रोजमर्रा के जीवन में हम देखते हैं कि तनिक सी प्रतिकूलता सामने आते ही हम लड़खड़ा जाते हैं । होशोहवास खो बैठते हैं तथा किंकर्तव्य विमूढ होकर कभी-कभी वह कर जाते हैं, जो नहीं करना चाहिए था। विशेष रूप से मानवी-गरिमा को धारण किए इस मानुष तन धारी देवत्व से भरी-पूरी सत्ता के कारण तो कदापि नहीं। वह है आत्मघात-पलायनवाद या प्रगतिशील चिंतन से मुख मोड़कर अपनी दिशाधारा उलटी कर देना। ऐसा क्यों होता है ? इस पर मनःशास्त्री-दार्शनिक कहते हैं कि यह मनुष्य का मनोबल, संकल्प शक्ति गिर जाने से, आशंकाओं-कुकल्पनाओं-के भय के कारण अधिकाधिक होता देखा जाता है।
आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि आदमी का मनोबल चुक गया हैं जूझने की अदम्य सामर्थ्य जो उसमें विद्यमान है, वह प्रायः क्षीण होती चली जा रही है तथा ऐसी स्थिति में वह जरा सा भी प्रतिकूलता का आघात सहन नहीं कर पाता। यह आघात-यश-कीर्ति के क्षेत्र में भी हो सकता है जिसमें अहं पर गहरी चोट लगी हो, धन-समृद्धि के क्षेत्र में भी हो सकता है जिसमें अच्छा-खासा घाटा मनुष्य को हुआ हो, विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में भी हो सकता है जिसमें जैसी अपेक्षा थी, वैसे परिणाम हस्तगत नहीं हुए अथवा किसी कारण असफलता का सामना करना पड़ा तथा बल-आरोग्य के क्षेत्र में भी हो सकता है, जब शरीर तो प्रत्यक्षतः स्वस्थ था पर वातावरण के दबाव या अकस्मात् उत्पन्न तनाव के कारण मनोबल टूट गया, उच्च रक्तचाप-मस्तिष्कीय रक्तस्राव के रूप में प्रकट हो वह आदमी को प्रायः पूरा ही तोड़ गया।
आत्मविश्वास की कमी, कल्पित भय भविष्य के प्रति निराशा ये तीनों ही स्थितियाँ ऐसी हैं, जो आदमी के संकल्पबल-आत्मबल को क्षति पहुँचाती तथा समाज में दुर्बल नागरिकों को जन्म देती है। हमारे राष्ट्र के साँस्कृतिक पराभव का, जो विगत दो हजार वर्षों में हुआ, यही मूल कारण है। यदि इस दुर्बलता से हमें उबरना है, तो हमें एक ही उपनिषद् वाक्य जीवन में उतारना होगा- “बलम् उपास्य” । हम सभी बल की, आत्मबल संवर्धन की, तथा मनःशक्ति संवर्धन की साधना करें। इसी में मानव मात्र के समूचे समाज व राष्ट्र का हित है।
“आत्म - जाग्रति के लिए अंतः करण को निर्भय, निष्काम एवं संपूर्ण समर्पण को साधना करनी पड़ती है। वत्स ! जिस दिन तू इस तत्वज्ञान को समझ लेगा, उस दिन तेरी अवरुद्ध आत्म-प्रगति के द्वार अपने आप खुल जाएँगे ।”
बहुत दिन तक आत्मशोधन करते रहने के बाद भी जब साधक को सफलता के दर्शन न हुए, तब उसे गुरुदेव के दस शब्दों का स्मरण हो आया। किसी समय उन्होंने कहा था । पुत्र ! जब तुम्हें ऐसा लगे कि इन शब्दों का रहस्य समझ में नहीं आ रहा, तक तुम प्रकृति की शरण में चले जाना। वहाँ तुम्हें आत्म जाग्रति के लिए प्रकाश मिल जाएगा।
सालों-साल आश्रम के जीवन में बँधे रहने वाले साधक ने उन वचनों का मर्म जानने का निश्चय किया। आश्रम जीवन का परित्याग कर वह प्रकृति की गोद में विचरण करने वाला पथिक बन गया। पथिक-साधक।
बरसात के दिन थे। मेघों से आसमान घिरा था। बूंदें अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर उत्तुँग शिखर को ढहा देने में लगी थीं। प्रत्येक आघात के साथ मिट्टी का एक कण टूट जाता और ढाल में बहता-बहता नीचे जा गिरता। पर्वत की देह छिन्न-विच्छिन्न हो चली थी। पत्थर और वृक्ष नरकंकाल की नसों और हड्डियों की तरह लगते थे। इतने कुटिल आघात झेलने वाले शिखर के प्रति बूँदों के मन में किंचित मात्र करुणा भी नहीं झलक रही थी।
पथिक की जिज्ञासा उभरी-”पर्वतराज ! नन्ही-नन्ही बूँदें तुम्हें चुकाए दे रही हैं, समूचा बदन गलता जा रहा है, फिर आपको इन बूँदों से बचा लो तात् ! अन्यथा तुम्हारा तो अस्तित्व ही कुछ दिन में समाप्त हो सकता है।”
बादलों की गर्जना में अपनी हँसी की गूँज मिलाते हुए अडिग शैल शिखर ने उत्तर दिया- “साधक ! तुम इतना भी नहीं समझ पाए कि परिस्थितियों के आघात मनुष्य को चुकाते नहीं, ऊँचे उठाते हैं । तुम देख नहीं रहे, मेरा शरीर तो अवश्य छिला जा रहा है, पर बूंदों के आघात जितने तीव्र होते हैं, मेरे अंतर की शक्ति और उल्लास उतना ही उद्दीप्त होता चला जाता है। तुम्हें लगता है मैं घट रहा हूँ , पर मैं प्रति वर्ष कुछ न कुछ बढ़ ही जाता हूँ। बूँदों के जिन आघातों को तुम मेरे शरीर को नष्ट करने वाला समझते हो, वस्तुतः उन्हीं के कारण में हरियाली से सुशोभित हो पाता हूँ।”
पथिक बोला- “पर्वत श्रेष्ठ ! धन्य है तुम्हारी निर्भयता। निस्संदेह निर्भय हुए बिना, आघातों से टकराए बगैर कोई ऊँचा नहीं उठ सकता उत्कर्ष नहीं पा सकता ।”
साधक आगे बढ़ा-दिन भर अविराम चलते रहने से उसके पाँवों में थकान आ गई थी। सरिता की जल धारा के मधुर नाद ने उसे आकर्षित किया। वह एक किनारे पर जाकर चुपचाप बैठ गया। पैर पानी में डाल दिये। बड़ी शीतलता मिली उसे, पर साथ ही आत्मग्लानि भी हुई, कि मैंने क्यों इन पर पाद प्रहार किया। स्वयं के इस दुर्व्यवहार पर उसे दुःख भी हुआ साथ ही जिज्ञासा भी जगी-कि पाँव की ठोकर सहने के बाद भी नदी ने से न तो कुछ बुरा कहा और न ही उसे चोट पहुँचाई उसे शीतलता दी, थकान मिटाई ।
“तुम इतनी सरल क्यों हो सरिते ?” उसने सवाल किया-सवाल सुनकर नदी से एक मधुर ध्वनि उभरी - “बंधु ! क्षुद्र जनों को भी हीन न समझूँ इसलिए । तुम नहीं जानते जो जैसा देखता है, उसका अंतरंग भी वैसा ही बनता है, यदि मैं औरों को छोटा मानूँ तो हर किसी से लड़ने झगड़ने वाली जमीन की क्षुद्रता में बदल जाऊँ । मैंने नियम बना लिया है कोई कुछ भी करे, मुझे तो अपनी उपकार भावना अक्षुण्ण बनाए रखकर उसका भला ही सोचना और करना चाहिए।”
“परंतु देवी ! रुकती तो तुम कहीं एक पल भी नहीं, आखिर इतनी अविराम गति क्यों?” नहीं का स्वर पहले की तरह मधुर था - “इसलिए कि बल के चरणों में मेरा सिर न नीचा हो । शक्ति और शुद्धता के लिए निष्कामता आवश्यक थी, उसी महाव्रत का पालन कर रही हूँ ।”
साधक वहाँ से आगे बढ़ता हुआ समुद्र के किनारे पहुँचा । दो पहर बीत चुकी थी, पर अभी आतप की तीव्रता बरकरार थी। जल वाष्पित होता जा रहा था। पथिक की जिज्ञासा मुखर हुई - “महासिंधु ! इस तरह तो तुम्हारी समूची जल राशि ही भाप बनकर उड़ जाएगी। तुम आतप का प्रतिरोध क्यों नहीं करते। निरंतर जलते रहने में भी कुछ सुख मिलता है क्या ?”
समुद्र हंसने लगा, बोला- “तुम भ्रमित हो गए हो पथिक । मैं खो कहाँ रहा हूँ , भला । मैं जलूँ नहीं तो भाप कहाँ से बने, भाप न हो तो जल कहाँ से बरसे, जल न गिरे तो वृक्ष-वनस्पतियों और संसार को जीवन कहाँ से मिले? साधक ! मुझे जो जल मिलता है, यह भी तो मेरे उत्सर्ग का ही प्रतिफल हैं । मेरी तो इच्छा है कि और वेग से जलूँ ताकि संसार को और भी तीव्रता से पोषण मिले ।”
साधक तत्वबोध के आनंद में झूम उठा। आत्म जाग्रति के लिए निर्भयता अनिवार्य है, निष्कामता होनी चाहिए अपने पास जो कुछ है, उस संपूर्ण को विश्व हित में जला देने वाले ही पूर्णता का आनंद ले सकते हैं । इस मर्म को समझकर वह अंतिम साधना के लिए गुरु चरणों में वापस लौट गया।
परमात्मा की इस सृष्टि में जहाँ एक ओर प्रगति के प्रचुर आधार भरे पड़े हैं, और सुख-साधनों की भरमार है, वहाँ विकृतियों और अवाँछनीयताओं की भी कमी नहीं । यहाँ सत्प्रवृत्तियों की तरह दुष्टता और दुर्बुद्धि का भी वैभव विस्तार छाया दीखता है। कई बार यह दुविधा होती है कि परमसत्ता ने इस विश्ववाटिका को ऐसी विसंगतियों से क्यों भर दिया कि एक ओर जहाँ श्रेष्ठता का अभाव नहीं, दूसरी ओर वहाँ दुष्टता भी सृष्टि-सौंदर्य को निगल जाने के मनसूबे बाँधती रहती है। जब नीति बनी, तो अनीति के अस्तित्व की क्या आवश्यकता थी ? जब देव मौजूद थे, तो दैत्यों का प्रकटीकरण किसलिए हुआ ?
उपभोक्तावादी दृष्टिकोण से हमारा यह सोचना ठीक हो सकता है, पर यदि हम निर्माता की स्थिति में होते, तो समस्या दूसरे ही रूप में सामने होती और उसका समाधान करने के लिए कदाचित् हमें भी वही करना पड़ता, जो परमेश्वर को करना पड़ा है। अनुदान कितने ही कीमती क्यों न हों, उनका महत्व समझना और उनके उपयोग में सतर्कता बरतना तब तक संभव ही नहीं हो सकता, जब तक कि अभाव या प्रतिकूलता की स्थिति सामने न हो। केवल सरलता संसार में बनी रहे, तब तो कठिनाई की कल्पना ही न होगी और तुलना करने के लिए कोई आधार न रहने पर उपलब्धि का न तो कोई मूल्य समझा जायेगा, न उसमें किसी प्रकार का आनंद रह जायेगा। जिन लोगों को प्रचुर सुविधाएँ उपलब्ध होती रहती हैं, उन्हें वे भार प्रतीत होने लगती हैं और वैसा रस नहीं आता जैसा कि अभावग्रस्त स्थिति वालों को उसी को हस्तगत करने में स्वर्ग-सौभाग्य जैसा आनंद आता है। रसास्वादन में जितना श्रेय सुख-साधनों को है, उतनी ही महत्ता उस अभावग्रस्त स्थिति की है, जिसके कारण उन पदार्थों की तीव्र अभीप्सा बनी रहती है। कड़ी भूख लगने और रतजगा होने पर रूखी-सूखी रोटी और पत्थर का बिछावन भी स्वादिष्ट और सुखकर लगते हैं, जबकि पेट भरा होने तथा नींद की खुराक पूरी होने पर सुस्वादु व्यंजनों पर भी नाक-भौं सिकोड़नी पड़ती है एवं आरामदायक बिस्तर भी सामान्य लगता है। भोजन की स्वादिष्टता और बिस्तर की उत्तमता का जितना मूल्य है, उनसे अधिक कड़ाके की भूख लगने और गहरी नींद आने का है। इस मूल्याँकन के कारण ही संतोष और आनंद मिलता है। इस आनंद के लिए ही उत्कट अभीप्सा उत्पन्न होती है और उसे प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम करने का साहस उठता है। प्राणियों को विभिन्न प्रकार की हलचलें करने की प्रेरणा इसी से मिलती है। मस्तिष्क को उसके आधार खड़े करने के लिए सोच-विचार करना पड़ता है। शरीर की तत्परता और मन की तन्मयता का प्रेरणा-केन्द्र अभीष्ट उपलब्धियों की आकाँक्षा ही रहती है और उन आकाँक्षाओं का उभार अभाव की कल्पना से उठता है। कंगाली की कठिनाइयों के चिंतन से सफलता बटोरने के लिए उत्साह उमगता है। रोगग्रस्तता और निर्बलता की दशा में शरीर की जो दुसह्य दुर्गति होती है, उससे डर कर ही लोग स्वस्थता प्राप्ति की व्यग्रता जताते हैं। यदि अक्षुण्ण स्वास्थ्य की निश्चितता रहे, तो फिर आरोग्य-संवर्धन के लिये जो किया और सोचा जाता है, उसकी किसी को आवश्यकता ही न पड़ेगी। फिर आरोग्य स्वाभाविक रहने और उसमें किसी प्रकार का संकट उत्पन्न होने का खतरा न रहने से उसका महत्व भी प्रतीत न होगा। ऐसी स्थिति में कोई उसके लिए फिर प्रयत्नशील क्यों रहेगा ? प्रयत्न की बात तो दूर कोई उस संदर्भ में चर्चा तक करना पसंद न करेगा। ऐसी दशा में सुदृढ़ स्वास्थ्य के कारण जो गर्व-गौरव एवं आनंद प्राप्त होता है, उसका भी अंत हो जायेगा। दस संसार में से मरण का अस्तित्व समाप्त हो जाय, तो भला, जीवन से मोह किसको रह जायेगा ? यहाँ कुरूपता के कारण ही सौंदर्य की पूजा होती है। जब सर्वत्र सौंदर्य-ही-सौंदर्य रहे, कुरूपता न रहे, तो जिस तुलना से आँखें सुन्दरता का स्वाद चखती और आनंदविभोर होती हैं, वह स्थिति बनी न रह सकेगी और दुनिया नीरस-निरानंद बन जायेगी।
रात के बिना दिन की उपयोगिता किसकी समझ में आती है ? न दिन का महत्व मालूम पड़ेगा, न उन घंटों के एक-एक क्षण के निष्ठापूर्वक उपयोग की आवश्यकता महसूस होगी। परिणाम यह होगा कि इन दिनों दिन के उजाले में काम पूरा करने की जो जल्दी मनुष्य को रहती है , वह तब न दिखाई पड़ेगी एवं लोग अकर्मण्य शिथिल-से बने रहेंगे। मानवी उत्साह तो अतिरिक्त लाभ पाने के लिए अथवा संभावित कठिनाई से बचने के लिए उत्पन्न होता है । उत्साह एक उत्तेजना है, जो लाभ कमाने एवं भय से बचने की कल्पना के सहारे उठती है। महामानवों और महापुरुषों में भी जो उत्कृष्ट साहस और पुरुषार्थ प्रकट होते हैं, उनके मूल में भी यही तथ्य काम करते हैं। यह बात दूसरी है कि उनके लाभ की परिभाषा सर्वसाधारण की तद्विषयक परिभाषा से भिन्न है। वे प्रायः व्यक्तिगत सुविधा के स्थान पर सामूहिक सुविधा की बात सोचते और आध्यात्मिक लाभ को प्रधानता देते हैं। इसी प्रकार वे भी सार्वजनिक विनाश और भौतिकता के नरक तुल्य दुःखों की विभीषिका को ध्यान में रखते हुए जन-जन का उत्साह उभारते हैं। यह स्तर भर का अंतर है। उत्साह जिसे शक्ति का स्रोत कह सकते हैं, बिना किसी लोभ या भय के उभरता ही नहीं। स्पष्ट है कि उत्साह की उत्तेजना ही मूर्च्छित व्यक्तित्व को जगाती , और उभारती और सक्रिय बनाती है, उसे प्रगति के पथ में धकेलती और महत्वपूर्ण कार्य कराती है। यदि उमंगें न उपजें, तो मनुष्य को शरीरचर्या की सामान्य क्रिया करते रहने के अतिरिक्त और कुछ करते-धरते न बन पड़ेगा। ऐसी अवस्था में उसकी दशा अर्धमृतकों-अर्धमूर्च्छितों जैसी बन जायेगी और सिवाय खाने-सोने के अतिरिक्त और कुछ सोचते-करते न बनेगा। उस साहसी मनोभूमि का वरदान पाने से वंचित ही बना रहेगा, जिसके सहारे तिनके आकाश चूमने लगते हैं और तुच्छ व्यक्तियों की गणना उच्च स्तरीय महा मानवों में होने लगती है।
अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों के ही अपने-अपने लाभ हैं। अनुकूलता, सुविधा एवं सफलता प्राप्त होने से मनुष्य को आत्म-गौरव की अनुभूति होती है। सफलता पर गर्व करने के साथ-साथ वह अपने व्यक्तित्व के वर्चस्व की अनुभूति भी करता है। यह आत्माभिमान, आत्मावलंबन का विश्वास दिलाता है और अपनी क्षमता के बारे में यह मान्यता बनाने का अवसर मिलता है कि आगे भी बड़े काम करने और बड़े लाभ पाने की स्थिति आनी है। यह अवधारणा जिस भी अंतराल में पूरी तरह हृदयंगम हो जाती है, निश्चय ही वह असाधारण सामर्थ्यवान बन जाता है। मनुष्य में आत्मबल सर्वोपरि बल है, उससे बड़ा और कोई बल नहीं। आत्मबल आत्मविश्वास पर ही अवलंबित है। पर आत्मबल इस आत्मबल का ही पूरक बल है।
संसार में अब तक जो अद्भुत और आश्चर्यजनक कार्य हुए हैं, उनकी सफलता का सूत्र तलाशा जाय, तो उन सब में मनोबल की ही प्रधान भूमिका दृष्टिगोचर होती प्रतीत होगी। उसी की प्रेरणा से शरीर अधिक परिश्रम करता है- मस्तिष्क में उमंगें छायी रहती हैं और अंतःकरण में सफलता की आशा सुदृढ़ बनी रहती है। महामानवों के जीवन-इतिहास का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि जिस प्रचंड मनोबल का परिचय उनके उत्तरार्ध जीवन में दिखाई पड़ता है, वस्तुतः वह प्रारंभिक जीवन छोटे-छोटे प्रयासों, प्रयोगों और सफलताओं के आधार पर ही विनिर्मित होता है वह कहीं आकाश से नहीं टपकता। यदि ऐसी बात रही होती तो आरंभिक जीवन में उन्हें कठोर संघर्ष करते नहीं देखा जाता। इससे स्पष्ट है कि छोटे कार्य और छोटे कदम की आरंभिक कक्षा क्रमशः उत्तीर्ण करता चले, तो मनुष्य शनैः-शनैः अधिक आत्मविश्वासी बनता जाता है और इस आधार पर विकसित हुई प्रतिभा के सहारे स्वयं को क्रियाशील बना कर इस स्थिति में जा पहुँचता है कि उसे असाधारण महत्व एवं सामर्थ्य का व्यक्ति समझा जा सके।
यह सुविधा पक्ष हुआ। असुविधा एवं प्रतिकूलता की उपयोगिता इससे भी अधिक है, पर वह कष्टकारक रहने से रुचिकारक नहीं लगती और आमतौर से लोग उससे डरते-बचते देखे जाते हैं। इतने पर भी उसका मूल्य किसी प्रकार कम नहीं होता। आवश्यकताओं को आविष्कारों की जननी कहा गया है। प्राणिशास्त्र के आचार्य कहते हैं कि विभिन्न जीवधारियों के जो रूप रंग, आकार-प्रकार एवं शरीर-संरचना इन दिनों है, वैसी बनावट विकासकाल के आरंभिक दिनों में उनकी न रही होगी। तब वे कुछ और डील-डौल के रहे होंगे। वर्तमान रूप तो उनकी भीतरी आकाँक्षा और बाहरी आवश्यकता के अनुरूप हुए क्रमिक परिवर्तन का परिणाम है। मन जिस वस्तु या स्थिति को पाने के लिए मचलता है, उसके लिए भीतर से क्षमताएँ उभरती हैं और बाहर से साधन जुटते हैं। चेतना की अद्भुत शक्ति का उसे चमत्कार समझा जा सकता है। चेतना का यह चमत्कार यदि न हुआ होता तो सृष्टि संरचना से अब तक की जीवनयात्रा के दौरान न जाने कितने जीव, कठिनाइयों और कठिन परिस्थितियों की मार के कारण विलुप्त हो गये होते और जो मुट्ठी भर शेष रहते, उनका इतिहास बहुत पुराना न होता, किंतु ऐसा न हुआ। शाकाहारी प्राणियों ने आत्मरक्षा के लिए और माँसाहारियों ने शिकार पर सफल आक्रमण करने के लिए अपने शरीरों में क्रमशः परिवर्तन किये और उनकी वंशावलियाँ आगे बढ़ती चली गई । इस परिवर्तन का एकमात्र कारण जीवनशास्त्रियों के शोध-निष्कर्ष से यही सिद्ध हुआ है कि उनकी अंतःचेतना में प्रस्तुत कठिनाइयों के समाधान की अकुलाहट और अधिक अनुकूलता की अभिलाषा उत्पन्न हुई। उसके दबाव से शरीर और मस्तिष्क ने तद्नुरूप ढलना शुरू किया और एक के बाद एक परिवर्तन होते चले गये। अन्य प्राणियों की तरह मानवी प्रगति का इतिहास भी यही है। यह प्रखरता प्रतिकूलताओं के साथ होने वाली टकराहट की प्रतिक्रियाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
भोंथरे आयुधों की धार तेज करने के लिए उन्हें पत्थर पर रगड़ना पड़ता है। रगड़ यों प्रत्यक्षतः अप्रिय और कष्टकर प्रतीत होती है। ऐसा लगता है कि इससे व्यक्ति और वस्तु घटते-मिटते हैं। मोटी दृष्टि को ऐसा लगते हुए भी वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। इस घर्षण से जो प्रखरता और समर्थता बढ़ती है, उसकी तुलना में रगड़ की कठिनाई अत्यंत न्यून हैं यदि वह स्वीकार न हो, तो औजारों की धार रखने और व्यक्तियों की प्रखरता बढ़ा कर उन्हें प्रतिभाशाली बनाने की आशा छोड़नी पड़ेगी। व्यायाम से शरीर पर दबाव पड़ता है और कष्ट होता है। आरामतलबी के अभ्यस्त लोगों के लिए यह भारी दंड भुगतने की तरह ही कष्टकारक प्रतीत होगा, पर जिन्हें बलवान-पहलवान बनना है, वे दंड-बैठक आदि कष्टकारक क्रियाएँ शरीर के असुविधा अनुभव करने पर भी किये ही चले जाते हैं। शिल्पी और कलाकार अपने विषयों में निष्णात बनने के लिए किस प्रकार मन मार कर अभ्यास करते है-यह उनके साथ रहकर जाना जा सकता है। जो इस तत्परता में प्रमाद बरतते हैं, उनकी सफलता उसी अनुपात में अनिश्चित बनती जाती है।
यदि सब सरलतापूर्वक होता चले, तो मनोरथ भले ही किसी प्रकार पूरे हो जायँ पर प्रतिभा विकास का रास्ता एक प्रकार से बंद होता चला जायेगा। अमीरों की संतानें आमतौर से आलसी और दुर्व्यसनी होती है, जबकि इसके विपरीत कठिनाइयों में पलने वाले गरीबों की संततियाँ आश्चर्यजनक प्रगति करती देखी जाती है। इस प्रकार की घटनाओं में प्रतिकूलताओं से टकराने पर उत्पन्न होने वाली शक्ति की कमी-वेशी ही अपनी-अपनी भूमिका निभाती देखी जा सकती है।
अमीरी को अपना कर निकम्मा बन बैठना जितना अशोभनीय है, उससे भी अधिक घातक गरीबी को अंगीकार करना है। जो इस संदर्भ में यह तर्क देते हैं कि गरीबी, दरिद्रता, उत्पीड़न, पिछड़ेपन की स्थिति में पड़े रहने से तपश्चर्या होती है, इसलिए कष्ट कर स्थिति में पड़े रहना और संतोष करना उचित है-ऐसी बुद्धि पर तरस आता है। वस्तुतः ऐसा सोच बैठना अर्थ का अनर्थ करना हो जायेगा। कष्ट में शक्ति नहीं, वह तो उलटा मनोबल तोड़ता है। शक्ति तो टकराने से उत्पन्न होती है। कठिनाइयों से जितनी तीव्रता से टकराया जायेगा, उतनी ही सामर्थ्य पैदा होगी। यदि प्रतिकूलताओं के समक्ष सिर झुका लिया गया तो फिर यही समझना चाहिए कि धीमी आत्महत्या जैसा कृत्य अपना लिया गया। टकराने और शक्ति उपार्जित करने के लिए प्रतिकूलता चाहिए, अतः ऐसे अवसर जब भी उपस्थित हों, रोने-खीजने की आवश्यकता नहीं, वरन् यह समझा जाना चाहिए कि मनोबल बढ़ाने और प्रखरता सँजोने का एक अवसर सामने आया। खोजने वाले विष में से भी अमृत खोज लेते हैं। अपनी सोच यह होनी चाहिए कि निसर्ग-व्यवस्था से जो कठिनाइयाँ सामने आ धमकी, उसे पछाड़ कर अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने का लाभ कमाया जाय। इस प्रकार का चिंतन ही अतिवादिता को निरुत्साहित कर तथ्यों को संतुलित रीति से ग्रहण करने की, समझ देता है।
सृष्टि में कठिनाइयाँ और प्रतिकूलताएँ देखकर हमें सृष्टी की अदूरदर्शिता का असमंजस नहीं करना चाहिए। सोचना यही चाहिए कि हमारे लिए प्रगति के महत्वपूर्ण साधन के रूप में उन्हें सृजा गया है। उन्हें उसी रूप में देखना, समझना चाहिए और प्रबल प्रतिरक्षा की भावना से दबाने-दबोचने का मानस बनाये रखना चाहिए। उन्नति का यही आधार है और विसंगतियों के पीछे का तत्वदर्शन भी।
समाज में सर्वोपरि पद पर होने के कारण उनके दायित्व भी बड़े-चढ़े हैं। जिन पर धर्म-संस्कृति की रक्षा का भार है, उन्हें तो और भी सतर्क होना चाहिए।
बोधिसत्व एक दिन सुन्दर कमल के तालाब के पास बैठे वायु सेवन कर रहे थे। नव-विकसित पंकजों की मनोहारी छटा ने उन्हें अत्यधिक आकर्षित किया, तो वे चुप बैठे न रह सके, उठे और सरोवर में उतर कर निकट से जलज गंध का पान कर तृप्ति लाभ करने लगे।
तभी किसी देव कन्या का स्वर सुनाई पड़ा- तुम बिना कुछ दिए ही इन पुष्पों की सुरभि का सेवन कर रहे हो। यह चोर कर्म है। तुम गंध चोर हो। तथागत उसकी बात सुनकर स्तंभित रह गये। तभी एक व्यक्ति आया और सरोवर में घुसकर निर्दयतापूर्वक कमल-पुष्प तोड़ने लगा, बड़ी देर तक उस व्यक्ति ने पुष्पों को तोड़ा-मरोड़ा पर रोकना तो दूर, किसी ने उसे मना तक भी न किया।
तब बुद्धदेव ने उस कन्या से कहा- देवि! मैंने तो केवल गंधपान ही किया था। पुष्पों का अपहरण तो नहीं किया था, तोड़े भी नहीं, फिर भी तुमने मुझे चोर कहा और यह मनुष्य कितनी निर्दयता के साथ पुष्पों को तोड़कर तालाब को अस्वच्छ तथा असुन्दर बना रहा है, तुम इसे कुछ नहीं कहती ? तब वह देव कन्या गंभीर होकर कहने लगी- तपस्वी ! लोभ तथा तृष्णाओं में डूबे संसारी मनुष्य, धर्म तथा अधर्म में भेद नहीं कर पाते। अतः उन पर धर्म रक्षा का भार नहीं है। किंतु जो धर्मरत है, सद्-असद् का ज्ञाता है, नित्य अधिक-से-अधिक पवित्रता तथा महानता के लिए सतत् प्रयत्नशील हैं। उसका तनिक-सा पथ भ्रष्ट होना एक बड़ पातक बन जाता है।
बोधिसत्व ने मर्म को समझ लिया और उनका सिर पश्चाताप से झुक गया।
स्वप्न विद्या अध्यात्म विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग और मानव-जीवन की एक अवस्था है जिसका विकास-परिष्कार करके अचेतन मस्तिष्क में छिपी रहस्यमयी शक्तियों को जाग्रत किया और परोक्ष-जगत के रहस्यों को आसानी से समझा जा सकता है। इस तथ्य को उन घटनाक्रमों के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है जिसमें भूत या भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास व्यक्तियों को स्वप्नों के द्वारा मिल जाता है। कभी-कभी तो भावी दुर्घटनाओं, प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वाभास सामूहिक रूप से भी होता है। एक ही घटनाक्रम के दृश्य या प्रेरणा अनेक व्यक्तियों के अचेतन मस्तिष्क में स्वप्नावस्था में कौंध जाते हैं और उन्हें अपने जीवन रक्षा के लिए सचेत करते हैं। यह घटनायें बताती है कि चेतना के धरातल पर सभी मनुष्य एक दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, तभी तो घटनाक्रम घटने के पूर्व ही उसके स्वरूप की, घटने के समय की जानकारी सामूहिक रूप से कइयों को स्वप्न में मिल जाती है। इस तरह की अनेक घटनाओं का वर्णन “द अनएक्सप्लेंड मिस्ट्रीज ऑफ माइंड, स्पेश एण्ड टाइम” एवं “टू एक्सपीरियन्सेज इन प्रोफेसीज” नामक पुस्तकों में विस्तारपूर्वक किया गया है।
ऐसी ही एक घटना वेल्स-इंग्लैंड के एक गाँव ‘एबरफेन’ की है, जहाँ लगातार पाँच दिनों की घनघोर वर्षा के कारण कोयले का एक विशाल पहाड़ अचानक धँस पड़ा और प्रबल वेग से बहने लगा। प्रवाह इतना तीव्र था कि गाँव का निकटवर्ती स्कूल उसमें देखते-देखते डूब गया और उसमें उपस्थित डेढ़ सौ के करीब छात्र-छात्राएं एवं शिक्षक सभी जीवित दफन हो गये। उन्हें निकल कर भागने तक का अवसर न मिला। इसके अतिरिक्त गाँव के आस-पास के अन्य घी भी उसमें दबकर नष्ट हो गये। कितने ही ग्रामवासी और उनके पशु इस आकस्मिक विपदा में फँसकर अपनी जान गँवा बैठे। खेतों में खड़ी फसल चौपट हो गयी। यह प्राकृतिक विपदा सन् 1966 के अक्टूबर माह की 21 तारीख को सबेरे 9 बजकर 15 मिनट पर घटित हुई।
समीपवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का इस विभीषिका का पूर्वाभास बहुत पहले हो गया था। उसी स्कूल में पढ़ने वाली एक छात्रा एरिल जोन्स को घटना से दो दिन पूर्व ही स्वप्न में वह भयावह दृश्य दिख गया था। जोन्स ने अनुभव किया था कि स्कूल अपने स्थान पर है नहीं, उसकी जगह कोयले का एक बड़ा ढेर लगा हुआ है । उसने यह बात अपनी माँ से बतायी, पर उसके कथन को हँसी में टाल दिया गया। इसी प्रकार एक महिला ने स्वप्न में देखा कि एक काला पहाड़ बह रहा है, कुछ बच्चे चिल्लाते हुए दौड़ रहे हैं और कुछ उसकी चपेट में आकर अपनी जीवनलीला गँवा बैठे हैं। एक व्यक्ति को पूर्वाभास हुआ कि एक बच्चा टेलीफोन बूथ की ओर भाग रहा है और कुछ अन्य लोग उसके पीछे दौड़ रहे हैं। सबके पीछे काले पानी का वेगवान प्रवाह गतिमान हैं । एक महिला ने यह दृश्य देखा कि उक्त स्कूल के कुछ विद्यार्थी अपनी स्कूल पोशाक में आसमान की ओर गमन कर रहे हैं, जबकि एक वृद्ध पुरुष को ‘एबरफेन’ शब्द स्वप्न में स्पष्ट और चमकदार अक्षरों में लिखा दिखाई पड़ा। इन सारी बातों का पता तब चला जब समाचार पत्र वालों ने उक्त घटना से संबंधित पूर्वाभास का सर्वेक्षण किया। पाया गया कि एक महिला को दुर्घटना से दो सप्ताह/पूर्व ही चीखते-चिल्लाते व काले पहाड़ के नीचे दबे हुए कुछ बच्चों का दृश्य स्वप्न में दिखा था। केण्ट निवासी एक युवक को पंद्रह दिन पूर्व इस घटना का पूर्वाभास हो गया था कि कोई दुर्घटना होने वाली है जिसमें सैकड़ों लोग काल−कलवित होंगे। इसी प्रकार वेल्स के एक अन्य स्कूल के अध्यापक अलेक्जेंडर वेन को घटना से संबंधित दृश्य कई दिनों तक लगातार दिखाई देते रहे। उसने इस आधार पर एक पेंटिंग भी बना ली थी। प्लायमथ की मनोविज्ञानी श्रीमती मिलडन को ध्यान की स्थिति में इस आपदा का आभास मिल गया था जिसका उल्लेख उसने अपने पड़ोसियों से भी किया था । बाद में जब वही दृश्य टी वी पर दिखाया गया तो पड़ोसी हैरत में पड़ गये और कहने लगे कि यदि उन संकेतों को समझने का प्रयास किया गया होता तो निश्चय ही दुर्घटना से पूर्व लोगों को बचाया जा सकता था।
स्वप्नों के माध्यम से कई बार ऐसी षड्यंत्रकारी घटनाओं का भी पूर्वाभास हो जाता है जिसमें अपने सगे-संबंधियों या अन्यों द्वारा जान खतरे में पड़ने वाली होती है। ऐसा ही एक पूर्वबोध इंग्लैंड के ‘मेरी ड्युडर’ के शासनकाल के समय निकोलस विटन को हुआ था। उस समय निकोलस पेरिस में इंग्लैंड का राजदूत था। उसे एक दिन स्वप्न हुआ कि उसका भतीजा-टामस विट्टन स्वयं को एक ऐसे षडयंत्र में फँसा रहा है जिससे परिवार की प्रतिष्ठ को आघात पहुँच सकता है और उसका जीवन खतरे में पड़ सकता है। आरंभ में तो निकोलस ने कोई ध्यान न दिया, पर जब वही स्वप्न लगातार कई दिनों तक बराबर दिखता रहा, तो उसने विशेष स्वप्न मानकर उसे गंभीरतापूर्वक लिया और इस आशय का एक पत्र महारानी को लिखकर यह निवेदन किया कि टामस को कुछ समय के लिए पेरिस से वापस बुलाकर उसे कारावास में रखा जाय। विषय की गंभीरता को समझते हुए ऐसा ही किया गया। उसे बंदी बना लिया गया। घटना इसके थोड़े दिनों के पश्चात् ही रानी के विरुद्ध चल रहे षडयंत्र का पता चला, जिसमें टामस के कई साथियों को फाँसी की सजा दी गयी।
वस्तुतः इस तरह के पूर्वाभास परक स्वप्न अचेतन की स्थिति में होते हैं, क्योंकि पूर्ण सचेतन स्थिति में मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्ध एक दूसरे के समन्वय से काम करते हैं एवं एक की स्वतंत्रता पर दूसरे का अंकुश लगा रहता है। अतः कोई सार्थक दृश्य प्रस्तुत करने का उन्हें मौका नहीं मिलता, किंतु जब व्यक्ति स्वप्न की अचेतन अवस्था में होता है तो दोनों के क्रियाकलाप स्वतंत्र होते हैं, फलतः यदा-कदा मन को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की झलक झाँकी मिल जाती है। अपनी भावनाओं को परिष्कृत एवं चिंतन-चरित्र को दात्त बनाकर अचेतन मन का परिष्कार किया जा सके तो संभावित भविष्य की झलक- झाँकी प्राप्त कर सकना ही किसी के लिए संभव है।
क्यों माने ईश्वर को ? मानना-एक कल्पना जनित विश्वास ही तो है। जिसका वैज्ञानिकता से कोई ताल-मेल नजर नहीं आता। ऐसे विचार स्वयं को वैज्ञानिक कहने-समझने वाली अधकचरी बुद्धि में कुलबुलाया करते हैं। किंतु , क्या कल्पना-मान्यता-विश्वास सर्वथा अवैज्ञानिक हैं या इनमें वैज्ञानिक तथ्य भी हैं। यह एक ऐसा विचार बिंदु है, जिस पर चिंतन करने से बौद्धिक विकास के नए आयाम खुलते नजर आते हैं। तब समझ में आने लगता है कि जिन तथ्यों को हम अपने अधकचरे पन के कारण अवैज्ञानिक समझते रहे-वही वैज्ञानिकता का केन्द्र बिंदु हैं।
बात अजीब सी लगने पर भी सौ फीसदी खरी हैं। विज्ञान और वैज्ञानिकता के मेरुदंड समझे जाने वाले गणित शास्त्र की ही परीक्षा कर लें, तो पाते हैं कि गणितज्ञों ने जो अन्वेषण किए है जिन अजीबोगरीब उलझनों को सुलझाया है, उसका प्रधान आधार “माना कि उत्तर अमुक है ,” का विश्वास रहा है। इस विश्वास को प्रयोग में लाकर शत-प्रतिशत सत्य हल निकाले जाते रहे हैं। उदाहरण के लिए यदि हमारे सामने यह पहेली रखी जाय कि सुनील के पास कुछ रुपये है। उसे अपने धन को मोहन, सुरेश और चंदू में बाँटना है। मोहन को कुल धन का आधा सुरेश को तिहाई देने के बाद चंदू के लिए सौ रुपये बचे तो पता लगाओ कि सुनील के पास कुल धन कितना था ?
अब तो ‘मानने’ को अवैज्ञानिक समझता है उसके लिए तो सवाल का जवाब खोज पाना निरा असंभव काम है। पर जिसे गणित शास्त्र की वैज्ञानिकता का पता है। वह तुरंत सोचने लगेगा-माना यह धन 1 रुपया है। 1/- का 1/2 = 1/2 भाग मोहन को मिला 1 का 1/3 = 1/3 भाग सुरेश ने लिया। कुल 1/2 + 1/3 = 5/6 भाग मोहन और सुरेश ले गए। बचा हुआ 1/6 भाग चंदू ने लिया । अब चंदू को जो हिस्सा मिला वह 100 था। अब ऐहिक नियम के अनुसार चूँकि 1/6 = 100 के इसलिए 1 बराबर है- 600 रुपये के । यही उत्तर है और सही भी है, जबकि सारी दुनिया में एक, छः सौ के बराबर कभी हो ही नहीं सकता। असंभव तरीके से संभव की खोज का नाम विश्वास है। यह एक ऐसा समर्थ सूत्र है, जिसके आधार पर परमात्मा की खोज की जा सकती है।
ईश्वर को मान लेने से-उस पर विश्वास करने से जहाँ अनेक व्यक्तिगत लाभ हैं वहाँ विश्व शाँति के लिए एक मजबूत आधार भी मिलता है। मान लेना एक सूत्र है जिसके आधार पर गणित के उत्तर निकाले जा सकते हैं। उसी तरह संसार में प्राणियों का आविर्भाव क्यों और कहाँ से हुआ है ? अनेक योनियों में बिखरी प्राण सत्ता का रहस्य क्या है ? जीवन का उद्देश्य क्या है और उसे किस तरह प्राप्त किया जा सकता है ? इन सवालों का प्रचलित विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं। वह स्थूलता का ही अध्ययन और प्रतिपादन कर सकता है। जबकि मनुष्य-शरीर की आधी शक्तियाँ भावनामय-विचारमय, संकल्पमय हैं। शारीरिक इंद्रियों की तरह भावनाएँ भी तृप्ति माँगती हैं। उनका भी अपना अलग क्षेत्र है। जब ईश्वर को मानवीय चेतना की तरह कोई सत्ता मान लेते हैं तो जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। हमारी भावनात्मक शक्ति का विकास होने लगता है।
प्राणिमात्र के प्रति, दया, करुणा, व्यवस्था, समता, सहिष्णुता, उदारता, मैत्री के भावों का विकास होने लगता है। जब हम मान लेते हैं कि संसार किसी भावनाशील शक्ति के द्वारा प्रेरित और नियंत्रित है। यह भावनाएँ ही स्थाई सुख और शाँति प्रदान करती है।
उसी के लिए तो विज्ञान और वैज्ञानिकता का आश्रय लेते हैं। पर प्रचलित विज्ञान के एकाँगीपन के कारण मनुष्य उलझता ही चला जा रहा है। जो तृष्णाएँ, विलासिताएँ, अहं वृत्तियाँ, क्रोध, विक्षोभ, ईर्ष्या, स्पर्धा, प्रतिशोध भौतिक महत्वाकांक्षाओं के मार्ग में भड़कती है। ईश्वर विश्वास के मार्ग में तप, त्याग, स्वाभिमान, सहयोग और सहानुभूति में बदल जाती है। जिससे न केवल अकेला व्यक्ति, बल्कि समूचा संसार भी शाँतिमय परिस्थितियों में बना रहता है।
मान्यताओं- विश्वासों की वैज्ञानिकता-आधुनिक विज्ञान ने सत्य सिद्ध की है। रेखागणित को ही लें-तमाम रेखागणित एक बिंदु से विकसित होती है। रेखा अनेक बिंदुओं से बनी एक दूरी है जिसमें लंबाई है, किंतु चौड़ाई नहीं। बिंदु वह वस्तु है जिसमें न तो लंबाई है, न मोटाई और चौड़ाई। ऐसी वस्तु का कोई अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए। कोई भी बिंदु अंकित किया जाएगा भले ही दशमलव के आगे कई शून्यों के बाद उसका व्यास आये पर मोटाई होगी अवश्य। यदि मोटाई हो जाती है तो वह बिंदु नहीं रहता और बिंदु रहता है तो परिभाषा गलत। अस्तित्वहीन वस्तु केवल विश्वास मात्र है, उसी पर संपूर्ण रेखागणित का धरातल टिका हुआ है और उसके माध्यम से जो भी अर्थ एकदम सही निकलते हैं। यह है विश्वास का प्रतिफल । उसी प्रकार ईश्वरीय सत्ता को मान लेने पर व्यक्तिगत कल्याण, समाज और विश्व के हित के परिणाम सही उतरने लगते हैं। दृश्य न होने पर भी उसकी कल्पना बिंदु की तरह एक शक्तिशाली सिद्धाँत है। परमात्मा को भी हम उसी रूप में ले लें तो इसमें भी मानवता का कल्याण ही सन्निहित है।
मनुष्य समाज की अधिकाँश व्यवस्था विश्वास पर ही आधारित है और उसी से हम सुखी हैं। भाई-भाई में पति-पत्नी में पिता-पुत्र, डाक्टर-मरीज, दुकानदार-खरीदार सबका काम विश्वास पर ही चल रहा है। विश्वास प्राप्त करके ही एक साधारण व्यक्ति पार्लियामेंट का सदस्य और प्रधानमंत्री बन जाता है। हमारे विश्वास में इतनी जबर्दस्त शक्ति है कि वह सामान्य सी परिस्थितियों को कुछ का कुछ बना सकती है। जो केवल दूसरों पर अविश्वास ही अविश्वास करते हैं, तो दूसरा चाहे कैसे भी हों, पर अविश्वास करने वाला व्यक्ति अपने आप ही दुःखी अशाँत और अव्यवस्थित बना रहता है। विश्वास की शक्ति पर ही संसार टिका हुआ है। हमारे लिए इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं कि ईश्वरीय चेतना पर विश्वास करें और यह देखें कि उसके फलितार्थ हमारे जीवन में उसी प्रकार सही उतरते हैं या नहीं जिस प्रकार पत्नी, पिता, माता, भाई-भतीजों पर विश्वास करके परस्पर हँसी-खुशी प्रेम और आनंद का जीवन जी लेते हैं।
रेखागणित की एक स्वयं सिद्ध साध्य यह है ‘अ’ और ‘ब’ एक सरल रेखा है। ‘उ’ बिंदु पर एक दूसरी सरल रेखा ‘द’ उसे काटती है। इस प्रकार ‘उ’ बिंदु पर बने हुए दोनों कोणों का योग बराबर दो समकोण होता है। यह एक विश्वास है, उसकी सत्यता का कोई आधार नहीं है। हम चाहें तो उसके टुकड़े ऐसे करे कि चह 180 न होकर 279 हो जायें या कुल 31 रखें। 180 डिग्री एक विश्वास की गई संख्या मात्र है और संसार में अब तक जितनी भी रेखागणित विकसित हुई है सभी त्रिभुजीय प्रमेय निर्मेयों का आधार केवल यह प्रारंभिक विश्वास है। और यह विश्वास इतना सही उतरता है कि हम पृथ्वी में बैठे-बैठे सूर्य चंद्रमा, बुध, हर्शल, प्लूटो, एंटलारि आदि विस्तृत तारामंडल की दूरी नाप लेते हैं। एक सरल रेखा पर दूसरी सरल रेखा खड़ी होकर दो समकोण बनाती है, इस विश्वास के द्वारा ही अंतरिक्षयान चंद्रमा तक, मंगल तक, शुक्र तक चला जाता है यह वह विश्वास है, जो बहुत हलका बिलकुल छोटा और निर्जीव सा है। जबकि ईश्वर एक समर्थ विश्वास है। कीट पतंगों के जीवन से लेकर वृक्ष वनस्पतियों के अस्तित्व तक का भेदन इसी शक्ति के द्वारा किया और आध्यात्मिक रहस्यों का पता लगाया जा सकता है।
सारी खगोल विद्या की जानकारी वृत्त सिद्धाँतों पर आधारित है। एक विश्वास या स्वयं सिद्ध प्रतिज्ञा है कि तुल्य चापों पर आधारित कोण भी तुल्य होते हैं। एक गोलाकार वृत्त में कहीं भी ‘अब’ और ‘सद’ दो समान दूरी के चाप लीजिए । अब चाप ‘अ ब’ को उसी वृत्त के किसी भी बिंदु ‘य’ से मिलाइए चाप ‘स द’ को भी उसी प्रकार किसी बिंदु ‘र’ मिलाइए। इस तरह बिंदु ‘य’ और ‘र’ पर बने कोण बराबर होते हैँ यह एक स्वयं सिद्ध साध्य है, जिस पर सारी ग्रह रेखागणित टिकी हुई हैं, यदि कोई अविश्वास करे कि हम यह बात नहीं मानेंगे-तो उसके लिए शेष सारे अभ्यास गलत हो जाते हैं पर यह स्वयं सिद्ध साध्य फलित होती है-तो उसके आधार पर सारे विश्व ब्रह्मांड में भ्रमण कर आना उसी तरह संभव हो जाता है जिस प्रकार हम अपने किसी जाने-माने शहर तक घूम आते हैं।
मान्यता पर चलने वाली गणित जब ऐसे ठोस और सत्य फलितार्थ प्रस्तुत कर सकती है, तो हम ईश्वर पर विश्वास करके क्या विश्व के रहस्यों का मूल्याँकन नहीं कर सकते ? ऐसी एक विचारधारा ऋषि के अंतरंग में उठी थी और उन्होंने प्रश्न करके सृष्टि के सब तत्वों को खोज डाला था। वेदों में सन्निहित ज्ञान वही विज्ञान है, जिसको पाने के लिए आज पाश्चात्य वैज्ञानिक भारी असंतुलन, यंत्रीकरण, हिंसा और असामाजिकता पैदा कर रहे हैं। फिर भी वस्तुस्थिति की खोज नहीं कर पा रहे हैं। सिद्धाँत बनते हैं, अगले वाला वैज्ञानिक उस सिद्धाँत में या तो संशोधन कर देता या काट कर रख देता है। संशोधनकर्ता भी अपने आपको पूर्ण विश्वस्त नहीं मानता। उसे तब भी यह आशंका बनी रहती है कि ही उसी के रहते हुए उसका सिद्धाँत काट न दिया जाये। अनेक नोबुल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों के सिद्धाँतों के धुर्रे उड़ गए। तब यही मानना पड़ता है कि पाश्चात्य जगत जिस विज्ञान पर ऐंठा हुआ बैठा है, वह खेत खिलौना है। तथ्य उनमें कुछ भी नहीं है।
विशाल ब्रह्मांड के रहस्यों, पृथ्वी पर होने वाली पुनर्जन्म की घटनाओं अति मानसिक शक्ति, बौद्धिक क्षमता, आत्मशक्ति के करतबों, दूरदर्शन पूर्वानुभूतियों, भविष्य ज्ञान आदि के प्रति हमारे मस्तिष्क में रचनात्मक और उपयोगी दृष्टिकोण ईश्वर को मान लेने पर ही बनता है।
ईश्वर विश्वास एक उत्पादक शक्ति है जो सृष्टि के गहन अंतराल से ज्ञान के हीरे मोती खोज-खोज कर हमारे ज्ञान-बुद्धि और वर्चस् को महान बना देता है। अब तो वैज्ञानिक फलितार्थों से भी यह निश्चय हो चुका है कि ईश्वर एक प्रकार की पूर्ण शक्ति है और उस पूर्णता का कितना भी अंश निकाल लेने पर पूर्णता ही शेष रहती हैं । बात कुछ अटपटी लगती है पर सच । एक चुम्बक पत्थर को कागज में रखकर उसकी शक्ति का चार्ट तैयार कर लें। फिर उस चुम्बक को लोहे से स्पर्श कराएँ तो लोहा भी चुम्बक बन जाता है। चुम्बक को हटाकर फिर उसका चार्ट तैयार करें तो पता चलेगा कि उसके आवेश का काफी अंश लोहे में खिंच जाने के बाद भी उसकी मूल शक्ति में कोई अंतर नहीं पड़ा। उसी प्रकार केवल विश्वास के आधार पर अपनी चेतना के साथ संबंध जोड़कर हम उन शक्तियों को विकसित और व्यवस्थित कर सकते हैं जिन्हें ईश्वरीय वैभव के रूप में जाना जाता है और जिनसे हमारे जीवन का वास्तविक अर्थ फलित होता है। न केवल इतना ही बल्कि मान्यता और विश्वास की वैज्ञानिकता को समझकर ईश्वर को मान लेने से समाज और देश भी अनुशासित, व्यवस्थित और मैत्री-पूर्वक रह सकते हैं।
इस संपूर्ण सृष्टि में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो भावनाशील हैं। उसमें से यदि संवेदनाएँ निकाल दी जायँ , तो फिर जो शेष बचेगा, वह भले ही कलेवर से मनुष्य जैसा हो, पर स्तर मानवीय नहीं कहा जा सकेगा। भाव-संवेदनाएँ ही हैं, जो जीवन को जोड़ कर रखती हैं, मनुष्य-मनुष्य के बीच मैत्री स्थापित करती है-व्यवस्था बनाये रहती हैं। दुर्भावनाओं से युक्त संसार और मरघट में कोई अंतर नहीं रह जाता। दूसरी ओर सद्भावनाओं की शीतल छाया उपलब्ध हो, तो लोग अभाव की स्थिति में भी आनंदपूर्वक जीवन जीते हैं। संवेदनाएँ न होतीं, तो संसार बिखर गया होता, अब तक कभी का नष्ट भ्रष्ट हो गया होता।
यह मनुष्य के लिए दुर्भाग्य की बात है कि उस जैसा विचारशील प्राणी जबकि इन मानवीय गुणों से रिक्त होता जा रहा है, तब भी सृष्टि के दूसरे अबोध प्राणियों की भाव-संवेदनाएँ अक्षुण्ण हैं। मनुष्य मर्यादाशील विचारशील प्राणी होने का गर्व करता है, पर टूटते हुए दाँपत्य संबंध, नष्ट होती पारिवारिक शाँति, उच्छृंखल होती जा रही पीढ़ियाँ और अराजकतापूर्ण सामाजिक संबंध यह बताते हैं कि हमारा जीवनक्रम गड़बड़ाता जा रहा है। हम चाहें तो प्रकृति के दूसरे जीवों से इस संदर्भ में शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।
“डिक-डिक” जाति का हिरन पत्नीव्रती होता है, वह सदैव जोड़े में रहता है। अपने जीवनकाल में वह कभी किसी अन्य हिरनी की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखता। शेर और हाथी के बारे में भी ऐसी ही बात होती है। जोड़ा बनाने से पूर्व वे पूर्ण सतर्कता बरतते हैं, किंतु एक बार जोड़ा बना लेने के बाद वे तब तक इस मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते, जब तक कि नर या मादा में से किसी एक की मृत्यु न हो जाय। मृत्यु के उपराँत भी कई ऐसे होते हैं, जो पुनर्विवाह की अपेक्षा विधुर जीवन व्यतीत करते हैं। इस प्रकार वे अपने समुदाय की संवेदना सहज ही प्राप्त करते रहते हैं और दूसरों के दुर्दिनों में अपनी संवेदना भी प्रदर्शित करते हैं।
चिंपांजीयों की पारिवारिक और दाँपत्य निष्ठ मनुष्य के लिए एक उदाहरण है। यह अपना निवास पेड़ों पर बनाते हैं। जोड़ा बनाने के बाद चिंपांजी अपने दाँपत्य जीवन को निष्ठापूर्वक निबाहते हैं और किसी अन्य मादा या नर की ओर आकृष्ट होकर वे कभी भी अपनी वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते। जब समस्त परिवार अपने वृक्षीय आवास में आराम कर रहा होता है, तो नर पेड़ के नीचे रहकर उनकी सुरक्षा करता है। कर्तव्यपरायणता से ओत-प्रोत चिंपांजी का यह दायित्व देखते ही बनता है। परस्पर का प्रेम न हो, तो यह कभी भी संभव नहीं।
जंगली बतखों में भी इस प्रकार की निष्ठ देखी जा सकती है। इन बतखों की लगभग चालीस जातियाँ होती हैं, किंतु हर बतख अपनी प्रजाति के अपने जोड़े के अतिरिक्त कभी किसी अन्य की ओर आकृष्ट नहीं होती। जापानी मैंडेरिन इनके बहुत अधिक समीप होती हैं, किंतु जीवशास्त्रियों के अनेक प्रयत्नों के बावजूद उसने उससे मिलन से इनकार कर दिया।
उल्लू एकबार अपने साथी का चयन कर लेने के बाद गृहस्थ जीवन की मर्यादा का आजीवन पालन करते हैं। मादा को 30-35 दिन तक अंडे सेने में लगते हैं। इस अवधि में नर अपनी मादा के लिए स्वयं भोजन जुटाता है और उसकी रक्षा करता है। बच्चे बड़े होने पर ही उड़ना और शिकार करना सीख पाते हैं। इस मध्य उन्हें माता-पिता का आश्रय निरंतर मिलता रहता है।
धनेश पक्षी को तो और भी अधिक कष्टपूर्ण साधना करनी पड़ती है। अंडे सेने के लिए आवश्यक ताप तथा मादा की सुरक्षा के लिए वह जिस कोटर में रहती है, नर उसका मुख बंद कर देता है, वह उतना ही खुला रहता है, जिससे चोंच भर बाहर निकल सके। बस इसी से नर अपनी मादा को खिलाता-पिलाता रहता है।
मातृत्व भावना यदि देखनी हो तो सारस पक्षी को देखना चाहिए। वे अपने अंडे इतने सुरक्षित पानी से घिरे स्थानों में देती हैं, कि उन्हें किसी प्रकार की कोई क्षति न पहुँचे। यदि किसी तरह वहाँ कोई अन्य जानवर पहुँच जाता है, तो सारस उसे रक्त-रंजित बनाकर भाग जाने के लिए मजबूर करते हैं। वे अपने अंडे बच्चों को कभी भी अकेला नहीं छोड़ते । एक साथी सदा उनके पास बना रहता है।
कौवे और सर्प जैसे जीव भी अपने बच्चों के प्रति अत्यधिक भावनाशील होते हैं। कौवे के अंडे-बच्चों से यदि कोई छेड़खानी करे, तो समूचा काक-समुदाय छेड़ने वाले पर टूट पड़ता है। सर्प अपने बच्चों को कुँडली में रखते हैं। इस अवस्था में भोजन का प्रबंध नर के जिम्मे होता है। छछूँदर गर्भधारण के बाद से ही भावी शिशु के लिए खाद्य-संग्रह आरंभ कर देती है, ताकि प्रसव के बाद जब तक बच्चे भली प्रकार चलने-फिरने न लगें, तब तक वह वहीं रह कर उनकी पहरेदारी कर सके।
इस संबंध में सबसे सुचारु व्यवस्था हाथियों में होती है। वे न केवल बच्चे की अपितु समूचा कबीला गर्भिणी को एक घेरे में रखकर उसकी सुरक्षा का प्रबंध करता है यदि ऐसे समय उस पर कोई आक्रमण करे, तो हाथी इतने अधिक खूँखार हो उठते हैं कि सारे जंगल को उजाड़ कर रख देते हैं।
हिन्द महासागर की कुछ मछलियाँ तो अंडों के समुच्चय को अपने साथ-साथ लिए फिरती हैं। ऐसा वह तब तक करती है, जब तक उनसे बच्चे न निकल जायँ और स्वयं तैरने ने लगें। एरियस तथा तिलपिया मछलियाँ तो अंडों को अपने मुख में सेती और बच्चों के आत्मनिर्भर होने तक अपने ही साथ रखती हैं। तिलपिया को थोड़ी भी आशंका हो, तो वह अपने बच्चों को मुँह में छिपा कर उनकी रक्षा करती है। कुत्ते, बिल्ली जिस सावधानी से बच्चों को मुख में दबाकर उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं, यह उससे भी अनूठा उदाहरण है। चूहों के दाँत बड़े तेज होते हैं, किंतु बच्चों को उठाते समय उन्हें कहीं भी कोई खरोंच नहीं आती इतनी कोमलता से उन्हें उठाते हैं।
मछलियाँ पानी में रहने वाली जीव हैं, पर गौराई जाति की मछलियाँ एक विशेष प्रकार की घास से अपना घोंसला बनाती और उसी में बच्चे पालती हैं। यही नहीं, उन्हें चिड़ियों की तरह बड़े होने तक स्वयं ही खिलाती-पिलाती भी हैं। सील मछलियाँ अपने बच्चों के पोषण के लिए अपने शरीर में भोजन की पहले से प्रचुर मात्रा एकत्र कर लेती हैं और उन्हें वे पाँच सप्ताह तक उसी के बल पर किनारे पड़ी सेती रहती हैं। इस अवधि में वे पूर्ण उपवास करती हैं। संतति प्रेम का यह अद्भुत प्रतिमान है।
आरंगटन और गिवन बंदर तथा चिंपांजी पेट या पीठ पर लादे बच्चों को बड़े होने तक घुमाते हैं। कई बच्चे मर जाते हैं, तो भी ये मातृत्व पीड़ावश कई-कई दिनों तक उनकी लाश को ही छाती से चिपकाये घूमते रहते हैं। ओपोसम बोमनेट के कंगारू की तरह की पेट में थैली होती है। बच्चों को वे उसी में रख कर पालते हैं। कहीं रुकने पर व इन्हें बाहर निकाल कर खेलना और शिकार करना सिखाते हैं।
वेल्स द्वीप से एक बार नाम, क्रम आदि के पहचान पट्ट पैरों में बाँध कर कुछ जल कपोतों को विमान से ले जाकर अन्य देशों में छोड़ दिया गया। इनमें एक कपोती भी थी जिसने हाल ही में दो बच्चों का प्रसव किया था। उसे ले जाकर 930 मील दूर तक एक अन्य टापू में छोड़ दिया गया, पर मातृत्व स्नेह ने उसे वहाँ रहने नहीं दिया। 15 दिनों की कष्टपूर्ण यात्रा के बाद वह अपने बच्चों के पास लौट आयी। जिन कपोतों के बच्चे नहीं थे, साथी थे, वे भी उनसे पृथक नहीं रह सके। अटलाँटिक और जिब्राल्टर होते हुए 3700 मील की लंबी यात्रा कर वे 5-6 महीनों में लौट आये।
इससे स्पष्ट होता है कि कर्तव्य पालन की मूल प्रेरणा संवेदनाओं से प्रस्फुटित होती है। यह संवेदना ही है, जो पारस्परिक स्नेह-सौजन्य को विकसित करती है। प्रगति का आधार भी यही है। व्यक्ति कभी इससे विहीन नहीं रह सकता। जब वह धारा के विपरीत जाता है, तो उसे ऐसी अनेक कठिनाइयों, उलझनों, विपत्तियों, विग्रहों का सामना करना पड़ता है, जैसे इन दिनों वह कर रहा है। सामंजस्य स्नेह का सहोदर है।
जहाँ सद्भावना होगी, वहाँ तालमेल स्वतः बनता और निभता चला जाता है। मानवेत्तर प्राणी इसी कारण मजे में रहते और दिन गुजारते हैं, क्योंकि उनमें पारस्परिक प्रेम अक्षुण्ण रहता है। सद्भाव के अभाव से स्वार्थ पनपते हैं और दो प्रतिद्वंद्वी स्वार्थों के संघात से विद्वेष और वैमनस्य उपजते हैं। जहाँ कटुता होगी, विग्रह होगा, वहाँ प्रगति भी ठप्प हो जायेगी और अवगति का मार्ग अपना लेने की मूर्खतापूर्ण दृश्यावलियाँ दिखाई पड़ेगी। आज यही हो रहा है। पारस्परिक सद्भाव घट कर तिल जितना रह गया है और स्वार्थी की टकराहट ने बढ़ की हिमालय जितना विस्तार ग्रहण कर लिया है, जिससे सर्वत्र अराजकता और अशाँति का वातावरण छाया दीखता है। परिवार से लेकर समाज, राष्ट्र तक में आज ऐसे विषम दृश्य इसी कारण दिखाई पड़ रहे हैं। परिवार विश्रृंखलित हो रहे हैं, समाज टूट रहे हैं और राष्ट्र खण्ड-खण्ड हो रहे हैं-इसके पीछे संवेदना और सहिष्णुता की कमी ही कारणभूत है। हम सद्भाव और सहनशक्ति पैदा करें, यही वर्तमान बिखराव का एक मात्र समाधान है। इसे हर हालत में प्राप्त किया ही जाना चाहिए।
आदर्श शिक्षक मात्र अध्ययन ही नहीं करते, छात्र को दस विद्या में ऐसा पारंगत कर देते हैं, कि वह स्वर्ण बनकर निखर उठता है। तक्षशिला विश्व-विद्यालय में सात वर्ष तक आयुर्वेद पढ़ने के उपराँत आचार्य बृहस्पति ने जीवक की परीक्षा लेकर विदा करने का मुहूर्त निकाला। उनने हाथ में खुरपी देकर कहा-”एक योजन की परिधि में एक ऐसी वनस्पति खोजकर लाओ, जो औषधि के काम न आती हो।” जीवक एक सप्ताह तक घूमे और लौटने पर बोले-”गुरुदेव ! एक भी ऐसी वनस्पति नहीं मिली, जो औषधि के काम न आती हो।” बृहस्पति ने अपने शिष्य को गले लगा लिया व कहा-”वत्स ! तुम सफल रहे। जाओ अब आयुर्वेद का प्रकाश दिग्दिगंत फैला दो।”
प्रायः ऐसा समझा जाता है कि मरणोत्तर जीवन में सभी प्राणी भूत-प्रेत बनते हैं और जिनके संपर्क में आते हैं उन्हें डराने या दुःख देने भर का कुकृत्य करते रहते हैं। ऐसी आत्माएँ भी होती हैं, पर उनमें से अधिकतर निकृष्ट स्तर की होती और विक्षोभ ग्रस्त होकर मरी होती हैं। इसके विपरीत ऐसी दिवंगत पुण्यात्मायें भी होती हैं, जो जिस प्रकार जीवन काल में सद्भाव प्रदर्शित करने में-उदार सेवा साधना में निरत नहीं, वैसा ही प्रयास वे मरने के उपराँत भी करती रहती हैं।
अमेरिका के प्रख्यात पत्रकार एवं लेखक बर्नार्ड हटन ने स्वयं पर घटित इस प्रकार की एक घटना का उल्लेख अपनी कृति “हीलिंग हैन्ड्स” में किया है। घटना सन् 1958 की है। हटन महोदय पोलियो माइलिटिस नामक बीमारी से पीड़ित थे। नेत्र ज्योति अत्यंत क्षीण हो चुकी थी। उनकी चिकित्सा कर रहे नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ हडसन ने उनकी बीमारी को असाध्य करार दिया और कहा-कि आपरेशन करने पर आँखों की शेष क्षीण ज्योति के भी चले जाने का खतरा है। श्रीमती पर्ल हटन को यह ज्ञात था कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के सुविख्यात नेत्र चिकित्सा विज्ञानी स्वर्गीय डॉ लैंग की अशरीरी आत्मा एलिसबरी के मिस्टर चैपमैन के माध्यम से अब तक सैकड़ों असाध्य नेत्र रोगियों की चिकित्सा कर चुकी हैं। अतः उनने अपने पति को एलिसबरी जाने का अनुरोध किया। बर्नार्ड हटन अपनी पत्रकारिता वाली बुद्धि को लेकर एलिसबरी पहुँच गये।
मि. चैपमैन के यहाँ उन्हीं की प्रतीक्षा की जा रही थी। गाड़ी से उतरते ही हटन महोदय को एक कक्ष में बुलाया गया, वे यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि युवक चैपमैन के व्यक्तित्व में आकस्मिक परिवर्तन कैसे हो गया। वह उनके कंधे पर हाथ रखे कह रहे थे “आइये मि. हटन ! आप नेत्ररोग से पीड़ित हैं। मैं डॉ लैंग हूँ, आपकी हर संभव सहायता करूंगा।” चैपमैन यह सब कुछ आँख बंद किये तंद्रा जैसी अवस्था में कह रहे थे। हटन को तर्क बुद्धि इसे कभी सम्मोहन सोचती, कभी टेलीपैथी, तो कभी थाँट ट्राँसफरेन्स, तो कभी दिव्य दृष्टि आदि। विचारों का ऊहापोह उनके मन में चल ही रहा था कि डॉ लैंग ने कहा कि-”तुम्हें माइनस 18 नंबर का चश्मा लगता है।” उस समय वास्तव में उन्हें इसी नंबर का चश्मा लगता था। हटन की आँखों को दो-तीन बार उंगलियों से स्पर्श करके डॉ लैंग ने बताया-कि “तुम्हारी आँखों का बचपन में जो आपरेशन हुआ था-बिलकुल ठीक था।” तब हटन की उम्र 6 वर्ष की थी और उस घटना को वे भूल चुके थे। आपरेशन करने वाले डाक्टर की भी मृत्यु हो चुकी थी।
बर्नार्ड हटन की आँखों को दुबारा उँगलियों से स्पर्श करके डॉ. लैंग ने कहा-’तुम्हारी आँखों का वीट्रियस ड्रेनेज सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है- डिप्लोपिया हो गया है। जिस बीमारी के वायरस तुम्हें कष्ट दे रहे थे वे तो तुम्हारे चिकित्सक के उपचार से नष्ट हो गये हैं, परंतु उसके स्थान पर प्रतिक्रिया स्वरूप नयी भयंकर बीमारी हो गयी है। हिपेटाइटिस वायरस के आक्रमण के कारण यकृत को क्षति पहुँच रही है और कष्ट बढ़ रहा है-शक्ति क्षीण हुई जा रही है।’ हटन को डॉ. लैंग की यह सब बातें, रोग की व्याख्या आदि एक पहेली सी लग रही थी। उनकी तार्किक बुद्धि हतप्रभ थी। तभी डॉ लैंग ने कहा- ‘मैं तुम्हारी आँखों का आपरेशन करूंगा जिसमें तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा, क्योंकि यह आपरेशन सूक्ष्मशरीर का होगा-स्थूल का नहीं। तुम हमारी बातें और उपकरणों का प्रयोग अनुभव करोगे, पर देख नहीं सकोगे। मेरे अन्य सहायक सूक्ष्मशरीर धारी आत्मायें भी है।
इतना कहकर डॉ. लैंग ने अपना काम प्रारंभ कर दिया। हटन उँगलियों को चलते हुए , आपरेशन के उपकरणों को इधर-उधर प्रयोग करते हुए अनुभव कर रहे थे। डॉ लैंग बीच में बोलते जा रहे थे-”मैं तुम्हारे सूक्ष्मशरीर को स्थूल शरीर से थोड़ा अलग करके फ्लुइड की जाँच कर रहा हूँ, क्रिस्टल लैंस, रेटिना आदि का परीक्षण कर रहा हूँ। कुछ मिनट बाद उन्होंने कहा-अब आपरेशन पूरा हो गया है। तुम्हारे सिलियरी मसल्स अत्यंत कड़े हो गये थे। इसके पश्चात् उनने अपने सहायकों से कहा-’यदि हिपेटाइटिस वायरस का आपरेशन न किया गया तो यह आपरेशन अधिक लाभदायक न होगा।’ डॉ. लैंग ने एक बार फिर से आंखें बंद की मुद्रा में ही हटन के शरीर पर हाथ फेरा। बर्नार्ड हटन को लगातार महसूस हो रहा था कि जैसे उनके मूर्छित शरीर पर आपरेशन किया जा रहा हो।
आपरेशन पूरा करने के बाद डॉ लैंग ने हाथ के सहारे से बर्नार्ड हटन को उठाकर बैठा दिया। उस समय उन्हें काफी कमजोरी अनुभव हो रही थी, तभी मार्गेट नामक एक नर्स आयी और उसने उन्हें खड़ा होने में मदद की। चलते समय डॉ. लैंग ने कहा-”मि. हटन मैं आपकी बराबर सहायता करता रहूँगा और अपने सूक्ष्मशरीर से आपके सूक्ष्मशरीर में आपरेशन भी करता रहूँगा। आपकी नेत्र ज्योति पुनः वापस आ जायगी और आपका जीवन सुखमय बीतेगा, ऐसी मुझे पूरी आशा है।” बर्नार्ड हटन अपनी उक्त कृति में लिखते हैं कि वापसी में जिस समय उन्हें कार में बिठाया गया था, उस समय आँखों से कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था, परंतु थोड़ी ही देर में धीरे-धीरे सब कुछ स्पष्ट नजर आने लगा। वह प्रसन्नतापूर्वक अपने घर आ गये। बार-बार उनका हृदय अदृश्य पितरसत्ता द्वारा की गयी अप्रत्याशित सहायता से भर आता था। इसके पश्चात् उनका सारा जीवनक्रम ही बदल गया।
‘मिस्ट्रीज ऑफ अनेकस्प्लेंड’ एवं ‘इन् विजबँल हेर्ल्पस’ नामक आदि पुस्तकों में इस तरह की अनेकों घटनाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन है जिसमें मनुष्य के कार्यों में अशरीरी दिव्य पितर आत्माओं द्वारा अप्रत्याशित रूप से सहायता प्रदान की गयी। इसी शृंखला में एक घटना सन् 1967 की हैं हडसन नदी के किनारे बने हुए विक्टोरिया कालीन एक भव्य मकान को लोगों ने भुतहा कह कर छोड़ दिया था, जिसे श्रीमती एकले नामक एक महिला ने खरीद लिया और उसमें सपरिवार रहने लगी। एक रात्रि उन्हें एक प्रेतात्मा दिखाई दी जिसे देखकर वे भयभीत हो गयीं और जैसे ही वहाँ से भागने के लिए पीछे मुड़ी उन्होंने देखा कि वही छाया उनके मार्ग में खड़ी है। इस पितर छाया ने धीमे स्वर में कहा-”तुम डरकर भागो नहीं। अभी तक जितने भी व्यक्ति इस मकान में आये हैं-वे भयभीत होते रहे हैं, जब कि हमारा उद्देश्य मनुष्यों को डराना और नुकसान पहुँचाना नहीं, वरन् उनकी सहायता करना और सहानुभूति अर्जित करना है।” वे आश्वस्त हुई और बोली- “आप लोग कौन हैं- कितने व्यक्ति हैं व इस रूप में आपको क्यों भटकना पड़ रहा है ?” प्रेतात्मा ने जवाब दिया-”हम लोग तीन व्यक्ति हैं जो तुम्हारे वंश के ही हैं तुम्हारा यहाँ आना एक संयोग मात्र नहीं हैं। हमारे द्वारा एकले को दी गयी विचार रूप में प्रेरणा ही तुम्हें यहाँ लायी है। मरणोत्तर जीवन में एक योनि ऐसी होती है जिसमें उच्च-अशरीर आत्मायें सहायक आत्माओं के रूप में सूक्ष्म-जगत में भ्रमण करती रहती हैं और जरूरतमंदों की सहायता करती रहती हैं। जब इस मकान को भुतहा ठहरा दिया गया तो हमने उचित समझा कि तुम्हें यहाँ बुलाया जाय। श्रीमती एकले काफी देर तक अपने पितर से बात करती रहीं। बाद में अनेकों प्रसंगों पर भी पितर आत्मायें उन्हें सहयोग देती रहीं।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को तो प्रेतात्माओं पर इतना विश्वास था कि अक्सर एक प्रेत विद्या विशारद कुमारी नैटिकोलन वर्ग को व्हाइट हाउस में बुलाया करते थे और उसके माध्यम से पितर आत्माओं से संपर्क कर महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे। ग्रहयुद्ध के दिनों में तो प्रेतात्मायें उनकी विश्वस्त मित्र हो गयी थीं, जिनकी मदद से लिंकन को उपद्रवियों के ऐसे-ऐसे रहस्यों का पता चल जाता था जिन्हें खुफिया विभाग द्वारा प्राप्त करना संभव न था। अपने जीवन के दुखद अंत को भी उन्होंने प्रेतात्माओं के माध्यम से जान लिया था। व्हाइट हाउस ऐसी संदेश देने वाली पितर आत्माओं की कथाओं से अभी जुड़ा हुआ है।
कैलीफोर्निया की महिला लेखिका रोज मेरी ब्राउन ने अपनी पुस्तक “डू वी डाई” में अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब वह 27 वर्ष की थी, तब एक दिन विश्व प्रसिद्ध विगतात्मा संगीतकार जिसमें बिथोवेन मोजार्ट आदि शामिल थे, को देखकर वह डर गयी। उसके विचार पढ़कर आश्वासन देते हुए उन्होंने कहा-’हम तुम्हारे माध्यम से संगीत के विकास की अपनी इच्छा पूरी करना चाहते हैं। इस दिशा में तुम अपनी योग्यता बढ़ाती जाओ, उसमें हम सभी तुम्हारी मदद करेंगे।’ इस तरह वे आत्मायें 15 वर्षों तक संगीत साधना में उसका सतत् मार्ग दर्शन करती रहीं। परिणाम यह हुआ कि सन् 1967 में बी. बी. सी. ने ब्राउन के संगीत पर आधारित एक वृत्त चित्र प्रसारित किया। विश्व के तत्कालीन संगीत विशारदों ने उसे देखने सुनने के बाद एक ही निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि यह सब ब्राउन की ही रचनायें हैं, तथापि यह निस्संदेह एक अविश्वनीय घटना है कि विश्व के विगत प्रसिद्ध संगीतकारों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त कृतियाँ हैं।
ब्राजील के बेलो होरीजोटे जनपद के जोंस पेड्रो डी फ्रीरास नामक एक कृषक के पुत्र ‘एरिगो’ ने आँकल्ट के इतिहास में अभूतपूर्व नाम कमाया है जब वह स्कूल में पढ़ता था तभी से उसे सिरदर्द की शिकायत रहती थी। वयस्क होने पर दर्द भी बढ़ता गया, साथ ही स्वप्न में उसे कुछ चिकित्सक प्रेतात्मायें भी दिखने लगीं जो उसे बराबर निर्देश दिया करती थीं। उसे आदेश दे रही एक अशरीरी आत्मा ने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह डॉक्टर एडोल्फो फिट्ट नामक जर्मन शल्य चिकित्सक है जिसकी मृत्यु प्रथम विश्वयुद्ध में हुई थी। वह परोपकारी चिकित्सक था, जो जरूरतमंद गरीब रोगियों की शल्य चिकित्सा मुफ्त में कर दिया करता था। उसने आगे बताया कि वह मैक्सिको के पिछड़े प्रदेशों में अपना परोपकारी कार्य आरंभ करना चाहता है और इसके लिए उसे एरिगो जैसे दयालु-हृदय माध्यम की आवश्यकता है। उसका सिरदर्द भी जरूरत मंद रोगियों की सेवा सहायता से ही ठीक होगा। इस प्रकार स्वप्न और सिरदर्द से पाँच वर्ष तक कसमकस करने के पश्चात् एरिगो को अंततः डॉ फिट्ज का निर्देश मानना ही पड़ा और पहली शल्य क्रिया अपने एक पड़ोसी से आरंभ की जिसे फेफड़े का कैंसर था। एरिगो के लिए यह एक विस्मयकारी घटना थी कि एक अशरीरी आत्मा उसके माध्यम से इतने जटिल आपरेशन को कुछ ही सेकेंडों में कैसे सफलतापूर्वक कर सकी।
अब तो एरिगो के लिए शल्य चिकित्सा दैनिक जीवन का क्रम बन चुका था जो सन् 1956 से जीवन पर्यन्त तक निर्वाध रूप से चलता रहा। आपरेशन के अतिरिक्त वह लोगों की निस्वार्थ सेवा में लगा रहता। ख्याति फैलती चली गयी। सन् 1963 में उसके चमत्कारिक कार्यों की जाँच करने के लिए विश्वविख्यात चिकित्सक डॉ अंद्रीजा पुहरिश की अध्यक्षता में ख्याति प्राप्त दस चिकित्सकों की एक टीम नियुक्ति हुई। देखा गया कि एरिगो के अस्पताल में सुबह से ही सैकड़ों मरीज जमा हो जाते थे जिन्हें वह जाँच पड़ताल करने के पश्चात् एक सामान्य से छुरे से शल्य क्रिया करके छुट्टी दे देता था। रोगियों के घाव कुछ ही मिनटों में अच्छे हो जाते थे। एक परीक्षण में उसके पास एक हजार रोगियों को बुलाया गया जिनमें से 545 के पास अपने-अपने चिकित्सकों के निदान कार्ड भी थे जिन्हें जाँचकर्ता दल ने अपने पास रख लिया। पाया गया कि एरिगो ने तद्नुरूप ही रोगों की पहचानकर उनका उपचार सफलतापूर्वक कर दिखाया। इस पूरी प्रक्रिया का फिल्माँकन भी किया गया था ताकि किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे। सन् 1971 में एरिगो की मृत्यु हुई, इससे पूर्व तक डॉ एडोल्फो फिट्ज की आत्मा उसके माध्यम से शल्य चिकित्सा का अपना परोपकारी काम बराबर करती रही।
सूक्ष्म-जगत का अस्तित्व है, इसके प्रमाण हमें ढेरों मिलते हैं, फिर भी हम प्रत्यक्षवादी उसे नकारते रहते हैं। यदि इस अपरिमित संभावनाओं से भरे परोक्ष-जगत को जाना-समझा जा सके तो इसकी मदद से अनेकों प्रकार से लाभान्वित हुआ जा सकता है। अध्यात्म परोक्ष जगत की खिड़की खोलकर उसका दिग्दर्शन कराने वाली विधा का ही नाम है।
अभी-अभी उन्होंने चाय समाप्त ही की थी, कि गेरुए वस्त्र में एक साधु कहाँ से आ पहुँचे। साधु की मुखमुद्रा देखने से ही लगता था कि इन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया है। यही नहीं-योग की उच्चस्तरीय भूमिकाएँ पार कर सिद्धावस्था प्राप्त है उन्हें। मस्तक पर अपूर्व तेज। भिखारियों की तरह विद्रूप मलिनता और आत्महीनता का भाव नहीं वरन् हाव-भाव चाल ढाल सबमें विलक्षण स्वाभिमान और बादशाह की सी मस्ती। कमंडलु के अतिरिक्त और कोई वस्तु साथ में नहीं, मुख प्रसन्नता से उद्दीप्त न कोई हीनता का भाव, न थकावट और परेशानी का ।
“कई दिनों से भूख और प्यास तंग कर रही है, साहब !” साधु ने विनम्र शब्दों में कहा-यदि एक दो रोटी टोस्ट, चाय या थोड़े से पैसे मिल जाते तो आपकी बड़ी कृपा होती।
मेजर कार्ल डिक ने चिलचिलाती गर्मियों में जैसी धूप होती है आँखों से ऐसा ही ताप बिखेरते हुए, साधु की ओर देखा और उपेक्षा से बोले जाओ-जाओ और किसी के घर में माँग लो, मेरे पास खिलाने का ठेका नहीं।
साधु ने इस उपेक्षा का बुरा नहीं माना। योगी का लक्षण ही है कि वह सुख-दुःख मान-अपमान में सदैव एक समान रहता है। उन्होंने हँस कर कहा-”साहब ! नाराज न हों क्या हिन्दू, क्या ईसाई, सृष्टि तो सभी परमात्मा की है। आप भेद क्यों करते हैं, आप से थोड़े से भोजन की याचना की है संभव हो तो पूरा कर दें।”
साहब की सहनशीलता कागज की नाव की तरह पानी में डालते ही गल गई। बड़े क्रोध से बोले- मक्कार हिन्दुस्तानी ! जाता है यहाँ से या अभी नौकर को बुलाकर धक्के मारकर बाहर निकलवा दूँ।
साधु की मुख मुद्रा में अभी भी न तो किसी प्रकार का क्रोध का भाव था न प्रतिशोध का। उसने धीमे से मुसकराते हुए कहा-महाशय ! जहाँ तक मेरे शरीर को अपमानित करने का प्रश्न है, वह कोई महत्व नहीं रखता पर चूँकि आपका सीधा प्रहार भारतीय योग, तत्वदर्शन पर है आपने सारे हिन्दुस्तानियों को मक्कार कह डाला-यह असह्य है।
साधु अभी कुछ और कहता इसके पहले ही क्रोध से भरे मेजर डिक ने चिल्लाकर नौकर को बुलाया और कहा-”इस मूरख को धक्के मार कर निकाल दो। नौकर भागा-भागा आया और मेजर की आज्ञा पालन करने के लिए जैसे ही बढ़ा उसके पाँव काठ की तरह निश्चेष्ट हो गए। आँखें निकल आयीं। वह एकटक भयभीत सा देख रहा था। साहब ने बहुतेरा डाँटा पर नौकर ऐसी अनसुनी कर गया जैसे हम किसी पत्थर के आगे कुछ बकते हैं और उस पर रत्ती भर प्रभाव नहीं पड़ता ।
साधु ने हँसकर कहा-”साहब ! नौकर पर नाराज क्यों होते हैं, वह तो मेरी इच्छाओं का वशवर्ती है। कहें तो आपको बाहर निकलवा दूँ। आप समझते हैं, हमारी योग साधनाएँ तपश्चर्याएँ मूर्खता है। आज आप अनुभव करें कि योग में साधारण मनुष्यों को ही नहीं पर्वतों और नदियों को भी इच्छावर्ती बना लेने की शक्ति है। हमारा अहंकार न बढ़े इसलिए सामान्य मनुष्य की तरह हम भीख माँग कर खाना खाते और जीते हैं।”
लेकिन मेजर साहब पर तो भौतिकता का भूत सवार था, अँग्रेजियत की शान चढ़ी थी। एक हिन्दू साधु से यकायक कैसे हार मान लेते। उन्होंने अपने पालतू कुत्तों को आवाज देकर पुकारा और साधु की ओर संकेत करके उन्हें बढ़ावा दिया कि वे साधु पर झपट पड़े और उसे काट खाएँ पर जैसे उन्हें लकवा मार गया हो, दोनों खूँखार कुत्तों ने एक बार मेजर की ओर देखा-दूसरी बार साधु की ओर खड़े हो गए, जैसे कोई द्वारपाल किसी सम्राट के अभिवादन के लिए खड़े हों। उनके शरीर तो क्या चेतना तक जवाब दे गई। काटना तो दूर वे भौंक तक नहीं सके।
मेजर के सारे शरीर से पसीना छूट गया। बुद्धि जवाब दे गई। साधु ने कमंडलु से थोड़ जल लिया और कहा-साहब ! मुझे आपसे कोई द्वेष नहीं, पर अब चूंकि हमारे धर्म को अपमानित करने की बात थी, इसलिए आपको कुछ दंड दिया जाय तो यह कोई दोष न होगा। मैं तुम्हें शाप देता हूँ आज से ठीक एक महीने बाद तुम मेरी तरह भूख से तड़पोगे, इस सारे शहर में माँगने पर तुम्हें रोटी न मिलेगी। तुम इस शहर में रह भी न सकोगे। यह कहकर उसने जल एक ओर छिड़क दिया और वहाँ से चुपचाप चल दिया। मेजर साहब का अभिमान अभी भी दूर नहीं हुआ था, तो भी उनके मुख पर भय के भाव निश्चित रूप से दिखाई दे रहे थे।
साधु वहाँ से चलकर लगभग एक फलांग दूर उसी लाइन के एक अन्य बंगले में प्रविष्ट हुए। यह बंगला कर्नल जार्ज का था। उनकी पुत्री इला बरामदे में बैठी अँग्रेजी का समाचार पत्र पढ़ रही थी। साधु उधर ही मुड़ गए।
“बेटी ! मुझे भूख सता रही है कुछ खाने को मिलेगा क्या?” साधु ने उसी विनयपूर्ण भाव और भाषा में पूछा-जिसका प्रयोग उन्होंने मेजर डिक के साथ किया था। इला को उन पर दया आयी। भले ही उसने यह न समझा हो कि यह साधु कोई सिद्ध महापुरुष है, पर उसे मानवता की सिद्धि का मूल्याँकन करना आता था। उसने कहा-बाबा जी ! बैठिये अभी आती हूँ। यह कहकर अंदर गई। थोड़ा दूध टोस्ट और फल लाकर साधु को दिए। साधु ने उन्हें खाया और पानी पिया। उनकी भूख शाँत हुई।
तृप्ति भरी मुसकान के साथ उन्होंने अपनी पोटली से एक फल निकाला फिर कर्नल की पुत्री की ओर देखकर कहा-पुत्री ! तू नहीं जानती हम योगी वह बात आगे से देख और जान लेते हैं, जो किन्हीं व्यक्तियों के साथ बाद में घटित होने को होती हैं। तुम्हारे घर में ठीक तीन सप्ताह बाद कोई बीमार पड़ेगा। डाक्टर और हकीम भी उसका इलाज नहीं कर सकेंगे। हमारे आयुर्वेद पर तुमको विश्वास तो न होगा, पर मैं तुम्हें एक दुर्लभ औषधि देता हूँ, यह फल हिमालय में मिलता है। जब सारा उत्तराखण्ड बर्फ से ढक जाता है तब यह बड़ी कठिनाई से मिलता है। यह फल ही तुम्हें चमत्कार दिखाएगा। जब तुम्हारे घर में कोई बीमार हो, डाक्टर हार जाये तब तुम एक अंगीठी में कोयले फूँकना जब कोयले दहकने लगें, तब उसमें यह फल रख देना। थोड़ा धुंआ छूटेगा और पटाखे की आवाज की तरह वह फूट जाएगा। उसके तुरंत बाद तुम देखोगी कि बीमारी की हालत में आश्चर्यजनक सुधार होगा और वह थोड़ी देर में ही अच्छा हो जाएगा।
लड़की को थोड़ा विस्मय हुआ, थोड़ा कौतूहल। फल उसने यों ले लिया कि उसने अपनी कई भारतीय सहेलियों से सुना था, भारतीय योगी-साधु सचमुच चमत्कारी होते हैं। वैसे उसका इस पर कोई विश्वास न था। फल लेकर उसने अपनी पुस्तकों के बीच कहीं छुपाकर रख दिया।
तीन सप्ताह बीते कोई अनहोनी बात नहीं हुई। पर उसके अगले ही दिन कर्नल जार्ज आफिस में काम करते हुए एकाएक गंभीर रूप से बीमार हो गए। काम छोड़कर उन्हें बीच में ही कार से घर पहुँचाया गया इला बहुत हैरान थी, कुछ अपने पिता की बीमारी पर कुछ उस साधु की बात का स्मरण करके कई सुयोग्य मिलटरी डाक्टरों ने उपचार किया पर कोई लाभ न हुआ। बम्बई से भी एक डाक्टर बुलाए गए, वह भी बीमारी ठीक न कर सके। कर्नल जार्ज की स्थिति मरणासन्न हो चली।
उसी दिन अपराह्न वही साधु एकाएक फिर कर्नल साहब के बंगले पर दिखाई दिए। उस समय इला अपनी सहेली मेजर डिक की पुत्री के साथ अपनी रसोई में थी। साधु को देखते ही इला बाहर आयी। उसे देखते ही बोले- “मुझे पता था तुम मुझ पर विश्वास नहीं करोगी तो भी तुम्हारे किए हुए उपकार का फल चुकाना मेरा कर्तव्य था, इसलिए दुबारा फिर आना पड़ा।
आगे की बात प्रारंभ करते हुए उन्होंने कहा-तुम्हारे पिता जी अस्वस्थ हैं, अब अंतिम समय है, तुम उस फल का प्रयोग करो तभी कर्नल साहब अच्छे हो सकेंगे।”
इला अपने पढ़ाई के कमरे में गई वह फल निकाला अंगीठी जलाई। जब कोयला अंगार हो गए तो वह फल उस पर रख दिया। थोड़ा धुंआ छूटा और फिर पटाखे की आवाज हुई।
इधर से बम्बई से आये डाक्टर कर्नल साहब की नब्ज़ टटोल रहे थे। जो शरीर कुछ क्षण पहले शव की तरह ठंडा हो रहा था, एकाएक उसमें गर्मी और चेतना दिखाई दी। डाक्टरों ने निश्चय किया, वह मृत्यु के पूर्व की अंतिम और तीव्र ज्योति है पर वे यह देखकर हैरान रह गए कि कर्नल साहब ने धीरे-धीरे आंखें खोल दीं। हलके मुस्कराने लगे। थोड़ी देर में स्थिति सामान्य हो चली। भयंकर स्थिति से देखते-देखते सामान्य स्वस्थ मनुष्य की सी स्थिति में आ जाना सचमुच बड़े आश्चर्य की बात थी। उपस्थित सभी डाक्टरों का स्वीकार करना पड़ा कि सचमुच अध्यात्म में कोई शक्ति है अवश्य जो पदार्थ के और भौतिक विज्ञान के नियमों का भी उल्लंघन कर सकती है। उन्होंने भारतीय योग की महत्ता भी स्वीकार की तब-जब इला ने और उसकी सहेली से सारी घटना आद्योपाँत विस्तार से डाक्टरों को कह सुनाई। सब कुछ सुनकर सभी लोग अवाक् थे ! वहीं पास खड़े मेजर डिक तो चौंके से पड़े। वे सोचने लगे जब दिया हुआ वरदान फलित हो सकता है, तब दिया गया शाप
जैसे-तैसे एक सप्ताह और पूरा हुआ। साधु को गए अब एक महीना पूर्ण हो चुका था। मेजर डिक साहब उस दिन प्रातःकाल समय पर ही उठे पर वह हैरान थे कि आज न तो कोई नौकर बैड टी लाया और न स्नान के लिए पानी ही, श्रीमती डिक ने बहुतेरी आवाजें लगाई पर जब वहाँ कोई सुनने वाला हो तब तो। मेजर उठे नौकरों के कमरों में जाकर देखा तो सब खाली पड़े थे। एक ही नौकर बचा था, सो उसने भीतर से ही चिल्ला कर कहा-”साहब इधर मत आना इस मुहल्ले में प्लेग फैल चुकी है। इन कमरों में भी चूहे मरे हैं, इसीलिए नौकर घर छोड़कर भाग गए। मुझे तो प्लेग हो गया है, इसलिए मैं तो भाग कर जा भी नहीं सका।”
मेजर ने पुलिस और स्वास्थ्य विभाग से सेवाएँ माँगी। नौकर को दवा का प्रबंध कराया और स्वयं सारा सामान बाँधकर वह बंगला छोड़ देने की तैयारी करने लगे।
सायं होने से पहले ही वे डाक-बंगले पहुँचे गए। इस आपाधापी में प्रातःकाल से चाय भी नहीं मिली थी। डाक बंगले के नौकर को आदेश दिया-”तीन कप चाय लाना।” चाय आई मेजर साहब उनकी धर्मपत्नी और पुत्री तीनों ने एक बार ही मुख लगाया और तीनों ने एक साथ अपने-अपने चाय के प्याले एक ओर सरका दिये। बात यह थी कि उनमें बुरी तरह मिट्टी के तेल की दुर्गंध आ रही थी।
अभी वे कुछ कहें इसी बीच सबका ध्यान कैप्टन स्मिथ नामक एक और अँग्रेज अफसर ने आकर बँटा लिया। जेब से पत्र निकालकर मेजर डिक को देते हुए स्मिथ ने बताया “छावनी के मेडिकल अफसर ने कहा है कि चूँकि आप लोगों के बंगले में प्लेग फैल गई है, इसलिए आप सबको छावनी एरिया से बाहर जाना पड़ेगा।” मेजर स्मिथ का माथा ठनका। उन्हें एक माह पूर्व हुई दुर्घटना याद आ गई। साधु का शाप क्या वस्तुतः सत्य होने जा रहा है? यह सोचते ही उनकी देह से पसीना फूट पड़ा।
अब जिस कोठी में उन्हें जाना था, उसका पता स्मिथ ने हाथ में थमा दिया। मेजर डिक बोले-”स्मिथ मैं वहाँ अभी चला जाता हूँ किन्तु हममें से किसी ने भी दिन भर हो गया, खाना नहीं खाया। पहले हमें खाना खा लेने दें।”
नौकरी तो नौकरी ठहरी। कोई उद्यम कर रहा होता तो भला अपने साथी को, एक असहाय व्यक्ति को दो टूक उत्तर देने की नौबत क्यों आती। स्मिथ को नौकरी चले जाने का भय था सो उसने कहा “मेजर साहब ! आप उस बंगले पर अभी चले जाएँ, आपके लिए भोजन का प्रबंध हम पीछे से करके ला रहे हैं।”
मेजर डिक वहाँ से तुरंत रवाना हो गए। नए बंगले में सामान पहुँच गया, पर उन्हें तो भूख सता रही थी। थोड़ी देर में कैप्टन स्मिथ अपनी पत्नी सहित वहाँ पहुँचे। देर के लिए क्षमा माँगते हुए उन्होंने बताया खाना तो बहुत पहले ही नौकर के हाथ ताँगे से भेज दिया गया था पर ताँगा किसी ट्रक से टकरा गया। खाना बिखर गया, नौकर अस्पताल में है हमें दुःख है कि आप भूखे हैं। इसलिए आप हमारे साथ चलिए घर से खाना खिलाकर लाते हैं।
सिनेमा के पर्दे पर जिस तरह रीलें घूमती हैं, उसी तरह कार्ल डिक के मस्तिष्क में इस समय एक महीने पहले घटी साधु वाली घटना के दृश्य याद आ रहे थे। उन्हें अब पूरी तरह संदेह और विश्वास हो गया था कि खाना मिलेगा नहीं। अपनी आशंका और शाप वाली बात उन्होंने कप्तान स्मिथ को भी बताई, पर स्मिथ ने उसे बहम बताया और मेजर साहब अपनी पत्नी और पुत्री के साथ उनके घर की ओर चल पड़े।
मार्ग में श्रीमती डिक ने मेजर से कहा-”हम मन ही मन उन साधु से क्षमा क्यों न माँग लें, संभव इससे ही संकट टल जाए, पर भावनाओं का मूल्य न समझने वाले मेजर डिक के लिए यह सोचना भी असह्य था। उन्होंने कहा-एक साधारण से मनुष्य से हम क्षमा नहीं माँग सकते। उन बेचारों को क्या पता था कि मनुष्य साधारण नहीं होता उसमें देवत्व का भंडार भरा पड़ा है। योगी उसी का विकास करके ईश्वरीय शक्तियों के समान काम करते हैं।
सब लोग स्मिथ की कोठी पर पहुँच कर खाने की मेज पर बैठ गए। अभी एक-एक प्लेट ही परोसी गई थी, नौकर पकाया हुआ माँस ला रहा था। मेजर डिक के पास आते-आते पैर में किसी वस्तु की ठोकर लगी और वह मेजर साहब पर ही जूझ गया। सारा शोरवा मेजर डिक पर ऐसे बिखर गया जैसे उनके साथ होली खेली गई हो। लाज के मारे मेजर चूहा-बिल्ली बन गए। उधर भूख के मारे बुरा हाल। सारी दिमागी ठसक निकल गई।
कप्तान स्मिथ ने उनके कपड़े बदलवाए। गर्दन में चोट आ गई थी सो दवा मली। दुबारा फिर खाने की मेज पर बैठे। नौकर एक ढके हुए बर्तन में कुछ लाया और मेजर साहब के सामने रख गया। मेजर ने ढक्कन खोला तो अजीब दुर्गंध आई। प्लेट में सड़ी हुई घास और पेड़ों के पत्ते रखे थे। कप्तान स्मिथ नौकरों पर बरस पड़े। नौकर भी आश्चर्यचकित थे कि हम तो अच्छा खाना लाए थे, मार्ग में ही यह क्या हो गया। मेजर ने चुपचाप स्वीकार कर लिया कि यह सब उन संन्यासी के शाप का फल है।
वे चुपचाप उठ पड़े। स्मिथ ने खाने के लिए मनाया और इस अपराध जैसे काम के लिए क्षमा भी माँगी, पर मेजर डिक वहाँ रुके नहीं। अपमान की हद हो गई थी। वह दिन यों ही गया। उन्हें पानी पीकर ही रात काटनी पड़ी।
दूसरे दिन वे रेलवे स्टेशन इस आशा के साथ पहुँचे कि वहाँ के होटल में खाना मिल जाएगा। किंतु कहते हैं आफत जब आती है तो साथ-साथ घूमती है-होटल बंद मिला। डिक महोदय स्टेशन मास्टर के पास गए तो उसने बताया कि प्लेग का असर हो जाने के कारण होटल बंद कर दिया गया है। उसने कहा-अगले स्टेशन पर भोजन का अस्थाई प्रबंध कर दिया गया है, आप वहाँ जाकर भोजन कर आयें। किंतु दुर्भाग्य कि वहाँ के लिए कार का कोई मार्ग था नहीं और रेलगाड़ी छूट चुकी थी। दूसरी गाड़ी दूसरे दिन जा सकती थी, उस दिन कोई और गाड़ी वहाँ जाने वाली भी नहीं थी।
मेजर साहब घर की ओर लौटे, मार्ग में एक मिठाई वाले की दुकान से थोड़ी मिठाई खरीदी, पर वहाँ पर मिठाई खाना उन्हें अपने स्वाभिमान के प्रतिकूल जान पड़ा। मिठाई कार में रख कर वे आगे बढ़ गए। आगे एक पीपल का पेड़ था वहीं वे रुके। तीनों व्यक्तियों ने मिठाई जैसे ही हाथ में ली कि उसे फेंकते ही बना। मिट्टी के तेल की ऐसी बदबू जैसे वह मिठाई बनी ही मिट्टी के तेल की हो। तीनों ने मिठाई फेंक दी।
तभी वही साधु कार की ओर आते दिखाई दिए। मेजर का अभिमान हवा हो चुका था। वे समझ चुके थे कि आत्मा की भी कोई शक्ति होती है, तीनों ने प्रणाम कर क्षमा माँगी।
साधु ने हँसते हुए कहा-”मुझे दुःख है कि आप लोगों को बड़ा कष्ट हुआ। पर मैं करता क्या? यदि आपको इतना सबक न सिखाया जाय तो आप न जाने क्या-क्या दुर्व्यवहार करते फिरें। अब आपके लिए अच्छा यही है कि स्यालकोट छोड़कर कहीं और चले जायें। इस शहर में आपको खाना नहीं मिल सकता।”
साधु तीनों को लेकर पास ही एक कुटी थी वहाँ गए। तीनों को बैठकर उन्होंने तीन पत्तलें सँजोई। शुद्ध शाकाहारी भोजन उन्होंने अपने हाथों से परोसा। झोपड़ी में कोई था भी नहीं, चूल्हा चौका भी नहीं था, पर भोजन था बिलकुल गर्म-गर्म । तीनों ने भर पेट खाना खाया बड़ा स्वादिष्ट भोजन था।
भोजन कर चुकने के बाद उन्होंने फिर साधु से क्षमा माँगी और अपने घर आए। सामान लादकर वे उसी रात बंबई के लिए चले गए। इस घटना को उस समय के सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने छापा। इसी का प्रभाव था अँग्रेज अधिकारियों ने भारतीय साधुओं का, हिन्दू धर्म का उपहास करना बंद कर दिया।
काल-खण्ड तीन हैं-भूत, वर्तमान और भविष्यत्। इनका अस्तित्व सिर्फ इस कारण है कि सृष्टि और समय की गति में जीवन-आसमान जितना अंतर है, यदि इस मध्याँतर को मिटा दिया जाय, तो काल के विभाग भी स्वतः समाप्त हो जायेंगे। फिर जो शेष बचेगा, वह वर्तमान के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा।
यह वर्तमान और सद्यः समय दोनों एक ही हैं। जगत की हर क्रिया वर्तमान से आरंभ होती है, पीछे वह अतीत बन जाती है। जीवन का प्रादुर्भाव वर्तमान है। तत्पश्चात् उसकी गति काफी मंद पड़ जाती है और समय बहुत आगे निकल जाता है, फलतः वह आगत-अनागत के दो अतिरिक्त खंडों में बँट जाता है। संसार की समस्त घटनाएँ सारी गतिविधियाँ ऐसी ही हैं, वह समय के सापेक्ष होती हैं, निरपेक्ष यहाँ कुछ भी नहीं। जो निरपेक्ष है, वह मात्र ईश्वर है और ईश्वर समय से बँधा नहीं। जो काल से मुक्त है, उसके लिए काल-खंडों का कोई अस्तित्व नहीं। जहाँ इनकी सत्ताएँ हैं, वहाँ काल और घटनाक्रमों की गति-भिन्नता भी स्पष्ट है। कई बार इस भिन्नता को मिटाते हुए मनुष्य जब समय की गति के साथ चल पड़ता है, तो वह अनागत में पहुँच जाता है और कितनी ही बार उक्त भिन्नता को बढ़ाते हुए गति धीमी करता है, तो वही भूतकाल का प्रवेश द्वार बन जाता है। प्रायः ऐसे कौशल सूक्ष्म-जगत में गति रखने वाले आध्यात्मिक पुरुष ही कर पाते हैं, पर अनेक अवसरों पर यह सब आम आदमियों में भी अनायास संपन्न होता देखा जाता है।
ऐसी ही एक घटना का उल्लेख मार्टिन एबोन ने अपनी पुस्तक “प्रोफेसी इन आवर टाइम” (पृ. 142) में किया है। प्रसंग 4 सितम्बर 1956 का है । इंगलबुड, कैलीफोर्निया निवासी श्री एवं श्रीमती पाल मैककैहन उक्त दिन जल्दी ही “ग्रैंड केन्याँन” (अमेरिका का एक दर्शनीय स्थल) पहुँच गये। जब शाम घिरने को आयी, तो उन्होंने एक महिला को उसके पति और बच्चे के साथ देखा, जो अपना सामान लिए पास से गुजर रहे थे। श्रीमती मैककैहन ने उस स्त्री को पहचान लिया। वह उनकी एक परिचिता श्रीमती नैश थी, जिसके साथ पिछले ही साल उनने यात्रा की थी। मैककैहन की पत्नी ने सोचा कि श्रीमती नैश अभी बहुत थकी होंगी, इसलिए उनने उस परिवार से तत्काल मिलने का विचार त्याग दिया।
इस संबंध में “अमेरिकन सोसायटी फॉर साइकिकल रिसर्च” की अपनी रिपोर्ट में वे लिखती हैं कि दूसरे दिन प्रातः उनने उसे बरामदे में बैठी देखा। मैककैहन दंपत्ति वहाँ गये और बातें करने लगे। प्रसंगवश जब उन्होंने नैश परिवार से यह बात कही कि कल ही उन्होंने उन सब को आते हुए देख लिया था, पर यात्रा की थकान के कारण कष्ट देना उचित नहीं समझा, तो श्री और श्रीमती नैश आश्चर्यचकित रह गये। उन्होंने विस्मय प्रदर्शित करते हुए बताया कि वे तो अभी-अभी यहाँ बस से आये हैं। कल तो वे अन्यत्र थे। इस पर बीच में ही हस्तक्षेप करते हुए श्री मैककैहन ने कहा कि उनने भी उन सब को देखा था और जब दृष्टि पड़ी, तब दोनों के बीच की दूरी मुश्किल से दस फुट रही होगी, पर नैश परिवार उनकी बात को आश्चर्य के साथ इंकार करते रहे और यही कहते रहे कि वे अभी-अभी यहाँ आये हैं। संभव है मैककैहन दंपत्ति ने भविष्य दर्शन किया हो। किंतु जो वे कह रहे थे वह सत्य था क्योंकि प्रत्येक दृश्य जो बताया गया, वैसा ही था।
एक ऐसी ही घटना की चर्चा करते हुए मास्टर ब्रुस अपने ग्रंथ “साइलेंट सिटी ऑफ अलास्का” में लिखते हैं कि सन् 1897 की गर्मियों में ड्यूक ऑफ एब्रूजी के नेतृत्व में एक यात्री दल ने अलास्का की तटवर्ती पहाड़ियों सेंट एलियास की यात्रा की। पर्वतारोहण दल जब पहाड़ के मध्य के समतल मैदान में पहुँचा तो वहाँ उन्हें एक पुराने शहर का भव्य दृश्य दिखाई पड़ा। यात्री दल के एक सदस्य सी. डब्ल्यू. थार्नटन का कहना था कि शहर की इमारतें, गलियाँ, वृक्षावलियाँ सब कुछ इतना सुस्पष्ट थिकि उसे भ्रम या दिवास्वप्न कहना उचित न होगा। वे लिखते हैं कि अभियान दल जब उसका निकट से निरीक्षण करने पहुँचा, तो दृश्य अचानक विलुप्त हो गया। इस दिव्य दृश्य के बारे में दल के सदस्यों में परस्पर मतभेद था। कुछ का मानना था कि वह प्राचीन ब्रिस्टल शहर (इंग्लैण्ड) का दृश्य था, जबकि अन्य सदस्य इससे सहमत नहीं थे। उनके अनुसार यह प्राचीन अलास्का की एक झलकी थी। कुछ भी हो, इतना सुनिश्चित है कि उनने जो कुछ देखा, उसका वर्तमान में कोई अस्तित्व नहीं है। सेण्ट एलियास पहले भी निर्जन था और अब भी आबादी रहित जन हीन क्षेत्र है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वहाँ हर वर्ष 21 जून से 10 जुलाई के बीच उस अज्ञात शहर का दिव्य दर्शन किया जा सकता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त अवधि में लोग समयावरोध को लाँघ कर पीछे चलते हुए उसके गर्भ में उतरते और अतीत की झाँकी करते हैं।
क्या यह संभव है, हाँ, अब विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि ऐसा सर्वथा अशक्य भी नहीं। उसके अनुसार समय के अनेक आयाम हैं। जब किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थान से संबंधित समय के उच्च आयाम में व्यक्ति आयासपूर्वक अथवा अनायास पहुँच जाता है, तो वह उस वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थान से संबंधित भूत और भविष्य की बातें जान लेता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो व्यक्ति अतीत एवं भविष्य के गर्भ में प्रवेश कर जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि समय भूत, वर्तमान एवं भविष्य के एक रैखिक क्रम में स्थित है। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि समय का यह एक आयाम हुआ। अपनी दूसरी भूमिका में अतीत, वर्तमान और भविष्य साथ-साथ रहते हैं। यदि सचमुच ऐसा है, तो फिर उन आयामों तक पहुँचा कैसे जाय, जहाँ एक समय में तीनों काल खण्ड एक साथ रहते हों? वैज्ञानिकों का इस संबंध में सुनिश्चित मत है कि इन अविज्ञात स्तरों तक उन आयामों द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है, जो हमें ज्ञात हैं, अर्थात् लंबाई, ऊंचाई और गहराई। इन तक एक प्रारंभिक बिंदु द्वारा पहुँचा जा सकता है-एक ऐसा बिंदु , जिसमें स्थान तो होता है, पर आयाम नहीं। इसे निम्न प्रकार से समझा जा सकता है।
यदि कोई कण आकाश (स्पेस) में गतिशील हो, तो उससे एक आयामीय रेखा का निर्माण होता है। यह आयाम लंबाई है। जब इस प्रकार की कोई रेखा आकाश से गुजारी जाय, तो उसे लंबाई और चौड़ाई का दो आयामीय तल विनिर्मित होगा। यदि ऐसे किसी तल को पुनः आकाश में परिभ्रमण कराया जाय, तो जिस आकृति की संरचना होती है, उसके लंबाई, चौड़ाई (या ऊंचाई) और गहराई तीन आयाम होंगे।
क्रिया इसके विपरीत भी संपन्न की जा सकती है। यदि गति उलटी कर दी जाय, तो त्रिआयामीय भूमिका से पुनः प्रारंभिक बिंदु पर पहुँचा जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी ऐसी वस्तु की, जिसके तीन आयाम हों, अनुप्रस्थ काट (क्रास सेक्शन) काटी जायें, तो उसमें दो आयामों वाला तक प्राप्त होगा। फिर इस तल की अनुप्रस्थ काट से एक आयामयुक्त लाईन प्राप्त होगी। यदि आगे पुनः इसे अनुप्रस्थ रूप से काटा जाय, जो जिस बिंदु की उपलब्धि होगी, वह सर्वथा आयाम रहित कण मात्र होगा।
इस तरह यह निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है कि तीन डायमेंन्सनों वाला पदार्थ किसी चार आयामों वाली वस्तु की अनुप्रस्थ काट है। जब ऐसी किसी त्रिआयामी वस्तु को एक विशिष्ट तरीके से, विशिष्ट दिशा में भ्रमणशील बनाया जाय, तो वह एक चार आयामों वाला पदार्थ का निर्माण करेगी। यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि वह किस प्रकार की वस्तु होगी, जिसकी अनुप्रस्थ काट में तीनों डायमेन्सन्स उपस्थित हों एवं उसे किस विशिष्ट दिशा में बुलायी जाय कि उससे चार प्रकार की भूमिकाओं का निर्माण हो? क्योंकि आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, दांये-बांये इस प्रकार की गतियाँ केवल बृहद् आकृतियों का सृजन करती हैं, किसी नये आयाम का नहीं। इसके उत्तर में वैज्ञानिक कहते हैं कि चूँकि समयावधि एक नवीन भूमिका है, अतः हर आयामों वाले पदार्थ का चौथा आयाम इसे माना जा सकता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक त्रिआयामी पदार्थ चार आयामों वाला होता है और ऐसी सभी वस्तुओं की विवेक संगत परिभाषा यही हो सकती है कि उनके दृश्य तीन ही आयाम हैं-लंबाई, चौड़ाई और गहराई, जब कि समयावधि का चतुर्थ डायमेन्सन अदृश्य स्तर का बना रहता है। तो क्या इस तरह की अवस्था और वस्तु संभव है? विशेषज्ञ इसका उत्तर ‘हाँ’ में देते हुए कहते हैं कि यह शक्य तो है, पर केवल परिकल्पना स्तर पर ही, क्योंकि वास्तव में बिंदु, रेखा और तल का यथार्थ अस्तित्व सदा उसी रूप में बना नहीं रहता। किसी लाईन के, जब वह गत्यात्मक अवस्था में आ जाय, तो लंबाई के साथ-साथ उसमें चौड़ाई (और समयावधि भी) हो सकती है, जैसा कि किसी तल के गतिमान बनने पर लंबाई, चौड़ाई के साथ-साथ उसमें मोटाई भी आ उपस्थित होती है। सवाल यह शेष रह जाता है कि ऐसे किसी द्रव्य (त्रिआयामी) की गति क्या हो कि वह चतुर्थ आयाम वाले पदार्थ को जन्म दे?
विज्ञान विशारदों का इस संदर्भ में विचार है कि जब किसी वर्गाकार तल को ऊंचाई के आयाम में (ऊपर-नीचे) चलाया जाता है, तो इससे घन की उत्पत्ति होती है। ऐसे ही यदि उक्त (परिकाल्पनिक) घन को समय के आयाम में गति दी जाय, तो जिस आकृति का जन्म होगा, वह एक चार डायमेन्सन वाली संरचना होगी।
यहाँ “समय के आयाम में गति “ का तात्पर्य भलीभाँति समझ लेना आवश्यक है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है इसका अर्थ एक अभिनव दिशा में गति से है, न कि पार्श्व, ऊर्ध्व और अधोगतियों से। शंकालु हृदय में यहाँ यह संदेह पैदा हो सकता है कि ऐसी दूसरी गतियाँ हैं क्या? उत्तर में यही कहा जा सकता है कि ऐसी कई ज्ञात गतियाँ हैं और अनेक अविज्ञात गतियों की संभावना विज्ञान जगत में प्रकट की जाती है । उदाहरण के लिए एक तो वह वेग हो सकता है, जो हर प्राणी और पदार्थ को पृथ्वी से मिलता है। इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से वेग रहित होने के बावजूद उन्हें वेगवान कहा जा सकता है। यह प्रच्छन्न गति है। इस तरह यह मानने में हर्ज नहीं कि त्रिआयामी दृश्य एक यथार्थ वस्तु की परिकाल्पनिक रूप से गति रहित अनुप्रस्थ काट है, जिसका चौथा आयाम-अवधि, पृथ्वी की उस दैनिक गति से अविच्छिन्न रूप से संलग्न है, जो हर पृथ्वीवासी पदार्थ और प्राणी को उक्त ग्रह से मिलती रहती है। इसके अतिरिक्त अन्य गतियाँ हैं-पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण गति, सूर्य द्वारा किसी महासूर्य की परिक्रमा गति एवं अपनी आकाश गंगा द्वारा किसी अन्य अविज्ञात केन्द्र की प्रदक्षिणा गति। चूँकि प्रत्येक दृष्ट पदार्थ पर यह गतियाँ साथ-साथ क्रियाशील हैं, अतः यह कहा जा सकता है कि उन सभी को उक्त सारे आयाम उपलब्ध हैं। यह बात और है कि सामान्य स्थिति में उनकी अनुभूति नहीं हो पाती, पर इतने से ही सत्य और तथ्य से इंकार तो नहीं किया जा सकता। इतना स्वीकार लेने के उपराँत इस यथार्थ को मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि उपरोक्त गतियों और आयामों को समय के परिप्रेक्ष्य में ही जाना, समझा और अनुभव किया जा सकता है। चूँकि समय-संदर्भ के अतिरिक्त इनकी अनुभूति और कोई उपाय नहीं, अस्तु इन सबको सरलता के लिए “समय का आयाम” कहा जाता है।
यहाँ यह जिज्ञासा हो सकती है कि अवधि यदि समय का एक पक्ष है, तो इसके दूसरे अन्य पहलू क्या होंगे? इस संबंध में इस विषय के निष्णात् विभिन्न प्रकार की संभावनाओं में से जिन संभाव्यताओं के बारे में अपना मत प्रकट करते हैं, वे हैं-दृश्य-अदृश्य एवं परिवर्तन व पुनरावृत्ति की घटनाएँ। वैज्ञानिकों का कहना है कि समय के अगणित पहलुओं में से मात्र “अवधि” ही एक ऐसी है, जो मानवी इंद्रियों के लिए ग्राह्य है। जब किसी वस्तु के संबंध में यह कहा जाता है कि उसका आविर्भाव हुआ, तो इसका आशय मात्र इतना होता है कि हमें अकस्मात् उसके अस्तित्व का पता चला। ऐसे ही किसी के तिरोभाव से उसकी अस्तित्वहीनता का बोध होता है, किंतु जन्म-मरण की मध्यावस्था इंद्रियगम्य नहीं है। उसे इंद्रियों द्वारा जाना नहीं जा सकता। यदि अनुभूति की जा सकती है, तो मात्र समयावधि के परिप्रेक्ष्य में ही वह संभव है। इसी प्रकार परिवर्तन को भी देखा नहीं जा सकता। जो दिखाई पड़ता है, वह परिवर्तनों का समुच्चय होता है। सूर्योदय-सूर्यास्त, ऋतुओं का गुजरना, पौधों एवं बच्चों का बढ़ना आदि ऐसी घटनाएँ हैं, जिन्हें हम देख नहीं पाते, किंतु फिर भी यह घटित तो होती ही है। इसीलिए इन्हें परिकाल्पनिक माना जाता है और ऐसा स्वीकार किया जाता है कि समय के किसी अन्य आयाम में इनका वास्तविक अस्तित्व है, वैसे ही जैसे किसी परिकाल्पनिक त्रिआयामी वस्तु की यथार्थ सत्ता अवधि के आयाम में होती है, अर्थात् उसी डायमेंन्सन में वह इंद्रिय-ग्राह्य बन पाती है।
इस दृष्टि से समय और उसके आयामों की महत्ता काफी बढ़ जाती है। यदि किसी व्यक्ति की इन आयामों में गति हो, तो उसके लिए वह सब संभव हो जाता है, जो सामान्य स्थिति और परिस्थिति में सर्वसाधारण के लिए असंभव स्तर का बना रहता है। फिर उसके लिए काल की विभाजन-भित्ति समाप्त हो जाती है और सब कुछ वर्तमान हो जाता है, अर्थात् वह किसी भी वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थान से संबंधित चाहे किसी काल-खण्ड में अप्रतिहत प्रवेश कर उससे संबंधित जानकारी उसी प्रकार उतनी ही आसानी से अर्जित कर सेता है, जैसे कोई व्यक्ति अपने सम्मुख की चीज के बारे में सरलतापूर्वक ज्ञानार्जन कर लेता है, किंतु यह सब शक्य उसी अवस्था में है, जब चेतना अत्यंत परिष्कृत स्तर की हो। अपरिष्कृत चेतना तो मनुष्य को पशु तुल्य बनाये रखती है, जब कि अपनी परिशोधित स्थिति में वह मानव को देवताओं की श्रेणी में ला खड़ा करती है। हम परिष्कृत चेतना संपन्न बनें, काल-खण्डों के अवरोध को तभी मिटाया जा सकता है और अविज्ञात को ज्ञात तभी बनाया जा सकता है।
भगवान् को ध्यानमग्न देखकर नारद जी ने लक्ष्मी जी से जब कारण पूछा, तो उन्हें बताया गया कि वे अपने सबसे बड़े भक्त पृथ्वीवासी एक व्यक्ति की उपासना कर रहे हैं। अपने से भी बड़े भक्त को देखने को व्यग्र नारद वापस लोट पड़े। कितने ही दिन वे खोये-खोये घूमते रहे।
एक दिन वह गाँव के बाहरी रास्ते से निकल रहे थे। चमड़े की दुर्गंध उनके चरणों की गति को और तीव्र कर रही थी। उन्होंने जैसे ही दृष्टि उठाई, पशु-चर्मों से घिरा एक मैला-कुचैला चमार दिखाई दिया। वह पसीने में लथ-पथ चमड़े की सफाई में व्यस्त था। नारद जी समझ गये, हो न हो यही विष्णु का परम भक्त है, जिसका चित्र उस दिन बड़ी निम्नता के साथ बनाया जा रहा था। अनिच्छित उनके चरण वहीं रुक गये। तीव्र दुर्गंध के कारण वे चमार के पास तो न जा सके। उनके मन में जिज्ञासा जाग्रत हुई कि इसकी दिनचर्या कर निरीक्षण तो करना ही चाहिए। वे दूर खड़े नाक पर हाथ लगाये उसके कार्यों को ध्यानपूर्वक देखने लगे।
चमड़े के ढेर को साफ करते-करते शाम हो गयी। नारद ने सोचा, शायद अब किसी मंदिर में जायेगा या अपने निवास पर ही भगवान् का नाम स्मरण करेगा, पर उसके द्वारा ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अब तो उनके क्रोध की सीमा न रही। वह सोचने लगे कि एक अधम चमार को मुझसे श्रेष्ठ बताकर मेरा अपमान किया है। कहीं भक्त ऐसे होते हैं। अंतः से आवाज आयी-थोड़ी देर और इसकी गतिविधि देखनी चाहिये। अतः वे रुक गये।
चमार तो अपने कार्य में लगा ही था। जब रात होने लगी, तो उसने चमड़े के सारे ढेर को समेटा। जितना चमड़ा दिन भर में साफ कर लिया था, उसे एक गठरी में बाँधा और जो चमड़ा साफ न हो पाया था, उसे एक ओर समेट कर रखा। फिर एक मैला कपड़ा लेकर सिर से पैर तक अपने पसीने को पोंछकर घुटनों के बल बैठ गया और हाथ जोड़कर भाव-विभोर हो कहने लगा-”प्रभो ! मुझे क्षमा करना, मैं बिना पढ़ा चमार आपकी पूजा करने के ढंग को भी नहीं जानता। मेरी आपसे यही विनय है कि मुझे कल भी ऐसी सुमति देना कि आज की तरह ही आपके द्वारा दी गई जानकारी को ईमानदारी के साथ पूर्ण कर सकूँ।”
नारदजी ने तभी पाया कि भगवान् विष्णु उसके समीप खड़े मुस्करा रहे हैं। मंद स्मित के साथ वे बोल उठे-”मुनिराज ! समझ में आया, इस भक्त की उपासना की श्रेष्ठता का रहस्य ?”
आत्म-चेतना को परमात्मा सत्ता से जोड़ने, उससे वार्तालाप करने तथा उसमें निवास करने का सर्वोत्तम उपास प्रार्थना हैँ । यह वह उपक्रम है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी अंतरात्मा की भूख को मिटाता है। शरीर की क्षुधा अन्न-जल से मिटती है और उससे उसको शक्ति मिलती है। उसी तरह अंतरात्मा अपनी आकुलता को मिटाने, अपने ऊपर चढ़े मल-विशेषों-कषाय-कल्मषों को हटाने और उसमें बल तथा प्रकाश भरने, अपूर्णता से पूर्णता की ओर ले चलने की प्रार्थना भगवान से करता है। पितु, मातु-सहायक, स्वामि-सखा की भावना रखकर आराध्य के सम्मुख की गयी प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती है। परमात्म चेतना को जहाँ-कहीं जब-कभी भी श्रद्धासिक्त भावभरी हार्दिक अभिव्यक्ति मिलती है तो उनकी प्रत्यक्ष या परोक्ष सहायता उभरे बिना रह नहीं सकती। ऐसी अनेकों घटनायें अनादि काल से लेकर अब तक के पुराण एवं इतिहास के पृष्ठो पर अंकित हैं जिसमें सनातन सत्ता के मानवी प्रार्थना पर द्रवीभूत होते और उसकी सहायता मिलते रहने को प्रमाणित करते हैं।
सुप्रसिद्ध मनीषी नार्मन विन्सेन्ट पील ने अपनी कृति “ट्रेजरि ऑफ कँरेज एण्ड कान्फीडेन्स” में कहा है कि जीवन को पवित्र, प्रखर, सुखमय एवं अतीन्द्रिय क्षमता संपन्न बनाने के लिए नियमित रूप से प्रार्थना करना अनिवार्य है। प्रार्थना न केवल पूजा-अर्चना का विषय है, अपितु आत्मसत्ता को विराट् चेतना के साथ जोड़ने की प्रचंड प्रक्रिया है। प्राण ऊर्जा उत्पन्न करने की-शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन की सर्वोच्च साधना है। शारीरिक दृष्टि से इसका प्रभाव हारमोन ग्रंथियों पर तो पड़ता ही है, साथ ही मानसिक स्तर को भी उत्कृष्ट चिंतन की दिशाधारा मिलती है। विधेयात्मक दृष्टिकोण इसी की परिणति है। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण के समतुल्य ही प्रार्थना भी ईश्वरीय सहायता को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। भौतिक-वेत्ताओं एवं चिकित्सा विज्ञानियों ने भी अब प्रार्थना को समर्थ अध्यात्मोपचार के रूप में मान्यता प्रदान की है। उनका मानना है कि प्रार्थना से न केवल उदासीनता और निराशा जन्य लाइलाज मानसिक व्याधियों वरन् असाध्य समझी जाने वाली शारीरिक बीमारियों का निदान भी प्रार्थना की शक्ति से संभव है। पाश्चात्य देशों में इसके लिए नियमित रूप से सामूहिक प्रार्थना सभायें आयोजित की जाती है और उनके प्रतिफल भी उत्साह वर्धक रूप से सामने आते हैं।
इस संदर्भ में मूर्धन्य विद्वान फ्रैंक एडवर्ड्स ने अपनी पुस्तक “स्ट्रैन्ज वर्ल्ड” में अमेरिका के टेनेसी राज्य के शेखुड स्थान की माग्रेंट-जेक्शन नामक एक बालिका का उदाहरण प्रस्तुत किया है। मार्गेट तब दो ही वर्ष की थी कि अचानक बीमार पड़ गयी। चिकित्सकों ने बहुत जाँच पड़ताल की पर रोग की भयंकरता उनके समझ में न आ सकी। अतः उसे नेशविले के वाँडरबिल्ट अस्पताल ले जाया गया। महीनों की सघन चिकित्सा के बावजूद भी उसको अंधी होने से बचाया न जा सका। बालिका अपने घर लौट आयी।
पता नहीं यह बीमारी आगे चलकर क्या स्वरूप धारण करे, यह भय मार्गेट के पिता को जो एक विद्युत कर्मी था, सताता रहता। अतः उन्होंने अपनी यह व्यथा एपिसकोपल मिशन के पादरी रेवरेण्डजाँन हस्के को बतायी और कहा कि इस लड़की की बीमारी का निदान डाक्टर ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, क्या किया जाय? पादरी ने लड़की के माता-पिता को प्रार्थना की शक्ति में विश्वास कराते हुए नियमित रूप से लगातार प्रार्थना करते रहने का सुझाव दिया। अब तो मार्गेट सहित उसके माता-पिता दो वर्ष तक नियमित रूप से उसकी आँख की दृष्टि लौट आने के लिए प्रार्थना करते रहे। बीच-बीच में पादरी महोदय भी सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित हो जाते। दो वर्ष पूरे होने को आये ही थे कि एक दिन फिर से पूर्व हुई बीमारी का पुनरावर्तन हुआ जिसके कारण उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। चार वर्ष की मार्गेट पर फिर अनेकों परीक्षण किये गये, पर इस बार भी रोग का सही पता लगा पाने में चिकित्सकों को असफलता ही हाथ लगी। रोग को असाध्य मानकर उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी। नेत्रहीन लड़की को भाग्य-भरोसे छोड़कर उसके माता-पिता साथ लेकर घर आ गये और उसकी स्वास्थ्य रक्षा के लिए अपने उपासना गृह में बराबर ईश्वर से प्रार्थना करते रहे।
कुछ ही दिन बीते थे कि एक रात्रि मार्गेट के पिता ने सिगरेट सुलगाने के लिए ज्यों ही माचिस जलाई उसके प्रकाश को देखकर वह उसे पकड़ने को दौड़ी लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि ढाई वर्ष की लंबी बीमारी के पश्चात् मार्गेट की आँखों की रोशनी लौट आयी थी। इस घटना के बाद उसकी दृष्टि में सुधार होता गया और कुछ ही महीनों में वह पूर्ण स्वस्थ हो गयी। आँखों पर किसी प्रकार के चश्मे की भी आवश्यकता नहीं रही। पादरी हस्के ने इस घटना को प्रार्थना की शक्ति का जीवन्त उदाहरण बताया है और कहा कि मनुष्य यदि अपने भीतर ईश्वरीय शक्ति में सच्ची श्रद्धा उत्पन्न कर सके तो उस आधार पर बड़े-से-बड़े-संकटों पर भी विजय प्राप्त कर सकता है।
इसी तरह की एक अन्य घटना का वर्णन “बिआँन्ड रीजँन मिरेकल्स कैन चेन्ज योर लाइफ” नामक अपने ग्रंथ में पी. राबर्टसन ने किया है। बारबरा कास्की नामक एक किशोरी 6 वर्ष से “मल्टिपिल स्केलोरिसिस” नामक महाव्याधि से ग्रस्त थी जिसकी चिकित्सा अमेरिका के इलिनोइस राज्य के एक अस्पताल में चल रही थी। उसकी देखभाल कर रहे उसी राज्य के प्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. थामस मारसल के अनुसार यद्यपि बारबारा मरणासन्न स्थिति में पहुँच चुकी थी, फिर भी उसकी आँखों में जिजीविषा की चमक विद्यमान थी। उन्होंने अपनी सूझबूझ के सहारे निराशा के घने अंधकार में डूबते हुए कास्की के माता-पिता को धैर्य बँधाते हुए कहा कि जब जगत के सब दरवाजे बंद दीखते हों तब अदृश्य चेतना के महासागर से आवश्यक सहायता खींच बुलाने के लिए ईश प्रार्थना ही एक मात्र कारगर उपाय-उपचार शेष रह जाता है। कारण बारबारा की स्थिति भी ऐसी ही हो गयी थी जिसमें मानवी प्रयत्नों की चिकित्सकीय उपचारों की इति श्री हो चुकी थी। मानवी बुद्धि के माध्यम से जो कुछ भी संभव था, अस्पताल में किया जा चुका था।
डॉ. थामस न केवल भौतिक चिकित्सा विज्ञानी थे, वरन् प्रार्थना की शक्ति में उनका अटूट विश्वास था जिसके माध्यम से वे अब तक सैकड़ों मरीजों को स्वस्थ करने की ख्याति अर्जित कर चुके थे। उन्होंने लड़की के पिता का ध्यान अस्पताल की मुख्य दीवाल पर लिखे हुए महाकवि टेनीसन के एक महावाक्य की ओर आकर्षित किया जिसमें लिखा था-’साँसारिक मनुष्य जो सोचता और करता है, उससे कहीं अधिक समर्थ शक्ति प्रार्थना में है।’ चूँकि बारबारा के रोग को चिकित्सकों ने असाध्य घोषित कर दिया था, अतः उन्होंने उसके माता-पिता को अध्यात्मोपचार की ओर प्रेरित किया। अस्पताल में ही टी. वी. पर प्रतिदिन ‘प्रार्थना द्वारा रोगोपचार’ विषय पर कार्यक्रम दिखाये जाने लगे कि किस प्रकार रोगी औषधि उपचार की अपेक्षा प्रार्थना की अध्यात्मोपचार प्रक्रिया द्वारा अनेक गुनी शक्ति प्राप्त करता और पूर्ण निरोग हो जाता है। इस प्रक्रिया से बारबारा का खोया आत्म विश्वास वापस लौटने लगा और वह स्वयं प्रार्थना के उन शब्दों को गुनगुनाने लगी। अब उसके मन में जिजीविषा की आकाँक्षा प्रबल हो उठी थी और नर्स की सहायता से प्रतिदिन सामूहिक प्रार्थना में सम्मिलित होने लगी। एक वर्ष तक यही क्रम चलता रहा।
अमेरिका के इलिनोइस प्राँत में डॉ. एफ. डिविनिटी पेट राबर्टसन ने ‘क्लब 700’ नामक एक संस्था स्थापित की है। यह संस्था टी. वी. प्रसारण के माध्यम से आध्यात्मिक रोग शमन के विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित करती है। रोगियों से मुलाकातें तथा उनके उपचार, प्रार्थना सभाओं का आयोजन आदि की जानकारी केबल टी. वी. के जरिये लगभग ढाई करोड़ व्यक्तियों तक पहुँचाई जाती है। बारबारा के लिए भी उन्होंने सामूहिक प्रार्थनाएँ आयोजित करनी आरंभ की दी जिसमें उसके साथ सैकड़ों लोग शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थनाएँ करने लगे। फलस्वरूप जो लड़की पहले बिस्तर से उठ नहीं पाती थी, धीरे-धीरे क्रमशः ठीक होने लगी, मल्टिपिल स्केलोरिसिस नामक जिस महाव्याधि से वह पीड़ित थी, उसका लक्षण ही यह है कि जिस प्रकार किसी विद्युत उपकरण में जिन तारों से बिजली पहुँचायी जाती है, उन पर चढ़ी प्लास्टिक खोल यदि जल जाती है तो दो तार जहाँ सटे हुए - होते हैं, वहाँ शार्ट सर्किट होने लगती है और शक्ति स्रोत से संबंध विच्छेद हो जाने के कारण उपकरण निरुपयोगी हो जाता है। इसी प्रकार मस्तिष्क से विभिन्न अंगों को नियंत्रण में रखने के लिए संकेत स्नायु-मंडलों के माध्यम से दिये जाते हैं। इन स्नायु तंतुओं पर भी ‘माइलिन’ नामक एक वसीय परत चढ़ी होती है जो इस बीमारी के कारण गलने लगती है। बारबरा के स्नायु तंत्र की माइलिन भी गलने लगी थी। फलस्वरूप हाथ-पैरों से लेकर क्रमशः सभी शारीरिक प्रणालियाँ एक के बाद एक बेकार होती चली गयीं। साँस लेना तक दूभर हो गया था अतः कृत्रिम श्वास पर इसे जीवित रखा जा रहा था। 6 वर्षों तक वह इसी प्रकार कृत्रिम यंत्रों के माध्यम से किसी प्रकार जीवित रही। सातवें वर्ष सामूहिक प्रार्थना की शक्ति ने अपना चमत्कारिक प्रभाव दिखाना आरंभ कर दिया। सर्वप्रथम फेफड़ों की क्षमता धीर-धीरे लौटने लगी। इसके बाद कैथेटर की सहायता में भी कमी आने लगी। जैसे-जैसे प्रार्थना में उसकी अभिरुचि बढ़ती गयी, आत्मविश्वास जगने लगा, त्यों-त्यों उसके स्नायु-मंडल की माइलिन परतें जो विगलित हो गयी थी, पुनर्स्थापित होने लगी और चिकित्सकों के प्रयत्न भी सफल होने लगे।
पी. राबट्सन के अनुसार बारबरा के ही शब्दों में ‘सात जून सन् 1971 को जब डॉ. थामस मुझे देखने आये थे तब मैंने जीने की आशा छोड़ दी थी, लेकिन उनकी सद्भावना एवं विशाल चिकित्सकीय अनुभव के साथ प्रार्थना शक्ति को जोड़ने की अद्भुत कुशलता ने मुझे नया जीवन प्रदान किया। ‘मेडिकल साइंस’ के ‘स्प्रिचुअल साइंस’ का बेमिसाल समन्वय, लोगों की सद्भावना तथा विश्वासपूर्वक सच्ची लगन से अंतःकरण कर पुकार का मनोविज्ञान क्या-क्या चमत्कार नहीं कर सकता है, अपने आप में एक अवर्णनीय सत्य है। ठीक दस वर्ष बाद अर्थात् 7 जून 1981 में सोलह वर्ष की उम्र में वह पूर्ण स्वस्थ हो गयी और चलने फिरने लगी। डॉ. थामस सहित सभी चिकित्सकों के लिए यह सुखद आश्चर्य था। सभी ने उस परमसत्ता की अनुकंपा के प्रति जो अहो-भाव अनुभव किया था, वह वर्णनातीत है।
प्राचीनकाल से ही प्रायः सभी देशों में इस प्रकार की असाध्य बीमारियों में आध्यात्मिक उपचारों का सहारा लिया जाता रहा है। यूरोप, अमेरिका आदि पाश्चात्य देशों इंद्रियगम्य उपचारों के अतिरिक्त ‘फेथ हीलिंग‘ जैसे अध्यात्मोपचारों में प्रार्थना के बल पर अनेकानेक आधि-व्याधियों से मुक्ति दिलायी जाती है। इसके लिए अशरीरी आत्माओं की भी सहायता ली जाती है। उदाहरण के लिए इटली की एक घटना को लिया जा सकता है। इस देश के ब्रसिया काउन्टी के मोन्टीकियारों नगर में पेरिनागिली नामक एक नर्स रहती थी। 13 जुलाई 1947 के दिन अचानक उसने हवा में तैरती हुई एक दिव्य नारी को देखा जिसके सीने पर सफेद, पीले और लाल रंग के तीन फूल थे। उस देवी ने उसे बताया कि यदि लोग सामूहिक प्रार्थना करके रोगग्रस्त व्यक्तियों की आधि-व्याधि दूर करने का सच्चे हृदय से संकल्प करेंगे तो उनकी बीमारियाँ दूर होने लगेंगी। नर्स ने जब यह बात अस्पताल में बतायी तो वहाँ का सारा स्टाफ और रोगियों के मित्रों ने मिलकर सामूहिक प्रार्थना सभा का आयोजन किया जिसका आश्चर्यजनक सत्परिणाम निकला। रोगियों में नयी आशा की किरणें उभरने लगीं जिसकी कोई उम्मीद तक नहीं थी। तब से न केवल उस अस्पताल में वरन् पूरे नगर में उस दिन सामूहिक प्रार्थनाएं आयोजित की जाती हैं जिसे ‘रोजामिस्टिका’ पर्व नाम दिया गया है। देवी सहायता को खींच बुलाने का प्रार्थना से बढ़कर दूसरा कोई कारगर उपास नहीं है।
प्रकृति की कारीगरी पर विचार किया जाय, तो हम पायेंगे कि वह सृष्टि का एक अद्भुत इंजीनियर है। उसने निर्माणों में एक-से-एक बढ़ कर ऐसी कृतियाँ गढ़ हैं, जिन्हें देख कर अचंभा हुए बिना नहीं रहता। यदा-कदा मन में यह विचार उत्पन्न होता है कि आखिर इन रचनाओं के पीछे निसर्ग का क्या प्रयोजन है ? क्या मात्र कौतुक-कौतूहल पैदा करने के लिए ही इनका सृजन हुआ है अथवा उद्देश्य कुछ और है? गंभीर मंथन से जो निष्कर्ष निकलता है, वह बताता है कि संभव है, इनका ध्येय मनुष्य को प्रेरणा देना हो कि वह अपनी गतिविधियाँ प्रकृति की तरह रचनात्मक बनाये, ध्वंसात्मक नहीं।
इन्हीं संभावनाओं को प्रकट करता हुआ भूमध्य सागर में सारडीनिया नामक एक द्वीप है। इसके उत्तरपूर्व में कैपोडो ओरसो अर्थात् “भालू अंतरीप” स्थित है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस अंतरीप का मुख्य आकर्षण वहाँ की भालूनुमा एक विशाल संरचना है। जब कोई भी पर्यटक इस “केप अंतरीप” की चोटी तक पालू गाँव के रास्ते से आता है, तो वह प्रकृति की इस अद्भुत कारीगरी को देखकर आश्चर्य में पड़ जाता है। भालू एक विशाल चट्टान से विनिर्मित है, जिसे पास से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह उस टापू और समुद्र के विहंगम दृश्य को देखने में निमग्न है।
प्रकृति की इंजीनियरिंग का ऐसा ही एक नमूना दक्षिणी चीन के युन्नान प्राँत में देखने को मिलता है। उक्त प्राँत की राजधानी कुनमिंग से लगभग 60 मील दक्षिण-पूर्व में एक ऊंचे पठार पर पत्थरों का एक सघन जंगल है। पत्थरों के इस वन को लाग दूर-दूर से देखने के लिए आते हैं। “पत्थरों का जंगल” इस नाम से तनिक अचंभा अवश्य होता है, किंतु उसे देखने के बाद नाम की सार्थकता सत्य जान पड़ती है। वस्तुतः वह हरीतिमा रहित अरण्य ही है। जब कोई पर्यटक दूर से अकस्मात् उस ओर दृष्टि दौड़ाता है, तो ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कोई विस्तृत वन सामने फैला हुआ हो-ऐसा वन, जिसमें पेड़ों के टहनियाँ और पत्ते न हों, सिर्फ तने शेष रह गये हों। भिन्न-भिन्न आकार और ऊंचाई वाले पाषाण-स्तम्भों से युक्त यह स्थल प्रथम दृष्टि में किसी घने वन का भ्रम पैदा करता है।
थीसली, ग्रीस में पिण्डस पर्वत की तराई में एक छोटा शहर है- कलाम्बका। इसकी पृष्ठभूमि में उत्तर की ओर विशाल चट्टानी स्तंभों के तीन समूह हैं। ये विशाल स्तंभ देखने में ऐसे प्रतीत होते हैं मानों कोई बौद्ध स्तूप हों। इन समूहों में स्तूपों के अतिरिक्त और भी कितनी ही संरचनाओं की नैसर्गिक अनुकृतियाँ बनी हुई हैं। इनमें दो, यात्रियों का ध्यान विशेष रूप से अपनी ओर आकर्षित करती है। ये हैं वहाँ के विशाल स्तूप एवं अगणित कँगूर वाली गढ़ियाँ। इस संपूर्ण प्राकृतिक निर्माण को तनिक हटकर देखने से ऐसा आभास मिलता है, जैसे रजवाड़ों की यह छोटी-छोटी गढ़ियाँ हैं और उन्हीं के निकट उनके पृथक्-पृथक् शिक्षाओं और सिद्धाँतों का उद्घोष करते उनके अपने-अपने स्तंभ। इस प्रस्तर रचना को ‘मिटिओरा’ के नाम से पुकारा जाता है। ग्रीक में इसका अर्थ “गगनचुंबी” होता है। स्तंभों में से कई-कई तो 18 सौ फुट ऊंचे हैं। इन स्तूपों की शोभा को तब चार चाँद लग गये, जब प्रकृतिगत निर्माणों के ऊपर मानवीकृत संरचनाएँ खड़ी की गई। यह अद्भुत निर्माण का विचार कुछ संन्यासियों के मन में तब आया, जब उन्हें संसार से विरक्ति अनुभव होने लगी। ऐसी स्थिति में इन सर्वथा अगम्य स्तूप श्रृंगों पर छोटे निवास बनाकर उनने अपनी इच्छा-पूर्ति की। वोटी पर स्थित उनके मठ सचमुच ही सर्वसाधारण की पहुँच से परे थे। यदि उनसे जुड़ी अलग होने और मुड़ने वाली सीढ़ी को हटा दिया जाय, तो मठ का संबंध समाज से बिलकुल ही विच्छिन्न हो जाता है। और उनमें रहने वाले व्यक्ति समाज में मनुष्य के बीच रहकर भी उनका संपर्क मनुष्य और समाज से एकदम टूट जाता है। निर्माणों की विशेषता यह है कि जब तक ध्यानपूर्वक इन्हें नहीं देखा जाय, तब तक यह ज्ञात नहीं होता कि इनके ऊपर मानवीकृत संरचना भी विनिर्मित है। ऐसे मठ वहाँ के खंभों में बीस से ऊपर हैं। इनका निर्माण 14 वीं एवं 15 वीं सदी में किया गया था और ये 19 वीं शताब्दी तक आबाद रहे। अब ये खाली पड़े हुए हैं। जो भी पर्यटक यहाँ आते हैं, वे प्रकृति और मनुष्य की इन मिली-जुली रचनाओं को देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं।
प्रकृति के वास्तुशिल्प का एक अच्छा उदाहरण “फ्रांसीसी गुफाओं” के रूप में देखा जा सकता है। यह कंदराएँ इटली में एसीनो नदी से लगे पहाड़ पर स्थित है। इन गुफाओं की सबसे बड़ी विशेषता उनमें स्थित अनेकानेक कक्ष हैं। हर कक्ष की अपनी-अपनी विशिष्टताएँ हैं। उन्हीं के आधार पर उनका नामकरण किया गया है। उदाहरण के लिए उसका एक भाग ऐसा है, जिसमें सिर्फ चमगादड़ रहते हैं। इस आधार पर उस प्रकोष्ठ का नाम “ग्रोटाडिले नोटोले” अर्थात् “चमगादड़ों की गुफा” रखा गया । उसके एक अन्य कक्ष का नाम “ग्रोटो ग्रेण्डे डेल वेण्टो” अर्थात् “ग्रेट केव ऑफ विण्ड” है। कंदरा के इस भाग में अनेक प्रकोष्ठ हैं। इनका आकार-प्रकार इतना बड़ा है कि उनमें बड़े-बड़े मठ समा जायँ। इनमें से कुछ में प्राकृतिक प्रकाश की अच्छी व्यवस्था है विशाल गुफा का एक भाग “साला डिले कैण्डेलाइन” कहलाता है। उक्त नाम उस हिस्से में स्थित उन अगणित छोटे-छोटे मोमबत्तीनुमा निर्माणों की ओर इंगित करता है, जो देखने से ऐसे प्रतीत होते हैं, मानों वही जल-जल कर उस भाग को प्रकाशित कर रहे हों। इसी कारण उसका नाम “मोमबत्ती वाला कमरा” रखा गया है। एक अन्य कक्ष “साला डेल इनफिनिटो” या “रूम ऑफ इनफाइनाइट” कहलाता है। इस प्रकोष्ठ में बड़े एवं विशाल सुसज्जित स्तंभ हैं, जो गुफा की छत को सँभाले हुए हैं। इन्हें देखने से ऐसा लगता है, जैसे प्रकृति ने विशाल खंभों का निर्माण कर विस्तृत छत को दृढ़ता प्रदान की हो, ठीक वैसे ही, जैसे मानवी निर्माणों में देखा जाता है। इनमें से अकेले ग्रोटा ग्रेण्डे डेल वेण्टो की लंबाई आठ मील है। उल्लेखनीय है कि फ्रांसीसी गुफाओं के प्रत्येक कक्ष एक दूसरे से संबद्ध हैं, उसी प्रकार जिस प्रकार विशाल इमारतों में कमरे परस्पर जुड़े होते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका में कोलोरैडो नदी के तट पर उसके दक्षिण पूर्व भाग में “उटाह” नामक स्थान है। यहाँ एक नेशनल पार्क है, जो “मेहराबों वाला पार्क” के नाम से प्रसिद्ध है। इस पार्क की विशेषता यह है कि यहाँ छोटे-बड़े कितने ही आकर्षक पत्थरों के मेहराब हैं। इन्हें देखने पर प्रकृति की उस कलाकारिता पर आश्चर्य होता है, जिसने कुशलतापूर्वक इन्हें गढ़ कर खड़ा किया। इनमें से कई इतने नाजुक और पतले हैं, कि विश्वास नहीं होता यह लंबे समय से अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। ऐसे में निसर्ग की निर्माण कुशलता पर विस्मय होना स्वाभाविक ही है। इस पार्क का सबसे लंबा मेहराब “लैंडस्केप आर्च” है। विश्व का यह अपने प्रकार का सबसे बड़ा आर्च है। इसकी लंबाई 291 फुट है।
स्पेन में मैड्रिड के निकट पाँच सौ एकड़ भूमि पर फैला पत्थरों का एक शहर है। इस शहर में विभिन्न आकृतियों की विलक्षण संरचनाएँ अब भी देखी जा सकती है। यों इस प्रस्तर शहर की कितनी ही रचनाएँ समय की मार से विनष्ट हो चुकीं हैं, किंतु अब भी इतनी शेष हैं, कि प्रकृति की वास्तुकला की दक्षता के बारे में काफी कुछ जाना-समझा जा सकता है।
प्रकृति की कृतियों में काँगो (दक्षिण अफ्रीका) की कंदराओं की चर्चा न ही की जाय, तो उल्लेख अधूरा होगा। माना जाता है कि यह कंदरा प्रस्तर युग में आदि मानवों को निवास रही होगी। यह अनुमान उनकी दीवारों में उत्कीर्ण तस्वीरों के आधार पर विशेषज्ञ लगाते हैं, किंतु जिन कारणों से यह विश्व-प्रसिद्ध बनीं, यह कारण मानवीकृत चित्र नहीं हैं, वरन् प्रकृति की विलक्षण कारीगरी है। इनमें अलग-अलग प्रकोष्ठो में विस्मय विमुग्ध करने वाली रचनाएँ हैं। विशेष दर्शनीय वहाँ के “क्रिस्टल पैलेस” “डेविल्स वर्कशाप” एवं तहखाना हैं। इनमें कहीं पर्दे की आकृति जैसी रचना है, तो कहीं बड़े-बड़े बबूले जैसा निर्माण, कहीं बाँसुरी, तो कहीं लंबी-लंबी सुइयाँ। एक स्थान पर ऐसा ड्रम है, जो रचना की दृष्टि से ही ड्रम नहीं हैं, वरन् वह ड्रमों जैसी ध्वनि भी निरंतर निकालता रहता है। वहाँ प्रवेश करने पर ऐसा लगता है, जैसे यह सभी, पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हों।
कैलीफोर्निया में नेवादा के निकट एक घाटी है “डेथ वेली” या मृत्यु घाटी। इस घाटी का आकर्षण वहाँ की भूमि में विनिर्मित सुन्दर बीहड़ है। इसे देखने से ऐसा आभास होता है, जैसे किसी कुशल शिल्पी ने अपने सधे और निष्णात् हाथों से इसे तराशा हो। इसका नाम मृत्यु घाटी इसलिए रखा गया है, क्योंकि गर्मियों में वहाँ का तापमान अति उच्च हो जाता है। इसके बावजूद छोटे-छोटे जीवधारी वहाँ मजे में रहते हैं।
प्रकृति की ये रचनाएँ अपनी मूक भाषा में मनुष्य को यह शिक्षा देती रहती हैं कि वह अपने सृजन और सृजनात्मक गतिविधियों से चाहे तो समाज का नव-निर्माण कर सकते हैं, पर दुःख की बात यह है कि निसर्ग के इस महत्वपूर्ण संदेश की उपेक्षा करते हुए हम इन दिनों निर्माण में न जुट कर ध्वंस को गले लगाये हुए ऐसे कार्यों में संलग्न हैं, जो थके मन को कुछ राहत देने की तुलना में विषाद का हलाहल पिलाने में व्यस्त हैं। हम संहारक नहीं, सर्जक बनें-दुःखद समाज को सुखद संसार में बदलने का यही एक मात्र उपाय है।
नगर सेठ माणिक ने जगद्गुरु शंकराचार्य से पूछा- “आचार्य वर ! आप तो वेदाँत के समर्थक हैं। भगवान् को निराकार सर्वव्यापी मानते हैं। फिर मंदिरों की प्रदर्शनात्मक मूर्ति पूजा परक प्रक्रिया का क्यों समर्थन करते हैं?”
आचार्य बोले- “वत्स ! उस दिव्य सर्वव्यापी चेतना का बोध सबको अनायास नहीं होता। देवालयों में प्रातः संध्या संधिकाल से, शंख घंटों के नाद के साथ दूर-दूर तक उपासना के समय का बोध कराया जाता है। घर-घर उपासना के योग्य उपयुक्त स्थल नहीं मिलते, मंदिर के संस्कारित वातावरण में कोई भी जाकर उपासना कर सकता है। नैतिकता, सदाचार और श्रद्धा के निर्झरों के रूप में देवालय अत्यंत उपयोगी हैं। जन-साधारण के लिए यह आवश्यक है।”
यज्ञ का आश्चर्यजनक प्रभाव जहाँ मनुष्य जाति की आत्मा, बुद्धि एवं शारीरिक मानसिक नीरोगता पर पड़ता है, वहाँ प्रजनन कोषों की शुद्धि भी होती है। याज्ञिकों को सुसंगति प्राप्त होती है। जिनके संतान होती है वे अपने भावी बालकों को यज्ञ भगवान के अनुग्रह से सुसंस्कारी, स्वस्थ, बुद्धिमान, सुन्दर और कुल की कीर्ति बढ़ाने वाला बना सकते हैं। जिन्हें संतान नहीं होती है, वे उन बाधाओं को हटा सकते हैं जिनके कारण वे संतान सुख से वंचित हैं। प्राचीन काल में संतान हीनों के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न किये जाते थे। यज्ञ के अंत में पुरोडाश या चरु अर्थात् खीर का हवन किया जाता था और बचे हुए भाग को यज्ञ-शेष के रूप में स्त्री-पुरुष या दोनों में से एक को भक्षण कराया जाता था। इससे जहाँ यज्ञ में आहुति दी हुई औषधियों की सुगंधि एवं ऊर्जा नासिक तथा रोमकूपों द्वारा प्रविष्ट होकर शरीर में आवश्यक तत्वों की अभिवृद्धि में सहायक होती थी वहीं उन औषधियों के मिश्रण से बने पुरोडाश और चरु यज्ञावशिष्ट के रूप में खाने से याज्ञिकों में जीवनी शक्ति के अभिवर्धन के साथ ही संतानोत्पादक तत्वों की कमी की भी पूर्ति हो जाती थी।
राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में शृंगी ऋषि ने कौशल्या आदि रानियों को साधारण चावलों की खीर नहीं, प्रत्युत उपयुक्त गुणों से युक्त औषधियों द्वारा निर्मित चरु या खीर का ही आस्वादन कराया था। इसीलिए उन माताओं ने राम, लक्ष्मण जैसे धर्मात्मा, वीर-पराक्रमी पुत्रों को जन्म दिया था। इसी तरह भागवत् पुराण के छठे स्कंध के 14 वें अध्याय में उल्लेख है कि चित्रकेतु ने अंगिरा ऋषि से प्रार्थना करके पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न किया था। यज्ञ समाप्त होने पर ऋषि ने सबसे बड़ी रानी कृताद्युति को यज्ञ-चरु का भोजन कराया था जिसके फल-स्वरूप उसने सुन्दर श्रेष्ठ एवं तेजस्वी राजकुमार को जन्म दिया। मनु-पुत्री इला एवं भगवान वासुदेव के दस पुत्रों का जन्म, कौशल देश के देवदत्त नामक ब्राह्मण को पुत्र की प्राप्ति यज्ञ के माध्यम से हुई थी। राजा द्रुपद ने द्रोणाचार्य को मारने के लिए उनसे भी अधिक बलिष्ठ और शस्वविद्या का ज्ञाता पुत्र प्राप्त करने के लिए यज्ञ कराया था। यज्ञ के अंत में जब पुत्रोत्पादक पुरोडाश बन कर तैयार हुई और जो अत्यंत स्वल्पकाल उसे खाने के लिए नियत था, उस समय दुर्भाग्यवश रानी जूठे मुँह थी। मुहूर्त व्यतीत होता देख यज्ञकर्ता ने उस खीर को यज्ञकुंड में ही पटक दिया। उसी समय धृष्टद्युम्न और द्रौपदी यज्ञकुँड में से निकले और अंत में उन्हीं से द्रोण की मृत्यु हुई। इस प्रकार की अनेकों घटनायें इतिहास-पुराणों में भरी पड़ी है जो यज्ञ और उसमें प्रयुक्त पुरोडाश एवं चरु की महत्ता का प्रतिपादन करते हैं।
शतपथ ब्राह्मण 1/6/2/5 के अनुसार ‘पुरोडाश’ उसे कहते हैं जो यज्ञ में पहले समर्पित किया जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण 2/13 में भी उल्लेख है- “पुरो वा एतान् देवा अक्रत यत्पुरोडाशानाँ पुरोडाशत्वम्” अर्थात् चूँकि यज्ञ में देवों ने इसे पहले प्रयुक्त किया-इसलिए इसे ‘पुरोडाश’ कहा जाता है। वस्तुतः पुरोडाश या चरु यज्ञाग्नि पर पकाये हुए औषधीय हव्य पदार्थ को कहते हैं। पूर्णाहुति हो जाने के उपराँत हवन कुँड या वेदी पर जो अग्नि रहती है उस पर उपयुक्त औषधियों के मिश्रण से युक्त निर्धारित आटे की बाटी सेंक ली जाती है। उसे पुरोडाश कहते हैं। प्रत्येक अन्न के गुण अलग-अलग होते हैं। उसी हिसाब से उसके आटे के गुण होते हैं। यह आटा अन्न को धोकर सुखा लेने के उपराँत धुली हुई चक्की पर अपने हाथ से पीसा जाता है। अन्न को धोना इसलिए आवश्यक है कि उसमें कोई मिश्रण न रहे। चक्की को भी धो लेना इसलिए जरूरी है कि इससे पिछली बार का कोई पिसान या आटा उसमें मिश्रित न हो। यह शुद्धता की सावधानी है।
‘चरु’ का तात्पर्य खीर से है। इसे स्थलीपाक भी कहते हैं। यज्ञ के अंत में औषधि मिश्रित इस खीर को-चरु को याज्ञिक के हाथों उसकी स्विष्टकृत आहुति दिलवाने के पश्चात् शेष बचे चरु को यज्ञावशेष के रूप में उसे खिला देते हैं। इस प्रकार चरु उसे कहते हैं जो हवन कुँड या वेदी के ऊपर पतले ताँबे या चाँदी के वर्तन में खीर बनायी जाती है। यह चावल की बनानी हो तो चावलों को पहले पानी में भिगो देना चाहिए ताकि अग्नि का तापमान कम हो तो भी वह पक सके। आम-तौर से मेवाओं की खीर-चरु पकायी जाती है। जिस मेवा की खीर पकानी हो उसे अच्छी तरह धोकर चार घंटा पूर्व पानी में फूलने के लिए डाल देनी चाहिए ताकि कम तापमान में भी वह पक सके ।
वैदिक काल से ही पुरुषों के लिए ‘पुरोडाश’ और महिलाओं के लिए ‘चरु’ का प्रचलन रहा है। किये गये यज्ञ का सर्वोच्च प्रभाव इनमें समाविष्ट होना माना गया है। पुरोडाश या चरु दोनों में से एक ही यज्ञीय ऊर्जा से बन सकता है, इसलिए यह निर्णय पहले ही करना होता है कि किये गये यज्ञ को प्रमुख लाभ किसे मिले पुरुष या नारी को। पूर्णाहुति होने के उपराँत सामान्य यज्ञों में थोड़ा सा ही तापमान बचता है। इसलिए उसमें से एक ही पदार्थ बन सकता है। ‘पुरोडाश’ बना लेने के उपराँत इतनी अग्नि ऊर्जा नहीं बचती कि उस पर ‘चरु’ भी पकाया जा सके। यह कार्य तभी हो सकता है जब अधिक आहुतियों बाला बड़े कुण्डों वाला यज्ञ हो। उसके लिए न केवल शाकल्य एवं घृत ही उच्च श्रेणी का विशेष व्यवस्था एवं सावधानी के साथ बना हुआ होना चाहिए, वरन् यज्ञ विधा को पूर्ण रूप से जानने वाले अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा एवं आचार्य भी होने चाहिए। यजमान को एक सप्ताह का व्रत-उपवास करना चाहिए। चारों पुरोहितों को एक मास पूर्व से फलाहार पर रहना चाहिए तथा एक वर्ष से ब्रह्मचर्य पूर्वक संयम से रहना चाहिए। होता यजमान और आचार्य दोनों ही पक्ष उच्चस्तरीय साधनारत हों, तभी बड़े यज्ञों का विधान ठीक तरह संपन्न हो सकता है, जो वर्तमान परिस्थितियों में अत्यधिक कठिन है।
निजी अनुभव एवं परामर्श से पाँच कुण्ड के तीन दिन में संपन्न होने वाले यज्ञ का विधान अनुकूल माना गया है। इसके लिए पाँच कुण्ड का यज्ञ करना पर्याप्त है। ऐसे यज्ञ से जो क्षमता उत्पन्न होती है, वह इतनी ही होती है कि एक व्यक्ति के लायक ‘पुरोडाश’ बना सके अथवा एक महिला के लिए ‘चरु’ उपलब्ध हो सके। दोनों के लिए बनाया जायगा तो शक्ति बँट जायगी और किसी को भी समुचित लाभ न मिल सकेगा। एक समय का पेट भर सके, इतनी मात्रा में चरु या पुरोडाश मिल सके, ऐसा प्रबंध करना चाहिए। वेदी पर तो इतनी मात्रा नहीं हो सकती, इसलिए जहाँ कुँड बनाकर यज्ञ किया गया हो, वहीं यह व्यवस्था की जानी चाहिए। पाँच कुण्डों में पाँच बाटी बन सकती है। इतने में एक मनुष्य का पूरे दिन का आहार मिल सकता है। यही बात ‘चरु’ के संबंध में भी है। पाँच कुण्ड के यज्ञ में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खीर पकाई जाय तो उससे एक महिला की 24 घंटे क्षुधा निवृत्ति हो सके, इतनी खीर मिल सकती है।
यज्ञ की जीवनी शक्ति की ऊर्जा पुरोडाश या चरु में होती है। इसलिए यह व्यक्ति विशेष के धन या प्रयत्न से किया जाता है। सामूहिक या सार्वजनिक यज्ञ में यह नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि पैसा सबका लगे और लाभ एक उठावे, यह अनुचित हैं। सामूहिक यज्ञ में नवात्र को भूनकर उसका प्रसाद सबको बाँटा जाता है। होली के यज्ञ में यही होता है। जौ की बालें होली की अग्नि पर भूनते हैं और उसी में से थोड़ा-थोड़ा अन्न सभी बाँट देते हैं। यह पुरोडाश प्रथा है - कहीं-कहीं नारियल की गिरी या गोला होली की अग्नि पर भून कर उसका एक-एक छोटा टुकड़ा उपस्थित जनों में बाँट देते हैं। इसे प्रसाद कह सकते हैं। जैसे यज्ञ के घृत को हाथों से मलकर अग्नि पर तपा कर चेहरे में लगाते हैं। जैसे यज्ञ की भस्म को एक अंगुली से मस्तक, कंठ, आदि पर लगाते हैं, उसी प्रकार यज्ञाग्नि पर कच्चे जौ भूनकर प्रसाद रूप में बाँटे जा सकते हैं।जौ की ऋतु न हो तो ज्वार, बाजरा आदि जो कच्चा अन्न उपलब्ध हो, उसका पुरोडाश भूनकर उपस्थित जनों को प्रसाद रूप में बाँट देना चाहिए। यह सामूहिक पुरोडाश वितरण की बात हुई। एकाकी पुरुष या नारी अथवा दंपत्ति के उपयोग के लिए पुरोडाश या चरु कुण्ड या वेदी पर ही विनिर्मित किया जाता है। सामूहिक रूप से इसका प्रचलन यज्ञ विधान में नहीं हैं।
पुरोडाश या चरु का उपयोग केवल संतानोत्पादन तक ही सीमित नहीं हैं वरन् यह शारीरिक और मानसिक आदि शक्ति की अभिवृद्धि में भी बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुआ है। दुर्बल एवं रोगियों के लिए पुरोडाश एवं चरु देने से उनकी जीव में शक्ति-प्राण ऊर्जा बढ़ती है, किंतु जिनकी पाचनशक्ति ठीक हो उन्हीं को इसकी पूर्ण मात्रा देनी चाहिए। कारण एक तो जो खाद्य पदार्थ पकाया गया है, वह स्वयं ही पौष्टिक होता है और वनौषधियों के मिश्रण तथा यज्ञ की ऊर्जा का उसमें समावेश हो जाने से तो जीवनी शक्ति और भी अधिक बढ़ जाती है। अस्तु व्यक्ति की पाचनशक्ति को देखकर ही यह हविष्यान्न से बना हुआ चरु या पुरोडाश उसे देना चाहिए। इसके गुण 24 घंटे तक ही रहते हैं। इसके उपराँत गुण समाप्त हो जाते हैं, फिर वह यज्ञ प्रसाद न रहकर मात्र खाद्यान्न ही रह जाता है।
पुरोडाश के लिए जौ सर्वोत्तम माना गया है जौ के छिलके छानकर उनकी बाटी हवनकुंड की मंद अग्नि पर सेंकी जाती है। हविष्यान्न का भी पुरोडाश बनता है। हविष्यान्न का अर्थ होता है-जौ, चावल, तिल। अनुपात इस प्रकार है-तीन छटाँक अर्थात् 150 ग्राम जौ, दो छटाँक चावल और एक छटाँक तिल। चावल प्राकृतिक लेना चाहिए। आजकल बासमती सरीखे कितने ही शंकर जाति के चावल चल पड़े हैं। यज्ञ कार्यों में प्राकृतिक चावल ही लेने चाहिए। तिल जहाँ भी यज्ञ कार्य में उल्लेख हुआ है, वहाँ काले तिल से अभिप्राय है। तिल काले और सफेद मिले हुए हों तो उन्हें छान लेना चाहिए। अकेला जौ अधिक बलिष्ठ और गरिष्ठ होता है। उसका पुरोडाश युवा व्यक्तियों के जिए ही बनाना चाहिए। बच्चों को, वृद्धों को, कमजोरों को हविष्यान्न की बाटी बनानी चाहिए, वह इतनी मोटी न हो जो बीच में कच्ची रहे और किनारे जल जायँ। इतनी पतली भी न हो और इतनी देर सेंकी भी न जाय कि वह कड़ी हो जाय और चबाने में कठिनाई उत्पन्न करे।
चरु में दूध अनिवार्य रूप में गाय का ही लिया जाता है। भैंस, बकरी आदि का दूध निषिद्ध है। गाय में भी काली गो अधिक श्रेष्ठ मानी गयी है। जिसके नीचे बछड़ा हो उसका दूध और भी अधिक अच्छा है। अभाव में किसी भी गाय का दूध लिया जा सकता है।
चरु-खीर के लिए चावल प्राकृतिक लेने चाहिए। धान लगे न रह गये हों, इसलिए उन्हें अच्छी तरह बीन लेने चाहिए। प्राकृतिक चावलों में चैता, साँवा, मकन, रामदाना आदि भी लिये गये हैं। यह फलाहारी माने जाते हैं और पचने में चावलों की तुलना में सुगम्य होते हैं। चरु में मेवा घी भी मिलाई जा सकती है। जल्दी पक जाने वाली सेवाओं में किशमिश, छुहारा, काजू, पिस्ता, चिलगोजा मुख्य हैं। इन्हें आग पर चढ़ाने से पूर्व चार घंटे पानी में भिगो लेना चाहिए। इससे वे चावलों के साथ अच्छी तरह घुल जाती हैं। पकाने में इस बात का ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि वह न तो कच्ची रहने पावें और इतनी अधिक पके भी नहीं कि लेही-पेस्ट बन जाय या जलने की गंध आने लगे और पेंदे पर चिपक जाय। बर्तन ताँबे का लेना चाहिए, पर जिनके यहाँ चाँदी के बर्तन पकाने लायक हो वे उसका प्रयोग कर सकते हैं।
आयुर्वेद में वर्णित जो वनौषधियाँ जिस रोग के लिए गुणकारी मानी गयी हैं, उन्हें पुरोडाश या चरु के साथ मिलाकर हवनकुँड या वेदी पर पका लेने पर यज्ञीय ऊर्जा समाविष्ट हो जाने के कारण उनकी क्षमता अनेक गुनी अधिक बढ़ जाती है। यज्ञ की संपूर्ण जीवन दायिनी शक्ति पुरोडाश या चरु में सन्निहित होती है। अतः इसका उपयोग न केवल रुग्णता एवं अक्षमता-अशक्तता निवारण एवं शारीरिक मानसिक जीवनी शक्ति की अभिवृद्धि के निमित्त किया जा सकता है, वरन् इसके सेवन से ओजस्वी-तेजस्वी और मनस्वी भी बना जा सकता है। इतना ही नहीं गीता 3-13- एवं 4-31 के अनुसार तो यज्ञ से बना हुआ यज्ञावशिष्ट अर्थात् चरु या पुरोडाश खाने वाला सर्व पापों से छूट जाता है तथा सनातन ब्रह्म को प्राप्त करता है।
भर देने से वह कुछ ही देर में गीला होकर बिखर जाता है। पर यदि आंवे में पका लिया जाय तो मजबूत होकर मुद्दतों काम देता है। यह तपाने का चमत्कार है। धातुओं का शोधन भी इसी प्रकार होता है। वे जमीन में से मिट्टी मिली हुई स्थिति में ही निकलनी है। उस स्थिति में वे किसी काम में लाए जाने योग्य नहीं होतीं। उन्हें भट्ठी में डालकर पिघलाया जाता है जब शुद्ध धातु सामने आ पाती है। कचरा जल कर अलग हो जाता है। यदि इस प्रक्रिया से डरा या बचा जाय तो धातुओं का विशाल कार्य परिकर निकम्मा ही पड़ा रहेगा और उनसे कोई उपयोगी उपकरण बन न सकेगा।
कच्ची मिट्टी से बने मकान बरसात आने पर घुल या बह जाते हैं। पर यदि उन ईंटों को पका कर इमारत बनाई जाय तो वह मुद्दतों यथावत् खड़ी रहती है। व्यंजन, मिष्ठान चूल्हे की अग्नि पर चढ़ने के बाद ही बनते हैं। आयुर्वेदीय औषधियों में रस, भस्में, अग्नि संस्कार से ही बनते हैं। अर्क, अवलेह आदि का निर्माण भी अग्नि सान्निध्य से ही होता है।
सूर्य ग्रीष्म में तपता है तो समुद्र से बादल बनते हैं और घनघोर घटाएँ बन कर भूमि को मखमली हरीतिमा से भरते हैं। तपस्वी योग साधते हैं और पत तितिक्षा के आधार पर प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों को जाग्रत करते हैं। गुरुकुलों में छात्रों को कठोर जीवन की संयम साधना कराई जाती है। इसी के बल-बूते वे प्रचंड पराक्रम करने में समर्थ नर रत्न बनते हैं।
तप की महिमा अपार है। कष्ट, सहिष्णुता का अभ्यास जब महान तो उसे तपस्या कहते हैं। यह भौतिक प्रयोजनों के लिए भी की जा सकती है और अध्यात्म प्रयोजनों के लिए भी। जो वृक्ष कठोर परिस्थितियों में उगते और बढ़ते हैं वे पर्वत शिखरों पर भी हरियाते हैं। आँधी तूफानों से टकराते हैं किंतु बगीचों की शोभा बढ़ाने वाले फूल तनिक सी सर्दी-गर्मी की प्रतिकूलता आते ही छुई-मुई की तरह कुम्हला जाते हैं। अमीरों की सुविधाएँ उन्हें निष्क्रिय दुर्व्यसनी बनाती हैं। पर जो खदानें खोदते हैं उन श्रमिकों की कलाइयाँ मजबूत और छातियाँ तनी रहती हैं। कठिनाइयों में पलने वाले बड़े पराक्रम करते देखे जाते हैं। पर जिनका पालन फूलों के पालने में हुआ है उन्हें जमीन पर पैर रखते ही चुभन होती है। कठिनाइयों का सामना कर सकने का तो उनमें दम ही नहीं होता। हर मौसम उनके प्रतिकूल पड़ता है। मौसमी बीमारियाँ एक प्रकार से उन्हें अपना स्थायी यजमान बना लेती है। श्रम से दूर रहने वाली महिलाओं को प्रसव के समय प्राणलेवा कष्ट सहना पड़ता है। कई बार तो वे इस प्रसंग में अपने प्राण तक गवाँ बैठती हैं। जब कि गाड़ियाँ लुहारों की लोहा पीटने वाली महिलाएँ इस प्रकार बच्चे प्रजनन करती हैं मानो कुछ असाधारण जैसा हुआ ही न हो। दो चार दिन की इस बड़े काम से छुट्टी तक नहीं लेतीं। तुलनात्मक अध्ययन करने पर पता चलता है कि निरोगता और दीर्घ जीवन की कुँजी श्रम शीलता के साथ जुड़ी है। वनवासी कोल, भील तीर से चीते को गिरा देते हैं जब कि उन्हें न तो पौष्टिक भोजन मिलता है और न सुविधा भरे साधनों को व उपलब्ध कर पाते हैं।
प्रगति पथ पर अग्रसर होने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने ढंग का कठोर श्रम करना पड़ता है। पहलवान, विद्वान, वैज्ञानिक, नाविक, कलाकार अनायास ही अपने विषयों में प्रवीण नहीं हो जाते। उन्हें कृषक मजदूर की तरह व्यस्त रहना और कठोर काम करना पड़ता है।
प्रतिकूलताएँ अनायास ही नहीं हट जातीं उनसे कठोर संघर्ष करना पड़ता है। वैज्ञानिकों को मोर्चा जोड़ने में कठिनाई के साथ जूझना और प्रचंड साहस का परिचय देना पड़ता है। आत्म-शोधन के लिए अभ्यस्त अनुपयुक्त आदतों को उखाड़ फेंकने में निरत होना पड़ता है। यह प्रसंग धोबी के द्वारा कपड़े धोए जाने के सदृश्य है। मैला कपड़ा जब गरम भट्ठी में उबलता है और डंडे की पिटाई सहता है तभी उसे भकाभक चमकने का अवसर मिलता है। मात्र पानी निचोड़ देने पर सफाई कहाँ से आती है। बर्तनों पर पत्थरों पर घिसाई से ही चमक आती है। अनीति से जूझने वालों को अनेक प्रहार सहने पड़ते हैं जिनसे निहित स्वार्थों को चोट पहुँचती है। सुधारकों में से अनेकों को शहीद होना पड़ा है। देव, दानव युद्ध में प्रथम आक्रमण करने वाले दैत्य जीतते और देव हारते रहे हैं। क्षति देवताओं को ही अधिक उठानी पड़ती रही है। भले ही अंत में सत्य की विजय होने वाली उक्ति सार्थक हुई हो और देवत्व को जीतने का श्रेय मिला हो। आक्रमण से भयभीत होकर यदि देवताओं ने पीठ दिखाई होती तो फिर उनका कोई ठिकाना न रहता सदा सर्वदा के लिए पराजित होकर रहना पड़ता।
भ्रूण को उदर से बाहर निकलने के समय प्रचंड पुरुषार्थ करना पड़ता है। इस समय का सारा दृश्य खून खच्चर से भरा होता है। इसके बिना स्वच्छ हवा और उन्मुक्त आकाश के नीचे विकसित होने का ही सुयोग न मिलता भ्रूण की स्थिति में पड़ा-पड़ा ही सड़ जाता। मुर्गी के अंडों में बंद चूजे जब थोड़ी सामर्थ्य अर्जित करते हैं तो बाहर निकलने के लिए हलचल मचाना आरंभ करते हैं। ऊपर के कठोर कलेवर में इसी आधार पर दरार पड़ती है और चूजा निकल कर बाहर आता है। अन्य जीवधारियों की तरह अपने स्वतंत्र अस्तित्व का परिचय देता है। यह संघर्ष अध्यात्म की भाषा में तप कहा जाता है। तप का अर्थ है तपना। तपने पर हर वस्तु निखरती है। सोने को तपाए जाने पर ही उसके खरे-खोटे होने की परख होती है। चाकू को पत्थर की चरखी पर घिसते हैं तभी उसकी तेज धार निखरती है।
कीर्तिमान स्थापित करने वाले पर्वतारोही, घुड़सवार, जान की बाजी लगाते हुए कदम बढ़ाते हैं। प्रतियोगिता जीतने वाले खिलाड़ी भी अपने पौरुष का चरम परिचय देते हैं। विजय श्री का वरण कर सकना उन्हीं के लिए संभव हुआ है जिनने अपने साहस के स्तर पर वरिष्ठता का परिचय दिया है। डरते रहने वाले, कायरता अपनाने वाले, भयभीत लोग अपेक्षाकृत अधिक हानि उठाते हैं। आक्रमणकारी उनकी मनः स्थिति ताड़कर अधिक निश्चिंततापूर्वक अधिक गहरा आक्रमण करते हैं। तन कर खड़े हो जाने वाले रीछ-वानरों ने लंका के दुर्दांत, दैत्यों को परास्त करके रख दिया था।
यमराज ने एक बार मौत को एक क्षेत्र से पाँच हजार आदमी मारकर लाने के लिए भेजा। वह जब झोली भर कर लाई तो गिनने पर वे पंद्रह हजार निकले। जवाब तलब हुआ कि इतने अधिक क्यों? मौत ने सबूत समेत सिद्ध किया कि बीमारी से तो पाँच हजार ही मरे हैं। शेष तो डर के मारे बिना मौत ही मर गए और परलोक आने वाली भीड़ के साथ जुड़ गए। कहा जाता है कि साहसी जीवन में एक बार मरता है पर कायर तो भयभीत रहकर पग-पग पर पल-पल पर मरता रहता है।
हीरा एक प्रकार से कोयला ही है। खदान में जिसे अधिक तापमान सहना पड़ता है वही कोयला हीरा बन जाता है। सच्चाई और बहादुरी की यथार्थता जाँचने की एक ही कसौटी है कि प्रलोभन और दबाव के आगे झुका गया या नहीं। जो तनकर खड़ा हो जाता है उसकी हिम्मत देखकर मुसीबत भी डर कर वापस लौट जाती है।
योगी जन तपश्चर्या के बल पर ही ऋद्धि-सिद्धियों को वरण करते हैं। सप्तऋषि इतने ऊंचे पद पर इसी आधार पर पहुँचे थे। भगीरथ ने गंगा को भूमि पर लाने और पार्वती ने शिव से विवाह करने में सफलता पाई। देवताओं को तपस्वी दधीचि की हड्डियां माँग कर इन्द्र-वज्र बनाना पड़ा। तपस्वी देवताओं से बड़े होते हैं वरदान देने के लिए उन्हें ही स्वर्ग से धरती पर आना पड़ता है।
विशेष प्रयोजन के लिए विशिष्ट व्यक्ति विशेष प्रकार की तप साधना करते हैं पर सर्व साधारण के लिए उसका सरल उपाय एक ही है कि उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संयम साधना एवं परमार्थ प्रयोजनों के लिए कष्ट सहने, पुरुषार्थ करने के लिए समग्र साहसिकता के साथ प्रयत्नशील रहें। अनीति के साथ संघर्ष में आपत्ति सहने के लिए भी। तभी कुछ उच्चस्तरीय उपलब्धि किसी को मिल सकती है। श्रेयार्थी बनने के लिए कुछ कीमत चुकानी पड़ती है एवं वह है ही तप-साधना के माध्यम से, अतः इस राजमार्ग पर चलकर ही सिद्धि-लब्धि का प्रमाद किया जाना चाहिए।
द्वापर युग में मालब देश में शिखिध्वज नाम का एक राजा था। उसकी पत्नी सौराष्ट्र की राजकन्या थी-नाम था उसका चूड़ाला। बहुत समय तक दोनों उपभोग में निरत रहे। पीछे उनके मन में आत्म ज्ञान की आकाँक्षा हुई। दोनों अपने-अपने ढंग से इस प्रयास में अग्रसर रहने लगे। रानी ने संक्षेप में समझ लिया था कि दृष्टिकोण को बदल लेना और अंतःकरण को साथ लेना ही ब्रह्मज्ञान है। सो उस उपलब्धि पर वह बहुत प्रसन्न रहने लगीं। राजा को भी सिखातीं, तो वे स्त्री के प्रति हीन भावना रखने के कारण उसकी बात पर ध्यान नहीं देते थे।
राजा को कर्मकाण्ड परक तप-साधना में विश्वास था, सो वे एक दिन चुपचाप रात्रि में उठ कर वन चले गये। रानी ने योगबल से जान लिया, सो राजकाज स्वयं चलाने लगीं। राजा के कुछ काल के लिए प्रवास जाने की बात कह दी।
एक दिन उनने राजा से मिलने की इच्छा की, सो सूक्ष्म-शरीर से वहीं जा पहुँची, जहाँ राजा था। वेष ऋषि कुमार का बनाया। परिचय पूछने पर अपने को नारद पुत्र कहा। राजा के साथ उनकी ज्ञानचर्चा चल पड़ी। पर संध्या होते ही वे दुःखी होने लगे। बोले मुझे दुर्वासा का शाप लगा है। दिन में पुरुष और रात्रि में नारी हो जाता हूँ। आपके पास कैसे टिक सकूँगा।
राजा न कहा-आत्मा न स्त्री है, न पुरुष। न इनमें कोई छोटा है, न बड़ा। डरने जैसी कोई बात नहीं है। आप हमारे मित्र हो गये हैं। प्रसन्नतापूर्वक साथ में रहे। कई दिन बीत गये। मित्रता प्रगाढ़ हुई, तो स्त्री बने ऋषि कुमार ने कहा-मेरी कामना-वासना प्रबल हो रही है। रुका नहीं जाता। राजा ने कहा-आत्मा पर कुसंस्कार न पड़े, तो शरीर क्रियाओं में कोई दोष नहीं है। उनका काम-क्रीड़ा प्रकरण चल पड़ा। न राजा को खेद था, न पश्चाताप। अब वे स्त्री-पुरुष को समान मानने लगे थे।
चूड़ाला ने अपना रूप प्रकट किया और राजा को महल में घसीट लाई। स्त्री को हेय मानने और उसके परामर्श की उपेक्षा करने का हेय भाव उनके मन से विदा हो गया। राजा ने चूड़ाला को अपना गुरु माना और प्रसन्नतापूर्वक राजकाज चलाते हुये आत्म ज्ञान में लीन रहे।
वसिष्ठ ने कहा-हे राम! आत्मा एक है। स्त्री-पुरुष होने से कोई अंतर नहीं आता। दृष्टिकोण बदल जाने पर ही मनुष्य ब्रह्मज्ञानी हो जाता है।
मृत्यु एक सुनिश्चित तथ्य है। यह एक ऐसी सचाई है जो सबके सामने एक न एक दिन आकर ही रहती है। इस संसार का कुछ नियम ही ऐसा है कि जो आया उसे जाना पड़ा। जो जिया उसे मरना पड़ा। इस तथ्य को हर कोई जानता है, पर जानते हुए भी मानने को तैयार नहीं होता । हर किसी को मृत्यु भय आरंभ से ही सताता रहता है और उससे बचे रहने का हर संभव प्रयत्न भी किया जाता रहता है। मरने के समय आदमी की दशा बड़ी दयनीय हो जाती है और वह किसी भी मूल्य पर उस घड़ी को टालने के लिए तैयार होता है, पर विधि के विधान के आगे किसी का वश नहीं चलता। यदि अपनी मृत्यु अवश्यंभावी है और वह बिना अवधि और सूचना के कभी भी हो सकती है- इस तथ्य को हृदयंगम किया जा सके तो फिर जीवन की अविच्छिन्न सहचरी मृत्यु से भयभीत होने का कोई कारण नहीं रह जाता।
तत्वदर्शी मनीषियों के अनुसार मृत्यु का अर्थ है- कुरूपता का सौंदर्य में परिवर्तन। अनुपयोगिता के स्थान पर उपयोगिता का आरोपण। इससे न तो डरने का कोई कारण है न रुदन का। वह तो हर्षोल्लास का उत्सव है जिसमें अनेक तरह की जीवनोपयोगी सत्प्रेरणाएं उभर कर आती हैं। जिस प्रकार दिन और रात काम करने और आराम करने के लिए होते हैं, ठीक उसी तरह जीवन-मृत्यु का क्रम भी अनवरत रूप से चलता रहता है। गीता के दूसरे अध्याय के 22 वें श्लोक- “वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्वति नरोडपराणि ।....” में शरीर को वस्त्र के सदृश समझा गया है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति फटे-पुराने वस्त्र को परित्याग करके नये वस्त्रों को ग्रहण कर लेता है, उसी तरह आत्मा भी निष्क्रिय एवं निस्तेज शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण कर लेती है। यह शरीर बना ही भस्मीभूत होने के लिए “भस्मात् शरीरम्” (यजुर्वेद 40/17) फिर मृत्यु से भय कैसा ? वस्तुतः यह एक ऐसा परीक्षा गृह है जिसमें जीवन की वास्तविकता का पता चलता है कि उसका प्रयोजन क्या था और कैसा प्रयोग किया गया ? शरीर आत्मा का परिधान-वाहन मात्र है। उसकी सुख-सुविधा के लिए आत्मा को पाप और पतन के-शोक और संताप के गर्त में नहीं धकेला जाना चाहिए जिसके कारण जन्म-जन्माँतरों तक नारकीय यातनायें भोगनी पड़ें और अनंतकाल तक पश्चाताप करना पड़े।
पुराने कपड़े उतार कर नये कपड़े पहनने में किसी को कोई कष्ट होता है क्या ? लगभग इसी तरह का प्रश्न मृत्यु के संबंध में पूछा जाय तो उसका उत्तर गंभीरता से ही दिया जाता है। कारण कि लोगों की मान्यता है कि मरण एक दुखदायी, कष्टप्रद और दारुण वेदना देने वाली प्रक्रिया है। भय की गणना मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियों में की जाती हैं, किंतु वह भय कायरता का नहीं-सतर्कता का लक्षण है। यों तो मरना कोई भी नहीं चाहता, वरन् मृत्यु से बचने का हर समय उपाय किया करता है। ‘हाय मैं मर जाऊंगा’ की यह भावना ही भय का कारण है जो कायरता की कोटि में आती है और व्यक्ति के अंतराल में छिपी साहसिकतापूर्ण सत्प्रेरणाओं को उभरने नहीं देती है।
जो जन्म लेता है उसका मरण भी सुनिश्चित है अर्थात् जीवन-मृत्यु का चक्र संसार के हर प्राणी के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। लेकिन मानवी मनोदशा कुछ ऐसे स्तर की बन चुकी है कि वह मृत्यु की अपेक्षा जीवन को ही अच्छा समझती और उसे अक्षुण्ण बनाये रहने का ताना-बाना बुनने में लगी रहती है। भले ही परिस्थितियाँ कितनी ही विपन्न और विषम क्यों न बनी रहें, पर जीवन को चयन करने की प्रवृत्ति का समापन नहीं हो पाता, क्योंकि भविष्य में उनके अनुकूल होने का सपना सँजो कर रखा जाता है। जब कि मृत्यु का चिंतन करते समय भावी संभावनाओं की आशा करना शेखचिल्ली की तरह ही निरर्थक सिद्ध होता है। ‘मैं जीवित बना रहूँ’ वाली जीवेषणा ही हर प्राणी के अस्तित्व को यथावत् बनाये हुए है। मृत्यु से भयभीत होने को यही एक मात्र कारण है। मरघट का गाँव से बाहर होना यही सिद्ध करता है कि व्यक्ति को मृत्यु पसंद नहीं। जबकि यह एक ध्रुव सत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता। फिर भी लोग भयभीत बने रहें और सतत् जीवित रहने की आशा सँजोये रखें, तो इससे बड़ा भ्रम और क्या हो सकता है? जीवन के भ्रम-भटकावों की उत्पत्ति मृत्यु-विस्मरण के फलस्वरूप ही होती है। दिन-प्रतिदिन मानव समाज में बढ़ रहे अपराधों-पापाचारों की संख्या को देखकर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि मृत्यु और कर्मफल मिलने के सुनिश्चित तथ्य को मनुष्य भुला बैठा है। सर्वत्र अनास्था, अंधविश्वास और अंध मान्यताओं का ही बोलबाला है।
अज्ञान के कारण ही मृत्यु का भय मनुष्य को सतत् संत्रस्त करता रहता है। यदि इसके कारणों की ढूँढ़-खोज की जा सके तो वास्तविकता को सहज ही समझा जा सकता है। वस्तुतः मृत्यु से बढ़कर मूल्यवान कोई दूसरी यात्रा हो नहीं सकती। उसमें व्यक्ति को कायाकल्प हो जाता है, नये सिरे से नये जीवन की शुरुआत होती है। पर उन्हें क्या कहा जाय जो छोटे बच्चों के समान बालू के मकान बनाने में ही निमग्न रहते हैं जिसे हवा का मामूली सा झोंका भी नष्ट कर डालता है। बचकानेपन को जीवन में समाविष्ट करने पर उसके दुष्परिणाम भी वैसे ही भुगतने पड़ते हैं। मृत्यु का तनिक सा आभास बाल मनोवृत्ति को डराने में कोई कसर नहीं उठा रखता है। तब मनुष्य को अपनी नासमझी पर पश्चाताप होता है, जब सुरदुर्लभ इस मानवी काया को कौड़ी मोल गँवा दिया जाता है और पाप-संताप का गट्ठर सिरपर लादकर यहाँ से कूच करना पड़ता है। तब निराशा और खीज के अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं लगता।
बृहदारण्यकोपनिषद्-4/5/6 के सूत्र आत्मनस्तु कामाय सर्वप्रियं भवति” का सार-संक्षेप यही है कि संसार के समस्त प्राणी और पदार्थ मात्र अपनी ही कामना के लिए मनुष्य को प्रिय लगते हैं। यदि मनुष्य उनके प्रति निरासक्त और तटस्थ हो जाय तो मृत्यु जैसा भय कदापि नहीं दिखेगा। कष्ट तो स्वार्थों की आपूर्ति न होने का ही होता है। संसार में रोजाना सहस्रों व्यक्ति जन्म लेते और मरते हैं, पर हर किसी के लिए न तो कोई हर्षोल्लास का वातावरण बनता है न मातम ध्वनि ही बजती है। यह उनके साथ किसी प्रकार का स्वार्थ और आसक्ति के न जुड़े रहने का ही प्रतिफल है।
किसी चीज की वास्तविकता को समझ लेने पर ही उसके गुणों से लाभान्वित हुआ और अवगुणों से बचा जा सकता है। अग्नि के गुण-धर्म विधि-व्यवस्था क्रम को समझ लेने के उपराँत ही भोजन पकाया और शरीर को जलने से बचाया जा सकता है। मृत्यु के संबंध में भी कुछ ऐसा ही सोचा समझा गया है । उसके स्वरूप को ठीक तरह से न समझने के कारण ही मनुष्य भयग्रस्त होता और जीवन के वास्तविक आनंद से वंचित रह जाता है। यदि इस तथ्य को समझा जा सके कि शरीर के मिटने के साथ ही आत्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता, तो मरण-भय का कोई कारण शेष नहीं रह जाता । मृत्यु एक परिवर्तनशील अवस्था है जिसके साथ ही जीवन की इति श्री नहीं समझ लेनी चाहिए। आत्मा अनादि, अनंत और अविनाशी है। वह ईश्वर जितनी पुरातन और कभी नष्ट न होने वाली सनातन है। उसकी मृत्यु संभव नहीं। शरीर का परिवर्तन स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक भी है। हर पदार्थ का एक क्रम है- जन्मना, बढ़ना और नष्ट होना। नष्ट होना एक स्वरूप का दूसरे स्वरूप में बदलना भर है। यदि यह परिवर्तन रुक जाय तो मरण तो बंद हो सकता है, पर तब जन्म की भी कोई संभावना नहीं रहेगी। यदि जन्म से प्रेरणास्पद बनाना है तो मरण का वियोग भी सहना होगा।
मृत्यु पर विजय पाने का एक तरीका यह है कि इस संसार को एक रंग-मंच माना जाय और अपने हिस्से के ‘रोल’ को ईमानदारी के साथ बखूबी निभाया जाय। दूसरे इसे रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म अथवा प्रतीक्षालय समझा जाय-स्थायी निवास व्यवस्था नहीं। ऐसे स्थान पर बैठा व्यक्ति बहिर्मुखी क्रिया-कलापों की ओर नहीं निहारता कि कोई क्या कह रहा है। यदि कोई गंदगी उछाल भी देता है तो भी उसे क्षमा कर दिया जाता है। किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष की भावनायें नहीं पनपतीं, क्योंकि यहाँ पर हर कोई व्यक्ति स्थायी रूप से नहीं ठहरता। एक के बाद एक के आने-जाने का क्रम सतत् बना रहता है। मरण का स्मरण करने का अर्थ ही जीवन को एक प्रतीक्षालय के रूप में समझना है जहाँ पर स्थायी पड़ाव डालने की योजना महत्वहीन ही मानी जायगी। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें मृत्यु को देखने वाला मृत्यु से पृथक् हो जाता है। ऐसी मनोदशा बना लेने पर दृश्य और दृष्ट का अलग होना सहज-स्वाभाविक है। मृत्यु और शरीर का संबंध अन्योन्याश्रित है। मृत्यु के प्रति सजगता एवं जागरुकता बरतने पर शरीर के प्रति जाग्रति स्वतः ही आ जाती है।
जन्म के साथ मृत्यु का जुड़ा रहना निताँत आवश्यक है। आधा व्यक्ति तो उसी दिन मर जाता है जब पैदा होता है और शेष आधा किसी भी क्षण दम तोड़ सकता है। जो व्यक्ति इस तथ्य को समझता है वह सजगता और जागरुकता के साथ मौत को एक सहचरी मानकर चलता है। मृत्यु उसे डराती नहीं, वरन् सद्प्रेरणाएँ उभारती हैं। मृत्यु का स्मरण बने रहने पर मनुष्य के जीवन में उथल-पुथल एवं क्राँतिकारी परिवर्तन आरंभ हो जाते हैं। उसके जीवन में सरलता समता और शुचिता की त्रिवेणी फूट पड़ती है जिसके संगम समागम से स्नेह, परोपकार, सहयोग-सहकार की आकृतियां स्वतः ही सुविकसित होती चली जाती हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता मिटकर परमार्थ परायणता का स्वरूप ग्रहण कर लेती है। यदि जीवन को एक खिलाड़ी की तरह जिया जाय तो मृत्यु के कटु-अनुभवों से बच निकलना सहज संभव है।
वस्तुतः मृत्यु एक ऐसी शुभ मार्गदर्शिका है जो ईश्वरीय विधान की वास्तविकता को समझने का पथ प्रशस्त करनी और जीवन को सही दिशाधारा देने में सक्षम होती है। इस संदर्भ में मूर्धन्य मनीषी वाल्टर स्काट का कहना है-मृत्यु निविड़ अंधकार भरी निशा में आखिरी नींद नहीं, वरन् ब्राह्ममुहूर्त का प्रथम जागरण है जिसके बाद हम उस ओर बढ़ सकते हैं जिस संबंध में कि अभी सोचना ही संभव है। दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने लिखा है-”हम जिस जिंदगी को जी रहे हैं, उस तक का मर्म नहीं जान पाये तो उस मृत्यु का जो अभी कई कोस आगे है-रहस्य कैसे जान पायेंगे ? प्रख्यात शोधकर्मी विलियम हैटर ने अपने शोधकार्यों को पूरा कर लेने पर मृत्यु समय की अंतिम साँस लेते हुए कहा-यदि इस समय भी मुझ में कलम उठा कर लिखने की शक्ति होती तो लिखता कि मरना कितना सरल और शाँतिपूर्ण है।”
कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ टैगोर के शब्दों में-’जन्म जीवन का आरंभ नहीं है और न मृत्यु जीवन का अंत। जीवन और मृत्यु मात्र जीवनक्रम का एक छोटा सा अध्ययन मात्र है।’ इसलिए दोनों को घनिष्ठ सहचर मानकर चलना चाहिए। जीवन इस तरह जिया जाय जिसे शानदार और सराहनीय कहा जा सके। जब मृत्यु आये तब शाँति और मुसकराहट के साथ उसका ऐसा स्वागत करें जैसा विचारशील, धैर्यवान और बहादुर लोग करते हैं।
आवश्यक नहीं कि सदा अनुकूलता ही बनी रहे। जीवन में प्रतिकूलता का भी स्थान और उपयोग है। यदि सदा सुविधाएँ ही बनी रहें तो व्यक्ति को किसी बड़े पुरुषार्थ की आवश्यकता न पड़ेगी। संघर्ष में पड़ने का कभी अवसर ही न आवेगा और इस हेतु जिस सूझबूझ का, साहस और धैर्य को अपनाना आवश्यक होता है उसकी कभी आवश्यकता ही न पड़ेगी। बिना प्रयोग में आये हर वस्तु सड़ती और घटती है जिन्हें प्रतिकूलताओं का सामना नहीं करना पड़ता जो सदा सुख-सुविधाओं में ही डूबे रहते हैं उनकी प्रतिभा पलायन कर जाती है। कठिनाइयों को देखकर वे हतप्रभ हो जाते हैं और तिल को ताड़ बना बेहिसाब घबराते और बेमौत मरते हैं।
माना कि सुविधाओं की अधिकता से जीवन-यापन में सुविधाएँ मिलती हैं। उन्नति की दिशा में सरलतापूर्वक अधिक तेजी से चला जा सकता है। इतने पर भी इस स्थिति में एक कमी बना रहती है कि उत्पन्न अभिवर्धन
के लिए जिस प्रबल पराक्रम की आवश्यकता पड़ती है उसे प्राप्त करने का अवसर ही नहीं मिलता। पौरुष और पराक्रम के दोनों ही स्रोत सूखे पड़े रहते हैं।
जिन्हें सदा प्रकाश में ही रहना और काम करना पड़ता है उन्हें रात्रि का अँधेरा बहुत भयानक लगता है। उसके रहते एकाकी सुनसान में जाते हुए उनका दिल धड़कता है। आवश्यक काम होने पर भी उस प्रवास के लिए हिम्मत नहीं पड़ती, किंतु कितने ही लोग ऐसे हैं जिनका कारोबार अँधेरे में ही काम करने से संबंधित है। चोर-डाकू अँधेरे से घिरे बीहड़ों में ही छिपे रहते हैं और अँधेरी रातों में ही घात लगाने के लिए निकलते हैं। घटाटोप वर्षा में भी खेत की मेड़ों से पानी बाहर न निकलने देने के लिए किसान उसी अँधेरों में साज-संभाल करने जाता है। अभ्यास से डर भगाया जा सकता है और साहसिकता को क्रमशः बढ़ाया जा सकता है।
ऐसे लोग कम ही हैं जिन्हें पूर्वजों की छोड़ी विपुल संपदा हाथ लगी है। जिनने ब्याज भाड़े के सहारे जिंदगी गुजारने की व्यवस्था करली हो या अगली पीढ़ियों के लिए भी निश्चित हों। इन अपवादों के लिए भी, संचय को सुरक्षित, सुव्यवस्थित रखने के लिए हिम्मत और दूरदर्शिता को आवश्यकता पड़ती है। भलाई को अपनाना और बुराई को छोड़ना पड़ता है। यदि ऐसा न किया जाय तो जो संग्रह था वह भी दूसरों के द्वारा किसी न किसी प्रकार के हथकंडे अपनाकर अपहरण कर लिया जाता है। कमाने से भी अधिक रखाने और पचाने का कार्य कठिन है। किसान पूरा परिश्रम करके खेती को उगाता, बढ़ाता है, पर फसल पकने पर यदि असावधानी बरती जाय तो पौधों पर लगे हुए दाने पशु-पक्षियों के पेट में ही चले जाते हैं। संयोजक को खाली हाथ ही रहना पड़ता है। सतर्कता हर स्थिति में आवश्यक है।
यों मनुष्य जन्मतः एकाकी ही आता है और जब दम तोड़ता है तो चिता पर अकेला ही सोता है। इसलिए साथियों और सहायकों की आशा रखकर जीवित रहते समय और परावलंबी होकर काम नहीं चलाया जा सकता, फिर भी इतना तथ्य तो हर किसी को स्मरण रखना होता है कि मिलजुल कर रहा जाय। सहकार के अवसरों को हाथ से न जाने दिया जाय। दूसरों की सहायता, सद्भावना प्राप्त करने का एक ही तरीका है कि पहल अपनी ओर से की जाय। गेंद फेंक कर जितने जोर से जिस दिशा में भी फेंकी जाती है वह आगे वाले अवरोध से टकरा की उसी गति से वापस लौट आती है। लोक व्यवहार से हमारी भूमिका जितनी सदाशयतापूर्ण होती है बदले में उसी अनुपात से दूसरों का सद्व्यवहार हमें उपलब्ध होता है।
कई बार प्रतिकूलताएं सामने आती हैं। लोगों के दुर्व्यवहार आड़े आते हैं। इन परिस्थितियों में कई व्यक्ति सकपका जाते हैं। प्रतिरोध करना, बच निकलना तो दूर उनसे अपना पक्ष प्रस्तुत करते तक नहीं, बनता अभिव्यक्तियों को मन ही मन दबाए रहना, संकोचवश अपनी समस्याओं और कठिनाइयों को प्रकट न करना एक अवगुण है जो घुटन पैदा करता है। घुटन अपने आप में एक विशालता है जो अंततः प्रकटीकरण की तुलना में अधिक हानिकारक सिद्ध होती है।
पत्थर के कोयले जलाकर सर्दी के दिनों में कई लोग कमरा गरम करने की दृष्टि से उसे छोटी कोठरी में बंद कर लेते हैं और तात्कालिक शीत निवृत्ति का लाभ भी अनुभव होता है, किंतु देखा गया है कि उस विषैली गैस से कोठरी में सोने वालों का दम घुट जाता है। सबेरे वे सभी लोग मरे निकलते हैं, जो लोग अपनी समस्याओं घुटते रहते हैं जी की जलन प्रकट नहीं होने देते, असंतोष एवं आक्रोश छिपाये रहते हैं वे मन समझाने को तो यह मानते हैं कि चुप रहकर उनने शाँति बनाये रखी, पर यह तथाकथित शाँति प्रकट अशाँति से महँगी पड़ती है। दूसरे लोग वास्तविकता को समझ नहीं पाते। घुटने वाले पर निराशा का, मन में विद्वेष रखने का, रूठने का, बुरे स्वभाव का लाँछन लगाते हैं। उपेक्षा बरतने के रूप में उसे प्रताड़ित करते हैं। इस प्रकार सहानुभूति की जो अपेक्षा की गई थी वह भी हाथ से चली जाती हैं।
समस्याओं के समाधान का सीधा तरीका यह है कि अपनी बात आवेश में नहीं, तथ्यों और तर्कों के साथ संबंधित व्यक्तियों के सामने रखी जाय। इतने भर से काम न चलता हो तो जो हस्तक्षेप कर सकते हैं, सुलझाव का वातावरण बना सकते हैं उनके सामने भी जटिलता को रखा जाय और उसका समाधान निकालने के लिए सहयोग प्राप्त किया जाय।
कहते हैं कि माता भी बिना माँगे रोटी नहीं देती। उलझनों का सही ढंग से सद्भाव भरा समाधान दूसरों से भी पूछा जा सकता है। वस्तुस्थिति विदित होने पर ही स्वजन संबंधी भी उस ओर ध्यान देते हैं, औचित्य का पक्ष लेते हैं और भ्रमग्रस्त को समझाते, अनीति अपनाने वाले को रोकते हैं। ऐसा न भी होता हो तो घुटन को प्रकट कर देने पर मन तो हलका होता ही है। यह लाभ भी कुछ कम नहीं।
घुटन भरी परिस्थितियों को अपने पक्ष की हलचल उभार कर ही उलझन को सुलझाया और कठिनाई से निपटा जा सकता है। इस हेतु मुखर निपटा जा सकता है। इस हेतु मुखर होना आवश्यक है। वस्तुस्थिति को प्रकट करते रहने से अनीतिकर्ता पर भर्त्सना बरसती है और समुदाय का दबाव पड़ता है। अपनी करतूतों पर पुनर्विचार करने का मन बनता है और अंततः दबाव मिटता या घटता है।
डर कर चुप ही बैठना या दरगुजर करते रहना, शाँति प्रिय होना नहीं हैं। सहनशील तो वे कहलाते हैं जिनके ऊपर अशुभ प्रतिक्रिया ही नहीं होती। अनुकूलता को वे प्रगति के लिए प्रयुक्त करते हैं और प्रतिकूलता के सामने अपने समूचे साहस और पराक्रम का प्रयोग करते हैं। ऐसे ही लोग उभयपक्षीय परिस्थितियों का लाभ उठाते हैं। प्रतिकूलताओं से लड़ने की मनःस्थिति बनाना और साधन जुटाना ऐसा कार्य है जिसके सहारे व्यक्तित्व को सुविकसित और प्रतिभा संपन्न बनाया जा सकता है।
सेण्टपीटर पहले मछुआरे थे। मछली पकड़ना और पेट भरना यही उनका धंधा था। एक दिन उनकी नाव में ईसा मसीह उस पार जाने के लिए बैठे। रास्ते में वार्तालाप होता रहा। इस वार्ता का इतना गंभीर प्रभाव हुआ कि मछलीमार उसी दिन संत बन गया और ईसा मसीह के साथ रहने लगा। उनकी सेवा-शैली और प्रवचन पद्धति उसने पूरी तरह हृदयंगम कर ली।
ईसा को फाँसी हो गई, पर सेण्टपीटर न निराश हुए न भयभीत । अपने अपने गुरु के पीछे छोड़े काम को आगे बढ़ाने का निश्चय किया और विरोधियों की परवाह किये बिना निर्भीकतापूर्वक प्रचार कार्य करने लगे। पुरानी रूढ़ि मान्यताओं को बदलने के लिए लोग मुश्किल से ही तैयार होते थे, फिर भी उनने अपना कार्य पूरे उत्साह के साथ जारी रखा।
सेण्टपीटर पर विरोधियों ने आक्रमण किये, जेल में डाला, उपहास किया और सताने के लिए जो कुछ कर सकते थे, किया, पर पीटर के प्रयासों में रत्ती भर अंतर न आया। उनकी प्रखर निष्ठ ने उन्हें ईसाई धर्म में ऊंचा स्थान दिलाया। वे अभी भी असाधारण श्रद्धा के साथ ईसाई समाज में स्मरण किये जाते हैं। समयानुकूल परिवर्तन सदा सराहनीय रहे हैं।
आचार्य महीधर का मत है कि मुहूर्तों में सुविधा एवं अवसर ही प्रधान कारण है। जैसे वर्षा ऋतु आवागमन में असुविधाजनक होती है, इसलिए उन दिनों विवाह नहीं होते। किंतु जिन देशों में वर्षा के दिन अन्य महीनों में होते हैं, उन दिनों वहाँ कोई अड़चन नहीं।
दिशाशूल, योगिनी, कलराज, चन्द्रमा आदि का विचार करके यात्रा करना या रोकना उपहासास्पद है, यह भी शकुन विचार की तरह अंधविश्वास है।
विवादों में वर के लिए सूर्य, कन्या के लिए बृहस्पति और दोनों के लिए चन्द्रमा देख कर मुहूर्त निकालना ऐसे ही अँधेरे में लट्ठ मारना है।
वर-कन्या का मंगली होना। इतने गुण मिलना न मिलना यह ऐसी बातें हैं, जिनके लिए वर कन्या का व्यक्तित्व देखा-परखा जाना चाहिये। न कि पंचांगों के सहारे किसी को दोषी, किसी को भाग्यहीन ठहराना। इस झंझट में कितने ही अच्छे विवाह-संबंधों से हाथ धोना पड़ता है और अनावश्यक विलंब करना पड़ता है। इन मान्यताओं को विशुद्ध भ्रम-जंजाल समझकर त्यागना ही बुद्धिसंगत है।
मूल आदि नक्षत्रों को अशुभ मानकर पिता, भाई आदि के लिये अनिष्टकर मानकर जन्मे बच्चे के प्रति घृणा भाव रखना सर्वथा अनुचित है।
ऋषि बालखिल्यो को उनके पिता ने इसी कारण पानी में बहा दिया था, पर बड़े होने पर वे सबके लिए मंगलमय और प्रतिभावान् निकले।
“आश्चर्य ! अरे यह क्या ?” उन्होंने हतप्रभ हो पानी हाथ में लिया। अद्भुत ढंग की भीनी-भीनी मनोरम सुगंध पानी से उड़ रही थी। सिप्रा के जल में तो ऐसी सुगंध नहीं। वह ठहर कर सोचने लगे। कुछ क्षणों के बाद उन्होंने परिचारिका को बुलाया । वह बेचारी दौड़ी-दौड़ी आयी, आते ही उससे पूछा- “आज तुमने मेरे नहाने के पानी में क्या मिला दिया है? पानी में बड़ी मोहक गंध आ रही है। किस की आज्ञा से तुमने यह किया?”
परिचारिका बेचारी हक्की-बक्की रह गई। कुछ पल बाद जब उसका डर कुछ कम हुआ तो उसने हिम्मत जुटाकर पानी को स्वयं सूँघा। पानी में सुगंध थी। उसे भी पानी सुगंधित लगा, किंतु उसने स्वीकार किया कि उसने पानी में कुछ नहीं मिलाया है। बड़ी विलक्षण समस्या खड़ी हो गई। चारों तरफ खोज-बीन होने लगी। आखिरकार सैनिक उन कहारों के पास पहुँचे, जो राजमहल के लिए प्रतिदिन पानी भरते थे। वहाँ मालूम पड़ा कि उस दिन सम्राट के यहाँ पानी का प्रबंध कहार की नवागत पुत्र वधु ने किया था।
सुनंदा नाम की वह नवीना कहार-वधु-सम्राट विक्रमादित्य के सम्मुख प्रस्तुत की गई। सम्राट ने साशीष-उससे पूछा “प्रसन्न रहो पुत्री, क्या तुम यह बता सकती हो कि पानी में ऐसी मनोरम गंध क्यों आती है? गंध है भी सर्वथा अपरिचित।”
सुनंदा आदर-मर्यादा में डूबी नीची निगाह किए खड़ी थी। सम्राट को प्रणाम करती हुई बोली- “अपराध क्षमा हो, राजाधिराज आज का पानी सिप्रा नदी का नहीं, मेरे मायके के एक कुंड का है। न जाने क्यों उस कुँड में आजकल सुगंधित पानी ही निकलता है। उज्जयिनी से थोड़ा दूर ही वह विरुपाक्ष कुँड है। “
सम्राट विक्रमादित्य की जिज्ञासा तीव्रतर हो उठी। आश्चर्य और घनीभूत हो गया- पूछा-आखिर क्या कारण है इसका? हो सकता है कि कुछ सुगंधित फूलों वाले पेड़, अथवा कुछ सुगंधित जड़ी-बूटियाँ उस कुँड को घेरे हों या वहाँ की भूमि में कोई ऐसा खनिज हो ?
आदर सहित मृदुल स्वर में उत्तर देते हुए सुनंदा बोली- “नहीं महाराज ! न तो कोई सौरभ वाले पेड़-पौधे वहाँ हैं और जहाँ तक मैं जानती हूँ वहाँ की भूमि में कोई सुगंधित खनिज भी नहीं है और न ही बाहर से सुगंध मिलाने का कोई भी प्रबंध उस कुँड में है।”
महाराज के साथ सारे अंतः पुर को सुनंदा के इस इनकार पर विश्वास नहीं हुआ। दुबारा पूछने पर उसने फिर से अपना वही कथन दुहरा दिया। सम्राट विक्रम बड़े चकित हुए यकीन आया और नहीं भी आया। फिर पूछा- “अच्छा इतना और बताओ कि उस कुँड में पानी किस स्रोत से आता है?”
उसने फिर सजज्ज भाव से कहा- “देव ! वह कुँड अपने में ही पूर्ण है। किसी स्रोत से पानी उसमें नहीं आता है। सुगंध पानी के भीतर से ही आती है। मेरी बात पर विश्वास कीजिए राज-राजेश्वर।”
मौन खड़े सारा वार्तालाप सुनते रहे महामंत्री भट्ट मात्र को थोड़ा रोष आया। तनिक तीव्र स्वर में उन्होंने पूछा- “जो कुछ तुम कह रही हो, बिलकुल सही कह रही हो। क्या सचमुच कोई ऐसा कुँड तुम्हारे मायके में है।”
भट्ट मात्र के आवेश ने कहार-वधु को थोड़ा भयभीत कर दिया। किंतु सत्य के समर्थन का प्रश्न सामने था। साहस स्वरित वाणी में वह स्पष्ट बोली- “मंत्रिवर सीधी-सादी बात है और सीधे-सादे ढंग से मैंने कही है। कोई राजनीतिक दांव-पेंच इसमें है नहीं। आप इतने आवेश में क्यों आ गए? मैं फिर आपके सम्मुख स्पष्ट करना चाहती हूँ कि मेरे मायके में, उज्जयिनी की सीमा से कुछ दूर विरुपाक्ष नाम का जल कुँड है। जिसमें आजकल सुगंधित जल भरा रहता है। इसमें मिथ्या कुछ नहीं है। यदि श्रीमान को विश्वास न हो तो सैनिकों को भेजकर परीक्षा करवा लीजिए। केवल तीन प्रहर का ही मार्ग है यहाँ से।”
तत्काल ही पाँच घुड़सवार सैनिक जल घट लेकर सुनंदा के द्वारा बताये मार्ग पर भेजे गए। सम्राट विक्रमादित्य की जिज्ञासा नगण्य चिंगारी से सुलगकर ज्वालामुखी बन गई थी। हजारों-हजार सुगंधों का उपयोग उन्होंने किया था, किंतु जैसी मोहक सौरभ उस पानी में से आ रही थी, वैसी उन्होंने आज तक कभी अनुभव नहीं की थी वरन् अलौकिक ही लगी उन्हें वह गंध।
सैनिक जब वापस लौटे, तो अपने साथ एक कहानी लेकर भी लौटे। उक्त कुँड का पता वे अवश्य लगाकर आये थे और साथ में पानी के घट भी भरकर लाये थे। महाराज के पूछने पर उन्होंने बताया- “धर्मावतार एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित वह विरुपाक्ष कुँड है। पहाड़ी पर कोई वृक्ष या वृक्षावली नहीं कुँड के पास एक पर्णकुटी है जिसमें एक युवा योगी ध्यानमग्न बैठा है। उसके रोम-रोम से तेज टपक रहा है। हमने उसे बहुत पुकारा किंतु उसका ध्यान भंग नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त हमने वहाँ कुछ नहीं पाया प्रभो। “
“सुवा योगी” इस शब्द को सुनते ही सम्राट की जिज्ञासा जैसे अनंत गुनी हो उठी। वे राजा होते हुए भी महान ताँत्रिक, योग के अप्रतिम जिज्ञासु और ज्ञान-विज्ञान के महापंडित थे। उनके बल विक्रम एवं बुद्धि-विवेक की कीर्ति समस्त भारत वर्ष में फैली हुई थी। वे जितने प्रजा वत्सल, रणशूर थे उतने ही महासाधक भी। राजनीतिक एवं शास्त्र ज्ञान में उनसे अधिक पारंगत राजा उस समय कोई न था। शकों का आतंक समाप्त कर तो जैसे उन्होंने प्रजा को नया जीवन ही दिया था। यही कारण था कि राज्य प्रबंध की दीक्षा लेने के लिए जहाँ कामरूप, प्रा. ज्योतिषपुर, तक्षशिला के राजकुमार उनके पास आते थे, वहाँ अध्यात्मिक ज्ञान की पिपासा शाँत करने के लिए योगी ताँत्रिक भी उन्हें घेरे रहते थे। लेकिन यह युवा योगी .... अद्भुत अस्फुट सा एक शब्द अनेक मुख से निकला।
एक पल का चिंतन दूसरे पल के निश्चय में बदला। रथ पर बैठकर चुने हुए सभासदों के साथ स्वयं विरुपाक्ष कुँड गए। जिज्ञासा तो संक्रामक ठहरी। सम्राट के पीछे दूरी अवंतिका और आस-पास से आये जिज्ञासु मनीषी और गृहस्थ थे। प्रायः जन हीन रहने वाला वह विरुपाक्ष शिखर आज स्वयं में नैमिषारण्य बन गया।
सम्राट ने पर्णकुटी में ध्यानस्थ बैठे उस युवक तपस्वी को देखा और देखते रह गए-सिन्दूरी लिए कर्पूर गौर देह-चौड़ा ललाट जिस पर लंबी जटाओं का मुकुट सुशोभित था, शाम्भवी मुद्रा में अर्धोन्मीलित नेत्र बस कुछ ऐसा ही लग रहा था जैसे भगवान महाकालेश्वर स्वयं देह धारण करके विराजमान हो गए हों। काफी देर बाद उस योगी ने आँखें खेली। राजा को आशीर्वाद देते हुए उसने मीठी वाणी में कहा- “नरोत्तम तुम्हारी जिज्ञासा का मुझे पता है। मैं शीघ्र ही बताता हूँ कि इस कुँड का पानी क्यों सुगंधित है?”
महाराज अभी तक मंत्रमुग्ध थे। उनके नेत्र उस सौंदर्य शिरोमणि योगी को निर्निमेष ताक रहे थे। ऐसी मीठी वाणी उन्होंने जीवन में कभी नहीं सुनी थी। मानवीय स्वर इतना मीठा हो सकता है, राजा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उस युवा योगी के कंठ से निकला प्रत्येक शब्द उन्हें अमृत का बिंदु लग रहा था।
राजा को अपने में डूबे देखा, उस तरुण साधक ने कहा- “राजन् ! व्यर्थ आश्चर्य में न डूबो सुस्थिर होकर सारा प्रसंग सुनो। इस कुँड में सुगंधित पानी क्यों है, इस प्रश्न के द्वारा किसी महान रहस्य का उद्घाटन नहीं होता है। बात बिलकुल सरल है। मेरे यहाँ आने से पूर्व इस कुँड का पानी सुगंधित नहीं था। मैं यहाँ-वेदों में वर्णित “मधु विद्या” की साधना करता हूँ। उसके प्रभाव से ही इस कुँड का पानी अलौकिक गंध से सुरभित और मधु से भी अधिक मीठा है। लो पानी का थोड़ा आचमन भी करो।”
तरुण योगी ने स्वयं अपने कमंडल में से राजा की हथेली में जल उड़ेला। जीभ पर रखते ही राजा का मुख खिल उठा। पानी में भी स्वाद होता है और इतना मधुर स्वाद, राजा के आश्चर्य की सीमा न रही। उन्होंने उस योगी के चरण पकड़ लिये। फिर अनुनय के साथ बोले- “प्रभो! लगता है आप साक्षात् देवाधिदेव है। हमें ज्ञान सुधा पिलाने के लिए कृपा करके धरती पर उतरे हैं-धन्य भाग है हमारे। अब विलंब न कीजिए देव, अपने उपदेशों से हमें कृतार्थ कीजिए। मधु-विद्या क्या है हमारे लिए स्पष्ट करने का अनुग्रह कीजिए।”
“मैं देवाधिदेव, नहीं राजन् उनका एक तुच्छ अनुचर हूँ। मेरा नाम-योगी गोरखनाथ है।” “तब-तब मेरे अग्रज महाराज भर्तृहरि के पथ को प्रशस्त करने वाले....” विक्रमादित्य ने अटकते-हुए वाक्य पूरा करने की कोशिश की। हाँ मैं ही। गोरखनाथ के इन शब्दों को सुनते ही सम्राट की श्रद्धा शंतगुणित हो उठी।
सम्राट की श्रद्धा को निहार कर महायोगी तेजोदीप्त आँखें अमित प्रेम से उद्भासित हो उठी। अनुकूलता की उस परितोष मुद्रा में वे साक्षात् शिव प्रतीत हो रहे थे। राजा की अशाँत-उत्सुकता का शमन करते हुए वे बोले- “ज्ञानसत्तम! मैं यहाँ निश्चल, भाव से दृढ़ संकल्प के साथ प्राणिमात्र के कल्याण की कामना करता हूँ। मैं यहाँ बैठा-बैठा यह संकल्प सँजोता रहता हूँ कि इस भूतल के सारे जीव परस्पर प्रेम से रहें सुखों से घिरे सबके मन में सर्व कल्याण की कामना विकसित होती रहे। सबकी इंद्रियाँ सर्वहित के कामों में लीन रहें-पिंड का सुख समुद्र उमड़ा और ब्रह्माँड के महासागर के साथ एक रूप हो जाय। प्राणों की सारी शक्ति केन्द्रस्थ करके मैं सबसे शुभोदय की कल्पना करता हूँ-जीवन का सारा रस समेट कर सर्व श्रेय का दीपक जलाता हूँ, जिसकी किरणें शिव भावना का प्रकाश लेकर इस भूमंडल के कोने-कोने में पहुँचती हैं। पुण्यात्मा राजन् यही वह मधु विद्या है, जीव-जीवन के प्रति मधुमय भावना का संकल्प”।
सुना तो सम्राट के नेत्र हृदयावंग में छलछला आयें। भाव विह्वल कंठ से बोले- “भाग्यवान हूँ प्रभो-जो अग्रज की तरह मैं भी आपकी कृपा का पात्र बन सका। अब तक का जीवन या तो तंत्र साधनाओं में बीता, रणविद्या के हुँकारो अथवा राजनीतिक पहेलियों को सुलझाने में। योगी की गुह्यताओं से सुपरिचित नहीं हूँ देव! क्या मन में विकसित कामना अथवा भावना इतनी बलवती हो सकती है कि वह इस भौतिक प्रकृति को ही बदल दे? क्या अगोचर अव्यक्त का प्रभाव इतना गोचर प्रत्यक्ष भी हो सकता है कि असंभव भी संभव प्रतीत होने लगे।”
योगी गोरखनाथ का ज्योति मुखमंडल मुसकान के माधुर्य में अरुणोदय की भाँति उठा। अतुल मधुरिमा को शब्दों से सींचते हुए वे बोले- “यह चमत्कार नहीं है राजन् संकल्प की सरल सिद्धि मात्र है। तुम अपने आस-पास जो कुछ देख रहे हो वह संकल्प के व्यक्त रूप के सिवाय और क्या है? दृढ़ संकल्प करके देखो राजन्! जो भी तुम्हारी कामना होगी, पूरी होगी। मेरी कामना तो आत्मा के सौरभ की कामना है। मैं संपूर्ण शक्ति एकत्र करके इस कामना के अव्यक्त प्रवाह को धरती के चारों छोरों पर भेजता हूँ और चित की अविचल एकाग्रता में, मैं स्वयं विस्मित होकर देखता हूँ कि मेरी अरुण भावनाएँ रूप ग्रहण कर रही हैं। इसके उपराँत जब शक्ति और स्थित हो जाती है तो मैं प्रत्यक्ष देखने लगता हूँ कि मेरी सर्वहित कामना एक विशाल हिलोर की तरह सारे संसार को अपने प्रवाह में सींच रही है। वीर विक्रम! इस जल में जो मिठास और सुगंध तुम पाते हो, वह मेरे मन की मंगल भावना का ही भौतिक रूप है। सब के लिए की गई कल्याण कामना के ही संसर्ग का फल है। मालवेश! तुम भी अपने प्रजाजनों के साथ इस मधुविद्या की साधना करो। तुम सबकी समवेत साधना धरती में मधुवाता ऋ तायते....मधुछरंति सिंधपः बनकर मुखरित होगी।”
आत्मा अनंत शक्तियों का भाँडागार है। उसमें अपने उद्गम केन्द्र परमेश्वर की समस्त शक्तियाँ बीज रूप में सन्निहित हैं। उन्हें उगाने और बढ़ाने के लिए योग-साधना एवं तपश्चर्या का खाद-पानी लगाना पड़ता है, साथ ही साथ उच्चस्तरीय चरित्र निष्ठ एवं उदार सेवा सहायता का अवलंबन अपनाना पड़ता है। इस नीति को अपना कर कोई भी साधक बुद्धिमान माली की तरह अपने अंतः क्षेत्र में विद्यमान ऋद्धि-सिद्धियों को उभार कर उनसे भरा-पूरा उद्यान खड़ा कर सकता है। इसके लिए बाहर से कुछ ढूँढ़ने, लाने या पाने की आवश्यकता नहीं है। मात्र कषाय−कल्मषों की परतों को हटा देने भर का साहस सँजो लेना पर्याप्त है। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार ही विभिन्न साधनाओं, तपश्चर्याओं का वास्तविक उद्देश्य है। अंगारे पर चढ़ी राख की परत ही उसे धूमिल और निस्तेज बना देती है। यह परत हअते ही अंगारा फिर अपनी गर्मी और प्रकाश का परिचय देने लगता है। चिंतन, चरित्र कर्तृत्व को यदि उत्कृष्ट एवं उच्चस्तरीय बना लिया जाय तो फिर आत्मिक प्रखरता के कारण उपलब्ध होने वाली असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों के मार्ग में और कोई बड़ा व्यवधान शेष नहीं रह जाता।
योगाभ्यास-परक साधना एवं उपासना के समस्त क्रिया-कलाप, विधि-विधान इस उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं कि उनमें निर्दिष्ट संकेतों का अनुसरण करते हुए मनुष्य अपने व्यक्तित्व को अधिकाधिक परिष्कृत एवं उदात्त तथा स्वयं को पवित्र बनाता चले। आत्म परिष्कार की इस प्रक्रिया में जिसने जितनी सफलता पायी वह उसी स्तर का संत, ऋषि, महामानव, देवता एवं अवतारी कहा गया। सामान्य मनुष्यों की तुलना में इन महामानवों को ब्रह्मलोक के निवासी कहा और उन्हें चमत्कारी माना जाता है। लौकिक सफलताओं को समृद्धि कहते हैं, किंतु आत्मोत्कर्ष की अलौकिक उपलब्धियाँ ‘विभूतियाँ’ एवं ‘सिद्धियाँ’ कहलाती हैं। सिद्धपुरुषों के चमत्कारी कर्तृत्व ही संसार भर के महामानवों को ऐतिहासिक श्रेय-सम्मान प्रदान करते हैं। उनकी गतिविधियाँ एवं सफलतायें असाधारण होती हैं, इसलिए उन्हें चमत्कारी भी कहा जाता है। यह चमत्कार बाजीगरों कर जादूगरी जैसे कौतुक-कौतूहल नहीं होते, वरन् इस तरह अर्जित प्रतीत होते हैं कि भव-बंधनों में जकड़े हुए दीन-दयनीय मनुष्यों के लिए जो संभव नहीं था, वह उनने सामान्य परिस्थितियों और स्वल्प साधनों से ही कि प्रकार आश्चर्यजनक ढंग से कर दिखाया। साधना से सिद्धि मिलने और सिद्धि के चमत्कारी होने की मान्यता का यही सुनिश्चित और ठोस आधार है।
जीवनोद्देश्य की पूर्णता ही सबसे बड़ी सिद्धि मानी जाती है। साधना का लक्ष्य उसे प्राप्त करना है। योगशास्त्रों एवं उपनिषदों में वर्णित चौरासी प्रकार के योग एवं विविध विधि तप-साधनाओं का लक्ष्य उसी तक पहुँचाने का है। साधना मार्ग पर चलते हुए सील के पत्थरों की तरह अनेकों छोटी-बड़ी सिद्धियाँ भी बीच-बीच में आती रहती हैं। इनसे लौकिक ऐश्वर्य और पारलौकिक सुख-शाँति का मार्ग प्रशस्त होता है।
सिद्धियों का वर्णन सभी योग ग्रंथों में मिलता है। योगी और सिद्धपुरुषों में कुछ विलक्षण प्रतिभा, सामर्थ्य एवं शक्ति देखी जाती है। उनमें सामान्य मनुष्य की अपेक्षा कहीं विशिष्ट आत्मबल होता है, जो विविध रूपों में परिलक्षित होता है। सिद्धपुरुष अपनी उपार्जित सिद्धियों का लाभ अपने निज के लिए नहीं उठाते, पर उनसे दूसरे सत्पात्रों को लाभान्वित करते रहते हैं। अपना आत्मबल देकर दूसरों की आत्मा को ऊपर उठा देने की महान सेवा तो वे निरंतर करते ही रहते हैं, यदा-कदा किन्हीं साँसारिक अभाव और कष्टों से पीड़ित व्यक्तियों को अपनी साधना का एक अंश देकर उन्हें कष्टमुक्त कर देते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अपना पुण्य-तप कष्ट पीड़ित को दान रूप में देना पड़ता है और उसके कठिन प्रारब्ध भोग को भुगतने को स्वयं तत्पर होना पड़ता है। संसार में हर वस्तु एक नियत नियम के आधार पर चल रही है। केवल कोरे आशीर्वाद देने से किसी का कोई भला नहीं हो सकता। सच्चा आशीर्वाद जो फलित हो, वही व्यक्ति दे सकता है जिसके पास तप की पूँजी संग्रहित हो और उसके एक भाग को आशीर्वाद के साथ देते हुए दूसरे का कठिन प्रारब्ध भोगने के लिए स्वयं तैयार हो। शक्तिपात के द्वारा दूसरों की आत्मा को ऊंचा उठाने में भी यही प्रक्रिया पूर्ण करनी पड़ती है। यह सब सिद्ध पुरुषों के लिए ही संभव है और सिद्धि साधना के ऊपर टिकी हुई है। कठिन तपश्चर्या एवं उच्चस्तरीय व्यक्तित्व द्वारा ही उसे उपार्जित रूप में वह किसी को नहीं मिलती।
साधना मार्ग में अग्रसर साधकों को समयानुसार जो सिद्धियाँ मिलती है, उनका वर्णन योगशास्त्रों एवं उपनिषदों में मिलता है। उनकी संख्या आठ हैं, जिन्हें अष्ट सिद्धियाँ भी कहते हैं। उनका वर्णन इस प्रकार है-
आत्म सिद्धि-इंद्रिय संयम, मनोनिग्रह, स्थित प्रज्ञता की प्राप्ति, समाधि, आत्म साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, तत्वज्ञान, भूतजय, मोक्ष, पंच क्लेशों से निवृत्ति, भव बंधनों से मुक्ति संसार की किसी भली-बुरी परिस्थिति का प्रभाव ग्रहण न करना।
विविधा सिद्धि:- पंच तत्वों पर नियंत्रण, उनके द्वारा अभीष्ट वस्तुयें तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकना, दूसरों के मन में अपनी भावना तथा मान्यता की स्थापना।
ज्ञान-सिद्धि-तीक्ष्ण बुद्धि, तीव्र स्मरण शक्ति, भूतकाल में हुई तथा भविष्य में होने वाली घटनाओं को जान सकना, दूरस्थ और समीपवर्ती परिस्थितियों का समान रूप से साक्षात्कार, पूर्वजन्मों को वृत्ताँत जानना, सब प्राणियों के मनोगत भावों को जानना, शास्त्रों का सारदर्शन, अंतः करण में वैराग्य और निस्पृह प्रेम।
तपसिद्धि:- कठोर तप कर सकने की शक्ति, सर्दी-गर्मी को बिना कष्ट के सहन, भूख प्यास पर नियंत्रण, जल-थल और आकाश पर विचरण कर सकना।
क्षेत्र सिद्धि:- थोड़े स्थान में बहुत विस्तृत वस्तुओं का समा सकना, सूक्ष्मशरीर द्वारा देश-देशाँतरों और लोक लोकाँतरों में भ्रमण कर सकना, अपने तेजस् को बाहर दूर-दूर तक फैला कर उस क्षेत्र के दुख तथा अभावों को दूर कर सकना, शरीरस्थ देवताओं का साक्षात्कार।
देवसिद्धि:- देवताओं, यक्ष, गंधर्व, प्रेत, पिशाच, बेताल, ब्रह्मराक्षस, छाया पुरुष आदि का अनुग्रह, स्वामित्व और सहयोग प्राप्त करना। मंत्र सिद्धि, सिद्ध योगियों का ब्रह्मरंध्र में संबंध-सात्रिध्य, षट्चक्रों और कुँडलिनी का जागरण।
शरीर सिद्धि:- दृष्टि या स्पर्श मात्र से दूसरों को निरोग और कष्ट मुक्त कर देना, अपार शारीरिक बल, अद्भुत मनोबल, उत्कृष्ट चिंतन, निर्वाध भाषण, शाप-वरदान से दूसरों को नष्ट कर देना या जीवन दान देना, स्पर्श से पदार्थों का स्वादिष्ट और सुगंधित हो जाना, स्वल्प आहार से बहुतों को तृप्त कर देना, वाणी एवं आशीर्वचनों का सफल होना, शरीर का कायाकल्प, दीर्घजीवन या अमर होना।
विक्रया सिद्धि:- अपने शरीर को अन्य शरीरों में परिवर्तित कर लेना, दूसरों के शरीरों को परिवर्तित कर देना, शरीर को अति भारी, अति हल्का, अति सूक्ष्म, अति विशाल बना लेना, अंतर्ध्यान हो जाना, सर्ववशीकरण, सब कामनाओं की पूर्ति के साधन जुटाना।
पातंजलि योगदर्शन एवं अन्यान्य ग्रंथों में जो आठ सिद्धियाँ गिनायी गयी हैं, वे इस प्रकार हैं- (1)-अणिमा-शरीर को अणु के समान सूक्ष्म कर लेना (2) महिमा-शरीर को बहुत बड़े आकार का बना लेना (3) गरिमा शरीर को बहुत भारी बना लेना (4) लघिमा-शरीर को बहुत हल्का कर लेना (5) प्राप्ति-दूरस्थ पदार्थों को स्पर्श अथवा प्राप्त कर लेना (6) प्राकाम्य-कामनाओं को अभिलाषित रूप में पूर्ण कर लेना (7) ईशित्व-शरीर और मनके भीतरी संस्थानों एवं चक्रों पर प्रभुता तथा संसार के अन्य पदार्थों को अपनी इच्छानुसार प्रयोग कर सकने की सामर्थ्य। (8) वशित्व-सब परिस्थितियों अथवा वस्तुओं को अपने वशवर्ती रख सकना।
अन्य शास्त्रों में सिद्धियों को अन्य रूपों में भी उपस्थित किया गया है, जिनका उल्लेख कई प्रकार से मिलता है। आद्य शंकराचार्य के मतानुसार सिद्धियाँ निम्न प्रकार की हैं-
(1)-जन्म सिद्धि-जन्म से ही पूर्व संचित संस्कार तथा वैभव प्राप्त होना (2) शब्द ज्ञान सिद्धि-श्रवण मात्र से सही अनुमान होना (3) शास्त्र ज्ञान सिद्धि-शास्त्रों के अभ्यास से असाधारण बुद्धि का विकास (4) आधिभौतिक ताप सहन शक्ति (5) आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति (6) आधिदैविक सहन शक्ति (7) विज्ञान सिद्धि-अंतः करण से तत्वज्ञान का स्फुरण होना (8) विद्या सिद्धि-विद्या के द्वारा अविद्या का नाश। किन्हीं-किन्हीं शास्त्रों में-(1) परकाया प्रवेश (2) जल आदि में असंग (3) उत्क्राँति (4) ज्वलन (5) दिव्य श्रवण (6) आकाश मार्ग गमन (7) प्रकाशावरण क्षण (8) भूत जय-आदि को अष्ट सिद्धियाँ माना गया है।
सच तो यह है कि मनुष्य शरीर में समस्त देवशक्तियाँ विद्यमान हैं जिन्हें साधना एवं तपश्चर्या द्वारा जाग्रत एवं विकसित किया जाता है। इस दिशा में अपने गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार में साधक जितनी अधिक पवित्रता एवं प्रखरता का समावेश करता जाता है, उसी क्रम से एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय विभूतियाँ-सिद्धियाँ हस्तगत होती चली जाती हैं। मनुष्य का मौलिक स्वरूप देवत्व प्रधान है। अतः शारीरिक, मानसिक और आत्मिक क्षेत्र की सिद्धियाँ भी अगणित प्रकार की हैं, उन्हें आठ या किसी अन्य संख्या में विभाजित नहीं किया जा सकता। आत्मबल की जिस दिशा में लगा दिया जाय, उसी में चमत्कार पैदा हो जायेगा और वह एक स्वतंत्र सिद्धि दिखाई देने लगेगी।
साधना की सफलता के रूप में उपरोक्त सिद्धियाँ समयानुसार सामने आती हैं, पर उनकी ओर आकर्षित होना, उन्हें अधिक महत्व देना, उनका प्रदर्शन करना अथवा उनसे कोई भौतिक लाभ उठाना, गर्व करना और चमत्कारी बनकर लोगों को अपने पीछे लगाना एक भारी भूल है।
योगदर्शन विभूति पाद (37) में कहा गया है- “ते समाधावुपसर्ग व्युत्थाने सिद्धयः।” अर्थात् ये सिद्धियाँ समाधि में विघ्न रूप हैं। जाग्रत अवस्था में सिद्धियाँ हैं। इसी ग्रंथ में वि. पा. के 50 वें सूत्र में उल्लेख है- “तद्वैराग्यादपि दोष बीज क्षये कैवल्यम्।” अर्थात् इन सिद्धियों से भी मन हटा लेने पर दोषों का बीज नाश होकर मुक्ति की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार ‘योग सुधाकर’ में कहा है- ‘तत्रापेक्षास्यत् तदा मोक्षाद् भ्रष्टः। कथं कृतकृत्य ताभियात्-’ अर्थात् यदि इन सिद्धियों की आकाँक्षा रही तो साधक मोक्ष-पथ से भ्रष्ट
हो जायेगा। फिर उसे लक्ष्य प्राप्ति कैसे होगी?
ईश्वर का अनुग्रह तथा पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए एक मात्र उपाय साधना है। इसे परम पुरुषार्थ माना गया है। अपने कुसंस्कारों से निरंतर लड़ते रहना, जीवन क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों की फसल उगाना, पशुता को देवत्व में परिणत कर देना-यही है साधना को स्वरूप। साधना उपक्रमों के साथ जुड़े हुए इस दिशा निर्धारण को जो समझते हैं और बिना हारे अनवरत प्रयास करते हैं, उन्हें सिद्ध पुरुष होने का अवसर निश्चित रूप से मिलता है। साधना से सिद्धि का सिद्धाँत अकाट्य है। प्रयास के साथ जुड़ी हुई उपलब्धि का प्रमाण, परिचय हर साधक कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है। साधक को सिद्धियाँ मिलती हैं जिसको देखते हुए यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। सिद्धियाँ और चमत्कारी क्षमतायें, देवी अनुग्रह केवल इसलिए उपलब्ध होते हैं कि उनका उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जा सके। यही साधना का मूल लक्ष्य है एवं इसी राजमार्ग पर चलते हुए वह सब कुछ पाने का प्रयास किया जाना चाहिए जो कि साधक को अभीष्ट है।
इन दिनों विश्व जिस अराजकता और उथल-पुथल के दौर से होकर गुजर रहा है, उसे देखते हुए ऐसा लगता नहीं कि निकट भविष्य में जल्द ही यह संकट टलने वाला है। यह प्रत्यक्षवाद पर आधारित निर्णय-निष्कर्ष है। पर परोक्ष की भी इस संदर्भ में उपेक्षा नहीं की जा सकती। भविष्यवाणियाँ परोक्ष दर्शन पर ही आवृत होती है और अनेक बार शत-प्रतिशत सत्य सिद्ध होती हुई देखी जाती है।
पिछले दिनों ऐसा ही एक भविष्य कथन “टाइम” पत्रिका में मदर स्रिप्टन का प्रकाशित हुआ। इंग्लैंड की इस भविष्यवक्ता ने आने वाले समय का बड़ा उज्ज्वल और आशावादी विवरण प्रस्तुत किया है। वे कहती हैं बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में ऐसी भीषण और भयंकर अस्थिरता विश्व भर में दिखाई पड़ेंगी कि एक बार यह आशंका होने लगेगी कि विश्व-विनाश सुनिश्चित है। इन्हीं दिनों प्रकृति-प्रकोप भी चरम सीमा पर होगा। महामारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकंप, बाढ़, अकाल, ज्वालामुखी, विस्फोट सभी संसार के के विभिन्न हिस्सों में इस कदर तबाही मचायेंगे कि लोग त्राहि-त्राहि कर उठेंगे। इसमें गृहयुद्ध, शीतयुद्ध, अंतर्राष्ट्रीय विद्वेष, एक-दूसरे से आगे निकल जाने की आपाधापी कोढ़ में खाज की तरह साबित होंगे। वर्ग-संघर्ष, सत्ता संघर्ष, धार्मिक उन्माद, वैयक्तिक संकीर्णता बढ़ोत्तरी पर होंगे, जिससे दुनिया के कई स्थानों में भीषण रक्तपात होगा। स्नेह-सौजन्य और मातृत्व की भावना का निरंतर ह्रास दिखाई पड़ेगा। यह ह्रास वैयक्तिक स्तर से लेकर राष्ट्रों तक में इस कदर होगा कि प्रत्येक अपने से छोटे और कमजोर को दबाने-दबोचने से लेकर अपने में मिला लेने तक में कोई संकोच न करेगा। “नैतिकता” बोलचाल को सैद्धाँतिक शब्द भर बन कर रह जायेगी। व्यवहार में तो सर्वत्र अनीति और अन्याय का ही बोलबाला होगा।
मदर स्रिप्टन लिखती हैं कि इन विसंगतियों के बावजूद विषम स्थिति देर तक टिकी रह न सकेगी। एक ऐसी विचार चेतना का नवोदय घनघोर घटाटोप के बीच से उन्हीं दिनों होगा, जिससे सारी प्रतिकूलताएँ देखते-देखते तिरोहित हो जायेंगी और वातावरण कुछ ऐसा बनेगा, जिसे आने वाले स्वर्णयुग की आधारशिला कहा जा सके। फिर इसी नींव पर नवयुग की सुदृढ़ इमारत विनिर्मित होगी। यह इमारत इतनी मजबूत और विशाल होगी कि अपनी भव्यता के कारण सदियों तक स्मरण की जाती रहेगी। स्रिप्टन कहती हैं कि इस नव-निर्माण में भारत का योगदान अप्रतिम होगा। सच्चाई तो यह है कि इसकी पहली भूमिका वहीं बनेगी और सर्वप्रथम उसे ही गलाई-ढलाई से गुजरते हुए अपना कायाकल्प करना होगा। तत्पश्चात् यह प्रक्रिया संदेशवाहकों और शाँतिदूतों के माध्यम से भारत के बाहर संपन्न होगी और देखते-देखते विश्व के कोने-कोने तक में अपना कलेवर-विस्तार करती चली जायेगी। परिवर्तन प्रक्रिया की संपूर्ण अवधि को स्रिप्टन ने दो सदी जितना बताया है। उनके अनुसार 21 वीं शताब्दी में 2025 तक बदलाव इतना स्पष्ट हो जायेगा कि वह व्यक्ति के चिंतन और आचरण में स्फुट झलकने लगेगा। सन् 2040 के आस-पास तक परिवर्तन समग्र और पूर्ण हो जायेगा। इसके उपराँत विश्व एक ऐसे शाँत और सुस्थिर युग में प्रवेश करेगा, जिसे दिव्यता की दृष्टि से अध्यात्म युग और प्रखरता की दृष्टि से स्वर्णयुग कहा जा सके। इसकी अवधि उनने हजार वर्ष से भी अधिक बतायी है। इसके बाद स्रिप्टन में स्वर्णयुग में लोगों का चरित्र-चिंतन, भौतिक संपन्नता, आध्यात्मिक उन्नति, अर्थव्यवस्था, संचार-सुविधा आदि का वर्णन किया है।
आगामी समय का उल्लेख करती हुई वे कहती हैं कि तब अर्थव्यवस्था तो पूँजीवादी जैसा होगा। लोगों को अधिकाधिक उपार्जन करने का अधिकार तो होगा, पर संपत्ति का नियोजन समाज के हाथों में होगा। अधिक ने और अनावश्यक व्यय करने की नीति अन्यायपूर्ण मानी जायेगी और वह किसी प्रकार बर्दाश्त नहीं की जायेगी। समान वितरण प्रणाली के अंतर्गत सभी लोग सुविधाओं का बराबर-बराबर उपभोग करेंगे। किसी को दूसरे के हिस्से को दबाने और निगलने की छूट नहीं होगी। छूट होगी तो इतनी भर कि वे कम से कम साधनों का उपयोग करें और जीवन-निर्वाह की आवश्यकता पूर्ति के बाद शेष बचे साधनों का उपयोग समाज सेवा के लिए करें, किंतु यह सब किसी बाह्य अथवा दंड द्वारा लागू नहीं होगा। आत्मानुशासन द्वारा इनका निर्वाह स्वतः होता रहेगा। जो इस आचार-संहिता की अवहेलना करेंगे, समाज में उनकी गणना अन्यायी, अत्याचारियों जैसी होगी। वे निम्न और क्षुद्र स्तर के असभ्य माने जायेंगे। ऐसे कुछ एक अपवादों को छोड़ दिया जाय, तो हर क्षेत्र में हर जगह विलक्षण समानता नजर आयेगी। निजी विभूतियों और व्यक्तिगत प्रतिभाओं के कारण बौद्धिक और मानसिक स्तर की असमानता भले ही दीख पड़े, पर भौतिक भिन्नता किसी प्रकार जीवित न रह सकेगी। यदि जिंदा रही, तो असुर बन कर ही साँस ले सकेगी।
पदार्थ विज्ञान का उल्लेख करती हुई वह कहती हैं कि उसका विकास तब चरमोत्कर्ष पर होगा। जिन क्षेत्रों में आज सोचते तक नहीं बन पड़ रहा है, अथवा जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकी है, उनका आविष्कार लोगों को चमत्कृत कर देगा। अनेकानेक ऐसे यंत्र-उपकरण विकसित कर लिये जायेंगे, जो आने वाले समय को भौतिक विकास की दृष्टि से अभूतपूर्व बना दें, किंतु इनके विकास में पदार्थपरक जानकारी का महत्व कम और अंतस् से आविर्भूत ज्ञान की महिमा अधिक होगी। इन दोनों के समन्वय से ही विज्ञान सर्वोच्च शिखर पर सुशोभित होगा। ऐसे यानों का निर्माण संभव होगा, जो बिना किसी ईंधन के सहारे द्रुतगति से उड़ सकें। इनकी सहायता से कई ऐसे ग्रहों की यात्रा शक्य हो सकेगी, जिनके बारे में अभी सोचा तक नहीं गया है। अंतर्ग्रही सभ्यता का पता लगा लिया जायेगा। तब विज्ञान कई क्षेत्रों में क्राँतिकारी परिवर्तन लायेगा। समुद्र में नये संपदा-भंडार की जानकारी मिलेगी। नये प्रकार के द्रुतगामी वाहन विकसित किये जायेंगे। आज के वाहनों का कोई मूल्य और महत्व न रह जायेगा। पर्यावरण को दूषित करने वाले प्रचलित वाहनों की तुलना में आगामी समय में ऐसे वाहनों का निर्माण होगा, जो पर्यावरण को अनावश्यक गंदगी से मुक्त रख सकें और समयानुरूप अपनी उपयोगिता भी सिद्ध करते रहें। वैसी वस्तुओं का उत्पादन रोक दिया जायेगा, जो जीवन को भोगी और विलासी बनाती हैं। इनके स्थान पर वैसी चीजें अधिकाधिक परिमाण में विनिर्मित की जायेंगी, जिनसे जीवन-मूल्यों में विकास होता हो। आग्नेयास्त्रों का बनना नहीं के बराबर होगा। तब इसकी आवश्यकता लगभग समाप्त हो जायेगी। जिन उद्देश्यों में आज इनका प्रयोग होता है, उस समय बदली मानसिकता से उत्पन्न हुए उत्कृष्टतावादी विचार के कारण ये निरुपयोगी सिद्ध होंगे। सामाजिक असहयोग और निंदा घृणित कार्यों के रास्ते प्रबल प्रतिरोध बन कर आड़े आयेंगे और उस प्रयोजन की सहज पूर्ति करते रहेंगे, जिनके लिए इन दिनों बल प्रयोग का अंतिम उपाय अपनाया जाता है।
ईंधन का नया विकल्प समुद्र में ढूँढ़ लिया जायेगा। फिर अधिकाँश कल-कारखाने इसी ऊर्जा से चलेंगे। परंपरागत ईंधन उस समय तक या तो चूक चुके होंगे अथवा समाप्ति के कगार पर पहुँच चुके होंगे। कई अन्य ऊर्जा स्रोतों का भी पता लगा लिया जायेगा। यह ऊर्जा-स्रोत सहायक की भूमिका संपन्न करते हुए विश्व को ईंधन के महत्वपूर्ण भाग की आपूर्ति करते रहेंगे। वाहनों की अनावश्यक बाढ़ कम होने से ऊर्जा की खपत कम हो जायेगी। उस बचत से औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सक्रियता लंबे समय तक सजीव बनी रहेगी। निर्जीव-निष्प्राण फिर कोई इकाई ऊर्जा की कमी के कारण नहीं होगी।
चिंतन-चरित्र में आदर्शवाद का समावेश जरूरी समझा जायेगा। वर्तमान में जिसे पुस्तकों में पढ़ने-सुनने तक सीमित माना जाता है, उन दिनों लोगों के आचरणों में उतरता प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा। जनसामान्य अधिक व्यावहारिक होंगे। ईश्वरीय सत्ता के प्रति एक बार पुनः आस्था जगेगी। आस्तिकता प्रतिष्ठिता होगी और नास्तिकता का अंत सदा-सर्वदा के लिए हो जायेगा। स्वयं को उस सर्वोच्च सत्ता का जीवंत प्रतिनिधि समझा जायेगा और जीवन में उन उच्चस्तरीय निर्धारणाओं को समाविष्ट करने पर बल दिया जायेगा, जो मनुष्य को वास्तविक अर्थों में परमात्मा का अंशधर साबित कर सके। बुद्धि पर विवेक का अंकुश होगा। किसी भी कार्य को करने से पूर्व व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर उसके व्यापक हानि-लाभ पर गंभीरतापूर्वक हजार बार सोचा जायेगा। इसके उपराँत ही उसे क्रियान्वित करने की बात सोची जायेगी। भावना, क्रिया और विचार का अद्भुत सामंजस्य इसी काल में देखा जायेगा। लोग किसी एक का अकेला आश्रय लेना पसंद
नहीं करेंगे। जहाँ क्रिया और विचार आवश्यक हों, वहाँ भावना प्रवाह में बहना असंतुलन माना जायेगा। सब इससे बचेंगे।
वर्तमान परिस्थितियों और सत्प्रवृत्ति विस्तार की बढ़ती गतिविधियों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मदर स्रिप्टन का पूर्वाभास किस कदर सच्चाई के करीब पहुँचता जा रहा है। इसमें दो मत नहीं कि युग-परिवर्तन का संकल्प ईश्वर की प्रबल आकाँक्षा है। उसकी इस आकाँक्षा को मूर्तिमान बनाने का ठीक यही उपयुक्त समय है। यदि इस अवसर पर हम गिलहरी जितना स्वल्प पुरुषार्थ भी दिखा सकें, तो भगवान के साथ साझेदारी निबाहने का श्रेय-सौभाग्य हमको निहाल बनाये बिना न रह सकेगा।
ज्ञान और विज्ञान दोनों के ऊपर विवेक का नियंत्रण होना चाहिए। विवेक रहित ज्ञान और विज्ञान ऐसी कट्टरता को जन्म देंगे जो दोनों के उपयोगी होते हुए भी विषवृक्ष बोयेंगे और किए गये परिश्रम को हानिकारक बनाकर रहेंगी।
स्वप्न क्या हैं और क्यों आते हैं? जीवन से इनका क्या संबंध है? इन्हें भविष्य-सूचक माना जाय अथवा वर्तमान और अतीत की व्यक्तिगत जीवन शैली की विशिष्ट देन कहा जाय? इस संदर्भ में उपरोक्त किसी एक मत का समर्थन करना इसकी एकाँगी व्याख्या होगी। सच्चाई तो यह है कि स्वप्न जीवन के संपूर्ण काल-खंड को प्रतिनिधित्व करते हैं। उनमें वर्तमान जीवन की झाँकी मिलती है, विगत की अनुभूति होती है और अनागत के संकेत भी सम्मिलित होते हैं।
त्रुटि और भ्राँति इस संदर्भ में वहाँ रह जाती हैं, जहाँ इसके किसी एक पक्ष प्रकार को लेकर अध्ययन किया जाता है और उसी को संपूर्ण सत्य स्वीकार लिया जाता है। उदाहरण के लिए फ्रायड को लिया जा सकता है। वह मनोवैज्ञानिक थे और उनका वास्ता मनोरोगियों से पड़ता था। उनने ऐसे ही लोगों पर अपने स्वप्न संबंधी अध्ययन किये। अतः निष्कर्ष भी वर्तमान जीवन की जटिलताओं से संबंधित प्राप्त हुआ। उनके अनुसार स्वप्न दमित इच्छाओं का परिणाम है। जुँग इसके एक कदम आगे बढ़े। अपने अनुसंधान में उन्होंने स्वप्न-स्रोत को “सामूहिक अवचेतन” नाम दिया। यह आते क्यों हैं? इस संदर्भ में उनका मत था कि दमित इच्छाओं की पूर्ति तो इसका एक पक्ष है, पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू वह है, जिससे वह व्यक्तित्व को अखण्डता और समग्रता प्रदान करता है। इसका अभाव मानसिक असंतुलन पैदा करता है, ऐसा उनका मानना था। बाद के अध्येताओं ने इसमें एक नया अध्याय तब जोड़ा, जब इसे भावी जीवन की झाँकी कराने वाला एक आधार बताया। ऐसे ही एक सपने की चर्चा मार्क ट्वेन ने अपने जीवनी लेखक अल्बर्ट पैन से की थी।
प्रसंग तब का है, जब मूर्द्धन्य मनीषी मार्क ट्वेन, सैम क्नीमेन्स के नाम से जाने जाते थे एवं “पेन्सिलवेनिया” नामक जहाज पर सहायक पायलट थे। उनका बीस वर्षीय भाई हेनरी उसी जहाज में क्लर्क के पद पर कार्यरत था। एक रात सैम ने एक सपना देखा। उस दृश्य में उन्हें एक धात्विक ताबूत दिखाई पड़ा, जो दो कुर्सियों के सहारे टिका हुआ था इसमें हेनरी का शव था। शव के ऊपर सफेद फूलों का गुलदस्ता रखा हुआ था, जिसके मध्य में एक सुन्दर लाल रंग का पुष्प लगा था। जिन दिनों की यह बात है, उन दिनों सैम अपनी बहिन के घर सेण्ट लुइस में रह रहे थे। प्रातः उन्होंने इसका उल्लेख अपनी भगिनी से किया और फिर जल्द ही इस बात को भूल गये।
कुछ दिन पश्चात् सैम का किसी प्रकरण को लेकर मुख्य पायलट से विवाद हो गया। इसके कारण सैम को एक अन्य जहाज “लैसी” में स्थानाँतरित कर दिया गया। हेनरी पेन्सिलवेनिया में ही बना रहा। थोड़े दिन उपराँत जब लैसी मिसीसिपी नदी में ग्रीनविले बंदरगाह पर पहुँचा, तो ज्ञात हुआ कि पेन्सिलवेनिया में विस्फोट हो गया है, जिसमें डेढ़ सौ लोगों की जानें गई। यह जान कर सैम ने राहत की साँस ली कि उनके भाई का मृतकों में नाम नहीं था, किंतु वह बुरी तरह घायल हो गया था और अचेतावस्था में पड़ा था। छः दिनों तक मृत्यु से कठिन संघर्ष करने के बाद हेनरी की अंततः मौत हो गई। सैम जब भाई की लाश के निकट पहुँचे तो यह देख कर हतप्रभ रह गये कि सपने में जैसा कुछ देखा था, बिलकुल वही दृश्य सामने मौजूद था, अर्थात् धात्विक ताबूत में पड़ा हेनरी का प्राणहीन शरीर और उसके ऊपर श्वेत पुष्पों का गुलदस्ता, जिसके बीचों बीच एक लाल रंग का गुलाब। संपूर्ण ताबूत दो कुर्सियों पर रखा हुआ था। इस प्रकार उनका स्वप्न अंततः सत्य सिद्ध हुआ।
एक ऐसे ही भविष्य सूचक सपने का वर्णन फ्रेडरिक ग्रीनकुड ने अपनी पुस्तक “इमेजिनेशन इन ड्रीम्स” में किया है। वे लिखते हैं कि एक रात उन्होंने सपना देखा कि व्यापार को लेकर एक बार वे किसी से मिलने गये। वहाँ उन्हें एक सुन्दर सजे-सजाये कमरे में बिठाया गया और प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया । वे कमरे में जल रही आग के समीप बैठ गये और मेण्टल पीस में हाथ रख कर सुस्ताने लगे। अचानक उन्हें हाथों के नीचे किसी बहुत ठंडी वस्तु का आभास हुआ देखा, तो पाया कि उनका हाथ एक ताजा कटे हाथ के ऊपर है। कलाई के नीचे से कटा यह हिस्सा किसी महिला के हाथ का था। वे भयभीत हो उठे और इसी के साथ उनकी नींद टूट गई।
कई दिन बीत गये। सामने की बात स्मृति से उतर गई। किसी काम को लेकर एक बार उन्हें एक व्यक्ति से मिलना था। वे वहाँ पहुँचे, तो उन्हें एक छोटे से सुसज्जित कमरे में बिठाया गया। अकस्मात् उनका ध्यान मेण्टल पीस की ओर चला गया, तो वे चौंक उठे। सपने में उनने जो कुछ देखा था, अब वह उनके सम्मुख था। मेण्टल पीस पर कलाइयों से टूटी हुई एक स्त्री के हाथ की ममी पड़ी थी।
ग्रीनवुड कहते हैं कि स्वप्न और यथार्थ के बीच इसे एक संयोग कहा जा सकता है, पर संयोग यह इसलिए नहीं है, क्योंकि स्वप्न और वास्तविक संसार में इस प्रकार की दुर्लभ घटनाएँ विरले ही देखी जाती हैं। उक्त घटना से ग्रीनवुड हैरान रह गये। उनकी हैरानी किपलिंग के शब्दों में कहें, तो निम्न प्रकार से व्यक्त की जा सकती है कि उनकी जीवन रूपी फिल्म का वह भाग, जो अभी रिलीज नहीं हुआ था, किस प्रकार और क्यों दिखाई पड़ गया?
इस प्रश्न से समय की प्रकृति से संबंधित उस मान्यता का खण्डन हो जाता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जन्म लेते ही हर मनुष्य एक ऐसे टाइम-कण्टिनुअस (अंतहीन व लगातार) में प्रवेश करता है, जो एक दिशा में समरूप गति से फिल्म रील की तरह खुलता हो। प्रस्तुत अवधारणा के अनुसार कोई भी घटना समय से पूर्व घटित नहीं हो सकती, न तो समय से पहले उसे विज्ञात बनाया जा सकता है। हमें समय के उस भाग से संबंधित घटनाओं की ही जानकारी मिल सकती है, जिसे सर्वसाधारण वर्तमान एवं अतीत के नाम से जानते हैं। उक्त धारणा के अनुसार भविष्य अग्राह्य और अगम्य है, पर व्यावहारिक जीवन में वस्तुस्थिति इसके विपरीत जान पड़ती है। ऐसी स्थिति में विकल्प शेष दो ही रह जाते हैं, प्रथम अवधारणा इस मान्यता से आरंभ होती है कि “जैसा समझा जाता है, समय की प्रकृति वैसी है नहीं” एवं दूसरे प्रतिपादन में वैज्ञानिक यह कहते हैं कि “चेतना की प्रकृति आम धारणा के प्रतिकूल है।”
पहले मत का समर्थन जे. डब्ल्यू. डूने का प्रसिद्ध सिद्धाँत “सीरियल टाइम (क्रमिक समय)” करता है। इसके अनुसार यदा-कदा यथार्थता और व्यक्ति के पारस्परिक संबंधों में कोई असाधारण गलती हो जाती है। इसी त्रुटि के कारण हमें कभी-कभी घटनाएँ समय के संदर्भ में अपनी यथार्थ स्थिति से पहले, विस्थापित अवस्था में दिखाई पड़ जाती है। उनका विश्वास है कि वास्तविकता का एक पृथक आयाम है, जिसमें दिक्−काल मिल कर एक हो जाते हैं।उनके अनुसार विशिष्ट परिस्थितियों में घटनाएँ स्पेश ग्रहण कर लेती हैं और फैल जाती हैं। यही वह अवस्था है, जिसमें हमारी चेतना भूत और भविष्य के कुछ भाग को ग्रहण कर लेती है। वे कहते हैं कि अतीत और अनागत में इस प्रकार का प्रवेश अचेतन मन द्वारा ही संभव है। सपनों के माध्यम से यही क्रिया संपन्न होती है और यदा-कदा भविष्य की दर्शन-झाँकी हो जाती है।
दूसरी अवधारणा का समर्थन एच.एफ. साल्टमार्श का सिद्धाँत करता है, जिसका प्रतिपादन उन्होंने अपने ग्रंथ ‘फोर नालेज” में किया है। साल्टमार्श अपनी उक्त रचना में कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जिसमें उसे ऐसा महसूस होता है, जैसे समय के पंख लग गये और वह उड़ गया। दूसरे अवसर पर यह प्रतीत होता है, जैसे समय ठहर गया हो। उक्त उद्धरण को प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि चेतना की सामान्य भूमिका में समय की अनुभूति एकरूप नहीं है, इसलिए ऐसा महसूस होता है। इस आधार पर वे निष्कर्ष निकालते हैं कि चेतना की प्रकृति, समय की प्रकृति पर निर्भर करती है। यदि समय की प्रकृति बदल जाय तो हमारी चेतना का स्तर भी परिवर्तित हो जायेगा और हम चेतना की किसी दूसरी भूमिका में पहुँच जायेंगे। उनका कहना है सामान्य स्थिति में हमारी इंद्रियाँ समय के अत्यंत छोटे भाग को ही ग्रहण कर पाती है, लेकिन अवचेतन स्तर के लिए यह छोटा भाग खिंच कर बहुत बड़ा और लंबा हो जाता है। इतना लंबा कि इसमें अनागत का कुछ अंश भी सम्मिलित हो जाता है। स्वप्न के दौरान यही दृश्यमान बनता है। इसकी पुष्टि मस्तिष्क संबंधी आधुनिक अध्ययनों से भी हो जाती है। मस्तिष्क विज्ञानियों के अधुनातन शोधों से विदित हुआ है कि दिमाग का बायाँ भाग सूचनाओं को क्रमिक, तार्किक और रैखिक रूप में तैयार करता है, जबकि दांया हिस्सा सभी सूचनाओं के साथ-साथ तैयार करता है। उसे रैखिक समय का कोई ज्ञान नहीं होता अथवा बहुत स्वल्प होता है। ऐसी स्थिति में यदि दांया हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाय, तो सूचनाओं के क्रम और उनकी ग्रहणशीलता में कोई अंतर नहीं आता, किंतु यदि बांये भाग को कोई हानि पहुँच जाय, तो इससे समय के हिसाब से संदेशों का क्रम बिगड़ जायेगा। इस अनुसंधान के आधार पर विशेषज्ञ बताते हैं कि स्वप्न-दर्शन में ब्रेन के दांये गोलार्द्ध का योगदान ही महत्वपूर्ण होता है। वहीं विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध जानकारियों को मिलाता और एक समग्र जानकारी तैयार करता है। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार इसमें भविष्य संबंधी जानकारी भी सम्मिलित हो सकती है। स्वप्न प्रक्रिया में बांये गोलार्द्ध का कार्य मात्र इतना है कि वह स्वप्न-विषय को क्रमिक ढंग से सज्जा दें।
यह तो भविष्य-दर्शन संबंधी सिद्धाँत हुए, पर उन सपनों का क्या तात्पर्य है, जो दैनिक जीवन की जटिलताओं और व्यक्तिगत समस्याओं से संबंधित होते हैं? फ्रायडवादी मान्यता के अनुसार वह मात्र जीवन-पद्धति और व्यक्तिगत रुझान का संकेत करते हैं, जिन्हें जान कर जीवन-शैली और व्यक्तित्व की प्रकृति का पता लगाया जा सकता है। बस उस मतवाद में सपनों का इतना ही महत्व है, पर आधुनिक जेस्टाल्ट मनोविज्ञान की इस संबंध में भिन्न धारणा है। ‘जेस्टाल्ट’ एक जर्मन शब्द है, जिसका अर्थ है-”संरचना” इस प्रकार जेस्टाल्ट मनोविज्ञान, जिसमें समस्याओं को ग्रहण किया जाय। इसी मनोविज्ञान पर जेस्टाल्ट थेरेपी आधारित है। इस थैरेपी का स्वप्न संबंधी अवधारणा यह है कि स्वप्न व्यक्तित्व का एक अपूर्ण क्रिया-व्यापार है, इसी अपूर्णता को इस उपचार पद्धति द्वारा पूरा किया जाता है। अचेतन द्वारा व्यक्तित्व के संबंध में दृश्य संकेतों के माध्यम से जो कुछ प्राप्त होता है, व्यक्ति उसका उपयोग समग्र व्यक्तित्व के विकास में कर सकता है और साथ ही किसी एक स्थान पर इकट्ठी ऊर्जा को मुक्त कर उसकी हानियों से बच सकता है। इस क्रम में स्वप्न द्रष्ट को एक प्रकार से स्वप्न-दृश्य का अभिनय करना पड़ता है। इसमें कल्पना-चित्रों का सहारा लेते हुए संपूर्ण नाटक का उपचार के समय दोबारा मंचन करना होता है। इसके साथ ही उपचार संपूर्ण हो जाता है।
उक्त उपचार पद्धति के जनक मनोविज्ञानी पर्ल्स के अनुसार व्यक्तित्व के पाँच स्तर होते हैं। इन सभी स्तरों के ठीक ढंग से काम करने पर ही कोई समग्र व्यक्तित्व को संपूर्ण रूप से जी सकता है। इलाज के समय व्यक्ति को इन पाँचों स्तरों से होकर गुजारा जाता है, तभी स्वप्न की अधूरी क्रिया पूरी हुई मानी जाती है। इसके साथ ही व्यक्तित्व की समग्रता प्राप्त कर ली जाती है।
मनोवैज्ञानिक ईवाँस के अनुसार स्वप्न एक ऐसी क्रिया है, जो मस्तिष्क को अनुकूलन और अस्वीकृत जैसे उसके दैनिक कार्यों को सफलतापूर्वक संपन्न करने में सक्षम बनाता है। यह कार्य कम्प्यूटर जैसी एक प्रक्रिया द्वारा संपन्न होता है, जिसमें कार्यक्रम को समय और परिस्थिति के हिसाब से बदलने और सुधारने की पूरी व्यवस्था होती है। ताकि व्यक्ति बदली परिस्थितियों में चुनौती का सफलतापूर्वक सामना कर सके। विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह क्रिया संपादित न हो, तो व्यक्ति की कार्य क्षमता प्रभावित होने लगती है। इसलिए प्रकृति द्वारा ऐसा प्रावधान किया गया है, जिससे मस्तिष्कीय कार्यकुशलता और व्यक्ति की क्षमता सर्वथा अप्रभावित बनी रहती हैं। स्वप्न में वर्तमान की झाँकी होती है, और भविष्य की झलकी भी। इस दृष्टि से जीवन के लिए वे उपयोगी भी हैं तथा आवश्यक भी।
स्वप्न संबंधी मनोवैज्ञानिक एवं अधुनातन वैज्ञानिक शोधें अब जिस निष्कर्ष पर पहुँचती जा रही हैं कि मानवी मस्तिष्क वहीं नहीं है, जितना दीख पड़ता है। इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा उन क्रिया कलापों में सतत् संलग्न रहता है जो परोक्ष स्तर के हैं। कैसे उनका अधिकाधिक लाभ निज के उत्थान व परिष्कार के लिए किया जाय, साधना विज्ञान का सारा ऊहापोह इसी के चहुँ ओर है।
संत का बाना भर पहनने से जब किसी की वृत्ति बदल सकती है, तो वैसे कर्म में प्रवृत्त होने पर तो क्या नहीं हो सकता? एक राजा कोढ़ी हो गया। वैद्यों के उपचार बताया कि-राजहंसों का माँस खाया जाय। हंस मान-सरोवर पर रहते थे। वहाँ तक कोई पहुँचता न था। साधु-संतों की ही वहाँ तक पहुँच थी। कोई संत तो पाप कर्म के लिए तैयार न हुआ, बहेलियों ने संत का बाना पहनकर वहाँ जाना और पकड़ना स्वीकार कर लिया।
मानसरोवर के हंस साधुओं से हिले रहते थे। उन्हें देखकर वे उड़ते नहीं थे। बहेलियों की घात लग गई और हंस पकड़ लिये, राजा के सामने प्रस्तुत कर दिये। राजा सोच में पड़े कि संत श्रद्धा से अभिप्रेत इन भावुक हंसों का स्वार्थवश वध करना अनुचित है। दया उमड़ी और हंसों को मुक्त कर दिया गया। राजा का दूसरा उपचार चलने लगा। इस घटना का बहेलियों पर भी प्रभाव पड़ा। वे सोचने लगे जिस संत वेष के लिए हंसों तक में इतनी श्रद्धा है, उसे ऐसे हेय प्रयोजनों के लिए कलंकित नहीं करना चाहिए। बहेलियों ने संन्यास ले लिया और वे सब संत बन गये।
भगवान बुद्ध कपिलवस्तु पधारे। यशोधरा का त्याग ही उन्हें इस स्थिति तक पहुँच पाया था यह भी उन्हें स्मरण था। वे महल पहुँचे और यशोधरा से पूछा-’यशोधरे! कुशल से तो हो?’
‘हाँ स्वामी’ चिर प्रतीक्षित स्वर सुन कर यशोधरा का हृदय गदगद हो उठा। ‘स्वामी नहीं, भिक्षु कहो यशोधरे! मैं अपना धर्म निभाने आया हूँ। बोलो तुम कुछ भिक्षा दे सकोगी?’ यशोधरा विचारमग्न हो उठी। अब क्या बचा है देने के लिए? अपने दाम्पत्य की स्मृतियों को छोड़कर और कुछ भी तो नहीं है, जो देने योग्य हो। कुछ क्षण तक विचार करते रहकर उसके चेहरे पर निश्चय के भाव उभरे और बोली-”भंते! अपने पूर्व के संबंधों को ही दृष्टिगत रखकर क्या आप भी कुछ प्रतिदान कर सकोगे?” “भिक्षु-धर्म की मर्यादा का उल्लंघन न होता होगा, तो अवश्य करूंगा आर्ये,” बुद्ध ने उत्तर दिया। यशोधरा ने अपने पुत्र राहुल को पुकारा और तथागत की ओर उन्मुख होकर बोली, “तो भगवन्! राहुल को भी अपनी पितृ परंपरा निभाने देकर उसे अपना अधिकार पाने दीजिए।” और फिर राहुल से बोली, “जाओ बेटा! अपनी पितृ परंपरा का अनुकरण करो। बुद्ध की शरण में, संघ की शरण में जाओ।”
राहुल के समवेत स्वरों में गूँज उठा, “बुद्धं शरणं गच्छामि” यशोधरा एवं सिद्धार्थ की श्रेष्ठ संतति राहुल भी इसी परंपरा में सम्मिलित हो गया जिसे स्वयं सिद्धार्थ ने-गौतम बुद्ध ने आरंभ किया था। माता को इसमें और भी अधिक श्रेय जाता है जिसने पति के अभाव में भी अपनी संतति को उच्चतम संस्कार दिये।
की बहुत कोशिश बसा लूँ, साँस में ही नाथ तुमको। जब लगा तुम दूर हो, तो यह हृदय तज धीर, रोया॥
सुन रखा था-है तुम्हारा, रूप जग में-”रसौ वै सः”। इसलिए अंतःकरण को, स्नेह के रस में भिगोया॥
जो मिला उसको लिखा, तकदीर का कहकर सहेजा। हरेक प्राणी में तुम्हीं हो, यह समझ-अधिकाँश खोया॥
प्राप्त हो इस जन्म में वह, लेख था गत-कर्मफल का। सुख मिले आगे इसी से , आज अच्छा बीज बोया॥
क्या पता-”था जन्म पिछला क्या” अशाँति व क्लेश क्यों है। था सभी अज्ञात फिर भी, अश्रु जल से हृदय धोया॥
जब पड़ा मालूम तुम ही, व्याप्तं हो प्रति चर अचर में विश्व-मानव के लिए, मृदु-प्यार नस-नस में समाया॥
किंतु दौड़ो जब नियंता, बाँसुरी आकर बजाओ। विश्वमानव के हृदय का, स्नेह और सौजन्य सोया॥
-माया वर्मा
हे प्रभो! चेतना से तुम्हारी, विश्व अब चहचहाने लगा है।
हर तरफ व्याप्त सत्ता तुम्हारी, आज हर व्यक्ति पाने लगा है।
श्रेय सबको स्वयं बाँटने को, एक आवाज तुमने लगाई।
और दृढ़ आत्म-विश्वास की, फिर भावना थी सभी में जगाई।
हर पथिक, पत्थरों को हटाकर, शक्ति अब आजमाने लगा है।
कल तलक मौन थीं जो जुबानें, अब कथाएँ तुम्हारी सुनाती।
याद कर दिव्यताएँ तुम्हारी, उलझनें फिर समाधान पातीं।
संस्मरण, पूज्य गुरुवर! तुम्हारे, विश्व सारा सुनाने लगा है।
जबकि अस्सी बरस तक स्वयं को, साधना में निरंतर तपाया।
विश्व कल्याण को तब तुम्हीं ने, दिव्य ब्राह्मणी कमल था खिलाया।
अब उसी की मधुर खुशबुओं से, हर हृदय महमहाने लगा है।
जब मनुजता घिरी आँधियों में, तब तुम्हीं ने सहारा दिया है।
रेत के द्वीप पर जो खड़ी थी, ठोस उसको किनारा दिया है।
गीत तुमने हमें जो सिखाए, कंठ हर एक गाने लगा है।
-शचीन्द्र भटनागर
(5 अप्रैल 1976 को शाँतिकुँज प्राँगण में पूज्यवर का उद्बोधन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ- ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। देवियों, भाइयों! गुरु द्रोणाचार्य ने जब पाण्डवों को विद्याध्ययन कराया, तो प्राचीन परंपरा के अनुरूप उन्होंने वही मंत्र पढ़ाये जो ब्राह्मण ग्रंथ पढ़ाये जो ब्राह्मण ग्रंथों में लिखे हुए है। शतपथ ब्राह्मण में विद्यार्थी को अक्षर ज्ञान से ही पहले जो पाठ पढ़ाया जाता है-वह है-”सत्यंवद् धर्मम् चर, स्वाध्याया मा प्रमदितव्यम्।” यह ऋचाएँ अक्षर ज्ञान से भी पहले याद करायी जाती हैं जिससे आदमी को मालूम पड़ जाये कि विद्या का उद्देश्य क्या है? ज्ञान का उद्देश्य क्या है? उद्देश्य पहले बताया जाता है और उसका प्रयोग पीछे पढ़ाया जाता है। क, ख, ग पीछे पढ़ाया जाता है, पहले यह बताया जाता है कि यह किस काम के लिए है। द्रोणाचार्य ने पाँचों पाण्डवों को प्राचीन परंपरा के अनुरूप वहीं पाठ पढ़ाये-सत्यं, वद, धर्मचर, स्वाध्याया मा प्रमदितव्यम्। चारों पाँडवों ने तो वे सारे के सारे पाठ याद कर लिये, लेकिन सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर वह पाठ याद न कर सके। उन्होंने कहा-गुरुदेव! पाठ थोड़ा जटिल है। ‘सत्यंवद’ कहिए तो मैं सुना देता हूँ, लेकिन अध्यात्म में कोई ज्ञान ऐसा नहीं है जो केवल जबान की नोक से कहा जाय और जो परिणाम उसके बताये गये हैं उन्हें पूरा करने में समर्थ हो सके। जीभ का नहीं यह अध्यात्म का विषय है। अपने जो पाठ मुझे पढ़ाया उसके लिए मैंने कोशिश की कि वह मेरे जीवन में प्रयोग होता हुआ चला जाय और मेरी जीवात्मा इसको धारण करले तो बात बने। महाराज युधिष्ठिर सारे जीवन भर इसी पाठ को याद करते रहे। उसमें भी एक बार गलती हो गयी थी और ‘नरो वा कुँजरोवा’-हाथी है या अश्वत्थामा। आखिर यह पता नहीं चला, ऐसा कहकर उन्होंने गलती कर ही डाली।
मित्रों, अध्यात्म में जो शिक्षण हम प्राप्त करते हैं उसको जीवन में उतारना पड़ता है। इससे कम में कोई बात बनती नहीं-गाड़ी आगे बढ़ती नहीं। उच्चारण हमारे लिए आवश्यक तो है, पर काफी नहीं है। राम नाम या गायत्री मंत्र तो सभी याद कर लेते हैं। केन्या पूर्वी अफ्रीका का हमारा लड़का यहाँ बैठा हुआ है। उसके यहाँ काँगो का एक तोता है जो ऐसा बढ़िया गायत्री मंत्र बोलता है कि उसकी और मनुष्य की आवाज में कोई फर्क ही नहीं मालूम पड़ता। पर क्या इतने से सुग्गे को गायत्री माता सिद्ध हो गयी? क्या वह आशीर्वाद दे सकता है? नहीं क्योंकि उसे मात्र अक्षर याद हैं। अक्षर याद कर लेने भर से अध्यात्म का कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता, जैसा कि आम लोगों का ख्याल है। आम लोगों को मुद्दतों से इसी तरह बहकाया जाता रहा है कि अक्षर याद कीजिए, अक्षरों का उच्चारण कीजिए और स्वर्गलोक को चले जाइये। राम नाम लीजिए, राम का नाम सुनिये और सीधे राम लोक को चले जाइये। पर ऐसा होता नहीं है। शुरुआत हम रामनाम से करें, ठीक है। नाम तो लेना ही पड़ता है, नाम नहीं लेंगे तो बात कैसे बनेगी? जिस तक पहुँचना है उसका नाम तो लेना ही पड़ेगा। स्टेशन का नाम बताये बिना तो उसका टिकट भी नहीं मिलता। वस्तु का नाम बताये बिना दुकानदार से कहते रहिए कि अमुक चीज, यह चीज वह चीज दे दीजिए तो वह भी कहेगा कि भाग यहाँ से। नाम की पहले जरूरत है, क्योंकि नाम हमको दिशा बताता है। लेकिन अगर नाम के उच्चारण तक ही सीमित रहा गया तो समझना चाहिए कि जिस तरीके से सुग्गा रामनाम और गायत्री मंत्र बोलता रहता है, पर लाभ कुछ नहीं पाता, उसी तरह उससे कम या अधिक लाभ आपको भी नहीं मिलेगा।
नाम उच्चारण आवश्यक है, पर इससे आगे उसे हमारी अंतरात्मा में इस गहराई तक समा जाना चाहिए कि वह हमारे व्यवहार में उतरने लगे। इस संदर्भ में प्रहलाद की घटना मुझे याद हो आयी। प्रहलाद को उसके मास्टर ने सबसे पहले पट्टी पूजन कराया और रामनाम पट्टी पर लिखकर कहा-पहले रामनाम लिख, पीछे क, ख, ग भी बतायेंगे। वह रोज रामनाम लिखने लगा। पहले दिन, दूसरे दिन, तीसरे दिन-चौथे दिन भी राम नाम। मास्टर ने कहा-अब राम नाम लिखना बंद करो और गिनती लिखों। उसने कहा नहीं साहब, अभी तो हम राम नाम ही पढ़ेंगे क्योंकि यह पाठ अभी पक्का नहीं हो पाया और वह राम नाम ही पट्टी पर लिखकर लाता रहा। पिता से शिकायत की गयी। उन्होंने कहा बच्चे! आगे वाली पढ़ायी पक्की कर लेनी चाहिए तब आगे पढ़ना चाहिए। प्रहलाद सारी जिंदगी भर उसी पढ़ाई में लगे रहे और पक्की करते रहे। बार-बार गायत्री मंत्र याद करने की बात कहते हैं और अभी 24 हजार का जप करा रहे हैं। आप यह पूछ सकते हैं कि क्यों साहब गायत्री मंत्र तो वही है, उसे चाहे हम एक बार जप कर लें या 24 हजार बार। फिर आप बार-बार क्यों कराते हैं? उससे क्या फायदा? गायत्री मंत्र याद भी हो गया और उसका अर्थ भी हम समझ गये-कि हे भगवान हमारी बुद्धि को शुद्ध पवित्र बना दीजिए। आप यही रेपिटोशन बार-बार क्यों कराते हैं? किस काम के लिए कराते हैं? आपको यह सवाल करना चाहिए और इसका जवाब मालूम करना चाहिए।
साथियों ‘रेपिटेशन’ इसीलिए कराते हैं कि हमारा मस्तिष्क बड़ा भुलक्कड़ है कि इससे ज्यादा भुलक्कड़ इस दुनिया में कोई होगा क्या? जहाँ तक भौतिक जीवन का सवाल है, वहाँ तक हम और आप बिलकुल सही हैं, कभी भुलक्कड़ नहीं हो सकते। इस मामले में हमारा दिमाग बहुत चालाक है, लेकिन इस मामले में वह इतना वाहियात है कि हम अपने जीवन लक्ष्य क्या है? हमारा कर्तव्य क्या है? हमारे जीवन का स्वरूप क्या हैं? हमको मालूम नहीं है। मूल चीज को हम एकदम भूल जाते हैं। बाहर की सब चीजों हमको याद रहती हैं कि दुकान में कितना नफा होगा, किसका लेना है, किसका देना है आदि बातें हमको ऐसे याद रहती हैं कि कभी भी उसमें भूल नहीं पड़ती लेकिन जहाँ तक अपनी जीवात्मा का सवाल है, परमात्मा का सवाल है, इसमें भूल पर भूल होती चली जाती है। इसलिए इस भुलक्कड़पन को दूर करने के लिए हम बार-बार आपसे गायत्री मंत्र का जाप कराते हैं, ताकि आपकी जीवात्मा में वह घुल जाय और आपकी स्मरण में अंतः चेतना में उसको प्रवेश करने का मौका मिल जाय। ग्रामोफोन के रिकार्ड के तरीके से हमारी जीभ की नोक कई तरह के अक्षरों का-मंत्रों का उच्चारण कर लेती है, पर हमारे जीवन में वे समाविष्ट नहीं हो पाते-प्रवेश नहीं कर पाते। फलतः हमको बार-बार याद करना पड़ता है। उच्चस्तरीय सिद्धाँतों को जीवन में प्रवेश कराने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। जिस तरह इम्तहान की तैयारी के लिए, बच्चों को अपना पाठ पक्का करने के लिए उसे बार-बार याद कराना पड़ता है, उसी प्रकार हम आपको गायत्री मंत्र के जप के रूप में बार-बार रेपिटेशन कराते हैं। ताकि आपकी याददाश्त में से जो वेश कीमती चीज भूल गयी उस गँवायी हुई चीज को आप तलाश कर पायें।
भगवान रामचंद्र की सीता जी को रावण चुरा ले गया। रामचंद्र जी ने पहाड़ों से, नदियों से, तालाबों से पेड़ों से, हवा से-हर एक से पूछताछ की कि कहीं सीता आपने देखी है। क्या सीता के बिना राम बिलकुल निर्जीव से हो गये थे। उनकी जीवात्मा निकल गयी थी। वे हारे-थके हुओं के तरीके से वन-वन में घूम रहे थे और सीता-सीता पुकारते थे। हम भी पुकारते हैं अपनी जीवात्मा को, जिसको कि हमने गँवा दिया है-खो दिया है। साँप के फन में से और हाथी के सिर में से मणि निकल जाती है तो वह बेकार हो जाता है। साँप और हाथी के सिर में यह मणि होती है कि नहीं, यह तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं जानता हूँ कि मनुष्य के भीतर एक मणि अवश्य होती है जिसको गँवा देने के बाद आदमी निष्प्राण हो जाता है। निस्तेज, निर्जीव-छूँछ हो जाता है और व्यथाओं, कष्टों, चिंताओं से घिर जाता है। सारे जीवन पर निराशा के बादल छा जाते हैं। वह मणि है हमारी जीवात्मा जिसको हमने गँवा दिया। अब तो लोहार की मरी हुई धौंकनी के तरीके से साँस भर चलती है। आज आदमी मरे हुए के बराबर है। मनुष्य जीवन के साथ जो श्रेष्ठताएँ उमंग, उत्साह और उल्लास जुड़े हुए होते हैं जिन्हें की आदमी अमृत की तरीके से बिखेरता रहता है, वह चेहरे पर कहीं दिखायी नहीं देती। ऐसी खीजें हुए बेचैन एवं चिंतित आदमी को मैं मरे हुए में शुमार करता हूँ। सीताजी के चले जाने के बाद रामचंद्र जी चिंतित दुःखी हो गये थे और अपना उत्साह, आनंद अपनी खुशी को सीता के नाम से पुकारते थे। हम भी आपसे निवेदन करते हैं कि आप अपनी सीता को पुकारिये, जिसका नाम हमने गायत्री माता रख दिया है। गायत्री माता को पुकारने के लिए गायत्री मंत्र का जप करने के लिए हमने कहा है।
गायत्री माता क्या हो सकती है? गायत्री माता बेटे, आपकी जीवात्मा हो सकती है और वह उच्चस्तरीय जीवात्मा जब आपके अंतः करण में प्रवेश करती है तो आपको आनंद और उल्लास से भर देती है और देवता बना देती है। वह गायत्री माता जो बीस साल पहले आपको एक छवि के रूप में सुपुर्द की थी, जिसको आप चंदन, धूपबत्ती चढ़ाते हैं प्रणाम करते थे-माला घुमाते थे, बहुत पुरानी बात है। जब आप छोटे बालक थे, तब हमने बताया था कि गायत्री माता हंस पर सवारी करती है और हाथ में पुस्तक, पुष्प कमंडलु लिए रहती है। पर आज मैं ज्ञान की बात कहता हूँ। जिस गायत्री माता का हम “जप कराते हैं, उपासना और अनुष्ठन कराते हैं, उसकी फिलॉसफी, उसका तत्वज्ञान, उसका सार, प्रकाश और मूल बताना चाहते हैं। मैं समझता हूँ के अब आप इस लायक हो गये हैं कि खुले दिल से, खुले मन से, आपको हम असलियत समझा सकते हैं कि आखिर गायत्री माता क्या हो सकती है जिसका हमें जप करना चाहिए और जप करने का उद्देश्य क्या हो सकता है जिसके लिए हम आपको बार-बार कहते हैं। जो सिद्धियों की-चमत्कारों की देवी है, जो शाँति की वरदान की देवी है, जो ऐसी देवी है जिसको प्राप्त करने के बाद में और कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं रह जाता। वह गायत्री मंत्र जो गुरु विशिष्ठ के पास था, जो विश्वामित्र के पास था जिन्होंने अपना सारा राजपाट छोड़कर जंगल में तप करने के बाद गायत्री माता का साक्षात्कार किया था और जिसने कहा था- धिकवलं क्षत्रिय बलं ब्रह्म तेजो बलंवलम्। मैं आपको उसी गायत्री मंत्र को बताना चाहता हूँ जो आपको निहाल कर सकता है-धन्य कर सकता है और आपको चमत्कारी बना सकता है और भगवान बना सकता है।”
वह गायत्री मंत्र जो ‘मद्यम दत्वा व्रजतब्रह्मलोकम’ प्रदान करता है। ब्रह्मतेजस् और ब्रह्मवर्चस् प्रदान करता है। यह गायत्री माता का प्राण है जिसका हमने कलेवर-शकल बना करके रखा है, अन्यथा जो निराकार शक्तियाँ है वे देखी और दिखायी नहीं जा सकती। उनकी शक्लें नहीं होती है। ठंडी, गर्मी, प्रेम, मुहब्बत, क्रोध जैसी संवेदनाओं की शकल नहीं हो सकती भगवान की केवल संवेदनाएं, विचारणाएँ, प्रेरणाएं , निष्ठायें, आस्थायें और अनुभूतियाँ हो सकती है। उनकी कोई शकल नहीं हो सकती। शकल हमारी कल्पना है। कल्पना इसलिए है कि हमको निष्ठ तक पहुँचने के लिए रास्ता मिल जाये। जिस तरह इंजेक्शन की सुई और शरीर के भीतर रक्त में दवा पहुँचा देती है, उसी प्रकार शक्लों के माध्यम से हमारा मस्तिष्क किसी चीज को पकड़ सकता है। शकल के बिना, नाम और रूप के बिना हमारी स्मरण शक्ति और दिमाग की बनावट काम नहीं कर सकती और हम उन संवेदनाओं को पकड़ नहीं सकते। इस संवेदना को, निष्ठ और आस्था को पकड़ने के लिए हमने शक्लों की मूर्तियों की कल्पना की है।
गायत्री माता क्या हो सकती है। अब मैं उसके शकल की व्याख्या करूंगा। गायत्री माता-बेटे, एक जवान स्त्री का नाम है जैसे कि हमने फोटो में छापा है और मंदिर में स्थापित किया है। जवान स्त्री इसलिए कि उसके प्रति तेरे भीतर मातृ बुद्धि पैदा हो, आँखों में शुद्ध पवित्रता का भाव पैदा हो, क्योंकि मनुष्य की भावना और ईमान दो बातों में सबसे ज्यादा गंदा हो जाता है। एक धन को देखकर, दूसरा जवान स्त्री को देखकर। एक पैसे को देखकर आदमी भ्रष्ट हो जाता है, दूसरे विपरीत सैक्स की जवानी देखकर न जाने कैसा शैतान दिमाग में आ जाता है कि आदमी सब कुछ भूल जाता है। कामिनी और कंचन दोनों को देखकर जो अपने ईमान को सही रख सकता है, उसे कह सकते हैं कि यह आदमी बहादुर है-शूरवीर है। इसके पास वह शक्ति है जिसका नाम-ब्रह्मवर्चस् है। जिसके पास ब्रह्मवर्चस वह भगवान को भी मजबूर कर सकता है कि आइये जमीन पर और हमारे सामने खड़े होइये। भगवान को इसके आधार पर हम खड़ा कर सकते हैं। भगवान को इसके सामने नत होना पड़ता है। मित्रो, ब्रह्मतेजस् आज कहाँ से है? चरित्र में से आता है। पूजा-चरित्र के लिए है। पूजा से भगवान नहीं मिल सकते, पूजा हमारा माध्यम है, लक्ष्य नहीं। पूजा के माध्यम से हम अपनी चरित्रनिष्ठ, विचारशीलता और आँतरिक उदात्तता का विकास करते हैं। उपासना इसी के लिए की जाती है।
मित्रो, ब्रह्मवर्चस् प्राप्त करने के लिए हमको वह साहसिकता जगानी पड़ेगी जो कि अध्यात्म का मूल उद्देश्य है। उसी के लिए सारे का सारा क्रिया कलेवर खड़ा किया गया है जिसमें सत्संग भी आता है। रामायण पाठ, गीता पाठ, गायत्री जप, देवदर्शन, तीर्थ यात्रा आती है। ये सब के सब साधन हैं और साध्य हैं-अपनी अंतरात्मा का परिष्कार। अंतरात्मा का परिष्कार जिस हिसाब से किया जाता है, उसी हिसाब से भगवान और उनकी शक्तियाँ मनुष्य के नजदीक आती हुई चली जाती हैं। अध्यात्म इसी के लिए बनाया गया था। उसका मूल उद्देश्य आदमी को श्रेष्ठ मनुष्य बनाना है, क्रमशः जीवात्मा से महात्मा, महात्मा से देवात्मा और देवात्मा से परमात्मा बनाना है। इन सीढ़ियों को पार करते हुए चलना है। इसी मूल उद्देश्य को पूरा करने के लिए सारे के सारे धर्मशास्त्र बनाये गये, योगाभ्यास बनाये गये, तपश्चर्याएँ बनायी गयीं। साधना विज्ञान बनाये गये और सारे के सारा अध्यात्म का इतना बड़ा कलेवर बनाया गया। आपको इसके उद्देश्यों को पूजा-उपासना के उद्देश्यों को समझना चाहिए।
ब्रह्मवर्चस पैदा करने वाली गायत्री माता की छवि हमको यह बात बताती है कि हमारी आँखों में दिव्य तत्व का प्रवेश होना चाहिए। हमारी आँखों में जो चीज जैसी है, उसी तरह की देखने का माद्दा पैदा होना चाहिए। नारी क्या हो सकती है? नारी हमारी माँ हो सकती हैं, बेटी हो सकती है, बहिन हो सकती और उससे भी ऊँचा एक और स्थान है -उसको धर्मपत्नी कह सकते हैं। पत्नी नहीं धर्मपत्नी-जो हमारी सह अंगनी-सहधर्मिणी है, और समाज को श्रेष्ठ नागरिक देने के उद्देश्य से है। दोनों हाथों से जिस तरीके से नाव को चलाते हैं, उसी तरीके से स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर के जीवन की नौका को खेने के लिए और उसे पार करने के लिए खड़े हो जाते हैं। स्त्री हमारी सहधर्मिणी है, इसलिए वह देवी है और पूजा करने योग्य है। अगर यह वृत्ति अपने भीतर बसायी और बनायी जा सके तो हमारे मस्तिष्क की दिव्य सत्ता का अस्सी फीसदी बिखराव में जो नष्ट होता हुआ चला जाता है उसे बचाया-रोका जा सकता है और अपनी आँखों में वह तेजस पैदा किया जा सकता है जिसके आधार पर हम भगवान को मजबूर कर सकते हैं और भौतिक लोगों को भी प्रभावित कर सकते हैं। अगर अपनी आँखों के द्वारा जो बिजली नष्ट होती रहती है उसको रोक पायें तब मैं आपसे कहता हूँ कि आपकी और हमारी आँखों में गांधारी की तरीके से वह तेजस पैदा हो सकता है कि हम अपने बच्चों को अगर यह आशीर्वाद दें कि तेरा शरीर लोहे का हो जायेगा तो लोहे का बन सकता है और अपनी आँखों में वह ब्रह्मतेजस् पैदा किया जा सकता है जो गाँधी जी की आँखों में था। 32 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी स्त्री को बा कहना शुरू कर दिया था, इससे उनके आँखों में वह ब्रह्मतेजस् पैदा हुआ कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल को अपने वायसराय को यों लिखना पड़ा कि आप गाँधी जी से आँख मत मिलाना , उनकी आँखों में हिप्नोटिज्म पावर है। जिसको भी देख लेते हैं उसी को वह प्रभावित कर लेता है उसी को मैस्मराइज कर देता है और चंगुल में फँसा लेता है। आप में से हर आदमी की आँखों में वह मैगनेट पैदा हो सकता है जिससे आप अपने लोगों को, पड़ोसियों को और हर आदमी को प्रभावित कर सकते हैं, अगर आप अपनी आँखों की शक्ति का बिखराव रोक पायें तब।
मित्रो, गायत्री माता हंस के ऊपर सवारी करती है। हंस का मतलब उस प्रतीक से है जो हमारे भीतर एक वृत्ति पैदा करती है। संकल्प पैदा करती है कि जो आदमी हंस है गायत्री माता उसके ऊपर सवारी करेंगी। हंस गायत्री माता का प्रतीक है जो जवान स्त्री के प्रति भिन्न सैक्स के प्रति दिव्यता का पवित्रता का भाव पैदा करता है। हंस वह आदमी, जो मोती खाये-जिसके ऊपर दाग धब्बे न हो। जो दूध और पानी को अलग करना जानता हो अर्थात् जिसके रोम-रोम में इंसाफ भरा हुआ पड़ा हो। हंस मोती खाता है अर्थात् जो विवेकवान हैं वे मोती खाते हैं अर्थात् न्याय की कमाई खाते हैं, ईमानदारी की कमाई खाते हैं और शुद्ध चीजें खाते हैं। वह आदमी हंस है तो दूध और पानी में फर्क करते रहते हैं अर्थात् जो चीज सामने आती है उसमें से यह फर्क करते हैं कि उचित क्या और अनुचित क्या है? यह कसौटी है खरे-खोटे की पहिचान की। पुराने जमाने में जब सोने-चाँदी के सिक्के चलते थे, तब उनके कसौटी लगाई जाती थी कि कौन सिक्का खरा है और कौन खोटा। आपके पास जो भी घटना आये, परिस्थिति आये, व्यक्ति या विचार आये, प्रत्येक के ऊपर कसौटी लगाइये और देखिए कि क्या इसमें उचित है और क्या अनुचित है। कौन नाराज होता है और कौन खुश होता है-यह देखना आप बंद कीजिए। यह दुनिया ऐसे पागलों की दुनिया है कि अगर आपने यह विचार करना शुरू कर दिया कि हमारे हितैषी किस बात में प्रसन्न होंगे तो फिर आप कोई सही सही काम नहीं कर सकते। सही काम करना है तो फिर आपको यह बात उठाकर ताक पर रखनी पड़ेगी कि कौन नाराज होगा कौन नहीं। अगर आपको भगवान को प्रसन्न करना है और अपने ईमान को प्रसन्न करना है, जीवात्मा को प्रसन्न करना तो लोगों की नाराजगी और प्रसन्नता की बाबत विचार करना एक दम बंद कर देना पड़ेगा। हमको भगवान की प्रसन्नता की जरूरत है, लोगों की प्रसन्नता की नहीं। आपको सर्टीफिकेट लेना है तो अपनी जीवात्मा का लीजिए और किसी का मत लीजिए।
मित्रो, वह गायत्री मंत्र जिसका हम आपको जप कराते हैं-जिस गायत्री माता की उपासना करते हैं, वह सिर्फ उस आदमी के गले में माला पहनी जा सकती है जो सत्यवान है। सत्यवान और सावित्री की कथा आपने सुनी होगी कि उसने सत्यवान का वरण किया था और कहा था कि हमने अपनी मनमर्जी से ब्याह किया है। यह सावित्री और गायत्री एक ही शक्ति का नाम है। गायत्री और सावित्री वरण कर सकती हैं? वरदान दे सकती है? कहना मान सकती हैं? उत्तर है-हाँ। नंदा नाई के बदले में पैर दबाने भगवान गये थे और गायत्री माता भी आपको दूध पिलाने के लिए और आपके पैर दबाने भगवान गये थे और गायत्री माता भी आपको दूध पिलाने के लिए आ सकती हैं, आपका वरण कर सकती हैं, पर शर्त एक ही है कि आपको सत्यवान होना चाहिए। जो सत्यवान नहीं है जिन्होंने अपना सारा जीवन झूठावान बना करके रखा है। जिसके व्यवहार में झूठ, विचारों में झूठ, नियम में झूठ, रोम-रोम में झूठ भरा पड़ा है, उसका यदि ख्याल हो कि गायत्री मंत्र बोलने के बाद में किसी ऐसी शक्ति को गुलाम बना सकता है जो उसके मनमर्जी के मुताबिक जो भी मनोकामना होगी, उसको पूरा कर दिया करेगी, तो मेरे हिसाब से यह ख्याल गलत है। दुनिया में ऐसी कोई देवी नहीं है जो किसी पूजा-पत्री करने वाले को निहाल इसलिए कर दिया करे कि उसने इतना जप किया, धूपबत्ती जलायी या इतना हवन कर दिया है। हवन, धूपबत्ती और जप की संख्या के नाम पर प्रसन्न होकर आदमी की मनोकामना पूरी कर दिया करे, ऐसी देवी दुनिया में नहीं है।
गायत्री क्या हो सकती है? उसका वाहन हंस क्या हो सकता है? उसका सार और आधार समझने की हमने भी कोशिश की है कि गायत्री उपासना से आपकी आँखों के अंदर दिव्यता, पवित्रता आनी चाहिए जिससे आपको प्रत्येक के भीतर देवत्व दिखता हुआ चला जाय। काँचन और कामिनी के प्रति अपना दृष्टिकोण साफ करके देखें, ताकि आपकी आँखों में अर्जुन और शिवाजी की तरीके से वह तेज आ जाये। अर्जुन को गाँडीव मिला था-आँखों का संयम कर लेने से और उर्वशी के प्रति अपनी मातृ बुद्धि रखने की वजह से और छत्रपति शिवाजी को देवी से तलवार मिली थी। तलवार और गाँडीव देवी-देवता देते हैं या नहीं, लेकिन वे साहसिक रूप में, आदर्शवादिता के रूप में चरित्रनिष्ठ के रूप में अवतरित अवश्य होते हैं और उसमें हजार हाथी के बराबर बल हो जाता है। अगर गाँडीव में तथा शिवाजी की तलवार में हजार हाथी के बराबर ताकत रही होगी तो मैं इसको अचंभा नहीं मानता, सब सही है। अंतरात्मा की महानता में कितना बल होता है-आप से मैं कैसे कह सकता हूँ। आपने तो देखा भी नहीं है। अगर आप अध्यात्म की छाया में खड़े हुए होते तो आप को मालूम पड़ता की गाँधी, बुद्ध, ईसा और विवेकानंद में कितनी बड़ी ताकत थी। अध्यात्म को आप समझते तक तो हैं नहीं। बार-बार वही माला, वहीं धूपबत्ती तक अपने आपको सीमित किये हुए हैं फिर आपको किस तरीके से आध्यात्मिक लाभ हो सकता है? गायत्री माता जिसकी हम आपको उपासना कराते हैं, अनुष्ठन कराते हैं, उसकी भक्ति के अगर आप इच्छुक है तो यहाँ से जाने से पूर्व कम से कम उसका सही स्वरूप अपनी अंतरात्मा में अवश्य निर्धारित कर लीजिए। इससे आपका फायदा तो होगा ही, साथ ही अध्यात्म के ऊपर जो एक कलंक आ गया है कि इसका कोई महात्म्य नहीं है कोई फल नहीं है, वह दूर हो जायेगा। प्राचीनकाल में केवल सात ऋषि थे और उन सात ऋषियों की वजह से सारी दुनिया में अध्यात्म जिंदा था। अगर दुनिया में सात आदमी भी अध्यात्मवादी रह जाय तो भी अध्यात्म जिंदा रहेगा। वही आदमी अध्यात्म के स्वरूप को जिंदा रखेंगे और उनकी वजह से ढेरों आदमी आ जायेंगे।
बेटे, हमने अपनी जिंदगी में सही अध्यात्म को समझने की और जीवन में उतारने की कोशिश की और ढेरों आदमी आ गये। हम से एक लाख आदमी वे बँधे हुए हैं जो अखण्ड ज्योति पड़ते हैं। अखण्ड ज्योति कौन-कौन पढ़ता है-अपने से बँधने का यह मैंने मानदंड रखा है। इससे एक लाख आदमी बँधे हुए हैं और एक लाख के सहारे, जो उनके स्त्री-बच्चे, पड़ोसी हैं सब मिलाकर 50 लाख हो जाते हैं। एक सही अध्यात्मवादी 50 लाख आदमियों को प्रकाश देने में समर्थ है। हम लोगों को यह यकीन दिलाने-विश्वास दिलाने में समर्थ है कि गायत्री मंत्र में कुछ जान है और लोगों ने देखा कि आचार्य जी गायत्री मंत्र का जप करते हैं, इस मंत्र में कोई शक्ति होती है। बस इसी एक वजह से इतने लोग इकट्ठे हो रहे हैं और अभी जब तक मैं जिंदा हूँ मैं समझता हूँ कि सारी दुनिया भर में करोड़ों आदमियों को गायत्री मंत्र का उपासक बनाकर जाऊँगा, क्योंकि मैं एक सही अध्यात्मवादी आदमी हूँ और लोगों को यह मालूम है कि उपासना का फल इनके पास है। इसलिए एक आदमी काफी है और सबके सब नास्तिक हो जायँ तो इससे कोई बनता बिगड़ता नहीं है उस एक आदमी की वजह से ही ढेरों आदमी अध्यात्मवादी बन जायेंगे। इसलिए मैं चाहता था कि अध्यात्म का गायत्री माता का असली स्वरूप आप समझ करके जायँ, तब काम चले। तब फायदा हो। तब उद्देश्य की पूर्ति हो। तब फिर आपको भी आनंद आये। भगवान को आनंद आये गायत्री माता को आनंद आये। फिर सबकी शिकायतें दूर हो जायेंगी। आपके पास वास्तविकता आ जायेगी और आपको जप करने के आधार और कारण मालूम पड़ते हुए चले जायेंगे।
हम आपको जो बार-बार जप कराते हैं, उसके कई प्वाइंट है। पहला प्वाइंट मैंने आपको शिक्षक-छात्र का पढ़ने-पढ़ाने का बताया है। दूसरा है-व्यायामशाला का। व्यायामशाला में आप जाइये और पहलवान जी से पूछिये-क्यों साहब, क्या हो रहा है? आप कितने दंड बैठक करते हैं। उत्तर मिलेगा 200-300 बैठक करते हैं। यह क्या हैं? ‘रेपिटेशन’ जिसे बार-बार करना पड़ता है। मिलिट्री वाले लेफ्ट राइट और कवायद के रूप में रोज रियाज करते रहते हैं। संगीत को जानने वाले रोज अपना रियाज करते रहते हैं। रियाज हाथ से गया कि संगीत हाथ से गया। स्नान करने और दाँत माँजने में हम रोज रेपिटेशन करते हैं। वर्तन साफ करते हैं तब, कपड़े साफ करते हैं तब यह सब रेपिटेशन है। मन के ऊपर जो मलिनतायें छायी हुई हैं, उसे धोने के लिए राम नाम के माध्यम से, बार-बार जप करने के माध्यम से रेपिटेशन करना पड़ता है। हम बार-बार भगवान को पुकारते हैं। गज और ग्राह की लड़ाई में गज की एक टाँग ग्राह के मुँह में चली गयी थी और ग्राह उसे घसीटता हुआ चला जा रहा था। जब गज ने देखा की हमारा कोई ठिकाना नहीं है, बचाव की कोई सूरत नहीं है, तो उसने आवाज लगायी और भगवान को 1008 बार पुकारा। गजराज के एक हजार आठ बार पुकारने पर भगवान दौड़े चले आये। बेटे, एक टाँग मुँह में पकड़कर घसीट ले गया था, कौन? ग्राह, किसकी? गज की और आप लोगों की तो सारी की सारी टाँगों को पकड़कर यह मगर घसीटे ले जा रहा है। एक-काम, दूसरा क्रोध, तीसरा-लोभ, चौथा-मत्सर, पाँचवाँ-अहंकार, छठा-मोह ये छह ग्राह कहाँ-कहाँ चिपके हैं-गर्दन पर, हाथ-पैर पर और पूँछ पर। ये सभी मुँह से पकड़कर घसीटे ले जा रहे है। इसलिए हम भगवान को पुकारते हैं कि हे भगवान! आप कहाँ हैं? आइये। हमारी जीवात्मा आप कहाँ हैं? आइये। हमारे जीवन लक्ष्य, हमारे उद्देश्य, हमारे जीवन, हमारे जीवन की महानता आप कहाँ हैं? हे हमारे आदर्श आप कहाँ हैं? आप आइये और हमको लेकर चलिए। बेटे, इसी के लिए हम जप कराते हैं आप से।
जप का मोटा उद्देश्य तो मैं कितनी बार आपको समझाता रहा हूँ। गायत्री मंत्र का टाइप राइटर से उदाहरण देता रहा हूँ। मंत्र का हमारी जीभ से उच्चारण होता है। इससे शक्ति केन्द्र खुल जाते हैं। बार-बार एक लयबद्ध और क्रमबद्ध शब्दों के उच्चारण करने से एक गति पैदा होती है-शब्द की गति। लोहे के पुल के ऊपर फौजी कदम से कदम मिलाकर पुल पर चलने से मना कर दिया जाता है। इसी तरह एक लयबद्ध, क्रमबद्ध दिशाबद्ध ढंग से उच्चारण किया हुआ शब्द इतना शक्तिशाली हो जाता है जिसे समझना मेरे लिए मुश्किल है। लेकिन साइंस के साथ मैं आपको समझा सकता हूँ कि बार-बार एक ही शब्द को एक ही गति से, एक ही चक्र को घुमा देने से ‘सेन्ट्रीफ्यूगल’ फोर्स पैदा हो जाती है। श्रेष्ठ शब्दों के गुँथन और बार-बार उनके उच्चारण के माध्यम से हमारे भीतर सेंटीफ्यूगल फोर्स पैदा हो जाती है। इसके अतिरिक्त बार-बार एक ही शब्दोच्चारण का एक साइकोलॉजिकल प्वाइंट भी है। पैरासाइकोलॉजी एवं मैटाफिजिक्स के हिसाब से हमारी चेतना चार हिस्सों में बंटी हुई है जिसे प्रशिक्षित करने के लिए चार आधार और स्तर हैं। पहला वाला स्तर जिसको हम लर्निंग कहते हैं। यह दिमाग का वह स्तर है जो केवल एक बात को समझा देने से जानकारी मिल जाती है-जैसे आपको बता दिया कि ऋषिकेश यहाँ से 22 मील है। इसकी जानकारी आपको हो गयी। दूसरी परत वह है जिसे हम ‘रिटेंशन’ कहते हैं अर्थात प्रस्तुत जानकारी के स्वभाव का अंग बना लेना। जिस बात को हम निरंतर करते रहते हैं, बहुत दिनों बाद वह हमारे स्वभाव में शामिल हो जाते हैं, आदत में शामिल हो जाती है। यह रिटेंशन कहलाता है। एक और परत है, जिसमें बहुत सी चीजें दबी हुई पड़ी रहती है और बड़ी मुश्किल से ही कभी-कभी याद आ जाती है। चेतना की इस परत में बहुत सारी चीजें दबी हुई पड़ी होती हैं जिन्हें हम भूल गये हैं। भूली हुई उन चीजों के ऊपर जब हम जोर देते हैं-उन पर प्रकाश फेंकते हैं तो वे स्मृतियाँ उठ कर खड़ी हो जाती हैं-जाग जाती हैं जिसे ‘रीकाल’ कहते हैं। आखिरी परत है-”रीकाग्नीशन” कहलाता है। एक और परत है, जिसमें बहुत सी चीजें दबी हुई पड़ी रहती है और बड़ी मुश्किल से ही कभी-कभी याद आ जाती है। चेतना की इस परत में बहुत सारी चीजें दबी हुई पड़ी होती हैं जिन्हें हम भूल गये हैं। भूली हुई उन चीजों के ऊपर जब हम जोर देते हैं-उन पर प्रकाश फेंकते हैं तो वे स्मृतियाँ उठ कर खड़ी हो जाती हैं-जाग जाती हैं जिसे रीकाल कहते हैं। आखिरी परत है-’रीकाग्नीशन’। रीकाग्नीशन उसे कहते हैं जिसमें कि मान्यताएँ, आस्थाएं, निष्ठाएं और विश्वास जम जाते हैं। एक के बाद एक परत मिलती हुई चली जाती है। जप के द्वारा, उपासना के द्वारा, अपनी जीवात्मा को उस स्थिति पर ले जाना पड़ता है जिसमें कि रीकाग्नीशन की स्थिति पैदा हो जाती है।
“सियाराम मय सब जग जानी” यह वाक्य हमने हजार बार पढ़ा और हजार बार सुना है, लेकिन हमारे भीतर न राम के प्रति भावना पैदा होती है और न सिया के प्रति भावना पैदा होती है। हर आदमी हमें शिकार मालूम पड़ता है, हर मर्द शिकार मालूम पड़ता है-हर औसत शिकार मालूम पड़ती है। जबान से हम कहते रहते हैं तो क्या बना? रीकाग्नीशन नहीं हो सका। मान्यताएँ, निष्ठाएं परिपक्व नहीं हो सकीं। निष्ठाओं को परिपक्व करने के लिए बराबर रस्सी से जिस तरीके से पत्थर के ऊपर निशान बनाने के लिए रगड़ करनी पड़ती है, उस तरीके से जप के द्वारा-उपासना के द्वारा बार-बार रगड़ बना करके अपनी अन्तःचेतना के ऊपर निष्ठाएं जमानी पड़ती है। इसलिए हम आपको जप कराते हैं इस तथ्य को आप लोग ध्यान रखना। आप जप करने का स्वरूप समझिये-कारण समझिये। अगर आप समझ जायेंगे तो ठीक है, फिर आपको जप करना हो तो करना और न करना हो तो मत करना, पर कम से कम आपकी मान्यता तो सही होनी चाहिए। मान्यताएं सही हो जायँ-जानकारी सही हो जाय तो ठीक है। तब आप समझना कि पचास फीसदी मंजिल पार कर ली। आगे आपकी मर्जी। आज की बात समाप्त । ॐ शाँतिः शाँतिः शाँतिः
समूची इंसानियत आज सवालों की काल-कोठरी में कैद है। बात पारिवारिक-सामाजिक क्षेत्र का हो या आर्थिक-राजनीतिक दायरों की। हर कहीं जलते सवालों की चिनगारियाँ फैल-बिखर रहीं हैं। अलगाव-आतंक, अव्यवस्था पर्यावरण असंतुलन, टूटते बिखरते परिवार न जाने कितने नाम रूप है इन सवालों के। हर रोज उपजा नया सवाल पुराने अनुत्तरित सवालों की संख्या बढ़ा देता है। समाधान की तलाश करता विज्ञान थक-हार चुका है। दर्शन भूल-भटक कर बुद्धि की भूल-भुलैया में जा फँसा है। धर्म मूढ़ताओं की विडंबना से ग्रसित है। चित्र-विचित्र मान्यताओं, कुरीतियों, कुप्रथाओं की मेघ मालाओं ने इस सूर्य को आच्छादित कर लिया है। इन व्यवस्थापूर्ण क्षणों में तलाश उस मनीषी की है, जो धर्म का आच्छादन तोड़े दर्शन को जीवन की राह के रूप में संवारे और विज्ञान का मार्गदर्शन करे। जिसका चिंतन प्रश्नों के चक्रव्यूह में उलझी मानवता के लिए मुक्तिकारक समाधान सिद्ध हो।
परम पूज्य गुरुदेव का जीवन ऐसे ही प्रज्ञा-पुरुष का जीवन था जिसमें ऋषित्व एवं मनीषा एकाकार हुई थी। अपने चिंतन में ज्ञान की प्रत्येक शाखा को गरिमा को पूर्ण स्थान देने वाले पूज्यवर वेदों की ऋचाओं, उपनिषदों की श्रुतियों के द्रष्ट की भाँति क्राँतदर्शी ऋषि थे, साथ ही शंकर, रामानुज मध्य की परंपरा में भाष्यकार भी। अपनी गहन साधना के बल पर सत्य की गंगोत्री उनका आवास बनी थी। उन्होंने सवालों, समस्याओं, उलझनों के शिकंजे में विकल बेबस मानव जीवन के दर्द को पहचाना और अपना समूचा जीवन इस व्यथा के निवारण के लिए उत्सर्ग कर दिया। उन्हीं के शब्दों में कहें तो हमारा यह जीवन भगवान की उस इच्छा के लिए समर्पित है, जिसके अनुसार वे प्रश्नचिह्नों के चक्रव्यूह में फँसी अपनी प्रिय मानवता का उद्धार करना चाहते हैं। हमारा अब तक का क्रिया-कलाप इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। जितने दिन और जीना पड़ेगा। उसकी एक-एक घड़ी और शरीर की एक-एक साँस इसी के लिए लगानी है।
उसके अनुसार समस्याओं के नाम-रूप कैसे ही और कितने भी क्यों न हों, पर इसके मूल में एक ही तत्व है-मानव का अशुभ चिंतन। इस संघातिक व्याधि का ब्योरा प्रस्तुत करते हुए उनका कथन है-”समस्त विकृतियों, कुँठाओं, शोक, संताप, द्वंद्व, संघर्षों, अभाव-अपराधों, रोग, क्षोभों का एक मात्र कारण हमारे चिंतन क्रम का कलुषित हो जाना है। दुष्ट चिंतन समस्त विग्रहों का मूल है। सारी विपत्तियाँ दुर्बुद्धि ही उत्पन्न करती है। अवांछनीय विचारणा है जो नरक की परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है। समस्त सुविधाएँ होने पर भी यदि विचार पद्धति सही नहीं तो व्यक्ति केवल दुःख पाता रहेगा और संबंधित लोगों को दुःख देता रहेगा। हमारी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय विपन्नताओं का कारण कुछ और नहीं केवल लोकमानस की अशुद्ध दिशा ही है। यदि भूल के कारणों को न सुधारा गया तो सुधारों के समस्त प्रयत्न सूखते जाने वाले पेड़ के पत्ते सींचने जैसी विडंबना सिद्ध होंगे।”
विज्ञान इस तथ्य से अपरिचित है। दर्शन को दायित्व बोध नहीं हो सका। साहित्यकारों में अधिकाँश अपनी बाल क्रीड़ा में व्यस्त रहे है। शास्त्र-पुराण-स्मृतियों आदि में जो कुछ है, वह प्रायः पुराना पड़ चुका है। वर्तमान परिस्थितियों से उसका कोई ताल-मेल नहीं। स्थिति का विश्लेषण करते हुए पूज्यवर के शब्द हैं, “कभी व्यक्ति की निर्वाह परिधि छोटी थी, समाज की समस्याएं नगण्य थीं। चिंतन और दर्शन का विस्तार एक सीमित क्षेत्र में ही हुआ था। भौगोलिक कठिनाइयों ने हर क्षेत्र को अपनी परिधि में सीमाबद्ध कर रखा था। तब धर्म का स्वरूप भी छोटा ही था। तत्वदर्शन प्रायः ईश्वर जीव, प्रकृति के निरूपण तक ही अपनी दौड़ लगाता था। उतने से ही भली प्रकार काम चल जाता था। पर अब वैसा नहीं रहा। परिस्थितियाँ आमूल चूल बदल चुकी हैं। नये प्रश्न नये समाधान चाहते हैं। जिन्हें तलाश ने की जिम्मेदारी मनीषियों की है। इसे युग मनीषा के अतिरिक्त और कोई सम्पन्न नहीं कर सकता। यह न शासन के हाथ की बात है और न समृद्धि के माध्यम से इसे जुटाया जा सकता है। इन दोनों का समर्थन, प्रोत्साहन, सहयोग मिलता रहे तो बहुत है। उत्तरदायित्व तो मनीषा का है उसे ही वहन करना पड़ेगा। “
पर मनीषी कौन? मनीषा कहाँ? लेखकों, साहित्यकारों बुद्धिजीवियों की इतनी बड़ी भीड़ के रहते इसका अकाल क्यों पड़ गया। संसार में प्रति वर्ष लाखों की संख्या में पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। न जाने कितनी संख्या में मनुष्य अध्ययन-अन्वेषण में व्यस्त हैं। पर समाधान क्यों नहीं मिल रहे? इसका उत्तर देते हुए युग मनीषी का कहना है-”बुद्धि व्यवसायियों की बिरादरी एक है, युग मनीषियों की दूसरी। बुद्धिवाद मानसिक विलक्षणता है, वह नट गायक की तरह अपनी कला का चमत्कार दिखाता और चकाचौंध भरा आकर्षण उत्पन्न करता है। बुद्धिवादी अपनी प्रखरता और चतुरता के बलबूते शब्द जाल के घटाटोप खड़े करने में देखते-देखते सफल हो सकते हैं। संपन्नों का गला पकड़ कर इच्छित धन राशि एकत्रित कर सकते हैं और उसके सहारे आदर्शवादी ढकोसले भी कागजी रावण की तरह खड़े कर सकते हैं। यह चित्र विचित्र तमाशे रोज ही देखने को मिलते हैं, पर उनके बलबूते वैसा कुछ बन पड़ने की आशा बँधती, जिसमें उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न साकार होते हैं जबकि मनीषा न केवल आदर्शवादी प्रतिपादन करती है, न केवल आदर्शवादी प्रतिपादन करती है, न केवल लोकशिक्षण में निरत होती है, बल्कि उसका निजी जीवन भी ऋषि-कल्प होता है। आस्थाओं को उछालने की सामर्थ्य इन्हीं व्यक्तित्वों में उत्पन्न होती है।”
लोक व्यवहार में मनीषी शब्द का अर्थ उस महाप्राज्ञ से लिया जाता है जिसका मन उसके वश में हो। जो मन से नहीं संचालित होता अपितु अपने विचारों द्वारा मन को चलाता है। उसे मनीषी और ऐसी प्रज्ञा को मनीषा कहा जाता है। शास्त्रकार का कथन है -”मनीषा अस्तियेषाँ ते मनीषि नः।” लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है “मनीषि नस्तु भवन्ति पावनानि नः भवन्ति” अर्थात् मनीषी तो कई होते हैं, बड़े-बड़े बुद्धि वाले होते हैं, परंतु वे पावन हों, पवित्र हों यह अनिवार्य नहीं है। प्रतिभाशाली-बुद्धिमान होना अलग बात है एवं पवित्र शुद्ध अंतःकरण रखते हुए बुद्धिमान होना दूसरी। यह कथन आज की परिस्थितियों में निताँत सही है। आज संपादक, बुद्धिजीवी, लेखक, अन्वेषक, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक तो अनेकानेक है, देश-देशाँतरों में फैले पड़े है क्योंकि तपशक्ति द्वारा अंतः शोधन द्वारा उन्होंने पवित्रता नहीं अर्जित की।
साहित्य की आज कमी नहीं है। जितनी पत्र-पत्रिकाएँ आज प्रकाशित होती हैं, जितना साहित्य नित्य विश्वभर में छपता है उस पहाड़ के समान सामग्री को देखते हुए लगता है, वास्तव में लिखने वाले बढ़े हैं, पढ़ने वाले भी बढ़े है। लेकिन इन सबका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? क्यों एक लेखक की कलम कुत्सा भड़काने में ही निरत रहती है एवं क्यों उस साहित्य को पढ़कर तुष्टि पाने वालों की संख्या बढ़ती जाती है। इसके कारण ढूंढ़े जायँ तो वहीं आना होगा, जहाँ कहा गया था “पावनानि न भवन्ति।” यदि लिखने वाले ऋषि कल्प जीवन जीते होते उनका चिंतन तप से उपजा होता तो ये विकृतियाँ नजर न आतीं जो आज समाज में विद्यमान है।
पूज्य गुरुदेव की मनीषा उनके ऋषित्व से उपजी थी। उनका चिंतन उनकी दीर्घकालीन गहन साधना का परिणाम था। चिंतन और साधना आपस में इस कदर घुल-मिल गये थे कि एक के बिना दूसरे के बारे में सोच पाना भी मुश्किल है। उनके ही शब्दों में स्पष्ट किया गया तथ्य है-”लेखन हमारे लिए कभी व्यवसाय नहीं रहा। इसे मैंने अपनी उपासना की तरह अपनाया है। तप ने मेरे चिंतन में प्राण भरे हैं।” एक अन्य स्थान पर उनके शब्द हैं, अपनी रचनाओं में मैंने अपना प्राण सँजोया है। उनमें कितनी आभा है, कितनी रोशनी है, कितनी मौलिकता है, और कितनी शक्ति है यह कहने की नहीं अनुभव करने की बात है। जिसने इन्हें पढ़ा तड़पकर रह गये। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय से इन्हें लिखा है सो इनका प्रभाव होना चाहिए हो रहा है, और होकर रहेगा।”
मनीषा पवित्रता है और तपस्या प्रखरता। दोनों का सुयोग तेल-बाती के समन्वय की तरह कृत-कृत्य करता है। मुनि को ऋषि बनना पड़ता है। मुनि अर्थात् मनीषी। ऋषि अर्थात् वह मनीषी जो तप साधना से अपना आत्मबल बढ़ाए और उपलब्धियों को अभावग्रस्तों की प्यास बुझाने के लिए उन्हें सुलभ कराए। आत्मबल के अभाव में साहस नहीं उभरता। साहस के बिना परमार्थ कैसा? परमार्थ में प्रयुक्त न होने पर ज्ञान वैभव-वर्चस्व आदि की सार्थकता कहाँ? अस्तु जिस अंतःप्रेरणा से मनीषा उभरती है, उसी का दूसरा अनुदान तपस्वी, जीवनचर्या के रूप में भी मिलता है। मनीषा यदि सच्ची और गहरी हो तो उसका दबाव व्यक्ति को तपस्वी बनने तक धकेलता कचोटता ही रहेगा।
मनीषा की यह सर्वांगीणता उनके अपने जीवन में पूरी तरह साकार हुई। जिसके प्रभाव और परिणाम-स्वयं के मनीषी होने तक सीमित न रहकर मनीषा के दिशा-दर्शक होने तक सक्रिय हुए। समर्थ और आत्मबल मात्र तीन अँगुलियों में दबी कलम तक सीमित नहीं रहा। इसके द्वारा वह उर्वर मनोभूमि में मनीषा के अंकुरण अभिवर्धन के लिए सक्रिय हुए। उलटी बुद्धि को उलट कर सीधा करने का लोकोत्तर दायित्व हाथ में लिया। इसे तनिक उन्हीं के शब्दों में सुने-”मनीषियों को यह मानने के लिए हम विवश करेंगे कि दुनिया के वर्तमान गठन को अनुपयुक्त घोषित करें और हर किसी को बताएँ कि चिर पुरातन ने दम तोड़ दिया और उसके स्थान पर नित नवीन को अब परिस्थितियों के अनुरूप नूतन कलेवर धारण करना पड़ रहा है। एक दुनिया एक राष्ट्र की मान्यता अब सिद्धाँत क्षेत्र तक सीमित न रहेगी उसके अनुरूप ताना-बाना बुना जायेगा और वह बनेगा जिसमें विश्व की एकता-विश्व मानव की एकता का व्यवहार दर्शन न केवल समझा वरन् अपनाया भी जा सके। इसके लिए विश्व चिंतन में हम ऐसा उलट फेर करेंगे जिसे उलटे को उलट कर सीधा करना कहा जा सकें।”
“इस उलट-फेर का दायरा किसी के एक क्षेत्र किसी एक देश तक सीमित न होकर मानवी बुद्धि के व्यापक क्षेत्र में संव्याप्त है। जहाँ कहीं भी सोचने का सामर्थ्य है उसे दिशा देना अपना दायित्व माना गया है। यों समीक्षाएँ भर्त्सनाएँ आये दिन होती रहती है। उन्हें इस कान से उस कान निकाल दिया जाता है। होना तो कुछ ऐसा ही होना चाहिए जिससे काम बने। युग मनीषी पूज्य गुरुदेव के द्वारा वही संपन्न हो रहा है। उनके ही शब्द हैं-वैज्ञानिक और दार्शनिक हमारी एक मुहीम हैं। वैज्ञानिकों को भड़कायेंगे कि युद्ध के घातक शस्त्र बनाने में उनकी बुद्धि सहयोग देना बंद कर दे। गाड़ी अधर में लटक जाय। उच्चस्तरीय वैज्ञानिक की प्रतिभा और सूझ-बूझ उन्हें वैसा न करने देगी जैसा कि अपेक्षा की जा रही है। अब उनका मस्तिष्क ऐसे छोटे उपकरण बनाने की ओर लौटेगा जिससे कुटीर उद्योगों की सहायता देने वाला नया माहौल उफन पड़े।”
“लेखकों और दार्शनिक का अब एक नया वर्ग उठेगा। वह अपनी प्रतिभा के बलबूते एकाकी सोचने और एकाकी लिखने का प्रयत्न करेगा। उन्हें उद्देश्य में सहायता मिलेगी। मस्तिष्क के कपाट खुलते जायेंगे और उन्हें सूझ पड़ेगा कि इन दिनों क्या लिखने योग्य है और मात्र वही लिखा जाना है। दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही मुड़ेंगे। इन दोनों खदानों में से ऐसे नर रत्न निकलेंगे जो उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने में आश्चर्यजनक योगदान दे सकें। ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करने में हमारा योगदान होगा, भले ही परोक्ष होने के कारण लोग उसे अभी देख या समझ न सके।”
एक अन्य स्थान पर उनकी स्पष्टोक्ति है-”हमने व्यक्तियों में पवित्रता और प्रखरता का समावेश करने के लिए मनीषा को ही अपना माध्यम बनाया एवं उज्ज्वल भविष्य का साक्षात्कार किया। स्वयं में युग मनीषी की भूमिका निभाते हुए उन अनुसंधानों की पृष्ठभूमि बनाने का हमारा मन है वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का प्रत्यक्ष रूप इस तर्क तथ्य, प्रमाणों को आधार मानने वाले समुदाय के समक्ष रख सकें। आत्मानुसंधान के लिए अन्वेषण कार्य किस प्रकार चलना चाहिए साधना-उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनःशक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है? गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति संपन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है। ऐसे अनेकानेक पक्षों की शोध हमने अथर्ववेदीय ऋषि परंपरा के अंतर्गत है सम्पन्न की है। जो आगामी समय में आत्मिकी के अनुसंधान में निरत होने वाले वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाश में आयेगी। परोक्ष रूप से हम उन्हें सतत् पोषण देते रहेंगे। सारी मानव जाति को अपनी मनीषा द्वारा एवं शोध अनुसंधान के माध्यम से लाभान्वित करने का हमारा संकल्प किस आश्चर्य रीति से सफल होगा, इसे आने वाला समय बतायेगा। “
युग मनीषी के रूप में अपनी भूमिका संपन्न करने वाले परम पूज्य गुरुदेव अब मनीषियों के निर्माण में संलग्न है। हो भी क्यों न? युग संधि की बेला में सबसे बड़ी जिम्मेदारी मनीषा की है। उसे अँधेरी निशा में समुद्र के बीच प्रकाश स्तम्भ की तरह एकाकी जलना होता है। उसे समर्थन किसका? सहायता किसकी? चारों ओर उफनते लहरों के कोलाहल और टकराव से अस्तित्व को चुनौती ही मिलती रहती है। फिर भी प्रकाश स्तम्भ न केवल अपनी सत्ता बचाये रहता है साथ ही उस क्षेत्र से गुजरने वाले जलयानों की इतनी सेवा भी करता रहता है कि उन्हें इस प्रदेश की चट्टानों से टकरा कर उलट जाने की विपत्ति में न पड़ने दे। बेशक हीरक हार बाँटते रहने की स्थिति न होने के कारण उन्हें दानवीर होने का श्रेय तो नहीं मिलता फिर भी जानकार जानते हैं कि प्रहरी की जागरुकता, सुरक्षा कर जो प्रावधान करती है, उसका कितना मूल्य महत्व होता है। आलोक बुझ जाने पर जलयानों के उलट जाने की दुर्घटना देखकर ही कोई यह जान सकता है कि प्रकाश स्तम्भ की मूक सेवा कितनी उपयोगी, कितनी आवश्यक होती है।
प्रश्न श्रेय का नहीं वह किसी को भी मिल सकता है, किसी का भी हो सकता है। पर उन चिनगारियों को भुलाया नहीं जा सकता है जो चमकी-भड़की और लपेट में वन प्रदेशों को ईंधन बनाकर दावानल की तरह गगनचुँबी बनती चली गई। सुकरात, अफलातून, अरस्तू जैसे मनीषियों के परोक्ष अनुदानों के गुणगान मुकुट धारियों जैसे ढोल, तासे बजाकर नहीं होते फिर भी तथ्य बताते हैं कि उनकी भूमिकाएँ शत-सहस्र शासकों से बढ़कर रही है। प्रज्ञा परिजनों में से जिनके अंतराल में दूरदर्शी विवेकशीलता का आलोक दीप्तिमान हो उनको समय की चुनौती स्वीकार करना चाहिए और संव्याप्त अंधकार में अपना साहस दीपक की तरह प्रज्वलित करना चाहिए।
जिस समाज या राष्ट्र में आत्मबल चुक जाता है, साँस्कृतिक विरासत के प्रति गरिमा का भाव समाप्त होने लगा है एवं सुसंस्कारिता-चरित्रनिष्ठ का स्थान कुसंस्कार एवं राष्ट्रीय चरित्र की गिरावट लाने वाले तत्व लेने लगते हैं, वह समाप्त पराधीन कहलाता है। उस पर कोई भी कभी भी आक्रमण कर सकता है-बंदी बना सकता है व उसकी मूलभूत थाती को समाप्त कर सकता है। विगत डेढ़ हजार वर्षों के अंधकार युग में ऐसा ही कुछ भारतवर्ष के साथ हुआ। अतीत का स्वरूप इतना स्वर्णिम गौरवान्वित करने वाला तथा आज का वर्तमान का स्वरूप कुछ ऐसा कि राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होते हुए भी आर्थिक-साँस्कृतिक हर दृष्टि से स्वतंत्र होते हुए भी आर्थिक-साँस्कृतिक हर दृष्टि से परतंत्र होना हमारी कहानी स्वयं कहता है। जिस राष्ट्र को कभी जगद्गुरु कहा जाता था, चक्रवर्ती माना जाता था, वह आज इतना विवश, पतन पराभव की स्थिति में क्यों हैं व क्यों वह अपने आत्मगौरव को अपनी संस्कृति की मूल्यों की गरिमा की पहचान नहीं पा रहा? इन कारणों की शीघ्रातिशीघ्र समझना व उपचार के प्रयास करना आज आपातकालीन स्तर के प्रयासों की तरह अनिवार्य माना जाना चाहिए एवं द्रुतगति से धर्मतंत्र के प्रगतिशील मंच की ओर से इसके लिए प्रयास चलना चाहिए।
अब जब हम 1994 में प्रवेश कर रहे है तथा 1947 में मिली आजादी के बाद 47 वर्ष और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बिता चुके हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है कि “सुपरपावर” कहा जाने वाला, प्राकृतिक भौगोलिक हर दृष्टि से विलक्षण, प्रतिभा संपन्न यह देश क्यों जातिवाद, संप्रदायवाद तथा देश की अखंडता को खतरे में डालने वाली आसुरी सत्ताओं के जाल से निकल कर बाहर नहीं आता। गणतंत्र के रूप में इस राष्ट्र को 1950 की 26 जनवरी को घोषित किया गया था व वैविध्यपूर्ण संस्कृति की अभिनव सृष्टि रूप में विनिर्मित इस राष्ट्र का विभाजन से आहत होने के बाद सुगठित कर एक महाशक्ति बनाने का जो संकल्प लिया गया था, वह क्यों गौण हो गया व अन्य ऐसे मुद्दे क्यों आ गये जो किसी प्रासंगिक स्थिति में नहीं है, यह एक गंभीर व पेचीदगी से भरी पहेली है, जिसे हर भारतवासी को अब बुझाना ही होगा।
राष्ट्र की भौतिक प्रगति, कर्मठ निष्ठावान नागरिकों के पुरुषार्थ पर ही संभव हो पाती है। राष्ट्रीय चरित्र जिंदा किये बिना, गले तक डूबे भ्रष्टाचार की दलदल से उबरे बिना हम कभी भी भौतिक क्षेत्र में परिस्थितियों को सही होने व प्रगति के सरंजाम खड़ा होने की कल्पना नहीं कर सकते। आस्थाओं को सशक्त किये बिना राष्ट्र को एक उपास्य-आराध्य देव मानकर उसकी समर्पित भाव से आराधना किये बिना हम उन प्रतिकूलताओं से नहीं जूझ सकते हैं जो आज हमारे समक्ष अवरोध की चट्टानें बनकर खड़ी हैं। परम पूज्य गुरुदेव ने इस मूल कारण को ढूंढ़ तलाश कर ही राष्ट्र की आजादी के साथ मानवी मनों को विनिर्मित करने का-विचारों में एक आमूलचूल क्राँति का तथा व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण का सारा ताना-बाना बुनकर युगनिर्माण योजना की पृष्ठभूमि बनायी थी। धर्मतंत्र ही, आस्थाओं को सशक्त बना सकता है एवं उसे विज्ञान सम्मत प्रगतिशील बनाकर यदि एक मोर्चा खड़ा किया जाय तो राजतंत्र के समानांतर एक ऐसा शक्ति-तंत्र विनिर्मित किया जा सकता है, जो आज की सभी समस्याओं का हल निकाल सके।
सभी ओर से निराश हर भारतवासी या भारत से जुड़े प्रवासी परिजनों व पूर्वी संस्कृति की ओर आशा भरी निगाह से निहार रहे विदेशियों के लिए गायत्री परिवार-युग निर्माण योजना ने नवयुग की उज्ज्वल भविष्य के साकार होने की न केवल योजना बनायी, उन्हें चरितार्थ भी कर दिखाया। एक मॉडल बनाकर खड़ा कर दिया जिसे देखकर इक्कीसवीं सदी के लिए आशान्वित हुआ जा सकता है और कोई तंत्र इस कार्य को कर नहीं सकता सिवा धर्मतंत्र के। परमपूज्य गुरुदेव ने धर्मतंत्र की हर मान्यता व निर्धारणों को विज्ञान सम्मत प्रतिपादित किया, सम्प्रदायवाद व जातिवाद के विद्वेषों से मुक्ति का मार्ग बताया तथा प्रमाणित कर दिखाया कि जाग्रत जनशक्ति धर्मतंत्र के भागीरथी पुरुषार्थ संपन्न कर दिखा सकती है।
समूह मन को जाग्रति कर सूक्ष्म जगत का अनुकूलन करने के निमित्त सामूहिक धर्मानुष्ठान विशिष्ट आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा जन-जन के मनों के रुझान को बदलना एक ऐसी प्रक्रिया है जो इस मिशन ने देव संस्कृति दिग्विजय के अश्वमेधी पराक्रमों द्वारा संपन्न की है तथा लाखों नहीं, करोड़ों व्यक्तियों के चिंतन को इस माध्यम से प्रभावित किया है। जातिवाद के जंजाल को तोड़ा है तथा एक ही ब्राह्मण वर्ग के औसत भारतीय निर्वाह में औरों के लिए जीवन जीने वाले समयदानियों की उत्पादन प्रक्रिया को बलशाली किया है। यदि सत्प्रवृत्ति संवर्धन व दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के कार्यक्रम राष्ट्र को एक अखण्ड व सशक्त बनाने के प्रयोग चल पड़े हैं-अभावग्रस्तता से उबारकर स्वावलंबी बनाने की दिशा में समाज गतिशील हो चला है तो उसका श्रेय जाग्रत धर्मतंत्र की शक्ति को ही जाता है। आह्वान है इस मिशन का हर उस विभूति को, जो आज की इस नैराश्यपूर्ण परिस्थितियों में आशावाद के राजमार्ग पर चलने की बाट जोह रही है। आशा ही नहीं विश्वास है , इस आमंत्रण को प्रबुद्धजन अवश्य स्वीकार करेंगे, नकारेंगे नहीं।
*समाप्त*