ऋचाकार का कथन है- “ चलते रहो-चलते रहो” चरैवेति-चरैवेति ! वे कहते हैं कि सोने वाले का भाग्य सो जाता है और चलने वाले का जग जाता है। निःचेष्ट रहना ही कलियुग है। जिसने तनकर चलना आरंभ कर दिया, उसके लिए सर्वत्र सतयुग ही सतयुग है। यह कथन अध्यात्म जीवन का प्राण है और भौतिक जीवन का एक तथ्य । गतिशीलों को सफलताएँ मिली है और पाषाणवत् जड़ बनकर जो बैठे रहे, उनको निस्तब्धता, निराशा के अतिरिक्त कुछ हाथ लगा नहीं।
शरीर के कण-कण में वायु का आवागमन होता रहता है और रक्त का प्रवाह अनवरत गतिशील रहता है। पैर एक स्थान छोड़कर दूसरे तक चलने के लिए सतत् गतिशील रहते हैं। यदि स्थिरता की जकड़न जोड़ों को पकड़ ले तो समझना चाहिए कि संधिवात या पक्षाघात जैसी अपंगता का आक्रमण हुआ है। सूर्य, चंद्र से लेकर ब्रह्माँड में अधर टँगे नक्षत्र स्थिर दीखते भर हैं। उनकी गतिशीलता असाधारण है। अचल दीखने वाली पृथ्वी तक अपनी धुरी पर, सूर्य की परिक्रमा पर व सूर्य, महासूर्य की महा परिक्रमा पर द्रुतगति से दौड़ते दिखाई देते हैं। गतिशीलता की इस प्रक्रिया का जो भी परित्याग करेगा, उसे मृतकों में न सही, अपंगों-मूर्च्छितों के घूरे कबाड़े के किसी कोने में ही जगह मिल सकेगी।
नदियाँ चलती हैं, झरने बहते हैं, पक्षी उड़ते हैं, हिरन फुदकते हैं। यहाँ तक कि तितली , चींटी, दीमक, मधुमक्खी तक को चैन नहीं। बैठे रहने का आलस्य-अवसाद यदि इनने किसी ने अपनाया होता तो उनकी गणना निर्जीवों में हुई होती। समुद्र भी कहाँ शाँत रहता है ? उसमें निरंतर ज्वार-भाटे उठते रहते हैं, तूफान मचलते हैं और वाष्प बादल उसके अंग अवयव के रूप में आकाश में उड़ान भरने का आनंद चखते हैं। गति ही जीवन है। प्रगति ही प्रशस्ति का मार्ग है जो गन्तव्य की ओर ले जाता है। अगति और मरण में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है। हम भी योजना बद्ध परिभ्रमण का उपक्रम अपनाकर स्वयं को सतत् गतिशील बनाये रखें। उसी में जीवन की सार्थकता है।
बिच्छू सरिता के पुलिन पर बिल बनाकर सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था। उसे जब भूख लगती बिल से बाहर आ जाता और रेत पर घूमकर छोटे-छोटे कीड़े - मकोड़े को उदरस्थ कर अपनी क्षुधा शाँत करता। कभी-कभी उसे केकड़े के दर्शन भी हो जाते। वह रहता तो जल में था पर धूप सेंकने के लिए किनारे पर आ जाता और रेत में घंटों पड़ा रहता। उसने रेत में भी अपने निवास की अस्थाई व्यवस्था कर रखी थी। एक छोटा बिल बना लिया था, जब उसे कौवे बगुले या अन्य किसी शत्रु के आगमन का संकेत मिलता सुरक्षार्थ वह उस बिल में छिप जाता।
केकड़े और बिच्छू दोनों में आकृति की समानता थी। शुरुआत में तो बिच्छू केकड़े से बिल्कुल न बोला, चुपचाप उसके क्रिया कलाप देखता रहता कि वह किस तरह पानी में कूद कर क्रीड़ा करता रहता है और जल विहार का आनंद लेता है। एक दिन बिच्छू से न रहा गया उसने अपनी इच्छा को प्रकट करते हुए कहा- “ मित्र ! आपको जल क्रीड़ा करते देखता हूँ तो मेरे मन में भी आता है कि मैं भी सरिता में कूद कर स्नान करूं। “
“ आप भूल कर भी ऐसा मत करना “ -केकड़े ने बिच्छू को सचेत करते हुए कहा-देखते नहीं नदी का प्रवाह कितना तीव्र है, कहीं जलधारा आपको भंवर की ओर बहा कर ले गई तो तैरने की इच्छा अपूर्ण रह जाएगी और विवश होकर जल समाधि लेती पड़ेगी। कहीं-कहीं पर तो नदी की गहराई इतनी अधिक है कि थाह लेना भी मुश्किल पड़ता है। “
“ मुझे तैरना नहीं आता इसलिए जान-बूझकर मैं मृत्यु को आमंत्रित तो नहीं करना चाहता” - बिच्छू बोला- “ पर क्या आप मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर नदी की धारा की सैर नहीं करा सकते। जब कभी सरिता के मध्य में नौका-विहार करते हुए यात्रियों को देखता हूँ। तो मेरा मन हर्षोल्लास से नाच उठता है, सोचता हूँ उन्हें कितना आनंद मिल रहा होगा। “ सैर करना तो कोई मुश्किल काम नहीं है पर आपकी पूँछ का डंक कितना विषैला है इसे कौन नहीं जानता। यात्रा के बीच में स्वभाववश कहीं आपने डंक चला दिया तो मेरा जीवन समाप्त हो जाएगा।”
“ आपका ही जीवन क्यों ? मेरा अपना बचना भी तो कठिन हो जाएगा। मैं इतना मूर्ख नहीं कि अपना हित अनहित भी न जानता होऊँ। तुम्हें डंक मारने पर मुझे भी तो जल में डूबना पड़ेगा। अतः मेरे डंक का भय तुम न करो। “ बिच्छू ने आश्वासन देते हुए कहा।
केकड़े को विश्वास हो गया । उसने बिच्छू को अपनी पीठ पर बिठाया और उतर पड़ा नदी में हवाखोरी करने के लिए । नदी की लहरों पर केकड़ा तैर रहा था। उसे जल क्रीड़ा में बड़ा आनंद आ रहा था । ऊपर बैठे बिच्छू को ऐसा लग रहा था मानो झूला झूल रहा हो। मंद-मंद प्रवाहित होती शीतल वायु उसे बड़ी भली लग रही थी। अपने चहुँ ओर अपार जल समूह को देखकर उसे ऐसा आनंद आ रहा था मानो छोटी किश्ती में बैठकर अवकाश के क्षणों में अपने व्यथित हृदय को शाँति और नवीनता प्रदान करने के लिए निकल पड़ा हो।
बिच्छू अपने आनंद में भूल ही गया कि केकड़े की पीठ पर बैठा है। तब तक एक बड़ी लहर का प्रवाह आया। हल्की सी फुहार उसकी पीठ पर गिरी। घबराहट में बिच्छू का डंक पूरे वेग से केकड़े की पीठ पर आ गिरा। केकड़ा तिलमिला गया। उसके पूरे शरीर में विष फैल गया। मरते-मरते उसने कहा- “आखिर” जिस बात के लिए मैं डर रहा था वही हुआ न ?
पश्चाताप के स्वर में बिच्छू बोला- “भाई ! स्वभाव का परिवर्तन बड़ा कठिन काम है। जैसे ही किसी वस्तु का स्पर्श मेरे शरीर से होता है स्वभाव वश डंक अपना कार्य पूर्ण कर देता है। अपनी मृत्यु को सामने देखकर मैं स्वभाव को दबा नहीं पाया।”
सचमुच ही वे कितने सम्माननीय हैं जो अपने स्वभाव को नियंत्रित करते के लिए सदैव प्रयत्न शील रहते हैं और जिन्होंने आत्म नियंत्रण द्वारा अपने स्वभाव को वश में कर लिया है।
बिच्छू का दुःस्वभाव उसके लिए ही नहीं केकड़े के लिए भी प्राणघातक सिद्ध हुआ। यह घटनाक्रम हम उन सब पर भी आए दिन घटित होता रहता है जो न तो अपने दुःस्वभाव के दुष्परिणामों का विचार करते हैं और न उसे सुधारने का प्रयत्न।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ मृत्यु शैया पर अंतिम सांसें ले रहे थे। तभी एक व्यक्ति आकर बोला। धन्य हैं आप ! आपने जीवन सार्थक कर लिया। छः हजार गीत रचे। आप तो तृप्त हो ही गये होंगे। दुनिया के लिए एक अनूठी धरोहर छोड़ी आपने गुरुदेव श्री रवींद्रनाथ ने आँखें खोली और बड़ी नम्रता से बोले- “तृप्त कहाँ हुआ ? मेरा प्रत्येक गीत अधूरा ही रहा। जो मेरे उद्गार थे वे तो अभी भी अटके हुए हैं। ये तो छः हजार उस दिशा में की गयी असफल चेष्टाएं हैं। उन उद्गारों को बाहर लाने के प्रयास हैं। मैंने छः हजार बार कोशिशें कीं किन्तु वह गीत अधूरा ही रहा जिसे गाना चाहता था। उस गीत को, उस उद्गार को गाने का प्रयास करने में ही लगा था कि जब तक बुलावा आ गया।
विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों के बीच इन दिनों प्रायः यह विवाद छिड़ा रहता है कि वर्तमान परिस्थितियों, पर्यावरण अध्ययनों और खगोलीय से क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि सृष्टि विनाश के कगार पर है ? सूर्य की ऊर्जा चुकती चलती चली जा रही है और पृथ्वी भी अपनी आयु पूरी करती दृश्यमान हो रही है ? मानवी दुर्बुद्धि के कारण क्या यह धरती धूल में नहीं मिल जायेगी ?
इन समस्त आशंकाओं का समर्थन भौतिकी विज्ञान का प्रसिद्ध सिद्धाँत भी करता है। थर्मोडायनामिक्स के दूसरे नियम के अनुसार विश्व, व्यवस्था से अव्यवस्था की ओर निरंतर प्रवाहमान है। विराट से विराट और सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तर पर यह नियम समान रूप से लागू है। इस दृष्टि से विचार करें, तो इन दिनों हम जिस मानसिक अराजकता के दौर से गुजर रहे हैं, वह उसका एक हिस्सा है, ऐसा माना जा सकता है। ऋषिकाल में एक समय वह था, जब समाज मानसिक दृष्टि से अत्यंत सुव्यवस्थित , सुविकसित और श्रेष्ठ था, जबकि आज चिंतन की दृष्टि से वह उतना ही निकृष्ट है। दूसरे शब्दों में कहा जाय, तो विज्ञान का यह दूसरा नियम अक्षरशः इस स्तर पर भी काम कर रहा है। तथ्य यह भी है कि मानसिक अस्थिरता ही सामाजिक विपन्नता पैदा करती है। अशाँत और अव्यवस्थित मानस सुव्यवस्था बने रहने देगा, ऐसा भी नहीं समझा जा सकता। तो क्या आज की मानसिक अराजकता विश्व-विनाश को जन्म नहीं दे देगी ? क्या हमारा भाग्य विधान इन दिनों अभागों जैसा बनता नहीं दिखाई पड़ रहा है ? भावनात्मक पतन से उत्पन्न अस्तित्व संकट को क्या टाला जा सकता संभव है।
उत्तर ताप-गति का पहला नियम देता है। उक्त नियम के अनुसार इस विश्व-ब्रह्माँड के समस्त पदार्थ और सारी ऊर्जा की मात्रा स्थिर है। दूसरी ओर विज्ञान वेत्ताओं का यह भी कहना है कि सूर्य के अन्दर जो गैसें हैं, वह सब चुकती चली जा रही हैं। हाइड्रोजन हीलियम घटती जा रही है ऐसी स्थिति में उसका अंत निकट ही माना जा रहा सकता है। वैज्ञानिकों के हिसाब से अपनी पृथ्वी की आयु पाँच अरब वर्ष है। खगोलविदों का कहना है कि बहुत पहले अपना ग्रह सूर्य का एक अंग था । बाद में वह टूट कर पृथक् हो गया। जब इस विशाल अवधि में इस ग्रह में अनेकानेक प्रकार के परिवर्तन हो गये। पहाड़ जलमग्न हो गये और जल की जगह हिमालय खड़ा हो गया, तो फिर पृथ्वी के जनक सूर्य को अपने अब तक के विशाल जीवन में खण्ड-खण्ड होकर बिखर जाना चाहिए अथवा जल कर नष्ट हो जाना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ। क्यों ?
इस संबंध में विश्व उत्पत्ति संबंधी अध्यात्म अवधारणा की तनिक चर्चा कर लेना अनुचित न होगा। सृष्टि उत्पत्ति संबंधी अध्यात्म मान्यता है कि भगवान ने एक से अनेक होने की इच्छा प्रकट की और सृष्टि बनकर तैयार हो गई, चित्र विचित्र जीव और जंतु पैदा हो गये, वनस्पतियाँ पैदा हो गई। उनके जीवन धारणा करने में सहायक तत्व भी साथ ही साथ उद्भूत हुए। विज्ञान जिस सृष्टि को तत्वों के संगठन-विघटन से विनिर्मित मानता और जिनके न रहने से विनाश की संभावना प्रकट करता है, उस बारे में अध्यात्म मान्यता दूसरी है। उसका कहना है कि यहाँ सब कुछ ईश्वरीय संकल्प के कारण उत्पन्न हुआ , तत्वों के मिलन -संयोग के फलस्वरूप नहीं। यह ठीक है कि सृष्टि में भौतिक स्तर पर रासायनिक प्रतिक्रियाएँ होती रहती हैं, पर स्रष्टा का अद्भुत सृजन भौतिक प्रक्रिया का परिणाम है - ऐसा नहीं कहा जा सकता। अब यहाँ एक प्रश्न पैदा होता है- जिसका निर्माण भौतिक संयोग-वियोग के कारण नहीं हुआ, उसके नाश का निमित्त भौतिक कैसे हो सकता है ? जो अलौकिक आकाँक्षा का परिणाम है, उसका अंत लौकिक गतिविधियाँ कैसे कर सकती हैं ? निष्कर्ष यह निकल कर सामने आता है कि यह विश्व विनष्ट हो नहीं सकता । होता भासता लग सकता है , पर वस्तुतः ऐसा होता नहीं। इस बिंदु पर विज्ञान और अध्यात्म परस्पर सहमत होते प्रतीत होते हैं । विज्ञान के हिसाब से सृष्टि जो आदि में थी, वही अब है ( ताप-गति का पहला नियम )। परिवर्तन भले ही उसमें हो रहे हों , पर मूल तत्व अपरिवर्तनीय और अक्षुण्ण बने हुए हैं। इस स्थिति में ही पदार्थ और ऊर्जा की मात्रा स्थिर रह सकती है। अध्यात्म का भी ऐसा ही मत है। उसके अनुसार यदि संसार नाश की ओर ( व्यवस्था से अव्यवस्था की ओर ) आरंभ से ही अग्रसर हो रहा होता, तो यह सृष्टि कब की समाप्त हो गई होती , पर उत्पत्ति काल से अब तक यह बनी हुई है, यही इसकी अक्षुण्णता का सबसे बड़ा प्रमाण है। सच्चाई तो यह है कि जहाँ नाश जैसा दृश्य उपस्थित हो रहा होता है वहाँ दूसरी ओर निर्माण की संभावना भी फलवती होती रहती है। गर्भवती स्त्री गर्भकाल में बहुत भारीपन महसूस करती है, उदासी, उबकाई , अरुचि, उल्टी होती रहती है। भोजन ठीक नहीं मिलने पर दुबली भी होती दिखाई पड़ सकती है। इतने पर भी यह सच है कि वह बीमार नहीं होती, उसके रस-रक्त नष्ट नहीं हो रहे होते, वरन् नवनिर्माण की एक विशिष्ट भूमिका संपन्न कर रही होती है। वही रस - रक्त एक अभिनव सृजन के रूप में बाद में बाहर आते हैं। सूक्ष्मता पूर्वक विचारा जाय, तो ज्ञात होगा कि इसमें न तो कुछ नष्ट हुआ है, न विनिर्मित, वरन् परिवर्तन की एक क्रिया घटित हुई है। माता का रक्त एक स्थूल पिण्ड का आकार ग्रहण कर उससे अलग हो गया। जो पहले तरल और ला था, अब उसका रूपाकार कुछ और है। स्वर्णाभूषणों के निर्माण में मात्र रूप और आकार को ही गलाया-ढाला जाता है। मूल स्वर्ण तत्व तो यथावत् बने रहते हैं।
यही क्रिया विश्व -ब्रह्माँड में चलती रहती है। बज-जब, जहाँ-जहाँ निर्माण की घटना घटित होती है, वहाँ दृश्य ऐसे ही उपस्थित होते हैं। प्रत्यक्ष आँखों को ऐसा मालूम हो सकता है कि विध्वंस हो रहा है, पर यह उसका धोखा है। कोई अपने सड़े अंग को ही ढोते रहने का दुराग्रह करे तो चिकित्सक इसे कैसे स्वीकार कर सकता है। वह तो अपने हिसाब से उसे काट-छाँट कर पृथक् करेगा और रोगी को नवीन जीवन प्रदान करने का प्रयास करेगा, भले ही देखने में यह कितना ही नृशंस और क्रूरतापूर्ण क्यों न लगे, पर इतने से ही वह अपने कर्तव्य को त्याग तो नहीं देता।
ब्रह्माँड के संबंध में भी यह बात पूरी तरह लागू होती है। यहाँ नाश - निर्माण जैसे दृश्य चलते रहते हैं। जीर्ण-शीर्ण मकान को ढहा कर नये निर्माण करने पड़ते हैं। पुरानी मशीनें भी कहाँ काम आती ! टूटे बर्तन, फूटे भाँड भी किसी काम के नहीं होते। उन्हें गला-जला कर अभिनव सृजन करना पड़ता है। इन सबकी देख-भाल , साज-संभाल मनुष्य को नियमित रूप से करनी पड़ती है। यंत्र के कल-पुर्जे टूट जाने पर वह उसे बदलता है। घर की दीवार कमजोर होने पर उसकी मजबूती का इंतजाम करता है। ऐसा कहाँ देखा जाता कि दीवार टूट रही और वह बेखबर सोया पड़ा हो, छत गिरने वाली हो और वह निश्चिंत बैठा हो। इसके पूर्व ही वह सतर्क होता और बरबादी से पहले सब कुछ ठीक कर लेता है।
भगवान की रीति-नीति भी ऐसी ही है। वह ‘प्वाइण्ट ऑफ नो रिटर्न’ पहुँचने से पूर्व ही कमान अपने हाथ में लेता और सब कुछ ठीक कर देता है। इन दिनों हम जिस उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे हैं, वह वास्तव में प्रसवकाल जैसी ही प्रक्रिया है , जिसमें मनुष्यों का - विश्व का कायाकल्प जैसा बदलाव होना है। इस संबंध में एन॰ कार्टराइट अपनी पुस्तक “एन इटरनल गॉड ऐज दि काउज ऑफ दि युनिवर्स “ में लिखते हैं कि वैज्ञानिकों ने कुछ रासायनिक क्रिया प्रक्रियाओं द्वारा कुछ एक पदार्थों की रचना कर ली, तो विज्ञानविद् यह मानने लगे कि यह विश्व ऐसी ही भौतिक प्रतिक्रिया की परिणति है, जबकि सत्य यह है कि यह किसी भौतिक क्रिया का परिणाम नहीं है। यदि ऐसा माना गया, तो अनेक ऐसे प्रश्न उठ खड़े होंगे, जिनका सहज में जवाब दे पाना कठिन होगा , यथा इतने कम समय में एक अमीबा से इतने प्रकार के जटिल जीवों का उद्भव कैसे हो गया ? और फिर अमीबा, अमीबा ही बना क्यों रह गया ? वे कहते हैं कि यदि कुछ क्षण के लिए यह मान भी लिया जाय कि यह सब विकासवादी प्रक्रिया के अंग हैं , तो फिर दूसरा सवाल पैदा होगा कि इस प्रक्रिया को प्रेरित करने वाला बल कौन था ? कैसे इतने सामान्य जीव से बुद्धि को आर्श्चय में डालने वाले प्राणी प्रकट हो गये ? मनुष्य के एक-एक अंग और तंत्र का गहराई से अध्ययन करने पर जो तथ्य सामने आते हैं , उनसे तो यही स्पष्ट होता है कि बारीक इंजीनियरिंग युक्त कौशलपूर्ण संरचना का निर्माण महज संयोग का परिणाम नहीं हो सकता। इसमें किसी कुशल अभियन्ता का हाथ होना चाहिए। फिर विज्ञान भी इस बात को स्वीकारता है कि भौतिक जगत में कोई भी क्रिया बिना किसी कारण या बल के संभव नहीं। कुछ देर के लिए यदि इसे मान भी लें कि मनुष्य किसी संयोग का नतीजा है, तो तर्कवादी पुनः यह दलील दे सकते हैं कि संयोग सैंकड़ों में एकाध घटित हो सकता है, पर हर मामले में संयोग का सिद्धान्त काम करेगा-यह किसी के गले कैसे उतरे ?
ऐसे में ईश्वरीय अवधारणा को मान लेने पर सारी मुश्किलों का समाधान सरलतापूर्वक हो जाता है। यदि यह स्वीकार लिया जाय कि भगवान इस सृष्टि की सर्वोपरि सत्ता है, उसी ने इसकी संरचना सुनियोजित ढंग से की है और कुशल माली की तरह इसकी देख-रेख करता है। झाड़-झंखाड़ उग आने पर संसार रूपी उद्यान की सफाई करता उनकी उखाड़-पछाड़ करता है और गुलाब जैसे पुष्पों को आरोपण कर मलयानिल की सुगंधित बयार बहाना और उसे सुवासित बनाये रखना भी उसी का काम है तो फिर संसार के समाप्त हो जाने जैसे असमंजस की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है। भला कौन माली अपने बाग को वीरान बनते देख सकता है ! यदि कभी दृश्य ऐसा दिखाई पड़े भी तो इसके पीछे उसकी कोई विशेष योजना ही समझी जानी चाहिए, जिसमें रुग्णों , बीमारों और अनुत्पादक वृक्षावलियों की जगह विशेष किस्म की उन्नत और आकर्षक पौधों को उगाने और लगाने की उसकी मंशा हो। इस मान्यता का मंडन “ क्रियेशन रिसर्च- इन्स्टीट्यूट, सैनडियागो , कैलीफोर्निया “ के एसोसियेट डायरेक्टर डूने टार्ल्वट गिश ने भी जोरदार शब्दों में किया है।
प्रत्यक्ष जितना, जो कुछ, जैसा भी दिखाई पड़े , पर यह सच है कि मनुष्य का भविष्य आकाश में चमचमाते गोले की तरह प्रकाशवान और उज्ज्वल है। आँखें जो कुछ देखती और बुद्धि जितना कुछ समझ पाती है, वह सब सर्वदा यथार्थ नहीं होते। इन दिनों दिखाई पड़ने वाली विनाश की संभावना भी मिथ्या साबित होकर रहेगी ऐसी आशा की जानी चाहिए।
आत्म-कल्याण के मार्ग में इंद्रियों की प्रबलता को प्रमुख शत्रु माना है। इंद्रियों से प्राप्त होने वाले सुखों के प्रति राग और द्वेष मिलकर मनुष्य को दिग्भ्राँत करते रहते हैं। यही कारण है कि वाह्य-जीवन की नश्वरता को स्वीकार करते हुए भी वह आत्मा के उद्धार की बात तक नहीं सोच पाता है। शास्त्रों में इस विषय में अधिक जोर दिया गया कि मनुष्य शरीर रहते हुये अपने स्वरूप का ज्ञान कर लेना चाहिये अन्यथा पुनः युग युगांतरों तक अनेकों घृणित योनियों में विचरण करना पड़ता है तब तक कहीं दुबारा मानव -शरीर प्राप्त करने का संयोग मिलता है। इस दुर्लभ संयोग को यों ही बरबाद कर देना बुद्धिमानी की बात नहीं है।
अग्नि के तेजस्वी स्वरूप को देखने के लिए ऊपर की सारी राख हटानी पड़ती है। अंधकार फैल रहा हो तो किसी भी वस्तु का साफ-साफ स्वरूप नहीं दिखाई पड़ता। उसी प्रकार अंतःकरण के मल, विक्षेप बने रहें तो आत्म-ज्ञान प्राप्त करना संभव न होगा। मानसिक चंचलता और आँतरिक मलिनता का उदय इंद्रियों के असंयम से होता है। इसलिए गीताकार ने लिखा है --
इन्द्रियस्येन्द्रियस्याथें रागद्वेषौ। तयोर्न वशमागच्छेतौहास्य परिवन्थिनौ॥
अर्थात्-- मनुष्य को चाहिये कि इंद्रियों के अर्थ व उनमें सन्निहित जो राग और द्वेष हैं उन दोनों के वश में नहीं होवे, क्योंकि आत्म - कल्याण के मार्ग में विघ्न करते वाले ये दोनों ही प्रबल शत्रु हैं।
जिन इन्द्रियों को आत्म-विकास की रुकावट मानते हैं यथार्थ में हमारे आत्म-कल्याण का कारण भी वही हैं। शत्रु के रूप में तो वे अपने बहिर्मुखी स्वभाव के कारण परिलक्षित होती हैं। जब तक इनका उपयोग बाह्य-जीवन के सुखोपभोग में करते हैं तब तक वह शत्रु है , किन्तु जैसे ही इन्हें आत्म-ज्ञान व आत्म-विकास की ओर मोड़ देते हैं इनके सत्परिणाम भी दिखाई पड़ने लगते हैं। परेशानी तभी तक रहती है जब तक ये अपने अर्थों में पूर्ण स्वच्छंद होती हैं। सदुपयोग करने लगें तो इन्हीं से महत्वपूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि इनकी स्वतंत्र विचरण की बहिर्मुखी प्रवृत्ति पर अंकुश बनाये रहें। किसी घोड़े की बेलगाम छोड़ दें तो वह अपने सवार को खड्डे में गिरा कर ही रहेगा। सवार की सुरक्षा सदैव इस बात पर निर्भर रहती है कि वह घोड़े के नियंत्रण को ढीला न करे। इससे जिस दिशा में जितनी दूर जाता चाहेंगे वही घोड़ा सुरक्षा-पूर्वक आपको पहुँचा देगा। जिह्वा-इन्द्रिय को ही लीजिये। भाँति-भाँति के स्वाद युक्त व्यंजनों की उसे सदैव लालसा बनी रहती है। चटोरेपन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण वह स्वास्थ्य को बरबाद करती है। जिह्वा का उपयोग वस्तुतः इसलिए है कि उससे खाद्य या अखाद्य की पहिचान करते रहें। अधिक कड़ुवा खा लेने पर जीभ छटपटाने लगती हे यह उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है कि वह अखाद्य है , उदरस्थ कर जाने का दुष्परिणाम तो बाद में मिलेगा। पाचन संस्थान की खराबी से होने वाले दुष्परिणाम से बचाने के लिए ही जीभ की तड़फड़ाहट उठी थी। किन्तु इसका लाभ तभी है जब हम खाद्य और अखाद्य के भेद को स्वीकार करें, उस पर नियंत्रण करें।
आँखों का कार्य है सौंदर्य-दर्शन । आत्मा के उद्गम परमात्मा के सौंदर्य को अन्यतम कहा जाता है। उस आँतरिक सौंदर्य के साक्षात्कार की लालसा स्वाभाविक है। हर किसी को सुन्दर वस्तुयें देखने की इच्छा बनी रहती है। किन्तु अधिकाँश होता यह है कि लोग वाह्य रूप रंग, चमक-दमक को ही सौंदर्य मानते हैं।
बात यहीं तक रहती तब भी गनीमत थी किन्तु स्वार्थपूर्ण और वासनात्मक दृष्टिकोण के द्वारा लोग आँतरिक सौंदर्य पर पर्दा डाल देते हैं। विराट का सौंदर्य इतना अभूतपूर्व और आह्लादमय है कि एक बार उसकी अनुभूति कर पायें तो आँखें सदैव उसे पाने के लिए ही तरसती रहेंगी। इसी दृष्टिकोण से इनकी उपयोगिता भी है।
इस संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब विधिवत, वैज्ञानिक तथ्य पर सन्निहित है। इस विज्ञान को समझने के लिये इन्द्रियों के विषय-विकारों से विज्ञान की ओर उन्मुख नहीं हो सकता। उसकी सारी चेष्टायें इन्हीं कुत्सित, घृणित, अदूरदर्शी, क्षणिक सुखोपभोग के के आसपास ही चक्कर लगाया करती है। फलतः विराट के साथ आत्मीयता स्थापित करने की कभी भावना तक नहीं बन पाती। तुलसी दास जी ने मानस में लिखा है -
इन्द्रिय द्वार झरोखा नाना, तहँ-तहँ सुर बैठे करि थाना।
आवत देखहिं विषय बयारी, ते हठि देहिं कपाट उधारी।
जब सो प्रभंजन उन गृह जाई, तबहि दीप विज्ञान बुझाई ।
इन्द्रिय सुरन्ह न ज्ञान सोहाई , विषय भोग पर प्रीति सदाई।
अर्थात्-- अनियंत्रित इन्द्रियाँ बलात् विषयों की ओर ले जाती हैं। ज्ञान-विज्ञान की बातें तो यों ही रखी रह जाती हैं। विषयों में राग और द्वेषों में स्वच्छंद विचरण करती हुई इन्द्रियों पर विचार व विवेक द्वारा ही नियंत्रण रखा जा सकता है। भोग से कभी तृप्ति नहीं होती , इससे मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य से भटककर दुःख क्लेश तथा त्रासदायक परिस्थितियों में जा फँसता है। इस विचार को गहराई तक अपने अंतःकरण में प्रवेश कर लेने से और इस पर निरंतर चिंतन मनन करते रहने से भोग के दुर्भाग्य पूर्ण परिणाम दिखाई दे जाते हैं। धीरे-धीरे इनसे घृणा उत्पन्न होने लगती है।
इतना होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि इन्द्रियाँ आपके वश में आ गयीं। जब कभी अनुकूल परिस्थिति बन जाती है तो इनमें प्रबल उत्तेजना उठे बिना नहीं रह पाती। ऐसी अवस्था में सारी विचार-शक्ति लड़खड़ा जाती है और एक आवेश के साथ लोग बुरे कर्मों की ओर बलात् खिंचे चले जाते हैं। यह परिस्थिति विचारों की क्षीण शक्ति के कारण उपस्थित होती है, इसलिए अपने प्रत्येक विचार को एक संकल्प का रूप दे देना चाहिए। इसी से इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है।
अपनी आँतरिक निर्मलता बनाये रखने से इन्द्रियाँ अपने आप संयमित होने लगती है। इस व्यवस्था का आधार सदाचरण है द्वेष घृणा, ईर्ष्या, क्रोध आदि से ही अंतःकरण मलिन व अपवित्र बनता है। अपनी भावनाओं में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता , सौजन्य और सहानुभूति के बाहुल्य से ही आँतरिक श्रेष्ठता स्थिर रहती है जब तक ऐसी स्थिति बनी रहती है तब तक दूषित विकार उत्पन्न नहीं होते और इन्द्रियाँ नियंत्रित बनी रहती हैं।
अपनी आँतरिक निर्मलता बनाये रखने से इन्द्रियाँ अपने आप संयमित होने लगती है। इस व्यवस्था का आधार सदाचरण है द्वेष घृणा, ईर्ष्या, क्रोध आदि से ही अंतःकरण मलिन व अपवित्र बनता है। अपनी भावनाओं में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता , सौजन्य और सहानुभूति के बाहुल्य से ही आँतरिक श्रेष्ठता स्थिर रहती है जब तक ऐसी स्थिति बनी रहती है तब तक दूषित विकार उत्पन्न नहीं होते और इन्द्रियाँ नियंत्रित बनी रहती हैं।
समर्थ गुरु ने पलायनवादी भाग्यवादी मान्यताओं को उलटा । अहिंसा का अतिवाद भी नहीं अपनाया, वरन् संव्याप्त अनाचार के विरुद्ध संघर्ष का लोक मानस तैयार किया। दूरदर्शिता और यथार्थता भी इसी प्रतिपादन में संग्रहित थी।
अंगुलिमाल डाकू था, पर बुद्ध की करुणा उसके निष्ठुर सूखे अन्तःकरण पर कृपा बनकर बरसी। उसने अपना दृष्टिकोण बदला और पतन के पथ से स्वयं को मोड़कर प्रव्रज्या लेली। धर्म-कार्य में प्रवृत्त होते ही उसकी जीवन धारा ही बदल गयी।
नगर के देव मंदिर में उत्सव मनाया जा रहा था। नगर-वासियों ने प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक प्लेटो को भी आमंत्रित किया । मंदिर में जाकर प्लेटो ने एक नया दृश्य देखा । जो भी नगर वासी आता प्रतिमा के सामने एक पशु या पक्षी की बलि जरूर देता। पशु तड़फड़ाता और लोग खुशी से नाचने लगते। किन्तु जीव मात्र की अंतर्व्यथा की अनुभूति रखने वाले प्लेटो से यह दृश्य न देखा गया। वे उठकर चलने लगे। तभी मन्दिर के पुजारी ने उन्हें रोका और कहा कि मान्य अतिथि आज तो आप को भी बलि चढ़ाकर जाना होगा।
प्लेटो शान्ति पूर्वक उठे और थोड़ा सा पानी लेकर मिट्टी गीली की और एक छोटे से जानवर की आकृति बनाकर देव प्रतिमा के सामने रखकर तलवार चलाई और काट दिया तथा चलने लगे। इतने में अंध श्रद्धालु मुँह बिचकाते हुए बोले। वाह ! यह भी कोई बलिदान हुआ।
प्लेटो ने शान्ति से कहा-हाँ निर्जीव देवता के लिए निर्जीव भेंट ही उपयुक्त थी सो चढ़ा दी। प्लेटो के इस जवाब से सभी निरुत्तर हो गये। उसी दिन से वहाँ बलि प्रथा का अंत हो गया।
योगवाशिष्ठ में एक श्लोक है जिसमें गुरु वशिष्ठ कहते हैं --
“ आशापाश शताबद्धा बासनाभाव धारिणः। कायात्कायमुपायन्ति वृक्षाद्वृक्षमिवाण्डजा ॥ “
अर्थात् हे राम ! मनुष्य का मन सैकड़ों आशाओं - महत्वाकाँक्षाओं और वासनाओं के बंधन में बँधा हुआ मृत्यु के पश्चात उन छुद्र वासनाओं की पूर्ति करने वाली योनियों और शरीरों में उसी प्रकार चला जाता है जिस प्रकार एक पक्षी एक वृक्ष को छोड़कर फल की आशा से दूसरे वृक्ष पर जा बैठता है। इस प्रकार कितने ही व्यक्ति जीवन काल की इच्छा पूरी न होने पर मृत्योपराँत भी वे अतृप्त बने रहते हैं और विक्षुब्ध हो प्रेत योनि में जीवन काटते रहते हैं श्राद्ध-तर्पण संस्कार , पिण्डदान आदि के माध्यम से देव संस्कृति के उपक्रमों में इसी लक्ष्य को पूरा किया जाता है ताकि पूर्वजों की आत्मायें तथा अन्यान्य अतृप्त मृतात्मायें शान्ति व सद्गति प्राप्त कर सकें। पुनर्जन्म एवं कर्मफल की सुनिश्चितता पर पाश्चात्य मनीषियों को भी अब दृढ़ विश्वास हो चला है और इस संदर्भ में उनने भी अनेकों तथ्य एवं प्रमाण जुटायें है।
भारत ही नहीं , वरन् पाश्चात्य जगत में भी ऐसे अनेकों घटनाक्रम देखे जाते हैं जो प्रमाणित करते हैं कि अतृप्त आत्मायें बहुत दिनों तक प्रेत योनि में भटकती रहती हैं और जिस-तिस प्रकार अपनी आकाँक्षाओं - वासनाओं को पूरा करने का प्रयास करती हैं। प्रेत विद्या विशारदों में प्रमुख माने जाने वाले इंग्लैण्ड के श्री जे0 डी0 विलियम्स ने इस क्षेत्र में गहन अध्ययन एवं अनुसंधान किया है। प्रेत विद्या की गुत्थियों को सुलझाने के लिए वे विख्यात हैं। मैनचेस्टर के एक घर से उनको एक दंपत्ति का बुलावा ऐसी ही एक गुत्थी के समाधान हेतु आया।
घर की स्त्री जे0 डी0 विलियम्स को एक आलमारी के पास ले गयी। यहीं पर वह प्रेत था जो दिखाई तो नहीं दे रहा था, पूछे गये किसी भी प्रश्न और अपनी उपस्थिति का प्रमाण एक विशेष प्रकार की खटपट के द्वारा दे रहा था। उसके संकेत बड़े ही शिक्षित व्यक्तियों जैसे थे। अंग्रेजी वर्णमाला के प्रथम अक्षर ‘ए’ के लिए वह एक बार खट्-खट् की आवाज करता था और ‘बी’ के लिए दो बार खट्-खट् की आवाज करता था। इसके जो अक्षर जितने नम्बर पर पड़ता है , उस अक्षर के लिए उतने ही बार बिना रुके खट् खट् का उसने संकेत बना लिया था और उसी के माध्यम से वह पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी देता था।
यह खेल सारे दिन चलता रहा। घर के दूसरी ओर कोई वस्तु नहीं थी कि वहाँ से खट् खट् की आवाज आ रही होती। लोगों ने सारी संभावनायें पहले ही छानबीन कर ली थीं। विलियम्स को तो बहुत देर के बाद बुलाया गया था। उनकी परा विद्या में निष्णातता होने के कारण ही उन्हें बुलाया गया था। उन्होंने सब जाँच पड़ताल कर ली , पर उन्हें कोई भौतिक कारण न मिला जिससे खट्-खट् का सूत्र समझ में आता।
गृहणी ने सर्वप्रथम विलियम्स का परिचय प्रेत से कराया , फिर पूछा- क्या तुम यहाँ उपस्थित हो ? प्रेत ने उत्तर में सबसे पहले बिना रुके पच्चीस बार खट्-खट् की जिसका अर्थ अँग्रेजी का ‘वाई’ अक्षर था। फिर थोड़ा रुक कर 5 बार खट् खट् की और थोड़ा रुककर 19 बार खट् खट् की जिसका संकेत क्रमशः ‘ई’ और ‘एस’ था। इस तरह उसने अँग्रेजी में ‘ घश्वस् ‘ ‘ अर्थात् ‘हाँ’ कह कर वहाँ होने की सूचना दी।
इसके बाद विलियम्स ने उससे अनेक प्रश्न पूछे। प्रेतात्मा ने उनमें से अनेक प्रश्नों के उत्तर दिये , पर ऐसे किसी भी प्रश्न से सहमति प्रकट नहीं की , न उनके उत्तर ही बताये जो मनुष्य जाति के लिए अहितकर होते। उदाहरण के लिए जुये , सट्टे , शराब संबंधी प्रश्नों के उत्तर उसने नहीं बताये। उसका कहना था कि जिन बातों से वह स्वयं दुखी है , वह बातें नहीं बतायेगा। पर इससे एक बात स्पष्ट हो गयी कि मनुष्य को मृत्यु के बाद जीवन की अनेक घटनाओं की ही नहीं, भाषा आदि की भी जानकारी रहती है और उसमें भविष्य को भी जानने की क्षमता आ जाती है जो आत्म के गुण का परिचालक है।
एकाएक विलियम्स ने उससे पूछा “ आप कौन हैं, क्यों उपस्थित हुए हैं। “ इस प्रश्न के उत्तर में उसी खट्-खट् वाली विधि से उसने बताया - मैं इस मकान में रहता था। जब मैं वृद्ध था तभी मैंने अपने बच्चों से कह दिया था कि मुझे अमुक कब्रिस्तान में दफनाया गया। तब से मैं अतृप्त बना अपने घर का चक्कर काटता रहता हूँ।
इसके पश्चात् श्री विलियम्स ने लोगों से पूछ कर उस मकान में रहने वाले किरायेदारों का पता लगाया तो उनसे मालूम हुआ कि वास्तव में उस वृद्ध ने मृत्यु से पूर्व इस तरह की इच्छा व्यक्त की थी।
एक और विलक्षण बात थी कि वह प्रेतात्मा तभी तक यह खट्-खट् की आवाज करती थी जब तक घर में सबसे छोटा लड़का उपस्थित रहता था। पहले कई दिन जब-जब वह स्कूल या घर से बाहर रहा, उसने उपस्थिति नहीं दर्शायी। उस दिन श्री विलियम्स और अधिक खोजबीन करते के लिए एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और एक पादरी को भी साथ लाये थे। उनकी उपस्थिति में प्रेतात्मा एक दो बातों के सामान्य उत्तर दे ही रहा था कि लड़का जो आज कई दिन से छिपा-छिपा रह रहा था , इतना भयभीत हो गया कि उसे तीव्र ज्वर हो आया । उसे अस्पताल ले जाना पड़ा । इसके बाद उसके माता - पिता को भी बच्चे की ओर से बड़ी चिंता हो गयी और उन्होंने दूसरा मकान ढूँढ़कर उस मकान को ही बदल लिया।
परामनोविज्ञानी श्री विलियम्स ने भूत-प्रेत संबंधी जिन तथ्यों का पता लगाया, उनमें से कई जानकारी की दृष्टि से बड़े ही उपयोगी हैं। उनमें से प्रमुख यह कि भूत-प्रेत किसी का अहित नहीं कर सकते। यदि करते भी हैं तो मात्र इतना ही कि वह कोमल और भीरु मस्तिष्क वालों को ही डरा सकते हैं या उनके शरीर पर किसी तरह का नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं। दूसरे उनकी जिस वस्तु में इच्छा या आसक्ति होती है , वह केवल उतना ही सोचते रहते और उसी का दुख करते रहते हैं। जब तक उस अवस्था में भी उनकी इच्छा आकाँक्षा या आसक्ति शिथिल नहीं पड़ जाती , तब तक मृत्यु वाली निद्रा नहीं आती और जीवात्मा भटकती रहती है और ऐसी दशा में दूसरे जन्म की तैयारी भी नहीं कर पाती। अतृप्त कामनायें एवं आसक्ति मनुष्य को मृत्यु के बाद भी घुमाती रहती है यह एक अकाट्य सत्य है।
उस कलाकार की इच्छा थी कि अपनी समस्त कला को समेट कर एक अमर कलाकृति बनाए। इसमें पवित्र आत्मा और शैतान का समन्वित चित्रण हो। पवित्रात्मा का प्रतीक वह महाप्रभु ईसा को मानता था और शैतान का प्रतीक उस व्यक्ति को जिसने महाप्रभु को कोड़े लगाकर कीलें ठोककर मर्मान्तक पीड़ा देते हुए उनका प्राण हरण किया था। चित्र में दोनों को पवित्रता और क्रूरता के आमने-सामने खड़ा हुआ दिखाया जाना था।
चित्रकार ऐसे दो जीवना व्यक्ति देखना चाहता था जिनकी आवृत्ति में पवित्रात्मा और शैतान की प्रकृति का पूरी तरह आभास मिल सके। मात्र कल्पना से नहीं सजीव छवि देखकर उस प्रकार की आवृत्ति बनाने की बात उसके मन में जँच रही थी।
पहले उसने पवित्रात्मा की आकृति वाला मनुष्य ढूँढ़ना आरंभ किया । उसके लिए वह दूर-दूर तक भटका। हजारों लाखों मनुष्यों के चेहरे गौर से देखे पर वैसा कोई मिला ही नहीं। एक दिन भटकते - भटकते वह किसी अनाथालय में जा पहुँचा वहाँ उसने एक पाँच वर्ष के बालक को देखा। उसके अभिभावक मर गए थे और भाई-बहिन बिछुड़ गये थे । स्नेह छिन जाने से उसकी आँखों से करुणा और कातरता बरस रही थी। वह प्यार खो चुका था - प्यार पाना चाहता था । चित्रकार ने उसे पवित्रात्मा के अधिक समीप पाया और चित्र के लिए उस आकृति को उपयुक्त मान लिया।
अनाथालय के अधिकारी से चित्रकार ने दो घंटे के लिए उस बालक को माँग लिया। उसे अपने स्टूडियो ले गया । बहुत प्यार किया खिलाया-पिलाया और सामने बिठाकर कुछ ही देर में उसकी आकृति कागज पर उतार ली । इसके बाद उसे धन्यवाद कहकर वापस अनाथालय भेज दिया गया। ईसा की छवि के रूप में यह चेहरा उसे बहुत संतोष जनक प्रतीत हुआ।
बच्चे ने स्टूडियो में प्रवेश करते समय वहाँ जो स्नेह - सद्व्यवहार पाया उससे उसकी आँखों में एक नया उल्लास चमका । किन्तु थोड़ी देर बाद जब उसे फिर उस नीरस कटघरे में लौटा दिया गया तो बच्चा समझ गया कि स्नेह दुनिया में से उठ गया । प्रवेश करते समय और विदा होते समय का अंतर उसके सामने स्पष्ट था । जिस धन्यवाद को साथ लेकर वह वापस लौटा था वह बनावटी भी था और अपर्याप्त भी । स्नेह की प्यास की एक बूँद भी समाधान उसमें न मिल सहा।
यहाँ केवल मतलब के लिए दुलारने पुचकारने की प्रथा है। बच्चा मन पर भरोसा कर फिर अनाथालय में रहने लगा। स्नेह की एक झलक स्टूडियो में उसने जो देखी थी - उसमें भी उसने नकलीपन ही पाया । आशा की किरणें फिर कभी उसने देखी भी नहीं।
चित्रकार का आधा चित्र बना चुका था। अब कोड़े मारने वाले शैतान की क्रूर आकृति की आवश्यकता पड़ी ताकि उस कलाकृति में अधिक यथार्थता का समावेश हो सके। इसके लिए भी वह दूर दूर तक भटका । अब की बार उसे पवित्रात्मा का चेहरा ढूँढ़ने से भी अधिक कठिनाई हुई , वैसी आकृति मिलती ही न थी जिसमें नर पिशाच के सभी चिन्ह पाये जा सकें।
खोजबीन उसने बराबर जारी रखी ! चेहरे देखने और खोजने में बराबर लगा रहा। इस प्रयास में उसके बीस वर्ष गुजर गए। चित्र अधूरा ही पड़ा था। अंत में उसे एक जेलखाने में अपनी इच्छित आकृति मिल गई एक पच्चीस वर्षीय नौजवान लंबी कैद की सजा भुगत रहा था । उसने अनेकों वीभत्स अपराध किए थे। आजीवन कारावास का दंड उसे न्यायालय से मिला था। उसकी आँखें , होंठ , हँसी , भवें और चेहरे की प्रत्येक रेखा पर शैतान नाच रहा था। ऐसी भयंकर आकृति उसने इन बीस वर्षों में अन्यत्र कहीं नहीं देखी थी।
चित्रकार ने संतोष की साँस ली। जेल के अधिकारियों से संपर्क स्थापित किया और दो घंटे के लिए उसे स्टूडियो में ले जाने की सुविधा प्राप्त कर ली। कैदी सुरक्षा अधिकारियों के संरक्षण में स्टूडियो लाया गया । चित्रकार ने पूछा - आपका क्या आतिथ्य किया जाय ? कैदी ने व्हिस्की की याचना की , उसने कहा शराब मेरी प्रिय अभिलाषा थी , पर अब तो जेल में वह भी दुर्लभ हो गई है। पिला सकें तो जी भर व्हिस्की पिलाने का प्रबंध कर दीजिए।
इच्छानुसार उसे शराब पिलाई गई। सामने कुर्सी पर बैठा नशे में धुत कैदी और भी भयंकर लग रहा था। ऐसी ही आकृति की तो चित्रकार को जरूरत थी। वह बड़े उत्साह के साथ चेहरे को देख-देख चित्र बनाता चला गया और शैतान की आकृति ठीक-ठीक बन गई । अपनी इस सफलता पर उसे बहुत संतोष था।
धन्यवाद देकर जब कैदी विदा किया जाने लगा , जब उसने नम्रता पूर्वक पूछा-क्या मैं अपनी आकृति का चित्रण देख सकता हूँ। चित्रकार ने उसकी इच्छा पूरी की और जो चित्र बनाया था वह हाथ में थमा दिया । कैदी उसे देखकर अवाक् रह गया उसने महाप्रभु की पवित्रात्मा और शैतान की पैशाचिकता को बार-बार देखा और हतप्रभ होकर सिर खुजाने लगा। चित्रकार ने इस असमंजस का कारण पूछा। कैदी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कान के पास मुँह ले जाकर कहा-आप भूल गए-पवित्रात्मा का चित्र मेरा ही है। आप अनाथालय से मुझे ही अब से बीस वर्ष पूर्व इसी स्टूडियो में लाये थे और इसी कुर्सी पर बिठाकर मेरा चित्र खींचा था। बीस वर्ष पूर्व का पवित्रात्मा - इतनी छोटी अवधि में कैसे पिशाचात्मा बन गया। महाप्रभु की आकृति शैतान में बदल गई। चित्रकार इसका कारण न जान सका। वह स्वयं भी स्तब्ध खड़ा था।
समाधान उभरा स्नेह की प्यास धन्यवाद से शान्त न हो सकी। नीरस दुर्व्यवहार से उद्विग्न अंतःकरण भटकता हुआ अनाचार के गर्त में जा गिरा। चित्रकार सोचने लगा “उस बालक की तरह इस कैदी की भी कुछ माँग है जिसे संस्कारों का पोषण देकर पूरा किया जा सकता था किन्तु अन्य पिशाच स्तर के व्यक्ति भी ऐसे ही बनते हों। “
वैज्ञानिक भी अब यह मानने लगे हैं कि शरीर के न रहने पर भी कोई ऐसा तत्व विद्यमान रहता है जिसमें पिछले जन्म के क्रियाकलापों की स्मृतियाँ संजोई रहती है। भारतीय दर्शन में इसे आत्मा तथा जीव चेतना का नाम दिया गया है। जहां चिरकाल से ऐसा विश्वास प्रचलित है कि शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा विनष्ट नहीं होती । इस तथ्य की पुष्टि वैज्ञानिकों द्वारा की गयी जाँच पड़ताल से भी अब हो गयी है। इस तरह के प्रकरणों में जिस कठोरता से जाँच पड़ताल की गयी और पूर्व जन्म के संबंध , घटनाक्रम , वस्तुओं का स्वरूप एवं स्थान का विवरण जैसा बताया गया , वैसा ही पाया जाना , उन समस्त शंकाओं को निरस्त कर देता है , जिन्हें कभी अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता था। आत्मा की अमरता पर दृढ़ विश्वास जहाँ मनुष्य को जन्म-मृत्यु के भय से छुटकारा दिलाता है वहीं कर्मफल की सुनिश्चितता के लिए तथा ईश्वर पर आस्था रखने के लिए भी आवश्यक है कि पुनर्जन्म व्यवस्था में विश्वास बनाये रखा जाय।
वैज्ञानिकों के लिए पुनर्जन्म जैसे गुह्य एवं जटिल प्रश्न अब अनुत्तरित नहीं रहे। संसार में ऐसे अनेकों उदाहरण विद्यमान है जो मरणोत्तर जीवन एवं पुनर्जन्म जैसे गंभीर दार्शनिक तथ्यों को प्रमाणित करते हैं। पाश्चात्य परामनोविज्ञान वेत्ताओं द्वारा आत्मा की अमरता संबंधी मान्यताओं को सही प्रमाणित करने के लिए मैस्मेरिज्म एवं हिप्नोटिज्म की विधा के अतिरिक्त मीडियम द्वारा स्पिरिट कम्यूनीकेशन अर्थात् मृतात्माओं से संदेश आवर्तन एवं प्लेंचिट जैसी विधियां भी विकसित की गयी हैं जिनमें मृतात्माओं से संपर्क साधा और जानकारियां हासिल की जाती हैं। फ्राँस , अमेरिका , ब्रिटेन , आस्ट्रेलिया एवं कनाडा आदि देशों में इस पर व्यापक रूप से अनुसंधान चल रहे हैं। योरोप और अमेरिका में आध्यात्मिक आन्दोलन अपनी प्रगति पर हैं। उनकी मान्यता है कि पंच भौतिक शरीर से पृथक् एक सचेतन अधिष्ठात्री सत्ता है जिसे ‘स्पिरिट’ या आत्मा कहते हैं जो मरणोपराँत भी बनी रहती है। इन देशों में ‘गाइड’ संज्ञक कुछ व्यक्ति है जो ध्यानावस्थित हो जाने पर प्रेत लोक की जानकारी प्राप्त करने और बताने का उपक्रम करते हैं। एक अन्य पद्धति में जब किसी मृतात्मा को बुलाना होता है , तो मृत व्यक्ति के किसी संबंधी को सब्जेक्ट या माध्यम मानकर उसे मानसिक वार्ता अर्थात् सम्मोहन के प्रभाव से अर्धनिद्रित सा कर देते हैं और तब अन्य परिवारी जन उससे उस आहूत आत्मा के संबंध में प्रश्न करते हैं। माध्यम उत्तर देता है। उन उत्तरों की फिर छानबीन होती है। कई बार तो पुलिस भी उनकी सहायता लेकर अघन्य अपराधों, हत्याओं की रहस्यमय गुत्थियों को सुलझाने में सफल होती देखी गयी है। सम्मोहन की इस विधा पर सुप्रसिद्ध मनीषी हेलेन बामबच ने “लाइफ बिफोर लाइफ” नामक एक पुस्तक लिखी है। इसमें केवल वे ही प्रश्नोत्तर संग्रहित किये गये हैं जो हिप्नोटिक सब्जेक्ट में आहूत आत्मा से इस विषय पर पूछे गये थे कि गत जीवन में पैदा होने से पहले वे क्या थे और कहाँ थे ? इस पुस्तक में उन 750 आत्माओं के साक्षात्कार एवं अनुभव संग्रहित हैं जो पुनर्जन्म की घटनाओं का सत्यापन करते हैं, साथ ही इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि इस जन्म से पूर्व भी कोई जन्म था।
प्रायः संचित संस्कारों के अनुरूप ही दिवंगत आत्मायें नया शरीर धारण करती हैं। पुनर्जन्म की योनियाँ तो वे स्वयं चुनती हैं अथवा अन्य आत्मायें उन्हें कुछ तद्विषयक परामर्श देती हैं। इस संबंध में की गई गहन खोजों का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए वामबच ने अपनी उक्त कृति में बताया है कि प्रायः 71 प्रतिशत आत्माओं का कहना था कि उन्होंने स्वयं ही किसी परिवार या योनि का चयन किया था। इनमें में बहुतों ने परामर्श का मिलना भी बताया। 27 प्रतिशत आत्माओं का कहना था कि उनका स्वयं का निर्णय था कि पुनः जन्म धारण करें किसी ने चुनाव करने को नहीं कहा। लगभग 3 प्रतिशत का मत था कि उन्होंने परामर्श के विरुद्ध अपना स्वतंत्र निर्णय लिया था, तो 19 प्रतिशत आत्माओं के अनुसार वे फिर से पैदा होना नहीं चाहती थीं और न ही उन्हें याद है कि किसी ने उन्हें इसके लिए परामर्श किया। जबकि 51 प्रतिशत दिवंगत आत्माओं ने बताया कि एक से अधिक परामर्श दात्री आत्मायें थीं। 19 प्रतिशत का कहना था कि सूक्ष्म लोक की सत्ताओं के संपर्क में आने पर ही उन्हें इस तरह के परामर्श मिले थे। इसमें से अधिकाँश प्रेत या पितर आत्मायें थीं जो प्रश्नोत्तर वाले दिन से पूर्व ही मर चुके थे।
अमेरिका के विख्यात पादरी एवं परामनोविज्ञानी नार्मन विंसेन्नपील ने अपनी कृति “द जाँइ आफ पॉजिटिव लिविंग” में दिवंगत आत्माओं से क्लेयरवायेन्स पद्धति से संपर्क कायम करके जीवात्मा की अमरता का सिद्धाँत प्रतिपादित किया है। उनका कहना है कि मृत्यु के उपरांत उच्चतम एवं सुख कर जीवन प्रारम्भ होता है। पूर्व संचित संस्कार इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उइया बोर्ड - (प्लाँचिट) द्वारा भी मृतात्माओं से संपर्क स्थापित किया जाता है। पाश्चात्य जगत में इस विधा का काफी प्रचलन है। नाटिंघम विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैनिक डॉ0 एलन गाऊड ने इस संदर्भ में गंभीरता पूर्वक जाँच पड़ताल ही है और इस प्रक्रिया द्वारा मृतात्माओं से मिली जानकारियों को सही बताया है। उदाहरण के लिए सन् 1950 में घटी एक घटना के बारे में हैरी स्टाक ब्रिज की मृतात्मा ने जो जानकारियाँ दीं जिसमें उसकी 14 जुलाई की मृत्यु तारीख भी सम्मिलित थी, मृत्यु प्रमाण पत्र देखने पर सही पायी गयी, जबकि दस्तावेजों में उसकी मृत्यु 17 जुलाई उसकी स्मृति पट पर उभारा जाता है और उनका विश्लेषण कर पूर्व जन्म की घटनाओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है। पश्चिम जर्मनी की विख्यात मनोचिकित्सक डॉ0 हीडे फिट्टाकाड ने इस संदर्भ में विशेष ख्याति अर्जित की है। वे सम्मोहन द्वारा रोगियों का उपचार करती है। उनका कहना है कि मनुष्य के रोगों की जड़ें प्रायः उनके प्रायः उनके पूर्व जन्म के लिये गये कर्मजं या संस्कारों में होती हैं। पूर्वजन्म की घटनायें भी व्यक्ति के अगले जीवन को प्रभावित करती हैं। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उनने बताया कि एक रोगी को प्रायः अपनी हत्या कर दिये जाने का भय सताता रहता था। सम्मोहन की स्थिति में जब उसका कारण पूछा गया तो ज्ञात हुआ कि पूर्व जीवन में उसकी क्रूरता पूर्वक हत्या कर दी गई थी। पूर्व जन्म की स्मृति या संस्कार अचेतन मन पर सर्वाधिक प्रभाव डालते हैं।
“द बुक आफ लिस्ट्स” नामक प्रसिद्ध पुस्तक में विद्वान लेखक डेविड वेलेचिंस्की ने पुनर्जन्म की अनेकों प्रमाणिक घटनाओं का वर्ण किया है। उनके अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख योद्धा रहे अमरीकी जनरल जार्ज पैटर्न को अपने पिछले छः जन्मों की स्मृति थी। संयोग वश इन सभी जन्मों में वे सेना में ही कार्यरत रहे। प्रथम जन्म में वे प्रागैतिहासिक काल में एक योद्धा थे। दूसरे में ग्रीक योद्धा, जो साइप्रस के राजा के विरुद्ध लड़ते हुए मारे गये। तीसरे जन्म में सिकन्दर की सेना में तो चौथे में जूलियस सीजर के साथ थे। पाँचवे में अंग्रेजों की सेना में “नाइट योद्धा” के नाम से प्रसिद्ध थे, जिसने ‘हंड्रेड इयर्स वार” के समय क्रेसी युद्ध में भाग लिया था और दुश्मनों के दाँत खट्टे किये थे। छठे जन्म में वह नेपोलियन की सेना में मार्शल थे। अमेरिका की प्रसिद्ध मनः चिकित्सक रुथ मोंटगोमेरी ने भी ऐसी अनेकों घटनाओं का वर्णन किया है जिनसे सिद्ध होता है कि मृत्यु के पश्चात् भी जीवन बना रहता है और वह अपना नया कलेवर पुनः मनुष्य रूप में ही धारणा करता है।
तिब्बत में बौद्ध धर्म के मतानुयायियों के अनुसार जीवन मुक्त आत्माएँ समूची मानव जाति के कल्याण हेतु धरती पर अवतरित होती हैं। लामाओं के पुनर्जन्म की घटनायें भी कभी-कभी प्रकाश में आती रहती हैं। पिछले दिनों स्पेन में जन्मा दो वर्षीय बालक ओजेल अपना पूर्व जन्म तिब्बत के लामा परिवार में बताता है।
उसका नाम मुलिक थाश्। वह व्याध था। पशु पक्षियों का ही व्याध नहीं, वह मनुष्यों का भी व्याध था। हिंसा एवं लूट-पाट की उसके व्यसन एवं व्यवसाय थे। वह इतना निर्दयी और अकरुण था कि लोग उसका नाम सुनते ही कांपने लगते थे। नित्य प्रति लोगों को लूटना और मारना उसका स्वभावगत पेशा था। इसी के आधार पर उसकी और उसके परिवार की आजीविका चलती थी।
संयोगवश एक दिन उसे कोई शिकार न मिल सका। सवेरे से शाम तक वह शिकार की घात में घूमता रहा। किंतु निराशा के सिवाय उसके हाथ कुछ न लगा। निराशा, भूख और परिवार की चिंता ने उसे इतना व्यग्र कर दिया कि वह बस्ती की ओर चल दिया। वह बस्ती से कुछ दूर स्थित एक मंदिर के समीप पहुंचा और दूर से अनुमान लगा लिया कि इस स्थान पर अर्थ सिद्धि हो सकती है। किंतु उस समय उस मंदिर में अनेक व्यक्ति मौजूद थे, इसलिये अवसर न देखकर वह रात होने तक के लिये वापस चला गया।
उस मंदिर के अधिष्ठाता एक वयोवृद्ध बाबाजी थे, नाम था सत्यजित। वे अपने सद्व्यवहार , संयम निवम, उदारता और ज्ञान के लिए उस जनपद में प्रसिद्ध थे। वे लोगों का दुःख दूर करने और उनकी सहायता करने में सदा तत्पर रहते थे। लोग उन्हें बड़ी श्रद्धा से देखते थे। दूर-दूर से लोग उनका सत्संग करने आते थे, और अन्न वस्त्र, दूध, दही और धन आदि, जो जिसके किए होता था दे जाते थे। किंतु वे पाई हुई सामग्री का अधिकाँश भाग, अतिथियों, गरीबों, यात्रियों आवश्यकताग्रस्त लोगों की सहायता में लगा देते थे। वे बड़े त्यागी और उदार प्रवृत्ति के थे।
संध्या गहरी होने लगी। बाबा ने सत्संग समाप्त करके श्रृंगार आरती की और आगंतुकों को प्रसाद देकर विदा कर दिया। वे सदा ध्यान रखाते थे कि आये हुये लोगों का ज्यादा देर न हो जाये। क्योंकि तब मार्ग में गुलिक के आक्रमण का डर हो जाता था। गुलिक व्याध-व्याघ्र से भी अधिक संघातिक है- यह बात सत्यजित अच्छी तरह जानते थे।
देवता की शयन सेवा के बाद सत्यजित मंदिर बन्द कर के अपने आसन पर बैठकर ध्यान मग्न हो गये। आज वे अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ विशेष अनुभव कर रहे थे। उनका हृदय आज कुछ अधिक आर्द्र होकर भगवान के चरणों में सन्मय हो रहा था। कारण की चिंता से निरपेक्ष वे भजन का आनंद ले रहे थे। तभी बाहर दरवाजे पर थाप लगी। वह एक बार ध्यान देकर फिर भजन में डूब गये। अबकी बार थपथपाहट के साथ एक कर्कश आवाज भी थी। दरवाजा खोलिये। “ कौन है भाई ?” बाबा ने पूछा। “ एक भूखा यात्री।” उत्तर आया। ‘ एक भूखा यात्री। मन ही मन दोहराते हुए पुजारी बाबा ने उठ कर साँकल खेल दी और कहा, “ आ जाइये अंदर आ जाइए “ आप न भी कहते तब भी मैं बाहर न खड़ा रहता “ - कहते हुये कठोर अवयव वाले उस भयानक दस्यु ने हाथ में परशु लिये हुये मंदिर में प्रवेश किया।
“ सत्यजित ने देखा और कहा- गुलिक ! हाँ ! गुलिक ही नहीं गुलिक व्याध। इस प्राँत का व्याघ्र गुलिक “- कहते हुये उसने बाबा की गर्दन पकड़कर गिरा दिया और उनकी छाती पर चढ़कर कमर से कटार निकाल ली किंतु उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पुजारी बाबा भयभीत होने के स्थान पर हँस रहे थे। उनके मुख पर किसी प्रकार की विकृति का कोई चिन्ह नहीं है। उनका मुख एक विलक्षण तेज से चमक रहा है। यह उसके लिये एक सर्वथा नया और आश्चर्यजनक दृश्य था। उसकी उठी हुई कटार नीची हो गई।
गुलिक ने प्रभावित वाणी में पूछा, “ मौत के मुख में पड़े हुये भी तुम हँस रहे हो। जिस स्थिति में लोग बिना मारे ही मर जाते हैं उस स्थिति में तुम्हारी यह निर्भयता मुझे इसका कारण जानकर ही तुम्हारी हत्या करूंगा।”
बाबा ने हँसते हुए पूछा, “ पहले तुम मुझे यह बताओ कि तुम मेरी हत्या क्यों करना चाहते हो ?” आज सवेरे से मैं और मेरा परिवार भूखा है। मुझे कहीं कोई शिकार नहीं मिला है। इसलिए आपको लूटने का निश्चय किया है। ‘ गुलिक ने अपना मंतव्य बतलाया। बाबा ने कहा, “ इसके लिए मुझे मारने और लूटने की क्या आवश्यकता है। तुम्हें जिस वस्तु की आवश्यकता हो वैसे ही ले जा सकते हो। यह द्वार तो सबके लिए सदा समान रूप से खुला हुआ है। “ बाबा ने अपनी बात कही।
गुलिक ने कहा मैं किसी का दिया हुआ नहीं लेता मैं तो अपने पराक्रम से कमाया हुआ भोजन स्वीकार करता हूँ और बिना कभी किसी की कोई वस्तु नहीं लेता, यह मेरा नियम है। अब जल्दी ही मुझे अपनी इस निर्भय हँसी का रहस्य बतलाइये, जिससे मैं अविलंब अपना काम पूरा करूं।”
“ क्या तुम्हारे माता-पिता, भाई -बन्धु जीवित हैं ? “ बाबा ने पूछा। “ नहीं, वे सब कब के मर चुके हैं। “ गुलिक ने उत्तर दिया। उनके मरने पर तूने या तेरे संबंधियों ने क्या किया ?” बाबा ने फिर पूछा। “ मरने के बाद उन्हें श्मशान ले जाया गया। चिता पर रख कर एक लुकारी से उनका मुँह झुलसाया गया और चिता में आग लगा उन्हें जला दिया गया। अंत में श्राद्ध आदि हुआ और कुटुँब के लोगों को भोज दिया गया। सबने प्रीति पूर्वक पूरी-पकवान और मिठाई खाई और परिवार को पवित्र किया। वस यही सब हुआ और किया गा। “ गुलिक ने पूरी कहानी सुना दी।”
“ सत्यजित ने मुस्कराते हुए कहा कि बस, इसी में मेरी हँसी का रहस्य छिपा हुआ है। इसी प्रकार जब तुम भी मृत्यु के अतिथि बनकर इस संसार से विदा होगे तब तुम्हें भी केवल लुकारी ही मिलेगी और तुम्हारे नाम पर लोग पूरी-पकवान आदि खायेंगे। तब तुम, पता नहीं , इस निस्सार एवं नश्वर जीवन में पाप क्यों कमा रहे हो। तुम्हारी इसी अबोधता को सोच-सोचकर मुझे हँसी आ रही है।” बाबा ने अपनी बात समाप्त कर दी।
“ सत्यजित ने मुस्कराते हुए कहा कि बस, इसी में मेरी हँसी का रहस्य छिपा हुआ है। इसी प्रकार जब तुम भी मृत्यु के अतिथि बनकर इस संसार से विदा होगे तब तुम्हें भी केवल लुकारी ही मिलेगी और तुम्हारे नाम पर लोग पूरी-पकवान आदि खायेंगे। तब तुम, पता नहीं , इस निस्सार एवं नश्वर जीवन में पाप क्यों कमा रहे हो। तुम्हारी इसी अबोधता को सोच-सोचकर मुझे हँसी आ रही है।” बाबा ने अपनी बात समाप्त कर दी।
गुलिक ने अपने सारे अस्त्र-शस्त्र नदी में बहा दिये और उसी दिन से सत्यजित के निर्देशानुसार सदाचरण में रत होकर एक संत का जीवन व्यतीत करने लगा। कुसंयोग से भी हुये एक सच्चे संत के समागम ने गुलिक जैसे दुर्दांत दानव को सच्चा मानव बनाकर अपना प्रभाव प्रमाणित कर दिया। धन्य है संत-समागम !
जीवनी शक्ति संवर्धन के निमित्त एक विलक्षण उपचार प्राण विद्या के अध्येताओं ने प्राणायाम के अनेक विधान खोजे हैं उनमें से कई तो ऐसे हैं जो स्वल्प समय में अपार शक्ति देते हैं पर वे निरापद नहीं होते, लोम विलोम प्राणायाम कुण्डलिनी साधना का ऐसा प्राणायाम है जिनमें हानि की कतई संभावना नहीं।
1 - किसी शाँत एकाँत स्थान में प्रातः काल स्थिर चित होकर बैठ जाइये। पूर्व की ओर मुख, पालथी मारकर सरल पद्मासन से बैठना, मेरुदण्ड सीधा, नेत्र अधखुले, घुटनों पर दोनों हाथ यह प्राण मुद्रा कह लाती है, इसी पर बैठना चाहिए।
2 - बाएँ हाथ को मोड़कर तिरछा कीजिये। उसकी हथेली पर दाहिने हाथ की कोहनी रखिए। दाहिना हाथ ऊपर उठाइए। अंगूठा दाहिने नथुने पर और मध्यमा तथा अनामिका उंगलियाँ बाएँ नथुने पर रखिये।
3 - बाएँ नासिका के छिद्र को मध्यमा ( बीच की ) और अनामिका ( तीसरी नंबर ) की उँगली से बदल कर लीजिये। दाहिने नथुने से धीरे-धीरे साँस खींचना आरंभ कीजिये। साँस फेफड़े तक ही सीमित न रहे, उसे नाभि तक ले जाना चाहिए और धीरे-धीरे इतनी वायु पेट में ले जानी चाहिए जिससे वह पूरी तरह फूल जाय।
4 - ध्यान कीजिए कि सूर्य की किरणों जैसा प्रवाह वायु में सम्मिश्रित होकर दाहिने नासिका छिद्र में अवस्थित पिंगला नाड़ी द्वारा अपने शरीर में प्रवेश कर रहा है और उसकी ऊष्मा अपने भीतरी अंग-प्रत्यंगों को तेजस्वी बना रही है।
5 - साँस को कुछ देर भीतर रोकिये। दोनों नासिका छिद्र बंद कर लीजिये और ध्यान कीजिये कि प्राण वायु द्वारा एकत्रित हुआ तेज नाभि चक्र में एकत्रित हो रहा है। नाभि स्थल में चिरकाल से प्रसुप्त पड़ा सूर्य चक्र इस आगत प्रकाशवान प्राण वायु से प्रभावित होकर प्रकाशवान् हो रहा है और उसकी चमक बढ़ती जा रही है।
6 - दाहिने नासिका छिद्र को अंगूठे से बंद कर लीजिये। बाँया खोल दीजिये। साँस को धीरे-धीरे बाँए नथुने से बाहर निकालिये और ध्यान कीजिये कि सूर्य चक्र को सुषुप्त और धुँधला बनाये रहने वाले कल्मष इस छोड़ी हुई साँस के साथ बाहर निकल रहे हैं। इन कल्मषों से मिल जाने के कारण साँस खींचते समय जो शुभ्र वर्ण तेजस्वी प्रकाश भीतर गया था वह अब मलीन हो गया और पीतवर्ण होकर साँस के साथ बाँए नथुने की इड़ा नाडी द्वारा बाहर निकल रहा है।
7 - दोनों नथुने फिर बंद कर लीजिए। फेफड़ों को बिना साँस के खाली रखिए। ध्यान कीजिए कि बाहरी प्राण बाहर रोक दिया गया है। उसका दबाव भीतर प्राण पर बिलकुल भी न रहने से वह हलका हो गया है। नाभिचक्र में जितना प्राण सूर्य पिण्ड की तरह एकत्रित था वह तेज पुँज की तरह ऊपर की ओर अग्रिम शिखाओं की तरह ऊपर उठ रहा है। उसकी लपटें पेट के ऊर्ध्व भाग, फुफ्फुस को बेधती हुई कंठ तक पहुँच रही है। भीतरी अवयवों में सुषुम्ना नाड़ी में से प्रस्फुटित हुआ यह प्राण तेज अंतः प्रदेश को प्रकाशवान बना रहा है।
8 - अंगूठा से दाहिना छिद्र बंद कीजिये और बांये नथुने से साँस खींचते हुए ध्यान कीजिये कि इड़ा नाड़ी द्वारा सूर्य प्रकाश जैसा प्राण तत्व साँस से मिल कर भीतर प्रवेश कर रहा है और वह तेज सुषुम्ना विनिर्मित नाभिस्थल के सूर्य चक्र में प्रवेश कर रहा है। इस तेज संचय से सूर्य चक्र क्रमशः अधिक तेजस्वी बनता चला जा रहा है।
9 - दोनों नासिका छिद्रों को बंद कर लीजिये। साँस को भीतर रोकिये। ध्यान कीजिये कि साँस के साथ एकत्रित किया हुआ तेजस्वी प्राण नाभि स्थित सूर्य चक्र में अपनी तेजस्विता निरंतर बढ़ रही है और वह अपनी लपटें पुनः ऊपर की ओर अग्रिम शिक्षा की तरह ऊर्ध्वगामी बना रही है। इस तेज से सुषुम्ना नाड़ी निरंतर परिपुष्ट हो रही है।
10 - बाँया नथुना बंद कीजिये और दाहिने से साँस धीरे-धीरे बाहर निकालिये। ध्यान कीजिये कि सूर्य चक्र का कल्मष धुएँ की तरह तेजस्वी साँस में मिलकर उसे धुँधला पीला कर रहा है और पीली प्राण वायु पिंगला नाड़ी द्वारा बाहर निकल रही है। भीतरी कषाय कल्मष बाहर निकलने से अंतः करण बहुत हलका हो रहा है।
11 - दोनों नासिका छिद्रों को पुनः बंद कीजिए और उपरोक्त नं0 6 की तरह फेफड़ों को साँस से बिलकुल खाली रखिए। नाभिचक्र से कंठ तक सुषुम्ना का प्रकाश पुँज ऊपर उठता देखिए। भीतर अवयवों में एक दिव्य ज्योति जगमगाती अनुभव कीजिए।
यह एक लोम विलोम सूर्य वेधन प्राणायाम हुआ। साँस के साथ खींचा हुआ प्राण नाभि में स्थित सूर्य चक्र को जाग्रत करता है। उसके आलस्य और अंधकार को बेधता है और वह सूर्य चक्र अपनी परिधि को वेधन करता हुआ सुषुम्ना मार्ग से उदर, छाती और कंठ तक अपना तेज फेंकता है। इन कारणों से इसे सूर्य वेधन कहते हैं। लोम कहते हैं सीधे को, विलोम कहते हैं उलटे को। एक बार सीधा, एक बार उल्टा। फिर उल्टा फिर सीधा। फिर उल्टा फिर सीधा । फिर उल्टा फिर सीधा। बाँए से खींचना , दाँये से निकालना। दाहिने से खींचना बाँये से निकालना। यह उल्टा सीधा च रहने से इसे लोम-विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम कहा जाता है। साँस खींचने को पूरक रोकने को अंतःकुम्भक, निकालने को रेचक और बाहर साँस रोकने को वाह्यकुम्भक कहते हैं। बांये स्वर में चंद्र धारा एवं इड़ा नाड़ी और दाहिने स्वर में सूर्यधारा एवं पिंगला नाड़ी अवस्थित हैं। दोनों के मिलने के स्थान पर जो प्रकाश पुँज एवं तड़ित प्राण उत्पन्न होता है उसे सुषुम्ना कहते हैं। यह परिभाषा भी हमें स्मरण रखनी चाहिए। एक बार उलटा, एक बार सीधा। एक बार दाँए से खींचना बाँए से निकालना, एक बार बाँए से खींचकर दाँए से निकालना, यह दोनों क्रियायें मिलने से एक पूर्ण लोम-विलोम सूर्य वेधन प्राणायाम बनता है। आरंभ में इन्हें तीन की संख्या से करना चाहिए। फिर हर महीने एक बढ़ाते हुए सात महीनों में इन्हें दस तक पहुँचा देना चाहिए। साँस को छोड़ने निकालने की क्रिया जितनी धीमी रखी जा सके उतनी ही अच्छी है। ध्यान रखिये कि भावना जितनी ही गहरी होगी उतना ही अधिक सत्परिणाम उत्पन्न होगा।
गायत्री का देवता सविता है। सविता सूर्य का एक जाज्वल्य मान रूप है। प्रथम कक्षा के साधकों को प्रतिमा के आधार पर ध्यान करना पड़ता है पर उसमें भी सूर्य मण्डल के मध्य में अवस्थित माता की प्रतिमा होती है। इससे ऊंची कक्षा में सूर्य के समान गोलाकार प्रकाशपुँज ही गायत्री माता का स्वरूप रह जाता है और उसी का ध्यान करते हैं। यह ध्यान करने योग्य प्रकाश पर्याप्त मात्रा में अपने अंतः प्रदेश में संव्याप्त होता है तो यह प्रकाश पुँज का ध्यान ठीक प्रकार से जमता है। इस उद्देश्य की पूर्ति इस सूर्य प्राणायाम से होती है। अपने भीतर बाहर सब कुछ प्रकाशवान दीखता है। तमोगुण रूपी अंधकार तिरोहित होने लगता है और यदा कदा आध्यात्मिक चेतनाएँ विभिन्न रंग रूप के ज्योति स्फुल्लिंगों के रूप में साधकों को परिलक्षित होती रहती है। प्रकाश दर्शन की अनुभूतियाँ आशा और उल्लास की प्रतीक मानी जाती है।
प्राण तत्व की एक उपयुक्त मात्रा इस प्राणायाम से साधकों को उपलब्ध होती है। यह मात्रा थोड़ी होते हुए भी अपनी शारीरिक , मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में बहुत सहायक होती है। प्राण को निग्रहित करने से मनुष्य मन चाही आयु प्राप्त कर सकता है। भीष्म की तरह शरशय्या पर पड़े हुए भी छः महीनों तक मृत्यु को टाल सकता है। इच्छानुसार जब चाहे समाधि लेकर प्राण-त्याग कर सकता है। साधारण जीवन में वह एक शक्ति पुँज बिजली घर के समान सिद्ध होता है जिसकी प्रेरणा से उसका निज का जीवन ही नहीं, संबंधित वातावरण भी सुदूर देशों तक प्रभावित होता है प्राण की महत्ता असाधारण है और वैसी ही प्राणायाम की भी।
किसी से दो टूक शत्रुता मत करो। शत्रु से भी इतना संबंध तो बनाए रखो कि साथ-साथ बैठ सको और घुल-घुलकर बातें कर सको। मित्र से मित्रता छोड़नी है तो उससे झगड़ों मत वरन् धीरे-धीरे प्रेम कम कर दो।
किसी से दो टूक शत्रुता मत करो। शत्रु से भी इतना संबंध तो बनाए रखो कि साथ-साथ बैठ सको और घुल-घुलकर बातें कर सको। मित्र से मित्रता छोड़नी है तो उससे झगड़ों मत वरन् धीरे-धीरे प्रेम कम कर दो।
केवल योग्यता से ही काम नहीं चलता। उसके साथ चातुर्य भी होना चाहिए। उसके साथ चातुर्य भी होना चाहिए। जो अपनी योग्यता प्रकट कर सकता है, यह योग्य है और यह “प्रकट कर सकना” चतुरता पर निर्भर है।
पत्थर से सिर मत मारो। जो तुम्हारी शक्ति के बाहर की बात है, उसे करना अपनी शक्ति का अपव्यय करना है। पत्थर तोड़ने वाले उसके मुकाबिले का शत्रु ढूँढ लाते हैं। बारूद की सुरंगों से ही बड़ी-बड़ी चट्टानें उड़ाई जाती हैं।
कुशल मूर्तिकार चित्र सेन को बंदी बनाने राज्य के सैनिक जब पहुँचे तब तक उसने अपनी ही अनेक मूर्तियाँ बना डाली और उनके बीच स्व मूर्तिवत् बैठ गया। पहचानना कठिन था कि असली चित्रसेन कौन सा है। सैनिक असमंजस में पड़ गये। कुछ विचार कर एक चतुर सैनिक कहा । यह कितनी सुँदर मूर्तियाँ हैं। इन्हें बनाने वाला निश्चय ही उच्च कोटि का कलाकार है” प्रशंसा सुनकर मूर्तिवत् बैठे चित्रसेन के चेहरे पर चमक आ गई।
सैनिक ने मुस्कुरा कर कहा “ लेकिन अभी कुछ कमी है।” “ कौन सी कमी है ?” आवेश में आकर चित्रसेन खड़ा हो गया। सैनिक ने तुरंत कलाई पकड़ली और बंदी बनाते हुए बोला बस यही कि अभी अहंकार विगलित नहीं हुआ है। चित्रकार अपनी मूर्खता पर सिर धुनता रह गया।
एक समृद्ध परिवार में दो भाई थे । काफी बड़ी जागीर थी। दोनों की शिक्षा दीक्षा भी संपन्न हुई। संस्कार एवं गलत संगत में पड़ जाने के कारण एक भाई को जुआ खेलने की आदत पड़ गई। सारी संपत्ति नष्ट हो जाने पर चोरी करने लगा। साथ ही उसमें कई बुराइयाँ घर कर गई। दूसरा भाई लोगों की दृष्टि में बड़ा प्रतिष्ठित था। वह समाज की भलाई के काम में हाथ बँटाता, सदाचार का जीवन बिताकर जितनी दूसरों की भलाई हो सकती थी, उतनी करता। लोग उसका बड़ा सम्मान करते।
एक ही कुल, एक ही परिस्थिति, एक ही वातावरण, फिर भी दोनों की दो विपरीत ध्रुवों जैसी स्थिति । ऐसा क्यों ? इसका एक ही उत्तर है कि पहले ने अपने जीवन में मनुष्यता की राह को भूलकर हैवानियत की राह अपनाई । दूसरे ने सही राह चलकर अपने को पूर्ण मनुष्य के रूप में विकसित किया।
असमर्थ और अविकसित बालक मात्र अपनी ही आवश्यकताओं को जताते और जिस-तिस की सहायता से काम चलाते हैं, किंतु जब वे बड़े होने लगते हैं, विकासक्रम के अनुसार दूसरों का हाथ बँटाने लगते हैं। समझदारी और समर्थता साथ-साथ बढ़ती है। इस बढ़ोत्तरी को क्षुद्रता अपनी ही सीमा में समेट कर रखना चाहती है। ओछेपन का चिंतन यही कहता कि अपनी बढ़ोत्तरी का लाभ अपने तक ही सीमित क्यों न रखा जाय ? दूसरों से किसी प्रकार झटक कर अपनी ही सुविधाओं को क्यों न बढ़ाया जाय? बात जिनके गले उतर जाती है, वे मात्र स्वार्थपरता को ध्यान में रखने और उसी की पूर्ति करने में लगे रहते हैं, किंतु प्रकृति व्यवस्था और अंतरात्मा इस नीति को अपनाने पर चिक्कारती भी है और बदले में उसे महानताजन्य लाभ उठाने से वंचित ही रखती है। उदारता के अभाव में कोई दयनीय और तिरस्कृत स्थिति में रहने के लिए ही विवश रह सकता है।
बच्चा बड़ा होता है और वह परिवार के अभिभावकों के कामों में यथाशक्ति हाथ बँटाने लगता है। इसके लिए उसे कोई , अतिरिक्त वेतन-पुरस्कार नहीं मिलता कोई, दबाव भी नहीं डालता। इतने पर भी वह अपनी प्रसन्नता के लिए, गरिमा उपयोगिता बढ़ाने के लिए गृह-व्यवस्था में किसी न किसी प्रकार भागीदार बनता ही है। इसी आधार पर यह समझा जाता है कि उसकी गरिमा-उपयोगिता किस क्रम से विकसित हो रही है। वह अपने से छोटे-भाई बहनों के प्रति तो सहज उदारता अपनाये रहता है। उन्हें खिलाने-पढ़ाने में यथा संभव मदद भी करता है। न करे और अपनी ही सुविधा की बात सोचता रहे, सहयोग में अरुचि दिखाये तो उसका मूल्य परिवार के सभी सदस्यों की दृष्टि में घट जाता है। उस पर स्नेह सद्भाव नहीं बरसता, जो उदार तत्परता अपनाने पर सहज ही बरस सकता था।
किशोरावस्था को पार करके जब विवाह-बंधन में बँधता है, तो साथ-साथ उसे उदारता, सहकारिता से भरी नीति भी अपनानी पड़ती है। अपनी सुविधाओं में कमी करके भी पत्नी की सुविधा-प्रसन्नता का विशेष रूप से ध्यान रखना पड़ता है। इसके बिना निष्ठुरता के रहते दाँपत्य जीवन भी नीरस रहेगा। बदले में वह प्रतिक्रिया हस्तगत नहीं हो सकेगी जिसके लिए विवाह से पूर्व बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाई गई और सपने सँजोये गये थे। इस संसार में “ इस हाथ दे और उस हाथ ले “ की सुनिश्चित परंपरा है। जो मात्र लेते की ही बात सोचते हैं, वे दूसरों की सद्भावना गंवा बैठते हैं और उतने भर से काम चलाते हैं, जितना कि अपने प्रयत्न से एकत्रित कर लिया गया था। अन्यान्यों का सद्भाव और सहयोग पाने पर ही प्रसन्नता-प्रफुल्लता और प्रगति का सुयोग बनता है। अपनी कमाई अपने लिए ही सीमित रखने वाला विश्व की सुनिश्चित परंपरा का उल्लंघन करता है। इसलिए घाटे पर घाटा सहता चला जाता है। संकीर्ण स्वार्थपरता उलट कर नीरसता और दरिद्रता ही लाद कर चली जाती है। उस स्नेह-सहयोग का अभाव की बना रहता है, जो प्रफुल्लित और प्रगतिशील बनने के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यकता है। अनुदारों का दाँपत्य जीवन भी कर्कश ही रहता है।
आगे बढ़ने पर बच्चे उत्पन्न होते हैं। उनकी सेवा सहायता के लिए पति-पत्नी दोनों को ही अपने शौक-मौज में कटौती करनी पड़ती है। प्रौढ़ता में प्रवेश करते-करते परिवार को सुरभित-सुवासित करने की नई जिम्मेदारियाँ सिर पर आती है। उन्हें पूरी करने के लिए अधिक श्रम करने, अधिक ध्यान देने और अपने लिए मितव्ययिता बरतने की आवश्यकता पड़ती है। यदि कोई कमाऊ व्यक्ति अपनी कमाई आप ही खाता रहने लगे, तो समझना चाहिए कि अपने अधिकारों से वंचित परिवार का हर सदस्य बागी- होने लगेगा ? और (दूर के रिश्तेदार सबसे अच्छे। वे जितने निकटवर्ती होंगे, उतना ही हैरान करेंगे। ) पारिवारिक सहयोग से उत्पन्न उल्लास में भारी कमी पड़ जायेगी। यह सोच कर हर समझदारियों को ध्यान में रखते हुए अपने लिए कम-से कम खर्च करता है। कमाई को परिवार की सुव्यवस्था में ही लगाता रहता है। यह नीतिमत्ता परिवार के हर सदस्य को प्रसन्न रखती है, उनके विकास में सहायता करती है। फलस्वरूप गृह संचालक को उसका श्रेय हाथों हाथ मिलता जाता है। उदारता र्व्यथ नहीं जाती, फलवती होकर बरतने वाले के लिए ऐसे सत्परिणाम सामने लाती है, जिसके फलस्वरूप उसे संतोष सम्मान और प्रशंसा ही उपलब्ध होते रहते हैं। अपने सुविधा-साधनों में जो कटौती करनी पड़ी, उस कमी के लिए उसे अपने या अन्य किसी से शिकायत नहीं करनी पड़ती।
यह समूचा संसार एक परिवार है। यहाँ आदान और प्रदान की समन्वित नीति ही सर्वत्र चरितार्थ होती है। देने वाला ही पाता है। बोने वाला ही काटता है। उदारता बरतने के बदले श्रेय-सम्मान पाने की ही यहाँ परंपरा है। अपना वैभव मात्र अपने लिए सुरक्षित रखने वाले कुछ ही दिन में अनुभव करते हैं कि यह संचय भारभूत बन कर लदा रहा और अनेक प्रकार की विकृतियाँ, विपत्तियाँ और विसंगतियाँ उत्पन्न करता रहा।
पेड़ इसलिए उपजते, बढ़ते और फूलते-फलते हैं कि उनने अपनी उपलब्धियों को जरूरतमंदों के लिए बखेरते रहने की नीति अपनाई होती है। टहनियों पर अनेक पक्षी घोंसले बना कर सुखपूर्वक रहते हैं। पत्ते पकने पर भूमि में गिरते और अपनी जन्मदात्री भूमि की , खाद की आवश्यकता पूरी करते हैं। फूल, सुगंध, शोभा और पराग बखेरते हैं। फलों को जरूरतमंद खाते रहते हैं। इतने पर भी उनके भीतर रहने वाले बीज सुरक्षित रहते हैं और अपनी नई वंशवृद्धि करके मूल सृजनकर्ता के लिए विस्तार ही करते हैं। उस परोपकारी को घाटा कहाँ पड़ता है ?
भेड़ दूसरों को गरम कपड़े देने के लिए बार-बार ऊन कटाती रहती है। इस घाटे को पूरा करते के लिए प्रकृति दौड़ कर आगे आती है और फिर कुछ ही दिन में ऊन को उतना ही बढ़ा देती है, जितनी कि वह काटे जाने से पूर्व थी। भेड़ जीवन भर इस उदारता का परिचय देती रहती है, पर उसे इसके लिए कभी पछताना नहीं पड़ता। गड़रिया उसे प्यार पूर्वक पालता है और उसके लिए सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहता है। इसके ठीक विपरीत रीछ के बाल अधिक लंबे होने पर भी अपने उस वैभव में किसी को भी साझीदार नहीं बनने देता, फलतः उसके बाल जन्म से लेकर मरण पर्यन्त प्रायः उतने ही रहते हैं, जितने कि आरंभ में थे। कृपण, अनुदार और निष्ठुर प्रकृति वाले अपनी-अपनी स्वार्थ-संपदा के बलबूते सुविधाएँ तो तनिक ही अर्जित कर पाते हैं, पर ईर्ष्याजन्य आक्रमणों को आये दिन सहते रहते हैं। अंतः जो अनावश्यक भारभूत था वह किसी न-किसी के द्वारा छीन ही लिया जाता है भले ही वे छीनने वाले कुटुँबी हों या आक्रमणकारी-अनाचारी । जोहड़ों में जमा पानी कुछ ही दिन में सड़ और सूख जाता है, जबकि बहते रहने वाले झरने का प्रवाह सदा अक्षुण्ण रहता है। उदारता के परिपोषण करने के लिए अनेकों जल स्रोत दौड़-दौड़ कर आते हैं और उस प्रवाह में अवरोध उत्पन्न नहीं होने देते।
सूरज निरंतर भ्रमण करता और असीम परिमाण में ऊर्जा -आभा समस्त सौर-मण्डल के ग्रह-उपग्रहों को निरंतर बाँटता रहता है। उसकी संपदा सृष्टि के आदि से बनी हुई है और अंत तक बनी भी रहेगी। उसे मूर्ख कदाचित् ही कोई कहता होगा। अधिकतर तो कृतज्ञतापूर्वक उसकी अभ्यर्थना ही करते रहते हैं। अँधेरी रात में चन्द्रमा का उदय होना कितना सुखद और सुविधाजनक होता है, इसे सभी जानते हैं। छोटे तारे तक टिमटिमाकर अँधेरे में भटक सकने वाले राहगीरों का मार्गदर्शन करते हैं। उनका अस्तित्व अति कुरूप निशा को भी मणि-मुक्तकों से जगमगाती चादर ओढ़ा देती है। इस अनुदान प्रयोग में निरत रहने वाली किसी भी आभा, घटक की उदारता को कभी किसी ने घाटा देने वाली मूर्खता नहीं कहा। उदारताजन्य सेवा-साधना में कभी किसी ने घाटा उठाना भी नहीं पड़ा। कृपण ही निष्ठुरता अपनाकर लालच के वशीभूत रहता है और अपने को हर किसी की आँख में हेय सिद्ध करते हुए अपनी भूल के लिए सिर धुनते हुए विदा होते हैं। संग्रह सड़ता है इस तथ्य को कोई भी समझदार न भूले और न भूलने दे, तो ही अच्छा है। जिस बीज को गलने, अंकुरित होने और वृक्ष बनने में घाटा दीखता है, वह उस साहस को अपनाये बिना भी कुछ समय छिपते-बचते काट तो सकता है, पर उस प्रकृतिक्रम को कोई क्या करे, जो कृपण को रौंद कर खाद बनाने और कीड़े-मकोड़ों का आहार बनाने के लिए अपनी निर्धारित प्रक्रिया को आदिकाल से विनिर्मित-निर्धारित किये हुए है।
मनुष्य की संरचना इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए की गई है कि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के उपराँत भी संपदा, क्षमता को अतिरिक्त मात्रा में उपार्जित कर सके। इस बचत वाली परिस्थिति का एक ही उपयोग है कि वह संव्याप्त अभावों और अनाचारों को संतुलित करने में अपने अतिरिक्त उपार्जन को खपाता रहे। इसमें उसका अपना लाभ उससे अधिक है, जितना कि दूसरों का हित साधन करते हुए देखा जाता है। दूसरों के लिए मेंहदी पीसने वाले के हाथ अनायास ही (कुछ लोगों के मनोरंजन का एक ही तरीका है कि उनकी बातों को सुनते रहा जाय। ) रच जाते हैं। इत्र का व्यवसाय करने वालों के कपड़े और कमरे अनायास ही महकते रहते हैं।
मानवी प्रगति का इतिहास जिस प्रगतिशीलता से भरा-पूरा है, वह उसकी बुद्धिमता या प्रयत्नशीलता का ही परिणाम नहीं है। वस्तुतः उसके पीछे बड़ा भाग उदार सहकारिता का है। एक की अनुभवशीलता और उपलब्धियाँ दूसरों को हस्ताँतरित होती रही है और उनसे चक्रवृद्धि ब्याज दर ने बढ़ कर विश्व वैभव की संरचना की है और मनुष्य को सृष्टि का मुकुटमणि बन सकने का श्रेय दिया है। सेवा सहकारिता और उदारता का प्रचलन यदि इस संसार से उठ गया होता, तो मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह वनमानुषों जैसा जीवन यापन कर रहा होता।
कहीं दुर्घटना, विपत्ति या संकट की घड़ी आ धमकने पर मानवी सहृदयता उसकी क्षति के लिए दौड़ पड़ती है। अग्नि काण्ड, भूकंप, दुर्भिक्ष, महामारी आदि के संकट उत्पन्न होने पर विकसित लोगों की अंतरात्मा उसके समाधान हेतु व्याकुल हो उठती है और राहत पहुँचाने के लिए अदम्य प्रेरणा उत्पन्न करती है। उससे प्रेरित होकर उदारचेताओं को शक्ति भर सहायता करने के लिए बाधित करती है। अब तक आकस्मिक विपत्तियों का सामना इसी प्रकार मिल−जुल कर अपनाई गई सेवा-साधन के आधार पर ही किया जाता रहा है। भविष्य में यदि कभी मनुष्य को निष्ठुरता ने जकड़ लिया और कृपणता के खूँटे से बाँध दिया, तो समझना चाहिए एक-एक करके सभी को असहाय स्थिति में बेमौत मरना पड़ेगा। तब शायद रोगियों तक की किसी की सेवा-साधना उपलब्ध नहीं होगी। गिरे हुओं और पिछड़े हुओं को यथावत् विपत्ति के दलदल में फँसे हुए दम तोड़ना पड़े। गर्भधारण करने , स्तनपान कराने और बालकों के परिपोषण से भी महिलाएँ इनकार कर दें, क्योंकि इस प्रसंग में उन्हें मात्र कष्ट सहने और शरीर निचोड़ने की हानि ही हानि दृष्टिगोचर होगी। तब शायद कोई युवती पितृगृह का स्वच्छन्द जीवन छोड़कर ससुराल में दूसरे परिवार की सेवा करने के लिए समर्पित होने का प्रस्ताव भी स्वीकार न करे। ऐसी दशा में समाज व्यवस्था का परंपरा क्रम चल भी सकेगा या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता।
आजीविका उपार्जन और सुविधाओं का उपभोग अपनी जगह ठीक हो सकता है, परंतु उनके लाभ शरीर पोषण तक ही सीमित है। समझा जाना चाहिए कि मनुष्य का एक पक्ष आत्मा भी है। उसकी अपनी आवश्यकताएँ और आकाँक्षाएँ भी है, जिनकी पूर्ति धर्म धारणा और सेवा साधना के अतिरिक्त और किसी प्रकार संभव नहीं हो सकती। संतोष, आह्लाद और उल्लास का रसास्वादन करने का अवसर उसी आत्मा को मिल पाता है जो उदार , परमार्थ , परायणता को भी अन्न जल की तरह नित्य प्रयोग में लाये जाने की आवश्यकता अनुभव करती है।
मनुष्य एकाकी आता और जाता है पर उसे समूचा जीवन जन समुदाय के साथ सहकारिता के आधार पर जीना पड़ता है। इसका तारतम्य तभी सही सुनियोजित रहता है जब सेवा स्तर की पहल अपनी ओर से की जाय। बीज के गलने का साहस उभरते देखकर ही पृथ्वी उसे अपनी उर्वरता का लाभ प्रदान करती है। प्रगतिशील के द्वारा पहुंचाये जाने वाले लाभों पर विश्वास करके ही खाद पानी देने वाले अंकुर की सहायता करने दौड़ पड़ते हैं।
यह संसार ऊँचे गुँबज की तरह है इसमें अपनी ही आवाज गूँजती है। इसे दर्पणों का बना महल भी कह सकते हैं जिसमें सब ओर अपनी ही छवि प्रतिबिंबित होती है। जब हम उदार बन कर देने के लिए हाथ बढ़ाते हैं तो प्रतिक्रिया भी ठीक वैसी ही सामने आती है। प्रस्तुत की गई सेवा बदले में अनेक गुनी सद्भावना , सहायता और कृतज्ञता भरी अभ्यर्थना (पुरुष एक कान से सुनता और दूसरे से निकाल देता है। पर स्त्रियाँ दोनों कानों से सुनती हैं और मुँह से निकालती है। ) के रूप में अपने पास वापस लौटने का प्रत्यक्ष परिचय देती है।
संसार भर के महामानवों ने उदारचेता और परमार्थ-परायणता अपनाने की अपनी गरिमा का परिचय दिया है। इसके बाद ही सभी दिशाओं से उन्हें श्रेय सम्मान मिला है। उनकी सीमित परंपरा से प्रेरणा पाकर अनेकों ने ऊँचा उठने में सफलता पाई है। इसी के सत्परिणाम उन्हें सिर आँखों पर उठाने के रूप में सामने आये हैं। जिन्हें अजस्र श्रेय सम्मान मिला है उनमें से प्रत्येक को सेवाधर्म अपनाना पड़ता है। भौतिक लाभों की संकीर्णपरता का सीमा बंधन तोड़ कर ऐसा कुछ करना पड़ा है जिसे हर कसौटी पर अनुकरणीय कहा जा सके।
अंधड़ आया और पीटर की नाव निर्जन द्वीप के समीप जाकर डूब गई। पीटर तैर कर किनारे जाने लगा। नाव उथले पानी में आकर डूबी थी। अतः आधा हिस्सा अभी भी दिखाई देता था। पीटर ने सोचा कि यदि शरीर सामान बच गया हो तो निकाल लेना चाहिए। निर्जन प्रदेश है। कुछ काम आयेगा। नाव के पास गया। कुछ खाने पीने की सामग्री और वस्त्रादि हाथ लगे और वह पेटी भी हाथ लग गई जिसमें स्वर्ण मुद्राएँ थी। मन प्रसन्नता से भर गया। किंतु दूसरे ही क्षण उदासी छा गई। क्योंकि निर्जन प्रदेश में वे स्वर्ण मुद्राएँ किस काम की । न वहाँ बाजार न कोई जीवन न जीवन उपयोगी सामग्री। वहाँ तो नीरवता व नीरसता का साम्राज्य था।
समुद्र के किनारे बैठा वह सोचने लगा कि सागर के दूसरे छोर पर इसी धन के लिए मारकाट मची हुई है किंतु इसमें इतनी शक्ति भी नहीं जो निर्जन द्वीप में उसकी सहायता कर सके। ऐसी धन-दौलत किस काम की।
व्यक्तित्व परिष्कार का गहन पक्ष उपासना , साधना और आराधना के साथ जुड़ा हुआ है। संचित पशु-प्रवृत्तियों के उन्मूलन के लिए अपने दोष-दुर्गुणों की बारीकी से परीक्षा करनी पड़ती है और जहाँ जो जितनी मात्रा में खोट दिखाई दे उसे बुहार फेंकने के लिए उसी प्रकार उद्यत रहना पड़ता है जैसा कि शरीर की, कपड़ों की, घर के वस्तुओं की सफाई पर निरंतर ध्यान देते रहने और तत्पर रहने के संबंध में सतर्कता बरती जाती है। सुसंस्कारिता का अभिवर्धन दूसरा पक्ष है। इसके लिए चिंतन, चरित्र और व्यवहार को मानवी गरिमा के अनुरूप बनाना पड़ता है। सेवा-साधना को भी नित्यकर्म में सम्मिलित करना पड़ता है। सुविस्तृत सामाजिक सहयोग के बलबूते ही मनुष्य आदिमकाल की अनगढ़ परिस्थितियों को पार करते हुए वर्तमान प्रगतिशीलता के उच्च शिखर पर पहुँचा है। सृष्टि का मुकुटमणि बनने का अवसर उसके एकाकी प्रयत्नों ने ही संभव नहीं किया है। इसके लिए मानवजाति की चिर-संचित उपलब्धियों का लाभ हस्तगत करने का अवसर उसे मिलता रहा है। यदि वह सब न मिल सका होता तो अभी भी कबीलों में रहने वाली जन-जातियों से अधिक अच्छी स्थिति उसकी न बन पाई होती।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसकी भूतकालीन प्रगति, वर्तमान सुयोग और भावी संभावनाओं का समूचा आधार जन सहयोग पर ही निर्भर है। इसके बिना तो उसकी स्थिति नर-बानर से तनिक भी अच्छी न रही होती। समाज-ऋण चुकाना भी उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार कि बैंक से लिया हुआ ऋण ब्याज समेत वापस करना पड़ता है। इस वापसी को ही सेवा-साधना के नाम से निरूपित किया गया है। उसे आवश्यक बताया गया है और अनिवार्य भी। मिल-जुल कर प्रगति करने और कठिनाइयों तथा अवरोधों से उबरने का अवसर इसी आधार पर मिलता है। दैनिक कर्तव्यों को जीवनचर्या के क्रिया-कलापों में सेवा-साधना का महत्वपूर्ण स्थान रहना ही चाहिए। इसके बिना किसी को भी आत्म-संतोष , जन सम्मान और प्रगति के विशिष्ट अवसरों के रूप में मिलने वाला दैवी अनुग्रह किसी को भी हस्तगत नहीं हो सकता। इसलिए अनिवार्य आवश्यकताओं में सेवा-साधना के लिए प्रयत्नरत रहने के उत्साह को सर्वत्र साहा जाता है।
मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले परिष्कृत व्यक्तित्व संपन्न नर रत्नों का उत्पादन संसार की सब से बड़ी सेवा है। इसके लिए सर्व-प्रथम आत्मनिर्माण करना पड़ता है, ताकि उस साँचे के संपर्क में आकर अन्यान्यों को भी उपयुक्त स्तर का विनिर्मित होने वाला अवसर मिलता रहे। इस निमित्त समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी की चार कसौटियों पर अपने को निरंतर कसते रहना पड़ता है और देखना पड़ता है कि कहाँ चूक तो नहीं हो रहीं । कहीं त्रुटि तो नहीं रह गयी।
मेंहदी पीसने वाले के हाथ स्वयं ही रंग जाते हैं। इत्र बेचने वाले के कपड़े से सहज सुगंध जाने लगती है। सेवा धर्म में रुचि रखने वाले के गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता की अनायास ही अभिवृद्धि होने लगती है। इस संदर्भ में उपेक्षा करने वालों के गले में संकीर्ण स्वार्थपरता की लानत बंधती है और वे अपनी तथा दूसरों की दृष्टि में हेय बनते जाते हैं। क्रियाएँ भी उनकी बेतुकी होने लगती है। आदतों में अवाँछनीयता बढ़ती जाती है। इसी को पतन-पराभव का नाम दिया जाता है। अनगढ़ता से भरी कुसंस्कारिता भी इसी को कहते हैं।
युग दायित्वों को देखते हुए लोक सेवियों का उत्पादन प्रथम कार्य है। इसे अपने से आरंभ किया और दूसरों तक इसकी प्रेरणा देते रहा जाय। सामाजिक दृष्टि से शिक्षा को प्रथम स्थान दिया जाता है। इसके बिना व्यक्ति आत्मचेतना के बहुमूल्य पक्षों से वंचित ही रहता है। इसलिए शिक्षा संवर्धन के लिए वैयक्तिक एवं सामूहिक प्रयत्नों को निरंतर गतिशील रखा जाना चाहिए। बालकों के लिए स्कूली सुविधा हो, प्रौढ़ नर-नारियों के लिए यह कार्य प्रौढ़ शिक्षा के साधन जुटाने से संभव हो सकता है। साक्षरता प्रथम चरण है और उसका अगला कदम उपयोगी पुस्तकों के माध्यम से जीवन समस्याओं में उपयोगी मार्गदर्शन करने वाले पुस्तकों का निरंतर स्वाध्याय आवश्यक बना रहता है। इसके लिए पाठशालाओं की तरह ही सद्ज्ञान संवर्धक पुस्तकालयों की भी स्थापना होनी चाहिए। इस संदर्भ में जनसाधारण की अपेक्षा को देखते हुए ऐसा प्रबंध करना चाहिए कि हर शिक्षित को घर बैठे सत्साहित्य पढ़ने की निःशुल्क मिलता रहे और वे अपने से संबंधित निरक्षरों को भी पढ़ कर सुनाया करें। साक्षरता के उपराँत सद्ज्ञान संवर्धन का यही प्रमुख कार्य हो। यों स्वाध्याय, सत्संग के माध्यमों से भी व्यक्तित्व विकास का मार्ग प्रशस्त होता है, किन्तु सद्ज्ञान के बिना पूर्णता तक पहुँच सकना कठिन है।
“न मालूम ! लोग हमारा विरोध क्यों करते हैं ?” हममें से न जाने कितने ऐसे हैं जो इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हैरान परेशान रहते हैं। तनिक चिंतन की गहराई में जायँ तो पता चलता है कि विरोध का जन्म प्रतिकूलता से ही होता है। जब तक पुष्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, शारीरिक अथवा मानसिक मौन अथवा मुखर रूप से प्रतिकूलता की अभिव्यक्ति नहीं करता तब तक विरोध उत्पन्न ही नहीं हो सकता। यह बात दूसरी है कि मनुष्य अपनी उस भूल, कभी अथवा दोष को देख समझ न पाये।
दृष्टि दोष, भाव दोष, भावा दोष और व्यवहार दोष यह चार दोष ऐसे हैं जो किसी भी व्यक्ति के लिए विरोध की बढ़ोत्तरी कर देते हैं। दीप-दर्शन संकीर्ण दृष्टिकोण, अदूरदर्शिता अथवा अतिदर्शन आदि दृष्टिदोष के सामान्य रूप है।
दोषदर्शी व्यक्ति सामान्यतया दूसरों की कमियों, दुर्बलताओं रहस्यों तथा छिद्रों को ही देखता और खीजता रहता है। अपनी इस वृत्ति के वशीभूत रहकर वह यह नहीं सोच पाता कि यदि मैं किसी दुराव अथवा दुर्बलताओं की खोज करने के लिए तत्पर रहूँगा तो संभवतः अन्य पक्ष मुझको अहित चिंतक मान बैठेगा। वह यह विश्वास किए बिना रह नहीं सकता कि यह हमारी कमजोरियों को जानकर या तो अनुचित लाभ उठाना चाहता है, दबाए रहना चाहता है अथवा कोई हानि पहुँचाने के लिए भूमिका तैयार कर रहा है। ऐसी अवस्था में उसका विरोध हो जाना स्वाभाविक ही है। फिर चाहे दोषदर्शी उसका कोई अहित न भी करना चाहता हो, सिर्फ अपनी वृत्ति से मजबूर होकर किसी व्यसन विवश व्यक्ति की तरह ही वैसा कर रहा हो तब भी यह कारण उसके विरोध को रोक नहीं सकता। थोड़े बहुत दोष सभी में होते हैं। कोई भी सर्वथा निर्दोष नहीं होता। इसी प्रकार कुछ न कुछ गुण भी सबमें मौजूद होते हैं। बुद्धिमान मनुष्य जो कि समाज में स्त्रिध तथा सरल जीवन का सुख लेना चाहते हैं , वे किसी के दोष नहीं गुण ही खोजा परखा करते हैं।
संकीर्ण दृष्टिकोण एक पाश के समान दुखदायी होता है। इसको लेकर जो व्यक्ति जहाँ भी जाता है। वहाँ अपने लिए नापसन्दगी तथा असहयोग उत्पन्न कर लेता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति हर वस्तु तथा हर व्यक्ति का अवमूल्यन ही करता रहता है। वह किसी को विशेषता अथवा गुण देखकर सराहना करना तो जानता ही नहीं। किसी की महत्ता अथवा मान्यता स्वीकार कर सकना उसके वश की बात नहीं होती। किसी की रचना कृति सुन्दरता अथवा सफलता से प्रभावित होने पर वह उसकी अभिव्यक्ति में चोरी करता है और यदि प्रभाव को प्रकट भी करता है तो किसी कमी अथवा तुलनात्मक दृष्टि से मूल्य एवं महत्व कम करके। किसी के विश्वासों, आस्थाओं को सम्मान देना तो दूर उनको मार्ग तक देने को तैयार नहीं होता। उसमें यह देख सकने की शक्ति नहीं होती कि कोई दूसरा व्यक्ति उसकी तरह सफल होकर आगे बढ़ जाय। ऐसे संकीर्ण व्यक्ति के प्रति लोग अहितैषी अनुदार अथवा ईर्ष्यालु होने की धारणा बना लेते हैं और उसके, संपर्क में लाने अथवा उसके संपर्क में जाने की पारस्परिकता को निरुत्साहित करने लगते हैं और यह एक प्रकार का विरोध ही है। बुद्धिमान व्यक्ति विशाल दृष्टिकोण को आश्रय देकर दूसरों को रास्ता देते और बदले में रास्ता पाकर निर्भय एवं निर्द्वन्द्व जीवन का सुख उपभोग करते हैं।
अदूरदर्शी व्यक्ति कदम-कदम पर गलती करता रहता है। वह जो कुछ कह रहा है उसका कहाँ पर किस पर किस समय और क्या प्रभाव पड़ सकता है इसका अनुमान कर सकना अदूरदर्शी के लिए संभव नहीं। वह ऐसे अनेक काम कर बैठता है जो उस समय तो बड़े , समीचीन मालूम होते हैं किन्तु समयान्तर में बड़ा ही प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न करते हैं अदूरदर्शी में एक दोष उतावली का भी होता है। जिसके कारण उसके बहुत से काम अहितकर सिद्ध होते है। जैसे किसी की आलोचना का अवसर आ पड़ा तो दूरदर्शी व्यक्ति तो उस अवसर से उत्पन्न उत्सुकता अथवा प्रेरणा को दबा लेगा, किन्तु अदूरदर्शी इसकी आवश्यकता को नहीं समझ पाता और अपनी बुद्धिमत्ता प्रकट करने अथवा स्पष्ट वक्ता होते का श्रेय लेते के लोभ से आलोचना अथवा निन्दा में प्रवृत्त हो जाएगा। जिसके फलस्वरूप सही होने पर भी आलोच्य व्यक्ति के साथ-साथ उस वर्ग अथवा उस समुदाय के सारे व्यक्ति उसके विरोधी बन जाएँगे। ऐसे ही अदूरदर्शी कर्मचारी, विद्यार्थी , नेता अथवा सुधारक अधिकारियों, अध्यापकों तथा लोक भावना को अपने विरुद्ध बना लिया करते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति कहने अथवा करने से पहले उसके प्रत्यक्ष, परोक्ष निकट अथवा दूर पड़ने वाले प्रभाव पर अच्छी तरह विचार कर लेने पर ही कोई काम करते हैं।
अतिदर्शी व्यक्ति किसी भी बात को बहुत बड़ा-चढ़ा कर देखता है। किसी का तिल जैसा दोष उसे ताड़ जैसा और चुल्लू भर गुण समुद्र जैसे दीखते हैं और उसी के अनुसार वह उनकी निंदा स्तुति भी किया करता है। जिससे निन्दा का शिकार व्यक्ति उसे शत्रु मानकर और स्तुति का केन्द्र व्यक्ति उसे प्रलापी अथवा मिथ्यावादी समझकर नापसंद कर देते हैं। अतिदर्शी को किसी का छोटा सा व्यवसाय लाखों-करोड़ों का तथा थोड़ा साधन ने जाने कितना मालूम होता है और तदनुसार ही वह उसका प्रचार भी करता है जिससे उस वर्ग के लोग उसे समाज में बदनाम करने वाला मानकर उसके विरोधी बन जाते हैं। समझदार व्यक्ति अधिकता से बचकर हर बात तथा हर व्यक्ति का उचित मूल्याँकन ही किया करते हैं। गलत मूल्याँकन से अथवा अनुचित प्रशंसा से यदि कोई एक आध हलकी मनोभूमि वाले प्रसन्न भी हो जाते हैं तो अन्य न जाने कितने उपयुक्ततावादी होकर उसके मिथ्या प्रचार के विरोधी बन जायेंगे।
दुर्भाव, स्वार्थभाव तथा अहंभाव- भावदोष के ही रूप माने गये हैं। जिन व्यक्तियों का हृदय दुर्भाव से दूषित रहता है, वे सबका अहित चिंतन ही किया करते हैं। वाक्पटुता व्यवहार कुशलता, दया , करुणा, प्रेम अथवा उदारता के कितने ही कृत्रिम आवरण क्यों न डाले जायें किन्तु दुर्भाव छिपाये नहीं छिप सकता । जिस प्रकार शत्रुता मुख में मिश्री मोल लेने पर भी नहीं छिप सकती उसी प्रकार दुर्भाव भी सौ आवरणों के भीतर से भी झलक जाता है। मनुष्य का मुख्य हृदय का दर्पण कहा गया है। दुर्भावना पूर्ण व्यक्ति किसी कितनी ही अनुकूलता क्यों न प्रकट करें किन्तु उसका अंतरभाव मुख के भावों से आँखों तथा मुद्राओं से प्रकट होता ही रहता है। बधिक के दाना दिखलाने, पुचकारने, प्यार करने और सहलाने खुजलाने पर भी पशु उससे सामंजस्य नहीं कर पाता किन्तु सद्भावना पूर्ण व्यक्ति के पास जाकर खड़ा हो जाता है और गर्दन ऊँची करके खुजलाने अथवा सहलाने का संकेत करने लगता है।
दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति किसी का हितैषी अथवा मित्र हो सकता है यह असंभव है। वह तो कारण अथवा अकारण रहने पर केवल दूसरों को नीचा दिखाने उनको आपत्ति में देखने, समय आने पर अहित करने में ही संतोष मानता है। किसी की उन्नति, विकास, अथवा हँसी-खुशी देखकर वह मन ही मन जलकर खाक हो जाता है। एक की दूसरे से बुराई करना, किन्हीं दो का विरोध भाव बढ़ाना गिरते हुए की टाँग खींच लेना, किसी के परिवार अथवा बच्चों को बिगाड़ना, पारस्परिक कलह को प्रोत्साहन देना आदि दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति के स्वाभाविक काम तथा कौतुक है। समाज का ऐसा कलंक और मूर्खता का पुतला यदि समाज में सहयोग तथा सुख पाना चाहे तो यह उसकी अनाधिकार चेष्टा ही होगी। उसका अधिकार तो विरोध एवं भर्त्सना ही है जो पाता है और उसे मिलना ही चाहिए। अच्छे तथा बुद्धिमान व्यक्ति संसार में किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखते, वे तो सद्भावना के धनी बनकर समाज में दूसरों की सुख देकर सुख पाना ही मनुष्यता की पहचान मानते हैं।
सब कुछ अपने तथा अपनों के लिए चाहने वाला स्वार्थी व्यक्ति समाज का चोर माना गया है। स्वार्थी भावना से दूषित व्यक्ति का संसार बस अपने तक ही सीमित रहता है। उसके गुणों, विशेषताओं संपत्तियों तथा प्रभावों का लाभ किसी दूसरे के काम न आ जाये इस बात से वह बड़ा सतर्क रहता है। यदि किसी विवशतावश उसका कुछ भी किसी के काम आ गया तो वह उसे अपना दुर्भाग्य ही मानता है। किसी भी प्रकार की आवश्यकता में काम आ जाने को वह अपनी चतुरता तथा व्यावहारिक बुद्धि की हार समझता है। स्वार्थी व्यक्ति संसार के सारे सुख साधनों पर केवल अपना ही अधिकार चाहता है। अपने स्वार्थ के समक्ष उसे किसी दूसरे का दर्द, कष्ट, पीड़ा, विपत्ति, आपत्ति कुछ भी तो नहीं नजर आते। वह “अपने जीते जग लिया” वाली कहावत का अक्षरशः समर्थक एवं प्रतिपालक होता है।
स्वार्थ भावना ही तो वह भावना है जो मनुष्य को शोषण, संचय , चोरी, ठगी तथा भ्रष्टाचार के पापों के लिए प्रेरित करती है। यह तो वह पाप है जिसके वशीभूत होकर मनुष्य अत्याचारी, आक्रमणकारी तथा अनाचारी बन जाता है।
एक ओर जहाँ स्वार्थी समाज में हर किसी से उनकी सद्भावना तथा सज्जनता का लाभ उठाकर अपना मतलब बनाता रहता है और वहीं दूसरी ओर अन्यों की आवश्यकता तथा सहायता के लिए बगली काटता रहता है। स्वार्थियों की यह कपट हाँड़ी कुछ ही समय तक चढ़ पाती है। शीघ्र ही उनका स्वरूप प्रकट हो जाता है और तब उन्हें समाज की तीव्र घृणा तथा विरोध का संताप सहन करते हुए एक बहिष्कृत सी जिंदगी बितानी पड़ती है। बुद्धिमान व्यक्ति सीमित स्वार्थ तथा असीम परमार्थ में विश्वास रखकर तदनुसार जीवन अपनाकर मनुष्यता के उन सुखों की उपलब्ध करते रहते हैं जिनके लिए स्वर्ग में देवता भी लालायित रहा करते हैं
अहंभाव तो मानो विरोधों का वटबीज ही है। जो व्यक्ति इस दोष से दूषित हो गया मानो उसके लिए विरोध ही नहीं पतन की भूमिका बनकर तैयार हो गयी। किसी का कहना न मानना, अनुशासन तथा नम्रता में अविश्वास करता, सहयोग तथा नम्रता में अविश्वास करना, सहयोग तथा पारस्परिकता को अनावश्यक मानना अहंकारी व्यक्ति के सहज दुर्गुण होते हैं। किसी की बात मानना अधिकारों को मान्यता देना अथवा समझदारी के आधार पर निर्णय लेना उसकी आत्म प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। जल्दी ही क्रुद्ध हो जाना आवेश से उद्दीप्त हो जाना उसकी वे दुर्बलताएँ है जो विरोध का विस्तार कर दिया करती हैं। जो विरोध का विस्तार कर दिया करती हैं। अपनी गलती पर अड़े रहना कसी की गलती को क्षमा न करना, समाज में आतंक एवं भय का वातावरण उत्पन्न करना उसका सहज स्वभाव होता है। असहनशील एवं अवज्ञापरक प्रवृत्तियों का अहंकारी व्यक्ति समाज में संकट माना जाता है। हो सकता है कि किसी शक्तिशाली अहंप्रधान व्यक्ति का लोग खुले तौर पर विरोध न करें, किन्तु सभी लोग उससे मन ही मन घृणा करते हुए दूर ही रहना चाहते हैं। किन्तु मिथ्याभिमानी, दंभी व्यक्ति तो चार दिन भी समाज में टिकने नहीं पात। शीघ्र ही समाज की असहयोगी भावना उस अवाँछित व्यक्ति को या तो उखाड़ फेंकती है अथवा होश में ला देती है। सत्ता , शक्ति संपत्ति, विद्या, बुद्धि होने पर भी समझदारी का तकाजा यही है कि इस दोष से बचा जाय। ऐसा करने वाले समाज में समानता तथा स्नेह का व्यवहार करते हुए पूजा एवं प्रतिष्ठा के पात्र बनकर जीवन में जिस सुख संतोष का अनुभव करते हैं उसकी तुलना में स्वर्ग का सुख भी खड़ा नहीं हो सकता।
कटु, असत्य, अश्लील तथा अनुपयुक्त बोलना भाषा दोष माना गया है। कटुवादी व्यक्ति एक साधारण बात को भी तीखा करके बोलता है। लोगों को उसकी बात चुभे इसमें उसे बड़ा मजा आता है। जहाँ मनीषियों ने कटु सत्य भाषण कितना अवाँछनीय हो सकता है यह सहज में ही समझा जा सकता है। बैन बाण-विष विशिखों से भी कष्टदायक होते हैं, तब तो ऐसे कटुवादी को समाज में सहयोग की आशा किसी प्रकार भी नहीं करनी चाहिए।
अब देखिए यदि आप विरोध से परेशान हैं तो कहीं इन दोषों में किसी दोष से आप आक्राँत तो नहीं है। और यदि ऐसा हो तो शीघ्र ही उसका परिमार्जन कर डालिए, आपका विरोध शीघ्र ही समाप्त होने लगेगा।
भविष्य को जानने की सामर्थ्य मनुष्य में विद्यमान है। यदि अचेतन से उठती स्फुरणाओं को गंभीरतापूर्वक जाना समझा जा सके तो न केवल यह ज्ञात हो सकता है कि भविष्य की हाँड़ी में क्या पक रहा है वरन् उसके अशुभ पक्ष से भी बचा और सुखद संभावनाओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है।
मार्गन रावर्टसन उनमें से एक हैं, जिन्होंने सन् 1898 में “ रेक आँफ द टाइटन और फ्यूटीलिटी” नामक एक उपन्यास लिखा था। इसमें अटलाँटिक महासागर की यात्रा कर रहे ‘टाइटन’ नामक एक विशाल जलयान के समुद्र में डूब जाने और सैकड़ों लोगों के जल समाधि लेने का वर्णन था। 14 वर्ष बाद 16 अप्रैल 1912 को मार्गन का काल्पनिक उपन्यास जीवंत हो उठा जब सचमुच टाइटैनिक नामक जहाज एक हिमखण्ड से टकराकर ध्वस्त हो गया। इसमें सवार चौदह सौ से भी अधिक लोग जलमग्न हो गये। 1898 में लिखित उपन्यास के सर्जन में और उस दुर्घटना ग्रस्त जलयान के दृश्य में इतना अधिक साम्य था कि न केवल उसका नाम और उसमें सवार यात्रियों की संख्या, लाइफ बोटों की संख्या वही थी वरन् यान का वजन, उसकी लम्बाई, गति और डूबने के समय में भी अद्भुत समानता थी। मार्टिन ऐबन के अनुसार लगता था राबर्टसन ने 14 वर्ष पूर्व ही भविष्य का सारा चित्र खींचकर रख दिया था।
अमेरिका के एक वरिष्ठ पत्रकार यूजीन पी0 लाइल जूनियर ने द्वितीय विश्व युद्ध का सारा खाका सन् 1918 में ही खींचकर रख दिया था। “ एवरीबडीज मैगज़ीन” नामक पत्रिका के सितम्बर 1918 के अंक में “ द वार ऑफ 1938” शीर्षक से उसे प्रकाशित भी कराया था। उसमें कहा गया था कि यदि जर्मनी को पूरी तरह नष्ट न किया गया तो वह पुनः उठ खड़ा होगा जिसका संचालन एक तानाशाह करेगा और देखते ही देखते सारे विश्व को महामारी की तरह अपनी लपेट में ले लेगा। लेख पढ़ने वालों में से विश्वास किसी को भी नहीं हुआ क्यों की उस समय जर्मनी बुरी तरह परास्त हो चुका था और शाँति समझौते की शर्तों पर हस्ताक्षर कर चुका था।
परन्तु बीस वर्ष बाद उसमें वर्णित सभी घटनाक्रम ज्यों के त्यों घटित होते चले गये। सन् 1920 के बाद से ही जर्मनी ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी आरंभ कर दी थी। हिटलर को पचास हजार से अधिक नाजी सेना सुसज्जित तैयार थी। सन् 1939 के पश्चात जो घटित हुआ वह युजीनलाइल की भविष्य वाणी में वर्णित था। विद्वानों का कहना है कि उनके इस भविष्य कथा पर यदि ध्यान दिया और उसे गंभीरता से लिया गया होता तो संभवतः द्वितीय विश्व युद्ध न होता तथा आज विश्व युद्ध न होता तथा आज विश्व का स्वरूप भी कुछ और ही होता।
इस संदर्भ में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के मूर्धन्य भौतिकीविद् एड्रियन डाब्स का कहना है कि भविष्य मनुष्य के वर्तमान में एक प्रकार की सूक्ष्म तरंगें उत्पन्न करती हैं जिन्हें “ साइट्रोनिक वेव फ्रण्ट” कहा जा सकता है। मानवी मस्तिष्क प्रायः स्वप्न अवस्था या ध्यान की ‘अल्फा स्टेट’ में इन स्फुरणाओं या तरंगों को पकड़ लेता है। अतः मनःमस्तिष्क को सचेतन बनाये रखकर संभावित घटनाओं की जानकारी प्राप्तकर सकना हर किसी के लिए संभव है। सुप्रसिद्ध मनीषी विल्हेम वान लिबनीज इस संदर्भ में अंतः प्रज्ञा के जागरण पर बल देते हैं और कहते हैं कि प्राचीन काल के ऋषि मनीषी इसी क्षमता की जाग्रत कर भविष्य की झाँकी कर लेते थे और उसी आधार पर वर्तमान ढाँचे को बदलते, परिष्कृत परिमार्जित करने का उपाय सुझाते थे।
“सुपर नेचर“ नामक अपनी कृति में ख्यातिलब्ध विद्वान लायल वाटसन ने कहा है कि कितने ही व्यक्तियों को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास अंतः स्फुरणा के आधार पर चेतन या अचेतन अवस्था या स्वप्नावस्था में हो जाता है। इसे ही विज्ञान की भाषा में ‘ प्रीकागनीशन ‘ अर्थात् पूर्वानुमान कहते हैं, जिसका अर्थ है जो कुछ घटित होने वाला है उसकी पहले से जानकारी हो जाना। यह वह ज्ञान है जो मनुष्य को भविष्य की विवेक सम्मत तैयारी करने और अशुभ पक्ष से बचने की दिशा देती है। वस्तुतः यह क्षमता स्त्रष्टा ने हर किसी को प्रदान की है कि वह अपनी अंतःप्रज्ञा को जाग्रत कर दिक्−काल की सीमा को लाँघकर भूतकाल, वर्तमान और भविष्य के गर्भ में झाँक सके और उसकी परिणति को जानकर उसमें वाँछित परिवर्तन के लिए कटिबद्ध हो सके। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो शत्-प्रतिशत भविष्य कथन की क्षमता बिना किसी साधना पुरुषार्थ के भी रखते हैं। वह या तो दैवी अंतः स्फुरणा के आधार पर, स्वप्नों के माध्यम से अथवा व्यष्टि चेतना के समष्टि चेतना के सीधे संपर्क में होने के आधार पर अर्जित संपदा के रूप में भी प्रस्फुटित हो जाती है, पर यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि अभ्यास करने पर हर कोई इस क्षमता को जाग्रत और विकसित कर सकता है और एक अच्छा भविष्यवक्ता बन सकता है।
स्वामी विवेकानन्द का कहना है कि समष्टिगत विश्व-ब्रह्मांड जिसे ‘ मैक्रोकास्म’ भी कहते हैं, अपने गर्भ में अगणित व्यष्टि घटकों- ‘माइक्रोकास्म’ को समाहित किये हुए है। इसमें चेतन-अचेतन से संबंधित सभी घटनाक्रम विद्यमान है। जीव-जंतुओं से लेकर वृक्ष-वनस्पतियों तथा जड़ कही जाने वाली वस्तुएँ इसी विराट की घटक है। इनसे संबंध स्थापित करने , तादात्म्य बिठाने की अद्भुत क्षमता मानव मस्तिष्क में विद्यमान है भविष्य विज्ञान का यही आधार है।
धरती की ऊपरी परत ही मनुष्यों के उचित जीवन यापन के लिए पर्याप्त है। धरती अपने ढंग से अपनी भीतरी ऊर्जा को नियंत्रित और व्यवस्थित करती रहती है। हमें अपनी आवश्यकताएँ सीमित करनी चाहिए। जनसंख्या-वृद्धि रोकनी चाहिए। यह प्रयत्न नहीं करना चाहिए कि गहराई में उतर पृथ्वी की खनिज संपदा का दोहन किया जाय । हमारे लिए इतना ही संतोषजनक होना चाहिए कि धरती की बाहरी परतों पर जो उपलब्ध है, उसी से व्यवस्थापूर्वक का चलायें, अन्यथा पृथ्वी का गर्भ काटने का प्रयत्न करने पर हम बिच्छू के बच्चों जैसा प्रयास ही कर रहे होंगे। इसका परिणाम ज्वालामुखियों और भूकंपों की अभिवृद्धि के रूप में सामने आकर अतिक्रमण का दंड भुगतने के लिए तैयार रहने की घोषणा करेगा।
ज्वालामुखी जब प्रचंड वेग से फटते हैं, तो गजब ढाते हैं। कोलंबिया का मुद्दतों से सोया हुआ ज्वालामुखी पर्वत नेवादोडेन रुर्ठज कुछ वर्ष पूर्व फटा, तो उसने हाहाकार उपस्थित कर दिया। उस आग ने म्यूरिल, करावियंका, लिबोनी आदि क्षेत्रों को अपने अंचल में लपेट लिया और कहते हैं कि 20 से लेकर 50 हजार तक की आबादी लुप्त हो गई। बर्फीले पहाड़ पिघल गये।
ज्वालामुखियों का अधिक प्रकोप इन्डोनेशिया क्षेत्र में होता रहा है। इस क्षेत्र में 170 के करीब ज्वालामुखी पर्वत विद्यमान हैं, जिनमें से 80 अभी भी आग की नदी बहा रहे हैं।
गत शताब्दी में इंडोनेशिया का सुँवावा द्विप का तंवेरा पर्वत फटा था। उसके कारण 56 हजार व्यक्ति एक ही झटके में समाप्त हो गये । दूसरा विस्फोट जावा-सुमात्रा के बीच क्रोकातोआ में हुआ था। उसकी गर्जना इतनी भीषण और भयंकर थी कि 3 हजार मील तक सुनी गई थी, साथ ही समुद्री तूफान भी आया, जिसमें 36 हजार लोगों की देखते-देखते मौत हो गई। समझा जाता है कि उसमें 26 हाइड्रोजन बमों जितनी शक्ति का उद्भव हुआ था। इसका गहरा धुँआ मोतान, और व्योकिंग राज्यों पर मुद्दतों छाया रहा।
विस्फोट होने पर यदि गैस मिश्रित धुँआ धरती के समीपवर्ती वायोस्फीयर और ट्रोपोस्फीयर तक बना रहता है, तो बादलों के साथ बरस कर जमीन पर आ जाता है और उसका प्रभाव जल्दी ही धरती पर दीख पड़ता है, । किन्तु यदि वह 20 किलोमीटर से ऊपर जा पहुँचता है, तो धूल आकाश में ही कई सालों तक छायी रहती है और पृथ्वी पर सूर्य ताप को आने से रोकती है। इससे धरती के मौसम पर असर पड़ता है। गर्मी कम हो जाती है, असमय वर्षा होते लगती है और घुटन अनुभव होती है।
वाशिंगटन राज्य के सेण्ट हेलेना क्षेत्र में फटे ज्वालामुखी की धूल लंबे समय तक आकाश में उड़ती देखी गयी और सबेरे-शाम पूर्व-पश्चिम में लालिमा दीखती रही। इन गैसों में गंधक की मात्रा अधिक होती है। गंधक एक जहर है। जब धरती पर हवा या पानी के साथ नीचे उतरता है, तो प्राणियों और वनस्पतियों को निश्चित रूप से हानि पहुँचाता है।
जब-जब संसार में बड़े ज्वालामुखी फटे हैं, तब-तब उनसे प्रभावित क्षेत्रों में मौसम संबंधी भारी उथल-पुथल हुई है। लोग आश्चर्यचकित रह गये हैं कि ऋतुओं ने अपनी परंपरा एकदम कैसे बदल दी ?
भूकंप के झटके पिछले दिनों दक्षिण अमेरिका , अफ्रीका और एशिया में विशेष रूप से आये हैं। वैसे उसने धरती का कोई कोना ऐसा नहीं छोड़ा, जो प्रकाशित न हुआ हो और जहाँ जान माल की भारी क्षति न उठानी पड़ी हो। महाराष्ट्र, कैलीफोर्निया, पेरु, निकारागुआ आदि के झटके को इस सदी का बड़ा हादसा माना जाता है। महाराष्ट्र में पिछले दिनों आये भूकंप में 40 से 50 हजार लोगों के मारे जाने की आशंका है। उत्तरकाशी में आये झटके में भी काफी लोग जान से हाथ धो बैठे। नेपाल में इस प्राकृतिक आपदा के कितने ही लोग शिकार हुए। पेरु में करीब 60 हजार मरे थे। निकारागुआ में 7 हजार , ग्वाटेमाला में 23 हजार, दक्षिण चीन में 20 हजार , बीजिंग झटके में 8 लाख, तुकीश् में 3 हजार, इटली में 3 हजार व्यक्ति मरे। इसके अतिरिक्त जापान, इण्डोनेशिया, चिली आदि के भूकंपों में भी भारी क्षति हुई।
विशेषज्ञों के अनुसार इस सदी के अंत तक विश्व भर में ऐसे कुछ और महा विनाशकारी झटके आ सकते हैं, जिनमें जन-जीवन की भारी हानि की संभावना व्यक्त की जा रही है। अमेरिकी पत्रिका “उनोवियर” ने भी ऐसी ही आशंका प्रकट की है और कहा है कि यदि ऐसा हुआ तो वह मनुष्य जाति के लिए बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
कुछ भी हो, इस प्रकार के भयावह उत्पातों में प्रकृति की अनगढ़ता और अव्यवस्था नहीं खोजनी चाहिए, वरन् यह देखना चाहिए कि कहीं अपनी ही कुछ उच्छृंखलताएँ पृथ्वी का कुपित तो नहीं कर रही हैं ? जिस डाली पर हम बैठे हैं, उसी के काटने की अदूरदर्शिता तो हम नहीं कर रहे ? फिर हम दैवी प्रकोपों को अपनी आज की परिस्थितियाँ के लिए जिम्मेदार न ठहराकर स्वयं अपनी परिस्थितियाँ हितकर व पारस्परिक साहचर्य पर आधारित विनिर्मित करने लगेंगे यही स्रष्टा चाहता भी है।
भौतिकता बाद ने अपनी भोगवादी पद्धति में ईश्वर को बाधा समझकर उसे सर्वथा अस्वीकार करने का हठ सा बना लिया। अपने पक्ष में तर्क व प्रमाण जुटाने के लिए विज्ञान की बैसाखी का सहारा लिया। यह सहारा तभी तक रहा जब तक वैज्ञानिकों का मस्तिष्क अपरिपक्व रहा। इस अपरिपक्वता के कारण ही यह भाव उपजा कि प्रकृति स्वसंचालित है न कोई उसका सृजेता है न ही संचालक। इसमें कर्ता के रूप में ईश्वर एक आरोपित नाम है जिसका कहीं न तो कोई अस्तित्व है न विश्व ब्रह्मांड से इसकी गतिविधि का कोई संबंध।
पिछले दिनों विज्ञान के क्षेत्र में हुई शोधों ने इस संबंध में एक नवीन दृष्टि प्रदान की है। इस संदर्भ में पार्टिकल फिजिक्स में हाइजन वर्ग का “ अनिश्चितता का सिद्धान्त बहुचर्चित रहा है। इसके अनुसार एक ही समय में एक ही तरह के कण किस तरह का व्यवहार करेंगे, यह नहीं जाना जा सकता। कण विशेष की गति एवं परिस्थिति के संबंध में कुछ भी कह पाना संभव नहीं। मात्र अनुमान भर लगाया जा सकता है और कोई अनुमान सही निकाले यह आवश्यक भी नहीं। इस संबंध में अनेक प्रयोग किये गये कि किन परिस्थितियों में कौन से कण किस तरह व्यवहार करते हैं ? एक ही परिस्थिति में एक प्रक्रिया से एक ही तरह के कणों का हजारों बार अध्ययन किया गया । किन्तु यह जानकर हैरानी हुई कि प्रत्येक बार हर कण का व्यवहार अनुमान से भिन्न था। इस आधार पर यह घोषणा करनी पड़ी कि पदार्थ की जैसी परिभाषा की जाती रही है वैसा कोई पदार्थ इस जगत में है ही नहीं। दूसरे शब्दों में यह घोषणा की गई कि पदार्थ मर गया। पहले कभी नास्तिक वादियों में अग्रणी फ्रेड्रिक नीत्शे ने घोषणा की थी कि ‘ईश्वर मर गया, पर अब विज्ञान को यह घोषणा करनी पड़ रही है कि ‘पदार्थ मर गया’ विज्ञान विदों को यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि पदार्थ विज्ञान से बाहर भी एक विशाल दुरूह एवं अज्ञान क्षेत्र रह जाता है जिसके अन्वेषण के लिए अभी तक कोई उपाय नहीं खोजा जा सका। पर यही क्षेत्र विज्ञान की सभी ज्ञात धाराओं का मूल स्त्रोत एवं नियंत्रण कर्ता है।
विज्ञानवेत्ता मैक ब्राइट का कथन है कि विश्व में परोक्ष में किसी ऐसी चेतन सत्ता के होने की पूरी और निश्चित संभावना है जो ज्ञान युक्त और इच्छा युक्त हो। उसी के कारण विश्व की गति विधियाँ संचालित हो रही हैं। डॉ0 मोर्डेल का मत है कि अणु और पदार्थ के सूक्ष्मतम कणों के इस विचित्र व्यवहार से यही सिद्ध होता है कि कोई चेतन शक्ति है अवश्य जिसके प्रभाव से ही अणु अथवा कणों का स्वभाव पकड़ में नहीं आता।
विज्ञान विदों के लिए अविज्ञेय सत्ता ही ऋषि के द्वारा परमात्म चेतना के रूप में जानी गई हैं । यह विश्व उसी चेतना से उत्पन्न हुआ है। उसी की सत्ता में स्थित है, उसी में मिलता घुलता जा रहा हैं जड़ चेतन की संपूर्ण सक्रियता का आधार वह परम प्रभू है, जो सृष्टि के प्रत्येक कला कृति में ओत-प्रोत है। न तो कुछ परमात्मा से भिन्न है और न परमात्मा की किसी से पृथक् है।
पवन, अग्नि, जल, मृतिका चार व्यक्त एवं आकाश रूप एक अव्यय इन पाँच महाभूतों से विश्व विनिर्मित हुआ है यह सभी पदार्थ अपने में जड़ और निर्जीव है। किन्तु उनमें एक जीवन, एक सक्रियता, सजीवता दृश्यमान होती है, उससे ही ईश्वरीय चेतना शक्ति की उपस्थिति का अनुमान सहज की लगाया जा सकता है। हवा की गतिशीलता अग्नि की तेजस्विता, जल की तरलता, मिट्टी की उर्वरता का गुण उस सर्वशक्तिमान परमात्मा से ही संभव है। अन्यथा किसी जड़ अथवा निर्जीव पदार्थ में सक्रियता की संभावना कहाँ ? अणु अथवा चेतनशील प्राण के रूप में विद्यमान परमात्मा ही शक्ति का जब इन पदार्थों से तिरोधान हो जाता है तो ऐसी स्थिति में कोई भी पदार्थ सक्रियता का प्रमाण नहीं दे पाता।
सृष्टि के किसी भी पदार्थ में अपनी कोई क्षमता अथवा अपना कोई गुण नहीं है। यह सब केवल उस चेतन स्वरूप परमात्मा का ही चमत्कार है जो प्रत्येक अणु के गुण एवं सक्रियता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। ऐसे सर्वव्यापक, सर्वसमर्थ चेतन शक्ति के अस्तित्व से इनकार करना अपनी अज्ञानता का परिचय देना है।
मनुष्य पुरुषार्थ परायण प्राणी है। वह चाहे तो असंभव भी संभव वन जाता है और अकर्मण्य-आलसियों के लिए सरल-संभव भी अशक्य स्तर का बना रहता है। यह उसके मनोबल और मानसिक संरचना पर निर्भर है कि कठिन-से-कठिन कार्य भी सहज रूप से संपादित हो जाय और आसान लगने वाली क्रिया भी दुरूह प्रतीत होने लगे।
इसी तथ्य की पुष्टि ईस्टर-द्वीप की खोज से भी हुई है। इस टापू के बारे में प्रथम जानकारी सबसे पहले डच एडमिरल जैकब रोगिबीन द्वारा सन् 1722 में मिली। जब वह अपने तीन जहाजों के साथ उक्त द्वीप के निकट पहुँचा, तो उसे दूर से ही विशालकाय मानवाकृति दिखाई पड़ी। नजदीक आने पर ही उसे यह ज्ञात हो सका कि वह कोई जीवित व्यक्ति नहीं, वरन् विशाल प्रस्तर प्रतिमा है। उस भव्य मूर्ति के साथ सामान्य आकार-प्रकार की एक विशाल पाषाण सेना थी। उस दिन ईस्टर सण्डे था, इसलिए उसने उसका नाम ईस्टर द्वीप रख दिया।
टापू की खोज के करीब सौ वर्ष बाद उसका गहन अध्ययन कार्य प्रारंभ हुआ। तब तक भव्य विग्रह भूलुण्ठित हो चुके थे। अध्येताओं के अनुसार यह पत्थर की आकृतियाँ ज्वालामुखी के दौरान बनी विशालकाय चट्टानों को तराश कर बनाई गयी है। उक्त द्वीप में रैनो राराकू के प्रसुप्त ज्वालामुखी के मुख के आस-पास अभी भी भीमाकार प्रस्तर खण्ड देखे जा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन्हें ज्वालामुखी के मुख की दीवार से तोड़ कर एकत्र किया गया है। इनमें से कितने ही टुकड़े मूर्ति की शक्ल में गढ़े हुए हैं और कितने ही अनगढ़ स्थिति में पड़े हुए हैं। इन्हीं में से अनेकों को बड़ी-बड़ी चट्टानों की बनी पीठिका पर बाद में खड़ा किया गया जबकि चार सौ के लगभग अर्धनिर्मित विग्रह ज्वालामुखी के मुख के भीतर अभी भी पड़े हुए हैं। इन अर्धनिर्मित मूर्तियों में से कुछ में तो केवल छैनी के कुछ एक निशान मात्र हैं, जबकि कतिपय खण्ड अधूरे पड़े हुए हैं। इनमें से आधे के आस-पास पूर्णरूप से तैयार हैं, जिन्हें मात्र ऊपर लाना भर था, किन्तु किसी कारणवश बाहर लाया नहीं जा सका। ज्वालामुखी के अंदर प्रवेश करत ही इस प्रकार के तैयार विग्रह बीच-बीच में रखे अब भी देखे जा सकते हैं। इनमें से कइयों के वजन 30 से 40 टन के बीच है। वहाँ की सबसे बड़ी मूर्ति 66 फुट ऊँची है। अनुसंधानकर्ताओं का अनुमान है कि ज्वालामुखी के भीतर रास्ते के इर्द-गिर्द प्रतिमाओं का पड़ा रहना इस बात का प्रतीक है कि वे बाहर आने की प्रक्रिया में सम्मिलित थीं, किन्तु प्रक्रिया पूरी होते से पूर्व ही उसे त्याग दी गई और मूर्तियाँ बाहर नहीं आ सकीं। इस अनुमान को तब और बल मिला जब अंदर में वास्तुकारों के पत्थर औजार भी मिले। इन औजारों की उपस्थिति यह बताती है कि शिल्पकार दुबारा अंदर प्रवेश करने वाले थे, पर संभव है किसी असामान्य परिस्थितिवश वे ऐसा नहीं कर सके और सब कुछ वहाँ छोड़ देना पड़ा। यह भी शक्य है कि अचानक ज्वालामुखी के भीतर कुछ असाधारण हलचल शुरू हो गई हो। अन्वेषणकर्ताओं का एक विचार यह भी है कि शायद मूर्तिकारों को अपने श्रम और समय का महत्व अकस्मात मालूम हो गया हो, और इन बहुमूल्य संपदाओं के निरर्थक अपव्यय किसी कौतुक-क्रिया में करने की तुलना में किन्हीं उच्चस्तरीय निर्माणों में लगाने की बात उनकी समझ में आ गई हो, अतएव बीच में ही वह कार्य रोक दिया गया हो।
तथ्य चाहे जो हो, शोधकर्ताओं का जिस बात ने सबसे अधिक परेशान किया है, वह है उन विशाल प्रतिमाओं का परिवहन। वे इस बात का तनिक भी अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं, कि सर्वथा साधनविहीन स्थिति में उन वृहद मानवाकृतियों को निर्माण स्थल से 10 मील जितनी दूरी तक किस भाँति ले जा सकता संभव हो सका ?
एक मत के अनुसार कदाचित् ऐसा लकड़ी के मोटे-मोटे लट्ठों के माध्यम से किया गया हो, पर टापू के मृदा-परीक्षण से जिस बात की जानकारी मिली, उसके अनुसार वह मिट्टी उतने विशाल वृक्षों को खड़ा रख पाने में समर्थ नहीं है, जितने बड़े और मोटे पेड़ इस कार्य के लिए आवश्यक हैं। एक अन्य विचार वनस्पतियों से बने रस्सों के प्रयोग का पक्ष प्रस्तुत करता है, पर 40 टन जितना भारी वजन इन रस्सों की सहायता से खींच पाना तर्कसंगत नहीं लगता, अतः इसे भी अमान्य कर दिया गया।
वास्तविकता चाहे जो हो, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि संकल्प यदि प्रबल हो और पराक्रम प्रखर , तो बड़ी-से बड़ी बाधा भी छोटी हो जाती है, पर हीन मनोबल वालों के समक्ष छोटा व्यवधान भी हिमालय जितना बड़ा और दुस्साध्य लगने लगता है। दूसरी ओर साहस बढ़ा-चढ़ा होने पर प्रकृति और परिस्थिति भी कर्त्ता की सहयोग देने के लिए विवश हो जाती है और ऐसे उपाय-उपचार सुझाने लगती है, जो सामान्य स्थिति और मानसिक स्तर की अवस्था में असंभव बना रहता है। लकीर बड़ी हो, तो उसके आगे और बड़ी रेखा खींच देना ही उसे छोटी बनाने का एकमात्र तरीका हो सकता है। मुसीबतों के संबंध में भी यही बात है। मनोबल और पुरुषार्थ को प्रखर बना लिया जाय, तो वे स्वतः ही तुच्छ हो जाती हैं, इसमें दो मत नहीं।
यह सृष्टि पंचतत्वों से बनी हुई है। प्राणियों के शरीर भी इन तत्वों के ही बने हुए हैं। मिट्टी , पानी, हवा, अग्नि और आकाश-इन पाँच तत्वों का ही सब कुछ संप्रसार है। जितनी वस्तुएँ दृष्टिगोचर होती हैं या इंद्रियों द्वारा अनुभव में आती हैं, उन सबकी उत्पत्ति पंच तत्वों द्वारा हुई है। वस्तुओं का परिवर्तन, उत्पत्ति, विकास तथा विनाश इन तत्वों की मात्रा में परिवर्तन आने से ही होता है। शारीरिक अस्वस्थता भी इन्हीं के असंतुलन के कारण उत्पन्न होती है। यदि इस असंतुलन को बराबर संतुलित बनाये रखा जाय, तो शरीर स्वस्थ और नीरोग बना रहता है।
शरीर ही नहीं, सृष्टि के जिस भी हिस्से में उक्त तत्वों के अनुपात में व्यतिरेक पैदा होता है, वहीं उस तत्व की प्रकृति की प्रधानता स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगती है। ध्रुव प्रदेशों में शीत की अधिकता है, वहाँ बर्फ जमी रहती है, वनस्पतियाँ नहीं उगती, कुछ गिने-चुने शीत प्रकृति के जीव ही वहाँ रहते हैं। इस विचित्रता का कारण प्रदेश में अग्नि तत्व की कमी होना है। दक्षिण अफ्रीका और दक्षिणी अमरीका में अत्यंत गर्मी पड़ती है। उन क्षेत्रों में पृथ्वी तवे के समान जलती है, दिशाएँ आग उगलती रहती हैं, सूर्य की प्रचंड किरणें सरस चीजों की सरसता नष्ट करके उन्हें अपनी ज्वाला में भूनती रहती हैं। यह प्रदेश भी अपने ढंग के निराले हैं। ध्रुव देश तथा विषवत् रेखा के समीपवर्ती प्रदेशों में जो असाधारण अंतर है, उसका कारण अग्नि तत्व की न्यूनता और अधिकता है। अस्व में आने वाले तूफान वहाँ वायु तत्व की अधिकता प्रकट करते हैं। आसाम एवं पूर्वी द्वीप समूहों में वर्षा की सघनता जल तत्व की प्रधानता का सूचक है। घने जंगल, दलदल, चित्र-विचित्र पौधे और जीव-जन्तु, खनिज पदार्थ आदि विभिन्नताओं का कारण उन स्थानों को तात्विक न्यूनाधिकता ही है।
सर्वविदित है कि जलवायु का स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। शीत प्रधान योरोपीय लोगों का रंग, रूप, कद, स्वास्थ्य, अफ्रीका निवासियों के रंग, रूप और स्वास्थ्य से सर्वथा भिन्न होता है। पंजाबी, कश्मीरी, बंगाली और मद्रासी लोगों के शरीर एवं स्वास्थ्य की भिन्नता प्रत्यक्ष है। यह जलवायु का अंतर है। किन्हीं स्थानों में मलेरिया, काली खाँसी, पीला बुखार, पेचिश, चर्मरोग, फीलपाँव, कुष्ठ आदि रोगों की बाढ़-सी रहती है और किन्हीं स्थानों का जलवायु ऐसा होता है कि वहाँ जाने पर तपेदिक जैसे कष्टसाध्य और असाध्य रोग भी अच्छे हो जाते हैं। यही बात पशुओं के संबंध में है। हिसार की गाय और निजामाबाद की गाय में जमीन-आसमान जितना अंतर देखा जाता है। यही प्रभाव खाद्य पदार्थों पर पड़ता है।
गेहूं, चावल, दूध, घी, चाय, शाक−भाजी, औषधि, वनस्पति आदि के गुण और स्वाद में प्रादेशिक अंतर के हिसाब से फर्क पड़ता है। प्रादेशिक अंतरों का कारण उन स्थानों में तत्वों की मात्रा की न्यूनता एवं अधिकता ही है।
यह तो स्थान और वातावरण में तत्वों की न्यूनाधिकता से उपजी भिन्नता की चर्चा हुई। ऐसी ही भिन्नता शारीरिक ढाँचे, स्वभाव और स्वास्थ्य में तब पड़ते देखी जाती है, जब शरीर में इनमें से कोई तत्व घट-बढ़ जाता है। ऋतुओं के प्रभाव के कारण स्वास्थ्य में लगने वाले झटकों का अस्तित्व भी इसी बात पर अवलंबित है। किसी को कोई और किसी के लिए एक वस्तु रुचिकर एवं हितकर होती है, तो किसी के लिए कोई दूसरी । यह बातें प्रकट करती हैं कि इन मनुष्यों में तत्वों की मात्रा में भिन्नता है। उष्ण प्रकृति वाला व्यक्ति यदि गरम तासीर वाली चीज खा ले, तो उसकी तबियत गड़बड़ाने लगती है। इसी प्रकार शीत प्रकृति वाला मनुष्य कोई ठंडी तासीर वाला खाद्य खा ले तो उसे सर्दी-जुकाम पकड़ लेता है इससे भी यही सिद्ध होता है कि हर व्यक्ति में स्थान और संरचना-भेद के हिसाब से तत्वों का अनुपात अलग-अलग होता है।
रोगी होना और नीरोग रहना-यह सब तत्वों की स्थिति पर निर्भर है। आहार-विहार की असावधानी के कारण तत्वों का नियत परिमाण घट-बढ़ जाता है, फलस्वरूप बीमारी खड़ी हो जाती है। वायु की मात्रा में अंतर आ जाने से गठिया , लकवा, दर्द, कंप, अकड़न , गुल्म, नाड़ी विक्षेप आदि उत्पात खड़े होते हैं। अग्नि तत्व के विकार से फोड़े, श्वाँस, उपदंश, पीलिया आदि बढ़ते हैं। जल तत्व की गड़बड़ी से जलोद्धर पेचिश, संग्रहणी, बहुमूत्र , प्रमेह, प्रदर , जुकाम, खाँसी जैसे रोग पैदा होते हैं। पृथ्वी तत्व बढ़ जाने से फीलपाँव, तिल्ली, जिगर , रसौली, मेदवृद्धि, मोटापा आदि व्याधियाँ उत्पन्न होती है। आकाश तत्व के असंतुलन से मूर्च्छा, मिर्गी, उन्माद, पागलपन, सनक, अनिद्रा, भ्रम, घबराहट, दुःस्वप्न, गूँगापन, बहरापन, विस्मृति आदि बीमारियों का आक्रमण होता है। दो, तीन या पाँचों तत्वों के मिश्रित विकारों से विकारों की मात्रा के अनुसार एक या अधिक रोग हो सकते हैं।
इसी प्रकार इन तत्वों की मात्रा कम हो जाय, तो दूसरे प्रकार के उपद्रव खड़े हो जाते हैं। अग्नि तत्व की कमी से शीत, जुकाम, नपुँसकता, गठिया, मंदाग्नि, शिथिलता, जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं। ऐसे ही अन्य तत्वों की कमी हो जाना, बढ़ जाना अथवा विकृत हो जाना रोगों का हेतु बन जाता है। शरीर पंचतत्वों का बना है। यदि सब तत्व अपनी नियत मात्रा यथोचित रूप से रहें, तो बीमारियों का कोई कारण नहीं रहता। जैसे ही इनके उचित अनुपात में अंतर आता है, वैसे ही रोगों का उद्भव होने लगता है। रसोई का स्वादिष्ट और लाभदायक होना इस बात पर निर्भर है कि उसमें पड़ने वाली चीजें नियत मात्रा में हों। चावल,दलिया,दाल,हलुआ,रोटी आदि में यदि अग्नि ज्यादा या कम लगे पानी ज्यादा या कम पड़ जाय-नमक, चीनी,घी आदि की मात्रा बहुत कम या बहुत अधिक हो जाय तो उस भोजन का स्वाद, गुण और रूप बिगड़ जाता है। यही दशा शरीर की है। तत्वों के परिमाण में गड़बड़ी पड़ जाने से खराबी आ जाती है।
इस खराबी से बचने के लिए दैनिक कार्यक्रम इस प्रकार का रखा जाना चाहिए कि सभी तत्व आवश्यक मात्रा में उचित रूप से प्राप्त होते रहें। इस विधा के निष्णातों ने इसके लिए कुछ ऐसे उपाय सुझाये है, जिसके द्वारा तत्वों को उचित परिमाण में प्राप्त करके स्वस्थ रहा जा सकता है।
पृथ्वी तत्व को ग्रहण करने के लिए प्रतिदिन प्रातः काल किसी पार्क, मैदान, उद्यान, खेत अथवा अन्य किसी स्वस्थ स्थान पर नंगे पाँव कम-से-कम आधा घण्टा नित्य टहलना चाहिए। इससे पैरों द्वारा शरीर का संचित विजातीय द्रव्य खिंचकर जमीन में चला जाता है और घास की तरावट से पैर ठंडे होते हैं। यह ठंडक मस्तिष्क तक पहुँच कर उसे शीतल बनाये रखती है। इसके अतिरिक्त ब्रह्ममुहूर्त में पृथ्वी से निकलते वाली स्वास्थ्यकारी भाप को शरीर सोखता रहता है। इसलिए प्रातः काल का भ्रमण अत्यधिक लाभकारी माना गया है। परिभ्रमण के समय यदि यह भावना भी होती रहे कि “ पृथ्वी की जीवनीशक्ति पैरों द्वारा अवशोषित होकर संपूर्ण शरीर में व्याप्त हो रही है और समस्त शरीर का विष खींचकर धरती माता हमें निर्मल और स्वस्थ बनी रही है, “ तो लाभ और भी चमत्कारी मिलता दिखाई पड़ेगा। सप्ताह में एक-दो बार मृतिका-स्नान भी लाभकारी होता है।
नित्य स्वच्छ और ताजे पानी से स्नान करना चाहिए। जिस प्रकार पानी पड़ते ही मुरझाई वनस्पतियाँ हरी हो जाती है, वैसे ही दैनिक स्नान से स्फूर्ति, चैतन्यता और सजीवता शरीर को मिलती है, शरीर शीतल, मन प्रफुल्लित और अंग साफ बने रहते हैं। स्नान का उद्देश्य सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, वरन् जल में घुले आवश्यक तत्वों को सोखना भी है।
प्रातः शौच जाने से पूर्व एक गिलास पानी पी लिया जाय, तो मल साफ होता है। कुल्ला एवं गरारे से मुख और गले की शुद्धि होती है। नाक से पानी खींचने से मस्तिष्क ठंडा रहता है। एनीमा लेने से पेट साफ रहता है।
पानी प्रायः हर घंटे एक-से-दो कप पीना चाहिए, अन्यथा इसकी कमी से कोष्ठबद्धता जैसी शिकायत पैदा हो सकती है। पीते समय पानी को घूँट-घूँट पीना चाहिए, ताकि उसमें आवश्यक लार मिलती रहे, साथ ही यह भावना भी करनी चाहिए कि “ इस अमृत तुल्य जल में जो शीतलता, मधुरता और शक्ति भरी हुई है, वह शरीर के कण-कण में, रोम-रोम में व्याप्त हो रही है “। भावना जितनी प्रबल होगी, फायदा उतना ही अधिक होगा।
अग्नि तत्व को ग्रहण करने के लिए धूप स्नान सबसे बढ़िया माध्यम है। प्रातःकालीन सूर्य के समक्ष प्रतिदिन आधे से लेकर एक घंटे तक नंगे बदन बैठना चाहिए और बारी-बारी से प्रत्येक अंग को सूर्य की ओर करके धूप सेंकना चाहिए। इससे आवश्यक विटामिन और तत्व शरीर के सभी अवयवों को समान रूप से मिलते हैं। सूर्य स्नान करते समय भाव यह होना चाहिए कि “ सूर्य भगवान का तेज हमारे अंग-अवयवों में प्रवेश कर उन्हें स्वस्थ, सतेज और प्रफुल्लित बना रहा है।”
सवेरे शुद्ध वायु में घूमने से इस तत्व की पूर्ति होती रहती है। टहलते समय गहरी साँस नाक से ली और छोड़ी जानी चाहिए, ताकि संपूर्ण फेफड़ों में उसका प्रवेश हो सके। साँस अंदर खींचते समय यह भाव होना चाहिए कि ब्रह्माँड में जो स्वास्थ्यकारी प्राण है, वह साँस के साथ भीतर जा रहा है। फिर उसे यथासंभव रोकना चाहिए। इस समय प्राण के रोम-रोम में समाने और शरीर-मन के स्वस्थ, सुन्दर, ओजस्वी एवं तेजस्वी होने का ध्यान करना चाहिए। साँस छोड़ते समय दोष-दुर्गुणों को निकाल-बाहर करने का भाव होना चाहिए। हवन द्वारा वायुभूत औषधियों को ग्रहण करना भी स्वास्थ्य के लिए हर दृष्टि से उत्तम है।
आकाश तत्व की शक्ति शब्द में निहित है। इस शब्द शक्ति को खींचना ही आकाश तत्व को प्राप्त करना हुआ। इसके लिए एकाँत स्थान में किसी नरम बिछौने पर शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दिया जाता है। फिर नेत्रों को बंद करके नीले आकाश का ध्यान किया जाता है और भाव किया जाता है कि निखिल नील आकाश में फैले सद्विचार , सद्विश्वास, सत्प्रभाव चारों ओर से एकत्रित होकर शरीर में विद्युत कणों की भाँति प्रवेश कर रहे हैं। उनके प्रभाव से अंतःकरण दया, प्रेम, परोपकार, कर्तव्य-परायणता, सेवा सदाचार साहस, उत्साह, प्रसन्नता से ओत-प्रोत हो रहा है। श्रद्धा और तत्परतापूर्वक की गई आकाश तत्व की यह साधना अत्यंत विस्मयकारी सिद्ध होती है। इस अभ्यास के फलस्वरूप अनेक सिद्ध महात्माओं, अवतारों तथा देवताओं की शक्तियाँ साधक पर अपना असर डालती और अंतराल को श्रेष्ठता से भरती रहती है। सद्विचारों से ही शरीर-मन स्वस्थ रहता है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
जिस कारण से कोई विकार पैदा हुआ हो उस कारण को दूर करने से वह विकार भी दूर हो जाता है। काँटा लग जाने से दर्द भी बंद हो जाता है। मशीन में तेल न होने के कारण वह भारी चल रही हो और आवाज कर रही हो, तो उसके कल-पुर्जों में तेल डाल देने से वह खराबी दूर हो जाती है। यही बात स्वास्थ्य-सुधार के बारे में भी है। जिस तत्व की न्यूनता, अधिकता से वह गड़बड़ी पैदा हो, उसे सुधार देने से सारा संकट टल जाता है। हमारा यह शरीर पंचभौतिक है। इन पाँच तत्वों में असंतुलन से ही तरह-तरह के विकार और व्याधि पैदा होते हैं। असंतुलन को मिटाना ही स्वास्थ्य को लौटाना है।
राजकुमारी क्षेमा अपूर्व सुन्दरी थी। सुवर्णवर्णा थी, रूप राशि थी। मगध सम्राट बिंबसार के यहाँ जब वह विवाहिता होकर राजगृह आयी तो महारानी कौशल देवी उस समय अग्रमहिषी थी। परन्तु सागल जैसे छोटे स्थान की राजकुमारी होते हुए भी बिंवसार ने उसे कौशल देवी के समकक्ष अग्र राजमहिषी का ही पद दिया । यह उसके अपूर्व सौंदर्य के कारण ही हो सका। सारे रनिवास में उस जैसी रूप सुन्दरी और कोई नहीं थी। स्वयं सम्राट अंतःपुर में उसके इर्द-गिर्द भँवरे की तरह मँडराया करता था। सम्राट की यह आसक्ति उसके अभिमान का कारण भी बनी हुई थी।
इसी बीच सम्राट-भगवान तथागत के संपर्क में आये। यह संपर्क मानों पारस और लौह खण्ड का मिलन था। काली-कुरूपता सुनहली आभा में बदलने लगी। जीवन के इकतीसवें वर्ष में यह विरल क्षण आया था। महात्मा बुद्ध के मार्गदर्शन में जब उसने स्रोतापन्न अवस्था प्राप्त की तो उसका समूचा जीवन ही बदल गया। सद्गृहस्थ की सारी जिम्मेदारियों को पहले की तरह भली-भाँति निभाते हुए भी उसमें अब बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया था। अब उसमें निरंकुश शासकों की सी पहले वाली उद्दंडता नहीं रह गयी थी। अब पहले की तरह दूर-देशों की नगर वधुओं के पीछे दौड़ने वाला कामुक बिंबसार नहीं रह गया था। अपने इस बदलाव को देखकर उसे स्वयं बहुत प्रसन्नता और संतुष्टि थी।
यह लोकमान्यता थी कि शासन करने वाला व्यक्ति जाने अनजाने अनेकों ऐसे दुष्कर्म कर ही लेता है, जिसकी वजह से नरक की योति मिलती है। परन्तु अब तो उसे विकार विमुक्ति की ऐसी विद्या मिल चुकी थी, जिसकी अपनाकर अधोगति की ओर ले जाने वाले सारे कुसंस्कारों का उन्मूलन हो गया। भविष्य में ऐसा कोई कर्म वह कर ही नहीं सकता था, जो नरक की ओर ले जाए। यों उसने उपदेश, धर्म, प्रवचन पहले भी सुने थे। परन्तु महात्मा बुद्ध ने तो विकार विमुक्ति की सक्रिय विद्या दी थी। अपने भीतर विकारों को तटस्थ भाव से देखते हुए उन्हें क्षीण करने का सरल पर प्रभावशाली उपाय दिया था। जिसके अभ्यास से उसे आशातीत लाभ भी हुआ।
सम्राट की अपने परिवार के लोगों से बहुत प्रेम था। उसकी चाहत यह थी कि इस शाँतिदायिनी विद्या का लाभ उसके अपने प्रियजनों को भी मिले। परन्तु उसे यह भी मालूम था कि इसके लिए किसी पर दबाव नहीं डालना चाहिए। अध्यात्म का जो मार्ग जिसे रुचिकर हो, वह उसे स्वेच्छा से अपनाए। परन्तु अपनी ओर से वह केवल प्रेरणा ही दे सकता था सो देता रहता था।
महारानी क्षेमा उसे बेहद प्रिय थी। अतएव वह चाहता था कि वह तथागत के सान्निध्य में आए और धर्म सीखे। लेकिन उसे यह भी मालूम था कि क्षेमा को तथागत से वितृष्णा है। उनके द्वारा की गई रूप-भर्त्सना से उसे घृणा है। इसीलिए वह उनके उपदेश सुनने के लिए एक बार भी नहीं गई। पहली बार जब इसी उद्देश्य भगवान को आमंत्रित किया गया ताकि राजपरिवार के लोग उनके संपर्क में आ सकें तब भी क्षेमा दूर रही। नगर में वेणुवन का दान देकर तथागत को कुछ समय के लिए राजगृह में रहने का शुभ संकल्प भी इसीलिए किया गया था कि उसके परिवार और राज्य के लोग भगवान के संपर्क में आयें और शुद्ध धर्म सीखकर शान्ति लाभ लें, परन्तु क्षेमा कभी वेणुवन नहीं गई।
बिंबसार क्षेमा के इस व्यवहार से दुःखी था। वह हृदय से चाहता था कि क्षेमा भगवान के उपदेश सुने। उनसे साधना सीखे और अपना मंगल साथ ले। परन्तु अपने परिवार के अथवा राज्य के किसी भी व्यक्ति पर उसने कभी कोई दबाव नहीं डालना चाहता था। अंततः उसने एक उपाय सोचा।
क्षेमा को गायन विद्या से बहुत प्रेम था। अच्छे संगीतकार और गायक उसके मनोरंजन के लिए अंतःपुर रमें बुलाए जाते थे। बिंबसार ने बेणुवन की मनोरमता पर कुछ गीत लिखवाए और कुछ अच्छे गायकों को वे गीत क्षेमा को सुनाने के लिए भेजा। वेणुवन का नन्दनवन जैसा वर्णन सुनकर उसके मनमें यह अभालाषा जागी कि वह वेणुवन की सैर करने जाए, परन्तु ऐसे समय जबकि भगवान मिक्षाटन के लिए बाहर गए हुए हों। महाराज बिंबसार ने ऐसा ही प्रबंध कर दिया।
वह वेणुवन पहुँची। वहाँ की नैसर्गिक सौंदर्य सुषमा और शान्तिप्रद वातावरण को देखकर वह अत्यन्त प्रभावित हुई। जैसा सुना था उससे भी कहीं बढ़कर मनोरमा पाया इस वेणु उद्यान को। कहाँ राज-महलों का घुटन भरा वातावरण ईर्ष्या, द्वेप भरी अशान्ति और कहाँ यह प्रकृति की उन्मुक्त मधुरिमा और तपोभूमि की अगाध शान्ति। घूमते-घूमते बहुत समय बीत गया। भगवान बुद्ध भिक्षाटन से लौट आए। उसने देखा कि अनेक स्थानों पर पेड़ों के नीचे अथवा पुष्प मंडपों के नीचे अनेक विपश्यना योगी ध्यान कर रहे हैं। उनमें से अनेकों युवक हैं। उन्हें देखकर उसके मन में यह भाव जागा कि यह उम्र में तो गृहस्थ जीवन के कामोपभोग का सुख भोगना चाहिए। ध्यान बेकार अपनी जवानी नष्ट कर रहे हैं।
इन्हीं विचारों में उलझी हुई वह वहाँ पहुँची जहाँ भगवान की गंध कुटी थी। उसके समीप एक पेड़ के नीचे स्वयं बुद्ध बैठे थे। जिन्हें टालना चाहती थी उन्हीं का सामना हो गया। तथागत ने नजर उठाकर क्षेमा की ओर देखा उनकी आंखों में असीम करुणा थी। परन्तु क्षेमा ने तो सदा वासना भरी आँखें देखी थी। यहाँ इन आँखों में तो वासना का नामोनिशान नहीं था। भगवान ने एक बार देखकर उपेक्षा से अपनी आंखें फेर लीं। रूपगर्विता क्षेमा का दर्प आहत हो गया। उसे जो देखता-देखता ही रह जाता, उसके रूप लावण्य में ऐसा तीव्र आकर्षण था। आज पहली बार उसने देखा किसी पुरुष ने उसे एक नजर देखकर अपनी आँखें फेर लीं। उसे यह सहन नहीं हुआ।
तथागत ने देखा क्षेमा के पास अनेक जन्मों में अर्जित प्रचुर पुण्यों का संग्रह है। परन्तु इस समय की मानसिकता में इसे शब्दों द्वारा धर्म को नहीं समझाया जा सकता । यह सोचकर महाकारुणिक बुद्ध ने ऋद्धि बल का उपयोग किया। क्षेमा ने देखा भगवान के समीप एक अत्यंत रूपवती देवागंना उपस्थित हो गई है और उनकी सेवा में लगी है।
उसकी रूप शोभा देखकर वह आश्चर्यचकित रह गई। ऐसा रूप तो उसने पहले कभी देखा नहीं था। अनुपम नारी सौंदर्य की सजीव प्रतिमा अंग-अंग लावण्य से भरपूर। अरे ! मैं तो इसकी परिचारिका बनने योग्य भी नहीं। जिसकी सेवा में ऐसी अप्सराएँ नियत हों, वह मेरी ओर आँख उठाकर क्यों देखे भला ? रूप सौंदर्य का ऐसा समुच्चय क्षेमा विस्मय-विमुग्ध होकर उस अप्सरा को देखती रही, देखती रही।
कुछ देर में उसने देखा कि यह नवयौवना धीरे-धीरे प्रौढ़ हो गई है। सौंदर्य की आभा ढलने लगी और देखते ही देखते अरे ! यह क्या हुआ ? चेहरे पर ही नहीं सारे शरीर पर झुर्रियाँ ही झुर्रियाँ । हड्डियों का ढाँचा, जिस पर यहाँ-वहाँ उभरी बदसूरत नसें और तिस पर ये झुर्रियां। अरे ! देख इस अस्थि कंकाल नारी की कमर झुकती जा रही है। डंडे के सहारे खड़ी है। दुर्बलता के कारण हाथ काँपते हैं पाँव काँपते हैं, सारा शरीर काँपता है। अरे ! यह तो डंडे के सहारे भी नहीं टिक सकती झुकते-झुकते गिर ही पड़ी। उखड़े-उखड़े साँस चलने लगे। यह देखो अब साँस भी रुक गया। ओह ! यह हड्डियों का ढेर। अरे ! यह तो सचमुच ढेर हो गई, मृत हो गई। सचमुच मर ही तो गई।
ऐसे सुन्दर रूप की यह अंतिम परिणति ? क्षेमा के मन में यकायक बिजली सी कौंधी। क्या मेरी भी यही दशा होगी। मेरा रूप लावण्य भी ऐसे ही जर्जरित हो जाएगा ? ऐसे ही निष्प्राण हो जाएगा बहुत बड़ा धर्म संवेग जागा उसके मन में। ऐसी जरा-मरणधर्मा काया के प्रति इतनी आसक्ति। वह गंभीर हो गई। यकायक उसके अनेक जन्मों संचित पुण्य पारमिताओं का धर्मबल जाग गया। तथागत समझ गए अब इसकी मनःस्थिति धर्म सुनने समझने योग्य है, तो उनकी करुणा का सरित प्रवाह बह उठा “ देख क्षेमा ! इस शरीर को देख, जो सड़ता है, चूता है, गंदा है, बदसूरत है, मृत है ! मूढ़ जन ही इसका अभिनन्दन करते हैं। चित्त को एकाग्र करके इस तत्व को समझ। इसके प्रति निर्वेद जगा। अनासक्ति जगा । समझ जैसा यह शरीर है वैसा ही तेरा शरीर है। जैसा बाहर है वैसा ही भीतर है। जैसा भीतर है वैसा ही बाहर है अशुचि का गंदगी की ढेर है यह। इस नश्वर शरीर के प्रति विमुख हो। उस परम विमुक्त अविनाशी अवस्था के प्रति सम्मुख हो। सम्यक् ध्यान करके अपने अहंकार की जड़ें खोद ले और निर्वाणिक शान्ति का लाभ कर। “
बुद्ध की करुणा उसके अंतराल के कल्मषों को धोने लगी। चित उपराम होकर देशना की धारणा करने लगा। भीतर चिंतन मंथन का क्रम चल
पड़ा। स्वयं भगवान सम्यक् संबुद्ध द्वारा कल्याणकारी मार्ग का निर्देशन मिला। अनेक जन्मों के पुण्यों का फल मिला। वह भावविभोर होकर भगवान के चरणों में गिर पड़ी और आभार प्रकट किया। उसे अब समझ में आया कि काम मोह में डूबी रहने के कारण इन महाकारुणिक से दूर रहकर वह अपने ही सुख से वंचित रही है। बुद्ध की करुणा से स्नात होकर वह महाराज बिंबसार के पास गई और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की कि किस युक्ति से आपने मुझे भगवान के पास भेज दिया। गई थी वन दर्शन के लिए, पर मिल गया निर्वाण दर्शन। उनके मार्ग निर्देशन में मेरे मन में बड़ा निर्वेद जागा है। मुझे उनके भिक्षु संघ में प्रव्रजित होने की अनुज्ञा दीजिए।
बिंबसार अब पहले वाला बिंबसार नहीं था। उसने बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने अंतःपुर की सर्वोपरि सुन्दरी को प्रव्रज्या लेने की अनुमति दे दी। प्रव्रज्या लेकर क्षोमा गहन ध्यान में प्रविष्ट हो गई । कुछ ही समय में उसने अहँते अवस्था प्राप्त की। उसकी धर्म सिखाने की कला इतनी प्रभावशाली थी कि स्वयं भगवान ने उसकी योग्यता को देखकर कहा-
एतहग्यं भिक्खवे, ममसाविकानं भिक्खुणीन मरायज्ञानं यदिदं क्षेमा। “
सभी श्राविकाओं में भिक्षुणियों में उसे महाप्रज्ञावती के अग्रपद से विभूषित किया।
प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपहारों में दृष्टि का स्थान सर्वोपरि है। इस अमूल्य उपहार की सुरक्षा एवं स्वस्थता के लिए हमें निरंतर सजग रहना पड़ता है। यों तो संतुलित और पौष्टिक आहार से शरीर के सभी अंग-अवयव बलिष्ठ होते हैं, किन्तु आँखों के लिए कुछ विशेष रूप से उत्तरदायी ऐसे आहार तत्व चिकित्सा द्वारा खोज निकाले गये हैं, जिनकी यदि उपेक्षा होती रहे तो नेत्र ज्योति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उनमें विटामिन ‘ए’ प्रमुख तत्व है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सर्वेक्षणकर्ता वैज्ञानिकों के अनुसार विटामिन ‘ए’ की कमी के कारण अंधत्व में प्रतिवर्ष 5-6 लाख बच्चे अपनी नेत्र-ज्योति खो बैठते हैं। सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डभ्0 एम॰ फ्रेंकलिन विकनेल का कहना है कि इस विटामिन के अभाव में रतौंधी का होना एक सामान्य बात है। इसकी कमी के कारण प्रायः आँखें सूजी रहती हैं और ऐसा व्यक्ति यदि तब भी उपेक्षा बरतता रहे तो वह स्थायी रूप से अंधेपन का शिकार हो सकता है। विटामिन ‘ए’ प्रकृति परिमाण में पाया जाता है, जिनका समावेश आहार में होना ही चाहिए।
व्यक्ति द्वारा यदि संतुलित और प्राकृतिक आहार लिया जाता रहे तो स्वास्थ्य अक्षुण्ण बना रहेगा और यदि स्वास्थ्य अच्छा है तो आँखें भी स्वस्थ रहेंगी ही, क्योंकि वे भी शरीर के अंग अवयव हैं। स्वस्थ आँखों का तात्पर्य मात्र आँखों सही दृष्टि से नहीं, वरन् सर्वथा दोष रहित आँखों से है। अर्थात् आँखों में शीघ्र थकान न आवे, पीलापन लिए हुए न हो और आँखों का गोलक गड्ढे में धँसा हुआ न लगे और न पुतलियों, पलकों के नीचे झुर्रियाँ हों। आंखें स्वच्छ, निर्मल, धवल व चमकदार हों तो ही आँखें स्वस्थ कहीं जायेंगी।
नेत्र चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार
विटामिन “ए” नेत्रों के स्वास्थ्य से बहुत अधिक संबंध रखता है। हमारी आँखों के ‘रेटिना’ कोषों में जो प्रतिक्रियाएं होती हैं, उनके लिए विटामिन ‘ए’ की प्रचुर मात्रा में उपस्थिति आवश्यक है इसकी कमी से इन क्रियाओं में व्यवधान होने लगता है और फलस्वरूप आँखों का ‘डार्क एडेप्टेशन’ का समय बढ़ने लगता है और रतौंधी होने लगती है। यदि इस विटामिन की और अधिक कमी हो जाती है तो दूसरे गंभीर लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं। आँखों की कंजरटाइवा के कोष मोटे, परतदार और सूखे हो जाते हैं और अपनी चमक खो देते हैं। आँख के कोने पर यह परत मोटी , सफेद और सिकुड़नदार हो जाती है। ऐसा बालक आँखों में किरकिरी की शिकायत करता है, धूप में देख नहीं सकता और आँखों से पानी बहने लगता है। यह प्रायः स्थानीय संक्रमण के कारण होता है जिसके फलस्वरूप आँसुओं को स्रवित करने वाली ग्रंथियां भी कम मात्रा में अपना स्राव निकालती है और आँखें सूखी सी रहने लगती है। उनकी चमक जाती रहती है। आँसुओं की कमी से कार्निया की मिलने वाला पोषण कम हो जाता है जिससे इसके पास वाले कन्जक्टाइवा पर सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। इन परिस्थितियों में आँखें अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता खो बैठती हैं, कार्निया-अक्षिपटल पर घाव हो जाते हैं और अंततः वह फट जाता है और व्यक्ति सदा के लिए अपनी नेत्र ज्योति खो बैठता है।
आँखों को स्वस्थ बनाये रखने में न अधिक मेहनत करनी पड़ती है और समय तथा श्रम भी अधिक नहीं व्यय करना पड़ता। मात्र थोड़ी जागरुकता एवं कुछ नियम पालन करने से आँखों को सदा स्वस्थ बनाये रखा जा सकता है। इन्हें निरंतर स्वस्थ रखने के संबंध में सर्वोपरि ध्यान नेत्रों की स्वच्छता पर देना होता है। आँखों की प्रकृति ठंडक पसंद है, अतः नित्य सुबह उठते ही उन्हें ठंडे पानी से साफ करना न भूला जाय। अच्छा सुबह उठते ही एक बाल्टी में शुद्ध शीतल जल लेकर बैठा जाय। एक स्वच्छ गिलास से उसमें से जल लेकर मुँह में पूरी तरह पानी भर लिया जाय। इसके पश्चात् एक चुल्लू में पानी भरकर आँखों पर हल्के से छींटे मारे। पलकों पर ध्यान रखा जाय कि वे झपके नहीं। पाँच-सात बार छींटे मारते-मारते साँस फूलने लगती है। अब मुँह का पानी कुल्ला करके सामान्य साँस लेनी चाहिए। थोड़े अंतर के बाद फिर से मुंह में पानी भरकर जल के छींटे आँखों पर मारें। यह क्रम पाँच-सात बार कर लेने से आँखें स्वच्छ एवं स्वस्थ अनुभूत होने लगती है।
आँखों को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाये रखने की क्रियायें अत्यंत सरल है, जिन्हें कोई भी अपनाकर लाभान्वित हो सकता है। आँखों को धूल एवं गर्मी से बचाये रखने के लिए यह अभ्यास भी यदि प्रति दिन न कर सकते हों तो प्रति दूसरे दिन करने की तत्परता बरतनी चाहिए। इसके लिए एक बाल्टी साफ पानी लिया जाय और श्वाँस रोककर अपने सिर को उस पानी में इतना डुबोया जाय कि आँख, नाक, मुँह सभी पूरी तरह डूब जायँ। अब उसी पानी के अंदर आँखें खोलने, बंद करने और पुतलियों को इधर-उधर घुमाने का प्रयत्न करें। जब साँस लेता हो तो सिर बाहर कर लें। दो-चार आवृत्ति से आँखें भलीभाँति स्वच्छ और शीतल हो जाती है।
नेत्रों को स्वच्छ एवं सशक्त बनाये रखने में त्रिफला जल को बहुत ही गुणकारी पाया गया है। किसी साफ-सुथरे मिट्टी के पात्र या स्टील के वर्तन में एक-दो चम्मच त्रिफलाचूर्ण अर्थात् आँवला, हरीतिकी एवं बहेड़ा के समभाग चूर्ण को रात्रि में एक गिलास पानी में भिगो दिया जाय। प्रातःकाल उसे स्वच्छ हाथों से खूब मलकर साफ सुथरे कपड़े से छान लें। यह जल नेत्रों को धोने में प्रयुक्त किया जाय तो उनकी सफाई तो होगी ही, साथ-साथ प्राकृतिक पोषण भी उन्हें मिलता रहेगा। इसी भाँति रात को सोते समय आँखों को शीतल जल से धो लेना भी लाभकर सिद्ध होता है।
आँखों को विश्राम निद्रा से मिलता है। अतः पूरी नींद लेने में कोताही न बरती जाय। चौबीस घंटों में कम से कम 6-7 घंटे सोने से आँखें चुस्त एवं दुरुस्त बनी रहती हैं। इसके ठीक विपरीत यदि पूरी नींद न ली गयी हो तो उनमें जलन बनी रहती है। वे सूजी-सूजी तथा बोझिल सी लगती है। उनमें लाल-लाल डोरे धागे से दिखने लगते हैं। ऐसे लोगों को प्रायः सिर दर्द की शिकायत बनी रहती है और काम-काज में जी नहीं लगता। आँखों से काम लेते हुए भी बीच-बीच में उन्हें आराम देने की भी आदतें विकसित करनी चाहिए।
नेत्रों को कमजोर और बीमार बनाने का एक प्रमुख साधन टेलीविजन का अति प्रयोग भी है। अतः उसे देखते समय लगातार एक टक न देखा जाय तो आँखों की सेहत के लिए अच्छा रहेगा। इसके लिए बीच -बीच में दृष्टि इधर-उधर घुमा लेने से भी बहुत कुछ राहत मिल जाती है। आँखों से बारीक काम लेते समय भी उन्हें बीच-बीच में आराम दिया जाय। यदि पढ़ाई कर रहे हैं या सिलाई, कढ़ाई कर रहे हैं तो सामान्यतया 20 मिनट बाद काम बंद करके थोड़ी देर तक दोनों हाथों की हथेलियों से आंखें बंद रखने से उनकी थकान दूर हो जाती है। यदि आँखें थकी-थकी सी लग रही हों तो गुलाब जल मिश्रित पानी से साफ रुई भिगोकर आँखों पर रखने से राहत मिलती है और तरोताजगी महसूस होती है।
दृष्टि सामर्थ्य को सुधारने या उसे यथावत् बनाये रखने के लिए प्राकृतिक चिकित्सकों ने जल, सूर्य तथा चन्द्र किरणों से लाभ उठाने की बातें बतायी है। शीतल जल से आँखों को धोने या छींटे मारने से उनको स्फूर्ति मिलती है, सफाई होती है तथा शीतलता मिलती है। सूर्य किरणों से लाभ उठाने के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा रहता है, जब कि स्वर्णिम सूर्य की किरणें शीतलता लिए होती हैं । इस प्रक्रिया में अधखुले नेत्रों से कुछ सेकेंड तक सूर्य के प्रकाश को देखते हैं और फिर नेत्र बंद कर लेते हैं। अब अंतः त्राटक की भाँति ध्यान द्वारा उस प्रकाश ऊर्जा को दोनों नेत्रों एवं उससे संबद्ध समस्त तंत्रिकाओं को सूक्ष्म केन्द्रों पर केन्द्रित करते हैं, साथ ही यह भावना भी परिपुष्ट करते चलते हैं कि उसकी समस्त कमजोरियाँ दूर होती जा रही हैं और नेत्र स्वस्थ एवं तेजस्वी बनते जा रहे है। दो-तीन बार से आरंभ करके सामर्थ्यानुसार सुबह को 10-15 मिनट तक अभ्यास किया जा सकता है। इसी तरह रात्रिकालीन चन्द्रमा को अथवा किसी तेज तारे को अपलक नेत्रों से तब तक देखते रहें जब तक आँखों से पानी न आने लगे। एक-दो बार के अभ्यास से ही आँखों में शीतलता प्रतीत होने लगती है।
मूर्धन्य नेत्र चिकित्सा विज्ञानी डॉ0 वेट्स तथा जर्मनी के नेत्र विशेषज्ञों ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि पामिना क्रिया नित्य नियमित रूप से करते रहने पर आँखों में विशेष तेज उद्भूत होता है और वे स्वस्थ बनी रहती है। इस अभ्यास में दोनों हाथों से आँखें ढक ली जाती है और किसी काली वस्तु का ध्यान किया जाता है। जब आँखों के सामने घना अंधेरा छाने लगता है तब हथेलियों को हटा लिया जाता है और आँखें झिलमिलाते हुए उन्हें प्रकाश में खोला एवं बंद किया जाता है। इसी भाँति दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ कर आँखों को एकबार गरम सेंक दी जाती है तो दूसरी बार आँखें झपकाते ठंडी हथेलियों से हलका सा पुतलियों पर दबाव डाला जाता है। एकोत्तर क्रम से यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है और इस प्रकार आँखों को क्रमशः उष्णता और शीतलता मिलती है और वे स्फूर्तिवान एवं स्वस्थ बनी रहती है।
नेत्रों को धूप, धूल और धुंआ से बचाकर रखने से वे स्वस्थ बने रहते हैं। किसी वस्तु को एकटक देखते रहने, लेटकर पढ़ने, सिनेमा, टी0वी0 पास से एवं बराबर अपलक देखते रहने से आँखों पर बुरा असर पड़ता है। इसने बचा ही जाना चाहिए।
गुण ग्राह्यता का संबंध चापलूसी और चाटुकारी के साथ स्थापित नहीं किया जा सकता। एक स्वरूप सच्चा होता है तो दूसरे का झूठा। एक हृदय क्षेत्र की उपज है तो दूसरी जिव्हा की। एक निःस्वार्थ होता है, तो दूसरा स्वार्थमय। एक की सर्वत्र प्रशंसा होती है, तो दूसरे की निंदा। मैक्सिको नगर के चेपल टेपक भवन में जनरल ओब्रग्रोन की प्रतिमा प्रतिस्थापित है जिसके नीचे उनके उपदेशों का सार संक्षेप खुदा हुआ है “आक्रमण करने वाले शत्रु से मत डरो किंतु चापलूस मित्रों के कपटपूर्ण व्यवहार के अवश्य बचाव का उपाय करना चाहिए।
व्यक्ति और समाज में रूपाँतरण की जब घटना घटती है, जो उसके प्रमुख माध्यम होते हैं स्वाध्याय और सत्संग। स्वाध्याय से सत्प्रेरणा मिलती है और सत्संग से सद्भावना पुष्ट होती है। जब ये आचरण में उतरते हैं, तो परिवर्तन सामने आता है एक ऐसा परिवर्तन, जो यदि सतत् प्रवाहमान रहे, तो मानव को महामानव और समाज को स्वर्ग बना देता है।
उदात्तीकरण का यह सामान्य सिद्धाँत हुआ ? सिद्धाँत और प्रक्रिया दो भिन्न बातें हैं। सिद्धाँत संभावना प्रकट करता है और उसे साकार करने की विधि प्रक्रिया है। प्रथम यदि द्वितीय में परिवर्तित न हो सके, तो थ्योरी मालूम होते हुए भी अभीष्ट की उपलब्धि किसी प्रकार संभव न हो सकेगी। पुस्तक और प्रवचन हमें रास्ता दिखाते हैं और संभावना व्यक्त करते हैं कि यदि व्यक्ति को अच्छा वातावरण मिले, तो वह उत्कृष्ट बन सकता है। सिद्धाँत मात्र है। इसे क्रिया रूप में बदले बिना परिवर्तन शक्य नहीं। जहाँ ऐसा दिखाई पड़ता है, वहाँ इसके पीछे उद्दीपन कार्य करता है। क्रिया को प्रतिक्रिया होता है, तो रूपाँतरण घटित होता है, फलस्वरूप व्यक्ति व समाज का अभिनव रूप सामने आता है।
इसी आशय का मंतव्य प्रकट करते हुए जे0 कृष्णामूर्ति कहते हैं कि श्रवण और अध्ययन आनन्ददायक तो होते हैं, पर परिवर्तन में इनकी भूमिका गणितीय सवालों को हल करने वाले सूत्रों जितनी ही होती है। सूत्र केवल संकेत मात्र होते हैं। विद्यार्थी को इनके आधार पर अपनी अकल भिड़ानी पड़ती है, तभी प्रश्न का सही उत्तर मिल पाता है। वैसे ही स्वाध्याय और सान्निध्य परिवर्तन की अनुकूलता तो उपलब्ध कराते हैं, पर इतना ही पर्याप्त नहीं है।
अंतस् की हलचल और उथल-पुथल भी अभीष्ट-आवश्यक है। जहाँ इस प्रकार की क्रियाएँ नहीं होती, वहाँ परिवर्तन की प्रतिक्रिया नहीं होती, वहाँ परिवर्तन की प्रतिक्रिया भी दृष्टिगोचर नहीं होती। एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए इसे और स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति से दिन में अनेक बार अनेक लोग यह कहते हैं कि तुम बीमार जैसे लग रहे हो, तो शाम होते-होते वह निश्चित रूप से अस्वस्थ हो जाता है, कारण कि वह वाक्य उसके अंदर उद्दीपन आरम्भ कर देता है। क्रिया चल पड़ती है, तो उसकी परिणति अवस्था के रूप में तुरन्त सामने आती है। वे लिखते हैं कि स्वाध्याय और सत्संग की अच्छी बातें अप्रभावी सिर्फ इसलिए सिद्ध होती हैं कि वे अंतराल की गहराई में उतर कर उस विन्द को छू पाती, जो बदलाव उत्पन्न करती है। यदि इस संदर्भ में अध्येता और श्रोता गम्भीर बने रहें और पढ़े अथवा सुने हुए प्रसंग के प्रति इतनी संवेदन शीलता उत्पन्न कर सकें कि वे अन्दर चल कर सीधे मर्म में आघात करें, तो रूपाँतरण तत्क्षण घटित होना आरम्भ हो जायेगा, पर इन दिनों ऐसा यदा-कदा ही होता देखा जाता है अतः परिवर्तन भी कभी-कभी दृश्यमान होता है।
इसकी प्रक्रिया दो प्रकार को संपन्न होती है - एक तो संदेश के प्रति इतना आकर्षण उत्पन्न किया जाय कि वह अंतस्तल में धँस कर बदलाव को निष्पन्न कर दें। इसके दूसरे प्रकार में खिंचाव तो होता है, पर उसका चुम्बकत्व उतना प्रबल नहीं होता कि वह अवचेतन में आविर्भूत हो सके। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को चेतन स्तर पर स्वयं प्रयास आरम्भ करना पड़ता है। अपनी वासना और तृष्णाओं को बलपूर्वक दबाना और जो श्रेष्ठ व सुन्दर है, उसे विकसित करना पड़ता है। इतना कर लेने के उपराँत व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है, उसका भीतरी दैत्य मर जाता और उसकी जगह देव पैदा होता है। यही क्रांति है। इसे संपादित कर लेने वाला व्यक्ति महान और समाज गुणवान बन जाता है।
विवेकानन्द ने एक बार अपने व्याख्यान में कहा था - “युवकों ! तुम महान बनना चाहते हो, तो महानता को अपने अंदर घटित होने दो, श्रेष्ठता को अंतःकरण में प्रवेश पाने दो, हृदय कपाट को अनावृत्त रखो, ताकि इस संसार में जो कुछ उदात्त और उच्चस्तरीय है, वह तुम में आत्मसात् हो सके। याद रखो, मात्र शब्दों को श्रवण-तंत्र से होकर गुजार भर लेने से विशेष कुछ न होगा, जो हो, वह इतना ही है कि तुम कष्ट कठिनाई को भूल कर थोड़े समय के लिए शाँति के समुद्र में डूब जाओगे, पर स्वयं शाश्वत शाँति के सागर न बन सकोगे, वह गहराई व गंभीरता पैदा न हो सकेगी जो ये सलिलागार अपने में सँजोये हैं। यह मत भूलों कि आने वाली पीढ़ियों के तुम भाग्य विधाता हो, भविष्य निर्माता हो। उज्ज्वल भविष्य का निर्माण वही कर सकता है, जो आत्म निर्माण कर चुका हो। अतः इस गोष्ठी को अपने में उतर जाने दी-सिर्फ शब्दों से नहीं, वाक्यों से नहीं, वान् भार्वां व क्रियाओं से।”
सचमुच शब्द और संदेश जब तक कार्य रूप में न परिणत हो जायँ, तब तक कर्ता के लिए निरर्थक और निरुद्देश्य हैं। सार्थक वे तभी बनते हैं, जब आचरण में उतरें और दूसरों को अनुकरणीय प्रेरणा दें, अन्यथा बुद्धि विलास मात्र बन कर रह जायेंगे। बौद्धिक संपदा का अपना एक गुण है कि वह बुद्धि क्षेत्र तक ही सीमित होकर रह जाती है। उसका उपयोग इससे आगे और कुछ नहीं हो पाता। वह पढ़ने-सुनने भर की वस्तु बनाती है और उसका बौद्धिक हस्ताँतरण भर होता रहता है। किसी ने कहीं कोई अच्छी बात सुनी या पढ़ी, तो उसे वह अपनी बुद्धि में-मस्तिष्क में कैद कर लता है और दूसरों को सुनाता रहता है। फिर वह क्रिया न बन कर ज्ञान का अध्ययन का - श्रवण का-स्मरण का विषय बन जाती है। इसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग यही हो सकता है कि उसे हम वाणी बन लेते हैं, जबकि जीवन बनना चाहिए और अच्छाई यदि जीवन न बनी, तो अच्छी बातें पढ़ने-सुनने का कोई अर्थ और उद्देश्य नहीं रह जाता। इसीलिए मूर्धन्य मनीषी गुजरिएफ कहा करते थे कि उत्तम बातों के प्रति अभिरुचि जगाओ - उत्कंठा बढ़ाओं - उन्हें सुनो और सुनाओ, पर यहीं रुक मत जाओ। इतना पर्याप्त नहीं है। यह आवश्यक तो है, क्योंकि इसके पश्चात् कुछ आर सम्भव है। किन्तु इतना काफी नहीं है। यह मात्र विचार है। इससे आगे का चरण अनुभव है। विचार से अनुभव की ओर यात्रा करके ही जानकारी को जीवन बनाया जा सकता है, उसे जिया जा सकता है। जहाँ जानकारी जीवन बन जाती है, वहीं उसी क्षण श्रेष्ठता घटित होती है और व्यक्ति का रूपांतरण हो जाता है। इन दिनों चूंकि चिंतन से अनुभूति की ओर का प्रयाण व्यक्ति में रुका हुआ, इसलिए प्रत्यक्ष में स्वाध्याय और सत्संग की नियमित दिनचर्या दिखाई पड़ने पर भी उनकी वह परिणति समाने नहीं आती, जो आनी चाहिए।
दुनिया में अच्छी बातों और विचारों का अभाव हो, सो बात नहीं। अभाव है, तो मात्र ग्रहणशील हृदय का। संग्राहक मन यदि व्यक्ति के पास हो, तो बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ी और आत्मसात की जा सकती है, किंतु जहाँ हृदयंगम की क्षमता ही न हो, वहाँ लाख प्रवचन सुनने और पारायण करने की प्रवृत्ति मनोरंजन जितना उथला प्रयोजन ही पूरा करती है। ऐसी दशा में साधारण जन अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए अनेक प्रकार के बहाने गढ़ता है तर्क यह देता है कि प्रभावशाली व्यक्तित्व के अभाव में ही सर्वसाधारण पर उसका असर नहीं पड़ सका। यह सच है कि उत्कृष्ट व्यक्तित्व का अपना पृथक प्रभाव होता है, पर अवास्तविक यह भी नहीं है कि प्रभावकारी वह वहीं साबित होता है, जहाँ मनस्विता होती है। अमनस्विता युक्त समुदाय तो उन्हें इसलिए घेरे रहता है कि वे सुन्दर-सुन्दर बातें बताते हैं, मन को शाँति पहुँचाते हैं, किंतु जहाँ बदलाव का प्रश्न आता है, चिकने घड़े बन जाते हैं। इस प्रकार लंबे समय का उनका पठन-श्रवण बेकार चला जाता है। नित्य पढ़ना और उसे भुला देना, नित्य सुनना और निकाल देना-प्रायः यही उनका स्वाभाविक क्रम होता है। इससे स्पष्ट है कि ग्रहण करने की अभीप्सा की अनुपस्थिति और ग्राह्य के प्रति अपेक्षा भाव ही वे कारण हैं, जो अच्छे उपदेश को व्यवहार में नहीं उतरने देते। इस तरह उपदेशक के अचुबंकीय व्यक्तित्व संबंधी सापेक्ष निरस्त हो जाता है। जब पशु-पक्षियों से शिक्षा ग्रहण कर दत्तात्रेय अनुपलब्ध की उपलब्धि कर सकते हैं, तो मनुष्य द्वारा बतलायी गई उत्तम बात को धारण करने में किसी को क्योँ आपत्ति होनी चाहिए ? यह समझ से परे हैं।
विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि यदि लोहा को सोना और सीसा का चाँदी बनाना हो, तो एक ही कार्य करना पड़ेगा, उनकी परमाणु संख्या को परिवर्तित करना पड़ेगा। किसी प्रकार लोहे और सीसे को क्रमशः सोने और चाँदी वाली परमाणु संख्या प्रदान की जा सके, तो उनका रूपाँतरण संभव है पर यह सब कैसे किया जाय ? इसकी प्रक्रिया उनके हाथ अभी नहीं लगी है। उन्होंने मात्र अभी सिद्धाँत दिया है, किन्तु केवल सिद्धाँत से बदलाव संभव नहीं। इसके लिए प्रक्रिया का होना निताँत आवश्यक है। व्यक्तित्व निर्माण में पुस्तक और प्रवचन की ऐसी ही भूमिका है। वे मार्गदर्शन मात्र करते हैं, उनके आधार पर पुरुषार्थ स्वयं करना पड़ता है। यह प्रक्रिया है। प्रक्रिया यदि चल पड़ें, साधारण से असाधारण बन जाना सुनिश्चित है। फिर समाज के स्वर्ग बनते देर न लगेगी।
परिवार के सभी लोग स्वर्ग सिधार गये तो एक व्यक्ति अपने छोटे बच्चे को लेकर हिमालय में तपोवन जाकर तप करने लगा। वर्षों बीत गये। बच्चा भी पिता के साथ तप करता रहा। जब पिता स्वर्गवासी हुए। बच्चा जवान हो चुका था। एक दिन उसे हिमालय से उतरकर नीचे आने की सूझ पड़ी। रात्रि विश्राम एक गाँव में किया उस रात उसने देखा कि कुछ लोग बाजा ढोल पीट रहे हैं। एक व्यक्ति घोड़े पर बैठा है। महिलाएँ गीत गा रही है। वह देखकर हैरान हुआ कि यह क्या है। लोगों ने कहा बाबा शादी हो रही है। घोड़े पर दूल्हा बैठा है। इसकी शादी होगी। युवक संन्यासी देखकर हैरान हुआ यह क्या तमाशा। रात पड़ गई खाना पीना खाकर कुएँ की मुण्डेर पर चद्दर बिछाकर सो गया गर्मी के दिन थे।
अचानक गहरी नींद से सपना देखा युवक संन्यासी ने कि वह घोड़े पर चढ़ रहा है और जैसे ही उसने पैर ऊपर उठाया कि धड़ाम कुएँ में जा गिरा। वह चिल्लाया निकालो मुझे ! लोग दौड़े। देखा ! युवक संन्यासी हँस रहा है लोगों ने कहा “बाबा ! कुएँ में गिरकर भी हंस रहे हो “ वह बोला निकालो तो सही पहले।
लोगों ने निकाला और पूछा । कुएँ में कैसे गिरे ? गिरे, फिर, हँसे क्यों ? उसने सारी बात बताई और कहा जब सपने की शादी इतना दुख दे सकती है तो सचमुच की शादी तो क्या दुर्गति बनाती होगी। मैं तो बच गया पर बाकी की क्या हालत होती होगी, सोच-सोच कर ही हँस रहा हूँ।
मनुष्य का प्रादुर्भाव कैसे हुआ ? इस संबंध में विकासवादी अवधारणा यह है कि जीवन विकास का प्रारम्भिक चरण एक कोशि जीव था। इसी से कालक्रम में छोटे-से-छोटे जीवधारी से लेकर मानव जितना बुद्धिमान प्राणी पैदा हुआ।
यदि इस मान्यता को आधार माना गया, तो यह भी स्वीकार करना पड़ेगा, कि विकासवादी प्रक्रिया पूर्णतः आकस्मिक थी। जहाँ सब कुछ अकस्मात् हो रहा हो, कोई नियामक तंत्र उसके पीछे काम नहीं कर रहा हो, उसकी परिणति भी अचानक घटी दुर्घटना जैसी होनी चाहिए, पर नृतत्ववेत्ता तो मानवी विकास की एक सुसंबद्ध शृंखला ढूँढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, यह कितना हास्यास्पद है और परस्पर विरोधी भी। यह सभी जानते हैं कि आकस्मिकता और सुसंबद्धता साथ-साथ घटित नहीं हो सकतीं। दोनोँ की प्रकृति भिन्न है। जहाँ आकस्मिकता होगी, वहाँ किसी प्रकार का नियम लागू नहीं होता, वह अनिश्चित एवं अनियमित होगी, पर जहाँ सुसंबद्धता है, वहाँ निश्चित रूप से कोई-न-कोई नियम, कोई-न-कोई तंत्र क्रियाशील होगा। इतना सब ज्ञात होते हुए भी विकासवादियों ने दोनोँ को मिलाने की गलती क्यों की ? यह तो वहीं जानें, पर “कहीं की ? यह तो वहीं जानें, पर “कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा” जैसी उक्ति को चरितार्थ करते हुए विज्ञान ने आदमी की एक विकासवादी शृंखला बना कर खड़ी कर दी। बीच-बीच में जहाँ की कड़ी नहीं मिल पायी उसकी विवेचना में एक नया सिद्धाँत गढ़ दिया। कहा कि इस मध्य प्रगति इतनी तीव्र हुई कि अगला सोपान पिछले की तुलना में एकदम बदल गया, इतना अधिक कि यह अनुमान लगा पाना कठिन हो गया कि दूसरे का आविर्भाव पहले वाले से ही हुआ हो। इस सिद्धाँत का नाम उनने “जम्प थ्योरी” रखा, पर क्रमिक विकास में आदि पूर्वजों को जहाँ-तहाँ छलाँग लगाने की विवशता क्यों आ पड़ी ? इसे बता पाने में वे असफल रहे। वस्तुतः जोड़-तोड़ का विज्ञान का यह पुराना तरीका है। जहाँ बुद्धि आगे काम नहीं करती, वहाँ तुरंत विज्ञानवेत्ता कोई-न-कोई नया सिद्धाँत खड़ा कर देते हैं ऐसा सिद्धाँत जो उनके पुराने मत का समर्थन कर सके। यहाँ भी वैसा ही किया गया, पर ऐसा करते समय कदाचित् वे यह नहीं सोच सके कि विकासवाद की इस प्रक्रिया द्वारा जीवन उत्पत्ति यदि मानी गई, तो उन प्रश्नों का उत्तर दे पाना कैसे संभव होगा, जो समय-समय पर इस संदर्भ में उठाये और पूछे जाते रहे हैं कि पहले कौन हुआ ? अण्डा या मुर्गी ? नर या नारी ? बीज या वृक्ष ?
विकासवादी इन प्रश्नों का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकें। सच तो यह है कि जीव उत्पत्ति संबंधी वर्तमान धारणा के आधार पर इन सवालोँ का उत्तर दे पाना कठिन ही नहीं, असंभव भी है। असंभव इसलिए कि मुर्गी के बिना अण्डे की कल्पना नहीं की जा सकती और यदि क्रमिक विकास से मुर्गी आविर्भूत हुई भी, तो बिना मुर्गे के अंडा कैसे पैदा हो ? आकस्मिक प्रक्रिया मुर्गे को कब जन्म देगी ? देगी भी या नहीं ? इसमें सदा संदेह बना रहता है। ऐसा ही संशय नारी-नर एवं दूसरे जीवों के युग्मों के संबंध में पैदा होना स्वाभाविक है। यह भी शक अस्वाभाविक नहीं कि जिस तरह हर प्राणी के जोड़े आज दुनिया में मौजूद, वह सब किसी आकस्मिक प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न हुई हैं ? इसे कोई विवेकशील व्यक्ति शायद ही स्वीकार कर सके। जो भी हो, कुछ क्षण के लिए यदि सृष्टि विकास संबंधी प्रचलित मत को अंगीकार कर भी लिया जाय, तो इस आधार पर वास्तविक आरंभिक मनुष्य (होमो इरेक्टस) का जो समय जीव विज्ञानियों ने निर्धारित किया है, वह दस लाख वर्ष से अधिक नहीं है, जबकि हाल की खोजों से इसका स्पष्ट खंडन होता है। सन् 1960 में अफ्रीका के तीन भिन्न स्थानों में तीन अलग प्रकार के अवशेष मिले। वैज्ञानिक विधि द्वारा जब इनकी आयु आँकी गई, तो प्राप्त उम्र की संगति वर्तमान सिद्धाँत द्वारा निर्धारित वय से किसी प्रकार नहीं बैठी। इससे स्पष्ट है कि सत्य और सिद्धाँत में कहीं कोई भूल अवश्य है, जिसका कारण प्राप्त जीवाश्मों (फोसिल्स) के अध्ययन से धीरे-धीरे स्फुट होने लगा। प्रथम अवशेष केन्या के रुडोल्ड बेसिन में मानवी खोपड़ी एवं कुछ अस्थियों के रूप में प्राप्त हुआ। इसकी आयु वैज्ञानिकों ने 20 लाख 60 हजार वर्ष बतायी। इसका संपूर्ण आकार-प्रकार आधुनिक मनुष्य से एकदम मिलता-जुलता था। एक मात्र खोपड़ी ही ऐसी थी, जो कुछ छोटी थी। द्वितीय गवेषणा दक्षिणी अफ्रीका में स्वाजीलैण्ड एवं नैआल की सीमाओं के बीच एक गुफा के रूप में हुई। इस कंदरा से जो हड्डियाँ पायी गई, वह आधुनिक मानव जैसी थी। इनके अस्तित्व के बारे में विशेषज्ञों का मत है कि वे आज से करीब एक लाख वर्ष ईसा पूर्व कहाँ निवास करते थे। तीसरा प्रमाण तंज़ानिया से प्राप्त हुआ। यहाँ से उपलब्ध हुए नमूनों में मानवी जबड़े और दाँत प्रमुख थे। इनकी आयु 30 लाख 75 हजार वर्ष आँकी गई।
इन साक्षियों से विकासवादियों को गहरा धक्का लगा, कारण कि अनुमान और सबूत में अवधि संबंधी इतना भारी अंतर होगा, इसकी उनने कल्पना तक नहीं की थी। दूसरे, वे इतने विकसित बुद्धि वाले होंगे, इसका भी अंदाज नहीं था, किन्तु अन्वेषण से यह भ्रम दूर हुआ और वे अनुमानित से भी अधिक बुद्धिमान निकले। प्राप्त औजारों से इसकी पुष्टि भी हो गई। उपकरणों में कई ऐसे मिले, जिन्हें देखकर अनुसंधानकर्ता चकित हुए बिना न रह सके। गोमेद पत्थर की बनी सुन्दर कलाकृति युक्त छुरियाँ ऐसी ही थीं। इनकी धार अब भी इतनी तेज थी कि उनसे कागज के टुकड़े आसानी से किये जा सकें। इसके अतिरिक्त उपलब्ध प्रमाणों से यह स्पष्ट विदित होता है कि धर्म के प्रति उनकी दृढ़ आस्था थी और वे मरणोत्तर जीवन पर भी विश्वास करते थे। भारतीयों की तरह उनमें अस्थि विसर्जन की भी प्रथा प्रचलित थी। इसकी पुष्टि बालक की उन हड्डियों से हो गई, जो एक बंद पात्र में पायी गई। विशेषज्ञों का यह सुनिश्चित मत है कि तब उनमें भाषा का विकास हो चुका होगा और उनके बीच कोई-विकसित बोली, बोली जाती होगी। कारण बताते हुए वे कहते हैं कि मरणोत्तर जीवन जैसे गंभीर एवं सूक्ष्म विषय को भाव-भंगिमाओं, मुद्राओं अथवा अर्थहीन ध्वनियों से अभिव्यक्त कर पाना संभव नहीं। यह शक्य तभी हो सकता है, जब विचार-विनिमय संबंधी कोई बोली अथवा भाषा हो। गिनती भी तब प्रचलन में आ चुकी थी, ऐसा विज्ञानों का मानना है।
सन् 1970 में जब दक्षिण अफ्रीका की उक्त गुफा का पता चला, तो एड्रियान बोजियर एवं पीटर व्यूमोण्ट नामक शोधकर्ताओं ने इसका गहराई से निरीक्षण किया। फलस्वरूप लगभग 3 लाख मानव निर्मित वस्तुएँ प्राप्त हुई इसके अतिरिक्त विभिन्न जंतुओं की जली हड्डियां मिलीं। लकड़ी के कोयले युक्त राख की एक पर्त भी पायी गई। इसी के नीचे बालक का कंकाल दबा पड़ा था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह दोनों परतें दो भिन्न युगों को निरूपित करती हैं। राख वाली सतह अपेक्षाकृत आधुनिक है। इसकी आय का हिसाब लगाते हुए वैज्ञानिक बताते हैं कि यह करीब 60 से 70 हजार वर्ष ईसा पूर्व की है, जबकि नर-कंकाल युक्त निचली सतह एक लाख वर्ष (ईसा पूर्व) पुरानी है।
इससे पहले तक प्राणि विज्ञानियों के एक वर्ग का अनुमान था कि ईसा पूर्व 75 हजार वर्ष पहले मनुष्य की जिस प्रजाति का अस्तित्व रहा होगा, वह निण्डरथल किस्म (आदि मानव की एक विशेष प्रजाति) का मनुष्य होगा, किंतु गुफा के अन्दर के अवशेष से जो कुछ विदित हुआ, उससे उनकी इस मान्यता को जबरदस्त आघात लगा। अनुसंधानकर्त्ताओं का कहना है कि यह अवशेष निश्चय ही आधुनिक मानव (होमो सेपियंस सेपियन्स) के हैं, जबकि विकासवादी प्रथम वास्तविक मनुष्य (होमो इरेक्ट्स) की उत्पत्ति ही दस लाख वर्ष पूर्व मानते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि वर्तमान स्वरूप को प्राप्त करने में उन्हें कई हजार वर्ष और लगे होंगे। ऐसा अनुमान है कि 35-40 हजार वर्ष ईसा पूर्व के आस-पास ही वे संभवतः आधुनिक रूप को प्राप्त कर सकें हों। मानव विज्ञानियों के हिसाब से भी लगभग इतना ही समय होमो सेपियन्स सेपियन्स के प्रादुर्भाव का हुआ है, जबकि शोधकर्ताओं के अन्वेषणों से इस प्रजाति की उपस्थिति एक लाख वर्ष ईसा पूर्व सिद्ध हो चुकी है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यथार्थ और अनुमान के बीच कोई बड़ी त्रुटि रह गई है। इस संबंध में एक प्रमुख शोधकर्ता बोजियर का कहना है कि हम बंदर को मनुष्य का पूर्वज मान बैठे हैं, यही शायद हमारी सबसे बड़ी गलती है और इसी कारण सबसे बड़ी गलती है और इसी कारण अनुमान तथा प्रमाण के बीच इतना बड़ा व्यतिरेक पैदा हुआ है। वे कहते है कि आधुनिक अनुसंधान में अब तक जितनी वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं, वे अब अनुमान से तीन गुना पुरानी साबित हुई हैं। तीर-धनुष, जिनके बारे में पूर्व उनका विकास हुआ होगा, अब पाषाण तीरों की उपलब्धि से यह स्पष्ट हो गया अस्तित्व में थे।
ऐसे ही अन्य स्थानों से प्राप्त साक्ष्य भी वर्तमान अवधारणा को हतोत्साहित करते हैं। सत्य तो यह है कि हम एक सर्वथा मिथ्या मान्यता अपनाये हुए हैं। इस सिद्धाँत के आधार पर सृष्टि विकास की कभी भी भली - भाँति व्याख्या नहीं की जा सकती। यदि प्राणियों को विकासवादी प्रक्रिया की परिणति कहा गया और मनुष्य को बंदर की औलाद माना गया, तो समुद्र में अब भी अनेक ऐसे जीव (सी अर्जिन, सी, कुकुँबर, जेलीफिश) मौजूद हैं, जिनकी वंशावली तो क्या, पूर्वजों तक का भी पता नहीं है। ऐसे में विज्ञान की यह शाखा अधूरी-असमर्थ ही नहीं, अविश्वसनीय भी साबित होती है। जिस विज्ञान के पास सभी सवालों का तर्क संगत जवाब नहीं, उसके कोई कैसे स्वीकार करे ?
यथार्थता इतनी है कि मानव आरम्भ से ही मानव था और आगे भी वह वही बना रहेगा। इसी स्वर में स्वर मिलाते प्रागैतिहासविद् पीटर ब्यामोण्ट कहते हैं कि हम लाख दुराग्रह पालें और आदमी को बंदर की संतान सिद्ध करें, पर उपलब्ध प्रमाण यह मानने के लिए बाधित ही करेंगे कि वर्तमान धारणा बेबुनियाद ही नहीं, बेतुकी भी है। जैसे-जैसे खोज कार्य आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे इस बात की संभावना भी बढ़ती जा रही है कि आज नहीं तो कल हमें इस तथ्य को स्वीकारना ही पड़ेगा कि मनुष्य शुरू से ही मनुष्य था और बंदर, बंदर। न बंदर से मनुष्य का उद्भव हुआ है, न अमीबा से जीव विकास। यह ठीक है कि आरम्भ में कल्पना की नींव से ही काम चलाना पड़ता है पर वे कहते हैं कि कल्पना का आधार अभी तक मान्य है, जब तक प्रमाण अनुपलब्ध हों। उपलब्ध साक्ष्य के आगे इसका कोई महत्व रह नहीं जाता।
इस प्रकार दृष्टि पसार कर देखा जाय, तो पायेंगे कि हम धीरे-धीरे उसी बिंदु की ओर अग्रसर होते चले जा रहे हैं, जहाँ से इस बात की दृढ़तापूर्वक घोषणा की जा सके कि सृष्टि ईश्वर की संरचना है और यहाँ के प्राणी उसके संकल्प के परिणाम। इस निर्णय से कदाचित् किसी विज्ञानवेत्ता को आपत्ति हो और वह विकासवाद के समर्थन में जिराफ जैसे जंतुओं का उदाहरण सामने रखते हुए यह कहे कि उसकी लंबी गर्दन विकासवादी प्रक्रिया का नतीजा है, तो यह किसी प्रकार स्वीकार्य नहीं होगा। लंबी गर्दन परिस्थिति के दबाव (ऊँचे-ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाने के प्रयास में पड़ने वाला खिंचाव) का परिणाम हो सकता है, पर यह बदलाव जर्म सेल (जनन कोशिका) में किस प्रकार पहुँच गया ? यह समझ से परे है। अफ्रीका के जंगलों में रहने वाले जनजाति कबीले के लोग भी अपने अंगों को दबाव और खिंचाव के द्वारा घटाते-बढ़ाते रहते हैं। सिर के ऊपर धात्विक छल्ले कस कर वे उसके स्वाभाविक गोलाकार को लंबा कर लेते हैं। ऐसे ही कानों और होठों में वजन लटका कर उन्हें बड़ा लेते हैं, पर उनके बड़े कान, लटकते होंठ और लंबा सिर उनकी संतानों में नहीं देखे जाते। उनमें उक्त अंग स्वाभाविक आकार के ही होते हैं। अस्वाभाविक रूप देने के लिए उनको वैसा ही उपक्रम अपनाना पड़ता है, जैसा पिता ने अपनाया था। यदि ऐसे उपायों से कायान्तर को संतति में ले जा पाना संभव होता, तो यहाँ भी वैसा होना चाहिए था पर ऐसा होता कहाँ देखा जाता है ? ऐसे में यह अंगीकार कर लेने में ही समझदारी होगी कि जिराफ की लंबी गर्दन प्रकृति प्रदत्त है, वह किसी अभ्यास एवं आदत की फलश्रुति नहीं।
इतना स्पष्ट हो जाने के उपरान्त फिर यह कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि मानव का आदि रूप भी वैसा ही था, जैसा वर्तमान में है और दूसरे जीव भी प्राकट्य के बाद से अपने-अपने आदिम स्वरूप को ही अपनाये हुई हैं। आगे भी वे अपने मूल रूप में बने रहेंगे - इसमें दो मत नहीं। केवल मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है, जिसमें परिवर्तन की संभावना शेष है और विकास की भी गुंजाइश बाकी है, पर यह सब मानसिक स्तर पर ही संपन्न हो सकेगा। उसकी चेतनात्मक प्रगति शुरू से होती आयी है। आगे भी वह जारी रहेगी तब तक जब तक मानव अपने चरण लक्ष्य को प्राप्त न कर ले। यही उसकी अंतिम मंजिल होगी और चेतनात्मक विकासवाद का आखिरी सोपान भी इस सर्वोच्च सोपान पर पहुँचना ही मानवी जीवन का उद्देश्य होना चाहिए ? जहाँ पहुँच कर कही अन्यत्र जाना और कुछ अतिरिक्त प्राप्त करना शेष नहीं रहा जाता। उत्कर्ष के इस बिन्दु पर प्रतिष्ठित होना विकासवादी अवधारणा द्वारा ही संभव है, पर यह अवधारणा चेतनात्मक ही होनी चाहिए पंचभौतिक काया वाली नहीं।
देखा जाता है कि मूर्ख भाग्यवान होते हैं। रूपहीनों का धनवान होना मशहूर है। अयोग्य मनुष्य बहुत जीते हैं। बेकार आदमी कम बीमार पड़ते हैं, दुख मत करो-अगर तकदीर तुम्हारा साथ छोड़ गई है तो बदले में कोई न कोई चीज तुम्हारे पास ऐसी होगी। जिसके लिए तकदीर वाले तरसते होंगे।
अपनी कटी उँगली दूसरों को मत दिखाते फिरो। अपना दुख दूसरों के सामने बखान मत करो। इससे तुम दूसरों की आँखों में गिर जाओगे और तुम्हें कमजोर पाकर कोई भी आक्रमण कर बैठेगा।
फकीर होने से पूर्व यह दमिश्क का बहुत बड़ा धनपति था दमिश्क में जगत प्रसिद्ध मस्जिद है। मन में विरक्ति भाव आया तो अपना वैभव त्याग कर मस्जिद में जाकर सुबह से शाम तक पूजा पाठ करता। बहुत दिन व्यतीत हो गये तो उसने सोचा कि वह अकेला ही सुबह से शाम तक पूजा पाठ करता है। अतः हो सकता है नगर के लोग कभी उसका त्याग, लयलीनता देखकर शायद मस्जिद का व्यवस्थापक बना दें। एक बरस बीत गया किंतु किसी ने एक दिन भी उसके पास आकर कभी नहीं कहा कि आप अव्वल नंबर के नमाजी है। उसने मनमें सोचा इस नगर के लोग भी अजीब हैं एक बार भी आकर कुछ नहीं पूछा उसने सोचा फिजूल ही वह सोचना रहा कि शायद कोई आकर उसकी झूठ-मूठ को तारीफ करेगा और पूछेगा आप ही मस्जिद की व्यवस्था सम्हाल लें।
रात को जब बिस्तर पर जाने लगा तो उसने ईश्वर से प्रार्थना की क्षमा करना प्रभु मुझ से बड़ी भूल हो गई। विरक्ति का भाव जागा। सोचने लगा कि यदि मैंने सच्चे मन से प्रार्थना की होती तो अब तक अल्लाह मिल गया होता। “क्षमाकर मुझे नहीं चाहिए कोई पद, प्रतिष्ठा, प्रशंसा सम्मान।” बड़े सच्चे मन से प्रार्थना की थी उसने। प्रातः जागा देखा। बहुत हैरानी में पड़ गया। लोगों की भीड़ घर के सामने लगी है और प्रार्थना कर रही है कि आप जैसे नमाजी हमने नहीं देखा। आप बड़े त्यागी हैं आप तो हमारी मस्जिद की व्यवस्था सम्हालने योग्य हैं।
आकाँक्षा छोड़ी तो सर्वस्व मिला। वास्तव में सब कुछ छोड़ने के बाद ही सब कुछ मिलता है।
हमारी यह इच्छा है, इसलिए उसकी ............................................... वह कोई तक नहीं है। देखना यह भी पड़ेगा कि जो चाहते हैं उसके लिए आवश्यक साधन जुटाए भी जा सकते हैं या नहीं । परिस्थितियों का उतार-चढ़ाव कई बार बड़ा विलक्षण बन जाता है। घटनाएँ कई बारे ऐसे अप्रत्याशित रूप से घटित होती है कि नजदीक आई सफलता उलट कर असंभव बन जाती है। ऐसे उलट फेर अपने हाथ से बाहर होते हैं। इस संसार में परिस्थितियों की अनेकों धाराएँ बहती हैं। आँधी-तूफान की तरह कई बार उनका रुख हमारी दिशा में बहुत सहायक होता है और कई बार इतना विपरीत होता है कि एक कदम भी आगे बढ़ते नहीं बन पड़ता। साहसी, सद्गुणी, और क्षमता संपन्न व्यक्ति भी इन विपरीत परिस्थितियों में असहाय हो जाता है जो सोचा गया है जिसके लिए प्रयास किया गया है वह अवश्य ही पूरा होकर रहेगा, इसका कोई निश्चय नहीं।
ऐसी अनेकों विडंबनाएं हैं जिनमें हम घिरे और जकड़े हैं। आकाँक्षा पुरुषार्थ की प्रबलता होते हुए भी अनेक कारण ऐसे हैं जो अभीष्ट सफलता की बात सुनिश्चित नहीं रहने देते। यों सत्प्रयत्नों का परिणाम तो होता ही है और बहुत करके सफलताएं भी उसी आधार पर मिलती हैं। किंतु इतने पर भी यह दावा नहीं किया जा सकता कि हर सुयोग्य और हर प्रतिभाशाली प्रयत्नशील को सफलता उतनी मात्रा में मिल ही जाएगी जितना कि सोचा या चाहा गया है।
असफलता की प्रतिक्रिया मन पर आघात करती है। उससे निराशा होती है और खीझ भी। कई बार तो यह आघात इतने गहरे होते हैं कि भविष्य में कुछ करने की हिम्मत जुटाना भी कठिन हो जाता है। कई व्यक्ति बेतरह टूट जाते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए यह मान लेते हैं कि अपना भविष्य अंधकारमय है। ऐसी मनः स्थिति में दुबारा न तो उत्साहवर्धक सोचते बनता है और न हिम्मत के साथ कोई बड़े कदम उठाने का साहस होता है। जिन का अंतर खोखला हो गया उनका बहिरंग पुरुषार्थ भी कैसे जगेगा। और जहाँ भीतर बाहर का अवसाद छाया हुआ हो वहाँ उज्ज्वल भविष्य का सूर्योदय कैसे होगा। असफलताएँ कई दुर्बल मन वालों पर ऐसा ही अभिशाप पटक जाती हैं जिनके कारण वे सचमुच गई गुजरी स्थिति में दिन काटने के दुर्भाग्य के साथ समझौता कर लेते हैं और निराशा भरी मनःस्थिति में जिंदगी के दिन पूरे करते हैं।
इन सब जंजालों से बचने का एक मात्र तरीका यह है कि हम कर्तव्य कर्म को अपना लक्ष्य निर्धारित करें और उसके लिए किए गए पुरुषार्थों को ही सफलता जितना आनंद उपहार स्वीकार कर लें। सचमुच कर्तव्य धर्म में उत्साह और आनंद पूर्वक निरत रहने वाली निष्ठा को अक्षुण्ण बनाए रखना एक उच्चकोटि की भावनात्मक सफलता को आनंददायक और संतोषजनक मान लिया उसे दृश्यमान सफलता के मिलने न मिलने की चिंता नहीं रहती। वह अपने प्रयास-पुरुषार्थ की उत्कृष्टता को ही सफलता मानकर संतोष कर लेता है और हर भले बुरे परिणाम को खिलाड़ी की हार-जीत मानकर मुसकराते हुए स्वीकार करता रहता है। कर्तव्य कर्म में निष्ठावान होना ही मानवी पुरुषार्थ की चरम सीमा है। अभीष्ट भौतिक परिणाम दैवाधीन है। अनेकों अविज्ञरत कारण सफलता प्राप्त होने के मार्ग में सहायक बाधक होते रहते हैं। इसलिए यह अनुमान कदाचित ही खरा उतरता है कि इतना पुरुषार्थ करने पर इतने समय में अथवा साधनों से इतनी सफलता प्राप्त कर ली जाएगी । घटना क्रम किस प्रकार घटित होता जा रहा हैं , इसे कोई नहीं जानता । ऐसी दशा में अनिश्चित को निश्चित मानकर चलने वालों को अगले दिनों निराश होना पड़े इसकी आशंका पड़ी ही रहेगी । आतुर फलाशा जब निराशा में परिणत होती है तो आदमी को आसमान से गिरकर पाताल में जा टकराने जितना कष्ट होता है। कई बार तो उसकी हड्डी - पसली इस बुरी तरह टूटती हैं कि भविष्य के लिए अपंग ही बनकर रह जाता है।
स्थिति का विश्लेषण करने वाले विज्ञ मनीषियों ने हमारे लिए सुरक्षित एवं सुनिश्चित मार्ग यह बताया हैं कि सफलता के लिए लक्ष्य निर्धारित करें - उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ करें साधन जुटाएँ इतने पर भी निर्दिष्ट फल मिल ही जायगा इसके सम्बन्ध में प्रस्तुत अनिश्चितता को भी ध्यान में रखें और इसके लिए अपनी मनोभूमि को तैयार रखें कि मनोरथ पूरा न हुआ तो भी बिना खीझ और निराशा के आगत का स्वागत किया जाएगा।
इस प्रकार की संतुलित मनः स्थिति केवल उन्हें ही प्राप्त हो सकती है जो कर्तव्य कर्म को अपनी सीमा मर्यादा मान लें और उसके लिए जो तत्परता बरती गई है उसे संतोष जनक समझें । सफलता को मनुष्य के गौरव की कसौटी नहीं माना जा सकता । प्रतिष्ठा उनकी कर्तव्य निष्ठा के साथ जुड़ी रहती है । असफल व्यक्तियों की सूची में वे समस्त महामानव गिने जा सकते हैं जिन्होंने उच्च आदर्शों के लिए अत्यंत कष्ट सहे और सदुपयोग के लिए बलिदान हो गए।
इसी तरह अनीतिपूर्ण दुष्ट-दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाकर ढेरों सफलताएँ पाने वालो की संख्या में कमी नहीं है। आज तो बहुतायत उन्हीं की है। इन सफल मनोरथ लोगों को पदार्थ एवं परिस्थितियाँ मिल गई सो ठीक है। पर उन्हें आत्म संतोष कहाँ मिल सका ? ईश्वर और समाज की दृष्टि में भी वे घृणित ही है। इतनी बड़ी हानि उठाकर जिनने कुछ भौतिक लाभ उठा लिया उन्हें सफल या सौभाग्यशाली नहीं कहा, माना जाना चाहिए।
कर्तव्य कर्म पूर्णतया मनुष्य के हाथ में हैं उसे वह पूरी ईमानदारी एवं तत्परता के साथ करता रह सकता है। अपने हिस्से के अपने हाथ का काम पूरा कर लिया जाना इतना ही संभव भी है और इतना ही पर्याप्त भी।
रेडियो जब तक बंद पड़ा रहता है, तब तक न उससे गीत सुनाई पड़ते हैं, न संगीत । खबरें भी नहीं आतीं, किंतु जब वह चालू होता है, तो सूक्ष्म तरंगों को पकड़-पकड़ कर श्रव्य बनाने लगता है। हमारा मस्तिष्क भी रेडियो जैसा है। जब उसके अंदर के सूक्ष्म संस्थान जाग्रत होते हैं, तो अदृश्य और अविज्ञात स्तर की घटनाएँ भी सुविज्ञात बनने लगती हैं। यदा-कदा जब ऐसा अकस्मात् होता है, तो उसे ही उसे ही लौकिक जगत “पूर्वाभास”‘ के नाम से पुकारता है।
घटना 1958 की है। पेंसबरी हाइट्स फिलाडेल्फिया की हैजल लैर्म्बट अपनी ड्यूटी से घर जा रही थी। आज भी वह उसी रास्ते से गुजर रही थीं। जिससे होकर अक्सर जाया करती थी। मोरिसविले पहुँचने पर डेलमूर एवेन्यू में उसने कार रोकी और अपनी एक सहकर्मी को उतारा। इसके बाद उसने बाजार जाने का विचार बनाया। जैसे ही उस रास्ते पर वह कुछ दूर आगे बढ़ी, उसके मन अचानक एक तीव्र भाव उत्पन्न हुआ, मानों कुछ गलत हो रहा हो। इसके पश्चात् अपनी कार दूसरी ओर मोड़ दी और गाड़ी तेज रफ्तार से चलाने लगी। ऐसा क्यों किया ? उसे स्वयं भी नहीं पता। गाड़ी चली जा रही थी। जल्द ही वह हिलसाइड स्ट्रीट के चौराहे पर पहुँच गई। यह सड़क एक नहर के किनारे-किनारे दूर तक चली गई थी। लैम्बर्ट ने ज्यों ही चौराहे से दूसरी ओर नजर दौड़ाई, भयभीत हो उठी। एक दो वर्षीय बालक नहर के बर्फ युक्त किनारे से लटका हुआ था। उसके हाथ छूटने या बर्फ के टूटने से वह नहर में गिर कर मर सकता था। गाड़ी सीधे उस बालक के निकट ले गई, किन्तु दुर्भाग्यवश उससे बाहर आने से पूर्व ही कार बर्फ में धँस गई, जिससे उसका निकलना असंभव हो गया। वह जोर-जोर से चिल्लाने और हार्न बजाने लगी। आवाज सुनकर जार्ज टेलर और उसका चौदह वर्षीय बालक सहायतार्थ पहुँचे। दोनों ने मिलकर पहले उस बालक को को बचाया, फिर फँसी गाड़ी को उनने बाहर निकाला। अब लैंबर्ट को समझ में आया कि क्यों उसे इस ओर आने की प्रेरणा मिली।
दुर्जन से न बैर पालों न प्रीति। कुत्ते के काटने और चाटने में दुख ही दुख है।
ऐसी ही एक घटना का उल्लेख विण्डसर आँनटेरियों ने अपनी पुस्तक “प्रीमोनीशन” में किया है। प्रसंग मार्च 1949 का है। चालीस वर्षीय चार्ल्स बोगराडस लास एंजिल्स में एक पुलिस अफसर के पद पर कार्यरत थे एक रात वे अपने साउथ सिमरन स्ट्रीट स्थित मकान में अपनी पत्नी के साथ बीमा संबंधी कुछ दस्तावेज देख रहे थे। अचानक उन्होंने कागजों को एक ओर सरकाते हुए कहा - “मिल्डरेड ! न जाने क्या मुझे ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे कुछ बुरा होने वाला है। यदि सचमुच ही मेरे साथ कोई दुर्घटना घटी, तो तुम धीरज से काम लेना, घबराना मत।”
इतना कह कर बोगारडस सो गया। पत्नी भी सो गई। तीन-चार दिनों तक सब कुछ सामान्य रहा। असामान्य कुछ भी घटित न हुआ। उस दिन की बात दोनों भूल गये।
एक दिन बोगारडस एवं एक अन्य अफसर अपनी रुटिन ड्यूटी पर थे। 11 बजे दिन तक सब कुछ ठीक-ठाक था, तभी अचानक उन्हें एक रेडियो संदेश मिला। कहा गया कि वे पश्चिमी वाशिंगटन में बोलीवार्ड अविलंब पहुँचे। सूचना थी कि वहाँ दो बंदूकधारी लूट-पाट मचा रहे हैं बोगारडस और साथी अफसर कार से तत्काल उक्त स्थल पर पहुँचे। पुलिस को देखते ही दोनों दस्यु भागने लगे। बोगारडस ने एक का पीछा किया। किन्तु वे अभी थोड़ी ही दूर बढ़े थे कि डाकू ने पीछे मुड़ कर बंदूक चला दी। गोली मस्तिष्क में लगी और वे वहीं लुढ़क गये। इस प्रकार बोगारडास का पूर्वाभास अंततः सत्य सिद्ध हुआ।
थानी से पीछा छुड़ाना है तो उससे कुछ माँगने लगे और निकम्पों को भगाना है तो थोड़ा सा कर्ज दे दो।
मिलता - जुलता एक अनरु प्रकरण कैलीफोर्निया का है। पाँल स्ट्रैटस्, मोडेस्टो, कैलीफोर्निया में ड्यूटी पर थी। अकस्मात् उसे ऐसा लगा, जैसे घर पर कुछ गड़बड़ होने वाली है। वह इससे व्यग्र हो उठी। पिता को फोन किया और अपने तेरह वर्षीय पुत्र का समाचार जानना चाहा। पिता तुरंत लड़की के घर पहुँचे, किन्तु तब तक विलंब हो चुका था। निकी अपनी साइकिल में भरी बंदूक लिये कहीं चला जा रहा था। न जाने कैसे वह हाथ से फिसल कर नीचे गिर पड़ी। गोली ऊपर की ओर चली और उसकी छाती को भेदते हुए निकल गई। वहीं उसके प्राण छूट गये। पॉल की आशंका इस प्रकार सही साबित हुई।
पूर्वाभास की एक ऐसी ही और घटना कैलीफोर्निया की है। क्लीफोर्ड मैक नामक एक व्यक्ति ने अब्राहम इजर को अपने घर पर दोपहर के खाने में निमंत्रित किया। भाजन हो चुकने के उपरांत दोनों वार्तालाप में व्यस्त हो गये। मैक प्रकाशक था और अब्राहम भी ऐसा ही कोई धंधा करता था। मैक की पत्नी वहाँ से ये कहते हुए उठ पड़ी कि उसे स्नान की इच्छा हो रही है। दोनों अपने व्यवसाय से संबंधित बातचीत में पुनः तल्लीन हो गये। जब करीब बीस मिनट बीत गये, तो इजर को न जाने क्यों यकायक ऐसा अनुभव हुआ, जैसे मैक की पत्नी किसी संकट में है। वह चिल्ला उठा और मैक से बाथरुम का दरवाजा तोड़ डालने का आग्रह करने लगा। अब्राहम में अचानक आये इस बदलाव से मैक भौंचक्का रह गया, सोचने लगा कहीं वह पागल तो नहीं हो गया।
चिल्लाना जारी था। अब्राहम बार - बार यही कह रहा था कि दरवाजा तुरंत तोड़ डालो , किंतु जब उसकी चेतावनी का कोई असर पड़ता नहीं दिखाई दिया, तो उसने पुलिस बुलाने की धमकी दी । अब मैक कुछ गंभीर हुआ । दोनों स्नानगृह के पास पहुँचे । वह अंदर से बन्द था। मैक ने आवाज लगायी , पर कोई जवाब नहीं मिला। उसने दुबारा पुकारा , किंतु इस बार भी कोई उत्तर न मिला। अब मैक को भी स्थिति की गंभीरता नजर आयी। उसने धक्के मार कर दरवाजा तोड़ डाला। अंदर उसकी पत्नी बेहोश पड़ी थी। उसका सिर पानी के टब के भीतर था। दोनों ने मिलकर उसे उठाया और अविलंब अस्पताल ले गये, जहाँ वह कुछ घंटे के उपचार के बाद पुनः स्वस्थ हो गई।
यहाँ कुछ कतिपय घटनाओं की चर्चा द्वारा यह बताने का प्रयास किया गया है कि जब सामान्य सत्र और अवस्था में काया इतनी अद्भुत हो सकती है, तो उसके दिव्य जागरण में वह कितनी असाधारण होगी, इसका अंदाज लगाया और उन अपरिमित संभावनाओं को जाना जा सकता है जो प्राकृतिक जाग्रति की स्थिति में आने पर संभव हो जाती हैं। शरीर में अलौकिक अवतरण संभव है, हर किसी के द्वारा हर कभी भी। कुछ को यह सहज सुलभ हो जाता है। कुछ को साधना पुरुषार्थ द्वारा।
रोगी ने चिकित्सक को अपनी परेशानी बतलायी कि जब वह रात को पलँग पर सोता है तब ऐसा लगता है कि चारपाई के नीचे कोई छिपकर बैठा हैं। नीचे झाँककर देखता हूँ तो वह गायब हो जाता है और जब पलँग के नीचे सोता हूं तो लगता है कि वह ऊपर बिस्तर पर आकर सो गया है। कृपया मेरी हैरानी मिटाइए अन्यथा मैं पागल हो जाऊंगा । मैं रात भर सो नहीं पाता । चिकित्सक ने कहा मामला गंभीर हैं रोग पुराना हैं। समय और पैसा बहुत लगेगा । उसने कहा कितना खर्च बैठ जाएगा । डॉक्टर ने कहा यही कोई दो सौ रुपया प्रति सप्ताह । किंतु इलाज लंबा चलेगा दो बरस भी लग सकते हैं।
रोगी पत्नी के पास दौड़कर आया । डॉक्टर को पूरी बात बताई। पत्नी ने मन ही मन सोचा बहम की दवा लुकमान पर भी नहीं थी। जरूर इन्हें किसी ठग से पाला पड़ गया हैं। पत्नी बोली यह इलाज तो महँगा पड़ेगा । इतनी अपनी आर्थिक हैसियत भी नहीं हैं। किंतु आप निश्चित रहें अब आपकी चारपाई ऊपर नीचे कोई नहीं आवेगा। वह गई उसने पलंग के चारों पाए कटवा दिये। अब न कोई नीचे बैठा दिखाई देता न ऊपर । रोगी को वापस न आता देख डॉक्टर का फोन आया कि आप आये नहीं। रोगी ने कहा डाक्टर घर में ही इलाज हो गया। कम समय में और पैसों के बिना। डाक्टर बोला “वह कैसे ?” उसने कहा वहम के भूत की बैठक का स्थान ही नहीं छोड़ा। पत्नी ने पलँग के चारों पैर काट दिये। अब मुझे अच्छी नींद आती है। अब मैं चैन सोता हूँ। कष्ट के लिए धन्यवाद।
उधार देना किसी निकम्मी वस्तु का कीचड़ में फेंक देने के बराबर हैं। किन्तु यदि दिये हुए को वसूल किया जा सके तो समझो बालू में से तेल निकाला।
सिद्ध संतों की समाधियों, कतिपय देवालयों एवं तीर्थ स्थलों के बारे में प्रायः कहा-सुना जाता है कि वहाँ जाते ही, मनौती मनाते ही बीमार और बीमारी ठीक ही गये। पहले जिनके बचने तक की उम्मीद नहीं थी, वे चमत्कारिक ढंग से स्वास्थ्य-लाभ करते हुए विज्ञान को चुनौती देते प्रतीत होते हैं। इस क्रम में कितने ही स्थल आये दिन साधारण से असाधारण और अद्भुत बनते पाये जाते हैं। कल तक जिनके बारे में कोई जानकारी तक नहीं थी, देखते-देखते उनकी प्रसिद्ध आकाश चूमने लगती है। विश्वभर में ऐसे कितने ही स्थान हैं, जिनकी अलौकिक महिमा को उजागर करने वाले अगणित प्रसंग हैं।
एक घटना सेण्टी चैपेली की है। उक्त चर्च का निर्माण पेरिस में संत लुईस ने काँण्स्टैण्टीनोपल से प्राप्त “क्राउन ऑफ थाँर्न्स” के सम्मान में करवाया था। आज भी काँटों का वह ताज सेण्टी चैपेली की शोभा बढ़ा रहा है, न सिर्फ उत्कृष्टता की दृष्टि से, वरन् अद्भुतता के विचार से भी।
प्रसंग पुराना है और मारगुएराइट पेरियर से संबद्ध है। यह महिला फ्राँस के विख्यात दार्शनिक और गणितज्ञ ब्लैसे पास्कल की संबंधी थी। नोट्री डेम स्थित सैण्टी चैपेली में वह नन का कार्य करती थी, पर पिछले तीन वर्षों से बहुत दुःखी थी। उसे डर था कि उसके आँख का व्रण कहीं उसकी नेत्र ज्योति न ले जाय। जब घाव में कोई सुधार होता नहीं दिखाई पड़ा, तो एक दिन वह अधीर हो उठी और जिस पीठिका पर ताज प्रतिष्ठित था, उसके निकट जाकर विषण्ण भाव से बैठ गई। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। वह आँखों से आँसू बह रहे थे। वह आँखें मूँदे न जाने क्या बुदबुदा रही थी। इसी समय चर्च की प्रधान नन वहाँ से गुजरी। पेरियर को इस अवस्था में देख कर अचानक उसे उसकी आँख की गंभीर दशा का भान हो आया। वह एक झटके से आगे बढ़ी और फोड़े युक्त आँख को ताज का स्पर्श करा दिया। करीब एक घंटे के बाद उसकी आँख से मवाद निकलना बंद हो गया। धीरे-धीरे तकलीफ घटती गई और कुछ दिनों में घाव सूख गया। इसके साथ ही आँख भी स्वस्थ हो गई।
इस घटना से पास्कल इतना प्रभावित हुआ कि अपनी विशेष पोशाक में काँटों के ताज से घिरी हुई एक आँख अंकित करवा ली और लैटिन में एक वाक्य लिखवा लिया, जिसका अर्थ होता था, जिसे मैं पहले मानता था, अब भलीभाँति जान गया हूँ।”
वहाँ स्थापित “क्राउन ऑफ थार्न्स” के बारे में मान्यता है कि वह ईसामसीह से संबद्ध है। इस घटना के बाद से अब प्रतिवर्ष वहाँ लाखों की संख्या में लोग आते और स्वस्थ होकर लौटते हैं। ईसाई समाज में जो आदर और सम्मान आरंभ के वर्षों में प्रभु ईशु को मिला था, वैसी श्रद्धा मरियम के प्रति नहीं दिखाई पड़ती थी, किन्तु चौथी शताब्दी आते-आते मदर मेरी को भी पूजने लगे। इस क्रम में कई बार ऐसा जान पड़ता, मानों मरियम जन श्रद्धा की दृष्टि से ईसा को भी पीछे छोड़ गई। यही वह काल था, जब मरियम के सम्मान में विश्व भर में असंख्य चर्च विनिर्मित किये गये। इन्हीं में से एक है - स्पेन में वार्सिलोना के समीप मोण्टसिरेट में स्थापित काले पत्थरों से बनी मैडोना (मरियम) की मूर्ति जो आज भी बीमारों और विकलाँगों को अपनी ओर आकर्षित करती है, किंतु जो सर्वाधिक प्रसिद्ध है, वह लार्डिस, फ्राँस में स्थित हैं।
इस संबंध में प्रथम जानकारी बर्नाडेट सोबिरस नामक एक लड़की को मिली। एक बार बर्नाडेट जब लकड़ी बीनने समीपवर्ती नदी तट पर गई, तो किनारे स्थित एक छोटी-सी गुफा में उसे एक दिव्य स्त्री दिखाई पड़ी, पर जब तक वह कुछ समझ पाती, इसके पूर्व ही वह अदृश्य हो गई। उसने इसे आँखों का भ्रम मान लिया और लकड़ी बीन कर अन्य लड़कियों के संग वह वापस लौट गई।
दूसरे दिन जब वह पुनः नदी किनारे पहुँची, तो कल की घटना भूल चुकी थी। अकस्मात उसकी दृष्टि कंदरा की ओर चली गई। उसे पुनः वही महिला दिखाई पड़ी। इस बार भी वह कुछ ही क्षण में ओझल हो गई।
पुनरावृत्ति कई महीनों तक चलती रही, किंतु लड़की यह समझने में किसी भाँति सफल न हो सकी कि वह नारी आखिर है कौन और क्यों बार-बार दिखाई पड़ती है ? एक दिन उस दिव्य आकृति ने स्वयं ही अपना परिचय देते हुए बताया कि वह मरियम है। इसके बाद वह बर्नाडेट को गुफा के पीछे स्थित एक गुप्त झरने के पास ले गई। बाद में यही जल-स्रोत स्वास्थ्यकारी सिद्ध हुआ।
जैसे-जैसे इसकी ख्याति फैलती गई, वहाँ आने वाली भीड़ भी तदनुसार बढ़ती गई। कुछ ही समय में यह असाधारण रूप से अधिक हो गई। इसके उपरांत वहाँ एक बड़े चर्च का निर्माण कराया गया और गुहा के अन्दर बर्नाडेट को जहाँ मरियम के दर्शन हुए थे, वहाँ संगमरमर की एक मूर्ति प्रतिष्ठित कर दी गई।
आज भी वहाँ प्रति वर्ष लाखों की संख्या में लोग आते और ठीक होकर लौटते हैं। एक आइरिश व्यक्ति से संबंधित वहाँ की एक घटना निम्न है।
चार्ल्स मैकडोनल्ड क्षय रोग का मरीज था। पिछले एक वर्ष से उसका चलाना-फिरना बिल्कुल बंद हो चुका था और बिस्तर पर पड़ा-पड़ा अपने मौत के दिन गिन रहा था। जब उसकी आयु 20 वर्ष थी, तभी उसे यह बीमारी हुई थी और जब अब जबकि वह 31 वर्ष का हो चुका था, व्याधि का आक्रमण फेफड़ों से बढ़ कर कंधे, वृक्क एवं अन्य अंगों तक पहुँच चुका था। इस गंभीर और मरणासन्न स्थिति में उसे डबलिन के एक आश्रम में भर्ती कराने का निश्चय किया गया, किंतु मैकडोनल्ड ने वहाँ भर्ती होने से पूर्व लार्डिस की यात्रा करने की इच्छा प्रकट की।
दूसरे दिन ही वहाँ के लिए प्रस्थान कर दिया गया। मैकडोनल्ड जब वहाँ पहुँचा, तो विशेष रूप से निर्मित स्ट्रेचर में उसे बिठा कर स्नान के लिए ले जाया गया। प्रार्थनादि के उपरान्त जब उसे नहलाया गया, तो बड़ी विचित्र अनुभूति हुई। ऐसा प्रतीत हुआ मनों संपूर्ण शरीर में बिजली प्रवाहित हो गई हो। इसके पश्चात् जब उसे दूसरे स्ट्रेचर में रखा जाने लगा, तो वह अपने वर्षों पुराने दर्द से छुटकारा पा चुका था। दूसरे दिन जब स्नान की बारी आयी, तो उस समय तक वह काफी स्वस्थ हो गया था, अब वह चल-फिर सकता था। उसने बिना किसी की सहायता के स्वयं स्नान किया और दो दिन के भीतर इतनी समर्थता अर्जित कर ली, कि अकेले डबलिन लौट सके।
नियमानुसार अंत में पुनः उसकी स्वास्थ्य परीक्षा की गई। चिकित्सकों को यह देख कर अचरज हुआ कि अब उसमें रोग का कोई लक्षण नहीं था। परंपरा के अनुसार पुनः जाँच के लिए उसे एक वर्ष बाद बुलाया गया। मैकडोनल्ड बिल्कुल स्वस्थ था। चिकित्सकों ने इसे एक चमत्कार घोषित करते हुए कहा कि वर्तमान चिकित्साशास्त्र घटना की व्याख्या करने में पूर्णतः असमर्थ है अतः यह उस श्रेणी में गिने जाने योग्य है, जिसकी अलौकिकता की चर्चा अक्सर होती रहती है।
लार्डिंस से जुड़ा एक अन्य घटनाक्रम लुईस ओलिवरी नामक फ्राँसीसी व्यक्ति से संबद्ध है। लुईस एक बिजली मिस्त्री था। एक बार काम करते समय वह सीढ़ी से फिलस कर नीचे गिर पड़ा और उसे पक्षाघात हो गया। उसके शरीर का अर्धांग लकवाग्रस्त हो गया। अब वह हर समय बिस्तर पर ही पड़ा रहता। कई महीने बीत गये ।उसकी पत्नी ने जब लार्डिस की महिमा सुनी, तो पति को वहाँ जाने के लिए राजी कर लिया।
झरने में पहली डुबकी लगाते ही वह बेहोश हो गया। उसे पकड़ कर बाहर निकालना पड़ा। जब होश आया, तो उसका पक्षाघात ठीक हो चुका था। अब वह चल-फिर सकता था।
इस तरह की कितनी घटनाएँ अब तक वहाँ घट चुकी हैं। इनमें कितनी सच्ची और सही अर्थों में अलौकिक हैं ? इसे परखने के लिए एक चिकित्सा दल वहाँ क्रियाशील है। आगंतुकों को सबसे पहले यहाँ अपना स्वास्थ्य परीक्षण कराना पड़ता है, इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य विशेषज्ञ उन रिपोर्ट का भी गहराई से अध्ययन करते हैं, जिसे रुग्ण अपने साथ लाये होते हैं। दिनों परीक्षणों के आधार पर वे एक सुनिश्चित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। इसके बाद स्नान की अनुमति मिल जाती है। व्याधि ठीक होने की स्थिति में फिर शरीर-परीक्षा होती है, जिसमें यह देखा जाता है कि मर्ज कितना प्रतिशत ठीक हुआ ? ठीक हुआ या नहीं ? स्वास्थ्य - सुधार के संकेत मिलने पर बीमार को एक साल बाद फिर बुलाया जाता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि मर्ज और मरीज की अब क्या स्थिति है ? इस बार यदि सेहत और उन्नत पायी गई एवं जाँच दल यह महसूस कर सका कि सुधार स्थायी और अलौकिक है, तो मामले को पेरिस में वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। इसके पश्चात् इसे चर्च पदाधिकारियों के सन्मुख रखा जाता है, जहाँ उसकी विधिवत् घोषणा होती है, और आधिकारिक रूप से चमत्कारिक करार दिया जाता है।
लार्डिस के सौ वर्ष के इतिहास में मात्र 60 घटनाएँ ही ऐसी है, जिन्हें अधिकारियों ने अद्भुत और आश्चर्यजनक घोषित किया है, शेष 6 हजार मामले ऐसे हैं, जिनके बारे में उनका कथन है कि वह सत्य तो हैं, पर उनका आधार अभौतिक ही निमित्त है पर वह कारण क्या है ? इसे नहीं जाना जा सका।
विश्वास यदि सुदृढ़ हो और श्रद्धा प्रगाढ़ हो, तो ऐसी घटनाएँ सर्वत्र घटती देखी जा सकती है, पर मानवी अंतराल की संरचना ही कुछ ऐसी है कि उसकी आस्था चाहे जहाँ, जिस किसी पर सहजता से नहीं जम पाती। जहाँ जमती हैं वहीं चमत्कार पैदा करने लगती है। पवित्र स्थलों के संबद्ध में देखी-सुनी जाने वाली अलौकिकताएँ इसी की परिणति हैं। यो सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य आत्माएँ भी अपनी कृपा बरसाती और ऐसा कुछ उत्पन्न करती हैं, जिसे अद्भुत कहा जा सके, पर श्रद्धा तत्व की आवश्यकता यहां भी अनिवार्य है। बिना इसके वैसा कुछ भी हस्तगत नहीं किया जा सकता, जिसे अनुपम - अद्वितीय के नाम से पुकारा जाता है। तीर्थों देवस्थलों पर ये चमत्कार जो देखे जाते हैं, उसके पीछे उन संस्कारों का विशिष्ट महत्व है जो जन श्रद्धा ने उस स्थान के अन्दर से जगा दिए हैं। हमारे यहाँ की उत्तराखण्ड के चारों धाम, वैष्णोदेवी, हरिद्वार में शाँतिकुँज - सप्तसरोवर, तिरूपति रामेश्वरम्, श्रंगेरी, पुरी, आदि स्थानों की महत्ता है। इसे किसी भी स्थिति में तर्क-तथा तथ्य की कसौटी पर नकारा नहीं जा सकता।
(गुरू पूर्णिमा की पूर्व वेला में शाँतिकुँज परिसर में 1977 में दिया गया उद्बोधन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ( भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न प्रचोदयात् )
मनुष्य की सामान्य शक्ति सीमित है। प्रत्येक प्राणी को भगवान ने इतना ही सामान दिया है कि वह अपने जीवन का गुजारा कर लें। कीड़ों - मकोड़ों और पशु-पक्षियों को सिर्फ इतना ही ज्ञान, साधन, शक्ति और इंद्रियाँ मिली हैं ताकि वे अपना पेट भर लें और प्रकृति की इच्छा पूरी करने के लिए अपनी औलाद पैदा करते रहें। इससे ज्यादा कुछ उनके पास हैं नहीं, लेकिन आपके पास है। अगर आपको इससे कुछ ज्यादा जानना और प्राप्त करना है, तो आपको वहाँ जाना पड़ेगा जहाँ शक्तियों के भाँडागार भरे पड़ें हैं। एक जगह ऐसी भी है जहाँ बहुत शक्ति भरी पड़ी है, जहाँ बहुत शक्ति भरी पड़ी है, जहाँ संपत्तियों को कोई ठिकाना नहीं। जहाँ समृद्धि की अनंत शक्ति है। सारे विश्व का मालिक कौन है ? भगवान । यह उसी का तो सामान है जिससे उन्होंने दुनिया को बना दिया। यहाँ जो कुछ भी वैभव आप देखते हैं, वह भगवान के भंडार का एक छोटा चमत्कार है। पृथ्वी के अलावा और भी लोक हैं। उन सबमें भी भगवान का भंडार भरा पड़ा हुआ है। बड़ा संपत्तिवान है भगवान। आपको यदि संपत्तियों की सफलताओं की, विभूतियों, की जरूरत है, तो अपना पुरुषार्थ इस काम में खर्च करिये कि उस भगवान के साथ में अपना रिश्ता बना लीजिए। उसके साथ जुड़ने में अगर आप समर्थ हो सकें, तो यह सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा। आप भगवान के साथ में अपना रिश्ता बना ले तो मजा आ जाये।
मालदार आदमी से रिश्ता बना लेने पर क्या हो सकता है ? लालबहादुर शास्त्री का नाम सुना है आपने, वे बिलकुल एक छोटे से आदमी थे। लेकिन पंडित नेहरू के साथ में उन्होंने अपने घनिष्ठ संबंध बना लिए जिसकी वजह से वे एम0पी0 हो गये। उनकी सहायता से व यू0पी0 के मिनिस्टर भी हो गये और फिर मरने के पश्चात् उनके उत्तराधिकारी भी हो गये। बहुत शानदार थे लालबहादुर शास्त्री, यह उनके अपने पुरुषार्थ का उतना फल नहीं था, जितना कि नेहरू जी के सहयोग का। उनकी निगाह में उनकी इज्जत जम गयी थी। उन्होंने देख लिया था कि यह आदमी बड़ा उपयोगी है, उसकी सहायता करनी चाहिए। उसकी सहायता से उनने भी लाभ उठाया, इसलिए पंडित नेहरू ने उनकी भरपूर सहायता की। ठीक यही बात हर जगह लागू होती है। भगवान एक सर्वशक्तिमान सत्ता है। उसके साथ अगर आप अपना संबंध जोड़ ले तब आपकी मालदारी का कोई ठिकाना न रहेगा। तब आप इतने सम्पन्न हो जायेंगे कि मैं आपसे क्या क्या कहूँ। आप बापा जलाराम के तरीके से संपन्न हो सकते हैं, आप सुदामा के तरीके से मालदार भी हो सकते हैं, विभीषण और सुग्रीव के तरीके से मुसीबतों से बचकर के फिर से अपना खोया हुआ राजपाट पा सकते हैं। नरसी मेहता के तरीके से हुण्डी भी आप पर बरस सकती है। यहाँ कुछ कमी है क्या ? यहाँ कोई कमी नहीं है। इसलिये यहाँ जो आपको बुलाया गया है उसका एक कारण यह भी है कि आप से कहा जाये कि आप भगवान से रिश्ता जोड़ लें। आप जो पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं, उसका मतलब यह है कि आप इन उपायों के माध्यम से अपना रिश्ता भगवान से जोड़ लें। एक गरीब घर की लड़की की यदि किसी मालदार पति के साथ में शादी हो जाये तो वह दूसरे ही दिन से उसकी मालकिन हो जाती है, क्योंकि उसने उससे रिश्ता मिला लिया।
रिश्ता मिलाने के लिए क्या करना पड़ता है ? बस यही तो मुझे आपसे कहना था। रिश्ता मिलाने में आप ख्याल करते हैं कि रिश्वत देनी पड़ती है, चापलूसी करनी पड़ती है, पर इस ख्याल को आप हटा दीजिए। रिश्वत देकर के भगवान को अपना मित्र बना सकते हैं ? उसका अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं ? ऐसा मत कीजिए। साथ ही आप यह विचार मत कीजिए कि जीभ की नोक से कुछ मोटी बातें, कुछ चापलूसी की बातें और स्तोत्र पाठ करने के बाद में भगवान को आप अपना बना सकते हैं। भगवान की साझेदारी पर आप यकीन कीजिए और यह समझिये पर आप यकीन कीजिए और यह समझिये कि भगवान आपकी जुबान को नहीं, आपकी नीयत को देखता है। दृष्टिकोण को देखता है, चरित्र को देखता है, चिंतन को देखता है और आपकी भावनाओं को देखता है। अगर आप इस क्षेत्र में सूने हैं तो आपके कर्मकाण्ड कोई बहुत ज्यादा कारगर नहीं हो सकते । आप देखते हैं न कि कितने पंडित लोग हैं जो तरह-तरह के विधि-विधान और कर्मकाण्ड जानते हैं, पर सब खाली हाथ रहते हैं। आपने देखा है न कि साधु-महात्मा तरह-तरह के जाप करते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, स्नान, ध्यान करते हैं, तीर्थ यात्रा करते हैं, लेकिन उनकी नियत भावना और दृष्टिकोण अगर ऊँचा न हुआ, व्यक्तित्व ऊँचा न हुआ, अंतःकरण ऊँचा न हुआ , तब उनका लाल-पीले कपड़े पहन लेना , तरह-तरह के आडंबर बना लेना और तरह-तरह के क्रिया-कृत्य कर लेना बिलकुल बेकार चला जाता है और सामान्य स्तर के नागरिकों से भी गयी बीती जिंदगी जीते हैं।
भगवान की कृपा कहाँ मिलती है ?
भगवान को प्राप्त करने का जो असली रहस्य है, उसे आपको जानना ही चाहिए। क्या करना होगा ? आपको भगवान के साथ जुड़ जाना होगा। जुड़ जाने को ही उपासना कहते हैं। उपासना का मतलब ही है जुड़ जायें। मैं आपको कुछ थोड़े से उदाहरण बताऊँगा। जुड़ना किसे कहते हैं ? आपने आग में लकड़ी को गिरते हुए देखा है न। उस लकड़ी की क्या कीमत है- दो कौड़ी की-जिसे आप पैर के नीचे फेंक दीजिए तो क्या , या तोड़कर फेंक दीजिए तो क्या -इधर से उधर करते रहिए। उसकी कोई कीमत नहीं हो सकती , पर आग के साथ में यदि उसको मिला दिया जाय तो आप देखेंगे कि थोड़ी ही देर में लकड़ी गरम होने लगती है और आग हो जाती है। तब आप उसे छू भी नहीं सकते और जो गुण अग्नि देवता के है वही गुण उस नाचीज लकड़ी में भी आ जाती है। ठीक यही तरीका व्यक्ति को , जीवात्मा को परमात्मा के साथ मिलने का हैं। क्या करें ? नजदीक तो आइये आप । नजदीक आने का बस एक ही तरीका है - अपने आपको सौंप देना - होम देना। भगवान की इच्छा पर चलना । लकड़ी अपने आपको सौंप देती है और होम देती है। आग जब उसको जलाती है तो जलने में वह रजामंद हो जाती है । उसी के साथ जब वह धुल गयी तो वह उसी का रूप हो जाती है । हमारी और आपकी नियति यह हो कि हम भगवान के साथ में घुल जायें । घुलने का मतलब है सौंप देंगे । उनको अपने में नहीं मिला लेंगे , अपनी मर्जी के ऊपर नहीं चलायेंगे , वरन् हम अपने को उनकी मर्जी के मुताबिक चलायेंगे । इसी का नाम समर्पण है । इसी का नाम विलय और विसर्जन है । इसी का नाम शरणागति है। बहुत से नाम इसको दिये गये हैं । उपासना का तत्वज्ञान इसी पर टिका हुआ है कि आप भगवान के अनुयायी होते हैं कि नहीं , उसका अनुशासन मानते हैं कि नहीं । आप भगवान की इच्छानुसार चलते हैं कि नहीं , उसके बताये हुए इशारे एवं संकेत पर चलते हैं कि नहीं । उपासना के साथ जुड़ा हुआ एक मात्र यही प्रश्न है और कोई दूसरा नहीं।
यह ख्याल ठीक नहीं है कि आप अपनी मनमर्जी पर चला सकते हैं और चलायेंगे । भगवान आपकी मर्जी पर क्यों कर चलने लगे ? भगवान के अपने कुछ नीति-नियम हैं , मर्यादा और कायदे हैं । आपकी खुशामद की वजह से आपकी मनोकामना पूरी करने के लिए भगवान अपने नीति-नियम को छोड़ देंगे , मर्यादा और कायदे कानून को छोड़ देंगे और अपने आपको पक्षपाती होने का इल्जाम लगायेंगे - कलंक लेंगे क्या ? नहीं ऐसा भगवान कर नहीं सकेंगे । अगर आपके मन में यह ख्याल हो कि भिन्नतों और खुशामदों से भगवान को कहीं नजदीक ला सकते हैं और उपासना कर सकते हैं तो आप यह ख्याल छोड़ दीजिए । तब क्या करना पड़ेगा ? जब एक ही काम करना पड़ेगा कि आप अपने आपको उनके हाथ की कठपुतली बना लीजिए , फिर देखिए भगवान क्या से क्या करवाते हैं । पानी दूध में मिल जाता है और उसकी हैसियत दूध के बराबर हो जाती है। छोटी सी ना चीज बूँद समुद्र में गिरती है और अपनी हस्ती को उसी में विसर्जित कर देती है और समुद्र की कीमत की हो जाती है । छोटी सी बूँद की हैसियत समुद्र के बराबर हो जाती है । दो कौड़ी का गंदा , कीचड़ से भरा हुआ नाला जब नदी में शामिल हो जाता है , तब वह नदी हो जाता है । उसका पानी नदी की तरह से पूजा जाता है । गंगा में गिरे हुए नाले का गंदा जल भी गंगाजल कहलाता है । यह कैसे हो गया ? नाले ने अपने आपको समर्पित कर दिया । किसको ? नदी को । यदि समर्पित न करता तब ? तब आपकी मनः स्थिति का होता और गंगा जी से कहता - आप नाला बन जाइये और हमारी मर्जी पूरी कीजिए । हमारे साथ-साथ रहिए । पर ऐसा हो नहीं सकता । भगवान को आप अपने जैसा नहीं बना सकते । अपनी मर्जियाँ पूरी कराने के लिए उन्हें मजबूर नहीं कर सकते । आपको ही उनके पीछे चलना पड़ेगा।
मित्रों, पारस के बारे में आप लोगों ने सुना होगा कि पारस को छूकर लोहा सोना हो जाता है, बदल जाता है । यदि लोहा वैसा ही रहे और पारस से कहे कि आप लोहा बन जाइये, तो यह संभव नहीं । पारस लोहा नहीं बन सकता । लोहे को ही बदलना पड़ेगा । चंदन के पास उगे हुए पौधे चंदन की खुशबू देते हैं और चंदन बन जाते हैं। पर आप तो यह चाहते हैं कि चंदन को ही हम जैसा बनना चाहिए । चंदन आप जैसा नहीं बन सकता । छोटी झाड़ियों को ही चंदन जैसा खुशबूदार बनना चाहिए । चंदन बदबूदार झाड़ी नहीं बन सकता । भगवान पर दबाव मत डालिए । तब क्या करना पड़ेगा ? आप उसके साथ में घुल जाइये , लिपट जाइये । बेल देखी है न आपने , वह पेड़ के साथ में लिपट जाती है और जितना ऊँचा पेड़ है , उतनी ऊँची होती चली जाती है । यदि बेल अपनी मनमर्जी से फैलती तो सिर्फ जमीन पर फैल सकती थी , और ऊँचा उठना मुमकिन नहीं था । परंतु इतनी ऊँची कैसे हो गयी ? क्योंकि वह पेड़ से गुंथ गयी , लिपट गयी । आप भी भगवान से गुंथ जाइये, लिपट जाइये , फिर देखिये कि आपकी ऊंचाई भी पेड़ पर लिपटी हुई बेल के बराबर होती है कि नहीं । भगवान बहुत ऊँचा है , आप उसके साथ जुड़कर के देखिये , उसके अनुशासन को पालिए । उसकी इच्छा के साथ चलिये , फिर आप देखिये कि भगवान के बराबर बन जाते हैं कि नहीं । पतंग अपने आपको बच्चे के हाथ में सौंप देती है । बच्चे के हाथ में उस बँधी हुई डोरी का एक सिरा होता है जिसे वह झटका देता रहता है और पतंग आसमान में जा पहुँचती है। पतंग अपनी डोरी को बच्चे के सुपुर्द न करे तब , उसे जमीन पर पड़ा रहना पड़ेगा ।
आप अपने जीवन की बागडोर और जीवन का आधार भगवान के हाथ में न सौंपे , उसकी मर्जी के अनुसार न चलें तो आप पतंग की तरीके से आसमान पर उड़ने की अपेक्षा मत कीजिए । आपने दर्पण देखा है न , उसके सामने जो चीज आती है वह दर्पण में वैसे ही दिखाई पड़ने लगती है । आपके जीवन में चारों ओर से दोष-दुर्गुण एवं कल्मष छाये हुए हैं , इसलिए आपका दर्पण भी - मानसिक स्तर भी वैसा ही बन गया है । लेकिन अगर आप भगवान को सामने रखें , उसके नजदीक जायें तो आप देखेंगे कि आपके जीवन में भी भगवान की आभा-भगवान की शक्ति उसी तरीके से बन जाती है जैसे कि दर्पण के सामने खड़े हुए आदमी की बन जाती है । वंशी अपने आपको पोली कर देती है और खाली कर देती है। पोली और खाली कर देने के बाद में फिर बजाने वाले के पास जा पहुँचती है और उससे कहती है कि आप बजाइये , जो आप कहेंगे वही मैं गाऊँगी । बजाने वाला फूँक मारने दीजिए और आप बजने के लिए तैयार हो जाइये ।
कठपुतली को आपने देखा होगा । उसके धागे बाजीगर के हाथ में लगे होते हैं । बाजीगर इशारे करता जाता है , और कठपुतली बिना कुछ कहे नाचना शुरू कर देती है । दुनिया को दिखाई पड़ता है कि कठपुतली का नाच कितना शानदार हुआ । पर वस्तुतः यह कठपुतली का नाच नहीं वरन् बाजीगर का कमाल है कठपुतली ने तो अपने शरीर के हिस्सों में धागे बँधवाये और उनको बाजीगर के हाथ में सौंप दिया समर्पण कर दिया । बस , यही आपको भी करना पड़ेगा । कठपुतली के तरीके से अगर आप बाजीगर के हाथ में अपनी जिंदगी की नाव सौंप सकते हों , अपने विचार और चिंतन सौंप सकते हों , अपनी इच्छाएँ और आकाँक्षाएँ सौंप सकते हों , तो फिर देखिये कि कैसा मजा आ जाता है । आप उस जनरेटर से संबद्ध हो जाइये जिसके साथ में जुड़ने के बाद ही बल्ब जलता है । पंखे तभी चलते हैं जब उनका संबंध बिजली घर से जुड़ जाता है। अगर आप सुनेंगे नहीं , जुड़ेंगे नहीं, तब आप रखे रहिए , आपकी कीमत ढाई रुपये है । आप प्रकाश नहीं दे सकते । आपकी हैसियत है तो ठीक है , वह आपको मुबारक , लेकिन अगर आप अनंत शक्ति के साथ न जुड़े तो सब बेकार है । अनंत शक्ति के साथ अगर आप जुड़ेंगे तो फिर देखेंगे कि कितना कमाल कर सकते हैं । इसलिए आदमी की सबसे बड़ी समझदारी यह है कि अपने आपको भगवान के साथ में जोड़ लें । उसकी शक्तियों के साथ में अपनी सत्ता को मिला दें । यह काम जरा भी कठिन नहीं है , वरन् बहुत सरल है । नल आपने देखा है न , जब वह टंकी के साथ जुड़ जाता है जिसमें पानी भरा हुआ है तो उसको बराबर पानी मिलता रहता है । अपने आप में अकेला नल कुछ भी तो नहीं है , लेकिन जब टंकी के साथ में रिश्ता मिला लिया तो उसकी कीमत बढ़ गयी । उस नल से अब आपको बराबर पानी मिलता रहेगा।
वक्त छोटा हो तो क्या , नाचीज हो तो क्या , यदि आपने सच्चे मन से भगवान के साथ अपने-आपको जोड़कर रखा है, तो भगवान की जो संपदा है , जो विभूतियाँ हैं, वह भक्त की अपनी हो जाती है और बराबर उसको मिलती चली जाती हैं । इसके लिए क्या करना पड़ेगा ? अपने आपको सौंपना पड़ेगा और क्या करना पड़ेगा भगवान को बहकाना , फुसलाना और अपनी मर्जी पर चलाना बंद करना पड़ेगा । आपको ही उसका कहना मानना पड़ेगा , आपको ही समर्पण करना पड़ेगा । बीज अपने आप को ही बनाना पड़ेगा। भगवान के खेत में अपने आपको बोइये, फिर देखिये कैसी फसल आती है । मक्का का एक दाना खेत में बो देते हैं और उसका पौधा खड़ा हो जाता है , भुट्टे आ जाते हैं और एक-एक भुट्टे में हजार-हजार दाने होते हैं । इस तरह एक बीज के -हजार दाने होते हैं । इस तरह एक बीज के -हजारों दाने हो जाते हैं। आप अपने आपको भगवान के खत में बोइये , गलिये , फिर देखिये आपकी स्थिति कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है। गलने का मन है नहीं, हिम्मत है नहीं, तो फिर काम कैसा चलेगा। आप गलने की हिम्मत नहीं करेंगे, बीज को जिंदगी भर अपनी पोटली में रखे रहेंगे और यह अपेक्षा करते रहेंगे कि जमीन हमारे खेत लहलहाते और हमको नहीं गलना पड़े ऐसा कहीं हुआ है क्या ? ऐसा नहीं होगा। आपको गलना पड़ेगा। अगर आप नहीं गलेंगे तब आप भगवान से क्या उम्मीद करेंगे ?
आपने सुना है न कि भगवान की आदत कुछ ऐसी है कि माँगते रहते हैं। पहले हाथ पसारते हैं , बाद में कुछ देने की बात कहते हैं। उनके हाथ पर आप कुछ रख नहीं सकते तो फिर आप क्या पायेंगे ? चावलों से, धूपबत्ती से आप भगवान को खरीद नहीं सकेंगे । आप आरती करके पा नहीं सकेंगे। जीभ की नोक से स्तोत्र पाठ करके या छोटे-बड़े कर्मकाण्ड करके भगवान के अनुग्रहों के आप अधिकारी नहीं हो पायेंगे। तो फिर क्या करना पड़ेगा ? आपको अपना दृष्टिकोण , चिंतन और चरित्र , भावना और लक्ष्य सब का सब भगवान के साथ में जोड़ना पड़ेगा। जिस दिन आप यह करने को तैयार हो जायेंगे तो उस दिन आप देखियेगा क्या क्या होता है। भगवान की मर्जी तो पूरी करिये फिर देखिये आपको कुछ मिलता है या नहीं। भगवान नियत देखते हैं। अभी मैंने सुदामा का नाम लिया था। सुदामा ने अपनी पोटली दे दी थी, बाद में भगवान ने उन्हें जो दिया वह आप जानते हैं। जिसके पास भी भगवान जाते हैं माँगते जाते हैं, देते हुए नहीं। शबरी के पास भगवान गये थे तो कोई सोना -चाँदी या हीरे-मोती लेकर नहीं गये थे। वे माँगते हुए गये थे कि अरे हम बहुत भूखे हैं कुछ खाना खिलाइये। शबरी के पास जूठे बेर थे-जो कुछ भी था भगवान के सुपुर्द कर दिया। गोपियों के पास भी गये थे। गोपियों से भगवान प्यार करते थे और उनसे यही पूछते थे- लाइये आप कुछ दीजिए । कुछ नहीं तो छाछ ही माँगते थे। कर्ण से भी माँगने गये थे , बलि से भी माँगने गये थे। हर जगह भगवान माँगते ही चले आते हैं। भगवान कहीं भी जाते हैं तो मनुष्य की पात्रता को परखने के लिए , उसकी महानता को विकसित करने के लिए एक ही दबाव डालते हैं कि आपके पास क्या है, उसे सुपुर्द कीजिए। भगवान की आदत को आप जानेंगे नहीं तो मुश्किल पड़ेगा और अपने आप को सौंपने के लिए अमादा न होंगे तो आप भगवान को अपना नहीं बना सकेंगे।
भगवान की भक्ति किसे कहते हैं ? समर्पण को पर आपने तो उसे कठपुतली के तरीके से चलाने और भक्ति से उचित और अनुचित जो कुछ भी फायदे होते हों, उठा लेने को मान लिया है। आप अपनी भक्ति की इस परिभाषा को बदल दीजिए। भक्ति कैसी होती है ? इसकी एक कहानी सुनाता हूँ आपको। लैला-मजनू की कहानी सुनी है न आपने, न सुनी हो तो सुनिये। एक मजनू था जो लैला को प्यार करता था और चाहता था कि उससे शादी हो जाये। लेकिन उसका बाप तैयार नहीं था। उसने कहा-हम भिखारी के साथ अपनी बेटी की शादी नहीं करेंगे। तब लैला ने सोचा-चलो मैं ही अपनी मर्जी से शादी कर लेती हूँ, लेकिन पहले देखूँ तो सही कि ऐसे ही अपनी खुदगर्जी के लिए-मतलब के लिए ही मुझे अपने शिकंजे में कसना चाहता है , या वास्तव में मुझे प्यार करता है। प्यार करने का अर्थ होता है-देना। सो उसने सोचा चलो उसकी परीक्षा लेनी चाहिए। उसने अपनी एक बाँदी को भेजा। उसने मजनू से कहा कि लैला बहुत बीमार है, तो वह बहुत दुखी हुआ। बाँदी ने कहा-दुखी होने से क्या फायदा कर सकते हो तो कुछ मदद कीजिए। अगर प्यार करते हैं तो कुछ कीजिए न। तो उसने कहा , क्या दूँ ? बाँदी ने कहा कि डाक्टरों ने कहा है कि लैला की नसों में खून चढ़ाया जायेगा। तो क्या आप अपना खून देंगे जिससे लैला की जान बचायी जा सके । मजनू फौरन तैयार हो गया और चाँदी का जो कटोरा बाँदी लायी थी उसे अपने खून से लबालब भर दिया और बोला-बाँदी जल्दी आना अभी मेरे शरीर में जितना भी रक्त है मैं सब उसके सुपुर्द कर दूँगा। मैं उसे मुहब्बत करता हूँ और मुहब्बत का अर्थ होता है-देना। इसलिए मैं तो देने ही देने वाला हूँ। बाँदी रक्त का कटोरा लेकर चली गयी। शेष नकली मजनुओं को भगा दिया गया लैला ने अपने बाप से कहा कि जो मुझ से इतनी मुहब्बत करता है और जो मुहब्बत की कीमत को समझता है उसके साथ तो मैं रहूँगी ही। लैला की मजनू के साथ शादी हुई थी। आपकी भी शादी भगवान के साथ हो सकती है , आप जरूर भगवान के साथ शादी कर सकते हैं।
इसके लिए करना क्या चाहिए ? एक ही बात करनी चाहिए-भगवान की मर्जी पर चलने के लिए आमादा हो जाइये। जो कुछ वह आप से चाहते हैं , वह आप कीजिए । आप चाहते हैं ठीक है , लेकिन जो आप चाहते हैं उससे पहले भगवान ने बहुत कुछ दे दिया है। उसने आपको इनसान की ऐसी बेहतरीन और समर्थ जिंदगी दी है कि इसके आधार पर आप अपनी मनमर्जी पूरी कर सकते हैं। मनमर्जी के लिए कोई कमी नहीं है। आपके हाथ कितने बड़े हैं, अकल कितनी है , आपकी आँखें और जुबान कितनी शानदार है। आप अपनी दैनिक जरूरतों की -जिनकी भगवान से अपेक्षा करते हैं , उनके लिए अपेक्षा मत कीजिए। आप जो पुरुषार्थ से कमाते हैं उसमें संतोष कर सकते हैं अथवा कम में काम चला सकते हैं आप अपनी हवस और अपनी ख्वाहिशें , तमन्नाएं और इच्छायें अपनी महत्वाकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए क्या भगवान को दबोचेंगे, भगवान को मजबूर करेंगे क्या ? क्या वह कर्तव्य की बात को छोड़ दें और आपके लिए पक्षपात करने लगें और कर्मफल की महत्ता का परित्याग कर दें। आप ऐसा मत कीजिए, भगवान को न्यायाधीश रहने दीजिए। आप भगवान को बेइज्जत मत कीजिए। आप अपनी मर्जी के लिए उनको पक्षपाती मत बनाइये। ऐसा वे करेंगे भी नहीं। आप बनाना चाहें तो भी वे नहीं करेंगे।
इसलिए तरीका सिर्फ एक ही है कि आप उस शक्ति के भंडार के साथ मैं अपने आपको मिला लीजिए , जोड़ लीजिए। मिलाने और जोड़ने का तरीका वही है अर्थात् आपको उनकी मर्जी पर चलना पड़ेगा । आप अपनी मर्जियाँ खत्म कीजिए , अपनी आकाँक्षायें खत्म कीजिए अपनी इच्छायें खत्म कीजिए। आप उन्हीं के हो जाइये और उन्हीं के साथ रहिए। जब आप भगवान के साथ हो जाते हैं तो वे आपके ही जाते हैं। आप उनके हो जाइये और अपना बना लीजिए राजा हरिश्चन्द्र बिके थे एक बार , डोमराजा खरीद ले गया था उन्हें। भगवान भी चौराहे पर बिकने के लिए खड़े हैं। वे आवाज लगाते है कि हम बिकने के लिए खड़े हैं कि हमको खरीद लिया जाय। जो हमको खरीद लेगा, उसी की सेवा करेंगे, उसी के साथ-साथ रहेंगे। आप चाहें तो उनको खरीद सकते हैं। क्या कीमत है ? आप अपने आपको उनके हाथों बेच दीजिए और उन्हें अपने हाथों खरीद लीजिए। स्त्री अपने हाथों अपने आपको अपने पति के हाथों सौंप देती है, अपने आपको बेच देती है और इसकी कीमत पर पति को खरीद लेती है। बस यही मित्रता का रास्ता है, यही भगवान की भक्ति का रास्ता है। आपको अपने जीवन में हेर फेर करना ही पड़ेगा और करना ही चाहिए। आप अपने घिनौने चिंतन को बदल दीजिए, छोटे दृष्टिकोण को बदल दीजिए,। लोभ और लालच से बाज आइये और भगवान की सुन्दर दुनिया को ऊँचा बनाने के लिए शानदार बनाने के लिए, उनके राजकुमार के तरीके से उनकी संपदा को, उनकी सृष्टि को ऊँचा और अच्छा बनाने के लिए कमर कसकर खड़े हो जाइये। आप समर्पित हो जाइये, शरणागति में आइये, विलय कीजिए-विसर्जन कीजिए, फिर देखिये आप क्या पाते हैं ? बीज के तरीके से गल जाइये और पेड़ के तरीके के उगने की तैयारी कीजिए। आप त्याग नहीं करेंगे तो पा कैसे लेंगे। जो त्याग करना है उसमें जप करना ही काफी नहीं है, जरूरी तो है, पर काफी नहीं। भगवान को चावल चढ़ा देना, धूपबत्ती उतार देना, आरती उतारना जरूरी तो है, पर काफी नहीं है। ज्यादा करने के लिए आप अपना कलेजा चौड़ा कीजिए और तैयारी कीजिए। आज मुझे यही निवेदन करना था, आप सब लोगों से।
मानवता के भाग्योदय के द्योतक सविता ! तुम्हें नमन। नवयुग के ‘उज्ज्वल भविष्य’ के घोषक सविता । तुम्हें नमन !! 1 !!
सुप्त देवसंस्कृति - उन्नायक, राष्ट्र-जाग्रति के पुरोहित । प्रखर ओज से, दिव्य तेज से, ब्रह्मवर्चस से, तुम ज्योतित ॥
प्राण-प्रदायक, साहस-दायक, पोषक-सविता। तुम्हें नमन। नवयुग के ‘उज्ज्वल भविष्य’ के घोषक - सविता। तुम्हें नमन ॥ 2 ॥
संवेदन-विहीन मानव हृदयों में, संवेदन पोषक। अरे! श्रेष्ठ चिंतन के पुरोहित। तुम हो सद्चिंतन प्रेरक॥
रोग-शोक, दारिद्र-दैन्य, अवरोधक-सविता। तुम्हें नमन। नवयुग के ‘उज्ज्वल-भविष्य’ के घोषक-सविता । तुम्हें नमन ॥ 3 ॥
समता ममता, नेह-रश्मियाँ बिखराने वाले सविता। आशा को प्रकाश किरणों को छिटकाने वाले सविता॥
घृणा - द्वेष के अंधकार, अवशोषक-सविता तुम्हें नमन। नवयुग के उज्ज्वल भविष्य’ के घोषक-सविता तुम्हें नमन। 4॥
उदय हो रहे हो तुम सविता । नवयुग का आगमन लिये। धराधाम पर स्वर्ग मनुज में देवोपम आचरण लिये॥
विश्व वंद्य। राष्ट्र - पौरुष संयोजक - सविता। तुम्हें नमन। नवयुग के उज्ज्वल भविष्य’ के घोषक-सविता तुम्हें नमन। 4॥
- मंगल विजय ‘विजयवर्गीय’
हम न भूलेंगे कभी माता-पिता के प्यार को। स्नेह से भीगे सहज शीतल विमल व्यवहार को॥
माँ, कि जिसने गर्भ में नौ माह तक पाला हमें, देव दुर्लभ देह में जिसने स्वयं ढाला हमें,
वह पिता, संतान हित जो पूर्ण न्यौछावर हुआ, जिस पुजारी के लिये परिवार ही मंदिर हुआ,
हम न भूलेंगे पिता-माँ के उसी उपकार को। स्नेह से भीगे सहज शीतल विमल व्यवहार को॥
मुस्कुराती माँ, कि जो एकाँत में रोयी स्वयं, दे हमें आराम, कष्टों में सदा सोयी स्वयं,
जिस पिता के त्याग से परिवार उपवन बन गया, आत्मसंयम और सेवा से तपोवन बन गया।
हम कभी भी भूल पाएँगे न उस परिवार को। स्नेह से भीगे सहज शीतल विमल व्यवहार को॥
धन्य वे माता-पिता जिनसे हमें यह तन मिला, पर हमें गुरुदेव से अध्यात्म का जीवन मिला,
पा गये पग एक से, तो दूसरे से प्रेरणा, एक ने दी देह, दूजे ने अलौकिक चेतन,
हम न छोड़ेंगे कमी ऐसी सबल पतवार को । स्नेह से भीगे सहज शीतल विमल व्यवहार को॥
वंदनीया माँ, स्वयं जो शक्ति हैं गुरुदेव की, जो स्वयं आकार सेवा-शक्ति हैं गुरुदेव की,
हम उन्हीं माता-पिता के अंश है, संतान हैं, पा गये उनसे अजर अध्यात्म का जलयान है,
पाल कर लेंगे इसी से हर भयंकर धार को । स्नेह से भीगे सहज शीतल विमल व्यवहार को॥
- शचीन्द्र भटनागर
माता अपने गर्भ में भ्रूण को रखती, पोषण देती तथा उसके स्वस्थ है। इसके लिए उसे कितना ही कष्ट क्यों न झेलना पड़ें, वह सहती है। आहार में वह जो भी लेती है, गर्भस्थ शिशु के लिए, जो भी चिंतन करती है, शिशु में सुसंस्कारिता के समावेश के लिए तथा उसके रक्त-माँस-मज्जा का एक-एक कण नियोजित रहता है - गर्भ में पल रही उस जीव सत्ता के लिए, जो नौ माह की अवधि पूरी कर माँ से लगाव की वेदना भरी कराह के साथ बाहर आता है व एक नये संसार से अपनी इंद्रियों के माध्यम से साक्षात्कार करता है। माँ से बढ़कर श्रेष्ठतम सत्ता ब्रह्म के बाद इस धरती पर कोई नहीं। सरस संवेदना की प्रतिमूर्ति हमेशा देती रहने वाली सतत् जीवन यज्ञ कर अपना सब कुछ अर्पित करने वाली मातृसत्ता अब तक इस धरती पर है, भगवान का अस्तित्व प्रमाणित होता रहेगा व आस्तिकता कभी भी इस धरित्री से मिटेगी नहीं।
प्रसंग यहाँ गुरु-पूर्णिमा पर्व के परिप्रेक्ष्य में मातृसत्ता की अपने संतानों के प्रति गहरी आँतरिक वेदना एवं अजस्र स्नेह की वर्षा का चल रहा है जो विगत चौबीस वर्षों से निरंतर प्रवाहित होती रह हमें आत्मिक प्रगति के पथ पर प्रशस्त कर अब देवसंस्कृति दिग्विजय वाहिनी का सदस्य बनाकर सतयुगी भविष्य की ओर ले जाने को कृत संकल्प है। अठारह अश्वमेध यज्ञ संपन्न हो चुके, जिसकी घोषणा पूज्यवर ने प्रायः पचास वर्ष पूर्व ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका में कर दी थी तथा जिसे यज्ञदेवता की दैनन्दिन स्तुति में समाहित कर प्रत्येक के लिए अपने स्थूल-शरीर के महाप्रयाण के बाद एक समर्थ सत्ता के सहारे छोड़कर सूक्ष्म व कारण सत्ता में स्वयं को प्रविष्ट करा विराट के एकाकार कर लिया था। अठारह की संख्या अब एक सौ आठ तक छोटे बड़े दिग्विजयी पराक्रमों के रूप में - विश्वव्यापी संकल्पों के रूप में पहुँचेगी, इसमें किसी को संदेह नहीं करना चाहिए।
परम वंदनीया माताजी 1943 में परम पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य में इस संस्था की संरक्षक अभिभावक -’ परिवार की मुखिया पद पर आसीन हुई थीं किन्तु प्रत्यक्षतः यह भूमिका उनने 1971 में सँभाली, जब पूज्यवर ने मथुरा से विदाई लेकर स्वयं को दृश्य पटल से हटाकर हिमालय की ओर प्रस्थान कर दिया था व बाद में शाँतिकुँज में साधनात्मक पराक्रम द्वारा लाखों-करोड़ों आत्मबल संपन्न महामानवों के सृजन के निमित्त अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। विगत चौबीस वर्षों में गायत्री परिवार के प्रत्येक पुराने-नये सदस्य ने शक्ति के स्त्रोत के रूप के में स्नेह सलिला माताजी की ओर से न केवल अजस्रं प्रवाह बहता अनुभूत किया है, वरन् अनेकानेक रूपों में उनके अनुदानों से स्वयं को लाभान्वित होता पाया है।
क्या यह संरक्षण इसी प्रकार मिलता रहेगा ? कोई कमी प्रत्यक्ष दर्शन न हो पाने के कारण कहीं होने तो न लगेगी ? क्या मिशन अपनी यह आगामी दस वर्षीय यात्रा सफलतापूर्वक पूरी कर सकेगा ? शारीरिक स्वास्थ्य पर दबाव के चलते कहीं हम उनके अनुदानों से वंचित तो नहीं हर जायेंगे ऐसे अनेकानेक ऊहापोह परिजनों के मन में चलते होंगे चलते हैं एवं प्रत्यक्ष चर्या में सुनने को भी मिलते हैं। परम वंदनीया माताजी ने विश्व मात्र के कष्टों के निवारण के लिए विगत मई माह में बहुत बड़ा कष्ट अपने ऊपर लिया व उस डेढ़ माह की अवधि से गुजर कर अब अधिकाँश समय मौन एकाकी साधना-तप द्वारा शक्ति संचय करोड़ों व्यक्तियों में मनोबल आत्मबल के संचार के निमित्त लगाने का निश्चय किया है। दूर से हमें भले ही उनके दर्शन होते रहें निकट से परामर्श उनके समीपवर्ती वरिष्ठ परिजनों के माध्यम से मिलते रहें, हमें अपनी गुरु पूर्णिमा की श्रद्धांजलि इसी रूप में देनी चाहिए कि हमारे पुरुषार्थ में कोई कभी किसी रूप में न आने पाये। निषेधात्मक चिंतन हम पर हावी न हों। आगामी यज्ञायोजन, विगत अश्वमेधों के अनुयाज यथावत तीव्र वेग से चलते रहें तथा हर व्यक्ति एक से अनेक गुना बनता हुआ इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल बनाने वाले इस मिशन की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता चले, यही हमसे उनकी अपेक्षा है।
माता ने पुत्र को दिया, पुत्रियों को दिया कहीं भेदभाव न रखा, आगे भी वह नहीं रहेगा। सभी को वे सतत् देती रहेंगी व इक्कीसवीं सदी के आगमन तक युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति एक हमें शक्ति प्रदान करती रहेंगी इसमें। किसी को कोई संदेह नहीं करना चाहिए। इस माह 22 जुलाई को गुरू पूर्णिमा है। हमारी श्रद्धा मिशन के लक्ष्योँ के प्रति और बढ़ें, आचार संहिता का पालन कर हम आदर्श पुत्र व पुत्री अपनी मातृ सत्ता के ऋषियुग्म के कहे जा सकें। नव जागरण के आलोक वितरण में हम से कोई कृपणता न हो, तो मानना चाहिए कि दीक्षा व दक्षिणा के उभय पक्षीय संयोग से चलने वाला सशक्त विद्युतप्रवाह कभी अवरुद्ध नहीं होगा। हम सतत् पाते ही रहेंगे, अनुभूतियों व अनुदानों के रूप में आइए। यह विशिष्ट गुरु पूर्णिमा पर्व इसी पावन उद्देश्य को लेकर हर्षोल्लास मनाएँ।
*समाप्त*