अपने भाग्य विधाता हम स्वयं

प्रयत्न और पुरुषार्थ के बल पर भौतिक उपलब्धियां उपार्जित किये जाने की बात सर्वविदित है पर इस तथ्य को विरले ही जानते हैं कि आस्थाओं एवं मान्यताओं के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव का समन्वय ही व्यक्तित्व बनाता है और व्यक्तित्व का स्तर ही संसार के पदार्थों एवं व्यक्तित्वों के साथ अनुकूल-प्रतिकूल तालमेल बिठाता है। इस तालमेल की प्रतिक्रिया ही उत्थान-पतन, सुख-दुःख के रूप में सम्मुख आती रहती है। वाह्य प्रगति एवं परिस्थितियाँ प्रत्यक्षतः दिखाई पड़ती हैं और उनका कारण भाग्य, पुरुषार्थ, अनुदान आदि बताकर समाधान कर लिया जाता है। जितनी गहराई में उतर कर तथ्य को समझ पाना किसी-किसी के लिए सम्भव हो पाता है कि वाह्य जीवन की समस्त घटनाएं, परिस्थिति, एवं उपलब्धियों व्यक्तित्व की आँतरिक स्थिति के फलस्वरूप ही उत्पन्न होती है।

परिस्थितियाँ एक ही हो सकती हैं किन्तु उन्हें दो व्यक्ति दो प्रकार से सोचकर अपनी प्रतिक्रिया जताते हैं। द्रोणाचार्य द्वारा भेजे जाने पर दुर्योधन को एक स्थान पर सभी दुष्ट-दुराचारी दिखाई पड़े किन्तु उसी स्थान पर गये धर्मराज युधिष्ठिर यह निष्कर्ष ले कर लौटे कि उस स्थान के लोगों में औसत स्तर की सज्जनता मौजूद है, पूर्ण दुर्जन कोई भी नहीं है। इस सृष्टि की समस्त संरचना सत्य और तम्, देव और दैत्य सम्मिश्रण से विनिर्मित हैं। रात और दिन की तरह यहाँ शुभ और अशुभ दोनों का आस्तित्व हैं। अन्धकार और प्रकाश से मिलकर रात्रि और दिन की रचना हुई है। उसी से काल-चक्र घूमता है ताने और बाने के उलटे सीधे धागों से कपड़े बुना जाता है। संसार में वाँछनीय और अवाँछनीय दोनों ही तत्व तो दैनंदिन जीवन की खोज से बच कर अपने व्यक्तित्व को सद्गुणों से सुसज्जित बनाया जा सकता है। संसार के परिवर्तन चक्र को जो विनोद की तरह देखता है, वह सुखी रहता है।

मनुष्य वस्तुतः विचारों का पुंज है उसे दृष्टिकोण के आधार पर ही जीवन का वाह्य स्वरूप बनता व आन्तरिक स्तर का निर्माण होता है आस्थायें-मान्यतायें सही बनती चली जाये तो परिस्थितियोँ कैसी भी हों, मानवीय उत्कर्ष-व्यक्तित्व का विकास हो कर ही रहता है, यह एक सुनिश्चित सत्य है।


मुक्ति के लिए संसार से पलायन क्यों?

महर्षि अंगिरा ने शिष्य गोपमाल का तिलक किया और कहा-तात्! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे अन्तःकरण में मुक्ति की आकांक्षा अत्यन्त प्रबल है। तो भी तुम जाओ और वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा के अनुसार गृहस्थ धर्म का अनुशीलन करो।

“आपकी आज्ञा शिरोधार्य है गुरुदेव! पर यह संसार तो बंधन है, वहाँ जाकर मुक्ति जैसे जीवन लक्ष्य को भूल गया तो?” भूलेंगे नहीं तात् ! यदि तुमने कर्म के फल में आसक्ति नहीं रक्खी तो गृहस्थ जैसे कठोर उत्तरदायित्व का पालन करते हुये भी तुम उसी लक्ष्य की ओर अपने आप अग्रसर पाओगे जिसके लिए तम गृहस्थ का परित्याग करना चाहते हो गोपमाल ने और अधिक प्रतिवाद नहीं किया। वह अपने घर आ गया श्रावस्ती के एक ग्रामीण की कन्या हेमामालिनी के साथ विवाह कर सुख से जीवन बिताने लगा।

गृहस्थी के कार्य बड़े बेढंगे होते हैं। एक बार धन के अभाव में गोपमाल को अपनी गायें बेचनी पड़ी तब तो पता नहीं चल पाया, पर जब वे गायें बिक कर चली गयीं, तब उसे पता चला कि उन्हें धोखे से कसाई के हाथों बेंच दिया गया। यह जानकर अन्तःकरण क्षुब्ध उठा इस अनजाने में हुये पाप के प्रति उसका अन्तःकरण तीव्रता से छटपटाने लगा।

अब उसने निश्चय किया कि वह गृहस्थी के उत्तरदायित्वों का परित्याग कर देगा। उसने यह बात किसी से बतायी नहीं, तथापि उसके जीवन में आकस्मिक परिवर्तन और तीव्र विकृति देखकर हेमामालिनी ने उसके मन की बात जान ली। उसने निश्चय किया कि यदि गोपमाल गृहस्थ का परित्याग करते हैं तो मैं भी उनके साथ गृह परित्याग कर दूँगी।

रात्रि का निविड़ अन्धकार हाथ का हाथ नहीं सूझता था, गोपमाल चुपचाप उठा और जैसे ही आगे बढ़ने को हुआ कि देखा कि हेमामालिनी सम्मुख खड़ी है। मुझे मत रोको देवी! डसने आहत वाणी ने कहा। ”

“रोकती नहीं आर्य मैं तो स्वयं भी आपके साथ चलने को प्रस्तुत हूँ आत्मकल्याण, क्या पुरुष की ही आवश्यकता है, नारी की नहीं?” हेमामालिनी ने पूछा “किन्तु अंतेवासी जीवन की कठोरता तुम कैसे सहन कर सकोगी। ” गोपमाल ने प्रतिवाद किया।

आप कर सकते हैं, तो मैं भी कर सकती हूँ। याद है पाणिग्रहण के समय मैंने आपको हर कष्ट में साथ रहने का वचन दिया आखिर उसे भी तो पालन करना है। गोपमाल कुछ उत्तर देते उससे पूर्व ही एक आकृति सामने आयी, गोपमाल ने उन्हें पहचाना। यह तो महर्षि खड़े हैं दोनों ने उन्हें प्रणाम किया। आशीर्वाद देते हुये अंगिरा ने कहा-”तात् तुम! दोनों आत्मकल्याण के इच्छुक हो दोनों तितिक्षाएँ सहन करने के लिए तैयार हो पर जो सामाजिक जीवन की विपरीत परिस्थितियों से नहीं लड़ सकता वह भला एकाँत जीवन के संघर्ष से क्या मुकाबला करेगा तुम्हारे पलायन से भी संसार इसी तरह पाप और अपराध करेगा। फिर क्या यह उचित न होगा कि तुम संसार में ही रहकर लोगों को पाप से बचाने के लिए उन्हें सन्मार्ग पर चलाने का प्रयत्न करो!

“लेकिन गुरुदेव। अनजाने में हुई भूलों का उत्तरदायी कौन होगा?” “ वत्स। यही समझने में तो निष्काम कर्म योग का सारा मर्म छिपा है मनुष्य कर्म करे पर सफलता या विफलता सुख या दुख, मान या अपमान सबमें में अपने आप को स्थिर रखकर फल से प्रभावित न हों तो संसार की बुराइयों का उत्तरदायी भी भगवान को माना जा सकता है। मनुष्य को तो अपने आप को उसका प्रतिनिधि मानकर लोकसेवा का ध्यान रखना चाहिए”

गेपमाल को मानो सिद्धि मिल गयी उस दिन उसने कर्म से विरक्ति का परित्याग कर दिया और लोक कल्याण को अपना लक्ष्य मानकर जीवन यापन करने लगा।


विशेष लेख - युगान्तरीय चेतना के उद्गम केन्द्र से सम्बन्ध जोड़ें

यह अप्रकाशित लेख परमपूज्य गुरुदेव द्वारा बसंत पंचमी 1990 की वेला में लिखा गया था इसमें आने वाले समय की समस्त संभावनाओं का उल्लेख है। पाठकगण आगामी वर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर युग सन्धि महापुरश्चरण की प्रथम पूर्णाहुति आँवलखेड़ा में पूज्यवर की जन्मस्थली में मानने का आह्वान इस अंक में पढ़ रहे हैं, साथ ही एक लाभ हीरकों-प्राणवान कार्यकर्ताओं के रूप में एक उपहार युग देवता के चरणों में चढ़ाने का संकल्प भी। यह आह्वान हम सभी के के लिए है। अब समय ऐसा है कि “अभी नहीं तो कभी नहीं। ”

भगवान राम और कृष्ण ने अपने-अपने समय की धर्म की श्रख और अधर्म के परित्राण के लिए व्यापक क्षेत्र में वातावरण विनिर्मित किया और क्रिया-कलाप ऐसा अपनाया जिसका रामायण और महाभारत में सुविस्तृत उल्लेख है। उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया का कहीं भी अनुभव किया और अनुमान लगाया जा सकता है। मन्दिरों में उनकी प्रतिमायें और घरों में उनकी तस्वीरें विद्यमान हैं। इतने पर भक्तजनों की यह ललक उमंगती ही रहती है, कि मथुरा एवं अयोध्या पहुँच कर उस उद्गम का दर्शन किया जाय, जहाँ वे उनसे और बड़े होने पर बड़े काम कर सकने में समर्थ हुये।

इस्लाम धर्म के संस्थान दुनिया भर में फैले पड़े हैं। उन्हें कुरान के माध्यम से उनके संदेश अपने स्थानों पर अभी भी मिलते रहते हैं, किंतु उस समुदाय के प्रत्येक श्रद्धालु के मन में यह उमंग उठती रहती है कि जहाँ पैगंबर जन्में थे, उस “काया” के दर्शन हेतु सशरीर पहुंच जाय। लाखों लोग हर साल हज यात्रा पर जाते और उस प्रक्रिया को पूर्ण लेने पर अपने सौभाग्य की चर्चा “हाजी” शब्द नाम के आगे लगा कर गौरवान्वित होते हैं। ईसाइयों को ईसा के जन्म स्थान यरुसलम पहुँचने की प्रायः वैसी ही इच्छा रहती है। बौद्ध संप्रदाय के लोग तथागत की जन्मभूमि लुम्बिनी एवं निर्वाण स्थली कुषीनगर पहुँचने की इच्छा तो सँजोये ही रहते हैं। भले ही परिस्थितिवश वे वहाँ बड़ी संख्या में हर साल पहुँच न पाये। विदेश से लाखों व्यक्ति फिर भी हर वर्ष वहाँ आते हैं। सिख धर्म के जन्मदाता सद्गुरु की जन्मभूमि नानकाना यो अब पाकिस्तान में चला गया है पर वहाँ भी सिख धर्मानुयायी प्रायः प्रत्येक वर्ष पासपोर्ट लेकर जाते रहते हैं। अन्य धर्मों के संबंध में भी यही बात हैं। उद्गम तक पहुँचने की लालसा गहन श्रद्धा का परिचय देती है। वह श्रद्धा आगे चल कर धर्म धारणा को विकसित करने में सहायक भी होती हैं।

गंगा लंबा रास्ता पार करती हैं। उसका जल सुविस्तृत क्षेत्र में उपलब्ध रहता है। बंगाल पहुँचते.पहुँचते तो उसकी सहस्रों धाराएँ विभाजित हो गई हैं जिनमें लोग नहाते रहते और उसी का जल पीने आदि के उपयोग में लाते रहते हैं। इतने पर पूर्ण समाधान नहीं होता और जिनमें समर्थ हैं, वे गंगोत्री ही नहीं, गोमुख तक भी जा पहुँचते हैं। यमुना के प्रति श्रद्धा रखने वालों को अमरकंटक की यात्रा करके ही चैन पड़ता है।

कैलाश पर्वत में शिव का निवास माना जाता है। और पार्वती का प्रत्यक्ष स्वरूप मानसरोवर के रूप में बखाना गया हैं। यों सप्त सरिताओं का उद्गम भी मानसरोवर हैं।

कैलाश मानसरोवर यात्रा अब बहुत कठिन हो गई हैं। , फिर भी किसी प्रकार वहाँ तक ला पहुँचने वालो की बड़ी संख्या रहती हैं। उद्गमों तक जा पहुँचने और वहाँ से प्रेरणा लेकर आने की मान्यता अकारण भी नहीं हैं। उसके पीछे श्रद्धा-संवेदना का गहरा पुट लो लगा होता है।

युग निर्माण योजना का आरंभिक ताना-बाना जहाँ से बुना गया हैं-”इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य “ का उद्घोष जहाँ से किया गया हैं, उस महायुगाँतरीय चेतना का सामयिक केंद्र शांतिकुंज हैं। उसका सान्निध्य पाने के लिए प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु, प्रज्ञा-परिजन पहुँचते हैं और ऐसा कुछ लेकर लौटते हैं, जिसे बैटरी को नये सिरे से चार्ज किए जाने के समतुल्य समझा जा सके। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की तपोभूमि जैसी कितनी पुरातन विशेषता भी यहाँ हैं। इसके अतिरिक्त इसे गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित होने के साथ-साथ और भी अनेक विशेषताएं उसके साथ जुड़ गई हैं। स्थापना के दिनों से लेकर अब तक नित्य नियमित रूप से लाखों की संख्या में गायत्री साधना यहाँ होती हैं। वर्ष भर में तो वह जप संख्या अरबों-खरबों की गणना तक जा पहुँचती हैं। नौ कुण्डों की विनिर्मित यज्ञशाला में नित्य नियमित रूप से यज्ञ होता है और वर्ष में आहुतियों की संख्या करोड़ों तक जा पहुँचती हैं। जिस अखण्ड-ज्योति की स्थापना इस महा मिशन के साथ साक्षी रूप में हुई थी। उस दीपक का प्रज्ज्वलन पिछले उनहत्तर वर्षों से अनवरत रूप से ज्योतिर्मय है। किसी दिव्य सत्ता का संरक्षण यहाँ गंगावतरण की तरह अवतरित होने की उपमा में इसके साथ जुड़ा देखा जा सकता है। गायत्री माता की प्राण -प्रतिष्ठा, सविता देवता का मन्दिर, शिव-अभिषेक, देवात्मा हिमालय की एक मात्रा जीवंत बोलती हुई प्रतिमा जो कि निर्माणाधीन हैं। सप्त ऋषियों की प्रतिमाएं यहाँ की विशिष्टताएं हैं जो देव संस्कृति के मूल आधार के यहाँ होने का प्रतिपादन करती हैं। ऐसी -ऐसी और भी अनेकानेक विशेषताएं हैं जो अपने ढंग की अनोखी कहीं या समझी जा सकती हैं।

मिशन के सूत्र संचालकों की चर्मचक्षुओं से भी देखी जा सकने वाली कायाएं वयोवृद्ध हों जाने पर भी सहस्रशीर्षा, सहस्र हाथ, सहस्रबाहु, सहस्रपाद ही नहीं सहस्र प्राण के रूप में अब तक तो स्थूल शरीर में भी विद्यमान हैं और विश्व मानव में प्राण फूंकने वाले तंत्र का सूत्र संचालन भी करते हैं। अगले दिनों यह काय कलेवर अदृश्य हो जायेंगे, तो उनकी प्राण चेतना से ओत-प्रोत सूक्ष्म शरीर यहाँ एक शताब्दी तक बनें रहने के लिए वचन बद्ध हैं। ;यह प्रक्रिया भाद्रपद पूर्णिमा 1994 से परमवंदनीया माता जी के महाप्रयाण के बाद तीव्रगति से संपन्न होती देखी जा सकती हैं।

अपने समय में नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय नव जीवन उभार सकने वालों को विनिर्मित प्रशिक्षित करने के लिये प्रख्यात रहे हैं। उनके उत्पादनों ने न केवल भारत न केवल एशिया वरन् समूचे संसार को बहुत हद तक पतन.पराभव से उबार कर देव संस्कृति के साथ कस कर बाँध देने में पाई। यह पुरातन काल की गौरव गाथा हैं। पर अब तो ऐसा कुछ कहीं दीख नहीं पड़ता। ईसाई मिशन अवश्य किसी हद तक उस शैली का अनुकरण कर रहे हैं। भारतीय संस्कृति के विश्व संस्कृति के, विस्तार होने के रूप में वैसा ही कुछ आयोजन करते हुए ताना.बाना बुनते हुए शांतिकुंज को देखा जा सकता है।

अगले बाहर वर्षों की युगसंधि बेला में यहाँ से क्या कुछ किया जाने वाला हैं, उसके सुविस्तृत निर्धारणों की तो समय से पूर्व चर्चा करना तो अप्रासंगिक होगा। पर उन संकल्पों में से एक ही ऐसा है जिसकी रूपरेखा को सुनने वाले तक हतप्रभ होकर रह जाते हैं। सुनने वालों के कान सहमत

होते हैं और न सोच सकने वाले को चिंतन सहायता करता है कि क्या ऐसा भी इन विकट परिस्थितियों में बन पड़ना संभव हो सकता है। फिर भी संयोजक सत्ता का कथन हैं कि जो आज असंभव लगता है वह कल संभव होकर रहेगा।

प्रस्तुत संकल्प है “ एक लाख सृजन शिल्पियों का, हीरकों को खरादे तराशे रत्नों का उत्पादन, प्रशिक्षण और उनको नव सृजन के कार्य क्षेत्र में उभारा जाना “। प्राचीन काल के सतयुगी वातावरण में उत्कृष्ट आदर्शवादिता के पक्षधर वातावरण में साधु.ब्राह्मणों, वानप्रस्थों की सृजन वाहिनियाँ राष्ट्र को, विश्व को जीवंत और जाग्रत रखने की व्रत धारणा को चरितार्थ करती रही होंगी। यह उन दिनों संभव भी रहा होगा, पर आज तो प्रवाह सर्वथा उलटी दिशा में बह रहा हैं। जिन्हें वासना, तृष्णा, अहंता ने कसकर के न जकड़ रखा हो, जो लोभ, मोह और अहंकार से ऊंचे उठकर आदर्शों के प्रति समर्पित होने की बात सोचते हों, ऐसे लोग जहाँ तहाँ ही नगण्य संख्या में ढूंढ़े मिलेंगे। अन्यथा सर्व साधारण पर संकीर्ण स्वार्थपरता का ही भूत सवार हैं। पैसे के अतिरिक्त और कुछ किसी को सूझ ही नहीं पड़ता। यहाँ तक कि अध्यात्म तत्वज्ञान के नगाड़े बजाने वाले भी स्वर्ग, मुक्ति, ऋद्धि.सिद्धि जैसी विचित्र स्वार्थ परायणता की परिधि से आगे नहीं बढ़ पाते। मनोकामनाओं की पूर्ति वाले वरदान, की कामनाएं ही उन्हें दायरे में घेरे बटोरे रहती हैं। ऐसी दशा में सेवा साधना और आत्मशोधन और लोककल्याण की बात पर ध्यान कौन दे?

एक लाख सृजन शिल्पी इन्हीं दिनों भ्राँत जन समुदाय में से निकाल सकना कैसे बन पड़े? झुलसाने वाली ग्रीष्म आतप में शांति की शीतल मेघमाला कहाँ से उठेंगी? यही हैं वह असंभव जिसे संभव कर दिखाने की प्रतिज्ञा शांतिकुंज ने ली हैं और उस दिवा स्वप्न समझे जाने वाले संकल्प को सार्थक सिद्ध करने की घोषणा तक सर्वसाधारण के कानों तक पहुँचाई हैं। यह इसलिए करना पड़ की सर्वत्र छाई हुई निराशा और भावी संकटों की आशंका से उद्विग्न लोकमानस को नये सिरे से सोचने की, नये प्रकाश का उदय होने की साँत्वना मिले। आशा और उत्साह यदि सार्थक स्तर पर उभारा जा सकें तो बहुत कुछ ऐसा बन पड़ सकता है जिसकी कल्पना से भी हुलसित, पुलकित होने की पृष्ठभूमि बन चले।

यह सब किस प्रकार बन पड़ेगा। इसकी विस्तृत रूपरेखा का वर्णन-विवेचन भी समयानुसार सुनने, समझने का अवसर मिलेगा। इस अवसर पर तो इतना ही समझ लेना चाहिए कि छोटे आकार-विस्तार वाले शांतिकुंज से जो कुछ उभर रहा हैं, उसे विश्वमानव के आगत सौभाग्य के उफनने जैसा समझा जा सकता है। इसे अपने समय के समुद्र मंथन जैसा एक नियोजन भी कहा जा सकता है। टिटहरी द्वारा समुद्र से अण्डे वापस लेकर हटने की प्रतिज्ञा पूरी हो सकती हैं, तो “नया इनसान बनाने की, नया संसार बसाने” की उमंगों को क्यों असंभव या उपहासास्पद समझा जाना चाहिए।

यहाँ इतना ही अनुरोध किया जा रहा हैं कि यदि ऐसे सशक्त उद्गम के साथ जुड़ने की बात मानी जा सकें तो उसकी परिणति सबके लिए एक प्रकार से श्रेयस्कर ही हो सकती हैं। हिमालय से पिघलने वाले ग्लेशियरों से जो नदियाँ जुड़ी हुई होती हैं, वे किसी भी ऋतु में सूखती नहीं उनकी जल धारा अविच्छिन्न रूप से प्रवाहमान बनी रहती हैं। विद्युत उत्पादक समर्थ संस्थानों से जुड़े रहने वाले ट्राँसफार्मरों से जनरेटरों का करेंट कभी चुकता नहीं। यह जोड़ संयोग उन सभी छोटे -बड़े उपकरणों को गति देता रहता है, जो बिजली के सहारे चलते और अनेकानेक महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरे करते हैं। बादलों का बरसना इसलिए अनादिकाल से जारी हैं कि वे समुद्र से उठने वाली भाप को अपना आधार अवलंबन बनाये हुए हैं।

नहरें इसलिए सिंचाई के निमित्त उपलब्ध रहती हैं कि वे बड़ी नदियों से निकलती हैं। यदि यह आधार उथले और घोटे रहे होते, तो वे उपलब्धियाँ हस्तगत न हो पातीं जो नदियों के, नहरों के, बिजली घरों के रूप में निरंतर कार्य करती देखी जाती हैं।

स्वावलंबन और वैयक्तिक पुरुषार्थ की भरपूर सराहना करते हुए भी इस तथ्य को समझाना ही होगा कि नीचे गिरने लिए हर कोई स्वतंत्र और समर्थ हैं, किंतु ऊंचाई की ओर प्रयाण करने के लिए किन्हीं समर्थ अवलंबनों के की आवश्यकता होती है। आकाश से भारी ऊंचाई से गिरने पर भी उल्काएं सरलतापूर्वक जमीन पर आ टपकती हैं, पर यदि कोई उपग्रह धरती से आकाश तक पहुँचाना हो तो उसके लिए शक्तिशाली राकेटों की व्यवस्था बनाये बिना काम चलता नहीं। पैरों के बल उछल कर तो कुछ फुट ऊंचाई तक ही अपना पुरुषार्थ दिखाया जा सकता है, पर यदि ऊंची और लंबी उड़ाने उड़ती हैं तो वायुयान का टिकट खरीदना और उस पर सवार होना अनिवार्य रूप से आवश्यक हो जाता है। समुद्र की लंबाई, गहराई और लहरों की उथल-पुथल को देखते हुए उस तैर कर पार करने की बात बनती नहीं। इसके लिए समुचित साधनों से संपन्न जलयान का आश्रय लेना पड़ता है। रेल या मोटर पर सवार होने वाले जितने कम समय में जितनी दूरी पार कर लेते हैं, उतना फासला एकाकी पुरुषार्थ पर निर्भर पदयात्री के लिए संभव नहीं होता।

नलों में पानी तभी तक चलता है जब तक कि उनका संबद्ध जल संपदा से भरी पूरी टंकी के साथ रहता है। बेल उतनी ही ऊंची चढ़ पाती हैं जितने ऊंचे पेड़ से लिपट लेने का सुयोग

उपलब्ध होता है अन्यथा वह जमीन पर फैलती छितराती रहेगी। शरीर के अंग अवयवों में गतिशीलता तभी तक रहती हैं जब तब कि उन्हें हृदय द्वारा -धमनियों द्वारा रक्त पहुंचाया जाता है। इस व्यवस्था के छिन्न−भिन्न हो जाने पर तो अच्छे भले अंग अवयव, निष्क्रिय निर्जीव बनकर रह जाते हैं।

सशक्त शक्ति उद्गम से संबंधित बने रहने में ही समझदारी हैं, यह इतिहास बताता है। आज का समय बड़ी विषमता से भरा हैं व अगले आने वाले दिन और भी विपन्नताएं, घनघोर संकट भरी परिस्थितियाँ उत्पन्न करते चले आ रहें हैं। ऐसे में जो सुरक्षा कवच इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री, “ सतयुग की वापसी “ को संकल्पित इस केन्द्र के माध्यम से सबको मिल सकता है वह संभवतः अन्यथा कही उपलब्ध न हो सकेगा। हमारा आश्वासन हैं कि हम गायत्री महाप्रज्ञा के तत्वदर्शन तथा यज्ञ के सत्कर्म विस्तार की प्रेरणा के जन-जन तक विस्तार के द्वारा सूक्ष्म व कारण सत्ता रूप में और अधिक सक्रिय हो एक व्यापक समुदाय के मनो का-चेतना का भावनात्मक परिष्कार उन्हें सुसंस्कारित बनाकर साँस्कृतिक क्राँति का सरंजाम जुटायेंगे। इसके लिए मात्र अपने को शक्तिस्रोत से जोड़ लेना भर काफी हैं। शेष काम ऋषि सत्ताएं स्वयं करेगी। हमारा हर जाति, मत, पंथ, संप्रदाय, वर्ण, राष्ट्र के व्यक्ति से हैं व विश्वास है कि यह पुकार अनसुनी न रहेगी।


नये युग के नये आधार व नये पंचशील

गायत्री को आद्य शक्ति कहते हैं क्योंकि विष्णु की कमल नाभि में से उत्पन्न हुए ब्रह्मा जी को इसी महामंत्र का अवलंबन लेने का निर्देशन हुआ था। उनने इसी का तप करके जड़ चेतन, सृष्टि का सृजन किया था। इसी महाशक्ति को इन दिनों युग शक्ति के रूप में जाना जा सकता है क्योंकि वायुमण्डल और वातावरण में भारी हुई विषाक्तता का निराकरण इसी की सामूहिक तपश्चर्या के सहारे संभव हैं। नौ युग का अवतरण भी प्रज्ञा अभियान प्रज्ञावतार के रूप में हो रहा हैं अगला युग प्रज्ञा युग होगा। उसे नव युग का सतयुग भी कहा जा सकता है। युग प्रचलन क्या होंगे, सार संक्षेप में कहा जाय तो वह यह हैं कि संसार एक कुटुँब की तरह होगा। एक राष्ट्र, एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति समस्त विशय में समान रूप से लागू होगी। ना कोई गरीब होगा। , ना अमीर। धरती सबकी माता है। उसके उत्पादनों का सभी लोग मिल -जुलकर उपयोग करेंगे आर्थिक, सामाजिक विषमताओं का पूरी तरह उन्मूलन होगा। सबको अपनी आवश्यकता के अनुरूप लेना होगा और अपनी सामर्थ्य भर काम करना पड़ेगा। सभी अपनी कमाई पर गुजर करेंगे। हराम की कमाई पर निर्वाह किसी का ना होगा। उत्तराधिकार में वंशजों प्रचुर का पूंजी प्राप्त करने गुलछर्रे उड़ाने का किसी को अवसर ना मिलेगा।

विभिन्न देश अपने स्वार्थों के लिए पड़ोसियों को हड़पने का अवसर प्राप्त ना कर सकेंगे। विश्व राज्य की सम्मिलित न्याय-व्यवस्था रहेगी और सेना भी एक केन्द्र के अधीन रहेगी। झगड़े पंचायतों से तय होगे। अनीति रोकने का काम सरकार के जिम्मे होगा। अत्याचारों, अंधविश्वासों, अवांछनीयताओं, कुरीतियों धूर्तताओं मूर्खताओं का जड़ -मूल से उन्मूलन होगा। हर किसी को व्यक्तिगत कठिनाई के लिए मुकदमे ना चलाने पड़ेंगे। नारी का सम्मान नर की तुलना में श्रेष्ठ होगा। सन्तानोत्पादन पर गड़े प्रतिबंध लगेंगे। ताकि धरती पर उतने ही लोग रह सके जिनके लायक साधन हैं शिक्षा और चिकित्सा सरकार के दायित्व होगे। बूढ़े भी अपनी क्षमता के अनुरूप काम करेंगे। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धाँत हर किसी को अपनाना होगा। मनुष्य के मौलिक अधिकारों में कोई व्यवधान उत्पन्न ना कर सकेगा अपराधियों को कड़ी प्रताड़ना मिलेगी, ताकि उस दिशा को अपनाने की किसी की हिम्मत ना बढ़े।

लोग सीमित समय में आजीविका उपार्जित कर दिया करेंगे और बचे हुए शेष समय का उपयोग निजी परिष्कार और लोक मंगल के लिए करेंगे। रिटायर्ड होने का अर्थ निठल्ले घूमना ना होगा। व्यक्ति की योग्यता का लाभ उसका परिवार ही नहीं समूचा समाज उठायेगा। भौतिकी की तुलना में विज्ञान की धारा आत्मिकी के उत्थान में समन्वयात्मक पुरुषार्थ करेगी विज्ञान से तत्वज्ञान को अधिक श्रेय सम्मान मिलेगा।

नव युग में शरीर रक्षा के पंचशील होगे 1- सात्विक एवं सीमित आहार। 2- स्वच्छ जल का पर्याप्त उपयोग। 3- खुली वायु में गहरी सास। 4- समुचित श्रम। 5- चिन्ता रहित रात्रि विश्राम। मानसिक स्वास्थ्य के पंचशील होंगे 1- खिलाड़ी जैसा दृष्टिकोण। 2- अनवरत मुस्कान। 3- इन्द्रिय निग्रह। 4- काम में मनोयोग एवं गौरव 5- उपलब्धि में संतोश, प्रगति में उत्साह सामाजिक पंचशील इस प्रकार होंगे। 1- ईमानदारी 2-नागरिकता की जिम्मेदारी 3- नर्म शिष्ट, एवं मधुर व्यवहार 4- वचन का पालन 5- उदार सहयोग पारिवारिक पंचशील इस तरह होगे। 1- अभिभावकों के प्रति सहयोग, कृतज्ञता, -सेवा - भावना छोटों का दुलार सहयोग 3- दाँपत्य सम्बंधों में सघन मैत्री। 4- सत्प्रवृत्तियों की सम्पन्नता मानना और उन्हें बढ़ाना। 5- सन्तान संख्या न्यूनतम। धार्मिक पंचशील होगे -1- सत्प्रवृत्तियों का समर्थन संवर्धन 2- दुष्प्रवृत्तियों से सहयोग, विरोध, संघर्ष 3- पीड़ा और पतन के निवारण में बढ़-चढ़ कर अंसधान उच्चस्तरीय अवस्थाओं को दृढ़तापूर्वक अपनाना 5- कर्त्तव्य पालन में तत्परता, अधिकार पाने में उदासीनता।

आध्यात्मिक पंचशील होंगे। 1- ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था पर अटूट विश्वास 2- आत्मावलंबन 3- औसत भारतीय स्तर जीवन, शेष उपलब्धियों का सत्प्रयोजनों में उपयोग 4- जीवन साधना में प्रखर तत्परता 5- आत्मियता चरम विस्तार

सार्वभौम पंचशील नवयुग के इस प्रकार होंगे 1- एकता 2- समता 3- संघबद्धता 4- सहिष्णुता 5-उदार निष्ठा।

इन आधारों सहित नवयुग के आगमन की संभावना को कोई चाहे तो शास्त्र कथन या भविष्यवाणी भी कह सकता है।


डाकू बना महात्मा

जब अंतःकरण निर्मल हो जाता है तो उसमें स्वयं हृदय स्थित प्रभु का प्रतिबिंब प्रत्यक्ष हो जाता है ! महात्मा आनंदकंद जी ने समझाते हुए कहा - “परमात्मा की प्राप्ति के लिए एकमात्र यही मार्ग है। मलिन अंतः करण प्रभु को प्राप्त करेगा, इसकी आशा व्यर्थ हैं। “

“ तब क्या प्रभु इन बाह्य नेत्रों के सम्मुख नहीं आते? “ जिज्ञासु ने शंका की।

“ऐसा नहीं किंतु बाह्य जगत में हम वही देख पाते हैं जो हमारे भीतर हैं ! “ महात्मा जी ने पुनः स्पष्टीकरण दिया-” अथवा यों समझ लो कि हमारा हृदय जितना निर्मल होता जाता है, हमारे नेत्रों में उतनी ही निर्मल एवं सूक्ष्म दृष्टि आती जाती हैं ! जिसके अंतःकरण में मैल हैं, उसकी दृष्टि में भी मैल रहेगा और मैली दृष्टि से भला उन मायातीत को कैसे देख सकता है? “

अंतःकरण की शुद्धि कैसे हो? स्वाभाविक था कि उपरोक्त समाधान के पश्चात यह प्रश्न उठे।

शास्त्रों में इसके लिए अनेक उपाय बताए गए हैं। अनेक मार्ग हैं। जो जिसका अधिकारी हो, उसे उसी का अवलंबन करना चाहिए। स्पष्ट था कि महात्मा जी बहुत गोल-मोल उत्तर दे रहे थे और वे इस प्रश्न से छुटकारा चाहते थे। “

तब मुझे इस प्रकार पूछना चाहिए कि मैं किस उपाय से अंतःशुद्धि करूं? “ प्रश्नकर्ता अत्यंत घुला-मिला था। वह सदा उनके समीप रहने वालों में था और उसी से निःसंकोच हो गया था।

“ भैया, यह काम गुरु का हैं। उस गुरु का जो मुमुक्षु के अधिकार को परख सके। ” महात्मा जी के स्वर की नम्रता बतला रही थी कि वे अत्यधिक संकुचित हुए हैं। ”गुरु वही हो सकता है जो शास्त्रज्ञ एवं आत्मदर्शी दोनों हो। यह तो तुम जानते ही हो कि शास्त्र ज्ञान के संबद्ध में मैं कोरा हूँ और साधन भी मैंने किए नहीं हैं।

“आप तो टालना चाहते हैं। “ हंसते हुए प्रश्नकर्ता ने फिर पूछा “ अच्छा, आपने स्वतः यह स्थिति कैसे प्राप्त की? “

“यह स्थिति? इस स्थिति से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? “ उन्होंने गंभीरता से पूछा-”तुम मेरे इससे पहले के जीवन के संबद्ध में कुछ जानते हो “

प्रश्नकर्ता तो क्या, यहाँ कोई भी नहीं जानता कि वह कौन है कहाँ के हैं, क्या जाति के हैं। बहुत पुरानी बात है जब नर्मदा तीर की इस अमराई में लोगों ने एक हट्टे-कट्टे लंबे कृष्ण वर्ण पुरुष को प्रातः काल इसी वटवृक्ष के नीचे पत्थर की शिला पर बैठे देखा था।

लोग कहते हैं कि उस समय उनको देखकर बहुतों को संदेह हुआ था कि वह चोर या डाकू हैं। कुछ लोगों ने सताया, गालियाँ दी और मारा भी। बड़ा दुःख हुआ उत्पीड़कों को जब हैजे के प्रकोप के समय उस साधु पुरुष ने उनके घर के लोगों की उनकी प्राणपण से सेवा की। बार-बार वे उच्च स्वर से ‘आनंदकंद’ कहा करते थे इसी से उनका नाम आनंदकंद पड़ गया। वैसे अपने संबंध में कुछ पूछे जाने पर वे सदा हँसकर चुप हो जाया करते।

आज तो वे आस-पास के लोगों के लिए आपत्ति में आश्वासन रुग्णावस्था में परिचारक ता थे। उनमें क्रोध कभी देखा नहीं गया। कुटी में संग्रह था, किंतु वह सदा उत्सर्ग करने को प्रस्तुत रहता था। इन सद्गुणों की मूर्ति को लोग साक्षात् देवता मानते थे।

“आप क्या जन्म से ही ऐसे हैं? प्रश्नकर्ता में कुतूहल जाग उठा। प्रश्न के उत्तर में कुछ क्षणों तक मौन रहे। फिर शून्य की ओर देखते हुये उन्होंने पूछा-”तुममें से किसी ने डाकू अभयसिंह को देखा है?

देखा तो यहाँ एक तरुण ने कहा-किन्तु” बचपन में मैं उसका नाम बहुत सुना करता था। इधर बीस वर्ष से उसकी कोई बात सुनने में नहीं आयी। ” तरुण को यह प्रश्न असंगत लगा था। वह जानता था कि महात्मा जी व्यर्थ चर्चा चलाता है तो वे उद्विग्न हो उठते हैं और प्रसंग बदल दिया करते हैं। इसी से वह शंकित हो उठा कि उस भयंकर डाकू ने कहीं फिर किसी को सताया या सताने की धमकी तो नहीं दी।

वटवृक्ष की सघन छाया में, मूल के चारों ओर बनी विस्तृत वेदिका पर प्रवीची में चटाइयों पर आज पर्याप्त लोग बैठे थे। मध्य में मृगचर्म डाले महात्मा आनंदकंद आसीन थे। उनकी कमर में मृगचर्म लिपटा था। श्मश्रु एवं जटाओं के केश कृष्ण-स्वेत मिश्रित थे। अब भी उनका शरीर सुगठित था। तथा सुपुष्ट मांसपेशियां चमक रही थीं। उनकी मुद्रा शांत एवं गम्भीर थी। उनकी तेजपूर्ण दृष्टि के सम्मुख नेत्र सीधे नहीं हो सकते थे। वहाँ जाकर मन स्वाभाविक शांत हो जाया करता था।

आस-पास के गाँवों के श्रद्धालु भक्तों को कानों-कान समाचर मिल चुका था कि महात्मा जी अपना पूर्ववत सुनाएंगे। अतः पर्याप्त व्यक्ति वहाँ आ जुटे थे। नहीं तो दो-चार व्यक्ति से अधिक कभी भी वहाँ दिखाई नहीं पड़ते थे। अपने दैनिक जीवन भार से मानव का बोझिल कंधा इतना कहाँ अवकाश देता है कि वह दो घड़ी एकाँत शांत का आनन्द लें। ‘

“हाँ। अब इधर बहुत वर्षों से वह डाकू अपनी क्रूरता से परित्राण पा गया है। ” उन्होंने अपने सामने बैठे तरुण से कहा जिसने प्रश्न पूछा था। “वह बड़ा भयंकर डाकू था। उसके सहचर तक उससे डरा करते थे। उसे दया करना तो आया नहीं था न उसने ब्राह्मण माने और न बाल-वृद्ध। पता नहीं कितनी महिलाओं को उसने लूटा होगा। हत्या उसके लिये एक क्रीड़ा थी। वैसे तो तुम सब भी वन पशुओं की हत्या की क्रीड़ा करते ही हो। वह इस शिकार में मनुष्यों तक बढ़ गया था। ”

“तब क्या आप उसे जानते हैं?” प्रश्नकर्ता के मन कौतूहल हुआ। श्रोताओं में काना-फूसी होने लगी। लोगों ने अनुमान किया अवश्य महात्मा जी के उपदेश और प्रयत्न से उसने डकैती छोड़ी होगी। लोग वर्षों से देखते आ रहे थे कि गाँव में कोई किसी का कुछ अपराध कर देता तो महात्मा जी स्वतः उसे क्षमा कराने पहुँच जाते। बिगड़े युवकों को वे चुटकी बजाते सीधे कर लेते थे। यही आज का प्रश्नकर्ता चोरी में इसने जेल काटी है। और शराब के बिना उससे रहा न जाता था। पक्का जुआरी था आज वह भगत बन बैठा था।

“मैं कह चुका हूँ कि अब उसने अपने सब कुकृत्य छोड़ दिये हैं और सभ्य सुसभ्य सुसंस्कारी बनने के प्रयत्न में है। ” महात्मा जी ने कहा वह भला क्या सभ्य बनेगा। तरुण तनिक वह कहाँ रहता है? उसे यह पता था कि महात्मा जी यह बात नहीं बतायेंगे।

“यदि वह तुम्हारे सम्मुख आ जाये तो तुम क्या करोगे?” कुछ मुस्कराते हुये उन्होंने पूछा।

“हम इतने लोग हैं”-तरुण ने कहा “वह हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकेगा। हम उसे पकड़ लेंगे और पुलिस में दे देंगे”।

“उसने बिगाड़ना तो छोड़ ही दिया है” उसने पूछा-”तब भी तुम उसे पुलिस में दोगे? उसके लिये अब भी दस हजार का पुरस्कार सरकार देने को प्रस्तुत है। ”

“पुरस्कार के लिये नहीं!” तरुण जानता था कि वह लोभ से निर्लिप्त नहीं रह सका। ” “न्याय के साथ यह व्यवहार करना ही चाहिए।

“न्याय?” वह जोर से हँस पड़े-” तुमने जो कुछ किया है इसी जन्म में और अनेकों जन्मों में जो किया होगा, यदि सर्वेश उसका न्याय करने लगे? अपने लिये तो उसे दयामय कहकर क्षमा चाहते हो और दूसरों के साथ न्याय करोगे?”

तरुण ने लज्जा से मस्तक झुका लिया वह सहसा कह उठे-”अभय सिंह तुम्हारे सामने बैठा है मैं ही अभय सिंह हूँ मैं तुम्हारे न्याय को सिर झुका कर ले लूँगा। आओ, मैं स्वयं चलता हूँ थाने पर! सचमुच वे उठकर खड़े हो गये। लोग भौंचक्के से रह गये। उनकी समझ में ही नहीं आया कि उन्हें क्या करना चाहिए।

थोड़ ही समय के अन्तराल में पुलिस इंस्पेक्टर के सामने खड़े थे सभी के हृदय होता है और न भी हो तो क्या? एक ऐसी भी शक्ति है जो हृदयहीन प्रकृति के नियमों पर भी शासन करती है। जिसके संकेत पर जड़, पाषाण, शिला भी द्रवित, श्रवित एवं पुलकित हो जाने में समर्थ होती है।

प्लिस इंस्पेक्टर ने स्पष्ट कह दिया कि, आप चाहे कोई भी हों अभय सिंह नहीं हो सकते और यदि हों भी तो मैं आपको गिरफ्तार करने की शक्ति अपने में नहीं पाता। ”

जिनके दर्शनों को इंस्पेक्टर ही नहीं, बड़े साहब भी कई बार आ चुके हैं और उन लोगों ने भी सन्देह नहीं किया है, उसे वह कैसे गिरफ्तार कर लें? ऐसे समाचार छिपे नहीं रहते पर इसके लिये फटकार के बदले उसे ऊपर बधाई ही मिली। इसे उस अज्ञात शक्ति की प्रेरणा ही मानना होगा।

एक दिन अभय सिंह ने बड़े कोल्हटकर (समीप के सबसे बड़े रईस) को सूचना दी कि तुम्हारे यहाँ कल रात्रि हम सदल बल पधार रहें हैं स्वागत की सामग्री के रूप में दस सहस्र मिले। महात्माजी लौट आये थे उसी वट वृक्ष के नीचे उस दिन से कहीं अधिक लोगों के बीच वे अपना पूर्ववृत्त सुना रहे थे।

भीरु कोल्हटकर अभय सिंह जानता था कि वह पुलिस बुलाने का साहस नहीं करेगा। ”महात्मा जी

का स्वर भरा जा रहा था केवल चार-पाँच साथियों के वह रात्रि को अँधेरा होते ही आठ बजे के लगभग वहाँ जाता था। ”

तनिक रुक कर वे कहने लगे-”उस दिन वहाँ बड़ी भीड़ थी। महाराज पधारे थे और उनके अभंगों से जनता धर्म चैतन्य हो चुकी थी। ” महात्मा जी ने नेत्र पोंछे, भीड़ से बाहर वह श्रद्धामय जिसे अभयसिंह कायर समझता था, उसे मिला और उसने डाकू के हाथों में एक थैली देते हुए कहा-” अभयसिंह कीर्तन में बाधा पड़ इससे पूर्व ही तुम्हें चले जाना चाहिए। ” किंतु वह मधुर ध्वनि उस अपवित्र कानों में भी जा चुकी थी। “मैं भी कीर्तन सुनूँगा। ” अभयसिंह ने थैली नहीं, पर उसे संत के चरणों में चढ़ाने की बात सोच ली। उस मूर्ख को पता नहीं कि बात सोच ली। उस मूर्ख को पता नहीं कि वे चरण त्रिभुवन की लक्ष्मी को ठुकराकर मंच पर आये हैं।

वह विह्वल हो रोते थे। “फिर क्या हुआ सो बहुत नहीं कहना है। ” रात्रि ढलने पर भीड़ छटने तक डाकू पीछे खड़ा रहा और भीड़ हटते ही वह उन चरणों तक पहुँचा। उसने उनकी रज मस्तक पर लगायी और एक क्षण में वह कुछ का कुछ हो गया। दूसरे दिन तो सायंकाल यह आनंदकंद इस वट के नीचे आ चुका था।

लोग आश्चर्य में थे-”एक दिन कुछ घंटों में इतना बड़ा परिवर्तन!” उधर महात्मा के नेत्र झर रहे थे और वे कह रहे थे प्रभो फिर दर्शन न होंगे।

किसी ने पीछे से दौड़ते हुये आकर कहा “श्री नामदेव महाराज आ रहे हैं। महात्मा चौंक कर खड़े हो गए। दूर से किसी बड़ी भीड़ की कंठ ध्वनि करतालों की झंकार के मध्य गूँजती आ रही थी रुक्माई विट्ठल!”


स्वजनों के माध्यम से त्रिकालदर्शी बनें

स्वप्न को जाग्रत और आत्मस्थिति का संधिस्थल माना गया है। ये न केवल जीवन की सच्चाइयों का अभ्यास कराते हैं, वरन् आत्मा की सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, कालातीत आदि के जो लक्षण तत्वदर्शियों ने बताये हैं, उसका भी प्रतिपादन करते हैं। प्रश्नोपनिषद् 4/5 में स्पष्ट रूप से कहा गया है - “अत्रैशः देव देवः स्वप्ने महिमानमनु भवति....!” अर्थात् स्वप्नों में आत्मचेतना मन के द्वारा अपनी विराट् का ही अनुभव करता है। जो देखा है उसे फिर से देखता है, सुनी हुई बातों को सुनता भी है। देश-देशांतर में देखी-सुनी बातों को फिर-फिर देखता-सुनता है। देखा, न देखा, न सुना और जो अनुभव में भी नहीं आया, वह भी भी देखता, सुनता और अनुभव करता है। यदि इन स्वप्न संकेतों को समझा और उनका यथार्थ अर्थ निकाला जा सके तो आत्मा जो एक चिर जाग्रत शाश्वत, सनातन और विश्वव्यापी तत्व है, उसकी दिव्य सामर्थ्यों का आनंद हर घड़ी लिया जा सकता है और स्वप्न संकेतों को भी आत्मकल्याण में नियोजित किया जा सकता है।

यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मवेत्ता मनीषियों ने भौतिक जगत के विकास की अपेक्षा अतीन्द्रिय चेतना के विकास पर अधिक बल दिया है और कहा है कि मानवी काया पं, कलेवरों से विनिर्मित प्रतीत अवश्य होती है, पर उसके कण-कण में सर्वव्याप्त दिव्य चेतना उतनी ही तक सीमित नहीं है-वरन् वह विश्व-ब्रह्मांड के विस्तार जितनी आसीन है। मानो मन जितना शुद्ध, परिष्कृत और पवित्र होता है, अदृश्य जगत के वास्तविक जगत चलचित्र को चेतनाजगत में परिभ्रमण कर वह स्वप्नों के माध्यम से उतना ही स्पष्ट देख सकता है। भविष्य के गुण रहस्यों की स्पष्ट ध्वनि भी सुन सकता है। महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक आइन्स्टीन से एक बार पूछा “ गया” आपकी सृजनात्मक प्रक्रिया का क्या रहस्य है? “ उत्तर में आइन्स्टीन का कहना था कि सोते समय स्वप्न में एक ऐसी स्थिति आती है जब बुद्धि एक लम्बी सी छलाँग लगाकर बोध के उच्चस्तर पर पहुँच जाती है। संसार के अधिकांश वैज्ञानिक आविष्कार इसी स्थिति में सम्भव हुये है। उनका विश्वास था कि गणित और विज्ञान की सहायता से यह सिद्ध किया जा सकता है यह संसार एक स्वप्न के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

वस्तुतः स्वप्नों का अपना एक स्वतंत्र विज्ञान है। इस तथ्य पर वैज्ञानिकों ने भी अब ध्यान किया है और परामनोविज्ञान की अनेकानेक शोधों के केन्द्र उन्होंने इसी विशय को बनाया है। परोक्ष रूप से विज्ञान भी अब सूक्ष्म जगत की सत्ता-उसकी अलौकिकता को महत्व देने लगा है। स्वप्न-विज्ञानियों की अवधारणा है कि कोई भी घटना अपने दृश्य रूप में आने से पूर्व अंतरिक्ष जगत में विकसित होने लगती है। अदृश्य सूक्ष्म जगत में जो भी होने जा रहा है उसकी पृष्ठभूमि तैयार होने लगती है। मानवीय अचेतन मन यदि थोड़ा भी परिष्कृत हो तो इन हलचलों को एवं परिणाम स्वरूप पूर्वाभास कर भविष्यवाणी कर सकता है। यह तथ्य मन की अलौकिकता तथा पवित्र-सात्विक-उच्चस्तरीय वृत्ति की महत्ता को उद्घाटित करता है। यदि स्वप्न में इन संकेत-संदेशों का बुद्धिमत्तापूर्वक गहराई से विश्लेषण किया जा सके तो दैनिक जीवन की अनेकानेक समस्याओं को सुलझाने की कुँजी हस्तगत हो जाती है। प्रख्यात मनोवेत्ता कार्ल जुँग ने फ्रायडवादी मान्यताओं का खण्डन कर इसी तथ्य को प्रतिपादित किया है कि स्वप्न दमित वासनाओं के काल्पनिक चित्र नहीं, वरन् जीवन की गहराइयों से भरे सूत्र हैं। ये मन का विनोद नहीं, वरन् भूत और वर्तमान की विवेचना तथा भवितव्य के संकेतों की एक माइक्रोफिल्म के प्रतीक हैं।

अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार मन की तीन अवस्थायें होती हैं- स्वप्नावस्था, जाग्रतावस्था और सुषुप्तावस्था। जाग्रत और सुषुप्तावस्था स्वप्न के बीच की होती है। इसी जीवन प्रवाह की जाग्रत और सुषुप्ति के बीच की मध्य धारा कहा जा सकता है। मानव मन जाग्रत अवस्था में जिस प्रकार इन इन्द्रिय सामर्थ्य से कई गुना अधिक काम कर दिखाता है, इससे भी अधिक विलक्षण चमत्कारपूर्ण कार्य वह स्वप्नावस्था में कर सकता है। इस अवस्था में प्रायः दो क्रियायें होती हैं। एक तो बुद्धि व इन्द्रियों का बाह्य जगत से सम्बन्ध विच्छेद होना था दूसरा मन का अंतर्जगत में विचरण करना। इस तरह स्वप्न मन की एक विशेष अवस्था है जिसमें वे दोनों क्रियायें अनिवार्य रूप से होती हैं। मनःशास्त्री इस सम्बन्ध में केवल यही जान और कह पाये हैं कि स्वप्न अचेतन मन की भाषा है। स्वप्न का संसार जितना जटिल और जितना उलझा हुआ है, उतना चमत्कारी एवं विमुग्ध कर देने वाला है। अंतर्जगत की गुत्थियों का हल निकालने के लिए सपनों की भूल-भुलैया में प्रवेश करके उसी प्रकार जानना और समझना पड़ेगा। जिस प्रकार जिन्दगी की समस्यायें सुलझाने के लिए हमें संसार क्षेत्र में विचरण करना पड़ता है। प्राचीन काल में इस विद्या का बहुत विकास हुआ था और ऐसे अनेक मनीषी मौजूद थे जो सपनों को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद उनमें सन्निहित तथ्यों का भी विश्लेषण कर देते थे। उन सपनों को त्रिकालदर्शन की विद्या कहा जाता था। अर्थात् स्वप्नों का ध्यान करने की ऐसी पद्धति उन दिनों विकसित हुई थी, जिसके आधार पर सपनों के माध्यम से भूतकाल की वे स्मृतियाँ जो भुला दी गई, वर्तमान की प्रस्तुतियों तथा मानवीय संभावनाओं के बारे में जान पाना सम्भव था। लेकिन विद्या भी स्वप्नों को पूरी तरह समझने या उनका विश्लेषण कर पाने में समर्थ नहीं थी। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें अचेतन ने अपनी भाषा में लोगों को ऐसे-ऐसे वरदान दिये हैं कि उन्होंने मनुष्य जाति के इतिहास को नये मोड़ दिये।

प्राचीनकाल के उदाहरणों को छोड़ भी दिया जाये तो भी इसी युग में ऐसे अनेकों प्रमाण हैं, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मनुष्य का अचेतन मन कितना समर्थ है। इस संदर्भ में मूर्धन्य मनीषी एरिकफ्राम ने अपनी कृति”दि फारगाटेन, लाँग्वेज” में कहा है कि स्वप्न अवस्था में पारस्परिक संबंधों तथा भविष्य की झाँकी ही नहीं निकलती, वरन् उच्चस्तर की बौद्धिक समस्याओं का भी समाधान मिल जाता है। जिन्हें जाग्रत अवस्था में हल नहीं किया जा सकता है। जाग्रत अवस्था में किसी विशेष समस्या पर समाधान नहीं हो पाता, जबकि स्वप्न अवस्था में यह सम्भव है। आधुनिक युग में जिन आविष्कारों और सिद्धान्तों की धूम मची हुई है, उनमें से कई अति महत्वपूर्ण उपलब्धियों के सूत्र वैज्ञानिकों ने स्वप्न की साँकेतिक भाषा को संयोगवश पढ़ लेने के बाद पकड़े थे। प्रख्यात वैज्ञानिक नील्सबोर द्वारा परमाणु संरचना की खोज से लेकर एलियास द्वारा सिलाई मशीन की सुई की खोज-जेस्सवाँट द्वारा बन्दूक के छर्रे-गणितज्ञ हेनरी फेहर एवं स्वामी रामतीर्थ द्वारा कठिन गणितों के समाधान तथा आइन्स्टीन की अधिकांश खोजों का श्रेय स्वप्न संकेतों को ही जाता है। बेन्जीन अणु की जटिल संरचना का हल रसायनशास्त्री फ्रेडरिक कैकुले को स्वप्न में ही मिला था। विख्यात दार्शनिक रेने देकार्ते से लेकर अनेकानेक महान कवियों, दार्शनिकों, कलाकारों ने अपनी ख्यातिलब्ध कृतियों के लिए स्वप्न संकेतों को ही उत्तरदायी बताया है और कहा है कि यदि इस भाषा पढ़ा और समझा जा सके तो बहुत सम्भव है प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रगति यात्रा को पूरा करता हुआ सत्य तक पहुँच सके। स्वप्नों के इसी महत्व को बताते हुये प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रेडरिक कैकूले ने कहा था कि यदि हम स्वप्नों की भाषा समझना सीख लें तो सृष्टि का कोई भी रहस्य, रहस्य नहीं रह जायेगा और हम सत्य को प्राप्त कर सकेंगे।

स्वप्नों की भाषा क्या है? वह व्यवहार में प्रयुक्त होने वाली भाषा से सर्वथा भिन्न है व्यवहार में प्रयुक्त होने वाली भाषा तो मनुष्य द्वारा अपनी सुविधा के लिए गढ़ी गई है और वह वाह्य आदान-प्रदान तक ही सीमित रहती है। उसे चेतन मन द्वारा आविष्कृत या गढ़ी हुई भाषा कहा जा सकता है, जबकि स्वप्न अचेतन मन की व्यवस्था में आते हैं जाग्रत अवस्था में जो व्यवहार किया जाता है, जो क्रियाकलाप सम्पन्न किये जाते हैं, वे चेतन मन की व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं और अपने अवचेतन की व्यवस्था में आते हैं अतः अचेतन के सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि वह सपनों की भाषा बोलता है और यह भाषा सांकेतिक या प्रतीकात्मक होती है।

यद्यपि इस भाषा को समझना कई दुरूह नहीं है। इसके लिये आवश्यकता केवल पर्यवेक्षण, निरीक्षण और अभ्यास की है। इसके अभाव में सपनों को समझ पाना सम्भव नहीं होता है। प्रत्येक व्यक्ति के अपने संस्कार होते हैं, मान्यतायें होते हैं और अपनी भावनायें होती हैं। अपनी कल्पनाओं और संस्कारों के अनुरूप ही मनुष्य का अचेतन प्रतीक गढ़ता है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। अब तक फ्रायडवादी मनःशास्त्री जो यही मान रहे थे कि सपनों के माध्यम से मानव मन अपनी दलित भावनाओं-इच्छाओं की पूर्ति करता है। स्वप्न मन की अतृप्त वासनाओं और कामनाओं की पूर्ति मात्र का उपक्रम है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। लेकिन युग से लेकर आधुनिक मूर्धन्य अनुसंधानकर्ता मनोवेत्ता मनीषियों ने सप्रमाण यह सिद्ध कर दिया है स्वप्न अचेतन की कल्पनाओं का ताना-बाना एवं असामंजस्य में डालने वाली मृग-मरीचिका नहीं, वरन् उसका हर पक्ष हमारी सूक्ष्म से सूक्ष्म भावनाओं को पूरी कुशलता से उद्घाटित करने वाला होता है। उसके संकेतों को पढ़कर जहाँ एक मनोवैज्ञानिक से छुटकारा पाया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर अपने व्यक्तित्व समुन्नत-परिष्कृत बनाने में सहायता भी मिलती है।

स्वप्न अचेतन में निहित विद्वता का उद्घाटन कर व्यक्ति को ऊँचा उठाने में सहायक होते हैं। इस सम्बन्ध में महान दार्शनिक प्लेटो ने अपनी कृति “फीडो” में कहा है कि स्वप्न अन्तरात्मा की ध्वनि का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। अरस्तू ने अपनी पुस्तक “डिवीनेशन” में स्वप्नों के तर्कसंगत होने पर महत्व दिया है और कहा है कि स्वप्न के आधार पर हम अपने उच्च सिद्धान्तों एवं योजनाओं का भली प्रकार निरीक्षण कर उन्हें मूर्तरूप दे सकने में समर्थ हो सकते हैं। शल्फवाल्डो इमरसन के अनुसार स्वप्न में हमारा अपना चरित्र ही परिलक्षित होता है स्वप्न संकेतों को पढ़कर हम न केवल अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत कर उच्च स्तरीय बना सकते हैं, वरन् अदृश्य शक्तियों एवं आत्मचेतना से भी अपना सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। वस्तुतः स्वप्न चेतना की वह आंशिक अनुभूति है जो यह प्रमाणित करती है कि आत्मसत्ता दिक्-काल से किसी बन्धन में बंधी नहीं है और विकास करके वह अपने विराट स्वरूप को प्राप्त कर सकती है।


गायत्री महामंत्र में निहित रोगोपचार की शक्ति सामर्थ्य

गायत्री महामंत्र सर्वविदित है इसका प्रयोग जिस भी क्षेत्र में किया जाता है, उधर ही सफलता प्राप्त होती चली जाती है। एक ओर जहाँ इस छोटे से आदि मंत्र में वह ज्ञान और प्रकाश-प्रेरणा भरी पड़ी है जिससे अज्ञान, अंधकार और अभाव को दूर किया जा सकता है और अंतर्निहित सूक्ष्म शक्ति के केन्द्रों को जाग्रत कर एक ऐसी मनोभूमि तैयार की जा सकती है जिस पर ईश्वरीय सत्ता केंद्रीभूत होने के लिए अपना आसन लगाने की स्वीकृति प्रदान करती है वहीं दूसरी यह वह विज्ञान और विद्या है जिससे शक्ति का उद्भव होता है, प्राण शक्ति बढ़ती है और दीर्घायुष्य प्राप्त होता है। अथर्ववेद 19/1/71 में गायत्री महिमा गान करते हुये स्पष्ट उल्लेख है कि यह आयु, प्राण-शक्ति कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली है। मन्त्र जप का लाभ मानसिक ओजस्विता, बौद्धिक प्रखरता, आत्मिक वर्चस् के रूप में मिलता ही है, अरोग्य प्राप्ति, आयुवृद्धि, विपत्ति निवारण जैसी अगणित भौतिक उपलब्धियां भी इसकी विशेषता है।

गायत्री महामंत्र का बार-बार लयबद्ध उच्चारण करने से मानवीय मन-मस्तिष्क एवं हृदय असाधारण रूप से प्रभावित होते हैं इस संदर्भ में वैज्ञानिकों गहन अनुसंधान किये हैं और पाया है कि मंत्रोच्चार से ध्यान की गहराई में मन को प्रवेश करने का अवसर मिलता है, जिसका प्रतिफल ‘अल्फास्टेट’ के रूप में ई. ई. जी मशीन पर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। ‘अल्फा-स्टेट’ मन की वह अवस्था होती है जिसका बाह्य रूप शांतचित्त और आन्तरिक प्रफुल्लता के रूप में दृष्टिगोचर होता है, जबकि आन्तरिक रूप से अन्तःकरण में दैवी गुणों का विकास होता है और अतींद्रिय क्षमतायें जाग्रत होती हैं। मंत्र जप मानवी चेतना को मथ डालने वाली संसार की सर्वाधिक शक्तिशाली प्रतिक्रिया है। उससे न केवल असाधारण शारीरिक, मानसिक क्षमता प्राप्त होती है, वरन् आत्मिक विभूतियों और भौतिक सिद्धियों को भी हस्तगत किया जा सकता है।

मंत्र विद्या के विशेषज्ञ वैज्ञानिक जानते हैं कि जिनसे जो भी शब्द निकलते हैं, उनका उच्चारण कण्ठ, तालु, मूर्धा, ओष्ठ, दन्त, जिह्वामूल आदि मुख के विभिन्न अंगों द्वारा होता है। इस उच्चारण काल में मुख के जिन भागों से ध्वनि निकलती है, उन अंगों की नाड़ी तन्तु शरीर के विभिन्न भागों तक फैलते हैं। इस फैलाव क्षेत्र में कई ग्रन्थियाँ होती है जिन पर उच्चारणों का दबाव पड़ता है। जिन लोगों की कोई सूक्ष्म ग्रन्थियाँ रुग्ण या नष्ट हो जाती हैं, उनके मुख से कुछ खास शब्द अशुद्ध या रुक-रुक कर निकलते हैं, इसी को हकलाना या तुतलाना कहते हैं। योगविद्या विशारद जानते हैं कि शरीर में अनेक छोटी-बड़ी दृश्य-अदृश्य ग्रन्थियाँ तथा शक्ति केन्द्र होते हैं जिनमें विशेष शक्ति भण्डार छिपे रहते हैं। सुशुम्ना सम्बन्ध षट्चक्र प्रसिद्ध है। ऐसे अगणित सूक्ष्म शक्ति केन्द्र शरीर में हैं। विविध शब्दों का उच्चारण इन विविध ग्रन्थियों पर अपना प्रभाव डालता है और उस प्रभाव से उन केन्द्रों का शक्ति भाँडागार जाग्रत होता है। मंत्रों का गठन इसी आधार पर हुआ है गायत्री महामंत्र में 24 अक्षर हैं इसका सम्बन्ध शरीरस्थ स्थूल एवं सूक्ष्म ग्रन्थि तन्त्रों-शक्ति केन्द्रों से है जो जाग्रत होने पर सद्बुद्धि प्रकाशक शक्तियों-अतींद्रिय क्षमताओं को सतेज करते हैं। गायत्री मंत्र के उच्चारण से सूक्ष्म शरीर का सितार चौबीस स्थानों से झंकृत होता है और उससे एक ऐसी स्वर-लहरी उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव अदृश्य जगत महत्वपूर्ण तत्वों पर पड़ता है। गायत्री महामंत्र की शब्दावली ही ऐसे शृंखलाबद्ध शब्दों से बनायी गयी है जो क्रम और गुम्फन की विशेषता के कारण उच्चारण कर्ता के शरीर, मन और अन्तराल के अतिरिक्त दृश्य-अदृश्य जगत में अपने ढंग का एक अद्भुत एवं विशिष्ट शक्ति प्रवाह उत्पन्न करती है।

मंत्र में ध्वनियाँ होती है। ध्वनियों के समूह को ही मंत्र कहते हैं। विज्ञानवेत्ताओं ने शब्द विज्ञान-ध्वनि विज्ञान पर प्रयोग-निरीक्षण किये हैं और अनेकों प्रत्यक्ष चमत्कार प्रस्तुत किये हैं। आज चिकित्सा उपचार से लेकर ध्वंसात्मक प्रयोजनों तक में इसे प्रयुक्त किया जाने लगा है। ध्वनि-तरंगों पर नित नये परीक्षण किये जा रहे हैं। जर्मनी के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने विविध परीक्षणों के आधार पर निष्कर्ष-प्रस्तुत करते हुये कहा है कि मानवीय काया पर ध्वनि तरंगों का विशेष मंत्र विज्ञान अद्भुत प्रभाव पड़ता है उनने’ ‘ॐ’ के उच्चारण से निकलने वाली ध्वनि तरंगों से उत्पन्न शक्ति का वर्णन करते हुए लिखा है यदि ‘ॐ’ का उच्चारण विधिपूर्वक किया जाय तो उससे एक मोटी दीवार तक फट सकती है। इसी तरह का निष्कर्ष फ्राँस की एक महिला वैज्ञानिक (मि. वाटसह्य) ने अपनी पुस्तक-”वाँइस फिगर्स” में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार मंत्र जप से हृदय और मस्तिष्क विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। नियतरूप से जप करते रहने पर क्रमशः मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का उद्भव होता है। प्राणशक्ति का अभिवर्धन, अरोग्य प्राप्ति एवं दीर्घायुष्य जैसे भौतिक लाभ तो इसके सहज परिणाम है।

मानवी काया में संजीवनी शक्ति-प्राणशक्ति की घट-बढ़ होने पर शारीरिक एवं मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है और अनेकानेक प्रकार की व्याधियाँ धर दबोचती हैं। चिकित्साविज्ञानी इसका उपचार अपने ढंग से करते हैं तो योगविज्ञानी प्राणायाम परक अनेक विधाओं द्वारा इसकी पूर्ति करने का मार्ग सुझाते हैं। गायत्री महामंत्र का जप इस आवश्यकता की पूर्ति आसानी से कर देता है। यह प्रक्रिया हानिरहित भी है और निरापद भी। गायत्री का अर्थ ही है-प्राणों का त्राण-रक्षा करने वाली। ‘गय’ माने प्राण और ‘त्रि’ माने त्राण करने वाली। इस उपक्रम अपना कर मनुष्य विपुल परिणाम में प्राण संचय कर सकता है और वहाँ प्राण बनकर जरूरतमंदों की भी सहायता कर सकता है।

भारतीय अध्यात्म शास्त्रों में इस तरह के अनेक मंत्रों का उल्लेख है जिनके भाव प्राणव जब से चिकित्सकीय लाभ उठाये जा सकते हैं। इन मंत्रों में गायत्री महामंत्र की महानता एवं उपाद्यता सर्वोपरि है। गायत्री महामंत्र सूर्य का मंत्र है जिसका प्राण-जीवनी शक्ति से सीधा सम्बन्ध है। यह अपने उपासक-जब कृता को सर्वप्रथम वायु अर्थात् दीर्घायुष्य प्राणवान बनाती है वैज्ञानिक परीक्षणों से भी अब इस तथ्य की पुष्टि हो गयी है कि इस महामंत्र का जप करने से मनुष्य की जीवनी शक्ति में असाधारण रूप से अभिवृद्धि होती है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में जिसे ‘इम्यूनिटी अर्थात् रोग प्रतिरोधी क्षमता कहते हैं, वह और कुछ नहीं प्राणशक्ति की अधिकता ही है। इसके क्षीण होने पर ही मनुष्य रोगी बनता है। गायत्री मंत्र का जप करते रहने पर समूची काया धीरे-धीरे प्राण प्रखरता से भरती जाती है और भीतरी एवं बाहरी रोगाणुओं से शरीर की रक्षा करने के साथ-साथ दीर्घायु प्रदान करती है। गहनतापूर्वक जाँच-परख करने पर पाया गया है कि इस मंत्र का जप करते रहने पर श्वासों की संख्या स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है। यह एक मिनट में 15 के स्थान पर सात रह जाती है। प्रायः 15 के स्थान पर सात रह जाती है। प्रायः प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति 24 घंटे में 21600 बार श्वास लेता है अर्थात् एक मिनट में 15 बार। प्राणायाम परक यौगिक क्रियाओं से श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण साधा और उसकी गति को कम किया जाता है। जब द्वारा भी यही प्रक्रिया संपन्न होती है। इस तरह से यदि कोई व्यक्ति एक घंटा प्रतिदिन जप करता है तो समझा जाना चाहिए कि उसकी आयु में लगभग 500 श्वासों की आयु-वृद्धि हो गयी। इस तरह से यदि वह इस प्रक्रिया को निरंतर जारी रखता है तो जीवन में कई वर्षों की वृद्धि हो सकती है। इस संदर्भ में जबलपुर मेडिकल कालेज के वरिष्ठ चिकित्सा विज्ञानी एवं हृदय रोग विशेषज्ञ डा. आर. एस. शर्मा ने गंभीरतापूर्वक परीक्षण किया है। उनने अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति “थेरप्यूटिकल बेनिफिट्सि आफ गायत्री मंत्र” अर्थात् गायत्री मंत्र के चिकित्सकीय लाभ में लिख है कि मंत्र जप आत्मोत्थान में सहायक तो होता ही है, साथ ही साथ इसके प्रभाव से शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य में भी अभूतपूर्व सफलता मिलती है। गायत्री महामंत्र के नियमित जप का मनुष्य के आयुष्य एवं जीवनक्रम पर क्या क्या प्रभाव पड़ता है? इस प्रयोग-परीक्षण के लिए 40 से 80 वर्ष आयु के 20 व्यक्तियों को चुना गया जो जप करते थे साथ ही संबंधित व्यक्तियों के परिवार से एक-एक ऐसे व्यक्ति को लिया गया तो जप नहीं करता था। दोनों ही समूहों का आहार-विहार परीक्षण के सात ई. सी. जी., ई.ई. जी., ब्लडप्रेशर आदि भी नोट कर लिये गये। यह भी परख लिया गया कि किसी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप या कोई अन्य हृदय संबंधी बीमारी तो नहीं है। तीन वर्ष तक बराबर त्रैमासिक परीक्षण किया जाता रहा। मंत्र जप करने वाले समूह के जो परीक्षण परिणाम सामने जाये, वे अद्भुत थे। पाया गया कि जो व्यक्ति जपकर रहे थे, अद्भुत थे। पाया गया कि जो व्यक्ति जप कर रहे थे, उनके रक्त दाब एवं हृदय दाब एवं हृदय-गति क्रमशः कम हो गयी थी, परंतु जो जप नहीं कर रहे थे उनके हृदय की गति एवं रक्त दाब अपेक्षाकृत बढ़े-चढ़े थे। पहले ग्रुप में न तो किसी को उच्च रक्त चाप की बीमारी थी और न ही ‘एन्जाइना’ जैसा हृदय रोग। उनमें से किसी को कार्डियोवैस्कुलर या सेरिब्रो वैस्कुलर बीमारियों से मरते भी नहीं देखा गया, जबकि दूसरे ग्रुप के कई व्यक्ति इन्हीं बीमारियों से ग्रस्त होकर दम तोड़ते देखे गये।

हृदय की गतियों पर सामान्य मनुष्यों का कोई नियंत्रण नहीं होता, लेकिन योगाभ्यासियों के लिए हृदय की गतियों पर सामान्य मनुष्यों का कोई नियंत्रण नहीं होता, लेकिन योगाभ्यासियों के लिए हृदय की धड़कन एवं नाड़ी गति आदि को इच्छानुसार घटा-बढ़ा लेना, उसकी लयबद्धता को सुस्थिर बना देना एक सामान्य क्रिया होती है। इस प्रक्रिया द्वारा हृदय की अनैच्छिक पेशियों को वशवर्ती बनाया जा सकता है। हृदय की असामान्यगति- “सायनस टैकीकार्डिया” से लेकर हृदयाघात तक की प्राणघातक बीमारियों से गायत्री मंत्र द्वारा छुटकारा पाया जा सकता है। इस मंत्र द्वारा हृदय की लयबद्धता को न केवल नियमित बनाया जा सकता है, वरन् असामयिक मरण से भी छुटकारा पाया जा सकता है। इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए डा. शर्मा ने पिछले दिनों 16 से 70 वर्ष की आयु के 266 व्यक्तियों पर 17 दिन से लेकर एक वर्ष तक गायत्री मंत्र के प्रभाव का परीक्षण किया। इनमें से अधिकतर कार्डियक अरिमियास, आट्रि टैकीकार्डिया जैसे विभिन्न प्रकार के हृदय रोगों से पीड़ित थे। इन्हें नियमपूर्वक गायत्री महामंत्र का जप कराया गया। एक वर्ष बाद पाया गया कि हृदय रोगों में दी जाने वाली प्रचलित औषधियों की अपेक्षा इस महामंत्र का अधिक स्थायी एवं अनुकूल प्रभाव पड़ा।

‘हाइपरटेन्स’ अर्थात् उच्च रक्तचाप वर्तमान शताब्दी की सबसे बड़ी बीमारी है। विश्वभर में इस महाव्याधि से पीड़ितों की संख्या करोड़ों में और प्रतिवर्ष लाखों नये रोगी इस शृंखला में आ जुड़ते हैं। प्रचलित औषधि उपचार भी इसमें कोई स्थायी राहत नहीं दिला पाते, कारण कि यह एक मनोकायिक रोग है, जिसकी जड़ मानसिक उत्तेजनाओं, उद्विग्नताओं, चिंताओं एवं तनावों में छिपी हुई है। इसका उपचार भी तद्नुरूप ही ढूँढ़ा जाना चाहिए जो चिंतन-चेतना को प्रभावित-परिष्कृत कर सके और ‘तंत्रिका तंत्र एवं स्नायु प्रणाली को सुसंतुलित बनाये रख सके। गायत्री महामंत्र को इसके लिए सबसे उपयुक्त पाया गया है। इस महामंत्र में एक ओर जहाँ मन-मस्तिष्क को उच्चस्तरीय विचारणाओं, सत्प्रेरणाओं से परिपूरित करने, मनोविकारों का श्वास करने की क्षमता है, वहाँ केन्द्रों, नाड़ी संस्थानों को प्रभावित-उत्तेजित करने और उन्हें जाग्रत कर क्षमतावान् बनाने की सामर्थ्य विद्यमान है। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने पाया है कि जिन व्यक्तियों की हृदयगति 110 प्रति मिनट थी, वह 3 माह से एक वर्ष की जप साधना के पश्चात् 70 प्रति मिनट तक हृदयगति को कम करने में सफल हुए। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुर ऑटोनामिकनर्वस सिस्टम एवं मन-मस्तिष्क का सीध संबंध मंत्र के साथ जुड़ जाने के कारण ही इस प्रकार के अप्रत्याशित परिवर्तन होते हैं।

गायत्री महामंत्र से होने वाले भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ, सिद्धियाँ, शक्तियां किसी दैवी कृपा से अकस्मात् ही प्राप्त नहीं हो जातीं, वरन् उसके द्वारा जो वैज्ञानिक प्रक्रिया अपने आप मंत्रवत् होती हैं उससे लाभ होता है। मंत्र की सफलता उसके शुद्ध उच्चारण में है, तभी उसमें गुँथे शब्दों का प्रभाव विभिन्न शक्ति केन्द्रों पर पड़ना संभव होता है। मंत्र जप में भावना के साथ-साथ नियमितता एवं लयात्मकता का प्रमुख योगदान होता है। श्रद्धा और विश्वास तो इसका मेरुदंड है ही।


प्राण प्रवाह के सुनियोजन से चिरयौवन

शरीर की स्वस्थता लंबे समय तक बनाये रख कर लंबी आयु प्राप्त कर सकना संभव है। क्या? यह प्रश्न इन दिनों विज्ञान जगत में चुनौतीपूर्ण बना हुआ है विज्ञानवेत्ता विविध विधि द्वारा इसी एक गुत्थी को सुलझाने में प्रयत्नशील हैं। हिमालय वासी दीर्घजीवी योगियों का उदाहरण हमारे समक्ष है, पर देखना यह है कि सर्वसाधारण के लिए भी यह संभव है क्या?

वैज्ञानिक इस संदर्भ में पूर्ण आशावादी हैं, पर उनका एक ही असमंजस है कि भौतिकवाद का समर्थन करने वाला विज्ञान क्या कोई ऐसी प्रणाली ढूंढ़ पाने में सफल हो सकेगा, जो सक्रिय जीवन जीते हुए दीर्घायु प्रदान कर सके। निष्क्रिय बन कर लंबी आयु प्राप्त करने का कोई तुक नहीं। यों इस संबंध में विज्ञान का सुनिश्चित दाव है कि इसके माध्यम से मनुष्य को वर्षों जीवित रखा जा सकता है। जीव जगत में इसके कई उदाहरण भी देखने को मिलते हैं। ध्रुवीय भालू प्रतिकूल मौसम आने पर स्वयं को बर्फ से धंसा लेते हैं और महीनों बिना खाये-पिये उस स्थिति में पड़े रहते हैं। परिस्थिति जब अनुकूल बनती है, तो वे अपनी निष्क्रिय त्याग कर बाहर निकल आते हैं। ऐसा ही एक अन्य प्राणी है-”स्लोथ”। पेड़ में निवास करने वाला भालू के आकार का यह जंतु इतना आलसी होता है कि भोजन ढूँढ़ने के कष्ट से बचने के लिए लम्बे समय तक वृक्ष की शाखों पर उलटा टँगा रहता है। अनेक बार यह अवधि इतनी लंबी होती है कि इस पर काई जम जाती है और पूरा शरीर उससे ढक जाता है। उसके इसी स्वभाव के कारण अंग्रेजी साहित्य में ‘स्लोथ’ शब्द आलस्य का पर्याय बन गया हैं। इसी प्रकार के कितने ही ऐसे जंतु हैं, जो निष्क्रिय रहते हुये लंबे समय तक जीवित बने रहते हैं। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने यह दावा प्रस्तुत किया है कि यदि मनुष्य को बर्फ में अति शून्य तापमान पर जमा दिया जाय, तो उसे भी वर्षों जिंदा रखा जा सकता है। लंबी निद्रा के बाद जब भी जगाना अभीष्ट हो, तो तापक्रम बढ़ा देने मात्र से उसके अंग-अवयव सक्रिय हो उठेंगे और व्यक्ति जीवित हो उठेगा। आजकल इस विधि का प्रयोग मानवी अंगों को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखने के लिए बहुतायत से किया जा रहा है। मनुष्य को चिरायु बनाने के लिए यदि विज्ञान के पास यही एकमात्र उपाय है, तो फिर इसे निरर्थक ही समझना चाहिए, क्योंकि जीवन का उद्देश्य मात्र वर्ष गिनाना अथवा पूरे करना नहीं है, वरन् उसे समर्थ-सशक्त बनाये रखना भी सहायक नहीं हो सकता, तो फिर उसके द्वारा प्रदत्त दीर्घ जीवन बेकार है।

यों शरीर शास्त्रियों ने आयुष्य के “एजींग” प्रक्रिया रोकने के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण अनुसंधान भी किये हैं और इस तथ्य का पता लगाया है कि असमय ही मरण क्यों आ धमकता है? इस संबंध में जैव रसायनज्ञों का कहना है कि आयु बढ़ने के साथ-साथ शरीर में ऑक्सीजन की खपत कम होती जाती है, जिससे शरीर कोशाएं मरने और अक्षम होने लगती हैं। समय बीतने के साथ-साथ यह क्रिया तेज होती जाती है, जिससे वार्धक्य और अकाल मरण आ उपस्थित होते हैं। इसका कारण बताते हुये वैज्ञानिक कहते हैं कि इसमें प्रमुख भूमिका पिट्यूटरी ग्रंथि के स्राव की है। इन दिनों इसके स्राव में एक विशेष प्रकार के रसायन की अधिकता पायी जाती है, जिसकी मात्रा बढ़ते पर्यावरण-प्रदूषण से उत्पन्न मानसिक विक्षोभ से और अधिक बढ़ जाती है। स्थिति तब और गम्भीर हो जाती है, जब व्यक्ति स्वयं भी मानसिक अस्थिरता की अवस्था से गुजर रहा हो। इन दोनों का संयुक्त प्रभाव इतना घातक होता है कि व्यक्ति देखते-देखते बूढ़ा हो जाता है और फिर मौत भी अपनी दस्तक देने लगती है। मूर्धन्य जैव रसायनवेत्ता एलन पोलाँक का कहना है कि यदि अंतःस्रावी तंत्र पर नियंत्रण किया जा सके, तो न केवल एण्डोक्राइन रस नियमित नियंत्र बने रहते हैं, वरन् शरीर प्रतिरक्षा तंत्र भी समर्थ-सशक्त बना रहता है। उनके अनुसार वय बढ़ाने की प्रक्रिया में थयमस ग्रंथि का भी महत्वपूर्ण हाथ है। वे कहते हैं कि इन दिनों अचिंत्य चिंतन की बढ़ती मात्रा के कारण इस ग्लैंड पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, फलतः धीरे-धीरे वह सिकुड़ने लगती है और अंत में अपने वास्तविक आकार का 1/10 वाँ हिस्सा ही रह जाती है। आकार घटने के साथ-साथ उसकी सक्रियता भी कम होने लगती है, जिससे संपूर्ण प्रतिरक्षा प्रणाली प्रभावित होती और कमजोर पड़ जाती है। कमजोर अवयव “बायोलॉजिकल एज” को बढ़ा देते हैं, जब कि यथार्थ में “क्रोनोलाजिकल एज” उतनी होती नहीं। दूसरे शब्दों कहे तो, यही बुढ़ापा है।

इसके अतिरिक्त वार्धक्य के कितने ही अन्य कारण भी विशेषज्ञों ने गिनाये हैं। फ्लोरिडा विश्व विद्यालय के शरीर विज्ञानी लियोनार्ड हेफ्लिक के मतानुसार प्रत्येक शरीर-कोश का अपना एक ‘जेनेटिक क्लाक’ होता है और हर कोशिका का विभाजन अधिकतम 50 बार होता है। बुढ़ापे की दशा में कोशिका-विभाजन के बीच का अंतराल घट जाता है, और जो क्रिया न्यूनतम सौ वर्ष में संपूर्ण होनी चाहिए, वह आधी आयु आते-आते पूरी हो जाती है। इसके उपरान्त कोशिकाओं के विभाजन और नवीनीकरण की गुंजाइश बिलकुल समाप्त हो जाने के कारण देह अक्षम बनाती और ऐसा होते-होते मर जाती है। वे कहते हैं कि यदि कोषा-विभाजन के बीच की अवधि को लम्बा किया जा सके, तो जिस अनुपात में वह अवधि बढ़ेगी, उसी अनुपात को उम्र को बढ़ा पाना हो सकेगा। योगियों में दीर्घायुष्य की जो घटना घटती जाती है, इसके पीछे यही रहस्य है। सर्वसाधारण में जो प्रक्रिया 50 वर्ष में पूरी हो जाती है, उसके पूर्ण होने में योगियों से सैकड़ों वर्ष का समय लग जाता है।

एक अन्य कारण का उल्लेख करते हुये विशेषज्ञ कहते हैं कि मुक्त मूलकों का भी वृद्धावस्था उपस्थित करने में बहुत बड़ा योगदान होता है। इतने पर भी यह निमित्त गौण है।

शरीर वेत्ताओं असामयिक जन्म-मरण के तीन प्रमुख कारण बनते हैं। ये हैं- मस्तिष्क अंतःस्रावी प्रणाली और प्रतिरक्षा तंत्र। इनमें से मस्तिष्क संपूर्ण शरीर तंत्र का केन्द्रीय संस्थान है। इससे काया और उसकी विभिन्न गतिविधियाँ नियंत्रित होती है। एण्डोक्राइन सिस्टम का काम है, जबकि शरीर स्वस्थता की देख-रेख इम्यून सिस्टम (जीवनी शक्ति के लिए उत्तरदायी संस्थान के जिम्मे है। इनमें से किसी के भी असंतुलित होने पर अस्वस्थता और जीर्णता देखते-देखते पैर जमा लेती एवं व्यक्ति को मौत के मुँह में ढकेल देती है। इनसे कुछ अधिक गहराई में उतरने पर ज्ञात होता है कि उपरोक्त संस्थान विस्तृत स्थूल निमित्त मात्र है। सूक्ष्म कारण तो इनके मूल में निवास करने वाले “जीन्स” है, जो सम्पूर्ण शरीर-प्रक्रिया को संचालित करते हैं। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि किसी प्रकार यदि इन्हें नियंत्रित कर लिया जाये, तो काया की समस्त गतिविधियाँ स्वतः नियमित हो जायेगी। पिछले दिनों इस दिशा में अनेक प्रयास हुये हैं “जेनेटिक इंजीनियरिंग” नामक विज्ञान की एक अभिनव शाखा का विकास भी हुआ है, किन्तु इस विज्ञान की सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि कायारत प्रत्येक गड़बड़ी को मिटाने के लिए जिससे सम्बन्ध हर एक जिनकी मरम्मत करनी पड़ती है। यदि किसी शरीर में पचास प्रकार की गड़बड़ियाँ हो, तो लगभग उतने ही जीन्स में सुधार की प्रक्रिया सम्पन्न करानी पड़ेगी। व्यवहारिक दृष्टि से यह अत्यन्त दुरूह कार्य है। ऐसी दशा में वैज्ञानिकों को अब यह स्पष्ट भासने लगा है कि जीन्स भी किसी वृद्ध वृक्ष के सूक्ष्म शाखा-पल्लव मात्र। जब कहीं है, वह जड़ जिसके सींचने भर से सम्पूर्ण तरुवर स्वास्थ-समयुक्त होकर लहलहाने लगे। जब वे इसी मूल की तलाश में है।

अध्यात्म विज्ञानी तो बहुत पहले से ही इस बात का प्रतिपादन करते रहे हैं कि शरीर-स्वस्थता के मूल में प्राण-चेतना की भूमिका प्रमुख है। देह जब आकार जराग्रस्त होती हैं, तब इसी का अस्त-व्यस्त प्रवाह कारणभूत होता है। विज्ञजन जानते हैं कि शरीर में 72 हजार सूक्ष्म नाड़ियां हैं। इनमें से 72 प्रमुख हैं। इनमें से भी 10 महत्व की। उक्त नाड़ियों में जब भी प्राण-प्रवाह में व्यक्ति क्रम पैदा होता है, तो रोग-सोको का जन्म होता है। तत्वज्ञ इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि इन नाड़ियों में से अधिकांश का संबंध पैर के पैर के तलुवों और हाथ की हथेलियों से है। शारीरिक श्रम के दौरान इनके बार-बार दबने से नाड़ियों में प्राण का आवागमन अप्रतिहत रूप से जारी रहता है, जिससे स्वास्थ्य भी अक्षुण्ण बना रहता है। पुराने जमाने में लोग इस विज्ञान से परिचित थे, इसलिए परिश्रम करने से जो नहीं चुराते थे और अपना काम स्वयं अपने हाथों से करने में रुचि रखते थे।

आज जबकि सुविधा-संवर्धन की प्रवृत्ति समाज में बढ़ी है, लोग अपना काम दूसरों के द्वारा कराने में रुचि रखते हैं। बढ़ती दौलत के कारण व्यक्ति ”श्रम के बदले पैसा” की नीति अपना कर श्रम खरीदते और स्वयं आराम तलब बनते जाते हैं। इन दिनों यह नीति समाज में अत्यधिक परिमाण में बढ़ी है। लोग इसके कारण अधिकाधिक आरामतलबी की ओर उन्मुख हुए हैं। श्रम का मद्दा घटने से शरीर में जो प्राण-प्रवाह पहले आसानी से होता रहता था, अब उसमें व्यवधान पैदा होने लगा है। अवयवों को उपयुक्त मात्रा में आवश्यक प्राण न मिले, तो उनका दुर्बल होना स्वाभाविक है। आजकल के जर्जर मनुष्य की जर्जर काया का यही प्रधान कारण है।

इसके लिए श्रम की महत्ता समझी जानी चाहिए और प्रत्येक को प्रतिदिन उपयुक्त परिमाण में इतना परिश्रम करना चाहिए, ताकि प्राण-प्रवाह संतुलित बना रहे। इसके अतिरिक्त सात्विक आहार भी इसके प्रवाह कसे संतुलित करने में महत्वपूर्ण योगदान करता है। ” अन्नों वै मनः” कहकर आप्तजनों ने इसी तथ्य को प्रतिपादित किया है। अन्न से मन बनता है। अन्न यदि सात्विक और नीतिपूर्वक उपार्जित हो, तो उससे विनिर्मित होने वाला मन भी उदास और उत्कृष्ट स्तर का होता है। मन यदि श्रेष्ठ हो, तो शरीर के स्वस्थ बनने में भी कोई अड़चन जप, तप, व्रत ध्यान भी प्राण के संचार में सहयोगी साबित होते हैं। प्राण-प्रवाह से संबंधित इन तथ्यों को ध्यान में रखा जाय, तो कोई कारण नहीं कि हम स्वस्थ और दीर्घायु जीवन न जी सके। शरीर शास्त्रियों की खोज अपने स्तर पर सही है, पर वह अपूर्ण है। हम संपूर्ण सत्य को समझें। जड़ की जगह पत्र-पल्लवों को न सींचे। ऐसा यदि हो सका, तो अक्षुण्ण स्वास्थ्य और दीर्घायुष्य निस्संदेह प्राप्त होकर रहेगा, इसमें दो मत नहीं।


वातावरण की महिमा गायी ऋषियों और मनीषियों ने

गुरु अपने शिष्यों के साथ तीर्थ यात्रा पर चले जा रहे थे। एक शिष्य ने कहा-गुरुव! चलते-चलते थकान सी आ गई है। कुछ विश्रान्ति की आवश्यकता अनुभव होती है। कुछ विश्रान्ति की आवश्यकता अनुभव होती है भोजन का भी समय हो गया है। गुरुव ने चारों ओर निगाह दौड़ाई। समीप ही बरसाती नदी के किनारे एक विशाल वृक्ष खड़ा था। फलों से लदा था, छाया भी थी। सबने अपराह्न की संध्या-वंदन कर गुरु के हाथों प्रसाद पाया, थोड़ी देर विश्राम कर थकान मिटाई व फिर “चरैवेति चरैवेति” सिद्धाँत का परिपालन करते हुए आगे बढ़ गए, प्रव्रज्या चलती रही। एक वर्ष गीत गया। संयोग से आगामी वर्ष लौटते हुए उसी स्थान पर रुके। किंतु वहाँ वह वृक्ष नहीं नहीं था। जमीन से उखड़ी जड़ें बता रही थीं कि कभी वहाँ वृक्ष का अस्तित्व था, कल−कल करती नदी भी पास बह रही थी। एक शिष्य ने जिज्ञासापूर्वक पूछ ही लिया कि “भगवन्! यह क्या हुआ। इतना हरा-भरा वृक्ष व देखते-देखते धराशायी हो गया जबकि छोटी-छोटी बेंतों की लताएँ यथावत् खड़ी हैं। ” गुरुदेव ने गंभीरतापूर्वक कहा कि तात्! यह वृक्ष तो विशाल था, सबको छाया व फल भी ता था पर इस बरसाती नदी के उफनते प्रवाह को इसकी खोखली जड़ें झेल नहीं पाईं। उन जड़ों के खोखलेपन के ध्वंसावशेष तो अभी भी तुम देख ही हो। नदी का प्रवाह अभी भले ही शांत नजर आ रहा हो पर वर्षा ऋतु में बाढ़ आई तो कमजोर होने से यह धराशायी हो गया व बह गया। खोखलेपन की ऐसी ही अभिशप्त परिणति होती है। “इसमें नदी के प्रवाह का कोई चमत्कार नहीं, वृक्षों के मूलभूत आधार जड़ों का सूख जाना ही प्रमुख कारण है। ”

शिष्यों ने प्रसंग सुना व मर्म समझा कि यदि जड़े मजबूत न हों अंतरंग का आधार सशक्त न हो तो अस्तित्व अस्थायी ही रहता है। चाहे व्यक्ति का अंतःकरण हो अथवा समाज रूपी भवन का प्रसंग हो-यदि जड़ें कमजोर होंगी, मर्मस्थल रुग्ण होगा, नींव कमजोर होगी तो व्यक्ति समस्याओं रूपी तूफान को झेल नहीं पाएगा, समाज रूपी भवन गिरकर ही रहेगा।

महात्मा जी ने आश्रम की ओर लौटते हुए प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा-”हे शिष्यगण ! मनुष्य को तुम एक प्रकार का भटका हुआ देवता मान सकते हो। उसके अंतराल में पड़े संस्कार जब प्रसुप्त पड़े रह जाते हैं तो वह सामान्य शिश्नोदर-परायण जीवन जीता देखा जाता है। अंतः की संवेदना सूख जाने के कारण निष्ठुर निर्दयी, कृपण स्थिति में नरपशु नरपिशाच की स्थिति में जीता देखा जाता है। यदि वह अंतःकरण की वातावरण के प्रभाव का लाभ उठा ले तो कोई भी प्रतिकूलता उसे हिला नहीं सकती, प्रगति पथ पर बढ़ते चरणों को कोई भी तूफान रोक नहीं सकता। व्यक्ति अपने संस्कारों को जमा कर ही देवमानव-महामानव-ऋषि, देवदूत बनता देखा है। ”

ऊपर आख्यान में बताई बात सही भी है। किंतु यह सब किया कैसे जाय? बीज यदि जमीन में पड़ा हो उसमें घुन हो तो कितना ही खाद-पानी दिया जाय उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता प्राणवान बीज परिस्थितियाँ अपने अनुकूल पाते ही भूगर्भ की नमी व गर्मी से पोषण पाते ही अंकुरित-पल्लवित-पुष्पित होता व विशाल वृक्ष का आकार धारण करता देखा जाता है। साधारण मानव भी इसी प्रकार अपनी सुसंस्कारिता को पोषण देते हुए तथा संस्कार युक्त वातावरण एवं महामानवों का सान्निध्य-संरक्षण पाकर आगे बढ़ते, असाधारण पुरुषार्थ करते देखे जाते हैं। यदि सब कुछ अनुकूल होते हुए भी व्यक्ति अपने विकास की तत्पर न हो तो इसे उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। उससे बड़ा अभागा और कौन हो सकता है जो तपःपूत सुसंस्कारित वातावरण पाकर, महापुरुषों दैवी सान्निध्य व संरक्षण पाकर भी अपनी आत्मिक प्रगति न कर सके।

किसी स्थान विशेष के संस्कार जैसे होते हैं वैसा ही आभामंडल उस स्थान विशेष पर बन जाता है तथा वहाँ विद्यमान लोगों को प्रभावित करता है। भगवान श्रीकृष्ण को जब महाभारत संग्राम के लिए भूमि का चयन करना पड़ा तो सारे बृहत्तर भारत का पर्यवेक्षण करने के बाद के लिए उपयुक्त पाया। विशिष्टता उस स्थान की यह थी कि थोड़ी सी खेती की जमीन के लिए एक भाई ने अपने दूसरे सगे भाई को नृशंसतापूर्वक मार डाला एवं उसे खेत की मेंड़ में दबा दिया। उनने कहा कि जिस स्थान पर संवेदना इतनी मृतप्राय हो जाय कि व्यक्ति निष्ठुरता की चरमसीमा पर पहुँच जाय, पर भाई-भाई के विरुद्ध, सगे, संबंधीगण एक दूसरे के विरुद्ध लड़ सकते हैं। कौरवों-पाण्डवों के लिए वही भूमि उपयुक्त मानी गयी एवं विशाल महाभारत वहीं संपन्न हुआ।

श्रवण कुमार अपनी मातृ-पितृ भक्त सेवा के लिए युगों-युगों तक या किये जाते रहेंगे किंतु जब वे अपने माता-पिता को लेकर मयदानव की क्रिया स्थली हस्तिनापुर के उत्तरी क्षेत्र के समीप से गुजर रहे थे तो वहाँ विद्यमान वातावरण के संस्कारों ने उनके चिंतन को भी प्रभावित कर दिया व उनने अपनी काँवर जमीन पर रखते हुए माता-पिता से स्वयं ही अपनी यात्रा पूरी करने को कहा। प्रज्ञा चक्षु पिता समझ गए कि इस स्थान में ही कोई ऐसी बात है कि उनका आज्ञाकारी बेटा ऐसा कह रहा है। उनने निवेदन किया कि कुछ दूरी तक उन्हें वह और पहुंचा दे, नेत्रहीन होने के कारण वे स्वयं चल नहीं पायेंगे, फिर वह चाहे अकेला उन्हें छोड़ कर चला जाए। थोड़ी ही देर में वह क्षेत्र पीछे निकलते ही श्रवण कुमार को स्वयं पर इतना पश्चाताप हुआ कि आखिर उनसे यह हुआ कैसे?

वस्तुतः स्थान विशेष के संस्कारों की अपनी महत्ता है। इसी कारण तंत्र साधक अपनी शक्ति साधना हेतु मरघटों को चुनते हैं। वहाँ की भूमि में, वातावरण में ऐसी विशिष्टता होती है कि उन्हें आसुरी शक्तियों की पूरी मदद अपनी साधना की सिद्धि में मिलती है।

पानीपत की तीन लड़ाइयां प्रसिद्ध हैं। पहली लड़ाई बाबर व राणासाँगा के बीच, दूसरी बाबर एवं इब्राहिम लोधी के बीच हुई। इन तीनों ने ही दिल्ली के तख्त का तथा भारत के भविष्य का निर्धारण कर यवन साम्राज्य की व आज के भारत के स्वरूप की स्थापना कर दी। पानीपत कुरुक्षेत्र ही स्थित हरियाणा का एक स्थल है, जहाँ के संस्कार कुछ इस प्रकार थे कि योद्धाओं में जबर्दस्त मान काट हुई एवं तीनों ही बार जो वर्षों के अंतराल पर लड़ाइयाँ हुई, उसी स्थान पर संघर्ष हुआ।

जहाँ तक भूमि व वातावरण के श्रेष्ठ संस्कारों का प्रश्न है-कई महत्वपूर्ण उदाहरण हमारे सामने हैं। समस्त ऋषियों की तपस्थलियाँ ऐसे स्थानों पर थीं, जहाँ आज तीर्थ-आरण्यक, धाम अथवा देवालय विद्यमान हैं। तीर्थों के साथ जो इतिहास जुड़ा है, वह इसी तथ्य का द्योतक है कि तपःपूत ऋषिगणों ने देवशक्तियों का आह्वान करके उस स्थान विशेष को संस्कारों से अनुप्राणित किया। उसी की महत्ता है कि आज भी उन स्थानों पर जाकर अलौकिक शांति मिलती हैं, दिव्य चेतना की उपस्थिति का आभास होता है।

भारत स्थित चारों धामों की, द्वादश-ज्योतिर्लिंगों की तथा सिद्धपीठों की अपनी महत्ता है कि किंतु हिमालय के उत्तराखण्ड कहे जाने वाले-उसका हृदय माने जाने वाले यमुनोत्री से लेकर नंदादेवी की चोटी तक के स्थान में जो विशिष्टता विद्यमान है-वह भारत ही नहीं विश्व के किसी भी हिमाच्छादित ऊँचे स्थानों पर नहीं है। यह स्थान देखने में भले निर्जीव, पाषाण खण्ड सा प्रतीत होता है जो वर्ष में 6 माह बर्फ से ही ढका रहता है किंतु तात्विक दृष्टि से पर्यवेक्षण करने पर यह एक प्रत्यक्ष देव स्थान है। उसके कण-कण में जीवन, संस्कार चेतना विद्यमान है। श्रीमद्भागवत के बारहवें स्कन्ध (अध्याय, 2, श्लोक 3) तथा दसवें स्कन्ध (अध्याय 87, श्लोक 5-6) में वर्णन है कि हिमालय, दिव्य सिद्धपुरुषों का निवास है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने विराट रूप के हिमालय में अवस्थित होने की बात कही है। थियासाफी की जन्मदात्री मैडम ब्लावट्की के अनुसार यहाँ सिद्धपुरुषों की, मार्स्टस की पार्लियामेंट है जो अध्यात्म क्षेत्र के महत्वपूर्ण निर्णय करती रहती है। पालब्रण्डटन, टी. लोबसंग राम्बा एवं “आटोबायोग्राफी ऑफ योगी” ग्रंथ के लेखक स्वामी योगानंद परमहंस ने इस क्षेत्र को विशिष्ट दिव्य अध्यात्म शक्ति से अनुप्राणित माना है। दुर्गम हिमालय, जो शिवलिंग, नंदनवन, स्वर्गारोहिणी, सत्तोपंथ जैसे स्थानों के उत्तर में तिब्बत क्षेत्र से लगा हुआ है, में ऋषि सत्ताओं के सूक्ष्म शरीर रूप में अवस्थित होने की अध्यात्म क्षेत्र में दो सौ वर्ष से भी अधिक वर्षों से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रम जी जिनने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की आधार शिला रखी थी, को भी मालवीय जी ने इस क्षेत्र से आमंत्रित किया था। स्वयं परम पूज्य गुरुदेव सत्ता के प्रतिनिधि गुरु से साक्षात्कार करने चार बार हिमालय यात्रा करने उसी क्षेत्र में गए थे।

ऋषि जमदग्नि, परशुराम की तपस्थली उत्तरकाशी, वरिष्ठ मुनि की क्रियास्थली देवप्रयाग, जहाँ श्रीराम ने वानप्रस्थ काल बिताया शुकदेव जी की तपोभूमि निर्वाणस्थली (केदारनाथ) अपितु जहाँ उन्हें चारों धाम की ज्योतिर्मठ भी यहीं स्थित हैं। श्रीकृष्ण रुक्मिणी ने बद्रीवन जो हिमाच्छादित बद्रिकाश्रम के अंचल में था, में ही तप−साधना की थी। पाण्डवों ने-

संकीर्णता भरे पक्षपात का नाम ही राग-द्वेश है। सुविस्तृत क्षेत्र में अपनापन फैला देने पर सभी अपने लगने लगते हैं। -पं. श्रीरामशर्मा आचार्य -स्वर्गारोहण इसी उत्तराखंड के के हिमाच्छादित शिखरों पर किया था। व्यास गुफा भी बद्रिकाश्रम से आगे वसोधरा निर्झर के समीप स्थित है जहाँ व्यास जी ने महाभारत व आर्ष का सृजन किया था। शिवजी की क्रीड़ास्थली कैलाश मानसरोवर इसी क्षेत्र में अवस्थित है गंगा धारण करने वाले कैलाशपति महाकालेश्वर ने स्वर्ग से अवतरित गंगा को जटाओं में धारण कर गोमुख के माध्यम से सारी पृथ्वी को अभिसिंचित करने का जो निर्देश दिया था, उस पौराणिक आख्यान की संगति भी शिवलिंग के समीप स्थित स्वर्ग गंगा, गंगोत्री ग्लेशियर, गोमुख व गंगोत्री से बैठती है। भगीरथ ने यहीं इस प्रयोजन के लिए तप किया था। वास्तविक कैलाश, मानसरोवर, शिवलिंग पर्वत शिखर, नीलकंठ शिखर तथा वहीं स्थित विशाल झील के रूप में हैं, यह भौगोलिक वेत्ता भी अब मान चुके हैं। अष्ट वसुओं ने जिस स्थान को भी अलकापुरी (अलकनंदा का उद्गम स्थल) पास है। इससे धरती स्वर्ग के इसी क्षेत्र में होने की विवेचना भी तथ्य सम्मत प्रतीत होती है।

पाँच प्रयोगों, पंच सरोवरों गुप्तकाशी-उत्तरकाशी तथा गंगा व यमुना जैसी उत्तराँचल को अभिसिंचित करने वाली विशाल नदियों का उद्गम केन्द्र यहीं होने से इस स्थान का अध्यात्म साधना की दृष्टि से विशेष महत्व है। दिव्य वनौषधियों से युक्त नंदनवन, हरकीदून तथा प्रायः सोलह से अधिक फूलों की घाटियाँ इस स्थान को वस्तुतः स्वर्ग की उपमा प्रदान करती हैं। यही देवताओं, ऋषियों, तपस्वियों का क्रीड़ा प्राँगण रहा है। आर्ष साहित्य में जो भी कुछ लिखा है वह एक प्रकार से हिमालय की ही आत्मा को अभिव्यक्ति है। इस क्षेत्र विशेष की महत्ता के कारण ही अध्यात्म वेत्ताओं ने इसे सर्वोपरि महत्व सदा से ही दिया है। इसी क्षेत्र को जाने वाली द्वापर हिमालय की छाया व गंगा की गोद में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपस्थली में शांतिकुंज की स्थापना भी इस भूमि के सुसंस्कारों को दृष्टिगत रख कर ही की गयी है। न केवल स्थापना हुई है अपितु सन् 1926 से सतत् जल रहे अखण्ड दीपक की स्थापना, कुमारिकाओं द्वारा अखण्ड गायत्री जप, नित्य यज्ञ एवं करोड़ों गायत्री महामंत्र की युगसंधि महापुरश्चरण साधना द्वारा इस क्षेत्र को संस्कारित कर इसे गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित भी किया गया है। इस कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर उपासना करने वाले के प्रसुप्त संस्कार स्वयं जाग उठते हैं, दैवीसत्ता का मार्गदर्शन उसे मिलता है तथा लौकिक एवं अन्यान्य समस्याएँ स्वतः सुलझ जाती हैं। यदि शांतिकुंज को दिव्यशक्ति धारा का गोमुख कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। इक्कीसवीं सदी का गंगावतरण भी यहीं हुआ है एवं उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष भी महाकाल द्वारा यहीं से किया गया है।

अन्याय स्थलों का उदाहरण देखने पर हम पाते हैं कि स्वयं महर्षि अरविंद ने जब क्राँतिकारी व समाज निर्माण के निमित्त महामानवों को मार्गदर्शन देने के बाद तप साधना करने का निर्णय लिया तो अगस्त्य मुनि की तपस्थली वेदपुरी का ही चयन किया। यह स्थान वही हैं जहाँ आज पांडिचेरी अवस्थित है जिस स्थान पर श्री अरविंद ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में व बाद में श्री माँ ने साधना की। वहीं पर अगस्त्य ऋषि की कभी कुटिया थी, ऐसा अध्यात्मवेत्ताओं का मत है इस स्थान का प्रभामंडल इतना अद्भुत दैवी एवं चमत्कारी था कि स्वयं राक्षस राज रावण उस स्थान पर आने की आजीवन हिम्मत न कर सका। उसके स्पष्ट निर्देश अपने अनुचरों के लिए थे कि उस आश्रम से दूर ही रहें नहीं तो वे उसके प्रभाव से अपना अस्तित्व तक खो बैठेंगे। इसी स्थान पर मुनि अगस्त्य ने श्री राम को माँ सीता की खोज के लिए जाते हुये दिव्यास्त्र प्रदान किये थे।

दक्षिण भारत में ही अरुणाचलम् नामक स्थान है जो महर्षि रमण की तपस्थली कहा है। यह शैव साधकों की तपोभूमि आदिकाल से रही है। इसी संस्कारित स्थान को जो पहाड़ियों से घिरा है, महर्षि रमण ने अपनी मौन साधना के लिए चुना व प्राण-शक्ति को घनीभूत कर इतना प्रचंड ऊर्जा संपन्न बना दिया कि वहाँ जाने वाला हर व्यक्ति स्वयं में परिवर्तन अनुभव करता था। कहा जाता है कि ऋषि आश्रमों में प्राचीनकाल में सिंह व गाय एक ही घाट पर पानी पीते थे। यह उक्ति और कहीं सत्य हो न हों, पर महर्षि रमण के आश्रम में हिंसक जीव भी पालतू पशुओं की तरह महर्षि व उनके पास अपने वाले दर्शनार्थियों के पास घूमते रहते थे। किसी को भी किसी ने कोई क्षति पहुँचाई हो, इसका एक भी उदाहरण देखने को नहीं मिला। 19 वीं सदी में जन्मे महर्षि रमण एवं श्री अरविंद सहित श्रीरामकृष्ण की तप−साधना, जो महाकाल व हिमालय की ऋषि सत्ता द्वारा प्रेरित थी, को ही वह श्रेय दिया जाता रहा है कि स्वतंत्रता संग्राम के लिए समुचित वातावरण इसी कारण बना व एक साथ अनेकों महामानव इस समय विशेष में जन्मे। शैव साधकों की उस तपस्थली के दिव्य संस्कार ही थे कि महर्षि मौन रहते थे फिर भी किसी आगन्तुक को ऐसा आभास न होता था कि उसके मन की बात को पढ़कर उसे समाधान, भावी जीवन संबंधी परामर्श उनकी चेहरे की मुसकान व नेत्रों की भावभंगिमा से न मिला हो। कोई साधक किसी भूमि विशेष में पड़े प्रसुप्त बीजाँकुरों को अपनी प्रखरता से जगाकर किस प्रकार उस स्थान को एक सिद्धपीठ बना सकता है, अरुणाचलम् इसका जीता जागता उदाहरण है।

इसी शृंखला में उज्जयिनी (आज का उज्जैन) का नाम भी आता है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक है, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक महाकालेष्वर की स्थापना यहाँ हुई है। अनेकों शक्ति साधक इसी भूमि पर साधना कर सिद्धि को प्राप्त हुए। राजा भर्तृहरि अपनी तप−साधना द्वारा शिप्रा नदी के तट पर स्थित इसी स्थान पर योगीराज बने। सूत-शैनक परंपरा में कुँभ के मेलों के लिए चुने गए चार दिव्य संस्कारित स्थानों में एक नाम उज्जैन का भी है जहाँ हर बारह वर्ष में एक बार सिंहस्थ का आयोजन आदिकाल से होता आ रहा है। इसमें सारे भारत वर्ष की हस्तियाँ एकत्र होकर अध्यात्म जगत से विभिन्न लौकिक एवं आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान निकाला करती थीं। हरिद्वार, प्रयाग, नासिक के साथ उज्जयिनी का नाम पवित्र स्थानों के रूप में इसी कारण लिया जाता है। संभवतः इस भूमि के संस्कार ही थे कि महर्षि साँदीपनि ने श्रीकृष्ण, बलराम, सुदामा, आदि को विद्या विस्तार का शिक्षण देने के लिए इसे ही चुना। युगों−युगों के लिए यह एक पवित्र स्थान बन गया।

प्रयागराज, जहाँ हर छह वर्ष में एक बार अर्धकुँभ एवं 12 वर्ष में पूर्ण कुँभ आयोजित होता है, तीर्थ राज कहलाता है। यहाँ त्रिवेणी संगम है जहाँ गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन होता है। महर्षि भरद्वाज का गुरुकुल यहीं पर था जहाँ पूरी धरित्री पर विद्या-विस्तार हेतु सतत् दस हजार शिक्षार्थी अध्ययनरत रहते थे। इस स्थान विशेष के संस्कार इतने दिव्य हैं कि यहीं से जन्मे महापुरुषों ने स्वतंत्रता के पूर्व एवं बाद में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं।

नासिक भी वह स्थान है जहाँ कुँभ का मेला गोदावरी के तट पर हर बार संपन्न होता है, पंचवटी भी यहीं स्थित है जहाँ श्रीराम ने वनवास का अधिकांश समय अपनी सहधर्मिणी एवं अनुज के साथ काटा था। महर्षि गौतम की यह तपस्थली रही है तथा महाप्रभु की बल्लभाचार्य की 84 बैठकों में से एक है। यह वही स्थान है जहाँ समर्थ गुरु रामदास ने तपकर अपनी व्यायामशालाओं के स्थापित करने के कार्य शुभारंभ का संकल्प लिया था। चौथा स्थान कुँभ के मेले के आयोजन का वह है जहाँ शांतिकुंज अवस्थित है-हरिद्वार।

उपरोक्त उदाहरण स्थान विशेष की महत्ता समझाने के लिए दिये गये। शांतिकुंज की अपनी विशिष्ट महत्ता विशेष वातावरण के कारण है यहाँ प्रखर प्रज्ञा रूपी महाप्राज्ञ गुरुदेव के तप की गर्मी विद्यमान है तो सजल श्रद्धा रूपी मातृशक्ति प्रातः स्मरणीय वंदनीया माता जी के स्नेह की नमी भी है। गर्मी व नमी पाकर ही बीज अंकुरित, विकसित, पल्लवित, होता है। ऐसे स्थान में की गयी थोड़ी सी साधना भी अगणित पुण्य फलदायी होती है। सारी ऋषि सत्ताओं की संग्रहित-शक्ति जहाँ हो, वहाँ किया गया तप सिद्धिदायक ही होता है गायत्री महाशक्ति की साधना, इक्कीसवीं सदी रूपी सतयुग के अवतरण हेतु युगसंधि महापुरश्चरण यहाँ पर न्यूनतम वर्ष में बार तो आकर संपन्न किया ही जाना चाहिए ताकि संस्कारित वातावरण का लाभ परिजनों में विद्यमान देवत्व के बीज को मिल सके, वे सुपात्र बन सकें। यह वह त्रिवेणी संगम है ‘जहाँ काक होहिं पिक बकऊँ मराला’ की उक्ति सार्थक होती है।

शांतिकुंज सविता शक्ति का सघनीभूत ऊर्जा केन्द्र है महर्षि तपस्थली में एक नूतन सृष्टि के सृजन के रूप में आज के युग के विश्वामित्र ने इस दिव्य भूमि के संस्कारों को पहचाना, जगाया, अनुप्राणित किया व विनिर्मित किया है अजस में करोड़ों सृजन शिल्पियों को नवयुग की आधारशिला रखने हेतु तपाया, विनिर्मित किया जाना है। शांतिकुंज दिव्य शक्तिधारा की गंगोत्री है-गोमुख है। दुर्गम हिमालय से ऋषि सत्ता की तप चेतन यहाँ एकीकृत हो सघन रूप में प्रकट होती है। गंगा, गायत्री एवं गुरुसत्ता की अद्भुत त्रिवेणी है-गायत्री तीर्थ का यह कल्पवृक्ष।


Quotation

मनुष्य को एक प्रकार की कठपुतली की उपमा दी जा सकती है। यदि वह अपनी मनोवृत्तियाँ तथा साधन संपत्ति कर्तव्यों के धागों में बाँधकर ईश्वर रूपी कुशल कलाकार के हाथों सौंप दे तो निस्संदेह उसका जीवन आदर्श, अनुकरणीय, प्रकाश-प्रद तथा ऐतिहासिक बन सकता है।

संत विनोबा अपने संस्मरण में लिखते हैं कि “व्यक्ति को न्दापूर्ण आलोचनाओं से डरकर सेवा के मार्ग से विचलित नहीं हो जाना चाहिए। क्योंकि उँगली उठाने वाले को यदि ध्यान से देखें तो ज्ञान होगा कि वह दूसरों की ओर एक ही उँगली उठा रहा होता है। जब कि तीन उँगलियाँ स्वतः उसकी ओर उठती हैं और चेतावनी देती हैं पहले स्वयं को देख फिर किसी और को देखना। ”


पूर्णतत्व की प्राप्ति का एक ही राजपथ

सीढ़ियाँ हों, चढ़नी हों, तो एक के बाद एक कदम बढ़ना पड़ता है और एक-एक सीढ़ी पार करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है। कोई यदि छलाँग दुर्घटना घटे बिना नहीं रह सकती। यह बात आत्मोत्थान के सर्दी में भी है। मनुष्य जिस परिवार में, समाज में, राष्ट्र और युग में जीता है, वह उसके लिए आगे बढ़ने -ऊंचा उठाने के एक-एक सोपान के समान हैं। इनसे होकर ही आगे बढ़ना पड़ता है। कोई यदि छलाँग लगाकर शीर्श पर पहुँचना चाहे, तो दुर्घटना घटे बिना नहीं रह सकती है। यही बात आत्मोत्थान के संदर्भ में भी है। मनुष्य जिस परिवार में, समाज में, राष्ट्र और युग में जीता है, वह उसके लिए आगे बढ़ने-ऊपर उठने के एक-एक सोपान के समान है। इनसे होकर ही आगे बढ़ना पड़ता है। प्रगतिक्रम में इनकी उपेक्षा करते हुए कोई यह सोचे कि वह कोई बजरंगी छलाँग मार कर चरम लक्ष्य तक पहुंच जायेगा, तो इसे उसकी प्रवंचना और अध्यात्म विज्ञान की अवमानना ही समझना चाहिए।

बालक जब छोटा होता है, तो पहले अक्षर ज्ञान कराना पड़ता है, तभी वह उस स्थिति में पहुँच पाता है कि पुस्तकें पढ़ सके। फिर जैसे-जैसे उसकी योग्यता बढ़ती जाती है, वैसे-ही-वैसे एक-एक कक्षा ऊपर उठते हुए वह स्कूल से कॉलेज में पहुँचता और स्नातक एवं स्नातकोत्तर की डिग्रियाँ प्राप्त करता है। यह प्रगति का स्वाभाविक क्रम है। भौतिक सफलता से लेकर आत्मोन्नति तक में इसी सिद्धाँत का अनुसरण करना पड़ता है, तभी वह पद प्राप्त होता है, जिस पर गर्व-गौरव अनुभव किया जा सके। हाथ पर सरसों जमाने जैसी जल्दबाजी तो बाजीगरी में ही देखी जाती है, इसलिए तुर्त-फुर्त का प्रतिफल वहाँ तत्क्षण में समाप्त हो जाता है। अध्यात्म न तो बाजीगरी है और न ऐसा कुछ, जिसमें सुनिश्चित कर्तव्यों की उपेक्षा करते हुए कुछ कहने लायक उपलब्धि की आशा की जा सके। इसमें तो परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के निर्धारित मार्ग से होकर गुजरना पड़ता है, जिसे साधना विज्ञान में स्वीकारा गया है। संसारी व्यक्तियों के लिए यह दुनिया ही साधना-भूमि है। इससे बढ़कर अनुकूल स्थान साधना के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता। इस साधना स्थल में उसे उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात् राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था में अवस्थान करना होता है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक-ठीक ढंग से पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योग-सिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में वह योग साधना की वह सारी विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है, जिसका अधिकारी एक यती है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, तो उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है। भला साधन-सुविधा हीन वन में वैराग्य की परीक्षा किस भाँति हो सकेगी? यदि कोई ऐसी अभावग्रस्त स्थिति में रह भी रहा हो, तो इसे उसकी मजबूरी कहना चाहिए, वैराग्य नहीं। जो जीवन भर सरोवर में कभी उतरा नहीं, वह बढ़-चढ़ जल में नहीं डूबने का दम्भ करें तो इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है? डूबने-नहीं डूबने की परख तो उसके पानी प्रवेश करने के बाद हो सकती है, बाहर रहकर नहीं। जो दुनिया में रहकर निर्लिप्त बना रहता है, वास्तविक वैरागी वही है और जिनसे यह अवस्था लिए, कंदरा और वन का एकान्त सबकुछ दिखावा। इस आडंबर में वही पड़ते, जिन्हें बड़प्पन की, जिन्हें बड़प्पन की, मान-सम्मान की चाह होती है, अन्यथा जो सही-सही योग साधना चाहते हैं, , उनके लिए समाज से बढ़कर कोई दूसरी उपयुक्त योगस्थली नहीं।

महाकवि गेटे ने अपने नाटक “फास्ट” में एक ऐसे चरित्र नायक का वर्णन किया है, जो आत्मज्ञान-संग्रह का अभिलाषी है। संसार में रह कर ही वह इसे प्राप्त करना चाहता था, पर कुछ समय पश्चात् उसे ऐसा अनुभव होने लगा, जैसे इस ज्ञान-संपादन में दुनिया सबसे बड़ी बाधा है। वह इसे छोड़ समाज से बहुत दूर कहीं एकाँत वन-प्राँतर में चला जाता और तपस्या करने लगता है, पर यहाँ भी उसकी एकाग्रता सध नहीं पायी। अभावजन्य पीड़ा और कुटुँबियों की याद उसे सताती रही। थक-हार कर वह पुनः समाज में आ जाता है, किन्तु तब तक उसकी अधिकांश आयु चुक चुकी थी। वह हताश हो जाता है उसे सन्तोश था, तो मात्र इतना ही कि जीवन के अन्तिम समय में उसे सत्य का बोध हो गया, जिसके ना होने के कारण ही वह अब तक संसार के अंदर और बाहर वनों में भटकता रहा।

कुछ ऐसा ही निष्कर्ष भारतीय पृष्ठभूमि उपन्यास”विराट्” में आस्ट्रियाई उपन्यासकार स्टीफल ज्वीग ने प्रस्तुत किया है। नायक विराट् निष्कर्म योगा का पक्षधर है। वह अपने अनुयायियों समेत समाज से दूर चला जाता है, फिर भी अनुभव करता है कि पूर्ण निष्कर्म नहीं हो सकता है। वह वहाँ से और घने जंगल में आ जाता है। यहाँ भी वह बिल्कुल निष्कर्म नहीं हो पाता। यह अहसास करते ही विराट् पुनः समाज में आकर निष्कर्म अवस्था त्याग कर कर्ममय जीवन अपना लेता है।

समाज में रहते हुये, कर्तव्यों का निर्वाह करते हुये ऐसा लग सकता है कि सांसारिक उलझनों में पड़कर व्यक्ति अपने लक्ष्य में भटक जायेगा। शायद इसी लिए उनसे बचने के लिए वह दूर चला जाता है, सोचता है कदाचित् इससे लक्ष्य-प्राप्ति में शीघ्रता होगी, पर सच्चाई यह है कि अपने ढंग से वह जितनी जल्दबाजी करता है ध्येय से उठना ही दूर हटता जाता है, विलंब उतना ही ज्यादा हो जाता है, क्योंकि दायित्वों की अपेक्षा द्वारा आत्मलाभ कराने वाला कोई मार्ग दुनिया में है नहीं। जो रास्ता निर्धारित है, वह माध्यम मार्ग का राजपथ ही हो सकता है, जिसमें आवश्यक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुये आगे बढ़ना पड़ता है। यहाँ एकदम भौतिकवादी बन जाने में भी हानि और पलायनवादी बनने में भी घाटा है। नफा तो अतिवाद तो त्याग कर ही उठाया जा सकता है। सांसारिकता में आकंठ डूब जाना जीवन का एक सिरा है, तो वैरागी बनकर संसार त्यागना इसका दूसरा छोर। जीवन में दोनों का समन्वय करके चलने से ही कुछ कहने लायक सफलता अर्जित की जा सकती है। वस्तु का ग्रहण और वर्जन, बंधन और वैराग्य-यह दोनों ही आवश्यक हैं। किसी एक को छोड़ और दूसरे को अपनाकर सत्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती वरन् इनका सम्मिलित स्वरूप ही पूर्णता तक ले जाने में सफल हो सकता है। संकट त्याग की और अन्नपूर्णा भोग की प्रतिमूर्ति है, दोनों मिलकर जब परिवार में, समाज में, राष्ट्र व विश्व में एक हो जाते हैं, तो पूर्णतः का वास्तविक आनन्द-लाभ मिलता है अन्यथा जहाँ कहीं भी बन्धन और मुक्ति में, भोग एवं त्याग में अनुराग विराग वैर-विरोध हुआ, वहीं नाना प्रकार अशांति और असंतोष पैदा होने लगते हैं। इन दोनों का भटकाव का एक मात्र कारण इस संसार-व्यूह को भलीभाँति न समझ पाना ही है। इस व्यूह में हमें प्रवेश करना भी आना चाहिए और उससे बार निकलना भी। केवल प्रवेश करना आता हो और बाहर निकलने की कला नहीं मालूम हो तो उसी में उलझकर हमारी मौत हो जायेगी। निःसंदेह इसमें भी हम वीरता दिखा जा सकते हैं किन्तु इसे तो विजय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि हमारी मंजिल जीत अर्जित करना है, बहादुरी पूर्वक मर जाना नहीं। या विलोचित मरण युद्ध का एक अच्छा पहलू हो सकता है, किन्तु है अधूरा दूसरी ओर जो इस चक्रव्यूह में अन्दर जाने से डरते हैं, उन कायरों के लिए वीरगति नहीं है। इस तरह यह दोनों प्रकार के लोग अपूर्ण हैं। अपूर्णता से सम्पूर्णता की प्राप्ति भला कैसे हो सकती है। यह तो संभव है, जब निवृत्ति के साथ प्रवृत्ति, शिव के साथ शक्ति का और सत्य के साथ सुन्दर भी हो।

इस दिशा में गड़बड़ी तब पैदा होती है, जब जीवन के किसी एक पक्ष को पूर्ण मान लिया जाता है और सी एक क्रियाविधि को पूरा करने में सारा जीवन खपा दिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को राज्य रक्षा का उपकरण मान बैठा हो, तो वह अपने को सैनिक बना लेगा। यदि किसी को सामाजिक समृद्धि का आधार माना गया है, तो हम उसे वणिक बनाने की चेष्टा करेंगे। किसी के जिम्मे शासन-संचालन का भार है, तो वह राजनेता से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता है। कोई नाट्यकार, रंगकर्मी और अभिनेता है, तो अपना श्रेय-सौभाग्य वह स्वयं को विदूषक बनाने में ही मानता रहेगा और उसी के गिर्द जीवन भर उसके थ्या-कपाप चलेंगे, पर मनुष्य इतना ही है, सो बात नहीं। यथार्थ तो यह है कि मनुष्य न तो केवल सैनिक है, न व्यापारी है, न नेता, न अभिनेता केवल सैनिक है। यह तो उसके गुण, अभिरुचि, स्वभाव, संस्कार के हिसाब से विकसित हुआ व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। उसका वास्तविक आपा इन्हें नहीं कहा जा सकता। मूलतः वह ब्रह्म का प्रकाश है। प्रकाश की पूर्णता उद्गम में मिलकर ही हो सकती है, पृथक रहने में नहीं। संसारी लोगों की सबसे बड़ी विडंबना वह है कि वह व्यक्तित्व के इन अंगोपाँगों को ही सब कुछ मान बैठते और समस्त ध्यान इन्हीं को निखारने, उभारने, सुधारने, सँवारने में लगा देते हैं, जबकि मूल प्रयोजन अछूता बना रहता है। व्यक्तित्व की प्रखरता भौतिक सफलता के लिए आवश्यक तो है, पर साथ ही इस बात पर भी विचार करते रहना चाहिए कि लौकिक समृद्धि के साथ आत्मिक प्रगति कितनी हुई? हुई या नहीं? समय-समय पर ऐसी समीक्षा के द्वारा ही इस प्रवृत्ति मार्ग में निवृत्ति मार्ग जैसी भावभूमि और अंतःकरण विकसित किये जा सकते हैं। इस दिशा में जितनी और जैसी गति होगी उसी हिसाब से मनुष्य लक्ष्य के करीब पहुँचता जायेगा।

इस प्रकार का समन्वयात्मक मार्ग समय की ही अनिवार्यता है, सो बात नहीं। प्राचीनकाल में भी इसकी आवश्यकता अनुभव की गई थी। उपनिषदों में यत्र-तत्र इस बात की झलक-झाँकी मिल जाती है-ईशोपनिषद् में स्पष्ट उल्लेख है-अंधंतमः प्रविषंति ये अविद्यामुपासते। ततो भूय इ वते तमो य उ विद्यायाँ रतः॥

अर्थात् जो केवल अविद्या अर्थात् संसार की ही उपासना करत हैं, वे अंध तमस् में प्रवेश करते हैं और उससे भी अधिक अंधकार में वे प्रवेश करते हैं, जो केवल ब्रह्मचर्चा में रित रहते हैं। अन्यत्र कहा गया है-विद्याञ्चाविद्याञ्चा यस्तद्धेदोभयं सह अविद्याया मृत्यं तीर्त्वाविद्ययामृतमष्नुते।

अर्थात् विद्या और अविद्या दोनों को ही जो एकत्र करके जानते हैं, वे अविद्या के द्वारा मृत्यु से उत्तीर्ण होकर विद्या द्वारा अमृत को प्राप्त करते हैं।

श्रुति कहती है-”एवं त्वयि नान्यधेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे। ” हे नर! कर्म करो। कर्म में लिप्त न होना पड़े, ऐसा कोई पथ इस संसार में नहीं।

स्पष्ट है, प्राचीन समय में कर्म करते हुए, समाज और संसार में रहते हुए ही ईश्वर-प्राप्ति का सर्वसम्मत मार्ग निर्धारित था, पर साथ ही इस बात की भी कड़ी चेतावनी थी कि संसार को साध्य न मान लिया जाय। साध्य तक पहुँचने का यह साधन मात्र है। इसका उपयोग और उपभाग तो हो, पर लक्ष्य प्राप्ति के निमित्त। ऐसा आज भी संभव है। यदि ऋषि निर्दिष्ट “तेन त्यक्तेन भुँ्ीथा” के आदर्श को अपनाया और जीवन में उतारा जा सके, तो इन दिनों की विषमताजन्य विष-व्रण को न सिर्फ मिलाया जा सकना संभव है, वरन् स्थिर शांति और सुव्यवस्था को भी प्रतिष्ठापित करना शक्य है।

ऋषियों ने इस भूमा के सुर में ही समाज को कभी बाँधने की चेष्टा की थी। समाज को इन मर्यादाओं में बाँध कर रिफर मनुष्य को ब्रह्म-उपलब्धि करने का प्रयास किया था। शरीर को अधम बता कर उसे पीड़ा देना नहीं चाहा, समाज को कलुषित कहकर उसका परित्याग करना नहीं चाहा, जीवन को अनित्य घोषित करके उसकी अवज्ञा करना नहीं सिखाया। उसने सब कुछ को ही ब्रह्म के द्वारा अखण्ड-परिपूर्ण करना। चाहा था। इसके लिए चार आश्रमों की विशिष्ट व्यवस्था थी। प्रथमावस्था में गलाई और ढलाई की क्रिया संपन्न होती, ताकि उसमें भावी व्यक्तित्व की मजबूत इमारत खड़ी। श्रद्धा, संयम, शिक्षा और ब्रह्मचर्य के द्वारा इसका संपादन होता। द्वितीय चरण में गृहस्थ की जिम्मेदारियों को निबाहते हुए परिवार और समाज की सुव्यवस्था में योगदान करना पड़ता। इसी में अग्रिम भूमिका की पृष्ठभूमि विनिर्मित होने लगती है। तृतीय चरण अर्थात् वानप्रस्थ में द्वितीय भूमिका का ही विराट् विस्तार हो जाता और जो कर्तव्य पहले घर-परिवार तक सीमित थे, वह अपरिमित बन कर कार्यक्षेत्र पूरी पृथ्वी हो जाता। इसी अवस्था में “वसुर्धव कुटुँबकम्” की भावना विकसित होती और व्यक्ति समस्त संसार को अपना बृहत्तर परिवार और यहाँ के निवासियों को भगवान की साकार प्रतिमा मानकर उनकी सेवा करता। इस प्रकार विराट् ब्रह्म की सेवा करते-करते वह ‘जीवन मुक्ति’ की चतुर्थ और अंतिम अवस्था संन्यास में अवस्थान करता।

पूर्णता प्राप्ति के यह चार क्रमिक सोपान थे, अब जबकि समाज और संसार के साथ-साथ संपूर्ण नियम-मर्यादाओं की ही अवहेलना करने पर मनुष्य उतारू हो गया है, तो देखना यह है कि उसकी मुक्ति किस हदतक कितनी जल्दी हो सकेगी। आज सात्विकता के सुनिश्चित राजमार्ग को हम भूल चुके हैं। राजसिकता का ऐश्वर्य भी हमारे लिए दुर्लभ हो गया है। अभी तो हम केवल तामसिकता के छीना-झपटी वाले पतनोन्मुख पथ पर प्राचीन आदर्श मात्र कहने भरके सिद्धाँत बन कर रह गये हैं। सरोवर की पूर्णता किसी समय चाहे कितनी ही सुगंभीर क्यों न रही हो, शुष्क अवस्था में उसकी रिक्तता का गढ्ढा भी उतना ही बड़ा कहलायेगा। हमारी स्थिति भी संप्रति लगभग ऐसी ही है। इन दिनों मैत्रेयी की तरह “येनाहं नामृता स्याँ किमहं तेन कुयाम्?” -”जब इनसे हमारी सद्गति नहीं हो सकती, तो इन्हें लेकर मैं क्या करूंगी?” कहने और करने वाले दुनिया में कुछ गिने-चुने लोग ही दिखाई पड़ते हैं। अधिकांश तो “ऋण कृत्वा घृत्वा घृतं पीवेत” वाला निम्न आदर्श ही चरितार्थ करते देखे जाते हैं। यह स्थिति तब तक बनी ही रहेगी, जब तक हम पूर्णता को संसार के बाहर के वैराग्य एवं वस्तुओं में तलाशते रहेंगे। मुक्ति कहीं बाहर नहीं, वरन् वह अपने ही अंदर की एक विशेष अवस्था है। इस को समाज में रहते हुए ही विकसित करना पड़ता है, तभी जीते जी उस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है, जिसे स्वर्ग, सद्गति, शांति कह कर पुकारा गया है।


पक्षी को छाया नहीं फल लागे अति दूर (Kahani)

वृक्षों में प्रतिस्पर्धा होने लगी कि कौन बड़ा होकर आसमान छू लेता है? सब ने अपना-अपना पुरुषार्थ प्रयत्न किया और ऊँचाई छू लेने की प्रतिस्पर्धा में ध्यान नहीं रहा कि विस्तार और फैलाव भी रुक सकता है और वही हुआ। बाजी ताड़ ने मार ली। ताड़ वृक्ष ऊँचा तो हो गया और अहंकार में गर्दन उठाये खड़ा भी हो गया। किंतु विस्तार न होने से वह किसी के उपयोग का रहा नहीं। ‘पक्षी को छाया नहीं फल लागे अति दूर’।

मनुष्य यश, धन, घटा अहंकार तो बड़ा कर सकता है किंतु ताड़-वृक्ष की तरह उपयोगिता घटा बैठता है। उसके हाथ से उदारता, दया, करुणा, मैत्री, ममता जैसे सद्गुण छिन जाते हैं। इसलिए अहंकार से बचे रहने की विज्ञजनों ने सदैव सलाह दी है।


अशिष्टता को शिष्टता से जीता

कई दिन के परिश्रम के बाद वे एक साड़ी बुन पाए थे। सोच रहे थे वह बिक जाए तो उदर पोषण की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए, बात महात्मा तिरुवल्लुवर के जीवन की है वे जन्म से जुलाहे थे। लोक सेवी संत होकर भी उन्होंने अपनी आजीविका अपने परिश्रम से ही कमाने का व्रत आजीवन निभाया। इसे वे ईश्वर उपासना का ही एक अंग मानते थे। अपनी वैयक्तिक समस्याओं के लिए उन्होंने कभी पराश्रय नहीं लिया।

संत अपनी धैर्य शीलता और क्षमा के लिए विख्यात थे। गाँव का एक युवक इसे ढोंग कहता था हमेशा उनकी परीक्षा लेने की बात सोचा करता था। दैवयोग से वे साड़ी लेकर बाजार में बेचने बैठे ही थे कि वह युवक वहाँ आ पहुँचा। उसने साड़ी का मोल पूछा तो संत ने विनम्र वाणी में उत्तर दिया सामान और मजदूरी दोनों मिलाकर साड़ी का मोल कुल दो रुपए होता है।

युवक ने साड़ी हाथ में ली और बीच से बराबर-बराबर टुकड़ों में फाड़ दिया और पूछा इन दो टुकड़ों में से अलग-अलग एक के कितने दाम होंगे। संत ने उसी निश्छलता से उत्तर दिया एक-एक रुपया। फाड़े गए दो टुकड़ों में से एक के फिर दो टुकड़े करते हुए युवक ने पूछा अब इन टुकड़ों की कीमत कितनी होगी तो संत ने बिना अप्रसन्न हुए उत्तर दिया आठ आने। तब तक वह युवक उस टुकड़े के भी दो टुकड़े कर चुका था। उसने पूछा-अब इन टुकड़ों के कितने पैसे लोगे तो तिरुवल्लुवर ने उसी धीर गंभीरता के साथ उत्तर दिया-चार आने।

युवक साड़ी के टुकड़े करता गया। वह हर बार सोचता था कि इस बार संत क्रुद्ध होंगे पर उनका हृदय था कि नवनीत। जितनी आँच दी उस युवक ने उतना ही पिघलता और गंभीर होता चला गया। न उन्होंने युवक को वैसा करने से रोका और न ही किसी प्रकार तर्क किया।

युवक ने अब पलट कर पाँसा फेंका। तार-तार हो चुकी साड़ी की गोल-मटोल गेंद की तरह लपेटता हुआ बोला अब इसमें रह ही क्या गया है जो पैसे दिए जाएँ। फिर भी यह लो कहकर वह धन का अभिमान प्रदर्शित करता हुआ दो रुपए निकाल कर देने लगा। तिरुवल्लुवर ने कहा-”बेटा। जब तुमने साड़ी खरीदी ही नहीं तो फिर तुमसे उसका मोल कैसे लूँ?”

युवक का उद्दंड हृदय अब तक पश्चाताप में बदल चुका था उसने विनीत होकर कहा- “महात्मन्। मुझसे भूल हो गई- साड़ी का मूल्य तो मुझे चुकाना ही चाहिए। ”

संत की आँखें डबडबा आई- वे बोले-”वत्स! तुम्हारे दो रुपए चुका देने से इस क्षति की भरपाई तो न हो जाएगी। सोचो! इसकी कपास पैदा करने में किसान ने कितना परिश्रम किया होगा। इसकी धुनने और बुनने में कितने लोगों का समय और श्रम लगा होगा। साड़ी बुनी गई तब मेरे घर वालों ने कितनी कठिनाई उठाई होगी। तुम्हारे दो रुपए चुका देने से क्या इन सबका परिश्रम संतुष्ट हो जाएगा?”

युवक अधीर हो उठा उसकी आँखें से पश्चाताप के आंसू फूट पड़े, वह कहने लगा-ऐसा था तो आप मुझे साड़ी न फाड़ने के लिए बलपूर्वक रोक भी तो सकते थे?

“रोक क्यों नहीं सकता था बेटा। मेरा शरीर तुम्हारे शरीर से कमजोर तो है नहीं पर वैसा करने से क्या तुम मान जात? महापुरुष कह गए हैं क्रोध को अक्रोध से अशिष्टता को शिष्टता से जीतना चाहिए। बलपूर्वक रोकने से तुम्हें शिक्षा देने का यह अवसर मिला वह कहाँ मिलता?”

साड़ी फाड़ने वाले युवक की उद्दंडता पूरी तरह धुल चुकी थी। इतने क्षणों में उसे अनुभव कर लिया था कि जो शिक्षा क्षमा और प्रेम से आती है। वही अंतःकरण में बैठकर चिरकाल तक प्रकाश देती रहती है।


हजरत लुकमान (Kahani)

लुकमान से किसी ने प्रश्न किया कि आपने इतनी शिष्टता कहाँ से सीखी? लुकमान ने उत्तर दिया “भाई मैंने शिष्ट व्यवहार अशिष्ट लोगों के बीच रहकर ही सीखा है। लुकमान का उत्तर सुनकर लोग अचरज में पड़ गये। लुकमान ने और आगे स्पष्ट करते हुए कहा कि अशिष्ट लोगों के बीच रहकर ही मैंने जाना कि अशिष्ट व्यवहार क्या है। मैंने पहले उनकी बुराइयों का देखा। फिर देखा कि कहीं वे बुराइयाँ मुझ में तो नहीं हैं। इस तरह के आत्मनिरीक्षण से मैं बुराइयों से दूर होता गया और आत्म सुधार के फलस्वरूप लोग मुझे लुकमान से हजरत लुकमान कहने लगे।


“सतयुग की वापसी” शुरुआत ऐसे होगी

देवसंस्कृति भारतीय संस्कृति का नाम इसलिए इस प्रकार पड़ा क्योंकि वह भारत में उत्पन्न हुई वस्तुतः वह विश्व संस्कृति है। उसे सच्चे अर्थों में देव संस्कृति(देवत्व उभारने वाली संस्कृति) कहा जाना चाहिए। इसमें तत्वदर्शन की प्रधानता अवश्य हैं पर वह विशुद्ध पारलौकिक नहीं है। उसमें प्रत्यक्ष जीवन का स्पर्श करने वाली समस्त दिशा धाराओं का समावेश हैं। विचार परिष्कार से लेकर चरित्रनिष्ठा, समाजनिष्ठा के सभी वे तत्व मौजूद हैं जो मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखे रह सकने में सर्वतोभावेन समर्थ हैं।

संक्षेप में इसी विस्तार को थोड़े से शब्दों यह कहा जा सकता है कि “मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण” की समस्त संभावनाएँ इस प्रक्रिया सन्निहित हैं। “वे चिंतन, चरित्र, और व्यवहार में उच्चस्तरीय उत्कृष्टता का समावेश कर सकने में समर्थ हैं। उसमें समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी के चारों तत्व इस प्रकार समाविष्ट हैं कि उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में महामानव, देवपुरुष बन सकता है। तत्वज्ञान और प्रथा प्रचलन का समग्र स्वरूप आदर्शों से भरा पड़ा है। इसमें वह सब कुछ है जिससे व्यक्ति समर्थ समुन्नत, सुविकसित, सुसंस्कृत बन सकता है। पुरातन इतिहास साक्षी है कि इस भूमि को स्वर्गादपि गरीयसी और वहाँ के निवासियों को संसार भर ने देव मानवों की संज्ञा दी थी। ज्ञान और विज्ञान में अग्रणी होने के कारण उसे जगद्गुरु, चक्रवर्ती आदि नामों से सम्मानित किया गया था।

आज की विकृत परिस्थितियों में सर्वतोमुखी सुधार परिष्कार के लिए जिस रामबाण औषधि की संजीवनी बूटी की आवश्यकता है। उसे अभी भी भारतीय देव संस्कृति के रूप में उबारा और कार्यान्वित किया जा सकता है। सतयुग की वापसी का यही सुनिश्चित तरीका है कि जिस आधार को देवपुरुषों ने अपनाया था उसे फिर से खोजा, सुधारा और कार्यान्वित किया जाय।

मध्यकाल के अंधकार युग में कुछ ऐसी गड़बड़ी हुई है कि खोखला कलेवर मात्र ही दिखावटी प्रतिमा की तरह किसी प्रकार बनाए रखा गया है। उसमें से समूचे प्राण तत्व का अपहरण कर लिया गया है। धर्म के नाम पर देवताओं के गुलाम और उनके एजेंटों के भ्रम जंजाल में जकड़े हुए शिकार मात्र रह गए हैं। कुरीतियाँ हमारे गले में फाँसी के फंदे की तरह फँसी हुई है। उन्हीं के कारण मूढ़ मान्यताएँ, अनैतिकताएं, अवाँछनीयताएँ अनेक कुप्रचलनों के रूप में हमें शूलती हूलती रहती हैं। इनमें आवश्यक परिवर्तन लाया जाना, सुधार परिवर्तन किया जाना आवश्यक है। यह कार्य छुट-पुट रूप से व्यक्तिगत हलके फुलके प्रयासों से नहीं हो सकता। इसे विशाल परिमाण में योजनाबद्ध एवं संबद्ध रूप में करना होगा। आरंभ कहाँ से किया जाय? इसके लिए नए सिरे से नया कुछ खोजने या सोचने की आवश्यकता नहीं हैं। पुरातन मार्ग ही इतना सुपरीक्षित है कि उसे यदि समझ और अपना लिया जाय तो उसी लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है जिस पर कि हमारे महान पूर्वज पहुंचे थे।

आवश्यकता है ऐसे पुरोहित और परिव्राजक उत्पन्न करने की जो निजी जीवन में औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार करें। सादा जीवन उच्च विचार की रीति नीति अपनाएँ तृष्णाओं को त्यागें और परमार्थ के लिए अपनी समग्र महत्वाकांक्षाएं नियोजित कर दें। इतने भर से जो उभार अंतः करण में से उभरता है वह योग्यताओं की कमी कुछ ही समय में पूरी देता है।

विदेशों में जहाँ प्रवासी भारतीयों के सहारे बैठने की खड़ा होने की काम करने की सुविधा मिल सकती है, वहाँ जाने की बात उन्हें चाहिए जिन्होंने लालच और अहंकार जीत लिया हो, जिन्होंने नम्रता अपनाने और कठिन काम करने में अभिरुचि उत्पन्न कर ली हो। जो वहाँ की भाषाओं का अभ्यास करके जन संपर्क के लिए अपने को सुयोग्य सिद्ध कर सकें। जल्दी ही वापस लौट आने, पैसा कमाकर घर भरने, अखबारों में नाम छपाने, नेता बनने की ओछी आकाँक्षाओं से घिरे हुए न हों। उन्हीं को आशाजनक सफलता मिल सकेगी और उन्हीं की सतयुग की वापसी में बड़ा कदम उठाने वालों में गणना हो सकेगी। मात्र “कथाएँ” सुनाकर मनोरंजन कर पैसे बटोर लेने वाले तो पंडे कहलाते हैं जो अभी वहाँ प्रचुर संख्या में है। गायत्री परिवार ने तो एक ही लक्ष्य बनाया है सतत् देने का। संस्कार एवं ममत्व के विस्तार का यही कार्य यहाँ के परिव्राजक कर भी रहे हैं।

इससे पूर्व कि हम विश्व को कार्य स्थली बनाएँ हमें अपने घर को सुधारना, बुहारना, होगा। बाहर उन्हीं का प्रभाव पड़ता है जो अपना समीपवर्ती वातावरण परिष्कृत कर चुके होते हैं। घर का दीपक जलाकर बाहर प्रकाश उत्पन्न करने के लिए कदम बढ़ाया जाता है। जो अपना शरीर, मन, घर स्वच्छ कर लेते हैं उन्हीं को बाहर की सफाई करने का प्रयास शोभा देता है।

अपने देश की स्थिति अब अन्यत्र की तुलना में अधिक गई गुजरी हो गई है। इसलिए पहले घर के बीमारों को दवा देनी चाहिए। घर के भूखों के लिए रोटी का प्रबंध करना चाहिए। इसके बाद ही बाहर का क्षेत्र सँभालना शोभा देगा।

करने योग्य कामों में सर्वप्रथम यह है कि लोक सेवा के लिए अपने को समर्पित करने वाले चरित्रवान, विचारशील, कर्मठ कार्यकर्ता उत्पन्न हों। निज की इच्छा आवश्यकताओं को तो हलका रखें ताकि दूर-दूर तक संपर्क क्षेत्र ऊँचा उठाने का दायित्व उठाया जा सकना संभव हो सके।

प्रस्तुत व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याएँ, दृष्टिकोण घटिया और चरित्र व्यवहार अधोगामी होने के कारण ही विभीषिका बनकर खड़ा हुआ है इसके निराकरण का एक ही उपाय है जनमानस का परिष्कार। इस प्रयोजन की पूर्ति लेखनी वाणी और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के रचनात्मक कार्यों द्वारा ही हो सकती है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में विविध-विविध क्रियाकलापों का निर्धारण-कार्यान्वयन करना होगा।

युग सृजेताओं को आवश्यक प्रशिक्षण देने के लिए शांतिकुंज हरिद्वार में नालंदा विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षण व्यवस्था की गई है। एक-एक महीने के और नौ-नौ दिन के शिक्षण सत्र निरंतर चलते हैं। इस स्वल्प अवधि में ही उन्हें कार्य क्षेत्र में उतरने की महती भूमिका संपादित करने के योग्य बना दिया जाता है। भोजन, निवास-प्रशिक्षण आदि की व्यस्त व्यवस्था इन सत्रों में है।

संगठन का नया क्रम टोली पद्धति विकसित करके किया गया है। तीन-तीन कार्यकर्त्ताओं की टोलियाँ बनाई गयी हैं और समीपवर्ती दस गाँवों को कार्यक्षेत्र बनाकर आलोक वितरण के क्रियाकलाप में जुट जाने के लिए कहा गया है। पुरोहित वर्ग के लोग घर का काम काज सम्भालते हुये समयदान और अंशदान देते हुये रचनात्मक कार्यों में निरत रह सकते हैं। जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हल्के हैं दूसरे लोग घर गृहस्थी सम्भालने योग्य हो चुके हैं या जिनने यह भार लादा ही नहीं हैं वे परिव्राजक स्तर के प्रवास प्रयोजन में निरत हो सकते हैं।

देश के समूचे क्षेत्र नवचेतना से अनुप्रमाणित करना है। विशेषतया ग्रामीण क्षेत्र में नया चिन्तन, नया उत्साह जगाना है। असली भारत बिखरे देहातों में बसता है। हमें प्रधानतया उसी समुदाय के साथ संपर्क साधना चाहिये इसके लिए गायत्री यज्ञों, दीप यज्ञों और साथ ही युग निर्माण सम्मेलनों का संयुक्त कार्यक्रम बनाया गया है। इस हेतु प्रचारकों की टोलियाँ आवश्यक उपकरणों के साथ योजनाबद्ध रूप से देश व विदेश के प्रवास पर निकलती हैं।

इन दिनों एक लक्ष्य एक लाख युगशिल्पी प्रशिक्षित करने, एक लाख टोली संगठन खड़े करने और एक लाख गायत्री यज्ञों समेत युग निर्माण करने का निश्चय किया गया है। आशा की गई है कि इन आरम्भिक क्रियाकलापों से सतयुग की वापसी के आगामी कार्यक्रमों ने भारी सहायता मिलेगी।

यह सब एक बूढ़ा भी देख सुन रहा था। वह बोला उपदेशक से इस अन्धे को प्रकाश के बारे में समझाना कठिन और असंभव है। इसके लिये चिकित्सक के पास जाना होगा। जबतक इसकी आँखें ठीक नहीं हो जाती इसे प्रकाश की वस्तु स्थिति ज्ञात नहीं होगी। चिकित्सा करने पर आँखों की ज्योति वापस आयी। अन्धे को प्रकाश का अनुभव होने लगा। उपदेशक ने अपनी भूल स्वीकार की। वास्तविकता सामने दिखने पर उपदेश दिया जाता है। जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है वह जीवन में उतरता है। कथनी भिन्न हो तो कहाँ कुछ दिखाई पड़ेगा कैसे वह किसी के जीवन में उतरेगा?


Quotation

अंधे को उपदेशक ने बहुत समझाया कि प्रकाश से संसार में ही सारी व्यवस्था बनी हुयी है किन्तु अन्धे ने एक न सुनी। वह बोला “यदि प्रकाश है तो सुनाओ, चखाओ, छूकर अनुभव कर लेने दो। ” सब बड़े हैरान यह कैसी उल्टी बातें करता है।


खतरों से डरे या उनसे जूझें?

सन् 1783 की घटना है गर्मी के चार बैंक एक साथ दिवालिया हुये। बैंकों ने सरकार से सहायता करने की अपील की पर सरकार ने स्पष्ट इन्कार कर दिया। दिवालिया होने के समाचार से हर हिसाब वाला अपना पैसा वापस लेने की उतावली में था। चलते कारोबार में तो लेन देन का पहिया लुढ़कता रहता है, पर जब जमा करने वाला एक भी न हो और सब के सब निकालने में अपना नम्बर सबसे पहला रखना चाहते हों तो ऐसी स्थिति को सरकार भी कैसे सम्भाले? इतना पैसा देना उसके बस में भी नहीं था। देश में हाहाकार मचा हुआ था। व्यापार ठप हो रहे थे और आगे क्या करना, यह रास्ता किसी को सूझ नहीं रहा था। इस परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए चारों बैंकों के संचालकों ने एक गुप्त मीटिंग की और एक ऐसी योजना बनाई, जिसके अनुसार इतना पैसा मिल सकता था, जिससे कि चारों बैंक चलने लगती। योजना थी तो बहुत जोखिम भरी, पर डायरेक्टर दिलेर था। उसने बैंक बन्द होने के जोखिम जितना ही यहाँ दूसरा जोखिम उठाना मंजूर कर लिया। कोई दूसरा विकल्प सूझ भी तो नहीं पड़ रहा था। योजना थी कि गुब्बारों से उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर एक मिशन भेजा जाय और उसके समाचार तथा चित्र संसार भर के प्रमुख अखबारों में एक साथ छपाये जायें। इसका कॉपीराइट पहले से ही तय कर लिया जाय। इन दिनों यह दोनों ही बातें बिल्कुल नहीं थीं तब एक हवाई जहाजों का प्रचलन नहीं हुआ था। गुब्बारों के बारे में प्रयोग चल रहा था। पर वह छोटा मोटा शौकिया था। वे छोटी यात्रायें कर सकते थे। इतनी लम्बी यात्रा गुब्बारों से करने की किसी ने सोची भी न थी। सबेरे घर से निकल कर दोपहर यह शाम तक घर लौट आना एक बात है और जिसमें पूरा एक सप्ताह लगे, उसके लिये कई आदमियों की एक टीम चाहिए। रात को सोना जरूरी था। इसके लिये पालिया बदलनी पड़ती फिर गैस एक बार में ही इतनी नहीं भरी जा सकती थी। वहाँ खर्च होती चले और नयी बनती चले ऐसा प्रबन्ध करना था। फोटोग्राफर और कैमरे ऊँचे दर्जे के चाहिए थे। लोग इतने उतावले थे कि छपने से पहले उसके रेडियो-समाचार भी सुनना चाहते थे। सब मिलाकर इतना सरंजाम जुटाना था, जिसके लिये टैक्नीशियन ही नहीं गुब्बारा भी बड़ा चाहिए था और साजो समान भी।

गुब्बारा बनकर तैयार हुआ, तो वह इतना बड़ा था जितना फुटबाल खेलने का एक अच्छा खासा मैदान। ऊंचा इतना कि गिरजाघर। यान्त्रिक उपकरणों के शिवाय एक दर्जन आदमियों के बैठने काम करने और सोने का इन्तजाम किया गया। इसके लिए काम चलाऊ कमरे थे। उत्तरी ध्रुव पर ठण्डक शून्य से बहुत नीचे रहती है और सदा बर्फ जमी रहती है। ऐसे मौसम में अनभ्यस्त लोगों को काम करने और जान बचाने के लिए आवश्यक गर्मी भी तो चाहिए। गुब्बारा ठीक तरह चल रहा है या नहीं, इसकी जानकारी लगातार प्राप्त करते रहे अमेरिकी सरकार से एक पनडुब्बी स्तर के छोटे बर्फ पर भी चल सकने वाले जलयान की व्यवस्था कर ली गयी। संसार में अपने दम का यह अनोखा प्रयोग था इसकी चर्चा एक महीने पहले सारे संसार में होने लगी थी। कौतूहल का ठिकाना न था।

जो अखबार तब निकलते थे उन सबसे खर्चा की जा चुकी थी। इतना पैसा तय किया गया था, जिससे बैंकों की रुकी हुयी गाड़ी चल पड़ती। रकम बड़ी थी, पर इस अद्भुत-अपूर्व घटना का हाथोंहाथ विवरण पढ़ने के लिये जनता इतनी आतुर थी कि उसकी कॉपीराइट राशि भी कम नहीं थी। छपना एक साथ था। जो पीछे रह जाते, उन्हें सदा के लिए वंचित रहना पड़ता। इस लिये अखबारों ने भी इसके परिशिष्ट अंक छापने और उनके अतिरिक्त मूल्य रखने की भी घोषणा की। खरीददारों की माँग पहले से इतनी आ गयी थी कि संयोजकों को उतना पैसा मिलने की आशा बंध गयी जितना की बैंकों को चलाने के लिये आवश्यक था।

इन दिनों तक उत्तरी ध्रुव सम्बन्ध किंवदंतियां ही प्रचलित थी। उसे भूतों का प्रदेश कहा जाता था। उस क्षेत्र की बारे में तब तक कोई प्रमाणिक जानकारी न थी। जो थी उसे बहुत बढ़ा-चढ़ा कर और डरावने ढंग से कहा जाता था। उसकी जानकारी प्राप्त करने के लिए सारे संसार में उत्सुकता की चरम सीमा थी। छः महीने का दिन महीने की रात एक कल्पनातीत बात थी। वस्तुतः वहाँ का वातावरण था भी ऐसा जिसमें इन्द्रधनुषों की भरमार ध्रुवीय प्रकाश अरोरा बोरयेलिस उड़ते हिम पर्वत आवाजों का कहीं से कही पहुँचना प्रतिध्वनियों का जादू जीव जन्तुओं के नाम पर सफेद रीछ बर्फ के नीचे रहने वाली विचित्र मछलियाँ आदि एक से एक बढ़कर अजूबे थे। समाचार जैसे ही रेडियो में पहुँचने लगे सुनने वालों को ऐसा लगा मानो वे किसी दूसरे की बातें सुन रहे थे।

यात्रा में सप्ताह भर का समय लगा। गुब्बारा दिन-रात चलता रहा। बर्फ के नीचे साथ-साथ चलने वाले अमेरिका जलयान ने ऐसी सहायता की जिससे भटकने का खतरा कम से कम होता गया। कुछ टैक्नीशियन ठण्ड से बीमार जरूरी पड़े पर यात्रा योजना के अनुसार उत्तरी ध्रुव तक तो नहीं समीप तक ठीक प्रकार पूरी हो गयी।

उत्तरी ध्रुव की यात्रा गुब्बारे से करना कितना कठिन है, इसका अनुमान आज के तेज वायुयानों और राकेटों के जमाने में लगाना कठिन है, पर जो लो उस यात्रा पर उन दिनों गये होंगे उन्हें चन्द्रलोक की यात्रा से कम गौरव प्राप्त न हुआ होगा। थोड़े से साहसी कोई कदम उठाते हैं, तो उन्हें देखकर कितनों के हौंसले बुलंद होते हैं। साहस के आधार पर मनुष्य की साहसिकता और वरिष्ठता का अनुमान लगता है। इस प्रेरणा से कई लोग कई तरह के काम कर गुजरते हैं।

जर्मनी की चार दिवालिया बैंकों को इस यात्रा से भी अधिक प्रतिष्ठा दिलायी और उनका ठप्प कारोबार फिर से आसमान पर जा पहुंचा। जिनने इस योजना को बनाया, जो इस दहलाने वाली यात्रा पर जाने के लिए तैयार हुए उनकी चर्चा संसार के कोने-कोने में होती रही। पढ़ने और सुनने मात्र से लाखों करोड़ों ने इतना उत्साह प्राप्त किया कि उन्हें मुद्दतों सराहा जाता रहा। जिन पत्रिकाओं में वे समाचार छपे, वे भी प्रख्यात हो गई।

उत्तरी ध्रुव की दुनिया एक अनोखी दुनिया है। ठंडक की दृष्टि से ही नहीं, दृश्यों दृष्टि से भी। ऐसे अनोखे वातावरण में जाने पर मनुष्य का एक नवीनता के साथ ही संपर्क नहीं बनता, वरन् नये साहस का उदय भी होता है। बढ़ा हुआ साहस मानवी प्रगति के हजार काम साधता है। डरपोकों की बात दूसरी हैं, पर साहसी लोग सदा खतरों से जूझते हैं और ऐसी परिस्थितियों में पदार्पण करते हैं, जो दूसरों को चकित कर देती है।

भीरु मनोवृत्ति के लोग इसलिए ऐसे छोटे-मोटे कार्यों की तलाश में रहते हैं, जिनसे लोगों को आश्चर्यचकित किया और यश कमाया जा सके, पर जो वास्तव में साहसी प्रकृति के हैं, उन्हें इस प्रकार के चयन की आवश्यकता नहीं पड़ती, कारण कि खतरों से खेलना उनका स्वभाव ही होता है, अतः जिस भी कार्य में वे हाथ डालते हैं, वही उनके साहस का परिचय देने लगता है। जहाँ अद्भुत और अभूतपूर्व स्तर के कार्य संपन्न हो रहे हों, वहाँ कर्ता और कार्य की प्रसिद्धि भी आ जुड़ती है। प्रसिद्धि से कीर्ति का बढ़ना और यश मिलना स्वाभाविक है। यह एक सहज प्रक्रिया है, जिसमें यश लिप्सा तो नहीं होती, पर कार्य की अद्भुतता के कारण ख्याति मिलती चली जाती है। इस ख्याति से व्यक्ति की शोभा बढ़ती है, सो बात नहीं अपितु असाधारण व्यक्तित्व के साथ मिलकर कर्तव्य की शोभा पाने लगता है। यह विशिष्ट विभूतियों की विशिष्टता का प्रभाव है। जहाँ ऐसी विशिष्टताएं होंगी, वहाँ खतरों की उपस्थिति मात्र से कोई कार्य रुका न रह सकेगा, प्रतिभा संपन्नों को यही पहचान है।

खतरों की प्रकृति यह है कि वह डरपोकों को दूर से अधिक लगता है, पर साहसी लोग जैसे-जैसे उसके समीप पहुँचते हैं, वैसे-वैसे नया साहस और नया उत्साह मिलता जाता है। गुब्बारे से उत्तरी-ध्रुव की यात्रा करने वाले यात्रियों को जो अनुभव हुए, उन्हें सुनकर दाँतों तले उँगली तो दबानी पड़ती है, पर यात्रियों ने उस नवीनता के साथ जुड़ी हुई प्रसन्नता को जो वर्णन किया, उसे सुनकर लगता ऐसा ही है, वस्तुतः वैसा होता नहीं। वस्तुतः इस विश्व का इतिहास लिखा ही उनने हैं, जिनने खतरे उठाये हैं। भले ही उपरोक्त प्रयोग सामयिक रूप से दिवालिये होते व्यवसाय को रोकने के लिए किया गया हो, किंतु इसने संभावनाओं के अनेकानेक द्वार खोल दिये। बाद में लोग स्की की मदद से, पैदल भी गए जो अधिक खतरे से भरा काम था। किंतु इस पहले दल ने जो दुःसाहस किया वह अध्यात्म जगत में जिजीविषा-शौर्य रूपी विभूति के नाम से जाना जाता है व जब भी संपन्न किया जाता है बदले में ढेरों यश-कीर्ति साथ लेकर आता है। यह मार्ग सबके लिए खुला है।


धूर्त कौवा (Kahani)

कबूतर की सुविधाएं देखकर कौए को ईर्ष्या होती कि उसका सब ओर से तिरस्कार होता है और दुत्कारा जाता है और कबूतर से बुलाकर दाना-पानी दिया जाता और सुरक्षा सुविधा दी जाती है। घर लौटते कबूतर के साथ एक दिन कौआ भी साथ हो लिया। कबूतर बोला। आप कौन हैं? मेरे पीछे क्यों लगे हैं? कौआ भोला बनकर बोला। “न जाने क्यों आप की सज्जनता और विनम्र स्वभाव देखकर कुछ आप से सीखने, सत्संग करने और सेवा लाभ लेने का मेरा मन करता है इसीलिए चला आया हूँ। कृपया, अधम की सेवाएँ स्वीकार करें। ”

भोला कबूतर कपटी कौए की बातों में आ गया। कौआ साथ रहने लगा। कबूतर अपने दाना-पानी में से उसे भी हिस्सा देता। कौआ छककर खता, किंतु ताक-झाँक से बाज न आता। कबूतर के मालिक ने दड़बे में कौआ देखा तो उसे आश्चर्य हुआ कि यह कैसी विचित्र मित्रता। किंतु कार्य व्यस्तता में उसने अधिक ध्यान नहीं दिया एक दिन प्रातः कबूतर बाहर जाने को हुआ तो कौए से बोला चलें बाहर सैर करें। कुछ दाना भी चुग लेंगे। कौआ बोला क्षमा करें आज बड़ी उदर पीड़ा है। रात्रि को इतना खाया कि भूख भी नहीं लगी। मैं आज विश्राम करूंगा आप ही घूम आवें। कबूतर चला गया। कौए ने अच्छा मौका देखकर मालिक की रसोई में प्रवेश कर भगौनी में रक्खी खीर खाने में लगा है उसने तुरंत रसोई का दरवाजा बंद कर दिया और पकड़ कर पंख और पैर बाँधकर कोने में पटक दिया। कौआ पछताया कि छल, कपट धोखे और लोभ के कारण ही उसकी यह दुर्दशा हुई है।


अंतर्जगत का देवासुर संग्राम ही अष्टांग योग का प्रत्याहार

चिंतन पर आसुरी सत्ता के आक्रमण का प्रतिकार अष्टांग योग में “प्रत्याहार” नाम से जाना जाता है। यह नंदिन जीवन में अनिवार्य रूप से सबके द्वारा संपन्न की जाने वाली एक प्रक्रिया है, अन्यथा अवांछनीय तत्व चढ़ाई करके अपने स्वतत्व अधिकार का ही अपहरण करते रहेंगे। देवता सदैव शांतिप्रिय और नीतिवान माने जाते हैं। वे परमार्थ-परोपकार में ही लगे रहते हैं व उसी की प्रेरणा देते हैं। व्यक्तित्व उत्कृष्ट व देवत्वमय बनाते हैं तो भी आसुरी तत्व देवत्व को कभी चैन से नहीं बैठने देते। कोई दोष या कारण न होने पर भी वे अवसर पाते ही आक्रमण करते रहते हैं। क्षमा और सहनशीलता के सहारे बात टालते रहने पर भी काम नहीं चलता। तब उन्हें प्रत्याक्रमण की योजना बनानी पड़ती हैं और वे विभिन्न क्षेत्र में प्रत्याहार द्वारा असुरता के आक्रमण से लड़ा जाता है।

आततायी आतंककारी हर क्षेत्र में भरे पड़े हैं। घात लगाने से चूकते नहीं। आवश्यक नहीं कि वे खून खच्चर वाली लड़ाई ही लड़ें। दूसरा और भी एक तरीका है जिसमें बाहर से आघात के चिन्ह दिखाई नहीं हैं पड़ते पर भीतर रक्त चूस लिया जाता है। रोगों के विषाणु यही करते हैं वे क्षय जैसे रोगों के रूप में प्रवेश करते हैं। चुपके-चुपके अपने वंश बढ़ाते रहते हैं और कुछ ही समय में समूचे शरीर पर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। तब मरण के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता। मजबूत शहतीर में घुन लग जाने से वह भीतर ही भीतर उसे खोखला करता रहता है। एक दिन ऐसा आ जाता है कि जरा सा धक्का लगने पर वह खोखला शहतीर जमीन पर पसर जाता है सड़ जाता है।

इसी प्रकार कुविचारों की विचारों एक वर्ग है जो कल्पना क्षेत्र में उतरता है। देर तक मानस पक्का करने के कारण वह ललक लालसा का छद्म वेष धारण करता है और विचारों को कार्य रूप में परिणित होने के लिए विवश कर देता है। वासनाएँ, कामनाएँ, लिप्साएँ, बीज रूप में विचार क्षेत्र में अंकुर उगाती हैं। उन्हें पोषण मिलते रहने पर तेजी से बढ़ती है। और अमरबेल की तरह समूचे जीवन को अपनी पकड़ में कस लेती हैं। कोई कृत्य अनायास ही नहीं बन पड़ता उसकी भूमिका लंबे समय से मनःक्षेत्र में अपना बाना बुनती रहती है। जड़ें पकड़ लेने पर पौधा मजबूत हो जाता है। तब यह उखड़ने में नहीं आता है। अंकुर उगते समय उसे सरलता पूर्वक चौथ कर हटाया जाता है। पर यदि पुष्ट होते रहकर गहराई तक जड़े प्रवेश कर लेने पर उसे उखाड़ना सरल नहीं होता। कुविचारों के संबंध में तो वस्तुतः यही होता है सद्विचार तो प्रयत्न पूर्वक उगाने बढ़ाने पड़ते हैं और दुष्प्रवृत्तियां कटीले बबूल की तरह कही भी जम जाती है और खाद पानी की परवाह किये बिना अपने आप बढ़ते रहते हैं। पीपल को परिपक्व होने में वर्षा का समय चाहिए और बबूल तो कुछ ही महीनों में चुभने वाले काँटों से लद जाता है। कुविचार भी प्रायः ऐसे ही होते हैं।

जीवन को उज्ज्वल उत्कृष्ट बनाना हो तो उसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन आदि का आश्रय लेना पड़ता है। अच्छे वातावरण और संपर्क के साथ जुड़ना हो तो दुष्प्रवृत्तियां खर पतवार की तरह हर खेत में उगी रहती हैं थ्ब्न्ज्ञ प्ज्ञन्भ् क् भी हरियाली है। जलकुँभी की तरह उन्हें कभी भी जलाशय में छा जाने में देर नहीं लगती। व्यक्तियों का समुदाय अवाँछनीय प्रवृत्तियों से भरा पड़ा है। कुकृत्यों का सर्वत्र प्रचलन है। उनकी छूत रास्ता चलतों को लगती चली जाती है।

इनका प्रतिकार न किया जाय तो अवाँछनीयताएँ टिड्डे की तरह बढ़ती है। मकड़ी, मच्छरोँ की तरह पनपती है और अपनी चपेट में उन्हें भी ले लेती है, जो चैन से रहने के इच्छुक है जो किसी को नहीं सताते। इतने पर भी वे मात्र बच्चे इसलिए नहीं रह सकते कि सज्जनता निभाते हैं, किसी को त्रास नहीं पहुँचाते हैं। खटमल, पिस्सू, जुँए, चूहे सभी तेजी के साथ बढ़ते हैं कि यदि उनकी रोकथाम के बारे में न सोचा जाय तो उनकी मन्द गति आक्रमण भी आस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर देता है। चोर उचक्कों से बेखबर रहा जाय तो कही भी जेब कट सकती है। घर के पिछवाड़े कही भी सेंध लगती है। स्वयं चोर न होना अच्छी बात है। पर इतने भर से चोरों के हथकंडे रुक नहीं सकते। सतर्कता को लेकर चौकीदार तक प्रबंध करने पर ही अपने सामान को बचाया जा सकता है।

कुविचार, कुकुरमुत्ते की तरह बिना बोये उगते हैं। जन्म जन्माँतरों के कुसंस्कार तनिक सी नमी पाते ही उद्भिजों की तरह उपज पड़ते हैं। सुखी घास की जड़ पहली वर्षा होते ही धरती पर फैल जाती है। कूड़ा-करकट हवा के साथ उड़ कर कही से भी घर के आँगन में आकर घुस जाता है। इस आधार पर उत्पन्न होते रहने वाली गंदगी को बुहारी से बुहारने, पानी से धोने के अतिरिक्त और कुछ भी काम करने पड़ते हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में इसी प्रकार के प्रयत्नों को “प्रत्याहार” या “प्रतिकार” कहते हैं। कुविचारों से जूझने के लिए सद्विचारों को ऐसी पुलिस फौज की व्यवस्था करनी पड़ती है जो आक्रमणों को देखते ही उनसे भिड़ पड़े। ऐसी बहादुरी से लड़े कि दुश्मन के पैर उखाड़ कर ही दम ले। लाठी का जवाब लाठी से, घूंसे का जवाब घूंसे से दिया जाता है। विष की औषधि विष बताई गयी है। कुविचारों को कुकर्म के रूप में परिणत होने से पहले उनके छत्ते में पलने वाले विषैले डंक वाली बर्रे की बढ़त बंद करनी चाहिए। सड़े जानवर के बिच्छू पनपे उससे पहले ही उस सड़ांध को हटा कर दूर पहुँचा देना चाहिए।

मन को जन्म जन्मान्तरों के कुसंस्कारिता और वातावरण से भरी पूरी अवाँछनीयता किसी भी क्षण छूत की बीमारी की तरह आक्रमण कर सकती है। इसलिए अच्छा है कि समय से पहले रोकथाम कर ली जाय। लक्षण उभरने लगे तब तो उपेक्षा बरतनी ही नहीं चाहिए। प्रतिरोध के लिए जो आवश्यक हो उसे अविलंब करना चाहिए और में पूरी कठोरता बरतनी चाहिए।

कुविचार तब पनपते हैं जब उन्हें विरोध का सामना नहीं करना पड़ता? जहाँ सुरक्षा की दीवार कमजोर दिखती है। कच्चे मोर्चे पर दुश्मन हमला करता है। यदि सुरक्षा पंक्ति समय रहते मजबूत कर ली जाय, सद्विचारों का भण्डार इतना भर लिया जाय कि उस भरी तिजोरी में कुविचारों को कही प्रवेश ही न मिल सके। यदि किसी प्रकार सीमा तक वे घुस ही पड़े तो उपेक्षा बरतने, जो हो रहा हो उसे होते रहने की ढील देनी ही नहीं चाहिए। खूनी साँड़ सामने से दौड़ा आ रहा हो तो दो ही प्रतिकार है एक तो लाठी लेकर उसे खदेड़ा जाय या भागकर किसी ऐसी आड़ में छिपा जाय कि उसके पैने सींगों से बचाव हो सके। कुकर्म का अवसर चुका देना भाग खड़े होने में बुद्धिमता है। पर यदि संभव हो तो कुविचारों को सद्विचारों के पक्षधर तर्कों, तथ्यों, प्रमाणों, उदाहरणों से इस प्रकार चुनौती देनी चाहिए कि उन्हें हार ही माननी पड़े। भविष्य के लिए निर्लिप्तता अर्जित होने का यही चिर स्थायी तरीका है। कुविचारों को बार बार परास्त करके उन्हें दुष्कर्मों के रूप में परिणत होते देने के पहले ही यदि प्रतिकार के लिए कमर कस ली जाय तो समझना चाहिए कि भविष्य को अंधकार की गर्त में गिरने वाले कुचक्र से पीछा छूटा।

कोई अचानक कुकर्मी नहीं होता। उस पर पहले ही कुविचारों का आक्रमण होता है। इन उगते लक्षणों को देखते ही सतर्क हो जाना चाहिए। उन्हें उपेक्षा का प्रश्रय नहीं मिलने देना चाहिए। समर्थन जैसा कुछ सोचने लगने पर उसे तिल का तार बनाते देर नहीं लगती जिसके मन में अचिन्त्य चिंतन आश्रय पाता है उसे उस स्थिति तक पहुँचने में देर नहीं लगती जिसमें दुर्व्यसनों का, दुष्प्रवृत्तियों का घेरा घिरता चला जाय और फिर उसे शिकंजे से छुटकारा पा सकना कठिन हो जाय।

गीता का महाभारत मात्र द्वापर में कुरुक्षेत्र के मैदान में ही नहीं लड़ा गया था। उसे हर व्यक्ति को अपने चिंतन और चरित्र की आत्म रक्षा के लिए हर किसी को निरंतर लड़ना पड़ता है। अर्जुन को शिथिल पड़ते देखकर कृष्ण ने उसे युद्ध रत होने के लिए प्रोत्साहित किया। उस प्रोत्साहन का तत्व दर्शन ही गीता ज्ञान है। यह जीवन में विजय श्री वरण करने का पहला चरण है। इस प्रत्याहार, परिष्कार में संघर्षरत होने का साहस दिखाए बिना कोई उस स्थिति तक नहीं पहुँच सकता जिसमें अंतरात्मा को परमात्मा में पहुँचाने का लक्ष्य प्रतीत होता है। जिसमें लौकिक प्रगति और प्रमाणिकता का श्रेय सम्मान एवं संतोष भरा दैवी अनुदान भी सम्मिलित है।


संपत्ति का सदुपयोग (Kahani)

अमरावती के नगर सेठ की मृत्यु हुई। मुनीम ने सबसे बड़े पुत्र को पिता की सम्पत्ति का हिसाब किताब समझाया। किस का लेना किसको देना। सब बताने के बाद वह उसे नीचे बने तलघर में ले गया जहाँ अरबों-खरबों की संपत्ति से तिजोरियाँ भरी पड़ी थी।

मुनीम ने का- “ मालिक यह सब आपके पूर्वजों की कमाई हुई है। “ सेठ पुत्र उदास हो गया। सेठ ने पूछा आप उदास क्यों हो गये?सेठ पुत्र बोला “इतनी संपत्ति जोड़ जोड़कर रखते गये किन्तु मेरे पूर्वज कुछ भी इनमें से अपने साथ नहीं ले जा सके। ” मुनीम ने कहा- “कोई ले भी जाता है संपत्ति, जो वे ले जाते?” सेठ पुत्र ने कहा तब ठीक है। इसके सदुपयोग की बात सोची जानी चाहिए और कहते हैं कि पीढ़ियों से पड़ी धन दौलत को उसने स्कूल, अतिथिगृह, अस्पताल और गरीब बच्चों की छात्रवृत्ति के लिए तुरन्त दान दें दिया। संपत्ति का मोह संग्रह के लिए उकसाता है। उदारता यदि बनी रहे तो सदुपयोग की बात सूझ पड़ती है।


अविज्ञात को जगाने के लिए मस्तिष्क खुला रखें

मानवी बुद्धि जो कुछ भी दिखती समझती है, वह अत्यल्प है। उसे धर्म सत्य ही कहना उचित होगा। यदि तथ्यों को सर्वांगीण जानने, समझने और उसके ज्ञात विज्ञात हर पहलू को पाने जितनी सामर्थ्य रहती होती, तो विदित हो पाता कि यहाँ सीधा चलने पर जो उलटा क्रम दिखाई पड़ता है, उसे अपवाद नहीं कहा जा सकता। सहायता करने वालों को असहयोग ही असहयोग प्रेम बाँटने वाले को घृणा ही घृणा प्रतिदान मिलते भी कई बार देखा गया है। यह सब एक सुनिश्चित विधान के अंतर्गत होता है। इसमें उलटा नियम अथवा आधा कानून जैसी कोई बात नहीं।

कई बार प्रगति प्रयासों के असफल होने के संबंधों में भी ऐसे अपवाद सामने आते रहते हैं। उसी योग्यता के उसी मार्ग पर चलने वाले उसी उपाय का अवलंबन करने वाले, दूसरे लोग बाजी बाजी जीतते, सफलता पर सफलता पाते चलें जाते हैं, पर पूरी ईमानदारी व समझदारी के साथ किये गये अपने प्रयत्न बहुत स्वल्प परिणाम दे पाते हैं। अनेक बार तो बुरी तरह निराशा ही हाथ लगती है। यदि अपनी ही भूल से ऐसा हुआ, तो वह भूल क्या थी?, यदि थी तो क्या जान बूझकर की गयी?इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढ़ खोजने पर भी ऐसे प्रश्न तथ्य हाथ नहीं लगते, जिन्हें असफलता का कारण ठहराया जाय, भूल माना जाय और भविष्य में उसे सुधारने का प्रयत्न किया जाय। अनेक बार मनुष्य स्वयँ बिल्कुल निर्दोष होता है। परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी विचित्र बन जाती हैं कि सब कुछ करा कराया मिट्टी हो जाता है। अतिवृष्टि, पाला, टिड्डी कीड़ों आदि के कारण किसान का तत्परतापूर्वक किया गया श्रम जब निरर्थक चला जाता है, तो उसकी समझ में नहीं आता कि उससे कहाँ क्या भूल हुई? वैसी ही भूल फिर न होने पाये, इसके लिए वह भविष्य में क्या सावधानी बरतें? ऐसे ही अगणित प्रसंग सामने आते रहते हैं।

इन्हीं आशंकाओं के मध्य भाग्य वाद का जन्म होता है। कहा जाता है-” मनुष्य नियति के हाथ की कठपुतली है। भाग्य टलता नहीं। विधि का विधान अकाट्य है। जो होनी है जो हो कर रहती है। “ इसी प्रकार के और भी कथन तब कहें जाते हैं, जब प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं। अप्रत्याशित संकट सामने आ खड़े होते हैं अथवा सफलता मिलते मिलते अपना रुख बदलती और बिजली की तरह आशा की चमक दिखाकर कहीं से कही चली जाती है। ऐसा ही तब भी कहा जाता है, जब अंधे के हाथ बटेर लगती है और सर्वथा समर्थ योग्य और श्रमशील को दिखती है। कितनों को ही ऐसी सफलताएँ वारतलबत हो जाती है जिनके लिए उनके पुरुषार्थ का श्रेय किसी भी प्रकार नहीं दिया जा सकता। पूर्वजों की बड़ी संपत्ति उत्तराधिकार में मिल जाय, तो उसमें प्राप्ति कर्त्ता का श्रेय क्या? लाटरी खुल जाने जैसी सफलताओं में किस कौशल ओर पौरुष को सराहा जाय? तेजी मंदी के दौर में कई व्यापारी देखते देखते दिवालिया होते तथा कई लखपति होते दृष्टिगोचर होते हैं। इनमें किसको मूर्ख किसको विद्वान कहा जाय? नदी में बाढ़ आती है किसी का खेत कटकर उसकी आजीविका को उदरस्थ कर जाती है। किसी के ऊपर खेत में कहाँ से लाकर ऐसी मिट्टी उपजाऊ पटक दी गयी कि वह उसकी पैदावार को देखते देखते अमीर बन जाता है।

नदी द्वारा एक ही भूमि को काट ले जाना और दूसरे को समृद्धि का वरदान बरसा जाना इसे क्या कहा जाए? इसके लिए दोष का श्रेय किसको दिया जाय? आँधी तूफान में जिसका छप्पर उजड़ गया और घर बिगड़ गया, उसमें उसकी क्या भूल बताई जाय ओर भविष्य में क्या सावधानी बरतने के लिए कहा जाय?सामान्य बुद्धि कुछ समझ नहीं पाती संयोग अथवा अपवाद कह कर टाल देती है। समय समय पर ऐसे प्रसंग उपस्थिति होते रहते हैं, जिसमें बुद्धि असमंजस में पड़ जाती है। और कोई भी निष्कर्ष व निर्णय नहीं निकाल पाती॥

एक ऐसे ही प्रसंग का वर्णन महात्मा आनन्द स्वामी ने अपनी पुस्तक “ एक ही रास्ता” में किया है। घटना सन् 1946 की है। दोपहर का समय था। मुँगेर के लोग तब घरों में विश्राम कर रहे थे। कई दिनों से वहाँ भूकंप के हल्के झटके महसूस हो रहे थे। झटके अत्यंत मंद होने के कारण लोग उस ओर से असावधान बने हुए थे और किसी प्रकार की सुरक्षा के कोई कदम नहीं उठायें गये। किसी को क्या पता कि आज उनके जीवन का आखिरी दिन है। प्रकृति की ओर से लगातार दी जा रही उपेक्षा का सामूहिक दण्ड इसी दिन मिलने वाला है। लोग अपने बिस्तर में अभी गये ही थे कि तीव्र भूचाल हुआ और देखते ही देखते घर धराशायी हो गये। सब कुछ इतनी शीघ्रता से पलक झपकते हो गया कि लोगों को बाहर भागने का मौका ही नहीं मिला। पूरा नगर श्मशान में परिवर्तित हो गया। प्रथम और दूसरे दिन तो लोग जीवित चोट खाये निकलते रहे, पर तीसरे दिन तो लाशों की कतारें लगी थी कि पन्द्रह दिनों तक निकलती चली गयी। दृश्य साकार मरघट में उपस्थित हो गया।

अभी तो मलबे की सफाई चल रही थी और उसके नीचे मरे पड़े लोगों की खोज की जा रही थी। एक स्थान पर जब काम चल रहा था, सफाई करने वाले अचानक चौंक उठे। नीचे से बार बार एक स्वर उभर रहा था, जिसमें धीरे ओर सावधानी पूर्वक खोद कर निवेदन किया जा रहा था। 15 दिनों तक जमीन में डूबे रहने पर भी यह कौन जीवित पड़ा है। इस आश्चर्य से कुछ समय तो लोग विस्मय मूढ़ में बने रहे, पर आपात स्थिति का ध्यान आते ही अधिक तत्परता और शीघ्रता दिखाई गई?

कुछ ही समय के परिश्रम के उपराँत भारी शहतीरों और ध्वस्त दीवारों के बीच विशाल ढेर के नीचे एक अधेड़ आयु का व्यक्ति बाहर निकाला गया। आस पास केले के ढेर सारे छिलके पड़े थे। उससे सुरक्षित बचे रहने के बारे में पूछा गया, तो बताया कि वह एक फल बेचने वाला है और इसी आय से वह अपना पेट पालता है। उक्त दिन केले की टोकरी लादे इस मकान की दलान के नीचे खड़ा था कि अकस्मात छत तीव्र कंपन से गिर पड़ी और वह उसी मलबे के नीचे दब गया। टोकरी इस प्रकार उल्टी कि सारे केले उसके नीचे सुरक्षित पड़े रहे और वह भी कुछ इस प्रकार दबा कि किसी प्रकार की कोई हानि नहीं पहुँची। धरती एक बार फिर काँपी इसी के साथ पता नहीं मलबे के मध्य कैसे एक छोटा सुराख हों गया। हवा और धूप गर्मी आने के कारण इतना पर्याप्त था। जीवन के लिए एक मात्र ही चीज की आवश्यकता रह गयी थी-पानी। दैव योग से पृथ्वी तीसरी बार फिर काँपी और जब मकान का फर्श टूट गया और पानी की एक लहर उधर आयी तो इस गड्ढे को ऊपर तक भर गई। हवा धूप यों छिद्र से उपलब्ध हो गये। केले पास ही थे। पानी भी परमात्मा ने भेज दिया था।

इस आधार पर अब तक जीवित रहा। आज अंतिम दिन है जब केले सब समाप्त हो गये है। पानी नहीं बचा है। प्रकाश भी नहीं आ रहा है, पर आप लोग आ गये, सो मैं आप सबों को भगवान की मदद ही मानता हूँ। इतना कहकर उसकी आंखें भर आयीं और भगवान को लाख लाख धन्यवाद देता हुआ चला गया।

यह ठीक ही है कि प्रसंग बार बार नहीं घटते यह अपवाद है। सामान्य क्रम इन्हें नहीं कहा जा सकता फिर भी अपवाद सर्वथा उपेक्षणीय नहीं है। उनका भी कारण खोजना होगा। अत्युक्ति न समझी जाय और पौरुष सार्थकों को बुरा न लगता नम्रता पूर्वक यहाँ तक कहा जा सकता है कि “भाग्य का खेल” 30 प्रतिशत घटनाक्रमों में काम कर रहा होता है। यों महत्ता तो कर्मनिष्ठा की ही रहेगी और खुला समर्थन उसी को दिया जायेगा पर इन अप्रत्याशित परिणामों के संबंध में भी तो विचार ही किया जाना चाहिए।

विज्ञान कहता है कि संसार में कभी भी ऐसा कुछ नहीं हो सकता, जो प्रकृति नियम के विपरीत हो। भूकम्प, बिजली गिरना, ज्वालामुखी फटना, तूफान जैसी घटनायें साधारण बुद्धि को आकस्मिक लगती है और उसके पीछे विपर्यय दीखता है, पर वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं।

उसके पीछे भी प्रकृति के सूक्ष्म नियम ही काम करते हैं। यह दूसरी बात है कि उन नियमों की जानकारी सर्वसाधारण को न हो अथवा उस तरह के घटनाक्रम आये दिन घटित न होने के कारण आश्चर्यजनक लगते हैं। चमत्कार उन्हीं को कहते हैं, जो दृश्य आमतौर पर देखने को नहीं मिलते हैं। जब भी विज्ञान का आविष्कार प्रथम बार हुए तो उन्हें भारी चमत्कारों के रूप में देखा गया था। रेल, टेलीफोन, बिजली, रेडियो, सिनेमा, टी. वी, आदि पूर्व काल में अप्रचलित आविष्कार जब सामने आये तो सामान्य बुद्धि हतप्रभ रह गयी और उसे जादू जैसा करामात समझा गया। पीछे अब जब विज्ञान के आविष्कारों का सिलसिला समझ में आ गया, तो अंतर्ग्रही यात्रा, अणु आयुधों, रोबोटों, कम्प्यूटर जैसी आश्चर्यजनक उपलब्धियों तक को साधारण बात मान लिया गया।

जादू नाम की कोई वस्तु दुनिया में नहीं है लोगों की परख क्षमता को चकमा देने की सफलता का नाम जादूगरी है। अध्यात्म क्षेत्र में सिद्धि चमत्कारों का वर्णन बहुत होता है। उन्हें देख कर आश्चर्य तो किया जा सकता है पर ऐसा नहीं माना जा सकता है कि यह आकस्मिक है। इनके पीछे प्रकृति के सामान्य नियम परम्परा का हाथ नहीं है। इसमें अव्यवस्था के लिए रंग मात्र की गुंजाइश नहीं है यहाँ ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता, जिसे अप्रत्याशित, चमत्कारी या असंभव कहा जा सके। जिसे हम नहीं जानते उस अविज्ञात को ही अपवाद कह सकते हैं। वस्तुतः उन अपवादों के पीछे भी प्रकृति का पूर्ण व्यवस्था क्रम काम कर रहा है। आदि काल में सूर्य, बिजली, आग, वर्षा आदि तत्वों को देवता माना जाता था उनकी मनौती मानयी और बलि चढ़ाई जाती थी। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण किन्हीं राक्षसों का आकस्मिक आक्रमण समझा जाता था, पर अब यह बात रही नहीं। विज्ञान के शोध निष्कर्षों ने भली प्रकार समझा दिया है कि यहाँ अप्रत्याशित कुछ नहीं है। अविज्ञात को ही अपवाद कहते हैं। वस्तुतः इस सृष्टि में अंधेरगर्दी के लिए व्यक्तिक्रम के लिए कहीं रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है।

अविज्ञात-अप्रत्याशित को ही अपवाद कहा जाता है वस्तुतः यहाँ अर्थवाद का ही अस्तित्व है। अपवाद का अर्थ इतना ही है कि जिस आधार पर वह असामान्य घटनाक्रम उपस्थित हुआ, उसकी जानकारी अपने पल्ले नहीं पड़ी है। क्यों अपवादों का सिलसिला चलता ही रहेगा, क्यों कि सामान्य व्यवस्था की ही हमें जानकारी है और उसी को देखने-समझने की आदतें भी हैं। सृष्टि के अविज्ञात नियमों के आधार पर जब भी कुछ असामान्य घटित होगा, तभी उसे अपवाद कर दिया जायेगा। प्रकृति के रहस्य अनंत हैं और मनुष्य की बुद्धि अत्यंत स्वल्प। ऐसी दशा में असाधारण तो घटित होता ही रहेगा। उचित यही है कि उसके संबंध अत्यंत स्वल्प। ऐसी दशा में असाधारण तो घटित होता ही रहेगा। उचित यही है कि संबंध में हम अपना दृष्टिकोण साफ कर लें। अपनी समीपता को स्वीकार करें और असमंजस में न पड़ कर तथ्यों तक पहुँचने का यथासंभव प्रबल करते रहें।

पिछले दिनों एक ही तरीका अपनाया जाता रहा है कि हर अपवाद को देव-मानवों के क्रिया-कृत्य मानकर समाधान कर लिया जाता रहा है। भाग्यवाद भी कुछ इसी प्रकार दर्शन है, जिसमें देवताओं के द्वारा भाग्य-निर्माण की बात कह कर एक विचित्र प्रकार भ्राँति उत्पन्न कर दी गई है। विचारशील वर्ग में अपवादों को ‘चान्स’ ‘काँइन्सीडेन्स, ’ ‘लक’ आदि कहा जाता रहा है। उसे अप्रत्याशित अवसर मात्र या दोष नहीं दिया गया है। उसमें अविज्ञात को अपवाद को मान्यता भर दी गई है और उसका कारण विविदत को मान्यता भर दी गई है और उसका कारण विदित न होने पर उसे किसी देवता का कोष या अनुग्रह कहकर एक नया भ्रम गढ़ने की चेष्टा नहीं की गई है। यह समझदारी का चिह्न है। सर्वज्ञ होने का दावा करना मिथ्या गर्व है। जो ज्ञात नहीं है, उसे जानने के लिए मस्तिष्क खुला रखा जाय और धैर्यपूर्वक रहस्योद्घाटन के सूत्र खोज निकालने का प्रयत्न करते रहा जाय। इसी में बुद्धिमानी है।


बड़प्पन के प्रदर्शन में घाटा ही घाटा

समझा यह जाता है कि हम दूसरों पर अपनी संपन्नता, बुद्धिमत्ता, बलिष्ठता का रोब जमाकर उन्हें प्रभावित कर सकते हैं, पर ऐसा होता कम और कदाचित ही है। किसी जमाने में मनुष्यों का एक वर्ग बहुत ही गई गुजरी, दीन−हीन अवस्था में था। तब उसके लिए संपन्नता और समर्थता दैवी वरदान जैसी थीं। स्वयं न तो वह बढ़कर समान स्थिति में पहुँचने की स्थिति में था और न वैसी कामना, कल्पना ही करता था। ऐसी असहाय, शारीरिक और मानसिक दशा में वह बलिष्ठों के सम्मुख सहज ही नत मस्तक हो जाता था और विवश होने पर गिड़गिड़ाने भी लगता था।

पर अब ऐसी बात नहीं। सर्वत्र एकता और समता की मान्यता को बल मिला है। सभी के लिए ऊँचा उठ सकना, आगे बढ़ सकना संभव माना गया है। सभी की धारणा वैसी बन गई है कि वह भी मानवी अधिकारों से सुसज्जित है। उसका उपयोग भी करना चाहता है पर परिस्थितिजन्य बाधायें इस मार्ग में खड़ी दीखती हैं। और अपने पिछड़ेपन के लिए बाधक परिस्थितियों को ही दोषी मानता है। अभीष्ट संभावनाओं के मार्ग में अवरोध करने वालों के प्रति द्वेष-बुद्धि उपजना स्वाभाविक है।

कभी समय था जब यह सोचा जाता था कि वैभव ईश्वर प्रदत्त है। वह भाग्यवानों को ही मिलता है। विधाता की इच्छा से ही कोई संपन्न विपन्न बनता है। भगवान की इच्छा कोई कैसे रोके? भाग्य कैसे बदला जाय? यह मान्यतायें पिछले वर्ग को किसी प्रकार संतोष प्रदान कर देती थीं और ईर्ष्या एवं आक्रोश से ग्रसित नहीं होता था। संपन्न वर्ग के लोगों में भी अपना वैभव प्रदर्शन निर्वाध रूप से चलता रहता था। विग्रह खड़े होने के दृश्य कदाचित ही कभी देखने को मिलते थे।

पर अब मान्यताओं में लगी आमूलचूल स्तर का परिवर्तन हुआ है। समझा जाने लगा है कि समर्थ वर्ग ने सारे सुविधा−साधन स्वयं की हथिया लिए हैं। भाग्यवादी लोक मान्यतायें इसलिए गढ़ी और फैलाई हैं कि दमित वर्ग अपने अधिकार समझने और माँगने न लगे। संपन्नों को अपनी प्रगति का बाधक मानकर उनके प्रति अपना आक्रोश प्रकट न करने लगे। संपन्नता निर्धनता की तरह ही जाति और लिंग के आधार पर प्रचलित ऊँच-नीच की भावना को अब कृत्रिम और निहित स्वार्थ द्वारा गढ़ी गई, फैलाई गई माना जाने लगा है। भाग्यवादी और ईश्वरेच्छा वाला दर्शन अब अभिजात वर्ग का कुचक्र भर माना जाने लगा है। पूर्व प्रचलनों का उदाहरण देकर भी अब यथा स्थिति बनाये रखने की बात बनती नहीं है। भाग्य को कोसने की अपेक्षा अब लोक चिंतन में इस तथ्य का समर्थन आरी कर दिया है कि समर्थों ने अपनी कुटिलता से समवितरण और सहविभाजन का सुयोग नहीं बनने दिया है। यदि उन्हें भी अवसर मिला होता, सभी के लिए समान परिस्थितियाँ रही होती तो उन्हें वह पिछड़ापन न भोगना पड़ता जो उन्हें इन दिनों भोगना पड़ रहा है।

कभी जिन लोगों को भाग्यवान माना और सराहा जाता था अब उनके प्रति दृष्टि बदल गई है और समझा जाने लगा है कि बाधायें और परिस्थितियां उत्पन्न करके उन्हें वंचित स्थिति में रखा गया है, उनके साथ अन्याय हुआ है। जिसे अन्यायी समझा जाय उसके प्रति-रोष-आक्रोश उत्पन्न हो यह स्वाभाविक है। साथ ही यह भी स्वाभाविक है कि जिन्हें अपनी प्रगति बाधक माना जाय उनके प्रति प्रतिशोध की भावना उपजे और विग्रह खड़ा करने का मन बने।

यह कहा जा सकता है कि जो बड़े बने हैं उनने अपनी बुद्धिमत्ता और परिश्रमशीलता के आधार पर प्रगति की है। पिछड़े लोग आलस्य, अनुत्साह और कम सूझबूझ के कारण ही पिछड़े-यदि इस कथन को सही भी मान लिया जाय तो भी मानवी एकात्मता का दर्शन यह कहता है कि विकसितों को अविकसितों की सहायता करनी चाहिए थी और वैभव को असाधारण रूप से एकत्रित करते रहने की अपेक्षा उसका विभाजन उदारतापूर्वक इस प्रकार करना चाहिए था कि जो पिछड़ गये हैं उन्हें सुविधाजनक स्थिति में पहुँचने में सहायता मिलती। बहुत भूखे लोगों के बीच बैठ कर यदि कोई अकेला षट्रस, व्यंजन खता और उनका प्रदर्शन करता रहे तो उसके प्रति किसी को भी सहानुभूति शेष न रहेगी। विग्रह और विद्रोह उभरेगा, ईर्ष्या पनपेगी और वह किसी न किसी रूप में सुसंपन्नों के प्रति हानिकारक सिद्ध होकर रहेगी।

अच्छा होता कि वैभवशाली लोग जनसाधारण के स्तर का निर्वाह स्वीकार करते और इसके उपराँत जो भी समय, श्रम, कौशल, वैभव आदि बचता उसे अविकसित वर्ग को विकसित बनाने के लिए नियोजित करते। इससे जो किसी कारण पिछड़ गये हैं उन्हें ऊँचे उठकर समान स्तर तक पहुँचने का लाभ मिलता और सुख दुःख में साझीदार बनकर समता का लाभ हर किसी को मिला और सर्वत्र सुख−शांति का वातावरण दृष्टिगोचर होता। ऐसा बन पड़ने पर वितरण की उदारता इसकी तुलना में उन्हें अधिक श्रेय प्रदान करती जिसे इन दिनों वैभव प्रदर्शन और अनावश्यक उपभोग द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है।

संचय और त्याग के उपदेश विशेषतया सुसंपन्न वर्ग के लिए हैं। इससे उन्हें निष्ठुर, अनुदार, कृपण, अहंकारी आदि का दोषारोपण सहने के आरोप से छुटकारा मिला॥ बढ़ी-चढ़ी कुशलता और श्रमशीलता को विभाजित कर देने पर उनको अधिक श्रेय और सम्मान मिलता। उपभोग में अति बरतने पर जिस सहकार की पूर्ति अभी बन पड़ती है उसकी तुलना में उदारचेता बनकर वे अधिक श्रेय और संतुष्टि प्राप्त करते।

यदि संकीर्ण स्वार्थपरता उन्हें न करने दे और अपनी कमाई आप ही खाने-खुन्दरते रहने का मन हो तो भी अपने बचाव को ध्यान में रखते हुए कम से कम इतना तो करना चाहिए कि वैभव का बड़प्पन का उद्धत प्रदर्शन न किया जाय। असाधारण ठाटबाट न रोपा जाय। बनावट, शृंगार, प्रदर्शन में जो अपव्यय होता है उसको रोका जाय। इससे कम से कम इतना लाभ तो रहेगा ही कि सर्वधारण की रहने पर भरती ईर्ष्या का सामना न करना पड़ेगा। इस कारण जो आक्रमण होता है जो आरोप लगता है उनसे बिना कठिनाई के बचाव हो सकता है।

देखा जाता है कि एक का ठाटबाट दूसरे को ललचाता है और उस भड़की हुई लिप्सा को पूरा करने के लिए अनाचार का मार्ग अपनाया जाता है। वह किसी हद तक रुक गया होता। बड़ों द्वारा विलासिता, साज−सज्जा और फिजूलखर्ची के द्वारा बड़प्पन प्रदर्शन को जो प्रयत्न किया जाता है। यदि उसे रोका जा सके तो ईर्ष्या के उस के उस अंधड़ से बचा जा सकता है जो अनीति उपार्जन जैसे अनेकों आरोप लगाता और ऊँचे टीले पर बैठे हुओं को घसीट कर अपनी समता तक लगाने के लिए अनेकों मार्ग खोजता है।

यह ठीक है कि समुन्नत बनने के लिए कुशलता और श्रमशीलता को अधिक श्रेय है। फिर भी इतना निश्चित है कि जो लंबे समय से पिछड़े हैं उनके उत्कर्ष, आवश्यक गुणों में प्रवीण हो जाने की तत्काल आशा नहीं की जा सकती। सामयिक कर्तव्य तो सुसंपन्नों के कंधे पर ही अधिक आता है कि वे अपनी प्रगति का लाभ पिछड़े वर्ग को प्रदान करके हलके बनो। सादगी अपनायें और औसत नागरिक की तरह रहते हुए अपनी विनम्र सज्जनता का परिचय दें। यह उनके अपने ही हित में है। अहंकारी ठाटबाट प्रदर्शन करके वे बड़प्पन का ढिंढोरा पीटते हुए जितने गौरवान्वित होने का प्रयत्न करते हैं उसकी तुलना में उन्हें घाटा ही अधिक रहेगा। भीतर या बार का असंतोष उन पर बार-बार दुहरा आक्रमण करेगा एवं उन्हें मानसिक उद्वेगों-संत्रासों का शिकार बनाएगा। अच्छा हो बड़प्पन के स्थान पर महानता को जीवन में उतारने की दिशा में प्रगति करें। यही युग की माँग है।


Quotation

भाव संवेदना की शक्ति जब दैवी अनुदान के रूप में मनुष्य अंतरात्मा पर उतरती है तो उसे निहाल बनाकर रख देती है। जब यह अंतःकरण के साथ जुड़ती है तो उसे देवदूत स्तर का बना देती है। एक एक के आधार पर ही ऐसे साधक में अनेकानेक दैवी तत्व भरते चले जाते हैं व उसे महापुरुष बना देते हैं।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


मनोरोग – हमारी अपनी ही उपज

मस्तिष्क का पूरा नियंत्रण सारे शरीर पर है। उसकी इच्छा से ही नाड़ी संस्थान काम करता है और ज्ञान तंतुओं के माध्यम से भी उसी का वर्चस्व छोटे से लेकर बड़े अंगों पर छाया रहता है। ऐसे में उद्गम केन्द्र जैसे महत्वपूर्ण स्थल पर घुटन जैसे असंतुलन का भार लदा रहे, तो वह स्थानीय नहीं हो सकता, उसका प्रभाव ज्ञान तंतुओं के माध्यम से अन्य अंगों तक भी पहुँचेगा रुग्णता की संभावना उत्पन्न करेगा।

व्यवहार मनोविज्ञानियों के अनुसार इसके भार को हलका करने के दो ही तरीके हैं-उसे वाणी द्वारा निकाल दिया जाय या क्रिया द्वारा निरस्त करते रहा जाय। वे कहते हैं कि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वह दबाव बाहर न निकल पाने की स्थिति में अनैच्छिक संस्थान की ओर मुड़ जाता है और शरीर में जो स्वसंचालित क्रियाएं होती रहती है, उनमें वह घुटन वाला विष जा घुलता है। इससे संबद्ध अंगों में सिकुड़न, अकड़न और जकड़न पैदा होने लगती है और इस बाहरी दबाव के करण उनकी क्रियाएँ असामान्य हो जाती है। यह दबाव यदि पेट की ओर मुड़ जाय, तो आमाशय पर अकारण ही तीव्र प्रतिक्रिया होती है और पाचन क्रिया में गड़बड़ मच जाती है, रक्त-संचार रुकता है और पाचक रसों की आपूर्ति थम जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार उक्त गड़बड़ी से पहले आमाशय में सूजन आती है, फिर जख्म बन जाते है॥ अल्सर इसी प्रकार का रोग है, जिसमें शारीरिक कारण कम और मानसिक अधिक रहते हैं।

बर्लिन विश्वविद्यालय के मूर्धन्य मनःशास्त्री एच. आइसैंक के वर्षों के अनुसंधान के उपराँत यह निष्कर्ष निकाला है कि व्यक्ति यदि मानसिक संताप की स्थिति से गुजर रहा हो, तो उसे जोर से रो पड़ने या फूट-फूट कर लिखने की इच्छा पूरी कर लेनी चाहिए। वे कहते हैं कि इस अभिव्यक्ति से मनोव्यथा का वह हिस्सा बाहर निकल आता है, जो नहीं निकलने पर विभिन्न प्रकार के रोगों कारण बनता है। घुटन का बड़ा भाग निष्कासित हो जाने के पश्चात् अवशेष बचता है। वह इतना प्रभावी नहीं है। व्याधि का कारण बने। यदि लोग लाज वश उस पीड़ा को दबाकर अपने वीतराग या मनस्वी होने का ढोंग किया जायेगा। तो मानव स्वभाव की कमजोरियों पर तो विजय पायी नहीं जा सकेगी। उल्टे घुटन दबकर भीतर बैठ जायेगा और अनेक गड़बड़ियाँ पैदा करेंगी। कोई विषैली चीज पेट में पहुँच जाये, तो सीधा तरीका यही है कि उल्टी दस्त द्वारा बाहर निकल जाने दिया जाये। यदि उसे उसे निकलने का अवसर न मिला, तो वह विष फिर अनेक भयंकर तरीकों से फूट कर निकलेगा और दस्त उल्टी जैसी कठिनाइयों की तुलना में तो मुसीबत पैदा होगी, वह अधिक कष्टसाध्य और समय साध्य होगी। जानकार लोगों का कहना है कि मनुष्य को जब कभी क्रोध आये। बक छक कर जी की जलन शांत कर लेना अच्छा है। सर्वथा मौन रहकर उसे सह पाना हर किसी की बात नहीं है। सर्वसाधारण के लिए उसके दुष्परिणाम से बचने का उपाय यही हो सकता है उस आवेग को तुरन्त निकाल दिया जाय, अन्यथा मन में कब्र हो जाने पर वह घृणा, द्वेष के रूप में जड़ जमा कर स्थाई रूप से बैठ जायेगी और शत्रुता का रूप धारण करके प्रतिहिंसा कर बैठेगा।

मानसिक सर्वांशों को घटाने-मिटाने का यही कारगर तरीका है। जो हर किसी के आंतरिक उद्वेगों को शांत करने में सफल होते देखा गया है। कामुक आकाँक्षाओं को होली जैसे त्यौहारों में नाच-गान के उल्लासों द्वारा निकाल बाहर कर दिया जाता है और जी हल्का कर लिया जाता है। इसके विपरीत मन में काम विकार घुमड़ते रहें, तो भीतर-भीतर वह घुटन दूसरे रूप में फूटती और हिस्टीरिया, मूर्छा, पागलपन जैसे कितने ही प्रकार के रोग उत्पन्न करती है।

एक उपाय यह भी हो सकता है कि मन को ऐसी प्रशिक्षित किया जाये कि उसमें सौम्य, सज्जनता ही स्वाभाविक हो जाये और विकार विकृतियों के लिए गुंजाइश ही न रहे, पर यदि क्रोध शोक आदि उठ रहे हों, तो उन्हें प्रकट होकर बाहर निकल जाने देना चाहिए। इसके लिये कोई सच्चा विश्वस्त मित्र होना ही चाहिए, जिसके सामने पेट के अन्दर के हर रहस्य और भेद को प्रकट कर ही देना चाहिए। जीवन में कोई ऐसा पाप हो गया हो, जिसके असह्य भार से मन में दबा-दबा कर महसूस करें तो ऐसे मौकों पर ही उसे मित्र कुटुंबी के समक्ष प्रकट देने पर जी हलका हो जाता है। किन्तु ऐसा करते समय ध्यान इस बात का अवश्य रक्खा जाना चाहिए कि जहाँ और जिससे यह सब कहा जा रहा है। वह विश्वस्त स्तर का है या नहीं। यदि व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ। तो वह गंदगी को उछालते फिरने की तरह हर जगह फैलायेगा और एक प्रकार से उसका ब्लैकमेल करता रहेगा। इस प्रकार जहाँ सहानुभूति मिलनी चाहिए। वहाँ अनेकों की घृणा बरसने की एवं असमान जैसी परिस्थितियाँ पैदा होने से घुटन और बढ़ती है, जबकि सुनने वाला व्यक्ति उससे प्रेम और सहानुभूति का बरताव करे, तो उसकी मानसिक वेदना में काफी कमी आती है, व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है और सहज स्वाभाविक जिन्दगी की ओर अग्रसर होने लगता है।

मनः संस्थान में उत्पन्न कुढ़न की इस विकृति से जो रोग पैदा होते हैं, उनके अलग से कोई पृथक लक्षण नहीं होते, वरन् वे शारीरिक व्याधियों में मिल कर ही फूटते हैं। शारीरिक बीमारी यदि कायगत हो, तो मामूली दवा-दारु ही अच्छा कर देती है, किंतु भावनात्मक विकार इसके मूल में हो, तो फिर उससे पीछा छुड़ाना तब तक ठीक नहीं जब तक जड़ का मूलोच्छेद न हो। पुराने समय में जब लोग सरल जीवन जिया करते थे, मन में उत्फुल्लता, निष्कपटता और निर्द्वंदता का संतुलन बनाये रहते थे, तब आज जितनी मानसिक रोगों की बाढ़ नहीं थी। उस जमाने में केवल काय-कष्ट ही होता था, अस्तु उनके उपचार में कोई कठिनाई नहीं होती थी। अब प्रत्यक्षतः तो शारीरिक रोग ही दीखते हैं पर उनके पीछे मानसिक बीमारियों की जटिल ग्रंथियाँ उलझी होती हैं। जब तक वे न सुलझें, दवा क्या काम करे। मानसिक रोगों की दवाएँ अभी निकली नहीं है। ऐसी परिस्थिति में यदि चिकित्सकों को चक्कर में डाल रखने वाले और दवाओं को झुठलाते रहने वाले रोगों का बाहुल्य औषधि-उपचार की परिधि से बाहर निकलने लगे, तो उसमें आश्चर्य की कुछ बात नहीं हैं।

स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर लिखा है कि रोगों का प्रमुख आधार परिस्थिति द्वारा मन और मन द्वारा शरीर प्रभावित होता रहता है। परिस्थितियाँ यदि बुरी हुई, तो शरीर मन पर उसका असर बुरा होता है, पर यदि अच्छी हुई तो उसका अच्छा प्रभाव भी दिखाई पड़ता है, किंतु आज के चुग में अनुकूल परिस्थितियाँ तो एक प्रकार से दुर्लभ ही हो गई हैं। हर जगह विपरीतताएँ और प्रतिकूलताएँ ही दिखाई पड़ती हैं। ऐसे में बाहरी परिवेश से मन बराबर प्रभावित होता रहता है और मन के गड़बड़ाने से शरीर भी शरीर भी अछूता बना नहीं रह पाता, वह भी लड़खड़ाना जाता है। इसीलिए अध्यात्मशास्त्र में अब आज की परिस्थितियों में क्रम को उलट कर देखा जाना चाहिए। उसमें शरीर द्वारा मन और सशक्त मन द्वारा बाह्य परिस्थिति को प्रभावित करने की बात प्रमुख मानी जानी चाहिए आहार, विहार और व्यवहार-यह शरीर को प्रभावित करने वाले उपादान हैं। यह इसका दोहरा लाभ हुआ।

जबकि प्रचलित क्रम अपनाने से हानि-ही-हानि उठानी पड़ती है। कई बार परिस्थिति जन्य यह दंड मानसिक पापकर्म के फलस्वरूप भी भोगने पड़ते हैं। दुष्कर्म कर लेना अपने हाथ की बात है, पर उसकी प्रतिक्रिया उठती है। उससे शरीर और मन का संतुलन बिगड़ता है। दोनों क्षेत्र रुग्ण होते हैं। उसके फलस्वरूप जनसहयोग का अभाव-असम्मान मिलता है और संतुलन बिगड़ा रहने से हाथ में लिए हुए काम असफल होते हैं। इन सबका मिला-जुला स्वरूप शारीरिक-मानसिक कष्ट के रूप में आधि व्याधि बनकर सामने आता है। कर्मफल भोग की यही मनोवैज्ञानिक पद्धति है। इससे बचाव करने के लिए निष्पाप जीवनक्रम अपनाने की जरूरत है। जो पाप पिछले दिन बन पड़े, उनके प्रायश्चित का विधान इसी जीवन में कर लेने की महती आवश्यकता है। इससे मन पर लदने वाला बोझ हलका होकर इतना कम रह जाता है, जिसे आसानी से ढोया जा सके।

साइकोसोमेटिक रोगों की बाढ़ इन दिनों बौद्धिक विकास के दुुरुपयोग से उत्पन्न की है। होना यह चाहिए कि जहाँ बुद्धिमत्ता के दुुरुपयोग का खतरा हो, वहाँ वह प्रयास न किया जाय। यदि यह अनुचित लगता है और मस्तिष्कीय विकास आवश्यक प्रतीत होता है, तो उसे सन्मार्गगामी बनाये जाने की समुचित तैयारी पहले से ही रखनी चाहिए। विकसित मस्तिष्क यदि दुष्प्रवृत्तियों से भरा रहा, तो निश्चित रूप से वह अभिशाप सिद्ध होगा और उसका दंड जटिल कष्टसाध्य एवं दुःसाध्य घुटन जन्य मानसिक रोगों के रूप में भी हो सकती है और ऐसी भी, जिसे शारीरिक व्याधि कहा जा सके।

घुटन एक न दीखने और समझ में आने वाली ऐसी बीमारी है, जिसका कुप्रभाव किसी भी भयंकर रोग से कम नहीं। अतृप्त और असंतुष्ट मनुष्य अपने आप ही अपने को खाता, खोता और खोखला करता रहता है। आवश्यकता इससे बचने की है। यदि भूल अपनी हो, तो स्थिति का सही मूल्याँकन करके जल्द-से-जल्द इस काल्पनिक मकड़जाले के उलझाव से स्वयं को मुक्त कर लेना चाहिए और परिस्थितियों से तालमेल बिठा कर मन का वजन हलका करना चाहिए। ऐसा नहीं करने और अंतरात्मा को दिन-दिन दुर्बल बनाते जाने से तो शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों ही बल नष्ट होते हैं। इस प्रकार की धीमी आत्महत्या की स्थिति से बच निकलना बुद्धिमानी है, भले ही उसमें कुछ बड़ा जोखिम उठाना पड़े, ऐसा करने से नहीं हिचकना चाहिए। घुटन यदि आत्मप्रताड़ना की है, तो किसी विश्वस्त बंधु के आगे जी खोल कर रख देना चाहिए, किंतु वह यदि किसी पूर्व पाप का दंड स्वरूप है, तो आगे से ऐसा पाप नहीं करने का प्रण करना चाहिए। मनोवेदना से बचने के यही सरल समाधान हैं इन्हें ही अपनाना और आजमाया जाना चाहिए।


वृत्तियों का परिमार्जन, व्यक्तित्व का उदात्तीकरण

स्वच्छ दीखने के दो तरीके हैं-अस्वच्छता को ढक देना या उसे साफ कर देना। आवरण चढ़ाने से अंतर इतना ही आयेगा कि निहित गंदगी बाह्य दृष्टि से ओझल बनी रहेगी। इतने पर भी उसकी सत्ता अपने स्थान पर यथावत् रहती और मौका पाते ही, आवरण हटते ही अपना परिचय पूर्ववत् देने लगती है।

मनुष्य की यह आम आकाँक्षा होती है कि दूसरों की नजरों में सम्मानित दीखे और सुसंस्कृत कहलाये। इसके लिए एकमात्र तरीका यही है कि व्यक्तित्व का रूपांतरण हो और उसे इतना प्रमाणिक, प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय कि सौरभ बिखेरने वाले फलों की ओर जिस प्रकार भौंरे खिंचते चले आते हैं, वैसे ही लोगों की श्रद्धा और सहायता अनायास मिलती चले। यह किंचित कठिन प्रक्रिया है। इन दिनों लोग पुरुषार्थ प्रधान ऐसे कार्यों से प्रायः बचना चाहते और किसी ऐसे सरल संस्करण की तलाश में रहते हैं, जो आसान हो एवं सुविधाजनक भी, साथ ही देखने में भी ऐसा न लगे, जिससे जल्द ही उसके असल की नकल होने का अनुमान लगता हो। व्यक्तित्व के संदर्भ में ऐसा उपाय यही हो सकता है कि बुराई पर आकर्षक पर्दा डाल दिया जाय और सज्जन एवं सरल होने का प्रदर्शन किया जाय। ऐसे में कई बार व्यक्तित्व की पहचान में धोखा हो जाता है और बुरे के अच्छे होने का भ्रम होने लगता है।

मानवी व्यक्तित्व के तीन पक्ष हैं-भावना, विचारणा और व्यवहार। इनमें से व्यवहार शारीरिक प्रवृत्ति है, जबकि विचारणा मानसिक वृत्ति है। इन दोनों का संबंध स्नायु तंत्र से है, किंतु भाव-संस्कार का संबंध स्नायु संस्थान से नहीं होता, वह चेतना का विषय है, अतएव उसको परिष्कृत करने की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि जब ईर्ष्या, राग, द्वेष, घृणा आदि संवेगात्मक तत्वों के नियंत्रण की बात आती है, तो शरीर विज्ञानी और मनोविज्ञानी स्वयं को असहाय महसूस करने लगते और यह बता पाने में असमर्थ साबित होते हैं कि शरीर मन के किन हिस्सों द्वारा किस प्रकार इनका संचालन-उत्पादन होता है। अब तक मन के संबंध में काफी शोधें मनोविज्ञान क्षेत्र में हो चुकी हैं और मस्तिष्क के बारे में भी अगणित अनुसंधान शरीरशास्त्री कर चुके और कर रहे हैं, पर उक्त दोनों विधाओं के विशेषज्ञ यह सुनिश्चित कर पाने में एक प्रकार से विफल ही रहे हैं कि आखिर मन-मस्तिष्क में से कहाँ किस अंग में ठीक-ठीक इनकी अवस्थिति है? जबकि अध्यात्मवेत्ता इनका अवस्थान-स्थान भी बताते और उन्हें प्रभावित करने की पद्धति भी सुझाते हैं, कहते हैं उनका यदि उदात्तीकरण हो जाय, तो हर किसी के लिए ईर्ष्या को उत्फुल्लता में, राग को विराग में, द्वेष को सहयोग में और घृणा को प्रेम में बदल पाना संभव हो जायगा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि नियंत्रण की प्रणाली स्थूल शरीर के ज्ञान-तंतुओं की क्रियाओं तक ही है, सीमित हैं। इसके आगे जो कुछ होता है, वह प्राकृतिक और संस्कारगत है एवं चेतना से संबद्ध है। इसका उदात्तीकरण अथवा शोध नहीं हो सकता है, रूपांतरण का इसके लिए अन्य कोई दूसरा तरीका नहीं। इस प्रकार नियंत्रण और रूपांतरण-बदलाव की यह दो पद्धतियाँ है। हम इन दोनों को भली-भाँति समझें और एक से स्थान पर दूसरे को प्रयुक्त न करें। दोनों की अपनी-अपनी सीमाएँ है। नियंत्रण के क्षेत्र में शोधन को न लायें और शोधन की जगह नियंत्रण का प्रयोग न करें। यह यदि सही-सही संपन्न हुआ, तो फिर शोधन के उपराँत नियंत्रण की आवश्यकता नहीं रह जायगी इतना सुनिश्चित है।

देखा गया है कि व्यक्ति व्यावहारिक जीवन में स्वयं को बदलना चाहता है, बुराइयों को त्यागना चाहता है, आदतों को परिवर्तित करना चाहता है, बुराइयों को छोड़ना चाहता है, वासनाओं को त्यागना चाहता है, किंतु लाख कोशिशों के बावजूद उसे असफलता ही हाथ लगती है। तात्कालिक सफलता तो इसमें मिलती देखी गई है, पर वह चिरस्थाई नहीं होती। कारण की तलाश करने पर यही ज्ञात होता है कि जो प्रयास किये गये, वह कायिक अथवा मानसिक स्तर के उथली परत मात्र के थे इस स्तर पर मात्र नियंत्रण ही संभव है, रूपांतरण नहीं। जहाँ नियंत्रण होगा, वहाँ उसके हटने-घटने की संभावना भी बनी रहेगी। ऐसी स्थिति में दुष्प्रवृत्तियों को बार-बार सिर उठाने का अवसर मिलता रहता है। इसलिए सुधार-संशोधन संबंधी नियंत्रण की पद्धति अपूर्ण एवं अधूरी है। इसकी तुलना में यदि उदात्तीकरण को अपनाया गया, तो इससे संपूर्ण एवं चिरकालिक रूपांतरण होता तथा समस्या का स्थायी समाधान मिलता। कारण कि हमारी अधिकांश प्रवृत्तियों का संबंध संस्कार-चेतना से है। जब उसका परिमार्जन किया जाता है, तो उससे संबंधित समस्त चेष्टाओं का उदात्तीकरण हो जाता है। शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान इतनी गहराई में उतर कर वास्तविक निमित्त को नहीं समझ पाने के कारण ही बार-बार विफल रहते देखे जाते हैं।

काय शास्त्र के बारे में शरीर वेत्ता स्खलन को रोक लेना ही सर्वोपरि मानते और उतने से ही ब्रह्मचर्य की अखंडता स्वीकार लेते हैं। मनः शास्त्री उस पर दमन के द्वारा विजय प्राप्त करने की बात कहते हैं। ज्ञातव्य है कि कुचलने का यह तरीका हर जगह सफल नहीं होता। ‘काम’ स्वयं में एक प्रचंड ऊर्जा है। शक्तिशाली ऊर्जा को बहुत समय तक दमित-नियंत्रित नहीं किया जा सकता। यदि किया गया, तो ऐसी विस्फोटक स्थिति पैदा होगी, जो व्यक्ति को सनकी, उन्मादी, पागल स्तर का बना देगी। इसलिए उस ऊर्जा का रूपांतरण होना चाहिए। यह रूपांतरण किस प्रकार का, कैसा हो? मनोवेत्ता यह बता पाने में नाकामयाब रहे, जबकि अध्यात्मवादियों के पास इसका सुनिश्चित उत्तर है। उनका कहना है कि यदि इस वासना के आवेग को सात्विक भावना में, ईश्वरीय अनुराग में बदल दिया गया, तो फिर ‘काम’ के सताने का सवाल ही पैदा नहीं होगा। इसके अतिरिक्त मनोविज्ञानियों के काम-दमन का प्रतिवाद करते हुए वे कहते हैं। कि इस रीति से मन प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप से बराबर उस ओर ही लगा रहता है और जिसका अनवरत स्मरण हो रहा हो, उस ओर से मन भला कैसे हट सकता है? निश्चय ही इस नियंत्रण के माध्यम से काम-विकास का उद्दीपन ही होता रहता है। इस सूक्ष्म शास्त्र को न समझ पाने के कारण ही मनोविज्ञान का यह सूत्र कारगर न हो सका। अध्यात्म में इसकी दिशा मोड़ कर ईश्वरोन्मुख कर दिया जाता है। इसलिए सामान्यजन में जो ऊर्जा काम-विकार उत्पन्न करने में खर्च होती रहती है, वही शक्ति भगवद्परायण व्यक्ति में स्वतः ही रूपांतरित होकर उच्चस्तरीय बनती रहती है, अतएव वहाँ वासना के सताने की बात तो दूर उसकी स्मृति तक नहीं उभरती। यही वास्तविक रूपांतरण है।

उदात्तीकरण और नियंत्रण के बीच उपरोक्त अंतर और उनकी सीमाओं को समझ लेने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि शारीरिक स्तर पर जो हमारी चेष्टाएँ और क्रियाएँ होती हैं तथा मानसिक स्तर पर जैसा हमारा चिंतन होता है, वह सब विशुद्धतः उन्हीं-उन्हीं स्तरों से संबंधित होते हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनका न्यूनाधिक लगाव भाव-संस्थान की संस्कार-चेतना से भी होता है। इसलिए मानवी चेष्टाओं को शुद्ध करने की जहाँ बात आती है, वहाँ उसके चित्तगत संस्कारों को भी ध्यान में रखना होगा? कारण कि मनुष्य 84 लाख योनियों की लंबी यात्रा के उपराँत यह शरीर धारण करता है, इसलिए चित्त में उनके भी सूक्ष्म संस्कार विद्यमान रहते हैं। इस आधार पर व्यक्तित्व भेद की व्याख्या भी अत्यंत सरल हो जाती है और यह बताया जा सकना शक्य हो जाता है कि यदि किसी में क्रोध, किसी में घृणा, किसी में प्रेम तत्व प्रबल है, तो ऐसा क्यों है? मनोविज्ञान की इस संबंध में जो व्याख्याएँ हैं, वह अत्यधिक दुरूह हैं और अधूरी भी, क्योंकि व्यवहार की व्याख्या वहाँ परिस्थिति के आधार पर की जाती है। यदि किसी व्यक्ति में घृणा की अधिकता है, तो इस बारे में उसका कहना है कि चूँकि उसे ऐसे किसी वातावरण में रहना पड़ा हो, जहाँ, तिरस्कार, अपमान, घृणा बड़े पैमाने पर मिला हो, अथवा बचपन में माता-पिता, भाई-बहन से फटकार मिलती रही हो, तो इसका परिणाम उसमें घृणा की उत्पत्ति के रूप में सामने आ सकता है। प्रेम, भय, क्रोध जैसी मानवी प्रवृत्तियों की व्याख्या, व्यवहार मनोविज्ञानी इसी प्रकार करते और कहते हैं कि परिस्थिति और समाज से वह जैसा कुछ सीखता है, वैसा ही बनता और विकसित होता चला जाता है। चूँकि व्यक्ति को समाज में पग-पग पर इन मनोवैज्ञानिक तत्वों से पाला पड़ता है, अतः उसमें ये सभी तत्व विकसित हो जाते हैं। घृणा-प्रेम के संदर्भ में व्यवहार मनोविज्ञान का यही निष्कर्ष है। इसके आगे उसके पास और कोई समाधान नहीं, किंतु मानवी व्यवहार इतना सरल कहाँ? वह इतनी जटिलताओं से भरा हुआ है कि केवल परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में उसकी न तो व्याख्या हो सकती है, न हल हो सकता है, किंतु यदि उसे हम क्रमशः व्यवहार जगत से विचार जगत, विचार जगत से भाव और संस्कार जगत तक ले जायँ, ओर चिंतन करें कि ऐसा व्यवहार हुआ, तो इसका कारण क्या हे? तो अंततः हम संस्कार जगत के उस मूल बिंदु पर पहुँचेंगे, जहाँ आकर मानवी आचरण को एक परिभाषा, सर्वांगपूर्ण व्याख्या तथा सर्वांगपूर्ण समाधान मिल जाता है। जब व्यवहार का उद्गम ज्ञात हो जाय, तो आदतों को बदल पाना सरल हो जाता है।

वस्तुतः हम जो कुछ भीतर हैं, वही बाहर अभिव्यक्त करते रहते हैं। हमारी संस्कार-चेतना शुद्ध अथवा मलिन जैसी होती है, आदतों के द्वारा, आचरण के द्वारा वह उन्हीं रूपों में प्रकट और प्रत्यक्ष होती रहती है। इसी से स्वभाव का निर्माण होता है। प्रकृति यदि हेय और निम्नस्तरीय है, तो इसके लिए भी अंतराल की वह भूमि ही जिम्मेदार है, और वह यदि उच्चस्तरीय है, तो उसका भी निमित्त वही है। व्यक्तित्व का सारा ढाँचा उसी निर्मित है, अतः व्यक्तित्व को बदलने के लिए उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए हमें उसी संस्थान को परिमार्जित और परिष्कृत करना होगा। इसके लिए एकमात्र उपचार आध्यात्मिक ही है। जप, तप, व्रत, उपवास, ध्यान आदि कुछ ऐसे साधन हैं, जिनका यदि नियमित अभ्यास किया जात रहे, ते यह उस अपरिष्कृत आँतरिक भूमि पर सुनिश्चित असर डालते और गंदगी को आवृत्त करने की बजाय निकाल-बाहर करते हैं। आचरण संबंधी अस्वच्छता को दबाने की तुलना में मिटाना ही उत्तम होगा। रूपांतरण ओर उदात्तीकरण का यही एकमात्र आधार है। व्यक्तित्व संपन्न इसी के द्वारा बना जा सकता है। अपनाया इसे ही जाना चाहिए।


आत्मविश्वास बढ़ाने की एकमात्र कुँजी

आत्मविश्वास से बढ़कर सुनिश्चित परिणाम और किसी का नहीं हो सकता। अपने ऊपर-अपनी सामर्थ्य पर यदि भरोसा किया जाय और यह माना जाय कि कई अभावों, कठिनाइयों के रहते हुए भी अपने में इतनी सामर्थ्य विद्यमान है कि किसी भी दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है और किसी भी झंझट से जूझा जा सकता है। अपनी सामर्थ्य स्वल्प मानने से, अपनी क्षमता पर विश्वास मानने से, अपनी क्षमता पर विश्वास न करने के कारण ही हम दूसरों की दृष्टि में दुर्बल और असमर्थ सिद्ध होते हैं।

अपनी क्षमता पर-अपनी प्रमाणिकता पर -अविश्वास करना उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं से वंचित रहना है। अपने ऊपर भरोसा न करने से न आत्मबल विकसित होगा न मनोबल बढ़ेगा। मनस्वी और तेजस्वी व्यक्ति वे होते हैं जिनका आत्म-विश्वास बढ़ा-चढ़ा होता है।

कठिन प्रसंगों पर आत्म-विश्वास जितना सहायक होते हैं जिनका आत्म-विश्वास बढ़ा-चढ़ा होता है।

कठिन प्रसंगों पर आत्म विश्वास जितना सहायक होता है उतना और कोई नहीं। संसार के पराक्रमी व्यक्तियों का इतास वस्तुतः उनके मनोबल की-आत्मविश्वास की गरिमा ही सिद्ध करता है। सफलता उचित मूल्य चुकाये बिना किसी को नहीं मिली। अपने ऊपर भरोसा न करने वाले लोग यह सोचते हैं। सफलता उचित मूल्य चुकाये बिना किसी को नहीं मिली। अपने ऊपर भरोसा न करने वाले लोग यह सोचते हैं हम इतना बोझ कैसे उठा सकेंगे? आदि निषेधात्मक आत्म-हीनता भरे विचार मनुष्य की आधी शक्ति नष्ट कर देते हैं और कल्पित आशंका प्रगति की ओर बढ़ने का नहीं देती सफलता मिले भी तो कैसे?

कहते हैं, कि “विपत्ति अकेली नहीं आती, वह अपने साथ और भी अनेकों मुसीबतें लिए आती है। ” कारण स्पष्ट है कि प्रतिकूलता से घबराया हुआ मनुष्य यह सोच नहीं पाता कि अब उसे क्या करना चाहिए। साधारण कठिनाइयों से पार होने में ही काफी धैर्य सूझ-बूझ और दूरदर्शिता की आवश्यकता पड़ती है, फिर कुछ अधिक परेशानी सही मानसिक संतुलन अभीष्ट होता है। यह न रहे तो विपत्ति की नई शाखाएं फूट पड़ती हैं और कठिनाई का नया दौर आरंभ हो जाता है। जब कभी ठंडे मस्तिष्क से विचार करने का अवसर आता है तब मनुष्य पछताता है और सोचता है कि आगत विपत्ति नहीं टल सकती थी तो कोई बात न थी। अपने मानसिक संतुलन को तो विवेक द्वारा बचाया ही जा सकता था और जो परेशानियां अपनी भूलों के कारण सिरपर ओढ़ली गईं उनसे तो बचा ही जा सकता था।

इस संसार में सभी कुछ है। अच्छाई भी बुराई भी। बुरे आदमियों में से अच्छाई भी बुराई भी। बुरे आदमियों में से अच्छाई ढूँढ़ें, आपत्तियों से जो शिक्षा मिलती है उसे कठोर अध्यापक द्वारा कान ऐंठकर सुनें और समझें। “अच्छा देखो और प्रसन्न रहो” का मंत्र हमें भली प्रकार जपना और हृदयंगम करना चाहिए।

स्वभाव में प्रसन्नता को सम्मिलित कर लेने में जीवन की बहुत बड़ी सार्थकता और सफलता सन्निहित है। मुँह लटकाये रहने की, रूठने की, भवें तरेरे रहने की आदत छोड़ देनी चाहिए। हँसते और मुसकराते रहने वाले का आधा डर तो अपने आप ही चला जाता है और आधे डर को वह अपने पुरुषार्थ तथा स्वजनों के सहयोग से दूर कर लेता है जो प्रसन्न मुख करने के कारण अनायास ही मित्रता करने लगे थे। प्रसन्नता, मित्र बढ़ाने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। जो हँसता है उसकी हँसी में सम्मिलित रहने के लिए दसियों व्यक्ति लालायित रहते हैं। पर जो साँप की तरह मुँह फुलाये बैठा रहता है और व्यंग बाणों की, कटुवचनों की फुंसकार ही छोड़ता रहता है उसके समीप जाने की हिम्मत कौन करेगा? कहते हैं कि मनहूसियत से बढ़कर दैवी प्रकोप कोई और नहीं हो सकता।

साधारणतः लोग अपने बारे में कुछ ठीक विश्लेषण नहीं कर पाते। इसके लिए वे दूसरों की संपत्ति पर अवलंबित रहते हैं। जब दूसरे लोग अपनी प्रशंसा कार्य कर रहे है। पर जब औरों के मुँह से अपनी निंदा, करने वाले के प्रति कृतज्ञता इसलिए मन में उठती है क्यों कि उसने हमारे सद्गुणों की चर्चा करके मानसिक उत्थान में भारी योग दिया है। वह हमें मित्र और प्रिय लगता है। पर जो अपनी निंदा करते हैं वे शत्रु दीखते हैं, बुरे लगते हैं, क्योंकि उनने अपना बुरा पहलू सामने प्रस्तुत करके मन में निराशा और खिन्नता उत्पन्न की दी।

आत्म-निरीक्षण की दृष्टि से अपने दोष, दुर्गुणों को ढूंढ़ना उचित है। किन्हीं घनिष्ठ मित्र को एकाँत में उनकी अनुपयुक्त गतिविधियों को सुधारने के लिए परामर्श देना भी उचित है। ऐसा करते समय हर हालत में यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि व्यक्तित्व का निराशात्मक चित्रण न किया जाय। किसी को भी लगातार खराब, अयोग्य, पापी, दुर्गुणी, दुष्ट, मूर्ख कहा जाता रहेगा तो उसका अंतर्मन धीरे-धीरे उन कहे जाने वाली बातों को सत्य स्वीकार करने लगेगा। यदि यह मान लिया जाय कि हम वस्तुतः अयोग्य हैं, बुरे हैं तो फिर मनोभूमि ऐसी ढलने लग जायगी कि जिसमें वह दोष, दुर्गुण स्वतः पैदा हो जायँ। ऐसी स्थिति में हिम्मत टूट जाती है, निराशा घेर लेती है, और कोई काम करते हुए मन भीतर ही भीतर सकपकाता रहता है कि कहीं काम बिगड़ न जाय और मूर्ख न बनना पड़े। इस सकपकाहट में हाथ पैर फूल जाते हैं और बने काम भी बिगड़ने लगते हैं। सदैव घबराहट मन में रहती है तथा असफलता हाथ लगने लगती, जिसका दोषारोपण भाग्य पर दिया जाने लगता है।

वस्तुतः ऐसा नहीं है। विचारों को काट द्वारा अपने विचार भी बदले जा सकते हैं। हमें अपना चिंतन बदलने के अतिरिक्त अपने सभी स्वजन संबंधियों की, परिचित-अपरिचितों की सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते रहना चाहिए। ढूँढ़ने पर हर किसी में कुछ गुण मिलते हैं, अच्छाइयों से रहित इस धरती पर कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ। जिसमें जो सद्गुण दीख पड़ें उनकी चर्चा उस व्यक्ति के सामने की जाय कि वह इन गुणों को बढ़ाते हुए एक दिन बहुत उन्नतिशील बन सकता है, तो निश्चय ही इस प्रशंसा का प्रभाव उस पर पड़े बिना न रहेगा। प्रशंसक बनकर हम हर व्यक्ति के मित्र बन सकते हैं। उसे समझाने और सुधारने में भी सफल हो सकते हैं। पर यदि निंदा और भर्त्सना करना ही हमने सीखा है तो सब कोई अपने शत्रु बन जायेंगे और अपनी सीख को भी दुर्भावना मानकर उसके प्रतिकूल आचरण करेंगे सृजनात्मक चिंतन के अतिरिक्त सृजनात्मक श्रमशीलता भी इसलिये जरूरी है कि वह कभी ठाली मन में गलत निषेधात्मक विचार नहीं आने देती।

बुढ़ापे या थकान का बहाना लेकर काम से जी चुराना एक बुरी और भोंड़ी आदत है। बुढ़ापे में कठोर काम करने में बेशक कठिनाई होती है पर हलके काम तो मरते दम तक करते रहा जा सकता है। गाँधी जी की मृत्यु 79 वर्ष की आयु में हुई वे दिन दिनों भी पूरे समय काम करते थे। बिनोवा की आयु 80 वर्ष की थी, वे अंत तक देश के कोने-कोने में नैतिक क्राँति का संदेश लिए घूमते रहे। राजगोपालाचार्य 80 वर्ष की आयु में भी कांग्रेस को पलटाने का हौंसला दिखाते रहे। पण्डित नेहरू 72 वर्ष की आयु में नौजवानों की तरह अठारह घंटा काम किया करते थे। संसार में में सभी विचारशील व्यक्ति जिन्हें जीवन का मूल्य और महत्व मालूम है बिना जवानी-बुढ़ापे का ख्याल किये निरंतर कार्य में संलग्न रहे हैं। श्रम किस प्रकार का हो यह शारीरिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए बदला जा सकता है पर नियमित रूप से कुछ उपयोगी काम तो मरते समय तक करते ही रहना चाहिए। खाली बैठने-बेकारी से बड़ी विपत्ति दूसरी नहीं है। यह सोचना निताँत मूर्खता है कि जो बैठे रहते हैं, जिनके दिन आराम से कटते हैं, वे भाग्यवान हैं। वस्तुतः उन्हें अभागे ही कहना चाहिए क्योंकि समय और सामर्थ्य रहते हुए भी वे श्रम जैसे मित्र का तिरस्कार करके जीवन के बहुमूल्य क्षणों को व्यर्थ गँवा रहे हैं, उनका कोई भी लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। आमतौर से हमें जितना काम करना पड़ता है यदि उसे उत्साहपूर्वक करें तो हमें कभी भी निषेधात्मक चिंतन का शिकार न होना पड़े।

एक बढ़ई किसी मजिस्ट्रेट की मेज को बहुत अधिक सावधानी से तैयार कर रहा था। किसी ने पूछा कि तुम इस इतने परिश्रम से क्यों बना रहे हो? बढ़ई ने इस प्रकार उत्तर दिया कि “जब मैं मजिस्ट्रेट होकर इस मेज पर बैठ कर काम करूं तो मुझे यह सुन्दर लगे। ” कुछ वर्ष बाद वह वास्तव में मजिस्ट्रेट बनकर उस मेज पर बैठा।

अमरीका के महान जन-सेवक गैरीसन ने अन्यायी रूढ़ियों का उच्छेद करने के लिये जब ‘लिबरेटर’ नाम का सामयिक पत्र प्रकाशित किया तो उसके प्रथम अंक में ही उसने लिखा था-”सच्चे दिल से मैं यह कार्य कर रहा हूँ। मेरे हृदय में किसी प्रकार की शंका नहीं है। मैं कभी किसी प्रकार का बहाना करके एक इंच भी पीछे नहीं हटूँगा और मेरी बात को सब कोई सुनेंगे। ” ऐसी अचल निष्ठा से गैरीसन का चरित्र विकसित हुआ था। इतना ही नहीं लिंकन, ग्राँट आदि जो बहुसंख्यक महान आत्मायें प्रतिष्ठा की रक्षा करते हुये वीरगति का प्राप्त हुई वे भी ऐसे ही दृढ़ निश्चय वाली थीं। इस प्रकार की इच्छा शक्ति होना वास्तव में महत्व की बात है। यही सफल जीवन की कुँजी भी है।

एक चिंतक का कथन है कि “जगत में तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं ‘जगत में तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं ‘करूंगा’ ‘नहीं करूंगा’ और ‘कर नहीं सकता। ” पहली प्रकार के सब कामों को पूरा कर डालते हैं, दूसरी प्रकार वालों को सब बातों का उलटा फल मिलता है और तीसरी प्रकार के सदैव असफल होते हैं। आत्म-श्रद्धा में आत्मविश्वास में इतना बल है कि जो कार्य असंभव जान पड़ता है। उसको भी करने का जो दृढ़ निश्चय कर लेता है तो वह कार्य उसके जीवन में कभी न कभी पूरा हो ही जाता है। हम अपने ऊपर भरोसा करें और नई सूझ-बूझ हर क्षण पैदा करते रहें नयी स्फूर्ति का उन्नयन होता देखें। आत्म विश्वास का सत्परिणाम असंदिग्ध है। जो अपने ऊपर भरोसा करता है सारी दुनिया उस पर भरोसा करती है।


जीवित रहने की इच्छा (Kahani)

डगलस जेरन्ड को डाक्टरों ने बताया कि ‘तुम जीवित नहीं रह सकते वह बोला’-”क्या मैं निराधार बालकों को ऐसे ही छोड़ जाऊँगा? नहीं, मर सकता। इसके बाद वह बहुत वर्षों तक जीवित रहा। इसी प्रकार ‘सेनेका’ बहुत समय तक रोग शय्या पर पड़े रहने के पश्चात् उठकर खड़ा हो गया। उसने कहा कि मेरे मरने की बात को मेरा पिता सहन नहीं कर सकता था, इस भावना से मैंने जीवित रहने का निश्चय किया और प्राणघातक व्याधि को हटा देने में समर्थ हुआ।


क्या सचमुच ईसा कभी भारत आए थे?

आदिकाल से ही देवभूमि भारत विशेषकर देवात्मा हिमालय ऋषि, मुनियों, योगियों एवं अवतारी महापुरुषों की तपस्थली रहा है। भगीरथ से लेकर पाण्डवों तक की कठिन तपस्यायें तथा उनके स्वर्गारोहण की कहानी यहीं संपन्न हुई थी। वेद व्यास से लेकर आचार्य शंकर ने इसी हिमालय की गोद में बैठकर ज्ञान-साधना की थी। गुरुनानक, कबीर, समर्थ गुरु रामदास, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ आदि महामानवों ने सनातन धर्म को विश्वव्यापी बनाने की विचारणा तपोभूमि हिमालय की गोद में बैठकर ही बनाई थी। अशोक, चन्द्रगुप्त, कालीदास, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गाँधी, दयानंद, राजाराम-मोहनराय, , देशबंधु चितरंजन दास आदि महापुरुषों ने भी इस तुषार मंडित हिमक्षेत्र में यहीं न कहीं अपना आसन जमाया था। राम, कृष्ण बुद्ध, महावीर, ईसा जैसे अवतारी महापुरुषों ने देवात्मा हिमालय में ही कभी तपस्या की थी और समस्त संसार का मार्गदर्शन किया था।

हजरत ईसा के बारे में भी ऐसे अनेकों प्रमाण विद्यमान हैं कि उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग ‘धरती का स्वर्ग’ कहे जाने वाले हिमालय की घाटी-कश्मीर में व्यतीत किया और तपस्यारत रहते हुए यहीं से स्वर्गारोहण किया।

भविष्य पुराण के प्रति सर्ग पर्व-द्वितीय-अध्याय के श्लोक 17 से 32 तक ऐसा ही उल्लेख है जिसमें ईसा मसीह के लंबे समय तक भारत के उत्तराखंड में निवास करने और तपस्यारत रहने का वर्णन है। उस समय उत्तरी भारत में शालिवाहन का शासन था। एक दिन वे हिमालय गये जहाँ लद्दाख की ऊँची पहाड़ियों पर उन्होंने एक गौरवर्ण दिव्य पुरुष को ध्यानमग्न स्थिति में तपस्या करते हुये देखा। समीप जाकर उन्होंने उनसे पूछा- आपका नाम क्या है और आप कहाँ से आये हैं? उस दिव्य पुरुष ने उत्तर दिया-”मेरा नाम ईसा मसीह है। कुँवारी माँ के गर्भ से उत्पन्न हुआ हूँ। आस्थाहीनों में आस्था तथा आशा का संचार करने वाला तथा निरंतर सत्य की खोज में रत ईश्वर का पुत्र हूँ। आस्थाहीनों में आस्था तथा आशा का संचार करने वाला तथा निरंतर सत्य की खोज में रत ईश्वर का पुत्र हूँ और विदेश से आया हूँ जहाँ बुराइयों का अंत नहीं है। उन आस्थाहीनों के बीच मैं मसीहा के रूप प्रकट हुआ हूँ। जैसे कि “म्लेच्छदेषे मसीहोऽहं समागत ॥ 25॥........ईसा मसीह इति च ममनाम प्रतिश्ठितम्॥ 31 ॥ इस श्लोक से स्पष्ट है। इस तरह ईसा ने अपने जीवन के उद्देश्य, आविर्भाव एवं इजराइल से भारत आगमन का विवरण दिया।

इस संदर्भ में आधुनिक खोजकर्ताओं ने जो तथ्यपूर्ण प्रमाणिक विवरण खोज निकाले हैं उन से भी उक्त पौराणिक कथन की पुष्टि होती है। म्यूनिख-जर्मनी के सुविख्यात धर्मशास्त्री रोबर्ट क्लाइट ने अपना संपूर्ण जीवन ईसाई धर्म के अनुसंधान में व्यतीत किया है। उनके अनुसार बाइबिल के न्यू टेस्टामेण्ट में ईसा के जीवन का जो वृत्ताँत मिलता है उसमें ईसा के 13 से 30 वर्ष की अवस्था का वर्णन रिक्त है। 30 वर्ष की उम्र में जब उन्होंने संत जॉन द्वारा बपतिस्मा ग्रहण किया तभी से उल्लेख मिलता है। लूका 2/52 में उनकी बौद्धिक क्षमता एवं महानता का यहीं से वर्णन मिलता है। इसी अध्याय में ईसा और उनकी माता मरियम का एक संवाद आता है ईसा कहीं गायब हो गये थे और तीस वर्ष तक उनका कुछ पता न लगा। क्लाइट के अनुसार 13 वर्ष की अवस्था में वे भारत आ गये थे तथा ब्राह्मण और बौद्धों से धार्मिक ज्ञान प्राप्त किया। ईसा पद वेद एवं उपनिषद् की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। यही कारण है कि जब वे भारत में संव्याप्त वर्ण व्यवस्था पर प्रहार करने लगे तो ब्राह्मणों-पुरोहितों से उनका मतभेद हो गया। वे वहाँ से चल कर हिमालय के उत्तरी भाग नेपाल आ गये और वहीं उन्होंने बौद्ध-दर्शन का अध्ययन किया और तंत्र साधनायें सीखीं 30 वर्ष तक वह यहीं रहे, तत्पश्चात् वापस इजराइल लौट गये और वहाँ अपनी शिक्षाओं का प्रचार शुरू किया। जिसे बाद में उनके शिष्यों-मैथ्यू, मार्क, ल्यूक और जॉन ने लिपिबद्ध किया जो ‘न्यू टेस्टामेण्ट’ में वर्णित है।

दसवीं शताब्दी के प्रख्यात इतिहासवेत्ता शैक-अल-सईद-अस सादिक ने अपनी ऐतिहासिक कृति “इकमाल-उद्दीन” में लिखा है कि ईसामसीह ने दो बार भारत की यात्रा की। पहली बार वे 12-13 वर्ष की उम्र में भारत आये थे और लगी 18 वर्ष रहे। दूसरी बार सूली पर चढ़ाये जाने और तत्पश्चात् पुनर्जीवित होने के बाद वे युजआशफ के नाम से लंबे समय तक कश्मीर में रहे थे और वहीं पर शरीर त्यागा था। उनकी यह पुस्तक दुबारा ईरान से प्रकाशित हुई थी। विश्वविख्यात मनीषी मैसमूलर ने भी “इकमाल-उद्-दीन” नामक इस पुस्तक का जर्मन भाषा में अनुवाद किया और उसे प्रकाशित कराया था।

कश्मीर के सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता प्रोफेसर फिदाहुसैन ने इस संबंध में गहन खोजबीन की है। अपनी पुस्तक “फिफ्थ गाँस्पल” में उन्होंने लिखा है कि बचपन में जब प्रथम बार ईसा भारत आये थे तब यहाँ के हिन्दू तथा बौद्धधर्म का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया था और उनसे संबंधित तीर्थ स्थलों की यात्रायें की थीं, साथ ही लद्दाख एवं कश्मीर की घाटी में कठोर साधनायें की थीं। इस समय उत्तरी भारत में राजा शालिवाहन का राज्य था। फिलिस्तीन (इजराइल) की दुखद घटनाओं के कारण दुबारा जब वे भारत आये तब यहीं कश्मीर में बस गये और मृत्युपर्यंत यहीं रहे। अपनी उक्त कृति में हुसैन ने ईसा के कश्मीर में बस गये और मृत्युपर्यंत यहीं रहे। अपनी उक्त कृति में हुसैन ने ईसा के कश्मीर आने, नाम बदल कर मृत्युपर्यंत ठहरने तथा उनके मकबरे आदि के बारे में विस्तारपूर्वक लिखा है। इसी तरह सुप्रसिद्ध पादरी एलिजाबेथ कलार ने अपने ग्रंथ में लिखा है कि ईसा भारत आये थे और तिब्बत में रहकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया और तंत्र साधनायें सीखीं। एक अन्य पाश्चात्य विद्वान ब्रायन एलबर्न ने अनेकों प्रमाण प्रस्तुत करते हुए बताया है कि ईसा ने कश्मीर में रहकर आयुर्वेद का उदाहरण देते हुए उनने लिखा है कि उस पुस्तक में ईसा के भारत आने, एवं हिमालय में तप साधना करने का स्पष्ट उल्लेख है।

“द अननोन लाईफ आफ दी जीसस क्राइस्ट” नामक अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति में रूस के ख्याति प्राप्त इतिहासवेत्ता निकोलाय अलेक्साँद्रोविच नोताविच ने ईसा के भारत-आगमन, यहाँ के विभिन्न स्थानों के भ्रमण तथा हिमालय में तप एवं ज्ञान संबंधी ऐतिहासिक तथ्यों की प्रमाणिक जानकारी दी है। उन्होंने लगातार चालीस वर्षों तक खोज करके उन प्रमाणों को संकलित किया है जो ईसा-मसीह के अज्ञातवास के दिनों का विवरण प्रस्तुत करते हैं। सन् 1887 में अपने भारत यात्रा के समय उन्होंने लद्दाख एवं तिब्बत की राजधानी ल्हासा की यात्रा की। ल्हासा के सबसे बड़े बौद्ध मठ-’हेमिस’ में उन्हें ताड़ पत्र पर पाली भाषा में लिपिबद्ध प्राचीन दुर्लभ ग्रंथ पढ़ने को मिले। दुभाषियों की सहायता से उन्होंने उन पुस्तकों का अध्ययन किया और पाया कि वह ईसा के जीवन से संबंधित हैं। उनमें उल्लेख है कि सुदूर देश इजराइल में ईसा नाम एक दिव्य बच्चे का जन्म हुआ। 13-14 वर्ष की उम्र में वह कुछ व्यापारियों के साथ भारत के सिंध प्राँत में पहुँचा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने की बुद्ध की शिक्षाओं का अध्ययन करता रहा। इसके बाद उसने पाँच नदियों के प्राँत-पंजाब की यात्रा की और कुछ दिन वहाँ जैन संतों के साथ व्यतीत किया। तदुपराँत वह जगन्नाथपुरी पहुँचे, जहाँ पुरोहितों ने उनका भव्य स्वागत किया। वहीं रहकर ईसा ने वेद-उपनिषद् और मनुस्मृति का अध्ययन किया और अपनी भाषा में उनका अनुवाद किया और वहीं पिछड़ी जातियों एवं शूद्रों का प्रशिक्षण करने लगे। इस पर उन्हें उन पुरोहितों का कोप भाजन बनना पड़ा जो यह समझते थे कि उनकी स्थिति और शक्ति का अतिक्रमण किया जा रहा है। 6 वर्ष जगन्नाथपुरी में व्यतीत करने के बाद वे राजगीरी, बनारस तथा अन्य कई पवित्र तीर्थ स्थलों का भ्रमण करते हुए हिमालय चले गये। नेपाल में वह 6 वर्ष तक रहे अंत में कई देशों की यात्रा करते हुए जगह-जगह उपदेश देते हुए पश्चिम की ओर चले गये और अंततः एशिया होते हुए फिलिस्तीन-इजराइल पहुँच गये।

सन् 1922 में रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी अभेदानंद भी तिब्बत के उस ‘हेमिस मठ’ में गये थे जहाँ ईसा के जीवन वृत्तांत से संबंधित पाण्डुलिपियाँ रखी हुई हैं। उन्होंने उस विवरण का अनुवाद भी किया था जो बाद में बँगला भाषा में “कश्मीरी ओ-तिब्बती नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद रूस के सुप्रसिद्ध मनीषी निकोलस रोरिख ने सन् 1925 में तिब्बत की यात्रा की और हेमिस के मठ में रखी उन पाण्डु-लिपियों का अध्ययन किया जो ईसा के जीवन के अज्ञातवास से संबंधित है। अपने अध्ययन एवं खोज को उन्होंने ‘द हर्ट आफ एशिया’ नामक ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया। अमेरिकी विद्वान लेवी ने भी अपनी पुस्तक “दी एक्वैरियन गास्पल आफ जीसस क्रइस्ट” के छठे एवं सातवें भाग में ईसा मसीह की दो बार की भारत यात्रा का वर्णन किया है। इसमें ईसा द्वारा दुर्गम हिमालय के कुमाऊँ क्षेत्र से लेकर तिब्बत तक की यात्राओं का वर्णन है जहाँ उन्होंने ल्हासा के बौद्ध मंदिरों में रखे आध्यात्मिक गुरुओं की रचनाओं, पाण्डुलिपियों का अध्ययन किया इसके बाद में लाहौर होते हुए सिंध प्राप्त पहुँचे और वहाँ से 30 वर्ष की आयु में वापस फिलिस्तीन चले गये। डॉक्टर स्पेन्सर कृत “मिस्टीकल लाइफ आफ जीसस” में ऐसे अनेकों प्रमाणों का संकलन है जिसमें ईसा के भारत आने, वैदिक एवं बौद्ध साहित्य का अध्ययन करने, उच्चस्तरीय साधना सीखने, एवं हिमालय में तपस्या करने का उल्लेख है। ईसा की “सरमन आद दी माउण्ट” नामक धर्मनीति भी इस बात का परिचायक है कि उन्होंने हिन्दू और बौद्ध धर्मों का गहन अध्ययन किया था।


अपना व्यक्तित्व प्रभावशाली बनायें

वाँछनीय सफलता के लिए अपेक्षित गुणों में प्रभावशीलता एक बड़ा ही आवश्यक गुण है। इस गुणों में प्रभावशीलता एक बड़ ही आवश्यक गुण है। इस गुण के अभाव में अनेक साधन, सुविधायें होते हुए और शरीर आदि से पुष्ट होने पर भी मनुष्य, समाज में अपना वाँछित स्थान नहीं बना पाता। बहुत बार देखा जाता है कि कोई व्यक्ति धन के आधार पर किसी काम को बनाना चाहता है लेकिन व्यक्तित्व की प्रभावहीनता के कारण असफल रह जाता है। बहुत से पढ़े-लिखे लोग अप्रभावी व्यक्तित्व के कारण साक्षात्कार आदि परीक्षाओं में असफल हो जाते हैं और यदि किसी प्रकार वे कोई स्थान पा भी लेते हैं तो भी उनकी प्रभावहीनता आए दिन आड़े आती रहती है। संसार में सफलता पाने और सफल जीवन बिताने के लिए प्रभावशीलता की बहुत बड़ी आवश्यकता है। प्रभावहीन जीवन का अर्थ है अरुचिकर-बेमजा जिंदगी काटना।

सार्थक प्रभावशीलता न तो हृष्ट−पुष्ट शरीर से मिलती है न सुन्दर आकृति अथवा रूप-स्वरूप से और न धन-दौलत और साधन सुविधाओं से। इस प्रभावशीलता के आधार कुछ गुण और व्यवहार हुआ करते हैं जो मनुष्य के व्यक्तित्व और आचरण में चमकते रहते हैं। जो जब चाहे उन्हें पाया, सीखा और अपने अन्दर उपजाया भी सकता है। जो जब चाहे उन्हें थोड़ी सी सावधानी रखकर अपने अन्दर उत्पन्न कर सकता है उनमें से कुछ गुण इस प्रकार हैं।

पहला है-दूसरों उचित मूल्याँकन करना और उन्हें मान्यता देना, संसार में प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई अवश्य होती है। किसी का शतप्रतिशत बुरा होना असंभव है। प्रायः लोग करते यह है कि किसी व्यक्ति की बुराई की ओर ही देखना और उसी की ओर संकेत करते रहते हैं उसके प्रकट होने वाले गुण की उपेक्षा करे देते हैं। उसकी बुराइयों की विवेचना और चर्चा करने में तो गाड़ियों उत्साह दिखलाते हैं लेकिन उसके गुण के प्रति मृतक की तरह मौन और कृपण की तरह संकीर्ण रहते हैं। जब इंसाफ और ईमान की बात यह है कि जिस उत्साह से किसी की बुराई देखी और कही जाती है उसकी अच्छाई की अधिक नहीं तो कम से कम उतने ही उत्साह से चर्चा की जाये।

बुद्धिमान व्यक्तियों का सहज स्वभाव होता है कि वे किसी की बुराई की अपेक्षा अच्छाई पर अधिक दृष्टि रखते हैं। यथासंभव बुराई को अदृष्टिगोचर ही कर जाते हैं और यदि उसके प्रकाशन की आवश्यकता भी पड़ती है तो उसकी चर्चा निंदा के रूप में नहीं असावधानी के रूप में करते हैं। वह भी इस ढंग से कि पात्र पर उसका प्रतिक्रियात्मक नहीं सृजनात्मक प्रभाव पड़े। गुणों को आगे रखकर किसी के अवगुणों की की गई चर्चा व्यक्ति को सुधार की ओर प्रेरित करत है। इस प्रकार सुधरा हुआ व्यक्ति सब से पहले उस सज्जन व्यक्ति का ही भक्त बन जाता है। अपनी जीवन नीति में इस नियम का पालन करने वाले अपने व्यक्तित्व में प्रभावशीलता का अर्जन करते हैं दूसरा गुण है सार्वजनिक सद्भावना को अर्जित करना। यह मनुष्य की प्रभावशीलता बढ़ाने में बहुत सहायक होती है। प्रायः लोग सद्भावना का क्षेत्र अपने लोगों तक ही सीमित रखते हैं। ऐसे संकीर्ण सद्भावना वाले लोग परोक्ष रूप से स्वार्थी होते हैं। अपने को दी हुई सद्भावना लौट फिर कर अपने पास ही आ जाती है यह कोई विशेषता नहीं। विशेषता तो तब है अपनों के अतिरिक्त भी सद्भावना का अजनबियों को भी वितरित किया जाए और हो सके तो शत्रुओं और विरोधियों तक में।

सद्भावना का प्रतिपादन सद्भावना के रूप में मिलना स्वाभाविक है जो व्यक्ति इसको जितना व्यापक और विस्तृत बना लेता है वह उतनी ही अधिक सद्भावना पाता है। कोई अपनी सद्भावना देता तो अकेला ही बहुतों को है पर बदले में पाता बहुतों की सद्भावना है। इस प्रकार सद्भावना के इस आदान-प्रदान में सद्भावुक के बहुत लाभ में रहता है वह एक अकेला बहुतों का प्रिय पात्र बन जाता है ऐसे एक अकेले व्यक्ति को सैकड़ों हजारों हाथ उठाने में लग जाते हैं। इस प्रभाव से किसी का ऊँचे से ऊँचा उठ जाना स्वाभाविक ही है। जिसको बहुत से लोग चाहें और प्यार करें उसका प्रभाव एक बड़ी सीमा तक फैल जाता है उसका व्यक्तित्व चुम्बक की तरह आकर्षक और सोने की तरह चमक उठता है।

समाज में उदार व्यवहार मनुष्य की प्रभावशीलता को बड़ी सीमा तक क्या धनी और क्या निर्धन, उदार व्यक्ति की व्यवहार सबके साथ प्रेम, है। वह सब से मीठा बोलता है। सबका यथायोग्य सम्मान करता है किंतु उसका यह व्यवहार अपने स्वार्थ के लिये नहीं होता। वह उदारता सबको सुख पहुँचाने के लिए करता है। स्वार्थ प्रेरित उदार व्यवहार का पता लगते देर नहीं लगती है। उसको एक बच्चा तक पहचान लेता है। मिथ्या उदारता स्वार्थ सिद्ध की आशा न रहने से समाप्त हो जाती है। वह विमुखता, उपेक्षा और निरपेक्षता में बदल जाती हैं। मिथ्या उदारता के प्रकट होते ही उपार्जित प्रभाव तो नष्ट हो ही जाता है साथ ही पिछले और अगले प्रभाव को भी वह नष्ट कर देती है।

वास्तविकता उदारता में सेवा और सहानुभूति का भाव रहना अनिवार्य है। उदार व्यक्ति जहाँ किसी के साथ नम्रता प्रेम और शिष्टता का व्यवहार करता है वहाँ सेवा करने के लिए भी तत्पर रहता है। वह किसी की दुःख सहानुभूति ही नहीं दिखलाता बल्कि यथा संभव सेवा भी करता है। किसी रोगी से उदार व्यवहार करने का यथार्थ रूप है कि उसकी पीड़ा तो पूछी ही जाए साथ ही यदि उसे परिचर्या की आवश्यकता हो तो उसकी भी उपेक्षा न की जाए। हो सके तो उसे डाक्टर को दिखला दे, दवा ला दे, और आर्थिक सहायता भी करे। तात्पर्य यह कि रीती सहानुभूति और संवेदना के साथ जितनी सेवा और सक्रियता जोड़ दी जायेगी उदारता उतनी ही सार्थक और प्रभावशाली बन जाएगी। ऐसे उदार और आत्मीयपन को संसार में सभी लोग प्यार करने लगते हैं। जो अपनी सेवाओं द्वारा दूसरों का स्नेह और प्रेम लेगा उसके प्रभाव की कोई सीमा न रह जायेगी।

तीसरे गुण के रूप में प्रभावशीलता का एक सुन्दर आधार “सत्य” माना गया है। जो सत्यवादी हैं, समाज में सबके साथ सत्यपूर्ण व्यवहार करता है, जैसा वह अपने को प्रकट करता है वैसा ही अन्दर से भी होता है वह समाज का विश्वास और आस्था का पात्र बनता है। जरा-जरासी बात के लिए लोगों उससे अपना दुःख सुख और समस्याओं को कहते संकोच नहीं होता। उसको परामर्श और पथ-प्रदर्शन के लिये बुलाते हैं। अपने विवादों और झगड़ों में पंचायत करते हैं। और आदर पूर्वक उसका दिया हुआ निर्णय शिरोधार्य करते हैं। इतना ही क्यों यदि कभी विश्वास पर संकट आपदा आ जाती है तो बड़ी संख्या में लोग उसकी सहायता के लिये दौड़ पड़ते हैं और हाथों-हाथ उसका संकट दूर करने में अपनी सेवायें समर्पित करते हैं। यह प्रभावशीलता का बड़ा श्लाघ्य स्वरूप है। ऐसी प्रभावशीलता किसी सत्यवादी और सत्याचरण करने वाले विश्वास पात्र को ही प्राप्त होती है।

चौथा गुण हैं -दूसरों के सम्मान की रक्षा। यह भी समाज में प्रभावशीलता बढ़ाने का एक श्रेष्ठतम उपाय है। यह बात कुछ प्रकृति की ओर से ही निश्चित होती है कि संसार के सारे आदमियों में कुछ न कुछ अहंभाव रहता है। वह चाहे स्वाभिमान के रूप में हो या अभिमान के रूप में। लेकिन कुछ न कुछ अहंभाव होता जरूर है। गरीब हो चाहे अमीर निर्बल हो चाहे बलवान सबकी इच्छा रहती है कि उसका अपेक्षित आदर अवश्य किया जाए। यह बात सही है कि धनवानों और बलवानों में सराहना, प्रशंसा और चाटुकारिता पाने की दुर्बलता होती है। लेकिन सामान्य व्यक्ति में यदि यह दुर्बलता नहीं होती तो भी वह यह तो चाहता ही है कि उसके साथ किया जाने वाला व्यवहार किसी प्रकार भी असम्मानपूर्ण न हों।

पाँचवें क्रम में समाज में प्रभाव बढ़ाने के लिए वाचालता के दोष से बचना चाहिए। कितनी ही विद्या, बढ़ाने के लिए वाचालता के दोष से बचना चाहिए। कितनी ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान क्यों न हो तथापि बहुत व निरर्थक बोलने का स्वभाव विकसित न करना चाहिए। अल्प और उपयुक्त भाषण वाणी में प्रभावशीलता उत्पन्न कर देता है। अपनी कहने के बजाय दूसरों की सुनने के लिए अधिक तत्पर रहिए। जो लोग दूसरों की सुनते तो कम और अपनी ही कहते रहते हैं उनका प्रभाव नष्ट हो जाता है। लोगों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। लोगों का स्वभाव होता है कि वे आप बीती दूसरों को सुनाने के लिए बड़े उत्सुक रहते हैं। समाज में बहुतायत ऐसे लोगों की ही होती है जो यह समझते हैं, उनकी समस्यायें और उलझनें दूसरों की अपेक्षा अधिक हैं और वे उन्हें प्रकट भी करना चाहते हैं। जो व्यक्ति मनुष्यों की इस सहज धारणा की रक्षा करते हुए व्यवहार करते हैं वे अपने मित्रों और सुहृदयों की संख्या में वृद्धि कर लिया करते हैं।

जो अपना दुःख सुनाए उसको सहानुभूतिपूर्वक ध्यान से सुन लेना चाहिए और अपनी संवेदना प्रकट करने में भी कृपणता न करनी चाहिए। किसी की वेदना सुनकर उपहास करना अथवा उसकी उपेक्षा कर देना एक नैतिक दोष है। इस से ग्रस्त लोग समाज में अपने विरोधियों तथा आलोचकों की वृद्धि कर लेते हैं ऐसी दशा में प्रभावशीलता के बढ़ने की आशा नहीं करनी चाहिए।

प्रभावशीलता की वृद्धि धन संपत्ति, विद्या, बुद्धि अथवा शक्ति के आधार पर नहीं होती। उसकी वृद्धि इस प्रकार के नैतिक गुणों के आधार पर ही होते है। इन गुणों को ग्रहण कर लेने पर मनुष्य साधन हीन होने पर भी प्रभाव शील बन जाता है और यदि साथ में विद्या और अन्य संपन्नतायें भी हों तब तो उसका प्रभाव समाज के नेतृत्व तक पहुँच जाता है। समाज में प्रभावशीलता की वृद्धि सद्भावों व्यवहारों और सत्कर्मों द्वारा होती है केवल साधन और संपन्नता के द्वारा नहीं जिसका व्यवहार और आचरण जितना अच्छा होगा वह उतना ही अधिक प्रभावशील बन जायेगा।


अंतस् की गंगोत्री देती है, सच्चा सुख व संतोश

सुख मानव की आदि कामना रह है। जितने भी प्रयत्न, पुरुषार्थ, उद्यम, उद्योग, मनुष्य करता है उसके मूल में उसकी सुख-प्राप्ति की इच्छा ही प्रमुख है। हर व्यक्ति इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिये बुद्धि, शक्ति, विवेक, विश्वास और योग्यता के अनुसार प्रयत्न करता है। एक सुख से जब उसका मन ऊब जाता है या उस सुख की अनुभूति में कमी आने लगती है तब उसका मन दूसरे सुख की खोज में लग जाता है। उसकी यह खोज उसके विश्वास या कल्पनाओं के आधार पर चलती रहती है। इन्द्रियजन्य सुख क्षणिक और व्याधि मूलक हैं इसलिए मनुष्य पारलौकिक सुखों की ओर आकृष्ट हुआ। इसके पीछे उसकी मूल भावना थी सुख की स्थिरता, शाश्वतता और अमरता सुख के अंत की बात सोचकर मनुष्य निराश हो जाता है। उसे घबराहट होती है। मृत्यु से भय का कारण भी यही है। उसे साँसारिक सुखों के प्रति इतना मोह हो जाता है कि जीवन का अंत उसे परमात्मा का एक क्रूर विधान लगाता है।

स्थूल सुखोपभोग भी जब मानव को तृप्ति, संतुष्ट एवं आनन्द न दे सके तो उसने परमात्मा के सान्निध्य में उसकी प्राप्ति करनी चाही। इसके लिये उसने वैराग्य, भक्ति, उपासना का सहारा लिया। शरीर को कष्ट एवं यातनाओं से उसने उनके मूल स्वभाव को तोड़ना, मरोड़ना चाहा। इसके सुख की अनुभूति के स्रोतों को हमेशा के लिये कठोरता पूर्वक दमन करना चाहा। लेकिन इस शारीरिक उपेक्षा एवं कठोरता के कारण, शारीरिक सुख की कामना गिरी नहीं-मरी नहीं-और तब यह सोचा जाने लगा कि जीवात्मा की मौलिक कामना आनन्द प्राप्ति है और इसी केन्द्र के चारों ओर हमारे जीवन के क्रियाकलाप, प्रयत्न, उद्योग चक्कर काटते रहते हैं और जब तक उसको यह कामना सही रूप से प्राप्त नहीं होती वह अतृप्त, अधीर एवं निरन्तर असंतुष्ट रहता है।

जिस प्रकार सुख की प्राप्ति के प्रयत्न आवश्यक हैं उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि अपने लिये श्रेष्ठतम सुख कौन सा है, इसे जानें। क्योंकि सुखोपभोग के उपरान्त भी जीवात्मा से उसका ताल-मेल बैठ नहीं पाता इसका मूल कारण है कि इन्द्रिय सुख एवं आत्मिक सुख में जमीन आसमान का अन्तर है। जो वस्तु या भोग शरीर के लिये आनन्ददायक है, वह आत्मा के लिए भी हो यह सर्वथा आवश्यक नहीं।

अतिशय, इंद्रियजन्य सुख, शरीर, मन, आत्मा को निरन्तर क्षीण बनाते हैं और इसके दुष्परिणाम व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन को छिन्न-छिन्न कर देते हैं। सुख की कामना का अर्थ है प्रसन्नता की स्थिति यदि सुखभोग हमें विषाद, व्याधि एवं चिंता की परिस्थितियाँ पैदा करता है तो उसमें निश्चय कहीं न कहीं त्रुटि है। यदि इस लोक में ऐसे सुख को त्यागकर वैसे ही सुख की कामना से पारलौकिक सुख की चाह बनाये तो वहाँ पर भी हमें ऐसी ही स्थिति में वैराग्य की भावना का उदय हुआ। वैराग्य से सुख एवं दुख दोनों ही स्थितियों में उदासीन रहने का अभ्यास था। किंतु यह उदासीन स्थिति भी जीवात्मा की सहज शांति एवं आनंद को न प्राप्त करा सकी।

जब विवेचनात्मक बुद्धि द्वारा शरीर एवं आत्मा को पृथक्- पृथक् अस्तित्व माना जाने लगा और दोनों के सुख दुख भिन्न-भिन्न प्रतिभासित हुये तब सुख की प्राप्ति के लिए शरीर एवं आत्मा के समन्वित उपक्रम की आवश्यकता हुई। शारीरिक सुखों को मिटाने के लिए तप आवश्यक है। कष्ट-कठिनाइयों के माध्यम से तितिक्षा ही शारीरिक तपश्चर्या है। अपनी इच्छाओं का दमन एवं स्वेच्छा से अभाव का वरण इसीलिये उपयोगी है कि यह क्षणिक सुखोपभोग के प्रति आसक्ति भाव को समाप्त करता है।

दूसरी ओर आत्मा-विकास का उपक्रम चलता है। इससे जीवन में श्रद्धा, विश्वास, प्रेम, आत्मीयता, उदारता, सहृदयता आदि सद्गुणों को गुणों को विकसित किया जाता है। इस साधना से आत्मा एवं शरीर की प्रथक सत्तायें दृष्टिगोचर होने लगती हैं ज्यों-ज्यों जीवात्मा एवं शरीर के संयोग का विकास एवं परिमार्जन होता है, आत्मिक शक्तियों की अनुभूति होती है और अब तक से भिन्न विलक्षण आनन्द एवं संतोश की स्थिति बनती है।

इसी आत्म-शोधन को ही साधना कहते हैं। वह जीवनोत्कर्ष की प्राप्ति के लिये अनिवार्य है। इसमें मनुष्य एक पतली पगडंडी पकड़ कर चलता है जिसके दोनों ओर सुख एवं दुख, जीवन एवं मुक्ति, स्वर्ग एवं नरक के छोर हैं। इनमें मनुष्य को सबसे अधिक जागरुक एवं सतर्क रहना पड़ता है। इसे विचार विचार परिमार्जन या विचारों की तपश्चर्या भी कह सकते हैं।

जीवन में सांसारिक एवं अध्यात्मिक के दोनों प्रकार के विचारों से मनुष्य-प्रभावित होता रहता है और कभी इधर कभी उधर खिंचता रहता है। जिस अनुपात में वह इनसे खिंचता है उसी अनुपात से सुख एवं दुख के प्रभाव में आता है।

साँसारिक कठिनाइयों, कष्टों, बाधाओं या इतर कल्पनाओं से प्रभावित होकर मनुष्य वैराग्य अंगीकार तो कर लेता है लेकिन वह जीवन भर बन जाता है क्योंकि वैराग्य के आवेश में कठोरता, एवं उग्र संयम का कृत्रिम जीवन वास्तविक एवं स्वाभाविक नहीं बन पाता। मन की कल्पना जब तक उत्कृष्ट बनी रहती है तब तक तो इस जीवन में निराशा नहीं आती किंतु वे कल्पनायें सर्वदा परिवर्तनशील हैं और कल्पनाओं में पड़ते ही मनुष्य का जीवन निष्क्रिय एवं आनंद रहित हो जाता है। कभी अनुभूति एवं उत्साह से मरता है कभी मानसिक चंचलता एवं अतृप्ति के कारण निराशा घर बनाती है। साधना का महत्व इसलिये है कि इससे दोष-दुर्गुणों का निवारण होता है। लेकिन इसमें दंभ बढ़ने की भी आशंका है और दंभ बढ़ने पर यह आडंबर को नियंत्रित करता है।

हमारे जीवन का उद्देश्य अपने व्यक्तित्व को परिमार्जित करना, दोष-दुर्गुणों को दूर करना एवं उनके दैनिक जीवन में व्यवहारिक रूप देना-होना चाहिए। इसी को गीता में भगवान कृष्ण ने निष्काम कर्म-योग की संज्ञा दी है और शास्त्रकारों ने “सहजसमाधि” बतायी। कबीर ने भी इसी का उल्लेख अपनी साखियों में किया है।

सभी प्राणियों के साथ अपना संबंध पवित्र, उदार एवं आत्मीयपूर्ण बनाने का प्रयत्न करना ही चाहिये। इससे हमें सात्विक सुख का अनुभव होगा। मनुष्य सच्चा सुख तभी प्राप्त कर सकता है जब वह अपने शरीर, मन, बुद्धि की शुद्ध की शुद्ध शक्तियों को जाग्रत करे। यही मनुष्य जीवन की श्रेष्ठतम साधना है। यही मनुष्य के विकास का उत्तम मार्ग है और उसी से जीवन लक्ष्य की पूर्ति होती हैं। दूसरी ओर असत् विचार भीतर के दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त करते हैं, जो हमारे दुःख, अकर्मण्यता एवं आलस्य के परिणाम के रूप में सामने आते हैं। वह पतित हो जाता है एवं इन्द्रियों के क्षणिक भोग में आनंद लेने लगता है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के अनेकों दुष्परिणाम इनके कारण आते हैं। संतोश, शांति, समृद्धि एवं प्रगति का एक ही राजमार्ग है-जीवनसाधना। सच्चा साधना द्वारा प्रसुप्त को जगा लेता है। यही हम सबका अभीष्ट लक्ष्य भी होना चाहिए।


विवाद होने तक इन्तजार करो (Kahani)

बहेलिया जाल फैलाया बटेरों का समूह उसे उठाता, झाड़ी में उलझाता और निकल भागता। बहेलिया नित्य खाली हाथ घर वापस लौट जाता। पत्नी ने कहा आज भी रीते ही लौट आये। उसने कहा “धैर्य रक्खो! उनमें फूट पड़ने का इंतजार करो। देखना सब फँसेंगे। ” एक दिन हुआ भी ऐसा ही। बहेलिया ने दाना डाला जाल फैलाया। बटेरों का झुँड आया। सभी दाना चुगने में लग गये। भूल से एक बटेर ने दूसरे के सिर पर पैर रखकर कुलाँच मारी। विवाद शुरू हो गया विवाद बढ़ते-बढ़ते नौबत मारा मारी तक पहुंच गई। दूसरा बोला लगता है जैसे जाल तू ही उठाता है। पहले पलट कर जवाब दिया और क्या तू उठाता है। यदि मैं न उठाऊँ तो तेरी क्या बिसात। बस विवाद बढ़ता ही गया। एक दूसरे के समर्थन में झुँड को दलों में विभाजित हो गया। बहेलिये ने सोचा अब काम बनने ही वाला है। वे इसी विवाद में उलझे रहे और जाल उठाना भूलकर एक-एक कर जाल में उलझते गये। जब सब जाल फँस गये। बहेलिये ने जाल समेटा सभी बटेर जाल में फँस चुके थे और व्यर्थ के विवाद और झगड़ने पर पछतावा कर रहे थे। बहेलिये को पत्नी की बात याद थी विवाद होने तक इन्तजार करो, संगठन जरूर बिखरेगा।


नैतिक अवमूल्यन व हम सबके दायित्व

बुराई, भ्रष्टाचार, अपराधों के संबंध में हमारी शिकायतें दिनों दिन बढ़ती जा रही है। प्रतिदिन एक बँधे हुए ढर्रे की तरह हम नित्य ही इस संबंध में टीका-टिप्पणी करते हैं, कभी सरकार को दोष देते हैं तो कभी प्रशासन व्यवस्था की छीछालेदर करते हैं। कभी किन्हीं व्यक्तियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। इस तरह की शिकायतें एक सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च-स्थिति के लोगों तक से सुनी जा सकती हैं। लेकिन कभी हमने यह भी सोचा है कि इनके लिए हम स्वयं कितने जिम्मेदार हैं। हम भूल जाते हैं कि बहुत कुछ अपराध, बुराइयाँ हमारे व्यावहारिक जीवन में अपने प्रयत्नों का परिणाम हैं। हमारे अनीतिपूर्ण जीवन, सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उपेक्षा, हाथ धरे बैठ जाने की प्रवृत्ति से ही बुराइयों को प्रोत्साहन मिलता है। यदि हम इनके लिए स्वयं को उत्तरदायी मानकर अपना सुधार करने में लगें, अपने कर्तव्यों को समझने लगें तो कोई संदेह नहीं कि बुराइयाँ घटने लगें और एक दिन समाप्त भी हो जायँ।

बुराइयों को मिटाने के लिए हमारा सर्वप्रथम कर्तव्य है-’हम दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करें जिसे हम स्वयं अपने लिए न चाहते हों। ’ ऋषिगणों ने इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुये अपनी प्रजा को बताया था-”ऋषिगणों ने इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए अपनी प्रजा को बताया था-”आत्मनः प्रतिकूलानि परेशाँ न समाचरेत्” “जिस बात को तुम अपने लिए नहीं चाहते उसे दूसरों के लिए मत करो। ”

हम नहीं चाहतें कि कोई हमारा अपमान करे तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम किसी का अपमान न करें। इसी तरह विश्वासघात, छल, कपट, धोखाधड़ी उत्पीड़न, शोषण नहीं होना चाहते तो हमारा भी धर्म है कि हम दूसरों के साथ ऐसा न करें। लेकिन खेद है कि जब कोई हमारे ऊपर अत्याचार करता है हम बुराई की, सिद्धान्तों, की, दुहाई देते हैं और केवल बचाव के लिए गुहार मचाते हैं किंतु जब हम स्वयं दूसरों के साथ ऐसा करते हैं तब किसी के कुछ कहने सुनने पर वे हमारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती और यही कारण है कि बुराइयां दिनों दिनों बढ़ती जाती हैं। हम उनकी शिकायतें, करने, आलोचना करने, में ही अपना काम पूरा समझ लेते हैं।

बुराइयों के सम्बन्ध में दूसरी विचारणीय बात है कि इन्हें रोकने के लिये हम स्वयं कितनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। अपने कारोबार, मनोरंजन, आराम, घर गृहस्थी के अलावा हम सामाजिक कर्तव्यों में कितना हाथ बँटाते हैं? यह प्रश्न हमारे सबके लिये एक चेतावनी है। भारतीय नागरिक कि यह बहुत कमजोरी है कि वह अपने ही जीवन से इतना चिपका रहता है कि सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर आँख उठाकर नहीं देखता। इनकी ओर अपेक्षा भाव बनाये रखता है। पड़ोस में डाकू रहता है। अनैतिक कार्य का अड्डा, समाज विरोधी हरकतें हमारे सामने होती रहती हैं। दूसरों को बदमाशी करते हम देखते हैं किन्तु हम में से कितने की सूचना सरकारी अधिकारियों को देते हैं या इनके खिलाफ हममें से कितने लोग आवाज उठाते हैं। इनके विरोध में आँदोलन हममें से कितने लोग चलाते हैं। बहुधा हम इन्हें चुपचाप देखते रहते हैं। बहुत बार हममें से ही बहुत लोग अपराधियों को आश्रय देते हैं, सहायता पहुँचाते, उन्हें बढ़ावा देते हैं। यह निश्चित सत्य है कि अपराधी अपनी बुराइयों के बल पर जीवित नहीं रह सकते। समाज के सहयोग पर ही उनका आस्तित्व कायम रहता है। जागरुक व्यक्ति जानते हैं कि समाज के तथाकथित स्वार्थी लोग ही अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अवांछनीय तत्वों को प्रोत्साहित करते हैं उन्हें सहारा देते हैं, आवश्यकता पड़ने पर उनका बचाव भी करते हैं। फिर एक दिन एक-एक कर हम सभी को इन दूषित तत्वों से हानि उठानी पड़े तो इसमें दोष किसका? क्योंकि अपराधी किसी का सगा नहीं होता, अपना लाभ न होते देख वह अपने तथाकथित बचाव करने वाले व्यक्ति पर भी आक्रमण कर सकता है।

कई बार किसी नागरिक पर बदमाश लोगों के आक्रमण को देखकर भी हममें से बहुत लोग चुपचाप आगे पग बढ़ा देते हैं। हममें से कइयों की जानकारी में रिश्वत का दौर चलता रहता है। कई बार जानते हैं कि सार्वजनिक कार्यों में ठेकेदार तथा नौकरशाही अनावश्यक लाभ उठा रहे हैं। हममें से बहुत से लोग धोखाधड़ी, ठगी, चोरबाजारी, मिलावट करने वालों को भारी भली-भाँति जानते हैं किन्तु यह सब जानकर हम इनका भंडा फोड़ नहीं करते। इनकी शिकायत पुलिस को या अपराध निरोधक संस्थाओं को नहीं करते। इनके खिलाफ संगठित होकर आँदोलन नहीं होता।

इस सम्बन्ध में हमारी यह शिकायत हो सकती है कि “आजकल कोई सुनता नहीं, ” जो इस तरफ के कदम उठाता है उसे ही उल्टी परेशानियां उठानी पड़ती हैं। बहुत कुछ अंशों में यह ठीक भी है। किसी बात की सूचना देने पर गुँडे के बजाय सूचना देने वाले को ही गिरफ्तार कर लिया जाता है। बुराई का प्रतिरोध करने वाले को दूषित तत्वों का कोप-भाजन बनना पड़ता है। यह सब ठीक है किंतु बिना कोई खतरा उठाये दूर तो नहीं किया जा सकता। सुधार के लिए एक ही मार्ग है, वह है सब तरह के खतरे उठाकर बुराइयों का मुकाबला करना। यदि प्रशासन इस सम्बन्ध में ढील दे तो उसके खिलाफ भी आवाज उठायी जाये। कई सरकारी कर्मचारी या समाज का सदस्य ही दूषित तत्वों का बचाव करे इन्हें प्रोत्साहन दें तो उनकी भी आलोचना करने में नहीं चूकना चाहिए।

इस तरह प्रतिरोध के लिए अकेले व्यक्ति को तो संकल्प करना ही चाहिए किन्तु सारे समाज को संगठित होकर बुराइयों के विपरीत कदम उठाना चाहिए। कई कारण नहीं कि समाज का संगठित शक्ति के समक्ष बुराइयां जीवित रह सकें। खेद है सामाजिक उत्तरदायित्व हम लोग नहीं समझते। कोई व्यक्ति किसी गुँडे से निपटते समय सहायता के लिए पुकार करता है तो हम किवाड़ बन्द करके बैठ जाते हैं, सुनकर भी अनसुनी कर देते हैं। देखकर भी अनदेखे बन जाते हैं। लेकिन वह दिन भी दूर नहीं जब हमें भी इन दूषित तत्वों से आक्रांत, होना पड़ेगा।

आज बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सामूहिक अभियान की आवश्यकता है। जब तक लोगों में इन सामाजिक उत्तरदायित्वों की भावना पैदा न होगी तब तक बुराइयां एक-एक कर हम सबको प्रभावित करती रहेंगी, हानि पहुँचती रहेंगी।

हमारी एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम बड़े-बड़े सिद्धान्त बघारते हैं, नीति और न्याय की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, लेकिन यह सब दूसरे के लिए। अपने कार्यकलापों को न्याय, नीति की कसौटी पर हम बहुत ही कम कसते हैं। एक दुकानदार बाजार में बैठकर सरकार, पुलिस आदि के भ्रष्टाचार की जी खोलकर आलोचना करता है किन्तु उसकी आलोचक वृत्ति उस समय गायब हो जाती है जब वह वस्तुओं में मिलावट करता है, ग्राहकों को कम तौलता है, अधिक मुनाफा वसूल करता है। आतताई और गुँडों को हम लोग कोसते हैं, उन्हें बुरा कहते हैं किन्तु हमारी समीक्षात्मक बुद्धि उस समय जाने कहाँ चली जाती है। जब हम पराई स्त्री को बुरी निगाह से देखते, बिना प्रति, मूल्य देय समाज के साधनों का उपभोग करते हैं, अनीति के साथ धन एकत्रित करते हैं, दूसरों के श्रम अधिकार एवं साधनों का अनुसूचित शोषण करते हैं।

जिस तरह हम दूसरों की आलोचना करते हैं, उनके लिये न्याय-नीति की माँग करते हैं उसी तरह यह भी आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार को नित-धर्म की कसौटी पर कसें। जो बुरा है उसे न करें।

हम दूसरों के कई ऐसी बात न करें जो स्वयं अपने लिये चाहते हैं बुराइयों को मिटाने के लिये सामाजिक उत्तरदायित्व जो हम पर है उसे सब तरह से खतरे उठाकर भी पूरा करने में न चूकें। कार्य व्यवहार को, नीति, न्याय और धर्म की कसौटी पर परखें जो बुराई उससे दूर रहें। ये तीन बातें हमारे जीवन में ढल जायें तो कोई सन्देह नहीं कि जो बुराइयाँ आज नहीं तो कल समाप्त हो जायेंगी।


प्रतिभा और योग्यता (Kahani)

प्रतिभा और योग्यता अपने स्वार्थों में ही खपती रहें। इससे अधिक बदतर स्थिति और कुछ नहीं हो सकती। यह कथन है-छय रोग के टीके का अन्वेषण कराने वाले डॉक्टर काल्मे का। उन दिनों फ्राँस में छय रोग जोरों पर था। इसका समूल नाष कैसे हो, इसका कोई उपाय समझ नहीं आ रहा था।

डॉक्टर काल्मे ने अपनी सारी साधन सुविधाओं को परे झटक दिया और महत्वपूर्ण कार्य में लग गये। सहयोगी के रूप में एक सहपाठी मित्र डॉक्टर गुएंरा आगे आये। उनका विवाह उसी वर्ष हुआ था किन्तु गृहस्थ को तपोवन बनाने की अपेक्षा मानव जाति की सेवा के लिए समाज को तपोवन बनाना उन्होंने अधिक महत्वपूर्ण माना।

इस शोध कार्य के दौरान उन्हें कई-कई दिन बिना भोजन के गुजारने पड़ते थे। उनके अथक परिश्रम से मिली लोकोपकारी सफलता के कारण इस टीके का नाम वैसील्स काँमले गुएंरा (बी.सी.जी.) रक्खा गया। इसी के बल पर करोड़ों मनुष्यों को छय के प्रकोप से मुक्त कराया जा सका।

उन्होंने न तो बी.सी.जी. की विधि पेटेण्ट कराई और न इनसे आविष्कार की कोई रियाल्टी ली। क्योंकि उनका स्पष्ट मत था कि मानव में निहित प्रतिभा सिर्फ उसी के लिए नहीं है-अपितु उस समूची मानव जाति का बराबर का अधिकार है।


सुखी बनने के लिए जीवन कला का शिक्षण

रूस के प्रख्यात विचारक और वैज्ञानिक निकोलाई अमरोसोव ने अपने एक निबन्ध में लिखा है कि -- “ मनुष्य को सुखी होना सिखाया जा सकता है। यह कोई जटिल या असाध्य प्रक्रिया नहीं है, न ही किसी का साथ दे और किसी का साथ न दे। बल्कि इस प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सकता है और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि मनुष्य स्वयं ही इस पर नियंत्रण रख सकता है। ”

प्रायः हम लोगों को विभिन्न दिशाओं में, विभिन्न लक्ष्यों की और दौड़ते हुए से देखते हैं। प्रश्न हो सकता है अनवरत चलते रहने वाले धर्म या निरंतर बनी रहने वाली इस विकलता का क्या कारण है। यदि उन प्रयत्नों का लक्ष्य जीवन अच्छा और निर्वाह की व्यवस्था भर जुटाना है तो कहा जा सकता है कि वह तो बहुत ही सहजता और सरलतापूर्वक जुटायी जा सकती है। मनुष्येत्तर अन्य जीव जंतु बड़ी सुविधापूर्वक अपने लिये भोजन, आवास की व्यवस्था बना देते हैं। उन्हें न किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए व्याकुलता होती है और न अपनी निर्वाह आवश्यकताओं को छोड़कर अन्य किन्हीं विषयों में रहते हैं अथवा नहीं, यह तो नहीं अनिवार्य, सामान्य और विलासितापूर्ण आवश्यकतायें भी बड़ी सरलता से पूरी होती रहती है, फिर भी उसे दुःखी अवसादग्रस्त देख जा सकता है।

यह बात उन लोगों के लिये कही जा रही है, जो सामान्यतः समझते हैं कि समृद्ध और साधन संपन्न होने से सभी प्रकार के दुखों और अभावों से छुटकारा पाया जा सकता है। वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। दुःख एक आँतरिक अभावात्मक धारणा है। वह अंतस् से संबंधित एक रिक्त अनुभूति है। उस रिक्तता को बाहरी उपादानों से नहीं भरा जा सकता। यही कारण है कि जो लोग संपन्न, समृद्ध और हृष्ट-पुष्ट देखे जाते हैं वे भी दुःख और पीड़ाओं से ग्रस्त रहते हैं, फिर प्रश्न उठता है कि जब साधन, संपन्नता और वाह्य वैभव विभूतियाँ सुख नहीं हैं तो सुख आखिर है-क्या? निकोलाई असोसोव ने कहा है-”सुख व्यक्ति के मानसिक चैन का एक एक कमोबेश स्तर है, जिससे वह कुल मिलाकर जीवन से संतुष्ट रहता है। ”

संतुष्टि-एक भावनात्मक अनुभूति है, जो उपलब्ध को पर्याप्त मानने से जन्मती है ओर अभीष्ट को प्राप्त करने के लिये प्रचुर सामर्थ्य और पर्याप्त साहस प्रदान करती है। सुख का अर्थ है उपलब्ध में संतुष्ट रहने, अनुपलब्ध के लिये आकुल-व्याकुल न होने की स्थिति। इस स्थिति में रहते हुए ही कोई व्यक्ति अपने अभीष्ट को प्राप्त करने के लिये भी सफलतापूर्वक आगे बढ़ता रह सकता है, अन्यथा असंतोष, अतृप्ति और आतुरता जैसी निषेधात्मक प्रवृत्तियाँ मनुष्य के मानसिक संतुलन को डगमगा देती हैं और उसकी शक्तियों को भी छिन्न-भिन्न कर देती है।

अतएव सुखी किस प्रकार रहा जाय? यह जानने के लिये अपनी भावनाओं को किस प्रकार प्रशिक्षित किया जाय? इस पर अधिक ध्यान दिया जाय। कहा जा चुका है कि और उपलब्धि को अर्जित करने या स्थिर रखने के लिये भावनाओं का संतुलन, परिष्कार, परिमार्जन ही अधिक सफल और कारगर तरीका है। बचपन, शैशव, और किशोरावस्था में तो व्यक्ति विवेक बुद्धि की दृष्टि से इतना परिपक्व नहीं होता कि वह अपनी भावनाओं को स्वयं शिक्षित कर सके। स्वयं शिक्षण करने की स्थिति कर सके। स्वयं शिक्षण करने की स्थिति तब आती है, जब मनुष्य अपने बचपन व किशोरावस्था से आगे बढ़कर युवावस्था में प्रवेश करता है और समाज के संपर्क में आता है। उस स्थिति में मनुष्य पर समाज से संपर्क का भी निरंतर प्रभाव पड़ता है।

इस प्रकार प्रशिक्षण की इस कला को सीख लेने एवं उसे अभीष्ट स्तर तक विकसित कर लेने मात्र से व्यक्ति सुख की अनुभूति प्रतिकूल और विपन्न परिस्थितियों में भी करता रह सकता है।


Quotation

स्वर्ग परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम है। वह अपनी उत्कृष्टता के कारण विपन्नताओं के बीच भी प्रसन्नता भरे वातावरण का सृजन कर लेता है।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


वंदनीया मातु को संदेश हमारा


वंदनीया मातु को संदेश हमारा (Kavita)

अश्वमेधों से उठी ऊर्जा! विनय हम कर रहे, वंदनीय मातु से, यह बात कह देना जरा।

हर दिशा के छोर ऊर्जा ! सिर्फ छू सकती तुम्हीं, दूरियों को नापने में भी, नहीं थकती तुम्हीं,

पूज्य गुरुवर तक पहुँच जाना, लेंगी माँ वहीं, हम उन्हीं के पद्म-चरणों पर, चढ़ाते अर्घ्य-सी, भाव-श्रद्धा से भरी सौगात, कह देना जरा।

तुम यही कहना कि हम, दुख-सुख सभी भूले रहे, माँ तुम्हारी गोद में हम, गर्व से फूले रहे,

मन विकल जब भी हुआ, तब स्नेह भीगा स्वर मिला, द्वार तक प्यासे अगर पहुँचे, हमें निर्झर मिला,

कौन संकट से उबारेगा हमें, यह सोचकर, रुक न पाती आँख से, बरसात कह देना जरा।

गलतियाँ हमसे हुई, फिर भी दुलारा आपने, जब कभी भटके कदम, फौरन पुकारा आपने,

आपसे संकल्प-बल सद् बुद्धि-बल हमको मिला, देवसंस्कृति दिग्विजय को चल पड़ा अब काफिला,

आपके बल पर भगीरथ, श्रम सदा करते रहें, है हमारा क्या भला औकात, कर देना जरा,

मातु से कहना, सतत्, संबल हमें देती रहें, स्नेह-ममता से भरा, आँचल हमें देती रहें,

बस उसी की छाँह में, बढ़ते रहेंगे हम सदा, काम जो सौंपा उसे, करते रहेंगे हम सदा, माँ! हमें प्रेरक उजाला, आपसे मिलता रहे,

फिर मिटेगी हर अँधेरी रात, कर देना जरा।

- शचीन्द्र भटनागर


तरने चला सकल संसार


तरने चला सकल संसार (Kavita)

गुरु के कृपा-मेघ से बरसी, करुणा की रस-धार। तरने चला सकल संसार॥

भौतिक संतापों में जग की, झुलस रही थी काया, तृष्णाओं के मरुस्थल में, मिल सकी न कोई छाया, प्रकट हुई आंवलखेड़ा से, शीतल मंद बयार। तरने चला सकल संसार॥

यह शीतलता पीड़ित मन को, लगी बड़ी सुखदायी, मानवता के उर में जिसने, आशा नई जगाई, नव फुहार बनकर उमड़े थे, गुरु के दिव्य विचार। तरने चला सकल संसार॥

कलुष धुले, वत्सों ने निज का, सत्स्वरूप पहचाना, अपना ही क्या अखिल विश्व के, दुख का कारण जाना निकल पड़े बाँटने प्राण की झोली में भर प्यार। तरने चला सकल संसार॥

बासंती आभा से दमके, गाँव-नगर-गलियारे, ज्ञान-रश्मि से पल-पल होने, लगे दूर अँधियारे, नया सवेरा लेकर आया हे, आनंद अपार। तरने चला सकल संसार॥

संयम, नियम, साधनाओं, के, अभिनव मंत्र जगाकर, ममता बाँटी जाति-वर्ग के, सारे भेद भुलाकर, भला भुला पायेंगे कैसे, तेरा यह उपकार, तरने चला सकल संसार॥

आज भावना की डालों पर, पंछी चहक रहे हैं, परमारथ की गंध लुटाते, अंतस् महक रहे हैं, जग तेरा आभार प्रकट, करता है बारंबार। तरने चला सकल संसार॥

- देवेन्द्र कुमार देव


नारी उत्कर्ष की सुखद संभावनाओं से भरा गंगावतरण

मनुष्य को सृजा भले ही स्रष्टा ने हो, पर उसे सँभालने, सजाने सुधारने और समर्थ बनाने का श्रेय नारी को ही जाता है। संपन्नता, प्रफुल्लता, कुशलता, कलाकारिता जैसे विशेषताएं उसने नारी को अनेक रूप में कृपापूर्वक प्रदान की हैं। इस अनुग्रह भरे सहयोग के बिना यह कदाचित् मानवी गरिमा से वंचित ही रहता है। वनमानुषों की तरह किसी प्रकार नीरस स्तर के दिन गुजारता है। नारी के अनेकानेक स्वरूप सजीवता के रूप में बरसते हैं और मनुष्य की तृप्ति, तुष्टि और शांति का आधार बनते हैं।

उसकी उदार अनुकंपा एवं समर्पित सेवा साधना के प्रति जितनी कृतज्ञता व्यक्त की जाय, उतनी ही कम है। अनुदान का प्रदान दे सकना तो कदाचित् संभव ही नहीं है। उसके ऋणों से उऋण भी नहीं हुआ जा सकता। इतने पर भी यह तो आशा की जानी ही चाहिए कि इस करुणामयी के आड़े समय में काम आया जाय। अपेक्षित प्रत्युपकार की तनिक सी याचना जब की जाय, तो इससे इनकार न किया जाय।

आत्मीयता का परिचय किन्हीं महत्वपूर्ण अवसरों पर उपहार के रूप में प्रस्तुत करने की परंपरा के पीछे यही तत्वदर्शन काम करता है कि उदारता भरे सहयोग प्रस्तुत करने पर ही कृतज्ञता एवं सद्भावना का प्रमाण परिचय प्रस्तुत किया जा सकता है। कन्या के विवाह में कुछ दिया ही जाता है। नारी को विवाह के दिन से स्मृति से उसी प्रकार के प्रतीकों का आदान-प्रदान होता है। मित्रों को किन्हीं सफलताओं के सद्भावना, प्रसन्नता प्रकट करने के लिए कुछ उपहार अनुदान देने का प्रचलन, भावनाओं की सही अभिव्यक्ति से सिद्धाँत पर अवलंबित है।

सहस्राब्दियों बाद इन दिनों एक ऐसा अवसर आया है जब कि नारी से उचित-अनुचित अनुदान लेते रहने के उपराँत अब इस बात का परिचय दें कि हृदयहीन निष्ठुरता को नहीं अपना रखा है और न वे सर्वदा कृतघ्न ही हैं। अच्छा होता सदा से समानता के आधार पर नीतियुक्त आदान-प्रदान चलता रहा होता और एक दूसरे ने परस्पर समान सेवा-सद्भावना का परिचय दिया होता। एकता और समता की कसौटियों पर दोनों पक्ष खरे उतरते रहे होते तो दोनों ने ही असीम लाभ उठाया होता और अपने इन्हीं नगर गाँवों में स्वर्गीय वातावरण का दर्शन मिलता रहा होता। यदि अनीति, पक्षपात शोषण की कुटिलता से बचा जा सका होता तो दोनों नक्ष परस्पर सघन सहयोग के आधार पर उन्नति के उच्च शिखर पर रहते हुए प्रचुर सुख-शांति का रसास्वादन करते रहे होते।

विगत पर पश्चाताप का एक ही सही तरीका है कि वर्तमान को सँभाल लिया जाय और पिछले दिनों खाई खुदती रही है, उसे पाट कर ऐसा समतल बना लिया जाय जिस पर भव्य स्तर के निर्माण-उत्पादन संभव हो सकें। इस शुभारंभ के लिए, इन्हीं दिनों को सर्वोत्तम मुहूर्त समझा जा सकता है। होना यह चाहिए कि पुरुषों का जिन भी घर-बाहर की महिलाओं पर प्रभाव है, उन्हें नारी जागरण के प्रयासों में भाग लेने और बढ़-चढ़ कर प्रयास करने के लिए प्रयास करने का ऐसा प्रोत्साहन, मार्गदर्शन दिया जाय तो निष्फल-निरर्थक बन कर न बिखर जाय।

महिलाओं के बीच सही प्रवेश तो महिलाओं का हो सकता है और वे ही परस्पर-अवाँछनीयता से निपटने और प्रगति पथ अपनाने के लिए एक दूसरे को कुछ न कुछ करते रहने के लिए सहमत कर सकती हैं। इसलिए कार्य क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति तो उन्हें ही संभालनी पड़ेगी, पर पुरुष इतनी कृपा कर सकते हैं कि उनके मार्ग में आने वाली बाधाओं को निपटाये। सहयोग दें और साधन जुटायें। इतने भर से अपने ही घर-पड़ोस की प्रतिभावान महिलाएँ ऐसे सरंजाम खड़ा कर सकती है जिससे नारी की समर्थता में चार चाँद लगने लगें और वे अगले ही दिनों अपने कंधों पर जो असाधारण दायित्व आने वाले हैं, उनके निर्वाह में वे असमर्थ-असफल सिद्ध न हों, इतनी क्षमता नारी समाज में उत्पन्न करने की जिम्मेदारी विचारशील पुरुषों की ही है। समय पर किये गये कार्य ही सराहे जाते हैं। चूकने पर तो पछतावा ही शेष रह जाता है। नारी की समर्थता में सामर्थ्य भर सहायता इन्हीं दिनों करना यही है वह भरपाई जिससे अब तक की सभी अवाँछनीयताओं का प्रायश्चित एकबारगी हो सकता है। इसके उपराँत तो वे अपने पैरों पर खड़े होने, चलने, बढ़ने और दौड़ने की स्थिति स्वयं प्राप्त कर चुकी होंगी। तब वे इन दिनों की बरती गई उदारता का समुचित बदलता चुकाने में तत्पर दिखाई देंगी और जो सेवा-सहायता अब तक करती रही हैं, उसमें भी कहीं अधिक अभिवृद्धि करेंगी।

यह सोचना निरर्थक है कि समर्थ होने पर नारियाँ पिछली करतूतों का बदला लेंगी और जिस तरह अभी बंधन में बँधी रहती हैं उसमें आनाकानी करेंगी। फलतः पुरुषों को घाटे में रहना पड़ेगा। ऐसी कुशंकाएं वे ही कर सकते हैं जिन्हें नारी की जन्मजात प्रकृति का परिचय नहीं है। माता से किसी पुत्र को, बहन से किसी भाई को, पुत्री से किसी पिता को और पत्नी से किसी पति को बदला लेने का झंझट खड़ा करने की आशंका नहीं करनी चाहिए। उनकी संरचना उन्हें तत्वों से हुई है जिसके कारण कि धरती माता सदा क्षमाशील रहती और अनुदान प्रदान करते रहने में कभी कोताही नहीं बरतती।

उज्ज्वल भविष्य की सुखद संभावनाओं से भरा पूरा गंगावतरण पर्व आदि निकट है। इसी के निमित्त युगसंधि की इन दिनों भागीरथी अभ्यर्थना चल रही है। महाकाल ने उसमें भागीरथी के लिए सर्व साधारण को आमंत्रण दिया है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत युगधर्म ने जीवंत नारियों को मूर्च्छना त्यागने और अपने समुदाय को मानवी गरिमा के अनुरूप गतिविधियों को अपनाने के लिए विशेष रूप से ललकारा है। उन्हें अपने ही पैरों चल कर मंजिल तक पहुँचाना होगा। अगली सदी नारी वर्चस्व की प्रमुखता प्रमाणित करने आ रही है। इसके प्रत्यक्ष प्रमाण सभी को 1997 के पश्चात् स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेंगे। उसके लिए अपने सहयोग का हाथ बढ़ाने में किसी को भी पीछे नहीं रहना चाहिए। इस अवसर पर नारी यदि अपनी मूर्छना से विरत न हो सकी तो इतिहास उसे ही नहीं उसके संरक्षक कहलाने वालों को भी क्षमा न करेगा।

युगधर्म का प्रथम चरण है-लोक मानस का परिष्कार-विचार क्राँति अभियान उसी के समानाँतर दूसरा चरण है-नारी जागरण। दोनों एक दूसरे के पूरक और परस्पर अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुये है। दोनों की समान महत्ता है। वे मिलजुल कर ही महा परिवर्तन की समग्र पृष्ठभूमि विनिर्मित करते हैं। यह दोनों ही चरण समग्र प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए समान गति से समानाँतर क्रिया-प्रक्रिया अपनाते हुए अग्रगामी रहने चाहिए। दोनों के बीच समग्र तारतम्य रहना चाहिए।

नारी को अपने बलबूते कुछ तो करने के लिए कहा ही गया है, पर साथ में यह भी आशा भरा विश्वास रखा गया है कि पुरुष इस प्रयोजन में उसके समर्थ सहयोगी की भूमिका का निर्वाह करेगा। उसे प्रोत्साहित करने, सुविधा देने और साधन जुटाने में किसी प्रकार की कोई शंका न रहने देगा। इस दिशा में कुछ कर सकने की स्थिति बनने देने में नारी समुदाय के सम्मुख कई प्रमुख बाधाएँ है। इनमें से एक है - प्रतिगामिता के वातावरण में रहते-रहते उत्पन्न हुआ निराशाजन्य अनुत्साह। दूसरा है - प्रगति की दिशा में कुछ सोचने और करने देने में अवरोध बन कर अड़ने वाला अवरोध। जिन लोगों के बीच उन्हें रहना है, उनमें से कम ही ऐसे होते हैं जिनको समर्थता अर्जित करना अखरता न हो। जो इन प्रयत्नों का तारतम्य बिठाने से प्रसन्न होते हों। फिर घरेलू काम काज इस बेढंगेपन से चल रहे होते हैं कि कुछ ही घंटे में निपटाये जा सकने वाले कार्य प्रायः समूचा समय अपने ही घेरे में कसे रहते हैं। घर से बाहर निकलने देने में अनेक प्रकार के संदेह उठाते और प्रतिबंध लगाते हैं। इन परिस्थितियों में किसी प्रगतिशील उत्साही महिला के के लिए भी कुछ कर सकना बहुत ही कठिन पड़ता है। यह कम दुर्भाग्य नहीं है कि पुरुष मुँह खोले, देश-विदेश कहीं भी भ्रमण करे, पर नारी को इसलिए घूँघट निकालने के लिए बाधित होना पड़े कि कहीं शील न गँवा बैठेगी, इस बात पर कौन विश्वास करें? मर्द अकेले जन संकुलित हाट-बाजारों में, कारखानों में निर्वाध रूप रूप से जा सकते हैं, पर स्त्रियों को अविश्वस्त समझकर किसी अच्छे काम के लिए भी घर से बाहर जाना पड़े, तो समझा जाता है उसकी निगरानी रखने वाला कोई चौकीदार साथ चले। इन प्रतिबंधों से भरी परिस्थितियों में यह कैसे बन पड़ेगा कि नवजागरण के लिए इच्छुक महिलाएँ घर-घर महिलाओं के साथ संपर्क साधने के लिए किस प्रकार घर से बाहर निकल सकें। वे कहीं एक जगह बैठी तो मिलती नहीं। उन्हें प्रभावित-सहमत करने के लिए निकलना आवश्यक है। असमर्थ रोगियों को देखने डाक्टर ही उनके घर पहुँचता है। महामारी फैलने के दिनों चिकित्सकों को ही वहाँ डेरा डालने की ड्यूटी लगती है। प्राचीन काल के साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थ परिव्राजक आदि तीर्थ यात्रा के नाम पर जन-संपर्क के लिए निरंतर परिभ्रमण करते रहते थे। यदि एक ही जगह जनता एकत्रित बैठ मिल जाया करती तो उन्हें यह कष्ट साध्य प्रक्रिया अपनाने के लिए अपने बहुमूल्य जीवन क्यों समर्पित करने पड़ते।

नारी उत्कर्ष के लिए अनजानों, अनगढ़ों, कुरीतिग्रस्तों का मार्गदर्शन अनगढ़ों, कुरीतिग्रस्तों का मार्गदर्शन करने के लिए उनमें प्रेरणा भर कर आगे कदम बढ़ाने के लिए इसके सिवा दूसरा उपाय है नहीं कि प्रचारिकाएँ घर-घर पहुंचे और उनके पिंजड़ों में घुस कर ही मन गुन की बात करें किंतु यह कठिनाई स्पष्ट दिखाई देती कि नव जागरण के लिए-रचनात्मक कार्यों को गति देने के लिए प्रतिभावान महिलाओं को घर से बाहर निकलने की, सुदूर क्षेत्रों तक पहुंच सकने की छूट कैसे मिले? चक्रव्यूह में फँसा अकेला अभिमन्यु बहुत हाथ पैर पीटने पर भी पराजित बनकर रह गया था। प्रतिगामिता की ऊँची चहारदीवारी। को लाँघ कर खुले क्षेत्र में जाकर काम करने के अवसर कैसे मिले?

इस अवरोध से उबरने के लिए नारी की सहायता के लिए नर को ही आगे आना पड़ेगा। उसकी आवाज में बल होता है और आदेश, निवेदन या आग्रह सहज ठुकराया नहीं जाता। पिता, भाई, स्वजन-संबंधी, संरक्षक के रूप में वह अपने प्रभाव क्षेत्र की महिलाओं को घर से बाहर निकलने देने में बहुत हदतक कारगर सहायता कर सकता है। समर्थन मिलने पर असमंजस ग्रस्त महिलाओं की भी हिम्मत बढ़ सकती है ओर वे वह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकने में समर्थ भी हो सकती हैं।

ठन दिनों ही इस भवितव्यता पर इसलिए जोर दिया जा रहा है कि नियति ने बीसवीं सदी के अंत और इक्कीसवीं सदी के आरंभ वाले अब से 2006 तक के के बारह वर्षों के मध्याँतर को बदल डालने वाली समर्थ हलचलें उत्पन्न करने वाला समय घोषित किया है। उपयुक्त समय पर हम काम सरल पड़ता है। बसंत ऋतु के मौसम में हर पेड़ पर अनायास ही फूल खिल पड़ते हैं। इन दिनों सभी क्षेत्रों में उचित हलचलें उभर रही हैं और महत्वपूर्ण परिवर्तनों की कारगर योजनाएँ बन रही हैं। उन्हें कार्यान्वित करने के लिए प्रतिभाओं को आगे आना ही होगा एवं वह करना ही होगा जो परोक्ष सत्ता उनसे कराना चाहती है।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- - आध्यात्मिक कायाकल्प की एक ही शर्त-पात्रता संवर्धन

(कल्प साधना सत्र मार्च 83 )

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

मित्रों, दो दिनों आप यह सुन रहे हैं कि कायाकल्प क्या है? कल्प के लिए आपको क्या करना पड़ेगा? कल्प के लिए दूसरे भी आपको भी कुछ करना पड़ेगा। अगर आप कुछ नहीं करेंगे, केवल पूजा ही करते रहेंगे, भीतर वाले हिस्से को ठीक नहीं करेंगे, केवल कर्मकाण्ड तक ही सीमित रह जायेंगे तो उद्देश्य कैसे पूरा होगा? यह कल्प कोई शारीरिक थोड़े ही है जो क्रियाओं भर से पूरा हो जायेगा। यह आँतरिक कायाकल्प है, इसके लिए आपको अपनी मनःस्थिति को, अपने चिंतन को, अपनी विचारणाओं को, आस्थाओं को, दृष्टिकोण को भी बदलना पड़ेगा। यदि यह कर सकें तो समझिये कि बाहर की सहायता भी आपको जरूर मिलकर रहेगी।

आमतौर से लोग यह समझते हैं कि देवताओं की खुशामद करके और उनसे कुछ प्राप्त करके हम अपना फायदा उठा लेंगे अध्यात्म इसी का नाम है। घर लोगों का यह ख्याल गलत है। देवताओं का अनुग्रह मिलता तो है, यह मैं नहीं कहता कि नहीं मिलता लेकिन बिना शर्त नहीं मिलता। कुपात्रों को भी नहीं मिलता। पात्रता पहले साबित करनी पड़ती है, इसके बाद में ही कहीं ऐसा होता है कि देवता कोई सहायता कर सकें और किसी भक्त या साधक को लाभ पहुँचाने में मददगार बन सकें। आपको भी यही विचार करके चलना चाहिए। आपको देवानुग्रह की आशा तो करनी चाहिए, गुरुजी के आशीर्वाद की आशा तो करनी चाहिए, गायत्री माता की कृपा की आशा तो करनी चाहिए, लेकिन उस आशा के साथ में जो एक शर्त जुड़ी है, उसे भूल नहीं जाना चाहिए। वह शर्त यह है कि आप अगर अपनी पात्रता साबित करेंगे तो देवता आपकी सहायता जरूर करेंगे और यदि आप अपनी पात्रता साबित नहीं कर सकते तो फिर यह विश्वास रखिये कि आपको निराश ही होना पड़ेगा। देवता से किसी ऐसी कृपा की आशा मत कीजिए जो कि कुपात्रों को भी मिल सकती है। देवता बड़े होशियार होते हैं, मंत्र भी बहुत होशियार होते हैं। आप कर्मकाँड करें, यह अच्छी बात है, लेकिन कर्मकाँडों को देखकर देवता थोड़े ही प्रसन्न होते हैं। वे तो कर्मकाँडों के पीछे छिपी हुई साधक की भावनाओं को देखते हैं और अगर भावनायें सही हैं तो निश्चित रूप से वही फल देते हैं जैसा कि आपने सुना है।

इस संदर्भ में आप एक उदाहरण पर ध्यान दीजिए। बादलों को आप देखते हैं न, वे कितनी कृपा करते हैं बादलों के बराबर उदार देवता कौन सा हो सकता है? वह बिना कीमत पानी बरसाता है और चाहे जितना बरसाता है वह समुद्र से लाता है और प्यासी जमीन को पानी पूरा करने के लिए कितना पानी बरसाता है। लेकिन आपको ध्यान है क्या कि उस पानी से कौन लाभ उठा पाता है? आप यह बताइये कि उससे हर कोई फायदा उठा लेता है क्या? हर कोई फायदा नहीं उठा सकता। बादलों से हर जगह हरियाली हो जाती है, लेकिन जो चट्टानें हैं, उन चट्टानों पर एक तिनका भी पैदा नहीं होता। आप नदी में पड़े हुए पत्थरों को जरा देखिये न। नदी के पानी से किनारे नीले हो जाते हैं, जमीन गीली हो जाती है, सब जगह गीले जो जाते हैं पर जो चट्टान-पत्थर का टुकड़ा नदी के बीच में सैकड़ों वर्षों से पड़ा हुआ है, जरा उसे तोड़-तोड़ कर देखिये नदी का उस पर कोई अनुग्रह नहीं दीख पड़ेगा, क्योंकि वह पत्थर है। बादलों के अनुग्रह से भी उसे कोई लाभ नहीं हो सका, क्योंकि वह चट्टान है। जब कि आप देखते हैं कि बादलों के पानी से भूमि में हरियाली पैदा हो जाती है, पर चट्टान में क्यों नहीं पैदा होती। छात्रवृत्ति के बार में आप जानते हैं कि वह फर्स्ट डिवीजन में पास होने वाले छात्रों को सरकार की ओर से दी जाती है। थर्ड डिवीजन में पास होने वाले को दी जाती है क्या? फेल होने वाले को मिलती है क्या? नहीं। साहब, हम पर दया कीजिए, उदारता कीजिए- यह मत कहिए। इस दुनिया में दया का, उदारता का कोई खास महत्व नहीं है।

दुनिया में सर्वत्र पात्रता का महत्व है, उसी की परख की जाती है। आपने देखा होगा कि किसी खूब सूरत लड़की को-कन्या को बहुत से पड़ोसी, आवारा लड़के यह माँग सकते हैं कि आप अपनी लड़की हमारे हवाले कर दीजिए और हमसे शादी कर दीजिए। इस संबंध में आपका क्या ख्याल है कि कोई अपनी जवान लड़की को-जो पढ़ी-लिख भी है, सुन्दर-सुयोग्य भी है, किसी माँगने वाले के सुपुर्द कर देगा क्या? नहीं करेगा। यद्यपि वह बेचारा प्यासा फिर रहा है कि कोई अच्छा जमाई मिल जाये तो हम पैसे भी देंगे, कपड़ा भी देंगे, खुशामद भी करेंगे, बारात भी आयेगी। वह कितना तलाश करता फिरता है। क्यों साहब-तलाश क्यों करते हैं आप जमाता को, जबकि आपके पड़ोस में ही पचास जमाता है और इसके लिए तैयार हैं कि हम भी आपके जमाई बनेंगे। हमको भी आप अपनी लड़की दे दीजिए, फिर बेटी का बाप क्यों नहीं देता उनको? क्यों उनसे मनाकर देता है? क्यों लड़ने-झगड़ने के लिए अमादा हो जाता है? क्यों अच्छे लड़के के पास जाता है, खुशामद करता है, पैसा भी देता है, खुशामद भी करता है, पैसा भी देता है, मिन्नतें भी करता है, ऐसा क्यों होता है? क्या बता सकते हैं आप? सिर्फ एक ही वजह है कि वह जमाता इस लायक है, उसमें इतनी पात्रता है कि वह उस लड़की का गुजारा कर सके, भरण-पोषण कर सके, उस लड़की की ठीक देखभाल कर सके। इसलिए लड़की का बाप ऐसे जमाता को तलाश करता है जो कि इसके योग्य हो। ठीक-बिल्कुल ठीक यही, बात समझिये कि देवताओं के अनुग्रह हर एक के हिस्से में नहीं आ सकते। गुरुओं के अनुग्रह हर एक के हिस्से में नहीं आ सकते। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद को अनुग्रह दिया था। माँगने वाले तो हजारों आदमी उनके पास आते थे और अपनी छोटी-मोटी जरूरतें पूरा कर करके भाग खड़े होते थे। लेकिन वह जो देना चाहते थे वह केवल उनने विवेकानंद को ही को ही दिया, क्योंकि उसके अंदर पात्रता का अंश पाया इसलिए अपनी आध्यात्मिक संपदा उन्हें के सुपुर्द कर दी माता समझती है कि बच्चे को कितना दूध चाहिए, वह उसी के अनुरूप उसे देती है। माता उसकी पात्रता को समझती है।

बादल कहाँ बरसते हैं? वहाँ बरसते हैं जहाँ बरसते हैं? वहाँ बरसते हैं जहाँ कि घनी हरियाली होती है। बादल वहाँ बरसने से इंकार कर देते हैं जहाँ पेड़ नहीं होते। रेगिस्तानों में पानी कहाँ बरसता है? पेड़ अपनी चुँबक शक्ति से बादलों को बरसने के लिए मजबूर कर देते हैं। यही कारण है कि जहाँ पेड़ नहीं होते हैं वहाँ कम पानी बरसता है। लीबिया में कुछ दिन पहले ऐसा ही हुआ था। पेड़ काट डाले गये और उसका परिणाम यह हुआ कि पानी बरसना बंद हो गया और सूखा पड़ गया। जब फिर से पेड़ लगाये गये तब बादलों ने बरसात की, मतलब यह है कि बादल पेड़ों के चुँबकत्व से खिंचते चले आते हैं। खदानें कैसे बनती है, आप जानते हैं क्या? खदानों में कहीं थोड़ा सा लोहा, थोड़ा पीतल, चाँदी, सोना वगैरह होता है और वे अपने चुँबकत्व से दूर-दूर फैले हुए अपने सजातीय कणों को अपनी ओर घसीटते रहते हैं और बड़ी खदानें बनती बढ़ती रहती है। यदि इस साल सौ टन लोहा है तो अगले वर्ष दो सौ टन हो जायगा, उससे अगले साल तीन सौर टन हो जायेगा। क्योंकि वह खदान जो चारों ओर से खींचती रहती है और जमा करती रहती है। ठीक यही बात देवताओं की कृपा के बारे में है। उनकी कृपा की घसीटा जा सकता है, बुलाया जा सकता है। देवता अपने आप देंगे? नहीं? अपने आप कौन दे देगा? आप अपने पैसे किसी को दे देंगे क्या? नहीं। बैंक वाला चाहे किसी को रुपये दे देगा क्या? नहीं। क्यों? क्योंकि बैंक वाला उधार देने से पहले हजार बार यह तलाश करता है कि जिस आदमी को दिया जाने वाला है, वह उस पैसे ठीक इस्तेमाल करेगा कि नहीं करेगा। बैंक का पैसा वापस मिलेगा कि नहीं मिलेगा। यह विश्वास न हो तो कोई देने को तैयार ही नहीं हो सकता। आपने देखा है न समुद्र को-समुद्र के पास कितनी सारी नदियाँ अपना सामान लेकर भागती हैं और उससे कहती हैं कि यह सब हमारा पानी लीजिए। क्यों लीजिये? क्योंकि वे समझती हैं कि हमारे पानी को जमा करने की शक्ति इसमें है और हम जब अपने पानी को जमा करती हैं तो वह एक मुनासिब जगह पर जमा ही नहीं हो जायगा, हमें वापस मिलता भी रहेगा-वाष्पित बादलों से वर्षा के रूप में।

नदियों के तरीके से दैवी शक्तियां भी देती तो हैं, पर हर एक को नहीं दे सकती। आप यह भूल मत जाइये कि जो कोई माँगेगा, देवता उसी को दे देंगे, जो नारियल चढ़ा देगा उसी को दे देंगे। इस तरह बरगलाने और फुसलाने से आप देवता के अनुग्रह नहीं प्राप्त कर सकते। कपड़े के तरीके से-कलेवर के तरीके से क्रियायें आवश्यक तो हैं, चाकू की तरीके से, लेकिन सामान तो हो आपके पास। चाकू से कैसे काटेंगे कर्म को? इसलिए केवल क्रियायें बहुत थोड़ा सा ही काम करती हैं। जो कर्मकाँड आप करते हैं-जप करते हैं, और क्रि से करते हैं यह हैं तो महत्वपूर्ण और जरूरी भी, लेकिन आप यह ख्याल मत कीजिए कि केवल जप करने से या अन्न कम खाने से आप कोई लंबे-चौड़े फायदे उठा सकेंगे। आपको अपनी मनःस्थिति को जरूर बदलना पड़ेगा। फूल जब खिलता है तब आपने देखा होगा कि उसके ऊपर कितने भौंरे आकर बैठ जाते हैं। कितनी तितलियाँ और शहद की मधुमक्खियों के गुच्छे मँडराने लगते हैं। कब आते हैं? जब फूल खिलता है तब फूल के तरीके से अगर आप अपने जीवन को खिला सकते हों, अपनी पात्रता को विकसित कर सकते हैं, अपनी मनःस्थिति में हेर फेर कर सकते हो तो आपको हम यकीन दिला सकते हैं कि देवताओं के अनुग्रह आपको जरूर मिलेंगे जो आप यहाँ प्राप्त करने आये हैं। आपके गुरुओं के आशीर्वाद, हमारे आशीर्वाद मिलेंगे और दूसरे गुरु भी आपके पास आयेंगे और आपकी आवश्यकता को जरूर पूरी कर देंगे।

पात्रता की परख हर जगह होती है। आप इस ख्याल में मत रहिए, मिन्नतें मत माँगिये, रगड़िये, झोली मत फैलाइये और यह उम्मीदें मत कीजिए कि कोई आदमी या देवता आपकी पात्रता को देखे या देवता आपकी पात्रता को देखे बिना केवल आपकी क्रिया-कृत्यों से प्रसन्न हो करके आपको निहाल कर जायेगा। ऐसा हो नहीं सकता। आपको इतिहास मालूम है न शिवाजी को ‘भवानी’ नाम की एक तलवार मिली थी। क्यों मिली थी? इसलिए मिली थी कि उसने अपनी पात्रता स्थापित की थी। उनके गुझ ने सिंहनी का दूध दुहने के लिए परीक्षा ली थी और कहा था आप जाइये सिंहनी का दूध लाइये। देखा गया कि वह इतना निष्ठावान है कि अपने कर्तव्य के लिए अपने प्राण भी दे सकता है तो भवानी से उन्होंने प्रार्थना की कि आप ऐसी तलवार दीजिए जो कि अजेय हो-अक्षय हो। अर्जुन को गाण्डीव कहाँ से मिला था? इन्द्र देवता ने दिया था। अर्जुन को ही क्यों दिया औरों को क्यों नहीं दिया। इन्द्र ने अर्जुन को देने से पहले इम्तहान लिया था कि इतनी कीमती चीज विश्वस्त आदमी को प्रामाणिक आदमी को ही दी जाये, हर एक को नहीं दी जाये। आपको याद होगा कि जब अर्जुन वहाँ गये थे तो उनका इम्तहान लेने के लिए इन्द्रलोक की सबसे खूबसूरत युवती उर्वशी को भेजा गया था। वह ऐसे हावभाव करने लगी और उससे शादी की बात कहने लगी। अर्जुन ने कहा-”आप तो हमारी माँ के बराबर हैं और हम आपके चरणों को धूल अपने सिर पर रखते हैं। आप यह समझ लीजिये कि हम ही आपकी संतान है” इस जवाब से प्रसन्न होकर इन्द्र ने यह समझ लिया कि यह व्यक्ति इस लायक है कि इसको गाण्डीव दे देना चाहिए। इन्द्र को जब यह विश्वास हो गया था कि अर्जुन गाण्डीव के लायक है तो उन्होंने उसे प्रसन्नतापूर्वक दे दिया।

आपको बापा जलाराम की कहानी मालूम है न। भगवान उनके यहाँ आये थे और उनको एक झोली दे गये थे जिसमें से अक्षय अन्न के भंडार निकलते थे। यह वरदान भगवान ने दिया था जो अभी भी है। आप यदि गुजरात के वीरपुर नामक गाँव में कभी पहुंचें तो आप को एक सिद्ध पुरुष जलाराम बापा का एक स्थान मिलेगा। वहाँ अन्न की एक झोली अभी भी टँगी हुई है जो भगवान ने उन्हें दी थी। जलाराम बापा की इच्छा थी कि हमारे दरवाजे पर से कोई भी खाली हाथ न जाने पाये। भगवान ने उनकी इच्छा पूरी की उन्हीं की क्यों पूरी की, औरों की क्यों नहीं की? इच्छायें, मनोकामनायें तो सभी करते हैं, तो सभी करते हैं, पर उनकी इच्छा पूरी क्यों नहीं करते भगवान? क्योंकि जलाराम बापा इम्तहान में पास हो गये थे। कौन से इम्तहान में पास हो गये थे? उन्होंने दो प्रतिज्ञायें की थीं कि जलाराम मेहनत-मजूरी करेंगे और खेती में से अनाज उगायेंगे और उनकी पत्नी ने प्रतिज्ञा की थी कि पेट भरने के बाद में जो कुछ भी अनाज हमारे पास बचेगा, उसे दुखियारों को, संतों को खिलाते रहेंगे। उनकी स्त्री खाना पकाती रहती थी सारा दिन और बापा जलाराम खेती-बाड़ी करते रहते थे। वह अनाज पैदा करते थे और उनकी धर्म पत्नी खिलाती रहती थी। इस बीच पेट भरने के लिए जो मिल गया उसी से गुजारा कर लिया बस। संत की यही निशानियां हैं कि उसका चरित्र ऊँचा न हुआ तब? तब सभी कथा-कीर्तन, भजन-पूजन जप-तप अनुष्ठान बेकार हैं। नहीं साहब हम तो अखण्ड कीर्तन करते हैं, जागरण करते हैं, जप-तप करते हैं। आप यह सब करते रहते हैं तो आपको मुबारक, लेकिन पहले आप सिर्फ एक जवाब दीजिये कि आप अपनी पात्रता को विकसित करते हैं कि नहीं? भगवान सिर्फ दो ही बातें देखते रहते हैं। और वे अपनी मानसिक पवित्रता और आपकी पूजा मतों अपने मन को धोने का एक तरीका।

मित्रों, भगवान को बरगलाया नहीं जा सकता, उसे फुसलाया नहीं जा सकता। भगवान के साथ में ब्लैकमेलिंग नहीं की जा सकती। भगवान के साथ में जुड़ने का एक ही सीधा रास्ता है कि अपनी पात्रता साबित करें भागीरथ के तरीके से। भगीरथ गंगा जी को माँगने गये थे। उन्हें पानी की जरूरत थी अपनी फसल के लिए और अपने बाप-दादाओं का उद्धार करने के लिए भी, साथ में इससे भी बड़ी जरूरत थी कि सारे संसार को पानी मिलना चाहिए। भगीरथ निस्वार्थ थे, उनने तप किया। यदि यह कारण रहा होता कि भगीरथ गंगाजी को अपने पास बुलायेंगे, पानी को स्टोर करेंगे हर आदमी से पैसा वसूल करेंगे और गंगा जी से अपना उल्लू सीधा करेंगे, तो आप विश्वास रखिये तब गंगा जी कभी भी भगीरथ के चुगुल में सने के लिए तैयार न हुई होती। उनने कारण की खोज की और उस आदमी की नियति को जाना। नीयत का अर्थ है-पात्रता, चिंतन का अर्थ है-पात्रता चरित्र का अर्थ है-पात्रता। पात्रता, आपको विकसित करनी ही चाहिए। देवताओं के अनुग्रह में कोई कमी नहीं है, यदि कमी है तो आपमें पात्रता की। गंगा हिमालय से जब निकल कर चली और बोली कि अब हम लोगों की प्यास बुझायेंगी, पशु-पक्षियों की प्यास बुझायेंगी, खेतों में हरियाली पैदा करेंगी, अब हिमालय में रहने और आपकी गोदी में ठहरने का हमारा जब जरा भी मन नहीं है, तब हिमालय ने बहुतेरा समझाया कि आप तो यहीं रहिए यहाँ क्या कष्ट है आपको? गंगा ने कहा नहीं, कष्ट का सवाल नहीं है, पर अब हमारी आत्मा नहीं मानती हैं हमारी आत्मा कहती हैं कि हमको अपने को श्रेष्ठ कामों में खपा देना चाहिए-बस-चल पड़ीं गंगा। लोगों ने यह भी कहा कि आप सूख जायेंगी, खाली हो जायेंगी और आप दिवालिया हो जायेंगी। लेकिन गंगा ने कहा-तो दिवालिया होने में क्या कोई हर्ज है? जिंदगी एक अच्छे काम में लग जाये तो कोई हर्ज है क्या? जब वह चल पड़ीं तो हिमालय ने देखा कि ऐसी शानदार छोकरी, ऐसा शानदार उसका मन, ऐसी शानदार उसकी भावना, इसको कमी नहीं पड़ने देना चाहिए। हिमालय ने उसकी यकीन दिलाया कि बेटी। तु बराबर बहती रहना, तुम्हारे जल स्रोत को सूखने का कभी भी मौका नहीं आयेगा। हमारी बर्फ बराबर गलती रहेगी और तुम्हारा पेट और तुम्हारी जरूरतों को पूरा करती रहेगी। लाखों वर्ष हो गये गंगा को बहते हुए, पर क्या कुछ कमी पड़ी क्या? कभी नहीं पड़ी। देवताओं के अनुग्रह पाने के यही तरीके हैं।

आप देवताओं का अनुग्रह पाने के लिए कल्प साधना कर रहे हैं। आपको विश्वास होगा कि गायत्री माता अनुग्रह करेंगी। जरूर अनुग्रह करेंगी गायत्री माता का स्वभाव ही है कि वह जरूर सहायता करती हैं यह भी आपको विश्वास होगा कि गुरुदेव आशीर्वाद देंगे, अपने पुण्य का एक अंश देंगे। बिलकुल यकीन रखिये, हमने जिंदगी भर अपने पुण्य के अंश बाँटे हैं। हमें बाँटने में बड़ी खुशी होती है, पर हमको खिलाने में खुशी होती है। हमारे ऊपर एक और शक्ति छायी हुई है जिसकी वजह से ब्रह्मवर्चस् बना है और यह शांतिकुंज बना हैं। जिनकी प्रेरणा से यह कल्प साधना शिविर लगाये हैं और जिनकी इच्छा से आपको यहाँ बुलाया गया है। वह आपको खाली हाथ जाने देंगे क्या? नहीं। यह तीनों शक्तियां ऐसी हैं जो बराबर आपकी सहायता करने के लिए अमादा हैं और सच्चे मन से चाहती हैं कि आपको कुछ दें। गाय सच्चे मन से चाहती है कि हम अपने बच्चे को अपना सारा का सारा दूध पिला दें। जो भी कुछ वह खाती है और जितना दूध बनता है वह चाहती है कि हम अपने बच्चे को पूरा का पूरा दूध पिता दें। लेकिन बच्चा तो उसका होना चाहिए। बच्चा किसी और का हुआ तब? गधी का बच्चा हुआ तब? तो क्यों पिलायेगी गाय। वह गाय का ही बच्चा होना चाहिए। आपको अध्यात्म का बच्चा होना चाहिए, अर्थात् आपका चिंतन, चरित्र और आपका व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए जिससे कि देवता हमेशा आपकी सहायता करते हुए चले जायँ। इससे कम में बात बनेगी नहीं। इसके लिए आपको त्याग करना ही चाहिए। आपको अपनी बुराइयाँ छोड़नी ही चाहिए, और आपको अपने दृष्टिकोण में महानता साबित करनी ही चाहिए।

मित्रों, भगवान को हम क्या कहें, वह देता तो बहुत है, लेकिन वह उस परीक्षा के बिना कहाँ देता है। आपको सुदामा जी का किस्सा याद होगा कि वह एक बार श्रीकृष्ण भगवान से कुछ माँगने के लिए गये थे और सुदामा जी के माँगने से पहले ही श्रीकृष्ण ने उनकी यह परीक्षा ले ली थी कि यह हमको भी कुछ दे पायेंगे कि नहीं। उनकी पोटली में चावल रखा हुआ था जिसे देखते ही कृष्ण भगवान ने कहा-पहले चावल की पोटली हमारे हवाले कर दीजिए, फिर बाद में करना बात। आप अपनी पोटली नहीं खाली कर सकते, तो हम क्यों आपके लिए खाली करेंगे? हम क्यों आपको सहायता देंगे? उन्होंने चावल की पोटली को उनके हाथों से छीन लिया और और छीनने के बाद में उसको अपने पास रखा। बस वही चावल बढ़ते हुये चले गये और उन्हीं चावलों के बदले सुदामा जी को वह धन मिल गया जिसके बारे में आपने सुना होगा कि द्वारिका जी से सारा धन सुदामा जी के पास चला गया था। वे चावल भगवान के के खेत में बोये गये थे। यदि वह चावल लेकर सुदामा जी द्वारिका नहीं गये होते, तब उनको खाली हाथ आना पड़ता। आप देंगे नहीं तो ले कहाँ से जायेंगे? इसलिए पहले देने की बात पर विचार कीजिए, परिशोधन की बात सोचिए। पवित्रता की बात सोचिये। अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने की बात सोचिये। इतना अगर आप आप सोच सकते हों, तो फिर आप देखना किस कदर आपको भगवान की सहायता मिलती है? देवताओं की कैसी सहायता मिलती है? आपके मंत्र कैसे चमत्कारी सिद्ध होते हैं? आपको व्रत और अनुष्ठान से कितना ज्यादा फायदा मिलता है? भगवान तो ऐसे ही हैं जो सबको निहाल कर देते हैं। उनने द्रौपदी को निहाल कर दिया था। आपको ध्यान है कि नहीं, भगवान ने द्रौपदी को कितना वस्त्र दिया था? लेकिन अगर आप माँगे तो क्या आपको मिलेगा? नहीं देंगे। तो फिर ऐसा पक्षपात क्यों? मित्रो, एक ही बात है कि द्रौपदी ने यह साबित कर दिया था कि उसको मिलने का हक है। आप भी साबित करिये कि आपको भी मिलने का है। आपने द्रौपदी के जीवन की वह घटना सुनी होगी कि जब एक बार वह जमुना स्नान कर रही थीं, तो पास में ही एक महात्मा जी स्नान कर रहे थे। उनके पास एक लंगोटी नहाने की और एक पहनने की। हवा का एक झोंका आया और एक लंगोटी बह गयी। जिसको पहने थे वह फट गयी। द्रौपदी ने देखा कि महात्मा जी की एक लंगोटी बह गयी और दूसरी फट गयी है और वह शर्म के मारे शरीर को छिपाकर झाड़ी के पीछे बैठ गये हैं। द्रौपदी का मन पिघल गया कि उनकी सहायता करनी चाहिए। उन्होंने अपनी साड़ी के दो टुकड़े किये और आधा टुकड़ा महात्मा जी को दे दिया और कहा-आप इससे अपने लिए दो लंगोटियाँ बना लीजिए। आपकी भी लज्जा ढ़क जायगी और आधी साड़ी से हमारा भी काम बन जायेगा।

यह क्या थी? द्रौपदी की उदारता थी जो उनके कपड़े के साथ में जुड़ी थी। कपड़े की कीमत क्या हो सकती है? कपड़ा तो जरासी कीमत का था, लेकिन जब भगवान के भंडार में चला गया तो लाखों गुना हो गया। भगवान ने देखा कि जो आदमी उदार है, उसके लिए उदार होना चाहिए। जो आदमी दयालु है, उसके लिए दयालु होना चाहिए। जो आदमी चरित्रवान है उसके लिए चरित्रवान होना चाहिए। जब दुशासन उसे नंगी कर रहा था जो भगवान ने द्रौपदी के लिए कितना सारा कपड़ा भेजा था, कितनी सारी सहायता की थी, यह आपने भी पढ़ा-सुना होगा। आप से मुझे यही कहना था कि आप यहाँ देवता का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए आये हैं और अगर आपको अनुदान पाने की इच्छा है तो आपकी यह इच्छा मुनासिब है-सही है आप किसी गलतफहमी में नहीं है, किसी अंधविश्वास में जकड़े हुए नहीं है। प्राचीन काल के असंख्य इतिहास ऐसे हैं जिसमें देवताओं ने सहायता की है, अनुग्रह किये हैं। आपको जरूर सहायता मिलेगी, पर एक शर्त को भूलियेगा मत। अगर आप उस शर्त को भुला देंगे तो आप घाटे में रहेंगे, आप निराश होंगे। फिर आप गाली देंगे और सोचेंगे कि मंत्र मिथ्या होते हैं, देवता मिथ्या होते हैं। क्यों मिथ्या होते हैं? अगर आपने अपनी पात्रता का विकास नहीं किया तब, चिंतन, चरित्र व्यवहार को उत्कृष्ट और उदार नहीं बनाया, तब आप घाटे में रहेंगे। इसके लिए ही हम आपको यह अनुष्ठान करा रहे हैं ताकि आपका चिंतन बदले, व्यक्तित्व कायाकल्प हो जाये, तभी देवता आपकी सहायता करेंगे। आप अपने भीतर को बदलने की कोशिश कीजिए। अपना चिंतन बदलिए, अपना चरित्र बदलिए, अपने जीवन का ढाँचा और ढर्रा बदलिये फिर देखिये आपकी बदली हुई परिस्थितियों में जो देवता नाखुश थे-मुँह मोड़े हुए थे, किस तरह आप के गुलाम हो जाते हैं कैसी आपकी सहायता करते हैं? कैसे आपको छाती से लगाते हैं? कैसे आपको निहाल करते हैं? यही अनुभव हमारे जीवन का भी है और इससे आपको भी लाभ उठाना चाहिए। आप अपने आपको खाली कीजिए और निहाल होकर जाइये। बस इतना ही कहना था मुझे आप से।

ॐ शांतिः।


अपनों से अपनी बात- - पराशक्ति का अवतरण अभिषेक अनुष्ठान

दृश्य जगत को आध्यात्म की भाषा में अपरा प्रकृति और अदृश्य जगत को परा सत्ता कहते हैं। स्थूल तथा दृश्यमान होने पर भी अपरा प्रकृति निरंतर बदलती रहने वाली गमाया मात्र है। सामान्य बुद्धि के लोग उसे ही सब कुछ समझते हैं उसी की लोभ लिप्सा में पड़े रहते हैं इसीलिए उसे माया शब्द से संबोधित किया गया है, पर हमारे ऋषियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखा और पाया कि सब कुछ जान पड़ने वाला अपरा प्रकृति परासत्ता की सामान्य सी देन है। सच यह है कि न केवल भौतिक जगत की समृद्धि जीवन का संपूर्ण उल्लास, सारी शक्ति, अपार वैभव, और अभूतपूर्व रहस्य सभी पराप्रकृति में सन्निहित हैं। परा सर्वस्व है अपरा तो उसकी क्षणभंगुर छया लेने की तरह ही संसार की समस्त समृद्धि, वैभव और विभूतियाँ परा जगत से करतल गत की जा सकती है। इसीलिए इस महाशक्ति को समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली चमत्कारिक सत्ता, कामधेनु और कल्पवृक्ष कहा गया है आध्यात्मिक प्रयोजनों की पूर्ति भी उसी में सन्निहित होने के करण उसे अमृत और ब्रह्म विद्या भी कहा गया है। उपनिषद् उसी की व्याख्या करते हैं। मूलाधार से निकलने वाली नाद स्वरूपा शक्ति चार प्रकार की वाणियों में से पहली स्थूल कानों से न सुनाई देने वाली किंतु सूक्ष्म कर्णेंद्रियों से अनहद नाद के रूप में आत्मा विभोर समाधि सुख प्रदान करने वाली सत्ता भी वही है। एक शब्द में इसी पराशक्ति को गायत्री कहते हैं। “इसी पराशक्ति को गायत्री कहते हैं। “त्रायते गावः इति गायत्री” गायन करने वालों का परित्राण करती है इसलिए लिये गायत्री कहा है। भौतिक जगत की सभी सुख सुविधायें, सामर्थ्य सन्निहित रहने के कारण ही इस देश में सबसे अधिक महत्व गायत्री उपासना को मिला। यह कहने वाली बात नहीं कि इस देश को जग गुरु और सोने की चिड़िया होने का गौरव भी कारण मिला। अथर्ववेद ने इसी पराशक्ति की अभ्यर्थना में ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ताम् पावमानी द्विजानाम् आयुः प्राणं प्रज्ञाँ पषुँ कीर्ति द्रविणम् ब्रह्मवर्चसम् ब्रह्मलोकम्” अर्थात् वेदों की जननी माँ गायत्री की उपासना करने वाले आयु (नीरोग) प्राण, यश, धन संपत्ति का सुखोपभोग करते हुए ब्रह्मवर्चस् की प्राप्ति करते ही भगवान तक जा पहुँचते हैं

इसीलिए गायत्री को काम बीज, ब्रह्म बीज भी कहा गया है। वह परमात्मा के नारी स्वरूप में शक्ति या व्यवस्थापिका के रूप में कार्य करती है पिता की अपेक्षा माँ का स्नेह बालक के लिए सर्वाधिक अभीष्ट है। माँ का प्यार मिल तो पिता का ऐश्वर्य मिलने में क्या विलंब लगे। सच बात तो यह है कि इस देश में मातृ सत्ता प्रधान व्यवस्था इसी तथ्य का पर्याय है।

इस महान पराशक्ति भगवती गायत्री को देश भू गया आज की समस्त पीड़ा पतन पराभव इसी का प्रतिफल है। इस देश का जाति का सौभाग्य कहा जाना चाहिए कि मन्दराचल पर्वत पीठ पर रखकर शेषनाग की रस्सी द्वारा समुद्र मंथन और चौदह रत्नों की खोज का कच्छप अवतार कार्य परम पूज्य गुरुदेव ने पूरा किया। जीवन को चौदह विभूतियों से अलंकृत करने वाली पराशक्ति भगवती गायत्री को कैदखाने से बाहर निकाल कर जन-जन के लिए सुलभ कर दिया। एक तरह से ब्रह्म विद्या के लड़खड़ा गये आधार को ही उन्होंने ठीक कर दिया। आज सारे संसार में गायत्री महाशक्ति का तीव्रगति से विस्तार हो रहा है। यही युग परिवर्तन का आधार है।

व्यक्तिगत उपासना अनुष्ठान से व्यक्तिगत जीवन समुन्नत होता है। व्यक्ति से परिवार, समाज और राष्ट्र बनते हैं इस दृष्टि से गायत्री उपासना का विस्तार आज की अनिवार्यता है। यित्र स्थापना, देव स्थापनाएं, घर मंदिर कार्यक्रम उसी की पूर्ति में किए जा रहे प्रयास हैं, पर आज के उलटे समय को उलट कर सीधा करने की आवश्यकता है, वह एकाकी उपासना मात्र से पूरा नहीं होगा उसके लिए बड़े सामूहिक अनुष्ठानों की आवश्यकता है। दोनों नवरात्रियों पर देश भर में किए जाने वाले अनुष्ठान इस तथ्य के प्रमाण हैं। प्राचीनकाल से ही बड़े और सामूहिक अनुष्ठानों का प्रचलन रहा है संभव है तब परिस्थितियाँ गंभीर न होने के कारण है। छोटे-छोटे हों पर पुराणों में जिस दुर्गावतरण का उल्लेख है वह देवताओं-देव प्रवृत्ति के लोगों की सामूहिक शक्ति उपासना ही रही है। सतयुग में मधुकैटभ द्वापर में शुंभ निशुंभ और त्रेता में महिषासुर का नाष जिस शक्ति द्वारा वर्णित है वह और कुछ नहीं अपितु पराशक्ति का अनुष्ठान प्रधान उपार्जन ही है महिषासुर अर्थात् पार्थिव-प्रवृत्ति-लोभ लालच, लिप्सा नारी जीवन के प्रति आत्मा की भावना उसी से अपराध अवाँछनीयताएँ बढ़ती हैं अराजकता बढ़ती है। दुर्गावतरण ज्ञान साधना ज्योति बोध शक्ति संचय का प्रतीक है वही पराशक्ति है वही गायत्री है।

आज के मधुकैटभ और महिषासुर पूर्ववर्ती तीन युगों से अधिक प्रचंड हैं उनके मारने को देव सेना और शक्ति अवतरण भी उसी अनुपात में विराट् होना अत्यावश्यक है। परम पूज्य गुरुदेव ने 1988 में 12 वर्षीय युग का संधि महापुरश्चरण की घोषणा उसी के लिए की। संयोग कहें कि ऐतिहासिक तथ्य भी उसी तरह जुड़ते जा रहो हैं 1990 का श्रद्धांजलि, समारोह अपने युग के ब्रह्मा से “महाविनाश के राक्षस से देवताओं से बचाओ” प्रार्थना थी। 1’999 शपथ समारोह देवताओं का एक-एक बूँद रक्त देने की तरह सवालाख मूर्धन्य युग निर्माण अवतरण अनुष्ठान युग संधि महापुरश्चरण द्वारा महाशक्ति के अवतरण की तैयारी है। 1995 में उसी की प्रथम पूर्णाहुति 4-5-6-7 नवम्बर कार्तिक पूर्णिमा को पूज्य गुरुदेव की जन्मभूमि आँवलखेड़ा (आगरा) में होने जा रही है। यह परमपूज्य गुरुदेव की घोषणा थी। 1-नवम्बर को वहाँ संपन्न शक्ति कलश स्थापना समारोह एक यादगार कार्यक्रम था जिसमें सारे देश के मूर्धन्य कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। मथुरा-आगरा की शोभा यात्राओं ने लोगों को झकझोर कर रख दिया। यही राष्ट्र की कुँडलिनी महाशक्ति का जागरण मनुष्य में देवत्व के अभ्युदय और धरती स्वर्ग के अवतरण का ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान है। उसकी महिमा में जितना लिखा जाये कम है। उसके अभूतपूर्व पुण्य फल भी सुनिश्चित समझे जाने चाहिए।

कलश स्थापना के तत्काल बाद कार्तिक पूर्णिमा 18 नवम्बर 1994 से कार्तिक पूर्णिमा 7 नवम्बर 1995 तक के लिए गायत्री शक्तिपीठ आँवलखेड़ा में इस प्रथम पूर्णाहुति के परिप्रेक्ष्य में अखण्ड तप प्रारंभ किया जा रहा है यह राष्ट्रव्यापी अनुष्ठान है, सारे राष्ट्र की कुँडलिनी का जागरण है अतएव समूचा राष्ट्र इसमें भाग लेगा। सुविधा और व्यवस्था की दृष्टि से एक-एक प्राँत को एक-एक माह बाँटा जा रहा है। कुछ बड़े प्राँतों को दो या तीन खंडों में विभक्त किया गया है। निम्न तालिका के अनुसार लोग आँवलखेड़ा (आगरा) पहुंचें और इस जप यज्ञ में भाग लें। पुरुष और महिलाएँ सभी समान रूप से भाग ले सकती हैं:-

अखण्ड जप सूर्योदय से सूर्यास्त तक चलेगा। एक बार में न्यूनतम 24 व्यक्ति ज पके लिए बैठेंगे। दो घंटे प्रातः दो घंटे साँय काल इस तरह प्रति व्यक्ति चार घंटे प्रतिदिन का अनुष्ठान हुआ। बारह घंटे के लिए 72 व्यक्ति अनिवार्य रूप से प्रतिदिन भाग लेंगे अधिक संख्या हो सकती है कम नहीं। 8-10 व्यक्ति बुखार बीमारी की स्थिति में रिलीवर के रूप में रहेंगे। न्यूनतम 80 साधकों को वहाँ प्रतिदिन उपस्थित रहना अनिवार्य है। एक प्राँत या एक जोन से एक माह के लिए कुल 80 व्यक्ति निकाल लेना कठिन बात नहीं है एक व्यक्ति न्यूनतम 10 दिन तो रहे ही-इस तरह एक माह के लिए 240 व्यक्ति पर्याप्त हो जायेंगे। शाखायें, शक्तिपीठें प्रज्ञा मंडल, महिला मंडल यह दायित्व सँभाले और भाग लेने वाले पते शांतिकुंज हरिद्वार भेजें। लोग सीधे आंवलखेड़ा पहुँचे। आँवलखेड़ा के लिए आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन या बिजली घर बस अड्डे के पास-ठीक किले के सामने 15-15 मिनट में बसें मिलती हैं। आगरा जलेसर मार्ग स्थित आँवलखेड़ा का मार्ग का तीन साढ़े तीन रुपये मात्र होगा। आवास भोजन आदि के वहाँ सभी प्रबंध हैं पर अपने पहनने, ओढ़ने, बिछाने, के कपड़े अवश्य ले जावें। वृद्ध बीमार छोटे बच्चे न जावें। सुविधा की दृष्टि से कोई किसी अन्य प्राँत के समय पहुँच जाता है तो हर्ज नहीं। यज्ञ, हवन, पूजन आदि की सभी सामग्री वहाँ उपलब्ध होगी। प्रति पूर्णिमा-अमावस्या ग्राम प्रदक्षिणा, सामूहिक सफाई और पूर्णाहुति हवन तथा रात दीपयज्ञ, सद्वाक्य लेखन, गीत संगीत होगा। परम पूज्य गुरुदेव की जन्मभूमि में प्रथम पूर्णाहुति समारोह के इस अखण्ड जप यज्ञ में भाग लेने के पुण्य से कोई भी परिजन वंचित न हरे।


नवयुग से संबंधित पूज्यवर के उद्गार

सभी परिजन अपने चिंतन में पवित्रता, उत्कृष्टता के उदार सिद्धांतों का समावेश करें। वैसी कल्पनायें करें। वैसी ही योजनायें और गतिविधियों को उसी स्तर की विनिर्मित होने दें। क्योंकि नया युग अब सन्निकट ही है।

अनगढ़ लोगों सुगढ़ बनाने में अपना कौशल माने। मैले कपड़े को साबुन और स्वच्छ जल से धोने का प्रयत्न करें। अनीति का जवाब अनीति नहीं हो सकता। इससे तो आक्रमण-प्रत्याक्रमण का कुचक्र चल पड़ता है और अंत भयावह ही होता है।

चिकित्सक मरीजों के प्रति उदार रहते हैं। वे आवेश में क्या कहते हैं इस पर ध्यान नहीं देते। वरन् रोगी को बचाने और रोग को मारने का ही प्रयत्न करते रहते हैं।

पागलखाने के डाक्टर अपने अस्पताल के पागलों से जैसा व्यवहार नहीं करते। बदले की नीति की नीति नहीं अपनाते। वरन् वह तरीका अपनाते हैं जो एक डाक्टर को मरीजों के साथ अपनाना चाहिए। दोनों एक जैसा आचरण करें तो डाक्टर और मरीज का अंतर कहाँ रहा।

बालक भूल करते हैं। उनके बालकपन स्थिति में स्वाभाविक भी है किंतु बड़े गलतियों को उदारतापूर्वक सहते हैं साथ ही उन्हें वह तरीका प्यार पूर्वक सिखाते हैं जिससे वे उस प्रकार की भूल आगे न करें। यही रीति नीति विचारशीलों द्वारा स्तर वालों के साथ अपनाई जाती है।

आवेश में अनर्थ ही बन पड़ता है। किस स्तर का दोष किस प्रकार के उपचार से सुधर सकता है। इसे सोचने का अवसर ही आवेशग्रस्त को नहीं मिला। इसलिए सुधार के लिए जिस स्तर की प्रताड़ना आवश्यक समझी जाय, उसे भी इसी आधार पर किया जाय जैसा कि डाक्टर नपा-तुला नश्तर फोड़े में दिलवाता है।

अपनी बात सही-दूसरे की गलत यह मान्यता हटवादी है। तर्क तो मनुष्य अपनी ही मान्यता के पक्ष में गढ़ता है इसलिए मतभेदों को उदारतापूर्वक सुलझाना चाहिए। मात्र अपने को ही सही और समझदार मानते रहने पर सत्य के निकट तक पहुँच सकना संभव नहीं होता। सही निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए न्यायाधीश जैसी निष्पक्ष मनःस्थिति होनी चाहिए।

पिछले दिनों संकीर्णता का दौर रहा है। विलगाव को प्रश्रय मिलता रहा है। एकता के लक्ष्य तक पहुँचने की बात नहीं सोची गई। इसलिए जातिवाद, मतवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, कबलावाद आदि के अनेक रूपों में संकीर्णता पकती रही है। इससे विग्रह बढ़े हैं। अब इस भूल का सुधार होना चाहिए।

विज्ञान के बढ़ते साधनों में अब दुनिया को बहुत छोटी कर दिया है। दूरवर्ती देश, द्वीप अब संचार साधनों और वाहनों के माध्यम से अति निकट आ गये हैं। इतने समूचे संसार को अब अति निकट ला दिया है। एक गाँव या परिवार की तरह अब हम सब का चिंतन और समाधान इसी दिशा में बढ़ना चाहिए।

अगले दिनों समस्त संसार एकता और समता के सिद्धाँतों पर विनिर्मित होगा। इसके बिना और कोई चारा नहीं। घर तभी चलता है जब परिवार के सब लोग एक होकर रहें एक रीति−नीति अपनायें। बिखरने से ही तो सभी का निर्वाह कठिन हो जायेगा।

अगले दिनों समस्त संसार एक देश बनकर रहेगा। एक भाषा होगी, एक व्यवस्था और कानून चलेगी। विचारों में एकता और आत्मीयता का गहरा पुट रहेगा। वह समय जितना निकट आता जायेगा, उसी अनुपात से सुख−शांति बढ़ती जाएगी। नवयुग के लिए हम सब स्वयं को तैयार करें।


VigyapanSuchana

तिथियाँ दिनाँक प्राँत

1- कार्तिक पूर्णिमा से मार्गशीर्ष पूर्णिमा 18 नवम्बर से 17 नवम्बर उत्तरप्रदेश (पूर्वी)

2- मार्गशीर्ष पूर्णिमा से पौष पूर्णिमा 7 दिसम्बर से 16 जनवरी हरियाणा, हिमाचल, जम्मू पंजाब, दिल्ली

3- पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा 15 जनवरी से 15 फरवरी छत्तीसगढ़ अंचल

4-माघ पूर्णिमा से फाल्गुन पूर्णिमा 15 फरवरी से 17 मार्च महाराष्ट्र

5-फाल्गुन पूर्णिमा से चैत्र पूर्णिमा 17 मार्च से 15 अप्रैल राजस्थान

6- चैत्र पूर्णिमा से बैसाख पूर्णिमा 15 अप्रैल से 14 मई गुजरात (प्रथम)

7-वैशाख से ज्येष्ठ पूर्णिमा 14 मई से 13 जून विंध्याचल

8-ज्येष्ठ पूर्णिमा से गुरुपूर्णिमा 13 जून से 12 जुलाई उत्तरी बिहार

9-गुरु पूर्णिमा से श्रावणी पूर्णिमा 12 जुलाई से 10 अगस्त दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर प्रान्त, बंगाल, उड़ीसा

10-श्रावणी पूर्णिमा से भाद्रपद पूर्णिमा 10 अगस्त से 8 सितम्बर मालवा, निमाड़

11-भाद्रपद पूर्णिमा से शरद पूर्णिमा 8 सितम्बर से 8 अक्टूबर दक्षिण बिहार

12-शरद पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा 8 अक्टूबर से 7 नवम्बर उत्तर प्रदेश (पश्चिम) गुजरात द्वितीय

*समाप्त*