पाप का प्राणहंता सौंदर्य भरा आकर्षण

सच्च सौंदर्य क्या है ? इसकी सही जानकारी एवं आसानी से साक्षात्कार न हो पाने के कारण बहुत से व्यक्ति एक विडंबना में जकड़े मृगतृष्णा में भटकते रहते हैं। पाप का स्वरूप भी ऐसा है जिसमें सौंदर्य व प्रत्यक्षतः आनन्द ही आनंद प्राप्त हो जाने का आकर्षण छिपा होता है, ऐसा आकर्षण जैसा एक शलभ के लिए दीपशिखा में होता है। शिखा की ज्योति का आकर्षण सम्मोहक होता हे, जिसमें फँसकर पतंग अपने पंख जलाकर भी उसी की ओर रेंगता रहता है। अंततः अपनी जान भी जलकर खाक होने के रूप में गंवा बैठता है।

सोचने योग्य बाते हे कि ऐसा क्या है, इसका क्या कारण है कि मनुष्य पाप के प्राणहंता सौंदर्य की ओर सतत् दौड़ता रहता है। यदि मनुष्य को सच्चे सौंदर्य के जो सत्य भी है तथा शिव-कल्याणकारी भी, तो वह पाप के झूठे आकर्षण की ओर कदापि प्रेरित न हो। आत्मा के सौंदर्य की ओर-परमात्मा के चारों ओर संव्याप्त प्रकृति के रूप में विद्यमान सौंदर्य की ओर एक बार मनुष्य जी भरकर दृष्टि डाल ले तो फिर उसे सारे झूठे सौंदर्य भरे पाप के आकर्षणों से घृणा हो जाए व वह निताँत निर्विकार हो बैठे।

सौंदर्य विषयक इस भ्राँति ने ही हर मनुष्य को एक प्रकार की माया में जकड़ रखा है। ‘माया’ अर्थात् वह जो नहीं है पर प्रतीत होती है। इस भ्राँति को कौन समझ पाता है, कौन नहीं, इसी पर मनुष्य जीवन का सारा खोल चल रहा है। मनुष्य की इसी भ्रांति ने इस स्वर्ग तुल्य पृथ्वी को बहुसंख्य व्यक्तियों के लिए नारकीय बना दिया है। ऐसे लोग ईश्वर की इस सुन्दर कृति को अपनी पाप दृष्टि से कलुषित कर देते हैं। उनको प्रतिक्षण अपने निम्न स्तरीय स्वार्थ, पाशविक वासना, जघन्य रुचि की पूर्ति के अतिरिक्त और कोई विचार मन में आता ही नहीं। फलतः वे स्वयं तो पतन के गर्त में गिरते ही हैं, अपने निकटवर्ती जनों के लिए भी काँटे बोते हैं। जिसे आत्मकल्याण की इस चोले में मिले इस विशिष्ट अवसर का सदुपयोग कर आत्मोत्थान की तनिक भी इच्छा है, उसे सदैव पाप से घृणा कर सद्वृत्तियों का चिंतन करते रहना ही अभीष्ट है।


प्रेम ही परमेश्वर है।

प्रेम अंतःकरण की भाव विभोर अवस्था का नाम है। हम अपनी आँतरिक शक्तियों को पहचान नहीं पाते, क्योंकि वे अतिसूक्ष्म है। हमारी स्थूल बुद्धि उन्हें अनुभव नहीं कर पाती इसीलिए योगी लोग विभिन्न योग साधनाओं द्वारा अपनी बुद्धि को सूक्ष्म और निर्मल बनाते हैं। चित्त को विषय-वासनाओं से मुक्त करके उसे किसी भी सूक्ष्म स्थिति में प्रवेश और चिंतन के योग्य बनाते हैं, तब कहीं उन भाव तरंगों की प्राप्ति और अनुभूति हो पाती है, जो अपने अंदर और बाहर सब तरफ तिल में तेल जल में विद्युत और शब्द में अर्थ की भाँति छिपे पड़े हैं। प्रेम भावनाओं के उद्रेक से अंतःकरण में अतिरिक्त कुछ और दिखाई ही नहीं देता इसलिए प्रेम जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है। उसके लिए कठिन साधनाओं की आवश्यकता नहीं । आत्मारस है उसकी अनुभूति कराने की शक्ति केवल प्रेम को है। इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट जानने के लिए हमें जीवन के उन क्षणों का स्मरण करना होगा जब हम किसी के प्रेम में भाव विभोर रहे हों। प्रेम में अद्वितीय रस, अनुपम सौंदर्य और रहस्यमय संगीत छिपा हुआ है। प्रेमी तो वीरान भी महल और राजप्रासादों में रहने वालों की अपेक्षा स्वयं को असीम तृप्त और परमानंद की स्थिति में पाता है। इसलिए लौकिक सुखों की तो उसे चाह भी नहीं होती।

संसार में जो भी कुछ सूनापन है वह प्रेम का अभाव है। संसार में जो कुछ भी सक्रियता है वह प्रेम की प्यास है। समस्त दुःखों के मूल में अंतःकरण की वह प्यास ही परिलक्षित होती है जो किसी से निष्काम, निर्विषय प्रेम पाने के लिए तड़पाया करती है। पुत्र मिल जाने के बाद उसे पालन-पोषण और विकास की चिंता आती है, धन के साथ इंद्रिय सुखों के प्रति आकर्षण की अनिवार्यता जुड़ी हुई है। पद के साथ महत्वाकांक्षाएं यश के साथ अहंकार का संबंध अनादि और अटूट है पर प्रेम में प्रेम की संतुष्टि के अतिरिक्त न तो कोई आकर्षण है न महत्वाकाँक्षा और न अहंकार । इसलिए वह आत्मानुभूति और ईश्वर प्राप्ति का सर्वोत्तम योग है। इससे ही मनुष्य उस सूक्ष्मतम सत्ता को पा सकता है। भगवान का भक्ति से संबंध बताते हैं, और कुछ नहीं प्रेम का ही दूसरा रूप है।

प्रेम की विलक्षणता यह है कि वह मिलन में भी उतना ही आनंद प्रदान करता है जितना विरह में आत्मसंतुष्टि । उन विरह के क्षणों में स्मृति अपना प्रभाव व्यक्त करती है और आत्मसंतोष के लिए जीवन को उत्सर्ग और सक्रियता से भर देती है। अगले मिलन के क्षणों की उमंग प्रेरणा देती है, प्रेमी की इच्छा और आदर्शों की पूर्ति की। भगवान की भक्ति और भगवान के प्रेम के साथ त्याग और सेवा को अनिवार्य स्थान दिया जाता है। वह विराट जगत के कण-कण में फैली चेतनता में सुख संतोष और सौंदर्य प्राप्त करने की दिशा प्रदान करता है। चंद्रमा किसके लिए चमक रहा है, क्यों चमक रहा है? आकाश को सितारों से क्यों भर दिया गया वे निरंतर जगमगाते क्यों रहते है।, वृक्ष ऊपर की ओर उठते जा रहे है। उन्हें ऐसी कौन सी चाह हे कि अपने भीतर के मधुर रस को फल बना कर भी उसका थोड़ा सा भी अंश अपनी जीभ पर न रखकर संसार को दान कर देते हैं। समुद्र कब से भरा है उसके भीतर कितनी प्रचंड हलचल है पर उसने आज तक अपनी मर्यादा भंग नहीं की। नदियाँ थोड़ा सा जल पाकर उमड़ पड़ती हैं, सीमाएँ तोड़कर खेत-खलिहान मकान, देवस्थान किसी की परवाह किए बिना सब को तोड़कर चल देती हैं पर समुद्र का मौन गांभीर्य आज तक नहीं टूटा। यह सब बताते हैं कि उन सब में ईश्वर अपने प्रेम की अभिव्यक्ति करता है। सेवा से प्रेम की अभिव्यक्ति होने से ही जगत का कण-कण दूसरों को देने की नीति पर चल रहा है। मुसकराते हुए फूल-चहचहाते हुए पक्षी, कल कल करते निर्झर और लहराता हुआ पवन सब में एक ही लगन, एक उत्साह सेवा और उसके माध्यम से प्रेम की व्यापक अभिव्यक्ति है।

प्रेम की यही व्यापकता ही तो मानव जीवन को स्थूल जगत से उठाकर सूक्ष्म जगत के चिंतन की प्रेरणा देती है इसीलिए प्रेम जीवन की सबसे बड़ी मार्गदर्शक सत्ता है। वह आदमी को भौतिक सुख की अपेक्षा आध्यात्मिक तथ्यों में जीवन और प्राण का संदेश देती है इसलिए यह सबसे सबल शिक्षण है। हम किसी को कितना प्यार करते हैं उतना ही उसमें प्रेरणाएँ और प्रकाश भरने के अधिकार हैं। कहते हैं प्यार से समझाई हुई बातें जीवन भर नहीं भूलती जब कि भयवश सीखी हुई, दबाव में आकर सुनी हुई सारपूर्ण बातें भी लोग अधूरे मन से सुनते और कुछ ही दिन में भूल जाते हैं।

भगवान सृष्टि के कण-कण में हैं और प्रेम भी सृष्टि के कण-कण में है। परमात्मा विश्व की मूल प्रेरणा है और प्रेम भी सृष्टि के संपूर्ण क्रियाकलापों का संचालक है। परमात्मा एक ऐसा तत्व है जो अपने आप में परिपूर्ण है अपने भीतर से सब कुछ निकालता अपने ही भीतर सब कुछ समेटता रहता है। इसमें से ही जीवन का उल्लास, उमंग, सौंदर्य सब कुछ अपने भीतर से उमड़ता और भीतर ही संतुष्ट होता रहता है, न उसे बाह्य ? वस्तुओं की अपेक्षा होती है न उपेक्षा ही। अद्भुत साम्यता है दोनों में। सच है जिसने प्यार करना सीख लिया, प्रेम पा लिया, उसने परमेश्वर को पा लिया।


यमलोक का चित्रगुप्त हमारा अचेतन मन ही है

जैसे-जैसे हम स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे हमें संकटों और अभावों के वास्तविक कारणों को समझने में सुविधा मिल रही है। मोटी बुद्धि सदा संकटों का कारण बाहर ढूँढ़ती है। व्यक्तियों परिस्थितियों पर ही प्रस्तुत विपन्नताओं का दोष थोपकर चित्त हलका करने की विडंबना चलती रहती है। समझदारी बढ़ने पर ही यह पता चलता है कि घटिया व्यक्तित्व ही पिछड़ेपन से लेकर समस्त संकटों के घाट हैं। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थिति बनती है उसे विचारशील ही स्वीकार करते हैं। अन्यथा आमतौर से कठिनाइयों के कारण बाहर ही ढूँढ़े जाते हैं। गहराई में प्रवेश किए बिना न तो वास्तविकता जानी जा सकती है और न उनके निवारण का कारगर उपाय ही बन पड़ता है। व्यक्तित्व का घटियापन सूझ ही न पड़े-उसके सुधार की कोई योजना बने ही नहीं तो परिस्थितियों की विपन्नता का समाधान हो नहीं सकता । वे एक से ही दूसरा रूप भर बदलती रहेंगी।

बहुत समय पहले शारीरिक रोगों को बाहरी भूत-पलीतों का आक्रमण माना जाता था। पीछे बात, पित्त, कफ, का ऋतु प्रभाव का कारण उन्हें माना गया। उसके बाद रोग कीटाणुओं के आक्रमण की बात समझी गयी। रोगों की शोधों का अगला चरण यह बना कि आहार की विकृति से पेट में सड़न पैदा होती है और उस विष से रोग उत्पन्न होते हैं। यह क्रम अधिकाधिक गहराई में प्रवेश करने का, अधिक बुद्धिमत्ता का-स्थूल से सूक्ष्म में उतरने का है। इस प्रगतिक्रम में उतरते-उतरते इन दिनों आरोग्यशास्त्र के क्षेत्र में इस तथ्य को खोज निकाला गया है कि शारीरिक रोगों के संदर्भ में आहार-विहार, विषाणु, आक्रमण आदि को तो बहुत ही स्वल्प मात्रा में दोषी ठहराया जा सकता है। रुग्णता का असली कारण व्यक्ति की मनःस्थिति है। मनोविकारों की विषाक्तता यदि मस्तिष्क पर छाई रहे तो उसका अनुपयुक्त प्रभाव नाड़ी संस्थान के माध्यम से समूचे शरीर पर पड़ेगा। फलतः दुर्बलता और रुग्णता का कुचक्र बढ़ते-बढ़ते अकाल मृत्यु तक का संकट खड़ा कर देगा। नए अनुसंधान जीवनीशक्ति का केन्द्र हृदय को नहीं मस्तिष्क को मानते हैं। रक्त की न्यूनाधिकता या विषाक्तता को रुग्णता का उतना बड़ा कारण नहीं माना जाता जितना कि मानसिक अवसाद एवं आवेश को “साइको न्यूरा इम्यूनलॉजी” की पूरी अवधारणा इसी पर आधारित है।

सुविख्यात मनः शास्त्री एच. एलेनवर्गर के शोधग्रंथ “ए हिस्ट्री ऑफ डाइनैमिक साइकियाट्र” के अनुसार शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रियाओं पर पूरी तरह मानसिक अनुशासन ही काम करता है। अचेतन मन की छत्र छाया में रक्ताभिषरण, आकुँचन, प्रकुँचन, श्वास-प्रश्वास, निमेष-उन्मेष, ग्रहण विसर्जन, निद्रा जाग्रति आदि की अनैच्छिक कहलाने वाली क्रियाएँ चलती रहती है। चेतन मन के द्वारा बुद्धिपूर्वक किए जाने वाले क्रियाकलापों और लोक व्यवहारों का ताना-बाना बुना जाता है। शरीर की परोक्ष और प्रत्यक्ष क्षमता पूरी तरह अचेतन और चेतन कहे जाने वाले मनः संस्थान के नियंत्रण में रहती है। उसी के आदेशों का पालन करती है। शरीर का पूरा-पूरा आधिपत्य मन मस्तिष्क के ही हाथों में रहता है। उस क्षेत्र की जैसी भी कुछ स्थिति होती है उसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है। यदि मस्तिष्क आवेशग्रस्त होगा तो शरीर के अवयवों में उत्तेजना और बेचैनी छायी रहेगी। इस स्थिति के ऐसे रोग उत्पन्न होंगे जिनसे शरीर के उत्तेजित होने, गरम होने, फटने फूटने जैसे अनुभव होने लगें। यदि मस्तिष्क, उदास, हताश, शिथिल हो जाएगा तो उस अवसाद का प्रभाव अंग अवयवों की दुर्बलता के रूप में देखा जा सकेगा।

यह मोटा निष्कर्ष हुआ। बारीकी में उतरने पर पता चलता है कि अमुक शारीरिक रोग अमुक मनोविकार के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं और वे तब तक बने ही रहते हैं जब तक कि मानसिक स्थिति में कारगर परिवर्तन न हो। मनीषी एस पी0 ग्रासमैन के शोध पत्र “न्यू होरिजाँन्स आँव साइकोलॉजी” में प्रकाशित इस अनुसंधान ने उस असमंजस को दूर कर दिया है जिसके अनुसार रोगियों को चिकित्सकों के दरवाजे-दरवाजे ठोकरें खानी पड़ती है। नित नई दवाएँ बदलनी पड़ती है। किंतु आशा-निराशा के झूले में झूलते हुए समय परन बीतता रहता है। रोग हटने का नाम नहीं लेते। तेज औषधियाँ अधिक से अधिक इतना कर पाती है कि बीमारी के स्वरूप और लक्षण में थोड़ा बहुत फेर बदल प्रस्तुत कर दें। जीर्ण रोगियों में से अधिकाँश का इतिहास यही है। जिससे औषधि उपचार की निरर्थकता ही सिद्ध होती रहती है।

आहार-विहार जन्य साधारण रोग तो शरीर की निरोधक जीवनी शक्ति ही अच्छी करती रहती है। उसी का श्रेय चिकित्सकों को मिल जाता है। सच्चाई तो यह है कि एक भी छोटे या बड़े रोग का शर्तिया इलाज अभी तक संसार के किसी भी कोने में किसी भी चिकित्सक के हाथ नहीं लगा है। कोई भी औषधि अपने आश्वासन को पूरा कर सकने में सफल नहीं हुई है। अंधेरे में ढेले फेंकने जैसे प्रयास ही चिकित्सा क्षेत्र में चलते रहते हैं। उसी भगदड़ में कभी-कभी किसी अंधे के हाथ बटेर लग जाती है। यदि ऐसा न होता तो कम से कम चिकित्सकों को खुद तो रुग्ण रहना ही न पड़ता । उनके घर वाले संबंधी तो बीमारियों से ग्रसित नहीं ही रहते । देखा यह गया है कि दवाओं की भरमार बीमारियों को घटाती नहीं वरन् उस नई विषाक्तता के शरीर में घुस पड़ने से नए-नए उपद्रव और खड़े होते हैं। सच तो यह है कि चिकित्सकों के शरणागत रहने वाले की अपेक्षा वे कहीं अधिक नफे में रहते हैं जिन्हें चिकित्सा का सौभाग्य या अभिशाप प्राप्त कर सकने का अवसर ही नहीं मिल सका।

शरीर शास्त्री भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आरोग्य और रुग्णता की कुँजी मनः क्षेत्र में सुरक्षित है। मानसिक असंतुलन और प्रदूषण का निराकरण किए बिना किसी को भी स्वस्थ शरीर का आनंद नहीं मिल सकता। जीवनीशक्ति का पिछले दिनों बहुत गुणगान होता रहा है। उसे प्राप्त करने के लिए आकाश-पाताल के कुलावे भी मिलाये जाते रहे है। टानिकों हारमोनों और ग्रंथि आरोपणों जैसे प्रयोग परीक्षणों की भरमार रही है। किन्तु गरीबों की बात तो दूर करोड़पतियों, शासनाध्यक्षों एवं स्वयं चिकित्सकों तक को उस प्रयास में कुछ पल्ले न पड़ा। अब यह निर्णय निकला है कि जीवनीशक्ति कोई शरीरगत स्वतंत्रता क्षमता नहीं है वरन् जिजीविषा की मानसिक प्रखरता ही अपना परिचय जीवनीशक्ति के रूप में देती रहती है। मानसिक स्थिति के उतार चढ़ावों के अनुरूप यह जीवनी शक्ति भी घटती-बढ़ती रहती है। शरीर की बलिष्ठता, सक्रियता, स्फूर्ति ही नहीं कोमलता, सुन्दरता और काँति तक मानसिक स्थिति पर अवलंबित है। विपन्नता की मनःस्थिति में भय, शोक, क्रोध आदि के अवसर आने पर तो तत्काल आकृति से लेकर शरीर की सामान्य स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ते प्रत्यक्ष देखा जाता है। यदि मनोविकार जड़ से जमालें तो समझना चाहिए कि शरीर एक प्रकार से विपन्नता में फँस ही गया और उस दलदल से निकल सकना चिकित्सा उपचार के बलबूते की बात नहीं रह गई है।

टब आरोग्य की दशा और रोग निवृत्ति की दोनों ही आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनः संस्थान की खोजबीन करना आवश्यक हो गया है ? और समझा जाने लगा है कि यदि मनुष्य के चिंतन क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया। वहाँ जमी हुई वितृष्णाओं और विपन्नताओं का समाधान न किया गया तो आहार-विहार का संतुलन बनाये रखने पर भी रुग्णता से पीछा छूट नहीं सकेगा। चिकित्सा उपचार से भी मन बहलाने के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध हो नहीं सकेगा। अब क्रमशः औषधि उपचार का महत्व घटता जा रहा है और मानसोपचार को प्रमुखता दी जा रही है। मानसिक बीमारियों की पिछले दिनों अलग से गणना होती रही है और उनका क्षेत्र अलग रहा है । अब नए शोध प्रयोजनों ने कुछ दुर्घटना जैसे आकस्मिक कारणों से उत्पन्न होने वाले रोगों को ही शारीरिक माना है और लगभग समस्त बीमारियों को मनः क्षेत्र की प्रतिक्रिया घोषित किया गया है। गहरी खोजों के फलस्वरूप आरोग्य जैसे मानवी जीवन के अतिमहत्वपूर्ण प्रयोजन पर नए सिरे से विचार करना होगा ओर आहार-विहार के ही गीत न गाते रहकर यह देखना होगा कि मनस्विता बनाए रहने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है ?

मानव मन के विशेषज्ञ ऐरिक फ्राम के ग्रंथ “मैन फार हिमसेल्फ” के अनुसार मानसिक विकृतियों में से सामयिक उलझनों के कारण तो बहुत थोड़े से होते हैं। अधिकतर उनका कारण नैतिक होता है। छल, दुराव एवं ढोंग, पाखंड के कारण मनुष्य के भीतर दो व्यक्तित्व उत्पन्न हो जाते हैं। एक वास्तविक दूसरा पाखंडी। दोनों के बीच भयंकर अंतर्द्वन्द्व खड़ा रहता है। दोनों एक दूसरे के साथ शत्रुता बनाए रहते हैं और विरोधी को कुचलकर अपना वर्चस्व बनाने का प्रयत्न करते हैं। यह अंत कलह सारे मनः क्षेत्र को अशाँत बनाए रखता है। इस विग्रह के फल स्वरूप अनेकों रोग उठ खड़े होते हैं और वे वैसी ही मानसिक स्थिति बने रहने तक हटने का नाम नहीं लेते। ,

शारीरिक रोग प्रत्यक्ष होते हैं। इसलिए उनकी जानकारी भी मिल जाती है और दवादारु से इनका इलाज होने के भी साधन मौजूद रहते हैं। मानसिक रोगों के विक्षिप्त, अर्धविक्षिप्त स्तर के ऐसे लोग गिने जाते हैं जो अपना सामान्य काम काज चला सकने में असमर्थ हो गए हों। जिनका शरीर निर्वाह और लोक व्यवहार लड़खड़ाने और लटपटाने लगा हो। जो अपने लिए और साथी संबंधियों के लिए भार बन गए हों। ऐसे रोगियों की संख्या भी लाखों से आगे बढ़कर करोड़ों की संख्या में अपने ही देश में छूने लगी है। ऐसों की संख्या का तो कोई ठिकाना ही नहीं जो रोजी रोटी तो कमा लेते हैं। और खाते-सोते समय भी साधारण लगते हैं, पर उनका चिंतन विचित्र और विलक्षण होता है । कितने ही दुष्टता की भाषा में सोचते हैं। और हर किसी पर दोषारोपण करते हुए शत्रुता की परिधि में लपेटते हैं। कितने ही आशंकाओं, संदेहों, आक्षेपों के इतने अभ्यस्त होते हैं कि इतने अभ्यस्त होते हैं कि उन्हें अपनी पत्नी, बेटी, बहिन तक के चरित्र पर अकारण संदेह बना रहता है। संबंधियों और पड़ोसियों को अपने विरुद्ध कुचक्र रचते हुए देखते हैं। दुर्भाग्य और ग्रह-नक्षत्रों के प्रकोप से कितने ही हर घड़ी काँपते रहते हैं और विपत्ति का पहाड़ अपने ऊपर टूटता अनुभव करते रहते हैं। शेखचिल्लियों के मनसूबे बाँधते रहने वाले, संभव, असंभव का विचार किए बिना अपने सपनों की एक अनोखी दुनिया बनाए बैठे रहते हैं। न अपनी पटरी दूसरों के साथ बिठा पाते हैं न किसी और को अपना घनिष्ठ बनने का अवसर देते हैं।

परिस्थिति का मूल्याँकन कर सकना दूसरों की मनःस्थिति और परिस्थिति समझ सकना उनके लिए संभव नहीं होता। अटपटे अनुमान लगाते और बेतुके निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। विचार जो भी उठें वे एक पक्षीय सनक की तरह बिना किसी तर्क वितर्क का आश्रय लिए बेलगाम घोड़े पर चढ़कर दौड़ते चले जाते हैं। जो सोचा जा रहा है उसका आधार क्या है-और उस सनक पर चढ़े रहने का अंततः परिणाम क्या निकलेगा इतना समझ पाना उनके क्षत विक्षत मस्तिष्क के लिए संभव नहीं होता। यह सनक कभी-कभी आक्रामक हो उठती है तो जो भी उनकी चपेट में आता है उसे सताने में कसर नहीं छोड़ते । मित्र को शत्रु, शत्रु को मित्र समझने में उनकी अदूरदर्शिता पग-पग पर झलकती है। आयु बड़ी जो जाने पर भी सोचने का तरीका बालकों जैसा ही बना रहता है। अपनी कार्य पद्धति को किसी उद्देश्य के साथ जोड़ सकना उनसे बन नहीं पड़ता। जैसे-तैसे समय गुजारते हुए ज्यों-त्यों करके ही मौत के दिन पूरे कर लेते हैं। इन्हें पागल तो नहीं कह सकते, पर व्यक्तित्व की परख की दृष्टि से उनसे कुछ अच्छी स्थिति में भी उन्हें नहीं समझा जा सकता।

मनीषी एल.के. फ्रैंक के ग्रंथ “सोशल एनालिसिस” के अनुसार विक्षिप्त, अर्धविक्षिप्त और विक्षिप्तता के सन्निकट सनकी लोगों के प्रायः आधा समाज भरा पड़ा है। मूढ मान्यताओं-कुरीतियों अंधविश्वासों में जकड़े हुए लोगों में तर्क शक्ति एवं विवेक बुद्धि का अभाव रहता है। उनके लिए अभ्यस्त ढर्रा ही सब कुछ होता है। उस लक्ष्मण रेखा से बाहर जाने में उन्हें भय लगता है। स्वतंत्र चिंतन के प्रकाश से उनकी आँखें चौंधिया जाती हैं और औचित्य को समझने स्वीकारने जैसा साहस उनके जुटाये जुट ही नहीं पाता। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित नर पशुओं की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।

शरीर से असमर्थों, दुर्बलों और रुग्णों की तरह मानसिक पिछड़ेपन और विकारग्रस्तता के दल-दल में धँसे हुए लोगों का ही बाहुल्य अपने समाज में दृष्टिगोचर होता है। यह विक्षिप्तता भी एक प्रकार की बीमारी ही है। जिसमें प्राणियों को तिरस्कार, असंतोष, अभाव एवं चित्र-विचित्र प्रकार के दुःख सहने पड़ते हैं।

विचारणीय है कि यह सब होता क्यों है ? मनुष्य का प्रत्यक्ष कोई दोष दिखाई नहीं पड़ता। जान-बूझ कर ऐसा कुछ किया हो जिससे उन शारीरिक व्याधियों और मानसिक आधियों का दुःख सहना पड़े ऐसा कुछ सूझ नहीं पड़ता। फिर ईश्वर ने ऐसी विचित्र संरचना क्यों की। किसी को ऐसा किसी को वैसा क्यों बनाया? इसका भी कोई उत्तर नहीं हो सकता ? ईश्वर न तो अन्यायी है न उसकी सृष्टि में अंधेरगर्दी, अव्यवस्था। दूसरी ओर इन व्याधिग्रस्त लोगों का ऐसा कोई प्रत्यक्ष कसूर भी नहीं दीख पड़ता, जिसका दंड भुगतने जैसी बात कही जा सके।

इस असमंजस का समाधान मनःशास्त्र के आचार्य कोरनहार्नी के शब्दों में कहें तो अनैतिक एवं असामाजिक चिंतन और कर्तृत्व से उत्पन्न होने वाला अंतर्द्वंद्व दुहरा व्यक्तित्व रच देता है और उससे निरंतर उठने वाली आँतरिक कलह सारी मनोभूमि को क्षत-विक्षत करके रख देती है। संचालक के आहत-घायल, उद्विग्न होने पर उसके आधीन काम करने वाले तंत्र की दुर्दशा होना स्वाभाविक है। शरीर के अनाचार और मस्तिष्क के मनोविकार ही वे कारण है जिनके कारण आत्मसत्ता का संचालित तंत्र अनेकानेक प्रकार के आत्म दंडों की व्यवस्था अपने आप कर देता है।

ये आत्मदंड ही शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग और असफलताओं के रूप में प्रकट होते हैं। यह त्रिविध समन्वय कितना कष्टकर और संताप दायक होता है उसे भुक्तभोगी ही जानता है। जिन्हें इन संकटों का त्रास सहना पड़ता है उनके लिए इस विपन्नता का प्रत्यक्ष नरक के रूप में ही अनुभव होता है। यमलोक के अधिपति चित्रगुप्त को अचेतन में नहीं समझा जाना चाहिए। उनका कार्यक्षेत्र यमलोक वह मनः संस्थान है जिसमें प्रतिफल को परिणत कर सकने की ईश्वर प्रदत्त क्षमता मौजूद है। यम, नियमन, व्यवस्था एवं अनुशासन को कहते हैं। मस्तिष्क को यमलोक और उसकी मूलभूत सत्ता को, चित्त को, चित्रगुप्त की संज्ञा देकर शास्त्रकारों ने स्थिति का सर्वथा सही चित्रण किया है। ईश्वर ने सर्वत्र स्व संचालित पद्धति रखी है। ताकि न्याय व्यवस्था का अलग अतिरिक्त झंझट न उठाना पड़े। अपनी ही सत्ता का एक पक्ष कर्म करता है और दूसरा उसका प्रतिफल गढ़ कर तैयार कर लेता है। बाहर के न्यायाधीश को तो भ्रम में भी डाला जा सकता है । परन्तु अंतस् में बैठे हुए हर द्रष्टा की निष्पक्ष न्यायशीलता को झुठलाना तो किसी के लिए भी संभव नहीं हो सकता।

इतना सब जान लेने के उपराँत हमें एक ही निश्चय-निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि चेतन की मूलसत्ता अंतःकरण को प्रभावित करने वाले नैतिक और अनैतिक विचार एवं कर्म ही हमारी भली और बुरी परिस्थितियों के लिए पूर्णतया उत्तरदायी हैं। इसी उद्गम से हमारे उज्ज्वल भविष्य का आधार खड़ा होता है और यहीं से विपत्तियों के जाल गिराने वाली दुखद सम्भावनाएँ विनिर्मित होती हैं। इस मूल केन्द्र का परिशोधन करना ही एक प्रकार से आँतरिक कायाकल्प जैसा प्रयास है। प्रस्तुत संकटों से छुटकारा पाने और निकट भविष्य में फलित होने वाले संचित प्रारब्धों का निराकरण करने के लिए आँतरिक परिशोधन का प्रयास इतना अधिक आवश्यक है कि उसे अनिवार्य की संज्ञा दी जा सकती है और कहा जा सकता है कि वृक्ष की जड़ें काटने से ही काम चलेगा। टहनियाँ तोड़ने और पत्तियाँ गिराने से स्थायी समाधान बन नहीं पड़ेगी।


उपदेश एक ही सार्थक है, यदि हृदयंगम हो जाय

आचार्य धर्मघोष अपने शिष्या के सहित प्रव्रज्या करते हुए आगे बढ़ रहे थे। परिव्राजक जीवन जहाँ लोकसेवा का माध्यम है वहाँ आत्मोन्नति का साधन भी । इसलिए एक अनिवार्य धर्म कर्तव्य की भांति उसे जीवन के तृतीयाँश के साथ जोड़ दिया गया था। आचार्य धर्मघोष उसी धर्माचरण का पालन कर रहे थे। तभी आ गया आषाढ़ का पहला दिन। आकाश मेघों से घिर गया, पुरवाई बहने लगी, विद्युत चमकने लगी, मोर कूक कर वर्षा के आगमन की सूचना लगे। निर्धारित नीति के अनुसार आचार्य को प्रव्रज्या का त्याग कर चातुर्मास करना चाहिए था।

‘क्षुद्रमति!’ गाँ का नायक-जहाँ वे ठहरे हुए थे-आचार्य प्रवर बोले “तात! वर्षा आ गई। हम बढ़कर आगे के गाँव भी नहीं जा सकते । चार महीन यहीं विश्राम करना होगा ? आपको कुछ कष्ट तो नहीं होगा, हमारी व्यवस्था में।”

कष्ट !.......... क्षुद्रमति बोला-आर्य श्रेष्ठ आप जैसे सर्वथा त्यागी और तपस्वी के आतिथ्य में कष्ट क्या हो सकता है किंतु एक बात है कहने में संकोच होता है और उसे छिपाया भी नहीं जा सकता। इस गाँव के सभी लोग दस्यु कर्म करते हैं। मुझे संदेह है कि आपके चार माह यहाँ ठहरने पर कहीं बंधु बांधवों की मति न पलट जाए। हम ठहरे दुष्टकर्मा व्यक्ति आप साधु संत। यदि आप वचन दें कि चार मास यहाँ रहते हुए आप और चाहे जो कुछ कर ग्राम वासियों को उपदेश न दें-यदि ऐसा कर सकते हों-तो आप इस गाँव में सहर्ष चातुर्मास कर सकते हैं।

धर्मघोष ने विचार किया। नीच साधनों से अर्जित कमाई पर जीवित रहना पड़ेगा यह ख्याल आते ही वह कुछ चिंतित हुए पर धर्म के साधन शरीर का जिंदा रखने और धार्मिक मर्यादा का पालन करने के लिए इस शर्त को आप धर्म के रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त कोई चारा भी तो नहीं था। उन्होंने तरुण सरदार क्षुद्रमति की शर्त स्वीकार कर ली।

चार मास बीत गए, धर्मघोष ने किसी प्रकार का प्रवचन नहीं किया। चातुर्मास समाप्त होते ही साधु जन वहाँ से चल पड़े। ग्रामवासी और स्वयं क्षुद्रमति उन्हें कुछ दूर तक पहुँचाने आए। आचार्य धर्मघोष आँखों में अरु भरे चल रहे थे। एक ओर वे विचार कर रहे थे मनुष्य जीवन की अज्ञानता पर मनुष्य थोड़े समय के लिए धरती पर आता है जानते हुए कि यह शरीर कुछ ही दिन का मेहमान है - दुष्कर्म करता है - दूसरी ओर उनकी कर्तव्य भावना कचोटती थी कहती थी तुमने चार मास तुच्छ सही सही पर इनके परिश्रम और जीवन संकट में डालकर कमाए द्रव्य से अपनी जीवन रक्षा की है सो बदले में उनका कुछ उपकार तो करना चाहिए।

गँ की सीमा ऐसे ही विचार करते पार हो गई। धर्मघोष रुके क्षुद्रमति ने उनके पुण्य चरणों में प्रणियात कर क्षमा याचना करते हुए कहा भगवान् ? हमसे जो भूलें हुई हो क्षमता करना कभी इधर आना हो तो फिर सेवा का अवसर देना।

आचार्य की आँखें छलक उठी। उन्होंने स्नेहपूर्वक क्षुद्रमति को हृदय से लगाते हुए और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-”तात! तुम्हारी सेवा से जितना हम प्रसन्न हैं उतना ही इस बात के लिए दुखी कि आप लोगों के अन्न पर चार मास बिताए उसका कुछ भी ऋण चुकाए बिना जा रहे हैं। हमारे पास धर्म शिक्षा के अतिरिक्त और है ही क्या ? अब तो चातुर्मास बीत चुका है, अब हम आपके गाँव की सीमा से भी बाहर है आप कहें तो एक उपदेश चलते समय देते जायँ।

क्षुद्रमति ने एक बार साथियों की ओर दृष्टि डाली-दूसरे क्षण कहा-”महामहिम आप मात्र एक उपदेश दें। हम उसका जीवन भर पालन करेंगे। “

ठीक है अबुस! आचार्य बोले-आज से तुम लोग व्रत लो सूर्यास्त के बाद कभी कुछ खाना मत-रात्रि के समय भोजन को हिंसा कहा गया है उससे कई बार विषैले कीटाणु पेट में चले जाते हैं हानि पहुँचाते हैं। इसलिए विज्ञजनों ने रात्रि में भोजन ग्रहण करना वर्जित किया है।

क्षुद्रमति और उनके साथियों ने इस उपदेश को स्वीकार कर लिया। साधुगण आगे बढ़ गए और क्षुद्रमति साथियों सहित बसती वापस लौट आया। कुछ दिन ऐसे ही बीते ग्रामवासियों ने सूर्यास्त से पूर्व ही भोजन करने का नियम बना लिया। फिर एक दिन दस्युकर्म की योजना बनाई गई। क्षुद्रमति अपने साथियों को लेकर प्रातःकाल से ही निकल गया। निकटवर्ती राज्य के एक गाँव में डकैती डाली उन्होंने। बहुत साधन लेकर वे लोग रातों-रात लौट पड़े। कुछ दूर बाहर आकर थे हारे दस्यु दल ने भोजन और विश्राम की व्यवस्था की। दो दस्यु सामग्री जुटाने के लिए भेजे गए। उन दोनों के मन में पाप आ गया उन्होंने मदिरा खरीदी उसमें विष मिला दिया और सारी सामग्री लेकर आ पहुँचे, दूसरे दस्यु जब सुरापान करने लगे क्षुद्रमति ने प्याला हाथ में ले लिया भोजन पर दृष्टि डाली तभी उसे याद आया वह वचन जो अपने आचार्य को दिया था उसने भोजन एक ओर रख दिया। पापगति दस्युगणों ने वचन पर कुछ भी ध्यान दिए बिना भोजन और सुरापान प्रारंभ कर दिया। विष के प्रभाव से वे सभी एक-एक करके मृत्यु के मुख में जाने लगे। क्षुद्रमति के सामने सारी स्थिति स्पष्ट हो गई। एक ओर उसे आचार्य के उपदेश से जीवन रक्षा की याद आ रही थी, दूसरी ओर उसे अपने ही स्वजनों की इस पाप बुद्धि पर पश्चाताप हो रहा था।

उसका अंतःकरण हाहाकार कर उठा-”लोभ पाप अंततः पतन का पथ ही प्रशस्त करता है। धर्म की एक चिनगारी रक्षा ही करती है। फिर क्यों न धर्म का आश्रय लिया जाय, ऐसा पवित्र और महान जीवन क्यों व्यर्थ गँवाया जाय।”

क्षुद्रमति की बुद्धि पलट गयी। उसने दस्यु कर्म छोड़ दिया। गाँव में रहकर कृषि करने लगा-परिश्रम से कमाकर खाने लगा। उसके जीवन में आयी धर्म की एक किरण सुख शाँति के प्रकाश पुँज की तरह जीवन में छा गई।


समस्याओं का कारण – मानवी दुर्बुद्धि

कर्म करने में मनुष्य स्वतंत्र है किंतु फल प्राप्त करने में वह सृष्टि के नियमों के बंधनों में बँधा हुआ है। अन्य जीवधारी इस तथ्य को अपनी स्वभाव प्रेरणा से समझते हुए तद्नुरूप आचरण करते रहते हैं पर मनुष्य है जो तुर्त-फुर्त परिणाम मिलने में विलंब होने के कारण प्रायः चूक करता रहता है। अदूरदर्शिता अपनाता है और तात्कालिक लाभ के लिए आतुर होकर यह भूल जाता है कि विवेकशीलता की उपेक्षा करने पर अगले ही दिनोँ किन दुष्परिणामों को भुगतने के लिए बाधित होना पड़ सकता है। यह वह गलती है जिसके प्रति उत्साहित होकर मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक भूलें करता है। फलतः उलझनों, समस्याओं, विपत्तियों का सामना भी उसे ही अधिक करना पड़ता है। कोई समय था जब मनुष्य अपनी गरिमा का अनुभव करता था। जीवन को स्रष्टा की अनुपम कलाकृति और विश्व विकास के निमित्त मिली हुई संपदा समझता था। स्रष्टा का युवराज होने के नाते अपने चिंतन और कर्तृत्व को ऐसा बनाये रहता था कि सुव्यवस्था बनी रहने पर किसी को किसी प्रकार की प्रतिकूलताओं का सामना न करना पड़े ।

इस संसार में इतने साधन मौजूद है कि यदि उनका मिल बाँटकर उपयोग किया जाय तो किसी को किसी प्रकार के संकटोँ का सामना न करना पड़े। प्राचीनकाल में इसी प्रकार की सद्बुद्धि को अपनाया जाता रहा है। कोई कदम उठाने से पहले यह सोच लिया जाता था कि उसकी आज या कल परसों क्या परिणति हो सकती है। औचित्य को अपनाये भर रहने से वह सुयोग बना रह सकता है जिसे पिछले दिनों सतयुग के नाम से जाना जाता था। सन्मार्ग का राजपथ छोड़कर उतावले लोग लंबी छलाँग लगाते और कँटीली झाड़ियों में भटकते हैं। इन दिनों इसी प्रकार की दुर्मति का बोलबाला हुआ है। जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ को प्रधानता मिली है और यह भुला दिया गया है कि जो कदम उठाये जा रहे हैं उससे दूसरों को किन संकटों में फँसना पड़ेगा। जिन्हें मात्र अपना ही ध्यान रहता है दूसरों के हितों की परवाह नहीं करते उसका ही यह प्रतिफल होता है कि स्वार्थ आपस में टकराते हैं और अनेकानेक समस्यायें पैदा होती है कि स्वार्थ आपस में टकराते हैं और अनेकानेक समस्यायें पैदा होती है। दूरगामी परिणामों पर विचार न करके जिन्हें तत्काल का लाभ ही सब कुछ लगता है वे चिड़ियों, मछलियों की तरह जाल में फँसते, चाशनी पर आँखें बंद करके टूट पड़ने वाली मक्खी की तरह पंख फँसाकर बेमौत मरते हैं। दुर्बुद्धि का यही कुचक्र जब असाधारण गति से तीव्र हो जाता है तब उलझनें भी ऐसी ही खड़ी होती है जैसी कि जन-जन को संत्रस्त करते और समुदाय को विपत्तियों के दल-दल में फँसाती जा रही दृष्टिगोचर हो रही हैं।

क्रिया की प्रतिक्रिया उत्पन्न होने में बहुधा विलंब लग जाता है। इसी कारण कितने ही लोगों में संदेह उत्पन्न हो जाता है कि जो किया है उसकी तद्नुरूप परिणति होना आवश्यक नहीं। कई बार बुरे कर्म करने वाले भी उन पाप दंडों से बचे रहते हैं। कई बार अच्छे कर्म करने पर भी उनके सत्य परिणाम दीख नहीं पड़ते। इससे सोचा जाता है कि सृष्टि में कोई नियमित कर्मफल व्यवस्था नहीं है। यहाँ ऐसे ही अंधेर चलता है । ऐसी दशा में स्वेच्छाचार बरता जा सकता है और जिसमें तत्काल लाभ दिखायी पड़े वह किया जा सकता है। ऐसे लोग क्रिया की प्रतिक्रिया उत्पन्न होने में जो समय लगता है उसकी प्रतीक्षा नहीं करते और नास्तिक स्तर का अविश्वास अपना कर जो भी सूझता है उस तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मानकर बैठ जाते हैं। यह भुला दिया जाता है कि बीज का वृक्ष बनना तो निश्चित है पर उसमें देर लग जाती है। दूध को दही बनने में भी कुछ समय तो लगता ही है। असंयम बरतने वाले अपने अनाचार का दंड तो भुगतते हैं पर उसमें भी समय लगता है। नशेबाजी का स्वास्थ्य बिगड़ता और जीवन फल घटता जाता है पर वह सब कुछ तुरंत ही दीख नहीं पड़ता। इसलिए पीने वाले अपनी आदत नहीं छोड़ते कि जब तत्काल कोई बड़ी हानि नहीं हो रही है तो भविष्य में भी कुछ अनिष्ट हो इसका क्या निश्चय है। अन्यान्य दुर्व्यसनों में लिप्त व्यक्ति भी ऐसा ही कुछ सोच लेते हैं। पता तब चलता है जब अनाचार का बड़ा संग्रह हो जाता है और घड़ा फूटता है।

यदि झूठ बोलते ही मुँह में छाले पड़ जाते । चोरी करते ही हाथ को लकवा मार जाता। व्यभिचारी नपुँसक हो जाते, तो किसी को कुछ अनर्थ करने का साहस ही न होता। पर भगवान ने मनुष्य की समझ और विवेक बुद्धि को जाग्रत करें। उसका सही उपयोग करके औचित्य अपनाये। सही मार्ग पर चले। इस परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वालों को दंड तो मिलता है पर देर में वस्तुस्थिति समझने के कारण उन्हें पश्चाताप तो करना ही पड़ता है। साथ ही अदूरदर्शिता अपनाने की आदत पड़ जाने पर पग-पग पर भूल करने और ठोकरें खाने की दुर्गति भी सहन करनी पड़ती है।

अन्य प्राणियों का भविष्य ज्ञान सीमित होता है। वे प्रकृति प्रेरणा के संकेतों को समझ कर अपने आचरण पर स्वेच्छापूर्वक अंकुश रखे रहते है। पर मनुष्य है जो भविष्य की अधिक सार्थक और सही कल्पना कर सकने में समर्थ होते हुए भी अवाँछनीयताओं को अपनाता है और अनेक प्रकार के कष्ट सहता है। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो दूर की बात सोच समझ सकते हैं। और परिणाम को ध्यान में रखते हुए अपनी वर्तमान गतिविधियों को सुनियोजित करते हैं। जीवन संपदा का सदुपयोग करके स्वयं को धन्य बनाते और अपने अनुकरणीय का अवसर देकर अनेकों का भला करते हैं। मनुष्य को ईश्वर ने जो अनेकानेक विशेषताएँ-विभूतियाँ प्रदान की हैं उनमें से एक यह भी है कि वह क्रिया की प्रतिक्रिया का अनुमान लगा सके और अनिष्टों से बचते हुए सुख-शाँति का जीवन जी सके।

इन दिनों स्नेह, सद्भाव, सहकार, सदाचार की कमी पड़ने से मनुष्य का व्यवहार ऐसा विचित्र बन गया है जिसमें शोषण ही प्रधान दिखायी पड़ता है। सहयोग के आधार पर तो परस्पर हित साधन की प्रक्रिया चलती रह सकती है, किंतु जहाँ व्यक्तिवाद की आपाधापी ही सब कुछ हो वहाँ यह समझ में नहीं आता कि संकीर्ण स्वार्थपरता अपना लेने पर दूसरों के अधिकारों को क्षति पहुँचाती है या नहीं ? यह स्थिति ऐसी है जिसमें दूसरों के कष्ट-संकट और अहित की ओर ध्यान जाता ही नहीं, मात्र अपना ही लाभ सूझता है। अनाचार, अत्याचार, शोषण, अपहरण, उत्पीड़न के मूल में यही वृत्ति काम करती है। निस्संकोच जघन्य कृत्य करने वाले वे ही होते हैं जिन्हें दूसरों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती। अपने तनिक से लाभ के लिए दूसरों पर पहाड़ जितना संकट उड़ेल सकते हैं। इस अनर्थ मूलक प्रवृत्ति की मानवधर्म के प्रतिपादकों ने भरपूर निंदा की है और कहा कि “आत्मवत् सर्वभूतेषु” वाली भाव संवेदना को सँजोये ही रहना चाहिए। जो व्यवहार हमें अपने लिए पसंद नहीं, वह दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। सबमें अपनी ही आत्मकथा को देखने का तात्पर्य है-दूसरों के दुखों को अपना दुख और दूसरों के सुख को अपना सुख माना जाय। मानवी स्तर की भाव संवेदनाओं का उद्गम इसी मान्यता के साथ जुड़ा हुआ है। इसे यदि हृदयंगम कर लिया जाय तो अनाचार बरत सकना संभव न होगा। सेवा सहायता के लिए मन चलेगा। दुख बँटा लेने और सुख बांट देने की उदारता बनी रहे तो मिल बाँट कर खाना और हिल-मिलकर रहना ही सहज स्वभाव बन जायगा।

अपनत्व को सिकोड़ लेना क्षुद्रता है और उसे व्यापक बनाकर चलना महानता । महामानव पुण्य परमार्थ की बात सोचते, योजना बनाते और गतिविधि अपनाते रहते हैं। यही आत्मविकास है। विकसित व्यक्ति का अपनापन मनुष्य मात्र से प्राणिमात्र में फैल जाता है। ऐसी दशा में जिस प्रकार अपने लिए सुख साधन जुटाने की इच्छा होती है उसी प्रकार यह भी सूझता है कि दूसरों को सुखी रहते देखकर अपना भी मन हुलसे, दूसरों के दुख में हिस्सा बँटाने के लिए सेवा सहायता हेतु दौड़ पड़ने की आतुरता उमगे। यदि इस मानवी मर्यादा का परिपालन होने लगे तो कोई किसी के साथ अनीति बरतने की कल्पना ही मन में न उठने दे। अनाचार अत्याचार के लिए तो कदम उठे ही नहीं, पाप अपराधों की बड़ी संख्या गिनाई जाती है पर वस्तुतः वे इन्हीं दो डालियों पर लगने वाले विष फल है। संकीर्ण स्वार्थपरता ही दूसरों की उपेक्षा करना सिखाती है और अपने लिए अनीतिपूर्वक भी मन चाहे सुख साधन बटोरने के लिए उत्साहित करती है। इसका मूलभूत कारण है अदूरदर्शिता-अविवेक। किस कृत्य का भविष्य में क्या परिणाम होगा, इसका दूरवर्ती अनुमान न लगा पाने पर तात्कालिक लाभ ही सब कुछ हो जाता है। भले ही उसके साथ अनीति ही क्यों न जुड़ी हो। जिस प्रकार दृष्टि दोष होने पर मात्र नजदीक की वस्तुएँ ही दीख पड़ती हैं और दूर पर रखी हुई वस्तुओं को पहचान सकना कठिन हो जाता है उसी प्रकार अदूरदर्शी तुरंत के लाभ को सब कुछ मनाते हुए उसे किसी भी कीमत पर पूरा करने के लिए जुट जाते हैं। इसके बाद इसकी परिणति क्या हो सकती है इसका अनुमान तक अदूरदर्शी लोग लगा नहीं पाते। आँखें रहते हुए भी यह अंधे जैसी स्थिति है। जिनका स्वभाव ऐसा बन जाता है वे तत्काल भले ही कुछ लाभ उठालें पर अपनी प्रामाणिकता को खो बैठते हैं। हर किसी की दृष्टि में अविश्वस्त बन जाते हैं। कोई उनका सच्चा मित्र नहीं रहता। समझदारी का जिनमें अभाव है उन्हें परामर्श देने या लेने योग्य भी नहीं समझा जाता। उनकी ओर सबकी शंका शंकित दृष्टि बनी रहती है। सच्चे सहयोग के अभाव में अविश्वस्त वातावरण में वे भीड़ के बीच रहते हुए भी अपने को एकाकी अनुभव करते हैं। एकाकीपन कितना नीरस, निस्तत्व और डरावना होता है उसे हर भुक्तभोगी भली प्रकार जानता है। इन दुर्गुणों के रहते स्वभाव में अनेकानेक अवाँछनीयताएँ भी सम्मिलित हो जाती है। आलस्य, प्रमाद, छल, प्रपंच, अतिवाद, अहंकार, लिप्सा, तृष्णा, जैसे अनेकों अनौचित्य एक साथ ही बिना बुलाये साथ हो जाते हैं। प्रामाणिकता चली जाने पर न तो प्रखरता शेष रहती है और न प्रतिभा ही व्यक्तित्व के साथ जुड़ी रह जाती है। चोर-चालाकों का मानस सदा भयभीत बना रहता है। अनिष्ट की आशंकायें बनी रहती हैं और संदेह करते संदेहास्पद स्थिति में बने रहते हुए ही समय गुजरता है। प्रतिफल, प्रतिशोध के, घृणा तिरस्कार के रूप में वापस लौटते हैं। संसार के दर्पण में अपनी ही कुरूप छाया दीख पड़ती है। स्व उपार्जित घृणा कुएँ की आवाज की तरह अपने ही पास वापस लौट आती है। अपना ही मानस अनौचित्य से भरा होता है तो अन्यान्यों के व्यवहार में भी उसी की झलक झाँकी दीख पड़ती है।

सज धज बढ़ी चढ़ी हो सकती है। श्रृंगार से रूप सौंदर्य सजाया जा सकता है। विज्ञापन बाजी के सहारे चाटुकारों के मुँह से सस्ती वाहवाही लूटी जा सकती है। पैसा देकर प्रशंसा पत्रक छापे जा सकते हैं। किन्तु इन कागज के फूलों की असलियत समझने में किसी को देर नहीं लगती। कागज की नाव कितनी दूर तक कितनी देर तक पानी में बह सकती है। कुछ को कुछ देर के लिए मूर्ख बनाया जा सकता है। पर सब को सदा के लिए गफलत में रखा जा सके यह संभव नहीं । अपने द्वारा किये गये दुर्व्यवहार किन्हीं अन्यों के द्वारा अपने ऊपर प्रतिक्रिया बनकर टूटते हैं। जिसने औरों को ठगा है वह किन्हीं अन्यों के द्वारा ठगा जाय ऐसे घटनाक्रम आये दिन घटित होते देखे जाते हैं। असंयम बरतने वाले तत्काल न सही, कल-परसों उसकी दुखदायी प्रतिक्रिया से दंडित हुए बिना नहीं रहते ।

मनुष्य-मनुष्य के बीच दीख पड़ने वाले दुर्व्यवहारों की परिणति इन दिनों हर ओर कष्टकारक दीख पड़ती है। मैत्री और साझेदारी हर क्षेत्र में समाप्त होती चली जाती है। जब विश्वास ही नहीं जमता तो सहयोग किस बलबूते पनपे। टूटे हुए मनोबल का व्यक्ति किस प्रकार कोई उच्चस्तरीय साहस कर सके। उसके न जुट पड़ने पर ऊँचे उठने आगे बढ़ने का सुयोग कैसे बने ?

अपने समय की सबसे बड़ी कठिनाई अनौचित्य की बढ़ोत्तरी है। उसके कारण विरोध तो सहना ही पड़ता है। घृणा और तिरस्कार का भाजन तो बनना ही पड़ता है। इस प्रकार जो हानि होती है उससे बचा नहीं जा सकता। एक या दूसरे रास्ते अवगति आ ही धमकती है।

मनुष्य-मनुष्य के बीच छाया हुआ छद्म और अविश्वास, असहयोग और अनाचार चित्र-विचित्र प्रकार के उद्वेग असंतोष और दुर्व्यवहार उत्पन्न करते देखा जाता है। फलतः धनी निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित सभी को अपने-अपने ढंग की कठिनाइयाँ उपजती हुई दिख पड़ती हैं। अधिकाँश लोगों को श्मशान के भूत पलीतों की तरह जलते-जलाते, डरते, डराते उद्विग्न और असंतुष्ट स्थिति में देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में यदि सुविधा साधनों का बाहुल्य रहा भी तो भी उससे क्या कुछ बनता है। बाहर वालों को सुखी, संपन्न देखना एक बात हे और अपनी दृष्टि में अपना मूल्य उच्चस्तरीय होगा वह कितने ही साधनों से संपन्न क्यों न हो, गई-गुजरी स्थिति में ही बना रहेगा। असंख्यों समस्यायें और चिंतायें उसे घेरे रहेंगी।

आज इसी स्थिति में जन साधारण को फँसा देखा जा सकता है। प्रगति के नाम पर सुविधा साधनों की अभिवृद्धि होते हुए भी चिंतन, चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता भर जाने के कारण जो कुछ चल रहा है वह ऐसा है जिसे निर्धनों, अशिक्षितों और पिछड़े स्तर के समझे जाने वालों की तुलना में भी अधिक हेय समझा जा सकता है। इसे प्रगति कहा भले ही जाता हो पर वस्तुतः है अवगति ही, जिसे मानवी दुर्बुद्धि ने आमंत्रित किया है, दुर्मतिजन्य इस दुर्गति का एक ही समाधान है-विचारक्राँति।


मजदूरी के पैसे (Kahani)

एक बार टॉलस्टाय देहातियों के जैसी पोशाक पहनकर गाड़ी की प्रतीक्षा में स्टेशन पर खड़े थे। इतने में एक आदमी परिवार की महिला ने उन्हें एक साधारण किसान समझकर कहा- “देख मरे पतिदेव सामने वाले होटल में हैं। तू उन्हें यह चिट्ठी दे आ। इस काम के लिए मैं तुझे दो आने दूँगी।”

टॉलस्टाय ने यह काम तुरंत कर दिया और मजदूरी के दो आने भी ले लिये। थोड़ी देर बार एक अमीर आकर टॉलस्टाय के साथ बातें करने लगा। वह उनसे बहुत ही नम्रतापूर्वक बातें करता रहा और बीच-बीच में उन्हें ‘काउन्ट’ के आद सूचक संबोधन से भी संबोधित करता था।

उस महिला ने यह सब देखा। पूछताछ करने पर पता चला कि देहाती जैसा दिखाई देने वाला वह आदमी तो काउन्ट लियो टॉलस्टाय हैं।

वह बहुत बहुत शर्मिंदा हुई और टॉलस्टाय के पास जाकर क्षमा माँगने लगी। उसने महनताना के रूप में दिये हुए दो आने उनसे वापस माँगे। तब टॉलस्टाय ने हँसकर जवाब दिया-”बहिन जी, ये तो मेरी मजदूरी के पैसे हैं। जिन्हें मैं कैसे वापस कर सकता हूँ ?


क्या मनुष्य ‘ब्रह्मा’ बन सकता है ?

इन दिनों मनुष्य और ईश्वर में एक प्रकार से होड़ लगी हुई है कि कौन कितना अद्भुत प्राणी विकसित कर सकता है। इन दृष्टि से देखा जाय तो मनुष्य ईश्वर से बीस हो साबित होगा, उन्नीस नहीं, क्योंकि उसकी रचना में अब तक सब अजूबे ही अजूबे पैदा हुए हैं।

अभी कुछ वर्ष पूर्व मैक्सिको विश्वविद्यालय के आनुवांशिकी विभाग ने एक ऐसी गाय विकसित की है, जिसे आकार की दृष्टि से कुत्ता कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। यह गाय मात्र 65 से0मी0 लम्बी है। इसको ‘जेबू’ प्रजाति की गाय से विकसित किया गया है। इसका आहार अत्यंत स्वल्प है। एक जेबू प्रतिदिन जितना चारा खाती है, उतने से प्रायः एक दर्जन मिनी जेबुओं का निर्वाह हो सकता है। अब तक इस प्रकार की 40 गायें पैदा की जा चुकी है। इनके करीब तीन दर्जन बछड़े हैं। देखने में ये बछड़े कम, बिल्ली के बच्चे ज्यादा लगते हैं। इनके अत्याधिक छोटे आकार के कारण चारागाह में बराबर खोने का भय बना रहता है। आज कल रंग-बिरंगी गायें मैक्सिको विश्वविद्यालय के आनुवांशिकी विभाग की शोभा बढ़ा रही है।

ऐसी ही वहाँ एक अन्य प्रयोग के दौरान गाय और भैंसें के संयोग से एक विचित्र जंतु पैदा किया गया। इसके कुछ गुण गाय से मिलते हैं, तो कुछ भैंसे से। खुराक में यदि यह गाय जैसा है, तो स्थूलता में भैंसे जैसा। रंग इसने गाय का पाया है, तो सींग भैंसे की। आवाज भैंसे से मिलती-जुलती है जबकि शक्ल गाय की तरह है। कुछ मिलाकर यह बड़ा अजीबोगरीब दीखता है।

इसी क्रम में बकरी और भेड़ की मध्यवर्ती संरचना भी वैज्ञानिकों ने विनिर्मित की। उसका नाम “शीगाँट” रखा गया। यह विलक्षण बकरी ऊन उत्पन्न करती और दूध भी देती है। ऐसे ही मादा शेर व नर चीते को मिलाकर ‘टिंग लायन’ नामक नया जीव विकसित किया गया। मादा तेंदुए एवं नर बाघ से जिस प्रजाति का जन्म हुआ, उसे ‘पैन्थोपार्ड’ कहकर पुकारते हैं, जबकि गधे और जेब्रा की वर्ण संकर संतान को ‘जैब्रायड’ नाम दिया गया है।

इन बड़े जंतुओं पर सफल प्रयोग के बाद अब वैज्ञानिक अपेक्षाकृत छोटे जीवों पर परीक्षण करने के मनसूबे बना रहे हैं। फिलाडेल्फिया यूनिवर्सिटी के जंतु शास्त्री डॉ0 बीट्रिस मिंट्स ने चूहों पर ऐसे कुछ प्रयोग किये और सफल हुए है। उन्होंने उनकी कोशिका में विशेष विधि द्वारा वैसे मानव ‘जीन’ प्रविष्ट करा दिये, जो शरीर विकास के लिए जिम्मेदार थे। उन ‘जीनो’ की उपस्थिति से चूहे की काया बृहदाकार हो गयी । इन चूहों का डॉ. मिंट्स ने ‘सुपर माउस’ नाम रखा। अब ऐसे ही प्रयोग बिल्ली, कुत्ते एवं दूसरे पालतू जीवों पर करने का विचार वैज्ञानिक बना रहे हैं और सुपर कैट, सुपर डाग स्तर की संरचनाएँ गढ़ने की सोच रहे हैं।

इसी शृंखला में शायद उनके मन में ‘सुपर मैन’ बनाने की बात भी कोंधे और गोरिल्ला अथवा चिंपांजी प्रभृति किसी जंतु का ‘जीन’ मनुष्य में प्रत्यारोपित करके उसे भीमकाय बना डालें। इस संबंध में वैज्ञानिकों का मत है कि यदि ऐसा हुआ, तो निश्चय ही मानव की संकर प्रजाति शक्ति और आकार में अद्वितीय साबित होगी। संभव हे इस दृष्टि से नव विकसित किस्म ‘सुपरमैन’ कहलाने का अधिकारी सिद्ध हो, पर अध्यात्म अवधारणा में जिस ‘अतिमानव’ की कल्पना की गई है, वह सर्वथा इससे भिन्न प्रकार का है। यह अतिमान परिष्कृत चेतना की एक सुसभ्य, श्रेष्ठ व सुसंस्कृत प्रतिमूर्ति है, भले ही उसका वाह्य आकार लंबा, छोटा कैसा भी क्यों न हो, किन्तु वैज्ञानिकों का सुपर मैन आकार प्रधान है। वह विशालकाय होने मात्र से सुपरमैन बन जाता है, भले ही उसकी प्रकृति नीत्शे के सुपरमैन जैसी ही क्यों न हो।

अब सवाल यह है कि मानव जीन प्रवेश करा कर किसी को सुपरजीव बना दिया जाय, अथवा अन्य किसी जंतु का जीन मनुष्य में प्रत्यारोपित करके उसे सुपरमैन बना डाला जाय या शेर व बाघ जैसे दो भिन्न जंतुओं के अस्वाभाविक संयोग से “लाइगर” जैसा प्राणी विनिर्मित कर दिया जाय, पर मूल प्रश्न फिर भी ज्यों-का-त्यों बना रहता है कि आखिर इनकी उपयोगिता क्या है ? यदि हाँ,” तो इसे रोका जाना चाहिए और कुछ ऐसा किया जाना चाहिए, जो ईश्वरीय विधान में अनावश्यक हस्तक्षेप न होकर उसमें सहायक हो। ऐसा कार्य यही हो सकता है कि हम सृष्टि को अव्यवस्थित करने की तुलना में अधिकाधिक सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाते चलें। सुपर जीवों जैसे नये सृजन का दायित्व पूर्णतः परमात्मा के जिम्मे छोड़ दें, अन्यथा यह परंपरा यदि चल पड़ी, तो फिर वैधानिकता का पूर्ण अंत हो जायेगा और नवीन ‘ब्रह्मा’ ऐसी-ऐसी कौतुकपूर्ण सृष्टियाँ करने लगेगा, जिनकी न तो कोई उपयोगिता सिद्ध हो सकेगी, न आवश्यकता ही। ऐसे में मनुष्य भले ही अभिनव रचनाकार की उपाधि पा ले, पर परमेश्वर से उसकी तुलना में सेर और छटांक जितना भारी अंतर बना ही रहेगा। अतः उत्तम यही है कि हम स्वयं मनुष्य बने रहें और निर्माता की भूमिका भगवान को संपन्न करने दें। सुव्यवस्था की गारंटी तभी दी जा सकेगी।


देवर्षि की माया

“कुछ कर्मों के करने से पुण्य होता है, और कुछ के न करने से। कुछ कर्मों के करने से पाप होता है और कुछ के न करने से।” धर्मराज अपने अनुचरों को समझा रहे थे। “कर्म संस्कार का रूप धारण करके फलोत्पादन करते हैं। संस्कार होता है आसक्ति से और आसक्ति क्रिया एवं क्रियात्याग दोनों में होती है। यदि आसक्ति न हो तो संस्कार न बनेंगे। अनासक्त भाव से किया हुआ कर्म या कर्मत्याग न पुण्य का कारण होता है और न पाप का।”

बड़ी विकट समस्या थी। कर्म के निर्णय के लिए जो सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, दिशाएँ, संध्या, दिन-रात्रि, चन्द्रमा, इंद्रियाँ मन बुद्धि एवं काल से द्वादश साक्षी नियत किये गये थे। उनमें से केवल मन और बुद्ध ही आसक्ति अनासक्ति के साक्षी हो सकते थे। वे तो उसी जीव के है यदि उन्होंने कही पक्षपात किया तो!

“एक बात और” धर्मराज ने अपनी बात आगे बढ़ाई! बहुधा अधर्म भी धर्म बनकर धोखा देता है और परिस्थिति भेद से धर्म भी अधर्म हो जाता है। दूसरे के वर्णाश्रम धर्म अपने लिए परधर्म है। धर्म का केवल बाद्म नाटक तो दंभ है। शास्त्रों के शब्दों का जानबूझकर अन्यथा अर्थ करना छली है। जो अपने धर्म में बाधा डाले, वह किसी के लिए धर्म होने पर भी विधर्म है। अपने धर्म से भिन्न किसी भी धर्म की स्वेच्छा स्वीकृति धर्माभास है। ये पाँचों अधर्म यानि त्याज्य कर्म है।

बेचारे यमदूत-सिर पकड़ लिया उन्होंने। यह अटपटा परिभाषा समझ लेना सरल नहीं था और समझे बिना उनका कल्याण नहीं। यदि तनिक भी चूके, किसी भी जीव को भ्राँतिवश कष्ट मिला तो धर्मराज क्षमा करना जानते ही नहीं। उन्होंने जब कभी बूढ़े ब्रह्मा से पढ़ा होगा-पितामह बहुत व्यस्त रहे होंगे सृष्टि कार्य में। धर्मराज को क्षमा का पाठ पढ़ाना ही वे भूल गए।

विवश होकर किया गया त्याग, कष्ट, सहन, ये सब पुण्य नहीं हे और इसी प्रकार किसी विशेष परिस्थिति में या किसी के द्वारा बलपूर्वक कराया गया, “अनिच्छा पाप भी पाप नहीं है।” यही एक सीधी बात कही थी यमराज ने। दूतों ने बड़े आनन्द से सिर हिलाकर सूचित कर दिया कि वे यह अंतिम वाक्य समझ गए।

“अब तुम जा सकते हो।” उन्होंने देख लिया था कि दूतों के हाथ में पाश और दंड उपस्थित है। उनके दूत कभी प्रमाद नहीं करते। भूलें भी यदा-कदा ही उनसे होती हैं। कार्य क्षेत्र में ही वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान के उदय का सर्वश्रेष्ठ स्थान अनुभूति का क्षेत्र है। उन्हें उपदेश के लिए अवकाश भी कहाँ मिलता है ? अहिर्निशि अविराम न्यायाधीश का स्वरूप उन्हें दूसरी ओर कहाँ ध्यान देने देता है।

“अनुभूति के क्षेत्र में भ्राँति की सम्भावना तो रहती है।” डरते-डरते वक्रतुंड ने, जो सबसे अधिक धृष्ट हो गया था, बहुत ही नम्र शब्दों में निवेदन किया।” और उसका परिणाम होता है दंड।”

“भ्राँति ही तो चेतनता का लक्षण है। भूलें या तो पूर्ण पुरुष परमात्मा से नहीं होती या जड़ से।” कुछ रुष्ट होकर धर्मराज ने डाँटा । “तुम मनुष्यकृत जड़ यंत्र बनना चाहते हो या तुमने अपने को पूर्ण पुरुष मान लिया है।”

“दंड ?” यमराज ने फटकारा” मूर्ख हो तुम! दंड ही शिक्षा है। वही भ्राँति से सावधान करता है और प्रमाद को दूर रखता है।”

कोई फिर बोलने का साहस नहीं कर सकता था। सभी चुपचाप वहाँ से एक ओर खिसक कर सोचने लगे। उन्होंने अपनी एक बैठक कर ली थी। ‘व्रत उपवास, दान, सेवा, आदि कर्मों के करने से पुण्य है।’ वक्रतुँड ने धर्मराज के प्रथम वाक्यांश का भाव्य किया। हिंसा, चोरी, अनाचार आदि करने से पाप होता है। बड़ी सीधी बात कह दी भीम दर्शन ने।

“पागल, पशु और शिशु किसी कर्म से युक्त नहीं होते।” यही सबसे कठिन स्थल था। “किंतु बुद्धिमान पुरुष भी आसक्ति न रखकर कर्म करेगा और उसके फल का भागी न होगा” - बड़ा टेढ़ा प्रश्न है। ऐसे पुरुष का निर्णय कैसे होगा ? सबसे वृद्ध वृहदोदर ने मुख्य प्रश्न उठाया। इसी के निर्णयार्थ तो यह गोष्ठी बैठी थी। शेपाँश तो निर्णित ही थे। उन पर कुछ न भी कहा गया होता तो क्या हानि थी।

“महाराजाधिराज श्री धर्मराज..........। अग्रचर का उच्च स्वर इन सभी के कानों में पड़ा । सम्भवतः आज धर्मराज स्वयं किसी विशिष्ट पुरुष को अपनी पुरी दिखलाने उठ खड़े हुए थे।” महाराज इधर ही आ रहे हैं” दूतों ने शीघ्रतापूर्वक अपने पाश और दंड उठाए और अस्त-व्यस्त मर्त्यलोक की ओर चल पड़े।

थोड़ी ही देर में वे एक स्थान पर पहुँच कर विचार करने लगे “इनका क्या होगा ?” एक दिगम्बर अवधूत पड़े थे नदी के किनारे यों ही घास पर। खूब परिपुष्ट शरीर था और इतना मैल उस पर जम गया था कि मानों वर्षों से स्नान न किया हो। सिर के बढ़े बाल उलझ गए थे। श्मश्रु जाल में तिनके एवं धूल भरी थी। हाथ-पैर के नाखून खूब बढ़ गए थे। उनके मुख पर एक ज्योति थी और ने अधमुदे हो गए थे।

“इसने तो एक ओर से सभी कर्मों का त्याग कर दिया है।” वक्रतुँड ने महाहनु के उत्तर में कहा।” भोजनादि छोड़ा तो नहीं हे कोई लाकर खिला देता चाहे जो भी खा लेता। खाद्याखद्य का कोई विचार नहीं। विधि निषेध का तनिक भी ध्यान नहीं। पकड़ ले चलो! ठस प्रकार के कर्महीन तमोलोक के अतिरिक्त और कहाँ जाएँगे।”

“मुझे तो रंग-ढंग और ही दिखायी पड़ते हैं। यह आनंद यह मस्ती और मुख का यह तेज!” महाहनु ने प्रतिवाद किया” मुझे तो अजामिल के समय की मार अब भी कँपा देती है। दुष्कर्मियों के लक्षण तो इनमें है नहीं। मैं तो साहस नहीं करता आगे बढ़ने का। “

“पुण्यात्मा सही । ले चलो फिर भव्य रूप रखकर।” झल्ला पड़ा वक्रतुँड।” अंततः समय तो इनका हो ही गया है और ले चलना ही होगा किसी रूप में।”

“पुण्य भी कहाँ हैं इनके पास!” वृहदोदर ने खिन्न होकर कहा।” आज अपने सबके सब साक्षी मूक हो गए हैं। इनके मन और बुद्धि का तो कोष ही रिक्त पड़ा है।” आश्चर्य था स्वर में।

“राजा के कर्मों का षष्ठाँश गुरु के कर्मों का दशमाँश और शिष्य के कर्म का दशमाँश माता-पिता के कर्मों का भी कुछ भाग।’ महाहनु विस्मित हो रहे थे। मान लिया कि ये गृहस्थ नहीं पत्नी और पुत्र के कर्मांश इन्हें आबद्ध नहीं करते। संभव है गुरु न किया हो और न किया हो कोई शिष्य । माता-पिता के बिना आकाश से टपके न होंगे। किसी न किसी राजा का ही राज्य होगा यह इनके कर्मों का अंश भी यहाँ क्यों नहीं उपलब्ध होता ?”

‘समस्या सीधी नहीं है ? बृहदोदर ने गंभीरता से कहा। तीन ही यमदूत इधर आए थे। साक्षी मौन हैं। मन और बुद्धि को छोड़ दे तो संस्कारात्मक चित्त ही ढूँढ़े नहीं मिलता। अब इन्हें ले भी चलें तो किस रूप में ? यमदूतों कमी दृष्टि दूर से ही प्रत्येक के अंतःकरण को साक्षात कर लेती है।

“एक उपाय है” वक्रतुँड ने जब को किंचित आश्वस्त होने का अवकाश दिया। “ हम इनके सम्मुख प्रत्यक्ष हो जायँ । अपने आप निर्णय हो जाएगा कि हम इन्हें ले चलें या यहाँ से नौ दो ग्यारह हो जायँ।” बात यह है कि धर्मराज ने उन्हें बता रखा था कि तुम्हें देखकर भी यदि कोई भयभीत न हो तो समझ लेना कि यह तुम्हारे अधिकार क्षेत्र से परे का जीव है। उसके संबंध में मुझे सूचना दे देना। जो तुम्हें देखकर भयभीत हो जाय बस, उसी के संबंध में तुम्हें विचार करना है।

“यदि कोई समर्थ हुआ” चौककर महाहनु ने सुझाया” कहीं दुर्वासा की भाँति क्रोधी भी हो साथ ही ? लेने के देने पड़ जाएँगे केवल सम्मुख प्रत्यक्ष होने में।”

“अंततः इनके कर्म हो क्या गए ?” “कर्म छू मन्तर तो हुआ नहीं करते और सृष्टि में आकर कोई निष्कर्म रह नहीं सकता। ये अनासक्त कर्मी होंगे जो थोड़ा बहुत भोजनादि कर्म करते भी हैं उसमें इनकी आसक्ति नहीं है। वक्रतुँड सम्मान करने लगा था महापुरुष का।”

“अनासक्ति फलोत्पादन नहीं करती ऐसी बात तो है नहीं। बृहदोदर ने धर्मराज के उपदेश पर ही शंका उठाई।” कर्म होगा तो उसका परिणाम भी होगा। विश्व में कुछ नष्ट तो होता नहीं है। यह परिणाम कर्ता को स्पर्श नहीं करते तो होते क्या हैं ?

ऊहँ, पशुओं, एवं उन्मत्तों के कर्मफल क्या होते हैं ? महाहनु हँस पड़ा सहचर के अर्थशून्य तर्क पर । प्रश्न तो यहाँ है कि अनासक्त भाव से किया गया कर्म फल भले न उत्पन्न करें, किंतु अनंत अपार संचित रागादि के कर्मांश का वह नाश तो नहीं करता। इनके संचित और इनके भाग से इतरजनों के कर्मंश का क्या हुआ?

यह विवेचन चल ही रहा था। एक क्षण के लिए दृष्टि हट गई थी तीनों की महापुरुष पर से। दूसरे क्षण उधर उन्होंने देखा और हक्के बक्के रह गए। अधखुले नेत्र पूरे बंद हो गए थे। केवल स्थूल शरीर घास पर खड़ा था। इधर-उधर ऊपर-नीचे, सब कहीं देख डाला सूक्ष्म शरीर या कारण शरीर या कारण शरीर का पता नहीं था। इनसे पृथक जीव की कल्पना उन्होंने कभी नहीं की थी।

“महाराज से शीघ्र निवेदन कर देना चाहिए”। भागे वे संयमनी की ओर। उन्हें कौन बताये-’न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति।’ वे किसी की सुनने को रुक भी कहाँ सकते थे।

थोड़े ही समय पश्चात् वही संयमनी, वही धर्मराज और वही यमदूत विवश धर्मराज आज फिर अपने दूतों को समझा रहे थे। झल्ला भी रहे थे इन अज्ञदूतों पर।

“हमने कान पकड़। झाकेंगे नहीं ऐसे महापुरुषों की ओर। “ बड़ी दीनता थी महाहनु के स्वरों में ‘एक जिज्ञासा मात्र की हमने। यदि प्रभु अधिकारी समझें...........।’

“स्फटिक या कमल पत्र को देखा है ?” धर्मराज ने कुछ शाँत होकर पूछा।

“उस पर कीचड़ या जल लिप्त नहीं होता ।” वक्रतुँड ने आशय समझ लिया था। स्पर्श करके भी गिर जाता है।

“ठीक इसी प्रकार ज्ञानादि साधनों से विशुद्ध चित्त पर कोई संस्कार ठहरता नहीं” धर्मराज ने उपदेश को यथा संभव संक्षिप्त करने का प्रयत्न किया।

“तब उस संस्कार का होता क्या है ? बृहदोदर ने शंका का उत्तरार्थ पूछा “क्या उसका नाश हो जाता है?” वह जानता हे कि विश्वात्मा की सृष्टि में विनाश जैसा कोई शब्द है ही नहीं। वहाँ केवल रूपांतर मात्र होता है।”

“शुभाँश सेवक एवं शुभ चिन्तकों में तथा अशुभंश उत्पीड़क एवं निंदकों में वितरित हो जाता है।” धर्मराज ने बड़े मजे से कह सुनाया। उनके प्रेमाकर्षण या द्वेषाकर्षण की तीव्रता या लघुता के अनुसार।

“अजामिल के पास से तो गए नहीं थे।”कहीं से आकर हस्वकाय भी पीछे खड़ा हो गया था। सुनंद के गदाघात का चिन्ह अभी भी उसके मस्तक पर बना हुआ था। उसका समाधान उस दिन के धर्मराज के उपदेशों से हुआ नहीं था।

“तू तो पूरा बच्चा है।” धर्मराज मुस्कुरा पड़े।” तुझे बता तो दिया कि मेरे नियम मेरी अधिकार सीमा तक ही है। जो मेरे और संपूर्ण जगत के स्वामी है, उनके भक्तों के संबंध में नियम निर्धारण करना मेरी शक्ति के बाहर है। वहाँ नियम की ओर न देखकर तुम्हें केवल इतना ही देखना है कि जीवन किसी प्रकार प्रभु के राम, रूप, गुण लीला से तनिक भी संबंधित तो नहीं है ऐसा होने पर उधर का मार्ग छोड़ दो।”

“जी हमने उधर का मार्ग ही छोड़ दिया आज।” पता नहीं कहाँ से हँसते हुए देवर्षि नारद खड़ाऊँ खटखटाते, वीणा लिए, खड़ी चुटिया फहराते आ धमके । सोचा कि भक्तराज को जय गोविन्द

करते चले। वैसे जाना तो था कैलाश।

दूत एक ओर खिसककर दंडवत करने लगे। धर्मराज हड़बड़ा कर उठे और उन्होंने भी पृथ्वी पर लेटकर अपना माथा देवर्षि के चरणों पर रखा।


अहंकार नहीं, स्वाभिमान ही वरेण्य

“लगता है आपने तो पूर्ण-ज्ञान प्राप्त कर लिया है।” किसी व्यक्ति ने ‘सर आइजक-न्यूटन’ से कहा।

“मेरे सामने ज्ञान का अथाह-समुद्र फैला हुआ है, जिसके किनारे बैठकर कुछ ही घोंघे और सीपियाँ उठा पाया हूँ।” विज्ञान जगत के गणमान्य मनीषी ने उत्तर दिया। उनकी निरभिमानता का कैसा सुन्दर उदाहरण है यह।

जीवन में उन्नति, समृद्धि व सफलता चाहने वाले व्यक्ति को घमंड से दूर रहना चाहिए। मनुष्य के वाँछित लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में यह बड़ा बाधक तत्व है। अहंकारग्रस्त व्यक्ति का विकास रुक जाता है। उसकी प्रगति की सारी संभावनाएँ धूमिल पड़ जाती हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर विद्वानों ने इसे हेय एवं त्याज्य बताया है।

समीपवर्ती अन्य व्यक्तियों से अपने आपको असाधारण विशिष्ट उच्चस्तर का मान लेने की मान्यता ही अहंकार है। अहंकार अनेक दुर्गुणों का जनक है। अपनी बुद्धि, ज्ञान, कला-कौशल, रंग-रूप, सामर्थ्य शक्ति किन्हीं विशेषताओं का अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बन जाता है। व्यक्ति के जीवन में अहंकार का संचरण होते ही उसकी क्रियाएँ एवं चेष्टाएँ बदल जाती हैं। वह नशाग्रस्त व्यक्ति की तरह असंतुलित एवं अव्यवस्थित कार्य व्यवहार करने लगता है। उसमें विवेकशीलता दूरदर्शिता का ह्रास होता जाता है।

किसी ने ठीक ही कहा है- “अभियान वह विषबेल है जो जीवन की हरियाली, सौंदर्य, बुद्धि-विस्तार, विकास को रोककर उसे शुष्क कर देती है।” “अहंकार एक ऐसी विष-बुझी तलवार है, जो अपने तथा दूसरे के लिए घातक सिद्ध होती है।” “अहंकार व्यक्ति को क्रूरता, शोषण, अनाचार की ओर प्रवृत्त करता है। फलतः व्यक्ति और समाज दोनों का अनिष्ट होता है।

गणित और विज्ञान के प्रकाण्ड विद्वान न्यूटन महोदय की-गणित संबंधी महत्वपूर्ण खोज एक पत्र में प्रकाशित हुई। इससे अनेक लोगों से प्रशस्ति-पत्र धन्यवाद, ज्ञापन, अभिनंदन उनके पास आने लगे। इस पर खेद व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था-”अब मेरी प्रसिद्धि तो खूब बढ़ेगी, किंतु विद्या, जिसके लिये मैंने जीवन भर का समय लगा दिया, उसका विकास रुक जायेगा।”

उपरोक्त कथन से ध्वनित होता है कि-प्रशंसा और प्रसिद्धि अभिमान के पोषक तत्व हैं। जिसे अपनी ही पढ़ाई और ख्याति की बात सूझती है, वह प्रगति की दिशा में कदम कैसे बढ़ा सकता है ? श्रम एवं साधना की महत्ता को वह भूल जाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर सपफली लेखक, कवि, वैज्ञानिक, कलाकार, दार्शनिक एवं महापुरुषों ने अपनी साधना की पूर्णता के पूर्व अपने क्रियाकलापों को गुप्त रखा, प्रशंसा प्रसिद्धि से अपने को अछूता रखा और अहंकार के शिकंजे से कोसोँ दूर रहे।

‘अभियान’ और ‘स्वाभिमान’ में आकाश-पाताल का अंतर है। अभियान का जन्म अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के फलस्वरूप होता है। जबकि स्वाभाविक का उदय व्यक्ति के उदात्त एवं विशाल आत्मीयतापूर्ण दृष्टिकोण के कारण। जहाँ अभियान व्यक्ति के ओछेपन की निशानी है, वहाँ स्वाभिमान उसके उच्चता और महानता की। अपने देश, जाति, धर्म, आदर्श मानवता की आन-बान और शान की रक्षा के लिये प्राणों की बाजी लगा देना स्वाभिमान का परिचायक है।

अभिमान भौतिक पदार्थों का होता है। धन, शिक्षा, रूप, बल, पद आदि नश्वर संपदाओं एवं विशेषताओं पर इतराने वाले व्यक्ति अहंकारी कहे जायेंगे। स्वाभिमान वे हैं, जो आदर्शों के पालन में

दृढ़ता प्रकट करते हैं और मानवी गरिमा को आदर्शवादी परंपराओं को समाज में जीवित रखने के लिए अपने सर्वस्व की बाजी लगा देते

है। अहंकारी जहाँ अपना तनिक सा अपमान भी सहन नहीं कर सकता है और चोट खाये सर्प की तरह दूसरों पर टूट पड़ता है, वहाँ स्वाभिमानी व्यक्तिगत लाभ हानि का-मानापमान का ध्यान न करके अपनी अहंता आदर्शों के साथ जोड़कर रखता है और स्वस्थ परंपराओं की रक्षा में ही अपनी सफलता एवं प्रशंसा मानता है। हमें अहंकारी नहीं स्वाभिमानी बनना चाहिए।


Quotation

कुछ दिन एकाँत में रहकर यह साधना करनी चाहिए कि संसार भर में जो कुछ है ईश्वर का है। मैं तो वस्तुओं या प्राणियों का उपयोग उनकी इच्छानुसार किया करूंगा।


तनिक उस पर विश्वास तो रखें!

जीवन में कई बार ऐसे घटनाक्रम घटित होते हैं, जिन्हें देखते हुए सहसा मुँह से निकल पड़ता है-”मारने वालो से बचाने वाला बड़ा है” उक्त प्रसंगों में अनेक बार ऐसे अवसर उपस्थित होते हैं, जिनमें व्यक्ति को मन जाना चाहिए था, पर हर बार वह बड़े अलौकिक ढंग से बच निकलता और बुद्धि को इसी निर्णय पर पहुँचने के लिए बाधित करता है कि जब परमसत्ता कृपालु हो, तो भला उसे कौन मार सकता है ?

घटना 1950 की है। कोरिया युद्ध में प्रतिरोध के लिए अमरीकी वायुसेना की सहायता माँगी गई, जिसके अंतर्गत अनेक विमान कोरिया भेजे गये । इन विमान चालकों में एक नौजवान चालक भी था उसका नाम मैथुसन था। वह अभी-अभी वायुसेना में लेफ्टिनेण्ट के पद पर नियुक्त हुआ था, अतः युद्ध का उसे कोई विशेष अनुभव नहीं था, पर उसमें साहस की कमी नहीं थी।

अन्य विमानों के साथ वह भी नित्यप्रति कोरिया के ऊपर गश्त लगाया करता । इसी क्रम में एक दिन वह चार सहयोगी विमानों के साथ उड़ा चला जा रहा था। मैथुसन का विमान शेष चारों से आगे चल रहा था। अभी वह जा ही रहा था कि अचानक उसकी दृष्टि च्याँग योंग हवाई अड्डे पर गई। वहाँ दो लड़ाकू विमान उड़ने की तैयारी में थे। उन्हें देखकर उसे यह समझते देर न लगी कि वे उन पर आक्रमण के लिए ही उद्यत हो रहे हैं। तुरंत उसके मन में विचार कौंधा-क्यों न उन्हें उड़ने से पूर्व ही नष्ट कर दिया जाय। यह विचार आते ही वह उसे क्रियान्वित करने के लिए ताने-बाने बुनने लगा, किंतु इस मध्य उससे एक चूक हो गई। वह यह भूल बैठा कि स्वयं भी शत्रु-सीमा के अंदर है और विपक्षी उसके लिए घात लगाये बैठे होंगे। यही असावधानी विपत्ति का कारण बनी।

अभी वह कुछ कर पाता, इसके पूर्व ही उसके विमान को एक तीव्र झटका लगा। मैथुसन अविलंब समझ गया कि वह शत्रु के चंगुल में फँस चुका है और झटका विरोधी पक्ष द्वारा दागे गये किसी गोले का परिणाम है। उसका अनुमान सही निकला। विमान उक्त झटके के साथ डगमगाने लगा। डगमाहट बंद हुई, तो उसने देखा विमान के दो टुकड़े हो गये हैं। उसका पिछला हिस्सा तेजील से नीचे की ओर गिरता चला जा रहा है, जबकि अगले भाग में वह अब भी सवार था और उड़ रहा था।

दृश्य देखकर पहले तो घबरा उठा, पर तुरंत ही स्वयं को सँभाला और परिस्थिति के अनुकूल किया। काकपिट से नीचे झाँक कर देखा। शत्रु खेमे में काफी सक्रियता थी। वह अब भी कुछ करना चाहता था, इसी निमित्त हवाई अड्डे के ऊपर चक्कर काट रहा था, पर इस असहाय स्थिति में वह क्या करें ? कुछ सोच नहीं पा रहा था तभी एक गोला कैबिन की दीवार से टकराया। वह एक ओर सरक गया। कुछ सँभला ही था कि दूसरे गोले ने जहाज के डैने को ध्वस्त कर दिया। इस आघात के साथ केबिन के दो टुकड़े हो गये। इसी बीच तीसरे गोले के प्रहार ने कक्ष को चूर्ण-विचूर्ण कर दिया।

मैथुसन द्रुतगति से नीचे गिरने लगा। उसका पैराशूट तोप के व्याघातों से जर्जर हो गया था, अतः प्राणरक्षा के लिए उसका भी उपयोग नहीं कर सका। जब वह जमीन से टकराया, तो कुछ समय के लिए संज्ञानशून्य स्थिति में पड़ा रहा, किंतु जल्द ही उसे होश आ गया। भागने के लिए उठा, तो उस पर गोलियों की बौछार होने लगी। मैथुनसन सामने पड़े टूटे विमान के पीछे छिप गया। शत्रु उसकी ओर बढ़े आ रहे थे। मृत्यु एक बार फिर सामने खड़ी थी। वह लगभग हताश हो चुका था, तभी न जाने कैसे नष्ट विमान में अचानक विस्फोट हुआ। आग का गोला देख विपक्षी पीछे भागे। इसी समय मैथुन को भी भागने का मौका मिल गया।

वह बेतहाशा भागा चला जा रहा था, शत्रु सैनिक भी उसका लगातार पीछा कर रहे थे। अंततः बचने का कोई उपाय न देख, वह एक जंगली दलदल में घुस गया और पीठ के बल लेटा रहा। मौत फिर सिर के ऊपर मँडराने लगी। गोलियाँ शरीर के कुछ ही ऊपर से गुजर रही थीं और कभी भी उसमें धँस कर उसे प्राणहीन बना सकती थी।

आकास्मात् सब कुछ शाँत हो गया। पहले तो मैथुसन ने इसे शत्रु दल की कोई चाल समझी और स्वयं भी निश्चेष्ट पड़ा रहा। जब देर तक कोई आहट न हुई, तो वह उठ बैठा और शत्रुओं की टोह लेने लगा। कुछ ही देर में उसे सिर के ऊपर एक अमरीकी हैलिकाप्टर चक्कर काटता नजर आया। मैथुन खुशी से झूम उठा। जल्दी से दलदल से बाहर निकला और हाथ हिलाकर उसे इशारा करने लगा। हैलिकाप्टर तुरंत नीचे उतरा, मैथुसन उसमें बैठा और फिर उसे सुरक्षित मौत के मुँह से निकाल ले गया।

बाद में जब वह साथियों से मिला, तो वे यही कहते पाये गये कि ईश्वरीय अनुग्रह के बिना मैथुसन का बच पाना असंभव था। व्यक्ति जब अनेक बार मौत का सामना करके सुरक्षित बच गया हो, तो इसे उसकी अहैतुकी कृपा के अतिरिक्त और कहा क्या कहा जाय।


अगली सदी नारी की होगी

अपना हितसाधन हर किसी को अभीष्ट है, पर थोड़ी समझदारी विकसित होने पर यह अपना ‘अपनों’ के प्रति ममत्व के रूप में विकसित हो जाता है। छोटा बच्चा अपनी भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, सहायता, खेल आदि तक ही सीमित रहता है, पर जब वह वयस्क हो जाता है, तो परिवार के अन्य लोगों के साथ-मित्र मण्डली के प्रति भी ममता उड़ेलता है और उनकी सुविधा-असुविधा का ध्यान रखने लगता है। मात्र उनसे लाभ ही लेने की इच्छा नहीं संजोए रहता, वरन् सहायता करने में भी प्रसन्नता अनुभव करता है।

जब जिम्मेदारी का अधिक अनुभव होने लगता हे तो अभिभावकों के रूप में पत्नी, बच्चों का भी बहुमुखी दायित्व निभाता है। बहिन, भाइयों का भी ध्यान रखता है। भाई-बहिनों के प्रति, घर के बड़े-बूढ़ों के प्रति भी ध्यान देता है और उस समुदाय की यथा-भाँति, यथा-रीति, सहायता करने में भी उत्साह प्रदर्शित करता है। यही आत्म विकास है जो और भी अधिक परिष्कृत होने पर निकटवर्ती एवं दूरवर्ती समाज के साथ जुड़ जाता है। तब व्यक्ति एकाकीपन अनुभव नहीं करता, परिवार तक ही सीमित नहीं रहता, वरन् संपर्क क्षेत्र के लोगों के दुःख-सुख में भी भागीदारी बनने लगता है। देश-विदेश में अन्यत्र बिखरी हुई घटनाओं के साथ भी अपनी भाव संवेदनाओं को जोड़ता है और ऐसा कुछ सोचने करने लगाता है जिसमें बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय की बात बनती है। किन्तु यदि क्षुद्रता ही मान्यताओं में घुस कर बैठी रहे तो मात्र अपना निजी सुख और लाभ ही सब कुछ दीखता है। देश, समाज, पड़ोस, परिवार आदि का हित साधन तो दूर, मात्र अपनी निज की वासना और तृष्णा ही सब कुछ बनकर रह जाती है। अपने बड़प्पन का प्रदर्शन करने में भले ही कितना ही धन, समय लग जाय, पर उपलब्ध क्षमताओं में से किसी को कुछ देने के लिए सहज सहमत नहीं होता। मजबूरी बाधित करें, तो बात दूसरी है।

समझदार सद्गृहस्थ अपनी कमाई को स्वयं ही नहीं हड़पते रहते, वरन् कम से कम कुटुँबियों को तो उसमें सहभागी बनाते ही हैं। बाहर वालों के लिए कुछ भले ही न बन पड़े, पर घर वालों के लिए तो आदान-प्रदान के मौलिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर तो किसी कदर उदारता अपनाये ही रहते हैं। संतान को स्वस्थ, प्रसन्न रखने, पढ़ाने तथा उनकी भावी प्रगति को ध्यान में रखते हुए कुछ न कुछ सोचते करते भी हैं। कारण कि उन्हें बड़ा होने पर बदले में सहायता, सम्मान, सुरक्षा की सींवना ध्यान में रहती ही। इस समुदाय में यदि महिला आती हैं तो उनके संबंध में नैतिकता एवं सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए उदार सहायता का रुख अपनाना पड़ता है। उन्हें सद्भाव एवं सम्मान भी किसी न किसी रूप में दिया जाता है। भले ही वे नगद कमाई के रूप में बदला चुका सकने की स्थिति में न होती हों।

पुत्री के विवाह में अच्छी खासी रकम खर्च करनी पड़ती है, भले ही वह अपनी सामर्थ्य से अधिक ही क्यों न हो। बहिन के बारे में भी यही सोचा जाता है कि अच्छा घर, वर मिले और भावी जीवन सुविधा, प्रसन्नता और सम्मान जनक परिस्थितियों में बिताये। कन्या के विवाह में बहुत दिन दौड़ धूप करने और महँगा दायित्व उठाने की व्यवस्था भी उसी कारण बन पड़ती है। माता के प्रति उसके उपकारों के बदले कृतज्ञता का परिचय दिये बिना भी आत्म संतोश नहीं होता। इस प्रकार परिवार के हर सदस्य का उत्कर्ष अपने निज के स्वार्थ साधन का ही एक अंग बन जाता है।

इस संदर्भ में एक विचित्र बात यह देखने को मिलती है कि पत्नी या पुत्रवधू के रूप में पराये घर से आने वाली महिलाएँ ससुराल के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर देने पर भी ‘अपनों’ की गणना में नगण्य सा स्थान बना पाती हैं। उनकी अहिर्निशि सेवा साधना को भी नर द्वारा अपना अधिकार समझा जाता है। अमेरिका में जब दास प्रथा का बाहुल्य था तब खरीदे हुए गुलामों से मन चाहा काम लेना और कमी देखने पर प्रताड़ना देना प्रचलन जैसा बन गया था। भले ही पीछे उसे अमानवीय माना गया हो और कानूनन उस प्रथा को समाप्त किया गया हो। पराये घर से आई महिलाओं से मन माना लाभ उठाते रहने पर भी अपने समुदाय पर न जाने क्या प्रेत-पिशाच चढ़ा रहता है कि वधू वर्ग की महिलाओं के हिस्से में पक्षपात ही आता है। उन्हें पराई समझा जाता रहा । ये अविश्वास की-संदेह की भाजन भी रहती है। और घर में घुसते ही उन्हें घूँघट डाले रहने, किसी से खुलकर बात न करने जैसे सामान्य मानवी अधिकार पर भी प्रतिबंध लग जाता है। घर से बाहर जाना है तो उनकी निगरानी, चौकीदारी करने के लिए कोई न कोई प्रहरी साथ रहना चाहिए। इसमें सुरक्षा कारण नहीं होती, वरन् आशंका का गहरा पुट रहता है, जिसके कारण यह वहम उठता है कि इसका अन्य कोई समर्थक-सहायक न बन जाय और शील न गँवा बैठे। वधुओं को ससुराल में किस प्रकार दिन काटने पड़ते हैं, इसे देखा जाय, तो प्रकट होता है कि यदि पति का आशीष, आश्रय, और संतान के प्रति वात्सल्य उन्हें पकड़े-जकड़े न रहता, तो वे ससुराल का त्रास और असम्मान सहने की अपेक्षा कहीं मेहनत-मजदूरी करके पेट पालना हजार गुना अच्छा समझती। ऐसी है अपने देश में वधू स्तर की महिलाओं की सामाजिक स्थिति, जिसे निंदनीय और अमानवीय ही कहा जा सकता है। कई तो इसी घुटन में मिरगी (मृगी) जैसे रोगों की शिकार हो जाती हैं, तो कई मानसिक संतुलन गँवा बैठती हैं।

पुत्री और बहिन को पराये घर का कूड़ा समझते हुए भी सहानुभूति का इतना अंश तो रहता ही है कि पितृगृह में रहते हुए उसे घूँघट निकाल कर रहने या किसी से भी बात न करने, सहेलियों से हँसने-बोलने पर प्रतिबंध नहीं रहता और उनके भविष्य की इतनी चिंता तो रहती है कि वह कही अंधकारमय न बन जाय, उसे दबायी-दबोची जिंदगी न जीना पड़े, किंतु वधुएँ अपने पितृ परिवार का परित्याग करके आजीवन दासों की स्थिति में स्वेच्छा-समर्पण करने के बाद भी वह सद्भाव और विश्वास अर्जित नहीं कर पाती, जो उस घर की लड़कियों को सहज ही मिलता रहता है। यह पक्षपात अखरने वाला भी है और असह्य स्तर का अनैतिक भी ।

पिता के घर में लड़कियाँ बड़ी उम्र की हो जाने पर भी अपनी पढ़ाई आगे जारी रख सकती हैं, ताकि उनके स्वावलंबन का रास्ता खुला रहे, सम्मान में भी कमी न पड़े, पर वधुओं से यह सुविधा प्रायः उसी दिन छिन जाती है, जब वे विवाहित होकर दूसरों के घर में प्रवेश करती है। इसमें न्याय और औचित्य कितना है, यह गंभीरतापूर्वक विचार जाने योग्य है। लड़की से ऐसा क्या गुनाह बन पड़ा, जिससे विवाह होने के उपराँत अपना वह विश्वास भी गँवा बैठी जो उसे चार दिन पहले तक मिलता रहा था। ऐसा उसके सिर पर गजब का गोला कहाँ से टूटा कि वह शिक्षा स्वावलंबन जैसी मानव जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं की इच्छा करने तक पर दुत्कारी जाने लगी। क्या वधू मात्र क्रीत दासी ही है। उसके सम्मान, स्वावलंबन या भावी उत्कर्ष का सारा ही क्षेत्र किस कारण अवरुद्ध हो गया ?

शिक्षित पुत्र, भाई अथवा पुत्री बहिन यदि कोई अच्छी सफलता प्राप्त करता है, आगे बढ़ता है, यशस्वी होता है, तो सारा घर फूला नहीं समाता। अपनों की उन्नति में प्रतिष्ठा में समूचे परिवार का प्रसन्न होना स्वाभाविक ही है और वह चरितार्थ भी होता है, पर वधुओं के संदर्भ में ऐसा कुछ सोचा जाना, किया जातक सहन नहीं होता। यह बुद्धि विपर्यय क्यों ? यह पक्षपात किस कारण ? अधिकाँश वधुओं का भावी उत्कर्ष उसी दिन से असंभव बना दिया जाता है, जिन दिन से कि वे ससुराल के पिंजड़े में कस दिये जाने के लिए विवश होती हैं। क्या यही परंपरा है ? क्या इसी को संस्कृति कहते हैं, जिसके कारण सेवाधर्म स्वीकार करते ही उसे अनेकानेक संदेहों के-अविश्वास के घेरे में रहना पड़े, हर ओर से झिड़की मिले, हर कोई अपने कार्य में उसे लगाये रहना अपना अधिकार समझे। हे भगवान! तेरा ऐसा प्रकोप भारत की नारियों पर ही किस कारण उतरा कि वे विवाह होते ही अपने भविष्य को सँजोने सँभालने की आकांक्षा रखने तक का अधिकार खो बैठे?

समय आ गया कि अब इस अवांछनीय प्रचलन को पूरी तरह बदल दिया जाय ? वधू या बहिन-बेटी को ससुराल में एक ही जैसी सुविधाएँ और स्नेह-सम्मान पाने का अधिकार मिलता रहे। उनकी भावी प्रगति के मार्ग में कोई किसी प्रकार बाधक न बने। उन्हें श्रेय मिलने की दिशा में अग्रसर होने पर जैसे पिता के परिवार में प्रसन्नता का अनुभव होता है, वैसा ही वातावरण ससुराल में भी उपलब्ध रहे। समय और न्याय की यही ऐसी प्रबल माँग है, जिसे न तो आगे झुठलाया जा सकेगा और न अमान्य किया जा सकेगा। अनीति के रहते विग्रह उभरने की आशंका बनी ही रहेगी और कल नहीं तो परसों मनोमालिन्य का कारण बन कर पारिवारिक संतुलन के मार्ग में अपना व्यवधान खड़ा करेगी। उस दुराग्रह के रहते हमारे घर-परिवार ही विघटन की, विग्रह की दिशा में मुड़ चलेंगे। इसलिए अच्छा यही है की समय रहते गलतियों को सुधार लिया जाय और ऐसा प्रचलन आरंभ किया जाय, जिसके आधार पर व्यक्ति, परिवार और समाज में प्रगति और प्रसन्नता का वातावरण अक्षुण्ण बना रहे।

इक्कीसवीं सदी नारी प्रधान शताब्दी के रूप में नई साज-सज्जा के साथ अवतरित होने जा रही है। योगी अरविंद ने इसे “मदर सेंचुरी” - मातृ शताब्दी के नाम से प्रतिपादित और घोषित किया है। विज्ञ मनीषा ने भी इसे सुनिश्चित संभावना के रूप में मान्यता दी है। आधी जनसंख्या को भी वे मानवाधिकार मिलने जा रहे हैं, जिसे अचिंत्य चिंतन ने लंबे समय से अनेकानेक बंधनों से जकड़ा और वंचित रखा है।

मनुष्य का वरिष्ठ पक्ष नारी भी अब शिक्षा, स्वावलंबन और सम्मान का लाभ उसी प्रकार उपलब्ध करेगी, जैसा कि सर्वसाधारण को बिना किसी जाति भेद, लिंग भेद के मिलना चाहिए। न्याय तुला अब डंडी की हरकतें सहन नहीं करेगी। धर्म काँटे पर औचित्य को ही स्थापित किया जायगा और वस्तुस्थिति को यथावत् प्रकट करने में किसी को भी छद्म अपनाने न दिया जायगा।

अपने देश में यह शुभारंभ ग्राम पंचायतों के जिले के उस भाग से आरंभ हुआ है जिसे धरती के नीचे दबी हुई जड़ कह सकते हैं। पंचायती राज्य में नारी को 30 प्रतिशत आरक्षण मिला है। विपक्षी पार्टियाँ पचास प्रतिशत की माँ करती हैं। युग निर्माण योजना की माँग है कि जब नर और नारी दोनों की जनसंख्या बराबर है, तो नारी को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व इस सुअवसर पर क्यों नहीं मिलना चाहिए ?

सरकारी प्रतिनिधित्व अभी चुनावों तक सीमित रहे तो भी बात आगे बढ़ेगी। वह पंचायतों में पंच चुने जाने तक सीमित नहीं रहेगी। क्षेत्रीय, प्राँतीय और केन्द्रीय स्तर के अधिकार क्षेत्र में भी उन्हें न्यायोचित स्थान मिल कर रहेंगे। भले ही इस जद्दो-जहद या उचित प्रतिष्ठापन में कुछ समय भले ही लग जाय। जन प्रतिनिधित्व की सार्थकता तब तक बनती ही नहीं, जब तक कि चुना हुआ प्रतिनिधि शिक्षा और विनयशीलता के क्षेत्र में आवश्यक दक्षता उपलब्ध न कर सका हो। अँगूठा छाप लोगों की विचारशीलता इस स्तर पर विकसित नहीं हो पाती कि वे समस्याओं का सही स्वरूप समझने और उनका सही समाधान कर सकने में समर्थ हो सकें। इसलिए जहाँ अधिकार मिलने की बात है, उसके साथ ही यह शर्त भी जुड़ी हुई है कि चुना हुआ प्रतिनिधि समझदारी की दृष्टि से पिछड़ा हुआ नहीं है। उनने शिक्षा और उसके साथ जुड़ी हुई है अन्यान्य जानकारियाँ पर्याप्त मात्रा में अर्जित की हों।

हर परिवार को इसमें प्रसन्नता अनुभव करनी पड़ेगी कि उसके परिवार की कोई महिला भले ही वह पुत्री, भगिनी, वधू या माता में से कुछ भी क्यों न हो, अपने क्षेत्र के लोगों के विश्वास और सहयोग की अधिकारिणी बनी और चुनाव जीता। इसमें यह भेदभाव नहीं चला कि वधुओं को घर की चहारदीवारी से बाहर नहीं निकलने दिया जायगा। उसे किसी के सामने मुँह खोलने का अधिकार न होगा। अपनी पुत्री या भगिनी ही तो किसी घर की वधू बन कर गई। अपने घर की वधुओं पर प्रतिबंध लगाने का तात्पर्य है कि प्रकाराँतर से वही प्रतिबंध पुत्रियों या बहिनों पर भी दूसरे परिवार के लोग लगा ही देंगे। तब महिला एक अनबूझ पहेली बन जायेगी। घोषित प्रतिनिधित्व की बात हवा में उड़ जायगी, क्योंकि प्रतिगामिता उसे राहत न देगी और नारी को सहस्राब्दियों बाद मिले अवसर को भी हाथ मलते गँवाना पड़ेगा।

अगले कदम सरकारी नौकरियों के क्षेत्र में उठेंगे। जिस आधार पर अनुसूचित जातियों-जनजातियों को आरक्षण देकर समान स्तर पर लाया जा रहा है, वैसा ही न्याय नारी को न मिले, यह हो नहीं सकता। समुन्नत देशों में महिला अधिकारियों या अफसरों का बाहुल्य है। मर्दों के कंधे पर तो अधिक श्रमसाध्य कार्य ही उनकी प्रजनन दायित्व से बचे रहने की सुविधा के कारण सौंपे जाते हैं। इस लिए स्वभावतः कम श्रम वाली अधिकाँश नौकरियाँ प्रायः महिलाओं को ही सँभालनी पड़ती हैं। वे अच्छा वेतन भी पाती है। सम्मान और अधिकार की दृष्टि से भी पीछे नहीं रहती। ऐसी स्थिति में पुत्रियों, बहिनों, माताओं या पुत्र-वधुओं को हस्तगत हो तो उन पुरुषों को अभागे ही कहा जायगा जो अपने परिवार के महिला सदस्यों की प्रगति देखकर जल-भुन कर ईर्ष्या से खाक होते रहे और उस सुयोग में वैसे ही अड़ेंगे अटकाते रहे जैसे कि पिछले दिनों इस अनीति को परंपरा का नाम देकर चलाया जाता रहा है।

सरकारी क्षेत्रों तक ही प्रगति का सारा क्षेत्र समाप्त नहीं हो जाता। आर्थिक, व्यावसायिक, शिल्प, उद्योग, कलाकारिता के भी अपने सुविस्तृत क्षेत्र है। अब तक मात्र पुरुषों को ही यह भारी भरकम वाले बोझिल दायित्व वहन करना पड़ता रहा है। यदि नारी भी उस वजन को हलका करने के लिए अपना कंधा लगाने की इच्छुक है तो संबद्ध पुरुषों को अपना वजन बढ़ने से उत्पन्न कठिनाई को हलका होते देखने का अवसर मिलेगा। अच्छा हो अब तक जो समुदाय मात्र खाना पकाने और बच्चों को जनने, पोसने जितने छोटे क्षेत्र में सीमाबद्ध रहा है, उसको उपार्जन के क्षेत्र में भी सहयोग देने पर उसका स्वयं का नहीं, समूचे परिवार को और समाज को उस प्रगति का भारी लाभ मिलेगा। इस लाभ से आधी जनसंख्या को वंचित ही रखे रहने का दृढ़ सोच या निर्धारण हर दृष्टि से अनुचित ही ठहराया जायगा और जो इस मार्ग में आड़े आ रहे होंगे, उनकी समझदारी को धिक्कारा जाता ही देखा जायेगा।

नारी की अपनी विलक्षणता और वरिष्ठता है। उसे स्रष्टा ने श्रद्धा, सद्भावना, सेवा, सहानुभूति और कला-कोमलता की बहुमूल्य सामग्री के साथ गढ़ा है। यह उसकी स्वाभाविक प्रकृति भी है और मनुष्यों में पाई जाने वाली भाव संवेदनाओं में सबसे उत्कृष्ट भी। पुरुष की श्रमशीलता और उलझनों में गर्वोक्ति करने की प्रकृति भी कहीं न कहीं, कभी न कभी काम आती रहती है, पर समूचे समाज की संरचना उत्कृष्ट आदर्शवादिता के उन्हीं तत्वों के आधार पर होनी चाहिए जिससे कि नारी की सत्ता समग्र रूप से परिपूर्ण है पुरुषों की गौरवगाथा-इतिहास के पृष्ठ युद्धों में खपने वालों की ही श्रेणी में गिने जाते हैं। अधिकारों के नाम पर अनाचार के क्षेत्र में उनकी ही करतूतें प्रमुख रही हैं। अपराधियों और नशेबाजी जैसे दुर्व्यसनों में लिप्त भी उसी वर्ग को अग्रगामी देखा जा सकता है। समाज में अगणित दुष्प्रवृत्तियाँ उन्हीं दुर्गुणों के कारण पनपी और बढ़ी हैं, जिन्हें पुरुषों की बघौली कहकर बलिष्ठता का श्रेय दिया जाता है।

अगले दिनों समाज की अभिनव संरचना होने जा रही है। उसमें अनाचारों, आक्रमणों, अपराधों और आतंकों का वर्चस्व घटता ही चला जायगा। जिस नवयुग की-सतयुग की वापसी के रूप में चर्चा हो रही है, उस पर वही चिंतन, प्रचलन और वातावरण छाया रहेगा जिनका कि प्रतिनिधित्व नारी करती है। इसलिए नवयुग के समाज संरचना में काम आने वाले महत्वपूर्ण तथ्य नारी के द्वारा ही आगे बढ़कर रोपे और सींचे जायेंगे। समूची मनुष्य जाति का अस्तित्व और वर्चस्व मातृशक्ति की अनुकंपा से ही विकसित हुआ और अक्षुण्ण रहा है। इसी तथ्य को अगले दिनों नारी और भी अधिक कुशलता के साथ व्यापक रूप में कर सकने के लिए अवसर प्राप्त करेगी, तो कोई कारण नहीं कि अपने इसी खिन्न उद्विग्न और विपन्न समुदाय को पुरातन काल की सतयुगी व्यवस्था के अंतर्गत जा पहुँचने का सुयोग उपलब्ध न हो।

कला को विकृत करने में पुरुष वर्ग की ही प्रायः भूमिका रही है। उसी के द्वारा विनिर्मित साहित्य में, संगीत में, अभिनय में, विकृतियों से भरा हुआ काल्पनिक स्वरूप गढ़ा गया है। रमणी, कामिनी, भोग्या, वेश्या के रूप में उसका अश्लील चित्रण करने वालों में उन तथाकथित कलाकारों की, व्यवसाइयों की प्रधान भूमिका रही है जो अपनी प्रतिभा का इस संरचना में गर्वपूर्वक उल्लेख करते हैं। नारी अश्लील हो ही नहीं सकती। वह प्रकृतितः भगिनी है, पत्नी है, माता है और मनुष्य का शालीन संवेदनाओं से भरा पूरा उज्ज्वल पक्ष है। वह किस प्रकार अपने पिता, भाई और पुरुष के रूप में जाने जाने वाले अपने उत्पादन के समक्ष अश्लीलता प्रदर्शन की धृष्टता कर सकती है। ति की भी वह अर्धांगिनी है, सहचरी, गृह लक्ष्मी और करुणा, ममता की गंगोत्री है। यौनाचार का भी इस सहयोग में राई-रत्ती जितना स्थान हो सकता है। पर उसमें भी शालीनता का ही समर्थक पक्ष प्रधान है। अश्लीलता के लिए तो दाँपत्य जीवन में भी स्थान नहीं है। फिर सर्वसाधारण के सम्मुख निर्लज्ज बनने में वह अपनी मूल प्रकृति को ध्यान में रखने पर सहमत हो ही नहीं सकती। जिस कामुकता ने हमारी पारिवारिकता, शालीनता और नारी गरिमा का निकृष्ट रूप में चित्रण किया है, उसका बोलबाला तभी तक है, जब तक पुरुष के हाथ में कला को किसी भी दिशा में मोड़ देने का स्वेच्छाचार हथियाया हुआ है। नारी प्रधान समाज की संरचना आने पर उसे केवल श्रद्धा की अधिष्ठात्री के रूप में ही सार्वजनिक मान्यता मिलेगी। अबला और कामिनी जैसे हीनता बोधक लाँछनों से उसे कोई भी लाँछित न कर सकेगा। ऐसा परिवर्तन काल अब सन्निकट ही समझना चाहिए।

प्रदूषण, युद्ध, नशा, दुर्व्यसन, अपराध, अभाव, दरिद्रता, शोषण, विग्रह जैसी अनेकानेक समस्याओं से घिरा हुआ समाज तब पूरी तरह राहत की सांस लेगा, जब नारी का नेतृत्व उसे प्राप्त होगा। उद्दंडता किसी भी क्षेत्र में प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभावों से वंचित बन चलेगी।

इन दिनों करने योग्य काम एक ही है कि नारी को अधिकाधिक शिक्षित, समर्थ, स्वावलंबी, साहसी और समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए सर्वत्र भाव भरे प्रयास चल पड़ें। समर्थ महिलाएँ अपने पिछले समुदाय को अधिक शिक्षित, सुयोग्य बनाने के लिए अपनी क्षमता का अधिकाधिक समय समर्पित करें। हर पति को चाहिए कि अपनी सहचरी को बच्चों को गोद में न लादकर उसे अपने समान ही नहीं, अपने से भी अधिक सुयोग्य कहलाने योग्य बनाने में अपने सच्चे प्रेम का परिचय दे। ऐसा होने पर ही आधी जनशक्ति को अभ्युदय के पथ पर बढ़ा पाना संभव हैं।


मानसिक एवं आत्मिक बल (Kahani)

रे एवरी इटली का विख्यात खिलाड़ी बचपन में न केवल दुबला पतला था, बल्कि अपंग था। वह ठीक से चल भी नहीं सकता था। डाक्टरों ने पैरों के व्यायाम और मालिश की सलाह दी, साथ यह भी कह दिया कि यदि कोई चमत्कार हो जाय तो वह चलने फिरने के लायक हो सकेगा। शुरू में उसका चलना-फिरना, घूमना व्हील चेयर पर ही होता था।

लेकिन उसके आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति ने उसे न केवल अपने पैरों पर खड़ा कर दिया बल्कि वह कूदने लगा। ऊँची कूद में इतना माहिर हो गया कि लोगों ने यहाँ तक कहना शुरू कर दिया कि उसके पैरों में मानों स्प्रिंग लगे हों।

इसी अपंग युवक ने पेरिस और सेंटलुइस में ऊँची कूद, लंबी कूद और तिहरी कूद में स्वर्ण पदक जीते। उसने यह सिद्ध कर दिखाया कि शारीरिक कमियों को भी मानसिक एवं आत्मिक बल से दूर किया जा सकता है।


प्राणशक्ति संवर्धन हेतु ब्रह्मचर्य अनिवार्य

विवेकानन्द ने एक बार कहा था कि जिन्हें जीवन में कुछ कहने लायक सफलता अर्जित करनी हो, उन्हें ब्रह्मचर्य के महत्व को समझ लेना चाहिए। भौतिक जीवन में जहाँ इससे संकल्प और प्रतिभा का जागरण होता है, वहीं आध्यात्मिक जीवन को विभूतिवान बनाने में इसकी महती भूमिका है।

यों ब्रह्मचर्य का प्रचलित अर्थ तो इंद्रिय संयम है, पर इसका शब्दार्थ इससे बिल्कुल भिन्न है। जो चर्या ब्रह्म के गिर्द चलती हो, वह ब्रह्मचर्य कहलाती है। ईश्वर प्राप्ति के लिए काम सेवन पर नियंत्रण प्राप्त करना प्राचीन काल में एक आवश्यक अनुबंध के रूप में स्वीकार किया गया था और इस मार्ग को ‘ ब्रह्मचर्य’ कहा गया था। चूँकि इसमें अहिर्निशि ब्रह्मचर्चा और चिंतन ही प्रमुख थे, अस्तु क्रिया बोध नाम रखा गया। उपासना के क्षणों में ईश्वर का गुणानुवाद तो अभीष्ट था ही, इसके अतिरिक्त दिनचर्या के अन्य कामों में भी दिव्य सत्ता का सतत् स्मरण और समीपता का अनुभव किया जाता । इस प्रकार हर कार्य में ब्रह्मसत्ता के बराबर मनन के कारण ही यह मार्ग ब्रह्मचर्य कहलाया।

आज इसकी लकीर भर पीटी जा रही है। तथाकथित भगवद्परायण लोग संयम के नाम पर स्खलन को तो किसी प्रकार रोक लेते हैं, पर मानसिक निग्रह के न बन पड़ने से जो ऊर्जा ऊपर चढ़कर व्यक्ति को उर्ध्वरेता बना सकती थी, वह दूसरे मार्ग से क्षरित होकर उन्हें खोखला बनाती रहती है। इस तरह सत्चिंतन के अभाव में शारीरिक नियमन आधे-अधूरे स्तर का बना रहता है। शायद इसी कारण से प्राचीन आचार्यों ने इस बात की आवश्यकता अनुभव की थी कि मन को सदा उदात्त भूमिका में बनाये रखा जाय। इससे इंद्रिय संयम स्वतः निभता चलेगा। निश्चित ही तब वे इस मनोविज्ञान से पूर्ण-रूपेण परिचित रहे होंगे कि म नहीं कामुकता की जड़ है। उसे यदि किसी श्रेष्ठ चिंतन में लगा दिया गया, तो फिर ‘काम ‘ का ‘उल्लास’ में उदात्तीकरण संभव है। वर्तमान में सर्वत्र इसके विपरीत आचरण हो रहा है, अतः ‘काम’ को परिष्कृत कर पाने में न तो सफलता मिल पाती है, न कोई वास्तविक ब्रह्मचारी बन पाता है।देखा गया हे कि क्षरण को रोक लेना ही संप्रति ब्रह्मचर्य की कसौटी बनी हुई है, भले ही चिंतन कितना ही अश्लील और कामोत्तेजक क्यों न हो । प्राचीन समय में ऐसी बात नहीं थी। तब विचारणा को प्रमुख और बिंदु क्षरण को गौण माना जाता था। विचारणा यदि ठीक-ठीक सध गई, तो फिर काम-क्रीड़ा पर नियंत्रण कोई बहुत कठिन नहीं कहा जा सकता। और यदि इन दोनों पर विजय प्राप्त कर ली गई, तो लक्ष्य तक पहुँचना सरल हो जाता है। यहाँ जानने योग्य तथ्य यह है कि काम-कौतुक से जितनी ऊर्जा बरबाद होती है, उससे कई गुनी अधिक शक्ति मानसिक काम-सेवन से नष्ट होती रहती है। इसलिए आत्मोत्थान के लिए ऊर्जा क्षरण के उक्त दोनों मार्गों को बंद करना पड़ता है, तभी यथार्थ उन्नति करतलगत कर पाना संभव है, अन्यथा दूसरों पर बड़प्पन जताने हेतु येन-केन प्रकारेण भले ही काम-वृत्ति पर रोक लगा दी गई हो, पर इससे कोई बड़े लाभ की आशा नहीं की जा सकती। आत्मोत्कर्ष जैसा महत्वपूर्ण प्रयोजन तो इतने भर से सध ही नहीं सकता। यह तो वैसा ही करना हुआ, जैसे किसी पात्र में रखे पानी के एक मार्ग को बंद कर दूसरे को खोल देना। इससे अंतर इतना ही पड़ सकता है कि जो संग्रह कुछ ही दिनों में समाप्त होने वाला था, अब वह धीरे-धीरे कर खत्म होगा और थोड़े अधिक समय तक चलेगा। यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं है कि शक्ति क्षरण के कितने रास्ते बंद है ? महत्ता इस बात की है कि पथ पूर्णतया बंद है या नहीं ? यदि नहीं, तो फिर यही समझना चाहिए कि धीमी आत्महत्या जैसी प्रक्रिया चल पड़ी, जिसमें व्यक्ति की मृत्यु तो नहीं होती, पर शनैः-शनैः प्राण शक्ति के क्षीण होते जाने से अंत में खोखली काया भर शेष रह जाती है। इस अवस्था में कलेवर पुतलोँ की तरह चलता-फिरता दिखाई तो पड़ता है, पर कुछ कर-धर पाने में असहाय स्तर का बना रहता है। यह मरण से भी बुरी दशा है। ऐसी स्थिति में आत्मोन्नति तो क्या, भौतिक प्रगति भी भारी पड़ने लगती है और जैसे-तैसे कर जर्जर शरीर को खींचा-धकेला जाता है। इस दोहरी हानि से बचने के लिए ही असंयम से विरत रहने का उपदेश किया गया है, जबकि संयम पालने वाले न सिर्फ शरीर की दृष्टि से बलिष्ठ ओज और तेजवान होते हैं, अपितु चेतना की दृष्टि से भी प्राणवान होते हैं। प्राणबल के लगातार इकट्ठा होते चलने से व्यक्ति अपने चरम लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता और अंततः उसे प्राप्त कर लेता है। यह समग्र प्रक्रिया ही ब्रह्मचर्य के अंतर्गत थी, पर इसे विडंबना ही कहना चाहिए। जिसमें आधे को पूर्ण मान लिया गया हो ? “सेलिबेसी-व्हाट डज इट रियली मीन ?” नामक ग्रंथ में जान ट्रेबर लिखते हैं कि वीर्य वस्तुतः एक प्रकार का रसायन है, जिसकी क्षति-पूर्ति शरीर द्वारा बराबर होती रहती है। महत्वपूर्ण इस रसायन को रोक रखना नहीं, वरन् उस अपव्यय की सुरक्षा है, जो सद्पात के साथ प्राण के एक बड़े हिस्से के रूप में बरबाद होती रहती है। यदि प्राण निर्गमन को रोक कर वीर्य को गिरा पाना किसी प्रकार संभव हो, तो फिर रतिक्रिया में किसी प्रकार की कोई हानि जैसी बात नहीं, पर ऐसा कर पाना शक्य नहीं इसीलिए उस क्षति को टालने के लिए वीर्यपात को ही रोकना पड़ता है।

‘काम’ का अपना एक आनन्द है। शरीर उसे भोगना चाहता है, पर जब व्यक्ति हट पूर्वक उसको रोकता और उस मुख से देह को वंचित करता है, तो अंदर से एक तीव्र प्रतिरोध उभरता है। यही खतरनाक है। दुःख और पागलपन यहीं पैदा होते हैं । ऐसी दशा में यदि कोई दूसरा बड़ा सुख मिल जाय, तो विक्षिप्तता टल जाती और एक अनिर्वचनीय आनंद मिलने लगता है। पागलपन तो उस स्थिति में आता है, जब मनुष्य उपलब्ध सुख को त्याग दे, किंतु सामने कोई दूसरा सुख नहीं हो। यदि कोई दूसरा बड़ा सुख मिल जाय, तो निश्चय ही वह पहले वाला छोटा और गौण हो जायेगा,? एवं उसकी महत्ता नगण्य जितनी रह जायेगी, ठीक वैसे ही, जैसे छोटी रेखा के आगे कोई बड़ी लकीर खिंच जाय, तो पहले वाली अप्रधान और दूसरी प्रमुख हो जाती है।

इसकी उपलब्धि के लिए ऋषियों ने एक सारगर्भित सूत्र दिया है। यदि उसे जीवन में उतारा गया, तो निस्संदेह उस बड़े आनंद की प्राप्ति की जा सकेगी, जिसके आगे काम-सुख तुच्छ हो जाता है। यह सूत्र है-अंतर्यात्रा का ? बहिर्यात्रा व्यक्ति को ‘काम’ में उलझाती है, जबकि अंतर्यात्रा उसे ‘राम’ तत्व का रसास्वादन कराती है। इस अंतर्यात्रा का सही ढंग से अभ्यास किया गया, तो भोग से भी अधिक रस इस अंतर्योग में आने लगेगा। यदि इसके पीछे की वैज्ञानिकता को समझ लिया जाय, तो बात और भी स्पष्ट हो जायेगी। यथार्थ में हम जिसे सुख मानते और बाहरी वस्तुओं में तलाश करते हैं, वह वास्तव में अंदर की मन की चीज है। बाहरी जगत से उसका रंचमात्र भी संबंध नहीं। यदि ऐसी बात नहीं रही होती, तो किसी सामग्री के उपभोग के पश्चात् वह फीकी लगती प्रतीत नहीं होती और रस की खोज में मन फिर किसी अन्य की माँग नहीं करता, पर दैनिक जीवन में अनुभव इसके विपरीत होते जान पड़ते हैं। इससे स्पष्ट है- मन ही सरसता और नीरसता के लिए जिम्मेदार है। इस मन के सुख की जो व्याख्या आप्तवचनों में की गई है, उसके अनुसार जब मन का योग एक विशेष प्रकार की विद्युत धारा से होता है, तो सुख की अनुभूति होती है और जब दूसरे प्रकार के प्रवाह से होता है, तब दुःख का कारण बनता है। अर्थात् दोनों स्थितियों के लिए आँतरिक तरंगें ही उत्तरदायी हैं। ब्रह्मचर्य के दौरान इन्हीं में से एक तरंग को जगाना पड़ा है, पर यह जगे कैसे ? इसकी भी प्रक्रिया बतायी गई है।

विज्ञान के अनुसार यह तरंगें सिर के पीछे स्थित दो छोटी परस्पर सटी ग्रंथियों के कारण पैदा होती है। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि इनमें से यदि सुखोत्पादक ग्रंथि जाग जाय, तो फिर चाहे कितना भी दारुण कष्ट उपस्थित हो जाय, भयंकर घटना घट जाय, व्यक्ति का कभी भी दुःख नहीं होगा। इसी तरह क्लेश पैदा करने वाली ग्लैण्ड के जाग्रत होने से आदमी कदापि सुखी नहीं रह पायेगा, भले ही उसे कुबेर जितनी संपत्ति मिल जाय, साधनों का अंबार लग जाय, अनुकूलता की अट्टालिका खड़ी हो जाय, पर इन सबके बावजूद वह पीड़ित बना रहेगा, कारण कि उक्त ग्रंथियों से संबंधित अंतस् की जो संवेदना थी, वह जाग गई। यह जागरण व्यक्ति अथवा वस्तु के कारण भी हो सकता है, परंतु यहाँ से मात्र संवेदना को जगाने का निमित्त बनते हैं, सुख दुःख का नहीं। सुख-दुःख का निमित्त तो वह भीतरी स्पन्दन ही है, जिसके कारण ग्रंथियाँ सक्रिय बनती और तत्सम भाव की प्रतीति कराती हैं। इसे संवेदना का विज्ञान कहा गया है। ब्रह्मचर्य के दौरान इसी का संयम करना पड़ता है। इसके मर्म को जिसने समझ लिया, वही ठीक-ठीक उसका पालन कर सकता है, अन्यथा इसके रहस्य को जाने बिना वह बाहरी पदार्थों में ही भटकता रहेगा, संसार से पलायन करेगा, इस उम्मीद में कि शायद कंदरा में ब्रह्मचर्य सध जाय, पर वहाँ भी उसे दुःख के अतिरिक्त कुछ भी हस्तगत नहीं होगा, और जीवन यों ही बरबाद होता चला जायेगा।

यहाँ तनिक उस शरीर शास्त्र को समझ लेना जरूरी है, जो काम वासना का निमित्त है। ज्ञातव्य है कि शरीर की अधिकाँश क्रियाएँ रस-स्रावों पर निर्भर है। यह स्राव यदि ज्यादा हुआ, तो तत्संबंधी क्रिया भी असामान्य स्तर की हो जाती है और कम होने पर भी वह असामान्य बनी रहती है। इन दोनों के स्तर में अंतर होता है। अधिकतम बनने से क्रियाविधि काफी तीव्र हो जाती है, जबकि कम होने पर मंद पड़ जाती है। सामान्य भूमिका में वह तभी रह पाती है, जब हारमोन संतुलित मात्रा में निकलें। यही सहज स्थिति है। वासना की दशा में यौन हार्मोन्स के स्राव पर पहले पिट्यूटरी का कठोर नियंत्रण होता है। यही कारण है कि बालकों को आरंभ के कुछ वर्षों तक काम-लिप्सा का ज्ञान तक नहीं होता, उसके सताने की बात तो दूर है, किंतु जब वह 14-15 साल की अवस्था के हो जाते हैं, तो निसर्ग के नियमानुसार यौन हारमोन्स पर पिट्यूटरी ग्रंथि का नियमन ढीला पड़ने लगता है। उसके ढीला पड़ते ही ‘काम’ संबंधी रसस्राव गोनैड (काम केन्द्र) को प्रभावित करने लगता है। यही वह आरंभिक अवस्था है, जिसमें ‘काम’ संबंधी जानकारी का प्रथम उदय बालकों में होता है। बाद में जिसमें जिस अनुपात में कामरस पैदा होता है, उसमें उसी अंश में उसके प्रति ललक देखी जाती है। कई व्यक्तियों में कई बार यौन के प्रति भयंकर अतृप्ति पायी जाती है, जबकि कुछ सामान्य ढंग की अभिरुचि प्रदर्शित करते हैं, तो कइयों की इसके प्रति एकदम अरुचि होती है। इन भिन्न-भिन्न मात्रा की ही भूमिका होती है।

इन यौन प्रवृत्ति को नियंत्रित कैसे किया जाय ? इसके दो तरीके हैं-एक दमन का तरीका है, दूसरा उदात्तीकरण का है। जैसा कि पहली कहा जा चुका है, दमन से विक्षिप्तता आ सकती है, व्यक्ति असामान्य बन सकता है, किन्तु उदात्तीकरण से आनन्द की उपलब्धि होती है। यह एक व्यापक आध्यात्मिक प्रयोग है, जिसमें काम वृत्ति को इतना परिष्कृत और विशाल बना दिया जाता है कि सताने जैसी कोई शेष रह नहीं जाती।

काम नियंत्रण के द्वारा जब प्राण शक्ति को संवर्धित किया जाता है, तो वही प्रतिभा, प्रखरता, साहस, मनोबल, पुरुषार्थ, पराक्रम, विवेक सहिष्णुता जैसी कितनी ही धाराओं के रूप में प्रकट और प्रस्फुटित होती है। धृति, स्मृति, आत्मविश्वास, शारीरिक स्वास्थ, कायिक बलिष्ठता, ओज तेज-यह सब ब्रह्मचर्य के ही सत्परिणाम है। जो इसे जितने अंशों में धारण करेगा, उसी परिमाण में हाथों-हाथ यह विभूतियाँ मिलती चली जायेंगी।


अंतःकरण ही वास्तविक भाग्य विधाता

आधुनिक तकनीकी युग में व्यक्ति के मानसिक-बौद्धिक स्तर का विकास तो हुआ है, पर अंतः करण के गई-गुजरी स्थिति में पड़े रहने के कारण वह अनेकानेक प्रकार की समस्याओं में उलझा असहाय-अपंगों की तरह बेचैन दिखाई पड़ता है। जबकि मानवी अंतराल में शक्तियों का विपुल भाँडागार भर पड़ा है, पर मानसिक दुर्बलताओं के फलस्वरूप वह आत्मानुभव तथा अतिमानवी क्षमताओं का विकास नहीं कर पाता परिणाम स्वरूप तृप्ति, तुष्टि और शाँति से वंचित रहता है। आत्मोत्कर्ष को उपलब्धि एवं आत्मिक क्षुधा की निवृत्ति के लिए ही ऋषि मनीषियों ने विविध विधि योग साधनाओं और तपश्चर्या का आविष्कार किया और परामर्श दिया है कि अंतःकरण की भाव संवेदना को-उत्कृष्टता को जगाया-बढ़ाया जाय, कारण कि व्यक्तित्व के समग्र विकास की जड़ें अंतःकरण की गहराई में ही विद्यमान हैं। नर से नारायण बनने का उद्गम स्थल यही है। ऋद्धि-सिद्धियों के भंडार इसी की तिजोरी में बंद हैं। इसे ही विकसित करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

यों तो व्यक्तित्व के विकास में कई तथ्यों का समावेश रहता है। इनमें एक शरीर में जीवनी शक्ति का प्रकटीकरण भी है जिसमें वह हृष्ट-पुष्ट सुडौल-निरोग एवं सुन्दर आकर्षक बना रहे। आशा और उमंग मन में भरी रहे। उत्साह और साहस का स्वभाव में समावेश हो, हँसने-मुस्कुराने की आदत हो तो व्यक्ति की आकृति-प्रकृति में उच्चस्तरीय आकर्षण का विकास होता है, भले ही उसकी बनावट में कुरूपता का ही बाहुल्य क्यों न हो। चेहरा मनः स्थिति का प्रतिबिंब है। निश्छल भोले-भाले, सज्जन और चरित्रवान व्यक्ति अपनी विशेषता अनायास ही प्रकट करते रहते हैं। प्रकृति ने कुछ ऐसी व्यवस्था की भी है जिससे व्यक्ति की भाव भंगिमा, शिष्टता एवं कार्य-पद्धति को देखते ही यह पता लग सके कि वह कितने पानी में है। अपने को प्रतिभावान बनाने के लिए शरीर और मन को इस प्रकार ढाला जाना चाहिए कि वह सौंदर्य, सज्जा, शिक्षा, कौशल आदि के अभाव में भी अपनी विशिष्टता का परिचय दे सके। इसमें आदर्शवादी अवलंबनों को ग्रहण करना ही अधिक प्रतिभा को विकसित करने की भूमिका निभाता है।

शालीनता व्यक्तित्व को वजनदार बनाने की दूसरी शर्त है। इसी सत्प्रवृत्ति को सज्जनता शिष्टता, सभ्यता, सुसंस्कारिता आदि नामों से पुकारते हैं। यह गुण, कर्म, स्वभाव में इतनी गहराई तक घुली रहती है कि किसी के पास कुछ समय बैठने उसे सुनने-समझने का अवसर मिलने, निकट से रहन-सहन और स्वभाव-व्यवहार पर थोड़ी सी दृष्टि डालने भर से पता चल जाता है कि बचकानापन किस मात्रा में घट गया और वजनदार व्यक्तियों में पायी जाने वाली विशेषताओं का कितना उद्भव-समावेश हो गया।

व्यक्तित्व विकास की सबसे महत्वपूर्ण परत अपना अंतःकरण है। इसकी महत्ता को पाश्चात्य मनीषियों ने भी स्वीकार किया है। प्रख्यात मनोवेत्ता जुँग ने अंतःकरण की ऊर्जा ‘लिविडों’ की महत्ता समझने-समझाने का भरपूर प्रयत्न-प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं “कि न जाने क्यों यह तथ्य बुद्धिमानों के गले नहीं उतरता कि वे मस्तिष्कीय चमत्कारों की तुलना में कहीं अधिक विभूतियाँ अंतःकरण को विकसित एवं क्रियान्वित करते हुए प्राप्त कर सकते हैं। अंतःकरण को यदि उच्चस्तरीय बनाया जा सके तो फिर कहीं किसी चीज की कमी नहीं रहेगी और तब अपने पराये का भेद भी समाप्त हो जायगा।”

अंतःकरण के व्यापक विकास में किन-किन साधनों की आवश्यकता पड़ेगी क्या साधन जुटाने पड़ेंगे, यह सोचते समय एक ....................................... का ध्यान रखना होगा कि ........................ क्षेत्र की सबसे बड़ी प्यास उस घनिष्ठता-आत्मीयता की होती है, जिसे व्यवहार में सद्भाव संफा मैत्री कहते हैं। पुरातन भाषा में इसी को अमृत कहते थे। पुरातन भाषा इसी को अमृत कहते थे। अंतरंग प्रेम को ईश्वर भक्ति और बहिरंग प्रेम को उदार सेवा साधक कहा जाता रहा है। बहिरंग प्रेम पारिवारिक और सामाजिक जीवन में उगाया-बढ़ाया जाता है तो ईश्वर भक्ति अर्थात् अंतःकरण के विकास के लिए अध्यात्म परक साधना उपचारों का सहारा लिया जाता है।

महर्षि अरविंद कहते हैं कि सामान्य मनुष्य का व्यक्तित्व अनेकों जाल-जंजालों से बना हुआ अच्छा खासा तमाशा होता है। उसमें कुसंस्कारों, निकृष्ट अभिलाषाओं और उफनते उद्वेगों की भरमार होती है। ऐसे लोगों के लिए न तो एकाग्र होते बन पड़ता है और न अंतर्मुखी होने की स्थिति आती है। ऐसे लोग वस्तुओं को माँग, परिस्थितियों की शिकायत और साथियों पर आक्षेप करते-करते ही दिन गुजारते हैं। उन्हें यह सूझता ही नहीं कि अंतराल में विकृति भर जाने से ही अनेकानेक विपन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। इस विषम स्थिति से छूटना कठिन नहीं है। मकड़ी की तरह स्वयं अपने हाथों बुने जाते को समेटने का साहस किया जा सके तो मुक्ति का आनंद ले सकना हर स्थिति के व्यक्ति को भी सरल हो सकता है।

मनःशास्त्री भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि व्यक्तित्व की उत्कृष्टता-निकृष्टता का केंद्रबिंदु मनुष्य के अंतराल का स्तर ही है। मनः संस्थान के इस सबसे गहरी-अंतिम परत को ‘सुपरचेतन’ कहा गया है। ‘सुपर’ इसलिए कि उसकी मूल प्रवृत्ति मात्र उत्कृष्टता से ही भरपूर है। उसे यदि अपने वास्तविक स्वरूप में रहने दिया जाय, अवाँछनीयताओं के घेरे में जकड़ा न जाय, तो वहाँ से अनायास ही ऊँचे उठने-आगे बढ़ने की ऐसी प्रेरणा मिलेगी जिन्हें आदर्शवादी उच्चस्तरीय ही देखा जा सके। प्रकाराँतर में ‘सुपर चेतन’ को ईश्वर के समतुल्य ही माना जा सकता है। वेदाँत दर्शन में ........................................................................................ ‘शिवोऽहम्’, ‘तत्वमसि’, आदि सूत्रों में जिस सत्ता को परमतत्व परमात्मा माना है वह परिष्कृत अंतःकरण ही है। उसी को विज्ञान की भाषा में ‘सुपर चेतन’ कहते हैं।

अंतःकरण की इसी गहन परत को विकसित करने के लिए भक्तियोग का आश्रय लिया जाता है। कर्म योग से शरीर , ज्ञान योग से मस्तिष्क और भक्ति योग से अंतःकरण की साधना की जाती है। अंतःकरण को ब्रह्म, मनः संस्थान को विष्णु और कायकलेवर को रुद्र की उपमा दी गयी है। यही तीनों व्यक्तिगत त्रिदेव हैं जिनके वरदान-अभिशाप पर उत्थान पतन की सारी संभावनायें अवलंबित हैं।

अध्यात्मवेत्ता अंतःकरण को कहीं अधिक महत्व देते हैं और उसे मनःसंस्थान से कहीं अधिक उच्चस्तरीय मानते हैं। कार्य कौशल से लोक व्यवहार बनता है। बुद्ध वैभव से उपयुक्त निर्णय होते हैं, किंतु अंतःकरण तो समूचे व्यक्तित्व का ही अधिष्ठाता है। उसकी परिष्कृत स्थिति ही सामान्य स्थिति में मनुष्य को महामानव, अतिमानव, ऋषि, देवता, देवदूत स्तर तक पहुँचाने हमें समर्थ होती है। अपने ही भीतर विद्यमान इस देवलोक का माहात्म्य ऋषि मनीषी सदा से ही बताते और उसकी अनुकंपा उपलब्ध करके जीवन लाभ देने वाले विभिन्न प्रतिपादनों द्वारा समझाते रहे हैं। सिद्धाँत और प्रयोग दोनों ही इन प्रयोजनों के लिए उनने गढ़े-परखे और प्रचलित किये हैं।

वैज्ञानिक प्रगति के इस युग में अब भौतिकवादी, समाजशास्त्री, तत्वज्ञानी, नीतिशास्त्री, मनोविज्ञानी सभी इस मिले-जुले निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि पतन-पराभव से छूटने और वरिष्ठता, उत्कृष्टता उपलब्ध करने के लिए ‘सुपर चेतन’ की अर्थात् अंतःकरण की उच्चस्तरीय परतें खोजी-कुरेदी जानी चाहिए। परामनोविज्ञान, मेटाफिजिक्स आदि माध्यमों से भी पिछले दिनों मनःसंस्थान की अचेतन परतों की महत्ता बखानी जाती रही है और उसे जगाने उभारने के लिए तरह-तरह के प्रयोगों की चर्चा होती रही है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, विचार संचालन प्राण−प्रत्यावर्तन, भविष्य ज्ञान जैसी कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमतायें इस संदर्भ में खोजी और परखी गयी हैं। इस दिशा में प्रयास चालू रखते हुए भी मूर्धन्य स्तर के मनीषी इस बात पर जोर दे रहे है। कि अचेतन से भी असंख्य गुनी उच्चस्तरीय संभावनाओं से भरे-पूरे ‘सुपरचेतन’ को नये सिरे से समझा-खोजा और उसके अभ्युदय का अभिनव प्रयास किया जाय। वे मानने लगे हैं कि अंतःक्षेत्र की उपलब्धियाँ व्यक्ति और समाज में उच्चस्तरीय परंपराओं का समावेश और नये युग का नया सूत्रपात कर सकने में समर्थ हो सकती है।

‘साइकोलॉजी ऑफ इंट्यूशन’ नामक अपनी कृति में प्रख्यात मनोवैज्ञानिक एमिली मारकाल्ट ने अंतःकरण की चर्चा करते हुए कहा है-”यह शरीर एवं व्यक्तित्व की चेतना का अतिसूक्ष्म एवं उच्चस्तरीय भाग है। ज्ञानेन्द्रियों और तर्क बुद्धि से जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं उनसे भी कही अधिक महत्वपूर्ण समाधान उच्च चेतन मन की सहायता से मिल सकता है। इस तंत्र को उजागर कर लेने का अर्थ है एक ऐसे देवता का साथ पा लेना जो उपयोगी सलाह ही नहीं देता, वरन् महत्वपूर्ण सहायता भी करता है। यही वह क्षेत्र है जहाँ से आदर्शवादी प्रेरणा में एवं उमंगे उभरती और मानवी को महामानव बनाने में सहायता करती हैं।

सुप्रसिद्ध मनीषी मार्टिन ट्रिनबी ने लिखा है विचार बुद्धि की उपयोगिता कितनी ही क्यों न हो, पर वह रहेगी अपर्याप्त ही। चेतना की पूर्णता का केन्द्र मस्तिष्क नहीं, अंतःकरण है। अब तक प्रकृति को खोजा, पाया और उसका दोहन किया गया, परन्तु अब परमात्मा की खोज और उसके पाने की बारी है। ऐसा संपर्क साधने के लिए एक मात्र स्थान मानवी अंतःकरण है। सहायता इसी केन्द्र में बसती है। हेनरी गाल्डर ने अपने ग्रंथ “एवोल्यूशन एण्ड मैन्स प्लेस इन नेचर” में इसी केन्द्र की विशालता को और अधिक गहरा बनाने पर जोर दिया है। उनका कहना है कि वस्तुओं का लाभ जिसे उठाना है, उसकी अंतः चेतना यदि निकृष्टता परायण रही तो संपदा का दुरुपयोग ही होगा। संपदा कितनी ही क्यों न बढ़े, पर यह ध्यान तो रहे कि उपभोक्ता की गरिमा ही साधनों का सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकती है।

जिस तरह परमाणु का ऊर्जा केन्द्र ‘यूक्लियस’ को माना जाता है, ठीक इसी प्रकार मनुष्य की स्थिति और संभावनाओं का केन्द्र बिंदु उसके अंतःकरण अंतराल को समझा जा सकता है। यहीं से मनः संस्थान को निर्देश मिलता है और वह एक अच्छे सेवक की तरह वैसा ही सोचना आरंभ कर देता है जिससे कि आकाँक्षा की पूर्ति संभव हो सके। मन की सोचने की दिशाधारा पूर्णतया अंतःकरण के संकेतों के ऊपर निर्भर है। वह तर्क तथ्य, प्रमाण, उदाहरण इसी स्तर के ढूंढ़ता और क्रमबद्धता करता है जिससे अपने अधिष्ठाता अंतःकरण की इच्छापूर्ण हो सके। इसके लिए वह चिंतन तंत्र को ही नियोजित नहीं करता है, वरन् शरीर-वाहन को भी इसी प्रयोजन के लिए नियोजित करता है। अंतः करण का आदेश मन मानता है और मन के इशारे पर चलने वाला शरीर स्वामी भक्त सेवक की भूमिका निभाने लगता है। इसमें उसे भला-बुरा सोचने या किसी प्रकार ननुनच करने की भी इच्छा नहीं होती। संक्षेप में अंतराल को ही मनः संस्थान और कायकलेवर का सूत्राधार कह सकते हैं। जो किया और सोचा जाता है उस समूचे क्रिया तंत्र का अधिष्ठाता अंतःकरण को ही कहा-माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।

मनोविज्ञान की भाषा में अंतःकरण को ही ‘सुपरचेतन’ कहा गया है। अध्यात्मशास्त्र में इसी अंतराल को जीवात्मा का निवास स्थान कहा गया है। मनुष्य की व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने और उस पर अनुग्रह बरसाने वाला-वरदान देने वाला जो ईश्वर है और जो हर व्यक्ति के साथ रहता है वह इसी अंतःकरण में बसता है। उसी की अनुकूलता-अनुकंपा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना, मंत्र, जप, अनुष्ठान से लेकर तप एवं योग साधनाओं का सृजन हुआ है। अंतःकरण ही मनुष्य का भाग्य विधाता है। इस क्षेत्र को उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं-आस्थाओं आकाँक्षाओं से अनुप्राणित करने पर ही व्यक्ति और समाज को वर्तमान से उबारा और उज्ज्वल भविष्य के निकट पहुँचाया जा सकता है।


भक्त की इच्छा भगवान ने कब पूरी नहीं की ?

‘पानी’! कल दस गज दूर था यानी उनके यहाँ से, किंतु दूरी तो शरीर की शक्ति, पहुँचने के साधन पर निर्भर है। दस कोस भी दस कदम जैसे होते हैं स्वस्थ, सबल व्यक्ति के लिए और आज के युग में वायुयान के लिए तो दस योजन भी दस कदम ही है। किंतु रुग्ण-असमर्थ के लिए दस कदम भी दस योजन बन जाते हैं-यह तो सबका प्रतिदिन का अनुभव हैं।

‘पानी’ ! तीव्र ज्वराक्राँत वह तपस्वी-क्या हुआ जो उससे दस गज दूर ही पर्वतीय जली स्त्रोत है। वह तो आज अपने आसन से उठने में भी असमर्थ है। ज्वर की तीक्ष्णता के कारण उसका कण्ठ सूख गया है। नेत्र जले जाते हैं। वह अत्यंत व्याकुल है।

‘पानी’! ओह, पानी देने भी आज रामसिंह नहीं आया। उसने पड़े-पड़े ही एक ओर देखा। उसका आसन के पास पड़ा तूँबा जल रहित है और अभी तो कहीं किसी के आने की आहट नहीं मिलती।

पास की पहाड़ी पर कुछ घर हैं पर्वतीय लोगों के। उन भोले ग्रामीणों की श्रद्धा है इस तपस्वी में। उनमें से एक व्यक्ति रामसिंह तो प्रायः दिन में दो-तीन बार यहाँ हो जाता है और स्थान स्वच्छ कर जाता है । जल भर कर रख जाता है। कोई और सेवा हुई तो उसे भी कर जाता है। इन महापुरुष की सेवा करने का उसे सौभाग्य मिलता है, यही क्या कम है। लेकिन रामसिंह के अपने भी तो काम है। उसके पशु हैं, बाल-बच्चे हैं, कुछ खेत हैं और फिर कल रात उसे भी ज्वर हो गया था। उसे आज अपने में देर हो रही है, इसमें कोई अद्भुत बात तो नहीं है।

‘पानी !’ तपस्वी का कंठ सूख रहा है। उसकी बेचैनी बढ़ रही है। उसे बहुत तीव्र ज्वर है और ज्वर की प्यास-रामसिंह नहीं आया ? दो क्षण पश्चात् ही उसने इधर-उधर नेत्र घुमाए।

‘पानी’! प्यास! रामसिंह! लगा तपस्वी मूर्छित हो जाएगा। उसका गौरवर्ण । मुख ज्वर के कारण लाल हो रहा है। उसके अरुणाभ नेत्र अंगार से जल रहे हैं।

“रामसिंह! तो तू रामसिंह का चिंतन और उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।” “पता नहीं क्या हुआ आप चाहें तो इसे ज्वर की विक्षिप्तता कह सकते हैं, आपको मैं रोकता नहीं।” “तू रामसिंह के भरोसे यहाँ आया था। धिक्कार है तुझे नीलकंठ।”

हाँ तपस्वी का नाम नीलकंठ है। यह दूसरी बात है कि उसे यहाँ कोई इस नाम से नहीं जानता। सच तो यह कि कोई उसका नाम या परिचय जानता ही नहीं। जानने पूछने का साहस नहीं हुआ किसी को। किंतु नाम की बात छोड़िए तपस्वी संभवतः ज्वर से उन्मत्त हो गया है। वह बारबार इस कठोर भूमि पर मस्तक पटक रहा है। अपने मुख पर तमाचे मारता जा रहा है-’तू अब रामसिंह की प्रतीक्षा करने लगा है। तुझे अब आशुतोष प्रभु का भरोसा नहीं रहा और तू चला है उपासना करने ? उपासक बना बैठा है तू इस अरण्य में। नेत्रों से अश्रुधारा चल रही है। मुख लाल लाल हो गया है, किंतु विक्षिप्त हो उठा है, वह तो।

आज जिसे नीलकंठ कहते हैं स्वर्गाश्रम से लगभग सात साढ़े सात मील दूर मणिरत्नकूट पर्वत के चरणों में चारों ओर पर्वतमालाओं से घिरा स्थल तो वही था, किंतु तब उसका कोई नामकरण नहीं हुआ था। बात जो शताब्दियों पूर्व की है यह।

तब की बात, जब ये नेपाली कोठी, धर्मशाला, दुकानें, कुछ भी नहीं थी। पाकर, अश्वत्थ के युग्मतरु भी नहीं थे। केवल दोनों जल धाराएँ थीं जो आज भी नीलकंठ के चरणों को दोनों ओर से धोती हुई एक में मिलकर आगे बढ़ जाती हैं। तब पाइप लगाकर धारा को नल का रूप देने की व्यवस्था नहीं थी। तब तो उसमें पत्तों की राशि पड़ी रहती और सड़ा करती।

आज भी नीलकंठ में यदा-कदा रीछ रात में आ जाते हैं। शेर और चीते वहाँ से सौ-दो सा गज तक पर्यटन कर जाते हैं। उस समय तो वन्य पशुओं का आवास था नीलकंठ। केवल दिन में पर्वत शिखरों पर स्थित पर्वतीय जन अपने पशुओं को लेकर वहाँ आते थे। ऐसे जंगल में एक दिन एक लंबे दुबले गौरवर्ण तरुण ने पता नहीं कहाँ से आकर आसन लगा दिया। वह वहीं आ जमा, जहाँ आज भगवान नीलकंठ विराजमान हैं। उस समय तो वहाँ ठिकाने की समतल भूमि भी नहीं थी।

बिखरे घुँघराले केश, प्रलंब बाहु, अरुणाभ! सुदीर्घ नेत्र पता नहीं क्या था उस तरुण में कि वन्य पशुओं ने प्रथम दिन से ही उसे अपना सुहृद मान लिया। भालुओं के बच्चे रात में कभी-कभी उसके तूँबे का जल लुढ़का दिया करते थे-इससे अधिक उसे किसी ने कभी तंग नहीं किया। उसके समीप शेर या चीते के जोड़े रात्रि में चाहे जब निःशंक आ बैठते थे।

तूँबा और कौपीन इनके अतिरिक्त उसके पास तो कंद खोदने के लिए भी कुछ नहीं था। किंतु जो इस प्रकार सर्वात्मा पर अपने को छोड़ देता है, परमात्मा उसकी उपेक्षा कर दे तो उसे परमात्मा कहेगा कौन ? पर्वतीय जन उसके आस-पास का स्थान आकर स्वच्छ कर जाने लगे और उनमें से कभी कभी और कभी किसी की गाय का दूध उसकी स्वीकृति पाकर सफल हो जाता है। दूध के अलावा उसने कभी कुछ लिया ही नहीं।

ऋतुएँ आयीं और गयीं। उसे करना क्या था भला, भजन, साधन को छोड़कर तपस्वी और क्या करेगा ? तप-साधन कुछ भी हो प्रारब्ध का भोग तो सभी को भोगना पड़ता है। एक वर्ष में जब जल मलिन हुआ, पत्ते सड़े, मच्छरों का अखण्ड-संकीर्तन अन्य वर्षों से बहुत बढ़ गया और पिस्सुओं की संख्या भी पर्याप्त हो गयी, एक दिन तपस्वी रुग्ण हो गया। उसे हड्डी-हड्डी कंपित कर देने वाला शीत लगा और ज्वर हो गया।

ज्वर आया और आता रहा। इधर कई दिनों से वह इतना अशक्त हो गया है कि अपने आसन से खिसक भी नहीं सकता। पास के पर्वत शिखर पर कुछ घर है। उनमें से एक घर रामसिंह का है। रामसिंह उसके लिए जल भर जाता है, स्थान स्वच्छ कर जाता है, कुछ आवश्यक सेवा-कार्य कर जाता है। किन्तु उसके भी बाल बच्चे हैं पशु हैं, खेत हैं और कल रात उसे भी ज्वर हो गया। उसे आने में देर होना कहाँ कैसे अनुचित या अस्वाभाविक कहा जा सकता है।

पैरों की आहट से तपस्वी की तन्मयता टूटी। उसने देखा रामसिंह अपनी मैली मोटी चद्दर पूरे शरीर पर लपेटे उसके पास खड़ा है। रामसिंह। अटकते हुए उसने कहा- “तुमको भी ज्वर हो गया दीखता है। तुम तत्काल घर लौट जाओ।” “जल रखकर अभी चला जाता हूँ। रामसिंह ने तपस्वी के चरणों पर मस्तक रखा और फिर तूँबा लेने बढ़ा। “उसे छुओ मत!” उसने रोक दिया मुझे जल नहीं चाहिए। दूसरे लोगों से कह देना, आज इधर कोई न आये।

“जो आज्ञा, प्रभु”! सरल रामसिंह ने फिर प्रणाम किया और वह लौट चला। उसने तो साधु संतों की आज्ञा मानना सीखा है। उसे बात का सीधा अर्थ ही समझ में आता है। महात्मा लोगों के चित्त का क्या ठिकाना वे पता नहीं कब कैसे रहना चाहते हैं। उनकी आ बिना प्रतिवाद के मान लेनी चाहिए वह तो अब इतना ही जानता है।

“मैं रामसिंह की प्रतीक्षा कर रहा था और वह आया”। रामसिंह के पीठ फेरते ही वह धीरे-धीरे बुदबुदाया। मेरे प्राण आशुतोष प्रभु की प्रतीक्षा करेंगे और वे दयामय नहीं पधारेंगे। परंतु इस अधम नीलकंठ के प्राणों ने उनकी प्रतीक्षा की कहा है।

‘पानी’ ! उसके होठों से अब यह शब्द नहीं निकल रहा था, क्योंकि उसने तो अब दाँत-पर दाँत दबा लिए थे। किन्तु उसके भीतर ज्वर का भीषण दाह पानी की माँग अत्यन्त प्रबल हो गई थी। उसके प्राणों में छटपटाहट चल रही थी।

“अब तो भगवान सदाशिव के कर कमलों से गंगाजल पीना है।” उसका संकल्प स्थिर हो गया। उसने दैहिक व्यथा की सर्वथा उपेक्षा कर दी”- वह यहाँ प्राप्त हो या कैलाश के दिव्य धाम में।”

जब कोई हठी इस प्रकार हठ कर बैठे, किसी के प्राण सचमुच उस चन्द्र मौलि के लिए ही आकुल हो उठें, कोई उसी विश्वनाथ पर भरोसा करके अड़ जाय-वह अपार करुणार्णव वृषध्वज उससे पल भर भी दूर कहाँ रहता है। द्रौपदी के कृष्ण व गजराज के त्राता की तरह वह तुरंत भागा चला आता है।

रामसिंह कठिनता से अपने घर के मार्ग से चौथाई दूर गया होगा- अरण्य वृषभ के घंटे से निकली दिव्य प्रणव ध्वनि से पूरित हो गया। बाल शशंक की मृदु किरणें मूर्छितप्राय तपस्वी के भाल पर पड़ी और साथ ही पड़ा एक अमृत स्यन्दीकर। विभूति भूषण कृत्तिवास प्रभु स्नेहपूर्वक देखते हुए कह रहे थे-’वत्स’ ?

ज्वर, ज्वर की ज्वाला और तृषा-अरे, उन सदाशिव के सामने तो कराल काल की ज्वाला भी शाँत हो जाती है। दूर भागती है। ताप की ज्वाला उन पर्वतीनाथ के श्रपदों से। तपस्वी के प्राण आप्लावित हो गए। उसने नेत्र खोले और वैसे ही मस्तक धर दिया उन सुरासुरवन्दित श्री चरणों पर।

“वत्स! गंगाजल लाया हूँ मैं ।” तपस्वी को स्तवन करने का समय नहीं मिला। भगवान शिव के

हाथों में उनका सुधा वारिपूरित खप्पर आगे बढ़ चुका था। तपस्वी ने मस्तक उठाया और प्रभु ने खप्पर उसके होठों से लगा दिया।

ठस घटना की वर्षों बीत गए। एक दिन भगवान आदि शंकराचार्य जब उत्तराखण्ड की ओर पधारे, ऋषिकेश आने पर पता नहीं कि प्रेरणा से वे गंगा पर होकर चलते गए पर्वतों में और वर्तमान नीलकंठ स्थान पर पहुँचे। उन्होंने दोनों पर्वतीय लघु जलधाराओं के संगम के समीप सिद्धवटी देखा और प्रसन्न हो गए। आचमन करने के पश्चात् सिद्धवटी के समीप आसीन हुए।

“यहाँ तो भगवान शिव का स्वयम्भूलिंग है।” सहसा भगवान शंकराचार्य ने नेत्र खोले और आसन से उठ खड़े हुए। उनकी ध्यान दृष्टि के समक्ष वर्षों पूर्व घटी इस घटना का हर चित्र स्पष्ट हो गया था। उनके निर्देश पर तरुमूल के समीप एकत्र मिट्टी साथ के सेवकों ने दूर की और उसके नीचे से श्यामवर्ण भगवान शिव का बाणलिंग प्रकट हो गया। आदि शंकराचार्य ने उस शिवलिंग का श्रद्धासिक्त अर्चन करते हुए शिष्यों को तपस्वी नीलकंठ की कथा कह सुनायी।

कथा सुनाने के पश्चात् वह बोले-भक्ति का मूल विश्वास है। इसी विश्वास के बल पर प्रभु यहां अपने आराधक के लिए व्यक्त हुए और लिंग रूप में उसी की श्रद्धा स्वीकार करके सदा के लिए स्थित हो गए। आज से यह शिवलिंग ‘नीलकंठ’ नाम से पूजित होगा और यह क्षेत्र नीलकंठ कहा जाएगा। भगवान शंकराचार्य ने साथ के जनों को उस समय सूचित किया था।


विवेक का आश्रय लें-भटकाव से उबरें

गायत्री की चौबीस शक्ति धारायें है। उनमें से एक धारा है - ऋतम्भरा की। इसी को प्रज्ञा कहते हैं प्रज्ञा अर्थात् बुद्धि की उत्कृष्टतम स्थिति। इसी को व्यवहारिक भाषा में विवेक कहते हैं, सत्यासत्य के बीच अंतर करने योग्य सद्बुद्धि। विवेकशीलता, दूरदर्शिता इसी की उपलब्धियाँ है। गायत्री महामंत्र में जिस ‘धी’ तत्व की प्रेरणा के लिए सविता देवता से प्रार्थना की गयी है, वह यह ऋतम्भरा प्रज्ञा-विवेक है। विवेक के जागरण के लिए ऋतम्भरा प्रज्ञा को विकसित करने के लिए ऋतम्भरा प्रा को विकसित करने के लिए ही सुविस्तृत ब्रह्म विज्ञान की रचना हुई है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं-”न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते”- सद्ज्ञान से अधिक पवित्र इस संसार में और कुछ नहीं है। इसकी प्राप्ति को संसार की सर्वोत्तम उपलब्धि माना गया है। गायत्री का ‘धयो’ शब्द ऋतम्भरा की आराधना की प्रेरणा देता है। विवेक के अनुशीलन को महत्व देता है।

मनुष्य के जीवन में अनेकों अवसर ऐसे आते हैं जब कुछ निर्णय लेते नहीं बनता। परस्पर विरोधी विचारधारा के आ जाने पर बुद्धि भ्रमित हो जाती है तथा यह निर्णय नहीं हो पाता कि किसी स्वीकारा और किसे अस्वीकारा जाय। बुद्धि की कसौटी पर कसने पर तो दोनों प्रकार के विचार उपयोगी लगते हैं। ऐसी विषम स्थिति में निर्णय का दायित्व बुद्धि के ऊपर नहीं छोड़ा जा सकता है। इस स्थिति के निवारण के लिए भारतीय अध्यात्मशास्त्र ‘विवेक’ के अवलंबन का निर्देश देते हैं।

विवेक मनुष्य का वह सद्गुण है जो उसे कर्तव्य-अकर्तव्य औचित्य-नौचित्य, श्रेष्ठ-निकृष्ट में पहचान कराता है। पाश्चात्य देशों में भी विवेक को दार्शनिकों, विचारकों, मनीषियों ने बहुत महत्व दिया है। प्रख्यात दार्शनिक सुकरात के एक प्रमुख शिष्य ऐन्टेस्थनीज ने तो “सिनिसज्म” नामक विवेकवादी दर्शन प्रदान किया। उनने बताया कि मनुष्य जीवन वासना, विलासिता एवं अहंता की पूर्ति के लिए नहीं, वरन् आत्मचिंतन, श्रेष्ठ व उत्कृष्ट विचारणा एवं सत्कर्मों के लिए मिला है। साँसारिक भोग सुखों को आध्यात्मिक चिंतन में अवरोध बताते हुए उसे त्यागने में ही परम कल्याण बताया है। उनका कहना है कि व्यक्ति अपनी इच्छा-आकाँक्षाओं-वासनाओं एवं लालसाओं को संयत रखे और उत्कृष्ट चिंतन और कर्तृत्व में अपना समय नियोजित करे यही महामानवों की भांति उच्च जीवनक्रम है। गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता तप एवं त्यागमय जीवन जीने से उपलब्ध होती है। विभिन्न धर्म-मतावलंबियों में झगड़ा उनकी क्षुद्र कामनाओं-महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति में विघ्न पड़ने से ही होता है। परंतु जिस व्यक्ति ने विवेक के द्वारा अपनी आकाँक्षाओं, वासनाओं पर नियंत्रण पा लिया हो उसका किसी से झगड़ा या संघर्ष नहीं होता। ऐसा विवेकशील मनुष्य सत्य-असत्य भले-बुरे कार्यों का निर्णय सुगमतापूर्वक करने में सक्षम होता है। विवेकपूर्ण सत्यमार्ग का अनुसरण करके ही महापुरुषों ने महानता को अर्जित किया है। इसी तरह ईसा से तीन सौ वर्ष पूर्व एथेन्स में रहने वाले साइप्रस द्वीप के दार्शनिक ‘जोनों’ ने लोगों को विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने का उपदेश दिया था। उनके विचारों को ‘स्टोइसिज्म’ या ‘स्टोइकवाद’ के नाम से जाना जाता है। इस दर्शन में प्रत्येक घटना के मूल में विवेक को कार्य करता हुआ माना गया हे और कहा गया है कि इस संसार में जो कुछ भी है शुभ ही शुभ है अशुभ है ही नहीं। अशुभ तो हमारी विचारणा और कर्तृत्व की देन है। उसके अनुसार कैसी भी परिस्थितियाँ क्यों न हों-शाँति एवं संतोष से सुख-दुख को सहन करते हुए रहना ही मानव जीवन का आदर्श होना चाहिए। हमें अपना दृष्टिकोण बदल देना चाहिए। दृश्यों अथवा घटनाओं को परिस्थितियों को बदलने में व्यक्ति स्वतंत्र नहीं है, परंतु अपनी मनःस्थिति एवं दृष्टिकोण को बदल लेने में वह पूर्णतया स्वतंत्र एवं सक्षम है। इतनी विशाल सृष्टि का संचालक किसी विवेकवान सत्ता द्वारा ही शक्य है, इसलिए भली-बुरी घटनाओं में समभाव रहकर उद्विग्नता से बचे रहकर प्रसन्नचित रहा जा सकता है। विवेकवान समस्त घटनाओं में शुभ मंगलमयता का ही दिग्दर्शन करते और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते। राम का प्रसिद्ध स्टोइकवादी पोसीडोनियस भयंकर रोग से ग्रसित होते हुए भी प्रसन्न रहता ओर कहा करता था-”ऐसे दुःख तो मुझे चाहे जितनी पीड़ा पहुँचा, चाहे जितना कम दे, परंतु मुझ से यह कभी स्वीकार नहीं कर सकता कि तू बुरा है।”

स्टोइसिज्म के अनुसार मनुष्य को अपने कार्यों का निर्धारण विवेक से करना चाहिए कर्त्तव्य के प्रति सजग रहना और फल के प्रति अनासक्त रहना ही विवेक संगत है। प्रिय-अप्रिय सबके प्रति समदृष्टि रखना ही नैतिक सिद्धाँत है। इंद्रियों के वंश में या संवेग या आवेश में होने से मनुष्य सद्विचार नहीं कर पाता। दया के स्थान पर सद्भाव रखना और प्रशाँत मन से आत्मीयता के भावों से परिपूर्ण सबका शुभ चिंतन करना ही सर्वथा विवेक सम्मत है। उनका सिद्धाँत था-’पाप से घृणा करो पर पापी से नहीं।’ मनुष्य अपने लिए सुखों की अवहेलना कर सकता है, पर दूसरों को दुःखी नहीं बनना ही उसके लिए वास्तविक धर्म या कर्तव्य परायणता है। संसार के सभी श्रेष्ठ पुरुषों ने कर्तव्यपरायण होकर ही उच्चता को प्राप्त किया। उपयुक्त एवं सार्वजनीन हितकारी बातों को अंगीकार करना ही विवेक सम्मत है।

इन दिनों संसार में जब मतभेदों की भरमार है। सामाजिक रीति−रिवाजों, परंपराओं, मान्यताओं में एक स्थान से दूसरे स्थान-समाज के बीच आसमान धरती जैसा अंतर है। विचारों में एकता-एकरूपता कहीं नहीं है। सर्वत्र वैभव, विलासिता, अहंता का प्रदर्शन ही दृष्टिगोचर होता है। इसी तरह अनेकों धर्म संप्रदाय है। एक धर्म में एक बात का समर्थन किया गया है तो दूसरे में उसका विरोध हुआ है। एक धर्मगुरु कुछ कहता है, दूसरा उसका विरोध करता है। किस शास्त्र को, किस धर्म को, किस महापुरुष को सही और किसे गलत ठहराया जाय, यह निर्णय नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में केवल विवेक ही यह बता सकता है कि आज की स्थिति में क्या ग्राह्य है और क्या अग्राह्य ? अनेकों संप्रदायों शास्त्रों, आप्तवचनों में एक को अपना पथप्रदर्शक चुनने में विवेक ही सहायक सिद्ध होता है। गायत्री का ‘धियो’ शब्द ऐसी विषम परिस्थितियों में विवेक की शरण में जाने की प्रेरणा देता है। उसकी शिक्षा है कि जो बात बुद्धि संगत हो, विवेक सम्मत हो, व्यवहार में आने योग्य हो, औचित्यपूर्ण हो उसी को ग्रहण करना चाहिए।

धर्म ही नहीं अनेकों प्रथा-परंपराएँ रीति-रिवाजें प्रचलित हैं अनेकों विचारधाराएँ हैं। जो किसी समय भले ही उपयुक्त रही हों, पर आज तो वे सर्वथा अनुपयोग एवं हानिकारक ही हैं। उन्हें वर्तमान काल की आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुरूप कसौटी पर कस कर अपनाना ही दूरदर्शिता है। भारतीय दर्शन शास्त्र इस संबंध में स्पष्ट निर्देश देता है कि व्यक्तियों एवं विचारों को आपस में संबद्ध मत करो। संभव है कोई उत्तम चरित्र का व्यक्ति भ्राँत हो और उसके विचार अनुपयुक्त हों। इसी प्रकार यह भी संभव है कि कोई चरित्रहीन व्यक्ति कभी कोई सारगर्भित बात कहता हो। चरित्रवान का सम्मान करना एक नैतिक कर्त्तव्य है, पर यह आवश्यक नहीं कि उनके उलझे विचारों को स्वीकार करने के लिए बाध्य हों। प्रधानता विवेक की है कि उपयोगी का चुनाव कहाँ से और किस प्रकार किया जाय। भगवान बुद्ध के उत्तम चरित्र एवं कठोर तपश्चर्या से प्रभावित तथा श्रद्धासिक्त होकर भारतीय जनसमूह ने उन्हें अवतार की उपाधि दी। इतने पर भी बौद्ध सिद्धांतों को स्वीकार नहीं किया। ईश्वर पर अनास्था, शून्यवाद, गृहत्याग में मोक्ष, यज्ञ निषेध आदि बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को भारतीय जनमानस न केवल अस्वीकार करता, वरन् विरोध भी करता है। दर्शनों में चार्वाक दर्शन भी सम्माननीय है। विद्वता एवं तर्क की दृष्टि से एक सीमा तक उसकी उपयोगिता है, पर नैतिक दृष्टि से चार्वाक के सिद्धाँत अनुपयोगी एवं हानिकारक ही सिद्धाँत अनुपयोगी एवं हानिकारक ही सिद्ध होते हैं । उन्हें व्यवहारिक जीवन में अपनाया नहीं जा सकता

विश्वभर में अनेक धर्म, संप्रदाय मत, सिद्धाँत, शास्त्र, नेता और विचारक हैं। उनकी अपने-अपने ढंग की मान्यताएँ हैं। इनमें से स्वयं के लिए वर्तमान में किसका किस अंश में किस प्रकार अनुसरण करना चाहिए, यह निर्णय करना हमारे विवेक के ऊपर है। अनुसरण करने का निर्णय जिस भी पक्ष में हो, उसके अतिरिक्त भी अन्य धर्मों, शासकों एवं महापुरुषों से घृणा अथवा आलोचना करने की आवश्यकता नहीं हैं उनके उपदेश वर्तमान में भले ही अनुपयोगी हो गये हों, पर कभी न कभी शुभ उद्देश्यों को लेकर ही कहे गये होंगे तथा उपयोगी सिद्ध हुए होंगे। उनका उद्देश्य पवित्र था, इसलिए वे सम्मान के अधिकारी हैं। विवेक की कसौटी पर कसकर, उपयुक्त-अनुपयुक्त, औचित्य-अनौचित्य की परख की जा सकती है। किसी देश-जाति या मनुष्य के कुछ बुरे कामों को देखकर सभी को पूर्णतया बुरा मान लेना उचित नहीं अमुक जाति समाज, अथवा राष्ट्र बुरा है, यह मान्यता अनुचित हैं। मात्र बुराइयों के आधार पर कोई समाज अथवा राष्ट्र बुरा है, यह मान्यता अनुचित है। मात्र बुराइयों के आधार पर कोई समाज अथवा राष्ट्र अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकता। न्यूनाधिक रूप में भले-बुरे व्यक्ति प्रत्येक समाज में होते हैं। समाज ही नहीं, गुण, अवगुण एक साथ एक व्यक्ति में विद्यमान रहते हैं। विवेक के आधार पर अच्छाइयों का चयन किया एवं अपनाया जा सकता है।

व्यक्तिगत जीवन में भी अनेकों अवसर ऐसे अवसर ऐसे आते हैं जब मनुष्य दिग्भ्राँत हो जाता है। लोभ, मोह, वासना के आकर्षणों में तुरंत का आकर्षण दीखता है। तात्कालिक लाभ के फेर में दूरवर्ती परिणामों की ओर ध्यान नहीं जाता। फलतः नीति-अनीति जिस भी प्रकार से बने, लाी उठाने के लिए हर संभव प्रयास करता है। यह रीति-नीति अविवेक की अदूरदर्शिता की परिचायक है। ऐसे अवसरों पर विवेक मनुष्य का मार्गदर्शन करता है। लोभ-मोह के आकर्षणों, तृष्णाओं-विकारों, भ्राँतियों से बचाता है और सही पथ प्रशस्त करता है।

ऋतम्भरा को-प्रज्ञा को ‘विवेक’ कहा गया है। गायत्री उपासक माँ के अंचल में बैठकर प्रज्ञा शक्ति का आह्वान करता है। मातृशक्ति में अपनी श्रद्धा एवं निष्ठा आरोपित करता है। ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ की अंतः पुकार जब उठती है तो आद्यशक्ति ऋतम्भरा रूप में प्रकट होती हैं पयपान कराने और अपने अनुदानों से सिक्त करने के लिए माता का करुण हृदय मचलने लगता है। उसका अनुग्रह साधक पर-प्रज्ञा के रूप में विवेक के रूप में बरसता है।

इस अध्यात्मिक संपदा को पाकर उपासक अपने जीवन को सार्थक बनाता है। भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी प्रकार की सफलताएँ विवेक की अनुगामिनी होती हैं। विवेकवान-दूरदर्शी सही अर्थों में अपना स्वार्थ साधता है और परमार्थ भी। सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवन सफल और सार्थक बनाता है।

“प्रज्ञा-विवेक” ही हमें दूसरों से अपने जैसा व्यवहार करने की प्रेरणा देता है। विवेकशीलता को अंतरात्मा की आवाज कहा जाता है । अंतर की आवाज सुन सकने में वही व्यक्ति समर्थ होता है जो काम क्रोध, लोभ, मोह, रागद्वेष आदि से ऊपर उठ जाता है। विवेकशीलता से ही नैतिक विकास होता है। विवेकी व्यक्ति सदैव अपना संतुलन बनाये रखता है, उद्वेगों से वह विचलित नहीं होता। प्रज्ञा की-विवेक की उपलब्धि के लिए हमें गायत्री महाशक्ति की धारा ऋतम्भरा की शरण में जाना होगा। ऋतम्भरा की आराधना-अभ्यर्थना द्वारा ही अंतः प्रज्ञा जाग्रत होगी। विवेक के जागरण से औचित्य-अनौचित्य उत्कृष्ट-निकृष्ट के बीच अंतर करने एवं उपयोगी का चयन कर सकने में मनुष्य समर्थ होता है। फलतः किसी प्रकार के भटकाव की संभावना नहीं रहती।


सफलता की कसौटी क्या हो ?

सामान्यतः सफलता को एक मूल्यवान उपलब्धि माना जाता है। प्रत्येक मनुष्य सफल होना चाहता है। किंतु इसकी सर्वमान्य परिभाषा अब तक नियत नहीं की जा सकी है। यही कारण है कि अलग-अलग व्यक्तियों के लिए इसका अलग-अलग अर्थ है। कोई व्यक्ति यश और सम्मान को सफलता का आधार मानता है तो कोई धन और पद को। किसी की दृष्टि में विद्या बुद्धि मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी है तो किसी के लिए मनुष्य का पद और प्रतिष्ठा। एक उपलब्धि को जहाँ भिन्न-भिन्न अर्थ दिए जा रहे हैं और प्रत्येक अर्थदाता अपनी मान्यताओं के अनुरूप उसे अर्जित करने के लिए आजीवन प्रयत्नशील हो तो वहाँ किसी सर्वमान्य परिभाषा का नियत कर पाना कठिन ही रहता है।

यथार्थ में सफलता धन-संपत्ति यश, प्रतिष्ठा के अनेक अर्थ रखती है। इनका समुच्चय रूप ही सफलता है। अंतर इतना सा है कि कोई किसी अंग को प्रधानता देता है और कोई किसी अंग को । विद्या-बुद्धि प्रयोग किए बिना कौन संपत्तिवान बना है ? संपत्तिशाली होने के साथ व्यक्ति की प्रतिष्ठा बढ़ जाना भी जुड़ा हुआ है। यही बात यश, प्रतिष्ठा और विद्या-विभूति के साथ जुड़ी है। प्रतिष्ठित व्यक्ति के पास साधारण लोगों की अपेक्षा अधिक संपत्ति और बुद्धि होती है तो विद्वान व्यक्ति यश और धन के लिए तरसेगा भी नहीं।

इन सब विशेषताओं के साथ एक बात अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है। ये महत्वाकाँक्षा ओर उसे पूरी करने के लिए आवश्यक क्रियाशीलता का परिणाम है। मनुष्य जन्म से असहाय और अकिंचन पैदा होता है और जन्म के साथ ही वह अपनी स्थिति, क्षमता और शक्ति में पूर्वापेक्षा कुछ वृद्धि करने के लिए सचेष्ट होने लगता है। बालबुद्धि से वयस्कोचित गम्भीरता में पदार्पण करने के बाद व्यक्ति अपनी आकाँक्षाओं को भली भाँति समझने लगता है और उसी के अनुरूप उन्हें पूरा करने की चेष्टा भी करता है।

मनुष्य की इच्छा आकाँक्षा कुछ अर्जित करने की होती हैं अपना विकास करने की अपनी योग्यताएं बढ़ाने की उपलब्धियाँ अर्जित करने की, तथा विभूतियाँ बढ़ाने की। इन्हीं आकाँक्षाओं से उसका जीवन प्रेरित संचालित रहता है। लेकिन प्रायः होता यह है कि हम जीवन की उस जीवन प्रेरणा को समझने में और उसे उनके यथार्थ रूप में ग्रहण करने में चूक जाते हैं। हम उन्हीं दिशाओं में अग्रसर होने लगते हैं जिनमें कि अन्य लोगों की प्रवृत्ति देखते हैं। दूसरे लोग किन स्थितियों में वे गतिविधियाँ अपनाते हैं-इस तथ्य पर ध्यान देने की अपेक्षा हमारी दृष्टि में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसके आस-पास के लोग उसकी उपलब्धियों को किन संदर्भों में लेते हैं सुकरात को अपने जीवन काल में ऐसे कई व्यक्तियों के संपर्क में आना पड़ा जो केवल उस पर अपनी विद्वता की धाक जमा कर उससे अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त चाहते थे। उन्हें जिन लोगों ने सम्मानित किया उनकी दृष्टि में अपना मूल्य सुकरात की अपेक्षा अधिक ऊँचा रखना चाहते थे।

अपने ढंग से यदि विद्या-वैभव बढ़ाना था तो उसका सही रास्ता श्रम-साध्य था, पर सुकरात की सफलता इतनी लुभावनी लगी कि उसे तत्काल प्राप्त करने के लिए समय और श्रम साध्य मार्ग अपनाने का धैर्य न बन पड़ा। नेपोलियन को केवल बड़ा बनने की इच्छा थी, अब वह विद्वता के क्षेत्र में हो या शक्ति के क्षेत्र में। अपने समय के विद्वानों की स्थिति देखकर पहले तो वह साहित्य के क्षेत्र में उतरा। पर उसे असफलता हाथ लगी और उसने तुरंत अपनी पटरी बदल कर सैन्य अभ्यास आरंभ कर दिया। हालाँकि वह बड़ा अवश्य बन गया पर उसके प्रशंसकों और आलोचकों की संख्या आज भी बराबर ही है। यद्यपि उसे वीर, योद्धा, कुशल शासक, साहसी और राजनीतिज्ञ भले समझा जाता है, पर सफल मनुष्य के रूप में उसका मूल्याँकन करते समय उसे अभिमानी और अहंकारी व्यक्ति कहना पड़ता है, जो एक सामान्य आदमी भी अपने लिए निंद्य मानता है।

मानवीय गुणों से रहित सफलताएँ कीर्ति और मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठा तो नहीं देतीं, फिर भी आम तोर पर लोगों की दृष्टि बाहरी सफलताओं पर ही अधिक टिकती है। जिन्हें धनवान, प्रतिष्ठित और पहुँच वाला आदमी मान लिया जाता है, लोग उसी के पीछे भागने-दौड़ने लगते हैं। उससे लाभ उठाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। ये सभी उपलब्धियाँ मनुष्य की महत्वाकाँक्षाओं और उसके लिए किए जाने वाले प्रयासों से प्रसूत हैं। क्योंकि अंततः मनुष्य महत्वाकाँक्षाओं को ही तो आधार बनाकर जीता है। यह उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे श्वास-प्रश्वास-हृदय की धड़कन नाड़ी की गति और रक्त का शरीर में परिभ्रमण। इन प्रक्रियाओं के आधार पर यदि किसी मनुष्य को सफल और विभूतिवान कहा जा सके तो महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति को ही मनुष्य की सफलता की कसौटी माना जाना चाहिए।

लेकिन यथार्थ में इस सफलता को जीवन की सार्थकता अथवा मनुष्यता की कसौटी मानना भूल होगी। हृदय का स्पंदन और रक्त का दौरा जीवन के चिन्ह तो है लेकिन सिर्फ इसी कारण किसी व्यक्ति की प्रशंसा तो नहीं की जा सकती। ये प्राकृतिक क्रियाएँ यदि बंद हो जायँ तो व्यक्ति की स्थिति पर शोक अवश्य व्यक्त किया जा सकता है। वैसी दशा आने पर उसकी सहायता भी की जा सकती है। परन्तु जब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा हो तो उसे सामान्य-स्वाभाविक कहना ही उचित है दिल की धड़कन और रक्त का परिभ्रमण जिस प्रकार स्वाभाविक है। उसी प्रकार स्वाभाविक है व्यक्ति की महत्वाकाँक्षाएँ और उन्हें पूरा करने का प्रयास, क्योंकि खाने-पीने की सुविधाएँ और साधन प्रकृति ने आरंभ से ही इतने जुटा दिए हैं कि यदि व्यक्ति को निर्वाह में संतोष करना होता तो इतने हाथ पैर मारने की जरूरत नहीं पड़ती।

सफलताओं का एक दूसरा पक्ष भी होता है कि व्यक्ति अपने मानवीय गुणों के और सामाजिक आदर्शों के प्रति कितना निष्ठावान है ? सफल तो झूठ-बेईमानी, दगाबाजी और अनीतिपूर्वक कमाने वाले लोग भी हो सकते हैं। क्योंकि इस प्रकार उनके पास धन तो इकट्ठा हो ही जाता है। एक नंबर के अय्यास और चरित्रहीन लोग भी सामान्य स्तर के लोगों से अधिक बुद्धिमान हो सकते हैं। प्रतिष्ठा डाकू, चोर, लुटेरों और अपराधियों को भी मिल जाती है, भले ही लोग डर से ऐसा करें, पर प्रश्न यह है कि क्या इन सफलताओं के आधार पर उन्हें सफल मनुष्य के रूप में देखा जाना चाहिए ?

उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं में ही मिलेगा। वस्तुतः बाहरी सफलताओं की अपेक्षा नैतिकता और दृष्टिकोण की उत्कृष्टता के आधार पर ही मनुष्य का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। बाहरी सफलताओं की अपेक्षा यह अधिक पुरुषार्थ साध्य है। क्योंकि कमजोर संकल्प के व्यक्ति शीघ्र ही अपने प्रयत्नों की निष्फलता से निराश हो जाते हैं और उन प्रयासों को छोड़ बैठते हैं। प्रगति के पथ पर चलने वाले और संघर्षों तथा कठिनाइयों का सामना करने के लिए मनोबल ही एक मात्र उपाय रह जाता है। अनैतिक बेईमान, तथा भ्रष्ट मार्ग अपनाने वाले व्यक्तियों का मनोबल क्षीण तथा कमजोर ही रहता है। वे कष्ट-कठिनाइयों से टकराकर शीघ्र ही पस्त हिम्मत हो जाते हैं। इस तथ्य को उद्घाटित करते हुए एक विचारक ने लिखा है-नीतिवान मनुष्य के उच्च दृष्टिकोण का ही वास्तविक महत्व है। वही स्थायी तथ्य भी है सफलता असफलता से भी पहले स्थान पर हमारा दृष्टिकोण आता है । जो कर्म दृष्टिकोण को महत्व देते हैं वे कल की चिंता नहीं करते और जिनका दृष्टिकोण दुर्बल है, वे ही प्रायः सफलता को अधिक महत्व देते हैं।

यहाँ सफलता को उन्हीं अर्थों में प्रयुक्त किया जा रहा है जिससे कि सर्वसाधारण परिचित हैं अन्यथा मनस्वी और पुरुषार्थी व्यक्तियों के लिए साध्य से साधन की पवित्रता ही अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है और उसी मापदण्ड के अनुसार व्यक्ति की उपलब्धियों से अधिक उसके आदर्श और नीतियाँ प्रमुख हो जाती हैं।

क्यों ? इसका उत्तर यों दिया जा सकता है कि नीति न्याय और आदर्शवादिता के आधार पर ही उपलब्धियों का स्थायित्व टिका है। बेईमानी से कोई व्यक्ति ज्यादा पैसा इकट्ठा कर ले और धीरे-धीरे सभी लोग उसी मार्ग पर चलने लगें तो आज प्राप्त की गई उपलब्धियाँ अपनी क्षण भंगुरता के कारण कल ही मर जाएँगी। इसीलिए नीति को सार्वभौम नियम कहा गया है। सार्वभौम नियम-अर्थात् जिनके आधार पर ही समाज की सुव्यवस्था और व्यक्ति का स्थाई सुख संतोष टिका हो। एक दुकानदार यदि कम तोलता है तो उसे हजार स्थानों पर से कम खरीदना पड़ेगा और गड़बड़ी फैलेगी सो अलग। इस कारण कम तोलना अनैतिक है। व्यवहार में ईमानदारी सभी के लिए व्यवहार्य और सहज लाभप्रद है। अन्य नैतिक आदर्शों को भी इसी आधार पर खरा और खोटा पाया जा सकता है। और जो इन आदर्शों की ओर चलने का साहस करेगा उसे जीवन के श्रेष्ठ मूल्यों का बोध भी होगा। यथार्थ में सफलता का चरम बिन्दु यही है। इसे न समझ पाने वाले उस व्यक्ति को जो नीति-अनीति अनुचित सभी तरीके अपनाकर संपन्न बनाना चाहता है गरीब और अभावग्रस्त बेवकूफ और मूर्ख लगेंगे। परंतु आदर्शनिष्ठ बनकर जिन्होंने स्वेच्छया निर्धनता का वरण कर लिया उनका दृष्टिकोण कुछ और ही बन जाता है। जिसका आनन्द तथाकथित सफल व्यक्ति अपनी सारी सफलताओं के बाद भी नहीं उठा सकता।

सफलताओं के विकृत और परिष्कृत स्वरूप को यदि हम समझ सके उनका नीर−क्षीर विवेक कर सकें तो वर्तमान मानदण्डों को बदलने की जरूरत महसूस की जा सकेगी। इस यथार्थता को समझने पर यह स्पष्ट हो सकेगा कि सफलता के मूल्याँकन का आधार नैतिकता तथा दृष्टिकोण की उत्कृष्टता है न कि तमाम सारी चीजों को बटोरना। इसके लिए सफलता के विभिन्न स्वरूपों, यश, प्रतिष्ठा, और संपन्नता की कसौटियाँ बदलनी पड़ेंगी तथा सद्विचारों, सत्प्रवृत्तियों एवं सत्कर्मों को उनके स्थान पर प्रतिष्ठित करना होगा।


विश्व संस्कृति का उद्गम केन्द्र रहा है भारतवर्ष

जर्मनी के प्रख्यात विद्वान तथा भारतीय संस्कृति के आराधक मैक्समूलर ने सन् 1858 में एक परिचर्चा में महारानी विक्टोरिया से कहा था- “यदि मुझ से पूछा जाय कि किस देश में मानव मस्तिष्क ने अपनी मानसिक एवं बौद्धिक शक्तियों को विकसित करके उनका सही अर्थों में सदुपयोग किया है ? जीवन के गंभीरतम प्रश्नों पर गहराई से विचार किया है और समाधान ढूँढ़ निकाले हैं ? तो मैं भारत की ओर संकेत करूंगा, जिसकी ओर प्लेटो और काण्ट जैसे दार्शनिकों के दर्शन का अध्ययन करने वालों का ध्यान भी आकृष्ट होना चाहिए।”

“यदि कोई पूछे कि किस साहित्य का आश्रय लेकर सैमैटिक यूनानी और रोमन विचारधारा में बहते हुए योरोपीय अपने आध्यात्मिक जीवन को अधिकाधिक विकसित कर सकेंगे ? जो इहलोक से ही संबद्ध न हो, अपितु शाश्वत एवं दिव्य हो, तो फिर मैं भारत वर्ष की ओर इशारा करूंगा।”

अपनी ज्ञान-पिपासा परितृप्त करने हेतु एक सदी पूर्व भारत आये प्रसिद्ध विद्वान लार्डविलिंगटन ने लिखा है-”समस्त भारतीय चाहे वे प्रसादों में रहने वाले राजकुमार हों या झोपड़ों में रहने वाले गरीब, संसार के वे सर्वोत्तम शील संपन्न लोग हैं मानों यह उनका नैसर्गिक धर्म है उनकी वाणी एवं व्यवहार में माधुर्य एवं शालीनता का अनुपम सामंजस्य दिखाई पड़ता है। वे दयालुता एवं सहानुभूति के किसी कर्म को नहीं भूलते।”

इस प्रकार के उद्गार व्यक्त करते हुए पेरिस विश्वविद्यालय के विद्वान दार्शनिक प्रो0 लुई टिनाऊ ने एक बार कहा था- “जीने की तथा परस्पर मानवी संबंधों की इतनी सुन्दर सर्वांगपूर्ण आचार संहिता विश्व के किसी भी धर्म अथवा संस्कृति में नहीं है, जो कि भारतीय संस्कृति में विद्यमान है। वह आज भी विश्व को मार्गदर्शन

करने में सक्षम है।”

वर्तमान संदर्भ में उपरोक्त कथन कुछ अत्युक्ति जैसे लग सकते हैं, पर उसकी प्राचीन साँस्कृतिक समृद्धि पर दृष्टिपात करें, तो विदित होगा कि इस संस्कृति के प्रति विदेशी विद्वानों की श्रद्धा अकारण नहीं रही। ज्ञान एवं विज्ञान की जो सुविकसित जानकारियाँ आज संसार में दिखाई पड़ी रही है, उनमें बहुत कुछ योगदान भारत का रहा है। समय-समय पर यह विश्व-वसुधा को अपनी भौतिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान-धाराओं से अभिसिंचित करता रहा है। इस सत्य के प्रमाण इन दिनों भी देखे जा सकते हैं। ऐसा उल्लेख है कि दक्षिण पूर्व एशिया में भारत के व्यापारी सुमात्रा मलाया और निकटवर्ती अन्य द्वीपों में जाकर बस गये तथा वहाँ के निवासियों से वैवाहिक संबंध भी स्थापित कर लिये। चौथी शताब्दी के पूर्व अपनी विशिष्टता के कारण यह संस्कृति उन देशों की दिशाधारा बन चुकी थी। जावा के बोरोबदर स्तूप और कम्बोडिया के शैव मंदिर राज्यों की सामूहिक शक्ति के प्रतीक प्रतिनिधि थे। राजतंत्र इन धर्म संस्थानों के अधीन रहकर कार्य करता था, चीन, जापान, तिब्बत, कोरिया की संस्कृतियों पर भारत की अमिट छाप आज भी देखी जा सकती है। बौद्ध स्तूपों एवं मंदिरों के ध्वंसावशेष इन देशों में अनेक स्थानों पर बिखरे पड़े हैं।

पश्चिमी विचारकों पर भी भारतीय तत्वज्ञान की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है। गणितज्ञ पाइथागोरस उपनिषद् की दार्शनिक विचारधारा से विशेष प्रभावित थे। कितने ही विद्वानों ने तो भारतीय साहित्य में समाहित विचारों से प्रेरणा लेकर अनेकों कृतियाँ रची, जो अपने समय में अनुपम कहलाई । गेटे ने सर विलियम जोनस कृत शकुँतला नाटक के अनुवाद से अपने ड्रामा ‘फास्ट’ की भूमिका के लिए आधार प्राप्त किया। दार्शनिक फिकटे तथा हेगल वेदाँत के अद्वैतवाद के आधार पर एकेश्वरवाद पर रचनाएँ प्रस्तुत कर सके। अमरीकी विचारक थोरो तथा इमर्सन ने भारतीय दर्शन के प्रभाव का ही प्रचार-प्रसार-अपनी शैली में किया।

गणित विद्या का आविष्कारक भारत ही है शून्य का अंक तथा संख्याओं के लिखने की आधुनिक प्रणाली मूलतः भारत की ही देन है। इससे पहले अंकों को भिन्न-भिन्न चिन्हों द्वारा प्रदर्शित करने की रीति थी। भारतीय विद्वान आर्य भट्ट ने वर्गमूल, घनमूल जैसी गणितीय विधाओं का आविष्कार किया, जो आज विश्वभर में प्रचलित है।

अरब निवासी अंकों को हिंदसा कहते थे, क्योंकि उन्होंने अंक विद्या भारत से अपनायी थी। इनसे फिर पश्चिमी विद्वानों ने इसे सीखा। अनुमान है कि भारत की अंक-प्रणाली का योरोप में प्रचार पंद्रहवीं शताब्दी में हुआ तथा सत्रहवीं सदी तक समस्त योरोप में प्रयोग होने लगा। “पाई” की कल्पना तथा मान के निर्धारण का श्रेय आर्य भट्ट को है। सदियों पूर्व भारतीय ज्योतिर्विदों ने यह कल्पना की कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण के समय का सही आकलन करने वाली ज्योतिष विद्या इसी देश की देन है। जर्मनी के कुछ विश्वविद्यालयों में आज भी वेदों की दुर्लभ प्रतियाँ सुरक्षित रखी हुई हैं तथा उनमें वर्णित कितनी ही गुह्यतम विधाओं पर वहाँ के वैज्ञानिक अन्वेषणरत हैं।

“वसुधैव कुटुँबकम्” की भावना से प्रेरित होकर ‘बहुजन हिताय’ की दृष्टि से यहाँ के निवासी समय-समय पर देश की सीमाओं को लाँघते हुए अपने ज्ञान-विज्ञान की संपत्ति को उन्मुक्त हाथों से बाँटने के लिए दूसरे देशों में भी पहुँचते रहे हैं। तब आज जैसे यातायात के सुविधा साधन भी न थे। दुर्गम पहाड़ों, नदियों, रेगिस्तान बीहड़ों की कष्टसाध्य यात्राएँ उनको पावन मनोरथ से डिगा नहीं पाती थी। बृहत्तर भारत की नींव उनके इन दुस्साहसी प्रयत्नों से पड़ी। कुमार जीव, कश्यप, मतंगु बुद्धयश तथा गुणवर्मन आदि बौद्ध भिक्षुओं ने प्राणों को हथेली पर रख कर पैदल चीन की यात्राएँ कीं। उनके उपदेशों से वहाँ के मनीषी इतने अधिक प्रभावित हुए कि उस भूमि के दर्शन-र्स्पशन के लिए वे पड़े। फाह्यान, हृनसाँग, इत्सिंग आदि विद्वान भारत आये तथा वर्षों तक अपनी ज्ञान पिपासा शाँत करते रहे। जो मिला, उसे अपने देशवासियों को बाँटने वापस लौटे। मंगोलिया, साइबेरिया, कोरिया आदि में भी भारतीय विद्वानों के पहुँचने तथा संस्कृति प्रचार का उल्लेख मिलता है।

कलिंग युद्ध के बाद अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ। प्रायश्चित के लिए उसने बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर धर्म प्रचार के लिए न केवल स्वयं कार्य आरंभ किया, वरन् अपने पुत्रों को भी वैसे ही अनुकरण के प्रति प्रेरित किया। श्रीलंका लें में उसने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को प्रचारार्थ भेजा। बोध गया से बोधिवृक्ष की एक शाखा लेकर उसको लंका में आरोपित किया। ‘बौद्ध धर्म’ के धार्मिक चिन्ह ग्रंथों एवं प्रसादों के रूप में जो लंका में दिखाई पड़ते हैं, सब महेन्द्र ओर संघमित्रा के प्रयासों के ही पुण्य प्रतिफल है। वर्मा का पुरातन नाम ब्रह्मदेश है, जिस पर भारतीय प्रभाव की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है।

कम्बोडिया तीसरी से सातवीं शताब्दी तक हिन्दू गणराज्य रहा। वहाँ के निवासियों का विश्वास है कि इस देश का नाम भारत के ही ऋषि कौण्डिण्य के नाम पर पड़ा, जिनने यहाँ की एक नाग कन्या से विवाह किया और अपना राज्य स्थापित किया। उनके बाद जयवर्मन, यशोवर्मन, सूर्यवर्मन आदि राजा हुए। यहाँ के ध्वस्त मंदिरों में हिन्दू संस्कृति के चिन्ह के रूप में रामायण के दृश्याँकन देखे जा सकते हैं। लाओ के कुछ मंदिरों में भी रामकथा के दृश्य खुदे हैं।

इण्डोनेशिया यों तो वर्तमान में मुस्लिम देश है, किंतु भारतीय संस्कृति की गहरी छाप अभी भी इस पर है। इण्डोनेशिया यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है-भारतीय द्वीप। जावा सुमात्रा, बोर्नियो नामक द्वीपों में यह विभाजित है। प्राचीन काल में वे सभी भारत के अंग रहे थे। रक्त एवं संस्कृति दोनों दृष्टियों से वहाँ के निवासी भारतीयों से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए है। जावा के लोगों का विश्वास है कि भारत के पराशर तथा व्यास ऋषि वहाँ गये थे तथा उन्होंने वहाँ विकसित सभ्य बस्तियाँ बसायी थी।

सुमात्रा द्वीप में हिन्दू राज्य की स्थापना एवं भारतीय संस्कृति का विस्तार चौथी शताब्दी में हुआ। पलेमवंग नामक स्थान कभी सुमात्रा की राजधानी थी, जहाँ भारतीय धर्म, संस्कृति एवं अध्यात्म विषयों का शिक्षण होता था। पाली एवं संस्कृत भाषा यहाँ पढ़ायी जाती थीं। इण्डोनेशिया के बाली द्वीप के बारे में विद्वान कहते हैं कि कौण्डिण्य के वंशधरों ने यहाँ हिन्दू राज्य की स्थापना की थी, जो दसवीं शताब्दी तक कायम रहा। बाद में वह उन लोगों के अधीन हो गया।

बोर्नियो द्वीप सबसे बड़ा है। यहाँ हिन्दू राज्य की स्थापना पहली सदी में हो गई थी। शिव, अगस्त्य, गणेश, ब्रह्मा आदि ऋषियों एवं देवताओं की मूर्तियाँ यहाँ प्राप्त हुई तथा कितने ही पुरातन हिन्दू मंदिर आज भी मौजूद हैं, जो यह बताते हैं कि यह द्वीप भारतीय संस्कृति का गढ़ रह चुका है।

इतिहासकारों का मत है कि थाईलैंड का पुराना नाम श्याम देश था। तीसरी शताब्दी में वह भारत का उपनिवेश बना तथा बारहवीं सदी तक भारत के अधीन रहा। श्याम की सभ्यता भारतीय संस्कृति से पूरी तरह अनुप्राणित है। उसकी लिपि उद्गम पाली भाषा है। पाली भारत की देन है। उसके रीति-रिवाजों में भारत जैसा साम्य दिखाई पड़ता है। दशहरा जैसे पर्व धूमधाम से मनाये जाते हैं। थाई जीवन में राम एवं रामायण के कथानक की प्रेरणाएँ गहराई तक जड़ें जमायी हुई हैं। अष्टमी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि पर्वों पर भारत की तरह वहाँ भी उत्सव मनाये जाते हैं। थाई रामायण का नाम ‘रामकियेन’ है, जिसका अर्थ होता है-’रामकीर्ति’ थाईलैण्ड में अयोध्या नामक एक नगरी भी है।

तिब्बती साहित्य पर बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव है। वहाँ के राजा संगचन गम्पो ने भारतीय लिपि के आधार पर तिब्बती वर्णमाला का आविष्कार किया। नालन्दा के आचार्य शाँति रक्षित ने सन् 747 में यहाँ पहुँच कर ‘समये’ नामक पहला विहार बनवाया । तत्पश्चात् कश्मीर के भिक्षुक पद्मसंभव के प्रयत्नों से वहाँ महायान की मात्रिक शाखा का प्रचार हुआ। लामावाद की उत्पत्ति उसी से हुई ।

ऐसे अगणित प्रमाण संसार के विभिन्न देशों में बिखरे पड़े है, जो यह बताते हैं कि भारत समय-समय पर अपने भौतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान सागर से इस वसुँधरा को अभिसिंचित करता रहा है। आगामी समय में यह बीज पुनः अंकुरित होंगे और विशाल वट वृक्ष का आकार ग्रहण कर समस्त विश्व को ऐसी शीतल छाया प्रदान करेंगे, जिसकी स्निग्धता से करोड़ों वर्षों तक पृथ्वी सुरम्य उद्यान की भाँति सुरक्षित और सुन्दर बनी रहे। बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तन का यह उत्तरार्ध होगा, जिसे प्रज्ञावतार अपनी प्रखर प्राण-चेतना द्वारा इन्हीं दिनों संपन्न करने जा रहा है।


उदारता घाटे का नहीं, नफे का सौदा

उच्चकोटि के स्वार्थ को परमार्थ कहते हैं। मोटी दृष्टि से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि परमार्थ में अपने को घाटा पड़ता है। और दूसरे लाभ उठाते हैं पर वास्तविकता यह है कि उससे दोनों ही पक्ष लाभ उठाते हैं, जबकि स्वार्थ साधन में वह व्यक्ति भी घाटे में रहता है जो तात्कालिक उपलब्धि को देखकर अपने को लाभान्वित हुआ एवं नफे में रहा मानता है।

सत्प्रयोजनों के लिए सज्जनों के माध्यम से यदि कुछ आर्थिक परमार्थ-परक या भावनात्मक अनुदान दिया जाय तो वह व्यर्थ नहीं जाता वरन् अनेक गुना होकर वापस लौटता है। इसमें बीज का उदाहरण सबसे अधिक फिट बैठता है। बीज गलता है अंकुर बनकर फूटता है। जिसके खेत में उगा हैं वह उसकी भावी परिणति का अनुमान लगाता है और सींचने, खाद देने का प्रबंध करता है। इसके बाद पौधा बढ़ता विकसित होता चला जाता है और फल फूलों से लदा वृक्ष बनता है। जो फल आते हैं, एक बार में सैकड़ों की संख्या में आते हैं और उनमें हजारों की संख्या में बीज होते हैं। इन सबको भी यदि बोया उगाया जा सके तो एक वृक्ष से उसके जीवन में उत्पन्न वृक्षों की बीजों की संख्या लाखों तक पहुँच सकती है। यदि वह बीज गलना स्वीकार न करता तो अपनी सामान्य स्थिति भी चिरकाल तक बनाए नहीं रह सकता। इसमें घुन जैसे कीड़े लग जाते व उसे खोखला बनाकर समाप्त कर देते हैं यही उदाहरण सर्वत्र लागू होता है। उपकारी प्रवृत्ति व्यक्ति की गरिमा बढ़ाती है। उसकी उदारता संपर्क क्षेत्र के सभी प्राणियों को प्रभावित करती है। यह सहज अनुमान लगाया जाता है कि यह व्यक्ति स्वार्थ को परमार्थ पर निछावर कर सकता है तो इसका चरित्रवान होना स्वाभाविक है जिसे चरित्रवान समझा जाता है उसकी प्रामाणिकता पर सहज विश्वास होता है। उसके साथ व्यवहार करने के लिए सभी उत्सुक रहते हैं। इसलिए अनेकों साथी सहयोगी उसे अनायास ही मिलते रहते हैं।

हर मनुष्य साथी सहयोगी चाहता है। अपना परिकर मित्र मंडल बढ़ाना चाहता है पर साथ ही यह संदेह भी करता रहता है कि कहीं खोटे के साथ पाला न पड़े और ठगे जाने की नौबत न आए। इसलिए सज्जनों की तलाश रहती है। व्यक्तिगत सज्जनता की परख कैसे हो ? मोटी पहचान वाणी से होती है। अपनी नम्रता जताने और दूसरों की प्रशंसा करने वाले मन भाते और सज्जन समझे जाते हैं पर आडंबर तो छली लोग और भी अच्छी तरह बना लेते हैं ऐसी दशा में यह संदेह बना ही रहता है कि मधुरभाषी दीखने वाला कहीं कपटी न हो। इस संदेह का निवारण उसके उदार व्यवहार को देखकर ही निवारण होता है। क्योंकि उदारता उसी से बन पड़ती है जो स्वार्थ-त्याग के लिए उद्यत होता है। निजी लाभ कटौती किए बिना परमार्थ बन ही नहीं सकता। निःस्वार्थ सेवा साधना को करने के लिए हृदय की विशालता चाहिए। जो दूसरों के दुःख से दुखी और दूसरों के सुख से सुखी हो सकता है, उसी के लिए यह संभव है कि उदारता बरते, दूसरे की सहायता करे। इसके लिए अपनी सुविधाओं में कटौती करके ही वह बचत की जा सकती है जो परमार्थ के काम आए। अपनी सुविधाओं में कटौती कर सकना किसी आदर्शवादी के लिए ही संभव है। हर किसी के लिए नहीं जिसमें आत्मसंयम अपनाने का साहस है, वही यह भी कर सकता है कि अपना समय, श्रम, ज्ञान, साधन दूसरों को देने के लिए कदम बढ़ा सके। यह शृंखला जहाँ चरितार्थ होती दीखती है, वहाँ सज्जनता के प्रति सहज विश्वास होता है। इतनी जानकारी के प्रति विश्वास हो जाने पर लोग उसके साथ मित्र भाव स्थापित करते हैं। प्रशंसक बनते हैं, साथ ही मैत्री बढ़ाते हैं। मैत्री में स्वभावतः यह होता है कि जिसके साथ सद्भाव स्थापित हुआ है, उसके कामों में भी हाथ बंटाया जाय। उदारचेता देखते हैं कि उनने थोड़े लोगों के साथ आत्मीयता बरती और सेवा सहायता की पर इसके बदले उन्हें अन्य लोगों से वैसा ही उदार व्यवहार मिलना आरंभ हो गया। इस प्रकार का एक अनाज का दाना बोने पर सौ दाने उत्पन्न होने वाला उदाहरण सहज ही चरितार्थ होने लगता है। उदारता का व्यवहार कभी घाटे का सौदा सिद्ध नहीं होता। कुछ के साथ बरती गई उदारता अनेकों का सहयोग सद्भाव लेकर वापस लौटती है। इस प्रकार व्यावसायिक दृष्टि से भी उदारता घाटे का सौदा सिद्ध नहीं होती। परमार्थ की दृष्टि से उसका अपना विशिष्ट महत्व है ही। इससे आत्मबल बढ़ता है संतोष मिलता है और चरित्र में निखार आता है। इस प्रकार सेवा साधना का महत्व समझने वाले और उसे चरितार्थ करते रहने वाले कभी घाटे में नहीं रहते। यदि आर्थिक दृष्टि से कुछ हानि उठाना पड़े तो उसकी भरपाई उस प्रतिक्रिया में हो जाती है, जो उसकी सहायता के बदले बहुतों की सद्भावना साथ लेकर वापस लौटती है।

स्वार्थी अनुदार होता है। वह अपना ही लाभ सोचता है। इस ललक में वह दूसरों की होने वाली हानि का अनुमान नहीं लगा पाता। उचित आदान-प्रदान तो सहज स्वभाव होता है। उसकी गाड़ी व्यवसायिक आधार पर भी चलती रहती है। किन्तु यह हर किसी से नहीं बन पड़ता कि जरूरतमंदों की आवश्यकता अपनी आवश्यकता से बढ़कर समझे और निज की सुविधा को घटाकर उस बचत से दूसरों के अभाव की पूर्ति करे। जो ऐसा कर पाते हैं वे उदार हृदय समझे जाते हैं और उनका व्यक्तित्व प्रमाणिक माना जाता है। अनेकों उसके प्रशंसक एवं सहयोगी बरते हैं। साथ ही उसके कामों में हाथ बँटाने के लिए भी तैयार रहते हैं।

महामानवों के उत्कर्ष के पीछे यही विधा काम करती हुई दिखाई देती है। उनने सेवा का व्रत लिया, प्रमाणिकता सिद्ध की, सहयोग पाया और जन समर्थन से ऊँचे पद पर पहुँचे। विशिष्ट व्यक्तियों में गिने गए और सेवा के बदले सहयोग का क्रम मिलता चला गया। वे उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे, प्रख्यात हुए और अपना उदाहरण अनेकों के लिए अपनाए जाने योग्य बनाकर छोड़ गए।

समाज का गठन इसी आधार पर हुआ हे कि इसमें उदारता का बढ़ा-चढ़ा परिचय देने वाला दूसरों का विश्वासपात्र बनता है और उनके बीच मैत्री, सरलता और सघनता पूर्वक चलने लगती है। उदारता के आधार पर परिवार से लेकर मित्र परिकर एवं समाज के बीच संगठन उत्पन्न होता है। उसकी दृढ़ता और आदर्शवादिता के प्रभाव से संबद्ध परिवार भली प्रकार प्रभावित होता है और वह परंपरा ही एक प्रकार से चल पड़ती है, जिससे अनेकों को अनेकों प्रकार से लाभान्वित होने का अवसर मिलता है। यह लाभ हर किसी के द्वारा समझा जाना चाहिए।

उदारता वहाँ अनर्थकारी सिद्ध होती है जब वह कुपात्रों के हाथ कुकृत्यों के लिए थमाई जाय। ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिनका स्वभाव एवं व्यवसाय ही दूसरों को ठगना है। वे अपने दोष दुर्गुणों के कारण हेय स्थिति में स्वयं पहुँचते हैं और कठिनाई के आकस्मिक होने का बहाना बनाकर करुणा उपजते और उस उभरी हुई भाव संवेदना का अनुचित लाभ उठाने के प्रयत्न में सफल होते रहते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की आवश्यकता है, अन्यथा ठगों को घात लग जाने पर ही अन्यान्यों को उसका पता चलता है। अविश्वास का विस्तार होता है। दूसरे वास्तविक आवश्यकता वालों को भी इस अविश्वास के माहौल से वंचित रहना पड़ता है।

उदारता के बदले मिलने वाला आत्मसंतोष स्वयं अपने आप में एक दैवी वरदान है। अंतःकरण की प्रसन्नता प्रकाराँतर से व्यक्तित्व के अनेक पक्षों को विकसित करती है। यह लाभ इतना बड़ा है कि बदले में अनुदान का प्रतिदान न भी मिले तो भी कोई घाटा प्रतीत नहीं होता। सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए यदि अपना उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके तो उस परंपरा में भी बहुतों का बहुमूल्य लोकहित होते देखा जा सकता।


मित्रों की संख्या (Kahani)

एक बहुत बड़ा सरोवर था। उसके उत्तर तट पर मोर रहता था, दक्षिण सिरे पर मोरनी। एक दिन मोर ने प्रस्ताव रखा कि हम-तुम विवाह कर लें, तो कैसा अच्छा रहे ? मोरनी ने पूछा तुम्हारे मित्र कितने हैं ? उसने ‘नहीं’ में उत्तर दिया तो मोरनी ने विवाह से इनकार कर दिया।

मोर सोचने लगा । सुखपूर्वक रहने के लिए मित्र बनाना भी आवश्यक है। उसने पूर्व तट पर रहने वाले सिंह से, पश्चिम तट पर रहने वाले कछुए से और बगल में रहने वाली सिंह के लिये शिकार का पता लगाने वाली टिटहरी से दोस्ती कर ली। समाचार मोरनी को सुनाया, तो वह तुरंत विवाह के लिये तैयार हो गई। पेड़ पर घोंसला बनाया और उसमें अंडे दिये और भी कितने ही पक्षी उस पेड़ पर रहते थे।

एक दिन शिकारी आये। दिन भर कहीं शिकार न मिला तो, वे उसी पेड़ की छाया में ठहर गये और सोचने लगे, पेड़ पर चढ़ कर अंडे-बच्चों से भूख बुझाई जाय। मोर दंपत्ति को भारी चिंता हुई, मोर मित्रों के पास सहायता के नीचे चला जहाँ शिकारी बैठे थे। इतने में कछुआ भी पानी से निकल कर बाहर आ गया सिंह से डर कर भागते हुए शिकारियों ने कछुए को ले चलने की बात सोची। जैसे ही हाथ बढ़ाया कछुआ पानी में खिसक गया। शिकारियों के पैर दलदल में फँस गये इतने में सिंह आ पहुँचा और उन्हें ठिकाने लगा दिया।

मोरनी ने कहा- मैंने विवाह से पूर्व मित्रों की संख्या पूछी थी, सो बात काम की निकली न, यदि मित्र न होते, तो आज हम सबकी खैर न थी।


आस्तिकता का शास्त्र – आयुर्वेद

आप यहाँ ! नगर का प्रतिष्ठित डाक्टर-वह डाक्टर जिसे स्नान भोजन के लिए भी ठिकाने से समय नहीं मिलता, इस प्रकार अपनी जमी-जमाई क्लीनिक छोड़कर सुदूर देहात में एक नन्हा सा तम्बू डालकर आ टिकेगा, इसकी कोई कैसे संभावना कर सकता है ?

“मैं चिकित्सक हूँ-अतः इस समय मुझे यहाँ होना ही चाहिए था।” डाक्टर अवधेश जी चटपट उठ खड़े हुए। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर आगन्तुक को नमस्कार किया।

केवल तीन राटी पड़ी हैं। एक में कंपाउन्डर तथा एक और सेवक है। एक में डाक्टर साहब का अस्पताल है और उसी के पिछले भाग में उनके रहने की भी व्यवस्था है। तीसरा तम्बू भोजनालय का काम देता है। उसी का एक भाग सामान रखने के भी काम आता है।

“आप सरकारी चिकित्सक तो हैं नहीं।” आगन्तुक एक टीन की कुर्सी पर बैठते हुए बोले-”नगर में भी आप सेवा कर ही रहे थे। वहाँ के रोगियों को भी तो चिकित्सक चाहिए।” दो-तीन टीन की कुर्सियाँ और एक छोटी सी मेज-जितने कम सामान में काम चल सके बस उतना सामान डाक्टर के पास था। वैसे एक चिकित्सक होने के कारण चिकित्सालय का ही सामान बहुत अधिक होना स्वाभाविक था।

“नगर के रोगियों की सेवा करने वाले पर्याप्त चिकित्सक वहाँ हैं।” डाक्टर ने शीघ्रतापूर्वक अपना इंजेक्शन का सामान ठीक करते हुए कहा। उनके पास रोगी आ रहे थे और उन्हें तुरंत इंजेक्शन देना था- ‘सरकारी चिकित्सक पर्याप्त नहीं हो रहे हैं, यह आप देख ही रहे हैं। यह सरकारी चिकित्सक का ही कर्तव्य नहीं है। रोग जहाँ असाध्य चुनौती देने वाला बन जाता है, किसी भी चिकित्सक का कर्तव्य वहाँ उसे पुकारता है।”

“तब आप मुझे भी अपना सहकारी बनालें।” आगन्तुक ने किंचित हँसते हुए कहा-”मैं” भी तो चिकित्सक ही हूँ।

“सच पूछिए वैद्य जी ! मैं तो स्वयं आपसे यह प्रार्थना करना चाहता था, किंतु हिचक रहा था।’ डाक्टर अवधेश एक क्षण स्थिर दृष्टि से वैद्य जी की ओर देखते खड़े रहे.............. “हम अंधेरे में ढेला फेंक रहे हैं। रोग नया है और उसकी कोई परीक्षित औषधि अभी किसी के पास है नहीं, किंतु रोग संक्रामक हे और अत्यंत उग्र भी । किसी मित्र को ऐसे स्थान पर रहने को कहना............. वैसे संभव है कि आयुर्वेद की सहायता कुछ कर सकें।

रोग तो हमारे लिए भी नया है, किंतु आयुर्वेद की पद्धति में कोई रोग नया नहीं होता।” वैद्य जी गंभीर हो गए और रोग के संक्रामक और उग्र होने का भय तो जैसा मेरे लिए है वैसा ही आपके लिए भी है।

एक ही शिविर में उसी दिन दो अच्छे चिकित्सक एक साथ कार्य करने लगे। यद्यपि दोनों की पद्धतियों में कोई ऐक्य नहीं था, किंतु चिकित्सा मात्र भले वे किसी पद्धति के हों............... सब एक स्थान पर एक हैं सबका लक्ष्य रोग को दूर करके रोगी के कष्ट को घटाते हुए मिटा देना है।

भारत में पहली बार प्लेग आया था। कोई औषधि तब तक आविष्कृत नहीं हुई थी। अनेक घर सूने हो गए। गाँव के गाँव उजड़ गए। ज्वर, गिल्टी और मृत्यु-जैसे मृत्यु ने अपना भयानक पंजा चारों ओर फैला रखा था और प्राणियों को शीघ्रतापूर्वक समेटे ले रहा था-ठीक उसी प्रकार जैसे भूखा बंदर दोनों हाथों से बिखरे चले उठा-उठा कर जल्दी-जल्दी मुख में भरता है।

“अमुक को ज्वर आ गया है।” समाचार अकेला नहीं आता था- “उसके लड़के को गिल्टी निकल आयी है। उसके भाई की दशा बिगड़ रही है। पड़ोस के मकान में अमुक मर गया। उसका शव उठाने वाला कोई नहीं है।”

न डाक्टर को अवकाश था, न वैद्य जी को। किसी को दवा दी, किसी को इंजेक्शन। किसी को पुल्टिश बाँधी किसी को चूर्ण फँकाया। न स्नान का ठीक समय, न भोजन का।

बात यहीं तक नहीं थी। चिकित्सा के अतिरिक्त मृतकों को गंगाजी पहुँचाने का भी प्रश्न था और नित्य नहीं तो, दूसरे तीसरे दिन ऐसा अवसर आ ही जाता था कि वैद्य जी और डाक्टर साहब, दोनों ही शव को कंधा लगा गंगातट चले जा रहे हैं। वैसे यह कार्य उनके कंपाउन्डर रसोइया तथा नौकर को अधिक करना पड़ता था और जब वे अपना कार्य छोड़कर कोई मृतक लेकर चल देते तो वैद्य जी चूल्हा फूँकते दीख पड़ते और डाक्टर साहब कंपाउन्डर का स्थान भी ले लेते।

“आज चपरासी को ज्वर आ गया है।” यह होगा, पहले से जानी समझी बात होने पर भी जब हुई बहुत भयानक लगी। वैद्य जी ने डाक्टर साहब से कहा-”कंपाउन्डर रसोइया, आप और मैं............ आगे बोला नहीं गया उनसे।”

“हम सभी खतरे में हैं।” डाक्टर ने बिना हिचके कहा, “मैंने सबसे यह बात पहले ही बता दी है और रसोइया या कंपाउन्डर अपने घर जाना चाहो तो मैं उन्हें प्रसन्नता से छुट्टी दे दूँगा। मेरी प्रार्थना माने तो आप भी..................।”

‘मैं दूसरी बात कह रहा था।’ वैद्य जी बीच में बोल उठे ‘न कंपाउन्डर जायेगा इस प्रकार और न रसोइया। इनके बिना आपका काम भी नहीं चल सकता। लेकिन मैं ठहरा वैद्य मुझे किसी कंपाउन्डर, चपरासी, रसोइये की जरूरत नहीं होती। मैं दवा भी घोट लेता हूँ, रोगी भी देख लेता हूँ और अपने लिए दो टिक्कर भी ठोंक लेता हूँ ।

“तो यह कहिए कि आपकी नीयत ठीक नहीं है।” डाक्टर खुलकर हँस पड़े-’आप यहाँ से हमें भगा देना चाहते हैं। यह क्यों भूलते हैं आप कि यहाँ आप हमारे अतिथि होकर आये और अब भी उसी स्थिति में हैं।’

“तो आप इस ब्राह्मण अतिथि को अपना यह आवास दान कर दीजिए।” वैद्य जी भी हँसे-”अपने संगी-सेवक लेकर नगर का मार्ग देखिए।”

“आपने ठीक यजमान नहीं चुना” डाक्टर ने उसी विनोद के स्वर में उत्तर दिया-”मुझमें इतनी श्रद्धा नहीं हैं।”

तब मुझे यमराज को यजमान बनाना पड़ेगा।” वैद्य जी गंभीर हो गए, किंतु किसी के भी नगर लौटने की चर्चा यही समाप्त हो गई।

दो-तीन दिन यूँ ही बीते। स्थिति दिन पर दिन गंभीर होती गई। “वैद्यजी मैं निराश हो चला हूँ।” अंततः एक रात आधी रात के बीत जाने पर जब डाक्टर अपने बिस्तरे पर लेटे, उन्होंने समीप के बिस्तर पर लेटे वैद्य जी से कहा-”हम न रोगियों को बचा पाते हैं और न उनका कष्ट ही कुछ कम कर पाते हैं। उलटे हमने अपने आश्रितों के प्राण भी संशय में डाल रखे हैं। वे जाना चाहें आग्रह करने पर भी चले जाये तो उन्हें सवेरे ही भेज दीजिए।” वैद्य जी डाक्टर साहब के शिविर में, उनकी ही रावटी में रहने लगे थे, यह तो कहने की आवश्यकता नहीं है। वे कह रहे थे-”मैं आपकी रसोई भी बना दूँगा और पूरा नहीं तो भी, कुछ काम कंपाउन्डर का भी कर दूँगा।”

“लेकिन इससे लाभ ?” डाक्टर का स्वर खिन्न था। ‘लाभ ?’ वैद्य जी झटके से उठ बैठे अपने बिस्तरे पर- “आप इसमें कुछ लाभ नहीं देखते ? नगर लौट जाने की इच्छा हो रही है क्या ? “मैं अकेला कहाँ जा रहा हूँ।” डाक्टर और खिन्न हो गए थे- “आपको साथ लेकर जाना चाहता हूँ।

“देखो आवधेश।” इस बार वैद्य जी मित्रता के स्तर पर आ गए-मैं प्रारंभ से आग्रह कर रहा हूँ कि तुम नगर चले जाओ। अपने सेवकों को और इन शिविरों को भी ले जाओ। मुझे इनमें से किसी की आवश्यकता नहीं। मैं सवेरे ही जमींदार की खाली छावनी की बैठक में डेरा डालूँगा।

“करेंगे क्या आप ?” डाक्टर भी उठकर बैठ गए।

“दवा घोटूँगा। रोगी देखूँगा। उन्हें दवा दूँगा। आश्वासन दूँगा।” वैद्यजी के स्वर में विनोद का लेश नहीं था-और किसी मृतक को उठाने वाला कोई न हुआ तो इतनी शक्ति इस शरीर में भगवान ने कृपा करके दी है कि अकेले उसे कंधे पर उठाकर गंगाजी में विसर्जित कर आऊँ।

“इससे क्या लाभ ?” डाक्टर ने फिर पूछा-”मेरी औषधियों के समान आपकी औषधियाँ भी प्रभावहीन सिद्ध हो रही हैं, यह तो आप देख ही रहे हैं।”

“औषधियाँ चुनने में हम प्रमाद नहीं करते” वैद्य जी अत्यंत गंभीर हो गए थे-”हमारी जितनी योग्यता है, जितना ज्ञान है उसका कोई भी भाग हमने छिपाया नहीं है और यही हम कर सकते हैं औषधि लाभ करे ही, यह तो न मेरे बस की बात है, न आपके। इसमें उद्विग्न होने की क्या बात ?”

“निष्फल उद्योग और वह भी खतरा उठाकर” डाक्टर ने वैद्य जी को समझाने के स्वर में कहा।

“उद्योग कर्तव्य है, इसलिए किया जाता है।” वैद्यजी इस बार तनिक जोश में आ गए, “आपकी चिकित्सा पद्धति की बात आप जाने किंतु आयुर्वेद तो आस्तिक शास्त्र है ? प्रारब्ध तथा ईश्वरीय विधान में आयुर्वेद को पूरा विश्वास है। हम विश्वास करते हैं कि जिसे जितना कष्ट प्रारब्धानुसार मिलना है-मिलकर रहेगा। निश्चित मृत्यु कोई टाल नहीं सकता।”

“तब भी आप चिकित्सा करते है” डाक्टर ने व्यंग किया “सो तो करता हूँ और यहाँ की चिकित्सा छोड़ने को प्रस्तुत नहीं वैद्य जी का स्वर स्थिर दृढ़ था-परिणाम अपने वश में नहीं है, अंतः उसका प्रभाव अपने कर्म पर क्यों पड़ने दिया जाय।”

“इस प्रयास का प्रयोजन ?”

“कर्तव्य पालन” वैद्यजी कह रहे थे-गीता ने भी यही कहा है-कर्मण्ये वा धिकारस्ते मा फलेपु कदाचन् हमारे प्रयास से रोगी को आश्वासन मिलता है। हममें दया मैत्री, करुणा, सेवा भाव का संचार होता है। प्रमाद को प्रश्रय नहीं मिलता सेवा का सात्विक आनंद, रोगी को आश्वासन एवं कर्तव्य पालन का पुण्यम आत्म प्रसाद इससे महान और कोई पुरस्कार आपको सूझता है।

“आप मेरे गुरु है।” डाक्टर साहब ने उठकर भावविभोर होकर वैद्य जी के चरण पकड़ लिए ‘स्वस्तिस्तु’ वैद्य जी हंसे- ‘ब्राह्मण की चरण वंदना करना आपको आया तो सही।’

‘चिकित्सक का ठीक कर्तव्य सुझाया आपने।’ डाक्टर परिहास ग्रहण करने की मनोभूमि में इस समय नहीं थे।

‘चिकित्सक का ही नहीं मनुष्य मात्र का ब्राह्मण को छोड़कर मानव कर्तव्य का निर्देष्टा कोई है भी तो नहीं। वैद्य जी इस चर्चा को समाप्त कर देना चाहते थे-’किसी भी क्रिया का फल कर्ता के वश में नहीं है वह है भाग्य विधाता के हाथ में। तब फल में आग्रह करके अपने कर्तव्य कर्म को जिसमें हमारी स्वतंत्रता है, कुण्ठित क्यों होने दिया जाय। कर्म में आस्था रखने वाले इन्हीं वैद्य ईशानचन्द्र ने अपने परवर्ती जीवन में ‘नैष्कर्म्य सिद्धि’ नामक ग्रंथ की भावप्रवण व्याख्या की और लोक हित में संन्यास लेकर स्वामी करुणानंद के नाम से जगत विख्यात हुए।


जितने दिन भी जियें, शान के साथ

मनुष्य की स्थायी रूप से युवा बने रहने की इच्छा सदैव से रही है। अपने यौवन को अक्षुण्ण बनाये रखते हुए शारीरिक-मानसिक दृष्टि से सक्षम बने रहने और उस आधार पर भौतिक जगत पर विजय प्राप्त करने की आकांक्षा प्रत्येक नर-नारी में बलवती देखी जाती है। किंतु यह एक-प्राकृतिक नियम है कि जिसका जनम होता है उसे एक दिन मृत्यु की गोद में भी अवश्य जाना पड़ता है, साथ ही इससे पूर्व उसे वार्धक्यजन्य कष्टों को झेलना पड़ता है। प्रयत्न करने पर भी जरावस्था से बच पाना संभव नहीं हो पाता। यह बात अलग है कि वृद्धावस्था में भी मानसिक प्रखरता को बनाये रखकर युवावस्था की तरह ही जीवन का पूरा-पूरा लाभ उठाया जा सकना संभव है। संसार में कितने ही महामानव हुए है। जिन्होंने ढलती उम्र में भी मानसिक प्रसन्नता और उत्साह को बनाये रखा और देश, समाज एवं संस्कृति की सेवा करते हुए समूची मानव जाति के लिए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

आयु से संबंधित शरीर यंत्र रचना का उत्तम ज्ञान प्राप्त करने तथा दीर्घायुष्य के लिए मनुष्य के प्रयत्न उतने ही पुराने हैं जितनी कि उसकी उत्पत्ति। आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति के इस युग में भी मेर्लिन से लेकर के गलिओस्ट्रो, ब्राउनसेकार्ड और वोरोनोक चार्ल्ट्नस जैसे मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने सदा युवा बने रहने के स्वप्न को साकार करने का प्रयास किया, किंतु वे सब असफल ही रहे। किसी को भी उस सर्वोच्च गूढ़ रहस्य को ढूंढ़ने में सफलता नहीं मिली किंतु फिर भी वैज्ञानिक इसको अधिक आवश्यक मानते रहे और विविध प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों से लेकर महँगे टानिकों, औषधियों की खोजकर मनुष्य के चेहरे पर कृत्रिम तरुणाई उभरने का असफल प्रयत्न करते रहे हैं। इस आधार पर पुरुष हो या स्त्री इस प्रकार अपने आपको तरुण बनाये रखने का प्रयास तो करते हैं, पर इंद्रियों पर संयम नहीं रख पाने के परिणाम स्वरूप अनेकानेक बीमारियों से पीड़ित होकर समय से पूर्व ही काल के ग्रास बन जाते हैं। इसके लिए मनोवैज्ञानिक, स्वास्थ्य विज्ञानी एवं चिकित्साशास्त्री वातावरण की विषाक्तता, कुपोषण, मनोविकार, चिंता, आर्थिक सुरक्षा का अभाव, सामर्थ्य से अधिक काम, नैतिक अनुशासन का अभाव और हर प्रकार से असंयमित जीवन को प्रधान कारण मानते हैं, तो कुछ कहना है कि दीर्घायुष्य वंशानुगत होता है । पर प्रायः देखा गया है कि दीर्घायु की परंपरा वाले परिवार का कोई सदस्य यदि घिचपिच वाले बड़े नगरों में निवास करने लगता है, असंयम को अपनाता है तो एक अथवा दो पीढ़ियों में ही उनकी दीर्घायु में न्यूनता आने लगती है।

मनीषियों का कहना है कि दीर्घायु प्राप्त करने अथवा हमेशा युवा बने रहने के लोभ में औषधियों का आँख मूँद कर उपयोग करना अवाँछनीय होगा। मनुष्य के दीर्घायु होने की कामना तभी की जा सकती है जबकि वह अपनी युवावस्था की दीर्घकालिक बनाये रखने में सफल हो। वृद्धावस्था में वृद्धि लाना तो एक अभिशाप ही होगा। एक वृद्ध व्यक्ति जो कि अपना भार स्वयं वहन करने में असमर्थ होता है, अपने परिवार और समाज के लिए भारभूत मालूम पड़ता है यदि सभी व्यक्ति शतायु बने रहेंगे तो समाज का युवा वर्ग इस भारी बोझ को सहन करने में असमर्थ रहेगा। आयु में वृद्धि करने से पूर्व इंद्रियों और मानसिक गतिविधियों को मौत के हौवे दिखाकर शरीर को संरक्षण दिलाने के बारे में कोई विधि खोजनी होगी। इसके लिए यह आवश्यक है कि रोगियों, आशक्तों, पागलों, सनकियों एवं शारीरिक-मानसिक रूप से लकवाग्रस्त व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि न हो। इसके अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति को दीर्घायुष्य बनाना भी विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता। मनुष्यों के गुणों का मूल्याँकन किये बिना ही केवल उनकी संख्या में वृद्धि करने के भयंकर परिणामों से सभी भली प्रकार से परिचित हैं। जो व्यक्ति दुखी, स्वार्थी, मूर्ख और निकम्मे है, उनकी आयु में कुछ वर्ष और जोड़ने से क्या लाभ ? शतायु व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि करना तब तक उचित नहीं कहा जा सकता जब तक कि उनके बौद्धिक और नैतिक पतन के मार्ग को अव( न कर दिया जाय और वृद्धावस्था से जुड़े रोगों से संरक्षित न कर दिया जाय।

वस्तुतः पुनः यौवन की कल्पना को तब तक साकार नहीं किया जा सकता जब तक कि उसका उद्देश्य मनुष्य के आँतरिक कायाकल्प से संबद्ध नहीं होगा। स्मरण शक्ति एवं इंद्रियों की यौवनोचित शक्ति को बनाये रखना मात्र ही युवावस्था की सही पहचान नहीं है, स्टेनेच, वोरोनोक आदि वैज्ञानिक मनीषियों ने पुनर्यौवन की व्याख्या करते हुए बताया है कि मनुष्य की सामान्य स्थिति में सुधार हो, वह अपने को शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ, शक्तिशाली, ओजस्वी-तेजस्वी और प्रसन्नचित्त अनुभव करे, उसमें मानवोचित सद्गुणों का विकास हो और वह अपनी क्षमताओं का विवेकपूर्वक इस्तेमाल करने की स्थिति में हो, तो उसे पुनर्यौवन की संज्ञा दी जा सकती है।

प्राचीनकाल में चिकित्सा क्षेत्र के अंधविश्वासों में एक मान्यता यह भी प्रचलित थी कि वृद्धावस्था से जीर्ण शरीर को युवा बनाने के लिए किसी नव युवक के रक्त को उसके शरीर में पहुँचाना आवश्यक है। इस मान्यता के आधार पर पोप इन्नोसेन्ट-अष्टम की धमनियों में तीन नवयुवकों का रक्त आधान किया गया, किंतु इस क्रिया के पश्चात् ही उनका निधन हो गया। निश्चित ही यह समाधान विज्ञान सम्मत तो था नहीं। इस घटना के बाद इस युक्ति को दुबारा नहीं आजमाया गया। इसके पश्चात् चिकित्सकों की दृष्टि अंतःस्रावी ग्रंथियों पर गयी। ब्राउन सिकार्ड जैसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने टेस्टिकल-अर्थात् अंडकोष के ताजे सारतत्व को अपने शरीर में प्रवेश करा कर पुनर्यौवन प्राप्त करने का प्रयास किया। इस शोध से उन्हें प्रसिद्धि भी खूब मिली । यद्यपि इस घटना के बाद उनकी अल्पकाल में ही मृत्यु हो गयी थी, किंतु एक विश्वास जिसमें अण्डकोष को नये यौवन प्राप्ति का माध्यम समझा गया, जीवित रहा। ब्राउन सिकार्ड के इस कार्य को वोरोनोक ने और आगे बढ़ाया। उसने अण्डकोष के सारतत्व को इंजेक्शन द्वारा शरीर में पहुँचाने की अपेक्षा अकाल वृद्धों अथवा वृद्ध पुरुषों के अण्डकोषों के स्थान पर गोरिल्ला व चिंपांजी के अण्डकोषों का प्रत्यारोपण किया। यह प्रत्यारोपण सफल तो रहा, किंतु मनुष्य के शरीर में अंडकोष अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सके। ऐसे प्रत्यारोपण के कोई स्थायी सत्परिणाम भी नहीं निकले।

मनुष्य अमरता की प्राप्ति के प्रयासों से कभी निराश होने वाला नहीं है, किंतु शरीर से अमरता की प्राप्ति एक असंभावित तथ्य है, क्योंकि हमारे अंगों की बनावट और उनके क्षय होने के कुछ सुनिश्चित प्राकृतिक नियम है। हाँ वह अपनी वास्तविक शारीरिक आयु को कुछ सीमा तक कम करने में और अपने अंतिम समय-जो कि एक ध्रुव सत्य है, को विलंबित करने में सफलता भी प्राप्त कर ले, पर उसका क्षय अवश्यम्भावी है। अपने मस्तिष्क और व्यक्तित्व का मूल्य उसे अपनी मृत्यु के द्वारा ही चुकाना पड़ता है। किंतु ऐसी मान्यता है कि हारमोन्स और औषधियों की सहायता से मानव वृद्धावस्था को रोग और पीड़ा रहित बना सकेगा। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने गहन खोजें की हैं और बहुत कुछ सफल भी हुए हैं।

शारीरिक आयु भौतिक जगत की भौतिक घड़ियों के द्वारा मापी जाती है। मनुष्य की आयु को दिनों और वर्षों में नापा जाता है। शैशवकाल, बाल्यावस्था और किशोरावस्था की अवधि लगभग 18 वर्षों में समाप्त हो जाती है। परिपक्वता और वृद्धावस्था 50-60 वर्षों में प्राप्त होती है। इस प्रकार मनुष्य का जीवन अल्प अवधि में विकसित तो हो जाता है, पर उसकी पूर्णता और क्षय को एक लंबी अवधि का मार्ग पार करना होता है। यही वह आयु है जिसे पुनर्यौवन प्रदान करने की आवश्यकता होती है। यह तभी संभव है जब तद्नुरूप ही जीवनक्रम अपनाया जाय, समय आने से पूर्व शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से व्यवस्थित तैयारी कर ली जाय, तब बुढ़ापे में भी युवावस्था जैसी सक्रियता को बराबर बनाये रखा जा सकता है।

समय की गति सदा सर्वदा से एक ही जैसी निरंतर रही है, किंतु बालकों, व्यवसायियों, व्यस्त व्यक्तियों और रोगियों के द्वारा उसकी गति में अंतर का अनुमान लगाया जाता है। बाल्यकाल के दिनों का मलय बहुत ही अधिक समझा जाना चाहिए। प्रत्येक क्षण का उपयोग शिक्षण के लिए किया जाना चाहिए। इस अवधि में जो समय नष्ट हो जाता है उसकी क्षतिपूर्ति होना संभव नहीं बच्चों को पेड़-पौधों की तरह या छोटे-छोटे पशुओं की तरह विकसित करने की अपेक्षा उन्हें प्रबुद्ध प्रशिक्षण का एक अच्छा पात्र समझा जाना चाहिए। इस प्रशिक्षण में शिक्षा के अतिरिक्त शारीरिक और मनोवैज्ञानिक ज्ञान गंभीर रूप से दिया जाना आवश्यक है जिसकी कि आधुनिक शिक्षा में अवहेलना ही की जाती है। परिपक्वता के बाद का उतना शारीरिक महत्व नहीं होता, इस अवधि में ऐन्द्रिय और मानसिक परिवर्तन नहीं होते। अतः इस अवधि को रचनात्मक कार्यों के द्वारा सदुपयोग करना चाहिए। वृद्धावस्था की समीपता आने पर मनुष्य को अपनी कार्यशक्ति को न तो विराम ही देना चाहिए और न ही निवृत्त होना चाहिए, कारण निष्क्रियता, आलस और अकर्मण्यता से अशक्ति की प्राप्ति होती है। युवकों की अपेक्षा वृद्धों पर अवकाश के बड़े बुरे परिणाम देखने को मिले हैं। जिन वृद्धों की शक्ति में ह्रास का अनुभव हो रहा हो उन्हें विश्राम के बजाय उनकी योग्यतानुसार काम दिया जाना चाहिए। उनकी मंदगति को कुछ मनोवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर प्रोत्साहित करना उपयोगी होगा। यदि दिनचर्या मानसिक और तात्विक रूप से व्यवस्थित एवं व्यस्तता पूर्ण बना ली जाय, तो कोई कारण नहीं कि वृद्धावस्था में भी मनुष्य नवयुवकों से भी बाजी मार ले।

शारीरिक आयु की मान्यता के आधार पर हम अपनी क्रियाओं के संबंध में कुछ नियम बना सकते हैं। एन्द्रिय और मस्तिष्कीय विकास में परिवर्तन होता रहता है। वे अटल नहीं होते। अपनी इच्छाशक्ति के द्वारा उनमें परिवर्तन किया जा सकता है। मनुष्य जीवन एक गाढ़े द्रव पदार्थ की तरह है जो कि भौतिक रूप से निरंतर बहता ही रहता है। वह अपनी दिशा को बदल ही नहीं सकता, वरन् नूतन प्राणचेतना फूँक कर वाँछित दिशा में प्रगति भी कर सकता है। जीवन में वृद्धि करने और युवकों जैसा सक्रिय जीवन जीने में सक्षम हो सकते हैं।

वस्तुतः आयु को अधिक लंबी बनाने में मनुष्य का शरीर के प्रति अवास्तविक मोह ही काम करता है। वह बहुत दिन जीना चाहता है, पर यह भूल जाता है कि जराजीर्ण रुग्ण और भारभूत जीवन बहुत समय तक जीने में अपने को और दूसरों को परेशान करने के अतिरिक्त और कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।

आत्मा अजर-अमर है-इस मान्यता को अपनाकर दीर्घजीवन का उद्देश्य आध्यात्मिक दृष्टि में किया जाता है। पर शरीर के लिए यह असंभव है कि वह अजर या अमर बन सके। प्रकृति नियमों का परिपालन करते हुए हम जितने दिन जी सकें उसी में संतोष करना चाहिए।

ऊँचे और अच्छे कामों में व्यस्त रह कर हम सामान्य जीवन को भी बहुत लंबा बना सकते हैं। आद्याशंकराचार्य, विवेकानंद, आदि कितने ही व्यक्ति स्वल्प काल तक जीवित रहे, पर इतने महत्वपूर्ण कार्य इतनी अधिक मात्रा में कर सके कि उस थोड़े जीवन पर भी गर्व किया जा सकता है। हमें लंबी जिंदगी पाने के फेर में आकाश-पाताल के कुलावे मिलाने की अपेक्षा इतने में ही संतोष करना चाहिए कि जितने भी दिन जियें शानदारी से जियें और इस तरह जियें जिसे दूसरे लोग अनुकरणीय और सराहनीय कह सकें।


उपासना फल क्यों नहीं देती ?

इन दिनों प्रायः लोगों को शिकायत रहती है कि उनकी उपासना फलदायी नहीं हो पा रही है कोई चमत्कार उत्पन्न नहीं कर पा रही है। ऐसे में यदि कोई यह कह दे कि अमुक देवता की उपासना साल भर में सिद्धि प्रदान करने की क्षमता रखती है, तो सामने वाला व्यक्ति तुरंत यह सोचने लगता है कि यदि ऐसी बात है, तो क्यों न उसी की उपासना की जाय। इस प्रकार वह पहली को छोड़ कर दूसरी को अपना लेता है, किंतु मन सर्वथा संशयहीन यहाँ भी बना नहीं रहा पाता और यह असमंजस खाये जाता है कि पता नहीं यह भी जल्दी फलित हो पायेगी या नहीं। इस मध्य यदि कोई तीसरा व्यक्ति उसकी उपासना पद्धति में खोट बताकर किसी अन्य पद्धति को अपना लेने की सलाह देता है, तो वह सद्य ऐसा करने के लिए तैयार हो जाता है। इस प्रकार उपासक वेश्या की तरह किसी एक के प्रति निष्ठावान न रह कर अनेकों को आजमाने और तुर्त−फुर्त में लाभ पा लेने के चक्कर में अपना बहुमूल्य जीवन गँवा देता है और अंत में निताँत खाली हाथ रह कर विभूतिहीन स्थिति में इस संसार से अलविदा कर जाता है।

यहाँ उपासकों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर वर्तमान की की गयी उपासना फलवती क्यों नहीं हो पाती ? इसका एक सबसे प्रमुख कारण है श्रद्धा का अभाव। गीता (4/39) का इस संबंध में स्पष्ट निर्देश है- “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं” अर्थात् इष्ट के प्रति जिसकी श्रद्धा होती है, वही ज्ञान-प्राप्ति कर पाता है। दूसरा प्रधान कारक है-एक निष्ठा भाव की कमी। यह सुविदित तथ्य है कि कोई भी मंत्र स्वयं में चमत्कारी नहीं होता, साधक की निष्ठा और आस्था ही, उसे वैसा बना देने में प्रमुख भूमिका निभाती है। यदि उपासक का विश्वास मंत्र, इष्ट अथवा उपासना-पद्धति को हर किसी के सामने नहीं प्रकट करने का शास्त्रों में विधान है। एक सच्चाई यह भी है कि पौधा लगाते ही वृक्ष फल नहीं देने लग जाता, दोनों के मध्य कुछ अंतराल होता है। किसान बीज बोता है, पर फसल काटने और धन्यों से कठोर भरने में महीनों का समय लग जाता है। पहलवान दैनिक कसरत के अभ्यास से वर्षों बाद ही अपना शरीर बलिष्ठ और मजबूत बना पाता है और फिर दंगल जीतने में सफल होता है। विद्यार्थी कठिन परिश्रम के उपराँत एक वर्ष बाद ही उसका सुफल अच्छे अंकों के रूप में प्राप्त करता है। इन प्रसंगों में यदि व्यक्तित्व चावल की खिचड़ी पकाने की तरह तुरंत ही सत्परिणाम की आशा करने लगे, तो इसे उसकी बालबुद्धि ही कहना चाहिए। योगवासिष्ठ में इस संदर्भ में स्पष्ट उद्घोष है-

कालेन परिणच्यते कृषिगर्भादयो यथा। एवमात्मविचारोऽपि शनैः कालेन च्यते॥

अर्थात् जैसे बीज बोने के पश्चात् अंकुर निकलने में देर लगती है और माता के उदर में गर्भ के परिपक्व होने में समय लगता है, उसी प्रकार साधना के पकने और फलदायी होने में समय लगता है।

फिर देर लगने के पीछे एक अन्य हेतु यह भी होता है कि साधक का अंतःकरण कितना स्वच्छ अथवा मलिन है। इसी अनुपात में समय भी लगता है। रंगरेज किसी कपड़े में आँख मूँद कर रंग नहीं चढ़ा देता है। पहले वह यह देखता है कि वस्त्र साफ है या मैला-कुचैला। यदि उसमें गंदगी नजर आती है, तो सर्वप्रथम वह उसकी साबुन से भली भाँति धुलाई करता है। फिर जब परिधान बिलकुल में मल विहीन व स्वच्छ हो जाता है, तब वह रँगने का कार्य प्रारंभ करता है। साधना की फलोत्पादकता के संबंध में भी यही बात समझी जानी चाहिए। वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की मनोभूमि पर निर्भर करती है। जिस व्यक्ति की मनोभूमि जितनी उर्वर और झाड़-झंखाड़ों, कषाय-कल्मषों से रहित होती है, उसकी उपासना उतनी ही जल्दी फलवती होती है, किंतु जिसका अंतः कारण कषाय-कल्मषों से भरा, अनुर्वर, ऊबड़-खाबड़ पथरीला होता है, उसकी उपासना आरंभ में होती है। बाद में जब वह धवल और निरभ्र आकाश की तरह साफ हो जाता है, तो उपासना का परिमाण भी सामने आने लगता है। अस्तु अध्यात्म मार्ग के पथिकों की उपासना में फल-प्राप्ति की उतावली न करने का शास्त्रकारों ने परामर्श दिया है। ऐसे कई उदाहरण देखने में आते हैं, जिसमें लंबे काल की साधना के पश्चात् भी फल न प्राप्त होने के कारण साधक उपासना छोड़ बैठने की अधीरता बरतते हैं कि ऐसा क्यों व किस कारण हुआ। ऐसा ही एक प्रसंग महान गायत्री उपासक विद्यारण्य स्वामी का है। उन्होंने लंबे समय तक निष्ठापूर्वक गायत्री के 23 पुरश्चरण किये, किंतु लाभ नगण्य जितना दिखाई पड़ा। इससे क्षुब्ध होकर उन्होंने गायत्री-उपासना छोड़ दी। उपासना का सत्परिणाम बस इतना ही दिखाई पड़ा कि उनके मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया। इससे उनने ग्रह-त्याग कर यायावरी अपना ली और दुखियों-पीड़ितों का दुःख कम करने में उनकी सहायता करने लगे। उनके इस परोपकार वृत्ति युक्त जीवन आरंभ होने के कुछ माह उपराँत एक दिन माँ गायत्री उनके सम्मुख प्रकट हुई वर माँगने को कहा। विद्यारण्य मुनि बड़े अचकचाये। असमंजस में पड़ कर उन्होंने पूछा “माते। अब तो कोई कामना मेरी शेष रही नहीं सब विगलित हो गई। यदि सचमुच ही आपने मुझ पर अनुग्रह किया है, तो सिर्फ इतना बता दीजिए कि मेरी अब तक की उपासना निष्फल क्यों चली गई अब जबकि मैंने उपासना बिलकुल छोड़ दी है, तब आपने दर्शन क्यों दिये ? यह मेरी समझ में नहीं आया।” “माँ आद्यशक्ति की वाणी फूट पड़ी तुम्हारे 24 महापातक थे। 23 पुरश्चरण से तुम्हारे 23 जन्मों के पाप धुल गये ओर जब तुमने सेवा जैसा पुण्य कार्य आरंभ कर 24 वें जन्म के पाप को भी धो लिया, तो अब में तुम्हारे समक्ष हूँ। तुमने तनिक उतावली कर दी। इसलिए उस दौरान तुम्हें मेरी कृपा नहीं मिल पायी।” विद्यारण्य स्वामी का समाधान हो चुका था। कुछ ऐसा ही घटनाक्रम माधवाचार्य के साधनात्मक जीवन के संबंध में भी घटित हुआ था।

इस प्रकार उपासना की सफलता में कितने ही ऐसे सत्य हैं, जिन्हें उसकी परिपक्वता के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। पातंजलि योगदर्शन के ‘अभ्यास-वैराग्य’ प्रकरण में सफलता के तीन सोपान गिनाये गये हैं - (1) - दीर्घकाल अर्थात् जब तक साधना से सिद्धि न मिल जाय, तब तक उसे निष्ठापूर्वक करते रहना चाहिए। (2) नैरन्तर्येण या नित्य-नैमित्तिकत्ता। इसके अंतर्गत उस प्रमाद से बचने को सलाह दी गई है, जिसमें उपासक दस दिन उपासना करके चार दिन आराम करने की बात सोचते हैं। इसके उपासना निष्फल जाती है। उसे नित्य-नैमित्तिक क्रिया की तरह प्रतिदिन आस्था पूर्वक किया जाना चाहिए। (3) सत्कारासेवित् अर्थात् चित्त की एकाग्रता। उपासना के दौरान मन के भटकाव को रोककर ध्यान आराध्य देव पर लगाये रहना और संपूर्ण उपासना काल में उसी का चिंतन-मनन करना-इसे उपासना को सफलता का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

इन सब बातों को ध्यान में रख कर यदि उपासना क्रम निरंतर जारी रखा जाय, तो कोई कारण नहीं, कि सामान्यजन भी उस विभूति से वंचित रह जायें, जिसे सिद्ध संत इसके माध्यम से अब तक हस्तगत करते आयें हैं।


राम राज्य (Kahani)

राम राज्य श्रेष्ठ सामाजिक व्यवस्था का एक आदर्श माना जाता है। उसका आधार भी यही पारिवारिक भाव था। श्री राम लक्ष्मण बन को गये, तो भाई भरत उनके ट्रस्टी के रूप में नंदी ग्राम में रहे। सारी अयोध्या इसे परिवार की ही घटना मानती रही तथा नागरिक गण अपनी जप, तप, साधना में उसी मनोयोग से लगे रहे, जिस भाव से भारत जी लगे थे। उस पृष्ठभूमि पर ही राम राज्य का भवन खड़ा किया गया था।

श्रीराम वन में मीलों के बीच रहे, बानर-भालुओं के साथ, उन्होंने उन सबके साथ परिवार का ही भाव बनाये रखा। सीता जी को जब लंका से मुक्त करके लाया गया, तो विभीषण उन्हें राजकीय ढँग से डोली में पर्दे में ला रहे थे। तब भगवान् श्रीराम ने कहा-”यह सब बालक अपनी माँ के दर्शन करने को आतुर हैं। सीता जी को पैदल इनके बीच से लाया जाय, ताकि इनके स्नेहभाव का पोषण हो सके।”

जब श्री राम अयोध्या लौटे तो साथ आये बानरों का परिचय उन्होंने अपने परिजनों के ही ढंग से दिया। उन्हें ‘भरतहुँ ते मोहि अधिक पियारे” कहकर पारिवारिकता का बोध सबको कराया।

राज्य सिंहासन पर बैठते ही उन्होंने मंत्रियों, ऋषियों, विचारकों तथा नागरिकों के बीच पहली घोषणा पारिवारिक स्तर पर ही की। जिन्हें पारिवारिक अधिकार देते हुए कहा-

“जो कछु अनुचित भाखहुँ भाई। तौ बरजेहु मोहि भय बिसराई॥

ऐसे स्नेहसिक्त पारिवारिक भाव ने ही समाज व्यवस्था को उसके स्तर तक पहुँचा दिया कि आज तक विश्व भर में राम राज्य श्रेष्ठतम व्यवस्था का पर्याय बना हुआ है। विश्व में और भी जहाँ आदर्श स्थापित हुए, हैं वहाँ पारिवारिक भावना ही मूल में कार्य करती रही है।


ऐसे इतिहास को बदलना होगा

भारत में गिरोह बंद डाकुओं का जिन दिनों दौरा-दौरा था, उन दिनों ढेरों छोटे-छोटे सामंती रजवाड़े बन गये थे। सभी ने राजा की उपाधि धारण कर ली थी। इनकी लूट-खसोट से जनता संत्रस्त थी। सामने आकर तो उस अनीति का ब्यौरा कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी, हर पीठ पीछे मन-ही-मन सभी कोसते थे इतने पर भी प्रशंसा सुनने की ललक इन सबको रहती थी उसकी पूर्ति के लिए एक चारण समुदाय ही बन गया था। वे प्रशंसा में कविता बनाते और जोशीली मधुर वाणी में उनके दरबार में उपस्थित होकर सुनाते थे। इसके बदले में उन्हें इनाम भी मिलते। इस इनाम के सहारे ही वे अपना पेट पालत थे।

यह चारण संप्रदाय इतिहासकारों के रूप में भी जन्मा है। पुरस्कार के लालच में उन्होंने आततायी सामंतों की बड़ी-बड़ी प्रशंसाएँ लिखी हैं। किसी-किसी को तो “महान” की पदवी तक दी है। महान शब्द बड़ा ऊँचा है। वह चरित्रवानों, लोकसेवियों, एवं परमार्थ हेतु त्याग-बलिदान करने वालों को ही मिलना चाहिए, पर हुआ कुछ विचित्र है। सिकन्दर जैसे आततायी और क्षुद्र व्यक्ति को इतिहासकारों ने “महान” शब्द से अलंकृत किया है। इतिहासकार प्लूटार्क, डियोडोरस, कर्टियस, एरियन ने सिकन्दर की करतूत का उल्लेख करते हुए भी उसे महान कहा है।

यूनान का सेनापति फिलिप आक्रान्ताओं में प्रसिद्ध हुआ है। उसने अनेकों आक्रमण किये और छोटे-छोटे राज्यों को मटियामेट करके अपने राज्य में मिला लिया। सिकन्दर उसी का बेटा था। पिता ने उसे अपने जैसा पराक्रमी बनाने के अतिरिक्त विद्वान बनाने की भी चेष्टा की। वह तीन वर्ष तक अरस्तू की पाठशाला में पढ़ा भी। युवा होते ही पिता के साथ कई लड़ाइयों में शामिल हुआ और विजयी भी हुआ। इससे उसका अहंकार आसमान छूने लगा।

बाप बेटों में अनबन ही नहीं हुई, मार-काट की भी नौबत आ गई। सिकन्दर की माँ के रहते फिलिप ने दूसरा विवाह कर लिया। उससे एक लड़का भी हुआ। फिलिप उसी को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। सिकन्दर इसे सहन न कर सका और कई सामंतों का गुट बना कर बाप को मरवा डाला । सिकन्दर की माँ ने अपने हाथों दूसरी पत्नी की हत्या कर दी। अब सिकन्दर के हाथ में सत्ता और सेना आ गई। वह अधिकाधिक क्षेत्र का अधिपति होने के लिए व्याकुल होने लगा। एक के बाद दूसरे आक्रमण की योजना चारों ओर छाने लगी।

सबसे बड़ा आक्रमण उसने चेल कबीले पर किया, जिसकी लूटमार से असीम धन मिला और छः हजार प्रजाजनों को गुलाम के रूप में पकड़ कर हाट-बाजारों में बेच दिया। आतंक की चरम सीमा थी। अनेकों छोटे राज्यों पर आक्रमण का तानाबाना बनाने लगा। ऊँचे वेतन और बड़े इनाम देने के प्रलोभन में यूनान भर के योद्धा उसकी सेना में भर्ती होने लगे। जो भी देश जीता, उसी प्रजा को पूरी तरह लूट लिया। हारे हुए देश के युवक-युवतियों को दास-दासियों के रूप में बंदी बनाया और साथियों को सस्ते मोल बेच कर अपना खजाना भरा और जो साथ में थे, उन्हें अनुग्रहीत किया, पराजित देश में कत्लेआम कराया और लाखों घर बरबाद किये।

सिकन्दर ने भारत पर भी हमला किया। उसके पास बहुत अधिक सेना थी। उसने सैनिकों को लूट का बहुमूल्य माल मिलने का सब्जबाग दिखाया। सबसे बड़ा मुकाबला राजा पुरु के साथ हुआ। मौसम, वर्षा का और नदियाँ उफन पड़ने के कारण उसे मुँह की खानी पड़ी। कई मोर्चों पर उसे गहरे घाव लगे और सेना के पाँव उखड़ गये। सिकन्दर ने जो प्रदेश जीते थे, उन सब में बगावत हुई और एक-एक करके सभी हाथ से निकल गये।

यह है सिकन्दर की करतूत फिर भी चारण इतिहासकारों ने न जाने उसमें किस महानता को देखा और “महान” की पदवी से अलंकृत किया। हमें ऐसे इतिहास को भी बदल डालना चाहिए।


देश को हार से बचा लिया (Kahani)

हल्दीघाटी के संग्राम में जब लड़ते-लड़ते महाराणा प्रताप की सेना खूब थकने लगी और स्वयं महाराणा प्रताप के प्राण संकट में पड़ गये तो सादड़ी के वीर झाला सरदार ने महाराणा को हटाकर स्वयं उनकी जगह पर उनका मुकुट धारण कर चँवर, मोर, छत्र, आदि राज चिन्हों के साथ हाथी पर चढ़कर यवनों को दिखा दिया कि महाराणा समर से हटे नहीं हैं। अपने स्वामी के प्राण बचाने में अपने प्राण निछावर कर दिए, लेकिन देश को हार से बचा लिया।


“मातृ-वंदन”


मातृ-वंदन (Kavita)

आप ही माँ! धड़कनें हैं, आप ही माँ ! प्राण हैं। आप हैं माता हमारी, हम सभी संतान हैं॥1॥

माँ ! रगों में दौड़ता जो, आपका ही रक्त है। आपका स्वर मुखर होता, साँस में हर वक्त है॥

आपके स्नेहिल-स्वरों की, सुन रहे हम तान हैं। आप ही माँ! धड़कनें हैं, आप ही माँ! प्राण हैं॥2॥

आपका अंचल सुखद, लगता अधिक, माँ-स्वर्ग से। आपकी गोदी, हमें प्रिय है अधिक, आपवर्ग से॥

भाव-संवेदन जगाते आपके ही गान हैं॥ आप ही माँ! धड़कने हैं, आप ही माँ! प्राण हैं ॥3॥

आपका संस्पर्श, जैसे छू लिया हो फूल ने। आपकी बांहें, सहारा ज्यों दिया, दो कूल ने॥

आपकी बांहें, हमें तो अभय का वरदान हैं। आप ही माँ! धड़कनें हैं, आप ही माँ प्राण हैं॥4॥

माँ बताओ! आपको फिर छोड़कर जायें कहाँ। और ऐसा स्नेह-संवेदित-हृदय पायें कहाँ॥

क्या पता हमको, कहीं भी और क्या भगवान हैं। वक्त आने पर लजायेंगे नहीं, हम दूध को।

आप पायेंगी, सदा सद्कर्म-रत, निजपूत को॥ आप पर सब हो समर्पित, बस यही अरमान हैं॥

आप ही माँ! धड़कनें हैं, आप ही माँ ! प्राण हैं॥6॥

-मंगल विजय


शिष्य का निवेदन


गुरुदेव! तुम्हें हमने, मन में बसा लिया है (Kavita)

गुरुदेव! तुम्हें हमने, मन में बसा लिया है। एक शक्तिपीठ अंतरतम, को बना लिया ॥

तुम ही हो गायत्री माँ, तुम ही हमारे गुरुवर। तुम से अलग न दीखा, साक्षात् कोई ईश्वर॥ संपूर्ण समर्पण कर, जीवन सफल किया॥

अब तो तुम्हीं हृदय धन, यह चेतना तुम्हीं हो। चिन्तन चरित्र में तुम, सद्भावना तुम्हीं हो। व्यक्तित्व ही मिशनमय, कर आपने दिया है॥

तुमने हमें जनम भर, सद्ज्ञान ही सिखाया। मोड़ा अनीति पथ से, सद्मार्ग पर चलाया। आत्मा का ज्ञान देकर, अर्जुन बना लिया है।

छोटे से दीप का ही, हम है। प्रकाश-लेकिन। हम कर सकेंगे सबके अज्ञान का संघन तम॥ इसमें अखण्ड ज्योति का घी मिला लिया॥

देंगे संदेश गुरु का-जाएँगे, जहाँ भी हम। निष्ठा नहीं चुकेगी, होगी न आस्था कम॥ घर-घर भ्रमण करेंगे-बीड़ा, उठा लिया है।

पूछो जो घर कहाँ है-है शाँतिकुँज अपना। क्या दे गये पिता श्री-जगहित में सदा तपना। जिसने ग्रहण किया यह, जीवन वही जिया है॥

अब शक्ति भर करें, गुरुवर काम आपका ही। साफल्य जिंदगी का-यह, पूर्ति साधना की। अगले जन्म के हित भी-अमृत, यही पिया है॥

-भावुक शिष्य


जल एक जीवन मूरि

जल की व्यापकता और सुलीता के कारण हमारी दृष्टि उसके गुणों की ओर नहीं जाती । वस्तुतः दुनिया में पानी से बढ़कर दूसरी कोई औषधि नहीं। जल को जीवन कहा गया है। यह नामकरण उसके गुण को देखकर ही किया गया था। शरीर के पाचन, रक्त परिभ्रमण रस-स्राव स्नायु संचालन एवं सभी जैविक कार्यों में जल का अमूल्य योगदान है। यदि सही ढंग से जल का सेवन किया जाय तो बीमार पड़ने, एवं डाक्टरों के पास दौड़ने जैसा झंझट ही न पड़े।

शरीर शास्त्रियों के अनुसार काया का दो तिहाई भाग जल से ही भरा है। यह शरीर के 61 से अधिक प्रतिशत भाग को बनाता है। रक्त का 83 प्रतिशत भाग पानी ही है, जो आक्सीजन के अतिरिक्त रोगों से जूझने वाली कोशिकाओं की फौज को वहाँ पहुँचाता है जहाँ उसकी आवश्यकता होती है। खून के जलीय अंश के कारण ही रोग प्रतिकारक कण एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच पाते हैं। माँस पेशियों के द्रव्य में 75 प्रतिशत और हड्डियों की मज्जा में 22 प्रतिशत पानी है, जिसके कारण जोड़ों में चिकनाहट प्रतीत होती है और भीतरी अंग अवयव आपस में चिपकते नहीं, चमड़ी सूखती नहीं । शरीर की सूक्ष्मतम कोशिकाओं के भीतर विद्युत संवहनशीलता के आधार इलेक्ट्रोलाइट्स सोडियम व पोटेशियम है, जिनका उचित संतुलन पानी में घुले हुए लवणों के कारण ही स्थापित हो पाता है।

यह कथन कि मस्तिष्क निरंतर पानी पर तैर रहा है विलक्षण सा प्रतीत होता है। किंतु मस्तिष्क की सभी 15 विलियन कोशिकायें पानी के कणों से ही विनिर्मित हैं और उनका कुल परिमाण खोपड़ी की क्षमता का 60 प्रतिशत तक होता है। वसा ऊतकों में जल 20 प्रतिशत होता है। यहाँ तक कि सूखी दीखने वाली हड्डियों में 25 प्रतिशत और धारीदार पेशियों में 80 प्रतिशत जल ही होता है। शरीर की सभी कोशिकाएँ जल में डूबी रहती हैं ताकि व नम रह सकें जिससे रुधिर वाहिकाओं और कोशिकाओं के बीच पदार्थों को मार्ग में आने-जाने के लिए सुगम कर सकें। इसके द्वारा ही उपयोगी अंश फेफड़ों में और अनुपयोगी अंश किडनी में चला जाता है। इस प्रकार जल भोजन को पेट के अनुकूल बनाने से लेकर रक्त बनने की प्रक्रिया में सहायक है।

मात्र संरचना में ही नहीं वरन् शरीर की आँतरिक क्रियाओं में भी जल का महत्वपूर्ण स्थान है। यह शरीर में उत्पन्न दूषित पदार्थ की साँद्रता कम कर रक्त को पतला करके उसमें ओजस्वी कणों की वृद्धि करता है। सड़े-गले पदार्थों को घुलाकर, त्वचा, मूत्र तथा श्वास के द्वारा बाहर निकाल फेंकता है। शरीर के दूषित पदार्थ जब बाहर निकल जाते हैं तो रक्त परिशोधन की प्रक्रिया को बल मिलता है। भोज्य पदार्थ को गुर्दा के फिल्टर वाले पहले भाग से छन-छन कर दूसरे भाग वाले नली तथा लघु नलिकाओं के लंब मार्ग से गुजरना पड़ता है। इन्हीं मार्गों से उच्छिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में जल गुर्दों की मदद करता है। संधि तथा आँतरिक अंगों के लिए जल स्नेहक (लुव्रिकेटर) की भूमिका निबाहता है। ताप नियंत्रक के रूप में शरीर से ऊष्मा हटाने में सहायक होता है। ज्यों ही शरीर गर्म हुआ कि अधिक रक्त त्वचा की ऊपरी सतह पर आ जाता है। उनके द्वारा प्रेषित स्वेद बूँदें रोम कूपों से वाष्पन क्रिया हेतु शरीर से बाहर जाती हैं। इसमें शरीर वातानुकूलित अर्थात् गर्मी में ठंडा एवं सर्दी में गरम होता है।

जल का उपयोग जितना अनिवार्य है उतना ही उसका कम प्रयोग अनेकानेक रोगों को जन्म देने वाला भी। चूँकि यह शरीर जल द्वारा ही संचालित है अतः इसके न्यूनतम सेवन से इसके अंदर अनेक गड़बड़ियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। शरीर में ऐंठन, मल उत्सर्जन में रुकावट, पेट दर्द, आदि का कारण जल की न्यूनता ही है ऐसे व्यक्ति प्रायः परेशान से रहते हैं एवं चिकित्सा के लिए डाक्टरों के पास रंग-बिरंगी गोलियों, चूर्ण आदि का सेवन करते हैं और मूल कारणों को न जानने के कारण कई अनेक रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। पेट में भारीपन के कारण शरीर में सुस्ती छाई रहती है, शरीर कमजोर हो जाता है और चेहरा निस्तेज।

ये कभी शरीर में उत्पन्न हो ही नहीं, इसके लिए प्रकृति ने मनुष्य के अनुकूल खाद्य पदार्थों में जल के अंश को संतुलित बनाया है। जिसे यदि प्राकृतिक रूप में लिया जाय तो कमी पूरी हो सकती है। “न्यूट्रिशन एण्ड डायट इन हेल्थ एण्ड डिजीज” के अनुसार हमारे भोज्य पदार्थों। में सत्तर प्रतिशत नमी होती है। बिना जलीय अंश के हम भोज्य पदार्थों का ग्रास गले से नीचे उतार नहीं पाते। ताजी सेम में 81 प्रतिशत और सलाद वर्ग के सब्जियों में 95 प्रतिशत पानी होता है। शुद्ध दूध में भी पानी की मात्रा अस्सी प्रतिशत होती है। भोजन के अन्यान्य पदार्थों में जलीय अंश कुछ न कुछ होता ही है। यहाँ तक कि शरीर को प्राप्त, होने वाले कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन के एक-एक ग्राम में क्रमशः, आठ, 1.06.41 ग्राम जल होने का अनुमान वैज्ञानिकों का है कुछ लोगों के मन में यह धारणा बन गई है कि चाय, कॉफी जैसे पेय पदार्थों से जल की कमी पूरी की जा सकती है। किंतु इसके सेवन से कैफीन नामक उत्तेजक जहरीला पदार्थ शरीर से जल की मात्रा को घटा देता है।

इस कमी को पानी पीकर दूर किया जा सकता है। प्यास प्रकृति की ओर से शरीर को एक संकेत मात्र है कि अब पानी पीना निताँत आवश्यक है। लेकिन इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि जब प्यास लगे तभी पानी पिया जाय। पानी तो पचाने के लिए, पचे को आत्मसात् करने के लिये ग्रहण किया जाता है। सामान्यतः व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम 8 से 10 गिलास पानी पीना चाहिए। इससे कम पानी पीना एक तरह रोगों को आमंत्रण देना है। प्रायः लोग पानी नहीं पीते और विशेषतः गर्मियों में, जबकि शरीर का बहुत सा पानी पसीने के रूप में निकल जाया करता है। ऐसे असावधानी के कारण लोग प्रायः उदर रोगों के शिकार हो जाते हैं।

कुछ लोग मोटापा कम करने, वजन घटाने के लिए पानी का प्रयोग कम करते हैं। जबकि पानी की पर्याप्त मात्रा शरीर की चर्बी से उत्पन्न बेकार जहरीले पदार्थों को बाहर निकाल देती है। इससे सही अर्थों में वजन घट जाता है।

शास्त्रों में लिखा है “भोजन के मध्य अधिक जल ग्रहण करना विष के समान है।” भोजन करते समय या तुरंत बाद एक साथ अधिक पानी पीने की प्रवृत्ति अच्छी नहीं समझी जाती। इससे भोजन को ठीक-ठीक चबा पाने की प्रक्रिया संभव नहीं हो पाती इससे पहले ही वह पेट में चला जाता है। भोजन करते समय बीच-बीच में थोड़े जल के उपयोग की सलाह केवल उस समय दी जा सकती है जब खाद्य पदार्थ अच्छी तरह चबाये नहीं जा सकते। यदि भोजन खूब चबाकर लिया गया हो तो वह स्वतः पानी जैसा तरल हो उठता है। उसे कंठ से नीचे उतारने के लिए पानी की कतई आवश्यकता नहीं । भोजन से 1/2 से लेकर 1 घण्टा बाद ही जल लिया जाना चाहिए।

सामान्यतया प्यास लगने पर ही लोग पानी पीते हैं परंतु पानी का सेवन कभी-कभी बिना प्यास के भी करते रहना चाहिए। कफ, प्रकृति वालों को तथा अधिक तरल भोजन करने वालों को प्यास कम लगती है। किंतु शरीर में मल जमा होने से जो गर्मी पैदा होती है उसको शीतल करने के लिए जल अवश्य लेना चाहिए। इसलिए प्यास न होने पर भी थोड़ी मात्रा में कई बार पानी लेने की आदत डालने की सलाह स्वस्थ विज्ञानी देते हैं

शरीर अपने विषों का निष्कासन पानी के माध्यम से करता है। इस प्राकृतिक प्रक्रिया में व्यक्ति का सहयोग पानी पीकर होता है। अँतड़ियों के लिए ऊषापान शरीर की निःसरण क्रिया को स्वाभाविक बनाता है। यदि प्रातः जल लेते समय मिचली आने लगे तो मात्रा को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे आदत डालनी चाहिए। इसके द्वारा गुर्दों। की मदद उनकी नलिकाओं की सफाई में अच्छी तरह हो जाया करती है। प्रातः कालीन जल पाचन क्रिया तथा रक्त के अभिसरण में महत्वपूर्ण भूमिका निबाहता है।

जल को जीवन मुरि कहा गया है।, यह औषधि है, गुणों की दृष्टि से अमृत प्रकृति प्रदत्त अमूल्य संपदा है। भली भाँति प्रयुक्त होने पर यह जीवन रक्षक तथा पोषक सिद्ध हो सकती है। आवश्यकता है इसके महत्व को समझकर सही रीति से इसका सदुपयोग करने की ? जिससे जन साधारण बिना खर्च के शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ होते रह सकते हैं।


आम और बाँस (Kahani)

एक जंगल में पास ही बाँसों का झुरमुट था एवं पास ही आम का पेड़ । बाँस ऊँचा था, आम छोटा। एक दिन बाँस ने कहा-” देखते नहीं, मैं कितना बड़ा हो चला, कितनी तेजी से बढ़ा। एक तुम हो, के सौभाग्य को सराहा, पर अपनी स्थिति पर भी असंतोष व्यक्त नहीं किया। समय बीतता गया। बाँस पक कर सूख चला, किन्तु आम की डालियां फलों से लदी और वह अधिक झुक गई। बाँस फिर इठलाया- “देखते नहीं, मैं सुनहरा हो चला और बिना पत्तियों के भी दूर-दूर से कितना सुन्दर दीखता हूँ । एक तुम हो, जिसे फलों से लदने पर भी नीचा देखना पड़ा रहा है।” आम ने फिर भी अपने संबंध में कुछ नहीं कहा। बाँस की सराहना भर कर दी । एक आया यात्रियों का झुँड । ठहरने के लिए आश्रय की तलाश थी, सो फलों से लदा छायादार आम वृक्ष सबको सुहाया। डेरा डाल कर वे वहाँ रात्रि विश्राम करने लगे।

जरूरत आग की पड़ी, भोजन पकाने के लिए। नजर दौड़ाई, तो पास में ही सूखा बाँस पड़ा पाया, काटा जलाना आरंभ कर दिया। बाँस बड़बड़ाने लगा, पर आम ठहरे यात्रियों को सुख पाते देखकर संतोष की साँस लेता रहा।


विशेष धारावाहिक लेखमाला-17 परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य - जिनने सिखायी हमें खोज सद्गुरु की

सूर्य में कितना ही प्रकाश क्यों न हो, पर यदि आँख की पुतली काम न करे तो समझना चाहिए कि सर्वत्र अंधकार ही अंधकार है। दिन या रात में कभी उसका अंत न होगा। यही बात शिष्य के संदर्भ में भी सच है। गुरु कितना भी समर्थ व योग्य क्यों न हो, परंतु यदि व्यक्ति के अंतराल में शिष्यत्व मौजूद नहीं है तो गुरु की योग्यता कारगर न हो सकेगी। गुरु बीज बोता है खाद पानी की व्यवस्था जुटाता है, लेकिन भूमि की उर्वरता भी चाहिए। अन्यथा बीजों का ढेर खाद-पानी का जखीरा ऊसर बंजर जमीन में यों ही व्यर्थ चला जाता है।

परम पूज्य गुरुदेव जिन्हें हम सभी ने सद्गुरु के रूप में पाया है उनके ज्ञान और तप से प्रकाशित-अनुप्राणित हुए है। उनकी प्राण-ऊर्जा से घोषित परिचालित हैं। तनिक उनसे भी तो पूछें-भला वे अपने को किस रूप में पहचानते थे ? प्रायः सभी के मनों में उठने वाली इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए एक प्रवचन में उन्होंने कहा था- “मैं एक समर्पित शिष्य हूँ, गुरु के हाथों का यंत्र एक कठपुतली मात्र । मेरे गुरु ने जब जो कराया तब वह कर लिया जैसे रखा वैसे रहे। मेरी अपनी भी कोई इच्छा है, यह कभी ख्याल आया ही नहीं। अपने जीवन की पोली बाँसुरी में गुरु के स्वर बजते रहे।”

सद्गुरु की प्राप्ति अद्भुत अनुदान है, एक अजस्र सौभाग्य। पर उनके लिए जो खुद को शिष्य के रूप में ढाल सके। स्वयं की क्षुद्रता को गुरु की गुरुता में विसर्जित कर सके। यों गुरु की ढूंढ़-खोज में भटकने वाले सैकड़ों हजारों है। लेकिन उनकी भी संख्या कम नहीं जिनने रामकृष्ण परमहंस के पड़ोस में रहते हुए उन्हें पगला ब्राह्मण कहकर तिरष्कृत किया था। महर्षि दयानंद के अति निकट रहते हुए भी कुछ रुपयों के लिए जहर देने वाले तथा थोड़ा सा वैभव पाने के लालच में ईसा को शूली चढ़वा देने वाले भी इतिहास के काले पन्नों में दर्ज हैं।

इन सबके जीवन भी लोकोत्तर महामानवों के संपर्क में आए। चाहते तो स्वयं की पात्रता विकसित कर ये सभी स्वयं को धन्य कर लेते, पर ऐसा नहीं हो सका। होता भी कैसे ? सद्गुरु को पहचानने-अपनाने के लिए अलौकिक दृष्टि चाहिए और ऐसी दृष्टि सिर्फ शिष्य में होती है। सूफी फकीर शेख फरीद के जीवन की एक घटना है। उन दिनों वह किशोर वय के थे। घूमते-फिरते वे एक पेड़ के पास जा पहुँचे, जहाँ एक साधु बैठा ध्यान कर रहा था। उसे झकझोर कर उठाते हुए उन्होंने पूछा-क्यों बाबा। हमें भी भगवान से मिलाएं। साधु ने उत्तर दिया बेटा भगवान से तो गुरु मिलाता है। तो बता मेरा गुरु कौन है ? साधु ने उत्तर दिया मैं पहचान बताए देता हूँ तू ढूँढ़ लेना। फरीद ने कहा- ठीक है तू पहचान ही बता। साधु बताने लगा तेरे गुरु एक पेड़ के नीचे बैठे होंगे। उनके चेहरे पर प्रकाश का वलय होगा। आँखें तेज पूर्ण होंगी शरीर से सुगंध निकल रही होगी। साधु की बात समाप्त होते ही शेख फरीद खोज में निकल पड़े। जैसे-जैसे दिन बीतते गए अभीप्सा गहरी होती गई। घटना को बीस वर्ष बीत गए। हारकर फरीद वापस लौट चले। वापस लौटने पर देखा एक पेड़ के नीचे एक साधु बैठा है। उसके चारों ओर प्रकाश वलय, भीनी सुगंध एक-एक करके सारे लक्षण मिल गए। खुशी के मारे वह उसके चरणों पर लोट-पोट हो गए। साधु ने प्रसन्नता से उनकी पीठ पर हाथ रखा उन्होंने उठकर उस साधु के चेहरे की ओर देखा। अरे यह क्या? यह तो वही साधु जिसने गुरु के लक्षण बताये थे। शेख फरीद ने पूछा “बाबा ! बीस वर्ष तक भटकते क्यों रहे ?” पहली बार मेरे पास एक कौतुकी, उद्धत लड़का फरीद आया था। अबकी बार बीस वर्ष की कठोर तपस्या से निखर कर समर्पित शिष्य फरीद आया है। और बेटे ! गुरु केवल शिष्य को मिला करते हैं। जैसे ही तुम शिष्य बन गए हम तुम्हें मिल गए।

गुरु की प्राप्ति इतनी कठिन, लेकिन पूज्य गुरुदेव को उनके समर्थ गुरु अनायास ही मिले, वह भी घर बैठे? इस पहेली को सुलझाते हुए गुरुदेव के शब्द हैं-”इसके लिए लंबे समय से जन्म-जन्मांतरों में पात्रता अर्जन की धैर्यपूर्वक तैयारी की गई। उतावली नहीं बरती गई । बातों में फँसा कर किसी गुरु की जेब काट लेने जैसी उस्तादी नहीं बरती गई, वरन् यह प्रतीक्षा की गई कि अपने जीवन की बूँद को किसी पवित्र सरिता में मिलाकर अपनी हस्ती का उसी में समापन किया जाय। किसी भौतिक प्रयोजन के लिए इस सुयोग की ताक झाँक नहीं की जाय वरन् बार-बार यही सोचा जाता रहे कि जीवन संपदा की श्रद्धाँजलि किसी देवता के चरणों में समर्पित करके धन्य बना जाय।

उनके अन्तःकरण से निकली ये भाव तरंगें ही हिमालयवासी महान ऋषि सत्ता को उनके घर तक खींच लाई। यद्यपि आयु की दृष्टि से उस समय वे सिर्फ पंद्रह साल के थे। लेकिन मनोभूमि का निर्माण पर्याप्त लंबे समय तक व्रतशील रहकर किया गया था। संकल्प धैर्य, और श्रद्धा का त्रिविध सुयोग अपनाये रहने पर मनोभूमि ऐसी बनती है कि अध्यात्म के दिव्य अवतरण को धारण कर सके। यह पात्रता ही शिष्यत्व है। समय पात्रता विकसित करने में लगता है, गुरु मिलने में नहीं। एकलव्य के मिट्टी के द्रोणाचार्य असली की तुलना में अधिक कारगर सिद्ध होने लगे थे। कबीर को अछूत होने के कारण जब रामानंद ने दीक्षा देने से इनकार कर दिया तो उन्होंने एक युक्ति निकाली। काशी घाट की जिन सीढ़ियों पर रामानंद नित्य स्नान के लिए जाया करते थे उन पर भोर होने से पूर्व ही कबीर जा लेटे। रामानंद अँधेरे में निकले तो उनका पैर लड़के के सीने में जा पड़ा। साथ ही पात्रता की परीक्षा भी हो गयी। रामानंद ने कबीर को अपना शिष्य बना लिया।

पात्रता की परीक्षा पास किये बगैर सद्गुरु का मिलन ही नहीं होता। किसी कारणवश भी हो जाय तो कुपात्र को रिक्त ही लौटना पड़ता है। स्वाभाविक है इतने घोर परिश्रम और कष्ट सहकर की गई कमाई ऐसे ही किसी कुपात्र को विलास, संग्रह, अहंकार अपव्यय के लिए हस्ताँतरित नहीं की जा सकती। देने वाले में इतनी बुद्धि होती है कि लेने वाले की प्रामाणिकता किस स्तर की है और जो दिया जा रहा है उसका उपयोग किस कार्य में होगा। जो लोग इस कसौटी पर खोटे उतरते हैं, उनकी दाल नहीं गलती।

विचित्र, विलक्षण और बहुधा कठोर होती हैं ये परीक्षाएँ। औसपेंसकी ने गुरु जिएफ के बारे में लिखा है कि वह किसी नये आने वाले के साथ बहुत कटु व्यवहार किया करते थे। यदि वह प्रसन्नतापूर्वक सब कुछ सहन कर जाता तो उनके द्वारा कराई जाने वाली गोपनीय साधनाओं का अधिकारी होता। एक बार उनके किसी पुराने शिष्य ने पूछा-आपका व्यक्तित्व इतना प्रेममय है फिर आप इतना कठोर कैसे हो जाते हैं। गुरजिएफ का जवाब था कठोर कहाँ होता हूँ-मैं तो पत्थरों में हीरे छाँटता हूँ। हीरे छाँटकर उन्हें तराशने लगता हूँ, पत्थरों को फेंक देता हूँ रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद के सामने उस समय अपनी समस्त सिद्धियाँ देने का प्रस्ताव रखा, जिस समय वे और उनका परिवार एक-एक अन्न कण के लिए तरस रहे थे। ऐसे में भी विवेकानंद ने उपेक्षा के स्वरों में कहा था, उन्हें ईश्वरीय प्रेम चाहिए तुच्छ सिद्धियाँ नहीं। विजय कृष्ण गोस्वामी ने शिष्य बनने के लिए उत्सुक एक व्यक्ति से कहा था बारह वर्ष तक लगातार गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करो तेरहवें वर्ष मेरे पास आना। एक अन्य व्यक्ति के द्वारा कारण पूछे जाने पर उन्होंने कहा-जिसमें बारह सालों का धैर्य नहीं वह मेरा शिष्य नहीं बन सकता। गुरुदेव के अपने जीवन में ऐसे एक नहीं वह मेरा शिष्य नहीं बन सकता। गुरुदेव के अपने जीवन में ऐसे एक नहीं अनगिनत अवसर आये जब उन्हें कठोर से कठोरतम स्थिति से गुजरना पड़ा। इन परीक्षाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने एक स्थान पर लिखा है-लोग गुरु को, भगवान को अपनी इच्छापूर्ति का साधन मान बैठे हैं। उसे मनमर्जी से चलाना चाहते हैं। पर साधनात्मक जीवन में यह विडंबना संभव नहीं। इसकी शुरुआत ही सद्गुरु में अपनी समस्त इच्छाएँ विसर्जित करने से होती हैं। मेरे गुरु ने मुझे धोबी की तरह पीट-पीट कर धुला है, धुनिए की तरह धुना है।

समूचे जीवन इस तरह की परीक्षाओं का क्रम अनवरत चलता रहा। पर उनके अस्तित्व से एक ही ध्वनि झंकृत होती रही। गुरु सो गुरु, आदेश सो आदेश, अनुशासन सो अनुशासन, समर्पण सो समर्पण। मार्गदर्शक पर विश्वास किया उसे अपने आपको सौंप दिया तो उखाड़-पछाड़ क्रिया में तर्क संदेह क्यों?” एक अन्य स्थान पर उनके शब्द हैं? “हमने अपना शरीर, मन, मस्तिष्क, धन और अस्तित्व, अहंकार सब कुछ मार्गदर्शक के हाथों बेंच दिया है। हमारा शरीर ही नहीं अंतरंग भी उसका खरीदा है। अपनी कोई इच्छा शेष नहीं रही। भावनाओं का समस्त उभार उसी अज्ञात शक्ति के नियंत्रण में सौंप दिया।”

अस्तित्व का ऐसा समर्पण लगता बड़ा भयप्रद है। जब मैं नहीं तो मेरा नहीं। तब फिर दुनिया में जीने का क्या प्रयोजन ? प्रत्यक्ष में घाटा ही घाटा दिखने वाले इस कारोबार के बारे में पूज्य गुरुदेव से उनके निजी अनुभव सुनना चाहें तो उनका अभिव्यक्ति है-”यह घाटे का नहीं असंख्य गुने लाभ का व्यापार है। जिसके हाथों हमने अपने शरीर और मन को बेचा। बदले में उसने अपने आप को हमारे हाथ सौंप दिया। हमारी तुच्छता जिसके चरणों में समर्पित हुई उसने अपनी महानता हमारे ऊपर उड़ेल दी। बाँस के टुकड़े ने अपने को पूरी तरह खोखला करके बंसी के रूप में प्रियतम के अधरों का स्पर्श किया तो उसमें से मनमोहक राग रागनियां निकलने लगीं।

“ अपनी इच्छा का तब अस्तित्व ही नहीं बचा। उसी की हर इच्छा जब अपनी इच्छा बन गई तो वह अद्वैत स्थिति ब्रह्मा और जीव के मिलन में आने वाले ब्रह्मानंद की अति सुखद लगने लगी। जिसे सच्चे मन से-बिना किसी प्रतिदान की आशा को गहरा आत्म समर्पण किया गया, उसने भी अपनी महानता में उदारता में प्रतिदान में कमी नहीं रहने दी। हमारे पास जो प्रत्यक्ष दीखता है उससे हजार-लाख गुना अप्रत्यक्ष छिपा पड़ा है। यह हमारा उपार्जन नहीं हैं। विशुद्ध रूप से उस हमारी मार्गदर्शक सत्ता का ही अनुदान हैं, जिसके साथ हमारी आत्मा ने विवाह कर लिया और अपना आपा सौंपने के फल स्वरूप उसका सारा वैभव करतल गत कर लिया। इस प्रकार यह समर्पण हमारे लिए घाटे का नहीं नफे का सौदा सिद्ध हुआ।”

यह समर्पण ही वह कसौटी बनी जिस पर बार-बार कसकर उनका शिष्यत्व खरा प्रमाणित हुआ। समर्पण को यदि शिष्यत्व का पर्याय कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। इस यथार्थता का उद्घोष करते हुए उनके अपने शब्द हैं-”हमारे घनिष्ठ स्वजनों को यह जान ही लेना चाहिए कि हमारा प्रत्येक क्रिया कलाप हमारे मार्गदर्शक के संकेतों पर ही चला है। समाज के संबंध में दूसरों के संबंध में हम बहुत बातें बहुत ढंग से सोचते हैं पर अपने बारे में सिर्फ उतना ही सोचते हैं कि हमारा मास्टर हमें जिधर ले चलेगा-उधर ही चलेंगे भले ही मार्ग हमारी रुचि या सुविधा के सर्वथा विपरीत ही क्यों न हो। समर्पण इससे क्रम में संपन्न ही कहाँ होता है। प्रेमिका ने प्रियतम पर अपनी इच्छा थोपी तब तो वह व्यापार व्याभिचार बन गया। हमारी आत्मा इतनी उथली नहीं जो समर्पण करने के बाद अपने मास्टर पर अपनी अभिरुचि का प्रस्ताव लेकर पहुँचे।

परिपूर्ण समर्पण की माँग, ऊपर से कठोर परीक्षाएँ पहली नजर में ऐसा लगता है कि गुरु से क्रूर व्यक्ति इस संसार में और कोई नहीं हो सकता। पर वास्तविकता इससे विपरीत है गुरु से बड़ा प्रेमी-खोजने पर तीनों लोकों में न मिलेगा। जिसे समर्पण कहते हैं-उसकी अनिवार्यता तो इसलिए है कि हम अपने अस्तित्व की शल्य चिकित्सा के लिए भली प्रकार सर्जन के हाथों सौंप सके और जो परीक्षाएँ है, कष्ट कठिनाइयाँ हैं वे और कुछ नहीं , जन्म-जन्माँतर के कुसंस्कारों को निकालने के लिए बरती हुई कठोरता है।

गुरु और शिष्य का संबंध रागात्मक संबंध है। प्रेम संबंधों का उच्चतम आदर्श है। साँसारिक संबंधों में सबसे घनिष्ठ रिश्ते दो ही हैं माँ और शिशु का संबंध पति और पत्नी का संबंध। परंतु इन रिश्तों की भावभूमि शरीर और मन के तल तक सीमित होकर रह जाती है। जबकि गुरु और शिष्य आत्मा की व्यापकता में फलते-फूलते परिपुष्ट होते हैं। इस तथ्य को स्वीकार करते उनके शब्द हैं-”हमारे मार्गदर्शक को हमने बहुत अधिक प्यार है और उनका स्वयं का प्रेम अपने मार्गदर्शक के प्रति हमारी प्रेम साधना को यदि साँसारिक रिश्तों से तौला जाय तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अनन्य पति प्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है। उनकी इच्छा अपनी इच्छा। अपने व्यक्तित्व के लिए कभी कुछ चाहने-माँगने की कल्पना तक नहीं उठी। केवल इतना ही सोचते रहे, अपने पास जो कुछ है। अपने से जो भी संपदाएँ, विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं, वे सभी इस आराध्य के चरणों पर समर्पित हो जाएँ। उनके प्रयोजन में खप जायँ। ऐसे अवसर जब भी जितने भी आएँ हमारे संतोष और उल्लास की मात्रा उतनी ही बढ़ी। गुरुदेव पर आरोपित हमारी प्रेम साधना प्रकाराँतर से चमत्कारी वरदान बनकर ही वापस लौटी है।

उनका हर आदेश हर संकेत ब्रह्म वचन की तरह शिरोधार्य रहा है। माँगना कुछ नहीं देना सब कुछ’ प्रेम के इस अविच्छिन्न सिद्धाँत को दोनों ने ही चरम सीमा तक निबाहा है। दूसरी ओर से क्या किया गया, इसकी चर्चा हमारी वर्णन शक्ति से बाहर है। अपनी ओर से हम इतना ही कह सकते हैं कि भगवान से बढ़कर हमने उनके निर्देशों को शिरोधार्य किया है। अरुचिकर और कष्टकर कोई प्रसंग आया तो भी उसे सहज स्वभाव स्वीकार किया। प्रेम की ऐसी ही रीति-नीति है। हमने अपनी ओर से प्रिय पात्र बनने से कुछ उठा नहीं रखा फलतः गुरुदेव का अनुग्रह अमृत भी अपने ऊपर अजस्र रूप में बरसा हैं। प्रेमतत्व के संवर्धन की साधना गुरु भक्ति से आरंभ होकर ईश्वर भक्ति तक जा पहुँची। हमें इस प्रसंग में इतने अधिक आनंद उल्लास का अनुभव होता रहा है कि उसके आगे संसार का बड़े से बड़ा सुख भी तुच्छ लग सके। अपने गुरु के प्रति बढ़ती हुई हमारी प्रेम भावना आत्म प्रेम और विश्व प्रेम में विकसित होती चली गयी और देखने वालों को उस अंतः भूमिका की प्रतिध्वनि एक दिव्य जीवन के रूप में मिल सकी।”

परम पूज्य गुरुदेव के गुरु प्रेम के आलोक में तनिक हम भी परखें हमारा शिष्यत्व कैसा है? ध्यान रहे मनुष्य जिसे प्यार करता है, उसके उत्कर्ष एवं सुख के लिए बड़े से बड़ा त्याग और बलिदान करने को तैयार रहता है। यदि अंतःकरण में गुरु प्रेम की पवित्र ज्योति जल सकी होगी तो अपने शरीर, मन, अंतःकरण एवं भौतिक साधनों का अधिकाधिक भाग समाज और संस्कृति की सेवा में लगाने से कदम पीछे नहीं हटेंगे। फिर तो ऐसी हूक उठेगी कि कोई भी साँसारिक प्रलोभन रोक सकने में समर्थ नहीं होगा। अपने आराध्य के लिए उनके आदर्शों के लिए सब कुछ लुटाकर भी अंतःकरण ऐसे दिव्य आनंद से भरापूरा रहेगा जिसे भक्ति योग के मर्मज्ञ ही जान सकते हैं।

*समाप्त*