्धि यही चकराने लगती है कि सर्वथा चिकनी सतह पर भी फिसलने के लिए वस्तु को किसी-न-किसी बल का सहारा चाहिए, फिर झील की सतह मोटे तौर पर समतल होते, हुए भी हलकी ऊबड़-खाबड़ दरार युक्त है। पाषाण भी पूर्णतः चिकने नहीं होते। उनमें भी कई-कई कोने और विषम किनारे होते हैं। हवा के तेज झोंकों से भी इनका नौ सौ फुट जैसी लम्बी दूरी तय कर पाना असंभव ही है। फिर ऐसी कौन-सी शक्ति है,जिसके कारण वे इतना लम्बी यात्रा करने में सफल होते हैं? विभिन्न क्षेत्रों के वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इसका समुचित उत्तर ढूँढ़ पाने में अब तक विफल रहे हैं। हाँ, उनने अपने-अपने प्रकार के अनुमान व अन्दाज अवश्य लगाये हैं, पर ऐसा कोई नहीं, जो सिद्धान्त बन सके अथवा जिसके बारे में विश्वासपूर्वक कुछ कहा जा सके। उक्त घटना को देखने और जाँचने उपरान्त इसका निमित्त न समझ पाने के कारण इन मूर्धन्यों ने अपनी सम्मति और संभावना भर प्रकट कर दी, कि उनके विचार में ऐसा हो सकता है, पर किसी ने अब तक इस संबंध में तर्कयुक्त कोई ऐसा मत प्रस्तुत नहीं किया, जो सर्वसंमत एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण लिए हो।

इन्हीं अध्येताओं में एक हैं- डॉ. राबर्ट पी. शार्प। डॉ. राबर्ट ‘कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’में प्राध्यापक एवं प्रख्यात भूगोलवेत्ता हैं। उन्होंने अनेक वर्षों तक इस घटना का गहन अध्ययन किया। इस दौरान उनने 30 पत्थरों को चुना। इनका आकार-प्रकार देखा और नामकरण किया। इनके स्थान और स्थिति को चिह्नित किया। इनमें दो पत्थर ऐसे निकले जो उनके अध्ययन में काम आये। इन दोनों पत्थरों में से एक ने अनेक बार में कुल 860 फुट की यात्रा की, जबकि दूसरे ने एकबार में 690 फुट का सबसे लम्बा सफर तय किया। इस लम्बे और सूक्ष्म अध्ययन के पश्चात् भी डॉ. राबर्ट कोई ठोस नतीजे पर नहीं पहुँच सके। इस निष्कर्ष के रूप में मात्र उनने इतना ही कहा कि ऐसा संभवतः वर्षा और वायु के कारण होता हो, पर दृढ़तापूर्वक वे भी कुछ कहने में समर्थ न हुए।

निमित्त चाहे कुछ भी हो, पर इसकी एक दार्शनिक व्याख्या यह हो सकती है कि जड़ समझे जाने वाले पत्थर भी शायद एक स्थान से चिपके रहना पसंद नहीं करते। कदाचित गति उन्हें भी प्रिय हो। इसलिए वे ऐसे कौतुक करते रह कर प्राणिजगत में आने वाली जड़ता के प्रति उन्हें सचेत करते हों और कोई जीवधारी तो नहीं, पर मनुष्य एक ऐसी प्राणी है, जो चेतन होते हुए भी हानि-लाभ-भला-बुरा जानते और प्रत्यक्ष रूप से गतिवान दीखते हुए भी परोक्ष रूप से जड़ता को ही अपनाये रहना चाहता है। वह अपनी इच्छाओं को, आकांक्षाओं को मान्यताओं, परम्पराओं और व्यवस्थाओं को बदलने से ऐसे बचता-बिदकता है, मानों उसका सर्वस्व छिनने जा रहा हो। वह इनसे उसी प्रकार चिपके रहना चाहता है, जिस प्रकार जोंक शरीर से। दूध सामने होते हुए भी उसे रक्तपान में ही ज्यादा रस आता है। उसे गुबरैले को क्या कहा जाए, जो मल में ही स्वर्ग के आनन्द की अनुभूति करता हो! जरा इससे बाहर निकल कर तो देखे तो ज्ञात हो कि इस विशाल संसार में ऐसी और भी कितनी ही चीजें हैं, जिन्हें सुन्दर और स्वर्गोपम कहा जा सके। कुएं का मेढ़क जब एक संपूर्ण चक्कर जल में काट लेता है, तो ऐसे टर्राता है, जैसे समस्त संसार की सैर कर ली हो।

मनुष्य की रीति-नीति भी क्षुद्र जीवों से कोई बहुत भिन्न नहीं। वह अपनी दीनता को विपन्नता को बचकानी और पुरानी प्रथा को पकड़े व जकड़ रह कर ऐसी गर्वोक्तियां करता है, जैसे सचमुच उसकी प्रज्ञा ऋतम्भरा बन कर फूट पड़ी हो। जब यह बालबुद्धि व्यक्ति पर सवार होती है, तो नारकिसस की तरह उसे कहीं का नहीं रहने देती। फिर वह आत्मा सम्मोहन के ऐसे भ्रम जंजाल में उलझती है कि व्यक्ति अपनी ही विचारणाओं और मान्यताओं के ताने-बाने में फँस कर रह जाता है। चाह कर भी उससे उबर नहीं पाता और उन्हीं में पिलते-पिसते मर जाता है।

ग्रीक पुराण में नारकिसस की एक कथा आती है। एक बार वह अपनी खोयी बहन की तलाश में इधर-उधर के समीप पहुँचा। पानी साफ लगा, तो पीने की इच्छा हुई। जब वह झरने में झुका तो उसमें उसे अपना सुन्दर मुखड़ा दिखाई पड़ा। शायद तब आइने का आविष्कार नहीं हुआ था, अतः चेहरा भी पहली बार देख रहा था। अपने रूप में लावण्य पर नारकिसस इस कदर मोहित हुआ कि फिर उठ कर अन्यत्र नहीं जा सका। यहाँ तक कि अपनी प्रिय भगिनी को भी भूल गया।

किसी स्थिर मान्यता, भावना, विचारणा, प्रथा, परम्परा से चिपक जाने की भी ऐसी ही दुःखद परिणति होती है। व्यक्ति स्वयं अपनी अवगति न्यौता बुलाता और प्रगति के द्वार बन्द कर लेता है। नदी का जल प्रवाहमान होता है, अतः लोग उसका आचमन करते और देवताओं पर चढ़ाते हैं, किन्तु तालाब अपनी क्षुद्र सीमा में बंधे रहने व प्रवाहहीन होने के कारण सड़न युक्त बना रहता है, जिससे न तो वह आचमन योग्य रह जाता है, न पवित्र देवालयों में अर्घ्य चढ़ाने योग्य। हम समयानुरूप अपनी मान्यताओं और प्रचलनों को छोड़ने-अपनाने के लिए तैयार रह सकें इसी में हमारी प्रगति है। अवगति तो अब आड़े आती है, जब ऐसे परिवर्तनों के प्रति दृढ़वादी बनते और अनुपयुक्त को ही अपनाने का आग्रह करते हैं।


सरकारी मान्यताएँ मिली (kahani)

आम के बगीचे में एक लड़का चुपचाप घुस गया और पेड़ पर चढ़ कर पके फल तोड़ने लगा।

इतने देर में माली आ पहुँचा। उसने चोर लड़के को देखा और पकड़ लिया। लड़के क्या कहता, झगड़ा तो उसके बाप से करना उचित लगा ताकि उससे कह सुनकर क्षति का मुआवजा पाया जा सकें।

माली ने लड़के से पूछा-तेरा घर कहाँ हैं?

तेरे बाप का नाम क्या है? वह कहाँ मिलेगा?

लड़के ने सरल स्वभाव उँगली के इशारे से पास के पेड़ की और इशारा किया और कहा वह इसी पर चढ़ा ऊपर वाली टहनी से आम तोड़ रहा है।

माली ने लम्बी साँस खींची। जब बाप कि करतूत यह है तो बेटा क्यों पीछे रहेगा?

इटली और आस्ट्रिया में भयंकर युद्ध हो रहा था। नित्य सैकड़ों लोग दोनों पक्ष के मरते और घायल होते। इन आहतों की उचित देखभाल करने की कोई व्यवस्था न थी। लाशें सड़ती रहती और घायल चिल्लाते रहते।

इस करुणा दृश्य को देख कर हेनरी ड्रम का मन पिघल गया। उसने एक बड़ी जमीन में चलता फिरता अस्पताल बनाया। दोनों पक्ष से आहतों की उठा ले जाने की स्वीकृति प्राप्ति की। घायल ले जाने के लिए एम्बुलेंस गाड़ी का प्रबंध किया। इस प्रयास का नाम उसने ‘रैडक्रास’ यही उसका प्रतीक भी था।

उस युद्ध में उस संस्था की सेवाओं को सर्वत्र सराहा गया। दुनिया भर में उसकी शाखाएं बनी। सरकारी मान्यताएँ मिली। आज रैडक्राँस एक मानव सेवा का अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है।


प्रमाणित तो होता है, सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व

मनुष्य के नहीं तीन शरीर होते हैं-स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर। दृश्यमान स्थूल शरीर ऊपर का होता है। इसके भीतर ‘सूक्ष्म शरीर है जो अदृश्य प्रवृत्तियों और शक्तियों के साथ जुड़ा रहता है अन्तराल का गहरा स्तर वह है जिसे ‘कारण शरीर’ कहते हैं। इसका संबंध परब्रह्म और उसकी सत्ता से है। इसके लिए योग साधना एवं तपश्चर्या की एक-एक करके सभी सीढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं। स्थूल से आगे सूक्ष्म और सूक्ष्म से आगे बढ़ कर कारण शरीर में प्रवेश करना पड़ता हैं,तब कहीं योगशास्त्रों में वर्णित ऋद्धि-सिद्धियों के दर्शन होते है। प्राचीनकाल का समूचा इतिहास इन्हीं आध्यात्मिक उपलब्धियों से भरा पड़ा है जिसे ऋषियों, तत्वदर्शियों योगियों और सन्तों का इतिहास कहा जा सकता है, वे अपने संकल्पबद्ध से या सूक्ष्म शरीर से परकाया प्रवेश से लेकर सुदूर ग्रह- नक्षत्रों तक कि यात्रा पलक झपकते ही कर लेते थे।

सूक्ष्म शरीर की सत्ता और सामर्थ्य स्थूल काया की तुलना में असंख्य गुना अधिक है। आध्यात्म क्षेत्र में इसके पग-पग पर प्रमाण उपलब्ध हैं। आध्यात्मिक जगत की प्रसिद्ध घटना है कि मंडन मिश्र के जगत गुरु आद्यशंकराचार्य से शास्त्रार्थ में पराजित हो जाने के बाद उनकी धर्मपत्नी विदुषी भारती ने मोर्चा संभाला। उसने शंकराचार्य से कामविद्या पर ऐसे जटिल प्रश्न पूछे जो इन जैसे ब्रह्मचारी संन्यासी की कल्पना से भी परे थे। किन्तु वे योगी थे उन्हें मण्डन मिश्र जैसे महान पंडित कि सेवाओं की उपेक्षा थी सो उन्होंने महिष्मती नरेश के मृतक शरीर में ‘प्रवेश किया और कामशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। तत्पश्चात वापस अपने शरीर में आकर उन्होंने भारती के प्रश्नों का उत्तर दिया। परकाया प्रवेश की यह घटना पिण्ड की सामर्थ्य के उस सूक्ष्म चेतन पक्ष का परिचय देती है जिसे रहस्यमय विभूतियों से संपन्न माना गया है।

सूक्ष्म शरीर द्वारा परकाया प्रवेश की एक दूसरी इतिहास प्रसिद्ध घटना महर्षि उपवर्ष के शिष्य देवदत्त की है जिन्होंने पाटलिपुत्र के राजा महापद्मनन्द के मृत शरीर में प्रवेश तो पा लिया था, फिर बाहर निकल नहीं सके थे।

महर्षि उपवर्ष के तीन शिष्य थे प्रथम वरुचि या कात्यायन जो पीछे सम्राट चन्द्रगुप्त के महामंत्री बने थे। इन्होंने पाणिनि व्याकरण के सूत्रों की टीका की थी। दूसरे थे-’व्याडी’-जिन्होंने एक विशाल व्याकरण ग्रंथ लिखा था और तीसरे थे-देवदत्त जो योग विद्या में निष्णात् थे और परकाया प्रवेश तक कि विद्या जानते थे। गुरु दक्षिणा-की एक लाख स्वर्ण मुद्रायें प्राप्त करने के लालच में इन्होंने तुरन्त मृत्यु को प्राप्त महापद्मनन्द के शरीर को माध्यम बनाया और दोनों साथियों पर अपने शरीर की रक्षा भार सौंपकर उसमें सूक्ष्म शरीर से जा घुसे। सारे राज्य में छाई दुख की लहर एकाएक खुशी में बदल गयी। चारों ओर उत्सव मनाये जान लगे। कुशाग्र बुद्धि महामंत्री शकटार ने जब पुनर्जीवित महापद्मनन्द के गुण, कर्म, स्वभाव, व्यवहार एवं पाण्डित्य में परिवर्तन पाया तो उन्हें वस्तु स्थिति समझते देर न लगी कि यह सारा खेल योग विद्या के ज्ञाता देवदत्त का है। उन्होंने निश्चय किया कि जैसे भी हो देवदत्त का है। उन्होंने निश्चय किया कि जैसे भी हो देवदत्त के पूर्ववर्ती शरीर को ढूंढ़ कर शवदाह करा दिया जाय ताकि महापद्मनन्द को इस रूप में जीवित रखा जा सके। यह वह समय था जब सिकन्दर सम्राट पुरु पाटलिपुत्र से ही होने वाली थी। ऐसी स्थिति में अपने सिपाहियों का मनोबल बढ़ाये रखना आवश्यक था। अतएव शकटार ने अपने विश्वासपात्र सैनिकों को भेजकर व्याधि के विरोध के बावजूद भी देवदत्त के शरीर का अग्नि संस्कार करा दिया। देवदत्त को जब इस बात का पता चला तो माथा पीटते रह गये। बाद की कथा तो सब जानते ही हैं।

विश्व-विख्यात चित्रकार गोया की आत्मा अमेरिका की एक विधवा हैनरोट के शरीर में प्रविष्ट हो गयी थी। यह घटना अमेरिका में प्रसिद्ध। नये शरीर में गोया ने ‘ग्वालन’ नामक सुन्दर कलाकृति का निर्माण किया। विधवा हैनरेट ने अपने जीवनकाल में कभी कोई चित्र नहीं बनाया था। अमेरिकी विशेषज्ञों को विधवा के व्यवहार में गोया की आत्मचेतना झाँकता दिखाई देती थी। वे इसे परकाया प्रवेश की घटना मानते थे।

योग सूक्ष्मता का विज्ञान है। यह परमसत्ता से संबंध जोड़ने, आत्मानुभूति कराने का सुनिश्चित साधन है। यह राह भले ही कठिनाइयों की आत्म नियंत्रण, आत्म-सुधार की हो पर एक वैज्ञानिक पद्धति जिसके परिमाण सुनिश्चित होते हैं। उस कठिन मार्ग पर चलने वाली आस्था को उक्त चमत्कारी सिद्धियाँ निःसंदेह परिपुष्ट करती है मानवीकाया की सूक्ष्म संरचना ही कुछ ऐसी होती है कि अन्तराल में प्रसुप्त उस बीज को भण्डार को विकसित का जा सके तो वह उसे अनंत गुना सामर्थ्यवान बना देती है। स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण शरीर इस सत्ता इसी स्तर की है। विज्ञान जगत के अनुसंधान कर्ताओं ने भी अब भारतीय दर्शन के इस तथ्य की पुष्टि कर दी है और कहा है कि मनुष्य की ‘ईथरिक बॉडी’ अर्थात् सूक्ष्म शरीर की सामर्थ्य स्थूल की तुलना में कई गुना अधिक है। वह शरीर के अन्दर और बाहर भी कार्य करता रह सकता है। अत्यन्त अल्प समय में दूरवर्ती स्थानों की यात्रा कर सकता है और जरूरतमंदों की सहायता कर सकता है।

आक्सफोर्ड स्थिति ‘साइकोलॉजिकल रिसर्च सेन्टर’के मूर्धन्य परामनोविज्ञानियों ने- ‘एस्ट्रल ट्रैवल’ अर्थात् ‘सूक्ष्म शरीर की यात्रा ‘पर गहन अध्ययन एवं अनुसंधान किया है। संस्थान के प्रमुख अनुसंधान अधिकारी डॉ.चार्ल्स एम.क्रीरी का कहना है कि जन सामान्य में लगभग दस प्रतिशत व्यक्तियों को अपने जीवन में सूक्ष्म शरीर से दूसरे स्थानों की यात्रा के अनुभव अवश्य होते हैं। इनमें से अधिकांश घटनाएं दुर्घटना या शल्य क्रिया के समय घटित होती है। इनके अनुसार इस तरह के अनुभव प्रायः शान्त एवं विश्रान्तिपूर्ण मनःस्थिति में होते हैं। गहन निद्रा में भी स्थूल शरीर से बाहर निकल कर सूक्ष्म शरीर की यात्रा की घटनायें प्रकाश में आती रहती हैं।

विश्व प्रख्यात लेखक अर्नेस्ट हैमिग्वे ने अपनी कृति ‘फेअरवैल टू आर्म्स’ में ऐसे अनेकों रहस्यमय संस्मरणों का वर्णन किया है जिनमें व्यक्तियों ने अपने स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर को अलग कर स्वयं की शल्य क्रिया होते या दुर्घटना में शरीर को आशक्त पड़े देखा है। इसी तर सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रेमण्ड मुडी ने इस तरह के कितने ही उदाहरण ढूंढ़ निकाले हैं जिनमें रोगियों ने अपनी मृत्यु को बहुत पास से देखा है कि किस तरह कष्ट कर परिस्थितियों में भौतिक शरीर से सूक्ष्म शरीर अलग होकर उन सारे दृश्यों को देखता रहा जिसमें उसे स्वस्थ करने के चिकित्सकों के प्रयत्न भी सम्मिलित थे।इस संदर्भ में तांत्रिक विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य अवस्था में स्थूल शरीर एवं सूक्ष्म शरीर दोनों संपूर्ण ऐक्य की स्थिति में रहते हैं, किन्तु कई बार बहुत-सी ऐसी परिस्थितियों भी आती हैं जब दोनों शरीर एक दूसरे अलग हो जाते हैं। तब सूक्ष्म शरीर के लिए कहीं भी गमन कर सकना संभव हो जाता है। इतने पर भी वह भौतिक शरीर से एक सूक्ष्म सूत्र द्वारा संबंध बनाये रखा जाता है। मृत्यु हो जाने पर यह संपर्क सूत्र समाप्त हो जाता है और सूक्ष्म शरीर पूरी तरह स्वतंत्र हो जाता है।

यह तथ्य है कि साँसारिक कष्ट कठिनाईयाँ स्थूल शरीर के साथ ही जुड़ी रहती हैं, सूक्ष्म शरीर को इस प्रकार की कोई आधि–व्याधि नहीं व्यापती। ‘ट्वेन्टी फिथमैन’नामक पुस्तक में ऐड मोरेल ने एक ऐसे ही व्यक्ति की घटना प्रकाशित की है जिसे जेल के भीतर भीषण यंत्रणायें सहनी पड़ती थीं। अभ्यास द्वारा उसने अपने सूक्ष्म शरीर को स्थूल काया से अलग करने की विद्या सीख ली थी और यंत्रणा के उन क्षणों में सूक्ष्म शरीर से जेल से बाहर विचरण करने चला जाया करता था।

पोलैण्ड का एक प्रतिभाशाली इंजीनियर अपनी अतीन्द्रिय क्षमता के लिए विख्यात था। अपने एक चिकित्सक मित्र के परामर्श पर उसने सूक्ष्म शरीर से सुदूर प्रान्तों कि यात्रायें की। स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर अलग हो जाने पर परीक्षणकर्ता वैज्ञानिकों ने पाया कि उस समय भौतिक शरीर जीवन नाम का कोई लक्षण विद्यमान नहीं होता था। हृदय कि धड़कन, नाड़ी गति, श्वास-प्रश्वास आदि बंद हो जाते थे। अन्यान्य वैज्ञानिक परीक्षणों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के ख्याति प्राप्त मनोविज्ञानी डॉ.चार्ल्स टी. स्टार्ट ने वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से शारीरिक क्रिया–कलापों की मोनीटरिंग करने पर पाया कि स्थूलकाया से सूक्ष्म सत्ता के निकल जाने पर समस्त कायिक गतिविधियों ठप्प पड़ जाती है और जैसे ही सूक्ष्म शरीर पुनः अपनी पंच भौतिक काया में लौटा आता है वे फिर सक्रिय हो उठती हैं। उनके इस अनुसंधान की प्रमाणिकता को अमेरिकन सोसाइटी फॉर साइकिल रिसर्च ने भी स्वीकृति प्रदान की है।

अभ्यास द्वारा भौतिक शरीर से सूक्ष्म शरीर को अलग करने के अतिरिक्त भी कितनी ही बार ऐसी घटनायें घटित होती है। जो सूक्ष्म शरीर की सत्ता में परिचय कराती हैं जिन्हें चिकित्सालयों के रिकार्ड में देखा जा सकता है। घटना फाकलैण्ड की है जहाँ पिछले दिनों ब्रिटेन और अर्जेन्टीना के बीच युद्ध हुआ था। एक सैनिक अचेतावस्था में अस्पताल में भर्ती किया गया था। गहन उपचार के बाद जब मूर्छा जगी तो उसने डॉक्टरों को बताया कि अमुक गाँव में अमुक परिवार में उसका उसने अपने पोते के शरीर पा लिया था। जाँच–कर्ताओं को उसने बताया कि उस परिवार का वह एक मात्र पुरुष सदस्य था जिसका जीवित रहना आवश्यक था। उसका प्राणांत हो जाने पर इस शरीर में मुझे सूक्ष्म शरीर से प्रवेश करना पड़ा। इसी तरह की न्यूयार्क के लेनोक्स हिल हास्पिटल के चिकित्सा विज्ञानी डॉ. रसल मैक रॉबट ने एक पादरी का वर्णन किया है जिसने अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा यात्रा करके चिकित्सकों को यह सोचने के लिए विवश कर दिया था कि भौतिक शरीर के अन्दर कोई सूक्ष्म सत्ता भी विद्यमान है जिसकी सामर्थ्य उसकी तुलना में असंख्य अधिक है।

मूर्धन्य परामनोविज्ञानी सिल्वान मुल्डून का कहना है कि वस्तुतः सूक्ष्मशरीर ब्रह्मांडीय ऊर्जा का सघनीकृत रूप मात्र है। योगसाधना एवं तपश्चर्या से ब्रह्मांडीय चेतन ऊर्जा सूक्ष्म शरीर में जैसे-जैसे साधन होती जाती है वह सशक्त एवं परिपुष्ट बनता जाता है उसकी क्षमता भौतिक काया से कई गुनी बढ़ी चढ़ी होती है जिसके लिए समय, स्थान दूरी आदि जैसे कारक काई अर्थ नहीं रखते उनके अनुसार सूक्ष्म शरीर से यात्रा करने के पश्चात् जितनी ताजगी और स्फूर्ति की अनुभूति होती है। उतना स्थूल शरीर से कभी भी संभव नहीं हो पाती। इसे उन्होंने मन की यात्रा कहा है जो प्रबल संकल्प बल के सहारे संपन्न होती है।


देश–देशांतरों में भ्रमण किया (kahani)

केरल की स्थिति कभी जाति-भेद और ऊंच-नीच की दृष्टि से इस क्षेत्र को बड़े पागल खाने की उपमा दी थी। ऐसी विकट परिस्थितियों और विषम परंपराओं को उस सफलता के साथ नारायण गुरु ने उलटा। उसे देखते हुए उनके व्यक्तित्व को एक चमत्कार की ही संज्ञा दी जाती है। उनका आश्रम कोल्लम के निकट बर्कला में स्थापित हुआ जो अब एक तीर्थ ही बन गया।

रवीन्द्र टैगोर उनका कार्य सुनकर दर्शनार्थ गये थे। वे वहाँ पहुँचकर भाव-विभोर हुए और कहा था मैंने देश–देशांतरों में भ्रमण किया है पर नारायण गुरु जैसा महापुरुष नहीं देखा। उन्हें केरल का गाँधी कहा जाता है।


मध्य मार्ग ही वरेण्य

अतिवादी हर दृष्टि से हानिकारक माना गया है। जो इसे अपनाते हैं, वे हर प्रकार से विपत्ति में पड़ते देखे जाते और हानि उठाते हैं। विवेकशील इस सचाई को समझते हैं, अस्तु वे न सिर्फ स्वयं इससे दूर रहते अपितु अन्यों को भी इससे दूर रहने की प्रेरणा देते हैं।

विद्वान विचारक बर्ट्रेंड रसेल ने अपनी पुस्तक ‘सामाजिक पुनर्निर्माण के सिद्धान्त’ में लिखी है कि नीति और अनीति में विभेद कर लेना व्यक्ति की बहुत बड़ी उपलब्धि यह है कि वह उसे अपने व्यवहार में किस सीमा तक उतार पाता है। वह अपने व्यवहारिक जीवन में जो जिस हद तक उसे अपना लेता है, उसे उतना ही विवेकवान बुद्धिमान समझा जाता है, पर मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वह नीति-अनीति, अच्छाई-बुराई सद्गुण-दुर्गुण में संतुलन-समीकरण नहीं बिठा पाता और एक ऐसे सिरे की ओर निरंतर बढ़ता चलता है, जो स्वयं उसके लिए पतन का कारण बनता है। वे कहते हैं कि यदि उत्कृष्टतावादी के लिए दूसरे सिरे की ओर चल पाना संभव नहीं तो मध्यम-मार्ग से भी काम चलाया जा सकता है जिससे साँप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे।

रसेल जैसे आधुनिक मनीषी एवं प्राचीन ऋषियों ने भले ही उच्च आदर्शवादी की बात ही हो और उसे जीवन में धारण करने पर बल दिया हो पर मनुष्य के इन दिनों कि मानसिक-स्थिति की, उसकी दुर्बल-संरचना को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि अच्छाई और बुराई के दो सिरों में से उत्कृष्टतावादी सिरे को छू पाना तो शायद उसके कमजोर मानस के कारण संभव न हो सके पर इतने से ही समाधान समाप्त नहीं हो जाता। आशा कि एक किरण फिर भी शेष रहती है। काम मध्यम-मार्ग से भी चल सकता है और सच्चाई तो यह है कि इन दिनों इसी सर्वोपरि आवश्यकता है, पर दृष्टि पसार कर चारों ओर देखने पर भी मनुष्य आज पतनोन्मुख सिरे पर ही दिखाई पड़ता है न उसके मध्य बिन्दु पर न ऊपरी सिरे के ऊर्ध्व बिन्दु पर-यही वर्तमान का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

आय की अपेक्षा व्यय जब इस सीमा तक पहुँच जाय, कि उसकी कोई महत्ता ही न रहे, तब वह अपव्यय कहलाता है। इस प्रकार दूसरों के श्रम-बिन्दुओं को हड़प कर उससे अनीतिपूर्वक उपार्जन करना और संचय-संग्रह का हिमालय खड़ा कर लेना भी एक प्रकार का अतिवाद है। उल्लेखनीय है कि जिस अतिवाद का आश्रय लेते लोग इन दिन दिखाई पड़ रहे हैं, उसमें ऊपरी दृष्टि से लाभ जैसा दिखने पर भी अपने और दूसरों के लिए हानि-ही-हानि है उदाहरण के लिए संचय-वृत्ति को लिया जा सकता है। इसमें प्रचुर धन इकट्ठा कर लेने से ऐसा लगने लगा है कि अब सारे अभाव दूर हो जायेंगे, पर वास्तविकता यह है कि जिस अनुपात में संचय वृद्धि होती जाती है, उसी अनुपात में अभाव भी बढ़ने लगते हैं, कमियाँ और महत्वाकांक्षाएं अवाँछनीय उद्भिजों की तरह उपजने और पनपने लगती हैं। इसी के साथ संग्रह था एक अन्तहीन सिलसिला चल पड़ता है, जो अपने साथ अनेक दुर्व्यसनों-दुर्गुणों-कुचेष्टाओं एवं कुइच्छाओं को जन्म देता चलता है। अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है-’इच्छाएँ अनन्त होती है’।इस सिद्धान्त के अनुसार एक इच्छा पूरी हुई ही नहीं दूसरी अपनी परिपूर्ति के लिए तत्काल आ धमकती है और व्यक्ति यदि महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश न लगा सका, तो यहाँ से एक ऐसी श्रृंखला की शुरुआत होती है, जिसकी समाप्ति मृत्योपरांत ही संभव हो पाती है। इस तरह जिन्दगी पिलती-पिसती पशुवत् हो जाती है, न वह खुद चैन ले पाती है, न दूसरों को चैन होने देती है। इसके विपरीत यदि संतोष से काम लिया गया होता जितना उपलब्ध है उतने से ही काम लिया गया होता, जितना उपलब्ध है उतने से ही काम चलाने का प्रयत्न किया गया होता, तो जीवन नीरस, उबाऊ न रहकर इतना सरस और सुखद होता, जिसे स्वर्गीय कहा जा सके, पर आज जीवन की जो परिभाषा दीख पड़ती है, उससे नहीं प्रतीत होता है कि शायद नियति का यही निर्धारण ही जिन्दगी है, जिसमें ऊबड़-खाबड़ वीथियों और कंटकाकीर्ण मार्गों का ही बाहुल्य हो। मनोविज्ञानी इस दुरवस्था का इस परिभाषा का एक ही कारण बताते हैं-वर्तमान का मानसिक दिवालियापन।

यहाँ जो कुछ भी है, सब अतिवाद की पराकाष्ठा है। जिसके पास संपदा है तो अति सीमा में और निर्धनता है, तो वह भी हद से ज्यादा। नास्तिकों की भी यहाँ कमी नहीं है किन्तु आस्तिकों और धार्मिकों की भी भरमार है। भावुक भरे पड़े हैं, किन्तु संगदिलों का भी अभाव नहीं है। यथार्थता यह है कि अतिवाद संकटों, उत्पातों की जड़ है। इससे विषमता बढ़ती है और आय दिन संकट एवं विग्रह खड़े होते रहते हैं। छीना-झपटी, लूट-खसोट, आतंक का कारण अति दर्जे की विषमता ही है। अति संपन्नता बढ़ती ही तब है, जब अन्याय का मार्ग अपनाया जाय। इससे शोषितों की ईर्ष्या स्वाभाविक ही है। अतः वे बदले की भावना से आक्रमण की नीति अपनाते हैं। दैनिक जीवन में ईर्ष्या कलह, द्वेष का कारण यही विषमताजन्य अतिवाद है। अतिवाद एक प्रकार का पागलपन है, जो व्यक्ति को स्वार्थ बनाता और आत्मीयता का क्षेत्र सीमित करता है। समर्थता, योग्यता और शौर्य आदि अच्छे गुण माने गये हैं किन्तु जब यही अति का अतिक्रमण की दुस्साहस दिखाते हैं और न तुच्छ और हेय कारणों के लिए जीवन खतरे में डालते है, अथवा दूसरों को अकारण प्रताड़ित करते हैं। इसके विपरीत सत्साहस इसका दूसरा और अन्तिम सिरा है पर उसे अपनाने में कोई हर्ज नहीं। क्योंकि व्यक्ति में जब उत्साह उभरता है तो वह उसे गुणवान,शीलवान बना देता है और उससे ऐसा कुछ करा लेता है, जो स्वयं उसको अपरिमित श्रेय-सम्मान देता और समाज को असाधारण लाभ पहुँचाता है, किन्तु यह भी एक यथार्थ है कि इस प्रकार के सत्साहस कभी-कभी किन्हीं विरलों में ही पाये जाते हैं। साधारण समय और सामान्यजनों में तो इसका बिल्कुल अभाव ही देखा जाता है। ऐसे लोगों के लिए एक मात्र विकल्प मध्यवर्ती रास्ता अपनाना ही शेष रहता है। अतः इस स्तर के लोगों के लिए इतने भर से भी काम चल सकता है।

शेक्सपियर की एक कविता है-’आँन दि जेनिथ’। इसमें वे लिखते हैं ‘मैं एक ऐसे सिरे पर खड़ा हूँ, जहाँ से दूसरे को देख पाना और छू पाना दोनों ही मेरे लिए असंभव हैं। मैं एक चरम-बिन्दु पर स्थित हूँ एक ऐसे चरम-बिन्दु पर जो मेरे लिए अत्यन्त असह्य और कष्टकारक साबित हो रहा है। इससे मैं उबरना चाहता हूँ, पर यह सब तब तक संभव नहीं, जब तक मैं संतुलनकारक मध्य-बिन्दु पर अपनी स्थिति न बना लूँ, जहाँ से दोनों सिरों के संतुलित प्रभाव ही मुझे प्रभावित कर सकें और मैं साम्य की अवस्था में बना रह सकूँ।’

इस प्रकार प्रकारांतर से उन्होंने भी इसे स्वीकार किया है कि सामान्यजनों के लिए बीच वाला रास्ता हो श्रेयस्कर है। सामान्य पासन-क्षमता वाले यदि असामान्य परिमाण में भोजन भी अहितकर ही साबित होगा। इसके विपरीत यदि तीक्ष्ण जठराग्नि वाले व्यक्ति अति न्यून मात्रा में भोजन करें, तो वह जल्द ही अपना स्वास्थ गँवा बैठेंगे। यह दोनों ही स्थितियाँ अतिवादी हैं। इनसे बचना चाहिए। भोजन पौष्टिक और स्वादिष्ट हो यह अच्छी बात है, पर जायके के नाम पर तल-भुन कर कोयला बना देना एक प्रकार का अतिवाद है, जो स्वास्थ्य के लिए अनुपयुक्त ही नहीं, अहितकर भी है। इसी प्रकार मित्रता और मिलनसारिता अच्छी आदत है पर अति के सीमा से परे हो जाने इसको भी शत्रुता के बदलते देर नहीं लगती। देखा गया है कि भावुकतावश लोग अनेकों से मित्रता गाँठ लेते हैं पर सूझबूझ और दूरदर्शिता के अभाव के कारण आये दिन ठगते–ठगाते देखे जाते हैं।

इसीलिए मनोवैज्ञानिक और मनीषी दोनों इस संदर्भ में ऐसी रीति-नीति अपनाने की सलाह देते हैं जो अति की सीमा के अन्दर हो जिससे मानवीगरिमा बढ़ती और सफलता मिलती हो। प्रसन्नता और प्रगति इसी से प्राप्त होती है। जो इस सामान्य नियम या अतिक्रमण करते, वे निरंतर अवगति के गर्त में गिरते चलते है किन्तु जो समझदारी और सूझ-बूझ का परिचय देकर मध्यवर्ती मार्ग का चयन करते हैं वे प्रायः हर क्षेत्र में सफल होते, सम्मान प्राप्त करते और विवेकशील कहलाते हैं। अतिवाद और अतिक्रमण से बच कर मध्यमार्गी का अनुसरण करना ही श्रेष्ठ है।


बंधने के लिए नहीं (kahani)

स्वामी रामतीर्थ ने एम.ए. प्रथम श्रेणी में पास किया। उन दिनों उच्च शिक्षितों की सर्वत्र माँग थी। रामतीर्थ को भी एक अच्छे वेतन की नौकरी का ऑफर आया। स्वामी जी ने इनकार करते हुए कहा मैं लोगों को बंधन से मुक्त कराने आया हूँ स्वयं बंधन में बंधने के लिए नहीं।


विज्ञान मुहर लगाता है, इन चमत्कारी सिद्धियों पर

सन् 1860 का मध्याह्न। द्वारिका नदी के तट पर स्थित तारापुर (पं. बंगाल) के श्मशान में शाल्मली वृक्ष की शीतल छाया में ध्यानस्थ अघोरी सन्त के समक्ष एक अधेड़ आयु का व्यक्ति कातर स्वर में मनुहार कर रहा था-’बाबा हमारा पुत्र मरणासन्न है। चिकित्सकों ने जवाब दे दिया है। वह कुछ घण्टों का मेहमान है। अब आप ही कृपा कीजिए, उसे बचा लीजिए, अन्यथा मैं लुट जाऊँगा, कहीं का न रहूँगा......।’ वह गिड़गिड़ाते चला जा रहा था और नेत्र पावस की तरह उमड़ रहे थे। करीब पंद्रह-बीस मिनट के उपरान्त ‘क्षेपा’(पागल) उपनाम से प्रसिद्ध सन्त वामाचरण की आँखें खुली। वे कुछ क्षण तक याचक की आँखों में आंखें डाले देखते रहे तत्पश्चात् श्मशान की मिट्टी उठायी। कुछ पल उसे मुट्ठी में बन्द रखी, फिर शोकाकुल व्यक्ति की ओर बढ़ाते हुए कहा-’बालक को इसे खिला देना, स्वस्थ हो जायेगा।’बंगाली ने हाथ बढ़ा कर उसे ग्रहण किया तो चकित रह गया। मृत्तिका पेड़े के टुकड़े में परिवर्तित हो चुकी थी। उसने गदगद हृदय से सन्त को साष्टांग प्रणिपात किया और चला गया।

यहाँ प्रतिपाद्य विषय पदार्थ-परिवर्तन की वह घटना है, जो अक्सर सिद्ध-सन्तों के अलौकिक प्रसंगों में दिखाई पड़ती और चर्चा का विषय बनती है। श्रद्धालु लोग ऐसे प्रकरणों को सिद्धि चमत्कारों आदि नामों से पुकारते हैं, तो तर्कशील मस्तिष्क उसमें संशय की गुंजाइश से सर्वथा इन्कार नहीं करते। उनका एक ही तर्क होता है कि पदार्थ का परिवर्तन और उनके उपादानों का रूपांतरण कैसे सम्भव है? यह कैसे शक्य है कि मिट्ठी मिष्ठान हो जाये और शीश, सुवर्ण में बदल जाये? किन्तु यत्र-तत्र जब वे ऐसे कौशल देखते तो उनका संदेहशील मन पुनः असमंजस में पड़ जाता और सोचने लगता है कि इसे क्या कहा जाय-सत्य? असत्य? दृष्टिभ्रम? या हस्तलाघव? निर्णय न कर पाने की स्थिति में सत्यता की परख अधूरी रह जाती है और उधेड़ बुन ज्यों कि त्यों बनी रहती है।

यहाँ एक प्रश्न अंतस् में बार-बार उभरता है कि आखिर इन दिनों मन इतना शंकाशील क्यों हो गया है? वह बात-बात में हर चीज का प्रमाण क्यों खोजता फिरता है? और न मिलने पर क्यों उसे अमान्य ठहराने की कोशिश करता है। इसका एक उत्तर यह दिया जा सकता है कि यह सब प्रत्यक्षवाद की देन है। उसने पिछले कुछ वर्षों में मानसिक-संरचना में इस कदर बदलाव उपस्थित कर दिया है कि अब वह ‘बाबा वाक्यं प्रमाणं?’ की जगह ‘प्रत्यक्षं किं प्रमाणं?’ पर ज्यादा विश्वास करने लगा है और जहाँ पुष्टि के लिए प्रमाण की माँग की जा रही है हो वहाँ इससे कम में भरोसा भी कैसे दिलाया जाय? दूसरे योग का वर्तमान समय में इतना प्रचार-प्रसार हुआ है कि धूर्तों को इससे अनुचित लाभ उठाने और भोले-भावुकों की जेबें खाली करने का अच्छा अवसर मिल गया है। ये जगह-जगह नुक्कड़-चौराहों पर योग के नाम पर मायाचार रचते और स्वयं को सिद्ध स्तर का योगी साबित करने का प्रपंच अपनाते देखे जाते हैं। इस क्रम में जब उनकी पोल खुलती और हाथ की सफाई पकड़ी जाती तो न सिर्फ उनकी निन्दा-भर्त्सना होती, वरन् योग विज्ञान जैसी प्रमाणिक विद्या से भी जन सामान्य का विश्वास उठने लगता है। एक तीसरा कारण इसका यह हो सकता है कि आजकल सच्चे योगी नहीं के बराबर रह गये हैं। जो हैं वे अपनी सिद्धियों का सार्वजनिक प्रदर्शन कर विज्ञान की चुनौती को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं होते। ऐसी स्थिति में दुविधा का निवारण कैसे हो? शंका का समुचित समाधान न हो पाने के कारण संशय यथावत् रह जाता है।

इन्हीं सब कारणों से प्रत्यक्षवाद को आज सबसे प्रमाणिक और प्रतिष्ठित माना जाने लगा है, इतने भरे से यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि साक्ष्य की अनुपस्थिति मात्र से ही किसी का अस्तित्व अमान्य नहीं हो जाता। उदाहरण के लिए ईश्वर को लिया जा सकता है। वह एक निराकार चेतन सत्ता है। उसे सिद्ध कर पाना न तो प्रत्यक्षवाद के लिए संभव है, न अध्यात्मवाद के लिए। उसका अनुमान भर लगाया जा सकता है। संभवतः इसी कारण से कपिल मुनि ने अपने दर्शन में मात्र इतना पर भी सच्चाई यह है कि उसकी सत्ता से इनकार ने तो अध्यात्म करता है न विज्ञान। अध्यात्म तो शुरू से ही यह कहता आया है कि हर वस्तु को लौकिकता के धरातल पर न तो पुष्ट किया जा सकता है न प्रमाणित। प्रसन्नता कि बात यह है कि विगत कुछ वर्षों में विज्ञान की भी तत्संबंधी मान्यता में बदलाव आया है और वह इसे मानने लगा है कि स्थूल यंत्रों के सहारे सूक्ष्म की सिद्धि एक सीमा तक ही संभव है इसके अतिरिक्त एक अन्य बात जो विज्ञान में दिखाई पड़ती है वह है, अनुमान का अवलंबन। इस आधार पर आरंभ में विज्ञान का हर सिद्धान्त कल्पना मात्र होता है। बाद में वह परिकल्पना बनता और फिर सत्य व सिद्धान्त के रूप में स्थापित होता है।

कुछ साल पहले तक ’टैकियोन’ कल्पित कण मात्र थे, पर हाल में उसके अस्तित्व की साक्षी ढूँढ़ ली गई। इस प्रकार प्रत्यक्षवाद पर आधारित पदार्थ विज्ञान भी कई बार परोक्ष का, अज्ञात अस्तित्व का अनुमान का सहारा लेकर अपना काम चलाता दिखाई पड़ता है। यों विचार किया जाय तो ज्ञात होगा कि उसमें अधिकाँश अनुसंधान ऐसे भी हुए हैं जो आरंभ में अनुमान थे और बहुत समय उपरान्त ही वे प्रमाणित हो सके। इस तरह यह कहा जा सकता है कि भौतिक विज्ञान की नींव भी अनुमान-प्रमाण पर ही खड़ी है, जबकि अध्यात्म विज्ञान तो प्रमाणों की श्रृंखला में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान शब्द जैसे चार प्रकार के साक्ष्यों को प्रस्तुत करता और प्रत्येक को प्रत्यक्ष स्तर का ही प्रमाण मानता है।

अतः जनसामान्य को भी यह हठवादिता छोड़ देनी चाहिए कि किसी के प्रत्यक्ष प्रमाण मिलने या प्रक्रिया-सिद्धान्त समझने पर ही उसे सच माना जाय, अन्यथा झूठा-ढकोसला करार दे दिया जाय। यह संभव है कि बाद में विज्ञान ऐसे प्रकरणों को भी सत्य की कसौटी पर प्रत्यक्ष कर दे जैसा कि शुरू से उसका इतिहास रहा है, पर इसके लिए दीमक जैसे धैर्य और पुरुषार्थ की आवश्यकता है, जो पहाड़ जैसे कलेवर को भी खोखले करने में अद्भुत दृढ़ता का परिचय देती है।

जहाँ तक पदार्थ के रूपांतरण का सवाल है साधारण जन की यह दलील होती है कि ऊर्जा का रूपांतरण तो सुना-देखा जाता है, पर पदार्थ का रूपांतरण? यह किस भाँति संपन्न हो सकता है यही उसका एकमात्र असमंजस है। यहाँ ध्यान योग्य बात अँग्रेजी की वह कहावत है, जो एक बहुत बड़े दार्शनिक सत्य को प्रतिपादित करती है- ‘नथिंग कम्स आउटा ऑफ नथिंग’ अर्थात् शून्य से शून्य की ही उत्पत्ति होती है। दूसरे शब्दों में यह दार्शनिक तथ्य स्पष्ट उद्घोष करता है कि जहाँ कुछ है वहाँ उससे दूसरा कुछ भी पैदा कर सकना संभव है।

इसी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए स्वामी

अभेदानन्द ने एक स्थान पर(अभेदानंद साहित्य में) लिखा है कि हर वस्तु में पूर्ण प्रकृति विद्यमान है।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादायु पूर्णमेवावशिष्यते॥

अर्थात् ब्रह्म पूर्ण है। उससे निष्पन्न होने के कारण यह संसार भी पूर्ण है। पूर्णत्व में से पूर्णता ले ली जाय, तो भी वह पूर्ण ही रहता है। लोहे का हम सोना बना लें या सोने को चाँदी में परिवर्तित कर दें, कोई अंतर नहीं पड़ता। उसकी पूर्णता ज्यों-की-त्यों बनी रहती है, क्योंकि वह भी प्रकृति का ही एक पदार्थ है और हर पदार्थ अपने में पूर्णता को पूर्ण प्रकृति को धारण किये हुए है। योग विज्ञान में इस प्रकार की सिद्धि अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति श्रेणी के अंतर्गत आती है, जिसमें संकल्प शक्ति द्वारा किसी भी वस्तु को प्राप्त कर लेना अथवा एक को दूसरी में रूपांतरित कर देना संपन्न किया जाता है। आज यह प्रक्रिया भले ही अविश्वसनीय और भ्राँति जैसी लगती हो, किंतु है यह पूर्णतः विज्ञान समस्त और निभ्राँत। यदा-कदा इसके उदाहरण भी देखने को मिलते रहते हैं।

स्वामी विशुद्धानंद परमहंस प्रायः इस प्रकार के चमत्कार अपने शिष्यों को दिखाया करते थे, जिसकी चर्चा उनके प्रमुख शिष्य पंडित गोपीनाथ कविराज ने यत्र-तत्र अपने ग्रंथों में की है। एक बार क्वीन्स कालेज के फिजिक्स के प्राचार्य अभय चरण सान्याल की इच्छा पर विशुद्धानंद ने उनकी इच्छित वस्तु लाल रंग का ग्रेनाइट पत्थर रुई से सूर्य विज्ञान द्वारा उनके समक्ष विनिर्मित कर दिया तो चमत्कृत रह गये। उनका सारा संशय जाता रहा। ऐसे ही एक अन्य अवसर पर उनने अपने शिष्यों के सम्मुख गुड़हल फूल को गुलाब में परिवर्तित कर दिया था। वे कहा करते थे कि इस प्रकार का निर्माण न सिर्फ सूर्य विज्ञान द्वारा संभव है, वरन् दूसरे अनेक विज्ञानों यथा-चंद्र विज्ञान नक्षत्र विज्ञान, वायु विज्ञान द्वारा भी संभव है और योग विज्ञान द्वारा भी। वांछित पुष्प के सुगंध का सृजन तो वे स्पर्श मात्र से तत्काल कर देते थे और वह इतनी तीक्ष्ण और चिरस्थायी होती कि नहाने-धोने पर भी कई दिनों तक यथावत बनी रहती। नाथ संप्रदाय के महान योगी गंभीरनाथ के बारे में प्रसिद्ध है कि जब वे गया प्रवास के दौरान कपिलधारा नामक स्थान पर साधनारत थे, तो माधव लाल नामक एक व्यक्ति अपनी व्यथा-कथा लेकर उनके समक्ष उपस्थित हुआ और असाध्य लम्बी बीमारी का उल्लेख कर फूट-फूट कर रो पड़ा। योगिराज का मन करुणा से विगलित हो गया। उन्होंने कुछ क्षण रुक कर बगल के पौधे से एक पत्ती तोड़ी। हाथ हवा में लहराया और उसे खा लेने के लिए माधव लाल को दे दिया। माधव लाल यही समझ रहा था, कि वह पत्ती ही होगी, पर जब हाथ में लिया, तो उसे अत्यंत आश्चर्य हुआ। पत्ती पके अमरूद में बदल चुकी थी। उसके सेवन से वह रोगमुक्त हो गया।

शिरडी के साईं बाबा के बारे में प्रसिद्ध है कि एक बार उनके दीपक का तेल समाप्त हो गया। उन्होंने पास-पड़ोस के लोगों से इसकी याचना की, पर जब सभी ने देने से इंकार कर दिया, तो उन्होंने मस्जिद के दीपक में पानी भर दिया। पानी, तेल बन कर जलता रहा।

प्रख्यात संत बुल्ला साहब तब बुलाकीराम हलवाहे थे। वे बिल्कुल अनपढ़ थे और गाजीपुर जनपद के एक जमींदार गुलाल साहब के यहाँ खेती-बारी का काम करते थे। उनकी प्रकृति बड़ी अध्यात्मिक थी। काम करते हुए भी चित्त भगवद्-स्मरण में ही लगा रहता। एक दिन नित्य प्रति की तरह खेत में हल चलाने गये। दो घंटे पश्चात बैलों को कुछ आराम देने हेतु उन्हें हल में जुता छोड़ खेत में खड़ा कर दिया और स्वयं मेंड़ में बैठ ईश-चिंतन में लीन हो गये। इसी बीच गुलाल साहब आ पहुँचे। बुलाकीराम को गायब देख उन्होंने जोर-जोर की दो-तीन आवाजें लगायीं, पर बुलाकीराम ध्यान में इतने तल्लीन थे कि आवाज सुन न सके। जमींदार उन्हें कामचोर समझ कर आग बबूला हो उठे। नजदीक आये, तो पता चला बुलाकीराम मेंड़ पर विश्राम कर रहे हैं और समीप आने पर पता चला वह हाथ में पानी युक्त लोटा लिए आंखें बंद किये कुछ बुदबुदा रहे हैं। उन्हें हलवाहे की इस हरकत पर क्रोध आ गया और पीठ पर एक जोरदार लात जमायी। बुलाकीराम का ध्यान भंग हो गया। आघात खाकर लोटा हाथ से छिटक पड़ा और उससे दही का गिरना देख गुलाब साहब हतप्रभ रह गये। जब बुलाकीराम से इसका रहस्य जानना चाहा, तो उत्तर मिला कि वह थोड़ी देर के लिए सत्पुरुषों की सेवा में निमग्न हो गये थे। पत्तलों में सब कुछ परोसा जा चुका था। दही परोसने ही वाला था कि आपके प्रहार से ध्यान भंग हो गया और दही छलक पड़ा। पानी का दही बन जाना-इस घटना ने गुलाल साहब को अभिभूत कर दिया। वे हलवाले बुलाकीराम के चरणों में गिर पड़े और उन्हें अपना गुरु बना लिया।

इस तरह की अगणित घटनाएँ सिद्ध संतों के चरित्रों में आये दिन घटते देखी-सुनी जाती हैं, जिन पर अविश्वास करने का कोई कारण दीख नहीं पड़ता फिर भी संशयी मन का ऊहापोह यथावत् बना रहता है। यों भौतिक विज्ञान भी पदार्थ रूपांतरण की इस संभावना से सर्वथा इनकार नहीं करता। वह कहता है कि भी पदार्थ अपनी मूल सत्ता को मात्र अपनी निश्चित परमाणु-संख्या के कारण ही बनाये रहता है। यदि इस संख्या में किसी प्रकार फेर बदल कर पाना संभव हो, तो पदार्थों का रूपांतरण भी असंभव नहीं। उदाहरण के लिए लोहे के एक अणु में 26 परमाणु होते हैं। यदि इनकी संख्या को बढ़ा कर किसी भाँति 79 कर दिया जाय, तो फिर लोहा, लोहा न रह कर सोना बन जायेगा। इसी प्रकार यदि इस संख्या को घटाकर क्रमशः 25, 24, या 3 कर दिया जाय तो वह सर्वथा दूसरी वस्तु मैंगनीज, क्रोमियम, लिथियम बन जायेगा। यह और बात है कि भौतिकशास्त्र अब तक कोई ऐसी विद्या विकसित नहीं कर सका हैं जिससे पदार्थों के परमाणुओं को घटाना-बढ़ाना संभव हो सके। योगशास्त्र के पास ऐसी गूढ़ और सुनिश्चित प्रक्रिया है, जिसके द्वारा वह अशक्य लगने वाला यह कार्य संपादित कर लेता है, फलतः वस्तुओं का रूपांतरण संभव बन पड़ता है। प्राचीनकाल में कीमियागिरों को लोहा से सोना बनाने में कदाचित् कोई सफलता मिली हो, तो उसमें परमाणु संख्या की न्यूनाधिकता को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है-ऐसा वैज्ञानिकों का सुनिश्चित मत है।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि योग विज्ञान में वस्तु-रूपांतरण की जो घटनाएँ दिखायी पड़ती हैं, वह कोई कपोल-कल्पना, सम्मोहन अथवा हस्तकौशल न होकर पूर्णतः विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है। संभव है आने वाले समय में पदार्थ विज्ञान भी ऐसी कोई विद्या विकसित कर ले, जिससे ऐसा कर पाना शक्य हो जाय।


सिर पीट लिया (kahani)

लड़की छोटी थी। वह अपने छोटे भाई को पीठ पर लाद कर खेत से घर ला रही थी।

राहगीर ने पूछा बेटा पीठ पर लदा लड़का तो तुमसे कुछ ही छोटा है। इसे लाद ले चलना तो तुम्हें भारी पड़ता होगा।

एक प्रसिद्ध लेखक मद्रास के मुख्य मंत्री के पास गये और उनका विस्तृत जीवन चरित्र छापने की सहमति माँगने लगे। मुख्यमंत्री ने दर्जनों नाम नोट कराये और कहा उन लोकसेवियों की जीवन गाथायें आप लिख दें मैंने तो मंत्री पद प्राप्त करके अपनी सेवाओं की पहले ही कीमत वसूल कर ली है।

घंटों सत्संग चलता। आत्मा परमात्मा की बातें चलती। महात्मा समझाता “आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है, निष्पाप है। निष्कलंक है। कीर्तन कराता प्रसाद बाँटता।” सब बिदा हो जाते और अपने-अपने काम में पूर्व की तरह लग जाते। नित्य यही क्रम चलता किंतु बड़ी हैरानी हुई लोग ज्यों के त्यों बेईमान, चोर, रिश्वतखोर, मिलावट करने, कम तौलने से न चूकते। झूठ फरेबी के जाल रचते। एक तर्कवादी सत्संगी से उलझ पड़ा कि काटा बाजारी, झूठ-फरेबी के जाल रचते। एक तर्कवादी सत्संगी से उलझ पड़ा कि काटा बाजारी, झूठ-फरेबी के जाल रचते। एक तर्कवादी सत्संगी से उलझ पड़ा कि काटा बाजारी, झूठ-फरेबी और सत्संग की क्या संगति इस दिखावे क क्या लाभ। सत्संगी बोला “आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है, निष्पाप है। निष्कलंक है। उसे कुछ पाप नहीं लगता। कोई दोष नहीं लगता। वह कभी अशुद्ध नहीं होती।” सुनने वालों ने सिर पीट लिया। कहा हो गया उद्धार। धर्मोपदेशक हम दैनंदिन जीवन में नित्य देखते रहते हैं।


प्राणयोग की उच्चतर सिद्धिदात्री साधनाएँ

‘प्राण’ हवा से-आक्सीजन से भी सूक्ष्म है। वह एक प्रकार की सचेतन बिजली है जो समूचे ब्रह्मांड में संव्याप्त है। प्राणी उसी के सहारे अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। उसका संतुलन बिगड़ते ही बलिष्ठ काया को भी तत्काल मृत्यु के मुख में जाना पड़ता है। प्राण का तात्पर्य है-जीवट, साहस, प्रतिभा, ओजस, तेजस् वर्चस्। यह जिसमें जितनी मात्रा में होता है, उसकी प्रखरता, तेजस्विता उसी अनुपात से उभरती है। महामानवों, सिद्ध पुरुषों में प्राणचेतना की बहुलता ही उनके प्रति आकर्षण का केन्द्र रहती है। दीर्घायुष्य इसी की देन है।

प्राणवान बनने के लिए लोक व्यवहार में भी कई उपाय हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के अनुसार प्राण विद्या के सहारे ही इस क्षेत्र में बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है। प्राण उपचार के प्राण-प्रयोग के कितने ही मार्ग है, जिनका संकेत प्रश्नोपनिषद् में सूक्ष्म विवेचना के साथ किया गया है। संक्षेप में वह साधना ‘प्राणायाम’ की प्रक्रिया द्वारा सधती है। विज्ञात प्राणायामों की संख्या चौरासी है। अविज्ञात इससे भी अधिक हो सकते हैं। अध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति करने, साधकों को प्राणवान बनाने के उद्देश्य से कुछ ऐसे निर्धारण चुने गये हैं जो सर्वसुलभ हैं और जिनके प्रयोग से लाभ तो बहुत हैं, किंतु कोई भूल रहने पर भी हानि होने की तनिक भी आशंका नहीं है।

यह तीन प्राणायाम हैं-(1)नाड़ीशोधन (2)प्राणाकर्षण और (3)सूर्यवेधन प्राणायाम। इन तीनों प्राणायामों में से एक ही साधक की स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए निर्धारित किया जाता है और उसे एक महीने तक नियत समय पर नियत विधि से करते रहना होता है। उसकी पद्धति, प्रक्रिया और विद्या निम्न प्रकार हैं-

(1)नाड़ीशोधन प्राणायामः-नाड़ीशोधन को एक प्रकार से आयुर्वेदोक्त पंचकर्म के समतुल्य माना जा सकता है। शारीरिक मलों के निष्कासन में वमन, विरेचन, स्वेदन, स्नेहन, नस्य के पाँच उपाय अपनाये जाते हैं और विभिन्न अवयवों से भरे हुए संचित मलों को निकाल बाहर किया जाता है। इसके उपराँत ही बलवर्धक रसायनें पूरी तरह काम करती हैं और प्रभाव दिखाती है। नाड़ीशोधन प्राणायाम का भी सूक्ष्म क्षेत्र में वहीं प्रभाव पड़ता है, पंचकर्मों से प्रत्यक्ष मल इंद्रिय छिद्रों से होकर कफ रूप में निकलते हैं। नाड़ी शोधन प्राणायाम में वही बात सूक्ष्म मलों, प्राणचेतना में घुले विकारों का निष्कासन करने के रूप में श्वसन क्रिया के माध्यम से संपन्न होती है, स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर का परिशोधन होकर उनमें नवीन चेतना का संचार होता है। इस प्राण प्रयोग में तीन बार बांये नासिका से साँस खीचते और छोड़ते हुए नाभिचक्र में पूर्णिमा के चंद्रमा का शीतल ध्यान, तीन बार दाहिने नासिका छिद्र से साँस खींचते हुए सूर्य का उष्ण प्रकाश वाला ध्यान तथा आखिरी बार दोनों छिद्रों से साँस खींचते हुए मुख से प्रश्वास निकालने की प्रक्रिया संपादित की जाती है। इसका प्रयोग इस प्रकार है-

सर्वप्रथम स्वच्छ एवं कोलाहल रहित शाँत-एकाँत स्थान में पूर्वाभिमुख हो पालथी मारकर ध्यान मुद्रा में बैठा जाता है। इसमें दोनों हाथ घुटनों पर मेरुदण्ड सीधा एवं आंखें बंद कर ली जाती हैं। तदुपराँत दांये हाथ के अँगूठे से दांयी नासिका का छिद्र बंद कर बाँये से साँस खींचते हैं और उसे नाभिचक्र तक ले जाते हैं और ध्यान करते हैं कि नाभिस्थान में पूर्णिमा के चंद्रमा के समान शीतल प्रकाश विद्यमान है, साँस उसे स्पर्शकर स्वयं शीतल एवं प्रकाशवान बन रहा है अब इसी नासिका छिद्र से पूरी साँस बाहर निकाल देते हैं तथा थोड़ी देर तक श्वास रोककर बायीं ओर से ही इड़ानाड़ी के इस प्रयोग को तीन बार करते हैं। इसके बाद दांये नासिका छिद्र से इसी प्रकार पूरक, अंतःकुंभक, रेचक व बाह्यकुंभक करते हुए नाभिचक्र में चंद्रमा के स्थान पर स्वर्णिम सविता-सूर्य का ध्यान किया जाता है। भावना की जाती है कि नाभि स्थित सूर्य को छूकर लौटने वाली प्राणवायु पिंगला नाड़ी से होते हुए ऊष्मा और प्रकाश उत्पन्न कर रही है। इस क्रिया को भी तीन बार करना होता है। अंत में नासिका के दोनों छिद्र खोलकर एक बार में ही बाहर निकाल देते हैं। प्रारम्भिक अभ्यास में एक सप्ताह तक नित्य एक ही बार नाड़ी शोधन का अभ्यास में एक सप्ताह तक नित्य एक ही बार नाड़ी शोधन का अभ्यास करते हैं, पर पीछे धीरे-धीरे इसकी संख्या बढ़ायी जा सकती है।

(2)प्राणाकर्षण प्राणायाम-प्राणाकर्षण प्राणायाम में ब्रह्मांडव्यापी प्राण तत्व का अपने लिए जिस स्तर का प्राण आवश्यक होता है, उसे खींचा जाता है। प्राण की अनेक धारायें हैं। जिस प्रकार वायु में आक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कार्बनडाइ आक्साइड आदि अनेकों रासायनिक सम्मिश्रण रहते हैं, उसी प्रकार संव्याप्त प्राण चेतना में भी ऐसे तत्व घुले हुए हैं जो विभिन्न स्तर के हैं और विभिन्न प्रकार के प्रयोजनों में प्रयुक्त होते हैं। उनमें से जिसको, जितनी मात्रा आवश्यक हो, उसे उसी अनुपात से खींचकर अपने किसी अंग विशेष में प्रतिष्ठापित किया जा सकता है। उनकी पद्धति एवं प्रक्रिया निम्न प्रकार है-

नाड़ीशोधन प्राणायाम की तरह ही इसमें भी पूर्व की ओर मुँह करके ध्यानमुद्रा में बैठा जाता है। भावनापूर्ण यह ध्यान किया जाता है कि अखिल आकाश प्राणतत्व से व्याप्त है। सूर्य के प्रकाश में चमकते बादलों की शक्ल के प्राण का उफान हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है। नासिका के दोनों छिद्रों से श्वास खींचते हुए अब यह भावना करनी पड़ती है कि प्राणतत्व के उफनते हुए बादलों को हम अपने अंदर खींचकर अवशोषित अवधारित कर रहे हैं। यह प्राण हमारे विभिन्न अंग-अवयवों में प्रवेश कर रहा है। इस प्रक्रिया में जितनी देर आसानी से साँस रोकी जा सकती हो, भीतर रोके रहना चाहिए और यह भावना करनी चाहिए कि प्राणतत्व में सम्मिश्रित चैतन्य बल, तेज, साहस, पराक्रम, जीवट जैसे घटक हमारे अंग-प्रत्यंगों में स्थिर हो रहे हैं। इसके बाद साँस धीरे-धीरे बाहर निकाल देते हैं, साथ ही चिंतन करते हैं कि प्राण का सारा तत्व हमारे संपूर्ण काया के अंग प्रत्यंगों द्वारा पूरी तरह सोख लिया गया। अब थोड़ी देर तक बिना साँस के रहते हैं और भावना करते हैं कि जो दोष-दुर्गुण बाहर निकाले गये हैं, वे हममें बहुत दूर चले जा रहे हैं और उन्हें फिर से दुबारा अंदर प्रविष्ट नहीं होने देना है। इस पूरी प्रक्रिया को पाँच प्राणायामों तक ही सीमित रखा जाता है।

(3)सूर्यवेधन प्राणायामः ब्रह्म-प्राण को आत्म-प्राण के साथ संयुक्त करने के लिए उच्चस्तरीय प्राणयोग की आवश्यकता पड़ती है। सूर्यवेधन इसी स्तर का प्राणायाम है। इस प्राणायाम में ध्यान−धारणा को और भी अधिक गहरा बनाया जाता है एवं प्राण ऊर्जा को साँस द्वारा खींचकर इसे सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कराया जाता है। इसमें प्रकाशपुँज को आर-पार करने की प्रक्रिया बनती है। चीरते हुए गुजरने में मध्यवर्ती ऊर्जा के साथ संपर्क बनता है और सतही प्रभाव के हलकापन में उलझे रहने के स्थान पर अंतराल में पायी जाने वाली प्रखरता के साथ जुड़ने की बात बनती है। सूर्य को इस विश्व कर प्राण माना गया है। सविता सचेतन प्राणऊर्जा का केन्द्र है। इस प्राणायाम की विधि संक्षेप में इस प्रकार हैं।

पूर्वाभिमुख, सरल पद्मासन या सुखासन, मेरुदण्ड सीधा, नेत्र आधे खुले, घुटनों पर दोनों हाथ। यह ध्यानमुद्रा है। बांये हाथ को मोड़कर उसकी हथेली पर दाहिने हाथ की कोहनी रखकर, दाहिने हाथ का अंगूठा दाहिने नासिका छिद्र पर, अनामिका अंगुलियों से बांये नथुने को बंद कर गहरी साँस खींची जाती है। यह साँस इतनी गहरी होनी चाहिए कि पेट फूल जाये, वह फेफड़े तक सीमित न रहे। उसके साथ ही गहनतापूर्वक ध्यान किया जाता है कि सविता का प्रकाश प्राण से मिलकर दांये नासिका छिद्र से पिंगला नाड़ी में होकर अपने सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर रहा है। जितनी देर तक सरलतापूर्वक साँस रुक सकती है उतनी देर तक रोके रखकर दोनों नथुने बंद करके यह ध्यान करते हैं कि नाभिचक्र के प्राण द्वारा एकत्रित यह तेज पुँज यहाँ अवस्थित चिरकाल से प्रसुप्त पड़े सूर्यचक्र को प्रकाशवान कर रहा है। वह निरंतर प्रकाशवान हो रहा है। अब बांये नथुने को खोल देते हैं और भावना करते हैं कि सूर्य चक्र को सतत् घेरे रहने वाले, धुँधला बनाने वाले कषाय-कल्मष छोड़ी हुई साँस के साथ बाहर निकल रहा हैं। इसके उपराँत दोनों नथुने फिर बंद करके फेफड़ों को बिना साँस खाली रखा जाता है, साथ ही भावना करनी पड़ती है कि नाभिचक्र में एकत्रित प्राण तेज सारे अन्तःप्रदेश को प्रकाशवान बना रहा है। सर्वत्र तेजस्विता व्याप्त हो रही है। यही प्रक्रिया फिर बांये नथुने से साँस खींचते व रोककर दांये नथुने से बाहर फेंकते हुए दुहरायी जाती है और साथ ही साथ भावना भी उसी प्रकार की जाती है जैसा कि ऊपर वर्णित है। यह पूरी प्रक्रिया एक लोम-विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम की हुई। इसे एक प्रकार का दधिमंथन समझा जा सकता है जिससे स्तब्धता में हलचल उत्पन्न होती है। प्रसुप्त को जाग्रत किया जाता है। समुद्रमंथन से जिस प्रकार 14 रत्न निकले थे, उसी प्रकार भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक विभूतियों के भाण्डागार हाथ लगने जैसी आशा इस आधार पर की जा सकती है।


सारी समस्याएँ सामंजस्य की ही तो हैं

इस अनंत अंतरिक्ष के विभिन्न खगोलीय पिण्डों के बीच परस्पर तालमेल न रहे, तो शायद आज जैसा संतुलन इस ब्रह्मांड में न रहने पाये, उनके घटकों में विभिन्न प्रकार की विसंगतियाँ उठ खड़ी हों और जीवन-सातत्य भी पृथ्वी पर संभवतः संदिग्ध बन जाय। यह सामंजस्य जड़ की ही नहीं, चेतन की, संपूर्ण प्रकृति की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसके न निभ सकने की स्थिति में जहाँ ग्रह-गोलक नियमन-नियंत्रण खो बैठते हैं, वहीं परिवार, समाज, संसार सब अस्त−व्यस्त हो जाते हैं, एवं उनकी प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। अस्तु जहाँ प्रगति की आकाँक्षा हो, वहाँ तालमेल का अनुबंध भी अनिवार्य रूप से आवश्यक माना गया है।

शरीर तंत्र भी इसका अपवाद नहीं। वहाँ इसकी अनिवार्यता तब अपरिहार्य लगने लगती है, जब तनिक-सा व्यतिक्रम विशाल जितना व्यतिरेक उत्पन्न कर देता है। यदि साँस चलने के लिए सन्नद्ध हो और रक्त अपना संचरण रोक दे तो? यदि हृदय धड़कना चाह रहा हो, पर फेफड़े उसका साथ देने से इनकार कर दें तो? जीवन अपना निर्वाह आगे रखना चाहे, किंतु मरण सामने आ धमकने के लिए मचलने लगे, तब कशमकश की कितनी विकट स्थिति उपस्थित हो सकती है-यह विचारणीय विषय है। ऐसे में सिवाय समझौता के और कोई दूसरा विकल्प शेष रह नहीं जाता। अतएव इन अवसरों पर शरीर-प्रणाली को भी मतभेद समाप्त कर संतुलित ढंग से चलने के सामान्य सिद्धाँत का ही सहारा लेना पड़ता है। जब किन्हीं कारणों से वह इसकी उपेक्षा करता अथवा ऐसा करने के लिए विवश कर दिया जाता है, तो कितना भारी उपद्रव उठ खड़ा होता है, इसे शरीरशास्त्री भलीभाँति जानते हैं। आपरेशन के दौरान होने वाली भूलों से कई बार इस प्रकार की इतनी भयानक विपत्तियाँ प्रस्तुत होती हैं कि शरीर तंत्र में तालमेल का-सामंजस्य बिठा कर चलने का कितना बड़ा महत्व है- इसकी ठीक-ठीक जानकारी तभी मिलती है।

एक ऐसी ही घटना का उल्लेख “स्ट्रैन्ज स्टोरीज, एमैजिंग फैक्ट्स” नामक पुस्तक में किया गया है। हुआ यों कि क्रिस्टोफर मैके नामक एक व्यक्ति को मस्तिष्क के एक आपरेशन हेतु “सेण्ट पॉल-रैमजे मेडिकल सेंटर, मिनिसोटा” में भर्ती किया गया। आपरेशन के उपराँत जब उसे छुट्टी मिली, तो एक सुबह उसकी हरकत को देखकर परिवार के सदस्य चौंके। प्रातः जब वह सो का उठा, तो दैनिक क्रिया से निवृत्त होने के पश्चात ऑफिस जाने के लिए अपनी कमीज-पैण्ट पहनने लगा, पर यह क्या! स्वजनों ने देखा कि जब-जब मैके पैण्ट पहनने की कोशिश करता और बांये हाथ से उसे ऊपर उठाता, तब-तब दांया हाथ तत्क्षण उसे नीचे सरका देता। बड़ी विचित्र स्थिति थी। आरंभ में पिता ने समझा कि क्रिस्टोफर मसखरी कर रहा है, किंतु ऐसा करते जब दस मिनट के करीब बीत गये, और मैके के चेहरे में भी परेशानी उभरती दिखाई पड़ी, तो पिता गंभीर हुए। उन्होंने पुत्र से कारण पूछा तो स्थिति स्पष्ट हो गई। क्रिस्टोफर ऐसा जानबूझ कर नहीं कर रहा था। वह तो पैण्ट पहनना चाह रहा था। उसका एक हाथ इसमें सहयोग भी कर रहा था, पर दूसरा न जाने क्यों असहयोग करने पर तुला था। इससे वह स्वयं भी हैरान था।

एक अन्य अवसर पर जब वह एक बेकार पुर्जा बाहर फेंकने का प्रयास कर रहा था, तो तत्काल उसका बांया हाथ उसके दांये हाथ को पकड़ लेता। एक बाँह पुर्जा फेंकना चाहती, तो दूसरी उसे पकड़ कर ऐसा करने से रोक देती। जब अक्सर ऐसे मौके सामने आने लगे, तो क्रिस्टोफर को पुनः डॉक्टरों को दिखाया गया। गहन परीक्षण से पता चला कि उसका “कारपस कैलोसम” नामक एक तंत्रिका गुच्छक कट गया है। यह तंत्रिका-गुच्छक मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के मध्य महत्वपूर्ण संपर्क-सूत्र का काम करता है। दोनों भागों के बीच संपर्क स्थापित न हो पाने के कारण ही यह जटिलता उत्पन्न हो गई थी। माइक्रो सर्जरी के बाद जब पुनः उसे जोड़ दिया गया तो समस्या समाप्त हो गई।

उसके कट जाने मात्र से ऐसी क्या बात हो जाती है कि इतने भर से रोगी को ऐसी गंभीर मुसीबत का सामना करना पड़ता है? इस संबंध में तंत्रिका विज्ञानियों का कहना है कि वस्तुतः यह अवस्था सामंजस्य के अभाव के कारण विनिर्मित होती है। वे कहते हैं कि मस्तिष्क के दांये-बांये दो भागों में से दांये हिस्से से शरीर का सम्पूर्ण बांया भाग संचालित होता है, जबकि बांये गोलार्ध से समस्त दांया हिस्सा। इतने पर भी दोनों गोलार्ध परस्पर सूचनाओं का आदान−प्रदान कर अपनी स्वतंत्र गतिविधियों से एक-दूसरे को बराबर अवगत कराते रहते हैं। जब तक उनमें इस प्रकार का संपर्क सूत्र बना रहता है, तब तक कोई असामान्यता परिलक्षित नहीं होती, किंतु संपर्क माध्यम के टूटते ही ऐसे चित्र−विचित्र लक्षण प्रकट होने लगते हैं, जो इस बात के द्योतक होते हैं कि मस्तिष्क के दोनों भागों के बीच का तालमेल भंग हो गया। ऐसी स्थिति में सामान्य जीवन जटिल हो जाता है और व्यक्ति को पुनः चिकित्सकों की शरण में जाना पड़ता है। हम जिस परिवार में, समाज में, समुदाय और राष्ट्र में रहते हैं, वहाँ भी इस प्रकार के सामंजस्य की आवश्यकता पग-पग पर पड़ती है। जब कभी उनसे यह संगति समाप्त होती या बिगड़ती है, तो आज जैसी विषम परिस्थिति पैदा होती देखी जाती है। इन दिनों के संकट का एक ही कारण है-ताल मेल का अभाव। वर्तमान में परिवार संस्था इसलिए विश्रृंखलित होती जा रही है, क्योंकि उनके सदस्य आपसी मतैक्य स्थापित करने में बुरी तरह विफल रहे हैं। बच्चों को उसमें अपनी अवगति और बुराई नजर आती है। कभी अभिभावक जिसमें परिवार की भलाई समझते हैं बच्चों को उसमें अपनी अवगति और बुराई नजर आती है। कभी अभिभावक एकदम कठोर बन जाते हैं, तो कभी बच्चे बिल्कुल दुराग्रही। इस प्रकार दोनों ही दो अतियों-दो सिरों के दो चरम बिंदुओं में अव्यवस्थित हो जाते हैं। कोई भी एक झुकने को तनिक भी तैयार नहीं होता। परिणाम स्वरूप परिवार टूटने लगते हैं। बढ़ते वर्ग संघर्ष के पीछे भी यही कारण है। वे एक-दूसरे से आगे निकल जाने, स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने, सम्मानित कहलाने के लिए ऐसे औंधे–सीधे कृत्य करने में संलग्न हो जाते हैं, जिससे दूसरे की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती है। जब दूसरे भी प्रतिक्रिया स्वरूप वैसी ही रीति-नीति अपनाते हैं तो दोनों में ठन जाती है। फिर वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने का अवसर की तलाश में रहते और मौका मिलते ही वैसा कर गुजरने से नहीं चूकते। आज धर्मक्षेत्र व राजनीति में उन्मादियों की इसी मानसिकता के कारण चहुं ओर ऐसी भयावह स्थिति घटाटोप की तरह घिरी हुई है कि कब और कहाँ कहर बनकर बरस पड़े, कुछ कहा नहीं जा सकता। संभवतः इन्हीं संभावनाओं का अनुमान करते हुए मूर्धन्य जर्मन वैज्ञानिक वानडेन एरिक ने अपनी पुस्तक “क्राइसिस ऑफ दि पे्रजेण्ट ईपाक” में लिखा है कि वर्तमान संकट का एक प्रमुख कारण द्वैतवादी और बहुवादी विचारधारा है। जिस दिन यह अद्वैतवादी विचारधारा में समाहित हो जायेंगे, उसी दिन संसार के सारे संकट प्रभात होते ही ओस-बिंदु के तिरोहित होने की तरह समाप्त हो जायेंगे। कथन में कितनी सच्चाई है-इसे उस परिवार अथवा समुदाय का गहन अध्ययन करके जाँचा-परखा जा सकता है, जहाँ अद्वैत की एकात्मता की-ऐक्य की विचारधारा काम करती और समूह में सामंजस्य का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करती है।

समाधान के निमित्त इतना ही कहा जा सकता है कि यदि प्रकृतिगत नियमों को ध्यान में रखकर वैसी ही रीति-नीति जीवन में अपनायी जाये तो पृथक-पृथक इकाई जैसा होते हुए भी हम एक समग्र प्रणाली का ऐसा अनूठा उदाहरण उपस्थित कर सकते हैं, जो निसर्ग के कण-कण में सहयोग-सहकार की तरह तालमेल की तरह पग-पग पर दृश्यमान होता है।


मुसीबत में फँसना (kahani)

बंदर का एक बच्चा था-बड़े नटखट स्वभाव का। माता-पिता का कहना न मानता। जो मर्जी आती सो करता। एक दिन बढ़ई तख्ता चीर रहे थे। शाम को काम बंद किया तो चिराव की जगह पर लकड़ी का टुकड़ा लगा दिया ताकि दूसरे दिन चीरने में सुविधा रहे।

नटखट बंदर बालक ने उस तख्ते पर चढ़कर कुदकना आरंभ किया बाप ने समझाया पर उसने एक न मानी। तख्ते के बीच में लगी हुई खपच निकल गई और उस चिराव के दरार में बंदर की पूछ फँस गयी। बहुत जोर लगाकर उसे निकाला गया पर बीच पूछ का काफी हिस्सा तो लहूलुहान हो ही गया। जो बच्चे बड़ों का कहना नहीं मानते उन्हें ऐसी ही मुसीबत में फँसना पड़ता है।


तप की शक्ति से दोषों का परिमार्जन

संतान पाने की चिर आकाँक्षा पूर्ण हुई तो अत्रि की प्रसन्नता का पारावार न रहा। महर्षि पुत्र और पुत्री में कोई भेद न करते थे। उनके लिए दोनों एक ही शाश्वत तत्व की अभिव्यक्ति थे। इसलिए पुत्री होने पर उन्हें उतनी ही प्रसन्नता थी, जितनी किसी को पुत्र पाकर होती है। नामकरण संस्कार से लेकर विद्यारम्भ तक सारे संस्कार विधिवत आपने संपन्न कराये। उन्होंने उसका नाम रखा-’अपाला’।

किंतु अपाला ज्यों-ज्यों बढ़ती गई, महर्षि की प्रसन्नता त्यों-त्यों घटती गई। अपाला की त्वचा में पहली बार श्वेत धब्बे देखकर वे चौंके भर थे। विश्वास यह था कि औषधि उपचार ये यह ठीक हो जायगा। पर आयुर्वेद के पन्ने पलट-पलट कर महर्षि थक गये।जो भी संभव प्रयोग थे, उन्होंने एक-एक कर सब कर डाले, किंतु त्वचा दोष दूर न हुआ। समाज की कैसी विडम्बना है कि पुरुष के अनेक दोष क्षमा हो जाते हैं पर कन्या का रंगरूप साधारण होना भी अस्वीकार्य होता है। फिर अपाला तो एक ऐसे रोग को शरीर में पाल रही थी, जिसे अपने समाज में न केवल रोग वरन् पाप भी माना जाता है। परिस्थितियों से निराश महर्षि अत्रि ने अब अपना सारा ध्यान अपाला को ज्ञानवान बनाने में केन्द्रित किया। वेद, उपनिषद् ब्रह्मांड आरण्यक आदि सम्पूर्ण आर्ष ग्रंथों के अध्यापन के साथ उन्होंने अपाला को व्याकरण मीमाँसा और दर्शन ग्रंथों का भी अनुशीलन कराया। अपाला ने संगीत विद्या भी सीखी और इस तरह वह अपने अपूर्व तेज और यश के साथ तत्कालीन शीर्षस्थ विद्वानों की श्रेणी में जा पहुँची।

अब वह यौवन के द्वार पर खड़ी थी। स्वाभाविक था

कि महर्षि उसके हाथ पीले करने की बात सोचते पर ऐसा आदर्शनिष्ठ युवक उन्हें मिलता कहाँ? जो जीवन के भौतिक और लौकिक आकर्षणों से ऊपर उठकर विवाह को दो आत्माओं का पुनीत संबंध मानकर अपाला को स्वीकार करता। धर्म और आत्म तत्व की बातें करना सरल है पर अनेक कठिनाइयों और संघर्षों में अपनी हानि सहकर भी उसे व्यवहार में लाने वाले तो कोई बिरले साहसी सपूत होते हैं। महर्षि ने दृष्टि दौड़ाई तो उन्हें ऐसा लगा कि पृथ्वी अभी आदर्शविहीन नहीं हुई। कृशाश्व जो कभी उनके स्नातक रह चुके थे, उन्होंने अपाला को सहर्ष स्वीकार कर लिया। वैदिक रीति से कृशाश्व और अपाला एक दाम्पत्य सूत्र में आबद्ध हो गये।

दाम्पत्य संबंधों का प्रारम्भिक आकर्षण कुछ कम हुआ तो कृशाश्व के मन में पत्नी के प्रति विरक्ति आने लगी। वासना का जाल ऐसा कुटिल है कि वह जहाँ भी उद्दीप्त होता हैं, प्रेम की पावनता को उपेक्षा और तिरस्कार में परिवर्तित कर देता है। जो कृशाश्व अब तक प्रेम के कारण त्वचा दोष वाली अपाला में गुण ही गुण देखते थे। अब उन्हें अपाला जैसी विदुषी नारी भी माँस पिण्ड मात्र लग रही थी। उनकी अन्यमनस्कता-विचारशील अपाला से छुपी न रह सकी। वह इस अपमान से छटपटा उठी और अन्ततः एक दिन पूछ ही बैठी-”आर्य श्रेष्ठ! मैं इतने दिनों से आपके स्नेह पूर्ण संबोधन मधुर व्यवहार से वंचित हो रही हूँ कोई अपराध तो नहीं हो गया? “ कृशाश्व क्या उत्तर देते? उन्होंने स्वीकार किया कि वह मन की वासना से आगे पराभूत हैं। प्रेम के स्थान पर सौंदर्य की अभिलाषा ने उनके आदर्श को तोड़ डाला है। जो निराशा एक दिन अपने स्वर्णिम शरीर में श्वेत छींटे देखकर हुई थी, उससे अधिक पीड़ा हुई पति की उपेक्षा से। आज प्रथम बार उनके मन में स्वाभिमान जाग्रत हुआ और उसे इस बात का बोध हुआ कि संसार में पराश्रय सदैव दुख देता है। आत्मस्थिति अपनी शक्ति, अपने पैरों पर खड़ा होने का भरोसा ही सच्ची शक्ति है। उसी से मनुष्य साँसारिक अपमान से अपनी सुरक्षा कर सकता है।

उसने पतिग्रह का परित्याग कर दिया। रही वह अपने पिता महर्षि अत्रि के आश्रम में ही। किंतु उसने अपना कष्ट वहाँ किसी से भी नहीं किया। शनैः शनैः उसने गंभीरता धारण कर ली। उसने देखा किसी भी वस्तु का सच्चा रहस्य उसके मूल में ही पाया जा सकता है। आत्मा ही वह केन्द्र बिंदु है, जिस पर एकाग्र होने से अपनी परिस्थितियों का सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो सकता है। यह विचार आते ही वह आत्म शोध की साधना में तल्लीन हो गई।

मनुष्य के मन में बड़ी शक्ति है। जिधर लगा दे उधर ही अज्ञात भूत के समस्त ज्ञान के कोष के कोष एकत्रित कर देता है। आत्मा की शोध करते हुए उसने अनुभव किया-मनुष्य जीवन के विकार, कष्ट और यंत्रणाएँ ईश्वर प्रदत्त नहीं उसकी निजी भूलें और पाप होते हैं। परमात्मा तो उनके प्रच्छालन में सहायता करता है। आत्मा को शुद्ध और सुघड़ बनाने की शक्ति प्रदान करता है। उसने इंद्र की उपासना इसी रूप में की। जप-तप, हवन-व्रत उपवास आदि तप-तितिक्षाओं के द्वारा उन्होंने अपना अन्तःकरण निताँत शुद्ध कर लिया। शास्त्र अनुशीलन और वेदों की शोध में अपने जीवन का एक-एक क्षण घुला दिया। शेष संसार से संबंध टूट गया। आत्मसाक्षात्कार की इस साधना में उसने रात-दिन एक कर दिए। भगवान को और क्या चाहिए, उन्हें तो निष्ठा की परख होती है, अन्यथा अपने भक्त की सहायता के लिए वे अहिर्निशि तत्पर रहते हैं।

आश्विन की शरद पूर्णिमा का दिन। जब सारा संसार निद्रा की गोद में पड़ा आनंद ले रहा था, अपाला आश्रम में एक नीरव नीड़ में बैठी ज्ञान-चक्षुओं से विश्व के अनंत विस्तार को हृदयंगम कर रही थी। पूर्णिमा की चंद्रमा अपनी सम्पूर्ण उज्ज्वलता पृथ्वी पर बिखेर कर आत्म सुख अनुभव कर रहा था। अपाला अपनी आत्म चेतन को भगवान इंद्र के विश्वात्म शरीर में हवन करती जा रही थी। देखते-देखते लघुता-महानता में अणु विभु में एकाकार हो चले। आत्मा ने अपने को परमात्मा के साथ एकाकार कर लिया।

“पूर्णकाम हो।” इस अन्तर्गूंज के साथ समाधि भंग हुई। सामने देखा देवराज इंद्र स्नेहपूर्ण मुसकान बिखेर रहे थे। देवेश! भावावेश में अपाला इतना ही कह सकी। पुत्री अपने पिता को पाकर जिस तरह विह्वल हो उठती है वैसे ही विह्वल अपाला की विह्वल आँखों से झर-झर आँसू बह चले। भाव नेत्र निर्निमेष अपने आराध्य को देख रहे थे। चिर प्यास-परम तृप्ति का आनंद ले रही थी। “मैं तुम्हारा त्वक्दोष दूर करता हूँ भद्रे।” भगवान इंद्र ने वात्सल्य भरे हृदय से कहा। वाणी सुनकर भाव विह्वलता से आकंठ डूबी अपाला उत्तर नहीं दे पा रही थी। धीरे-धीरे भाव संवरण करते हुए उसने कहा देव! यह शरीर आज नहीं तो कल छूटेगा ही। वह रुग्ण रहे या रोग मुक्त उससे क्या बनता-बिगड़ता है, आप तो मुझे वह शक्ति दें, ऐसी सामर्थ्य दें, विद्या और प्रकाश दें जिससे मैं इस प्रसुप्त भौतिक आकर्षणों से भ्रमित संसार को कुछ ज्ञान दें सकूँ। संसार का कुछ कल्याण कर सकूँ। एवमस्तु। कहकर महावन अदृश्य हो गये पर वे अपनी क्राँति शक्ति प्रज्ञा का एक विशिष्ट अंश अपाला पर छोड़ गए। अपाला ऋषित्व को पा गयी। यह संवाद हवाओं की तेजी में घुलकर सारे आश्रम और राष्ट्रवासियों के अन्तःकरण को स्पर्श कर गया। कृशाश्व ने सब कुछ सुना तो दूसरे दिन ही अपाला को लेने महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे। बड़ी अनुनय विनय की। पर अपाला ने साथ जाने से इनकार कर दिया। शेष जीवन पिता के साथ रहकर उन्होंने धर्म और समाज की सेवा में बिताया। कृशाश्व ने स्वयं भी अपाला से वेद मंत्रों के दिव्य रहस्य व समाधि तत्व का अनुभव प्राप्त किया।


संतों की परीक्षा (kahani)

संतों की परीक्षा में एक जिज्ञासु फिरता रहता था। उनसे पूछने की अपेक्षा उनके क्रिया–कलापों को देखता। एक

−−−***---


सृष्टि संरचना की जड़ में है चेतना का निरंतर विकास

वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार चेतना अथवा आत्मा स्थूल शरीर की भाँति कोई पृथक अस्तित्व नहीं वरन् यह भी पंचभौतिक शरीर की तरह पदार्थों का सम्मिश्रण मात्र है। इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि यदि प्रस्तुत कथन सत्य है, तो पदार्थों के मिश्रण की प्रक्रिया का ज्ञान कराने वाले किसी दूसरे मन की भी आवश्यकता निश्चित ही पड़ेगी। इस संदर्भ में मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक जॉन बर्लिट्ज ने ठीक ही कहा है-”मस्तिष्क का गहन विश्लेषण करने के उपराँत भी मनुष्य को जब आत्मा अथवा मन का अस्तित्व किसी प्रकार समझ में नहीं आता और थक-हार कर जब उसे मस्तिष्क प्रक्रिया का एक अंग मान लेता है, तो वह यह भूल जाता है कि इस प्रकार की स्वीकारोक्ति ही आत्मा के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है। “ विज्ञान के अनुसार गति ही गति उत्पन्न करती है। यदि इस कथन को सत्य मान लिया जाय तो यह कैसे स्वीकारा जा सकता है कि जड़ मस्तिष्कीय संरचना चेतना या बुद्धि उत्पन्न करती हैं, क्योंकि बुद्धि अथवा चेतना कोई गति नहीं वरन् गति का अनुमान करने वाली शक्ति है। इस प्रकार भौतिकीविदों का उक्त प्रतिपादन स्वतः गलत प्रमाणित हो जाता है।

विज्ञान के धुरंधरों की मान्यता है कि स्मृति का आधार मस्तिष्क एवं शरीर की विशिष्ट संरचना है। इन दिनों प्रायः इसी आधार पर किसी को असाधारण बुद्धि सम्पन्न एवं किसी को मूर्ख घोषित कर दिया जाता है। आइंस्टीन विलक्षण बुद्धि वाला था। वैज्ञानिकों की उपरोक्त कथन की पुष्टि उनकी मस्तिष्कीय-संरचना द्वारा हो भी गई। जब मृत्योपराँत उनके ब्रेन का अध्ययन किया गया, तो प्रत्येक न्यूरोन के पीछे ग्लायल सेलों की संख्या उनमें सामान्य से अधिक पायी गयी। बस, फिर क्या था। शरीर शास्त्री इस दिशा में स्थापित अपने सिद्धाँत को निरपेक्ष सत्य मान बैठे। यही उनकी सबसे बड़ी भूल थी। प्रथम तो सपोरटिंग (ग्लायल ) सेलों के बढ़ जाने से बुद्धि बढ़ जाती है-यह उन्होंने किस आधार पर सुनिश्चित किया, समझ से परे की बात है। यदि केवल उक्त असामान्यता ही उनके निर्णय-निर्धारण का आधार रहा, तो निश्चय ही इसे निराधार कहा और अमान्य ठहराया जा सकता है। आये दिन कितने ही बच्चे प्रसव पूर्व असावधानियों के कारण विकृत हो जाते हैं। उनके यदा-कदा तीन-तीन टाँगे पायी जाती हैं। कइयों में उँगलियाँ असामान्य संख्या में होती है। परस्पर जुड़े बच्चे भी देखने को मिल जाते हैं, किंतु इनसे उनकी बौद्धिक क्षमता प्रभावित हुई हो ऐसा देखने में नहीं आया। वाह्य अंगों की तरह अंदर के अंगों में भी ढेरों विकृतियाँ पायी जाती हैं। कई मामलों में यह बात भी देखने को मिल जाते हैं, किंतु इनसे उनकी बौद्धिक क्षमता प्रभावित हुई तो ऐसा देखने में नहीं आया। वाह्य अंगों की तरह अंदर के अंगों में भी ढेरों विकृतियाँ पायी जाती है। कई मामलों में यह बात भी देखने को मिलती है कि व्यक्ति में असाधारण बुद्धि कौशल के होते हुए भी ग्लायल सेलों की संख्या उनमें सामान्य लोगों की जितनी थी, फिर भी वे बढ़-चढ़ कर बौद्धिक-क्षमता का परिचय देते थे। यही वैज्ञानिकों के बुद्धि संबंधी सिद्धाँत का खण्डन हो जाता है और यह स्पष्ट होता है कि इसका आधार संरचना न होकर कोई और है। शरीर शास्त्री जानते हैं कि प्रत्येक साढ़े सात वर्ष में शरीर की समस्त आणविक संरचना परिवर्तित हो जाती है। बचपन का शरीर युवावस्था में, यौवन के कोषाणु वार्धक्य में नहीं, रह जाते, फिर भी बचपन तक की स्मृतियाँ घटनाएँ ज्यों की त्यों बनी रहती हैं। यह भी उसी मान्यता को पुष्ट करता है कि बुद्धि का निमित्त कारण मस्तिष्कीय संरचना नहीं हो सकती।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी वस्तु का कारण उसी में सन्निहित होता है, जैसा कि बीज में विशाल वृक्ष की समस्त संभावनाएँ छिपी रहती है, अस्तु यह कहा जा सकता है कि परिणाम कारण की ही अभिव्यंजना मात्र है।

प्रख्यात भौतिक विज्ञानी जे.ए. बटलर अपनी रचना “इन साइड द लिविंग सेल “ में लिखते हैं-”इस समस्त सृष्टि को चेतना एवं पदार्थ की मिश्रित अभिव्यक्ति के रूप में माना जाना चाहिए, यद्यपि इस बात को साक्ष्यों और प्रमाणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता, फिर भी यह अटल सत्य है कि अंत की संभावनाएँ प्रारंभ में, वृक्ष का वैभव बीज में ही समाया होता है। “

अंग्रेज विज्ञानी जे. इर्विन “सेल विद क्वीयर एनर्जी” नामक पुस्तक में कहते हैं “शरीर की समस्त कोशिकाएँ एवं उत्तक अपने-अपने प्रकार के निश्चित कार्य में अहिर्निश जुटे रहते हैं। इस क्रम में उनमें किसी प्रकार का कोई व्यक्तिक्रम नहीं होता, न गलती दिखायी पड़ती है। यदि यहाँ यह स्वीकार कर लिया जाए, कि सही-सटीक काम करना उनका स्वभाव है, तो अगले ही पल एक अन्य प्रश्न उठ खड़ा होगा कि इस स्वभाव का आधार क्या है, जो उसे गलत करने नहीं देता, जबकि स्वयं मनुष्य-अगणित कोशिकाओं का विशाल समुच्चय -औंधे-सीधे कार्य करता रहता है? और इस प्रकार अनेक सवाल एक के बाद एक पैदा होते चले जायेंगे, जिनका समुचित जवाब दे पाना विज्ञान के लिए कठिन ही नहीं, असंभव भी है। अन्ततः हमें अध्यात्म विज्ञान की आत्मा व चेतना वाली मान्यता स्वीकार करनी ही पड़ेगी, तभी इन जटिल प्रश्नों का सहज समाधान संभव हो सकता हैं।” जीवन क्या है? इस संबंध में दो प्रकार की मान्यताएँ हैं। प्रथम यह कि जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक विकास का क्रमिक रूप है, जिसमें वातावरण और वंश परम्परा का प्रभाव होता है। दूसरा पक्ष अध्यात्मवादियों का है। उनके अनुसार जीव में आत्म तत्व का अलग अस्तित्व होता है, जो शिशु के विकास के अति आरंभिक अवस्था में ही प्रविष्ट होता है। मृत्यु के संबंध में प्रथम मत वाले वैज्ञानिकों की मान्यता है कि शरीर बनाने वाले दोनों तत्व अर्थात् अणु और चेतना शक्ति अपना-अपना कार्य बंद कर दें, तो मृत्यु हो जाती है, जबकि दूसरी मान्यता के समर्थक प्रायः सभी धर्म और अध्यात्मिक प्रतिपादन हैं। उनकी मान्यता है कि आत्मा की मृत्यु नहीं होती, वरन् मृत्यु के बाद उसका अस्तित्व अक्षुण्ण बना रहता है। कर्मफल के रूप में दण्ड पुरस्कार इसे ही भोगना पड़ता है।

इस ब्रह्मांड की संरचना के संबंध में प्रथम स्कूल वाले वैज्ञानिकों की मान्यता थी कि इसका निर्माण कुछ रसायनों के पारस्परिक क्रिया-प्रतिक्रिया के आधार पर हुआ। रसायन अणुओं के संयोग से बने हैं। बाद में परमाणुओं की सत्ता सिद्ध हुई। रदरफोर्ड एवं बोर जैसे वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया कि परमाणु अनेक विद्युत कणों के संयोग से विनिर्मित एक लघु सौर परिवार के रूप में हैं। तब से लेकर अद्यतन जो प्रयोग हुए है उनसे यही ज्ञात होता है कि सृष्टि संरचना का आधार परमाणु नहीं, वरन् सूक्ष्म तरंगें है। सृष्टि का आदि कारण यही है। अतः अब तरंग को सृष्टि का आधार माना जाता है, किंतु विज्ञान की बढ़ती पकड़ अब तरंगों को भी असंदिग्ध नहीं मानती।

सर जेम्स जीन्स ने आधुनिक वैज्ञानिकों की मान्यताओं पर कुठाराघात करते हुए अपनी पुस्तक “द ग्रेट डिजाइन” में लिखा है “यह पदार्थ क्या है? क्या यह विद्युत विकिरण? तब यह विकिरण क्या है? विकिरण सृष्टि का आधार मूलतत्व है, जिससे यह सृष्टि बनी है। यह विशुद्ध ऊर्जा है, कुछ अन्य नहीं।”

इस प्रकार सृष्टि-रचना संबंधी विज्ञान और अध्यात्म दोनों एक ही बिंदु पर पहुँचते है कि इसकी मूलसत्ता चेतना ही है। पदार्थ उसी की स्थूल अभिव्यक्ति है। उससे भिन्न कुछ अन्य नहीं। इसी चेतना को विज्ञान ऊर्जा कहकर अभिहित करता है, जबकि अध्यात्म उसे सर्वव्यापी सत्ता कहता है। नाम भले ही अलग हों, पर वस्तु एक ही है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि सीमित दायरे में चेतना को पदार्थ और विस्तृत परिधि में यह चेतना ही जीवित पदार्थ या आत्मा है। यह चेतना ही अधिक स्वतंत्र रूप में विशुद्ध चेतना है। इस प्रकार यह चेतना के विकास की पद्धति वैज्ञानिकों के विकासवाद का ही स्वरूप हुआ। इस विकास यात्रा के एक किनारे में पदार्थ तथा दूसरे में चेतना या आत्मा है। चेतना का विकास का क्रम तब तक जारी रहता है, जब तक चेतना (आत्मा)परमात्मा (परम तत्व) से एकाकार न हो जाय। इस संबंध में दार्शनिक मेटरनिक ने ठीक ही कहा है-”ब्रह्मांड के एक अणु का भी रहस्य मेरी समझ में जिस दिन आ जायेगा, उस दिन यह विश्ववाटिका या तो नर्क तुल्य हो जायेगी या फिर मेरी चेतना ही जड़वत् बन जायेगी। “

हम इस सच्चाई को समझें और चेतना के अधिकाधिक विकास की ओर ध्यान दें, तभी यह जीवन सार्थक हो सकता है। हमारा यही लक्ष्य और प्रयोजन है।


बड़े अपराधी नहीं बनना (kahani)

आस्ट्रेलिया हर्बर्ट नगर की जेल में एक बार भयंकर आग लगी। उसे बुझाने के लिए कैदियों ने भरसक प्रयत्न किया। फिर भी जेल की कई दीवार जल कर ढह गयी। आग बुझाने पर कैदी अपनी-अपनी बैरकों के सामने बैठ गये कोई भागा नहीं। जब यह पूछा गया कि इस अवसर का लाभ उठा कर भाग क्यों नहीं गये? तो उन सब ने एक स्वर में एक ही बात कही। हमने व्यक्तिगत क्षेत्र में अपराध करके शासन की सजा पायी। अब शासन की मर्यादा तोड़ के ईश्वर के दरबार में और भी बड़े अपराधी नहीं बनना चाहते।


मृगतृष्णा में भटक कर जीवन सम्पदा न गंगायें

अन्य जीव-जंतुओं का लक्ष्य और पुरुषार्थ मात्र शरीर रक्षा एवं सुविधा तक सीमित रहता है। उन्हें न तो चेतना के स्वरूप का ज्ञान होता है और न उसके प्रति किन्हीं कर्तव्यों के पालन का दायित्व अनुभव होता है। पर मनुष्य के संबंध में ऐसी बात नहीं है। उसकी संरचना स्रष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति के रूप में हुई है। शारीरिक और मानसिक ढाँचा इस स्तर का विनिर्मित हुआ है कि वह स्वल्प श्रम और समय में शरीर मात्र की उचित आवश्यकताओं को सरलतापूर्वक पूरी कर सके और बची हुई क्षमता को उन प्रयोजनों में लगा सके जिसके लिए यह जीवन संपदा उपलब्ध हुई है। विश्ववाटिका को अधिक सुरम्य, सुव्यवस्थित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाना स्रष्टा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र-युवराज मनुष्य को सौंपा है और कहा है कि वह जीवन संपदा का सदुपयोग इसी प्रयोजन के लिए प्रधान रूप से करे। शरीर निर्वाह यदि बुद्धिमत्तापूर्वक किया जाये तो उसके लिए स्वल्प शक्ति का नियोजन ही पर्याप्त होता रहेगा। शेष बचत से वे सभी प्रयोजन पूरे होते रहेंगे जिनसे व्यक्तिगत अपूर्णताओं को पूरा करते हुए पूर्णता का लक्ष्य पूरा किया जा सके। इस प्रकार स्वार्थ और परमार्थ के दोनों लक्ष्य साथ-साथ सफलतापूर्वक संपन्न होते रह सकेंगे। यही है वह राह जिसे मानवी-गरिमा को अनुभव करने वाले व्यक्ति को अपनाना उचित है।

इसे अज्ञान या अनौचित्य या भटकाव ही कहना चाहिए कि विचारशील होते हुए भी मनुष्य अविवेकी प्राणियों की तरह जीता है और अपनी सारी क्षमताएँ ललक और लिप्सा में ही खपा देता है। सीमित वस्तुओं में निर्वाह भली प्रकार बन पड़ने पर भी उसे विलास, वैभव एवं संग्रह के लिए इतना पाने की अभिलाषा रहती है जिसकी न आवश्यकता है न उपयोगिता। इसी को लोभ कहते है। परिवार को स्वावलम्बी एवं सुसंस्कृत बनाने की जिम्मेदारियाँ उस परिकर में रहते हुए सहज निभती रहती है। पर सोचा यह जाता है कि कुटुम्बियों के ऊपर सुविधा संपदाओं का अंबार लाद दिया जाय। उत्तराधिकार में इतना छोड़ दिया जाय जिसे पीछे वाले बिना हाथ-पैर हिलाये सात पुश्त तक बैठे खाते रहें। उसी कुचक्र के अपने उदाहरण और परामर्श से परिजनों को भी हेय जीवन जीने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इसी प्रक्रिया को मोह कहते है। लोभ और मोह की खाई समुद्र जितनी गहरी है उसे पाटने के लिए इंद्र जैसी प्रतिभा और कुबेर जितनी संपदा भी कम ही पड़ती रहती है। ललक, लिप्सा की आँशिक पूर्ति भी न बन पड़ने पर असंतोष ही छाया रहता है और उस उद्विग्नता में अनाचार पर उतारू होकर तृष्णाएँ पूरी करने में निरत होना पड़ता है। इन्हीं दोनों को भवबंधन कहते हैं। इन से बँधा हुआ प्राणी बेचैनी के अतिरिक्त और कुछ हस्तगत कर नहीं पाता। स्रष्टा के दरबार में पापों की पोटली बाँधकर उपस्थित होना पड़ता है। उस प्रश्न का उत्तर बन नहीं पड़ता जिसमें पूछा जाता है कि जिस निमित्त मनुष्य जन्म की धरोहर सौंपी गयी थी उसका उपयोग किस प्रकार हुआ? समुचित उत्तर न बन पड़ने पर उस दुर्गति का भाजन बनना पड़ता है, जिसमें अमानत में खयानत करने वालों को कठोर प्रताड़ना दिये जाने का विधान है। भविष्य के लिए यह विश्वास भी उठ जाता है कि यदि फिर ऐसा ही अवसर दिया गया तो अप्रामाणिकता की मनःस्थिति सँजोये हुए व्यक्ति फिर अपनी सदाशयता का परिचय दे सकेगा? साधन रहते हुए जो कुछ नहीं कर सका तो वह मरणोत्तर जीवन की साधन हीन परिस्थितियों में क्या कुछ कर सकेगा? यही वह स्थिति है जिसमें पश्चात्ताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता।

तीसरी एक और भी मूर्खता है जिसे कहते हैं अहंकार। किराये के घर में रहने वाला, धरोहर के रूप में मिली हुई बौद्धिक क्षमता को जो स्व-उपार्जित मान बैठते हैं वे अपनी हर भली-बुरी तृप्ति पर सभी के मुँह से प्रशंसा के शब्द सुनने के लिए आतुर रहता है। हर किसी पर अपनी संपन्नता और समर्थता का रौब गाँठना चाहता है। इसी ओछी मनोवृत्ति का नाम है-”अहंता”। इसे भी लोभ और मोह की तरह घातक ऐषणाओं में गिना गया है और अनर्थों के लिए प्रेरित करती रहने वाली विडम्बना कहा गया है।

तुच्छ होते हुए भी रावण जैसा अहंकारी बना फिरने वाला इसी व्यामोह में प्रायः ऐसे प्रपंच रचता रहता है जिनका औचित्य किसी भी प्रकार विचारशीलता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। शरीर की सज्जा को सुँदर और बलिष्ठ दिखाने के लिए कितना समय, श्रम खर्च करना पड़ता है, कितना आडम्बर बनाना पड़ता है इसे सहज ही सर्वत्र देखा जा सकता है।

अमीरी दिखाने के लिए गरीबों को भी इतनी आतुरता होती है कि प्रहसनों में स्वाँग करने वाले अभिनेताओं को भी प्रायः पीछे छोड़ दिया जाता है। ठाट-बाट जमाकर दूसरों को अपनी विशेषता से चमत्कृत करने के लिए लोग इतने आडम्बर खड़े करते है जिन्हें देखकर प्रतीत होता है उन्हें अमीरी प्रदर्शित करने के अतिरिक्त और कुछ भी महत्वपूर्ण हो सकता है यह सूझता ही नहीं। अपव्यय के अगणित स्वाँग इसीलिए खड़े किये जाते हैं कि लोग इस भ्रम में पड़ सकें कि इनके पास अपार संपदा है। विवाह शादियों में घर फूँक तमाशा देखने वाले प्रायः इसी निमित्त पैसे की होली जलाते हैं कि बिरादरी वालों में उनकी नाक कछुए से भी अधिक लम्बी दीख पड़े। मुखिया बनने, ऊँची पदवी पाने, साधारण जनों की तुलना में अपने को अधिक बड़ा सिद्ध करने के लिए जो प्रपंच रचने पड़ते हैं उन्हें देखकर लगता है कि अहंकार की वितृष्णा-लोभ और मोह से भी बढ़ी-चढ़ी है। उन दो में कुछ थोड़ा बहुत हाथ तो लगता है पर अहंकारी तो आदि से अंत तक मूर्खता से घिरा और अपव्यय से बँधा रहता है। चाटुकार उसे बुरी तरह निचोड़ते हैं। शेखी बखारने वाले विचारशील वर्ग में ओछा, बचकाना और भ्रमित स्तर का ही गिना जाता है। स्वयं को भी प्रपंच में इतना अधिक खपाता रहता है कि उस हानि की तुलना नहीं की जा सकती। अहंकार की पूर्ति के लिए जितना कुछ करना पड़ता है वह अपव्यय के खाते तो जाता है साथ ही मन को मलीन बनाने और ईर्ष्यालुओं, विद्वेषियों, विरोधियों की संख्या बढ़ाते रहने की हानि भी सहन करता रहता है।

जिस सुर दुर्लभ मनुष्य शरीर को स्वयं पार होने और दूसरों को पार करने वाले प्रयोजनों में लगाकर इसी जीवन में स्वर्गोपम दृष्टिकोण का आनंद लेने और जीवन मुक्त जैसी निर्द्वंदता प्राप्त करने का लाभ लिया जा सकता था, उसे लोभ, मोह, अहंकार के लिए बेतरह खर्च कर दिया जाता है। नुकसान में तो आलसी और प्रमादी भी रहते हैं पर उन्हें अपंग-अनगढ़ों की श्रेणी में गिनकर दया का पात्र भी समझा जा सकता है, किंतु उन्हें क्या कहा जाय जो समझदार होते हुए भी नासमझी के तीन-तीन लबादे ओढ़ते हैं और उस भारी भरकम वजन को ठीक तरह वहन न कर पाने पर रोते-कलपते और दुर्भाग्य को कोसते रहते है। विपत्ति कहीं बाहर से आई हो तो उसके लिए किसी को सहायता के लिए भी पुकारा जा सकता है, पर उस मूर्खता के लिए क्या कहा जाय जिसने स्वयं ही सड़ी कीचड़ के दलदल में घुसते-घुसते दुर्गति की चरम सीमा तक जा पहुँचने की ठान ठानी है। सही आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हर किसी को सुविधाएँ प्राप्त हैं। शरीर यात्रा के लिए वायु, जल और आहार की आवश्यकता पड़ती है। हवा सहज ही उपलब्ध रहती है। पानी थोड़े हाथ-पैर हिलाकर प्राप्त किया जा सकता है। पेट भरने के लिए जितने आहार की आवश्यकता है उतना औसत मनुष्य एक घंटे के श्रम से कमा सकता है। तीन आवश्यकताओं की आम चर्चा होती रहती है। रोटी, कपड़ा और मकान। इनको यदि औचित्य की सीमा में उपलब्ध कराना पर्याप्त समझा जाय तो अपने और अपने सीमित कुटुम्बियों के लिए इतना पुरुषार्थ पर्याप्त हो सकता है जिसके उपराँत शक्तियों का विपुल भण्डार बच सके और उसे मानवी गरिमा के अनुरूप प्रयोजनों में लगने वाले महामानवों की पंक्ति में बैठ सकने में सफल हो सकता है। साधनों की कमी रहने पर भी ऋषिकल्प आप्तजनों ने इतना कुछ एक ही जीवन में पूरा कर दिखाया। जिसका लेखा-जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि उनने आत्मसंतोष, जन सम्मान और दैवी के अनुग्रह के तीन वरदान प्रचुर परिणाम में उपलब्ध कर दिखाये।

दुरुपयोग से अमृत भी विष बन जाता है। सदुपयोग से मलमूत्र भी सोना उपजाने वाली खाद के रूप में श्रेय अर्जित करते हैं। जीवन का सदुपयोग बन पड़े तो वह जीने वाले को धन्य बना सकता है। और उसके संपर्क में आने वाले भी चंदन वृक्ष के समीप उगे अन्य पौधों की तरह गौरवान्वित होते हैं। पर जहाँ दुरुपयोग के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं वहाँ कोयले की दलाली में काले हाथ होने के अतिरिक्त और क्या कुछ पल्ले पड़ने वाला है। भोग योनि वाले अन्य जीव जंतु अथवा प्रारब्ध भोगकर जहाँ से आये थे वहाँ चले जाते हैं। साथ में नई पाप पिटारी लाद कर नहीं ले जाते। जितने दिन जीते हैं प्रकृति की गोद में स्वच्छंदतापूर्वक दिन बिताते हैं पर मनुष्य है जो नीरस, चिंतित, क्षुब्ध, अशाँत और आकुल -व्याकुल पाया जाता है। इसे आश्चर्य भी कहा जाना चाहिए और दुर्भाग्य भी कि इतनी विपुल साधन संपदा से भरा पूरा मनुष्य जन्म पाने वाला प्राणी उपलब्ध हीरक हार को कौड़ी मोल बेच कर खाली हाथ विदा होता और भविष्य के लिए पश्चाताप भरी प्रताड़ना और दुर्गति ही साथ लिए जाता है। ऐसा अनर्थ क्यों होता है कि सृष्टि के समस्त प्राणियोँ का मुकुट मणि समझा जाने वाला प्राणी दिव्य उपलब्धियों का दुरुपयोग करके मात्र घाटा और संकट ही उठाये जबकि सामान्य क्षमताओं वाले प्राणी प्रकृति के अनुरूप रहकर इस सुरम्य संसार में कल्लोल करते और दिन बिताते हैं। इस विपर्यय की भूल में उपलब्धियों का दुरुपयोग ही एक मात्र कारण है।

वैभव को सुयोग कहना भूल है। सौभाग्य का सीधा अर्थ है सदुपयोग का निर्धारण और उसे पूरा कर दिखाने का कौशल इसके लिए आवश्यक समझदारी हर विचारशील में होनी चाहिए। अन्यथा धन-संतान जैसी मनोकामनाओं को पूरी करने वाले तक अपेक्षाकृत अधिक त्रास सहते देखे गये हैं। धन का अभाव या अपव्यय अपने-अपने ढंग की विपत्तियाँ उत्पन्न करते हैं। धनी दुर्व्यसनों के अहंकार के चाटुकारों के, ईर्ष्यालुओं से घिरते और विलाप करते देखे गये हैं। संतान की संख्या बढ़ा लेने और उन्हें सुसंस्कृत न बना सकने पर उन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है जिनके बिना संतान वाले ग्रसित नहीं होते। दुरुपयोग करने पर माचिस भयंकर अग्निकाण्ड का कारण बनती और सुई जैसी उपयोगी वस्तु से गहरा घाव होने की पीड़ा सहनी पड़ती है। मनुष्य जीवन प्राप्त होना समुचित ऊँचे स्तर का सुयोग है। इसे दैवी अनुग्रह उच्चस्तरीय उपहार भी कह सकते हैं। इतने पर भी यदि उसका दुरुपयोग लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति में ही होता रहे तो समझना चाहिए कि दुर्बुद्धि की चरम सीमा हो गई। अपनी ही समझ साथ न दे तो कल्पित मृगतृष्णा में भटक कर हिरन की खीज, निराश और प्यास की पीड़ा सहते-सहते प्राण देना पड़े तो इसके लिए अन्य किसी को दोष देते कैसे बन पड़े? मनुष्य जीवन यदि निरानंद, नीरस, निष्ठुर और हेय प्रयोजनों में व्यतीत हो चले तो इसके लिए अपने अविवेक अतिरिक्त और किसी को क्यों-कैसे कोसा जाय?


महिलाओं का समाधान (kahani)

न्यूयार्क के न्यायाधीश की कचहरी में एक रोटी चोर पेश किया गया था। पुलिस ने सबूत दिया कि उसने एक नान बाई की दुकान से चार रोटी चुराई थीं। चोर ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा वह भूख से बेचैन था खरीदने के लिए पैसे न थे। कोई मजूरी मिली नहीं। इसलिए विवशता से उसे उतनी छोटी चोरी करनी पड़ी जिससे एक समय का पेट भर जाता। न्यायाधीश ने उस पर एक रुपया जुर्माना किया। साथ ही अदालत में उपस्थित सभी लोगों पर भी एक-एक रुपया जुर्माना किया। उन्हें भी एक प्रकार का अपराधी ठहराया गया कि समाज में इस स्थिति के लोगों के रहते हुए भी वे मौज मजे की जिंदगी कैसे जीते है? जुर्माने की राशि से चोर को कोई छोटा-मोटा व्यवसाय कर लेने की सुविधा दी गयी।

श्रीरामकृष्ण परमहंस की धर्म पत्नी शारदामणि महिलाओं का सत्संग चलाया करती थीं। उसमें नियमित रूप से संभ्रान्त घरों की महिलाएँ बड़ी संख्या में आती। एक वेश्या भी सत्संग में आने लगी। इस पर अन्य महिलाओं ने आपत्ति की और उसे न आने देने के लिए माताजी से कहा।

माता शारदामणि ने कहा-सत्संग तो गंगा है। उसमें तो मेढ़क, मछलियाँ भी रहती है। इससे गंगा कहाँ अपवित्र होती है। गंगा में नहाने से तो अपवित्र भी पवित्र हो जाते है फिर एक वेश्या के आने से सत्संग कैसे अपवित्र हो जायेगा। शिकायत करने वाली महिलाओं का समाधान हो गया।


सात्वस्मिन परम-प्रेम-स्वरूपा

एक बार एक व्यक्ति ने संत सुकरात से पूछा-”मानवी जीवन में सबसे मूल्यवान वस्तु कौन-सी हैं?” उनका उत्तर था-”प्रेम”। पूछने वाला चौक पड़ा। उत्तर उसकी अपेक्षा के विपरीत था। उसने सोचा था-आत्मा, परमात्मा या इनके संबंधित कोई अन्य दार्शनिक शब्द उनके मुख से निकलेगा, पर संत के उस उत्तर से वह अवाक् रह गया। यों विचार किया जाय तो जवाब साधारण होते हुए भी असाधारण अर्थ सँजोये हुए है।

प्रेम संसार की अकेली ऐसी अपार्थिव चीज है, जिसे हर कोई प्राप्त करना चाहता है, चाहे वह गरीब हो या अमीर, शिक्षित हो या अशिक्षित-सब समान रूप से इसकी अपेक्षा दूसरों से करते हैं। यह अद्वितीय है। मनुष्य का सारा दर्शन, समस्त काव्य, संपूर्ण धर्म एवं समग्र संस्कृति इसी एक शब्द से अनुप्रेरित है। मानवीय जीवन में जो भी श्रेष्ठ और सुँदर है, वह सब स्नेह से ही जन्म और जीवन पाता है। जीवन में संवेदना की कमी सबसे बड़ी दरिद्रता है। जिसके भीतर का यह स्रोत सुख गया, उससे बढ़कर दीन इस संसार में दूसरा कोई नहीं। इससे संसार के किसी भी कोने में किसी बिराने का भी सहयोग हस्तगत किया जा सकता है, जबकि इसका अभाव अपनों को भी अजनबी बना देता है। यह प्रेम का बाह्य प्रतिफल हुआ, किंतु जब इसका उत्स फूटता है, तो अन्तरंग का, अन्तःकरण का वह कोना भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता, जहाँ परमेश्वर का बास बताया जाता है। फिर भी यह स्पष्ट आभास मिलने लगता है कि “मैं” और “वह” दो नहीं एक हैं। दूसरे सभी उसी की पृथक अभिव्यक्तियाँ हैं। बस, इस तादात्म्य की अनुभूति ही तो स्वर्ग-मुक्ति है। एक सूफी कथा है किसी प्रेमी ने अपनी प्रेमिका का द्वार खटखटाया। भीतर से आवाज आयी कौन है? प्रेमी ने जवाब दिया-मैं हूँ, तुम्हारा प्रेमी। प्रत्युत्तर मिला-यहाँ दो का स्थान नहीं है। कुछ दिनों बाद प्रेमी पुनः उस द्वार पर आया। दस्तक दी, किंतु इस बार “कौन है?” के उत्तर में जवाब था-”तू ही है।” इसके साथ ही बंद पट खुल गये।

कथा के पीछे एक गूढ़ दार्शनिक सत्य निहित है, इसमें दो मत नहीं। आत्मयोग का साधक अपने अंतरंग में भावनात्मक और बहिरंग में क्रियात्मक प्रेमतत्व की दिव्य संवेदनाओं का परिचय देता है। इसके रसास्वादन से आत्मा को असीम तृप्ति मिलती है। यही तृप्ति बाह्य जीवन में तुष्टि और शाँति के रूप में प्रकट होती है। जिसने इसकी अनुभूति कर ली, समझा जाना चाहिए कि उसने प्रेम तत्व का पान कर लिया। उसका “स्व” “पर” में समाहित हो गया और जहाँ पर आ गया, वहाँ प्रेम के घनीभूत रूप परमेश्वर को पाने में भी देरी नहीं लगती।

वियोगी हरि ने अपनी पुस्तक “प्रेम योग“ में प्रेम के तीन रूप बताये हैं-निष्काम प्रेम, सकाम प्रेम और ज्ञानयुक्त प्रेम। सकाम प्रेम आसक्ति है। निष्काम प्रेम भक्ति है। ज्ञानयुक्त प्रेम तर्क पर आधारित अनुराग है। इसमें सबसे उत्तम प्रकार का प्रेम भक्ति बताया गया है। अध्यात्म क्षेत्र में जहाँ कहीं भी “भक्ति” शब्द का प्रयोग हुआ है, वहाँ उसका प्रच्छन्न अर्थ प्रेम ही होता है। प्रेम किसके प्रति? ईश्वर के प्रति। प्रेम की पराकाष्ठा ही समर्पण है। यह समर्पण वहीं हो सकता है, जहाँ उच्च आदर्शों का समुच्चय हो। यह भगवान के अतिरिक्त दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। अतः जहाँ कहीं भी इस प्रकार का समर्पण होता है, वहाँ किसी की कृपा बरसने की प्रतीक्षा नहीं की जाती, वहाँ किसी याचना की कामना नहीं होती। जो होता है, वह शुद्ध प्रेम-भाव है। यही आदी और यही अंत है। प्रेम से आरंभ कर व्यक्ति अंतिम पड़ाव-महाप्रेम -ईश्वर प्रेम में ही ठहरता है। पृथ्वी गोल है। अतः उसका कोई अंत और आरंभ नहीं-कोई ओर छोर नहीं। चाहे जहाँ से प्रारम्भ करें, अंत में वहीं आना पड़ेगा, जहाँ से यात्रा की शुरुआत हुई थी। इसी प्रकार प्रेम का श्रीगणेश चाहे जिस रूप में जहाँ से किया जाय, उसका समापन उस महाप्रेम में ही होगा, जिसे “रसो वै सः” कहकर आप्तजनों ने संबोधित किया है।

देवर्षि नारद का भक्ति सूत्र में कथन है-”सा त्वस्मिन परम प्रेमरूपा”। सचमुच, वह परम सत्ता प्रेमरूप ही है। उसकी प्राप्ति हम अपने अंदर प्रेम तत्व का विकास कर ही कर सकते हैं। इस संदर्भ में जो अपने भीतर इसका जितना विकास कर सका, समझना चाहिए, वह भगवद् सत्ता के उतना ही सन्निकट पहुँचा। इस परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाय तो सुकरात का उत्तर अत्यंत सारगर्भित जान पड़ेगा।


पूरब की लाली लायी नवयुग का संदेश

भारत का भविष्य विषयक भविष्यवाणी में विश्व के प्रायः सभी भविष्यवक्ताओं ने जो एक महत्वपूर्ण बात कही है,वह यह कि इन दिनों यहाँ जो अराजकता और अराजकता और अशाँति का घनघोर घटाटोप चहुँ ओर संव्याप्त है। वह अगले ही दिन जलवे तवे में जल-बूँद की तरह देखते-देखते अपना अस्तित्व गँवा देगा और उसकी जगह एक ऐसी नवीन क्राँति व शाँति ले लेगी, जो हजारों वर्षों तक समस्त संसार को अभिनव ऊर्जा और आभा प्रदान करती रहेगी। इस क्रम में पंद्रहवीं सदी के मूर्धन्य भविष्य द्रष्टा निक्सन की चर्चा अप्रासंगिक न होगी। उल्लेखनीय है कि रॉबर्ट निक्सन इंग्लैंड के एक छोटे से गाँव में पैदा हुए। जब वे पंद्रह वर्ष के किशोर थे, तभी से उनने भविष्यवाणियाँ करनी शुरू कर दीं। आरंभ में लोग उन्हें सनकी प्रकृति का मानते थे, किंतु धीरे-धीरे लोगों को जब यह पता चला कि जो वह कहता है, वह सच होकर रहता है, तो उनकी गणना भविष्यवक्ता के रूप में प्रख्यात हो चुके थे। इससे प्रभावित होकर वहाँ के तत्कालीन अंग्रेज सम्राट हेनरी ने उन्हें अपना राजकीय भविष्य द्रष्टा नियुक्त कर लिया था और समय-समय पर उनसे अपने भविष्य संबंधी सलाह सम्मति लेते रहते थे, किंतु निक्सन ने सिर्फ हेनरी व इंग्लैंड के बारे में ही भविष्यवाणियाँ की हों ऐसी बात नहीं है। संपूर्ण विश्व के संबंध में और विशेष कर भारत के संदर्भ में उनका कथन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अपने दिव्य-दर्शन के आधार पर भारत के बारे में उनने कहा है कि बीसवीं शताब्दी के अंत तक उक्त देश में आस्था संकट, अपराध और उग्रवाद अपनी चरम सीमा पर होंगे, पर 21 वीं सदी आते-आते उनका मूलोच्छेद इस तरह होगा एवं परिस्थितियाँ ऐसे करवट बदलेंगी जैसे वहाँ कभी वातावरण विषम रहा ही न हो। धीरे-धीरे उसकी सारी बाधाएँ समाप्त हो जायेंगी, इनमें से जो ऐन केन प्रकारेण अपने आपे को सुरक्षित रखना चाहेगी, वह भविष्य के गर्भ में पक रहे प्रबल आध्यात्मिक प्रवाह के एक झोंके में ही धराशायी हो जायेंगी। वह अपना अस्तित्व श्रेष्ठ और सुँदर बना कर ही कायम रख सकेगी। निकृष्टता तब आज की श्रेष्ठता की भाँति दुर्लभ बन जायेगी। यत्र-तत्र यदि वह टिमटिमाती भी रहेगी, तो उपेक्षा और अनादर की दृष्टि से देखी जायेगी। 2050 के आस-पास वर्तमान का गरीब, अशिक्षित, अविकसित और प्रतिगामी भारत अपना जीर्ण-शीर्ण चोला उतार फेंकेगा और समृद्धि व श्रेष्ठता के ऐसे मानदण्ड स्थापित करेगा जिसे अद्वितीय कहा जा सके। तब भारत एक अध्यात्मिक महाशक्ति के रूप में उभरेगा और वैसा ही उदाहरण उपस्थित करता दीख पड़ेगा, जैसा प्रबल चुँबक के प्रभाव-क्षेत्र में आने वाले लौह कण स्वतः उसकी ओर आकर्षित होते और अनायास उनका गुण धारण करने लग जाते हैं। इस समय तक सम्पूर्ण विश्व भारत का लोहा मानने लगेगा। उसकी अध्यात्मिक विरासत चरमोत्कर्ष पर होगी। उस समय का भारतीय भूगोल भी आज जैसा न रहेगा। सीमाएँ बदलेंगी और उनमें विस्तार होगा। जो भूमि पिछले युद्धों में आक्रांताओं द्वारा हड़प ली गई अथवा दरिद्रता के असह्य भार के कारण टूट कर पृथक हो गयी, वह सब एक बार फिर उस पवित्र देश में सम्मिलित हो जायेगी। भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय, लिंग, जाति संबंधी विवाद न रहेगा। सब मिलकर एक जाति-धर्म बन जायेंगे। और समग्रता का एक सम्पूर्ण इकाई का परिचय देंगे तब मनुष्यता और सामाजिकता सर्वोपरि समझी जायेगी।

वे कहते हैं कि लोग तब स्वयं की हानि पर भी दूसरों को लाभ पहुँचाने में गर्व-गौरव अनुभव करेंगे। संवेदनाओं का उफान इतने जोर पर होगा कि स्व का विस्तार पर तक होने में देर न लगेगी। लोगों की मानसिकता में फिर आमूल-चूल परिवर्तन आयेगा। सोच बदलेगी, तो वर्तमान परिभाषाएँ भी अपना सद्यः स्वरूप यथावत बनाये न रह सकेंगी। उनमें नये सिरे से नये विचार होंगे, और परिस्थिति के अनुरूप उनकी नूतन व्याख्या होगी, जिन्हें मानने और अपनाने में लोग किसी प्रकार की कोई अनख न दिखायेंगे। पदार्थ विज्ञान के क्षेत्र में भी उसकी उन्नति विश्व में अग्रणी मानी जायेगी। इस क्षेत्र में वह ऐसे-ऐसे अनुसंधान करेगा, जिससे सर्वत्र उसकी तूती बोलने लगेगी। अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में तब एकमात्र वही देश संसार भर में अकेला रह जायेगा,जो उस क्षेत्र के शोध कार्य को आगे बढ़ायेगा। संप्रति जो कतिपय देश इस दिशा में अन्वेषण-कार्य में जुटे हैं,अथवा जुटने वाले हैं,वे आने वाले समय में आर्थिक संकटों और घरेलू समस्याओं में इस कदर उलझेंगे कि उनमें निपटने में ही उनकी अधिकाँश सामर्थ्य चुक जायेगी,फलतः इस प्रकार के शोध-अनुसंधान को वे आगे जारी न रख सकेंगे। रॉबर्ट निक्सन आगे कहते हैं कि यदि भारत के अथक प्रयास से किसी अंतर्ग्रही सभ्यता का पता लगा लिया जाय, तो इसे आश्चर्य नहीं माना जाना चाहिए। आज उड़न तश्तरी की जो गुत्थी पहेली बनी हुई है, आगामी समय में वह सुलझा ली जायेगी। इसका श्रेय भारत को ही मिलेगा। खनिज तेलों के संदर्भ में आज का परावलंबी भारत तब स्वावलम्बी बन जायेगा। उसे समुद्र में तेल का इतना बड़ा भण्डार प्राप्त होगा, जिससे न सिर्फ वह अपनी ही कमी दूर कर सकेगा, वरन् अन्य अनेकों का भी पेट भर सकेगा। यह बात दूसरी है कि बढ़ते प्रदूषण के कारण धीरे-धीरे उसका प्रयोग मोटर-वाहनों में बंद हो जायेगा और सीमित क्षेत्र में ही उपयोग अप्रतिहत जारी रह सकेगा। ईंधन के कई ऐसे विकल्प ढूँढ़ लिये जायेंगे,जो लगभग प्रदूषणमुक्त होंगे। भारत वर्ष विश्व भर में इन ईंधनों की आपूर्ति करेगा। सौर ऊर्जा ईंधन का अच्छा विकल्प सिद्ध होगा। अधिकाँश यंत्र-उपकरण इसी के माध्यम से चलाये जायेंगे। विश्व भर में इस ऊर्जा का सबसे अधिक दोहन भारत-भूमि में ही होगा। इसके लिए ऐसी परिष्कृत मशीनें विकसित की जायेंगी, जो हर क्षेत्र की ऊर्जा आवश्यकता को पूरी कर सकें। वहाँ के सबसे ऊँचे पर्वत से इतनी विपुल संपदा प्राप्त होगी कि उसके खोये वैभव की भरपाई हो सके। यद्यपि तब भौतिक समृद्धि की महत्ता सार्वजनिक जीवन में बदले दृष्टिकोण के कारण नगण्य जैसी समझी जानी लगेगी, किंतु इससे भवितव्यता बदल नहीं जायेगी। निक्सन का कहना है कि यह भूमि एक बार फिर वैभवशाली बनेगी और वह समृद्धि प्राप्त करेगी, जो पूर्व में कभी उसकी अमूल्य थाती थी। ऐश्वर्य तो उसके कण-कण में इस प्रकार बोलेगा, मानों साक्षात् स्वर्ग ही उतर आया हो। फिर उसका प्रसार-विस्तार शैशव से किशोर, किशोर से वयस्क, वयस्क से प्रौढ़ावस्था की तरह पृथ्वी के कोने-कोने में अभिवृद्धि करता चलेगा, जिससे कभी का भौगोलिक सीमाओं में आबद्ध भूखण्ड अपनी बहुमूल्य आध्यात्मिक विरासत के कारण सम्पूर्ण धरा को ऐसा साँस्कृतिक चिंतन देगा,जो भले ही देश की भौगोलिक सीमा को बढ़ा न सके, पर संस्कृति का विराट विस्तार इस कदर होगा कि संपूर्ण विश्व विशाल भारत-महाभारत लगने लगे।

निक्सन कहते हैं कि यह सब उपलब्धियाँ उस देश की अभूतपूर्व आध्यात्मिक क्राँति के कारण होंगी। यदि निक्सन के उक्त कथन की तुलना वर्तमान भारत से करें, तो इसकी संगति देश की इन दिनों की परिस्थिति और प्रगति से काफी कुछ मेल खाती प्रतीत होगी। उनके कथनानुसार यदि आने वाले काल में यह राष्ट्र समस्त वसुंधरा का मुकुटमणि साबित हो, तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि महाकाल का चक्र अपनी चरमगति पर है-विश्वभर में घटते घटनाक्रमों से इसका स्पष्ट आभास मिलता है,किंतु इस भागवत वेला में अपना भी दायित्व कोई कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि चरित्र चिंतन की दृष्टि से हम अपने को परमसत्ता की इच्छा के अनुरूप ढाल सके, तो इस परिवर्तन प्रक्रिया में न हम केवल स्रष्टा के सहभागी बनेंगे, अपितु उन विभूतियों से भी सहज ही ओत-प्रोत हो सकेंगे, जिन्हें प्राप्त करने में साधना-क्षेत्र के साधकों को वर्षों नहीं, जन्मों तक इंतजार करना पड़ता है।


Quotation

किसी शास्त्र को इस दृष्टि से मत पढ़ो कि उसमें जो कुछ लिखा है वह तुम्हारे ही लिए है। वे अनेकों के लिए अनेक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिखे गये हैं। उनमें से उतना ही चुनो जो तुम्हारे अनुरूप है।


जोखिम अनुभव करेंगे (kahani)

दो मित्र थे। एक के पास कीमती घोड़ा था। दूसरा उसे किसी भी प्रकार प्राप्त करने को व्याकुल था। पहले ने स्पष्ट इनकार कर दिया। इस पर दूसरे ने एक चाल चली। अँधेरे में वह एक बीमार बुढ़िया का रूप बनाकर बैठ गया। जैसे ही वह घुड़सवार उधर से निकला वैसे ही बुढ़िया ने प्रार्थना की उसका गाँव थोड़ी ही दूर पर है। बीमारी की वजह से वह चल नहीं सकती। उसे घोड़े पर बिठा लिया जाय। घुड़सवार दयालु था। उसने बुढ़िया को घोड़े पर बिठा दिया स्वयं पैदल चलने लगा। अवसर पाकर बुढ़िया बने मित्र ने घोड़ा धर दौड़ाया और कहता गया मैंने चतुरता से घोड़ा ले लिया। ठगे गये मित्र ने आवाज देकर रोका और कहा, घोड़ा भले ही ले जाओ पर इस बात की चर्चा किसी से न करना अन्यथा किसी अन्य वास्तविक गरीब बीमार का हक मारा जायेगा। लोग फिर किसी भी गरीब-बीमार का विश्वास न करेंगे और नेकी करने में भी जोखिम अनुभव करेंगे।


बढ़ती आयु के साथ मेधा और प्रखर होती है

उपयोग और उपभोग का मोटा सिद्धाँत यह है कि इनसे वस्तुओं की क्षमता, योग्यता और आयु धीरे-धीरे घटती और फिर समाप्त हो जाती है। गाड़ी के पुर्जे लम्बे इस्तेमाल के उपराँत घिस जाने के कारण बदलने पड़ते हैं, तभी वह अपनी पुरानी क्षमता को प्राप्त कर पाती है। शरीर भी अधिक समय तक लगातार श्रम कहाँ कर पाता है? ज्यादा परिश्रम से उसमें थकान आती और विश्राम की आवश्यकता अनुभव की जाती है। थोड़े आराम के पश्चात जब उसकी क्लाँति समाप्त होती है, तभी उसके अंग-अवयव ताजगी महसूस करते और पुनः नये सिरे से नई स्फूर्ति के साथ काम में मुस्तैद होते हैं। यह उपयोग का सामान्य सिद्धाँत हुआ, पर इसे बिल्कुल ही अकाट्य नहीं माना जाना चाहिए। अपवाद यहां इस क्षेत्र में भी मौजूद हैं, जो दैनिक जीवन में सर्वत्र देखे जाते हैं।

बुराइयाँ अभ्यास और आदत के कारण ही उपजती और व्यक्ति के जीवन में कुकुरमुत्तों की तरह पलती-पनपती रहती है। कुकुरमुत्तों का यह स्वभाव होता है कि वे तनिक-सी नमी पाते ही उग पड़ते और बरसाती दिनों में अपनी उपस्थिति से जल-जंगल एक कर देते हैं। ऐसे ही अवाँछनीयताएँ आरंभ में अपना स्थान ढूँढ़ती और कमजोर स्थल पाते ही वहाँ फूट पड़ती है। एक बार जगह मिल जाने के बाद फिर वे अपनी जड़े जमाना आरंभ करती हैं। आचरण में उतरने के उपराँत धीरे-धीरे वे परिपक्व व पुष्ट होने लगती हैं और अन्ततः जीवन का अभिन्न अंग बन जाती हैं। शराबी, जुआरी और व्यभिचारी इसी कारण से इनसे जीवन भर उबर नहीं पाते। जो उबरते हैं उनकी अद्भुत संकल्प शक्ति ही इसमें सहायक होती है, अन्यथा व्यसनी मन और पापी तन की जोड़ी उन्हें कुटेव की कीचड़ से बाहर निकलने का मौका ही नहीं देती। जो निकलते हैं उनकी संख्या भी इतनी स्वल्प होती है, जिसे नगण्य जितना ही माना जा सकता है। खिलाड़ी यदि नियमित रूप से अभ्यास न करें, तो वह राष्ट्रीय स्तर तो क्या, स्थानीय स्तर के मुकाबले में भी हारते और पदक गँवाते देखे जाते हैं। पहलवानों, साहित्यकारों, संगीतज्ञों, वक्ताओं, विद्यार्थियों सभी के साथ यही बात समान रूप से लागू होती है कि दैनिक अभ्यास से योग्यता और क्षमता में अभिवृद्धि होती है। शरीर के संदर्भ में भी सच्चाई यही है कि नियमित श्रम करने से उसके सारे तंत्र सक्षम और मजबूत बने रहते हैं। लगातार श्रम करने से उनमें थकावट आती है, यह सत्य है, पर मिथ्या भी नहीं है कि यदि उसे यों ही निठल्ला पड़ा रहने दिया जाय, जो जंग लगे चाकू की-सी स्थिति पैदा हो जाती है और फिर वह किसी काम का नहीं रह जाता। इसी तथ्य की पुष्टि मस्तिष्कीय क्षमता के संबंध में अधुनातन शोधों ने की है। इस बारे में अब तक की मान्यता थी कि आयुष्य के साथ-साथ व्यक्ति की उस क्षमता का ह्रास होने लगता है, जिसकी अपूर्व सामर्थ्य का उपयोग कर यौवन में उसने स्वयं को असाधारण सिद्ध किया था, किन्तु शरीर-शास्त्रियों का कहना है कि शरीर के अन्य अंग-अवयवों के साथ यह बात लागू हो सकती है, परन्तु मस्तिष्क और उसकी सामर्थ्य के बारे में यह धारणा नितान्त गलत है कि उपयोग और उम्र का दुष्प्रभाव उसकी असाधारणता पर पड़ता है। यह दावा किया है कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी की शरीर विज्ञानी मेरियन डायमण्ड ने। अनेक वर्षों तक मानवी मस्तिष्क और उसकी क्रियाशीलता का अध्ययन करने के पश्चात् उनका कहना था कि नियमित मानसिक श्रम दिमाग को बुढ़ापे में भी जवान जैसी स्थिति में बनाये रहता है और उसकी क्षमता कलाकारों की भाँति निरंतर निखरती और बढ़ती ही चलती है।

उक्त निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व उनने इस आशय के अनेक प्रयोग-परीक्षण चूहों पर किये। जब डायमण्ड और उनके सहयोगियों ने चूहों को पिंजड़ों में बन्द रखने की तुलना में उन्हें दूसरे चूहों को पिंजड़ों में बन्द रखने की तुलना में उन्हें दूसरे चूहों के साथ ऐसे वातावरण में रखा, जहाँ उनके खेलने की अनेकानेक वस्तुएँ थी, ऐसी वस्तुएँ जिनके प्रयोग से उनकी दिमागी क्षमता का उपयोग होता हो। ऐसी स्थिति में उनने जो कुछ देखा उससे वे हतप्रभ रह गये। शोधकर्ताओं का कहना था कि इस प्रयोग के बाद चूहों के कॉर्टेक्स की केमिस्ट्री और संरचना में स्पष्ट परिवर्तन परिलक्षित हुए। शोधकर्मियों ने देखा कि कोर्टिकल पर्त की प्रत्येक न्यूरान आकार-प्रकार में पहले से कई गुनी बड़ी हो गई थी। इसके अतिरिक्त जो एक अन्य विशेषता देखी गई, वह यह थी कि हर एक तंत्रिका कोशिका से जुड़ी रहने वाली सहायक कोशिकाओं (ग्लायल सेल्स) की संख्या में वृद्धि हो गई थी। इसके परिणाम स्वरूप इन चूहों की क्षमताओं में स्फुट अभिवृद्धि दृष्टिगोचर हुई। अन्य चूहों की तुलना में से वैसे कार्य अधिक दक्षता और चतुरतापूर्वक करते पाये गये, जो दूसरों के लिए ज्यादा कठिन और कष्टसाध्य प्रतीत होते थे।

ऐसे ही प्रयोग उन चूहों पर दोहराये गये, जिनकी उम्र 766 दिन थी। अनुसंधान दल के वैज्ञानिकों का कहना था कि चूकों की यह वय शारीरिक क्रियाशीलता की दृष्टि से मनुष्य के 76 वर्ष के बराबर मानी जा सकती है। विशेषज्ञ-दल का कहना था कि उपरोक्त प्रयोग के परिणाम बूढ़े चूहों पर भी पहले ही जैसे दृष्टिगत हुए, अर्थात् उनकी भी मस्तिष्कीय-संरचना में वही बदलाव पाये गये जो जवान चूहों में देखे गये थे। इस प्रकार प्रो. डायमण्ड और उनके साथियों ने यह साबित कर दिया कि आयुष्य का मस्तिष्क पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव न सिर्फ भ्रामक है, वरन् गलत भी है। उनके अनुसार दिमाग अपनी सक्रियता-निष्क्रियता के अनुरूप ही प्रखरता का प्रदर्शन करता है, बढ़ती वय से उसका कोई लेना-देना नहीं।

उल्लेखनीय है कि आइंस्टीन-मस्तिष्क पर किया गया अध्ययन भी उपरोक्त तथ्य की ही पुष्टि करता है। न्यूरोलॉजिस्टों ने मृत्यु उपरान्त निकाले गये उनके सम्पूर्ण दिमाग की सूक्ष्मतापूर्वक जब जाँच-पड़ताल की, तो एक ही परिप्रेक्ष्य में उनका वह अंग अन्यों की तुलना में अलग पाया गया। उनमें हर न्यूरान के लिए ग्लायलसेलों की जो सामान्य संख्या होती है, वह अधिक थी। इसके अतिरिक्त कॉर्टेकल के अनेक न्यूरान का आकार-प्रकार साधारण मस्तिष्क के अपेक्षा बड़ा था। दूसरों शब्दों में उनका कार्टिकल पर्त अन्यों से कहीं अधिक मोटा था। ध्यान देने योग्य बात यह भी हैं कि वे अपने आरंभिक जीवन में फिसड्डी किस्म के विद्यार्थी थे। इसके लिए उन्हें प्रायः अभिभावकों की डाँट-फटकार सुननी पड़ती थी। यह संभव है कि इससे तंग आकर उनने कुछ कर गुजरने के निमित्त बाद में पढ़ाई में अधिकाधिक ध्यान देना प्रारंभ किया हो, जिससे लगातार दिमागी दबाव व क्रियाशीलता के कारण उनकी मस्तिष्कीय-संरचना में परिवर्तन आना शुरू हो गया हो, जिसकी उपलब्धि उनके उत्तरार्ध जीवन में सापेक्षवाद के ऐसे सिद्धान्त के रूप में हुई जिसने उन्हें विश्व-प्रसिद्ध बना दिया। उनके उक्त सिद्धान्त के बारे में प्रचलित है कि वह इतना दुरूह है कि अब तक उसे विश्व के मात्र तीन ही विज्ञानवेत्ता

भलीभाँति समझ पाये हैं, जिनमें से एक वे स्वयं थे।

अस्तु किसी को अब यह असमंजस करने की जरूरत नहीं कि बढ़ती आयु के साथ दिमागी प्रखरता घटती है। फिर भी जिन्हें ऐसा प्रतीत होता हो, उन्हें यही मानकर संतोष कर लेना चाहिए कि शारीरिक निष्क्रियता के कारण बरते जाने वाले मानसिक निठल्लेपन की ही यह परिणति है। सुन्दर सजा बँगला भी जब सर्वथा खाली पड़ा रहता है, तो वह चमगादड़ों अबाबीलों और उल्लुओं का डेरा बनकर रह जाता है। उसकी सुसज्जा तो मारी ही जाती है, बिना साफ-सफाई किये वह किसी प्रकार रहने लायक भी नहीं रह जाता। यही बात कपड़े के संबंध में है। उसकी जितनी धुलाई की जाती है, रंग उतना ही चोखा और चटक चढ़ता है। कमरे के फर्श की सफाई जितनी बार जितनी अधिक होती है, उतनी ही उसकी चमक में निखार आता है। फिर कोई कारण नहीं कि मस्तिष्क के बार-बार के उपयोग से उसकी क्षमता न बढ़े और बढ़ती उग्र के साथ-साथ उसमें प्रखरता न आये। उपयोग और उपभोग का सिद्धान्त अपने स्थान पर सही है। कई संदर्भों में उससे वस्तुओं की क्षमता प्रभावित होती व घटती है, पर कोई ऐसे भी प्रसंग दैनन्दिन जीवन में देखे जाते हैं, जिनमें तथ्य सर्वथा उससे विपरीत दिखाई पड़ते हैं। मस्तिष्कीय क्षमता के बारे में भी सत्य यही है कि वह बढ़ती आयु के साथ बढ़ती जाती है, घटती नहीं।


लक्ष्मण जी ने वही किया (kahani)

सुग्रीव ने राम का आश्रय लेकर अपने शत्रु बाली का वध करा लिया था। इससे पूर्ण उसने वचन दिया था कि सीता की खोज में अपनी सेना सहित तत्परतापूर्वक काम करेगा।

पर जब सुग्रीव का काम बन गया तो उसे अपना पूर्व वचन निभाने की याद ही नहीं रही। विनोद विलास में दिन बिताने लगा।

आवश्यकता पड़ी कि आदर्शों की सुध भूल जाने की कड़ाई के साथ याद दिलायी जाये और झकझोर कर खड़ा किया जाय। लक्ष्मण जी ने वही किया और भूले हुए को स्मरण दिला कर धमकाते हुए वचन पालन करने के लिए बाधित किया।


शिक्षा-संस्कृति जनता की धरोहर

“प्रजा महर्षि यज्ञदीप्ति को सबसे अधिक सम्मान देती है, यहाँ तक ठीक है महाराज। शिक्षक ही समाज का निर्माण करता है, इसलिए वह सबसे अधिक आदर-सत्कार पाने लायक है। किन्तु आचार्यगण राजकीय व्यवस्था की आलोचना करें यह सह्य नहीं। महाराज! शिक्षा राजनीति का आश्रित नहीं। शिक्षकों को राजतंत्र की आलोचना करने या मार्गदर्शन का कोई अधिकार नहीं।” महामंत्री आँत्रेष्टक आवेश में बोले चले जा रहे थे।

महाराज भद्रबाहु ने रोककर पूछा-”तुम्हारा आशय क्या है महामात्य, वह कहो-क्या तुम चह चाहते हो कि आचार्य यज्ञदीप्ति के गुरुकुल में अध्यापन करने वाले आचार्यगणों को दंडित किया जाय?”

नहीं महाराज। आँत्रेष्ठक ने छलबाज जुआरी की तरह विश्वस्त दांव फेंकते हुए कहा-’मेरी ऐसी कुछ इच्छा नहीं। पर यदि प्रजा ने राज्य के प्रति विद्रोह कर दिया तो? कैसे भी हो आचार्यों की राजनीति का आश्रित होना ही चाहिए। मेरा तो यह सुझाव भर है कि समस्त गुरुकुलों को दी जाने वाली सहायता समाप्त कर दी जायें। जब भूख सताएगी तो ये आचार्य अपने आप सीधे हो जाएँगे।”

सम्राट भद्रबाहु के माथे की लकीरें गहरी हो गई, वे कुछ चिन्तित स्वर में बोले-यह मत भूलो महामंत्री तुम्हारी योग्यता भी इन गुरुकुलों की ही देन है। यदि उनके साधन समाप्त कर दिए गए तो आज देश में जो प्रतिभाएँ हैं, प्रज्ञा है-तेजस्विता है, ज्ञान और विज्ञान है, वह नष्ट हो जाएगा।”

“राज्य को अराजकता से बचाने और आपके सम्मान को सुरक्षित रखने के लिए यदि प्रतिभाओं के स्रोत बंद करने पड़े तो बुरा क्या है?” महामंत्री की यह कूटनीति काम कर गई। दांव ठिकाने पर लगा। भद्रबाहु ने घोषणा करा दी-”अब आगे किसी भी गुरुकुल को राजकीय सहायता नहीं मिलेगी। अब तक दी गई सारी गौएं, अन्न और वस्त्र छीनकर अविलंब लौटा लिए जांय।”

देखते ही देखते आश्रमों के सारे साधन छिन गए। स्थिति गंभीर हो चली। विद्यार्थियों का भरण-पोषण तो भिक्षाटन से किया जा सकता था-पर आचार्य क्या करते?

महर्षि यज्ञदीप्ति की अध्यक्षता में आचार्यों का सम्मेलन बुलाया गया। सर्व सम्मति से यह निश्चय किया गया कि महर्षि स्वयं ही महाराज तक जायें और उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराकर राजकीय वृत्ति पुनः प्रारंभ कराएँ।

महर्षि ने जाकर सम्राट के सामने स्थिति का निवेदन किया, पर महामंत्री आँत्रेष्टक की धूर्तता के आगे उनकी एक न चली। लेकिन मार्ग में उन्होंने निश्चय किया “शिक्षा जन-जीवन की नैसर्गिक आवश्यकता है, राजतंत्र के दबाव में उसे नष्ट नहीं किया जा सकता। लोक जीवन उस जरूरत को अनुभव करेगा तो स्वयं ही आगे बढ़कर सहायता भी करेगा। गुरुकुल बंद कदापि नहीं होंगे। देश को निरक्षरता के कलंक में धकेला नहीं जायेगा।

यही सोचते हुए महर्षि जैसे ही अपने पर्णकुटीर में पहुँचे देखा उनका नन्हा-सा बालक भूख से व्याकुल पृथ्वी पर लोट रहा है। क्षुधित शिशु पर माँ के समझाने-मनाने का कोई असर नहीं था। माँ भी क्या करती आज कई दिनों से अन्न का दाना न मिलने के कारण उसके स्तनों में भी दूध नहीं आ रहा था।

यज्ञदीप्ति की आंखें भर आयीं-”जो सारे समाज का हित-चिन्तन करते हैं, समाज क्या उन्हें इसी स्थिति में रखेगा।” पर वे मनस्वी महात्मा थे। परिस्थितियों से विचलित होना उनके स्वभाव में नहीं था। उन्होंने धर्म-पत्नी के कान में कुछ कहा-”पत्नी भीतर गई और एक कटोरे में कुछ ले आयीं। बच्चे ने प्रसन्नतापूर्वक दूध पी लिया। उस बेचारे को क्या पता था कि श्वेत रंग का दिया गया तरल पदार्थ नहीं चावल के आटे का घोल है।

आचार्य गण भद्रबाहु के निर्णय से बड़े निराश हुए। पर गुरुकुल न बन्द किए जांय, इस बात पर सब एक मत थे। प्रातःकाल सभी विद्यार्थियों को भिक्षाटन के लिए भेजा गया। किन्तु जिस घर के सामने गुहार लगाई वहीं से फटकार भरे स्वर सुनने को मिले-”जो शिक्षा बालकों को भिखारी बनाती हो, उस शिक्षा से अच्छा है, बच्चे अनगढ़ रहें। घरों में रहकर परिश्रम से उपार्जित अन्न ग्रहण करें। भीख माँगना मानवीय शक्ति एवं परमात्मा का अपमान करना है। अध्यात्म-धर्म, शिक्षा और संस्कृति के नाम पर इस अनात्म कृत्य का पोषण नहीं किया जा सकता।”

ब्रह्मचारी खाली हाथ गए थे और लौट तब भी हाथ खाली ही निकले। एक बार तो ऐसा लगा कि अब विद्यालय बन्द हो जायेंगे। किन्तु आचार्य अभी भी साहस हारने को तैयार न थे। राज्य की शिक्षा और संस्कार परंपरा को बनाये रखने के लिए वे प्रत्येक तितिक्षा पर कसे जाने के लिए तैयार थे।

विद्यार्थियों के लिए यह नियम बनाया गया कि अपनी व्यवस्था के लिए वे अपने अभिभावकों का आश्रय लें। इधर आचार्यों ने अपने लिए आश्रम में ही फल-फूल, शाक और अन्न उगाकर पेट पालन प्रारंभ कर दिया। मुसीबतें आयी पर गुरुकुल एक दिन के लिए भी बन्द न हुए। आचार्य कौपीन पहन कर रहने लगे पर अध्ययन एक दिन भी बन्द न किया। आचार्य पत्नियों के पास जो मंगलसूत्र थे, विक्रय कर आश्रम के लिए गायें मँगा ली गई। उनके दाने-चारे का प्रबंध भी वे स्वतः करने लगीं, पर उन्होंने आचार्यों के अध्यापन कार्य में थोड़ी भी रुकावट न आने दी।

अभाव तो आखिर अभाव ही थे। आश्रमों के पास इतनी भूमि भी तो नहीं थी कि उससे आचार्यों और उनके आश्रित सभी-बच्चों को पेट भर अनन मिलता रहता। महर्षि यज्ञदीप्ति समय निकालकर स्वयं भी जंगल जाया करते और जितना बन पड़ता उतनी सूखी लकड़ियां काट कर लाया करते। यह कार्य वे दूसरों की आँख बचाकर करते, जिससे विद्यार्थियों के अध्यापन में अवरोध न आने पाए। शरीर पहले ही कृश था। भूख ने रही-सही शक्ति और तोड़ दी। यज्ञदीति ने लकड़ी का बोझ उठा तो लिया किन्तु दो पग भी आगे न बढ़ सके। आँखों के सामने अँधेरा छा गया पर लड़खड़ा गए और वे वहीं सिर के बल गिर पड़े।

देखते-देखते ग्रामवासियों की भीड़ एकत्रित हो गई। जल के छीटे लगाए गए। महर्षि की चेतना लौटी पर वह शून्य में थी। वे बुदबुदाए -”हे प्रभु। जब तक शिक्षा और संस्कृति के आधार यह गुरुकुल स्वावलम्बी और साधन संपन्न नहीं हो जाते, तब तक मैं बार-बार जन्म लेता हूँ। बार-बार गुरुकुलों की सेवा करता रहूँ। “ इन शब्दों के साथ महर्षि ने अपना यह नश्वर शरीर छोड़ दिया।

ग्रामवासियों एवं नगरवासियों में यह समाचार वर्षाकालीन मेघों के समान सर्वत्र पल भर में फैल गया। एक ओर चिता प्रज्वलित हो रही थी, उस पर महर्षि का पार्थिव शरीर फूँका जा रहा था। दूसरी ओर जनता साधनों से आश्रमों के आँगन पाट रही थी। लोगों ने संकल्प कर लिया था-शिक्षा और संस्कृति हमारी अपनी आवश्यकता है राजतंत्र उसे सहायता नहीं देता तो न दे पर हम नागरिक उसे साधन हीन नहीं रहने देंगे।


जहाज खरीद लिया (kahani)

टामस जेफरसन-जो उस समय अमरीका के उपराष्ट्रपति थे-किसी अन्य नगर के एक होटल में गये और ठहरने के लिये स्थान की याचना की। वे उस समय साधारण किसान की वेशभूषा में थे। होटल के मालिक ने कहा-”हमारे यहाँ कोई स्थान रिक्त नहीं है।”

वे चले गये। बाद को मैनेजर को किसी ने बताया कि ये तो अमेरिका के उपराष्ट्रपति थे। तब तत्काल ही उसने एक व्यक्ति को भेजा कि वह उन्हें क्षमा याचना करते हुये वापस ले आये।

जब वह व्यक्ति पहुँचा और उसने मैनेजर का संदेश जेफरसन से कहा तो उन्होंने यही कहा-”जिस होटल में एक किसान के लिये स्थान नहीं हो उसमें अमरीका का उप राष्ट्रपति कैसे ठहर सकता है।”

अमेरिकी उन दिनों अफ्रीका से लोगों को पकड़ कर ले जाती और उनसे पशुओं जैसा व्यवहार करते थे। बहुत से लोगों ने यह धंधा ही अपना लिया था कि अफ्रीका निवासियों को पकड़कर लायें और उन्हें अमेरिका में बेचें।

ऐसा ही एक जहाज अफ्रीकी महिलाओं का आया। बोली उसकी भी लगी। फिलिप हिटले नामक एक गोरी महिला ने अपनी सारी संपत्ति बेच कर बदले में वह

जहाज खरीद लिया।

फिलिप ने उन सभी महिलाओं को पढ़ाया। सभ्यता सिखाई, स्वावलम्बी बनाया और इस काम के लिये तैयार किया कि वे दासों की दशा सुधारने और उस प्रथा का अन्त कराने के लिए आन्दोलन में जुट पड़े। यह आन्दोलन तेजी से चला और कालान्तर में सफल भी हुआ।


वृक्ष-वनस्पति भी परस्पर बातें करते हैं, मूक नहीं हैं

सत्य चाहे कुछ भी हो, जब तक इस स्थूल बुद्धि को कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल जाता, उसे संतोष नहीं होता। यों अध्यात्म अवधारणा तो इसे भलीभाँति स्वीकारती है कि इस दृश्य जगत में जड़-चेतन कहे जाने वाले समस्त प्राणी व पदार्थ चेतना के एक अविच्छिन्न प्रवाह से जुड़ें हुए हैं, पर पदार्थ विज्ञान को इतने से संतुष्टि कहाँ! वह तो प्रत्यक्षवाद के धरातल पर आधारित है और किसी भी तथ्य को स्वीकारने एवं नकारने के लिए तर्क सम्मत सत्य की आवश्यकता अनुभव करता है। यह उचित भी है। आँख जब तक स्वयं सब कुछ देख न ले, किसी अघटित पर विश्वास क्यों करें! पर असत्य यह भी नहीं है कि अपनी सामर्थ्य और सीमा के अन्दर ही इस प्रकार का दावा वह प्रस्तुत कर सकती है, इससे बाहर नहीं।

विज्ञान के साथ नहीं हुआ। वृक्ष-वनस्पतियों के संदर्भ में उसने पिछले दिनों अपने अन्वेषण-अनुसंधान द्वारा अध्यात्म विज्ञान की इस मान्यता की तो पुष्टि कर दी कि जीव-जन्तुओं की तरह उनमें भी भाव-संवेदनाएँ होती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में वे भी चिन्ता, भय, शोक, पीड़ा की अनुभूति करते हैं और परिस्थितियाँ अनुकूल होते ही अन्य जीवधारियों की तरह हर्ष व विषाद की संवेदनाओं को अपने पड़ोसी वनस्पतियों तक पहुँचाते कैसे हैं? प्राणियों में इस निमित्त बोलियाँ होती हैं, विशिष्ट स्तर की विशेष मुद्राएँ-भाव-भंगिमाएँ होती हैं, जिनसे उनमें आगत-अनागत सूचनाओं का आदान-प्रदान होता रहता है, पर पौधे? उनमें तो ऐसी मुद्राएँ भी नहीं होती, फिर जानकारियों के प्रसारण का आधार क्या है? क्या इसे सूक्ष्म स्तर की कोई विशेष बोली मान ली जाय? हाँ, वर्तमान शोध इसी निष्कर्ष पर पहुँचा है कि पादप इस प्रकार का विनिमय अपनी विशिष्ट बोली के आधार पर करते और पड़ोसियों को वर्तमान एवं भविष्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत कराते रहते हैं।

शेक्सपियर ने “मैकबेथ” नामक नाटक में जब पहली बार यह कहा था कि-पौधे बोलते हैं, तो पश्चिमी जगत ने इसे कवि की कल्पना मात्र माना था, पर सूक्ष्म की ओर निरन्तर बढ़ते विज्ञान ने अब इसे सत्य सिद्ध कर दिखाया है कि उक्त कथन में उतनी ही सच्चाई है, जितनी उदयाचल और अस्ताचल से दिनमान के उगने और डूबने में। यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन, सिटल के प्रो. डेविड एफ.रोएडस ने इसी बात की पुष्टि अपने प्रयोग परीक्षणों द्वारा कुछ वर्ष की और कहा कि पौधों में सूक्ष्म स्तर की वार्तालाप द्वारा निरन्तर जानकारियाँ का आदान-प्रदान चलता रहता है, पर वे इतने सूक्ष्म होते हैं, जिन्हें मानवी कान सुन समझ नहीं सकते। इसे एक सुखद संयोग ही कहना चाहिए, जिस मध्य इस अनुपलब्ध की उपलब्धि हुई।

हुआ यों कि प्रो. रोएड्स के मार्गदर्शन में एक वैज्ञानिक दल पौधों पर तनाव संबंधी अध्ययन करने में जुटा हुआ था। अनेक वर्षों तक इस प्रकार के शोध के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण तथ्यों का पता लगाया। शोधकर्मियों न पाया कि सुखा, कोहरा, खाद की कमी प्रदूषण आदि तत्व समान रूप से वनस्पतियों को तनाव-जन्य स्थिति में पहुँचा देते हैं। उन्होंने देखा कि इन परिस्थितियों में पौधे रोगों एवं उन कीटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं, जो पादप भक्षी होते हैं। ऐसी दशा में उनका आक्रमण जल्दी और ज्यादा होता है। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि इस अवस्था में उनकी नैसर्गिक प्रतिरक्षा प्रणाली ठीक उसी प्रकार लड़खड़ाने लगती एवं कमजोर हो जाती है, जिस प्रकार मनुष्य एवं अन्य जंतुओं के बरसाती पानी में भीग जाने से उनकी प्रतिरोधी क्षमता प्रभावित होती है। वे कहते हैं कि पानी में भीग जाना उनके रोग का कारण नहीं, वरन् सच्चाई यह है कि इससे प्रतिरोधी क्षमता में ह्रास आने से रोगाणुओं का आक्रमण जल्दी उन्हें अपनी चपेट में लेता और शिकार बनाता है।

यह तो वनस्पतियों और प्राणियों में तनाव व रोग के सामान्य एवं सरल धारण हुए, पर अनुसंधानकर्ताओं ने पादपों पर परीक्षण के दौरान एक अन्य ऐसा कारण भी पाया, जो उनमें तनाव पैदा करता था। यह था उनके अन्दर चलने वाला रासायनिक परिवर्तन। विशेषज्ञों ने पाया कि तनाव की स्थिति में वनस्पतियाँ अपने अन्दर अधिकाधिक पोषक तत्व उत्पन्न करती हैं। इसके अतिरिक्त वैसे रसायनों का निर्माण भी करती है, जो शत्रुओं के आक्रमण से उनकी सुरक्षा कर सके।

इतनी जानकारी उपलब्ध करने के उपरान्त उनने एक विशेष प्रकार के पौधे पर परीक्षण आरंभ किया। उस विशेष जाति के पौधे में से कुछ में वैज्ञानिकों ने भूखे पादपभक्षी कीड़ों को रख दिया, जबकि अन्यों को इनसे दूर रखा। देखा गया कि कीड़े आरंभ में बड़ी तेजी से बढ़े, किन्तु तुरन्त ही थोड़े दिनों बाद यह तथ्य भी उजागर हो गया कि अब उनकी वृद्धि उस गति से नहीं हो रही है, जो आरंभ में थी, साथ ही यह भी ज्ञात हुआ कि पादपीक्षी, पौधों को अब उतना नुकसान नहीं पहुँचा रहे हैं, जितना प्रारंभ के कुछ दिनों में। विश्लेषण से विदित हुआ कि आक्रमण के कुछ ही दिन पश्चात् पादपों ने प्रोएन्थोसाइनिडिन जैसे ऐसे विषैले और घातक रसायन बनाने आरंभ किये, जो कीट विनाशक थे।

अनुसंधानकर्ताओं को आश्चर्य तब हुआ जब कुछ सप्ताह बाद उन्होंने पड़ोस के स्वास्थ पौधों का अध्ययन-विश्लेषण आरंभ किया। उनने देखा कि सामान्य स्थिति में ऐसे रसायन जिस परिमाण में पौधों में पाये जाने चाहिए, उससे अनेक गुना अधिक पड़ोसी स्वस्थ पौधों में ये विद्यमान थे। इसका एक ही अर्थ निकलता था कि पास के पौधों में आक्रमण का पता उन्हें चल चुका था और उस स्थिति से निपटने की तैयारी में वे जुट चुके थे। उनके लिए आश्चर्य की बात यह थी कि आखिर स्वस्थ पौधों को इसका पता कैसे चला कि बगल में बैरी पहुँच चुके हैं? निश्चय ही आक्रान्ताओं के शिकार हुए वृक्षों ने उन्हें यह सूचना दी, जिसकी अग्रिम तैयारी के रूप में उनमें घातक रसायन बनते देखे गये।

इतना सुनिश्चित हो जाने के उपरान्त अब प्रो. रोएड्स एवं सहयोगियों ने यह जानने का निश्चय किया कि आखिर यह जानकारी पड़ोसियों तक किस माध्यम से पहुँची? मिट्टी अथवा जड़ से? प्रयोगशाला के भीतर गमलों एवं बाहर जमीन में लगे पौधों पर अनेकानेक परीक्षण के पश्चात् शोध दल ने पाया कि माध्यम क्या हो सकता है? इस संबंध में विशेषज्ञों को निश्चित मत है कि उनने वाणी द्वारा ही सूचना का सम्प्रेषण पड़ोसियों तक किया। प्रयोग से यह भी सिद्ध हो गया कि उनके वार्तालाप की परिधि की एक निश्चित सीमा है, उसी के अंतर्गत यह विचार-विनिमय संभव हो पाता है। उनके अनुसार यह दायरा सौ गज से भी ज्यादा होता है।

इसी तथ्य की पुष्टि दो ब्रिटिश वनस्पति शास्त्रियों ने भी की है। योर्क यूनिवर्सिटी के अन्वेषणकर्ताओं डॉ. साइमन वी. फाउलर एवं प्रो. जॉन एच. लाटन का कहना है कि यदि यह साबित हो जाय कि वृक्ष-वनस्पतियाँ परस्पर विचार-विनिमय अथवा वार्तालाप करते हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि जिनमें भाव-संवेदनाएँ हैं, निश्चय ही उनमें इसके संप्रेषण की भी विद्या व क्षमता निसर्ग ने सँजोयी होगी। यह बात और है कि उस गहराई और सूक्ष्मता को जानने-पहचानने की ओर हम धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं। उनके अनुसार आरंभ में पौधों में इस प्रकार के किसी संवेगात्मक तत्व से सर्वथा इनकार किया जाता था, किन्तु कुछ समय पश्चात् विज्ञान ने इसे सिद्ध कर दिखाया। अब यदि उसके अग्रिम चरण में विज्ञानवेत्ता यह प्रमाणित कर दें कि जीवधारियों की तरह उनमें बातचीत की भी सामर्थ्य है, तो आश्चर्य क्या!

सचमुच हम एक ही चेतना की पृथक-पृथक अभिव्यंजना हैं। फिर उनमें यदि कोई संपर्क सूत्र हो, तो विस्मय कैसा! अध्यात्म विज्ञान तो इसे आरंभ से ही स्वीकारता आया है। अब यदि भौतिक विज्ञान उसी को अपने परिष्कृत यंत्रों और सूक्ष्म स्तर के अनुसंधानों द्वारा सिद्ध कर दे, तो इसे अचंभा नहीं, वरन् उसी सत्य की पुनरुक्ति भर माना जाना चाहिए, जिसे बहुत पूर्व से चेतना विज्ञान कहता चला आ रहा है।


इशारा प्रगाढ़ निद्रा की ओर (kahani)

नगर में नाटक मण्डली आयी। नाटक के मालिक ने बर्नार्डशा को भी आमंत्रित करना उचित समझा। सोचा कि उनके आने से ख्याति फैलेगी। भले-बुरे की राय भी मिलेगी। किन्तु नाटक प्रारंभ होते ही बर्नार्डशा ऊँघने लगे। नाटक लम्बा चला शॉ खर्राटे भर कर सोने लगे। मालिक बड़ा हैरान कि यह क्या गलती हो गई। बूढ़े को उठाना भी उचित नहीं है। शिष्टाचार के नाते कुछ कह भी नहीं सकता था। नाटक पूरा हुआ।। शॉ ने आँखें खोलीं। उठाकर चलने लगे। मालिक बोला-”श्रीमान्! कैसा लगा नाटक। अपनी राय प्रकट करते जाते तो हमें प्रसन्नता होती।” शॉ बोले “क्या अब भी मन्तव्य प्रकट करने की आवश्यकता है?” उनका इशारा प्रगाढ़ निद्रा की ओर था।


श्रद्धामयोऽयं पुरुषः

उन दिनों रामकृष्ण परमहंस हनुमान की साधना कर रहे थे। कुछ ही दिनों में उनकी प्रकृति में विलक्षण परिवर्तन दिखाई पड़ने लगे। बंदरों की तरह उछलना-कूदना, पेड़ पर चढ़ना-सब कुछ में कपिवृत्ति का विचित्र समावेश था। इतना ही नहीं, बंदरों की भाँति उनके पूँछ भी निकलने लगी। सभी हैरान थे, पर साधना की समाप्ति के साथ कुछ ही दिनों में वे अस्वाभाविक लक्षण स्वतः तिरोहित हो गये। ऐसे ही एक अवसर पर जब वे राधा भाव की साधना कर रहे थे, तो उनके विचार व्यवहार, चाल-ढाल न सिर्फ स्त्रियों जैसे हो गये थे वरन् शरीर में स्त्रैण गुण भी उभर आये थे। महिलाओं की तरह उरोज और मासिक स्राव भी शुरू हो गया था, किन्तु ज्योंही साधना पूरी हुई धीरे-धीरे सभी असामान्यताएँ अदृश्य हो गई।

यहाँ चर्चा किन्हीं महापुरुष अथवा साधनाओं की नहीं की जा रही है। कहने का आशय मात्र इतना भर है कि अध्यात्म श्रद्धा-विश्वास की जिस धुरी पर टिका है, उसे यदि प्रगाढ़ और प्रबल किया जा सके, तो आज जिस प्रकार इस सूक्ष्म विज्ञान की विश्वसनीयता पर उँगली उठायी जा रही है, उसकी गुंजाइश न सिर्फ सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जायेगी, अपितु अनेक ऐसी उपलब्धियाँ भी हस्तगत हो सकेंगी, जिसे अब तक पढ़ी-सुनी भर, कपोल-कल्पना भर मानी जाती रही थीं।

यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि विश्वास में ऐसी कोई शक्ति है क्या, जिसके कारण ऐसी अनपेक्षित उपलब्धियाँ करतलगत कर पाना संभव हो? उत्तर में चिकित्साशास्त्र का उदाहरण दिया जा सकता है। शरीर विज्ञान में मनःकायिक रोगों की उपज अन्तराल की उस आस्था को बताया गया है, जो निषेधात्मक चिन्तन के रूप में इतना सुदृढ़ हो जाता है कि अब तक जो चिन्तन मात्र था, वह व्याधि के रूप में प्रकट और प्रत्यक्ष होने लगता है। आरोग्यशास्त्र का उक्त सिद्धान्त प्रकारान्तर से उसी अध्यात्म मान्यता को परिपुष्टि करता है कि विचार और विश्वास को यदि सबल और सशक्त बना लिया जाय, तो जो कुछ सोचा गया था, उसके मूर्तिमान होने में विलम्ब नहीं लगता। गीता में इसी का समर्थन “‘श्रद्धामयोयम पुरुषः यच्छृद्धः स एवं सः” कह कर किया गया है।

अध्यात्म इसी आस्था-विज्ञान का नाम है। उसमें आस्तिकता का स्थान तो है, पर वह तब तक कुछ कर पाने में सफल नहीं हो पाती, जब तक सर्वोपरि सत्ता के प्रति निष्ठा घनीभूत होती जाती है, त्यों-त्यों परिपाक के परिणाम ऐसे अद्भुत और अनूठे सामने आने लगते हैं, जिसे चमत्कार कहा जा सके। आस्तिक और आत्मविश्वासी इसका सहज लाभ सरलतापूर्वक उठा लेते हैं, किन्तु प्रत्यक्षवाद के पक्षधर नास्तिक प्रकृति के लोग चूँकि ऐसा करने में समर्थ नहीं हो पाते, अतः ऐसे लाभों से वंचित रह जाते हैं और “नो सोल, नो गाँड”, “ईश्वर मर गया” जैसी मनगढ़ंत बातें करने लगते हैं।

प्रसन्नता की बात है कि इन दिनों जब महाकाल का चक्र अपनी पूरी गति पर है, तो ऐसे लोगों की मूर्छना टूटी है, जो ईश्वर नाम की किसी सत्ता अथवा व्यवस्था से सर्वथा इनकार करते थे। अब उसी भूखण्ड से आस्तिकता का शंखनाद होने लगा है, जहाँ कभी अनास्था व नास्तिकता का वर्चस्व था। इससे यह सहज विश्वास होने लगा है कि आने वाले समय में सर्व समर्थ सत्ता के प्रति आस्था जगेगी और वह दृढ़ता पैदा होगी, जिसे तर्क की थोथी दलीलों की तरह नहीं, वरन् तथ्य और प्रमाण की तरह प्रत्यक्ष अनुभव की जा सके।

अमेरिका एक ऐसा ही देश है, जहाँ आजकल विश्वास-चिकित्सा की लहर-सी चल पड़ी है। वहाँ “यूनिटी स्कूल ऑफ क्रिश्चियनिटी” “कम्यूनिटी ऑफ जीसस” “चर्च ऑफ फादर डिवाइन” “दि एमेनुअल मूवमेण्ट” “क्रिश्चियन साइंस” एवं “न्यू थॉट मूवमेण्ट” जैसे नामों से विभिन्न केन्द्रों पर ऐसी ही चिकित्सा चलायी और मूर्द्धन्यों द्वारा अपनायी जा रही है। यह उपचार पद्धति कितनी जोर पकड़ती जा रही है, इसका अनुमान इसी बात से लगता है कि अब वहाँ प्रायः दस में से हर पाँच बुद्धिजीवी अपना काम आरंभ करने से पूर्व प्रार्थना करते और भगवान से सफलता की याचना करते हैं। इनमें चिकित्सक, अभियन्ता, वक्ता, लेखक, कलाकार जैसे सभी क्षेत्र के लोग सम्मिलित हैं। एनाहिम (कैलीफोर्निया) के मेलोडीलैण्ड स्कूल में ऐसे ही एक उपचार केन्द्र की स्थापना की गई है, जिसमें प्रत्येक बृहस्पतिवार को हजार से भी अधिक लोग उपचार हेतु उपस्थित होते हैं। ऐसा ही एक केन्द्र फैमिंघम नामक कस्बे में श्री और श्रीमती अल्बर्ट डोपलर नामक प्रौढ़ दंपत्ति चलाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक ओहियो नगर में बी. मेडलिन नामक एक वयोवृद्ध महिला चिकित्सक ने इसी पद्धति द्वारा रोगियों का इलाज करते हुए प्रसिद्धि पायी थी। केप-ओड नामक स्थान में भी एक ऐसा ही आरोग्य केन्द्र काम कर रहा है।

विश्वास-चिकित्सा की विविध शाखाओं के संस्थापकों में फिल्मोर दंपत्ति विशेष उल्लेखनीय हैं। वे आरंभ में स्वयं भी बीमार थे, किन्तु अपने अगाध ईश-विश्वास के कारण जब स्वस्थ हुए, तो इसका प्रयोग अन्य अनेकों पर किया और उन्हें कष्टसाध्य व्याधियों व्याधियों से मुक्ति दिलायी।

यहाँ यह उल्लेख करना अनुचित न होगा कि विश्वास एक ऐसा पारस है, जो लौह के संयोग से स्वर्ण जैसा सत्परिणाम प्रस्तुत करता है उसमें इतनी अमोघ शक्ति है कि उसे दृढ़तापूर्वक जिस भी लक्ष्य पर संधान किया जाय, वहीं शब्दबेधी बाण जैसा चमत्कार उत्पन्न करता है। यह विश्वास किसी विचार के प्रति हो, अथवा परम सत्ता के प्रति, जब वह गहन अन्तराल में अपनी जड़े जमा लेता है, तो अपने सदृश्य परमाणुओं को दूर-दूर से खींच बुलाता और ऐसा वातावरण विनिर्मित करता है, जैसी इच्छा की गई थी। चुम्बक को जब धूल में रखा जाता है, तो वह मृत्तिका कणों को अपनी ओर नहीं खींचता, वरन् सजातीय लौह कणों को ही आकर्षित करता है। विश्वास-चिकित्सा में भी यही विज्ञान कार्य करता है। जब कोई रोगी गहन आस्था के साथ परमेश्वर से आरोग्य की प्रार्थना करता है और ऐसा विश्वास करता है कि वह अवश्य स्वस्थ हो जायेगा, तो दो प्रकार की शक्तियाँ साथ-साथ कार्य करने लगती है। परमात्मा की समर्थ शक्ति और प्रबल संकल्प का स्वसंकेत-यह दोनों सत्ताएँ जब एकत्रित होती हैं, तो दिव्य वरदान जैसा प्रतिफल उपस्थित करती हैं और बीमार देखते-देखते स्वस्थ हो जाता है।

विश्वास चिकित्सा के पीछे के इस विज्ञान को समझ लेने के उपरान्त नास्तिकों एवं संदेहशीलों को इस पर शंका करने की तनिक भी गुंजाइश शेष रह नहीं जाती। आज के एड्स कैंसर एवं इस जैसे अन्य अनेक दुस्साध्य व्याधियों को दूर करने का यह रामबाण उपचार हो सकता है। इससे गंभीर बीमारियाँ ही नहीं, विकट परिस्थितियाँ भी देखते-देखते दूर की जा सकती हैं। जब विश्वासपूर्वक उस “कर्तुम्कर्तुमन्यथाकर्तुम्” से प्रार्थना शक्ति की जाती है, तो तत्क्षण उसकी समर्थ शक्ति कार्य करने लगती और स्थिति-परिस्थिति को सामान्य एवं सहज बना देती है।

हम उस परमात्मा सत्ता के प्रति यदि आस्था और श्रद्धा जगा सकें, तो न सिर्फ वर्तमान की विषम परिस्थितियों से त्राण पा सकेंगे, अपितु उसकी समर्थ सहायता संकटों में, बीमारियों में, दुर्घटनाओं में भी पग-पग पर अनुभव कर सकेंगे। यह आज की सर्वोपरि आवश्यकता एवं सर्वसुलभ उपचार है। इस सरल-सस्ती प्रक्रिया का अपनाने में ननुनच नहीं ही किया जाना चाहिए।


मैं हाजिर हूँगा (kahani)

एक जगह मिलिटरी के जवानों को एक भारी गार्डर उठाना पड़ रहा था। वह बड़ा बहुत था। कामुक कम। मुश्किल से थोड़ा-थोड़ा करके उसको खिसकाया जा सकता था। उनका कप्तान जोर लगाओ का हुक्म तो दे रहा था पर स्वयं उसको हाथ लगाकर उठाने को तैयार न था।

एक घुड़सवार वहाँ रुका उसने घोड़ा बाँध दिया और जवानों के साथ बड़ी हिम्मत से उसे उठाने में जुट गया। देखते-देखते गार्डर उठा लिया। कप्तान ने घुड़सवार को धन्यवाद दिया और उसका परिचय पूछा।

घुड़सवार ने कहा-कप्तान से बड़ा। अब प्रश्न पर प्रश्न उठने लगे उसे कोई बड़ा अफसर समझा गया।

तब क्या आप सेनापति रक्षा मंत्री आदि है। घुड़सवार ने कहा उससे भी ऊँचा तब क्या प्रेसीडेन्ट है। उनने अपना नाम जार्ज वाशिंगटन बताया और घबराये हुए कप्तान से कहा जब कोई कठिन काम पड़े तो उसमें सहारा देने के लिए अपने देश के प्रेसीडेन्ट जार्ज वाशिंगटन को बुलावा भेज दिया करो, मैं हाजिर हूँगा।


“यज्ञोपैथी” का ज्ञान-विज्ञान पक्ष

यज्ञ का सूक्ष्म विज्ञान किसी भी अणु, परमाणु और विराट के रहस्यों से कम आश्चर्यजनक नहीं है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में यद्यपि दवा की टिकिया देकर रोग निदान का प्रतिशत सर्वाधिक है, तथापि रक्त में सीधी औषधि पहुँचाने की इंजेक्शन प्रणाली को ज्यादा प्रभावशाली माना जाता है। यह एक विलक्षण सत्य है कि शरीर के क्रिया व्यापार को चलाने वाली वह रस-रक्त स्राव विहीन नाड़ियाँ होती हैं जिनमें इनसे भी सूक्ष्मतर प्राण चेतना प्रवाहित होती हैं जिनमें इनसे भी सूक्ष्मतर प्राण चेतना प्रवाहित होती है। स्पष्ट है यदि कोई ऐसी पद्धति हो जो स्नायु संस्थान को प्रभावित कर सकती हो तो उसे इंजेक्शन चिकित्सा से भी अधिक कारगर होना चाहिए। भारतीय आयुर्वेदाचार्यों, जैसे धन्वन्तरि, चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट आदि सभी ने यज्ञ चिकित्सा को इसी कोटि का माना है। ऋषियों ने तो उसे आत्मोत्कर्ष का अमोघ साधन ही माना है, पद यदि उतनी गहराई में न जाएँ, मात्र भौतिक स्तर तक ही कल्पना करें तो यज्ञ की गरिमा अपार है। यज्ञ आरोग्य की दृष्टि से सर्वोपरि सफल चिकित्सा प्रणाली कही जा सकती है। यज्ञ “आप्त काल” कहे गये हैं। बंध्ययात्व के निवारण से लेकर राजयक्ष्मा जैसे कठिन रोगों के निवारण में यज्ञ का असाधारण और समस्या रहित उपचार होता रहा है।

यज्ञ के माध्यम से औषधि के गुणों को अत्यधिक सूक्ष्म बना दिया जाता है। इस सूक्ष्मता की शक्ति का कुछ आभास प्राप्त करने के लिये होम्योपैथी के औषधि विज्ञान प्रक्रिया को देखा जा सकता है। उसका आविष्कार ही इस आधार पर हुआ है कि अधिक सूक्ष्म होने पर औषधि की शक्ति अनेक गुना अधिक बढ़ जाती है।

हवन में स्वास्थ संवर्धन और रोग निवारण की जो अद्भुत शक्ति है उसका कारण पदार्थों को वायु भूत बना कर उसका लाभ लेना ही है। वायुभूत बनी हुई औषधियाँ जितना काम करती हैं उतना वे खाने-पीने से नहीं कर सकती। तपेदिक आदि रोगों के रोगियों को डॉक्टर लोग भुवाली, शिमला, मंसूरी जैसे अच्छी वायु के स्थानों में जाकर रहने की सलाह देने हैं। कई अच्छे अस्पताल भी वहाँ बने हैं। डॉक्टरों का कहना यह है कि औषधि सेवन के साथ-साथ यदि उत्तम आक्सीजन मिली वायु सेवन की सुविधा हो तो रोग अच्छा होने में बहुत सहायता मिलेगी। निसंदेह प्राण वायु-आक्सीजन भी एक दवा ही है। प्रातःकाल जब वायु में आक्सीजन की मात्रा अधिक होती है, टहलने जाना आरोग्यवर्धक माना जाता है। वायु में लाभदायक तत्व मिले हो तो उसकी उपयोगिता का लाभ स्वतः ही मिलेगा। हवन द्वारा यही प्रयोजन पूरा किया जाता है। उपयोग औषधियों को वायुभूत बनाया जाय और उसका लाभ उस वातावरण के संपर्क में आने वालों को मिलें, आरोग्य की दृष्टि से हवन का यह लाभ बहुत ही महत्वपूर्ण है। पौष्टिक पदार्थों के बारे में भी यही बात है। दुर्बल शरीर को बलवान बनाने के लिये पौष्टिक आहार की आवश्यकता अनुभव की जाती है, पर पौष्टिक पदार्थों को कमजोर देह और कमजोर पेट वाला व्यक्ति हजम कैसे करें यह समस्या सामने आती है। दुर्बल या रोगी व्यक्ति की पाचन क्रिया मंद हो जाती है। साधारण हलका भोजन थोड़ी मात्रा में लेने पर भी जब अपच, दस्त, उल्टी आदि की शिकायत शुरू हो जाती है तो अभीष्ट मात्रा में पौष्टिक भोजन कैसे हजम हो? इसका सरल साधन हवन है। अग्निहोत्र में मेवा पदार्थ हवन किये जायें और उन्हें नाक, मुख या रोम कूपों द्वारा ग्रहण किया जाय तो वे शरीर में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं और वायुभूत होने के कारण अपनी सुगमता के आधार पर लाभदायक भी अधिक हो सकती हैं।

यज्ञ का वैज्ञानिक आधार भी यही है कि अग्नि अपने में जलाई गई वस्तुओं को करोड़ों गुना अधिक सूक्ष्म बनाकर वायु में फैला देती है। एक छोटे से प्रयोग द्वारा स्वयं ही इस तथ्य को जाना और अनुभव किया जा सकता है। एक मिर्च उतनी तीखी नहीं होती, जितनी कि बँटने पीसने पर हो जाती है। पीसी हुई मिर्च का स्वाद या प्रभाव भी थोड़े ही लोगों पर होता है किन्तु उसे जला दिया जाय तो आसपास के दसियों फुट की परिधि में उसका असर फैल जाता है। वैज्ञानिक स्तर पर अग्नि की सूक्ष्मीकरण सामर्थ्य फ्राँस के डॉक्टर हाँफकिन तथा मद्रास के डॉ. कर्नल सिंग ने प्रयोगों द्वारा प्रमाणित की है। उनका कहना है कि आग में घी जलाने केसर आदि के धुएं से विष का नाश हो जाता है और वायु में घुले जहर वर्षा के साथ जमीन में चले जाते हैं तथा खाद बनकर पृथ्वी की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं।

हवन की गैस सड़न को रोकती है। शरीर के भीतर या बाहर जिन छोटे बड़े जख्मों के कारण पायेरिया, कोलाइटिस, तपेदिक, दमा, नासूर, कैंसर, संग्रहणी जुकाम आदि रोग होते है, उन्हें सुखाने के लिए हवन की गैस कितनी अधिक उपयोगी सिद्ध होती है, इसका प्रयोग कोई भी करके देख सकता है।

हवन वायु जहाँ रोग निवारक है वहाँ रोग निरोधक भी है। बीमारियों से बचने के लिए हैजा, चेचक, टी.बी. आदि के टीके लिये जाते हैं। इन टीकों से हलके रूप में वही रोग पैदा किया जाता है जिसके प्रतिरोध में टीका बना था। इस प्रकार पहले हलका रोग उत्पन्न करेंगे ताकि भविष्य में बड़े रोगों की चढ़ाई न हो या बुद्धिमानी की बात नहीं है। डाकू से लड़ने के चोर को घर में बसा लेना यह तात्कालिक लाभ की दृष्टि से भले ही उपयोगी हो, पर दूरदर्शिता नहीं है, क्योंकि डाकू न आवे तो भी चोर तो अवसर मिलने पर नुकसान कर ही सकता है। ऐलोपैथिक रोग निवारक टीकों की अपेक्षा हवन की वायु अधिक विश्वसनीय और हानि रहित है। यज्ञ की ऊष्मा शरीर में प्रवेश कर केवल रोग बीजाणुओं को ही मारती है, स्वस्थ कोषों पर उनका तनिक भी बुरा प्रभाव नहीं पड़ता वरन् पुष्टि ही होती है। यह एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है।

शारीरिक रोगों के निवारण करने के अतिरिक्त हवन की वायु में मानसिक रोगों के निवारण की अपूर्व क्षमता है। अभी तक केवल पागलपन और विक्षिप्तता के ही इलाज ऐलोपैथी में निकले हैं। पूर्ण पागलों की अपेक्षा वर्तमान पागलों, अर्धविक्षिप्तों की संख्या शारीरिक रोगियों से भी अधिक है। मनोविकारों से ग्रसित लोग अपने लिये तथा दूसरों के लिए अनेक समस्यायें पैदा करते हैं। शारीरिक रोगों की तो दवा-दारु भी है, पर मनोविकारों की कोई चिकित्सा अभी तक नहीं निकल सकी है। फलस्वरूप सनक, उद्वेग आवेश, संदेह कामुकता, अहंकार, अविश्वास, निराशा, आलस्य, विस्मृति आदि अनेक मनोविकारों से ग्रसित लोग स्वयं उद्विग्न रहते हैं, कलह करते हैं और संबंधित सभी लोगों को खिन्न बनाये रहते हैं। इतना ही नहीं ऐसे व्यक्ति दूसरों की नजरों में गिर जाते हैं और सहयोग सद्भाव खो बैठते हैं। फलस्वरूप उनकी प्रगति ही नहीं रुक जाती बदनामी और हानि भी उठानी पड़ती है। इन सभी मनोविकारों की एक मात्र चिकित्सा हवन है। हवन सामग्री की सुगन्ध के साथ-साथ दिव्य वेद मंत्रों के प्रभावशाली कम्पन मस्तिष्क के मर्म स्थलों को छूते और प्रभावित करते हैं। फलतः मनोविकारों के निवारण में उनका बहुत प्रभाव पड़ता है। भारतीय संस्कृति में जन्म से लेकर मरण तक के षोडश संस्कारों में हवन को अनिवार्य रूप से जोड़ा गया है ताकि उसके प्रभाव से मनोविकारों की जड़ ही कटती रहे। मनुस्मृति में यज्ञ के संपर्क से ब्राह्मणत्व के उदय की बात इसीलिए कही गई है कि हवन की ऊष्मा से संपर्क स्थापित करने वाला व्यक्ति विचारवान और चरित्रवान दोनों ही विशेषताओं से युक्त बनता है। ऐसे ही लोगों को ब्राह्मण कहते हैं।

रोग निरोधक और निवारक गुणों के अतिरिक्त यज्ञ वायु में स्वास्थ संवर्धन का भी गुण है। जो पौष्टिक पदार्थ एवं औषधि तत्व शरीर में प्रवेश करके रक्त में मिलते हैं वे जीवनी शक्ति बढ़ाने में सहायता करते हैं और जो कमी किसी विशेष अंग की शक्ति में आ गई थी उसे पूरा करते है। नपुँसकता, मधु मेह, रक्तचाप, अनिद्रा, नाड़ी संस्थान की दुर्बलता आदि रोगों में हवन की निकटता का आश्चर्यजनक लाभ होता है। संतान उत्पन्न करने की क्षमता बढ़ती है। प्राचीन काल में पुत्रेष्टि यज्ञ इसी प्रयोजन के लिए होते थे। गर्भवती स्त्रियाँ हवन की समीपता का लाभ उत्तम संतान के रूप में देख सकती हैं और वन्ध्यात्वदोष दूर हो सकता है।

यज्ञ किसान इन दिनों तो ऐसे ही धार्मिक कर्मकाण्ड प्रक्रिया तक सीमित रह गया है, पर उसमें उपयोगी पदार्थों को अग्नि के माध्यम से सूक्ष्मीकरण का रहस्यमय विज्ञान भी जुड़ा हुआ है, इसे बहुत कम लोग जानते हैं। थोड़ी-सी हवन-सामग्री यों अपने स्थूल रूप में जरासी जगह घेरती और तनिक-सा प्रभाव उत्पन्न करती है, पर जब वह वायु भूत होकर सुदूर क्षेत्र में विस्तृत होती है तो उस परिधि में आने वाले सभी प्राणी और पदार्थ प्रभावित होते हैं। स्वल्प साधनों को अधिक शक्तिशाली और अधिक विस्तृत बना देने का प्रयोग यज्ञ प्रक्रिया में किया जाता है। फलतः उसके प्रभाव क्षेत्र में आने वालों को शारीरिक व्याधियों से ही नहीं मानसिक “आधियों” से भी छुटकारा पाने का अवसर मिलता है।

शरीर के अवयवों को प्रभावित करने के लिये औषधियों का लेप, खाना पीना या सुई लेने से उपचार हो सकता है। किन्तु मानसिक रोगों एवं मनोविकारों की निवृत्ति के लिये उपचार सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो मस्तिष्कीय कोषों तक पहुँचने और अपना प्रभाव उत्पन्न करने में समर्थ हो सके। यह कार्य यज्ञ से उत्पन्न हुई शक्तिशाली ऊर्जा से सम्पन्न हो सकता है। वह नासिका द्वारा, रोमकूपों एवं अन्यान्य छिद्रों द्वारा शरीर में प्रवेश करती है। विशेषतया मस्तिष्क के भीतरी कोषाणुओं तक प्रभाव पहुँचाने के लिए नासिका द्वारा खींची हुई वायु ही काम कर सकती है। यदि उसमें यज्ञ-प्रक्रिया द्वारा प्रभावशाली औषधियों और मंत्र ध्वनियों का समावेश किया गया है तो उनका समन्वय विशेष शक्तिशाली बनेगा और मानसिक विकृतियों के निराकरण में अति महत्वपूर्ण उपचार की भूमिका सम्पन्न करेगा। यही शोध अनुसंधान ब्रह्मवर्चस की यज्ञोपैथी की विद्या का एक अति महत्वपूर्ण पक्ष है।


जीवित मंत्र (kahani)

प्रजातंत्र जब असफल होता है तो उसका स्थान तानाशाही लेती है इस दुर्भाग्य का कारण है दुर्बल सरकारें। प्रजातंत्र में सफल सरकार वह है जो भय और गरीबी से जनता को बचा सके। अन्यथा लोग सब खो बैठेंगे और गृह युद्ध जैसी स्थिति में तानाशाही उठ खड़ी होती है। प्रजातंत्र की सफलता ऐसी सशक्त सरकार पर निर्भर है जो जनता के हितों की रक्षा कर सके। ऐसी सरकार बना सकने के लिए सशक्त और सजग जनता का होना आवश्यक है। वस्तुतः जाग्रत जनता ही प्रजातंत्र सफल बनाती है और वही उसका लाभ लेती है।

श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि “गायत्री संध्यावंदन की आत्मा है, और उसके जप से ही संध्या का फल मिलता है। ब्राह्मणों के संध्यावन्दन की परिणति गायत्री में होती है और गायत्री की ॐ में होती है।”

स्वामी विवेकानन्द भी प्राणायाम के अवसर पर गायत्री का जप करने का समर्थन करते थे। उनके मतानुसार-”गायत्री का नियमित जप करते रहने से नीच आदमी भी बदल कर बहुत ऊँचे दर्जे पर पहुँच सकता है। भारत वर्ष में जात-पाँत और सामाजिक प्रथाओं में विभिन्नता की हो बहुत बड़ी बाधा पाई जाती है, उसके प्रतिकार का उपाय यही है कि जैसा भगवान् कृष्ण ने भगवद्गीता (अध्याय 4 श्लोक 13 ) में कहा है हमको पुनः हिन्दू समाज में चार वर्णों के पुनर्स्थापन का प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए गायत्री की उपासना भी बड़ी उपयोगी है क्योंकि उसमें कहा गया है कि हम इस ब्रह्मांड का सृजन करने वाले परम्-तत्व का ध्यान करते हैं, वह हमारे मन को-अन्तःकरण को प्रकाशित करें।” पवित्रता, ओज, गहनता, माधुर्य, हृदयंगमता, प्रसाद पूर्णता की दृष्टि से वेद की ऋचाएँ अद्वितीय है। उनमें गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ है इस मंत्र के जप से मनुष्य का मन शान्त ही नहीं होता वरन् उसके महान तेज से उसका हृदय भी प्रकाशित होता है। यह एक जीवित मंत्र है।


हम मोती उस माला के


हम मोती उस माला के (kavita)

जिसकी काँति गगन तक फैली, हम मोती उस माला के, जिसने किया जगत आलोकित, हम कण हैं उस ज्वाला के।

महाशक्ति के साथ जुड़े हैं, इसका हमें गुमान है, हममें से हर भक्त राम का, अंगद है, हनुमान है,

भिक्षु-परिव्राजक हम तो हैं, सभी बुद्ध भगवान के, हम वाहक हैं गुरुसत्ता से प्राप्त, अमर सद्ज्ञान के, ग्वाल-बाल हम हैं गिरधर के, सखा उसी नँदलाल के।

हममें फूँके प्राण, उबरा यूँ निर्जन वीरान से, हमें तराशा हीरे जैसा, लाकर किसी खदान से,

पारस बनकर छुआ,भरे हम स्वर्णिम नये निखार से, कुरु से जुड़कर लगे लहरने, हम गंगा की धार से, गंगोत्री के जल हैं हम तो, नहीं नीर नद-नाला के।

कल का समय भयंकर होगा, डूबा गर्द-गुबार में, मानव का पुरुषार्थ न काफी, होगा इस संसार में,

गुरुसत्ता है ज्योतिपुँज, हम जुड़ें अपरिमित ज्योति से, उबर सकेंगे केवल जुड़कर, उसी शक्ति के स्रोत से, किरणें बनकर बिखर जायेंगे, हम उस प्रखर उजाला के।

गुरु का यह संदेश लिये, जायेंगे सकल जहान में, धुल बुहारेंगे जो फैली, हर मन में-इंसान में,

हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा, लेकर यह आदर्श हम, अपना कर उत्थान, सभी का कर देंगे उत्कर्ष हम, शिष्य साहसी हैं हम सब तो, शांतिकुंज की शाला के।

-शचीन्द भटनागर


जीवन-मूरि


जीवन-मूरि (kavita)

धुल गया है प्राण में विष, पर कहीं हैं अमृतकण भी। आजकल तो बस यही, एहसास जीवन दे रहा है॥

“नेति-नेति” कहा गया व अगम अगोचन भी बने तुम। “व्याप्त कण-कण में हो” यह विश्वास जीवन दे रहा है॥

इस जगत की गंध ने तो, कर दिया मस्तिष्क ही क्षत। किन्तु नंदन का मलय वातास, जीवन दे रहा है॥

हो भले आकाश में पाताल में, बैकुँठ में तुम। “उर गुहा में हो” यही आभास जीवन दे रहा है॥

शेष सांसें कालक्रम की, क्रामिक गिनती मात्र ही थीं। लिख जिस पर “राम” वह निःश्वास जीवन दे रहा है॥

इस जगत की हलचलों ने, कष्ट और दुख ही दिया है। आत्म और परमात्म-तत्वी, रास जीवन दे रहा है॥

रात के तम ने अनेकों, भाँति प्राणों को छला था। उदित सविता का पवित्र उजास, जीवन दे रहा है॥

-माया वर्मा


परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

इस अंक में गायत्री जयंती (30 मई 1993) के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है पूज्यवर द्वारा दिया गया गायत्री जयंती 1983 का एक उद्बोधन जिस में गायत्री महाविद्या के गुह्यतम पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। पढ़े-अमृतवाणी

गायत्री मंत्र कृपा कर हमारे साथ-साथ कहिए- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों! जिस पुनीत गायत्री पर्व को आप मनाने के लिए आये हैं, उसका बहुत महत्व है। आपने तो केवल उसको सुना है, पर मैंने देखा है। आपने तो केवल उसको आपके लिए यह पर्व सामान्य जानकारी के लिए आकर्षक भी हो सकता है, पर मेरे लिए तो जीवन है। मेरे नस-नस में गायत्री पर्व घुसा हुआ है। माँस में, अस्थियों में, मस्तिष्क के प्रत्येक कण में घुसा हुआ है। जीवन की गतिविधियों में भरा हुआ है। ऐसा है यह गायत्री पर्व, जिसके लिए कितनी श्रद्धा लेकर हमने इतनी लम्बी जिन्दगी ली ली। इसमें कोई शक नहीं कि आपका दृष्टिकोण दूसरा हो सकता है और मेरा दूसरा, लेकिन हमारे दानों के लिए यह हमारी माँ है। आप छोटे बच्चे हों तो क्या और हम बड़े बच्चे हों तो क्या? लेकिन हम दानों की माँ एक ही है-’गायत्री माता’ जिसको हम भारतीय संस्कृति की जननी कहते हैं। भारतीय धर्म की जीवात्मा कहते हैं। वेदों के मंत्रों से लेकर पुराणों तक का सारा वाङ्मय जिसकी व्याख्या के स्वरूप बना, जिसके सारे देवी-देवता, 24 देवता, त्रिपदा के तीन देवता, 24 अक्षरों के 24 अवतार, सारे का सारा पूजा-पाठ का परिकर-गायत्री के अलावा और कुछ है नहीं। भारतीय संस्कृति और भारतीय धर्म विरुद्ध गायत्री स्वरूप हैं।

गायत्री की महत्ता के बारे में कितना सारा बताया गया है, कितने गुण गाये गये हैं। लेकिन आमतौर से आदमी निराश देखे गये हैं और यह कहते सुने गये है कि हमको वे लाभ सुनने को तो मिलते हैं पर पायें नहीं जा सकते। मेरा मत इससे भिन्न है। आपकी शिकायत है कि गायत्री का कोई चमत्कार हमने नहीं देखा, लेकिन मैंने देखा है। कुछ ऐसे भी चमत्कार हैं जो मैं आपको भी दिखा सकता हूँ, पर कुछ ऐसे हैं जो मेरे लिये देखना संभव नहीं अथवा दिखाना नहीं चाहता। गायत्री के ऐसे सारे के सारे चमत्कारों के बारे में ऋषियों ने जो कुछ भी कहा है, उन्हें अक्षरशः मैंने सही पाया है। फिर आपने गलत क्यों पाया और मैंने सही क्यों पाया? गायत्री जयंती के पुण्य पर्व पर आइये इसी महत्वपूर्ण तथ्य पर प्रकाश डाले और पर्दे को उठाने की कोशिश करें कि हमारे लिये गायत्री क्यों चमत्कारी है और आपके लिए क्यों निराशाजनक हैं। अक्षर तो वही 24 हैं। माला तो वही है। पूजा के विधि-विधान भी वही हैं, फिर आप में फरक कैसे पड़ गया। हम यही चाहते हैं कि आप इसे जाने लें।

गायत्री के संबंध में हमारे गुरुदेव ने जब पहले दिन आये थे, तभी उसका तत्वज्ञान समझा दिया था और कहा था कि गायत्री की शक्ति बादलों की तरह बरसाती है, लेकिन इसके लिए एक शर्त है कि मिट्टी मुलायम होनी चाहिए और गड्ढा होना चाहिए। मिट्टी मुलायम होगी तो हरियाली पैदा हो जायगी और गड्ढा होगा तो बादलों का पानी जमा हो जायेगा। टीले के ऊपर, चट्टानों के ऊपर पानी बरसेगा तो हरियाली कैसे पैदा हो जायगी? बादल अपने आप में ऐ इकाई है, लेकिन समग्र नहीं है। जिसको ग्रहण करना है- धारणा करना है उसकी अपनी स्थिति और योग्यता भी होनी चाहिए, व्यक्तित्व भी होना चाहिए। उन्होंने एक बात और कही जिसे हमने गिरह बाँध ली, पर आप तो सुनने को भी तैयार नहीं हैं। वह थी-’भगवान की कोई साधना नहीं होती। कोई भगवान की साधना कैसे कर सकता है? साधना सिर्फ अपने आपे की करनी पड़ती है। अपने आपे की साधना कर लेने और पात्रता विकसित कर लेने के बाद में दैवी शक्तियों का अनुदान अनायास ही बिना माँगे मिलता हुआ चला जाता है।’ मेरे गुरु ने जिस दिन दीक्षा दी उसी दिन मुझे वास्तविकता समझा दी और कहा-कि सारे का सारा ध्यान अपने ऊपर केन्द्रित कर लीजिये मैंने अपने ऊपर केन्द्रित रखा और यही कहता रहा-आदर्शों को, सिद्धान्तों को भगवान कहते हैं, उत्कृष्टता को भगवान कहते हैं और उसी की आराधना के लिए, उसी की उपासना के लिए अपने हर एक साँस को, हर एक चप्पे को, योग्यता के हर एक कण को मैंने नियोजित कर दिया। हमने भगवान की महत्ता को समझने की कोशिश की और उसने हमको गायत्री के नजदीक ला दिया। आप तो लाखों मील दूर हैं इसलिए कि आपने केवल सुना है और कृत्यों को किया है, अतः निराश नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे। लेकिन हमको-पूरी तरीके से सच्चे मन से हजार बार कहने की हिम्मत पड़ती है कि गायत्री शक्तिवान है, सामर्थ्यवान है और चमत्कारी है। गायत्री में वह सब कुछ है जिसके बारे में बताया गया है।

लेकिन मित्रों! यह कैसे संभव हो सका? ऐसे संभव हो सका कि हमारे दृष्टिकोण में और आपके दृष्टिकोण में फरक रहा। आपने उस तरीके से उपासना की कि आपको लाभ मिला या नहीं, परन्तु हमारी नीयत दूसरी ही रही है। हमने पाने का कभी विचार ही नहीं किया। शुरू के दिन से आखिरी दिन तक हमने केवल देने का ही विचार किया है। आपने किस स्तर की उपासना की है? हमने दधिचि जैसे स्तर की उपासना की है। हमने कमाया तो था, लेकिन देवताओं से कहा-’कुछ हमारे पास है। आप दुनिया को देते हैं तो कुछ हमसे भी लेते जाइये।’ ऐसे इनसान होते भी रहे हैं और हर अध्यात्मवेत्ता का स्तर यही होना चाहिए। देवता केवल दिया ही नहीं करते, उन्हें भी जरूरत होती है। आप जानते नहीं है क्या? एक बार देवताओं की जरूरत पड़ी थी और वे इंसानों की सहायता माँगने के लिए आये थे। उनने दशरथ से कहा था कि हम बहुत हैरान है और हमको इंसान के मदद की जरूरत है। तब दशरथ जी कैकेयी के साथ अपना रथ लेकर स्वर्गलोक को देवताओं की सहायता करने गये थे। दधिचि ने देवताओं की जरूरत पूरी की थी और हमारे पूजा करने के तरीके भी उसी तरीके से रहे हैं। देवताओं ने एक और आदमी से हाथ पसारा। उसका ना था-अर्जुन। अर्जुन देवताओं की मदद करने के लिए गये थे। मदद करने के बाद में जब देवताओं ने अपना काम बना लिया तो सोचा इसे उसी स्तर का कुछ इनाम देना चाहिए। सो स्वर्गलोक की सबसे खूबसूरत महिला उर्वशी को उनने पेश कर दिया और कहा-पैसे के बाद में लोग खूबसूरती चाहते हैं, विषय-विकारों को चाहते हैं, आप यह ले जाइये। अर्जुन ने मना कर दिया और कहा- हमने तो अपने आपको संयमी जीवन में ढाल लिया है। क्या करेंगे इन बेकार की चीजों को। तब देवताओं ने उससे भी शानदार चीज गाण्डीव इसलिए दिया गया था कि जहाँ कहीं भी उससे तीर चलायेगा, पार करता हुआ चला जायेगा, असफल हो ही नहीं सकता। समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को भवानी से तलवार दिलायी थी-ऐसी शानदार तलवार जो चीरती हुई चली गयी-पार करती हुई चली गयी।

मित्रों! मैंने वहीं किया है। उपासना मैंने इसी ढंग से की है। हमने सिर्फ एक काम किया है-अपने आपको धोया है, अपने आपके ऊपर पॉलिश की है और अपने आपको रगड़ करके तेज चाकू की तरीके से बना दिया है कि जहाँ कहीं भी मारेंगे चीरता हुआ चला जायेगा। यह है हमारा व्यक्तित्व और आप तो उलटा चलते हैं। पूजा उपासना को जीवन से दूर रखना चाहते हैं। बिजली के पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तारों को अलग-अलग रखना चाहते हैं तो उनके अंदर करेण्ट कैसे आयेगा। उपासना में त्याग की बात सिखाई जाती है और आप भोग की बात कहते हैं। योग भावनात्मक है, क्रियापरक नहीं। योग में जहाँ लोभ और मोह के ऊपर अंकुश लगाना पड़ता है वहाँ आप उसी की पूर्ति करना चाहते हैं। आप उलटा चलते हैं। मैं आपके विचारों में क्राँति लाना चाहता हूँ न केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में, वरन् सामाजिक क्षेत्र में व्यवस्था के क्षेत्र एवं भावनात्मक क्षेत्र में, वरन् सामाजिक क्षेत्र में, व्यवस्था के क्षेत्र एवं भावात्मक क्षेत्र में भी क्राँति लाना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि यह गायत्री जयंती के पुनीत पर्व पर आप भी अपने मन की सफाई कर ले जाइये, ब्रेनवाश कर ले जाइये, दिशा लेकर जाइये और उस वास्तविकता को जानकर जाइये कि जहाँ से चमत्कार उत्पन्न होते हैं, सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं।

हमारे जीवन में ऐसा ही हुआ। 24 साल तक उपासना करता रहा और सिर्फ जौ की रोटी और छाछ खाता रहा अपनी जीभ को धोते रहने के लिए। इसलिए कि जिस जीभ से मुझे मंत्रों का उच्चारण करना है, आशीर्वाद देने है, उपदेश देने है, लोगों को सलाह देनी है उस जीभ को जरा पैनी तो कर लूँ, फौलाद की तो बना लूँ। इसलिए मैंने अपनी जीभ से जद्दोजेहद की है। हमने प्रत्येक के ऊपर संयम किया है हमने समय के ऊपर, विचारों के ऊपर और अपने पैसे के ऊपर संयम किया है। हमने किसी का खाया नहीं-खिलाया है। हमने अपने आपसे जद्दोजेहद की है। पैसे के बारे में जद्दोजेहद, दिमाग के बारे में जद्दोजेहद, आचरण के बारे में जद्दोजेहद, समय के नियंत्रण के बारे में जद्दोजेहद किया है। हमारा मनोरंजन एक ही रहा है-भगवान का काम। हमारी भावना एक है, मन एक है, लक्ष्य एक है। हमारा प्रिय एक है और वह है हमारा भगवान। सोते हुए सपना दीखता है तो हमको भगवान का दीखता है। पूजा की कोठरी में बैठते हैं तो हमें चारों ओर भगवान की सुगंध आती है। जहाँ कहीं भी जाते और अपना दिल टटोल कर देखते हैं तो वहाँ भगवान धड़कता हुआ दिखाई पड़ता है। हमने भगवान को अनुभव किया है, पर आप तो देखने की फिराक में रहते हैं। क्या देखेंगे भगवान को? आँखों से मिट्टी देखी जाती है। मिट्टी के अलावा क्या किसी ने देखा है भगवान को? देखा किसी ने नहीं है, पर अनुभव किया है। हमने अपनी प्रत्येक गतिविधियों में, उद्देश्यों में, विचारों में भगवान को नाचते हुए-रास करते हुए देखा है, हमारी नियति और गतिविधियां अध्यात्म के सही तरीके खाती हैं। हम यह अनुभव करते हैं कि अध्यात्म के सही तरीके से हम नजदीक आये हैं और सही तरीके से फायदा उठाने में समर्थ हो गये हैं।

मित्रों! हमने क्या किया और क्या पाया पाने की बात मलम है आपको जिसे मैं हजार बार बता चुका हूँ। शरीर की बाबत बता चुका हूँ कि यह शरीर भगवान का है। हमने अपने शरीर को भगवान के हाथों बेच दिया है। अब यह हमारा नहीं, हमारे ‘बास’ का है। इसलिए उसको इसकी एक बार नहीं 99 बार रखवाली करनी पड़ेगी। हमने अपनी अकल भगवान को बेच दी है। अब यह भगवान की जिम्मेदारी है कि अकल को सँभाले। आइन्स्टीन के दिमाग के बारे में पहले ही 10 लाख डॉलर के बीमे कराये गये थे कि मरणोपराँत उनका दिमाग निकाल लिया जायेगा और रिसर्च लैबोरेटरी में यह खोजबीन की जायेगी कि उनका इतना शानदार दिमाग किस तरीके से हो गया है। अपने बारे में अभी तो मैं कुछ नहीं बताता पर पीछे देख लेना हमारे दिमाग के बारे में। हमने ऐसी-ऐसी अजीब कल्पनायें की हैं कि सारे विश्व के 450 करोड़ मनुष्य तराजू के एक पलड़े पर और हमारा बाट एक पलड़े पर। हम जमीन पर रहने वाले 450 करोड़ मनुष्यों के भाग्य को बदल डालने का दावा करते हैं। उनको हैरानी से बचा लेने का दावा करते हैं। आदमी के उज्ज्वल भविष्य की संरचना का दावा करे हैं और इन दिनों चल रही वे हवायें जिनसे एक-एक आदमी उलटा हो जाता है-इन हवाओं को-फिजाओं को मोड़-मरोड़ डालने का दावा करते हैं हम। हमारी सम्पदाओं-विभूतियों का अता-पता नहीं है, किसी को। हमारे पास बहुत सम्पदायें हैं और हमारी सेवाओं के बारे में जिसे हर आदमी जानता है कि गुरुजी के दरवाजे पर से कोई भी आदमी खाली नहीं गया है। यह हमारा शान है। इस शान को हम कायम रखेंगे। आपकी मनोकामनाओं के बारे में हमारी सहायता तो नहीं के बराबर है, लेकिन अगर आप सौ मन मुसीबत लेकर आये थे तो 25 मन मुसीबत हमने मिटा दी है। आपकी सौ फीसदी जरूरतें हम कहाँ से पूरी करेंगे, लेकिन हम यकीनपूर्वक कह सकते हैं कि ईमानदारी के साथ अपनी सामर्थ्य के अनुसार हमने हर आदमी को पूरा-पूरा फायदा पहुँचाया है। मित्रो! यह हमारे चमत्कार हैं जिसे आप जानते हैं और जो नहीं जानते, उन बहुत-सी बातों को हमने छिपा कर रखी हैं। छिपाकर रखी गयी बातों को जानने के लिए उस समय तक इंतजार करना पड़ेगा। आपको जब तक हमारा शरीर जिंदा है। सबूत हमने सब जमाकर रखे हैं। हमने कहा है कि आदमी के पाँच शरीर होते हैं और हम पाँच शरीरों से काम करते रहे हैं। हमारे जाने के बाद आप देख लेना कि आचार्य जी एक नहीं-पाँच शरीरों से काम करते रहे हैं, और बहुत-सी बातें हैं जो हमने सब छिपाकर रखी हैं। आप देख लेना वे चमत्कार जिन्हें रहस्य कहते हैं, जादू कहते हैं, अतीन्द्रिय क्षमतायें कहते हैं, वे सब भी हमारे पास हैं।

गायत्री को त्रिपदा कहते हैं। इसकी व्याख्या सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् के रूप में, सरस्वती, काली-लक्ष्मी के रूप में, ब्रह्म-विष्णु-महेश के रूप में सच्चिदानन्द के रूप में की जाती है। यह उसका दर्शन पक्ष है। दर्शन और प्रयोग-कर्मकाण्ड पढ़ना हो तो ‘गायत्री महाविज्ञान’ में हमने सब कुछ लिख दिया है, पढ़ लीजिये। और भी कर्मकाण्डों को देखना हो तो आद्यशंकराचार्य की ‘गायत्री पुरश्चरण पद्धति’ तथा देवी भागवत पढ़िये। पर जो बात मैं बताना चाहता हूँ वह सिर्फ एक है कि आदमी के जीवन में गायत्री का समावेश कैसे हो? आदमी के जीवन में गायत्री का समावेश कैसे हो? अध्यात्म थ्योरी में नहीं व्यक्तित्व में होना चाहिए और व्यक्तित्व थ्योरी में नहीं रहता, वह आदमी के साथ घुला रहता है। हमारे साथ व्यक्तित्व घुला हुआ है। अध्यात्म हमारे मस्तिष्क में नस-नाड़ियों में, क्रिया–कलापों में, गतिविधियों में, चिन्तन में-सबमें घुला हुआ है। हमारे तीन शरीर हैं, आपके भी तीन शरीर हैं। एक है हमारा कारण शरीर जिसको अन्तरात्मा या अन्तःकरण कहते हैं। उससे हमने उपासना की है, मस्तिष्क से साधना और शरीर से आराधना की है।

उपासना कहते हैं नजदीक आने को। लकड़ी और आग जब नजदीक आ जाते हैं तब लकड़ी आग हो जाती है। हमने अपने आपको भगवान् के लिए समर्पित किया है और कहा है कि हमारी शक्तियाँ आपकी हैं। हमारा धन आपका है। हमारी अकल आपकी है। आप हुकुम दीजिये कि हमें क्या करना चाहिए? उपासना इसी चीज का नाम है और कोई उपासना नहीं होती यह विशुद्ध रूप से विचारपरक है, भावनापरक है, आस्थापरक है, निष्ठापरक है और श्रद्धा परक है। हमारी उपासना एक है-समर्पण की, श्रद्धा की, हमने नाले की तरीके से अपने आपको नदी के साथ में मिला दिया है और उसमें मिल जाने की वजह से हमारी हैसियत, हमारी औकात, हमारी शक्ति और हमारा स्वरूप नदी जैसा बन गया है। आप भी अपने आपको मिलाइये न और भगवान से कहिए न कि आप हुकुम कीजिए-आज्ञा कीजिए और हम चलेंगे। हमारी उपासना हमारे ऊपर इसी रूप में छायी रही है। उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है-”सपनेहु आप पुरुष जग नाही।” आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रों! हमारे भीतर श्रद्धा है। हमने एक का पल्ला पकड़ लिया है और सारे जीवनभर उसी का पल्ला पकड़े रहेंगे। हमारा प्रियतम कितना अच्छा है। उससे अधिक रूपवान, सौंदर्यवान, दयालु और सम्पत्तिवान और कोई हो नहीं सकता। हमारा वाही सब कुछ है वही हमारा भगवान है। आप ऐसी निष्ठा पैदा नहीं करेंगे क्या? उपासना इसी को कहते हैं जिसमें समर्पण की भावना हो-माँगने की नहीं देने की भावना हो। जवान औरत आती है और अपना ईमान, अपना मन, अपनी भावना, अपना शरीर, अपना गोत्र, वंश सब पति के हाथ पर रख देती है। हमने भी सब कुछ रख दिया है अपने पति के हाथ पर और कहा है कि हम आपके हैं और आपके होकर के रहेंगे। आपके अलावा हमारा कौन है और हम किसके-नजदीक जायेंगे। किसका पल्ला पकड़ेंगे। आपका कहना नहीं मानेंगे तो किसका मानेंगे। आप ही हमारे हैं और हम आपके हैं। मित्रों! यह उपासना है हमारी जिसने हमारी अन्तरात्मा को भक्ति से भर दिया है। भक्ति कहते हैं समर्पण को। इसी को ‘अद्वैत’ कहते हैं, ‘एकत्व’ कहते हैं।

गायत्री उपासना का दूसरा स्वरूप है-साधना। साधना अपने आपको करने को कहते है। हमने अपने आपको कितना कसा है, शरीर को, इन्द्रियों को कितना कसा है। अपने व्यवहार को कितना कसा है। अपनी इच्छा-आकाँक्षाओं और महत्वाकाँक्षाओं को चूरा करके फेंक दिया है। अपने आप को धोने के लिए परिष्कृत करने के लिए हमने धोबी के तरीके से बेरहमी के साथ पीट-पीट कर धोया है और धुनिये के तरके से अपने आपको धुना है। क्या आप अपने आप से जद्दोजेहद नहीं करेंगे? अपने आप से लड़ेंगे नहीं क्या? गायत्री का चमत्कार देखने का अगर आपका मन है, वास्तविक रूप में गायत्री से मोहब्बत है तो आप साधना के लिए अमादा हो जाइये साधक बनिये। साधना भगवान की नहीं अपनी होती है। भगवान पर क्या चंदन चढ़ायेंगे, चावल चढ़ायेंगे, स्नान करायेंगे? भगवान पर रहम कीजिए। पहले अपनी गंदगी धोइये, अपने को स्नान कराइये। अपना तो कराते नहीं हैं स्नान-भगवान को और करायेंगे। अपने आपको धोइये-साधना इसी को कहते हैं।

मित्रों! हमने आराधना की है। आराधना उसे कहते हैं जिससे सेवा पूजा करनी पड़ती है। सेवा हमने भगवान की है। भगवान किसे कहते हैं? सिद्धान्तों को कहते हैं, आदर्शों को कहते हैं। उन खिलौनों को भगवान नहीं कहते जिनको आपने भगवान मान रखा है। वे तो हमारी ध्यान-धारण के लिए एक ‘मीडियम’ हैं। आदर्शों को भगवान कहते हैं जिसके तई हमारी गतिविधियाँ, हमारे पसीने का एक-एक चप्पा, समय का एक-एक कण लगा है। सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन को-लोकमंगल को, संस्कृति की सेवा को आराधना कहते हैं। सूरज निकलने से लेकर डूबने एक हम बराबर भगवान के काम में लगे रहते हैं। यही हमारा भजन है, उपासना है, तप है और सेवा है। आपकी अन्तरात्मा को उछाल देने के लिए ही हमारी वाणी चलती है। जनता–जनार्दन को ऊँचा उछाल देने के लिए हमारी लेखनी चलती रहती है। हमारी गतिविधियों का चप्पा-चप्पा इसी के लिए चलता रहता है लोकहित के लिए जनता जनार्दन के लिए, सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन के लिए हम बराबर 12 घण्टे काम करते हैं। यह हमारी आराधना है, मसक्कत है। हमारा श्रम है-साधन है। भौतिक सामर्थ्य जो कुछ भी है हमने आराधना में लगा दिया है, चिन्तन साधना में और अन्तःकरण उपासना में लगा दिया है। यह है चमत्कारों के स्रोत। आप इसको सुनना, नोट करके रखना और जहाँ तक संभव हो सके वहाँ तक चलना। भागना नहीं आता दौड़ना नहीं आता तो छोटे बच्चे की तरीके से दीवाल पकड़ कर गाड़ी के सहारे चलना सीखिये-एक कदम आगे बढ़िये। लोभ, मोह की हथकड़ी और बेड़ी को-जिसने आपको मजबूती से जकड़ रखा है-छोड़िये-थोड़ा ढीला करिये फिर देखिये आपको आगे बढ़ने का मौका मिलता है कि नहीं श्रेष्ठता की दिशा में, शालीनता की दृष्टि में, महानता की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाइये। अपने बच्चों, संबंधियों मित्रों के प्रति हमने अपने कर्तव्य का पालन किया है। उनके लिए संस्कृति छोड़ी है, संस्कार छोड़े हैं, परम्परायें छोड़ी हैं और आप तो लालच करते हैं उनके लिए जमा करना चाहते हैं। जो हराम का खायेगा देख लेना उसका पेट फटेगा। पेट फटने का मतलब है-कुमार्गगामी, दुर्व्यसनी होना, हराम का पैसा किसी को भी नहीं फला है। हराम के पैसे ने आज तक किसी को भी निर्मल क्षीर नहीं बनाया है। वह अपनी दुर्गति कराकर रहेगा।

मित्रों! हमारे आध्यात्मिकता की यही निशानी है- एक हमारा पराक्रम-जिसमें हमने पुराने ढर्रे को-लोभ और लालच तो तोड़ने की कोशिश की है और दूसरा पराक्रम-जिसमें हमने आगे बढ़ने की कोशिश की है। इस तरह हम सिद्धान्तों की दिशा में, उद्देश्यों की दिशा में आगे बढ़ते चले गये और उनमें चमत्कार पाया। गायत्री माता बड़ी चमत्कारी है। इसमें सिद्धियों के जखीरे भरे पड़े हैं-साधनों के जखीरे भरे पड़े हैं और न जाने क्या-क्या भरा पड़ा है। गायत्री की महत्ता को मैं किस मुँह से कहूँ जिसमें आदमी भौतिक जीवन में समृद्ध हो जाता है और आध्यात्मिक जीवन में सुसंस्कृत हो जाता है। हमने आध्यात्मिक जीवन में सुसंस्कारिता पायी है और भौतिक जीवन में समृद्धि। यह समृद्धि हमारे काम आयी है और हमारे मित्र और कुटुम्बियों में से हर एक के काम आयी है। ऐसी समृद्धि आप नहीं इकट्ठी करेंगे क्या?

आज गायत्री जयंती के दिन मेरा भाव और मन था कि आपको अपने जीवन के रहस्य निश्चय और अपने विश्वासों को आपके सामने परदे की तरीके से खोल करके ही रहूँ-रहस्यों को बताऊँ। आपको चमत्कारों की दिशा में गायत्री माता का अनुग्रह प्राप्त करने की पूरी-पूरी छूट है, लेकिन इस दिशा में चलिये तो सही। धीरे चलिये, पर शुरुआत तो करिये। शुरुआत करने के लिए हमने प्रज्ञा अभियान चलाया है। इससे दुनिया का भला होगा कि नहीं, पर आपका जरूर भला हो जायेगा। आप अपने आप पर नियंत्रण करते और उदार बनाने में जरूर समर्थ हो जायेंगे। आप समर्थ हो गये तो दुनिया जरूर समर्थ हो जायेंगे। साँचे हमारी सही होंगे तो हम सैकड़ों खिलौने अच्छे ढालने में समर्थ हो सकेंगे। साँचे ही अगर ठीक न हो सकेंगे तो हम दुनिया को कैसे ढालेंगे? आप पहले अपने आपको बदल डालिये। हमने अपने आपको जितना बनाया है, भगवान हमें उसी हिसाब से अनुग्रह देते हुए चले गये। यही है हमारा रहस्य और यही है हमारी आत्मकथा। यही है हमारे सारे के सारे रहस्यों का उद्घाटन जो आज गायत्री जयंती के दिन हमने आप लोगों के सामने अपना जी खोलकर रख दिया है। आपको करना हो तो इसी तरीके से करना-न करना होता तो आपकी मर्जी। आपको खेल-खिलवाड़ पसंद है तो ठीक है बच्चों की तरीके से खेल-खिलवाड़ ही करते रहिए। इससे भी क्या हर्ज है। मनोरंजन ही सही, लेकिन आप लम्बी चीजें नहीं पा सकेंगे। लम्बी चीजें-महत्वपूर्ण चीजें पाने लिए भी जिसकी आज बहुत जरूरत है, आपको यही करना चाहिए। अब हम जगह खाली कर रहे है और आपको उस जगह पर बिठा रहे है और यह कहते हैं कि जैसी शानदार जिन्दगी हमने जी ली, चमत्कारों से भरी हुई जिन्दगी हमने जी ली। जैसे महिमा और गरिमा हमने प्राप्त करली, आपके लिए भी खुला हुआ है। जरा हिम्मत दिखाइये न- हम दावत देते है- आप आइये और जिस रास्ते पर हम चले है आप भी चलिए। जो हिम्मत हमने दिखाई है आप भी दिखाइये और इसी जीवन में धन्य और कृत-कृत हो जाइये। अपने आपको कृतकृत्य बना लीजिए और सारे समाज को धन्य बना दीजिए। ऐसा मौका फिर कभी पायेंगे क्या?

आज गायत्री जयंती के दिन मेरे मन के उद्गार यही थे जो मैंने आप लोगों के सामने पेश कर दिये-व्याख्यान के रूप में नहीं वरन् सिर्फ इसलिए कि आप इस पर विचार करें और गौर करने के बाद में ऐसे कदम बढ़ाये जैसे हमने अपने जीवन में बढ़ाये। इसी आशा के साथ आज हम आप लोगों को विदा करते हैं कि आप इन पर बार-बार विचार करेंगे और बार-बार यह कोशिश करेंगे कि इन सिद्धान्तों को जहाँ तक संभव हो वहाँ तक जीवन में उतारने की कोशिश करेंगे। आज की बात खत्म।

सर्वेभवन्तुसुखिनः सर्वेसन्तुनिरामयः। सर्वेभद्राणिपश्यन्तु माकश्चिद्दुखमाप्नुयात्।


“प्राणः प्रजानाँ उदयत्येष सूर्यः”

काया की छाया, स्थूल का सूक्ष्म, व्यक्त का अव्यक्त, दृश्य का अदृश्य, प्रत्यक्ष का परोक्ष पक्ष सर्वविदित है। ऐसे ही यह गोचर संसार यदि लौकिक है, तो इसकी एक अलौकिक सत्ता भी होनी चाहिए।

विज्ञान भले ही अभी ऐसे ग्यारह लोकों की कल्पना भर कर सका है, पर अध्यात्म विज्ञान में तो 14 लोकों की सुनिश्चित मान्यता है। इनमें से सात पृथ्वी के नीचे और छः ऊपर, सातवाँ पृथ्वी। इस प्रकार कुल चौदह लोक हुए। यहाँ तात्पर्य मात्र इतना भर बताना है कि हर पदार्थ की कम-से-कम एक सूक्ष्म सत्ता अवश्य होती है। इस जगत को आभा और ऊर्जा से अनुप्राणित करने वाला यह प्रकाशवान सूर्य भी ऐसा ही एक ग्रह है। योगी जन इसके सूक्ष्म अस्तित्व से सर्वथा इनकार नहीं करते।

यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या दृश्य के साथ अदृश्य की उपस्थिति संभव है?स्थूल सूर्य का कोई ऐसा कलेवर भी हो सकता है, जो अगोचर स्तर का व्यापक, विस्तृत एवं अधिक सामर्थ्यवान हो? उत्तर “हाँ” में दिया जा सकता है। शरीर की एक समरूप छाया होती है, इसे कदाचित ही कोई अस्वीकार करें। इनकार करने वाले प्रकाश की उपस्थिति में इसका स्पष्ट आभास प्राप्त कर सकते हैं, फिर भी यह सत्य है कि अँधेरे में इसका आपा अनुपस्थित जैसा बना रहता है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह मौजूद नहीं है। विद्यमान तो वह तब भी होती है। अन्तर मात्र इतना होता है कि अंधकार के कारण दिखाई नहीं पड़ती। गहन तमिस्रा में तो अपने ही शरीर के कई अंग-अवयव दृश्यमान नहीं होते, तो फिर सूक्ष्म स्तर की छाया भासमान कैसे हो? फिर भी जो इसका कारण चाहते हों, वे छाया-पुरुष के साधकों का उदाहरण ले सकते और यह देख सकते हैं कि किस प्रकार आवाहन मात्र से उनकी ही अनुकृति आज्ञानुवर्ती सेवक की तरह उनके इर्द-गिर्द डोलने लगती और आदेश मिलते ही क्षणमात्र में वह कार्य कर गुजरती है, जो शरीरधारी कर्ता के लिए शारद ही शक्य हो! ऐसे ही चमत्कार सिद्ध-सन्त अपने सूक्ष्म शरीरों से करते दृष्टिगोचर होते हैं। स्थूल सत्ता एक स्थान पर असमर्थ जैसे स्थिति में पड़ी रह कर जहाँ दीन-हीन साबित होती है, वहीं सशक्त सूक्ष्म शरीर अनेक स्थानों पर एक ही समय में ऐसे कौशल कर दिखाते हैं, जिन्हें अचंभा कहा जा सके। इससे दो बातें सिद्ध होती हैं। प्रथम तो पुरुष की एक छाया-पुरुष जैसी हूबहू अपने ही जैसी, सूक्ष्म प्रतिकृति होती है और दूसरे, वह अपनी अभिव्यक्त सत्ता से अधिक समर्थ होती है। विज्ञान भी अब न्यूनाधिक इसे स्वीकारने लगा है कि हर पदार्थ का अपना एक अव्यक्त अस्तित्व होता है।

प्रसिद्ध विज्ञान वेत्ता एवं प्रख्यात लेखक लायक वाट्सन ने अपनी बेष्ट सेलर कृति “सुपरनेचर” में लिखा है जब किर्लियन ने अपने अद्भुत कैमरे का आविष्कार किया, तो पहली बार पदार्थ विज्ञान से स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश कर उसकी सुनिश्चित पुष्टि की। मात्र पदार्थपरक अस्तित्व पर ही विश्वास करने वाले विज्ञानियों को हैरानी तब हुई, जब उनने उससे वृक्ष-वनस्पतियों, मनुष्यों एवं मानवेत्तर प्राणियों के चित्र उतारने शुरू किये। हर तस्वीर के चारों ओर उन्हें एक विस्तृत नीली आभा दिखाई पड़ी, जो बिल्कुल मूल वस्तु का ही आकार लिए रहती है। बाद में उसे आभामंडल, आँरा आदि कूल वस्तु के अव्यक्त अस्तित्व जैसे संबोधनों से संबोधित किया गया। अध्येताओं को आश्चर्य तब हुआ, जब उन्हें कटी पत्तियों में भी संपूर्ण पत्ते के चित्र प्राप्त हुए। उनका अनुमान था कि आधे पत्तों के अपूर्ण प्रभामंडल की प्राप्त होंगे, पर तथ्य उलटा ही हस्तगत हुआ। ऐसे ही एक अन्य अवसर पर एक कटी टाँग वाले व्यक्ति का किर्लियन फोटो लिया गया, तो उसमें टाँग का वह भाग भी वहाँ स्फूट मौजूद देखा गया, जिसे कभी पृथक कर दिया गया था। इससे उनकी यह भ्रान्ति मिट गई कि स्थूल अवयव के विनष्ट होने के साथ-साथ उसका सूक्ष्म वजूद भी समाप्त हो जाता है।

इसी मत समर्थन करते हुए डॉ. गोपीनाथ कविराज अपने “सूर्य विज्ञान रहस्य” में लिखते हैं कि पदार्थ का प्रवाह सदा भविष्य से वर्तमान, वर्तमान से भूत के क्रम में चलता है। जो वस्तु अभी नहीं है, जो कल्पना, जो घटना अभी अघटित है, वह अनागत के गर्भ में पल-पक रही है, फिर वह वर्तमान बनती है, तत्पश्चात् अतीत के, विस्मृति के क्रोड में समा जाती है, किन्तु फिर भी उनका अस्तित्व एकदम समाप्त नहीं हो जाता। जो होता है वह मात्र इतना है कि वह तिरोहित स्तर का बन जाता है, परन्तु रहता अवश्य है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अनादिकाल से अब तक जो-जो वस्तुएँ वजूद में आयी है, अथवा आने वाली हैं, प्रकृति में चिरकाल से अपना आपा सदा बनाये हुए हैं। विज्ञान अपने शोध-अनुसंधान के दौरान इन्हीं का अन्वेषण करता और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर की ओर निरन्तर बढ़ता चलता है।

आकाश में चमकने वाला अपना सूर्य भी पदार्थपरक एक पिण्ड है। यों प्रत्यक्ष में तो वह प्रकाश और ऊष्मा बिखेरने वाला अग्नि का गोला भर प्रतीत होता है, पर वैज्ञानिक बताते हैं कि यदि यह जलता गोला किसी कारण नहीं होता, तो आज यह पृथ्वी आबाद नहीं होती। अतिशय दण्ड के कारण यहाँ बर्फ जमी रहती और रोशनी के अभाव में असा-निशा की-सी स्थिति होती। इस पुष्टि से यह दिनमान महत्वपूर्ण तो है, किन्तु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण वह अंशुमाली है, जो इन चर्मचक्षुओं को दिखाई नहीं पड़ता और हृदयाकाश में सहस्रों रविओं से भी अधिक देदीप्यमान बनकर चमकता रहता है। योगी-यती इसी की झलक-झाँकी पाने के लिए योगरत रहते और जन्मों बिता देते हैं। यह वही सूक्ष्म सत्ता है, जिसकी स्थूल अभिव्यक्ति हम दृश्य जगत के अन्तरिक्ष में उदीयमान देखते हैं एवं जिसके बारे में श्रुति का उद्घोष है-”सूर्य आत्मा जमतस्तस्थुशस्च” अर्थात् यह सूर्य जगत की आत्मा है। यहाँ “सूर्य” शब्द से विश्व को प्रकाशित करने व आकाश में उगने वाले सूरज से किसी को अर्थ नहीं लगाना चाहिए और न यह भ्रम पालना चाहिए कि यही विश्वात्मा है। भला एक जगह अचल रहने वाला सर्वथा जड़ पदार्थ संसार की आत्मा कैसे हो सकता है? आत्मा तो सर्वव्यापी परमात्मा की अंशधर है। उसे तो वही गुण अपने में सँजोये रहना चाहिए, जो ईश्वर में है, पर वह तो चेतन भी नहीं फिर जगत की आत्मा किस भाँति को सकता है? दूसरी दृष्टि से विचार करें, तो आत्मसत्ता को शरीरसत्ता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहना चाहिए-ऐसा प्रतीत होता और प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है। देखा गया है कि आत्मा के पृथक होते ही प्राणियों का प्राणान्त हो जाता व शरीर सड़ने-गलने लगता है। यदि इस दृश्य सूर्य को जगत की आत्मा मान लिया जाय, तो स्कैण्डिनेवियाई देशों में से नार्वे, स्वीडन आदि राष्ट्रों में कई ऐसे स्थान हैं, जहाँ तीन-तीन महीनों तक सूर्य के दर्शन नहीं होते। फिर भी वहाँ जनजीवन सामान्य बना रहता है। उक्त अवधारणा की आरे यदि श्रुति का आशय रहा होता, तो फिर वहाँ मरण का नग्न नृत्य ही दिखाई पड़ना चाहिए, किन्तु ऐसा दीखता कहाँ है? इससे स्पष्ट है कि आप्तजनों का आशय दृश्यमान दिवाकर से नहीं, वरन् उस चेतन सत्ता से है, जिसे “सविता” कहा गया है। यह बात आगे के सूत्र से और भी साफ हो जाती है-”प्राणः प्रजानाँ उदयत्येष सूर्यः” अर्थात् यह उदीयमान सूर्य ही जीवधारियों में प्राणशक्ति के रूप में प्रकट होता है। यदि यहाँ तात्पर्य जड़ जगत के सूर्य के आधिभौतिक रूप से लगाया गया, तो अनेक विसंगतियाँ उठ खड़ी होंगी, यथा-गर्मी और रोशनी विकीर्ण करने वाला स्थावर पिण्ड प्राण के रूप में प्राणियों में किस प्रकार प्रस्फुटित हो सकता है? अतः यह मान कर चलना ही बुद्धिमानी होगी कि जो स्वयं चेतन है, वही प्राण चेतना के रूप में अन्यत्र प्रकट हो सकता है। सविता में ही यह गुण है। इस प्रकार यहाँ भी संकेत उसी सूर्य से है, तो हर एक के अंतराकाश में उदीयमान है। श्रुति में इसी का समर्थन दूसरे प्रकार से यह कहकर दिया गया है-

सहस्ररश्मि शतधा वर्तमानः। प्राणः प्रजानामुदयंत्येष सूर्यः॥

अर्थात् प्राण ही सहस्र रश्मियों वाला सैकड़ों प्रकार से वर्तमान प्रजा को उत्पन्न करने वाला सूर्य है। इसी की ओर उँगली निर्देश करते हुए गीता में भगवान कहते हैं-”ज्योतिषाँ रविरंशुमान (10/21)”। ज्योतियों में मैं सूर्य हूँ। इसे ही यजुर्वेद में यों कहा गया है-”ब्रह्म सूर्य समं ज्योतिः (23/48)” अर्थात् ब्रह्म सूर्य-ज्योति के समतुल्य है। जिस तरह भौतिक दिनमान सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करता रहता है, उसी प्रकार चैतन्य सूर्य जिसको प्रायः “सविता” के नाम से पुकारा गया है, उसकी ज्योति से जगत का समस्त जड़ चेतन, कण-कण, अणु-अणु समान रूप से प्रकाशित हो रहा है। यह सविता-प्रकाश की ब्रह्म है। यही छान्दोग्य उपनिषद् का निर्देश है-

“आदित्यो ब्रह्मत्यादेशस्तस्यों पष्याख्यानम्” (3/19/1)

अर्थात् आदित्य ही ब्रह्म है। यह महर्षियों का आदेश है। इसमें परमेश्वर की सत्ता को समझने का उपदेश है।

सूर्य ब्रह्म कहलाने का अधिकारी तभी हो सकता है, जब उसकी सत्ता हर स्थिति और अवस्था में हर क्षण समूची दुनिया को अपनी आभा प्रदान कर रही हो, पर प्रत्यक्ष में ऐसा होता कहाँ दीखता है? आकाश में उगने वाला गोला तो रात्रि के पहर पूरी धरित्री को गहन तम में धकेल देता है। उस वक्त उसकी किरणों से वसुँधरा वंचित होती है, फिर उसे ब्रह्म कैसे कहा जाय? और जहाँ ब्रह्म का प्रकाश न हो, वहाँ यह सृष्टि और उसकी नियम-व्यवस्था बनती व चलती कैसे रह सकती है? क्योंकि जगती का निमित्त कारण तो वही है। फिर भी हम देखते हैं कि यहाँ सब कुछ नियमानुसार हो रहा है। इससे स्पष्ट है कि अध्यात्म क्षेत्र के आचार्यों का तात्पर्य उस महासूर्य से है, जिसके बाह्य दृष्टि से न दिखने वाले अनन्त गुना आलोक से यह ब्रह्मांड आलोकित है। गीता में इसी को और सरल शब्दों में निम्न प्रकार से निरूपित किया गया है-

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता यदि भाः सदृश्ी सा स्याद्मासस्तस्य महात्मनः (11/12)

अर्थात् अंतरिक्ष में हजार सूर्यों के एक साथ उदित होने से जो तेज पैदा होता है, वह भी उस ब्रह्मतेज के समान कदाचित ही होता है।

इस प्रकार यह प्रमाणित हो गया कि दृश्य सूर्य एवं आर्ष वाङ्मय में वर्णित सूर्य में जमीन-आसमान जितना अन्तर है। वस्तुतः यह लाल अग्नि पिण्ड ब्राह्मी-चेतना-सविता की ही स्थूल अभिव्यंजना है, इसमें दो मत नहीं। यहाँ शंकालु हृदय को यह संदेह हो सकता है कि जब जड़-चेतन रवि दो पृथक अस्तित्व हैं, तो फिर साधना-विधानों में जड़ दिनमान के आश्रय का क्या तुक है? ऐसे लोगों के समाधान के लिए इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि मानवी मन इतना चलायमान है कि उसे स्थिर व एकाग्र करने के लिए दृश्य माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है। जिसने निराकार ईश्वर को देखा नहीं, उसे साकार साधनों से काम चलाना पड़ता है, उन्हें ब्रह्म का मूर्तिमान प्रकाश मान कर चलना पड़ता है। इतने पर भी अंतिम लक्ष्य वह सर्वव्यापी तेजोमय ब्रह्म की उपलब्धि ही होती है। बालक जब छोटा होता है, तो उसे लकड़ी की तिपहिये गाड़ी से चलना सिखाया जाता है। बाद में जब उसके पैर लड़खड़ाने बन्द हो जाते और जमीन में स्थिर होकर टिकने लगते हैं, तो फिर उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती है। वह अपनी टाँगों से ही बिना किसी सहायता के न सिर्फ चलने लगता है, अपितु दौड़ने-भागने में भी समर्थ हो जाता है।

साधना विज्ञान में इसी बात को ध्यान में रख कर जड़ के सहारे चेतन की ओर, व्यक्त के सहारे अव्यक्त की ओर निरन्तर बढ़ते चलने का प्रावधान है। हम दृश्य जगत में उगने वाले सूर्य का ध्यान तो करें, पर उसके पीछे उसकी चेतना को-ब्रह्मवर्चस को सविता को ग्रहण-धारण करने का ही प्रयास लक्ष्य मानें। स्थूल में न अटकें वरन् उसकी सूक्ष्म सत्ता तक पहुँचने का प्रयास करें-सूर्योपासना का यही तत्वदर्शन है। जो इसे समझ कर सविता के भर्ग को जितने अंशों में आत्मसात् करता हैं, उसकी सूर्योपासना-सविता साधना-गायत्री आराधना उसी अनुपात में सफल मानी जाती है।


लाभान्वित कराने का परिजन (kahani)

पाठकों को याद दिलादें कि जून 93 का अखण्ड-ज्योति का अंक बढ़े कलेवर के साथ “सूर्य साधना विशेषाँक” के रूप में प्रकाशित हो रहा है। परम पूज्य गुरुदेव की तृतीय पुण्यतिथि गायत्री जयंती 30 मई 1993 पर प्रकाशित जून का यह अंक सूर्य-सविता-सावित्री के विभिन्न नवयुग की गायत्री-सावित्री साधना के कई रहस्यों का उद्घाटन करने वाला होगा। इसका मूल्य अन्य अंकों के समान ही होगा। अधिक से अधिक व्यक्तियों को इससे लाभान्वित कराने का परिजन प्रयास करें।


धारावाहिक विशेष लेखमाला-(6) - करुणा के सागर-स्नेह की प्रतिमूर्ति युगपुरुष पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

एकाकीपन ही जब जीवन का एक मात्र अर्थ बन गया हो, पारिवारिकता का सारा मूल ढाँचा ही जब चारों ओर ध्वस्त होता दिखाई पड़ता हो तब एक विशाल परिवार अपने को धुरी बनाकर अपने चारों ओर बनाते हुए हम अपने परम पूज्य गुरुदेव को पाते हैं जिनने जीवन भर एक काम सतत् किया-प्यार लुटाते बाँटते रहने का। गायत्री परिवार की मूल धुरी है-वह करुणा वह संवेदना जो गुरुसत्ता से उनने बंटायी। यह कार्य परमपूज्य गुरुदेव ने आरंभ किया व उसे परिपूर्णता तक लाने का दायित्व परमवंदनीय माता जी के माध्यम से सतत् निभाया।

गायत्री परिवार की विराट जनमेदिनी में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे इस स्नेह संजीवनी से लाभान्वित होने का अवसर न मिला हो। हर व्यक्ति की यह अनुभूति रही है कि एक वही ऐसा है जिसे इतनी देर तक गुरुदेव के श्री चरणों में बैठकर अपनी व्यथा-कथा सुनाने व बदले में गुरु की स्नेह सरिता में अवगाहन का मौका मिला। अक्सर ऐसे व्यक्ति मिलते रहते हैं देश व विदेश में जो यही कहते हैं कि मुझसे अलग से बुलाकर, बैठकर उनने बात की, पीठ पर हाथ फिराया व मनोबल को इतना ऊँचा उछाल दिया कि देखते-देखते कष्ट दूर हो गए तथा प्रगति पथ पर बढ़ते चलने का राजमार्ग मिल गया। ऐसे व्यक्तियों को वही अनुभूति हुई तो श्री कृष्ण के साथ महारास खेलने वाली गोपियों को हुई होगी। इनकी संख्या कम नहीं लाखों में है।

मूलतः गुरुवर का हृदय माँ का हृदय था। माँ प्यार भी करती है, बच्चे को दुलारती है, किन्तु साथ ही साथ एक आँख सुधार की भी रखती है। विश्व मानवता के सुधार की दृष्टि रखने वाली मातृ स्तर की उस गुरुसत्ता ने जहाँ परिजनों की दुष्प्रवृत्तियों-दुर्व्यसनों अवांछनीय कामनाओं से अनुदान भी ढेरों बरसाए। क्या यह सत्य नहीं कि हर ऐसे व्यक्ति को लौकिक आध्यात्मिक स्तर के अगणित अनुदान मिले और वे निहाल होते चले गए। अब स्थूल शरीर नहीं रहा भी तो भी वह आश्वासन तो सतत् है ही व नित्य प्रतिपल साकार हो रहा है “कि जो भी मरा ध्यान करेगा, मेरे बताए काम में स्वयं को नियोजित करेगा उसके योगक्षेम का वहन मैं अंत तक करूंगा।” गायत्री परिवार का हर कार्यकर्ता ऐसी गुरुसत्ता के साथ जुड़ कर स्वयं को सुरक्षित व धन्य अनुभव करता है।

माँ का हृदय होने के नाते विश्व मानवता की हर व्यथा उनकी अपनी व्यथा थी। दहेज में जलती बहुओं का वर्णन समाचार पत्रों में पढ़कर उनका बोलते-बोलते गला भर आता था। लगता था कही कोई बहू जली है, लड़की-नारी जाति पर अत्याचार हुआ है तो वह उनकी अपनी ही बेटी के साथ हुआ है। अक्सर अपने प्रवचनों, कार्यकर्त्ताओं से चर्चा के दौरान व अंतरंग गोष्ठी में वे इन प्रसंगों पर बोलते-बोलते रुक जाते थे, कण्ठ अवरुद्ध हो जाता था तथा यह कहकर बात समाप्त कर देते थे कि “क्यों नहीं यह सब बन्द होता, क्यों नहीं तुम सब इसके खिलाफ प्रतिरोध का मोर्चा प्रबल बनाते हो? मुझे उम्मीद है कि अगले दिनों देखते-देखते इन उत्पीड़कों का निश्चित ही दमन हो जाएगा।” इन शब्दों में जहाँ उत्पीड़ितों की पीड़ा के प्रति असीम करुणा का भाव है, वहाँ वह “मन्यु” भी झलकता है, जो उनकी यति योद्धा रूपी सत्ता का मूल मर्म था।

एक बात सुनिश्चित है। माँ के हृदय जैसी विशालता, सहनशीलता व संवेदना विकसित किये बिना कोई संगठनकर्ता अपने आत्मीयों का परिकर न बढ़ा सकता है न उसके लक्ष्यों को सुनिश्चित गंतव्य तक पहुँचा सकता है। यदि किसी संगठन को सैनिक अनुशासन के स्थान पर नैतिक व भावनात्मक अनुशासन विकसित कर उसे आगे बढ़ाना है तो उसके सदस्यों को सबसे पहले गायत्री परिवार के मुखिया के जीवन दर्शन को समझना व जीवन में उतारना होगा। दूसरों का दुख दर्द समझे व सहानुभूति जताए-कष्ट बँटाये बिना कोई भी व्यक्ति अपने सहकर्मी अथवा अन्यान्य कार्यकर्त्ताओं की श्रद्धा का पात्र भी नहीं बन सकता। यह व्यवहार में उतरने वाली वह गुण प्रधान विद्या है, जिसका जीता-जागता उदाहरण हमें गुरुसत्ता के रूप में मिलता है।

1971 के जून माह में मथुरा से हिमालय-हरिद्वार क्षेत्र के लिये उन्हें लाखों परिजनों द्वारा दी गयी विदाई इस तथ्य की साक्षी है कि हर शख्स के मन में उनके प्रति कितना स्नेह था। कितनी श्रद्धा थी। उस समय का दृश्य जिनने भी देखा है, उनका हृदय विगलित हुए बिना रह नहीं सकता। एक तरफ तो इतना अधिक स्नेह-इतनी करुणा किन्तु दूसरी ओर गुरुसत्ता के मन में कठोरता इस सीमा तक कि जिस स्थान पर जिनके साथ इतने दिन रहे, उसे छोड़कर जाने में तनिक भी असमंजस मन में नहीं। अपनी पुत्री का विवाह कर तुरंत हमेशा के लिए इस स्थान को छोड़ देना हममें से कितनों के बस की बात है? किन्तु यह अवतारी स्तर की सत्ता ही होती है जो दोनों कार्य एक साथ निबाहती है।

तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता के रूप में हम गुरुदेव को जानते हैं किन्तु उनका वास्तविक परिचय उनकी स्नेहमयी-मोहक उस मुसकान के रूप में अधिक है, जिसने लाखों व्यक्ति उनके पास रोते हुए आते थे तथा हँसते हुए वापस जाते थे। यह उनका विशाल हृदय ही था जिसके समक्ष नतमस्तक हो हर व्यक्ति अपने अंदर की व्यथा अपनी हर बात उनसे कह स्वयं को अत्यन्त हल्का महसूस करता था। इसलिए तो पूज्यवर अपनी पत्रिका में अधिकार से लिखते हैं-”लोग हमें भूल सकते हैं, पर हम अपने किसी स्नेही को भूलेंगे नहीं।”

अंतःवेदना, मानव मात्र के प्रति करुणा जो महामानवों में होती है, उसका वे दिखावा नहीं करते। वह तो सहज ही उनके जीवन व्यवहार में परिलक्षित होती रहती है। स्वामी विवेकानन्द के जीवन का वह प्रसंग सभी को ज्ञात है, जब फिजी में हुए भयंकर अग्निकाण्ड पर वे रात्रि भर व्याकुल रहे, सो नहीं सके तथा सभी शिष्यगणों द्वारा पूछने पर मात्र यही बात सके कि कहीं बड़े व्यापक स्तर पर जन क्षति हुई है। हजारों मील दूरी पर हुई घटना की अनुभूति उसी समय किसी को हो सकती है, यह विज्ञान के लिए कौतूहल का विषय हो सकता है किन्तु अध्यात्म की परिधि में यह असंभव नहीं। महामानवों का अंतःकरण एक विशाल मेक्रोकाँस्मास की तरह होता है वह समष्टि का दुख उनकी पीड़ा बन जाता है। ऐसे ही बंगला देश की आजादी के समय हुए युद्ध में हजारों अबलाओं तथा निरीह इंसानों पर हुआ अत्याचार उनकी वाणी व लेखनी में देखा जा सकता था। हर किसी की पीड़ा उनकी अपनी थी, उसका परिचय देते अनेकानेक घटनाक्रम देखने को मिलते हैं। एक का यहाँ जिक्र कर रहे हैं।

दिल्ली के एक परिजन जो काफी वर्षों से जुड़ें हैं, शाँतिकुँज प्रायः हर रविवार को आते रहते थे। एक दिन आने पर गुरुदेव के दर्शनों के बाद बोल उठे-”पूज्यवर आपने तो इस बार बचा ही लिया, नहीं तो जान तो चली ही गयी थी।” विस्तार से उनने बताया कि वे दुकान के लिए सड़क पार कर रहे थे कि एक ताँगा उधर आ गया व वे फिसल कर उसके नीचे आ गए। तांगा निकल जाने पर उठकर खड़े हो गए देखा कि मात्र हल्की-सी खरोंच थी, न फ्रैक्चर हुआ था न किसी प्रकार की कोई गंभीर चोट थी। बोले-”आपकी कृपा से ही बच गए।” गुरुदेव बोले-”बेटा! तू तो बच गया पर तूने देखा, मेरा क्या हाल हुआ?” इतना कहकर उनने अपनी धोती ऊपर कर उन सज्जन को अपनी जाँघें दिखायी। दोनों पर गहरा लाल नील का निशान था। ताँगा गुजरा तो था उन सज्जन के पैरों पर किन्तु सारी पीड़ा गुरुसत्ता ने हर ली थी ऐसे अगणित प्रसंग लाखों व्यक्तियों के हैं। किन-किन का बखान यहाँ करें?

अपने प्रवचनों में अक्सर पूज्यवर कह उठते थे कि-”हमारे देश में लाखों बाबाजी हैं। यदि उनकी कथनी करनी एक हो जाय तो सारा भारत अपना दुख-कष्ट भूल प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता चले। यदि ये बाबाजी विलासिता के साधनों को भूल मानव जाति की उस तरह सेवा कर सके जैसा मिशनरी भावना लिए क्रिश्चियन पादरी करते हैं, तो वास्तव में हिंदू जाति का उद्धार हो जाय। वे कहते थे कि कभी-कभी मेरा मन करता है कि अफ्रीका के जंगलों में सेवा कार्यों में लगे पादरियों की पाँवों की धोवन लाकर इन सब बाबाजियों पर छिड़क दूँ ताकि इनका उद्धार हो जाय।” हय उनका मर्मस्थल था जो मानव मात्र की वेदना को समझता था तथा सुधारकों की-पीड़ा-पतन निवारकों की एक सेना खड़ी करने की टीस पैदा करता रहता था। गायत्री परिवार इस टीस से तो जन्मा है।

हम आप आज दुनिया भर के व्याख्यान देते लोगों को देखते-सुनते हैं, स्वयं भी देते हैं किन्तु कितना दूसरों के कष्टों में सहभागी बन जाते हैं, यह आत्म विश्लेषण स्वयं हमें करना है। वास्तविकता यही है कि बिना दूसरों का कष्ट समझे कोई व्यक्ति अध्यात्म प्रगति के पथ पर आगे बढ़ ही नहीं सकता। चिकित्सकों में वेदना का स्तर क्या व कितना होना चाहिए, यह हम गुरुदेव के जीवन में देखते हैं।

शाँतिकुँज का ही एक प्रसंग है। उन दिनों पूज्यवर प्रतिदिन व्याख्यान देने अपने कक्ष से छोटे से शाँतिकुँज के वर्तमान गायत्री तीर्थ में बने प्रवचन प्राँगण में जाते थे। एक कार्यकर्ता जो वशिष्ठ ब्लॉक के नीचे वाले एक कक्ष में मलेरिया बुखार से पीड़ित था, मन ही मन सोचता था कि दवा तो चल रही है पर एक बार गुरुदेव के दर्शन हो जाते तो तुरंत आराम हो जाता। चिकित्सा हेतु गये एक कार्यकर्ता बंधु स उसने कहा भी किन्तु उसे यह कहकर सोने को कह दिया गया कि “तुम को दवा दे दी है- आराम करो। गुरुदेव को कोई और काम नहीं है? जो तुम्हें देखने आ जायेंगे।” वह बेचारा आँखें बंद कर लेटा ही था कि सीधे प्रवचन कक्ष को जाते गुरुदेव की उसके कक्ष में प्रवेश करने के साथ उनकी मधुर आवाज उसके कानों में गूँज गयी-”क्यों भई! क्या बात है? ज्यादा तकलीफ है क्या? दवा तो चल ही रही है। मन मजबूत रखना।” इतना कहकर उसके सिर पर हाथ फेरा व उपस्थित चिकित्सकों से हाल−चाल पूछ सीधे प्रवचन के लिए चले गए। उस कार्यकर्ता की स्थिति तो बयान ही नहीं की जा सकती। आँखों से सतत् अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। उसी दिन शाम को वह पूर्ण स्वस्थ स्थिति में ऑफिस में पूरे उत्साह से कार्य में लगा हुआ था।

मर्म को स्पर्श करने वाली संवेदना का यह तीव्रतम स्तर जब तक विकसित नहीं होगा तब तक हम वस्तुतः अध्यात्म का पहला पाठ पढ़ आगे बढ़ ही नहीं सकते। यही करुणा तो है, जिसके आगाध स्रोत से बहने वाली भागीरथी ने लक्षाधिक व्यक्तियों को स्नान कर धन्य कर दिया। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखे गए पत्रों को, जिन्हें अनेकों व्यक्तियों ने भलीभाँति सजा-सँवार कर अपने पास सुरक्षित रखा है, पढ़कर यही अनुभूति होती है। हर पात्र अपने आप में संवेदना से सराबोर एक ऐसा दस्तावेज है, जो यह प्रेरणा देता है कि दूसरों का दिल जीतना ही नहीं, उनके आत्मबल को शिखर पर पहुँचा कर उनसे समाज निर्माण की विभिन्न गतिविधियाँ संपन्न करा लेना महामानवों की सदा से रीति-नीति रही है वह हमें भी जन-श्रद्धा अर्जित करनी है तो यही मार्ग पकड़ना होगा।

उनके साथ बिताए थोड़े से क्षण भी हम आप सबके लिए अमूल्य थाती बन गए हैं। एक छोटे से स्नेह सिक्त वाक्य ने किसी कार्यकर्ता-परिजन या व्यक्ति की जीवन की दिशाधारा बदल दी है। मात्र कथनी ही नहीं, जीवन व्यवहार में करुणा-संवेदना का समावेश जब किसी के जीवन में होता है तो वह विलासिता को दूर भगा जीवन को सादगी-संपन्न बना देता है। स्वयं पूज्यवर का जीवन ऐसा ही था। किसी कार्यकर्ता के घर कोई बीमार हो, जब तक उसके लिए मुसम्बी के रस की व्यवस्था करने की स्थिति न हो, तब तक स्वयं उनने इतना अधिक काम करने-थकान की स्थिति होने पर भी वंदनीय माताजी द्वारा दिये जाने पर उसे स्वीकार नहीं किया। गलती से एक बार ग्रहण करते ही पता लगने पर उँगली डालकर उल्टी की व उसे निकाल दिया। यह एक छोटी-सी घटना “आत्मवत् सर्वभूतेषु” के उनके उस स्वरूप की परिचायक है जिसकी जीती जागती मिसाल वे थे। खादी की एक धोती व एक मोटा कुरता बस यही जीवन भर पहना व इतने भर में सारा जीवन काट दिया।

कोई आश्चर्य नहीं कि उनके जीवन दर्शन व्यवहार में उतरे इस ब्राह्मणत्व ने ही औरों का दिल जीतकर उनसे वह सब करा लिया जो स्वयं शायद वे न कर पाते। उनने यह प्रमाणित कर दिखाया कि जब आदमी के जीवन में भगवत् सत्ता के प्रति सच्चा प्रेम-साधन संवेदना मानवमात्र के प्रति करुणा का समावेश होता है तो सबसे पहले वह सुविधा साधनों को तिलाँजलि देकर उनका उपयोग समष्टि के लिए करता है।

वास्तव में देखा जाय तो एक आदर्श ब्राह्मण, करुणा के सागर-स्नेह की प्रति मूर्ति के रूप में हम परमपूज्य गुरुदेव-अपने आराध्य देव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की सारी विशिष्टताएँ इस मूल आधार-बीज से पनपे वट वृक्ष के वैभव की तरह है। हमें एक पथ वे दिखा गए हैं कि हम सब भी इन गुणों को जीवन में समाहित कर अपनी जीवन समिधा की एक जलती चिनगारी भी हमें स्पर्श कर जाए तो हमारा जीवन यज्ञ वस्तुतः सफल हो जाए।


अपनों से अपनी बात- - शपथ हमें कितनी याद है, कितनी भूल गए?

“कुछ दिन पहले शपथ उठायी, उसको भूल न जाना भाई” ये पंक्तियाँ आज भारत ही नहीं विश्वभर में गूँज रही हैं-अश्वमेधिक पराक्रम का संदेश “घोड़ा अश्वमेध का छोड़ा-कैसे बैठे हैं चुपचाप” वाली पंक्ति के साथ। सभी परिजनों को भली भाँति याद है कि आज से एक वर्ष पूर्व शपथ समारोह में 8−9−10 जून 1992 की तारीखों में एक भव्य आयोजन में डेढ़ लाख कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में हम सभी ने परमपूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली की माटी हाथ में लेकर देव संस्कृति दिग्विजय के निमित्त शपथ ली थी। उस शपथ को पूरा करने के लिए एक लाख से भी अधिक प्रणवान् भावनाशीलों ने तीन माह का समय दिया था तथा शेष पचास हजार ने इनके बदले निर्वाह राशि देते रहने का संकल्प लिया था। आज जब हम परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि गायत्री जयंती 1993 (संवत् 2050) की तीसरी जयंती मना रहे हैं, तो यह आत्म चिंतन का विषय है कि शपथ लेने के बाद हम में से कितनों को स्मरण रहा, कितने भूल गए?

परमपूज्य गुरुदेव के जीवन का एक-एक पल समिधा की तरह देव संस्कृति के निमित्त हुए महायज्ञ में होमा जाता रहा। उनने 80 वर्ष की आयु को उस तरह जिया कि उसमें पाँच− व्यक्तियों से अधिक ही उनकी संकल्प शक्ति के चमत्कार से बन पड़ा। गायत्री परिवार रूपी विशाल संगठन का विस्तार उनके सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करते ही उतना ही विराट होता चला गया। आज भारत के कोने-कोने में शाँतिकुँज के देवसंस्कृति विस्तार अभियान की चर्चा है। भारतीय संस्कृति के निर्धारणों को जनसुलभ बनाते हुए आज की समस्याओं का समाधान गायत्री व यज्ञ के माध्यम से समझाते हुए संस्कार महोत्सवों, रजवंदन समारोहों तथा अभी तक संपन्न तीन अश्वमेधों (जयपुर, भिलाई, गुना) के माध्यम से जो कार्य विगत एक वर्ष में बन पड़ा है, वह बताता है कि हर परिजन अपनी आराध्य सत्ता के बताए निर्देशों का परिपालन करने को कटिबद्ध है।

मात्र भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में आज गायत्री महाशक्ति का-भारतीय संस्कृति के विश्व संस्कृति वाले संदेश को पूज्यवर के अग्रदूतों ने पहुँचाने का प्रयास किया है। इंग्लैण्ड जिसके राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था, जहाँ की पार्लियामेण्ट सारे विश्व के भाग्य का निर्धारण करती थी, जिसे “ग्रेट ब्रिटेन” इसीलिए कहा जाता था कि विश्व की तीन चौथाई आबादी पर उसी का राज्य था, उसी इंग्लैण्ड के हाउस ऑफ काँमन्स (लोकसभा) व हाउस ऑफ लार्ड्स (राज्यसभा) के सम्माननीय सदस्यों को फरवरी 93 के अंतिम सप्ताह में संबोधित करने का अवसर शाँतिकुँज प्रतिनिधि होती है, आज इंग्लैण्ड, अमेरिका, कनाडा, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, फ्राँस, पुर्तगाल, जर्मनी, केन्या, तंज़ानिया, जिम्बाब्बे, दक्षिण अफ्रीका, बोत्सवाना, सूरीनाम, मारीशस, फिजी, आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड तक अपना विस्तार कर चुकी है। विश्व के कोने-कोने तक भारतीय अध्यात्म का तत्वज्ञान पहुँचाने को तत्पर कार्यकर्ताओं की एक टोली निरन्तर इसी कार्य में संलग्न हो तीन अश्वमेध महायज्ञों-लेस्टर यूके (9−10−11 जुलाई 1993), टोरोण्टो कनाडा (23−24−25 जुलाई 1993) तथा लाँस ऐंजेल्स यू.एस.ए. (20−21−22 अगस्त 1993) को सफल बनाने हेतु तत्पर है तथा मई माह के अंत में तैयारी हेतु पहुंच रही है। यही नहीं मई माह में देश के बाहर पहला शक्तिपीठ व गायत्री ध्यान केन्द्र डर्बन (दक्षिण अफ्रीका) में स्थापित होने जा रहा है। यह बताता है कि कार्य का विस्तार किस सीमा तक हो चुका है या होने जा रहा है।

समस्या एक मात्र यही है कि कार्य विस्तार के साथ व्यक्ति उस स्तर के नहीं मिल पा रहे हैं, जिनका समयदान भारत के बुद्धिजीवी वर्ग-दक्षिणी भारत के बहुभाषी क्षेत्र व विदेश के विश्व विद्यालयों-विभिन्न संस्थाओं में नियोजित हो सके। 30 मई को परमपूज्य गुरुदेव की पावन पुण्यतिथि पर यही अपेक्षा मन में रख सकते हैं कि और अधिक संख्या में शपथ को याद रखने वाले, नये सिरे से लेने वाले सुयोग्य स्तर के समयदानी आगे आयेंगे व हमारे संकल्पों को साकार बनायेंगे। तभी हम गुरुसत्ता के स्वप्नों को सँजोने का महत् कार्य पूरा कर सकेंगे।

*समाप्त*