आत्म विश्वास का जागरण ही सफलता का मूल कारण

जिन्हें हम सुखी, सफल यश-कीर्ति के शिखर पर पहुँचा हुआ समझते हैं, यह मानते हैं कि प्रतिकूलताओं से परे कितना प्रसन्नता भरा उनका जीवन है, निकट से उनके विगत जीवन व दैनन्दिन जीवन के झंझावातों का अध्ययन करके देखें। हो सके तो सीधे उनसे ही पूछने का प्रयास करें कि क्या कभी उनके जीवन में किसी प्रकार की कोई मुसीबत नहीं आयी? उन्हें कष्ट कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा? तो हमें ज्ञात होगा कि भी सुख-समृद्धि आसमान से फट कर अपने आप नहीं मिली है। रोजमर्रा के जीवन में हम जो कठिनाइयाँ व मुसीबतें झेलते हैं, उनने उनके जीवन को भी उसी प्रकार झकझोरा था। जैसे हम कभी-कभी मानसिक रूप से परेशान हो हताशा के झकोरों में झेलने लगते हैं, ऐसा उनके साथ भी हो चुका है। इससे हमें आत्मबोध है, तो सहायक शक्तियाँ भी हैं।

पुनः हम उन्हीं से जानने का प्रयास करें कि किसने उन्हें विपत्तियों के जाल से उबारा? क्या कोई जादूगर आकर जादू की छड़ी घुमा गया एवं वे अवरोध गायब हो गए? तब हमें पता चलेगा कि विपन्नताओं के निवारण में आत्म विश्वास ही उनका प्रमुख संबल रहा है। जब सारे संसार ने, सभी मित्रों उन्हें आश्वस्त किया था।, हिम्मत बढ़ाकर सतत् प्रयास के लिए प्रेरित किया था।

हमारी आज की परेशानी अपनी निज की हताश, आत्म विश्वास खो देने की ही प्रतिक्रिया है। आप हार मान बैठे हैं, व समझते हैं कि हम से कुछ नहीं को सकेगा, विपत्तियाँ स्वयं के बूते नहीं टलेंगी। चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा है। ऐसे में हम अपना आत्म विश्वास जगाकर देखें, वर्तमान के साधन भले ही छोटे व न्यूनतम हों उनका सदुपयोग करने में जुट जाएं तो पाएँगे कि कुछ ही दिनों में परिस्थितियाँ बदल रही हैं। जीवन जीने के इसी कौशल को अर्जित कराना अध्यात्म विज्ञान का लक्ष्य भी तो है।


औरों के हित जो जीता है!

बुधवार की यह सुबह अहमदाबाद के लिए अब तक की सबसे मनहूस सुबह में थी। निजामुल मुल्क के चाचा हामिद खाँ ने भारी फौज के साथ पूरे नगर को घेर लिया। अहमदाबाद के शासक, हामिद खाँ की विशाल सेना से डर कर किले में जा छुपे। हामिद खाँ और उसके सिपाहियों ने जब नगर में प्रवेश किया तो उनका स्वागत गली सड़कों के सन्नाटे ने किया।

कोई डेढ़ प्रहर दिन चढ़ा होगा जब खाने-पीने आदि ने निवृत्त हो यह विशाल वाहिनी अहमदाबाद पर उमड़ आयी। थोड़ी देर पहले इस नगर से रात का अंधकार छटा था। थोड़ी देर बाद ही इसे दूसरे अंधकार ने घेर लिया। यह अंधकार था घोड़ों के खुरों से उड़ी धूल के बादलों का।

प्रतिपक्षी सेना को नदारद पा हामिद खाँ और उसके सैनिक नदारद पा हामिद खाँ और उसके सैनिक खुले हाथ कत्लेआम और लूट-पाट में लग गए। हजारों सिपाही विभिन्न टुकड़ियों में बँट,नगर के विभिन्न इलाकों में फैल गए। भाले की नोकों में नारियों और शिशुओं के शरीर उछाले जाने लगे। तलवारों की तेज धारें नागरिकों को गाजर-मूली की तरह काटने लगीं। इन चीख पुकारों के करुण स्वर के बीच बिना किसी दर्द और सहानुभूति के नगर निवासियों के कच्चे-पक्के निवासों को आग के हवाले करना प्रारंभ कर दिया।

शत्रु का अत्याचार प्रतिक्षण बढ़ रहा था। यह देखकर अहमदाबाद के अग्रगण्य पुरुष इकट्ठे हुए और यह विचार करने लगे कि नगर को इस समय एक धनी व्यापारी आगे आए। उनका नाम नगर सेठ खुशहाल चन्द्र था। उस सामूहिक हत्याकाण्ड के समय वह अपने प्राणों की चिंता न करके सेनापति हामिद खाँ के पास पहुँचे और विनम्र वाणी में कहा-”यह अराजकता रोककर नगर में व्यवस्था स्थापित कीजिए।”

हामिद खाँ ने रोषपूर्ण नेत्रों से नगर सेठ की ओर देखा। सिर पर अहमदाबादी जरी की पगड़ी, कानों में स्वर्ण कुण्डल और मुख पर सौम्य भाव। वह आरक नेत्रों से कई क्षण तक उन्हें देखता रहा। फिर बोला-”मैं धन चाहता हूँ। उसके बिना यह हत्याकाण्ड बन्द नहीं होगा।”

नगर सेठ का हृदय द्रवित हो उठा। करुण स्वर में उन्होंने कहा “कितना धन चाहते हो? मैं दूँगा। दो। व्यर्थ ही निर्दोष नागरिकों की हत्या और संपत्ति का यह महानाश मैं नहीं देख सकता। “हामिद खाँ बोला-”जितना माँगूँगा उतना धन दोगे?” आप सेना को लूटमार करने से रोकिये । मैं अभी लौट कर आता हूँ।”

हामिद खाँ ने एक बार नगर सेठ की ओर देखा। नगर सेठ जानते थे कि सारा धन मुझे ही देना होगा। लेकिन इस समय अपनी संपत्ति बचाने का विचार उन्हें छू भी नहीं गया था। इसलिए उनके मुख पर दृढ़ता थी। इस दृढ़ता ने अत्याचारी के हृदय को छुआ। उसने तुरन्त रणभेरी बजाने की आज्ञा दी। लूटमार करने वाली सेना अपने अपने शिविरों की ओर लौट पड़ी। जनता ने राहत की साँस ली।

थोड़ी ही देर बाद दिखाई दिया कि चार बैलों के सुन्दर रथ पर स्वर्ण मुद्राओं से भरी असंख्य थैलियां लिये हुए नगर सेठ हामिद खाँ की ओर जा रहे हैं। दूसरे ही क्षण सेनापति के सामने मुहरों का ढेर देखकर सेनापति की आंखें चमक उठीं। मुक्त कण्ठ से उसने कहा-”नगर सेठ, तुम्हारा, नगर अब सुरक्षित है। “नगर सुरक्षित था, मगर नगर सेठ अपना सब कुछ लूटा बैठे थे। पीढ़ी दर पीढ़ी उनके पूर्वजों ने जो धन इकट्ठा किया था, वह अब विदेशियों के हाथ पहुँच चुका था।

नगर सेठ के सामने प्रश्न था-अब व्यापार कैसे चलेगा? कल बाजार में हुण्डिया कैसे चलेगा? कल बाजार में हुण्डियाँ कैसे सरकेगी? लेकिन उनके मुख पर चिंता की एक की एक भी रेखा दिखाई नहीं देती थी । वहाँ एक अनिवर्चनीय आनन्द की आभा थी। धन गया तो क्या हुआ, शहर तो बच गया। जनता की रक्षा तो हो गई। नगर सेठ वापस लौटे। दूसरे ही क्षण चारों ओर यह खबर फैल गई कि अपना सर्वस्य लुटाकर नगर सेठ खुशहाल चन्द्र ने हमें और हमारे शहर को बचाया है। जो काम सेना नहीं कर सकती थी, वही काम अकेले एक नगर सेठ ने किया है। बस, नगर के सभी प्रमुख व्यापारी इकट्ठे हुए और उन्होंने सर्व संपत्ति से यह निर्णय हुए और उन्होंने सर्व संपत्ति से यह निर्णय किया कि अहमदाबाद की मण्डी में जितना भी माल काँटे पर तोला जाय, उसका चार आना प्रतिशत सेठ जी को मिले।

आज भी नगर सेठ की स्मृति में भारत सरकार की ओर से प्रतिवर्ष उनके वंशजों को कुछ रकम बराबर दी जा रही है। प्रदत्त धनराशि बहुत नगण्य है। पर इसके साथ जो नगर सेठ खुशहाल चन्द्र के साहस और उदारता की कहानी जुड़ी हुई है, उसका मूल्य असीम है। आज हमारे देश में भी एक नहीं अनेक करोड़पति, अरबपति मौजूद हैं। पर राष्ट्र और विश्व के कल्याण की किसे परवाह है? सभी अपने-अपने भोग विलास में लिप्त हैं। यदि यह धन कल्याणकारी योजनाओं में लग सका होगा तो देश का नक्शा ही और होता।


सिद्धपीठों से जुड़ी गुह्य विज्ञान की विधा

बात उन दिनों की है, जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। दो जर्मन पर्यटक भारत-यात्रा पर आये हुए थे। इसी मध्य युद्ध छिड़ गया । उन्हें इस बात की चिंता सताने लगी कि भारत पर शासन कर रही ब्रिटिश सरकार कहीं बंदी न बनो ले, अस्तु हिमालय होते हुए तिब्बत भाग जाने का दोनों ने फैसला किया और सम्पूर्ण युद्धकाल वहीं बिताने की सोची । जब वे सुदूर हिमालय के तिब्बत वाले क्षेत्र में पहुंचे, तो वहाँ उन्होंने एक साधन संपन्न मठ देखा, जहाँ विज्ञान जगत की समस्त सुविधाएँ मौजूद थीं। आश्रमवासी इस शर्त पर उन्हें रहने देने को राजी हुए कि लड़ाई समाप्ति के तुरंत बाद वे वहाँ से चले जायेंगे। अनुबंध मिल गई वे आराम से रहने लगे। कुछ काल पश्चात् जब लड़ाई समाप्त हुई, तो पैदल वे भारत भटक जाने के कारण बरमा जा पहुँचे वहाँ चर्चा मध्य जब उन दोनों ने मठ और वहाँ के विकसित विज्ञान की बातें बतायी, तो लोगों को सहसा विश्वास नहीं हुआ। कुछ ने उसे देखने की इच्छा व्यक्त की, तो दानों जर्मन वहाँ ले चलने को तैयार हो गये।

जब वहाँ पहुँचे, तो वे आश्चर्यचकित रह गये। वही वृक्षावली वही पर्वत शिखर, वही झरना और वही शिला-खण्ड, जहाँ वे अपना अधिकाँश समय बातें करते बिताते। सब कुछ वही था, पर वह विशाल मठ गायब था। न जाने इस अल्प अंतराल में वह कहाँ अंतर्ध्यान हो गया था।

यहाँ चर्चा किसी जादू या तिलिस्म की नहीं, वरन् उस विज्ञान की, की जा रही है, जिसे सर्वसाधारण “गुह्य विद्या” के नाम से जानते हैं। यह विद्या “ के नाम से जानते हैं। यह विद्या वस्तुतः क्या? संक्षेप में कहें, तो वह विज्ञान, जिसके द्वारा असंभव को संभव कर दिखाने का अनोखा कौशल प्रदर्शित किया जाता है। योगियों में जब यह विद्या संपूर्ण रूप में प्रकट होती है, तो उनमें ऐसी अनेकों क्षमताएँ मूर्तिमान होने लगती हैं, जो सामान्य बुद्धि को आश्चर्य और अचंभे में डाल देती हैं। यह सिद्धावस्था है। इस अवस्था की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें अनेक सिद्धियों के अतिरिक्त साधक में इच्छानुसार दृश्य-अदृश्य होने की अपूर्ण क्षमता पैदा हो जाती है।

उपरोक्त प्रसंग के संदर्भ में यहाँ यह संदेह पैदा हो सकता है कि सिद्ध संतों के जीवन में आविर्भाव-तिरोभाव की घटना तो सर्वविदित है, पर सर्वथा जड़ कहलाने वाली भूमि में यह विशेषता कैसे पैदा हो सकती है? यह कैसे पैदा हो सकती है? यह कैसे शक्य है कि पृथ्वी का कोई खण्ड, विशेष अथवा उस पर निर्माण आवश्यकता पड़ने पर इंद्रियग्राह्य हो जाय और अन्य समय में अदृश्य स्तर का बना रहे? इस संबंध में “ज्ञानगज” नामक हिमालय स्थित गुह्य स्थान के विषय में अपनी पुस्तक में स्पष्टीकरण हैं कि सिद्धाश्रम साधारण लौकिक आश्रमों जैसा नहीं होता, न तो सभी को सब समय दिखाई पड़ता है। यदि कभी किसी को यह दृष्टिगोचर हो जाय, तो इसे आश्रमवासी परमहंसों की परम कृपा ही समझनी चाहिए, अन्यथा बाकी समय में यह भूतियाँ सामान्य स्तर और स्थिति वालों के लिए कारण है कि साधारण पर्यटक से लेकर तीर्थयात्री तक कोई भी इसका पता नहीं पा पाते। वे कहते हैं कि स्थूल भूमि में अवस्थित रहने पर भी वह ठीक भौतिक स्थान नहीं है, अथवा यों कहा जाय कि वह न तो स्थूल है, न सूक्ष्म, जबकि एक साथ स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही हैं, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।

अपने देश में इस प्रकार की कितनी ही भूतियाँ है। एक ऐसी ही सिद्ध भूमि का उल्लेख कर्नल आलकाँट ने अपनी रचना” ओल्ड डायरी लेवेस” में किया है। घटना बम्बई की है। एक बार आलकाँट और थियोसोफी की संस्थापिका मैडम ब्लैवट्स्की घूमने निकले। कुछ दूर चलने के उपराँत ब्लैवट्स्की ने अचानक एक स्थान पर गाड़ी रुकवायी। कर्नल से गाड़ी पर रुकने को कहकर स्वयं उतर पड़ी। और यह कहते हुए सामने के मठ में चली गई कि “अभी आती हूँ”।

आलकाँट ने देखा कि पास ही एक विशाल मठ है। ब्लैवट्स्की मठ के अन्दर चली गई। थोड़ी देर पश्चात् बाहर निकलीं तो हाथ में फूलों की कई मालाएँ थीं, उनमें से एक उनने आलकाँट को दी।

अगले दिन आलकाँट अकेले घूमने निकले और घूमते हुए उसी स्थान की ओर निकल पड़े। उन्हें यह दे, कर अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि एक दिन पूर्व जिस भव्य मठ को स्वयं अपनी आँखों से देखा था, आज वह नहीं था। मठ के स्थान पर मात्र एक उद्यान दिखाई ड्राइवर से इस बारे में पूछने पर इनकार कभी कोई मठ था ही नहीं। आपको आलकाँट ब्लैवट्स्की द्वारा ही समझ सके।

एक अन्य घटना की चर्चा ”साधु दर्शन तथा सत्प्रसंग (प्रथम-खण्ड) ग्रन्थ में पं. गोपीनाथ ने की है। प्रसंग केदार नामक एक बालक से संबंधित है। वे लिखते हैं कि एक शाम केदार के पीस एक योगी पुरुष आये और एक स्थान का पता बताते हुए दूसरे दिन वहाँ आकर मिलने को कहा। मार्ग के बारे में पूछे जाने पर विस्तारपूर्वक बालक को बात दिया और यह भी कहा कि आगे का रास्ता वहाँ से स्वतः मालूम हो जायेगा।

अगले दिन नियत समय पर निश्चित स्थान विश्वेश्वर गंज तक बालक निर्देशानुसार आ पहुँचा। वहाँ विश्वेश्वरगंज से मैदान की ओर किसी अज्ञात प्रेरणा से उसी ओर मुड़ गया। समीप पहुँचा, तो देखा कि मैदान मध्य एक बड़ी शिला है। उस पर एक दिव्य पुरुष विराजमान है। उनके दर्शन से केदार के मन में यह भाव आया कि इन्होंने ही बुलाया । पहुँचा, तो देखा कि मैदान मध्य एक बड़ी शिला है। उस पर एक दिव्य पुरुष मन में यह भाव आया कि इन्होंने ही बुलाया है। उनके दर्शन से केदार के मन में यह भाव आया कि इन्होंने ही बुलाया है। समीप जाने पर उन महापुरुष ने उसे बैठने का इशारा किया और कुछ रहस्यमय प्रसंग समझाने लगे। चर्चा देर तक चलती रही। काफी समय हो जाने पर महापुरुष ने केदार से यह कहते हुए प्रस्थान करने को कहा कि उसके घर के लोग उसकी अनुपस्थिति के करण चिंतित हो रहे हैं। इसके साथ ही उनके सामने की ओर अपनी भुजा बढ़ा दी। तत्क्षण दूरदर्शन के दृश्य की तरह उसका घर, माँ, बहन, भाई एवं उनने हाथ हिलाया और दृश्य तिरोहित हो गया। केदार के यह पूछने पर कि इस समय वे किस स्थान पर हैं? भव्य पुरुष ने जवाब दिया कि यह एक ऐसा स्थान है, जहाँ से समस्त विश्व अत्यन्त निकट है।

इसके पश्चात् केदार ने प्रणाम किया और चल पड़ा। उसका विश्वास था कि मैदान पार करते ही वह विश्वेश्वरगंज पहुँच जायेगा, पर ऐसा न हो सका। पगडंडी समाप्त करने पर उसने स्वयं को इलाहाबाद रोड पर पाया, जहाँ से विश्वेश्वरगंज लगभग तीन मील दूर था। गया था पूर्व की ओर, पर लौट रहा था पश्चिम की ओर से। इतना ही नहीं, हर बार उसके लौटने के स्थान और दिशा भिन्न-भिन्न से समीप जिस मैदान की चर्चा की गई है, उसे केदार ने इससे पूर्व कभी नहीं देखा था, यद्यपि वह इस ओर कई बार आ-जा चुका था। कदाचित् चह भी कोई सिद्ध भूमि हो और अधिकार-भेद के हिसाब से दृश्य-अदृश्य बनने की उसमें सामर्थ्य हो, इस बात से सर्वथा इनकार नहीं किया जा सकता।

ऐसी ही एक विलक्षण स्थान का वर्णन ”ब्रह्मांडोनो भेद” नामक गुजराती ग्रन्थ में मौजूद है। उसमें “सत्यज्ञानाश्रम” नाम के हिमालय के तिब्बत वाले भाग में स्थित एक सिद्धाश्रम का उल्लेख है। बताया जाता है कि यहाँ ज्ञान-विज्ञान की अद्भुत उन्नति हुई है। एक रोम पर्यटक ने इस मठ का वर्णन किया है। एक रोम पर्यटक ने इस मठ का वर्णन अपनी पुस्तक में किया है। एक अन्य ग्रीक पुस्तक में किया है। एक अन्य ग्रीक यात्री ने भी इस गुप्त स्थान के बारे में लिखा है। कि ऐसा विलक्षण स्थान शायद पृथ्वी में अन्य? न हो। आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व फेंग्लियान नामक एक चीनी विद्वान ने इस दुर्गम हिमालय का वृत्ताँत प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि यहाँ के एक रहस्यमय मठ में अद्भुत यौगिक क्रियाएँ होती हैं, जिनके बल पर वहाँ के योगी दिव्य शक्ति संपन्न बन सके है। इन सभी विवरणों से ज्ञात होता है कि हिमालय का वह अलौकिक आश्रम अनेक प्रकार की परा-अपरा विद्याओं का अनुपम भाण्डागार है। कायाकल्प की अनूठी प्रक्रिया द्वारा वृद्ध देह को तरुण बना लेना, समूचे संसार को एक स्थान पर बैठे-बैठे हस्तामलकवत् देख लेना, वैज्ञानिक यंत्रों के बिना दुःसाध्य रोगों, अंग-भंगता एवं विकलाँगता को दूर कर देना, भोंडे शरीर गठन को रूपलावण्यमय बना देना जैसी कितनी ही लौकिक-अलौकिक विद्याएँ वहाँ अब भी संरक्षित हैं। यह भी उल्लेख मिलता है कि वायु दुर्ग जैसी अदृश्य संरचनाओं के निर्माण में वहाँ के योगीगण सिद्धहस्त है।

हिमालय स्थित एक इसी प्रकार कील सिद्धपीठ का उल्लेख काशी के प्रसिद्ध संत स्वामी विशुद्धानन्द परमहंस अपनी वार्तालापों में अक्सर किया करते थे, जिसका उल्लेख यत्र-तत्र पं. गोपीनाथ कविराज ने अपनी पुस्तकों में किया है। इस आश्रम का विवरण देते हुए वे कहते थे कि इसका दर्शन प्रायः वही लोग प्राप्त कर पाते हैं, जो वहाँ के महापुरुषों का अनुकंपा अर्जित करने में सफल होते अथवा वैसे लोग जो स्वयं योग विज्ञान में गूढ़ गति रखते हों। उनके अनुसार वहाँ योग के अतिरिक्त नाना प्रकार के प्राकृतिक विज्ञान की शिक्षा योगार्थियों को दी जाती है। आचार्यगणों में शताब्दियों लम्बी उम्र वाले योगी और दीर्घायुष्य प्राप्त विज्ञानवेत्ता वहाँ के उपाध्याय और संरक्षक है। इनके अतिरिक्त अनेक ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणी, संन्यासी परमहंस, भैरवी, और कुमारियाँ वहाँ रहते हैं। सभी लम्बी वय वाले हैं। इसकी भौगोलिक स्थिति के बारे में वे कहा करते थे कि हिमालय में यह स्थल कैलास मानसरोवर से भी दूर है। इसकी भौगोलिक स्थिति के बारे में वे कहा करते थे। सभी लम्बी वय वाले है। इसकी भौगोलिक स्थिति के बारे में वे कहा करते थे कि हिमालय में यह स्थल कैलास मानसरोवर से भी दूर है। ठीक-ठीक स्थान का पता होने पर भी सामान्यजन इसका संधान नहीं कर सकते, क्योंकि सर्वसाधारण की दृष्टि से यह सदा ओझल बना रहता है।

बंगाल के विख्यात संत राम ठाकुर भी बातचीत के दौरान हिमालय स्थित कितने ही सिद्ध स्थलों के बारे में बताया करते थे। अपनी चर्चा में वशिष्ठाश्रम एवं योगेश्वर आश्रम जैसे सिद्ध स्थानों का अक्सर वे उल्लेख किया करते थे। योगेश्वर वे उल्लेख किया करते थे। अपनी चर्चा में वशिष्ठाश्रम एवं योगेश्वर आश्रम के संबंध में उनका कहना था कि वहाँ स्फटिक निर्मित एक विशाल शिवलिंग है, जिसके चारों ओर एक अपार्थिव शुभ्र ज्योति फैल कर उसे आलोकित करती रहती है। उस सुन्दर शिवलिंग पर ध्यान जमाये एक रूप सुन्दरी न जाने कबसे ध्यानस्थ है। कौशिकी सिद्धाश्रम के विषय में वे बताते थे कि वह बड़ा ही रसमय आश्रम है। संपूर्ण मठ शिला निर्मित है। वहाँ दस महा तापस सदियों से तपस्यारत हैं, जबकि वहाँ के शेष तीन योगी जागृतिक कल्याण के निमित्त भ्रमण कर रहे हैं। उनका कहना था कि सामान्य कल्याण के निर्मित भ्रमण कर रहें हैं। उनका कहना था कि सामान्य लोगों की दृष्टि में यह आश्रम अगोचर बने रहते हैं और सिर्फ अधिकारी पुरुषों को ही दृश्यमान हो पाते हैं। राम ठाकुर के इन प्रसंगों का जिक्र बंगाल के प्रसिद्ध लेखक नवीन चन्द्र सेन ने “आमार जीवन” नामक अपनी आत्मकथा के “प्रतारक ना प्रवर्चक“ नामक चतुर्थ अध्याय में किया है।

चटगाँप (अब बँगला देश में) स्थित जगतपुरा आश्रम के प्रतिष्ठिता कि उनने तिब्बत के मतगाश्रम नामक सिद्ध मठ में वर्षों तक योग की शिक्षा प्राप्त की थी। बाद में वहाँ की अद्भुतता से आकर्षित होकर योग के प्राप्त करने के उद्देश्य से उस ओर प्रस्थान किया, पर स्थान का साधन न पा सके। पर स्थान का संधान न पा हो गई और निराश होकर लौटे।

भारतीय संस्कृति में चौदह लोकों की अवधारण प्रसिद्ध है। इनमें से एक मात्र पृथ्वी ही सर्वसाधारण के अवलोकन योग्य द्वैत युक्त है। वे एक साथ-सूक्ष्म दोनों है। सामान्य मनुष्यों के लिए जहाँ उनकी सता अदृश्य स्तर की बनी रहती है, वहीं अधिकारी पुरुष उनका और उनमें निवास करने वाले देवपुरुषों का स्थूल संरचना की तरह दर्शन करते रहते हैं। इतना ही नहीं, उन-उन लोकों में उनका अप्रतिहत आवागमन भी होता रहता है। विज्ञान ने इनमें से पाँच ही आयामों की संभावना को स्वीकार किया हैं, जबकि शेष का अन्वेषण जारी है।

विवेकानन्द ने भुवन संबंधी भारतीय दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण करते हुए एक स्थान पर कहा है कि “लोक” से कदापि यह नहीं समझा जाना चाहिए कि यह किन्हीं ग्रहों में स्थित हैं। चन्द्रलोक, बुध लोक, बृहस्पति लोक जैसे नामों से प्रकारान्तर से उन्हीं सूक्ष्म भूमियों को शास्त्रकारों ने अभिहित किया है, जो हमारे ही इर्द गिर्द है। स्तर-भेद के हिसाब से उन्हें भिन्न नाम दिया गया है। इन नामों से किसी को यह अर्थ नहीं लगा लेना चाहिए कि उक्त लोक उस-उस नाम के स्थूल ग्रह से संबंधित है। इन ग्रहों में से कइयों की खोजबीन की जा चुकी है। वे पृथ्वी जैसे ही जड़ पिण्ड है। ऐसे में उन ग्रहों से उनकी संगति बिठाना ठीक नहीं। इस स्थिति में विवेक संगत स्थापना यही हो सकती है कि ये सभी वैसी ही सूक्ष्म भूतियाँ, जैसी भूमियों की चर्चा बौद्ध ग्रन्थों में “बुद्ध क्षेत्रों” के नाम से की गई है।

यह सुस्पष्ट हो जाने के उपराँत इतना मान लेने में कोई दुराग्रह नहीं होना चाहिए कि सूक्ष्म भवनों की तरह सिद्धाश्रम भी छोटे स्तर की भूमियाँ हैं, जो स्थूल-सूक्ष्म दोनों हैं और इसी पृथ्वी पर स्थित हैं। यदि अपने को, आचरण को, चिन्तन और भावनाओं को शोधित-परिष्कृत कर इस योग्य बनाया जा सके कि उनमें देवपुरुषों के अनुग्रह को आकर्षित करने की क्षमता पैदा हो जाय, तो निश्चय ही हममें से प्रत्येक देवभूमियों के दिव्य-दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करने में सफल हो सकेगा, जो के अंतर्गत आते रहे हैं। यही नहीं, उस मनोभूमि में पहुँचने पर जो आध्यात्मिक लाभ ऋद्धि-सिद्धियों को रूप में संभव है, हस्तगत हो पाना इस माध्यम से शक्य हो सकता है। प्रचंड आध्यात्मिक पुरुषार्थ से यह असंभव भी नहीं हैं।


मन चित्त से अलग नहीं (Kahani)

बोधिधर्म जब चीन पहुँचे तो उन की ख्याति सारे चीन में फैल गई। जब राजा को मालूम हुआ कि उसके राज्य में परम ज्ञानी संत का आगमन हुआ है तो वह भी दर्शन लाभ पाने बोधिधर्म के पास पहुँचा। राजा का बड़ा स्वागत सत्कार किया। राजा ने बोधिधर्म को मन की बात बताई कि उसका मन अशाँत रहता है। कृपया बताएँ कि यह कैसे शाँत होगा। बोधिधर्म ने कहा-”अबकी बार आप जब भी आवें अपने मन को भी साथ लेते आयें। कोई उपाय सोचेंगे। “राजा बड़ा हैरान हुआ कि बड़ा अजीब संत है। मन लाने के लिए जायगा। किंतु क्या करता, संत की आज्ञा। बताए गये समय पर राजा पहुंचा। बोधिधर्म ने पूछा! “आ गये। मन को ले आये।” राजा ने कहा मन ऐसी वस्तु तो नहीं है जो मुझ से अलग होती।बोधिधर्म ने कहा भला एक बात जो तय हुई कि मल तुम में ही है। बोधिधर्म ने कहा तो फिर एकाँत में शांतचित्त से बैठ जाएँ और आंखें बंद कर लें और खोजें कि मन कहाँ है और जब उसे ढूँढ़ शाँत चित्त से बैठ गया और आँख बंद करके अंदर मन को लगा ढूंढ़ने। अंदर झाँकता ही गया डूबता ही गया ‘उसने ध्यान से देखा कि मन नाम की कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो ढूँढ़ी जा सके। उसकी खोज बेतुकी है। उसे समझ आई कि जो वस्तु है ही नहीं उसके बारे अगर क्रियान्वित न किया जाय तो कोई झंझट ही नहीं। राजा ने बोधिधर्म के सम्मुख मस्तक नवाया और कहा कि मुझे समझ आ गई कि मेरे विचार करने की शैली ही मुझे बेचैन बनाए हुए थी। बोधिधर्म ने कहा जब भी तुम्हें बेचैनी हो तब विचारों को उलटकर विचार करने की आदत बना लें। वही सारी ऊर्जा एक दृष्टि, एक सोच, एक विचार बन जायगी और बेचैनी तुरंत शाँत हो जायगी।


परकाया प्रवेश एक सत्य, एक तथ्य

कैम्प के आस-पास घना जंगल था। जंगल की सघनता दिन में ही शाम हो जाने का भ्रम पैदा कर रही थी। चारों ओर ली निस्तब्धता को यदा कदा किसी वन्य पशु की आवाज भंग कर देती । मनुष्य विहीन इस इलाके में ये कुछ मनुष्य अपने कैम्प में बैठे किसी योजना पर विचार कर रहे थे। उनके द्वारा पहनी गई पोशाक उन सभी के फौजी होने की याद दिला रही थी। वहीं पास में एक नदी बहती थी। नदी के पास ही यह मंत्रणा चल रही थी।

एकाएक उनमें से कुछ लोगों का ध्यान नदी की ओर चल गया। एक ने अपने कमाण्डेन्ट की ओर संकेत ने अपने कमाडेन्ट की ओर तनिक उधर देखिए।”लंबा कद, गठीला शरीर गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आंखों में तेज ऐसा था फैरेल साहब का प्रभावशाली व्यक्तित्व। वे इसी साल सन् 1938 में ही इंग्लैण्ड संकेत को समझ कर उन्होंने भी दृष्टि अटक कर रह गई टेलिस्कोप उठाकर देखा देखा एक बहुत जीर्ण शीर्ण शरीर का बूढ़ा संन्यासी पानी में घुसा एक शब को बाहर निकाल रहा है। हाँफता जाता था और खींचता भी। बड़ी कठिनाई से शब किनारे आ पाया।

अंग्रेज होते हुए भी उनकी आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि थी। भारत वर्ष में एक उच्च सैनिक अफसर नियुक्त होने के बाद तो जैसे उनके जीवन में एक नया मोड़ आ गया। भारतीय तत्वदर्शन का उन्होंने गहरा अध्ययन ही नहीं किया, जितनी भी जानकारी मिली, वह सिद्ध महात्माओं का समाधान करते रहे। अब तक तो उनकी अंर्तचेतना में भारतीय संस्कार स्थान ले चुके थे।

यह बूढ़ा व्यक्ति शब क्यों खींच रहा है? इस रहस्य को जानने की उनकी जिज्ञासा स्वाभाविक थी। योजना तो वही धरी रह गई, सब लोग एकटक देखने लग गए कि वृद्ध संन्यासी इस शब का क्या करता है?

इतनी देर में वृद्ध संन्यासी शब को खींच कर एक वृक्ष की आड़ में ले जा चुका था। थोड़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा, कुछ पता नहीं चला कि वह क्या कर रहा है। कोई पंद्रह-बीस मिनट बाद ही दिखाई दिया कि वह युवक जो अभी शव के रूप में नदी में बहता चला बाहर निकल आया और कपड़े सुखाना चाहता था।

मरे हुए आदमी का अचानक जीवित हो जाना एक महान आश्चर्य जनक घटना थी और एक बड़ा भारी कौतूहल पैदा कर रहा था, साथ में आशंका दिया। थोड़ी ही देर बाद सशस्त्र सिपाहियों की एक टुकड़ी ने जाकर उस युवक को घेर लिया और उसे बंदी बनाकर उनके पास ले आए।

,युवक के वहाँ आते ही फैरेल ने प्रश्न किया-वह वृद्ध कहाँ है? इस पर युवक हँसा जैसे इस गिरफ्तारी आदि का उसके मन पर कोई प्रभाव ही न पड़ा हो। हँसते हुए वह बोला-वह बूढ़ा आश्चर्यचकित फैरेल ने एक साथ इतने सारे सवाल पूछ डाले जिनका एक साथ उतर देना असंभव सा था।

युवक ने संतोष के साथ बताया इस योगी है हमारा स्थूल शरीर बूढ़ा हो गया था, काम नहीं देता था। अभी इस धरती पर रहने की हमारी चाहत मरी नहीं थी। किसी को मारकर बलात् शरीर में प्रवेश करना तो पाप होता, इसी कि कोई अच्छा शब मिले तो उससे अपना यह पुराना चोला बदल डालें। सौभाग्य से यह पुराना चोला बदल डालें। सौभाग्य से यह इच्छा आज पूरी हुई। मैं। ही वह बूढ़ा हूँ। यह शरीर अब तक उस युवक का था, अब मेरा है।

सारा विवरण सुनकर वे हतप्रभ हो गया। कुछ क्षण की चुप्पी के बाद उन्होंने अगला सवाल किया-

“तब फिर तुम्हारा पहला शरीर कहाँ ह?”

स्केत से उस युवक शरीर में प्रवेश धारी संन्यासी ने बताया वह वहाँ पेड़ के नीचे अब मूक अवस्था में पड़ा है। अपना प्राण खींच कर उसे इस शरीर में धारण कर लेने के बाद उसकी कोई उपयोगिता आवश्यकता नहीं रही। थोड़ी देर में उसका अग्नि संस्कार कर देते पर अभी तो इस शरीर कपड़े भी नहीं सुखा पाए थे कि आपके सैनिकों ने हमें बंदी बना लिया,

श्री फैरेल इसके बाद उस संन्यासी से बहुत सारी बातेँ पूछते रहे। उन्हें यह भी उत्सुकता थी कि

स्थूल शरीर के अणु-अणु में व्याप्त प्रकाश शरीर को किस प्रकार समेटा जा सता है कि प्रकार शरीर से बाहर निकाला जा सकता है और दूसरे किसी शरीर में ह? पर यह सब कष्ट साध्य योग थीं। उसके लिए तो उनके व्यस्त जीवन में समय न था । पर उन्होंने यह अवश्य स्वीकार किया कि सूक्ष्म अंर्तचेतना से संबंधित भारतीय तत्वदर्शन से संबंधित भारतीय तथ्य है। सन् 1948 ई॰ में ब्रिटेन वापस लौटकर उन्होंने योग-तंत्र से संबंधित कर एक ग्रंथ के रूप में प्रकाशित कराया।


कण- कण में संव्याप्त चेतन सत्ता

भारतीय संस्कृति की यह प्राचीन अवधारण है कि कण-कण में महत् चेतना समायी हुई है। जड़ से लेकर चेतन पर्याप्त सर्वत्र इसी की क्रीड़ा-कलोल है। सृष्टि की मूल सत्ता यही है। इसी से संसार के समस्त क्रिया-व्यापार संपन्न होते हैं। भौतिक अभौतिक शक्तियों के रूप में प्रकाराँतर का यही जीवन-प्राण है। यदा-कदा यही महत् प्राण न जाने क्यों जड़ पदार्थों में भी जीवंत जैसी हलचलें शुरू करते और लोगों को अचंभे में डालते दिखाई पड़ता है?

बैरोन फ्रेडरिक वान हृजेल ने अपने ग्रंथ “दि मिस्टिकल एलाीमेण्ट ऑफ ग्रन्थ “दि मिस्टिकल एलीमेण्ट ऑफ रिलीजन “में एक अनुठा विवरण प्रस्तुत किया है। बात उन दिनों की है, जब 1870 में सम्राट विक्टर एमेन्युएल द्वितीय रोम एवं पैपल राज्यों पर कब्जा कर इटली का क्षेत्र-विस्तार करने में लगे थे। उन्हीं दिनों सोरियेनों सैलेब्रो (दक्षिण इटली) में स्थित सेण्ट डोमिनिक गिरजाघर में एक अलौकिक घटना घटित हुई। 15 सितम्बर 1870 का दिन था। संत डोमिनिक की जयंती मनाने की तैयारी चल रही थी। मध्याह्न हो चुका था। चर्च में संत की मूर्ति पूजा के लिए अनावृत चल रही थी। मध्याह्न हो चुका था। चर्च में संत चौंक पड़े कि प्रतिमा आगे-पीछे जीवित मनुष्य की तरह टहलने लगी है। शोरगुल सुनकर चर्च के दूसरे लोग भी वहाँ आ पहुंचे। विग्रह का चलना जारी रहा । वह आग बढ़ती, फिर पीछे चलती पुनः बायीं ओर मुड़ जाती तत्पश्चात् फिर आगे-पीछे, उसके बाद दांये-बांये। इस प्रकार संत-प्रतिमा एक “क्रास” का निर्माण कर रही थी। गति लगभग एक घटें तक होती रही । इस गति से दोनों मूर्ति अपने आधार से बिल्कुल विच्छिन्न बनी रही। इस मध्य डोमिनिक का दाहिना हाथ उपदेश देते संत की तरह बराबर ऊपर-नीचे आत-जाता रहा। लिली पुष्प युक्त बायाँ हाथ यदा-कदा दांये का साथ दे देता। चेहरे का भाव इस बीच उसी प्रकार बदलता रहा , जिस तरह विषय वस्तु बदलने से क्षण-क्षण में वक्ताओं के भाव परिवर्तित होते रहते हैं। थोड़े-थोड़े अंतराल में ललाट पर बल पड़ जाते और आँखें ऐसी प्रतीत होती, मानों उपस्थित जन समुदाय पर मृदु भर्त्सना बरसा रही हों। दूसरे क्षण वह घूम कर पार्श्व में स्थित लेडी रोजरी के विग्रह पर स्थिर हो जातीं, जैसे वे कुछ निवेदन कर रही हों। तीव्र भावनाओं के आवेग में वक्तृता के समय वक्ताओं के होंठ जिस प्रकार फड़कते हैं, संत-मूर्ति भी कुछ वैसा ही दृश्य उपस्थित कर रही थी।

उल्लेखनीय है कि प्रतिभा की विलक्षण गति को जिस किसी ने भी रोकने का प्रयास किया, वे उसमें सफल तो न हो सके, उल्टे किसी अज्ञात शक्ति के वशीभूत हो वे भी वैसा ही उपक्रम करने लगे। लगभग एक घंटे पश्चात् सब कुछ सामान्य हो गया। दूसरे दिन यह बात सम्पूर्ण मिलेटों में आग की तरह फैल गई। वहाँ के विशप ने एक तरह फैल गई। वहाँ के विशप ने एक आयोग का गठन कर इसकी जांच का आदेश दिया। फरवरी 1971 में जब पड़ताल-कार्य पूरा हुआ, तो आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि 15 सितम्बर 1870 के दिन डोमिनिक चर्च में जो कुछ घटा, वह सर्वथा अलौकिक और अद्भुत था। उसकी सच्चाई पर संदेह नहीं किया जा सकता।

एक और इसी प्रकार की घटना सैक्रामेण्टो,अमेरिका की है। इसकी चर्चा रेमण्ड लेमोण्ट ब्राउन ने अपनी प्रसिद्ध कृति “फैण्टम्स ऑफ दि थियेटर “में विस्तारपूर्वक की है। प्रसंग फ्राँसीसी क्राँति के बाद का है। सन् 1867 में रिचर्ड टर्नर ने सैक्रामेण्टो में “टर्नर्स वैक्सवर्क थियेटर” नाम से एक रंगशाला की स्थापना की। थियेटर का मुख्य आकर्षण मंद प्रकाशित गिलोटीन दृश्य के साथ उन फ्राँसीसी नर-नारियों के पुतले थे, जिन्हें फ्राँसीसी-क्राँति के दौरान फ्राँसी दे दी गई थी। इनमें प्रमुख थे-एक अभिजात वर्गीय दंपत्ति, एक युवती एवं काले वस्त्राभूषण में सज्जित मोनजियर निकोडिम लियोपोल्ड-लोपिड नामक एक टैक्स कलक्टर। इन सबके मोम के पुतले पीठिका में प्रतिष्ठित थे।

थियेटर के शुरू हुए अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ था। एक प्रातः पहरेदार ने जब उसका दरवाजा खोला, तो वह यह देख कर चौंक पड़ा कि लियोपोल्ड लोपिड की मोम-मूर्ति पीठिका से पृथक होकर दरवाजे के निकट फर्श पर खड़ी है। उसका सिर धड़ से अलग होकर नहीं पास में पड़ा था। पहरेदार एजरा-मोटर ने इसकी सूचना टर्नर को दी। टर्नर ने इसके बाद रात्रि पहरा और कड़ा कर दिया, साथ ही द्वार का ताला भी बदल कर मजबूत लगा दिया। इतने पर भी घटना रुकी नहीं। प्रायः प्रत्येक सुबह कमरा खोलने पर कलक्टर का पुतला आधार से नीचे फर्श पर मिलता। जब यह नित्यप्रति होने लगा, तो टर्नर और पोटर ने थियेटर में रात्रि बिता कर रहस्य जानने का निश्चय किया। नियत समय पर दोनों रंगशाला पहुँचे, पर दुर्भाग्यवश उन्हें नींद आ गई और मामला समझ पाने में वे असफल रहे। सबेरे जब उनकी आँखें खुली, तो पुतला आज भी अपने आसन से नीचे पाया गया दूसरी रात दोनों ने जागते हुए बिताने की योजना बनायी।

रात्रि के करीब ढाई बजे होंगे। दोनों ने देखा कि मोनजियर की मूर्ति हिलने-डुलने लगी है। पैरों में गति शुरू हुई और धीरे धीरे वह पीठिका से नीचे उतर आयी। कुछ दूर बढ़ने हिलने के पश्चात् स्थिर हो गई। अब हाथ हिलने लगे और इसी के साथ होठों में कंपन प्रारंभ हुए। एक मानवी आवाज से कमरे की निस्तब्धता भंग हो गई। मूर्ति फ्राँसीसी भाषा में बोल रही थी “शांति की नींद यहाँ सो पाना किसी के लिए संभव नहीं। यदि तुम्हें अपनी जान संभव नहीं। यदि तुम्हें अपनी जान प्यारी है, तो फिर कभी निशाकाल में इधर मत आना, अन्यथा पछताओगे।”

इतना कहकर आकृति शाँत हो गई। दूसरे दिन जब इस रात्रि घटना को जानकारी समाचार पत्रों में छपी तो एक पत्रकार टर्नर के पास आया और थियेटर में रात बिताने का आग्रह करने लगा।बहुत समझाने पर भी न माना अंततः अँधेरा घिरा, तो उस व्यक्ति को रंगशाला में पहुँचा दिया गया। बाहर से दरवाजा बन्द कर चौकीदार वहीं बाहर बना रहा।

दूसरा पहर बीतने जा रहा था। ठीक इसी समय कमरे से चीखें आने लगीं और दरवाजे पर लगातार आघात होने लगे। प्रहरी ने ताला खोला, तो पत्रकार चीख मार कर बेहोश हे गया बाद में संपूर्ण वृत्ताँत सुनाते हुए पत्रकार ने बताया “ करीब दो घंटे तक सब कुछ सामान्य रहा । इसके उपराँत अचानक कलक्टर की आकृति में कंपन हुई। पहले हाथ हिला, फिर गर्दन मुड़ी। अब वह अपने चबूतरे पर चलने लगी, उससे नीचे उतरी और मेरी ओर मुड़ी। अब वह अपने चबूतरे पर चलने लगी, उससे नीचे उतरी और मेरी ओर मुड़ी। अब वह अपने चबूतरे पर चलने लगी, उससे नीचे उतरी और मेरी ओर मुड़ी। अब वह अपने चबूतरे पर चलने लगी, उससे नीचे उतरी और मेरी ओर मुड़ी। मैं खड़ा हुआ। मोम आकृति अब भी मेरी ओर बढ़ रही थी। मैं भय से काँप उठा और दरवाजा पीटने लगा। इस समय तक वह मेरे काफी निकट आ चुकी थी, इतना अधिक कि उसने अपने हाथों का घेरा मेरी गर्दन के गिर्द डाल दिया। मेरे प्राण जुबान तक आ गये। मैं चौंककर उठा । तभी किवाड़ खुले और इसके बाद बेहोश हो गया।”

इन्हीं घटनाओं के तारतम्य में हर्बर्ट थर्स्टन ने अपनी पुस्तक”व्यूरैंग एण्ड अदर एपेरिशन्स” में लिखा है कि माल्टा द्वीप के वालेटा शहर के एक स्कूल के छात्रों ने एक बार पिकनिक के उपराँत शहर के उत्तर पश्चिम में स्थित मरियम की एक भव्य प्रतिमा के दर्शन को कार्यक्रम बनाया। मेलाइहा ग्राम की इस मूर्ति के बारे में जनश्रुति थी कि वह अद्भुत चेष्टाएँ करती है, विशिष्ट भंगिमा बना कर दर्शकों को आशीर्वाद देती है। छात्र जब वहाँ पहुँचे, तो कुछ विद्यार्थियों ने फादर जॉन मैकहेल के साथ “ग्रोटा डेला मैडोना” की उस प्रसिद्ध गुफा में प्रवेश किया, जहाँ मरियम का विख्यात विग्रह प्रतिष्ठित था। संपूर्ण विवरण का उल्लेख करते हुए फादर मैकहेल ने अपनी डायरी में लिखा है कि जैसे ही वे लोग विशाल कन्दरा के द्वार पर पहुँचे, दूर से ही जीवंत मूर्ति ने उन लोगों को एक प्रकार से मोहित कर लिया। सभी गुफा के अंदर गये, तो ज्ञात हुआ कि श्वेत पाषाण से विनिर्मित वह एक प्राचीन प्रतिभा थी। उसका बायाँ हाथ एक सुन्दर शिशु को थामे हुए था, जबकि दाहिना स्वतंत्र था। फादर मैकहेल ने मोमबत्ती की रोशनी में मूर्ति का गहराई से निरीक्षण किया। वह एक बड़े प्रस्तर खण्ड से बनी थी और बिलकुल संधि रहित थी। अभी वह उसे निहार ही रहे थे। कि अकस्मात् उंगलियों में हलचल हुई। वे सतर्क हो गये। कनिष्ठ अँगुली पीछे की ओर मुड़ी। कुछ क्षण पश्चात् अनामिका और मध्यमा ने भी उसका अनुसरण किया, तत्पश्चात् तर्जनी की बारी आयी और सबसे अंत में अंगूठे ने भी उनका साथ दिया। इस प्रकार आरंभ में जो उंगलियां सामने फैली हुई थी, अब उनकी दिशा विपरीत हो गई थी। इसके बाद संपूर्ण हाथ ऊपर की ओर उठा, मानों मरियम आगन्तुकों को आशीर्वाद प्रदान कर रही हो। कुछ पल आशीर्वाद प्रदान कर रही हों। कुछ पल तक उक्त में रहने के उपराँत हाथ पुनः नीचे आ गया एवं उंगलियां पूर्ववत् हो गई।

इसे महत् प्राण का चमत्कार कहें या कौतुक, उसके रहस्य को भलीभाँति समझने के लिए उस सत्ता को संपूर्ण विदित हो सकेगा कि जनसामान्य में कौतूहल पैदा करने वाली इन अलौकिकताओं के पीछे उसका प्रयोजन क्या है?


योग्यता और सेवा-साधना (Kahani)

ओहियो के जंगल में गारफील्ड की विधवा माता रहती थी। लकड़ी काट कर गाँवों में बेचने जाती, तो लड़के को झोपड़ी में बंद करके लगा जाती, ताकि जंगल के भेड़िये उसे खा न जाये। राज को माँ उसे दुलार करती और कुछ पढ़ाती॥ बड़ा होकर माँ-बेटे ने एक खच्चर ले लिया और लकड़ियाँ सिर पर ढोने की अपेक्षा उसी पर लाद कर ले जाने लगे। गारफील्ड को पढ़ने भी पढ़ाई भी पढ़ने लगा और ज्ञानवर्धक साहित्य भी। युवा होते-होते बह ग्रेजुएट बन गया और दूसरी अच्छी नौकरी भी मिल गई। इसी के साथ बचे हुये समय में वह समाज सेवा के अनेक कार्य करता। उसके स्वभाव और चरित्र से उस क्षेत्र के सभी लोग परिचित हो गये।

प्रगति पथ की अनेक मंजिलें पार करते हुये गारफील्ड अमेरिका की राज्यसभा का सदस्य चुना गया। इससे अगले चुनाव में वह राष्ट्रपति के पद पर प्रतिष्ठित हुआ। यह सफलता किसी देवता के वरदान से नहीं, उसे अपनी योग्यता और सेवा-साधना के बलबूते पर उपलब्ध हुई थी।

यह पथ हर व्यक्ति के लिए खुला हुआ है। जो किसी की प्रतीक्षा न कर स्वयं पुरुषार्थ में संलग्न होते हैं, वे अपनी संकल्प शक्ति से लक्ष्य को प्राप्त करके रहते हैं।


कुल्लू के रघुनाथ

कुल्लू नरेश का शरीर युवावस्था में ही गलित कुष्ठ से विकृत हो गया था। पर्वतीय एवं दूरस्थ प्रदेशों के चिकित्सक व्याधि से पराजित होकर विफल मनोरथ लौट चुके थे। क्वाथ स्नान, चूर्ण भस्म, रस रसायन कुछ भी तो नहीं कर सका।

नरेश न उच्छृंखल थे, न भोग परायण। उनके पूर्व पुरुषों ने कुलाँत क्षेत्र के दिव्य त्रिकोण (व्यास नदी के उद्गम, पार्वती नदी के उद्गम और दोनों के संगम स्थल की मध्य भूमि) को भगवान उमा, महेश्वर की विहार अपवित्र करना उचित नहीं समझ। मनुष्य रहेगा, तो उसके साथ उसके प्रमाद, त्रुटियां भी रहेंगी। ही। अतः उन्होंने व्यास के दक्षिण तट पर अपनी राजधानी बनायी, जो आज कुल्लू कही जाती। यों इस त्रिकोण में उनके बंशाधरों ने पीछे एक निवास बना लिया था नगर में और वही आज पुरानी राजधानी के नाम से जाना जाता है।

इतने भाव प्रवण कुल में जिनका जन्म हुआ, उनके रक्त में वासना की वृद्धि के लिए आहार कहाँ से मिलता । नरेश बचपन से अत्यन्त श्रद्धालु थे और श्री रघुनाथ जी के उपासक थे। शरीर में रोग के लक्षण प्रकट होते ही चिकित्सा के साथ पंडितों के अनुष्ठान प्रारंभ हो गए थे।

प्रारब्ध प्रबल होता है, तब पुरुषार्थ सहज सफल नहीं होता। वर्षा की उमड़ती नदी में बाँध बनाने के प्रयत्न सफल हो, असीम शक्ति और साधन की अपेक्षा है। ग्रह शांति,देवाराधन और चिकित्सा के प्रयत्न प्रारब्ध को रोक नहीं सके थे। नरेश के स्वागत में कुष्ठ फूल पड़ा था।

‘यह घृणित रोग’ नरेश को देह का मोह नहीं रहा था किन्तु उन्हें आंतरिक व्यथा था कि अब न वे सत्पुरुषों-संतों के चरणों पर मस्तक रखने योग्य रहे और न कथा सत्संग में बैठने योग्य है। किसी तीर्थ में पुण्य क्षेत्र में कैसे जाया जा सकता है? अपने रोग का संस्पर्श दूसरों को प्राप्त हो, बड़ी सावधानी से नरेश इसे बचाते थे। पत्नी तक को उन्होंने पद वंदना से वंचित कर दिया था। उस साध्वी को भी अपने आराध्य की आज्ञा स्वीकार करके दूर से ही दर्शन करना पड़ता था।

“यह संस्पर्श से फैलने वाला संक्रामक रोग है। किसी भी पावन तीर्थ में यह भाग्यहीन अब स्नान के योग्य नहीं रहा।” महाराज अत्यंत दुःखित रहने लगे थे।” किसी मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं रहा मुझे। पतितपावन प्रभु भी रूठ गए मुझसे”

टंत में राजपुरोहित ने नरेश को मणि कर्ण में निवास की संपत्ति दी। मणि कर्ण क्षेत्र का गंधक मिश्रित जल संभव कर्ण क्षेत्र का गंधक मिश्रित जल संभव है नरेश के रोग को दूर कर सके। कर्ण क्षेत्र का गंधक मिश्रित जल संभव है नरेश के रोग को दूर कर सके। राजपुरोहित की वह आशा सर्वथा पर बहुत है भारत में भी बहुत हैं, किन्तु प्रायः सर्वत्र उनमें एक गंध है और वे स्वाद में कषाय न भी हों, परन्तु स्वादिष्ट नहीं है। मणिकर्ण के क्षेत्र में खौलने जल स्त्रोत का विस्तार मीलों में है। लगभग पूरा मणिकर्ण ग्राम घर-घर में इस जल को अपने कुण्डों में रोक कर उससे भोजन सिद्ध कर लेता। जल गंध रहित था, स्वादिष्ट भी। आज भी अनेक रोग- विशेष रूप में चर्मरोग उससे दूर होते हैं।

नरेश ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उनकी दृष्टि दूसरी थी। शरीर जाता ही हो तो उमा-महेश्वर की गोद में जाय। भगवती हिमवान् सुता का साक्षात् भौतिक रूप है- पार्वती नदी और उनकी धारा को अंकमाल देने चलने वाला खैलता ऊष्णोदक स्रोत साक्षात् का प्राकट्य तो शम्भु-उमा को कोड़ा में हुआ है। वहाँ कहीं भी स्नान किया जा सकेगा, मुख्य स्थल से कुछ नीचे हटकर । जन संपर्क का प्रश्न ही वहाँ नहीं उठता।

राज्य का भार वैसे भी अब मंत्रियों पर था। आज के समान भुन्तर के समीप व्यास पर सेतु नहीं था। रस्सियों को बाँधकर किसी प्रकार पर्वतीय जन व्यास को पार करते थे। नरेश के लिए कुछ अच्छा सेतु बना। व्यास-पार्वती के संगम में स्नान करके वहाँ से दस कोस ऊपर मणिकर्ण गाँव को कोई अस्तित्व नहीं था। केवल पर्व के समय वहाँ कुछ लोग आ जाते थे।

“इस क्षेत्र में पाण्डु-पुत्रों” ने निवास किया था। इसके मूर्धन्य भाग में ही अर्जुन ने तप करके चन्प्द्रमौलि की आराधना की और अपने पराक्रम से उनको संतुष्ट किया । भगवान गंगाधर अर्जुन पर कृपा करने के लिए यहाँ किरात वेश में विचरण कर चुके हैं। जगंबा पार्वती के शवरकन्या के रूप में श्री चरण यहाँ पड़े हैं। यह विवरण सुन नरेश इस क्षेत्र की विशेषता जान अपने रोग को अपनी व्यथा को भूल गए। वे शिखर को प्रणिपात करते, ऊष्णोदक में स्नान करते और प्रायः भाव विह्वल रहते।

“श्री राम जय राम जय जय राम।” जिह्वा पर यह नाम तो उनके बचपन से बसा था। अब इस क्षेत्र में आकर उन्होंने अत्र और दूध भी त्याग दिया था। उनका राज्य स्वादिष्ट फलों। का भण्डार है। किंतु उनके लिए वे फल भी अब अग्राह्य बन गए थे। वन में मिलने वाला, जंगली गोभी और कुछ ऐसे ही शाक इनको मणिकर्ण के गरम जाने में उबाल दिया जाता और दिन में एक बार नरेश उसे ग्रहण करते। आस-पास के क्षेत्रों में भी नरेश ही आते थे। तप,जप और भावना उनके देह की बाह्यावस्था कुछ भी हो, उनका हृदय इलावर्त शिखर पर जमे हिम के समान उज्ज्वल हो गया था।

सहसा एक दिन राजधानी में संदेश आया कि नरेश लौट रहे है। राजसदन सजाया गया। प्रजा प्रसन्न हुई। उनके प्रजा प्रसन्न हुई। उनके प्रजा वत्सल नरेश रोगी ही सही, उनके मध्य में तो रहेंगे।

“गगनचुंबी हिम गौराकृति पर्वत शिखर उन ज्योतिर्मय के घुटनों का चन्द्र उनके भाल पर था वा क्षितिज पर किन्तु पिंगल जटाजूट का अंत दृष्टि नहीं उनके भाल पर था या क्षितिज पर किन्तु पिंगल जटाजूट का अंत दृष्टि नहीं पाती थी।” लौटकर नरेश ने एकाँत में राजगुरु को जो कुछ बतलाया, वह यहीं था-”मणिकर्ण के गरम जल वह यही था-”मणिकर्ण के गरम जल से उठती भाप स्पष्ट नहीं देखने देती थी और संध्याकाल का अंधकार भी प्रारंभ हो गया था। किन्तु लगता था हिमशीतल पार्वती की धारा से एक पाटल गौर मूर्ति उठ खड़ी हुई है और उसे वाम भाग में किये कर्पूर गौर, अमित तेजोमय भवानीनाथ स्वयं सम्मुख खड़े हैं।”

गदगद कण्ठ अश्रु झरते नयन नरेश कह रहे थे-”प्रभु की मूर्ति, लगता था क्षण में प्रकट होती, फिर अदृश्य हो जाती । उन्होंने मुझे आदेश दिया-’अयोध्या से अपने श्री रघुनाथ जी की ले आ। उनका स्मानोदक लेकर स्नान कर’ तेरा शरीर स्वस्थ हो जायगा।”

नरेश ने बताया कि रात्रि में उन्होंने स्वप्न में अयोध्या की वह छोटी सी श्री रघुनाथ जानकी की मूर्ति देखी है। वह स्थान देखा है। और उन मर्यादा पुरुषोत्तम ने भी इस पर्वतीय प्रान्त को अपने पदार्पण से धन्य करने को वचन दिया है।

राज पुरोहित को जैसे निधि मिल गई। मार्ग मिल गया तो लक्ष्य भी मिल गई। मार्ग मिल गया तो लक्ष्य भी मिल कर रहेगा। स्वयं राजपुरोहित ने अयोध्या जाने का निश्चय किया। सेवक, सचिव आदि सबको आदेश दे दिए गए।

यह समूह पैदल यात्रा करके अयोध्या पहुंचा। उसे निर्दिष्ट स्थल पर श्री रघुनाथ जी की उस मूर्ति के दर्शन भी ही गए। राजपुरोहित पूरे एक वर्ष अयोध्या रहे। उन्होंने प्रत्येक दिन, प्रत्येक पर्व पर जैसी जिस विधि से सेवा श्री रघुनाथ जी की होती थी, उसका सावधानी पूर्वक निरीक्षण किया और उस सबको लिखते गए।

एक वर्ष पश्चात् बनाकर एक रात्रि में राजपुरोहित के नेतृत्व में यह पर्वतीय लोगों का समूह मन्दिर से उस श्री मूर्ति को लेकर चल पड़ा। प्रातः काल जब मन्दिर में मूर्ति नहीं मिली, अयोध्या में बड़ी तीव्र हलचल हुई।

अयोध्या के लोग क्रुद्ध तो बहुत हुए किन्तु प्रतिवाद के ईंधन के स्थान पर नम्रता का जल पड़े तो क्रोधाग्नि कब तक जलती रह सकती है। सबसे अद्भुत बात यह हुई कि वह कुल तोले की मूर्ति किसी के उठाये उठती नहीं थी। सब प्रयत्न करके थक गए और अंत में अयोध्या से आए लोगों को कहना पड़ा-’जब प्रभु ही जाना चाहते हैं, तो उन्हें रोकने वाले हम कौन होते हैं?’पूरे मार्ग में विधिपूर्वक श्री रघुनाथ जी की पूजा, अर्चा होती रही। मार्ग में ही वे पर्वोत्सव मनाए गए जो उस समय पड़े।

कुल्लू में श्री रघुनाथ जी के पहुँचने से पूर्व ही उनके मंदिर को साथ श्री रघुनाथ जी कुल्लू पधारे और मंदिर में उन्हें विराजमान कराया गया। नरेश ने मंदिर विराजमान कराया गया। नरेश ने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, किंतु श्री रघुनाथ जी पधारते समय दूर से उनकी पालकी को साष्टाँग प्रणाम कर लिया था।

उत्तम मुहूर्त में श्रीरघुनाथ जी का विधिपूर्वक महाभिषेक संपन्न हुआ। अभिषेक का जल स्वयं राजपुरोहित सेवकों द्वारा लिवाकर राजा के पास आये और उल्लसित स्वर में बोले आप चौकी पर विराजे अब आपका अभिषेक संपन्न हो।

‘आप भी ऐसी अनुचित आज्ञा देंगे, ऐसी आशा मुझे नहीं थी। नरेश दोनों हाथ जोड़कर दूर खड़े रोते-रोते कह रहे थे-’यह मेरे आराध्य के अभिषेक का परम पावन जल है। इसे क्या इस कुष्ठ से अपवित्र देह पर डाला जा सकता है? यह मेरा वंदनीय है। मैं कैसे यह कर सकता हूँ कि इसका कोई कण मेरे पैरों तक जाय?

‘राजपुरोहित को बड़ा खेद हुआ। राजा को समझा सकेंगे, ऐसी आशा उन्हें नहीं थी और नरेश को स्वस्थ देखने की भी दूसरी युक्ति सूझती नहीं। अंततः उन्हें वह अभिषेक जल लेकर लौटना पड़ा। स्वस्ति पाठ के साथ केवल कुछ जल कण वे अपने नरेश के मस्तक, पर डाल सके थे और एक कलश जल नरेश ने अपने पीने के लिए रख लिया था।

“श्री रघुनाथ जी जय॥” राजपुरोहित अभी उस कक्ष के द्वार तक पहुँचे थे कि उन्हें पीछे से नरेश की भावविह्वल अपने यजमान की संपूर्ण स्वस्थ काया को देखते रहे और तब उनके कण्ठ से अस्पष्ट गदगद स्वर निकला-’ श्रद्धा की जय। कुल्लू के रघुनाथ मंदिर में आज भी अयोध्या से आया श्री रघुनाथ जी का वही विग्रह विराजमान है। देवताओं की इस घाटी के वे अध्यक्ष हैं।

विजयादशमी को घाटी के सब देवता उनका अभिवादन करने कुल्लू आते हैं। अनेकों दर्शनार्थी -पर्यटक कुल्लू के जिस प्रसिद्ध दशहरे के लिए उन दिनों वहाँ आते हैं, उसकी पृष्ठभूमि शायद बहुत से लोग जानते नहीं। यह भी रघुनाथ का लीला धाम जो है।


आत्मानुसंधान देगा सहजानन्द

‘आनन्द’ अध्यात्म की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जो व्यक्ति इसे प्राप्त कर लेता है, उसकी अवस्था आध्यात्मिक दृष्टि से काफी उच्च मानी जाती है। इस आनन्द का उद्घाटन हर एक में हो सकता है, पर सर्वसामान्य में इसका निमित्त कोई दूसरा होता है, इसलिए वह क्षणभंगुर है और भौतिक भी, जबकि आध्यात्मिक आनन्द चिरस्थायी और अभौतिक अर्थात् आत्मिक है।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित है कि बाह्य वस्तुओं में हमें जहाँ-जहाँ, जब-जब सुख की अनुभूति होती है, वह वस्तुतः हमारे अंतस् के आनन्द की ही छाया मात्र है, क्योंकि बाहरी उपादानों में सुख कभी होता नहीं। जो होता है, वह मात्र दुःख है। यदि भौतिक पदार्थ आनन्द के स्त्रोत रहे होते, तो जिस चीज से एक को प्रसन्नता मिलती है, दूसरे के लिए भी वह इसके ठीक विपरीत हैं। देखा जाता है कि जो सामग्री हमारे जीवन में सुख और शाँति बनकर आती है, दूसरे के लिए वही महान दुःख का कारण बन जाती है। जड़ पदार्थ सचमुच ही याद प्रसन्नता के उद्गम है।,

ते आकुलता-व्याकुलता का निमित्त उन्हें क्यों बनना चाहिए? यदि बनते हैं तो निश्चय ही समझने में कोई भूल हुई और हम कुछ-के -कुछ मान बैठे हैं। कुत्ता सुखी हड्डी से निकल रहा है। वह जोर-जोर से चूसता है और आनन्दित होता रहता है, जबकि वास्तविकता यह है कि रक्त उसके जबड़ों से निकलता रहता है। उसे वह अस्थि से बाहर आता मान चबाता रहता है। रस उसे मिलता है, यह सत्य है, पर आस्वादन उसके अपने ही रस-रक्त का है, हड्डी का नहीं-अन्दर का है, बाहर का नहीं। पानी से यदि प्यास बुझती है, तो उससे सबकी बुझनी चाहिए, ऐसा नहीं कि किसी की बुझे और किसी की नहीं। कोई यदि कहे कि सभी की तो बुझती है, पर वह अतृप्त बना रहता है, तो इसमें त्रुटि-उसकी अपनी है, पानी की नहीं।

आत्मगत सत्य और वस्तुगत सत्य में नहीं अंतर है। एक से संबंधित सत्य की उपलब्धि दूसरे में नहीं की जा सकती और न यही संभव है कि एक सच दूसरे का पर्याय बने। द्रव्य का गुण आत्मा में ढूँढ़ना बेईमानी है और आत्मा का धर्म पदार्थ और संसार में तलाशना नासमझी। संसार में सौंदर्य भरा पड़ा है। कोई उसको निहार दूसरे को उससे वह सुख नहीं मिल पाता। यदि सौंदर्य है, तो इसकी खोज करने वाले प्रत्येक अन्वेषक को इससे सुख मिलना चाहिए, एक ऐसा कहाँ होता है? जिस सौंदर्य से भोग और विलासिता से हमें आनन्द मिलता है, उसी से कोई ’बुद्ध’ भाग अतृप्त बना रहता है, जबकि दूसरा घोर नरक जैसी परिस्थिति में भी स्वर्गीय सुख की प्रतीति करता है। आखिर ऐसा क्यों?

गहराई से विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जिस शाश्वत संतोष की तलाश हम बाहर करते रहते हैं, वस्तुतः वह अन्दर की वस्तु है। बाहर यदि उसकी अनुभूति होती है, तो वह भी भीतर का ही विस्तार हैं जैसे-जैसे हम गहराई में प्रवेश करते चलते हैं, वैसे-वैसे इस तथ्य की अनुभूति और अधिक स्पष्ट होती जाती है। इस सुख को बाहरी वस्तुओं में ढूँढ़ना चाहते हैं। सुख वहाँ है नहीं, इसलिए दुःख भोगना पड़ना है। इतना जानते समझते हुए भी व्यक्ति आज संसार में साधनों के पीछे शाँति के लिए भागता फिर रहा है। कोई इसे किसी चीज में खोजने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरा किसी अन्य प्रयास कर रहा है, तो दूसरा किसी अन्य विषय में इसके अन्वेषण का प्रयत्न कर रहा है। सभी प्रयत्नशील हैं, पर आज तक इनमें से कोई भी इस सनातन सुख को उपलब्ध कर पाने में सफल न हो सका । पत्नी सोचती है कि उसे पति में सुख मिलेगा और पति का विश्वास है कि वह इसे पत्नी से प्राप्त कर लेगा। माँ, बेटे में सुख ढूँढ़ रही है, जबकि बेटे में पुत्र, पिता में-संसारी,संसार में और वैरागी, विराग में इसे अपने-अपने ढंग से खोज-यात्रा पूरी न हो सकी है और न भविष्य में पूरी होने की आशा है क्योंकि जिन्हें हम सुख का स्त्रोत मान बैठें हैं, वे इसके उद्गम है नहीं ।

आश्चर्य तो तब होता है, जब यह विदित होता है कि जिनमें हमें शाँति की तलाश है, वे इसकी खोज कहीं कर रहा है, मन कुछ और ढूँढ़ रहा है। शरीर अधिकाँश व्यक्ति की आज ऐसी ही स्थिति है। वे अपने में होते नहीं। संपूर्ण आपा वहाँ उपस्थित नहीं होता। इसलिए उनसे भेंट सम्पूर्ण रूप से होती नहीं। मिलन मात्र शरीर से हो पाता है, जो मन-प्राण के बिना अधूरा है। जो तृप्ति का अन्वेषण बाह्य विश्व में करते रहते हैं, उनकी सता हर वक्त अधूरी बनी रहती है। ऐसे लोगों को थोड़ी भी ठोकर लगती है, तो एकदम असंतुलित होकर गिर पड़ते हैं, और फिर गिरते ही चलती हैं, गिरने पर या तो आत्महत्या कर लेते हैं, गिरने पर या तो आत्महत्या कर लेते हैं या फिर पागल हो जाते हैं। जो तनिक बुद्धिमान हैं वे ना मात्र के वैरागी बन कर इधर-उधर भटकने लगते हैं। यही कारण है कि इन दिनों विक्षिप्तों,अर्धविक्षिप्तों और वैरागी कहे जाने वाले वेश धारियों की संख्या कुकुरमुत्तों की तरह द्रुतगति से बढ़ती ही जा रही है, क्योंकि वर्तमान में लोगों की यात्रा भीतर से बार की ओर हो गई है, जबकि होना इसके विपरीत चाहिए।

कभी यही स्थिति भर्तृहरि के समझ भी उपस्थित हो गई थी। उनका विश्वास था कि संतुष्टि बाहरी विषय वासनाओं द्वारा संभव है। इसकी प्राप्ति के लिए न जाने वे कितने मार्गों में भटकते रहे, कुछ कहा नहीं जा सकता। हर जगह-उन्हें निराशा हाथ, लगी, फिर भी वे हताश नहीं हुए। एक सामान्य व्यक्ति और उनमें यही मूल-भूत अंतर से उस बात की पुष्टि कर लेना चाहते थे, जिसमें आनन्द को संसार में बिखरा बताया गये विषयों और वस्तुओं में आनन्द तो मिला, पर चिरस्थायी न रह सका। फिर दूसरे तीसरे और चौथे में उनकी खोज आरंभ हुई। हर बार स्थिति एक-जैसी अनुभव हुई। हर बार स्थिति एक जैसी अनुभव हुई। इस प्रकार भटकाव भरी लम्बी जिन्दगी के उपराँत उनने जिस पुस्तक की रचना की उसका नाम हैं ”श्रृंगार शतक”। इस पुस्तक में उन्होंने बाह्य जगत में सुखोपलब्धि की व्यर्थता का विस्तार से उल्लेख किया है। इसके बाद उनकी अंतर्यात्रा शुरू प्रसिद्ध किया है और बताया है कि स्थित आनन्द की उपलब्धि आँतरिक एवं मात्र आँतरिक है। लगभग मिलता-जुलता भव प्रकट करते हुए मूर्धन्य मनीषी जंग ने अपनी पुस्तक “माडर्न मैन सर्च ऑफ ए सोल” में कहा है कि आरंभ में मनुष्य संबंधी मान्यता यह भी वह मात्र एक शरीर है और यह संसार उसके उपभोग के निमित्त है। ऐसी स्थिति में वह तुष्टि का संधान साधन-सामग्रियों में करता था और उसी के अधिकाधिक भोग में लिप्त रहता था। इसमें कइयों को संतुष्टि अनुभव हो भी जाती थी और कई अशाँत बने इधर-उधर शाँति की तलाश करते रहते थे। अब जबकि शरीर के अन्दर आत्मा की उपस्थिति को विज्ञान ने भी करीब-करीब स्वीकार लिया है, संभव है उसकी उपलब्धि से व्यक्ति को संपूर्ण सुख की उपलब्धि हो जाय और उसे पहले की तरह निरर्थक भटकता न पड़े। इसीलिए वे सलाह देते हुए कहते हैं कि यदि सचमुच ही मनुष्य के अन्दर वैसा कोई अद्भुत तत्व है, जिसकी प्राप्ति ही चरम प्राप्ति साबित हो और जिसके उपलब्ध हो जाने से सब कुछ उपलब्ध हो जाता हो जाने से सब कुछ उपलब्ध हो जाता,तो मनुष्य को उसी परम तत्व की शोध में जुट जाना चाहिए।

“स्वीरिचुअल क्रइसिस ऑफ मैन”नामक ग्रंथ में विख्यात विचारक पॉल ब्रण्टन लिखते हैं कि अध्यात्म की खोज वस्तुतः अपने ही अन्दर की खोज है, जबकि संसार जड़ पदार्थों के अनुसंधान की यात्रा है। विज्ञान जड़ युक्त है। अध्यात्म चेतनायुक्त है। जड़ में जड़ शोध की जानी चाहिए। उससे जो कुछ हस्तगत होगा, वह जड़वत् होगा, जबकि आनन्द चेतनामय है। यह आत्मा गुण है। आत्मा चैतन्य है, अस्तु इसे प्राप्त कर ही उस अवस्था में प्रतिष्ठित हुआ जा सकता है, जिसे भारतीय अध्यात्म में “सच्चिदानन्द” कहकर अभिहित किया गया है वे लिखते हैं कि इन दिनों भूल यह हो गई कि हम जड़ में चेतना को आत्मा की खोजते फिर रहे है, पुरा प्रकृति को अपरा प्रकृति में ढूँढ़ रहे है, जबकि दोनों पृथक विज्ञान है जिस दिन यह निरर्थक प्रक्रिया बेद होगी, उसी दिन से मनुष्य की वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा शुरू होगी। फिर उसे शाँति और संतोष के लिए बाहर भटकना नहीं पड़ेगा।

इसके लिए उपाय यही है कि हम उपलब्ध साधनों में ही संतुष्ट रहें और धीरे-धीरे संतोष को बढ़ाते हुए साधन को घटाते चलें, तो एक दिन उस अवस्था में पहुँच सकते हैं। शुरुआत यदि इससे उलटी हुई, अर्थात् साधन को यदि इससे उलटी हुई, अर्थात् साधन को बढ़ाया और संतोष को घटाया गया, तो वह वासदायी अवस्था आ पहुँचेगी, जो आजकल चारों ओर दिखाई पड़ती है। प्रथम स्थिति में हमारी यात्रा अंतर्जगत की ओर होती है, जबकि दूसरी अवस्था हमें बहिर्जगत की ओर ले जाती है। प्रथम सुखदायी है, दूसरी दुःखदायी इस अर्थ में कि यदि हम बाहरी दुनिया और उसकी वस्तुओं से अपना सुख जुड़ा मानते हैं तो उसके दुःख भी हमसे संलग्न होते चले जायेंगे। यह पंचभौतिक विश्व नश्वर है। उसकी एक-एक चीज नाशवान है। हमारा मोह जिससे संयुक्त है, वह भी एक-न-एक दिन समाप्त होगा ही। इसीलिए तत्वेत्ताओं ने प्रेम की वस्तु परमात्मा को उपलब्ध करना ही अध्यात्म का उद्देश्य है। सर्वोच्च शांति एवं परमानंद इसी अवस्था में प्राप्त की जा सकती है। इसी के निमित्त हमारा प्रयत्न होना चाहिए।

दिग्भ्राँत प्रतिभा-प्रखर प्रज्ञा में बदले आज के इस वैज्ञानिक युग में एक बढ़ी-चढ़ी मूर्खता जनसाधारण के मन में कुछ अधिक गहरी जड़ें जमाकर बैठ गयी है। कि ईश्वर के संबंध में ज्यादा माथापच्ची करने के बजाय उसकी किसी सिद्धांत रहित ऐसे भूतप्रेत के रूप में कल्पना कर ली जानी चाहिए। जो निशिदिन उपहार बटोरने और नाक रगड़ने वाले भक्तजनों के पीछे पड़ा रहता है। साथ ही पूजा-पाठ की छिटपुट टंट घंट कर देने भर से फूल कर कुप्पा हो जाता है और मन चाहे, उपहार वरदान बाँट कर हर किसी की मनोकामनाएँ पूरी करता है, भले ही वे कितनी ही अनावश्यक या अनुचित क्यों न हो।

इसके अतिरिक्त इस तथाकथित मनुष्य निर्मित “परमेश्वर” में एक और भी बुरी आदत है कि पूजा−पत्री में कोई छोटी-मोटी गलती हो जाय तो वह आग-बबूला हो जाता हो जाय और कल तक जिसे भक्त किसी दूसरे देवता की पूजा करने लगे तो उसकी भी अच्छी खासी सी खबर लेता है। ऐसे लोगों की इस ईश्वर के संबंध में भ्राँतिपूर्ण मान्यता है।

आज का सशक्त माना जाने वाला परमेश्वर यही है, जिसे जातियों, वर्गों कबीलों और महा मतान्तरों वाले लोग, अपने-अपने तरीके से खोजते और अपनी-अपनी मान्यता के अनुरूप नाम रूप देते हैं। इस काल भैरव से किसी का क्या भला होता है इसे तो पूजने वाले ही जानें, पर एक बात निश्चित है कि इन स्वयंभू देवी-देवताओं के स्वयंभू एजेंटों की पाँचों उंगलियां हर घड़ी घी में रहती हैं। वे मनोकामना पूरी करने अथवा गरीबी दूर कराने के बहाने हर स्थिति में अपना एजेंटों का धन्धा बढ़ाते चलते रहे हैं।

विचारणीय यह है कि क्या सिद्धांत रहित उपहार मनुहार को लालची और किसी भी चाटुकार की सही गलत मनोकामनाएँ पूरी करने वाला कोई परमेश्वर हो भी सकता है क्या? इस संदर्भ में किसी भी दृष्टिकोण से विचार करने पर उत्तर नहीं में ही देना पड़ता है, क्योंकि सिलसिला यदि चल पड़े तो रही बची विवेकशीलता और न्याय निष्ठा के तो परखच्चे ही उड़ जायेंगे।

ऐसे कबायली परमेश्वर को पूजने वाले ही मनोकामनाएँ परमेश्वर को पूजने वाले ही मनोकामनाएँ पूरी होने पर उसे सौगुनी गाली भी देते देखे गये है जिसमें कि आशाएँ लगाये रहने से पूर्व मित्रता करने और चमचागिरी दिखाने में अतिवाद की सीमा ताक पहुँच जाते हैं। इस भ्राँत मान्यताओं वाले जंजाल को ही यदि परमेश्वर माना जाय तो फिर इसी के साथ एक बात और भी जान लेनी चाहिए कि इसके पीछे वास्तविकता कुछ भी न होने से लाभ कुछ भी नहीं होने वाला है। अँधे के हाथों कभी बटेर लग जाय तो बात दूसरी है।

उपरोक्त को पढ़ने से संभवतः तथाकथित पूजापाठ करने वालों की मान्यताएँ डाँवाडोल हो सकती है। जो थोड़ी-बहुत आधे-अधूरे मन से टंट-घंट करते थे, उसमें भी कमी आ सकती है। भक्तिवाद की आड़ में यह मिथ्या भ्रम-जंजाल चलाते रहने वाले को तो अपने व्यवसाय में घाटा दीख पड़ते ही अनख होने में ऐसी स्थिति भी आ सकती है जो प्रतिपक्ष पर किसी भी स्तर का आक्रोश लेकर पिल पड़े।

किन्तु यथास्थिति न कर यह भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए कि धर्म क्षेत्र में रूढ़िवादिता अंधविश्वास-मूढ़मान्यताएं अंधविश्वास-मूढ़मान्यताएं तथा मानव मात्र में भाग्यवाद-पलायनवाद अथवा अकर्मण्यता की प्रमोद भरी असुरता अकर्मण्यता की प्रमोद भरी असुरता फैलाने वाला भ्रम जंजाल जब भी बढ़ता है, तब तब उस समाज की तत्कालीन सभ्यता का पराभव आरंभ हो जाता है। प्रत्यक्षतः आस्तिक दीखते हुए भी प्रच्छन्न नास्तिक जब इस परिमाण में बढ़ने लगते हैं। तो प्रतिक्रिया स्वरूप परसता के वास्तविक स्वरूप को समझाने-धर्म का परिशोधन, परिष्कार कर इसका आमूलचूल कायाकल्प करने वाला तंत्र भी स्वतः विकसित होने लगता है। ऐसा समय संधिकाल परिवर्तन काल-युगाँतरकारी चेतना का कार्यकाल माना जाता है। वैजानिक धर्म-तर्क सम्मत धर्म-प्रमाण एवं तथ्यों पर आधारित सांस्कृतिक मान्यताएँ जब समाज में स्वीकारी जाने लगें तो समझना चाहिए कि प्रज्ञा जाग्रत हो रही है एवं समूह चेतना को बदलने का प्रयास कर रही है। आज का समय कुछ ऐसा ही है।

हमें वस्तुस्थिति को रंगीन चश्मा हटाकर अपनी अंतःदृष्टि से देखना चाहिए एवं धर्म-संप्रदाय से देखना चाहिए एवं धर्म-संप्रदाय-संस्कृति के नाम पर फैले धर्माडंबर से मुक्ति पाने हेतु अब तत्पर हो जाना चाहिए। विचारक्रांति, संस्कृति चेतना का नवोन्मेष, देवसंस्कृति चेतना का नवोन्मेष, देवसंस्कृति दिग्विजय का पराक्रम सब इसी पुरुषार्थ के पर्यायवाची नाम हैं। लक्ष्य एक ही है दिग्भ्राँत प्रतिभा-प्रखर प्रज्ञा में बदले तथा समष्टिगत चेतना विकसित हो। परम सत्ता के सही रूप को समझे, व्यवहार में जीवन में उतारे ताकि मानवी गरिमा के अनुरूप आचरण शक्य हो सके। ऐसा अलभ्य अवसर जिसमें सब कुछ बदलने वाला है। बार-बार आने वाला नहीं है।

मनश्चेतना के उच्चस्तरीय आयाम

मानव मस्तिष्क को क्षमता असीम एवं अप्रत्याशित है। उसे समस्त शक्तियों, अतीन्द्रिय क्षमताओं का केन्द्र मात्रा गया है। उसका पूरा नियंत्रण सारे शरीर पर होता है। उसकी इच्छा से ही नाड़ी संस्थान काम करता है और ज्ञानतंतुओं के माध्यम से उसी का वर्चस्व छोटे से लेकर बड़े अंगों पर छाया रहता है। मस्तिष्क के अरबों बड़े अंगों पर छाया रहता है। मस्तिष्क के अरबों पर छाया रहता है। मस्तिष्क के अरबों स्नायु कोषों में रहता है। मस्तिष्क के अरबों स्नायु कोषों में से प्रत्येक की अपनी विशेषता, अपनी दुनिया और अपनी संभावनायें हैं। वे प्रायः अपना अभ्यस्त काम निपटने भर में दक्ष होते हैं। उनकी अधिकाँश क्षमता प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। काम न मिलने पर हर चीज निरर्थक रहती है। इसी प्रकार इन ज्ञान तंतुओं से-स्नायु कोषों से दैनिक जीवन की आवश्यकतायें पूरा कर सकने के लिए आवश्यक थोड़ा सा काम कर लिया जाता है, तो उतना ही करने में वे दक्ष रहते हैं। यदि अवसर मिला होता, उन्हें उभारा और प्रशिक्षित किया गया होता तो वे अबकी अपेक्षा लाखों गुनी क्षमता प्रदर्शित कर सके होते। इस रहस्य को यदि जाना-समझा जा सके तो अब की अपेक्षा मनुष्य हजारों गुनी अधिक विभूतियों से भरा पूरा हो सकता है।

हमारे मस्तिष्क के भीतर जिस ऊर्जा का सत्त निर्माण होता रहता है उसका क्रियाशीलता में उपयोग होना आवश्यक है, किन्तु जब उसकी क्रियाशीलता पर अंकुश लगाकर उसे अवरुद्ध कर दिया जाता है। तो उसके परिणाम अनेकानेक मनोरोगों के रूप में सामने आते हैं। इस संदर्भ में सुविख्यात मनोवेत्ता मैस्लो का कहना है कि किसी व्यक्ति विकास को अवरुद्ध करने से उसमें न्यूरोसिस जैसे रोग विकसित होते हैं। उनके अनुसार मस्तिष्क को स्वस्थ क्रियाशीलता के लक्ष्य को प्राप्त करने की चाह होता है और जब व्यक्ति को उस योग्य और उचित कार्य करने से वंचित किया जाती है तो न केवल उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता है, वरन् वह रोग का आकार ग्रहण कर लेता है। मस्तिष्कीय क्षमताएं कुँठित होने लगती है और वह व्यक्ति ऊब, निराशा, निष्क्रियता एवं अकर्मण्यता जैसी मनोविकृतियों की चपेट में जकड़ने लगता है। इसका विस्तार क्रमशः उसी प्रकार होता जाता है जिस प्रकार से कि एक तालाब के बंधे हुए जल पर काई का विस्तार होता है।

सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी एल्हुअस हक्सले ने मानव मस्तिष्क की संभावनाओं पर विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि मानवी मस्तिष्क अनेकानेक विभूतियों एवं क्षमताओं का भाण्डागार है। शरीर शास्त्री एवं चिकित्सा विज्ञानी अभी तक मात्र उनके स्नायुकोषों और ज्ञानतंतुओं का ही थोड़ा-बहुत आकलन कर भर पाये हैं, पर उन विशिष्ट क्षमताओं को नहीं खोज पाये है जो मस्तिष्क की अविज्ञात अचेतन परतों में छिपी दबी पड़ी है। उनके अनुसार मानव मस्तिष्क का एक भाग चेतन है तो दूसरा अचेतन जिसमें अतीन्द्रिय सामर्थ्य से लेकर मनुष्य के जन्म जन्मांतरों के भले-बुरे संस्कार दबे हुए रहते हैं। इस परत को सामान्यता देख नहीं जा सकता । इस परत को सामान्यता देखा नहीं जा सकता। इसी तरह उसका सर्वोच्च स्तर परम चेतन है इस परत तरह उसका सर्वोच्च स्तर परम चेतन हे जिसकी पिटारी में पराशक्तिओं का रुचिकर उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उनने बताया है कि आर्कविषप वाँटले ने पाँव वर्ष की आयु में ही परिकलन की एक असामान्य क्षमता का विकास कर लिया था। वह कठिन से कठिन गणितीय प्रश्नों को अपने को अपने मस्तिष्क में हल कर लिया करता था, किन्तु नौ वर्ष की आयु में उसमें इस क्षमता का पूर्णतः को मानसिक रूप से हल कर दिया करते थे जिनके उत्तर 36 अंकों तक हुआ वर्षों में ही खो दिया था। बेंजामिन-फ्रेंकलिन ने जब कि उसकी आयु छः वर्ष की ही थी, अपने पिता से पूछा था कि उसके जन्म का ठीक समय क्या है? उतर मिलने पर उसने मौखिक रूप से अपनी आयु की अवधि को सेकेंडों में रूपांतरित कर दिया था। इस गणना में दो लीप ईयर के हिसाब का भी ध्यान रखा गया था। इसी तरह की इतनी ही घटनायें सामने आती रहती है जिनमें पर्व जन्म की स्मृतियाँ भी सम्मिलित है।

अब प्रश्न उठता है कि एक छः वर्ष के बच्चे में इतनी क्षमता कैसे विकसित हो सकती है? इस प्रश्न के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि वह क्षमता उसमें पूर्व से ही विद्यमान है कि वह क्षमता उसमें पूर्व से ही विद्यमान थी, जो कि हम सब में भी विद्यमान है, किन्तु हम उसका उपयोग नहीं कर सकते। यही बात हमें मानसिक चेतना के उच्चस्तरीय आयामों के अस्तित्व में होने का बोध कराती है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे मस्तिष्क में कुछ ‘हायर सर्किट्स’ भी होते हैं। वाटले सफोर्ड, फ्रेंकलिन जैसे बच्चों का आकस्मिक रूप से इन सर्किटों से संबंध जुड़ गया था, रूप से इन सर्किटों से संबंध जुड़ गया था, किंतु जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ती गयी, वे जीवन की वास्तविक समस्याओं आवश्यकताओं के निकट पहुँचते गये और वह क्षमता लोप नहीं हो जाता, वरन् वह मानसिक चेतना की किन्हीं अज्ञात परतों में जा छिपती है। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए विश्वविख्यात, भौतिक विट् आइन्स्टीन ने कहा था कि जब वे एकाँत में शाँत चित होकर किसी विषय पर गहराई से उच्चस्तरीय गहन परतों में छिपे गूढ़तम सूत्रों की जानकारी हस्तगत हो जाती है।

भारतीय ऋषि मनीषियों ने आदिकाल से ही ऐसे उपाय-उपचार खोज लिये थे और कहा था कि योग, साधना, तप तथा एकाग्रता परक ध्यान की प्रक्रियाओं से मानव की मस्तिष्कीय क्षमताओं-मानसिक शक्तियों में असीम वृद्धि हो जाती है। इससे मस्तिष्क में लगता है जिससे मानसिक क्षमताओं का विकास स्वतः बढ़ जाता है। आज विज्ञान भी एक ऐसे कगार पर आ खड़ा हुआ है जहाँ पर मस्तिष्कीय विकास के विभिन्न पक्षों पर व्यापक शोध अद्भुत मानसिक आवश्यकता मात्र सी और विधेयात्मक दिशा देने की है।


Quotation

रेशम के कीड़े अपने लिए खोल बनाते और उसमें कैद रहकर दुर्भाग्य को कोसते हैं। गूलर के भुनगे उसी छोटे-दायरे में सिसका करते हैं। इसी तरह हम भी अपने घेरे में सिसकते हुए जीते और अनंत आनन्द गँवा बैठते हैं। —पं. श्री राम शर्मा आचार्या


पहला सुख निरोगी काया

शक्तियों में नीरोगता को पहली प्रत्यक्ष शक्ति माना गया है। नीरोग है वह रोटी कमाने से लेकर,विद्या पढ़ाने और कला-कौशल क्षेत्र में प्रवेश करने तक कहीं भी सफलता प्राप्त कर सकता है। जो रोगी है वह स्वयं तो कष्ट भुगतता ही है, अपनी सेवा परिचर्या में औरों को भी लगाये रहता है। यह अनुत्पादक श्रम है। इसमें मित्र कुटुंबी जो भी लगता है, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खीजता है। रोगी कमाता तो क्या है औषधि, पथ्य, परिचर्या आदि में दूसरों की शक्ति का उसके लिए नियोजन होता है। अस्वस्थ व्यक्ति का मन, मस्तिष्क, स्वभाव सभी अस्त−व्यस्त हो जाता है। वह कोई योजन बनाने और उसे सफल बनाने की स्थिति में भी नहीं रहता। अपने लिए और दूसरों के लिए भारभूत बन कर ही वह दिन गुजारता है। ऐसी जिन्दगी न अपने को प्रसन्नता देती है न दूसरों को। किसी से झगड़ा झंझट हो जाय तो प्रतिवाद करने ी सामर्थ्य भी नहीं होती। दबकर मन मार कर रहना पड़ता है। जो कमाऊ नहीं है, प्रसन्नता दे नहीं सकता, उसके प्रति दूसरों के मन में सम्मान भी नहीं रहता। इसलिए नीरोग रहना जीवन की प्रथम आवश्यकता मानी गई है। हर किसी को इसी स्थिति में रहना चाहिए। गरीब होते हुए भी यदि व्यक्ति नीरोग है तो अपनी प्रसन्नता बनाये रह सकता है और उसे दूसरों को भी बाँट सकता है।

नीरोग रहने के लिए क्या करना चाहिए? इसे लोग रहस्यमयी विधा समझते हुए भ्रांतियों में भटकते रहते हैं। वे बहुमूल्य दवाएँ खरीदते हैं, पौष्टिक खाद्य खरीदते हैं और जो भी बनता है करते हैं गुणी योगीजनों से राह पूछते हैं। इतने पर भी सुनिश्चित और चिरस्थायी आरोग्य किसी-किसी के ही हाथ आता है। यह तथ्य विरलों को ही विदित है कि स्वास्थ्य अति सरल है। नीरोग रहने के लिए ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता जो रहस्यमय है। केवल प्रकृति का अनुसरण करने वाले थोड़े से नियमों का पालन करने भर से इस प्रयोजन की पूर्ति बिना किसी कठिनाई के हो जाती है। बीमारी अस्वाभाविक है। इस असंयम की दुष्परिणाम भी कह सकते हैं। यह नियम बहुत नहीं है। थोड़े से ही हैं, जो सर्वविदित है।, सर्वसुलभ हैं, जिनका पालन करने में निभाने में-किसी को भी कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। मूर्खता या उद्दंडता वश मनुष्य इन्हें तोड़ता, बिगाड़ता है तो बीमारी चढ़ दौड़ती है। थोड़ा अपने ऊपर संयम रखा जाय। थोड़ी सावधानी बरती जाय तो बीमार होने का अभिशाप न भुगतना पड़े। यह नियम संयम भी ऐसे नहीं हैं, जिनके लिए योगाभ्यास जैसी कठिन प्रक्रिया रोज ही अपनानी पड़े।

स्वस्थ बने रहने के लिए जिन मर्यादाओं का पालन करना पड़ता है। वे मात्र पाँच हैं। इन्हें नीरोगता के पंचशील कह सकते हैं।(1) सात्विक भोजन (2)उपयुक्त (3) समय पर गहरी नींद (4) स्वच्छता (50) मन को हलका रखना। इन पाँच नियमों के पालन करने से स्वास्थ्य अक्षुण्ण बना रहता है। यदि किसी कारणवश बिगड़ गया है तो भूल सुधार लेने से प्रकृति क्षमा कर देती है ओर खोया हुआ स्वास्थ्य फिर वापस लौटा देती है।

सात्विक भोजन से तात्पर्य है बिना भूख के कभी न खाना। खाने की मात्रा इतनी सीमित रखनी चाहिए जिसमें आधा पेट आहार से भरे, चौथाई पानी के लिए और चौथाई हवा के लिए खाली रहे। आम तौर से लोग जायके के फेर में पड़कर आवश्यकता से प्रायः दूना खा जाते हैं। पीछे पेट की थैली चौड़ी की गई थैली, जब तक तन नहीं जाती, तब तक ऐसा लगता है मानों हम भूखे हैं। आमाशय आँतें जिगरी से रिसने वाला पाचक रस इतना कम होता है कि औसत खुराक की तुलना में प्रायः आधा ही पच सके। लोगों को यह भ्रम है कि ज्यादा खाया जायगा तो ज्यादा रक्त माँस बनेगा। ज्यादा ताकत आयेगी। लोग यह भूल जाते हैं कि जो पच सके वह अमृत और जो बिना पचा पेट में पड़ा रहे वह विष होता है।

खाने के संबंध में एक और बुरी आदत लोगों में पाई जाती है। जल्दी जल्दी बिना चबाए निगलना। यह भुला दिया जाता है कि जिस प्रकार पेट में पाचक रस निकलता है, उसी प्रकार मुँह के स्राव भी महत्वपूर्ण है। यदि पूरी तह भोजन के ग्रास को चबाया गया है। तो ही वे ठीक तरह पचेंगे अन्यथा दाँतों का काम आंतों को करना पड़ेगा और अपच उत्पन्न होगा।

क्या खाया जाय? इसका उत्तर एक शब्द में यह है कि हमारा खाद्य जीवित हों जीवित का अर्थ है उसे भुना तला न गया हो। यदि मजबूरी हो तो उसे उबाला भर जा सकता है। मिर्च मसाले, नामक, शक्कर की जितनी आवश्यकता है, उतनी फलों में, शाक भाजियों में होती है। ऊपर से जो मिलाया जाता है वह नुकसान के अतिरिक्त और कुछ नहीं करता। अत्र लेना आवश्यक हो तो उसे अंकुरित कर लेना चाहिए। यही जीवित खाद्य की व्याख्या। छिलके हटाकर बनायी दाल तथा बिना बोकर का आटा (मैदा) एक प्रकार से निर्जीव हो जाते हैं। छिलके में बहुमूल्य जीवन तत्व होते हैं। । उन्हें दलने उपराँत, भूनने तलने के बाद एक प्रकार से खाद्य का कोयला ही पेट में जाता तो वह साधारण होते हुए भी मेवा मिठाइयों की तुलना में कही अधिक पौष्टिक होगा। यही है खाद्य के सादे नियम। इनका पालन करते रहा जाये तो पेट कभी खराब न होगा और बीमारी से बचाव की आधी समस्या हल हो जायगी।

खाने के बाद पचाने के लिए श्रम की जरूरत है। अंग अवयवों को पुष्ट रखने के लिए शारीरिक श्रम की निताँत आवश्यकता है। पशु पक्षियों को अपना आहार जुटाने के लिए दिनभर भाग दौड़ करनी पड़ती है। यह व्यवस्था इसलिए है कि भोजन पचता रहे और भीतरी तथा बाहरी अवयवों को उस परिश्रम द्वारा मजबूती हस्तगत होती रहे। यदि वे मनुष्य की तरह आराम तलबी का जीवन बितायें, बैठे ठाले रहें तो न उनका भोजन पचे, न अंग अवयवों में पुष्टाई रहे। न अंग अवयवों में पुष्टाई रहे। मनुष्यों में अनेक अब बुद्धि जीवी बनते जाते हैं। मस्तिष्कीय काम लिखा पढ़ी रहते हैं। श्रम के अभाव में उनका पाचन तंत्र गड़बड़ा जाता है और हाथ पैरों से लेकर हृदय फेफड़े गुर्दे, जिगर आदि में कमजोरी घुसती जाती है। होना यह चाहिए कि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शारीरिक श्रम नियमित रूप से किया जाय। मानसिक श्रम में कोताही कदापि न हो। यही कारण है कि किसान, मजदूर जैसे श्रमजीवी शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ रहते हैं और बैठे ठाले समय गुजारने वाले, क्लर्क, मुनीम, वकील आदि अपना स्वास्थ्य गँवाते चले जाते हैं। न ठीक तरह भोजन पचता है न अन्य अवयवों की श्रम जन्य मजबूती हाथ लगती है। जिन्हें ऐसी परिस्थितियों में रहना पड़ता है। व्यायाम अपनाना चाहिए। तेज चलना तथा टहलना, मालिश, अंग संचालन के कोई तरीके ऐसे निकालने चाहिए, जिससे अंग अवयवों को पसीना निकाल देने वाला श्रम करने का अवसर मिल सके। ड्रिल के कई तरीके अंग संचालन की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध होते हैं। वयोवृद्धों को भी चारपाई पर पड़े-पड़े प्रत्येक अवयवों की उठाने, गिराने, फैलाने , सिकोड़ने का व्यायाम करना चाहिए। जो स्वयं यह करने की स्थिति में न हों उन्हें दूसरों की सहायता से यह फैलाने, सिकोड़ने की व्यायाम पद्धति अपनानी चाहिए। नियमित मालिश भी व्यायाम की आवश्यकता पूरी करती है। कमजोरों, बीमारों,वृद्धों का काम इससे भी चल सकता है।

इसके अतिरिक्त पूरे समय नींद लेने की आवश्यकता पूरी करनी चाहिए। मध्यम श्रेणी के आयु के व्यक्ति को सात आठ घटें सोना चाहिए। इसके लिए ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए जिसमें जल्दी सोने और जल्दी उठने का क्रम सतत् बना रहे। बहुत रात बीतने तक जागते रहना और सबेरे देर से उठना स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। जिन्हें रात में कम समय सोने को मिलें उन्हें दोपहर को नींद लेने का क्रम बनाना चाहिए। थकान को दूर करने के लिए नींद से बढ़कर और कोई खुराक नहीं है। रात में दिन में कुल मिलाकर कम सोना बुढ़ापा जल्दी बुलाने का ढंग है। कई व्यक्ति शौक मौज में गपबाजी में सिनेमा आदि देखने में रात का बहुत सा भाग गुजार देते हैं। ग्यारह बारह बजे तक सोने का तुक बिठाते हैं। देर तक दुकान खोले बैठे रहने वाले और घर आकर गरम रसोई की फरमाइश करने वाले घर की स्त्रियों का स्वास्थ्य चौपट कर देते हैं। जिन्हें देर में घर आना हो उन्हें गरम रोटी की फरमाइश नहीं करनी चाहिए। शाम को बना हुआ भोजन अपने लिए उठाकर रखना लेना चाहिए। उसी के काम चलाना चाहिए। ताकि इस कारण घर की स्त्रियों की देर तक जागना न पड़े। जिन घरों की स्त्रियों का स्वास्थ्य चौपट कर देते हैं। जिन्हें देर में घर आना हो उन्हें गरम रोटी की फरमाइश नहीं करनी उन्हें गरम रोटी की फरमाइश नहीं करनी चाहिए। शाम को बना हुआ भोजन अपने लिए उठाकर रखवा लेना चाहिए। उसी से चलाना चाहिए ताकि इस कारण घर की स्त्रियों को देर तक जागना न पड़े। जिन घरों की स्त्रियाँ देर से सोती और जल्दी उठती हैं, वे अनेक बीमारियों से घिर जाती हैं।

कभी-कभी सिर भारी होने ,कई दिन नींद अधूरी आने, पेट में कब्ज रहने, शरीर के किसी अंग में पीड़ा होने आदि कारणों से नींद अधूरी आती है। सपने दिखते रहते हैं। ऐसी अनिद्रा से मिलती जुलती स्थिति में भी आँखें बद करके चुपचाप पड़े रहना चाहिए। कोई विचार मस्तिष्क में चक्कर काटते रहने या ग्रंथि बनने पर भी अनिद्रा जैसी स्थिति बन जाती है। ऐसी दशा में विचार दिमाग में घूम रहा हो, उसे भिन्न प्रकार का विचार मस्तिष्क में लाना चाहिए। शरीर का विचार मस्तिष्क में लाना चाहिए। शरीर के अंग प्रत्यंगों को शिथिल करने का अभ्यास “शवासन” या शिथिलीकरण कहलाता है। अभ्यास किया जाय और यदि रात की नींद में विक्षेप पड़ रहा हो तो अंग शिथिल करने के अभ्यास का प्रयोग किया जाय। अपनी ओर से शक्ति भर प्रयत्न यही किया जाय कि सोने का समय जागने में न बीते। स्मरण रहे, दिन भर की शारीरिक और मानसिक थकान दूर करने के लिए नींद से बढ़कर और कोई उपचार नहीं है। उसमें जो भी विक्षेप पड़ते हों, उन्हें दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।

स्वास्थ्य की बिगाड़ने में एक कारण गंदगी है। शरीर, वस्त्र, घर उपकरण, आहार आदि के माध्यम से विषाणु शरीर में प्रवेश लगता है। पानी के बर्तन साफ सुथरे रहने चाहिए। कुएँ या नल से पानी निकालने के बाद उसे कई परत वाले कपड़े से छान लेना चाहिए। भोजन की सामग्री एवं पकाने के बर्तनों की सफाई भी आवश्यक है। छोटे-छोटे कीड़े मकोड़े खाद्य सामग्री में घूस जाते हैं। बारीकी से न देखा जाय तो वे दिखते भी नहीं। यह सभी स्वास्थ्य के शत्रु हैं। इसलिए इनसे बचने इन्हें हटाने का हर संभव उपाय करना चाहिए।

जिन स्थानों पर हवा का, धूप का आवागमन नहीं होता। ऐसे सीलन भरे स्थानों में भी रोग के कीटाणु पलते हैं। रहने के घर यथासंभव ऐसे होने चाहिए, जिनमें धूप और हवा का आवागमन होता रहे। मजबूरी हो तो ऐसे घरों को आग जलाकर गरम कर लेना चाहिए। कपड़े ढीले पहने जायँ, की आग जलाकर गरम कर लेना चाहिए। कपड़े ढीले पहने जायँ, कम पहने जायँ ताकि शरीर से धूप और हवा जो कपड़े रोज नहीं धोये जा सकते, उन्हें कड़ी धूप में कई घंटे नित्य सुखाना चाहिए। मुँह ढ़ककर सोने की आदत बुरी है। इससे साँस की गंदी हवा ही बार बार भीतर जाती है और जहरीले तत्व शरीर में बढ़ाती है।

स्वास्थ्य रक्षा का पांचवां आधार है विचार तंत्र। मस्तिष्क पर कुविचारों का अनावश्यक तनाव न पड़ने देना चाहिए। चिंता, क्रोध, आवेश,भय निराश आदि के हीन विचार जिस मस्तिष्क में जमा होते रहेंगे वह शरीर तंत्र का संचालक है। हृदय रक्त संचार करता है।, फेफड़े शुद्ध वायु को शरीर में पहुंचते हैं। ठीक इसी प्रकार प्रकार मस्तिष्क ज्ञान तंतुओं द्वारा समस्त अंग अवयवों पर शासन करता है। यदि मस्तिष्क उत्तेजित आवेश ग्रस्त रहेगा तो सारे शरीर पर उसका बुरा असर पड़ेगा। अनैतिक विचारों के संबंध में भी यही बात है। ईर्ष्या,डाह, चोरी-बेईमानी प्रतिशोध, आदि से दूसरों को हानि पहुँचाने वाले विचार भी ऐसे ही है। उनकी प्रतिक्रिया जीवन संतुलन पर तो बुरी होती ही है। साथ ही स्वास्थ्य को भी बिगाड़ती है। अनैतिक अथवा रहकर कोई व्यक्ति शरीर को स्वस्थ नहीं रख सकता। उत्तेजक विचारों विचारों में कामुकता प्रधान है। कितने ही लोग कामुकता प्रधान है। कितने ही लोग वासनात्मक कुकल्पनाएँ करते रहते हैं। काम सेवन का अवसर न मिलने पर भी जिस तिस के साथ कामसेवन-विलास की कल्पना करते रहते हैं। यह भी एक उत्तेजनात्मक प्रक्रिया है। इससे तनाव बढ़ता है। और मानसिक शक्तियों का बेतरह क्षरण होता है।

जिन्हें स्वस्थ रहना हो उन्हें मस्ती भरे दिन गुजारने चाहिए, हँसते-मुसकाते रहना चाहिए। प्रसन्न रहने की आदत न केवल स्वभाव को लोकप्रिय बनाती है, वरन् स्वास्थ्य को भी सुस्थिर-सुदृढ़ बनाये रहती है। मिल-जुलकर रहने, मिल−बांट कर खाने,हँसती-हँसाती जिन्दगी गुजारने से मनुष्य देखने में आकर्षक सुन्दर लगता है, लोकप्रिय बनता है। इतना ही नहीं, उसका स्वास्थ्य भी परिपुष्ट, नीरोग एवं दीर्घजीवी बना रहता है।

स्वास्थ्य को अच्छा बनाये रहने के उपरोक्त पाँच नियमों को यदि सतर्कता पूर्वक पालन किया जाय तो शरीर ऐसा बना रहेगा जिस पर दुर्बलता और रुग्णता का आक्रमण ही न हो सके। कदाचित् कोई व्यक्ति किसी कारण रुग्णता की चपेट में भी आ जाय तो इन पाँच नियमों का पालन करने पर अपने खोये हुए स्वास्थ्य को वापस लौटा सकेगा। यह प्रक्रिया के नियमों का परिपालन हैं जो जीव-जन्तु मनुष्य के शिकंजे में नहीं बंधे हैं, जिन्हें स्वेच्छापूर्वक जीवन जीने का अवसर मिलता है, उनमें से कदाचित् ही कोई बीमार पड़ता है। मौत बुढ़ापा तो स्वाभाविक है। पर बीमारी अस्वाभाविक है। यह तो प्रकृति के अनुशासन की अवज्ञा करने का दंड है। दंड का भाजन उसी को बनना पड़ेगा। जो करेगा। खुली हवा पक्षी तक सदा नीरोग रहते हैं। फिर बुद्धिमान कहे जाने वाले मनुष्य को आये दिन बीमारी का दंड भुगतान पड़े, इसका कारण जीवन के सरल नियमों को अवज्ञा करना भर है। यदि वह सही रास्ते पर चलें तो निश्चय ही नीरोग और दीर्घजीवी बना रह वह सब कुछ कर सकता है, जिसके लिए इस धरती पर वह आया है।


सेवा-साधना ही सर्वोपरि (Kahani)

शबरी यद्यपि जाति की भीलनी थी, किंतु उसके हृदय में भगवान् की सच्ची भक्ति भरी हुई थी। जहाँ वह रहती थी, वन में अनेक ऋषियों के आश्रम थे उसकी उन ऋषियों की सेवा करने और उनसे भगवान् कथा सुनने की इच्छा रहती थी। अनेक ऋषियों ने उसे नीच जाति की होने के कारण कथा सुनाना स्वीकार नहीं किया और दुत्कार दिया।

किन्तु इससे उसके हृदय में न कोई क्षोभ उत्पन्न हुआ और न निराशा। उसने ऋषियों की सेवा करने की एक युक्ति निकाल ली। वह प्रतिदिन ऋषियों के आश्रम से सरिता तक का प्रथा काटकर आश्रम से सामने रख देती। शबरी का यह क्रम महीनों चलता रहा, किंतु किसी ऋषि को यह पता न चला कि उनकी यह सेवा करने वाला है कौन? शबरी आधी रात रहे ही जा कर अपना काम पूरा कर आया करती थी।

उन्होंने एक रात जागकर पता लगा ही लिया कि यह वही भीलनी है, जिसे अनेक बार दुत्कार कर द्वार से भगाया जा चुका था। तपस्वियों ने अन्त्यज महिला की सेवा स्वीकार करने में परंपराओं पर आघात होते देखा और उसे उनके धर्म-कर्मों में किसी प्रकार भाग न लेने के लिए धमकाने लगे। मत ऋषि से यह न देखा गया। वे शबरी को अपनी कुटी में स्वयं ले गये और उन्हें सबसे पहले छाती से लगाया। शबरी की कुटी में स्वयं गये और उसका आतिथ्य स्वीकार किया। भगवान उन्हें ही सर्वाधिक प्यार करते हैं, जो तप साधना की आत्म प्रवंचना में न डूबे रहकर सेवा-साधना को सर्वोपरि मानते हैं।


शाँत रातों को बरसते हैं वहाँ, पत्थर

यह दृश्य जगत एक धुँधली छाया की तरह हैं इसकी मूलभूत सत्ता अदृश्य जगत में सन्निहित है छाया को समझने के लिए मेल सत्त को समझना अनिवार्य होता है इसके उपराँत प्रतिबिंब संबंधी ज्ञान अर्जित कर लेना कठिन नहीं रह जाता। आये दिन इस भौतिक जगत में कितने ही प्रकार की घटनाएँ घटती रहती है। इनमें से कई सहज लौकिक क्रिया-प्रतिक्रिया की परिणति होती है, जग कि अनेक परोक्ष संसार से संबंध रखती है। लौकिक घटनाएं तो आसानी से ज्ञेय होती हे, पर अलौकिक घटनाक्रमों के सूत्र संकेत समझ पाने में हमारी बुद्धि असहाय बनी रहती है। उसकी असमर्थता तब और बढ़ जाती है, जग मस्तिष्क को भ्रमाने वाले प्रकरण सामने आते हैं। ऐसे ही एक प्रसंग की चर्चा विलियम जी0 रॉल ने अपनी पुस्तक “दि पोल्टरंगाइस्ट” में की है। वे लिखते हैं कि सन् 1927 में एक बार मूर्द्धन्य लेखक और प्रकृति विद् इवान सैडरसन ने रबड़ की खेती देचाने सुमात्रा (इंडोनेशिया) की यात्रा की। जब वहाँ पहुँचे, तब धुंधलका घिर चुका था। स्नानादि से निवृत्त होने के उपराँत अतिथि और सभी रात्रि भोजन के पश्चात् सब बरामदे में आये। अभी वहाँ बैठे हुए कुछ ही क्षण बीते होंगे कि अचानक बरामदे की छत पर पत्थरों की बौछार होने लगी। सैडरसन चूँकि उस अतिथि के यहाँ पहली बार गये थे, अतः उक्त घटना से वे हतप्रभ रह गये। बाद में मेलबान ने बताया कि यह यहाँ की सामान्य बात है। वे इसके अभ्यस्त हो चुके है ओर निर्भय भी। उनका कहना था कि रात में यहाँ अक्सर यह घटना घटती देखी जाती है। बौछार प्रायः उन्हीं रातों को होती है, आमतौर पर शाँत होती है। आँधी, तूफान वाली रातों में यह अनहोनी नहीं होती। गहन अँधेरा अथवा चाँदनी वाली रात्रि से भी इसका कोई संबंध नहीं। यह कौतुक खिली चाँदनी अथवा सघन तमिस्रा चाहे किसी में भी हो सकता है। इतना बताने के बाद उन्होंने सैडरसन को एक सलाह दी, कहा-आप इन पत्थरों को बटोर कर उन्हें चिह्नित कर दें’ पहचान के लिए उन पर निशान लगा लें और फिर उन्हें घर के बाहर, वाटिका में अथवा सघन वृक्षावलियों वाले रबड़ के खेतों में कही भी फेंक दें, वे पुनः आपे पास वापस आ जायेंगे। सैडरसन को यह बात कुछ अविश्वसनीय-सी लगी। अविश्वास का कारण भी मौजूद था। उनके मस्तिष्क में यह बात किसी कदर नहीं बैठ पा रही थी कि रबड़ के सघन खेतों में फेंके गये छोटे पत्थरों को कोई किस भाँति ढूंढ़ कर वापस कर सकता है, सो उन्होंने संदेह प्रकट किया, तो मित्र ने परीक्षा कर लेने का परामर्श दिया और पेन्सिल, स्याही एवं कुछ रंग सामने रख दिये। सभी ने मिल कर उन पत्थरों को एकत्रित किया और उन पर तरह तरह की डिजाइन बनाने लगे। कुछ पर नंबर डाल दिये, कुछ को रंग डाला। यह कार्य पूरा होने के उपराँत सभी ने मिलकर उन्हें फेंकना आरंभ किया। कुछ पत्थर दूर रबड़ के घने खेतों में फेंके गये, कुछ को मकान के बाहर थोड़ी ही दूरी पर डाल दिया गया, कुछ उद्यान में ऐसे ही पटक दिये गये। सैडरसन के आश्चर्य का तब ठिकाना न रहा, जग कुछ ही पल में अधिकाँश पत्थर बरामदे की छत पर बरस पड़े। उनने जाकर देखा, तो पाया कि छत पर जिन पत्थरों की बरसात हुई थी, से सभी उनके द्वारा फेंके गये चिह्नित प्रस्तर टुकड़े ही थे। उस रात घटना की सूक्ष्मता पूर्वक जाँच करने के उपराँत सैण्डरसन ने अंत में कहा कि यह कोई मानवीय प्रयास नहीं हो सकता। यह लोकोत्तर सत्ता का स्पष्ट प्रमाण है, किन्तु उसकी चेष्टा के पीछे छिपे रहस्यों को स्थूल जाँच पड़तालों द्वारा नहीं जाना जा सकता। इसके लिए स्वयं को सूक्ष्म बनाना और सूक्ष्म लोक में गति रखने वाला सामर्थ्य अर्जित करना अपरिहार्य है, तभी ऐसी अद्भुतताओं का सही कारण ढूंढ़ा और समाधान पाया जा सकता है। किंतु देखा गया है कि ऐसे प्रसंगों में हम प्रायः स्थूल में उलझ कर रह जाते हैं और उसी में उसके वास्तविक कारण की तलाश करते रहते हैं। भूल यहां हो जाती है, अतः कठिन प्रयास के बावजूद प्रयत्न निष्फल रह जाते हैं, जबकि स्थूल का निमित्त सूक्ष्म है ओर व्यक्त क्रियाविधि अव्यक्त पर आधारित है। गोचर सत्ता को समझने के लिए अगोचर अस्तित्व को जानना जरूरी है। आज व्यतिक्रम यह हो गया है कि हम पहले दृश्य को समझना चाहते हैं, फिर अदृश्य की ओर आगे बढ़ते हैं। सारी गड़बड़ इस उलटबाँसी के कारण ही है। होना यह चाहिए कि पहले परोक्ष का अन्वेषण किया जाय तत्पश्चात् प्रत्यक्ष को समझने में कठिनाई हो नहीं सकती।


Quotation

हम ईश्वर के बनें, उसके लिए जिएँ। अपने को इच्छा और कामनाओं से खाली कर दें। उसकी इच्छा और प्रेरणा के आधार पर चलने के लिए समर्पण कर दें, तो परमेश्वर को अपने कण-कण में लिपटा हुआ, अनंत-आनंद की वर्षा करता हुआ पा सकेंगे।

-पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य


भगवान दत्तात्रेय की तरह इन्हें गुरु बनाकर तो देखें

मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना जात है। उसकी श्रेष्ठता का आधार अन्य प्राणियों की तुलना में नीति, सदाचार, धर्म, परोपकार एवं उदार सेवा- सहकारिता की भावनायें ही तो है। यदि मनुष्य ने इन्हें सुविकसित न किया तो उसमें और पशुओं में क्या अंतर रह सकता है। तब मनुष्य भी बिना सींग और पूँछ का पशु ही माना जायगा। सेवा-सहयोग की-सहकार की -प्रवृत्तियां तो ऐसी है जो विभिन्न पशु-पक्षियों में भी पायी जाती है। सूझ-बूझ उनमें भी है, अंतर केवल इतना है कि जहाँ मनुष्य ने बुद्धि के कारण इन्हें विकसित करने में सफलता अर्जित की, वही पशु-पक्षी अपने आदिम वर्ग की उसी श्रेणी में बने रहे जिनमें वे कभी जन्में थे। मनुष्य के लिए यह कलंक की ही बात मानी जायगी कि जग तुच्छ समझ जाने वाले पशु-पक्षियों में परोपकार, नैतिकता सदाचार ओर सहकार के सद्गुण मिलते हो और मनुष्य अनैतिकता की ओर बढ़ता जा रहा हों यदि कहाँ ईश्वर ने मनुष्यों की तरह इन जीव-जंतुओं को भी सोचने के लिए बुद्धि और विचार करने के संयंत्र प्रदान किये होते तो वे सेवा-सहायता एवं नैतिकता जैसे सद्गुणों की होड़ में मनुष्यों से भी कही आगे बढ़ गये होते। अनुसंधानकर्ता प्राण शास्त्रियों ने अपने अध्ययन में पाया है कि पशुओं में प्रगाढ़ मित्रता होती है और सामयिक व्यवधान आने पर भले ही कुछ समय के लिए टूट जाये, किंतु पुनः पहले जैसी मित्रता हो जाती है। उनमें गाठें नहीं पड़ती और न उनमें मनुष्यों के बीच लंबे समय तक चलने वाले ईर्ष्या, द्वेष, एवं मनोमालिन्य जैसी कोई बात होती है। फ्लोरिडा के वैज्ञानिक ने अपने एक अध्ययन में बताया है कि दो नर डाल्फिनों में गहरी दोस्ती थी। दोनों साथ रहते और समुद्र में तैरते थे, किंतु इसी बीच एक तीसरी मादा डाल्फिन उनके बीच आयी। उसे कौन अपनी ओर आकर्षित करे? उस मादा के ध्यानाकर्षण हेतु दोनों में अरसे तक एक दूसरे के प्रति प्राणघाती प्रतिद्वन्द्विता चलती रही। इस घटना के पटाक्षेप होने के पश्चात् जग वे दोनों डाल्फिन फिर मिले तो एक दूसरे को न केवल पहचानने लगे वरन् पुनः पहले जैसी दोनों की घनिष्ठ मित्रता हो गयी। दोनों साथ-साथ खेलने और तैरने लगे, मानों बीच में कुछ हुआ ही न हो। त्याग संसार का सर्वोपरि धर्म है जिस पर समस्त सृष्टि क्रम चल रही हैं। लेने और देने, पाने और छोड़ने के विश्व नियम को जो प्राणी जितना आत्मसात् कर सका, वह उतना ही विकसित हो पाया। त्याग और सहयोग का विधान अपार शक्तिशाली है, वह सब पर लागू होता है। स्वेच्छा से किया जाने वाला त्याग संतोष और शाँति प्रदान करता है। एक का त्याग दूसरे की प्राप्ति का वरदान है। जो त्याग नहीं कर सकता उससे प्राप्त करने का अधिकार छिन जाता है। पशु-पक्षी भी अपनी सीमित सामर्थ्य और योग्यता के आधार पर अपने संगी-साथियों, विपत्ति ग्रस्तों की सेवा सहायता करते पाये गये है। प्रकृति - वर्णन कारी सुविख्यात जीव विज्ञानी रिजबेक ने अपने कृति में सेवाभावी सिंहों का वर्णन किया है उनके अनुसार एक वयस्क सिंह का कन्धा बुरी तरह जख्मी हो गया था। शिकार करना तो दूर की बात, उससे उठा भी नहीं जा रही था, किंतु उसकी प्राणरक्षा साथ रहने वाले एक दूसरे सिंह ने की। वह उस घायल साथी के लिए तब तक शिकार लाता रहा जब तक कि वह स्वस्थ समर्थ नहीं हो गया।आज प्रगति की अंधी दौड़ में दूसरों को धक्का देकर आगे निकलने की होड़ में ही हर कोई मानव व्यस्त दिखायी देता है। दुष्टता और दुराचार की प्रवृत्तियां अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गयी है, ऐसी स्थिति में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्रणी कैसे कहा जा सकता है? सृष्टि के सारे जीव-जंतु एक ही ईश्वर की संतानें है, फिर क्यों न इन छोटे-छोटे प्राणियों से सेवा-सहयोग की शिक्षायें सीखकर अपने जीवन में उतारने का हम भी प्रयत्न करे। सुप्रसिद्ध जीवविज्ञानी

डब्ल्यू0 एच॰ थार्प के अनुसार मादा डाल्फिन अपना प्रसव एकाँत में करती हे,किंतु यदि बंदी अवस्था में उसे प्रसव करना ही पड़े तो उसकी सहेलियाँ इस आपत्ति में उसकी रक्षक बनती है, क्योंकि प्रसव करती हुई मादा को देखकर नर डाल्फिन मरने - मारने पर उतारू हो जाता है। उसकी उत्तेजना से मादा को बचाने के लिए कई मादायें एकत्र होकर एक मजबूत रक्षा कवच बना लेती हैं जिसका बेधन कर सकता नर के बूते से बाहर होता है। जच्चा-बच्चा दोनों की देख-रेख मादा डाल्फिन ही किया करती है। नवजात शिशु केवल जन्म देने वाली माँ का ही नहीं, वरन् सबका बच्चा माना जाता है। जब नवजात शिशु पहली बार साँस लेने जल की सतह पर आता है तो माता के साथ तैरने वाली दूसरी मादायें ठीक बच्चे के नीचे इस प्रकार से तैरती है मानों वह उसे बचाने की पूरी-पूरी तैयारी में ही तैर रही हो। यह सुरक्षा क्रम तब तक चलता है जब तक बच्चा स्वयं तैरना नहीं सीख जाता। औजारों का प्रयोग करना ओर उन्हें सुरक्षित रखना मनुष्य ही नहीं, पशु भी जानते हैं। कैलीफोर्निया का ऊदबिलाव विचित्र ढंग से शिकार करता है। यह घोंघे जैसे कड़े आवरण वाले समुद्री जीवों का शिकार करता है इनके कठोर आवरण को हटाने में उसे पत्थर से तोड़ना पड़ता है । समुद्र तट पर घूमते हुए ज्यों ही उसकी नजर घोंघे तोड़ने के अपने काम लायक किसी पत्थर पर पड़ी, वह उसे उठा लेता है और उसे लेकर सीने से सटाते हुए गहरे पानी में गोता लगाता है। जग शिकार सहित पानी से बाहर आता है तब उसी पत्थर से ठोंक-पीट कर अपना खाद्य खा लेता है। अखाद्य आवरण आदि को फेंक देता है। किंतु पत्थर को पकड़े दुबारा डुबकी लगाता है और नये खा? को पुराने पत्थर से तब तक चुनता और खाता रहता हे जब तक उसका पेट नहीं भर जाता। इतनी समझदारी उसमें है। व्यक्ति चाहे सज्जन हो या दुर्जन, भले या बुरे किसी भी कार्य को संपन्न कर सकने में हर मनुष्य को संतुलित व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है। दुर्जन व्यक्ति को दृष्टि से गये-गुजरे होते हैं परिणाम स्वरूप सहा असंतुलित ही बने रहती हे और तद्नुरूप ही उनके कार्य भी होते हैं संघर्षों में भी जो जितना संतुलित रह सका, वह अपने लक्ष्य की ओर उतना ही अग्रसर हो सकेगा। व्यक्ति को अपनी मनःस्थिति योगी की बनानी होती है उसे स्मरण रखना पड़ता है कि वह विश्व रंगमंच पर एक कलाकार की भूमिका संपादित कर रहा है। उसकी मनोदशा एक खिलाड़ी समय आक्रामक भले ही दीख पड़ते हैं किंतु उनका उद्देश्य खेल ही होता है। वे खेल में न तो विपक्षी को मारते हैं और न चोट पहुँचाने का प्रयास ही करते हैं जबकि चोल में वे गुत्थमगुत्था तक हो जाते हैं, भागते, लकुकते-छिपते, चिल्लाते, मर्राते और एक दूसरे पर दाँत पंजा चलाने दिखाई पड़ते हैं। पशुओं का गया गुजरा भले ही माना जाता हो, किंतु उनके गुणों का लोहा तो हमें मानना ही पड़ेगा। ‘स्वामिभक्त’ एवं ‘वफादार’ शब्द सुनते हो वरवश कुत्तों की सुकृति ही आती है। जो कुत्ता अपने पालनकर्ता के फेंके गये चंद टुकड़ों पर जिंदगी बसर कर रहा हो, समय आने पर अपने प्राणों का मोह लेकर वह कहाँ कर्तव्यच्युत होता है? ऐसे अनेकों गुण है जिनमें मनुष्येत्तर प्राणी हमसे कही आगे है। उन्हें प्रकृति ने ऐसी सूझबूझ दी है कि बिना किसी शिक्षा-दीक्षा के इतना सुन्दर सुव्यवस्थित जीवन यापन करते हैं कि उनकी सुरुचि, अनुशासनशीलता, साहसिकता, बुद्धिमता और अतीन्द्रिय सामर्थ्य पर आश्चर्यचकित रह जाता पड़ता है। नकुल-नेवला परिवार का एक सदस्य है मीरकैट, जिसे “स्टिकटेल्स” या लकड़पुच्छा के नाम से भी जाना जाता है, अपने पारस्परिक स्नेह सद्भाव एवं साहसिक कारनामों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल में रहने वाला यह प्राणी जीवन की तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी उत्साह और उमंगों के बलबूते अपने अस्तित्व को बनाये हुए है उसका सामूहिक जीवन मनुष्य के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है। प्राणि विशेषज्ञों के अनुसार इन प्राणियों का जीवनक्रम स्वार्थपरता का नहीं परमार्थ परायणता का होता है। ‘जियो और जीने दो’ तथा मिल−बांट कर खाने समुदाय के हर प्राणी के रोम-रोम में रम चुका है। भोजन को वे कभी अकेले ही नहीं चट कर जाते, वरन् अन्य स्वजनों को साथ लेकर मिल−बांट कर ही खाते हैं। अपने लिए कठोर और दूसरों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण रखने में ही उन्हें जीवन की सार्थकता नजर आती है। कोई भी मीरकैट जब कभी किसी संकटग्रस्त परिस्थितियों में फँस जाता है तो वे आपस में मिल-जुलकर उसका साहस के साथ सामना करते और उससे बच निकलने में समर्थ होते हैं। मादा जब गर्भकाल से गुजर रही होती है तो अन्य सक्षम सदस्य उसकी आहार व्यवस्था जुटाते और सुरक्षा आदि का प्रबंध पूरी तरह करते पाये गये है। उनकी एकता, समता, सहिष्णुता और साहसिकता की भावनायें मनुष्य से कही अधिक बढ़ चढ़कर पायी जाती है। आततायियों के प्रतिरोध-आक्रोश की भावना केवल मनुष्यों में ही नहीं पायी जाती, वरन् प्रकृति जगत के ये नन्हे से सूरमा भी अनीति का डटकर मुकाबला करते हैं। सामान्यतः कमजोर जानवर ताकतवर जानवर से भयभीत हो जाते हैं और डर कर या तो भाग जाते हैं अथवा आत्म समर्पण कर देते हैं, परन्तु मीरकैट ऐसी परिस्थितियों में गजब की साहसिकता और समझदारी का परिचय देते हुए आततायी का डटकर मुकाबला करते हैं। तब कोई भी सबल आक्रान्त उन पर आक्रमण करने को उतारू होते हैं तो वे सभी एक जुट होकर उस पर टूट पड़ते हैं। घेराव की स्थिति में वे एक दूसरे से सटकर खड़े हो जाते हे और आक्रमणकारी पर एक साथ झपट्टा मारते और उसे खदेड़ कर ही छोड़ते हैं। शरीर बल के धनी नर-नकुल अपने छोटे-छोटे परिजनों की रक्षा हेतु पंक्ति के दोनों छोरों पर सदा तैनात मिलेंगे। यदि सेना की भाँति एकत्रित और संगठित न रहे होते तो संभवतः कुछ की दिनों में उनका अस्तित्व कब का समाप्त हो गया होता। लेकिन सहयोग और सामूहिकता की प्रवृत्ति के कारण वे क्षुद्र होते हुए भी सुरक्षित और व्यवस्थित जिंदगी जीते हैं और उनका अस्तित्व भी उतना ही सुरक्षित बना हुआ है। प्रकृति ने सभी प्राणियों की भावनाशील और कर्तव्य परायण बनाया है। हर प्राणी को उसकी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप ऐसे साधन दिये हैं जिनका वे भरपूर उपयोग करते और हँसी खुशी का जीवन जीते हैं यदि चतुरता का दंभ भरने वाला मनुष्य भी इन छोटे-छोटे प्राणियों से कुछ शिक्षा और प्रेरणा ग्रहण कर सके तो उसके सभी सांसारिक विग्रह देखते-देखते दूर हो जायँ।


क्रिया नहीं, भाव को देखो

अपनी सहज संकरुण दृष्टि डालते हुए तथागत भगवान बुद्ध ने पूछा- ”बिंबिसार! स्वस्थ तो है न ? प्रजा को कोई कष्ट तो नहीं ? पाटिल- पुत्र पर गंगा का प्रकोप बढ़ रहा था, वह रुक गया या नहीं? “ और बिंबिसार तब तक मौन थे, जब तक उन्होंने तथागत को प्रणिपात नहीं कर लिया। चरण धूलि मस्तक पर लगाकर भगवान बुद्ध के समीप ही एक ओर बैठ गए। बैठते हुए तथागत के प्रश्नों का उत्तर भी दे डाला-” भगवन्! आपकी चरण रज जिस मस्तक पर कृपा बरसाए उसके अमंगल की कामना तो भगवान इन्द्र भी नहीं कर सकते। हम स्वस्थ हैं, प्रजा सुखी है, बाढ़ का जल राजधानी की सीमा रेखाओं का स्पर्श छोड़कर पीछे लौट गया। सब ठीक है किंतु........... ।” उससे आगे कुछ कहते कहते वे एकाएक रुक गया। संभवतः उन्हें बात सर्व साधारण के समक्ष व्यक्त करने में संकोच हो रहा था। “कहो-कहो! बिंबिसार तुम्हारी व्यग्रता का कारण क्या है? कौन सी समस्या है, जिसने पाटिल पुत्र नरेश को विस्मय में डाला है बोलो, कुछ संकोच हो रहा हो तो एकाँत की व्यवस्था की जाये।” उपस्थित भिक्षु-भिक्षुणियों एवं सुदूर गणराज्यों से पधारे धर्म तत्व जिज्ञासुओं पर अपनी दृष्टि दौड़ाते हुए सम्राट बिंबिसार ने अपनी संपूर्ण दृष्टि भगवान बुद्ध पर डाली और विनरत भाव से कहने लगे - “नहीं देव! ऐसी तो कोई बात नहीं पर जो कुछ हुआ, वह ऐसा भी नहीं जिस पर विचार न किया जाय। भगवन्! पाटलिपुत्र अपने नागरिकों की चरित्र निष्ठा के लिए दूर-दूर तक विख्यात है। यहाँ की कुलबधुएँ अपने शील वैभव की सब प्रकार से रक्षा करती है। इस देश में उच्छृंखलता का कही भी नाम निशान तक नहीं है । त्यागी, तपस्वियों, विद्वानों और तत्वदर्शी सिद्ध-पुरुषों का अभाव भी नहीं हैं। पर जो कार्य किसी महान धर्म-निष्ठ को पूरा करना चाहिए था, उसे शील सदाचार से सर्वथा रहित कोई नगर वधू-करे इस विस्मय का समाधान नहीं हो पाता। इसी कारण आज आपकी सेवा में उपस्थित हुए है।” “ अभी तुम्हारी पूरी बात समझ में नहीं आई सम्राट! हुआ क्या है वह’ विस्तार से कहो “ भगवान बुद्ध ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा। सम्राट कहने लगे- “ भगवन्! तीन दिन पूर्व भगवती भागीरथी ने अपना प्रचंड रूप धारण किया नगर कोट की रक्षण दीवार ही नहीं प्रधान दुर्ग का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया। ऐसा लगता था वे इस बार संपूर्ण नगर को अपने जल आक्रोश में डुबो कर ही छोड़ेंगे। घरों में पानी भरने लगा 1 गायों बछड़ों के लिए सूखा स्थान नहीं रहा। विकट परिस्थिति की आशंका से सभी लोग काँप गए। तब राष्ट्रध्वज के नाते मेरा दायित्व था कि उस संकट से बचाने का कुछ उपाय करूं। मैंने सभा सचिव से विस्तार से विचार विमर्श किया । पाटिल पुत्र में जो भी धर्म-निष्ठ एवं विचारशील लोग थे, सब की गोष्ठी बुलाई। लोगों ने बाढ़ के प्रकोप से बचने के लिए अपनी-अपनी तरह के सुझाव दिये। यज्ञ,जप,तप साधन व्रत और उपवास भी किए गए।पर जल राशि सुरसा के शरीर की तरह बढ़ती ही गई। कोई उपाय कारगर न हुआ। महा आश्चर्य-महाभाग कि उस संकट की घड़ी में बल कोई उपाय पाटलिपुत्र की रक्षा करने में समर्थ न हुए तो एक अनिंद्य सुन्दरी नगर वधू वहाँ आ पहुँची। सुन्दर सा नाम है उसका लोग उसे ब्रिदुमती के नाम से पुकारते हैं। नगर के धन संपन्न काम लोलुप व्यक्तियों की वासना-तृष्णा पूर्ति ही उसकी आजीविका का माध्यम है। उसने जीवन में कभी तप नहीं किया, माला नहीं फेरी यहाँ तक कि उसने चरित्र-निष्ठा, शील और सदाचार का महत्व भी नहीं समझा पर उसने तो धर्म तत्व चेताओं के संपूर्ण ऐश्वर्य पर पानी फेर दिया। भगवती गंगा के सम्मुख खड़ी होकर उसने अनंत जल राशि की आरती उतारी, मैंने उसे एक क्षण के लिए ही ध्यान मुद्रा में देखा, इसके बाद जो कुछ हुआ, मुख पर लाते हुए भी लज्जा आती है, देव ।

हजारोँ लोगों की भीड़ के सामने उसने भगवान सूर्यदेव और आकारु को साक्षी बनाया और अश्रुपूरित गदगद अगरा में बोली -” भगवती गंगा! यदि मैंने संपूर्ण जीव अपने कर्तव्य का पालन निष्ठा भाव से किया हो तो अब अपनी जलराशि समेट लो और मेरे देशवासियों को चैन की साँस लेने दो।”“ भगवन्! एक बूँद तीन बूँद -बूंदों की अविरल झड़ी लग गयी। उसकी आंखों बरसती रही, उस खारे जल ने मंदाकिनी को पवित्र जलधारा का स्पर्श मात्र किया था कि इनका प्रकोप अपने आप घट चला। देखते - देखने गंगा ने अनधिकृत प्रदेश से अपना अंबुआलोड़ खींच लिया और अपनी चिर धारा में वेगवती हो उठी। योगी, सिद्धों और धर्म तत्व वेत्ताओं की यह असमर्थता और शील रहित नगर वधू की विजय ऐसा लगता है देव! कहाँ प्रजा भ्रम में न पड़ जाए। लोग धार्मिक मर्यादाओं की अवहेलना न करने लगें। यही मेरी चिंता का कारण है। भगवान ‘बुद्ध मुस्कराए, उन्होंने कोई उत्तर या समाधान नहीं दिया। प्रिय शिष्य आनन्द को समीप बुलाकर कान में कुछ कहा और उस दिन की धर्म सभा विसर्जित कर दी । महाराज बिंबिसार के आतिथ्य की संपूर्ण व्यवस्था करने के उपरांत आनन्द कुछ भिक्षुओं के साथ पाटलिपुत्र की ओर जाते दिखाई भगवान बुद्ध इस समस्या का क्या उत्तर देते हैं यह जानने की सभी को प्रबल जिज्ञासा थी। इसलिए रात सबने बेचैनी और प्रतीक्षा में व्यतीत की।प्रातः काल हुआ, देवी उषा के आगमन होते ही कड़ चीवरधारी भिक्षु आश्रम की व्यवस्था में जुट गए। ऐसा लगता था, जैसे आज कोई बड़े धर्मोत्सव की तैयारी की जा रही हो। सभी अपनी दैनिक उपासनाएं कर सभा कक्ष में जुड़ने लगे। थोड़ी देर में सभा भवन पूरी तरह भर गया। सम्राट महात्मा बुद्ध के समीप बैठे। एक भिक्षु ने सूचना दी आनन्द पाटलिपुत्र से आ गए है, नगर बिंदुमती उसके साथ ही है। सम्राट चौंके पर इससे पूर्व वे कुछ पूछें, भिक्षु भगवान बुद्ध का संकेत पाकर बाहर निकल गया। थोड़ी ही देर में शिष्य आनन्द के साथ बिंदुमती ने उस सभा मंडप में प्रवेश किया। उसका सौंदर्य उतना आकर्षक नहीं था, जितना स्वाभिमान । जीवन भर लोगों की वासना की पूर्ति करने वाली नारी के मुख मंडल पर भी इस प्रकार का संतोष गंभीरता से कम न थी। भगवान बुद्ध ने उसका स्वागत ठीक उसी तरह किया, जिस, प्रकार श्वसुर ग्रह से लौटी हुई पुत्री का स्वागत एक पिता भरे हुए हृदय से करता है। तथागत की आज्ञा से बिंदुमती उनके पास ही बैठी। सारी सभा में सन्नाटा छाया हुआ था। भगवान तथागत ने एक बार सारे सभासदों की ओर अध्ययन दृष्टि से देखा और फिर अत्यंत करुणा भरी दृष्टि से बिंदुमती की ओर देखते हुए कहा-”पुत्री। यहाँ के नागरिकों और स्वयं सम्राट तक की विस्मय है कि तु भ्रष्ट, वासना-लोलुप और दूसरों का धन हरण करने वाली वेश्या है। तुझ में वह कौन सी शक्ति थी, जिसने गंगा को भी अपनी बाढ़ समेटने को विवश कर दिया। मैं तो जानता हूँ किंतु ये नहीं जानते । तू इन्हें बता दे।” बिंदुमती ने एक बार तथागत के चरणों पर दृष्टिपात किया और एक शक्ति सी अनुभव करती हुई बोली-” वह मेरी नहीं कर्तव्य निष्ठा की शक्ति थी” बिंबिसार ने पूछा -” कर्तव्य निष्ठा की शक्ति तुझ जैसी वेश्या में कैसे सम्भव है?” बिंदुमती बोली “ महाराज । मैंने अपनी आजीविका के लिए अपने शरीर का व्यापार किया है, वासना के लिए नहीं और अपने कर्तव्य का पालन पूर्ण निष्ठा के साथ किया । धनी, निर्धन, ब्राह्मण शुद्र का भेदभाव किए बिना मैंने प्रत्येक ग्राहक को संतुष्ट किया है जिसका धन लिया उसके साथ विश्वासघात नहीं किया परन्तु उसकी इच्छा से कुछ अधिक ही संतोष उसे प्रदान किया। यही मेरी सत्य निष्ठा है। जिसने पुण्यतोया गंगा को भी प्रभावित किया।” और इससे पूर्व भगवान बुद्ध कुछ कहें सम्राट बिंबिसार गौतम बुद्ध के चरणों पर जा गिरे और बोले “ भद्रे का कथन सत्य है। भगवन् मेरी आंखों अब खुल गयी है। निश्चय ही अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करने से बड़ा और कोई धर्म नहीं है।


धर्म का प्रयोजन (Kahani)

विलासिता और सुख-साधनों के बीच रह कर वह प्रयोजन पूरा नहीं होता, जो इस आश्रम में प्रवेश करने वालों से अपेक्षित हैं एक राजा किसी ऋषि की हिमालय गुफा में जाकर शिष्य हो गया। उसने शिष्यों समेत अपने यहाँ पधारने का आमंत्रण दिया। सुविधानुसार सभी वहाँ पहुँचे। आहार-विहार में शिष्यों का मन लग गया। वे लंबी अवधि तक वहाँ रहने को तैयार हो गये। पर ऋषि दिन-दिन दुर्बल होने लगे। रुग्णता उन्हें ग्रसने लगी। राजा ने कारण पूछा, तो उनने एक ही कारण बताया, कि उनका मन हिमालय में पड़ा है और शरीर यहाँ। दोनों के दो जगह रहने से मनुष्य सुखी नहीं रह सकता और जो सुखी नहीं रह सकता, बीमार पड़ता है। राजा ने वस्तुस्थिति समझी और उन्हें उनकी गुफा तक पहुँचा दिया। वानप्रस्थी का स्थान वही है जहाँ वह काम कर सके, जिसके लिए उसने व्रत लिया।

द्रोणाचार्य धर्म शास्त्रों में प्रवीण पारंगत थे। पर वे शास्त्र अध्ययन के अतिरिक्त शस्त्र विद्या में भी कुशल थे उनमें प्रवीणता प्राप्त करने के लिए उनने तप साधना शक्ति भावना से भी अधिक श्रम किया था। वे शस्त्र संचालन का सत्पात्रों को शिक्षण देने के लिए भी एक साधन संपन्न विद्यालय चलाते थे। एक दिन धौम्य ऋषि द्रोणाचार्य के आश्रम में जा पहुंचें। आचार्य को स्वयं शस्त्र धारण किये और दूसरों को शस्त्र संचालन पढ़ाते देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ और बोले ‘सत्तें को तो दया धर्म अपनाना और भक्ति का प्रचार करना ही उचित है। उन रक्तपात की व्यवस्था क्यों बना रहे हैं।” उनने कहा यह परिस्थितियों की मांग है। सज्जनों को सत्संग से, सत्परामर्श से समझाकर रास्ते पर लाया जा सकता है इसलिए हम पहले उसी का प्रयोग करने के लिए कहते हैं किंतु सर्पों, बिच्छुओं, भेड़ियों पर धर्म शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । उनका मुँह कुचलने की शक्ति का होना आवश्यक है। इसके गिना उनकी दुष्टता रुकती नहीं।” धौम्य का समाधान हो गया द्रोणाचार्य की मान्यता स्वयं उनके शब्दों में ही इस प्रकार है-

अग्रतश्चतुरो वेदः पृष्ठतः स शरंधनुः। इदं बाह्य इंद क्षात्रं शास्त्रादपि शरादपि॥

अर्थात् “ मुख से चारों वेदों का प्रवचन करके और पीठ पर धनुषबाण लेकर चला जाय। शास्त्र शक्ति और शस्त्र दोनों ही आवश्यक है, शास्त्र से भी और शस्त्र से भी धर्म का प्रयोजन सिद्ध करना चाहिए।”


वातावरण हमें स्वयं ही बनाना होगा

जन्मतः मनुष्य कोरे कागज की तरह होता है संपर्क में आने वाले वातावरण द्वारा उसका स्वभाव या रुझान गढ़ा जाता है। प्रचंड गर्मी के दिनों में पानी के स्त्रोत सुख जाते हैं और घास पात के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं पर वर्षा आने पर वह बात नहीं रहती। देखते-देखते ठंडक का माहौल बन जाता है और सर्वत्र जल भरा दीखता है। जमीन पर हरी मखमल का फर्श बिछ जाता है। यह परस्पर विरोधी चमत्कार वातावरण के परिवर्तन से ही बन पढ़ते हैं। ऋतुएँ अपने प्रभाव से हर किसी को अपने-अपने ढंग से प्रभावित करती है। युद्ध उपद्रव आतंक से प्रत्यक्ष प्रभावित भले ही सीमित लोग ही होते हों पर उनके कारण भयभीत अस्त−व्यस्त अधिकांश लोगों का मानस बनता है। वसंत ऋतु हर किसी को उल्लास और सौंदर्य को अनुभूति कराती है। पर्व त्यौहारों और हर्षोत्सवों के दिनों में सर्व साधारण का मन हुलसने लगता है। समुचित सुसंस्कृत वातावरण में साधारण जनों को भी सभ्यता का स्वरूप जानने और उस ढाँचे में ढलने का अनायास ही सुयोग मिलता है। इसके विपरीत दुष्ट, दुर्जनों, अनाचारी व्यभिचारी, दुर्व्यसनी, लोगों के बीच रहते हुए अच्छे भले भी उसी प्रवाह में बहने लगते हैं। व्यक्तिगत प्रयास और साहस का मूल्य समझते हुए भी देखने में यही आता है कि वातावरण का प्रभाव दबाव भी कम सशक्त नहीं है। वह भी बहुत कुछ कर गुजरने में समर्थ होता है। जर्मनी में नाजीवाद रूस में साम्यवाद जनता की निजी उपलब्धि नहीं थी। वहाँ लोक मानस को शासन तंत्र ने अपने अनुरूप ढालने में सफलता पाई थी। सतयुग भी सीमित संख्या वाले ऋषि मनीषियों की ही अनुभूति मात्र था। समाज सुधारकों और राष्ट्र निर्माताओं ने योजना बुद्ध रूप से सुसंगठित प्रयास किये है और जन समुदाय को अपनी अनुयायी आदर्श अपनाने के लिए भी बनाया है। ऐसे लोगों में गाँधी, बुऋ ईसा, आदि मनस्वी लोग निर्माताओं का उदाहरण सर्व साधारण के सामने आंखों के सामने तैरता रहता है। आत का अनौचित्य भरा चिंतन स्वभाव एवं क्रियाकलाप उन लोगों की देन है जिनने लोकमानस को प्रभावित करने को शक्ति को उभारा ओर अपने मन चाहे प्रयत्नों से लोक प्रचलन को अनुपयुक्त मार्ग पर धकेला। इसमें साहित्यकारों, अभिनेताओं, प्रचारकों, नेताओं का विशेष रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। टेलीविजन शिक्षित- अशिक्षित सभी को अपने प्रभाव से प्रभावित करते हैं। शासन या समाज द्वारा जिन लोगों का जिन कृत्यों का समर्थ किया जाता है प्रोत्साहन मिलता है उसी प्रकार का लाभ प्राप्त करने के लिए असंख्यों का मन मचलता है समारोहों जुलूस प्रदर्शनों के माध्यम से उत्पन्न किये जाने वाला वातावरण भी उन लोगों तक को अपने प्रवाह में घसीट ले जाता है जिनका प्रत्यक्षतः इससे कुछ लेना देना नहीं है। वातावरण के प्रभाव से बच निकलना या उससे विपरीत दिशा में स्वतंत्र चिंतन के आधार पर चल सकता किन्हीं बिरलों के लिए ही संभव होता है। व्यक्ति निर्माण से लेकर समाज निर्माण तक के लिए देश को ऊँचा उठाने एवं आगे बढ़ाने के लिए जहाँ व्यक्तिगत जीवन को आदर्शवादिता के सहारे प्रखर प्रतिभावान् बनाने की आवश्यकता है। वही यह भी उचित है कि ऐसा वातावरण बनाने का प्रयत्न किया जाय जिसमें शालीनता को पनपने का अवसर मिल सके। जिसमें जल विरोध के कारण अवाँछनीयताओं को बेमौत मरना पड़े। जितना आवश्यक अपना उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करना है, अनौचित्य भर वातावरण को उलटने ओर शालीनता का पक्षधर माहौल बनाने के लिए सुविस्तृत क्षेत्र में सुनियोजित ढंग से व्यापक प्रयास किये जायेँ। व्यक्तिगत सेवा सहायता भी सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप सराहनीय हो सकती है। पीड़ितों पिछड़ों के लिए, अपंगों-असमर्थों के लिए उनकी आवश्यक सहायता उदारचेताओं द्वारा जुटाई ही जाती चाहिए। वह सहृदयता का, उदारता का परिपोषण करने के लिए आवश्यक भी है। उदारचेता इन अभिव्यक्तियों को दुर्भाग्यग्रस्त लोगों के कष्ट व व्यथाओं को निष्ठुर मन से देखते रहना, सेवा सहायता के लिए हाथ न बँटाना आत्मधिक्कार और लोक अपयश का कारण बनता है। इस संदर्भ में सभी को आवश्यक ध्यान रखना चाहिए। इतने पर भी यह नहीं समझ लिया जाना चाहिए कि दरिद्रों की आर्थिक सहायता या पीड़ितों की प्रत्यक्ष सेवा करने मात्र से ही कर्तव्य की इति श्री हो जाती है। सार्वजनीन हित कामना और अभ्युदय की योजना बनाते समय यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि निकृष्टता भरा मानस और आचरण ही समस्त विपत्तियों का व आज के आस्था संकट का प्रधान कारण है, अवांछनीयताओं के दलदल से मानवी सत्ता को उबारने के लिए असाधारण स्तर का ऐसा प्रबल प्रयास किया जाय जो प्रचलन को ही उलट सके। उलटे को उलट कर सीधा कर सके

। मनुष्य सीखने वाला प्राणी ही। परिस्थितियों के अनुरूप वह बुराइयों को अपनाने के लिए भी चल पड़ता है। और यदि प्रेरक वातावरण के साथ रहने का सुयोग जुट सके तो वह कुछ से कुछ भी बन सकता है। पारस छूकर लोहा बनने की उपमा इसी संदर्भ में दी जाती है। संसार के महामानव के ने अंतः प्रेरणा के अतिरिक्त प्रेरणाप्रद संपर्क सान्निध्य से ही बहुत कुछ पाया था। बुद्ध, गांधी, शंकराचार्य, विवेकानंद जैसे प्रखर व्यक्तित्वों ने ऐसा वातावरण विनिर्मित किया था, जिसके चुम्बकत्व वाले दबाव से खिंच कर असंख्य छोटे बड़े उनके बताये मार्ग पर चल पड़ने के लिए कटिबद्ध हुए। जब युद्धोन्माद उत्पन्न करके धन जन का विशाल समुच्चय उस ज्वाला में होमा जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि प्रेरणाप्रद वातावरण बनाकर असंख्य जन समुदाय को उत्कृष्ट आदर्शवादिता अपनाने के लिए प्रोत्साहित न किया जा सके। प्राचीन काल में मनीषाएँ, प्रतिभाएँ इस प्रयोजन को व्यक्तिगत रूप से मिलजुल कर पूरा कर लिया करती थी। पर आज तो परिस्थितियाँ ही दूसरी है। इसमें समर्थ प्रवाह तंत्र ही अभीष्ट वातावरण बनाने में समर्थ हो सकता है। उदाहरण के लिए ईसाई धर्म और साम्यवाद के दूत गति से अग्रगामी होने के प्रत्यक्ष प्रमाण सामने प्रस्तुत है। इन दोनों ने आंधी तूफान की तरह बढ़कर जन समुदाय के सामान्य मस्तिष्कों को अपने ढाँचे में ढाल लेने की अप्रत्याशित सफलता पाई है। प्राचीन काल के अनेकानेक धर्म सम्प्रदाय, दर्शन और संगठन ऐसे ही सामूहिक प्रयासों की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न हुए और क्रमशः चक्र वृद्धि रीति नीति अपना कर आगे बढ़ते चले गये । इन दिनों भी यह यथार्थता यथा-स्थान अवस्थित है। समाचार पत्र, साहित्य, सिनेमा, टी0वी0 जैसे कुछेक समर्थ तत्रो ने सामान्य जन मानस को अपने ढाँचे में ढाल लेने में असाधारण सफलताएँ पाई है। तानाशाही राजतंत्र भी इसी अस्त्र के सहारे इच्छा या अनिच्छा को अपने आदेशों का परिपालन करने के लिए बाधित करते रहे है। तथ्य बताते हैं कि जाम भूमिका किसी समय में अवतारों, देवदूतों, विशिष्ट प्रतिभाओं, द्वारा संपन्न की जाती रही है, आज उनका अभाव होने पर भी समर्थ प्रचार एवं प्रभाव तंत्र के सहारे बहुत कुछ संपन्न किया जा सकता है। समय को देखते हुए यही अनुरूप भी लगता है। मनीषियों को इन सामयिक आवश्यकताओं पर पूरी गंभीरता पूर्वक विचार करना और प्रचार तंत्र का सदुपयोग करने का एक सशक्त ढाँचा खड़ा करने में जुट जाना चाहिए। अपने समाज में इन दिनों अनेकों अवाँछनीयताएँ अनैतिकताएँ, मूढ़मान्यताएं अंध परंपराएँ, कुरीतियाँ प्रचलित है। बाल विवाह, खर्चीले विवाह कन्या विक्रय, वर विक्रय, मृतक भोज भिक्षा व्यवसाय, फैशन अपव्यय, जातिगत ऊँच-नीच पर्दा प्रथा आदि कुप्रचलनों की परिणतियों ने दूरगामी दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाली समस्याओं के बवंडर खड़े किये हुए है। आलस्य और प्रमाद के कारण मनुष्य की आधी उत्पादक शक्ति नष्ट हो रही है। शिक्षितों की बेरोजगारी का एक बड़ा कारण यह है कि कुर्सी मेज पर बैठकर काम करना उन्हें श्रम की तुलना में श्रेयस्कर लगता है भाग्यवाद भूत−पलीत, ग्रह−नक्षत्र, शुन, मुहूर्त, टोना-टोटका, जादू, चमत्कार जैसी अनेकानेक भ्राँतियों ने समझदारों की नासमझी के रूप में अपने समाज में गहरी जड़े जमा रखी है। पुराने लोग स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि, देवदर्शन, आदि के फेर में पड़े रहते हैं। नई पीढ़ी के लोग वासना, तृष्णा और अहंता के लिए समूची तत्परता नियोजित किये रहते हैं। आत्मशोधन का पुण्य और लोकमंगल का परमार्थ रास नहीं आता। संक्षेप में यही है समाजगत मान्यताओं और प्रचलनों का सर्वविदित स्वरूप है। दूर-देर तक फैली विष-वृक्ष की इन्हीं जड़ों में लंबे समय तक कुठाराघात करने की आवश्यकता है। साथ ही नंदनवन जैसे चंदन वन जैसे सत्प्रवृत्तियों के अभिनव उद्यानों का आरोपण अभिवर्धन भी उतना ही आवश्यक है। इसके लिए प्राणवान प्रतिभाओं के उच्चस्तरीय प्रयासों, संगठनों को योजनाबद्ध रूप से हाथ में लेकर समुद्र पर सेतु बाँधने का प्रयास अभीष्ट है। इमारतों को गिराने में थोड़े से प्रयत्नों से ही काम चल जाता है, पर यदि उन्हें विनिर्मित करना हो तो अत्यधिक साधनों की, कुशल श्रमिकों और इंजीनियरों की जरूरत पड़ती है जिन्हें भी सदाशयता, सृजन, संवर्धन अभीष्ट है, उन्हें मिलजुल कर ऐसे प्रयास करने होंगे, जो वातावरण के उलटे प्रवाह को उलट कर सतयुगी निर्माण को संभव बना सके। यही विचार क्रांति अभियान का लक्ष्य है।


विवेकपूर्ण गुरु दक्षिणा (Kahani)

संत तुकाराम जी को लगन लगी। उन्हें प्रभु कृपा से सद्गुरु मिले। मंत्र दीक्षा दी। तुकाराम जी ने कहा- “गुरु वर! दक्षिणा क्या दूँ? गुरु बोले पाव भर तूप दे दे। “ महाराष्ट्र में “तूप” का अर्थ घी होता है । तुकाराम एक पाव घी देकर छुट्टी पा सकते थे। पर सोचा “तूप” शब्द का ही प्रयोग क्यों किया, ‘घी’ ‘घृत’ आदि क्यों नहीं कहा। तुकाराम जी मानसिक उधेड़बुन में थे गुरु मंद-मंद मुस्करा रहे थे। शिष्य के विवेक और समर्पण भाव की परीक्षा थी। तुकाराम ने गुरु की मुख-मुद्रा देखी। समझ गये अर्थ कुछ गूढ़ ही है। अर्थ किया तूप, अर्थात् ‘तरापन’ । मरेर पर का अभिमान गुरु माँगते हैं। एक पाव घी के साथ भाव संकल्प कर दिया, अभिमान छोड़ने का । संत तुकाराम की निरभिमानता उन्हें वहाँ तक उठा ले गयी, जहाँ सदेह स्वर्ग ले जाने के लिए विमान भेजा गया। यह विवेकपूर्ण गुरु दक्षिणा ही फलित हुई थी।


परोक्ष की रहस्यमय गुत्थियाँ

सामान्य दशा में काया की सत्ता जितनी असमर्थ और अशक्त दिखाई पड़ती है, वस्तुतः उतनी है नहीं। सिर पर भारी बोझ लदे रहने पर जिस प्रकार मनुष्य की हलचल सीमाबद्ध और कमजोर हो जाती है वैसी ही बात इस शरीर के साथ भी है। कल्मष इस शरीर के साथ भी है। कल्मष का वजन हटते ही वह संपूर्ण रूप से सक्रिय हो उठती है और ऐसे-ऐसे कौशल कर दिखाती है, जिन्हें अचंभा कहा जा सके। विस्मय तो तब होता है जब भार की सामान्य स्थिति में भी कई बार उसकी सूक्ष्म सत्त इतना आश्चर्यजनक कार्य कर दिखाती हैं कि उसे देख कर बार-बार यही सोचना पड़ता है कि अपरिष्कृत स्थिति में जो इतनी अद्भुत हो सकती है परिष्कृत अवस्था में वह कितनी असाधारण होगी, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। घटना “राँक” नामक एक ब्रिटिश जहाज की है। लिवरपूल से चल कर ठीक पश्चिम की ओर स्थित नोवा स्कोटिया की ओर वर अटलांटिक महासागर में बढ़ा चला जा रहा था। यात्रा में कई सप्ताह बीत गये। एक दिन जहाज के एक कर्मचारी राबर्ट ब्रूस ने कप्तान के केंबिन में एक अजनबी को देखा, वह श्यामपट्ट पर कुछ लिख रही था। एक निताँत अपरिचित को जहाज में देख कर ब्रूस चौक पड़ा। उसने इस बात की सूचना कप्तान को दी। कैपटन को ब्रूस की बातो पर विश्वास नहीं हुआ, किंतु फिर भी वस्तुस्थिति जानने वह चल पड़ा। अपने केबिन में पहुँचा तो उसकी नजर ब्लैक बोर्ड पर जा टिकी, उस पर सुस्पष्ट शब्दों में लिखा था-”उत्तर -पश्चिम की ओर बढ़े”। वहाँ कोई नहीं था, किंतु श्यामपट्ट पर लिखे निर्देश से उसे इतना आभास तो मिल गया कि सहकर्मी जो कुछ कह रहा है, वह सत्य है। कमरे के अंदर निश्चित ही कोई न कोई आया है। वह कौन हो सकता हे और फिर अचानक कहाँ गायब हो गया? उसकी समझ में कुछ न आया। फिर भी मन को आश्वत करने के लिए उसने सहयोगियों से पूछ-ताछ की। हर किसी ने इस बात से स्पष्ट इनकार किया कि उसने कप्तान के कमरे में प्रवेश किया था। उतने पर भी अधिकारी को संतोष न हुआ। उसने सभी को हैण्डराइटिंग की जाँच की, पर किसी की राइटिंग श्यामपट्ट के अक्षरों से न मिली। जहाज लिखे निर्देश के अनुसार उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने लगा। काफी दूर चलने के उपराँत कर्मचारियों ने देखा कि सामने बर्फ में एक अन्य जहाज फँसा पड़ा है। सभी यात्रियों को उससे बाहर निकाला गया। वे जग दूसरे जहाज पर सवार हो रहे थे, तो अकस्मात् एक व्यक्ति पर ब्रूस की आंखों स्थिर हो गई। ध्यान से देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गया। यह वही व्यक्ति थ, जो कप्तान के कक्ष में उक्त निर्देश लिखता दिखाई पड़ा था । अधिकारी को जब इस बात का पता चला, तो उसने उस व्यक्ति से वही वाक्य लिखने को कहा, जो जो उसके कमरे के ब्लैकबोर्ड पर लिखा हुआ था। बिलकुल वही हैडराइटिंग थी, किंतु इस विचित्र घटना के बारे में वह कुछ भी बता पाने में असमर्थ था। दुर्भाग्यग्रस्त जहाज के कप्तान ने इतना अवश्य बताया कि लगभग उसी समय जब दूसरे जहाज में इसकी अनुकृति देखी गई, तब वह सो रही था। उठने पर पूर्ण विश्वास के साथ यह कहता पाया गया कि सभी सुरक्षित बच जायेंगे। उक्त वृत्ताँत का उल्लेख राबर्ट डेल ओवेन ने अपनी पुस्तक “फुटफाँल्स आँन दि बाउण्ड्री ऑफ अनाफदर वर्ल्ड “ में विस्तारपूर्वक किया है। ऐसी ही एक अन्य घटना की चर्चा हैरोल्ड ओवेन ने अपनी रचना “जर्नी फ्राम आब्सक्यूरिटी” में की है। बात उन दिनों की है, जब प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हुए कुछ ही दिन बीते थे। तब हैरोल्ड ओवेन “एच एम एस आस्ट्रिया” नामक पोत पर एक अफसर थे। पोर उस समय अबुल की खाड़ी पर लंगर डाले खड़ा था। युद्ध की समाप्ति की खुशी में जहाज के कप्तान ने एक भेज का आयोजन किया और उसमें सभी अफसरों को निमंत्रित किया। लेकिन ओवेन प्रसन्न नहीं लग रहे थे। उन्हें एक विचित्र प्रकार का अवसाद घेरे हुए था। न जाने क्यों उनके मस्तिष्क में बार-बार एक ही विचार आ रहा कि क्या उनका भाई इस लड़ाई में जीवित बच सका है? जन्दी ही पोत ने कैमरुन के लिए प्रस्थान कर दिया। वहाँ जाकर ओवेन बीमार पड़ गये। इसी अवस्था में उन्हें एक विलक्षण अनुभूति हुई। जिसका उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि एक दिन चिट्ठी लिखने के विचार से वे अपने कक्ष में गये। दरवाजे के पर्दे को हटाकर ज्यों की उनने केबिन में कदम रखा, वे चौक पड़े। सामने की कुर्सी पर उनका भाई विल्फ्रैड बैठा दिखाई पड़ा। उसे देखते ही एक विचित्र सिहरन समस्त शरीर में दौड़ गई। हाथ पैर पस्त से हो गये। उनने धीरे से पूछा कि वह किस प्रकार यहाँ आ गया? विल्फ्रैड ने इसका जवान तो नहीं दिया, पर उसकी भंगिमा से यह स्पष्ट प्रकट हो रहा था कि वह चाह कर भी कोई चेष्टा नहीं कर पर रहा था और जड़वत् बना हुआ था। प्रश्न का उत्तर मात्र एक बेजान मुसकान से दिया। अल्फ्रेड को वहाँ पाकर ओवेन को प्रसन्नता भी ही रही थी और अचंभा भी। उत्सुकतावश ओवेन ने एक बार पुनः प्रश्न दुहराया किंतु इस बार भी वह हँसी हँस दी। ओवेन लिखते हैं कि उन्हें अपने भाई से असीम प्यार था अतः उसकी उपस्थिति उस समय सुखद प्रतीत हो रही थी उन्होंने आगे फिर इस बात को जाने का प्रयास नहीं किया कि वह किस प्रकार केबिन में आ पहुंचा कुल मिलाकर उस क्षण उसे पाकर वे संतुष्ट थे। उस समय अटलगेड अपनी सैनिक पोशाक में था। यह देखकर ओवेन सोचने लगे कि इस शालीन और सुरुचिपूर्ण कक्ष में यह ड्रेस कितनी अवांछनीय प्रतीत हो रही हैं इसी के साथ उनकी आंखें कुछ पल की लिए कक्ष की सज्जा पर जा टिकी। दृष्टि जब वापस मुड़ी, तो कुर्सी खाली थी। वहां अल्फ्रेड नहीं था इसके साथ ही ओवेन को ऐसा महसूस हुआ, जैसे उनके हाथ-पाँव अनायास ही सामान्य स्थिति में आ गये हों और यह भी आभास मिला, मानो कोई अपूरणीय क्षति हुई हो। वे अत्यधिक थकान अनुभव करने-लगे और सुस्ताने के लिए लेट गये। गहरी नींद के उपराँत जब लगे, तो उनका मन पूरी तरह आश्वस्त हो चुका था कि अल्फ्रेड अब इस दुनिया में नहीं रहा। कुछ दिन पश्चात् सैनिक हैडक्वार्टर की ओर से इस आशय की सूचना मिल गई। इस घटनाओं से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि स्थूल शरीर की सुषुप्ति की शिथति या इसके विनष्ट होने पर भी मनुष्य की सूक्ष्म यथावत बनी रहती है और इस सूक्ष्म शरीर से वह चाहे जहाँ आ-जा सकती और चाहे कभी भी किसी को भी कोई सूचना, मार्गदर्शन या सहायता दे सकती है। सर्वसामान्य में यह शरीर अत्यंत निम्न स्थिति में उपेक्षणीय पड़ा रहता है अतः कोई समर्थ सहायता कर पाना तो दूर अपना आभास तक भी वह नहीं दे पाता। मरणोपराँत ही उसकी थोड़ी बहुत झलक झाँकी कौतुक-कौतूहल के रूप में देखने को मिलती है अन्यथा वह बिलकुल ही अंजान, असमर्थ जैसी दशा में पड़ा-पड़ा सड़ता रहता है। जब हाड़-माँस के शरीर को सशक्तता के लिए पौष्टिक भोजन और नियमित व्यायाम अनिवार्य है तो फिर सूक्ष्म स्तर के शरीरों के लिए यह शर्तें क्यों भूला दी जानी चाहिए? निश्चय हो उनकी सामर्थ्य का परिचर हम तभी पा सकते हैं जब उन्हें बलवान बनाने वाले आध्यात्मिक आहार-उपचार को व्यवस्था की जा सके। आत्मिकी तंत्र में इसकी पूरी-पूरी व्यवस्था हैं आध्यात्मिक जीवन के अंतर्गत जब इन्हें परिपुष्ट करते हुए जगाया और उभारा जाता है तो वे स्वामिभक्त सेवक की भूमिका निबाहते देखे जाते हैं। तिब्बती भाषा में छाया पुरुष जो सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं, तुल्य कहलाते हैं दक्ष योगी अपना ही अथवा किसी जन्य व्यक्ति का तुल्या प्रयास पूर्वक तैयार कर उससे तरह तरह के काम लिया करते हैं कई बार यह तुल्या इतना सामर्थ्यवान होता है कि वह अपनी ही जैसी संतति पैदा करने लगता है प्रथम पीढ़ी की यह संति “याँग-तुल” कहलाती है। यह भी यदि सशक्त हुई, तो इससे पुनः दूसरी पीढ़ी का आविर्भाव होता है यह तुल्या “नाइंग-तुल” कहलाता है। इस प्रकार समर्थ तुल्या लंबी वेशावली के निर्माण में अनेक बार सफल होता देखा जाता है। तुल्या वंशज भी अपने मूल आदि तुल्या की तरह क्षमतावान् होते हैं और अनेक अद्भुत कार्य करते देखे जाते हैं लामाओ के अनुसार यह छाया जैसी अनुकृतियाँ मनुष्यों को भी विनिर्मित को जा सकती है और पशुओं की भी। दोनों समान रूप से शक्तिशाली होती है। कई बार तो एक-एक तिब्बती योगी मनुष्य पशु सहित दशाधिक तुल्पाओ का निर्माण कर लेते हैं और उनसे विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण काम करा लेते हैं, ऐसा गुह्यविदों का मत है। ऐसे ही एक प्रसंग का वर्णन सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी पर्यटक एवं मूर्द्धन्य तंत्रविद्-एलेक्जेण्ड्रा डेविड नील ने अपने ग्रंथ”मैजिक एण्ड मिस्ट्री इन तिब्बत” में किया हैं वे लिखती है कि तिब्बत के 14 वर्षीय प्रवास काल में यद्यपि उनने इस प्रकार की कई छाया कृतियों को कई अवसरों पर इधर-उधर तैरते देखा था, किंतु न जाने क्यों उन्हें इन पर सहज में विश्वास न हो सका था अतः एलेक्जेण्ड्रा ने स्वयं इस साधना को संपन्न करके इसकी सच्चाई को जानने का निश्चय किया। इस निर्मित जिस व्यक्ति का उनने चयन किया, वह एक सीधा-सादा ठिगने कद का संन्यासी था। कई महीनों तक एकाँत साधना करने के पश्चात् वह उस व्यक्ति का तुल्या बनाने में सफल हो गई। कई महीने बाद फ्रांसीसी महिला ने तिब्बत के दूसरे भागो को देखने का कार्यक्रम बनाया और अपने नौकर के साथ एक दिन चल पड़ी। उन्हें यह देख कर घोर आश्चर्य हुआ कि उनका तुल्या भी यात्रा में साथ-साथ चल रहा है। वे लिखती है कि यद्यपि यह संरचना पूर्णरूप से दृश्य सूक्ष्माकृति थी किंतु यदा कदा उसके स्पर्श की स्पष्ट प्रतीति भी होती थी। एलेक्जेण्ड्रा ने इससे कई आवश्यक पर असंभव जैसे लगने वाले कार्य लिए, ऐसा वे लिखती है अंततः फ्राँस लौटने से पूर्व उतने इसे विगलित कर दिया। यह सूक्ष्म की शक्ति है। सूक्ष्म में स्थूल से महान सामर्थ्य होती हैं प्रयासपूर्वक हाड़ माँस की देह से गुँथी हुई सूक्ष्म सत्ता को पृथक किया जा सके तो दृश्य कलेवर से अनेक गुने चमत्कारी कार्य स्वल्प समय में इनके अदृश्य शरीरों द्वारा लिये जा सकते हैं, पर इसके लिए शोधन प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक है। कषाय-कल्मषों से लदा शरीर वैसा कुछ भर कर पाने में असमर्थ होता है, जैसी कि इसकी वास्तविक क्षमता और योग्यता बतायी गई है। यह भार उठते ही उसकी विशिष्टताएँ स्वयमेव प्रतिभासित होने लगती है। विभिन्न अवयवों का जैसे जैसे शोधन परिमार्जन होता चलता है, वैसे ही वैसे उनमें दिव्य सूक्ष्म तत्वों का विस्तार भी बढ़ता जाता है और इसी के साथ सूक्ष्म शरीर को विशेषताएँ भी शनैःशनैः अप्रकट से प्रकट होने लगती है। शरीर मन की शुद्धि क्रिया जब संपूर्ण हो जाती हे तो सूक्ष्म काया की दिव्यता अपनी पूर्ण प्रखरता के साथ दृष्टिगोचर होने लगती है और उन उन विभूतियों से व्यक्ति को संपन्न कर देती हे जिन्हें प्रायः महापुरुषों से जुड़ा हुआ माना ताजा है। इसी को सिद्धियों का जागरण कहा गया है जो हर किसी के लिए संभव है।


महत्संकल्प, समष्टि के हित का

“ अघोरनाथ! साधुता व्यर्थ है यदि वह स्वार्थ कलुषित हो।” गुरुदेव ने दीक्षा देने के दिन ही कहा था। आज उनके वचनों का स्मरण आ रहा है यश, ऐश्वर्य तथा भोग तो प्रत्येक संसारासक्त चाहता है। सिद्धियाँ तुझे और क्या देंगी? मठ-मंदिर तथा लोक प्रशंसा। साधे संप्रदाय में वह जो घोर सांसारिकता आ गई है, उसे अपनाकर मुझे लज्जित करना। घर गृहस्थी आदि का ही यह दूसरा रूप । तुझसे मुझे आशा है व्यक्तित्व के पोषण से ऊपर उठना वत्स।”अपनी ही मुक्त की चिंता यह भी तो व्यक्तित्व का ही चिंतन हैं स्वार्थ ही तो है यह।” अघोरनाथ आज यह सोचने लगे है। क्षीण कार्य अपरिग्रहशील, तपोनिरत अघोरनाथ ने अब तक ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे यह कहा जा सके कि गुरुदेव के दीक्षा कालीन उपदेशों को वे भूल गए हो। उनकी कठोर तपस्या घोर वन में एकांत साधना एवं लोक निरपेक्षता की देखते ही सबके मस्तक उनके सामने झुक जाते हैं। सच्चे योग साधक के सम्मुख सिद्धियाँ आती है। अघोरनाथ के सम्मुख अनेक रूप में वे आयी और बार बार आयी किंतु उन्होंने तत्काल झिड़क दिया उन्हें जैसे कोई घाव भरे खजुलाहे कुत्ते को झिड़क देता है। “शिव स्वरूप गुरु गोरखनाथ अमर हैं । उन्होंने काल के पद अवरुद्ध कर दिये है। रामेश्वर सिद्धि ने उन्हें यह सामर्थ्य प्रदान की।” नाथ संप्रदाय में जो जनश्रुतियाँ है। अघोरनाथ ने भी सुनी है और उन पर श्रद्धा की है। आज इस श्रवण ने चित को एक नवीन संकल्प दिया-” जरा-मरण भयातुर रोग शोक संत्रस्त, काम -क्रोध-लोभ-निष्पीड़ित मानव समुदाय अपनी इन असह्य पीड़ाओं से परित्राण पर जाये यदि रमेश्वर का सिद्धयोग सर्वसुलभ हो। लो मंगल के इस अनुष्ठान में आत्माहुति देने में भी श्रेय है।” मनुष्य स्वयं में महान नहीं है। दैहिक बल, बुद्धि धन अथवा तप उसे महान नहीं बनाता। महत्संकल्प मनुष्य को महान बनाता है। जो अपने संकल्प स्वार्थ दूषित नहीं है तो समष्टि स्वयं उसको सुयोग प्रदान करती है। महत संकल्प के लिए महान श्रम को शक्ति साहस तथा अनुकूल योग अपने आप उपस्थित होते हैं। अघोरनाथ का संकल्प महान था और अपने संकल्प के प्रति स्थिर प्रतिष्ठ निष्ठा थी। रमेश्वर के स्वरूप, उसकी मृत, मूर्छित, वृद्ध आदि अवस्थाएँ तथा उनके संबंध में आवश्यक विवरण उन्हें अल्पकाल में ही प्राप्त हो गए। ऐसे अनेक विवरण उन्हें अल्पकाल में ही प्राप्त हो गए। ऐसे अनेक विवरण उन्हें मिले, जिनकी प्राप्ति हो किसी रस साधक के पूरे जीवन की साधना का परिणाम कहा जा सकता है। विशुद्ध विप्र वर्गीय पारद- कृष्णा, पीत एवं अरुणिमा से सर्वथा शून्य शुघ्र चन्द्रोज्वल रस धरा में अपने आप उपलब्ध नहीं होता। अनेक अनुष्ठानों के उपराँत मत्रपूत साधक मरुस्थल के मानव वर्जित प्रदेश के प्राणप्रद स्पर्श हीन सिकता कणों से उसे तब कण-कण के रूप में प्राप्त कर सकता है जब ग्रीष्म के मध्याह्न में धरा गर्भ से रमेश्वर के कण ऊपर उठते हैं। अपने को अग्नि में आहुति देने के समान अनुष्ठान है यह मरुस्थल की प्रचंड ऊष्मा जल विहीन धरा और उसमें से अनेक योजन लक्ष्यहीन भटकती यात्रा में राशि-राशि उड़ती बालुका में अल्पतप कणों का अन्वेषण, किंतु अघोरनाथ को यह दुष्कर नहीं लगा। उन्होंने शुद्ध विप्र वर्गीय पारद प्राप्त किया। विशुद्ध पारद- भगवान महेश्वर के श्री अंग का सार सर्वस्व । वह जिसे उपलब्ध हो गया, देव जगत उसका सम्मान करने को विवश हैं काम की चर्चा व्यर्थ, उद्धत चामुण्डा तथा अपना ही रक्तपान करने वाली छिन्नमस्ता तक उस महाभाग के सम्मुख यक्ष राक्षस पिशाच उसकी छाया का स्पर्श करने में समर्थ नहीं । स्वयं विशुद्ध पारद की उपलब्धि अपने आप में महती सिद्धि है। किंतु अघोरनाथ के महत्तम संकल्प की शक्ति के सम्मुख तो इसकी कोई गणना नहीं है। सिद्ध भूमि आवश्यक थी। कामाख्या और हिग्रलाज स्मरण आये। भगवती महामाया ही तो सिद्ध रस की साधना में व्याघात उपस्थित करती है। इस विचार ने अघोरनाथ को जालंधर पीठ पर भी स्थिर नहीं होने दिया। त्रिपुर भैरवी प्रसन्न न हों तो कोई सफलता किसी को मिला नहीं करती। उनको गोद का आश्रय अपेक्षित है रस साधक को। “ भगवती त्रिपुर सुंदरी की छाया जो स्फटिक शुम्र विग्रह वृषभ ध्वज के श्री विग्रह में पड़ती है, भस्म भूषिताड़ शिव के वक्ष में वह किंचित् श्याम प्रतीत होने वाला प्रतिबिंब ही भगवती त्रिपुर भैरवी की है।” अघोरनाथ ने अपने सम्प्रदाय के एक संत से कभी यह विवरण सुना था। साधनास्थल चुनने में इस सुने हुए विवरण ने उनकी सहायता की।” भगवान नीलकण्ठ के विशद वक्ष में भगवती का प्रतिबिंब अर्थात् शक्ति समन्वित पुरुष अर्धनारीश्वर की सौम्य क्रीड़ास्थली अधोगति ने व्यास, पार्वती सरिताओं की मध्यभूमि त्रिकोण सिद्ध क्षेत्र कुलाँत में भी सुदूर हिमक्षेत्र में पार्वती के उद्गम स्थान को उपयुक्त माना। चारों ओर हिश्वेत शिखर, सत्वगुण मानो सर्वत्र साकार हो रहा था। पार्वती के उद्गम का अल्प प्रवाह और उसे अंकभाल देता ऊष्णेदक निर्झर- भगवान उमा महेश्वर का व्यक्त विग्रह प्रकृति में वह जल रूप हैं योग सिद्ध तपस्वी अघोरनाथ को आहार की अल्पतम अपेक्षा ही थी। जब जरूरत हो, वे कुछ नीचे आकर वन्य कंद मूल सहज प्राप्त कर लेते थे। एक ही इच्छा थी कि विश्व के प्राणी जरा-मृत्यु शोक रोग से परित्राण प्राप्त करे। शरीर की स्मृति नहीं। क्षुधा-पिपासा की चिंताएँ बहुत पीछे छूट चुकी। काटे में कौपीन, और फटे कानों में मुद्र, जलपात्र रखना तक जिस तापस ने, त्याग दिया हे, वह बड़ी सी झोली में औषधियां, खरल, तथा अनेक वस्तुओं का परिग्रह लिए इस एकांत प्रदेश में आ बैठा था। एक ही व्यथा है उसे” प्राणियों की व्यथा दूर हों।” “कहाँ त्रुटि है? क्या भूल हो रही है मुझसे?” अघोरनाथ लगे है। पूरे छः महीने से । आज शच्चन्द्रिका का भी योग आ गया किंतु रसेश्वर अनुविद्ध क्यों नहीं होता? पारद मूर्छित हो जाता है। गुटिका बन जाती है। ताप सहिष्णु भी हो गया है। सब हुआ, किंतु वह अनुविद्ध नहीं हो रहा है। परीक्षण-प्रक्रियाओं में पकड़ कर वह पुनः सक्रिय सप्राण हो उठता है। उन्होंने आसन स्थिर किया और गुरुदेव के चरण कमलों में चित को एकाग्र करके वे ध्यानस्थ हो गए। शुभ्र ज्योत्सना घनीभूत होकर जैसे शरीर बन गई हो। धरा का स्पर्श गिना किए भी सम्मुख सुप्रसन्न स्थित वह भव्य तपोमय श्री विग्रह। पिंगल जटा भार से विद्युत्माला का भ्रम सहज हो सकता था। कर्ण में मुद्रा होने से अनुमान होता था कि वे देवता नहीं, कोई योगीश्वर है। चाहते हुए भी अघोरनाथ नेत्र पलक खोलने में समर्थ नहीं हो रहे थे। उनका कोई अंग किंचित गति करने को शक्ति से भी रहित जान पड़ा, किंतु नेत्र पलक खुले हो इस प्रकार प्रत्यक्ष दर्शन वे उन तेलोमय का, अपनी गुरुसत्ता का कर रहे थे। मन की मन चरण वंदन कर लिया उन्होंने। “वत्स! किसी समय यही इच्छा इस गोरखनाथ की भी हुई थी।” अत्यंत स्वेहत्रिग्ध, किंतु तनिक खिल स्वर था-” गोरख मिट जाता । अपने अमरत्व की अभिलाषा कहाँ की थी मैंने। मुझे तो रससिद्ध हो जाने के पश्चात् पता लगा कि काल को कृष्ण यवनिका में मेरे लिए अमरता का यह छिद्र भी भगवती महामाया का पूर्व संकल्पित विधान ही था। उनका संकल्प अमोघ है। उनके लीला विलास में व्याघात उपस्थित किया नहीं जा सकता । मैं समझाता था, काल के पदों को रुद्ध करने का साधन मुझे मिल गया है किंतु भ्रम सिद्ध हुआ मेरा। मुझे भविष्य के साधकों को संरक्षण एवं प्रकाश प्रदान करने के लिए महामाया ने सुरक्षित मात्र किया है।” “धन्य हो गया जीवन। जन्म-जन्म को साधना सफल हुई। साक्षात शिव स्वरूप गुरु गोरखनाथ ने दर्शन देकर कृतार्थ किया मुझे।” अघोरनाथ का देह भले निष्कम्प हो, उनका चित विह्वल हो रहा था। अनंत भावनाओं को उद्वेग अंतः करण में एक साथ उठ रहा था। “ भगवान महाकाल की गति अवरुद्ध नहीं हुआ करती। उनकी गति को रुद्ध करने के साधन है, किंतु वे महामाया को इच्छा से हील सक्रिय होते हैं “गुरु कह रहे थे।” काल के प्रवाह में वे साधन किन्हीं’-किन्हीं को सुरक्षित कर देते हैं।, किसी उद्देश्य विशेष से।” “ अच्छा समझ लो, तुम सफल हो ही जाते हो।” अघोरनाथ के अंतर्द्वंद्व को लक्षित करके गुरु ने कहा। “जरा मृत्यु तथा व्याधि का ही निवारण तो कर सकोगे। भय-शोक, लोभ मोह तो मनुष्य के मन से उत्पन्न होते हैं ये दुःख तो उसके मन से पैदा होते हैं। अमर होने मात्र से मनुष्य सुखी कैसे हो जाएगा? तुम्हें लगता नहीं है कि मृत्यु से अभय होकर अजितेन्द्रिय प्राणी अधिक तमोगुणी, विषय लोलुप, अधर्माचारी होकर परिणाम स्वरूप अनंत काल तक अशाँत , क्षुब्ध और दुःखी रहने लगेगा। “ “ मानव का कल्याण चाहते हो तो उसके विचारों में परिवर्तन करो। उसके शरीर का नहीं मन का कायाकल्प करो। उसे जीवन जीने की कला सिखाओ।” “क्षमा करो प्रभु ! “ अचानक अघोरनाथ के नेत्र खुल गए।वहाँ कोई दृश्य नहीं था। किंतु उस हिम प्रदेश में भी उनका संपूर्ण शरीर पसीने से नहीं उठा था। उसी समय उन्होंने अपनी झोली का संपूर्ण संग्रह पार्वती के प्रवाह में विसर्जित कर दिया और चले मानव के मन का भावकल्प करने का नया संकल्प लेकर।


जाति भेद संबंधी मूढ़ मान्यता (Kahani)

उस दिन चोर अकेला रह गया था। गिरोह के अन्य साथी बिछुड़ गये। सामने से तीन संपन्न आदमी आते दिखाई पड़े अकेला चोर और तीन यात्री। घात कैसे लगे। चोर को एक तरकीब सूझी उन्हें फूट डालकर एकाकी कर दिया जाय। पूछने पर उनने आनी जाति ब्राह्मण, क्षत्रिय, और शुद्र बताई। चोर ने पहले कमजोर शूद्र को पकड़ा और कहा- “यह तो हमारे पुरोहित हैं यह हमारी बिरादरी के हैं, इनसे तो कुछ नहीं कहना। तू इतनी संपदा कहाँ से लाया? बड़ी जाति वाले की बराबरी करेगा। पहले तेरी ही मरम्मत की जायेगी।” शुद्र पिटता भी रहा और जो पास में था छिना बैठा। इसके बाद पंडित जी की बारी आई, कहा- “पंडित की भिक्षा पर निर्वाह करना चाहिए। इतनी दौलत जमा करना अधर्म है।” सो उसने पंडित जी की धुनाई की और जो कुछ उनके पास था, छीन लिया। तीसरा नंबर ठाकुर का था। उनसे कहा-”अभी तो आपका पैसा ले लेते हैं। पीछे आप हमारे गिरोह में शामिल हो जाता। जो लिया है उससे अनेक गुना कुछ ही दिन में दिला देंगे।” ठाकुर ने दुर्गति कराने से पहले ही जो कुछ था, सो चोर को सौंप दिया। फूट डालकर एक चोर ने तीन राहगीरों को लूटने में सफलता प्राप्त कर ली। इसका मूल कारण था-जाति भेद संबंधी मूढ़ मान्यता। हमारे राष्ट्र के पतन-पराभव का मूल कारण यही कट्टरता रही हैं। मुगल आक्रांताओं एवं फिरंगियों को इसी आधार पर इस शस्य-श्यामला धरती पर मध्यकाल में अपना अधिकार जमाने में सफलता मिली।


समन्वय-सहकारिता की रीति-नीति

प्रकृति का क्रम स्थिर जैसा प्रतीत होता है मोटी दृष्टि से घर, बाजार, सड़क खेत आदि अपने स्थान पर यथावत् स्थिर मालूम पड़ते हैं। बारीकी से देखने पर उन सब में प्रगति क्रम पर आधारित गतिशीलता अपने परिपूर्ण वेग के साथ काम करती दिखाई देती है। अणु-परमाणु अपने नाभि के इर्द-गिर्द उसी क्रम से घूमते दिखाई पड़ते हैं जैसे सौर मंडल के ग्रह-उपग्रह। ब्रह्मांड में अवस्थित निहारिका से लेकर अनेकानेक ग्रह- नक्षत्र तक क्षण भर भी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते, उनकी गतिशीलता ही खगोल के वर्तमान स्वरूप को बनाये हुये है। स्थिर होने पर तो वे संभवतः अपना अस्तित्व ही गँवा बैठते ह। वनस्पतियों और प्राणियों पर भी यही नियम लागू होता है। वे उपजते हैं, बढ़ते हैं, परिपक्व होते, ढलते और अंत में जराजीर्ण होकर परिवर्तन की स्थिति में गिरकर अपने पुराने स्वरूप को ही बदले देते हैं। इसी को सृजन -अभिवर्धन और परिवर्तन का क्रम कहते हैं। यह सचेतन जीवधारियों पर ही नहीं, जड़ पदार्थों पर भी लागू होता है। इस नियमित क्रम के अनुरूप अपने मानस को ढालने की पूर्ण तैयारी हर किसी को करनी चाहिए। अन्यथा समय आगे बढ़ जायगा और वह पिछड़ कर प्रतिस्पर्धा में पिछड़े हुओं की तरह हाथ मलता रह जायेगा। पेड़ पौधों के पत्ते सतत् हिलते रहते हैं वे ऊपर उठते, फैलते और फिर सिकुड़कर जरा जीर्ण होते, रूप बदलते और नया कलेवर धारणा करते हैं। शरीर के भीतर और बाहर भी वही क्रिया चलती हैं। काया को कुछ न कुछ करते रहना पड़ता है। वह मूर्ति को तरह किसी एक स्थान पर बैठ कर स्थिर नहीं रह सकती। चारपाई पर किसी कारणवश एक स्थिति में पड़े रहने वालों की पीठ में “बेडसोर” कहे जाने वाले घाव बन जाते हैं। अचल पड़े रहने वाले असंख्य रोगों के शिकार हो जाते हैं। उनका भोजन तक नहीं पचता। अंग- अवयव जकड़ कर निष्क्रिय हो जाते हैं। शरीर के भीतर भी प्रत्येक अवयव जीवकोश अपनी-अपनी क्रियाओं में संलग्न रहता है। रक्त संचार से लेकर श्वास-प्रश्वास तक की अनेकानेक हलचलें काय कलेवर के अंतराल में चलती रहती है। इस गतिशीलता को जीवन कहते हैं। यदि यह सभी प्राणवान गतिविधियां एवं हलचलें एक क्षण के लिए भी रुक जाय तो फिर तत्काल मरण की स्थिति बन जाती हैं भव्य भवन भी समयानुसार जरा जीर्ण होने लगते हैं और गिरकर खंडहर बन जाते हैं। इस कबाड़ को हटा कर लोग नई संरचना करते हैं। पर्वत स्थिर प्रतीत होते हैं पर वास्तविकता यह है कि वे भी उठते, धंसते और आगे बढ़ने-पीछे हटने की गतिशीलता अपनाये रहते हैं चाल भले ही धीमी हो । समुद्रों ने भी कितनी ही बार पलटा खाया है उनके खण्ड होते रहे है। वे कभी मिलते कभी बिछुड़ते देखे गये हैं। ग्रह-नक्षत्र भी नये बनते और पिछले बूढ़े होकर दम तोड़ते रहे हैं जिधर भी दृष्टि प्रसार कर देखा जाय, उधर ही परिवर्तन का विच्छिन्न माहौल काम करता दीखता है। इसी को दूसरे शब्दों में “प्रगतिशीलता “ भी कहा जा सकता है। इसे नकारा नहीं जा सकता झुठलाने से भी बात नहीं बनती। हमें तथ्य को समझाना और तद्नुरूप अपने मानस को उस प्रक्रिया के अनुरूप अपने को तैयार करने के लिये अभीष्ट चिंतन अपनाना चाहिये। किसी आग्रह पर अड़ कर नहीं बैठना चाहिये। हठ जड़ता का चिन्ह है। उस में तो यथार्थता को नकारने की अदूरदर्शिता काम करती रहती हैं। प्रथा परंपराओं में अनादि काल से परिवर्तन होता रहा है। आरंभ काल में जब साधनों का अभाव था, तब जीवन यापन की एक पद्धति थी। इसके उपराँत जैसे-जैसे ज्ञान की, साधनों की उपलब्धि का क्षेत्र बढ़ता गया, उसी अनुपात से रहन सहन एवं सोच विचार भी बदलता गया। यह प्रवाह निरंतर चलता आ रहा हैं इसे इतिहास के पृष्ठ उलटकर भली-भांति देखा समझा जा सकता है पिछली शताब्दियों में याँत्रिक वाहन नहीं हो। जलयान, वायुयान तार, टेलीफोन, कल-कारखाने, बिजली आदि का ही अता-पता भी न था। उन दिनों रहन-सहन की पद्धति भी आज जैसी न थी। जैसे-जैसे साधन बढ़े उसी के अनुरूप जीवन पद्धति में भी परिवर्तन हुआ और प्रचलनों में अंतर पड़ता चला गया। आज हम पाँच शताब्दियों में ही इतने बदल गये है, जिसे देखते हुये जमीन-आसमान जैसा अंतर हुआ समझा जा सकता है सहस्राब्दियों की बात छोड़ें, मात्र कुछ दशाब्दियों की और आज की परिस्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन करे तो प्रतीत होगा कि परिस्थितियाँ किस तेजी से बदलती गई? परिवर्तन किस आश्चर्यजनक ढंग से होते गये? बात यहाँ तक बढ़ गई कि पुरातन काल जैसी रीति-नीति और प्रथा परंपरायें अपनाये रखना अब किसी भी प्रकार संभव नहीं रहा। सघन वन प्रदेशों में जहाँ-तहाँ आदिम जन- जातियों के कुछ कबीले पाये जाते हैं, उनकी मनःस्थिति और परिस्थिति को देखकर आश्चर्य होता है कि वे इन दिनों में किस प्रकार उस पुरातन पद्धति को अपनाये रह सके है। उन्हें एक कौतूहल ही समझा जा सकता है इसे हठवादिता भी कहा जा सकता हे, पूर्वाग्रह या पिछड़ापन भी। यदि उनने प्रगति क्रम के साथ चलने की आवश्यकता, समझी होती प्रगतिशीलों ओर पिछड़ों के बीच ताल-मेल बैठाया होता, सामंजस्य बैठा होता तो निश्चय ही पूर्वाग्रहों ने हार मानी होती और अनगढ़ लोग उस गई गुजरी स्थिति से आगे बढ़ कर विकसित वर्ग में सम्मिलित हो गये होते। इसमें प्रगतिशीलों को भी उपेक्षा का दोषी ठहराया जा सकता है, पर अधिक दोष उस हठवादिता को दिया जायेगा जिसने समय के गतिशील प्रवाह को नहीं समझा और एक कदम आगे बढ़कर प्रस्तुत प्रगति के साथ संबंध जोड़ने में उत्साह नहीं दिखाया यह भूल किसी भी क्षेत्र से हो रही हो, वह परिणाम में घाटा ही प्रस्तुत करेगी। हम आदिम काल की ओर नहीं लौट सकते, बढ़ते आगे की ओर ही पड़ेगा । उल्टे पैरों पीछे की दिशा में चलने का कोई कौतूहल वो प्रस्तुत कर सकता है पर लंबी यात्रा कर सकता इस आधार पर संभव नहीं हो सकता । बुद्धिमानों आगे बढ़ने में ही है। यह समझा जा सकता हो कि प्रगति के अत्युत्साह में हम ऐसी अवाँछनीयता न अपना ले जा अनर्थ का कारण बने। धन उपकरण बुद्धि कला आदि उपयोगी वस्तुओं का भी दुरुपयोग अनर्थ पैदा करता है फिर प्रगति यदि शालीनता की मर्यादायें तोड़ने लगे, तो उसका परिणाम भी भयानक हो होगा। तथ्य को ध्यान में रखते हुये यदि प्रगति पथ पर अग्रसर हुआ जाय तो ही औचित्यपूर्ण है। प्रगति क्रम विज्ञान और बुद्धिवाद की बढ़ोत्तरी के साथ-साथ अधिक द्रुतगामी हुआ है जो परिवर्तन पूर्वकाल में धीमी गति से हजारों वर्षा में हो पाते वे अग अत्यन्त तेजी के साथ होगे लगे हैं। दुनिया अब बहुत छोटी रह गई है। प्रेम और संचार साधनों ने विभिन्न क्षेत्रों में बिखरी हुई विचारधाराओं का एक दूसरे के समीप खड़ा होने की स्थिति में ला दिया है। द्रुतगामी वाहनों ने साधनों और क्षेत्रों की दूरी अपेक्षाकृत बहुत कम कर दी है। क्रमशः संसार एक छोटे प्रदेश ”ग्लोगल क्लेज” की तरह आपस में सट गया है। संस्कृतियों के बीच असाधारण रूप में घुलने-मिलने की स्थिति उत्पन्न हुई है। एक ने दूसरे से बहुत कुछ सीखा, अपनाया है साथ ही सभी समुदायों ने अपनी पुरातन परंपराओं में से उन तत्वों को हटाने का प्रयत्न किया है जो सामयिक उपयोगिता की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे थे। भाषा ही , सांप्रदायिक, साँस्कृतिक कट्टरता क्रमशः अधिक लचीली होता गई है और प्रवाह उस दिशा में बढ़ रहा है जिसमें विश्वमानव की एकता के केन्द्र पर केन्द्रित होने के लिये प्रेरणा मिल रही है। लगता है अगली कुछ ही शताब्दियों में विश्वमानव इसी समझदारी अपना लेगा जिसमें उकता समता और सहकारिता के सिद्धांतों को पूरी तरह अपना लिया जायेगा। लोग अपने-अपने आग्रहों के प्रति कट्टर न रहेंगे। बात इस प्रकार बनेगी कि अनेकानेक मान्यताओं के बीच जहाँ जितनी उपयोगिता पाई जायेगी, वहाँ से उसे उतनी मात्रा में ग्रहण कर लिया जाएगा। जो समय से पीछे रह गया उस परंपरा के लिए कोई अग्रह नहीं करेगा। कम से कम एक दूसरे पर लादने का प्रयत्न तो करेगा ही नहीं। समन्वय का अर्थ प्रकारांतर से सहकारिता ही है। मिलजुल कर रहने काम करने, सामंजस्य बिठाने की प्रक्रिया ऐसी है जिसका सहभागी होने वाले प्रत्येक घटक की शक्ति अनेक गुनी बढ़ी जाती है। अकेला तिनका, पत्ता , धूलिकण, पौधा, मनुष्य सभी दुर्बल और अशक्त रह जाते हैं। उनके लिये कोई बड़ा काम कर सकता तो दूर-अपने आप की रक्षा करना भी कठिन पड़ता है। खेत में, उद्यान में उगे हुये पौधे सहयोगी, सहभागी बनकर अपने आप में सुदृढ़ एवं शोभायमान लगते हैं सरलता पूर्वक फलते-फूलते और सुदृढ़, सुरभित बने रहते हैं पर यदि उनमें से प्रत्येक चीज अलग-अलग रहे पृथक -पृथक बने तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित न रहेगी। फलने-फूलने का अवसर तो कदाचित ही आवे इस सिद्धांत को सृष्टि के सभी समझदार प्राणी जानते और मानते हैं। चिड़िया झुण्ड बनाकर रहती और साथ-साथ उड़ती है। यह माना जाना चाहिए कि जो पृथकता की नीति अपनायेगा उसकी संकीर्णता अहमन्यता उसी के लिए घातक सिद्ध होगी। झुण्ड से अलग रहने वाले पशु ‘पक्कड़’ कहे जाते हैं उनका स्वभाव अन्यों की अपेक्षा अधिक उद्धत, अधिक अनगढ़ और अधिक असुरक्षित रहता है वे अपने आप में अपेक्षाकृत अधिक आशंकित रहते हैं दूसरे भी उन्हें देखकर आतंकित हो उठते हैं, बचने या खदेड़ने का प्रयत्न करते हैं। इस स्थिति में रहना, मनुष्य के लिए घातक और संकटापन्न ही बनता है। इससे बचना एवं सहकार- मनस्वी की नीति अपनाकर प्रगति पथ पर चलते रहने में ही समझदारी हे, इसे तथ्य को भली प्रकार हृदयंगम कर लिया जाता चाहिए।


लोकसेवी (Kahani)

लोकसेवी प्रकाश स्तम्भ के समान होते हैं दीपक के समान जलते हैं व अन्य- अनेकों को प्रकाश देते हैं। रात्रि का घना अंधकार था। यात्री को कई कोस आवश्यक काम से जाना था। रास्ता सूझ नहीं पड़ता था। एक गरीब की कुटिया से जलता उसका दीपक माँगा । उसने दे दिया। दीपक छोटा था, पर उसका प्रकाश यात्री से दस कदम आगे चलता। हवा में बुझने न पाये इसका ध्यान रखा चलता। यात्री गन्तव्य स्थान तक पहुँच गया। प्रकाशवान् व्यक्तित्व भले ही छोटे हों, किसी के पास है तो उसे संकट से उबार देते हैं।


संयमी सदासुखी

जीवन तो सभी को मिलता है और वह जैसे-तैसे कट भी जाता है, पर जीवन को अच्छे ढंग से जीना बहुत कम लोग जानते हैं किसी भी प्रकार का असंयम निश्चय ही जीवन को अल्प कालीन को दीर्घायु और सुखी बनाने के लिए प्रत्येक बात में संयम से काम लेना बुद्धिमानी है। जिस प्रकार उत्तम स्वास्थ्य का रसथ्य संतुलित सात्विक भोजन है, उसी प्रकार सुखी का रहस्य भी संतुलित और संयमित व्यवहार-व्यापार है। जैसा कि मि0 गेलार्ड हासर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “लुक यंगर लिव लागर” में लिखा है जीवन का उत्तरार्द्ध ही वह महत्वपूर्ण भाग है जिसमें प्रवेश करने पर हमें अपने जीवन का वास्तविक बोध हो जाता है कि हमारा जीवन सफल रहा या विफल। वस्तुतः हमारा जीवन एक पुस्तक के समान है और उसका एक-एक दिन एक-एक पृष्ठ के समान हैं यदि हम अपनी जीवन पुस्तक को संतुलित रखते हैं, तो उसके पूर्वार्द्ध के पृष्ठो को पढ़कर उत्तरार्द्ध जीवन में लाभ उठाया जा सकता है। यदि ऐसा नहीं करते हैं तब भी जीवन के पूर्वार्द्ध के समाप्त होने पर उसके उत्तरार्द्ध भाग को संतुलित बनाया जा सकता है। अतः निराश होने का कोई कारण नहीं है। जीवन में जहाँ कही भी कमी अथवा असंतुलन हो तो उसे ठीक करने का हमें सतत् प्रयत्न करना चाहिए। ऐसा करने से ही जीवन सुखमय बन सकेगा। जीवन की दो अवस्थाएँ होती है। एक बहिर्मुखी और दूसरी अंतर्मुखी पहले हमें इस बात का पता लगा लेना चाहिए कि इनमें से किस अवस्था को उन्नत करना है। यदि पूर्वार्द्ध में जीवन संतुलित एवं संयत नहीं हो सका, तो वह उत्तरार्द्ध में संतुलित एवं संयत हो सकता है। बशर्ते कि हम में साहस हो और अपने अन्दर छिपी हुई शक्ति को विकसित करने की कला हमें ज्ञान हो। उस कला द्वारा हम अपने में सोई शक्ति को जगाकर नवचेतना, नई उमंग तथा नवजीवन प्राप्त कर सकते हैं। आज तक यह नहीं देखा गया कि असंतुलित जीवनयापन करने वाले, शरीर और मन से स्वस्थ रहकर लंबी आयु पाये हों और उनकी स्वाभाविक मृत्यु हुई हो, जब कि इसके विपरीत ऐसे अनगिनत उदाहरण दिये जा सकते हैं। कि लोगों ने सतर्क रहकर संतुलित और संयमी-जीवनयापन किया है और उसके फलस्वरूप उनकी लंबी आयु हुई है और वे प्राकृतिक मृत्यु से मरे है। इसलिए हम इस बात को बलपूर्वक कह सकते हैं कि एक वृद्ध व्यक्ति, भले ही वह दुर्बल हो, पर संयमों जीवन बिताने वाला ही, उस युवा व्यक्ति से कही अधिक दिनों तक जीने को क्षमता रखता है, जो तथ्य में शंका करने की ले मात्र भी गुंजाइश नहीं है। शरीर के स्वास्थ को पूर्णतः बनाये और स्थिर रखने के लिए जीवन को ऐसे संयमित ढंग से ढालना चाहिए, जिसका मानव-जीवन के कल्याण से संबंध रखने वाले प्राकृतिक विधानों के साथ पूरा-पूरा सामंजस्य हो। इसका अभिप्रायः सब तरह की अनीतियों, बुरी आदतों और व्यसनों से दूर रहना है, जो हमारी जीवनी- शक्ति कर शोषण और शरीर में आरोग्य प्रदान करने वाली एवं स्वस्थ रखने वाली शक्ति को क्षीण किया करते हैं। प्राकृतिक जीवन-पद्धति के अनुयायी यह भली-भांति जाने है कि अस्वास्थ्य की दशा अयुक्त आहार के ही कारण उत्पन्न हुआ करती है, जो सभी प्रकार के रोगों का कारण और आयु को क्षीण करने वाली है। पर ऐसे लोग भी कम नहीं है, जो खाने-पीने के लिए गलत तरीके को अपनाये हुए है और उसे अपनाये ही रहना चाहते हैं , यद्यपि वे अच्छी तरह जानते हैं कि उनके खान-पान का वह तरीका उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस प्रकार की मनोवृत्ति को आत्म - घात की भूमिका की कहनी चाहिए। संतुलित जीवन और संयम एक दूसरे के बिना काम नहीं चल सकता। संयम मानव जीवन का सर्वोच्च आदर्श है। खान-पान, रहन-सहन, विचार-व्यवहार आदि संतुलित जीवन के समस्त कार्य-कलाप में संयम की मर्यादा का पालन कर मनुष्य शरीर, चित और मस्तिष्क स्वस्थ और सुखी बना रह सकता है संयम अर्थात् इन्द्रिय - निग्रह करना जरा कठिन अवश्य है, पर यही वास्तविक जीवन कला है जिसके बिना मनुष्य किसी भी अवस्था में सुखी नहीं रह सकता।संयम मन, वाणी और कर्म तीनों का होना चाहिए मनः संयम में इन्द्रियों के अधीन रहने की आदत सबसे बड़ी बाधा होती है। इस बाधा को दूर करने के लिए हमें बुद्धि के अंकुश से काम लेना होगा। स्वयं बुद्धि को इन्द्रियों के पीछे-पीछे भागने नहीं देना चाहिए। कौन - कौन से अहार-विहार श्रेयस्कर है और उनका किस सीमा तक सेवन करना चाहिए, कब और कितना परिश्रम या विश्राम करना चाहिए आदि बातों का निर्णय अंधी इन्द्रियों पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं। ये काम तो स्वयं बुद्धि के है और उसे ही करने चाहिए। भ्रष्ट बुद्धि को अभ्यास द्वारा धीरे-धीरे शुद्ध बना लेना चाहिए, ताकि वह इंद्रियों पर शासन कर सके, उन पर नियंत्रण रख सके पर यदि उसको इन्द्रियों का दास ही बना रहने दिया जायेगा तो धोखा होगा और मन कभी संयत न हो सकेगा। फलतः जीवन में असंतुलन की स्थिति न आ सकेगी जीवन सुखी न हो सकेगा। मन के संयम से वाणी का संयम कम महत्वपूर्ण नहीं है। वाणी में इन्द्रियों को चलायमान करने की शक्ति होती है। अतः वाणी का संयम सुखी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। व्यर्थ वाद - विवाद,, बकवास ,गाली , गलौज तानाशाही, भद्दे मजाक तथा असत्य भाषण आदि असंयमित वाणी के लक्षण हैं। इससे वैमनस्य की उत्पत्ति होती हे, वैर भाव बढ़ता है, जीवन में कटुता आती है। इसके विपरीत प्रेम भरे मीठे वचन और सत्य भाषण विश्व विमोहन होते हैं। इनसे मैत्री बढ़ती है, वातावरण में प्रसन्नता आती हे और जीवन में आनंद की लहर उमड़ पड़ती है। सत। कर्म और असत् कर्म समझना तथा तदनुसार आचरण करना कर्म का संयम कहलाता है। इस कार्य में विवेक - बुद्धि की सहायता आवश्यक होती है। क्रम का संयमी सच्चा कर्मयोगी कहलाता है। चाहे मार्ग में कितनी ही विघ्न बाधाएं हो, वह कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता अपनी जीवन यात्रा को सुगम सुगम, सरल और सुखद बनाने के लिये यह निताँत आवश्यक है कि हम यथा संभव कर्तव्य परायण बनें सच्चे कर्मयोगी बने। सच्चा कर्मयोगी ही सफल जीवन का सच्चा आनन्द प्राप्त कर सकता है। संसार में सभी दीर्घजीवी संयमित जीवनयापन से ही लंबी आयु के अधिकारी हुए थे। इस संबंध में कुछ दिन पूर्व अमरीका में 10 वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्तियों की आदतों और रहन-सहन का अध्ययन किया गया था जिन बातों से वे दीर्घायु हुए थे उनका लोगों में प्रचार करना इस अध्ययन किया गया था। जिन बातों से वे दीर्घायु हुए थे, उनका लोगों में प्रचार करना इस अध्ययन का लक्ष्य था। पता लगा कि उनकी लंबी आयु का रहस्य मुख्यतः उनका संयमित जीवन ही था। वे शराब और तम्बाकू आदि छूते तक न थे। उनमें से बहुतेरों ने कभी माँसाहार भी नहीं किया था। वे फल, दूध, शहद सब्जी और मक्खन का सेवन विशेष रूप से करते थे वे खूब परिश्रम करते थे और गहरी नींद सोते थे। हमारे देश के अनेकों दीर्घजीवी संतों, राजनेताओं ने अपने ।स्वस्थ जीवन का रहस्य इन शब्दों में व्यक्त किया “शारीरिक दृष्टि से में पूर्णतः सुखी हूँ। प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करना नहीं भूलता । मुझे स्फूर्ति और ताजगी का अनुभव होता है। सिर दर्द, मैं कभी जानता ही नहीं । मुझे इस बात से बड़ी हैरानी होती है। “ जीवन में संयम हो और करने के लिए काम हो , तो 101 तक स्वस्थ जीवन बिताया जा सकता है। “स्व पंडित सातवलेकर जी, स्व लोकमान्य तिलक, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी , तथा 101 वर्षीय डा कर्वे विश्वेश्वरैया आदि जितने भी महान व्यक्ति हो गये हैं या अभी विद्यमान है। सभी संयमी ओर संतुलित जीवन अपना कर ही महान और आयुष्मान् बने है।


माया ही बंधन है (Kahani)

इंग्लैण्ड के बादशाह हेनरी पंचम जब युवराज थे तब बड़े उजड्ड थे। एक बार न्यायाधीश ने किसी अपराधी को कानून के अनुसार दंड दिया। इस पर हेनरी ने न्यायाधीश से कहा-”मैं युवराज की हैसियत से आदेश देता हूँ कि आप इसे छोड़ दें। न्यायाधीश ने आदेश नहीं माना और कहा-कानून युवराज से बड़ा है। इस पर बौखलाये हेनरी ने न्यायाधीश को एक थप्पड़ जड़ दिया जज ने तुरंत पुलिस बुलाकर उसे जेल में अंदर करा दिया। साथ ही एक नोट लिख कर भेजा।”आगे चलकर आपको इस देश का राजा बनना है। अगर आप ही राज्य के कानूनों का सम्मान न करेंगे, तो प्रजा आपकी आज्ञा क्यों मानेगी। हेनरी ने अपनी भूल मानी और माफी माँगी। जब वह राजा बना। तब भी उस न्यायाधीश की घटना को सदा सराहता रहा।

स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्य को एक कथा सुनाई। एक तत्व ज्ञानी अपनी पत्नी से कह रहे थे, संध्या आने वाली है। काम समेट लो। एक सिंह कुटी के पीछे यह सुन रहा था उसने समझा संध्या कोई बड़ी शक्ति है, जिससे डर कर यह निर्भर रहने वाले ज्ञानी भी अपना सामान समेटने को विवश हुए है। सिंह चिंता में डूब गया और संध्या का डर सताने लगा। पास के घाट का धोबी दिन छिपने पर अपने कपड़े समेट कर गधे पर लाने की तैयारी करने लगा। देखा तो गधा गायब। उसे ढूंढ़ने में देर हो गई। रात घिर आई और पानी बरसने लगा। धोबी को एक झाड़ी में खड़खड़ाहट सुनाई दी, समझा गधा है। तो लाठी से उसे पीटने लगा-धूर्त यहाँ छिपकर बैठा सुनाई दी, समझा गधा हैं।सिंह की पीठ पर लाठियां पड़ी तो उसने समझा यही संध्या हे सो डर से थर- थर काँपने लगा धोबी उसे घसीट लाया और कपड़े लादकर घर चल दिया रास्ते में एक दूसरा सिंह मिला उसने अपने अपने साथी की दुर्गति देखी तो पूछा यह क्या हुआ? तुम इस प्रकार लदे क्यों फिर रहे हो। सिंह ने कहा संध्या के चंगुल में फंस गया, वह बुरी तरह पीटती है और इतना वजन लादती है। सिंह को कष्ट देने वाली संध्या नहीं उसकी भाँति थी, जिसके कारण धोबी को कोई बड़ा देव दानव समझ लिया गया और भार एवं प्रहार बिना शिर हिलाये स्वीकार कर लिया गया । हमारी यही स्थिति है। अपने वास्तविक स्वरूप को न समझने और संसार के साथ जड़ पदार्थों के साथ अपने संबंधों का ठीक तरह ताल मेल न मिला सकने की गड़बड़ी ने ही हमें उन विपन्न परिस्थितियों में धकेल दिया है, जिनमें अंधकार के अतिरिक्त और कुछ दीखता ही नहीं। इस भांति को ही माया कहा गया है। माया को ही बंधन कहा गया है। और दुख का कारण बताया गया है। यह माया और कुछ नहीं वास्तविकता से अपरिचित रखने वाला अज्ञान ही है।


रक्षक के हाथ बड़े लंबे हैं।

“ आज रक्षक भक्षक बन गया है। हम किसी प्रकार तुझे सेना में जाने से रोक नहीं सकते।” मेरी माता ने कहा था। उस माता ने जिसने जीवन के अस्सी वसंत देख लिए है जो पिछले बाईस वर्ष का अपना वैधव्य जीवन एक मात्र अपने इस पुत्र के सहारे बिताती रही है। जिसकी भौहों तक के केश श्वेत ही चुके है। जिसके शरीर पर काल की रेखाएं झुर्रियां के रूप में सर्वत्र गिनी जा सकती है। जो इस बुढ़ापे में भी घर के काम से बचा समय अपने छोटे बगीचे में पेड़ पौधों को सींचने-गोड़ने तथा घास निकालने में बिता देती है। फलों को कुतरने वाली चिड़ियों एवं गिलहरियों को भी जो बुरा-भला कहने के बदले-चुगने को दोनों समय नियम से दाने डालती है। जिसे किसी से झगड़ने पूरे कस्बे में किसी ने कभी नहीं देखा। वह मेरी माँ रो रही थी । उसने मुझे विदा लेते समय कहा था जहाँ तक बन सके अपने हाथ निरपराधो के रक्त से रँगने से बचना। परमात्मा तेरी रक्षा करेगा? प्रत्येक युवक को सैनिक शिक्षा लेनी ही पड़ती है हमारे देश में और प्रत्येक सैनिक आयु का व्यक्ति इस युद्ध के प्रारंभ में ही सेना में बुला लिया गया। मेरी माँ को चाहे जितना दुःख हो हजारों माताओं को उसा ही दुःख है। किंतु जर्मनी में फयुहरर (हिटलर) के आदेश को कोठ्र असह्य वृद्धा कैसे टाल सकती थी। मुझे सैनिक प्रशिक्षण पहले ही प्राप्त ही चुका था। अब कुछ महीनों में मैं पनडुब्बी पर काम करने के लिए शिक्षित किया गया, क्योंकि में बहुत कुछ जल सेना की शिक्षा भी प्राप्त कर चुका था। जर्मनी की जल सेना छोटी है। ग्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका की संयुक्त जल सेना चर्चा तो दूर रही कलेले ब्रिटेन को जल शक्ति से टक्कर लेने की बात भी सोची नहीं जा सकती। किंतु-फ्युहरर को अपनी पनडुब्बियों पर भरोसा है। विपक्षी के जहाजों को डुबा कर उसकी जल सेना की रीढ़ तोड़ दी जा सकेगी। यह कठिन भले ही हो, असंभव नहीं लगता है और जर्मनी का शौर्य असंभव को संभव बनाने से ही कब हिचका है। मेरा काम न यान संचालन करना है और न तारपीड़ो से प्रहार करना। मैं यंत्र कक्ष निरीक्षक हूँ। कभी-कभी रेडियो संवाद लेने और सुनने का भी काम कर रहा हूं। वैसे यह तो है ही कि पनडुब्बी के प्रत्येक व्यक्ति को उसके संचालन, तारपीडो प्रहार तथा यंत्रों के समस्त प्रयोगों की शिक्षा लेनी पड़ती है। कब कैसी दुर्घटना होगी और किस व्यक्ति के लिए कौन सा काम अनिवार्य बन जायगा यह कहा नहीं जा सकता। कोई कह सकता है कि मैंने किसी जहाज पर अपने हाथ से तारपीड़ी नहीं चलाया, अतः हत्या के रक्त से बचा हूँ किंतु मैं अपने आपको धोखा कैसे दे सकता हूँ। मुझे ही अपने यंत्रों से पता लगा कर सूचित करना पड़ता था कि विपक्षी जहाज कहाँ है? किस ओर जा रहा है? किस स्थान से उस पर आघात करना ठीक रहेगा, यह निर्णय भले कप्तान करता हो किंतु मेरा योग इस विनाश में कम नहीं बिगाड़ा जिन्हें हम जानते तक नहीं। यह भी तो हो सकता था कि वे कभी हमारे देश पर आक्रमण करने न जायँ। लेकिन वे विपक्ष के जहाज पर हे, जब वे सर्वथा असावधान होते, हमारी पनडुब्बी से उनकी मृत्यु दौड़ पड़ती उनकी ओर। हमारी पनडुब्बी में पर्याप्त पैट्रोल था। एक महीने हम बराबर समुद्र में रह सके, इतना ईंधन, भोजन का सामान और आधार के प्रचुर अन्न । हमने अफ्रीका के दुर्गम पश्चिमी तट के एक स्थान पर कुछ खाद्य पदार्थ और पैट्रोल छिपा रखा था। संकट के समय वह हमारे काम आता। दो बार बीच में हम वहाँ उतरे भी थे। कुल सात व्यक्ति थे हमारी पनडुब्बी में सब युवक और साहसी हमने ब्रिटेन के पाँच जहाज डुबाए, जिनमें तीन भारी सैनिक जहाज था, कुछ इसका यह परिणाम हुआ कि ब्रिटेन के हवाई जहाज और विध्वंसकों का पूरा दल हमारी खोज में निकल पड़ा । वन में जैसे किसी नरघाती चीते को ढूंढ़ने लगे। संभव उन्होंने अपने अन्वेषण के क्षेत्र बाँट लिए हो। “ बचने और भागने की नीति कायरों की नीति है। “हमारे केन्द्र को परिस्थिति की सूचना दी तो वहाँ से फटकार मिली।” आघात करो और शत्रु के अधिक से अधिक विध्वंसकों को नष्ट कर दो।”तुम्हारे दो सहयोगी और आ रहे है। हमारा कप्तान आवेश में आ गया। केवल बारह घंटों में हमने विपक्ष के तीन विध्वंसकों को और जल समाधि दे दी। किंतु इस उत्साह का दुष्परिणाम सम्मुख आ गया। हम घिर गए। ब्रिटिश पोतों ने इस प्रकार विस्फोटक फेंकने प्रारंभ किए, जिससे मिलों तक समुद्र का पानी पूरी गहराई में ऐसे खौलने लगा, जैसे चूल्हे पर चढ़ा पतीली का पानी। भयंकर विस्फोट का शब्द । मैं मूर्छित हो गया और फिर मुझे कुछ पता नहीं है कि मेरे साथियों का मेरी पनडुब्बी का अथवा हमें घेरे में लेकर मौत की वर्षा करने वाले उन विपक्ष के विध्वंसकों का क्या हुआ? केवल अनुमान कर सकता हूँ कि पनडुब्बी के चिथड़े उड़ गये होगे। मेरे साथी समुद्र के गर्भ में सो गए होंगे समुद्री जंतुओं ने उन्हें पेट में पहुँचा दिया होगा। जल के ऊपर तेल का प्रवाह जब तैर आया होगा, विपक्षी पोत अपनी सफलता का आनन्द मानते लौट गए होंगे, किंतु मैं ‘रक्षक के हाथ बहुत लंबे हैं’ इसलिए मैं यह सब लिचाने को बचा हुआ हूँ। जब मुझे चेतना प्राप्त हुई, तेज धूप थी। सूर्य आकाश में सिर के ऊपर था। पीड़ा से मेरा पूरा शरीर फटा जा रहा था। शीघ्र ही उल्टी हो गई। बहुत सारा खारा पानी निकला पेट से। शरीर और सिर का दर्द कुछ कम हुआ। किंतु प्यास के कंठ सूखा जा रहा था। हिलने की शक्ति नहीं थी। मैं आधे से चित पड़ गया और पता नहीं कब तक पड़ा रहा। संभवतः’ मैं फिर मूर्छित हो गया था इस बार मुझे वर्षा की बूंदों ने जगाया। बड़ी-बड़ी बहुत तेज वर्षा किंतु कुल आधे घंटे के पश्चात् फिर सूर्य निकल आया। कुछ वर्षा का जल मैंने मुंह खोलकर कंठ तक पहुँचाया था। अब बैठकर मैंने कमीज खोली और उसे मुख में निचोड़ने लगा। थोड़ी शक्ति मिली जल पीकर। मैं चौक गया, क्योंकि मैं जिस आधार पर पड़ा हूँ, वह स्थिर नहीं है। वह हिल रहा है और संभवतः चल भी रहा है मैं उठ कर खड़ा हो गया और देखने लगा कि मैं कहाँ हूँ। चारों ओर अनंत समुद्र है। सूर्य ढलने लगा है अतः मैं केवल दिशा का अनुमान कर सकता हूँ, किंतु मैं इस समय कहाँ हूँ-यह जानने का कोई उपाय नहीं। यह मैंने देख लिया है कि जिस आधार पर मैं इस समय हूँ, वह एक तैरता हिमखण्ड है- ध्रुव से समुद्र मैं तैर आने वाला हिमखण्ड । जल में वह कितना डूबा है पता नहीं किंतु ऊपर अब वह दो-ढाई गज लंबा है । इसका अर्थ है। कि मैं उत्तर ध्रुव से चलने वाली शीतल जल धारा में दक्षिण अफ्रीका की ओर इस हिम खंड पर बहता जा रहा हूँ ऊपर एक भारी गिद्ध चक्कर लगा रहा है। वह मेरी मृत्यु की प्रतीक्षा करता होगा। वह समुद्री गिद्ध अब दस - पंद्रह दिन मजे से प्रतीक्षा करता साथ चल सकता है। मृत्यु में सिहर उठा। जेबों का टटोलने पर पेंसिल,डायरी और कुछ गोलियाँ मिल गयी है। ये आहार की गोलियाँ है। इनसे पेट नहीं भरता, क्ष्द्वाधा का कष्ट नहीं मिटता, किंतु शरीर को क्षमता मिल जाता है। काम करने को क्षमता बनी रहती है। हमारे वैज्ञानिकों ने विपत्ति में पड़े सैनिकों के लिए इनका आविष्कार किया था। मैंने तो गोली एक साथ खाली है। शरीर में अब स्फूर्ति का अनुभव करता हूँ। दर्द भी घटा है। किंतु यह तैरता, हिमखंड इन बहते हिमखंडों को सूचना देने वाला विभाग क्या इनसे अनभिज्ञ है? क्या इसके अपेक्षणीय आकार तक गल जाने के कारण अब उसने इसका पता रखना और इसके संबंध में जहाजों को सूचना देना-बंद कर दिया हे? क्या कोई जहाज मिलेगा मार्ग में? यह भी तो सम्भव है कि इसके प्रवाह की सूचना दी गयी हो और इधर से कोई जहाज आये हो नहीं अंतिम संभावना ही अधिक है। इसका अर्थ जो कुछ हे जीवन के अंतिम क्षण तक उसे लेकर आतंकित क्यों बनूँ। किंतु मैं यह सब क्यों लिखने बैठा हूँ? क्या उपयोग इसका? इस हिमखंड पर बैठे-बैठे और कर भी क्या सकता हूँ। समय काटने का साधन भी तो कुछ चाहिए। रात्रि का अंधकार फैलने से पूर्व एक दुर्घटना और हो गयी। मैं जिस हिमखंड पर था, उसमें एक रेखा दिखी बस बाल के समान पतली रेखा। शीघ्र ही वह दरार बन गयी और हिमखंड दो टुकड़ों में विभक्त हो गया। मैं जिस टुकड़े पर बैठा था, वह बहुत छोटा हो गया था। कूदकर मैं दूसरे टुकड़े पर आ गया। रात्रि कैसे व्यतीत हुई पूछिए मत। सूर्य की किरणों को देर तक मेरा शरीर सेंकना पड़ा, तब कही में उठकर बैठने योग्य हुआ हूँ किंतु यह सम्मुख क्या है? हे भगवान। हे दयावान! यह तो पृथ्वी है ये वृक्ष दिख रहे है समुद्र तट के । मेरे प्रभु! ते तेरे लंबे हाथ मुझे बचाने यहाँ तक बढ़ आये है। माँ ने सच कहा था, रक्षक के हाथ बहुत लंबे हैं। इस घटना को बीते क्षण पल कास कितने गुजरे ठीक पता नहीं। वर्षा पीछे अमेरिकन उन्थ्रोपोलिजिस्ट राबर्ट बेलटाइन को समुद्र तट पर एक डायरी मिली। उसमें इस जर्मन सैनिक के लिखे अनुभव है। ढूँढ़ - खोज की प्रवृत्ति वाले बेलन्टाइन ने अपनी पुस्तक-” दन उस्टानिशमेण्ट माई लाइफ “ में इसका जिक्र करते हुए लिखा है कि काँगो के सुदूर उत्तरी गहन जंगली भाग में अत्यंत बर्बर बौने लोग रहते हैं । काँगो के सात फुट ऊंचे बालूवा’जाति के शूर भी उन बौनों का नाम से काँपते हैं। शायद किसी ने साहस नहीं किया उस अंचल में जाने का। बहुत पता करने पर मालूम हुआ कि कोई गौर वर्ण तरुण उन बौनों के बीच रहते हैं। दूर से दो एक शिकारियों ने उसे देखा है। बौनों के संपर्क में आने वाली जाति के मुखिया का कहना है” वह बौनों का देवता है। उसी के कारण बौनों अत्यधिक निर्भय हो गए है और अब नर हत्या भी उन्होंने छोड़ दी है। “ वह देवता कहता है कि “ पूरे संसार का कोई स्वामी है और उसके रक्षा करने वाले हाथ भले दीखते न हो, सब कही विपत्ति से बचाने को बढ़ जाते हैं। किंतु प्राणियों के मारने वाले को वह रक्षक पसंद नहीं करता।”‘


Quotation

देवालय टूटकर खँडहर बन सकते हैं, गिरकर समय के साथ नष्ट हो सकते हैं। लेकिन उत्तम ज्ञान और सद्विचार कभी नष्ट नहीं होते। - श्रीराम शर्मा आचार्य


संकल्प सिद्धि हेतु एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया

मंत्र-जप को व्रत संकल्प को प्रबल - प्रखर बनाने का एक सशक्त माध्यम माना गया है । अतः भौतिक जीवन में उस की आवश्यकता महसूस की जाती हैं यों तो जपयोग कहने का तात्पर्य सामान्यतया अध्यात्म साधना और ईश्वर-उपासना से लिया जाता है, पर जानने योग्य तथ्य यह है कि अध्यात्म क्षेत्र में जितनी इसकी महत्ता उपयोगिता है उससे कोई कम भौतिक क्षेत्र में नहीं है। भौतिक जीवन की समृद्ध बनाने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, कारण कि किसी व्यक्ति की सफलता-विफलता का मुख्य हेतु अस्थिर और अव्यवस्थित चित वृत्तियाँ होती है। जो इन्हें संयमित कर लेता अथवा शुभ अशुभ भाव संकल्पों के आधार पर अच्छों को सुरक्षित रख बुरी को निकाल बाहर करता है जीवन में वही सफल ही पाता है। सामान्य जीवन में उपयोग यही कार्य संपन्न करता है। वह अनावश्यक संकल्पों को शमित और शुभ संकल्पों को पोषण देकर सुदृढ़ बनाता और अंततः उसकी सिद्धि में सहयोग करता है। वस्तुतः मानवी चित भाव संकल्पों का विशाल भण्डागार है। उसमें अनेकानेक प्रकार के शुभ - अशुभ संकल्प भरे पड़े होते हैं, पर अधिकांश लोगों में इसकी स्थिति अव्यवस्थित स्टोर रूम जैसी होती है। वे जिन संकल्पों को पोषण देकर उगाना - बढ़ाना चाहते हैं प्रायः वे अधिक समय टिक नहीं पाते और जिन्हें बार-बार हटाने मिटाने की कोशिश करते हैं, विस्थापन बने रहते हैं। इसी प्रकार जो बाते स्मृति में लगातार बनी रहती आवश्यक होती है, वह विस्मृत हो जाती है। और अनावश्यक अनुपयोगी बाते बरबस याद आती रहती है। ऐसे किसी एक संकल्प पर अपने चित को स्थिर नहीं रख पाते। प्रयास तो करते हे पर अगले ही पल मन में कई अन्य विचार उमड़ने - घुमड़ने लगते हैं जिससे आरंभिक संकल्प मौन हो जाता है एवं क्षुद्र लौकिक विचार प्रमुख बन जाते हैं ऐसे अस्थिर चित्त को एकाग्र करने का एक कारगर उपाय जप है। इसके माध्यम से अंतः के समस्त संकल्प-विकल्पों को निकाल बाहर कर मन को एक निश्चित वृत्ति में लगाकर उसे उस उद्दंड भूत की तरह साधा जा सकता है जो काम नहीं मिलने पर साधने वाले को ही मार डालने की बात करता है। कुछ लोगों का विश्वास है कि एक अन्य उपाय द्वारा भी मन को सुसंस्कृत बनाया जा सकता है उनका कहना है कि यदि अंतस् की वृत्तियों पर कड़ी नजर रखकर सूक्ष्म दृष्टि से उसके शुभाशुभ का निर्धारण कर लिया जाय तो इतने भर से चित व्यवस्थित हो जायगा किंतु इस विचार में कोई प्राण नजर नहीं आता । इससे इतना तो संभव हो सकता है कि भली बुरी वृत्तियों की जानकारी मिल जाय, पर इससे अस्तव्यस्तता समाप्त हो जायगी-ऐसा नहीं कहा जा सकता। शास्त्रों में नाम-स्मरण को अमोघ उपचार सुझाया गया है। आप्त वचनों के अनुसार इसमें इतनी विलक्षण शक्ति है कि वह चित को सदा निर्धारित संकल्प पर स्थिर रखता है। आर्षग्रंथों संकल्प पर स्थिर रखता है। आर्षग्रंथों में इसकी महिमा का बखान किया गया है। जिसके पीछे अनुभवगम्य आध्यात्मिक और तर्क सिद्ध बौद्धिक दोनों आधार है। अनुभवगम्य इसलिए कि आत्मा को गति सदा सत् संकल्पों की ओर होती है। इस कार्य में भगवान की ओर से भी सहायता मिलती है। यदि इच्छा शक्ति दृढ़ रही तो उस संकल्प की जीवन में उतरते देखा जा सकता है दूसरे शब्दों में प्रबल संकल्प सदा सिद्धि हो कर रहते हैं। उनकी सिद्धि प्रत्यक्ष गतिविधियों पर जितनी निर्भर है उससे कही अधिक महत् सत्ता की परोक्ष इन्द्रियातीत शक्ति पर अवलंबित है। यह सत्ता मात्र संकल्प के अनुरूप बुद्धि विकसित ही नहीं करती वरन् किसी अगोचर विधि द्वारा स्थिति के अनुरूप परिस्थिति भी निर्मित करती है। जप द्वारा इसी का सफल क्रियान्वयन सहल संभव हो पाता है वन-उपवन के वृक्ष वनस्पतियों को यह नहीं विदित होता कि वे बादलों को अपनी ओर आकर्षित कर उन्हें बरसने के लिए किस प्रकार बाधित करते हैं। पर उन्हें इतना अवश्य पता होता हे कि इससे पूर्व उनने इसकी आवश्यकता महसूस की थी। ठीक यही बात मनुष्य के संबंध से भी है। उसे यह नहीं ज्ञात होता है कि ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति अनुकूल कैसे बनेगी, और उसकी इच्छा पूर्ति कैसे संभव हो सकेगी? यदा कदा परिस्थितियां इतनी विकट होती है। कि उन्हें देखकर व्यक्ति को नैराश्य घेरने लगता है पर यदि दृढ़व्रती हो तो न केवल उसके स्वयं के प्रयत्न पुरुषार्थ से वरन् अन्य अनेक माध्यमों से भी उसे ऐसी सहायता प्राप्त होने लगती है। कि प्रतिकूलता धीरे-धीरे अनुकूलता में जीवन में ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई हो आत्म निरीक्षण करने पर उसे इसकी सत्यता का आभास अवश्य होने लगता है संभव है। वह इस प्रक्रिया की वैज्ञानिकता से अनभिज्ञ हो और इसे पूर्णतः भगवद् कृपा, अपना सौभाग्य अथवा देव-अनुकंपा मान बैठा हो पर वास्तविकता यह कि यह उसके दृढ़ संकल्प तीव्र अंभरप्सा और परमसती के अनवरत स्मरण का ही परिणाम है। वस्तुतः जब किसी व्रत को उच्चस्तरीय उद्देश्य का बारंबार स्मरण किया जाने लगता है तो वह व्यक्ति के मन मस्तिष्क में इस तरह छा जाता है। कि तब जो क्रिया प्रयास बन पड़ते हैं, उनमें न्यूनाधिक मात्रा में उसकी अभिव्यक्ति अवश्य होती हैं इस प्रकार ध्यान उस ओर लगा रहने और लगातार प्रयत्न बन पड़ने से उसकी संसिद्धि संभव हो जाती हे छोटे-शब्दों अथवा वाक्यों से अभिव्यक्त होने वाले व्रत-संकल्पों का स्मरण तो इस विधि द्वारा संभव है पर लंबे -चौड़े संकल्पों का निरंतर स्मरण कैसे बन पड़े ? इसके लिए शार्टहैण्ड में किस प्रकार कई-कई वाक्यों को कुछ ही शब्द संकेतों द्वारा व्यक्त कर देने की व्यवस्था है वही प्रक्रिया अपनाने का निर्देश विशेषज्ञ यहाँ देते हैं इस प्रकार सुविधानुसार अपने संकल्प का कोई छोटा प्रतीक -प्रतिनिधि शब्द गढ़ा जा सकता है। और उसका लगातार स्मरण करते रहकर उस व्रत को परिपुष्ट किया जाता रह सकता है। इसी को मंत्र जप कहा गया है। अध्यात्म जगत में इसके लिए ( हरि ( हरि ( तत्सत् सोऽहम् जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। यहाँ इसका वैज्ञानिक तरीका है। यह कहना उपयुक्त न होगा कि जो कोई खुदा, अल्लाह , राम आदि का नाम जप रहा है। वह ‘ईश्वर ‘ का ही स्मरण कर रहा है वरन् उसकी इस प्रक्रिया का वैज्ञानिक अर्थ मात्र इतना है कि उससे वह मन के किसी संकल्प की सिद्धि प्राप्त कर रहा है। यदि कोई निर्धन जीभ से मात्र राम नाम जपता है, तो यह समझा जा सकता है कि इसमें उसका धन की कामना निहित है या दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है। कि वह “ऐश्वर्य” की कामना हेतु जप कर रहा है। इसी प्रकार यदि कोई व्यापारी नाम पर करता है तो इसमें उसकी व्यापार सफलता का उद्देश्य किया हो सकता है। या यों कहा जाय कि वह ‘सफलता’ का जप करता है। दोनों के प्रयत्न -पुरुषार्थ भी किसी लौकिक संकल्प की पूर्ति के लिए नियोजित होते हैं यहाँ जानने योग्य यह है कि अध्यात्म मार्ग को जपयोग प्रस्तुत जपयोग प्रक्रिया से नितांत भिन्न है। अध्यात्म पथ के पथिकों को इसके लिए कोई शाँत - एकांत तलाश करें भगवद् सत्ता का स्मरण और उसमें अपना विलय- विसर्जन करना पड़ता है इस स्थिति में जपयोग में यह सब कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । यहाँ इसके द्वारा मात्र उस संकल्प को प्रबल बनाये रखना पड़ता है। जिसकी संसिद्धि हम चाहते हैं। आजकल इसी जप का एक स्वरूप संस्करण है। सार्वजनिक आँदोलनों में अपने लक्ष्य पर जनता को ध्यान एकाग्र करने के लिए एक ‘नारा’ बना लिया जाता है। ताकि अंत तक जनता उस ध्येय प्राप्ति के लिए अपना संघर्ष जारी रख सके। वस्तुतः जपयोग का ही एक प्रकार है। इसकी तुलना निस्संदेह उस ‘राम धुन’ के साथ की जा सकती हैं जो भक्त मंडलियों में गाई गुनगुनाई जाती है। चूँकि वहाँ इसका उद्देश्य मात्र भक्ति - भावना का उत्पादन करना होता है। अतः इससे अधिक कोई परिणाम वहाँ प्राप्त भी नहीं हो पाता, मगर नारों में निश्चित प्रयोजन, लक्ष्य व संकल्प निहित होने के कारण वे अपनी क्षमता का प्रमाण - परिचय स्थूल रूप में परिणति प्रस्तुत कर ही देते हैं। इस प्रकार जपयोग अथवा नाम स्मरण की प्रक्रिया स्थिर चित्त वृत्ति और संकल्प सिद्धि का एक वैज्ञानिक आधार है। यह सभी के लिए समान रूप से उपयोगी और लाभकारी हो सकता है। जिस संकल्प संकेत के साथ यह क्रिया आरंभ होती है, उसकी सिद्धि सुनिश्चित हो जाती है। विभिन्न व्यक्ति एक ही नाम का जप कर भिन्न-भिन्न प्रकार के संकल्पों की सिद्धि को प्राप्त होते हैं यही इस जपयोग की सबसे बड़ी विशेषता है।


कर्ता की भावना (Kahani)

व्यक्ति-व्यक्ति की भावनाओं में अंतर से परिणति भी भिन्न भिन्न होती है। उस पुरोहित को देवालय के समीप यज्ञ करते देखकर उधर से गुजरते हुये राजकुमार ने यज्ञ का कारण पूछा। पुरोहित ने कहा कि वह वल्वि पत्रों से हवन कर रहे है तीन वर्ष हो गये।

पर पाँच सोने के विल्व फल पाने का और दखिता मिटाने का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। राजकुमार ने पुरोहित से उनका आसन माँग लिया और उसी विधि से यज्ञ में आहुतियां डालने लगे, पर उनकी भावना में अंतर था । उनने क्रिया कृत्य में समूची श्रद्धा का समावेश किया और संकल्प किया कि जो भी प्रतिफल मिलेगा, उसे लोक कल्याण में लगा देंगे । दूसरे दिन यज्ञ कुण्ड में से सोने का पाँच विल्व फल निकले और राजा की झोली में जा बैठे। पुरोहित के आश्चर्य का समाधान करते हुए, राजकुमार ने कहा ’देवता मात्र कृत्य को ही महत्व नहीं देते । कर्ता की भावना भी परखते हैं।”


एक सशक्त वैकल्पिक उपचार पद्धति-यज्ञोपैथी

यज्ञ चिकित्सा इतनी सरल और उपयोगी है कि उसके आधार पर मारक और पोषक दोनों ही तत्वों को शरीर में आसानी से पहुँचाया जा सकता है। यों यज्ञ विज्ञान के अनेक पक्ष हैं इनमें एक रोगोपचार भी है। मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य को अभिवृद्धि के साथ-साथ शारीरिक रोगों के निवारण में भी उससे ठोस सहायता है। औषधि उपचार में शरीर के विभिन्न अवयवों तक पदार्थ को पहुँचाने का माध्यम रक्त है। रक्त यदि दूषित निर्बल हो तो यह प्रेषित उपचार पदार्थ ठीक तरह परिवहन नहीं कर सकता। फिर एक कठिनाई और भी हैं कि रक्त में रहने वाले स्वास्थ्य प्रहरी श्वेत कण किसी विजातीय पदार्थ को सहन नहीं करते उससे लड़ने - मरने को उधार खाये बैठे रहते हैं। औषधि जब तक कम रोग कीटाणुओं पर आक्रमण होने इन स्वास्थ्य प्रहरियों से ही महाभारत करना पड़ता है। बीमारी पर आक्रमण होने पर प्रयुक्त औषधि और स्वास्थ्य कण ही आपस में भीड़ जाते हैं। और यह नया विग्रह और खड़ा हो जाता है पेट की पाचन क्रिया रक्त में उन्हीं पदार्थों को सम्मिलित होने देती है जो शरीर संरचना के साथ तालमेल खाते हैं। इसके अतिरिक्त जो बच जाता है। वह विजातीय कहा जाता है। और उसे कूल, मूत्र , स्वेद, कफ आदि के द्वारा निकाल बाहर किया जाता रहता है। इस पद्धति को देखते हुए यह भी अति जटिल कार्य है। कि औषधियों में रहने वाले रसायन किस प्रकार विषाणुओं तक पहुँचे और किस तरह वहाँ जाकर अपना निवारक उपक्रम आरंभ करके उसे सफलता के स्तर तक पहुँचायें। इस कठिनाई का हल यज्ञ प्रक्रिया को चिकित्सा प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने पर सहज की संभव हो जाता है। औषधि को पेट में पंच कर रक्त में मिलकर श्वेत प्रहरियों से लड़ने के उपराँत पीड़ित स्थान तक पहुँचने की लंबी मंजिल पारे नहीं करती पड़ती। वरन् मंजिल पारे नहीं करती पड़ती । वरन् इस सारे जंजाल से बचकर एक नया ही रास्ता उसे मिल जाता है। शरीर शास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि मात्र रक्त ही जीव कोशों की खुराक पूरी नहीं करता वरन् आहार साँस द्वारा भी शरीर में पहुँचाता है और वह इतना महत्वपूर्ण होता है कि उसकी गरिमा मुँह द्वारा खाये और पेट द्वारा पचाये गये आहार की तुलना में किसी भी प्रकार कम नहीं होती । रक्त को भांति प्राणवायु भी आक्सीजन के रूप में समस्त शरीर में परिभ्रमण करती हैं । पोषण पहुँचाने और गंदगी को बुहारने में उसका बहुत बड़ा हाथ है। दृश्य रूप से जो कार्य पाचन और रक्ताभिषरण पद्धति से होता है। अदृश्य रूप से वही सारा कार्य श्वासोच्छवास क्रिया द्वारा भी संपन्न होता है। यह दोनों ही पद्धतियां मिलकर दो पहियों की गाड़ी की तरह जीवन रथ को गतिशील बनाये रहती है। स्वास्थ्य सुधार और रोग निवारण को आवश्यकता को पूरा करने के लिये श्वासोच्छवास प्रक्रिया को अवलंबन बनाने पर उससे कही अधिक लाभ उठाया जा सकता है। जो रक्ताभिषरण पद्धति से आमतौर पर काम में जाया जाता है। यह कार्य यज्ञ-चिकित्सा द्वारा संपन्न होता है। इस माध्यम से न केवल विषाणुओं से सफलता पूर्वक संघर्ष संभव हो सकता है। वरन् पोषण की आवश्यकता भी पूरी हो सकती है। यज्ञ द्वारा वायु भूत बनाई गई औषधियां सूक्ष्मता की दृष्टि से इस स्तर पर पहुँच सकती है। कि विषाणुओं से भी सूक्ष्म होने की विशेषता के कारण उन पर आक्रमण करके सरलता पूर्वक परास्त कर सकें। पाचन, परिवहन और प्रहरियों से उलझने जैसे झंझट इस मार्ग में नहीं हैं और विलय का अवसर भी नहीं है। साँस द्वारा अभीष्ट पदार्थों को शरीर के अंतरंग किसी भी अंग अवयव तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है। इस चिकित्सा सिद्धान्त के अनुसार विषाणुओं का मारण जितना आवश्यक समझ जाता है उससे कही अधिक स्वस्थ कोशिकाओं में समर्थता की अभिवृद्धि आवश्यक हैं सामान्यतया रोगोपचार का एक पक्ष जहां विषाणुओं को मारना होता है। वही दुर्बलता को दूर कर सबलता का परिपोषण करना भी होता है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति का सारा ध्यान संहार उपचार पर ही केन्द्रित रहते हैं यह एकाँगीपन जब तक दूर नहीं किया जायगा तब तक चिकित्सा प्रक्रिया अधूरी ही बनी रहेगी। यज्ञ चिकित्सा में ये दोनों ही विशेषताएँ विद्यमान है। उसके माध्यम से उपयोगी रासायनिक पदार्थों को इतना सूक्ष्म बना दिया जाता है। कि इस कारण वे अपने-अपने उपयुक्त प्रयोजनों को पूरा कर सकें। अणुओं में पाया जाने वाला चुंबकत्व अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये वातावरण में से अभीष्ट मात्रा अनायास ही ग्रहण करता रहता है। यज्ञ प्रक्रिया से सहारे वायु समस्त भीतरी अवयवों में अनायास हो जा पहुँचते और स्थानीय जीवाणुओं को अनावश्यकता पूरी करते हैं पेड़ आकाश में परिभ्रमण रुकने वाले बादलों को अपनी ओर खीचते हैं। पेड़ आकाश में परिभ्रमण करने वाले बादलों को अपनी ओर खीचते हैं घास की पत्तियां हवा में रहते वाले जलाँश को अपने ऊपर ओस के रूप में बरसा लेती हैं सशक्त वायु भूत रसायन जब शरीर के भीतर पहुंचता है। तो वहाँ की आवश्यकतानुसार सहज ही पूरी होने लगती है। प्रकृति एक ओर ते वस्तुओं का परिवर्तन करने के लिये विनाश व्यवस्था चलाती हैं और दूसरी ओर अनावश्यक क्षरण रोकने और क्षतिपूर्ति के साधन भी जुटाती है। इसी संतुलन के आधार पर सृष्टि क्रम चल रहा हैं अन्यथा विनाश या विकास में से एक के अत्यधिक उग्र हो जाने पर एकाँगी स्थिति बन जाती और असंतुलन की अराजकता दिखाई देती है रोग कीटक जिस प्रकार स्वस्थ जीवाणुओं पर आक्रमण करते हैं उसी प्रकार उन्हें भी नियंत्रित करने के लिये वातावरण में आवश्यक तत्व बने रहते हैं। यज्ञ द्वारा उत्पन्न विशेष गैस के सूक्ष्माणुओं में यह विशेषता रहते हैं कि वे रोग कीटकों पर नभ सेना की तरह बरस पड़े । रक्त के श्वेत कण जहां भूमि गत लड़ाई लड़ते और आमने- सामने की गुत्थम-गुत्थ करते हैं वहाँ यज्ञ की वायु नभ मार्ग से बम गिराने की तरह शत्रु सेना को निरस्त करती है। यह उपचार प्राकृतिक परंपरा के अनुसार स्वतः ही संपन्न होता है। मनुष्यकृत उपायों का इसमें न्यूनतम भाग ही रहती है जीवाणुओं की दुर्बलता के अंतराल में उस पुकार रहती है परिपोषण प्राप्त करने की । बच्चा रोकर माता का ध्यान आकर्षित करता है और उससे अपनी क्षुधा के लिये पयपान का अनुदान प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार दुर्बलता ग्रस्त जीवाणु अपने लिये समर्थ परिपोषण की याचना करते हैं इसकी पूर्ति वे रासायनिक पदार्थ करते हैं जो यज्ञ प्रक्रिया द्वारा वायु भूत होकर इस प्रकार सफाई और परिपोषण के ध्वंस और निमार्ण के दोनों ही प्रयोजन यज्ञ वायु के द्वारा पूरे होने लगते हैं और अस्वस्थता का बहुत हद तक समाधान हो जाता है। सूक्ष्म जगत की क्षमताएँ विलक्षण है लाख हस्त कोशल अपनाया जाय अथवा कैसे भी यंत्र की सहायता हल जाय पर फलों से शहद प्राप्त नहीं किया जा सकता किंतु वही काम मधुमक्खी अपनी विशिष्ट क्षमता द्वारा बड़ी आसानी से कर लेती है। जीवाणुओं में यह विशेषता है कि यदि आसपास के वातावरण एवं संरक्षण की आवश्यक सामग्री स्वयमेव खींच लेते हैं सामान्य वायु जो साँस द्वारा ग्रहण की जाती है उसमें सामान्य जीवन संचार बनाये रहने के कितने ही पदार्थ रहते हैं रोगी की आवश्यकताएँ विशेष प्रकार की होती है उसे विशेष मात्रा में विशेष पदार्थ चाहिए इनकी पूर्ति यदि विशिष्ट धूम द्वारा यज्ञविधि से को जो सके तो रोगोपचार का मूल उद्देश्य पूरा हो जाता हे इसे भैषज्य यज्ञ कहते हैं। विष कीटकों को मारने के लिये अनेकानेक- विशेषताओं से युक्त औषधियाँ निरंतर बनती और बढ़ती चली जा रही है यह सभी ऐसी है जो प्रत्यक्ष स्पर्श के उपराँत ही अपना प्रभाव आरंभ करती है इससे भी सरल तरीका यह है कि औषधियां पदार्थों को वायुभूत बनाकर वहाँ पहुँचा दिया जाय जहां संशोधन की आवश्यकता है। संभवतः भारतीय परंपरा में मृत शरीर को जलाने के पीछे यह दृष्टि भी रही होगी कि निर्जीव काया में उत्पन्न होने वाली सड़न से वातावरण को विषाक्त होने से रोकने के लिए उसे अग्नि संस्कार द्वारा समाप्त किया जाय। सामान्य स्वास्थ्य संवर्धन के लिये यज्ञाग्नि द्वारा वायुभूत बनाये गए पदार्थों का सेवन, मुँह द्वारा खाये गये और पेट द्वारा पचाये गये पौष्टिक पदार्थों की तुलना में कही अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। इस प्रकार बीमारियों से लड़ने वाली जीवन शक्ति को बढ़ाने तथा विषाणुओं के आक्रमण को निरस्त करने में भी यज्ञ- अग्निहोत्र का सफल उपयोग हों सकता है। स्वास्थ्य रक्षा के अतिरिक्त बल बढ़ाने और व्यक्तित्व को विकसित करने में समर्थ विचारणाओं तथा भावनाओं का संवर्धन इतना बड़ा लाभ है जिसे स्वास्थ्य रक्षा से हजार गुना मूल्यवान और महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।


विधाता की नीति (Kahani)

जब राजा ययाति आपने मुख से अपने तपस्या की प्रशंसा और अन्य तपस्वियों का तिरस्कार करने के कारण पुण्य क्षीण हो सिद्धों के लोग से नीचे गिरने लगे, तो राजा अष्टक ने उन्हें गिरते देख कहा “महाराज , समस्त देवताओं को साक्षी बना मैं अपना समस्त पुण्य आपको अर्पित करता हूँ आपका पतन न हो।” ययाति मुसकराये और कहने लगे,”नर श्रेष्ठ ! दान केवल वेदवेत्ता ब्राह्मण या दीन ही ले सकते हैं। मैं न तो ब्राह्मण हूँ, न दीन। इसलिए, है पुण्य शील अष्टक “ मुझे नीचे गिरने दो। इसी समय पास खड़े राजा प्रवर्दन ने भी ययाति को अपना पुण्य भेंट करता चाहा। ययाति के फिर अस्वीकार करने पर राजा वसुमान ने आगे बढ़कर कहा,”सज्जनों! ययाति दान ग्रहण नहीं करते, आप वृथा कष्ट न करें। “ फिर ययाति की ओर मुड़कर बोले,” महाराज समस्त पुण्य देता हूँ , आप का पतन न हो। ययाति हँसे और बोले, “पुण्यशील वसुमान! उचित मूल्य से कम में किसी वस्तु को मोल लेना भी एक प्रकार का दान लेना है। मैं न तो ब्राह्मण हूँ और न दीन, अतः मुझे नीचे गिरने दो। मैंने जो कर्म किए है उनका फल मुझे पाने दो , क्योंकि यही विधाता की नीति है।


सैनिक जो साधु बन गया

‘सावधान! हवाई जहाज के लाउडस्पीकर से आदेश का स्वर आया। यह अंतिम सूचना थी। वह पहिले से ही द्वार के सम्मुख खड़ा था और द्वार खोला जा चुका था उसकी पीठ पर हवाई छतरी बँधी थी रात्रि के प्रगाढ़ अंधकार में नीचे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। केवल आकाश में दो चार तारे कभी-कभी चमक जाते थे । मेघ हल्के थे वर्षा की कोई संभावना नहीं थी। बादलों के होने से जो अंधकार बढ़ा था उसने आश्वासन ही दिया कि शत्रु छतरी से कूदने वाले को देख नहीं सकेगा। हवाई जहाज बहुत ऊपर चक्कर लगा रहा था। सहसा वह नीचे चील की भाँति उतरा एक हजार दो सौ फीट, एक सो सत्रह कूद जाओ ! आदेश सभी अंग्रेजी में दिए जाते थे। यह आदेश भी अंग्रेजी में ही था। एक काली छाया हवाई जहाज से तत्काल नीचे गिरी और द्वारा बंद हो गया। हवाई जहाज फिर ऊपर उठ गया वह मुड़ा और पूरी गति से जिस दिशा से आया था, उसी दिशा में लौट गया। शत्रु के प्रदेश से यथा शीघ्र उसे निकल जाना चाहिए । जिसे नीचे गिराया गया, उसकी खोज खबर लेना न उसका कर्तव्य था और न ऐसा करना इस समय संभव ही था। ‘एक दो-तीन-दस, ग्यारह-सत्तर,इकहत्तर, गिरने वाला पत्थर के समान ऊपर से गिर रहा था किंतु वह अभ्यस्त था। बिना किसी घबराहट के वह गिनता जा रहा था। उसे पता था कि उसे जब गिराया गया, उसका हवाई जहाज पृथ्वी से एक हजार दो सो फीट ऊपर था। ‘एक सौ पंद्रह , एक सौ सोलह, एक सौ सत्रह ! संख्या जो उसे बताई गई थी, पूरी गिनी उसने और तब उसके हाथों ने पीठ पर बंधी छतरी की रस्सी खींच दी। पैराशूट एक झटके से खुल गया। अब वायु में तैरता हुआ धीरे-धीरे नीचे आ रहा था। सहसा वायु का वेग प्रबल हो गया। पैराशूट एक दिशा में उड़ चला, किंतु वह बहुत दूर नहीं जा सका था। उसके सहारे उतरने वालों के पैरों को किसी वृक्ष की ऊपरी टहनियों का स्पर्श हुआ। अगले क्षणों में एक शाखा में पैर उलझाने में वह सफल हो गया। बहुत कड़ा झटका लगा। मुख, हाथ, पीठ शाखाओं पर रगड़ लगी। कुछ चोट तथा कुछ खरोंचें भी आयी। शरीर की नस-नस फड़फड़ा उठी, लेकिन अंत में पैराशूट उलट गया। वह डाल परस्पर बैठ गया और उसने रस्सियाँ खोलकर पैराशूट को पीठ पर से उतार लिया वह कहाँ है, कुछ पता नहीं उसे चारों ओर घोर वन है। वन्य पशुओं की चिंघाड़ रह-रह कर गूंज रही है। जो मान चित्र उसे दिया गया था, अब वह बड़ी कठिनाई से काम देगा क्योंकि हवा उसे अपने लक्ष्य से कितना हटा लायी है कि स्थान पर वह आ गया हैं यह जानने का कोई उपाय उसके पास नहीं। रात्रि के इस अंधकार में भूमि पर उतरना आपत्ति को आमंत्रण देना था। प्रकाश वह थोड़ा भी कर नहीं सकता था। इससे शत्रु कही समीप हुआ तो वह पता पा जाएगा। जब तक झुटपुटा नहीं हुआ वह चुपचाप उसी डाल पर बैठा रहा। मच्छरों ने उसका मुख लाल बना दिया। शीतल वायु के झकोरे यद्यपि शरीर को अकड़ाए दे रहे थे, उसे अच्छे लगने, क्योंकि कुछ क्षण को उनके कारण मच्छरों से उसे छुटकारा मिल जाता था। वायु की दुर्गंध बतलाती थी कि समीप ही कहे दलदल है। झुरमुट के प्रारंभ में ही नीचे उतरा। सबसे पहले उसने कमर से बड़ा चाकू निकालकर भूमि में गड्ढा बनाया। गीली मिट्टी होने से थोड़े ही परिश्रम में गड्ढा इतना बन गया कि उसमें पैराशूट रखकर ऊपर से मिट्टी के ऊपर सुखे पत्ते इधर, उधर से लाकर बिखेर दिये। अब वह निश्चित हुआ कि पैराशूट या ताजे गड्ढे को देखकर शत्रु को कोई संदेह होने का भय नहीं रहा। “लेकिन जिस वृक्ष पर वह उतरा था, उसकी टहनियां और पत्ते टूटे थे। उनको हटा देना चाहिए, इधर ध्यान हो नहीं गया था। “जापानी वन निरीक्षकों का ध्यान उस वृक्ष के आस’पास खोज की और पैराशूट को भूमि में से खोद निकाला। इसके बाद उनके सैनिकों का एक पूरा समूह वन में फैल गया उसके लिए छिपना संभव नहीं रह गया और पिस्तौल का उपयोग करने से कोई लाभ नहीं था। विवश होकर वह उनके सामने आ गया। “हम इसे गोली नहीं मार सकते वह भारतीय है। उसे नेताजी को देना होगा। “जापानी अधिकारी परस्पर विवाद करने में लगे थे। एक अंग्रेजों के जासूस को मार देना चाहिए, इस विषय में दो मत नहीं था उनमें किंतु नेताजी ने बहुत कठोर रुख बना लिया था, भारतीयों के साथ किए जाने वाले व्यवहार को लेकर। बात लगभग झगड़े की सीमा तक पहुँच चुकी थी। नेता जी अड़े थे-प्रत्येक भारतीय बंदी उन्हें दे किया जाय। उसके साथ क्या हो, यह निर्णय वे करेंगे।, “यह हमारे सैनिक अधिकारों में हस्तक्षेप हैं।”जापानी अधिकारियों को ऐसा प्रतीत होता था और वे मन में चिढ़ते थे, किंतु प्रत्यक्ष विरोध करना उनके लिए संभव नहीं था उन्हें टोकियो से आदेश मिला था “सुभाषचन्द्र वसु का सम्मान सम्राट के प्रतिनिधि की भाँति किया जाना चाहिए।” कल रात्रि में कोई अंग्रेजी सेना का विमान वन में जासूस उतार गया। यह पता नहीं है जासूस अकेला ही आया है या उसके कुछ और साथी है। विमान का पीछा नहीं किया जा सका, किंतु वन में खोज करने वाले सैनिक एक भारतीय को पकड़कर ले आये थे। भूमि में गढ़ा हुआ पैराशूट मिल गया, जिससे वह उतरा था। अब बिना कठोर व्यवहार किए यह कुछ बताने वाला नहीं। कुछ सैनिक अधिकारी उसे गोली मार देने के पक्ष में थे। किंतु नेता जी का संदेश आ गया है। उन्होंने कहलाया है उससे पूछने का काम मुझ पर छोड़ दो।’ यह संदेश टोकियो भेजा गया। “हम यदि उसे रोकते हैं। बात टोकियो तक पहुँच सकती है। “प्रधान सैनिक अधिकारी ने गंभीर चेतावनी दी और तब दूसरा उपाय ही इसे छोड़कर नहीं रह गया कि उस भारतीय को चुपचाप नेता जी के समीप भेज दिया जाय। इस बीच उसे एक गंदे कमरे में हथकड़ी डालकर बंद कर दिया गया था। मच्छरों को भगाने के लिए हाथ भी खुले नहीं थे। लेकिन विपत्ति इतनी ही कहाँ थी। चूहों का एक झुण्ड आया। उसने उसे पहले दूर से देखा, सूँघा और फिर वे निकट आ गये। जब उनमें से एक ने उसकी गर्दन पर मुँह लगाया तो वह चीख पड़ा “हे भगवान।” लेकिन थोड़े ही क्षणों में वह रुआंसा हो गया- उसके जैसे नास्तिक पामर की पुकार भगवान क्यों सुनने लगे। जीवन में शिक्षाकाल से अब तक उसने कभी ईश्वर की सत्ता स्वीकार नहीं की थी। यो वह पहले संयम पसंद करता था किंतु जासूसी में अनेक बार शराबियों -जुआरियों के बीच रहना पड़ा । धीरे-धीरे उसमें अनेकों दुर्व्यसन आ गये। नास्तिक था ही परलोक को चिता पागलपन लगती थी। अब तक किये गये अपने अनेक उपक्रमों की बाद कर वह रोने लगा समूचे अंतः करण से वह पुकार उठा-”हे भगवान!” और बिना एक पर को देर लगाए भगवान ने उसकी पुकार सुन ली। घंटे भी वह देर करता तो चूहे उसे नोंच-नोंच कर खा लेते। उन्होंने गर्दन,पैर और कंधे पर केवल तीन घाव किये कि कोठरी का द्वार खुल गया उसे वह जापानी सैनिक भी भगवान का दूत ही लगा। वह गोली भी मार देता -तो भी वह उसे ऐसा ही मानता। किंतु वह उसे मोटर में बिठाकर नेताजी के समीप ले गया। आज वह अनुभव कर रहा था कि भगवान है और वह उसे जैसे नास्तिक को भी पुकार सुनता है। उसने बचा लिया। अब यह जीवन उसका, उसी के स्मरण में अब जीना या मरना है। उसने नेताजी से कहा-’अब शस्त्र उठाकर किसी ओर से किसी को भी हत्या करने की मेरी इच्छा नहीं है। भगवान है तो पूरी पृथ्वी उसकी अपनी है। अतः मैं युद्ध में अब किसी ओर से नहीं लड़ूंगा । “तुम पर प्रभु की कृपा है तुम सच्चे अर्थों में भगवद् भक्त को। भले यह भक्ति तुम्हें इसी क्षण मिली है। “तेरा जी का स्वर भी भर आया था “हम तुम पर कोई प्रतिबंध लगाने को धृष्टता नहीं कर सकते। तुम चाहे जहाँ जाने को स्वतंत्र हो। हम केवल यही कहेंगे कि हमारा आतिथ्य स्वीकार कर लो आज के दिन।” उससे कुछ पूछा नहीं गया। उसने स्वयं जो बता दिया, वही नोट कर लिया गया हथकड़ियां तो नेताजी ने पहुँचते ही खुलवा दी थी। उन्होंने जिस श्रद्धा से उसे भोजन कराया इसके स्मरण मात्र से वह विभोर हो उठा। उनकी यह श्रद्धा उसे इसी कारण मिली क्योंकि अब वह भगवान का था। भगवान ! भगवान ! कहकर उसका गला रुँध गया। अगले दिन वह साधु हो गया उसको जीवन ही जीवंत शिक्षण बना बरमा को उसने अपना कार्य क्षेत्र बनाया। उसके जीवन के प्रतिपल में एक ही मधुर गूँज उठने लगी” सुहद सर्व भूतमान । “ नेता जी ने अपने पत्रों में शिशिरदास नाम के इस व्यक्ति की भावनापूर्ण चर्चा की है।


बड़प्पन सहयोगी बनने में (Kahani)

सत्य और आदर्श दोनों में विवाद उठ खड़ा हुआ यथार्थ कहता था ‘मैं बड़ा हूँ’ और आदर्श कहता था में । विवाद तय न हुआ। यथार्थ और आदर्श दोनों प्रजापति ब्रह्म के समीप गये और कहा “भगवान ! आपने ही हमें पैदा किया है अब निर्णय दें, हम दोनों में मुस्कराकर बोले-”भाई ! बड़ा तो वही हो सकता है। जो आकाश और पृथ्वी दोनों में संबंध जोड़ दे। यथार्थ ने अपना विस्तार करना प्रारंभ किया पृथ्वी से ऊपर उड़ता ही गया, पर वह सूर्य को भी छू नहीं सका। उसने हार मान ली और आदर्श से बोला,”अच्छा अब आप यह करके दिखाये। आदर्श आकाश को चला गया और वहां से अपने पैर बढ़ाकर धरती को छूने का प्रयत्न करने लगा, पर वह बीच में ही लटक कर रह गया। दोनों ने सिर झुकाकर प्रजापति के सामने अपना-अपना होना स्वीकार की। ब्रह्माजी ने कहा,”यो हार मान जाओगे, तो तुममें से एक भी जीवित न बचेगा। जाओ, अब थोड़ा मिलकर प्रयत्न करो। यथार्थ और आदर्श भाई - भाई की तरह मिले और दोनों ने पृथ्वी - आकाश को जोड़ दिया। प्रजापति यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए और बोले-”वत्स ! तुम्हारा बड़प्पन परस्पर प्रतिद्वंद्वी बनने में नहीं, सहयोगी बनने में है। जिसने जितने में यथार्थ और आदर्श का समन्वय किया , वही अपने स्तर से उद्यत स्थिति तक बढ़ सकता है । यह बात समान रूप से समुदाय में व्यक्ति -व्यक्ति में पाई जाने वाली भिन्नता पर लागू होती है। श्रेष्ठ कर्मों के आधार पर ही व्यक्ति श्रेष्ठ एवं श्लाघ्य पर प्राप्त करता है।


पुण्य फलदायी गायत्री साधना

गायत्री साधना द्वारा आत्मोन्नति होती है। यह सुनिश्चित तथ्य है। कतुष्य के अंतः क्षेत्र के संशोधन, परिमार्जन संतुलन एवं विकास के लिए गायत्री मंत्र से बढ़कर और कोई उसका साधन नहीं है। जो अतीतकाल से असंख्यों व्यक्तियों के अनुभवों में सदा खरा उतरता आया हो। मन , बुद्धि, चित्त, अहंकार का अंतःकरण चतुष्टय गायत्री महामंत्र की उपासना के द्वारा शुद्ध कर लेने वाले व्यक्ति के लिए साँसारिक जीवन में सब आरे से सब प्रकार की सफलताओं का द्वार खुल जाता है उत्तम स्वभाव अच्छी आदतें, स्वस्थ मस्तिष्क, दर दृष्टि , प्रफुल्ल मन, उच्च चरित्र , कर्तव्य निष्ठा की प्रकृति को प्राप्त करने के पश्चात् गायत्री साधक के लिए संसार में कोई दुःख कष्टकर नहीं रह जाता, उसके लिए सामान्य परिस्थितियों में भी सुख ही सुख उपस्थित रहता है इन रहस्यों को गायत्री उपासना में निमग्न साधकों ने अनुभव किया है। अथर्ववेद 1'-17- ' द्गह्यड्ड गायत्री है स्तुति करते हुए कहा गया है कि वह आयु , प्राण , प्रजा, पशु, कीर्ति, करने वाली है। “संपूर्ण वेद, यज्ञ, दान , तप गायत्री मंत्र की एक कला के समान है ये भव्य गायत्री के उद्गाता महर्षि विश्वमित्र के हैं महर्षि याज्ञवल्क्य तो गायत्री को वेद वाङ्मय की सर्व श्रेष्ठ उपलब्धि मानते हैं गायत्री और समस्त वेदों को तराजू में तोला गया तो उन्हें गायत्री वाला पलड़ा भारी लगा। उन्हीं के विचार से “वेदों का सार उपनिषद् एवं उपनिषदों एवं उपनिषदों का सार व्याहृतियों समेत गायत्री है। गायत्री वेदों की जननी है, पापों का नाश करने वाली है, इससे अधिक पवित्र करने वाला अन्य कोई मंत्र पृथ्वी पर नहीं है। नारकीय दावानल में फँसे हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली गायत्री ही हैं उससे उत्तम वस्तु स्वर्ग और पृथ्वी पर कोई नहीं। अन्य उपासनाएं करें चाहे न करें, केवल गायत्री उपासना से व्यक्ति जीवन मुक्त हो जाता है। गायत्री उपासना आत्मा का परम शोधन करने वाली है। उसके प्रभाव से कठिन दोष और दुर्गुण का परिमार्जन हो जाता है। जो मनुष्य गायत्री तत्व को भली प्रकार समझ लेता है। उसके लिए संसार में कोई सुख शेष नहीं रह जाता। कुषि अन्नि, शैनिक , शंख पाराशर एवं भगवान मनु जैसे गायत्री के परम उपासकों ने अपने जीवन की उपासना संबंधी अनुभूतियों को इसी रूप में उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम को दर्शाया है। महर्षि व्यास तो इनसे भी आगे अपने गूढ़तम साधना के परिणामों को दर्शाते हुए कहते हैं”जिस प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री हैं।” गायत्री काम धेनु के समान है। गंगा शरीर के पाप कामों निर्मल करती है , गायत्री 3पों ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र होती है जो साधक गायत्री महामंत्र को छोड़कर अन्य उपासनाएं करता है। वह पकवान् छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान हैं राम कृष्ण, हनुमान, भगवान शंकर, गणेश, कार्तिकेय , जैसी अवतारी सत्ताओं ने स्वयं गायत्री महाशक्ति की उपासना की और उपार्जित शक्ति का उपयोग असुरता से लड़ने के लिए किया । अपने भक्तों को भी गायत्री की ही शरण में आने का संदेश उन्होंने दिया। काम्य सफलता, तथा तप की सिद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। गायत्री ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है। अनुचित काम करने वाली के दुर्गुण गायत्री के कारण छूट जाते हैं जो ब्रह्मचर्य पूर्वक गायत्री की उपासना करता है। और आहार में ताजे आँवले के फलों को सेवन करता है। वह दीर्घ जीवी होता है । ऐसा कहा गया है। मंदमति, कुमार्गगामी और अस्थिर भांति भी गायत्री के प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त करते हैं जो पवित्रता और स्थिरता -पूर्वक गायत्री की उपासना करते हैं वे आत्म लाभ प्राप्त करते हैं। योग का मूल आधार गायत्री है। गायत्री से ही संपूर्ण योगों की साधना होती है। उपरोक्त अभिमतों से मिलते जुलते विचार प्रायः सभी ऋषियों के है। ऋषि प्रचर भारद्वाज , चरक, नारद, वशिष्ठ, गौतम , उद्दोलक, देवगुरु बृहस्पति, शृंगी ऋषि , वैशम्पायन, दुर्वासा, परशुराम, दत्तात्रेय, अगस्त अनत्कुमार, कण्व शैतिक जैसे ऋषियों के जीवन वृत्तांतों से स्पष्ट है कि उनकी महान सफलताओं का मूल हेतु गायत्री उपासना ही था कोई भी ऋषि अन्य विषयों में चाहे परस्पर विचारों की भिन्नता रखते रहे हों पर गायत्री के बारे में उन सबमें समान श्रद्धा भी और सभी ने उपासना क्रम में उसे प्रमुख स्थान दिया। गायत्री मंत्र का निरंतर जप रोगियों को अच्छा करने में और आत्मा की उन्नति के लिए उपयोगी । गायत्री महामंत्र का स्थिर चित्त और शाँत हृदय से किया हुआ जप आपत्ति काल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है यह कहते हुए महात्मा गांधी ने स्वीकार किया है। कि “उपासना एवं प्रार्थना में कैसे गायत्री महामंत्र को प्रथम स्थान दिया है।” रामकृष्ण परमहंस का कथन है कि लोगों को लंबी एवं क्लिष्ट साधना की जरूरत नहीं। इस छोटी सी गायत्री की साधना करके देखें। गायत्री की उपासना से बड़ी से बड़ी सिद्धियां मिल जाती है। यह मंत्र छोटा है किंतु इसकी शक्ति भारी है।


परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

वसंत पर्व 1976 पर दिया गया विशिष्ट उद्बोधन

( भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भागो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । देवियों, भाइयों! वसंत पर्व पर हमें हमेशा नये संदेश मिलते रहें। जिस सत्ता के साथ हमारा बड़ा घनिष्ठ संबंध है और जिसको आज्ञा से हमारा सारा जीवन व्यतीत हुआ है, जिसको हमने अपने आपे का समर्पण किया है, उस समर्पण किया है उस समर्पण वाली शक्ति ने हमसे यह वायदा किया था कि वसंत पंचमी के समय पर हर साल का एक कार्यक्रम बना कर भेजा करेंगे। वह सुबह हमको मिल गया है। आप में से कई आदमी वसंत पंचमी पर यहाँ आये होगे, पर वह भावावेश की ही बाते हमने कही और आपको क्या करना है और हमें क्या करना है, इसके संबंध में एक छपा हुआ इश्तहार बांट दिया। मालूम नहीं आपने ध्यान दिया अथवा नहीं। गुरुजी के साक्षात्कार हो गये दर्शन कर लिये बहुत हो गया। पिछले दिनों किसी ने यह अफवाह फैला दी थी कि - गुरु जी बीमार पड़े है । उन लोगों को यह बताने के लिए कि हमारे शरीर में कोई खराबी नहीं है और शरीर में अगर कभी हमारी मृत्यु हुई तो आप यह समझना कि गुरुजी का ट्रांस्फर हुआ है। किसी महत्वपूर्ण काम के लिए उनको भेज दिया गया है और जो काम अभी हम स्थूल शरीर से करते हैं उसकी अपेक्षा सौगुना अधिक काम कर रहे होंगे। क्योंकि शरीर का संबंध ही ऐसा है कि हमको बहुत दूर तक चलने नहीं देता। इसलिए जो काम अभी हम इस शरीर से नहीं कर सकते, उसकी अगर आवश्यकता पड़ी-गुरुदेव को आवश्यकता पड़ी तो स्थूल शरीर से सूक्ष्म ऐसा करें लेकिन फिलहाल अभी ऐसी कुछ योजना नहीं है न हम बीमार है और न हमें कोई कष्ट है और न कोई बात है हम ठीक तरीके से अपनी यह साधना-उपासना कर रहे है। हमें सूक्ष्मीकरण के लिए कहा गया था उस साधना में हम मुस्तैदी से लगे हुए हैं इस बारे में इतना की कहना काफी है कि हमारे बारे में आपको कोई चिंता करने की बात नहीं है। चिंता तो आपकी हमको करनी है आप क्यों करेंगे? बच्चे माँ बाप की चिंता क्यों नहीं करेंगे कि पिता जी का यह काम कैसे होगा? वह काम कैसे होगा? पिताजी का कर्ज कैसे चुकेगा? बच्चों को क्या पता? पिता को ही यह ध्यान रखना पड़ता है कि अगर हम नहीं रहे या आगे चलकर बच्चे बड़े होगे तो उनको खिलाने-पिलाने का क्या इंतजाम करना पड़ेगा इनके रहने के लिए मकान , इनके ब्याह-शादी का क्या इंतजाम करना पड़ेगा ? इनके काम धंधे का क्या इंतजाम करना पड़ेगा यह चिंता करना बड़ों का काम हैं हम बड़े है, भावनाओं में भी बड़े है हम बड़े है तो यह हमारा काम है कि आप सब लोगों का ध्यान रखें । विगत वर्ष जब वसंत पंचमी का उत्सव हुआ था तब हमने बहुत सी बातें कही थी, पर उनमें से विशेष रूप से ध्यान देने लायक दो बाते खास हैं बात यह है कि यह युग संधि का समय है जिसमें अभी पंद्रह वर्ष बाकी हैं सन् 2000 आने में यह खराब समय अभी खतम नहीं हुआ हैं पहले अभी समझते थे कि यह खत्म हुए है न हारी बीमारी । हारी-बीमारी के ऐसे-ऐसे चक्कर है कि एक दिन में एक-एक गाँव में 22-23 बच्चों की मृत्यु हो जाती हैं कभी-कभी चौपाइयों में ऐसी बीमारी फैलती है कि वे सारे के सारे ढेर हो जाते हैं कभी-कभी भूकंप आ जाते हैं अभी -अभी हिन्दुस्तान में इस तरीके से तूफान आये कि लाखों आदमियों को तबाह करके रख दिया। इस तरीके से चीजें पैदा हो जाती है और न जाने कहा से आ जाती हैं नेचर-प्रकृति हमसे नाराज हो गयी है इंसानों का चाल चलन देखकर प्रकृति ने नाराजगी से अपना बदला चुकाने का निश्चय किया है और वह बराबर चुका रही है और हैरानी पैदा कर रही हैं एक बात हमने यह कही और आप सबको सावधान किया था कि आप लोग सावधान रहना। तो क्यों साहब। हमारे सावधान रहने से क्या हो जायगा । मान लीजिए कोई ऐसी बीमारी आ जाय, कोई ऐसा उपद्रव खड़ा हो जाय तो हम क्या करेंगे? इसलिए हमने कहा था कि अभी हम आपसे अलग नहीं हुए है हमारी शक्ति के दो हिस्से जरूर हो गये है अभी तक जो शक्ति सीमित भी और क्या करना है परिवार की शाखाओं में ही भरती जाती थी, संगठन करने या आयोजन करने या सम्मेलन बुलाने में शिविर लगाने में खर्च हो जाती थी, अब दो साल की सूक्ष्मीकृत साधना में अपने शक्ति को इस हिसाब से विकसित किया है कि पचास परसेंट शक्ति से हमारे पास जो अभी थोड़े से 24 लाख व्यक्ति है, उनकी हम सुरक्षा कर लेंगे। पचास फीसदी शक्ति हम सुरक्षा में लगायेंगे। आपकी हारी-बीमारी में घाटे में दुख में, मुसीबत में , हैरानी में हमारी आधी शक्ति बराबर काम करती रहेगी। इसमें भी आप कमी नहीं पायेंगे,चाहे आप कैसी ही मुसीबत में क्यों न फँसे हो और लोगों से अप हर हालत में नफे में रहेंगे- यह हमारा वायदा है और यह हमारा आप से कहना है। एक और बात हमने यह कही थी कि अब आपको बार-बार हरिद्वार आने और बार-बार हमसे मिलने की आवश्यकता नहीं है। इसका बहुत सीधा सा सरल रास्ता हमने निकाल लिया है। वह यह है कि यदि हमसे मिलने की आवश्यकता हो तो आप दस बार लंबे-लंबे प्राणायाम करना और प्राणायाम करने के बाद में सिर के ऊपर दाहिना हाथ फिराना । हाथ फिराने के बाद में देखना कि जो कुछ भी आपे मन में विचारो वह सबके सब बाहर निकल गये और हमारे विचारो का भीतर आना शुरू हो गया। उस वक्त जो विचार उठें उसको यह मान लेना कि यह गुरुजी की बात है-विचार है। यह रविवार के दिन करना चाहिए। हो सके तो नित्य करना चाहिए। एक बात हमने यह कही थी कि आपके देखभाल की आपके सुख -शाँति की, आपको आगे बढ़ाने की -ऊंचा उठाने की आपके दुःख दर्दों को कम करने की जिम्मेदारी है आपको कोई मुसीबत हो हैरानी की की बात हो तो माता जी से कह देना अथवा जो काई भी हो यहाँ। हमने सात सदस्यों की एक कमेटी बनायी है ट्रस्टी बनाये है ये ऐसे है जो अपने घर से ही अपना खर्च चलाते हैं ऊंची योग्यता के है यहां के कामों को बड़ी ईमानदारी और जिम्मेदारी से संभालते हैं और हमको यकीन हो गया हे कि ये आदमी हमेशा अपनी जिम्मेदारियों को सँभालते रहेंगे उनके सुपुर्द हमने यह कर दिया हे कि जो कोई भी यहां आया करें इनके हाथों लिख कर दे दिया करे वह हम तक पहुँच जायेगा और हम आपका काम कर देखें । यह हम आप से वायदा करते हैं और आपको वचन देते हैं हमने आपके लिए आपे व्यक्ति-अपने नुमाइंदे नियुक्त किये है जो आपसे संबंधित बातों को ठीक से समझा सके। जो बाते आपसे , आपके शरीर से, आपके सुख और दुख से संबंधित हैं उसके बारे में हमारा जाक वायदा है जो दायित्व है उसके बारे में ये आदमी आपको ठीक से समझा देंगे। अपने इन नुमाइंदो को हम आपकी सेवा में भेज रहे है। उ बहुत बड़ा काम हमने किया है। यज्ञीय परंपरा का पुनर्जीवन । वैसे तो सारी जिंदगी भर हमने बड़े ही काम किये हैं हमारा जीवन बड़ा है। हमारे ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारियां डाली गयी हैं दिमाग तो हमारा बड़ा है ही, पर हमारा कलेजा बहुत बड़ा हैं इतना कलेजा है कि हाथी का य तो होगा या व्हेल का। उससे कम भारी कलेजा हमारा नहीं है हमें वजनदार काम सौंपे गये हैं हाथी के ऊपर जब वजन रखा जाता है तब भारी वजन रखा जाता है। शेर को छलाँग मारनी पड़ती है तो बड़ी छलांग मारता है इसीलिए हमारे कंधों पर बड़े काम डाले गये हैं यह जो युग संधि के दिन है इसमें अनेकों काम पूरे करने के लिए हमें सौंपें गये है और उन सौंपे गये कामों को क्या हम अकेले पूरा कर लेंगे? - यह कहना जरा मुश्किल हैं क्योंकि जब रामचन्द्र जी ने रावण को मारा था तब अकेले उन्होंने मार हो सो बात कहाँ थी। उनके साथ में नल-नील जामवंत थे, हनुमान थे, अंगद थे और कितने ही रीछ-वानर थे सबने मिलकर मारा था । इसी तरीके से सबको मिलाकर हमको एक ऐसा अनुष्ठान करना है जैसा कि पहले जिस दिन से ब्रह्म जी ने धरती बनायी थी, उस वक्त से न कभी हुआ था और न कभी होगा। संकल्प हमारा यह है कि एक लाख यज्ञ करें एक लाख गायत्री यज्ञ कहाँ होगे? हमारी इच्छा है कि एक लाख अलग-अलग स्थानों पर करें ताकि हर गाँव का वातावरण, हर गाँव की सुरक्षा , हर गाँव में हमारा और हमारे गुरुदेव का प्राण इस यज्ञ के माध्यम से जा पहुँचे यज्ञ एक माध्यम है । किस तरीके से लाउडस्पीकर हमारी आवाज को पकड़ कर उसे बाहर फैलाने का एक माध्यम है जो कि हमारी आवाज को पकड़ रहा है गायत्री माता की आवाज को पकड़ रहा हैं तो गुरुजी आज कल तो पैसे की तंगी है, सूखा पड़ गया है- अकाल पड़ गया है -तूफान आ गया है - कैसे हो यज्ञ? बेटे हमने उस हिसाब से इन यज्ञो को रखा ही नहीं है । जो यज्ञ रखे है वे ऐसे है कि ज्यादा से ज्यादा स्थानों में हो और जिनमें गरीब से गरीब लोग भाग ले। यह यज्ञ भीलों में भी हो , अछूतों से भी हो - सब जगह हो जाय॥ इस यज्ञ में यह बात रखी है कि गुड़ जो सब घरों में होता है उस गुड़ में जरा सा घी मिला दीजिए और उनकी बेर जैसी छोटी-छोटी गोलियाँ बना लीजिए यहां से हम अभिमंत्रित की हुई जो हवन सावित्री भेजेंगे उसे उन सबके ऊपर - जितनी भी गुड़ की गोलियाँ बनी हुई है-उनके ऊपर रख दीजिए और उनसे हवन कर लीजिए । गुरु जी। वेदियां कौन बनायेगा? हमको तो बनाना नहीं आता। जमीन पर चौरस वेदियाँ बनती और उन्हीं पर हवन होगा। यज्ञशाला का सारा सामान हम अपनी जीप गाड़ियां में रखकर भेजेंगे, आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा। गुड़ और घी मिलाकर के मुश्किल से एक रुपये लागत आयेगी और उसी से यज्ञ पूरा हो जायेगा। इसमें गरीब आदमी भी एक रुपया खर्च कर सकता है। इसके लिए आप यह भी कर सकते हैं कि पाँच कुण्डीय, नौ कुण्डीय, 51 कुण्डीय यज्ञ के स्थान पर एक कुण्डीय यज्ञ से काम चला सकते हैं । इसमें यह भी हो सकता है कि आप पाँच कन्याओं को पीले कपड़े - पहना कर भेज दीजिए । वे पाँच देवियों के रूप में, गायत्री के पाँच में बैठ जायेगी और वही हवन कर लेगी। यह छोटा सा हवन है। इस में आपको कोई सामान इकट्ठा नहीं करना है केवल गुड़ की एक डली और थोड़ा सा घी लाये जिससे बेर के बराबर गोलियां बन जायेगी और उसी से हवन हो जायगा। इसमें एक रुपये की लागत आयेगी। इस तरीके से हम एक लाख स्थानों पर यज्ञ करेंगे और वह यज्ञ आपको कराने है। इसके लिए आपको पाँच नयी जगह बनानी है । आपको हम पाँच- पाँच गांवों का सरपंच बना रहे है पाँच- पाँच गाँव सुपुर्द कर रहे है आप एक ही जगह पर नहीं रहेंगे, वरन् पाँच जगहों पर काम करेंगे। इस मिशन को इस स्थान पर पाँच जगहों पर फैलाने की कोशिश करेंगे। आपके समीपवर्ती जो गाँव है, नगर है उनमें एक-एक मिशन की शाखा स्थापित कीजिए । शाखा स्थापित करने में हमारे दो काम तो पहले से ही चल रहे थे- एक यह कि एक माला गायत्री का जप सबको करना चाहिए। गायत्री चालीसा का पाठ और एक माला का गायत्री जप यह दोनों काम तो पहले से ही हमने आपके सुपुर्द कर दिये थे। अब इस नये वसंत पंचमी से दा काम ओर सुपुर्द करते हैं। पहला यह कि आपको नये स्थानों पर पाँच यज्ञ करने हैं हमको नये स्थानों की जरूरत है। इस बार हमने 51 कुण्डीय या सौ कुण्डीय यज्ञों को कराने की स्पष्ट मनाही कर दी है और कहा कि अभी मात्र एक कुण्ड का यज्ञ होगा। उसी से हमारा संतोष होगा। सौ कुण्डीय यज्ञों से नहीं बड़े यज्ञों की आवश्यकता अभी नहीं बाद में होगी। तब हम बता देंगे। इससे न उद्देश्य की पूर्ति होगी, न लक्ष्य पूरा होगा और न एक लाख की संख्या पूरी होगी। इसलिए जो भी आप लोग लोग हमारी आवाज को सुन रहे हैं, उन सबका काम व उद्देश्य है कि वे सभी अपने-अपने समीपवर्ती गाँवों में जाकर के यह देखें कि एक-एक कुण्ड का हवन कहाँ कहाँ होना संभव है। यह बात नंबर एक हो गयी।

बात नंबर दो यह है कि आपके पास एक प्रचार मंडली होनी चाहिएं प्रचार मंडली का अर्थ यह है कि अब हमने इसके लिए संगीत को माध्यम बनाया है। नाद जी के पास भी संगीत था, शंकर जी के पास भी संगीत को माध्यम बनाया है। नारद जी के पास भी संगीत था, शंकर जी के पास भी संगीत था। सरस्वती के पास संगीत था, विष्णु के पास संगीत था। सबने संगीत था, विष्णु के पास संगीत था। सबने संगीत के माध्यम से प्रचार किया था। हमको अब जो भी व्याख्यान करना है-संगीत के माध्यम से करेंगे-व्याख्यानों से नहीं। व्याख्यानों में वक्ता का प्राण काम नहीं करता, लेकिन जो संगीत हमारे बनाये हुए हैं-हमारे मिशन से बनाये हुए है और देव कन्याओं ने गाये हैं, उन्हीं संगीतों रख देंगे और उनके हृदय के भीतरी हिस्सों को छुयेंगे। यह संगीत यहीं से जायेगा। और व्याख्यान भी हमारा यहीं से जायेगा। एक एक यज्ञ में हम अपना वीडियो बनाकर भेजेंगे। वीडियो उसे कहते हैं। जो आदमी की तरीके से आवाज भी सुनाता है और शकल भी दिखाता है। वह हमारी और माता जी की शकल भी दिखायेगा और आवाज भी सुनाएगा और देवकन्याओं का गीत भी सुनाएगा। कुँवारी कन्याओं की वाणी में ओजस्विता भी ज्यादा होती है और उसमें प्रभाव ज्यादा होता है। उनका भी टेप भेजेंगे’- जहाँ-जहाँ कहीं भी आप एक कुण्ड का हवन करेंगे। सामान्यता हमने यह आशा की है कि आप पाँच कुण्ड का हवन करेंगे पाँच नये स्थानों पर । हर एक जिम्मेदार आदमी को जिसको हमने शक्ति पीठें कहा है- समर्थ शाखा कहा है, उप शाखा और स्वाध्याय मंडल कहा है उनमें से हर एक आदमी जो हमारा प्रज्ञा पुरुष है जो हमसे घनिष्ठ है, हम चाहते हैं कि वह सौ नये गाँवों में हमको बिठा दे। हजारों गाँवों में हमको बिठा दे। हजारों गाँव ऐसे हैं हिन्दुस्तान के जो अभी हमने देखे नहीं। शहरों में हम गये है, कस्बों में गये है, पर गाँवों में तो गये नहीं। इस बार गाँवों में जाने का हमारा मन है। यह प्रबंध आप कीजिए। अभी हम जो अपने आदमी आपके पास भेज रहे हैं, सिर्फ इस काम करें। एक लाख कुण्ड का एक-लाख वेदियों का हवन हमें करना है जिसमें हमारा भी व्याख्यान होगा, माता जी का भी व्याख्यान होगा और हमारे गुरु का संरक्षण भी होगा और लागत क्या है-एक रुपया। इस तरह का व्यापक स्तर पर आयोजन करने का हमारा मन है। इसके लिए आप जी जान से कोशिश करे।

यह वर्ष समयदान का वर्ष हैं। हमने आप लोगों से समयदान का वर्ष है। हमने आप लोगों से समयदान माँगा है। लोगों ने कहा था कि हम गुरु जी की हीरक जयंती मनायेंगे। तो आप क्या करेंगे हीरक जयंती में? हवन करेंगे, जुलूस निकलेंगे? जुलूस निकालेंगे? नहीं जो हम कहें सो कीजिए और हमारा कहना यह है कि एक गाँव पीछे एक यज्ञ हो एक हवनकुंड का या पांच कुण्ड हो और उसमें पाँच कन्यायें बैठे और उसी में हमारा वीडियो दिखाया जाय। इस तरह एक काम तो हमारा यही है-एक लाख यज्ञों को पूरा करना। हमारा यह संकल्प अधूरा रहे नहीं है। चारों वेदों के भाष्य का संकल्प अधूरा नहीं रहा, हजार कुण्डीय यज्ञ का अधूरा नहीं रहा-तब नहीं रहा जब हम वहाँ थे, पर इस समय हम नहीं हैं। इस समय हमारी जगह पर हैं आप, तब पाँच यज्ञों को अपने सीमावर्ती गाँवों में कीजिये। वहाँ में कीजिए। वहाँ शाखा स्थापित कीजिए ताकि हमारी शाखायें जितनी भी हो-पाँच गुनी अधिक बढ़ जायँ। अभी 2400 शाखाएं। है। उसमें पाँच का गुणा कर दीजिए तो एक लाख से अधिक हो जायेंगी। कम से कम एक लाख स्थानों पर इस तरह गायत्री परिवार का प्रचार करने के लिए-शाखायें स्थापित करने के लिए हमारी इच्छा है और इसलिए आप हमारे इस काम में मदद कीजिए। नंबर दो-इसके लिए प्रचारक मंडलियों की आवश्यकता पड़ेगा ताकि आप प्रत्येक घरों में जा करके हमारा संदेश सुना सकें। इसके लिए आपको अपना तथा प्रत्येक प्रज्ञा पुत्र का परिवार के हर सदस्यों का जन्म दिन मनाना पड़ेगा। जन्म दिन मनाने में केवल नहीं चलेगा। इसके लिए संगीत प्रचारकों की जरूरत पड़ेगी। संगीत प्रचारकों के लिए आपको यह करना है कि यहाँ शांतिकुंज में जो युग शिल्पी सत्र चलते हैं। उसमें एक आदमी आप भेज दीजिए जो यहाँ से प्रशिक्षण लेकर जाने के बाद में वहाँ के लोगों को प्रवचन करना, हवन करना सिखा देगा, संगीत सिखा देगा। पहले भी युगशिल्पी सत्र में आ चुके है। लोग, पर तब संगीत पर इतना जोर नहीं दिया गया था। अब नये शिक्षण में हमारा ध्यान संगीत पर है। अब नये शिक्षण में हमारा ध्यान संगीत पर है। मध्यकालीन जितने भी संत हुए है, उनने संगीत के मध्यकालीन जितने भी संत हुए है, उनने संगीत के माध्यम से अपना प्रचार किया है। कबीर ने अपना प्रचार से अपनी काम किया था। मध्यकालीन सभी संतों ने वाणी के व्याख्यान द्वारा नहीं, बल्कि संगीत के द्वारा प्रचार किया था। तो आपके यहाँ से भी एक मंडली ऐसी होनी चाहिए। जो यहाँ से भी एक मंडली ऐसी होनी चाहिए जो यहाँ से संगीत सीखकर के जाए। इसका नाम हमने वक्त विश्वविद्यालय रखा है। इसके लिए आप लोग अपने-अपने यहाँ से एक-एक आदमी ऐसा भेजिए जो अपने यहाँ से एक-एक आदमी ऐसा भेजिए जो जीवंत हो जिसमें जान हो जिसको हम आपके क्षेत्र का अध्यापक बनाकर के भेज सकें। मंडली आपको तैयार करनी है। प्रचार आपको करना है।, मिशन के विचार आपको फैलाने हैं। इसके लिए गाँव जन्मदिन के समय, तथा त्यौहारों के अवसर पर मीटिंग बुला लीजिए-काम के लोगों को बुला लीजिए। अबकी बार जो भी यज्ञ होंगे, उसमें हमने यह इन्तजाम किया है कि ढाई सो से ज्यादा आदमी न आये। क्योंकि हम जो वीडियो भेजेंगे उसमें दो सौ से ढाई आदमी ही आ सकेंगे।

एक बात और जो करनी है वह यह कि अब हमारा विश्व विद्यालय चलने वाला है। इसमें एक एक लाख व्यक्तियों को पढ़ाने वाले है। लेकिन हमारे इस मिशन के लिए हर एक आदमी को शांतिकुंज आना तो मुश्किल है। अतः वह एक नया प्रशिक्षित अध्यापक जो यहाँ से जायेगा वही अपने स्थानीय लोगों को बुलाकर के वही शिक्षण देगा जो हम यहाँ युगशिल्पी सत्र में बुलाकर देते हैं। इस तरीके से देशभर में जितनी भी शाखायें हैं यदि उनमें से दस-दस आदमी हो जाते हैं। इस तरह के अब तक जितने भी विश्वविद्यालय चले हैं उनमें से किसी में भी एक लाख विद्यार्थी नहीं थे। न किसी आँदोलन में एक लाख विद्यार्थी नहीं थे, इसलिए उनके नाम और संख्याएं बढ़ जाती थीं, लेकिन लाख व्यक्ति शामिल हुए। घुमा−फिरा कर वही चले जाते थे, इसलिए उनके नाम और संख्याएं बढ़ जाती थी, लेकिन लाख व्यक्तियों को हम पढ़ाकर जायँ जिससे वे यों कहें कि गुरुजी ने हमको पढ़ाया था। गुरुजी के हाथ का सर्टीफिकेट हमारे पास है। जो भी आदमी यहाँ युगशिल्पी सत्र में आयेगा उनको हम सर्टीफिकेट देंगे कि तुमको अध्यापक नियुक्त किया है। इस तरह से एक लाख अध्यापक नियुक्त करने का हमारा मदद करेंगे। अब शाँतिकुँज से हम अपने आदमी इसलिए भेज रहे हैं। कि जो भी जीवंत आदमी है, प्राणवान आदमी हैं वे इस बात का संकल्प लें कि हीरक जयंती वर्ष में कि इस कार्य के म करेंगे ही। जो भी काम आप करें, उसका पानी लेकर संकल्प कर दीजिए, वह संकल्प हमारे पास आ जायेगा। और तब समाधान होगा।

दो-तीन काम और है जो आपको करने है। हरीतिमा संवर्धन के लिए पेड़ भी लगाये जाने चाहिए। जुड़ी-बूटी औषधालय हमारे यहाँ है, हम चाहते हैं कि वह भी आपके यहाँ हो जाय। अभी जो हवन सामग्री बाहर से माँगते हैं, उसके पेड़-पौधे आप अपने खेतों में खुद पैदा कर लें और उसी को कूट-पीस कर प्रयुक्त कर लिया करें। इस तरह के कई काम है जो आप कर सकते हैं। आपके पास कमरे हों तो छोटे बच्चों के स्कूल चला सकते हैं। जगह न हो तो आप किराये पर ले लीजिए। किसी से एक कमरा माँग लीजिए और कह दीजिए कि जितने समय तक हमारे काम आयेगा उतने समय तक मिशन का है, शेष सारे समय आपका है चाहे जैसा उपयोग कीजिए। या फिर कोई धर्मशाला में एक कमरा ले लीजिए। कोई मंदिर टूटा-फूटा हो उसकी मरम्मत करा लीजिए तो उकसा जीर्णोद्धार भी हो जाएगा। अब तक 2400 शक्तिपीठें बनाई जिनमें से किसी-किसी में लाखों रुपये लगे हैं । वे हैं तो सही, पर उन्हें अपने स्थान पर रहने दीजिए। अब कुछ ऐसी नयी शक्तिपीठें भी हो सकती है। जो छप्पर की छायी हुई हों, जिन्हें हर साल नये सिरे से बदल दिया जाय। कुछ ऐसी भी शक्तिपीठें हो सकती हैं जो खपरैल से छायी गयी हों जिन्हें बरसात में ठीक कर लें और उसी से काम चला लिया करें। जब जरूरत हो तो उसी में बच्चों के संस्कार कर लें जन्म दिन मान लें उसी में अपनी पाठशाला चला लें। या कहीं किसी का एक कमरा माँग लें, इसके लिए हम आपको यकीन दिलाते हैं कि अच्छे उद्देश्य के लिए वह आपको मिल जायगा।

इन सब कार्यों के लिए हम अपने कार्यकर्ता भेज रहे हैं कि आप सब वहाँ इकठ्ठा होकर यह विचार करें कि गुरुजी ने नये वर्ष के लिए जो संकल्प लिए हैं, उस संकल्प के कई उद्देश्य हैं। उसमें से एक तो यह है कि इन दिनों का जो वातावरण है उनमें प्रलय होने जैसी दुर्घटनायें होना संभव है। दूसरा यह है कि इन बीस सालों में आप लोग किसी मुसीबत में फँस सकते हैं। आपको तो दिखाई नहीं पड़ता परंतु मुझे दिखाई पड़ता है कि आप किसी मुकदमें में पड़ सकते हैं या कोई और बात हो सकती है। कोई अकाल की चपेट में आ सकते हैं या कोई और कठिनाई उठा सकते हैं जिन्हें देखना हमारा काम है और इसीलिए हम यह आयोजन कर रहे है। यह आयोजन हम इसलिए भी कर रहें है कि सारे संसार में जो दुर्घटनायें घट रही हैं- चाहे वह ईरान संसार में जो दुर्घटनायें घट रही है। चाहे वह ईरान-ईराक का युद्ध हो, फिलिस्तीन और इसराइल का युद्ध हो, या अमेरिका की नक्षत्र युद्ध योजना हो या परमाणु युद्ध की विभीषिका। हमने पचास फीसदी अपनी शक्ति ऐसे कामों के लिए सुरक्षित रखी हैं कि जिससे इस वातावरण की शुद्ध करने में और जो आदमी इस तरह की बाते करने के लिए तुले हुए बैठे है- आमादा बैठे है और जो आदमी इस तरह की बातें करने के लिए, संसार में शाँति स्थापित करने के लिए और अप लोगों की व्यक्तिगत समस्याओं के लिए-इन तीनों उद्देश्य के लिए यह कार्यक्रम हमने बनाये हैं। संकल्प लेंगे कि यह काम गुरुजी का तो हम कर ही डालेंगे।

मित्रों। हम चाहते हैं कि जो वजनदार काम हमारे गुरुजी ने हमारे जिम्मे सौंपा है,उस वजनदार काम को पूरा करने में हम समर्थ हो सकें। समर्थ बनने के लिए “बैकिंग शक्ति” भी होनी चाहिए और वह “बैकिंग शक्ति” आप होंगे हमारी पीठ पीछे वाली शक्ति आप होगे। इसलिए इस वर्ष के सौंपे हुए जो काम हैं, उनको आप किस सीमा तक पुरा कर सकेंगे और किस सीमा तक पूरा नहीं कर सकेंगे और किस सीमा तक पूरा नहीं कर सकेंगे, यह ध्यान रखना है। हमने हर वर्ष बार हम आपसे संकल्प कराने के लिए लेते हैं कि आप क्या करेंगे और अगले वर्ष आपका कार्यक्रम क्या होगा। बस, यही हमारा उद्देश्य था इसी के लिए हमने आपको बुलाया था। अब जो यज्ञ होंगे उनमें आप लोगों की एकत्रित होकर के सामूहिक रूप से संकल्प लेने की उम्मीद और अपेक्षा कर रहे हैं। बस यही कहना था आप लोगों से।


Quotation

दुर्भाग्य कभी आप के पीछे हाथ धोकर पड़ जाए, ऐसा लगने लगे कि कोई उपाय प्रगति पथ पर स्थिर रखने में समर्थ नहीं है, चारों ओर सफलता ही सफलता, अंधकार ही अंधकार प्रतीत हो रहा हैं, तब आप महापुरुषों के ग्रंथ पढ़ें जीवन ज्योति मिलेगी।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


धारावाहिक विशेष लेखमाला-12 - संवेदना विस्तार से विनिर्मित हुआ है-यह विराट् परिवार

“अन्यान्य संगठन तो निहित स्वार्थों के लिए बनते, टूटते व बिखरते रहें है। किंतु हमने जो गायत्री परिवार के रूप में चुने हुए पुरुषों की एक माला तैयार की है, उकसा एक ही लक्ष्य है इक्कीसवीं सदी का स्वरूप क्या होगा? वह कैसे आयेगी? उसकी एक झलक झाँकी सारे विश्व को दिखाना तथा अध्यात्म को अपने जीवन में उतारकर सारे जमाने को बता देना कि यह जीवन की शीर्षासन अवश्य है पर इसे व्यवहार में उतारकर चैन की-आँतरिक आनन्द की, मस्ती भरी जिन्दगी गुजारी जा सकती।”कार्यकर्ताओं से की जाने वाली नियमित चर्चाओं के क्रम में परम पूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से निकले ये विचार ये चार यहाँ संगठन के रूप में उनके द्वारा स्थापित “गायत्री परिवार” रूपी उस विराट सेना की भूमिका के नाते अभिव्यक्त हुए थे, जो आज देव संस्कृति दिग्विजय के उपक्रम में अश्वमेधी पराक्रमों में सारे विश्व में कार्यरत दिखाई पड़ती है।

किसी को लगा सकता है कि जैसे विश्व में इतने पंथ, सम्प्रदाय, विचारकों-मनीषियों के पीछे सतत् चलते रहने वालों के हजूम होते हैं, वैसा ही एक पंथ या संप्रदाय कोई यह “गायत्री परिवार”भी होगा किंतु उथली दृष्टि इससे ज्यादा सोच भी क्या सकती है। परम पूज्य गुरुदेव के शब्दों में “हमने व माताजी ने संवेदना बाँटी है-जीवन भर तथा इसी एक कमाई से इतने व्यक्तियों की एक “लार्जर फेमीली” खड़ी कर दी है। जिसमें सब एक दूसरे के दुःख-सुख में शरीक ही भावी विश्व कैसा हो? इसका एक दिग्दर्शन करा सकेंगे। “निश्चित ही किसी भी संगठन के निर्माण के पीछे सृजेता की गहरी अंतःदृष्टि जरूरी है। नैतिक व आध्यात्मिक अनुशासन जरूरी है। नैतिक व आध्यात्मिक अनुशासन किसी भी संगठन में उसके निर्माता के संवेदनात्मक सहारे से आपाआप आ जाता है, उसके लिए किसी तरह की सैनिक अनुशासन की कार्यवाही ही नहीं करनी पड़ती । जिसका हृदय विशाल है, करुणा से जिसका अंतःकरण लबालब भरा पड़ा है, वह अपनी अंदर की बेचैनी बिखेरे बिना, अनेकों को उसका अनुदान दिये बिना चैन से कभी बैठ ही नहीं सकता। यह सारी प्रक्रिया हम परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी के जीवन क्रम से रूप में देखते हैं।

देवसंस्कृति दिग्विजय के निमित्त अश्वमेधी पराक्रम का निकली चतुरंगिणी सेना के अगणित सैनिक आज लोगों को ग्राम प्रदक्षिणा करते, ग्रामतीर्थ की स्थापनाएं रजवन्दन समारोह तथा संस्कार समारोह संपन्न करते दिखाई देते हैं, गायत्री एवं यज्ञ के माध्यम से जन-जन को युग परिवर्तन की प्रक्रिया समझाते दिखाई पड़ते हैं। प्रायः तीन करोड़ से अधिक व्यक्ति प्रत्यक्षतः तथा इनसे भी दस गुना अधिक परोक्ष रूप से जुड़े दिखाई देते हैं जिसमें “हम बदलेंगे-युग बदलेगा” का उद्घोष साकार होता दीख पड़ता है। इस विशाल वट वृक्ष का, जो अगले दिनों एक-डेढ़ दशक में ही अपने साये में सारे विश्व को लेगा, देखने के पूर्व उस बीज की महत्ता को समझना होगा जो आज से साठ वर्ष पूर्व गला व जिसने अपनी सारी महत्वाकाँक्षाओं को निज की मुक्ति, व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति, सिद्धि या सफलताओं के शिखर की उपलब्धि के बजाय समष्टि के उत्थान के निमित्त लगा दिया व उसी की परिणति के रूप में देवसंस्कृति को विश्व संस्कृति बनाता यह विराट गायत्री परिवार आज दिखाई पड़ता है।

पारस्परिक चर्चाओं व कार्यकर्ता गोष्ठी के क्रम में उच्चस्तरीय परामर्श आदि, प्रसंगों में पूज्यवर बताया करते थे कि “बेटो। ब्राह्मण इस धरती से समाप्त हो गया है। मुझे वही ब्राह्मण जो साधन-सुविधाओं की माँग नहीं करता बल्कि जो पास है, वह भी उसका दे देने का मन करता है।, वह भी उसका दे देने का मन करता है। बहिरंग जीवन सादा व अंतःकरण कुबेर की तरह धनी होता है। औसत भारतीय का जीवन जीता है व सदा औरों को ऊँचा उठाने की सोचता है। दुर्भाग्य आज यह है कि परिभाषा करते हैं। जब कि देखा जाय तो जाति से लोग कुछ भी हों, कर्म से आत एक ही वर्ण चारों ओर दिखाई पड़ता है- “शूद्रवर्ण”-शिश्नोदर परायण जीवन ही जिनका इष्ट है, लक्ष्य है व महत्वकाँक्षाएँ जिनकी भौतिक जगत की अनेक गुनी बढ़ती-बढ़ती सारी धरती पर औरों के लिए जीने वाले लोगों की होगी।”

जिस समय आजाद, भगतसिंह, विस्मिल, खुदीराम बोस आदि आजादी के लिए शहीद हो रहे थे, “श्रीराम मत्त” के रूप में पूज्यवर आगरा जिले के एक युवा योद्धा सैनिक की तरह उन सभी उपक्रमों में लगे थे जो उपरोक्त शहीदों द्वारा संपन्न हुए। जेलयात्रा बारबार होने से जमींदार घर की कुर्की तक की नौबत आने पर भी राष्ट्र की आजादी सर्वोपरि उन्हें दिखाई दी। जब द्वितीय सर्वोपरि उन्हें दिखाई दीं जब द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ होने के साथ भारत की आजादी सन्निकट दिखाई दे रही थी तब वे अपने गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला के साथ साथ “अखण्ड-ज्योति’ मखिका आरंभ कर बापू के निर्देशों एवं अपनी अदृश्य शरीरधारी गुरुसत्ता के सतत् मार्गदर्शन के अनुरूप एक ऐसे परिवार के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ कर रहे थे जिसे स्वतंत्र भारत को इक्कीसवीं सदी के शुभारंभ से अंत तक ले जाने का महत्ती जिम्मेदारी वाला काम करना था। इसके लिए उनने जमींदारी का वैभव त्याग, स्वयं के साधनात्मक पराक्रम द्वारा, मुक्ति, सिद्धि की लक्ष्य सिद्धि को गौण एवं औरों के कष्टों में सहभागिता को वरीयता देकर स्वल्प साधनों में भी एक ऐसी संस्था के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ कर दी, जिसका आदि से अंत तक का इतिहास त्याग आदि से अंत तक का इतिहास त्याग व बलिदान, संवेदना व समर्पण का इतिहास है।

अपने संस्मरणों को सुनाते हुए पूज्यवर अकसर कहा करते थे कि “बेटो। यह गरीबी हमने जान बूझकर ओढ़ी है। एवं तुम से ओढ़ने को कहा है क्योंकि यही युगधर्म है। तुम्हारे पास है साधन तो उन्हें औरों को बाँट दो। रहो ब्राह्मण की तरह । यह संस्था जो हमने बनायी है, एक नमूना है कि अगले दिनों का मानव समाज कैसा हो सकता है, यह अगले दिनों लोग यही आजाद व भगतसिंह ने किस तरह तत्कालीन समाज के गिने-चुने युवा लोगों में अपनी करुणा उड़ेलकर निज को बलिदान करने के लिए प्रेरित कर दिया। “यदि वे सभी-विस्मित, चंद्रशेखर आजाद या भगतसिंह आज के नेताओं की तरह विलासिता की जिंदगी जी रहे होते तो क्या प्रेरणा के स्त्रोत बन सके होते? स्वयं आगे आकर उनने उदाहरण प्रस्तुत न किया होता तो क्या देश की आजादी के लिए वह वातावरण बन सका होता जिसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। थिगली लगी धोती पहनने वाले सरदार पटेल व आधी धोती पहनने वाले गाँधी जो जनता की दी गयी एक-एक पाई का हिसाब रखते थे, न होते तो क्या “क्विट इण्डिया” आँदोलन सार्थक बना होता।” आँदोलन सार्थक बना होता।” अन्यान्य संगठनों में बहुधा वे संवेदना का मर्मस्पर्शी विस्तार करने वाले उन तंत्रों का हवाला देते थे, जिनसे महामानव उपजे। प्रेम महाविद्यालय जिसने लालबहादुर शास्त्री, श्रीकृष्ण दास जाजू, श्रीसंपूर्णनंद जैसी व्यक्ति समाज को दिए, श्रीसंपूर्णानंद जैसे व्यक्ति समाज को दिए, केशव बलीनराप हेडगेवर जिनने श्री गोलवलकर तथा भाऊसाहब देवरस जैसे त्यागी तपस्वी समाज को दिए, डा. बाबासाहब अम्बेडकर जिनके माध्यम से पिछड़ों-दलितों को ऊँचा उठाने की एक मुहित समाज में बनी। कि यदि इन सभी ने निज के ब्राह्मणत्व को बनाए रखा होता तो वह सब न कर पाते जो व अंततःकर पाए।

आज की राजनीति की समीक्षा करते हुए पूज्यवर कभी-कभी कटाक्ष की भाषा में इनकी संज्ञा केकड़ा-वृत्ति से देते थे। एक कथा कभी-कभी वे हम सभी को गोष्ठियों में संगठन वृत्ति कैसे बनी रह सकती है। व कैसे टूटती है, इसका स्पष्टीकरण देते हुए सुते थे-बोलते थे-”एक व्यक्ति दूर से देख रहा था कि बिना ढँके तो ये सब निकल कर रेंगते हुए बाहर चले जायेंगे । चह उसकी मदद को आया व कहने लगा कि “इन्हें ढक दो, कहीं ये निकल कर बाहर न चलें दो, कहीं ये निकल कर बाहर न चलें जायँ। केकड़ों का व्यापारी बोला-”आप निश्चित रहें । इन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूँ। “उसकी उत्कंठा का समाधान करते हुए उसने बताया कि “एक भी केकड़ा इस पूरे समूह में से जा निकलने की कोशिश करता है तो चार केकड़े मिलकर उसकी टाँग खींच लेते हैं कि यह कैसे ऊपर जा रहा है। जब सभी की यह मनोवृत्ति हो तो कोई बाहर कैसे आ सकता है? अतः आप निश्चित रहें।”

कहानी का सार समझते हुए पूज्यवर कहते कि आज की कीच से भरी राजनीति में इन्हीं केकड़ों का समुच्चय है। इस ऐसे समाज के निर्माण की परिकल्पना कर रहे हैं जिसमें वरिष्ठता हो, न कि कुटिलता निरहंकारिता विनम्रता हो, न कि कुटिलता-दांव−पेंच कूटनीति। आज की जोड़-तोड़ की राजनीति के विषय में वे बहुत पूर्व लिखा चुके थे कि धर्म तंत्र का काम सशक्त समर्थ प्रजातंत्र का निर्माण लोकशिक्षण के माध्यम से करना है। यदि व्यक्ति सही बन सका तो निश्चित ही समाज व उसके मूर्द्धन्य-कर्णधार भी सही होंगे उसके लिए इकाई को ही ठीक करना होगा। इसी को उनने मानव निर्माण अभियान-युगनिर्माण अभियान “मेनमोकिग ओडीसी” नाम दिया जो व्यक्ति के अंदर के ब्राह्मणत्व के जागरण के माध्यम से चलना था।

कैसे कार्यकर्ता वे चाहते थे वह कैसा आदर्श सृजन तंत्र के एक सिपाही का होना चाहिए, इसका एक नमूना वह परिपत्र है जो पूज्यवर ने “अध्यात्म क्षेत्र की परिष्टता विनम्रता पर निर्भर “नाम से समस्त विनम्रता पर निर्भर “ सेवाधर्म के साथ शालीनता को निस्पृह एवं विनम्र होना चाहिए इसी में उसकी गरिमा एवं उज्ज्वल भविष्य की संभावना है। जो बड़प्पन लूटने, साथियों की तुलना में अधिक चमकने-उछलने का प्रयत्न करेंगे, वे औंधे मुँह गिरने और अपने दांतों को तोड़ लेंगे।”“......संस्थाओं के विघटन में पदलोलुपता ही प्रधान कारण रही है” “.............. युगशिल्पियों को समय रहते इस खतरे से बचना चाहिए। हममें से एक भी लोकेषणा-ग्रस्त बड़प्पन का महत्वाकाँक्षी ना बनने पाए। ..... स्मरण रहे अधिक वरिष्ठ व्यक्ति अधिक विनम्र होते हैं। फलों से डालियाँ लद जाने पर आम का वृक्ष धरती की ओर झुकने लगता है।,,....

..शांतिकुंज के हर कार्यकर्ता को सफाई और पहरेदारी का काम अपने हाथों करना पड़ता है। यहाँ कोई मेहतर नहीं है। नेतागिरी के लिए विग्रह खड़ा करने वाले क्षेत्र दूसरे हो सकते हैं, पर सेवाधर्म में इस प्रकार की लिप्सा का थोड़ा प्रदर्शन भी असहनीय है। पदवी पाने के लिए विग्रह करने वालों के लिए स्वयंसेवी संगठनों में कोई स्थान नहीं होता। .... युगशिल्पी एक महान मिशन का अंग अवयव होने के कारण ही सम्मान पाते और उच्चस्तरीय व्यक्तित्व का श्रेय पाते हैं। उन्हें सार्वजनिक प्रयोगों में मैं...मैं शब्द का उपयोग ना करके .... हम हम लोग कहना चाहिए। श्रेय तो सभी के सम्मिलित प्रयत्नों से बन पड़ा है, इसलिए उसके किये जाने में सभी के मिले-जुले प्रयत्नों के संकेत रहने चाहिए। साथियों को स्नेह-दुलार, सहयोग देने में हम सदा अग्रणी रहें।,,

इस परिपत्र के ऊपर अद्भुत एक-एक वाक्य कुँजी है किसी संगठन की सफलता का। यदि आज जातीय सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक संगठन असफल हैं तो इसी कारण। महाभारत की वेदव्यास की उक्ति... बहव यत्र नेतार, बहव मानकाँक्षिण... सदल अवसदित। आज सामूहिक आत्मघात के रूप में दिखाई देती है तो इसका मूल कारण वही है कि बड़प्पन की महत्वाकांक्षा लिप्सा ने उस ब्राह्मण बीज को समाप्त कर दिया है जो कभी जन नेतृत्व करता था। उस चाणक्य समर्थ रामदास तथा रामकृष्ण परमहंस श्री अरविंद के पुनर्जीवित संस्करण के रूप में हम आज मार्गदर्शन तंत्र के रूप में गायत्री परिवार के अधिष्ठाता को देखते हैं।भले ही देखने को उनका स्थूल शरीर हमारे बीच न हो, उनकी सूक्ष्मसत्ता ही इतनी सक्रियता से, परम वन्दनीया माता जी के माध्यम से अपने विराट संगठन को पोषण देती, साहित्य रूपी एक विशाल विधि व उनके जीवन की जी गयी एक-एक अनमोल घड़ी के रूप में नज़र आती है।

संवेदना जब आत्मोत्सर्ग की बलिदान की अहं को छोड़ कर समष्टि के हित की जाग जाती है तो व्यापक हो जाती है। ऐसा व्यक्ति चाहे वह आदि शंकराचार्य हो या विवेकानंद जागने पर चुपचाप नहीं बैठ सकता, वह विश्व स्तर पर साँस्कृतिक नवोन्मेष की प्रक्रिया को सम्पन्न करने आगे बढ़ता चलता है। जो भी अपने पास है, वह भी देते रहने को सदा उसका मन करता है। जिसके भीतर महा रुद्र ताँडव कर रहा हो, वह धरती का सारा ज़हर पिये बिना शांति से बैठा कैसे रह सकता है? ऐसे सतत् संवेदनशील बेचैन व्यक्ति ही संगठन बन पाते हैं। ऐसी जाग्रत संवेदना जिसने एक विराट प्रजा परिवार बना दिया तथा जिसकी फैली हुई शाखाओं के साये में आने वाले दिनों में सारी विश्व वसुधा को बैठना है, हमारे आराध्य पूज्य गुरुदेव ने अपने एवं परम वन्दनीया माता जी के माध्यम से पैदा की, एक सुरक्षित तंत्र विकसित कर समर्पित स्वयं सेवकों की प्रतिभाओं का सुनियोजित-सुगठित रूप सबके समक्ष प्रस्तुत किया। यही निश्चित रूप से नवयुग का आधार विनिर्मित करेगा, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है।


अंतः करण में विवेक और संतोष से ही स्थाई सुख-शांति और प्रसन्नता मिलती है (Kahani)

एक मिट्टी के टीले पर बैठे हुए संत अनाम अस्ताचलगामी भगवान सूर्य को बड़े ध्यान से देख रहे थे, किस प्रकार एक दिन महाशक्तियों का वैभव नष्ट हो जाता है।

संत अनाम इन्हीं विचारों में डूबे थे कि एक आदमी उनके समीप आया और प्रणाम कर चुपचाप खड़ा हो गया। मुस्कुराते हुए संत अनाम ने पूछा- वत्स! मुझसे कुछ काम है?

आगंतुक ने विनय की-- भगवन्! मैं पुरु देश का धनी सेठ हूँ। तीर्थ यात्रा के लिए चलने लगा, तो मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा-- आप इतने स्थानों की यात्रा करेंगे, कहीं से मेरे लिए शांति, सुख, प्रसन्नता मोल ले आना। मैंने अनेक स्थानों पर ढूंढ़ा पर यही तीन वस्तुएं कहीं नहीं मिली। आपको अत्यंत शांत, सुखी और प्रसन्न देखकर ही आपके पास आया हूँ, सम्भव है आपके पास ही वह वस्तुएं उपलब्ध हो जाएं।

संत अनाम फिर मुस्कराए और अपनी कुटिया के भीतर चले गये,। एक निमिष के उपराँत ही लौट कर आए और एक कागज की पुड़िया देते हुए बोले-.यह अपने मित्र को दे देना और हाँ तब तक इसे कहीं खोलना मत।,,

आगंतुक पुड़िया लेकर चला गया। मित्र ने एकाँत में ले जाकर उसे खोला और उसमें रखी औषधि का सेवन करके कुछ दिन में ही सुखी, शांत और प्रसन्न हो गया। एक दिन वह धनी सज्जन मित्र के पास जाकर बोला- मित्र! मुझे भी अपनी औषधि का कुछ अंश दे दो, तो मेरा भी कल्याण हो जाए।

मित्र ने पुड़िया खोलकर दिखाई-- उसमें लिखा था-- अंतः करण में विवेक और संतोष से ही स्थाई सुख-शांति और प्रसन्नता मिलती है। चिंतन के स्तर पर किये पुरुषार्थी से ही स्थाई सुख-शांति मिल सकती है, स्थूल पदार्थों के द्वारा नहीं।


महाकाल का संकेत


महाकाल का संकेत (Kavita)

भरी रही जो भूमि सदा से स्वस्थ सुगंधित फूलों से. उस धरती को यहाँ न भरने देंगे कभी बबूलों से ॥

यहाँ संत ऋषियों का जीवन उन्नत रहा विचारों से सत्कर्मों को अधिक मान्यता मिली यहाँ मनुहारों से

इसी संस्कृति के सूर्योदय सेजग ने किरणें मांगीं यहीं आदि कविता जन्मी जग कविमन में करुणा जागीं

मानवता की संस्कृति में इन सक्षम सबल सहारों को... कभी नहीं जीने देंगे हम अब निर्बल निर्मूलों से.....

यहाँ मधुरता ही झरती थी हर उपवन अमराई से यहाँ प्यार की गंध उठा करती थी हर पुरवाई से

स्रस बसंती पवन वीरता की उमंग भर जाता था यहाँ पर्व होली दीवाली का समता सिखलाता है।

स्गम रही सबको जो संस्कृति, उसकी पथ पगडंडी को, नहीं भरेंगे घृणा-विषमता-अविश्वास के शूलों से।

था कृतज्ञ इस संस्कृति में हर व्यक्ति यहाँ हर दाता का, माना हर प्राकृतिक शक्ति को भी वरदान विधाता का,

प्यार अनुज को, अग्रजनों को मिला सदा सम्मान यहाँ, देवतुल्य थे पूज्य वृक्ष-जल-अग्नि-चंद्र-दिनमान यहाँ,

वसुँधरा जिनका कुटुम्ब थी, बंधु विश्व के वासी थे, उन्हें ना बनने देंगे हम उपहास स्वयं की अभूलों से।

इसका पत्थर भी श्रद्धा से शिवशंकर बन जाता था, सामूहिक सहकार उमड़ता था खेतों-खलिहानों से,

यहाँ लोक गाथाएं भरी रहीं अनगिन बलिदानों से, तूफानों में श्रद्धा-साहस-तप-सहकार जरूरी है,

हमें यही संकेत दे रहा महाकाल अब कुलों से।

शचीन्द्र भटनागर


खुलकर युद्ध करो....


खुलकर युद्ध करो (Kavita)

ऐसी भी क्या कायरता इतना तो नहीं डरो। पाश्चात्य संस्कृति से अब तो खुलकर युद्ध करो।

बात वेषभूषा तक रहती तो चुप रह जाते। खान-पान से भी बच जाते कभी ना टकराते।

दुश्चरित्रता लेकिन अब तो हद तक बढ़ आई। कर लेना बर्दाश्त उसे तो अतिशय दुखदाई।

विष पीकर मर जाना अच्छा मन ना अशुद्ध करो। पाश्चात्य संस्कृति से अब तो खुलकर युद्ध करो॥

अगर सिनेमा शृंगारिकता तक ही रह जाता। तो यह अंतर्द्वंद्व न शायद इतना दुख पाता।

लेकिन यह तुल पड़ा नारियों को नंगा करने। खलनायक सीधे घुस आया है अपने घर में।

अस्त्र करो धारण जन-मानस को भी क्रुद्ध करो। पाश्चात्य संस्कृति से अब तो खुल कर खुलकर युद्ध करो॥

भ्रष्टाचार दहाड़ रहा है खुलकर दरवाजे। नाच रही पशुता घर-घर में बजा-बजा बाजे।

प्रजातंत्र को कौन सम्भालेगा आगे बढ़ कर। आँख मूँद कर बैठ गये यदि हिंसा से डर कर।

जनमानस का करो प्रशिक्षण और प्रबुद्ध करो। पाश्चात्य संस्कृति से अब तो खुलकर युद्ध करो॥

आगे बूढ़ा भीष्म पितामह पीछे कर्ण छली। दांये द्रोणाचार्य बीसियों बांये बाहुबली।

चक्रव्यूह है कठिन किंतु अभिमन्यु ना घबराना। डर जाने से अच्छा उसमें घुसकर मर जाना।

वीरों और शहीदों का पथ मत अवरुद्ध करो। पाश्चात्य संस्कृति से अब तो खुलकर युद्ध करो॥

उपज पड़े रावण अहिरावण अपने ही घर में। शूर्पणखायें नाच रहीं है, जैक्षन के स्वर में।

टपने लोकगीत बेचारे माँग रहे भिक्षा। लोकपाल कह रहें कि यह सब ईश्वर की इच्छा।

इस कुत्सा को आग लगाओ अब गृह युद्ध करो। पाश्चात्य संस्कृति से अब तो खुलकर युद्ध करो॥

बलराम सिंह परिहार

*समाप्त*