ध्यानः व्यक्तित्व के सुनियोजन की विधा

अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठ विचारों का स्नान करा देना ही ध्यान कहलाता है। न जाने हमें क्यों समझ में नहीं आता, किंतु वस्तुतः हमारी समस्त समस्त समस्याओं का मूल कारण व्यक्तित्व के गठन में संव्याप्त कमियों में छिपा हुआ है। दुःख, सुख जो भी हमें बहिरंग में अनुभूत होता है, इस व्यक्तित्व में आए बिखराव के कारण ही। व्यक्तित्व को सही ढंग से निखार लेना, उसका सुनियोजन करना जिस दिन मनुष्य को आ जाता है, उसकी सारी समस्याओं -कष्टों परेशानियों का अंत हो जाता है। जीवन जीने की कला के नाम से जिस विधा को पुकारा जाता है, वह यही अध्यात्म साधना है, जिसकी ध्यान एक क्रिया है।

ध्यान मात्र एकाग्रता नहीं है। वह तो मात्र इसकी पहली अवस्था है। जब व्यक्ति का व्यक्तित्व व्यवस्थित ही नहीं, पूर्णतः प्रकाशित भी होने लगता है परमात्म चेतना के दिव्य प्रकाश से, तब ध्यान संपन्न हुआ माना जाता है। प्रकाशवान व्यक्तित्व का प्रमुख लक्षण है शाँत विचारशील मन जो सतत् श्रेष्ठ विचारों में निमग्न रहता है, आदर्शों के लिए स्व को खपा देने वाला चरित्र तथा सभी से सामंजस्य स्थापित कर लेने वाला व्यवहार।

ध्यान को भी जनसाधारण ने एक कर्मकाण्ड का मान लिया है, कुछ विशेष बाह्योपचार समझ लिया है। कर्मकाण्ड यदि हैं तो शृंगार मात्र, यदि नहीं है तो भी ध्यान का मर्म समझ में आ जाये तो अनिवार्य भी नहीं। व्यक्तित्व की सुव्यवस्था-आमूलचूल परिष्कार व्यक्ति को मूर्च्छना से जगाकर उसको आत्म जाग्रति की स्थिति में लाकर व्यक्तित्व के विस्तार की जानकारी कराना ही ध्यान का मूल उद्देश्य है। चाहे यह प्रयोग निराकार परब्रह्म की चेतना से एकाकार होने के रूप में संपन्न हो अथवा नाटक के माध्यम से दीपक की लौ पर ध्यान द्वारा इष्ट पर केन्द्रित लययोग की साधना द्वारा -नादयोग के माध्यम से, दिव्य ध्वनियों के श्रवण द्वारा अथवा सौर चेतना पर केन्द्रित आत्मचेतना द्वारा लक्ष्य सभी का एक है आँतरिक सुव्यवस्था व बहिरंग के साथ सामंजस्य।


पतन से उत्थान की ओर

‘भिंक्षाँ देहि’-नगर से प्रसेनजित के द्वार पर अभिराम कपिल ने गुहार लगाई। जीवन का बहुत ही मार्मिक क्षण था जब कि नगर सेठ की अद्वितीय सुन्दरी परिचायिका गौर वर्णा मधुलिका भिक्षा लेकर द्वार पर उपस्थित हुई। आचार्य इन्द्रवत के स्नातकों में कपिल भी मनोज के समान अनिंघ सुन्दर थे। सुदीर्घ वक्ष, उन्नत ललाट गौरवर्ण। भिक्षा देर तक झोली में ही। मधुलिका और कपिल देर तक एक दूसरे को निर्निमेष देखते रहे। सौंदर्य के इस आकर्षण में कपिल मुग्ध हो गये। कितने क्षण इस तरह बीत गये। कुछ पता ही नहीं चला।

इसके बाद कपिल को जब भी अवसर मिलता वही द्वार, वही भिक्षा, सब कुछ वहीं और तब प्रारंभ हुई पतन की करुण कथा। कपिल ने रमणी के सौंदर्य में न केवल अपनी विद्या खोई वरन् ओजस्, आरोग्य और वर्चस् सब कुछ खो दिया फिर भी वासना की आग शाँत न हुई। ऐसा होता तो वासना और तृष्णा ने सैकड़ों बार इतिहास के मस्तक को कलंकित नहीं किया होता। इस शाश्वत सत्य से कपिल कहाँ बचने वाले थे ? अभी तो अधोगति का आरंभ था अंत नहीं।

वसंत पर्व समीप था। सुकुमारियाँ ऋतुराज का स्वागत करने के लिए नाना परिधान, अंगराग, कंचुकि केसर वाणी आभूषण सजाने में व्यस्त हो गई। मधुलिका सुन्दरी तो थी किन्तु धन उसके पास कहाँ?निदान युवक प्रेमी कपिल को ही उसने अपनी आकाँक्षाओं का आखेट बनाया उसने कपिल से ही एक शत स्वर्ण मुद्राओं की याचना की। वह जानती थी कपिल भिक्षु है, स्नातक है, दूरवर्ती कौशाम्बी का रहने वाला है। यहाँ उसके पास कहाँ सो उसी ने युक्ति भी बताई ‘आप श्रावस्ती नरेश के पास चले जायें वे अप्रितम दानी हैं। एक सौ मुद्राएं उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं। ’

कामार्त कपिल राजद्वार पर पहुँचे। वे विवेक खो चुके थे। रात्रि में ही राज प्रासाद करना चाहा फलतः न केवल प्रहरी की प्रताड़ना मिली, बल्कि दस्यु की आशंका से उन्हें रात बन्दीगृह में बितानी पड़ी विद्यमान वर्चस खोने के बाद उन्हें आत्म सम्मान से भी च्युत होना पड़ा।

प्रातःकाल वे बन्दी वेष में नृपति के सम्मुख प्रस्तुत हुए। कपिल ने शील खोया था परन्तु उन्हें उबारने वाला सत्य अभी तक उनके पास था। उन्होंने महाराज को सब कुछ स्पष्ट बता दिया। परिचारिका मधुलिका के सम्मोहन से यहाँ तक की सारी गाथा कपिल ने कह सुनाई।

सम्राट, कपिल की निश्छलता पर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने पूछा-’युवक बोलो अब तुम क्या चाहते हो जो माँगोगे मिलेगा। ’एक शत स्वर्ण मुद्रा-कपिल ने मन ही मन कहा। फिर विचार आया जब कुबेर का भण्डार ही खुला है तो एक शत क्यों एक सहस्र, नहीं -नहीं एक लक्ष-’जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ‘क्यों न ऐसा कुछ माँगा जाय जिससे मधुलिका के साथ आजीवन सुखोपभोग किया जा सके।

‘आपका सम्पूर्ण राज्य चाहिए राजन्-याचक के मुख से यह निकलते ही समस्त सभासद परिचायक अंगरक्षक अवाक् और स्तब्ध रह गए। किन्तु श्रावस्ती नरेश किंचित मात्र विचलित नहीं हुए। ’

‘तथास्तु!कपिल!’वे बोले’मैं निस्संतान हूँ। राज्य भोग ने मेरी आत्मिक शक्तियों को जर्जर कर दिया था मैं चाहता ही था कोई सुयोग्य पात्र मिले तो इस जंजाल से मुक्त होकर आत्म कल्याण का मार्ग खोजूँ -तुमने आज मेरा भार उतार दिया। आज से यह श्रावस्ती तुम्हारी हुई। ’

नृप के इस औदार्य पर कपिल आश्चर्य चकित रह गए। आत्म कल्याण, आत्म शाँति क्या इतनी महान है जिस पर राज्य यों न्यौछावर किया जा सकता है। स्तब्ध कपिल की अन्तर चेतना ने अंगड़ाई ली। जाग्रत कपिल सँभले और बोले -’नहीं। नहीं! क्षमा करें राजन् मैं अपने उसी श्रेय की ओर प्रस्थान करूंगा। जिसका निर्देश मेरे गुरुदेव ने दिया था ‘क्षण भर में वह राजप्रासाद से बाहर चले गए। लोगों ने देखा वे जा रहे हैं दूर बहुत दूर -बहुत अति दूर।

मनुष्य भटका हुआ देवता है, यह सत्य है पर सत्य यह भी है कि जब यह सत्य अंतस् की चिनगारी जाग जाती है तो व्यक्ति का गंतव्य पुनः देवत्व की लब्धि व पूर्णता की प्राप्ति बन जाता है। जिस परम पिता ने अजामिल, विल्व मंगल, अम्बपाली को तार दिया, वह किस-किस का उद्धार नहीं कर सकता पर पहले जागे तो सही अंतश्चेतना। वही मूल प्रारंभिक बिंदु है मनुष्य की आत्मिक प्रगति कठे


विवाद का स्वरूप (kahani)

‘स्वामी रामकृष्ण परमहंस के दो शिष्यों में विवाद छिड़ गया कि उनमें बड़ा कौन है। अंत में दोनों स्वामी जी के सम्मुख गये। स्वामी जी ने उत्तर दिया बस इतनी सी बात है। ’इस का हल तो बड़ा सरल है। तुम में से जो दूसरे को बड़ा समझे वही बड़ा है। ‘अब तो विवाद का स्वरूप ही बदल गया। दोनों एक दूसरे को तू बड़ा है, तू बड़ा है’ कहने लगे। ’


वेदाँत की भाषा में परमात्म सत्ता का काव्य

अनंत आकाश के गर्भ में यह सारा दृश्य पदार्थ एक छोटे -से घटक के रूप में रह रहा है। यहाँ जो कुछ समग्र है, वह व्यापक है। उसकी इकाइयाँ दिखती तो अलग-अलग हैं, पर वे परस्पर इतनी अधिक गुँथी हुई हैं कि उन्हें तत्वतः पृथक कर पाना किसी प्रकार संभव नहीं। मोटे तौर पर किसी भी पदार्थ को तोड़ा और बिखेरा जो सकता है।

चाहे परमाणु की अंतर्देशीय संरचना पर दृष्टि डालें, चाहे सौर-परिवार की गतिविधियों को देखें अथवा ब्रह्मांडीय ग्रह-तारकों या निहारिकाओं को सर्वत्र एक ही नियम काम करता दिखाई देगा। इसी प्रकार स्थूल परिधि से आगे जितनी गहराई में उतरते चले जायेंगे, उतना ही यह स्पष्ट होता जायेगा कि इस विश्व में मात्र एक ही दिव्य शक्ति संचारित हो रही है। उसी की हलचलें तरह-तरह के पदार्थ एवं दृश्य उपस्थित करती रहती हैं। उसी सृजन, अभिवर्धन और परिवर्तन का त्रिविध क्रियाकलाप चलता रहता है। इन सब प्रसार विस्तार पर गहराई में उतरने पर मात्र एक ही तत्व शेष रह जाता है, जिसे ब्रह्म प्रकृति अथवा दोनों की संयुक्त सत्ता -अर्धनारी नटेश्वर पुरुष प्रकृति का गुँथन ही कहा जा सकता है। इसी स्थिति का वर्णन’ सियाराममय सब जग जानी’के रूप में किया है और उसे भगवान का रूप में नमन, अभिनंदन किया है।

प्रगतिशील विज्ञान अब वयोवृद्ध वेदाँत के साथ विचार -विमर्श कर रहा है और लड़ाई समाप्त करके चिरस्थायी समझौते की तैयारी कर रहा है। नवीनतम खोजें पदार्थ की जड़ तक पहुँचते -पहुँचते मात्र एक ही शक्ति का अस्तित्व शेष बचता देखती है। यह शक्ति जड़ नहीं वरन् विचारपूर्ण है। व्यवस्था और संतुलन उसकी नीति है। ऐसा कर सकना विवेकशील के लिए ही संभव हो सकता है। विवेकयुक्त सर्वव्यापी शक्ति को ब्रह्म नाम दिया जाय या और कोई। निष्कर्ष वहीं पहुंचता है जहाँ एक ही सर्वव्यापी शक्ति के क्रीडा कल्लोल के अतिरिक्त और कुछ भी शेष नहीं रह जाता है।

सामान्यतः भले ही किसी अनजान द्वारा इस तथ्य पर विस्मय व्यक्त किया जाय कि परमाणु का अधिकाँश भाग रिक्त (स्पेस )है और शेष अत्यन्त हिस्से में ही इलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्यूट्रान आदि विद्युत प्रवाह है, किंतु वेदाँत के अनुयायियों के लिए यह कोई नवीन तथ्य नहीं है। वेदाँत के अनुसार द्रव्य का उद्गम आकाश से हुआ है, इसलिए द्रव्यमय जगत की प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक कण में आकाश(स्पेस)की उपस्थिति अनिवार्य है। परमाणु के शेष हिस्से में विभिन्न विद्युत प्रवाहों की सक्रियता ऊर्जा का ही सूक्ष्म रूप है। वेदाँत की भाषा में यही प्राण है।

विकिरण यद्यपि अति सूक्ष्म तथा वेगवान होता है तो भी वह द्रव्य के ही स्तर का है। वेदाँत की मान्यता है कि प्रकाश दिक् काल में ही विस्तृत व क्रियाशील रहता है। सर्वोच्च सत्ता रेडियेशन के क्षेत्र से परे है। कठोपनिषद् में उसका वर्णन करते हुए कहा गया है ‘वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और न नक्षत्र ही। ’प्रकाश के ये प्रवाह वहाँ नहीं पहुँच सकते। फिर नाशवान अग्नि की तो बात ही क्या ?पदार्थ विज्ञान भी आज चेतना -तरंगों के अनंत विस्तार के द्वार पर आ पहुँचा है डाल्टन ने जब परमाणु की धारणा विज्ञान जगत को दी, उस समय से परमाणु को पदार्थ का मूल कारण माना जाता रहा है, पर अब यह धारणा सम्पूर्ण ध्वस्त हो चुकी है।

एक सामान्य व्यक्ति की अनुभूति यही होती है कि यह वस्तु जगत रूप, रंग और ठोसपन से बना है, किंतु यह अवास्तविक है- यह समझ अब विज्ञान की धीरे-धीरे विकसित होती जा रही है। संभवतः इसी कारण से पदार्थ विज्ञानी एडिंगटन ने अपनी रचना’ दि नेचर ऑफ दि फिजीकल वर्ल्ड ‘में लिखा है-’पदार्थ की तीन अवस्थाओं के अतिरिक्त एक चौथी प्लाज्मा अवस्था है। इस अवस्था में द्रव्य को और अधिक तापमान देने से वह अदृश्य शक्ति में रूपांतरित हो जाता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि पदार्थ की मूल सत्ता अव्यक्त है। जो व्यक्त है, वह उसकी छाया जैसा है। ’

पहले जो परमाणु अविभाज्य माना जाता था, आज उसका विभाजन और विस्फोट अनंत शक्ति और ज्ञान का स्रोत बन गया है। यह पाया गया है कि परमाणु में दो विद्युत धाराएँ हैं। केंद्रीय नाभिक तथा परमाणु के मुख्य भाग में धनात्मक विद्युत होती है और केन्द्रीय भाग के बाहरी हिस्से के चारों ओर ऋणात्मक विद्युतधारा से भरे इलेक्ट्रान होते हैं। केन्द्रीय नाभिक में भी दो भिन्न-भिन्न कण होते हैं, जिन्हें न्यूट्रान और प्रोट्रान कहते हैं। अपने स्वाभाविक रूप में परमाणु विद्युतवेशी नहीं होता, क्योंकि उसके भीतर की धनात्मक और ऋणात्मक विद्युत धाराएँ सदा समान होती हैं। ऋणावेशी इलेक्ट्रान और धनावेशी प्रोट्रान परस्पर संतुलन कायम रखते हैं। इस प्रकार परमाणु सौर व्यवस्था का एक लघु बिंब मात्र होता है।

लेकिन परमाणु -सिद्धान्त के क्षेत्र में सर्वाधिक रोमाँचकारी खोज तब हुई, जब वैज्ञानिकों ने गैस की तह से अवयवों को गुजारा। अवयव आर- पार हो गये। तब परमाणु के ठोस होने की धारणा खंडित हो गई, क्योंकि ये अवयव कहीं भी न तो टकराये न ही किसी अवरोध द्वारा रोके जा सके। परीक्षणों से यह भी ज्ञात हुआ कि परमाणु का नाभिक सूर्य की तरह और उसके चतुर्दिक् परिक्रमात इलेक्ट्रान ग्रह नक्षत्रों जैसे है। इस प्रकार परमाणु सौर-मंडल का ही एक छोटा नमूना सिद्ध हुआ। यह भी ज्ञात हुआ कि एक इलेक्ट्रान का व्यास संपूर्ण परमाणु के व्यास का 50 हजारवाँ हिस्सा है और नाभिक का व्यास भी लगभग उतना ही है। इस प्रकार पूरे परमाणु का करीब शत-प्रतिशत हिस्सा ‘स्पेस’ है। यदि मनुष्य शरीर के भीतर के समस्त परमाणुओं को इस प्रकार दबाया जाय कि उनमें से प्रत्येक का यह रिक्त ‘स्पेस ‘भर जाये तथा वे परस्पर अधिकतम सघन हो जायें तो फिर मनुष्य का शरीर एक ऐसे छोटे से धब्बे या बिंदु की तरह हो जायेगा कि वह किसी श्रेष्ठ ?अति संवेदनशील’इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप ‘से ही देखा जा सके।

प्रयोगों से यह भी विदित हुआ कि पदार्थ का सारभूत अंश, कण के रूप में नहीं तरंगों के रूप में है। इसी आशय का मंतव्य प्रकट करते हुए ’दि लिमिटेशन ऑफ साइंस’में विज्ञानवेत्ता डी. सुलीवान लिखते हैं-’इस प्रकार यह पहला संकेत था, जो कि आधुनिक विज्ञान की ओर ये आया कि पदार्थमय जगत का मूलभूत स्वरूप वस्तुतः पदार्थ कण के रूप में नहीं, अपितु तरंगों के रूप में है। विश्लेषण की अंतिम अवस्था में पदार्थ बिल्कुल क्षीण हो गया और उसकी सत्ता अज्ञात तरंगों में समाहित होती दीखने लगी। ”दि फिलॉसफी ऑफ फिजीकल साइन्स ‘में एडिंगटन लिखते हैं-’पदार्थ की मूल सत्ता कण और तरंग दोनों रूपों में है। कण इसलिए कि वह पदार्थ का हिस्सा है और तरंग इसलिए कि वह अत्यन्त सूक्ष्म है। ”दि मिस्टीरियस यूनीवर्स ‘में जेम्स जीन्स भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। वे कहते हैं कि वस्तुतः हम जिस पदार्थ की दुनिया में रहते हैं, उसका आदि रूप तरंग है। वस्तुएँ विखंडित होने के उपराँत अंततः इसी तरंग में परिवर्तित हो जाती है।

प्रयत्न और परिश्रम से किये गये प्रयोगों तथा एकत्रित और विश्लेषित आँकड़ों एवं नित नवीन अनुसंधानों द्वारा भौतिक विज्ञानी जिस तथ्य के निकट पहुँचे हैं, वह यही कि विश्व -ब्रह्मांड की संरचना में समरसता और आँतरिक संगीत है और वह अत्यन्त सूक्ष्म, अति निपुण गणितीय मस्तिष्क का ही सुन्दर सुविस्तृत प्रकाशन है। प्रकृति राज्य की नियामक शक्तियों के रूप में वे कारण और क्रम -व्यवस्था ही पाते हैं। विज्ञान के विभिन्न सिद्धान्तों, नियमों का समन्वय अद्वैत वेदाँत की दिशा में ही होता दीख रहा है। वैज्ञानिक, दार्शनिक पॉल आर. हेल का कथन है-’सम्पूर्ण सृष्टि की एक अंतिम सुनिश्चित व्याख्या की खोज करता हुआ वैज्ञानिक चिंतन अद्वैतवादी है। ’

मैटर के कण ‘इलेक्ट्रान ‘द्रव्य कण भी हैं तथा तरंग भी। उसी प्रकार ‘रेडियेशन’ के पार्टिकल ‘फोटान’ तरंग भी हैं तथा द्रव्य भी। इस प्रकार मैटर और रेडियेशन की पृथक सत्ताएँ खतरे में पड़ गई हैं और वे दोनों एक ही मूल सत्ता एक ही यथार्थ के अंग मात्र प्रतीत होते हैं। इसीलिए वाल्टर फ्रैंकलीन अपनी रचना ‘क्वाण्टम गौड’ में लिखते हैं -’पदार्थ और प्रकाश भले ही बाह्य दृष्टि को दो पृथक अस्तित्व जान पड़ते हों, पर मूलतः वे एक ही सत्ता की दो भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इसे अब विज्ञान भली भाँति स्वीकारने लगा है और यह भी पुष्ट हो चला है कि विशेष परिस्थितियोँ में एक का दूसरे में रूपांतरण संभव है। ’इस प्रकार विज्ञान ने भी इसे लगभग अंगीकार कर लिया है कि मैटर और रेडियेशन दो भिन्न वस्तु न होकर एक ही मूलसत्ता के दो पहलू हैं। वह सत्ता समयानुसार दोनोँ में से कोई भी रूपाकार कभी भी ग्रहण कर सकती हैं पर इन सभी परिवर्तनों के बीच सदा वही मूलसत्ता विद्यमान रहती है। उसका संपूर्ण योग सदा एक-सा बना रहता है -ऐसी, विज्ञान के पदार्थ संरक्षण के महत्वपूर्ण सिद्धाँत की मान्यता है। स्पष्टतः यह वेदाँत की प्रसिद्ध अवधारणा ‘पूर्णमदः पूर्णमिदं ‘के ही अनुरूप है, जिसमें कहा गया है-’पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। ’

चेतना और पदार्थ का द्वैतभाव अब मिट चला है। विश्व का निर्माण और नियंत्रण करने वाली शक्ति का अनुभव आधुनिक वैज्ञानिकों को होने लगा है तथा इस शक्ति से मानवीय चेतना की समानता की भी अनुभूति की जा रही है। विज्ञान ”एकाब्रहम द्वितीयो नास्ति“ की पुष्टि और समर्थन के द्वार पर आ पहुँचा है -विज्ञान और अध्यात्म की मिलन वेला आ उपस्थित हुई है।


छोटा है न बड़ा (kahani)

“हजरत उमर उस नगर में जा रहे थे जहाँ उनकी विजय के उपलक्ष में स्वागत समारोह का आयोजन किया गया था।

रास्ता लंबा था। रात का सफर। सवारी के लिए ऊँट। कई साथी। तय किया गया कि बारी-बारी एक आदमी ऊँट की नकेल रस्सी पकड़ कर आगे-आगे चले और बाकी ऊँटों की पीठ पर झपकी लेते चलें।

रात भर चलने के बाद सवेरा उस समय नगर में हुआ जहाँ स्वागत आयोजन था। बारी के अनुसार हजरत उमर नकेल पकड़ कर चल रहे थे। स्थान समीप आया, ऊँट की पीठ पर सवार अर्दली ने पुकारा यह नकेल पकड़ कर चलेगा, वे सवार हो जायें।

पर हजरत ने यह कर इंकार कर दिया कि बारी के अनुसार उन्हें ही नकेल पकड़ कर चलना है। जो सवार है वे अपनी जगह पर सवार रहें। हममें से कोई न तो छोटा है न बड़ा। ’


मंत्र सिद्धि के आधार स्तंभ

कई व्यक्ति मंत्र, जप या पूजा पत्री के विधि- विधानों को ही उपासना की समग्रता समझ बैठते हैं और जब कोई सत्परिणाम हाथ नहीं लगता तो उसकी निरर्थकता की शिकायत करते हैं। इन दिनों आस्तिकता पर दुहरी मार पड़ रही हैं। एक ओर विज्ञान और बुद्धिवाद ईश्वरीय सत्ता को प्रत्यक्ष न देख पाने से उसकी सत्ता को अस्वीकार करता है। अधिक से अधिक यह मानता है कि प्रकृति या ‘इकॉलाजी’ संदर्भ किसी प्रकार पदार्थ और प्राणी समुदाय का व्यवस्था - परक संतुलन बिठाये हुए है। इसमें भक्ति, करुणा, अनुकंपा जैसा कोई तत्व नहीं है और न कर्म फल सिद्धान्त कसौटी पर खरा उतरता है। आत्मा को वह चलते-फिरते पौधे की हलचल गिनता है। इस प्रकार भौतिकवाद को नास्तिकवाद के समीप ही मानना चाहिए।

दूसरी ओर प्रच्छन्न नास्तिकवादी है जो पूजा, पुजापे की रिश्वत देकर या जीभ की लपालपी से उलटे सीधे सभी कामों की मनोकामना पूरी कराना चाहते हैं। साथ ही स्वर्गलोक में राजशाही मौज मजा करने के रंग -बिरंगे सपने देखते हैं। सपने की अवधि तो किसी प्रकार कट जाती है, पर जब विलंब होने लगता है तो प्रत्यक्ष वैभव हाथ आया न देखकर परोक्ष स्वर्ग पर से भी आस्था खो बैठते हैं। साहस के अभाव में मन की बात तो नहीं कह पाते, पर मानने लगते हैं कि ईश्वर का पल्ला पकड़ना बेकार है। मंत्र जप या पूजा -पत्नी के झंझट में कोई सार नहीं हैं।

वस्तुतः यहाँ यह भुला दिया जाता है कि मंत्र जप का लाभ मात्र जीभ की नोक हिला देने भर से नहीं मिलता और न ही छिट-पुट पूजा-पत्री की भेंट चढ़ा देने भर से उपासना पूरी हो जाती है। मंत्र उपचार में जहाँ शक्ति का महत्व है, वहाँ उसके प्रयोक्ता का स्तर भी आवश्यक है। बारूद, गोली, कारतूस अपनी जगह अपना काम करते हैं, इस पर भी बन्दूक का अपना स्तर है। बढ़िया बन्दूकें सही और लंबा निशाना लगाती हैं, जबकि गाँव के लुहारों द्वारा बनाये हुए तमंचे उतना काम नहीं कर पाते। इसलिए मंत्र का उपयुक्त चुनाव करना तो आवश्यक है ही, पर इससे भी अधिक आवश्यकता इस बात की है कि प्रयोक्ता ने अपना स्तर पवित्र और प्रखर बना लिया हो। इसके लिए उसने आवश्यक तपश्चर्या की हो। मंत्र जप का सत्परिणाम तभी मिलता है।

मंत्र जप में श्रद्धा भी एक पक्ष है। जिस उपासना, देवसत्ता एवं क्रियाकृत्य पर अटूट श्रद्धा और अडिग विश्वास हो, उसका प्रतिफल भी चमत्कारी होगा। किंतु यदि अन्यमनस्कता, उपेक्षापूर्वक, बेगार भुगतने, लकीर पीटने की तरह उसे किसी तरह निबाहते रहा जाये तो वही मंत्र एक प्रकार से निष्फल, निरर्थक जैसा बन जाएगा नाम मात्र का प्रतिफल ही उससे दृष्टिगोचर होगा।

श्रद्धा होने पर किसी संत की दी हुई भभूत भी बहुमूल्य औषधि जैसा, पुण्य प्रसाद जैसा फल देती है, किंतु उसी को यदि अविश्वास -उपहासपूर्वक कौतूहल की तरह काम में लिया जाये तो उससे किसी बड़ी संभावना की आशा नहीं की जा सकती। श्रद्धा से पत्थर में भी देवता जैसी सामर्थ्य उत्पन्न हो जाती है। उसका अभाव हो तो प्रतिमा का खिलौने से बढ़कर और कोई अर्थ नहीं रह जाता।

कहा जाता है कि “शंका डायन और मनसा भूत। ” झाड़ी से भूत इसी प्रकार उत्पन्न होते हैं। रात्रि के सुनसान जंगल में पीपल के पत्तों का खड़खड़ाना और उल्लू जैसे पक्षियों का विचित्र शब्दों में बोलना किसी डरपोक का भूतों की उपस्थिति का अनुभव कराता है और वह उतने भर से घबरा जाता है। इसी प्रकार गले में गायत्री का रक्षा कवच बाँधकर मनुष्य भयानक विपत्तियों के बीच में से गुजर जाता है। यह श्रद्धा का ही प्रतिफल है अनेक व्यक्तियों को गायत्री महामंत्र की उपासना के फलस्वरूप अनेक प्रकार के कष्टों से छुटकारा पाते और अनेक सुविधायें उपलब्ध करते हुए देखकर हमें यही अनुमान लगाना चाहिए कि उस मंत्र जप में ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश अवश्य है जिनके कारण उपासक की अंतः भूमि में आवश्यक हेरफेर होते हैं और वह असफलताओं एवं शोक -संतापों पर विजय प्राप्त करते हुए तेजी से समुन्नत समर्थ एवं सफल जीवन की ओर अग्रसर होता है।

रामायणकार ने “मंत्र परम लघु जासु बस” कहकर मंत्र की सर्वोपरि शक्ति और महत्ता का वर्णन किया है। मंत्र शक्ति की इतनी महत्ता होने पर भी सभी लोग वह सामर्थ्य नहीं जुटा पाते, उसकी सफलता में उन्हें संदेह बना ही रहता है। उसका कारण और कुछ नहीं, अंतःकरण का गहरा और उथला होना अर्थात् श्रद्धा और विश्वास की कमी का होना ही है। मंत्र में सन्निहित भावनाओं को प्रखर बनाने के लिए जिस परिष्कृत और समर्थ व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है, वह न जुटा पाने से मंत्र अपना सामान्य प्रभाव ही अभिव्यक्त करके रह जाता है। उससे कुछ विशेष लाभ मिलता नहीं। व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने का कार्य वाणी की सत्यनिष्ठ सरलता और मधुरता से प्रारंभ होता है। और जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप में छा जाता है। जिस तरह मैले शीशे पर पड़ने वाली प्रकाश की किरणें अपना कोई प्रभाव नहीं दिखा पातीं, उसी तरह मलिन अंतःकरण में पड़ने वाले मंत्र का प्रकाश केवल मात्र उसी सफाई में लगा रहेगा। यदि व्यक्ति की जीवन दिशा अपने दोष -दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालने और उनके स्थान पर सद्गुणों की प्रतिष्ठा की हुई हो तब तो उस स्थिति में मंत्र जप का प्रभाव लिंब से ही सही देखने को मिल जाता है। पर यदि आहार -विहार, रहन-सहन, वाणी -व्यवहार द्वारा अंतःकरण को मल-विक्षेप से लादते रहा गया हो तो कितना ही अच्छा और अधिक मंत्र जप भी कोई प्रभाव परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगा।

सितार के तारों पर क्रम विशेष से उँगलियाँ रखने से उसमें से भिन्न -भिन्न प्रकार की ध्वनि तरंगें स्वर लहरियाँ निकलती हैं। उसी प्रकार मंत्र के अक्षरों का क्रम जिस क्रम से ऋषियों ने बिठाया है, उसका अपना वैज्ञानिक महत्व है। गायत्री का अर्थ तो सीधा सादा हैं-भगवान् हमारी बुद्धि को निर्मल कर दें, पर उसके अक्षरों का गुँथन इस प्रकार के प्रभाव उत्पन्न करने वाली क्षमता प्रादुर्भूत होती है। गायत्री महामंत्र के जप से उत्पन्न पराध्वनि सृष्टि के सारे वातावरण के परमाणुओं को कँपा देने की शक्ति से ओतप्रोत हैं। साथ ही जपकर्ता की भावना के अनुरूप अदृश्य लोक से प्रेरणा, शक्ति और सहायता भी, खींच लाने में समर्थ है। गायत्री मंत्र के अर्थ का भाव लिए अनेकों छन्द वेदों में विद्यमान हैं और सद्बुद्धि के निमित्त प्रार्थना करने वाली भी अनेकानेक ऋचायें हैं, किन्तु जो विशेषता आदिशक्ति गायत्री में है वह और किसी में नहीं यह शब्द गुँथन की विशेषता है।

मुख से निकलने वाली शब्द प्रक्रिया द्वारा दिन भर बातचीत का क्रम चलता रहता है, पर उससे मात्र विचारों, का, जानकारियों का, आदान-प्रदान होता है। कुछ बातें ऐसी ही बकवास हँसी ठिठोली जैसी भी होती हैं, जो अपने को या सुनने वाले को मूर्ख बनाती हैं या निरर्थक समय नष्ट करती रहती हैं। उनमें काम का सार तत्व बहुत कम होता है।

किंतु मंत्रोच्चार में प्रयुक्त होने वाली वाणी का प्रभाव भारी भरकम होता है। वह शब्द भेद का काम करती है। परिमार्जित व्यक्तियों की परिमार्जित वाणी को “वाक्” या”परावाक्” कहते हैं। उसका प्रभाव सुनिश्चित रूप से होता है। नारदजी ने वाल्मीकि, ध्रुव, प्रहलाद, पार्वती, सावित्री आदि को जो परामर्श दिया, वह उनके पुराने जीवन प्रवाह को उलट देने में समर्थ हुआ। यदि कोई दूसरा इसी प्रकार की सलाह देता तो उसका प्रभाव कदाचित ही कुछ पड़ता।

योगीजन मात्र बैखरी वाणी का ही प्रयोग नहीं करते। मात्र जीभ से शब्दों का उच्चारण ही नहीं करते। उनकी शेष तीन वाणियाँ भी मुखर रहती हैं “मध्यमा, परा, पश्यंती वाणियाँ”जो मुँह से उच्चारित नहीं होती। इनमें मध्यमा चेहरे की भाव -भंगिमाओं से नेत्रों से प्रकट होती है। परावाणी के साथ विचार शक्ति और प्राणशक्ति जुड़ी होती है। वह कानों से सुनी तो नहीं जाती, पर प्रभाव इतना अधिक करती है जितना घंटों बोलते रहने पर भी नहीं हो सकता। पश्यंती वाणी अन्तःकरण से अंतरात्मा से निकलती है। उसी में शाप -वरदान देने की, ऊँचा उठाने आगे बढ़ाने की सामर्थ्य होती है। बैखरी वाणी से बोलना तो परिवारी लोगों के बीच रहकर ही बालक सीख लेता है, पर अन्य उच्चस्तरीय तीन वाणियों को मुखर बनाने के लिए सात्विक आहार, सत्यवचन, मौन आदि से लेकर अन्याय कई प्रकार की साधनायें करनी पड़ती हैं।

ब्रह्मदेव के चार मुख है। उन्होंने उन चारों से चार वेदों का सृजन किया। यह चतुर्धा प्रकटीकरण वस्तुतः बैखरी, मध्यमा, परा और पश्यंती इन चार वाणियोँ के ऊर्ध्वगामी उभार का अलंकारिक वर्णन किया है। यह कार्य ब्रह्मदेवता ने किया सो उसे आत्म देवता भी सम्पन्न कर सकता है। पुराणों की कथा है विष्णु भगवान की नाभि से उत्पन्न कमल नाल पर ब्रह्मा जी कई बार उतरे और ऊपर चढ़े। मंत्र साधना में यही होता है। उच्चारित होने के उपरान्त स्थूल शब्द अन्तःकरण के मर्मस्थल की गहराई में उतरता है और उस शक्ति स्रोत की ऊर्जा से सम्पन्न होकर ऊपर आता है। जब वह ऊपर आता है तो बैखरी में पश्यंती का वैसा ही प्रभाव होता है जैसा कि बिजली के संपर्क से धातु के तार में। वह मंत्रवत् शब्द समस्त सृष्टि में हलचल उत्पन्न करता है। सूक्ष्म जगत को स्पंदित करता है और व्यक्ति को सामान्य न रहने देकर उसे दैवी शक्ति से सम्पन्न बना देता है।

अध्यात्म क्षेत्र में मंत्र विद्या का जो कुछ भी चमत्कार कहा, सुना और देखा जाता है, उसे परिष्कृत एवं संयमित वाणी का ही प्रतिफल कह सकते हैं। इसके लिए मंत्र साधक का जपकर्ता को अपना व्यक्तित्व इस स्तर का विनिर्मित करना होता है जिससे जिव्हा से उच्चारण किये गये मंत्र अक्षरों में प्रयुक्त होने वाली वाणी मात्र ध्वनि न रहकर “वाक्” शक्ति के रूप में प्रकट हो सके और उसके प्रभाव से सूक्ष्म जगत में ऐसी हलचलें उत्पन्न हो सकें जो मंत्र उद्देश्य के अनुरूप परिस्थिति एवं वातावरण उत्पन्न कर सकने में समर्थ हो सकें।

मंत्र साधना में वाक् शक्ति को विकसित करने के लिए मन, वचन और कर्म में ऐसी उत्कृष्टता उत्पन्न करनी पड़ती है कि जीभ को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रह जायें। इतना कर लेने के उपरान्त जपा हुआ मंत्र सहज ही सिद्ध होता है। और उच्चारण किया हुआ शब्द असंदिग्ध रूप से सफल होता है। यदि वाणी दूषित, कलुषित, दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा उच्चारित मंत्र भी जल जायेंगे। तब बहुत संख्या में बहुत समय तक जप, स्तवन, पूजा पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट सत्परिणाम उपलब्ध न हो सकेगा। परिष्कृत जिव्हा में ही वह शक्ति रहती है कि उसके द्वारा उच्चरित मंत्र प्रचण्ड और प्रभावशाली होता है और मनुष्यों के अंतःस्थल तथा अनन्त अन्तरिक्ष को प्रभावित किये बिना नहीं रहता। ऐसे परिष्कृत वाणी को”वाक्”को मंत्र साधना का प्राण कह सकते हैं। उसे साधक की कामधेनु एवं तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। इसी परिमार्जित जिव्हा को सरस्वती कहते हैं। मंत्र की आत्मा वही है। सिद्धियों का उद्गम स्थल उसी को मानना चाहिए। इसी आधार पर मंत्रों की चमत्कारी विशेषता उभरती है और जपकर्ता को ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बनने का अवसर मिलता है।


प्रायश्चित नहीं परिमार्जन

चित्तौड़ कौन जाएगा? महर्षि हारीत के आश्रम में प्रत्येक अंतवेसी के सम्मुख आज यह प्रश्न है। महर्षि ने कल सायंकालीन संध्या समाप्त करने के बाद सूचित कर दिया था कि चित्तौड़ का राजपुरुष सवेरे प्रतीक्षा करेगा। मध्याह्नोत्तर प्रस्थान का समय है और अब तक निश्चय नहीं हो सका कि यह गौरव किसे प्राप्त होगा।

महर्षि हारीत के आश्रम का कोई भी छात्र किसी शासक के मार्ग निर्देश करने की योग्यता रखता है किंतु, कुछ ऐसे ब्रह्मचारी हैं जो गुरुदेव के श्री चरणों से पृथक् होना नहीं चाहते। कुछ ने नैष्ठिक रूप से आश्रम स्वीकार किया है। जिनका अध्ययन समाप्त नहीं हुआ उनके लिए तो कोई प्रश्न नहीं है। सबसे मुख्य बात यह है कि इस समय चित्तौड़ पुरी का नागरिक समुदाय अनेक कारणों से तर्कशील होकर सनातन सदाचार पथ से अस्त-व्यस्त हो रहा है। चित्तौड़ नरेश बाप्पा रावल चाहते हैं कि राजगुरु के पद पर जिस विभूति की प्रतिष्ठा हो उनका शील एवं तप लोगों में सात्विकता एवं श्रद्धा का संचार करे।

बात ठीक भी है, धर्म का पालन केवल भय से ही कब तक होगा। उसका स्थान तो अंतर में होना चाहिए। नम्रता के ये मूर्तिमान स्वरूप छात्र इनके मन में नहीं आता कि उनके संयम तप ने उनके संकल्प में वह शक्ति दे दी है कि राजगुरु के पद पर रहना तो दूर वे यहाँ से केवल सोच लें तो संपूर्ण अव्यवस्था दूर हो जाये। अधर्म तथा उसके परिकर अधिष्ठाता देवताओं में इतना साहस ही नहीं है। कि वे इन तपोमूर्तियों के संकल्प क्षेत्रों की ओर दृष्टिपात भी करें।

“आचार्य चरण जिसे आज्ञा दें..”बात तो इतनी निश्चित है कि उसमें सोचने समझने को कुछ रह ही नहीं जाता। गुरुदेव जिसे आज्ञा देंगे, उसे जाना ही पड़ेगा। उसकी योग्यता एवं शक्ति का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है तब?गुरुदेव की आज्ञा उनका आशीर्वाद कौन नहीं परिचित है उन सर्व समर्थ की शक्ति से? इसी शक्ति के कुछ कणों को पाकर ही तो बाप्पा रावल सामान्य भील बालक से चित्तौड़ नरेश बन सके। इसी शक्ति की प्रचण्ड ऊर्जा के समक्ष दुर्धर्ष और बर्बर अरबों के प्रचण्ड आक्रमण विफल हुए। लेकिन वे किसे आज्ञा देंगे ?असमंजस संकोच, हिचक और इसलिए भी यह सब कि प्रथम बार गुरुदेव ने किसी को आज्ञा न देकर छात्रों पर यह बात छोड़ दी है कि वे स्वयं निश्चय करें।

महर्षि पीपल वृक्ष के नीचे बनी वेदी पर बैठ चुके हैं और आप सब की प्रतीक्षा कर रहें हैं। सुमंत ही गुरुदेव का सबसे प्रिय शिष्य है। वह है भी आश्रम में सबसे अल्पवयस्क, सबसे चपल, सबकी सेवा में पटु और सबका स्नेह पात्र। सबको ढूंढ़-ढूँढ़ कर वह सन्देश सुना आया।

दिन का प्रथम प्रहर बीत चुका था। दिशाएँ वेद मंत्रों के सर स्वर पाठ से पवित्र हुई और हवन का सुरभित धुँआ तो अब भी गगन में कुण्डलियाँ बनाता उठ रहा है। पीपल की अरुण, मृदुल कोपलों की छाया में वेदिका पर जैसे मूर्तिमान अग्नि देव विराजमान हैं और अब उनके चारों ओर ये बल्कलधारी धूमिल, रुक्ष केशों वाले युवकों के रूप में मानों नम्रता, शील, सत्य, त्याग आदि सद्गुण ही एकत्र हो गये हैं।

“ब्राह्मण का तप एवं त्याग इसीलिए है कि उससे विश्व को अभय तथा शाँति का वरदान प्राप्त हो। ”महर्षि ने एक बार देख भर लिया अंतेवासियों की ओर और फिर उनका घन गम्भीर स्वर दिशाओं के साथ श्रवणों को पवित्र करने लगा। तर्क मन की चंचलता की ही एक मोहक वृत्ति है और श्रद्धा है जगन्नियंता का मंगल वरदान। तर्क का मायाजाल मानव का मन अपने प्रमाद एवं दोष को समर्थन देने के लिए फैलाता है। इसका परिणाम है असंयम, जिसका फल अशाँति एवं क्लेश है। ब्राह्मण अपने त्याग तप एवं आचरण से माया मुग्ध मानव के मन का तर्क जाल छिन्न करके उसमें श्रद्धा -आस्था का अमर प्रकाश प्रदीप्त करता है।

आचार्य हारीत के साथ जैसे आश्रम के सब चर -अचर मूक हो गये। वायु तक निस्तब्ध हो उठी निःशब्द शाँति और उसमें एक अद्भुत संकोच पूर्ण अव्यक्त भाव। अन्तेवासियों ने मस्तक झुका लिए थे।

“चित्तौड़ नरेश बहुत खिन्न हैं। ”पुत्र के समान प्रिय प्रजा का अस्त व्यस्त भाव किसे खिन्न नहीं करेगा। उन्हें एक ब्राह्मण चाहिए। तुममें से कौन उन अभीप्सु को आशीर्वाद देगा?आचार्य ने दृष्टि चारोँ ओर घुमाई।

“हममें जो कुछ भी है, वह श्री चरणों का प्रसाद ही है। हमार पास अपनी तो त्रुटियाँ प्रमाद एवं क्षुद्रता ही हैं। ”बन्धु वर्ग के संकोच का भार बड़े ही उठाते हैं। नैष्ठिक व्रती सत्यसंघ जी ने सब को प्रसन्न कर दिया। बड़ी नम्रता से अंजलि बाँधे खड़े हो गये -श्री चरण आशीर्वाद दे सकते हैं महाराज को। उस आशीर्वाद का वहन करने की जिसे आज्ञा होगी उसकी योग्यता का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है।

“राजपुरुष को यहीं बुला लो। महर्षि ने एक क्षण कुछ सोच कर सुमंत की ओर संकेत किया सुमंत तो संदेश सुनाने के लिए तैयार ही बैठा था।

आचार्य अभय चित्तौड़ के राजगुरु का आसन भूषित करेंगे। राजपुरुष ने आकर प्रणाम किया महर्षि हारीत के चरणों में और जैसे ही वह हाथ जोड़ कर खड़ा हुआ, महर्षि ने अपना निर्णय सुना दिया। “

“अभय। “राजपुरुष नाम सुनकर ही चौंका और जब उसने निर्दिष्ट आचार्य अभय को देखा, उसका मुख सूख गया।

“अभय। “सभी ब्रह्मचारी चौंके। उन्हें अपने गुरुदेव के इस निश्चय का अनुमान भी नहीं हो सकता था। यह अभय ब्राह्मण है, यह बात तो उसके द्वारा सबसे ज्ञात है, किन्तु यह गुरुदेव का न तो छात्र है, न ब्रह्मचारी ही। इसने तो कुछ दिन हुए जब नियमित संध्या प्रारंभ की है। क्या हुआ जो वह प्रतिभा संपन्न है, इसमें त्याग और तप भी है तो सोचा भी नहीं जा सकता।

ब्रह्मचारियों को स्मरण है कि जब यह आश्रम में आया था तब इसका शरीर मलिन हो रहा था। इसके वस्त्र फटे थे। गुरुदेव ने सबको मनाकर दिया था परिचय पूछने के लिए किन्तु इसका प्रमाद, इसका औधत्य इसका कठोर शरीर सब ऐसा लगता है, जैसे यह कोई डकैत हो।

लेकिन धीर-धीरे वह विनम्र होता गया बड़ा मधुर कंठ पाया है इसने प्रतिभाशाली भी है यह। भजन तो बड़े ही मोहक स्वर से गाता है। गुरुदेव ने इसे आदेश दिया है। बड़ी मनोरम व्याख्या करता है, गूढ़ पदों की। ”शरीर में शक्ति है, बुद्धि में योग्यता है, स्वभाव में नम्रता है। ”ब्रह्मचारियों अपना समाधान कर लिया जब स्वयं महर्षि ने आदेश दिया, तो इसमें भ्रम का स्थान कैसे हो सकता है?

श्रद्धा के स्वरूप ब्रह्मचारी गण आश्वस्त हो जाये, महर्षि की शक्ति एवं सम्मान से प्रभावित राजपुरुष मस्तक झुका कर किसी प्रकार तैयार हो जाये। लेकिन उसे तो मालूम है कि वह क्या है। वह कैसे अपने को भूल जाय। वह उठा और आर्तभाव से महर्षि के चरणों पर गिर पड़ा। बड़ा करुण रुदन था उसका। सभी स्तब्ध थे।

“मेरे बच्चे!”महर्षि उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोले उनकी वाणी में अपार वात्सल्य था-”तुम इतने कातर क्यों हो रहे हो। तुम चित्तौड़ के लोगों के शील, स्वभाव, विचार शैली से परिचित हो। मनुष्य को अपने किये हुए का परिमार्जन करने को सदा प्रस्तुत रहना चाहिए। जब एक अपना सुधार कर लेता है, उसका उज्ज्वल आदर्श दूसरों के हृदय को प्रकाशित कर देता है। संग का प्रभाव सब पर पड़ता है। चाहे वह कोई भी क्यों न हो। ”

“आचार्य! मैं तो दस्यु हूँ मैंने भयवश ही यहाँ आश्रय लिया था। किन्तु श्री चरणों के साश्रिध्य ने अब इस हीन हृदय में इतनी शक्ति दे दी है कि आपके आदेश से प्रायश्चित का वह स्वागत कर सके। “उसने अपने को स्थिर कर लिया।

“सो कुछ नहीं। ”महर्षि की वाणी में आश्वासन और आशीर्वाद दोनों थे - ‘तुम्हें प्रायश्चित के साथ परिमार्जन करना है और सच्चा प्रायश्चित तो है पश्चाताप। उसे जहाँ भी तुम जाग्रत कर दोगे वहीं हृदय परिशुद्ध हो जाएगा। ”

“आचार्य अभय की यात्रा व्यवस्था तुमने कर ली होगी। ”राजपुरुष ने केवल मस्तक झुका कर स्वीकृति सूचित की। अभय ने पुनः मस्तक रखा महर्षि चरणों में। उन्हें आशीर्वाद के साथ जो ब्रह्मचारियों का सौहार्द भरा संदेश एवं अनुगमन मिला था, वह प्रसन्न कर सका या नहीं, यह कहना कठिन है। कहा इतना ही जा सकता है कि उन्होंने अपने को स्थिर रखा और किसी प्रकार विदा हुए आश्रम से।

नगर के प्रवेश द्वार पर ही चित्तौड़ नरेश बप्पा रावल महारानी के साथ अभ्यर्थना के लिए खड़े हुए थे। महाराज प्रणाम के लिए झुके, इसके पूर्व ही वह दो कदम पीछे हटते हुए बोले’राजन् आपने मुझे पहचाना नहीं। आपके सम्मुख कुख्यात लंपट दस्यु अभय खड़ा है। मैं अपने योग्य दण्ड के लिए प्रस्तुत होकर आया हूँ। ”

बप्पा रावल के अधरों पर हल्की सी स्थिति रेखा झलकी। उनके स्वर में महर्षि हारीत के प्रति गहरी श्रद्धा और निष्ठ थी-’दस्यु श्रेष्ठ अभय को भूल जाना सम्भव नहीं है और जिसके नेत्र इतना पहिचानने में भी प्रमाद करें, वह क्या शासक होने योग्य है लेकिन भगवन्! जब कुत्सित लौह पारस का स्पर्श करके स्वर्ण बन जाता है उसकी पूर्वाकर्ती तो कोई अर्थ नहीं रखती। उसे आभूषण बनाने को उत्सुक न हो, ऐसा हीन बुद्धि कौन होगा? मैं तो परम भाग्य शाली हूँ। महापुरुष तो अपने संग से स्वर्ण नहीं पारस बना दिया करते हैं। औरों को मुझे अपने आचार्य के आसन पर ऐसे ही पारस के पूजन का अवसर मिला है। ”

“मेरे पूर्व अपराध ऐसे नहीं जिन्हें क्षमा किया जा सके। “ अभय को महाराज की श्रद्धा पर आश्चर्य हो रहा था। ये जानबूझ कर पहिचान कर भी क्योँ मुझे आचार्य मानते जा रहे है।

“जब कोई तपोधन अपने वरद हस्त से किसी के मस्तक का स्पर्श कर देते हैं, यमराज में भी साहस नहीं रह जाता उसके पुर्वापराधों पर विचार करने का। “महाराज का निश्चय भ्राँतिहीन था। “अब विकृतियों का परिमार्जन आप स्वयं करेंगे मैं तो केवल आज्ञावर्ती हूँ। ”

महर्षि हारीत के विदा होते समय के आदेश अभय के अन्तःकरण में स्पष्ट हो गए। प्रायश्चित नहीं परिमार्जन। अंततः उसी के अनुगामियोँ के प्रभाव से चित्तौड़ पुरी में यह अश्रद्धा एवं अव्यवस्था करना है। उसका आश्रम की ओर मुख करके महर्षि को प्रणाम करके वह विकृतियों के परिमार्जन के लिए कृत संकल्प हो गए।


कुँडलिनी महाशक्ति व उसकी संसिद्धि

मानवी -काया एक समूचा ब्रह्मांड है। जो कुछ इस सुविस्तृत ब्रह्मांड में है, स्रष्टा ने उसे बीज रूप में मानवी पिंड में सँजो दिया है। आत्मसत्ता में सन्निहित विश्व की इन समस्त विभूतियों को यदि साधनात्मक उपचारों द्वारा खोजा और जगाया जा सके तो जीवात्मा को देवात्मा एवं परमात्मा बनने का अवसर मिल सकता है। इस अन्वेषण प्रयास को ”ब्रह्म विद्या” और जागरण प्रक्रिया को ‘ब्रह्मतेज - सम्पादन’कहते हैं। इस संदर्भ में शरीर स्थित सूक्ष्म चैतन्य केन्द्रों को जाग्रत एवं जीवंत करने और उनके ब्रह्मबल से उच्चकोटि का लाभ उठाने की प्रक्रिया कुँडलिनी जागरण के नाम से जानी जाती है।

कुँडलिनी जागरण के माहात्म्य की योगशास्त्रों में जितनी चर्चा हुई है उतनी और किसी साधना के संबंध में सार्वभौम स्तर पर नहीं मिलती। योगवशिष्ठ, तेज बिन्दूपनिषद्, योग चूड़ामणि, ज्ञान संकलिनी तंत्र, शिवपुराण, देवी-भागवत्, शाण्डिल्योपनिषद्, मुक्तिकोपनिषद्, हठयोग -प्रदीपिका, कुलावर्ण -तंत्र, योगिनी-तंत्र, घेरंड-संहिता, कंठश्रुति, ध्यान बिंदूपनिषद्, रुद्रयामलतंत्र, योगकुण्ड-लिन्योपनिषद्, शारदा तिलक आदि ग्रन्थों में इस विद्या के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। उसके विधानों और विवरणों में तो थोड़ा बहुत अंतर है, पर यह मान्यता सर्वविदित है कि आँतरिक आत्मिक शक्तियों को प्रसुप्ति से जाग्रति में बदलने, जाग्रति को प्रचंड बनाने में कुँडलिनी जागरण प्रक्रिया से असाधारण सहायता मिलती है।

कुँडलिनी क्या है?इसके संबंध में शास्त्रों और तत्वदर्शियों ने अपने - अपने अनुभव के आधार पर कई अभिमत व्यक्त किये हैं। ज्ञानार्पण तंत्र में कुँडलिनी को विश्व जननी और सृष्टि संचालिनी शक्ति कहा गया है-”शक्ति कुँडलिनी विश्व-जननी व्यापार वद्धोद्यता। ”विश्व व्यापार एक घुमावदार उपक्रम के साथ चलता है। परमाणु से लेकर ग्रह नक्षत्रों और आकाश गंगाओं तक की गति परिभ्रमण-परक है। हमारे विचार और शब्द जिस स्थान से उद्भूत होते हैं, व्यापक परिभ्रमण करके वे अपने उद्गम केन्द्र पर ही लौट आते हैं। यही गतिचक्र भगवान के चार आयुधों में से एक है। महाकाल की परिवर्तन प्रक्रिया इसी को कहा जा सकता है। जीव को चक्रारुढ़ मृतिका पिंड की तरह यही घुमाती है और कुम्हार जैसे अपनी मिट्टी से तरह-तरह के पात्र-उपकरण बनाता है उसी प्रकार आत्मा की स्थिति को उठाने-गिराने की भूमिका भी वही निभाती है। कुँडलिनी सृष्टि संदर्भ में समष्टि और जीव संदर्भ में व्यष्टि संचार करती है।

अध्यात्म ग्रंथों में विशेषता उपनिषदों में कुँडलिनी महाशक्ति की चर्चा हुई है, पर उतने को ही पूर्ण पक्ष नहीं मान लेना चाहिए। उतने से आगे एवं अधिक भी बहुत कुछ कहने, जानने और खोजने योग्य शेष रह जाता है। इन अपूर्ण घटकों को मिलाकर हमें वस्तुस्थिति समझने अधिक जानने के लिए अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए।

‘कठोपनिषद्’के यम-नचिकेता संवाद में जिस पंचाग्नि विद्या की चर्चा हुई है, उसे कुँडलिनी महाशक्ति की विधि-विवेचना कहा जा सकता है। ‘श्वेताश्वेतर उपनिषद् में उसे’योगाग्नि’कहा गया है और बताया गया है कि इसके जागरण से मनुष्य का शरीर योगाग्निमय हो जाता है। वह रुग्णता, वार्धक्य एवं मृत्यु पर विजय पा लेता है-यथा-

’नतस्य रोगों न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्। ’

दैनिक योग प्रदीपिका में उसे ‘स्पिरिट फायर’कहा गया है। जानवुडरफ सरीखे सुप्रसिद्ध तंत्रावेषी उसे ‘सर्पेन्टाइन फायर’नाम देते रहे हैं। थियोसोफिकल सोसायटी की संस्थापिका मेडम ब्लैवेट्स्की ने उसे विश्वव्यापी विद्युत शक्ति “कास्मिक इलेक्ट्रिकसिटी” नाम दिया है। उनने उसकी विवेचना विश्व विद्युत के समतुल्य चेतनात्मक प्रचंड प्रवाह के रूप में की है।

अपने ग्रंथ-”वायस आफ दि साइलेन्स” में उनने कहा है कि सर्पवत् या बलयान्विता गति अपनाने के कारण उस महाशक्ति को कुँडलिनी कहते हैं। इस सामान्य गति को योग साधक अपने शरीर में चक्राकार बना लेता है। इस अभ्यास से उसकी वैयक्तिक शक्ति बढ़ती है। कुँडलिनी विद्युतीय अग्नि युक्त गुप्त शक्ति है। यह वह प्राकृतिक शक्ति है जो सेन्द्रिय एवं निरीन्द्रिय प्राणियों और पदार्थों के मूल में विद्यमान है।

ब्रह्मांड में दो प्रकार की शक्तियाँ काम करती हैं एक लौकिक-सेकुलर और दूसरी आध्यात्मिक-स्प्रिचुअल। इन्हें फिजीकल एवं मेटाफिजीकल भी कहते हैं। कुँडलिनी ब्रह्मांडव्यापी आध्यात्मिक शक्ति है। यद्यपि यह साधक द्वारा उच्चस्तरीय साधना करने पर जाग्रत होती है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह साधक की अपनी उपार्जित पूँजी है। यह एक प्रचंड विश्वव्यापी दिव्य शक्ति है जिसे उपयुक्त सत्पात्र अपनी आत्मिक संपदा और सशक्तता बढ़ाते हैं। उस उपार्जित संपदा के आधार पर साँसारिक वैभव और आत्मिक वर्चस्व का दुहरा लाभ मिलता है।

पिछले दिनों कुँडलिनी महाशक्ति की सत्ता तो स्वीकार की गयी, पर वैज्ञानिक क्षेत्रों में उसे किन्हीं शारीरिक क्षमताओं का एक रूप देने का प्रयत्न किया गया है। शरीर विज्ञानियों ने उसे नाड़ी संस्थान से उद्भूत ‘ग्नवर्स फोर्स’ कहा है। मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता डॉ. रेले ने अपने बहुचर्चित ग्रंथ -”मिस्टिरियस कुँडलिनी“ में उसकी वेगस नर्व्स के रूप में व्याख्या की है। माँसपेशियों और नाड़ी संस्थान के संचालन के काम आने वाली सामर्थ्य को ही अध्यात्म प्रयोजनों में काम करने पर कुँडलिनी संरक्षक बनने का वे प्रतिपादन करते हैं। उनके मतानुसार यह शक्ति जब नियंत्रण में आ जाती है तो उसके सहारे शरीर की ऐच्छिक और अनैच्छिक गतिविधियों पर इच्छानुसार नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। वह आत्म नियन्त्रण बहुत बड़ी बात है। इसे प्रकारांतर से व्यक्तित्व के अभीष्ट निर्माण की तदनुसार भाग्य निर्माण की सामर्थ्य कह सकते हैं। वे इसी रूप में कुँडलिनी का गुणगान करते और उसकी उपयोगिता बताते हुए उसके जागरण का परामर्श देते हैं।

डॉ. रेले की उक्त पुस्तक की भूमिका तंत्र मर्मज्ञ सर जॉन वुडरफ ने लिखी है। जिसमें उन्होंने रेले के इस अभिमत से असहमति प्रकट की है कि वह शरीर संस्थान की विद्युतधारा मात्र हे। उन्होंने लिखा है-’वह एक चेतन और महान सामर्थ्यवान शक्ति है- ग्राण्डपोटेन्शियल है जिसकी तुलना अन्य किसी पदार्थ या प्रवाह से नहीं की जा सकती। उनके अनुसार नाड़ी शक्ति कुँडलिनी का एक स्थूल रूप ही है, वह मूलतः नाड़ी संस्थान या उसका उत्पादन नहीं है। वह न कोई भौतिक पदार्थ है और न मानसिक शक्ति। वह स्वयं ही इन दोनों प्रवाहों को उत्पन्न करती हैं। स्थिर सत्यस्टेटिक रियल और गतिशील सत्य-फैनामिक रियल एवं अवशेष शक्ति ”रेजीडुअल पावर” के समन्वित प्रवाह की तरह इस सृष्टि में काम करती है। व्यक्ति की चेतना में वह प्रसुप्त पड़ी रहती है। इसे प्रयत्नपूर्वक जगाने वाला विशिष्ट सामर्थ्यवान बन सकता है।

विज्ञान की भाषा में कुँडलिनी को जीवनी शक्ति अथवा जैव चुम्बकीय विद्युत कहते हैं। इसका केन्द्र मस्तिष्क माना गया है, तो भी यह रहस्य अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ कि मस्तिष्क को अपनी गतिविधियों के संचालन की क्षमता कहाँ से मिलती है?योगशास्त्र इसका उत्तर मूलाधार में निहित काम बीज की ओर संकेत करते हुए बताता है कि अव्यक्त मानवी सत्ता को व्यक्त होने का अवसर इसी केन्द्र से मिलता है। वही काम तंत्र के विभिन्न क्रियाकलापों के लिए आवश्यक प्रेरणा भी देती हैं। यही वह चुम्बकीय ‘क्रिस्टल’है जो काया के ट्रांजिस्टर को चलाने वाला आधार खड़े करता है। काम-शक्ति के प्रकटीकरण का अवसर जननेन्द्रिय के माध्यम से मिलता है, अतः उस स्थान पर अव्यवस्थित मूलाधार चक्र को कुँडलिनी केन्द्र एवं संक्षेप में ‘कुँड’कहते हैं।

हठयोग के व्याख्याकारों ने वस्ति क्षेत्र के गह्वर में अंडे की आकृति वाले ‘कंद’ के साथ उसका संबंध जोड़ा है। शिव संहिता में कहा गया है गुदाद्वयं गुलतश्चोर्ध्वं मेढ्रैकाँगुलतस्त्वधः एवं चास्ति समं कदं समता चतुरंगलम्। अर्थात् गुदा से दो अंगुल ऊपर और लिंगमूल से एक अंगुल नीचे चर अंगुल विस्तार ‘कंद’ का प्रमाण है। इसी में आगे उल्लेख है-’गुदा एवं शिश्न के मध्य में जो योनि है-वह पश्चिमाभि मुखी अर्थात् पीछे का मुख है, उसी स्थान में ‘कंद’है और इसी स्थान में सर्वदा कुँडलिनी स्थिति है।

कुँडलिनी परिचय में स्थान-स्थान पर स्वयंभू लिंग की चर्चा है। बहुत स्थानों पर उसे ‘कंद’भी कहा गया है। यह क्या है?इसे जानने के लिए स्थूल शरीर से संबंधित शरीर शास्त्र और सूक्ष्म शरीर संबंधित शरीर अध्यात्म शास्त्र का पर्यवेक्षण किया जा सकता है। शरीर में यह घटक सुषुम्ना का मेरुदंड का नीचे वाला अंतिम छोर है जिसे ’काँडा इक्वाइना’भी कहते हैं। मेरुदंड मस्तिष्क से प्रारंभ होकर चेचु (काक्सीक्स) की अंतिम कशेरुका तक जाती है। और इसके बाद रेशमी धागों की भाँति शुँडाकृति हो जाती है। उसके अंत में अगणित पतले-पतले धागों से पैदा हो जाते हैं। जिससे नाड़ी तंतुओं का एक सघन गुच्छा तैयार हो जाता है। इसी गुच्छक को ‘काँडा इक्वाइना’ कहते हैं। सूक्ष्म शरीर के ‘कंद’ का इसे प्रतिनिधि कहा जा सकता है। शरीर शास्त्र की दृष्टि से यही स्वयंभू लिंग है। मूलाधार चक्र में ‘आधार’शब्द इसी स्थान के लिए व्यवहृत हुआ है। रीढ़ की अंतिम चार अस्थियों के सम्मिलित सुच्चय को भी कई मनीषियों ने कंद बताया है। मल-मूत्र छिद्रों के मध्य स्थान पर मूलाधार चक्र बताया गया है। उसे चमड़ी की ऊपर सतह नहीं मान लेना चाहिए, वरन् उस स्थान की सीध में ठीक ऊपर प्रायः तीन अंगुल ऊँचाई पर अव्यवस्थित समझना चाहिए। इस तरह मूलाधार मल-मूत्र छिद्रों के मध्य वाली सीध पर अंतः गह्वर में स्थित मानना चाहिए। कुँडलिनी को ‘सार्वभौमिक जीवन तत्व’कहा गया है। इसके भीतर आकर्षण और विकर्षण की दोनोँ ही धारायें विद्यमान हैं। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से उन प्रवाहों को जैवीय विद्युत एवं जैव चुंबकत्व कह सकते हैं। मनीषी हर्बर्ट स्पेन्सर के अनुसार इसे -”ऐसेन्स ऑफ लाइफ“ जीवन सार कहा जा सकता है। बाइबिल के अनुसार यही तत्त्व महान सर्प है। अध्यात्मशास्त्र इसे ब्रह्माग्नि कहते हैं और इसका केन्द्र ब्रह्मरंध्र को मानते हैं। वहाँ से यह मूलाधार की ओर दौड़ती और वापस आती है। पाश्चात्य मनीषी आर्थर एवलन ने इसी को संग्रहित शक्ति बताया है और कहा है कि ‘जो महत् ब्रह्म सत्ता -ग्रेट कास्मिक फोर्स ब्रह्मांड का सृजन एवं धारण करती है, उसकी व्यक्ति देह में अवस्थित प्रतिनिधि सत्ता का नाम कुँडलिनी महाशक्ति है। ’स्वामी विवेकानन्द के अनुसार -”वह केन्द्र, जहाँ समस्त अवशिष्ट संवेदनायें संचित संग्रहित हैं, मूलाधार चक्र कहलाता है। वहाँ पर कुँडलिनी शक्ति कहा जाता है। प्राणायाम व योग साधना द्वारा इसे जगाया जा सकता है। ”

‘षट्चक्र निरूपण’ के अनुसार मूलाधार स्थित त्रिकोण के भीतर स्वर्ण के समान स्वयं भूलिंग है, जिस पर कमल तन्तु के समान ब्रह्मद्वार को अपने मुख से ढके हुए विद्युत एवं पूर्ण चन्द्रमा की आभायुक्त अतिसूक्ष्म कुँडलिनी शक्ति सो रही है। इसी तरह योगकुण्डल्युपनिषद् में उल्लेख है कि मूलाधार के मध्य वह आत्मतेज, ब्रह्मतेज रूपी कुँडलिनी निवास करती है। वही जीव की जीवनी शक्ति है, प्राणशक्ति है। वह तेजस् रूप है। इसी में आगे -1/43-45 श्लोकों में वर्णन है कि इस अग्नि मंडल में साधक का जब, अपान प्राण, जाकर मिलता है तो अग्नि की लपटें और तीव्र हो जाती हैं। उस अग्नि से गरम होने पर सोई हुई कुँडलिनी जगती हैं और लाठी से छेड़ने पर सर्पिणी जिस प्रकार फुंसकार कर उठती हैं, वैसे ही यह कुँडलिनी भी जाग्रत होती है। जाग्रत कुँडलिनी षट्चक्र वेधन करती हुई सहस्रार में पहुँचती है। जो इस रहस्य को जानता है ब्रह्मवर्चस् प्राप्त करता है, नर से नारायण बनने का अवसर प्राप्त करता है।


मरने से डरना क्या?

शरीर मरणधर्मा है। जो इस संसार में आता है, उसे एक-न-एक दिन जाना पड़ता है। उसकी मृत्यु निश्चित रूप से होती है, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो आनंद और संतोषपूर्वक जीते और उसी उत्साह से मृत्यु को गले लगाते हैं, जबकि अधिकाँश उसका नाम सुनकर ही भयभीत हो उठते व उससे बचने की अपनी प्रबल इच्छा व्यक्त करते हैं।

देखा जाय तो इन दो प्रकार के लोगों में मूलभूत अंतर उनकी अपनी जीवन शैली के कारण होता है। एक जो समाज के लिए जीना और उसी के लिए मरना चाहता है, जो अपने “स्व”को गलाकर “पर”में मिला लेता है। और जिसकी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाएँ पूर्णतः समाप्त हो गई हैं, उसके लिए मृत्यु भी वैसी ही संतोषप्रद होती है, जैसी जिन्दगी, पर जो लोग कूपमण्डूक बन कर स्वार्थपरायण जीवन जीते हैं, उनकी व्यक्तिगत इच्छाएँ अनंत -अपूर्ण होने के कारण जब तक जीते हैं, तब तक तो दुःख तकलीफ उठाते ही रहते हैं, मरते समय भी इससे मुक्त नहीं रह पाते और मौत को दुःखद बना लेते हैं।

मनोवैज्ञानिकों ने मृत्यु-भय के दो कारण बताये हैं-एक अनभ्यास दूसरा आकाँक्षा प्रायः देखा जाता है कि जिस अवस्था अथवा कार्य का हमें अभ्यास या अनुभव नहीं होता, उससे डर लगने लगता है। जिस व्यक्ति को अँधेरे में नहीं रह सकता। जो व्यक्ति कभी किसी सुनसान स्थान अथवा जंगल में नहीं रहा हो, उसका ऐसे अवसर आने पर दिल धड़कनें लगता है। यही बात मौत साथ भी लागू होती है। इसका जीवन में पहले किसी ने एहसास किया हो, ऐसा किसी को याद नहीं आता, तब तो उसका अभ्यास ही कैसे संभव हो? भले ही शरीराँत अकष्टकर और पीड़ाहीन हो, फिर भी उसका भय प्रथम बार पानी में तैरने अथवा हवाबाजी करने की तरह सतत् बना रहता है।

पर भय का इससे भी महत्वपूर्ण कारण मरने वाले की अतृप्त इच्छाएँ हैं। जब तक व्यक्ति को ऐसा महसूस होता रहे कि अभी उसे बहुत कुछ जानना करना और भोगना शेष है, और इसी बीच उसका जीवन-शकट अवरुद्ध होता दिखाई पड़े, तो तब तक, वह चाहे ज्ञानी-अज्ञानी, नास्तिक-आस्तिक कोई भी हो, उसकी जिजीविषा समाप्त नहीं हो सकती। यदि यात्रा के दौरान गाड़ी खराब हो जाय, और गंतव्य अभी दूर हो, तो यात्रीगण निराश हुए बिना नहीं रहते, किंतु यात्रा पूरी होने के उपरान्त गाड़ी का कुछ भी हो जाय, इसकी चिंता उन्हें नहीं होती।

जीवन में ऐसी स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति की कामना और शरीर के बीच परस्पर सामंजस्य नहीं होता। व्यक्ति की तृष्णा अपूर्ण होती है और शरीर अपनी आयु पूर्ण करने को होता है, तो व्यक्ति शोकाकुल हो उठता है। फिर उसे जीवन की इस अंतिम कड़ी के स्मरण से ही डर लगने लगता है। दूसरी ओर ऐसे भी उदाहरण देखने को मिलते हैं, जिसमें मृत्यु का आलिंगन खुशी-खुशी कर लिया जाता है। भगतसिंह, विवेकानन्द, शंकराचार्य आदि ऐसे पुरुष हुए हैं, जिन्हें मरने का भय तनिक भी नहीं रहा।

आखिर व्यक्ति अपने अंतिम समय में अभय क्यों नहीं रह पाता? क्यों उसे मौत की पीड़ा सताती रहती है। क्यों कुछ लोग इसके प्रति साहस सँजो लेते हैं? जबकि अधिकाँश असंतुष्ट व भयभीत बनें रहते हैं? गंभीरता पूर्वक विचार करने में आता है वह व्यक्ति की स्वार्थ और परमार्थपरक, व्यक्ति और समाजपरक गतिविधियाँ।

वस्तुतः जब व्यक्ति का जीवनोद्देश्य महान हो, वह समय अथवा समाज की किसी ऐसी समस्या के समाधान में निरत हो, जो समय साध्य हो एवं जिसके हल के लिए किसी एक व्यक्ति का प्रयत्न - पुरुषार्थ काफी न हो, वरन् समाज के एक बहुत बड़े समुदाय के समग्र जीवन एवं लम्बा समय अभीष्ट हो, तो ऐसा उच्च प्रयोजन अपने साथ ओत-प्रोत होने वाले व्यक्ति को शाँति और संतोष पूर्वक शरीर त्यागने की शक्ति प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है, कि जिस प्रयोजन में लोकमंगल की, समाज कल्याण की कामना निहित हो, उसकी गणना श्रेष्ठ कार्यों में होती है। ऐसे कार्य करने वाले व्यक्ति को मरते समय संतोष रहता है कि उसने अपने मानवोचित कर्त्तव्यों का पालन करते रह कर समय और समाज की आजीवन अमूल्य सेवा की और जीवन को धन्य बताया। मृत्यु भय ऐसे लोगों को नहीं होता। वास्तविकता तो यह है कि इनकी अंतिम साँसें अत्यन्त चैन और शाँतिपूर्वक निकलती है। उनमें लक्ष्य पूर्ति के लिए जीने का भी उत्साह बना रहता है और यदि इसके लिए जीवनोत्सर्ग आवश्यक हुआ, तो उससे भी पीछे नहीं हटते।

इसके विपरीत यदि जीवन ध्येय घर परिवार के छोटे दायरे तक ही सीमित संकुचित रहा और व्यक्ति सदा अपनी ही उन्नति-प्रगति की बात सोचता एवं योजनाएँ बनाता रहा, तो न तो जीते जी उसे शाँति मिल सकेगी, न मरणोपराँत। मृत्यु के दौरान भी उसका ध्यान उसी ओर लगा रहेगा। ऐसी स्थिति में व्यक्ति द्वारा लंबे जीवन की कामना करना स्वाभाविक है और यदि इसी बीच मौत की घड़ी अकस्मात् उपस्थित हो गई, तो उसकी घबराहट और चिंता का बढ़ जाना अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि उसकी इच्छाएँ अपूर्ण रहती है, जिसे वह हर हालत में पूर्ण होता देखना चाहता है, पर वह हो कैसे ?इच्छाएँ सीमित हो, तब तो यह संभव भी है, किंतु”इच्छाएँ अनंत होती हैं”-अर्थशास्त्र का यह प्रसिद्ध सिद्धाँत चरितार्थ होता हो, वहाँ किसी की समस्त इच्छाएँ सदा पूरी कैसे होती रह सकती हैं?ऐसे व्यक्ति में उसकी एक इच्छा पूर्ण हुई नहीं कि दूसरी आ धमकती है और दूसरी के बाद तीसरी जीवन इन्हीं के पूर्ति -प्रयास में लगा रह जाता है। एवं इसी मध्य मौत के क्षण आ जाते हैं। इस समय तक भी जब वह अपनी कामनाएँ अधूरी पाता है, तो परेशान हो उठता है, एवं महाप्रयाण से कतराने लगता है।

तात्पर्य यह कि जब तक जीवन-लक्ष्य में समूह और समुदाय की कल्याण-भावना समाहित न हो, तब तक मृत्यु सुखद संतोषप्रद नहीं हो सकती। जब व्यक्ति ऐसे कार्य में अपना श्रेय-सम्मान समझ कर जीवन में उसे महत्व देता एवं आवश्यकतानुसार समय, श्रेय, और संपदा नियोजित करता है, तब उसका सत्परिणाम जीवन में स्वर्ग -मुक्ति का आनंद लाभ के रूप में सामने आता और अंतकाल में तृप्ति-तुष्टि प्रदान करता है। फिर ऐसे लोगों के लिए मौत कष्टकारक नहीं रह जाती। चूँकि इनका एकमेव लक्ष्य समाजपरक होता है, अस्तु आजीवन इसके सुधार, निर्माण उत्थान की बात सोचते रहने से व्यक्तिगत इच्छा-आकाँक्षाएँ जाग्रत हो नहीं पातीं, फलतः उनकी पूरी-अधूरी होने का विचार भी मन में नहीं उठता। अतः तत्संबंधी कोई चिन्ता भी नहीं सताती। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक उत्थान के लिए अनेकों के समय और श्रम अपेक्षित होते हैं, साथ ही इसकी सिद्धि भी लंबे काल में हो पाती है, न तो किसी एक व्यक्ति का पराक्रम ऐसे कार्य को पूरा कर सकता है, न ही स्वल्प अवधि में इसके पूर्ण होने की गुँजाइश रहती है, अतः प्रयोजन अधूरा रहने पर भी इसमें संतोषपूर्वक जीने और मरने की पूरी-पूरी संभावना रहती है। मृत्यु को जीतने और उसे भयमुक्त बनाने का निस्संदेह यही सरल -सुनिश्चित मार्ग है।

वस्तुतः मानवी जीवन अपने उद्गम स्रोत से निकल कर समुद्र की ओर प्रवाहमान होने वाली गंगा के समान है। उसकी एक-एक बूँद एक-एक व्यक्ति के समान है। यदि यह बूँदें अपना पृथक अस्तित्व बना कर रहना चाहें और अपनी आकाँक्षा पूर्ति के लिए मनमर्जी ढंग से इधर-उधर बहना चाहें तो क्या वह प्रवाहमान रह पायेंगी?अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर पायेंगी?संभवतः नहीं। इसके लिए उसे अपना व्यक्तिगत अस्तित्व त्यागना पड़ेगा और नदी-जल राशि बन कर चलना पड़ेगा, तभी उसकी गति -प्रगति है, अन्यथा अकेली बूँद तो कुछ ही देर में गर्मी से भाप बन जायेगी, अथवा जमीन द्वारा सोख ली जायेगी, या वृक्ष-वनस्पतियों जीव-जन्तुओं द्वारा उदरस्थ हो जायेगी। इस प्रकार उसका दुःखद अंत हो जायेगा और समुद्र से मिलने की उसकी चाहें धरी की धरी रह जायेंगी। अस्तु बूँद समुद्र से मिल सकें, इसके लिए आवश्यक है कि वह नदी जल सके एकाकार होकर आगे बढ़े। इसी में उसकी स्वयं की सार्थकता और उसका सुखद अंत सन्निहित है।

मनुष्य भी अपना स्वार्थ त्याग कर समाज से एकाकार हो सके, अपनी व्यक्तिगत अभिलाषाओं को समाज की उन्नति-प्रगति में विसर्जित कर सके और पृथक अस्तित्व बनाये रहने का उसका कोई आग्रह न हो, तो निश्चय ही उसके जीवन मृत्यु के बीच का भेद मिट सकता है। फिर इस स्थिति में जीवन में जिस आनंद की अनुभूति करता है, मरते समय भी उसे ऐसी ही शाँति का एहसास होगा।


प्रबंध आप करने में जुट गए (kahani)

“एक बार मेंढ़कोँ को अपने समाज की अनुशासनहीनता पर बड़ा खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे।

प्रार्थना स्वीकृत हो गई। कुछ समय बाद शिवजी ने अपना बैल मेंढ़कों के लोक में शासन करने भेजा। मेंढक इधर-उधर निःशंक भाव से घूमते फिरते सो उसके पैरों के नीचे दब कर सैकड़ों मेढ़क ऐसे ही कुचल गये।

ऐसा राजा उन्हें पसन्द नहीं आया मेंढक फिर शिवलोक पहुँचे और पुराना हटा कर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे।

वह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। बैल वापस बुला लिया गया। कुछ दिन बाद स्वर्गलोक से एक भारी शिला मेंढ़कोँ के ऊपर गिरी हजारोँ की संख्या में वे कुचल कर मर गये।

इस नयी विपत्ति से मेढ़कों को और भी अधिक दुख हुआ और वे भगवान के पास फिर शिकायत करने पहुँचे।

शिवजी ने गम्भीर होकर कहा-बच्चों पहले हमने अपना वाहन बैल भेजा था, दूसरी बार, हम जिस स्फटिक शिला पर बैठते हैं उसे भेजा। इसमें शासकों का दोष नहीं है। तुम लोग जब तक स्वयं अनुशासन में रहना नहीं सीखोगे और मिलजुलकर अपनी व्यवस्था बनाने के लिए स्वयं तत्पर न होगे, तब तक कोई भी शासन तुम्हारा भला नहीं कर सकेगा। मेंढ़कों ने अपनी भूल समझी और शासन से बड़ी आशायें रखने की अपेक्षा अपना प्रबंध आप करने में जुट गए।


कैसा होगा भविष्य का मानव?

मानवी विकास से संबंधित जटिल प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए चिरकाल से ही ऊहापोह चली आर रही है। आदि-मानव मनु थे, उनकी संतानें मनुष्य कहलाई। स्वर्ग से आदम और हवा जमीन पर धकेल दिये गये और उन्होंने यहाँ आकर जो संतानें उत्पन्न की, वे मनुष्य बन गयीं। ब्रह्माजी ने सृष्टि उत्पन्न की और उसी समय वृक्ष वनस्पतियोँ एवं समस्त जीवधारियों के साथ सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में मानव को सृजा। इन पौराणिक आख्यायिकाओं से अब बुद्धि का समाधान नहीं होता। विज्ञान इस संदर्भ में तर्क, तथ्य और प्रमाणों को आधार मानकर खोजें करता रहा है और आगे भी इस प्रयास में संलग्न है।

आदि मानव कहाँ और कब पैदा हुआ?इस संबंध में अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि एशिया एवं अफ्रीका उन प्रमुख केन्द्रों में से है-जहाँ मानव का विकास सबसे पहले हुआ। प्रारंभिक अवस्था में वह ‘केनियोपिथेकस’ के रूप में था, जो अब बारह वर्ष करोड़ पूर्व पृथ्वी पर निवास करते थे। एशिया में पाये जानें वाले ‘रेमापिथेकस’नामक आदि मानव अफ्रीका से होते हुए भारत पहुँचे।

‘आस्ट्रेलोपिथेकस अफ्रिकेन्स’ को उनने ‘प्रथम मानव की संज्ञा दी है और कहा है कि अफ्रीका के सबाद्ध प्राँत में पाये जानें वाले इस मानव प्रजाति के मस्तिष्क का अग्र और पश्च भाग विकसित था, जो इस बात का प्रमाण है कि उनकी मस्तिष्कीय शक्तियाँ तब भी उन्नत अवस्था में थी। मूर्धन्य वैज्ञानिक लुइस एच.मार्गन ने अपनी कृति में मानव विकास के तीन स्तरों का वर्णन करते हुए बताया है कि किस तरह मनुष्य ने वन में, गुफाओं में अन्य जीवधारियों की तरह जीवन व्यतीत करते हुए आज के तथाकथित सभ्यता के युग में प्रवेश किया है।

नृतत्त्ववेत्ताओं ने प्रागैतिहासिक प्रमाणों के आधार पर मानव-जाति का अस्तित्व इस धरती पर लगभग 32 लाख वर्ष पूर्व आँका है। विकासवादियों का भी कहना है कि वह अब से दस लाख वर्ष पूर्व इस स्थिति में विकसित हो गया था। कि उसे मनुष्य नाम दिया जा सके। मिश्र, भारत, दक्षिण और मध्य अफ्रीका, चीन, जावा आदि देशों में जो मानव कंकाल, खोपड़ियाँ तथा प्रयोग के जो उपकरण मिले हैं, उनसे प्रतीत होता है कि उन क्षेत्रों में मनुष्य का अस्तित्व मौजूद था। एक जगह उत्पन्न होकर उसकी पीढ़ियाँ दूर-दूर फैली या विभिन्न स्थानों में अपने-अपने क्रम से मनुष्य का विकास हुआ। इस प्रश्न के उत्तर में जो बातें कहीं गयीं है। उनमें यही युक्ति संगत है कि वातावरण और परिस्थितियों ने धरती के विभिन्न स्थानों में जीवों के विकास को प्रोत्साहन दिया है।

इसी क्रम में मनुष्य भी विभिन्न स्थानों में अपना स्वतंत्र विकास करता रहता है, अपने पूर्वजों की तुलना में उसे अपेक्षाकृत अधिक उन्नति करते रहने का अवसर मिलता रहा है।

आदि मानव को ’हामिनिड’ नाम दिया गया है- अर्धवानर और अर्धमानव लगभग वन मानुष स्तर का। इसी से कालान्तर में पूर्ण मानव ‘होमोसेपियन्स’और विकसित मानव- ’होमोसेपियन्स’ और विकसित मानव ’होमोइरैक्ट्स’ क्रमशः बनते चले आये हैं। परिस्थितियों के अनुसार नस्लें सुधरती गयीं है। यह नस्लें भारत, चीन, अफ्रीका और यूरोप के कुछ स्थानों पर विकसित हुई। सुप्रसिद्ध अनुसंधान डा. लेविस लीके ने अफ्रीका में ओल्डुबाई नामक 30 मील लम्बी और 300 फुट गहरी गुफा की खोज करके जो अवशेष प्राप्त किये, उससे न केवल मनुष्य की, वरन् प्रागैतिहासिक काल के अन्य प्राणियों के इतिहास की भी प्रामाणिक शृंखला मिलती जुलती है। सबसे पुराना नर कंकाल जिसे नृतत्त्ववेत्ताओं ने ‘जिंजानथ्रोपस’ नाम दिया है, यह प्रमाणित करता है कि मनुष्य का अस्तित्व अब से 13 लाख वर्ष पूर्व भी विद्यमान था। पश्चिम जर्मनी में नियडर नदी के किनारे रानलैण्ड क्षेत्र की एक गुफा में मिली मानव खोपड़ी मध्य सुमात्रा एवं जावा में प्राप्त अस्थियाँ, फ्राँस की लासापेल ओ साँ की गुफा में मिले कंकाल, सहारा एवं इसराइल में खुदाई से उपलब्ध अस्थियों के अवशेष, चीन में डा. ब्लैक को मिली अस्थियाँ एवं यूरोप के विभिन्न भागों से मार्स्टन द्वारा संग्रहित पुरातन प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य अपने पूर्वजों की अपेक्षा क्रमिक विकास के पथ पर अग्रसर होता आया है। राफेलर फाउण्डेशन की सहायता से प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्राज वाइडन राइसन ने मनुष्य विकास के पुरातन कालीन इतिहास संबंधी जो व्यापक खोजें की है, उनका विवरण “डेण्टीशन आफ साइनान्थ्रोपस” द एक्सटीमिटी बोन्स आफ साइनान्थ्रोपस नामक तीन ग्रंथों को प्रकाशित किया है। इनमें उन्होंने मानवी विकास क्रम पर अधिक प्रामाणिक प्रकाश डाला है। चार्ल्स डार्विन ने अब से एक सौ वर्ष पहले यह कहा था कि आदि मानव अफ्रीका में जन्मा था। उनकी इस मान्यता का कारण उस क्षेत्र में मिल प्रागैतिहासिक काल की खोपड़ियोँ थी। अब अन्यत्र भी उसी प्रकार के प्रमाण मिल रहे है। डॉ. लीके सहित अनेक वैज्ञानिकों ने अब वैसे ही अवशेष ढूँढ़ निकाले है। इनके अनुसार मनुष्य का अति पूर्वज एन्थ्रोपायड एप और उसके पीछे का विकसित वंशज- ’आस्टेलोपिथेकस’ माना जाता है। यह दोनों ही कपि मानव थे। इसी वंश का क्रमिक विकास होता गया और उसकी न केवल आकृति, वरन् प्रकृति भी बदलती गयी और विकसित होती चली गयी। समयानुसार वह काल आया जिसे पुरातत्व वेत्ताओं के अनुसार ”प्लीस्टोसीन एरा” अथवा मानव युग कहते हैं। यह दस लाख वर्ष पूर्व आरंभ हुआ।

विकासवादियों का कहना है कि प्राचीन मानव शारीरिक दृष्टि से विशालकाय और बलिष्ठ थे, पर मस्तिष्कीय चेतना की दृष्टि से मंदबुद्धि थे। जैसे-जैसे बुद्धि का उपयोग अधिक होने लगा वह बढ़ती गयी और शरीर से कम श्रम लिया गया तो वह छोटा होता गया। प्रकृति का सिद्धाँत है कि जिस तत्व की उपयोगिता समझी जायेगी, आवश्यकता अनुभव की जायेगी तथा प्रयोग में लायी जायेगी, वह बढ़ेगी, मजबूत होगी और जिसकी उपेक्षा की जायेगी वह निरर्थक पड़ी पड़ी चली जायेगी। साधन बढ़ने से उसका विकास क्रम यहाँ आ पहुँचा जहाँ आज हम हैं। पुराने महागज और सरीसृप-डायनोसौर आज के हाथी और गिरगिट की तुलना में कई गुना बड़े और भीमकाय थे। इसके विपरीत पुराने ज्ञान कौशल, उपकरण और साधनों में इस समय तक अत्यधिक विकास हुआ है। एक ओर घटोत्तरी तो दूसरी ओर बढ़ोत्तरी का अपना क्रम चलता रहता है। इन दोनों ही पहियों पर टिका प्रगति रथ इधर-उधर के झकझोरे खाता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा हैं।

पुराना मनुष्य कैसा था, इसकी एक झलक झाँकी हिमालय पर पाये जानें वाले ‘हिम -मानव’के रूप में अभी भी यदा-कदा सामने आती रहती है। हिमालय का अस्तित्व अब असंदिग्ध है। उसके प्रमाण एक के बाद एक मिलते ही जाते हैं। पिछले दिनों एवरेस्ट चोटी पर सफल चढ़ाई करने वाले एडमंड हिलेरी के साथ शेरपा तेनसिंह के पिता का यह दावा था कि उन्होंने 16 हजार फुट की ऊँचाई पर चुरघो इलाके में हिममानव को निकट से देखा था, सीमेन्ट जैसा रंग, लम्बी नाक, पंजे डेढ़ फुट, आँखें छोटी बाल तीन से पाँच इंच तक थे। वह शाकाहारी भी एवं माँसाहारी भी थे। नेपाल, सिक्किम और भूटान के लोगों ने भी अपने अपने क्षेत्रों में हिम मानव देखें हैं। कुछ सुप्रसिद्ध नेपाली इतिहासकार अंतर हृषित-वे अपने एक लेख में हिम-मानव का आँखों देख वर्णन प्रकाशित किया था, साथ ही उनके फोटो भी छपाये थे जो उन्होंने स्वयं खींचे थे। उनके अनुसार हिममानव की ऊँचाई 11 फुट थी और सीना तीन-फुट चौड़ा। वह मनुष्य से बहुत कुछ मिलता जुलता है। शरीर पर बालों की अधिकता ही उसे सामान्य मनुष्य से अलग करती है। वह किसी को देखकर भयभीत नहीं होता।

तिब्बती लामा छेभेद के मठ में एक विशालकाय अस्थिपंजर रखा हुआ है जिसकी विशेष पर्वों पर पूजा की जाती है। कहा जाता है कि यह किसी पवित्रात्मा हिममानव का कंकाल है जो उस लामा की समय-समय पर सहायता करता रहा। इस अस्थिपंजर की विशालता को देखते हुए उस क्षेत्र में हिममानव के अस्तित्व की पुष्टि होती है।

भविष्य में मनुष्य कैसा बनेगा? इसका उत्तर उसकी इच्छा और आवश्यकता को देखते हुए ही दिया जा सकता है। मानव चिंतन की दो विशेषताएं हैं -पहली भौतिकवादी और दूसरी अध्यात्मवादी। यदि चिंतन का प्रवाह वर्तमान स्तर का भौतिकवादी ही बना रहा और पहल जीवशास्त्रियों के हाथ रही तो नये सिरे से जीव-कोषों का ढालना आरंभ करेंगे जो अंतर्ग्रही परिस्थितियों में भी अपना निर्वाह कर सकें। वर्तमान मनुष्योँ की शारीरिक और मानसिक स्थिति को विज्ञान के आधार पर ऐसे मोड़ दिये जा सकते हैं। जो भावी परिस्थितियों के साथ सुविधापूर्वक तालमेल बिठाये रह सकें। उसका शरीर ही नहीं मन भी बदला जा सके, अब इतनी शक्ति विज्ञान के हाथों आ गयी है और वह उसका उपयोग समस्त मानव जाति के साथ सत्ताधीशों की सहायता से बलपूर्वक भी कर सकता है। अन्न, वस्त्र, निवास आदि की कमी का ध्यान रखते हुए वर्तमान स्तर के मनुष्य को हटाकर उस स्थान पर नयी जाति के नयी नस्ल के मिनी मनुष्य भी बनाये जा सकते हैं जो कम जगह घेरे और खुराक भी नष्ट न करें, पर बुद्धिमता एवं प्रतिभा की दृष्टि से बढ़े चढ़े हों। बौद्धिक प्रखरता के बल पर वे बिजली, पवन आदि जैसी प्राकृतिक शक्तियों पर अपना आधिपत्य कर मनचाही दिशा में प्रगति कर सकेंगे।

आध्यात्मवादी चिंतन धारा मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की पक्षधर है। समय ही बतायेगा कि प्रधानता भौतिकवाद की रहती है या अध्यात्मवाद की। इन दिनों दोनें पक्षों में रस्साकशी चल रही है।

प्रबुद्ध अध्यात्म भी अब मनुष्य जाति को विनाश के सर्वभक्षी संकट में से निकालने के लिए अपना कर्तव्य पालन करने के लिए कटिबद्ध हो रहा है। भले ही उसकी विशालकाय प्रयोगशालाएं दृष्टिगोचर न हों, पर निश्चेष्ट वह भी नहीं है। जब कि मानवी भाग्य एवं भविष्य का भला-बुरा निपटारा होने की घड़ी सामने है, तो देव पक्ष की सत्ता भी निष्क्रिय नहीं बनीं रह सकती है। मनुष्य के ईश्वर कृत सनातन रूप को अक्षुण्ण और परिष्कृत बनाये रखने के लिए अध्यात्म शक्तियाँ भी दृश्य या अदृश्य रूप से अपना काम प्रचंड वेग से कर रही हैं। अदृश्य जगत में हो रहा देवासुर संग्राम अभी भी सूक्ष्मदर्शी आँखें देख सकती हैं।

यदि अध्यात्म शक्ति विजयी हुई तो मनुष्य ‘मिनी’ नहीं “महान” बनेगा। तीव्र परिवर्तनों की वर्तमान गति उसे महामानव-देवमानव -अतिमानव भी बना सकती हैं। महर्षि अरविन्द ने निकट भविष्य में मनुष्य में ऐसे अवतरणों की संभावना व्यक्त की है। अपनी कृति “द ह्यूमन साईकिल” में उनने कहा है कि मनुष्य सचेतन प्राणी है और चेतना का सहज स्वभाव महत् चेतना की ओर अग्रसर होने अति चेतन बनने का है। मनुष्य अपने विकास क्रम में जीव चेतना से ऊपर उठकर अर्ध देवता बन चुका है और अब पूर्ण देवत्व की ओर अग्रसर है। बौद्धिक विकास के बाद अब आत्मिक प्रगति का युग आ रहा है। मानव-जाति समान हितों के बाहरी कारणों को छोड़ कर आध्यात्मिक विकास के फलस्वरूप आँतरिक एकता का अनुभव करने लगी है। आर्थिक और बौद्धिक दृष्टिकोण के स्थान पर आध्यात्मिक और अतिमानसिक भावना बढ़ती जा रही है। भावी मनुष्य सुनिश्चित रूप से दिव्य-शक्तियों से संपन्न होगा जिसकी चेतना देव स्तर की होगी, जो इस धरती पर उदार आत्मीयता, स्नेह, सौजन्य और सहकार की अमृतधारा बहाने और स्वर्ग का वातावरण बना सकने में समर्थ होगा। यदि मानवी विवेक जग पड़ा तो संभावना इसी प्रकार की अधिक है। मानव से महामानव नर से नारायण बनना ही मनुष्य की नियति है।


पक्षपात रहित आत्म-निरीक्षण ही अनिवार्य

कोई समय खाली नहीं रह सकता। उसमें भला या बुरा कुछ तो हो ही रहा होगा। सर्वथा निष्क्रियता संभव नहीं। बर्तन में कोई वस्तु रखी होगी?अन्यथा खाली होने पर उस जगह को हवा घेर लेगी। जहाँ भलाई का प्रसंग नहीं चल रहा होगा वहाँ बुराई का माहौल बनें बिना न रहेगा। जहाँ बुराई का बहिष्कार-तिरस्कार हो रहा होगा। वहाँ अच्छाई अपनी जड़ जमा रही होगी। दोनों में से एक भी स्थिति न हो, ऐसा बन नहीं पड़ता। गर्भकाल में भ्रूण तेजी से विकास कर रहा होता है। मरण के उपराँत काया बड़ी तेजी से सड़ना, गलना आरंभ कर देती है। यथास्थिति बनें रहना संभव नहीं। आयुष्य यों तो विकास का क्रम अपनाती है। बचपन से कुमार, किशोर, प्रौढ़ बनते हुए उन्नति वाला क्रम अपनाती है या फिर ढलान का उत्तरार्द्ध आने पर क्रमशः शुष्कता, थकान, बुढ़ापे का सिलसिला चल पड़ता है और वह घटोत्तरी अंततः जराजीर्ण स्थिति से लेकर मरण तक जा पहुँचती है। मानवी व्यक्तित्व के संबंध में भी यही बात है। या तो वह पतन की ओर चल रहा होगा। या उत्थान की ओर। सूर्य-चन्द्र, ग्रह नक्षत्र स्थिर नहीं रहते। उनका या तो उदय होता है या अस्त।

मनुष्य या तो सत्प्रवृत्तियाँ अपनाता है अथवा उनके अभाव में दुष्प्रवृत्तियों का आश्रय ग्रहण करने लगता है। यदि व्यक्ति को, समाज को, वातावरण को सद्भाव, सहयोग से भरा पूरा खाना रखना हो उसका एक ही उपाय है कि सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन का प्रयास किया जाय। तदनुसार कार्यक्रम बनाया जाय और उनमें अधिकाधिक लोगों को अधिकाधिक उत्साह के साथ लगाया जाये। ऐसा न बन पड़ने पर उसका परिणाम एक ही होगा कि दुष्प्रवृत्तियाँ पनपेंगी। व्यक्ति अनाचारी बनेंगे। अपराधी, अनाचारों का सिलसिला चल पड़ेगा और आक्रोश, विग्रह, त्रास एवं रोष-प्रतिशोध भरी प्रतिक्रिया अपना स्वरूप प्रकट करने लगेगी।

आज प्रचलन में अवाँछनीयताओं की भरमार इसलिए दिखाई पड़ती है कि सत्प्रवृत्तियों से संबंधित रचनात्मक कार्यक्रमों में लोगों को लगाने का प्रयत्न नहीं किया जाता। नागरिकता, नैतिकता, सामाजिकता, उदारता का जीवन क्रम में उतारने का प्रावधान न हों तो समझना चाहिए कि खाली समय और ठाले प्रयास का प्रवाह अनौचित्य की दिशा में चल पड़ेगा। पुरानी कहावत है कि “खाली दिमाग शैतान की दुकान”जिस समय में कोई रचनात्मक कार्य न बन पड़ रहा होगा उस समय मस्तिष्क में अचिंत्य चिंतन घोंसला बनायेगा और अंडों-बच्चों की फौज खड़ी करेगा। खाली समय और चिंतन यथास्थान बनें रहें निष्क्रिय बनें रहें यह हो ही नहीं सकता।

पतन का क्रम ऐसा ही है कि वह उत्थान की अपेक्षा कहीं अधिक द्रुतगामी होता है। भाप बनकर आकाश में बादल बनकर विचरण करने की स्थिति देर में और धीरे-धीरे बनती है, पर जब हिमालय की बर्फ पिघलती है तो वह नदियों के माध्यम से अत्यंत द्रुतगामी प्रवाह पकड़ती है। वह जलधार तेजी से बहती हुई कुछ ही दिनों में गहरे समुद्र में जा मिलती है। तब जल काला, गँदला और स्वाद खारी हो जाता है। उसे पशु पक्षी भी पीते नहीं सिंचाई आदि के काम में भी नहीं आता। बल्कि दिन दिन अधिक खारा अधिक गँदला, अधिक गाढ़ा और अधिक अनुपयोगी बनाता जाता है। पतन का भी यही क्रम है। यदि उस राह पर कोई व्यक्ति या समुदाय चल पड़े तो उसका प्रवाह क्रमशः तेज ही होता जायेगा। जमीन से कटाव तो तेज वर्षा मात्र से होने लगता है, पर यदि खार खड्डों को पाटना हो तो उसके लिए दूर-दूर से मिट्टी पड़े परिश्रमपूर्वक लानी पड़ती है। और उसकी पकड़ मजबूत बनाने के लिए समय साध्य, श्रमसाध्य व्यवस्था बनानी पड़ती है। ठीक यही बात चारित्रिक उत्थान और पतन के संबंध में भी हैं। दोनोँ ही क्रम धीमी गति से चलते हैं। पर जब परिपक्व हो जाते हैं। तो अपना बढ़ा चढ़ा रूप दिखाने लगते हैं। पतन झूठ बोलने, प्रमाद करने, बरगलाने, फुसलाने, कुसंग में पड़ने जैसे छोटे कृत्य समझे जानें वाले क्रियाकलापों से आरंभ होता है। किन्तु वह अपने अनुरूप परिस्थितियाँ प्राप्त करते रहने पर उसी प्रकार बढ़ता है जिस प्रकार भरपूर खाद पानी पाने पर पौधों का विकास निरंतर होता है। सज्जनों, लोकवासियों, महामानवों का जीवन विकास भी इसी प्रकार होता है। वे छोटे-छोटे पुण्य-परमार्थ हाथ में लेते हैं, संयम बरतने की छोटी-छोटी प्रतिज्ञायें लेते, उन्हें संकल्पपूर्वक पूरी करते हुए उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ते हैं। और एक समय आता है कि वे मूर्धन्य महामानवों में गिनें जानें लगते हैं। अपने क्रियाकलापों की अविस्मरणीय और अभिनन्दनीय परम्परा भावी पीढ़ियों के लिए छोड़ जाते हैं। स्वयं तरते हैं और अनेकों को अपने कंधों पर बिठाकर पार करते हैं।

जंक्शन स्टेशन पर कितनी ही पटरियाँ बिछी होती हैं। इनमें से कोई कहीं पहुँचती है तो कोई कहीं। आरंभ में इनका अंतर थोड़ा ही होता है। गाड़ियाँ अपने लक्ष्य के अनुसार बिछी पटरियों पर बढ़ना आरंभ करती हैं। गति चलती रहती है और चलती रेलों का अंतर बढ़ता जाता है। दिल्ली से एक ही समय छूटने वाली गाड़ियों में से एक कलकत्ता पहुँचती है तो दूसरी बम्बई। दोनोँ के बीच क्रमशः दूरी का अंतर बढ़ता जाता है और उनके लक्ष्य तक पहुँचते -पहुँचते इतना अंतर बन जाता है कि आश्चर्य होता है। यही उत्थान पतन की दिशा में उठने वाले छोटे-छोटे कदमों का कालान्तर में ऐसा ही परिणाम उपस्थित होता है। एक दस्यु दुराचारी बन जाता है, तो दूसरा मुनि मनीषी। यदि एक ही समय में कुछ व्यक्ति जमीन में गड्ढा खोदना आरंभ करे तो उसका परिणाम कुछ ही दिनों में असाधारण अंतर के रूप में दृष्टिगोचर होगा। यही उत्थान पतन की परम्पराओं का अपना-अपना क्रम है। छोटे आरंभ ही समयानुसार विशालकाय परिणाम प्रस्तुत करते हैं। छोटा सा वट बीज उर्वर भूमि में बोये जानें पर समयानुसार विशाल वृक्ष बनता है। बीज और वृक्ष का क्रम यही रहता है, भले ही पेड़ बबूल का हो या आम का। उत्थान और पतन में किसी भी दिशा को अपनाया जाय, उसमें तद्नुरूप प्रगति तो होती रहती है।

उपरोक्त क्रम व्यवस्था को गंभीरता पूर्वक समझना चाहिए और तथ्य को ध्यान में रखते हुए यह निश्चय करना चाहिए कि किस दिशा में चलना और किस लक्ष्य तक पहुँचना है। जो मार्ग चुना जाय उस पर धीमी गति से उठते हुए कदम भी मंजिल की ओर अग्रगामी होंगे। यह नहीं हो सकता कि मार्ग कोई अपनाया जाय और किसी अन्य लक्ष्य तक पहुँचा जाय जिनने अनीति को व्यवहार में उतारा वे दुर्गुणों के अभ्यासी बनें, कुकर्म करने लगे और अंत में दुष्ट-दुरात्माओं के समुदाय में सम्मिलित हुए। यही बात श्रेष्ठता के संबंध में भी है। वही भी क्रमिक गति से ही हस्तगत होती है। अचानक न तो कोई दुरात्मा बनता है और न महानात्मा। दोनों विपरीत परिस्थितियाँ प्राप्त करने के लिए इच्छा, आकाँक्षा, विचारणा एवं गतिशीलता को अग्रगामी बनाना पड़ता है। बहुत करके यह योजना इच्छा-पूर्वक बनाई जाती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वह स्व संयोगवश अनिच्छित रूप में भी बन जाती है। हर हालत में गति का संबंध प्रगति के साथ जुड़ा ही रहता है।

अपनी, अपने परिवार की, संबंधियों एवं सहयोगियों की दिशाधारा का गहरा निरीक्षण-परीक्षण करते, रहना चाहिए। सहचरों से अधिक अच्छा और सान्निध्य कोई दूसरा नहीं हो सकता। बाहर के लोगों की आधी-अधूरी सुनी-बताई जानकारी ही मिल पाती है। पर निरंतर साथ रहने वाले वस्तुस्थिति को अधिक अच्छी तरह जानते हैं। यही बात अपने आप के संबंध में और भी अच्छी तरह कही जा सकती है। आत्म निरीक्षण में यदि पक्षपात को हटाया जा सके तो गुण और दोष दोनों ही अधिक अच्छी तरह समझे जा सकते हैं। साथियों से भी इस प्रकार की सलाह ली जा सकती है। यह बिना संकोच के ढूँढ़ा और पूछा जाना चाहिए। वस्तुस्थिति जाननी इसलिए आवश्यक है कि भविष्य का निर्धारण उसी आधार पर संभव होता है। बुराइयों का भंडार बढ़ाते चलने पर मनुष्य दूसरों की तथा अपनी आँखों में गिरता चला जाता है। अनौचित्य के प्रति घृणा उपजती है। बाहर से कोई भय, संकोच, दबाव या प्रलोभन वश भले ही मन की बात प्रकट न करें, पर भीतर तो वैसे ही मान्यता बनेंगी जैसी कि वस्तुस्थिति समझी गई है। ऐसी दशा में कोई सच्चा स्नेह नहीं दे सकता और सच्चा सहयोग भी नहीं प्रदान कर सकता। हेय व्यक्तित्व वाले अपना जनाधार खो बैठते हैं। साथ ही समाज की, शासन की प्रकृति व्यवस्था की प्रताड़ना भी सहते हैं। अनाचारी तात्कालिक सफलता प्राप्त करते देखें गये हैं आकस्मिक आक्रमण में लाभ इसलिए मिल जाता है कि जिस पर हमला किया गया है वह बेखबर रहता है, पर यह भी निश्चित है कि आहत व्यक्ति को जो चोट लगती है उसका घाव सहज नहीं पुरता। वह बदला लेने के लिए अवसर ढूंढ़ता रहता और समय आते ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से चोट करता है। अनीति को देखकर अन्यान्य लोग भी आक्रांता के प्रति क्षोभ से भरते हैं और उसके प्रति अपना मानस घृणा से भर लेते हैं। जिसका संपर्क क्षेत्र इस प्रकार असहयोग एवं तिरस्कार से भरा हुआ हो वह सहयोग एवं सम्मान से तो वंचित रहेगा ही, साथ ही अवसर आने पर उनके द्वारा हानि पहुँचाये जानें का भी भय बना रहेगा। यह स्थिति किसी को भी सुख चैन से नहीं रहने देती। प्रगति पथ पर बढ़ने में पग-पग पर अवरोध खड़े करती रहती है।

धरती पर बिखरे काँटे और कंकड़ नहीं बीने जा सकते। यह हो सकता है कि अपने पैरों में जूते पहन कर चला जाये और काँटे कंकड़ वाले रास्ते पर बिना जोखिम उठाये चला जाये। समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार को एकाँकी प्रयत्न से मिटा सकना कठिन है, इसके लिए संगठित एवं व्यापक अभियान की आवश्यकता है। समाज और शासन का सहयोग भी उस उन्मूलन में आवश्यक है। जब तक वह शुभ घड़ी नहीं आती तब तक यही उचित है कि अपने को, अपने परिवार को विशेषतया संबद्ध नई पीढ़ी को उस जोखिम से बचाया जाय, जिसमें अवाँछनीयताएँ छूत की बीमारी की तरह दुर्बल पक्ष पर हावी होती है। इतना बचाव कर लेने पर कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि चलते हुए अंधड़ की धूल अपनी आँखों में न पड़े। आँधी में चलते समय यदि बंद ढक्कन वाला चश्मा आँखों पर पहन लिया जाय तो उस प्रतिकूल मौसम में चलते हुए भी अपनी आँखोँ को सुरक्षित रखा जा सकता है। अपने-अपने परिवार में किशोरों को विशेष रूप से कुसंग से बचाने का प्रयत्न करना चाहिए। यहाँ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि ऐसी अवाँछनीय छूत प्रायः समवयस्कों, सहकर्मियों से विशेष रूप से लगती हैं, क्योंकि उन्हीं के साथ संपर्क भी अधिक रहता है। उन्हीं का प्रभाव भी अधिक पड़ता है। समवयस्कों में यदि सद्गुणी अधिक हों तो वे अपने प्रभाव का लाभ साथियों को भी दे सकते हैं।

गुरुकुलों में अनेक असुविधाएँ रहते हुए भी प्राचीनकाल में उन्हें इसलिए वरिष्ठता दी जाती थी कि वहाँ कुसंग की कोई गुँजाइश नहीं रहती थी। वातावरण में तनिक भी प्रदूषण न रहने से ऐसी आशंका नहीं रहती थी कि शिक्षार्थियों का चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार अवाँछनीय की दिशा में चल पड़ेगा। इन दिनों मूर्धन्य विचारशीलों को यह योजना बनाते देखा गया है कि स्कूल भले ही सरकारी रहें, पर छात्रावास इस स्तर के बनायें जायें जहाँ पढ़ाई के अतिरिक्त शेष सारा समय उपयोगी सत्प्रवृत्तियों में, प्रेरणाप्रद मनोरंजनों में लगा रहे। ऐसे छात्रावासों का संचालन यदि समर्थ और वरिष्ठ हाथों में रहे और विधि व्यवस्था में शालीनता भरा अनुशासन जुड़ा रहे तो उसका असाधारण प्रभाव छात्रों पर पड़े बिना न रहेगा। उठती आयु में अपनाई गई आदतें प्रायः जीवन भर काम देती हैं।

जो बात छात्रों के विकास पर लागू होती हैं, वही मनुष्य मात्र पर भी लागू होती हैं चाहे उम्र कितनी ही क्यों न हो गयी हो। यह मानकर चलना चाहिए कि पतन की गति तीव्र होती है। किसी को भी अपनी चपेट में कभी भी ले सकती है। आज अवाँछनीयताओं से भरे वातावरण में जी रहे हम सभी एक महामारी के संक्रमण काल में रह रहे हैं। दुर्गुण कब किसी को लग जायें, किस रूप में वे उन्हें रुचिकर लगते हुए उनके ही व्यक्तित्व को घुन बनकर खोखला करते चले जाएं, उसका कोई ठिकाना नहीं। प्रति-पल प्रति-क्षण जब तक स्वयं पर दृष्टि नहीं होगी, अपनी स्वयं की गहरी खोज बीन न होगी, पता भी न चलेगा कि हम कब किनकी चपेट में कितने गहरे तक आ गये हैं। हर कोई व्यक्ति दूध का धुला हुआ नहीं होता। मानवी कमजोरियाँ सभी में होती हैं। इन दुर्बलताओं पर निरंतर दृष्टिपात करते हुए श्रेष्ठ सान्निध्य का चयन कर स्वयं को वासना-तृष्णा-अहंता रूपी मगरमच्छों से मझधार में बचाकर ले जाना इस जीवन संग्राम का सबसे बड़ा कौशल है। जो इसमें जितना अधिक निष्णात् है, वह उतना ही सर्वांगपूर्ण सफल एवं ईश्वर की दृष्टि में सुपात्र है। हम नित्य प्रभु से प्रार्थना करें कि “प्रभु”! हमें आप ज्ञान दें, बल दें, धन दें, यश दें पर साथ ही यह विवेक भी कि हम कहीं इन सबके साथ व्यक्तित्व को पतन की दिशा में तो नहीं ले जा रहे?सद्बुद्धि की प्रार्थना में यही भाव छिपा है कि हम और कुछ बन पायें न बन पायें एक स्वच्छ अंतःकरण वाला मानव बन जाएं, बस ऐसी सद्बुद्धि हमें सतत् नित्य मिलती रहे। अनुदान तो स्वतः सद्बुद्धि अपने साथ लेकर आती है।


काम बन जानें के उपराँत (kahani)

“लोकमान्य तिलक काँग्रेस अधिवेशन में भाग लेने लखनऊ आये। वहाँ उनका कार्यक्रम इतना व्यस्त था कि अपने निजी कार्यों के लिए भी समय निकालना बहुत मुश्किल था। बड़ी कठिनाई से वे भोजन का अवकाश पा सके। भोजन के समय परोसने वाले स्वयं सेवक ने कहा ”महाराज! आज तो आप को बिना पूजापाठ के ही भोजन करना पड़ा। ”लोकमान्य गम्भीर हो गये और बोले- ”अभी तक जो हम कर रहे थे वह भी एक प्रकार की पूजा थी “मात्र कर्मकाण्डों की लकीर पीटना ही पूजा नहीं है। समाज सेवा भी एक प्रकार की पूजा है, आराधना है।”

“राजा एक ऐसे विनम्र आदमी की खोज में था जिसे मंत्री बनाया जा सके। उसने अपने दूत भेजे और राज्यभर में से अति विनम्र आदमी खोज लाने को कहा। दूत एक गाँव में ठहरे और रात्रि विश्राम किया। उन्होंने देखा इस व्यक्ति के पास छः मंजिला हवेली है। नौकर चाकर, वाहन इत्यादि सब कुछ है। फिर भी फटे कपड़े पहनें फिरता है और कंधे पर मछली पकड़ने वाला जाल भी लिये घूमता है। उन्होंने पूछा ”भाई अब काहे की कमी है। इस जाल क्यों लटकाए घूमते हो। “उस व्यक्ति ने कहा ”यों ही। मैं धनवान अवश्य बन गया हूँ किंतु अपने पुराने समय को न भूल जाऊँ याद बना रहे इसलिए जाल लटकाए रहता हूँ “सिपाहियों ने सोचा इस व्यक्ति से अधिक विनम्र और कौन होगा? इसे तो अपने धन पर भी अहंकार नहीं है। इतनी बड़ी हवेली है। फिर भी फटा कोट पहनने में नहीं झिझकता। उसे चुन लिया गया और राजा के पास ले जाकर प्रस्तुत किया। राजा ने सब कुछ सुनने के बाद मंत्री पद नियुक्ति कर दी। जिस दिन से वह मंत्री बना कि उसने जाल एक तरफ फेंक दिया और फटे पुराने वस्त्र उतारकर कीमती पोशाक पहनकर राज भवन पहुँचा। तब लोगों ने पूछा ”अरे तुम्हारा जाल कहाँ गया। जिसे तुम अहंकार गलाने, सादगी बताने को लटकाए फिरते थे।” वह व्यक्ति बोला– ”अब जब मोटी मछली ही फँस गई तो अब जाल को कब तक लटकाए फिरूं। प्रभुता पा लेने, काम बन जानें के उपराँत पुरानी लीक पर फिर कितने लोग चलते हैं। ”


सहयोग और समन्वय का मार्ग अपनायें

संघर्ष और सहयोग दो ही मार्ग ऐसे है जिनमें से किसी एक को चुनकर समस्याओं का समाधान सोचा जा सकता है। संघर्ष का तात्पर्य है-अपनी मर्जी को दूसरे पर थोपना। उसे अपनाने के लिए बाधित करना। कहने से न मानता हो तो उसका दमन, उत्पीड़न करना, यह नीति समर्थ-असमर्थों के प्रति अपनाते रहे हैं। बलवान के लिए ही यह संभव है कि वह निर्बल को दबा ले और उसे अपनी मर्जी पर चलायें इसी मान्यता वाले दूसरा उपाय प्रलोभन देने के रूप में भी अपनाते रहे हैं। लालच देकर भी किसी को वह करने के लिये बाधित किया जा सकता है जिसे वह स्वेच्छा से नहीं करना चाहता। वेश्यावृत्ति इसी आधार पर पनपी है। उसमें दोनोँ में से कोई भी पक्ष किसी का सच्चे मन से सहयोगी नहीं होता पर प्रलोभन को माध्यम बनाकर एक दबता है, दूसरा दबाता है। दास प्रथा में दमन प्रधान रहा है। युद्धों में हारे हुये राज्य की प्रजा को विजेता अपनी विजय उपलब्धि में लूटी गई संपदा की तरह अपनी मानता है। उनके धन साधन तो छीन ही लिये जाते थे, साथ ही युवा स्तर के नर-नारियों को भी लूटे हुये पशुओं की तरह पकड़ लिया जाता था। और उनसे स्वामी पशुओं की तरह काम लेता था। अमेरिका के बाजारों में काले हब्शी इसी बिकते रहते, उन्हें चिड़ियोँ या मछलियों की तरह जाल में फँसाकर लाया जाता था।

यह प्रक्रिया बौद्धिक स्तर पर भी काम करती देखी गई है। चतुर लोगों ने मूर्खों को इसी आधार पर अपना अनुयायी बनाया है और उसी पिंजड़े में स्वेच्छापूर्वक कैदी बनें रहने के लिये विवश किया है। इन सब तरीकों को दबाव का संघर्ष का, तरीका कह सकते हैं। इस विधा को अपना लेने पर पराजित अपना मनोबल यहाँ तक कि ईमानदारी भी खो बैठता है। साथ ही विजेता की अहंमन्यता का वारापार नहीं रहता, वह अपने को सर्वशक्तिमान मानने लगता है और अपनी आक्रामक नीति का और भी अधिक दुस्साहस के साथ प्रयोग करता है।

दूसरा मार्ग सहयोग का है। सभी जानते हैं कि ईंटों के मिलने से भवन बनता है। तिनके मिलाकर रस्सी बनती है। सींकें समर्थ बुहार लगाती हैं। बूँदें मिलकर सरिता के रूप में बहती हैं। बिखरें मन के मिलकर सुन्दर माला या हार का रूप धारण करते हैं। परिवार एक प्रकार से छोटा समाज है जिसमें सभी समर्थ असमर्थ मिलजुल कर रहते, मिल बाँट कर खाते, सुरक्षित रहते और समुन्नत बनने के लिए अग्रसर होते हैं। बिखर जानें पर इनमें से किसी का भी कोई महत्व नहीं रह जाता। सहकारिता के आधार पर सैन्य दल बनता है, कारखाने चलते हैं। और विशालकाय निर्माण कार्य पूरे होते हैं कहते हैं कि चींटियां मिलकर हाथी की सूंड़ में घुस पड़ें तो उसे मार सकती हैं। दीमकों और टिड्डियों को विशालकाय क्षेत्रों को वीरान करते देखा गया है। प्रजाताँत्रिक देशों में वोट के बल पर शासनों में परिवर्तन होते देखा गया है। मधुमक्खियाँ मिलकर छत्ता बनाती और शहद बनाने जैसा कौशल विकसित करते हुये यशस्वी बनती हैं। सहकारिता को इस युग की उच्चस्तरीय उपलब्धि माना गया है। संगठन इसी सिद्धाँत के अनुरूप खड़े होते हैं। ठेके इसी आधार पर काम करते हैं। धर्मतंत्र से लेकर राजतंत्र में अपनी संगठन शक्ति के आधार पर ही आश्चर्यजनक कार्य करते देखा गया है। अर्थतंत्र की प्रगति में यही शक्ति प्रमुख रूप से काम करती है। जहाँ इसके विचार को अपनाया नहीं जाता विग्रह पर विघटन पर उतारू रहा जाता है वहाँ समझना चाहिये कि देर सबेर में सर्वनाश होकर रहेगा। संयुक्त परिवार की हर दृष्टि से विकासोन्मुख एवं सुख-शाँति की सुनिश्चित विधा माना गया है। इसके विपरीत संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रेरित अदूरदर्शी लोग डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाते और ढाई चावल की खिचड़ी पका कर उपहासास्पद बनते और असफल रहते देखे गये हैं।

सहकारिता का प्रत्यक्ष स्वरूप मिलजुल कर काम करने के रूप में एक जुट बनने, एकत्रित होने के रूप में दृष्टिगोचर होता है पर थोड़ी गहराई में उतर कर उसके सिद्धाँत या दर्शन पर विचार किया जाये तो यह तथ्य उभर कर ऊपर आता है कि समन्वय की भावना ही सहकारिता के रूप में विकसित होती है। अपने स्वार्थ को अलग या ऊँचा रखने पर वह आधार बन नहीं सकता अपने स्वार्थ को अन्यायों के स्वार्थ में मिलाकर चलना होता है, इसी को उदारता या परमार्थ-परायणता कहते हैं। अधिकार को गौण और कर्तव्य को प्रमुख मानकर चलने पर ही यह विधा बनती है। इसी को संकीर्णता, अनुदारता, स्वार्थपरता कट्टरता आदि के नाम से जाना जाता है। यह क्रिया-परक भी हो सकती है और विचार-परक भी। अपने को ही प्रधानता देना और अन्यायों की उपेक्षा करना यही है वह चिन्तन जो अनेक विग्रह और संकट खड़े करता है।

यह संकीर्णता अनेक रूपों में सामने आती रहती हैं। सम्प्रदायवाद जातिवाद, व्यक्तिवाद आदि के रूप में यह क्षुद्रता अपने-अपने ढंग से काम करती और टकराव का माहौल बनाती है।

सम्प्रदायवादी अपनी मान्यताओं को ही सही होने का हठ करते हैं। अपने विचारों के साथ ईश्वरीय आदेश शास्त्र वचन, देवदूत कथन, सनातनी, सत्य मानते हैं। बात इतने भर तक सीमित रहती तो कोई बात भी नहीं थी।

व्यक्ति अपने लिए किसी विश्वास को सही मानने और अपनायें रहे तो इसे उसकी व्यक्तिगत मान्यता कहकर विचार स्वातंत्र्य के अंतर्गत लिया जा सकता है। पर संकट तब खड़ा होता है। जब अन्यायों को सभी मान्यताओं को झुठलाया जाता है, उन्हें अधर्मी, नास्तिक, काफिर म्लेच्छ आदि कहकर झूठा ठहराया जाता है। इसी आधार पर उनके साथ झंझट खड़ा किया जाता है। दमन को पुण्य माना जाता है। और विचारों को दूसरों पर थोपने में जितनी सफलता पाई जाय, इसे धर्म की, ईश्वर की सेवा कहा जाता है। यह अतिवाद है, दुराग्रह भी। किसके विचार किस हद तक सही हैं। इसका निर्णय होना अभी शेष है। जब सभी संप्रदाय अपने को सच्चा और दूसरों को झूठा मानते हैं तो इसका निर्णय कैसे हो कि अगणित सम्प्रदायों में से कौन एक सही तथा अन्य सब झूठे हैं?जब सभी एक जैसा दावा करते हैं। तो विचार शीलता के आगे यह संकट खड़ा होता है कि वह किसको सही और अन्यों को झूठा ठहरायें। उपयोगिता की कसौटी पर अपने को कसे जानें के लिए कोई प्रस्तुत नहीं होता। दुहाई पूर्वजों की या प्रचलन कर्ताओं की देवदूत ठहराने की दुहाई देता है। जब सभी का दावा एक जैसा हो तो फिर किसे सही और किसे गलत ठहराया जाय?यह झगड़ा हठवादिता पर आधारित होने के कारण कभी निपटने वाला नहीं है प्रत्येक मतावलंबी अपने अतिरिक्त सभी को झूठा ठहरायेगा और उन्हें मिटाने या नीचा दिखाने के लिये चित्र-विचित्र तरकीबें सोचता रहेगा। शास्त्रार्थ होने से लेकर तलवार चलने तक की दुर्घटनाएं इसी आधार पर होती रहीं हैं। कट्टरता जब तक शाँति और समाधान का कोई मार्ग निकलने वाला है नहीं। सहकारिता की जड़ें यह संकीर्णता के पक्षधर सदा काटते ही रहेंगे।

चैन से रहने और रहने देने का तरीका एक ही है-सहिष्णुता और समन्वय। अपने को सही मानें, पर दूसरे मतावलम्बियों को भी वैसे ही स्वतंत्रता प्रदान करें। भोजन और वस्त्र के संबंध में अपनी रुचि के अनुसार चयन करने की छूट रहती है, तो फिर साम्प्रदायिक मान्यताओं को भी अपनी रुचि के अनुरूप अपनाने की सुविधा क्यों न हो?कोई किसी से टकराये क्यों?कोई किसी को झूठा क्यों बताये?जब हर व्यक्ति की आकृति और प्रकृति में थोड़ा अन्तर रहने पर भी परस्पर मिलजुलकर रहा जा सकता है। तो अनेक मान्यता वाले अपने अभिमतों को एक गुलदस्ता क्यों न मानें और क्यों न बिना टकराये अपनी-अपनी मान्यता बनायें रहकर भी सहिष्णुता का मार्ग क्यों न अपनायें?हिन्दू धर्म में यह परिपाटी अति प्राचीन काल से चलती चली आ रही है। अनेक देवी-देवताओं की मान्यता है। किसी को देवता के देवालय में जानें पर आपत्ति नहीं होती है?वरन् सभी को श्रद्धापूर्वक शीश झुकाते हैं। कई बार तो एक ही देवालय में अनेकानेक देवताओं की स्थापना होती है। यों उनके नाम पर पूजा-प्रचलन और कथा प्रसंग अलग-अलग भी पाये जाते हैं। अपने प्रिय देवता को सर्वोपरि ठहराने का भी उपक्रम चलता है। इतने पर भी देवताओं की भिन्नता को लेकर कभी कोई कटुता भरे विग्रह खड़े नहीं होते। यही बात एक कदम और भी आगे बढ़ाई जा सकती है। अनेक धर्म सम्प्रदायोँ को भी इसी सहिष्णुता और समन्वय भावना से सहन किया जा सकता है। इससे भी एक कदम आगे बढ़ना हो तो सभी धर्म प्रचलनों में से जो बातें समय के अनुरूप उपयोगी प्रतीत हों उन सभी को अपनाने का उत्साह जगाया जा सकता है। जो मान्यताएं या प्रथायें समय से पीछे की हो गई, उनकी उपेक्षा की जा सकती है। आवश्यक नहीं कि जो प्रतिपादन कभी किन्हीं परिस्थितियों में किन्हीं व्यक्तियों या क्षेत्रों के लिए उपयुक्त ठहराया गया हो, वह आज भी हर किसी के लिए उसी रूप में मान्यता प्राप्त करता रहे। ऐसा करने पर तो सुधार परंपरा और प्रगतिशीलता का अंत ही हो जायेगा। सत्य की शोध में चलते आ रहे प्रयत्नों के मार्ग में अवरोध ही खड़ा हो जायेगा।

सम्प्रदायवाद की तरह संकीर्णता का एक दूसरा क्षेत्र भी है -जातिवाद। किसी जमाने में व्यवसाय और क्रियाकलाप के आधार पर जातियाँ बनती थीं। बजाज, सुनार, अध्यापक, शिल्पी, साहित्यकार आदि की भी अपनी-अपनी बिरादरियाँ हैं, पर उनका सभी वंशों में जन्में लोग अध्यापक, व्यवसायी, कलाकार आदि हो सकते हैं। ऐसी दशा में जन्म जाति पर आग्रह करने का कोई तुक नहीं रह जाता। विशेषतया तब जब कि उसकी अलग पहचान बनाई जाय। दूसरों से उसे सर्वथा भिन्न रखा जाये। अपने वंश के लोगों को अपना और अन्य सबको बिराना ठहराया जाये। बात इस तरह बढ़ जाये कि अपनी जाति वालों के साथ पक्षपात और दूसरों के साथ उपेक्षा बरती जाये। इन दिनों तो जातियाँ एक प्रकार से छोटे-छोटे राष्ट्रों समुदायोँ के रूप में इस सीमा तक विकसित हो गई है कि एक दूसरे के साथ रोटी-बेटी का संबंध करना तो दूर, उत्सव आयोजनों में भी अपनी ही जाति वालों को आमंत्रित करते हैं। बात बढ़ते-बढ़ते ऊँच-नीच तक पहुँचती है। हर बिरादरी अपने को ऊँचा ठहराती है। और दूसरों को नीचा होने की मान्यता बनाती है। देखा यहाँ तक गया है कि एक ही बड़ी जाति के अंतर्गत पाई जानें वाली उपजातियाँ तक अपने-अपने को ऊँचा ठहराती हैं, दूसरों को नीचा बताती हैं, अपने दायरे से आगे बढ़कर कोई किसी के साथ रोटी-बेटी जैसे रिश्ते बनाने को तैयार नहीं होता। यह बिखराव की भयावह स्थिति है। इसके रहते कोई देश, समाज पारस्परिक घनिष्ठता के सूत्र में नहीं बँध सकता। यह जातिवाद भी एक प्रकार की संकीर्णता, कट्टरता ही है। इसे हटना और हटाया ही जाना चाहिये। जातियों, वंशों के बीच समन्वयवादी तालमेल बैठना ही चाहिये।


व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की धुरी-अध्यात्म

मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन एवं मानव समाज में सुख-शाँति की परिस्थितियां किस आधार पर बनेंगी यदि इस प्रश्न का संक्षिप्त सा उत्तर दिया जाये, तो वह होगा मनुष्य में मनुष्यता विकास से। इसी को प्रकारांतर से व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का तात्पर्य मात्र शारीरिक स्वस्थता एवं बौद्धिक प्रखरता के युग्म को मानना भूल होगी। इसका सही व स्वस्थ स्वरूप सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को व्यक्तित्व में विकसित करने से प्रकट होता है।

मानवी समाज में व्यक्ति के भिन्न-भिन्न स्तर दिखाई देते हैं। एक से काय-कलेवर के होते हुए भी गुण, कर्म स्वभाव का अंतर ही एक की अपनी अलग पहचान बना देता है। मानवी मूल्यों की अवहेलना कर उलटी राह पर चलने वाले नर पशु, नर पिशाच की श्रेणी में गिनें जाते हैं। तो साँस्कृतिक एवं सामाजिक आदर्शों के अनुरूप जीवन पद्धति पर चलने वाले महा-मानव की श्रेणी में जा विराजते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अन्दर जिज्ञासा बराबर बनी रही है कि परिपक्व व्यक्ति की पहचान क्या है?उसके सही लक्षण क्या हैं?

इस संदर्भ में प्रो.जी. डब्लू. आलपोर्ट ने अपने मंतव्य इस प्रकार प्रकट किये हैं-”व्यक्ति की परिपक्वता, अपने गुणों के विस्तार एवं कमियों को खुले दृष्टिकोण से स्वीकार कर सुधारने की वृत्ति के साथ आती है। ”एक परिपक्व व्यक्ति के जीवन दर्शन में एकरूपता का समावेश होता है। उसके अन्तस् में मानव मात्र के कल्याण की भावना विकसित होती है, जिसके आधार पर वह समता, सौहार्द, सहयोग तथा मैत्री पूर्ण व्यवहार करता दिखाई देता है।

मूर्धन्य मनीषी अब्राहम एच.मैसलो ने अपनी पुस्तक “टुवार्डस ए साइकोलॉजी ऑफ बीइंग“ में परिपक्व व्यक्तित्व की व्याख्या करते हुए लिखा है कि हर व्यक्ति आत्म सिद्धि प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है। यही उसकी समस्त क्रियाओं की अभिप्रेरणा है। किन्तु जब तक व्यक्ति अपने में सादगी, शालीनता, सच्चरित्रता जैसे आध्यात्मिक गुणों का विकास नहीं कर लेता उसके व्यक्तित्व में परिपक्वता और सर्वांगीण उन्नति नहीं आती। आत्म सिद्धि उसके बाद का अगला चरण है। मैसलो के शब्दों में इस प्रकार का व्यक्तित्व जीवन और समाज के यथार्थ को भली भाँति ग्रहण करता है। उसके जीवन में अधिक सहजता होती है। वह जीवन की समस्याओं को तटस्थ होकर समझता है और उनका समाधान ढूँढ़ता है। स्वयं समस्याओं से प्रभावित नहीं होता। मैसलो के ऐसे व्यक्तित्व की परिकल्पना में और गीता के समत्व भाव से युक्त पुरुष में कोई अंतर नहीं है। गीता के दूसरे अध्याय के 48वें श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं। ”योगस्थ कुरु कर्माणि संगं त्यकत्वा धनंजय।” अर्थात् आसक्ति को त्याग कर सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित होकर कर्मों को करने वाला व्यक्ति समत्व-भाव से युक्त मनुष्य है। मनोवैज्ञानिकों साईमंडस ने भी परिपक्व व्यक्ति को “आँतरिक द्वन्द्वों और बाह्य दुर्गुणों से मुक्त बतलाया है। ”पाश्चात्य मनोविज्ञान में परिपक्व व्यक्तित्व का जो स्वरूप उभर कर आता है उसमें भी भारतीय दर्शनों एवं मनोविज्ञान के परिपक्व व्यक्तित्व की अवधारणा का ही समावेश दिखाई देता है।

भारतीय जीवन दर्शन का निचोड़ हमें गीता में मिलता है। अतः गीता में वर्णित आदर्श पुरुष की व्याख्या से हमें पूर्व के मनोविज्ञान में परिपक्वता की परिभाषा मिलती है। इसके अनुसार व्यक्ति के स्वभाव एवं स्वरूप में तीन गुणों की प्रधानता होती है। ये गुण हैं सत्व, रज और तम। इन्हीं तीन गुणों से प्रभावित समूचा मानव समुदाय दिखाई देता है। लेकिन सभी व्यक्तियों में इन तीन गुणों की मात्रा समान रूप से नहीं होती। गुणों की मात्राओं का भेद व्यक्ति के व्यक्तित्व में परिपक्वता संबंधी भिन्नता भी उत्पन्न करता है। सत्व, गुण की प्रधानता से व्यक्ति ज्ञान पर बल देता है। शरीर स्वास्थ अच्छा होता है। सत्व गुण की विशेषता है निर्मलता। इस गुण की प्रधानता लिए व्यक्ति मन में सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति बनाये रखने के कारण श्रेष्ठ होते हुए भी जीवन में कठिनाईयां को अनुभव करता है। रजोगुण प्रधान व्यक्ति में आसक्ति अत्यधिक होती है और इस कारण वह विभिन्न प्रकार की तृष्णाओं और कामनाओं से ग्रस्त रहता है। तमोगुण से प्रभावित व्यक्ति अज्ञानी होता है। वह लापरवाही से काम करता है। उसमें आलस्य प्रमाद एवं विभिन्न प्रकार के भ्रमों की प्रधानता होती है।

तात्पर्य यह है कि इन कमियों के रहते व्यक्ति गीता के अनुसार परिपक्व नहीं होता। परिपक्वता के लिए व्यक्ति का गुणातीत भाव में प्रतिष्ठित होना आवश्यक है। गीताकार ने ऐसे व्यक्ति की व्याख्या करते हुए कहा है -वह निरंतर आत्म भाव में स्थित होकर दुःख सुख को समान समझने वाला है। धैर्यवान है, प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है, वह निंदा स्तुति में भी समान भाव वाला है। वह संपूर्ण कार्यों में कर्तापन के अभिमान से रहित रहता है?इसके अनुसार परिपक्व व्यक्ति के लक्षण स्थिति-प्रज्ञ व्यक्ति ही परिपक्व व्यक्ति है।

श्री अरविंद ने अपने सर्वांगपूर्ण योग-दर्शन में व्यक्तित्व की व्याख्या चेतना के विभिन्न स्तरों एवं सोपानों के संदर्भ में की है। उनके अनुसार-मानवीय व्यक्तित्व के वल चेतन और अचेतन मन का अच्छा या बुरा संगठन नहीं है। उसका अति महत्व यदि मानवी विकास क्रम उच्चतर अवस्थाओं की ओर अग्रसर हो रहा है तो अवश्य ही वे उच्चतर अवस्थायें सम्भावनाओं के रूप में उसकी प्रकृति में आज भी अति चेतन में निहित है। इसलिए यह भाग महत्वपूर्ण है। मानव का विकास मार्ग जिसे वह तय कर चुका है उसके अवचेतन को निर्धारित करेगा। वे कहते हैं कि मनुष्य के अवचेतन में स्थित भूत संस्कार मात्र ही वर्तमान व्यवहार को ही नहीं बनाते, वरन् अति चेतन का प्रभाव भी उस पर रहता है, जिसके बल पर मनुष्य का व्यक्तित्व रूपांतरित होता है। परिपक्व व्यक्तित्व के संदर्भ में भी अरविंद का बल उस आध्यात्मिक तत्व पर है, जिसकी उपलब्धि होने पर व्यक्ति पर शाँति, आनंद और प्रकाश की प्राप्ति करता है। वही व्यक्ति अपने अंतरमन में प्रकाश पुँज पा सकते हैं, जिसे उन्नत होने, ऊपर उठने, विकसित होने, की सच्ची, गंभीर सतत् अभिलाषा, इच्छा तथा आकाँक्षा है। वह परिपक्व व्यक्तित्व के लिए त्याग को आवश्यक मानते हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी दृष्टि को सीमित तथा क्षणिक स्वार्थों से हटायें, अहंकार की बेड़ियों को तोड़ें और स्नेह-सौजन्य के आधार पर कुटुम्बकम्’की भावना को अंगीकार करें। यह छोटा चरण भी व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। इसी के सहारे विश्व वसुंधरा पर सुख-शाँति का साम्राज्य स्थापित हो सके गा। समय की माँग भी यही है।


सामने झुकना पड़ा (kahani)

“यह कहना गलत है कि गृहस्थाश्रम साधना में किसी तरह बाधक है। प्राचीनकाल में बहुसंख्यक ऋषि सपत्नीक रहकर गुरुकुल में वास कर साधना करते शिक्षण शोध प्रक्रिया चलाते थे।

एक बार अत्रि अपने आश्रम से चलकर एक गाँव पहुँचे। आगे का मार्ग बहुत बीहड़ और हिंसक जीव-जन्तुओं से भरा हुआ था, सो अत्रि रात को इसी गाँव में एक सद्गृहस्थ के घर टिक गये। गृहस्थ ने उन्हें ब्रह्मचारी वेष में देखकर उनकी आव-भगत की और भोजन के लिये आमंत्रित किया। अत्रि ने जब समझ लिया कि इस परिवार के सभी सदस्य ब्रह्मसंध्या का पालन करते हैं, किसी में कोई दोष-दुर्गुण नहीं है, तो उन्होंने आमंत्रण स्वीकार कर लिया।

भोजनोपराँत अत्रि ने गृहस्थ को प्रणाम कर प्रार्थना की “देहि में सुखदाँ कन्याम्” अपनी सुखदा कन्या मुझे दीजिये। जिससे मैं अपना घर बसा सकूँ। उन दिनों वर ही कन्या ढूंढ़ने जाते थे। कन्याओं को वर तलाश नहीं करने पड़ते थे। उन दिनों नर से नारी की गरिमा अधिक थी। गृहस्थ ने अपनी पत्नी से परामर्श किया। अत्रि के प्रमाण पत्र देखे, और वंश की श्रेष्ठता पूछी और वे जब इस पर संतुष्ट हो गये कि वह सब प्रकार से योग्य है तो उन्होंने पवित्र अग्नि की साक्षी में अपनी कन्या का संबंध अत्रि के साथ कर दिया, अत्रि के पास कुछ था नहीं, इसलिये गृहस्थ संचालन के लिए आरंभिक सहयोग के रूप में अन्न, वस्त्र, बिस्तर, थोड़ा धन और गाय भी दी। छोटी सी, किन्तु सब आवश्यक वस्तुओं से पूर्ण गृहस्थी लेकर अत्री अपने घर पधारे और सुखपूर्वक रहने लगे।

इन्हीं अत्रि और अनुसुइया के द्वारा दत्तात्रेय जैसी तेजस्वी संतान को जन्म मिला। भगवान् को भी एक दिन इनके सामने झुकना पड़ा था। ”


रोगोत्पत्ति की जड़ें तन में नहीं-मन में

शरीर को स्वस्थ रखने के लिये जिस प्रकार आहार-विहार का ध्यान रखा जाता है। उसी प्रकार मानसिक संतुलन को ठीक रखने की आवश्यकता पड़ती है। किसी समय व्याधियोँ के लिये ग्रह-नक्षत्रों, भूत-प्रेतों देवी-देवताओं को जिम्मेदार माना जाता था। बाद में बैक्टीरिया, वायरस, विजातीय द्रव्य को इसका कारण माना जाता रहा। किन्तु आधुनिक शोध से यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि बीमारियाँ मनुष्य के मन में पैदा होती हैं एवं तन में पनपती हैं। इन्हें ’साइकोसोमेटिक’ या मनोशारीरिक रोग भी कहा जा सकता है।

आधुनिक सभ्य समाज में जहाँ जीवन में संघर्ष बढ़ रहा है। व्यक्ति के जीवन में मानसिक तनाव की वृद्धि हो रही है। यह तनाव मनोविकारों के कारण पैदा होता है। नैतिक तथा सामाजिक मूल्यों के प्रति अनास्था भी इसका कारण होती है। इसका प्रभाव मस्तिष्क के माध्यम से समग्र शरीर पर पड़ता है। ‘आटो नामिक नर्वस सिस्टम‘ की इसमें महती भूमिका होती है, जो मस्तिष्क के भाग ‘हाइपोथैलेमस’ से प्रभावित होता है। इसको सिम्पेथेटिक तथा पैरा सिम्पेथेटिक दो भागों में विभाजित किया गया है। इनके द्वारा हृदय, पाचन संस्थान, अंतः स्रावी ग्रंथियां संतुलन की अवस्था में क्रियाशील रहती है। मनोभाव सेरेब्रल कारटेक्स में पैदा होते हैं, जिनका प्रभाव हाइपोथैलेमस के माध्यम से पेरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम द्वारा कार्यिकीय परिवर्तनों के माध्यम से हृदय, रक्त नलिकाओं, अंतः स्रावों और विभिन्न ग्रंथियोँ पर होता है। इसी प्रकार मनोशारीरिक रोगों का प्रभाव हमारे शरीर पर होता है।

मनोभावों का उत्तेजनात्मक प्रभाव हृदय गति, रक्तचाप, रक्त नलिकाओं के व्यास में परिवर्तन, रक्त के रासायनिक परिवर्तन के रूप में होता है। जिसकी परिणति हार्टअटैक, कारडिएक एरिथमिया, इसेन्शियल हायपरटेंशन, ऐंजाइना पेक्टोरिस तथा माइग्रेन के रूप में हो जाती है।

एक व्यापारी भावनात्मक उतार-चढ़ाव के साथ ही चिंतित रहा करता था। कुछ समय बाद उसे उच्च रक्तचाप की बीमारी हो गयी। मनोवैज्ञानिकों ने उसे अपने दृष्टिकोण को बदलने तथा अपने समाज का उत्थान के रचनात्मक प्रयास में लगने की सलाह दी। देखा गया कि कुछ दिनों बाद ही उसे उच्च रक्तचाप से मुक्ति मिल गयी।

यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका में प्रतिवर्ष आधे से ज्यादा मृत्यु हृदय रोगों से होती हैं। चिकित्सकों के अनुसार 45 से 65 वर्ष की उम्र में 25 प्रतिशत मृत्यु साइकोसोमेटिक कोरोनरी आर्टरी डिसीसेज के कारण होती है। डबलिन और स्पाइगील मेन ने कोरिया युद्ध के दौरान शव परीक्षण द्वारा यह निष्कर्ष निकाला था। मेट तथा केनन ने अपनी खोजों में पाया है कि भावात्मक संवेगों का रक्त के जमाव की गति से साधा संबंध है। ब्लड बैंक में रक्त दाताओं को तीन श्रेणियों में बाँटा गया जो शाँत मनःस्थिति के थे उनके रक्त जमने की दर 8 से 12 मिनट थी, पर जो भयभीत थे उनके रक्त के जमाव का समय 4 से 5 मिनट था जो अत्यधिक चिंतित तथा भयभीत थे उनका 1 से 2 मिनट था। हृदयाघात में मृत्यु का कारण खून का थक्का जम जाना होता है। जो थ्राम्बस या इम्बालिस्म के रूप में होता है। थक्का बनने की प्रक्रिया रक्त के रासायनिक परिवर्तन पर निर्भर करती है। जिस पर मानसिक तनाव का सीधा प्रभाव होता है। हृदय की मायोकारडियम नामक पेशियोँ को बराबर खुराक नहीं मिलने से वे दुर्बल हो जाती हैं। इसका कारण भी तनाव-ग्रस्तता होती है। आगे चलकर ये ही हृदय रोग का कारण बनता है जिससे मृत्यु तक हो जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार मनोविकारों से रक्तचाप में वृद्धि हो जाती है। जिसे इसेन्शियल रक्तचाप भी कहते हैं। इसका कारण रक्त नलिकाओं का कड़ा हो जाना है। सामान्यतः रक्त नलिकायें लचीली ‘इलास्टिक’ होती है।

किंतु उम्र बढ़ने के साथ-साथ या मानसिक तनाव के कारण वे सिकुड़ जाती है तथा कड़ी हो जाती हैं। जिसके कारण हृदय को रक्त संचार में ज्यादा श्रम करना पड़ता है। फलतः रक्तचाप बढ़ जाता है। इसी से आगे चलकर, हृदय रोग, वृक्क का खराब होना तथा मस्तिष्क की नसों का फटना या उनमें रक्त का थक्का जमने की संभावना बढ़ जाती है। प्रख्यात चिकित्सक फेडमेन तथा रोजमेन का कहना है कि जब व्यक्ति पर मानसिक तनाव का अत्यधिक दबाव होता है तो उसका ब्लड कोलेस्टरोल लेवल एवं कोगुलेशन टाइम बढ़ जाता है। रुसेक तथा जोमेन ने 40 वर्ष की उम्र के 100 रोगियों की जाँच की जिन्हें कोरोनरी हृदय रोग था उनमें से 11 व्यक्ति मानसिक तनाव से पीड़ित थे। मानसिक तनाव से एड्रीनल गलैण्ड उत्तेजित होती है

जिससे वृक्क के माध्यम से भी रक्तचाप बढ़ जाता है। चिकित्सक शंक ने बिल्लियों पर कुत्तों द्वारा भौंकते रहकर तनाव बढ़वाया। कुछ समय बाद उनका रक्तचाप बढ़ा हुआ पाया गया। उनकी एड्रीनल ग्रंथि भी बढ़ी हुई थी।

मानसिक तनाव का प्रभाव हृदय की गतिविधियोँ पर विशेष रूप से पड़ता है। हृदय की सामान्य गति 72 प्रति मिनट होती है, किन्तु तनाव की अवस्था में यह गति बढ़कर 200 से 300 प्रति मिनट तक हो सकती है। इसी से टोकेकारडिया एरिदमिया, फिब्रिलेशन तथा ब्रेडिकारडिया आदि जैसे हृदय रोग पनपने लगते हैं। ऐंजाइना पेक्टोरिस में छाती के सामने वाले भाग में तीव्र वेदना होती है। यह कोरोनरी धमनी के, मानसिक तनाव के कारण संकुचन से भी होता है इससे रक्त में रासायनिक परिवर्तन भी होता है जिसमें खून का थक्का जम जाता है। माइग्रेन की तकलीफ इन्हीं कारणों से होती है। मानसिक विकारों से जन्मे मनोशारीरिक रोगों से शाँक एन्यूरिस्म तथा रक्तस्राव जैसी बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं जिनसे बेहोशी, लकवा या कभी कभी मृत्यु तक हो जाती है।

मनोविकारों से रहित मन की शरीर को निरोग रखने में महत्वपूर्ण भूमिका है। इस तथ्य को विश्व के मूर्धन्य चिकित्साशास्त्री भी अनुभव कर चुके हैं। जिन्हें स्वस्थ, प्रसन्न और निरोग रहना हो उन्हें चाहिए कि वे पहले अपने मन को नियंत्रित-संयमित करें। जिस प्रकार अनियमित भोजन करने, और चटोरेपन से स्वास्थ्य बिगड़ता है, उसी प्रकार चाहे कुछ चिंतन करने से मन पर दूषित प्रभाव पड़ता है जिसकी परिणित शारीरिक रोगों के रूप में उभरती है। इसीलिए मनःचिकित्सक चिंतन, निंदा, चुगली, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, आवेश आदि के प्रसंगोँ से बचने की सलाह देते हैं। मन के भटकाव को रोककर यदि सही दिशा दी जा सके तो स्वास्थ्य की समस्या का समाधान तो होता ही है। साथ ही अन्य अनेकों, झगड़े, झँझट और वैमनस्य से भी बचा जा सकता है।


अवसर देने का निश्चय किया (kahani)

‘सेवा कर्म ही सर्वकालीन युगधर्म है। अध्यात्म का मर्म यही है। ईसा को भक्त जनों की एक बड़ी सभा में प्रवचन करना था। जाते समय रास्ते में एक बीमार मिला। वे उसकी सेवा में जुट गये।

देर होते देखकर उपस्थित लोग उन्हें खोजने निकले, तो उन्हें पीड़ित की सेवा में संलग्न पाया। सभा के लोग वहीं एकत्रित हो गये। ईसा ने कहा -’कथनी से करनी श्रेष्ठ है। तुम सेवा धर्म अपनाओ, तो ब्रह्मज्ञान का वह आनंद सहज ही प्राप्त कर सकोगे, जिसे पाने के लिये तुम यहाँ आये हो। ‘

“जन जागरण हेतु यात्रा का अर्थ मात्र उस क्रिया को किसी तरह पूरा करना भर नहीं।

चन्द्रमा की दो सन्तानें थीं -एक पुत्र और दूसरी पुत्री। पुत्र का नाम पवन और पुत्री का नाम आँधी। पुत्री को एक दिन ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरे पिताजी साँसारिक पिताओं की तरह पुत्र और पुत्री में भेद करते हैं। चन्द्रमा आँधी की व्यथा ताड़ गये। उन्होंने पुत्री को आत्म-निरीक्षण का एक अवसर देने का निश्चय किया।

चन्द्रमा ने आँधी और पवन दोनों को अपने पास बुलाकर कहा-’बच्चों!’ क्या तुमने स्वर्गलोक में इन्द्र के कानन में ‘पारिजात’नामक देव वृक्ष देखा है?

‘हाँ’दोनों ने एक स्वर से उत्तर दिया।

‘तो तुम पारिजात की सात परिक्रमा करके आओ। ’

पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर दोनों चल दिये, पारिजात देव वृक्ष की ओर। आँधी सिर पर पैर रखकर दौड़ी। वह धूल, पत्ते और तमाम कूड़ा करकट उड़ाती हुई बात की बात में परिक्रमा करके आ खड़ी हुई। आँधी समझ रही थी पिता का काम कर मैं जल्दी लौटी हूँ, तो जरूर पिताजी मेरी पीठ ठोकेंगे।

थोड़ी देर बाद पवन लौटा, पर उसके आगमन पर सौंधी-सुगंध से सारा भवन महक उठा। चन्द्रमा ने कहा-’बेटी!’अब तुम अच्छी तरह से समझ गई होगी, कि जो अत्यधिक तेजी से दौड़ता है, वह खाली झोली लेकर आता है और जिसकी गति स्वाभाविक होती है, वह मन को मुग्ध करने वाली सुगंध लाता है जिससे संपूर्ण वातावरण सुगंधित हो जाता है। ’

वानप्रस्थों की यात्रा पवन देव के समान ही उद्देश्य पूर्ण होती है। ”


समर्पण की महत्ता

कामना, लालसा, वासना की संकीर्ण परिधि में ही सामान्यतया मानव मन का चिंतन घूमता रहता है। शास्त्रकारों ने इसे ही पुत्रेषणा, वित्तैषणा और लोकेषणा कहकर इससे उबरने को कहा है। आत्मोत्कर्ष के मार्ग में यही प्रधान बाधाएँ हैं। जन सामान्य में व्याप्त राग, द्वेष, कलह, कटुता इन्हीं में जकड़े रहने का परिणाम है। जब तक इस संकीर्णता से मुक्ति न मिले मनुष्य जैसा देव दुर्लभ जीवन कौड़ियों के मोल बिकता है। इंद्रियों, आकर्षणों में फँसा हुआ जीवन ‘प्रेय’मार्ग कहा गया है। इसमें शाश्वत अपेक्षाओं और गम्भीर आस्थाओं के प्रति अभिरुचि तो दूर इस मनःस्थिति का प्राणी उन्हें अस्वीकारने भी लगता है। जिससे सामाजिक जीवन में अशाँति और अव्यवस्था का ही विकास होता है।

इसके विपरीत एक और जीवन भी होता है जो उत्कृष्टता, आदर्शवादिता चरित्रनिष्ठ और समाज निष्ठ के प्रति समर्पित होता है इसे ‘श्रेय पथ’ कहते हैं। इसमें इन्द्रियों को संतुष्ट करने की हेय प्रवृत्ति का परित्याग होने से भावनाओं का अन्तःकरण का विकास होता है। जीवन सत्ता मानवीय तथा देवी विभूतियों और क्षमताओँ से विभूषित होती चली जाती है। प्रत्यक्ष में यह सौदा घाटे का हो सकता है। पर यही श्रेय समर्पित जीवन क्रमशः उत्कृष्टता और आत्मिक आनंद की श्रेणियों में उठता हुआ मनुष्य को उसके जीवन लक्ष्य-परमात्मा तक पहुँचा देता है अंतःकरण की पुकार को अनसुनी न किया जाय तो परमात्मा की यह प्रकाश किरण उसकी प्रेरणा महापुरुषों के माध्यम से सत्साहित्य के माध्यम से मानवीय पीड़ा पतन के प्रति संवेदना के रूप में हर किसी के पास आ जाती है। इसे स्वीकार कर समर्पित होकर जिया जा सके तो निस्संदेह मनुष्य जीवन धन्य हो सकता है।

वट का बीज अत्यंत लघु और नगण्य सा होता है, पर समुचित खाद-पानी पाकर वह विकसित होकर वृक्ष का रूप धारण कर लेता है और पशु-पक्षियों को भोजन एवं आश्रय प्रदान करने से लेकर मनुष्य जाति की अनेक प्रकार से सेवा करता है। इसके विपरीत अपने आप में सीमित प्रकृति का नन्हा प्रतिनिधि किसी कीड़े मकोड़े को भले ही संतुष्टि प्रदान कर दें, पर उससे अधिक की क्षमता उसमें नहीं। अपने आप तक सीमित रहने अपने स्वार्थों तक केन्द्रीभूत रहने की संकीर्ण मनोवृत्ति कभी भी किसी व्यक्ति को ऊँचा नहीं उठा सकती।

श्रेय संपादन आत्मविश्वास बड़ी उपलब्धियों के लिए अपनी अहंता का परित्याग आवश्यक होता है। समर्पण इसी का नाम है। वही वट बीज जो कल तक अत्यन्त तुच्छ सा घेरे में घिरा हुआ था, जब अपने आपको माँ धरित्री की गोद में समर्पित कर देता है तो उसमें विकास के नन्हें अंकुर फूट पड़ते हैं। सविता की किरणें उसे शक्ति देती हैं, पवन की शीतलता उसे दुलारती हैं। बादल उसका अभिसिंचन करते हैं। सम्पूर्ण प्रकृति का सहयोग मिलने लगता है। बीज नीचे बैठता और अपनी जड़ें अपनी आधार भूमि सुदृढ़ कर लेता है। ऊपर उठता है तो एक विशाल वृक्ष के रूप में परिणित होता चला जाता है। ऐसा वृक्ष जिसके आश्रय में सैकड़ों जीव जन्तुओं को पोषण पक्षियों को विश्राम और राह चलते बटोही उसके शीतल सुखद आश्रय में अपनी थकान मिटाते हैं। यही नहीं उसे अपने संपूर्ण जीवन में करोड़ों बीजों का जनक होने का गौरव मिलता है। समर्पण की महत्ता अनंत है। अणु से विभु, लघु से विराट बनने की प्रक्रिया आत्म समर्पण के ही साँचे और ढाँचे में परिपूर्ण होती है।

इससे इतर कोई सुगम मार्ग नहीं। आदान प्रदान के व्यक्त अव्यक्त दो ही रूप हैं। एक का नाम है सहयोग सहकारिता अर्थात् किसी व्यक्ति संस्था उद्योग के कार्यों में अपनी उपलब्ध क्षमताओं को मिलाना अपना कर्तव्य जोड़ना। यह भावना साँसारिकता के दायरे में ही सीमित है। उसके बदले में भौतिक लाभ चाहे पद प्रतिष्ठा के रूप में हो अथवा अर्थोपार्जन यश आदि के रूप में प्राप्त होता है। इस प्राप्ति को सहकर्तृत्व ही कहा जायेगा। यह सहयोग समाज की एक सुसंस्कृत परंपरा और सामुदायिक विकास का आधार है, किन्तु समर्पण उससे हजारों गुने उन्नत स्तर की अध्यात्म साधना है। सहयोग से भौतिक प्रगति के लक्ष्य प्राप्त किये जा सकते हैं। परमार्थिक प्रयोजनों की भी एक सीमा तक शक्ति सहायता मिल सकती है। किन्तु महान कार्य, बड़े उद्देश्य समर्पित सेवाओं के बिना संभव नहीं हो पाते। श्रेष्ठता के प्रति समर्पण आत्मा की क्षमताओं और भावनाओं को प्रकट करके व्यक्ति, समुदाय और संसार को प्रगति का मार्ग, नई ज्योति और सदाशयी लक्ष्यों की सफलता प्रदान कर सकती हैं। आध्यात्मिक साधनाएँ या पारमार्थिक सेवाएँ तो समर्पण के अभाव में पनप ही नहीं सकती।

उत्कृष्टता, श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा-सिक्त समर्पण एक उदात्त आध्यात्मिक भावना है जो किसी क्षेत्र के लिए अनवरत शक्ति संचार की प्रेरणा एवं स्रोत बनकर काम करने लगती है।

प्रभु समर्पित व्यक्ति का प्रत्येक चिंतन और कर्तृत्व एक ही दिशा में नियोजित रहने से अत्यधिक प्रखर और गतिशील हो उठता है। यही नहीं उसके साथ पवित्रता की ऐसी भावना सन्निहित रहती है, जो ध्येय को भौतिक प्रवंचनाओं से धराशायी होने से बचाती है।

सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण घटना ताँत्याटोपे के जीवन से संबंधित है। अजीजान नाम की एक नर्तकी सेनापति ताँत्या का मन जीतने के लिए आकर्षणों का जाल बिछा दिया। वे उसके मन की बात भाँप गये। उन्होंने एक दिन अजीजान से कहा”मेरे जीवन का एक ही ध्येय है अंग्रेजों को भारत भूमि से मार भगाना। यदि सचमुच तुम मुझे प्यार करती हो तो मेरे इस श्रेष्ठ लक्ष्य में तुम्हें समर्पित होना पड़ेगा’ अजीजान तैयार हो गई। किन्तु समर्पण इतनी सरल प्रक्रिया नहीं है कि उसे योँ ही निबाहा जा सके। अजीजान ने अपनी सारी संपत्ति स्वाधीनता संग्राम को लगा दी। स्वयं को गुप्तचर सेवाओं के लिए समर्पित किया। अंग्रेजों की छावनियों में जाना-वहाँ के सुराग लाना जोखिम भरा कार्य था, जिसे अविचल निष्ठ ही पूरी कर सकती थी। अजीजान को भी भयंकर कष्टों एवं संकेतों का सामना करना पड़ा, किन्तु वह ध्येय के प्रति अविचल बनी रही। समर्पण की पवित्रता ने उसके हृदय की वासना को भी धो दिया।

समर्पण से ही व्यक्ति की निष्ठ परखी जाती है। इसमें खरा उतरने पर ही उसका समर्पण सार्थक होता है। लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने अपनी पुस्तक’आत्मदानियोँ से’में समर्पण की व्याख्या विवेचना करते हुए कहा है कि समर्पण का अर्थ है ‘मन अपना, विचार इष्ट के, हृदय अपना भावनाएँ इष्ट की आपा अपना किंतु समग्र रूप इष्ट का ‘इस परिभाषा का अर्थ अपनी अहंता से पूरी तरह अवकाश पा लेना है। योग साधनाओं में सिद्धि के गुणोँ में यह स्थिति अनिवार्य मानी गयी है। अतएव समर्पण को आत्म कल्याण की सर्वोपरि साधना के रूप में लिया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र के प्रख्यात संत जनार्दन पन्त के चरणों में समर्पित होने के बाद एकनाथ लोक वरेण्य हो गये। मार्ग्रेट एलिजाबेथ नोबुल विवेकानंद के चरणों में अपनी क्षुद्र अहंता निवेदिता बन सकीं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम बिना किसी विशेष रक्तपात के जीता जा सका उस में जन नेताओं के समर्पित भावनाओं को ही श्रेय जाता है। तब उसमें से किसी में भी न तो महत्वाकाँक्षा थी, न पूर्वाग्रह व सेवा के फल की कामना थी न यश की। सरफरोशी की तमन्ना अर्थात् सच्चे समर्पण की भावना का जहाँ उदय होगा वहीं उद्देश्य सार्थक होते ही चले जायेंगे।

समर्पण में आशाओं, आकाँक्षाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। पारमार्थिक साधनाओं में या आत्मोपलब्धि, मोक्ष के लिए समर्पित होने के लिए संपूर्ण कामनाएँ नष्ट करनी पड़ती हैं। मार्ग दर्शक या ध्येय की प्रामाणिकता सिद्ध हो जाये तो फिर कर्तव्य में अवाँछनीयता की गुँजाइश रहती ही नहीं।

अंतःकरण में न कोई छल है न छद्म अपनी बौद्धिक क्षमताएँ सक्रियता, प्रगति सब ध्येय के प्रति अर्पित हों, यही सच्ची साधना है। यह सौभाग्य जिन प्रयोजनों के लिए मिल जाते हैं। चाहे वह साँसारिक हों या आध्यात्मिक उनकी सफलता की आधी मंजिल तत्काल पूर्ण हो जाती है। साथ ही उस समर्पित आत्मा को ईश्वर सान्निध्य का एक ऐसा दिव्य लाभ इसी साधना से मिल जाता है जिसके लिए योगाभ्यास और जन्म जन्माँतरों की कठिन और लंबी साधना पूरी करनी पड़ती है। सत्प्रवृत्तियों, उच्च आदर्शों को समर्पित जीवन। ऐसे साधक के लिए ही भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है। “तू अपना मन और बुद्धि मेरे ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में लगा। इस तरह तू मेरे में ही निवास करेगा। मेरे को ही प्राप्त होगा। इसमें कुछ संशय नहीं। सच्चे समर्पण की यही फलश्रुति है।


Quotation

“हमारे देश में बहुत से धर्म हैं। हम उन सब का आदर करें। हम आपस में न लड़ें और धर्मों को अपने बीच दीवार न बनायें और हम सब मिलकर काम करें’ -जवाहर लाल नेहरू


असफलता पर बड़ा क्लेश (kahani)

“बिहार प्रान्त में हेमंत पुर नाम की कभी बहुत शानदार रियासत थी। अब तो उसके ध्वंसावशेष ही रह गये हैं। इन खण्डहरोँ में से कभी-कभी एक क्षीण काया वाले साधु की मूर्ति आसमान में उड़ती दिखाई पड़ती है और भीतर प्रवेश करने पर यह भी प्रतीत होता है कि इसमें कोई आदमी रहता है। पानी का भरा घड़ा, बुहारी, मटका आदि वस्तुएँ न जाने किसकी रखी हुई हैं।

कहते हैं कि यहाँ के राजा साहब जब सिंहासनारूढ़ थे तब उनकी प्रेरणा से उस साधु ने ताँबे से सोना बनाने का प्रयोग किया था। पूरा होने से पूर्व ही वह गलती से कढ़ाव में गिरकर प्राण गंवा बैठा था। साधु की आत्मा को इस असफलता पर बड़ा क्लेश हुआ। वह अभी तक प्रेत रूप में उस खण्डहर में विचरता देखा जाता है। ”


आस्था-क्षेत्र में भी विज्ञान का प्रवेश

वर्तमान में विज्ञान ने अपनी गतिमान शोध प्रक्रिया के द्वारा अनेकानेक नूतन आयामोँ को उद्घाटित किया है। इससे दृश्य जगत की कई पहेलियाँ सुलझी हैं। साथ ही प्रकृति के अविज्ञात साधनों के उपयोग की विधा भी भली-भाँति समझ में आई है। किन्तु मनुष्य ने इन साधन-सुविधाओं का उपयोग अपने व्यक्तित्व की परिपक्वता या अपरिपक्वता के आधार पर ही किया है। इन सारी उपलब्धियों की सार्थकता तभी सिद्ध हो सकेगी जब मानवी मन उसे विधेयात्मक रूप में अंगीकार करे। इस हेतु शोध के एक अन्य आयाम में प्रवेश करना होगा। जड़ को एक मात्र क्षेत्र न मान कर चेतना के क्षेत्र में प्रविष्ट होना अपरिहार्य है।

चेतना के विज्ञान को आत्मिकी का नाम दिया गया है। मानवी अंतराल में निहित बहुमूल्य रहस्यों का सदुपयोग न हो पाने के कारण मनुष्य इस शक्तिशाली भंडार का लाभ उठाने से वंचित रहा है। वंचित रहने में एक कारण यह भी है कि इसे अंधविश्वास, रूढ़िवाद के रूप में करार कर दिया गया। आज आप्त वचनों की दुहाई पर्याप्त नहीं आवश्यकता तर्क, तथ्य, प्रमाणों की है। इसकी जिम्मेदारी विज्ञान ने हर क्षेत्र में सँभाली है। पदार्थ की तरह चिंतन चेतना के क्षेत्र में उसने मनोविज्ञान के रूप में आधिपत्य जमाया है, तो यह उसी का दायित्व बन पड़ता है कि चेतना विज्ञान के सूत्रों पर प्रयोग अनुसंधान करके उसे वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करे। ऐसे साधन जुटाये, समस्त उपाय आविष्कृत करे जिनको प्रयुक्त करने से मानवी काय संरचना तथा मनः संस्थान की प्रसुप्त क्षमताएं उभारी जा सकें तथा व्यक्ति को वर्तमान से कहीं अधिक सक्षम, समर्थ एवं असाधारण बनाया जा सके।

अध्यात्म के कई उपचार मात्र श्रद्धा पर अवलंबित है। कभी समय था जब संयमित जीवन, साधना प्रक्रियाओं, तप के उपक्रमों, आप्त वचनों, आर्ष साहित्य के कथनों को श्रद्धा के सहारे अपनाया जाता था और उनके परिणाम स्पष्ट गोचर होते थे। किन्तु आज मानव की बुद्धिवादी प्रकृति ने श्रद्धा के गूढ़ तत्व में प्रवेश न कर पाने के कारण इनसे सर्वथा इन्कार कर दिया है। इस प्रयोजन की पूर्ति प्रखर तथ्यों से ही कर संभव है। विज्ञान साक्षी की आज प्रामाणिकता का परिचायक बन गई है। वरिष्ठता का चोला आज कल वैज्ञानिकता ने पहन रखा है। ऐसी स्थिति में विचार एवं भावना क्षेत्र के साम्य स्थापक तथ्य को ढूँढ़ निकालने में उसे अग्रणी होना चाहिए। उपरोक्त तथ्य से सहमति व्यक्त करते हुए मूर्धन्य मनोविद इरा प्रोगाफ ने अपनी कृति ‘डेथ एण्ड रिबर्थ ऑफ साइकोलॉजी’ में कहा है कि मनोविज्ञान के परंपरागत अध्ययन को भारतीय साधनाओं में वर्णित प्रक्रियाओं से दिशा ग्रहण कर तत्संबंध शोध प्रयास करना होगा। इस तरह किया गया प्रयास नूतन मनोविज्ञान को जन्म देने वाला सिद्ध होगा। जिससे मानवी व्यक्तित्व को प्रखर बनाना संभव हो सकेगा।

लारेन्स हाइड ने अपनी कृति ‘आइसिस एंड औरेसिस‘ में यही मत व्यक्त किया है कि वर्तमान में प्रचलित उपरतलीय मनोविज्ञान की पद्धतियाँ व्यक्ति के मनःक्षेत्र की गड़बड़ियोँ का सही निदान नहीं कर पाती है। इस संबंध में आध्यात्मिक साधनाओं पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है। उनके अनुसार मनोविकारों एवं अंतर्द्वंद्वों से न केवल शारीरिक मानसिक रोग होते हैं। अपितु इस कुचक्र में फँस जानें पर आर्थिक पारिवारिक सामाजिक जीवन के भी नष्ट भ्रष्ट हो जानें की बात भी पूर्णतया स्पष्ट है। पुरातन काल में यही तथ्य पाप-पुण्य के प्रत्ययों से समझाया जाता था।

आधुनिक काल में इसे इण्डी विजुअल साइकोलॉजी एवं सोसल साइकोलॉजी में सामंजस्य स्थापित कर समझाया जा सकता है। इसी को इरा प्रोग्राफ ने अपनी अन्य कृति ‘युँग्स साइकोलॉजी एण्ड इट्स सोसल मीनिंग‘में समझाते हुए कहा है कि ‘मनोविकारों एवं रोगों के प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में न रहकर सामाजिक क्षेत्र में भी कलुष उत्पन्न करते हैं। अतः इस स्तर पर व्यापक अनुसंधान अपरिहार्य है।

प्राचीन समय में साधना निग्रह, आहार-विहार, साधना, योग, तप जैसे अध्यात्म उपचारों को सफलता में देव अनुग्रह को माध्यम माना जाता था।

अब इन्हीं को क्रिया-कलापोँ के सहारे, स्वसम्मोहन, अचेतन, परिशोधन, प्रसुप्त शक्तियों के जागरण, संकल्पबद्ध, एकाग्रता एवं इच्छा शक्ति के चमत्कार के रूप में सिद्ध किया जा सकता है।

मानवी सत्ता में निहित ऐसे अनेकानेक आधार अब विदित हो गये हैं जिन पर वैज्ञानिक प्रयोग करके व्यक्ति कि उपयोगी विशिष्टताओं को उभारा और अनेक दृष्टियों से समर्थ बनाया जा सकता है। गुण, सूत्र, हार्मोन्स, नाड़ी, गुच्छक एक प्रकार से षटचक्रों, उत्पाटन क्रियाओं महा ग्रंथियों के परिष्कार के रूप में पुरातन काल जैसी भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं।

प्राचीन काल में ऋद्धि-सिद्धियोँ की चर्चा अपने ढंग से होती थी। आज भी प्रसुप्त विशेषताओं का अस्तित्व स्वीकार करने और उन्हें उभारने की संभावनाओं पर परा-मनोविज्ञान ने अपने समर्थन की मुहर लगा दी है। सम्मोहन विचार संचालन दूर श्रवण, भविष्य ज्ञान जैसे उपचार अब अध्यात्म न रहकर इस क्षेत्र की जानी मानी धारायें बन चुकी हैं। इनसे एक कदम और आगे बढ़ा जा सके तो बहुचर्चित ऋद्धि -सिद्धियोँ से आज के मनुष्यों को लाभान्वित होने का अवसर मिल सकता है। इन दिनों इन्हें कौतूहल की तरह देखा समझा जा सकता है पर अगले समय में इन्हीं उपलब्धियोँ को बड़े एवं व्यापक रूप से उसी तरह प्रयुक्त किया जा सकेगा जिस तरह सम्मोहन आदि का प्रयोग चिकित्सा पद्धति के रूप में होने लगा हैं।

आज व्यक्तियों को न केवल श्रेष्ठ वरन् अधिक समर्थ भी बनाये जानें की आवश्यकता है ताकि वे विकृतियों से बचने बचाने में, विपत्तियों से जूझने जुझाने में प्रवीण एवं सफल सिद्ध हो सकें। यह श्रेष्ठता एवं समर्थता शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक तीनोँ ही स्तर की होनी चाहिए ताकि मनुष्य की कर्म, ज्ञान एवं भाव की विविध धाराओं को उच्चस्तरीय बनाया जा सके।

महामानव निर्माण का यह समग्र क्षेत्र अनुसंधान प्रक्रिया से गुजरे, यह समय की माँग है।

व्यक्ति के सुधार के लिए आमतौर से भाषण एवं पुस्तकों के सहारे प्रशिक्षित करने की बात सोची जा रही है, पर मानवी इतिहास के लगातार के अनुभव यह बताते हैं कि आस्था क्षेत्र में निकृष्टता की जड़ें जमीं होने के कारण बाहरी सुझाव क्षणिक प्रभावी ही सिद्ध होते हैं। यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि मानवी सत्ता का उद्गम केन्द्र अन्तःकरण है उस क्षेत्र में भावनाओं, मान्यताओं, आकाँक्षाओं का साम्राज्य है उसे संभालने सुधारने की सामर्थ्य भौतिक उपचारों में नहीं है, किन्तु बुद्धिवाद ने इसे अंध विश्वास करार कर दिया है। यदि इस क्षेत्र में वैज्ञानिकता प्रविष्ट हो सके तो ब्रेन वाशिंग की तरह आस्था परिष्कार की संभावना सिद्ध हो सकती है। निश्चित ही व्यक्तित्व को परिष्कृत कर महामानव बनने की आध्यात्मिक आधारों को स्वीकार कर वैज्ञानिक प्रणाली आविष्कृत होने की पूर्ण संभावना है। समय-समय पर दार्शनिक, मनीषी, अध्यात्मवादी अपने-अपने सुझाव देते रहे है। आवश्यकता इस बात की है कि अध्यात्मवादी एवं वैज्ञानिक दोनों संयुक्त रूप से इस शोध परियोजना को अपने हाथ में ले और अन्वेषण करें कि चिरकाल से व्यवहृत एवं सफल होती रही मनुष्य में देवत्व के उदय की संभावना को वर्तमान परिस्थितियोँ में वर्तमान साधनों से किस प्रकार पुनर्जीवित किया जा सकता है। प्राचीनकाल में मनुष्य में देव भाव के उदय एवं धरित्री पर स्वर्गिक वातावरण की परिस्थितियाँ रही हैं। अन्वेषण के नूतन प्रयास इस लुप्त कड़ी को पुनः जोड़ सकने में अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं। विज्ञान एवं अध्यात्म दोनोँ के संयुक्त प्रयत्न स्वयं सार्थक होकर मानव जाति को सार्थकता की ओर अग्रसर कर सकते हैं।


परमात्मा का निराकार रूप (kahani)

‘जर्मन का प्रसिद्ध नाटककार गेटे अपने लक्ष्य में आजीवन उसी मन और निष्ठ से संलग्न रहा।

जब उसकी मृत्यु हुई तब भी नाटक ही उसे दीख रहा था। अंतिम साँस छोड़ते हुए उसने उपस्थित लोगों से कहा, लो अब परदा गिरता है। एक मजेदार नाटक का अंत होता है।

‘चाणक्य ने बालक चन्द्रगुप्त में प्रतिभा देखी। उसे अपनी शक्ति देकर देश पर हमला करने वालों को रोक सकने योग्य समर्थ बनाया राज्य शासन का अधिकार दिलाया।

चन्द्रगुप्त अपने कर्तव्य को भूला नहीं। उसने सदा संघर्ष रत रह कर शत्रुओं को भगाया और देश में सुशासन स्थापित किया। साथ ही चाणक्य के संचालन में चलने वाले नालंदा विश्वविद्यालय को समुन्नत बनाने में पूरा योगदान दिया। ”

“शिवा का सवाल परमात्मा की सबसे सरल उपासना कौन सी है?मुझे बहुत भला लगा। यह बात औरों की भी जानने की है। जो दूसरों की भलाई में निरत रहता है। वह भगवान की ही भक्ति करता है। परोपकार से बढ़कर और भगवान की ही भक्ति करता है। परोपकार से बढ़कर और कोई उपासना नहीं है। यह सरल है, उत्तम है और सुखदायक भी। परोपकार करने में आत्मा की प्रसन्नता इतनी बढ़ जाती है कि रोमाँच हो जाता है तो फिर उसका फल तो और भी स्वर्गीय सुखों से भरा हुआ होगा। भलाई साक्षात् परमात्मा का निराकार रूप है। -समर्थ गुरु रामदास


अपने को न हेय समझें न तुच्छ

अपने आप को तुच्छ, हीन, हेय मान बैठना व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी है। यह मानसिक ग्रंथि किसी भी सुयोग्य, सुशिक्षित, धनी, सुखी, संपन्न को दयनीय और पिछड़ेपन की स्थिति में ले जाकर पटक सकती है। दूसरों को अपने से समर्थ, योग्य और बलवान मानकर गया गुजरा समझ बैठना आत्महीनता कहलाती है। दब्बू, झेंपू, संकोची स्वभाव के व्यक्ति अपनी दुर्बलता छिपाने का प्रयत्न करते हैं और विनयशीलता, सज्जनता का दिखावटी प्रयास करते हैं। किन्तु फिर भी उनकी हीनता की झलक स्पष्ट दिखाई दे जाती है। नम्र तथा सज्जनों को, शिष्ट और सभ्यों को अपने मान सम्मान की रक्षा करते हुए अपने मन की बात विनम्र शब्दों में व्यक्त करते हुए कोई कठिनाई नहीं होती, जबकि आत्महीनता की ग्रंथि से ग्रसित व्यक्ति से न कुछ व्यक्त करते बन पड़ता है। और न उचित प्रतिपादन करते ही बनता है। दूसरों के पिछलग्गू बन कर कितने ही इस तरह का जीवन जीते और प्रगतिशीलता से हाथ धोते देखे जाते हैं।

कितने ही व्यक्तियों को साधारण सी बात कहने में घबराहट, घुटन और बेचैनी महसूस होती है। बहुत साहस बटोर कर आधी अधूरी अभिव्यक्ति करने में ही वे समर्थ हो पाते हैं। इस प्रकार के अस्पष्ट मंतव्य व्यक्त करने के कारण संभव है लोग कथन का कुछ अन्य अर्थ लगा लें अथवा आत्महीनता की झलक उन्हें मिल जाये और उसका नाजायज फायदा मनुष्य की सारी बुद्धिमता, योग्यता और प्रतिभा पर पानी फेर देती है। अपने को व्यक्त न सकने के कारण वह दूसरों की दृष्टि में असमर्थ, अयोग्य, असफल और मूर्ख साबित होता है। उसकी क्षमता पर लोगों को विश्वास नहीं होता। इसीलिए उन्हें उत्तरदायित्व पूर्ण कार्य सौंपे जानें से भी लोग बचते हैं। हर जगह ऐसे लोगों को उपेक्षा, अवमानना का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार के व्यवहार से हीनता में और अधिक वृद्धि होती चली जाती है। फलतः वह अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।

प्रायः आत्महीनता की घुटन दुर्भावनाओं में प्रकट होती देखी जाती है। अन्याय, पक्षपात की मान्यता जड़ जमाने लगती है। जितने लोगों से वास्ता पड़ता है, व्यक्ति को ऐसा लगता है कि वे सब विद्वेषी हैं। उसका हितैषी कोई है ही नहीं। विद्वेष के लिए बहुत बड़े कारण ढूंढ़ने की आवश्यकता नहीं है। सामान्य व्यवहार में भी दुर्भावना की दुर्गंध अनुभव की जा सकती है। किसी निर्दोष व्यक्ति या सहज स्वाभाविक घटना को आशंका और संदेहों की दृष्टी से अपने इच्छित स्तर से देखा जा सकता है। मित्र या शत्रु के रूप में किसी भी व्यक्ति को देखना स्वयं के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यदि किसी के प्रति अंध श्रद्धा अथवा प्रगाढ़ प्रेम हो, तब वह सर्वगुण सम्पन्न दृष्टिगोचर होता है। पर ऐसा कम ही होता है। आत्महीनता की ग्रन्थि प्रायः द्वेष दुर्भावनाओं का ही आरोपण अधिक करती है। दमित स्नेह सद्भाव यदा-कदा उभरते हैं तब उदारता, प्रेम, करुणा, दया, ममता जैसे ज्वार आते हैं किन्तु आत्महीनता की लहर उन्हें भी शीघ्र लपेट ले जाती है।

हीन भावना की परिणति कभी-कभी उद्धत आचरण में भी होती है। तोड़-फोड़, आक्रोश, अनशन, रूठना, रोना जैसे विचित्र व्यवहार के रूप में इसे देखा जा सकता है। भूत-प्रेतों का प्रकोप भी ऐसे ही लोगों पर अधिक होता है। अनेकों सपने और दिव्य अनुभूतियाँ सुनाने में ऐसा ही वर्ग अग्रणी रहता है। शृंगार और फैशन बनाना, अत्यन्त सजधज, यह भी हीनता की संज्ञा में आता है। इसमें थोड़े से अहं की तुष्टि होती है जिससे राहत मिलती है। धर्मात्मा के रूप में आत्म विज्ञापन करके दूसरों से प्रशंसा अर्जित करने का भाव भी ऐसे लोगों में अधिक देखा जाता है। आशंका, असमंजस की स्थिति में इन्हें कठिनाइयाँ भी अधिक उठानी पड़ती हैं। अनेक रुकावटों, उलझनों का सामना करना पड़ता है।

कुरूपता, दरिद्रता, ऊँच-नीच की भावना अशिक्षा, आदि कारण भी ऐसे हैं जिनके कारण व्यक्ति आत्महीनता का शिकार बन जाया करते हैं। लोग भी उन्हें हेय दृष्टि, अथवा तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, व्यवहार करते हैं, तब अंतः मन में हीनता के भाव घर कर लेते हैं। और यह मान्यता स्थाई स्थान बना लेती है। लड़के लड़कियों के भेदभाव के पीछे न कोई वैज्ञानिक तर्क है न आध्यात्मिक न सामाजिक, फिर भी लोगों ने लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को श्रेष्ठ मान लिया है। और उन्हें अधिक सुविधा व लाड़ प्यार दिया जाता है। कन्या को पराया धन मानकर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। उनकी शिक्षा दीक्षा में भी साधारण सी खाना पूर्ति कर दी जाती है। जब कि लड़कों के लिए उच्च एवं खर्चीली व्यवस्था भी करनी पड़े तो भी लोग हिचकिचाते नहीं। इसी आत्महीनता के कारण लड़कियाँ स्वयं भी लड़कों की अपेक्षा अपने को द्वितीय श्रेणी का मान बैठती हैं।

अपने आप को पापी, अपराधी, अभिशप्त, दुर्भाग्यशाली ग्रहदशा से पीड़ित मान बैठने वाले व्यक्ति भी सदा दबे, सहमे, झिझके-बुझे से दिखाई देते हैं। उनके चेहरे सदा मुरझाए, शंकालु और उदास ही दिखाई पड़ते हैं। वे सदैव अपने को त्रस्त और कठिनाइयों से लदा समझ बैठते हैं। ऐसे व्यक्ति अपना भविष्य अंधकारमय मान बैठते हैं। और साहस हीन बन जाते हैं। भीतर से टूटे, हारे हुए लोग सदा अपने भाग्य को कोसते रहते हैं। अपने से ऊँची स्थिति के लोगों से तुलना करने पर उन्हें अपना दुर्भाग्य और अधिक स्पष्ट नजर आने लगता है। कदाचित यह तुलना अपने से छोटों से भी की गई होती तो वर्तमान उतना हेय और हीन तथा अभावग्रस्त नजर न आता। बड़ों की तुलना न करके अपना पुरुषार्थ जगाकर प्रयत्न करने पर दुर्भाग्य तिरोहित हो सकता था। किन्तु हेय और गया गुजरा मान बैठने वालों से ऐसे प्रयत्न, पुरुषार्थ की आशा भी नहीं की जा सकती। उनका मनोबल पहले से ही क्षीण हो चुका होता है।

वियना के सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी डाक्टर एर्ल्फड एडलर के अनुसार आत्महीनता की ग्रंथि में वे ही लोग फँसते हैं जिनका चिंतन निषेधात्मक होता है अथवा जो स्वार्थी और चालाक होते हैं। जो केवल अपने ही स्वार्थ सिद्ध करने की सोचते और व्यक्तिगत लालसा, कामनाओं की पूर्ति के सपने संजोते रहते हैं, अथवा जिनका मन कल्पनाओं की उड़ान भरता है। उनका कथन है कि मनुष्य की धारणाएँ प्रायः भ्रम मूलक होती हैं। अधिकाँश लोग अपना मूल्याँकन सही रूप से नहीं कर पाते और दूसरों की दृष्टि में कुछ का कुछ प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार वे स्वयं अपने को ही धोखा दे रहे होते हैं। वास्तविकता और कलपना का संघर्ष मनुष्य के मन में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न कर देता है और आत्महीनता की गहरी खाई में धकेल देता है। इससे छुटकारा पाना तभी संभव है जब आत्मबल बढ़ाया जाय और आत्म निरीक्षण किया जाय। यह तभी संभव है जब चिंतन की दिशा धारा विधेयात्मक हो।

वस्तुतः जब तक प्रत्येक व्यवहार की विवेचना का अभ्यास नहीं बनाया जाता। उसके मूल में बैठी प्रेरक भावनाओं पर दृष्टि नहीं डाली जाती, तब तक इस ग्रंथि से छुटकारा पाना मुश्किल है। आत्महीनता किन कारणों से मिलती है, वंशानुगत है अथवा परिवार के सदस्यों के परस्पर आचरण और व्यवहार से उत्पन्न हुई है। उस पर विचार कर उसी तरह के निराकरण के उपाय उपचार की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। प्रायः मनुष्य दूसरों की दृष्टि में अपने को परखने का असफल प्रयास करता है इसीलिए स्वयं अपने असली रूप को शक्ति और सामर्थ्य, योग्यता को देखने से वंचित रह जाता है। इससे त्राण पाना तभी संभव है जब वह दृढ़ निश्चय करे कि वह संसार का श्रेष्ठ प्राणी है और उसके लिए कोई कार्य असंभव नहीं है दूसरे यदि श्रेष्ठ हैं तो वह क्यों नहीं वैसा बन सकता। यही वह मनःस्थिति है जो व्यक्तित्व को ऊँचा उठाती है और श्रेय सम्मान का अधिकारी बनाती है।

सुविख्यात रूसी लेखक गोर्की ने अपने देश के किसानों को संबोधित करते हुए कहा था कि -’याद रखो कि तुम पृथ्वी के सबसे श्रेष्ठ और आवश्यक प्राणी हो। कोई कारण नहीं कि कोई व्यक्ति अपने को अनावश्यक तुच्छ अथवा हीन समझे। यदि वही अपना मूल्य न समझेगा तो दूसरे उसे किस प्रकार आवश्यक मानेंगे। “यही मत शेक्सपियर का भी है कि सबसे बड़ी बात हे कि मनुष्य न दीन-हीन है न तुच्छ। उसे सदैव मनुष्य तत्व और मनुष्य सुलभ शक्तियों में विश्वास बनाए रखना चाहिए। अन्य प्राणियों की तरह न वे गये गुजरे हैं न तुच्छ। इस तरह की बलवती भावनाओँ से ही आत्महीनता की ग्रंथि से छुटकारा पाया जा सकता है।


प्रोत्साहन-प्रशिक्षण देने में अधिक समय (kahani)

“परिष्कृत हिन्दी के पितामह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी आरंभिक जीवन में रेल कर्मचारी थे। स्टेशन मास्टर, टेलीग्राफ इन्सपेक्टर जैसे पदों पर काम करते समय उन्हें वेतन भी अच्छा मिलता था।

पर उनने हिन्दी को परिष्कृत और राष्ट्रभाषा स्तर की बनाने की बात सोची। अध्ययन के लिए 6 घंटा नित्य व्यस्त कार्यक्रम में कटौती करके नियमित रूप से निकाले। योग्यता उपयुक्त हो जानें पर नौकरी छोड़ दी और मात्र बीस रुपया मासिक निर्वाह लेकर सरस्वती पत्रिका का संपादन करने लगें। आजीविका घट जानें पर उनने उसी अनुपात से सारे खर्च घटा डाले और उतने में ही काम चलाना आरंभ कर दिया। उनके द्वारा जो महान सेवा हुई उसे देश का बच्चा-बच्चा जानता है।

द्विवेदी जी ने निजी रचनाएँ लिखने में कम और नौसिखियों के लेखों को शुद्ध करने, उन्हें प्रोत्साहन-प्रशिक्षण देने में अधिक समय लगाया।


सबसे अधिक लाभदायक व्यवसाय

इन दिनों लोक चिंतन का प्रवाह इस दिशा में है कि मनुष्य शरीर मात्र है और उसके लिए जितना सुविधा साधनों का बाहुल्य होगा, वह उतना ही सुखी एवं प्रसन्न होगा, पर यह मान्यता आँशिक रूप से ही सत्य है। यह भुला नहीं देना चाहिए कि मनुष्य की वास्तविक सत्ता उसकी चेतना में सन्निहित है। वह शरीर से भिन्न भी है। यदि जीवन तत्व शरीर से पृथक हो जाये तो मात्र अकेली काया सुख साधनों के बाहुल्य होने पर भी किसी प्रकार की अनुभूति न कर सकेगी। इतना ही नहीं, वह अपनी सत्ता भी देर तक यथावत् बनाये न रह सकेगी। थोड़ी देर में वह सड़ने गलने लगेगी। जीव जन्तुओं का भक्ष्य बन जायेगी। ऐसी दशा में सुख साधनों का लाभ तो उसे मिल ही कैसे सकेगा? शरीर को यदि सब कुछ मान लिया जाये, तो भी अकेले सुविधा साधन उसे स्वस्थ, सुखी और सक्षम बनाये रहेंगे, इस बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता। अनुगमन चेतना का होता है। चेतना का स्तर गड़बड़ा जाये, तो फिर साधनों की बहुलता भी कुछ काम न आ सकेगी। मस्तिष्क को चेतना का केन्द्र माना जाता है। उसे यदि क्लोरोफार्म आदि के सहारे संज्ञाशून्य कर दिया जाये, तो शरीर का किसी प्रकार की अनुभूति न हो सकेगी। यहाँ तक कि बड़ा आपरेशन होने पर भी पता न चलेगा कि किसी अंग की काट-छाँट तक हो रही हैं। अन्य प्रकार से मूर्च्छा आदि की स्थिति हो जानें पर शरीर को किसी प्रकार की अनुभूति नहीं होती। यहाँ तक कि मृत्यु हो जानें पर शरीर को अपना अस्तित्व होने, न बचने तक का पता नहीं चलता। जीवन तभी तक हैं, जब तक चेतना है।

चेतना को शरीर के साथ घुला मिला तो देखा जा सकता है, पर उसकी स्वतंत्र सत्ता वस्तुतः उससे है सर्वथा अलग। वही न होता, तो शरीर के यथावत् बनें रहने पर भी मृत्यु हो जानें पर भी चेतना का स्वतंत्र अस्तित्व मरणोत्तर जीवन के रूप में पाया जाता है। पुनर्जन्म के अगणित प्रमाण उपलब्ध होते हैं। अशरीरी भूत-प्रेत जैसी आत्माओं के अस्तित्व भी सप्रमाण पाये गये हैं। इससे दोनोँ की सत्ता एक-दूसरे के पृथक ही मानना पड़ता है। जड़ और चेतन से मिल कर जीवन बनता है। पंच तत्वों को सम्मिश्रण काय-कलेवर का निर्माण करता है और उसमें अनुभूतियाँ करने की शक्ति तभी तक काम करती है, जब तक कि जीवन का अस्तित्व बनारहता है। प्रत्यक्ष जीवन को जड़ और चेतन का संयुक्त अस्तित्व माना जाये, तो कुछ अत्युक्ति न होगी। दोनों के सर्वथा पृथक हो जाने पर तो सारा सीराजा ही बिखर जाता है। जिसे कुछ समय पूर्व जीवित कहा जाता था, वही प्राण निकलने पर सड़ने लगता है। जीवन के साथ ही संबंध भी समाप्त हो जाता है। मृतक शरीर को जल्दी ठिकाने लगा देने की उतावली पड़ती है। इसके विपरीत यदि चेतना के साथ संबंध जुड़ा हो तो उससे जन्म-जन्मान्तरों का किसी न किसी रूप में सूत्र जुड़ा रहता है। यह सब शरीर और चेतन के प्रमाण हैं।

इन प्रचलित मान्यताओं में शरीर को एकाँकी समर्थ माने जानें के कारण ऐसा सोचा जाता है कि शरीर-सुविधाएँ यदि जुटायी जाती रहें तो मनुष्य प्रसन्न रह सकता है, पर यह मान्यता भी गलत है। यदि मन किसी कारण खिन्न-विपन्न स्थिति में हो, तो भूख, नींद तक गायब हो जाती है और स्वजन विछोह जैसा कष्ट इतना कष्टकारक होता है कि उसे शरीर पीड़ा से किसी प्रकार कम नहीं कहा जा सकता। अपमान, हानि, घाटा, असफलता जैसे मानसिक कष्ट भी ऐसे त्रासदायक होते हैं। कि उनसे अत्यधिक पीड़ित होकर मनुष्य आत्म हत्या कर तक कर बैठता है। इसका अर्थ यह हुआ कि बड़ी-बड़ी सुविधा होते हुए भी चेतना की व्यथा इतनी अधिक कष्टकारक होती है कि उसकी तुलना में शरीर को गँवा देना भी कम मालूम पड़ता है।

प्रसन्न रखने और सुख पाने के लिए सिर्फ सुविधा साधनों से ही काम नहीं चल सकता उसके लिए यह भी आवश्यक है कि मानसिक प्रसन्नता भी जुड़ी रहे?यहाँ यह विचारणीय है कि मात्र साधन ही शरीर और चेतना दोनों को समान रूप से सुखी नहीं रख सकते। ऐसे अवसर तो कभी-कभी ही कदाचित् ही आते हैं। जब यह आभास ही नहीं होता कि उन्हे किसी प्रकार का कष्ट है। पर बहुधा होता उससे उल्टा है। आत्म प्रताड़ना, अंतः व्यथा, असंतोष, खेद, उद्वेग आदि का कारण मानसिक होता है। दुष्कर्मां ओर दुष्प्रवृत्तियोँ का प्रभाव ही ऐसा होता है। जो अन्तस् को विचलित कर देता है। इसके विपरीत ऐसा भी होता है कि परमार्थ के लिए किया गया त्याग और शरीर से सहायता करना इतना आनंदित करता है कि उसके लिए उठाई गई प्रत्यक्ष हानि भी दुःख देने की अपेक्षा आनंद और उल्लास ही अधिक प्रदान करती है।

त्यागी, तपस्वी, संत, महामानव, दानी, परोपकारी आदि को आर्थिक एवं शारीरिक दृष्टि से घाटा ही उठाना पड़ता है, इतने पर भी उसकी प्रसन्नता इतनी बड़ी चढ़ी होती है, कि उसकी तुलना में प्रत्यक्ष घाटे को नगण्य गिना जाता है। उपवास आदि के कुछ कार्यों में शरीर को जितना कष्ट होता है, उसकी तुलना में मानसिक संतुष्टि कहीं अधिक होती है। यह नर-नारी के सम्मिश्रण से चलने वाली प्रगति का समय है। कोई छोटा, कोई बड़ा बन कर रहे, कोई दुर्बल, कोई सशक्त बना रहे-कोई अपने दबाव में दूसरे को कसकर रखे, तो इससे कोई सुखी-संतुष्ट न रह सकेगा। एक का असम्मान दूसरे पर खिन्नता लादे बिना न रहेगा। पिछले दिनों का इतिहास इसका प्रमाण है। दमित नारी से मनमर्जी काम भले ही करा लिया हो, पर उसके साथ ही मनो मालिन्य और कुत्सा का ही जन्म हुआ है, साथ ही पतन पराभव का भी। दमित व्यक्ति की प्रतिभा क्षीण होती है, और खिन्न रहने वाला व्यक्ति सहयोग, सहानुभूति पूर्वक दूसरे का काम नहीं कर सकता। ऐसी दशा में उत्पन्न विपन्नता के बीच रहने वाला अपने मनोबल को गिराता गँवाता चला जाता है। जो शरीर की दुर्बलता से भी महँगा पड़ता है। हल में एक बैल समर्थ और दूसरा दुर्बल हो जाता हो, तो मात्र दुर्बल को ही सामर्थ्य से बाहर बहन नहीं करना पड़ता, समर्थ को भी स्थिति में अधिक भार वहन करना पड़ता है। असंतुष्ट दांपत्य जीवन भी इसी प्रकार भारभूत बनकर रहता है। उनके बीच साझेदारी के साथ जुड़ी हुई सद्भावना पनप ही नहीं पाती। इसमें पुरुष का अहंकार तो प्रमुख कारण होता ही है। दूसरा यह अनीति मूलक तथ्य भी जुड़ा होता है कि प्रतिरोध न कर पाने वाले दुर्बल का अधिक शोषण क्यों न किया जाय?यह स्थिति दोनों ही पक्षों के लिए कष्ट कारक और घाटे में रखने वाली है। इसी के चरितार्थ होने से अधिकाँश पति-पत्नी उस आनंद और उत्कर्ष से वंचित रहते हैं, जो पारस्परिक स्नेह सहयोग के बीच सहज ही पनप सकता है।

शोषण की प्रवृत्ति अपना कर कोई दूसरे से प्रत्यक्षतः कुछ लाभ भले ही उठा ले, पर दुर्भाव और असंयम के पनपते ऐसा मनोमालिन्य ही पनपता है, जिससे घाटा उठाने वाला तो दुःखी रहता ही है, सुखी वह भी नहीं रह पाता, जिसने इच्छा के विपरीत किसी प्रकार का शोषण या दहन किया है। पति-पत्नि के बीच जिस सद्भावना और सहयोग की आशा की जाती है, वह इसके बिना पनप ही नहीं सकती कि न्याय निर्वाह ठीक प्रकार चलता रहें। उत्पीड़न से उठाया गया लाभ अंततः घाटे से भी महंगा पड़ता है। इसके बिना लाभ भी नहीं उठाया जाता। खिन्न-विपन्न मानसिकता के रहते असहयोग से भी भारी पड़ता है। उससे उस लाभ की आशा नहीं की जा सकती, जो किसी को दबा, सता कर किसी प्रकार पूरा कराया गया है।

सहयोग पाने वाले का इस संदर्भ में उत्तरदायित्व अधिक है। उसे अपनी विशिष्ट सद्भावना का परिचय देना पड़ता है। सद्भावना बोने पर सहकारिता का अंकुर उगता है। यह कार्य बलपूर्वक सता कर या दबाकर पूरा नहीं कराया जा सकता। पहले बीज बोना पड़ता है, इसके बाद ही काटने का अवसर सामने आता है। निष्ठुरता बरतने और अपनी ही मर्जी को प्राथमिकता देने की स्थिति में किसी प्रकार दमन पर आधारित श्रम भर कराया जा सकता है। पर जब उस निष्ठुरता में अनाचार बरते जानें की गंध आती है तो सहज ही प्रतिशोध जैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। इस प्रकार किसी से कुछ करा लेने पर अपने दर्श अहंकार का प्रदर्शन किया तो जा सकता है। उकसाया और आतंकित भी किया जा सकता है, पर वह स्थिति बन ही नहीं पाती, जिसमें श्रद्धा उपजती और सेवा-सहायता की प्रवृत्ति उमंगती है।

सहयोग और शोषण का प्रतिफल जिन्हें मिलने का ज्ञान है उन्हें दूरदर्शिता और समझदारी की नीति अपनानी चाहिए। सेवा सद्भावना और सहकारिता का अपनी ओर से बढ़ा चढ़ा अनुदान प्रदान करने के बाद ही यह आशा करनी चाहिए कि बदले में सेवा, सद्भावना और सहकारिता की वापसी “बोओ-काटो” सिद्धाँत के अनुसार मिल सकेगी। इस संदर्भ में जो पहले करता है, आगे रहता है, वह अपने बड़प्पन का परिचय देता है। और उसके बदले ऐसा सहयोग भी पाता है। जो भयभीत आतंकित करने वाले को कभी हस्तगत नहीं हो सकता। अच्छा हो, इस संबंध में समर्थ समझा जानें वाला पक्ष पहल करे और सेवा के बदले सहकारिता की अपेक्षा रखे। अच्छा तो यह है कि अपने कर्तव्य पालन में अग्रणी रहा जाये और साथी को किसी प्रकार की शिकायत करने, उलाहना देने का अवसर ही न आने दे।

मैत्री सबसे बड़ी उपलब्धि है। जड़ पदार्थों को पाकर मनुष्य प्रसन्नता और सबलता अनुभव करता है, फिर चेतन पक्ष का सर्वोत्तम उपहार यदि मैत्री के रूप में अर्जित कर लिया जाय, तो समझना चाहिए कि अधिक मूल्यवान और अधिक महत्वपूर्ण लाभ अर्जित कर लिया गया। संसार में अधिक सुखी उसे माना जाता है, जिसके कि सच्चे मित्रों की संख्या अधिक है। शत्रुता तो मनुष्य से दुर्व्यवहार के बदले खरीदी जा सकती है। अपनी ओर से बरती गयी असहिष्णुता एवं उपेक्षा तो किसी को भी अपने से पराया बना सकती है। हाथों हाथ इससे लाभ-हानि का परिचय भले ही न मिलता हो, पर मनों में पड़ी दरार कुछ ही दिन में वह प्रतिफल सामने ला खड़ा करती हैं, जिससे सहज प्रतीत हो जाता है कि असहिष्णुता, अन्यमनस्कता, निष्ठुरता, उद्वेग जैसा बरताव के कारण किसी को खिन्न कर देने के कारण अंततः किसी न किसी दिन अधिक घाटा उठाना पड़ता है।

यह तो लोकाचार का प्रसंग हुआ। हृदय जीतना या किसी के मन में अपना स्थान बना लेना कितना बड़ा लाभ है, इसका पता तब चलता है, जब क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आती है। इस दृष्टि से मैत्री सबसे अधिक लाभदायक सिद्ध होती है। सद्भावनाओँ का आदान-प्रदान इतना अधिक सुखद है, जिसकी तुलना में और किसी लाभ की कामना नहीं की जा सकतीं सद्व्यवहार अपनाकर सेवा सहायतार्थ अवसर ढूंढ़ते रहना और जब कभी भी वे मिलें तब उन्हें चरितार्थ किये बिना न चूकना, ऐसी नीति है, अनेक लाभों के साथ फलित होने वाली सद्भावना है, जिसकी तुलना में कदाचित ही कुछ ढूंढ़ा पाया जा सके।


सफलता का आधार आत्म-विश्वास

अमेरिका के हैवीवेट बौक्सिंग चैम्पियन जौय फ्रेजर ने अपनी सफलता का एक मात्र कारण शुभ संभावनाओं से भरा पूरा चिंतन और ईश्वर विश्वास को बताया है। फ्रैजर को अपने जीवन काल में धार्मिक पुस्तकें पढ़ने और देवालयों में जाकर देवाराधना करने में गहन अभिरुचि थी। बचपन से ही बौक्सर बनने की मान्यता उसके अन्तः करण में जम चुकी थी और तद्नुरूप प्रयत्न भी जुटते चले गये। इतना ही नहीं आर्की मूर जैसे प्राणवान, आत्म विश्वासी एवं प्रतिभा के धनी व्यक्ति की संगति पाकर उसका संकल्प और भी दृढ़ होता चला गया। यद्यपि फ्रैजर की आर्थिक स्थिति अनुकूल नहीं थी, फिर भी उसने अपनी मनःस्थिति को विचलित नहीं होने दिया। फलतः वर्ष 1964 में टोकियो में आयोजित ओलम्पिक गेम्स में यू.एस.ए. की तरफ से प्रतिनिधि चुना गया।

परमात्मा का अनुग्रह भी पुरुषार्थी को ही प्राप्त होता है। फ्रैजर मैच के बाद जीतता चला गया। किन्तु कुछ दिनों बाद अवरोध भी सामने आये सेमी फाइनल के एक मैच में उसके बाँये हाथ का अंगूठा टूट गया था। फिर भी उसने अपने मनोबल को गिरने नहीं दिया और विरोधी परिस्थितियों में भी फाइनल गेम को जीत सकने में सफल रहा। स्वर्ण पदक विजेताओं की शृंखला में अपना नाम दर्ज करा सका।

फ्रैजर ने अपनी सफलता के रहस्य को प्रकट करते हुए बताया है कि सेमीफाइनल की रात्रि को मैंने एक होटल में अपना कमरा बंद करके गर्म पानी से स्नान किया और परमात्म सत्ता के ध्यान में अवस्थित हो गया। अचानक ही मेरे अंतराल कुछ ऐसे प्रेरणास्पद शब्द सुनाई देने लगे कि तुम्हारे पिताजी का तो पूरा बायाँ हाथ ही नहीं रहा था, फिर भी वे 13 बच्चे और माँ के जीवन निर्वाह की व्यवस्था भली प्रकार जुटाने में सफल रहे, पर तुम्हारा तो एक मात्र अँगूठा ही टूटा है इस आत्म प्रेरणा ने ही मेरी प्रसुप्त प्रतिभा को जगाया जिसके फलस्वरूप चैम्पियन बनने का सौभाग्य मिला। उनका कहना है कि ईश्वर की शक्ति पर विश्वास रखने का एक ही प्रतिफल होता है आत्म-विश्वास की जाग्रति। जिससे चिंता को विधेयात्मक दिशा मिलती और असंभव दिखने वाले कार्य भी संभव होते जाते हैं।

इस संदर्भ में अमेरिका के सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी डॉ. नौर्मन विन्सेट पील ने अपनी पुस्तक ‘ट्रैजरी आफ करेज एण्ड कान्फीडेन्स‘ में लिखा है कि व्यक्ति के अंतरंग से आत्म-विश्वास की आशा-उत्साह भरी किरणें फूट पड़ें तो सफलता मिल कर रहती है। चार शब्दों का जादुई फार्मूला ’इट कैन बी डन’ अर्थात् ‘यह कार्य किया जा सकता है। ‘को प्रस्तुत करते हुए उनने बताया है कि इस तरह कि उत्साह वर्धक विचारों को पनपने से असंभव दिखने वाला कार्य भी संभव हो जाता है ईश्वरीय सत्ता में विश्वास रहने के कारण ही इस तरह के संकल्प पूरे होते देखे गये हैं। अंधविश्वासोँ और अंध मान्यताओं का शिकार बनने पर तो व्यक्ति को निराशा और हताशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता अपने भीतर से उत्साह जगाने पर ही दैवीय चेतना सहायक के रूप में सिद्ध होती है।

संसार में ऐसे कितने ही व्यक्ति हुए हैं। जिनने विपन्नता एवं कठिन परिस्थितियोँ के बीच रहकर भी आत्म-विश्वास एवं ईश्वरीय आस्था के बल पर उसका डटकर मुकाबला किया और क्रमशः प्रगति करते हुए चरम उत्कर्ष पर पहुँचे। संकल्प बल जगते ही प्रयास भी तद्नुरूप चल पड़ते हैं। और अदृश्य सहायता भी मिलती है।

इंग्लैण्ड में जन्मी मैरी बेकर एडी का बाल्यकाल बड़ी विपन्न एवं विषम परिस्थितियों से गुजरा। उसके माता-पिता सामान्य कृषक एवं धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। छठी संतति होने एवं विपन्नता के कारण उसके उपयुक्त भरण-पोषण की सुविधा नहीं जुट पाई तो शारीरिक रुग्णता का शिकार बनना पड़ा। पर उसकी धार्मिक निष्ठा और ईश्वर विश्वास में कमी नहीं आई। बारह वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उसे एकाएक दैवी चेतना की सत्प्रेरणा उभरी कि आत्म-विकास और जनमानस के कल्याण हेतु कुछ कर गुजरना चाहिए। मैरी ने कविता लिखना आरंभ कर दिया जिन्हें स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया। मैरी ने ईसा की रोगोपचार संबंधी उपदेश कथाओं ‘गोस्पैल स्टोरीज ‘का स्वाध्याय बड़ी अभिरुचि के साथ किया और तद्नुरूप ईश्वर उपासना, साधना, और आराधना का उपक्रम भी बिठाती चली गयी। फलतः आरोग्य लाभ भी हस्तगत हुआ।

इतना ही नहीं आत्म-विश्वास और ईश्वर विश्वास की सम्मिलित शक्ति से उत्पन्न प्राण ऊर्जा से चिकित्सा उपचार की विधि व्यवस्था से लोगों को भली-भाँति अवगत कराने के लिए उसने कई व्याख्यान भी दिये। अपने गहन अध्ययन, अन्वेषण, और अनुभवों के आधार पर मैरी ने ’साइंस एण्ड हैल्थ’ नामक एक पुस्तक लिखी जिसे दस वर्ष बाद प्रकाशित किया गया। मैरी ने मनोकायिक औषधि और आइंस्टीन द्वारा प्रतिपादित पदार्थ और चेतना के संबंधों का लंबे समय तक अध्ययन किया जो उसके कार्य में सफलता का आधार बन गया। उसकी चिकित्सा प्रणाली का मूलभूत आधार व्यक्त अलौकिक विज्ञान ’इंम्परसनल मैटाफिजीकल साइंस’ था। जिसमें व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं को महत्व न देकर सार्वभौमिक नियम व्यवस्था के अनुरूप चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार का स्वरूप निर्धारित किया जाता है। उसकी दृष्टि में यदि विश्वव्यापी दैवी चेतना के संदेशोँ को ग्रहण कर लिया जाय और तद्नुरूप सन्मार्ग पर अग्रसर होने का प्रयास भी चल पड़ें तो स्वास्थ संवर्धन के साथ ही समग्र प्रगति का द्वार भी खुल सकता है। आस्था ही वह मूल तत्व है जो परमात्मा सत्ता को सत्पात्र पर अपना प्यार बखेरने के लिए विवश कर देती है। इसे इस घटना के माध्यम से भी समझा जा सकता है।

अमेरिकी पादरी एवं मनोविज्ञानी विन्सेंटपील ने अपनी उक्त पुस्तक ”ट्रैजरी आफ करेज एण्ड कान्फीडेन्स” में इस तथ्य की पुष्टि एक घटना के माध्यम से की है। युद्ध के समय एक बालक बुरी तरह घायल हो गया जिसे अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। बच्चे की माँ को इस बात की सूचना भिजवा दी गयी कि आपका बच्चा जल्दी ही दम तोड़ने वाला है। वह दौड़ती हुई अस्पताल पहुँची और अपने बेटे से मिलने के लिए आग्रह करने लगी। लेकिन चिकित्सकों के मुँह से यही निकला कि बच्चा अपनी जिन्दगी और मौत के मध्य की स्थिति से गुजर रहा है। मामूली सी उत्तेजना भरा माहौल उसकी जीवन लीला को समाप्त कर सकता है। वह इस समय अचेतन अवस्था में पड़ा है उसे कोई आभास नहीं है कि मुझसे मिलने के लिए कौन आया है? माँ ने यह शर्त मान ली कि वह बच्चे के पास किसी तरह का कोई शब्द मुँह से नहीं निकालेगी और न ही किसी तरह का शोर-शराबा मचायेगी। मात्र बेटे के पास थोड़ी देर बैठने की ही इच्छा प्रकट की। चिकित्सकगण महिला की करुण और ममता भरे भावों को देखकर द्रवित हो उठे और मिलने की आज्ञा दे दी। पर शर्त ज्यों की त्यों बनी रही कि बच्चे के पास बैठकर मुँह से कोई शब्द न निकालें। माँ बच्चे के पास बैठी और अपने पवित्र अन्तःकरण से ईश्वर से प्रार्थना करने लगी। बच्चे की आँखें बन्द थीं। माँ ने उसकी भौंहों पर धीरे-धीरे हाथ फेरा। बिना नेत्र खोले ही बच्चा बोल उठा कि माँ तुम आ गई। माँ के स्नेह सद्भाव का हाथ उसके लिए दैवी अनुकंपा, आशीर्वाद-वरदान के रूप में फलित होने लगा और वह जल्दी आरोग्य लाभ प्राप्त कर सका।

डॉ.रौबर्ट ऐन्थाँनी ने अपनी पुस्तक ‘टोटल सैल्फ कान्फीडेन्स’ में आत्म विश्वास की शक्ति को सर्वोपरि बताया है। मनुष्य की शारीरिक मानसिक गतिविधियों का निर्धारण भी उसी आधार पर होता है। कार्य में निष्क्रियता और सक्रियता का अनुमान आत्मबल की न्यूनाधिकता से ही लगाया जा सकता है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए उनने एक महिला का उदाहरण प्रस्तुत किया है। सम्मोहन विद्या का प्रयोग करके महिला के मन-मस्तिष्क में एक ही बात कूट-कूट कर भर दी गयी है कि वह टेबल पर रखी पेंसिल को इधर-उधर खिसका नहीं सकती है। इस तरह का विश्वास में मन में जम जानें का प्रतिफल था कि उसे मामूली सा कार्य भी असंभव दिखने लगा। यदि उसे अपने अंतर्मन की प्रसुप्त क्षमता का आभास रहा होता तो वैसी स्थिति का सामना करना नहीं पड़ता। आत्म-विश्वास गंवा देने के यही परिणाम सामने आते हैं। प्रसुप्त चेतना की जाग्रति से ही मनुष्य को अपनी असीम सामर्थ्य का पता चलता है आत्म विश्वास ही इसका मूल आधार है।


Quotation

“नानक वाणी”

प्राणिमात्र में संत नानक एक ईश्वर की सत्ता को स्वीकार कर किसी में कोई भेद नहीं समझते थे जैसे-

जी जत सब तिसदे सपना का सोई। मंदा किसनुँ आखिये, जे दूजा होइ॥

अर्थात् जीव-जन्तु सब उस प्रभु के हैं। सब में वही व्याप्त है। तब अच्छा या बुरा किसको कहें। उसके सिवा कोई दूसरा तो है नहीं।

आगे महाराज जी फरमाते हैं-

अवल अल्ला नूर उपाया, कु दरत के सब बंदे। एक नूर ते सब जग उपजया कौन भले कौन मंदे॥

गुरुजी के रूहानी जीवन का दृष्टिकोण इतना सार्वभौम था कि पदार्थ मात्र में ईश्वर की सत्ता को देखते थे। उनकी दृष्टि में अपना और पराया कोई था ही नहीं उनका कहना है कि-

ना कोई बैरी नाही बेगाना। सगल संघ हमको बनिआई॥

मेरा-तेरा छोड़िये, भाई होइये घूर। घर-घर ब्रह्म पसारियाँ, भाई देखे सुने हजूर॥

मानस को जात सभै, एको पहिचानयो, एक ही के सेव सब ही को गुरुदेव एक, एक ही स्वरूप सभै, एक जोत जानवो।


चिंतन मौलिक हो व विचार स्वतंत्र

चिंतन ही चरित्र एवं व्यवहार का उद्गम स्रोत हैं। इस क्षेत्र की प्रखरता ही अन्य दोनों को भी उत्कृष्ट एवं पवित्र बनाती है, इस महत्ता पर ध्यान न दिये जानें के कारण ही इसके स्वातंत्र्य व निर्मलता पर प्रायः ध्यान नहीं दिया जाता है।

हमारे द्वारा किसी भी चीज को मात्र इसलिए स्वीकार कर लिया जाता है, क्योंकि वह अमुक किसी ग्रन्थ में लिखी अथवा किसी बड़े आदमी द्वारा कही गई हैं। परन्तु संभव है, तत्कालीन परिस्थितियाँ व व्यक्ति विशेष की स्थिति कुछ भिन्न हो। इस पर पुनः चिंतन करके कोई भी अपनी वर्तमान परिस्थितियोँ के अनुरूप उपयुक्त मार्ग दर्शन प्राप्त कर सकता है। साथ ही उसे मौलिकता का गुण भी हस्तगत हो सकेगा।

स्वामी विवेकानन्द ने इस तरह की स्वतंत्रता की अनिवार्यता को अपने एक वक्तव्य में स्पष्ट किया है उनके अनुसार किसी बात को किसी ग्रंथ अथवा किसी व्यक्ति की प्रभुता के आधार पर न स्वीकारना चाहिए। अपितु वही स्वीकार्य है जो निज के विवेक व स्वतंत्र चिंतन द्वारा अपनाई गयी हो।

प्रत्येक व्यक्ति के अन्तराल में मौलिक विचार क्षमता विद्यमान है। इसी कारण प्रत्येक का मन अपने ढंग से एक नूतन संसार का सृजन करता है। अपनी हर यात्रा में मनुष्य यहाँ कुछ नूतन शोध करता है। नवीन रहस्योँ को उद्घाटित करता है। किन्तु इस मौलिक क्षमता का उपयोग करने वाले कम ही लोग होते हैं। अधिकाँशतया विचारों की गुलामी-परवशता को स्वीकार करके समूचे जीवन को गुलाम बना लेते हैं। इसे जीवन के राजमार्ग में भटकाव ही कहा जायेगा क्योंकि कोई भी पथ दूसरे के कंधे पर बैठ कर पूरा नहीं किया जा सकता। चाहे यह विचार के क्षेत्र में हो अथवा व्यवहार के क्षेत्र में।

स्वतंत्र चिंतन व मौलिक विचार ही विद्या है, जिसके द्वारा मानव मन अपना समाधान प्राप्त कर सकता है। जीवन की समस्याएं सुलझा सकता है। अपना सही मार्ग निर्धारित कर सकता है। हर नए पादप के लिए अनिवार्य है। कि अपनी जड़ों पर खड़ा हो। धरती से स्वयं हेतु स्वतः ही जीवन रस प्राप्त करें जिस तरह शारीरिक आवश्यकताओं के लिए मनुष्य को आत्मनिर्भर होकर जीवन निर्वाह करना होता है उसी तरह विचारों के क्षेत्र में भी स्वाधीन हुए बिना उपयुक्त समाधान पाना संभव नहीं। जीवन निर्वाह के लिए दूसरों के सहारे रहना यदि शारीरिक परजीविता है, तो मन, बुद्धि, विवेक पर ताला लगाकर किसी बात या विचार को अपने ऊपर लाद लेना मानसिक परजीविता ही कही जाएगी।

इसका तात्पर्य यह नहीं है कि पुस्तकें न पढ़ी जाएँ अथवा किसी की बातों का श्रवण न किया जाये। पढ़ना और सुनना विचारों की उर्वरता के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। यह चिंतन और विचार प्रक्रिया के लिए एक प्रकार का खाद है। इससे विचार हेतु नूतन आधार विकसित होते हैं। अवएव अध्ययन तथा विद्वानों-मनीषियों के साथ विचार विमर्श अवश्यमेव करणीय है। किन्तु पढ़ी हुई, सुनी हुई सभी बातों को ध्रुव सत्य मान कर बिना सोँचे-विचारे अनुकरण करने लगना भूल ही कही जायेगी। यह अंधानुकरण ही मानसिक दासता है।

पठन और श्रवण के साथ आवश्यक है मनन और

निदिध्यासन। मनुष्य स्वयं के बारे में जितना अधिक समझ सकता है, उतना दूसरा कोई नहीं। यही कारण है, स्वयं के अनुकूल उपयुक्त समाधान वह स्वयं अन्वेषित कर सकता है। उतना अन्य कोई नहीं। पढ़ी और सुनी बातें समाधान हेतु सहायक तो हैं, पर पूर्ण नहीं। पूर्ण समाधान के लिए इन पर मनन करने की आवश्यकता है। तभी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप सामंजस्य बिठा कर सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है। यह क्रिया ही समस्या का पूर्ण समाधान दे सकने में सक्षम है।

शासन-तन्त्र में बराबर की हिस्से दारी धन व धरती का समान विभाजन ही सामाजिक स्वतंत्रता हेतु पर्याप्त नहीं है। इसका मूल आधार मानसिक है।

जब तक लोगों के दिलो-दिमाग पर किसी भी मजहब वाद, सम्प्रदाय का कट्टरपन व भेद भाव की गुलामी रहेगी, तब तक समाज परेशान ही रहेगा। समस्याओं की बहुलता और संघर्ष की स्थिति बनी ही रहेगी।

राजनीतिक दासत्व से छुटकारे की प्राप्ति, दासत्व के विष वृक्ष की डालों को छाँटना भर है। इसकी जड़ें तो मनुष्य के मानसिक धरातल में गहरी जमी है। जब तक अपने बारे में सोचने निर्णय करने का काम मनुष्य किसी ग्रन्थ विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के ऊपर छोड़ देता है, तो यही स्थिति दासत्व के गरल विटप को खाद्य प्रदान करने लगती है। ऐसी स्थिति में मानसिकता दासता से छुटकारा नहीं पाया जा सकता।

निःसंदेह हर मनुष्य को अपने जीवन की गीता स्वयं रचनी होगी। किन्तु अंकन कागज के पन्नों पर नहीं, अपितु अन्तरात्मा कृष्ण के मार्गदर्शन पर आचार व व्यवहार के रूप में लिपिबद्ध होगा। यह प्रक्रिया ही जीवन का यथार्थ समाधान अन्वेषित कर सकेगी। ऐसा करने पर ही स्वतंत्रता व जीवन मुक्ति का अधिकार पाया जा सकता है। संसार में जो भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने ऐसे ही जीवन ग्रन्थों का सृजन किया है

इस तथ्य का हृदयंगम करना होगा कि हम स्वयं ही अपनी समस्याओं तथा जीवन की अधिकतम गहराई में प्रविष्ट हो सकते हैं। इसका सही समाधान भी स्वतंत्र विचारणा ही करेगी। इसके अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं-’नान्यः पन्थाः विद्यतेडनायः।’ ईश्वर प्रदत्त बुद्धि, विवेक प्रतिभा को वैचारिक गुलामी से अनावृत करने पर स्वतंत्र निर्णय शक्ति का विकास संभव बन पड़ेगा।

उपरोक्त कथन का यह भाव कदापि नहीं कि अन्य मनीषियों ग्रंथों के विचार व्यर्थ हैं। पर उनकी अव्यर्थता इतनी भर है कि वे चिन्तन के स्वातंत्र्य का राजमार्ग उद्घाटित करते हैं। पर पथ गमन स्वयं ही करना होगा। इसके बिना उद्घाटन का भी महत्व कम हो जाता है। इसी भाव की अभिव्यक्ति करता हुआ उपनिषद् का ऋषि ‘श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः’ का सूत्र प्रतिपादित करता है। मात्र श्रवण करके उसे व्यवहार में उतारने लगना अविवेकपूर्ण है। श्रवण के पश्चात बाह्य व आंतरिक परिस्थितियों तथा सिद्धाँत व व्यवहार के सभी पक्षों पर सर्वांगीण चिंतन ही मनन व निदिध्यासन है। इसी को चिंतन की स्वतंत्र का नाम दिया गया है।

इस प्रक्रिया में विचार की प्रामाणिकता भी परखी जाती है। इस प्रामाणिकता की एक कसौटी है। वह यह कि उसके मूल में सच्चाई हो। जिस विचार से व्यक्ति व समाज के धारण पोषण, सत्व संशुद्धि का निरोध न हो। अर्थात् जिससे व्यक्ति व समाज का जीवन अधिक समर्थ और निर्बल बनें। जिससे विकृति का उदय न हो वही विचार उत्तम है। पर जिस विचार से किसी व्यक्ति या समूह का तो लाभ हो, किन्तु दूसरे घाटे में रहते हों तो समझना चाहिए उसमें कहीं न कहीं दोष अवश्य है। यह एक ऐसा मापदण्ड है, जिससे किसी भी विचार को मापा जा सकता है।

स्वतंत्र चिंतन के लिए व्यक्ति को महान चरित्र व नैतिक बल का स्वामी होना अनिवार्य है। क्योंकि चरित्रहीन एवं अनैतिक व्यक्ति के मन, प्रतिभा व बुद्धि सभी निर्बल व रुग्ण होते हैं। ऐसे लोगों में उन्नत विचारों का क्षेत्र बंजर प्रायः होता है। इसी कारण चारित्रिक दृढ़ता व मन की सबलता अनिवार्य है। जिस तरह वेगवती गंगा को धारण करने के लिए शिव जी सदृश सामर्थ्यवान व्यक्तित्व की आवश्यकता पड़ी। ठीक वैसे ही अंतराकाश से अवतरित होने वाली विचार गंगा को धारण करने के लिए सबल मस्तिष्क व सशक्त विवेक की आवश्यकता है। अन्यथा चरित्रहीन व्यक्ति को यावज्जीवन दूसरों के विचारों का गुलाम होना ही पड़ता है।

मौलिक चिंतन व विचार स्वातंत्र्य की साधना के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है अंतरात्मा की वाणी सुनना। आत्मा हमें निरन्तर अपना परामर्श देती रहती है। यदि इसे सुनने का प्रयत्न किया जाय, तो वैदिक ऋषियों के सदृश अपनी समस्याओं का समाधान निज के अंतराल में प्राप्त कर सकते हैं।


वास्तविकता शिक्षा (kahani)

“गाँधी टोपी सर्वत्र मशहूर हो गई थी। एक किसान ने गाँधी जी को पहली बार देखा और उन्हें नंगे सिर पाया।

किसान ने पूछा आपके नाम से चलने वाली टोपी जब लाखों करोड़ों के सिर पर है तो आप उसे क्यों नहीं पहनते।

किसान के सर पर एक बड़ा साफा बंधा हुआ था। उसकी ओर इशारा करते हुए गाँधी जी ने कहा। जब आप जैसे लोग इतना कपड़ा फिजूल ही इस्तेमाल कर लेते हैं। तो उस कमी को पूरा करने के लिए मेरे जैसे लोगों को नंगे सिर रहना ही पड़ेगा।

“आगरा जिले के खँदोली कस्बे के निकट कुछ समय पूर्व शिकारियों ने भेड़िये की माँद से एक पाँच वर्षीय जीवित मनुष्य बालक पकड़ा। भेड़िये ने उसे खाया नहीं पाल लिया था। पकड़े जानें के समय उसका रहन-सहन, चलना, खाना, बोलना भेड़ियों जैसा था।

उसे पकड़कर लखनऊ मेडिकल कालेज में इस प्रयोग के लिए भर्ती किया गया कि वह मनुष्य जैसा आचरण करने का अभ्यास कर ले। पर इसमें यत्किंचित् ही सफलता मिली। चौदह वर्ष का होकर वह मर गया आरंभिक चंचल मन से उसने जो सीखा, समझा, देखा था भविष्य में उसी के अनुरूप आचरण करता रहा।

बच्चे की वास्तविकता शिक्षा उसके आरंभिक जीवन में होती है। ”


परिवर्तन की महा बेला में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें

महत्वपूर्ण परिवर्तन, घटनाक्रम, क्राँतियाँ अनायास होती दिखाई पड़ती तो हैं, किंतु गंभीरतापूर्वक तथ्यों का अवलोकन करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि इस परिवर्तन के पीछे न जानें कब से परिस्थितियाँ बन रहीं थीं एवं सम्भावनाओं का जाल जंजाल अनायास फूट पड़ने के लिए ताने-बाने बुन रहा था। हाँ, स्थूल दृष्टिकोण से चर्म-चक्षुओं को ये सारे परिवर्तन चमत्कारिक ढंग से घटते हुए प्रतीत होते अवश्य हैं। पर लगता नहीं कि यह उथल-पुथल लंबे समय से निर्मित परिस्थितियों का प्रतिफल हैं। पता तब चलता है जब ये सारी घटनाएं घट चुकती हैं। उस समय सिर्फ पछतावा ही हाथ लगता है और चिंतन का क्रम प्रारंभ हो जाता है कि काश। हम भी दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाये होते और संभावनाओं को देखते हुए अपने क्रिया-कलापों में परिवर्तन पहले से किये होते तो महत्वपूर्ण श्रेय-सौभाग्य से वंचित भी न होते और दुःखद संभावनाओं से भी बच निकलने का रास्ता मिल गया होता।

महापुरुष, महामानव, देवमानव अवतार संत, सुधारक, शहीद उन परिस्थितियों को पहले से परख कर सुखद संभावनाओँ को लाने के लिए प्रबल-पुरुषार्थ में जुट पड़ते हैं और विपरीत परिस्थितियों के प्रति सचेत हो जाते हैं। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त एवं पृथ्वी के महत्वपूर्ण उथल पुथल से लेकर ब्रह्मांडीय विस्फोटों तक यही एक तथ्य उभर कर सामने आता है कि परिवर्तन लंबे काल से चल रही प्रक्रिया का परिणाम है। किसी आकस्मिक प्रतिक्रिया की परिणति नहीं।

माँ के गर्भ में प्रसव काल के समय उठने वाली पीड़ा एवं नवसृजन के परिवर्तनों को देखकर छोटे बच्चे एवं बुद्धि के लोग यही सोचते हैं। कि कल तक तो माँ स्वस्थ थीं, आज अचानक क्या हो गया। यह परिवर्तन उन्हें अजीब सा लगता है और उनके लिए मात्र कौतुक-कौतूहल से भरा हुआ जान पड़ता है, किंतु संबंधित व्यक्ति एवं चिकित्सक जानते हैं कि यह परिवर्तन तो उस समग्र व सहज प्रक्रिया का ही अंग है, जिसकी संभावना नौ माह पूर्व बन चुकी थी ओर उस भ्रूण कलल का बीजारोपण हो चुका था जो चेतन बिंदु को खींचकर ले आये।

आधि - व्याधियोँ के बारे में चरक, सुश्रुत, धन्वंतरि प्रभूति मनीषियों ने एक ही बात स्पष्ट की है कि जो बीमारियाँ अनायास होती दिखाई पड़ती हैं, जिसके दबाने के लिए ही एलोपैथिक चिकित्सक लाल, पीली गोलियाँ एवं कैप्सूल देते और बदले में रोगों को निकलते हुए देखते हैं। सामान्य जन इन रोगों के बारे में सोचते हैं कि यह गड़बड़ी तो कल ही हुई, किन्तु उपरोक्त शोधकर्ताओं ने बताया है कि स्थूल आकार धारण करने वाला रोगों का जखीरा लंबे समय से चले आ रहे असंयम का ही दुष्परिणाम है, इसे ठीक करने के लिए चिकित्सा व्यवस्था से लेकर लंबे समय तक संयमशीलता अपनाने की भी सलाह उन्होंने दी और कहा है कि तभी रोगों से मुक्ति संभव है। मनुष्य इन्हीं रीति-नीति को अपनाकर अपने स्वास्थ को अक्षुण्ण रख भी सकता है।

दाँत सड़ने की घटना अचानक एक दिन में ही प्रकाश में आती है, किन्तु इसके लिए चिकित्सकों ने लंबे समय से चली आ रही चटोरेपन एवं शक्कर से बनें पदार्थों का बाल्यावस्था से प्रयोग और इन्द्रिय लोलुपता अपना कर जीवनी शक्ति का क्षरण ही मुख्य कारण बताया है। वर्षा, आँधी, चक्रवात, ज्वालामुखी, भूकंप जैसी घटनाओं के बारे में संबंधित वैज्ञानिकों ने एक ही तथ्य स्पष्ट किया है कि घटनायें भले ही क्षणों में घट जाती हैं पर इसका अर्थ यह नहीं कि यह सब सामयिक परिस्थितियों का परिणाम है, बल्कि प्रकृति में यह क्रम बहुत पहले चल चुका होता है।

वर्षा के पहले ग्रीष्म ऋतु में तपन का क्रम बन चुकता है, जिससे मानसून की हवायें प्यास बुझाने के लिए चल पड़ती हैं और घनघोर वर्षा करती हैं। आँधी एवं चक्रवात के समय क्षण में ही तिनकों पत्तों एवं धूल कणों को आकाश में उड़ते हुए देखते हैं। इस तीव्र प्रकृतिगत असंतुलन के पीछे कारण उस क्षेत्र में कम दबाव का बन जाना होता है। जिसे पूरा करने के लिए सभी दिशाओं से तीव्र हवा के झोंके चलने लगते हैं। ज्वालामुखी एवं भूकंप के लिए पृथ्वी के नीचे गैसों के बवंडर वर्षों से उमड़ते घुमड़ते रहते हैं एवं चमत्कार दिखाने धरती को हिलाने और छेद कर बाहर निकलने के लिए आतुर रहते हैं। ये घटनाएँ कुछ ही क्षणों की होती हैं। इसमें करोड़ों रुपये की संपत्ति मिनटों में ही नष्ट हो जाती है पर ऐसी परिस्थितियाँ कई वर्षा से निर्मित हो रही होती हैं।

वैज्ञानिकों, विद्वानोँ, विद्यार्थियों, एवं मनीषियोँ के बारे में भी तथ्य ऐसा ही कुछ है। न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धाँत की खोज, जेम्सवाट द्वारा स्टीम इंजन बनाया जाना, जगदीशचन्द्र बसु द्वारा पेड़−पौधों में जीवन होने का संकेत ग्राहमबेल द्वारा बिजली शक्ति का उत्पादन, आर्किमिडीज द्वारा प्रतिपादित उत्पलावन सिद्धाँत, कोपरनिकस के पृथ्वी के घूमने एवं सूर्य के स्थिर रहने की बात, ये सभी महत्वपूर्ण खोजें एक दिन ही घटित हुई। किंतु इन वैज्ञानिकों के जीवन को देखने पर स्पष्ट पता चलता है कि इसके लिए उन्हें जीवन भर तत्परता एवं तन्मय पूर्वक एक दिशा में जुटे रहना पड़ा। तब ये महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत हो पाई। गोता खोरों की तरह मणि, मुक्तक प्राप्त करने के लिए नित-निरंतर डुबकी लगाते रहे। किसी निश्चित दिन सफलता मिलने पर यह तो नहीं कह सकते कि यह उपलब्धि उन्हें एक दिन में मिली। वह तो उनके लंबे समय से चलने वाले प्रबल पुरुषार्थ, अदम्य साहस एवं जीवट का प्रतिफल था।

विद्यार्थी को अंकसूची एक दिन में मिल जाती है, किन्तु उसके लिए उसे एक वर्ष तक अपने समस्त लालसाओं की ओर से ध्यान हटाकर एकाग्रता पूर्वक जुटे रहना पड़ता है। रामायण, महाभारत, उपनिषद् जैसे आर्ष साहित्य एवं कैयट द्वारा लिखित भामती, चरक संहिता जैसे ग्रंथ प्रकाश में तो एक दिन में आये, लेकिन इसके लिए रचनाकारों को पहले से न जानें कितना परिश्रम करना पड़ा था। कार्लमार्क्स द्वारा ‘दास कैपिटल ‘उनके जीवन भर के अध्ययन का सार था। टाम काका की कुटिया, लिखने वाली हैरियट स्टो के मन मस्तिष्क में बाल्यावस्था से ही दास प्रथा को बन्द करने वाले क्राँतिकारी विचार उमड़ रहे थे। ये घटनाएँ बताती हैं कि परिवर्तन तो क्षण में दिखाई पड़ते हे। किन्तु उसके पीछे मानवी पुरुषार्थ प्रकृतिगत व्यवस्था एवं सामाजिक परिस्थितियाँ न जानें कब से काम करती रहती हैं, तभी अचानक यह परिवर्तन एक दिन संभव हो जाता है। जिसे आमतौर से चमत्कार की संज्ञा दे दी जाती है।

इन दिनोँ संसार भर में घट रहे घटनाक्रम को भी ऐसा ही माना जाना चाहिए और समझना चाहिए कि जो कुछ वर्तमान में फलित हो रहा है। वह लंबे समय से चलने वाली प्रक्रिया की परिणति है। ऐसे अवसर लाखों वर्षों में कदाचित् ही उपस्थित होते हैं, जब संपूर्ण विश्व का समग्र का या-कल्प हो तो दिखाई पड़े। इतिहास में जब-जब ऐसे मौके प्रस्तुत हुए हैं। तब-तब उनमें भगवान का प्रत्यक्ष हाथ होने का अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित हुआ है और उनसे साझेदारी करने वालों को अनुदान-वरदान से निहाल होते देखा गया हैं। आज का समय भी वैसा ही अपूर्व है, जिसमें चहुँओर ईश्वरीय हस्तक्षेप हस्तामलकवत दिखाई पड़ रहा है। हम इसमें भागीदारी, निभाकर वैसा ही श्रेय-सम्मान अर्जित कर सकते हैं, जैसा कभी हनुमान-अंगद, नल-नील ने किया था। कही ऐसा न हो कि यह स्वर्णिम अवसर हम चूक जायें और जन्म भर पछताते रहें।


बिल्ली को क्या मालूम ? (kahani)

एक व्यक्ति को अचानक भ्रम हो गया कि वह चूहा है। घर के लोग, मित्र, पड़ोसी, सब बड़े परेशान। पहले तो समझा कि यह यों ही ठिठोली करता है किन्तु धीरे-धीरे मामला बड़ा गंभीर होता चला गया। घर के लोग उसे पकड़ कर मनोवैज्ञानिक के पास ले गये। मनोवैज्ञानिक ने 6 माह का समय माँगा। महंगा इलाज किया। उस व्यक्ति का वहम भी मिट गया कि वह चूहा नहीं है, मनुष्य ही है। डॉक्टर की फीस चुकाकर जब वह चलने लगा तो सीढ़ियाँ उतर ही रहा था कि इतने में अचानक बिल्ली सामने से गुजर गई। वह व्यक्ति चीख मार कर छलाँग लगाता हुआ वापस दौड़कर सीढ़ियाँ चढ़ आया। हाँफता हुआ मनोवैज्ञानिक के पास पहुँचा। मनोवैज्ञानिक ने पूछा क्यों क्या बात है। क्या तुम फिर भूल गये कि तुम चूहा नहीं हो मनुष्य ही हो। आदमी बोला कि वह तो सब ठीक है मैं तो मानता हूँ कि मैं आदमी हूँ। किन्तु बिल्ली को क्या मालूम ?उसने थोड़े ही आप से इलाज कराया है। है तो यह मजाक किन्तु मनुष्य की भी यही वास्तविकता है। कोई अपने को धन मानता है तो कोई पद, कोई अपने को तन मानता है तो कोई मन। स्वाभाविक है जो अपने को नहीं जानते वे कुछ भी मानने लगते हैं।

=======================================================================================

“पृथ्वी के क्षेत्रफल की अपनी एक निश्चित सीमा रेखा है। शेष संपूर्ण भाग जलमग्न है। परन्तु पृथ्वी पर निवास करने वाले प्राणियों विशेष कर मनुष्य की बढ़ती जनसंख्या का कोई सी मा बंधन दिखाई नहीं देता।

वैज्ञानिकों ने यह अनुमान लगाया है कि विश्व में प्रति व्यक्ति के हिसाब से यदि 0.4 हेक्टेयर कृषि करने -खाद्यान्न उत्पादन के लिए तथा 0.08 हेक्टेयर भूमि रहने योग्य, मकान, सड़क, एयरफील्ड बनाने, उद्योग खड़ा करने तथा कूड़ा -कचरा डालने आदि के लिए दी जाय तो भी जनसंख्या वृद्धि के अनुपात से यह पृथ्वी सन् 2000 तक मनुष्य के लिए छोटी पड़ जायेगी। भले ही पृथ्वी का कोना-कोना चप्पा-चप्पा कृषि योग्य क्यों न बना लिया जाय। ऐसी स्थिति में अरबों लोग नंगे, भूखे-प्यासे मरने को विवश होंगे।


नवयुग का आगमन सुनिश्चित

दस वर्ष उम्र की छोटी सी लड़की आँगन में खेलकूद में मग्न थी और माँ अपने घरेलू काम में उलझी हुई थी। अचानक वह लड़की दौड़ती चीखती माँ-माँ पुकारती माँ के पास चली आई और कहने लगी। माँ देखो मेरी पीठ पर चाकू से निर्ममतापूर्वक प्रहार करने के निशान हैं। और माँ। मैं घर के पिछवाड़े में स्थित झाड़ी में जमीन के अन्दर हूँ।

माँ चौक पड़ी कि बेटी को हो क्या गया है किन्तु वह लड़की लगातार कराहती जा रही थी व उसके शरीर पर नील के निशान भी थे। बाद में जब झाड़ी में ढूँढ़ा गया तो एक व्यक्ति की लाश मिली। पुलिस के द्वारा खोजने पर दो हत्यारों का पता चला। लोगों को आश्चर्य हुआ आखिर इस लड़की को यह सब बाते कैसे मालूम हुई। यह लड़की और कोई नहीं बल्कि अमेरिका की भूतपूर्व चित्र नायिका एवं वर्तमान में भविष्य दर्शी के रूप में राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त केब्रिना किन्केडा ही हैं। उसने अमेरिका के महत्वपूर्ण व्यक्तियों फरेह, फैकेट, क्लाइन्ट वाकर एवं लिण्डाडे जार्ज के बारे में जो कुछ कहा वह अक्षरशः सत्य घटित होता गया। उसने 21 हत्यारोँ को खोजने एवं उनके बारे में सत्यता का पता लगाने में पुलिस अधिकारियों की भी कई अवसरों पर मदद की और 42 गुमशुदा लोगों को भी ढूँढ़ निकाल। यह तो केब्रिना के अतीन्द्रिय ज्ञान का छोटा सा पक्ष हुआ। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों के बदलाव से संबंधित जिन घटनाओं के संबंध में उसने जैसा बताया था। वे सभी उसी रूप में अपने समय पर घटित होती गयी।

जब उसने वसंत 1974 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सितम्बर से पहले हाइट हाउस से निकलने की बात कही, तो लोगों ने उसकी हँसी उड़ाई और कपोल कल्पना मात्र समझा, क्योंकि परिस्थितियाँ रिचर्ड निक्सन के पक्ष में थीं, किन्तु 8 अगस्त को जब निक्सन ने टेलीविजन पर अपना त्यागपत्र संबंधी अभिभाषण देना प्रारंभ किया तो लोग किन्केडा को सत्य समझने लगे।

उन्होंने राष्ट्रपति फोर्ड के बारे में कहा था कि उन पर एक प्राण घातक हमला होगा, किन्तु वे सुरक्षित बच जायेंगे। पेपर में छपी उपरोक्त घटना को जब लोगों ने जब 1975 में पढ़ा तभी किन्केडा पर विश्वास हो सका।

18 नवम्बर 1974 को उसमें एक अखबार के संवाद दाता को बताया कि “केरोलिन केनेडी आतंकवादी घटना में मारे जायेंगे उनके साथ रहने वाली उनकी पुत्री बच जायेंगी। ” लगभग 11 महीने बाद 23 अक्टूबर 1975 को बम काण्ड में उनकी मृत्यु हो गई और केब्रिना की भविष्य वाणी सत्य सिद्ध हुई उपरोक्त घटनाक्रमों के बारे में केब्रिना कहती थीं कि “जब मैं सो जाती हूँ तो मुझे भविष्य में घटित हो रहे दृश्य दिखाई देते हैं और मैं अनुभव करती हूँ कि ये सभी दृश्य स्वयमेव ही आ रहे हैं। ”उन्होंने 1971 से 2000 के बीच हो रहे क्राँति कारी परिवर्तनों को भी स्पष्ट किया है। जिसका उल्लेख डेविड वाले किन्सी एवं इरबिंग वेल्स ने “द पीपुल्स एलमेनेक”में विस्तार पूर्वक उल्लेख किया है। उनके अनुसार-

1-सारा विश्व आर्थिक दृष्टि से एक राष्ट्र कहलायेगा और मुद्रा विनिमय के लिए विश्व मुद्रा की व्यवस्था होगी। सभी देशों में इसी को माना जायेगा।

2-मनोविज्ञान का उपयोग गुप्तचर विभाग में व्यापक स्तर पर होगा। एवं अतींद्रिय क्षमता संपन्न व्यक्तियों के कारण उसको प्रामाणिकता भी मिलती रहेगी। न्यायालय में इनकी बातें मानी जाएँगी।

3-प्रमुख ईंधन के रूप में सूर्य से निकलने वाली रोशनी का प्रयोग किया जायेगा। यही ऊर्जा का स्रोत बनेगा।

4-जातिगत संघर्षों में लोग बुरी तरह जुट जायेंगे किंतु इस सदी के अंतिम पाँच वर्ष पूर्व सभी धर्मों जातियों एवं संप्रदायों का एकीकरण हो जाएगा।

कैन्सर के बारे में यह सूचना मिलेगी कि वह वायरस से उत्पन्न होता है, उसके निदान के लिए प्रतिरोधी क्षमता खोजी जायेगी। और कैन्सर का पूर्णतः निदान संभव हो जायेगा।

6-यू.एफ.ओ ’उड़नतश्तरी’ से संपर्क सध जायेगा, जो पृथ्वी वासियों के लिए सुखद परिस्थितियाँ विनिर्मित करने का संकेत होगा, इसके द्वारा 12 नये ग्रह खोजे जायेंगे, जहाँ मानव जीवन का अस्तित्व संभव होगा। और परस्पर सूचनाओं के आदान-प्रदान का क्रम चल निकलेगा।

7-भयावह भूकंपों से विनाश तो होगा ही, किन्तु विकास की सुखद संभावना भी प्रकट होगी। पैसिफिक सागर में नये द्वीप उभर कर आयेंगे, जिसमें मनुष्य जाति का अधिकाँश भाग जीवन-यापन करने लगेगा।

8-बरमूडा ट्रैंगल ’जिसमें यान अदृश्य हो जाते हैं’के बारे में यह स्पष्ट पता चलेगा कि यह उड़नतश्तरी के क्रियाकलापों का केन्द्र है, जहाँ से अदृश्य लोकों से संबंध स्थापित किया जा सकेगा। एवं धरती वासियों को अनुदान मिलेगा।

9-आँख-गुर्दे की तरह हाथ-पैर भी प्रत्यारोपित किये जा सकेंगे। जिसके द्वारा अपंग, अपाहिज लोगों को नया जीवन मिलेगा।

10-मस्तिष्क से उत्पन्न हुए लकवा जैसे रोगों का स्थायी निदान संभव हो जायेगा।

11-धूम्रपान के विषैले प्रभाव के कारण कोई भी व्यक्ति धूम्रपान की ओर कदम नहीं बढ़ायेगा बल्कि आत्मानुशासन से ऐसे उद्योग स्वयमेव ही बन्द हो जायेंगे।

12-जनसंख्या न बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति जिम्मेदारी अनुभव करेगा और यह अंतर्राष्ट्रीय कानून में सम्मिलित किया जायेगा, किन्तु इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि हर व्यक्ति का झुकाव संयम की ओर होगा।

यह तो उनकी विज्ञान के विकास, मानवी स्वास्थ्य एवं अर्थव्यवस्था संबंधी भविष्यवाणियाँ थीं किंतु उनने आने वाले समय के बारे में भी बहुत कुछ कहा है। इस संबंध में केब्रिना का मत विश्व के मूर्धन्य भविष्य वक्ताओं की ही तरह है। वे भी इसे स्वीकारती हैं कि वर्तमान समय समस्त विश्व के लिए भारी उथल पुथल का है। इस क्रम में एक समय ऐसा आयेगा, जब यह प्रतीत होने लगेगा कि सर्वनाश को टालना और मानवी अस्तित्व को सुरक्षित बचा पाना कदापि संभव नहीं है, तभी एक ऐसी अभिनव चेतन जन्म लेगी, जो भँवर में फंसी नाव को सुरक्षित किनारे पर ले आयेगी। इसके बाद का मानवी इतिहास हर क्षेत्र में पिछले दिनों की तुलना में अनुपम और अभूतपूर्व होगा, जिसे युगों-युगों तक लोग याद करते रहेंगे।

उनकी इस भविष्यवाणी की संगति प्रज्ञा अभियान की गतिविधियों से हूबहू बैठती चली जा रही है। इसे पूरा करने में भगवत्सत्ता भी अपने ढंग का प्रयास कर रही है। हमें भी उस प्रयास में सहयोगी बनने के लिए अपनी सक्रियता का परिचय देना चाहिए।


पैरों में गिरकर क्षमा माँगी (kahani)

“तालाब में कमल और तट पर गुलाब दो फूल खिल रहे थे। दोनों बड़े लुभावने प्रतीत हो रहे थे। गुलाब के फूल ने अकड़कर कमल के फूल से कहा -मित्र तुम बड़े भले ही हो किंतु सुगंध मेरी ही लोगों को आकर्षित करती है।

कमल ने कहा -भाई गुलाब। बुरा मत मानोँ तो हम दोनोँ का एक ही उद्देश्य है। आप सुगंध बखेरते हो और प्रकृति ने सौंदर्य मुझे प्रदान किया है। दानोँ मिलकर जो काम कर रहे हैं वह एक नहीं कर सकता था।

गुलाब अपने परदोष दर्शन पर लज्जित हो गया और कमल दुगुने उत्साह से सौंदर्य बिखेरने लगा। ”

“आप की सफलता का रहस्य क्या है?एक पत्रकार ने प्रेसीडेन्ट जान्सन से प्रश्न किया। जान्सन ने उत्तर दिया”असफल व्यक्ति”कैसे उसने पुनः प्रश्न किया। जान्सन ने बताया। जब भी मैं किसी असफल व्यक्ति से मिलता और बात-चीत करता तो पता लगता कि वह असफल किन कारणों से हुआ। पीछे उन कारणों और अनुभवों का लाभ उठाकर ही मैंने सफलता अर्जित की”।

“मीरा की आदत सी बन गई थी। जब वह मंदिर में बैठती, तो कभी मूर्ति की ओर पीठ कर लेती, तो कभी पैर।

एक बार वह प्रतिमा की ओर पैर करके बैठी थी, इतने में एक व्यक्ति ने मंदिर में प्रवेश किया। मीरा को इस स्थिति में बैठी देख उसे क्रोध आ गया। उसे भगवान का यह अपमान बर्दाश्त न हो सका। वह आगबबूला हो उठा और मन में जो आया बक डाला।

अब मीरा का वस्तुस्थिति का बोध हुआ। नाराजगी का कारण समझ में आया, तो मुस्कुरा दिया, कहा- बेटा। गालियाँ क्यों दे रहा है? भला तू ही बता, जिस ओर भगवान नहीं है, मैं उसी ओर पैर कर लूँगी। मुझे तो हर ओर, हर दिशा में, कण-कण में भगवान दिखते हैं।

व्यक्ति का अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने पैरों में गिरकर क्षमा माँगी और चलता बना।

संकीर्ण दृष्टि वालों को सर्वत्र बुराई ही दिखती है।


परम् पूज्य गुरुदेव वृहत जीवन परिचय

परम् पूज्य गुरुदेव ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में मूर्धन्य राजनेताओं जितना बढ़-चढ़ कर कार्य किया। उ.प्र. सरकार के सूचना विभाग ने आगरा जिले के स्वाधीनता “संग्राम का इतिहास “में उसका उल्लेख किया है, पर वह निताँत संक्षिप्त है। पहली बार शाँतिकुँज से उनके इस योगदान पर ऐसी पुस्तिका प्रकाशित की गई। पर जिसे संपूर्ण न भी कहा जायें तो अपर्याप्त भी नहीं कहा जायेगा।

यह पुस्तिका जिन हाथों में गई, उन सभी ने अनुरोध किया है कि प.पू. गुरुदेव के व्यक्तित्व और कर्तव्य पर एक समग्र पुस्तक उपलब्ध होनी चाहिए। अभी तक जो भी कुछ लिखा गया है वह सिंधु में बिंदु से अधिक नहीं है, यद्यपि अब तक उन पर तीन पी.एच.डी. हो चुकी हैं। संकल्प श्रद्धाँजलि समारोह के समय विशेषाँक भी प्रकाशित हो चुका है। कोई एक ऐसी समग्र पुस्तक का अभाव निःसंदेह खटकने वाली बात है। जिसमें उनकी साधना, तपश्चर्या, स्वाधीनता संग्राम, पत्रकारिता, हिमालय प्रवास, विशिष्ट यात्रायें, हिमालय दर्शन, पत्राचार, पत्रिकाओं का संपादन, साहित्य सृजन, गायत्री तपोभूमि, शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस् और गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना, देशव्यापी प्रव्रज्या, बड़ों से भेंट, विशिष्ट सम्मान, विदेश प्रवास, पारिवारिक परिचय, विलक्षण कार्य, अतीन्द्रिय क्षमतायें, अभूतपूर्व उल्लेखनीय घटनायें, संस्मरण, साहस-संघर्ष, संगठन, सम्पन्न कार्यक्रमों का विवरण, महाप्रयाण उसके पश्चात् के निर्धारण तथा पूर्ति प्रबंध आदि सभी सुविस्तृत क्रमबद्ध, प्रामाणिक दस्तावेजों सहित प्रकाशित हों, अभी तक यह प्रश्न था, इसे लिखे कौन?कैसे लिखा जाये?अतएव यह कार्य उनके संपूर्ण वाङ्मय के साथ-साथ जिनके चालीस भाग (वाल्यूम्स) सम्पादन का कार्य प्रारंभ हो गया। यह जीवन चरित भी चिर-प्रतीक्षित था। उनके लिए भी उचित व्यवस्था हो गई है। पर जितनी सामग्री संकलित कर ली गई है। जोड़ने और प्रकाशन योग्य सामग्री उससे भी अनेक गुना अधिक अनुपलब्ध है। इस जीवन परिचय में समग्रता आ जाये अतएव स्वजनों, संबंधियों, पाठकों तथा उन सभी परिजनोँ से, जिनके पास कुछ न कुछ संस्मरण, सामग्री उनसे संबद्ध है। वे उसे हमारे पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भिजवाने की कृपा करें। जिसकी जो भी सामग्री होगी उन योग के पश्चात् सादर लौटा दी जायेगी।

वंदनीय माताजी, प.पू. गुरुदेव के जीवन का अविच्छिन्न अंग रही है। उनकी सहभागिता से ही उनके जीवन और मिशन की पूर्णता है। पू. गुरुदेव के जीवन काल में उन्होंने जो योगदान दिया है, वह उनके कर्तव्य से कम नहीं। महाप्रयाण के पश्चात् तो पू. गुरुदेव का संपूर्ण व्यक्तित्व उन्हीं में समाहित हो गया है, अतएव सभी संस्मरण संदर्भ वंदनीय माताजी के भी भेजे जायें।

क्या-क्या सामग्री भेजी जाये उसका विवरण निम्नानुसार है-

1-ऐसे व्यक्तिगत पत्र जिन्होंने जीवन के किसी भाग को स्पर्श किया हो, प्रभावित किया है, स्वगत तथ्य का अपना लेख उनकी लेखनी से लिखे पत्र के साथ अवश्य जोड़ें। ऐ से परिजन उपलब्ध फोटो भी साथ भेजें।

2-जहाँ कार्यक्रम संपन्न हुए हों उनका विस्तृत विवरण फोटोग्राफ सहित।

3-सभी शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, चरणपीठों के फोटोग्राफ, बनने का इतिहास, वर्तमान परिस्थितियाँ और उनसे जुड़े हुए परिजनोँ के पते, परिचय सामूहिक फोटोग्राफ।

4-अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपे उनके लेख-संस्मरण

5-उनके मित्रों, संबंधियों, कुटुम्बियों, से संबंधित परिचय-संस्मरण, फोटोग्राफ बाल्यावस्था के।

6-समाचार पत्रों में छपे उनसे संबंधित कार्यक्रमों, जीवन परिचय आदि की कतरने।

7-उनसे संबंधित किसी भी तरह के दस्तावेज, प्रमाण पत्र, प्रशस्ति-पत्र, अभिनंदन पत्र आदि।

8-उनके संपर्क में आने के बाद आये जीवन में

परिवर्तनों का उल्लेख, साधनाजन्य अनुभूतियाँ।

9-अन्य मंचों, संस्थानों, विद्यालयोँ आदि में संपन्न कार्यक्रमों, भाषणोँ, गोष्ठियों के उल्लेख।

10-किसी के पास उनसे संबंधित जो कुछ भी कहने, सुनने, दिखाने योग्य हो, वह सभी सामग्री।

11-जिनके पास फोटोग्राफ के साथ नेगेटिव उपलब्ध हों वे कृपया फोटोग्राफ के साथ नेगेटिव भी भेजें। नेगेटिव रंगीन या श्वेत श्याम जो भी हों वहीं भेजना चाहिए।

यह मिशन उन सभी का हृदय से आभारी रहेगा, जो इस महान् कार्य में थोड़ा भी योगदान देगा।


परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- - संधिकाल के महत्व पर एक विशिष्ट उद्बोधन

(दिनाँक 24-12-71)

इस अंक में प्रस्तुत संधिवेला, जो युगपरिवर्तन का संदेश लेकर आयी है, का महत्व एवं परिजनों को इसमें क्या कुछ करना है, इसका विशद मार्ग दर्शन है विशिष्ट त्रैमासिक सत्रों में शाँतिकुँज परिसर में 24 दिसम्बर 1971 को परम पूज्य गुरुदेव द्वारा अभिव्यक्त इन महत्वपूर्ण विचारों की सरिता में पाठक अवगाहन करें, जो आज के समय के लिए और भी सामयिक एवं हमें चुनौती देते दिखाई पड़ रहे हैं।

गायत्री मंत्र साथ-साथ-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों। इस समय जिसमें हम और आप रह रहे हैं, यह युग संधि का समय है। युग-संधि क्या है?युग-संधि उसे कहते हैं। जबकि दो महत्वपूर्ण चीजें आपस में बदलती हैं-जैसे संध्या का समय। एक संध्या प्रातःकाल होती है और एक सायंकाल होती है। दिन खत्म हो जाता है, रात आ जाती है। यह सायंकाल की संधि का समय है। रात चली जाती है और सवेरा आने में समय लगता है। यह प्रातःकाल की संधि का समय है। दो चीजें जब मिलती हैं तब उनको संधि कहते हैं-संध्या काल कहते हैं। यह संध्या का समय है जिसमें दैत्य विदा होने जा रहा है और देव प्रकट होने जा रहा है। दैत्य वह जिसको हम पदार्थवाद-भौतिकवाद कहते हैं। जो देखने में चमकदार, शक्तिशाली और सामर्थ्यवान है, लेकिन भीतर से कलुषित है। उसकी प्रतिक्रियाएं स्वयं के लिए भी और दूसरों के लिए भी दुःखद हैं। रावण जिया तो सही, जप, तप भी किया, सोने की लंका भी बनायी। लेकिन ऋषियों को मारता-काटता रहा, दुःख देता रहा और दुःख पाता रहा और अंततः दुःख पा करके ही मरा। स्वयं भी दुःख पाया और स्त्री -बच्चों को दुःख से जलते -भुनते देखा। दैत्य दुःख देता है और दुःख पात है। देखने में उसका बाहरी कलेवर सोने जैसा चमकदार मालूम पड़ता है। उसकी ताकत ऐसी मालूम पड़ती है मानों दस सिर और बीस भुजाओं वाला हो। सामान्य मनुष्य से ज्यादा ताकतवर होता है दैत्य-जाइंट। जाइंट पहली बार विदा होने जा रहा है। फिर कौन आने वाला है?अब देव का युग सहृदयता का युग, सादगी, सज्जनता और सद्भावना का युग आने वाला है। ‘जाइंट’ जो जानें वाला है, जिसे हम स्वार्थपरता कहते हैं। संकीर्णता, निष्ठुरता और कृपणता कहते हैं, वह आज जन-मन के भीतर छा गया है। आज आदमी कितना संकीर्ण, कितना स्वार्थी हो गया हैं। उसे दूसरों के बारे में कोई चिंता नहीं, केवल अपनी ही चिंता। यह कौन होता है ?केवल अपनी ही चिंता करने वाले को दैत्य कहते हैं। दैत्य मनोवृत्ति के रूप में भी आता है और व्यक्ति के रूप में भी आ सकता है। उसकी यही पहचान है।

दैत्य कहाँ रहते हैं?कहाँ बतावें आपको। अपना मुँह शीशे में देखिये तो आपको दिखाई पड़ेगा। कि दैत्य-राक्षस जाइंट आपके भीतर बैठा हुआ है। जिसकी हवस इतनी ज्यादा है वह उतना बड़ा दैत्य है। हर एक की हवश आसमान छू रही है। सौ रुपये महीने कमाने वाले का भी गुजारा नहीं। हविश का राक्षस इस तरीके से उछलता और उबलता रहता है कि अच्छे कार्यों के लिए भजन-पूजन के लिए कुछ नहीं बचता हमारे पास, फिर सेवा के लिए, परमार्थ के लिए देवपूजन के लिए कहाँ बचेगा?आपके पास है क्या जिससे पूजन करेंगे। आपके पास तो बची हुई एक हविश है जिसको पूरा करने के लिए आप हर एक को निगलना चाहते हैं। आपकी ख्वाहिशें इतनी बढ़ी हैं कि आप हर एक का सफाया करना चाहते हैं, हर एक को अपने पेट में भर लेना चाहते हैं। पेट में कौन भरता है-दैत्य। वह कभी भजन करता है रावण के तरीके से, तो कभी मारीच के तरीके से पूजन करता है। चारों ओर दैत्य छाया हुआ है। यह पढ़ा-लिखा भी है। बलवान है और विधावान भी है। कुबेर के खजाने में बंधा हुआ भी है यह ‘जाइंट ‘जो आज सारे के सारे विश्व के मानस पटल पर छा गया है। दैत्य अब मरने जा रहा है-विदा होने जा रहा है।

अब क्या आने वाला है?देव आने वाला है। देव किसे कहते हैं?शराफत को कहते हैं-भलमनसाहत को कहते हैं। देवता कहाँ रहते हैं?आसमान में रहते हैं ?नहीं। देवता एक सभ्यता का नाम है-संस्कृति का नाम है। इसी तरह दैत्य एक सभ्यता का नाम है-संस्कृति का नाम है। देव और दानव दो संस्कृतियों के नाम है। आज हर जगह दैत्य संस्कृति, जाइंट-संस्कृति, विलासिता की संस्कृति के रूप में मनुष्य के ऊपर हावी है। चाहे वह लंबे तिलक लगाता हो, चाहे पैण्ट पहनता हो। सब इस मामले में एक ही हैं कोई फर्क किसी में नहीं पड़ता। अब यह सभ्यता खत्म होने वाली है। शायद आपको दिखलाई न पड़ता हो, पर हमको दिखाई पड़ता है। कैसे दिखाई पड़ता है। आप समुद्र के किनारे बैठ जाइये। आपको आने वाले जहाजोँ के मस्तूल पानी ऊपर दिखाई पड़ेंगे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अभी मस्तूल दिखाई दे रहा है, थोड़ी देर में पूरा जहाज सामने आ जायेगा। बादल जब चमकते हैं। तब हमको मालूम पड़ता है कि पानी गिरने वाला है। पहले वाली संभावनायें देखकर मालूम पड़ जाता है कि कुछ हेरफेर होने वाला है। परिवर्तन होने वाला है। परिवर्तन का संकेत पाकर बिल्ली अपने बच्चों को लेकर चल देती है। मकड़ी अपने जाले को समेट लेती है। भविष्य की जानकारियाँ सभी को होती हैं। चिड़ियों और कुत्तों को भी तथा अन्य प्राणियों को भी। दिव्यदर्शियों को भी होती हैं और परिस्थितियों का अनुमान लगाने वाले कम्प्यूटरों को भी। ये सभी भविष्य के बारे में अनुमान लगा लेते हैं और इनमें से अधिकाँश सही भी होते हैं।

युग संधि का जो यह समय है, उसमें एक ओर मालूम पड़ता है कि विनाश अपनी आखिरी बाजी लगाने जा रहा है। हारा हुआ जुआरी अंत में जो कुछ भी मिलता है उसी को दाँव पर लगा देता है, यहाँ तक कि बीबी को भी दाँव पर लगा देता है। वह बागी हो जाता है और क्या करता है? चरम सीमा पर जा पहुँचता है। दैत्य भी इन दिनों चरमसीमा पर जा पहुँचेगा। अब वह समय निकट आ गया जिसमें दैत्य अपनी चरमसीमा पर होगा। आपने देखा होगा कि प्रातःकाल जब सूर्य उदय होने वाला होता है तो अंधेरा सबसे ज्यादा उसी वक्त होता है। रात्रि घनीभूत कब होती है - जब प्रातःकाल नजदीक आ जाता है। दीपक की सबसे बड़ी लौ कब होती है-जब दीपक बुझना शुरू होता है। चींटी के पंख कब उगते हैं? जब उसके मरने के दिन नजदीक आ जाते हैं। जब आदमी मरने को होता है तो बहुत जोर से साँस लेता है और चेहरे पर चमक मालूम पड़ती है।

मित्रों। युग संधि के बारे में कई तरह के विचार हैं कितनी ही तरह की मान्यतायें हैं। उसमें एक यह कि एक पक्ष नष्ट होने वाला है और एक पक्ष जीवंत होने वाला है। ऐसे समय को ‘प्रसव पीड़ा ‘ कहते हैं जिसमें एक ओर प्रसूता के ऊपर जान की बनी रही है। वह जीवन और मौत के झूले में झूल रही है। दूसरी ओर खुशी, उमंग, मुस्कान कि नया बच्चा गोदी में आने वाला है। एक ओर तो खुशी भी होती है संतोष होता है। कि नया बच्चा आने वाला है और दूसरी ओर प्रसव पीड़ा में जान भी निकलती है। यह प्रसव पीड़ा का समय है-युग की पीड़ा का युग परिवर्तन का समय है। जिनमें हम और आप रह रहे हैं। इसमें दैत्य मरने जा रहा है और देव अपना जन्म लेने जा और देव अपना जन्म लेने जा रहा है-उदय होने जा रहा है।

आपको इसका आभास कैसे मिलता है?हम कई आदमियों से मालूम करते हैं-कई फैकेल्टीज से मालूम करते हैं, कई विचारकों से मालूम करते हैं तो नतीजा उसी स्थान पर जा पहुँचता है कि युग परिवर्तन का समय नजदीक आ गया है। यह विनाश और विकास का संधिकाल है। इस संबंध में आकाश की जानकारी रखने वालों से पूछताछ की तो उन्होंने कहा कि अब दुनिया में घुटन पैदा होने वाली है। हवा के अंदर गर्मी और विषाक्तता इस कदर बढ़ती जा रही है कल कारखानोँ के द्वारा मशीनों के द्वारा, उद्योगों के द्वारा कि सारा का सारा वातावरण विषाक्त होता जा रहा है। शहरों की गंदगी कहाँ डालते हैं?नदियों में परिणाम स्वरूप सारी की सारी नदियाँ विषैली होती चली जा रही हैं। अब गंगा तक का पानी न नहाने लायक रहा हैं न पीने लायक। न केवल हिन्दुस्तान में वरन् सारे संसार में हवा और पानी खराब होते जा रहे हैं। हम चारों ओर से हवा और पानी के रूप में जहर पी रहे हैं। बढ़ता शोर-कोलाहल आदमी के मस्तिष्क को पागल बनाने के लिए काफी है। जिस तरह से कुपोषण के कारण छोटे बच्चे की मौत के मुँह में चले जाते हैं। उसी तरीके से इन कुप्रभावों से आदमी की शारीरिक और मानसिक सेहत अब खराब होने वाली हे।

मौसम के जानकारों का कहना है कि अगले दिन हमारे लिए मुसीबत के होंगे। क्योंकि तापमान इस कदर बढ़ता चला जा रहा है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर जो बर्फ जमा है, वह बेतहाशा गलने वाली है और जल प्रलय का दृश्य सामने आने वाला है। इतिहास बताता है कि पृथ्वी जब से बनी है तब से कई बार ऐसे मौके आये हैं जब जल प्रलय हुई है और आबादियाँ डूब गई हैं। धरती बिना आबादी के रह गयी है और क्या बुरे दिन मालूम पड़ते हैं?

साँख्यिकी के जानकारोँ से जब हम पूछते हैं कि आपका क्या ख्याल है तो वे भी लगभग यही बात कहते हैं कि अगले दिन बहुत खराब आ रहे हैं। क्यों आने वाले हैं?इसलिए आने वाले हैं कि जनसंख्या बेहद बढ़ती चली जा रही है। जनसंख्या का पृथ्वी पर बढ़ना एक बहुत बड़ा जुर्म है एक बड़ा जोखिम है। पृथ्वी के भीतर असंख्य प्राणियों को जीवित रखने लायक खुराक नहीं है और न इसकी लंबाई-चौड़ाई इतनी है कि रबर की तरीके से हम इसको फैला दें। इंसानों की एक सीमित मात्रा ही इस पर रह सकती है और खुराक पा सकती है। लेकिन इंसान के ऊपर जहालत इस कदर हावी होती चली जा रही है कि कीड़ों-मकोड़ों के तरीके से, चूहे और कुत्तों के तरीके से बिल्लियाँ पैदा होते चले जाते हैं। और दुनिया के लिए आफत पैदा करते हैं। बच्चे यदि इसी कदर बढ़ते रहे तो आप देख लेना दुनिया भूखों मरेगी। फिर यह ’नेचर’ ऐसे बेहूदे लोगों के लिए हमेशा तीन डंडे तैयार रखती है -एक महामारी, दूसरा अकाल और तीसरा महायुद्ध। ‘इकॉलाजी’ के हिसाब से महामारियाँ फैलेंगी और मक्खी, मच्छरों के तरीके से अनावश्यक रूप से बढ़ी हुई औलादों को समाप्त कर देंगी। तूफान आयेंगे, लड़ाइयां होंगी, अकाल पड़ेंगे ताकि भूख के मारे जरूरत से ज्यादा बढ़ी हुई आबादियाँ खत्म हो जायें। ये मुसीबतें आयेंगी और जरूर आयेंगी।

और कौन क्या कह रहा था?जो ग्रह नक्षत्र विद्या के जानकार हैं। वे कह रहे थे कि पृथ्वी का खाविंद सूर्य है। ये दोनोँ मियाँ बीबी के तरीके से रहते हैं। सूरज कमाता रहता है और पृथ्वी को भेजता रहता है। उसी के आधार पर पृथ्वी जिंदा रहती है। फलती-फूलती है और हरी-भरी बनी रहती है। अगर सूरज की कमाई इसके हिस्से में न आयी होती तो यह मर गयी होती, मंगल और बुध की तरीके से जल-गल रही होती। या फिर प्लूटो और नेपच्यून के तरीके से इतनी ठंडी होती कि यहाँ बर्फ के अलावा और कुछ न होता। यदि सूरज ने अपनी आँखें मोड़ली होतीं तो यह शनि और शुक्र की तरह गैस का गुब्बारा बनकर रह रही होती। लेकिन यह सूरज की मोहब्बत है जिसकी कमाई यह खाती रहती है। और उससे गर्मी और रोशनी लेती रहती है।

‘लाइफ’ कहाँ से आ गयी धरती पर सूरज से। कीड़े-मकोड़े, जीव-जन्तुओं इंसान इन्हीं दोनोँ के ‘कम्बिनेशन’से पैदा हुए हैं। पृथ्वी और सूरज का बहुत घना संबंध है। अब इसमें फर्क आ गया है। तलाक की नौबत तो नहीं आने वाली है। लेकिन नाखुशी की बहुत परिस्थितियाँ पैदा हो गयी हैं। सूरज का पहले का भी इतिहास है कि जब कभी भी पृथ्वी और सूरज के संबंधों में जरा भी फर्क आया है, घर में कलह उत्पन्न होने वाला है। अब यह कलह फिर से उत्पन्न होने वाला है। सन् 1971 से सूरज के ऊपर ‘स्पाट्स’ उत्पन्न होने वाला है जो लगातार बीस वर्ष तक चलेंगे। ‘स्पाट्स’ किसे कहते हैं? ’स्पाँट्स’ उन्हें कहते हैं जिनमें कि एक-एक लाख मील लम्बी लपटें-ज्वालाएं सूरज में से निकलती हैं। और वे इतनी खतरनाक विकिरण पैदा करती हैं कि उसका सबसे बड़ा प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है। पहले भी कई बार ऐसे विकिरण आ चुके हैं और उसने पृथ्वी के संतुलन बिगाड़ दिये हैं। दूसरी बात अगले दिनों ऐसे सूर्य ग्रहण शृंखलाबद्ध रूप से आ रहे हैं। जैसे कि 800 वर्षों के इतिहास में कभी नहीं आये इनका परिणाम सारा विश्व देखेगा।

तीसरी बात जो खगोल विघा के जानकार बताते हैं कि सन् 81 के बाद में एक और आपत्ति आने वाली है- बृहस्पति के जानकार भी बतलाते हैं। कि अगले बीस पच्चीस साल सन् 1980 से 2005 तक का समय युग-संधि का वह पक्ष है जो नुकसान देय है-खौफ नाक है अखण्ड-ज्योति में आपने कई बार ऐसी भविष्यवाणियाँ पढ़ी होगी। अब कुछ और लेख जनवरी और फरवरी 1980 के अंक में जा रहे हैं। ताकि लोगों को आगाह किया जा सके। यह लोगों को डराने वाली बात नहीं है, वरन् परिस्थितियों का विश्लेषण है। इसी तरह एक और तथ्य है जिसकी वजह से हम कह सकते हैं कि यह नुकसान के समय हैं। इसके लिए धर्मशास्त्रों की गवाहियाँ पेश कर सकते हैं। बाइबिल में ईसा की वह भविष्यवाणियाँ हैं जिन्हें “सेवन टाइम्स “के नाम से जाना जाता है। उनके अनुसार यह समय सन् 80 से सन् 2000 तक का समय होता है। उन भविष्यवाणियों का साराँश केवल तबाही है इंसानों पर आने वाली तबाही है। तो उसमें लिखा है कि 14 वीं सदी में कयामत आयेगी। कयामत का मतलब नुकसान भी हो सकता है। अभी वह कयामत जिसमें पृथ्वी का सफाया हो जायेगा, बहुत देर की बात है, लेकिन नुकसान का समय जरूर नजदीक है, मुसलमानों के लिए ही नहीं हम सबके लिए भी। सूरदास के ग्रंथों से लेकर प्राचीन धर्मशास्त्रों, भविष्य पुराण, कल्कि पुराण, आदि सभी भविष्यवाणियों से भरे पड़े हैं। इससे मालूम पड़ता है कि अगले बीस वर्षों तबाही के खौफनाक आ रहे हैं।

युग संधि का एक लक्षण यह होता है कि तबाही होती है। एक सत्ता उखाड़ी जाती है और दूसरी जमायी जाती है। क्राँतियाँ होती हैं। एक चले गये, दूसरे आ गये। नुकसान होते रहे। दुनिया में जब एक सत्ता उखड़ती है और दूसरी सत्ता आ जाती है, तब हमेशा गड़बड़ियाँ फैलती हैं, नुकसान होते हैं दूसरी बातें होती हैं। युगसंधि का यह पक्ष नंबर एक है। इसका एक और पक्ष हे-सुनहरा वाला पक्ष जिसको हम ‘प्रसव पीड़ा’ कहते हैं। और जिक्र भी कर चुके है। इसमें बीज गलता जाता है और अंकुर पैदा होता जाता है धान रोपी जाती है-खुशी के गीत गाये जाते हैं कि अगले दिन फसल होने वाली है। भवन का शिलान्यास किया जा रहा है, नींव चिनी जा रही है और अगले दिनों भवन खड़ा हो जायेगा। यह क्या है? उज्ज्वल भविष्य की संभावनायें हैं-शिलान्यास के रूप में, अंकुर पैदा होने के रूप में, बच्चा पैदा होने के रूप में। अगर आप देख सकते हैं तो इन दिनों उज्ज्वल भविष्य की संभावनायें भी सामने हैं। जिस युग संधि में हम रह रहे हैं। उसे आपत्ति काल कह सकते हैं। आपत्ति धर्म कह सकते हैं। ऐसे समय में जाग्रत आत्माओं की विशेष जिम्मेदारी होती है। उनको कुछ खासतौर से देखभाल करनी साज-सँभाल करनी पड़ती है। परिवर्तन की घड़ियों में खासतौर से देखभाल करना उन लोगों की खास जिम्मेदारी हो जाती है जो जगे हुए आदमी हैं जिनमें से मैं आपको भी शुमार करता हूँ।

ऐसे समय कुछ खास समय होते हैं जिन्हें आपत्तिकालीन समय के नाम से पुकारते हैं। मसलन मोहल्ले में आग लग जाये छप्पर जलने लगें, तो आपको सामान्य काम बन्द कर देने चाहिए और बाल्टी लेकर रेत लेकर के चल पड़ना चाहिए और जहाँ भी आग लगी है, बुझानी चाहिए। आपत्तिकालीन समय में आपत्तिकालीन फर्जो को अंजाम देना पड़ता है। दुर्घटनायें घट जायें, भूकंप आ जाये, रेलगाड़ी का ऐक्सीडेंट हो जाये, आपके पड़ोस में और सैकड़ों लोग घायल पड़े हों, तब आप यह नहीं कह सकते कि हमारे पास समय नहीं है फुरसत नहीं है। यह कहना बंद कीजिये। इस तरह के जो काम सामूहिक जिम्मेदारी के होते हैं, उनको पूरा करने के लिए लग जाना चाहिए। नये युग का नये जमाने का महाकाल का प्रज्ञावतार का खासतौर से आप लोगों का तकाजा है, उन लोगों से जो जाग्रत हैं-जगे हुए हैं जिस में मैं आपको शुमार करता हूँ जिनकी कि अकल जनसाधारण से ऊँची है। जनसाधारण से मेरा मतलब है-वे आदमी जो सिर्फ पेट के लिए जिंदे रहते हैं। इनको अपने स्वार्थ के अलावा अपने मतलब के अलावा दूसरी को चीज दिखाई नहीं देती। उनको न भगवान दीखता है, न दया-धर्म दीखता है न देश दीखता है न संस्कृति दीखती है। लोभी लालची और लिप्सा में डूबे हुए आदमी हविश के मारे हुए आदमी को मैं जनसाधारण आदमी कहता हूँ। वे उस भगवान की पूजा करना चाहते हैं जो दोनाँ भर-भर के दे जाता है। बाल-बच्चे पैदा कर जाता है और इनाम दे जाता है। ऐसे भगवान की पूजा बंद कीजिये वह भगवान नहीं हो सकता जो आवश्यकता को देखे बिना, औचित्य और अनौचित्य को देखे बिना हर एक की मनोकामना पूरी करता रहता है। जो भगवान आज आदमी के ऊपर छाया हुआ है वह भगवान नहीं शैतान है। भगवान की कुछ परिभाषा होनी चाहिए, कुछ क्रम होना चाहिए। भगवान सिद्धान्तों को कहते हैं, आदर्शों को कहते हैं, उत्कृष्टता को सच्चाई को कहते हैं, ईमानदारी और वफादारी को कहते हैं, संस्कृति की सेवा को कहते हैं। आप लोग जो तीन महीने के शिविर में आयें हैं उनमें से मुझे वे आदमी मालूम पड़ते हैं। जो भगवान को जानते हैं, भगवान की परिभाषा जिनके दिमाग में आ गयी है। जो भगवान से संबंध रखने वाले हैं, भगवान को प्यार करने वाले हैं और भगवान उन पर कृपा करने वाला है। आप सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा कुछ असामान्य मालूम पड़ते हैं। असामान्य मनुष्यों से मुझे कुछ कहना है। सामान्य मनुष्य को मैं जानता हूँ कि वह दुखियारा है। उस बीमार को दवा की जरूरत है। ये मेरे पास आते रहते हैं और मैं उनसे यही पूछता रहता हूँ कि बेटे, बता क्या बात है ?क्या तकलीफ है। हारी-बीमारी से लेकर बेटे-बेटी की शादी-ब्याह, नौकरी, पदोन्नति तक की बातें करते हैं और मैं उनसे यही कहता हूँ कि भगवान से प्रार्थना करेंगे और करा देंगे तेरा काम। बस उस गरीब को और क्या चाहिए। मित्रों क्या होना चाहिए?बालकों को गुब्बारे के अलावा-टॉफी और चॉकलेट के अलावा कुछ नहीं मालूम। उनसे कुछ काम नहीं होने वाला। वे तो गोदी में खेलनें लायक और प्यार करने लायक हैं। वे मुसीबत में कुछ सहायता करने वाले नहीं हैं। उन से धर्म अध्यात्म की, लोक-परलोक की, भगवान की समाज संस्कृति की कुछ भी बात नहीं कहते। उनसे तो यही कहा जा सकता है कि अपना पेट भरिये, अपनी हवश पूरी कीजिये और इंसान की तरह से गुजारा की जिए। लेकिन आप से कहना है, क्योंकि आप में वह तत्व हमें दिखायी पड़ते हैं जो जीवंतों में होने चाहिए। जीवंत वे जो सामान्य मनुष्यों से ऊँचे उठे हुए होते हैं-जैसे आपने सुबह सूरज को निकलते हुए देखा होगा। सबसे पहले सूरज की किरणें पहाड़ों की चोटी पर आती हैं, पेड़ों पर आती हैं, फिर नीचे आते आते जमीन पर आती हैं। भगवान भी उनके ऊपर आते हैं जिनके पास दिल होता है-हृदय होता है, जिनके पास भावनायें होती हैं। भगवान बांसुरी बजाते हुए, डमरू बजाते हुए या तीर-कमान चलाते हुए नहीं आते। तो फिर क्या करते हैं? वे सिद्धांतों को ले करके आते हैं, आदर्शों को लेकर आते हैं। जो ऊँचे स्तर के लोगों में, भावनाशीलों में दिखाई देती है।

आप क्या कहना चाहते हैं ?मैं यही कहना चाहता हूँ कि इस युग-संधि की वेला में आप कुछ महत्वपूर्ण काम कर पायें तो आपके लिए शान की बात गरिमा की बात होगी। क्या करना चाहिए? करने को तो ढेरों के ढेरों काम पड़े हैं, पर हमने इन तीन महीनों में जो आपको याद दिलाया है वह यह कि हमको जमाने की फिजाँ बदल देनी चाहिए। बहुत सारे संकट हैं, लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा संकट-आस्था संकट है। अकल का संकट नहीं है। पुराने जमाने में कोई कोई पढ़े लिखे होते थे, बाकी सारी की सारी जनता बिना पढ़ी थी। हमारी माताजी जिनके पेट से हम पैदा हुए हैं, बिल्कुल बिना पढ़ी थीं। उन्होंने हमें बालकपन से ही इस प्रकार के संस्कार दिये कि हम भूल नहीं सकते। हमारा सबसे बड़ा गुरुजी हमारी माँ हैं, जो हमारे भीतर नैतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के सारे गुणों को अपने दूध के साथ में पिला करके और गोदी में खिला करके हमको सिखाकर के गयीं थीं और माताएं भी ऐसी हो सकतीं हैं। बहुत से आदमी ऐसे हो सकते हैं जिनके पास शिक्षा न हो और ऐसे आदमी शिक्षित हो भी सकते हैं जिनकी अकल का तो कहना ही क्या। इसके बारे में कल भी कह चुका हूँ कि मालाबार हिल के ऊपर एक वकील रहता था जिसने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच में इस कदर खाई पैदा कर दी कि दोनों देशोँ में तबाही आ गयी। यह है अकल जिसके ऊपर हम लानत भेजते हैं। आप लोगों को एक ही काम करना है कि इस अकल को विचारों को बदल देना है। शोध अनुसंधान वालों से भी हमने यही कहा है कि आप केवल एक चीज की शोध कीजिये कि आदमी की विवेक बुद्धि को और चिंतन के ऊँचे वाले स्तर को जो गड़बड़ा गया है-उसको ठीक कर लीजिये क्योंकि आज आदमी बुद्धिजीवी हो गया है। उसकी बुद्धि को हर क्षेत्र में पटक-पटक कर मारना है। जिस तरह धोबी कपड़े को पीट-पीट कर धुलाई करता है, वैसे ही अकल को पीट-पीट कर ठीक करना है। यह अकल का लिबास ओढ़ करके आदमी के दिमाग और जीवन पर हावी हो रही है, इसको पटक मारनी है जिससे इसको ठिकाने लगाया जा सके।

अब आप क्या करना चाहते हैं?अब हम एक और काम करना चाहते हैं कि हमारा छोटा सा समूह छोटा सा समुदाय एक और प्लानिंग करके चले तो मजा आ जाये। ऐसे समय में हम मूकदर्शक हो करके नहीं रह सकते। हमारा छोटा सा जखीरा ऐसे समय में पानी पिलाने के लिए जागरूकों की टोली में चलेगा ही। अभी हम बच्चे हैं, छोटी बाल्टी हमारे पास है, हाथ छोटे हैं, तो क्या हुआ, अपना फर्ज हमें पूरा करना चाहिए। युग संधि के इस वर्तमान समय में कुछ काम करने की हैसियत में हम है, उसे पूरा करने के लिए हम आमादा हो जायें तो ज्यादा अच्छा होगा। इसके लिए हमने चार पंचवर्षीय योजनायें बनायीं हैं। हमारा अपना भी ऐसा ख्याल है और जिन लोगों से हम मिलते-जुलते हैं। या जिनका नियंत्रण हमारे ऊपर है, उनकी सलाह मशविरा से भी हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अगले 20 साल सन् 80 से लेकर सन् 2000 तक का समय ऐसा है जिसमें एक कोने में नये युग का पौधा विकसित हो इस लायक हो जायेगा कि उसकी छाया में लोगों को बिठाया जा सके। हम विनाश को, जो संभावनायें के रूप में डराता रहता है, उस स्थिति में नीचे कर सकेंगे निरस्त कर सकेंगे। जिससे लोगों को राहत मिले और वे चैन की साँस ले सके। आदमी का संतुलन 20 साल में बन जायेगा, ऐसा हमारा ख्याल है। पाँच-पाँच वर्ष की चार योजनायें जो हमने बनायी हैं, मैं नहीं जानता कि कब तक सँभालूँगा पर मैं इतना जरूर कहता हूँ कि चारों योजनाओं के गति पकड़ने तक हम किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं अपना वजूद कायम रखेंगे और यह कोशिश करेंगे कि नया युग लाने का जो आन्दोलन शुरू किया है उसका फल भी देखने को मिल जाय।

पहली योजना बहुत सिम्पल है, दूसरी योजना उससे कठिन है, तीसरी योजना और कठिन है और चौथी योजना सबसे ज्यादा कठिन है। पाँच सूत्री कार्यक्रम प्रत्येक के लिए है। सबकी जानकारियाँ कराने से आप परेशान हो जायेंगे और कहेंगे कि इतना बड़ा प्लान है जिसे हम पूरा नहीं कर सकेंगे। अतः हम आपको प्राइमरी कक्षा की जानकारी देते हैं कि प्राथमिकता योजना में आप व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से वातावरण को संशोधित करने की कोशिश करें। जो फिजा और हवा लोगों को धकेले जा रही है। जिससे हर चीज सूख गयी है। उसे दूर करने और लड़ाई लड़ने के लिए हमको दो काम करने चाहिए। एक तो आप अपनी व्यक्तिगत साधना में पहली जनवरी से दो चीजें मिला दें। पहली यह कि नया युग लाने के लिए एक धारा एक प्रवाह कहीं से चला है, हम उसी से प्रभावित होते हैं, हम उसी से प्रभावित होते हैं और आपको भी प्रभावित करने के लिए उसी ताकत का इस्तेमाल करते हैं। जो महान शक्ति इतना बड़ा कार्य कर रही है नये युग को ला रही है उसके साथ संपर्क बनाने वाली साधना-उपासना जो बहुत सरल है, आन पहली जनवरी से चाहे तो कर सकते हैं। इसके लिए आपको नित्य प्रातःकाल साढ़े चार बजे साँस के रूप में उस प्राण को खींचना है। हम भी प्रातःकाल उस प्राण रूपी माँ के दूध को पीते हैं, शक्तियाँ आ जाती है। दिन भर हम उछलते रहते हैं, फुदकते रहते हैं। आप लोगों को जाग्रत आत्माओं को दूध को जो प्रातःकाल प्राणाधार के रूप में आता है, ग्रहण करना चाहिए और रात्रि को सोते समय वातावरण में उसे तीर कमान की तरह इस तरीके से छोड़ना चाहिए कि इस वातावरण को संशोधित करने में मदद कर सके। इसकी एक उपासना पद्धति है जिसे मैं फिर कभी समझा दूँगा कि दोनोँ उपासनायें एक प्रातःकाल की और दूसरी रात्रि को सोते समय कैसे करनी चाहिए?

दूसरा है महा पुरश्चरण, जिसमें सामूहिक उपासना मुख्य है। सामूहिक उपासना में बड़ी शक्ति है। एक समय पर एक मन से एकाग्र होकर की गयी उपासना स्वर विज्ञान के हिसाब से अद्भुत सामर्थ्य उत्पन्न करती है। इसलिये हम कहते रहते हैं कि गायत्री मंत्र एक साथ बोलिये। मंत्र एक साथ बोले जाते हैं। स्वर एक साथ होने चाहिए। हवन में भी हम साथ बोलने पर जोर देते रहते हैं। एक समय पर एक साथ एक क्रम से की हुई उपासना का वह फल होता है, जैसे कि लोहे के बड़े पुलों पर से होकर जब कभी सिपाही चलते हैं तो कदम मिलाकर लेफ्ट-राइट चलने से उन्हें मनाकर दिया जाता है, क्योंकि उससे पुल टूटने का खतरा रहता है। आप लोग सामूहिक रूप से साथ एक ही समय एक सी ध्वनि, एक ताल-लय एक नाद का उपयोग कर सकें तो स्वर विद्युत का एक बहुत बड़ा आधार विनिर्मित होगा और वातावरण के संशोधन का प्रयोजन पूरा करेगा। इस तरह एक व्यक्तिगत उपासना है और दूसरी सामूहिक। यह हमारे पंचवर्षीय योजना के आध्यात्मिक प्रयोग है। भौतिक और रचनात्मक प्रयोग अलग है जो अपने स्थान पर चलते रहेंगे।

एक और भी हमारा प्रयत्न है और वह उससे भी शानदार है। देवात्माओं के अवतरित होने का ठीक यही समय है। देवात्माएं युग को संभालने के लिए युग को परिवर्तित करने के लिए जन्म लेने को व्याकुल हो रही हैं। जब रामचन्द्र जी आये थे। तो उनके साथ में देवता आये थे। उन्होंने कहा था-जिस जमाने में आप पैदा हुए हैं-आदमी दो कौड़ी के हो गये हैं। आदमियों से सहायता नहीं मिलेगी आपको। मरने-मिटने के लिए और बड़े काम संभालने के लिए तो आदमी शायद ही मिल पायें आपको लेकिन हम चलेंगे और रीछ, बंदरों के रूप में सारे के सारे देवता चलने के लिए आमादा हो गये थे। उन्होंने रीछ-बंदरों के यहाँ जन्म लिया था, परन्तु इंसानों के घरों के घुटन भरे वातावरण में जन्म लेने से मना कर दिया था और कहा था कि इन पेटुओं के यहाँ हम कैसे रहेंगे जिनमें कषाय और कल्मष भरे हुए है। जिन घरों में स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी की परंपरायें नहीं हैं, उन घरों में हम कैसे जियेंगे ?उनका कुधान्य खाकर हम कितने दिन जियेंगे?इसलिए देवताओं ने मना कर दिया था। और रीछ-बंदरों के घरों में पैदा हुए थे। आज की आवश्यकताएं सूक्ष्म हैं। मैं आपसे सूक्ष्म बातें कह रहा हूँ-विशुद्ध अध्यात्म की बातें। स्थूल बातें, समाज सेवा की बाते, पुरुषार्थ की बातें कल करूंगा। इस समय का सबसे बड़ा काम यह है कि युग को बदलने के लिए सामान्य नहीं, असामान्य आदमियों की जरूरत है। इसके लिए भीम, अर्जुन, भरत और हनुमान चाहिए। इसके लिए स्वराज्य लाने वाले गाँधियों, नेहरूओं और सुभाषचन्द्रों की जरूरत है। बड़ी आत्माओं की, जबर्दस्त हस्तियों की जरूरत है। मैं चाहता हूँ कि हैवानों के पेट में से जन्म लेने के लिए देवताओं को मजबूर होना पड़े और इंसानियत को कलंकित न होना पड़े। कितना ही अच्छा होता कि सन् 1980 से देवता इंसानों के यहाँ जन्म लेते। इसके लिए हमें घरों का वातावरण ठीक करना चाहिए। हमारे दाम्पत्य जीवनों में मनु और शतरूपा रानी की संस्कारोँ वाली परंपरा पैदा होनी चाहिए, ताकि देवताओं का आह्वान किया जा सके। हमारे घरोँ में कुँती की परंपरा पैदा होनी चाहिए ताकि देवता उनकी कोख में और गोद में खेलने के रजामंद हो सकें। देवता हर एक के यहाँ नहीं आ सकते। शकुँतला के पेट में से भरत आये थे। घर-परिवारों में ऐसी परिस्थितियाँ फिर से पैदा करने के लिए ही हमने ‘परिवार निर्माण योजना’ को जन्म दिया है और कहा है कि परिवारों में धार्मिक वातावरण बनायें। दाम्पत्य जीवन में पूजा उपासना की, आरतियों की, पंचयज्ञों की, गायत्री माता को प्रणाम करने की न्यूनतम उपासना की परंपरा आरंभ कीजिए। सारे के सारे घरों का वातावरण बनाने के लिए, ताकि कोई देवात्मा यदि जन्म लेने के इच्छुक होँ तो मौका मिल सके।

मित्रों। हमने इस कुँभ मेले पर जाति-बिरादरियों के शिविर लगायें हैं। इस माध्यम से हम विवाह परंपरा में ब्राह्मविवाहों का प्रचलन करना चाहते हैं। ब्राह्मविवाह से मतलब है- आदर्श विवाह, शालीनता के बिना खर्च के विवाह। आज सभी जगह असुर विवाहोँ दैत्य-विवाहोँ का प्रचलन है। जिसमें बेटे वाला बेटी वाले का पेट फाड़ डालता है। दोनोँ तरफ पैसे की होली जलती है। ऐसे घरों में देवता नहीं गुँडे, धूर्त, राक्षस और कंस पैदा होगे, हिप्पी और एक्टर पैदा होगे और जन्म देने वालों के लिए आफत पैदा करेंगे इसीलिए हमने विवाह परंपरा को शानदार बनाया है और इसलिए शानदार बनाया है कि हमारे परिवारों में हमारे घरों में देवता जन्म ले सकें। यदि यह परंपरा चल पड़ी फिजा फैल पड़ी एक की देखा-देखी दूसरे ने ग्रहण कर लिया, तब फिर हमारी आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और भावनात्मक परिस्थितियों में जमीन - आसमान जैसा फर्क आ सकता है। यह वह चीज है जो हमने पहली तीन पंचवर्षीय योजना में शामिल की है चौथी और भी अधिक क्राँतिकारी है जिसका जिक्र मैं कल करूंगा। आज अपनी बात यहीं समाप्त करता हूँ।

॥ ॐ शान्तिः ॥


देवसंस्कृति को विश्व-संस्कृति बनाने को सन्नद्ध अश्वमेधी पराक्रम (उत्तरार्ध)

(गताँक से आगे)

जैसे-जैसे भारत से बाहर विदेश के सर्वप्रथम अश्वमेध यज्ञ के दिन समीप आ रहे थे, सभी उत्सुक थे, जिज्ञासु थे, यह जानने-देखने, समझने के लिए कि परम पूज्य गुरुदेव जिनने संस्कृति पुरुष के रूप में समग्र जीवन जिया एवं परम वंदनीय माताजी, जो उनके साथ छाया की तरह रहती हुई निरंतर तप करती रही, भारत से जाकर बसे अपने प्रवासी बच्चों एवं वहाँ के नागरिकों के लिए इन यज्ञ योजनाओं के माध्यम से क्या कुछ देने जा रही है। इन पंक्तियों के लेखक ने विगत तीन वर्षों की विश्व प्रव्रज्या में कई ऐसे व्यक्तियोँ से मुलाकात की जो भारत का स्मरण करने मात्र से भाव विभोर हो जाते थे, रोम-रोम में पुलकन होने लगती थी व कह उठते थे कि हम वर्षों पूर्व वहाँ से आए कुछ बीज संस्कारोँ के लाए थे उन्हें उगाया पौधा बनाकर बढ़ाया है पर एक साथ अभी भी मनमें है कि कभी वहाँ जा पायें। नहीं जा पाते तो आप लोग आ जाते हैं-आप सबके माध्यम से भारत के हिमालय के ऋषियों की संस्कृति का दर्शन कर लेते हैं। गंगा जल जो देवस्थापना के लिए पहली बार भारत से बाहर गया था, ने प्रत्येक के मर्मस्थलों को स्पर्श किया था। धनी संपन्नों की बात और है पर आमआदमी व विदेश का वह नागरिक जिसने गंगा के माहात्म्य को औरों से सुना है हाथ में गंगा जल लेकर जब कहता था। कि आप गंगा यहाँ ले आए, इससे बड़ी सौगात हमारे लिए क्या हो सकती है, यह आपका हमारे लिए बहुमूल्य उपहार है तो हम सभी के अंतःकरण गदगद हो जाते, परम् वंदनीय माताजी के इस निर्धारण व निर्णय पर कि पूरे विश्व के चौबीस करोड़ घरों में देवस्थापना अगले दिनों संपन्न होनी है।

किन्तु जब गोमुख से निकलने वाली गंगा स्वयं ही चलकर उनके द्वारा आने वाली गंगा स्वयं ही चलकर उनके द्वारा आने वाली हो, ऐसा सौभाग्य उन्हें मिलने जा रहा हो, परम वंदनीया माताजी के स्वयं पहली बार इंग्लैण्ड, कनाडा व अमेरिका की धरती पर पदार्पण के रूप में, तो सभी रोमाँचित हो उठे थे। ज्ञान गंगा जो गायत्री महाविद्या के रूप में ऋषि युग्म ने विगत साठ वर्षों में जन-जन तक पहुँचाई व पुण्य तोया गंगा का जन्म भी तो संयोग से एक ही साथ ही गायत्री जयंती-गंगा दशहरा के दिन हुआ था। पूज्यवर ने स्थूल काया से महाप्रयाण कर कारण सत्ता में इसी दिन प्रवेश किया था तथा पूज्यवर व परम वंदनीया माताजी ने इसी पावन दिन देवसंस्कृति दिग्विजय का संकल्प उद्घाटित करते हुए संस्कार महोत्सवों-अश्वमेधों के विश्वभर में संपन्न होने की घोषणा की थी। वस्तुतः यह सभी के लिए एक महोत्सव था, खुशी पर्व था, धरती पर स्वर्ग जैसे वातावरण को लाने की पूर्व बेला का युगान्तरीय चेतना का शंखनाद था, देवसंस्कृति के विश्वव्यापी बनने की दिशा में एक अभूतपूर्व प्रयास-पुरुषार्थ के बीजारोपण का समय था।

भारत सरकार के इंग्लैण्ड में उच्चायुक्त (हाईकमिश्नर) प्रसिद्ध विधिवत् महामहिम श्रीलक्ष्मीमल सिंधवी से 25 फरवरी 1993 को लंदन में हुई मुलाकात के समय का वार्तालाप एकाएक ही विस्तृत विवरण लिखने के पूर्व मानस पटल पर आ जाता है, जिसमें उनने कहा था कि “गायत्री परिवार भारतीय संस्कृति को विज्ञान सम्मत बनाते हुए अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रतिपादन को जिस तरह आज पश्चिम के सम्मुख रख रहा है, इसकी सबसे बड़ी आवश्यकता है-विशेषतः युवा पीढ़ी के लिए जो संस्कृति का अर्थ मात्र कला व नृत्य-गायन ही समझते हैं। पूज्य आचार्य श्री ने जिस तरह संस्कृति को जीवन प्रवाह का एक अविच्छिन्न अंग बनाते हुए उसे धर्म व सभ्यता के मध्य एक सेतु के रूप में स्थापित किया हैं, यह अभूतपूर्व है। ”देवसंस्कृति की विराट प्रदर्शनी की रूपरेखा, सेमीनार व वर्कशाप के विषय तथा यज्ञ के मूल प्रयोजन को सुनकर न केवल उनने इस कार्य के लिए साध्वाद दिया था अपितु अपने प्रयासोँ से भावनाशीलों को प्रोत्साहित करने की बात भी कही थी ताकि कम से कम इंग्लैण्ड, सं.राज्य अमरीका व कनाडा जैसे देशोँ में उनके माध्यम से यह प्रदर्शनी एक स्थायी आयोजन का रूप ले ले। अश्वमेध महायज्ञ में दस जुलाई 1993 को एवं पुनः पार्लियामेण्ट आफ वर्ल्ड रिलीजन शिकागो(यू.एस.ए.) में 2 सितम्बर 1993 को पारस्परिक चर्चा में यही विचार-भाव उनने अभिव्यक्त किये।

परिजनोँ को यह सब बताने के मूल में हमारा एक ही उद्देश्य रहा है कि वे अपने मस्तिष्कीय आयामोँ का विस्तार करें, विराट विश्व -”ग्लोबल वर्ल्ड” में क्या कुछ सूक्ष्म चेतना के माध्यम से घटित संपादित हो रहा है, यह जानें ताकि वे आश्वस्त हो सकें कि संधिवेला में बहुसंख्यक भावनाशील-बुद्धि जीवी क्रमशः एक ही चैतन्य प्रवाह से जुड़ते चले जा रहे हैं। विश्व-संस्कृति के इस लीला प्रसंग में हम इस वर्ष विदेश में संपन्न तीन अश्वमेध महायज्ञों “लेस्टर, टोरोण्टो, लॉस एंजेल्स” स्वा. विवेकानंद के अमेरिका प्रवास की शताब्दी पर विश्व हिन्दू परिषद् अमेरिका द्वारा आयोजित “विजन-2000 वाशिंगटन” विश्व धर्म संसद द्वारा 1893 में संपन्न ऐतिहासिक शिकागो वर्ल्ड पार्लियामेण्ट ऑफ रिलीजन की शताब्दी पर आयोजित द्वितीय सात दिवसीय संसद तथा शिकागो में ही अगले वर्ष 21, 30, 31 जुलाई 1994 की तारीखों में आयोजित चौथे विदेश के अश्वमेध महायज्ञ की व्यापक तैयारियाँ के विषय में बताने जा रहे हैं। इन छहों ही प्रसंगों के निमित्त जो भी कुछ गायत्री परिवार के निमित्त बने भावनाशील परिजनोँ की तथा रीछ-वानर की भूमिका रही, उसे तथा उसके सत्परिणामों व विश्वव्यापी प्रतिक्रिया को जानकर निश्चित ही अगणित अनेकों को सत्प्रेरणा मिलेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।

इंग्लैण्ड(लेस्टर) के प्रथम अश्वमेध महायज्ञ 1-10-11 जुलाई 1991 की तैयारियों की प्रारंभिक कठिनाइयों व उनके समाधान मिलते चले जानें की चर्चा हम पिछले अंक ‘अक्टो.93‘ में कर चुके हैं। गुरुपूर्णिमा एवं 3 जुलाई जब शाँतिकुँज में मनाया जा रहा था, तब हमारे नौ भाई लेस्टर में एक हजार से अधिक भावनाशील कार्यकर्ताओं के मध्य इस आयोजन को संपन्न कर अश्वमेध की प्रारंभिक भूमिका बना रहे थे। चार दिन बाद ही परम वंदनीया माताजी, डॉ.प्रणव पण्ड्या एवं श्रीमती शैलबाला पण्ड्या का आगमन भारत से होने वाला था। तैयारियाँ सभी पूरी हो चुकी थीं। 6 जुलाई को मध्याह्न हरिद्वार से ओड (खेड़ा गुज.)से परम वंदनीया माताजी के लिए बनकर आये विशिष्ट वाहन से दल दिल्ली को रवाना हुआ। दिल्ली सीमा पर दिल्ली गायत्री परिवार के परिजनों ने स्वागत की सारी तैयारियाँ कर रखीं थीं। प्रीत विहार में दर्शन देने के बाद “ईस्ट आफ कैलाश”(दक्षिणी दिल्ली) में आयोजित एक विराट सभा में नयी दिल्ली में आयोजित नवम्बर 1994 के अश्वमेध की तैयारी हेतु परिजनोँ को सुनियोजित क्रियापद्धति अपनाते हुए कार्य करने का संदेश परम वंदनीया माताजी ने दिया था तत्काल बाद ही रात्रि में लंदन के लिए ब्रिटिश एयरवेज की फ्लाइट थी जिससे रवाना हो साढ़े आठ घण्टे की यात्रा कर वे 7 जुलाई प्रातः 6 बजे लंदन जा पहुँची।

इंग्लैण्ड वासियों के लिए यह एक परम सौभाग्यशाली दिन था। इसी दिन से एक नये अध्यात्म का शुभारंभ होना था। सैकड़ों परिजन लंदन के गेटविक हवाई अड्डे पर परम वंदनीया माताजी को लेने आये थे। लंदन गेटविक से प्रायः 45 मील उत्तर में तथा लंदन से लेस्टर 110 मील उत्तर में है। पाँच जुलाई सेही परिजन लेस्टर में आना एकत्र हो गये थे। प्रवासी भारतीयों की अच्छी खासी संख्या मिडलैण्ड क्षेत्र में है। कावेण्ट्री, बर्मिघम, वाँलसाल, वुल्वर हैम्पटन, लफबरो, पीटबरो, एशबी, नटिंघम, नार्थम्पटन, ल्युटन, मिलटन कैर्न्स इन सभी का मध्य बिंदु लेस्टर माना जाता है। एम-1 मोटर वे जो इंग्लैण्ड का प्रमुख राजमार्ग है, लेस्टर को छूता हुआ निकलता है। आयोजकों ने प्रायः चार हजार कारों तथा चार सौ कोचेज (बड़े बस आकार के डबलडेकर वाहन) की पार्किंग की व्यवस्था की थी। यह भी कम पड़ने पर सोरवेली कम्यूनिटी कालेज से लगे दो तीन मील के क्षेत्र में जो इंडस्ट्रीज हैं उनने अपनी पार्किंग की सुविधा अश्वमेध के याजकों के लिए उपलब्ध करा दी। अंग्रेज नागरिकों की यह श्लाघनीय पहल आने वाले परिवर्तनों की एक शुरुआत मात्र थी।

प्रायः पंद्रह दिन से दिन में 5-6 बार ‘सनराइज’ रेडियो तथा स्पेक्ट्रम एफ.एम. बीबी सी लेस्टर से सतत् अश्वमेध के विज्ञापन आ रहे थे। “गरवी गुजरात” व लेस्टर मरक्युरी के विशेष परिशिष्ट भी 7 जुलाई को प्रकाशित हुए। सभी को जानने की जिज्ञासा थी कि कैसा होगा यह अश्वमेध? जिनने रामायण सीरियल देखा था उन्हें तो लव−कुश द्वारा घोड़ा पकड़ा जानें की कथा याद थी। यहाँ भी वे सोच रहे थे कि ऐसा ही कोई घोड़ा भारत से आने वाला होगा अथवा स्थानीय स्तर पर घोड़े की बलि की व्यवस्था की जानें वाली होगी। किन्तु 6, 7, 8 जुलाई को केन्द्रीय प्रतिनिधियों के इंटरव्यू जो प्रसारित हुए, उनसे सभी के मन की भ्रान्तियाँ निकल गयीं।

सोरवेली कम्यूनिटी कॉलेज का पूरा परिसर वासंती परिधान में रंगा था। कॉलेज में तीन बड़े कक्षोँ में प्रदर्शनी लगायी गयी थी। कोआर्डीनेंशन सेण्टर वहीं बनाया गया था। सेमीनार व वर्कशाप के लिए चार बड़े हालों की व्यवस्था की गयी थी। कॉलेज के ड्रामा थिएटर में ऋषि चिंतन’युगपुरुष “संजीवनी साधना ‘तथा भारत के अश्वमेधों की वीडियो फिल्में दिखाया जाना 9 जुलाई को प्रातः से ही आरंभ हो गया था। प्रदर्शनी सभी के आकर्षण की मूल बिंदु थी। लंबी-लंबी लाइनें लगी थीं ताकि सभी क्रम से अंदर जाकर अनुशासित ढंग से अध्यात्म के विज्ञान सम्मत प्रतिपादन को देख समझ सकें प्रायः सौ परिजनों ने भोपाल’भारत’से आए श्रीदत्तात्रेय एम. जोशी के सहायक के रूप में पिछले चार-पाँच दिन से रात-दिन लग कर यह विशाल प्रदर्शनी खड़ी की थी कैप्शन्स लिखे थे एवं लगभग एक हजार चित्रों, ट्राँसपेरेसी तथा वैज्ञानिक उपकरणों-माडल्स के सहारे देवसंस्कृति का आमूलचूल एक नया ढाँचा खड़ा कर दिया था। वैज्ञानिक चार्ट्स के द्वारा सभी यह देख-समझ रहे थे कि ब्रह्मवर्चस् की शोध में किस किस क्षेत्र में साधकों को क्या-क्या लाभ मिले हैं। ब्रिटिश लोगों के लिए ये आँकड़े तो आँख खोल देने वाले थे। षोडश संस्कारों की विधि सम्मत वैज्ञानिक व्याख्या, आसन-प्राणायाम-ध्यान के वैज्ञानिक आयाम व शरीर -मन के अलावा आध्यात्मिक लाभ, मंदिरों के शिल्प के मूल में छिपी तर्क सम्मत ऋषि मनीषा, पर्व-त्यौहारोँ के तथ्य प्रधान निरूपण से भारतीय संस्कृति का एक विलक्षण आयाम लोगों को देखने को मिला। ध्यान कैसे किया जाना चाहिए, इसके लिए एक फ्रेममार्की का डोम बनाया गया था। जो पिरामिड आकार के ऊपर गुँबद रूप में था जिसमें ध्यान एक संक्षिप्त टिप्पणी के बाद संपन्न होता था। जड़ी-बूटियों चिकित्सा भारतीय व पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य में कैसे व्यवहारिक स्तर पर वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति बन सकती है, यह सबके कौतूहल का बिंदु था। परमपूज्य गुरुदेव के जीवन वृत्त मिशन के भावी निर्धारण तथा यज्ञ व अश्वमेधों के इतिहास व गायत्री महाशक्ति के चौबीस रूपों की झलक झाँकी देखकर इस प्रदर्शनी के सर्वांगपूर्ण रूप को सभी ने सराहा। हाउस ऑफ लार्ड्स एवं कामन्स से आए संसद सदस्यों, पुलिस ग्रह विभाग के अधिकारी गणों व विभिन्न संस्थाओं के प्रमुखों ने भी इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया।

कलश यात्रा का समय प्रातः 9 बजे का निर्धारित था। तीन हजार से अधिक बहिनें कलश धारण करने को सनातन मंदिर पहुँच गयी थीं। किंतु इंग्लैण्ड का मौसम जो सदा अनिश्चित रहता है प्रातः से ही रुठा सा लग रहा था। तेज बारिश 11 बजे थम गयी। तब परम वंदनीया माताजी के साथ झाँकियाँ सहित एक कलश यात्रा का शुभारंभ उनके संक्षिप्त उद्बोधन व कलश पूजन के बाद हुआ। प्रायः दस हजार से अधिक व्यक्ति कलश यात्रा में थे। स्वामी नारायण संस्था (बोन्नासनवासी अक्षय पुरुषोत्तम धाम) सत्य साईं मिशन, सीताराम सेवा ट्रस्ट आदि के स्वयं सेवक कलश यात्रा को सुव्यवस्थित ढंग से चला रहे थे। दोपहर देवपूजन के पश्चात् यज्ञाश्व प्रवेश होना था। ध्वजारोहण में भारत, इंग्लैण्ड एवं युग निर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान के ध्वज फहराये गये। देवपूजन के समय कलश पूजन के समय वरुण देवता का आह्वान करते ही एकाएक बारिश आरंभ हो गयी। पर यह क्षणिक ही थी क्योंकि मात्र उपस्थिति का आभास कराने को वरुण देवता ने यह उपक्रम जुटाया था। यज्ञाश्व प्रवेश के साथ ही परम वंदनीया माताजी द्वारा घोषणा हुई एवं पाँचवे अश्वमेध महायज्ञ(विदेश के सर्वप्रथम) का शंखनाद हो गया। परम वंदनीया माताजी के उद्बोधन के साथ कार्यक्रम समापन हुआ। शनिवार-रविवार 10 व 11 जुलाई को सभी ओर से एक ही रुख था -लेस्टर की ओर। प्रशासन की व्यवस्था पूरी थी पर परिजनोँ का सहयोग भी अनुपम था। प्रायः साठ हजार व्यक्तियों ने शनिवार को व पिचहत्तर हजार व्यक्तियों ने रविवार को यज्ञ में भाग लिया। विदेश में जब किसी के पास भी थोड़ा सा समय अन्य किसी काम के लिये नहीं है। इतनी बड़ी संख्या जुट जाना अभूतपूर्व था। वहाँ के इतिहास में यह प्रथम ही ऐसा विराट आयोजन था। भारी संख्या में ब्रिटिश नागरिकों ने भी भाग लिया। कई उत्सुक व्यक्ति प्रदर्शनी देखने व वर्कशाप आदि में आए। सेमीना (संगोष्ठी) व वर्कशाप (कार्यशाला )का मूल उद्देश्य था-भारतीय संस्कृति संबंधी विचारोत्तेजक विषयों पर वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण द्वारा युवा वर्ग के मन में फैली भ्रान्तियों का निवारण जन-जन को देव-संस्कृति के तर्क तथ्य-प्रमाण सम्मत स्वरूप की जानकारी तथा प्रश्नोत्तरी के माध्यम से ज्ञानयज्ञ में सबकी भागीदारी। तनाव को कैसे कम किया जाय?शरीर मन आत्मा को कैसे चुस्त दुरुस्त रखा जाय?(फिजीकल-मेण्टल-स्प्रिचुअल फिटनेस)गायत्री साधना व उससे जुड़ी शंकाएं-समाधान, ध्यान का साकार एवं निराकार स्वरूप कैसा हो व्यवहारिक स्तर पर कैसे उसे करें, युवा वर्ग की समस्याएं व उनका समाधान, नारी शक्ति की नवनिर्माण में भूमिका जैसे विषयों पर वर्कशाप एवं सेमीना आयोजित हुई। डॉ.रमण गोकल, प्रमोद भटनागर, श्रीकालीचरण शर्मा, सूरज प्रसाद शुक्ला एवं डा. प्रणव पण्ड्या द्वारा अंग्रेजी में प्रस्तुत इन संगोष्ठियों में प्रायः चार हजार से अधिक ने भागीदारी की।

यज्ञ, दीक्षा, संस्कारों का क्रम नित्य चलता रहा। सबसे भाव भरा वंदनीया माताजी का 11 जुलाई को विदाई उद्बोधन था जब उनने सभी प्रवासी परिजनों को सतत् अपना सामीप्य संरक्षण देने का आश्वासन एक गीत के माध्यम से दिया। अंतिम दिन सभी की इच्छा होने के कारण भारत की ही तरह पर्वों पर चलने वाले प्रवास का उपक्रम चल पड़ा। परम वंदनीया माताजी को प्रणाम कर यज्ञ का प्रसाद ले परिजन पीछे चल रहे गरबा में सम्मिलित होते जा रहे थे। प्रणाम का क्रम प्रायः 6 घण्टे तक चला। तत्पश्चात् लंदन होकर परम वंदनीया माताजी 13 जुलाई प्रातः को वापस लौट आयी। शेष दल कनाडा (टोरेण्टो) महायज्ञ (23, 24, 25 जुलाई की तैयारी के लिए उसी दिन प्रातः रवाना हो गया। )

कनाडा में प्रवासी परिजन यों तो पाँच लाख से अधिक हैं किन्तु टोरेण्टो अकेले व आसपास के क्षेत्र में उनकी संख्या पौने दो लाख हैं। यही नहीं अमेरिका की सीमा लगी हुई है अतः शिकागो, डेटाँयर, बफेलो, न्यूजर्सी आदि के परिजन सतत् कनाडा आते जाते रहते हैं। टोरेण्टो महायज्ञ की यही विशेषता रही कि उसमें टोरेण्टो गायत्री परिवार का जितना योगदान था, उसका एक चौथाई योगदान अमेरिका के विभिन्न नगरों से आए परिजनों का भी जिनने इसे अपना कार्यक्रम मानकर स्वयं सेवक वृत्ति से सारा कार्य किया। इसमें वाशिंगटन, वर्जीनिया, अटलाण्टा, फलोरिडा, टेक्सास, ओकलाहोमा तथा लास ऐंजल्स से आए परिजन भी थे। टोरेण्टो को ओशावा, ओटावा ‘कनाडा की राजधानी’ तथा माण्ट्रियल के परिजनों का भी खूब सहकार मिला। बहुसंख्यक कैनेडियन मूल के नागरिक, प्रसिद्धि भविष्य वेत्ता एलन काइट जो पीले वस्त्रों में थे। फेडरेशन ऑफ हिन्दू एसोसिएशन ’एफ.आई.एच.’ के प्रायः 80 से अधिक संगठनों के प्रमुख कार्यकर्ता इस आयोजन से जुड़े हुए थे। डॉ.प्रणव व कालीचरण जी पहले दो बार तैयारी हेतु यहाँ की यात्रा मई-जून में कर चुके थे अतः अश्वमेध समिति यार्क यूनिवर्सिटी कैम्पस में भरपूर तैयारी के साथ जुटी हुई थी। पूरा कैम्पस ही विशाल सभागारों पण्डाल हेतु दो बड़े मैदान, कार पार्किंग व आवास हेतु यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दे दिया था। प्रदर्शनी जहाँ लगनी थी वहाँ पहले से ही एक विशाल “अश्व “का मॉडल खड़ा हुआ था। उसी के चारों ओर अश्वमेध की प्रदर्शनी लगा दी गयी। प्रतीक्षा वंदनीया माताजी की थी जो नयी दिल्ली से 20 जुलाई की संध्या तक पहुंचने वाली थीं। टोरेण्टो एयरपोर्ट से भव्य शोभयात्रा के माध्यम से परम वंदनीया माताजी यार्क यूनिवर्सिटी कैम्पस पहुँची। उनके आने के साथ ही टोरेण्टो के मौसम का मिज़ाज भी बदल गया। सभी वर्षा की संभावना से परेशान थे किंतु 21 जुलाई को शाम को खुला मौसम हल्की बादलों की छाँव वाली ठण्डक लिए यथावत् बना रहा तथा 25 जुलाई को मौसम विभाग की खुली घोषणा के बावजूद कि दोपहर से ही घनघोर बारिश व ओलों की वृष्टि होने लगेगी, रात्रि परम वंदनीया माताजी के विमान के लंदन की ओर प्रस्थान के बाद ही फिर अपने मिज़ाज में आया।

ऐसी घनघोर बारिश रात्रि 8 के बाद हुई कि प्रातः 11-11-30 तक नहीं थमी। तब तक आयोजक सभी कार्यों से निवृत्त हो चुके थे।

टोरेण्टो में यज्ञ का उपक्रम यद्यपि लेस्टर की ही भाँति रहा, दीक्षा-संस्कार देवाह्यान-आहुतियाँ-आरती, वर्कशाप, सेमीनार एवं प्रदर्शनी जो दिन-रात ख्ली रही व लगभग सत्तर हजार से अधिक व्यक्तियों ने देखी, कुछ बातें लेस्टर से भिन्न व विलक्षण स्तर पर संपन्न हुई। प्रायः पाँच प्राँतीय व केन्द्रीय स्तर के मंत्री इस यज्ञ में आये, अधिकारी गण भी गृह व आव्रजन विभाग से लेकर अग्नि सुरक्षा, पुलिस, यातायात आदि के नित्य यज्ञ में भाग लेते रहे। भाग लेने वाले विदेशी कैनेडियन, ब्रिटिश नागरिकों की तुलना में अधिक थे। भागीदारी करने वाले योजकों की संख्या भी पाँच हजार से अधिक अमेरिका-वासियों के साथ मिलकर अस्सी हजार से अधिक पहुँच गयी थी। प्रवीण भाई सूटर्स वाले, रमेश भाई मजीठिया व रमेश भाई चोराई के सहयोग से भोजन व्यवस्था, ज्यूस आदि की व्यवस्था व अन्य आर्थिक सुप्रबंध सहज ही बन गए थे। कनाडा सरकार ने इस कार्यक्रम को मल्टी फेथ कन्वेंशन बताते हुए अपनी ओर से पैंतीस हजार कैनेडियन डालर ’7 लाख रुपयों’ का अनुदान चेक रूप में अपनी नागरिक आब्रजन मंत्री सुश्री जिम्बा के माध्यम से परम वंदनीया माताजी को भेंट किया। यह सारी उपलब्धियाँ इस यज्ञ की सभी के लिए अनूठी रहीं। चमत्कारोँ के प्रसंगों की जो अगणित हे, हम छोड़ दें तो भी प्रत्यक्ष जो हुआ उसे कोई प्रमाण की आवश्यकता नहीं। ”महायज्ञ में आओ, आहुतियाँ स्वीकार करो”वाला देवाहान का सामगान आरंभ होते ही एक साथ नौ नारियलों का टोरेण्टो में, अटलाण्टा तथा मियामी फ्लोरिडा में 108 व 51 कुण्डी यज्ञों में फटना स्वयं में एक अद्वितीय घटना है जो बताती है कि भाव हो तो देवता स्वयं पधारते हैं।

परम वंदनीया माताजी के 25 जुलाई को लंदन होकर दिल्ली रवाना होने के बाद एक दल श्रीकालीचरण व प्रमोद भटनागर के नेतृत्व में लॉस ऐंजल्स’ स.राज्य अमेरिका’महायज्ञ की तैयारियों के लिए अगले ही दिन प्रस्थान कर गया था तथा डॉ.प्रणव के साथ एक दल न्यूयार्क, न्यूजर्सी, वाशिंगटन व कैलीफोर्निया की राजधानी सेक्रामेण्टो होता हुआ लॉस ऐंजेल्स, अगस्त के मध्य में पहुँचा। इनमें उल्लेखनीय है न्यूजर्सी में 6 हजार से अधिक व्यक्तियों द्वारा 108 कुण्डी गायत्री महायज्ञ, वाशिंगटन में स्वामी विवेकानन्द की स्मृति में आयोजित विजन 2000 एक विद्वत्सभा तथा सेक्रामेण्टो में भागवत् कथाकार श्री रमेश भाई ओझा व चिदानंद मुनि जी की उपस्थिति में 501 कुण्डी गायत्री महायज्ञ “विजन-2000” अपने आप में अनूठी उपलब्धि लिए एक कार्यक्रम के रूप में संपन्न हुआ जिसमें हिन्दुत्व अपनी पूरी गरिमा व साँस्कृतिक वैभव के रूप में तीन दिवसीय आयोजन के रूप में 6, 7, 8 अगस्त को अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन के हृदय स्थल पर छाया दिखाई दे रहा था। अमेरिका की विभिन्न यूनिवर्सिटी के विद्वान तथा सारे विश्व के विश्व हिन्दू परिषद तथा धर्मतंत्र से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने एक साथ एकत्र हो वाशिंगटन हिल्टन होटल में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार विमर्श किया तथा स्वामी विवेकानन्द का स्मरण करते हुए उनके कार्य को विश्व भर में फैलाने का संकल्प लिया गया। शाँतिकुँज का प्रतिनिधित्व कर रहे डॉ. प्रणव पण्ड्या के युवा वर्ग में तथा बुद्धिजीवी वर्ग में तीन व्याख्यान थे। हाँरमोनी ऑफ रिलीजन्स, रिलीजन ऑफ फ्यूचर तथा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर दी गयी वक्ताओं के माध्यम से परम पूज्य गुरुदेव के प्रतिपादन प्रायः दस से पन्द्रह हजार नये प्रबुद्ध व्यक्तियों तक पहुँचे। अनेकों नये व्यक्ति मिशन की प्रवृत्तियों से जुड़े व इस प्रकार एक नूतन अध्याय आरंभ हुआ।

पूरे शाँतिकुँज दल का अंतिम कार्यक्रम “लॉस ऐंजल्स यू.एस.ए का अश्वमेध था जो शृंखला में सातवाँ व विदेश में तृतीय था। टोरेण्टो व लेस्टर की ही तरह यहाँ तीन दिन तक महायज्ञ दीक्षा, संस्कार, पं.वंदनीया माताजी के उद्बोधन के साथ साथ विराट देवसंस्कृति की प्रदर्शनी एवं सेरीटोस कॉलेज नारवाँक में सेमीनार-वर्कशाप का क्रम चला। जो भी कुछ अन्य स्थानों से अलग घटित हुआ वह यहाँ उल्लेख के योग्य है। लॉस ऐंजेल्स अमेरिका विशाल महाद्वीप के पश्चिमी तट पर स्थित एक विशाल नगर है जिसकी 80 से अधिक उपनगरियाँ हैं। हालीवुड भी यहाँ है तो विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों के हेडक्वार्टर से भी यहीं हैं। यहाँ तक कि स्वामी विवेकानन्द ने भी शिकागो धर्म सभा के बाद अपना पहला केन्द्र यहीं स्थापित किया था। गायत्री परिवार लॉस ऐंजेल्स विगत 14 वर्षों से सतत् साप्ताहिक गायत्री यज्ञ कर जन-जन तक गायत्री व यज्ञ के संदेश के कारण संभवतः उन्हें अमेरिका में आयोजन का सौभाग्य मिला। अपने परिवार से जुड़े सभी व्यक्ति प्रबुद्ध समुदाय के इंजीनियर्स, चिकित्सक अथवा व्यापारी गण हैं। सभी ने एक जुट होकर जो कार्य किया उससे सत्तर से अस्सी हजार से अधिक जनसमुदाय तीन दिन तक सेरीटास महाविद्यालय के कैम्पस में उपस्थित हो कृतकृत्य होकर गया। पाँच हजार से अधिक गोरे अमेरिकन एवं अन्य आध्यात्मिक संस्थाओं -चर्चों से जुड़े प्रतिनिधियों ने इसमें भागीदारी की। प्रबुद्ध वर्ग की गोष्ठियाँ अत्यन्त सफल रहीं। युवावर्ग सर्वाधिक यहीं उपस्थित रहा। पहली इंग्लिश की अंतर्राष्ट्रीय स्तर की किताब का जिसमें गायत्री संबंधी समस्त शंकाओं का समाधान तथा मिशन के विराट स्वरूप का परिचय है, यही विमोचन हुआ।

इस कार्यक्रम के साथ ही विदेश के अश्वमेधी पराक्रम का समापन हो गया एवं अश्वमेध यज्ञ की ध्वजा गायत्री परिवार यू. एस. एवं प्रतिनिधि द्वारा शिकागो यज्ञ के आयोजक गणों को दे दी गयी, जो 29, 30, 31 जुलाई 1994 की तारीखों में आगामी ‘विदेश का चौथा’ अश्वमेध संपन्न करेंगे। परम वंदनीया माताजी के साथ आठ सदस्यीय दल 24 अगस्त को चलकर भारत वापस 26 अगस्त को आ गया जहाँ हरिद्वार नगरी की प्रारंभिक सीमा से भव्य स्वागत द्वारा उन्हें शाँतिकुँज लाया गया। एक दूसरा दल डॉ. प्रणव पण्ड्या के नेतृत्व में ‘शिकागो’ महायज्ञ के प्रयास हेतु साढ़े तीन हजार मील की प्रव्रज्या व एक विराट 151 कुण्डी यज्ञ आयोजन हेतु तथा”वर्ल्ड पार्लियामेण्ट ऑफ रिलीजन”जो सौ वर्षों बाद इतिहास में दूसरी बार 25 अगस्त से 4 सितम्बर 1993 के मध्य शिकागो में आयोजित थीं, में विश्व गायत्री परिवार की एक बड़े स्तर पर भागीदारी करने हेतु रुक गया। इन दोनों ही कार्यक्रमों को संपन्न कर दल 17 सितम्बर को भारत लौटा। इन अभूतपूर्व आयोजनों की एक संक्षिप्त सी झलक आगामी अंक में पाठक देख सकेंगे। निश्चित ही देवसंस्कृति को विश्व संस्कृति बनाने का महाकाल का यह उपक्रम इन उपलब्धियोँ के माध्यम से हम सभी को एक जुट हो सक्रिय बनने का संदेश दे रहा है। हम उस पुकार को अनसुनी कर दें तो अलग बात है, किन्तु जो भी कुछ हो रहा है व भविष्य में घटित होने वाले परिवर्तनों की एक चेतावनी भरी झाँकी मात्र है।

*समाप्त*