मनुष्य को भटके हुए देवता की अत्युक्ति दी गयी है व यह कहा जाता रहा है कि कभी तो उसको अहसास होगा, अपने अन्दर निहित देवत्व का। कभी तो वह पहचानेगा कि किन महान उद्देश्यों को लेकर वह जन्मा है व स्रष्टा ने, उसके परमपिता ने, उससे क्या-क्या अपेक्षाएँ रखी है ? यह एक विडम्बना ही तो है कि मनुष्य सबकुछ जानते समझते हुए भी उसी राह पर चलता रहता है जो उसे नर-पशु बनने की दिशा में ले जाती है। नर-पशु वह जो मात्र पेट-प्रजनन तक सीमित ही न रहे, उसमें इतना लिप्त हो जा कि दीन-दुनिया, भगवान-परब्रह्म, समाज-परमार्थ किसी का कोई संबंध वह स्वयं से न मानें। इस युग की यह सबसे बड़ी नासमझी है जो अनेकों पर सवार है व ढेरों कुकृत्य उनसे कराती रहती हैं।
अध्यात्म, भटकन से उबारने की विधा का नाम है। अध्यात्म उस दूरदर्शिता का नाम है जो व्यक्ति यदि अंगीकार करले तो उसका देवत्व की ओर अग्रगमन का पथ कंटक विहीन होता चला जाता है। अध्यात्म आदर्शों का जीवन में उतारते हुए जीवन को श्रेष्ठतम बनाने का विधा का नाम है। वस्तुतः यह सही अर्थों में वही विधा है जिसका आश्रय लेने पर मनुष्य अमरत्व को - अमृतत्व को प्राप्त होता है (विधाऽयामृतमश्नुते)। अध्यात्म मनुष्य को संकीर्णता की पगडंडी से निकालकर उदार-परमार्थ की चौड़ी राजमार्ग की पट्टी पर ले जाने वाली एक ऐसी प्रक्रिया का नाम है जो देखते ही देखते व्यक्ति का आमूलचूल कायाकल्प कर देती है।
हमें देखना होगा कि हमें किस पथ पर जाना है ? कहीं यूँ ही तो नहीं चल दिए, बिना कुछ सोचे-समझे-विचार किये? बिना अपरिचित स्थान का नक्शा देखे, सही मार्ग पहले से मन में न रखकर चलने वाला भटकता ही रहता है, कभी मंजिल तक नहीं पहुँच पाता। यह भटकन बड़ी दुख भरी, संत्रास भरी परिस्थितियाँ पैदा करती है व तब हम परिस्थितियों को दोष देने लगते हैं। यदि भटकन से मुक्ति पानी है तो हम राजमार्ग पकड़े-अध्यात्म के अवलंबन का, आदर्शों के समुच्चय को जीवन का अपरिहार्य अंग बनाने का। फिर हम चाहे मंदिर जायें-न जानें, कर्मकाण्ड करें-न करें, हमारा भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है क्योंकि वास्तविक भगवान जो अंदर बैठा है, हमारे साथ है व मार्गदर्शन करता हुआ वह निश्चित ही हमें देवत्व की ओर ले जाएगा।
“आर्य श्रेष्ठ!” आचार्य पत्नी ने यम से विनती निवेदन किया- “नचिकेता अभी किशोर ही तो है, उसके साथ इतनी कठोरता मुझसे देखी नहीं जाती। दस माह बीत गए उसने मठा और जौ की सूखी रोटियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं खाया। जबकि अन्य स्नातक और स्वयं मेरे बच्चे भी रसयुक्त, स्वादिष्ट भोजन करते हैं। फिर उसी के साथ इतनी कठोरता क्यों?”
यमाचार्य ने हँसकर कहा- “देवी! तुम नहीं जानती-साधना को ‘समर’ कहते हैं। युद्ध में तो अपना प्राण भी संकट में पड़ सकता है फिर भी कोई आवश्यक नहीं कि विजय ही उपलब्ध हो। अभी तो नचिकेता का अन्य संस्कार ही कराया गया है। परमात्म चेतना अत्यन्त पवित्र है, अग्नि रूप है। शरीर सामर्थ्य न होगा तो नचिकेता उसे धारण कैसे करेगा। नचिकेता आ यह अन्य संस्कार उसके अन्नमय कोश के दूषित मलावरण, रोग और विजातीय द्रव्य को निकालकर उस आत्मा-साक्षात्कार के योग्य शुद्ध एवं उपयुक्त बना देगा। यद्यपि यह सब छुरे की धार पर चलने के समान कठिन है। पर-नचिकेता के समान साहसी और प्रबल आत्म जिज्ञासु इसे सरलता से निभा लेते हैं। “
गुरु माता के विरोध के बावजूद भी नचिकेता का अन्न संस्कार एक वर्ष तक चलता रहा और उसके बाद आचार्य यम ने उसे प्राणायाम के अभ्यास प्रारम्भ करायें। प्राणाकर्षण, लोभ-विलोम, सूर्य-वेधन उज्जयी और नाड़ी शोधन आदि प्राणायाम का अभ्यास कराते हुए कुछ दिन बीते, उसके प्रभाव से युवा साधक के मुखमण्डल पर काँति तो बढ़ी पर उसका आहार निरन्तर घटता ही चला गया। गुरु माता यह देखकर पुनः दुःखी हुई और बोली ‘स्वामी! ऐसा न करो। नचिकेता किसी और का पुत्र है। कठोरता अपने बच्चों के साथ बरती जा सकती है और के साथ नहीं।’
यमाचार्य फिर हँसे और बोले-’भद्रे! शिष्य अपने पुत्र से बढ़कर होता है। उस बालक के हृदय में तीव्र आत्मा जिज्ञासाएँ हैं। यह वीर और साहसी बालक आत्म कल्याण की, साधनाओं की हर कठिनाई झेलने में समर्थ है, इसीलिए हम उसे पंचाग्नि विद्या सिखा रहे हैं। आर्यावर्त की पीढ़ियाँ कायर और कमजोर न हो पायें और यह आत्म विद्या लुप्त न हो जाये इस दृष्टि से भी नचिकेता को यह साधना कराना श्रेयस्कर ही है। माना कि उसका आहार कम हो गया है। पर प्राण स्वयं ही आहार है। आत्मा अग्नि रूप है, प्राण और प्रकाशवान है, वह प्राणायाम से पुष्ट होती है। इसी से उसे हर पौष्टिक आहर मिलते हैं। मनोमय कोश के लिए प्राणमय कोश का यह परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।”
एक वर्ष प्राण साधना में बीता। नचिकेता को अब यमाचार्य ने मन के हर संकल्प को पूरा करने का अभ्यास कराया। वह सोता तब अचेतन मन की पूर्व जन्मों की क्रियायें स्वप्न पटल पर उभरती, उसमें कई ऐसे पापों की क्रियाएँ भी होती जिन्हें प्रकट करने पर आत्मग्लानि होती। उसको वह सारी बातें बतानी पड़ती। गुरु माता ने उससे भी उसे बचाने का यत्न किया, पर यमाचार्य ने कहा-”आत्मग्लानि और कुछ नहीं पूर्व जन्मों के पापों के संस्कार मात्र हैं, जब तक मन निताँत शुद्ध नहीं हो जाता तब तक आत्मबोधन का मनोबल कहाँ से आएगा। मन की गाँठें खोलने का इसके अतिरिक्त कोई उपाय भी तो नहीं है कि साधक अपनी इस जन्म की सारी की सारी गुप्त बातें को प्रकट कर अपने कुसंस्कार धोये, स्वप्नों में परिलक्षित होने वालों में पूर्व जन्मों के पापों को भी उसी प्रकार बताये और उनकी शुद्धि प्रायश्चित करे।
मनोमय कोश भी शुद्धि के लिए नचिकेता को कच्छ चांद्रायण से लेकर गोमय--गोमूत्र सेवन तक की सारी प्रायश्चित साधनाएँ करनी पड़ती। उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरु माता का हृदय करुणा से सिसक उठता। पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने जितना समर कितना कष्ट-साध्य है। अतएव नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित नहीं हुए।
तीन वर्ष बीत गए, उसने कोई जीवन सुख नहीं जाना। शरीर को उसने शुद्ध कर लिया पर शरीर क्षीण हो गया, प्राणों पर नियंत्रण भी सीख लिया पर उससे मन क्षीण हो गया। मनोमय कोश को भी उसने जीत लिया। संकल्प-विकल्प युक्त नचिकेता अब इस स्थिति में था कि अपने मन को ब्रह्मरंध्र में प्रवेश कराकर सूक्ष्म जगत के विज्ञानमय रहस्यों की खोज करें और आत्मा तक पहुँच कर उसे शोभित करे, जगाए और प्राप्त करे। मन को दबाकर क्रमशः आज्ञा चक्र, विशुद्ध चक्र, मणिपुर चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, अनाहत चक्र तक प्रवेश किया। वहाँ बैठी हुई महाविद्या रूपिणी कुण्डलिनी की हल्की झाँकी होती तो उसका मन काँप उठता। पर दूसरे ही क्षण एक पुकार अन्तःकरण से आती कि मान लें यह भौतिक सुख नचिकेता अगर मिल भी गए तो इन्द्रियाँ उनका रसास्वादन कितने दिन तक कर सकती हैं। तू तो उस अक्षर, अविनाशी आत्मा का वरण कर।
पूर्णमासी का दिन, बसंत ऋतु-चार वर्ष से निरंतर उम्र तप कर रहे नचिकेता का शरीर बिल्कुल क्षीण हो गया था। आज का दिन उसके लिए विशेष महत्व का था। एक प्राण को दूसरे प्राण में समेटता हुआ वह मूलाधार तक जा पहुँचा। उसने अपने संकल्प की चोट की उस आद्यशक्ति पर। चिर निद्रा में विलीन कुण्डलिनी पर उसका कुछ असर हुआ, इस पर उसने तीव्र से तीव्रतर प्रहार हुआ, चोट खाई हुई काल सर्पिणी फुंसकार मार कर उठी व सहस्रार तक जाकर फुफकारने लगी। उसने नचिकेता के मन के स्थूल भाव को चबा डाला, जला डाला। नचिकेता आज मन न रहकर आत्मा हो गया। उसकी लौकिक वासनायें पूरी तरह जल गई। वह ऋषि हो गया।
अब वह ब्रह्म में विलीन हो सकता था। तथापि अपनी महान संस्कृति के उत्थान का संकल्प लेकर वह यहाँ से चल पड़ा और नवनिर्माण के महान कार्य में जुट गया। उसने इस पंचाग्नि विद्या का सारे संसार में प्रसार कर अमर साधक कहाने का श्रेय प्राप्त किया।
ईश्वर को किसी ने देखा नहीं है और न वह सर्वव्यापी निराकार होने के कारण देखने की वस्तु है। इसकी प्रतीक प्रतिमा तो इसलिए बनायी जाती है कि मानवी कलेवर में उत्कृष्टता की पक्षधर भाव-श्रद्धा को उस माध्यम के साथ जोड़कर परब्रह्म को विशिष्टताओं की परिकल्पना करना सर्वसाधारण के लिए सहज संभव हो सके। राष्ट्रध्वज में देश भक्ति की भाव-श्रद्धा का समावेश करके उसे गर्व-गौरव के साथ दुहराया और समुचित सम्मान प्रदान किया जाता है। इसी प्रकार सर्वव्यापी, न्यायनिष्ठ सत्ता का प्रतिमा में आरोपण करके भाव-श्रद्धा को उस स्तर की बनाया, सुविकसित किया जाता है कि वह सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय परब्रह्म के साथ जुड़ सकने योग्य बन सके।
भगवान का दर्शन करने के लिए लालायित अर्जुन, काकभुसुण्डि, यशोदा, कौशल्या आदि के आग्रह का जब किसी प्रकार समाधान होते न दीख पड़ा और साकार दर्शन का आग्रह बना ही रहा तो उन्हें तत्वज्ञान की प्रकाश प्रेरणा ने इस विशाल विश्व को ही विराट् स्वरूप दर्शन का वर्णन-विवेचन गीताकार ने अलंकारिक ढंग से समझते हुए यह प्रयत्न किया है कि विश्वव्यापी उत्कृष्टता ही उपासना योग्य ईश्वरीय सत्ता है। यों यह समस्त विश्व-ब्रह्मांड में तो एक नियामक सूत्र संचालक के रूप में जानी मानी जा सकती है। उसे अनुशासन, संतुलन, सुनियोजन आदि के रूप में ही वैज्ञानिक दृष्टि से समझा जा सकता है। उसकी अनुभूति भाव श्रद्धा के रूप में ही हो सकती है। तन्मय और तद्रूप होकर ही उसे पाया जा सकता है। अग्नि के साथ एकात्मता प्राप्त करने के लिए ईंधन को आत्म समर्पण करना पड़ता है और अपना स्वतंत्र अस्तित्व मिटाकर तद्रूप होने का साहस जुटाना पड़ता है। ईश्वर और जीव के मिलन की यह प्रक्रिया है। नाले को नदी में अपना विलय करना पड़ता है। पानी को दूध में घुलना और वैसा ही स्वाद स्वरूप धारण करना पड़ता है। पति और पत्नी इस समर्पण की मानसिकता को अपना कर ही द्वैत से अद्वैत की स्थिति में पहुँचते हैं। मनुष्य भी जब देवत्व से संपन्न होता है तो देवता बन जाता है और जब उसमें परमात्मा जैसी व्यापकता ओत-प्रोत हो जाती है तो आत्मा की स्थिति परमात्मा जैसी हो जाती है। उसमें बहुत कुछ उलटफेर करने की अलौकिकता भी समाविष्ट हो जाती है। ऋषियों और सिद्ध पुरुषों को इसी दृष्टि से देखा और उन्हें प्रायः वैसा ही श्रेय सम्मान दिया जाता है।
विभिन्न मतमतान्तरों के अनुरूप विभिन्न प्रकार की पूजा पद्धतियाँ क्षेत्र या सम्प्रदाय विशेष में प्रचलित पायी जाती हैं, पर उन सबके पीछे लक्ष्य और रहस्य एक ही काम करता है कि अपने आप को परिष्कृत एवं सुव्यवस्थित बनाया जाय। यही है ईश्वर की एक मात्र पूजा, उपासना एवं अभ्यर्थना। विश्व व्यवस्था में निरन्तर संलग्न परमेश्वर को इतनी फुरसत नहीं कि वह इतने भक्तजनों की मनुहार सुने और चित्र-विचित्र उपहारों को ग्रहण करे। यह सब तो मात्र अभ्यर्थना के माध्यम से अपने आपको उत्कृष्टता के मार्ग पर चल पड़ने के लिए स्वसंकेतों के रूप में रचा और किया जाता है। ईश्वर पर न किसी की प्रशंसा का कोई असर पड़ता है और न निंदा का। पुजारी नित्य प्रशंसा के पुल बाँधते और निन्दक हजारों गालियाँ सुनाते हैं। इनमें से किसी की भी बकझक का उस पर कोई असर नहीं पड़ता। गिड़गिड़ाने, नाक रगड़ने पर भी चुनाव आयोग किसी को अफसर नियुक्त नहीं करता। छात्रवृत्ति पाने के लिए अच्छे नम्बर लाने और प्रतिस्पर्धा जीतने से कम में किसी प्रकार भी काम नहीं चलाता। ईश्वर की भी यही सुनिश्चित रीति-नीति है उसकी प्रसन्नता इसी एक केन्द्र-बिन्दु पर केन्द्रित है कि किसने उसके विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुन्दर-समुन्नत बनाने के लिए कितने अनुदान प्रस्तुत किये। अपने को कितना प्रामाणिक एवं परिष्कृत बनाया। उपासनात्मक कर्मकाण्ड इसी एक सुनिश्चित व्यवस्था को जानने-मानने के लिए किये और अपनाये जाते हैं। यदि कर्मकाण्ड भर लकीर पीटने की तरह पूरे किये जायँ और परमात्मा के आदेश-अनुशासन की अवज्ञा की जाती रहे, तो समझना चाहिए कि यह बालक्रीड़ा मात्र खेल-खिलवाड़ है। उतने भर से क्या
किसी का कुछ भला हो सकने वाला है? नहीं?
देवपूजा के कर्मकांडों को प्रतीकोपासना कहते हैं - जिसका तात्पर्य है कि संकेतों के आधार पर क्रिया-कलापों को निर्धारित करना। देवता का प्रतीक एक पूर्ण मनुष्य की परिकल्पना है जिससे प्रेरणा पाकर उपासक को भी हर स्थिति में सर्वांग सुन्दर एवं नवयुवकों जैसी मनःस्थिति में बने रहना चाहिए। देवियाँ मातृसत्ता की प्रतीक हैं। उनको तरुणी एवं सौंदर्यमयी होते हुए भी कुदृष्टि से नहीं देखा जाता, वरन् पवित्रता की मान्यता विकसित करते हुए उन्हें श्रद्धा-पूर्वक नमन-वंदन ही किया जाता है। नारी मात्र के प्रति साधक की मान्यतायें इस स्तर की विनिर्मित, विकसित होनी चाहिए।
पूजा-अर्चना में जल, अक्षत, पुष्प, चंदन, धूप-दीप नैवेद्य आदि को संजोकर रखा जाता है। इसका तात्पर्य उन माध्यम संकेतों को ध्यान में रखते
यह संसार दो तत्वों से विनिर्मित है-एक-जड़, दूसरा-चेतन। जड़ अर्थात् पदार्थ और चेतन अर्थात्-प्राण। मानवी अस्तित्व इन्हीं दो आधारों पर खड़ा है। पंचतत्वों से बना शरीर पदार्थ परक है, तो पंचप्राणों के समन्वय से बनी चेतन आत्मा। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जीवधारी भी इन्हीं दोनों के समन्वय से बने हैं। अस्तु इन दोनों के क्षेत्रों में काम करने वालों को उनके स्वरूप एवं सदुपयोग का ज्ञान होना चाहिए और इस संदर्भ में गहन अध्ययन, अनुसंधान उनका परम लक्ष्य होना चाहिए। प्राण पदार्थ के बिना अपनी क्षमता एवं चेष्टा प्रकट करने में असमर्थ है। इसी प्रकार जड़ पदार्थ के अंतराल में छिपा रहस्यमय अनुशासन न हो तो वह या तो निष्क्रिय रहेगा या अस्त−व्यस्त होकर अव्यवस्था उत्पन्न करेगा।
कुछ समय पूर्व पदार्थ को जड़ अर्थ निर्जीव माना जाता था, पर अब वह मान्यता बदल गयी है। विज्ञान की नवीनतम शोधों ने जीवाणुओं को, वृक्ष-वनस्पतियों को तो जीवंत कहा ही है, साथ ही यह भी बताया है कि मिट्टी, पत्थर, धातु, पानी जैसी वस्तुओं में भी जीवन मौजूद है। उनमें भी एक सुनिश्चित प्राण चेतना मौजूद है, जिसका कि अपना अलग ही प्रभामंडल है। इसी से फंदा, जंग, काई, सड़न आदि के रूप में उनकी शक्ति का परिचय मिलता रहता है। भले ही वह स्वल्प मात्रा में ही क्यों न हो। हर पदार्थ एक नियत अनुशासन के अंतर्गत अपना स्वरूप बनाये हुए हैं और क्रियाशील रह रहा है। अब इस अनुशासन को अच्छी तरह समझा और उसमें भरपूर दूरदर्शितापूर्ण समन्वय-संतुलन की क्षमता रहने के कारण चेतन स्तर का माना जा रहा है। पदार्थ के अंतराल में अनुशासन, अस्तित्व एवं हलचल के रूप में चेतन के दर्शन होते हैं। वनस्पतियों से लेकर जीवाणुओं तक और सामान्य जीवधारियों से लेकर मनुष्य तक में यह चेतना अपना काम विभिन्न प्रकार से करती दृष्टिगोचर होती है।
चेतना का एक अन्य क्षेत्र है- अदृश्य जीवधारी। मरणोत्तर जीवन के अस्तित्व को अब असंदिग्ध रूप से माना जाने लगा है। मरण और जन्म के बीच का मध्यावधि में प्राणी किसी न किसी रूप में अपनी सत्ता बनाये रहता है। अध्यात्म की भाषा में इन्हें प्रेत, पितर, देव, दैत्य आदि नाम दिये जाते हैं। इनके निवास स्थलों को स्वर्ग, नरक, अंतरिक्ष, श्मशान आदि कहा जाता है। पदार्थ विज्ञानी इन अदृश्य आत्माओं का अस्तित्व तो मानते हैं, पर मरणोत्तर जीवन की स्थिति के संबंध में अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके हैं। अदृश्य जीवधारियों की भी एक दुनिया ऐसी है जैसी कि अदृश्य जीवाणुओं-विषाणुओं की। दृश्यमान जलचर, थलचर, नभचर छोटे-बड़े प्राणियों की प्रत्यक्ष दुनिया के संबंध में हम सब बहुत कुछ जानते हैं।
इन सबके ऊपर एक ब्रह्मांड व्यापी चेतना है जिसे विज्ञान की भाषा में ‘कास्मिक कान्शसनेस’ कहते हैं। उसी के निर्धारण एवं अनुशासन में यह समूचा जड़-चेतन अपने-अपने क्रियाकलापों में बिना प्रमाद किये सुव्यवस्थित रीति से निरत है। अनंत अंतरिक्ष में बिखरे हुए विशालकाय ग्रह-नक्षत्रों को अपने पृथक-पृथक कार्यों में निरत रखने से लेकर उनके मध्य पारस्परिक तालमेल बिठाये रहने का उत्तरदायित्व यह ब्रह्मांडव्यापी चेतना ही सँभालती है। प्राणियों को अपनी सत्ता बनाये रहने, निर्वाह सामग्री उपलब्ध करने, वंश चलाने, मोद मनाने जैसे आधार उपलब्ध करने में किसी अदृश्य सत्ता की दूरदर्शी योजना काम करती देखा जा सकती है। मनुष्य जैसे विकसित प्राणियों की प्रगति और अविकसितों में विद्यमान संभावना को देखते हुए सहज ही समझा जा सकता है कि यह भौतिकवाद ने अपने बाल्यकाल में बड़े-जोश-खरोश के साथ कहा था। क्या प्राणी, क्या पदार्थ सभी की संरचना, गतिविधि, सुव्यवस्था एवं सहकारिता को देखते हुए गंभीर चिंतन को यह स्वीकार करने में तनिक भी कठिनाई नहीं रह जाती है कि इस ब्रह्मांड में एक विवेकवान निर्धारण का अस्तित्व है और वह इस सृष्टि क्रम को आश्चर्यजनक रूप से सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाये हुए हैं। अध्यात्म की भाषा में इसे ‘परमात्मा’ कहते हैं। विज्ञान ने इसे ब्रह्मांडीय चेतना कहा है। इसका अस्तित्व मानने की दृष्टि से अब आत्मिकी और भौतिकी समान रूप से सहमत है। मतभेद इस बात पर है कि अतिरिक्त अन्य स्वरूप क्या है? स्पष्ट है कि भावुक भक्तजन तत्वदर्शी और प्रत्यक्षवादी परमात्मा की ब्रह्मांडीय चेतना की रीति-नीति के संबंध में मतभेद रखते हुए भी अस्तित्व के संबंध में एकमत हो चले या होते जा रहे हैं।
उपरोक्त पंक्तियों में उस सत्ता के अस्तित्व कं संबंध में थोड़ा प्रकाश डाला गया है। जो इस दृश्यमान एवं अदृश्य जगत के सूत्र संचालन में अपनी प्रमुख भूमिका संपादित कर रही है। यह
जिसने भारत के पुरातन इतिहास को ध्यानपूर्वक पढ़ा है, वे उन दिनों के समतुल्य की मनुष्यकृत एवं प्रकृति प्रदत्त उपलब्धियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन परिस्थितियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। कारण स्पष्ट है-समय, श्रम, चिंतन और साधन का दुरुपयोग न किया जाय तो परिणति में जमीन-आसमान जैसा अंतर होगा ही। खाई खोदने और दीवार चिनने में निरत दो व्यक्तियों की गतिविधियाँ एक दूसरे से उलटी होने के कारण उसके परिणामों में भी उसी अनुपात से अंतर आता है। आरंभ में दोनों एक जगह थे, पर एक ने खाई खोदी और गहराई बढ़ाई। दूसरे ने चिनाई जारी रखी और ऊँची दीवार उठाई समतल भूमि पर दोनों प्रयास एक स्थान पर थे, पर विपरीत क्रियाकलाप ने दोनों के मध्य दुहरा अंतर खड़ा कर दिया। यही बात मनोयोग एवं श्रम साधना के संबंध में भी है। दुरुपयोग से पतन और सदुपयोग से उत्थान का सिलसिला चलता रहे तो अंतर में द्रुतगति से फर्क पड़ता चला जाएगा।
आज साधनों का बाहुल्य है, फिर भी रीति-नीति में अवाँछनीयता घुस पड़ने के कारण उनका अपव्यय या दुरुपयोग ही होता रहा है। फलतः जो कमाया वह व्यर्थ ही नहीं गया, वरन् दुरुपयोगजन्य पतन-पराभव का सरंजाम जुटा लिया गया। उससे तो वे कहीं अच्छे रहे जो साधनों के स्वल्प होते हुए भी मात्र उसके सदुपयोग की योजना एवं व्यवस्था बनाते रहे और अपने समय के देवमानव कहला सके। भारत भूमि में तैंतीस करोड़ देवताओं का निवास होना, इस धरित्री का स्वर्गादपि गरीयसी कहलाना एक ही रहस्य का उद्घाटन करता है कि उन दिनों उपलब्धियों का सर्वश्रेष्ठ उपयोग ही जन-जन के मन में था। जबकि इन दिनों वासना, तृष्णा और अहंता की परितृप्ति के अतिरिक्त और किसी ने कुछ समझा ही नहीं। दृष्टिकोण एवं आचरण में दीखने वाला यह जमीन, आसमान जैसा अंतर यही बताता है कि महत्व साधनों के बाहुल्य का नहीं, सदुपयोग का है।
दुरुपयोग क्यों? सदुपयोग क्यों नहीं? इसका कारण एवं उत्तर एक ही है-दृष्टिकोण में उत्कृष्टता-निकृष्टता की भिन्नता का होना। एक जैसी आकृति के मनुष्यों में यह प्राकृतिक भिन्नता क्यों पायी जाती है ? इसका उत्तर भी एक ही है अपनी क्षमता का सही प्रकार से उपयोग न बन पड़ा। अनाड़ी ड्राइवर कीमती मोटर का भी, ऐक्सीडेंट कर बैठते हैं। आकाँक्षा, विचारणा, संवेदना से विनिर्मित अंतःकरण मनुष्य के हाथ में इतनी बड़ी संपदा है कि इसका सदुपयोग-दुरुपयोग कहीं से कहीं पहुँचा देता और कुछ से कुछ बना देता है। आश्चर्य इस बात का है कि लोग अपने भौतिक साधनों का उपयोग तो भली प्रकार जानते हैं, किन्तु असंख्य गुनी महत्वपूर्ण आँतरिक क्षमताओं के बारे में एक प्रकार से अनजान ही बने रहते हैं और जब उनके उपयोग का का प्रसंग आता है तो अनाड़ी, अनजान जैसा आचरण करके अपने ही साधनों का अपने ही विरुद्ध उपयोग करते हैं।
आज व्यक्ति और समाज दुर्दशा देखते ही बनती है। सोने, में तौलने जैसी काया, हीरे, मोती न्यौछावर करने जैसा मस्तिष्क, देवताओं के स्वर्ग से बढ़कर अन्तःकरण अपने-अपने क्षेत्र में इतनी अद्भुत क्षमतायें भरे बैठे है कि उनकी रहस्यमयी स्थिति की चर्चा करने भर से आँखें चमकने लगती है। इतने पर भी व्यक्ति सर्वथा पिछड़ी-गयी-बीती, हारी-थकी, कंगाली और विपन्नता से भरी हुई दुर्दशाग्रस्त स्थिति में जीवनयापन करता है। उसका कारण एक ही है - अपने साधनों, औजारों की क्षमता एवं प्रयोग क्रिया के संबंध में अज्ञानग्रस्त रहना।
ऐसे उदाहरणों से इतिहास के पृष्ठ रंगे पड़े हैं जिनमें शिक्षा, संपदा, अनुकंपा एवं परिस्थिति की दृष्टि से गये गुजरे कहे जाने वाले व्यक्तियों ने अपनी आँतरिक विशिष्टता के आधार पर अनेकों का हृदय जीता, सहयोग पाया और चारित्रिक विशिष्टता के सहारे
प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलते चले गये और अभ्युदय की एक-एक सीढ़ी पार करते हुए उन्नति के शिखर पर जा पहुँचे, कठिन काम संपन्न किये। मनस्वी, तेजस्वी कहलाये और आश्चर्यजनक सफलतायें प्राप्त करते चले गये। दैवी वरदान लगने वाली इस गौरवगाथा के मूल में एक ही रहस्य निकला कि वे आँतरिक विशिष्टता को समझने और सही तरीके ये प्रयुक्त करने में सफल रहे।
यही है आत्मविद्या-ब्रह्मविद्या, जो मनुष्य की आंतरिक गरिमा का स्वरूप समझाती उसे विकसित करने का मार्ग बताती तथा उपलब्धियों का सदुपयोग कर सकने में समर्थ बनाती है। वैभव के उपार्जन में शिक्षा, श्रमशीलता, कुशलता आदि गुण काम आते हैं। यह भौतिकी का क्षेत्र है, जबकि व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने के लिए आत्मिकी का प्रयोग करना पड़ती है। अतः अनुसंधान एवं उपयोग इस क्षेत्र का भी होना चाहिए। यही नहीं दोनों के समन्वय के साथ प्रयास भी सतत् चलने चाहिए।
जापानियों को रूस की लड़ाई में एक नदी आड़े आई। पुल बनाना कठिन था। इसके लिए एक हजार नागरिकों की लाशों का पुल बनना था। नागरिकों की भर्ती की गई। एक हजार की जगह चार हजार नाम आ गये। इन नामों में एक लड़का भी था, जो भर्ती होने के लिए उतावला था, पर उसकी माँ बीमार थी, अकेला था इसलिए मंजूरी नहीं मिली। माँ ने अपने को आड़े आया देखकर विष पी लिया और लड़के को भेजते हुए कहा-शरीर की माँ की अपेक्षा राष्ट्रमाता की सेवा अधिक आवश्यक है, तुम प्रसन्नतापूर्वक जाओ।
माँ ! हरिद्रुमत के पुत्र महर्षि गौतम का तप और ज्ञान भुवन-विख्यात है। मैं ‘ईश-दर्शन’ की परितृप्ति के लिए उनके पास जाना चाहता हूँ। महर्षि मुझसे पूछेंगे-तुम्हारा नाम और गोत्र क्या है, तब मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? ब्रह्मचारी बालक ने अपनी माता से यह सवाल किया।
जननी जाबाला ने उत्तर दिया-”तात! निराश्रित होने के कारण यौवनावस्था में मुझे अनेक गृह स्वामियों की परिचर्या करनी पड़ी। वृत्ति बनाये रखने के लिए मुझे उनको शरीर भी अर्पित करना पड़ता था? उनमें से तू किसका पुत्र है मैं यह नहीं जानती? इसलिए तेरा गोत्र भी कैसे निर्धारित करूं? हाँ मेरा नाम जाबाला है और तू अपने जीवन में सत्यकाम (“सत्य से ही प्रयोजन रखने वाला”) है। इसलिए जब वे तेरा नाम पूछें तो अपना नाम सत्यकाम जाबाल बताना। वत्स! तेरे जीवन का सत्य तेरी आत्म कलुषता की निवृत्ति ही तुझे ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दर्शन करेगी ऐसा मुझे विश्वास है। “
सत्यकाम जाबाल कई दिनों की यात्रा करके महर्षि गौतम के आश्रम पहुँचे। साष्टांग दण्डवत प्रणाम करने के उपराँत ब्रह्मचारी सत्यकाम जाबाल ने निवेदन किया-”देव! पचरह्वाचर जगत का स्वामी, नियन्ता और पालनकर्ता कौन है, उसका क्या स्वरूप है यह मैं जानना चाहता हूँ। आपकी सेवा में आचार्य श्रेष्ठ इसी हेतु से उपस्थित हुआ हूँ।”
“तुम्हारा गोत्र और नाम क्या है सौम्य!” महर्षि गौतम ने सीधा सा सवाल किया और कहे शब्द निश्छलतापूर्वक अक्षरशः दुहरा दिये-”भगवान! मेरी माँ यौवनावस्था में निराश्रित थी। आजीविका के लिए उसने कई सद् गृहस्थों की परिचर्या की। उनमें से अनेकों ने उसके साथ शारीरिक संबंध भी रखा। जब तक मुझे अपने पिता का निश्चित पता न चले, तब तक मैं अपना गोत्र क्या बताऊँ। हाँ मेरा नाम सत्यकाम जाबाल है।”
महर्षि एक क्षण के लिए ऐसे विचार मग्न हो गये, जैसे समाधिस्थ योगी अपने आप में ही खो जाता है। उनकी सम्मान अपने प्रभुत्व की रक्षा के लिए कैसे-कैसे झूठ बोलता और नाटकीय जीवन जीता है। इतना गहन सत्य इतने अधिक सहज भाव से कह देना असाधारण बात है। इसलिए सत्यकाम जाबाल निः गोत्र होकर भी ब्राह्मण और ईश्वर प्राप्ति का अधिकारी है। “
फिर सत्यकाम की ओर देखते हुए उन्होंने कहा- “वत्स! तूने सत्य का परित्याग न कर अपनी विशिष्टता प्रतिपादित की है। मैं तुझे ब्रह्म विद्या का शिक्षण दूँगा। जा समिधाएँ ले आ, तेरे उपनयन की व्यवस्था करने जा रहा हूँ। “ यह कहकर ऋषि अपने पर्ण कुटीर की ओर चल पड़े और सत्यकाम वन की ओर।
दीक्षा हो गई और भी बहुत से छात्र आचार्य गौतम के आश्रम में विद्याभ्यास करते थे। यह सब उच्च कुल और वर्ण के थे। उन्होंने सत्यकाम जाबाल के गुरु कुल प्रवेश को गंभीर बात माना। महर्षि के निर्णय की आलोचना-अवहेलना कर सके, ऐसी क्षमता तो उनमें नहीं थी, किन्तु उनके अनर्गल प्रलाप महर्षि गौतम के कानों तक पहुँचे बिना रह न सके।
महर्षि ने उस दिन का पाठ भी यथावत पढ़ाया और कहा-”बालकों ब्रह्म ज्ञान को शब्द की नहीं अनुभूति की भाषा में पढ़ा और जाना जाता है। उसके लिए एक ही शर्त है आत्मा का पूर्ण निष्कलुष और निष्कपट होना। जो किसी भी सत्य को उसी रूप में स्वीकार कर सकने का साहस रखता है, उसे जीवन लक्ष्य तो अपने आप दौड़कर मिलता है। उसे पाठ पढ़ाने या अक्षर ज्ञान कराने की आवश्यकता नहीं।”
महर्षि अपना वक्तव्य देकर लौटे तो सत्यकाम उनकी प्रतीक्षा करता हुआ मिला। उसने कहा-”भगवन्! निर्देश दें, मैं अपना अध्ययन कहाँ से प्रारंभ करूं।” ऋषि ने गंभीरता में ही स्थिर रहकर उत्तर दिया-”तात! यह है तीन सौ कृष गायें, इनके भरण-पोषण का भार तुम पर है।”
गुरु कुल के छात्रों ने मन ही मन आचार्य के निर्णय को सराहा। पर उन्हें इस बात का कहाँ पता था कि ऋषियों की पैनी दृष्टि व्यक्ति की श्रद्धा और निष्ठ को किस प्रकार एकाग्र कर उसके लिए आत्मकल्याण का राजमार्ग खोल देती है। ईश्वर तो प्रकाश है, जो परिस्थितियों के द्वारा तप और चिंतन के द्वारा आत्मा में उतरता है। पाठ्य पुस्तकें पढ़कर उसके संबंध में थोड़ी जानकारियाँ पायी जा सकती हैं। जो अनुभूति के अभाव में ऊपर की दूब की तरह बहुत शीघ्र मुरझा जाती है।
सत्यकाम जाबाल ने गुरु देव को प्रणाम किया। गौओं को प्रणाम किया। कृश-काय गौओं की ओर दृष्टि डालते ही उसकी आँखें भर आई। जो तपस्वी दिन-रात समाज के उत्थान के लिए अपने शरीर और शारीरिक हितों को बर्फ की चट्टान की तरह घुलाया करते हैं। उनके हितों की लोग इतनी उपेक्षा करते हैं कि गौओं को भर पेट चारा भी न मिले। आखिर शरीरधारी होने के कारण महर्षि को भी भौतिक उपयोग की वस्तुयें आवश्यक होती हैं।
हरित तृण चरती और स्वच्छन्द विचरण कर रहे निर्झरों का अमृतमय जलपान करती हुई गौएँ नित्य निखरने लगीं। उन्हें वर्षों बाद मनोवाँछित आहार और वातावरण मिला था, सो गौओं के स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन सुधरते जा रहे थे और उन्हें देखकर सत्यकाम का हृदय पुलकित होने लगा। श्रद्धा का यही तो गुण है कि वह प्रतिक्षण अपने श्रद्धास्पद की प्रसन्नता का ध्यान रखकर अपने अहंकार से शून्य हो जाता है। और तभी उसे विश्व के यथार्थ दर्शन करने का सुन्दर अवसर मिल पाता है।
गायों में एक साँड़ भी था। उसका अनेक गौओं के साथ संयोग हुआ और इस तरह नन्हें-नन्हें बछड़े बछड़ियाँ जन्म लेने लगे। देखते-देखते गायों की संख्या एक हजार हो गई। सत्यकाम को कुछ आश्चर्य हुआ, पर उन्होंने सत्य ब्रह्म के बारे में यह जान लिया जिस तरह एक ही साँड़ के वीर्य को अनेक जाति और वर्ग की गौओं के द्वारा धारण किये जाने से अनेक रंग की और रूप की नई गायें तैयार हो गई।
उसी प्रकार सृष्टि में जो कुछ भी है, वह ब्रह्म का ही वर्ग है। वही प्रत्येक चेतन प्राणियों में प्रस्फुटित और विकसित हो रहा है। इस तरह के चिंतन से उनकी साँसारिक मोह वासनाएँ नष्ट होकर बीज रूप परमात्मा में केन्द्रित होने लगीं।
एक दिन सायंकाल सत्यकाम ने गायों के झुण्ड को एक स्थान पर रोका। संध्यावंदन के लिए उसने अग्नि प्रदीप्त की। अग्नि ने जैसे ही समिधाओं को जलाना प्रारंभ किया उसके मस्तिष्क में विचार आया कि परमात्मा का शरीर अग्निमय है। वे ही पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग और समुद्र में अपने मंथन से प्रकाश, ऊष्मा, दिव्य ज्योति और बड़वाग्नि में उपस्थित होकर विराट संसार का संचालन करते हैं।
दूसरे दिन सत्यकाम अपनी गायों को लिए हुए आश्रम की ओर लौट रहे थे। मार्ग में एक हंस मिला। हंस को देखते-देखते ही उसे उसके नीर-क्षीर विवेक की बात याद आ गई और इस प्रकार सत्यकाम जाबाल ने माना कि ब्रह्मवेत्ता पुरुष को भी उसी संसार में केवल ब्रह्मतेज प्रकाश का ही अग्नि, सूर्य, चन्द्र और विद्युत के रूप में ध्यान करना चाहिए। इस तरह सत्यकाम ने प्रकाश पूर्ण लोकों में रहने की विद्या पाई।
इससे सत्यकाम को यह जानने का अवसर मिला कि ब्रह्म प्राण रूप से शरीर में विद्यमान है। प्रकाश है और प्रकाश रूप में ही सबकुछ आँखों से देखता है। अपने आप में ही वह कानों की तरह सब सुनता और मन की तरह वह अपने आप में सबकुछ कल्पित करता और एक कलाकार की तरह संसार में काम करता है।
इस तरह जब सत्यकाम जाबाल आश्रम लौटे तो उनके मुँह पर अपूर्व ब्रह्मतेज देखकर महर्षि गौतम ने संतोष भरी मुसकान बिखेरी उन्होंने अपने शिष्य को हृदय से लगा लिया। आश्चर्य से देख रहे अन्य छात्रों को महर्षि ने बताया कि सत्यकाम को प्रकृति के सान्निध्य का जो अनुपम अवसर लाभ मिला, उसने उसका पूरा सदुपयोग किया। शिक्षा मात्र रटंत बारहखड़ी व उथली जानकारियों का नाम नहीं है। शिक्षा तब ब्रह्मविद्या से मिलती है तभी सार्थक बनती है। विराट ब्रह्म का साक्षात्कार कर सत्यकाम ने अपने ब्रह्मणत्व को ही सार्थक किया है।
उद्यान में भ्रमण करते-करते सहसा राजा विक्रमादित्य महाकवि कालीदास से बोले आप कितने प्रतिभाशाली हैं, मेधावी हैं, पर भगवान ने आपका शरीर भी बुद्धि के अनुसार सुन्दर क्यों नहीं बनाया? कुशल कालिदास राजा की गर्वोक्ति समझ गये। उस समय तो वे कुछ न बोले। राजमहल में आकर उन्होंने दो पात्र मँगाये-एक मिट्टी का और एक सोने का। दोनों में जल भर दिया गया। कुछ देर बाद कालीदास ने विक्रमादित्य से पूछा- “राजन किस पात्र का जल अधिक शीतल है?” मिट्टी के पात्र का विक्रमादित्य ने उत्तर दिया। तब मुसकराते हुए कालिदास बोले-जिस प्रकार शीतलता पात्र के बाहरी आधार पर निर्भर नहीं है, उसी प्रकार प्रतिभा भी शरीर की आकृति पर निर्भर नहीं है। विद्वता और महानता का संबंध शरीर से नहीं आत्मा से है।
एक बार रेगिस्तान में मुसाफिरों का एक काफिला सफर कर रहा था। संयोग से रास्ते में लुटेरों के बहुत बड़े दल ये काफिले की मुठभेड़ हुई। सरदार के हुक्म से हरेक यात्री की तलाशी ली गई, जो मिला उसे छीन लिया गया। एक लड़के की तलाशी में सिवा फटे पुराने कपड़ों के कुछ मिला नहीं। तो सरदार ने पूछा-क्या तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। “मेरे पास चालीस अशर्फियां हैं जो माँ द्वारा कपड़ों में सीदी गई हैं, ये मैं अपनी बहन के लिए ले जा रहा हूँ।” जब ये तुम्हें छिपानी न थीं तो फटे कपड़े में सिलवाने की क्या जरूरत थी? तो लड़के ने कहा- माँ ने इस वास्ते सीदी कि कोई छीन न ले और नसीहत भी दी कि बेटा, कभी झूठ न बोलना। मैंने अपनी माँ की आज्ञा का पालन किया।
लड़के की इस सच्चाई से लुटेरों का सरदार खुश हुआ और मुसाफिरों का लूटा माल वापस लौटा दिया। सभी लुटेरों को बदलकर सच्चा रास्ता बताने वाला यह बालक और कोई नहीं अपितु खलीफा अमीन था।
आज हर ओर से अभाव! अभाव! की आवाज आ रही है। आदमी दिन-रात मशीन की तरह काम में जुटा रहता है। तब भी उसके खर्चे पूरे नहीं होते। हर समय कोई न कोई कमी उसे सताती रहती है। अभाव को पूरा करने के लिए लोगों ने आय के अनुचित साधन भी अपना लिए हैं। किन्तु अभाव से फिर भी पीछा नहीं छूटता। गरीब तो गरीब हैं, उन्हें कोई भी अभाव रह सकता है। लेकिन जब आप बड़े-बड़े धनवानों को अभाव का रोना रोते सुना जाता है, तो सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि इसका कारण धन की कमी नहीं है बल्कि कुछ अन्य ही है जो गरीब अमीर दोनों को समान रूप से जकड़े हुए है। अभावों का मुख्य कारण है आवश्यकताओं की बढ़ोत्तरी। आवश्यकताएँ जिस तेजी तथा अनुपात से बढ़ती हैं, आय का उस अनुपात से बढ़ पाना असंभव है। फलतः मनुष्य के कोई न कोई अभाव बना ही रहता है।
यदि ध्यानपूर्वक देखा जाये और विचारपूर्वक सोचा जाये तो पता चलेगा कि जीवन में वास्तविक अभाव बहुत कम होते हैं। अभाव की वास्तविक अवस्था में किसी का भी जीना कठिन है। ज्यादातर लोग कृत्रिम अभावों की वेदना से व्यग्र रहते तथा मरते हैं। अन्न वस्त्र आदि जीवन की निताँत आवश्यकता की आपूर्ति की ही वास्तविक अभाव कहा जा सकता है। समाज में मनुष्य की इन अनिवार्य आवश्यकताओं की किसी न किसी प्रकार पूर्ति होती रहती है। यह बात अलग है कि किसी की ये जरूरतें सघन रूप से अति पूर्ति पाती हों और किसी की केवल सीमाबद्ध।
आज संसार में जो कुछ भी दुःख, क्षोभ, अशाँति, असंतोष अथवा व्यग्रता दिखाई दे रही है, उसका मूल कारण मनुष्य की बढ़ी हुई कृत्रिम आवश्यकताएँ रही हैं। मूल आवश्यकताओं को कोशिश करके भी नहीं बढ़ाया जा सकता है। जबकि बनावटी जरूरतों की बढ़ोत्तरी का कोई अंत नहीं। मनुष्य प्रयत्न करके भी पेट से अधिक कपड़ा नहीं पहन सकता। यदि वह ऐसा करेगा तो रोगी तथा असभ्य बनेगा।
जब इन्हीं मूल आवश्यकताओं के साथ कृत्रिमता अथवा अनावश्यकता जोड़ दी जाती है, जब ये जरूरतें भी ईरान से तूरान तक बढ़ जाती हैं। पेट के लिए भोजन चाहिए, ठीक है। किन्तु भोजन के जिए मसाले, मक्खन, मलाई, कचौड़ी, पकौड़ी, अण्डा-मुर्गी माँस-मज्जा थाली भर जंजाल आदि विभिन्न व्यंजन ठीक नहीं है। भोजन की आवश्यकता मौलिक है उसमें स्वाद अथवा प्रकारों का आरोप कृत्रिमता है। कृत्रिमता से कलुषित भोजन की जरूरत सामान्य रूप से पूरी नहीं की जा सकती। सामान्य सरल तथा सादा भोजन जो कि मनुष्य के स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए जरूरी है, आठ दस रुपए में पूरा जाता है। वहीं बनावटीपन और स्वादों से सजाया भोजन सौ रुपए में भी नहीं पूरा हो सकता। अस्तु अभाव की जड़ आवश्यकता की पूर्ति नहीं भोजन के साथ जुड़ी कृत्रिमता ही है।
वस्त्रों एवं निवास के साथ भी यही बात है। तन ढकने के लिए कपड़ा चाहिए कि जिससे कि शरीर की रक्षा हो सके और सभ्यता की भी। यह काम साधारणतया कपड़ों की दो-तीन जोड़ी से आसानी से हो सकता है। इसके लिए किसी को भी अधिक व्यग्रता अथवा व्यय की जरूरत नहीं पड़ती। बुद्धिमानी तथा सावधानी से थोड़े पैसों में भी काम चलाया जा सकता है।
लेकिन जब कपड़ों की सामान्य जरूरत मूल्यवान वस्त्रों, प्रकारों, नित्य नवीन फैशनों की अनेकताओं के बनावटीपन से बोझिल कर दी जाती है, तब उसका खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है। एक हजार रुपए साल का खर्च बढ़कर पाँच हजार रुपए साल हो जाता है। ऐसी बनावटी जरूरत से जिसका पैसा बरबाद होगा वह अभाव की आग में जलेगा ही।
प्रकाश तथा वायु की सुविधा वाला एक साधारण सा मकान साधारण रूप से थोड़े पैसों में बनवाया अथवा किराये पर लिया जा सकता है। लेकिन निवास की इस जरूरत के साथ आलीशान सजी हुई कोठी की कल्पना जब जुड़ जाती है तब यह साधारण जरूरत असाधारण बन जाती है। अपनी पूर्ति में सारी जिंदगी की कमाई खर्च कर देने पर भी ठीक ढंग से पूरी होती नहीं दिखती।
आमतौर पर जरूरतों की तीन कड़ियाँ हैं। मूल जरूरतें, कृत्रिम अथवा विलास जन्य जरूरतें और व्यसन जन्य जरूरतें। जीवन रक्षा से संबंधित भोजन, वस्त्र और आवास की साधारण जरूरतें मूल जरूरतें हैं। इन्हीं जरूरी चीजों का अनावश्यक स्तर बढ़ा देने से यही मूल जरूरतें कृत्रिम अथवा विलास विषयक हो जाती हैं नशीली, प्रदर्शन-परक तथा वासना बोधित जरूरतें व्यसन-रूप जरूरतें हैं। तीसरे स्तर की आवश्यकताएँ मनुष्य जीवन के लिए अनिवार्य तो नहीं ही हैं वरन् हानिकारक भी हैं। ये न केवल कमाई को नष्ट करती हैं बल्कि स्वास्थ्य एवं जीवन को भी तबाह कर देती हैं। व्यसन विषयक जरूरत मानव जीवन की भयानक शत्रु है। इन्हें जरूरतों की कोटि में न रखकर दुर्भाग्य की कोटि में रखना ही उचित होगा।
जरूरतों के न्यूनाधिक्य के अनुपात से ही दुःख सुख की वृद्धि होती है। जिसकी जरूरतें जितनी कम हैं वह उतना ही अधिक संतुष्ट एवं सुखी रहेगा ? उसे अभाव की पीड़ा उतनी ही ज्यादा भोगनी होगी। जिसकी जरूरतें जितनी ही अधिक होगी, वह उतना ही असंतुष्ट एवं दुःखी होगा और उसके सम्मुख हर समय अभावों का भूत मंडराता रहेगा। कोई भी व्यक्ति जरूरतों को तो बिना किसी कठिनाई के आसानी से बढ़ाता रह सकता है। लेकिन उसकी पूर्ति के लिए अपनी आय को आसानी से नहीं बढ़ा सकता। जरूरतों की पूर्ति न होने की पीड़ा आय बढ़ने की प्रतीक्षा तो करती नहीं। वह तो तत्काल सताने लगती है और तब तक सताती रहती है जब तक कि उसकी पूर्ति नहीं हो जाती। किन्तु इसके साथ एक मुसीबत यह भी है कि एक जरूरत की पूर्ति हुई नहीं कि दूसरी तैयार। जरूरतों की बढ़ोत्तरी रक्त बीज की तरह होती रहती है। यदि कोई किसी प्रकार दस-जरूरतों की पूर्ति कर पाता है तो इसके साथ उतनी ही और खड़ी हो जाती है। जरूरतों की वृत्ति का यह तारतम्य किसी भी प्रकार रुकता नहीं। फिर एक आवश्यकता एक बार पूरी होने के बाद दूसरी बार के लिए फिर तकाजा करने लगती है। पूर्ति के इस सिलसिले से आवश्यकताएँ थमने की जगह बढ़ती जाती है।
मूल जरूरतें, आवश्यकतानुसार आगे भी बढ़ सकती हैं। किसी के सामाजिक, अथवा स्थानीय स्तर के साथ इनका स्तर भी बढ़ाया जा सकता है। किन्तु केवल तब ही जब उसका बढ़ाया जाना न सिर्फ अनिवार्य बल्कि उपयोगी भी हो जाए। समाज में प्रतिष्ठा बढ़ जाने अथवा स्थान ऊँचा हो जाने से किसी को अपने रहन-सहन का स्तर भी ऊँचा करना पड़ सकता है। कार्य कुशलता अथवा बौद्धिकता के कारण भोजन का सामान्य तथा साधारण खर्च बढ़ाया जा सकता है। किन्तु वह बढ़ाया तब ही जाये जब उसकी निताँत अनिवार्यता हो जाये और उसके अनुरूप या तो उनकी आय में बढ़ोत्तरी हो गई हो अथवा बढ़ने की संभावना हो। प्रदर्शन अथवा अहं की तुष्टि के लिए ही साधारण स्तर की असाधारण रूप में बढ़ाना विलास एवं अपव्ययता होगी।
इसके साथ यह जरूरी ही नहीं है कि स्तर तथा स्थान बढ़ जाने पर भी जरूरतों का स्तर बढ़ाया ही जाये। रहन-सहन अथवा आहार-विहार का स्तर तो वास्तव में उसकी स्वच्छता-सादगी तथा व्यवस्था ही मानी जानी चाहिए न कि बहुमूल्यता अथवा बहुतायतता। भारत में तो ऐसे सत्पुरुषों की गौरवपूर्ण परंपरा सुदीर्घ काल से चलती रही है कि समाज में सर्वोपरि प्रतिष्ठा पा लेने पर भी उनके रहन-सहन तथा आहार-विहार का स्तर पूर्ववत ही साधारण बना रहा। उसे उठाने की न कोई आवश्यकता अनुभव हुई और न उनकी बढ़ी हुई सामाजिक प्रतिष्ठा ने ही इसके लिए उनपर दबाव डाला। फिर भी स्तर स्थान तथा आय के अनुसार रहन-सहन उठाने की छूट एक सीमा तक मानी जा सकती है। किन्तु यह हो जरूरत और उपयोगिता के अनुसार ही प्रदर्शन या सफलता के लिए नहीं।
कृत्रिम एवं व्यसनमूलक जरूरतों की अनियंत्रित वृद्धि ने समाज में शोषण का चक्र चला रखा है। यह सही है कि मनुष्य अपनी अनावश्यक तथा अनुचित जरूरतों की पूर्ति के लिए दूसरों का शोषण करने लगा है। किन्तु यह भी किसी प्रकार झूठ नहीं है कि मनुष्य दूसरे कि अपेक्षा स्वयं अपना शोषक अधिक है। कोई दूसरा तो उसका शोषण चार-छः अथवा दस-
बीस प्रतिशत कर पाता होगा। आदमी अपनी पाली हुई निरर्थक जरूरतों को अपनी पूरी अथवा अधिकाँश कमाई चुगा देता है। अपनी अनावश्यक जरूरतों को बढ़ाकर फिर उनकी मजबूरन पूर्ति करने के लिए कमाई का अपव्यय करना अपनी आय का शोषण करना ही तो है। फिर व्यसन पालकर तो वह अपना आर्थिक शोषण ही नहीं करता जीवनी शक्ति एवं स्वास्थ्य भी गँवा बैठता है। शोषण की शिकायत दूसरे से करने के पहले स्वयं की जरूरतें घटाकर स्वयं के द्वारा किया जा रहा शोषण बंद करना चाहिए। दूसरों के शोषण से त्रस्त मनुष्य यदि एक बार स्वयं का शोषण बन्द कर दे तो भी बहुत राहत पा सकता है।
यदि आप अभावों से दुखी रहते हैं, दिन-रात मेहनत करते हैं फिर भी पूर्ति का संतोष नहीं पाते तो अपने जीवन पर नजर डालिए। अपनी आय की कमी की शिकायत करने के बजाय अपने व्यय की विवेचना कीजिए। अवश्य आप पाएँगे कि आपकी आय उतनी कम नहीं है जितनी कि आपकी जरूरतें बढ़ी हुई हैं। यदि आप बिना किसी विशेष उद्योग अथवा आय वृद्धि के सुखी एवं संतुष्ट होना चाहते हैं तो आज ही जरूरतें कम करना शुरू कर दीजिए। सबसे पहले व्यसन-मूलक जरूरतें तो ऐसे छोड़ दीजिए जैसे धोखे से हाथ में आ जाने पर आग को छोड़ देते हैं।
आप तो केवल उन्हीं आवश्यकताओं पर खर्च करें जो जीवन के लिए निताँत अनिवार्य हों। जरूरतों को वश में कर लेने पर जीवन में सुख, संतोष और संपन्नता सुनिश्चित हो जाती है। इस रहस्य को जानकर अपनाकर आप आज और अभी अपने अभाव भरे जीवन की दुःख पूर्ण काल कोठरी से निकलकर भाव भरे भव्य भवन में प्रवेश कर सकते हैं, जहाँ प्रसन्नता और संपन्नता की छटा बिखरी पड़ी है।
दर्शन क्या है? कुछ औंधे-सीधे विचारों को अव्यवस्थित रूप में रख देना? या एक ऐसी समृद्ध चिंतन-प्रणाली प्रस्तुत करना, जिससे समय, समाज एवं समस्त विश्व का समग्र विकास सम्भव हो सके? सुकरात के शब्दों में कहें, तो वास्तविक दर्शन यही है।
किन्तु इन दिनों दर्शनों की ऐसी बाढ़ आयी है कि विचार और दर्शन में कोई अंतर ही नहीं रहा। जब भी किसी के मन में कोई नयी सोच उभरी, उसको लिपिबद्ध कर दिया। बस, वह उसके द्वारा प्रतिपादित दर्शन बन गया। भले ही वह सैद्धान्तिक ही क्यों न हो समय की आवश्यकता पूर्ति करती हो अथवा नहीं, वह दर्शन है। सन 1896 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय की स्नातक दर्शन परिषद में व्याख्यान देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि जिसमें व्यावहारिकता हो, जो संपूर्ण जीवन-शैली को प्रभावित करता हो, जिसमें समाज को मार्गदर्शन करने की सामर्थ्य हो, सही अर्थों में वही सच्चा दर्शन है, शेष सभी विचारधारा है। लिबनिज, काण्ट, हेगल, स्पिनोजा सभी ने ईश्वर संबंधी अपने-अपने मत भर प्रकट किये है, अतः वे विचारक तो हो सकते हैं, दार्शनिक नहीं। जहाँ फिलॉसफी होती है, वहाँ क्राँति होती है, समग्र परिवर्तन होता है, जबकि विशिष्ट विचारधारा कुछ एक अनुयायी भर पैदा कर पाती है, कोई नया समाज अथवा व्यवस्था नहीं। कतिपय नवीन चिंतन देकर फिलॉसफर बन बैठना-यह पश्चिम की पद्धति और देन है। भारत जैसे पूर्वी देशों में तो दर्शन समाज परिवर्तन का सुनिश्चित आधार माना जाता है। गाँधीजी ने ग्रामोद्योग पर आधारित दर्शन दिया था और कहा था कि हर हाथ को काम और हर पेट को अनाज इसी के माध्यम से संभव है। आर्थिक स्वावलंबन इसी के द्वारा हस्तगत किया जा सकता है। भारत का जब कभी आर्थिक कायाकल्प होगा, इसी आधार पर संपन्न होगा।
एक समय था, जब संपूर्ण विश्व में मार्क्सवाद की बड़ी धूम थी। उसने अर्थतंत्र से संबंधित इतनी सशक्त विचारधारा दी थी कि संसार में उससे क्राँति हो गई। विश्व के आधे से अधिक देश उस विचारधारा को अपनाने के लिए विवश हो गये। इस आधार पर उन देशों ने एक नई समाज व्यवस्था को जन्म दिया, जिसका नाम समाजवादी समाज-व्यवस्था रखा गया। ईसा के दर्शन को जब लोगों ने हृदयंगम किया, तो दुनिया में ईसाईयत फैल गई। रूसो फिलॉसफर थे। मौलिक चिंतन के राजतंत्र के जमाने में जब उनने राजे-और सामंतों की तानाशाही और निरंकुशता देखी, तो उनके अंदर का दार्शनिक जाग उठा और एक नई व्यवस्था “डेमोक्रेसी” का प्रतिपादन किया। जिन दिनों की यह बात है, उन दिनों जब सर्वप्रथम इसे प्रस्तुत किया गया, तो लोगों ने इसकी बड़ी हँसी उड़ायी, कहा-यह दर्शन नहीं, पागलपन है। भला जनता, जनता पर किस प्रकार शासन कर सकती है? किन्तु आज वही पागलपन किस तरह सारी धरती में अपना प्रभुत्व जमाये हुए है-यह सर्वविदित है। यह एक लाँसर की शक्ति है। ऐसी विचार-चेतना जब कभी जहाँ भी अवतरित हुई है, उसने सुषुप्ति तोड़ी और मूर्च्छना मरोड़ी।
बुद्ध अपने काल के सशक्त मनीषी थे। जहाँ मनीषा जन्म लेती है, वहीं मनीषी का अवतरण होता है। ऐसे मनीषी जब धरित्री पर आविर्भूत होते हैं, तो समाज के जरा-जीर्ण कलेवर का उद्धार हो जाता है। उसमें नयी चेतना पैदा होती है, नई व्यवस्था आती है, नई स्फूर्ति और उमंग का आविर्भाव होता है। यह मनीषी की मनीषा की सामर्थ्य है। दर्शन इसी से उत्पन्न होता है, बुद्ध ने जब अपने समय को देखा, तो उन्हें घोर वितृष्णा हुई। उस जमाने की कुप्रथाओं से उन्हें इतनी घृणा हुई कि उनने समाज को एक अभिनव सूत्र दिया- “बुद्धं शरणं गच्छामि” बुद्धि की, विवेकशीलता की, समझदारी की शरण में आओ-उनने इसका आह्वान किया। “संघं शरणं गच्छामि”-संघबद्ध होकर काम करो- अपनी ढपली, अपना राग मत गुनगुनाओ, समाज की सेवा संगठित होकर ही की जा सकती है-लोगों को इसका उनने प्रथम पाठ पढ़ाया “धम्मं शरणं गच्छामि”-आज का जो सर्वोपरि धर्म-समाज सेवा है, उसे समझो और अपनालो, इसका उपदेश किया।
इस बुद्ध दर्शन ने जन-चेतना में जो उथल-पुथल मचायी, वह असाधारण थी। संपूर्ण उत्तर पूर्व इससे इस कदर प्रभावित हुआ, जिसकी छाप आज तक विद्यमान है। इस प्रकार के करतब कर दिखाने वालों को मनीषी कहते हैं। मनीषी विचार नहीं, दर्शन देते हैं-एक ऐसा दर्शन, जो लम्बे समय तक समाज का मार्गदर्शन करता रहे। समस्याओं का समाधान सुझाता रहे- उलझनों को घटाता-मिटाता रहे। ऐसे लोग भारत में प्राचीन समय में बहुतायत से हुए थे। ये ऋषि कहलाये इनने भारतीय संस्कृति को एक समृद्ध चिंतन और सर्वांगपूर्ण दर्शन दिया। इसी दर्शन ने इस भूमि में इतने सार महामानव, अवतार, युगपुरुष, समाज सुधारक, ऋषि-मनीषी पैदा किये कि इसे देवभूमि कहा जाने लगा। इसकी तुलना स्वर्ग से की जाने लगी। इसे स्वर्ण की उपमा दी जाने लगी-ऐसा स्वर्ग जिसमें जीवन्त देवता रहते हों-चलते- फिरते प्रत्यक्ष देव निवास करते हों। ऐसे देव जहाँ भी रहेंगे, वहाँ स्वर्ग की अनुभूति स्वाभाविक है। इमर्सन कहा करते थे “मुझे नरक में भेज दो, मैं वहीं स्वर्ग पैदा कर दूँगा।” यह फिलॉसफी की शक्ति है, शिक्षा या वातावरण की नहीं। शिक्षा और वातावरण तो कई देशों में भारत जैसे रहे हैं, पर वहाँ वह संस्कृति और विद्या नहीं है, इसलिए वे-वहाँ के निवासी भारत जैसे नहीं बन सके।
वर्तमान में सर्वत्र अराजकता और अव्यवस्था का दौर-दौरा इसलिए दीख पड़ता है, क्योंकि आज दर्शन के नाम पर वितंडावाद ज्यादा चल पड़ा है। सब अपने नाम-यश के पीछे भागते प्रतीत होते हैं। जब स्थिति ऐसी हो जाय, जिसमें व्यक्ति प्रमुख और समाज को गौण माना जाना लगे, तो दशा दयनीय और दुःखद होनी स्वाभाविक है। एक वानगी के सहारे भली-भाँति समझा जा सकता है कि सम्प्रति किस प्रकार लोग एक दूसरे पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश कर स्वयं को यशस्वी बनाने की चेष्टा कर रहे हैं। कई वर्ष पूर्व प्रूधों ने गरीबों पर एक पुस्तक लिखी। नाम रखा- “फिलॉसफी ऑफ पोवरटी” अर्थात् “दरिद्रता का दर्शन” इसके कुछ समय पश्चात मार्क्स ने इसके जवाब में एक दूसरा ग्रंथ लिखा - “पोवरटी ऑफ फिलॉसफी “ अर्थात् “दर्शन की दरिद्रता”। उक्त रचना में कई प्रकार के तर्कों द्वारा प्रूधों के तथ्यपूर्ण विचार को गलत साबित करने का प्रयास किया है। जब स्वयं को श्रेष्ठ और वरिष्ठ सिद्ध करने के लिए दूसरों को निकृष्ट बताने की प्रतिस्पर्धा चल पड़े, तो समाज की जो दुरवस्था हो सकती है, वही आजकल दिखाई पड़ रही है। इसी दिशा में सारा श्रम, समय, क्षमता, प्रतिभा चुकते दृष्टिगोचर हो रहे हैं। जब समाज-निर्माण में काम आने वाली क्षमताओं का दुरुपयोग होने लगे, तो उससे उत्पन्न होने वाले दर्शन का अन्दाज लगाया जा सकता है। आज इसी भ्रष्ट दर्शन ने समाज की यह गति बनायी है। जब भौतिकवादी दर्शन भोगवाद के “ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत” के चरमोत्कर्ष पर पहुँच जाय, तो समय का प्रवाह किस ओर होगा, इसका अनुमान लगाना, कोई बहुत मुश्किल नहीं।
“ह्वट इज फिलॉसफी?” नामक कृति में मूर्धन्य विचारक फ्रैंक विली ने इसी पर विचार किया है। वे लिखते हैं कि फिलॉसफी चिंतन प्रणाली कम, जीवन विधा अधिक है। यह सिद्धान्त नहीं, व्यवहार है। उनके अनुसार जिस दर्शन में जीव जीने की कला का अभाव हो, जो व्यक्ति-निर्माण की प्रक्रिया नहीं बता पाता हो एवं जहाँ अपकर्ष से उत्कर्ष की ओर जाने का कोई मार्ग न हो, वह दर्शन नहीं हो सकता। व कहते हैं कि दर्शन में इतनी सामर्थ्य होनी चाहिए कि वह मानवी जीवन को चरम लक्ष्य तक पहुँचा सके। यहाँ उनके विचार भारतीय अध्यात्म से बिलकुल मिलते-जुलते हैं। वस्तुतः भारतीय अध्यात्म में ही इतनी शक्ति है कि वह जीवन के अंतिम ध्येय तक व्यक्ति को पहुँचा सके, किन्तु थिली के अनुसार आज वह भी असहाय इसलिए लग रहा है क्योंकि इन दिनों पूर्वी अध्यात्म पर पश्चिमी विचारधारा हावी है। वह मात्र कथन, श्रवण एवं मानसिक ऐयाशी जैसा विषय बन कर रह गया है।
ऐसी दशा में अध्यात्म को जी कर दिखाने की आवश्यकता पड़ी, ताकि लोगों को आश्वस्त किया जा सके कि यह किसी भी प्रकार घाटे का सौदा नहीं, है, इसमें हर तरह से लाभ-ही-लाभ है। यह काम शाँतिकुँज के संचालक ने बखूबी पूरा किया। आज उसी का परिणाम है कि उनके जीवन-दर्शन पर आधारित “युग-निर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान” आन्दोलन द्रुत गति से अपना कलेवर-विस्तार करता चल रहा है। अगले दिनों यह विश्वव्यापी बनकर “युग परिवर्तन” का अपना महती प्रयोजन पूरा कर ले, तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए, वरन् इसे उनके द्वारा प्रतिपादित क्राँतिकारी दर्शन का सत्परिणाम मानना चाहिए।
एक दिन एक राजा अपने मंत्री और नौकर के साथ शिकार खेलने के लिए गये। संयोगवश तीनों भटक गये। रास्ते में एक अंधा फकीर बैठा माला जप रहा था। नौकर फकीर के पास पहुँचा और बोला “अबे ओ अंधे इधर से कोई घुड़सवार तो नहीं गुजरा?” फकीर ने कहा मुझे नहीं मालूम। मंत्री जी फकीर को देखकर कहने लगे ओ फकीर इधर से कोई आदमी गया ? फकीर ने कहा जी हाँ अभी बादशाह का नौकर गया है। थोड़ी देर में राजा भटकता हुआ अंधे फकीर की झोपड़ी में पहुँचकर बोले सूरदासजी, कृपया यह बतायें कि इधर से कोई आदमी तो नहीं गुजरा? फकीर ने जवाब दिया अन्नदाता, पहले नौकर आया फिर आपका वजीर और अब आप खुद तशरीफ लाये हैं। तीनों मिले तो आश्चर्य कि अंधे आदमी ने विभिन्न व्यक्तियों को कैसे पहचान लिया ? तीनों फकीर के पास गये तो फकीर ने जवाब दिया।
“अन्नदाता! आदमी बातचीत से पहचाना जाता है। मैंने तीनों को बातों से पहचान लिया क्योंकि शब्द व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करता है कि वह कितना भारी अथवा हल्का। अतः अपना व्यक्तित्व वजनदार बनाना चाहिये।”
आज गुरुदेव उदासीन दिखाई पड़ते हैं। अपनी सुरसरि सलिल से भीगी धूसर जटाओं द्वारा भगवान् बादरायण के पाद पंकजों को स्पर्श करने के अनंतर उनके प्रिय शिष्य पैल ने कहा-’यदि मैं अनाधिकारी न समझा जाऊँ तो कारण जानने की अंतर में उत्कण्ठा जाग्रत हो रही है।’ उनकी अंजलि बँधी थी और शब्द अत्यन्त नम्र। “सुन सकते हो वत्स।” महर्षि ने सूर्योपस्थान कर लिया था प्रातः कालीन हवन तथा सामगान समाप्त करके वे आज एकाकी इस सरस्वती तट के नीम तरु के मूल में बिना आसन के शिला पर आ बैठे थे। उनकी दृष्टि क्षितिज से उतर कर उस ऋषिकुमार पर पड़ी।
“प्राणियों में कलुषित भावना घर कर रही हैं। लोगों का चिंतन विकृत हो चुका है।” अहिर्निश जन-कल्याण का चिन्तन करने वाले उन करुणामय के नेत्र भर आये थे।” प्रायः सभी अल्पायु होते जा रहे हैं और उनकी मेधा शक्ति क्षीण होती जा रही हैं।”
“जो अनिवार्य है उसके लिए प्रभु को शोक क्यों?” संकोच के कारण शिष्य की वाणी रुद्ध हो गई। उसने दूसरे ढंग से कहा- क्या प्रभु उस नैसर्गिक नियम को परिवर्तित करने का कोई मार्ग ढूँढ़ रहें हैं? अपने गुरु की अपार शक्ति में शिष्य का संपूर्ण विश्वास था और वह इस विचार से पुलकित हो गया था।
“जगन्नियन्ता की इच्छा सर्वोपरि हैँ उसे कोई बदल नहीं सकता। महर्षि का स्वर खिन्न था। मैं सोच रहूँ इन अल्पवयस, अल्प मेधस, कलुष-हृदय प्राणियों के उद्धार का उपाय।”
“क्या वह आज भी अनुपलब्ध हैं?” शिष्य का स्वर कहता था कि वह आश्चर्य को संगत नहीं कर पा रहा हैं। पंचमवेद महाभारत प्रस्तुत हो गया है और प्रभु ने पुराणों की भी रचना कर ली हैं। इनमें न तो अधिकार की बाधा है और न मेधा की तीव्रता की आवश्यकता। सरल सुलभ साधनों द्वारा सभी के कल्याण का पथ प्रशस्त हो गया हैं ऐसा मैंने आचार्य चरणों से ही तो सुना हैं।
“ग्रंथ निर्माण ही तो उनका उद्देश्य पूर्ण नहीं कर दिया करता।” महर्षि का खेद ज्यों का त्यों था। श्रुतियों के इन सरल-सुलभ तथ्यों को विश्व भर में प्रसारित करने की आवश्यकता है। इसके बिना उनका निर्माण अर्थहीन हैं। हम सभी आचार्य के अंतेवासी तो उनके अध्ययन को उत्सुक हैं। पैल का स्वर भी निराशापूर्ण था वह समझ रहा था कि हम लोग इन महिमामय ग्रंथों के पढ़ने के योग्य आचार्य की दृष्टि में नहीं हैं। क्या हममें से कोई भी उनको उपलब्ध करने का अधिकारी नहीं?
“अधिकारी तो सभी है।” आचार्य के वाक्य ने संतोष दिया। “लेकिन प्रश्न प्रचार का है। ये ग्रंथ श्रुतियाँ नहीं हैं जो एक दूसरे तक आज की पाठ्य प्रणाली से प्रचारित हो जाएँगी। इनका प्रचार समाज के हर वर्ग तक करना हैं और तुम जानते हो कि द्विजेतर वर्ण ऋषिकुल में अध्ययनार्थ नहीं आते।
“तब?” सचमुच समस्या गंभीर थी और शिष्य ने इस पर कभी विचार नहीं किया था। “हम राज-सभाओं में उनका प्रवचन करेंगे।” झटपट उसे एक युक्ति सूझी।
“तब भी उससे अंत्यज तथा नारिवर्ग वंचित रहेगा।” सर्वज्ञ महर्षि ने योजना की त्रुटि पकड़ी। ऐसा मान भी लें कि कुछ उत्साही, साहसी आत्मत्यागी पंचम वर्ण की झोंपड़ी में भी निंदा स्तुति की चिन्ता किए बिना पहुँच जायेंगे, तो क्या उद्देश्य सफल होगा? ब्राह्मण के प्रति उत्तरोत्तर बढ़ती अश्रद्धा को तुम देख नहीं रहें हो? किसी विप्र की वाणी से अभीष्ट प्रभाव उत्पन्न होगा इसमें संदेह ही है।”
“तब तो कोई मार्ग नहीं।” ऋषिकुमार संपूर्ण निराश हो गया। मार्ग तो प्रभु के हाथ में है। वे अमार्ग में भी मार्ग निकाल देते हैं। महर्षि कृष्ण द्वैपायन ने क्षितिज की और देखते हुए कहा। कोई अंत्यज या प्रतिलोमज-प्रतिभाशाली -उत्साही एवं शारीरिक-मानसिक शक्ति-संपन्न श्रद्धालु प्राप्त हो तो उससे द्विजाति तो वस्तु की उत्तमता के कारण ग्रहण करेंगे और द्विजेतर वर्ण साम्य के कारण उसकी वाणी का आदर करेंगे।
“कौन है ऐसा।” उसे महर्षि की दिव्य क्षमताओं पर भरोसा था। “उग्रश्रवा।” चिन्तन मग्न पैल नाम सुनते ही चौंक पड़ा। उसके चिंतन की कड़ियाँ एक-एक करके बिखरने लगीं।
कौन नहीं परिचित इस नाम से ? कश्मीर से पाटलिपुत्र तक उग्रश्रवा के नाम से सभी काँपते थे। वही एक ऐसा दस्यु है जो महीनों चलकर छापा मारता है। उसके और उसके लोगों का पता तक नहीं लगता। सूचित की हुई निश्चित तिथि पर उसके सैनिक प्रकट होते हैं जैसे प्रेत। फिर तो नृशंस हत्याकाण्ड से मेदिनी काँप उठती है। पैल यही सब सोच रहा था। इतने मैं अन्य अन्तूवासी आ गए। कुछ सोचते हुए महर्षि उठ खड़े। उन्होंने सभी को इशारा किया और एक ओर चल पड़े सभी के कदम स्वतः ही उनका अनुगमन करने लगे।
कुछ दिन चलने पर सभी ने नगर में प्रवेश किया। प्रवेश करते ही महर्षि का मुखमंडल करुणा से आशक्त हो उठा आंखें डबडबा आयी। अनुगमन कर रहें शिष्यों के चेहरों पर जुगुप्सा, घृणा व क्रोध के मिश्रित भव उभरे।
‘उफ इतना नृशंस नरसंहार।’ राजपथ पर लाशें बिखरी पड़ी थीं। भवनों के तोरण द्वारा टूटे पड़े थे और कहीं-कहीं अग्नि की लपटें उठ रही थीं। श्रावन, काक, तथा चीलों की चख-चख चल रही थी। गिद्ध मँडरा रहे थे। भवनों से अबलाओं एवं बालकों का करुण क्रंदन हृदय को विदीर्ण किए देता था। अकस्मात इस दुर्दिन में भगवान वेदव्यास विदर्भ में आ पहुँचे थे।
‘निश्चय ही दस्यु अभी नगर में ही है।’ आचार्य के पीछे चलने वालों में सबसे आगे के ब्रह्मचारी मीमाँसाकार जैमिनि ने कहा। बहुत बचाकर वे पाँव रख रहे थे कि कहीं रक्तादि के स्पर्श से गात्र-अपवित्र न हो जावे।
हम लोगों को लौट चलना चाहिए। एक ब्रह्मचारी ने जो सबसे पीछे तथा आयु में सबसे कम था कहा- इस समय नगर में घोर अशाँति हैं। इससे हृदय में खेद ही होता है। सभी नागरिक आकुल एवं त्रस्त हैं। ऐसे समय यहाँ हरने में कोई लाभ नहीं दिखाई पड़ता।
“इन क्रन्दन करते हुए दीनों को छोड़कर तुम शाँति के लिए आश्रम जाना चाहते हो?” गुरु के स्वर में स्नेह पूर्ण रोष था। “दोनों की उपेक्षा करने वाला दीनबंधु की उपेक्षा करता है यह तुम्हें स्मरण रखना चाहिए। ब्राह्मण के लिए सबसे बड़ी तपस्या हैं पीड़ितों का परित्राण। हम उससे विमुख नहीं हो सकते।”
“हम लोगों को प्रज्वलित अनल को शीतल करने में लग जाना चाहिए।” जैमिनी ने उत्साहपूर्वक कहा-और यदि संभव हो तो आहतों का उपचार भी करना चाहिए। इन कामों को नागरिकों ने प्रारंभ कर दिया हैं। बात सच्ची थी। हमें उससे भी महान काम करना है। ध्वंस को निवारित करना ही इस समय सबसे बड़ी आवश्यकता है। चाहते हैं। आचार्य की गति बढ़ गयी थी और अनुगामियों को दौड़कर अनुकरण करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा था।
“मैं उसे यही से शाप देकर भस्म कर दूँगा?” इस प्रकार आचार्य पाद की आकुलता तपस्वी कुमार अरुण के लिए असह्य हो गयी थी और उन्होंने कमंडलु में से अपनी दाहिना अंजलि में जल तथा वाम कर में कुश निर्मित ब्रह्दण्ड सँभाला।
“नहीं वत्स।” गुरुदेव रुक गए। स्नेहपूर्वक उन्होंने उस तेजस्वी किशोर के मस्तक पर हाथ फेरा। “क्रूरता का प्रतिकार जब कभी क्रूरता से किया जाता है वह उसे एक क्षणिक विराम देकर द्विगुणित महकाने वाला सिद्ध होता है। अनल को तेजस् घृत से नहीं शीतल जल से शाँत करना चाहिए।”
“यदि वह दुष्ट आपकी आज्ञा न माने?” आवेश जैमिनी में भी आ गया था। उनका कर्म सिद्धाँत जैसे को तैसा देने का समर्थक है।
वह तो ऐसा करेगा ही। अपमान एवं आघात भी कर सकता है। महर्षि ने कहा-वह तो भ्राँत हैं। ज्ञान हीन हैं। क्रोध ने उसे अंधा बना दिया हैं, और लोभ ने उसे उन्मत्त। वह क्या तुम्हारे कोप का पात्र हैं? उसके अज्ञानवश किए आचरण क्या देने योग्य हैं? दयनीय है वह।
शिष्यों की समझ में नहीं आ रहा था कि उनके कृपासिन्धु गुरुदेव अन्ततः करना क्या चाहते हैं। इतना ही उन्होंने समझा कि प्रत्येक स्थिति में शाँत रहने का कठोर आदेश मिल गया हैं।
कुछ ही क्षणों में एक भारी भरकम आवाज गूँजी दस्युराज उग्रश्रवा महर्षि के चरणों में प्रणाम करता है। उस समय ऋषियों का प्रताप मार्तण्ड मध्य क्षितिज पर था और दस्यु को यह ज्ञात था कि ऋषि की एक वाणी उसको सदल विनाश के गर्त में सहज ही
फेंक देने में समर्थ हैं।
“दस्युराज?” तुम्हें लज्जा नहीं आती? इस उपाधि को अपने मुख से संबोधित करने में? महर्षि के स्वर में तिरस्कार था ठीक वैसा तिरस्कार जैसा बच्चे को झिड़कते समय माता के स्वर में हुआ करता है।
“क्यों देव। मैं इसमें क्यों लज्जित होऊं?” दस्यु का कण्ठ दृढ़ था। मेरे पास छत्र-चँवर नहीं हैं, अन्यथा मेरे इस विजयाभियान तथा राजाओं की विजय यात्रा में क्या अंतर है? वे भी तो धन तथा यश के लिए ही लूट तथा हिंसा करते हैं। मैं नरपति शब्द की विडम्बना नहीं करता अन्यथा महाराज भी कहलाना कठिन नहीं हैं।
“नित्य किसी के द्वारा आचरित होने पर अनीति स्तुत्य नहीं हो जाती।” महर्षि ने घृणा पूर्वक कहा। राजा यदि दुष्ट दमन के अतिरिक्त शस्त्र उठाता है तो वह भी दस्यु हैं, यह तो ठीक किन्तु क्या इससे वह स्तुत्य हो गया?
“प्रतिभा के अधीश्रवर से तर्क करके विजय की आशा करने का दुस्साहस नहीं कर सकता।” दस्यु ने मस्तक झुकाया। मैं केवल उनकी किसी सेवा से अपने को पवित्र करने की इच्छा करता हूँ। क्या प्रभु अधम को इस योग्य समझते हैं।
“मैं स्वयं ही तुमसे याचना करने आया हूँ।” महर्षि ने उस दस्यु को चकित कर दिया। आशा है तुम अपनी प्रसिद्धि एवं साहस का सम्मान करोगे और एक वृद्ध ब्राह्मण को निराश नहीं करोगे। उन्होंने भेदक दृष्टि से उसकी ओर देखा।
“मेरे समीप किसी भी चक्रवर्ती के कोष से अधिक रत्न एवं स्वर्ण हैं तथा सभी राज्यों के कोष-गोधन आदि एक संकेत मात्र से प्राप्य हैं। बड़े उल्लास से दस्यु ने कहा- यदि प्रभु ने मुझे इतना बड़ा सौभाग्य का पात्र बनाया है तो यह सेवक भी मस्तक तक देकर
उसकी रक्षा करने का प्रयत्न करेगा।”
“मेरा काम वल्कल एवं फलों से चल जाता है और गायें सरस्वती तीर पर कम नहीं हैं।” उन महामेध का पार पाना दस्यु के लिए कहाँ शक्य था। वह उनकी माँग सुनने को उत्सुक था। “मेरे देवता को बलि भी नहीं दी जाती। मैं तो एक साधारण भिक्षा चाहता हूँ। तुम उसे दोगे सुत?”
“मैं आज्ञा की प्रतीक्षा कर रह हूँ।”हाथ जोड़कर उसने मस्तक झुका रखा था। लूट के स्वर्ण - वस्त्रादि की ढेरी एक ओर लगी थी। उसके दल के सभी अनुयायी एकत्र हो गये थे। उनके वस्त्र रक्ताक्त हो चुके थे। अरुण खंगम्यान में चले गए थे और भाले आदि उन लोगों ने पीछे डाल दिये थे। वे जानते थे कि महर्षि के समीप उन पर कोई आघात करने का साहस न करेगा और यदि कोई करे भी तो वे दुर्बल नहीं हैं। दोष उनका नहीं रह जायगा तब।
“यह संपत्ति उनके स्वामियों के लिए छोड़ दो।” यहाँ तक तो दस्यु ने कोई आपत्ति नहीं की, किन्तु महर्षि कहते ही चले गये- और इन शस्त्रों को फेंक दो। इस नृशंस कार्य को सदा के लिए परित्याग करने प्रतिज्ञा करो।
“यदि मैं यह न कर सकूँ?” डाकू का स्वर भर गया था। वह अपने को सचमुच विवश पा रहा था। क्या कोई दूसरी आज्ञा देकर प्रभु अपने वचनों से छुटकारा नहीं दे सकेंगे? वह बहुत कातर हो रहा था। कह नहीं सकते कि शाप के भय से भीत भी था या नहीं।
“केवल एक बात और वत्स”! महर्षि एक वाक्य ने उसे आश्वासन दिया। केवल एक ही बात परिवर्तन में और वह यह कि ऐसी दशा में अन्य किसी पर शस्त्र प्रयोग करने के पूर्व तुम मेरा वध कर दो। भगवान व्यास ने अपना रजत श्मश्रु केश मण्डित मस्तक झुका दिया।
“छिः!” दस्यु जैसे पागल हो गया। उसने अपनी कमस से तलवार नोचफ की कवच उतार दिया और उन विश्ववद्य के चरणों में रोता हुआ गिर पड़ा।
इस घटना के कई दिन बीत गए। एक दिन सरस्वती के पावन तट पर भगवान व्यास एक शिला पर आसीन थे और अग्रश्रवा दोनों हाथ बाँधे उस शिला के नीचे घुटनों के बल बैठा हुआ था “तुम धातु और पाषाण के पीछे इतने व्यस्त क्यों हो गए हो?” भगवान् व्यास के स्वरों में कोमल वात्सल्य भाव उमड़ रहा था।
“आनन्द तथा सुख के लिए।” उसकी वाणी उसके नेत्रों के समान ही आर्द्र थी। वस्तुतः उसका हृदय उसे अपने क्रूर मार्ग पर लौट जाने के लिए बार-बार प्रेरित कर रहा था और निष्कपट भाव से उसने श्रीगुरू चरणों में अपनी आँतरिक व्यथा निवेदन कर दी थी।
“तुम विश्वास करते हो कि उनमें आनन्द और सुख हैं?” उन योगिराज के नेत्र उसके दोनों नेत्रों पर स्थिर हो गए। उन्हें इस हिरन के सम्मुख डाल दो और देखो कि यह उनसे कितना सुख या आनन्द प्राप्त करता है। पास ही एक मृग शावक हरित तृणों को धीरे-धीरे कुतर रहा था।
“यह उनके मूल्य को नहीं जान सकेगा। उसने वैसे ही साधारण ढंग से कह दिया।
यह मूल्य ज्ञान कल्पना ही तो हैं। महर्षि गंभीर होकर बोले-तुमने उसे बहुमूल्य मान लिया हैं, इसी से उसे पाकर प्रसन्न होते हो। यह प्रसन्नता उनमें से नहीं तुम्हारे अंतर से ही तुम्हें उपलब्ध होती हैं।
“वह उसका निमित्त कारण तो है ही!” अब भी उसका हृदय परिवर्तित नहीं हुआ था। अंततः प्रसन्नता किसी कार्य में तो होती नहीं। वह कहीं न कहीं निमित्त रूप में ही तो प्राप्त होती हैं, ऐसी उसकी मान्यता थी।
“वह कार्य में भी होती हैं। “ महर्षि ने पुचकारा और उनका संकेत पाते ही वह मृग उनके पैरों के पास आकर खड़ा हो गया। उनका कोमल हाथ उसकी पीठ पर घूम रहा था और वह पशु मुग्ध भाव से उनके नेत्रों की ओर देख रहा था। तुम कह सकते हो कि विश्व में कोई ऐसा प्राणी है जिसे यह स्नेह आनन्द नहीं देगा? दूसरों को इस प्रकार स्नेह दान में अंतर को क्या कम आनन्द उपलब्ध होता है?
“गुरुदेव।” जैसे कोई अलौकिक घटना हो गयी हो। बड़े ही अद्भुत स्वर में वह पुकारा। दो क्षणों के लिए उसकी वाणी मूक हो गयी। भगवान व्यास के नेत्र अभी भी उसके नेत्रों में स्थिर थे। महर्षि का भाव प्रवाह नेत्रों के माध्यम से प्रविष्ट होकर उग्रश्रवा की अंतःचेतना का मथ रहा था। आपकी वाणी ने मेरे हृदय के घोर अंधकार को दूर कर दिया। आप इस मानव रूप में साक्षात् श्रीहरि हैं। वह वहाँ अपने ही नेत्र सलिल से भीगी पृथ्वी पर दंडवत् लेट गया। बड़े कष्ट से उसने उपयुक्त शब्द कहें।
भगवान व्यास मुस्कुरा रहे थे। उस दस्युपति को क्या पता था कि वह अनजाने में जो महात्म्य वाक्य कह गया वह सत्य ही था। मुझ पापिष्ठ का उद्धार कैसे होगा नाथ? वह विक्षिप्त की भाँति तड़प उठा।
अब तक तुमने दूसरों की स्थूल संपत्ति तथा जीवन का अपहरण किया हैं। व्यासदेव कह रहे थे। अब इस योग्य बनो कि तुम उन्हें अंतर की दिव्य संपत्ति एवं अमर जीवन वितरित कर सको। दूसरों को शाँति देकर तुम शाँति प्राप्त कर सको। दूसरे दिन से वह उग्रश्रवा भगवान व्यास का प्रधान पुराण वाणी सूत हो गया। उसके पुराण प्रवचन को सुनकर अनेकों अपना सोया देवत्व जगाकर ऋषि बनें। इस प्रकार न केवल एक नया बाल्मीकि जन्मा, ब्राह्मणत्व के विस्तार की नया प्रक्रिया का शुभारंभ हो गया।
सृष्टि की संचालक सत्ता, सर्व समर्थ सत्ता है। उसके लिए राई का पहाड़ बना देना और पर्वत को राई में परिवर्तित कर देना कोई कठिन नहीं वह उतना ही सरल है, जितना साधारण रात-दिन का होना। यदि उससे तादात्म्य स्थापित किया जा सके, तो उससे जुड़ी अगणित पहेलियों में से पर्दा उठ सकता है, जो आये दिन मानवी बुद्धि को चकित और चमत्कृत करती रहती है।
घटना अमेरिका की है। एडविन रोबिन्सन एक ट्रक ड्राइवर था। वह प्रायः लम्बी दूरी की यात्रा करता, माल लाया और ले जाया करता था। जब उसकी आयु 53 वर्ष की हुई, तो एक दिन एक सड़क दुर्घटना में उसकी आंखें चली गई और वह अंधा हो गया। कान भी लगभग बहरे हो गये थे। विशेषज्ञों ने उसकी जाँच करने के उपरान्त एक स्वर से यही कहा कि अब रेबिन्सन इस दुनिया को नहीं देख सकेगा। कान के बारे में भी उनके ऐसे ही विचार थे। अतीन्द्रिय चिकित्सकों ने भी उसे असाध्य अंधों की भाँति छड़ी के सहारे चलता और श्रवण-यंत्र की सहायता से सुनता था। जिंदगी उसे भारभूत प्रतीत होने लगी थी, किन्तु फिर भी नियति का सुनिश्चित निर्धारण समझ कर वह उसे ज्यों-त्यों करके खींच रहा था। उसमें न पहले जैसा उत्साह रहा, न उमंग। जीवन नीरस और ऊबाऊ लगने लगा था। कई बार वह अपनी विकलाँगता से इतना खिन्न हो जाता कि जीवन त्यागने की बात सोचने लगता। ऐसे हर अवसर पर उसे एक ऐसी शक्ति का आभास होता, जो उसे आँतरिक संबल प्रदान करती जान पड़ती। वह पुनः नये जोश से जीवन आरंभ करता, किन्तु कुछ ही दिनों में फिर वही अवसाद घेर लेता। इसी आशा-निराशा के बीच वह जीता चला जा रहा था। नौ वर्ष इसी तरह गुजर गये।
सन 1980 की बरसात को एक दिन रोबिन्सन की मुर्गी का चूजा उसके फलमाउथ, मैन स्थित मकान के गैराज के नजदीक दाने चुग रहा था। रोबिन्सन को इसका पता नहीं था। अतः वह अपने प्रिय चूजे का पता लगाने के लिए निकल पड़ा। हर दिन की तरह आज भी उसके हाथ में एल्युमिनियम की छड़ी थी और कानों में श्रवण यंत्र लगा हुआ था। अभी वह थोड़ी ही दूर सामने के वृक्ष के निकट गया था कि दुर्भाग्य से फिर उसपर आघात किया। पेड़ पर अकस्मात बिजली गिर पड़ी और रोबिन्सन बेहोश हो गया। बीस मिनट पश्चात जब उसकी चेतना लौटी, तो वह आश्चर्यचकित हो रहा था। उसका अंधत्व गायब हो चुका था। अब वह अच्छी प्रकार देख सकता था। उसका श्रवण उपकरण जलकर पूरी तरह नष्ट हो चुका था, किन्तु इसके बिना भी सम्प्रति रोबिन्सन अच्छी तरह सुन सकता था।
उसका पूरी तरह परीक्षण करने के पश्चात मूर्धन्य नेत्र विशेषज्ञ डॉ अर्ल्बट मोल्टन का उद्गार था कि वह नहीं जानता कि इसकी व्याख्या कैसे की जाय, पर यह सत्य है कि रोबिन्सन अब अंधा नहीं रहा। वह सब कुछ देख सकता है। उनने इसे चमत्कार की संज्ञा देते हुए कहा कि ऐसे प्रकरण स्थूल बुद्धि की पहुँच से परे के विषय हैं, अस्तु इनकी वैज्ञानिक व्याख्या संभव नहीं। जो संभव है, वह इतना ही कि प्रकृति के विभिन्न रहस्यमय प्रसंगों में से एक इसे मान लिया जाय और यह दुराग्रह छोड़ दिया जाय कि वह किस भाँति संपन्न हुआ, क्योंकि सूक्ष्म का अनुसंधान करने और गहरी पैठ रखने वाली बुद्धि का विकास हुए
बिना ऐसी गुत्थियों का समाधान शक्य एवं सरल नहीं।
घटना के एक माह बाद एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन परिलक्षित हुआ। रोबिन्सन जो कि विगत 35 वर्षों से गंजा था, उसके सिर पर घने बाल उग आये। चिकित्सकों के अनुसार उसका गंजापन आनुवंशिक था, अतः बिना किसी उपचार के इतने लम्बे अंतराल बाद उनका पुनः उग आना चमत्कारिक ही कहा जायेगा। एक अन्य आश्चर्यजनक बात घटना के दिन जो देखने में आयी, वह यह कि पेड़ और श्रवण यंत्र दोनों ही जलकर बरबाद हो गये, पर रोबिन्सन इससे सर्वथा अछूता बना रहा।
इन सब तथ्यों को देखने के उपराँत यही कहा जा सकता है कि उस “अघटन-घटना पटीयसी” के लिए असंभव को संभव कर दिखाना कठिन नहीं। मुश्किल तो मनुष्य के लिए हो सकती है, पर जिसने इतनी विलक्षण सृष्टि गढ़ी और खड़ी की है, भला उस सत्ता के लिए यह सब दुस्साहस क्यों कर होना चाहिए? हम यदि उससे सघन संपर्क कर सके, उसकी चेतना को स्वयं में अवतरित कर सके, तो न सिर्फ अपने अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति कर सकेंगे, वरन् उन गुत्थियों को सुलझाने में भी समर्थ हो सकेंगे, जो अनसुलझी बनी हुई है व परिष्कृत चेतना की माँग करती है।
वर्षों पूर्व नीत्से ने घोषणा की थी कि ईश्वर मर गया। यदि बात सचमुच ऐसी रही होती, तो इस जड़ जगत का संपूर्ण ढांचा ही लड़खड़ा गया होता एवं प्रकृति की हर प्रणाली में सर्वत्र अराजकता और अव्यवस्था ही झलकती-झाँकती दृष्टिगोचर होती, किन्तु प्रत्यक्ष में ऐसा होता कहाँ दीखता है? सूक्ष्म से सूक्ष्म परमाणुओं के अंतराल में भी एक सुनिश्चित क्रमबद्धता पायी जाती है। इससे ऐसा लगता है इस संसार काँ संचालित करने वाली कोई परोक्ष सत्ता अवश्य होनी चाहिए।
एक जमाना था, जब लोग भोले, भावुक और विश्वासी हुआ करते थे। तब ईश्वरीय सत्ता के प्रति उनके मन में न कोई शंका थी, न संदेह। यह उनकी अच्छाई थी। बुराई यह थी कि इसके साथ-साथ हुए थे, जिससे उनका विकास लम्बे समय तक अवरुद्ध बना रहा। बुद्धिवाद के बढ़ने के साथ-साथ कुप्रथाओं का अंत तो हुआ , पर एक इससे भी भयंकर आस्था-संकट आ खड़ा हुआ-नास्तिकवाद , जो ईश्वर के अस्तित्व को ही, संदेहास्पद मानने लगा और उसे तर्क, तथ्य व प्रमाण की कसौटी पर कसने का प्रयास चेतनात्मक सत्ता की पुष्टि न हो सकी, तो कुछ सिर फिरे किस्म के दार्शनिकों ने यह कहना प्रारंभ किया कि भगवान नाम की किसी सत्ता का संसार में कोई अस्तित्व नहीं। बस, यहीं से अनीश्वरवादी दर्शन की शुरुआत हुई।
पश्चिमी जगत में इस विचारधारा का जन्म डार्विन से हुआ, जब उसने मनुष्य को बन्दर की औलाद बताया। यों प्रत्यक्षतः उसने आस्तिकवाद पर कोई प्रहार नहीं किया, पर परोक्ष रूप से इसका खण्डन कर दिया। बाद के अनुसंधानकर्ताओं ने उनके कथन को सही सिद्ध करने के लिए जोड़-गाँठ करके बन्दर से मनुष्य तक के विकास-यात्रा की एक क्रमबद्ध शृंखला तैयार कर दी। इतने पर भी बीच की उसकी कई कड़ियाँ अब तक ढूँढ़ी नहीं जा सकी है। इस महत्वपूर्ण त्रुटि से छुटकारा पाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नये सिद्धाँत का प्रतिपादन किया। इसका नाम रखा गया-”जम्प थ्योरी” या “सैलटैटरी थ्योरी “। सह सिद्धाँत के अनुसार मानवी विकास में बीच-बीच में कई ऐसे पड़ाव आये, जहाँ प्रगति अचानक एकदम रुक गई और फिर अकस्मात् इतनी तेजी से आरंभ हुई कि प्राणी की शारीरिक-संरचना पहले से काफी बदल गई। दूसरे शब्दों में विकासवाद के पक्षधरों ने इसे यात्रा के दौरान की एक लम्बी छलाँग बतायी। उनके अनुसार इसी कारण बीच की दो मिलती-जुलती कड़ियाँ नहीं पायी जा सकीं। हाथी, घोड़े, ऊँट आदि जानवरों की आधी-अधूरी वैशावलियाँ भी इसी प्रकार येन-केन प्रकारेण तैयार कर ली गई। इतने पर भी आश्चर्य यह है कि कुछ एक प्रमाणों के आधार पर विज्ञान ने संपूर्ण जीव-जगत को विकासवाद पर आधारित कैसे मान लिया? जबकि कितने ही जीव (जेलीफिश, स्पाँज, सीअरचीन, सीकुकुम्बर एवं अन्य) ऐसे है, जिनके किसी एक पूर्वज को भी सारी पृथ्वी पर अब तक खोजा नहीं जा सका है। ऐसे में विकासवादी अवधारणा को सच कैसे मान लिया जाय और इस तथ्य से सर्वथा इनकार कैसे किया जाय कि इनकी रचना के पीछे किसी अदृश्य सत्ता का हाथ नहीं है?
यदि जीव-जगत को विकासवादी प्रक्रिया की परिणति माना जाय, तो फिर वनस्पति-जगत को भी इसमें सम्मिलित करना पड़ेगा, जबकि पादप-जगत में ऐसा कोई सिद्धाँत नहीं है, जिसमें एक वृक्ष से दूसरे का उद्भव बताया गया हो। हाँ, किसी प्राकृतिक माध्यम अथवा कृत्रिम ढंग से दो पौधों में परस्पर परागण की क्रिया हो जाय, तो उससे तीसरी प्रजाति की उत्पत्ति हो सकती है, पर नैसर्गिक रूप से उसमें परिवर्तन तब तक नहीं होगा, जब तक किसी बाह्य कारक के कारण उसका पर-परागण न हो जाय, जबकि प्राणियों की दुनिया में एक जीव से दूसरे का प्रादुर्भाव लाखों-करोड़ों साल की प्रगति-यात्रा के दौरान होने वाले स्वाभाविक परिवर्तन को माना जाता है। यदि ऐसा, हुआ, तो यह सृष्टि में विकास संबंधी अंतर्विरोध होगा, क्योंकि एक ही क्रिया की दो भिन्न प्रक्रियाएँ प्रकृति में अब तक नहीं देखी गई। ऐसे में हर जन्तु, जाति और वृक्ष को बिलकुल स्वतंत्र मान कर चलना ही बुद्धिमानी होगी। यह तभी संभव है, जब इसके पीछे किसी स्रष्टा का हाथ होना माना जाय।
इसी प्रकार का मंतव्य प्रकट करते हुए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य वनस्पति शास्त्री एवं प्रख्यात विकासवादी ई−जे काँरनर कहते हैं कि यदि पूर्वाग्रह रहित होकर कहूँ तो पौधों के अब तक के जीवाश्म-रिकार्ड विकासवादी मान्यता को हतोत्साहित करते और किसी अविज्ञात रचयिता का पृष्ठ पोषण करते पाये जाते हैं। इसी प्रकार के विचार प्रकट करते हुए प्रसिद्ध जेनेटिसिस्ट एवं विक सवादी रिचर्ड बी−गोल्ड्समिड कहते हैं कि समस्त प्राणी और पादप अकस्मात् प्रकट हुए और बिना किसी परिवर्तन के वे अब तक बने हुए है। एक अन्य विकासवादी जॉर्ज गेलार्ड सिम्पसन का कहना है कि प्रीकै म्ब्रिज युग के जीवाश्मों की अनुपस्थिति विकासवादी अवधारणा के लिए पहेली बनी हुई है। वे कहते हैं कि इसे विकासवाद की अपेक्षा जीवों का स्वतंत्र उद्भव जैसी मान्यता के आधार पर आसानी से सुलझायी जा सकती है। बरमिंघम विश्वविद्यालय के एनाटानी विभाग के अध्यक्ष लार्ड सोली जुकरमैन ने जीवन पर्यन्त अपने अन्वेषण के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य यदि गोरिल्ला सदृश्य प्राणी से विकसित हुआ होता तो वह अपने जीवाश्मों में बिना किसी परिवर्तन के ज्यों-का-त्यों बना रहता, जबकि जीवाश्म विज्ञानियों ने मनुष्य के तथाकथित पूर्वजों के ढेर सारे जीवाश्म खोज निकालने का दावा किया है। इनका यह दावा जुकरमैन के निष्कर्ष के विरुद्ध है। इससे यही सिद्ध होता है कि मनुष्य आरंभ से ही मनुष्य था और गोरिल्ला, गोरिल्ला। यह विचारधारा भी किसी विधाता की उपस्थिति का संकेत करती है।
जीव-विकास के समर्थक जीवन का प्रादुर्भाव जीवन विहीन रसायनों से मानते हैं। उनके अनुसार आदिमकाल में कुछ रसायनों की परस्पर प्रतिक्रिया से अमीनो अम्ल बने, जो बाद में जीवन-विकास के लिए उत्तरदायी हुए। इस प्रकार बने एक कोशीय जीवों से कालक्रम में जटिल संरचना वाले बहुकोशीय जीवों की उत्पत्ति हुई। यदि जीव-उद्भव संबंधी इस मान्यता को सही माना गया, तो अनेक ऐसे प्रश्न उठ खड़े, होंगे, जिनका उत्तर दे पाना कठिन होगा, यथा-यौगिकों का पारस्परिक प्रतिक्रिया की प्रेरणा कहाँ से मिली? जड़ पदार्थों में चेतना का आविर्भाव किस भाँति सँभव हो सका? आदि। इस स्थिति में किसी सूक्ष्म रचनाकार का अस्तित्व स्वीकार कर लेने से जीव-विकास संबंधी विवेचना अत्यन्त सरल हो जाती है। यदि ऐसा नहीं माना जा सका और अमीबा से ही जीवोत्पत्ति का दुराग्रह अपनाया गया , तो ऐसी विसंगतियाँ सामने आती है, जिन्हें किसी कदर स्वीकार नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए आधुनिक विकासवाद अथवा नव डार्विनवाद को लिया जा सकता है। इसके अनुसार म्यूटेशन विकास का निमित्त कारण है। उल्लेखनीय है कि म्यूटेशन गुणसूत्रों अथवा जीन्स में आकस्मिक परिवर्तन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। विशेषज्ञों का मत है कि इस परिवर्तन की दर का पता लगाना संभव है और यह भी अन्दाज लगाना शक्य है कि कितने अनुकूल म्यूटेशन विकासवादी परिवर्तन के लिए अभीष्ट होंगे। यह गणना भी सरल है कि एक अमीबा के पूर्ण मनुष्य में रूपांतरण में कितना लंबा कालखण्ड आवश्यक होगा। इन्स्टीट्यूट फॉर क्र्रियेशन रिसर्च, सैनडियागो, कैलीफोर्निया के एसोसिएट डायरेक्टर डूने टार्ल्बट गिश, जो कि विकासवाद के प्रबल विरोधी है, के अनुसार गणितज्ञों के एक दल ने जब इसकी गणना की, तो प्राप्त समय पृथ्वी की उत्पत्ति से कई अरब लंबा पाया गया। वैज्ञानिकों पृथ्वी को 5 अरब वर्ष पुराना मानते हैं, जबकि विकासवादी प्रक्रिया से मानवी प्रादुर्भाव का समय अनेकों गुना विशाल मिला। यह विरोधाभास विकासवाद का खण्डन करता है और जीवन विकास संबंधी किसी ऐसे मतवाद पर विचार करने के लिए विवश करता है, जो सर्वमान्य हो। ऐसी स्थिति में डूने की “क्रियेशन थ्योरी” ही ज्यादा सटीक और सारगर्भित प्रतीत होती है, जिसमें उनने सृष्टि-संरचना के पीछे भगवान को प्रमुख माना और कहा है कि मनुष्य समेत हर प्राणी का पदार्पण स्वतंत्र सत्ता के रूप में हुआ है , उनमें किसी का किसी से कोई संबंध नहीं। एक कोशिका अमीबा आरंभ में भी अमीबा था, अब भी अमीबा है और जब एक तक यह सृष्टि रहेगी, वह अपने उसी रूप में विद्यमान रहेगा। मनुष्य और बन्दर आदि काल से वही थे और अनंत काल तक उसी कलेवर को अपनाये रहेंगे।
यहाँ भौतिकी के एक प्रसिद्ध सिद्धाँत पर तनिक चर्चा कर लेना अनुचित न होगा। थर्मोडायामिक्स के दूसरे नियम के अनुसार संपूर्ण प्राकृतिक तंत्र में व्यवस्था की ओर जाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यह पूरे ब्रह्माँड में सूक्ष्म और स्थूल स्तर पर समान रूप से देखी जाती है और अब तक कभी असफल होते हुए नहीं पायी गई है। विकासवाद का प्रतिपादन इससे ठीक उलटा है। वह कहता है कि समस्त निसर्ग का अव्यवस्था से व्यवस्था (कुछ अव्यवस्थित रसायनों के व्यवस्थित संयोग से अमीबा की उत्पत्ति और फिर उससे अधिकाधिक जटिल जीवों का विकास ) की ओर विकास करने का आम स्वभाव है। उसके अनुसार यह स्वभाव सूक्ष्म परमाणुओं से लेकर बड़े पदार्थों तक में सर्वत्र दिखाई पड़ता है। ज्ञातव्य है कि प्रकृति की एक ही प्रक्रिया से संबंधित दो विपरीत सिद्धाँत लागू नहीं हो सकते। उपरोक्त दोनों नियमों में से सत्य कोई एक ही हो सकता है। ज्ञातव्य यह भी है कि थर्मोडायनामिक्स के सुस्थापित दूसरे नियम पर अँगुली उठाने का साहस अभी तक किसी ने नहीं किया। ऐसी स्थिति में विकासवादी प्रक्रिया संशय के घेरे में आ जाती है।
इस दशा में यदि आस्तिकवाद के ईश्वर की मान्यता को स्वीकार लिया जाय, तो सृष्टि रचना संबंधी व्याख्या अत्यन्त सरल हो जाती है। वैज्ञानिक डूने गिश ने इसी का आश्रय लेते हुए विज्ञान और विकासवाद के बीच संव्यास विसंगतियों के आधार पर विकासवाद को अमान्य कर दिया। वे अपनी लंबी शोध के उपराँत उसी निष्कर्ष पर पहुँचे है, जिसे भारतीय अध्यात्म बहुत पहले से कहता आ रहा है। उनने कण-कण में भगवान की उपस्थिति का समर्थन कर अन्ततः उस उपनिषद् वाक्य की ही पुनरुक्ति की है, जिसमें “ईशावास्यामिदं सर्व” कहकर उसे सर्वव्यापी सर्व नियंता बताया है। इस दर्शन को अंगीकार कर लेने के पश्चात् “एकोऽहम् बहुस्याम्” के ईश्वरीय संकल्प को मान लेने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इससे जीव-उत्पत्ति और सृष्टि-विकास संबंधी सारी उलझनें समाप्त हो जाती है। फिर हमें न तो यह कहने की जरूरत पड़ेगी कि मनुष्य बन्दर की संतान है और न यह कि संसार स्वतः उत्पन्न है।
राजनीतिक, सामाजिक, बौद्धिक क्राँतिकारियों की समस्याएँ उनके पीछे कार्य कर रहे मनोबल व साहस के साथ जुड़ी हैं। दुस्साहसियों में नेपोलियन जैसे मनुष्यों की गणना प्रायः होती रहती है। इंग्लैण्ड के ऊपर जब जर्मनी की बेतहाशा बमबारी हो रही थी और इस देश के पराजित होने का अंदेशा नागरिकों के मन पर बुरी तरह छाया हुआ था, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री ने एक नारा दिया था - “वी” फॉर विक्ट्री। यह नारा घर-घर पर अंकित कर दिया गया और जनता में नये सिरे से उत्साह जगाया गया कि जीतेगा अन्ततः इंग्लैण्ड ही। इन दोनों बातों से जन जीवन में नया मनोबल उभरा और उसके सहारे उभरते पराक्रम ने इंग्लैण्ड की हारती बाजी को जिताकर दिखाया। दुष्प्रयोजनों के लिए तो लुटेरे, हत्यारे भी साहस दिखाते रहते हैं, पर ऊँचे उद्देश्यों के लिए जब भी साहस उभरता है तब उसके पीछे साधनों की कमी होते हुए भी मनोबल का ऐसा प्रचंड प्रवाह उभरता है जिसके सहारे पराजय विजय में बदल जाती है। ऐसा सत्साहस प्रायः दैवी ही होता है। क्षुद्र स्तर के प्राणी तो स्वार्थ सिद्धि की लड़ाई ही लड़ते देखें गये हैं। मुहल्लों में कुत्तों जैसी लड़ाई होती तो कहीं भी देखी जाती है।
अगले दिनों प्रतिभाओं को युग परिवर्तन के लिए ऐसा कुछ पराक्रम करना पड़ेगा जिसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कहा जा सके। क्योंकि इतने व्यापक क्षेत्र में इतने बड़े और इतने कष्ट साध्य परिवर्तन प्रस्तुत करने के अवसर कदाचित पृथ्वी में पहली बार ही मिले हैं। राजाओं-सामंतों की सेना अपने साधनों के बल पर लड़कर हारती और जीतती रही है। पर ऐसा प्रथम अवसर है जब अधिकाँश राजा-प्रजा का विकृत चिंतन और चरित्र नये सिरे से अभ्यास से पूर्व ही उत्कृष्टता की दिशा में ढाला गया है और उसके लिए वरिष्ठ प्रतिभाओं को आगे बढ़कर बुद्ध के धर्म चक्र परिवर्तन जैसी भूमिका निभाने के लिए सामूहिक रूप से समुद्यत होना पड़ेगा।
नवसृजन के इस विश्व मानव के भाग्य-भविष्य को नये सिरे से से लिखने वाले सुयोग में दैवी शक्ति का निश्चित रूप से बड़ा योगदान होने वाला है। इसके लिए किसी को किसी से कुछ माँगने की, आग्रह या अनुरोध करने की आवश्यकता नहीं हैं। अपनी पात्रता अनुरूप बना लेने पर सब कुछ अनायास ही खिंचता चला आता है। वर्षाकाल में खुले में रखा बर्तन अनायास ही भर जाता है, पर छोटी कटोरी हो, तो उसमें उतनी ही कम पानी दीखेगा, जबकि बड़ी बाल्टी पूरी तरह भरी हुई मिलेगी। यह पात्रता का ही चमत्कार है। गहरे सरोवर लबालब भर जाते हैं जबकि ऊँचे टीलों पर पानी की कुछ बूँदें नहीं टिकती। वर्षा में उपजाऊ जमीन हरियाली से लद जाती है, पर ऊसर बंजर ज्यों-के-त्यों वीरान पड़े रहते हैं। नदियाँ चूँकि समतल की अपेक्षा गहरी होती है, इसलिए चारों ओर पानी सिमट कर उनमें भरने और बहने लगता है। यह पात्रता ही है, जिसके अनुसार छात्रवृत्ति, प्रतिस्पर्धा, पुरस्कार आदि उपलब्ध होते हैं। यह लाभ मात्र चापलूसी करने भर से किसी को नहीं मिलते। कोई अफसर रिश्वत या खुशामद से प्रसन्न होकर किसी को यदि अनुचित पद या उपहार प्रदान कर दे, तो उसकी न्यायनिष्ठ पर-कर्तव्य पालन की जिम्मेदारी न करने का आक्षेप लगता है और उस कारण उसकी खिंचाई होती है। यह नियम शाश्वत है, इसलिए भगवान पर भी लागू होता है।
पात्रता अर्जित कर लेने पर बिना किसी अतिरिक्त कोशिश-सिफारिश के अपनी योग्यता के अनुरूप पद प्राप्त कर लिए जाते हैं। इसलिए दैवी शक्तियों के अवतरण के लिए पहली शर्त है-साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता। सर्वत्र इसी को खोज और माँग है। विवाह योग्य हो जाने पर उसके अभिभावक उपयुक्त जोड़ा तलाश करने के लिए कुपात्र पड़ोस में बसता हो, तो भी उसकी ओर से मुँह फेर लेते हैं। खुशामद-सिफारिश भरे संदेश पहुँचने पर भी ध्यान नहीं देते। आध्यात्मिक सिद्धियाँ ईश्वर की पुत्रियाँ हैं। उन्हें प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को सर्वांग सुन्दर होना चाहिए, भीतर से भी और बाहर से भी। यह पात्रता की परिभाषा है।
दूसरा सद्गुण जो इतना ही आवश्यक है वह है-उदारता। जिसके अंतराल में करुणा, ममता, सेवा, सहायता की कोमलता है, वहीं दूसरों को भी निष्ठुरता से विरत कर सकता है, करुणाकर बना सकता है। ईश्वर की अनुकंपा उन्हें मिलती है, जो दूसरोँ पर अनुकंपा करने में रुचि रखते हैं। निष्ठुरों की कठोरता-संकीर्ण स्वार्थपरता देखकर पड़ोसियों से लेकर भगवान तक की अनुकंपा वापस लौट जाती है।
पूजा-पाठ का उद्देश्य आत्म परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन की उदारता जगाना भर है। यदि भाव कृत्यों से यह दोनों उद्देश्य सध रहे हों, तो समझना चाहिए कि उनका समुचित लाभ मिलेगा, किन्तु यदि क्रिया मात्र चल रही हो, और सद्भावनाओं के विकास-परिष्कार पर उनका कोई प्रभाव न पड़ रहा हो, तो समझना चाहिए कि क्रिया कलापों की लकीर भर पीटी जा रही है और उसके सहारे आत्म-प्रवंचना जैसी ही कुछ विडंबना बन पड़ेगी। इन दिनों प्रायः ऐसा ही खेल-खिलवाड़ चलता रहा है और लोग देवी-देवताओं की हजामत बनाने के लिए चित्र-विचित्र स्वाँग रचते और बड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रतीक्षा करते रहे हैं। देवता उतने मूर्ख है नहीं, जितने कि समझे जाते हैं। हेय स्तर का व्यक्ति ही छोटे-मोटे उपहारों या कथन श्रवणों से भरमाया जा सकता है। पर देवता तो वास्तविकता परखने में प्रवीण होते हैं, साथ ही इतने दरिद्र भी नहीं है कि छोटे-छोटे उपहारोँ के लिए आंखें मूँदकर दौड़ पड़े, जो माँगा गया है, उसे मुफ्त में ही बाँटते-बखेरते रहें। यही कारण है कि मनौती मनाने के लिए पूजा-पत्री का सरंजाम जुटाने वालों में से अधिकाँश को निराश रहना पड़ता है। आरंभ में जो लाटरी खुलने जैसा उत्साह होता है, वह परीक्षा की कसौटी पर कसे जाने पर निरर्थक ही सिद्ध होता है। आस्तिकता के प्रति उपेक्षा, आशंका का भाव बढ़ते जाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि लोग कम कीमत में बहुमूल्य वस्तुएं पाने की आशा लगाने लगते हैं और जब वह विसंगति गलत सिद्ध होती है, तो कभी साधना को, कभी देवता को, कभी अपने भाग्य को दोष देते हुए भविष्य के लिए एक प्रकार से अनास्थावान ही बन जाते हैं। इस विडंबना से हमें मुक्त होना होगा।
धातुओं की खदानें जहाँ कहीं होती हैं, उस क्षेत्र के अपने सजातीय कणों को धीरे-धीरे खींचती और एकत्रित करती रहती है। उनका क्रमिक विस्तार इसी प्रकार हो जाता है। जहाँ सघन वृक्षावली होती है, वहाँ भी हरीतिमा का चुम्बकत्व आकाश से बादलों को खींचकर अपने क्षेत्र में बरसने के लिए विवश किया करता है। खिले हुए फलों पर तितलियाँ न जाने कहाँ-कहाँ से उड़-उड़ कर आ जाती हैं। इसी प्रकार प्रामाणिकता और उदारता की विभूतियाँ जहाँ कहीं भी सघन हो जाती हैं, वे अपने आपमें एक चुम्बक की भूमिका निभाती हैं और अखिल ब्रह्मांड में अपनी सजातीय चेतना को आकर्षित करके अवधारण कर लेती हैं। ईश्वरीय अंश इसी प्रकार मनुष्य में बढ़ता है और उसे देवमानव-महामानव का स्तर प्रदान करता है। यही है ईश्वर की अनुकंपा अथवा अवधारणा, जो सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा निश्चित रूप से प्राणवानों में अधिक पाया जाता है। सामान्य प्राण को महाप्राण में परिवर्तित करना ही ईश्वरीय उपासना का उद्देश्य है। इसी के फलित होने पर मनुष्य को मनीषी, क्षुद्र को महान, नर को नारायण बनने का अवसर मिलता है। ऐसे व्यक्ति जब समाज में बढ़ने लगते हैं तो युग परिवर्तन का सरंजाम जुट जाता है।
स्वयं का भार वहन करना भी आमतौर से कठिन काम माना जाता है। फिर अनेकों का भार वहन करते हुए उन्हें ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने का लक्ष्य पूरा करना तो और भी अधिक कठिन पड़ना चाहिए। पर यह कठिनाई या असमर्थता तभी तक टिकती है जब तक अपने से समर्थ की कमी रहती है। उसका बाहुल्य हो तो मजबूत क्रेनें रेलगाड़ी के पटरी से उतरे डिब्बों को अंकुश में लपेट कर उलट कर सीधा करती और यथा स्थान चलने योग्य बना कर अच्छी स्थिति में पहुँचा देती है।
इक्कीसवीं सदी में उससे कहीं अधिक पुरुषार्थ किये जाने हैं। जो पिछले दो महायुद्धों की विशेष विभीषिका में विनाश हुआ है जैसे कि वायु प्रदूषण ने जीवन मरण का संकट उत्पन्न किया है। विषमताओं और अनाचारजन्य विभीषिकाओं ने जो संकट उत्पन्न किये हैं। शक्ति तो इन सभी में खर्च हुई है, पर ध्वंस की अपेक्षा सृजन के लिए कहीं अधिक सामर्थ्य और साधनों की आवश्यकता पड़ती है। इसका संचय यदि समय रहते किया जा सके तो समझना चाहिए कि दुष्ट चिंतन और भ्रष्ट आचरण के कारण उन असंख्य समस्याओं का समाधान संभव होगा जो इन दिलों हर किसी को उत्तेजित, विक्षुब्ध और आतंकित किये हुए हैं।
अपंग दया का नहीं, सम्मान का, समानता का, सहयोग का और प्यार का सच्चा अधिकारी है, यदि ऐसा हो जाय तो वे लोग जिनकी विकलाँगता में उनका अपना कोई हाथ नहीं है, स्वयं हमारे बराबर खड़े होने की शक्ति प्राप्त कर सकेंगे।
होमर ने नेत्रहीन विकलाँगता के बावजूद अपने युग की सारी वास्तविकता को गहराई से देखा और परखा। प्यार हो या युद्ध, मानव संबंध हों या शत्रुता के रिश्ते, अलौकिक धारणायें हों या धार्मिक आस्थायें, मानव प्रवृत्ति हो या सामाजिक बंधन कोई भाव ऐसा नहीं जो महाकवि होमर की दृष्टि से ओझल रहा हो। होमर के निकटतम मित्र उन्हें सतत् प्रेरणा एवं प्रोत्साहन देते रहे।
दाँस्तोवस्की नामक महान लेखक जिसने “क्राइम एण्ड पनिशमेंट” जैसे विशिष्ट उपन्यास को लिखकर साहित्य जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी वस्तुतः मानसिक रूप से रोगी थे किन्तु भावनात्मक सुधार करने वाले पड़ोसी के कारण यह कृति विश्व को दे पाये।
जिस प्रकार शरीर में कुछ कारणों से ज्वर, दाह, सूजन आदि का प्रकोप हो जाता है, उसी प्रकार मनः क्षेत्र पर भी कुछ ऐसे भार लद जाते हैं जिनका भार न सह पाने के कारण वह उत्तेजना का केन्द्र बन जाता है। आवेश चढ़ने लगता है और इस प्रकार से ज्वर की स्थिति बन जाती है। यही तनाव है। इस स्थिति में सिर तो भारी रहता है साथ ही बेचैनी, घबराहट, उदासी, थकान का भी सिलसिला चल पड़ता है। रात को थोड़ी और हलकी नींद आ पाती है जिससे सबेरे उठने पर भी स्फूर्ति का अनुभव नहीं होता। रात करवटें बदलते बीतती है। कोई सामान्य विचार मन में चल पड़े तो वह लगातार चलता ही रहता है। हटाने पर हटता नहीं। कुकल्पनाओं का एक पूरा जाल जंजाल बनकर खड़ा हो जाता है और उसी में चिंतन के समस्त सत्र, सारी सामर्थ्य खप जाती है।
तनाव रात्रि में अनिद्रा का कारण बनता है और दिन में खीज का, उदासी मिश्रित आवेश चढ़ा रहता है। फलतः किसी काम में मन नहीं लगता। न काम करना सुहाता है और किसी व्यक्ति का व्यवहार। तनिक-तनिक सी बात पर झुँझलाहट आती है और वह प्रसंग समाप्त हो जाने पर भी उत्तेजना बनी रहती है अपने पराये सभी बुरे लगते हैं। उनसे न शिष्टाचार निभ पाता है और न सद्व्यवहार बरतते बन पड़ता है।
जब श्रम-समय और व्यवस्था का तालमेल नहीं बैठता तो फिर हाथ में लिया काम ठीक प्रकार नहीं होता उसमें असफलता ही दृष्टिगोचर होती है। उसे देखकर दूसरे भी खीजते हैं और उपहास उड़ाते हैं। अयोग्य ठहराते हैं। उसकी प्रतिक्रिया अपने ऊपर और दूसरों के ऊपर खीज आने के रूप में सामने आती है। यह एक प्रकार से रुग्णता की स्थिति है, जिसके लम्बे समय तक चलते रहने पर मनुष्य आत्महीनता की ग्रंथियों में जकड़ जाता है। ऐसे ही लोग घर त्याग कर बैरागी का वेश बनाते, देश परदेश आवारागर्दी में भटकते और कभी तो आत्महत्या कर बैठते हैं।
तनावग्रस्तता का कारण प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी हो सकती हैं। पर प्रमुख कारण मनःस्थिति का गड़बड़ाना है। ऐसे रोगियों को देखते यह चाहिए कि उन्हें आवश्यकता से अधिक काम अनिच्छा के साथ तो नहीं करना पड़ता। मनुष्य को परिश्रमी तो होना चाहिए पर काम को विनोद मानते हुए खिलाड़ी की भावना से करना चाहिए। उसे भार बेगार या अत्याचार अनुभव नहीं करना चाहिए। बिना बीच-बीच में विश्राम किये लगातार काम करते रहने से भी ऐसा होता है कि अंदर गर्मी की मात्रा बढ़ जाती है और वह शरीर को ज्वर से तपाने की तरह मस्तिष्क पर उत्तेजनात्मक प्रभाव डालती है। इसका प्रत्यक्ष परिचय तनाव के रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है।
कभी-कभी मानसिक तनाव के चिह्न शरीर पर भी उभर आते हैं। हाथ पैरों में जलन, भड़कन कँपकँपी जैसे चिह्न दिखाई पड़ते हैं। पेट तो विशेष रूप से अपना क्रियाकलाप ढीला कर देता है। अपच रहने लगता है। मल त्याग में बाधा पड़ती है और मूत्र थोड़ा-थोड़ा करके गँदले रंग का होने लगता है।
मानसिक उत्तेजना शारीरिक अस्तव्यस्तता को बढ़ाती है और शारीरिक अस्तव्यस्तता मन को गड़बड़ा देती है। उसी चपेट में अनिद्रा और उत्तेजना का माहौल चढ़ दौड़ता है। तनाव-ग्रस्त व्यक्ति सदा खिन्न-उदास और खीजे हुए दीखते हैं। यह सामान्य स्वास्थ्य को लड़खड़ा देने के चिह्न हैं। जीवनी शक्ति पर दुष्प्रभाव पड़ने से वह तनिक-तनिक सी प्रतिकूलताओं को सहन नहीं कर पाती और छोटे-मोटे कारणोँ से कई प्रकार के रोग अनायास ही पकड़ लेते हैं। दुर्बलता और रुग्णता तनाव की सहेली बन कर रहती है।
इस व्याधि से छुटकारा कैसे पाया जाय? इस प्रश्न उत्तर पाने के लिये चिकित्सकों या दूसरे लोगों से यत्किंचित् सहायता ही मिल पाती है। उनके पास उत्तेजना −परक निद्रा लाने वाली या उत्तेजना बढ़ाने वाली औषधियाँ ही होती है, जो तात्कालिक कुछ लाभ दिखाने के उपराँत अपना प्रभाव खो बैठती है। तब स्थिति और भी बिगड़ जाती है।
समझा जाना चाहिये कि काम करने की शैली में अव्यवस्था का प्रवेश हो जाने से निर्धारित काम न तो पूरे हो पाते हैं। और न सही रूप में उनका तारतम्य बैठ पाता है। ऐसी दशा में बिगड़े या उलझे हुये काम यह चाहते हैं कि पाता है। ऐसी दशा में उलझे हुये काम या चाहते हैं कि नये सिरे से कार्य पद्धति का निरीक्षण किया जाय और उसमें जहाँ भी खोट रह रही हो, उसे निकाला जाय। क्रमबद्ध दिनचर्या बना लेने से बीच बीच में थोड़े विश्राम का समय भी निकल आता है और काम भी पूरा हो जाता है। मन पर भार भी नहीं पड़ता। इस लिये तनाव के रोगियों को समय सारिणी बना कर अपना दैनिक क्रम ऐसा बनाना चाहिये जो सन्तुलित हो। शरीर और मस्तिष्क के अनुरूप ही काम करना पड़े। लगातार काम करने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि बीच−बीच में थोड़े थोड़े समय के लिये विश्राम लेते रहा जाय।
काम को भार न माना जाय और न उसके सर्वोत्कृष्ट रूप की ही कल्पना की जाय। जो अपनी इच्छायें सर्वोत्कृष्ट स्थिति तक पहुँचती या पूरी होती देखना चाहते हैं उन्हें तनिक सी कमी रह जाने पर असंतोष होता और रोष आता है। हड़बड़ी सदा काम को बिगाड़ती है। या हड़बड़ी उन्हीं को होती है जो महत्वाकांक्षाएं से बड़ी−बड़ी संजोये रहते हैं पर काम कुछ नहीं कर पाते या थोड़ी मात्रा लँगड़े −लूले स्तर का ही बन पड़ता है। इसलिये अपने कामों के संबंध में सामान्यतया काम चलाऊ बनता रहे इतने में ही संतोष करना चाहिये।
जन−संपर्क में मनुष्य का अनेक लोगों से पाला पड़ता है। इसमें ..कुटुम्बी संबंधी, मित्र, पड़ोसी ही नहीं कर्मचारी और अधिकारी भी होते हैं। उन्हें यदि सदैव प्रसन्न रखने की बात सोची जाय तो वह बन पड़ने वाली बात नहीं है। किसी न किसी से कुछ न कुछ मतभेद रहेगा ही और एक दूसरे के कार्य व्यवहार में नुक्ताचीनी निकालते ही रहेंगे। उन्हें साधारण और स्वाभाविक मानकर चलना चाहिये और बात को नाराजी के स्तर तक पहुँचने देने की अपेक्षा यही करना चाहिये कि किसी प्रकार मतभेद का समाधान निकल आये और संबंधों में कटुता न आने पाये।
किसी भी घटना या व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक महत्व न दिया जाय। जीवन का एक कला, एक खेल माना जाय जिसमें अनुकूलतायें आती जाती ही रहती है इन्हें अनावश्यक महत्व देने और उनके बनने बिगड़ने पर ही खोज आती है। यह खोज ही तनाव का प्रधान कारण होती है।उसे इसी रूप में मानकर चलना चाहिये कि यह दिनचर्या अस्त−व्यस्त होने या मस्तिष्कीय घुस पड़ने की प्रतिक्रिया मात्र है। इसे संभाल लेने और मौज मस्ती के साथ जी सकने का अभ्यास करने पर तनाव की तीन चौथाई समस्या करने पर तनाव की तीन चौथाई समस्या हल हो जाती है। वस्तुतः तनाव की सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा प्रबंध व्यवस्था को विकसित कर लेना है।
एक गाँव में एक किसान रहा करता था। सब लोग उसकी नेकी की तारीफ करते थे। उसके पास एक सुन्दर और चलने में तेज घोड़ा था जिसे देख डाकू उस पर मुग्ध हो गया। मुसाफिर का वेश बनाकर किसान के घर पहुँचा। किसान ने उसकी बड़ी खातिर की। घर से विदा होते समय लौट आने का आश्वासन देकर घोड़ा लेकर डाकू चला गया। किसान ने भी आशा बिलकुल छोड़ दी।
अचानक वही डाकू किसान को पास के गाँव में मिल गया। डाकू भागने की कोशिश करने लगा किन्तु किसान की पकड़ में आ गया। किसान प्रेम से बोल पड़ा, देखो घोड़ा तो तुम ले गये मगर एक नसीहत सुनो। तुम भूल से भी किसी से इस बात का जिक्र न करना, वरना जो कोई भी इस बात को सुनेगा उसी के दिल से हमदर्दी जाती रहेगी।
डाकू पर किसान की अच्छी नसीहत का बड़ा असर हुआ। अगले दिन डाकू-घोड़ा बाँधकर पैरों में गिर पड़ा और माफी माँगने लगा। डाकू ईमानदारी का जीवन बिताने लगा।
अमीनिया के सर्वोच्च सेनापति सीरोनग्रिथ का व्यक्तित्व उनकी माता ने बनाया। विधवा नार्विन ग्रीड कपड़े सीकर किसी तरह अपने बच्चों को पेट पालती थी। बड़े बेटे ग्रिथ ने अपनी मर्जी से गरीबी के कारण स्कूल में फीस माफ कराने की अर्जी दे दी। जो परिस्थिति से पूर्णतः जानकार अध्यापक की सिफारिश पर मंजूर भी हो गई।
ग्रिथ की माता को जब यह पता चला ता, उन्होंने उस सुविधा को अस्वीकार कर दिया। उनने लिखा हम लोग मेहनत करके गुजारा करते हैं तो फीस नहीं दे सकेंगे। गरीबी में अपनी गणना कराना हमें मंजूर नहीं, हमारा स्वाभिमान से इन परिस्थितियों से भी जूझ लेंगे।
संगठन का चमत्कार हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। वह भले लोगों द्वारा श्रेष्ठ कामों में तो सफल होता ही है, किन्तु कई बार उसके सहारे दुष्ट दुरात्मा भी सफल होते और अपनी धाक जमाते देखे गये है।
चम्बल क्षेत्र का भिण्ड −मुरैना डिवीजन एक प्रकार से डाकुओं की खदान समझा जाता है। सरकारी रोकथाम के प्रयत्नों को वे प्रायः सफल नहीं होने देते।
इटली का इटली का सिलियन ग्रुप इस संबंध में विश्वविख्यात है।उस गिरोह में सौ से अधिक व्यक्ति नहीं है, पर अपराधों में धन कमाने में वह असाधारण रूप से सफल हुआ है।
इटली के बाद वह ग्रुप अमेरिका जा पहुँचा और सारे धनी क्षेत्र को उसने अपने संगठित विभागों में बाँट रखा है। इसको समाप्त करने में अमेरिका का गुप्तचर विभाग और पुलिस उतनी सफल नहीं हो पाती जितनी कि होनी चाहिये। कारण कि जितने पकड़े जाते हैं उससे ज्यादा उस संगठन में नये दस्यु सम्मिलित हो जाते हैं। उनका कारोबार इसलिये नहीं बंद हो पता कि उसके सदस्यों में संगठन−अनुशासन का निर्वाह पूरी तरह होता है।
माफिया गिरोह संसार भार में कुख्यात है। इस शब्द से सभी आतंकित होते हैं। इस सफलता को दुष्टता की विजय नहीं, वरन् संगठन की महत्ता कह सकते हैं। यदि सज्जनों और सुधारकों ने संगठन का महत्व समझा और उसे सच्चे मन से अपनाया होता वे भी अपने लक्ष्य में सफल होकर रहते।
संस्कृत शब्द का अर्थ है- शुद्ध, परिष्कृत , परिमार्जित। अतः संस्कृत भाषा का अर्थ हुआ शुद्ध एवं परिमार्जित भाषा केवल व्याकरण या कथोपकथन मात्र नहीं होती, वरन् उसमें अभिव्यक्ति की विविध क्षमतायें भी होती है। जो भाषा अभिव्यक्ति में जितनी समर्थ होगी, उसे उतना ही समृद्ध माना जायेगा। इस प्रकार शुद्ध और परिमार्जित भाषा वही मानी जायगी, जिसमें जीवन के सभी भावों की अभिव्यक्ति भलीभाँति हो सकती हो और इसके लिए अस्पष्टता, अशुद्धता अथवा काम चलाऊपन का सहारा लेना आवश्यक न हो। समर्थ भाषा वही है जो मनुष्य समुदाय के समस्त विचारों और भावनाओं को परिष्कृत ढंग से अभिव्यक्त कर सके।
अभिव्यक्ति विचारों और भावनाओं के अनुसार ही होती है। जिसके जैसे संस्कार और विचार होंगे, चिन्तन और भावनायें होंगी वैसी ही उसकी भाषा शैली होगी। परिमार्जित परिष्कृत भाषा उत्कृष्ट एवं परिष्कृत चिन्तन एवं संवेदना भाषा को संस्कृति की वाहिका कहा गया है, जैसी संस्कृति होगी वैसी ही भाषा होगी।
ज्ञानामृतमयी संस्कृत भाषा को देववाणी कहा गया है। यह समग्र देव संस्कृति की वाहिका भाषा है। उसकी समृद्धि, उसका सौंदर्य और महत्व उस संस्कृति के संदर्भ में ही है। वेदों का ऋषियों का समूचा ज्ञान-विचार इसी एक भाषा में सन्निहित है अतः इसे वेद जननी भी कहते हैं। यह न केवल भारतीय भाषाओं का मूल है, वरन् संसार में समस्त भाषाओं को जन्म देने वाली ओजमयी भाषा भी यही है। सुप्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर ने अपने ग्रंथ “साइंस आफ लैंग्वेज “ में लिखा है- संस्कृत तो भाषाओं की भाषा है। विविध भाषायें इसी एक भाषा से जन्मी है। मूर्धन्य मनीषी विलियम जोन्स ने कहा है कि संस्कृत भाषा संसार की सबसे प्राचीन भाषा है। इसकी रचना अद्भुत है। वह ग्रीक भाषा की अपेक्षा अधिक पूर्ण, लैटिन भाषा की अपेक्षा अधिक संपन्न और दोनों की तुलना में अधिक परिष्कृत है। परंतु दोनों के साथ धातु क्रियाओं और व्याकरण के रूप में इतनी मिलती जुलती है कि यह मिलाप आकस्मिक नहीं हो सकता। यह मिलाप इतना गहरा है कि कोई भाषा शास्त्री परीक्षा करने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे बिना नहीं रह सकता कि ये सभी भाषायें एक ही स्रोत संस्कृत भाषा से निकली है। महात्मा गाँधी के शब्दों में संस्कृत अध्यात्म की भाषा है जिससे समस्त भाषायें विचारणायें एवं भावनायें अपना पोषण प्राप्त करती है। जब से हमने अध्यात्म को खो दिया तब से संस्कृति को भी खो दिया और इस प्रकार संस्कृत भाषा का प्रभाव प्रसार घटता गया।
संस्कृत की संस्कृति क्या है? इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो उसके एक-एक पक्ष की समृद्धि को देखकर आश्चर्य होगा। अपने समय के योरोपीय अभिजात्य वर्ग पर टिप्पणी करते हुए प्रख्यात जर्मन कवि गेटे ने कहा था- “यह सोचकर आश्चर्य होता है कि एक समृद्ध उच्चवर्गीय अंग्रेज का कितना सारा समय लड़ने और महिलाओं को ले भागने में लगता है। यद्यपि इसका तात्पर्य यह नहीं कि अंग्रेजों में आध्यात्मिक पुरुष, विद्वान तपस्वी और त्यागी लोकसेवी कुछ कम हुए है। गेटे का तात्पर्य पाश्चात्य संस्कृति के उस पक्ष को उजागर करना है कि तब उनके समाज में प्रतिष्ठा कैसे और किन लोगों को प्राप्त होती थी। दूसरी ओर देवसंस्कृति में संस्कृत का जब सर्व सामान्य में प्रचार-प्रसार था, उस समय भारतवर्ष में सर्वाधिक प्रतिष्ठा ऐसे लोगों को प्राप्त होती थी जिनके जीवन में त्याग, तपस्या, निस्पृहता, आदर्शवादिता , चरित्रनिष्ठ, दार्शनिक गंभीरता, लोकसेवी वृत्ति और ईश्वरीय अनुराग की प्रधानता होती थी। जिनकी आत्मिक सम्पदा बढ़ी-चढ़ी होती थी और जो उच्चस्तरीय व्यक्तित्व के धनी वे ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण कहलाते थे। इसका अर्थ यह कदापि नहीं था कि संस्कृत की संस्कृति में शरीर सुखों की-भौतिक सुखों की उपेक्षा की गयी थी, वरन् देवी संस्कृति के अनुसार मानव जीवन के चार पुरुषार्थ निर्धारित किये गये थे- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। अर्थ, काम और धर्म-तीनों ही इहलौकिक इन्द्रिय-परक सुखों से भी संबंधित है साथ ही उनका आध्यात्मिक विकास के लिए भी उपयोग है।
संस्कृत की संस्कृति मनुष्य मात्र को महामानव-देवमानव बनने की प्रेरणा देती है। वेद और उपनिषद् उस संस्कृति के आदि ग्रंथ भी है और सारतत्व भी। वे व्यक्ति को सदा विराट् से ही जुड़ने की प्रेरणा देते हैं, क्षुद्रता से नहीं। छान्दोग्य उपनिषद् कहता है- “महामना स्यात् तद्व्रतम्।” अर्थात् महामानव बनना ही मानव जीवन का व्रत हो। देव संस्कृति के प्राचीन प्रवक्ता आचार्यगण अपने शिष्यों को स्पष्ट कहते थे- “यान्यस्माकं सुचरितानि त्वमोपास्यानि नो इतराणि” अर्थात् हमारे आचरण के उत्तम अंश ही तुम ग्रहण करो, उन्हीं का अनुकरण करो औरों का नहीं। श्रीमद्भगवद्गीता 2/46 में तो यहाँ तक कहा गया है- “यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥” अर्थात् सब ओर से परिपूर्ण जलाशय से जिस प्रकार प्रयोजन के अनुसार ही जल ग्रहण किया जाता है, उसी प्रकार जानकर ब्रह्मविद्यावद् सभी वेदों से अपने लिए उपयोगी आशय ग्रहण कर लेता है।
दार्शनिक उदारता और आचरण की मर्यादा इस संस्कृति के मूलतत्व है। चिन्तन की जितनी उदारता इस संस्कृति का अंग रही है, वैसी विश्व में कभी कहीं भी नहीं देखी सुनी गयी। चार्वाक दर्शन के आचार्य बृहस्पति कहते हैं कि- “चैतन्मविशिष्टः कायःपुरुषः” अर्थात् चेतना से युक्त यह शरीर ही पुरुष है, तो विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि- चित्त, मन और विज्ञसि के रूप में क्रियाशील विज्ञान अर्थात् कान्शसनेस ही वास्तविक है, आकार आदि उसी की अनुभूतियाँ मात्र है। इससे पृथक इनकी सत्ता अवास्तविक है। शून्यवादी बौद्ध कहते हैं कि परम सत्य तो शून्य ही है। साँख्य दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीवात्मा एक स्वतंत्र पुरुष है और इस प्रकार असंख्य पुरुष है, जबकि वेदान्त दर्शन मानता है कि एक ही सर्वव्यापी चेतना के अंश है ये जीवात्माएँ। यह अकेले दार्शनिक मतवैभिन्य का विषय नहीं है, अपितु एक दूसरे रही है। परन्तु इसके कारण परस्पर हिंसा या शरीर बल का प्रयोग कभी उचित नहीं माना गया।
इसके विपरित पश्चिमी संस्कृति में दार्शनिक मत भिन्नता प्रकट करने पर मंसूर से लेकर ईसा तक को फांसी पर चढ़ना पड़ा। भारत में वेदों को अपौरुषेय, ईश्वर निर्मित मानने वालो से लेकर उन्हें “त्रैगुण्य विषय” में ही सीमित मानने जाते हैं। एक ही वेदान्त दर्शन के आचार्य शंकर, रामानुज, मध्व, निम्बार्क आदि सभी एक दूसरे के विचारों को काटते हैं, परंतु इस कारण उन्हें एक ही समाज का अंग बनकर रहने में किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं हुआ। गैलीलियो ने ग्रह-गति संबंधी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया तो उसे नास्तिक करार दिया गया और जान गँवानी पड़ी। जबकि भारत में आर्यभट्ट और वराह मिहिर दोनों भू-भ्रमण सिद्धाँत के बारे में परस्पर विरोधी विचार रखते हुए भी एक दूसरे को महान गणितज्ञ मानते रहे और जनता दोनों का समान रूप से आदर करती रही। उपनिषदों को ज्ञान की सर्वोच्च अनुभूति कहने वाले और उन्हें असमंजस से भरा बताने वाले दोनों को ही समान रूप से श्रेष्ठ तत्वदर्शी माना गया। इस संदर्भ में गीता का स्पष्ट उद्घोष है- “बुद्धौ शरमन्तिच्छ” अर्थात् “बुद्धि की शरण में जाओ परंपराओं से अधिक महत्व विवेक को दो।” कारण, कालिदास के शब्दों में वह सब जो पुराना है, सदा अच्छा ही हो, यह निश्चित नहीं।
भारतीय ऋषि-मनीषियों ने यह तथ्य भलीभाँति जान लिया था कि बाह्य भिन्नताओं से आँतरिक भिन्नता खंडित नहीं होती। पात्रों के रूप और आकार की भिन्नता हो जाता। दीपक भिन्न-भिन्न धातुओं के भिन्न-भिन्न आकारों के बने होते हैं, पर उनसे निकलने वाली प्रकाश प्रभा एक ही होती है। आचार्य अभिनव गुप्त के अनुसार शास्त्र के अभ्यासी विद्वान अपनी मनीषा से जिस-जिस तत्व का वर्णन करते हैं , हे परमतत्व वह सब आप ही है। विद्वानों का विवाद मात्र संज्ञा या नाम को लेकर है, तत्व तो एक ही है। इसी आँतरिक एकत्व की अविच्छिन्न अनुभूति के कारण विचारों की इतनी विविधता होने पर भी सद् विवेक सब में एक जैसा था। श्रेष्ठ भाव संवेदनाओं , उत्कृष्ट चिंतन चेतना एवं आदर्श कर्तृत्व पर इस महान संस्कृति के हर अनुयायी , मनीषी ने सदा बल दिया है। रामायण हो या गीता, महाभारत हो या रघुवंश-सभी में सत्य, धर्म और श्रेय का ही जयगान है। गुण कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाने पर ही सबने बल दिया है। यही वह आधारभूत तथ्य है जो सामान्य मनुष्य को महामानव बनाने और नर से नारायण बनने की प्रेरणा देते हैं।
संस्कृत भाषा वाली देव संस्कृति का उद्देश्य सदा ही व्यावहारिक रहा है। मानसिक कौतूहल की दौड़ इस संस्कृति का अंग नहीं, वरन् संयत-संतुलित, आनन्दमय जीवन जीना ही इसका लक्ष्य है। निराशावाद का इस संस्कृति में कहीं भी स्थान नहीं है। संस्कृत नाटकों में दुखान्त प्रसंग नहीं होते। ट्रैजिडी भरे नाटक यहाँ वर्जित है। संस्कृत रंगमंच भी मृत्यु चित्रण एवं दुखांत नाटिकाओं से रहित रहे, यह विधान है। संसार की नैतिक सुव्यवस्था और कर्मफल-सिद्धाँत में विश्वास इस संस्कृति की सार्वभौम आस्थायें है। भारतीय संस्कृति देव संस्कृति है। इसमें सर्वोच्च जीवन मूल्य ही स्वीकार किये गये है। श्रेयमार्ग पर चलना ही आनन्द और शाँति का मंगल मार्ग माना गया है। एकता, समता और समृद्धि की उपासिका संस्कृति का ही संस्कृत भाषा अभिन्न अंग है। इसे नवजीवन प्रदान करने तथा इससे निरंतर प्रेरणा प्राप्त करते रहने से देव संस्कृति का विकास विस्तार करने में सहायता ही मिलेगी यह कर सुनिश्चित तथ्य है।
प्रभु ! स्वर्ग का अधिकार किसे मिलता है? एक ग्रामवासी ने महात्मा ईसा से सवाल किया। पास में ही एक बालक अपनी मस्ती में खेलता हुआ चारों ओर आनन्द बिखेर रहा था, ईसा ने उसकी ओर संकेत करते हुए कहा इसे।
आपका आशय नहीं समझा महात्मन् ग्रामीण ने फिर कहा। ईसा मुसकराये और बोले-”जो बच्चे की तरह सरल और निरहंकारी है, वही स्वर्ग का अधिकारी है।”
लोग अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार संबद्ध लोगों के बारे में भले या बुरे होने की बात सोचते रहते हैं। जिनके गुण दीख पड़ते हैं उन्हें सज्जन मान लिया जाता है और जिनके दोष दीख पड़े उन्हें दुर्जन मानने की मान्यता बन जाती है। यों हर किसी में न्यूनाधिक मात्रा में दोष दुर्गुण रहते ही है पर अपना निज का जो दृष्टिकोण बन जाता है वह दूसरों का एक पक्ष ही सामने आने देता है विशेषतया दोषों के संबंध में। गुणों की तो उपेक्षा भी होती रहती है पर दोष जब दीखते हैं तो उनके साथ बढ़ा चढ़ा कर मानने की बात मन में बैठ जाती है। यही कारण है कि आम आदमी में दोषों की भरमार ही अपने इर्द−गिर्द दीख पड़ती है। अस्तु द्वेष,घृणा और उपेक्षा से लेकर उनका विरोध करते रहने जैसा मानस बन जाता है। गुणों की प्रशंसा करने में जो सकुचाते हैं इसमें अपना अहं भी बाधक होता है क्योंकि वह अपने अतिरिक्त और किसी को सर्वगुण संपन्न मानता ही नहीं। फिर औरों के साथ सद्गुणियों- हितैषियों जैसा व्यवहार कैसे बन पड़े? इसी मनोवैज्ञानिक धुरी पर लोगों की मान्यता परिभ्रमण करती देखी जाती है। बच्चों के अतिरिक्त और किसी के साथ घनिष्ठता प्रायः जुड़ ही नहीं पाती। अतएव काला चश्मा पहनने वाले को जिस प्रकार सब कुछ काला ही काला दीखता है उसी प्रकार व्यक्तियों घटनाओं और परिस्थितियों में मात्र अवाँछनीयता ही खोजते पर ऐसा कुछ मानस बन जाता है कि संसार में मात्र दोष ही भरे पड़े है, मनुष्यों में मात्र स्वार्थ परायणता ही भरी पड़ी है।
इस मान्यता के अनुसार निराशा-बढ़ती है जो कभी विद्रोह के रूप में, कभी वैराग्य के रूप में उभरती है। जिनके साथ निर्वाह चलता है उसमें उपेक्षा या कटुता भरती और बढ़ती चली जाती है। इसकी प्रतिक्रिया असद् व्यवहार के रूप में ही उभरती है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। अपनी ओर से असहयोग क्या दुर्भाव बरतने पर दूसरे भी अपना रुख प्रायः वैसा ही बना लेते हैं। फलस्वरूप मनोमालिन्य बढ़ता जाता है। सहयोग के साथ-साथ सम्मान भी उपलब्ध होना बन्द जैसा होता जाता है।
यह स्थिति उन लोगों के बीच अधिक तेजी से पनपती है जो साथ-साथ रहते हैं। जिन्हें दूर-दूर रहना पड़ता है , यदा-कदा ही मिलते हैं उनकी बात तो भूलते जाने का स्तर भी अपना लेते हैं पर जो साथ-साथ रहते हैं उनमें यदि दोष दृष्टि उभरे तो फिर कलह के बीज जमते चले जाते हैं और वे बढ़कर तिल से ताड़ की स्थिति तक जा पहुँचते हैं। यही कारण है सहवासियों के बीच प्रायः वैसे मधुर संबंध नहीं पाये जाते जैसे कि पाये जाने चाहिए। पीठ पीछे तो बुराई करने का दौर चलता ही रहता है। कभी-कभी तो आमने सामने भी तुनकने या कडुआ बोल बैठने जैसी अप्रिय घटनायें भी घटने लगती है। अवसर आने पर जिसका दाँव लगता है वह डंक मारने से भी नहीं चूकता।
यह बुरा कुचक्र है जिसके कारण अनेकों को अनेक प्रकार के वास सहने पड़ते हैं। अनेकों समस्याओं में उलझना पड़ता है और अनेकों विग्रह आये दिन सामने खड़े रहते हैं। यह समूची प्रतिक्रिया मूलतः अपनी ही दोष दृष्टि से उत्पन्न होती है। यदि उसे आरंभ में ही समेट कर रखा गया होता, उगते ही दबा दिया गया होता तो चिंतन अवसर ह न आता और उन अनेकानेक झंझटों से बचा न जा सकता था समय का बड़ा भाग इन उलझनों में उलझे रहने में ही नष्ट हो जाता है। चिंतन जो इन अनावश्यक कार्यों में खप जाता है यदि बचाया जा सका होता तो उससे सहज ही शाँति पाने और प्रसन्न रहने की स्थिति बनी रह सकती थी। घात प्रतिघातों वाला समय यदि किन्हीं उपयोगी सृजनात्मक कार्यों में लग सका होता तो उनके सत्परिणाम सहज ही सामने आते रह सकते थे।
होना यह चाहिए कि अपने दृष्टिकोण को सदाशयता ढूँढ़ निकालने का अभ्यस्त बनाया जाय। छिद्रान्वेषण की अपेक्षा गुण ग्राहकता की सद्प्रवृत्ति का विकसित किया जाय। यह सर्वथा संभव भी है और सरल भी। संसार में कोई प्राणी या व्यक्ति ऐसा नहीं जिसमें कुछ न कुछ उपयोगी विशेषता न हो। उसे खोज निकालने की यदि अपनी आदत विकसित , हो सके तो फिर हर कहीं से कुछ न कुछ ऐसा देखा, खोजा और पाया जा सकता है जो उत्साह बढ़ा सके। प्रशंसा के योग्य दीख पड़े। यदि उसी पक्ष को अपने स्वभाव का अंग बनाया जा सके तो गुण दीख पड़ने पर बड़े प्रिय पात्र बनाने एवं प्रशंसा करने का मन चलेगा। शिष्ट व्यवहार और सद्भाव का प्रदर्शन भर ऐसा है जो दूसरों को अपने प्रति सौजन्य प्रदर्शित करने के लिए बाधित करता है। प्रशंसा के बदले प्रशंसा मिलती है और प्रतिष्ठा के बदले प्रतिष्ठा। अपना सद्भाव दूसरे के सद्भाव को उभारता है और क्रमशः स्नेह सौजन्य का पारस्परिक व्यवहार बनता चला जाता है। यह अच्छी स्थिति है। जिसके प्रति जितने अधिक लोगों का सौजन्य है वह उतना ही प्रसन्न रहता है। मनोबल में वृद्धि होती दीखती है। विरोधियों की संख्या घटे और सहयोगियों की बढ़े तो अपने क्रियाकलापों में सुगमता ही रहेगी, सफलता ही मिलेगी। प्रगति के पथ प्रशस्त होते जाने की संभावना ही बढ़ेगी।
यहाँ गुण-दोष विवेचन की, नीर−क्षीर, विवेक बुद्धि को झुठलाया नहीं जा रहा है पर यह कार्य हर कोई नहीं कर सकता। इसके लिए राजहंस जैसी निष्पक्षता और उज्ज्वल विवेक बुद्धि चाहिए। सामान्ताओं में वह विशेषता नहीं होती है। वे प्रायः एकाँगी दृष्टिकोण अपनाये रहने के अभ्यस्त होते हैं। अपने स्वभाव के अनुरूप एक ही पक्ष ढूँढ़ते हैं। बगीचे में सुगंधित और सुरक्षित
फूल खिले होते हैं। भ्रमर उन्हीं पर मँडराता है। तितलियाँ, मधुमक्खियाँ भी उन्हीं के सौंदर्य पर मुग्ध होती और अपने-अपने स्तर का रसास्वादन करती है। इसके ठीक विपरीत गुबरीले कहलाने वाले भी उसी बाग में रहते हैं। उन्हें गोबर की गंध सुहाती है और कचरे के ढेर में रहते और वहीं से आहार उपलब्ध करने की आदत होती है। वे इधर-उधर घूम कर कहीं न कहीं खाद के लिए जमा किया हुआ सड़ा गोबर ढूँढ़ निकालते हैं और उसे पाकर फूले नहीं समाते। उसी में डेरा डालते हैं। कभी अभिव्यक्ति प्रकट करने का अवसर मिले तो फिर समूचे बगीचे में मात्र गोबर की ही प्रधानता होने का वर्णन अपने साथियों से करते हैं, जो उसकी बात को सही भी मानते हैं और अनुमोदन भी करते हैं।
तब क्या इस संसार में सब कुछ अच्छा ही अच्छा है? क्या सभी की सराहना की जाय? और सभी से मैत्री भाव बढ़ाया जाय? यहाँ ऐसा कुछ नहीं कहा जा रहा है। यह संसार गुण−दोषों से भरा पड़ा है। इसकी संरचना सत् और असत् के सम्मिश्रण से हुई है। शैतान और भगवान दोनों ही अपना-अपना काम करते हैं। अंधकार और प्रकाश दोनों का ही अपना-अपना अस्तित्व है। इस तथ्य को समझते हुए सर्वसाधारण के लिए व्यावहारिक यही है कि जो अवाँछनीय है उसकी चपेट में अपने को न आने देने के लिए बचते रहने की सतर्कता अपनाई जाय। हो सके तो दूसरा को भी सावधान किया जाय। कम से कम अनौचित्य का समर्थन या सहयोग तो नहीं ही किया जाय।
सबको सुधारने की यदि अपनी शक्ति न हो तो कम से कम इतना तो करें ही कि अपने आप को सुधार लें, अपने दृष्टिकोण को सज्जनोचित स्तर पर परिष्कृत कर लें। संसार में अच्छाइयाँ इतनी कम नहीं है कि उन्हें ढूँढ़ना, अपनाना और सराहना संभव ही न हो सके। अपना लाभ सब प्रकार इसी में है कि गुण-ग्राहकात की नीति सहयोग बढ़ाकर अपनी मित्र मँडली विनिर्मित करने का क्षेत्र विस्तृत किया जाय। साथ ही खीज और निराशा से उत्पन्न होने वाले उन मनोविज्ञान जन्य व्यथाओं से बचा जाय जा शरीर और मस्तिष्क को खोखला बनाकर अकालमृत्यु के मुंह में धकेलती है।
आयरलैण्ड के एण्ट्रिल प्रदेश में एक बड़ी झील है- लोधारीन। साधारणताया वह पानी से लबालब भरी रहती है, किन्तु कभी-कभी एक विचित्र आश्चर्य होता है कि झील का पानी पूरी तरह अदृश्य हो जाता है। मात्र कीचड़ ही उसकी स्मृति चिन्ह के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इतना अधिक पानी इतनी जल्दी गायब हो जाता है? इसकी खोज मूछतों से चल रही है, पर अभी तक किसी निष्कर्ष पर पहुँचना वैज्ञानिकों के लिए संभव नहीं हुआ है।
इटली के मेवार्डो जन्मजात रूप से गरीब नहीं था, पर उसने निश्चय किया कि अपने देशवासियों की औसत आमदनी से अधिक खर्च न करेगा। इतना वह हाथों की मजदूरी से कमा लेता था। इसके अतिरिक्त उसने कितने ही उद्योग चलाये जिसमें होटल उद्योग प्रमुख था। उसके विभिन्न स्थानों में 51 होटल थे। इसके अलावा भी उसने रेल के डिब्बों में सुधार करके कई लाभदायक आविष्कार किये थे। इनकी आमदनी का अधिकांश लाभाँश मजदूरों को मिलता था। जो बचता था वह उस क्षेत्र के अभावग्रस्त व्यक्तियों को दे दिया जाता था।
मेवार्डो के चार बच्चे थे। उन सबको उसने यही परंपरा सिखायी। पैतृक धन के रूप में 50 शिलिंग उसके पास थे, वही अपने बच्चों के लिए छोड़कर उसने इस दुनिया से विदा ली।
उनके दान की ख्याति से दिशाएँ आलोकित थी। प्रशंसा के स्वरों की गूंज से वायुमण्डल व्याप्त था। क्या गुण नहीं थे उनमें? न्यायी, सत्यवादी , वीर, दानी तथा प्रजावत्सल सब कुछ तो वे थे ही। उन्हें अपनी प्रजा के प्रत्येक नर-नारी के प्रति निज की सन्तानवत् स्नेह था। अपने नित्य नियम के अनुरूप वह कई सौ दुधारू पशु-प्रचुर मात्रा में अन्न-वस्त्र तथा स्वर्ण मुद्राएँ दान करके ही भोजन ग्रहण करते थे। दानशीलता में उस समय उनकी टक्कर का कोई न था।
सब कुछ था, फिर भी आत्मा में शाँति नहीं थी। बड़े से बड़ा दान देकर भी उन्हें आत्म-संतोष न मिल पाता। वे यही सोचते रहते कि “मैं असंख्य नर-नारियों को नित्य अतुल दान दिया करता हूँ। मेरे समान कोई अन्य दयालु, उदार तथा दानशीलता शासक नहीं है।” और यही भावना उस समय चिंता का कारण बन जाती। वे परेशान होने लगते कि कहीं कोई अन्य व्यक्ति मुझ से अधिक दानशील अथवा कृपालु तो नहीं।
उनका यह-अहं आँशिक ही सही, इससे उपजी ईर्ष्यालु वृत्ति कभी उन्हें चैन न लेने देती और वे सदा मानसिक शाँति से वंचित ही रहते।
एक दिन वे अपनी प्रजा की वास्तविक स्थिति का परिचय पाने हेतु राज्य में भ्रमण कर रहे थे। वेश बदला हुआ था। तभी उधर से दो व्यक्ति बात करते हुए निकले। एक कहा रहा था “राजा जनश्रुति के राज्य में हम कितने सुखी है। किसी प्रकार की चिन्ता अथवा अभाव हमें नहीं है। योग्य शासक के रूप में तीनों लोकों में जनश्रुति की कीर्ति फैल रही है। उनकी दानशीलता की कोई सीमा नहीं।”
तभी बीच में बात काटता हुआ दूसरा व्यक्ति बोला “ हाँ भाई तुम ठीक कहते हो। परा सहस्रों व्यक्तियों को सुख-समृद्धि देने वाला यह नर रत्न स्वयं आत्मिक शाँति से वंचित है जो संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उससे तो वह गाड़ी वाला रैक्क कहीं उत्तम है। जिसने इस लोक की तथा लोकोत्तर शाँति भी प्राप्त कर ली है। उसका पुण्य जनश्रुति से कहीं ज्यादा है।”
जनश्रुति ने जैसे ही यह सब सुना उसी क्षण से उनका अहं हिम की शिला की भाँति बूँद-बूँद कर गलने लगा। विवेक झकझोरने लगा। हृदय में अपने आप के प्रति हीन भावना का समावेश हो गया और आत्मा तड़प उठी, उस धनहीन वैभव हीन गाड़ी वाले के दर्शनों के लिए। जिसे उनकी अपेक्षा कहीं अधिक पुण्यवान कहा जा रहा था।
अपने में अहं भाव एवं आत्म प्रशंसा की दुर्बलता के बावजूद नृपति में सच्चे ज्ञान के प्रति असीम-अभीप्सा थी। दूसरे दिन ही सेवकों-सैनिकों को आज्ञा दी गई कि कहीं भी किसी भी प्रकार उस गाड़ी वाले रैक्क को ढूँढ़ निकला जाय।
पर अभी केवल रस्सी जली भर थी बल नहीं गए थे। रैक्क को ढूँढ़ लिया गया। सूचना राजा को दे दी गई। जनश्रुति छै सौ दुधारू गाएँ, सैकड़ों अश्वों सहित रथ असंख्य स्वर्ण मुद्राएँ तथा प्रचुर मात्रा में अन्य बहुमूल्य सामग्री लेकर रैक्क के आश्रम पर पहुँचे। किन्हीं साधु संत अथवा धार्मिक प्रवृत्ति के महापुरुषों से मिलने जाते समय उनकी दानशीलता कुछ अधिक ही विक सित हो जाया करती थी। पर यह क्या? जनश्रुति ने रैक्क को प्रणाम किया। उत्तर में उन्होंने शुभ आशीर्वाद से भरे मंगल वचन कहे। तब नृपति के यह कहने पर कि “यह तुच्छ भेंट आपके लिए लाया हूँ-स्वीकार करके मुझे कृतार्थ करें।” रैक्क ने मंद हास्य के साथ कहा- “तुम आध्यात्मिक ज्ञान पिपासा की शाँति हेतु यहाँ आए हो तब इन सब वस्तुओं की क्या आवश्यकता थी? मैं क्या करूंगा इन्हें लेकर? देखते हो, मेरी कुटी बहुत छोटी है। यह सब कुछ तो राजमहलों में ही शोभा देता है। जिज्ञासा की शाँति के लिए तो यहाँ आपका आना भर पर्याप्त होता। अभी जाओ जब इन सब वस्तुओं की सारहीनता का बोध हो तब चले आना जो कुछ भी मेरे पास होगा-वह तुम्हारे जैसे जिज्ञासुओं के लिए ही है।”
जनश्रुति हतप्रभ होकर राजमहल लौट आये। उस दिन नींद भी नहीं। बेचैनी से पार्श्व बदलने हुए ही रात्रि के तीन प्रहर बीत गए। चतुर्थ प्रहर में कहीं नींद लगी। निर्धन गाड़ी वाले की विरक्ति का उन पर गहरा असर हुआ। रैक्क ने वे उनके वस्तुएँ स्वीकार नहीं की यह बात उनके अस्तित्व को तीर की तरह बेधती चली गई। आज उन्हें लग रहा था कि अब तक मैंने जो भी दान पुण्य किया वह सब निरुद्देश्य निरर्थक ही रहा। पर इससे उनके हृदय में रैक्क के प्रति जो श्रद्धा तथा निष्ठ के भाव थे वे घने और गहरे हो उठे थे।
प्रायः होते ही नित्य की भाँति चारण आए और उनके गुण-गान करते हुए गायन प्रारंभ किया पर आज उन्हें यह प्रशंसा सारहीन और भौतिक जगत से कहीं दूर-अपने आत्म भवन में ही रम रहे थे। तत्काल गुणगान की प्रक्रिया रुकवा दी गई। उनकी उद्विग्नता आज चरमसीमा पर थी। अब उन्हें ऐसा लग रहा था कि जब तक रैक्क से न मिल लूँ मुझे चैन न मिलेगा। आज उन्हें वे सब गाथाएँ भी याद आ रही थी जो रैक्क का पता लगाने गए हुए सेवकों ने आकर सुनाई थी कि किस प्रकार से सैकड़ों व्यक्ति अपनी चिन्ताएँ, उलझने, समस्याएँ लेकर जाते हैं और उस वैभवहीन गाड़ीवान से मानसिक परितोष व उल्लास की ऊर्जा लेकर लौटते हैं।
जनश्रुति बिना कुछ खाए पिए ही चल दिए और रैक्क के समक्ष जा पहुँचे। आज न दल-बल साथ में था, न कुछ भेंट चढ़ावा। आज थी मुखमुद्रा में असीम गम्भीरता, नयनों में चातक जैसी दर्शन लालसा, हृदय में अपार वेदना, मन में अमित श्रद्धा तथा आत्मा में अनन्त ज्ञान की प्यास। रैक्क उन्हें देखते ही प्रसन्नता से खिल गए। सादर बिठाया और कहा-”राजन् ! आज आपने आध्यात्मिक शाँति का राज मार्ग पा लिया है।
“राजा अवाक् थे। बड़ी मुश्किल में कह सके “अभी कहाँ पाया है भगवन् ! वह आपके अनुग्रह के बिना कहाँ प्राप्त होगा? अभी तक का जीवन निरर्थक ही चला गया। अब आपकी कृपा हो जाए तो इस तप्त मानस पर भी शीतलता के कुछ छींटे पड़ जायें।”
रैक्क ने कहा-”निरर्थक तो सृष्टि में एक कणिका जी है-नृपश्रेष्ठ। अभी तक आपने जो भी दान पुण्य, प्रजा की सेवा अथवा कार्य किये वे यश अथवा प्रशंसा की भावना से किए। और यश-प्रशंसा तथा आदर आपको उन उपकरणों के माध्यम से मिला भी।”
जनश्रुति की जिज्ञासा अब कुछ आश्चर्य मिश्रित होते जा रही थी। रैक्क जो एक साधारण सी गाड़ी हाँकने वाला था इतना बड़ा दार्शनिक लग रहा था कि जनश्रुति का हृदय बड़ा दार्शनिक लग रहा था कि जनश्रुति का हृदय झुका हुआ जा रहा था। तन फिर उन्होंने प्रश्न किया-”पर आत्मा को शाँति नहीं मिली है। मैं राज्य भोग, सुख सुविधाएँ सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हूँ देव ! बस मुझे संतोष चाहिए तृप्ति चाहिए, शाँति चाहिए।”
रैक्क अब जी अपने सहज स्वाभाविक मंद हास्य के बीच डूबता तरता प्रसन्न हो रहा था। उसने स्नेह से कहा-”अधीर न हो नृपवर ! राज्य अथवा सुख के साधन कुछ भी त्यागने की आवश्यकता नहीं है आपको। बस इन सबके प्रति मन में जो आसक्ति का भाव है उसे ही त्यागने से काम चल जाएगा। राज्य करिए पर अपने आपको सेवक समझकर। सुख-साधनों का भी उपयोग करिए पर यह सोचकर कि यह सब आपके उस शरीर की सुरक्षा के लिए है-जिस पर संपूर्ण देश की सुरक्षा का जार है। दान भी खूब करिए, पर यही सोचकर कि वे सब वस्तुएँ परमात्मा ने आपको केवल इसलिए दी हैं कि आप उन्हें उन दीन-पीड़ित तथा असहाय व्यक्तियों तक पहुँचा दें जो उनके सच्चे अधिकारी हैं। अपने आप को न मानकर केवल माध्यम मन लें। आत्मा की शाँति और कहीं नहीं आत्मा में ही छिपी होती है राजन् ! उसे जाग्रत करने भर की देर है बस। जो इस तथ्य को देख लेता है वही द्रष्टा है। आत्मा समस्त शक्तियों का भंडार है और यही भंडार असीम है अनन्त है।”
जनश्रुति इस ज्ञानामृत का पान उसी प्रकार कर रहे थे जैसे प्रथम पावरा के जल को ग्रीष्म से तपी धरती बूँद-बूँद पी जाती है। अब राजा अपने निवास स्थान की ओर लौट रहे थे। आज उन्हें ऐसा लग रहा था। जैसे कोई बोझ सा रखा था, वह अचानक ही हट गया। तत्वज्ञानी रैक्क का एक-एक शब्द स्मृति पटल पर जैसे शिलालेख की भाँति खुद कर गहरा हो गया था। राजा विचार कर रहे थे कि अजी तक कहाँ मैं अंधकार में भटक रहा था। यह साधनहीन सा दिखने वाला व्यक्ति अपने अंदर कितना बड़ा व्यक्तित्व समेटे है। चारों ओर से ज्ञान एकत्रित होकर उसकी आत्मा में उसी प्रकार भर उठा जैसे झील अपने चारों ओर की ऊँचाइयों का जल अपने आप में खींचती रहती है और असंख्यों प्राणियों की तृषा तृप्ति का उपकरण बन जाती है।
उस दिन से जनश्रुति के जीवन में जो परिवर्तन हुए। उन्हें लोगों ने खुली आँखों से देखा तथा अनुभव किया। दिन-रात वे असीम तृप्ति, अभेद्य शाँति तथा अपरिमित आनन्द का पान करने लगे। आत्मा की शाँति का स्रोत जैसे फूट कर झर-झर करता वह उठ था।
उडसन नाम का विमान चालक कोरिया युद्ध में था। उसका बमयान आज दिन में उड़ान ले रहा था। एक दो तीन उडसन को आदेश मिला और उसने बटन दबा दिया। यान के नीचे बद्धधे बम बंधन से छूट गये। नीचे से धुँआ और लपटों का अंबार उठ रहा था। आक्रमण सफल रहा। उसका यान लौटा तो उसे समाचार मिला कि शत्रु पीछे हट गया। उडसन की प्रशंसा हो रही थी। उसकी इच्छानुसार वही चौकी देखने की उडसन को स्वीकृति मिल गई। दारुण चीत्कारें, जलते माँस की दुर्गन्ध सैनिक स्त्रियों की रोती, चीखती, चिल्लाती आवाजें सुनकर उडसन के अंतःकरण में संवेदना की धारा फूट पड़ी। विक्षिप्त जैसी स्थिति हो गयी उडसन की। तीन महीने पश्चात् ही उसकी चेतना लौटी।
अब वह बदला हुआ था। युद्ध पिपासु पिशाचों के लिए उसके मन में घृणा के भाव थे। युद्धक विमान चालक अब विश्व शाँति का समर्थक बन गया। वे जारतीय विचारों के समर्थक बन गये। वे कहा करते थे भविष्य में भारत ही विश्व शाँति रूपी स्वप्न को साकार करेगा।
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बाजार में सभी तरह की वस्तुएँ सुसज्जित रूप से विक्रयार्थ सजी रखी रहती हैं। पर उनमें से कौन क्या खरीदे यह ग्राहक की अपनी अभिरुचि पर निर्भर रहता है। हमें संकीर्ण स्वार्थ-परता के दुर्गन्ध भरे दलदल में फँसना है या गंगाजी की पतित-पावनी धारा में प्रवेश करके अपने को स्वच्छ, शीतल करना है यह अपना निज का चयन एवं निर्णय है। गंगा के समीप ही कहीं सड़ा दलदल भी होता है। किस में प्रवेश करके किस स्थिति में पहुंचा जाय यह अपनी निज की अभिरुचि पर निर्भर है।
जन सामान्य में अधिकाँश लोग आदर्शों की दृष्टि से बहुत अधिक गये गुजरे होते हैं। उन पर पशुता के कुसंस्कार मानव कलेवर प्राप्त कर लेने के उपराँत भी पूरी तरह छाये रहते हैं। तात्कालिक लाभ ही उसका उणस्य एवं इष्ट होता है। तुरन्त किस प्रकार कितना रसास्वादन करते बन पड़े इसी की ललक हर किसी पर छाई रहती है। लोक मान्यता सब प्रकार से प्रवाह धारा बन जाती है। हलके वजन की वस्तुएँ उसी प्रवाह के साथ-साथ चलती दौड़ती हैं। यह विवेक उन बहने वालों में से किसी में भी नहीं होता कि प्रवाह किधर जा रहा है और उसका अंत कहाँ किस रूप में होगा। इस चिंतन के अभाव में आमतौर से अंधी दौड़ चलती रहती है। भेड़ चाल का उदाहरण घटित होते हर जगह देखा जाता है। सभी नदियों का स्वच्छंद जल अंततः खारे समुद्र में गिर कर वैसा ही अपेय बन जाता है। भले ही आरंभ में वह कैसा ही स्वच्छ, गुणकारी, शीतल और सराहनीय क्यों न रहा हो। जनसाधारण में हलचलें तो पाई जाती हैं पर वे किस निमित्त हो रही हैं अंत में कहाँ जा पहुँचेगी इसका पूर्ण निर्धारण प्रायः किसी से जी नहीं बन पाता। जनमानस की प्रवृत्ति प्रायः वानर जैसे अनुकरण की होती है। बहुत लोग जैसा सोचते वैसा करते देखे जाते हैं उसी की नकल बनाना अन्यान्यों से बन पड़ता है। दूरदर्शी विवेक का उदय हुआ तो बहुत कम देखा जाता है। दूरवर्ती लाभ हानि का निष्कर्ष निकालना तो किन्हीं बिरलों से ही बन पड़ता है। सामान्यतया समाज में अंधी भेड़ों का उदाहरण बनने और एक के बाद दूसरा खड्ड में गिरते चलने का निमिष बनता है।
उपर्युक्त का चयन मानवी प्रज्ञा की उच्चस्तरीय विशेषता इसके लिए लाक प्रचलन की उपेक्षा करनी पड़ती है। तत्काल का लाभ छोड़ना पड़ता है। यदि इसे छोड़ते न बन पड़े तो चाशनी में पर फँसाकर मक्खी की तरह तड़प-तड़प कर बेमौत मरना ही पड़ता है। मछलियों और चिड़ियों की जाल में फँसकर इसी प्रकार की दुर्गति होती है। बीज की तरह गलकर और विशाल वृक्ष की तरह फलने का सौभाग्य तो किन्हीं-किन्हीं को ही उपलब्ध होता है। शेष दाने तो सीलन भरी कोठरी में पड़े रहकर कृमिकीटक के पेट में चले जाते हैं।
मनुष्य जन्म मिलना स्रष्टा का विशिष्ट किन्तु प्रारंभिक उपहार है। इसमें आने का वरदान जिन्हें मिलता है वे दूरदर्शी विवेकशीलता से सुसम्पन्न होते हैं। राजहंस की तरह उन्हें दूध पानी को अलग करने की कला आती है। कीड़े की उपेक्षा करने और गहरी डुबकी लगाकर मोती चुनने का कौशल भी उन्हीं में देखा जाता है। जो विवेक की कसौटी पर खरे उतरते हैं, जिनमें श्रद्धा-प्रज्ञा और निष्ठा की उत्कृष्टता विद्यमान रहती है, वे निर्वाह की न्यूनतम आवश्यकता पूरी होते रहने के संबंध में निश्चित रहते हैं। ऐसे लाग जीवन तत्व के सम्बन्ध में गंभीरता से विचार करते और उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग का उपाय सोचते हैं। यदि कोई इस स्तर का चयन कर सके तो उसे “सेवा धर्म” अपनाने की ही ललक जगेगी। उत्कंठा उठेगी। परोपकार में स्वार्थ सिद्धि का समावेश जी अनायास ही हो जाना है। गाय दूसरों के लिए दूध, बछड़े, गोबर आदि देती रहती है उसके बदले में उसे चारा दाना, पानी, आच्छादन आदि की सुविधा मिलती है और सम्मानपूर्वक गौ माता कहा जाता है। बैलों का श्रम जी असंख्य मानवों का पेट अपने कृषि पराक्रम द्वारा भरता है। उसे निर्वाह के लिए कष्ट नहीं उठाना पड़ता। आदर्शवादी हंसों की पग-पग पर सराहना होती है। उनके दर्शन शुभ माने जाते हैं। भगवती सरस्वती के वाहन रूप में उन्हें अंकित किया जाता है। बादलों का दर्शन होते ही सभी प्राणियों में प्रसन्नता भरी उमंग उमड़ती है। उषाकाल का उदय होते ही पक्षी चहचहाने लगते हैं और अन्यान्य प्राणियों की गतिशीलता अनायास ही सक्रिय हो जाती है।
समझा जाता है कि सेवा-साधना में प्रत्यक्ष ही घटा है। अपना समय, धन लगाने पर ही दूसरों की सहायता बन पड़ती है। इस आधार पर दूसरे लाभ उठा सकते हैं पर अपना तो खर्च ही खर्च हुआ ऐसी दशा में जिन्हें अपने स्वार्थों को प्रमुखता देनी है उन्हें सेवा कार्यों से बचना ही चाहिए। अपने घाटे से होने वाली हानि का बचाव ही करना चाहिए।
यह चिंतन एकाँगी और अदूरदर्शी है। जिसकी हम सेवा सहायता करते हैं। उसका मन सहज ही जीत लेते हैं। उसकी सहानुभूति, सद्भावना अर्जित करते हैं। जो प्रकारान्तर से प्रशंसा, श्रद्धा, सहकारिता एवं उपकार के रूप में लौटकर वापस आती है। यह कम मूल्य का प्रतिदान नहीं है। कोई व्यक्ति मात्र अपने ही बलबूते प्रसन्न रहने और सफल बनने के सारे सरंजाम नहीं जुटा लेता। उसमें दूसरों का जितना योगदान होता है उसी अनुपात से उपलब्धियाँ भी बढ़ी-चढ़ी होती हैं। एकाँकी संकीर्ण व्यक्ति तो निस्तब्ध ही बैठा रह सकता है। नीरस ही बना रह सकता है। एकाँगी प्रसन्न रहना तो किसी ब्रह्मज्ञानी के लिए ही संभव होता है। आमतौर से अपने सुख बँटाये जाते हैं और दूसरों के दुख बाँटकर अपने कंधे पर लिए जाते हैं तभी बदले में आत्म संतोष और जन सम्मान की विभूतियाँ हस्तगत होती हैं। जब अन्य सुनने वालों को ये विवरण विदित होते हैं तो उन्हें प्रबल प्रसन्नता होती है और कर्म के प्रति सहज सद्भाव उमड़ता है। इस प्रकार जिसके साथ नेकी की गयी है उसी पर ही अनेकानेक अन्यान्यों द्वारा भी यश की सम्मान की वर्षा होने लगती है। जिसका प्रत्यक्ष कुछ उपकार नहीं किया गया है उसके द्वारा भी कृतज्ञता और प्रशंसा बरसाई जाती है। यह लाभ तत्काल न सही प्रकारान्तर से कितने ही मार्गों द्वारा अपने लिए लाभदायक सिद्ध होते हैं। सेवाभावी उदारचेता-परमार्थ परायण माना जाता है। इसके साथ ही उसे दयालु, उपकारी, निःस्वार्थ चरित्रवान भी दयालु मान लिया जाता है। व्यक्तित्व की यह प्रमाणिकता मनुष्य को बढ़ी-चढ़ी पूँजी है।
प्रामाणिकता के सहारे ही अनेकों महत्वपूर्ण आदान-प्रदान और सद्भाव सहकार मिलते-रहते हैं। प्रगति चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो उसके लिए दूसरे उपयोगी व्यक्तियों का सहयोग समर्थन आवश्यक है। यदि वह न मिले तो अकेला व्यक्ति कितना ही सुयोग्य और पुरुषार्थी क्यों न हो व्यापक क्षेत्र में लोकप्रिय न बन पड़ेगा। मात्र अपने ही कर्तृत्व का सीमित प्रति प्राप्त कर किसी प्रकार दिन गुजारता रहेगा। जबकि अनुदान का प्रतिदान असंख्य गुना होकर लौटता है। नाले अपना जल गंगा को सौंपते हैं। फलतः वे नाले न रहकर गंगा के समान ही सम्मान पाते हैं। समर्पण के द्वारा अंततः उनका जल जी गंगा जल ही बन जाता है। स्वार्थ को परमार्थ स्तर तक विकसित कर लेना आत्मिक प्रगति की चरमसीमा है।
सेवा धर्म ठीक इसी प्रकार का है, जिसे अपनाने पर दूसरों को लाभ होना स्वाभाविक है। पर यह भी सुनिश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि उस दिशा में कदम बढ़ाने वाला स्वयं जी कम लाभान्वित हुए बिना नहीं रहता। जिनने इस आधार पर लाभ उठाया वे तो उस परिस्थिति के बदले जाने पर वैसा लाभ पाने में देर कर देते हैं। पर सेवाभावी की उदारता उसके अन्तःकरण में स्थिर स्थान बनाकर रह जाती है और वैसे सुयोग के अवसर अनायास ही आये दिन उपलब्ध होते रहते हैं। फिर यह सत्प्रवृत्ति स्वभाव का एक अंग बन जाती है। पुण्य किसी को भी अधिक पवित्र प्रखर, प्रतिभावान, यशस्वी और मनस्वी बना सकता है। इस निरंतर चलते रहने वाले लाभ को सामान्य नहीं असामान्य स्तर का ही मानना चाहिए।
कल्पना को साकार करने वाले दुस्साहसी वायुयान उन दिनों कल्पना लोक तक ही सीमित था, पर धुन के धनी और साहस के पुतले फाउलोइस में इसे कल्पना लोक से उतारकर मूर्तिमान कर दिया। इसमें उसे अपनी सारी पूँजी स्वाहा करनी पड़ी और न जाने कितनी रातें इस कल्पना को मूर्तिमान बनाने की उधेड़बुन में जागते हुए बितानी पड़ी।
पहला जहाज बड़ा बेतुका था। बाँस और डंडों का अंबार खड़ा था। 25 हार्स पावर का इंजन इतनी आवाज करता था कि सुनने वाले के कान बहरे हो चलें।
सेना के जनरल ने उसमें प्रगति की संभावना देखी और 150 डालर में उसे खरीद लिया, साथ ही कुछ पुरस्कार भी दिया। उड़ान भरने में उस साहसी मंडली के कुछ सदस्य मारे भी गये, पर भावी कल्पना ने उन्हें मृत्यु भी सस्ती अनुभव कराई।
टैक्सास प्राँत के एन्टीनियो की एक फैक्टरी ने सुधरे हुए पुर्जे बनाये और पहली उड़ान 50 फुट तक ऊँची उठ कर साढ़े सात मिनट में सम्पन्न हुई।
उस दुस्साहसिक प्रयास का ही प्रतिफल है वायुयान आज अंतरिक्ष के आर-पार जाने में सफल हो रहे हैं।
मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सद्गुण है श्रमशीलता। श्रम करते रहने से शरीर और मन के कलपुर्जे गतिशील रहते और उनकी तीक्ष्णता बढ़ती रहती है। सभी जानते हैं कि निकम्मा पड़ा रहने वाला चाकू भी जंग खा जाता है। इसके विपरीत बराबर काम करने वाला औजार तेज रहता है और चमकता रहता है। इसी तरह श्रमशील मनुष्यों का चेहरा भी चमकता रहता है। इसी के आधार पर जीवन संपदा का पूरा मूल्य वसूल किया जाता है। सारी उन्नतियाँ, समग्र विकास, परिश्रमी व्यक्ति के श्रम सीकार ही हैं।
संसार में एक नहीं, अनेकों ऐसे व्यक्तियों के प्रमाण मौजूद हैं, जिन्होँने साधन सुविधाओं से हीन परिस्थिति, में जन्म लेकर परिश्रम के बल पर उन्नति के शिखर पर पहुँच कर दिखा दिया।
उन दिनों बम्बई का वैंकटेश्वर प्रेस भारत में प्रतिष्ठित और कलात्मक छपाई के लिए प्रसिद्ध थी। उसकी यह ख्याति तभी से थी जबकि बड़े-बड़े शहरों में भी नाममात्र को प्रेस नहीं थे। इस प्रेस के संस्थापक खेमराज ने मारवाड़ से आकर गुजारे के लिए बम्बई में एक बुकसेलर के यहाँ नौकरी की। दिन रात मेहनत करके उन्होंने कुछ धन इकट्ठा किया जिससे एक छोटी सी पुस्तकों की दुकान कर ली। बाद में पुस्तकें बेचने के साथ कुछ पुस्तकें छापने भी लगे। इसमें उन्होंने इतना परिश्रम किया कि उनमें एक प्रकाशक की प्रतिमा जाग उठी। उन्होंने अपने अथक श्रम के बल पर इतना विकास किया कि बम्बई का वैंकटैश्वर प्रेस आज भी उनकी श्रमशीलता की गाथा गा रहा है।
सुई से लेकर इंजन तक छोटी से छोटी और बड़ी-से-बड़ी वस्तुओं के निर्माता उद्योग समूह टाटा के संस्थापक जमशेद जी टाटा को प्रायः सभी लोग जानते हैं। किन्तु यह जानने वाले कम ही होंगे, कि उनका जन्म गरीब पुरोहित परिवार में हुआ था। गरीबी में पले और पढ़े टाटा ने बड़े होने पर एक साथियों की टीम तैयार की और कपड़े का एक छोटा कारखाना खोला। कठोर श्रम की निरन्तरता के बल पर शनैः-शनैः उन्नति करते हुए कालान्तर में उद्योग पति के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनके वंशजों ने इसी श्रमशीलता का अनुकरण करते हुए अपने औद्योगिक क्षेत्र को आगे बढ़ाया।
राकफैलर की गणना विश्व के समृद्धतम व्यक्तियों में की जाती है। किन्तु इस समृद्धि का अर्जन करने वाले डेविडसन राकफैलर को प्रारंभिक जीवन में अपना तथा अपनी माँ का पेट पालने के लिए मुर्गी खाने में काम करना पड़ता था। इस काम के अलावा वह कभी खेती में आलू खोदते और कभी मजदूरी करते। निरंतर किए गए परिश्रम के बल पर उपार्जित थोड़े से धन से एक नया काम शुरू किया और उन्नति करते चले गए। बचपन में फटे हाल स्थिति में प्रौढ़ावस्था समृद्धि तक पहुँचने की सफलता का रहस्य बताते हुए उन्होंने एक अवसर पर कहा कि मेरी उन्नति का राज है “श्रम निष्ठा”।
सुप्रसिद्ध सफल व्यवसायी शापुराजी बारोचा के जीवन में भी श्रम निष्ठा की छाप है। गरीबी में पले शापुरा जी ने किसी तरह पढ़ना शुरू किया। अध्ययन काल में समय मिलने पर मेहनत-मजदूरी करके माँ का आर्थिक दबाव कम किया। मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने कुछ दिनों रेलवे और बैंक की नौकरी की। बाद में स्वतंत्र व्यवसाय के क्षेत्र में उतरे। अपनी परिश्रम शीलता के बल पर वह निरंतर उन्नति करते गए
जाम्बिया के चिलाँगा स्थान में जोजा बेन्गोम नदी के किनारे मुण्डावाँगा नाक विश्व प्रसिद्ध उद्यान लगाने वाले राल्फ सेण्टर का पूरा जीवन श्रम का जीता-जागता प्रतीक है। यह 1951 में चिलागा में रेंजर थे। उच्च अधिकारों से प्रार्थना करके उन्होंने नदी किनारे 4 एकड़ भूमि प्राप्त की और अपने सृजन कार्य में जुट गये। नौकरी से जो समय बचता था उसमें वह बंजर पथरीली तथा छोटी-छोटी झाड़ियों वाली भूमि को बगीचा लगाने योग्य बनाते। वहाँ के निवासियों को अत्यधिक आश्चर्य था कि वह विचित्र व्यक्त इस बंजर भूमि पर बगीचा लगाने के लिए कितनी कड़ी मेहनत किए जा रहा है। किन्तु लगातार किया जाने वाला कठोर परिश्रम फलीभूत हुआ। असर आज यह स्थान विश्वभर के वनस्पति शास्त्रियों तथा सैलानियों के लिए बन गया है। इसमें 2538 प्रकार के पौधे हैं जिसमें 60 प्रतिशत विदेशी हैं। विश्वभर के उद्यान विशेषज्ञ श्रम के इस चमत्कार को दुनिया का आठवाँ आश्चर्य मानते हैं। उद्योग धंधे, व्यवसाय-रोजगार आदि के अलावा विभिन्न विषयों के विद्वान, समाज-सुधारक मनीषियों ने भी कड़ी मेहनत को अपनाकर ही सफलता पाई। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर को 18-18 घण्टे काम करना पड़ता था और रात रात जागकर पढ़ते। इसी श्रम निष्ठा ने उन्हें उच्चकोटि का विद्वान बनाया।
सतपुड़ा और विन्ध्य की पहाड़ियों के बीच छोटे से आश्रम में रहने वाले पूना बाबा का संपूर्ण जीवन श्रममय था। उन्होंने पशुसेवा का श्रम साध्य कार्य हाथ में लिया। चिकित्सा सम्बन्धी जानकारों के लिए कड़ी मेहनत करने के साथ, घास काटना, बाड़ा साफ करना आदि कार्य भी स्वयं करते थे। इस अनुकरणीय जीवन से निकटवर्ती भीलों ने भी प्रेरणा लेकर अपने जीवन को परिवर्तित किया और उन्हें देवता की तरह पूजने लगे।
इसी तरह का जीवन व्यतीत किया इटलियन राजकुमार लाइन डिल वारजो ने। वे 1937 में 30 वर्ष की आयु में भारत आए। यहाँ उन्हें गाँधी-विनोबा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इन विभूतियों से प्रेरणा लेकर उन्होंने दक्षिण फ्राँस में आके कम्यूनिटी नाम के आश्रम की स्थापना की जिसमें 8 घण्टे का श्रम अनिवार्य है। आश्रम में काम आने वाली प्रायः सभी चीजें वहाँ तैयार होती हैं। आश्रम वासी समाज सुधार के लिए भी कार्य करते हैं। उनकी श्रम साधना और शाँतिमय जीवन को देखकर विनोबा ने उनका नामकरण किया था, शाँतिदास। पश्चिमी जगत में भौतिकता की विपुलता, और विलासिता के दिमाग बिगाड़ने वाले वातावरण में शाँतिदास अपना अपमान समझते हैं। इस प्रकार बरते जाने वाले उपेक्षा-भाव के कारण ही अभाव व्यस्तता और गरीबी को पोषण मिलता है क्योंकि मेहनत ही उपार्जन का आधार है। जिस समाज में इसके प्रति दिलचस्पी न होगी वहाँ उपार्जन असम्भव प्रायः है। इसके अभाव में स्वाभाविक संतोष मानसिक शाँति से वंचित रहना पड़ता है, क्योंकि श्रम जीवन का धर्म है।
किसी भी उपलब्धि का आधार परिश्रम ही है। इसकी महत्ता बताते हुए नीतिकार ने कहा है कि उद्यम करने से ही कार्यों की सिद्धि प्राप्त होगी। इच्छा करने या सोचने विचारने मात्र से नहीं। सोते हुए सिंह के मुख में पशुगण अपने आप नहीं चले जाते।
निःसन्देह इसके बिना और बात तो दूर पेट भरना भी कठिन होता है। परिश्रम करके खाद्य पदार्थों का उपार्जन करना पड़ेगा, उन्हें पकाना पड़ेगा।
हाथों में मुँह में डालना पड़ेगा तभी श्रम साधना सतत् प्रेरणास्रोत रहेगी। टी. इलियट,किशोरी लाल, मश्रूवाला, प्रतिभा बनर्जी, उर्मिला शास्त्री आदि ने श्रम को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाकर अनुकरणीय जीवन जिया।
आजकल परिश्रम के प्रति अवहेलना की वृत्ति हममें घर करती जा रही है। जिससे हमारे जीवन में असंतुलन पैदा हो गया है। तथाकथित शिक्षित कहे जाने वाले वर्ग में तो इसकी बढ़ोत्तरी और अधिक है। ऐसे लोग श्रम करने से प्रायः जी चुराते हैं। श्रम न करने के निठल्ले बैठे रहने से स्वास्थ्य जी गड़बड़ाने और लड़खड़ाने लगता है। इन दिनों की स्वास्थ्य संबंधी बढ़ती समस्या का यह एक भी प्रमुख कारण है। अतः बुद्धिमानी इसी में है कि हम श्रमनिष्ठा को किसी न किसी रूप में अवश्य पनपाये रहें। मानसिक श्रमशीलता से अचिन्त्य चिन्तन रुकता और अनावश्यक शक्ति क्षरण बन्द होता है, जबकि शारीरिक श्रम से शरीर मजबूत बनता एवं उसकी स्वास्थ्यता बढ़ती है। समृद्धि और सम्पन्नता में अभिवृद्धि होती है, सो अलग।
दावतों की बचत अनाश्रितों के लिए बंबई में एक ओर जहाँ इन्द्र और कुबेर जैसे ठाट-बाट हैं, वहाँ दूसरी तरफ बीमारों, निराश्रितों और भुखमरी से ग्रस्त
लोगों की संख्या भी कम नहीं है यहाँ प्रीतिभोजों की इतनी जूठन आयेदिन बचती हैं जिसे फेंका न जाय तो हजारों का पेट भर सकता है।
इस संदर्भ में एक समाज सेवी मेहता दम्पत्ति ने दस हजार निराश्रितों को भोजन नियमित रूप से कराने का जिम्मा अपने कंधे पर लिया। वे प्रीतिभोज वालों का पता लगाकर उनसे अनुरोध करते हैं कि जो सामान बचे वे उसे फेंके नहीं, उन्हें सूचना दे दें। उनकी गाड़ी आकर उस सामान को ले जाएगी और निराश्रितों के पास पहुँचा देगी।
योजना बहुत सफल रही और जहाँ-जहाँ भीख माँगने वालों ने पेट भरने का प्रबंध होने पर दूसरे उद्योग खोजने आरंभ कर दिये।
उन दिनों मैं भी दैनिक व्यवहार की वस्तुयें बिकती तो ज्यादा थीं, पर उनमें दुकानदारों की चालाकियाँ भी खूब चलती थीं। विभिन्न वस्तुएँ खरीदने के लिए ग्राहकों को दूर-दूर के बाजारों में जाना पड़ता था और पूरा दिन खराब होता था। इस कठिनाई को देखते हुए अमेरिका के एक छोटे से व्यापारी माईक कोलन ने एक ऐसी दुकान खोली जिसमें प्रायः 300 प्रकार की दैनिक उपयोग की वस्तुयें उपलब्ध रहती थीं। मूल्य लिखकर टँगे रहते थे और हर वस्तु शुद्ध रूप में पूरी मात्रा में मिलती। उसकी दुकान पर लिखा रहता था-”ईमानदार बनो, ईमानदारी बरतो और ईमान को धर्म समझो।”
मुनाफा कम रखा गया था तो भी बिक्री दिन-दिन अधिक बढ़ती जाने से लाभाँश भी उचित बना रहा और ग्राहक भी संतुष्ट होकर जाते। उस दुकान का नाम रखा गया-सुपर मार्केट”। भारत में तथा अन्यान्य देशों में सरकारी गैर सरकारी सुपर मार्केट इसी सिद्धान्त पर चल रहे हैं। इस प्रचलन का जन्मदाता है-माईक कालेम।
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पूजा प्रतिष्ठा में दीपक को प्राथमिकता मिलती है और उसे देव प्रतिनिधि मानकर नमन वंदन की वेदी पर प्रतिष्ठापित किया जाता है। इसका कारण उसका वैभव नहीं स्तर है। जो सामर्थ्य की दृष्टि से नगण्य होते हुए भी ऐसे साहस का परिचय देता है जो सामान्यों में नहीं असामान्यों में ही देखा जाता है। श्रद्धा असामान्यों के ही चरणों पर विनत होती है।
दीपक की मूल्य संपदा नगण्य जितनी है। पर सदुद्देश्य के लिए बहुत कुछ कर गुजरने की हिम्मत असीम। दूसरों को प्रकाश देने के लिए, अँधेरे से जूझने के लिए अपने अस्तित्व की बाजी लगा देना सामान्यों के लिए अति कठिन है। कठिनाइयां झेलने, संकट उठाने के लिए तो इच्छा, अनिच्छा से सभी को विवश होना पड़ता है। यह नियति है। स्वार्थ पूर्ति भी बिना कष्ट सहे और पुरुषार्थ किए कहाँ होती है कुमार्ग पर चलने वाले भी पग-पग पर ठोकरें खाते रोते-चिल्लाते देखे जाते हैं। मरण तो निश्चित है। वैभव भी हस्तान्तरित होता है। यह प्रकृति व्यवस्था है जिसके कारण हर किसी को दौड़ने और मरने के लिए विवश होना पड़ता है। विवशता को सदाशयता और स्वेच्छा से शिरोधार्य करना और प्रवाह का उचित उपयोग कर लेना ऐसी दूरदर्शिता है किसे अपनाने का साहस, दीपक करता है और सर्वत्र सराहा जाता है।
साधनों की सार्थकता उनके उपयोग में है। दुरुपयोग से विनाश ही उत्पन्न होगा और अपव्यय से पश्चाताप। आनन्द उस वैभव से मिलता है जो सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त हो सके। दीपक की बुद्धिमत्ता इसमें है कि उसने विवेक की ज्योति जलाई और उपलब्ध साधनों का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिए वह साहस जुटाया जिसका परिचय देने में सामान्यों को असमर्थ ही रहना पड़ता है। साधनों का उपयोग अपव्यय का दुरुपयोग करना ही प्रवाह है इसी में सब बहते और ऊबते हैं। सदाशयता के निमित्त उन्हें जुटा सकना किसी से बन नहीं पड़ता।
आदर्शों की बात कहते सुनते तो कई देखे जाते हैं पर उन्हें व्यवहार में उतारने और निष्ठा की परीक्षा देने के लिए भट्टी का सामना करने के लिए तैयार कौन होता है। दीपक की निष्ठा ही वह महानता है जिसके साथ उसका देवोपम अभिवंदन होता है। निष्ठा की यथार्थता उसी त्याग, बलिदान की कसौटी पर सिद्ध है जिसे दीपक ने अपनाया और अपने को धन्य बनाया।
अंधेरा कितना विशाल-दीपक कितना नगण्य? अनाचार कितना व्यापक, आलोक कितना स्वल्प? संघर्ष में हार किसकी जीत किसकी? साथी कौन? समर्थक कितने? इन विवेचनाओं में उलझनों की अपेक्षा दीपक अपना कर्तव्य निर्धारित करता है और उस पर एकाकी चल पड़ता है। आत्मदान ही उसकी तपस्या है। आलोक वितरण ही उसकी साधना है संकल्प सच्चा है या झूठा इसका प्रमाण ही है लक्ष्य के प्रति अडिग निष्ठा। आदर्शवादियों को अनादि काल से इसी मार्ग पर चलना पड़ा है और अनन्त काल तक इसी पर चलना पड़ेगा।
गणितज्ञों की दृष्टि से दीपक मूर्ख है। उसने कमाया कुछ नहीं खोया बहुत। बुद्धिमानों की दृष्टि में दीपक सनकी है, जो अपने को लुटाता है। व्यवहार कुशलों का मत है आदर्शों की दुहाई देना भर पर्याप्त है, उन्हें अपनाकर घाटा नहीं उठाया जाना चाहिए। शुभ चिन्तकों और परामर्श-दाताओं का अजिमत जो भी रहा हो। दीपक का निश्चय है कि वह तमिस्रा की सघनता के मध्य भी प्रहरी होकर जियेगा। प्रभात की प्रतीक्षा करेगा। जब तक जागरण का पर्व नहीं आ जाता तब तक मूर्च्छना का लाज उठाने वाले निशाचरों को चुनौती देते रहना उसका धर्म है। इस नीति निर्वाह में किसका, कितना प्रयोजन सिद्ध हुआ इसका मूल्याँकन करना दूसरों का काम है। दीपक इतने से ही संतुष्ट है कि जो संभाग था, उसे पूरी ईमानदारी से करने में उसने प्रमाद नहीं बनता। धन्य है दीपक ! धन्य है उसका निश्चय !!
भारत में जहाँ करोड़ों-अरबों रुपये का दान मन्दिर मठ और पंडे पुजारी चट कर जाते हैं, यहीं पर विदेशों में विवेकपूर्वक दान होता है। वहाँ करोड़ों डालर का होता है। उनका हिसाब कहाँ तक लिखा जाय, दो-एक उदाहरण ही पर्याप्त होंगे। एण्ड्रयू कार्नेगी ने अपने जीवन काल में प्रायः 20 करोड़ डालर का दान बड़े-बड़े सार्वजनिक कार्यों के लिए किया और जॉन राकफेलर ने 60 करोड़ डालर का, कई करोड़ पतियों ने कई-कई डालर के एक-एक चेकर देकर पूरी यूनीवर्सटीज कायम करा दी-जैसे जॉन हाफकिन्स यूनिवर्सिटी, ले लैण्ड स्टानफोर्ड यूनिवर्सिटी आदि। अवश्य ही ऐसी भारी संपžियों के एकत्र करने में भारी पाप भी जाने-अनजाने हो जाता है। उनका प्रायश्चित और परिमार्जन भी ऐसे सार्वजनिक सत्पात्रों, सत्कार्यों के लिए विवेकपूर्वक किये गये महादान से हो जाता है।
“आप तो आत्मदर्शन हैं ऋषि कुमार ! सभी जानते हैं आपने तरुणाई की साध, साधनाओं में घुलाकर सिद्धि पाई है। सबमें ही अद्वैत आत्मा का दर्शन करते हैं आप, फिर क्या मैं आत्मा नहीं हूँ जो आप मेरी आकाँक्षाओं की उपेक्षा करते हैं?” एक मनमोहन दृष्टि इतना कहते-कहते एक बार ऊपर उठी और महायोगी, विरुपाक्ष के तपःतेज से दमकते आनन पर टिक कर एक क्षण में ही झुक गई।
अखरों पर मधूरिम मुसकान बिखेरते हुए विरुपाक्ष ने उत्तर दिया-”वारुणि ! आप सच कहती हैं आप में भी वही आत्मा है जो समस्त जीवों में है। मुझमें यह जो चेतना काम कर रही है यह जी आत्मा ही है। किन्तु देवी ! विशुद्ध हुई आत्मा अपने ही गुणों का रसास्वादन करती है। करुणा का सुख, सेवा और सौजन्यता का अमृत, प्राणि मात्र में प्रेम भाव की प्रतिष्ठा-भद्रे ! मैं नहीं समझता इन भावनाओं से भी बढ़कर कोई सुख है, इस संसार में? इस शारीरिक सौंदर्य को इतना महत्व क्यों देती हो, आत्म के गुणों के प्रकाश में क्यों नहीं आती?”
वारुणि ने नीति शज्ञस्त्र पढ़ा था, दर्शन-तत्व मीमाँसा की व्याख्याएँ पढ़ी थीं, पातंजलि योग सूत्र जी उसने कंठस्थ किये थे। किन्तु सब वैभव के बंदीगृह में। वह एक नृत्याँगना के घर जन्मी थी। जब वह पढ़ती तब पायलों को झंकार, कहरवा और राग बहरतवील की लय में उसका मन झूमा करता। पखावज के साथ उसका पैर थिरकने लगता तो सितार के साथ उसकी चूनर हवा में नाचने लगती। शिक्षित होकर भी वातावरण ने उसे भोग भूख और खजाना की प्यास दी थी। वह आत्मा की निर्लेप भाव स्थिति को भला क्या जानती? विरुपाष का उपदेश काम नहीं आया, पर वह भी सच था कि उसने अपने सौंदर्य की जो जाल विरुपाक्ष को पाथबद्ध करने के लिए मिलाया था वह जी चूर-चूर हो गया। भद्रे ! विरुपाष ने कहा-”जब तक मनुष्य का मन र्निल न हो वह भाव प्रज्ञता को क्या समझेगा लो मैं चला पर याद रखना तुम्हारी यह काम लिप्सा ही एक दिन तुम्हारे पतन का कारण बन सकती है।” यह कहकर महाभाग विरुपाष है वहाँ से चल पड़े। वारुणि उन्हें अपलक देखती रह गयी।
यह पहला अवसर था, जब वह किसी पुरुष द्वारा ठुकराई गई हो। वाराँगना वारुणि के सौंदर्य ने आकर्षित न किया हो ऐसा एक भी तो राजकुमार तरुण, नागरिक, श्री सामंत नहीं बचा था अगस्तारण्य में। विरुपाष ही ऐसे व्यक्ति थे जिनके संयम के समक्ष वारुणि स्वयं पराभूत हो गयी थी।
वर्ष पर वर्ष बीतते गये काल के थपेड़े खाकर वारुणि का सौंदर्य न जाने कहाँ नष्ट हो गया। वह रूप श्री जो नित-प्रति अनगिनतों को लुब्ध करती मुग्ध बनाती और अपने चुम्बकत्व में आकर्षित करती रहती थी आज न जाने कहाँ विलीन हो चुकी थी। अब तो यौवन के पाप वृद्धावस्था में रोग और उपदेश के रूप में फल-फूल कर सामने आ रहे थे।
अद्भुत है कर्म कृषि जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। आज सारे नगर में विसचिका का प्रकोप था। हजारों लोग रोज मौत के मुँह में समाते जा रहे थे। औरों के घर तो फिर भी प्रकाश सेवा-सुश्रूषा करने वो थे। एक वारणि ही ऐसी थी जिसके घर में भी अंधकार था और मन व मस्तिष्क भी निराशा और संताप की तमिस्रा में डूब चुके थे। कष्ट बढ़ता जा रहा था, पर प्राण नहीं निकलते। सारे शरीर में वर्ण फूटने लगे थे। घाव पोंछने वाला भी कोई नहीं था। उसकी आँखें पश्चाताप के आँसुओं से गीली हो रही थीं।
तभी द्वार खुलने की आवाज सुनाई दी। किसी ने आगे बढ़कर ज्योति स्तम्भ पर रखे सूखे दिए को टटोला और दीपक जलाया। महायोगी विरुपाष ने दीपक के प्रकाश में देखा, कि वारुणि के सिरहाने रखा तकिया भाव बिन्दुओं से भीग चुका है। वह वेदना की निर्झरिणी में डूब उतरा रही थी। आचार्य ने आगे बढ़कर वारुणि को हाथ का सहारा देकर बैठाया, जल पिलाया, घाव धोये, औषधि लेपन किया। हलकी शीतलता-नींद आ गयी वारुणि को। उसने स्वप्न में देखा कि एक दिव्य ज्योति सम्मुख खड़ी कह रही है-”वारुणि ! छोड़ इन भोगों की कामना को और आ मुझ में मिला जा।” उसका दर्द धुल गया और अब वह अपने आपको उस आत्मा में लीन अनुजव कर रही थी। जिसमें महायोगी विरुपाष विचरण किया करते थे।
स्वामी रामदेव परिव्राजक अमेरिका के सियेटेल नगर में जा रहे थे। एक आठ वर्षीय बालक जो भाद्र पुरुषों की सी पोशाक पहने था और अखबार बेच रहा था, उसने स्वामीजी से अखबार खरीदने को कहा।
स्वामी जी ने पूछा-तुम तो किसी संपन्न घर के लड़के मालूम पड़ते हो, फिर अखबार क्यों बेचते हो? लड़के ने कहा मेरे घर वाले सम्पन्न हैं, पर इससे क्या? मुझे तो स्वावलम्बन की शिक्षा अभी से लेनी है। जितना स्वयं कमा सकता हूँ उसके लिए अभिभावकों पर निर्भर क्यों रहूँ?
वृक्ष-वनस्पतियों एवं जीवधारियों का जीवन धूप तथा प्रकाश-रश्मियों के रंग पर निर्भर करता है। सूर्य की प्रकाश-ऊर्जा तरंगों का अवशोषण करके पेड़-पौधे बढ़ते और परिपुष्ट बनते हैं। इसके अभाव में उन्हें निष्क्रिय होते और पीला पड़कर दम तोड़ते सभी ने देखा है। यही तथ्य मनुष्य के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य पर भी लागू होता है। प्रकाश-रश्मियाँ हमारे लिए उतनी ही आवश्यक हैं जितनी कि पेड़-पौधों को। ये जीवन धारण के लिए क्लोरोफिल नामक हरे तत्व से मिलकर भोज्य पदार्थों के उत्पादन में सहायक होती है। वैज्ञानिक खोजों से अब यह बात स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो गयी है कि शरीर के रासायनिक तत्वों पर सही संतुलन बनाये रखने में सूर्य की रसवर्णी किरणें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। खनिज तत्वों के घट बढ़ से उत्पन्न स्वास्थ्य असंतुलन एवं रुग्णता का प्रकाश रश्मियाँ दूर कर देती हैं। सही तरीके से यदि रंग विशेष की किरणों का आश्रय लिया जा सके तो उनसे न केवल शरीर को अपेक्षित मात्रा में रासायनिक तत्वों की पूर्ति होती रहती है वरन् वह विकार रहित और निरोग भी बना रहता है। यदि किसी कारणवश कोई रोग उत्पन्न ही हो गया हो तो सूर्य किरणों से उसका निवारण हो जाता है। कार्य पुष्प एवं प्राण संचार का आधार सूर्य ही है।
सूर्य की विभिन्न रंग-रश्मियों से विभिन्न प्रकार के रोगों को दूर करने की विज्ञान सम्मत उपचार प्रक्रिया व्रतपो थेरेपी, कलर हीलिंग, कीटोनथेरेपी आदि नामों से जानी जाती है। प्राचीन काल से ही र्सू की सप्तवर्णी किरों रोग निवारण एवं प्राण-संवर्धन के रूप में प्रयुक्त होती रही हैं। ऋग्वेद 1/50/52 में उल्लेख है कि सूर्य-रश्मियों द्वारा हृदय रोग एवं पाण्डु रोग को दूर किया जा सकता है। इसी तरह अथर्व वेद की ऋचा 9/8 के अनुसार प्रातःकाल की आदित्य किरणें अनेक प्रकार की व्याधियों को नष्ट कर देती हैं। अनुसंधानकर्ता वानवेत्ताओं ने जी अब इस तथ्य की पुष्टि कर दी है। ‘द स्पेक्ट्रोक्रोमोमेट्री एनसाइक्लोपीडिया’ नामक प्रसिद्ध विश्वकोष में मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डॉ. पी. गेटियाली ने सूर्य चिकित्सा के सिद्धान्तों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है कि किस प्रकार से कैसे और क्यों विभिन्न रंगों की किरणें विभिन्न प्रकार के रोगों को प्रभावित करतीं और शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करती हैं।
पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान हिपोक्रैट्स सूर्य किरणों द्वारा रोगियों की चिकित्सा करने के लिए विख्यात थे। तेरहवीं शताब्दी में इस संदर्ज में डेनमार्क के ख्याति-लब्ध चिकित्सक डॉ. नाई फिसेन ने गहन अनुसंधान किया था और पाया था कि प्रकाश रश्मियों से क्षय जैसे घातक रोगों पर निंयत्रण पाया जा सकता है। इस विधि से उनसे कितने ही क्षय रोगियों का उपचार कर उन्हें आरोग्य लाभ प्रदान करने में सफलता भी पायी थी इसके पश्चात् डॉ. रोलियर, डॉ. आर. डी. स्टकर, डॉ0 ए. ओ. ईव्स, डॉ. बेबिट जैसे प्रख्यात् चिकित्सा विशेषज्ञों ने सूर्य चिकित्सा के क्षेत्र में गंभीरता पूर्वक अध्ययन अनुसंधान किये और इस आधार पर जटिल एवं असाध्य रोगों की सफलतापूर्वक चिकित्सा की। अमेरिका के डॉ0 जॉन डोन ने रंग चिकित्सा से टी. बी. जैसी प्राणघातक बीमारी के रोगाणुओं को नष्ट करने और इससे संत्रस्त व्यक्तियों की प्राण रक्षा करने में अभूतपूर्व सफलता अर्जित की है। डॉ. जेम्सकुक, ए. बी. गार्डेन, एच. जी. वेल्स प्रजृति विख्यात मनीषियों ने भी क्रोमोथेरेपी पर गंभीर खोजें की हैं। और इसे रोग निवारक पाया है।
सूर्य चिकित्सा के सिद्धान्त के अनुसार रुग्णता का कारण शरीर में रंगों का घटना-बढ़ना है। मानवी काया की संरचना जिन पंच भौतिक तत्वों से हुई है उनके अपने रंग और प्रभाव हैं और यह सभी तत्व सूक्ष्म रूप से सूर्य किरणों में सूक्ष्म रूप से विद्यमान हैं। आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि मनुष्य शरीर में विविध रंग एक रासायनिक सम्मिश्रण के रूप में विद्यमान होते हैं। इनकी उपस्थिति विभिन्न अंगों में घटक अवयवों में अलग-अलग वर्णों के रूप में देखी जाती है। इन रंगों की न्यूनाधिकता से विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं। इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक मेरी एर्ण्डसन ने अपनी कृति “कलर हीलिंग“ में कहा है कि सूर्य किरणों में सन्निहित रंग की जीवन का आधार है। प्राणऊर्जा का उभार उन्नयन इन्हीं की देन है। उनके अनुसार सौंदर्य छटा बिखेरने वाले मनोरम रंगों की उपस्थिति न केवल सृष्टि संरचना में भाग लेने वाले तत्वों में विद्यमान हैं, वरन् मानवी काय संरचना के सभी घटक भी रंगीन हैं। शरीर का हर रंग अवयव कोई न कोई रंग लिए हुए है। रक्त, माँस, मज्जा, मेद, हड्डी, फेफड़े, हृदय आंतें, यकृत, गुर्दे, आदि के अपने-अपने रंग हैं। यह सभी अवयव एक ओर जहाँ सतत् एक प्रकार की ऊर्जा तरंगों का विकिरण करते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर सूर्य से अपनी आवश्यकता के अनुरूप विविध रंग की किरणों को भी आकर्षित-अवशोषित करते रहते हैं। इस आदान-प्रदान में व्यवधान पड़ने पर मनुष्य शारीरिक मानसिक रूप से रुग्ण रहने लगता है जिसे रंग चिकित्सा द्वारा दूर किया जा सकता है।
प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री डॉ. विलियम बेनहेम
एनो का कहना है कि मनुष्य की समूची काया रंगों का पिण्ड है जिसकी प्रत्येक कोशिका से रंगीन ऊर्जा तरंगों का फव्वारा फूटता रहता है। इन ऊर्जा तरंगों का सौर ऊर्जा तरंगों से एक प्रकार का सघन आदान-प्रदान चलता रहता है। जब कभी उसमें व्यवधान पड़ता है तो मनुष्य शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक रूप से बीमार रहने लगता है शारीरिक संरचना में भाग लेने वाले घटकों, रासायनिक तत्वों के साथ उनके रंगों के अनुपात में भी असंतुलन पैदा हो जाता है जिसे रंग चिकित्सा द्वारा दूर किया जा सकता है। उनके अनुसार नीले रंग की प्रकाश रश्मियों के प्रयोग से अतिसार, संग्रहणी, खाँसी, श्वास, मूत्र विकार, बुखार, सिरदर्द, प्रमेह आदि तथा लाल रंग की किरणों के द्वारा सभी प्रकार के वायु विकार एवं बात-व्याधियों का निवारण संभव है। इसी तरह हरे रंग से सभी प्रकार के चर्म रोगों एवं अन्यान्य व्यथाओं का उपचार किया जा सकता है।
सूर्य चिकित्सा विज्ञानों के अनुसार लाल, पीला और नीला-यही प्रमुख तीन रंग हैं, अन्य सभी मिश्रित श्रेणी के रंगों में गिने जात हैं। इनमें से लाल रंग की प्रकाश रश्मियों का प्रयोग ठण्ड जनित रोगों, रक्त विकार एवं चर्म रोगों में किया जाता है। रक्त की कमी, उदासी, निराशा की मनः स्थिति में लाल कपड़े पहनने तथा उससे रंगी वस्तुओं के संपर्क में रहने से लाभ होता है। लाल रंग का ध्यान भी उपयुक्त पाया गया है। गठिया, लकवा, सूजन, दर्द आदि में लाल रंग प्रयुक्त होता है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य बात है कि उत्तेजना उत्पन्न करने के कारण लाल रंग का सेवन बहुत सावधानीपूर्वक किया जाता है, अन्यथा इसकी अधिकता नुकसानदायक भी होती है।
पीले रंग की प्रकाश किरणों में पाचन का विशेष गुण होता है। अपच या शरीर की परिपाक प्रक्रिया शिथिल हो जाने पर इन रंग-रश्मियों का प्रयोग लाभकारी होता है। कफ ज्वर, खुजली आदि रोगों में अन्दर जमी हुई विकृतियाँ ही प्रधान कारण होती हैं जिन्हें निकाल बाहर करने में पीले रंग को बहुत ही उपयुक्त पाया गया है। इसी प्रकार नीला रंग शीतलता प्रधान होने के कारण गर्मी से उत्पन्न होने वाले रोगों में लाभदायक माना गया है। सिर दर्द नेत्र विकार, अनिद्रा, उच्च रक्त चाप, उत्तेजना, जैसे उष्णता प्रधान रोगों में नीले रंग का उपचार किया जाता है। लू-लगने, फोड़ा फुन्सी उठने, जहरीले कीड़े के काट लेने पर नीले रंग का कपड़ा पानी में भिगोकर पीड़ित अंग पर रखने से ठंडक की अनुभूति होती है। सूखी खाँसी, श्वास में भी इस वर्ण के उपयोग से राहत मिलती है।
मिश्रित रंग की प्रकाश रश्मियों का अपना अलग ही प्रभाव होता है। लाल और पीले रंग से बना नारंगी रंग प्राण संवर्धन के लिए प्रसिद्ध है। कैल्शियम के चयापचय में इस रंग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एण्टी-स्पास्मोडिक गुणों से युक्त होने के कारण यह माँस पेशियों की ऐंठन-जकड़न को दूर करता एवं अग्नाशय एवं तिल्ली को सक्रिय बनाता है। फेफड़ों को शक्तिशाली बनाने, नाड़ी गति को तीव्र करने एवं रक्तचाप नियंत्रित करने में भी यह रंग प्रयुक्त होता है।
‘जामुनी रंग का निर्माण लाल और आसमानी रंग के मिलने से होता है। दर्द निवारण के साथ ही यह किरणें ज्वर को दूर करने तथा रक्त शिराओं को उत्तेजना प्रदान करने में प्रयुक्त होती हैं। जब कि सिंदूरी रंग की किरणें गुर्दे को सक्रिय एवं स्वस्थ बनाती हैं। यह आसमानी रंग की अधिकता तथा लाल रंग की अल्प मात्रा के मिलने से बनता है। लेमन कलर हलके पीले और हलके हरे रंग के सम्मिश्रण से बनता है। विषैले तत्वों को शरीर से निकाल बाहर करने तथा व्यक्ति को नव-जीवन प्रदान करने में इन रंग प्रकंपनों की सक्रिय भूमिका होती है। लेमन कलर मस्तिष्क के सेरिब्रम भाग को प्रभावित कर थायमस नामक अंतःस्रावी ग्रन्थि को उत्तेजित करता है और बौनेपन को दूर करता है। इसी तरह लाल और बैंगनी कलर मिलकर ‘मैजेन्टा कलर’ बनाते हैं। यह रंग एड्रीनल ग्रन्थि एवं हृदय को शक्ति प्रदान करत है, साथ ही गुर्दे से सम्बन्धित बीमारियों का उपचार भी इससे हो जाता है। भावनात्मक स्थिरता प्रदान करने में भी इसे प्रयुक्त किया जाता है। सुप्रसिद्ध सूर्य चिकित्सा विज्ञानी सोलेन के शब्दों में सूर्य की सप्तवर्णी किरणों में जितनी रोग नाशक क्षमता विद्यमान है उतनी संसार के किसी भी पदार्थ या औषधि में नहीं है, आवश्यकता मात्र सही तरीके से प्रयोग करने भर की है।
सोवियत संघ के एक दूर दराज गाँव में रहने वाले साइकोव परिवार ने पिछले 40 वर्षों से नमक का प्रयोग नहीं किया है।
कहा जाता है कि जार के शासन काल में अत्याचारों से पीड़ित यह परिवार पश्चिमी रूस के साइबेरिया के एक गाँव में चला गया था, जब लेनिन ने जारशाही को समाप्त किया तब से यह साइकोव परिवार आवकान नदी के दुर्गम क्षेत्र की एक गुफा में रहने लगा। भोजन के लिए यह परिवार खेती करता तथा वृक्षों की छाल वस्त्र के रूप में धारण करता है तथा कहीं आने-जाने के लिए एक तरह की नौका का प्रयोग करता है। इस परिवार के सजी सदस्य दूसरों की तुलना में अधिक स्वस्थ हैं।
किसी कुप्रचलन को इसलिए मान्यता नहीं मिलनी चाहिए कि वह पुरातन काल से प्रयोग में आता रहा है। आदिमकाल का मनुष्य जब कपड़े बनाना या पहनना नहीं जानता था, तब नंगे शरीर रहता था या पत्ते आदि से कुछ अंग ढक लेता था। अब विकसित सभ्यता के जमाने में जब वस्त्रों का प्रचलन हर स्थान में होने लगा तो कोई जी समझदार मनुष्य नंगा रहना पसंद नहीं करेगा। अब मनुष्य ने अपनी जरूरतें भी बदल ली हैं। और भोजन की तरह वस्त्र भी दैनिक प्रयोग की वस्तु बन गये हैं। कोई समय ऐसा भी रहा है जब मिट्टी के बर्तन ही उपलब्ध थे, पर अब तो उनके स्थान पर धातुएँ प्रयोग में आने लगी हैं। कभी बाल काटने का रिवाज नहीं था, पर अब तो अधिकाँश लोग दाढ़ी-मूँछ काटने-छाँटने लगे हैं। इन सामयिक परिवर्तनों को कोई बुरा नहीं मानता।
प्राचीन काल में स्त्रियाँ भोजन पकाने और बच्चे पालने के काम भर में अभ्यासी थीं। तब उन्हें वही काम सौंप दिया गया था। उनने उसे स्वेच्छापूर्वक अपना लिया। रिवाज बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक पहुँचा कि उन्हें उतनी ही सीमा में प्रतिबंधित भी किया जाने लगा। जो काम पुरुषों की तरह स्त्रियाँ कर सकती थीं, उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। व्यवसाय जैसे कार्यों में एक तो वैसे ही वे अनुभवहीनता की पिछड़ी स्थिति में थीं, इस पर भी उस क्षेत्र में प्रवेश न करने के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया ऐसे ही और भी प्रतिबंध अन्य क्षेत्रों में लगे और उन्हें उन कामों को करने से रोक दिया गया। स्वभावतः नर और नारी एक ही सिक्के के दो पहलू, एक ही गाड़ी के दो पहिए, एक ही शरीर के साथ जुड़े हुए दो हाथ या दो पैर हैं। दोनों की क्षमता या दक्षता में कोई अन्तर नहीं है। सच पूछा जाय तो नारी कितनी ही बातों में वरिष्ठ एवं सक्षम है, जब कि पुरुष उन्हें नहीं कर पाता। गर्भधारण शिशु पालन जैसे कार्यों में नारी अग्रणी है, जबकि पुरुष से उन कार्यों का बन पड़ना कठिन है। गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से भी नारी कोमल, दयाशील, सेवाभावी और क्षमाशील है, जब कि इन सब गुणों की पुरुष में बहुत कमी पायी जाती है।
प्रयोग में न आने पर कई विशेषतायें क्षीण हो जाती हैं। पुरुषों को श्रम परायण और साहसी रहना पड़ा, जबकि महिलाओं को उनका प्रयोग प्रायः नहीं करना पड़ा, अतएव वे इस दृष्टि से पिछड़ गयीं। यह संयोग की ही बात थी, जबकि उसे उनकी दुर्बलता मान लिया गया और वे इस दृष्टि से कनिष्ठ समझी जाने लगी॥ उनके साथ व्यवहार भी वैसा ही चल पड़ा मानो वे सचमुच अयोग्य या असमर्थ हों, जब कि बात वैसी है नहीं। जब भी अवसर आया है, सुयोग मिला है तब-तब नारी ने अपनी गरिमा का वैसा ही परिचय दिया है जैसा कि आमतौर से मर्द किया करते थे। अनेक प्रसंग ऐसे भी हैं। जिनमें नारी ने नर की तुलना में कितनी ही प्रतिस्पर्धाएं जीतीं हैं और अपनी समता का ही नहीं, वरिष्ठता का भी परिचय दिया है। शारीरिक न्यूनाधिकता का कोई बड़ा फर्क नहीं होता। पशु−पक्षियों में भी नर-मादा दोनों ही प्रायः एक जैसी क्षमता के होते हैं। थोड़ा बहुत अंतर ही कभी किसी की बनावट में देखने को मिलता है। वह इतना बड़ा नहीं होता कि किसी को बहुत समर्थ और दूसरे को अत्यंत दुर्बल ठहराया जा सके। मनुष्यों में भी नर-नारी के सम्बन्ध में यही बात है। जिन देशों में नारी प्रधान कुटुम्बों की परम्परा चलती है, वहाँ नारी का दर्जा हर दृष्टि से बड़ा माना जाता है और पुरुषों को उनके आज्ञानुवर्ती बनना और चलना पड़ता है।
अब भी शिक्षा में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होना, प्रतिस्पर्धाओं में आगे रहना, संगीत, साहित्य, कला जैसे विषयों में अपनी वरिष्ठता वे ही सिद्ध करती देखी गयी हैं। शारीरिक सौंदर्य और स्वभावगत सहिष्णुता की दृष्टि से उन्हें प्रायः अग्रणी ही पाया जाता है। चतुरता कठोरता, धूर्तता जैसी विशेषताओं को यदि सराहनीय माना जाता हो तो ही मर्द किसी कदर अपने को बढ़ा-बढ़ा जान सकता है।
वास्तविकता यह है कि मनुष्य जाति में दो अविच्छिन्न पक्ष नर और नारी है। उनमें से न कोई छोटा है न बड़ा न कोई वरिष्ठ है न कोई कनिष्ठ। यह बात दूसरी है कि यदि अवसर न ले तो कार्यान्वयन के अभाव में किसी को पिछड़ी स्थिति में रहना पड़े। प्रजनन नारी का विशेष गुण है और वह इतना महत्वपूर्ण है कि यदि उसकी दुर्दशा एक शताब्दी तक भी बनी रहे तो समझना चाहिए कि संसार में से मनुष्य जाति का अस्तित्व ही सदा-सर्वदा के लिए समाप्त हो गया। पिता के न रहने पर माता किसी प्रकार बालकों को पाल-पोष लेती है, पर माता का अभाव रहने पर बच्चे या तो जीवित ही नहीं रह पाते अथवा अनेक दृष्टियों से पिछड़े रह जाते हैं।
शास्त्रकारों ने ईश्वर की प्रार्थना करते हुए प्रथम उसे माता के रूप में स्मरण किया। इसके बाद पिता को स्थान दिया गया है। युग्मों का जहाँ जी उल्लेख है वहाँ प्रथम नारी और द्वितीय नर का स्थान है। लक्ष्मीनारायण सीताराम, राधेश्याम, उमा-महेश, सावित्री-सत्यवान आदि की युग्म शृंखला में नारी की प्राथमिकता है। देवी पूजन में कन्या पूजा का विधान है, जब कि देवताओं के स्थान पर लड़कों को विराजमान नहीं किया जाता है। देवी-देवताओं का जहाँ भी उल्लेख आता है, वहाँ नारी को ही प्राथमिकता दी जाती है। लक्ष्मी गणेश की अभ्यर्थना में दीपावली के अवसर पर प्राथमिकता लक्ष्मी को ही मिलती है। पशुओं में भी इसी प्रकार का प्रचलन है। गाय और बैल में से प्राथमिकता गौ को ही ठहरती है। इस प्रकार के प्रमाणों से प्रकट है कि नारी को साँस्कृतिक और उपयोगिता की दोनों ही दृष्टि से प्राथमिकता प्राप्त है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि अर्थ उपार्जन के स्रोत पुरुष के हाथ में चले जाने के कारण उसी ने अपने को वरिष्ठ ठहराया, जबकि यदि नर को गृहव्यवस्था संभालनी पड़े और नारी आर्थिक उपार्जन के क्षेत्र में बढ़ चले तो उसकी समर्थता ही अधिक सिद्ध हो सकती है। अब भी खेल, परीक्षाओं की प्रतिस्पर्धाओं में महिलायें अधिक अच्छे नम्बर लाती हैं और अधिक सफल सिद्ध होती हैं। कला क्षेत्र पर तो उनका एकाधिपत्य है ही।
भूलों को सुधारा जाता रहा है। गलतियों का प्रायश्चित होता रहा है। लम्बे समय से चले आ रहे नर और नारी के बीच बढ़ते अनौचित्य का अन्त आने का समय अब आ गया। आधी जनसंख्या का मनोबल गिराने और उसके स्वाभाविक मानवाधिकारों से वंचित करके मात्र नारी ही घाटे में नहीं रही, नर को उससे जी अधिक घाटा सहना पड़ा है। गाड़ी का एक बैल दुर्बल हो जाने पर उसके बदले का भार दूसरे बैल को ही सहना पड़ता है। पक्षाघात से आधा अंग बेकार हो जाय तो दूसरे को उसके बदले का दबाव सहना पड़ता है एक हाथ का एक पैर का आदमी प्रायः आधा ही काम कर सकता है। एक पहिए की गाड़ी किसी प्रकार आधा अधूरा काम ही कर पाती है। युग्म जिनके भी जहाँ बने हैं, वे एक दूसरे के पूरक रहे हैं। इसमें से एक दुबला रहे दूसरे को उसकी क्षति उठाये बिना न रहना पड़ेगा। नर और नारी यदि कंधे मिलाकर रहे होते तो दोनों नफे में रहते। जहाँ वैसा प्रचलन है वहाँ प्रगति को विकसित रूप में देखा जाता है। जापान अमेरिका, इसराइल, जर्मनी, चीन, रूस आदि विकसित देशों की जनता जितनी बलिष्ठ और समृद्ध है, उसका बड़ा श्रेय वहाँ के नारी समुदाय को ही जाता है। भारतीय महिलाओं का पुरातन इतिहास तो हर क्षेत्र में मूर्धन्य रहा है। वे अपने भाइयों, पतियों, पुत्रों के लिए शक्तिस्रोत बनकर रही हैं। वयोवृद्ध भी अपनी लड़कियों पर गर्व करते रहे हैं। एकाकी पुरुषों एवं एकाकी कार्यों में जितने जी पराक्रम-पुरुषार्थ देखते बन पड़ते हैं, वहाँ नारियों की गरिमा ही अधिक दिखती है। पुरुष तो इस अभाव के रहते अनेक कमियों के केन्द्र रहे हैं। यहाँ तक कि विधुर या अविवाहितों की मरण संख्या ही अधिक रही है। आज नारी अपने ऊपर थोपी गई असमर्थता के कारण दुर्बल होकर रह रही है, पर शुरू में वह वैसी नहीं थी। जब उसे अवाँछनीय बंधनों में न बाँधने का न्यायोचित समय था, तब नारियों ने हर दृष्टि से अपने को कनिष्ठ नहीं, वरिष्ठ ही सिद्ध किया है।
समय चक्र सदा-सदा से घूमता रहा है। वह लौटकर अपनी जगह आ जाता है। सूर्य पहले दिन में पूर्व से निकलता है। शाम को वह पश्चिम में अस्त तो होता है, पर सदा नहीं डूबा रहता है और दूसरे दिन फिर नये उत्साह के साथ पुनः उसी पूर्व दिशा में उदय होता है जिसमें कि वह पहले दिन उदय हुआ था। पतझड़ में वृक्ष के पत्ते गिर तो जाते हैं, पर वसंत आते ही वे नये कोपलों से लद जाते हैं और फूल-फलों से लदे हुए पाये जाते हैं।
समय चक्र ने नारी को भी दुर्गति से निकालने का निश्चय किया है। महाकाल के अभिनव वसंत ने पतझड़ को वसंत में परिवर्तित करने का निश्चय कर लिया है, साथ ही नारी के वर्चस्व को लौटाने का भी। इक्कीसवीं सदी नारी शताब्दी घोषित की गयी है जिसमें नारी के पिछड़ेपन की अन्तता दिख रही है। देखने को यह भी दिखेगा कि वह अपने साथी से किसी भी क्षेत्र में नहीं पीछे रह गयी, लेकिन दस कदम आगे ही बढ़ गयी है।
प्राकृतिक चिकित्सा का प्रयोक्ता
अब से 150 वर्ष वर्ष पूर्व आस्ट्रिया का एक पशु चिकित्सक डॉक्टर जे. स्क्राथ मात्र उपचारक ही नहीं दार्शनिक भी था। पालतू पशुओं की रुग्णता और वन्य पशुओं की स्वस्थता की तुलना करते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आहार-विहार में अप्राकृतिकता का समावेश ही इसका प्रधान कारण है। उसने माँसाहार का घोर विरोध किया और कहा कि मनुष्यों की बीमारियों का बहुत बड़ा कारण यह है। उसने प्राकृतिक रहन-सहन द्वारा रोगों से छुटकारा पाने पर कई पुस्तकें भी लिखीं।
आरंभ में स्क्राथ का सब ओर से उपहास हुआ, पर जब उसने असाध्य रोगियों को इन्हीं अनुबन्धों का पालन कराकर उन्हें अच्छा किया तो लाग आश्चर्य-चकित रह गये। उसने असाध्य रोगी ठहराये गये ड्यूक को अपनी विधि से अच्छा किया तब लोगों ने समझा कि प्राकृतिक आहार-विहार का आरोग्य से कितना बड़ा संबंध है।
लिप्सा का आध्यात्मिक जीवन में कोई स्थान नहीं। भौतिक जीवन में जो इसे अपनाते हैं, वे असह्य हानि व संकट उठाते देखे जाते हैं। अनेक बार तो जान जोखिम में पड़ती दृष्टिगोचर होती है और कई बार इसमें फँस कर लोग मौत के मुँह में जाते दिखाई पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में अतीत के गर्भ में समा चुकी इन घटनाओं की पुनरावृत्ति कर, उन्हें दृश्यमान बनाकर प्रकृति संसार को यह बताना चाहती है कि किस प्रकार इसका परिणाम विघातक होता है और मृत्यु को आमंत्रण देता है।
घटना 17वीं सदी की है। कैप्टन हैण्ड्रिक वान उर डेकेन नामक एक लालची डच के मन में यह इच्छा जाग्रत हुई कि किसी प्रकार अपार संपदा कमाकर धनपति बना जाय। आकांक्षा उठते ही योजनाएँ बनने लगीं। उसे इसका सबसे अच्छा उपाय यही सूझा कि सुदूर पूर्व की यात्रा की जाय और कुछ वर्ष वहाँ वैभव संग्रह कर पुनः स्वदेश लौटा जाय। योजना को क्रियान्वित करने के लिए उसने एक नौका खरीदी और एम्सटरडम से यात्रा आरंभ की। ‘गुडहोप’ अंतरीप तक सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा कोई अवाँछनीय नहीं घटा। दुर्भाग्य से शुरुआत इससे आगे बढ़ने पर हुई। अभी वह अंतरीप से कुछ मील ही गया था कि नाव भयंकर तूफान में फँस गयी। उसकी तीव्रता इतनी प्रचण्ड थी कि उस पर से उसका नियंत्रण एकदम समाप्त हो गया। नाव ज्वार-भाटों में चिकोले खाती, डूबती-उतराती तूफान की दिशा में ब.ए चली। कैप्टन ओर उसके साथी असहाय थे। सभी इस विपदा से बचा लेने के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे थे, पर संकट न टलना था, न टला। अन्धड़ की भयंकरता पल-पल बढ़ती गई। इससे पाल जी उसे बर्दाश्त नहीं कर सका और फट कर चिथड़े-चिथड़े हो गया। नाविकों के लिए आशा का अंतिम दीप भी बुझ गया। अब नैया बिल्कुल दिशाहीन हो गयी। आँशी के सहारे जिस जिस दिशा में बढ़ती, शिलाखण्डों से टकराती, टूटती-फूटती चली जा रही थी कुछ नाविकों के मन में आया कि शायद नयी पाल के सहारे उसको यत्किंचित् यिंत्रित किया जा सके, अतः दो चार दुस्साहसी साथियों के साथ कप्तान ने तत्काल एक अस्थायी पाल बनाकर खड़ा किया, पर प्रयत्न निरर्थक गया। आधी की भीषण मार वह अधिक देर झेल न सका और देखते-देखते अपने दुर्भाग्य को प्राप्त हुआ। चार दिनों के दुर्द्धष चक्रवात का सामना करते-करते नाव का ढाँचा बिलकुल चरमरा गया था। पाँचवें दिन उसके सारे हिस्से अलग हो गये। सामान समुद्र में डूब गया। दो साथी भी बचने का असफल प्रयास करते हुए अथाह जलराशि में समा गये। कप्तान और शेष सहयोगियों के हाथ नौका की टूटी-फूटी लकड़ियाँ लगी। वे उनके सहारे तैरने लगे, पर विशाल दूरी को इस प्रकार पार करना कैसे संभव था? अंततः उनकी जल समाधि लग गयी। इस प्रकार संपूर्ण यात्रा का समापन “गुडहोप” अंतरीप में आकर हो गया।
किन्तु समुद्र यात्रा करने वाले नाविक एवं त्री इस घटना को यथावत घटते आज भी देखते हैं। 11 जुलाई 1881 को इंग्लैण्ड के राजकुमार जार्जजो कि बाद में सम्राट जार्ज पंचम बने, उक्त घटना का अपनी लाँग बुक में विवरण प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि जब वे एच. एम. एस. इनकान्सटैण्ट से यात्रा करते हुए दक्षिणी अफ्रीकी तट पर पहुँचे तो लगभग चार बजे प्रातः वे और उनके साथियों ने हूबहू वहीं दृश्य देखा, जो 17वीं सदी के कप्तान हेण्ड्रिक और उनके दुर्भाग्यपूर्ण पोत के बारे में प्रचलित है। दुर्घटनाग्रस्त पोत से एक विचित्र आभा निकल रही थी। पास आने पर सब कुछ अचानक अदृश्य हो गया।
सितम्बर 1939 में यही दृश्य लगभग सौ लोगों ने उस वक्त, देखा, जब वे काल्स खाड़ी में ग्लेनकेयर्न तट पर धूप स्नान कर रहे थे। करीब 15-20 मिनट तक दृष्टिगोचर होने के उपराँत दृश्य उसी प्रकार अकस्मात गायब हो गया, जैसे प्रकट हुआ था।
इसके तीन वर्ष पश्चात् कुछ लोगों ने पुनः उसी दृश्य को टेबल खाड़ी के निकट केप टाउन के पास देखा। हर बार के दृश्य में नाव के चारों ओर एक अलौकिक प्रकाश दृश्यमान हुआ।
ध्यान तक था नहीं, जब हमें आपका। प्यार तब से, हमें आप करते रहे॥ मृदु-हथेली, लगाये रहे प्यार की। पर सुकोमल-हथोड़ी से गढ़ते रहे॥1॥
किन्तु हम अनगढ़े, एक पाषाण थे। आप की छटपटाहट से, अनजान थे॥ आपके स्नेह का, शिल्प चलता रहा। बहुत धीमे, मगर कुछ बदलता रहा॥
काम की, क्रोध की थे गठाने बहुत। किन्तु बेचैन रह, आप ढलते रहे॥ मृदु-हथेली, लगाये रहे प्यार की। पर सुकोमल-हथोड़ी से गढ़ते रहे॥2॥
आज भी शिल्प, पूरा कहाँ हो सका। साफ, बेकार कूड़ा, कहाँ हो सका॥ किन्तु फिर भी, अधूरा न छोड़ा हमें। हम बहुत ढीठ थे, किन्तु मोड़ा हमें॥
हो नहीं भावना-शून्य, निष्प्राण हम। आप संवेदना, प्राण भरते रहे॥ मृदु-हथेली, लगाये रहे प्यार की। पर सुकोमल-हथोड़ी से गढ़ते रहे॥
हैं अधूरे, मगर एक तो लाभ है। दिव्य-संस्पर्श का, मिल रहा लाभ है॥ माँ लगाये हथेली, मृदुल प्यार की है हथोड़ी, पिता के परिष्कार की॥
भान होगा हमें, जन्म-जन्मान्तरों। दिव्य माता-पिता, साथ चलते रहे॥ मृदु-हथेली, लगाये रहे प्यार की। पर सुकोमल-हथोड़ी से गढ़ते रहे॥
शिल्प करना पिता! यूँ हमारा सदा। माँ ! हमें प्यार का दो, सहारा सदा॥ दुर्गुणों, दुर्व्यसन से, बचाना हमें। सद्गुणों से सतत् ही, सजाना हमें॥
फिर असंभव नहीं, देव बनना प्रभो। आप दोनों, वरद्हस्त धरते रहे। मृदु-हथेली, लगाये रहे प्यार की। पर सुकोमल-हथोड़ी से गढ़ते रहे॥
- मंगलविजय
पग-पग पर असुरक्षित हैं हम, दुनिया बीहड़ वन है। अभयदान दो और छुपा लो, माँ! अपने आँचल में॥
कैसी है आवाज तुम्हारी-मन में उत्सुकता थी। यत्न किया तो पड़ी सुनायी, झरनों की कलकल में॥
पावन करती हो तुम, सबको-सुना वेदमंत्रों में। वह पावनता मिली उषा में, एवं गंगा जल में॥
गायत्री का गुँजन जब, उर गह्वर में गहराया। जब लाली खिल पड़ी सविता की, अपने ब्रह्म-कमल में॥
तुम में ध्यान लगाया तब ही, शाँति मिली कुछ मन को। वर्ना क्षत हो गया हृदय था, इस जग की हलचल में॥
तुम ही प्रज्ञा-सरस्वती तुम ही, मणि काँचन लक्ष्मी। और तुम्हीं दुर्गा काली हो, शिव के हालाहल में॥
तुम ही कृपा की किरण बखेरो, हमको पद्म बनादो। वर्ना हम तो पड़े हुए हैं, जगती के दलदल में॥
- माया वर्मा
इस अंक में प्रस्तुत है 8 , सितम्बर 1980 को शाँतिकुँज प्रांगण में उपस्थित शिविरार्थियों के मध्य दिया गया परम पूज्य गुरुदेव का उद्बोधन। विषय सीधा हमारी समस्याओं के मूल स्रोत को स्पर्श करता हुआ उनका समाधान बताता है।
गायत्री मंत्र साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः। साथियों ! अध्यात्म ही क्यों?
स्रष्टा ने मनुष्य जीव विशेष उद्देश्य के लिए बनाया है और विशेष उपहार के रूप में दिया है। भगवान ने अपने कार्य में, अपने विश्व उद्यान में सहायता करने के लिए इसको सुरम्य और समुन्नत बनाने के लिए मनुष्य को अपने सहायक के रूप में पैदा किया। उसको जो अनेक विशेषतायें दी है, वह एक अमानत के रूप में-एक धरोहर के रूप में दी है, ताकि इसका ठीक तरीके से उपयोग करके वह अपने व्यक्तिगत जीवन में सरलतापूर्वक सारा काम चला सके और निर्वाह कर सके। उसके पास जो समय बचे, शक्तियाँ बचे, उससे विश्व उद्यान को समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्न करना उसके लिए संभव बन सके। इस दृष्टि से मनुष्य शरीर बनाया शौक-मौज के लिए नहीं बनाया। शौक मौज के लिए अगर मनुष्य शरीर बनाया होता तो फिर यह बहुत भारी पक्षपात गिना जाता। अन्य प्राणियों को जो सुविधायें नहीं मिलीं, वह मनुष्य को ही क्यों दी गयी? इसका एक मात्र उत्तर यही है कि जिस तरह विशेष तरीके से एक खजाँची के पास खजाना जमा कर दिया जाता है, मिनिस्टर के पास विशेष अधिकार केन्द्रित कर दिये जाते हैं, उसी प्रकार भगवान ने मनुष्य को विशेष अधिकार दिये है, ताकि वह इस विश्व उद्यान को सुन्दर, समुन्नत, सुविकसित बनाने के लिए भगवान के कार्य में मदद करे। हममें से प्रत्येक का कर्तव्य है कि उस परम पुनीत उत्तरदायित्व को समझें जो भगवान ने हमारे ऊपर सौंपा है।
यह हमारा बड़ा सौभाग्य है कि भगवान की इच्छा पूरी करने के साथ-साथ में उपहार के रूप में अपने जीवन का लक्ष्य भी प्राप्त कर सकते हैं। पूर्णता का लक्ष्य इस तरीके से प्राप्त कर सकते हैं कि हम भगवान की इच्छाओं को पूरा करें और अपने गुण-कर्म, स्वभाव का विकास करें। इनका विकास करने से ही यह संभव है कि हमारी आत्मा विकसित हो और आत्मा विकसित होते हुए परमात्मा के स्तर तक पहुँचने में समर्थ हो सके। इसलिए हमको स्रष्टा की इच्छा पूरी करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। ऐसा यदि हम कर सकें तो हमें अध्यात्मवादी कहा जायेगा। अध्यात्म का सारे का सारा शिक्षण इसी उद्देश्य के लिए है कि व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझे और उत्तरदायित्वों को समझे। कर्तव्य और उत्तरदायित्वों को समझते हुए अपनी गतिविधियों का निर्धारण इस तरीके से करे-दृष्टिकोण का निर्धारण इस तरीके से करे जिसमें व्यक्ति चरित्र निष्ठ बनता हो, शालीन बनता हो और समाज में सुव्यवस्था पैदा करने में सहायक बनता हो। यही है जीवन का उद्देश्य।
आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य के पास जहाँ इतनी बुद्धि और सुविधा-साधन दिये गये वहाँ उसको हँसी-खुशी का जीवन जीना चाहिए था, हलका-फुलका जीवन जीना चाहिए था इतनी सुविधा उसके पास रहनी चाहिए थी कि अपना गुजारा बहुत कम में करने के बाद-सुख-सुविधा करने के बाद में सारा समय हँसी खुशी के साथ भगवान के कामों में लगा सकने में समर्थ रहा होता। ऐसा ही जीवन निर्माण हमारे लिए हुआ है, लेकिन अचंभा इस बात का है कि हममें से अधिकाँश आदमी कठिनाइयों में फँ से हुए है। अधिकतर आदमी आपत्तियों में रोते और खीझते हुए देखे जाते हैं तो वे आगे कैसे बढ़ेंगे? जब आपत्तियाँ ही रास्ता रोके खड़ी है, कठिनाइयाँ ही पग-पग पर हैरान कर रही है ,तो आगे वाली बात कैसे बन सकती है। अब यह देखना चाहिए कि आखिर हुआ क्या? कैसे ऐसी स्थिति आ गयी? जब भगवान ने हमको इतने साधन दिये थे कि उन साधनों से हम अपना उद्देश्य पूरा कर सकते थे, पर उन्हें पूरा करना तो दूर उलटे कठिनाइयों में ही जकड़े रह गये-मुसीबतों में ही फँसे रह गये। बात कैसे बनेगी? आइये हम लोग इस पर विचार करें।
जब हम विचार करते हैं तब मालूम पड़ता है कि हमारे भीतर, हमारे चिंतन में और हमारे क्रियाकलापों में कहीं भूल पड़ जाती है। इस भूल का ही परिणाम है कि हमारी मनःस्थिति दुर्बल होने से-विकृत होने से हमारे बहिरंग जीवन में सारी की सारी परिस्थितियाँ विकृत होती चली जाती है ग्रसित होते चले जाते हैं। अगर हम अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत कर सकें, अपनी गतिविधियों को सही कर सकें- अपने क्रियाकलापों में हेरफेर कर लें, तब वे सारी समस्यायें जो मनुष्य जाति को खाये जा रही है, जिनसे आदमी को हर वक्त बेचैन रहना पड़ता है हर समय कष्ट से घिरा रहना पड़ता है, जिससे पार पाने के लिए वह हर किसी के सामने पल्ला पसारता और नाक रगड़ता है कि आप हमारी सहायता कीजिए, तब किसी की भी सहायता प्राप्त न करनी पड़े। अध्यात्म की शिक्षा यही है कि अपने भीतर हम देखे, अपने आपको समझें, अपने आपको जानें। अपनी गलतियों के बारे में गौर करें और अपनी गतिविधियों के बारे में गौर करें और अपनी गतिविधियों को ठीक करने के लिए प्रयत्न करें। अगर हमने ऐसा प्रयत्न प्रारंभ कर दिया तो समझना चाहिए कि सच्चे अर्थों में हम अध्यात्मवादी हुए।
कीचड़ जहाँ कहीं भी सड़ती है वहाँ दुर्गंध फैल जाती है, रेंगने वाले कीड़े जहाँ तहाँ घूमना शुरू हो जाते हैं, मक्खी-मच्छर पैदा हो जाते हैं। इनमें से प्रत्येक विकृति को हम दूर करना चाहें तो कठिन है, लेकिन यदि कीचड़ की गंदगी का साफ कर दिया जाय तो वह सब विकृतियाँ दूर हो जायेंगी जिनसे हम परेशान थे। यही बात हमारे जिनसे हम परेशान थे। यही बात हमारे जीवन में भी लागू होती है। हँसता-हँसाता, खिलता-खिलाता जीवन हमारा होना चाहिए था। हमको प्रसन्न और प्रफुल्लित रहना चाहिए था। हमारी शक्ति ऐसी होनी चाहिए थी कि अपनी हलकी जिन्दगी को स्वयं पार कर लें और अपने कंधे पर बिठाकर दूसरों को पार लगा दें, लेकिन ऐसा बन नहीं पड़ता। इसका कारण यह है कि हमारे जीवन में जो अशुद्धियाँ छायी हुई है, उनसे हमारा मानसिक रक्त दूषित हो गया। जिस प्रकार रक्त के दूषित हो जाने पर फोड़े-फुन्सियों का निकलना स्वाभाविक है, उसी प्रकार जीवन में असंख्य विकृतियों के आजाने से असंख्य चिन्ताओं, हैरानियों, परेशानियों का निकलना संभव है। इसको दूर करने के लिए उन स्रोतों को बंद करना पड़ेगा जहाँ से ये फूटती है। शरीर की बीमारियों को ही लें-तो शरीर की मशीन इतनी अच्छे तरीके से बनायी गयी है कि इसको प्राकृतिक नियमों के अनुरूप अगर ठीक तरीके से चलाया जा सके तो न इसमें कमजोरी आने की कोई गुंजाइश है और न बीमार पड़ने की।
प्रकृति में हम दृष्टि डाल कर देखते हैं तो सृष्टि का कोई प्राणी बीमार नहीं मालूम पड़ता। बुढ़ापा तो सबको आता है,मरना भी सबको पड़ता है, झरना भी सबको पड़ता है, पर बीमारी नाम की कोई चीज किसी भी योनि में दिखायी नहीं पड़ती। कहीं भी किसी को रोता-कराहता बीमारी से नहीं पाया जाता, केवल एक अभागा प्राणी मनुष्य ही है जो बार-बार बीमार पड़ता रहता है। इसका कारण क्या है? इसका एक ही कारण है कि हमने आहार-विहार के संबंध में हमारी बेकाबू रही। जो चीज नहीं खानी चाहिए थी, वह हम खाते रहे। जितनी तादाद में नहीं खाना चाहिए उससे ज्यादा तादाद में खायी। फलस्वरूप हमारा पेट खराब हुआ। पेट खराब होने-उसमें सड़न होने की वजह से असंख्य बीमारियाँ खड़ी हो गयीं। अगर हम इसको ठीक करना चाहते हों तो, दवाइयों से न तो रोग ठीक हो सकते हैं और न टॉनिक खाने से-औषधियों से हमारी कमजोरी दूर हो सकती है। कमजोरी दूर करने के लिए-बीमारियों को दूर करने के लिए-चाहे अब चाहे अब से एक हजार वर्ष बाद अंततः एक ही उपाय काम में लाना पड़ेगा कि हम संयम बरतना सीखें। इन्द्रियों का निग्रह करना सीखे। समय का नियंत्रण करना सीखें। आलस्य और प्रमाद से अपनी शक्तियों का जो क्षरण होता रहता है- उसकी रोकथाम करना सीखें। अगर हमने यह सब सीख लिया तो हमारे स्वास्थ्य की गारंटी, फिर हम दीर्घजीवी बनेंगे और निरोग रह सकेंगे, भले ही हमें सस्ते मूल्य का भोजन ही क्यों न मिलता हो। गरीबी में ही निवास क्यों न करना पड़ता हो। फिर हमें किसी चिकित्सक के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, अगर हम संयम रूपी चिकित्सक की सहायता लेनी शुरू करें तब। यह आध्यात्मिकता की शिक्षा है कि हम भीतर देखे और बीमारियों की जड़ काट कर दूर करें। असंयम को हटाये और सुन्दर स्वास्थ्य पायें।
मानवीय मस्तिष्क की ओर हम देखते हैं तो मालूम पड़ता है कि इतनी बढ़िया मशीन, इतना सुन्दर कम्प्यूटर कदाचित ही दुनिया में कहीं पाया जाता हो। मानवीय मस्तिष्क में स्वर्ग के सारे के सारे तत्व भरे पड़े है। दृष्टिकोण आदमी का अच्छा हो तो हर जगह सद्गुण, सहयोग बिखरा हुआ दिखायी पड़ेगा। सृष्टि में जहाँ कहीं भी मनुष्य अपनी दृष्टि पसर कर देखेगा तो मालूम पड़ेगा कि इसमें सर्वत्र सद्भावनायें भरी पड़ी है। लेकिन हम देखते हैं कि इस मस्तिष्क के द्वारा जिस तरह का चिंतन करना चाहिए था, जो काम करना चाहिए था, उसको तोड़-मरोड़ करके ऐसे बना दिया गया है कि शुद्ध चिंतन करने की अपेक्षा अशुद्ध चिंतन में ही सदा उलझा रहता है। ईर्ष्या, डाह, चिन्ता, निराशा, भय, आशंका आदि जिनके कोई वास्तविक कारण नहीं होते हमारे ऊपर छायी रहती है और जीवन को नरक रूप में बनायें रखती है। अगर वास्तविक कारण हों भी तो आदमी उसको स्वाभाविक एवं सामान्य समझ करके हँसी-खेल में भी टाल सकता है, लेकिन प्रायः वह राई भर की बात को पहाड़ के बराबर बनाकर के रात-दिन उद्विग्न बना रहता है। अगर मस्तिष्क को ठीक रखा जा सके तो हम इसी मस्तिष्क के द्वारा भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए न जाने कितने द्वार खोल सकते हैं। यदि यह न बन पड़े तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि चारों ओर जो भय, आशंकायें, निराशायें दिखायी पड़ती है, उनसे तो दूर बचे ही रह सकते हैं।
दरिद्रता पैसे की कमी का नाम नहीं है, वरन् मनुष्य की आँतरिक कृपणता का नाम दरिद्रता है। रंगीन चश्मा पहन खा है हमने और उसी से देखते हैं जिससे हर जगह वहीं रंग दिखायी पड़ता है। पीलिया के मरीज को हर चीज पीली दिखायी पड़ती है। ठीक इसी तरीके से विकृत दृष्टिकोण होने पर हमें हर जगह नरक दिखायी पड़ता है। द्वेष दिखाई पड़ता है, दुश्मन दिखाई पड़ते हैं। आशंकायें और भय दिखायी पड़ते हैं। झाड़ी में से भूत और रस्सी में से साँप निकलने वाली बात आप सबने सुनी होगी। ये आशंकाएँ केवल हमारे विकृत मस्तिष्क के चिह्न हैं जो अगर ठीक न हुए तो दिक्कत पड़ेगी। इन्हें हमें दूर करना होगा। जहाँ मन की इच्छानुकूल परिस्थितियों के होने की बात है, वहाँ उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपने मस्तिष्क के चिंतन करने के तरीके को सुधार लें। चिंतन करने का तरीका अगर सँभाला-सुधारा जा सके तो सामान्य परिस्थितियों में भी हँसी-खुशी की भरी हम जिंदगी काट सकते हैं। संत इमर्सन कहते थे कि हमें नरक में भेज दीजिए, हम वहीं अपने लिए स्वर्ग बना लेंगे। बात सही है। शालीनता का दृष्टिकोण रखने वाले, ऊँचे दृष्टिकोण रखने वाले, वास्तविकता को समझने वाले इस दुनिया में हर समय हँसते-हँसाते हुए पाये जा सकते हैं।
तीसरा क्षेत्र-परिवार संस्था का है जो कितना अस्त−व्यस्त दिखायी पड़ता है। जिस परिवार में हम रहते हैं, भगवान ने उसका गठन स्वर्गीय आनन्द के लिए किया है, लेकिन उसके लाभों से हम वंचित रह जाते हैं। एक बाड़े में जिस तरीके से बहुत सी भेड़े रहती है, एक जेलखाने में जैसे बहुत से कैदी रहते हैं, उसी तरीके से हम अपने कुटुम्बों के बीच में निर्वाह करते रहते हैं। कहने को तो संबंधी कहे जाते हैं, रिश्तेदार भी कहे जाते हैं, पर जैसा स्नेह सौजन्य, सद्भाव, सेवा-सहकारिता इत्यादि का वातावरण होना चाहिए था, कुटुम्बों में कहीं दिखाई नहीं पड़ता। इसका कारण यह है कि कुटुम्बों को बनाने और उनकी देखभाल करने वाले यह भूल जाते हैं कि उनके पारिवारिक उत्तरदायित्व क्या है ? पारिवारिक उत्तरदायित्व को लोगों ने समझ रखा है कि हम अपने कुटुम्बियों को प्रसन्न बनाने के लिए उनकी इच्छानुकूल चलें। उनके लिए धन-दौलत, सामान इकठ्ठा करें जिससे कि वे प्रसन्न रह सकें। यह सब करने से कुछ लाभ नहीं होता, वरन् इससे मनुष्यों की आदतें खराब होती चली जाती हैं। घर के वातावरण में विलासिता की, हरामखोरी की दुष्प्रवृत्तियाँ पैदा होती हे, और उसके दुष्परिणाम दुर्व्यसनों के रूप में और दूसरी बुराइयों के रूप में देखने को मिलते हैं।
जरूरत इस बात की है कि हम अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों को समझें और उनको भावनात्मक तथा मानसिक संपदायें दें। हम उनको श्रमशील बनने की आदत सिखायें, स्वच्छता की, व्यवस्था की आदत सिखायें। नियमितता का समय का पालन करना सिखाये। भाषण में मधुरता और शिष्टाचार का समावेश करना सिखायें। यह बातें तभी सिखायी जा सकती हैं जब हम स्वयं अपने आपको अच्छे ढाँचे में ढाल लें। अपने आपको अच्छे ढाँचे में ढालकर के हम अपने समीपवर्ती लोगों को अपेक्षाकृत अच्छा शिक्षण दे सकते हैं। परिवारों में अगर हम अपने काम को उदाहरण रूप में प्रस्तुत कर सकें तो यही हमारे घर और कुटुम्ब नर-रत्नों की खदान बन सकते हैं और उनमें से एक से एक बढ़िया हीरक-एक से एक बढ़िया आदमी निकल सकते हैं। भूत-पलीतों के रहने लायक खण्डहर जिस तरीके से होते हैं, प्रायः हमारे परिवारोँ की स्थितियाँ वही हैं। न उनमें शाँति है न चैन। घर में जाते तो हैं, पर भाग खड़े होने का मन करता है। यह पारिवारिक जीवन में आनन्द के अभाव के कारण है और उस अभाव का कारण है– हमारा विकृत दृष्टिकोण। दृष्टिकोण को अगर हम सुधार पायें तो घर का रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति बड़ा आनन्ददायक मिले। उनके साथ सहकारिता का जीवन जीते हुए सद्भावना के आधार पर हम अपने घरोँ में स्वर्गीय आनन्द लेने में समर्थ हो सकते हैं।
जहाँ कहीं भी हम देखते हैं, प्रत्येक क्षेत्र में मुसीबतें ही दिखायी पड़ती हैं। आर्थिक कठिनाइयों से आज हर आदमी दुखी पाया जाता है। सोचा जाता है कि यदि कुछ बाहरी आमदनी हो जाय तो शायद आर्थिक कठिनाइयाँ दूर हो जायँ। लेकिन यह बात एक सीमा तक ही सही है, सौ फीसदी नहीं। अगर हम ज्यादा आमदनी नहीं भी बढ़ा सकते हो तो भी ऐसे उपाय हैं कि हम आर्थिक तंगी से बच सकते हैं। जितनी अपनी आमदनी है उसके हिसाब से बजट बनाकर चलें तो यह पूरी तरह से संभव है कि हम ठीक तरीके से जीवनयापन कर लें। जीवन तो बहुत तरीके से जिया जा सकता है। कोई जरूरी नहीं कि कोई बहुत खर्चीला जीवन ही जियें। दुनिया में ऐसे बहुत से आदमी है जो कम से कम में गुजारा कर लेते हैं। क्या हमारे लिए यह संभव नहीं है? अगर हम खर्च से कम आमदनी करते हैं तो कम खर्च में गुजारा करें और आर्थिक कठिनाई जैसी मुसीबतों से सहज ही छुटकारा पायें। हम अपनी योग्यता बढ़ाये, श्रम करने की सामर्थ्य बढ़ायें। योग्यता बढ़ाने से, श्रम ज्यादा करने से पैसा ज्यादा मिलता है। आलस्य और प्रमाद जिन लोगों पर छाया रहता है दरिद्रता स्थायी रूप से उनके पास बनी रहेगी। शारीरिक दरिद्रता आलस्य के रूप में और मानसिक दरिद्रता प्रमाद के रूप में जिन लोगों के पास है, कितना कही धन होने पर भी वे गरीबों जैसा-दरिद्रों जैसा जीवन ही जियेंगे सामाजिक जीवन में हम देखते हैं कि किस तरीके से चारों ओर विकृतियाँ फैली हुई हैं-आपाधापी और खींचतान मची हुई है। समाज में रहकर मनुष्य को कितना उन्नतिशील और प्रसन्न रहना चाहिए था, पर यही समाज विकृतियों-विषमताओं के कारण नरक बना हुआ है। जाति-पाँत के नाम पर किस तरीके से अलग होते जाते हैं। लिंग भेद के नाम पर स्त्री-पुरुषों के नाम पर एक को ऊँचा और एक को नीचा बनाकर किस तरीके से विषमता पैदा की जाती है। पर्दा प्रथा के नाम पर पचास फीसदी जनता को अपने मानवोचित अधिकारों से किस तरीके से वंचित किया जाता है। विवाह-शादियों पर खर्च होने वाली धनराशि किस तरीके से हमें गरीब और बेईमान बनाती है। दहेज एवं मृत्युभोज के नाम पर कितना पैसा खर्च होता है। भिक्षा व्यवसाय में लाखों की तादाद में आदमी कैसे अपने समय को खराब करते और अपनी दीनता का परिचय देते हैं। कुरीतियाँ, बेईमानी, उद्दंडताएं धूर्तताएं चारों ओर फैली पड़ी है। किस तरह से इनका उन्मूलन संभव है?
इनको कानून बनाकर पुलिस के द्वारा भी दूर नहीं किया जा सकता। यदि इनको कभी दूर किया जा सकेगा तो आध्यात्मिकता के सिद्धाँतों को आदमी के भीतर जमा करके ही दूर किया जा सकेगा। आदमी की धर्मधारणा यदि जीवंत की जा सके, तो समाज में असंख्य प्रकार की विकृतियाँ जो संघर्ष पैदा करती हैं, विग्रह पैदा करती हैं, इन सबसे पिण्ड छुड़ाया जा सकता है। अगर आदमी अध्यात्मवादी दृष्टिकोण लेकर चले और समाज में आध्यात्मिकता की मान्यताओं की स्थापना की जा सके, तो इन समस्त विकृतियों का उन्मूलन सहज विकृतियों का उन्मूलन सहज संभव है।
हम देखते हैं कि व्यक्तिगत जीवन के जितने भी पहलू है, पक्ष हैं-वे सभी असंगत एवं विकृत हैं। इसका कारण आध्यात्मिक दृष्टि की कमी है। उसी से परिस्थितियाँ विकृत होती है। सामूहिक रूप से सामाजिक जीवन में भी यही बातें ज्यों की त्यों घुमा फिरा कर दिखायी पड़ता है कि युद्धों की विभीषिका अपना मुँह बाये खड़ी हैं। अगर हम युद्धों के द्वारा एक दूसरे को परास्त करके विजय प्राप्त करने की बात को दिमाग में से निकाल दें और इस बात को स्वीकार लें कि न्याय के आधार पर जो कुछ उचित होगा, हम उसी को स्वीकार करेंगे। तब फिर निश्चित है कि युद्धों की समाप्ति हो जायेगी और इस मद के लिए संसार भर में जो पैसा लगा चुका है या लग रहा है या लगने जा रहा है उसे रोका जा सकेगा और बचे हुए धन एवं जनशक्ति को जनकल्याण में लगाया जा सकेगा। युद्धों में लगने वाली विपुल संपदा को यदि सिंचाई, स्वास्थ्य एवं शिक्षा व्यवस्था जैसे कामों में कितनी खुशहाली आ जाय, कितनी निश्चितता हो जाय। अगर युद्ध के सिद्धाँत को मन में से निकाल दिया जाय और न्याय के सिद्धाँत को स्वीकार कर लिया जाय तो आदमी भय और आशंका से सहज ही छुटकारा पा सकता है।
किसी भी क्षेत्र में हम विचार करते हैं तो एक ही बात मालूम पड़ती है कि मनुष्य की भौतिक अथवा आध्यात्मिक समस्याओं के समाधान और किसी तरीके से नहीं हो सकते। ईश्वर प्राप्ति के लिए बहुत सारे जप, अनुष्ठान, दान, पुण्य किये जाते हैं, किंतु यह भुला दिया जाता है कि अपने दृष्टिकोण एवं चरित्र को उच्चस्तरीय बना लेने पर ही अपने मन के स्वच्छ दर्पण में भगवान दिखायी पड़ेंगे। लोग अपने को साफ नहीं करते, मन को धोने की कोशिश नहीं करते और भगवान को, देवी-देवताओं को प्रसन्न करने और बुलाने की कोशिश करते हैं। अपने भीतर का आकर्षण और चुम्बकत्व न हुआ तो हम भगवान को कैसे पा सकेंगे? स्वर्ग-मुक्ति कैसे पा सकेंगे? सद्गति और शाँति कैसे पा सकेंगे?
व्यक्तिगत जीवन की तरह ही हम यह देखते हैं कि इस दुनिया को सुँदर और समुन्नत बनाने के लिए क्या किया जाय? इसके लिए यों तो असंख्य योजनायें बनती हैं जिसमें भौतिक सुविधाओं के संवर्धन का ध्यान रखा जाता है। यदि इन अनेक योजनाओं को बनाने के साथ-साथ इस बात का भी ध्यान रखा जा सके कि व्यक्ति समाज और राष्ट्र की परंपराओं में समता के सिद्धाँत, एकता के सिद्धाँत, शुचिता के सिद्धाँतों को समाविष्ट करें, तब फिर दुनिया में कोई कमी नहीं रह सकेगी। फिर जितने साधन आज है उसी में हम बड़े मजे से गुजारा कर सकेंगे। संसार में अगर एकता की दिशा में हम चलने लगे तो जाने कितनी प्रसन्नतादायक स्थितियाँ पैदा हो जाय। अगर दुनिया की भाषा एक हो जाय, अपनी-अपनी अलग-अलग भाषाओं के लिए लड़ाई-झगड़ा करना हम लोग बंद कर दें, तो एक भाषा से ज्ञान में वृद्धि में कितनी सहायता मिल सकती है। संस्कृति अगर हम सबकी एक हो तो आदमी अलग-अलग धर्म के नाम पर आदमी आपस में टक्कर क्यों मारे? अगर दुनिया में एक राष्ट्र हो और सारे देश उसी के प्राँत मान लिये जायँ तो राष्ट्रों के बीच कलह कैसे पैदा हो? समता के सिद्धाँत को यदि सभी मान ले तो जाति के नाम पर, लिंग के नाम पर, अर्थ विषमता के नाम पर, जो चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है उसका ठहरना कैसे संभव हो सकेगा नरक हमारे भीतर है और स्वर्ग हमारे भीतर, दानव हमारे भीतर है और देव हमारे भीतर है। देव को जगाया उभारा जा सके तो इस धरती पर स्वर्ग के दर्शन कर सकते हैं। यही है वह अध्यात्म जिसके द्वारा मनुष्य के सामने उपस्थित असंख्य समस्याओं का समाधान सन्निहित है। मेरी बात समाप्त। ॐ शाँतिः शाँतिः शाँतिः।
नारी की पीड़ा व्यथा, वेदना को समझ सकना, गहराई से अनुभव कर लेना उसी से संभव है, जिसने नारी का हृदय पाया हो। हृदय की इन विशिष्ट धड़कनों में ही एक सहस्राब्दी से अधिक समय तक दलित, शोषित नारी का जीवन शास्त्र पढ़ा जा सकता है। इसके अभाव में बौद्धिक विवेचनाओं के आकर्षण, ग्रंथों के भंडार लेख मालाओं-वक्तृताओं के अंबार तो पैदा किये जा सकते हैं, पर वह आकुलता-आतुरता नहीं पैदा की जा सकती है, जिससे प्रेरित होकर सर्वस्व न्यौछावर के लिए मन हुलस उठे। मन-प्राण में वह तड़प भरी बेचैनी पैदा हो सके जो समूचे जीवन को क्षत-विक्षत हो रहे नारी अस्तित्व के लिए मरहम का रूप देने के लिए कृत संकल्प हो जाय।
पू. गुरुदेव के जीवनक्रम में नारी अभ्युदय का नवयुग लाने के लिए संवेदनशील पुरुष को उमड़ते-उफनते देखते हैं उसके पीछे उनके अन्तः अस्तित्व की यही प्रेरणा शक्ति थी। जिसे उन्हीं के शब्दों में कहे तो पुरुष की तरह हमारी आकृति बनाई है, कोई चमड़ी फाड़ कर देख सके तो भीतर माता का हृदय मिलेगा। जो करुणा, ममता, स्नेह और आत्मीयता से हिमालय की तरह निरंतर गलते रहकर गंगा-यमुना बहाता रहता है। हृदय की इसी सामर्थ्य से उन्होंने मातृ शक्ति की अंतर्वेदना को अनुभव किया। यही अनुभूति उनमें व्याकुलता, आश्चर्य और आक्रोश के रूप में उभरी और अंततः नारी शक्ति को युग शक्ति का रूप दे डालने के महान संकल्प के रूप में परिणत हुई।
व्याकुलता इस बात के लिए कि मातृ शक्ति के प्रति आज इतना दूषित दृष्टिकोण कि अभिभावक उसे पराये घर का कूड़ा मानकर उपेक्षा करते और लड़कों की तुलना में कहीं अधिक निचले दर्जे का पक्षपात करते हैं। पति की दृष्टि में वह कामुकता की आग को बुझाने का एक खरीदा गया माध्यम है। उसे कामिनी, रमणी और भोग्या के रूप में ही निरखा-परखा और संतान का असह्य भार वहन करने के लिए बाधित किया जाता है। ससुराल के समूचे परिवार की दृष्टि में वह मात्र ऐसी दासी है, जिसे दिन रात काम में जुटे रहने और बदले में किसी अधिकार या सम्मान पाने के लिए अनधिकृत मान लिया जाता है।
स्थिति यह है कि आधी जनसंख्या को शिक्षा एवं स्वावलंबन के अभाव में पर्दा प्रथा, अनुभवहीनता एवं सामाजिक कुरीतियों ने बेहतर जकड़ रखा है। नारी की पराधीनता का एक रूप यह है कि उसे पर्दे में, पिंजड़े में, बंदी गृह की कोठरी में ही कैद रहना चाहिए। इस मान्यता को अपनाकर नारी का असह्य, अनुभवहीन ही बताया जाता रहा है। अबला की स्थिति में पहुँचने में वह अब आक्राँताओं का साहसपूर्वक मुकाबला कर सकने की भी हिम्मत गँवा बैठी है। आड़े समय में अपना और अपने बच्चों का पेट पाल सकने तक की स्थिति में नहीं रही है। व्यवसाय चलाना, ऊँचे पद का दायित्व निभाना तो दूर, औसतन पारिवारिक व्यवस्था से संबंधित अनेक कार्यों में हाट-बाजार, अस्पताल तथा अन्य किसी विभाग का सहयोग पाने के लिए जाने में झिझक, संकोच से रहकर मूक बधिर होने जैसे परिचय देती है।
हृदयद्रावक स्थिति का अंत यही पर नहीं है। आज रोज के अखबार स्त्रियों के अपहरण, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार से रंगे रहते हैं। नव वधुओं के जलने-जलाने की खबर तो जैसे सामान्य बात हो गयी हैं। आखिर क्या हो गया है कि बूढ़े बच्चियों से पिता-पुत्रियों तक से बलात्कार करने लगे है। जब कभी गुरुदेव इन विडंबना भरी स्थितियों का ब्यौरा समाचार पत्रों में पढ़ते उनकी व्याकुलता सीमा का अतिरेक कर जाती। ऐसे ही क्षणों में उभरी हृदय की सिसकियों को शब्द देते हुए वह कहते है-मेरा हृदय। क्या करूं इसे-जो नारियों के कष्ट को देखने-सुनने में स्वयं को असमर्थ पाता है। उनकी वेदना का स्पर्श पाकर ऐसा लगने लगता है कि हृदय का सारा रक्त निचुड़ कर उसकी वेदना का मलहम बन जाने के लिए आतुर है। यह वेदना मेरे अंदर पीड़ा का ज्वार ला देती है? जिसे मैं सह नहीं पाता सह भी नहीं सकता। लोग कहते हैं कि आंखें रोती हैं, दर्द होते ही होठ बिसुरते हैं। पर क्या किसी ने मेरी तरह रोम-रोम के रो-पड़ने का अनुभव किया होगा। क्या किसी का अस्तित्व जार-जार रोया होगा?
उनकी यह व्याकुलता जितनी गहरी हुई-आश्चर्य भी उतना ही घना हुआ। आखिर कैसे हो सकी नारी की अवमानना अवहेलना? जिसके कारण उनकी स्थिति पंख कटे पक्षी की सी हो गई। युग ऋषि के शब्दों में कहें तो आज के इन प्रचलनों का प्राचीन भारतीय संस्कृति के साथ कोई ताल-मेल नहीं खाता। स्वर्ग और नरक आकाश और पाताल में जितना अंतर है उतना ही नारी के प्रति प्राचीनकाल में उच्चस्तरीय श्रद्धा रखे जाने और सुविधा दिये जाने की स्थिति में और इस हेय प्रतिबंध की स्थिति को समझा जा सकता है।
जिसे सामंती काल के असुर युग में द्वारं किमेकं नरकस्य? नारी। अर्थात् नरक का द्वार कहकर उपेक्षणीय ठहराया। वैदिक ऋषिगण उसी की प्रशंसा करते नहीं अघाए। एक स्थान पर तो शास्त्रकार ने यहाँ तक निःसंकोच भाव से कह दिया।
नारी त्रैलोक्य जननी, नारी त्रैलोक्य रूपिणी। नारी त्रिभुवनधारा, नारी शक्ति स्वरूपिणी॥
इसका सबसे बड़ा प्रमाण वैदिक भारत में ईश्वर की मातृ रूप में प्रतिष्ठा है। माँ की गरिमा एवं महत्ता को आदिकाल से मनीषियों ने समझते हुए मातृ शक्ति की आराधना एवं पूजा का विधि विधान बनाया। चेतनशील मानव ने सभ्यता की और जैसे ही कदम रखना प्रारंभ किया उसके मस्तिष्क के समक्ष यह प्रश्न उभरा वह आया कहाँ से? यहीं से माँ के प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न हुआ और ईश्वर को आदि जननी मानकर आराधना प्रारंभ की। यहाँ से प्रेरणा पाकर संसार की सभी संस्कृतियों में मातृ शक्ति की उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है।
चाहे वह इटली की फारचुना के रूप में हो, रोम की साइवेलें, ग्रीक की हेरा, मध्यपूर्व की माँट हो, अथवा उत्तरी अफ्रीका की तिवायत। मैक्सिको को एसिस हो, यूनान में अनोन्का, सीरिया में अस्टीटें,मोआब में आख्तर और अबीरसीनियाँ में आसार के नाम से नारी शक्ति की ही पूजित रही है। बेबीलोन यही अर्चना लाया और मिश्र में आइसिस के रूप में संपन्न की। प्रायः विश्व के हर कोने के परमेश्वर को नारी के रूप में पूजित कर नारीत्व के प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए है और इसकी प्रेरक शक्ति भारत भूमि रही है। आज इससे अधिक महान आश्चर्य और क्या होगा कि जहाँ से नारी को श्रद्धा देने की प्रेरणा उमगी परंपरा के रूप में पनपी-समूचे विश्व में व्यापक बनी-वहीं का नारी जीवन दुर्दशाओं और विडंबनाओं से ग्रस्त है।
इस महान आश्चर्य से चकित पूज्य गुरुदेव तनिक आक्रोश भरे स्वर में समाज के कर्णधारों से प्रश्न करते है-इस पीड़ित नारी से नर को क्या मिला? उसे असहाय बनाकर किसने क्या पाया? घर-परिवार के लोगों की इससे क्या सुविधा बढ़ी? पति को उससे क्या सहयोग मिला? बच्चे क्या अनुदान पा सके? देश की अर्थव्यवस्था एवं प्रगति में पिछड़ी नारी से क्या योगदान दिया? समाज को समुन्नत बनाने में वह क्या योगदान दे सकी? इन प्रश्नों पर विचार करने से लगता है नारी को पीड़ित, पददलित, उपेक्षित रखा जाना किसी प्रकार उचित नहीं हुआ। समय पूछता है कि अनुचित को कब तक सहन किया जायेगा और कब तक चलने दिया जायेगा।
इससे उनके संवेदना के आँसू ही नहीं छलके पौरुष की प्रचंडता से भुजाएँ भी फड़की, महाकाल का संकल्प उनके स्वरों से मुखरित हुआ। इक्कीसवीं सदी नारी सदी। यह उद्घोष नारी जागरण का मंत्र बना
और वे बने इस महामंत्र के द्रष्ट। साथ ही प्रारंभ हुआ अविराम प्रयासों का सिलसिला। उनके भावपूर्ण प्रयासों को उन्हीं के शब्दों में टाँके तो शाँतिकुँज की स्थापना का मूल प्रयोजन महिला जागरण अभियान का आरंभ करके उसे नारी के समग्र उत्कर्ष की अनेकानेक गतिविधियों को विश्वव्यापी बनाना हैं।
अभियान के क्रियाकलाप चार भागों में विभक्त किये गये-
1.साहित्य प्रकाशन 2. नारी शिक्षण सत्र 3.संगठन द्वारा संघ शक्ति का उदय 4. रचनात्मक कार्यक्रमों का व्यापक विस्तार। साहित्य प्रकाशन के सिलसिले में न केवल शत-सहस्र पुस्तकें प्रकाशित हुई बल्कि महिला जाग्रत अभियान पत्रिका ने भी प्रवाह पकड़ा।
साहित्य प्रकाशन का उद्देश्य जहाँ एक ओर नारी की व्यथा वेदना से संवेदनशील जन-मानस को अवगत कराना था वहीं दूसरी ओर उसकी गरिमा की गौरवपूर्ण प्रतिष्ठा का अदम्य प्रयास भी था। संवेदना को झकझोरते हुए उनके शब्द दृष्टव्य हैं। आर्थिक दृष्टि से परावलंबी नारी पग-पग पर मन मानकर रहती है, पैसे-पैसे के लिए दूसरे के सामने गिड़गिड़ाती है। घर की खुशहाली में कोई योगदान नहीं दे पाती। उपेक्षिताओं, परित्यक्ताओं, विधवाओं की दुर्गति होती है। उन्हें और उनके बच्चों को क्या-क्या सहना पड़ता है इसके हाहाकार भरे दृश्य पर्दे के पीछे छिपे रहते हैं। यदि उन्हें देखने, सुनने और अनुभव करने का अवसर मिले तो चट्टान को भी फफक- फफक कर रोना पड़ेगा। इसका स्वरूप प्रस्तुत कर सकना न लेखनी के लिए संभव है न वाणी के लिए। उस भुक्तभोगी शरीर और अन्तरात्मा को रेतने वाली असहनीय पीड़ा को कोई आप बीती के रूप में अनुभव कर सके तो ही ध्यान सकता है।
इस कारुणिक प्रस्तुति करण के अनुयायी है नारी की गैदय सरिता चिचिन्त के उन्हें शब्द “नारी महाविद्या के प्रस्तुत है शक्ति है, पतिव्रता है , कला है और वह संत है, तो इस संसार में के आधार पर दृष्टिगोचर होता है। नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धि है, सिद्धि के और वह सब कुछ है जो मानव प्राणी के समन्वय अथवा, कार्यों एवं संकटों को निवारण करने में समर्थ है। यदि उसे श्रद्धासिक्त सद्भावना के साथ सींचा जाय तो यह सोमलता विश्व के कण-कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओत-प्रोत कर सकती है।”
एक अन्य स्थान पर दृष्टव्य है- “नारी को वरिष्ठ और नर को कनिष्ठ ठहराने वाली अपनी साँस्कृतिक मान्यता हर दृष्टि से सही है। दानी बड़ा होता है उपभोक्ता छोटा। उस अनुदानी की समता कौन कणों और स्नेह बिंदुओं के मणिमुक्तकों से उस हार-उपहार की विनिर्मित किया और गले में धारण कराया। इतना ही नहीं “नारियाँ नहीं वे प्राणवान प्रतिमाएँ अपने शरीर की प्रयोगशाला में बनाकर प्रस्तुत करती है। उनके समान मूर्तिकार , चित्रकार श्रद्धाकार कौन हो सकता है? परमेश्वर ने अपना दृश्यमान और चेतनात्मक सौंदर्य उसी में उड़ेल दिया है।”
इसी गरिमा की जीवन प्रतिष्ठा के लिए युगावतार का समूचा जीवन क्षण-क्षण कर्मरत रहा। कन्या प्रशिक्षण सत्र हो महिलाओं की संगठन चेतना का जागरण। सबके पीछे यही प्रेरणा क्रियाशील रही। सामान्य क्रम में स्थूल क्रियाकलापों की समीक्षा करने वाले इसकी तुलना नारी जाग्रति के लिए विगत समय में क्रियारत होने वाले ईश्वर चन्द्र विद्यासागर आचार्य कर्वे, राजा राम मोहन राय आदि प्रयासों से कर सकते हैं।
परन्तु इस प्रयास में बहुत कुछ ऐसा है जो अतुलनीय है। अच्छा हो इसे उन्हीं शब्दों में ग्रहण करे “यह नहीं सोचना चाहिए कि यह बरसाती बादल कुछ बड़ी गर्जन-तर्जन करके ठंडा पड़ जाएगा। यदि यह कुछ व्यक्तियों का या संगठनों का प्रयास होता तो वैसी आशंका की जा सकती थी। पर यथार्थता कुछ और ही है। कालचक्र गतिशील हो रहा है और उसने युग बदलने जैसी करवट ली है। सूक्ष्मजगत में वे संभावनाएँ बन चली है। जो अपने प्रचंड प्रवाह से कितना ही महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तुत करेंगी। नारी का पुनरुत्थान उन्हीं में से एक सुनिश्चित तथ्य है।
वस्तुतः महाकाल का यह प्रथम आश्वासन है, जिसके पीछे पिछड़ों का ऊंचे उठाकर समता का धरातल बनाने के लिए वचनबद्ध दिलाया है। लोकमानस भी समय की प्रचंड धारा के विपरीत बने रहने का देर तक प्रयास नहीं करता रह सकता। तूफान मजबूत पेड़ों को भी उखाड़ फेंकता है। घटाटोप वर्षा में देखा जाता है। पानी का दबाव बड़े-बड़े बाँधो में भी दरार डालने और उन्हें बहा ले जाने का दृश्य प्रस्तुत करता है। यह महाकाल की हुँकार ही है, जिसने नारी को पिछड़े क्षेत्र से हाथ पकड़कर आगे बढ़ने के लिए धकेला और घसीटा है। अब न सिर्फ नारी के भाग्य में स्वतः की बेड़ियों से मुक्ति लिख दी गई है। वरन् विधाता ने उसे मुक्ति दूत बनने का गरिमापूर्ण दायित्व भी सौंपा है। जिन्हें सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त है-वे अनुभव कर सकते हैं कि यह अपने युग का सुनिश्चित निर्धारण है। जो इन्हीं दिनों पूरा होने वाला है।”
महाकाल की यह हुँकार ही उनके संकल्प के स्वरों में मुखरित हुई। इसी हेतु चली थी उनकी प्रचंड तप साधना और सक्रिय हुए थे विचारात्मक एवं क्रियात्मक प्रयास। उनके इन प्रयासों का अंतिम भाग इन्हीं दिनों पूरा होने को है। जो संवेदनशील अंतःकरण
युग ऋषि के इन भाव स्पंदनों का स्पर्श पा सके हों। जिनके अंतरतम में इन दिनों नारी उत्थान की सेवा-साधना तपश्चर्या करने का मन हो वे अपनी उपयुक्त दिशा पाने के लिए शाँतिकुँज हरिद्वार से संपर्क स्थापित कर सकते हैं।
“इक्कीसवीं सदी-नारी सदी” के महामंत्र की साधना इसी पुण्यवेला में युग ऋषि के संरक्षण में की जानी है। इसके लिए पूर्वकाल का स्वस्थ संस्कृति परंपराओं एवं वर्तमान के विवेक पूर्ण विचारों का सामंजस्य बैठाकर समाज को प्रशिक्षित करना होगा। भारतीय आध्यात्मिक धरातल पर मातृ शक्ति की पुनः प्रतिष्ठापना करनी होगी। तभी समाज एवं विश्व का उज्ज्वल भविष्य संभव है। तथा नारी धारती एवं निर्मात्री की महत्वपूर्ण भूमिका संपादित करने में सक्षम होगी। जिसके लिए वह अभी भी अपनी कारण सत्ता में प्रयत्नरत है।
अभागा है वह मनुष्य या राष्ट्र जो भागवत् मुहूर्त के आने पर सोया हुआ रहे या उसके उपयोग के लिए तैयार न हो, क्योंकि उसके स्वागत के लिए दीया सँजोकर नहीं रखा गया और उसकी पुकार की ओर से कान बंद कर लिये गये है पर कहीं अधिक अभागे है वे जो सशक्त और तैयार होते हुए भी, उस शक्ति का अपव्यय करते हैं और उस मुहूर्त का दुरुपयोग करते हैं, उनके भाग्य में होती है पूरी न हो सकने वाली क्षति या एक महान विनाश।-- रवीन्द्र
*समाप्त*