जीवन-समुद्र का मंथन एवं तीन दिव्य रत्न

बहिरंग में दृश्यमान समुद्र की तरह हमारा जीवन भी एक समुद्र के समान है, जिसका मंथन करने पर हमारे हाथ तीन बहुमूल्य रत्न लगते हैं । पहला है -प्रेम की पुलकन -आँतरिक उल्लास की अनुभूति, दूसरा है - सत्य रूपी ज्ञान की गहन शोध प्राप्ति हेतु सहज जिज्ञासा, तीसरा है -पीड़ित मानव समुदाय के प्रति असीम- असहनीय स्तर की करुणा का उभार व उस निमित्त अपना सब कुछ लगा देना । इन्हीं को भक्ति , ज्ञान व कर्म त्रिवेणी, उपासना व साधना-आराधना के रूप में जाना जा सकता है ।

प्रेम की पुलकन होना अर्थात् भौतिकवाद से भरी- स्वार्थों के शिकंजे से जकड़ी, इस दुनिया रूपी तपते रेगिस्तान में सरसता से भरी कुछ बूंदें बरस जाना । एकाकीपन की ऊब, नीरसता-संवेदन हीनता की मनः स्थिति में तथा कठोर परिश्रम की थकान व उतार-चढ़ाव के मनोगत विक्षोभों से भरे इस जीवन में, सरसता केवल प्रेम में है । प्रेमी बनकर हमें अपना ‘अहं’ खोना पड़ता है व आदर्शों के समुच्चय-श्रेष्ठता की प्रतिमूर्ति अपने इष्ट परम पिता परमेश्वर को सब कुछ सौंपना पड़ता है । खोने के बाद प्रेमी-भक्त जो पाता है, वह लाख करोड़ गुना अधिक होता है । यही सच्ची भक्ति का स्वरूप होता है ।

ज्ञान, सत्य के रूप में इस जगत में विद्यमान है । उसे पाने के लिए निरंतर गहन शोध में मनुष्य लगा होता है । जो अब तक जाना जा सका, वह अद्भुत है । अभी जो जानने को शेष है , वह असीम-अनंत व अत्यंत लाभदायक है । खुले दिमाग से इसे पाने का प्रयास करना तथा उसके लिए साधनारत रह निरंतर अधिकाधिक सीखने की वृत्ति बनाए रखना एक उच्चस्तरीय योग है । यही ज्ञानयोग कहलाता है ।

इस संसार में पीड़ा-पतन-पराभव की अति कष्टकर परिस्थितियाँ संव्याप्त हैं । मात्र सुख ही सुख नहीं, कष्ट भी अत्यधिक है । औरों की पीड़ा में हिस्सा बँटाने के लिए उन्हें पतन से बचाने के लिए निज की प्रतिभा-वैभव सब कुछ लगा देना, यह परम पुरुषार्थ है, कर्मयोग की पराकाष्ठा है तथा सच्ची भगवत् आराधना है ।

इन तीन दिव्य रत्नों के रूप में हमें जीवन-साधना से जो अमृत-कण हाथ लगते हैं, उनसे सारी वसुधा को हम धन्य बना सकते हैं ।


अंतस् की निर्झरिणी- संजीवनी प्रसन्नता

प्रसन्नता आँतरिक पवित्रता का, शुद्धि का बाह्य परिणाम है-दृश्यमान चिह्न है ।जब चित्त शुद्ध होकर सत्वगुण-संपन्न हो जाता है तभी प्रसन्नता की सहज वृत्ति जाग्रत होती है । जब इस तरह के सत्वगुण-संपन्न महापुरुष, जिनका अंतस् निर्मल पवित्र और स्वच्छ हो जाता है, जिन्होंने अपने अंतस् का समाधान कर लिया वे हँसते हैं तो सारे वातावरण में हँसी के स्रोत फूट पड़ते हैं । उनके चारों ओर प्रसन्नता साकार हो उठती है । दुःखी संक्षुब्द व्यक्ति भी उस प्रसन्नता के वातावरण में उस समय के लिए अपने दुःख क्लेशों को भूल जाता है । महापुरुषों के साथ बिताये गये क्षण स्वर्गीय आनन्द से कम नहीं होते । ऐसा लगता है मानों किसी दूसरे लोक में विचरण कर रहे हों जहाँ के वातावरण में उत्साह, उल्लास, उमंग, प्रसन्नता, मुस्कान भरा हो । उनके निर्मल हृदय से प्रसन्नता की सुरसरि वैसे ही प्रवाहित होती रहती है जैसे पावन हिमालय से गंगा ।

समाज के विशाल भवन में मनुष्यों का गठन उसी तरह है जैसे किसी माला के विभिन्न मनकों का । भवन के निर्माण में प्रत्येक ईंट का अपना विशेष स्थान है , इतना ही नहीं नींव में निम्न स्तर पर लगी हुई ईंट का और भी महत्व है क्योंकि उसके ऊपर समस्त भवन का बोझ उठा हुआ है ।सेंट पाल के शब्दों में “हम सब एक दूसरे के साक्षी हैं परस्पर अन्योन्याश्रय हैं । अतः किसी को भी भले ही निम्न स्तर का क्यों न हो, हमें घृणा की दृष्टि से देखने का अधिकार नहीं है ।” जीवन में प्रसन्नता के अवतरण के लिए समता रूपी व्यावहारिक गीता का यही सूत्र है । सबसे प्रेम करना, सबके अस्तित्व को अपनी ही तरह मान कर उसका पूरा-पूरा आदर करना, पड़ोसी से लेकर सारी वसुधा को प्रेम करना आवश्यक है । इससे आँतरिक क्षेत्र से घृणा । अनुदारता, स्वार्थ परता आदि दोष दूर होंगे और प्रसन्नता का प्रकाश प्रकट होने, लगेगा । इक्कड़पन, पड़ोसी से कोई मतलब न रखने की वृत्ति, अपने तक सीमित रहने की वृत्ति ही दुःख का मूल कारण है ।

गुण दोषों का संबंध उसी तरह है जैसे दीपक के प्रकाश में उसकी स्वयं की छाया । “जड़-चेतना-गुण दोष मय” के अनुसार हर व्यक्ति में गुण-दोष अवश्य हैं किंतु प्रत्येक व्यक्ति मूल रूप से अच्छा है बुरा नहीं, अतः किसी के गुण दोषों से प्रभावित होना आध्यात्मिकता की पहचान नहीं । कर्तव्य के साथ थोड़ा बहुत अहंकार होना स्वाभाविक है । इस तरह के दोष छाया दोष कहे जाते हैं जिनका अस्तित्व भी स्वीकार करना आवश्यक है । गुण दोष रहित मनुष्य मिलना दुर्लभ है । अतः गुण दोषों का ध्यान न रखकर सभी का आदर करना प्रसन्नता की अभिवृद्धि करना है ।

दूसरे से अनादर अविश्वास, मतभेद, विचार-भेद रखना, प्रसन्नता की जगह राग, द्वेष, क्लेश, गुटबंदी, दलबंदी, भिन्न-भिन्न वाद, प्राँतीयता, एकाँगी निर्णय में सब प्रसन्नता को दूर करके मानव मात्र के सुख चैन को नष्ट-भ्रष्ट करने वाले साधन हैं । इनको अपनाने वाला क्षणिक सुख अथवा तात्कालिक लाभ भले ही पाले किंतु अंततोगत्वा कलई खुल जाती है और लोक भर्त्सना से लेकर आत्म प्रताड़ना के दण्ड से तिलमिलाते हुए वे देखे गये हैं । आत्म बल क्षीण हो जाता है, आत्म विश्वास कोसों दूर हो जाता है, ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक तेज रहित होकर छूँछ बन जाता है ।

विभिन्न विचारों, दृष्टिकोणों, स्वभावों के कारण भेद हो सकते हैं यह स्वाभाविक भी है किंतु, इनके साथ द्वेष तथा कटुता के भाव न हों वरन् प्रेम एक दूसरे को आदर देने की भावनाएँ हों-जिससे विचार का, बातचीत का, हृदयों की एकता का रास्ता खुला रहे और मनुष्य अपने मनोमालिन्य को दूर कर सके । प्रसन्नता के लिए परस्पर बुनियादी प्रेम, आदर, भावनाएँ होना आवश्यक है । स्नेह में भी आसक्ति होती है किंतु, निःस्वार्थ प्रेम और आदर अंतस्तल को शुद्ध कर उसे बल प्रदान करता है, समर्थ बनाता है ।

प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए उदार बनें । संकीर्णता व मनहूसियत से भरे हृदय में प्रसन्नता प्रकट नहीं होती । सबके लिए हृदय खोल कर रखें । हृदय खोल कर मिलें । मनहूस वही होता है जो दूसरों के प्रति संकीर्णता, घृणा के विरोधी भाव रखता है । व्यवहार

में, बातचीत में, रहन-सहन में उदारता बरती जाय । भगवान द्वारा तैयार की गयी इस पाठशाला में तरह-तरह के व्यंजन विनिर्मित हैं, उन्हें परोसने में हम कंजूसी क्यों बरतें । पूरी उदारता के साथ क्यों न जन-जन तक पहुँचायें, उन्हें तृप्त करें ।

मुसकान, प्रसन्नता, हँसी-खुशी, हमारी आँतरिक प्रसन्नता, सद्भावना,आत्मीयता का सिगनल-प्रतिबिंब हैं । दुश्मन के साथ मुस्कुरा कर बातचीत करने से दुश्मनी के भाव नष्ट हो जाते हैं, मुसकान के द्वारा दूषित भाव ग्रन्थियाँ सहज ही नष्ट हो जाती हैं । प्रसन्नता वह आँतरिक स्रोत-निर्झरिणी है, जिसके प्रवाहित होने से अपना ही नहीं पास-पड़ो के लोगों का जीवन हरा-भरा एवं सुगंधित खुशहाली से भर जाता है । यही है- आध्यात्मिक उन्नति का प्रथम सोपान ।


जगे वह समझदारी, जो जीवन को धन्य बना दे

मानवीय मस्तिष्क जीवन भर अनेकानेक प्रकार के ताने-बाने बुनता रहता है । शरीर भी कुछ न कुछ उठा पटक जैसी हलचलें करने घड़ी लगा रहता है । उसके सामने बाह्य जगत की समस्याएँ अड़ी-खड़ी रहती है और उन्हीं को सुलझाने में इच्छानुरूप हल निकालने में समूचा समय गुजर जाता है । इतने पर भी यह देखा जाता है कि मनोरथों में से कदाचित् यत्किंचित् ही किसी के हाथ कुछ लगता है । अधिकाँश तो खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ ही लौट जाते हैं । असंतोष विक्षोभ और उन्माद ही अपने-अपने रंग चढ़ाते और मजे चखाते रहते हैं । सुर दुर्लभ मनुष्य जीवन प्रायः भ्रमते-भ्रमाते गुजर जाता है और भगवान के दरबार में वापस लौटने पर अपराधी की तरह लज्जा से आंखें झुकाये पश्चाताप से जलते ही जा खड़ा होना होता है ।

बड़ी भूल यह होती रहती है कि संसार भर का ज्ञान समेटने के लिए लालायित व्यक्ति ज्ञानवान, विद्वान, होने का दावा तो करता है, पर जान इतना भी नहीं पाता कि वह स्वयं क्या है ? कौन है ? किस लिए आया है ? क्या करना है ? और कहाँ जाना है ? इस आत्म विस्मृति के कारण वह भुलावे में रहता , छलाव में उलझता, अभावों के लिए रुदन करता, किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करता है । यदि अपने स्वरूप और लक्ष्य की जानकारी रही होती तो जिंदगी को दाँव पर लगाकर इस प्रकार न हारना पड़ता, जिस प्रकार कि आम लोग हारे जुआरी की तरह सब कुछ गंवाकर भारी उद्विग्नता के बीच विकट दुर्भाग्य का अनुभव करते हैं । अपने को चतुर और समर्थ समझने वालों तक को जब ऐसी दुर्गति के बीच दिन गुजारने पड़ते हैं तब उन नर वानरों के संबंध में क्या कहा जाय जो पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सोच भी नहीं पाते , जिन्हें कोल्हू की तरह पिलते और पिलाते रहकर ही भाग्य समझ कर किसी प्रकार जीवित रहना पड़ता है । समझा जाना चाहिए की मनुष्य जीवन ईश्वर की विभूति-वैभव में सबसे ऊंचे दर्जे की अनुकंपा, संपदा है इस कलाकृति को उसने बड़े अरमानों के साथ सँजोया है । उसे सृष्टि का मुकुटमणि और अपना राजकुमार घोषित किया है । इसी के अनुरूप उसे ऐसा शरीर, ऐसा मानस और इतना वैभव प्रदान किया है कि वह उसके सहारे विश्व उद्यान को सँभालने, सँजोने का पूर्ण परमार्थ संचित करते रहने के अतिरिक्त उत्कृष्टता का परिचय देते हुए देव मानवों जैसा जीवन भी जी सके । उदात्त दृष्टिकोण अपना कर सर्वत्र स्वर्गीय भाव संवेदनाओं का रसास्वादन करता रहे। पर इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि वह पथ भूले बनजारे की तरह कँटीली झाड़ियों में उलझता, पग-पग पर ठोकरें खाता किसी प्रकार समय गुजारता है । भूल भुलैयों में जिसे उलझाना पड़ रहा है मृगतृष्णा में भटकते, थकते, खीजते ही दम तोड़ना पड़ता है ।कई तो और भी निकृष्ट दुष्टता पर उतरते देखे गये हैं । उन्हें मरघट के प्रेत पिशाचों की तरह जलने जलाने, डरने डराने वाली दुष्टता और भ्रष्टता को चरितार्थ करते देखा है। जिस प्रयोजन के लिए देव मानव स्तर का मनुष्य जीवन किसी महान सौभाग्य की तरह उपलब्ध हुआ था, उसकी ऐसी बरबादी होने पर अपार कष्ट ही सहना पड़ता है ।

खजाँची, उच्च अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र में बहुत कुछ सँजोए रहते हैं । पर वह सारा वैभव, नियुक्ति कर्ता द्वारा निर्धारित किये प्रयोजनों के लिए ही होता है । यदि उनमें से कोई हस्तगत वैभव को मनमर्जी से स्वार्थ प्रयोजनों के लिए खर्च करने लगे तो समझना चाहिए कि अब इसे भर्त्सना ही नहीं प्रताड़ना भी सहनी पड़ेगी । पदच्युत होकर अप्रामाणिक लोगों की तरह तिरस्कृत होते हुए ही भटकना पड़ेगा । इतनी छोटी बात भी जो अपने संबंध में न सोच सके और दुनिया भर की जानकारी बटोरने का घमंड करते हुए बुद्धिमान होने का अहंकार जताता रहे तो उसे मूढ़ मति के अतिरिक्त और क्या कहा जाएगा ?

जन्मा कुछ दिन खेला कूदा, किशोरावस्था आने पर कल्पना की रंगीली उड़ानें उड़ना, युवा होते होते विवाह बंधनों में बँधा जो बोझ लादा है उसे वहन करते रहने के लिए दिन रात कमाने के लिए खटते रहना, बढ़ाये हुए परिवार की बढ़ती समस्याओं को जिस तिस प्रकार किसी हद तक सुलझाना,ढलती आयु के साथ अशक्तता और रुग्णता का चढ़ दौड़ना समर्थ संतानों द्वारा समस्त वैभव पर कब्जा जमा लेना-स्वयं को असहाय, अपमानित स्थिति में दिन गुजारने के लिए बाधित होना और रोते कलपते मौत द्वारा दबोच लिया जाना, आम लोगों की नियति ? इस बीच सुखद संभावनाओं की आशा तो जब तब बँधती रहती है, पर उसकी झलक-झाँकी तो क्षण भर के लिए सामने प्रकट हस्तगत होने से पहले ही तिरोहित हो जाती है जिंदगी का बोझ तो किसी प्रकार बहन कर लिया जाता है । पर उसके साथ अपने को, विशाल विश्व को और भारी अरमानों के साथ निहाल करने वाले स्रष्टा को क्या मिला ? इस प्रकार विचार करने पर एक ही उत्तर प्रतिध्वनित होता है कि जो सुयोग-सौभाग्य उपलब्ध हुआ था वह जलने भूनने पर उठने वाले काले धूएँ की तरह कुछ बना तो सही पर अदृश्य अंतरिक्ष में एक विस्मृत तथ्य बन कर न जाने कहाँ तिरोहित हो गया ?

इस संसार में मात्र इतनी साधन सामग्री है कि सभी लोग मिल बाँट कर खा सकें और समता एवं एकता अनुभव करते हुए हँसते-हँसाते जी सकें । पर जिन्हें बड़प्पन बटोरने की हविस चढ़ी है, जो इन्द्र से कम शक्तिवान और कुबेर से कम संपन्न नहीं रहना चाहते, उन अतिवादियों के लिए मात्र एक ही काम शेष रहता है- अनाचार के अवलंबन का । दीवार ॐ ची उठानी हो तो कहीं न कहीं से मिट्टी खोदनी पड़ेगी, गड्ढा बनेगा ।अनेकों को अभाव के गर्त में धकेले बिना कोई सुसंपन्न नहीं बन सकता । महत्वाकाँक्षी तो सर्व साधारण की तुलना में बहुत बढ़ा चढ़ा रहना चाहता ही है । इस तृष्णा की सुरसा की तृप्ति तो कोई नहीं कर पाया, पर इस विभ्रम में अपना और दूसरों का अहित इतना अधिक कर लेता है कि उस असीम ललक-लिप्सा को मात्र धिक्कारा ही जा सकता है । भले ही कुछ चाटुकार-चापलूस उस अनर्थ संचय को सौभाग्य और पराक्रम कह कर बखानते रहे ।

यही है वह समूचा भ्रम -जंजाल जिसमें उलझ कर जीवन संपदा को फुलझड़ी जलाने जैसा कौतुक कुतूहल मात्र बनकर रह जाना पड़ता है । नशेबाजी जैसी अर्ध विक्षिप्तता जब तक सिर पर चढ़ी रहती है तब तक तो कुछ पता नहीं चलता है कि अपने ही हाथों अपने ऊपर कितना अनर्थ लादा जा रहा है । पर जब आँख खुलती है तब बहुत देर हो चुकी होती है, न पीछे लौटना बन पड़ता है और न सुधार करके नए सिरे से गिनती गिनते ही बन पड़ता है ।

मनुष्य जीवन की संपदा निरर्थक विडंबनाओं में गँवा देने पर भावी संभावनाएँ घोर संकट से भरी पूरी ही सामने आ खड़ी होती हैं ।चौरासी लाख योनियों में फिर से कष्ट साध्य परिभ्रमण पापों के दंडों से भरी पूरी लंबे समय तक को नारकीय यातना, सताये-बहकाये गये लोगों की अभिशाप भरी हाय, अपयश की लंबे समय तक चलने वाली भर्त्सना बस इतना भर शेष रह जाता है । जीवन की पूर्णाहुति हो जाने पर पीछे के लिए क्या बुद्धिमानी, पुरुषार्थ-परायणता, और सफलता इसी समूचे जाल जंजाल को कहते हैं, जिस पर मूर्खों को लज्जित होने तक आवश्यक प्रतीत नहीं होता और मरते-मरते भी मुँह मरोड़ते और शेखी बघारते हैं ।

अच्छा होता यदि सघन अंधकार में भटकती हुई जीवनचर्या को कहीं से प्रकाश की एक किरण हस्तगत होने का सुयोग बनता और भ्राँतियों की भयानकता से उबरने का सुयोग प्राप्त हो पाता । अपने संबंध में विचार करने और जो बचा है, उसका सही सदुपयोग करके कुछ तो बना लेने का परामर्श प्राप्त होता । पर वह भी कहाँ बन पाता है । कदाचित कहीं से उपयोगी सुझाव उभरता है तो उसे अनसुना कर दिया जाता है । प्रकाश की ओर से मुँह मोड़ लिया जाता है । इस दयनीय दुर्मति और उसके साथ जुड़ी हुई दुर्गति का आकलन करने वाला विवेक “हा हन्त” कहकर , पेट में घूँसा मारकर, मुँह को हाथ में छिपाकर किसी कोने में जा बैठता है । जहाँ लाभ को हानि और हानि को लाभ समझने की सनक ठंडे उन्माद की तरह सिर पर सवार हो रही हो । वहाँ कोई करे भी क्या ? कहे भी क्या ?

इस भौंड़े संसार में ऊपर से नीचे गिरने का ही प्रचलन दिखाई पड़ता है । हर वस्तु ऊपर से नीचे गिरती है । आकाश में विचरने वाली उल्काएं यदा-सदा जमीन पर आ गिरती हैं । ऊंचाई में उड़ने वाले बादल तक गुरुत्वाकर्षण से खिंचकर जमीन पर आ गिरते और धूल चाटते देखे जाते हैं । आदम-हौवा तक ऊपर से नीचे कूद पड़े थे । हिमालय के बर्फ पिघल कर गहरे गड्ढों वाली नदी बनकर ढलान की दिशा में बहने लगती है , और अंत में उस खारे समुद्र में जा मिलती है, जिसका पानी पशु-पक्षी तक नहीं पीते । यही है इस संसार का पतनोन्मुख प्रचलन, जिसका अनुसरण करके लोग अधोगामी चिंतन और प्रयास अपना तो लेते हैं । ऐसे ही लोग बड़ी संख्या में पाये और अपने इर्द-गिर्द मक्खी, मच्छरों की तरह विद्यमान दिखाई पड़ते हैं । इन बहुसंख्यकों का अनुसरण करके भला कोई अपना क्या हित साधना कर सकता है ? उनके परामर्श भी ऐसे ही अधोगामी होते हैं । तथाकथित स्वजन संबंधी भी ऐसे ही सुझाव देते और आग्रह करते देखे जाते हैं । इनका बुलावा अपने जैसी काक मंडली में आ बैठने के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता । अपने संचित कुसंस्कार भी उसी कीचड़ में लौट चलने के लिए प्रेरित करते हैं , जिनमें मुद्दतों रहना पड़ा । दूसरे अधिकांश लोग भी अंधी भेड़ों की तरह उसी दिशा में बढ़ते चले जा रहे है ।

सोचा अपने स्वयं के बारे में भी जाना चाहिए । ज्ञान, अपने भूत, वर्तमान, और भविष्य के संबंध में से भी उपलब्ध करना चाहिए । देखना मात्र अधोगामियों को ही नहीं चाहिए वरन् नजर उठा कर उस ओर भी निहारना चाहिए, जिस दिशा धारा को महामानवों ने अपनाया और उत्कृष्ट आदर्शवादिता पर चलते हुए पीछे वालों के लिए ऐसा मार्ग छोड़ना है । जिसका अनुकरण करने पर अपने को और साथी सहचरों को धन्य बनाया जा सके तो पहुँचा इस निष्कर्ष पर जाना चाहिए कि पतन से विमुख होकर उत्थान का मार्ग अपनाना ही श्रेयस्कर है । नाविक अपने को, अपनी नाव को, उसमें बैठे यात्रियों को खेकर इस पार से उस पार पहुँचाता है । क्या उस स्तर का मनोरथ अपने भीतर नहीं उठ सकता है ? क्या नर पामरों जैसी दुर्गंध भरी जिंदगी जीने के अपेक्षा ऊपरी लोक में रहने वाले देवताओं की स्थिति में जा पहुँचने के लिए अपने को उल्लसित तरंगित नहीं किया जा सकता ? क्या इस स्तर की साहसिकता और दूरदर्शिता अपना सकना अपने लिए संभव नहीं हो सकता ? यह सब भी अपने ही हाथ की बात है, जिसे अपने भाग्य का निर्माता माना गया है, वह उत्थान-पतन में से किसी को भी चुन सकता है । स्वर्ग या नरक में से किसी भी दिशा में चल पड़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है । दूसरों का न सही अपना भविष्य निर्माण करने के संबंध में कोई भी बात अपनाना और किसी भी राह पर चल पड़ना पूरी तरह अपनी आकाँक्षा और निर्धारण पर अवलंबित है ।

जो बीत गया वह यदि अनुपयुक्त रहा हो तो भी इतनी गुँजाइश अभी भी है कि शेष सदुपयोग करके बन पड़े अनर्थ का परिमार्जन किया जा सके । सूर, तुलसी, अम्बपाली, अंगुलीमाल, अजामिल, अशोक आदि आरंभ से ही वैसे न थे, जैसा कि विवेक का उदय होने पर पीछे हो गये । नये सिरे से अपनायी गयी श्रेष्ठता इतनी समर्थ होती है कि उसके दबाव से पिछले दिनों बरती गई अवाँछनीयता को दबाया-दबोचा जा सके । जो खाई पिछले दिनों खोदी गयी थी, उसे भरने का प्रयत्न नये सिरे से चल पड़े तो ऐसा समतल क्षेत्र विनिर्मित हो सकता है, जिस पर कुछ भी उगाया या खड़ा किया जा सके ।

उर्ध्वगमन का निश्चय बन पड़ने पर देवता लंबे हाथ पसारते और डूबते को उबारने में कोई कुछ भी कोर कसर नहीं रखते । ऊर्ध्वगामियों को भगवान ने सदा साहस दिया है और असमर्थता को असमंजस को समाप्त करने में पूरा-पूरा सहयोग दिया है । दिव्य जीवन जीने के लिए संकल्प, उभारने, साहस करने और ॐ ची छलाँग लगाने के लिए उद्धत समर्पित लोगों में से किसी को भी मझधार में डूबना नहीं पड़ा है । देवताओं के उदाहरण इस तथ्य की साक्षी देने के लिए अभी भी इतिहास के पृष्ठो पर यत्र-तत्र विद्यमान हैं । ईसा, बुद्ध, गाँधी, विवेकानन्द, दयानन्द, आदि की आरंभिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि इनसे कोई बड़ी आशा की जाती । पर जब वे उत्कृष्टता अपनाने के लिए तरंगित हो उठे तो दिव्य सत्ता ने उनकी भरपूर सहायता की । कठिनाइयों को सरल बनाया, आवश्यक सुविधा साधनों को जुटाया और उससे कहीं अधिक आगे पहुँचाया जहाँ तक उनने पहुँचने की अभिलाषा रक्खी और योजना बनायी । भगीरथ का गंगावतरण संकल्प आरंभ में असंभव जैसा लगता था, पर दैवी सत्ता ने उसे सर्वथा संभव करके दिखा दिया , साथ ही उस प्रवाह को भागीरथी नाम दिये जाने पर यह भी प्रसिद्ध कर दिया कि भगीरथ जनक और भागीरथी उनकी पुत्री भर थी । इस उपलब्धि की कदाचित् आरंभ में भगीरथ ने कल्पना तक न की होगी । पर उच्च, आदर्शों के लिए समर्पित होने पर दधीचि, हरिश्चन्द्र जैसे कितने ही बड़भागी बन चुके हैं । हनुमान, अर्जुन ने जो श्रेय प्राप्त किया उसकी पृष्ठभूमि तभी बनी जब उनने अपने आप को उत्कृष्टता के चरणों में समर्पित कर दिया । ऋषियों-तपस्वियों की ऋद्धि-सिद्धियों के पीछे यही तथ्य काम करते और चमत्कार दिखाते पाये जाते हैं ।

इन दिनों एक अद्भुत सुयोग-संयोग है,ईश्वर इस संसार की वर्तमान परिस्थितियों के कायाकल्प करना चाहता है। युग परिवर्तन की सुनिश्चित योजना उसने बना ली है । इक्कीसवीं सदी में उस नियोजन का अधिकाँश भाग पूरा हो चुका होगा । यही समय है जब भगवान के सहचर हो कर उसका हाथ बँटा सकते हैं और वह श्रेय पा सकते हैं जो कभी केवट, शबरी, गीध, गिलहरी ने भौतिक दृष्टि से असमर्थ होते हुए भी अपनी भावनाओं को क्रिया रूप में परिणित करके पाया था । उनमें से कोई घाटे में नहीं रहा । सुग्रीव और विभीषण भगवान के सहयोगी बनकर घाटे में नहीं रहे । सुदामा को अपनी बगल में दबी हुई चावल की पोटली तो सौंपनी पड़ी पर बदले में उसने फूस छप्पर वाली झोपड़ी को द्वारिका के रूप में परिवर्तित और सुसज्जित पाया । कल-परसों गुजरात बीरपुर के जलाराम बाबा अक्षय अन्न भंडार की झोली पा चुके हैं । उनने अपना समूचा साधन और वैभव भगवत् प्रयोजन के लिए समर्पित जो किया था ।

यशोधरा के पुत्र राहुल और अशोक की पुत्री संघमित्रा ने तथागत के संकेतों पर अपने को निछावर करके वह श्रेय पाया, जिसे कदाचित वे सामान्य जनों जैसा संकीर्ण स्वार्थ-परक का जीवन जीते हुए किसी प्रकार पा नहीं सकते थे । बुद्ध और गाँधी की सफलताओं के पीछे भी यही तथ्य काम करते हुए देखा जा सकता है । ईश्वरीय शक्ति तथा अनुकंपा को मनुष्य मात्र ने उपलब्ध किया है । अर्जुन का रथ हाँकने वाला अभी भी इस खोजबीन में है कि कोई ऐसा और मिले जिसका सारथी बनने में उसे सुयोग मिल सके । अपने जीवन को धन्य बनाने का ठीक यही मुहूर्त्त है । इसे न चूका जाय तो ही मनुष्य की समझदारी मानी जाएगी ।


माफी खुदा से - खुदा के बन्दों से

ऊंट चले जा रहे थे उस अंधड़ के बीच में । ऊपर से सूर्य आग बरसा रहा था । नीचे की रेत में शायद चने भी भुन जायं ।अंधड़ ने कहर बरसा रहा था । एक-एक आदमी के सिर और कपड़ों पर सेरों रेत जम गयी थी। कहीं पानी का नाम भी नहीं था और न कहीं किसी खजूर का कोई ऊंचा सिर दिखाई पड़ रहा था । जमाल को यह सब नहीं सूझ रहा था । उसके भीतर इससे भी ज्यादा गर्मी थी । इससे कहीं अधिक भयानक अंधड़ चल रहा था उसके हृदय में । वह उसी में झुलसा जा रहा था कि उसका ऊंट कहाँ जा रहा है । वैसे काफिले के दूसरे ऊंटों के साथ उसका ऊंट भी ठीक मार्ग पर चल रहा था । मार्ग की कल्पना ही थी, रेत के साठ से सौ, दो सौ फीट ॐ चें टीलों के मध्य में कोई मार्ग नहीं था ।

ऊँटों की छाया छोटी से लंबी होने लगी । सूर्य पश्चिम में लुढ़कने लगा । अंधड़ घट रहा था । धीरे-धीरे शाम हुई । उस धूल भरे आकाश में डूबते सूर्य ने आग लगा दी । जैसे अपने चारों ओर इस आग को देखकर ही सरदार ने काफिले को एक चौरस ऊंचे स्थान पर रोकने का आदेश दिया ।

‘अरे जमाल, तुम क्या उतरोगे नहीं ? ‘ किसी ने उसके ऊँट की नकेल पकड़ ली । दूसरे ऊँटों के साथ वह भी खड़ा हो गया और सोचता होगा कि उसका सवार क्यों उसे छुटकारा नहीं दे रहा है । वह जैसे जाग पड़ा हो । उतर आया ऊँट से । एक ओर उसी जलती रेत में लुढ़क गया ।

आज पाँच दिन हो गये काफिले को चले । नखलिस्तान में सूखते ही डेरा-डंडा उठ गया था और अभी तक दूसरे नखलिस्तान का पता तक नहीं था । हम रास्ता तो नहीं भूल गये हैं ? इतना भयंकर था यह प्रश्न कि कोई मुख पर इसे लाने तक की हिम्मत नहीं कर सकता था । फिर भी सबके नेत्रों में यही प्रश्न था । “या अल्लाह ऐसा न हो ।” सब के हृदय एक स्वर से चिल्ला रहे थे । एक-एक बूँद पानी के लिए तड़प-तड़प कर मरना और अपने चाकू या दांतों से अपनी ही नसों को काटकर रक्त पीना । क्या अर्थ है इसके अतिरिक्त मार्ग भूल जाने का ।

दिन भर से एक बूँद जल कंठ के नीचे नहीं गया था । केवल शिशुओं को घंटे दो घंटे चिल्लाने पर एक चम्मच पानी मिलता था । कंठ सूख गए थे । सिर घूम रहा था और लगता था कि कलेजा निकल आवेगा । आँखों के आगे अंधकार छा रहा था और जलते हुए नेत्र बाहर निकल पड़ते थे ।

मशकों का पानी परसों खत्म हो गया । किसी के भी चमड़े के थैले में एक बूँद पानी न रहा था । छोटे बच्चों के लिए रखा पानी भी तीसरे प्रहर पूरा हो गया । कल एक ऊंट हलाल हो चुका है । इस प्रकार ये पन्द्रह-बीस ऊँट कितने दिन चलेंगे ।

आज कौन अपना ऊंट देगा काफिले के लिए ? सरदार ने पूछा । वाणी उसकी भी अटक रही थी । जीभ सूख गयी थी ।

“बारी तो हमीद की है ।” कहने वाले ने हमीद की ओर इस तरह देखा जैसे खा जाएगा ।

“वह तो है ही ।” सरदार ने विपश्चित् उत्तर दिया-पर एक से क्या होता है ? सब बहुत प्यासे हैं और कल दिन के लिए बच्चों को भी पानी रखना होगा ।

“मेरा ऊंट ले लो ।” बड़े आश्चर्य आदर एवं चौंककर लोगों ने जमाल को देखा । भला अपना जीवन इतनी उदारता से कौन दूसरों को दे सकता है । इस भयंकर रेगिस्तान में ऊंट ही तो जीवन है ।

“खुदा ने चाहा तो कल हम नखलिस्तान पहुँच जायेंगे ।” कृतज्ञता पूर्वक सरदार ने कहा-” तुम मेरे ऊंट पर मेरे साथ चलो और वहाँ पहुँचते ही हम तुम्हारे लिए ऊंट का वह बच्चा देंगे जो काफिले में पहले उन्नत होगा। सरदार की ऊंटनी ही दो-चार दिन में बच्चे देने वाली है ।” काफिले वालों को यह पता था ही और इस समय तो पानी का सवाल था । सस्ते महँगे सौदे का समय नहीं रहा था ।

“मुझे कोई बदला नहीं चाहिए ।” जमाल ज्यों का त्यों पड़ा था-”अगर यकीन न हो कि अगले नखलिस्तान में हजरत इमाम से मिल सकूँगा और वह मुझे खुदा से माफी दिला देंगे तो में इस रेत से उठना भी पसंद नहीं करूंगा ।”

कृतज्ञता प्रकाश के लिए समय नहीं था । हमीद का ऊंट भी ले लिया गया और इसमें उससे पूछने की कोई बात नहीं थी । वह तो नखलिस्तान से चलते वक्त तय हुए क्रम में आता था । हमीद मन मसोस कर रह गया । रस्सी से जकड़ कर दोनों ऊंट गिरा दिये गये । निरीह पशु बलबला कर ही रह गये । तेज छुरा उनके पेट में घुसा दिया गया । जरूर ही ऐसा करते समय मौलवी ने कलमा पढ़ने की तकलीफ की ।

ऊपर की खाल उतार कर दाहिनी कोख में से पानी की अंतड़ी सावधानी पूर्वक बाहर निकाली गयी । यह आँत भारतीय ऊंटों में नहीं होती । रेगिस्तानी ऊंट को जब पानी नहीं मिलता तो इस आँत से पानी निकाल लेता है और इस प्रकार सात दिन तक वह अपनी पानी की आवश्यकता पूरी कर सकता है । दोनों ऊंटों की आँतो में छोटे छिद्र करके सब पानी मशकों में भर लिया गया ।

“पहिले जमाल को ।” सरदार ने डांटा । लोग अपने-अपने चमड़े के थैले लेकर टूट पड़े थे और कोई किसी से पीछे लेने के लिए नहीं तैयार था । वैसे सबको बराबर पानी बटेगा, यह सब जानते थे । जमाल रेत पर पड़ा था और पानी में भाग बँटाने की उसने कोई चेष्टा नहीं की थी । अंततः एक अरब युवक उसके पास गया और उसका थैला पानी से भर कर उसके पास रख गया ।

“कल तक” बस कल शाम तक ही जमाल बड़बड़ा रहा था- ”मेरे परवरदिगार ! अगर कल शाम तक कोई रास्ता न मिला मुझे तुझसे माफी पाने का तो मैं तेरे दिये पानी और कबाब को नहीं कबूल करूंगा । कल न सही परसों का आफताब मुझे जरूर जला देगा और तब मैं खुद तेरे कदमों में अपने कसूर की माफी माँगने हाजिर हो सकूँगा ।” कुल तीन-चार घूँट पानी उसने गले से नीचे उतारा ।

लंबा छरहरा बदन, बड़ी-बड़ी आँखें, कश्मीरी सेब जैसा रंग । वह जितना सुन्दर था, उतना ही चंचल भी । सफेद तर्रेदार पगड़ी में अपने घुँघराले बाल छिपाए ढीला पजामा और चोगा पहने दोपहरी में भी कैम्प में इधर से उधर उछलता रहता था । उसके उन्मुक्त हास्य से तंबू गूँजता ही रहता था ।

उसका बाप पिछले साल मरा है और माँ उसे बचपन में ही छोड़ गयी थी । अरब का लड़का रोता नहीं । नटखट जमाल कभी मनहूस सूरत में नहीं देखा गया । वह जैसे बचपन में किसी सोते हुए की नाक या खुले मुख में रेत की मुट्ठी डाल दिया करता था, वैसे ही अब भी बुड्ढों की लंबी दाढ़ियों में अवसर पाकर खजूर के बीज फँसाने से नहीं चूकता ।

बहुधा डाँटा जाता था । बूढ़े बिगड़ पड़ते थे उस पर, जब वह उनकी कोई वस्तु छिपा देता था । बड़े साफ दिल का था । सभी मन में उसकी इज्जत करते थे ।बड़ा भावुक मन था उसका । रोजा उसने कभी नहीं छोड़ा और सुबह , शाम तथा दोपहर की तीन नमाज तो बराबर पढ़ ही लेता है । अपने तंबू में वही अकेला है जो नमाज पढ़ते वक्त अक्सर रो पड़ता है पता नहीं उस हँसी के पुतले में उस वक्त कहाँ से दुख उमड़ पड़ता था । यों वह मजाक करने में खुदा को भी नहीं छोड़ता । अक्सर कहता है-”मुझे अगर खुदा मिल जाय तो उसकी खूब घनी, उजली, लंबी दाढ़ी में ढेर से खजूर के बीज उलझा दूँ । इतने बीज कि फरिश्ते दिन भर में भी न निकाल सकें ।”

जमाल को अधिक आकर्षित किया है बूढ़े अहमद ने । वह हाथ में छोटी सी खजूर के पत्ते की लकड़ी बनाकर कमर झुकाकर काँपता, मुँह चलाता और जल्दी से दोपहरी में तंबू में अहमद की नकल करता है तो कहकहों की बाढ़ आ जाती है । बुड्ढा गालियों की बौछार करके अभिनय को और भी रसमय बना देता है ।

“आज पानी से चलो कुछ मोटे-मोटे मेंढक पकड़ लायें ।” उसने प्रस्ताव किया गुलनार से । यह उससे भी नटखट लड़की है । जमाल की शरारतों, स्वाँगों और उछल-कूद में वह अक्सर शामिल हो जाया करती है । खूब मोटे-मोटे-पीले-पीले ।

“तू मेढ़क खाने लगा है, ऐं”! मुँह बिचकाया उस शैतान लड़की ने । मैं अभी जाकर अब्बा से कहती हूँ । सब कह दूँगी अरब होकर तू मेढ़क खाने लगा है । छिः ताली बजाकर वह हँसते-हँसते दुहरी हो गयी । लोट-पोट हो गयी । उसी प्रकार हँसते-हँसते भागने का उपक्रम किया उसने ।

“सुन भी तो ।” जमाल ने इधर-उधर देखा । कोई पास नहीं था । उसके षड्यंत्र का पता किसी को न चले, इसलिए धीरे-धीरे कान में कुछ फुस-फुसा गया उस लड़की के ।

“बहुत खूब खिलखिला उठी, वह कूद पड़ी । बुड्ढा भी क्या समझेगा “।

“चुप भी रह ।” शायद वह उत्साहातिरेक में भंडा-फोड़ कर देती । सावधान किया जमाल ने और दोनों नखलिस्तान की ओर चले गये ।

बुड्ढ़े को क्या पता था कि उसके साथ क्या शरारत की गयी है । वह अपनी पांचवीं नमाज पढ़ने आया । नमाज पर जा खड़ा हुआ । उसका मुसल्ला दिन भर बिछा रहता है और वही एक है जो पाँचों नमाज बदस्तूर पढ़ता है ।

जमाल थोड़ी दूर पर बैठा गम्भीर बना था और उसके पास ही गुलनार पीछे को मुख किये, मुख में कपड़ा डाले, इस प्रकार हिल रही मानों भूकंप आ गया है उसके पेट में । बुड्ढ़े का ध्यान इन शैतान दोनों की ओर नहीं था । दूसरे अपने-अपने बिस्तरों पर लेटे थे और कुछ लोग एकत्र होकर गप्पें लड़ा रहे थे ।

बुड्ढा घुटनों के बल बैठा । गुलनार और जोर से हिलने लगी-”तुझे जुड़ी तो नहीं आ गयी ?” जमाल ने चुटकी ली । वह तनिक हटकर बिना बोले हिती रही ।

बुड्ढ़े ने मत्था टेका और कूद पड़ा वहाँ से इस तरफ जैसे किसी साँप पर सिर पड़ गया हो । उसने गौर किया था पहले कि सिर रखने की जगह जाय-नमाज कुछ ऊंची उठी है -”या अल्लाह !” वह चीख पड़ा और हाँफ रहा था । कोई जानवर नीचे से जाये-नमाज को हिलाने लगा था ।

सब चौंक कर दौड़ आये । लड़के पेट पकड़कर लोट-पोट हो रहे थे । मुसल्ले का कपड़ा हटाते ही सब के सब हँसने लगे ।पाँच मेढ़क खूब मोटे, पीले, रेत में गढ्ढा करके एक लाइन से विराज रहे थे । उनके पैर आपस में बँधे थे और इसलिए कूदने की कोशिश-करके भी वह कूद नहीं पा रहे थे ।

“नमाज के वक्त ही मजाक !” बुड्ढा गुस्से से चीख रहा था और काँप भी रहा था -”खुदा का भी कसूर करने से नहीं डरते तुम ?”

“खुदा का कसूर !” जैसे कलेजे में लगे ये शब्द । हँसी काफूर हो गयी । चेहरा स्याह पड़ गया । धक से हो गया जमाल उसने फिर नहीं देखा कि लोग हँस रहे हैं । गुलनार लोट-पोट हो रही है और बुड्ढा अहमद एक स्वर में गालियाँ बके जा रहा है, दोनों हाथ से सिर पकड़ लिया उसने ।

चहचहाता कैम्प मनहूसी का डेरा हो गया था । नखलिस्तान तो क्या सूखा, सबको एक आफत से छुटकारा मिला । दूसरी जगह जमाल की तबियत में फर्क आने की उम्मीद ने किसी को रास्ते की दिक्कते सोचने नहीं दी। जो दिन भर सबको हँसाता रहता था, उसका अचानक अपने आप में घुलते रहना और उसी से लेना सबको तकलीफ देह था । उसकी उदासी ने तो शैतान की खाला गुलनार जैसी लड़की को भी गुमसुम बना दिया था ।

किसी का समझाना मनाना काम नहीं आया । बुड्ढ़े अहमद ने आँखों में आँसू भर कर उसे पुचकारा । उसका एक उत्तर है-”खुदा के कसूर को तो खुदा ही माफ कर सकता है ।” गुलनार के स्नेह भरे हाथ को उदासी से उसने हटा दिया और उसका खेलने, घूमने, टहलने का भाव भरा आग्रह भी उपेक्षित हो गया ।

मार्ग की तकलीफें भूल गयीं सबको जब उन्हें एक खूब बड़ा, ऊंचे-ऊँचे खजूर के फलों से लदे पेड़ों से घिरा दूर तक घास के मैदान से हरा-भरा नखलिस्तान मिला । सबसे बड़ी बात तो यह थी कि वहाँ उन्हें किसी फिरके से लड़ना नहीं पड़ा था । वैसे अपने भालों को उठाए, मरने मारने को तैयार होकर ही उन्होंने नखलिस्तान की भूमि में प्रवेश किया था । लड़ाई का न होना ही एक आश्चर्य का विषय था ।कुल एक छोटा तंबू था नखलिस्तान में । पागल सा फकीर उसमें रहता था । बुड्ढ़े ने कोई ऐतराज नहीं किया और उस बुड्ढ़े को जिसे सारा अरब श्रद्धा से सिर झुकाता है जिसे और कोई नहीं मात्र जमाल ही जानता था । खदेड़ने की आवश्यकता नहीं जान पड़ी । साहस भी नहीं था किसी में क्योंकि वे हजरत इमाम थे, पहुँचे हुए पैगम्बर-फकीर ।

तंबू खड़े हो गये एक गोलाई में । बीच में दोपहरी में आराम करने के लिए एक बड़ा तंबू लगा । सब दोपहरी में इसी में रहते । ऊंट चरने छोड़ दिये गये । भर पेट पानी पिया सबने और खूब खजूर खाये । मशकें और घड़े भरकर रख दिये गये ।

“जमाल ने अब तक न तो पानी पिया और न कुछ खाया ही है ।” सबसे पहले गुलनार को उसकी याद आयी। अभी तक सभी अपने खाने-पीने और तंबू लगाने में तथा सामान रखने में लगे थे-”वह चुपचाप रेत पर पड़ा है ।” सरदार की प्यारी लड़की ने अपने अब्बा का ध्यान आकर्षित किया और कुछ खजूर और चमड़े के थैले में पानी लेकर दौड़ गयी ।

थोड़े खजूर खा लो और पानी पी लो !” प्रायः सारा काफिला उसे घेर कर खड़ा हो गया था । सभी का एक ही हठ था । अँधेरा बढ़ता जा रहा है । हम लोग तुम्हारा तंबू खड़ा कर देते हैं और सामान भी ठीक कर देते हैं। इस तरह तो तुम दो दिन भी नहीं जी सकते ।

“मैं मर जाऊँ तो मुझे यहीं दफना देना ।”वह न तो रो रहा था और न गुस्से में ही जान पड़ता था । बड़ी नम्र वाणी थी उसकी “मेरे लिए पाक परवरदिगार से दुआ करना कि वह मुझे माफ कर दे ।” किसी की समझ में नहीं आता था कि इस जिद्दी लड़के को कैसे समझाया जाये ।

“कोई बुला लाओ हजरत इमाम को ।” रोते-रोते गुलनार ने अपनी आंखें सुर्ख कर लीं, मैं खुद जाती हूँ । ये उनकी बात जरूर मान लेंगे ।”

“वह तो पागल है ।” सरदार ने स्नेह से अपनी लड़की का हाथ पकड़ा, तुझे मार न बैठे । वह किसी की बात न तो सुनता है और न समझता है । सबने आते ही उस बुड्ढ़े को रंग-ढंग से खतरनाक पागल समझ लिया था। उनकी समझ में नहीं आता था कि क्यों सारे अरब में वह पहुँचा हुआ फकीर माना जाता है ।

“माफ किया मैंने तुझे !” पता नहीं कहाँ से वह पागल खुद ही दौड़ता हुआ भीड़ में घुस आया । जमाल के सिर पर हाथ रखकर उसने प्यार से कहा-”मेरे भोले बच्चे ! मैंने तुझे माफ कर दिया ।”

“माफ कर दिया ?” जमाल जैसे जी उठा । हृदय से एक भार उतर गया । फकीर के पैर चूमे, इससे पहले ही वह फकीर जैसे आया था, वैसे ही भीड़ हटाता भाग गया ।

“तू तो सीधे खुदा से माफी माँग रहा था न ?” गुलनार ने जब जमाल को हँसाकर पानी पिला लिया, खजूर खिला चुकी तब छेड़ा, हँस रही थी वह ।

“मुझे खुदा ने ही माफ किया है ।” जमाल गम्भीर बन गया-”हजरत इमाम पहुँचे हुए फकीर हैं और खुदा में और उसके बन्दों में फर्क दूर हो चुका होता है ।”


ब्रह्मांड के कण -कण में है अनाहत-नाद

ध्वनि शक्ति के रूप में शब्द शक्ति को तेसर से भी अधिक सामर्थ्यवान एवं शक्तिपुंज माना गया है । इसी आधार पर विज्ञान ने खगोल जगत में ब्रह्मांडीय आदान-प्रदान की संभावना अभिव्यक्त की है, जबकि सूक्ष्म जगत में चलने वाले घटना क्रमों की पूर्व जानकारी को अध्यात्म ने संभव बनाया है ।

अध्यात्मवेत्ताओं ने वाणी के चार रूपों का वर्णन किया है-परा, पश्यंति, मध्यमा और वैखरी । वैखरी वाणी स्थूल है जो मुंह से जिह्वा द्वारा शब्दोच्चारण के रूप में बोली जाती है । जीभ की वाणी को कान सुनते हैं । परिष्कृत मन की वाणी ‘मध्यमा’ कहलाती है । मन मध्यमा वाणी में बोलता है और इसे नेत्र सुनते हैं । हृदय की वाणी ‘पश्यंति’ कहलाती है । हृदय की वाणी हृदय ही सुनता है । आत्मा की वाणी ‘परावाणी’ कहलाती है। आत्मा के अंतरंग क्षेत्र से जो अनहद ध्वनि उत्पन्न होती है, उस संदेश को दूसरी आत्मायें सुनती हैं । यह संतों की, ऋषियों की, सिद्ध महापुरुषों की, देवताओं की वाणी है, जो सीधे मनुष्य के अंतःकरण में प्रविष्ट हो जाती है । यह सब ध्वनियों के ही प्रकार है जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होती गयी हैं ।

स्थूल वाणी के रूप में प्रयुक्त वैखरी को छोड़ कर यदि हम शेष तीन सूक्ष्म वाणियों पर गंभीरतापूर्वक विचार करें, तो पायेंगे कि इन्द्रियातीत अनाहत, शब्द ब्रह्म-नादब्रह्म के रूप में शब्द शक्ति को महिमा को शास्त्रकारों ने बड़ी गंभीरता से प्रस्तुत किया है । अब जबकि विज्ञान ने पराध्वनि के रूप में अश्रव्य ध्वनियों को ढूँढ़ निकाला है, तो ऋषियों को वह प्रतिपादन सत्य प्रतीत होने लगा है जिसमें कहा गया हे कि इस सृष्टि की उत्पत्ति ही ‘शब्द शक्ति ‘ से हुई है । विज्ञान ने भी अब इस तथ्य को स्वीकार लिया है कि हम ध्वनि तरंगों के लहराते अनंत सागर में रह रहे हैं । हम जो कुछ भी बोलते हैं उसका विनाश नहीं होता, वरन् वह सूक्ष्म ध्वनि तरंग के रूप में हमारे चारों ओर उमड़ते घूमड़ते रहते हैं और अनंत काल तक अस्तित्व में बने रहते हैं । इस संसार में शब्द के रूप में अब तक जितने विचार प्रकट किये गये हैं, वह सभी सूक्ष्म तरंगों के रूप में अब भी अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं । गंभीर चिंतन की स्थिति में यदा-कदा यही सूक्ष्म तरंगें हमारे मस्तिष्क की पकड़ में आकर अकस्मात् नये विचार दे जाती हैं । पर इसके लिए मस्तिष्कीय तरंगों की फ्रीक्वेंसी ब्रह्मांडव्यापी सूक्ष्म तरंगों से ट्यूण्ड होनी चाहिए । मूर्द्धन्य मनीषी लायल वाटसन ने इस संदर्भ में उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपनी प्रसिद्ध कृति ‘सुपरनेवर’ में कहा है कि गहन चिंतन की स्थिति और कठिन गणितीय प्रश्नों के हल के समय में भी आइन्स्टीन के मस्तिष्क से सदा ‘अल्फा तरंगें’ ही निकला करती थीं और ऐसे समय अचानक ही उनके मस्तिष्क में प्रश्नों के हल कौंध जाया करते थे । सापेक्षवाद का प्रसिद्ध सिद्धान्त भी ऐसे ही एक अवसर की देन बताया जाता है ।

ज्ञातव्य है कि अलग-अलग स्थितियों में मानवी मस्तिष्क से अल्फा, बीटा, थीटा, डेल्टा नामक विभिन्न प्रकार की मस्तिष्कीय तरंगें-(ब्रेन-वेव्स) निकलती हैं । ध्यान की गहनतम अवस्था में प्रायः अल्फा तरंगें ही निस्सृत होती हैं । ऐसी स्थिति में सूक्ष्म संसार से साधक जब अपना संपर्क सूत्र स्थापित कर विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ हस्तगत करता है तब भी मस्तिष्कीय तरंगें अल्फा ही होती हैं । ऋषियों ने ध्यान की ऐसी ही गहन स्थिति में वेदों को उपलब्ध किया था, इसलिए उन्हें ‘श्रुति’ भी कहा गया है । ‘श्रुति’ अर्थात् सुना हुआ । शब्द शक्ति की यह अत्यंत सूक्ष्म तरंगें होती हैं जो स्थूल कर्णेन्द्रियों की पकड़ से परे हैं । तंत्र और मंत्र शास्त्र में इसी शक्ति का उपयोग कर अनेकानेक विलक्षण कार्य संपन्न किये जाते हैं । मंत्रों के माध्यम से विषैले जीवों के जहर को निर्विष किया जाता है, जबकि तंत्र-शास्त्र में और भी अद्भुत कार्य संपन्न किये जाते हैं ।प्राचीन काल में जिन दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होता था, उनमें शब्द-शक्ति की ऊर्जा से चालित उपकरणों के प्रयोगों का उल्लेख मिलता है जिससे ज्ञात होता है कि यह कितनी सूक्ष्म और सामर्थ्यवान शक्ति है । इस सूक्ष्म शक्ति से निकटस्थ अथवा दूरस्थ किसी भी व्यक्ति को प्रभावित किया जा सकता है ।

आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों ने भी अब इस तथ्य को प्रमाणित कर दिखाया है कि सूक्ष्म ध्वनि तरंगों को पृथ्वी अथवा अंतरिक्ष के किसी भी हिस्से तक अपने मूल रूप में प्रसारित-संचारित किया जा सकता है । रेडियो स्टेशनों से प्रसारणों को जब ‘सुपरइम्पोजिशन आफ साउण्ड वेव’ के सिद्धाँत पर तीव्र बना दिया जाता है, तो क्षण मात्र में वे तरंगें समस्त भू मण्डल में फैल जाती हैं । अंतरिक्ष में गतिमान भू-उपग्रहों की गतिविधियों की जानकारी पृथ्वी स्थित प्रेक्षक इसी आधार पर लेते और चालक दल से बातचीत करते हैं । इसी आधार पर अंतर्ग्रही सभ्यताओं-लोकोत्तर-वासियों की ढूँढ़ खोज चल रही है और उनके संकेतों को ग्रहण करने और उनके लिए संकेत प्रेषित करने के प्रयत्न किये जा रहे हैं । सन् 1380 में कलिकोवो युद्ध के समय रूस के युवराज दमित्री दान्स्काय ने शत्रुओं की टोह ऐसी ही सूक्ष्म तरंगों के माध्यम से ली थी ।

मनुष्य की कर्णेन्द्रियाँ 20 से लेकर 20000 हर्टज् आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को सुन सकती हैं । इससे ऊपर अथवा कम आवृत्ति वाली अश्रव्य ध्वनियों को “पराध्वनि” कहते हैं । सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी बी. कुद्रयावत्सेव का कहना है कि अब जब कि पराध्वनियों के रिसीवर बना लिये गये और उनसे श्रव्य ध्वनियों को सुना तो यह ज्ञात हुआ कि श्रव्य ध्वनियों के साथ-साथ आवाज में अश्रव्य ध्वनियाँ भी मिली होती हैं । मंत्रों में अश्रव्य ध्वनियों के समावेश से उनमें विभिन्न प्रकार के प्रभाव परिणाम उत्पन्न करने की सामर्थ्य होती है । पराध्वनियाँ दो प्रकार की होती हैं-(1) निम्न आवृत्ति वाली-’इन्फ्रासोनिक’ एवं (2) उच्च आवृत्तियों वाली-’अल्ट्रासोनिक’ । कम आवृत्ति की होने के कारण इन्फ्रासोनिक ध्वनियाँ सभी दिशाओं में गति कर सकती हैं, साथ ही कम शक्ति की होने के कारण वे मनुष्य एवं अन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों के लिए लाभदायक भी हो सकती हैं । इस संबंध में फ्राँस के मूर्द्धन्य वैज्ञानिक वाल्दीमीर गैब्रियू ने अपने लंबे अध्ययन-अनुसंधान के पश्चात् बताया है कि 7 हर्ट्ज आवृत्ति वाली इन्फ्रासोनिक ध्वनि के संपर्क क्षेत्र में जब व्यक्तियों को नियमित रूप से कई दिनों तक कुछ समय के लिए बिठाया गया, तो पाया गया कि उनकी मानसिक क्षमता में असाधारण रूप से परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ । सभी के मस्तिष्क ‘अल्फा’ एवं ‘बीटा’ स्टेट में पाये गये जो ध्यान की उच्च अवस्थाओं में ही संभव हो पाया है ।

वस्तुतः हमसे कितनी ही ध्वनि तरंगें हर समय टकराती रहती हैं, पर इनमें से उन्हें ही हम सुन पाते हैं जो श्रवण सीमा के अंतर्गत आती हैं । श्रवणातीत अत्यंत सूक्ष्म अल्ट्रासोनिक ध्वनियाँ 10 लाख से एक हजार करोड़ तक की कंपन उत्पन्न करती हैं । परंतु इस विश्व ब्रह्मांड में संव्याप्त अनाहत नाद से इससे भी सूक्ष्म स्तर का होता है । अल्ट्रासोनिक ध्वनियों का संप्रेषण और ग्रहण तो ‘राडार’ जैसे यंत्र-उपकरणों के माध्यम से संभव है, पर सूक्ष्म नाद को जानने-समझने के लिए स्थूल इन्द्रियों का योग और तप द्वारा सूक्ष्मीकरण करना ही एक मात्र साधन है । अब विज्ञान ने पराध्वनियों को समझने के लिए कुछ विशेष प्रकार की ध्वनियाँ भी विकसित कर ली हैं । इन युक्तियों के प्रयोग से अब यह ज्ञात कर पाना संभव है कि पराध्वनि किस मार्ग से गुजर रही हैं । इस युक्ति से उनका फोटो लिया जाना भी रुक्त हुआ है ।

गर्मी के दिनों में जमीन के संपर्क में रहने वाली हवा प्रायः ऊपर उठती दिखाई पड़ती है । इन ऊर्ध्वारोहण करती धाराओं के दीखने का कारण यह है कि वायु गर्म होने के पर फैलती है, उसका घनत्व कम हो जाता है और उसके प्रकाशीय गुण जैसे अपवर्तन गुणाँक बदल जाते हैं । ऐसे ही संपीड़ित वायु की उन धाराओं को भी देखा जा सकता है जिनका घनत्व आस-पास की वायु के घनत्व से अधिक हो । इसी तरह जब पराध्वनि तरंगों का संचरण होता है, तब वायु में संपीड़न विरलन एकान्तर क्रम से पैदा हो जाते हैं । वायु के ये परिवर्तन गर्मी के कारण होने वाली परिवर्तन के सदृश्य ही होते हैं । इस प्रकार ध्वनि तरंगों की छायाकृति भी उसी प्रकार प्राप्त की जा सकती है जिस प्रकार विभिन्न तापमान वाली जलधाराओं का प्रतिबिंब । पर्दे की जगह फोटोप्लेट रखकर पराध्वनि तरंगों का चित्र लिया जा सकता है । परंतु नाद योग की सूक्ष्मातिसूक्ष्म तरंगों को देखने-सुनने की सामर्थ्य अभी विज्ञान को नहीं मिल पायी है । इसे तो योग साधना द्वारा ही जाना समझा जा सकता है ।

अध्यात्म में नादयोग के रूप में पराध्वनियों का उपयोग आत्मिक विकास के लिए प्रयुक्त करने की व्यवस्था है, पर विज्ञान ने इनका उपयोग विभिन्न प्रकार के रोगोपचार और सुरक्षा उपाय जैसे अन्यान्य क्षेत्रों में कर लोगों की साधना सुविधाओं में अभिवृद्धि की है । इन तरंगों का वैज्ञानिकों ने उपयोग कर अब एक ऐसी सुरक्षा घंटी विकसित की है कि यदि इन तरंगों को रात के वक्त घर में फैला दिया जाय तो चोर अथवा अन्य किसी भी प्रकार की हलचल इनकी तीक्ष्ण आँखों की पकड़ से बच नहीं सकती और तुरंत घंटी बजा कर इस की सूचना मालिक को दे देती हैं । इसी तरह शल्यचिकित्सा, कीटाणु-नाश, ऋतु परिवर्तन, मोटे धातु खंडों का विलगन आदि क्षेत्रों में इसे विद्युत एवं अणु शक्ति के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है । इन कार्यों को देखते हुए इसकी विलक्षण सामर्थ्य का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है ।

दक्षिण गर्मी साधनाओं में शब्द शक्ति का उपयोग जहाँ आत्मोत्थान एवं जनकल्याण के लिए किया जाता है, वहीं वाममार्गी साधनाओं में इस पराशक्ति का दुरुपयोग प्रायः दूसरों को क्षति पहुँचाने में भी होता रहा है । विज्ञान-वेत्तओं ने भी ध्वनि तरंगों में सन्निहित इन क्षमताओं को अब ढूँढ़ निकाला है और पाया है कि मनुष्यों सहित प्राणियों एवं जड़ इमारतों पर इनका प्रभाव बुरा होता है । पिछले दिनों चैकोस्लोवाकिया के एक इंजीनियर प्रो. गावराड ने पराध्वनि उत्पादक एक ऐसा यंत्र विकसित किया जो प्रयोग के दौरान अपनी शक्ति शाली तरंगों के कारण प्राणघातक सिद्ध हुआ । जब उसकी तरंगें एक बैल पर डाली गयीं तो वह तड़प कर तुरंत वहीं मर गया । मृत्यु का करण जानने के लिए जब उसकी चीर-फाड़ की गयी तो देखा गया कि आँतरिक अवयव बिलकुल विकृत हो गये थे । डाक्टरों का कहना था कि ध्वनि तरंगों की मार इतनी तीव्र थी कि अंग अवयव अर्धतरल की स्थिति में आ गये और यही उसकी मृत्यु का करण बना । इसी तरह के प्रयोग-परीक्षण, मछलियों, मेढ़कों एवं कीड़े-मकोड़ों पर किये और पाया गया कि इन सभी पर पराध्वनियाँ प्राण घातक प्रभाव छोड़ती हैं । यह भी देखा गया है कि इन तरंगों का प्रभाव सदा बुरा ही नहीं होता । फूल मटर के बीजों पर जब पराध्वनियाँ डाली जाती हैं तो उनमें तेजी से अंकुर फूटने लगते हैं ।

आर्ष वाङ्मय में ओंकार शब्द का महत्वपूर्ण स्थान है । सृष्टि की उत्पत्ति इसी से हुई बतायी गयी है । इसके तीन अक्षर अ, उ, म समस्त ब्रह्मांड का बोध कराते हैं । यह सत्, रज, तम रूपी तीन गुणों,वर्तमान, भूत और भविष्य रूपी तीनों कालों तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तीन सर्वोपरि शक्तियों के परिचायक हैं । समूचे विश्व-ब्रह्मांड के कण-कण का मूल यही अनाहत स्वर है । नाद-ब्रह्म के साधक इसी पराध्वनि की साधना करते और समाधि स्थिति तक जा पहुँचते हैं।


सच्चा सुख अंततः है कहाँ ?

स्त्री-पुरुष, राजा-रंक, धनी-निर्धन, अशक्त-सशक्त सभी की यह कामना होती है कि उन्हें सुख मिले । सुख का सच्चा स्वरूप और उसकी वैज्ञानिक आवश्यकता पर बहुत थोड़े से व्यक्तियों ने विचार किया होता है । अधिकाँश तो शरीर की स्थूल उपयोग सामग्रियों को ही सुख का साधन मानते हैं और इन्हीं के पीछे अंधी दौड़ लगाते रहते हैं । यह साधना और ये सुख इतने निर्बल होते हैं कि उनसे व्यक्ति की आँतरिक पिपासा शाँत नहीं होती । क्षणिक सुख का-सा जो आभास होता है वह भी अंततः अग्नि में घी डालने का ही काम करता है । इससे सुख प्राप्ति की कामना प्रबल होती है और उनके प्रति राग या आसक्ति बन जाती है ।

यह भाव सुख न रहकर दुःख बन जाता है क्योंकि शारीरिक सुख अधोगामी होते हैं उनसे शक्तियों का पतन होता है- और यह अशक्तता ही दुःख का कारण होती है । इसलिए इन्द्रियों की वाह्य लिप्सा को सुख नहीं मानते ।

धन-दौलत जिसे सुख का साधन मानते हैं वह भी सुख कहाँ दे पाता है । ऐसा रहा होता तो हेनरी फोर्ड, राकफेलर आदि प्रमुख धनपति महासुखी रहते । धन के कारण उत्पन्न होने वाला भय, आलस्य भोग आदि से मनुष्य का हृदय हर घड़ी काँपता रहता है । धनिकों को थोड़ा घाटा लगा कि हार्टफेल हुआ । यह बात बताती है कि धन का साहसी भावनाओं से पूर्णतया संबंध- विच्छेद है अतः भयदायक परिस्थितियों में रहकर विपुल धन संपत्ति का स्वामी होकर भी मनुष्य सुखी रह सकेगा इसमें संदेह ही है ।

शारीरिक दृष्टि से बहुत मोटा या बलवान होने में भी स्थिरता नहीं है । संसार की अन्य वस्तुओं की तरह शरीर में भी परिवर्तन होता रहता है आज की स्वस्थ अवस्था सदैव इसी तरह बनी रहेगी इसकी कहीं निश्चितता नहीं है ।

एक बात यह भी है कि शरीर की दृष्टि से संपन्न व्यक्ति भी कई बार अहंकार, प्रदर्शन और दूसरों पर अपनी धाक जमाने की भावना से कुत्सित और नृशंस कर्म करने लगते हैं । अपराधों के वैधानिक दंड से मनुष्य बचाव कर सकता है किंतु पाप की प्रक्रिया जब मस्तिष्क में विद्रूप उत्पन्न करती है तो मनुष्य के वाह्य और आँतरिक जीवन में अशाँति की आँधी छा जाती है । ऐसे व्यक्तियों का अंत सदैव ही बड़ा निर्मम, निर्दय और भयानक हुआ है ।

तब फिर क्या सौंदर्य को सुख मान लें ? अपने पास भरा-पूरा परिवार है उससे क्या सुख मिलता है । बहुत पढ़ लिख लिया है इससे क्या सुखी हैँ ? सोचते चले जाइये । एक-एक परिस्थिति पर पूर्णतया विचार कर लीजिये । वाह्य साधन सुख नहीं दे सकते । सौंदर्य का आकर्षण मनुष्य को पतित बना देता है, फिर वह सदैव साथ रहने वाला भी तो नहीं है । परिवार में संख्या तो अधिक है किंतु बेटे-बाप में नहीं बनती । बच्चियों की शादी की समस्या सताती है । बेटे दुष्ट और दुर्गुणी हों, स्त्रियाँ फूहड़ हों तो नारकीय यंत्रणायें देखने के लिए दूर जाने की आवश्यकता न होगी ।

तथाकथित अर्थकरी विद्या भी मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकी । आज शिक्षा का प्रसार हुआ है पर उसी अनुपात में बेकारी भी बढ़ी है । दिखावट, बनावट, फैशन-परस्ती, फिजूलखर्ची आदि बुराइयाँ आज अधिकाँश पढ़े लिखे लोगों में ही दिखाई देती हैं । फलस्वरूप अशिक्षितों से भी अधिक दुखी रहते देखे जाते हैं । ऐसी दशा में शिक्षा को भी सुख का मूल कैसे मानलें।

मनुष्य के दुःख का प्रमुख कारण उसके निजत्व की अज्ञानता है । इस कारण मनुष्य का दृष्टिकोण ही भिन्न हो जाता है । जिस स्थिति में हैं उसी का मानकर जीवन का सारा क्रिया व्यापार चलता है । इन व्यवसायों में जब विघ्न उत्पन्न होते हैं तो भाग्य को दोष देते हैं । भगवान को कोसते, रोते बिलखते रहते हैं ।

हमारी स्थिति ठीक उस नाटक के राजा की सी है जो नाटक समाप्त होने पर भी इस बात पर अड़ जाता है कि मेरा वह खजाना, रानी, सेना, सिपाही लाओ नहीं तो घर नहीं जाऊँ गा । तब नाटक कंपनी का मालिक उसे समझाता है कि भाई तुम्हें राजा तो इस नाटक की सफलता के लिए बनाया था । तुम सचमुच राजा तो नहीं हो। एक निर्धन व्यक्ति हो जिसे पारिश्रमिक देकर इस कंपनी में भरती किया था ।

ऐसे बावले राजा पर लोग हँसते हैं, कहते हैं वह बिलकुल बुद्धिहीन है । पर हम सब ठीक उस राजा जैसे ही हैं जो अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर हाड़-माँस की इस दानव देह पर अभिमान कर बैठे हैं । प्रत्येक बात, सुख और सुविधाओं का चिंतन इस पंचभौतिक शरीर की दृष्टि से ही करते हैं । पर जब इस जीवन का नाटक खतम होता है और हम शरीर के स्टेज से उतार दिये जाते हैं तो कितने दुःखी हो सकते हैं इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।

इस संसार में वही परमात्मा विभिन्न रूपों में रूपाँतरित होकर अपना प्रकाश फैला रहा है । वह कण-कण में समाया है । वह साक्षी है, वह नित्य, अविनाशी, परमात्मा ही सच्चे आनंद का स्रोत है, उसी को जानने की प्रेरणा देते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है - - -

भूर्भुवः स्वस्त्रयो लोका व्याप्त भोम्ब्रह्मतेषुहि । स एव तथ्यतो ज्ञानी यस्तव्देति विचक्षणा ॥

“अर्थात् इस पृथ्वी, आकाश और पाताल में जो सर्वत्र विद्यमान परमात्मा है वही जानने योग्य है । उसे जाने बिना मनुष्य दुःख क्लेश और संताप से विमुक्त नहीं हो सकता ।”

मनुष्य जीवन में सात्विकता की ॐ ची प्राप्त कर लेना ही सर्व सुलभ और सहज उपाय है इसके लिए कहीं जटिल ऊहापोह की आवश्यकता नहीं । निष्काम भावना से संसार के संपूर्ण कर्मों का पालन करते हुए मनुष्य अपनी भौतिक सात्विकता प्राप्त कर सकता है ।मनुष्य सत्याचरण करे इसमें कौन सी कठिनाई है । परमात्मा की उपासना, सद्व्यवहार, सहृदयता, उदारता, निष्कपटता, ये कौन-से वजनदार पत्थर हैं जो उठाये नहीं उठते । मनुष्य इन सद्गुणों को अपने जीवन में विकसित करने का साहस करे तो ऐसी कोई भी बाधा नहीं जो उसे सुख प्राप्ति से रोक सके । मनुष्य जीवन की सरल समुचित और सात्विकता की त्रिशक्ति के आधार पर ही उसके भौतिक भावनात्मक और पारलौकिक सुख विकसित होते हैं ।

हमारे श्रेष्ठ अंतःकरण का जो दिव्य पुरुष इस शरीर में विद्यमान है अपना धन, शक्ति, विद्या तथा सौंदर्य सब कुछ वही है । वाह्य साधनों में जो सुख दिखाई देते हैं वे रेगिस्तान की मरीचिका के समान ही हैं । उनमें भटकता हुआ इंसान मृग की भाँति धोखा ही खाता है ।

इस तथ्य को जितना ही विचार सकें उतना ही अच्छा है, जितना अपने जीवन में समावेश कर सकें उतना ही श्रेयस्कर है । सत्य और न्याय के साँचे में विनिर्मित मनुष्य जीवन को इन्हीं की प्राप्ति में ही संतोष मिल सकता है ।


न्याय की विजय (Kahani)

मराठा सरदार राघोवा पेशवा पर अपने भतीजे की हत्या का अभियोग था । जिस न्यायालय में उसका निर्णय होने वाला था, उसके न्यायाधीश श्री रामशास्त्री थे । श्री शास्त्री सत्यनिष्ठ के लिए दूर-दूर तक विख्यात थे, इसलिए राघोवा को भय था कहीं उसे सजा न मिल जाये ।

राघोवा की धर्मपत्नी को एक उपाय सूझा । उन्होंने श्री रामशास्त्री को भोज दिया और इस विचार से उनकी खूब आवभगत की कि उससे प्रभावित होकर श्रीशास्त्री उनके पक्ष में ही निर्णय देंगे । बात-बात में उन्होंने इस बात की चर्चा ही छेड़ दी तो न्यायानिष्ठ श्री रामशास्त्री ने कहा-’न्याय की दृष्टि से तो सरदार को प्राणदण्ड मिलना ही चाहिए ।’ राघोवा की पत्नी उनकी इस निर्भयता से प्रभावित तो हुई पर उन्होंने कहा-’इस तरह का निर्णय देने का परिणाम जानते हैं आप, क्या होगा ? हम आपके, जिंदा ही आपकी जीभ कटवा लेंगे और किसी गड्ढे में गढ़वा देंगे ।

बिना उत्तेजित हुए श्री शास्त्री ने उत्तर दिया ‘यह आप कर सकती हैं पर उससे मुझे कोई दुःख नहीं होगा, गलत निर्णय देने की अपेक्षा तो जीभ क्या सिर काट लिया जाना ही अच्छा है ।’ अंततः विजय न्याय की ही हुई ।

एक मनुष्य किसी महात्मा के पास पहुँचा वह कहने लगा-जीवन अल्पकाल का है । इस थोड़े से समय में क्या करें । वाल्यकाल में ज्ञान नहीं रहता । बुढ़ापा उससे भी बुरा होता है । रात-दिन नींद नहीं लगती है । रोगों का उपद्रव अलग बना रहता है । युवावस्था में कुटुँब का भरण-पोषण किये बिना नहीं चलता । तब भला ज्ञान कैसे मिले ? लोक-सेवा कब की जाय ? इस जिंदगी में तो कभी समय मिलता दीखता नहीं ।’ ऐसा कह और खिन्न होकर वह रोने लगा ।

उसे रोते देखकर महात्मा भी रोने लगे । उस आदमी ने पूछा-’आप क्यों रोते हैं ?’ महात्मा ने कहा-’क्या करूं बच्चा ! खाने के लिए अन्न चाहिए लेकिन अन्न उपजाने के लिए मेरे पास जमीन नहीं है । मैं भूख से मर रहा हूँ । परमात्मा के एक अंश में माया है । माया के एक अंश में तीन गुण हैं । गुणों के एक अंश में आकाश है । आकाश में थोड़ी सी वायु है और वायु में बहुत आग है । आग के एक भाग में पानी है । पानी का शताँश पृथ्वी है । पृथ्वी के आधे हिस्से पर पर्वतों का कब्जा है । नदियों और जंगलों को जहाँ देखो, वहाँ अलग बिखरे पड़े हैं । मेरे लिये भगवान ने जमीन का एक नन्हा सा टुकड़ा भी नहीं छोड़ा । थोड़ी-सी जमीन थी भी, सो उस पर और-और लोग अधिकार जमाये बैठे हैं । तब बताओ मैं भूखों न मरूंगा ?

उस मनुष्य ने कहा-’यह सब होते हुए भी तुम जिंदा तो हो न ? फिर रोते क्यों हो ? महात्मा तुरंत बोल उठे-’तुम्हें भी तो समय मिला है, बहुमूल्य जीवन मिला है, फिर ‘समय नहीं मिलता, जीवन समाप्त हो रहा है, इसकी रट लगाकर क्यों हाय-हाय करते हो । अब आगे से समय न मिलने का बहाना न करना । जो कुछ भी है उसका तो उपयोग करो ।’


सुव्यवस्थित जीवन शैली वास्तविक अध्यात्म

कूड़े को भी यदि यथास्थान सुरुचिपूर्ण ढंग से दाब-ढक रख दिया जाय तो वह बुरा न लगेगा । इसके विपरीत यदि तस्वीरें, फूल गुलदस्ते आदि सुँदर वस्तुएँ भी अस्त-व्यस्त क्रम से फैला दी जायं तो वे गंदगी मात्र बनकर रह जायेंगी । चतुर माली अपने बगीचे में बाढ़ के लिए लगाई गई झाड़ियों को भी इस तरह काटते-छाँटते हैं कि वे मनमोहक लगने लगती हैं । इसके विपरीत यदि गुलाब के पौधों की डालियाँ भी छितरी-बिखरी रहें तो वे कुरूप झाड़ियों जैसी दिखाई पड़ेगी । काला-कलूटा मनुष्य भी यदि अपने बाल, वस्त्र, रहन, सहन, को ठीक ढंग से रखता है तो वह सुँदर प्रतीत होता है । किंतु यदि गोरा-चिट्टा, प्राकृतिक बनावट का सुँदर होते हुए भी नाक,आँख आदि में मल भरे है, बेतुके बाल और बेसिलसिले मैले-कुचैले कपड़े पहने है तो उस व्यवस्थित काले-कलूटे मनुष्य की तुलना में कुरूप दिखाई देगा ।

प्रकृति ने किस वस्तु को कैसी सुन्दर-असुन्दर बनाया है, यह अपने हाथ की बात नहीं । किंतु इतना मनुष्य के हाथ में भी है कि वह अपनी कला-कुशलता, व्यवस्था बुद्धि का समावेश करके कुरूप लगने वाली वस्तुओं को भी सुन्दर बना दे और फूहड़पन के द्वारा सुन्दर वस्तुओं को भी कुरूप और कुरुचि पूर्ण बना दे । कुछ समय पूर्व जो जमीन खार-खड्डों वाली, ऊबड़-खाबड़, भद्दी, भोंड़ी दिखाई पड़ती थी, व्यवस्थित होने पर बड़ी सुरम्य उद्यान बनकर जीवंत तस्वीर जैसी मनोहर, मनोरम दिखाई देने लगती है । इस अद्भुत परिवर्तन का एक मात्र कारण मनुष्य की व्यवस्था बुद्धि है, जिसके साथ श्रम को जोड़कर प्रयुक्त किया जाय तो कहीं भी सुन्दरता का सृजन किया जा सकता है । जहाँ इस कौशल का अभाव होगा वहाँ बहुमूल्य वस्तुएँ भी कुरुचिपूर्ण गंदगी बनकर कचरे की तरह जहाँ-तहाँ अशोभनीय स्थिति में पड़ी होगी । प्राकृतिक सौंदर्य का कोई अस्तित्व नहीं, ऐसा तो नहीं कहना चाहिए ,पर व्यवहार को कसौटी पर कसा जाय तो प्रतीत होगा कि जितनी भी सुन्दरता अपने इर्द-गिर्द प्रस्तुत है उसमें से अधिकाँश को मनुष्य की कुशल व्यवस्था ने ही पैदा किया है ।

सच कहें तो सौंदर्य और व्यवस्था एक ही प्रक्रिया के दो रूप हैं । कला को सौंदर्यत्पादक कहा जाता है । पर यह कला सुरुचिपूर्ण व्यवस्था बुद्धि के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । सामान्यतया चित्रकला, मूर्तिकला , साहित्य, कविता, गायन, वाद्य, नृत्य आदि के माध्यम से किसी कलाकार की कला की अभिव्यक्ति होती है । यह तो कला का प्रतिफल हुआ । पर वह वस्तुतः है क्या ? इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाय तो यही स्पष्ट होगा कि यह पदार्थों को एवं क्षमताओं को व्यवस्थापूर्वक क्रम बद्ध कर देने भर की कुशलता है इसी को कला कहते हैं ।

कागज का टुकड़ा, कई तरह के रंग, पतले से ब्रुश इतनी सी नगण्य लगने वाली सामग्री को कहाँ किस क्रम, कितनी कुशलता से कहाँ नियोजित किया जाय कि उसमें से अमुक छवि या अमुक भाव प्रकट होने लगे । इस प्रक्रिया को जिसने ठीक तरह सँजो लिया उसे चित्रकार कहते हैं । बहुमूल्य चित्रों की कीमत उनमें लगे कागज या रंगों के आधार पर नहीं दी जाती, बल्कि उस व्यवस्था बुद्धि की प्रखरता को परखा जाता है जिसने तुलिका के सहारे निर्जीव कागज को जीवंत कलाकृति के रूप में प्रस्तुत करके रख दिया । यही बात मूर्तिकला के संबंध में है । एक पत्थर का टुकड़ा-छोटे-छोटे छैनी-हथौड़ी, रेती जैसे उपकरण बस उन्हीं नगण्य सी वस्तुओं के सहारे वह ऐसी बहुमूल्य प्रतिमा गढ़ देता है कि उसे देख-देख कर दर्शन का मन हुलसने लगती है । इस दर्शनीय प्रतिमा का मूल्याँकन पत्थर या श्रम के घंटों का लेख-जोखा लेकर नहीं हो सकता, गढ़ने वाले की तन्मयता एवं सौंदर्य परख की सूक्ष्म क्षमता ही बेजान पत्थर में जान डाल देती है । जड़ पत्थर में भावाभिव्यक्ति का जो निर्झर झरता है वह और कुछ नहीं मूर्तिकार का संवेदनात्मक सौंदर्य ही है ।

क्या है साहित्य कला ? शब्द कोष के जंगल में बिखरी हुई वनस्पतियों का तोरण, वंदनवार, गुलदस्ते, गजरे और पुष्पहारों के रूप में कलाकृति बनाकर प्रस्तुत करना ही है । लकड़ी की लेखनी को, भगवती सरस्वती कौन बनाता है ? साहित्यकार का भावाभिव्यक्ति कौशल । इसे शब्दों का सुरुचिपूर्ण कथन भी कह सकते हैं । वस्तुतः यह क्रमागत शब्द व्यवस्था ही साहित्यकार की कला है । कविता में यही तत्व छन्द-बद्ध होकर प्रस्फुटित होता है । इसमें शब्दों को लयबद्ध, तालबद्ध, भावबद्ध करने में और भी प्रवीणता दिखाई पड़ती है ।

हम संगीत की सोचें-तो यह कंठ के ध्वनि प्रवाह को बहुरंगी फव्वारे की तरह तंजुल-मनोरम बनाना है । कंठ से ध्वनि तो सभी के निकलती है, पर वह अस्त-व्यस्त होती है । गायक अपनी सूक्ष्म बुद्धि से उसे स्वरों में विभाजित करता है । और फिर उसके उतार-चढ़ाव समाविष्ट करके मर्मस्पर्शी गीत अलापता है । वरदान क्या है ? अनगढ़ उपकरण पर वादक की उँगलियाँ, थपकियाँ उस पर एक विशिष्ट क्रम से थिरकती हैं और इतने भर से नस-नाड़ियों का झंकृत करने वाला संगीत बजने लगता है । यही तथ्य अभिनय के संदर्भ में भी है । हाथ-पैर की उँगलियाँ, कमर, गर्दन, कंधे, नेत्र, मुख आदि सामान्य काय अवयवों का इस प्रकार स्पन्दित होना जिसमें नर्तक की भाव मुद्रा उभरे और दर्शकों के मन मयूर को अपने साथ-साथ नाचने के लिए बाधित कर दे। दूसरे शब्दों में नृत्य-अभिनव में प्रयुक्त होने वाले अवयवों की हलचलों को एक विशिष्ट भाव प्रवाह के अनुरूप गतिशील रहने की व्यवस्था । स्पष्ट है कि इस व्यवस्था का दूसरा नाम ही कला है । अपने कला का निष्णात व्यवस्थापक ही उस क्षेत्र का कलाकार कहा जायगा ।

व्यापार, उद्योग, कृषि, पशुपालन, शिल्प आदि जीवन का कोई भी क्षेत्र क्यों न हो ? हर कहीं व्यवस्था बुद्धि की अपेक्षा रहती है । कोई काम छोटा हो या बड़ा सफल तभी होगा जब उसे पूरी सतर्कता और मुस्तैदी के साथ किया जायगा । लापरवाही और गैर जिम्मेदारी बरतने से लाभदायक काम भी हानिकारक बन जाते हैं । किसी कार्य में कुछ लोग सफल होते हैं, कुछ असफल । इसमें कभी-कभी तो परिस्थितियाँ भी कारण होती हैं । पर अधिकतर कार्य की सजग-सुव्यवस्था का होना न होना ही सफलता-असफलता का प्रधान कारण होता है । जो बच्चे अनुत्तीर्ण होते हैं, उनमें से मंद बुद्धि तो बहुत थोड़े होते हैं, अधिकाँश में लापरवाही ही भरी होती है । समय पर मनोयोगपूर्वक पढ़ना उनसे नहीं बन पड़ता । मनमौजी बने घूमते हैं । जब जी हुआ पढ़े, जब मन न हुआ न पढ़े । दौड़ में तेज दौड़ने वाले खरगोश को हराकर धीमे चलने वाला कछुआ बाजी जीत गया है । इसका एक ही कारण था खरगोश जहाँ बैठा, वहाँ सुस्ताया, जहाँ रुका वहाँ उछला और बेढंगी चाल चलता रहा । किंतु कछुआ बढ़ता और उत्साहपूर्वक अनवरत चलता ही रहा और खरगोश से पहले नियत स्थान पर पहुँच गया । प्रकृति ने कछुए को मंद, और खरगोश को तेज गति प्रदान की है । पर उन लोगों ने अपनी समझ के अनुसार मंदता को तेज जितनी लाभदायक बना दिया और तेजी को निरर्थक गवाँ दिया ।

किसके पास प्रकृति प्रदत्त कितनी है, यह प्रश्न गौण है । मूल बात यह है कि वह जितनी भी है,क्या उसका सदुपयोग करने पर ध्यान दिया गया है ? प्रयत्न करने पर, सतर्कता बरतने पर, उत्साह पूर्वक काम में रुचि लेने पर-सामान्य स्तर का मनुष्य भी क्रिया-कुशल बन सकता है और उसे निरंतर विकसित करता रह सकता है। ऐसे उदाहरण सर्वत्र भरे पड़े हैं, जिनमें मंदमति समझे जाने वाले मनुष्यों ने निरंतर सतर्कता बरतने की आदत परिपक्व करके अपने को प्रखर प्रतिभाशाली बनाया है उनकी असावधानी की बुरी आदत जब सतर्कता, सुव्यवस्था और सुरुचि में बदली तो सारा व्यक्तित्व ही परिवर्तित हो गया । आरंभिक दिनों का बुद्धूपन न जाने कहाँ चला गया और उसके स्थान पर न जाने कौन समझदारी का मुकुट पहना गया ? वस्तुतः यह किसी अन्य का अभिशाप वरदान नहीं है । अपनी निज की अव्यवस्था और व्यवस्था के ही प्रतिफल हैं । जो दो मनुष्यों की प्रायः एक जैसी स्थिति होते हुए भी उनके व्यक्तित्व में जमीन-आसमान जैसा अंतर उत्पन्न हो जाता है ।

अपनी व्यवस्था बुद्धि को विकसित करने में यदि तत्परता बरती जाय तो अपनी प्रतिभा चेहरे पर तत्काल दिखाई देने लगेगी । आलसी, अनुत्साही मनुष्य के चेहरे पर मुर्दनी छायी रहती है, लगता है कि कब्रिस्तान में से खोद कर निकाला है । नीची आँखें, रोती सूरत,

अनिश्चितता और आशंका व्यक्त करने वाली रेखाएँ, न हिलने वाले अचल होठ, अनुत्साह जन्य जड़ता को देखकर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि उसे रोना-कोसना आता हो तो आता हो -हँसना और हँसाना इसके भाग्य में नहीं है । उदीयमान व्यक्तित्व सदा उमंग भरे रहते हैं । उनमें भरपूर उत्साह देखा जाता है । इस आँतरिक तेजस्विता के कारण उनके हाथ, पैर काम करने के लिए मचलते रहते हैं । निःचेष्ट बैठे-बैठे समय गँवाना ही उन्हें बहुत भारी पड़ता है ।

यह व्यवस्थित जीवन शैली किसी चमत्कारी कायाकल्प के बारे में बहुत कुछ पढ़ने-सुनने को मिलता-रहता है। बूढ़ों के जवान बनने, अपंगों के क्रियाशील होने और मुर्दों के जी पड़ने की कितनी ही किंवदंतियां सुनने को मिलती रहती हैं । पर यह तथ्य निश्चित रूप से सत्य है जिसने अपनी शारीरिक, मानसिक जड़ता को मार भगाया-स्वयं की सामर्थ्य को व्यवस्थित करने की आदत डाली उसकी तेजस्विता आँखों से, चेहरे से और शरीर के अंग-प्रत्यंग से चमकने लगी । व्यक्तित्व में समायी अनेकानेक शक्तियाँ जागने लगी । उसके हाथ-पैर नर्तकों की तरह स्फूर्तिवान रहने लगे । मस्तिष्क की प्रखरता इस तेजी से बढ़ी कि वह साथियों को योजनों पीछे छोड़कर दूरदर्शी बुद्धिमानों की अग्रिम पंक्ति में जा बैठा । इस प्रखर प्रगतिशीलता का उपहार किसे मिला है ? इसकी परीक्षा एक ही बात से हो सकती है कि उसकी एवं कितनी व्यावहारिक बन चुकी है ।


ऐसा बनें, जैसा दूसरों को बनाना है

इन दिनों सबसे बड़ी दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता का कार्य एक ही है- युग-सृजेताओं को अग्रिम पंक्ति में खड़े होना । पीछे खड़े रहने वाले झंझट में न पड़ने की दृष्टि तो अपने को सुरक्षित अनुभव करते हैं पर वस्तुतः वे रहते अतिशय घाटे में हैं । उत्तरदायित्वों से मुँह छिपा लेने पर हर संभावना को मूक-दर्शक बने देखते रहने वालों की उदासी अपनाने में यह जोखिम भी है कि उन्हें ऐसा कुछ हस्तगत नहीं हो पाता जिस पर गौरव किया जा सके । आलसी, प्रमादी किसी प्रकार दिन तो गुजार लेते हैं पर गिने अर्धमृतकों में ही जाते हैं । मनुष्य जीवन की गरिमा और जिम्मेदारी ही जिसकी समझ में न आई, उसके लिए पेट, प्रजनन भर में जिंदगी के दिन रोते कलपते काट लेने के अतिरिक्त ऐसा कुछ हस्तगत हो नहीं पाता जिससे संतोष, सम्मान पाने और सिर ऊंचा उठा कर प्रज्ञावानों, प्रगतिशील, वरिष्ठों की तरह चलने का अवसर मिल सके । पिछड़े पन से ग्रसित लोग यह समझ ही नहीं पाते कि समुन्नत और सुसंस्कृत स्तर की रीति-नीति अपनाने वाले कितनी प्रसन्नता, प्रशंसा पाते हैं और समाज, समुदाय पर अनुदानों की झड़ी लगा देने वाले कितनी उच्चस्तरीय अनुभूतियों के साथ असाधारण उपलब्धियाँ अनुभव करते हैं ।

जो ढर्रे से ऊंचे उठकर वरिष्ठता स्तर की सूझ बूझ उगा पाते हैं उनके लिए यह जिम्मेदारी एक अनिवार्य आवश्यकता बनकर सामने आ खड़ी होती है कि कुछ बड़े कदम उठाने चाहिए । कुछ बड़े अनुदान और बड़े वरदान पाने की उमंग उभरनी चाहिए । ऐसे लोगों को क्रमबद्ध रूप से दोनों कदम आगे बढ़ाते हुए लक्ष्य के उच्च शिखर पर जा पहुँचने की यशस्वी पर्वतारोहण जैसी साहसिकता जुटानी पड़ती है । इस उपलब्धि के लिए आत्म-परिष्कार और समाज-सुधार के दोनों ही प्रयासों को साथ-साथ अपनाते हुए समग्र-प्रगति की दिशा में चल पड़ना होता है ।

नेतृत्व का अपना आनंद है । मार्ग दर्शकों की यश-गाथा अनंत काल तक चर्चा का विषय बनी रहती है और मरण के उपराँत भी यश शरीर को जीवंत बनाये रहते हैं । सेवा, साधना का, धर्म-धारणा का उपक्रम अपनाना किन्हीं शूर साहसियों से ही बन पड़ता है पर जो ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं वे कृतकृत्य भी हो जाते हैं। अनुकरण करने वालों के लिए ऐसी परंपरा विनिर्मित करते हैं जिसका अवलंबन लेकर वे भी साधारण न रहकर असाधारण बन सकें । ऐसों को ही देवमानव या युग-पुरुष की संज्ञा मिलती है ।

इन दिनों युग परिवर्तन की प्रभात बेला में असंख्यों को असंख्य प्रकार की उपलब्धियों से लाभान्वित होने का अवसर मिलने की संभावना बन ही रही है । सबसे अधिक नफे में वे रहेंगे जो इन दिनों युग धर्म के निर्वाह में दत्त चित्त रहेंगे नव सृजन के संदर्भ में कुछ बढ़-चढ़ कर काम करेंगे । जिनमें संवेदना, भाव, चेतना और दूरदर्शिता के तत्व किसी भी अनुपात में जीवित हैं उन्हें संकीर्ण स्वार्थपरता में कटौती करके बचत को उस प्रयोजन में लगाना पड़ेगा जिससे उज्ज्वल भविष्य की संरचना में कुछ महत्व पूर्ण योगदान बन पड़े । ऐसे लोगों के लिए प्रमुख कर्त्तव्य ही बनता है-लोक मानस का परिष्कार । दृष्टिकोण और क्रिया कलापों में सतयुगी परंपरा का प्रतिष्ठापन । मोटे शब्दों में यह विचार क्राँति है । जिसमें समूची मानवता को नये सिरे से नये भाग्योदय का सौभाग्य उपलब्ध हो सके । आदिम काल से चलती आ रही एक अस्तव्यस्तता दिशा धारा को अभिनव सुनियोजन का अवसर मिल सके जिसके कारण अब तक के इतिहास में एक नई शृंखला जुड़ सके । इस दृष्टि से अपने समय को सर्वसाधारण के लिए सामान्य रीति से प्रखर प्रतिभाओं के लिए विशेष अनुपम उपलब्धियाँ हस्तगत करने का अवसर मिल सके । भविष्य में जब कभी भी इसे ऐतिहासिक मोड़ वाले समय की समीक्षा-विवेचना होगी, तो एक शब्द में यही कहा जाता रहेगा कि युगसंधि की बेला में अंतरिक्ष से असीम चेतना और ऊर्जा बरसी थी । धन्य थे वे लोग जो उस समय कार्यरत रह सके और दिशाओं के दरवाजों पर अड़े हुए किवाड़ों की भूमिका निभा सके । नामकरण की दृष्टि से उनका परिचय सृजन शिल्पियों के रूप में भी कहा और लिखा जाता रहेगा ।

‘विचार क्राँति’ अपने समय की सबसे बड़ी माँग है । जनमानस का परिष्कार किये बिना वह कुछ भी संभव न हो सकेगा, जो भविष्य के संबंध में सोचा, चाहा और निर्धारित किया गया हो । समस्त समस्याओं की जड़ एक ही केन्द्र पर केन्द्रित है । दुर्बुद्धि, दुर्गति के लिए मनुष्य ही पूरी तरह जिम्मेदार है । यदि मनुष्य को यही सोचने और सही करने भर की मानसिकता बनाने का अवसर मिल सके, तो समझना चाहिए कि प्रस्तुत अगणित समस्याओं, विभीषिकाओं और अवाँछनीयताओं के घटाटोप से छुटकारा पाने का सुयोग हस्तगत हो गया।

यह सब अनायास ही घटित हो जाने वाले नहीं है । उसके लिए प्रमुख भूमिका अग्रगामियों की होगी, जिनके सम्मिलित प्रयास से समुद्र पर सेतु बाँधने, गोवर्धन उठाने, स्वतंत्रता उपलब्ध करने और परिव्राजकों द्वारा समस्त संसार में धर्मचक्र प्रवर्तन जैसे अविस्मरणीय अवसरों की नये सिरे से वही पुनरावृत्ति हुई समझी जा सके। रात्रि के अवसान और अरुणोदय के आगमन के बीच मध्याँतर होता है, जिसे ब्रह्ममुहूर्त कहते हैं । युगशिल्पियों को उसी के समतुल्य माना जायगा ।

जनमानस का परिष्कार करने की महती आवश्यकता को पूरा करने में जिनका मन उपयुक्त भूमिका निबाहने के लिए हुलसित हो, उन्हें प्रयास का आरंभ अपने आप से करना होगा । दूसरों से कुछ करने के लिए कहा जाय, तो यह आवश्यक नहीं कि वह परामर्श को मान ही लें और मार्गदर्शक के अनुरूप अपने गतिविधियों को मोड़ ही लें, किंतु अपने आप के लिए तो उस अनुशासन का परिपालन हर मनस्वी के लिए सहज संभव हो सकता है । अपने ऊपर तो अपना अधिकार पूरी तरह है ही, फिर उसमें अवज्ञा का प्रश्न सामने ही नहीं आ सकेगा । अपने को सुधार लिया जाय, तो अन्यान्यों को उसका अनुकरण करने के लिए प्रस्तुत वातावरण ही दबाने-दबोचने में पूरी तरह समर्थ हो सकता है । साँचे में ढालकर ही खिलौनों और पुर्जे बड़ी संख्या में ढलते विनिर्मित होते चले जाते हैं । दूसरों को उपदेश देकर उन्हें इच्छित दिशा में चलाया जा सका होता तो अब तक तो सारी दुनिया ही बदल गई होती ।

आज उपदेष्टाओं की कहाँ कुछ कमी है । हर प्रवचन मंच पर उन्हीं को छाया देखा जा सकता है । कभी सात ऋषि, तपस्वी और आठ वसु-मनीषी ही सतयुग को बुलाने और पकड़े रखने में पूरी तरह समर्थ रहे थे । अनुयायी तो उन्हें बड़ी संख्या में सहज ही मिलते रहे और बात बन गई, पर आज तो जन गणना के अनुसार 70 लाख से अधिक धर्मधारी अपनी आजीविका इसी व्यवसाय से प्राप्त करते हैं । इसके अतिरिक्त कथा-वाचकों, कीर्तनकारों, उपदेशकों और मार्गदर्शकों में अपने को सम्मिलित बताने वालों की संख्या प्रायः इतनी ही और हो सकती है । इस प्रकार अपने देश में ही तथा-कथित मार्गदर्शक-प्रवक्ताओं की संख्या एक करोड़ से ऊपर निकल जाती है । धर्म, राजनीति समाज, विभिन्न वर्गों के संगठनों पर छाये हुए इतनी बड़ी संख्या वाले मार्गदर्शक प्रवक्ताओं द्वारा किसी भी क्षेत्र को, किसी भी मंच को सुनियोजित करने में सफलता क्यों नहीं मिल रही है ? इस अत्यंत विकट किंतु साथ ही अत्यंत सरल प्रश्न का उत्तर एक ही है कि दूसरों से जो कराने की अपेक्षा की जाती है, उसमें अग्रणी कहलाने वाले प्रायः असफल ही रहते हैं । कथनी और करनी में अंतर रहने पर उसका प्रभाव शून्य के बराबर रह जाता है । रंगमंच में आकर्षक वेश-भूषा बना कर अभिनेता न जाने क्या-क्या बकते-गाते रहते हैं, पर इन नारों की वास्तविकता जानने के कारण दर्शकों में से कोई मनोरंजन पाने के लिए ऐसा कुछ उपलब्ध नहीं करता, जिससे प्रवाहित होकर आदर्शवादी रीति-नीति अपना सकना संभव हो सके । बुरी बात तो अपने संचित कुसंस्कार और अनाचारियों का समुदाय है, जो पतन पराभव का कुयोग जुटा देता है । बात ऊंचा उठने और आगे बढ़ने की है । इस प्रयास में सफलता मात्र उन्हीं को मिलती है, जो प्रतिपादनों को अन्यान्यों पर थोपने से पहले अपने आपको तद्नुरूप बनाने में समर्थ हो सके हैं । निष्णात अध्यापक ही छात्रों का समुचित अध्यापन करा सकने में समर्थ होते हैं । जो स्वयं ही अनपढ़ हों, वे दूसरों को क्या पढ़ायें । जो स्वयं ही संगीत कला में प्रवीण नहीं, वह संगीत विद्यालय का अधिष्ठाता होने की घोषणा करें, तो उसे उपहासास्पद ही माना जायेगा ।

उपदेश इन दिनों प्रायः सर्वथा असफल इसी कारण से हो रहे हैं कि उपदेशक जो दूसरों से कराना चाहते हैं, उसे निजी जीवन में समाविष्ट करके यह सिद्ध नहीं किया जा पाया कि जो कहा गया है, वह व्यावहारिक भी है। यदि उचित, व्यावहारिक और लाभप्रद रहा होता तो उपदेशों के अनुरूप प्रवक्ता ने सर्वप्रथम अपने को उस विद्या को अपनाकर लाभान्वित किया होता । इस संदेश असमंजस का निवारण न कर पाने पर ही उपदेशकों के दरबार में दिये जाने वाले भाषण भी विडंबना बन कर रह जाते हैं, श्रवणकर्ताओं के गले नहीं उतरते । भाषण, परामर्शों से भावुकों को अवाँछनीयता की दिशा में भड़काना, उत्तेजित करना तो संभव है, पर संभावना बनेगी ही नहीं कि उत्कृष्टता अपनाकर संयम बरतने और परामर्श प्रयोजनों के लिए किसी को अग्रणी किया जा सके। यही कारण है कि इन दिनों तथाकथित नेताओं को अभिनेताओं की संज्ञा देकर लोग कौतुक-कुतूहल जैसा मजा लेते हैं और इस कान सुन कर उस कान निकाल देते हैं, पल्ले झाड़कर चल देते हैं । बाद में उस कौतुक के प्रति व्यंग्य-उपहास करते हुए मजा जमाने की खूबी को-बहरूपिया स्तर की संज्ञा देते हुए उसकी निंदा तक करते देखे जाते हैं । विशेषतया यह प्रक्रिया तब तेजी से उभरती देखी जाती है, जब प्रसंग आदर्शवादिता अपनाने के लिए,सिद्धाँतों को अपनाने के लिए लोगों से कहा जा रहा हो । निजी या वर्ग स्वार्थ के प्रतिपादन ही प्रायः प्रवक्ताओं के परामर्श में चुन लेते हैं और वैसा ही कुछ करने से आगे की बात पर ध्यान नहीं देते । हड़तालों और प्रदर्शनों के लिए, विग्रह-उपद्रव के लिए, आक्रोश उत्पन्न करने एवं अड़ंगेबाजी में नेतागिरी अपना काम कर जाती है, पर जहाँ सृजन और उपयोगी सुधार-परिवर्तन की बात कही जाय, वहाँ लोग ॐ घने या उठ कर चलने लगते हैं ।

इस विडंबना में दोष जनमानस का नहीं, वरन् प्रवक्ताओं की अनधिकार चेष्टा का है । वे दूसरों से वह कराना चाहते हैं, जिसे वे स्वयं तक कर सकने में समर्थ नहीं हो सके । अच्छाई तो कुछ समय छिपी भी रह सकती है, पर बुराई की विडंबना में एक खूबी यह जुड़ी हुई है कि वह हींग की तीखी गंध की तरह अनायास ही दूर-दूर तक फैल जाती है । फूलेरी फूल की सुगंध अपना अस्तित्व छोटे क्षेत्र में जमा कर रह जाती है । अनाधिकारी धर्मोपदेशक खोटे सिक्के की तरह मात्र विक्षोभ और अविश्वास ही भड़काते हैं ।

यहाँ यह ऊहापोह इसलिए किया जा रहा है कि नवसृजन के हर क्षेत्र में, हर प्रसंग में आदर्शवादिता का संपुट लगता है, लोगों को अपनाई गई दुष्प्रवृत्तियों को छोड़ने के लिए कहा जाता है, जो उचित उत्कृष्ट है, उसे अपनाने के लिए अनुरोध आग्रह किया जाता है । यह नीचे गिरे को ऊपर उठाने जैसा असाधारण प्रयत्न हुआ । इसे संपन्न करने के लिए ऊपर उठाने की ऐसी समर्थता संचित की जानी चाहिए जैसी कि गिरे इंजन को फिर से सीधा खड़ा करने के लिए सशक्त क्रेनों की आवश्यकता पड़ती है । कुएँ से पानी खींचने के लिए भी तो भुजाओं का बल तो चाहिए ही । अंतरिक्ष में उपग्रह फेंकने वाले केंद्रों में शक्तिशाली राकेट लगाने पड़ते हैं ऊपर उठाने के लिए सक्रिय असाधारण समर्थता की आवश्यकता पड़ती है, फिर लोगों को अनगढ़पन से विरत होने और उत्कृष्टता अपनाने के लिए सहमत करने के लिए अनिवार्य रूप से ऐसी प्रतिभाएँ चाहिए, जो अपने खरेपन की कसौटी पर कसे जाने और आग में तपाये जाने के उपराँत खरी उतरी हो ।

बुराई बढ़ाने में तो नशेबाजों के, व्यभिचारियों के, गुंडागिरी अपनाने वाले आवारागर्दों तक के गिरोह अनेकों को प्रभावित करने और चंगुल में फँसा लेने में आये दिन सफल होते रहते हैं पर उत्कृष्टता की दिशा में सहमत और प्रेरित कर सकना मात्र उन्हीं के लिए संभव होता है जो लोकशिक्षण के लिए जो निर्धारण विनिर्मित किया गया है, उसका प्रयोग परीक्षण यदि अपने ऊपर कर लिया गया है तो उनके परामर्श, उपदेशों और आह्वानों को शिरोधार्य करने वालों की भी कमी नहीं पड़ती है । उन्हें असफलता के लिए किसी को भी दोषी नहीं ठहराना पड़ा है । बुद्ध, ईसा और गाँधी के उपदेशों का न तो उपहास हुआ और न अनुगमन के लिए कोई तैयार न हुआ जैसी शिकायत करनी पड़ी जमाने को, समाज को, लोक मानस को दोषी ठहराने की भी आवश्यकता नहीं पड़ी । विनोबा का अनुरोध असंख्यों स्वीकारा और भूदान के लिए लाखों एकड़ भूमि प्रस्तुत कर दी । महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद, आद्य शंकराचार्य आदि को ऐसी निराशा का सामना नहीं करना पड़ा कि उनकी बात कोई सुनता, मानता नहीं । मध्यकालीन संतों के इतने अधिक अनुयायी समवेत हुए कि उनका अपना अपना संप्रदाय ही बन गया । यदि उनके संस्थापक ओछे, खोटे और प्रवक्ता भर रहे होते तो नियम-संयम के साथ बंधे हुए किसी न किसी सीमा तक असुविधा उत्पन्न करने वाले उनके अनुबंधों को कोई क्यों स्वीकार करते । पुरातन काल के मुट्ठी भर ऋषि-मनीषी अपने समय में धरती पर स्वर्ग उतारने और मनुष्य में देवत्व उभारने का असंभव जैसा दीखने वाला कार्य संभव बनाने में उसी आधार पर सफल हुए थे । सतयुग आसमान से नहीं टपकता वरन् ऋषि-मनीषी स्तर के प्रचंड और प्रखर व्यक्तित्व ही उसे धरती पर खींच बुलाते हैं । आज भी “वयंराष्टजागृयाम पुरोहिताः” स्तर के पुरुषार्थ की अपेक्षा तथा आवश्यकता ।


सफाई (Kahani)

गाँधी जी की आकाँक्षा को कार्य रूप में परिणत करने वालों में बाबा राघव दास का नाम अग्रणी कै । इनका आश्रम बरहन (गोरखपुर) में था । वहाँ की जनता उन्हें उच्च कोटि का महात्मा मानती और उनके प्रति अपार श्रद्धा भावना रखती थी । एक बार बरहन में टाउन एरिया की सफाई कमेटी की अव्यवस्था के कारण कई हफ्तों तक पखाने साफ नहीं किये गये, इस कारण पूरी बस्ती में गंदगी फैल गई । बाबा राघव दास ने कमेटी के कर्मचारियों को लिखा । बार-बार कहने पर भी कर्मचारी टाल मटोल करते रहे । तब बाबा जी स्वयं बस्ती में पहुँचे और पखाने अपने हाथों से साफ करने लगे । गंदगी बहुत अधिक थी । वे पूरी लगन के साथ कार्य में जुटे रहे । यह देखकर पूरे कस्बे में हलचल मच गई । बड़े-बड़े घरों के पुरुष और स्त्रियाँ सफाई के कार्य में सहयोग करने लगे । देखते-देखते कस्बों के पखानों की सफाई हो गई । फिर तो सफाई कमेटी के कर्मचारियों की भी आँखें खुलीं और सफाई की तुरंत उचित व्यवस्था की गई ।


गायत्री की हंस योग साधना

शरीर निर्वाह में अन्न और जल से भी अधिक महत्व वायु का है । वायु में प्राण-वायु की-ऑक्सीजन की महत्ता सर्वोपरि है । ऑक्सीजन का महत्व विज्ञान के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं । रक्त में लालिमा उसी की है ।इसी ईंधन के जलने से शरीर का इंजन गर्म रहता है और सब कुछ पुर्जे अपना-अपना काम सही रीति से करते हैं । ऑक्सीजन का एक नाम प्राण वायु भी है । वह समुचित रूप से मिलती रहे तो शरीर बलिष्ठ बना रहेगा ।

प्राण ऑक्सीजन से अधिक सूक्ष्म स्तर का है जिसे जीवनी शक्ति, प्रतिभा और प्रखरता के रूप में माना जाता है। सूक्ष्म प्राण के रूप में जीवट प्राप्त करने के लिए प्राणायाम किये जाते हैं । इसके अनेकों विधिविधान हैं उन्हीं में से एक सूर्य वेधन, अनुलोम विलोम ब्रह्मवर्चस् साधना में प्राण साधना के नाम से सम्मिलित है ।

इस साधना में मनःस्थिति को ब्राह्मी भूत बनाना पड़ता है । अपने को शरीर और मन से ऊपर की स्थिति में अनुभव कराने वाली ब्रह्मचेतना जगानी पड़ती है । इसकी भूमिका बन पड़ने पर श्वास प्रक्रिया में इतना दिव्य आकर्षण उत्पन्न हो जाता है कि उसके सहारे अनन्त अंतरिक्ष से दिव्य प्राण को अपने लिये आकर्षित करना और उपलब्ध अंश को धारण कर सकना संभव होता है । इसी का नाम सोऽहम् साधना है ।

प्राणायाम से साँस खींचने की प्रक्रिया को पूरक कहते हैं । हंसयोग में साँस खींचने के साथ अत्यंत गहरे सूक्ष्म पर्यवेक्षण में उतर कर यह खोजना पड़ता है कि

वायु के प्रवेश करते समय सीटी बजने जैसी ध्वनि भी उसके साथ ही घुली हुई है । यह ध्वनि प्रकृति गति नहीं वरन् ब्राह्मी है और ईश्वरीय संकेतों,संदेशों तथा अनुदानों से भरी हुई है । साँस के साथ भीतर प्रवेश करती है और संपूर्ण जीव सत्ता पर अपना अधिकार जमा लेती है । सोऽहम् के कुँभक में यही भावना रहती है कि जीवन संपदा पर परिपूर्ण अधिकार ‘सो’ हम-परमेश्वर का हो गया । साँस छोड़ते समय साँप की फुफकार जैसी अहम् की ध्वनि का अनुभव अभ्यास में लाना पड़ता है और भावना करनी होती है कि अहंता को विसर्जित निरस्त कर दिया गया है । अहम् के स्थान पर ‘स’ इस परमेश्वर की प्रतिष्ठापन हो गयी है । वेदान्त योग की यही एकत्व अद्वैत स्थिति है । इसी में पहुँचने में अयमात्मा ब्रह्म-प्रज्ञानब्रह्मा-शिवोऽहम् - सच्चिदानंदोऽहम् मुतत्वमसि आदि बोधक शब्दों में व्यक्त की गई भावनाओं की अनुभूति होती है ।

निरंतर आत्मा और परमात्मा के साथ अपने संबंध को स्मरण करने और संपर्क सूत्र बनाये ‘सोऽहम्’ का अर्थ है- मैं वह परमात्मा हूँ । शिवोऽहम् - सच्चिदानंदोऽहम् आदि शब्दों में सोऽहम् का ही स्पष्टीकरण है । इस तथ्य को हर घड़ी स्मरण रहने और स्मृति सूत्र को सुदृढ़ बनाने की सुविधा इसी ‘अजपा’ जाप में मिलती है ।

गायत्री की यह ब्रह्मवर्चस साधना-पंच कोशों के अनावरण की साधना है उससे ब्रह्म सान्निध्य ब्रह्म साक्षात्कार का लाभ मिलता है । उसके कितने ही आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे प्रतिफल हैं जिनसे क्रमशः आत्मा का परमात्मा के रूप में विकास होते हुए अपूर्णता की पूर्णता में परिणति होती है ।


माइकेल फराडे (Kahani)

लंदन की एक गंदी बस्ती में एक अनाथ बालक रहता था । अखबार बेचकर अपना गुजारा करता था । सात वर्ष की आयु से ही एक जिल्द साज की दुकान पर काम करने लगा । एक दिन एक पुस्तक बाँधते हुए उसकी निगाह विद्युत संबंधी एक लेख पर पड़ी । मालिक से अनुमति माँग कर उसने एक ही रात में उस लेख को पढ़ डाला । जिज्ञासा बढ़ी । प्रयोग एवं परीक्षण के लिए उसने विद्युत की छोटी मोटी आवश्यक वस्तुएँ एकत्रित करनी आरंभ कर दीं । बालक की रुचि देखकर एक ग्राहक बहुत प्रभावित हुआ । उसे वह भौतिक शास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान डेंवी का भाषण सुनवाने ले गया । बालक ने डेवी की बातें ध्यान से सुनी एवं नोट भी किया । उसने डेवी के भाषण की समीक्षा करते हुए अपने परामर्श लिख भेजे । डेम्फ्री डेवी अत्यधिक प्रभावित हुए । उन्होंने यंत्रों को व्यवस्थित रूप में रखने के लिए बालक को रख लिया । बालक नौकर और सहयोगी वैज्ञानिक दोनों ही की भूमिका निभाता रहा । दिन भर कामों में व्यस्त रहता, रात को अध्ययन करता । यदि बालक अपने मनोयोग, अध्यवसाय एवं पुरुषार्थ के बल बूते प्रसिद्ध वैज्ञानिक बना । भौतिक विज्ञान की जगत में माइकेल फराडे को कौन नहीं जानता है ?


आनंद कंद के आश्रय से संसिद्धि

वत्स ! तुम मेरे कुल के नहीं हो । ‘आचार्य श्रीनिवास ने बड़े स्नेह से कहा’ जो अधिकारी जिस साधन का है, उसको उसी में लगना चाहिए । आचार्य श्री निवास प्रकाँड विद्वान हैं । उनके विरक्त गृहस्थ शिष्यों की संख्या भी कम नहीं है । उसने कई वर्ष से संकल्प कर रखा था कि वह आचार्य की शरण ग्रहण करेगा । सौभाग्य से आचार्य आये थे इधर । वह कितनी उत्सुकता से इस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था , किंतु आचार्य ने उसे स्वीकार नहीं किया

“आहार शुद्धौ सत्व शुद्धि । सत्व शुद्धि धुवा स्मृतिः ।”

‘विवेक मुख्य साधन है हमारे मार्ग का और विवेक का अर्थ है भोजन के शुद्धा शुद्ध का विवेक ।’ आचार्य ने समझाया - प्रतिपत्ति की परिपक्वता के लिए चित्त शुद्ध होना चाहिए । अन्न की शुद्धि से चित्त की शुद्धि हमारे साधन का मुख्य आधार है । जितना संभव हो, इसे अपनाओगे तो तुम्हें लाभ ही होगा ।’

अन्न की शुद्धि-अन्नमय कोश की स्थूल देह की शुद्धि प्रथम आवश्यक है, इसे कोई कैसे अस्वीकार कर देगा, किंतु आज यह असंभव प्रायः बात है । अन्न शाक जिस भूमि में जिस खाद से उत्पन्न होते हैं, आहार के पदार्थों का जो भ्रष्ट, मिश्रित रूप बाजार में उपलब्ध होता है-कोई कहाँ तक सावधानी बरतेगा । अपवाद स्वरूप किन्हीं अतिशय संपन्न सज्जन के लिए भले संभव हो यह सामान्य साधक के वेश की तो बात नहीं है आहार के स्वरूप दोष, संगदोष और अर्थ दोष न हो, यह बात उसे उस समय भी बहुत सरल नहीं लगी । आज की स्थिति तो जैसी है- प्रत्यक्ष ही है ।

‘वत्स ! तुम हमारे कुल के नहीं हो ।’ वह गया था योगिराज अनंत की शरण लेने, किंतु वहां भी उसे वही उत्तर मिला ’प्राण की शुद्धि से चित्त की शुद्धि हमारा साधन है । सामान्य प्राणायाम करोगे तो लाभ होगा, तुम्हें, किंतु हठयोग की निर्विकल्प समाधि के लिए जितना प्राणायाम, जो मुद्राएँ आवश्यक है उनका खिचाव सहन करने योग्य तुम्हारा शरीर नहीं है ।’

‘क्रिया की शुद्धि से चित्त की शुद्धि होती है । अपने को आग्रह पूर्वक सत्कर्म में लगाए रखो । इससे अन्न दोष तुम्हें प्रभावित नहीं कर सकेगा । योग की क्रियाओं का थोड़ा अभ्यास मनोबल देगा । ‘योगिराज ने समझाया-लेकिन परामर्श साधन का तुम्हारा अपना मार्ग यह नहीं है । समय आने दो, उपयुक्त गुरु की उपलब्धि अवश्य तुम्हें होगी ।’

प्राण के संयम से अथवा क्रिया की शुद्धि से तात्पर्य यह कि प्राणमय कोश की शुद्धि से चित्त की शुद्धि होती है, बात सर्वथा उचित है, किंतु बुद्धि जिसे उचित कहती है, क्या हम वही करने में सफल हो पाते हैं ? मन की पराधीनता से छुटकारा पा लेना यदि इतना सुगम होता ..........

धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम् ।

हमारी बुद्धि सदा ठीक ही निर्णय करती है, ऐसा भी तो नहीं है ।उसको भी लगा यह उसका मार्ग नहीं है । वह प्राणायाम तथा मुद्राओं का व्यायाम क्रम नहीं चला सकेगा । क्रिया की शुद्धि के लिए सावधान रहेगा । सफल कितना होगा, वह स्वयं नहीं जानता ।

‘भावना शुद्ध रहे तो क्रिया शुद्ध होती है भावना की शुद्धि से प्राणमय कोश की शुद्धि हो जाती है और अन्नमय कोश भी शुद्ध हो जाता है । अन्नदोष अधिक बाधा नहीं देता ।’ वह गये थे महात्मा श्री सीताराम शरण जी के समीप । महात्मा जी ने बड़ी मधुर वाणी में उन्हें समझाया-’भगवान के रूप गुण-लीला के चिंतन का अभ्यास करो । मानसिक पूजा को अपना दैनिक कार्य बना लो और प्रतिकूल भावना से मन को प्रयत्न पूर्वक हटाते रहो। संसार के व्यक्ति तथा पदार्थों का चिंतन मन को मत करने दो । मन को राग और द्वेष के प्रवाह से दूर रखो । दया क्षमा, सेवा के भावों को मन में बसने दो ।’

उसको महात्मा जी ने आदेश दिया था-’कुछ दिन अभ्यास करके तब मेरे पास आना ।’

‘महात्मा जी अतिशय विनम्र हैं ।’ इसीलिए उन्होंने स्पष्ट नहीं कहा कि तुम हमारे शिष्य होने के अधिकारी नहीं हो । उसके ऐसा सोचने का कारण है ।वह प्रयत्न करके हार गया है । पूरे तीन महीने उसने चेष्टा की है । मन कोई अपने हाथ में है कि जो चाहेंगे वह सोचा जा सकेगा । दो क्षण तो वह अभीष्ट चिंतन में लगता नहीं है । सोचना चाहते हैं कुछ, मन सोचता कुछ है । निष्प्रयोजन बिना सिर,पैर की बातें मन में आती रहती हैं, किंतु मानसिक पूजा नहीं चल पाती ।

मनोमय कोश की शुद्धि से चित्त की शुद्धि-मन ही तो चित्त है । मन शुद्ध हो जाय, भावना शुद्ध होने लगे-उसे लगता हे यही साध्य है । शुरुआत में ही यह साधन बन जाय, यह उसे अपने वश की बात नहीं लगती । अतएव, महात्मा जी के पास जाने का उत्साह उसमें नहीं हो पा रहा और ऐसे में एक दिन वह स्वामी आत्मानंद जी के पास जा पहुँचा । उनका प्रवचन चल रहा था-’बुद्धौ शरणमन्विच्छ’-तुम नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त अद्वितीय सच्चिदानंद हो । बुद्धि की शरण ग्रहण करो ।यह समस्त प्रपंच तुम्हारी दृष्टि मात्र है । उसने स्वामी जी की बहुत प्रशंसा सुनी है । स्वामी जी में उसकी श्रद्धा है । संत सेवा में उसकी प्रीति है । किंतु स्वामी जी इतने बड़े विद्वान हैं और इतनी ॐ ची बात कहते हैं कि उसके पल्ले कुछ पड़ता नहीं है ।

शाम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान इस षट् संपत्ति से संपन्न जितेन्द्रिय, विरक्त, एकाग्रचित्त साधक जब साधन चतुष्टय का आश्रय लेता है-विवेक वैराग्य से संपन्न होने पर जब उसमें मुमुक्षा जागती है, तब गुरु से श्रवण किया हुआ तत्व अंतः करण में मनन के द्वारा प्रकट होता है, और निदिध्यास अविद्या को निवृत्त करने में सफल होता है ।

षट् संपत्ति जीवन में आयी नहीं, साधन चतुष्टय सम्यक् अपनाए नहीं गए तो श्रवण किया हुआ तत्व केवल बौद्धिक ज्ञान बनकर रहा जाता है । विज्ञानमय कोष की शुद्धि से, ज्ञान की शुद्धि से, अंतःकरण की शुद्धि पर स्वामी जी बल देते हैं । उनका कहना है अंतःकरण की उपेक्षा कर दी जाय तो वह स्वतः शाँत समाहित हो जाएगा । तादात्म्य के बिना तो चित्त में क्रिया होगी ही नहीं । किंतु चित्त से तादात्म्य न किया जाय, उसकी उपेक्षा किया जाय यह क्या सरल है इस सवाल के उत्तर में, मै इस कुल का नहीं हूँ, यह बात स्वयं उसने निश्चित कर ली ।

उस घटना को बरसों बीत गए । वह तीर्थ यात्रा करने निकला था । वैसे भी वह पंढरपुर, डाकोर जी, वृन्दावन वर्ष में एक बार न जाय तो उसे बेचैनी होती है इस बार चित्त बहुत अशाँत था उसका, अतएव घर से निकल पड़ा था । वृन्दावन घूमते हुए रमण रेती के पास से गुजर रहे थे तभी देखा एक फक्कड़ उन्हें पुकार रहा था -’अरे इधर तो आ । मैं तेरे लिए आकर बैठा हूँ और तू देखता तक नहीं ।’ लंबी दुबली देह, उलझे केश, कमर में मैली सी लंगोटी और पूरे शरीर में लिपटी ब्रजरज । उस अवधूत का रंग गोरा या साँवला, यह कहना भी कठिन था । कोई चिन्ह नहीं, जिससे उसका संप्रदाय जाना जा सके ।

‘बैठ यहाँ ।’ उसने समीप जाकर प्रणाम किया तो अवधूत ने उन्हें समीप बैठने का आदेश दिया । ‘तू भटकता कहाँ है ? मेरे कुल का है तू ?’ प्रभो ! वह सहसा भाव क्षुब्ध हो उठा । वत्स ! तुम मेरे कुल के नहीं हो।’सभी महापुरुषों से यह सुनते-सुनते वे निराश हो गए थे । एक संत ने उन्हें अपने कुल का कहा तो सही।

आनंद की शुद्धि कर । आनंदकंद का आश्रय ले । अवधूत खुल कर हँसे । उसकी आँखें आंसुओं से भरी थीं । हाथ उन्होंने जोड़ रखे थे । किंतु उनकी भंगिमा से स्पष्ट था कि महात्मा की बात उन्होंने समझी नहीं है ।

“देख रोटी खाए बिना तो मेरा काम नहीं चलता । अवधूत हँसते जाते थे और कहते जाते थे- कौन कैसे कमाता है उसके घर का चूल्हा बर्तन कैसा है, साधू यह सब पूछ कर भिक्षा नहीं लिया करता । भिक्षा में मिला अन्न साधू के लिए पवित्र है । इस अन्न शुद्धि को समझाता है तू ?”

‘ठीक-ठीक तो नहीं समझता ।’ उसने धीरे से कहा ।

‘सीधी बात है पेट को भरने के लिए-जीवन निर्वाह मात्र के लिए भोजन करो, अन्न में स्वाद मत लो । स्वाद के लिए भोजन मत करो तो अन्न शुद्ध । आहार में आनंद लो, किंतु स्वाद का आनंद नहीं वह प्रसाद है भगवान का, इसका आनन्द लो तो आहार की परम शुद्धि हो गई ।

उसके नेत्र चमक उठे । अन्नमय कोश की शुद्धि इतनी सरस होगी, यह तो बात ही कभी उनके ध्यान में नहीं आयी थी ।

‘नाक पकड़ कर बैठने की आवश्यकता नहीं । अवधूत का स्वभाव बार-बार हँसना था, तो वे हँस रहे थे । क्रिया आवश्यक है इसलिए करो । आनंद पाने के लिए क्रिया करो । क्रिया में आनंद मत लो, इसमें आनंद लो कि तुम परमात्मा के लिए क्रिया करते हो । प्राणमय कोश की शुद्धि इतनी ही है ।

‘मन के पीछे लाठी लेकर मत पड़ो ।’ अवधूत ने इस बार चौंका दिया-’उसे अपनी उधेड़ बुन करने दो । केवल इतना ध्यान रखो कि मनोराज्य में, मन की कल्पनाओं में तुम्हें आनंद नहीं लेना है । आनंद तुम लोगे तब, जब तुम्हारा मन परमात्मा के विषय में चिंतन करेगा । तुम्हारे रस लिए बिना वह भटकता है तो भटका करे। आनंद को पृथक् करो और मनोमय कोश शुद्ध हुआ धरा है ।

‘तनिक कठिन बात है, किंतु बहुत कठिन नहीं है । वह सोचने लगे-’अंततः कुछ अभ्यास तो साधन मार्ग में करना ही होगा ।’

‘बुद्धि के विचारों में भी आनंद मत लो । अवधूत ने आगे समझाया नया ज्ञान, नवीन सद्भावना, बुद्धि के नये चमत्कार इनमें भी आनंद मनाना बंद करो । बुद्धि जब तक परमात्मा के परम ज्ञान को कोई प्रकाश न दे उसे नीरस बन जाने दो । विज्ञान मय कोश इस प्रकार शुद्ध हो जाएगा ।

‘तुम्हारा मार्ग आनंद मार्ग है । दुःखी मत हो चिंता मत करो । खिन्न मत हो ।’अवधूत दृढ़ स्वर में इस बार कह रहे थे - हँसना सीख लो और उद्धार हो गया । चिंता दुःख आवे तो ठहाका लगाकर हंसों । चंचल कन्हाई तुम्हें छकाना चाहता है वह तुम्हारा गम्भीर फूला हुआ मुख देखकर हँसना चाहता है । उसके खिले हँसते मुख की बात सोचो ।

‘लेकिन भगवान् ! उसने बीच में प्रार्थना की-’मन में विकार भी तो आते हैं ।’

‘तब कन्हाई कहीं पास ही होता है । वह नटखटपन पर उतर आया है अवधूत हँसे-वह पेट पकड़कर हँसते-हँसते दुहरा हुआ जाता है और तुम बुद्धू बन रहे हो । ऐसे समय अधिक जोर से हंसों और फिर देखो कि विकार का कैसा कचूमर बनता है । गिरधर लाल ने मस्तक भूमि पर रखा । जब उन्होंने सिर उठाया, अवधूत उछलते-कूदते निकलते एक ओर भागे जा रहे थे ।


बाधाओं से टकराये जो, उसे इंसान कहते हैं

सफलता सर्वप्रिय है । इसकी प्राप्ति सुगमता से नहीं होती है । प्रत्येक कार्य करके उन पर विजय प्राप्त करें । बिना विघ्न के हुआ कार्य जीवन को आनंद से पूर्ण नहीं कर सकता है । हमें आनंद की प्राप्ति कार्य के प्रारंभ करने से ही होने लगती है तथा मार्ग में विघ्न होने पर और आनंद आयेगा । बिना कष्ट उठाये मिली हुई सफलता ऐसी लगती है जैसे हमने कोई वस्तु मुफ्त में प्राप्त की हो । ऐसी वस्तु आनंद-दायक नहीं होती । सोने का महत्व इसलिए अधिक है क्यों कि वह आसानी से प्राप्त नहीं होता । लोहा अधिक उपयोगी होने पर भी पर्याप्त मात्रा में मिलता है । लोहा सोने से सस्ता है ।

कठिनाई से प्राप्त वस्तु हमें अधिक आनंद देती है । उसका हमारे मन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है । दुर्लभ वस्तु आनंद और सुख प्रदान करने वाली होती है । वह कठिनाइयों से टकराने का इतिहास लिए रहती है । वह इस बात की कसौटी का परिणाम है कि हममें ऐसा कार्य करने की क्षमता है । कठिनाई मानव के गुणों की परख का साधन है । दुर्लभता से प्राप्त वस्तुएँ ही सफलता की द्योतक हैं । ऐसी वस्तुओं के विषय में ही पुस्तकों में लिखा जा सकता है । प्रवचन दिये जा सकते हैं जो वस्तुएँ सफलता से प्राप्त हो जायें उनके विषय में लिखना अपने समय को व्यर्थ करना है । कोई वस्तु महत्वपूर्ण इसीलिए है कि उसकी प्राप्ति में बाधाएँ आयीं । जिन्हें दूर करना पड़ा था । इन्हीं की प्राप्ति के आनंद से यह संसार रसमय बना है तथा मनुष्य इसे छोड़ने को तैयार नहीं होता ।

कठिनाइयाँ संसार में गतिशीलता बनाये हुए हैं । इन्हीं के कारण मनुष्य को समय-समय पर अपनी कार्य कुशलता का परिचय देने का अवसर प्राप्त होता है । मनुष्य की सजगता और सावधानी के कारण भी कार्य के मार्ग में आने वाली बाधाएँ ही हैं । जीवन में बार-बार ठोकरें खाकर ही मनुष्य अनुभवी होता है । बार-बार संघर्ष करने से त्रुटियों में सुधार होकर योग्यता में वृद्धि हो जाती है । कष्टों से मनुष्य दृढ़ तथा साहसी बनता है। हथियार पत्थर पर रगड़ने से पैने होते हैं । हीरे में चमक आ जाती है । कठिनाइयों की आवृत्ति से मनुष्य में चेतनता आ जाती है । मनुष्य में जो शक्तियाँ छिपी रहती हैं । प्रयोग में न आने के कारण जिन शक्तियों की अभिव्यक्ति नहीं होती । वे प्रत्यक्ष में आकर कार्य में सहायक हो जाती हैं ।

जीवन में कार्य करने की जागरुकता तथा उससे प्राप्त आनंद तभी स्थायी रहता है जबकि कार्य में कष्टों का समावेश हो । इतिहास में प्रसिद्ध व्यक्तियों ने कष्ट सहे तो उनके सामान्य कार्य भी उनको अमर कर गये वरना वे सामान्य रह जाते । जैसे प्रताप, शिवाजी, गाँधी, जवाहर आदि कष्ट सहने के कारण महान बने । वे इनके बिना सामान्य मनुष्य होते । जागरुकता और परिश्रम से किये गये कार्य बिना कष्ट उठाये नहीं पूरे हुए । कष्ट के द्वारा प्रभू मनुष्य की परीक्षा लेते हैं । जो मनुष्य इस परीक्षा में सफल होते हैं उन्हें आनंद मिलेगा । परीक्षा से डरने वाले उन्नति नहीं कर सकते उनकी इच्छायें पूरी नहीं होतीं ।

सफलता की पूर्ति धीरे-धीरे कार्य करने से होती है । इस बीच में उन्हें कष्टों से बार-बार टकराना पड़ता है । ये विघ्न कई प्रकार से मनुष्य के सामने आते हैं । दैवी प्रकोप अकस्मात् कठिनाई के रूप में सामने आते हैं । हम भूलों से भी कठिनाइयाँ अनुभव करते रहते हैं । आकस्मिक कठिनाइयाँ हमारे कार्य पथ को सुगम नहीं रहने देतीं और प्रायः हम कार्य छोड़ने तक को प्रस्तुत हो जाते हैं । कठिनाई वास्तव में वह नहीं होती जो हम समझते हैं बल्कि वह हमारे अविवेक का प्रतीक होती हैं । अविवेकी मनुष्य उसको इस रूप में देखता है । वास्तव में परिस्थितियाँ ही कठिनाई का परिवर्तन रूप होती हैं । हम अपनी बुराई के अनुसार कुछ का कुछ समझ जाते हैं । छोटी सी बात हमें वृहद रूप में दिखलाई देने लगती है । हमारा पुराना अभ्यास हमें बार-बार ऐसा सोचने पर विवश कर देता है ।

स्वभाव परिवर्तन से हम कठिनाई पर विजय प्राप्त कर सकते हैं । स्वभाव शीघ्र बदलना सरल नहीं होता । स्वभाव बनने में भी पर्याप्त समय लगता है इसी प्रकार स्वभाव को बदलने में भी समय लगेगा । अतः हमें धैर्य, साहस और दृढ़ता का प्रयोग करना चाहिए । भूल होने पर सावधानी से कार्य करना चाहिए । पत्थर और रस्सी जाते जाते वहाँ पर निशान बना देती हैं । धैर्य के साथ परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढालने का प्रयत्न करें तो आसानी हो जायगी हम सफल हो जायेंगे । आकस्मिक परिस्थितियों को आने से रोकना हमारे वश की बात नहीं है परंतु उसे सहन करने के लिए अनुभव और अभ्यास की आवश्यकता है ।

आकस्मिक कठिनाई उपस्थित होने पर हम उसे नहीं रोक सकते परंतु उसके रूप को समझ सकते हैं । तेज धूप घास को जला डालती है । परंतु हमेशा के लिए घास समाप्त नहीं होती, वर्षा होने पर वह फिर हरी भरी हो जायगी । ईश्वर ने जिसे जीवन दिया है वह जियेगा,उसे कोई मार नहीं सकता है । प्रकृति का रहस्य बड़ा विचित्र है । वह विपत्ति की विरोधी सुविधा भी अपने आप प्रदान करती है । बीमारी के बाद आरोग्य प्रदान करने के लिए भूख दी है जो जल्दी ही क्षति पूर्ति कर देती है । ग्रीष्म के बाद वर्षा, ठंड के बाद गर्म, रात्रि के बाद दिन तथा अंधकार के बाद प्रकाश का दर्शन होता है । रोग, शोक आदि स्थायी नहीं हैं उन्हें तो आने की गति से ही जाना है और फिर क्षति पूर्ति भी होती है ।

आपत्ति का आना दुखदायी है परंतु मन पर उसकी प्रतिक्रिया का विशेष महत्व है । विपत्ति के बाद घबराहट होना विशेष रूप से भयावह है जो हमारी जीवन शक्ति को खींच लेती है । इससे भविष्य में शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक संतुलन बिगड़ जाता है । आकस्मिक विपत्तियाँ बड़े-बड़े महान पुरुषों पर भी छाई रहीं सामान्य मनुष्य की तो बात ही क्या है । इस संसार में विरोधी भावों का आवागमन तो चलता ही रहता है । ये तो मनुष्य के कर्मों का फल देने, मनुष्य को जाग्रत करने, उसके कार्यों में साहस और बल भरने के लिए आती हैं । समय पर इनके कारण कार्य का क्रम बदलना पड़ जाय तो कोई हानि नहीं । हमें अपने को स्थिति के अनुकूल बदल लेना चाहिए ।

पहले संपन्न थे अब अभाव ग्रस्त हैं तो हमें समाज द्वारा किये गये उपहास से दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि उपहास कर्ता विवेकशील प्राणी नहीं होते । उन्हें इस कार्य को करने की फुरसत नहीं है । मूर्ख आदमी के उपहास को हम रोक नहीं सकते तथा उसके उपहास का कोई मूल्य भी नहीं है । इन विपत्तियों द्वारा होने वाली क्षति से हम चाहें तो बच सकते हैं । वास्तविक क्षति विपत्तियों से नहीं उसके पश्चात् होने वाली विपत्ति से होती है । कठिनाई से वीरता-पूर्वक लड़ना इसका एक उपाय है । वीर ही विपत्ति को हँसते-हँसते झेलते हैं । वीर अपने भविष्य को उज्ज्वल देखता है । इसलिए वह धड़ काटने वाली तलवार का मुकाबला करता है । मरूंगा तथा स्वर्ग को प्राप्त करूंगा अथवा पृथ्वी को भोग करूंगा,इस भावना से उसके सामने हमेशा उत्साह तथा आशा का संचार होता है । धैर्य, साहस और प्रयत्न उसके बुरे समय के साथी होते हैं । उसका इनके रहते कुछ नहीं बिगड़ सकता ।

बुरे समय में मानसिक संतुलन बनाये रखने वाले व्यक्ति दृढ़ रहते हैं और कठिनाइयों को हँसते-हँसते झेलते रहते हैं । मानसिक संतुलन से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है । मित्र और शत्रु सीमा में रहते हैं । उसकी अपनी भूलों रूपी दुर्घटनायें नहीं सता सकतीं । विवेकशील व्यक्ति दुर्भाग्य का दुखड़ा नहीं रोता । हमें लज्जा बुरे काम से करनी चाहिए, सद्गुण प्रेरित

कर्मों पर गर्व करना चाहिए । संसार में महापुरुषों ने संकटों को हँसते-हँसते झेला । मुसीबतों के थपेड़े उन्हें अपने स्थान से डिगा न सके और अंत में वे सफल हुए । निर्भय, निःसंकोच तथा ग्लानि रहित होकर कार्य में लगे रहना चाहिए । घबराना नहीं चाहिए, तभी हम कठिनाइयों पर विजय पायेंगे । विघ्नों का आना तो आवश्यक है । उनका साहस से मुकाबला करते हुए अपने मनोबल को ऊंचा रखना चाहिए जिससे एक वीर का जीवन जी सकें ।


सच्चा सेनानी (Kahani)

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का स्वतंत्रता आँदोलन में अपना विशिष्ट स्थान है । राजनीति में वे जिस सक्रियता से भाग ले रहे थे उससे उनके निकटतम मित्र भी सोचने लगे थे कि संभव है तिलक की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी हो । उसी उद्देश्य से एक बार उनके घनिष्ठ मित्र ने पूछा-”स्वराज्य मिलने के बाद आप प्रधान मंत्री का पद सँभालेंगे अथवा राष्ट्रपति का ।”

उन्होंने जवाब दिया-”देखो बंधु ! किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर राजनीति में नहीं आया, मैं तो भारत माता का एक छोटा सा बेटा हूँ और उसी की सेवा के लिए काम कर रहा हूँ ।”

तो स्वराज्य प्राप्ति के उपराँत आप की इस सेवा में क्या भूमिका होगी ? मित्र ने पूछा ।

तिलक ने गंभीर वाणी में कहा-”फिर भी वही सेवक की भूमिका निबाहूँगा । हमारे देश में अशिक्षा, अज्ञान और पिछड़ापन है । उसी के परिणाम स्वरूप मिल जाने के बाद में राजनीति से विलग रहकर अध्यापन का कार्य करूंगा । इसी कार्य को करते हुए जन मानस में उत्कृष्ट विचारों की स्थापना करने का प्रयास करता रहूँगा।


सूक्ष्म ध्वनि प्रवाह को सुनें व समझें

मानवी काया अनंत शक्तियों का भाँडागार है । इसका सूक्ष्म ढाँचा वीणा एवं सितार के ढाँचे से बिलकुल मिलता जुलता है । जिस प्रकार काष्ट एवं तारों से बनी वीणा एवं सितार के भिन्न-भिन्न अंग हैं, ठीक उसी प्रकार हमारे शरीर में सिर, जिह्वा, उदर, तंत्रिकाएं, स्पर्श, शब्द तथा त्वचा आदि अंग-अवयव हैं । संगीत में जिसे स्वर कहा गया है ‘गात्र-वीणा’ में उनकी संज्ञा ‘चक्र’-प्लेक्सस से है । स्वर साधक काष्ठ निर्मित सितार के तारों को छेड़ते और उन से सुमधुर लहरियाँ एवं विविध राग-रागनियां निकलते तथा उनके भरपूर आनंद उठाते हैं । इसी तरह योग-विद्या के ज्ञाता नाद ब्रह्म की साधना से अपने आँतरिक तारों को झंकृत कर षट्चक्रों को जगाने और उनकी प्रवृत्तियों को रूपाँतरित कर उनमें सन्निहित क्षमताओं को विकसित करके ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी बनते हैं । अपने इसी शरीर में सप्त देव, सप्त ऋषि, सप्त लोक, सप्त सागर, सप्तमेरु, सप्त तीर्थ, सप्त साधना के रूप में-सप्त स्वरों के-सप्त झंकृतियों के रूप में प्रतिक्षण तरंगित होते रहते हैं जिससे सारा अंतर्जगत संगीतमय बना रहता है । इन तरंगों में असाधारण शक्ति भरी पड़ी है । नाद ब्रह्म की साधना द्वारा यदि इन्हें नियमित, सुव्यवस्थित एवं लयबद्ध बना लिया जाय तो न केवल शारीरिक और मानसिक जगत की सूक्ष्म शक्तियों को जगाया और उनसे लाभ उठाया जा सकता है, वरन् आत्मिक जगत की विभूतियों से भी लाभान्वित हुआ जा सकता है ।

टोरोंटो के मूर्द्धन्य वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में गहन अध्ययन एवं अनुसंधान किया है । उनने एक ऐसा साउंड ग्रूफ कक्ष तैयार किया है जिसमें साँस लेने छोड़ने की व्यवस्था तो है, परंतु यदि कोई व्यक्ति इसके अंदर जाकर बैठे तो उसे अपनी श्वास-प्रश्वास की गतियाँ, हृदय की धड़कन, पाचन तंत्र की क्रियायें आदि सब कुछ घड़ी की टिक-टिक की तरह स्पष्ट सुनाई पड़ने लगती हैं । इस आधार पर व्यक्ति स्वयं ही आँतरिक हलचलों का निरीक्षण परीक्षण कर अपने आँतरिक वीणा से झंकृत होने वाली स्वर लहरियों का पता लगा सकेगा । चिकित्सा विज्ञानी अंदर की इन्हीं ध्वनियों को विशेष यंत्रों के माध्यम से सुन और देख कर रोगों का पता लगाते और उपचार का तारतम्य बिठाते हैं । अध्यात्म में आँतरिक ध्वनियों एवं नादयोग के रूप में पराध्वनियों का उपयोग आत्मिक विकास के लिए प्रयुक्त करने की व्यवस्था है । नादयोग के अभ्यास द्वारा न केवल शारीरिक मानसिक विकृतियों को दूर किया जा सकता है, वरन् जीवात्मा को परमात्मा से मिलन की अनुभूति भी प्राप्त की जा सकती है ।

शरीर-वीणा की सूक्ष्म ध्वनि तरंगों को यदि सुना और उन्हें लयबद्ध किया जा सके तो जीवन के उस गुह्य रहस्य को जाना-समझा जा सकता है जिसके लिए उच्चस्तरीय तप एवं योग साधनाओं की कष्ट साध्य प्रक्रिया का अवलंबन लेना पड़ता है । मूर्द्धन्य भौतिक विज्ञानी चार्ल्स जी. वान राइपर ने अपनी पुस्तक “ऐन इन्ट्रोडक्सन टू जनरल अमेरिकन फोनेटिक्स” में जीवनोपयोगी ध्वनि विज्ञान की इस क्षमता पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि शरीर में समाविष्ट स्वर लहरियों के अविरल प्रवाह को समझे बिना मनुष्य चेतना की रहस्यमय परतों से अनभिज्ञ ही बना रहेगा और उसकी विलक्षण क्षमताओं से कोई लाभ नहीं उठा सकेगा । अब तो कानों से सुनी जा सकने वाली तथा न सुनी जा सकने वाली ध्वनियों के अध्ययन-अनुसंधान के लिए “श्रोत ध्वनि विज्ञान” नाम से एक पृथक शाखा ही बन चुकी है जिसमें श्रवण और श्रवणातीत दोनों ही प्रकार की ध्वनि तरंगों का वैज्ञानिक ढंग से विवेचन-विश्लेषण किया जाता है । राइपर का कहना है कि ध्वनि एक निश्चित भौतिक प्रक्रिया एवं सृष्टि की एक महत्त्वपूर्ण शक्ति है । जिस प्रकार प्रकृति और प्राणि जगत में प्रकाश, गर्मी, चुँबकत्व एवं गुरुत्वाकर्षण शक्तियों का प्रभाव होता है और उससे उनके शरीर बढ़ते पुष्ट और स्वस्थ बनते हैं, उसी प्रकार ध्वनि में भी तापीय और प्रकाशीय ऊर्जा होती है और वह प्राणियों के विकास में उतना ही महत्वपूर्ण स्थान रखती है जितना वायु, अन्न और जल । रक्ताभिषरण,श्वास-प्रश्वास, आकुँचन-प्रकुँचन का शरीर में निरंतर चलने वाला क्रिया कलाप विभिन्न प्रकार की स्वर लहरियाँ उत्पन्न करता है और उन्हीं के तरंग प्रवाह से जीवन गतिमान रहता है ।

माँसपेशियाँ देखने में भले ही रक्त माँस के रेशे भर लगती हों पर उनसे निकलने वाली ध्वनियाँ इतनी अद्भुत एवं आश्चर्य जनक होती हैं जिन्हें सही प्रकार सुनने-समझने पर काया की विलक्षणता का रहस्य सहज ही खुल जाता है । इनके फैलने और सिकुड़ने की क्रिया संपन्न होते समय कुछ ध्वनि तरंगें निकलती हैं, जिन्हें यदि कानों को हाथ के दोनों अंगूठे से बंद करके सुना जाय तो वे स्पष्ट सुनाई देती हैं । अब तो कई ऐसे वैज्ञानिक यंत्र उपकरण भी आविष्कृत कर लिये गये हैं जिनके माध्यम से शरीर के किसी भी हिस्से की ध्वनि कंपनों को देखा,सुना और मापा जा सकता है । शारीरिक स्वस्थता एवं मानसिक प्रसन्नता अथवा ध्यान आदि दशा में ये ध्वनियाँ दिव्य वीणा से निकलने वाली मधुर स्वर लहरियों की तरह सुनने में कर्णप्रिय लगती हैं, किंतु उत्तेजना, तनावग्रस्तता आदि की स्थितियों में वे बेसुरी हो जाती हैं और कोलाहल जैसी प्रतीत होती हैं । सामान्यतया ये ध्वनियाँ कानों को 25 हर्ट्ज (साइकल प्रति सेकेंड) तक ही सुनाई देती हैं । सह सब ‘आहत’ ध्वनियाँ हैं, जो कानों से सुनी जा सकती हैं । विज्ञान की पकड़ में अब वे ध्वनियाँ भी आ गयी हैं जिन्हें हमारे खुले कान नहीं सुन सकते । इन्हें ‘पराश्रव्य’ ध्वनियाँ कहते हैं ।

आधुनिक युग की नव विकसित तकनीकी के फलस्वरूप वैज्ञानिकों ने शारीरिक माँसपेशियों की स्वर लहरियों को सुनने-समझने में बहुत कुछ सफलता प्राप्त कर ली है । माउंट सिनाई स्कूल आफ मेडिसीन के सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. जोशुआ एफ. जैफे ने मैकनिकल इलेक्ट्रानिक स्टेथोस्कोप के माध्यम से 1000 हर्ट्ज तक की ध्वनि तरंगों को पकड़ा है जिसके अंतर्गत हृदय की ‘लप-डप-लपडप वाली लय-ताल युक्त मधुर गुनगुनाहट और फेफड़ों की घुरघुराहट को सरलतापूर्वक सुना-समझा जा सकता है । यह प्रकृतिगत ध्वनियाँ हैं। कर्णेंद्रियों की पकड़ से बाहर होने के कारण ही इन्हें सूक्ष्म कहा जाता है, अन्यथा यह स्थूल ही हैं, क्योंकि यंत्रों के माध्यम से उन्हें हमारे कान भी सुन सकते हैं । कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के गणितज्ञ जी. आई. टेलर ने ‘आटोकोरिलेशन’ जैसी नवविकसित गणितीय प्रणाली के माध्यम से इन ध्वनियों की गणना करने में सफलता प्राप्त की है । इसी तरह प्रिन्स्टन यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ अनुसंधान कर्ता जेम्स डब्ल्यू. कूली ने कम्प्यूटर की फास्ट फोरियर ट्राँसफार्म्स तकनीकी द्वारा माँस पेशियों की लयबद्ध और क्रमबद्ध रूप से निकलने वाली ध्वनि तरंगों को रिकार्ड करके दिखाया है । उनका कहना है कि हमारे शरीर की स्वर लिपियाँ संगीत में मामूली सा व्यतिरेक उत्पन्न होने पर भी समूचा काय तंत्र लड़खड़ाने लगता है । शरीर की इन स्वर लहरियों को यदि समझा जा सके तो आंतरिक अवयवों की हलचलों, रक्त प्रवाह, हृदय की धड़कन, पाचन संस्थान आदि की जानकारी बिना किसी यंत्र-उपकरण के भी आसानी से प्राप्त की जा सकती है और तद्नुरूप उपाय-उपचार किया जा सकता है ।

इटली के वैज्ञानिक फ्राँसिस्को मैरिया ग्रिमाल्डी ने अपनी कृति “फीजीकोमैथिस डी लूमाइन” में शरीर-वीणा से निकलने वाली ध्वनि तरंगों की रहस्यपूर्ण जानकारी दी है । उन्होंने इस संबंध में मानवी मस्तिष्क एवं उसको आन्दोलित करने वाली विचारणाओं एवं भावनाओं से जोड़ा है । भारतीय तत्ववेत्ता ऋषियों ने इसे ही प्राण चेतना के नाम से संबोधित किया है और उसके परिष्कार एवं अभिवर्धन के लिए विविध-विधि साधनात्मक उपाय उपचारों को सृजन किया है । विज्ञानवेत्ता भी अब इसी तथ्य को पुष्टि कर रहे हैं । ब्रिटेन के विख्यात भौतिक विज्ञानी एवं रसायन शास्त्री विलियम हाइडे वोलेस्टन ने भी अपने अनुसंधान निष्कर्षों में बताया है कि शरीर की समस्त हलचलों और गतिविधियों का संचालन प्राण चेतना द्वारा ही होता है । यदि उसकी लयबद्धता को अभ्यास द्वारा नियमित बना लिया जाय तो जीवन की रहस्यमय विलक्षणताओं को, जिन्हें अतींद्रिय क्षमतायें भी कहा जाता है, साक्षात्कार किया जा सकता है । उनके अनुसार अंदर की सूक्ष्म ध्वनियों को सुनने के लिए सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय को विकसित करने की आवश्यकता है । तभी हम ब्रह्मांडीय चेतना से उद्भूत होने वाली संबंध जोड़ने में सक्षम हो सकते हैं ।

कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के डॉ. नेल्सन की गणना मूर्द्धन्य प्राणि शास्त्रियों में की जाती है । उनने अपने प्रयोग-परीक्षणों से यह सिद्ध कर दिखाया है कि मानवेत्तर प्राणियों में भी उनके शरीर से निकलने वाली ध्वनि तरंगों का विशेष महत्व है । उनने पाया है कि पानी के भीतर रहने वाली शार्क मछलियाँ संकटग्रस्त परिस्थितियों में एक-दूसरे की माँसपेशियों की सूक्ष्मतर ध्वनि कंपनों को सुगमता से सुन लेती हैं और उससे एक दूसरे को बचाने का उपाय ढूँढ़ती और उसमें सफल भी होती हैं । इसी तरह के अनुसंधान ब्रिटेन के मार्टरेट ए. डवन्सी ने किया हैं । जापानी बटेर के अंडों पर किये गये अनुसंधान के आधार पर उनने यह निष्कर्ष निकाला है कि चूजा निकलने के चार दिन पूर्व ही अंडे की ध्वनियाँ जन्मदात्री को स्पष्टतः सुनाई देने लगती हैं । इतना ही नहीं उनने यह भी सिद्ध कर दिखाया है कि भ्रूण को पारदर्शी प्लास्टिक में रखकर यदि किसी ऐसे अंडे के पास रखा जाय जिसमें से बच्चा निकलने का प्रयत्न कर रहा हो, पर कुछ अड़चनों की वजह से बाहर निकलने में असमर्थ रहा हो, तो उस भ्रूण की माँसपेशियों की लयबद्ध ध्वनियों को सुनकर वह अपने कवच को सुगमता पूर्वक तोड़कर बाहर निकल आता है । जन्तु विज्ञानी जी. गौल्डपिंक के अनुसार यह सारा खेल प्राणी के अंदर विद्यमान सचेतन प्राण विद्युत का है जो निखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त विश्व चेतना का एक छोटा सा घटक है ।

अध्यात्म साधनाओं में आसन-प्राणायाम से लेकर ध्यान-धारणा तक की समस्त प्रक्रियायें व्यष्टि चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना से ऐक्य स्थापित करने के लिए विनिर्मित हुई हैं । स्फूर्ति उत्पन्न करने वाली अपने अंदर की ध्वनि कंपनों स्वर लहरियों को जिन्हें विज्ञानवेत्ता ‘फिजियोलॉजिकल टैमर’ के नाम से संबोधित करते हैं, उन्हें हर व्यक्ति सुन और क्रमबद्ध कर सकता है । इससे न केवल जीवनी शक्ति की अभिवृद्धि की जा सकती है, वरन् चेतना के उच्च सोपानों पर आरुढ़ हुआ जा सकना संभव है । मंत्र-जप में इन्हीं स्वर लहरियों का तादात्म्य सूक्ष्म जगत की ध्वनियों से बिठाया जाता है, फलस्वरूप सूक्ष्म जगत की हलचलों को आसानी से सुना जा सकता हे ।

शरीर की स्थूल ध्वनियों को व्यवस्थित एवं लयबद्ध कर लेने पर न केवल शारीरिक आरोग्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है, वरन् मानसिक एवं आत्मिक स्तर की प्रतिभा और विभूतियाँ अर्जित की जा सकती हैं, क्योंकि सृष्टि के विभिन्न क्रिया-कलापों को संचालित करने वाली भौतिक शक्तियाँ तथा भावनात्मक अभिव्यंजनायें सूक्ष्म प्रकृति के अंतराल में मूलतः ध्वनि प्रवाह बन कर ही कार्य कर रही हैं । यह ध्वनि हर व्यक्ति के शरीर से भी उत्पन्न होती है, पर बहिर्मुखी प्रवृत्ति होने के कारण हम उन्हें सुन नहीं पाते । यदि अभ्यास किया जाय और नाद योग-साधना से सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों की शक्ति को जगाया जा सके, तो अनंत ब्रह्मांड के सूक्ष्म रहस्यों को आसानी से जाना-समझा जा सकता है । नादयोग सूक्ष्म ध्वनि प्रवाह को सुनने समझने की क्षमता का विकास करने की विधा है । इसके नित्य नियमित अभ्यास से स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर का विकास होता और जीवन की सफलता का रहस्य खुलता जाता है ।


सबसे बड़ा शत्रु है– असंयम

भगवान ने सृष्टि के अन्य जीव जंतुओं, पशु पक्षियों की ही भाँति मनुष्य शरीर को भी इस प्रकार बनाया है कि वह आजीवन स्वस्थ रहे । जो पशु दुर्भाग्य से मनुष्य के संपर्क में आ गये या दासता के बंधनों में बँध गये हैं-जिन्हें उसके जैसा अ प्राकृतिक आहार-विहार अपनाना पड़ता है वे तो कभी-कभी अवश्य बीमार पड़ते हैं, बाकी जंगलों में स्वच्छंद विचारने वाले अपनी इच्छानुसार आहार-विहार अपनाने वाले पशु पक्षी न तो कभी रोग ग्रस्त होते हैं और न बेमौत मरते हैं । बीमारियाँ प्रकृति की देन नहीं हैं । वह तो मनुष्य के अप्राकृतिक, अस्वाभाविक, बनावटी, चटोरे, विलासितापूर्ण और उद्धत आचरण के फलस्वरूप प्राप्त हुई सजाएँ हैं । यदि हम अपने चटोरेपन को काबू में रख सकें, औचित्य का, व्यवस्था का, नियमितता का, संयमशीलता का ध्यान रहे तो बीमार पड़ने का कोई कारण नहीं रह जाता । अप्राकृतिक विलासिता-पूर्ण जीवन की आदत डाल कर मनुष्य ने अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारी है, अपने-आप अपने स्वास्थ्य का सत्यानाश किया है, पीढ़ी दर पीढ़ी तक इस अव्यवस्था में ग्रसित रहने के कारण अब बीमारी और कमजोरी एक पैतृक धरोहर के रूप में उसके पल्ले बँध गई है । फिर भी यदि हम चाहें और थोड़ा सा अपने स्वभाव में परिवर्तन लें तो तीन चौथाई बीमारियों से अनायास ही पिंड छुड़ा सकते हैं ।

हमारे जीवन का सबसे बड़ा शत्रु असंयम है । उसके द्वारा जितनी हानि उठानी पड़ती है उतनी सौ दुश्मन मिलकर भी नहीं पहुँचा सकते । इंद्रियों की, मन की सामर्थ्य को सृजनात्मक कार्यों में प्रयुक्त करने की अपेक्षा जब हम उसका अपव्यय अनुपयुक्त दिशा में करते हैं तो वह शक्ति न केवल व्यर्थ ही चली जाती है वरन् उसके अभाव के कारण उत्पन्न हुई दुर्बलता से एवं दुरुपयोग के कारण उत्पन्न हुई हानिकारक प्रतिक्रिया से दुखद परिणाम ही सामने आते हैं । जीभ के चटोरेपन को ही लीजिये, वह मिठाई या मिर्च मसालों के लिये लार टपकाती है । मनुष्य का स्वाभाविक भोजन वह है जो बिना अग्नि का उपयोग किये, कम से कम अग्नि का उपयोग किये या कम से कम गड़बड़ी किये प्राकृतिक रूप में उपलब्ध होता है । इस दृष्टि से फल, शाक, दूध, दही, छाछ, मेवे आदि को उत्तम आहार माना जा सकता है । अन्न का उपयोग बिना अधिक तोड़ मरोड़ का होना चाहिए । खिचड़ी, दलिया, चावल, दाल, उबले हुए अन्न या मोटे बिना छने आटे की रोटी का उपयोग भूख से कुछ कम मात्रा में अच्छी तरह चबाकर नियत समय पर करने की आदत डाली जाय तो वह आसानी से पच सकता है, अच्छा रक्त माँस बनाकर शरीर का ठीक पोषण कर सकता है । पर हमारी जो चटोरेपन की आदत पड़ गई है वह गुण को नहीं स्वाद को देखती है । जो चीज जितनी ज्यादा पीसी, भुनी तली गई होगी, मिठाई, घी, मसाले आदि का जितना अधिक सम्मिश्रण होगा उतनी ही वह स्वादिष्ट लगेगी । इस स्वाद के वशीभूत होकर हम हानिकारक चीजें, अधिक मात्रा में उदरस्थ करते रहते हैं । फलस्वरूप अपनी पाचन क्रिया बिगाड़ लेते हैं उसके बिगाड़ने पर नाना प्रकार के रोगों का आक्रमण होना स्वाभाविक ही है ।

हकीम लुकमान का यह कथन अक्षरशः सही है कि “लोग अपने दाँतों से अपनी कब्र खोदते हैं ।” जीभ के असंयम के कारण हम प्रायः अपनी आधी आयु खो देते हैं और एक चौथाई जिंदगी बीमारियों का कष्ट उठाते हुए, हकीम डाक्टरों के आगे नाक रगड़ते हुए उनकी जेबें गर्म करते हुए व्यतीत करते हैं । यह हानि कुछ कम हानि नहीं है पर अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व करने वाला बेवकूफ आदमी जरा देर की जीभ की खुजली मिटाने के लिये खुशी-खुशी इतनी हानि सहन करता रहता है ।

जीभ ही नहीं अन्य इंद्रियों का असंयम भी न्यूनाधिक रूप से ऐसा ही घातक है । ब्रह्मचर्य की मर्यादाओं का उल्लंघन करते रहने के कारण आज अधिकाँश नर-नारी गुप्त रोगों से ग्रसित पाये जाते हैं । पुरुषों में स्वप्नदोष, प्रमेह, नपुँसकता, शीघ्रपतन, बहुमूत्र, सुजाक, उपदंश आदि और स्त्रियों में प्रदर, सोम गर्भाशय में सूजन, गांठें, मासिक धर्म के समय कमर में दर्द, अधिक रक्त स्राव, संतान न होना, होकर मर जाना, प्रसवकाल में भयंकर कष्ट आदि नाना प्रकार के जननेन्द्रिय संबंधी रोग घर कर लेते हैं । जो लड़के-लड़की विवाह से पूर्व बहुत स्वस्थ और सुन्दर थे वे दो चार वर्ष में ही अपना सत्यानाश इस असंयम की मूर्खता के कारण कर लेते हैं ।

असंयम मीठा विष है । यह मीठी छुरी की तरह बाहर से प्रिय लगता है, प्रसन्नतावर्धक दीखता है, क्षणिक सुख की अनुभूति कराता है परन्तु परिणाम में विष के तुल्य भयंकर सिद्ध होता है । मानसिक ऐयाशी भी ऐसी ही घातक है । चटोरेपन और कामुकता की भाँति ही उसका भी भयंकर प्रभाव होता है । शौकीन तबियत के लोग आये दिन ऐसे शगल तलाश करते रहते हैं जिससे मनोरंजन के साधन जुटते रहें । तीरतर-बाजी, कबूतरबाजी, मुर्गे लड़ाना, ताश, जुआ, चौपड़, शतरंज, शिकार खेलना, सिनेमा, नाटक, सरकस, नाच रंग आदि के कितने ही ऐसे फालतू शौक लोग अपने वक्त काटने, मन बहलाने की दृष्टि से पालते हैं, पर उनके कारण समय की बरबादी, आदतों के आदी होने की जो बुराई पैदा हो जाती है, उसके कारण उसका जीवन एक व्यर्थ की निकम्मी चीज बन जाता है । ऐसे लोग जीवन में महत्वपूर्ण कार्य करना तो दूर अपनी आजीविका को भी ठीक तरह से नहीं चला सकते । इन शौकों में इनके खर्च बढ़ते हैं, जिनकी पूर्ति संचित पूँजी को समाप्त करने के बाद, कर्जे लेने या चोरी, बेईमानी करके ही करनी पड़ती है ।

अपनी वासनाओं पर काबू रखना उन्हें कुमार्ग पर न जाने देना मनुष्य के शौर्य, पराक्रम एवं पुरुषार्थ का प्रधान चिन्ह है । एक दूसरे की मारकाट करने वाले लड़ाकू आक्रमणकारियों को बहुधा शूरवीर कहा जाता है । यह परिभाषा बिलकुल गलत है । यदि यही बात सही हो तो कसाई और मछुआरे सबसे बड़े शूरवीर माने जा सकते हैं । आत्म रक्षा के लिए शस्त्र उठाना दूसरी बात है, उद्दंडों को नियंत्रण में लेने के लिए दंड नीति अपनाना भी उचित है पर साधारणतया लड़ाकू प्रक्रिया की प्रशंसा धर्मशास्त्रों में कही नहीं है वहाँ तो अहिंसा का ही प्रतिपादन है । जिस युद्ध में निरंतर संलग्न रहने के लिए भगवान कृष्ण ने अर्जुन के बहाने जन साधारण को उपदेश दिया है उसमें मनः क्षेत्र में कुहराम मचाने वाले इस असंयम असुर के विरुद्ध लड़ते रहने का संदेश सन्निहित है । असुर के उपद्रव जब तक स्वच्छंद गति से चलते रहेंगे तब तक जीवन का न कोई सदुपयोग हो सकेगा और न उत्कर्ष । असंयम के चंगुल में फँसे रहना अपनी सारी महत्वपूर्ण शक्तियों की बरबादी करके जीवन को असफल बनाने के लिए बुराई के समक्ष आत्म समर्पण करने के बराबर है ।

आलस्य और प्रमाद में पड़े हुए हम अपने बहुमूल्य समय का सत्यानाश करते रहते हैं । जीवन की एकमात्र संपदा समय ही है । जिसने उसका सदुपयोग कर लिया वह विजयी बना, सफल हुआ, उन्नति के शिखर पर पहुँचा और जिसने लापरवाही के साथ वक्त काटा उसके पल्ले हाथ मलते रहना ही रहा । सबेरे जल्दी उठना, हर काम को फुर्ती और मुस्तैदी से निबटाना, अपने कार्यक्रम में आशावादी और उत्साही रहना, समय विभाजित करके हर काम ठीक समय पर करना । ऐसा दिव्य गुण है जिसे अपनाकर कोई सामान्य स्थिति में पड़ा हुआ मनुष्य भी प्रगति के साधन उपलब्ध करता हुआ विजय श्री का वरण कर सकता है ।

कई लोग असंयम के वशीभूत होकर दावतों में बहुत खा जाते हैं और पीछे कष्ट उठाते हैं । इसी प्रकार सामने उपस्थित सुखोपभोग की वस्तुएँ धन, ऐश्वर्य, शक्ति, सत्ता, प्रशंसा, प्रतिष्ठ आदि उपस्थित होने पर लोगों की नीयत बिगड़ जाती है । कितनी मात्रा उनके लिए पर्याप्त है कितने का उपयोग उनके लिए संभव है यह सोचने की अपेक्षा वे अधिकाधिक माया का लालच उसी प्रकार करने लगते हैं जैसे चटोरा आदमी अधिक खाकर मरता है । धन का अपने आप में कुछ महत्व नहीं, चाँदी, सोना या नोट कितनी ही मात्रा में क्यों न हो उससे सीधा लाभ कुछ भी नहीं, उनका सदुपयोग जीवनोत्कर्ष में जितना हो जाता है उतना ही उस धन का मूल्य है, शेष तो कूड़े करकट की तरह एक व्यर्थ पड़ी रहने वाली वस्तु है जिसे अंत में कोई न कोई अपना विराना मुफ्त के माल की तरह लूट ले जाता है । इस सचाई से अनभिज्ञ होने के कारण अनेकों व्यक्ति लालच के मारे अधिकाधिक धन संग्रह में लगे रहते हैं । कामवासना, मनोरंजन आदि के अधिकाधिक अवसर प्राप्त करने के लिए भी इसी तरह लोग बदहवास हो जाते हैं । यह चीजें एक सीमित मात्रा में ही आनंददायक हो सकती है, उनकी अति सब प्रकार घातक ही सिद्ध होती है । इसलिए भौतिक उन्नति के बारे में किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र को अधिक महत्वाकांक्षी न होना चाहिए । अपनी वासनाओं और तृष्णाओं पर मनुष्य को संयम ही करना चाहिए।


अब्राहम लिंकन (Kahani)

अब्राहम लिंकन अमेरिका में संयुक्त राज्य की परिषद के प्रधान हुए है । उनकी बचपन में कुछ पढ़ाई नहीं हुई थी और न उनके प्रभावशाली मित्र ही थे । अंत में जब वह अदालतों में वकालत का अभ्यास करने लगे तो राजनीतिक अभियोगों में निर्बल पक्ष वालो की ओर से वकालत करने लगे, जिससे उनका थोड़ा बहुत महत्व भी खतरे में पड़ गया । निस्सहायों का किसी राज्य के मुकाबले में पक्ष लेना कुछ साधारण साहस की बात नहीं है । ऐसे साहस पर अवलंबित रहते हुए वह एक दिन काँग्रेस के मेम्बर ही नहीं अपितु , प्रधान भी हो गये । अब्राहम लिंकन जिस बात को सत्य मान लेते थे, वह लोकमत से कितनी ही प्रतिकूल हो, उसे सम्पूर्ण किये बिना नहीं रहते थे । उस समय अमेरिका में गुलामी की प्रथा प्रचलित थी । गुलामी के मुकदमे अदालत में बहुत आते थे । किसी भागे हुए गुलाम के मुकदमे को जब कोई भी वकील हाथ में नहीं लेता था तो लिंकन उस गरीब का वकालत नामा प्रस्तुत करते थे । गुलामों के वकील होने के कारण उनसे गोरे लोग बहुत घृणा करते और उनकी उन्नति में बाधाएँ डालते थे । परन्तु अब्राहम लिंकन आपत्तियों से घबराये नहीं वे लोगों का हृदय इस प्रकार जीतकर महान बने ।


लालच की हथकड़ी-व्यामोह की बेड़ी

वन्य पशु झुँड बनाकर साथ-साथ रहते, एक दूसरे का अनुकरण करते हुए जीवन भर भटकते और विचरते रहते हैं । उनका कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता । पक्षियों का भी यही हाल है । जिन साथियों के साथ घुल मिल जाते हैं उनके समीप घोंसला बनाते हैं एक साथ चलते और उड़ाने भरते हैं । उन्हें यह विदित नहीं होता है कि वे कहाँ और क्यों जा रहे हैं । चींटी, दीमक जैसे कीड़े-मकोड़े भी साथियों का अनुकरण करते रहने की आदत में ही मजबूर होते हैं । लक्ष्य सोचने के लिए दूरदर्शिता भी विवेकशीलता और परिष्कृत सूझ-बूझ चाहिए । उनके अभाव में जीवधारी भी किसी उद्देश्य का निर्धारण और उसे प्राप्त करने का नियोजन नहीं कर पाते ।

भेड़े इस आदत के लिए बुरी तरह बदनाम है । आगे चलने वाली भेड़ का मुँह जिस भी ओर उठ जाता है उसी दिशा में उनका पूरा समूह चल पड़ता है । किसी गड्ढे में अगली भेड़ गिरते ही पीछे वाली सब उसी में गिरती चली जाती हैं । किसी को यह नहीं सूझता कि यह अनुकरण उचित है या नहीं । अंधानुकरण में विचारशीलता का प्रयोग करने की आवश्यकता तो नहीं पड़ती, पर उस झंझट से बचने वाले दूसरे अनेक प्रकार के खतरे उठाते और अंततः भारी घटे में रहते हैं । घुमंतू गाड़ी लुहारिया बड़ी संख्या में होते हुए भी अपने समुदाय का परंपरागत कार्य ही अपनाए रहते हैं । यों इस प्रकार जीवनयापन में उन्हें कम कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता और उन सुख-सुविधाओं से वंचित ही बने रहते हैं जो सूझ-बूझ से काम लेने पर नए मार्ग दिखा सकती थी । नए उपाय सुझा सकती थी । प्रगति के पथ पर चल सकने का सहज ही पथ प्रशस्त होकर सकती थी ।

मनुष्य का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही विचित्र है जो अपने से भारी भरकम लगने वाले लोगों की नकल बनाता है और उस मार्ग पर चल पड़ता है जिस पर चलने वाले लोग समझदारी का दावा करते और अपेक्षाकृत अधिक सफलता अर्जित करने की बात कहते हैं । स्वतंत्र चिंतन के नीर-क्षीर विवेक की प्रतिभा किन्हीं विरलों में ही पाई जाती है । अधिकतर लोग उसी दिशा में चल पड़ते हैं जिस पर कि समीपवर्ती लोगों को चलते देखते हैं ।

इन दिनों लोगों पर फयली बुखार की तरह आवेश सवार है कि जितनी जल्दी जितना अधिक वैभव कमाया और मजा उड़ाया जा सके वही कर गुजरना चाहिए । ऐसे ही होता देखा भी जाता है । इसलिए सामान्य मनोबल वाले औसत दर्जे के आदमी उसी मार्ग पर चल पड़ते हैं । बिना इस बात का विचार किये कि यह रास्ता कहाँ पहुँचता है और लाभ की लालसा में कहीं विपत्तियों के दलदल में तो नहीं फँसा देगा । उतावले लोग सुविधा संपन्नता के प्रलोभनों में कुमार्ग अपनाने में भी नहीं चुकते, पर नासमझी इतनी ही रहती है कि क्षणिक लाभ के लोभ में फँसकर कहाँ चिरस्थाई मुसीबत के कटघरे में पैर फँसा देने की भूल तो नहीं हो रही है । उतावली का आवेश ऐसा होता है, कि दूरगामी परिणामों के संबंध में विचार करने की फुरसत ही नहीं मिलती । ऐसी रीति-नीति अपनाली जाती है जिसके कारण कुछ क्षण शौक-मौज के लाभ सफलता के सपने देखते रहने के उपराँत जब आँख खुलती है, तब प्रतीत होता है कि भटकाव के कुचक्र में फँस कर कितना अनर्थ कर लिया गया । समझदार समझे जाने वाले मनुष्य की अदूरदर्शिता ही उसके लिए विपत्ति का सबसे बड़ा कारण बनती है । अधिकाँश इसी प्रकार के दुष्परिणाम भुगतते, रोते-कलपते किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं । अंधानुकरण करने वाले भी इस मुसीबत से बच नहीं पाते

बरगद का बीज समय पर उगता है और विशालकाय वटवृक्ष बनने में लंबा समय लेता है । नारियल के पेड़ भी लंबे समय उपराँत फलते हैं पर जिन्हें इतना ठहरने के लिए धीरज नहीं, वे हथेली पर सरसों जमाकर दिखा देने वाले बाजीगरों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते हैं कुछ हाथ नहीं लगता तो यह नहीं समझ पाते कि इस दुनिया के बाजार में उचित मूल्य देकर ही सब कुछ खरीद सकने की प्रथा है । जो बिना मूल्य या कम मूल्य में बहुत कुछ बटोर ले चलने की मानसिकता बनाए होते हैं , वे चोरों और उठाईगीरों की तरह पकड़े जाते हैं और प्रताड़ना, भर्त्सना सहने के साथ-साथ उस प्रामाणिकता को भी गवाँ बैठते हैं, जिसके सहारे आज नहीं तो कल बहुत कुछ पाये, कमाये जाने की आशा संभावना तो बनी भी रह सकती थी ।

जल्दी धनवान बनने के लिए अनाचार पर उतारू होने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है भी नहीं । उचित श्रम करके उचित पारिश्रमिक उपलब्ध करना और उसमें से मितव्ययितापूर्वक खर्च चलाने के उपराँत जो बचता है उसमें से श्रम, समय और साधना को इस विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने वाले परमार्थ में ही खपाना पड़ता है । ऐसे लोग औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में संतुष्ट रहने और धनाध्यक्ष बनने के सपने नहीं देखते । ऐसे लोगों को आत्म संतोष, लोक सम्मान का लाभ तो प्रचुर मात्रा में मिलता है, पर उस स्तर की संपदा संग्रह करना बन नहीं पड़ता जिसके सहारे मनमर्जी गुलछर्रे उड़ाए जा सकें और उत्तराधिकारियों के लिए सात पीढ़ी तक बैठ कर खाते रहने के लिए दौलत के भरे हुए भंडार छोड़कर विदा हुआ जाय ।

नासमझी की लंबी शृंखला की प्रथम कड़ी है-लोभ लिप्सा । गुजारा तो थोड़े से साधनों में भी हो सकता है । उतना कमाने के लिए थोड़े समय का श्रम पर्याप्त होना चाहिए । पशु पक्षियों को पेट भरने के लिए दिन भर खोज तलाश में भागना-दौड़ना पड़ता है । पर मनुष्य के कई फुट लंबे दो हाथ और जादुई कुशलता से भरा-पूरा मस्तिष्क मिल जुलकर एक फुट आकार के पेट को भरने के लिए आधा किलो खाद्य सामग्री थोड़े ही समय में सहज कमा सकता है । फिर उसके पास समय श्रम, कौशल और साधन इतनी मात्रा में बनते रहने चाहिए जिसका उपयोग मानवी गरिमा के उपयुक्त पुण्य-परमार्थ में कर सकने के लिए पर्याप्त फुरसत और सुविधा रहनी चाहिए । पर देखा गया है कि बहुसंख्यक लोग निर्वाह मात्र में संतुष्ट न होकर संपदा संचय के सपने ही देखते रहते हैं । इसी उधेड़बुन में सारा समय खपाते रहते हैं । इन दिनों कुछ अपवाद जैसे क्षेत्रों को छोड़कर शेष संसार में ऐसी सुविधा है नहीं कि ईमानदारी और परिश्रम की कमाई स्वीकार करने वाला व्यक्ति धनाढ्य बन सके । जो इस मर्यादा पालन से संतुष्ट नहीं रह सकते उन्हें कुछ न कुछ ऐसे तरीके अपनाने पड़ते हैं जिन्हें अनाचार की श्रेणी में गिना जा सके । ॐ ची दीवार उठाने के लिए कहीं दूसरी जगह से मिट्टी उठाने के लिए खाई खोदनी पड़ती है । एक की अमीरी भोगने के लिए असंख्य को गरीब रहने के लिए विवश होना पड़ता है । स्रष्टा के इस संसार में इतने ही साधन पैदा किये हैं कि सब लोग मिल बाँटकर खाते हुए प्रसन्नता और सहकार का जीवन जी सकें । इस व्यवस्था का व्यतिरेक करने पर मनुष्य स्वयं कष्ट उठाता और दूसरों को भी ऐसी कठिनाइयों में रहने के लिए विवश करता है । इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए धर्म अनुबंधों में ‘अपरिग्रह’ को प्रमुख माना गया है । नीति पूर्वक कमाया तो अधिक भी जा सकता है, पर उसमें से उतना ही खर्च निजी प्रयोजनों में करने की छूट है जितने में औसत नागरिक को संतोष करना पड़ता है । बचत को तो विश्व उद्यान को अधिक सुरम्य बनाने के लिए सत्प्रवृत्ति संवर्धन में ही लगाते रहा जा सकता है ।

मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में जो अधिक सुविधा-साधन अर्जित करने का मौका मिलता है, वह सब उसका निजी पुरुषार्थ ही निमित्त कारण नहीं, वरन् असंख्यों का उदार सहयोग उसमें जुड़ा होता है । भोजन, वस्त्र तथा दैनिक उपयोग में काम आने वाले उपकरण मनुष्य के अपने बनाये कहाँ होते हैं ? इन हर उपयोगी पदार्थों के पीछे असंख्यों का श्रम कौशल जुड़ा होता है । भाषा-लिपि पर आधारित शिक्षण का ढांचा भी पीढ़ी दर पीढ़ी अनेक विचारशीलों के सहयोग से ही खड़ा हो पाया । गृहस्थ बनाने वाली जीवन संगिनी पत्नी भी तो किसी दूसरे परिवार से ही आई होती है । इस प्रकार सम्पदा संचय तो दूर दैनिक निर्वाह के लिए भी मनुष्य असंख्यों के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोग पर पूरी तरह निर्भर है । जबकि पशु-पक्षी अपने ही बलबूते अपनी जिंदगी पार कर लेते हैं । वस्तुस्थिति को समझने वाले जानते हैं कि मनुष्य मात्र सामाजिक प्राणी ही नहीं है, वह समाजगत ऋणों से भी लदा है और उससे उऋण होने का एक ही तरीका है कि उसकी उपलब्धियों का एक बड़ा भाग लोककल्याण के लिए नियमित रूप से नियोजित रहे । किंतु यह ऋण मुक्ति का कर्तव्य पालन उनसे बन ही नहीं पड़ता । जो लोभ लिप्सा के निविड़ बंधनों में सिर से पैर तक जकड़े पड़े है, उनको इन बंधनों को ढीला करने की इच्छा नहीं होती । ऐसी दशा में लालची के लिए यह असंभव ही बना रहता है कि सामाजिक ऋण मुक्ति की दृष्टि से जीवन संपदा को सार्थक बनाने की दृष्टि से अपने को लोक मंगल के निमित्त किये जाने वाले परमार्थ प्रयोजनों में कुछ भूमिका निभा सके । कदाचित कुछ इच्छा उठे भी तो यह सदा अतृप्त रहने वाली तृष्णा ही ऐसी रोक लगा देती है जिसे व्यस्तता और अभावग्रस्तता का नाम देकर आत्म प्रवंचना करने और लोगों को बहकाने वाले बहाने बनाने के कितने ही तर्क सूझ पड़ते हैं ।

धन का संचय तो कितनी ही बड़ी मात्रा में बिना उचित-अनुचित का विचार करते हुए किया जा सकता है, पर उसके उपयोग के लिए एक छोटी सीमा मर्यादा निर्धारित है । कोई अमीर भी एक मन भोजन नहीं कर सकता । सौ फुट लंबे पलंग पर सोने और उतना ही बड़ा बिस्तर बिछाते किन्हीं धनिकों भी नहीं देखा जा सकता । अधिक उपार्जन और अधिक संग्रह मन बहलाने भर का है अंततः वह इसी धरती पर पड़ा रह जाता है जिस पर कि वह अनादि काल से पड़ा हुआ है । और अनंत काल तक पड़ा रहेगा । संपदा का इस हाथ से उस हाथ तक हस्तान्तरण तो हो सकता है, पर इसमें शरीर निर्वाह में काम आने वाले साधनों को छोड़कर शेष को इसी दुनिया की सुरक्षित पूँजी के रूप में जहाँ का तहाँ छोड़ना पड़ता है । यह तथ्य सामान्य समय में समझ में नहीं आता पर जब हिसाब बन्द कराने का समय आता है कि कमाने के नाम पर आत्म प्रवंचना और पापों का पिटारा सिर पर लादे जाने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता । बादशाह सिकन्दर ने मरते समय अपने दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकाल दिये थे कि अपार धन संपदा का स्वामी होते हुए भी बिना एक पाई साथ लिये खाली हाथ चला गया ।

भोजन के रस को आंतें निचोड़ लेती है । जो कचरा बनता है उसे मल रूप से बाहर निकालना पड़ता है यदि कोई खाता तो रहे पर मल विसर्जन से इनकार कर दे, तो उसे पेट फूलने, शूल उठने, उल्टी, दस्त चल पड़ने जैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा । धन संचय के संबंध में ठीक यही बात लागू होती है । वह अनावश्यक रूप से जहाँ भी जाना होता है वहाँ किसी न किसी प्रकार की विकृति खड़ी करता है । इनमें से अपव्यय और दुर्व्यसन मुख्य है । रोका हुआ पानी कहीं न कहीं से बाहर निकलने के लिए रास्ता बनाता है । यदि उसके लिए उचित मार्ग उपलब्ध न हो तो फिर अनुचित मार्ग अपनाने की एक मात्र मजबूरी ही सामने रहती है । बाद में होने वाली हानियाँ जिसने देखी हैं वे जानते हैं कि रुकावटों से बाधित होकर जल संपदा जैसी विभूति कितने अनर्थ करने पर उतारू हो जाती है । अनावश्यक मात्रा में जमा हुए धन के संबंध में भी यही बात शतप्रतिशत लागू होती है ।

पेट में जमा अनावश्यक कचरा यदि सही रीति से बाहर न निकले तो उल्टी दस्त चल पड़ने पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए । दुर्व्यसन ही वे कृमि कीटक हैं जो गंदगी को चाटकर सफाई का रास्ता बनाते हैं । शेखी खोरी के उन्माद में व्यक्ति कितने प्रकार के अपव्यय करता है । पैसे की जगह दस पैसे खर्च होते देख कर किसी प्रकार उसे राहत मिलती है । इस लिए जहाँ धन जमा होता है वहाँ नोटों से बनी फुलझड़ियाँ जलाकर चित्र-विचित्र प्रकार के कुतूहल दर्शाते दीखते हैं । नाली में से जब तक गंदगी साफ नहीं कर दी जाती तब तक उसके प्रवाह में अवरोध बने रहने से दुर्गंध भरी कीचड़ की कुरूपता ही बिखरती रहती है ।

विपुल मात्रा में धन कमाने की परिस्थितियाँ सर्वसाधारण के सामने इस व्यवस्थित संसार में हैं ही नहीं । ललचाते रहने वालों में से अनुकूलता न मिलने पर निराश ही रहना पड़ता है । इस दैनिय स्थिति में फँसे हुए लोगों की मुसीबतें और भी अधिक है जो कमा तो लेते हैं पर उसकी सुरक्षा रखने और सदुपयोग करने में समर्थ नहीं है ।

धनाढ्य बनते ही पड़ोसी, संबंधी तक ईर्ष्या से जलने लगते हैं और अपहरण करने से लेकर बरबादी करने तक षड्यंत्र रचते हैं । वफादार समझे जाने तक जान के ग्राहक होते हैं । ऐसों के मित्रों को दगाबाजी करते देर नहीं लगती । संबंधित लोगों में से हर कोई चाहता है कि छत्ते में जमा शहद लूट लेने में किसी प्रकार उसकी घात लग सके । किसी की बढ़ोत्तरी को देखकर प्रसन्न होने वाले संसार में हैं कहाँ ? जमा पूँजी पर घात लगाने के लिए चोर-डाकुओं से लेकर चापलूसों और दबोचने वाले मित्र वर्ग, मरी लाश पर मँडराने वाले गिद्ध कौओं की तरह मँडराते और कुत्ते, सियारों की तरह चट करने की तरह झपट ही पड़ते हैं । चंदे के नाम पर आग्रह करने वाले, रिश्वत के नाम पर खून निचोड़ने वालों की कमी नहीं रहती । इसके अतिरिक्त बीमारी, मुकदमेबाजी, ऐयाशी, नशेबाजी जैसे दुष्प्रवृत्तियाँ भी अपने ढंग से गन्ने का रस पाने के लिए कुछ न कुछ दाँव घात लगाते ही रहते हैं ।

कहते हैं अमीरों को नीति-अनीति का भेद छोड़कर अधिकाधिक कमाई के लिए बुरी तरह पिसते-खटते हुए जिंदगी बितानी पड़ती है । उत्तराधिकार जमाने वाली पीढ़ी उस मुफ्त के माल को बेदर्दी से खर्च करती और दुर्व्यसनों में उसे जल्दी से खर्च डालने के लिए आकुल रहती है और थोड़े ही समय में बिना मेहनत की कमाई कपूर की डली की तरह हवा में गायब हो जाती है । तीसरी पीढ़ी के समर्थ होते-होते माल-असबाब खतम हो चुका होता है, जैसे आलस्य, प्रमाद, अपव्यय, दुर्व्यसन जैसे दुर्गुणों पूर्वजों की विरासत रूप में यथावत् बने रहते हैं । ऐसी दशा में गाड़ी धकेलने के लिए उन्हें दादागीरी करने के लिए चोरी, उठाईगीरी जैसे छल-प्रपंचों का आश्रय लेना पड़ता है । जेल जाने से बच भी जाये तो उन्हें इतना जलील होना पड़ता है कि कोई भला आदमी उन्हें पास बैठने देने तक में कतराता है । धन संचय की ललक अक्सर उत्तराधिकारियों के प्रति अपनी मोह-ममता जताते हुए , अपनी कर्म पद्धति की आवश्यकता जताते हुए देखे जाते हैं । पर होता ठीक उलटा है । गरीबी और कठिनाइयों से जूझने वाली पीढ़ी प्रतिभावान बनती और कई प्रकार की परिश्रम जन्य सफलताएँ प्राप्त करती देखी जाती है जबकि अमीरों की पीढ़ियां अपने दुर्भाग्य को कोसते हुए आम तौर से देखी जाती हैं । उपकार समझकर बढ़ाये हुए हाथ वस्तुतः परिणाम अपकार जैसे ही होते हैं ।

बाहर से चमकने वाली हर वस्तु भीतर से वैसी ही हो, यह आवश्यक नहीं । साँप, बिच्छू, काँतर, गोह जैसे रेंगने वाले जंतुओं की संरचना देखने में कैसी सुहावनी लगती है, पर उनके भीतर जो विष भरा रहता है वह समीप आने वाले को बेहतर सताता है । धन की अपनी उपयोगिता हो सकती है, पर उसे अनावश्यक मात्रा में जमा करते रहना या बढ़ाते रहना ऐसा बुद्धि विपर्यय है जिसमें बाहरी आकर्षण कितना ही क्यों न हो, पर अन्ततः उस कुचक्र में बेतरह उलझने की परिणति ऐसी है जिसके लिए खेद और पश्चाताप ही सहना पड़ता है।

कहा जा चुका है कि यदि औसत नागरिक निर्वाह स्तर से अधिक जमा भी है, तो उसका एक ही उपयोग है कि उसे परमार्थ प्रयोजनों में हाथों हाथ लगाते रहा जाय । पिछड़ों के बढ़ाने-बिगड़ों को बनाने, गिरों को उठाने और उठों को अच्छाई के लिए सत्प्रवृत्ति संवर्धन के पक्षधर ऐसे अनेकों काम करने के लिए पड़े हैं जिसमें भामाशाह, कर्ण, अशोक जितना वैभव भी कम पड़ता है । उनके लिए उदारता अपनाई जा सके तो ही समझना चाहिए कि धन, उपार्जन में लगा श्रम, सार्थक हुआ । अन्यथा उसे अनावश्यक संचय निष्ठुरता का प्रतीक ही समझा जाएगा । जिसमें सद्भावना का तिरस्कार और अपने लिए तृष्णा का जलन उत्पन्न करने वाले अनर्थ का आह्वान ही कहा जा सकता है ।

जीवन-संपदा महत्वपूर्ण कार्यों के लिए धरोहर रूप में मिली है, उसे उन्हीं प्रयोजनों में खर्च किया जाना चाहिए जिसके निमित्त विश्वस्त अधिकारी समझकर नियंता ने सौंपी है । विश्व उद्यान को अधिक सुरम्य और अधिक सुविकसित करने के लिए ही वे विभूतियाँ मनुष्य को सौंपी गई हैं जिससे स्रष्टा के अन्य सभी प्राणी वंचित हैं । इसमें न तो न्याय की सर्वव्यापी, व्यवस्था समझे जाने वाले स्रष्टा एक जीव विशेष के साथ बरता गया पक्षपात है और न मनमर्जी बरतने के लिए अनायास ही हाथ लगा अनियंत्रित अधिकार । जो जीवन का उसके वास्तविक स्वरूप एवं उद्देश्य को न समझकर लोभ-लालच जैसी विडंबना में उसे गवाँ देते हैं उनके लिए यही कहा जा सकता है कि असीम अनुग्रह के रूप में मिला दैवी अनुदान का मूल्य महत्व न समझा जा सका और हीरक हार को टूटे काँच के अकड़ों की तरह कौड़ी मोल बेच दिया गया ।

वासनाएँ इतनी और ऐसी हैं जिन्हें एक जन्म में पूरी कर सकना किसी भी तरह संभव नहीं । तृष्णा की खाई इतनी गहरी है कि उसमें कुबेर के खजाने उड़ेल देने पर भी भरा जा सकना संभव नहीं । अहंकार किस बात का किया जाय ? जब सृष्टि में एक से एक बढ़कर संपन्न-समर्थ और विशिष्ट भरे पड़े है, तब राई जैसी उपलब्धियों को पाकर इतराने-इठलाने का क्या तुक ? अहंकार रावण तक का टिक न सका, तब सामान्य जन यदि यह सोचने लगे कि उनका बड़प्पन जन मान्यता पर छाया रहेगा तो उस चिंतन को उपहासास्पद होने के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है ?

मानव जीवन को सुन दुर्लभ अलभ्य अवसर माना गया है । इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग बन पड़ना ही दाता और ग्रहीता के लिए गर्व-गौरव की बात हो सकती है । स्रष्टा का युवराज कहाने वाला मनुष्य यदि उसके विराट वैभव विशाल विश्व की सर्वतोमुखी प्रगति में सहयोगी बने तभी उसके पद एवं गौरव की सार्थकता है अन्यथा पेट और प्रजनन की आपूर्ति तो कृमि-कीटक भी करते रहते हैं । यदि उतने भर के लिए इस अलभ्य अवसर को कोल्हू के बैल की तरह पिसते और पीसते गवाँ दिया गया तो समझना चाहिए कि समझदार कहलाने और समझे जाने वाले मनुष्य ने परले सिरे की नासमझी का परिचय दिया ।

जीवन संपदा पाने पर गर्व गौरव अनुभव करने का अधिकार मात्र उन्हीं को है जो उपलब्ध क्षमता साधन, संपदा और लंबी अवधि का उपयोग मानवीय गरिमा को अक्षुण्ण रखने में ही नियोजित करते रह सकें अन्यथा दुरुपयोग की नीति अपनाने पर तो अमृत भी विष बन जाता है । लालच की हथकड़ी, व्यामोह की बेड़ी, और अहंकार की तौक से अपने आपको अपने हाथों कस कर बाँध लेने और दुर्व्यसनों की विषम परिस्थितियों में सांसें पूरी कर जाना दुःखदायी दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है ।


विख्यात अमेरिकी लेखक अर्नेस्ट हैमिग्वे (Kahani)

प्रतिभा योग्यता,सफलता के बीज प्रत्येक मानव के अंतराल में छुपे हुए हैं । जरूरत उन्हें अंकुरित करने पुष्पित-पल्लवित करने की है । इसके लिए जो कला आवश्यक है, वह है परिश्रमशीलता और आत्म विश्वास।

विख्यात अमेरिकी लेखक अर्नेस्ट हैमिग्वे का यह कथन विचार मात्र नहीं है, वरन् यह एक ऐसा तथ्य है जो उनके निजी जीवन में घटित भी हुआ । इसी के आधार पर उन्होंने साधारण परिवार में जन्म लेकर भी साहित्य सृजन, युद्ध, मुक्के बाजी तीनों विरोधी दिखने वाले क्षेत्रों में एक साथ सफलता प्राप्त की ।

साहित्यकार होते हुए भी हैमिग्वे की मनोवृत्ति एक सिपाही की थी । पल-पल भर कठिनाइयों से जूझने को वह प्रतिभा संवर्धन का सबसे बड़ा साधन मानते थे । अन्याय, अत्याचार, शोषण, गरीबी, उत्पीड़न, स्वार्थ घृणा आदि से लड़ना उनका काम था ।

‘सन् आँलसो राइजेज’ एवं ‘फैयरवेल टू आर्म्स’ आदि कृतियों में इसी के स्वर उभरे हैं । उन्होंने अपनी लेखक शैली के बारे में लिखा है-दुनिया में सबसे कठिन काम है ईमानदारी और सरलता के साथ मानव में निहित शक्तियों के जागरण की कहानी कहना । इस कठिन काम को उन्होंने बखूबी पूरा किया ।

सन् 53 में उन्हें अमेरिका का सबसे बड़ा पुरस्कार पुलिट्जर पुरस्कार तथा 54 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। पुरस्कार लेते समय उन्होंने स्पष्ट किया इस तरह की सफलताओं के बीज प्रत्येक के अन्दर हैं- बशर्ते वह उन्हें परिश्रम व आत्म विश्वास के बल पर जगाए ।


परंपराओं की तुलना में विवेक सर्वोपरि

सोच और आकाँक्षा मानवी प्रगति के महत्वपूर्ण आधार स्तंभ है । यदि समय के साथ-साथ नई सोच और इच्छा न जगे, तो मनुष्य कल वाली पिछड़ी स्थिति में पड़ा रहे । उसकी आज की विकसित स्थिति विगत के प्रगतिशील चिंतन की ही परिणति है ।

एक समय था, जब स्वतंत्र चिंतन पर पूर्ण पाबंदी लगी हुई थी । तब इस पर धर्मतंत्र का कठोर नियंत्रण था । धार्मिक केन्द्र ही सत्य-तथ्य का, सही-गलत का निर्णय निर्धारण करते थे । जो इन्हें चुनौती देते, वे यातना-गृहों में गंभीर यंत्रणा के शिकार होते अथवा जान से ही हाथ धो बैठते । इतने पर भी लोग इन धर्मध्वजियों की परवा किये बिना अपनी स्वतंत्र विचार-चेतना समय-समय पर प्रकट करते रहे । यह बात और है कि इसका दुसह्य दुष्परिणाम उन्हें भुगतना पड़ता, किंतु इतने से ही सत्य के प्रसार को न तो रोका जा सका है, न आने वाले समय में ही ऐसा किया जा सकेगा । जो इसका दुस्साहस करेंगे वे प्रबल झंझावातों के समक्ष तिनके की तरह अपना अस्तित्व खो बैठेंगे । वैज्ञानिक प्रगति का इतिहास इसका साक्षी है । मध्य युग में जब विज्ञान फल-फूल रहा था, उन दिनों पश्चिमी जगत में धार्मिक कट्टरता इस कदर बढ़ी-चढ़ी, थी कि बात-बात पर वैज्ञानिकों को धार्मिक न्यायालयों, गिरिजाघरों की शरण में जाना पड़ता और वहाँ नियुक्त धर्माध्यक्षों की सलाह सम्मति लेनी पड़ती । जो बात धर्म के विरुद्ध होती अथवा तत्कालीन स्थापित मान्यता के विपरीत जान पड़ती, उस पर कड़ी आपत्ति प्रकट की जाती और उक्त प्रसंग को अपने विचार और पुस्तक से निकाल देने की सलाह दी जाती । जो इस सुझाव को मान लेने के लिए राजी हो जाते, उन्हें माफ कर दिया जाता, पर जो सच्चाई की दुहाई देते हुए प्रचलित अवधारणा को स्वीकारने से इनकार कर देते, अपनी ही बात पर अड़े रहते, उन्हें एक प्रकार से जीवन से हाथ धोना पड़ता, क्योंकि तब ऐसे प्रकरणों के एकमात्र न्यायकर्ता चर्च ही होते । राजा भी इन मामलों में निरपेक्ष बने रहते । ऐसी स्थिति में अधिकृत व्यक्तियों को इसका पूर्ण अधिकार होता कि प्रचलन के विरुद्ध बोलने-चलने वालों को चाहे जो दंड सुना दिया जाय, उस पर आपत्ति करने की किसी की हिम्मत नहीं होती, भले ही आवाज उठाने वाले व्यक्ति के मत मान्यता पूर्णतः सही क्यों न हों, पर तब सही-गलत की किसे चिंता थी ! जहाँ काना राजा और अंधी पूजा हो, वहाँ के लिए वह एक आँख वाला ही सर्वोच्च व सर्वोपरि होता है और फिर सिर के ऊपर लटकती नंगी तलवार ! यह दोहरी स्थिति बोलने कहाँ देती ! मुँह बंद करने के लिए ही विवश करती है । यह सब होते हुए भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि प्रखर सत्य को बनावटी बादल देर तब ढके रह सकेंगे । ग्रहण तो सूर्य में भी लगता है, पर वह होता क्षणिक ही है, उसकी जाज्वल्यता को देर तक छिपाये रखने की सामर्थ्य पृथ्वी में कहाँ है ! रात आती और बीत जाती है । क्षणभंगुर अंधड़ देर तक नहीं टिकती । शाँत हवा उसके जोश को क्षणमात्र में दुरुस्त कर देती है । कठिनाइयाँ आती और अपनी मौत मरती हैं । टिकाऊ तो वही होते, जो सत्य और शाश्वत हैं । असत्य का संसार में स्थान कहाँ है ? अंधविश्वासों के बाजार कुछ दिनों तक गर्म अवश्य होते हैं, किंतु स्थिर विश्वासों के आगे उनकी चलती कहाँ है ?

विज्ञान के समझ पिछले दिनों ऐसी ही समस्याएँ प्रस्तुत हुई । जो सत्य था, उसे पुरातन पंथियों ने प्रचलित मान्यता के आधार पर असत्य घोषित कर दिया और मिथ्या की विजय-पताका फहरायी जाने लगी । इतने पर भी वैज्ञानिक सच्चाई को सामने लाने वाले मूर्द्धन्य पीछे हटें नहीं, निर्भीक सेनानायक की तरह अपने अन्वेषण - अनुसंधान के दौरान अपने उपलब्ध तथ्य पर वे अड़े रहे। परिणाम ? जैसी आशा थी, वैसा ही हुआ । काँपरनिकस से लेकर ब्रूनों तक को असह्य त्रास झेलने पड़े । गैलीलियो को अस्सी वर्ष की अवस्था में बंदी-ग्रह की राह पकड़नी पड़ी, जो अंततः मृत्यु-गृह भी साबित हुआ । ब्रूनो को तो कट्टरतावादियों ने जिंदा जला दिया । इनका दोष मात्र इतना था कि इनने मूढ़मतियों को मूढ़ बात जाँचा-परखी विज्ञान सम्मत बात बताने की कोशिश की थी, जो उनके गले न उतरनी थी, न उतर सकी किंतु इन वैज्ञानिकों का बलिदान अकारथ चला गया, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता । जल्द ही वह समय भी आया, जब तथ्य को तर्क और प्रमाण की कसौटियों पर कसने के उपराँत ही सत्य-असत्य घोषित करने पर बल दिया जाने लगा । इस क्रम में एक समय ऐसा आया, जब किसी भी बात को तर्क की तराजू और प्रमाण के पैमाने पर तौलने-नापने के पश्चात् ही उसे तथ्य-सत्य की मान्यता मिल पाती । जो इन मानदंडों पर खरे नहीं उतरते, उन्हें ठुकरा दिया जाता । इस प्रकार उपजी वैज्ञानिक सोच और प्रगति की आकाँक्षा ने विज्ञान को आज की उस अति विकसित अवस्था में पहुँचा दिया, जहाँ मूढ़ता के रहते न तो पहुंच पाना सरल था, न संभव । आज भी उसमें इतना लचीलापन विद्यमान है कि जिसे सम्प्रति सौ टंच खरा माना गया है, उसे ही कल यदि किसी प्रकार त्रुटि पूर्ण ठहरा दिया जाय तो उसे भी त्यागने के लिए वह हर वक्त तैयार रहता है । उन्नति-प्रगति का यही रहस्य है । उत्तुँग ऊंचाइयों वाली नई मंजिल तक पहुँचने का यही राजमार्ग है ।

शल्य-चिकित्सा के प्रगति क्रम की भी कुछ ऐसी ही कथा-गाथा है । रोमन साम्राज्य के पतन के साथ ही सर्जरी ने उस काल में जो समृद्धि अर्जित की थी, धीरे-धीरे कर वह लुप्त होती चली गई । बाद के युग में उसका जो अस्थि-अवशेष बचा, उसने भी अपनी मर्यादा खो दी । वैज्ञानिक सोच पर तो एक प्रकार से अंकुश लग चुका था । चहुँ ओर अंधमान्यता और अंधपरंपरा के घनघोर घटाटोप थे । ऐसे में उपचार के साधन मात्र औषधियाँ और अंधविश्वास रह गये थे, पर जटिल रोगों का इलाज केवल दवाइयों के सहारे तो हो नहीं सकता । यह जरूरी तो है, किंतु उनसे भी अधिक आवश्यक उन सड़े-गले अंगों की काट-छाँट है, जो श्रीर में विषाक्तता पैदा करते हैं । इस अपरिहार्यता की अनुपस्थिति में दवा भी नगण्य जितनी साबित होती है । जब इस जटिलता के कारण बड़े पैमाने पर मौतें होने लगीं, तो तत्कालीन लोकमानस पर दबाव पड़ा । इससे बचने-बचाने के तरीके सोचे जाने लगे । ऐसे में समय की माँग ने एक नई किस्म के शल्य-चिकित्सकों को जन्म दिया । कुछ हज्जामों ने नाई का अपना पैतृक धंधा छोड़कर सर्जरी अपना ली । उस्तरा चलाना तो उन्हें भली-भाँति आता ही था । शरीर संरचना संबंधी रही-सही ज्ञान की कमी कब्रिस्तानों के शवों पर हाथ साफ कर पूरी कर ली । इस प्रकार वे काम चलाऊ सर्जन बन गये । अब उनका काम हजामत बनाना नहीं, औरों की जेबें हल्की करना हो गया । नुक्कड़- चौराहों पर वे मजमा लगाते और कष्ट पीड़ितों को त्रास देते, भले ही उस तथाकथित त्राण के पीछे उनके प्राण क्यों न निकल जायँ, इसकी उनको तनिक भी चिंता नहीं थी, वह जेबें गर्म करना होता,पर इसमें उनका दोष ही क्या था ? उन्हें न तो आपरेशन के दौरान होने वाले रक्तस्राव को रोकने का तरीका मालूम था, और न चीर-फाड़ के मध्य रोगाणुओं-विषाणुओं के संक्रमण का ही ज्ञान था । एक प्रकार से तब मध्ययुगीन सर्जरी की यह शैशवावस्था थी और इस प्रकार का दृश्य तत्कालीन समय में फ्राँस और इंग्लैंड में एक आम बात थी, क्योंकि उन दिनों वहां मूत्राशय की पथरी एक गंभीर समस्या बनी हुई थी, जिसका एक मात्र उपचार आपरेशन ही था ।

धीरे-धीरे अनुभव, क्षमता और शिक्षा के आधार पर इन तथाकथित ‘बार्बर सर्जनों’ की तीन श्रेणियां बन गई । योग्यता क्षमता के आधार पर उन्हें पृथक्-पृथक् आपरेशनों की छूट दी गई, साथ ही एक आचार-संहिता का भी निर्माण हुआ, जिसमें अन्य अनेक बातों के अतिरिक्त इस बात का भी उल्लेख था कि किस आपरेशन की कितनी फीस हो । पीछे तत्संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने वाले अनेक मेडिकल स्कूल भी खुल गये । इनमें पेरिस का ‘सेण्ट काँम कॉलेज’ विख्यात था । समय के साथ-साथ अभ्यास और अनुभव में निखार आया । फलतः सर्जरी में दिन-दिन नई सोच, नई तकनीक व खोजें जुड़ती चली गई । इसी का सुफल आज सर्जरी की कितनी ही अभिनव समृद्ध शाख के रूप में हमारे सामने हैं । तब तब बार्बर सर्जन एब्रोस पारे ने यदि इस क्षेत्र को नवीन विचारणा और प्रणाली न दी होती, तो कदाचित् आज सर्जरी इतनी विकसित स्थिति में कभी न पहुँच पाती और न वे स्वयं आधुनिक शल्य चिकित्सा के पितामह कहलाने का गौरव प्राप्त कर पाते।

यह भौतिक उत्कर्ष के क्रमिक विकास की कहानी हुई । आत्मिक व आध्यात्मिक उन्नयन कभी प्राचीन समय में चरमोत्कर्ष पर थे, पर इन दिनों तो वह रोते-कलपते अपने अपकर्ष का ही उल्लेख करते सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहे हैं । प्रश्न यह है कि आत्मिकी की यह दुर्दशा क्यों और कैसे हो गई ? उत्तर के रूप में इतना ही कहा जा सकता है कि बदले परिवेश और परिस्थिति के कारण उत्पन्न परिवर्तित चिंतन के अनुरूप अध्यात्म की व्याख्या की आवश्यकता अनुभव नहीं की गई, फलस्वरूप मृत ढकोसले को ढोते रहने की लकीर भर पीटी जाती रही । यही कारण है कि आजकल अध्यात्म वेश-दरवेश की साज-सज्जा मात्र बन कर रह गया है । पुराने जमाने में सुविधा और साधन दोनों की कमी थी, इसीलिए ऋषि-महर्षि चित्र-विचित्र वेश-विन्यास अपना लेते थे । आज न तो किसी प्रकार का अभाव है, न असुविधा ही । ऐसी दशा में अजीबोगरीब रूप-राशि की कोई आवश्यकता रह नहीं जाती । जिसकी जरूरत है, वह अब बहिरंग न होकर अंतरंग की उत्कृष्टता है । चरित्र, चिंतन, व्यवहार ही अब वे पक्ष है, जिनमें परिवर्तन की सुधार-संशोधन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इन्हीं संभावनाओं को साकार करने के लिए युग ऋषि द्वारा ‘विचार क्रान्ति अभियान’ के रूप में एक अभिनव आँदोलन का सूत्रपात हुआ है, जिसमें लोगों से खुली अपील की गई है कि अब पुरानी प्रथाओं और मान्यताओं से-सड़ी सोच एवं विकृत आकाँक्षाओं से चिपके रहने का समय लद गया । शरीर के आकार प्रकार में बदलाव के साथ-साथ परिधान में भी परिवर्तन करना पड़ता है । यही बात इन दिनों आध्यात्मिक अवधारणाओं के लिए लागू होती है, जिसे पूरा करने के लिए लोकमानस को हर प्रकार से तैयार रहना चाहिए। इससे कम में समाज और अध्यात्म की उन्नति किसी भी प्रकार संभव नहीं । यही समय की माँग है ।


धर्म चेतना का सार आध्यात्मिक पंचशील

पंचशीलों के कितने ही प्रकार हैं । उन्हें विभिन्न महापुरुषों ने विभिन्न प्रकार से व्यक्त किया है । वे सभी अपने-अपने कार्य क्षेत्र और समय के अनुरूप हैं । पर इनमें से सभी ऐसे नहीं हैं जिन्हें हर वर्ग का व्यक्ति हर समय कार्यान्वित कर सकने की स्थिति में हो, ऐसी दशा में यह देखना होगा कि सर्वजनीन हित साधने की दृष्टि से उनमें किनका ऐसा चयन किया जाना चाहिए जो आज की परिस्थितियों के भी अनुकूल हों ।

भगवान बुद्ध के पंचशील उनने अनुचरों-बौद्ध भिक्षुओं को प्रधान लक्ष्य मानते हुए निर्धारित किये गये हैं । वे है-

1-किसी का जीवन नष्ट न करो अर्थात् पूर्ण अहिंसा बरतो (2) जो तुम्हें न दिया गया हो उसे मत लो अर्थात् चोरी से छल से कुछ भी अर्जित न करो । (3) ब्रह्मचर्य पालो तथा अपनी इंद्रियों का संयम रखो (4) कम बोलो, यथार्थ बोलो, धर्म के समर्थन को ध्यान में रख कर बोलो (5) नशा मत करो । यह निर्धारण इसलिए किये गये कि धर्मोपदेशकों को श्रद्धास्पद स्थान पर बैठने वाले लोगों को सामान्यजनों की तुलना में अपना स्थान ऊंचा रखना ही चाहिए अन्यथा सामान्य लोगों जैसा स्वभाव धारण करते हुए उच्च आदर्शों के संबंध में उसका प्रभाव न पड़ेगा ।

पं. नेहरू और चीन के शासनाध्यक्षों ने मिलकर राजनीतिक पंचशील की घोषणा की थी । उनके राष्ट्रों के बीच उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान खोजा गया था । वे थे-(1) राष्ट्र एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें तथा सार्वभौम हितों का ध्यान रखें (2) विवादों में आक्रमण की नीति न अपनाएँ वरन् पारम्परिक विचार विनिमय तथा पंच निर्णय के आधार पर उनका समाधान खोजा जाय (3) एक दूसरे के आँतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करें (4) समानता और आपसी सद्भाव का निर्वाह करें (5) शाँतिपूर्ण सह अस्तित्व की बात सोचें । यह पाँचों बातें ऐसी है, जिन्हें राष्ट्राध्यक्षों के आपसी संबंधों को सही रखने की दृष्टि से तब निर्धारित किया गया था । इन्हें उन्हीं लोगों द्वारा अपनाया जा सकता था । जन साधारण इस संदर्भ में कुछ कर नहीं सकता मात्र अपने शासकों से इसके लिए अनुरोध और आग्रह कर सकता है ।

गाँधी जी ने सत्याग्रह के दिनों में विशिष्ट पंचशीलों की घोषणा की थी । वे उस समय की आवश्यकता को देखते हुए देशभक्तों के लिए आवश्यक थे । वे इस प्रकार निर्धारित हुए थे (1) निर्भयता (2) शारीरिक श्रम (3) अस्वाद का पालन (4) सर्वधर्म सम भाव (5) अस्पृश्यता निवारण । यह सभी वैसे हर समय में हर किसी के लिए कार्य रूप में अपनाए जाने योग्य हैं । सत्याग्रही व्यक्तियों के लिए स्वयं सबके लिए तो उस समय की विशिष्ट आवश्यकताओं को देखते हुए उपयोगी थे ही । महर्षि पतंजलि ने इन पाँच कर्तव्यों पाँच व्रतों को पाँच यज्ञ का नाम दिया है, इसकी व्याख्या इस प्रकार है- (1) अहिंसा (2) सत्य (3) अस्तेय (4) ब्रह्मचर्य (5) अपरिग्रह यह पांचों उनके लिए आवश्यक हैं जो आत्मिक प्रगति के मार्ग पर चलना चाहते हैं । योग साधना में जिनकी अभिरुचि है उनके लिए क्रिया पक्ष की साधनाएँ करने के साथ ही इन अनुबंधों का पालन करना आवश्यक निर्धारित किया गया है ।

एक पंचशील आज की परिस्थितियों में सभी सेवा भावी उदारचेता लोगों के लिए अपनाए जाने योग्य है, जिनका प्रणयन, युगधर्म के अनुरूप हमने किया है वह है (1) सत्य एवं तथ्य के प्रति आस्था (2) अपने संपर्क क्षेत्र के उत्कर्ष आस्था (3) मानवता के आदर्शों एवं सहयोग में आस्था । (4) सामाजिक न्याय में आस्था (5) ईश्वर में आस्था ।

यह पंचशील ऐसे हैं जिन्हें जन साधारण के आत्मिक उत्कर्ष की दृष्टि से योग्य एवं उपयोगी माना जा सकता है। इन्हें जन साधारण द्वारा अपनाया और कार्यान्वित भी किया जा सकता है । इनमें से प्रत्येक की इन्हीं सर्वोपयोगी पंचशीलों धर्म चेतना का सार समझते हुए अपनाने योग्य अपना विश्वास एवं उत्साह व्यक्त करना चाहिए ।


Quotation

अनंत शास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्चकालो बहुविध्नता च । यत्सार भूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीर मिवाम्बुमध्यात् ॥पंचतंत्र कथामुख

शास्त्र अनंत है, विद्याएँ अनेक है जीवन की अवधि थोड़ी है और विघ्न बहुत हैं । अतः जिस प्रकार हंस पानी अलग कर केवल दूध ही ले लेता है, वैसे ही हमें भी शास्त्रों का सार तत्व ग्रहण करके उसकी उपासना में लग जाना चाहिए ।


अहंकार एक भारी विपत्ति

इस संसार की हर वस्तु में अच्छाई के साथ-साथ कुछ बुराई भी मिलती है । कोई व्यक्ति या वस्तु यहाँ ऐसी नहीं बनी जिसमें न्यूनाधिक मात्रा में गुण दोष का समावेश न हो । प्रत्येक अच्छाई अपने साथ कुछ बुराई छिपाये रहती है और प्रत्येक बुराई के पीछे कुछ अच्छाई का भी तत्व छिपा रहता है । सफलता और असफलता के बारे में यही बात लागू होती है । यो आमतौर से हर आदमी सफलता चाहता है और उसे प्राप्त कर प्रसन्न होता है । असफलता में हानि एवं खिन्नता अनुभव होती है । यह स्वाभाविक है क्योंकि इच्छा पूर्ति में सुख और उसमें पड़ी हुई बाधा को दुख माना गया है ।

इतना होते हुए भी सफलता में कुछ हानि और असफलता में कुछ लाभ भी होता है । असफलता हमें भूलो पर विचार करने का मौका देती है और यह सिखाती है कि हम जहाँ गलती करते रहे है , वहाँ अधिक ध्यान दे और उसमें सुधार करे । सावधानी बरतने और अधूरे मन से काम करने पर आमतौर से काम बिगड़ते हैं । श्रम से जी चुराने, आलस में पड़े रहने, समय-कुसमय का ध्यान न रखने से भी असफलता की संभावना बढ़ जाती है । कटु स्वभाव और अशिष्ट व्यवहार से भी दूसरे लोग चिढ़ते हैं और असहयोगी बनते हैं , ऐसी दशा में भी अपनी इच्छा पूर्ति के मार्ग पर बाधा उत्पन्न होती है । असफलता मिलने पर आमतौर से मनुष्य दूसरे पर उसका उत्तरदायित्व डालकर स्वयं निर्दोष बनना चाहता है पर बुद्धिमता का अंश जब जाग्रत रहता है तब वह यह भी सोचता है कि मेरी भूल कहाँ रही और उसे सुधारा जाय ?

जिस प्रकार ऊधम मचाने और बताये हुए काम न करने पर बच्चे को धमका देने पर वह रुकता, सोचता और बदलता है, उसी प्रकार असफलता रूपी दैवी फटकार पड़ने पर मनुष्य को यह को यह भी सोचना पड़ता है कि उसके लिए क्या करना अनुचित था ? अपनी गतिविधियों को सुधार लेने पर जहाँ बिगड़े काम के बनने की संभावना बढ़ जाती है, वहाँ सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि मनुष्य को अपनी आदतों और गतिविधियों में सुधार करने का अवसर मिलता है यह सुधार उस बिगड़े काम को बनाने में ही सहायक नहीं होता वरन् भविष्य के लिए सफलताओं का एक व्यवस्थित शिक्षण देकर प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त कर देता है ।

सफलता की अच्छाई सर्व विदित है ही । उससे अभीष्ट लाभ प्राप्त होता है, दूसरे प्रशंसा करते हैं, अपना हौसला जानते हैं और इसलिए उसे चाहते हैं तथा पसन्द भी करते हैं । पर उसमें एक छोटी बुराई भी छिपी रहती है , यदि उसकी ओर से सावधान रहा जाय तो वह हानिकारक भी सिद्ध होती है । इस बुराई का नाम है मन या अहंकार । सफलता पा कर मनुष्य मदमत्त हो इतराने लगता है, अपनी औकात भूल जाता है और सफलता को पाकर वह यह सोचने लगता है-”मुझसे बड़ा बुद्धिमान, चतुर और पुरुषार्थ कोई नहीं, मैं हर दिशा में चुटकी बजाते जो चाहे वह प्राप्त कर सकता हूँ ।”

आत्मविश्वास होना अलग बात है । वह एक आध्यात्मिक गुण है । पर अहंकार तो उससे सर्वथा भिन्न वस्तु है। मोटे रूप में आत्मविश्वास तथा अहंकार एक से दिखते हैं पर उसमें जमीन आसमान जैसा अंतर रहता है । कायरता और अहिंसा बाहर से दीखने में एक सरीखी लगती है पर उनकी मनोदशा में दिन रात जैसा भेद रहता है । आत्मविश्वासी आत्मा की महत्ता मानते हुए भी सावधानी, परिश्रम, अध्यवसाय, परिस्थितियां, दूसरों का सहयोग, जागरुकता आदि बातों पर ही सफलता को अवलंबित समझता है और असफलता की परवाह न करके अपने सुनिश्चित पथ पर मजबूती से पैर बढ़ाना हुआ चला जाता है ।

आत्मविश्वास का अर्थ है अपने कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहना और कठिनाइयों से तनिक भी विचलित न होना । अहंकार इससे भिन्न वस्तु है । इसे ‘ मद ‘ इसलिए कहा गया है कि नशीली चीजें खाकर जिस प्रकार उन्मत्तता आ जाती है, उसी प्रकार एक छोटी सफलता पा कर मनुष्य सोचने लगता है कि मैं ही सब कुछ हूँ , मुझमें कोई त्रुटि नहीं, मेरी बुद्धि सारी दुनिया से बढ़कर है । जो चाहूँ सो चुटकी बजाते पूरा कर सकता हूँ । छोटी स्थिति के आदमी जिनके दिल और दिमाग छोटे होते है-कोई मामूली-सा लाभ, श्रेय या महत्व पाकर इतराने और बौराने लगते हैं । उनकी अकड़, उद्दंडता और अशिष्टता के रूप में चेहरे पर झलकती रहती है । सरकारी अफसरों, रईसों, तथा कथित रईसों, नवधनाढ्यों में से कितने ही ऐसे होते हैं, जिनकी अकड़ और उद्दंडता देखकर यही सोचना पड़ता है कि छोटी सी उपलब्धि पाकर उन्होंने सज्जनता का मार्ग छोड़ दिया और उद्धतता को अपना लिया ।

उद्धतता सारी मनुष्य जाति का, सृष्टि की विधि व्यवस्था का सज्जनता का अपमान है । यह किसी से भी बर्दाश्त नहीं होती । मानव की स्वयं की आत्मा उसके प्रति विद्रोह करती है । जिन्हें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ हो उनकी बात दूसरी है । वैसे साधारणतया सभी को अहंकार बुरा लगता है । भले ही उसका कोई तुरंत विरोध न करे पर जब भी अवसर आता है अहंकारी व्यक्ति देखता है कि उसका एक भी सच्चा मित्र इस संसार में नहीं है। चापलूस और खुशामदी लोग जो अपने मतलब के हुए उसकी नाक का बाल बने हुए थे, अवसर पाते ही गिरे में लात लगाने का प्रयत्न करते हैं।

भगवान को मनुष्य के दुर्गुणों में सबसे अप्रिय अहंकार है। ईश्वर का अंश होने से जीवन महान है पर यह सारी महानता ईश्वर की है। अपनी सत्ता की दृष्टि से मनुष्य अत्यंत तुच्छ है वह कितनी ही बातों में पशु-पक्षियों से भी पिछड़ा हुआ है। दूसरों की सहायता के बिना उसका काम ही नहीं चलता। जो कुछ भी लाभ या सुख प्राप्त होता है उसमें उसकी निज की योग्यता का जितना महत्व है उसकी अपेक्षा दूसरों के सहयोग के अनुग्रह का सहस्रों गुना अधिक श्रेय सम्मिलित रहता है।

एकाकी रहने वाला मनुष्य तो लखनऊ अस्पताल में भरती हुए भेड़ियों द्वारा पाले गये रामू बालक जैसा ही अविकसित रह सकता है। रामू भी जैसा कुछ था भेड़ियों के पालने के कारण था। यदि मनुष्य के बालक को कोई न पाले, किसी का सहयोग न मिले तो वह सृष्टि के अन्य जीवों की तरह जीवित भी नहीं रह सकता। आठ-दस वर्ष की आयु तक तो उसे सर्वथा परावलंबी रहना पड़ता है। बीमारी, अशक्ति, स्वाभाविक ज्ञान की कमी आदि अनेकों खामियाँ उसमें ऐसी हैं जिसमें अन्य जीवों के बच्चे ग्रस्त नहीं होते। उनकी सारी उन्नति और सफलता सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक हुए मानवीय सामूहिक सत्प्रयत्नों का ही परिणाम हैं। समाज के ऋण और सहयोग का, दूसरों की कृपा और अनुकंपा का महत्व भूल यदि कोई इतराता है और अहंकारी बनकर मदोन्मत्त होता है तो यह उसकी तुच्छता ही मानी जायेगी। अहंकार का नाश करने का परमात्मा सदा प्रयत्न करते रहते हैं क्योंकि, यही दुर्गुण भव बंधनों में जीव को बाँधे रहने में सबसे बड़ी लोह शृंखला का काम करता है। अहंकारी के मन के सब सद्गुण उसी प्रकार विदा होने लगते हैं जैसे तालाब का पानी सूखने पर उसके तट पर रहने वाले पक्षी अन्यत्र चले जाते हैं। अहंकार से अन्य दुर्गुणों का पोषण होता है और घमंडी आदमी में वे सब बुराइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जो गुंडों या आसुरी जीवों में होती हैं। असुर या गुंडों का अहंकार आरंभ में विकृत होता है, इसके पश्चात् वे दूसरों को तुच्छ समझते हुए उनकी हर क्रिया में अपना अपमान देखने लगते हैं और उसका प्रतिशोध लेने के लिये जहरीले साँपों की तरह अनर्थ करने पर उतारू हो जाते हैं।

अहंकार की उद्धतता मनुष्य के ओछेपन का चिन्ह है। महानता व्यक्ति के झुकने और नम्र बनने में है। उन्नति और सुधार उसी का संभव है जो अपनी त्रुटियों और दुर्बलताओं को जानता है। जो अपने को सर्वोपरि मान बैठा है उसे सुधार को बात सोचने का अवसर ही कहाँ है? ऐसे मनुष्य हवा भरे हुए पानी के तरह अंत में उपहास के पात्र बनते हुए नष्ट ही हो जाते हैं। इसलिए विज्ञजन अहंकार को बहुत ही हेय मानते रहे हैं। हर बार सफलता प्राप्ति के समय हमें यह आत्म निरीक्षण करते रहना चाहिए कि कहीं इससे हमारा अहंकार तो नहीं बढ़ा? यदि बढ़ा तो सोचना चाहिए की लाभ की अपेक्षा हमारी हानि ही अधिक हुई है। अहंकार को एक भारी हानि ही नहीं विपत्ति भी मानना चाहिए।


जनसेवा (Kahani)

गाँधी जी ने नेटाल् से स्वदेश लौटने को तैयार हुए तो सैकड़ों व्यक्तियों ने उनके विदाई समारोह में भाग लिया। रजत और सवर्ण के आभूषणों की कौन कहे, उन्हें तो मूल्यवान घड़ियाँ तथा हीरे की अँगूठियाँ तक उपहार में मिली। गाँधी जी इस निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहे थे कि प्राप्त उपहारों का क्या किया जाय? वह ऐसे ही संकल्प विकल्प में पड़े हुए थे। जो व्यक्ति दूसरों को त्याग वृति का उपदेश दे, सादगी से रहने के लिए आग्रह करे फिर भला ऐसे मूल्यवान उपहारों को कैसे ग्रहण कर सकता था।

उन्होंने कस्तूरबा तथा बच्चों को समझाया। बच्चे तो उनकी बात जल्दी समझ गये पर कस्तूरबा मानने को तैयार न हुई वह गाँधी जी के निर्णय का विरोध ही करती रही। अधिक कहा तो रो पड़ीं। उन्होंने रोते हुए कहा-’आपने तो हमारे सब आभूषण ले ही लिये हैं। यह उपहार यहाँ के निवासियों ने कितनी श्रद्धा के साथ दिये हैं। पर आप नहीं चाहते कि ये आभूषण मेरे पुत्रों की शादी में काम आयें और उनकी बहुएँ पहनें। फिर यह उपहार तो मुझे मिलें हैं। इन पर आपका क्या अधिकार है?

गाँधी जी ने निर्विकार भाव से समझाया- क्या तुम इतना भी नहीं जानती कि यह उपहार जनसेवा के बदले मिले हैं। अतः इनका उपयोग जनहित के लिए ही किया जाना चाहिए।

सन् 1896 तथा 1901 में गाँधी जी को जो उपहार मिले उन्हें सार्वजनिक उपयोग के उद्देश्य से बैंक में जमाकर दिया। वह अपने को सदैव सार्वजनिक वस्तु का प्रहरी मानते थे।


क्या बिगाड़ा था उसने किसी का ?

कई दिनों के झुटपूटे के बाद आज पहली बार सूरज निकला था। बादल छट गये थे और धूप बहुत सुखद लग रही थी। ओसीन की तबियत इधर कुछ दिनों से काफी खराब चल रही थी। सूर्य निकल आने से उसको काफी राहत महसूस हो रही थी। पता नहीं स्वास्थ्य सचमुच कुछ सुधर गया था फिर मौसम का ही प्रभाव था। ओसीन का पति ओकावा आज सुबह से ही बाहर गया हुआ था। मौसम ठीक होने के बाद ही उसका बाहर जाना संभव हो सका था।

पति को बाहर भेजकर वह घर के छोटे-छोटे कामों में लग गयी थी। वह चाहती थी की दोपहर के आस-पास जब ओकावा वापस आये, तब तक उसके सारे काम निबट चुके हों, ताकि दोनों आज के साफ मौसम का आनंद उठा सकें।

जापान के हिरोशिमा नगर के बाहरी छोर पर उनका अपना मकान था। जहाँ वह अपने पति और बच्चे के साथ सुखद जिन्दगी के सपने बुनने में उलझी रहती थी। पिछले कुछ दिनों से उसके मन में कुछ विशेष कामों के प्रति बहुत तीव्र इच्छा पैदा होने लगी थी। वह कुछ विशेष स्थानों पर जाना चाहती थी, विशेष तरह की चीजें खाना चाहती थी। लगभग दो वर्ष पहले इन्हीं दिनों जब ओसीन पहली बार माँ बनने की प्रतीक्षा कर रही थी, तभी उसकी इच्छाएँ कुछ इसी तरह तीव्र हो उठी थीं। पर वे इच्छाएँ इन इच्छाओं से बहुत भिन्न थीं। तब वह मीठी चीजें बहुत खाया करती थी। पर इन दिनों उसे खट्टी चीजें बहुत भाती थीं। पिछली बार उसके लड़का हुआ था और इस बार उसे मन ही मन विश्वास जग चुका है कि उसकी गोद में नन्ही सी गुड़िया आने वाली है।

उसका मन इन दिनों गहरी ममता से भर चुका है। उसे लगने लगा है कि वह अब दो बच्चों की माँ है। भीतर की ममता दुगुनी हो चुकी है। लेकिन अभी अपनी अनदेखी बिटिया को वह प्यार नहीं कर पाती। बस कभी-कभी एकाँत पाकर अपने उभरे हुए पेट पर धीरे से हाथ फिरा लेती हैं यदा-कदा अनचीन्ही बेटी को पुचकार लेती है। जब भीतर हिल डफल बहुत हो जाती है, तो बच्ची को इस शरारत के लिए डाट भी देती है। “क्यों तंग करती है लाड़ली मेरी “वह उसे समझाती है। “अभी से तू इतनी शैतान है, तो जन्म लेने के बाद क्या करेगी नहीं बेटी माँ को इस तरह तंग नहीं करते और फिर अपने आप ही मुस्करा उठती है। बाकी समय अपना सारा प्यार बेटे पर उड़ेलती रहती है।

आज सुबह वह अपने बेटे के कामों में लगी हुई है। धूप निकल आयी थी तो उसके मन में बेटे को नहला देने की बात भी आयी। दो दिनों से खराब मौसम के कारण होचोवा को इस डर से नहीं नहलाया था कि कहीं उसे ठंड न लग जाए। पर धूप निकल आयी थी। आज उसे नहला ही देना चाहिए। बहुत गंदा हो रहा था और फिर आज न नहलाया तो कल मौसम जाना कैसा रहे। यही सोचकर वह बच्चे के रोने के बावजूद उसके कपड़े उतारती रही। पहले कमीज उतारी। बनियान की बारी आयी तो होचोवा एकदम मचल गया। वह उसके हाथों से छूट-छूट जा रहा था। एक बार तो वह लगभग हाथों से निकल ही गया था। पर उसने उसे फिर घसीट लिया।

एक हाथ से होचोवा को पकड़ा और दूसरे हाथ से पानी छूकर देखा पानी बहुत ठंडा नहीं था और तभी उसके भीतर बहुत जोर से कुछ हिलने-डुलने लगा। ओसीन ने अपना गीला हाथ पेट पर रख लिया “न बेटी न तंग नहीं करते। भैया को नहला लेने दे। “ एक और होचोवा जोर जोर से रो रहा था और उसके हाथों से निकलने के लिये मचल रहा था और दूसरी और यह.......। “तुम दोनों भाई-बहिन क्यों तंग कर रहे हो मुझे!” ओसीन ने मुस्करा कर पेट के उभार की ओर देखा। “शैतान बच्चों!” और वह सोचने लगी इस समय ओकावा घर पर होता तो उसकी सहायता करता। उसके उसके पेट के भीतर की हलचल बहुत प्रबल होती जा रही थी। बिटिया रानी अब भीतर नहीं रहना चाहती वह खुद को बता रही थी।

उसी समय सहसा बहुत जोर से गूँ-गूँ ऊ -ऊ की आवाज हो उठी। उसका ध्यान एक बार फिर अपने पेट की ओर गया। पर दूसरे ही क्षण ध्यान आया, यह पेट के भीतर की आवाज नहीं थी। आवाज की दिशा में बहुत सारा धुंआ ओर गर्द गुबार उड़ रहा था। साफ आकाश कहीं छुप गया था। सारा वातावरण मटमैला हो गया था और इन सबके बीच पाँच हवाई जहाज उड़े जा रहे थे।

ओसीन को स्थिति समझने में क्षण भी नहीं लगा। उसने साबुन से पुते नन्हें होचोवा को झपट कर अपनी गोद में समेटा, एक हाथ पेट पर रखकर अपनी अनदेखी बेटी को साँत्वना दी और झपटकर भीतर भागी.......। नहाने का पानी, साबुन और तौलिया खुले आकाश के नीचे पड़े रहे।

चारों ओर शोर ही शोर था। आग और धुंआ। मनों मिट्टी धरती की कोख में उछल कर आकाश की ओर जाती थी ओर फिर आग के समान धरती पर बरस पड़ती थी।

धमाके बहुत पास आ गए थे। उसे लगा कि उसका घर धमाकों से घिर गया था। अचानक उसके मुँह से जोर की एक चीख निकली। उसे लगा कोई आग उसकी बांयी जाँघ को चीर कर भीतर घूमती चली गयी है। नंग-धड़ंग, साबुन ओर मिट्टी से सना नन्हा होचोवा उससे जोरों से चिपट गया।

इधर अभी ओकावा लौटते हुए अपनी बस्ती की सीमा तक पहुँचा ही था कि हवाई जहाजों की आवाज से उसके कान खड़े हो गए। यों यह अनुभव उसके लिए या बस्ती के किसी अन्य व्यक्ति के लिए नया था। अब तो विश्व युद्ध ही छिड़ा हुआ था। जाने कब तक यह लड़ाई चलेगी। हाँ इधर पिछले तीन दिनों से हवाई-जहाज नहीं दिखे थे। आज धूप निकली थी तो हवाई जहाज भी आ निकले थे।

वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करें, बस एक ही बात उसके मन में थी, ऐसे समय उसे अपने घर ओसीन ओर होचोवा के पास होना चाहिए था। बस इसी एक बात को ध्यान में रखते हुए वह गिरते पड़ते घिसटते हुए चला जा रहा था। चारों ओर चीखने की आवाजें आ रही थीं। स्थानीय वालंटियर और सैनिक अधिकारी भी प्रकट हो गये थे। मोटर गाड़ियाँ इधर-उधर दौड़ रही थीं।

अपने घर पर दृष्टि पड़ते ही उसे लगा कि दिल की धड़कने बंद हो जाएँगी। जैसे-तैसे गिरता पड़ता हुआ घर के भीतर घुस गया। उसके सामने लहूलुहान और पड़ी थी और उसके सीने से बेजान सा होचोवा चिपटा था। अभी वह कुछ करता तभी एक अधिकारी कई वालंटियरों के साथ घर के भीतर जा पहुँचा उसने लगभग झपटते हुए ओसीन की छाती पर हाथ रखा और सहसा वह अपने साथियों की ओर मुड़ा-जीवित है।”

वालंटियर झुके और ओसीन को उठा ले चले। ओकावा ने लगभग झुलसे हुए होचोवा को उठा लिया। बीते पलों के साथ सूर्य ढक चला था। गाड़ियाँ अस्पताल के अहाते में प्रवेश कर रही थीं।

क्षण बीतते गए। वह बरामदे के एक कोने से दूसरे कोने तक टहल रहा था वह रात भर इसी प्रकार टहलता रहा था और अब ऊषा की पहली किरणें धरती को छू रहीं थीं।

उसे पता ही नहीं चला कि रात किधर गयी। वह तो यही जानता था कि डाक्टर ने ओसीन और होचोवा को सरसरी नजर देख दो अलग-अलग आपरेशन थियेटरों में भिजवा दिया था। रात भर वह यूँ ही टहलता रहा था और किसी ने उसे यह नहीं बताया था कि उसकी पत्नी-बच्चा कैसे हैं। वे बचेंगे भी कि नहीं वह नहीं जानता था। यदि वे नहीं बचे तो ?

‘उनके मरने से पहले मुझे उनसे थोड़ी बात कर लेने दो’ वह कहना चाहता था। पर किससे कहता ? यहाँ कौन था उसकी बात सुनता ? जिन दरवाजों के भीतर उसकी पत्नी उसका नन्हा बालक गये थे उनके भीतर उसे नहीं जाने दिया गया था और वह स्वयं भीतर घुसने का साहस नहीं कर सका था। तभी एक दरवाजा खुला।

वह पलट कर खड़ा हो गया। अभी कुछ सोचता इतने में एक नर्स का मायूस स्वर उभरा सॉरी मि0 ओकावा हम आपके बच्चे को नहीं बचा सके। इन शब्दों ने उसे निस्पंद कर दिया। लगा कि वह चक्कर खाकर गिर पड़ेगा। इतने में दूसरे दरवाजे के खुलने की आवाज ने उसे सचेत कर दिया।

“मि0 ओकावा आप आ सकते हैं” खुले दरवाजे के बीच प्रकट हुई एक अन्य नर्स ने कहा। नर्स उसे कई रास्तों से घुमाती हुई एक वार्ड में ले गयी। घायलों के एक जंगल में उसने एक बैड पर पड़ी ओसीन को देखा। अभी वह कुछ कहता की साथ ले आने वाली नर्स उसके बिल्कुल पास आ गयी थी।” हमें खेद है, मि0 ओकावा हम आपकी पत्नी और बच्ची को नहीं बचा सके।

“बच्ची!” और सहसा उसे ध्यान आया की उसकी पत्नी अपने शरीर में एक नन्ही सी जान को भी पाल रही थी। उसकी आँखों में आँसू उतर आए।

“आप बच्ची को देखना चाहेंगे ? नर्स उससे पूछ रही थी। उसका सिर अपने आप स्वीकृति में हिल गया। और फिर वह नर्स के पीछे-पीछे चलता हुआ बहुत सारे गलियारों को पारकर एक कमरे के सामने आया।

नर्स उसे वहीं रुकने का इशारा कर स्वयं भीतर चली गयी। दरवाजा खुला। नर्स के हाथों में सफेद कपड़ों में लिपटी एक बच्ची थी। नर्स ने कपड़े की तहें हटा दीं।

एक गोरी, चिट्टी स्वस्थ बच्ची कपड़े की बीच पड़ी थी। उसके मुख पर रोने के से भाव थे। शायद चीखती-चीखती उसकी बच्ची मर गयी थी। नर्स ने बच्ची के सिर को एक ओर घुमाते हुए ओकावा को बच्ची का बांया गाल दिखाया। गाल पर एक बड़ा सा ताजा-ताजा घाव था। चमड़ी फटी हुई थी। नंगा लाल माँस दिख रहा था। खून चारों ओर जमकर काला पड़ गया था।

वह कुछ सोचने लगा पास में पड़ी पत्नी और बच्चे की लाश पर एक नजर डालते हुए उसने नर्स की ओर देखते हुए बच्ची की ओर इशारा किया “सिस्टर! आखिर यह तो अभी दुनिया में आयी भी नहीं थी-इसने आक्रमणकारियों का क्या बिगाड़ा था?” कौन उत्तर देता। इस घटना से विदीर्ण हृदय ओकावा बौद्ध साधु हो गया। विश्व युद्ध समाप्त होने पर जब जापान का प्रतिनिधि मंडल वैज्ञानिक आइन्स्टीन से मिलने गया। उसमें ओकावा भी एक था उसकी बात-चीत से विगलित हो महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन शाँति प्रयत्नों में अग्रसर हुए। ओकावा ने अपने जीवन के मार्मिक तथ्यों को ‘द डे आफ्टर’ में पिरोया और अपना शेष संदेश समझने-समझाने में बिताने लगा।


सूक्ष्म अवयवों का सुसंचालन – स्वास्थ्य संवर्धन

शरीर को स्वास्थ्य और चुस्त-दुरुस्त बनाये रखने के लिए पौष्टिक आहार और अनुकूल जलवायु तो आवश्यक हैं ही, पर इनके साथ एक और बात की जरूरत पड़ती है, वह है आसन व व्यायाम। मशीन यदि बहुत अच्छी भी हो, पर लम्बे समय तक वह बंद पड़ी रहे, काम न लिया जाय, तो उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती और कल-पुर्जे ठीक ढंग से काम नहीं कर पाते हैं। कोठी शानदार हो, किंतु अधिक काल तक परित्यक्त बनी रहे, तो उसमें चमगादड़ों, अवावीलों और मकड़ियों के घोंसले उसे रहने लायक स्थिति में नहीं रहने देते, उसका साज-सज्जा मारी जाती और धूल की पर्त यत्र-तत्र दिखाई पड़ती है।

यही बात शरीर के साथ भी है। उसे अच्छा भोजन मिल रहा हो, ओबोहवा भी अच्छे हो, पर अंग संचालन जैसी अनिवार्य प्रक्रिया नियमित रूप से संपन्न नहीं हो पा रही हो, तो अंग-अवयव जकड़-मकड़ दिखाने और शरीर का साथ नहीं दे पाने की विवशता प्रकट करने लगते हैं। इसीलिए व्यायाम स्वस्थता के लिए आवश्यक माने गये हैं। यों तो इसकी आवश्यकता-पूर्ति तो सामान्य रूप से चलने, दौड़ने और प्रतिदिन की कसरत से तो होती ही रहती है, पर इन प्रक्रियाओं का कुछ खास अंगों पर ही ज्यादा प्रभाव पड़ता है, शेष अंग या तो अप्रभावित बने रहते हैं अथवा असर तना न्यून होता है, जिसे नगण्य कहा जा सके। विशेषकर शरीर के भीतर के छोटे अवयवों तक इनका प्रभाव नहीं पहुँच पाता, इसलिए वे जंग लगे चाकू की सी स्थिति में धीरे-धीरे आने लगते हैं। इस कठिनाई को ध्यान में रख कर ही प्राचीन शरीर शास्त्रियों ने योगासनों की विशेष व्यवस्था की थी, ताकि उनसे संपूर्ण शरीर के बड़े-छोटे सभी अंगों की कसरत बराबर होती रह सके। इसके अतिरिक्त दंड-बैठक और दौड़ में अधिक ऊर्जा की खपत होती है, जबकि आसनों द्वारा उस अनावश्यक क्षरण को रोककर उसे उपयोगी प्रयोजनों में लगा देना संभव होता है। इस दृष्टि से योगासन स्वास्थ्य के लिए अधिक उत्तम और उपयोगी हैं। विशेषकर वैसे लोगों के लिए जो शरीर से कमजोर हैं और थकाने वाले व्यायाम नहीं कर सकते, उनके लिए तो यह विशेष लाभकारी है।

आधुनिक शरीर विज्ञानियों ने आपने प्रयोग-परीक्षणों में योगाभ्यास परक व्यायामों को प्रचलित व्यायामों की तुलना में अधिक प्रभावकारी और उपयोगी पाया है। शरीर को संचालित करने में प्राण जैसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सूक्ष्म प्रणालियों में भी इनका असर पड़ता देखा गया है। इसलिए इस विधा के विशेषज्ञों ने कुछ विशिष्ट आसनों की क्रियाओं में आवश्यक फेर-बदल कर उसे सर्वसाधारण के लिए अत्यंत सरल बना दिया है। बदले हुए रूप में इन यौगिक कसरतों का अभ्यास कितने ही लोग व्यक्तिगत रूप से करते देखे जाते हैं। इसके अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण योगासनों को मिलाकर उसे एक संयुक्त आसान के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। अन्य कठिन अभ्यासों को न भी किया जाय और इन्हीं सरल ओर संयुक्त आसनों को करते रहा जाय, तो भी कामचलाऊ व्यवस्था बन जाती है। सूर्य नमस्कार जैसे आसान ऋषिगणों द्वारा इसी निमित्त गढ़े गये। इसकी संपूर्ण प्रक्रिया में लगभग समस्त बाहरी-भीतरी अंगों का संचालन हो जाता है।

आज के आधुनिक युग में नृत्यों, ब्रेक डांस, गीत-संगीत पर आधारित अंग संचालनों के पीछे मूल दृष्टि संभवतः सम्मिलित लोगों का मनोरंजन करने की अधिक रही है। साथ-साथ अंगों के नर्तन-थिरकन द्वारा स्वास्थ्य संवर्धन का एक महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरा होता है, यह भी संभव है किंतु प्राचीन नृत्यों में भारतनाट्यम् कथकली, ओडिसी, कत्थक जैसे प्रसिद्ध नाच एवं अगणित दूसरे लोकनृत्य शरीर शास्त्र के इसी सिद्धाँत पर आधारित है कि इनसे लोकरंजन और स्वास्थ्य संवर्धन का दुहरा लाभ मिले। दक्षिण भारतीयों नृत्यों को सूक्ष्मतापूर्वक देखा जाय, तो स्पष्ट ज्ञात होगा कि इन्हें शरीर विज्ञान की सूक्ष्मताओं को ध्यान में रखते हुए विनिर्मित किया गया है, अन्यथा सिर से लेकर पैर तक के अवयवों का जैसा संचालन उनमें होता है, वैसा लोकनृत्यों में शायद ही देखा जा सके। इसीलिए शरीर स्वास्थ्य की दृष्टि से इन्हें अधिक विज्ञान सम्मत माना गया है, पर हर एक के लिए यह न तो संभव है, न सरल। समय भी इनमें अधिक चाहिए और सीखने, अभ्यास करने में भी कष्ट साध्य है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कामचलाऊ निर्वाह आधुनिक अनुसंधानों द्वारा विकसित नवीन अभ्यासों एवं सूर्यनमस्कार जैसे संयुक्तासनों से किया जा सकता है। जिनके पास अधिक समय है और जो दूसरे आसनों को करने में सक्षम हैं, वे उन्हें भी कर सकते हैं। इसमें हर्ज नहीं।

आस्ट्रियाई अनुसंधानकर्ता स्टीफन सैंडरसन अपने लंबे काल के अध्ययन के उपराँत इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यदि नियमित रूप से योगासनों को या जाय, तो आज की अधिकाँश बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। उनका कहना है कि इन दिनों के रोगों का एक प्रमुख कारण आराम तलबी की बढ़ती प्रवृत्ति है। विज्ञान ने जिस अति से दुनिया को विकास की ओर धकेला है, यह प्रसन्नता की बात है, पर इसका दूसरा दुःखदायी पक्ष भी है। उसने इतने सुविधा-साधन मनुष्य को उपलब्ध कराये हैं की धीरे-धीरे उसके श्रम का माद्दा घटा है, वह अधिकाधिक आराम तलब बनता गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि जो काम पहले अपने हाथों से, अपने श्रम से संपन्न होता था, अब उन छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी मशीन का मोहताज होना पड़ रहा है। परिणाम सामने है। शारीरिक श्रम से जो थोड़ी-बहुत मेहनत हो जाती थी और जिससे व्यायाम की जो न्यूनाधिक पूर्ति होती थी, शरीर उससे वंचित हो गया। फलतः आवश्यक रोगी होने लगें। उनके अनुसार इस कमी की पूर्ति योगासनों के माध्यम से सरलतापूर्वक की जा सकती है। उनका दावा है कि इनसे न सिर्फ व्यायाम की आवश्यकता पूरी होती है, वरन् रोगों को भी दूर भगाया जा सकना संभव है। उनने स्वयं अनें प्रकार के रोगों पर इनका सफलतापूर्वक परीक्षण किया है। अनेक दमाग्रस्त व्यक्तियों को उनने मात्र आसान-प्राणायाम के अभ्यास से स्वस्थ बनाने में सफलता पायी है। इसके अतिरिक्त मधुमेह, मिर्गी, उच्च रक्तचाप, एवं हृदय संबंधी प्राणघातक व्याधियों को इनसे ठीक किया है।

अमेरिका में भी इस संबंध में शोधें हो रही हैं। वहाँ के ‘यौगिक ट्रीटमेण्ट रिसर्च सेण्टर’ में मधुमेह पर विशेष अध्ययन किया गया है। शोधकर्ताओं द्वारा वहाँ निमित्त आयुवर्ग के लगभग 300 रोगियों पर योगासनों के प्रभावों का परीक्षण किया गया। उन्हें इस बीच संतुलित भोजन का नियमित आहार बराबर दिया जाता रहा। समय-समय पर इस मध्य उनके मूत्र, रक्त, की नियमित जाँच होती रही। तीन माह पश्चात् जब उनके रक्त का पुनः परीक्षण किया गया, तो आशातीत परिवर्तन दिखाई पड़ा। करीब 50 प्रतिशत रोगियों में रक्त में शक्कर की मात्रा काफी घटती देखी गई। जिन रोगियों को इससे कम लाभ प्राप्त हुआ, उनके बारे में गहराई से अध्ययन किया गया, तो पता चला क या तो वे बहुत पुराने रोगी थे अथवा वंशानुगत क्रम से एक-दूसरे में व्याधि चली आ रही थी।

हृदय रोग भी उक्त संस्थान में कुछ आरंभिक परीक्षण किये गये हैं, जिनका परिणाम काफी उत्साहवर्धक पाया गया है। जिन लोगों का हृदय संबंधी तकलीफें बनी रहती थीं, उन्हें कुछ विशेष प्रकार के आसनों का अभ्यास करने की सलाह दी गई। एक वर्ष उपराँत उनकी तकलीफें घटती देखी गई।

पोलैण्ड के ‘थर्डक्लीनिक ऑफ मेडिसिन’ में भी यौगिक क्रियाओं पर गहराई से अध्ययन हुआ है। अध्ययनों के उपराँत वहाँ के शोधकर्मी जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, वह यह है कि यदि व्यक्ति ज्यादा नहीं तो कम-से-कम सर्वांगासन, हलासन, शवासन जैसे सरल आसनों को नियमित रूप से करता रहे तो भी उससे काफी फायदे होते हैं। सर्वांगासन का सीधा असर मस्तिष्क एवं मेरुदंड पर पड़ता है। मस्तिष्क में ही समस्त अंतःस्रावी ग्रंथियों को नियंत्रित करने वाला महत्वपूर्ण अवयव पीनियल ग्लैण्ड स्थित है। अंतः यदि इसे नियंत्रित किया जा सके, तो संपूर्ण अंतः स्रावी तंत्र ही संतुलित हो जाता है, ऐसा विशेषज्ञों का कथन है।

इस प्रकार विज्ञान ने भी अब यह सिद्ध कर दिखाया है कि सामान्य कसरतों की तुलना में आसनों का हलका-फुलका व्यायाम कहीं अधिक प्रभावकारी और स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी है। इसके करते रहने से माँसपेशियों में खिंचाव एवं सूक्ष्म अवयवों में दबाव पड़ता रहता है। अतः इसके सम्पादन स्वास्थ्य संवर्धन एवं आत्मोत्कर्ष का दुहरा लाभ मिलता है, इसे किया ही जाना चाहिए।


साहसी और डरपोक (Kahani)

एक आदमी चला जा रहा था। रास्ते में एक कुत्ता मिल गया। कुत्ते की कद-काठी और हाथ-भाव से वह डर गया और भागने लगा। कुत्ते ने भी उसका पीछा किया। आदमी बेतहाशा भागा जा रहा था और कुत्ता भी रुकने का नाम नहीं लेता।

दूर से यह सब दृश्य एक विज्ञ पुरुष देख रहा था। व्यक्ति जब उसके पास से गुजरा, तो उसने चिल्लाकर - “मूर्ख! रुक जा, भाग मत। कुत्ता तुम्हारा पीछा नहीं कर रहा है।”

इस वाक्य से कुछ ढाढ़स हुआ। वह हाँफते हुए रुक गया। उसके रुकते ही कुत्ता भी उसके पीछे खड़ा हो गया, कुछ इधर-उधर सूँघ कर फिर चलता बना।

अब सुधी सज्जन से उसे समझाया- “कुत्ता वस्तुतः तुम्हारा पीछा नहीं कर रहा था। वह तो तुम्हारे भय के कारण पैदा हुए एड्रीनेलिन रस की गंध से खिंचा चला आ रहा था। तुम्हारे रुकते ही, भय समाप्त होते ही वह रसस्राव बंद हो गया, जिससे गंध का निकलना रुक गया और कुत्ता भी लौट गया।

अब वह व्यक्ति सोचने लगा-हमारी तरह न जाने कितने ही लोग रस्सी को साँप समझ बैठते और डरते-मरते रहते हैं। इसके बाद ही उसे इस उक्ति की सच्चाई समझ में आयी, जिसमें कहा गया है- डरपोक जीवन में कितनी ही बार मर चुकते हैं, जबकि साहसी का मरण सिर्फ एक बार उपस्थित होता है।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - युग संधि की वेला व हमारे दायित्व

जून माह की इस पत्रिका में गायत्री जयंती के पुण्य पर्व पर प्रस्तुत है, परम पूज्य गुरुदेव का एक उद्बोधन जो हमें बदलते हुए इस विषम समय में झकझोरता है कुछ सोचने व कर गुजरने के लिए आगे बढ़ने को । क्षुद्रता को छोड़कर महानता के पथ को अपनाने को। 1980 की वसंत की पूर्व वेला में शाँतिकुँज परिसर में यह उद्बोधन यहाँ चल रहे सत्रों के दैनिक उद्बोधनों की शृंखला की एक कड़ी मात्र है। किंतु इसका एक-एक शब्द ऐसा है जो आज चौदह वर्षों बाद भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना कि यह उन दिनों था, विशेषकर इसलिए भी कि हम युग परिवर्तन की उस महा लीला के क्षण के अति निकट आ पहुँचे हैं। पढ़ें, आत्मचिंतन व कुछ गहन मनन करें-अमृतवाणी का।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

मित्रो, हममें से प्रत्येक परिजन को कुछ मान्यतायें अपने मन में गहराई तक उतार लेनी चाहिए। एक यह कि जिस समय में हम और आप जीवित रह रहे हैं, वह एक विशेष समय है। यह युग परिवर्तन की बेला है, इसमें युग बदल रहा है। जिस तरह प्रातःकाल का समय विशेष महत्वपूर्ण समय होता है। इसमें हर आदमी सामान्य काम न करके विशेष काम करता है अध्ययन से लेकर भजन तक के उच्चस्तरीय कार्य इसमें किये जाते हैं, क्योंकि प्रातःकालीन समय अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यह समय भी इसी तरह का है। यह संध्याकाल है, इसमें युग बदल रहा है। इस विशेष संध्याकाल को हमें विशेष कर्तव्यों के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। हममें से प्रत्येक साधक को यह मानकर चलना चाहिए कि हमारा व्यक्तित्व विशेष है। हमको भगवान ने किसी विशेष काम के लिए भेजा है। कीड़े-मकोड़े और दूसरे सामान्य तरह के प्राणी पेट भरने के लिए और औलाद पैदा करने के लिए पैदा होते हैं। मनुष्यों में से भी बहुत नर-पामर और नर-कीटक हैं जिनके जीवन का कोई लेखा-जोखा नहीं। पेट भरने और औलाद पैदा करने के अलावा दूसरा कोई काम वे न कर सके। लेकिन कुछ विशेष व्यक्तियों के ऊपर भगवान विश्वास करते हैं और यह मानकर भेजते हैं कि हमारे भी कुछ काम आ सकते हैं, केवल अपने ही गोरख धंधे में नहीं फँसे रहेंगे। युग निर्माण परिवार के हर व्यक्ति को अपने बारे में ऐसी ही मान्यता बनानी चाहिए कि हमको भगवान ने विशेष काम के लिए भेजा है। यह कोई विशेष समय है और हममें से हर आदमी को यह अनुभव करना चाहिए कि हम कोई विशेष उत्तरदायित्व लेकर आये हैं। समय को बदलने का उत्तरदायित्व-युग को आवश्यकताओं को पूरा करने का उत्तरदायित्व हमारे कंधों पर है। अगर इन तीनों बातों पर आप विश्वास करे सकें तो आपकी प्रगति का दौर खुल सकता है और आप महामानवों के रास्ते पर, जो कि अपने इस युग निर्माण परिवार का उद्देश्य है, आप सफलता पूर्वक चल सकते हैं।

यह विशेष समय वैसा नहीं है जैसा कि शाँति के समय का होता है। यह आपत्तिकाल जैसा समय है और आपत्तिकाल में आपातकालीन उत्तरदायित्व होते हैं। हमारे ऊपर सामान्य जिम्मेदारियाँ नहीं हैं, वरन् युग की भी जिम्मेदारियाँ हैं-यह मानकर हमको चलना चाहिए और साथ ही यह भी मानकर चलना चाहिए कि रीछ-वानर जिस तरीके से विशेष भूमिका निभाने के लिए आये थे। जैसे पाण्डव विशेष भूमिका निभाने के लिए आये थे और ग्वाल-बाल श्रीकृष्ण भगवान के साथ विशेष भूमिका निभाने के लिए आये थे। गाँधी जी के सत्याग्रही उनके साथ विशेष भूमिका निभाने के लिए आये थे। बुद्ध के साथ चीवरधारी भिक्षु कुछ विशेष उत्तरदायित्व निभाने के लिए आये थे। आप लोग इस तरह का अनुभव और विश्वास कर सकें कि आप लोग हमारे साथ उसी तरीके से जुड़ें हुए हैं और विशेष उत्तरदायित्व महाकाल का सौंपा हुआ पूरा करने के लिए हम लोग आये हैं। अगर यह बात मान सकें तो फिर आपके सामने नये प्रश्न उत्पन्न होंगे और नयी समस्याएँ उत्पन्न होंगी और नये आधार, नये कारण उत्पन्न होंगे।

इसके लिए जो आपको पहला कदम बढ़ाना पड़ेगा वह यह कि आप को अपनी परिस्थितियों में हेरफेर करना पड़ेगा। जिस तरीके से सामान्य मनुष्य जीते हैं, उस तरीके से आप जीने से इनकार कर दें और यह कहें कि हम तो विशेष व्यक्तियों और महामानवों की तरीके से जियेंगे। जब मात्र पेट ही भरना है तो गंदे तरीके से क्यों, श्रेष्ठ तरीके से क्यों न भरें। पेट भरने के अलावा जो कार्य कर सकते हैं, उसे क्यों न करें। जब यह प्रश्न आपके सामने ज्वलंत रूप से आ खड़ा होगा तब यह आवश्यकता आपको अनुभव होगी की हम अपनी मनः स्थिति में हेरफेर कर डालें-अपनी मनः स्थिति को बदल डालें ओर हम लौकिक आकर्षणों की अपेक्षा यह देखें कि इनमें भटकते रहने की अपेक्षा मृगतृष्णा में भटकते रहने की अपेक्षा भगवान का पल्ला पकड़ लेना ज्यादा लाभदायक है। भगवान का सहयोगी बन जाना ज्यादा लाभदायक है। संसार का इतिहास बताता है कि भगवान का पल्ला पकड़ने वाले, भगवान को अपना सहयोगी बनाने वाले, कभी घाटे में नहीं रहे। अगर इस बात पर विश्वास कर सकें तो जानना चाहिए की हमने एक बहुत बड़ा प्रकाश पा लिया। ऊंचा उठने के लिए मनः स्थिति बदलना और साँसारिकता का पल्ला पकड़ने की अपेक्षा भगवान की शरण में जाना आवश्यक है। यही हमारा दूसरा कदम होना चाहिए।

तीसरा कदम आत्मिक उत्थान के लिए हमारा यह होना चाहिए कि हमारी महत्वकाँक्षाएँ, कामनाएँ, इच्छाएँ बड़प्पन के केन्द्र से हटें ओर महानता के साथ जुड़ जायें। हमारी महत्वकाँक्षाएँ यह नहीं होनी चाहिए की हम जिंदगी भर वासना को पूरा करते रहेंगे और तृष्णा के लिए अपने समय और बुद्धि को खर्च करते रहेंगे और अपने बड़प्पन को, अपनी अहंता को, ठाट-बाट को लोगों के ऊपर रौब गालिब करने के लिए हम तरह-तरह के ताने बाने बुनते रहेंगे। अगर हमारा मन इस बात को मान जाए और अंतः करण स्वीकार कर ले कि यह बचकानी बातें हैं, छिछोरी बातें हैं छोटी बातें हैं। अगर हम क्षुद्रता का त्याग कर सकें तो फिर हमारे सामने एक ही बात खड़ी होगी कि अब हमको महानता ग्रहण करनी है। महापुरुषों ने जिस तरीके से आचरण किये थे, उनके चिंतन करने का जो तरीका था, जिस तरीके से उनने आचरण किये थे, वही तरीका हमारा होना चाहिए और हमारी गतिविधियाँ उसी तरीके की होनी चाहिए। जैसा कि श्रेष्ठ मनुष्यों की रही हैं और रहेंगी। यह विश्वास करने के बाद हमको अपनी क्रिया पद्धति में, दृष्टिकोण में, मान्यताओं में, इच्छा-आकाँक्षाओं में परिवर्तन करने, बदल देने के बाद

व्यावहारिक जीवन में भी थोड़े से कदम उठाने चाहिए। साधकों के लिए यही मार्ग है कि मन और इंद्रियों की गुलामी को छोड़ दें। इंद्रियों की गुलामी को हम छोड़ दें और इनके स्वामी बनें। अब तक हम असहाय के रूप में, दीन-दुर्बल के रूप में इंद्रियों के कोड़े सहते रहे हैं और इनके दबाव और इनकी वजह से चाहें जहाँ घूमते हैं। मन हमको चाहें जहाँ घसीट ले जाता है। कभी गड्ढे में धकेल देता है, कभी कहीं कर देता है। इन्द्रियाँ हमसे जाने क्या-क्या करा लेती हैं मन ज जाने क्या-क्या करने के लिए कहता रहता है। हम असहाय एवं गुलामों के तरीके से इन्हीं का कहना मानते हैं। अब हमको इन परिस्थितियों को बदल देना चाहिए। हमारी आपसे प्रार्थना है कि आप इनके स्वामी बनें। स्वामी अपनी ललक लिप्सा को छोड़ दें। इंद्रियों को नौकरानी के तरीके से इस्तेमाल करें बल्कि मन को नौकर के तरीके से इस्तेमाल करें। मन को हुकुम दें कि आपको हमारा कहना मानना ही पड़ेगा। इंद्रियों से कहें कि आप हमारी मर्जी के बिना जो चाहे नहीं कर सकतीं। हमारी आज्ञा के बिना कैसे करेंगी ? इस तरीके से इंद्रियों के ऊपर हुकूमत अगर हम कर पायें तो हम गुलामी बंधन से मुक्त हो जायें। जिस के लिए हम मुक्ति चाहतें हैं असल में यह कोई भवबंधनों से मुक्ति नहीं है। हमारे मन और इंद्रियों की गुलामी का नाम ही भव बंधन है। इनसे यदि हम अपने को छुड़ा लेते हैं तो हम स्वभावतः जीवन मुक्त हो जाते हैं और मोक्ष मिल जाता है अगर इसके लिए हम साहस इकट्ठा कर पायें तब।

संसार में रहकर हम अपने कर्त्तव्य पूरे करें, हँसी-खुशी से रहें, अच्छे तरीके से रहें, लेकिन इस कदर व्यस्त न हो जायें-इस कदर न फँस जायें कि हमको अपने जीवन के उद्देश्यों का ध्यान ही नहीं रहे। अगर हम इसमें फँसेंगे तो मरेंगे। मक्खी चाशनी के ऊपर दूर बैठकर रस लेती रहती है तब तो ठीक है। इस तरह वह जायका भी लेती रहती है और अपने को सुरक्षित भी रखती है, पर कोई ऐसी मूर्ख मक्खी जैसे के आप हैं, चाशनी के ऊपर बेहिसाब टूट पड़ती है तो शहद खाना ता दूर-चाशनी खाना तो दूर-वह अपने पंखों में भी लपेट लेती है और बेमौत मरती है। आपने उस बन्दर का किस्सा सुना होगा जो अफ्रीका में पायें जाते हैं और जिनके बारे में यह कहा जाता है कि शिकारी लोग उसको मुट्ठी भर चने का लालच दे करके उसकी जान ले लेते हैं। उसे गिब्बन कहते हैं। उसे फँसाने के लिए लोहे के घड़े में चने भर दिये जाते हैं और गिब्बन उन चनों को खाने के लिए आता है, मुट्ठी बाँध लेता है, लेकिन तब वह मुट्ठी निकालना चाहता है तो वह निकलती नहीं है। जोर लगाता है तो भी नहीं निकलती। इतनी हिम्मत नहीं होती की मुट्ठी को खाली दे और हाथ को खींच ले, लेकिन वह मुट्ठी को छोड़ना नहीं चाहता। इसका परिणाम यह होता है कि हाथ बाहर निकलता नहीं और शिकारी आता है तथा उसको मार कर खत्म कर देता है। उसकी चमड़ी को उधेड़ लेता है। हमारी और आपकी स्थिति ऐसी ही है जैसे अफ्रीका के गिब्बन बंदरों की। हम लिप्साओं के लिए, लालसाओं के लिए, वासना के लिए, तृष्णा के लिए, अहंकार की पूर्ति के लिए मुट्ठी बंद करके बंदरों की तरीके से फँसे रहते हैं और अपनी जीवन संपदा का विनाश कर देते हैं। इससे हमको बाज आना चाहिए और अपने आपको इनसे बचाने की कोशिश करनी चाहिए।

हमको अपनी क्षुद्रता का त्याग करना ही है। जब हम क्षुद्रता का त्याग करते हैं तो कुछ खोते नहीं वरन् कमाते ही कमाते हैं। कार्लमार्क्स मजदूरों से यही कहते थे-”मजदूरों एक हो जाओ, तुम्हें गरीबी के अलावा कुछ खोना नहीं है।” मैं कहता हूँ कि अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले विद्यार्थियों-तुम्हें अपनी क्षुद्रता के अलावा और कुछ नहीं खोना है, पाना ही पाना है। आध्यात्मिकता के मार्ग पर पाने के अलावा और कुछ नहीं है। इससे एक ही चीज हाथ से दी जाती है जिसका नाम है-क्षुद्रता और संकीर्णता। क्षुद्रता और संकीर्णता को त्यागने में अगर आपको बहुत कष्ट न होता हो तो मेरी प्रार्थना है कि आप इसको छोड़ दें और महानता के रास्ते पर चलें। जीवन में भगवान को अपना हिस्सेदार बना लें। भगवान के साथ अपने को जोड़ लें। अपने को जोड़ लेंगे तो यह रिश्तेदारी यह मुलाकात आपके बहुत काम आयेगी। गंगा ने आपको हिमालय के साथ में जोड़े रखा है। गंगा और हिमालय का तालमेल तथा-रिश्ता-नाता ठीक बना रहा और गंगा हमेशा पानी खर्च करती रही, लेकिन उसके पानी की कमी भी कभी नहीं पड़ने पायी। हिमालय के साथ-भगवान के साथ हम अपना रिश्ता जोड़ें तो हमारे लिए जीवन में कभी अभावों का, संकटों का अनुभव न करना पड़ेगा जैसे कि सामान्य लोग पग-पग किया करते हैं। गंगा का पानी सूखा नहीं, लेकिन नाले का सूख गया क्योंकि उसने महान सत्ता के साथ संबंध बनाया नहीं। बाढ़ का पानी आया तो सूखा नाला उलछने लगा, जैसे ही पानी सूखा, नाला भी सूख गया नौ महीने सूखा पड़ा रहा। बरसाती नाला तीन महीने बाद ही सूख गया, लेकिन गंगा युगों से बहती चली आ रही है, कभी सूखने का नाम नहीं लिया। हम भी अगर हिमालय के साथ जुड़ने भगवान के साथ जुड़ने की हिम्मत कर पायें, तब हमें भी सूखने का कभी मौका नहीं आयेगा।

अपने आपको हम अगर भगवान को समर्पित कर सकें तो ही भगवान को पायेंगे। कठपुतली ने अपने आपको बाजीगर के हाथों सौंप दिया और बाजीगर की सारी कला का लाभ उठाया। हम भगवान की सारी कला का लाभ उठा सकते हैं, शर्त केवल यही है कि हम अपने आपको अपनी महत्वाकांक्षाओं को और अपनी दुष्प्रवृत्तियों को भगवान के सुपुर्द कर दे। पतंग ने कुछ खोया नहीं, बच्चे के हाथ में अपने को सौंप दिया और बच्चे ने उस पतंग को डोरी के साथ उड़ाया ओर पतंग आसमान छूने लगी। अगर पतंग ने इतनी हिम्मत और बहादुरी न दिखायी होती और बच्चे के हाथ में अपना मार्ग-दर्शन सौंपा होता तो क्या पतंग उड़ सकती थी नहीं, जमीन पर ही पड़ी रहती। बांसुरी ने अपने आपको किसी गायक को सौंपा। गायक के होठों से लगी और गायक होठों ने वह हवा फूँक मारी जिससे कि चारों और मधुर संगीत निनादित होने लगा। हम भगवान के साथ अपने आपको इसी तरीके से जोड़ें जैसे कि कठपुतली पतंग और बाँसुरी अपने आपको जोड़ती है, न कि इस तरीके से कि पग-पग पर हुकूमत चलायें भगवान के साथ और अपनी मनोकामना पेश करें यह भक्ति की निशानी नहीं है। भगवान की आज्ञा पर चलना हमारा काम है। भगवान पर हुकूमत करना और भगवान के सामने तरह-तरह की फरमाइशें पेश करना यह तो वेश्यावृत्ति का काम है। हममें से किसी को भी उपासना लौकिक कामनाओं के लिए नहीं, बल्कि भगवान की साझेदारी के लिए, भगवान को स्मरण रखने के लिए, भगवान के आज्ञानुवर्ती होने के लिए और भगवान को अपना समर्पण करने के उद्देश्य से उपासना करेंगे, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपकी उपासना सफल होगी। आपको आँतरिक संतोष मिलेगा। न केवल आँतरिक संतोष मिलेगा, बल्कि आपके व्यक्तित्व का विकास होगा और व्यक्तित्व के विकास का निश्चित परिणाम यह होता है कि आदमी भौतिक और आत्मिक दोनों तरह की सफलताएँ भरपूर मात्रा में प्राप्त करता है।

मेरा आपसे यह अनुरोध है कि आप हँसती-हँसाती

जिंदगी जियें, खिलती-खिलाती जिंदगी जियें। हलकी-फुलकी जिंदगी जियें। अगर हलकी-फुलकी जिंदगी जियेंगे तो आप जीवन का सारे का सारा आनन्द पायेंगे ओर अगर आप वासना, तृष्णा, लोभ लिप्सा में घुसेंगे तो नुकसान उठायेंगे। आप अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए जिंदगी जियें और हँसी-खुशी से जियें। किसी बात को बहुत महत्व न दें। अपने किसी कर्तव्य की उपेक्षा भी ने करें, लेकिन उसमें इतने ज्यादा मशगूल भी न हों कि किसी लौकिक काम को ज्यादा महत्व देने लगें ओर अपने मन की शाँति खो बैठें।

हमें माली की जिंदगी जीनी जीनी चाहिए मालिक की नहीं। मालिक की जिंदगी में बहुत भारीपन है और बहुत कष्ट है। माली की जिंदगी के तरीके से रखवाली करने वाले के चौकीदार की तरीके से हम जियें तो पायेंगे कि जो कुछ भी कर लिया वह हमारा कर्तव्य ही काफी था। मालिक को चिंता रहती है कि सफलता मिली कि नहीं उसको इतनी चिंता रहती है कि अपने कर्तव्य ओर फर्ज पूरे किये कि नहीं। हम दुनिया में रह, काम दुनिया में करें, पर अपना मन भगवान में रखें अर्थात् उच्च उद्देश्यों और उच्च आदर्शों के साथ जोड़कर रखें। कमल का पत्ता पानी पर तैरता है लेकिन डूबता नहीं है। हम दुनिया में डूबें नहीं। हम खिलाड़ी की तरीके से जियें। हार-जीत के बारे में बहुत ज्यादा चिंता न करें। हम अभिनेता के तरीके से जियें और यह देखें कि हमने अपना पार्ट-प्ले ठीक तरीके से किया कि नहीं किया। हमारे लिए इतना ही संतोष बहुत है। ठीक है परिणाम नहीं मिला तो हम क्या कर सकते हैं। बहुत सी बातें परिस्थितियों पर निर्भर रहती हैं परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं रही तो हम क्या कर सकते हैं। हमने अपना कर्तव्य पूरा किया, हमारे लिए इतना बहुत है। इस दृष्टि से अगर आप जियेंगे तो आपकी खुशी को कोई छीन नहीं सकता और आपको इस बात की परवा नहीं होगी कि जब कभी सफलता मिले तब आप प्रसन्न हों। चौबीसों घंटे आप खुशी से जीवन जी सकते हैं। जीवन की सार्थकता, सफलता का यही तरीका है।

साधकों में से कई व्यक्ति हम से यह पूछते रहते हैं कि हम क्या करें ? मैं उनमें से हर एक से कहता हूँ कि यह मत पूछिए, बल्कि यह पूछिये कि क्या बनें। अगर आप कुछ बन जाते हैं तो करने से भी ज्यादा कीमती है वह। फिर जो कुछ भी आप कर रहे होंगे वह सब सही हो रहा होगा। आप साँचा बनने की कोशिश करें। अगर आप साँचा बनेंगे तो जो गीली मिट्टी आपके संघर्ष में आयेगी-आपके ही तरीके से आपके ही ढंग के-शकल के खिलौने बनते हुए चले जायेंगे। आप सूरज बनें तो आप चमकेंगे और चलेंगे। उसका परिणाम क्या होगा ? जिन लोगों के लिए आप करना चाहते हैं वे आपके साथ-साथ चमकेंगे ओर चलेंगे। सूरज के साथ में नो ग्रह और बत्तीस उपग्रह हैं। वे सब के सब चमकते हैं और साथ-साथ चलते हैं। हम चलें, हम प्रकाशवान हों, फिर देखेंगे कि जिस जनता के लिए आप चाहते थे कि वह हमारी अनुगामी बने ओर हमारी नकल करे तो वह ऐसा ही करेगी। आप देखेंगे की आप चलते हैं तो दूसरे लोग भी चलते हैं। आप स्वयं नहीं चलेंगे और यह अपेक्षा करेंगे की दूसरे आदमी हमारा कहना मानें तो यह मुश्किल है। आप गलें और वृक्ष बनें और वृक्ष बन कर के अपने जैसे असंख्यों बीज आप अपने भीतर से पैदा कर डालें। हमको बीजों की जरूरत है। आप बीज बनिये, गलिये वृक्ष बनिये और अपने भीतर से ही फल पैदा करिये ओर प्रत्येक फल में से ढेरों के ढेरों बीज पैदा कीजिये। आप अपने भीतर से ही बीज क्यों नहीं बनायें ?

मित्रो, जिन लोगों ने अपने आपको बनाया है उनको यह पूछने की जरूरत नहीं पड़ी कि क्या करेंगे। उनकी प्रत्येक क्रिया इस लायक बन गयी कि उनकी क्रिया ही सब कुछ करा सकने में समर्थ हो गई। उनका व्यक्तित्व ही इतना आकर्षक रहा कि प्रत्येक सफलता का और प्रत्येक महानता को सम्पन्न करने के लिए काफी था। सिक्खों के गुरु रामदास के शिष्य अर्जुन देव जी बर्तन-थाली साफ करने का काम करते थे। उन्होंने अपने आपको अनुशासन में ढालने का प्रयत्न किया था, पर जब उनके गुरु यह तलाश करने लगे कि कौन से शिष्य को अपना उत्तराधिकारी बनाया जाय। सारे विद्वानों की अपेक्षा और दूसरे गुण वालों की अपेक्षा उन्होंने अर्जुन देव को चुना और यह कहा कि अर्जुन देव ने अपने आपको बनाया है। बाकी आदमी इस कोशिश में लगे रहे कि हम दूसरों से क्या करायें और स्वयं क्या करें। जबकि होना यह चाहिए था कि जिस तरीके से अर्जुन देव ने कुछ किया था और न कराया था, केवल अपने आपको बना लिया था। इसलिए उन्हें गुरु ने माना कि यह सबसे अच्छा आदमी है। सप्त ऋषियों ने अपने आपको बनाया था। उनके अंदर तप की संपदा थी, फिर जो कोई भी जहाँ कहीं भी रहते चले गये, और जो भी काम उन्होंने किये वही महानता श्रेणी का उच्चस्तरीय काम कहलाया। अगर उनका व्यक्तित्व घटिया होता तो फिर बात कैसे बनती।

गाँधी जी ने अपने आपको बनाया था तभी हजारों आदमी उनके पीछे चलें। बुद्ध ने अपने आपको बनाया, हजारों आदमी उनके पीछे चलें। हम भी अपने में चुम्बकत्व पैदा करें। खदानों के अन्दर लोहे और अन्य धातुओं के कण जमा हो जाते हैं, उसका कारण यही है कि जहाँ कहीं भी खदान होती है, वहाँ चुम्बकत्व रहता है। चुम्बकत्व छोटी-छोटी चीजों को अपनी ओर खींचता रहता है। हम अपनी ‘क्वालिटी’ बढ़ायें, अपना चुम्बकत्व बढ़ायें, अपना व्यक्तित्व बढ़ाये यही सबसे बड़ा करने के लिए काम है। समाज की सेवा भी करनी चाहिए, पर मैं यह कहता हूँ कि समाज सेवा से भी पहले ज्यादा महत्वपूर्ण इस बात को आप समझें की हमको अपनी ‘क्वालिटी’ बढ़ानी है। कोयले और हीरे में रासायनिक दृष्टि से काई फर्क नहीं ? कोयले का ही परिष्कृत रूप हीरा है। खनिज में से जो धातुएँ निकलती हैं, कच्ची होती हैं, लेकिन जब पकाकर के ठीक कर ली जाती हैं और साफ-सुथरी बना दी जाती हैं तो उन्हीं धातुओं का नाम स्वर्ण-शुद्ध स्वर्ण हो जाता है। उसी का नाम फौलाद हो जाता है। ही अपने आपको फौलाद बनायें। अपने आपकी सफाई करें। अपने आपको धोये। अपने आपको परिष्कृत करें। इतना कर सकना यदि हमारे लिए संभव हो जाये तो समझना चाहिए कि आपका यह सवाल पूरा हो गया कि हम क्या करें ? क्या न करें ? आप अच्छे बने। समाज सेवा करने से पहले ये आवश्यक है कि हम समाज सेवा के लायक हथियार तो अपने आपको बना लें। यह ज्यादा अच्छा है कि हम अपने आपकी सफाई करें।

मित्रों, एक और बात कहते हुए अपनी बात समाप्त करना चाहते हैं। एक हमारा आमंत्रण अगर आप स्वीकार कर सकें तो बड़ी मजेदार बात होगी। आप हमारी दुकान में शामिल हो जाइये, इसमें बहुत फायदा है। इसमें से हर आदमी को काफी मुनाफे का शेयर मिल सकता है। माँगने से तो हम थोड़ा सा ही दें पायेंगे। भीख माँगने वालों को कहाँ किसने कितना दिया है। लोग थोड़ा सा ही दे पाते हैं। आप हमारी दुकान में साझेदार-हिस्सेदार क्यों नहीं बन जाते। हमारे गुरु और हमने साझेदारी की है। शंकराचार्य और मान्धनता ने साझेदारी की थी इस दुकान में। सम्राट अशोक और बुद्ध ने साझेदारी की थी। समर्थ गुरु रामदास और शिवाजी ने साझेदारी की थी। रामकृष्ण और विवेकानन्द ने साझेदारी की थी। क्या आप ऐसा नहीं कर सकते कि हमारे साथ शामिल हो जायँ। हम और आप मिल करके एक बड़ा काम करें। उसमें से जो मुनाफा आये उसको बाँट लें। अगर आप इतनी हिम्मत कर सकते हों कि हम प्रमाणिक आदमी हैं और जिस तरीके से हमने अपने गुरु की दुकान में साझा कर लिया है, आप आयें ओर हमारे साथ साझा करने की कोशिश करें। अपनी पूँजी उसमें लगायें। समय की पूँजी, बुद्धि की पूँजी हमारी दुकान में शामिल करें और इतना मुनाफा कमायें जिससे कि आप निहाल हो जायें। हमारी जिंदगी के मुनाफे का यही तरीका है। हमने अपनी पूँजी को अपने गुरुदेव हमारे भगवान की कम्पनी में शामिल हैं। हम अपने गुरुदेव की कंपनी में शामिल हैं। आपमें से हर एक का आह्वान करते हैं कि अगर आपकी हिम्मत हो तो आप आयें और हमारे साथ जुड़ जायें। हम जो भी लाभ कमायेंगे भौतिक और अध्यात्मिक, उसका इतना हिस्सा आपके हिस्से में मिलेगा कि आप धन्य हो सकते हैं और निहाल हो सकते हैं, उसी तरीके से कि जैसे हम धन्य हो गये और निहाल हो गये। यही हमारा साधकों से आग्रह भरा अनुरोध इस बदलती विषम वेला में है।


नमन है तुमको बारंबार


नमन है तुमको बारंबार (Kavita)

गुरुवर ! आज तुम्हारी वाणी बदलेगी साँर, नमन है तुमको बारंबार ।

वचन तुम्हारे हर लेंगे अब हर मन का अँधियार, नमन है तुमको बारंबार ।

शापित मानव में तुमने नूतन प्राण जगाये, संस्कृति के मरुथल में तुमने अमृत-कण बरसाये। निर्मम हृदयों में सरसायी करुणा की रसधार । नमन है तुमको बारंबार ।

सहज-सरल वाणी से तुमने जन-जन को अपनाया, जटिल और दुर्लभ दर्शन को तुमने सुलभ बनाया । सुगम हुए सारी धरती को यूँ उत्कृष्ट विचार । नमन है तुमको बारंबार ।

अत्याचार बहुत है, हाहाकार मचा है भारी , दुष्प्रभाव से देश-देश में फैली है लाचारी । इस विपत्ति-वेला में तुमने दिया सबल आधार । नमन है तुमको बारंबार ।

तर्क-बुद्धि से पहले भावों की प्रेरणा जगायी , पहले तपे स्वयं, फिर ऊर्जा कण-कण में खरायी। मानवता को दिया संजीवन-विद्या का उपहार । नमन है तुमको बारंबार ।

तपःपूत लेखनी तुम्हारी रही जगाने वाली , हर हताश के हृदय मनोबल सदा बढ़ाने वाली । दिया दुखी मानव को तुमने ही अमोघ उपचार । नमन है तुमको बारंबार ।

-शचीन्द्र भटनागर


समर्पित की अकुलाहट


समर्पित की अकुलाहट (Kavita)

सब कुछ, हे जीवन-धन ! देकर भी करता मन, दे दूँ कुछ और अभी ।

तन अंगीकार करो, मन को स्वीकार करो , भ्रम-लोभ-मोह लेकर , प्राणों का भार हरो , दूँ आठों याम तुम्हें , हर श्रम-विश्राम तुम्हें , सारा पूजन-अर्चन , देकर भी करता मन, दे दूँ कुछ और अभी ।

प्रभू ! भक्ति समर्पित हो , सब शक्ति समर्पित हो , जीवन भर की सारी , अनुरक्ति समर्पित हो , उँगलियाँ सुमिरन हों , पासें अनुसरनी हो , अंतस् का अनुगुँजन , देकर भी करता मन, दे दूँ कुछ और अभी ।

प्रभू ! नाम तुम्हारा हो , धन-धाम तुम्हारा हो , बस कर्म हमारे हों , परिणाम तुम्हारा हो , मैं अनजाना हो लूँ , बिना पहचाना हो लूँ , हर आश्रय-अवलंबन , देकर भी करता मन, दे दूँ कुछ और अभी ।

-चिन्मय


धारावाहिक विशेष लेखमाला-25 ,गायत्री जयंती पुण्यतिथि पर विशेष - परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य

गायत्री रूपी वटवृक्ष जिनकी ब्राह्मणत्व रूपी उर्वर भूमि में फलित हुआ

परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण आज से चार वर्ष पूर्व इन्हीं दिनों गायत्री जयंती के दिन हुआ था, जब उनने अस्सी वर्ष जिये गये अपने जीवन के दृश्य रूप को समेटकर स्थूल-दृश्य काया के बंधनों से मुक्त हो स्वयं को उस महा विराट से जोड़ लिया था, जिसका दिग्दर्शन उन्हीं की सूक्ष्म व कारण सत्ता के रूप में आज सभी को हो रहा है। सोलहवें चित्रकूट अश्वमेध यज्ञ के समापन वेला में लिख जा रहे इस विशेष लेख में पूज्यवर के ब्राह्मण रूप में जिये गये जीवन के विशिष्ट क्षणों के माध्यम से ब्राह्मणत्व की वह चिंतन परक व्याख्या है, जो आज समाज में तथा कथित बुद्धि जीवियों-जातिवाद को संदेह भरी राजनीति करने वाले क्षुद्रमना व्यक्तियों की जिव्हा पर विराजमान है। ब्राह्मण क्या है? कैसा होता है? कैसे हर कोई बन सकता है ? उसका दार्शनिक विवेचन इस पूर्वार्ध में पढ़ें। उत्तरार्ध में हम उनके जीवन के व्यावहारिक पहलुओं का ब्राह्मणत्व के परिप्रेक्ष्य में वह दिग्दर्शन करायेंगे, जो हम सबने इन्हीं चर्मचक्षुओं से देखा है।

जड़ें जमीन में न हों, उसे पेड़ की कल्पना करना कठिन है। ठीक इसी तरह ब्राह्मणत्व ही वह आधार है वह आधार वह उर्वर भूमि है जिसकी गोद में गायत्री का वह बीज अपनी चमत्कारी परिणति प्रस्तुत करता है। परमपूज्य गुरुदेव के जीवन में हम सबने गायत्री महाशक्ति की जिन आश्चर्यजनक शक्तियों को देखा, जाना, अनुभव किया, लाभान्वित हुए, इसके रहस्य का खुलासा करते हुए उन्हीं के शब्द हैं-”हमारा जीवन प्रयोग प्रत्यक्ष है। हमने सारे जीवन ब्राह्मण बनने की साधना की। इसके लिए पल-पल तपे, इंच-इंच बढ़े। जिंदगी में यज्ञोपवीत संस्कार का वह क्षण कभी नहीं भूला जब महामना मदनमोहन मालवीय ने गायत्री महामंत्र सुनाने के साथ ही कहा था-”गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है”। “ब्राह्मण जन्म से नहीं जीवन साधना से बना करते हैं। इस तथ्य को न समझने वाले छुटपुट पूजा पत्री करने और उलटी-पलटी माला खिसकाने के सहारे लंबे चौड़े स्वप्न देखते और विफल-मनोरथ, निराश, असफल बने रहते हैं।”

सामान्य क्रम में यह सत्य किसी को कबीरदास की उलटबांसी जैसा लग सकता है। हो भी क्यों न ? ब्राह्मण घर में जन्म लेने, ब्राह्मण कहलाने के बावजूद-ब्राह्मण बनने का उपदेश किस अनबूझ पहेली से कम है। इस उलझन को सुलझाते हुए उनके शब्द हैं- “ब्राह्मणत्व एक साधना है। मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान है। इस साधना की ओर उन्मुख होने वाले क्षत्रिय विश्वामित्र और शूद्र ऐतरेय भी ब्राह्मण हो जाते हैं। साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल ओर धुँधकारी शूद्र हो गए। सही तो है जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ। ब्राह्मण वह जो समाज से कम से कम लेकर उसे अधिकतम दे। स्वयं के तप, विचार और आदर्श जीवन के द्वारा अनेकों को सुपथ पर चलना सिखाये।”

इसे न समझ पाने के कारण बहुधा लोग भ्रमित होते रहते हैं। बहुत से इसका नाम सुनकर गर्वित हो उठते हैं। अपनी जाति-दंभ में फूल उठते हैं। अनेकों के चेहरों पर ‘ब्राह्मण’ शब्द तिरस्कार और उपेक्षा के भावों को घना कर देता है। किंतु इन ढेर सारे भावों का उद्दीपन सिर्फ गलत अवधारणा का परिणाम है। यदि अवधारणा सही होती तो वैदिक वाङ्मय के परिभाषित शब्दों का सम्यक् ज्ञान होने पर इन विवादों का कोई फेर न पड़ता। प्राच्य विद् आई0ए॰ रोजेट ने भी अपनी रचना ‘वैदिक इण्डिया’ में इस तथ्य को स्वीकारा है। उनके अनुसार यह शब्द जाति कुल, गोत्र, रूप, रंग, का द्योतक न होकर एक मनोवैज्ञानिक अवस्था का द्योतक है। यह विकसित व्यक्तित्व की विशेष अवस्था है। इसका ठीक-ठीक समानार्थी शब्द जब यहीं के प्राचीन अर्वाचीन चिंतन में नहीं है, तब पश्चिम की रीते कोश से कुछ आशा कराना व्यर्थ है।

वैसे भी पश्चिमी मनोविज्ञान ने ज्यादातर रोगियों की छान-बिन की है। बीमार, भग्न मानसिकता इन विचारकों के कार्य की सीमा रेखा बन गई। स्वस्थ लोगों के अभाव में उनकी सारी खोजें रोग अध्ययन पर आधारित हैं और एक स्वस्थ व्यक्ति निताँत अलग होता है अस्वस्थ व्यक्ति से। फ्रायड का कभी सामना नहीं पड़ा स्वस्थ व्यक्तित्व से। पड़ता भी क्यों ? सही सलामत आदमी को क्या गरज पड़ी है वैद्य डाक्टरों के पास जाने की। इसी कारण उसने समूचे व्यक्तित्व को मुख, गुदा, लिंग प्रधान, काम प्रसुप्ति एवं जननाँगीय अवस्थाओं में समेट दिया। यही हाल उस जैसे अनेकों का है। इनका विवेचन देखने से लगता है जैसे आदमी के जीवन में कामुकता के सिवाय ओर कुछ बचा ही नहीं। लेकिन इस सिद्धाँत रचना में उसकी गलती भी क्या ? यदि मानसिक रूप से बीमार न हो तो उसे मनःचिकित्सक के पास जाने की क्यों सूझेगी ? यही कारण है, फ्रायड, एडलर, जैनेव इन सभी ने अपने सिद्धाँतों की इमारत बीमार मन की जमीन पर खड़ी की।

समग्रता के परिप्रेक्ष्य में देखने पर समूचा व्यक्तित्व-परक अध्ययन तीन वर्गों में बँटा दीखता है। एक रोगात्मक, सारा पश्चिमी अध्ययन इसी खाँचे में समा जाता है। केवल अभी-अभी इधर कुछ संपूर्ण धारणाएं मजबूती पकड़ती जा रही हैं, जो कि स्वस्थ व्यक्ति के बारे में सोचती हैं। लेकिन वे एकदम आरंभ पर ही हैं। पहले कदम भी नहीं उठाये गये। दूसरे प्रकार के अध्ययन वे जो स्वस्थ व्यक्ति के बारे में सोचते हैं। स्वास्थ्य पर मन आधारित हैं। ये हैं पूरब के मनोविज्ञान पर- बौद्ध, पतंजलि, जैन, सूफी-इन्होंने इस पर गहरी खोज की है। तरह-तरह की साधना प्रणालियों का विकास यहाँ देखने को मिलता है। विकासमान व्यक्तित्व तमाम सारी अतीन्द्रिय क्षमताओं की चर्चा यहाँ सुनने को मिलती है। कुल मिलाकर इनकी मदद व्यक्तित्व विकास की पूर्णता पाने के लिए है।

फिर एक तीसरा प्रकार है, जिसे गुरजिएफ ‘परम मनोविज्ञान’ कहता है। इसकी दशा अविकसित है। इसमें विकास की पूर्णता पाये हुए व्यक्तित्वों का अध्ययन करने की चेष्टा हैं। श्री अरविंद की पुस्तक ‘सीक्रेट ऑफ द वेद’ में वैदिक ऋषियों के इन्हीं प्रयासों पर संकेत है। उनका खुद का भी थोड़ा-बहुत प्रयास है। ब्राह्मणत्व की साधना के चरम शिखर पर पहुँचने वाला कैसा होगा ? यहीं पर उसकी एक झलक देखने को मिलती है।

स्वस्थ व्यक्तित्व की अगर बखूबी जाँच करें, उसकी विकास यात्रा के आरंभिक बिंदु की ओर देखें तो वह अवस्था है जड़ता की। एक तमस उनको घेरे रहता है। इस आवरण के कारण इनको न तो सोचने का मन करता है और न कुछ करने का। चिंतन और कर्म दोनों से विरति एक मात्र लक्षण है इनका। इसे तोड़ने आगे बढ़ने का उपाय सिर्फ एक है-कठोर श्रम। श्रम का कुठार ही इस तमस की कारा को तोड़ने में सक्षम है। इस ओर प्रयत्न करने का मतलब है ब्राह्मणत्व की ओर उन्मुख होना।श्रम होगा तो अर्जन होगा। फिर शुरुआत भले शरीर करे देर सबेर साथ तो मन को भी देना पड़ेगा। कर्म और चिंतन इन दोनों पैरों के बिना ब्राह्मणत्व की राह पर कैसे चला जा सकेगा। इस अर्जन की अवस्था में होता है रजस का जागरण। कामनाओं-इच्छाओं का उदय, अतृप्ति की जलन का अहसास इसी अवस्था की देन है। अर्जन का सदुपयोग अपने लिए नहीं औरों के लिए हो। इस भावना का उभार धीरे-धीरे व्यक्तित्व को उस धरातल पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ वह अनेकों को संरक्षण देने लगता है।

मनुष्य में कर्म, चिंतन और भाव तीनों का ही विकास ठीक-ठीक हो सके इसी विज्ञान विधान गायत्री मंत्र है। इसे ऋषियों द्वारा अन्वेषित ऐसी वैज्ञानिक पद्धति के रूप में जाना जा सकता है-जिसका प्रयोग मानवीय व्यक्तित्व में अंतर्निहित समस्त शक्तियों को जगा सके और उसे पूर्णता दे सके। इस तरह ब्राह्मणत्व गायत्री एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक की चाहत दूसरे का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती है। दूसरे का प्रयोग पहले की प्राप्ति कराता है।

आधुनिक युग में परम पूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन में इस गंभीर प्रयोग की सफल साधना की। निष्कर्ष में उन्होंने कहा-”गायत्री की तुलना अमृत, पारस और कल्पवृक्ष से की गई है। इसके तत्वज्ञान के संपर्क में आकर मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को-बल और महत्व को, पक्ष और प्रयोजन को ठीक तरह समझ लेता है। इस आस्था के आधार पर विनिर्मित कार्य-पद्धति अपनाने रहने पर वह ब्राह्मण बन जाता है भले ही लौकिक रूप में उसे सामान्य परिस्थितियों का जीवन जीना पड़े। ब्राह्मण की आस्थाएँ एवं विचारताएँ इतने ऊँचे स्तर की होती हैं उनके निवास स्थान अंतःकरण में अमृत का निर्झर झरने जैसा आनन्द हर घड़ी उपलब्ध होता रहता है।

गायत्री निःसंदेह पारसमणि है। जिसने उसे छुआ वह लोहे का सोना बन गया। गुण, कर्म और स्वभाव में महानता उत्कृष्टता उत्पन्न करना इसका प्रधान प्रतिफल है। जिसकी आँतरिक महानता विकसित होगी, उसकी बाह्य प्रतिभा का प्रखर होना प्रतिभा जहाँ कहीं भी होगी, वहाँ सफलताएँ और समृद्धियाँ हाथ बाँधे सामने खड़ी दिखाई देंगी। लघु को महान बनाने की सामर्थ्य ओर किसी में नहीं केवल अंतरंग की महत्ता गण, कर्म और स्वभाव की उत्कृष्टता में है। गायत्री का तत्त्वचिंतन उसी को उगाता बढ़ाता और सँवारता है। फल स्वरूप उसे पारस कहने में कोई आपत्ति नहीं। इसे पाकर अंतरंग ही हर्षोल्लास में निमग्न नहीं-रहता, बहिरंग जीवन भी स्वर्ण जैसी आभा से दीप्तिमान रहता है। इतिहास का पन्ना-पन्ना इस प्रतिपादन से भरा पड़ा है कि इस तत्वज्ञान को अपनाकर कितने कलुषित और कुरूप लौह खण्ड स्वर्ण जैसे बहुमूल्य, महान, अग्रणी एवं प्रकाशवान बनने में सफल हुए हैं।

कल्पना की ललक और लचक ही मानव जीवन का सबसे बड़ा आकर्षण है। कल्पना लोक में उड़ने-उड़ाने वाले ही कलाकार कहलाते हैं। सरसता नाम की जो अनुभूतियां हमें तरंगित, आकर्षित एवं उल्लसित करती रहती है, उनका निवास कल्पना क्षेत्र में ही है। भावनाओं में ही आनन्द का उद्गम है। आहार निद्रा से लेकर इंद्रिय-तृप्ति तक की सामान्य शारीरिक क्रियाएं भी मनोरम तब लगती हैं, जब उनके साथ सुव्यवस्थित भाव कल्पना का तारतम्य जुड़ा हो अन्यथा वे नीरस और भार रूप क्रियाकलाप बनकर रह जाती है। उच्च कल्पनाएँ अभावग्रस्त असमर्थ जीवन में भी आशाएँ और उमंगें संचारित करती रहती हैं। संसार में जितना शरीर संपर्क से उत्पन्न सुख है। उससे लाख-करोड़ गुना कल्पना, विचारणा एवं भावना पर अवलंबित है। इस दिव्य संस्थान को सुव्यवस्थित करने और परिस्थितियों के साथ ठीक तरह ताल-मेल बिठा लेने की अद्भुत सामर्थ्य गायत्री के साधनात्मक प्रयोगों से मिलती है। इसी लिए उसे कल्पवृक्ष कहते हैं।

पर गायत्री साधना के ये सभी लाभ जीवन में तभी मिलते हैं जब लक्ष्य ब्राह्मणत्व की प्राप्ति हो अन्यथा यह समर्थ महामंत्र भी सामान्य कर्मकाण्ड बन कर रह जाता है। एक बार पारस्परिक चर्चा में पूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मणत्व को स्पष्ट करते हुए कहा था “ब्राह्मण की सही माने में पूँजी तो विद्या और तप है-जो उसे गायत्री मंत्र की साधना से मिलती है। भौतिक सुविधाओं के मामले में तो उसे सर्वथा अपरिग्रही होना चाहिए।” फिर कुछ रुक कर थोथा रोप व्यक्त करते हुए बोले-”खेद है आज अपरिग्रह को दरिद्रता समझ लिया गया जबकि अपरिग्रह का मतलब है स्वयं पर विश्वास और ब्राह्मण का जीवन इसका उच्चादर्श है। जब मनुष्य का स्वयं पर, समाज पर और भगवान पर पूरी तरह विश्वास उठ जाता है तभी वह लालची होकर सुविधाएँ बटोरने लगता है।

ऐसे विश्वासी और उदार व्यक्तित्व जिस काल में बहुसंख्यक थे, उस समय को धरती का सतयुग माना गया। श्रीमद् भागवत के ग्यारहवें स्कंध के बारहवें अध्याय के दसवें श्लोक में साफ उल्लेख है कि सतयुग में सिर्फ एक वर्ण था, ब्राह्मण (हंस) तभी सतयुग का एक और नाम प्रचलित हुआ ब्राह्मण युग। इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्तित्व की अन्य व्यवस्थाएँ नहीं थीं। बल्कि सभी लोग अपनी-अपनी अवस्था से इस ओर निष्ठ पूर्वक बढ़ रहे थे ब्राह्मणत्व की ओर जो निष्ठ पूर्वक बढ़े से ब्राह्मण जिस तरह ब्रह्मचर्य का साधक ब्रह्मचारी कहलाता है, उसी तरह ब्राह्मणत्व का साधक भी ब्राह्मण की संज्ञा से विभूषित होता है। अपनी इसी निष्ठ की बदौलत धीवर कन्या के पुत्र व्यास, दासीपुत्र सत्यकाम जाबाल ब्राह्मणत्व की चरमावस्था पा सके। आज के जमाने में भी कायस्थ घराने में जन्म लेने वाले श्री अरविंद स्वामी विवेकानन्द वैश्य कुल में जन्म लेने वाले गाँधी जैसे अनेकों है जिन्होंने अपने व्यक्तित्व विकास की साधना द्वारा ब्राह्मणत्व उपलब्ध किया। विदेशों में यह नाम भले न प्रचलित हो पर इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ ब्राह्मण नहीं हुए। सुकरात, योरो, इमर्सन, आइन्स्टीन सौ टंच खरे ब्राह्मण थे।

व्यक्तित्व विकास की यह साधना पूरी हुई, इसे कैसे पहचाने? इस पहेली को गीता ने अपने अठारहवें अध्याय के बयालीसवें श्लोक में सुलझाया है। इसके अनुसार अंतःकरण का निग्रह, आचरण एवं व्यवहार की परिष्कृत स्थिति सरल आस्तिक बुद्धि अपरिग्रह आदि ऐसे लक्षण हैं जिनसे इन्हें पहचाना जा सकता है। प्राचीन समय में ब्राह्मणों ने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया भी। स्मृतियों की विविधता इसका प्रमाण है। जिसे देखकर हर्ष के समय आये चीनी यात्री हृनसाँग ने इसे ब्राह्मणों का देश घोषित किया। आधुनिक युग में ब्राह्मणत्व विकसित करने की प्रेरणा देने वाले परमपूज्य गुरुदेव ने सामाजिक उपादेयता की दृष्टि से इसे दो वर्गों में बाँट दिया-विचारक एवं प्रचारक । दूसरे शब्दों में कहें तो ब्राह्मण और साधु। असलियत में दोनों एक से हैं विचारक इनकी वह स्थिति है जो वन विधान का निमार्ण करती हे और सामयिक समस्याओं का समाधान खोजती है। प्रचारक वर्ग समाज को पुराने और अनुपयोगी विधान को छोड़ने और वन विधान पर चलाने के लिए प्रतिबद्ध होता है। कमोबेश दोनों पर बराबर का दायित्व है।

इसी दायित्व के निर्वाह पर भावी समाज की स्थिरता समृद्धि और सतयुग की सृष्टि टिकी हुई है। इसी कारण इन्हें सावधान करते हुए भागवतकार ग्यारहवें स्कन्ध के बारहवें अध्याय के बयालीसवें श्लोक में कहते हैं - ब्राहम्णस्यहि देहोयं क्षुद्र कामाय नेष्यते “-ब्राह्मण का जीवन क्षुद्र कामनाओं के लिए नहीं है। जीवन ओर समाज के संरक्षण की जिम्मेदारी उसी की है।”

उनका ही आह्वान करते हुए परम पूज्य गुरुदेव के शब्द हैं- “इस आड़े वक्त में संस्कृति ने ब्राह्मणत्व को पुकारा है। यदि वह कहीं जीवित हो तो आगे आये। जाति और देश में हम वर्ण का संबंध नहीं जोड़ते। ब्राह्मण हम उन्हें कहते हैं जिनके मन में आदर्शवादिता के लिए इतना दर्द मौजूद हो कि वह अपनी वासना -तृष्णा से बचाकर शक्तियों का एक अंश अध्यात्म की प्राण रक्षा के लिए लगा सकें। किसी भी वंश में पैदा क्यों न हुए हो पर जिनमें मानवीय आदर्शों की रक्षा में कुछ त्याग और बलिदान करने का शौर्य एवं साहस उठता हे वस्तुतः वही ब्राह्मण कहा जाने का अधिकारी है। उसी वर्ग ने समय-समय पर ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ प्रस्तुत की हैं। “आज फिर वही परीक्षा की घड़ी आ गई, जब मानवता की जीवन रक्षा करने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने की हिम्मत दिखाई जाय, और संस्कृति को इस कलंक से बचाया जाय कि उसका संरक्षक ब्राह्मणत्व मर गया था, इसलिए उसकी जीवन रक्षा न हो सकी। अपने परिजनों को जिनमें ब्राह्मणत्व का शौर्य साहस विद्यमान हो समाज की पुकार पूरी करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। आमंत्रण को स्वीकारें और गायत्री साधना की उन चमत्कारी विभूतियों को अपने जीवन में पायें- जिन्हें हमने पाया और धन्य हुए। “

उनकी वाणी का यह दर्द एवं ब्राह्मणत्व का मर्म हमारी समझ में आ जाय तो माँ गायत्री व ज्ञान गंगा भागीरथी का अवतरण दिवस हमारे जीवन में पूरी सार्थकता व प्रेरणाओं के साथ उतर जाएगा, इसमें तनिक भी अविश्वास हमें नहीं करना चाहिए।


अपनों से अपनी बात - श्रद्धाँजलि पर्व चित्रकूट अश्वमेध तक

परमपूज्य गुरुदेव के समान विराट् बहुमुखी व्यक्तित्व वाले युग पुरुष जिनने आत्मीयता विस्तार के आधार पर इतना बड़ा संगठन विनिर्मित किया था, ने स्थूल काया के बंधनों से मुक्ति लेकर 1990 की गायत्री जयंती के पावन दिवस पर सूक्ष्मशरीर में प्रवेश किया था। यह सूक्ष्म में प्रवेश ऐसा था जिसमें हम उनके सुत-प्रियजनों को उनके स्थूल शरीर के दर्शन पुनः नहीं होने थे। यह एक विराट् पुरुष का लौकिक दृष्टि से महाप्रयाण था-एक अनंत यात्रा पर किंतु उनकी शक्ति अतीव बलशाली सामर्थ्य के दिग्दर्शन परम वंदनीय माताजी के माध्यम से आँशिक रूपों में तथा रामनवमी 1948 से आरंभ किये गये सूक्ष्मीकरण प्रयोगों के रूप में किये जा सकते थे। प्रत्यक्षतः पूज्यवर ने 1971 के हिमालय प्रवास पर जाते समय सारी व्यवस्था का दायित्व वंदनीया माता जी को सँभलवा दिया था। एक वर्ष पश्चात् लौटने पर उनने पृष्ठभूमि से देव परिवार विनिर्मित करने की प्रक्रिया ही चलायी। इसी निमित्त प्राण प्रत्यावर्तन-कल्प साधना संजीवनी साधना के सत्र चले। प्रायः दस लाख से बढ़कर ऋषि युग्म की गोदी में पला यह परिवार अब प्रायः साढ़े पाँच करोड़ की संख्या पार कर चुका है।

सूक्ष्मीकरण जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1984 की रामनवमी से आरंभ हुआ अप्रत्याशित दैवी प्रकोपों, दुष्चक्रों, घटनाक्रमों से जन-जन की सुरक्षा के निमित्त था। युग संधि काल में चले बीस वर्षीय महापुरश्चरण ने, जो सारे गायत्री परिजन संपन्न कर रहे थे, के साथ मिलकर उसने वह भूमिका निभाई जो आज देव संसकृति के, विश्व संस्कृति के रूप में विस्तार के दिग्-दिगंत तक विजय दुँदुभि के बज उठने के रूप में दिखाई देती हैं। 1986 की वसंत पंचमी पर वह क्रम जो एकाँत साधना का था, पंचवीर भद्रों के शक्ति जागरण का था, विश्व मात्र की देवात्म शक्ति कुँडलिनी के जागरण का था, एक नया रूप लेकर आया व पूज्यवर ने पंचवर्षीय ‘एक्सटेंशन’ के साथ नई-नई योजनाओं के साथ सार्वजनिक रूप से सबसे मिलने का क्रम आरंभ किया एवं 2 जून 1990 को गायत्री जयंती के दिन अपनी सभी शक्ति परम वंदनीय माताजी को देकर वे महाप्रयाण कर गये।

अंतिम संदेश में पूज्यवर ने कहा- यह स्थूल शरीर के क्रियाकलापों मात्र की इस काया के समापन की प्रक्रिया है। असली कार्य तो सूक्ष्म व कारण सत्ता के रूप में उनके बाद होना है। विराट् श्रद्धाँजलि पर्व जिसमें प्रायः पन्द्रह से बीस लाख परिजन 1 से 4 अक्टूबर 1990 की तारीखों में अपने इष्ट आराध्य को श्रद्धा सुमन अर्पित करने हरिद्वार पहुँचे, स्वयं में इस विशाल गायत्री परिवार की श्रद्धा पर आधारित सामर्थ्य का परिचायक था। तुरंत बाद शक्ति साधना की प्रक्रिया भारत भू के चप्पे-चप्पे में सोये संस्कारों को जगाने की निमित्त संपन्न होना आरंभ हुई तथा विराट् संस्कार महोत्सवों के माध्यम से पूरे उत्तरी मध्य, पूर्वी, पश्चिमी भारत के साथ विश्वभर के सत्ताईस देशों में ये आयोजन सफलता पूर्वक हुए। पंजाब व आसाम समस्या का समाधान प्रत्यक्षतः तो किन्हीं औरों से बन पड़ा होगा, किंतु परोक्ष स्तर पर साधना से शक्ति के उपार्जन की दैवी अनुकूलताओं को आमंत्रित कर अप्रत्याशित विपत्तियों से जूझने व इन्हें निरस्त करने की प्रमुख भूमिका इसी माध्यम से सम्पन्न हुई।

शपथ समारोह (1992 गायत्री जयंती) जो शाँतिकुँज व आस पास के परिसर में सम्पन्न हुआ, में तुमुलनाद हुआ-देव संस्कृति की दिग्विजय का, इसके निमित्त अश्वमेधी पराक्रम का पूज्यवर की “ अश्वमेधादि रचाएँ यज्ञ पर उपकार को” जिसे गायत्री यज्ञायोजन प्रक्रिया की एक अनिवार्य स्तुति घोषित किया गया था, साकार रूप लेने लगी। असुरत्व के निवारण, उत्पीड़कों-शोषकों के दमन तथा सज्जनता देवत्व के जागरण व संगठन, उत्पीड़ितों के संरक्षण व शोषण के प्रति मन्यु जगाकर उससे जूझने का संकल्प अश्वमेधों द्वारा हो एवं इसके लिए परिजन अधिकाधिक समय में अंशदान व समयदान निकालें-यह मार्मिक अपील परम वंदनीया माताजी द्वारा शपथ समारोह के समय परिजनों से की गई। डेढ़ लाख परिजनों का तीन माह का समय दान इस परिमाण में हो गया कि यदि सभी व्यक्ति आगामी 10 वर्षों में मात्र एक बार ही तीन माह का समय समान निमार्ण के निमित्त दे दें तो शाँतिकुँज आने वाले इस समय में वह काम कर सकने की स्थिति में आ गया जो सामान्यतः चार हजार वर्षों में संभव होता।

शेर का बेटा शेर ही होता है परम पूज्य गुरुदेव न अस्सी वर्ष का जीवन एवं उसका एक-एक पल समिधा की तरह विराट् समाज रूपी हवनकुँड में होम कर दिया तो उनके बेटे-अटियाँ प्राणप्रिय शिष्य क्यों पीछे रहते। उनके समयदान, साधन दान, प्रतिभा दान, भावनाओं के विस्तृतीकरण की प्रक्रिया से 108 अश्वमेध यज्ञों की शृंखला आरंभ करने का संकल्प महाकाल की प्रेरणा से उभरा व देखते-देखते इसने भारतीय संस्कृति के विस्तार की प्रक्रिया को अग्रगामी बना दिया। प्रत्येक अश्वमेध जो कलश यात्रा प्रयाज क्रम में ग्राम-प्रदीक्षण, ग्राम तीर्थ स्थापना, रजवंदन से आरंभ हुआ व संस्कार महोत्सव के बाद अश्वमेधी आयोजन के रूप में एक बड़े स्तर के सूर्योपासना क्रमानुसार सूक्ष्म के परिशोधन के निमित्त संपन्न हुआ, ऐ ऐतिहासिक मील का पत्थर बन गया। जब तक युग परिवर्तन न हो, यह सिलसिला चलता ही रहेगा तथा कुल 108 अश्वमेधी आयोजनों-छोटे बड़े स्तर के संस्कार महोत्सवों के माध्यम से देश व विश्व राष्ट्र की भूमि का चप्पा नापता हुआ सतयुग की वापसी का उपक्रम करेगा। यही संकल्प बार बार दोहराया गया।

पहला आयोजन जयपुर राजस्थान का था जो कार्तिक पूर्णिमा 1992 को एक ऐतिहासिक आयोजन के रूप में सम्पन्न हुआ। यह धर्म भीरु व्यक्तियों की भीड़ नहीं थी बल्कि गायत्री व यज्ञ संदेश जीवन में उतार कर जन-जन पहुँचाने वाले श्रद्धा के सूत्रों से जुड़े परिजनों रूपी मणिमुक्तकों की एक माला भी जो विशिष्ट उद्देश्यों को लेकर सवाई मानसिंह स्टेडियम, जयपुर में एकत्रित हुई थी। प्रायः बीस लाख व्यक्तियों ने राष्ट्र को एक समर्थ सशक्त व अखण्ड बनाने की शपथ ली।

इसी कड़ी में सम्पन्न देसरे भिलाई (दुर्ग-म0प्र0) गुना (म0प्र0) तथा भुवनेश्वर (उड़ीसा) यज्ञों से सार भारत में एक विशिष्ट वातावरण बन गया। भारत के इन चार यज्ञों के बाद विश्व के इतिहास में पहली बार मात्र ढाई माह की अवधि में भारत से बाहर तीन अश्वमेध यज्ञ लेस्टर शायर (यू0के0) 9,10,11 जुलाई, टोरोन्टो (कनाडा) 23,24,25, जुलाई तथा लॉस एंजलेस (यू0एस0ए0) 20,21,22, अगस्त 1993 की तारीखों में सम्पन्न हुए। लाखों प्रवासी भारतीयों, युवा भाई बहिनों तथा अमेरिकी, केनेडियन व ब्रिटिश मूल के व्यक्तियों तक गायत्री महाविद्या का ज्ञान पहुँचा। विश्वधर्म संसद जो शिकागो में हुई वह भी इसी वर्ष सितम्बर माह में सम्पन्न हुई तथा उसमें मिशन के प्रतिनिधियों को ऐतिहासिक सफलता हस्तगत हुई।

इन सात अश्वमेधों के साथ अनुयाज क्रम भी चलता रहा व अगले यज्ञों का प्रयाज भी। अक्टूबर 93 में शरद् पूर्णिमा पर लखनऊ उत्तर प्रदेश में आयोजित आठवें अश्वमेध ने पिछले सभी कीर्तिमान जोड़ दिये। नेपाल एवं समूचा उत्तरी भारत इस यज्ञ से लाभान्वित हुआ। प्रेस, मीडिया, टी0वी0 के माध्यम से पूज्यवर का संदेश जन-जन तक पहुँचा। किसी भी प्रकार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से रहित इन यज्ञों में सभी वर्गों के प्रतिनिधि सम्मिलित होकर जाति पाँति संप्रदाय के नाम पर समाज को तोड़ने की दुरभिसंधि रचने वाले व्यक्तियों को अंगूठा दिखाते हुए अपने मूल प्रयोजन में निरत रहे। ‘सतयुग की पुनः वापसी वह भी अति शीघ्र।

नवाँ अश्वमेध बड़ोदरा गुजरात का था। इस भावनाशील प्राँत के चप्पे-चप्पे को प्रयाज क्रम में नापा गया था इस यज्ञ की सफलता तीस लाख व्यक्तियों की भागीदारी एवं राष्ट्र व विश्व के सभी मीडिया प्रमुखों की उसमें दिलचस्पी से आँकी जा सकती है। बहुसंख्य प्रवासी भारतीय भी उसमें सम्मिलित हुए। दसवाँ यज्ञ भोपाल मध्य प्रदेश का था। कार्यकर्ताओं की खदान कहे जाने वाले इस क्षेत्र के यज्ञ ने पूरे पश्चिमी मध्य प्रदेश व मालवा अंचल की ज्ञान गंगा से आप्लावित कर दिया। अनुयाज गोष्ठी में सम्मिलित कार्यकर्ताओं का उत्साह देखते ही बनता था। जो जो भी गतिविधियां भोपाल यज्ञ के बाद अनुयाज क्रम में सम्पन्न हो रहीं हैं, वे आने वाले दिनों में इन अश्वमेधों की महत्वपूर्ण उपलब्धि कही जायेंगी।

ग्यारहवाँ अश्वमेध नागपुर (महाराष्ट्र) बारहवाँ ब्रह्मपुर (उड़ीसा) तेरहवाँ कोरबा (विलासपुर) म0प्र0 तथा चौदहवाँ पटना (बिहार) का, इस वर्ष के इन प्रथम चार यज्ञों ने चार प्राँतों को 1994 वर्ष के इस पूर्वार्ध में मथा व समूचे जन समुदाय को अश्वमेधिक दिग्विजय के प्रयासों से परिचित कराया। पन्द्रहवाँ यज्ञ मार्च के अंतिम व अप्रैल के प्रथम सप्ताह में कुरुक्षेत्र में तथा सोलहवाँ यज्ञ विगत अप्रैल की नवरात्रि में चित्रकूट (मध्य प्रदेश व उ0प्र0 की सीमा पर) में सम्पन्न हुआ। क्रमशः भगवान कृष्णा की कर्मभूमि कुरुक्षेत्र जहाँ से श्री गीता का उपदेश निस्मृत हुआ था तथा भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट जहाँ उन्होंने पावन कामदारी पर्वत पर साढ़े ग्यारह वर्ष तप कर अपना वनवास बिताया था, इन यज्ञों के बाद ऐतिहासिक मील के पत्थर बन गये हैं।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भिण्ड अश्वमेध यज्ञ अपनी पूरी तैयारियों के साथ सम्पन्न होने की स्थिति में था व शिमला महायज्ञ की तैयारियाँ पूरे जोर शोर से प्राँत व्यापी गतिविधियों के साथ गर्मी पर थीं। परम वंदनीया माताजी ने अपने जाने का कार्यक्रम विशिष्ट परिस्थितियों के कारण इन दो यज्ञों सहित आगामी सभी कार्यक्रमों के लिए स्थगित कर अपने प्रतिनिधियों को भेजने का निश्चय किया तथा स्वयं को आँवलखेड़ा की अर्धमहापूर्णाहुति के लिए सुरक्षित रखने का निर्णय लिया। निश्चित ही इन निर्धारणों की पृष्ठभूमि में कोई उसी स्तर के महत्वपूर्ण कारण रहें होंगे, जिन्हें दृष्टिगत रख परम पूज्य गुरुदेव ने क्षेत्रीय पदयात्रा का काम अपने वरिष्ठ प्रतिनिधियों के जिम्मे सौंपकर स्वयं को साधना पुरुषार्थ में संलग्न कर सूक्ष्मीकरण में प्रवेश किया था। कार्य महाकाल की सत्ता करा रही है। निश्चित रूप से वह जो भी निर्धारण करेगी, वह विश्व मात्र के हित में होगा। अगले अश्वमेधों या संस्कार महोत्सवों या छोटे स्तर के यज्ञों-देवस्थापना कार्यक्रमों में कौन जाता है, यह महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि शक्ति सतत् अपने अजस्र स्त्रोत से निरंतर बहती रहेगी, निमित्त किसी भी अर्जुन, हनुमान, निषाद, गिलहरी या शबरी को बना सकती है। निश्चित ही दुंदुभि इसी प्रकार बजती रहे सारे विश्व ब्रह्मांड को निनादित करती रहेगी व सन् 2000 के आने की अवधि तक अपने लक्ष्य को समीप लाकर रहेगी।

*समाप्त*