बुझता दीपक पूरी लौ को उभार कर जलता है। मरते समय मनुष्य की लंबी साँसें चलती हैं। चींटी के मरते समय पंख उगते हैं। रात्रि के अंतिम पहर में अंधियारा अत्यधिक सघन होता है। हारा जुआरी बढ़-चढ़कर दाँव लगाता है। “ मरता क्या न करता” वाली उक्ति बहुत बार चरितार्थ होकर देखी जाती है। भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण वाले असुर तत्व अपने सिंहासन के पदच्युत होते समय यदि कुछ असाधारण उपद्रव खड़े करें तो इसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाना चाहिए।
महर्षि विश्वामित्र ने अपने समय में नई दुनिया बनाने का प्रचंड यज्ञ किया था। जिसमें हरिश्चंद्र जैसी कितनी ही उच्च आत्माओं ने भरपूर सहयोग भी किया। उनके प्रयास को असफल बनाने के लिए युग यज्ञ में विघ्न डालने वाले अनेकों उभरे और उछले। मारीच, सुबाहु और ताड़का इनमें अग्रणी थे। दशरथ पुत्रों ने आगे बढ़कर आसुरी आक्रमण से लोहा लिया और दिव्यशक्ति प्राप्त कर लंका का दमन तथा सतयुगी रामराज्य के संस्थापन का प्रबल प्रयत्न किया।
अनाचरण से कुपित प्रकृति का प्रकोप इन दिनों पुनः बरस सकते हैं। पिछले दिनों अपनाये गये अनाचरण का दंड अथवा समय का प्रायश्चित भी इसे कह सकते हैं।
परिवर्तन काल में प्रसव पीड़ा की तरह कष्ट भी सहने पड़ते हैं। यदि बीसवीं सदी की अंतिम अवधि में कुछ ऐसे ही अप्रिय प्रसंग दिख पड़ें तो इसे परीक्षा की घड़ी ही समझना चाहिए। पैनापन लाने के लिए शस्त्रों को पत्थर की सान पर घिसा ही जाता है। बलिदानों से सुषुप्त न्याय-निष्ठा में नया उभार भी आता है। बलिदानों की घटनाएं नये बलिदानी उत्पन्न करती हैं। आक्रोश से उभरने के लिए अनीति भरे आचरण की ऐसी पहल होती है जो उसे जड़मूल से उखाड़कर फेंक सके। महा चंडी का अवतरण ऐसी अनीति को निरस्त करने के लिए ही सम्पन्न हुआ था।
सूरज डूबते-डूबते संध्या काल को रक्तरंजित कर देता है। ऐसी ही विडंबनायें यदि युग परिवर्तन की बेला में उभरें तो उनके लिए पहले से ही तैयार रहा जाय। स्वयं को अवरोधों से निपटने हेतु सक्षम, आत्मबल, सम्पन्न बनाया जाय।
मेरे जीवन का अर्थ क्या है, इति क्या है, हे प्रभु! मैं यह तो नहीं जानता। मुझे तो ऐसा लगता है, तुम्हारे जीवन का ही एक अंश लेकर प्रादुर्भूत हुआ, प्राणी मैं केवल तुम्हारा ही हूँ। तुम्हीं मेरे भीतर और बाहर भी तुम्हीं हो। तुम्हीं मेरे सर्वस्व हो। मेरे सर्वस्व तुम्हीं तो हो। प्रेम और प्यार के साँसारिक रिश्ते-नाते मेरे लिए क्या हैं? में संसार के लिए क्या हूँ? हाड़-माँस का पुतला। उसे लोग कितना चाहते हैं। मैं सब कुछ देकर भी तो संसार की इच्छाएं पूर्ण नहीं कर सकता। मेरे अंतरमन में जो शुद्ध प्रेम की धार बह निकली है, उसे तुम्हारे अतिरिक्त और कौन समझेगा?मेरे प्रियतम! मेरे लिए तुम्हीं सबसे प्रिय हो। सबसे प्रिय संसार में तुम्हीं मेरे लिए हो।
मछली को मैंने जल से बाहर आकर तड़पते देखा। माँ का अगाध वात्सल्य से रिक्त होते हुए बालक का करुण-क्रन्दन मैंने देखा, वर्षों हो गए वनवासी प्रियतम नहीं आये, उनके प्रेम की पीर में विकल विरहणी की पीड़ा को मैंने देखा। प्रभु! तुमसे पृथक् होकर मैं भी तो पीड़ाओं के सागर में गिर गया हूँ। मेरी सुनने वाला कोई नहीं रह गया, देवेष! मुझे तो अपनी इस पृथकता को देर तक बनाए रखना दूभर हो गया है, करुणाकर! मुझे अपने अंतस्तल में खींच लो। मुझे आत्मसात कर लो प्रभु।
मेरे मन, मेरी बुद्धि मेरी चेतना में अब एक तुम्हारा ही ध्यान शेष है कहने को श्वास चल रही है, किन्तु यह मुझे ऊपर उठाए लिए जा रही है। नीलम आकाश में जहाँ हे दिव्य! केवल तुम्हारा ही प्रकाश प्रस्फुटित हो रहा है-वहाँ केवल तुम्हीं अपने अनहद नाद से विश्व भुवन में मधुर गीत आलोड़ित कर रहे हो। अब यह श्वास जो तुम्हारी दिव्य छवि-दिव्य ध्वनि में अटक गई है, पीछे नहीं लौटाना चाहती सर्वेश्वर! अब इसे पीछे न लौटने दो, महाभाग! कौन जाने फिर तुम्हारी कृपा की किरण मिले या न मिले।
चार मंथन की प्रक्रिया में कष्ट उठाए बहुत दिन हो गये प्रभु! एक दिन मुझे ऐसा लगा था, संसार में केवल तुम्हीं सत्य हो। उस दिन मेरे जीवन की चंद श्वासें तुम्हें ही समर्पित हो गई थीं। उस दिन से तुम्हारा दिया ही खाया जो तुमने पिलाया-पिया। अमृत भी विष भी। कामनाएं कभी मिटीं कभी भड़कीं। तुमने कई बार बहुत समीप आकर मुझ व्यथित को संभाला। कई बार पुकार लगाई, पर तुम मेरे द्वार तक भी न आए। कभी एक क्षण के लिए भी आ जाते तो ऐसा लगता, जीवन परिपूर्ण हो गया। एक पल की अनुभूति से ही हृदय कमल खिल उठता था। सुख की खोज के लिए पतंग की तरह उड़ते मन की डोर टूट जाती और लगता मुझमें तुममें कोई अंतर नहीं रह गया। जो तुम सो मैं। किन्तु अगले ही क्षण कौन सा पर्दा डाल देते हो, जो तुम एक तरफ और मैं दूसरी तरफ खड़ा ताकता रह जाता हूँ। अतीत की सुधियों में खोए मन को विश्राम दो प्रभु! अब मुझमें और अधिक प्रतीक्षा की शक्ति शेष नहीं रही। तुम्हारे चिर मिलन की बाट जोहते आँखें थक गई हैं। मेरी आँखें तुम्हें अपलक ढूंढ़ते-ढूंढ़ते थक गई हैं।
अपने लिए अलग क्या हूँ?मैं तो तुमसे अलग हूँ भी नहीं। मुझमें तुम्हीं तो सुनते हो। मैंने देखा ही कब, यह तुम्हीं तो मेरी आँखों के भीतर बस कर देखते हो। मुझे क्यों दोष देते हो प्रभुवर! मैंने इच्छा ही क्या की?तुम मेरे भीतर बैठकर नाना प्रकार की इच्छाएं न जगाते तो मुझे क्या आवश्यकता थी, जो मैं संसार में भटकता। जो कुछ भी है अच्छा या बुरा तुम्हारा ही है। अब मुझे इस प्रपंच में पड़कर रहा नहीं जाता, मेरे सर्वस्व! जो कुछ भी है तुम्हारा है, सो तुम ले लो। अपना दिया हुआ सब वापस कर लो।
पीड़ाओं के सागर से निकलकर यों ही मैं एक दिन ध्यानावस्थित होकर प्रभु से अनवरत पुकार किए जा रहा था। वहाँ मेरे अतिरिक्त दूर दूर तक सिर्फ एक निर्जन पृथ्वी थी और उसे अंक में भरता हुआ शुभ्र नीलाकाश। समस्त बहिर्मुखी चित-वृत्तियों को मैंने समेटकर अपने भीतर भर लिया था। यों कहें कि मैं अपने हृदय की गुफा में आ बैठा था और उसमें बैठा-बैठा उस परम ज्योति के दर्शन कर रहा था, जो इतने समीप थी-जितना मेरा हृदय और इतनी दूर कि उसे अनंत आकाश की विशाल बाहों से भी स्पर्श करना मेरे लिए कठिन हो रहा था। मैं निरंतर उस परम ज्योति परमात्मा का भजन कर रहा था। उनके भजन में, मैं संसार की सुध-बुध खो बैठा था।
हे प्रभु, मुझे क्या पता तुम दोष रहित हो, गुणाकर हो या सर्वथा निर्गुण। तुम प्रकृति हो या पुरुष, निर्मल हो या मलीन-मुझे तो एक दृष्टि में तुम ही तुम दिखाई दे रहे हो। तुम्हारी ही सत्ता सारे जग में समा रही है। तुम्हीं फूलों में हंस रहे हो, पत्तों में डोल रहे हो। वनस्पतियों का रस और हरीतिमा भी तुम्हीं हो। सूर्य-चन्द्र और नक्षत्रों की चमक तुम्हीं हो। सूर्य-चन्द्र और नक्षत्रों की गति सब कुछ तुम्हीं हो। यह संसार तुम्हीं में समा रहा है या तुम्हीं संसार में समा रहे हो।
तुमसे बढ़कर सुंदरतम, रूप राशि वाला मैंने कहीं और नहीं देखा। तुमसे महान और नहीं पाया। पृथ्वी से भी अधिक क्षमाशील और जनता से भी बढ़कर वात्सल्य का प्रवाह भेजने वाले प्रियतम! तुम्हारे अतिरिक्त और मुझे कुछ नहीं सूझ रहा। यदि मैं किसी और का गुणगान करूं, किसी और को देखूँ, किसी और को सुनूँ तो मेरे जीवन!मेरी आँखें न रहें, कान न रहें, जिह्वा न रहै। प्रभु! तुम्हारे प्रेम की चाह लेकर तुम्हारे द्वार पर पड़ा हूँ। मेरे सर्वस्व! ठुकरा दो अथवा प्यार करो अब मेरे लिए कोई और भी तो नहीं है।
हे प्रभु! मेरा जीवन तुम्हें समर्पित हैं। अब मैं कहीं भी रहूँ, कैसे भी रहूँ। दुःख मिले या सुख तेरा प्रेम तो निबाहूँगा ही। मेरे मन में अब साँसारिकता की चाह नहीं रही। स्वर्ग मिले या मुक्ति, नरक मिले या स्वर्ग मुझे उसकी भी चिंता नहीं है, प्रभु तुम्हें पाकर अब मुझे और कुछ पाने की कामना शेष नहीं रही। हे प्रभु! तुम्हारा ही प्यार, तुम्हारा ही नाम, तुम्हारा ही भजन मेरे शरीर मन और आत्मा में छाया रहै। हे मेरे जीवन आधार! मुझ पर तुम्हारा पूर्ण अधिकार रहे, तुम मुझपर पूर्ण अधिकार रखना।
मनुष्य के संकल्प और सुनियोजित पुरुषार्थ का महत्व कम नहीं है फिर भी समय को अनुकूलता हों तो सफलता कम समय में और अधिक तेजी से मिलती है। हवा के रुख में पीछे से आगे धकेलने वाले को पैदल चलने वाले या साइकिल सवार को कम परिश्रम में अधिक दूरी पार कर लेने का अवसर मिलता है। ढलान पर बिना पेट्रोल खर्च किये ही मोटर लुढ़कने लगती है। नदी के बहाव में नावें भी गति पकड़ लेती हैं। लकड़ी के मोटे लट्ठे नदी में तैरते हुए इतनी लंबी दूरी पार कर लेते हैं जिसमें परिवहन वाले संभवतः ढेरों किराया माँगते। हवा का रुख अनुकूल देखकर बच्चे पतंग उड़ाने के लिए दौड़ पड़ते हैं। पनचक्की वाले अपनी मशीन चालू कर देते हैं। किसान वर्षा के दिनों में बुआई करते हैं और फसल की खेती तेजी से बढ़ती पकती देखते हैं। माली भी ऋतु के अनुरूप पेड़-पौधे लगाते और उद्यान की अभिवृद्धि में चमत्कारी प्रगति होती देखते हैं। कुम्हार भी सूखा मौसम देखकर आवाँ पकाता है।
रूस में लेनिन जेल में बंद थे जब उन्हें मुक्त किया गया तो आश्चर्यचकित होकर उनने पूछा-इतनी जल्दी सत्ता परिवर्तन का कठिन कार्य कैसे सम्पन्न हो गया विवरण सुनने के उपराँत उनने जाना कि क्राँतिकारियों के प्रयासों का समय ने भी साथ दिया और कठिन कार्य सरल हो गया।
भारत की स्वतंत्रता में सेनानियों का त्याग-बलिदान तो प्रमुख था ही पर उन दिनों अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी ऐसी बन गई थीं कि जिसमें ब्रिटेन इतनी दूरी पर इतने जाग्रत देश पर देर तक शासन कर सकना संभव नहीं देख रहा था। दबाव और झुकाव ने मिलजुल कर अनुकूलता बना ली। ऐसे घटना-क्रम संसार में अन्यत्र भी बहुत बार घटित हुए हैं। जिनमें मूर्द्धन्य प्रतिभाओं का उफनता संकल्प, साथ ही लोकमानस का उस संदर्भ में भाव भरा उत्साह मिलकर एक ऐसी शक्ति बनें जिसके कारण इतनी बड़ी और इतनी महत्वपूर्ण सफलता मिली जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित होकर रह गये।
नये युग में संदर्भ में प्रथम आवश्यकता यह समझी गई है कि अवाँछनीय चिंतन को उलट दिया जाय। आज हम सब भ्रांतियों के युग में रह रहे हैं। भटकाव की दिशा में चल रहे हैं। पारिवारिक सुख सुविधा के लिये गये प्रयास कुछ ही समय में अनेक गुनी हानि लेकर सामने आ उपस्थित होते हैं। फुर्ती, उत्तेजना के लिए पिया गया नशा कुछ समय तो अपना चमत्कार दिखाता है पर थोड़े दिनों में पीने वाले के शरीर को पोला और मन को ढीला बनाकर रख देता है। अर्थ संकट, परिवार विग्रह, अपयश जैसी अनेकों हेय प्रतिक्रियाएं सामने आकर खड़ी होती हैं। इन दिनों का जीवन दर्शन किसी भी कीमत पर तात्कालिक लाभ उठा लेने का बन पड़ा है। भले ही अनीतिमूलक हो और बाद में कितने ही बड़े संकट क्यों न खड़े करें। छोटे-बड़े अपने-अपने क्षेत्र में अपने-अपने ढंग से इसी प्रवाह में बह रहे हैं। आदर्शों के प्रति आस्था टूटती जा रही है। मानवी गरिमा के साथ जुड़ें हुए गौरव और वर्चस्व की उपेक्षा हो रही है विवेक को दकियानूसी कहकर पीछे धकेल दिया गया है और मनमर्जी को उच्छृंखलता बरतना बड़प्पन समझा जाने लगा है। यह प्रचलन कुछेक बलिष्ठों को ही लाभदायक लगा। सर्वसाधारण को उसका भारी त्रास सहना पड़ा। सोचा जाने लगा कि प्रचलित अनाचार का अंत होना चाहिए। जिस दुश्चिन्तन को अपनाकर अच्छे भले आदमी अनाचारी वर्ग में सम्मिलित होते हैं, उसका अंत होना चाहिए। ऐसी व्यापक जनभावना ही ईश्वरेच्छा बन जाती है।
अनाचार की प्रतिक्रिया का नाम ही दैवी अवतार है। प्रतिभाएं जब संशोधन के सृजन कार्य में जुटती हैं तो उनकी सहायता में दैवी अनुकूलता का सहयोग भी मिलता है। ध्रुव, प्रहलाद, हरिश्चन्द्र से लेकर गाँधी, बुद्ध तक को दैवी सफलतायें हस्तगत हुई जिनमें मानवी सहयोग के साथ दैवी अनुग्रह भी जुड़ा हुआ कह सकते हैं। महाकाल की अदृश्य व्यवस्था सूक्ष्मजगत में इसका ताना-बाना बुनती रहती है। अनीति को जिताने में उसकी बड़ी भूमिका रहती है। इस तथ्य के पक्ष में इतिहास के असंख्यों घटनाक्रम ढूंढ़ें और प्रस्तुत किये जा सकते हैं। यह स्वीकारा जाना चाहिए कि इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता विचार-क्राँति है। लोगों की सोच उस मान्यता के साथ जुड़ गई है जो तुर्त-फुर्त असीम लाभ पाने के लिए औचित्य को ताक पर उठाकर रख देती है। कहने को कोई नीति सदाचार का समर्थन वाणी से भले ही करे पर अधिकाँश लोगों का आचरण अंधविश्वासों, ललक-लिप्साओं और चतुरता के सहारे कुछ न कुछ कर गुजरने का स्वभाव बन गया है। इसी आधार पर वे विकृतियाँ उपज पड़ी हैं, जिनके कारण अनाचार का बोलबाला होता दिखता है। सार्वजनिक हित बुरी तरह आहत होता है।
इस तथ्य को सभी जानते हैं कि मनःस्थिति के अनुरूप ही विचार संस्थान काम करता है। साधन और सहयोग जुटता है फलतः परिस्थितियाँ बनकर खड़ी हो जाती हैं। परिस्थितियों का प्रत्यक्ष उपचार भी किया जाना चाहिए। पर यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि सड़ी कीचड़ के खाई-खड्ड कृमि-कीटकों, विषाणुओं और दुर्गन्ध भरे उफानों का सृजन करते ही रहेंगे। जब तक इस उद्गम में भरी सड़न को हटाया न जायेगा तब तक ऊपर से सूखी बालू का छिड़काव अथवा अगरबत्ती जलाने जैसे उपचार से स्थायी समाधान बन नहीं पड़ेगा। चेचक की फुँसियों पर मरहम लगाने में कुछ हर्ज नहीं पर काम रक्त शोधन उपाय से ही चलेगा अन्यथा फुँसियाँ अच्छी होते हुए भी अन्य प्रकार के रोग विस्फोट उभरते रहेंगे। रक्त के अशुद्ध रहते रुग्णता से निश्चिंतता कहाँ से मिलती है। विष वृक्ष के पत्ते तोड़ने से नहीं उसकी जड़ काटने से काम चलता है। इन दिनों सुविधा, साधन पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़े-चढ़े है पर उनके कारण लाभ मिलने के स्थान पर हानिकारक माहौल ही बन रहा है। इस उलटबाँसी का रहस्य इतना भर है कि जनमानस में दुर्बुद्धि भर जाने से दुरुपयोग का स्वभाव और अभ्यास बन गया है। फलतः अवाँछनीय रीति से उपयोग किया गया अमृत भी विष का काम कर रहा है। शक्तियों का, साधनों का दुरुपयोग होते देखकर एक शब्द में यही कहा जा सकता है कि यह दुर्बुद्धि का कौतूहल है। यदि औचित्य की पक्षधर गतिविधियाँ अपनायी गयी होतीं तो उनके प्रयोक्ता धन्य हो जाते और प्रस्तुत साधनों के सदुपयोग भर से समस्याओं में से एक भी टिक न पातीं जो जन-जन को अभावों और अनाचारों के शिकंजे में कसकर नींबू की तरह निचोड़े जा रही है।
प्रकृति का उत्पादन इतना कम नहीं है कि प्रस्तुत समुदाय की उचित आवश्यकताओं को पूरा न कर सके। हर पेट को रोटी और हर हाथ को काम मिल सके। इसकी व्यवस्था अत्यन्त सरलता पूर्वक जुटाई जा सकती है। यदि मूर्द्धन्यों के निहित स्वार्थ आड़े न आयें और कुछ लोग कुबेर जैसे सम्पन्न बनने की ललक छोड़ दें तो जितना कुछ इन दिनों उपलब्ध है उसको मिल−बांट कर खाने पर सभी को सुखपूर्वक जीने का अवसर मिल सकता है। व्यक्तिगत विलासिता और अहमन्यता यदि इतने स्वेच्छाचार पर न उतरे तो कोई कारण नहीं कि सुविकसितों का वैभव, श्रम, कौशल और चिंतन सर्वसाधारण की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत न कर सकें।
पिछले वर्ग के व्यक्तियों पर आलस्य, प्रमाद जैसी नासमझी छायी हुई है तो विकसित वर्ग पर निजी लिप्सा, लालसा, भूत पिशाच की तरह हावी है। इन्द्र से काम विलासी और कुबेर से कम संपत्तिवान बनने की किसी की महत्वाकाँक्षाएं हैं कि नहीं। ऐसी दशा में एक ओर खड्ड खुदेंगे और दूसरी जगह टीले उठेंगे। समानता और एकता के अभाव में बिखराव और संग्रह वाली धनी वृत्ति आये दिन संकट खड़े करती रहेगी। भले ही उनके लिए दम-दिलासा देने वाले कुछ उपचारों का सिलसिला यों ही चलता रहै। व्यक्ति अपना जीवन-क्रम शालीनता का निर्वाह करते हुए किस प्रकार सुनियोजित करे यदि यह समझ जन-जन में उगाई जा सके तो समझना चाहिए कि संसार की आधी समस्याओं का समाधान हो गया। प्रतिभायें यदि औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार कर सकें तो उनके पास जो असाधारण स्तर की क्षमताओं के भंडार शेष रह जाते हैं वे पिछड़ों के लाभ उठाने में लग सकते हैं और खड्ड टीलों को पाटते हुए समतल भूमि बनाने की युग समस्या का सरलतापूर्वक समाधान कर सकते हैं। व्यक्ति में संकीर्ण स्वार्थपरता, अदूरदर्शिता, उद्धत अर्हता, ललक लिप्सा, वासना तृष्णा यदि किसी रूप में बनी और बढ़ती रहीं तो समझना चाहिए कि चल रहे सुधार-उपचार मन बहलाव के कौतुक-कौतूहल ही बनकर रह जायेंगे। सही रूप में स्थायी समाधान तभी संभव होगा जब मनुष्य की मानवी गरिमा, मर्यादा और वर्जना के प्रति निष्ठा उत्पन्न होगी। यह उत्पादन जहाँ भी, जिसके यहाँ भी उठ खड़ा होगा, समझना चाहिए कि उसकी शक्ति और सामर्थ्य हजार गुनी हो गयी और इतने भर से लोग मिल-जुलकर उन सभी समस्याओं का हल कर लेंगे जिनका घटाटोप आज भावी विनाश की संभावनायें लेकर उमड़ घुमड़ रहा है। विचार शक्ति इस विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है। उसी ने मनुष्य के द्वारा इस ऊबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनना है।
विकास करना होगा तो भी वही करेगा। दीन हीन और दयनीय स्थिति में पड़े रहने देने की जिम्मेदारी भी उसी की है। उत्थान पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है। वस्तुस्थिति को समझते हुए इन दिनों करने योग्य एक ही काम है जनमानस का परिष्कार। इसी को “विचार क्रान्ति”‘ का नाम दिया गया है। इसी की सफलता-असफलता पर विश्व के मनुष्य का उत्थान-पतन पूरी तरह निर्भर है। प्रमुखता और प्राथमिकता इसी को मिलनी चाहिए। विश्वात्मा की यही माँग है। दैवी शक्तियाँ इसी को सम्पन्न करने के लिए उद्धत हैं। प्रयोजन की पूर्ति के लिए जो कदम बढ़ाएंगे, वे पायेंगे कि हवा अनुकूल चल रही है। ऐसी अनुकूलता जिसमें अभीष्ट की सफलता अत्यंत सरल संभव होती दिख पड़े।
“ सचमुच पारस का कोई पदार्थ है?” अलबर्ट माँरीसन रसायन शास्त्री हैं। इस नाते यह जिज्ञासा सतत् उन्हें बनी रहती थी। प्रत्येक वैज्ञानिक को एक सनक होती है। कहना यह चाहिए कि प्रतिभा का प्रसाद उसी को प्राप्त होता है, जो अपनी सनक का पक्का हो। माँरीसन को प्राचीन पदार्थ शास्त्र के अन्वेषण की सनक थी और विषय कोई हो, उसका प्राचीनतम साहित्य तो भारत के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं उपलब्ध है नहीं। अलबर्ट माँरीसन भारतीय पदार्थ शास्त्र का अन्वेषण कर रहे थे। उन्होंने पुराण, ज्योतिष तथा अनेक सूत्र एवं कारेका ग्रन्थ एकत्र कर लिए थे।
“केवल कल्पना हे पारस?” अनेक बार यह विचार आता था-” एक भव्य कल्पना-भारतीय कल्पना प्रवण होते हैं। कितनी पूर्ण कल्पना की है उन्होंने?” “ प्रकृति कोई सामाजिक अव्यवस्था उत्पन्न नहीं होने देती। कोई लोभी कभी पारस नहीं पाता।” अल्बर्ट का मन उन्हें संतुष्ट नहीं होने देता था-केवल परम संतुष्ट संत उसे पाते या देखते हैं वह उनके संतोष की परीक्षा मात्र बन सकता है। एक रहस्य से बाहर आकर फिर रहस्य हो जाता है वह।
‘परमात्मा के लिए कुछ असंभव तो नहीं है। वैज्ञानिक अल्बर्ट आस्तिक हैं-जिन्हें भी पारस मिला वे सच्चे अर्थों में संत थे। अपने लाड़ले बच्चे पर प्रभु अपना कोई रहस्य प्रकट कर दें-कोई कठिन बात तो नहीं है?‘पारस पदार्थ है या कल्पना?’साहित्यिक या समालोचनात्मक झट से ‘कल्पना’ कह देगा। किन्तु एक रसायन शास्त्री ऐसा नहीं कह पाता। लोहे की आणविक संरचना में केवल एक परिवर्तन उसे स्वर्ण बना देगा। यह परिवर्तन उसमें भार एवं रंग दोनों दे देगा। अवश्य उसका विस्तार आकार संकुचित हो जायेगा। पारस यदि कोई ऐसा पदार्थ हो, जो अपने स्पर्श से लोहे के अणुओं में अपेक्षित परिवर्तन कर देता हो।
“पारस प्राप्त किए बिना तो समस्या सुलझेगी नहीं। वैज्ञानिक का काम कल्पना से नहीं चलता। वह प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानता है। अल्बर्ट को पारस की आवश्यकता थी। पारस यदि कहीं हो तो निश्चित अपने भारत में ही हो सकता है। जहाँ अनेक बार पाया गया है अथवा उसे पाने की कल्पना की गई है। भारत की यात्रा कुछ कठिन नहीं थी वैज्ञानिक के लिए। वे केवल भ्रमण करने वाले यात्री बनकर ही आये। उन्हें पता था कि पारस कभी जन सामान्य की जानकारी में नहीं आया। आज उसे पाने की चर्चा भारत में पागलपन ही कही जाएगी।
‘कहाँ से कैसे अन्वेषण प्रारंभ हो?’ कुछ ठीक उपाय सूझता नहीं था। अवश्य ही अलबर्ट ने भारतीय साधुओं के प्रति अपना आकर्षण व्यक्त कर दिया था। वे प्रायः पता लगाकर अच्छे कहे जाने वाले साधुओं के दर्शन करने पहुँचते थे। किन्तु बहुधा निराशा हाथ लगती थी।
मुझे बड़े आश्रमों वाला बड़ा साधु नहीं चाहिए। बहुत शीघ्र उन्हें अनुभव हो गया कि जो प्रख्यात साधु हैं वे सम्पन्न हैं ओर जहाँ सम्पत्ति स्वीकृत होती है पारस का पता वहाँ पाने की आशा भी नहीं की जा सकती।” कौपीनधारी जिसके पास कुछ न रहता हो, जो देने पर भी पैसा न ले, ऐसा साधु चाहिए मुझे।”
घूमते-भटकते-अपने अन्वेषण की सनक में वह दुर्गम हिमालय में पहुँच गए। एक स्थान पर उन्होंने देखा अपने हाथ पर सिर टेके एक अलमस्त साधु लेटे थे। उनकी आँखों से करुणा झर रही थी। देह पर एक स्वर्णिम आभा की दीप्ति थी। अल्बर्ट उनके पास जाकर घुटनों के बल बैठ गये। पतलून की क्रीज की चिन्ता न जाने कब छूट चुकी थीं।’ तुम पारस क्यों चाहते हो?’ वह ऐसा पदार्थ नहीं कि मात्र कौतूहल निवृत्ति के लिए उसे पाया जा सके। संत समझा रहे थे-”मुझे वह प्राप्त नहीं। किसी को आज प्राप्त है या नहीं, मुझे पता नहीं, किन्तु तुम क्यों नहीं सोचते कि उसे पा लेने पर कितनी अव्यवस्था हो जाएगी समाज में?”
‘आप चाहें तो उसे पा सकते है?’ अल्बर्ट ने पूछा। उनकी जिज्ञासा अभी तर्क से तृप्त होने को प्रस्तुत नहीं थीं
‘परमात्मा परम दयालु है।’ साधु का स्वर गदगद हुआ। उसका कोई बच्चा कोई हठ ही कर ले तो वह दयामय उसे अवश्य पूर्ण कर देगा। पारस पदार्थ बना देने में उस सर्वशक्तिमान को क्या देर लगेगी।
‘काश। एक बार मैं उसे देख पाता?” रासायनिक की उत्कंठा आतुर हो उठी। ‘क्या करोगे उसका?’ साधु हंसे।उसका आविष्कार संसार के लिए सबसे बड़ा विध्वंसक बम सिद्ध हो सकता है।
“आज कितने कंगाल हैं लोग।” अल्बर्ट ने प्रार्थना के स्वर में कहा-”दरिद्रों पर दया नहीं आती आपको? उनका दुख-उनका अभाव दूर करने के लिए केवल कुछ घंटों को पारस का प्राप्त होना भी पर्याप्त हो सकता है। “ “बहुत भावुक हो तुम!” “वैज्ञानिक भावुक नहीं हुआ करते”। “साधु खुलकर हंसे-आज की शासन व्यवस्था तो देखो। पारस प्राप्त कर लो तो स्वर्ण बनाने के लिए छिपते फिरोगे। पारस पता लगने पर तुमसे छीन लिया जाएगा तुम जेल में बंद होओगे या तुम्हारी हत्या करा दी जायेगी। आगे पारस का क्या होगा-तुम कोई आश्वासन नहीं दे सकते। इसे पाकर तुम कितनी अशाँति ले लोगे-तुमने स्वयं सोचा है?”
“आपको सत्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।” वैज्ञानिक ने मस्तक झुका दिया-” सब आपत्तियाँ झेलकर भी यदि मैं कुछ कंगालों की सेवा कर सकूँ-आप मुझपर विश्वास कर सकते हैं कि मैं आपके देश के दरिद्रों की ही सेवा करूंगा पारस या उससे बना स्वर्ण इस देश के बाहर नहीं जाएगा। मैं अपने उपयोग में भी उसे नहीं लाऊंगा।”
“तुम इस प्रकार कह रहे हो, जैसे पारस मेरे पास पड़ा है।” साधु हंसे
“आप उसे पा सकते हैं।” वह निराश नहीं हुआ। उसका आग्रह स्थिर रहा-दरिद्रों का दुःख दूर करने में आप मेरी सहायता करेंगे।
“जिनका चित्त सम्पत्ति के अभाव में दुखी है वे दरिद्र हैं।” साधु ने समझाने का मार्ग लिया-जिनके पास संपत्ति नहीं है वे दरिद्र हैं-ऐसा तो तुम नहीं मानते होगे, क्योंकि मेरे पास एक कौड़ी नहीं और मुझे दरिद्र मानकर मेरी सहायता करने की बात तुम सोच भी नहीं सकते।”
“संपत्ति के अभाव में जो दुःखी हैं, वे दरिद्र हैं।” अल्बर्ट ने साधु की परिभाषा स्वीकार की-” उनकी ही मैं सेवा करूंगा। आपके समान संतुष्ट महापुरुषों की कोई क्या सेवा कर सकता है?” “आज तुम बंबई चले जाओ!” साधु ने आज्ञा दी। दो दिन वहाँ रहो। इसके अनंतर यदि पारस की आवश्यकता प्रतीत हो तो यहाँ आ जाना। “
हिमालय की दुर्गमता को छोड़कर माँरीसन रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। उनके कूपे में केवल एक यात्री थे। कोई भारतीय व्यापारी होंगे। उनके वस्त्र कोट में लगे हीरों के बटन, अंगूठी में जड़ा बड़ा सा नीलम अवश्य वे कोई संपन्न व्यक्ति होंगे। किन्तु उनका श्रीहीन मुख बार-बार लंबी श्वाँस लेना, बार-बार नेत्र पोंछना-कोई बहुत बड़ा दुख उन पर आया जान पड़ता था।
‘बाबू ! एक पैसा!स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी।गोद में नवजात शिशु लिए मैले-फटे वस्त्रों में शरीर छिपाये एक कंगाल प्रायः भिक्षुणी आ खड़ी हुई। दीनता की साकार मूर्ति लगती थी वह। “चल! भाग यहाँ से।” व्यापारी ने उसे दुत्कार दिया। वह तो जैसे इसकी अभ्यस्त हो गई थी। बड़ा खेद हुआ अल्बर्ट को। उसने अपनी जेब से मनीबैग निकाला, जो पहिला नोट हाथ में आया, उस भिखारिन के हाथ पर रखकर खिड़की बंद कर ली उसने।
“ये भिखारी अब भी पिंड नहीं छोड़ते।” व्यापारी महोदय-अपने आप बड़बड़ा रहे थे-” इन्हें अपने से मतलब, कोई जिए या मरे, इन्हें पैसा चाहिए।”
“क्या कष्ट हैं इन्हें ? “ इच्छा हुई अल्बर्ट को जानने की। किन्तु बिना प्रयोजन किसी अपरिचित की व्यक्तिगत बातों में बोलना असभ्यता है।अपने समाज के शिष्टाचार के कारण चुप रहना था और व्यापारी महोदय समझते नहीं थे कि साहब हिन्दी जानता है। स्वयं वे अंग्रेजी बोलने में असमर्थ थे। गाड़ी सीटी देकर चल चुकी थी।
पर्याप्त समय तक उस डिब्बे में दो ही यात्री रहै। ट्रेन जब बोरी बंदर स्टेशन पहुंच गई, तब भी दो ही यात्री उतरे उसमें से। अलबर्ट माँरीसन मार्ग में अपनी पुस्तकों के पन्नों में उलझ गये थे। उन्हें याद भी नहीं आयी कि वे डिब्बे में एकाकी हैं।
अरे! दूसरे दिन प्रातःकाल होटल के एक कमरे में उन्होंने जब प्रातःकाल अखबार उठाया वे चौंक पड़े। एक बार उनके हाथ से अखबार छूटकर गिर पड़ा।
“भारत के प्रसिद्ध व्यापारी श्री ...........न कल रात आत्महत्या कर ली” समाचार के प्रथम पृष्ठ पर मोटा शीर्षक था। उन्हें स्मरण आया-यह नाम तो उन्होंने कल अपने साथ यात्रा करने वाले यात्री महोदय के बक्से पर लिखा देखा था। तब क्या उन्होंने........’उन्हें अपने सट्टे के व्यापार में बहुत बड़ा घाटा लगा था।” समाचार पत्र ने विवरण दिया था-अनुमान किया जाता है कि घाटा एक अरब के लगभग है। उसे दे डालने पर उनकी केवल अपने रहने की कोठी और दस-बारह करोड़ की संपत्ति बची रहेगी, उनकी श्रीमती जी के समीप।
उसे स्मरण आया-वे व्यापारी बड़बड़ा रहे थे-मैं कंगाल हो गया। केवल कुछ करोड़ बचेंगे मेरे पास। आज का अरबपति दरिद्र हो गया।
“दरिद्र ! “ अल्बर्ट फिर चौंके-”दस-बारह करोड़ और विशाल कोठी होने पर भी वह अपने को ऐसा दरिद्र समझता था कि आत्म हत्या करके मर गया। जब वह भिखारिन सिर्फ एक रुपये का नोट पाकर आनन्द से खिल उठी थी। दोनों में दरिद्र कौन?” जिनका चित्त संपत्ति के अभाव में दुखी है, वे दरिद्र! साधु के वचन स्मरण और मन ने कहा-संपत्ति के अभाव की कोई सीमा है?कुछ ही करोड़ रहने, आत्महत्या कर लेने वाला सेठ-असंतोष जिसे है-वह दरिद्र यही तो अर्थ हुआ। ऐसे दारिद्रय की दवा पारस कैसे कर सकता है? ठीक ही तो कहा था साधु ने-यदि किसी को कुछ सार्थक देना चाहते हो-तो उसे विचार दो-जीवन जीने की कला सिखाओ। वैज्ञानिक ने टेलीफोन डायरेक्टरी उठा ली थी। वे पूछना चाहते थे कि यूरोप के लिए वायुयान कब जा रहा है। पारस पाने की कोई उत्कंठा अब उनमें नहीं रह गयी थी।
मनुष्य ब्रह्मांड का ही प्रतीक-प्रतिनिधि है। उसके अंदर वह समस्त शक्तियाँ विद्यमान हैं, जो हमें इस विराट विश्व में दिखाई पड़ती हैं। इसी विशेषता के कारण ऋषियों ने मानवी काया को “माइक्रो काँस्म” कहकर अभिहित किया है। यदि प्रयास-पूर्वक इस सूक्ष्म ब्रह्मांड को अपने अंदर प्रकट किया जा सके, तो मनुष्य सचमुच देवता के समतुल्य अलौकिक और असाधारण बन जाय। यदा-कदा उसकी यही असाधारणता अद्भुत विद्युत शक्ति के रूप में प्रकट और प्रत्यक्ष होती रहती है।
घटना सन् 1846 की है। नोरमैंडी, फ्राँस की एक 14 वर्षीय लड़की एंगेलिक कोटिन एक दिन अपनी फैक्टरी में काम कर रही थी कि अकस्मात् उसने देखा कि उसके संसर्ग में आने वाली वस्तुएं उछल-उछलकर दूर छिटक जाती हैं। उसे इस पर आश्चर्य तो हुआ, पर सहसा विश्वास न हो सका कि ऐसा उसके स्पर्श के कारण ही हो रहा है। पुष्टि के लिए दस्ताने सिलने वाली मेज के ऊपर रखी एक कील को उसने छूने का प्रयास किया। उसकी उंगलियाँ ज्यों ही उसके निकट पहुँची, कील उसकी पकड़ से दूर छिटक गई। दस सप्ताह तक यह सिलसिला जारी रहा, उसके बाद ही सबकुछ सामान्य हुआ। इस बीच कोटिन एकदम असहाय बनी हुई थी। उसका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। वह जिस भी चीज के नजदीक पहुँचती अथवा स्पर्श करती, उसमें विचित्र हलचल होने लगती। कुर्सी में बैठने का उपक्रम करते ही वह खिसककर आगे बढ़ जाती, बिस्तर बुरी तरह काँपने लगते, रसोईघर में प्रवेश करते ही बरतन खनकने लगते और समीप पहुँचते ही इधर-उधर उछलकर गिरने लगते। पुस्तक, भोजन, वस्त्र आदि हर वस्तु के साथ यह विचित्रता दिखाई पड़ती।बाद में पेरिस के “अकादमी ऑफ साइंस” के विशेषज्ञों द्वारा सूक्ष्मता से उस लड़की का अध्ययन किया गया, पर विशेषज्ञ दल यह बताने में बिलकुल असमर्थ रहे कि ऐसा क्यों कर होता है। उनने इस बात से भी इन्कार किया कि यह विद्युत चुँबकीयता से संबंधित कोई घटना है। उनका तर्क था कि इसमें वस्तुएं व्यक्ति से चिपकती हैं, विकर्षित नहीं होतीं। उनके अनुसार यह शरीर-शक्ति का ही कोई परिवर्तित रूप था।
दूसरी घटना 1890 की है और इसकी प्रकृति पहली से कुछ भिन्न है। मामला तब प्रकाश में आया, जब लुईस हैम्बरगर नामक एक युवक एक दिन अपने वर्कशाप में काम करने गया। उसने देखा कि उसकी उपस्थिति से घात्विक पुर्जों में कुछ अनूठी हलचल हो रही है। अब उनमें से एक पुर्जे को उठाने की कोशिश की, तो पकड़ने से पूर्व ही वह उसकी उंगलियों में आ चिपका। जब उसके सामने आलपिनों से भरा एक डिब्बा रखा गया, तो पिन डिब्बे से कूद-कूदकर उसकी खुली हथेली से चिपकने लगीं। बाद में परस्पर चिपकती हुई पिनों की एक लंबी शृंखला बन गई। यह कौतुक “ मेरीलैंड कॉलेज ऑफ फार्मेसी, बाल्टीमोर” के वैज्ञानिकों के सम्मुख हो रहा था, जो बाल्टीमोर के इस अद्भुत युवक की जाँच करने के विचार से उपस्थित हुए थे। लंबी पड़ताल के पश्चात् निष्कर्ष के रूप में वे इतना ही कहते पाये गये कि घटना की व्याख्या विज्ञान द्वारा संभव नहीं, कदाचित् यह कोई रहस्यमय प्रसंग है, जिसमें शरीर की सूक्ष्म शक्ति किसी कारणवश अकस्मात् फूट पड़ती हो। इसकी भलीभाँति व्याख्या रहस्यवाद करने में सक्षम है।
एक प्रसंग 1938 का है। न्यूयार्क की “यूनिवर्सल काउंसिल फोर साइकिक रिसर्च” नामक संस्था ने एक पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहा था कि जो कोई वस्तुओं को अपनी मानसिक शक्ति द्वारा आकर्षित अथवा विकर्षित करने का कौशल प्रदर्शित कर अपनी दक्षता सिद्ध करेगा, उसे 10000 डालर इनाम दिया जायेगा। इसके उपराँत न्यूयार्क की एक महिला एंट्वायन टिमर आगे आयी और चुनौती स्वीकार की। एक प्रदर्शन के दौरान लोगों ने देखा कि रसोईघर के बर्तन उसके हाथों से इस बुरी तरह चिपक गये कि मुश्किल से ही उन्हें अलग किया जा सका।
कई बार इस क्रम में लोगों के जमीन से चिपकने का भी प्रकरण सामने आते देखा गया है। ऐसा ही एक मामला जोपलिन, मिसूरी में तब देखने में आया, जब फ्रैंक मैककिन्स्ट्री नामक एक युवक प्रातः भ्रमण के लिए निकला। कुछ दूर चलने के पश्चात् रास्ते में उसका मित्र जान ड्यूक मिल गया। वह मित्र से बातें करने लगा। जब पुनः चलना चाहा, तो उसने अनुभव किया कि किसी शक्ति ने उसके पैरों को जमीन से जकड़ रखा है। बहुत कोशिश के पश्चात् भी वह आगे बढ़ने में सफल न हो सका, तो अंततः आगे बढ़ गये दोस्त को आवाज दी। ड्यूक ने बलपूर्वक उसे उस स्थिति से मुक्त किया। फिर जब कभी फ्रैंक को इस दशा का आभास मिलता, वह चलते हुए बाहर कभी नहीं रुकता।
यदा-कदा इस प्रकार की विद्युत चुँबकीय सक्रियता अस्वस्थता की स्थिति में देखी जाती है। घटना जनवरी 1837 की है। ऑक्सफोर्ड, न्यूहेम्पशायर की एक महिला जेनी बीमार पड़ी तो उसकी उंगलियों से करीब डेढ़ इंच लंबी विद्युत किरणें निकलने लगीं। डॉक्टरों को इसका कारण किसी प्रकार समझ में न आया। कई प्रकार के उपचार इन्हें रोकने के लिए किये गये, पर सब निष्फल साबित हुए। अंत में छः सप्ताह बाद वह स्वयं रुक गई। ऐसा ही एक प्रकरण उस समय सामने आया, जब 1879 की गर्मियों में ओंटेरियो, लंदन की एक 19 वर्षीय लड़की कैरोलीन क्लेयर संघातिक तंत्रिका रोग से मुक्त हो रही थी। उसने देखा कि धात्विक वस्तुओं के समीप पहुँचते ही वह उछल-उछलकर उसके हाथ-पैरों से चिपकने लगती हैं। चिपकाव इतना मजबूत होता कि प्रयासपूर्वक ही उसे समाप्त कर पाना शक्य होता। कुछ दिनों के बाद वह सामान्य बन गई।
सन् 1920 में न्यूयार्क की एक जेल में विषाक्त भोजन की एक घटना के उपराँत इसी तरह का मामला घटित हुआ। जिन लोगों ने इस भोजन को ग्रहण किया, उनमें से आधे से अधिक लोगों में विद्युत चुँबकीयता दिखाई पड़ी। कागज के टुकड़े, आलपिन, हेयरपिन आदि उनकी ओर स्वतः आकर्षित होते देखे गये। वे कंपास की सुई को भी हाथ में घुमा सकते थे।
सन् 1960 के दशक में लंदन, इंग्लैंड में विद्युत चुँबकीयता की एक बड़ी ही अजीबोगरीब घटना देखने को मिली। ग्रेस चार्ल्सवर्थ अपने लंदन स्थित मकान में वित्त चालीस वर्षों से रह रही थी। सब कुछ सामान्य था, पर पिछले दो वर्षों से उसे एक विचित्र अनुभूति हो रही थी। चार्ल्सवर्थ जब भी अपने कमरे की कोई वस्तु छूती, उसे गहरा विद्युतीय आघात अनुभव होता, बिस्तर पर पड़ते ही तीव्र कंपन महसूस करने लगती, कभी-कभी उसे दीवारों पर विद्युत चिंगारियाँ चमकती दिखाई पड़तीं। जब वैज्ञानिकों ने उसके मकान की जाँच की, तो वहाँ कुछ भी असामान्यता नजर नहीं आई। विशेषज्ञों का कहना था कि जो झटके चार्ल्सवर्थ अनुभव करती है वह कहीं बाहर के न होकर स्वयं उसके शरीर के हैं।
शरीर विद्युत के हाल की घटनाओं में सबसे प्रमुख दो हैं। दोनों ही इंग्लैंड की हैं। प्रथम घटना 1973 की है। लंदन की सोफिया नामक महिला को तब कुछ आश्चर्य हुआ, जब वह चालू टेलीविजन के निकट आयी और उसके आते ही टेलीविजन गड़बड़ा गया। उस समय उसने इसे संयोग मात्र मान लिया, पर कुछ घंटे उपराँत जब वह बजते रेडियो के नजदीक आई, तो अकस्मात् उसमें भी खराबी आ गई। इसी समय उसे टेलीविजन की बात याद आयी। वह रेडियो को यथावत् छोड़कर थोड़ा पीछे खिसक गई। ट्राँजिस्टर फिर से बजने लगा। अब उसे इसका रहस्य समझ में आया कि ऐसा उसके स्वयं के कारण होता है। पुष्टि के लिये उसने एक बार टेलीविजन फिर से खोला। टी.वी.किसी खराबी का संकेत दे रहा था। वह पाँच-छः फुट पीछे आ गई। उसके पीछे हटते ही टी.वी.सामान्य हो गया और उसमें कार्यक्रम आने लगा। इस प्रकार कई बार आगे-पीछे होकर उसने यह सुनिश्चित कर लिया कि यंत्र में सामयिक खराबी की निमित्त वह स्वयं है। दूसरी घटना जैकलीन प्रीस्टमैन नामक मैनचेस्टर, इंग्लैंड की एक नारी से संबंधित है। जब जैकलीन अपने वैक्यूम क्लीनर, स्वचालित टिकट मशीन, टी.वी.सेट, रेडियो सेट के पास पहुँचती तो वे अनायास चल पड़ते। उसके वहाँ से दूर जाते ही यंत्र पुनः पूर्ववत् हो जाते। महिला की जाँच करने पर उसमें उच्च वोल् टेज की काय-विद्युत पायी गई।
प्रस्तुत प्रकरणों से यही निष्कर्ष सामने आता है कि मनुष्य एक चलता-फिरता चुँबक एवं बिजलीघर है और उसमें वैसी ही विद्युत विद्यमान है, जो याँत्रिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्ध होती है। किसी आँतरिक गड़बड़ी के कारण जब वह बाहर आती है, तो वैसा ही प्रमाण-परिचय देने लगती है, जैसा बाह्य विद्युत। पर यह उस विशाल शक्ति-भंडार की अगणित विभूतियों का एक प्रमाण मात्र हुआ। यदि उस भंडागार को संपूर्ण रूप से जाग्रत किया जा सके, तो इस प्रकार की अनेकानेक शक्तिधाराओं को हस्तगत किया जा सकता है। तब मनुष्य साधारण न रहकर असाधारण शक्तिसम्पन्न देवमानव-महामानव बन सकता है। हम सबको इसी दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास-अभ्यास करना चाहिए।
गुरुकुल दीक्षाँत समारोह भी हो गया किन्तु तीनों विद्यार्थियों को घर जाने की आज्ञा न मिली। वे सोचने लगे अब क्या बाकी है। सब कुछ तो पढ़ सीख लिया। वर्षों घर नहीं गये उन्हें याद सता रही थी। सायंकाल होते ही गुरु ने कहा”‘ तुम तीनों चारों तो आज जा सकते हो।” जाने का नाम सुनकर विद्यार्थी बिना इंतजार किये शाम को ही चल पड़े। रास्ता पैदल का था। पगडंडी पकड़कर जंगल के रास्ते से जा रहे थे। किन्तु गुरु ने पहले ही मार्ग में काँटेदार झाड़ियाँ बिछवा दी थीं। उनमें से एक विद्यार्थी ने पगडंडी का मार्ग छोड़कर रास्ता पार कर लिया। दूसरे ने छलाँग लगाकर काँटेदार मार्ग पार कर लिया। तीसरा झाड़ियां हटाकर रास्ता साफ करने में लग गया। सोचा अंधेरे में दूसरे आगंतुक यात्री उलझेंगे बेचारों को बड़ा कष्ट होगा। साथ जिन्होंने रास्ता पार कर लिया था वे बोले छोड़ो भी जल्दी चलो अंधेरा होने वाला है। तीसरा विद्यार्थी जो काँटा साफ करने में लगा बोला-”इसीलिए और जरूरी है काँटा साफ करना कि कोई बेचारा अंधेरे में उलझ न गिरे। तुम चलो मैं पीछे से आता हूँ। अचानक झाड़ी में से गुरु प्रकट हुए, बोले जो दो आगे चले गये हैं अंतिम परीक्षा में असफल रहें हैं अभी उन्हें कुछ दिन गुरुकुल में और ठहरना होगा। जिसने काँटे बीने थे उसकी पीठ थपथपाकर कहा तुम अंतिम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए तुम जा सकते हो।। गुरु ने कहा अंतिम परीक्षा शब्द की नहीं प्रेम की थी। पाँडित्य की नहीं औरों के लिए करुणा थी।
जीवात्मा ईश्वर का अंश है। समुद्र की लहरों व सूर्य की किरणों से उसकी तुलना की गई है। इस भिन्नता को घटाकाश अर्थात् घड़े के भीतर की सीमित पोल और मठाकाश अर्थात् विशाल विश्व में फैली हुई पोल। घड़े के भीतर की पोल वस्तुतः ब्रह्मांडव्यापी पॉल का ही एक अंश है। घड़े की परिधि से आवृत्त हो जाने के कारण उसकी स्वतंत्र सत्ता दिखाई पड़ती है, पर तात्विक दृष्टि से वह कुछ है नहीं। घड़े के आचरण ने ही यह पृथक रूप से देखने और सोचने का झंझट खड़ा कर दिया है। शाँत समुद्र में लहरे नहीं उठतीं, पर विक्षुब्धता की स्थिति में वे अलग-सी लगती हैं और उदलती दिखाई पड़ती हैं। सूर्य के तेजस की विस्तृत परिधि ही उसके वितरण विस्तार की सीमा है। सूर्य सत्ता का जहाँ तक जिस स्तर का विस्तार है वहाँ तक उसी स्तर की धूप का अस्तित्व दृष्टिगोचर होता है। इस प्रभा विस्तार की जो विभिन्न प्रकार की हलचलें हैं उन्हीं को किरणें कहते हैं। किरणों का सात रंगों में अथवा अल्ट्रावायलेट, अल्फावायलेट एक्स्लैसर आदि में अलग से जाना माना जा सकता है, पर यह विभाजन सूर्य से भिन्न किसी पृथक सत्ता का भान नहीं करता। ऐसे ही उदाहरणों से जीवन और ईश्वर की एकता-भिन्नता समझी जा सकती है।
जीव की मूल सत्ता ईश्वरीय है। चेतना का समुद्र इस विश्व में एक ही है। उससे भिन्न या प्रतिपक्षी दूसरी कोई सत्ता देवी-देवताओं के या जीवों के रूप में कहीं नहीं है। तत्वेत्ताओं ने जाना है कि, यहाँ केवल एक है दूसरा नहीं है। “जीव की पृथकता भी प्रकृति के समन्वय से है। प्रकृति के तीन स्तर सत्-रज-तम् कहलाते हैं। इन्हीं तीनों की परतें जीव के ऊपर चढ़ जाती हैं, और वे तीन शरीर कहलाती हैं।
स्थूल शरीर, अर्थात् हाड़माँस की जन्मने मरने वाली काया। सूक्ष्म शरीर अर्थात् बुद्धि, संस्थान, सुख दुःख प्रिय अप्रिय अपने विराने का अंतर करने वाला मस्तिष्कीय विचार विस्तार। कारण, शरीर, अर्थात् मान्यताओं एवं भावनाओं का समुच्चय, अंतरात्मा जिसे अंतःकरण भी कहा गया है। इन तीनों शरीरों की यों प्याज के छिलके, केले के तने या एक के ऊपर पहने हुए वस्त्रों से उपमा दी जाती है, पर य उपमा बहुत ही अधूरी है। कारण कि यह आवरण सभी एक दूसरे से पृथक हैं जबकि तीनों शरीर एक दूसरे के साथ इस प्रकार घुले हुए हैं जैसे दूध में भी और सरसों में तेल।
जीव को इन आवरणों में लिपटे रहने से कई तरह के, कई स्तर के सुख मिलते हैं, इसलिए वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता। फलतः बद्ध अवस्था में बना रहता है। स्थूल शरीर में कई प्रकार के वासनात्मक सुख हैं। सूक्ष्म शरीर में कल्पना लोक के मनोरम स्वप्न, विनोद, मनोरंजन, सफलता पद सम्मान व वैभव आदि के बुद्धि विलास के अनेकों साधन मौजूद हैं। कारण शरीर में अर्हता की गहरी परतें जमी हैं। आकाँक्षाओं की उमंग इसी केन्द्र से उठती है। मान्यताओं की आस्था और संवेदनाओं की पुलकन खट्टी-मीठी गुदगुदी तो है पर यह कुल मिलाकर है मधुर। जीवन में प्रिय अप्रिय प्रसंग आते जाते रहते हैं, जिसके कारण इन तीनों शरीर आचरणों को छोड़ने का मन नहीं करता। फलतः जीवात्मा का सघन अस्तित्व बन जाता है, जिसे स्वतंत्र भी कहा जा सकता है।
बंधन मुक्ति के तमाम मतभेदों के रहते हुए भी एक समन्वित तथ्य और सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। वह यह कि जीवात्मा को प्रिय अप्रिय की विक्षुब्ध अव्यवस्था विवशता से उबरना चाहिए और ऐसी स्थिति में रहना चाहिए जहाँ आदतों की, संस्कारों की पराधीनता उसे अवाँछनीय चिंतन एवं अवाँछनीय संवेदनाओं का कष्ट देने में समर्थ न हो सकें। समस्त विपन्नताओं की जड़ यह पराधीनता ही है। जीवन का आनन्द उठाने से इसी विवशता के कारण वंचित रहना पड़ता है। यही बंधन मनुष्य को उच्चस्तर तक पहुँचकर देवोपम आनंद, उल्लास उपलब्ध करने के मार्ग में एकमात्र व्यवधान बने रहते हैं। इस स्थिति को बदल सकना यही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है-इसी को ‘मुक्ति कहा गया है’। मुक्ति प्राप्त करना ही जीवन का लक्ष्य माना गया है।
मुक्ति का अर्थ है-स्वाधीनता। पराधीनता के बंधनों को काट देना ही स्वाधीनता है। यह पराधीनता -मात्र चिर-संचित संस्कारों की है जो स्वभाव का बनकर हमारे चिंतन व कर्म को अपने ढर्रे पर चलाती है-अपनी लाठी से हाँकती है। शरीर को यह पराधीनता, वासना के बंधन में बाँधकर बेतरह घसीटती है, उसका स्वास्थ्य चौपट करती है, दीर्घजीवन से वंचित करती है और सत्कर्म निरत रहकर समृद्धियाँ, सफलताएं प्राप्त करने के स्थान पर ऐसा कुछ करते रहने में लगाती हैं जिनके कारण रुग्णता, निंदा, असफलता, दरिद्रता, कुरूपता जैसी विपन्नताएं ही आये दिन सामने खड़ी रहती हैं। विवेक कई बार सोचता है कि अपनी गतिविधियों में अमुक प्रकार का परिवर्तन करना चाहिए। किन्तु औचित्य को समझते हुए भी वैसा कुछ बन नहीं पड़ता। आदतें इतनी जबरदस्त सिद्ध होती हैं कि उपयोगी सुधार के मनसूबे एक कोने में रखे रह जाते हैं और आदतें अपनी बेढंगी राह पर शरीर को घसीटती चली जाती हैं और वे काम कराती हैं जिनके लिए पीछे पश्चाताप ही करना शेष रह जाता है। यदि आदतें शरीर का संचालन न करें तो विवेक के हाथ से नियंत्रण, संचालन किया जाने लगे तो स्वास्थ्य, सौंदर्य दीर्घजीवन जैसी उपलब्धियाँ तो अति साधारण हैं। समर्थ काया से अभीष्ट प्रयोजनों में आश्चर्यजनक सफलतायें देने वाले पराक्रम पुरुषार्थ का अभिनव स्त्रोत खुल सकता है और उसके फलस्वरूप जो जीवन लाभ मिल सकता है, उसकी कल्पना मात्र से आँखें चमकने लगती है। दुर्बल शरीर इन्द्रिय सुख की लिप्सा भर में लगा रहता है, साधन उपस्थित होने पर भी वह उसका समुचित आनन्द नहीं ले सकता। भोजन का आनंद कड़ाके की भूख लगने वाले को ही मिल सकता है। आलस्य, प्रमाद को भगाकर व्यवस्थित दिनचर्या बनाना और उस पर निष्ठापूर्वक आरुढ़ रहना सफलताओं का प्रधान आधार माना गया है और शरीर भौतिक जगत से सीधा संबंध उसी का है। समर्थ शरीर ही भौतिक उपलब्धियों का केन्द्र होता है। शरीर पर विवेक का नियंत्रण जिस मात्रा में होता जाता है उसी अनुपात से भौतिक सफलताओं का पथ प्रशस्त होता चला जाता है। यह स्थिति शरीर क्षेत्र की मुक्ति कही जा सकती है। इसका प्रतिफल है भौतिक सुख।
सूक्ष्म शरीर के क्षेत्र में हमारा चिंतन उस ढर्रे में ढला हुआ होता है, जिसकी प्रतिक्रिया ही हमें अर्धविक्षिप्त स्तर का बनाये रखती है। कितने प्रकार की सनकें, कितने वहम, कितने भ्रम मस्तिष्क में लदे होते हैं यदि उन्हें ठीक तरह से समझा जाय तो प्रतीत होगा कि विवेकहीन व्यक्ति की तुलना में चालू आदमी निस्संदेह अधपगला होता है। लोक-प्रभाव का संशोधन करने वाली अवतारी आत्माएं उतरती हैं। उनके चले जाने के बाद फिर विकृतियाँ भरने लगती हैं और सामाजिक प्रचलनों में गंदे नाले जैसी गंदगी भरती चली जाती है। जन मान्यताएं-लोगों के प्रचलित ढर्रे ही अपने को सुहावने लगते हैं। कुरीतियाँ मूढ़ मान्यताएं, अन्धविश्वासों के सहारे न जाने कितनी उपहासास्पद भ्रांतियां मस्तिष्क में जड़ जमाकर बैठ जाती हैं। लोगों में प्रचलित भ्रष्टाचार अपने को भी ललचा लेता है। विकृत चिंतन के कारण मनुष्य न सोचने योग्य सोचता है और बाल बुद्धि की योजनाएं बनाकर उनमें बहूमूल्य विचार शक्ति को नष्ट करता रहता है। चिंता, निराशा, खीज, आवेश, उत्तेजना, निष्ठुरता, घबराहट, कायरता, कृपणता, ईर्ष्या व द्वेष, आत्महीनता व उद्दंडता जैसे अनेकों मानसिक रोग मस्तिष्क को घेरे रहते हैं और सौ रोगों से ग्रसित शरीर की जो दुर्गति होती है वैसा ही मनोविकार विचार संस्थान को, सूक्ष्म शरीर को बनाए रहते हैं। यह मनोगत कुसंस्कारों की, चिंतन विकृतियों की पराधीनता है जिसके कारण हर दृष्टि से अद्भुत विचारणा सर्वनाश के गर्त में गिरती और नष्ट होती रहती है।
परिष्कृत सूक्ष्म शरीरी चिंतन की उत्कृष्टता के कारण स्वयं हर घड़ी सदा संतुष्ट, उल्लसित एवं प्रफुल्लित बना रहता है। अवाँछनीय मानसिक भ्रम से छुटकारा पाने के कारण उसकी सूझबूझ दूरदर्शी और तत्वदर्शी बन जाती है। उसका लाभ न केवल संपर्क क्षेत्र को वरन् समस्त संसार को मिलता है।
कारण शरीर की चेतना की अवस्था यदि सुधर जाए तो मनुष्य महात्मा, देवात्मा और परमात्मा बन सकता है। यही ध्रुव का केन्द्र है जहाँ आत्मा और परमात्मा का पारस्परिक पतला सा संबंध सूत्र जुड़ा हुआ है। उसे परिष्कृत कर दिया जाय तो ब्रह्म चेतना का, जीव चेतना का विशिष्ट संबंध स्थापित हो सकता है और ऐसे आदान-प्रदान का पथ प्रशस्त हो सकता है, जिस के आधार पर नर से नारायण का अवतरण प्रत्यक्ष देखा जा सके। ऐसी स्थिति में पहुंची हुई आत्माओं की संज्ञा देवताओं से दी जाती है।
अध्यात्म विज्ञान की पृष्ठभूमि को संक्षेप में इतना कुछ समझ लेने के उपराँत तत्वज्ञान के एक जिज्ञासु को इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मनुष्य को मिली हुई तीन शरीरों के रूप में तीन विभूति या प्राणी जगत की सबसे बड़ी ईश्वर प्रदत्त उपलब्धियाँ हैं। इन तीन क्षेत्रों में जो विकृतियाँ घुस पड़ी हैं उन्हीं ने जीव को निकृष्ट स्तर का दीन-दयनीय बनाकर रख दिया है। प्रकृति का-भौतिकता का अनावश्यक और अवाँछनीय भार लद पड़ने से पिता और पुत्र का वियोग उपस्थित हो गया है। इसी अशक्ति, अविद्या और अभाव की परिणति स्वरूप जीव की दुर्गति हुई है। प्रकृतिगत आकर्षणों की ओर अस्वाभाविक और असाधारण रूप से दौड़ पड़ने से ही कुसंस्कारों की परतें जमी हैं और उनने पतनकारी दुर्दशा उत्पन्न की है। उस अवाँछनीयता से जूझना ही वह साधना समर है, जिसमें प्रत्येक हनुमान और अर्जुन को-साधक का अपना पराक्रम दिखाना पड़ता है।
आत्मा को परमात्मा से मिला देने के लिए कुसंस्कारों से पीछा छुड़ाना पड़ता है और ईश्वरीय प्रेरणा का अनुगमन करते हुए अपनी अंतरंग स्थिति ऐसी बनानी पड़ती है जो ब्राह्मी कही जा सके।
दूध और पानी एक रस होने से घुल सकते हैं। लोहा और पानी का घुल सकना कठिन है। हम अपने भौतिकतावादी स्तर से ऊंचे उठें और ईश्वरीय चेतना के अनुरूप अपनी क्रिया, विचारणा एवं आस्था को ढालें तो ईश्वर प्राप्ति का जीवन लक्ष्य पूरा हो सकता है। वियोग का अंत योग में होना चाहिए यही ईश्वर की इच्छा है। बच्चे दिनभर खेलकूद और पढ़ने-लिखने में संलग्न रहे, पर रात को घर लौट आए और एक ही बिस्तर पर सो जाये, ऐसी माता की इच्छा रहती है। परमात्मा भी अपने पुत्र आत्मा से ऐसी ही अपेक्षा करता है। उसकी इच्छा पूर्ण करने के लिए हमें जो चेतनात्मक पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी का नाम योग है। योग साधना हमारे लिए सर्वोपरि श्रेय साधन है। उसमें अपनी प्रवृत्तियों को तत्परता पूर्वक लगाया जा सके, उसी में कल्याण है।
चिंतन की उत्कृष्टता को अध्यात्म की भाषा में योग कहा गया है। इसके लिए ध्यान-धारणा, स्वाध्याय-सत्संग, चिंतन-मनन जैसे उपाय अपनाने पड़ते हैं। जीवन का दूसरा पक्ष है चरित्र। इसे क्रिया कृत्य या कर्मकाँड भी कहते हैं। दुष्प्रवृत्ति का निरोध और सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास ही वह अन्तःक्षेत्र का साहस भरा पराक्रम है, जिसे तप कहा जाता है। तप अर्थात् संयम अनुशासन। इसी ऊर्जा के सहारे व्यक्ति पकते और प्रखर होते हैं। धातुओं के परिशोधन में यही प्रक्रिया काम में लाई जाती है।
चारित्रिक चार अनुशासन सर्व ज्ञात है। जिन्हें इंद्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम के नाम से बताया जा रहा है। इनके अभाव में असंयम के ऐसे छेद बनते हैं, जिनमें होकर ईश्वर प्रदत्त सभी विभूतियाँ और मनुष्य उपार्जित सारी सम्पदायें टपकती रहती हैं। मनुष्य निचोड़े नींबू की तरह छूँछ बनकर रह जाता है। छलनी में दूध दुहने पर गाय पालने वाले को कोई लाभ नहीं होता। तली में छेद रहने पर कुशल मल्लाह भी नाव को पार लगाने में समर्थ नहीं होता। असंयमी, आलसी कितना ही सुसम्पन्न क्यों न हो, अपने इन्हीं दुर्गुणों के कारण दुर्गति का त्रास सहेगा, ठोकरें खायेगा और असफल होता रहेगा।
इन्द्रिय असंयम में जीभ का चटोरापन और कामुकता को अधिक विनाशकारी माना गया है। स्वाद के नाम पर चटोरा व्यक्ति अधिक मात्रा में अभक्ष्य खाता और पेट पर असह्य भार लाद कर न केवल पाचन तंत्र को वरन् समूचे काय तंत्र को गड़बड़ा देता है। दुर्बलता और रुग्णता इसी अनाचरण के अभिशाप हैं। कामुकता के माध्यम से जीवन-रस गंदी नाली के द्वार से बहता रहा है और मनोबल, बुद्धि बल एवं ओजस, तेजस् का भंडार खोखला होता जाता है। कहते हैं- मनुष्य भोगों से नहीं भोगता वरन् भोग ही मनुष्य को भोग लेते हैं। समय से पूर्व ही जीर्ण-शीर्ण बनाकर अकाल मृत्यु के मुख में धकेल देते हैं।
समय संपदा का मूल्य न समझने वाले, श्रम से जी चुराने वाले, समय को आलस्य प्रमाद में गंवाने वाले दरिद्र बनने, पिछड़ेपन का त्रास सहने और उपहास तिरस्कार का भाजन बनते हैं। दिनचर्या पर ध्यान न देने वाले, अस्त-व्यस्त गतिविधियाँ अपनाने वाले हर कार्य में असफल रहते हैं उन्हीं को प्रगति समृद्धि का सुयोग मिलता है।
अर्थ-असंयम का अर्थ है फिजूलखर्ची। व्यसन विलास और अहंकार से प्रेरित होकर कितने ही लोग पैसा फूँकते रहते हैं। श्रृंगार सजधज में ढेरों पैसा उड़ जाता है।कुरीतियों के कुचक्र में फंसकर लोग गाढ़ी कमाई को फुलझड़ी की तरह जलाते हैं। यदि औसत नागरिक स्तर का जीवनक्रम अपनाया जा सके तो सादा जीवन उच्च विचार का आनंददायक प्रतिफल हर किसी को सहज ही संभव हो सकता है।
विचार-संयम का तात्पर्य है चिंतन को अनगढ़, अनैतिक, असंभव कुकल्पनाओं से रोककर सुनियोजित विधि व्यवस्था का ताना-बाना बुनने में जुटाए रखना। एकाग्रता, मनोयोग, तन्मयता इसी को कहते हैं। बंदर जैसी चंचल चित्तवृत्ति का नियंत्रण ही मनोनिग्रह है। योग साधना में विविध उपायों के सहारे इसी का अभ्यास करना पड़ता है। वैज्ञानिक, कलाकार, दार्शनिक एवं प्रगतिशील व्यक्ति इसी दक्षता में प्रवीणता प्राप्त करते और अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल होकर रहते हैं। दूरदर्शिता का मार्ग यही है, जिसमें आरंभ में थोड़ा घाटा उठा कर कुछ ही समय उपराँत असीम लाभ उठाया जा सकता है। किसान, माली, विद्यार्थी, व्यवसायी, पहलवान अपने आरंभ काल में समय और धन गंवाते दिखते हैं। पर कुछ ही समय का धैर्य और श्रम उन्हें पूँजी की तुलना में असंख्य गुनी उपलब्धियों से मालामाल करके रख देता है। किसानों के कोठे भरते हैं। माली अमीर बनते हैं। विद्यार्थी अफसर होते और पहलवान दंगल पछाड़ते देखे जाते हैं। वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, कलाकारों की आरंभिक साधना भी बचकाने लोगों को निरर्थक सिर खपाई दिखती है। पर जब समयानुसार छोटा पौधा विशाल वृक्ष बन कर अपनी गरिमा का परिचय देता है तब यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि दूरदर्शिता अपनाना ही सबसे अच्छा व्यवसाय है। इसी को अपनाकर सामान्य परिस्थिति के व्यक्ति महामानव बने, सौभाग्यशाली हुए और अपने कर्तव्य के आधार पर लोक श्रद्धा के भाजन होकर इतिहास में प्रसिद्ध हुए हैं। हम भी संयम बरतें व समर्थ संपन्न बनें।
सम्मान की पूँजी देने पर मिलती, बाँटने पर बढ़ती और बटोरने पर समाप्त हो जाती है।
धन कमाना एक बात है और खर्च करना सर्वथा दूसरी। सनकी किस्म के व्यक्ति यदि किसी प्रकार संपत्ति कमा लेते हैं, तो उपयोग न मालूम होने की स्थिति में उसका अपव्यय ही होता है। इस प्रकार जीवन भर की कमाई बेकार चली जाती है। उससे न व्यक्ति का अपना भला होता है, न राष्ट्र का। इसके विपरीत यदि समाज निर्माण के रचनात्मक कार्यों में उपयोग हो, तो इसका दुहरा लाभ मिलता है। व्यक्ति पुण्य का भागी बनता है और राष्ट्रीय प्रगति में उसके महत्वपूर्ण योगदान की सर्वत्र सराहना होती है, किन्तु सनकियों को न अपनी चिंता, न देश की। ऐसे ही लोग संपत्ति का सर्वाधिक दुरुपयोग करते देखे जाते हैं।
कैटाअरो, इटली की एक धनी महिला मारिया टलारिका ने अपने वसीयतनामे में लिखा कि मृत्युपरान्त उसके धन को उसकी संतानों को न दिया जाय और उससे एक ऊंची मीनार बनवाई जाए। मीनार के ऊपर छोटा एवं सुँदर कमरा हो, जिसमें वह अपना मरणोत्तर जीवन दुनिया की अशाँति से अलग शाँतिपूर्वक बिता सके।
मार्टिन गुहरे फ्राँस के आर्टिगैट गाँव का रहने वाला था। उसकी पत्नी पहले ही दिवंगत हो चुकी थी। दो पुत्र उससे दूर अन्य शहरों में नौकरी करते थे। गाँव में वह अकेला रहता था। जब उसे लगा कि मृत्यु निकट है, तो उसने अपने वकील को बुलवाया और उसे लगा कि मृत्यु निकट है, तो उसने उसके इस आशय की इच्छा का उल्लेख था कि उसके बाद उसकी संपत्ति का क्या किया जाय? मार्टिन गुहरे का उसमें स्पष्ट निर्देश था कि संपदा उसकी स्वयं की कमाई हुई है। पुत्रों ने कभी उनका तनिक भी ध्यान नहीं रखा। अतः इससे उनको उत्तराधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में संपत्ति का उपयोग एक भव्य हवादार कब्र के निर्माण में कर देने का उल्लेख किया था। बाद में इसी कमरे में अपने मृत शरीर को अंतिम रूप से दफना देने की प्रार्थना थी। इस निर्माण से जो धन बचे, उससे पत्नी की समाधि विनिर्मित करने का निर्देश था।
जेवियर मट्ज मोरक्को के उद्योगपति थे। फुटबाल खेल से उनका गहरा लगाव था। अपने छात्र जीवन में वे इसके अच्छे खिलाड़ी रह चुके थे। आरंभ में उनने निश्चय कर लिया था कि वे अपना जीवन इसी खेल के लिए समर्पित कर देंगे। पर नियति कुछ और ही थी। उन्हें इससे नाता तोड़ना पड़ा। पारिवारिक दायित्व को पूरा करने के लिए विवश होकर उन्हें एक फैक्टरी में काम करना पड़ा। किन्तु इतनी स्वल्प आय उनके बड़े परिवार के लिए कम पड़ती थी, अतः गियर बनाने के आरंभ में उनने एक छोटी फैक्टरी खोली। बाद में बढ़ते-बढ़ते यह काफी बड़ी हो गई और शुरू के गरीब जेवियर अपने उत्तरार्द्ध जीवन में एक उद्योगपति के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनके लड़कों का अपना स्वतंत्र व्यापार था, पर पिता-पुत्र के बीच संबंध मधुर न थे। अपना अंतिम समय निकट जानकर जेवियर ने एक वसीयतनामा तैयार किया, जिसमें लिखा कि उसकी सारी संपत्ति मोरक्को के उस फुटबाल खिलाड़ी को दे दी जाय, जो उसकी मृत्यु के पश्चात् के तीन वर्षों में उसने देशी-विदेशी टूर्नामेंटों में कुल मिलाकर एक सौ पाँच गोल किये हों।
जर्मनी के हैमलिन शहर के एक करोड़पति आर्थर एकमैन ने अपने इच्छा-पत्र में लिखा कि उसकी मृत्यु के उपराँत अंतिम-क्रिया में जो लोग सम्मिलित हों, उनमें उसकी दौलत वितरित कर दी जाय। बाद में वैसा ही किया गया।
कैनन हैरी समरसैट, इंग्लैंड का एक धनी भिखारी था। वह अपने धन का अधिकाँश भाग बैंक में जमा कर देता और थोड़े में से जैसे-तैसे गुजारा करता। अंतिम दिनों में उसके पास लगभग एक हजार पौंड जमा था। वह बीमार पड़ गया तो उसने मजिस्ट्रेट के नाम एक पत्र लिखा और प्रार्थना की कि उसके देहावसान के पश्चात् उस रकम से एक मनोरंजन गृह बनवाया जाय, ताकि भिक्षा-वृत्ति के बाद का समय भिक्षुक उसमें गुजार सकें।
क्काँग जुफू सोल, कोरिया के एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे। पत्रकारिता से उनने काफी धन कमाया था। इसके अतिरिक्त पेय बनाने की एक फैक्टरी भी थी। उनके कोई संतान नहीं थी। पत्नी ने भी अपना घर कहीं अन्यत्र बसा लिया था। धन का उपयोग उनकी समझ में नहीं आ रहा था। एक दिन उनके दिमाग में एक विचार कौंधा और वैभव के उत्तराधिकार के निमित्त एक इच्छा-पत्र लिख डाला। उस पत्र में उसने न्यायाधीश से अपील की थी कि उसके शरीराँत के बाद धन का दावेदार वही हो सकता है जो राजधानी में डेढ़ हजार मीटर ऊंचा टावर उसकी स्मृति में बनवाएं। शर्त को किसी व्यक्ति द्वारा पूरा नहीं किये जाने के कारण संपत्ति को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया।
धन कमाना बुरा नहीं है। बुरा तो वह तब बन जाता है, जब उसका दुरुपयोग होने लगे, जबकि सदुपयोग से न सिर्फ व्यक्ति यशस्वी बनता है वरन् उससे राष्ट्र की प्रगति भी आगे बढ़ती है। कमाने से पूर्व खर्च करना सीखें। समाज के लिए नियोजित करना सीखें। विवेकशीलता इसी में है और समय की माँग भी यही है।
स्वस्थ रहने पर ही कोई अपना और दूसरों का भला कर सकता है। जिसे दुर्बलता और रुग्णता घेरे हुए होगी वह निर्वाह के योग्य भी उत्पादन न कर सकेगा, दूसरों पर आश्रित रहेगा। परावलंबन एक प्रकार से अपमानजनक स्थिति है। भारभूत होकर जीने वाले न कहीं सम्मान पाते हैं और न किसी की सहायता कर सकने में समर्थ होते हैं। जिससे अपना बोझ ही सही प्रकार से उठ नहीं पाता, वह दूसरों के लिए किस प्रकार कितना उपयोगी हो सकता है।
मनुष्य जन्म अगणित विशेषताओं और विभूतियों से भरा-पूरा है। किसी को भी यह छूट है कि उतना ऊंचा उठे, जितना कि अब तक कोई महामानव उत्कर्ष कर सका है। पर यह संभव तभी है जबकि शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हों। जो जितनों के लिए जितना उपयोगी और सहायक सिद्ध होता है उसे उसी अनुपात में सम्मान और सहयोग मिलता है। अपने और दूसरों के अभ्युदय में योगदान करते उसी से बन पड़ता है जो अपने को स्वस्थ रहने की स्थिति में बनाये रखता है।
अपंग-अविकसित और असहाय, दीन-दरिद्र दिखते ही हैं। पर साथ ही इस पंक्ति में वे लोग भी सम्मिलित होते हैं जो दुर्बलता या रुग्णता से ग्रसित हैं। इसलिए उनके दुखद, दुर्भाग्यों और अभिशापों में प्रथम अस्वस्थता को ही माना गया है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि वैसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए। यदि किसी कारण इस चपेट में आना पड़े भी तो वह दुर्दिन अधिक समय ठहरने न पाये। सच्चे अर्थों में जीवन उतने ही समय का माना जाता है जितना कि स्वस्थता पूर्वक जिया जा सके। कुछ अपवादों को छोड़कर अस्वस्थता अपनी निज की उपार्जन है, भले ही अनजाने में, भ्रमवश या दूसरों की देखा−देखी उसे न्योत बुलाया गया हो। सृष्टि के सभी प्राणी जीवन भर निरोग रहते हैं। मरण काल आने पर जाना तो सभी को पड़ता है। यह नियति की व्यवस्था है। इसमें किसी का चारा नहीं। पर निरोग रहना हर जीवधारी का जन्मसिद्ध अधिकार है।जिन प्राणियों को किसी के बंधनों में बंधे रहने की विवशता नहीं होती वे सभी जन्म से लेकर मरणपर्यन्त निरोग रहते हैं। स्वच्छंद जीवन जीने वाले पशु पक्षियों में कभी किसी को बीमार नहीं पाया जाता। कोई दुर्घटना ग्रसित हो जाए तो दूसरी बात है। मनुष्य की उच्छृंखल आदत ही उसे बीमार बनाती है। जीभ का चटोरापन अतिशय मात्रा में अखाद्य खाने के लिए बाधित करता रहता है। जितना भार उठ नहीं सकता उतना लादने पर किसी का भी कचूमर निकल सकता है। पेट पर अपच भी इसी कारण चढ़ दौड़ता है। बिना पचा सड़ता है और सड़न के रक्त प्रवाह में मिल जाने से जहाँ भी अवसर मिलता है रोग का लक्षण उभर पड़ता है। कामुकता की कुटेव जीवनीशक्ति का बुरी तरह से क्षरण करती है और मस्तिष्क की तीक्ष्णता का, क्रियाकौशल का हरण कर लेती है। अस्वच्छता, पूरी नींद न लेना, कड़े परिश्रम से जी चुराना, नशेबाजी जैसी कुटेव भी स्वास्थ्य को जर्जर बनाने का निमित्त कारण बनते हैं। खुली हवा ओर रोशनी से बचना, घुटन भरे वातावरण में रहना भी रुग्णता का एक बड़ा कारण है। भय या आक्रोश जैसे उतार-चढ़ाव भरे ज्वार-भाटे भी मनोविकार बनते और व्यक्ति को सनकी, कमजोर एवं बीमार बना कर रहते हैं। हंसती-हंसती जिंदगी जीने वाले प्रायः स्वस्थ ही रहते हैं और लंबी जिंदगी जीते हैं।
अपने ऊपर औचित्य का अंकुश लगाये रहा जाय तो दुर्बल पड़ने या बीमार रहने का अवसर ही न आये। उच्छृंखलता सर्वत्र अराजकता स्तर की अव्यवस्था को जन्म देती है। इसी कुमार्ग पर चलने वाले ही रोग ग्रस्त बनते या रहते देखे गये हैं। इस अनाचार का परित्याग कर देने पर कोई भी अपने खोये स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त कर सकता है। प्रकृति उद्दंडता को दंड भी हाथों-हाथ देने में निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह न्याय करती एवं कठोर है। किन्तु साथ ही इतनी दयालु भी है कि गलती मान लेने, आदत सुधार लेने और रास्ता बदल लेने पर क्षमा भी कर देती है। कितने ही स्वास्थ्य गंवा बैठने वाले लोग अपनी आदतें सुधार लेने के उपराँत पुनः स्वस्थ और समर्थ बनते देखे गये हैं। यह रास्ता सभी के लिए खुला है।
दंड के प्रतिफल की उपेक्षा करते रहने वाले ही बहुधा कुमार्ग पर चलने और कुकर्म करने पर उतारू होते हैं। यदि समय रहते समझा जा सके कि अस्वस्थता अपने लिए व अपने साथियों के लिए कितनी कष्टकर होती है, तो संभव है कि लोग आग में हाथ डालकर उस महत्वपूर्ण अंग को जला बैठने जैसी भूल न करें। दुर्बल शरीर इतना परिश्रम पुरुषार्थ भी नहीं कर सकता कि निर्वाह की आवश्यकताओं को अपने बलबूते कमा सकें। बीमारों का कष्ट चाबुक से पिटने या हथौड़े से कूटने के समान कष्टकर होता है। परिचर्या में जिन साथियों को लगना पड़ता है, उनका समय नष्ट होता है। इलाज का खर्च भी कम महंगा नहीं पड़ता। घर में पूर्व संचय न होने पर कर्ज लेने से लेकर कपड़े बेचने तक की नौबत आ जाती है। कितनों को ही खर्चीला उपचार न करा पाने पर अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है। सहानुभूति का शिष्टाचार तो स्वजन संबंधी निभाते ही हैं, पर मन से उन्हें भी रोगी भारभूत लगता और अच्छा न हो सके तो बुरा हो जाने की कामना में ही मन करने लगते हैं। स्वयं को भी ऐसे जीवन में कोई रस नहीं रह जाता। ज्यों-त्यों करके ही मौत के दिन पूरे करने पड़ते हैं। प्रगति की बात तो सोचते भी नहीं बनती। जब जीवित लाश की तरह जिंदगी ढोई जा रही है तो फिर अभ्युदय की योजना किस बलबूते बनें। उज्ज्वल भविष्य के सपने तो किस आधार पर देखे जायं? यह सब दुखद संभावनाएं मात्र एक ही कारण से अवरोध बनकर खड़ी होती हैं कि शरीर के साथ मन भी स्वस्थ रहने लगता है। दोनों एक साथ जुड़े जो हैं।
मन को ग्यारहवीं इंद्रिय कहा गया है। जिस प्रकार बीमार व्यक्ति की सभी इन्द्रियाँ असमर्थता अनुभव करती हैं उसी प्रकार शारीरिक अस्वस्थता की स्थिति में मन भी अस्वस्थ, अस्त−व्यस्त और विकृत होने लगता है। बीमारों में प्रायः चिड़चिड़ापन देखा जाता है। वे आक्रमण करने की स्थिति में तो होते नहीं, अपना क्रोध, आवेश, खिन्न व उद्विग्न रहकर ही व्यक्त करते हैं। शरीर और मन के सहयोग से ही हमारे समस्त क्रिया कलाप सही रूप से चल सकने की स्थिति में हैं। शरीर गड़बड़ाता है तो मन को भी अपनी चपेट में ले लेता है। चिंतन गड़बड़ाने लगता है। फलतः रोगी व्यक्ति किसी प्रकार शाँत बने रहने की स्थिति में नहीं रहता। दूसरों के सत्परामर्श न उसे सुहाते हैं और न अपना मानसिक स्तर इस योग्य रहता है कि किसी को कोई उपयुक्त एवं व्यावहारिक परामर्श दे सके। यह दुहरी हानि है। शरीरगत अशक्तता, रुग्णता, पीड़ा, बेचैनी तो स्वयं ही सहन करनी पड़ती है। पर मानसिक अस्तव्यस्तता का नया दौर चल पड़ने पर एक नया उपद्रव सामने आता है और स्थिति अर्द्ध-विक्षिप्त जैसी बन जाती है। शरीर रोगी, मानसिक रोगी भी रहने लगते हैं। इसके कारण उन्हें दुहरा दबाव सहना पड़ता है।
सही चिंतन के अभाव में इर्द-गिर्द के व्यक्ति और वातावरण पर ही सारे दोष थोपने का प्रवाह चलता है। अपनी गलतियाँ समझने और सुधारने का मानस ही नहीं रहता है। फलतः अपने को खिन्नता का और दूसरों को निराशा का सामना करना पड़ता है। रुग्णता के कष्ट में इस अतिरिक्त भार से त्रास और भी अधिक बढ़ता है, साथियों को हैरानी बढ़ जाती है सो अलग।पीड़ित स्थिति में कुछ महत्वपूर्ण कार्य एवं उपार्जन तो बन नहीं पड़ता। साथ ही चिकित्सा, पथ्य आदि का अतिरिक्त व्यय भार और बढ़ जाने पर सामान्य स्तर के लोगों के सामने आर्थिक कठिनाई भी दिन-दिन बढ़ती जाती है। जमा पूँजी चुक जाने पर चिकित्सा की अतिरिक्त पारिवारिक निर्वाह में भी अड़चन खड़ी हो जाती है। इससे न केवल रोगी वरन् उसका परिवार, परिजन भी एक नई विपत्ति में फंस जाता है। सहानुभूति दिखाने वाले, पूछताछ करने वाले आते हैं तो उनका अतिथि सत्कार भी करना पड़ता है। इन महंगाई के दिनों में वह भी कम वजन नहीं डालता। बीमारी से छुटकारा पाने के बाद भी इतनी शक्ति बहुत दिनों में आ पाती है कि परिश्रमपूर्वक उपार्जन करके पहले की तरह फिर अपना साधारण क्रम चलाया जा सके, बीमारी के दिनों में हुई आर्थिक स्थिति एवं अस्त-व्यस्तता के कारण उत्पन्न हुई गड़बड़ियों की क्षतिपूर्ति की जा सके।
सामाजिक या राष्ट्रीय दृष्टि से हर रोगी समुदाय को क्षति पहुँचाने वाला अपराधी है। भले ही उसे दंड देने का कोई प्रावधान न हो। भले ही वह निर्दोष, दया, सहानुभूति या सेवा का पात्र समझा जाता हो। कारण कि रुग्णता प्रकाराँतर से समूचे समाज पर अनावश्यक भार डालती है। चिकित्सकों का प्रशिक्षण, अस्पतालों का भारी भरकम ढाँचा औषधियों की शोध, उनका निर्माण, वितरण यह सब मिलाकर इतना बोझिल होता है कि उसमें ढेरों, धन, शक्ति और जन शक्ति खपती है। यदि इसे सरकार जुटाती है तो भी उसे उसका संतुलन जनता पर टैक्स लगाकर ही पूरा करना पड़ता है। यदि राशि बच सकी होती तो शिक्षा संवर्धन, उद्योगों के संवर्धन जैसे उपयोगी कार्यों में लगती और सार्वजनिक प्रगति में सहायक होती। उन सबमें कटौती करके ही रोगियों के लिए उपचार के साधन जुटाए जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति निजी संसाधनों से चिकित्सा कराता है तो भी चिकित्सकों के प्रशिक्षण और औषधि निर्माण का जो ढाँचा खड़ा किया गया है उसमें प्रकाराँतर से जन साधनों का नियोजन हुआ तो देखा ही जा सकता है। यह प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप से राष्ट्रीय हित में कटौती हुई ही समझी जा सकती है। काम में एवं उत्पादन में कमी पड़ती है। जहाँ व्यक्ति की निजी हानि है वहाँ उसके कारण राष्ट्र की समृद्धि एवं प्रगति को भी हानि पहुँचती है। रोगी की छूत दूसरों को भी लगती है। उसके श्वाँस से, मलमूत्र, पसीने में जो अतिरिक्त गंदगी और विषाक्तता रहती है वह घूम फिरकर अन्य अनेक लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करती है। इस प्रकार उस चपेट में सूखे के साथ गीला भी जलता है। जो लोग अपने स्वास्थ्य को साज संभालकर रखे हुए थे वे इस रोग प्रदूषण से कहीं न कहीं जरूर प्रभावित हो सकते हैं। इससे जनसाधारण को समाज या राष्ट्र को होने वाली असाधारण क्षति ही मानना पड़ेगा भले ही वह साधारण जैसी दिख पड़ती क्यों न हो।
समर्थ स्वास्थ्य के आधार पर समस्त राष्ट्र समर्थ बनता है प्रगति करता है। वहीं रोगियों की संख्या बढ़ने से अवनति का प्रवाह चल पड़ता है। जो शक्ति दीवार उठाने में लगनी चाहिए थी वह खाई पाटने में खप जाती है। इस घाटे से देश का हर नागरिक न्यूनाधिक मात्रा में प्रभावित ही होता है। इसलिए वैयक्तिक रुग्णता भी सामाजिक क्षति के रूप में फलित होती है। सामुदायिक प्रगति में जो जितनी बाधाएं डालता है, जो जितनी उपेक्षा व असमर्थता प्रकट करता है, उसके असहयोग से समस्त समाज को प्रत्यक्ष या परोक्ष
रूप से हानि ही हानि उठानी पड़ती है। ऐसी दशा में यदि उसे अपराधी स्तर का माना जाय तो इसमें कुछ भी अनुचित न होगा। राजदंड भले ही न मिले तो प्रकृति उसे उस भूल का दंड देने में कोई कोर कसर नहीं रखती। रुग्णता आखिर कोई दैवी विपत्ति या आकस्मिक दुर्घटना तो है नहीं। उन्हें मनुष्य ही प्रकृति मर्यादाओं का उल्लंघन करके स्वयं ही न्योत बुलाता है। ऐसी दशा में कोई रोगी अपने को निर्दोष नहीं कह सकता है। भले ही उसे अपनी भूल के बदले भी साथी, सहयोगियों की सेवा सहानुभूति मिलती रहे पर इतने भर से उसकी निर्दोषता तो सिद्ध नहीं हो जाती है।
रुग्णता की बहुमुखी हानियों पर यदि गंभीरतापूर्वक विचार किया जा सके तो यह सहज ही समझा जा सकता है कि इस विपत्ति से बचना-बचाना ही उपयुक्त प्रतीत होगा। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए जिस आहार-विहार के संयम को अपनाने भर से काम चल सकता है उसकी अपेक्षा करना किसी भी बुद्धिमान के लिए भार प्रतीत न होगा।
संयमित जीवन से हर दृष्टि में लाभ ही लाभ हैं। हानि केवल इतनी है कि उच्छृंखलता, अव्यवस्था, चटोरापन की ललक जैसी अवाँछनीयताओं पर अंकुश लगाने का साहस करना पड़ता है।रोग से लड़ने में जितनी शक्ति खर्च होती है, उतनी को यदि संयम बरतने, जीवनचर्या में सुव्यवस्था का समावेश करने में लगाई जा सके। तो इतने भर से समग्र स्वास्थ्य रक्षा की गारंटी मिल सकती है। उस आधार पर उस शास्त्र वचन के अनुरूप लाभ उठाया जा सकता है। जिसमें “आरोग्य” को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का मूल साधन माना गया है।
महाराज बड़े सज्जन, उदार और दयालु हैं उनके दरबार में कोई खाली हाथ नहीं लौटता। बात फैलने लगी। उदारता का अनुचित लाभ उठाने के लिए चालकों की भीड़ भी जुटने लगी। चतुर मंत्री ने बात ताड़ ली और एक दिन घोषणा कर दी कि महाराज बीमार हैं, उन्हें पाँच व्यक्तियों का रक्त चाहिए तभी उनके प्राणों की रक्षा की जा सकती है। पूरा एक सप्ताह बीत गया किन्तु एक भी शुभचिंतक अथवा याचक आगे नहीं आया। राजा को बड़ी निराशा हुई। तभी चतुर मंत्री ने भावुक हृदय राजा को संसार की रीति नीति बताते हुए कहा महाराज आप व्यथित न हों। आप तो बहुत छोटे राज्य के राजा हैं। प्रजाजनों ने आपको ठग लिया तो कौन सी बड़ी बात है। किन्तु परमात्मा के दरबार में तो यह नित्य होता है उसके भक्तगण उसे दिन रात भ्रमित करते और ठगते रहते हैं किन्तु कष्ट सहने, त्याग करने और काम करने में कोई बिरला ही आगे आता है।
यूनान का जमींदार सुकरात के सामने अपनी संपत्ति व जागीर और वैभव का बखान बड़े गर्व से करने लगा। सुकरात पहले तो चुपचाप सुनते रहे फिर उन्होंने दुनिया का नक्शा मंगवाया और उसे फैलाकर जमींदार को दिखाया व पूछा इस विश्व के नक्शे में देखकर वह यह बतायें कि उसका देश यूनान कहाँ स्थित है। जब उसे यूनान मिल गया तो पूछा अब उस जागीर को खोजो। जमींदार ने कहा “ महाराज आप भी कैसी बात करते हैं। इतने बड़े विश्व में मेरी छोटी सी जागीर की क्या बिसात ? यह भला इसमें कहाँ दिख पायेगी। तब सुकरात ने कहा “ भाई इतने बड़े नक्शे में जिस जागीर के लिए एक बिन्दु भी न रक्खा जा सके उस जरा सी जमीन पर तुम इतना गर्व करते हो। फिर अखिल ब्रह्मांड में तुम्हारी उस जागीर का स्थान तो अत्यन्त क्षुद्र होगा फिर इतनी अल्प क्षुद्रता पर गर्व कैसा ?”
भारतीय संस्कृति की यह विशिष्टता है कि वह प्रतीकों, चिन्हों, आकृतियों और अक्षरों के मध्य बड़े-बड़े रहस्यों को छिपाये हुए है। इन्हें सही-सही समझा जा सके, तो मानवी प्रगति और शाँति को अक्षुण्ण रखने में न केवल सहायता मिलेगी, वरन् ऋषियों का वह श्रम सार्थक हो सकेगा, जिसे उन्होंने इनके अन्वेषण में लगाया था।
ॐ और स्वास्तिक आर्य संस्कृति में ऐसे दो प्रतीक हैं, जो विश्व-ब्रह्मांड के भेदों को अपने में बहुतायत में संजोये हुए हैं। इन्हें अक्षर और आकृति कहकर टाल देना उचित नहीं। यह सत्य और संदेश के दो महान तत्वों को धारण किए हुए है। प्रणव यानि ओंकार यदि ब्रह्मांड-उत्पत्ति संबंधी रहस्य उद्घाटित करता है, तो उस ब्रह्मांड के चराचर जीवों की स्वस्ति-कामना स्वस्तिक में सन्निहित है। इस दृष्टि से व्यावहारिक जीवन में स्वस्तिक अधिक उपयोगी और उद्देश्यपूर्ण है। यह स्वस्तिक ही है, जो व्यक्ति को लोक व्यवहार में सौमनस्य और सामंजस्य की प्रेरणा देता है। वह जीव-जीव और मनुष्य-मनुष्य के बीच विभेद की दीवार खड़ी नहीं करता, वरन् एक ही परमात्म तत्व की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ होने के कारण समान मानते हुए उनके सौभाग्य की मंगल कामना करता है। व्यक्तित्व में वह श्रेष्ठता का संदेश वाहक है। सदाचार, संयम, सेवा, सहिष्णुता, साहस, सात्विकता, श्रमशीलता, शुचिता, स्नेह, सौजन्यता जैसे मानवोचित गुण, जिनसे मनुष्य और समाज का सर्वोपरि कल्याण होता है, इन सभी का प्रेरणास्रोत स्वस्तिक ही है। जहाँ अनुराग और प्रेम है, वहाँ प्रच्छन्न रूप से इसकी ही शक्ति क्रियाशील होती है। यह शक्ति जहाँ जितनी अधिक होगी, वहाँ उसका परिमाण में देवत्व विद्यमान होगा। माँगलिक अवसरों पर दीवारों-दरवाजों, मकानों-दुकानों पर इस शुभ संकेत को अंकित करने के पीछे यही प्रयोजन होता है कि उस मुहूर्त में पवित्र शक्ति का अधिकाधिक परिमाण विद्यमान रहे और आयोजन निर्विघ्न संपन्न हो जाय, किसी प्रकार का कोई अवरोध-अड़चन न आने पाये। बच्चों के मुँडन संस्कार के समय मुँडित मस्तक पर इसी चिन्ह को बनाया जाता है, ताकि मस्तिष्क की उस सर्वथा खाली भूमि में श्रेष्ठता का आकर्षण होकर सुसंस्कारों का बीजारोपण हो सके। प्राचीन काल में इसी कारण इस आकार के आवास विनिर्मित किये जाते थे, ताकि उसमें व्याप्त शक्ति का ज्यादा-से ज्यादा लाभ लिया जा सके। इसके अतिरिक्त इसका एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। शुभ सूचक होने के कारण जब भी किसी की भी नजर इस पर पड़ती है, तो उसका अवचेतन इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। उसमें एक सात्विक भाव-संचार हो जाता है। विवाह-अवसर पर परिणय-मंडप और घर में यत्र-तत्र इसी निमित्त इसका अंकन किया जाता है। शादी के निमंत्रण पत्रों पर इसे प्रमुख स्थान प्राप्त होता है। इसके अलावा पूजा की वेदी पर सुशोभित होकर यह आकृति वातावरण की दिव्यता को और अधिक बढ़ाती है। दक्षिण भारत के द्वारों पर बनी अल्पनाओं से इन्हीं के विविध रूपों के दर्शन होते हैं। कर्नाटक में ‘स्वस्तिक’ नाम का एक व्रत अत्यन्त प्रसिद्ध है। इसमें बहुरंगी स्वस्तिक का निर्माण कर भगवान विष्णु की अर्चना की जाती है।
इस प्रकार कर्नाटक में ‘स्वस्तिक’ नाम का एक व्रत अत्यन्त प्रसिद्ध है। इसमें बहुरंगी स्वस्तिक का निर्माण कर भगवान विष्णु की अर्चना की जाती है।
इस प्रकार इस आकृति-निर्माण के पीछे दो ही उद्देश्य कारण भूत माने जाते हैं-प्रथम इसमें निहित देवशक्ति को आकर्षित करना और द्वितीय मन की भीतरी परतों को प्रभावित-उत्तेजित कर उन्हें अधिक सक्रिय बनाना। इसे देखते ही एक प्रकार का उत्साह उमड़ पड़ना उसके इसी मनोवैज्ञानिक प्रभाव को इंगित करता है। इसी कारण तंत्र शास्त्रों में इसे एक माँगलिक यंत्र की संज्ञा दी गई है। यंत्रों में यही एकमात्र ऐसी आकृति है, जो निर्द्वंद्व है, अन्यथा संसार की हर एक वस्तु द्वंद्वात्मक है, उनमें से प्रत्येक में दो विपरीत सत्ताओं की उपस्थिति है। स्वयं सृष्टि भी इसका अपवाद नहीं। वह प्रकृति और पुरुष के विरोधी युग्म का परिणाम है। द्रव्यों में ऋण-धन नामक दो प्रकार के विद्युत कण मौजूद हैं। आग जलाती है तो वह जीवनरक्षक भी है। भोजन पकाने में उसका रचनात्मक गुण काम आता है, तो मकान को भस्मीभूत करने में ध्वंसात्मक प्रकृति निमित्त बनती है। वायु सबसे बड़ी जीवनदायी है, तो तूफान उतना ही बड़ा विनाशलीला मचाने वाला, किन्तु स्वस्तिक इन सबसे परे कल्याण का उद्घोषक है। उसमें मात्र शुभ ही शुभ की कामना है। अशुभ का रंचमात्र भी नहीं। इस दृष्टि से जीवन में उसकी उपादेयता कहीं अधिक बढ़ जाती है। मनुष्य की वास्तविक उन्नति और संसार में शाँति स्वस्तिक में छिपी अवधारणा के बिना हो ही नहीं सकती। आकृति विज्ञान की यह अनुपम देन सार्थक तभी समझी जायेगी, जब हम इसकी शिक्षा को समझकर अंगीकार कर सकें।
इस प्रकार इस आकृति-निर्माण के पीछे दो ही उद्देश्य कारण भूत माने जाते हैं-प्रथम इसमें निहित देवशक्ति को आकर्षित करना और द्वितीय मन की भीतरी परतों को प्रभावित-उत्तेजित कर उन्हें अधिक सक्रिय बनाना। इसे देखते ही एक प्रकार का उत्साह उमड़ पड़ना उसके इसी मनोवैज्ञानिक प्रभाव को इंगित करता है। इसी कारण तंत्र शास्त्रों में इसे एक माँगलिक यंत्र की संज्ञा दी गई है। यंत्रों में यही एकमात्र ऐसी आकृति है, जो निर्द्वंद्व है, अन्यथा संसार की हर एक वस्तु द्वंद्वात्मक है, उनमें से प्रत्येक में दो विपरीत सत्ताओं की उपस्थिति है। स्वयं सृष्टि भी इसका अपवाद नहीं। वह प्रकृति और पुरुष के विरोधी युग्म का परिणाम है। द्रव्यों में ऋण-धन नामक दो प्रकार के विद्युत कण मौजूद हैं। आग जलाती है तो वह जीवनरक्षक भी है। भोजन पकाने में उसका रचनात्मक गुण काम आता है, तो मकान को भस्मीभूत करने में ध्वंसात्मक प्रकृति निमित्त बनती है। वायु सबसे बड़ी जीवनदायी है, तो तूफान उतना ही बड़ा विनाशलीला मचाने वाला, किन्तु स्वस्तिक इन सबसे परे कल्याण का उद्घोषक है। उसमें मात्र शुभ ही शुभ की कामना है। अशुभ का रंचमात्र भी नहीं। इस दृष्टि से जीवन में उसकी उपादेयता कहीं अधिक बढ़ जाती है। मनुष्य की वास्तविक उन्नति और संसार में शाँति स्वस्तिक में छिपी अवधारणा के बिना हो ही नहीं सकती। आकृति विज्ञान की यह अनुपम देन सार्थक तभी समझी जायेगी, जब हम इसकी शिक्षा को समझकर अंगीकार कर सकें।
जीमूत वाहन चले जा रहे थे आकाश मार्ग से। अकस्मात् उनकी दृष्टि रमणक द्वीप पर पड़ी। सुविस्तीर्ण वह मनोहर द्वीप और उसमें क्रीड़ा करते नागकुमार, किन्तु विद्याधर राजकुमार के लिए इसमें कोई आकर्षण नहीं था। उन्हें चौंकाया गया था एक विचित्र दृश्य ने। द्वीप के बाहरी भाग में पर्याप्त दूर तक एक अंतरीप चला गया था और उसके लगभग छोर पर एक उज्ज्वल शिखर दिख रहा था।
रमणक पर तो कोई उच्च पर्वत नहीं है। यह हिम शिखर यहाँ और इतना उज्ज्वल। अपने मूल भाग से ऊपर तक उज्ज्वल यह पर्वत। जितना ही ध्यान से उन्होंने उसे देखा, जिज्ञासा उतनी बढ़ती चली गयी। वह उतर पड़े वहाँ। उतरने के साथ ही वह चौंक पड़े। हे भगवान! कोई भी उस दृश्य को देखकर विह्वल हो उठता और जीमूत वाहन तो अत्यन्त सदय पुरुष थे। वे स्तंभित, चकित, भयातुर, स्तब्ध खड़े रह गये। वहाँ कोई पर्वत नहीं था। वह पर्वताकार दिख रहा अस्थिपंजरों का अकल्पित अंबार था। वहाँ ढेर के ढेर कंकाल और उनमें भेद, माँस और स्नायु का लेश नहीं। जैसे किसी ने सावधानी से स्वच्छ करके हजारों-हजार कंकाल वहाँ क्रम से सजाए हों।
क्या है यह?क्यों ये अस्थियाँ यहाँ हैं ? उस अस्थि पर्वत के ऊपरी भाग के कंकाल ऐसे लगते थे जैसे उन्हें अभी कुछ सप्ताह पूर्व ही वहाँ रखा गया है। लेकिन पूछें किससे? उस अशुभ स्थान के आस-पास कोई प्राणी नहीं था।लगभग पूरा अंतरीप निर्जन पड़ा था। वह उस अंतरीप से द्वीप के मध्य भाग की ओर बढ़े। उन विद्याधर के लिए नाग जाति से कोई भय नहीं था। यह जाति तो मित्र हैं उनके पिता की और शत्रु भी होती तो भी उनके सिद्ध देह का कुछ बनने-बिगड़ने वाला था नहीं। क्या है वहाँ अंतरीप के अंतिम भाग में ? जो पहला नाग मिला, उससे ही उन्होंने पूछ लिया। वहाँ? नाग-तरुण ने एक बार दृष्टि उधर उठाई और उसके नेत्र खिन्न स्वर में कहा-” हममें कोई उस अशुभ स्थान की चर्चा नहीं करता। उस ओर मुख करने में हम भी बचते हैं। लेकिन उसका आतंक हममें से सबके सिर पर सदा रहता है।” “ऐसा क्या बात है वहाँ?” उन्होंने अपना परिचय तो नहीं दिया, किन्तु वे इस द्वीप के अतिथि हैं, यह उन्होंने सूचित कर दिया।
आज पूर्णिमा है। स्वर्णवर्णा मृत्युपक्षी आज वहाँ उतरेगा और एक नाग के शरीर का अस्थि पंजर उस पर्वत की ओर बढ़ जाएगा। उस नाग तरुण ने व्यथित स्वर में बतलाया। “आज के दिन आप उस ओर जाने की भूल न करें।”
स्वर्णवर्णा मृत्युपक्षी क्या? अब भी कोई बात समझ में नहीं आयी थी। मस्तक उठाया तो वह नाग तरुण जा चुका था। किसी वृद्ध नाग से ही यह पहेली सुलझ सकती है।
विनता का पुत्र गरुड़ है हमारा आतंक। प्रत्येक पर्व पर उसके लिए बहुत सी खाद्य सामग्री लेकर किसी न किसी को अंतरीप के अंत में स्थित उस महावृक्ष के समीप जाना पड़ता है। वह वैनतेय सामग्री के साथ उसको लाने वाले को भी उदरस्थ कर लेता है। प्रहर भर पश्चात् वह अस्थि राशि के ऊपर उसके कंकाल को उगल कर उड़ जाता है। बड़ी कठिनाई से वृद्ध नाग ने रुक-रुककर क्रोध, क्षोभ तथा पीड़ा के स्वर में यह बतलाया।
‘वृद्ध बोल रहा था।” पहले तो वह असंख्य नागों का स्वेच्छया विनाश करता था। यह तो हमारे उस वंश शत्रु की उदारता ही है कि पर्व पर केवल एक बलि का वचन लेकर उसने हमारी जाति को जीवित छोड़ रखा है। कुछ छड़ रुककर फिर बोला-हम सब अपनी सम्पत्ति द्वेष का दंड भोग रहे हैं। इसमें गरुड़ को दोष भी कैसे दिया जा सकता है।
“अतीत में कुछ भी हुआ, अब इसे विस्मित होना चाहिए। “ जीमूत वाहन जैसे अपने-आप से कुछ कह रहे हों, ऐसे बोल रहे थे। ‘नागमाता कद्रू ने देवी विनता के साथ छल किया। माता के अनुरोध पर नाग-भगवान सूर्य के रथ के अश्वों की पूँछ में लिपट गये। दूर से अश्वों की पूँछ श्याम जान पड़ी। देवी विनता अपने वचनों की स्पर्द्धा के नियम में पराजित होकर पुत्र के साथ नागमाता की दासी हो गयी। माता तथा स्वयं को इस दास्य भाव से मुक्त करने के लिए अमृत हरण करने में वैनतेय को जो श्रम करना पड़ा, सुरों में जो उनके सम्मान भाजन थे, संग्राम करना पड़ा और दास्यकाल में नागों ने उनको वाहन बनाकर उनका तथा उनकी माता का बार-बार तिरस्कार करके जो अपराध किया, उससे नागों पर उनका रोष सहज स्वाभाविक था। “ “हम गरुड़ को दोष नहीं देते।” वृद्ध नाग ने दुःख भरे स्वर में कहा। “गरुड़ अन्न अथवा फल आहार करने वाला प्राणी तो है नहीं। उसे जब जीवाहार ही करना है, सृष्टि के प्रतिपालक से अपने शत्रुओं को आहार के रूप में प्राप्त करने का वरदान लिया उसने। हम तो अपने पूर्व-पुरुषों के अपकर्म का प्रायश्चित कर रहे हैं। अनंत काल तक के लिए यह प्रायश्चित हमारी जाति के सिर पर आ पड़ा है। “ऐसा नहीं। संतानों को सदा-सदा के लिए पूर्व-पुरुषों के अपराध का दंड भाजन बनाये रखा जाए, यह उचित तो नहीं है। जीमूत वाहन ने गंभीर स्वर में कहा।” गरुड़ इतने निष्ठुर नहीं हो सकते। मुझे उनकी उदारता पर विश्वास है।”
“हतभाग्य नागों के अतिरिक्त विश्व में सबके लिए वे उदार हैं।” वृद्ध नाग ने दीर्घ श्वाँस ली।
“आज पर्व दिन है। किसको जाना है आज गरुड़ की बलि बनकर ? जीमूत वाहन ने कुछ क्षण सोचकर पूछा। “द्वीप के उस आवास में आज क्रंदन का अविराम स्वर उठ रहा है। आज उसी की बारी है। वृद्ध को यह बतलाने में बहुत क्लेश हुआ। वह वहाँ से एक ओर चला गया। लेकिन उसने जो बता दिया था, उस संकेत से उस अभिशापग्रस्त आवास को ढूंढ़ लेना कठिन नहीं था। “बेटा! तुम युवक हो। अभी तुम्हारे आमोद-प्रमोद के दिन हैं।तुम मुझे जाने दो। इस वृद्ध के बिना भी तुम इस परिवार का पालन कर सकते हो।” एक वृद्ध नाग उस परिवार में रोते-रोते पुत्र से अनुनय कर रहा था। “मैं जाऊंगी। मेरे न रहने से परिवार को कोई हानि नहीं। अब मैं आपकी संतानों की रक्षा में शरीर देकर धन्य बनूँ, इतनी अनुमति दें।” वृद्धा नागिन ने नेत्र पोंछ लिये। “मातः! गरुड़ को नारी बलि कभी भेजी नहीं गयी। कोई नाग परिवार इतना कायर नहीं निकला कि किसी नारी की मृत्यु के मुख में भेजकर अपनी रक्षा करना चाहै। गरुड़ को भी ऐसी बलि कदाचित् ही स्वीकार होगी। उन्होंने यदि इसे अपनी प्रवंचना या अपमान माना तो संपूर्ण जाति विपत्ति में पड़ जायेगी। पिता की सेवा में पुत्र का शरीर लगे, यह पुत्र का परम सौभाग्य आज मुझे मिल रहा है। मैं इसे नहीं छोड़ूँगा। “ युवक नाग में कोई व्याकुलता नहीं थी। पूरे परिवार में वही स्थिर धीर दिख रहा था।
“यह अवसर आप सब आज मुझे देंगे।” अचानक उस आवास में पहुँचकर जीमूतवाहन ने सबको चौंका दिया। “आप ?आप कोई भी हों, हमारे अतिथि हैं।” पूरा परिवार एक साथ सम्मान में उठ खड़ा हुआ। “दयाधाम! आप हमारी परीक्षा न लें। यह तो हमारी पारिवारिक समस्या है।”
“मुझे आपका कोई सत्कार स्वीकार नहीं। मैं अतिथि हूँ और आपसे गरुड़ के पास उनकी बलि सामग्री ले जाने का अवसर माँगने आया हूँ।” जीमूत वाहन के स्वर में दृढ़ निश्चय था। “आप मुझे निराश करेंगे तो मैं वहाँ कभी नहीं जाऊंगा। आप मुझे रोक नहीं सकते। “ “अतिथि की ऐसी माँग कैसे स्वीकार की जा सकती है ?” बड़े धर्म संकट में पड़ गया नाग परिवार। वह आसन तक स्वीकार नहीं कर रहे थे। अंत में उनका आग्रह विजयी हुआ। वे जायेंगे ही, यह जानकर अत्यंत अनिच्छा होने पर भी नाग परिवार को उनकी बात माननी पड़ी। यद्यपि वह युवक उनके साथ उस अंतरीप के छोर तक गया। रमणकद्वीप में आज पहली बार एक साथ दो व्यक्ति उस बलि स्थान तक पहुँचे थे। जीमूतवाहन ने बहुत आग्रह करके किसी प्रकार युवक को लौटा दिया।
आकाश में गरुड़ के पंखों से उठता सामवेद की ऋचाओं का संगीत गूँजा और एक स्वर्णिम प्रकाश सारी दिशाओं में फैल गया। संपूर्ण धरा और सागर का जल जैसे स्वर्ण द्रव से आर्द्र हो उठा। उच्च अस्थि राशि स्वर्णवर्णा बन गई। जीमूतवाहन उस छटा को मुग्ध नेत्रों से देख रहे थे। भय कंप उनमें तनिक भी न था।
एक बार प्रचंड वायु से सागर क्षुब्ध हुआ और तब गरुड़ उतर आये। महातरु के समीप अंतरीप पर उन्होंने बलि सामग्री देखते ही भोजन करना प्रारंभ कर दिया। उन्हें भी आश्चर्य था-”आज सामग्री लाने वाला यह है कैसा ?न रोता है-न भयभीत है और न व्याकुल ही दिखता है।”
क्षुधातुर गरुड़ के समीप अधिक विचार करने का अवकाश नहीं था। बलि-सामग्री शीघ्र समाप्त करके उन्होंने जीमूत वाहन को समूचा निगल लिया और उड़कर अस्थि पर्वत पर बैठ गए। भोजन के पश्चात् विश्राम करके देह का कंकाल उगलकर तब जाया करते हैं।
“महाभाग! तुम कौन हो” गरुड़ ने बड़ी व्याकुलता अनुभव की। उन्होंने कंठ इधर-उधर घुमाया। अस्थि समूह से उड़कर नीचे आये। लगता था उन्होंने कोई तप्त लौह निगल लिया हो। जीमूत वाहन को उन्होंने झटपट उगल दिया और पूछा “तुम नाग नहीं हो सकते। तपस्वी ब्राह्मण अथवा भगवद्भक्त ही अपने तेज से मेरे भीतर ऐसी ज्वाला उत्पन्न कर सकते हैं।”
जीमूत वाहन का सारा शरीर गरुड़ के जठर द्रव से लथ-पथ हो रहा था। उनके शरीर में कई खरोंचें थीं। किन्तु वे अविचलित स्थिर और शाँत थे। उन्हें पहचानते हुए गरुड़ बोले-” आपने एक क्षुद्र नाग के लिए स्वयं की बलि देने का क्यों सोचा ?
“इस सृष्टि में क्षुद्र कोई नहीं है। सबके भीतर समान रूप से परम पुरुष की सत्ता है। यह शरीर किसी के काम आ सके इससे अधिक सौभाग्य और क्या होगा ?” “मैं आपका प्रिय करूं ?” गरुड़ का स्वर शिथिल था। जीमूत वाहन शाँत स्वर में बोले-”आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो सारा द्वेष भूलकर इस नागद्वीप के निवासियों को अभय दें।”
“महाभागवत, दयाधर्म के धनी जीमूत वाहन ! मैं स्वयं पर लज्जित हूँ। तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो, तुम्हारा आत्मदान सार्थक हुआ। अब इस द्वीप पर गरुड़ नहीं उतरेगा तुम्हारी जीव दया का प्रकाश सर्वत्र फैले।” यह कहते हुए गरुड़ उड़ चले। जीमूत वाहन के मुख पर संतोष की रेखा चमक उठी।
“महाभागवत, दयाधर्म के धनी जीमूत वाहन ! मैं स्वयं पर लज्जित हूँ। तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो, तुम्हारा आत्मदान सार्थक हुआ। अब इस द्वीप पर गरुड़ नहीं उतरेगा तुम्हारी जीवदया का प्रकाश सर्वत्र फैले।” यह कहते हुए गरुड़ उड़ चले। जीमूत वाहन के मुख पर संतोष की रेखा चमक उठी।
गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ को भारतीय धर्म का पिता कहा गया है। उसे वेदमाता, देवमाता एवं विश्वमाता माना गया है। वेदों से लेकर धर्म शास्त्रों तक का समस्त दिव्यज्ञान गायत्री के बीजाक्षरों का ही विस्तार है। योग साधना और तपश्चर्या की शक्तिधाराएं गायत्री रूपी उद्गम से ही निस्सृत हुई हैं। उसकी साधना के सत्परिणाम, अमृत, पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु और ब्रह्मानंद के रूप में बताए गये हैं। यही पाँच प्रमुख वरदान हैं। इसी रहस्य के कारण उसका एक स्वरूप पाँच मुख वाला भी चित्रित किया जाता है। भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों के अनंत भंडार इस महाशक्ति के अंतराल में छिपे पड़े हैं। “ साधना से सिद्धि “ का सिद्धाँत विधिवत गायत्री साधना के माध्यम से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो सकता है। साँसारिक संकटों में भी गायत्री उपासना वरदान की तरह सिद्ध होती है। आद्य शक्ति गायत्री माता का आँचल पकड़ने वाला कभी निराश नहीं हुआ।
गायत्री महामंत्र में चौबीस अक्षर हैं। तत्वज्ञानी ऋषियों ने इन अक्षरों में बीज रूप में विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है। देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि इसी उपासना के सहारे उच्च पदासीन हुए हैं। ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ के रूप में निखिल ब्रह्माँड में यही महाशक्ति संव्याप्त है। छोटे से छोटा चौबीस अक्षर का कलेवर किंतु उसमें ज्ञान और विज्ञान का भंडागार है। सृष्टि में ऐसी कुछ भी नहीं जो गायत्री में न हो। उसकी उच्चस्तरीय साधनाएं कठिन और विशिष्ट भी हैं, पर साथ ही सरल भी इतनी हैं कि उन्हें हर कोई हर स्थिति में बड़ी सरलता और सुविधा के साथ सम्पन्न कर सकता है। इसी से उसे सार्वजनीन और सार्वभौम माना गया। नर-नारी, बाल-वृद्ध बिना किसी जाति व सम्प्रदाय भेद के उसकी आराधना प्रसन्नतापूर्वक कर सकते हैं और श्रद्धा-भक्ति के अनुरूप लाभ उठा सकते हैं।
गायत्री के ही चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चार वेद बने हैं, इसी लिए गायत्री को वेदमाता कहते हैं। ज्ञान की विवेचना में ही अन्य शास्त्र-पुराण रचे गये हैं। भारतीय तत्व दर्शन और ज्ञान-विज्ञान गायत्री बीज से ही उत्पन्न हुआ है। मानव में देवत्व जगाने वाली इस महाशक्ति की उपासना-आराधना के सहारे ही प्राचीन भारत के महान नागरिक देवोपम बने थे, अतः गायत्री को देवमाता भी कहा गया। गायत्री को ही आत्मशक्ति, ब्रह्मविद्या कहा गया है और उसकी अमृत कलश से उपमा दी गयी है। आत्मकल्याण और ईश्वर-दर्शन का अवलम्बन और मार्गदर्शन गायत्री में मंत्र में ओत-प्रोत है। उसे अपनाने वाले साधक अमृतपान करते हैं और देवताओं की तरह सच्चे अर्थों में अजर-अमर हो जाते हैं। गायत्री को अमृतकलश इसीलिए कहा गया है।
गायत्री की एक और उपलब्धि कामधेनु और ब्रह्मास्त्र के रूप में बतायी गयी है। “कामधेनु” अर्थात् माता की तरह परिपोषण करने वाली, प्रगति और समृद्धि के ओजस वरदान देने वाली। “ब्रह्मास्त्र” अर्थात् वह अस्त्र जिसके प्रहार से पतन-पराभव, संकट और विघ्न चूर-चूर होते चले जायें। जिसने सही रीति से गायत्री माता का अवलम्बन लिया है, उसने अथर्ववेद की उस साक्षी ऋचा को अक्षरशः सही पाया है जिसमें उस महाशक्ति को दीर्घजीवन, प्राण, पराक्रम, सुसंतति, सहयोगी परिवार, निर्मल यश, साधन, वैभव तथा ब्रह्मवर्चस-आत्मबल का वरदान बताया गया है।
सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री-प्रत्यक्ष ऋतम्भरा प्रज्ञा गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों में मानवी चिंतन और चरित्र को उच्चस्तरीय बनाये रहने वाला सारा तत्वदर्शन विद्यमान है। इस महाशक्ति की साधना में योगाभ्यास और तपश्चर्या के वे समस्त आधार, संकेत और विधान मौजूद हैं जिनके सहारे साधक को ऋद्धि-सिद्धियों का समुचित लाभ मिल सकता है। आत्मिक प्रगति की दोनों उच्च भूमिकाएं-स्वर्ग और मुक्ति पाने के लिए तत्वज्ञान का अवलम्बन अनुपम है।
प्रत्येक धर्मपरायण को गायत्री का अवलम्बन आवश्यक ठहराया गया है। भारतीय धर्मानुसार नित्य उपासना का विधान ‘ संध्यावंदन ‘ कहलाता है। संध्या विधान में गायत्री का स्थान वैसा ही है जैसा कि शरीर में मेरुदण्ड का। भारतीय धर्म के दो प्रतीक चिन्ह हैं- एक शिखा दूसरा सूत्र (यज्ञोपवीत)। दोनों ही गायत्री की प्रतिमाएं हैं। सिर के सर्वोच्च शिखर पर गायत्री की ज्ञान ध्वजा फहराने और कंधे पर गायत्री के नौ शब्द, नौ धागे बनाकर, तीन व्याहृतियों को तीन ग्रंथियों का रूप देकर यज्ञोपवीत के रूप में कंधे पर धारण करने का अनुशासन है। मस्तिष्क-ज्ञान का, और शरीर कर्म का आधार है। दोनों पर ही शिखा और सूत्र के रूप में गायत्री की प्रतिष्ठापना की गयी है अर्थात् इन दोनों का उपयोग संचालन इन्हीं चौबीस अक्षरों में सन्निहित प्रेरणाओं के अनुरूप करने का निर्देश आर्य ग्रंथों और आप्त वचनों में किया गया है। शास्त्रों में “गुरुमंत्र” नाम गायत्री को ही दिया गया है। विद्यारंभ, वेदारंभ, उपनयन आदि संस्कारों में गायत्री के आधार पर दीक्षा दी जाती है। अन्य मंत्रों को देव मंत्र, साधना मंत्र, सम्प्रदाय मंत्र आदि तो कहा जा सकता है, पर अनादि, “गुरुमंत्र” गायत्री को ही कहा गया है। भगवान राम को गुरु वशिष्ठ ने एवं भगवान कृष्ण को संदीपन ऋषि ने यही गुरुमंत्र दिया था। महर्षि विश्वामित्र द्वारा राम को बला और अतिबला शक्तियाँ इसी साधना के माध्यम से प्राप्त हुई थीं। स्वयं विश्वामित्र ब्रह्मर्षि इसी के प्रभाव से बने थे। उनका कथन है- “गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है। सम्पूर्ण शास्त्र, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं है।”
भगवान मनु का कथन है कि गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला और कोई मंत्र नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से तीन वर्ष तक गायत्री का जप करता है, वह ईश्वर को प्राप्त करता है। जो द्विज दोनों संध्याओं में गायत्री जपता है, वह वेद पढ़ने के फल को प्राप्त करता है। अन्य कोई साधना करें या न करे केवल गायत्री जप से ही सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता, वह निन्दा का पात्र है।
पराशर ऋषि कहते हैं कि समस्त जप सूक्तों तथा वेद मंत्रों में गायत्री मंत्र परम् श्रेष्ठ है। वेद और गायत्री तुलना में गायत्री का पलड़ा भारी है। भक्ति पूर्वक गायत्री जपने वाला परम् भक्त होकर पवित्र बन जाता है। वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास पढ़ लेने पर भी जो गायत्री से हीन है, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिए।
इसी तरह शंख ऋषि कहते हैं कि नर्क रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली गायत्री ही है। उससे उत्तम वस्तु स्वर्ग और पृथ्वी पर कोई नहीं है। गायत्री का ज्ञाता निस्संदेह स्वर्ग को प्राप्त करता है।
शौनक ऋषि का मत है कि- अन्य उपासना करें चाहे न करें, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाता है। साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय भावनापूर्वक दस हजार मंत्र जप करने से विपत्ति का निवारण होता है। इतना ही नहीं अत्रि ऋषि के अनुसार तो गायत्री आत्मा का परमशोधन करने वाली है। उसके प्रभाव से कठिन दोष और दुर्गुणों का परिमार्जन हो जाता है। जो मनुष्य गायत्री तत्व को भली प्रकार समझ लेता है, उसके लिए संसार में कोई दुःख शेष नहीं रह जाता।
महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री को “सर्वकामधुक” कहा है अर्थात् ऐसी कोई इच्छा नहीं जो गायत्री उपासना से पूर्ण न हो। भगवान व्यास के अनुसार- जिस प्रकार पुष्पों का सार शहद, दूध का सार घृत है उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। सिद्ध की हुई गायत्री कामधेनु के समान है। गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है। गायत्री रूपी ब्रह्मगंगा में आत्मा पवित्र होती है। जो गायत्री को छोड़कर अन्य उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। काम्य सफलता तथा तप की सिद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ कुछ नहीं है।
भारद्वाज ऋषि कहते हैं- ब्रह्मा आदि देवता भी गायत्री का जप करते हैं। वह ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है। अनुचित काम करने वालों के दुर्गुण गायत्री के कारण छूट जाते हैं। गायत्री से रहित व्यक्ति शूद्र से भी अपवित्र है। गायत्री के सम्बंध में महर्षि वशिष्ठ का मत है कि- मंद-मति, कुमार्गगामी, और अस्थिर मति व्यक्ति भी इसके प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त करते हैं। फिर सद्गति होना सुनिश्चित है। जो पवित्रता और स्थिरता-पूर्वक गायत्री की उपासना करते हैं। वे आत्मलाभ करते हैं। नारद जी ने गायत्री को भक्ति का ही स्वरूप माना है और कहा है कि जहाँ भक्ति रूपी गायत्री रहती है वहीं श्रीनारायण का निवास होने में कोई संदेह नहीं करना चाहिए।
गौतम ऋषि का मत है- योग का मूल आधार गायत्री है। गायत्री से ही सम्पूर्ण योगों की साधना होती है। शृंगी ऋषि की उक्ति है कि ज्ञान-विज्ञान का आदि स्रोत गायत्री ही है। उससे अधिक संसार में और कुछ नहीं है। देव गुरु बृहस्पतिजी कहते हैं कि देवत्व और अमरत्व की आदि जननी गायत्री है। इसे प्राप्त करने के पश्चात और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता।
उपरोक्त अभिमतों से मिलते जुलते अभिमत प्रायः सभी प्राचीन ऋषियों के हैं। अन्य बातों में चाहे आपस में मतभेद भले ही रहे हों पर, गायत्री के बारे में उन सब में समान श्रद्धा थी और वे सभी अपनी उपासना में उसका प्रथम स्थान रखते थे। मध्यकाल के संतों एवं वर्तमान शताब्दी के आध्यात्मिक महापुरुषों ने भी गायत्री के महत्व को उसी प्रकार स्वीकार किया है जैसा कि प्राचीन काल के तत्वदर्शी ऋषि-मनीषियों ने किया था। आज का युग बुद्धि और तर्क का, प्रत्यक्षवाद का है।
महात्मा गाँधी कहते हैं- “ गायत्री मंत्र का निरंतर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्मा की उन्नति के लिए सर्वाधिक उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शाँति पूर्ण हृदय से किया हुआ भावपूर्ण जप आपत्तिकाल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है। “
महामना मदन मोहन मालवीय जी का कथन है- “ ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमें दिये हैं उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री ऐसी है जिससे बुद्धि पवित्र होती है। ईश्वर का प्रकाश आत्मा में आता है। इस प्रकाश से असंख्य आत्माओं को भव बंधनों से ज्ञान मिलता है। गायत्री में ईश्वरीय सत्ता-आदर्शों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करने की शक्ति है। साथ ही भौतिक अभावों को भी वह दूर करती है। जो द्विज गायत्री जप नहीं करता वह अपने कर्तव्य धर्म छोड़ने का अपराधी होता है। लोकमान्य तिलक एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी गायत्री को आत्मा के अंदर प्रकाश उत्पन्न करने तथा भारतवर्ष को जगाने वाला मंत्र कहा है। यह मंत्र इतना सरल है कि एक श्वाँस में इसका उच्चारण किया जा सकता है। इस पुनीत मंत्र का अभ्यास करने में किसी प्रकार के तार्किक ऊहापोह किसी प्रकार के मतभेद अथवा किसी प्रकार के बखेड़े की गुँजाइश नहीं है।
महर्षि अरविन्द ने कई जगह गायत्री का जप करने का निर्देश किया है और कहा है कि गायत्री में ऐसी शक्ति सन्निहित है जो महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है। उन्होंने स्वयं इसके सावित्री पक्ष का अवलम्बन लेकर आत्मोत्कर्ष की उपलब्धि की।
इन उपाख्यानों में वेद, उपनिषदों से लेकर मनीषियों तक ने एक स्वर में यह स्वीकार किया है कि व्यक्ति की अंतः भूमिका को परिष्कृत कर उसे सुखी-समुन्नत बनाने के सारे तत्व गायत्री में विद्यमान है। एकाँगी प्रगति कभी चिरस्थाई नहीं हो सकती, यह गायत्री महामंत्र की अद्वितीय विशेषता है। स्वार्थ के साथ परमार्थ, लोक के साथ पारलौकिक कल्याण का योग ही परिपूर्ण कहा जा सकता है, यह सारी शिक्षाएं गायत्री उपासना में सन्निहित हैं।
अपने गुरु की परिस्थितियाँ अपने ढंग की अनोखी हैं। इनमें कंस और रावण की तरह प्रत्यक्ष आक्रमण जैसा कोई संकट नहीं है, फिर भी स्थिति की विपन्नता ऐतिहासिक महा संकटों की तुलना में कहीं अधिक भयानक हैं। विपत्तियों का नया स्वरूप है- आस्था संकट। आज मानवी अंतराल में ऐसी मान्यताओं ने जड़ जमा ली हैं जिन्हें आदर्शों के प्रति अनास्था कह सकते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता पर आधारित विलासी अहमन्यता ही आज जन-जन की आस्था बन गयी है। वासना, तृष्णा एवं लोभ-मोह की ललक-लिप्सा दावानल की तरह बढ़ रही है और अपनी लपटों में उन सभी को लपेट रही है जिन्हें मानवी गरिमा से अभिपूरित जाना जाता रहा है।
इन परिस्थितियों को मनुष्यकृत सामान्य- प्रयत्न कदाचित ही संभाल सकते हैं। प्रगति के लिए प्रयत्नशील नेतृत्व ने हर मोर्चे पर असफलता अनुभव की है और निराशा व्यक्त की है। ऐसे असंतुलन को संतुलन में बदलने का महान कार्य स्रष्टा की सूक्ष्म चेतना और दिव्य प्रेरणा ही सम्पन्न कर सकती है। गायत्री महाशक्ति का- ऋतम्भरा प्रज्ञा का अवतरण ही अपने युग के आस्था संकट को दूर कर सकता है। यही कार्य इन दिनों सम्पन्न हो रहा है। समय की आवश्यकता के अनुरूप महाकाल की प्रचंड हलचलें युग अवतार का उद्देश्य पूरा करने के लिए क्रमशः अधिकाधिक प्रखर होती चली जा रहीं हैं। साधना का रक्षा−कवच धारण कर हममें से हर कोई आने वाली प्रतिकूलताओं व आसन्न संकट से स्वयं का बचाव व विश्व वसुधा का गौरव बढ़ाने वाला कार्य सम्पन्न करता है।
इन परिस्थितियों को मनुष्यकृत सामान्य- प्रयत्न कदाचित ही संभाल सकते हैं। प्रगति के लिए प्रयत्नशील नेतृत्व ने हर मोर्चे पर असफलता अनुभव की है और निराशा व्यक्त की है। ऐसे असंतुलन को संतुलन में बदलने का महान कार्य स्रष्टा की सूक्ष्म चेतना और दिव्य प्रेरणा ही सम्पन्न कर सकती है। गायत्री महाशक्ति का- ऋतम्भरा प्रज्ञा का अवतरण ही अपने युग के आस्था संकट को दूर कर सकता है। यही कार्य इन दिनों सम्पन्न हो रहा है। समय की आवश्यकता के अनुरूप महाकाल की प्रचंड हलचलें युग अवतार का उद्देश्य पूरा करने के लिए क्रमशः अधिकाधिक प्रखर होती चली जा रहीं हैं। साधना का रक्षा−कवच धारण कर हममें से हर कोई आने वाली प्रतिकूलताओं व आसन्न संकट से स्वयं का बचाव व विश्व वसुधा का गौरव बढ़ाने वाला कार्य सम्पन्न करता है।
मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास-निर्माण में आमतौर से वातावरण और प्रयत्न-पुरुषार्थ का महत्व माना जाता है। यह मान्यता एक सीमा तक ही ठीक है। क्योंकि एक जैसी परिस्थितियों में जन्में और पले बालक आगे चलकर भारी भिन्नता युक्त देखे गये हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि संतान के व्यक्तित्व का ढाँचा बनाने में जो जीवन तत्व काम करते हैं, वे न जाने कितनी पीढ़ियों से चले आते हैं। मातृकुल और पितृकुल के सूक्ष्म उत्तराधिकारियों से वे बनते हैं। सम्मिश्रण की प्रक्रिया द्वारा वे परंपरागत स्थिरता ही नहीं बनाए रहते, वरन् विचित्र प्रकार से परिवर्तित होकर कुछ से कुछ बन जाते हैं।
मनुष्य ही नहीं, वरन् पृथ्वी पर पाए जाने वाले जितने भी प्रकार के वनस्पति एवं प्राणी समुदाय के जीव पाए जाते हैं, उन सबके जीवन का आधार वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है। इस सदी के पूर्वार्द्ध के बाद इस संबंध में इतना अधिक अनुसंधान हुआ है कि इसके लिए नित नयी रिपोर्ट तैयार होती है। शोध की इतनी तीव्र गति होने का श्रेय इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप एवं ‘ साइवरनेटिक्स ‘ जैसी विधा को है, जिसमें वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों की जानकारियों को समग्र रूप से प्रस्तुत किया जाता है।
छोटे से छोटे जीव अमीबा से लेकर जटिलतम संरचना वाले मानव शरीर की रचना एक ही प्रकार के जीवन रस से हुई मानी जाती है। विभिन्न प्रकार के जीवों की शरीर रचना बनाने के सूत्र संकेत अपने में समेटे हुए, पदार्थ को वैज्ञानिकों ने डी. एन. ए. डीआँक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल नाम दिया है। यही डी. एन. ए. नामक जीवन रस वंशानुक्रम के सब रहस्यों को अपनी पिटारी में बन्द किये हुए रहता है। गुण सूत्रों पर चिपके हुए इस डी. एन. ए. में अनेकानेक अति सूक्ष्म नाजुक स्प्रिंग जैसे पदार्थ इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा देखे जा सकते हैं। जिन्हें ही “ जीन्स “ कहा जाता है। जीन्स में स्मृति कोष होते हैं और माइक्रोस्कोपिक कंप्यूटर में जैसे विभिन्न प्रकार के संकेत एवं विस्तृत सूचनायें निकलती रहती हैं, उसी प्रकार इनमें शरीर की रचना के बारे में जीव कोषों को निर्देश मिलते रहते हैं। जिससे शरीर के करोड़ों विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में परस्पर समन्वय स्थापित होता है।
शरीर के लाल रक्त कणों एवं कुछ विषाणुओं को छोड़कर प्रत्येक जीव में डी. एन. ए. पाया जाता है। वयस्क मनुष्य के शरीर में डी. एन. ए. के 600 अरब ‘ ऊर्जा पैकेट्स ‘ पाए जाते हैं। इन सबकी रासायनिक संरचना समान एवं आकार-प्रकार एक सा होता है। केवल मनुष्य में ही नहीं, घास के पत्तों, कुत्ते, बिल्ली, चूहे आदि प्रत्येक जीवधारी शरीर रचना में डी. एन. ए. के पैकेट्स का आकार-प्रकार एवं रासायनिक संरचना एक सी होती है। जीवों में विभिन्नता लाने के
‘ कोड ‘ डी. एन. ए. में ही छिपे होते हैं जिसके फलस्वरूप ही चिड़ियां, मछलियाँ, वनस्पति, कीट पतंगों एवं विभिन्न प्राणियों की सृष्टि होती है। डा. हरगोविन्द खुराना नामक भारतीय वैज्ञानिक ने आर. एन. ए.-राइबो न्यूक्लिक एसिड की संरचना के बारे में विशेष शोध कार्य किया जिससे उन्हें सन् 1961 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
विभिन्न प्राणियों में जाति के अनुसार क्रोमोसोम्स-गुणसूत्रों की संख्या निर्धारित हुआ करती है। सबसे अधिक गुणसूत्रों की संख्या मनुष्य में पायी जाती है। मनुष्य में इनकी संख्या 46 अर्थात् 23 जोड़ी होती है। जीवन धारण के समय भ्रूण कलल में 23 गुणसूत्र माता से और 23 गुणसूत्र पिता से संयुक्त होते हैं। प्रत्येक मनुष्य का व्यक्तित्व, उसके स्वभाव की बनावट का आधार गुणसूत्रों की संरचना में सन्निहित होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के फेफड़े, हृदय, गुर्दे, रक्त का समूचा भंडार और 35 फुट लम्बी आंतें आदि की रचना का संकेत डी. एन. ए. में छिपा होता है। मानव शरीर के विभिन्न जीवकोषों की बाहरी संरचना रासायनिक रूप से एक सी होती है। शरीर के विभिन्न अंग-अवयवों को विभिन्न कार्य करने होते हैं। त्वचा, आँख, कान, नाक आदि की बनावट डी. एन. ए. के संकेत के अनुसार होती है। यह प्रक्रिया गर्भकाल में तो चलती ही रहती है, परन्तु मनुष्य के पूरे जीवन काल में निरंतर जीवकोषों का रद्दोबदल होता रहता है।
जीवकोष के केन्द्र में बैठा डी. एन. ए. पूर्व नियोजित संस्कारों के संकेत देता रहता है। उसी के फलस्वरूप पाचनक्रिया, दिल की धड़कन, विचार एवं संवेदनाएं होती हैं। डी. एन. ए. को आधुनिक वैज्ञानिकों ने बायोकैमिकल पैरामीटर्स एव बी-एम, आर-बेसिक मेटाबाँलिक रेट का संतुलन करने वाला बताया है। इसकी रचना के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है कि सूक्ष्मदर्शी यंत्र से देखने पर यह सर्पिलाकार टेप जैसी संरचना वाला होता है। डी. एन. ए. का अणु भार 3 लाख से अधिक होता है और यदि उसके अणु के टेप शृंखला को खोलकर एक सीध में रखा जाए तो उसकी लम्बाई 5 फुट हो जाएगी। हमारा शरीर चूंकि कोशिकाओं की ईंटों से बना हुआ होता है और एक युवक के शरीर में यह कोशिकायें 600 खरब तक होती हैं इसलिए यदि सम्पूर्ण शरीर के डी. एन. ए. को खींच कर रस्सी बनायी जाए तो वह इतनी बड़ी होगी, जिससे सारे ब्रह्माँड को नाप लिया जाना संभव हो जाएगा। इस संदर्भ में शिकागो युनिवर्सिटी के मूर्द्धन्य कोशिका विज्ञानी डा. जार्ज बीडल का कहना है कि इसके अणु की संरचना इतनी लंबी इसलिए होती है कि जीवन
काल की अवधि के सभी संकेत इसी के अणु इकाइयों में संग्रहित हुआ करते हैं।
डी. एन.ए. के अणु की रासायनिक संरचना में तीन प्रमुख रासायनिक पदार्थ पाए जाते है- सुगर, फास्फेट और नाइट्रोजन के यौगिक। इसकी रचना घुमावदार सीढ़ी जैसी होती है। सीढ़ी के एक ओर सुगर, दूसरी ओर फास्फेट और बीच में नाइट्रोजन यौगिकों की होती है। जीवन के सारे रहस्य इन नाइट्रोजन यौगिकों में छिपे हुए हैं, ऐसा वैज्ञानिकों का अनुमान है जिसके रहस्यमय संकेतों को समझने के लिए विशद अनुसंधान चल रहें हैं।
सन् 1900 के आरम्भ में सुप्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. सटन ने गुणसूत्रों (क्रोमोसोम्स) के बारे में विज्ञान जगत को बताया। उनके अनुसार हर जीवकोष में गुणसूत्र व जीन्स जोड़ बनाकर रहते हैं। प्रत्येक जोड़ का एक भाग माँ एवं एक भाग पिता से आता है। शुक्राणु में जोड़ का एक ही भाग विभाजित होकर आता है जो ‘Y’ (वाय) क्रोमोसोम कहलाता है। डिम्बाणु में जोड़ का दूसरा भाग होता है जिसे ‘X’ (एक्स) क्रोमोसोम कहते हैं। ‘XX’ मिलकर मादा व XY मिलकर नर बनाते हैं। मनुष्य में 23 जोड़ क्रोमोसोम-गुणसूत्र होते हैं जिनमें 22 जोड़ (44 कुल) ‘ ऑटोसोम्स ‘ कहलाते हैं। ये शरीर रचना से सम्बंध रखते हैं। एक जोड़ ‘ सेक्स क्रोमोसोम ‘ कहलाता है। इसी से लिंग (नर या मादा) का निर्धारण होता है। मादा में XX व नर में XY का जोड़ होता है। इन्हीं क्रोमोसोम्स में सूक्ष्म न्युक्लियो प्रोटीन के कण होते हैं, जिन्हें ‘जीन्स’ कहते हे अर्थात् जिस प्रकार एक डोरे में थोड़ी -थोड़ी दूर पर गांठें लगा देते हैं। इन गुणसूत्रों में भी गांठें लगी हुई होती हैं। इन गाँठो को ही ‘जीन्स’ कहते हैं। ये विशेष स्थानों पर स्थित होते हैं जिन्हें ‘लोकस’ कहते हैं और इसी आधार पर जीव की सारी विशेषताओं का निर्धारण होता है।
एक “जीन” हेरेडिटी अर्थात् आनुवाँशिकता की रासायनिक इकाई है जो नर-मादा के संयोग से बनने वाले भ्रूण कलल में पहुँच कर उसकी मूल संरचना एवं विभाजन द्वारा प्रत्येक कोष में पहुँच कर उनकी विभिन्न विशेषताओं का स्वरूप निर्धारित करता है। गुणसूत्रों में 50-60 प्रतिशत प्रोटीन, 25-48 प्रतिशत डी. एन. ए. एवं शेष आर. एन. ए. नामक जीवन तत्व होते हैं। सर्वप्रथम डॉ. जेम्स वाटसन एवं डॉ. फ्रांसीसी क्रिक नामक वैज्ञानिकों ने डी. एन. ए. की संरचना का मूल आधार बनाया और यह बताया कि विभिन्न गुणों का प्रतिनिधित्व किस प्रकार इसकी सर्पिल संरचना पर दर्शाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार हर जीव डी. एन. ए. के अणु पर एक सुनिश्चित स्थान पर स्थित होता है और आनुवाँशिक सूचनाएं आर. एन. ए. के अणु को पहुँचाता है। आर. एन. ए. केन्द्रक से मिल कर जीवकोष के साइटोप्लाज्म में जाता है जिससे संरचना से संबंधित संस्थानों को गुणों के विषय में निर्देश दिया जा सके।
पैतृक गुणों के निर्वाह के लिए ‘ जीन्स ‘ को ही उत्तरदायी माना जाता है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को गुणों का स्थानान्तरण ‘ आनुवाँशिकी ‘ (हेरेडिटी) कहा जाता है। इसका अर्थ है-शारीरिक-शरीर कार्य प्रणाली से संबंधित एवं मानसिक गुणों का सम्प्रेषण चाहे वे दृश्य हो या अगोचर। इसे पीढ़ी का सतत् निर्वाह या जीवन क्रम के विकास का मूल चरण माना जा सकता है। यद्यपि बच्चे अपने माता-पिता से मिलते-जुलते दीखते हैं, तथापि उनमें कुछ विभिन्नताएं होती हैं। इन्हें विज्ञान की भाषा में ‘ वेरिएन्स ‘ कहा जाता है। एक ही पिता की दो संतानों, एक ही जाति के विभिन्न जीवों एवं एक ही वंश परम्परा से अलग-अलग प्रकार की भिन्नताएं पायी जाती हैं। इस विज्ञान को जिसमें इन विभिन्नताओं के कारण उत्पन्न समानताओं एवं असमानताओं के मूल कारणों का विवेचन किया जाता है तथा संतान के व्यवहार, शरीरगत विशेषताओं एवं पिता की पीढ़ी से संतान की पीढ़ी तक उनके पहुँचने की विधि-व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है-
‘जेनेटिक्स’ कहा जाता है। पर्यावरण अर्थात्- वातावरण, अनुभव एवं अभ्यास से होने वाले परिवर्तन जेनेटिक्स से कोई मतलब नहीं रखते।
‘ जेनेटिक्स ‘ अथवा जनन विज्ञान जीवविज्ञान की एक शाखा है जिसकी उपशाखा- ‘ यूजेनिक्स ‘ कहलाती है। हिन्दी में इसे ‘ सुप्रजनन ‘ अथवा ‘ नस्ल सुधार ‘ कहते हैं। मानवीय विकास के नये आधारों में इस विज्ञान का आश्रय लेने की बात अब गंभीरता पूर्वक सोची जा रही है। मनुष्यों की वर्तमान पीढ़ी की अपेक्षा उसके पूर्वज शारीरिक, मानसिक व दीर्घ जीवन की दृष्टि से बढ़-चढ़ थे। आज के मनुष्यों की इस कमी को पूरा करने तथा ‘ जीन्स ‘ के घटक डी. एन. ए. के साथ सीधे हस्तक्षेप करके नुकसान पहुँचाने वाले एवं वंश परम्परागत रोग उत्पन्न करने वाले तत्वों को हटाकर जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा उनके स्थान पर लाभदायक अर्थात् शरीरगत बलिष्ठता, मानसिक कुशाग्रता बढ़ने वाले जीन्स को बढ़ने का अनुसंधान प्रयास चल रहा है। विशेषज्ञों के इन प्रयासों को देखकर लगता है कि व्यापक जीवन तत्व की संरचना में वाँछित हेर-फेर किया जा सकेगा और ऐसे मनुष्य तैयार किये जा सकेंगे जो अपने पूर्वजों से अधिक विकसित, सशक्त, समर्थ, प्रतिभाशाली एवं दीर्घजीवी होंगे। इसी संभावना को देखते हुए डा. जेम्स वाटसन एवं डा. फ्राँसिस क्रिक ने सन् 1962 में इस क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान नोबुल पुरस्कार ग्रहण करते हुए कहा था- “ सूत्र हाथ में आ गया है “ सूत्रधार नहीं ; संभव है एक दिन वह भी हाथ लग जाएगा और तब आज जो मनुष्य प्रकृति के इशारे पर नाचता है, तब प्रकृति उसके इशारों पर चलने लगे। “
‘ जेनेटिक्स ‘ अथवा जनन विज्ञान जीवविज्ञान की एक शाखा है जिसकी उपशाखा- ‘ यूजेनिक्स ‘ कहलाती है। हिन्दी में इसे ‘ सुप्रजनन ‘ अथवा ‘ नस्ल सुधार ‘ कहते हैं। मानवीय विकास के नये आधारों में इस विज्ञान का आश्रय लेने की बात अब गंभीरता पूर्वक सोची जा रही है। मनुष्यों की वर्तमान पीढ़ी की अपेक्षा उसके पूर्वज शारीरिक, मानसिक व दीर्घ जीवन की दृष्टि से बढ़-चढ़ थे। आज के मनुष्यों की इस कमी को पूरा करने तथा ‘ जीन्स ‘ के घटक डी. एन. ए. के साथ सीधे हस्तक्षेप करके नुकसान पहुँचाने वाले एवं वंश परम्परागत रोग उत्पन्न करने वाले तत्वों को हटाकर जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा उनके स्थान पर लाभदायक अर्थात् शरीरगत बलिष्ठता, मानसिक कुशाग्रता बढ़ने वाले जीन्स को बढ़ने का अनुसंधान प्रयास चल रहा है। विशेषज्ञों के इन प्रयासों को देखकर लगता है कि व्यापक जीवन तत्व की संरचना में वाँछित हेर-फेर किया जा सकेगा और ऐसे मनुष्य तैयार किये जा सकेंगे जो अपने पूर्वजों से अधिक विकसित, सशक्त, समर्थ, प्रतिभाशाली एवं दीर्घजीवी होंगे। इसी संभावना को देखते हुए डा. जेम्स वाटसन एवं डा. फ्रांसीसी क्रिक ने सन् 1962 में इस क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान नोबुल पुरस्कार ग्रहण करते हुए कहा था- “ सूत्र हाथ में आ गया है “ सूत्रधार नहीं ; संभव है एक दिन वह भी हाथ लग जाएगा और तब आज जो मनुष्य प्रकृति के इशारे पर नाचता है, तब प्रकृति उसके इशारों पर चलने लगे। “
किसी का बहिरंग का वैभव-बड़प्पन देखकर उसकी गरिमा का मूल्याँकन करना सही नहीं कहा जा सकता। गरिमा उत्कृष्टता में छिपी रहती है, क्योंकि सशक्तता उसी के साथ जुड़ी रहती है। सूक्ष्म जगत में प्रवेश करने पर भौतिकता का कलेवर नहीं रहता, पर इससे शक्ति में कोई कमी नहीं आती, वरन् वह आवरण का भार हल्का हो जाने पर और भी अधिक सम्पन्न बनती जाती है।
अध्यात्म-सूक्ष्मता का विज्ञान है। उसमें पदार्थ के विस्तार को नहीं, गुणों की- सूक्ष्म विशेषताओं को, तेजस्विता को, अधिक महत्व दिया गया है। आँतरिक उत्कृष्टताएं आँखों से दृष्टिगोचर नहीं होतीं, तो भी उनका प्रभाव कितना अधिक होता है, इसे सहज ही जाना जा सकता है। विचारवान इसलिए विस्तार की अपेक्षा सूक्ष्मता-जन्य प्रखरता को ही महत्व देते हैं।
दृश्य रूप बड़े हो तो उसकी महत्ता भी उतनी ही होगी, यह बात स्थूल स्तर पर ही सही सिद्ध होती है। सूक्ष्म प्रयोजनों में स्वल्प का महत्व बढ़ता जाता है। दृश्य जगत क्या है ? पदार्थों का समुच्चय। पदार्थ क्या है ? यौगिकों, तत्वों और परमाणुओं का समन्वय। परमाणु क्या है ? विद्युत बिंदुओं का संगठन। इन विद्युत बिंदुओं- इलेक्ट्रॉन- प्रोटानों की भी गहराई अभी खोजी जा रही है। दृश्य जगत वस्तुतः उन विद्युत बिंदुओं से आरंभ होता है, जो कहने सुनने में सरल, किंतु देखने- अनुभव करने में अत्यंत छोटे कलेवर के कारण अति कठिन है।
हमारे शरीर के कोशाणु बहुत ही छोटे हैं। उनकी अवशोषण शक्ति भी उनके कलेवर के अनुरूप ही स्वल्प है। उनमें प्रवेश कर सकने वाले पदार्थ इतने छोटे होने चाहिए, जो इन शरीरगत कोशाणुओं के भवन में आसानी से प्रवेश पा सके। आहार में प्राकृतिक रूप से हर जीवनोपयोगी पदार्थ बहुत ही छोटे अंशों में विद्यमान रहते हैं, इसलिए वे पच कर शरीर में घुल-मिल जाते हैं; पर यदि उन्हें सघन रूप से लिया जाय, तो उनके मोटे कण चूर्ण-विचूर्ण होने में बहुत समय और श्रम लेंगे और तब कहीं कठिनाई से थोड़ी मात्रा में हजम होंगे। यही कारण है कि शाक-भाजी, अन्न-दूध में अत्यंत स्वल्प मात्रा में मिले हुए क्षार और खनिज हमारे शरीर में घुल जाते हैं ; किंतु उन्हीं पदार्थों को यदि गोलियों के रूप में खाया जाये तो उनका बहुत छोटा अंश ही शरीर को मिलेगा, बाकी स्थूल होने के कारण बिना पचे ही मल मार्ग से निकल जाएगा।
हाइड्रोजन परमाणु का एक इलेक्ट्रॉन अपने केन्द्र के चारों ओर एक सेकेण्ड में 6000 खरब चक्कर काटता है। परमाणु की संरचना सौरमण्डल के सदृश्य है। उनके भीतर विद्युत कण भयंकर गति से घूमते हैं, फिर भी उनके पेट में बड़ा सा आकाश भरा रहता है। परमाणुओं के गर्भ में चल रही भ्रमणशीलता के कारण ही इस संसार में विभिन्न हलचलें हो रहीं हैं। यदि वे सब रुक जायें, तो पदार्थ सत्ता अपना अस्तित्व बनाये रख पाना मुश्किल हो जायेगा और सर्वत्र अकल्पनीय शून्यता दिखाई पड़ेगी।
वजन की दृष्टि से कौन भारी और कौन हल्की है, इस आधार पर उसकी गरिमा का मूल्याँकन नहीं हो सकता। चट्टान बहुत भारी है ; किंतु उसका मूल्य हीरे के एक टुकड़े के बराबर नहीं होता। सबसे हल्के हाइड्रोजन अणु अन्य भारी समझे जाने वाले अणुओं की तुलना में कम नहीं अधिक ही महत्व प्राप्त कर रहें हैं।
बड़े पदार्थ अणुओं का एक विशाल रूप होता है। प्रत्येक कण, को अपना स्वतंत्र अस्तित्व और प्रभाव प्रकट करने का अवसर नहीं मिलता। वे यदि अलग-अलग होकर अपनी मूलसत्ता को प्रकट कर सकने की स्थिति में होते हैं, तो आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार नमक का एक करोड़वाँ भाग भी अपना आश्चर्यजनक काम करता है।
आहार और चिकित्सा में सूक्ष्मता को महत्व मिलना चाहिए। इस तथ्य पर विज्ञान वेत्ता बहुत समय से प्रकाश डाल रहें हैं। होम्योपैथी के जनक डा. हैनीमैन का कहना था कि यदि समस्त चिकित्सा पद्धतियों को सूक्ष्मता के सिद्धाँत पर आधारित किया गया होता, तो आज जितनी बीमारियाँ दवाओं के पार्श्व प्रभाव से उत्पन्न होती देखी जाती हैं, वह व्यथा तब शायद न दिखाई पड़ती। उनका मानना था कि दवाओं की स्थूल मात्रा से रोग घटने के बजाय बढ़ते हैं। इसलिए होम्योपैथी में सूक्ष्मता के सिद्धाँत को महत्व दिया गया है। आयुर्वेद भी इसी सिद्धाँत पर आधारित है, पर एलोपैथी इस पर विश्वास नहीं करती। वह मात्राओं की बहुलता पर अधिक भरोसा करती है। अतएव उसमें एक व्याधि के समाप्त होते ही भारी मात्रा में खाई गई दवाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरी बीमारी के उत्पन्न होने की शत-प्रतिशत आशंका बनी रहती है। यह औषधियों के सूक्ष्म स्थूल स्वरूप की लाभ हानि हुई।
आहार शास्त्र में भी यही सिद्धाँत काम करता दिखाई पड़ता है। दूध को लें, तो उसमें एक ग्रेन का छः लाखवाँ अंश जितना स्वल्प लोहा होता है; पर इतने से ही बच्चे के शरीर की लौह आवश्यकता पूरी हो जाती है। यदि इसी लोहे को गोली के रूप में दें, तो उससे पोषण की जगह उल्टा-स्वास्थ्य संकट उठ खड. होगा और शरीर पर अनावश्यक बोझ बढ़ेगा।
बात को और भी स्पष्ट रूप से समझने के लिए यह स्मरण रखना चाहिए कि एक क्यूबिक इंच के 1, 20, 00, 000 वाँ भाग आकार का एक लाल रक्त कण होता है। एक बूँद खून में इस तरह के प्रायः तीन लाख अणु होते हैं। वे ही खनिजों, क्षारों- तथा अन्य रसायनों को अपने ऊपर लादे सारे शरीर में ढोते फिरते हैं। इन पर कितनी हलकी और विरल वस्तु लद सकती है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है और खाद्य पदार्थों में सूक्ष्मता के सिद्धाँत की उपयोगिता समझी जा सकती है।
मनुष्य की स्वयं की पूर्ण सत्ता बीज रूप में कितनी छोटी होती है, यह जानने के लिए हमें शुक्राणु के आकार पर विचार करना होगा। गर्भाधान के समय उसका आकार एक क्यूबिक मिलीमीटर का दस लाखवाँ भाग जितना होता है। उसी के भीतर शारीरिक और मानसिक दृष्टि से एक पूर्ण मानव मौजूद रहता है। इस आधार पर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि सूक्ष्मता अपने अंदर कितनी बड़ी विशालता संजोये रहती है। इतने पर भी उसे यह पता नहीं होता कि काया की विशालता का कोई मूल्य नहीं। जीवन तो नाप-तौल में न आ सकने वाली अकिंचन- सी चेतना का है। वह चेतना ही इतने बड़े शरीर-यंत्र के अगणित कलपुर्जों का संचालन करती है। जब वह शिथिल पड़ जाती है, तो शरीर लड़खड़ा जाता है और विलग हो जाने पर वही देह तत्काल सड़-गल कर नष्ट होने लग जाती है।
यहाँ कहा मात्र इतना भर जा रहा है कि आकार-प्रकार की डील-डौल से पदार्थ और प्राणी की शक्ति एवं श्रेष्ठता का अनुमान लगाना ठीक नहीं। जो व्यक्ति अथवा वस्तु आकार में बड़े एवं आकर्षक हैं, वह श्रेष्ठ एवं सामर्थ्यवान होंगे, इसके विपरीत छोटे, अनाकर्षक व सामान्य दिखने वाले क्षुद्र व छोटे होंगे- यह मान्यता उचित नहीं। सूक्ष्म अदृश्य है और स्थूल दृश्य- इस आधार पर यह कहा जाए कि सूक्ष्म की महत्ता नगण्य जितनी है, तो इसे बाल-बुद्धि ही कहना चाहिए। वास्तविकता तो यह है कि हम जैसे-जैसे सूक्ष्मता की ओर बढ़ते हैं और अधिक समर्थ और सशक्त होते हुए उपनिषद्कार के शब्दों में “ विद्युत ब्रह्म “ की सीमाएं छूने लगते हैं। इसी का इसी का संकेत वृहदारण्यक उपनिषद् के ऋषि “ विद्युद्येव ब्रह्म “ (5-7-1) कह कर करते हैं। अध्यात्म अवलंबन द्वारा इसी प्रक्रिया को सम्पन्न किया जाता है इस मार्ग में बढ़ता हुआ व्यक्ति जैसे-जैसे गहराई में उतरता जाता है उसका आपा उतना ही उत्कृष्ट और उदात्त बनता जाता है, बाह्य जीवन कृत्रिमता से दूर सरल और सादगी युक्त चला जाता है। उसका बाह्य दृश्यमान स्वरूप वैसा होते हुए भी भीतर की महानता अपनी जगह अक्षुण्य बनी रहती है।
चर्म चक्षुओं से दीख पड़ने वाले वैभव विस्तार का मूल्य बढ़-चढ़ कर मानने की स्थूल बुद्धि प्रायः धोखा खाती है। गहराई में तलाश करने से पता चलता है कि महत्व विस्तार का नहीं उसमें सन्निहित सूक्ष्म क्षमता और उत्कृष्टता का है। मनुष्य को धन, बल, पद, ज्ञान आदि के आधार पर नहीं, उसकी आँतरिक स्थिति के मूल्याँकन के बाद भली-भाँति देखकर ही यह समझा जा सकता है कि वह कितना समर्थ और कितना गरिमा वान है।
वृद्धा नियम से चर्च जाती और पादरी का प्रवचन मन लगा कर सुनती, जब भगवान का नाम आता तो बुढ़िया बड़ी भक्ति भाव से सिर झुकाती और जब-जब शैतान का प्रसंग आता तो भी बुढ़िया उसी भाव से सिर झुकाती। पादरी चकित हुआ। उसकी उत्सुकता बढ़ी। वे अपने को रोक न सके। एक दिन कथा समाप्त होते ही चर्च से बाहर बुढ़िया को रोक कर पूछने लगे। माँ परमात्मा का नाम आने पर सिर झुकाने की बात तो समझ में आती है। किंतु शैतान का नाम आने पर जो सिर झुकाती हो यह बात समझ में नहीं आती। बुढ़िया बोली “ कौन जाने किस वक्त किससे काम पड़ जाये ?”
बौद्धिक उतार-चढ़ाव, तर्क-वितर्क हमारे क्रियाकलापों को अधिक लाभदायक और सुरक्षा-युक्त बनाने में सहायता करते हैं ; पर प्रायः जीवन को वे कोई दिशा या प्रेरणा नहीं देते। किसी विचार से सहमत होने पर आवश्यक नहीं कि उसे कार्यान्वित करने का उत्साह उभरे ही। जो किया जाता है, उसका आनंद सामान्यतया तब मिलता है, जबकि सफलता मिलती है। असफलता प्राप्त हो, तो दुःख होगा। यह बौद्धिक अनुभूति हुई। आन्तरिक आस्थाओं का प्रभाव इससे ज्यादा गहरा है। उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठावान रहने भर की मान्यता दृढ़ रहे तो इतने भर से कोई व्यक्ति अपनी उत्कृष्टता पर गर्व कर सकता है। यह आस्थाओं का चमत्कार है, जो बिना सफलताओं के भी मात्र अपनी आँतरिक उपस्थिति भर से अंतःकरण को उत्फुल्लता से भरे रहती है।
आस्थाएं प्रेरणा उभारती हैं ; बढ़ने के लिए गति और सोचने के लिए प्रकाश प्रस्तुत करतीं हैं। उदात्त की दिशा में बढ़ सकना आस्थाओं की विद्यमानता के बिना हो ही नहीं सकता। निष्ठा से संकल्प उठता है और संकल्प से साहस और पराक्रम उभरते हैं। तन्मयता तथा तत्परता इसी अंतःस्थिति में से किसी प्रयास से नियोजित होती है और मन एवं कर्म का ऐसा स्तर बन पड़ने पर ही महत्वपूर्ण प्रगति संभव होती है। सोचने से पता चलता है कि बुद्धि की अपनी उपयोगिता होते हुए भी श्रद्धा की शक्ति असीम है। इसलिए शास्त्रों में श्रद्धा को ही जीवन कहा गया है। व्यक्तित्व और कुछ नहीं- श्रद्धा का प्रतिबिंब-परिचय भर है। गीताकार की यह उक्ति उसी सत्य की पुष्टि करती है-” श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छृद्वः
स एव सः “ अर्थात् “ यह व्यक्ति श्रद्धा का कुँज है। जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।” यथार्थता यही है।शरीर की बनावट और मस्तिष्कीय कुशलता का महत्व होते हुए भी उनका व्यक्तित्व के स्तर का निर्माण करने में कोई विशेष योगदान नहीं है। मनुष्य के व्यक्तित्व की ढलाई श्रद्धा की भट्टी के सान्निध्य में होती है। इस श्रद्धा तत्व की गरिमा को यदि स्वीकार किया जा सके तो, यह भी मानना पड़ेगा कि उसे विकसित, परिष्कृत एवं परिपक्व करने के लिए ईश्वर-मान्यता का अवलंबन लेना आवश्यक है। ईश्वर के अस्तित्व की आस्था और उसके साथ तादात्म्य बिठाने के प्रयास में इतना लाभ प्रत्यक्ष मिलता है कि मनुष्य की आदर्शवादी निष्ठाएं परिपक्व होती हैं और उसके सहारे व्यक्ति ऐसी बनता है, जिसमें आत्मसत्ता के अस्तित्व का परिचय भीतरी और बाहरी दोनों क्षेत्रों से प्राप्त किया जा सके।
ईश्वरीय सत्ता के विकृत स्वरूप का ही इन दिनों बोलबाला है। उनके तथाकथित भक्त उसे हर प्रकार से बहलाने- फुसलाने के कौतुक करते देखे जाते हैं और उन टंट-घंटों से अपने मनोरथ पूरा करने के सुख-स्वप्न देखते रहते हैं। जब तक इनसे लाभान्वित होने की आशा बनी रहती है, तब तक आधा अधूरा उत्साह भी रहता है ; किंतु जैसे ही लाभ संदिग्ध दिखता है, वैसे ही भक्ति भाप बनकर आसमान में उड़ जाती है। कुछ दिनों पूर्व जो ईश्वर-विश्वास उपजा था, अब वही बेकार-बकवाद लगने लगता है और नास्तिकता जैसा मानस बनने लगता है ; संसार ईश्वर-विहीन प्रतीत होता है। बात इस प्रकार की भ्राँति और उथली मनोभूमि की नहीं, सच्ची आस्तिकता की चल रही है। उसका वास्तविक लाभ श्रद्धा का सृजन करना है। यह उच्चस्तरीय आस्था के बिना संभव नहीं। यह आस्था जब प्रगाढ़ होती है, तब श्रद्धा कहलाती हैं। श्रद्धा ही महानता पैदा करती है और जीवन को इस रूप में विकसित करती है, जिसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है। जहाँ इसका अभाव होता है, वहीं महामानव बनना तो दूर जीवन में पग-पग पर दुःखों का, कष्टों का सामना करना और संकट झेलना पड़ता है। श्रद्धा और आस्तिकता का एक-दूसरे के साथ अटूट सम्बंध है। किसी को ईश्वर का प्रथम अनुदान मिलता है तो, वह श्रद्धा के रूप में ही मिलता है। फिर जैसे-जैसे इस तत्व की उपलब्धि गहनतम होती जाती है, वैसे-वैसे जीवन के अभिनंदनीय बनने की संभावना उसी अनुपात से परिपुष्ट होती चलती है। सिद्ध साधकों में जो अद्भुत सिद्धियाँ दिखाई पड़ती हैं उनकी जननी इस स्थिति को कहा जा सकता है। यह आस्तिकता का परोक्ष लाभ हुआ जिसमें संदेह करने की तनिक भी गुंजाइश नहीं है। पूजा का प्रत्यक्ष प्रतिफल मिलने में शंका की गुँजाइश होने पर इस श्रद्धा के वरदान को असाधारण वरदान की ही संज्ञा दी जा सकती है।
जीवन में भले-बुरे प्रसंग घटते रहते हैं, सफलताएं भी मिलती हैं ; पर असफलताओं, हानियों, विछोहों और दुर्घटनाओं की भी कमी नहीं। प्रतिकूलता आने से आदमी टूटने लगता है। कई बार तो वह इतना किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि क्या करना और क्या सोचना चाहिए यह सामान्य-समझ भी नहीं रह जाती, फलतः जो हानि सामने आती है, उसकी भयंकरता असाधारण होती है। टूटा व्यक्ति अपने ऊपर से आस्था-आत्मविश्वास खो बैठता है और प्रकाश की ज्योति खो बैठने से अंधकार में भटकता है। इस स्थिति में मनुष्य जीवित तो रह सकता है ; पर उज्ज्वल भविष्य की आशाएं एक प्रकार से गुम हो जाती हैं। यह अवस्था प्रत्यक्ष दुर्घटनाओं से भी अधिक भयावह है। यद्यपि यह दीखती नहीं ; पर दुष्परिणामों की दृष्टि से उसकी विभीषिका कम नहीं होती। ऐसी विपन्नता से बचने का एक ही सशक्त उपाय है ईश्वर-विश्वास।
ईश्वर-विश्वास यदि वास्तविक हो तो इस प्रकार के दुहरे प्रहार से बच सकना संभव हो सकता है। बाहरी कठिनाइयों की बढ़ी-चढ़ी विभीषिका के बावजूद आँतरिक साहस और संतुलन की स्थिति बनी रहे, तो वे सहज ही सरल हो सकती है। यह आत्मज्योति श्रद्धा का तेल पाकर ही जलती है। आस्तिक जन यह अनुभव करते हैं कि कोई दिव्य शक्ति उसके साथ है। स्वजन-संबंधियों, परिचितों-मित्रों का सहयोग छूट जाने पर भी वह सहारा देगी। दूसरे साथ छोड़ सकते हैं ; पर माता का दुलार कुपुत्र के प्रति भी यथावत् बना रहता है- यही उद्गार किसी कवि ने निम्न प्रकार से प्रकट किये हैं.....
माता न कुमाता हो सकती, हो पुत्र कुपुत्र भले कठोर। सब देव-देवियाँ एक ओर, ऐ माँ ! मेरी तू एक ओर।
मातृ स्नेह और ईश्वरीय करुणा एक ही बात है। इस संदर्भ में इन दोनों का वात्सल्य बेटे के प्रति निरंतर उमगता रहता है, भले ही बेटा कितना ही पतित क्यों न हो। ईश्वर की कृपा पतित पर- पथभ्रष्ट पर भी बरसती है और डरावनी विभीषिकाओं के बीच भी अपने आँचल में आश्रय देती है। जो उस आश्रय पर विश्वास करते हैं, उन्हें उज्ज्वल भविष्य की ज्योति घोर अंधकार की घड़ियों में भी दीख पड़ती हैं और उतना भर सहारा मिलने से मनुष्य डूबने से बच जाता है, फिर से उठ खड. होने का अवलम्बन प्राप्त कर लेता है।
जो भावनाशील और जाग्रत होती है, वैसी आत्माएं ही भगवद् अनुकंपा प्राप्त कर पाती हैं। इस संदर्भ में सूफी कवि हफीज ने अपने संस्मरण में लिखा है- एक रात उसके गुरु ने आवाज देकर किसी शिष्य को बुलाया। सब सो रहे थे ; अकेला हफीज ही जाग रहा था, सो वह उठ कर आया। गुरु ने उसे बहुत सारी महत्वपूर्ण बातें बतायी। इसके बाद फिर गुरु ने आवाज देकर किसी शिष्य को आने के लिए कहा। अब भी हफीज को छोड़सभी सो रहें थे, सो वह फिर जा पहुँचा और इस बार भी वह लाभदायक ज्ञान नोट करके लाया। उस रात इसी प्रकार पाँच बार पुकार हुई और हर बार हफीज ही पहुँचता और ज्ञान पाता रहा। कवि ने लिखा है कि गुरु के इस विशेष अनुग्रह और शिष्य के लाभान्वित होने के सौभाग्य के पीछे जगना ही कारण था। अन्य छात्रों की तरह यदि वह भी सो रहा होता तो उस लाभ से वंचित ही रहना पड़ता।, जो केवल उसे ही मिल सका।
महर्षि अरविंद कहते थे-” ईश्वर-दर्शन के लिए आत्मा की ज्योति का आलोक रहना आवश्यक है, अन्यथा अंधकार में समीप रहते हुए भी अन्य पदार्थों की तरह ईश्वर को भी नहीं देखा जा सकेगा। आत्मा की ज्योति तीन धाराओं में बहती है- जागरुकता, सतर्कता और चैतन्यता। जिसका अंतःकरण जाग्रत है ; जिसका विवेक सतर्क है और जिसकी क्रियाशीलता में चैतन्यता का समावेश है, वह हर क्षेत्र में सफल होता है। इन्हीं सफलताओं में से एक ईश्वर का साक्षात्कार भी है।”
जी. एल. गोल्डस्मिथ कहते थे- “ भगवान मनुष्य की अंतरात्मा और वह सदा सत्य की ओर उन्मुख रहती है। कोई अपनी उस अंतरात्मा से विमुख नहीं हो सकता, जो विश्वात्मा का ही एक अंग है। ऐसी दशा में किसी का भी सच्चे अर्थों में नास्तिक बन सकना संभव नहीं। यह बात दूसरी है कि ईश्वर संबंधी किन्हीं मान्यताओं से चिढ़ कर कोई उस समूची सत्ता से ही इन्कार करने का आक्रोश व्यक्त करने लगे।
मनुष्य एक ऐसी चेतना से सम्पन्न है, जो ऊँचा बैठना, श्रेष्ठ बनना और शाँति पाना चाहती है। इसी चेतना को आत्मा कहा गया है, जो हर किसी के भीतर विद्यमान है। लक्ष्य-निर्णय करने
में ही लोग भटकते हैं। आकाँक्षा सर्वत्र एक ही रहती है। असफलता एवं विपन्नता से जब मन उद्विग्न हो रहा हो, तो उसे केवल आत्मा के आँचल में ही शाँति मिल सकती है। वैभव और वर्चस्व आत्मा में निहित है। कष्टग्रस्त तो शरीर होता है। आत्मा को पहचानने पर अपनी सुसम्पन्नता और सुखद भवितव्यता पर विश्वास बना रहता है। जहाँ इस प्रकार की आस्था रहेगी, वहाँ विपन्नताओं से न तो असह्य उद्विग्नता होगी और न निराशा का भार ही वहन करना पड़ेगा।
कोई ईश्वर से विमुख होने की बात कर सकता है ; पर सत्य से विमुख होने का साहस नहीं कर सकता। झूठ बोलने वाले भी सत्य का प्रतिपादन करते हैं और अपने प्रति दूसरों से सत्य व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। दुष्टता से खिन्नता और सज्जनता में प्रसन्नता आत्मा की प्रकृति है। उसे अपने व्यवहार में कोई चाहे भले ही उपेक्षित करता रहे, फिर भी दूसरों के व्यवहार-दर्पण में उसे देखने की आकाँक्षा बनी रहती है। दूसरों के साथ-साथ स्वयं को भी तभी संतोष मिलता है, जब कुछ उदार सद्व्यवहार बन पड़ता है। यही है आत्मा का अस्तित्व, जिससे इन्कार कर सकना न नास्तिक के लिए संभव है और न आस्तिक के लिए। हम इस आत्मा को झुठलाने का प्रयत्न कर सकते हैं ; पर इसमें सफलता किसी को भी मिल नहीं सकती। अपने अस्तित्व में अपनी मूल प्रकृति में समाये हुए सत्य, श्रेष्ठ और संतोष के प्रति आस्था रखे बिना किसी का भी काम नहीं चल सकता। इसलिए आत्मा के अस्तित्व से इन्कार करने वाला भी आत्म-विश्वास का परित्याग कर सकने में समर्थ व सफल नहीं हो सकता।
कर्म के लिए मनुष्य स्वतंत्र है। वह चाहे शुभ करे या अशुभ, इसकी उसे पूरी छूट है। शुभ का फल सदा श्रेष्ठ होता है और अशुभ का निकृष्ट। इस शुभाशुभ के भेद के लिए भगवान ने मनुष्य में विवेक-बुद्धि का समावेश किया, ताकि जो उदात्त हो उसे अपनाये और अनुदात्त का परित्याग करे। इतने पर भी न जाने क्यों वह निम्न और निकृष्ट कर्मों में निरत रहकर दैव-दुर्विपाक, दुर्भाग्य एवं दंड का भागी बनता है। संवेदनहीन बनकर वह नरपिशाच जैसा जीवन जीता, अनेकों को कष्ट देता व प्रतिफल भी पाता है।
एलागा बेल्स रोम का सम्राट था। यों आयु की दृष्टि से वह अभी किशोर था ; किंतु अतिथि सत्कार का उसका तरीका बड़ा ही विभत्स और क्रूर था, इतना क्रूर की कई बार तो नाम की घोषणा के साथ ही अतिथि की हृदय-गति रुक जाती और प्राणाँत हो जाता। एक बार उसके मंत्री बेल्फास ने मंत्री होने के नाते सलाह देने के अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए राजा को राय दी-” इन क्रूर कर्मों में संलग्न रहने की तुलना में यदि आप प्रजाहित के कार्य में तत्पर रहे होते तो आज सर्वत्र आपकी यश गाथा गायी जाती और लोगों के हृदय में आप निवास करते”। इतना कहना था कि दरबार में बेल्फास के नाम की घोषणा कर दी गई ; बताया गया कि आज के शाही मेहमान राजमंत्री होंगे। अपना नाम सुनते ही मंत्री बेहोश होकर गिर पड़ा पर ; इतने से ही उस निर्दय सम्राट का मन पसीजने वाला न था। मेहमान के स्वागत करने की तैयारी का आदेश दिया गया। भोजन परोसने के बाद उसे मेहमान खाने में लाया गया। सामने तीक्ष्ण कीलों वाली एक लोहे की कुर्सी रखी थी। बैठने के साथ ही एक हृदय विदारक चीत्कार उभरी और फर्श रक्तरंजित हो गया। अब तक मंत्री बेहोश हो चुका था। उसे यों ही छोड़ दिया गया। बाद में उसी हालत में उसकी मृत्यु हो गयी।
यह बात नहीं कि हर अतिथि को स्वादिष्ट भोजन ही परोसे जाते। भोजन का स्तर व्यक्ति के स्तर पर निर्भर करता और प्रायः बदलता रहता। कभी खाने में लोहे की छोटी-छोटी कतरन, काँच के टुकड़े सम्मिलित होते, तो कभी थालियों को बिच्छू और साँप के टुकड़ों से सजाया जाता। जो कोई इन्हें खाने से इन्कार करता, उसकी सजा दर्दनाक मौत होती उन्हें जहरीले साँपों के घरों में बंद कर दिया जाता, जंगली जानवरों के आगे छोड़ दिया जाता। कई बार उनके हाथ-पैर काट लिए जाते और व्यक्ति को जंजीरों में कस कर जलाशय में कमर तक पानी खड. होने का आदेश मिलता। प्रहरी उसकी निगरानी करते। कई दिनों बाद जब भूख से निर्बल होकर पैर शिथिल हो जाते और शरीर का वजन सहन करने में अक्षम बनते, तो देह पानी में लुढ़क पड़ती और दंडित छटपटाते हुए सदा के लिए शाँत हो जाता।
नृशंस नरेश को जब यह तरीके पुराने पड़ते दिखे, और विशेष मनोरंजक न रह गये तो उसने मृत्युदंड का एक दूसरा उपाय निकाला। इसमें एक चिता जलायी जाती चिता की अग्नि जब अपनी प्रखरता पर होती, तो अपराधी को कुछ लोग उठाकर उसमें जिंदा फेंक देते। अभियुक्त जब बचने के लिए उससे बाहर आने का प्रयास करता, तो अग्नि को चारों ओर से घेरे संतरी अपनी बल्लम घोंप कर उसे वहीं गिरा देते। इस प्रकार जल्द ही उसकी मृत्यु हो जाती। राजा को इस क्रीड़ा में असीम आनंद मिलता।
यदा-कदा राजा स्वयं भी मेहमान बनता और दरबारियों के यहाँ भोजन में सम्मिलित होता। इसका अर्थ भी मौत था। देखा जाता कि सम्राट जिस अधिकारी के यहाँ भोजन करता, दूसरे दिन उसके परिवार के किसी सदस्य को वह भी अपने यहाँ बुलाता, उसकी आरती उतारता, स्वागत-सत्कार करता, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार स्वयं उसका होता था। फिर उसकी आंखें निकाल कर उसे भटकने के लिए छोड़ दिया जाता और यह मुनादी पिटवा दी जाती कि कोई उसे भोजन न दे। अंत में भूख-प्यास से उसके प्राण निकल जाते।
क्रिया की प्रतिक्रिया और ध्वनि की प्रतिध्वनि प्रसिद्ध है। गेंद को जिस वेग से दीवार पर मारा जाता है, उसी गति से वह वापस लौट आती है। जितने बल से किसी वस्तु पर प्रहार किया जाता है, वह भी हमें उसी शक्ति से उलटे आघात करती है। यह केवल भौतिक नियम नहीं है, वरन् कर्म फल के सूक्ष्म सिद्धान्त पर भी समान रूप से लागू होता है। कई बार तो वह इतना प्रबल होता है कि हाथोंहाथ उसका परिणाम इसी जीवन में प्रत्यक्ष हो जाता है। इतिहास साक्षी है, जिसने भी अति बरती उसका अंत भी अंततः वैसी ही क्रूरता से हुआ।
एलागा बेल्स के मामले में यही हुआ। जब उसने अपनी दादी को निमंत्रित किया, तो उसके अंगरक्षकों ने उसकी बड़ी निर्ममता पूर्वक बोटी-बोटी काटकर वैसी ही दुर्गति की, जैसी की उसके द्वारा अनेकों की हुई थी। उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर उसी के समक्ष गिद्धों को खिलाए जाते रहे व वह तब तक देखता रहा जब तक कि बेहोश होकर उसका जीवन समाप्त न हो गया। नर पिशाच होते हैं, इसका साक्षी था बेल्स, किंतु क्या न्यूनाधिक मात्रा में मानव मात्र में ऐसे वृत्ति वाले नहीं है ऐसा नहीं माना जा सकता। दहेज के लिए अपने हाथों, अपने सामने, अपने घर की बहू को नृशंसतापूर्वक जलाने वाले भी नर पिशाच हैं। कर्मों के फल से वे भी न बच सकेंगे।
एलागा बेल्स के मामले में यही हुआ। जब उसने अपनी दादी को निमंत्रित किया, तो उसके अंगरक्षकों ने उसकी बड़ी निर्ममता पूर्वक बोटी-बोटी काटकर वैसी ही दुर्गति की, जैसी की उसके द्वारा अनेकों की हुई थी। उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर उसी के समक्ष गिद्धों को खिलाए जाते रहे व वह तब तक देखता रहा जब तक कि बेहोश होकर उसका जीवन समाप्त न हो गया। नर पिशाच होते हैं, इसका साक्षी था बेल्स, किंतु क्या न्यूनाधिक मात्रा में मानव मात्र में ऐसे वृत्ति वाले नहीं है ऐसा नहीं माना जा सकता। दहेज के लिए अपने हाथों, अपने सामने, अपने घर की बहू को नृशंसतापूर्वक जलाने वाले भी नर पिशाच हैं। कर्मों के फल से वे भी न बच सकेंगे।
जानवरों की बुद्धि को यदि प्रशिक्षित और परिष्कृत किया जा सके तो कई बार वे मनुष्यों जैसी प्रतिभा और प्रखरता का परिचय देने लगते हैं। ऐसी ही एक घटना 20वीं सदी के प्रारंभ की है।
इंग्लैंड का एक नागरिक था- डेविड पार्कर। विवाह हुए कई वर्ष बीत जाने पर भी उसे कोई संतान न हुई, तो उसने एक कुतिया पाल ली। नाम रखा- फाइले।
डेविड सरकारी गुप्तचर विभाग में काम करता था उसने फाइले को मनोरंजन का साधन मात्र बनाए रखना उचित न समझा और उसे प्रशिक्षित करने का निश्चय किया। जिस कला में वह प्रवीण था, जिसमें उसकी रुचि थी, उसी में कुतिया को भी पारंगत बनाने का निर्णय किया।
कुछ ही दिनों में दोनों में गहरी मित्रता हो गई, इतनी गहरी कि कभी डेविड को कार्यवश बाहर पड़ता, तो फाइले खाना-पीना त्याग कर डेविड की वाट जोहती रहती। उसके आने पर ही वह अन्न ग्रहण करती, पैरों से लिपटती और प्रेम प्रदर्शित करती।
प्रशिक्षण भी बीच-बीच में चल रहा था। डेविड जो कुछ सिखा सकता था, सिखाया जैसे चोरों का पता कैसे लगाया जाता है ; चोरी का माल कैसे बरामद किया जाता है ; अपराधी का पीछा करके उसके मनोरथ को कैसे विफल किया जाता है ; आदि अनेकानेक कौशल उसने कुतिया को खेल-खेल में सिखला दिये। रोज-रोज के अभ्यास से फाइले ने भी मनुष्यों जैसी समझ अर्जित कर ली ।
एक दिन डेविड घर से बाहर दौरे पर था। पत्नी मकान में अकेली थी। उसे किसी का साहचर्य प्राप्त था- तो वह एकमात्र कुतिया ही थी, अन्यथा रात्रि में घर एक प्रकार से सुनसान जैसा बना रहता। डेविड की उपस्थिति में उसका कोई न कोई इष्ट-मित्र आता ही रहता था, फलतः अकेलापन का डरावना वातावरण समाप्त हो जाता ; पर इस समय की स्थिति बड़ी असह्य थी। इसी का लाभ उठाकर कुछ चोर घर में घुस आये। मालकिन गहरी नींद में सो रही थी ; किंतु कुतिया जरा सा खटका होते ही जाग पड़ी। प्रश्न यह था कि क्या करना चाहिए ? मोटी बुद्धि यह कहती है कि हो-हल्ला मचाया जाय ; चोरों को काटा और भगाया जाय। सम्भवतः दूर दर्शिता ने उसे सुझाया कि ऐसा करने पर उसकी तथा मालकिन की जान जा सकती है। धन को भी नहीं बचाया जा सकता था। उसने दूसरा उपाय सोचा चुपचाप मुर्दे जैसी पड़ी-पड़ी सब देखती रही। चोर माल लेकर चल दिये, तो वह दबे पाँव उनके पीछे लग ली। चोरों ने माल को पास के कब्रिस्तान में गाड़ और सुविधानुसार उसे बेचने का निश्चय किया।
कुतिया ने यह सब देखा और चुपके से घर लौट आयी। प्रातः जानकारी हुई, हल्ला मचा और पड़ोसी एकत्रित हुए। कुतिया ने एक परिचित का पैंट पकड़ और उसे कब्रिस्तान की ओर ले गयी। अन्य दर्शक भी पीछे चले। नियत स्थान पर उसने पंजों से जमीन खोदी। माल मिल गया। नन्हें-से जानवर की इस बुद्धिमानी पर सभी अवाक् रह गये।
डेविड लौटा, तो उसे फाइले की सूझ-बूझ पर भारी प्रसन्नता हुई। उसने जाना कि इसमें सीखने की क्षमता है। उसे जासूसी कुत्तों के केन्द्र में भर्ती कर दिया गया। कुछ ही समय में उसने इतनी बुद्धिमत्ता अर्जित कर ली कि उन्हीं दिनों भड़के द्वितीय महायुद्ध में उसने महत्वपूर्ण केंद्रों में अति गोपनीय पत्र मुँह में दबाकर नियत स्थान पर पहुँचाने और उनके उत्तर लेकर वापस लौटने का कार्य इतनी अच्छी तरह किया कि सेना के प्रमुख अफसर तक, दंग रह गये। उसे कप्तान का पद दिया गया। और आयु पूरी करके जब मरी, तो पूरे सैनिक सम्मान के साथ दफना कर उसका स्मारक बनाया गया, जिस पर अभी भी हर वर्ष श्रद्धाँजलि दी जाती है। जब पशुओं में ये विलक्षणताएं हैं तो मनुष्यों में तो ऐसे अगणित हैं, जिनकी प्रतिभा को यदि परिष्कृत करने में सहायता मिले तो वे साधारण से कहीं ऊँचे उठकर असाधारण स्तर के बन सकते हैं।
पंडा जी ने श्रोताओं को स्वर्ग के बारे में लंबी चौड़ी तारीफों के पुल बाँधते हुए समझाया, तो श्रोता सदेह जाने को तैयार हो गये। वे बोले “ हमें अभी भिजवा दो। यदि इतनी सुविधाएँ हैं। सब वस्तुएँ सुलभ हैं, कोई परेशानी ही नहीं है तो अभी भिजवा दीजिए” पुरोहित ने ऊंचे स्वर में कहा “ जो भी स्वर्ग जाने के इच्छुक हों वे खड़े हो जायँ” सभी खड़े हो गये। किंतु एक श्रोता बैठा ही रहा। पुरोहित ने पूछा “ तुम क्यों बैठे रह गये? “ श्रोता बोला। मुझे ऐसे स्वर्ग में नहीं जाना जहाँ खड़े-खड़े जाना पड़ता है। और जहाँ मुफ्त में सुविधाएँ ही सुविधाएँ मिलती हों, ऐसे स्वर्ग की मुझे कतई भी आकाँक्षा नहीं है। इससे तो अकर्मण्यता ही बढ़ेगी, जो मेरे भविष्य की ओर भी बिगाड़ेगी। सही भी तो है। व्यक्ति अपना स्वर्ग या नरक अपने कर्मों से स्वयं बनाता है।
कवि दंडी की साहित्य साधना चल रही थी। मार्ग-दर्शन उन्हीं के पिता कर रहे थे। किसी भी दिशा में आगे बढ़ने के लिए विशेष प्रयास, विशेष पुरुषार्थ करना ही पड़ता है। पहलवानी करना चाहे या खिलाड़ी बनना हो, वाणी का उपयोग हो या लेखनी का, ज्ञानमार्गी बने या कठोर कर्म के पथ में उतरे-सभी के लिए यही एक तत्व ज्ञान है। जितना तपेगा उतना ही निखरेगा। जितनी रगड़ खाएगा उतनी ही चमक पाएगा। कवि दंडी अपनी उपलब्धियों को अपने समकालीन कवि कालिदास की प्रतिभा से आगे ले जाना चाहते थे। वह स्वयं पूरी लगन से श्रम कर रहे थे और उनके पिता पूरी तत्परता से निर्देशन।
श्रेष्ठ-साधक अपनी साधना में अपने मार्गदर्शक को प्रधानता देकर चलते हैं। मार्गदर्शक का संतोष ही उनकी प्रगति का मानदंड बनता है। एक बार लक्ष्य निर्धारित करके फिर कितनी सीढ़ियां किस प्रकार चढ़ना है, यह मार्ग दर्शक के ऊपर छोड़ कर साधक के लग जाते हैं अपनी समूची शक्ति के साथ निर्देश को पूरा करने में। इस स्थिति में हर कदम पर उन्हें निर्देशक के संतोष का ही ध्यान रहता है। मानो वही मूल लक्ष्य हो।
दंडी अपनी सम्पूर्ण निष्ठा से इसी साधना में तन्मय थे। उनकी प्रतिभा निखरने लगी। हर प्रयास पर उन्हें प्रशंसा भी मिलती और आलोचना भी। प्रशंसा से उत्साह बढ़ कर आलोचना से आत्मशोधन करते हुए वह बढ़ रहे थे। परिचितों की दृष्टि में उनका स्तर बहुत उच्चकोटि का माना जाने लगा था। औरों से प्रशंसा पाकर उनका मन प्रसन्नता से फूल उठता। अब वे यह आशा करने लगे, कि उनके मार्ग दर्शक भी उन्हें प्रशंसा के फूलों से लाद देंगे। किंतु वहाँ कुछ उल्टी सी प्रतिक्रिया हुई। प्रशस्ति के स्थान पर आलोचना बढ़ गयी। मन को बुरा लगा, परंतु विनयी शिष्य की तरह आदेशों का पालन करते रहै।
मोम जब तक नरम रहता है तो किसी भी आकार में सहज ही मुड़ जाता है, ना चटकता है और न बेडौल होता है। साधक की जब तक अपने स्वरूप के बारे में कोई मान्यता नहीं बनती- तब तक उसका अंतः करण भी नम्र मोम की भाँति होता है। उसे कैसा भी मोड़-ढाला जाये कोई कष्ट या प्रतिक्रिया अनुभव नहीं होती। लेकिन जब अपने स्वरूप की प्रतिष्ठा की कोई मान्यता-स्पष्ट या अस्पष्ट बनते ही वह अंतःकरण अपनी लोच खो बैठता है। फिर परिवर्तन से अपनी मान्यता का स्वरूप हिलता, बिगड़ता सा लगता है। न जाने कितनी प्रतिक्रियाएं मन को बेचैन करने लगती हैं। दंडी की स्थिति भी अब कुछ इसी तरह की होने लगी है। पिता के आदेश-निर्देश, उनकी मीन-मेख उन्हें अप्रीतिकर लगने गली थी। कभी-कभी अंदर रोष भी उत्पन्न होने लगता।
पिता सब कुछ जानते समझते हुए भी उस ओर तनिक सा ध्यान नहीं दे रहे थे। कुशल शिल्पी की तरह उनका ध्यान अपनी सुगढ़ मूर्ति की बारीक से बारीक कमी तक पहुँचता था। किसी पत्थर में मनुष्याकृति थोड़े से परिश्रम से ही उभरने लगती है। सामान्य जन उसके नाक-नक्शा देख कर ही संतुष्ट होने लगते हैं। लेकिन शिल्पी अपनी कल्पना भाव उसमें भरने के लिए उन सुँदर अंगों को भी बार-बार काटता-छाँटता व घिसता रहता है। दंडी के पिता को अपना कर्तव्य भली प्रकार मालूम था। शिष्य के पथ्य-कुपथ्य का उन्हें ध्यान था। इसी कारण वह अधिक तत्परता से अधिक बारीकी से अपने कार्य में लगे थे।
उधर शिष्य की अधीरता अपने चरमोत्कर्ष पर जा पहुँचा। उसे लगने लगा- कब मेरी श्रेष्ठता पूर्णता प्रमाणित करके अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर मिले। कब लोगों की प्रशंसा और श्रद्धा का भाजन बनूँ ?।” किंतु उनकी हर ऐसी कोशिश पर पिता द्वारा श्रेष्ठता स्वीकार करने के स्थान पर दोषों की सूची बढ़ दी जाती। बहिर्मुखी होने देने के स्थान पर अधिक एकाँत सेवन के लिए दबाव दिया जाता।
दंडी का रोष बढ़ने लगा। विकृत-अहंकार, सिद्धान्त और लक्ष्य दोनों पर हावी हो गया। सामने तो मर्यादा वश कुछ न कहते, किंतु इधर-उधर अपना असंतोष व्यक्त करने लगे। लेकिन पिता पर जैसे किसी बात का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ रहा था। वह अपने काम में निर्विकार चित्त हो पूरी तन्मयता से लगे थे। अन्य व्यक्तियों से तो प्रशंसा एवं सद्भावना मिल जाती, पर पिता कठोर के कठोर। दंडी को अपने अहंकार तुष्टि में एकमात्र बाधक अब वही दिखने लगे। उन्हें यहाँ तक लगने लगा कि इनके जीवित रहते मेरा संतोष संभव नहीं।
व्यक्ति जब ज्ञान सम्मोह, स्थिति में होता है, तब ऐसी ही स्थिति हो जाती है। विवेक कुँठित हो जाता है- तथा हित-अहित भूल जाता है केवल अपना अहंकार एवं उसकी तुष्टि ही सर्वोपरि दीखने लगती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति भयंकर से भयंकर निर्णय भी ले डालता है। अपनी सारी साधना को निरर्थक करने वाले कदम उठाने को तत्पर हो जाता है। कवि दंडी भी उसी प्रवाह में बह उठे। उन्होंने निर्णय कर लिया अपनी राह के काँटे को उखाड़कर फेंकने का। पिता- मार्गदर्शक गुरु की हत्या......। अविवेक पूर्ण भयंकर कुकृत्य। किंतु उस समय विचार कहाँ था, एक उन्माद, नशा था- जो सोचने नहीं देता।
रात्रि के पूर्व ही वे ‘सशस्त्र’ पिता के शयन कक्ष में छुप गये। घड़ी भर में भयंकर घटना हो जाती। पर नियति को कुछ और ही करना था। शयन के पूर्व दंडी की माता- पति को प्रणाम करने पहुँची। संयोग से उन्होंने अपने पुत्र का प्रसंग छेड़ दिया। माँ ने पुत्र का पक्ष लेते हुए उसके प्रति कड़ाई की शिकायत की। पुत्र की बढ़ती हुई प्रतिभा की सराहना की और पति से उनके कठोर व्यवहार का कारण पूछा।
सिरहाने के पास छुपे हुए दंडी की उपस्थिति से अनजान पिता का स्नेह ज्वार उफन पड़ा। मार्ग दर्शक की कठोरता हट गयी। भरी आँखों गदगद वाणी से वे अपने पुत्र की प्रशंसा करने लगे। बड़ाई करते हुए बोले-” भद्रे! सच कहा जाय तो दंडी मेरी सीमा से भी आगे जा चुका है। किसी भी पिता को अपने ऐसे प्रतिभाशाली पुत्र पर
गर्व होगा.......।” दंडी के कान इससे अधिक कुछ न सुन सके। वह स्तब्ध, आश्चर्यचकित सोच रहे थे-” इतना स्नेह इतनी श्रेष्ठ मान्यता..... फिर इतनी कठोरता क्यों ?”
पुनः कानों ने सुनना शुरू किया। इस बार पिता नहीं मार्ग दर्शक गुरु बोल रहे थे। “ किंतु देवी! मेरा कर्तव्य कठोर है। दंडी की असाधारण क्षमता को यों ही नहीं छोड़ जा सकता। फिर उसका लक्ष्य भी कालिदास की प्रतिभा से आगे निकल जाने का है। इस अवसर पर मेरी थोड़ी सी ढील सदा के लिए उसकी प्रगति की संभावना समाप्त कर सकती है। पिता की तरलता पुत्र का अहित न कर दे, इस कारण गुरु भाव से अधिक कठोर बनना ही पड़ता है। दंडी इस कठोर साधना के योग्य नहीं हैं, ऐसा मेरा हृदय स्वीकार नहीं करता। यदि वह सह सका तो अवश्य पा लेगा। अन्यथा मेरा तिरस्कार करेगा तो भी उसका जो स्तर है, वह तो बना ही रहेगा। मैं क्यों उसके अंदर में हीन कल्पना लाकर अपना कर्तव्य छोड़ू ?”
दंडी की मानों समाधि लग गयी। सारा शरीर रोमाँचित हो रहा था- नेत्रों से अश्रु बह रहे थे। कब माता चली गयी, कब पिता सो गये, उन्हें कुछ भान न हो सका। सारी रात वह एकटक अपने पिता को, अपने मार्ग दर्शक को देखते रहे, मनुष्य है या देवता। क्या देवता भी इतने उज्ज्वल हो सकते हैं......? आँसू झरते रहें- कलुष धुलता रहा।
प्रातः काल से दंडी अद्वितीय निष्ठावान शिष्य साधक हो गये। पिता के स्वकर्तव्यनिष्ठ स्वरूप ने शिष्य की भ्राँति मिटा दी और दंडी समर्थ कवि बन सके। स्वयं माँ सरस्वती ने उनकी श्रेष्ठता स्वीकार की।
नहुष को पुण्य फल के बदले इन्द्रासन प्राप्त हुआ। वे स्वर्ग में राज्य करने लगें। ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हें न आए, ऐसे कोई बिरले ही होते हैं। नहुष भी सत्ता मद से प्रभावित हुए बिना न रह सके। उनकी दृष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी। वे उसे अपने अंतःपुर में लाने की विचारणा करने लगे। प्रस्ताव उनने इन्द्राणी के पास भेजा। इन्द्राणी बहुत दुःखी हुईं। राजा के विरुद्ध खड. होने का साहस उसने अपने में न पाया, तो एक दूसरी चतुरता बरती। नहुष के पास संदेश भिजवाया कि वह ऋषियों की पालकी में जोते और उस पर चढ़कर मेरे पास आवें, तो प्रस्ताव स्वीकार कर लुँगी।
आतुर नहुष ने अविलंब वैसी व्यवस्था की, ऋषि पकड़ बुलाए, उन्हें पालकी में जोता गया, उस पर चढ़ हुआ राजा जल्दी-जल्दी चलने की प्रेरणा देने लगा। दुर्बलकाय ऋषि दूर तक इतना भार लेकर तेज चलने में समर्थ न हो सके। अपमान और उत्पीड़न से वे क्षुब्ध हो उठे। एक ने कुपित होकर श्राप दे ही तो डाला-” दुष्ट! तू स्वर्ग से पतित होकर पुनः धरती पर जा गिर।” श्राप सार्थक हुआ, नहुष स्वर्ग से पतित होकर मृत्युलोक में दीन-हीन की तरह विचरण करने लगें।
इन्द्र पुनः स्वर्ग के इन्द्रासन पर बैठे। उन्होंने नहुष के पतन की सारी कथा ध्यान पूर्वक सुनी और इन्द्राणी से पूछा-” भद्रे, तुमने ऋषियों को पालकी में जोतने का प्रस्ताव किस आशय से किया था ?” शची मुस्कराने लगीं। वे बोली-नाथ, आप जानते नहीं, सत्पुरुषों का तिरस्कार करने, उन्हें सताने से बढ़कर सर्वनाश का कोई दूसरा कार्य नहीं। नहुष को अपनी दुष्टता समेत शीघ्र ही नष्ट करने वाला सबसे बड़ा उपाय मुझे यही सूझा। यह सफल भी हुआ। देव सभा में सभी ने शची से सहमति प्रकट कर दी। सज्जनों को सताकर कोई भी नष्ट हो सकता है। बेचारा नहुष ही इसका अपवाद कैसे रहता ?
सावित्री महाशक्ति की साधना का भौतिक रूप, तंत्र कहलाता है। इसे वाम मार्ग भी कहते हैं। इसका उद्देश्य साँसारिक कामनाओं की पूर्ति कर सुखोपभोग करना है। इससे नाश भी संभव है और निर्माण भी, पर आत्मोपलब्धि का वह प्रयोजन अधूरा रह जाता है, जो मानव जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य है। संक्षेप में कहे, तो गायत्री का वह पक्ष, जो अपरा प्रकृति पर नियंत्रण करता है, गायत्री तंत्र है।
ताँत्रिक साधनाओं की कार्यपद्धति का आधार ही यह है कि दूसरे प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाली शक्ति को हस्ताँतरित करके एक जगह इकट्ठा कर लिया जाये और फिर उस संचित शक्ति का मनमाना उपयोग किया जाये। तंत्र में बलि प्रथा का यही प्रयोजन है। उसमें किन्हीं पशुओं का वध करके उनके पाँच प्राणों का उपयोगी भाग खींच लिया जाता है। जैसे शिकारी लोग वराह के शरीर में से चर्बी को अलग से निकाल लेते हैं वैसे ही तंत्र साधक उस वध होते हुए पशु के दस प्राणों में से उपयोगी पाँच प्राणों को चूस जाते हैं और उससे अपनी शक्ति बढ़ लेते हैं। बकरे, भैंसे, मुर्गे आदि के बलिदानों का आधार यही है। मृत मनुष्यों के शरीर में एक सप्ताह तक कुछ उपचक्र एवं ग्रंथियों में चैतन्यता बनी रहती है। श्मशान भूमि में रहकर मुर्दों द्वारा शव-साधना करने वाले अघोरी उन मृतकों से भी शक्ति चूसते हैं। देखा जाता है कि कई अघोरी मृत बालकों की लाशों को जमीन में से खोद ले जाते हैं, मृतकों की खोपड़ी (महापात्र) लिए फिरते हैं चिताओं पर भोजन पकाते हैं। यह सब किन्हीं निहित उद्देश्यों के लिए किया जाता है। कुछ ताँत्रिक कोमल प्रकृति के वयस्क स्त्री-पुरुषों या छोटे बालकों के प्राण चूस जाते हैं। ऐसे अघोरी, कापालिक, रक्तबीज, वैतालिक, ब्रह्मराक्षस, प्रेत, पितर, वताँक पुरुष तथा डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी, कपाल-कुँडला, सर्पसूत्रा, धूमावती आदि स्त्रियाँ अब भी गुप्त प्रकट रूप से जहाँ-तहाँ देखी जाती हैं। मंत्र विज्ञान का यह अभिचार पक्ष सर्वाधिक निंदनीय है।
इस प्रकार मनुष्य या पशु-पक्षियों के शरीर से खींची हुई शक्ति अधिक समय तक ठहरती नहीं, उसका तात्कालिक कार्य के लिए ही उपयोग हो सकता है। किसी पर मारण प्रयोग करना होता है, कृत्या, घात, चौकी या मूँठ चलानी होती है, तो उसके लिए किन्हीं प्राणियों का बलिदान आवश्यक हो जाता है। ताँत्रिकों का आधार ही दूसरों की शक्ति अपहरण करके अपना काम चलाना है। इसी प्रकार उनके जितने भी काम होते हैं, वे इसी तरह एक स्थान से शक्ति का अपहरण करके दूसरे पर फेंकने के आधार पर होते हैं।
किसान और डाकू में जो अंतर है, वही अंतर दक्षिण मार्गी योगी और वाममार्गी ताँत्रिक में है। किसान अपने खेत में बाहर से लाकर बीज, खाद और पानी डालता है। परिश्रमपूर्वक उसकी जुताई, निराई, गुड.ई, सिंचाई, कटाई करता है, तब फसल का लाभ उठाता है। डाकू इन सब झंझटों में नहीं पड़ता, वह किसी भी राह चलते को लूट लेता है। किसान की अपेक्षा डाकू अधिक नफे में रहता मालूम होता है। वह एक दिन में अमीर बन जाता है और रईसी शान के साथ दौलत खर्च करता है। किसान वैसा नहीं कर सकता। कारण यह है कि उसे धन कमाने में काफी समय, श्रम, धैर्य एवं सावधानी से काम लेना पड़ता है। अतः खर्चते समय पीड़ा होती है। डाकू की स्थिति दूसरी है, वह लूट कर लाता है, तो होली की तरह उसे फूँक भी सकता है। ताँत्रिक चमत्कारी सिद्धि युक्त होते हैं। थोड़े ही दिनों के प्रयत्न में वे प्रेत, पिशाच सिद्ध कर लेते हैं और उनके द्वारा अपना आतंक फैलाते हैं। किसान और डाकू की कोई तुलना नहीं। इसी प्रकार योगी और ताँत्रिक की भी कोई समता नहीं हो सकती है।
एक का आधार परा प्रकृति है, तो दूसरे का अपरा प्रकृति। एक का प्रयोजन यदि आत्मलाभ और ईश्वर-दर्शन है, तो दूसरे का स्वार्थ-साधन। एक सात्विक है, दूसरा तामसिक। एक इष्ट युक्त है, तो दूसरे में अनिष्ट की पग-पग पर संभावना होती है। एक अंतर्जगत का अनुसंधान करता है, तो दूसरा बहिर्जगत का शोषण-दोहन। एक के अंतस् में पंचकोश, पंच प्राण, चेतना चतुष्टय, षट्चक्र एवं उपचक्रों, मात्रिकाओं, ग्रंथियों, भ्रमरों, कमलों, उपत्यिकाओं को जाग्रत करके आनंददायिनी अलौकिक शक्तियों को हस्तगत करना मूलभूत हेतु होता है, जबकि दूसरे में प्राणियों की प्राण-चेतना का अपहरण कर सामर्थ्यवान बनना प्रमुख होता है। योग में स्वयं को परिष्कृत कर ईश्वरीय चेतना को आविर्भूत किया जाता है, तो तंत्र में क्रूर- कृत्यों द्वारा दूसरों की चेतना लूट ली जाती है। योग समत्व पैदा करता है, तो तंत्र का वाममार्गी पक्ष विभेद की दीवार खड़ी करता है। एक का कार्य रचनात्मक है, दूसरे का ध्वंसात्मक है। एक प्रकृति के अनुरूप चलना सिखाता है, तो दूसरा प्रकृति के विपरीत। एक में व्यवस्था की प्रेरणा है तो दूसरे में अव्यवस्था की भावना है। इस प्रकार विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखा जाये तो दोनों की राह दो विपरीत दिशाओं में जाती दिखाई पड़ती है। योग यदि व्यक्ति और समाज के लिए उपयोगी और मंगलकारी है, तो अभिचार प्रयोग अमंगल की ही संभावनाओं से भरा हुआ है। इसीलिए तंत्र को सर्वसाधारण और अनाधिकारी पुरुषों के अनुपयुक्त ठहराया गया है।
गायत्री द्वारा यह दोनों ही प्रयोग संभव है। उससे योग की दक्षिण मार्गी साधना भी होती है और तंत्र का वाममार्गी अनुष्ठान भी हो सकता है। संसार के अन्य किसी मंत्र से जो कार्य होते हैं, वे सब गायत्री से भी हो सकते हैं। तंत्र साधना भी हो सकती है, पर जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है तंत्र मार्ग कंटकाकीर्ण है। उसमें पग-पग पर हानि की संभावना रहती है। कई बार तो चूक होने पर जान के भी लाले पड़ जाते है। इसलिए उसका अनुष्ठान चाहे जब, जहाँ, जिस किसी के लिए निषिद्ध माना गया है।
गायत्री का तंत्र पक्ष उग्र साधना प्रणाली युक्त है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत जो साधना की जाती है, उससे प्रकृति के अंतराल में बड़े प्रबल कंपन उत्पन्न होते हैं, जिनके कारण ताप और विक्षोभ की मात्रा बढ़ती है।
मनुष्य के बाह्य एवं आँतरिक वातावरण में एक प्रकार की सूक्ष्म आँधी चलने लगती है, जिसकी प्रचंडता के झकझोरे लगते हैं। यह झकझोरे मस्तिष्क की कल्पना-तंतुओं से जब संघर्ष करते हैं, तो अनेकों प्रकार की भयंकर प्रतिमूर्तियाँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं। ऐसे अवसर पर डरावने भूत, प्रेत, पिशाच, देव, दानव जैसी आकृतियाँ दीख सकती हैं। दृष्टि-दोष उत्पन्न होने से कुछ न कुछ दिखाई दे सकता है। अनेकों प्रकार के शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्शों का अनुभव हो सकता है। यदि साधक निर्भयतापूर्वक इन स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं को देखकर मुस्कराता न रहे, तो उसका साहस नष्ट हो जाता है और उन भयंकरताओं से यदि वह भयभीत हो जाय, तो वह भय उसके लिए जानलेवा संकट बन सकता है।
वाममार्गी तंत्र का शक्तिस्रोत दैवी, ईश्वरीय शक्ति नहीं वरन् भौतिक शक्ति हैं। प्रकृति के सूक्ष्म परमाणु अपनी धुरी पर द्रुतगति से भ्रमण करते हैं। उनके घर्षण से ऊष्मा पैदा होती है। तंत्र शास्त्र में इसी शक्ति को काली, दुर्गा, बगला, चंद्रघण्टा, कूष्माण्डा, कालरात्रि, त्रिपुरा जैसे नामों से पुकारा जाता है। इस ऊष्मा को प्राप्त करने के लिए अस्वाभाविक, उल्टा प्रतिगामी मार्ग ग्रहण करना पड़ता है। जल के बहाव को रोका जाय, तो उस प्रतिरोध से एक शक्ति का उद्भव होता है। जो ताँत्रिक वाममार्ग पर चलते हैं, वे काली शक्ति का प्रतिरोध करके अपने को एक तामसिक, पंचभौतिक बल से सम्पन्न कर लेते हैं। उलटा आहार, उलटा विहार, उल्टी दिनचर्या, उल्टी गतिविधि सभी कुछ उनका उल्टा होता है।
द्रुत गति से एक नियत दिशा में दौड़ती हुई रेल, मोटर, नदी, वायु आदि के आगे आकर उसकी गति को रोकना और उस प्रतिरोध से शक्ति प्राप्त करना- यह खतरनाक खेल है। हर कोई इसे कर भी नहीं सकता, क्योंकि प्रतिरोध के समय झटका लगता है। प्रतिरोध जितना ही कड़ा होगा, झटका भी उतना ही जबरदस्त लगेगा। तंत्र साधक जानते हैं कि जन कोलाहल से दूर एकाँत खंडहरों, श्मशानों में निविड़ अर्धरात्रि के समय जब उनकी साधना का मध्यकाल आता है, तब कितने रोमाँचकारी भय सामने आ उपस्थित होते हैं, इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं। उनसे न तो डरना, न विचलित होना साधारण काम नहीं है। साहस के अभाव में यदि इस प्रतिरोधी प्रतिक्रिया के साधक भयभीत हो जायें, तो वह पागल, बीमार, गूँगा-बहरा, अंधा हो सकता है। साहसी और निर्भीक प्रकृति के मनुष्य इस मार्ग में सफलता प्राप्त करते देखे जाते हैं।
तंत्र के चमत्कारी प्रलोभन निश्चित रूपेण असाधारण हैं। दूसरों पर आक्रमण करना तो उसके द्वारा बहुत ही सरल है। किसी को बीमारी, पागलपन, बुद्धि भ्रम, उच्चाटन उत्पन्न कर देना, प्राणघातक संकट में डाल देना आसान है। सूक्ष्म जगत में भ्रमण करती हुई किसी “चेतना-ग्रंथि” को प्राणवान बनाकर उसे प्रेत, पिशाच, बैताल, भैरव, कर्ण पिशाचिनी, छाया पुरुष आदि के रूप में सेवक की तरह काम लेना, सुदूर देशों से अजनबी चीजें मंगा देना, जेब की वस्तुएं या अज्ञात व्यक्तियों के नाम पते बता देना ताँत्रिकों के लिए संभव है। घुमावती विद्या के माध्यम से वेष बदल लेना या किसी वस्तु का रूप बदल देना भी उनके लिए असंभव नहीं। ऐसी कितनी ही विलक्षणताएं उनमें देखी जाती हैं, परन्तु स्मरण रखना चाहिए कि इन शक्तियों का स्रोत परमाणुगत ऊष्मा ही है, जो परिवर्तनशील है। यदि थोड़े दिनों साधना बंद रखी गई, त्रुटि बरती गई या छोड़ दी गयी तो, उस शक्ति का घट जाना एवं स्वयं का अहित हो जाना अवश्यंभावी है।
ऐसे में अभिचार प्रयोगों की उपयोगिता सीमित हो जाती है और तात्कालिक प्रयोजनों तक ही सीमाबद्ध होकर वह रह जाती है, किंतु एक स्वतंत्र विज्ञान होने के नाते उसका लाभ तो लिया ही जा सकता है। लिया जाना चाहिए पर आशंका
एक ही है, विज्ञान के सदुपयोग की तुलना में दुरुपयोग होने की संभावना अधिक बनी रहती है, इसके अतिरिक्त इसका आधार गलत और खतरनाक है। शक्ति प्राप्त करने के उद्गम स्रोत अनैतिक और अवाँछनीय हैं, साथ ही प्राप्त सिद्धियाँ भी अस्थायी हैं। इस दृष्टि से जितना परिश्रम एक ताँत्रिक करता है, उसकी तुलना में वह घाटे में रहता है। यह समय, श्रम यदि आत्मकल्याण के लिए नियोजित होता, तो उसका अपना भी कल्याण होता और संसार व समाज का भी, किंतु तंत्र में कम समय में उपलब्धि एवं चमत्कारी आकर्षण ही प्रलोभन का मुख्य कारण है, जिसका खामियाजा प्रयोक्ता को भुगतना पड़ता है। इसीलिए अद्भुत होते हुए भी इस मार्ग को निषिद्ध एवं गोपनीय ठहराया गया है। अन्य समस्त तंत्र साधनाओं की अपेक्षा गायत्री का वाममार्गी प्रयोग अधिक शक्तिशाली है यह सच है और यह भी सत्य है कि अन्य सभी विधियों की अपेक्षा इस विधि से मार्ग ही निरापद और ग्रहण योग्य है, उसी का अवलंबन लिया जाना चाहिए।
पड़ता है। इसीलिए अद्भुत होते हुए भी इस मार्ग को निषिद्ध एवं गोपनीय ठहराया गया है। अन्य समस्त तंत्र साधनाओं की अपेक्षा गायत्री का वाममार्गी प्रयोग अधिक शक्तिशाली है यह सच है और यह भी सत्य है कि अन्य सभी विधियों की अपेक्षा इस विधि से मार्ग ही निरापद और ग्रहण योग्य है, उसी का अवलंबन लिया जाना चाहिए।
परमात्मा ने पंचतत्वों से निर्मित इस काया में इतनी अगणित संभावनाएं भर कर रख दी है कि यदि उनका विवेक-पूर्वक उपयोग किया जाये तो सामान्य स्थिति में प्राप्त किये जाने वाले लाभों, सफलताओं और उपलब्धियों से अनन्त गुना अधिक लाभ तथा सफलताएं प्राप्त की जा सकती हैं। किसी के पास प्रचुर धन-सम्पदा हो, आर्थिक दृष्टि से कोई कितना ही सम्पन्न क्यों न हो, किंतु यदि वह मनमाने तरीके से अस्त-व्यस्त और बिना सोचे समझे उसे खर्च करता रहे तो अंततः आर्थिक संतुलन का बिगड़ना निश्चित ही है। इसी प्रकार मनुष्य उपलब्ध शक्ति को आवश्यक अनुपयोगी कार्यों में खर्च करता रहता है और बाद में उपयोगी आवश्यक कार्यों के लिए शक्ति लगाने में वह प्रायः असमर्थ ही रह जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य के पास जितनी मात्रा में शारीरिक और मानसिक शक्ति उपलब्ध है, यदि उसे ढंग से प्रयोग में लाया जाय तो आमतौर पर लोग जितना काम करते हैं, कम से कम उसका दूना काम तो किया ही जा सकता है।
इस तथ्य से सभी अवगत हैं कि मनुष्य की अधिकाँश शक्तियाँ व्यर्थ के कार्यों में खर्च होती है और सभी जानते हैं कि जितना कुछ करने की क्षमता अपने पास है, उससे अधिक कुछ किया जा सकता है। प्रश्न उठता है कि पर्याप्त शक्ति-सामर्थ्य होते हुए भी मनुष्य अपनी आसक्ति और दुर्बलता के कारण क्यों वाँछित सफलताएं प्राप्त नहीं कर सकता ? होता यह है कि उपयोगी प्रयोजनों में जितनी शक्ति खर्च होती है, उससे कहीं अधिक उसकी शक्ति निरर्थक कामों में खर्च होती रहती है। यदि तनिक सतर्कता से काम लिया जाये तो इस अनावश्यक अपव्यय को बचाया जा सकता है और ऐसे कार्यों में लगाया जा सकता है, जिनसे कुछ उपयोगी प्रयोजन सधता हो।
व्यर्थ में बिना किसी कारण, बिना किसी आवश्यकता के लोग बक-झक करते रहते हैं। इस प्रकार जिह्वा के माध्यम से जितनी शक्ति नष्ट होती है, लोग उसका मूल्याँकन नहीं कर पाते। वे यह भूल जाते हैं कि क्रिया चाहे कोई भी क्यों न हो, उसके लिए ऊर्जा चाहिए और उसे जुटाने में कोशिकाओं का ईंधन जलेगा ही। इस तरह शक्तियों को अनावश्यक रूप से नष्ट करना उनका अपव्यय करना ही तो है। इस प्रकार शक्ति का ऐसा महत्वपूर्ण कोश, जिसे यदि उपयोगी, योजना बद्ध कार्यों में लगाया जाये, तो उतने से ही प्रगति की दिशा में काफी दूर तक आगे बढ़ जा सकता है। सतर्कता बरत कर शक्ति की यह थोड़ी-थोड़ी बचत और उसे उपयोगी कार्यों में लगाने की प्रवृत्ति ही बूँद-बूँद करके घड़ा भरने की उक्ति को चरितार्थ करती हुई, जीवन को महान बनाने वाली सफलताओं में परिणत होती है।
लोग सोच-विचारों में अधिकाँशतः निरर्थक और निरुद्देश्य बातें ही सोचते हैं और न जाने कैसे निरर्थक अव्यावहारिक रंग-बिरंगे सपने देखते रहते हैं। उन बातों की परिस्थिति और योग्यता से जरा भी संगति नहीं होती फिर भी लोग आकाश की उड़ने भरते रहते हैं। यदि इन निरर्थक बातों में कुकल्पनाओं में चित्त को उलझाया न जाये और सार्थक-सोद्देश्य चिंतन किया जाये, तो उत्साहवर्धक और आशाजनक सफलताएं प्राप्त की जा सकती हैं।
बहुत से लोग जीवन क्रम में आने वाले साधारण से उतार-चढ़ाव को आकाश-पाताल जैसा बढ़ा -चढ़ा कर देखते हैं और उनसे अकारण ही असामान्य रूप से उद्विग्न, उत्तेजित होते रहते हैं। इस तरह की चिंता और व्याकुलता का कारण खोजा जाए तो प्रतीत होगा कि जिस वजह से मन को इतना उद्विग्न किया गया था, वह मानव जीवन में आये दिन घटती रहने वाली घटनाओं में से एक बहुत छोटी सी हलचल मात्र है। मानसिक उद्वेगों के कारण जितनी शक्ति नष्ट होती है, उस शक्ति को यदि सृजनात्मक चिंतन में लगाया जाये तो न केवल असाधारण रूप से ज्ञानवृद्धि हो सकती है, वरन् वर्तमान स्थिति से ऊँचे उठकर आगे बढ़ने एवं प्रगति करने का भी पथ प्रशस्त होता है।
मानसिक उद्वेगों पर किस प्रकार नियंत्रण रखा जाय और कैसे मानसिक स्वास्थ्य सुस्थिर रखा जाय, इस संबंध में अनेक प्रयोग अनुसंधानों के बाद मनःशास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यह इस बात पर निर्भर है कि उद्वेग और क्षोभ का प्रभाव व्यक्ति पर कम से कम हो। प्रसिद्ध मनःशास्त्री बिल्डर पेनफिल्ड दीर्घकालीन शोध के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि व्यक्ति जितना ही मानसिक तनाव या दबाव अनुभव करेगा, वह शरीर से और मन से उतना ही रुग्ण होगा, साथ ही ऐसी मानसिक विकृतियाँ भी उठ खड़ी होंगी, जिन्हें अर्ध रुग्ण स्थिति एवं अस्त व्यस्तता कहा जा सकता है। इस तरह की मनःस्थिति का व्यक्ति अपने लिए व अपने साथियों के लिए एक समस्या बनकर रहता है। न वह स्वयं चैन से बैठता है और न दूसरों को चैन से बैठने देता है।
कनाडा के शरीर विज्ञानी डा. हेन्स सेल्ये इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि स्वास्थ्य के बिगड़ने और मनः संस्थान को अस्त व्यस्त होने का प्रधान कारण नाड़ी संस्थान पर बढ़ हुआ तनाव ही है और इसका प्रमुख कारण अचिन्त्य चिंतन के कारण मनःसंस्थान का संतुलन बिगड़ जाना है। लोग काम करना तो चाहते हैं, पर यह नहीं जानते कि उसे कैसे किया जाना चाहिए ? शरीर और मन का तनाव कोई आकस्मिक या अप्रत्याशित घटना नहीं है। न तो वह बादलों की तरह बरसता है और न ही बिजली की तरह गिरता है। वस्तुतः वह आग्रह पूर्वक बुलाने पर स्वाभिमानी अतिथि की तरह आता है। बेढंगे मन से अत्यधिक काम करना ही इस संकट को आमंत्रित करना है। ढंग कायदे और करीने के साथ आदमी अधिक भी काम करता रह सकता है। पर यदि बेतरतीब ढंग से आठ-दस घंटे भी काम किया जाये तो बुरी तरह थकान आयेगी और तनाव उत्पन्न होगा।
शरीर का रासायनिक संतुलन मुख्यतः तीन ग्रंथियों पर अवलंबित है। एक पिट्यूटरी मस्तिष्क के नीचे तथा दो ग्रंथियाँ एड्रीनल गुर्दे के समीप हारमोन और दूसरे अति महत्वपूर्ण रासायनिक तत्वों का निर्माण, शोधन, परिवर्तन प्रायः उन्हीं की सक्रियता के कारण संभव होता है। अनावश्यक और अस्त-व्यस्त मानसिक श्रम करने का प्रभाव इन तीनों ग्रंथियों पर पड़ता है और वे काम ठीक तरह से न कर पाने के कारण शरीर की रासायनिक आवश्यकता ठीक तरह पूरी करने में असमर्थ हो जाती हैं। इस प्रकार हमारी आँतरिक और अदृश्य भूख पूरी न होने के कारण भीतरी दुर्बलता बढ़ती जाती है तथा रोग निरोधक और दूसरी क्षमताओं का भंडार रिक्त होता चला जाता है।
मानवी रक्त एवं मूत्र में तनाव के हारमोन्स चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान मिलते हैं। इसका चिन्ह है शरीर में ग्लूकोस की मात्रा में अभिवृद्धि। इस दौरान मुँह में सूखापन, मीठा खाने की इच्छा, श्वाँस लेने में कठिनाई, विभिन्न अंगों द्वारा अनायास प्रतिक्रिया इसके प्रमुख लक्षण के रूप में देखे जाते हैं। तनाव अवस्था में एक महत्वपूर्ण चिन्ह यह भी दिखाई देता है कि तनाव के चिन्ह को जानकर भी अनदेखा करना, टाल देना। जब हम विभिन्न समस्याओं से गुजरते हैं और माँस पेशियाँ कड़ी हो जाती हैं इस स्थिति में अधिक दबाव के कारण सिरदर्द प्रारंभ हो जाता है जिससे समाधान पाने के लिए तनाव को दूर करने की अपेक्षा गोलियाँ लेने को महत्वपूर्ण मानते हैं। किंतु इन माध्यमों से सही इलाज हो नहीं पाता। तात्कालिक लाभ भविष्य में हानियाँ ही अधिक दिखलाता है। तनाव को- माँसपेशियों को तनाव रहित करने का यह सही समाधान नहीं है। यह उससे भी अच्छा है कि सिरदर्द प्रारंभ होते ही तनाव रहित होने के लिए जाग्रत बना जाये। दूसरे चिन्हों की जानकारी मिलते ही ऐच्छिक शिथिलीकरण की प्रक्रिया ज्यादा उपयोगी है इससे सीधा एवं स्थाई लाभ मिलता है।
हृदयरोग तनाव का निश्चित चिन्ह है। तनावग्रस्त होने के कई स्थूल कारण हैं इनमें व्यायाम की कमी, वजन बढ़ना, कम भोजन, पारिवारिक इतिहास, प्रदूषित वातावरण में निवास, नशीले पदार्थों का सेवन ये भी हृदयरोग उत्पन्न करने में सहयोगी हैं। अस्थमा रोग का हमला भी इसमें सम्मिलित है। अल्सर या चमड़ी में खुजली का क्रम प्रारंभ होना यह बताता है कि तनाव प्रक्रिया सक्रिय हो गयी है।
तनाव के दौरान रक्त प्रवाह कमर से नीचे ऊपर विभिन्न अंग अवयवों की ओर तेजी से होने लगता है। इसके कारण पाचक रस का स्राव बंद होते ही हृदय और पाचन संस्थान में सीधा प्रभाव पड़ता है। अतः हमारा पेट कार्य करना बंद कर देता है। विशेष रूप से प्रोन पेटिपट अल्सर के रोगी पाचक अम्ल अति चिंता एवं तनाव से जलाते हैं और आत्मघाती रास्ते का चयन करते हैं।
फिर प्रारंभ हो जाता है कब्ज के रूप में रोग बढ़ने का क्रम एवं आँतों के रोग जिनमें पेट का दर्द भी अपना चित्र विचित्र रूप दिखाने लगता है। इसी दशा को चिकित्सकों ने “ इरीटेबल बाँवेल सिन्ड्रोम“ की संज्ञा दी जिसमें पाचन तंतुओं की गतिशीलता पेट में गड़बड़ाने लगती है। यह जलन आमतौर पर अल्सर का रूप लेकर “अल्सरेटिव कोलायटिस“ के रूप में बदल जाती है जिसका निराकरण आज भी चिकित्सा पद्धति के पास नहीं है। वस्तुतः जीवनी शक्ति का अभाव ही वह प्रमुख कारण है जो तनाव की प्रतिक्रिया रूप में दिखाई देता है, नहीं तो तनाव रचनात्मक भी हो सकता था।
साथियों का अनावश्यक अपव्यय रुके और वह उपयोगी प्रयोजनों में लगे, इसके लिए यह आवश्यक है कि काम करते समय उसमें पूरे मन से पूरी निष्ठा से, पूरे मनोयोग और पूरी तत्परता से उसे करने में जुटा जाये। इस प्रकार समान रूप से सारी तन्मयता समेट कर किसी काम को किया जाये, तो वह अधिक मात्रा में तो होगा ही, साथ ही उसका स्तर भी ऊँचा रहेगा। जिन लोगों ने संसार में बड़े-बड़े कार्य किये हैं विभिन्न क्षेत्रों को अपनी उपलब्धियों से लाभान्वित किया है, उनकी सफलता का एक ही कारण रहा है कि जब वे अपना काम आरंभ करते हैं तो एक प्रकार से उसमें तन्मय होकर खो जाते हैं। उस काम में वे इस प्रकार डूब जाते हैं कि उन्हें दूसरी बात सूझती ही नहीं। यही वह जीवन जीने कला है जो तनाव मुक्त रचनात्मक जीवन जीना सिखाती है। अध्यात्म का व्यावहारिक पक्ष यही है।
जीवन स्थिर नहीं। उसके साथ जुड़ी सुविधाओं का कोई ठिकाना नहीं। हंसता बचपन बोझिल जवानी की ओर बढ़ता और कराह भरे बुढ़ापे में बदल जाता है। संपदा ने किसका साथ दिया है, मित्र-सहयोगी पानी के बबूले की तरह उछलते और समय के साथ आगे चले जाते हैं। स्थिर है तो सिर्फ धर्म और ईश्वर। जिनकी स्थिरता-सुदृढ़ता को संसार का कोई अंधड़ डगमगाने में समर्थ नहीं। मानव समय रहते इनकी शरण लो।
अपनी आवश्यकता और अनिवार्यता के बावजूद आज ऐसे स्थान नगण्य है-जहाँ परिवेश-पर्यावरण और वातावरण तीनों उच्चस्तरीय शक्ति संपन्न हों। परस्पर घुले-मिले हों। एक की प्रभाविकता दूसरे को संपुष्ट करती हो। जहाँ जाकर व्यक्ति अपने स्वास्थ्य-व्यवहार और संस्कारों में परिवर्तन महसूस किए बिना न रहें। जीवन की उल्टी धारा को मोड़-मरोड़कर सीधा करने वाली जगह यदि है तो हिमालय की दुर्गमताओं से घिरी। पालब्रान्टन, योग ऋषि बंधु जैसे खोजियों की कृतियाँ इन स्थानों का वर्णन कितना ही मोहक क्यों न करे ? पर सर्वसामान्य के लिए वहाँ जाने का अर्थ है स्व के अस्तित्व को नष्ट करने पर उतारू हो जाना। लगभग यही स्थिति अन्य स्थानों की है। यदि परिवेश ठीक है तो पर्यावरण नहीं। दोनों हैं तो वातावरण का विशिष्ट स्तर अज्ञेयवादियों की खोज की तरह बेबूझ है-दूरातिदूर बना हुआ है। इन तीनों दुर्लभताओं को अपने में समेट कर सुलभ बनाने की दृष्टि से शांतिकुंज अपने आपमें अनूठा है। जिसका स्थूल मोहक आकर्षण सूक्ष्म अंतवेर्धी सामर्थ्य, कारण की बरबस उलटफेर कर डालने वाली शक्तियां अनुभूतिगम्य हैं।
इस अनूठेपन की अनुभूति को वस्तु और इन्द्रिय संयोग की संकरी सीमा में नहीं समेटा जा सकता। इसके पीछे उस सूक्ष्म और सघन आवरण की क्रियाशीलता है, जिसमें न केवल पदार्थ बल्कि हम स्वयं घिरे रहते हैं। इस आवरण के अनेक स्तरों के अनुरूप अनुभूतियों के अनेक रूप-रंगों का आस्वादन जाने-अनजाने होता रहता है।गहरी पैठ और विश्लेषक दृष्टि के अभाव में पृष्ठभूमि में होने वाली उस क्रियाशीलता को नहीं समझ पाते जो भावानुभूतियों अनेक रूप रंग प्रदर्शित कर हमें आश्चर्य में डालती रहती है।
पर यदा-कदा प्रायः हममें से प्रत्येक के जीवन में ऐसे क्षण आ जाते हैं, जब हमें इस तथ्य की अनुभूति हुए बिना नहीं रहती। इन विशेष क्षणों में तो हम स्वयं उस स्थान परिवेश तक पहुँच जाते हैं-जहाँ इस विशिष्ट आवरण के किसी स्तर की अत्यधिक सघनता है। अथवा हमारा चित्त स्वयं आरोह-अवरोह कर उस स्तर विशेष का संस्पर्श पा लेता है। संस्पर्श से अपनी अनुभूति कराने के कारण ही मनीषियों ने इस आवरण को वातावरण की संज्ञा दी है। वात् शब्द का अर्थ वायु का समानार्थी है। वायु का मतलब उस तत्व विशेष से है जो अपने स्पर्श से हमारे अंतःकरण में अनुभूतियों की इन्द्रधनुषी आभा बिखेर दे।
स्वामी योगमयानंद के आर्य शास्त्र प्रदीप के अनुसार अनुभूतियों में तीव्रता और मंदता का कारण इसका सघन और विरल होना है। सघनता और विरलता के अनुपातिक परिणाम में ही अनुभूति की तीव्रता या मंदता का अनुभव हो पाता है। संस्पर्श देने वाले इस आवरण को हम सुखद या दुखद इन दो शब्दों में वर्गीकृत कर लेने का मिथ्या प्रयास भले कर लें। किन्तु वास्तविकता यही है कि इसकी सीमाएं उतनी ही विचित्र, व्यापक और विस्तीर्ण हैं जितना कि स्वयं अनुभवों का संसार।
सामान्य अर्थों में हम परिवेश-पर्यावरण-वातावरण को समानार्थी मान बैठते हैं। पर हमारी यह मान्यता उथली सोच का परिणाम है। सत् ही भौतिक स्थिति में अटक कर उसके पीछे छुपी मनोवैज्ञानिक गहराइयों की अवहेलना है। यथार्थ में ये तीनों शब्द अपना अलग अर्थ रखते हैं। भेद सिर्फ अर्थ के अलगाव का नहीं अनुभूतियों की संरचना का भी है। परिवेश का तात्पर्य शुद्ध भौतिक परिस्थितियों से है। स्थान विशेष की स्थिति से है। उदाहरण के लिए यदि हमें घर गाँव का परिवेश समझना हो तो घर की स्थिति, अड़ोस-पड़ोस में कौन रहते हैं ? घर के पास चिकित्सालय विद्यालय की स्थिति का अता-पता करेंगे। इसकी सीमा इतने तक ही है। जबकि पर्यावरण शब्द अपने अर्थ की व्यापकता के घेरे में परिवेश के अतिरिक्त और बहुत कुछ समेटे रखता है। इसका अध्ययन परिवेश की प्रभाविकता का अध्ययन है। न केवल परिवेश बल्कि वायु आकाशीय स्थिति के साथ अन्य सूक्ष्मताएं हमारे जीवन को किस तरह से प्रभावित करती हैं ? इसकी छानबीन, ढूंढ़ व खोज भी हैं। जीवन पर प्रभाविकता सिर्फ शरीर अर्थों में नहीं बल्कि मानसिकता के घेरे में। आधुनिक विज्ञान द्वारा अपने अध्ययन फलक का विस्तार कर लिये जाने के कारण इस विधा ने आज “डीप इकोलाजी” के रूप में जन्म पाया है। भले आज हमें उसका शैशव काल देखने को मिले। पर उसकी गतिविधि क्रिया कलापों को देख कोई भी उसके विकास की असीम संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता। व्यवहार विज्ञानी सी.सिम्पसन ने अपने शोध अध्ययन “बिहैवियरल चेंजमेंट्स इन मैन” में पर्यावरण के बदलते रूपों के अनुसार मानवीय व्यवहार के बदलते क्रम की छानबीन कर इसके प्रभावों को स्पष्ट करने की कोशिश की है।
वातावरण इन दोनों को अपने प्रभाव में समेटने वाला कहीं अधिक सूक्ष्मतर तत्व है। उपर्युक्त दोनों को यदि स्थूल-सूक्ष्म कहें तो इसे कारण की उपमा देना कोई अत्युक्ति न होगी। इसकी इसी विशेषता के कारण हममें से अनेक इसके विज्ञान को समझने में असमर्थ हो जाते हैं। सामान्य क्रम में एक ही परिवेश को इसके विभिन्न स्तर अपने स्पर्श से प्रभावित करते रहते हैं। तदनुसार चित्त के अनुकूल-प्रतिकूल संस्कारों का संयोग मानवीय व्यवहार के तरह-तरह के चित्र खींचता रहता है। एक ही घर में रहते हुए हम गमगीन और हर्ष छलकाते जिस माहौल की अनुभूति करते हैं वह इसी की सृष्टि है। यदा कदा इस तरह के अनुभव बिना किसी विशेष घटनाक्रमों के यों ही हो जाते हैं। उस समय प्रत्येक वस्तु, पदार्थ सुख या दुःख से सनी लगने लगती है। कभी-कभी इसके विपरीत घटनाक्रमों में परिवर्तन इसके किसी स्तर विशेष की सघनता बढ़ा देता है। उसके सहज सामीप्य की उपलब्धि से उपस्थिति प्रत्येक जन हर्षोल्लास या दुःख, उच्छ्वास की तरंगों में डूब जाता है। शादी-विवाह या किसी प्रियजन की मृत्यु पर इस तरह की अनुभूतियाँ सहज हो जाती हैं। यह बदलाव परिवेश-पर्यावरण बदलने के कारण न होकर वातावरण बदल जाने से बन पड़ता है। किसी धार्मिक अनुष्ठान’यज्ञायोजन के समय में भी हमारे अंतः-करण किन्हीं विशेष स्पंदनों से सराबोर हुए बिना नहीं रहते।
अनुभूतियों के इस निरंतर सिलसिले के बावजूद आज वह पुरुषार्थ विस्तृत प्रायः है जो वातावरण के किसी उच्चस्तरीय शक्ति-स्पंदनों वाले स्तर को सघन और चिरंतन बनाये रखे। भले यह कार्य सामान्य मानवीय सामर्थ्य के बाहर हो किन्तु मानव विकास के लिए चेतना जगत में प्रवेश कर उच्च स्थितियों में अधिष्ठान के लिए इसके सिवा कोई अन्य उपाय है भी नहीं। प्राचीन समय के सतयुगी माहौल के पीछे वे प्रयास ही थे, जिसके द्वारा हर गाँव को छोटे-मोटे तीर्थ का रूप दे दिया गया था। इसके अतिरिक्त विशिष्ट स्थानों को कठोर तपश्चर्या के बलशाली चुँबक द्वारा पवित्रता-प्रफुल्लता, सामंजस्य आदि ओजस्वी तत्वों से भरी-पूरी ऐसी चादर तान दी जाती थी, जिसके साये में मानव अपनी आकुलता संताप से छुटकारा पा सके। यह चादर अपनी मजबूती बरकरार रखे इसके लिए तप की चुँबकीय सामर्थ्य निरंतर सक्रिय रहती थी।
पौराणिक आख्यानों में अगस्त्य की वेदपुरी, नर-नारायण के बद्रीवन आदि विभिन्न ऋषियों की वातावरण की विशिष्ट प्रयोगशालाओं का चमत्कारी वर्णन आज हमारे लिए कौतूहल की वस्तु है। बौद्धिक सामर्थ्य अपनी सारी कलाबाजियों के बाद यह सोच पाने में असफल है। न सोच पाने का कारण प्रत्यक्ष का अभाव भी है। अथवा ऐसे वातावरण संपन्न स्थानों से स्वयं का संपर्क न हो पाना है। अन्यथा इसका यत्किंचित् संपर्क भी चित्त के संस्कारों को अपने अनुरूप बनाए नहीं रहता। श्री अरविंद अलीपुर की जेल की जिस काल कोठरी में रहे थे। उनके चले जाने के बाद जेलर ने वहाँ पर किसी अन्य कैदी को रख दिया। यौगिक वातावरण की सघनता कैदी के मन को जबरन उन्हीं ऊंचाइयों की ओर ले जाने लगीं। अनभ्यासी मन घबरा गया। अंग्रेज जेलर भी परेशान-बाद में उसे कारण का पता लगा। कैदी का तबादला किया गया। ‘चंपकलाल की वाणी’ में लेखन ने अपना एक निजी अनुभव संजोया है। पाटन शहर के पास बावड़ी नामक गाँव में तालाब के किनारे नीम के पेड़ के नीचे लेटते ही उसे गहरी समाधि लग गई। उसे इस अद्वितीय आनंद की उपलब्धि पर महान आश्चर्य हुआ। बाद में गाँव वालों से पता करने पर मालूम हुआ कि एक संत ने वहाँ वर्षों कठोर साधनायें की हैं।
वातावरण को इस गहरी प्रभाविकता के कारण योगशास्त्रों ने स्थान-स्थान पर साधना विशेष के लिए स्थान विशेष की अनिवार्यता बताई है। जहाँ मन प्रधान-योग साधनाओं के लिए नदी का किनारा पर्वतीय सान्निध्य जैसे मन को विश्राँति देने वाले स्थल सुझाए हैं। वहीं प्राण प्रधान ताँत्रिक साधनाओं हेतु श्मशान-कब्रिस्तान को साधना स्थली के रूप में चुनने का विधान है।ताकि बचे रहे अवशिष्ट प्राण से अपनी क्षमता में अभिवृद्धि हो सके। साथ ही उस वातावरण के सूत्र स्पंदनों की ओर सहज आकर्षित होने वाली शक्तियों से तादात्म्य बिठाया, सहयोग प्राप्त किया जा सके। पंचमुँडी, नवमुँडी आसनों की सृष्टि भी इसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए थी।
मानवीय चेतना के व्यापक उलट-फेर के लिए संस्कार पानी के रूप में शाँतिकुँज की स्थापना के पीछे भी यही सिद्धांत काम कर रहा है। हिमालय की पर्वतीय शृंखला के मध्य कल-कल निनादिनी गंगा की सप्त भुजाओं में ममतामय आलिंगन में बंधे इस स्थान की स्थूल मोहकता हम लोगों को कितना भी क्यों न आकर्षित करे। पर वह सिर्फ उतना भर नहीं है। दृश्य कितना भी शक्ति सम्पन्न और आकर्षक क्यों न हो अदृश्य को शताँक ही अभिव्यक्त कर पाता है। यहाँ की अदृश्य सामर्थ्य को ऋषि सत्ताएं प्राचीन समय से ही संजोती-बढ़ाती रही हैं। गायत्री मंत्र के प्रथम द्रष्टा विश्वामित्र की सिद्धि स्थली के रूप में विख्यात इस क्षेत्र में सप्त ऋषियों ने अपने तरह-तरह के प्रयोग सम्पन्न किये हैं। इन विशिष्ट प्रयोगों में चिकित्सा प्रयोग का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। दिये वर्णन के अनुसार भारद्वाज ने ऋतुपरक आहार-विहार, कश्यप ने प्राणायाम याज्ञवल्क्य एवं गौतम के हवन अत्रि के मानसोपचार, विश्वामित्र द्वारा प्रार्थना तथा मंत्र से चिकित्सा, जमदग्नि द्वारा जल चिकित्सा और महर्षि वशिष्ठ द्वारा स्पर्श चिकित्सा संबंधी प्रयोग यहीं पर संपन्न हुए थे।
ऐसे न जाने कितने प्रयोगों की जन्मदात्री इस स्थली के सूक्ष्म संस्कारों को युगऋषि ने अपने प्रचंड सामर्थ्य द्वारा पुनः दीप्त किया है। यह दीप्तिमान सामर्थ्य उस ढाँचे के रूप में है जो मानवीय व्यवहार को तोड़-मरोड़कर जबरन उत्कृष्टता का रूप दे देती है। जहाँ कुछ ही दिन का प्रयास स्वयं को साथ आए स्वजनों को आश्चर्यानुभूति कराए बिना नहीं रहता।
क्षमता इतने तक सीमित नहीं है। वास्तविकता इसके कहीं अधिक परे ओर अपनी प्रचंडता में कहीं अधिक सूक्ष्म है। जिसके सृष्टिकर्ता युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा की तपनिष्ठा पर मोहित होकर नियंता ने इसे सतयुग की गंगोत्री दर्जा दे डाला है। इसी तप कौशल से आकर्षित होकर हिमालय की ऋषि सत्ताओं ने इस भूमि को अपनी कार्य सिद्धि के लिए चुना है। उनकी तपनिष्ठा से बुनी गई अपनी विशिष्ट स्तरीय सघनता लिए वातावरण की चादर सदा मजबूत बनी रहे, इसके ऋषि युग्म का सूक्ष्म सान्निध्य ही नहीं, वे प्रयास भी हैं जो करोड़ों की संख्या में जप, यज्ञ, अग्निहोत्र, उच्चस्तरीय चिंतन रूप ज्ञान यज्ञ के रूप में प्रतिदिन सम्पन्न किए जाते हैं। पूर्वकाल में विश्वामित्र, अगस्त्य के प्रयासों की भाँति इस अतुलनीय प्रयास द्वारा उद्भूत शक्ति को हम कितना ग्रहण कर पाते हैं यह स्वयं की क्षमता पर निर्भर है।
प्रत्येक की अपनी सीमा है-जिसे मानवीय अहं स्वीकारने में हिचकता है।इस हिचकिचाहट को दबाने में कुशल बुद्धि ढेरों आलोचना-जन्य सवाल उछाल फेंकती है। इस अद्भुत प्रयास के रहते प्रत्येक आने वाला तुरंत-फुरंत ऋषि क्यों नहीं बन जाता ? यह या इस जैसे अनेक प्रश्न मानवीय व्यक्तित्व की जटिलता तथा चित्त एवं वातावरण के सघन संयोग की अभिक्रिया को न जानने के कारण है। वातावरण का लाभ प्रत्येक को मिलता है पर कितना ? इस प्रश्न का उत्तर प्रत्येक की ग्रहण-शीलता के अभाव में सुमेरु शिखर पर चढ़ दौड़ने वाले पर्वतारोही वहाँ के दिव्य वातावरण के स्पंदनों में रीते रहते हैं। शारीरिक ग्रहणशीलता उन्हें बर्फ की कंपकंपी भर दे पाती है। लाभ अधिकतम लिया जा सके-इसके लिए महाभारत के वन पर्व में ऋषि धौम्य युधिष्ठिर को समझाते हुए कहते हैं “वातावरण का सान्निध्य लाभ स्वयं के पुरुषार्थ का प्रारंभ है अंत नहीं। अग्नि जलाने से गर्मी तो मिल जाएगी पर यज्ञानुष्ठान के अजस्र लाभों के लिए सतत् जागरुक रहकर सारे विधि नियमों का पालन करना पड़ता है।”
सिर्फ शरीर यदि-यहाँ पर बना रहे तो परिवेश जन्य लाभ उत्तम स्वास्थ्य के रूप में मिल जायेगा। यदि कोई शरीर के साथ प्राण को यहाँ के महाप्राण से एकाकार करने की कोशिश करे तो यहाँ का पर्यावरण-व्यवहार की दुर्बलताओं से छुटकारा दिलाकर इसे परिमार्जित प्रखर बना डालेगा। वातावरण की सामर्थ्य इन दोनों से अलग है। इसके प्रभाव सीधे अचेतन के संस्कारों पर पड़ते हैं। व्यक्तित्व के उद्यान में दिव्यता के बीज बोने की प्रक्रिया इसी के द्वारा संपन्न होती है। इसका लाभ लेने के लिए आवश्यकता कहीं अधिक जागरुक होने की है। ध्यान में जिस तरह स्वयं को हम भागवत चेतना की ओर खोलते हैं, उसी तरह यहाँ रहकर प्रत्येक स्थिति-जागते-सोते कर्मरत रहते भाव यह होना चाहिए कि तीर्थ चेतना, तीर्थ निर्माता ऋषि की शक्ति प्रत्येक रोम से प्रविष्ट हो स्वयं को देव पुरुष के रूप में ढाल रही है। यह मात्र कल्पना नहीं है। जागरुक चिंतन की प्रगाढ़ता शीघ्र अनुभूतियों के क्षेत्र में प्रवेश दिलाती है। और ये भावानुभूतियाँ अपना प्रतिफल-स्वास्थ्य-व्यवहार और चिंतन में हुए व्यापक परिवर्तनों में किए बिना नहीं रहतीं। ऐसे परिवर्तन जिन्हें देखकर हम शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ गुरुसत्ता के इस विलक्षण तपःपूत सृजन पर अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते। तीर्थ सेवन का लाभ उठाकर जीवन को धन्य बनाने का अवसर ऐसे जाग्रत वातावरण में रहने वालों को सहज ही मिल जाता है। इसमें किसी को संशय नहीं रखना चाहिए। नवरात्रि की साधना ऐसे वातावरण में तो निश्चित ही विशिष्ट लाभ प्रदान करती है। यह अनुभूति अनेकों की है।
संत फरीद के पास एक व्यक्ति आया और बोला !” सुना है, मंसूर को काट डाला गया तब भी मंसूर हंसता रहा। ईसा को सूली पर लटकाया जा रहा था तब भी वे कहते रहे कि लटकाने वाले अंजान हैं इन्हें क्षमा करना प्रभु। समझ में नहीं आता बात जंचती नहीं कि कोई मुझे पत्थर मारे, गर्दन काटे और मैं अनदेखा कर दूँ, क्षमा कर दूँ।” फरीद उठे और उस व्यक्ति को एक कच्चा नारियल दिया और कहा इसे तोड़कर लाओ और देखो ध्यान रखना इसकी अंदर की गरी साबुत निकलनी चाहिए। व्यक्ति ने नारियल पत्थर पर दे मारा। परिणाम तो स्पष्ट था ही कच्ची गिरी टूटनी थी ही। व्यक्ति फरीद के पास गया और बोला कि क्षमा करें मैं गिरी बचा नहीं पाया। क्योंकि वह ऊपरी खोल से जुड़ी हुई थी। सूखा था। कहा इसे तोड़कर लाओ। व्यक्ति ने देखा नारियल सूखा है। इसकी गिरी तो अलग बज रही है। उसने नारियल तोड़ा देखा गिरी साबुत निकली है। फरीद बोले-”देखा बस तुम्हारी ओर मंसूर की, तुम्हारी और ईसा की समझ में कच्ची और पक्की गरी का ही जितना अंतर है। क्योंकि जिनका शरीर और मन इकट्ठा ही बना रहता है उन्हें शरीर के दुःख, कष्ट-क्लेश महसूस होते हैं। ऐसे मनस्वी लोगों को भौतिक दुःखों की पीड़ा कभी सताती है ?”
हम अमृत के पुत्र, सुधा का पान किया है। शारदेय-संस्कृति का ही, संदेश दिया है।।1।। अंधकार की छाती पर, पदचिह्न जमाये। चले अमावस्या से, हम पूनम तक आये।। उजली स्याही से, स्वर्णिम-इतिहास लिखा है। शरद-ज्योत्सना के सम्मुख, तम नहीं टिका है।। हमने मुसकाते-मुसकाते, तिमिर पिया है। हम अमृत के पुत्र, सुधा का पान किया है।।2।। हमने जग के जमना तट पर, रास रचाया। हर गोपी को, आशा का पियूष पिलाया।। किरणों सी अपनी बांहें, हम फैलाते हैं। शीतल किरणों से, जन-जन को सहलाते हैं।। हमने मानवता का, दुखता-घाव सिया है। हम अमृत के पुत्र, सुधा का पान किया है।।3।। अंधकार के विषधर, फिर फन फैलाये हैं। शारदेय-संस्कृति को डसने, बौराये हैं।। भोगवाद का विष, अविरल बढ़ता जाता है। भाषा, भाव, विचारों पर, चढ़ता जाता है।। भोगवाद के विष को, रस में घोल दिया है। हम अमृत के पुत्र, सुधा का पान किया है।।4।। नाग नाथने का इतिहास, पुनः दोहरायें। जन-मानस को, विकृति-विष से मुक्त करायें।। संस्कृति की पूनम का, चाँद उगाना होगा। चंद्र किरण बनकर, प्रकाश फैलाना होगा।। हमने तम की छाती पर, चढ़ नाच किया है। हम अमृत के पुत्र, सुधा का पान किया है।।5।। देव-संस्कृति शरद-पूर्णिमा बन बिखरेगी। फिर ‘वसुधैव कुटुँबकम्’की, आभा निखरेगी।। समरसता का ऐसा राग, रचेगा फिर से। समता की वंशी का स्वर, उभरेगा फिर से।। देव संस्कृति-सुधा-पानकर, विश्व जिया है। हम अमृत के पुत्र, सुधा का पान किया है।।6।।
-मंगल विजय विजय वर्गीय
आज कर दो कृपा, मातु वरदायिनी। स्वच्छ-शालीन, अंतःकरण हो सके। बुद्धि दो, हम सुपथ का, चयन कर सकें, फिसलनों पर स्वयं, संतुलन कर सकें, खाइयों के निकट हम, संभल कर चलें, छाँह अमराइयों की, न हमको छलें, विघ्न-बाधा-ढलानों, भरे मार्ग पर, एक पल भी न डगमग, चरण हो सके। मातु! इतना विपुल धन, न देना हमें, स्वार्थ से पूर्ण जीवन, न देना हमें, प्राप्त कर हम जिसे, भूल जायें विनय, लोक कल्याण को, मिल न पाये समय, मोह-संकीर्णता से, न मन भर सके, स्वार्थ का फिर नहीं, संक्रमण हो सके। दृष्टि में प्यार हो, पर प्रलोभन न हो, जिंदगी में जरा भी, प्रदर्शन न हो, प्यार से छलछलाता, हृदय दो हमें, कंठ से सौम्यता दो, विनय दो हमें, भाव संवेदनापूर्ण, व्यवहार से, विश्व का स्वस्थ, वातावरण हो सके। माँ! हमें विश्व-परिवार, का भाव दो, लोकहित के लिए, नित नया चाव दो, द्वेष-दुर्भावना से, न हम भर सकें, दूसरों की गहन पीर, कम कर सकें, कर्म से आत्मसंतोष, पायें सदा, आचरण का सहज, अनुकरण हो सके।
-शचीन्द्र भटनागर
6 अप्रैल 1976 को शाँतिकुँज परिसर में दिया गया उद्बोधन
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो नः प्रचोदयात्।
साधन स्वर्ण जयंती वर्ष में हम आपको गायत्री उपासना के साथ-साथ विशेष रूप से जो शिक्षण देते हैं वह ध्यान का शिक्षण है। उपासनायें दो हैं-नाम और रूप की उपासनायें। नाम और रूप के बिना उपासनायें नहीं हो सकतीं। यह दो यूनिवर्सल उपासनायें हैं। किसी भी मजहब में चले जाइए, व्यक्ति नाम जरूर ले रहा होगा। मुसलिम तसबीह पर नाम ले रहा होगा। ईसाई पादरियों को आप माला जपते हुए देखेंगे। आर्य समाजी प्रकाश का ध्यान कर रहे होंगे। अन्य अमुक तरह का ध्यान कर रहे होंगे। नादयोग वाले कान में आने वाली आवाजों का ध्यान कर रहे होंगे। बहरहाल ध्यान जरूर करना पड़ता है। ध्यान के बिना गति किसी की नहीं है। इसीलिए हमने कहा है कि जप के साथ-साथ आप ध्यान किया कीजिए। स्थूल ध्यान मूर्ति पूजा के माध्यम से होता है-तस्वीरों के माध्यम से होता है, क्योंकि मनुष्य का मानसिक विकास इतना नहीं हो पाया है कि वह बिना किसी फोटोग्राफ के, बिना किसी मूर्ति के किसी चीज का ध्यान कर सके। लेकिन जब वह विषय पक्का हो जाता है तब फिर मूर्ति की कोई खास जरूरत नहीं रह जाती। तब हम अपने भीतर बैठे हुए भगवान का साक्षात्कार कर सकते हैं। उसका ध्यान कर सकते हैं।
ध्यान का क्या मतलब है? ध्यान का मतलब है-कि हमारे जीवन के दो पक्ष हैं। एक पक्ष वह है जो बाहर फैला हुआ पड़ा है। हमारे कानों के सुराख बाहर को हैं और हमारी आँखों के सुराख बाहर को हैं। हम बाहर की चीजों को देख सकते हैं और बाहर कौन बैठा हुआ है-कौन जा रहा है, यह भी बता सकते हैं। बाहर की चीजें हमको दिखाई पड़ती हैं, किन्तु भीतर की चीजें हमको बिल्कुल दिखाई नहीं पड़तीं। तो क्या भीतर कोई चीज नहीं है।? बेटे, असल में जो कुछ भी चीज है वह भीतर ही है, बाहर नहीं है। बाहर केवल दिखाई पड़ती है, पर असल में हर चीज भीतर है। जिंदगी कहाँ है ? जिंदगी बाहर नहीं हमारे भीतर है और बुद्धि जिसकी वजह से हम रुपया कमाते हैं, सम्मान कमाते हैं, वह बाहर नहीं-हमारे भीतर है जिसकी वजह से हम हर चीज कमा सकते हैं। भीतर हमें दिखाई नहीं पड़ता और हम कहते हैं कि हे भगवान, यह आपने क्या मखौल कर दिया मनुष्य के साथ कि बाहर की चीजों की जानकारी दे दी, पर भीतर की चीजों की नहीं दी। भीतर की जो चीजें संपत्तियाँ, विभूतियाँ, देवत्व और महानता दबी हुई पड़ी हैं वह हमको दिखाई नहीं पड़तीं। हमको अपना बेटा दिखाई पड़ता है, संपत्ति दिखाई पड़ती है, यह और वह दिखाई पड़ता है, ओर न जाने क्या-क्या दिखाई पड़ता है। पर हमको अपना भविष्य नहीं दिखाई पड़ता, आत्मा नहीं दिखाई पड़ती, परमात्मा नहीं दिखाई पड़ता। यहाँ तक कि हमारे भीतर वाले कलपुर्जे तक दिखाई नहीं पड़ते। आँखें तक दिखाई नहीं पड़तीं। भीतर की बात तो कौन कहे, बाहर की भी दिखाई नहीं पड़ती। अच्छा बताइए आपकी नाक कैसी है ? भवें कैसी हैं? पलकें कैसी हैं? जब आपको बाहर की चीजें ही दिखाई नहीं देतीं हैं, तो फिर भीतर की कैसे दिखेंगी ? इसीलिए तो गरेबान में मुँह डालकर के जब हम भीतर की तलाश करते हैं तो उसको ध्यान कहते हैं। अपने भीतर झाँकने का नाम ही ध्यान है।
ध्यान किसका किया जाता है ? स्वयं का या भगवान का ? बेटे स्वयं तो क्या और भगवान तो क्या दोनों एक ही हैं। स्वयं का विकसित रूप ही भगवान है। हमारा विकसित रूप जो है- ‘शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्’’ तत्वमसि’’ अयमात्माब्रह्म’’ प्रज्ञानंब्रह्म’ है। वेदाँत के यह सारे के सारे महावाक्य यह बताते हैं कि हमारा परिष्कृत रूप भगवान है। हमारा भगवान हमारा परिष्कृत रूप ही है। डायमंड क्या है ? डायमंड और कोयले में कोई खास फर्क नहीं है। एकाध इसके एलीमेंट्स और एकाध इसके भीतर जो जर्र है, उनमें फर्क पड़ता है, अन्यथा हीरा और कोयला एक ही है। आत्मा और परमात्मा एक है। यह थोड़ा सा सीमाबद्ध है तो वह असीम है। यह अणु है और वह विभु है। यह मायाग्रस्त है तो वह मुक्त है। बस इतना ही फर्क है। अगर हम अपने आपको साफ कर लें तो हम उसको प्राप्त कर सकते हैं।इसलिए हम प्रकाश का ध्यान करते हैं, भीतर वाले का ध्यान करते हैं। अपने लक्ष्य का ध्यान करते हैं, जीवन का ध्यान करते हैं। तो गुरुजी आपने इसीलिए सूरज का ध्यान बता दिया है ? हाँ बेटे, वह तो हमने प्रतीक बता दिया है। उसकी चमक देखकर अगर आप यह अंदाजा लगाते हो कि हमारे ध्यान में चमक आ जाती है या नहीं आती अथवा आपके ध्यान में गायत्री माता आ जाती हैं या नहीं आतीं, तो उससे बनता-बिगड़ता नहीं है। उससे केवल यह बात साबित होती है कि आपके दिमाग की परिपक्व अवस्था आयी कि नहीं। प्रकाश से मेरा मतलब है। प्रकाश ‘डिवाइन लाइट’ लेटेन्ट लाइट’ या ज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। यह चमक के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। चमक का अर्थ ज्ञान है। जिस प्रकाश के लिए हमने कहा है वह है जिसके लिए भगवान से हमने प्रार्थना की है-’तमसोमा ज्योतिर्गमय’।
हे भगवा! हमको अंधकार की ओर नहीं प्रकाश की ओर ले चलिए। अध्यात्म में प्रकाश शब्द जहाँ भी प्रयुक्त हुआ है वहाँ ज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
ध्यान के लिए जो हमने यह बताया कि आप प्रकाश का ध्यान किया कीजिए, तो कहाँ-कहाँ प्रकाश का ध्यान किया करूं ? अभी स्वर्ण जयंती साधना वर्ष में हमने आपको तीन जगह ध्यान करने को कहा है। एक आप मस्तिष्क में ध्यान किया कीजिए। दूसरा अंतरात्मा में हृदय स्थान पर और तीसरा नाभि स्थान पर ध्यान किया कीजिए। हमारे तीन शरीर हैं और तीनों शरीरों के ये तीन केन्द्र हैं। इन तीनों के भीतर प्रकाश चमकना चाहिए। प्रकाश हमारे तीनों शरीरों के भीतर प्रविष्ट होना चाहिए। इसका क्या अर्थ है ? इसका अर्थ यह है कि जब प्रकाश हमारी नसों में आये, नाडियों में आये, शरीर में आये तो नाभि से होकर आये। नाभि में से होकर इसलिए कि माता और बच्चे का जो संबंध सूत्र है वह नाभि से जुड़ होता है। इसलिए स्थूल शरीर का केन्द्र नाभि को माना गया है। जिस प्रकार माता के शरीर में से उसका रक्त नाभि से होकर हमारे शरीर में आता था और दोनों का संबंध जुड़ हुआ था, उसी प्रकार भगवान का प्रकाश नाभि में से होकर हमारे शरीर के भीतर आता है। जब वह प्रकाश आयेगा तब आपकी हड्डियाँ चमकेंगी, रक्त चमकेगा, माँस चमकेगा। चमकने से मेरा मकसद यह है कि तब आपके भीतर कर्मनिष्ठा, स्फूर्ति, साहसिकता, श्रम के प्रति प्यार, कर्मयोग के प्रति प्यार, कर्तव्य परायणता के प्रति प्यार उभरेगा। यह कर्मयोग है। प्रकाश का ध्यान करने वाला कभी ठाली बैठ नहीं सकता। वह सतत् सत्कर्मरत् ही रहेगा।
तीन योग हैं- कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। प्रकाश के माध्यम से इन तीनों योगों को हृदयंगम करने के लिए मैंने आपको कहा है। भगवान का प्रकाश जब शरीर में आएगा तो कर्मयोग के रूप में आयेगा और आदमी कर्तव्यनिष्ठ होता हुआ दिखाई पड़ेगा। उसके लिए ‘ वर्क इज वरशिप’ होगा। पूजा कर्म-श्रेष्ठ कर्म, आदर्श कर्म, लोकोपयोगी कर्म मर्यादाओं से बंधे हुए कर्म- सभी कर्मयोग के अंतर्गत आते हैं जो हमें सिखाते हैं कि जब प्रकाश हमारे शरीर में आता है तो हमारे शरीर की प्रत्येक क्रिया को कर्मनिष्ठ होना चाहिए। परिश्रमी होना चाहिए। यह बताता है कि आदमी को जो प्रकाश का ध्यान करता है उसे हरामखोर और आलसी नहीं होना चाहिए। चोर और हरामखोर मेरी दृष्टि में दोनों बराबर हैं। महाराज जी हमारा बेटा बड़ा हो गया है और खूब कमाता खाता है और हम तो अपनी मौज करते हैं। नहीं बेटे, कामचोर और चोर में तो कामचोर ही बड़ा होता है। मनुष्य के लिए यह सबसे बड़ी गाली है। कामचोर सबसे खराब आदमी है। नहीं गुरुजी हमको तो पेंशन मिलती है और हम मौज करते हैं। नहीं बेटे हम तुझे मौज नहीं करने देंगे। जब तक जिंदा है तब तक शरीर से तुझे कर्म करना पड़ेगा। अपने लिए रोटी खाने-पेट भरने को है, दूसरों के लिए तो नहीं है। उसके लिए कर। गुरु जी! हमारे बेटे तो पढ़ गये और हम अब निश्चिंत हो गये। तेरे ही तो पढ़ गये समाज के बेटे तो नहीं पढ़े। चल रात को नाइट स्कूल चलाया कर और दूसरे के बच्चों को पढ़ाया कर। इसलिए मित्रों, क्या करना पड़ेगा कि जब वह प्रकाश, जो मैंने ज पके साथ-साथ करने के लिए बताया है, अगर वह आपके भीतर नसों में स्फूर्ति के रूप में आये तो जब तक आप जिंदा हैं तब तक हम काम करेंगे, कर्मयोगी बनेंगे, मेहनत करेंगे-मशक्कत करेंगे, श्रेष्ठ काम करेंगे, कर्तव्यों का पालन करेंगे। जो हमारे लिए, हमारे समाज के लिए, देश के लिए, धर्म के लिए सबके लिए कर्तव्यों का बंधन बंधा हुआ है, इसका हम पालन करेंगे। अगर इस तरह की स्फूर्ति और नाड़ी अभ्यास बन जाए तो मैं समझूँगा कि आप कर्मयोगी हैं और आपने उस प्रकाश के ध्यान को जो मैंने बताया था- उसे सीख लिया और उसका मकसद समझ गये।
दूसरा वाला प्रकाश का ध्यान करने के लिए जो मैंने बताया था और यह कहा था कि आप अपने मस्तिष्क में प्रकाश का ध्यान किया कीजिए। आपके मस्तिष्क में, मन में जब प्रकाश आये तब आपको ज्ञानयोगी होना चाहिए। कर्मयोगी शरीर से, ज्ञानयोगी मस्तिष्क से। आपके मस्तिष्क के भीतर जो भी विचार आए निषेधात्मक नहीं, विधेयात्मक विचार आने चाहिए। अभी तो आप लोगों के मस्तिष्क में विचारों की कितनी भीड़, कितने मच्छर-मक्खी, कितनी वे चीजें जो आपके किसी काम की नहीं हैं, कितने विचार, कितनी कल्पनाएं आती रहती हैं। उनका यदि आप विश्लेषण करें तो देखेंगे कि मस्तिष्क में जाने कितने मक्खी-मच्छरों जैसे विचार भरे पड़े हैं। अभी उनमें से एक तो गुस्से का भरा था, एक कामवासना का विचार करता रहा, एक सिनेमा का विचार करता रहा। एक यह विचार करता रहा कि मैंने लाटरी के तीन टिकट खरीदें हैं उसमें से तीन-तीन लाख रुपये तो मिल ही जाएंगे। उन रुपयों से क्या-क्या करूंगा- अमुक काम करूंगा, अमुक बच्चे को, अमुक को दूँगा- आदि बेसिर पैर की सारी की सारी बातें सारे के सारे ताने बाने बुन रहा है। इससे आपकी सारी शक्तियाँ निरर्थक होती जा रहीं है।यह सब बेकार की कल्पनाएं हैं जिनके पीछे न कोई तारतम्य है, न वास्तविकता है और न इनसे आपको कुछ लेना-देना है। इस प्रकार की कल्पनाएं निरर्थक और अनर्थ मूलक ही होती हैं। सार्थक कल्पनाएं अगर आपके मस्तिष्क में आयीं होती, क्रमबद्ध रूप से आपने विचार किया होता तो आप में से अधिकाँश व्यक्ति बाल्टेयर हो गये होते, रवीन्द्रनाथ टैगोर हो गये होते अगर आपने अपनी कल्पनाओं को क्रमबद्ध बनाया होता, दिशाबद्ध बनाया होता, उत्कृष्ट और सक्षम बनाया होता। हमारी एक ही विशेषता है कि हम विद्वान है। इसीलिए विद्वान हैं कि हमने अपनी चिंतन की धाराओं को सीमाबद्ध-दिशाबद्ध करके रखा है। हमारा चिंतन अनावश्यक बातों में कभी भी नहीं जाता। जब कभी जाएगा क्रमबद्ध बातों में ही जाएगा, दिशाबद्ध बातों में जाएगा, आदर्श बातों में जाएगा और जो संभव है उनमें जाएगा। हमारा मस्तिष्क इतना ताना बाना बुनता है कि वह एक वास्तविकता और व्यावहारिकता पर टिका रहता है। जो अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और जो अनावश्यक है- ऐसे सारे के सारे विचारों को हम बाहर से ही मना कर देते हैं कि- “नो एडमीशन” यहाँ नहीं आ सकते, बाहर जाइये। आपको दाखिला हमारे मस्तिष्क में नहीं मिल सकता।
मित्रों! ज्ञानयोग उस चीज का नाम है जिसमें कि अपने भीतर चिंतन में जो अवाँछनीय तत्व घुलते चले जाते हैं, उनको हम हिम्मत के साथ रोकें और जिन चीजों की आवश्यकता है, जो चिंतन हमारे भीतर आना चाहिए उस चिंतन को भुला करके- निमंत्रित करके अपने भीतर स्थिर करें, तो हमारा मस्तिष्क वह हो सकता है जिसे हम ज्ञान का भंडार कह सकते हैं। विद्या की दृष्टि से, ज्ञान की दृष्टि से, सुलझाव की दृष्टि से एक से एक बहुमूल्य चीजें इसके भीतर से निकलती हुई चली आ सकती है। ज्ञान की गंगा हमारे मस्तिष्क में से वैसी ही बह सकती है जैसे कि शंकर जी के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती थी। हमारे मस्तिष्क में संतुलन का चन्द्रमा उसी तरीके से टंगा रह सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर टंगा हुआ था और हमारा तीसरा नेत्र-विवेक का नेत्र, दूरदर्शिता का नेत्र उसी तरीके से खुल सकता है जैसे कि शंकर भगवान के मस्तिष्क पर खुला हुआ था। मित्रों, यह ज्ञानयोग की साधना है। प्रकाश चमकना चाहिए हमारे ज्ञान को और विचारों को संतुलित और सुव्यवस्थित करने के लिए। अगर आपको ऐसा ज्ञान आए तो मैं समझूंगा कि हमने आपको अनुष्ठान में और साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में सम्मिलित करके जिस ध्यान की बाबत बताया है उसको आपने जान लिया और उसका व्यवहारिक स्वरूप समझ लिया। अगर आप उसका व्यावहारिक रूप नहीं जान पाये और कल्पना लोक में ही उड़ते रहे तो फिर ख्वाब ही देखते रहेंगे- सपने ही देखते रहेंगे। आध्यात्म सपना नहीं व्यावहारिक है। यह हमारे इसी जीवन से ताल्लुक रखता है और आज से ताल्लुक रखता है। ख्वाबों का अध्यात्म नहीं है, सपनों का अध्यात्म नहीं है। ख्वाबों का-सपनों का भगवान नहीं है। भगवान है तो वह जो हमारे आज के अभी के जीवन में आना चाहिए और हमारे व्यक्तित्व के रूप में प्रकट होना चाहिए।
मित्रों! तीसरा वाला प्रकाश का जो ध्यान हमने बताया है, वह अंतःकरण का प्रकाश है, विश्वासों का प्रकाश है, आस्थाओं का-निष्ठाओं का करुणा का प्रकाश है। जो चारों ओर प्रेम के रूप में प्रकाशित होता है। हम प्रेम के रूप में भक्ति योग करते हैं। भक्तियोग से क्या मतलब होता है ? भक्तियोग का मतलब है-मुहब्बत। जिस तरह से हम व्यायामशाला में अभ्यास करते हैं और उससे अपने शरीर और कलाइयों को मजबूत बनाते हैं और फिर उसका हर जगह इस्तेमाल करते हैं। सामान उठाने में, कपड़े धोने में, बिस्तर उठाने में करते हैं। हर जगह काम में लाते हैं- किसको ? जो व्यायामशाला में ताकत इकट्ठा की थी उसको। इसी तरीके से हम भगवान के साथ मुहब्बत शुरू करते हैं, प्यार शुरू करते हैं, भक्ति करते हैं। भगवान की भक्ति के माध्यम से जो हम ताकत इकट्ठा करते हैं, उस मुहब्बत को हर जगह फैल जाना चाहिए। हम अपने शरीर को मुहब्बत करें ताकि इसको हम अस्त−व्यस्त न होने दें- नष्ट-भ्रष्ट न होने दे। हम अपने शरीर को प्यार करें ताकि वह निरोग होकर के दीर्घजीवी बनें। यह हमारा शरीर के प्रति प्यार है। यह भक्ति है शरीर के प्रति भगवान की। मन के प्रति हमारी भक्ति यह है कि हम पागलों के तरीके से अपने मन-मस्तिष्क को खराब न कर दें। यह देव मंदिर है और इतना सुँदर मंदिर है कि हमारे विचारों की क्षमता, सूर्य की क्षमता के बराबर है। इसको हम असंतुलित न होने दें। हम अपने आप से प्यार करें। अपनी जीवात्मा से प्यार करें।
जीवात्मा ! जीवात्मा की तो हमने इतनी उपेक्षा की है कि यह बेचारी कराहती रहती है और यह पूछती रहती है कि दोस्त हमारा क्या होना है ? बेटे हमारा क्या होना है ? यह पूछते-पूछते वह बूढ़ी हो गयी। बुढ़िया पूछती रहती है कि बेटा हमारा भी कुछ होना है क्या ? और आप कहते रहते हैं कि अरे बुढ़िया! तू तो मरने वाली है। तेरा तो यही बद्रीनाथ है तू कहीं मत जा यहीं पड़ी रह। यह बुढ़िया जो है हमारी जीवात्मा है और यह ऐसे ही कसकती-कराहती रहती है। वह अंधी हो गयी है, आँखों से दिखाई नहीं पड़ता जीवात्मा को। अपनी जीवात्मा से यदि हमें प्यार रहा होता तो बेटे वह जवान हो गयी होती। जीवात्मा से मुहब्बत अगर हमें होती तो वह इतनी प्रचंड और प्रखर हो गयी होती कि हम साक्षात् भगवान के रूप में काम आते। पर हमारी जीवात्मा मर गयी क्योंकि हम उससे प्यार नहीं करते। हम किसी से प्यार करते हैं क्या ? नहीं, हम किसी से प्यार नहीं करते। बीबी से प्यार करते हैं ? नहीं ! बीबी के लिए तो हम जोंक हैं। खून की प्यासी जोंक जिससे चिपकती उसका खून पी जाती है। औरत के लिए तो हम जोंक हैं। उसकी जवानी हमने चूस ली। उसको छूँछ बना दिया। पचासों बीमारियों की वह मरीज बन गयी है। उसके पास जो कुछ भी था, अपने माँ-बाप के घर से गुलाब का सा शरीर लेकर आयी थी हमने उसको वासना की आग में जला दिया। वह जली हुई औरत कराहती-कसकती-सिसकती हुई पड़ी रहती है। जल्लाद छुरे लेकर के जिस तरह से मारता है, हमने भी अपनी औरत में इतने छुरे मारे इतने छुरे मारे कि सारा का सारा खून निकाल करके फेंक दिया। बच्चे पर बच्चा पैदा करते रहें और वह चिल्लाती रही कि हमारी हड्डियाँ इस लायक नहीं हैं और हमारे पास माँस उतना नहीं है, कृपा कीजिए अब हम बच्चे पैदा नहीं कर सकते और आप हैं कि बच्चे पैदा करते चले गये। वह हजार बीमारियाँ ले करके कभी हकीम जी के यहाँ चक्कर काटती है कभी आचार्य जी यहाँ चक्कर काटती है और कहती है कि गुरुजी यह बीमारी है, यह बीमारी है। अगर अपने अपनी स्त्री को प्यार किया होता तो उसको पढ़ाया होता, शिक्षा दी होती, दीक्षा दी होती। उसके स्वास्थ्य की रखवाली की होती और उसको सुयोग्य बनाया होता। उसको विकसित किया होता और श्रेष्ठ बनाया होता। पर अब तो वह किसी काम की नहीं बची।
प्यार है आपके पास ? भक्ति है आपके पास ? नहीं है। अगर भक्ति और प्यार रहा होता तो आपने अपने माँ-बाप की सेवा की होती। बहिन-भाइयों की सेवा की होती। अपने बच्चों की सेवा की होती। नहीं, गुरुजी हमने तो की है। बेटे आप सेवा करना नहीं जानते। प्यार करना जानते ही नहीं है। आप तो एक ही बात जानते हैं-पैसा। बेटे को पैसा दे जा। अरे क्यों पड़ा हुआ है इन बच्चों के पीछे। इनका भविष्य खराब करने के लिए पैसा जमा करता चला जा रहा है, क्या इनको शराबी बनाएगा ? अय्यास बनाएगा ? दुराचारी बनाएगा ? क्या बनाएगा ? नहीं, महाराज जी मैं तो पैसा छोड़ करके जाऊँगा, बेटे को देकर जाऊँगा और वह सारी की सारी जिन्दगी मौज करेगा। बेटे वह मौज नहीं अपनी जिंदगी खराब करेगा, और सबका सत्यानाश करेगा। प्यार, मित्रों किसे कहते हैं, आप जानते नहीं हैं। प्यार एक ही चीज का नाम है जिसमें आदमी को दिया जाता है। प्यार का अर्थ देना होता है। जिसको भी हम प्यार करते हैं उसको हम कुछ दिये बिना नहीं रह सकते। हम बच्चे को प्यार करेंगे तो उसको कुछ देंगे। जिस किसी को भी प्यार करेंगे हम उसको कुछ देंगे। भक्तियोग का अर्थ है- दया, भक्तियोग का अर्थ है करुणा, भक्तियोग का अर्थ है प्रेम, भक्तियोग का अर्थ है सेवा। नहीं महाराज जी सेवा का अर्थ होता है- मूर्ति पर टन-टन घंटी बजा दी, बस हो गयी नवधा भक्ति। तो यही है तेरी नवधा भक्ति- कौन सी- “ पाद सेवनम् पंखाझेलनम् “ पाद सेवन और पंखा झलने को ही नवधा कहा जाता है। जो बातें भक्ति की हैं उनसे तो हजारों मील दूर भागते रहते हैं और स्वाँग करते रहते हैं- खेल-खिलौने बनाते रहते हैं। दंड-कमंडल पेलते हैं और भगवान को भी धोखा देते हैं और अपनों को भी धोखा देते हैं और कहते हैं कि नवधा भक्ति करते हैं। बेटे, इसे नवधा भक्ति नहीं कहते।
मित्रों क्या करना पड़ेगा ? भक्तियोग के उस वास्तविक स्वरूप को समझना पड़ेगा जिसके लिए हमने आपको बताया था कि आप प्रकाश का ध्यान किया कीजिए। प्रकाश का ध्यान करेंगे तब फिर आपको वहाँ चलने का मौका मिल जाएगा जहाँ कि “ तमसो माँ ज्योतिर्गमय “ की बात बतायी गयी थी। एकाग्रता ध्यान का एक उद्देश्य है। बिखराव को रोकना भी कह सकते हैं, क्योंकि हमने अपने आप को सब जगह बिखेर दिया है। यदि हमने अपने आपको एक लक्ष्य पर केन्द्रीभूत किया होता तो बंदूक की नली से बारूद जिस तरीके से एक दिशा में चली जाती है और
लक्ष्य भेद करने में सफल होती है, हम भी अपने जीवन लक्ष्य में सफल हो गये होते। अर्जुन ने अपने बिखराव को एक केन्द्र पर इकट्ठा कर लिया था। द्रौपदी-स्वयंवर में जब वह गया था तो द्रोणाचार्य ने लोगों से पूछा था कि क्या दिखाई पड़ता है ? किसी ने कहा मछली की पूँछ, तो किसी ने कहा मछली की टाँग, मछली का पेट। तो आचार्य द्रोण ने कहा- आप मछली का निशाना नहीं बेध सकते, भागिये यहाँ से। फिर अर्जुन से पूछा कि आपको क्या दिखाई पड़ता है ? अर्जुन ने कहा- हमें एक ही चीज दिखाई पड़ती है और वह है मछली की आँख। तो मारिये निशाना और सफलता का वरण कीजिए। मित्रों, असंख्य दिशाओं में फैला हुआ हमारा मस्तिष्क कभी सफलता नहीं पा सकता। इसे एक दिशा में इकट्ठा कीजिए।
यह ध्यान जो हम आपको बताते हैं- मेडीटेशन कराते हैं और कहते हैं कि अपने मन का बिखराव-फैलाव रोकिये। फैलाव के कारण न आपका मन विद्या पढ़ने में लगता है, न स्वास्थ्य संवर्धन में कभी मन लगता है। हर समय बिखराव ही बिखराव। यह जो मन की अस्त-व्यस्त स्थिति है, इसको आप इकट्ठा कीजिए भगवान के माध्यम से, जप के माध्यम से, ध्यान के माध्यम से और प्रत्येक काम को जब करना हो तो इतना तीखा अभ्यास डालिए कि जब जो काम करना पड़े उसी में तन्मय हो जाएं। साँसारिक कार्य में भी और भगवान के कार्य में भी। यह एकाग्रता आध्यात्मिकता का गुण है। आप जब भी जो भी काम करें उसमें इतनी तन्मय हो जायें कि “ वर्क इन वर्क” “प्ले इन प्ले” अर्थात् जब आप खेलें तो इस कदर खेले कि खेल के अतिरिक्त और कोई चीज ध्यान में ही न रहे और जब आप काम करें तो इस मुस्तैदी से काम करें कि काम के अलावा आपको कोई दूसरी चीज दिखाई ही न पड़ा। इस तरह की तन्मयता के साथ किये गये काम सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देते हैं। मित्रों! तन्मयता हमारे जीवन का वह वास्तविक स्वरूप होना चाहिए जो वैज्ञानिकों के पास होता है। वैज्ञानिकों में और साधारण बी. एस. सी. में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता- दोनों एक जैसे होते हैं। वैज्ञानिक उसे कहते हैं जो अपने रिसर्च कार्य में जब लगता है तो इतना गहरा डूबता हुआ चला जाता है जैसे मोती ढूंढ़ने के लिए पनडुब्बी सागर में गहराई तक चला जाता है और उसको बीन करके लाता है। यह एकाग्रता का चमत्कार है। आपको एकाग्रता केवल भजन में ही नहीं लानी है वरन् हर काम में इसका अभ्यास करना है। एकाग्रता का अभ्यास न होने के कारण ही सदैव यह शिकायत बनी रहती है कि गुरु जी हमारा मन भजन-पूजन में नहीं लगता। तो क्या किसी काम में आपकी एकाग्रता होती है ? हर काम में बिखराव है। आप अपने मन को निग्रहित करना सीखिये। जब जो काम करना हो तब उसमें इतनी मुस्तैदी से तन्मय होना सीखिए ताकि आप जब भजन करना शुरू करें तो भजन में भी उतनी तन्मयता हो जाए जितनी एक योगी की होती है यदि आपने प्रकाश का ध्यान करना सही तरीके से सीख लिया तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आप वह सब कुछ प्राप्त कर सकेंगे जो एक अध्यात्मवादी को प्राप्त करना चाहिए।
भौतिक ऊर्जा व प्राण ऊर्जा के समन्वय से एक तीसरी शक्ति के आविर्भाव में प्राचीनकाल के वैज्ञानिक ऋषियों ने एक अद्भुत सफलता प्राप्त की और उसे ‘यज्ञाग्नि’ के नाम से संबोधित किया। यज्ञ भारतीय परंपरा में उपासनात्मक अनुष्ठानों में भी सम्मिलित रखा गया है और उसका प्रयोग सृष्टि और समाज के असंतुलन को संभालने में एक सामर्थ्य विशेष के रूप में भी हुआ है।
यज्ञ का भारतीय संस्कृति में अविच्छिन्न स्थान है। उसे यज्ञ संस्कृति भी कहा जाता रहा है। जन्म से लेकर मरण पर्यंत षोडश संस्कारों के रूप में इस प्रक्रिया का सोलह बार प्रयोग करके उसके जीवन कम में से पशु प्रवृत्तियों के निराकरण और देव प्रवृत्तियों के अविवर्धन की अपेक्षा की जाती रही है। प्रत्येक पर्व और शुभारंभ में यज्ञ कृत्य की अनिवार्यता मानी गयी है। होली वार्षिक सर्वजनीन यज्ञ है। पाँच आहुतियों का बलिवैश्व यज्ञ दैनिक नित्यकर्म में सम्मिलित रखा गया है। भारतीय धर्मानुयायी का विवाह विधान दो आत्माओं की वैल्डिंग की तरह जोड़ने वाले यज्ञ कृत्य के साथ ही संपन्न होता है। पार्थिव शरीर की पूर्णाहुति चिता जलाकर अंत्येष्टि यज्ञ के रूप में ही संपन्न होती है। इन परंपराओं पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि भारतीय जीवनचर्या में यज्ञ को कितनी गहराई तक घुला मिला कर रखा गया है।
यज्ञ के भी गायत्री की तरह दो पक्ष हैं-एक दार्शनिक, दूसरा वैज्ञानिक। जीवन यज्ञ अथवा यज्ञीय जीवन एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण जिसके अनुसार पवित्रता और उदारता की रीति-नीति अपनाकर जिया जाना चाहिए। प्रथम और प्रमुख धर्मशास्त्र ऋग्वेद के प्रथम मंत्र के प्रथम चरण में यज्ञाग्नि को पुरोहित कहा गया है। पुरोहित अर्थात् मार्गदर्शक, यहाँ मार्गदर्शक का तात्पर्य जीवन की दिशा धारा का निर्धारक है।यज्ञाग्नि की पाँच विशेषतायें बतायी गयी हैं-(1) सदा गरम अर्थात् सक्रिय रहना(2) ज्योतित अर्थात् अनुकरणीय बनकर रहना (3) संपर्क में आने वालों को अपने जैसा बना लेना (4) उपलब्धियों का संग्रह न करके वितरित करने रहना (5) लौ ऊंची रखना अर्थात् चिंतन, चरित्र और स्वाभिमान को नीचे न गिरने देना। इन्हीं आदर्शों को पंचशील कहा गया हैं। जो विभिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न प्रकार से प्रयुक्त होते हैं। पंचशील ही पंच देव है। उपासना में इन्हीं पाँचों को मूर्धन्य माना गया है।
यज्ञाग्नि का वैज्ञानिक रूप यह है कि जिसमें प्राण ऊर्जा से लेकर ब्रह्म ऊर्जा तक की प्रमुख पाँच अग्नियों को ज्वलंत किया जाता है। कठोपनिषद् के यम-नचिकेता संवाद में पंचाग्नि विद्या का सुविस्तृत उल्लेख है। उस प्रक्रिया के सहारे शरीर के आधारभूत पंचतत्वों का नये सिरे से परिमार्जन करके कायाकल्प जैसी स्थिति उत्पन्न की जा सकती है। चेतना के भी पाँच आधार हैं जिन्हें पाँच प्राण कहते हैं। इन पाँच घटकों का स्तर बढ़ाकर साधक की प्राण संज्ञा को किस प्रकार उच्चस्तरीय बनाया जा सकता है, यह भी एक रहस्य है। जिसका आभास यम निर्देशित पंचाग्नि विद्या में मिलता है।
जीव सत्ता को प्राण कहते हैं, उसमें भौतिक और आत्मिक दोनों ही स्तर की ऊर्जा का समावेश है। इस प्राण को प्रखर एवं प्रचंड बनाकर प्राणाग्नि तक पहुँचाने की विद्या प्राणायाम कहलाती है। इसके अतिरिक्त अंतर्जगत में सन्निहित दिव्यता को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने में और सुषुप्ति की जाग्रति में परिणत करने के लिए अंतराल को प्रभावित करने वाली अनेक साधनाओं का भी अवलंबन अपनाना पड़ता है। गीता में “प्राण-अपान में और अपान को प्राण में यजन करने” का संकेत है। यह अंतःक्षेत्र की प्राणाग्नि का यज्ञाग्नि का प्रज्ज्वलन है। कुँडलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन, ग्रंथि वियोजन, ध्यान, धारणा समेत समाधि प्रकरण जैसी अनेक साधनायें इसी परिधि में आती हैं। आत्म यज्ञ में बाहरी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं पड़ती। कायसत्ता में विद्यमान साधन सामग्री से ही योगाग्नि उत्पन्न कर ली जाती है और वह प्रतिफल हस्तगत किया जाता है जिसका महात्म्य-विस्तार अध्यात्म विज्ञान को अनेकों साधनात्मक दिशाधाराओं में किया गया है। यज्ञाग्नि और प्राणाग्नि में परस्पर संबंध में प्रश्नोपनिषद् में सुविस्तृत प्रकाश डाला गया।
अध्यात्म विज्ञान के अनुसार काक सत्ता की पाँच परतें हैं जिन्हें पंचकोश कहते हैं। अन्नमय, प्राणमय, मन्तेमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश के नाम से इन्हें जाना जाता है। इन्हें आत्मिक प्रगति के पाँच सोपान एवं पाँच दिव्यलोक भी कहते हैं। यह सब कुछ अपने ही शरीर हैं, परन्तु अभीष्ट ऊर्जा के अभाव में सब कुछ प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है। जागरण के लिए उसे ऊर्जा चाहिए। पक्षियों के अंडे निजी गर्मी से नहीं, बाहरी गर्मी से पकते हैं। काया के पाँच तत्वों और चेतना के पाँच प्राणों को प्रखर बनाने के लिए जिस आँतरिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है उसे पंचाग्नि विद्या-प्राणाग्नि विद्या के सहारे संपन्न किया जाता है। मनुस्मृति के अनुसार सामान्य काया को यज्ञ विद्या के सहारे ब्राह्मीय देवत्व संपन्न बनाया जाता है। कहा गया है कि ब्राह्मण वंश नहीं, वरन् आत्मविकास का एक सोपान है, उसमें यज्ञोपचार का आश्रय लेना पड़ता है। यहाँ अध्यात्म यज्ञ का ‘प्राण से प्राण के यजन’ का संकेत है, फिर भी उस प्रक्रिया में अग्निहोत्र की अत्यधिक उपयोगिता मानी गयी है। संक्षेप में व्यक्तित्व में अंतरंग और बहिरंग क्षेत्रों में प्रखरता भर देने के लिए योगाग्नि और यज्ञाग्नि की आवश्यकता तत्वदर्शियों ने समझी है।
अग्निहोत्र यज्ञ विधान का तीसरा सोपान है। आमतौर से यज्ञ शब्द से अग्नि पूजा का ही अर्थ लिया जाता है। यह देखने में भौतिक विज्ञान की प्रक्रिया प्रतीत होती है, पर वस्तुतः उसमें चेतन और पदार्थ की विशिष्टताओं का समान रूप से उपयोग होता है। अग्निहोत्र का महात्म्य भौतिक उपलब्धियोँ के रूप में किया जाता है, फिर भी उसके साथ जुड़े हुए दिव्य परिणाम कम नहीं हैं।
अग्निहोत्र का प्रचलन भारत में छोटे-छोटे सही-गलत रूप में सर्वत्र पाया जाता है। देवता के नाम पर ज्योति जलाने और गूगल चढ़ाने की परंपरा से पिछड़े वर्ग भी परिचित हैं। होली जलाने में बच्चों तक को उत्साह रहता है। अगरबत्ती, धूप व दीप जलाने से इसी प्रयोजन की चिन्हपूजा है। अन्य धर्मावलंबी भी इस प्रक्रिया को किसी न किसी रूप में धर्म प्रयोजनों के अवसर पर प्रयुक्त करते हैं। प्रश्न यह उठता है कि इतने व्यापक प्रचलन के पीछे कोई विशेष उद्देश्य है या ऐसे ही सुगंधित धुंआ फैलाने जैसे छोटे प्रयोजन के लिए यह सब किया जाता है।
मनुष्य शारीरिक एवं मानसिक रूप से निरंतर गंदगी निकालता रहता है। सामूहिक रूप से भी आये दिन गंदगी एवं कचरा उत्पन्न होता है। यह सभी निरंतर वायुमंडल में सम्मिलित होता और बढ़ता जाता है। यों तो इस गंदगी का शोधन वाली बात का भी महत्व है, पर समझा जाना चाहिए कि यज्ञ जैसा उच्चस्तरीय अनुष्ठान एवं अनुशासित विधि-विधान मात्र इतने भर के लिए नहीं बना है। आज पर्यावरण प्रदूषण की सर्वत्र चर्चा है और अंतरिक्ष के विषाक्तता से भरते जाने के कारण उत्पन्न संकट की विभीषिका ने सभी को चिंतित किया है। कल-कारखाने परमाणु भट्टियाँ एवं परिवहन के साधन जैसे मोटर गाड़ियाँ और वायुयान आदि को बंद करने की भी किसी की हिम्मत नहीं पड़ती और प्रदूषण से निपटने की कोई तरकीब भी हाथ नहीं लगती।इस संदर्भ में यज्ञाग्नि द्वारा निसृत ऊर्जा से कचरे को माचिस से नष्ट करने की तरह नयी आशा का केन्द्र बिन्दु मानकर इसे ब्रह्मवर्चस् की शोध शृंखला में सम्मिलित किया गया है।
यज्ञ के फलस्वरूप ‘पर्जन्य’ बरसने का प्रतिफल बताया गया है। पर्जन्य का मोटा अर्थ बादल भी है और उससे अभीष्ट वर्षा होने का तुक बिठाया गया है, पर वास्तविकता यह है नहीं। पर्जन्य अंतरिक्ष में घुमड़ने वाली प्राण परतों को कहते हैं, जो जल ही नहीं, पवन, अन्न और वनस्पतियों में सम्मिलित होकर प्राणियों की क्षमता एवं पदार्थों की उपयोगिता की अभिवृद्धि करता है। यज्ञ से इसी पर्जन्य की वर्षा होने और उससे सुखद परिस्थितियां विनिर्मित होने की बात कही है। विश्व वैभव के संवर्द्धन में यज्ञ प्रक्रिया का कितना बड़ा योगदान हो सकता है। इस तथ्य को अतीत के अध्यात्म विज्ञानी ऋषि-मनीषियों ने भली-भाँति जाना था और इस उपचार से विश्व-कल्याण का व्यापक वातावरण बनाया था। विषाक्तता भरे आज के वातावरण में इस महाविज्ञान की खोई हुई कड़ियों को फिर से ढूंढ़ निकालने की आवश्यकता पड़ी और तद्नुरूप ही उसकी व्यवस्था बनाई गई है। यों तो चिन्ह पूजा के रूप में जो आधी-अधूरी लकीर पिटती रहती है, उससे यज्ञ परंपरा का परिचय भर मिलता है। पर वह प्रयोजन पूरा नहीं होता जिसका कारण इस पुष्य प्रक्रिया को उच्चस्तरीय ऊर्जा शक्ति के रूप में मान्यता मिली थी।
यज्ञीय ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है-शारीरिक और मानसिक रुग्णता से जूझना और स्वास्थ्य संवर्द्धन का पथ-प्रशस्त करना। प्राचीनकाल से ही मनुष्य के शारीरिक और मानसिक रोगों की निवृत्ति में यज्ञाग्नि का उपयोग होता रहा है। दोनों क्षेत्रों की समर्थता बढ़ाने में भी इस प्रक्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसका परिचय इतिहास पुराणों की अनेकों आख्यायिकाएं प्रस्तुत करती हैं। यज्ञोपचार से राजा दशरथ के चार पुत्र, अश्वत्थामा, द्रौपदी आदि विशिष्ट आत्माओं के जन्म धारणा करने की गाथायें बताती हैं कि इस ऊर्जा का प्रभाव मानवी सत्ता की कितनी गहरी परतों में पहुँचता है। बात इससे कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। यह समस्त संसार एक विश्व पुरुष है, उसे विराट् भी कहा गया है। इस विराट् के घटकों-अवयवों में समस्त प्राणी और पदार्थ सम्मिलित हैं। यज्ञोपचार को इस विराट् का प्राणोपचार माना गया है और “यज्ञेन यज्ञमय जन्तदेवा”-मंत्र में विभूतियों के अजस्र अभिवर्धन की बात कही गयी। इसमें सृष्टि की सामान्य संपदा को असामान्य बना देने और प्राणियों तथा पदार्थों का स्तर ऊंचा उठा देने का संकेत है।
सर्वविदित है कि पदार्थ के तीन स्वरूप होते हैं-ठोस, द्रव और गैस। कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता, वरन् परिस्थिति के अनुरूप इन्हीं तीन स्थितियों में अदलता-बदलता रहता है। वायुभूत हुआ पदार्थ सृष्टि के कण-कण में फैल जाता है। वही सूक्ष्मीकृत पदार्थ श्वाँस के माध्यम से सरलतापूर्वक काया के कण -कण में भी अतिशीघ्र पहुँचाया जा सकता है, जबकि उसे उदरस्थ करने और पचाने के लिए प्रभावी बनाने में विलंब ही नहीं लगता, वरन् अंश भी थोड़ा बहुत हाथ ही लगता है। इंजेक्शन में सरलता मानी गयी है और उस माध्यम से उपचार सामग्री भीतर पहुँचाने का उपाय खोजा गया है, किन्तु यह पद्धति भी आँशिक रूप से ही सफल हुई है। कई बार तो शरीर के श्वेत रक्त कण उसके प्रति विद्रोह तक खड़ा कर देते हैं और लाभ के स्थान पर हानि उठानी पड़ती है। किन्तु यज्ञाग्नि द्वारा पदार्थ को वायुभूत बनाकर उसे शरीर में प्रवेश कराने की पद्धति ऐसी है जिसे निरापद, सरल और सफल होने का अपेक्षाकृत अधिक अवसर है। कारण सूक्ष्म होने पर पदार्थ की सामर्थ्य और व्यापकता बढ़ती है। यज्ञ में यजन किये गये पदार्थ नष्ट नहीं होते, वरन् अदृश्य होकर अपेक्षाकृत अधिक सशक्त और व्यापक बन जाते हैं और साँस के सहारे अंदर पहुँचकर अपना अधिक प्रभाव छोड़ते हैं। इस माध्यम से रोग निवारक और परिपोषक पदार्थ वायुभूत होकर जब भीतर पहुँचते हैं तो अपनी सूक्ष्मता के कारण स्वभावतः अधिक प्रभावी होते हैं। इस प्रक्रिया की एक और विशेषता है कि साँस नाक द्वारा ली जाती है और वह मस्तिष्क मार्ग से फेफड़ों में होती हुई समूचे शरीर में वितरित होती है। अतः यज्ञ प्रक्रिया द्वारा निस्तृत गैस का प्रमुख लाभ मस्तिष्क को मिलता है। इस तरह यज्ञ से शारीरिक ही नहीं, मानसिक उपचार भी बन पड़ता है।
यज्ञ में मात्र अमुक पदार्थों का वायुभूत बनाना ही एक प्रसंग नहीं है, वरन् याजकों की श्रद्धा, विशेष स्थिति, मंत्रों की स्वर शक्ति व्यक्तियों की संयुक्त ऊर्जा जैसे अनेक कारणों के मिलने से एक विशिष्ट वातावरण बनता है। ऐसा विशिष्ट जिसमें देवसत्ता की उपस्थिति का अनुभव किया जा सके। इस उत्पादन का न केवल उस प्रयोजन में भाग लेने वालों पर प्रभाव पड़ता है, वरन् व्यापक वातावरण पर उसकी उपयोगी प्रतिक्रिया होती है। पर्जन्य के रूप में प्राण ऊर्जा, प्राणियों की समर्थता का संवर्धन, ऋतुओं की अनुकूलता, वनस्पतियों का विशिष्ट परिपोषण, रोग कीटाणुओं का शमन जैसे कितने ही भौतिक लाभ प्राचीनकाल से में यज्ञों से मिलते रहे हैं। प्राण और पदार्थ की संयुक्त ऊर्जा से जिस अग्नि का आविर्भाव होता है, उसकी सामर्थ्य एवं परिणति तो असाधारण है। सृष्टि एवं समाज के बिगड़ते संतुलन को संभालने में समय-समय पर इस तरह राजसूय, वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों के विराट् आयोजन होते रहे हैं। इस दिनों इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शाँतिकुँज द्वारा विश्व स्तर पर आयोजित अश्वमेध यज्ञों को उसी पुरातन शृंखला की कड़ी माना जाना चाहिए। इसमें सतयुग की देवलोक की संभावनाओं को मानवी प्रयत्नों द्वारा अवतरित, विनिर्मित, सुनिश्चित तथ्य सन्निहित है।
कर्कटि नाम की एक राक्षसी को क्षुधा बहुत तीव्र थी। वह समय-कुसमय, बाल-वृद्ध किसी को भी भक्षण कर जाती थी। फिर भी भूखी रहती थी। उसने अपनी कठिनाई ब्रह्माजी से कही। उनने अनुग्रहपूर्वक उसे सुई जैसा छोटा बना दिया। तनिक सी रक्त की बूँद पी जाने से उसकी तृप्ति हो जाती। इस पर मृतकों के ढेर जमा होने लगे और दुर्गंध फैलने लगी। कर्कटि ने फिर इस अव्यवस्था की चर्चा ब्रह्माजी से कीं। उन्होंने उसका पुरातन रूप बना दिया। साथ ही यह भी कहा कि वह कुछ प्रश्न पूछकर हर किसी से यह जान लिया करे कि वह मरण योग्य है भी या नहीं? जो मृत्यु कं मुख में जाने योग्य हो, उन्हीं को खाया कर। किसी आत्मवेत्ता पर हाथ न डालना, क्योंकि अमर जीवन पर विश्वास करने के कारण वो शरीर छोड़ने पर भी नहीं मर सकते।
कर्कटि वैसा ही करती। आत्मा का अमरत्व जिन्हें विदित होता, वे उसकी हंसी उड़ाकर प्रसन्नतापूर्वक शरीर त्याग देते। जिन्हें अज्ञान का नागपाश जकड़े होता, वही मृत्यु के समय बिलखते, उन्हीं का माँस कर्कटि को स्वादिष्ट लगता। निदान यह सुँदर नर्तकी का भेष बनाकर राजमहल में चली गई। जिन कुकर्मियों को प्राण दंड मिलता, उनसे पेट भरती और जो उसके नृत्य-गायन पर मुग्ध हो जाते, उन्हें चूसकर खोखला कर देती। राजा की सभा में जो ज्ञानवान आते, उनसे भी वह दूर रहती।
मृत्यु का डर अज्ञानियों और आतंकवादी कुकर्मियों को ही लगता है।
*समाप्त*