जर्रे जर्रे में समायी ईश्वरीय सत्ता

परमसत्ता का अस्तित्व कण-कण में है, यह तथ्य सभी स्वीकार करते हैं। प्रत्यक्ष दिखाई न पड़ने पर भी परमात्मा तो है ही। अनुभूतिपरक बोध जो हमें सत्त परमात्मा का होता रहता हे, हमें आस्तिक बनाता है। हमारे कर्मों पर एक न्यायाधीश जैसी दृष्टि रखता हुआ हमें सतत् उसका आभास कराता रहा ह। यदि वास्तव में किसी दृश्यमान प्रतीक को देखकर ही हम परमात्मा पर, उसे अस्तित्व पर विश्वास करना चाहते हों तो, हम ऐश्वर्यमान, सौंदर्य से भरी पूरी प्रकृति की सत्ता के कण-कण में उसका दर्शन ही नहीं, अनुभूति भी कर सकते हैं। “ऐश्वर्य” शब्द जो यहाँ प्रयुक्त हुआ है, उसी से “ईश्वर” शब्द बना है। जो वैभव का पुँज है, जिसकी कीर्ति चहुँओर संव्याप्त हो, अपने आप में पूर्ण हो, सौंदर्य से अभिपूरित हो, वही ईश्वर है। सतत् हम उसी की उपस्थिति अपने चारों ओर देखने का प्रयास करें तो हम वह ईश्वर दृष्टिगोचर होने लगेगा जो “इकॉलाजिकल” संतुलन के रूप में, हिम व हरियाली से आच्छादित पहाड़ों-नदियों, वृक्ष, वनस्पतियों, जीव, जंतुओं-मानव मात्र की संवेदना भावना के रूप में हम देखते व पाते हैं। भारतीय संस्कृति देव संस्कृति है, अर्थात् यह मनुष्य की मूलभूत सत्ता को दैवी मानती है व उसे भटकाव से हटाकर सतत् देवत्व की ओर उन्मुख होते रहने की प्रेरणा देती है। भगवान को देवत्व अत्यंत प्रिय है इसीलिए तो वे सदा उसी का साथ देते आये व आगे बढ़ाते आये हैं। हमारे ऋषि - मुनियों ने-देव संस्कृति के प्रणेताओं ने हिम से आच्छादित पर्वत शृंखला हिमवान देवतात्मा हिमालय से सृष्टि का प्रादुर्भाव माना है व उस पर्वतराज को मात्र शिलाखंडों पर ढकी बर्फ नहीं, जीता जागता भगवत् सत्ता का रूप माना है, जहाँ से कभी देवत्व पूरे आर्यावर्त में फैला-ब्रह्मवर्त कभी यहीं से प्रस्फुटित होकर पूरी विश्व वसुधा को ब्रह्मवर्त बना गया।

प्रकृति में कण-कण में तो भगवान है ही पर देवात्मा हिमालय की ऐश्वर्यमान सत्ता व उससे निकल कर उसके उर की संवेदना का निर्झर लेकर बहने वाली गंगा - यमुना जैसी सरिताओं में हम भगवान के अस्तित्व का बोध और अधिक निकट से पाते हैं। तप-ऊर्जा से भरे पूरे इस ऐश्वर्यमान सृष्टि के सौंदर्यशाली रूप को देखकर भला कौन ईश्वर के अस्तित्व को नकार सकता है ?


साधन नहीं, साधना

धर्म और दर्शन, साहित्य एवं संस्कृति का पतन-देख नागेश भट्ट का स्वाभिमानी मन विचलित हो उठा। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक आर्ष-साहित्य का अवाँछनीय भाग सुधार नहीं डालेंगे, जब तक शुद्ध और सच्चे दर्शन का निर्माण नहीं कर लेंगे - तब तक और कोई काम करेंगे ही नहीं, चाहें उन्हें भूखों कही क्यों न मरना पड़े।

शाम तक जो कुछ मिल जाता खाकर वे दिन भी आर्ष-ग्रन्थों की खोज, पठन-पाठन, मनन-चिंतन और लेखन-संकलन में ही लग रहते। अपनी संस्कृति को जीवित करने को उनकी अदम्य भावना ने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं देने दिया। आयु जैसे-जैसे ढलती गयी वैसे-वैसे उनका शरीर ही निर्बल नहीं होता गया वरन् पीठ में कूबड़ भी निकल आया।

लोग हँसते और कहते - यह देखो भगवान का काम। कहते हैं जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा स्वयं करता है। अब भगवान को क्या हो गया है जो अपने इस प्रेमी की भी रक्षा नहीं कर पाए ? कहने वाले तो नागेश के सामने भी न जाने क्या-क्या कह जाते, पर उस निस्पृह सेवक का मन जैसे कमल का पत्र बन गया था। कोई कुछ कहता वह उसी तरह दुलक जाता जैसे पुरइन के पत्ते पर से पानी। जिस दीवार के सहारे बैठते थे, जब वह चुभने और कूबड़ को कष्ट देने लगी तो नागेश भट्ट ने उस दीवार को कटवाकर छेद करा लिया। छेद इतना बड़ा था कि जब वे दीवार के सहारे बैठ जाते तो कूबड़ उसी में समा जाता और उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न होता।

इस तरह निर्धनता और अभाव के मध्य नागेश भट्ट की साधना निरंतर चलती रही। स्वार्थी तत्वों द्वारा मिलाये, मिथ्या, विचारों, श्लोकों को अपने साहित्य में से वे ऐसे निकाल-निकाल कर फेंकते गए जैसे किसान खेत के झाड़ - झंखाड़ को। नागेश भट्ट प्रकाँड पंडित गिने जाने लगे। उनकी योग्यता के आगे कोई भी प्रतिक्रियावादी व्यक्ति टिक नहीं पाता था।

महाराज पेशवा बाजीराव ने यह सब सुना तो स्तब्ध रह गए। सचमुच ऐसा भी पंडित और लगनशील तपस्वी अब भी इस देश में हो सकता है, इस पर उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने ऐसे महान साधक और संस्कृति निष्ठ देव-पुरुष के दर्शन करने और उन्हें सहायता देने का निश्चय किया।

पेशवा बाजीराव महाराष्ट्र से चलकर स्वयं ही वाराणसी पहुँचे। वस्तुतः जैसा सुना था, वैसा ही पाया। नागेश भट्ट का शरीर काल का कौर बन चला था। पर वह थे कि अब भी पुस्तकों का ढेर जमा किए अपनी साधना में जुटे पड़े थे जैसे शेष संसार उनके लिए किसी श्मशान की तरह हो-जहाँ न तो कुछ दर्शनीय होता है न ग्रहणीय। संसार में कोई भौतिक सुख भी होता है, यह उन्होंने जाना ही नहीं।

पेशवा ने उन्हें देखा तो उनकी आंखें डबडबा आयीं। अपने दुर्भाग्य पर उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ। ऐसे महापुरुष को तो बहुत पहले सहयोग दिया जाना चाहिए था। संभवतः तब वे अब की अपेक्षा सैकड़ों गुना अधिक काम कर सके होते।

बाजीराव ने आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया और बड़े आदर के साथ-”कहा, आयार्च प्रवर ! आज्ञा दें मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूं तो यह मेरा बड़ा सौभाग्य होगा। “

ध्यान भंग हुआ तो नागेश भट्ट ने सिर ऊपर उठाकर महाराज की ओर देखा और उन्हें आदर के साथ बैठाते हुए कहा-हाँ महाराज ! आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए एक सूत्र कठिनाई से हाथ लगा है पर उसकी व्याख्या नहीं हो पा रही। यदि आप उसमें मेरी सहायता कर सकें तो आपकी बड़ी कृपा होंगी।”

आर्थिक सहायता देने के लिए आये महाराज पेशवा यह सुनकर स्तब्धित हो बोले “आपकी साधना अद्वितीय है उसकी सफलता कोई रोक नहीं सकता। धन्य है आपका ब्राह्मणत्व एवं यह देश जिसने आप जैसे नर रत्नों को जन्म दिया।”

प्रतिभाएँ जब आज अपने शोषण की, अधिकारों की तथा कार्य क्षेत्र में प्रतिकूलताओं का शोर मचाती दिखाई देती है तो लगता है, उन्हें ब्राह्मणत्व का क, ख, ग समझाना सर्वाधिक अनिवार्य है। यदि यह समझ में आ गया तो बिना किसी गिला-शिकवा के प्रतिभा परिष्कार संपन्न हो आत्मबल संपन्न देवमानवों से, यह धरित्री देवभूमि - अभिपूरित होती दिखाई पड़ने लगेगी।


सतयुग आएगा तो इसी आधार पर

विशेषतया भारतवर्ष में और साधारणतया संसार भर में अगणित ध्वंसावशेष जो देव संस्कृति के विश्वव्यापी विस्तार के परिचायक है अभी भी उपलब्ध होते हैं। इनमें से बहुत कम ऐसे हैं जिन्हें किले या राज महलों के खंडहर कहा जा सके। इनमें से अधिकाँश ऐसे हैं जिन्हें धर्म स्थानों की आकृति के कहा जा सकता है। मंदिर इनमें से थोड़े हैं। क्योंकि जब उनकी संख्या अधिक न थी। न अनेकों देवी देवता थे और न उनके लिए बनाए गए पूजा गृहों का बाहुल्य। इसलिए उनके प्रतीक चिन्ह भी कम ही पाए जाते हैं। धर्मालयों में ऋषि पुरोहित वर्ग के लोग जन कल्याण की अनेकानेक प्रवृत्तियां चलाते थे। ऋषि काल को लंबा समय बीत गया। फिर उस समय चिरस्थायी वास्तुकला का विकास भी नहीं हुआ था। जो निर्माण होते थे, वे स्वल्प काल में ही ढह जाते थे। उनका प्रमाण परिचय देने वाली साक्षियाँ अब उपलब्ध नहीं होती। पर चैत्यों-विहारों और धर्म संस्थानों के खंडहर अभी भी जहाँ तहाँ उपलब्ध हैं। वे पुरातत्व वेत्ताओं ने बौद्धकाल के बताए हैं। क्योंकि ऋषि परंपरा का भारतीय संस्कृति की अंतरात्मा का पुनर्जीवन उन्हीं दिनों संभव हुआ था। सामंत काल में अपनी भौतिक रक्षा के लिए किले बनाये जाते थे और उचित अनुचित हर काम में संरक्षण देने वाले वरण किए गए देवताओं के भव्य मंदिर -उनके अवशेष जहाँ तहाँ अभी भी पाए जाते हैं। दुर्ग जिस प्रयोजन के लिए बनाए जाते थे, वह समय परिवर्तन के साथ ही बदल गया। देवता मनोकामना पूरी करने भर के लिए थे। कर्मवाद की प्रधानता फिर उभर आने और एकेश्वरवाद की मान्यता पनपने से बहुमुखी देवताओं की भी उपेक्षा-अवज्ञा होने लगी। इन परिस्थितियों का बदलाव उपलब्ध खंडहरों की आकृति और प्रकृति देखने से विदित होता है।

मध्यकाल में पूजा उपासना मनोकामना की पूर्ति अथवा स्वर्ग मुक्ति, ऋषि, सिद्धि के निमित्त होती रही है। उसके पीछे विशुद्ध व्यक्तिगत लाभ था। उसी में से हिस्सा बंटने के लिए भावुक भक्तजन इन पुजारियों की झोली भेंट पूजा से भरा करते थे। किंतु धर्मचक्र प्रवर्तन ने सर्व साधारण का दृष्टिकोण ही बदल दिया। वह विघटनकारी परिवर्तन था, जिसमें लोकोपयोगी धर्म-संस्थानों को मात्र देवताओं को कतिपय विडंबनाओं के सहारे वशवर्ती करने का प्रयत्न किया जाने लगा। जब कि उनका आरंभ लोक शिक्षण में धर्म धारणा का समावेश करने का सफल प्रयोग करते रहने के लिए किया गया था। वस्तुतः इन्हें धर्मप्रचारकों की व्यक्तिगत निर्वाह व्यवस्था तथा सार्वजनिक क्रिया-कलापों को संपन्न करते रहने के लिए क्षेत्रीय व्यवस्था के रूप में किया गया था। हर गाँव में उतने बड़े निर्माण नहीं हो सकते थे जिससे कि उनकी आवश्यक साधन सुविधा जुट सकती थी। “ घर का जोगी जोगड़ा अन्य गाँव का सिद्ध” होने की उक्ति के अनुसार दूर के ढोल सबको सुहावने लगते थे और धर्म प्रयोजन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक आते जाते रहने के निमित्त कारण बनते थे। उस क्षेत्र के लोगों का सत्त अभ्यास से औरों से संपर्क सधता था एवं वह बहुमुखी सहयोग में परिवर्तित होता था।

पुराणों का अवगाहन करने से पता चलता है कि जिस प्रकार पके फल पेड़ से अलग होकर अन्यत्र जहाँ जरूरत होती है वहाँ चले जाते हैं। इसी प्रकार ऋषि-मनीषियों में भी यह परंपरा अपनाई हुई थी कि वे अपने जन्म स्थान में ही सदा नहीं बने रहते थे वरन् वानप्रस्थ, संन्यास, आश्रम की पुरातन परंपरा के अनुसार पिछड़े क्षेत्रों को उभारने और जो उभर चुके हैं उन्हें अन्यान्यों की सेवा सहायता करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु निरंतर परिभ्रमण करते थे। जहाँ भी पिछड़ापन दीखता था वहाँ डेरा डाल कर रम जाते थे। जहाँ थोड़े उपदेश परामर्श से काम चल सकता था वहाँ थोड़ा ठहर कर आगे बढ़ जाते थे। यही थी वह सारगर्भित प्रक्रिया जिसने चिरकाल तक सतयुगी वातावरण बनाए रखा और सभी को भौतिक, आत्मिक प्रगति का समुचित अवसर मिलता रहा।

पुराणों में ऐसे अनेकानेक प्रसंगों का वर्णन है जिसमें भारत भूमि की प्रतिभाएँ अपनी योग्यता के अनुसार जन सेवा करने के निमित्त सुदूर यात्राओं पर निकली और लक्ष्य पूरा होने पर समय लगने की बात ध्यान में रखते हुए वहाँ समय साध्य योजनाएं बनाकर बस गई। इनकी पीढ़ियाँ अपने पूर्वजों की व्रतशीलता का ध्यान रखे रहीं। लोक सेवी की विशेष पहचान बनाए रहीं। ऐसे अनेक यात्रा अभियानों और यत्र तत्र केन्द्र बनाकर रहने के संबंध में सुविस्तृत उल्लेख स्थान-स्थान पर आते हैं।

इन दिनों भारत विशाल भारत था। समूचा एशिया उसकी परिधि में आता था। जम्बू द्वीप में योरोप और एशिया दोनों आते हैं। एशिया की भाषाएँ भी संस्कृत होने के कारण समझने में सरल थी। यूरोप इन दिनों वीरान पड़ा था। उसके निवासी आदिमों की तरह जहाँ तहाँ बन प्रदेशों में छोटे-छोटे समुदायों के रूप में गुजारा करते थे। उनका एकत्रित करना और सहयोग पूर्वक रहना एक ऐसा बड़ा काम था कि उसने जोड़- बटोर करने में ही बहुत सारा समय ले लिया। इसके उपराँत ही सह-निवास की और समाज शासन की कृषि , व्यवसाय, शिक्षा, सभ्यता आदि की स्थापना हो सकी। इस ऐतिहासिक काल का वर्णन खंडहरों, शिलालेखों में तो नहीं मिलता पर स्थान परिवर्तन के कारण पुराने छूटे हुए स्थानों की जो स्थिति होती है, उसका आभास अभी भी मिलता है। सतयुग के भारतीयों को प्रमुख कार्य यही करते रहना पड़ा कि वे बिखराव को एकत्रीकरण में और अनगढ़पन की सुसंस्कारिता में बदलें। निर्वाह के लिए आवश्यक भौतिक संभावनाएँ बनाएँ। साथ ही मानवी गरिमा के सूत्रों को हृदयंगम कराते हुए प्रगतिशील सभ्यता का वातावरण बनाएँ।

यह कार्य सर्व प्रथम समीपवर्ती क्षेत्र में आरंभ करने की प्रथा रही। आर्यावर्त से लगा जुड़ा क्षेत्र कार्य शिक्षण की दृष्टि से सरल पड़ता था। यातायात भी सरल पड़ता था। भाषा संबंधी कठिनाई भी न थी। लोगों में सीमित धर्म चेतना भी थी। इसलिए उनके बीच रहकर काम करना सरल पड़ता था। इसलिए पुरोहित परिव्राजकों की गतिविधियाँ जितनी इस समीपवर्ती क्षेत्र में दीख पड़ी , उसकी तुलना में अन्यत्र उनका अनुपात कम ही रहा। फिर भी उसे नगण्य नहीं कहा जा सकता। वह उदार सेवा, भावना से भरा पूरा विश्वकल्याण के निमित्त अपनाया गया क्रिया कलाप ऐसा था जिसका ऐतिहासिक तारतम्य अभी भी बैठता है।

सतयुग काल की परिस्थितियों की साक्षी देने वाली इमारतों के ध्वंसावशेष मिल सकना अब कठिन है, क्योंकि इतने लंबे समय तक प्रकृति प्रवाह उन्हें असाधारण रूप में बदल देता है। उनका अता पता मनुष्यों द्वारा प्रयुक्त की गई और बाद में छोड़ दी गई भूमियों को देखकर ही लगता है। लोक गाथाओं के वर्णनों में भी इस स्थिति का आभास मिलता है। विभिन्न क्षेत्रों में जो लोक कथाएं जन-श्रुतियों के रूप में चली आती है। उनका मध्यवर्ती तारतम्य बिठाने में भी यह अनुमान लगता है कि एक ही मानसरोवर से यह छोटी मोटी अनेकानेक सरिताएं निकली है। जीवन-यापन की पद्धतियों में उपकरणों के निर्माण और उपयोग में भी समता रही है। इस सब का निष्कर्ष यही निकलता है कि किन्हीं कुशल मालियों ने योजनाबद्ध रूप से विभिन्न भूभागों में उद्यान लगाये हैं। वे विश्व विकास के रूप में मानवी प्रगति के रूप में फलित होते रहे हैं।

भारतीय सभ्यता का विकास बीजारोपण तो हिमालय के उत्तराखंड से लेकर गंगा यमुना के दोआबा के मध्य में अधिक दृष्टिगोचर होता है। पर उसका विस्तार क्रमशः समीपवर्ती क्षेत्रों में प्रभावित करते करते निरंतर आगे बढ़ता चला गया। उसने समूचे भूमंडल को प्रभावित किया। एशिया में तो उस प्रयास की साक्षी देने वाले अगणित खंडहर अभी भी मौजूद है। साथ ही प्रथा-प्रचलनों, मान्यताओं, दिशा-धाराओं का स्वरूप ऐसा बना हुआ है कि उन टहनियों को देखते हुए तने का-जड़ों का परिचय सहज ही प्राप्त कराया जा सकता है।

जहाँ पहुँचने में समुद्र बाधक नहीं होते थे। वहाँ लंबी यात्राएं पैदल ही कर ली जाती थी। जहाँ संभव था वहाँ माल , असबाब ढोने के लिए घोड़े, गधे, ऊंट आदि का प्रयोग किया जाता था। बैलगाड़ियाँ भी विनिर्मित रास्तों पर चल लेती थी। पर दलदलों और हिम शिखरों को पार करने के लिए पैदल चलने, आवश्यक सामग्री साथ ले जाने, का दुस्साहस करना पड़ता था। समुद्री मार्ग से लंबी यात्राएं करने के लिए छोटी नावों ने बड़े जहाजों के रूप में विकास कर लिया था। निकट वर्ती छोटी यात्राएं डोंगियों को चप्पू के सहारे धकेल कर इधर उधर ले जाया जाता था। पर लंबी दूरी तक समुद्र पार करने की प्रक्रिया बड़े जलयानों से ही हो पाती थी। उन्हें मजबूत पतवारें बाँधकर हवा का रुख मोड़ते हुए चलाया जाता था। इस प्रकार इन भूखंडों में भी भारतीय पहुँचे जिनकी दुरुहता से निपटने के लिए इन दिनों विशालकाय यंत्र-चलित जलयानों और वायुयानों से काम लिया जाता है। किंतु प्राचीन काल में यह सुविधा न थी तब उन्हें खतरनाक समुद्री यात्राएँ करनी पड़ती थी। समस्त विश्व को एक परिवार की तरह सुविकसित करने का लक्ष्य जो था।

इन दिनों महाद्वीप में (1) यूरेशिया (2) अफ्रीका (3) अमेरिका (4) आस्ट्रेलिया की गणना होती है। न्यूजीलैंड व फिजी हैं तो छोटे से पर उन्हें भी एक कोने में पड़ा होने के कारण आस्ट्रेलिया महाद्वीप का एक भाग मान लेते हैं। समुद्र के बीच असंख्य छोटे बड़े टापू हैं इन में से कुछ तो अभी तक वीरान पड़े हैं पर कुछ में अच्छी बसावट हो गई है। एशिया में जापान, इंडोनेशिया, मलाया आदि के द्वीप समूह इसी प्रकार के हैं। जो हैं तो छोटे पर उनमें निकटवर्ती द्वीपों को मिलाकर ऐसा जजीरा बन गया है कि उनका संयुक्त रूप किसी बड़े देशों के समतुल्य ही शक्तिशाली हो गया है। इन सब को मिलाकर बहुत बड़ी संख्या में देश हो गए हैं। उन सब में तो संभवतः भारतीय परिव्राजकों का पहुँचना नहीं हुआ है पर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में वह हवा चलती और अपनी लपेट में उन सबको लेती रही है। जैसे चीन पहुँचे हुए प्रचारकों ने उस क्षेत्र में इतने कार्य-कर्ता तैयार किए थे जो जापान, कोरिया, साइबेरिया जैसे क्षेत्रों का उत्तरदायित्व स्वयं अपने कंधों पर उठाने में सफल होते रहे हैं। ऋषि काल के उपराँत पुरोहितकाल आया। वे भी प्रचार प्रक्रिया के लिए दूरगामी यात्राएं तो करते रहे पर उन्होंने देव मंदिर बनाने पर ही अधिक जोर दिया। मात्र बौद्धधर्म ही ऐसा था जिसने परिस्थितियों में तथ्यपूर्ण सुधार, परिष्कार करने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न किया। इन दिनों भारत अपनी ही उलझनों में उलझा है। धर्मतंत्र की जनमानस को प्रभावित करने वाली शक्ति चुक गई है। सब कुछ शासन तंत्र की व्यवस्था में केंद्रित हो गया है। शासन का सूत्र संचालन अर्थ व्यवस्था करती है। धर्म तो सम्प्रदायों में बँट गया है। पुरातन काल की गाथाएँ सुनना , अमुक कर्म काँडों की लकीर पीटना, एक दूसरे से बढ़कर सिद्ध होने की प्रतिस्पर्धा में, सम्प्रदायों की शक्ति लग रही है। वे आदर्श दृष्टि-गोचर नहीं होते जिनके आधार पर यह देश कभी विश्व का मुकुट-मणि बना था। उन्हीं को पुनर्जीवित करना आज का इस विशिष्ट अवधि का युगधर्म है। प्रतिभावानों को इसी काम के लिए आगे आना होगा तथा अपने महती दायित्व को निभाना व पूरा करना होगा। यही समय की माँग है।


जीन प्लनडिन (Kahani)

फ्राँस के सेंट आमेर प्राँत में सन् 1826 ई॰ में जन्मा जीन फ्राँकाईस दुनिया का एक अद्भुत एवं साहसी कलाकार माना जाता हैं। सामान्य आर्थिक स्थिति के कारण उसे किसी अच्छे विद्यालय में पढ़ने का अवसर न मिल सका। साधारण सी शिक्षा ग्रहण करने के बाद उसने जिमनास्टिक विद्यालय में भर्ती पा ली । संकल्प के धनी बालक जीन ने घर पर भी अपना अभ्यास जारी रखा। परिणाम स्वरूप मात्र नौ वर्ष की अल्पायु में ही 10 फुट की ऊँचाई पर रस्सा बाँध कर उस पर चलने का सफल सार्वजनिक प्रदर्शन कर दिखाया। अभी वह किशोर ही था कि पिता का साया सिर पर से उठ गया और पूरे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी बालक-फ्राँकाईस पर आ पड़ी। इस महान जिम्मेदारी को उसने अपनी कला का सार्वजनिक प्रदर्शन करके पूरा किया। आगे चलकर उसने अपना नाम फ्राँकाईस जीन से बदलकर प्लनडिन रख लिया और उसी नाम से विख्यात हुआ।

एक बार जब वह अमेरिका के प्रवास पर था तो वहाँ उसने न्यागरा का जल प्रपात देखा। यह प्रपात अमेरिका और कनाडा के बीच मध्य रेखा का काम करता है। यह 360 मीटर चौड़ा है। उसे देखकर जीन प्लनडिन ने घोषणा की कि ‘वह न्यागरा जल प्रपात के दानों शिरों पर रस्सा बाँधकर उसे पार करेगा’ जब लोगों ने उसकी इस घोषणा को पढ़ा तो किसी को विश्वास नहीं हुआ और उसे मात्र अपने नाम का प्रचार करने वाला बताया।पर जब जीन ने निश्चित तिथि पर अमेरिका वाले भाग से कनाडा वाले भाग तक रस्से पर चढ़ कर इस प्रकार पार कर दिखाया जैसे कोई दीवार पर चल रहा हो। कनाडा वाले सिरे पर पहुंच कर उसने पुनः उसी रास्ते अमेरिका जाने की घोषणा कर दी। इस बार उसने अपने साथ कैमरा ले लिया था। जिससे कि न्यागरा के सुंदर प्राकृतिक दृश्य का चित्र बीच से लिया जा सके। अभी वह मध्य तक की दूरी ही तय कर पाया था कि संतुलन डगमगा गया और उसके हाथ का बाँस प्रपात में जा गिरा और गोते लगाता हुआ अदृश्य हो गया। दुर्घटना की आशंका से हजारों दर्शकों की आहें निकल गयी। कितनों ने भय से आंखें, बन्द कर लीं, किन्तु जब जीन से रस्से से झूल कर अपना संतुलन बन लिया और प्राप्त के मध्य रस्से पर खड़े होकर प्राकृतिक दृश्य के फोटो लेने लगा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। अनेकों चित्र लेने के बाद साहसी जीन संतुलन सम्हालते हुए, अनेक करतबों को दिखाते हुए न्यागरा को पार कर दिखाया।

तीसरी बार उसने अपने लड़के को कंधे पर बिठाकर न्यागरा जल-प्राप्त के रस्से पर चढ़कर पार किया। अंतिम बार प्लर्नाडेन ने एक अन्य व्यक्ति को कंधे पर बैठाकर न्यागरा को पार किया। पहले तो कोई भी व्यक्ति इस जोखिम भरे कार्य के लिए तैयार न हुआ और जो साहसी व्यक्ति तैयार भी हुआ था, उसे जब जीन ने कंधे पर उतारा तो वह बेहोश पाया गया। चिकित्सकों ने जाँच करने के उपरान्त बताया कि यह व्यक्ति भय के कारण बेहोश हो गया है। एक घंटे बाद उसे होश आया था। प्लनडिन का पुत्र, जिसने इसे पूर्व अपने पिता के कंधे पर चढ़कर प्रपात को पार किया था उससे जब लोगों ने पूछा कि तुम्हें भय क्यों नहीं लगा, तो उसने बताया कि “मुझे अपने पिता की कुशलता, साहसिकता एवं सफलता पर पूर्ण विश्वास है।”

जीन प्लनडिन इसके बाद जब इंग्लैंड पहुँचा तो वहाँ के लोगों ने एक विश्वविजेता सूरमा की तरह उसका स्वागत किया। अपने 26 दिनों के प्रवास काल में उसने इंग्लैंड में अनेकों आश्चर्यचकित कर देने वाले करतब दिखाये और लाखों पौंड कमाये। इसी प्रकार फ्राँस वापस लौटने पर वहाँ की जनता ने उसका हार्दिक स्वागत किया और उपहारों से उसे लाद दिया।

एक सुनिश्चित ध्येय और उसके प्रति समर्पित जीवन साधना मानव को महामानव के गौरवपूर्ण पद पर पहुँचा देती है। जीन प्लनडिन की कला-साधना और उसके प्रति समर्पण प्रगति के इच्छुक हर किसी के लिए एक सर्वोत्तम उदाहरण है।


नरपशु नहीं, देवमानवों की पीढ़ी जन्मे

मानवी विकास जहाँ अन्यान्य घटकों पर निर्भर है, वहाँ परिवेश को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यह सही है कि माता का चिंतन आहार तथा संस्कार बालक को प्रभावित करते हैं तथा जन्म लेने के बाद तक भी उन पर उनकी छाप रहती है किंतु बहिरंग जगत में आते ही कच्ची मनोभूमि पर वातावरण का दृश्यजगत का, आसपास के परिवेश-संगति का जो प्रभाव पड़ता है, उसका अपने आप में बड़ा महत्व है। यदि हम सही वातावरण शिशुओं, विकसित हो रहे बच्चों, को दे पाएँ, सुसंस्कारों का आरोपण कर पाएँ , तो जो संतति जन्म लेगी, निश्चित ही संस्कारवान-श्रेष्ठ चिंतन वाली होगी- देवमानवों के रूप में विकसित होने वाली। यदि वातावरण श्रेष्ठ आत्माओं को भी हेय स्तर का मिला तो संभव है उनकी प्रगति में अवरोध आ जाय, वे नरपशु की नहीं किन्हीं और रूपों में जीवन जीती हुई इस मानुष तन का दुरुपयोग करती देखी जायँ।

महापुरुषों का कथन है कि कई श्रेष्ठ स्तर आत्माएँ इस धरित्री पर आती हैं, किंतु उचित वातावरण गर्भावस्था में या उसके बाद न मिल पाने के कारण वे शीघ्र ही धरती छोड़कर अकाल मृत्यु को प्राप्त हो पुनः श्रेष्ठ कोख व वातावरण की तलाश में सूक्ष्म जगत में चली जाती है। पारलौकिक जीवन सूक्ष्म जगत के रहस्य बड़े विलक्षण है अतः ऐसा होता हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जन्म लेने के बाद घरों में जो स्वर्गोपम वातावरण मिलना चाहिए, वह न मिल पाने के कारण भी कई आत्माएँ घुटती -असाध्य मनोरोगों का शिकार होती व अल्पायु को प्राप्त होती दिखाई देती है। कई बार मानवी जगत से संबंध टूट जाने तथा पशुओं की संगति पाने पर मानव शिशुओं को वैसा ही विकसित होता देखा जाता रहा है। जंगल का जीवन जैसा परिवेश प्रदान करता है, शिशु वैसा ही विकसित होता चला जाता है। रामू भेड़िये की कथा प्रख्यात है, जिसमें उसे भेड़िये नवजात स्थिति में उठाकर ले गये थे व अंततः शिकारियों ने उसे भेड़िये की तरह चौपायों की भाँति चलते पाया। बहुत प्रयास करने पर भी उसे बचाया न जा सका। ऐसे उदाहरण अगणित हैं। एक घटना सन् 1924 की है, जब जर्मनी स्थित हैमलिन के जंगलों से वन रक्षकों ने पीटर नामक एक दस वर्षीय बच्चे को जंगली खूँख्वार जानवरों के मध्य खेलते हुए पाया। उस समय बच्चे की गर्दन में कमीज का टुकड़ा लटक रहा था। इस आधार पर विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया था कि कुछ विषम परिस्थितियों में यह लड़का घर से पलायन कर गया होगा। आचरण एवं बोली में वह जानवरों जैसा ही व्यवहार करता था। पीटर का सचित्र विवरण जब वहाँ के राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में निकाला गया तो क्रूगर नामक एक किसान ने उसे अपना पुत्र बताया जो रोज-रोज के पारिवारिक कलह के कारण घर छोड़कर निकल गया था। इस तथ्य की पुष्टि तब हुई जब वह एक रात मौका पाकर पुनः घर से जंगल में भाग गया। खोजकर्ताओं ने दुबारा पकड़कर उसे इंग्लैंड के शासक किंग जार्ज प्रथम के सुपुर्द कर दिया। जहाँ विशेषज्ञों की देख−रेख में उसका शिक्षण प्रारंभ किया गया। बाद में वह एक सभ्य नागरिक बन गया और पचास वर्ष तक जीवित रहा।

इसी तरह का विवरण फ्राँस स्थित एवराँन नगर के विक्टर नामक बालक का मिलता है जिसे सन् 1696 में जंगल में भेड़ियों के समूह से पकड़ा गया था। एक दिन अवसर मिलने पर वह भी फिर से उसी जंगल में पलायन कर गया जहाँ से उसे पकड़ा गया था। सन् 1768 में भयंकर सर्दी की एक रात में वह वन स्थित एक कृषि फार्म पर आया जहां उसे फिर पकड़ लिया गया और मूर्द्धन्य शरीर विज्ञानी एवं मनोविद डॉ0 इटार्ड को सौंप दिया गया। उन्होंने उसे धैर्य पूर्वक मानवीय व्यवहार एवं सूत्र-संकेतों का प्रशिक्षण दिया। गंभीरतापूर्वक अध्ययन करते के पश्चात् उनने निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया कि पीटर की उम्र 20 वर्ष की है। किन्हीं परिस्थितियों के कारण मानव संस्कृति और सभ्यता से कट जाने के कारण उसमें मानवीय आचरणों का अभाव हो गया था, पर प्रकृति सहचरी के कठोर आघातों से वह इतना अधिक सामंजस्य स्थापित कर चुका था कि चिलचिलाती धूप एवं कड़कड़ाती शीत में भी मजे से रहता रहा। डॉ0 इटार्ड के संरक्षण में उसने अपने जीवन के 40 वसंत देखो तक तक वह एक सभ्य नागरिक बन चुका था।

सन् 1973 में आस्ट्रिया के समाचार पत्रों में पाँच वर्षीय एक बालक का सचिव विवरण छपा था जिसे वैज्ञानिकों के एकोजी दल ने जर्मनी के जंगलों में शिकारी कुत्तों के झुंड से पकड़ा था। वह कुत्तों की तरह ही चलता और भौंकता था। देखा गया कि संकट आने पर वह अपनी बाहें मादा कुतिया की गर्दन में डाल देता था और उसी को अपनी माँ समझता था। इससे पूर्व सन् 1960 में थाईलैंड के प्रसिद्ध चिड़ियाघर चैंगमाई के मालिक हैरोल्ड एम यंग ने लाहू पहाड़ियों के घने जंगल में रहने वाले एक भीमकाय भेड़िये बालक को पकड़ा था। रात्रि के समय वह पहाड़ी से नीचे उतरता और मनुष्यों तथा पशुओं को अपना शिकार बनाता। भेड़ियों की तरह ही वह अपने दाँतों से शिकार की गर्दन पर वार करता और उनका सफाया कर देता था।

सर्वाधिक आश्चर्यपूर्ण विवरण आयरलैंड के उस बच्चे का है जिसे जंगली भेड़ों के समूह में से पकड़ा गया था। उसकी विशेषता यह थी कि अन्य मेमनों की तरह ही वह झाड़ - झंखाड़ों से पत्तियाँ नोचकर खाता, उन्हीं की तरह हाथ पैरों से चलता और मेमनों की बोली में अपना स्वर मिलाता था। सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ0 एम्स्टेर्डम में परीक्षणोपराँत निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया है कि उस बालक ने प्रकृति के साथ इतना सघन तादात्म्य स्थापित कर लिया था कि सर्दी-गर्मी का उसके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। अंततः वातावरण सही मिलने पर वह मानव बालक के रूप में विकसित हो सका।

उपरोक्त विवरणों से तथ्य एक ही निकलता है कि मानवी प्रगति के लिए परिवेश, सुसंस्कारी वातावरण अत्यंत अनिवार्य है। क्या आज की तथा कथित सभ्य मानव जाति निरंतर प्रदूषित हो रही संस्कृति, टी0वी0 मीडिया द्वारा गड़बड़ा रहे घर के वातावरण एवं स्वयं के व्यवहार पर भी थोड़ा ध्यान देगी ताकि भावी पीढ़ी सुसंस्कारी बन सके।


दलदल से उबरें, जीवनोद्देश्य को जानें

स्रष्टा को निष्पक्ष, चयनकारी और सुनियोजक कहा गया है। उसने हर प्राणी को उसकी आवश्यकता के अनुरूप साधन उपलब्ध कराये हैं, पर देखा जाता है कि मनुष्य की शारीरिक संरचना और मानसिक विशेषता ऐसी है, जो अन्य किसी प्राणी को उपलब्ध नहीं। इसका कारण कोई पक्षपात नहीं, वरन् यह है कि उसे विशेष उत्तरदायित्व सौंपे गये है। उन्हें ठीक तरह संपन्न कर सकने की दृष्टि से ही वह विशेषताएँ और विलक्षणताएँ उपलब्ध कराई गई है, जो असाधारण स्तर की है। इसका कारण एक ही है कि उसे सृष्टि की सुव्यवस्था बनाये रखने के उपयुक्त बनाया गया है। निराकार होने के कारण भगवान उन प्रत्यक्ष क्रियाकलापों को कर नहीं पाते, जो संसार को श्रेष्ठ , समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाये रखने के लिए किये जाने आवश्यक है।

इस हेतु उसे एक सहायक की आवश्यकता पड़ी। राजाओं के युवराज यही करते हैं। मनुष्य ईश्वर का राजकुमार है। उसे इसलिए इतनी विभूतियों के साथ सृजा गया है कि वह एक कुशल माली की तरह उसके विश्व उद्यान को, उन सारी विभूतियों से भर दे, जिनका समुच्चय परमेश्वर का गौरव बना हुआ है। सरकारी अफसरों, सेनाध्यक्षों, कोषाध्यक्षों को विशेष साधन और अधिकार इसलिए दिये जाते हैं कि उनका उपयोग वे मात्र लोक हित के लिए करें। निजी निर्वाह के लिए उन्हें अलग से वेतन दिया जाता है। मनमर्जी का खर्च उसी सीमा तक किया जा सकता है। सरकारी साधनों को यदि वे जनहित की अपेक्षा मनमर्जी से अवाँछनीय प्रयोजनों के लिए उपयोग करने लगे, तो उन्हें पदच्युत भी किया जा सकता है।

सही मनोयोग, उत्साह और भावनापूर्वक काम करने वाले कर्मचारी पदोन्नति के अधिकारी बनते हैं। मनुष्य भी आत्म परिष्कार और लोकमंगल में निरत रह कर महामानव, देवपुरुष , ऋषि , मनीषी और जीवन-मुक्तों के समतुल्य गौरव भरे पुरस्कार के भाजन बनते हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण , उज्ज्वल चरित्र और सेवा साधना से भरापूरा जीवन जीने वाले धरती के देवता जैसी स्थिति प्राप्त करते और अपने चारों ओर स्वर्ग बिखरा देखते हैं। यही जीवन का लक्ष्य और आनंद है। यह सब विभूति-वैभव उन्हीं को उपलब्ध होता है, जो आदर्शों के लिए समर्पित रहकर धर्मधारणा और लोक साधना की गतिविधियाँ अपनाते हैं। यह उत्कर्ष, अभ्युदय प्राप्त कर सकना हर किसी के अपने वश की बात है। चौराहे पर खड़ा मनुष्य इच्छानुसार किसी भी मार्ग को अपना सकता है। नरक अथवा स्वर्ग की ओर चलने वाली किसी भी दिशा को वह अपना सकता है। इस चयन की छूट उसे पूरी तरह मिली हुई है।

निजी आवश्यकताएँ मनुष्य की इतनी स्वल्प है, कि उन्हें निताँत सरलतापूर्वक कुछ ही घंटों के श्रम से उपार्जित किया जा सकता है। हाथी , ऊँट , भैंसे जैसे पशुओं को तो बड़ी मात्रा में आहार चाहिए, पर मनुष्य का पेट आधा किलो अन्न से भर सकता है। तन ढकने को कपड़ा और सोने के लिए जमीन प्राप्त कर लेना भी इतना कठिन नहीं है, जिसे पूरा करने में समूची सामर्थ्य लगाने और जीवनोद्देश्य की पूर्ति करने में व्यस्तता का बहाना बनाना पड़े। सभी प्राणी अपने अन्य साथियों जैसी सुविधाएँ प्राप्त करके सुखी और संतुष्ट जीवन यापन कर लेते हैं, फिर मनुष्य के लिए ही ऐसी क्या आफत है कि उसे कुबेर जैसी संपदा और इंद्र जैसी प्रभुता चाहिए। औसत नागरिक स्तर स्वीकार कर लेते पर सादगी के साथ गुजारा भी हो सकता है और उत्कृष्टता को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त अवसर एवं अवकाश भी मिल सकता है। इसमें न कोई अवरोध है, न व्यवधान।

दुर्भाग्य केवल एक ही है कि पथभ्रष्ट मनुष्य उन महत्वाकाँक्षाओं के फेर में पड़ जाता है, जो दूर से देखने पर तो बड़ी मनमोहक मालूम पड़ती है, पर निकट आने पर विष दंश गड़ा कर सारा रक्त चूस जाती हैं। विलासिता , तृष्णा और दर्प प्रकट करने वाली अहंता का कुचक्र ऐसा है कि इनमें से एक भी गड़ी तिजोरी की तरह व्यक्ति को अकचकाकर रख देने के लिए पर्याप्त है, फिर यदि तीनों का ही आक्रमण चल पड़े , तो समझना चाहिए कि सन्निपात जैसी स्थिति बन गई और ऐसी लौह शृंखला में वह बँध गया , जिनसे छुटकारा पाना अति दुर्लभ हो जाता है।

कुछ पगले ऐसे भी देखें गये हैं जो दिनभर कूड़े-कचरे में से चमकदार चीजें बीनते और पीठ पर लादते रहते हैं , भले ही वे कितना ही निरर्थक या भारभूत क्यों न हों। लालची भी यही करते हैं। पैसे की रटंत एक प्रकार के उन्माद की तरह चढ़ी रहती है। उसकी तृप्ति के लिए अहिर्निशि व्यस्त रहना भी कम पड़ता है। इतना ही नहीं, अतृप्ति की आग को बुझाने के लिए अनाचार पर उतारू होकर वह ईंधन जुटाना पड़ता है जो संतोष तो दे ही कैसे सकेगा ? आग में तेल डालने से लौ निरंतर और अधिक , और अधिक के रूप में हाहाकार उत्पन्न करने वाला दावानल भड़का देती है।

उपयोग के लिए सीमा निर्धारित है। रोटी , कपड़ा और मकान की एक सीमा है उससे अधिक बटोरने पर वे भारभूत बन जाते हैं। संपन्नता संचय के पीछे पागल होकर सारा समय गँवा देने वाले भी उपयोग तो अन्यान्यों की तरह सीमित हो कर पाते हैं। बचत को फिर कभी के लिए जमा रखने की ललक में धनी बने व्यक्ति उसकी सुरक्षा और अभिवृद्धि के फेर में निरंतर चिंतित बने रहते हैं। संचय को लपकने के लिए अपने भी विराने हो जाते हैं। ईर्ष्या करते और नीचा दिखाने के लिए आक्रमण का कोई भी स्वरूप अपनाने के लिए षड्यंत्रों पर षड्यंत्र रचते रहते हैं।

लालची व्यक्ति की अनुदार निष्ठुरता संचय को किसी पुनीत कार्य में लगाने के लिए तो किसी प्रकार सहमत ही नहीं होती, फलतः दुर्व्यसनों, अपव्ययों और कुकृत्यों में ही उसे लगाना पड़ता है। कृपण का धन मुकदमें- बाजी, बीमारी आवारागर्दी, चापलूसी, ठगी जैसे छिद्रों से होकर गंदी नालियों में बह जाता है। मरते समय मात्र पश्चाताप और पाप ही सिर लद कर रह जाता है। हर किसी को मुट्ठी बाँधे आना और हाथ पसारे जाना पड़ता है- यह सोचना भी मूर्खतापूर्ण है कि उत्तराधिकारियों के लिए विपुल धन छोड़कर जाना, आराम की जिंदगी जीने की व्यवस्था बनाने में प्यार का प्रदर्शन है। होता उससे ठीक उलटा है। अमीरों की संतानें अकर्मण्य और दुर्व्यसनी बनती हैं। तीसरी पीढ़ी के लिए कुछ बचाता ही नहीं, इसलिए उन्हें दुर्गुणों से ग्रसित रहने के कारण भिखारी या अपराधी की जिंदगी जीनी पड़ती है। विपुल वैभव छोड़ मरने वाले स्वयं तो कोल्हू के बैल की तरह पिसते और पिसाते ही रहते हैं, जो छोड़ मरते हैं वह हराम का माल जिनके ऊपर भी लदता है, वे उससे सुख तो पा ही कैसे सकेंगे ? भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण की उसके बदले खरीदते और गये-गुजरे व्यक्तित्व के कारण तरह-तरह के त्रास ही सहते और देते रहते हैं। कृपणों की निष्ठुर संपदा अपने लिए, साथियों और वंशजों के लिए अनेकानेक विपत्तियों का कारण ही बनती है।

व्यामोह भी लालच की तरह दूसरा आत्मघात है। परिवार को सीमित रखा जाय, और परिजनों को सद्गुणी, सुसंस्कारी, स्वावलंबी बनाया जाय, तो समझना चाहिए कि उसने अपने कर्तव्य का पालन कर लिया , अन्यथा औलाद बढ़ाते चलना, अपने लिए अर्थ चिंता में डूबना, पत्नी का स्वास्थ्य चौपट करना, बालकों भविष्य अंधकारमय बनाना और देश को समस्याग्रस्त रहने के लिए विवश करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इन्हीं विपत्तियों को बढ़ाते चलने को लोग परिवार-पोषण कहते हैं और उन्हें आलसी-प्रमादी बनने के लिए उस पैसे को लुटाते रहते हैं, जो सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगकर विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों में लगाया जा सकता था।

तीसरी महत्वाकाँक्षा अपने को अधिक अमीर और चतुर प्रदर्शित करने के लिए उत्थित करने वाला अहंकार है, जिसमें अनेकों ठाट बाट, पाखंड और प्रपंच रचने पड़ते हैं, उद्धत और उद्दंड आचरण अपनाना पड़ता है। फिर भी लोग न तो उसकी धाक मानते हैं और न खुले मन से उसकी प्रशंसा करते हैं। अमीरी इन दिनों बेईमानी की पर्यायवाची बन चली है, निष्ठुरता का आरोप लगाती है और ईर्ष्या भड़काती है। ऐसा अहंकार किस काम का जो अपने समय , चिंतन और प्रयासों को उद्धत स्तर का बनाकर दूसरों को भर्त्सना करने का अवसर दे और अपने आप को असाधारण बनने के प्रपंच में फँसाकर हेय स्थिति में गिरा दे। फिर वह दुर्व्यसन खर्चीला भी तो बहुत पड़ता है। निरंतर जाल-जंजाल बुनते रहने के लिए उकसाता भी तो है।

देखा गया है कि विवेकहीन व्यक्ति लोभ, मोह और अहंकार के प्रदर्शन में अपनी समूची शक्ति गँवा देता है और जब जीवन लक्ष्य पूरा करने के लिए कुछ करने का स्मरण आता है, तब प्रतीत होता है कि भौतिक और आत्मिक संपदा का समूचा भाग तथाकथित महत्वाकाँक्षाएं कही जाने वाली तृष्णा की पूर्ति के लिए खप गया। अब व्यस्तता और अभाव-ग्रस्तता का बहाना बनाने के अतिरिक्त और कुछ शेष बचा ही नहीं, जिसके बदले पुण्य-परामर्श कमाया, सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म को सार्थक बनाया जा सके।

हथकड़ी के रूप में लोभ , बेड़ी के रूप में मोह और अहंकार के रूप में कैदी की तरह मुश्क बाँधने वाली लौह शृंखला के त्रिविध भव बंधनों में मनुष्य स्वेच्छा-पूर्वक बंधता है। इतना ही नहीं, उस कृत्य में निरत रहते को बुद्धिमानी मानकर शेखी और बघारता रहता है। पर यह विडंबना किसी के लिए भी सत्परिणाम उत्पन्न नहीं करती। सताने और रुलाने का कार्य ही यह कर पाती है और प्रपंची पिशाचिनियों की तरह उँगलियों पर नचाती, हँसाती, रुलाती है। जो पास में था, उसका पूरी तरह अपहरण ही करती रहती है। आश्चर्य है कि अपने को बुद्धिमान समझने और बताने वाले व्यक्ति भी उसी कुचक्र में फंसते, ईश्वर प्रदत्त दिव्य संपदा को बर्बाद करते रहते हैं। रोते-कलपते हाथ मलते, सिर धुनते अपनी प्रपंच लीला समाप्त करते हैं।

यही है भूल-भुलैया का तिलस्म, जिसमें प्रवेश कर जाने के बाद आगे का रास्ता दीखना ही समाप्त हो जाता है। यही है वह भव-बंधन जिसमें मुश्कें कसे कैदी की तरह निरंतर त्रास सहना पड़ता है। यही है वह भ्रम जंजाल जिसमें फँसा हुआ मनुष्य लाभ की बात सोचता और मात्र हानि उठाता रहता है।

स्रष्टा की उस आशा अपेक्षा का भी यह तिरस्कार है जिसने अपनी सर्वोपरि कलाकृति जीवन संपदा इसलिए प्रदान की थी कि उसमें हाथ बँटाने वाला युवराज अपनी विभूतियों का सदुपयोग करके स्वयं प्रसन्न रहेगा और उसे प्रसन्न करेगा। पर देखा जाता है कि भ्रम-जंजालों में फँसा मनुष्य अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने के अतिरिक्त और कुछ कर सकने में समर्थ नहीं हो सकता। मृगतृष्णा में भटकते-भटकते प्यासे मरने वाले हिरन की तरह उसकी दुर्गति ही होती है। माया के बंधन इसी प्रचलन को कहते है। इसी को स्वेच्छापूर्वक वरण की गई आत्महत्या भी कह सकते हैं।

अनेकानेक कर्म काँडों के साथ जुड़ी हुई पूजा-अर्चा का प्रयोजन इतना ही है कि अंधकार के भटकाव से निकालने वाले उस प्रकाश की प्रति हो जो जीवन के सत्य और लक्ष्य का भान करा सके। जो निरंतर मिलते मरण के त्रास से जुड़कर मानवी गरिमा के अमृत का रसास्वादन करा सके। जो असत् से जुड़ी प्रीति की विपत्ति समझा सके और सत् के रूप में आत्म साक्षात्कार को उपलब्ध कराने के लिए इस जन्म धारण को कृतकृत्य बना सके। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए की गई आत्मिक पेकार को कण-कण में गुँजित करना और उसकी दिव्य प्रतिक्रिया की अनुभूति करना, यही है साधना का तत्वदर्शन और प्रयोजन। यदि वह बन पड़े तो तृप्ति-तृष्टि और शाँति की तीनों दिव्य विभूतियाँ हस्तगत होती हैं।

ईश्वर को न किसी के उपहार की आवश्यकता है, और न मनुहार की। वह इतना दरिद्र नहीं कि किसी के भोग-प्रसाद के बिना भूखा बैठा रहे। वह इतना ओछा भी नहीं है कि अपनी प्रसन्नता के लिए चापलूसों द्वारा किए गए गुणगान से प्रसन्न होकर उन्हें मन चाहे वरदान प्रदान कर सके। मनोकामनाओं की पूर्ति में उसकी कोई रुचि नहीं है। यह कार्य तो उसने मनुष्य को प्रखर प्रतिभा प्रदान करके पहले ही पूरा कर दिया है कि उत्कृष्ट प्रयोजनों के लिए , पुरुषार्थ करें और अभीष्ट उपलब्धियाँ सरलतापूर्वक उपार्जित करें। कर्तव्यों की उपेक्षा करते हुए मुफ्त में उचित-अनुचित वरदान पाने के लिए लालायित रहने वाले इस प्रयोजन के लिए गिड़गिड़ाने , नाक रगड़ने को ईश्वर के दरबार में भक्ति समझा जाता है न पूजा आराधना। ईश्वर तक पहुँचने और उसकी सहज अनुकंपा प्राप्त करने के लिए तो अपने ही दोनों चरणों को उठाते हुए उत्कर्ष के शिखरों तक अनवरत श्रम करते हुए पहुँचना पड़ता है। वे चरण हैं (1) आत्म परिष्कार (2) विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने के लिए किये गये पुण्य परमार्थ। आत्म कल्याण का , जीवन की सार्थकता का , ईश्वर की अजस्र अनुकंपा प्राप्त करने का सदा से यही मार्ग रहा है और यह अनंत काल तक चलता रहेगा भी। उन्हीं को अपनाकर परम-पद पाया जा सकता है तथा नर में नारायण प्रकट करने का सुयोग सौभाग्य पाया जा सकता है। यही है वह शाश्वत सत्य और सनातन राजमार्ग जिसे अपनाकर लोग इच्छित दिशा अपनाते और अपने लिए उत्थान या पतन का पथ प्रशस्त करते है। स्वर्ग और नरक में से किसी का भी स्वेच्छा-पूर्वक चयन कर सकना स्रष्टा ने पूरी तरह मनुष्य के अपने हाथ में दे रखा है। इसमें उसका कोई हस्तक्षेप नहीं। वह न किसी पर अनुकंपा बरसाता है, न निष्ठुर होता है, न उपेक्षा, शत्रुता जैसा अवाँछनीय हस्तक्षेप करता है। आत्मा, परमात्मा का ही छोटा अंश है। बूँद को पूरा अधिकार है कि वह दिशा अपनाए और महासागर में पहुँच कर उसी के रूप में अपनी स्थिति परिवर्तित करे। कोयले का परिष्कृत रूप हीरा है। मनुष्य जब अपने आप को कषाय-कल्मषों से मुक्त कर लेता है तो उसका वास्तविक स्वरूप निखरता और वह गरिमा उपलब्ध होती है, जिससे यह जन्म सार्थक और कृतकृत्य होता है।

सराहनीय बुद्धिमत्ता वह है जिसके आधार पर चिरस्थाई लाभ के लिए तात्कालिक छोटी सी हानि भी उठाली जाय। विद्यार्थी, पहलवान, किसान, व्यवसायी, आरंभिक दिनों में घाटा उठाते हैं उन्हें अपने श्रम और खर्च का तत्काल कोई प्रतिफल नहीं मिलता, पर समय आने पर लगाई गयी पूँजी सैकड़ों गुने सत्परिणाम लेकर वापस लौट आती है। इस नियति निर्धारण पर जिनका विश्वास है वे सत्प्रयोजनों में मुक्त हस्त से उदारता-पूर्वक अपना अनुदान नियोजित करते और हर दृष्टि से नफे में रहते हैं। इसके विपरीत जिनकी मान्यता यह है कि तुरन्त के लाभ को ही बस कुछ मानना चाहिए, वे जाल में फँसकर प्राण गँवाने वाली चिड़ियों और मछलियों की तरह मूर्ख बनते और कष्ट उठाते हैं इंद्रिय भोगों के लिए अतिशय आतुर व्यक्ति स्वाद तो कुछ क्षण ही चखते है, पर अपनी जीवनी शक्ति को बुरी तरह गँवाकर दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु के शिकार बनते हैं। आवारागर्दी में जीवन भी भटकने वाले दर-दर से दुत्कारें खाने वाले लोग वे ही होते हैं जिन्होंने वर्चस्व अभिवर्धन की कल्याणकारी राह छोड़कर आलस्य प्रमाद अपनाया, दुर्व्यसनों में समय गँवाया। कुसंग में पड़ कर कुमार्ग अपनाते और अनर्थकारी दल-दल में फँसते रहे, जिन्हें किसी भी कीमत पर तत्काल विपुल वैभव चाहिए उन्हें उस मक्खी का उदाहरण बनना पड़ता हैं, जिसने कढ़ाई भरी चासनी को एक बार में उदरस्थ कर लेने की ललक में आँखें मूँद कर कूद पड़ी थी और अपने पंख और पैर उसी में लिपट जाने के कारण बेमौत मरी थी।

लोभ-लिप्सा उसी सीमा तक उचित हो सकती है, जिस सीमा तक कि उससे शरीर निर्वाह की उचित आवश्यकताएँ पूरी होती रही। शेष तो अपने और अपनों के लिए अनर्थ हेतु कमाना है। जो उचित रीति-नीति अपना कर सीमित समय में , अधिक कमा सकता है। उनके लिए सही मार्ग एक ही है कि पीड़ा और पतन के निवारण में उस बचत को लगा दे जो लिप्सा और तृष्णा की पूर्ति के लिए अनावश्यक रूप से जमा की जा रही है, अथवा फुलझड़ी की तरह जला कर उस मौज मस्ती के लिए उड़ाई जा रही है जो अनर्थकारी परंपराएँ पैदा करती है। अपने को सताती और दूसरों को रुलाती है।

सुख संतोष और गर्व गौरव मात्र इस बात में केन्द्रीभूत है कि न्यूनतम में गुजारा करते हुए शेष बचत को उन प्रयोजनों के लिए नियोजित कर दिया जाय जिनके लिए कि यह मनुष्य जीवन का अलभ्य अवसर बड़ी आशाओं और अपेक्षाओं के साथ पवित्र धरोहर के रूप में दिया गया है। इससे कम में कोई विलासी अहंकारी मौज मस्ती के लिए कितना ही क्यों न कमा ले, निश्चित रूप से शारीरिक, मानसिक और आत्मिक क्षेत्र में अवाँछनीयताएँ संचित करता है और उनके दुष्परिणाम निरंतर त्रास पाने के रूप में सहता रहता है। चिंतित खिन्न, उद्विग्न, रुष्ट , असंतुष्ट ऐसे ही लोग रहा करते हैं। जीवन का अपव्यय, सृष्टि का दोहन , विचारशीलों का तिरस्कार पाने में न जाने किन्हें क्या मजा आता है, जो कभी प्रपंच में निरंतर व्यस्त रह कर मानवोचित पुण्य-प्रयास करने में कतराते और चित्र-विचित्र समस्याओं को तिल का ताड़ बना कर श्रेष्ठता का परिपोषण न करने का बहाना बनाते रहते हैं।

जितने श्रम और मनोयोग औसत आदमी प्रपंचों में रस अनुभव करते हुए मरता-खपता रहता है, यदि उतना ही प्रयास जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया होता तो निश्चय ही बड़े परिणाम में ऐसा कुछ किया जा सकता था , जिससे अंतरात्मा इस जन्म में संतोष अनुभव करती, अनुकरणीय और अभिनंदनीय कृत्य कर पाती और परलोक की दृष्टि से अनंत काल तक सद्गति प्राप्त करते रहने की परम मंगलमयी परिस्थितियाँ प्राप्त करती रहती।

ढलाई से पहले धातुओं की गलाई करनी पड़ती है। स्रष्टा के सुख शाँति भरे ढाँचे में ढलने के लिए अपनी उन भ्राँतियों और दुष्प्रवृत्तियों को गलाना पड़ेगा जो इस सुरम्य संसार को खंदक-खाई और पाप पतन का आगार बना लेते हैं। इसी लिए आत्म-परिष्कार की आवश्यकता को सर्वोपरि महत्व की प्राथमिकता देने योग्य बताया गया है। अभ्युदय के सर्वांग सुँदर रंग में अपने को रँगने के लिए आवश्यक है कि मैले कपड़े को जिस प्रकार धो लिया जाता है, उसी प्रकार महानता की मंगलमयी परिस्थितियों को वरण करने के लिए उचित यही है कि उन भ्राँतियों से निपट लिया जाय जो निविड़ बंधनों में बाँधने वाली माया रूपी नागपाश में बाँधने वाली सर्पिणी कही जाती है। यह और कुछ नहीं सही को गलत और गलत को सही बनाने वाली भ्राँति है जिसके कारण रंगीन चश्मा पहन कर अपने को और संसार को अपने कल्पित रंग में रँगे हुए हम देख रहे हैं। अच्छा होता यह चश्मा उतार दिया जाता और दृश्यों को उस असली रूप में देखा होता जैसा कि वे वास्तव में है। भेड़ों के झुँड में पले सिंह शावक ने अपनी हैसियत को तभी जाना था जब उसे अपने असली स्वरूप का ज्ञान हुआ था। कस्तूरी मृग जिस सुगंध के लिए व्याकुल होकर अनेक दिशाओं में दौड़ता , थकता और निराशा से ग्रसित होकर बेमौत मरता है। हम सुख की तलाश में वासना, तृष्णा और अहंता की तृप्ति करने के लिए अथक श्रम करते और असह्य भार ढोते हैं। आश्चर्य यह है कि नाली के कीड़ों की तरह इस हेय स्थिति से उबरने के लिए साहस दिखाना तो दूर , विचार करने तक की आवश्यकता नहीं समझते हैं। समझदार कहे जाने और उस पर अभिमान करने वाले मनुष्य की यह कितनी बड़ी नासमझी है कि वह अपने स्वरूप, दायित्व और लक्ष्य से अनजान बन कर सतत् भटकता रहता है। इस भटकन से मुक्ति ही इस जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। इसी के निमित्त अध्यात्म का समूचा सरंजाम है।


यह वसुँधरा बंध्या नहीं

देव। वत्स राज्य की प्रजा चिंतित है। स्वयं मुझे भी आश्रय की अपेक्षा है। नरेश ने राज्य गुरु अनंत- शंकर आचार्य के चरणों में प्रणाम करके प्रार्थना की- आपकी असीम कृपा एवं अकल्पनीय प्रतिभा ने राज्य को अब तक निश्चिंत रखा।

कोई अमर नहीं है, यह बात मैं समझता हूँ। स्वयं तुमसे इस संबंध में विचार करना था मुझे। आचार्य ने सत्रह पूर्वक कहा- जराजीर्ण इस कलेवर को कालार्पण करने का समय समीप आ गया है, यह मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। तुम इतना करो कि राजोद्यान में देश के विद्वान ब्राह्मणों का सत्कार करने की घोषणा कर दो। आगे क्या करना है, मैं स्वयं देख लूँगा।

‘ जैसी आज्ञा। ‘ नरेश को आश्वासन प्राप्त हुआ। वे राज सदन लौट गये। देश के विभिन्न नगरों में वत्स नरेश की विद्वत-सत्कार घोषणा का प्रचार हो गया।

‘ विद्वत्सत्कार।’ वत्स राज्य की घोषणा कुतूहल एवं उत्साह दोनों को देने वाली थी। कोई यज्ञ, कोई सत्र, कोई तथ्य निर्णायिका विद्वत्परिषद- ऐसा कुछ नहीं। अब तक तो नरपतिगण ऐसे ही किसी अवसर पर देश-देश के विद्वानों को आमंत्रित किया करते थे। लेकिन वत्स नरेश की घोषणा में ऐसा कुछ नहीं है।

‘ पूरा नवीन संवत्सर वत्स राज्य विद्वत्सत्कार वर्ष के रूप में मनाएगा। आप अपनी सुविधानुसार पधारें। जब तक आप रहना चाहेंगे , हम सेवा करके अपने को कृतार्थ मानेंगे। घोषणा तो यही थी। इसमें कहीं किसी प्रयोजन का संकेत नहीं। कोई एक निश्चित अवधि में सब लोग जब एकत्र नहीं होते हैं तो यज्ञ, सत्र अथवा परिषद के अकस्मात् आयोजन की भी संभावना नहीं रह जाती।

‘ कैसा है यह विद्वत्सत्कार का शुभारंभ ?’ यह प्रश्न सभी विद्वानों के मन में उठना था। प्रश्न उठा तो कुतूहल ने यात्रा करने की प्रेरणा दी। वत्स नरेश ने विद्वानों की यात्रा के लिए यथासंभव सब सुविधाएँ मार्ग में कर दी थी। सभी पड़ोसी राज्यों से भी उन्होंने विद्वानों को यात्रा में सुविधा देने की प्रार्थना की थी।

‘ आचार्य अनंत शंकर भगवती वीणापाणि के वरद पुत्र हैं।’ अनेक स्थानों पर विद्वानों ने वत्सराज्य की इस आह्वान-घोषणा पर विचार करने के लिए स्थानीय संगोष्ठियाँ आयोजित कर ली। उन गोष्ठियों में प्रायः एक जैसी बातें कही गयी- वे क्या चाहते हैं, कल्पना कर लेना सरल नहीं हैं, किंतु इस प्रकार उनके सत्संग का सुअवसर उपलब्ध हुआ, यह हम सबका सौभाग्य।’

आचार्य वृद्ध हो गए हैं। उनके कुल में और कोई तो है नहीं। अनेक स्थानों में यह अनुमान भी किया गया- उन्हें अपना उत्तराधिकारी भी तो राज्य को देना है। अब वे इस विषय पर विचार करने की अवस्था प्राप्त कर चुके हैं। तपस्वी, विद्वान, ब्राह्मणों में ही उन्हें अपना अधिकारी चुनना है।

आचार्य के आह्वान का प्रयोजन प्रायः लोगों ने अनुमान कर लिया था, इससे आगंतुकों की संख्या बढ़ गयी थी। किंतु इससे आचार्य ने कोई असुविधा अनुभव नहीं की। वे तो केवल इससे बचना चाहते थे कि आशा लेकर प्रतिस्पर्धा के भाव से आये ब्राह्मणों को लौटने का निष्ठुर कार्य न करना पड़े।

राजोद्यान सत्कार-शिविर बन गया। नगर के बाहर रम्य स्थलों पर सुँदर आवास बना दिए गए थे। आगत-अतिथि उन आवासों में संपूर्ण सुविधा प्राप्त करके भी स्वच्छंदता-पूर्वक स्वरुचि के अनुसार व्यवहार करते रहें-ऐसा प्रथम अत्यंत सावधानी से किया गया था। आचार्य स्वयं राजोद्यान में आ बसे थे और विद्वानों को उनके समीप आने में कोई रुकावट नहीं थी। वहीं पर वस्त्र , धन, धेनु आदि देकर स्वदेश लौटने के इच्छुक विद्वानों का सत्कार करने की व्यवस्था थी।

वत्स राज्य की राजधानी उत्सव , अनुष्ठानमयी हो उठी। अर्चा, तप, यज्ञ, कीर्तन, वेदपाठ, शास्त्रचर्चा-विद्वान ब्राह्मणों के यहाँ यही तो होता था। जल, पुष्प, दर्भ, समिधा, फल तथा यज्ञ एवं अर्चन की सामग्रियाँ सबके लिए अत्यंत सुलभ कर दी गयीं थी। नागरिक जनों को लगा उनके समस्त पुण्य इस समय साक्षात् फलोन्मुख हो उठे हैं।

विद्वद्वर्ग आचार्य के समीप उपस्थित होता था। परस्पर भी उनकी गोष्ठियाँ होती थी। इन दिनों केवल आचार्य के अपने अंतेवासी ब्रह्मचारी परस्पर मिल नहीं पाते थे। उन्होंने उनमें से प्रत्येक को आगतों के सेवा सत्कार में नियुक्त कर दिया था और इस पुनीत पर्व पर इतना उत्तम कार्य प्राप्त कर वे भी उत्साह पूर्वक लगे थे।

बड़ा सात्विक समारोह। अत्यंत सरल सत्संग का सुअवसर। वत्स नरेश की श्रद्धा धन्य है। स्तुत्य है उनकी निष्काम श्रद्धा विद्वानों ने आचार्य के आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। जिनको जब जाने की आवश्यकता प्रतीत हुई-समुचित सत्कार एवं दान से सम्मानित करके लौटने की पूरी सुविधा नरेश ने कृतज्ञता तथा नम्रता प्रकट करते हुए प्रदान की। किसी को संकेत भी नहीं प्राप्त हुआ कि इस आयोजन का कोई प्रयोजन भी था। अपने अनुमान विद्वानों को अकारण प्रतीत हुए।

वेद, वेदांत, धर्मशास्त्र, कर्मकाँड, न्याय, साँख्य वेदाँत, व्याकरण, साहित्य आदि के प्रकाँड पंडित पधारे थे। अद्भुत प्रतिभाशाली, अकल्पनीय अनुष्ठान धनी, स्वभाव सिद्ध तापस तथा योग-सिद्ध साधक भी आये थे। विद्वानों की मंडलियां आती रहीं और विदा होती रहीं।

इव। नरेश को अपने आचार्य में अगाध श्रद्धा थी। वे केवल आज्ञा का अनुगमन कर रहे थे-अकथनीय पाँडित्य पाया है इन्होंने। नरेश किसी की विद्या से प्रभावित हुए, आते तो प्रार्थना कर लेते थे।

‘ राजन्। किसने क्या पढ़ा है ? क्या जानता है ? इसका अधिक मूल्य नहीं है।’ आचार्य तटस्थ स्वर में कह देते- ‘ वह स्वयं क्या है, महत्व की बात यह है।’

‘ लोक पूजित तपोधन पधारे आज। ‘ नरेश समुत्सुक सूचना देते।

‘ कार्य-क्लेश केवल प्रकृति के राज्य में पुरस्कार पाता है।’ आचार्य अद्भुत है। उन पर जैसे कोई सूचना प्रभाव ही नहीं डालती। वे व्याख्या करने लगते हैं- जनार्दन की संतुष्टि भिन्न वस्तु है और जो उसका संपादन न कर सके, जनता के मार्ग दर्शन का दायित्व उठा लेने की शक्ति उसमें नहीं हो सकती। ‘

‘ साधना ने जिन्हें सिद्धि समुदाय का स्वामी बना दिया है, ऐसे महापुरुष की सेवा का सौभाग्य मिला मुझे आज।’ नरपति का हर्ष अनुचित नहीं था।

‘ सिद्धि साधना की सफलता की नहीं, उसके बाधित हो जाने की परिचायिका है।’ आचार्य उपदेश करने लग जाते- लोक नायक को उससे सावधान रहना चाहिए, क्योंकि वह सामान्य नियमों का उल्लंघन करके भी न्यायालय की परिधि में नहीं आया करता। शारीरिक आसक्ति या यश-इच्छा ने ही उसे सिद्धि के स्वीकार करने को विवश किया है। कामना वहाँ निर्बीज नहीं हुई। अत्यंत उर्वर खाद है सिद्धि इस बीज के लिए। अतः वह बीज कैसे कितना बड़ा वृक्ष बनेगा, कहा नहीं जा सकता। उससे असावधान रहोगे तो अपना अहित कर सकते हो श्रद्धा के आवेश में।

‘ देव। आज अंतिम विद्व-मंडल भी विदा हो गया।’ नरेश के स्वर में अत्यंत व्यथा थी। वर्ष समाप्त हो गया। आगत विद्वान जा चुके। उनका सत्संग, उनकी सेवा का महापुण्य-यह सब तो ठीक, किंतु इस आयोजन का उद्देश्य जब आज भी अपूर्ण है, तब वह कब कैसे पूर्ण होगा ?’

“ व्यथित होने की आवश्यकता नहीं है। राजन्। यह वसुंधरा कभी बंध्या नहीं होती। ‘ ‘ आचार्य ने आश्वस्त करते हुए कहा-’ ‘ अपने इस संपूर्ण देश का नाम सृष्टिकर्ता ने अजनाभ वर्ष अकारण नहीं रखा है। व्यष्टि में-अपनी देह में समस्त सद्भावनाओं का केन्द्र है, नाभिचक्र और समष्टि में सृष्टिकर्ता के सर्वतो मुखी ज्ञान का उद्भावक है यह अजनाभ वर्ष। लेकिन अन्वेषण अपने स्थान पर बैठे-बैठे कर लेने की आशा करना मेरे लिए भी उचित नहीं था। यात्रा करूंगा मैं तुम्हारे साथ। ‘ ‘

बहुत कम लोगों को साथ ले जाना था। अन्वेषण यात्रा भी इसे कहना कठिन था। आयार्य ने उस आदेश देने वाली रात्रि को शयन नहीं किया था। वे पूरी रात्रि ध्यानस्थ रहे और प्रातः जब यात्रा के लिए प्रस्तुत होकर नरेश पधारे, आयार्य नित्यकर्म संपूर्ण कर चुके थे। रथ पर बैठते ही उन्होंने वत्स राज्य के ही एक सीमा स्थित ग्राम में चलने का आदेश दे दिया।

‘ ‘ मेरा अहोभाग्य। ‘ ‘ एक साधारण झोंपड़ी के सम्मुख जब ये रथ आकर खड़े हुए, ग्राम के प्रायः सब नर-नारी एकत्र हो गए। उस झोंपड़ी का स्वामी तो हर्ष से उन्मत्त प्रायः हो उठा। ‘ मुझ कंगाल के यहाँ आज श्री हरि स्वयं पधारे।’

नरेश कहीं किसी स्थान पर आते, कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी। अपनी प्रजा का निरीक्षण करने नरेश को समय समय पर आना ही चाहिए , किंतु नरेश के साथ स्वयं आयार्य पधारें-संपूर्ण ग्राम जनों को लगता था कि आज उनके यहाँ श्री बैकुँठनाथ ही आ गये हैं।

‘ आज याचक होकर तुम्हारे यहाँ वत्स नरेश पधारे हैं, देवता। ‘ आचार्य ने धीमे से कहा।

‘ ‘ राजन्। क्या सेवा करे यह निर्धन ब्राह्मण आपकी?’ ‘ उस अत्यंत सरल ग्रामीण ने अब नरेश की ओर देखा। अभी तक तो वह आचार्य की वंदना-अर्चना में यह भी भूल गा था कि उसके यहाँ आचार्य के साथ कोई और भी आए हैं।

राजन। सदाचार के सम्यक् पालन में अभयदेव शर्मा की समता करने योग्य मैं किसी को नहीं पाता। आचार्य गंभीर स्वर में कह रहे थे- ‘ प्रबल प्रलोभन इन्हें विचलित नहीं कर सके, यह आप भी जानते हैं। प्रकृति के प्रकोप तथा शरीर का असहयोग भी इन्हें अस्थिर नहीं कर पाता। सदाचार धर्म का दृढ़ मूल है। और जहाँ धर्म सम्यक् पूर्ण है, जनार्दन स्वतः सुप्रसन्न है। अभयदेव ने अपने सदाचार तथा दीन जनों की सेवा से उस सर्वेश को संतुष्ट किया है। शास्त्र का मर्म ऐसे सत्पात्र में अप्रकाशित नहीं रहता। पुस्तकीय पाँडित्य की अपेक्षा यहाँ नहीं है। आप अपने भावी राजगुरु की चरण वंदना करें।

‘ आप अपने देश को, अपने नरेश को और मुझ वृद्ध को निराश नहीं कर सकते।’ आचार्य ने उस ब्राह्मण को बोलने ही नहीं दिया- यह दायित्व आप सँभाल सकते हैं, ऐसी आस्था मुझमें है। आप आज ही राजधानी चलना स्वीकार करें तो यह बूढ़ा अतिथि आपके यहाँ आहार ग्रहण करेगा- अब उनके लिए यह प्रार्थना स्वीकार करने के अलावा और मार्ग भी क्या रहा था ?

निश्चित ही ब्राह्मणोचित जीवन जीने वाला सादगी भरी जिंदगी के सूत्रों के हित का चिंतन करने वाला व्यक्ति ही समाज का नेतृत्व कर सकता है आज सबकी दृष्टि इन्हीं पर है।


महत्वाकाँक्षा की सनक से खड़े ये अजूबे

महत्वाकाँक्षाएं प्रायः उसे पालने वालों को तो हैरान-परेशान करती ही हैं, अन्य अनेकों को भी अछूता नहीं छोड़ती। शाँतिपूर्वक रहने और दूसरों को रहने देने का एक ही तरीका है कि औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाया जाय, और विचारों में उच्चस्तरीय आदर्शों को समाविष्ट किया जाय।

एक समय था, जब विश्व के अधिकाँश भाग में सामंतवाद का बोल बाला था। सामंतवादी साम्राज्य का एक ही लक्ष्य होता था- विस्तारवाद। जिसे इसकी आकाँक्षा होती, वही डाकुओं का , बलिष्ठ लोगों का समर्थन प्राप्त कर ऐसे ही दस्युओं का ऐसा बलिष्ठ गिरोह बनाता, जिससे पास-पड़ोस के इलाकों में आतंक के सहारे अपना वर्चस्व कायम किया जा सके। मारकाट मचती, तो निर्दोषों की खून की नदियाँ बह जाती, पर उन साम्राज्यवादियों को इसकी क्या परवा थी। उन्हें तो धन , दौलत और राज्य चाहिए, सो इन आकस्मिक आक्रमणों से मिल जाते। बस फिर क्या था। अंधे को आँखें चाहिए। वह किस प्रकार मिलती हैं, कठोर अंतःकरण वालों को इसकी क्या चिंता। पर जो दूसरों का चैन छीनते हैं, उन्हें भी तीसरे शाँति से नहीं जीने देते। सेर की सवा सेर मिलते रहते हैं और अगले की पदच्युत कर पिछले उस पर अधिकार करते रहते हैं।

कभी चीन में भी ऐसे घटनाक्रम तेजी से घट रहे थे। यह ईसा पूर्व 300 की बात है। उन दिनों चीनी शासक अपने-अपने राज्य की सुरक्षा के लिए विशाल दीवारें विनिर्मित कर रहे थे। तब भारत में मजबूत महल बनाने और पहाड़ियों पर किले खड़े करने एवं चारों ओर खाई खोदने का प्रचलन था, पर चीनी सामंतों ने एक कदम आगे बढ़कर समुद्र की सीमाओं को पृथक करने की विभाजन रेखाएँ खड़ी की थीं। सामान्य सा देश अनेक छोटी रियासतों में विभाजित था। इतने पर भी उन्हें चैन नहीं। घात-प्रतिघात के आक्रमण-प्रत्याक्रमण बराबर चलते रहते और निर्बल, सबलों का शिकार बनते।

यह क्रम अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि ईसा से 24 वर्ष पूर्व वहाँ ‘ चेन’ नामक एक शक्तिशाली सम्राट का उदय हुआ। वह समूचे राष्ट्र पर अपना अधिकार कर लेने के मनसूबे बनाने लगा। इच्छा उपजी, तो तद्नुरूप योजनाएँ बनने और क्रियान्वित होने लगीं। इस क्रम में उसने सैकड़ों लड़ाइयाँ लड़ीं और रक्तपात इस कदर मचाया कि छोटे राजा उससे मिल जाने में ही अपनी भलाई समझने लगे। इस प्रकार कुछ ही वर्षों में पूरे चीन पर उसका एकछत्र राज्य हो गया। वह वहाँ का चक्रवर्ती बन बैठा, पर इतने से ही बाहरी आक्राँताओं को रोका तो नहीं जा सकता था। आखिर उन्हें भी तो साम्राज्य, धन और यश की कामना थी। चेन ने समझा था कि अब चैन से दिन गुजारने से उसे कोई रोक नहीं सकता, पर शायद उसने उस ‘ ‘ चेन प्रतिक्रिया’ ‘ (शृंखला प्रतिक्रिया) को भुला दिया था, जिसकी शुरुआत कभी उसने नृशंस लूट-पाट मचा कर की थी। भीड़-भाड़ में जब हलकी सी भी धक्का मुक्की हो जाती है, तो उसका रेला-सा चल पड़ता है और तब तक जारी रहता है, जब तक वह आखिरी सिरे को छू न ले। अब विपुल संपदा के अधिपति चेन की बारी थी। मध्य एशिया के कबाइली छापामार उसको नींद हराम किये हुए थे। बीच-बीच में वे आक्रमण करते, संपत्ति लूटते और भारी बर्बादी मचाते। जब यह सिलसिला आये दिन चलने लगा। तो रक्षा का उपाय सोचा गया। योजना बनी कि उत्तर-पश्चिम सीमा पर एक विशाल दीवार खड़ी की जाय, जिससे आक्रमणकारियों से राज्य की सुरक्षा हो सके और इस विशालकाय आकाँक्षा पूरी करने का श्रेय-सौभाग्य भी मिले। अब एक ही प्रश्न था कि इतना विपुल धन कहाँ से कैसे प्राप्त हो ?

पर सनक अपनी महत्वाकाँक्षा किसी-न-किसी प्रकार पूरी कर ही लेती है। हठवादी चेन की बढ़ी-चढ़ी महत्वाकाँक्षा ने उसे असंभव जन्य कार्य को पूरा करने की ठानी। कार्य आरंभ कर दिया गया। दीवार बनने लगी। प्रबंध ऐसा किया गया कि रास्ते में जो नदी-नाले निकलें, वे भी उसके नीचे होकर गुजरें। इस निमित्त अनेक पुल बनने लगे। कार्य इतना बड़ा था कि उसके लिए आस-पास के क्षेत्र में उपलब्ध ईंट-पत्थर पर्याप्त न थे। परिणाम यह हुआ कि मोटी दीवार की पोल को भरने के लिए समीपवर्ती क्षेत्र के पेड़-पौधे, बालू-रेत जो भी मिले काट कर भर दिये गये। आधुनिक अनुसंधान बताते हैं कि यह भी जब अपर्याप्त साबित हुए, तो भूखे, कंगालों को उसमें जिंदा दफन किया जाने लगा। इसके प्रमाण आज भी जहाँ-तहाँ दीवार से बाहर झाँकते उनके कंकाल के रूप में मौजूद है।

इस अभूतपूर्व संरचना के लिए कुशल कारीगर और प्रशिक्षित मजदूर चाहिए, सो भी इतने, जितने से चेन की महत्वाकाँक्षा जल्दी-से-जल्दी पूरी हो सके। इतने कुशल शिल्पी और श्रमशील श्रमिक एक साथ कैसे उपलब्ध हों। हल इसका भी निकाल लिया गया। दूर-दूर के क्षेत्रों से बलिष्ठ जवानों को पकड़ कर दास बना लिया गया। उन्हें बड़ी संख्या में पकड़ तो लिया गया। उन्हें बड़ी संख्या में पकड़ तो लिया गया, पर इससे पूर्व उनके भोजन, आवास, विश्राम जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के बारे में सोचा तक न गया। अकुशल प्रबंध और दिन-रात के कठिन श्रम से हृष्ट-पुष्ट जवान भी जल्द ही जब क्षय रोग के रोगी जैसे लगने लगे। इतने पर भी जब उन पर समुचित ध्यान न दिया गया, तो बड़ी संख्या में उनकी मौतें होने लगी। सड़ते-गलते शरीर को ठिकाने लगाने के लिए योजनाकारों को मोटी दीवार के रूप में अच्छी कब्र मिल गई। सभी सामूहिक रूप से दीवारों में जहाँ-तहाँ दफनाया जाने लगा। इससे ईंट गारे की भी कभी-पूर्ति कुछ हद तक हो जाती थी। उपाय अच्छा लगा, तो यह सिलसिला चल पड़ा। जब भी कारीगरों और मजदूरों की मृत्यु से उनकी कमी पड़ती, तो दूसरे राज्यों पर आक्रमण कर ऐसे लोग पकड़ लिये जाते। मरने पर फिर उनका दफन उसी में कर देते। इस प्रकार उस हत्यारी दीवार ने लगभग एक लाख लोगों को निगल लिया। यह दीवार संबंधी तत्कालीन दस्तावेजों से ज्ञात होता है।

चेन सोचा था कि विशालकाय निर्माण के उपराँत उसे आक्राँताओं का त्रास नहीं झेलना पड़ेगा , पर अनुमान गलत निकला। अब दस्युओं ने दीवार में जहाँ-तहाँ सेंध लगाना शुरू किया। इस प्रकार वे चेन-साम्राज्य में लूट-पाट करने और भागने में सफल होते रहे। दीवार पर बने रक्षक बुर्ज के चौकीदार और सेना भी उनका दमन न कर सके। जो हुआ, वह मात्र इतना कि दीवार टूटती और मरम्मत होती रही, पर यह क्रम भी अधिक दिनों तक जारी न रह सका। चेन के उत्तराधिकारियों के लिए इसकी देख-रेख कठिन पड़ गयी, फलतः वह जहाँ-तहाँ गिरने और टूटने लगी। राज्य भी स्थिर न रह सका। तलवार के बल पर जिन सामंतों को कभी काबू किया गया। अब वे भी अपनी तलवारें चमकाने लगे। चेन-वंशज उन्हें वश में न रख सके। परिणाम यह हुआ कि फिर चीन के खंड-खंड हो गये।

कारण साफ था कि विजय किन्हीं उच्चादर्शों के नाम पर राष्ट्रीय एकीकरण के लिए उसे सुसंगठित और सबल बनाने के लिए नहीं प्राप्त की गयी थी और न अधीनस्थ सामंतों को विजय से पूर्व अथवा बाद में ऐसा कुछ समझाया गया था कि यह सब राष्ट्र के हित के लिए किया जा रहा है। प्रचार से निजी स्वार्थ तो कोई छिपता नहीं। यदि ऐसा प्रचारित किया भी गया होता, तो तद्नुरूप आचरण के अभाव में वह झूठा ही साबित होता। नहीं कारण है कि उद्देश्य उच्च न होने से देश उस रूप में संगठित न रह सका और चेन के बाद पुनः सत्ता संघर्ष के लोभ में परस्पर आक्रमण प्रत्याक्रमण शुरू हो गये।

आज चीन की दीवार संसार के महानतम आश्चर्यों में गिनी जाती है। वह 2150 मील लंबी है और ऊँचाई 15 फुट से लेकर 31 फुट तक है। चौड़ाई औसतन 32 फुट है। समग्र पाते कि चेन यह क्यों न सोच पाया कि मनोबल संपन्न अंतराल और देशभक्ति से भरे-पूरे सैनिक, आक्रमणों को निरस्त करने में सफल हो सकते हैं। विशालकाय किले और संरचनाएं उस कार्य को पूरा नहीं कर सकते।

वर्तमान में चीन की दीवार खंडहर बन कर रह गई है। दिन-दिन वह और गिरती बिखरती जा रही है। साथ ही अपनी मूक भाषा में सर्वसाधारण को बताती रहती है कि किस प्रकार महत्वाकाँक्षा की बढ़ी-चढ़ी सनक जिन पर उभरती है, वे कैसे-कैसे अजूबे खड़े करते व धनबल, जनबल, बुद्धिबल को अपार क्षति पहुँचाते हुए यशस्विता प्राप्त करने का एक असफल व हास्यास्पद प्रयास करते हैं।


दुर्भाग्य का रोना (Kahani)

हिन्दी के ख्याति-लब्ध साहित्यकार बालकृष्ण शर्मा ‘ नवीन’ का जीवन अभावों में बीता। जब भी कभी इस विषय पर चर्चा चलती तो वे कहते ‘ ‘ भई हम तो उन लोगों में से हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी सड़कों पर काट दी और मरने के समय अस्पताल में पहुँच गए। वे कहा करते थे- साधन सुविधाओं के आधार पर प्रतिभा का आकलन नहीं किया जा सकता और न ही प्रतिभा संवर्धन हेतु इनकी आवश्यकता है।

यह तथ्य उनके जीवन में पूरी तरह घटित हुआ। गरीबी में जीने पर भी उन्होंने अपनी क्षमताओं को स्वयं के हित में नियोजित करने की जगह राष्ट्र के हित में नियोजित करना श्रेयष्कर माना। साहित्य भी उनके लिए सेवा का माध्यम बना।

चीन के प्रसिद्ध चित्रकार “होने एकनान” के बचपन में ही न तो हाथ रहे न पाँव। इस विकलाँग साहसी बालक ने वर्षों तक अभ्यास करके मुँह में पेंसिल दबाकर चित्र बनाने में सफलता अर्जित कर ली और लोगों को यह दिखला दिया कि मनुष्य उपलब्ध साधनों से बहुत कुछ कर सकता है। पेंसिल से चित्र बनाने के उपराँत जीभ से ब्रश का काम लेता, मुँह में रंग भरकर पेंटिंग करता। इस प्रकार अपंग होते हुए भी ‘होने एकनान’ ने चीन के चित्रकारों में अद्वितीय स्थान पाने का गौरव प्राप्त किया। उसने दुर्भाग्य का रोना कभी नहीं रोया।


भगवान की इस धरोहर का दुरुपयोग न हो

जीवन क्या है ? समय के धागों से बुन कर बनाया गया एक कपड़ा। घड़ी-पलों से बुन कर बनाया गया एक मकान। समय ही ईश्वर प्रदत्त वह वैभव है जिसकी हुँडी इस संसार के बाजार में किसी भी दुकान पर बुनाई जा सकती है। इसके बदले कुछ भी खरीदा जा सकता है। धन-संपत्ति के लिए लोग आकुल व्याकुल होकर असाधारण उत्कंठा सँजोये होते हैं, पर वह भी कुछ नहीं, समय के बदले खरीदी हुई वस्तु ही है। श्रम ही पैसे के रूप में बदल जाता है। शारीरिक और मानसिक श्रम के बदले ही हम इच्छित वस्तुएँ खरीदते हैं। उन्हीं में एक धन वैभव भी है।

समय असीम भंडार किसी को भी नहीं मिला है। हर किसी के हिस्से में सीमित सांसें ही आई हैं। वे एक-एक करके बूँदों की तरह टपकती और अंतरिक्ष में विलीन होती रहती हैं। वह दिन दूर नहीं, जब यह भंडार चुक जाता है और जो गुम गया वह फिर लौट कर कभी वापस नहीं आता। भंडार चुक जाने पर वह सब कुछ न जाने कहाँ विलीन हो जाता है जिसे हम अपना स्वरूप मानते हैं। मरने के उपराँत शरीर का कोई अस्तित्व बचता नहीं है। प्राण निकलते ही उसके अवशेष जल्दी से जल्दी अपने को-कलेवर को समाप्त करने में जुट जाते हैं। संबंधी अंत्येष्टि न भी करें तो गिद्ध, कुत्ते, शृंगाल आदि उसे ठिकाने लगा देते हैं। अन्यथा वह लोथड़ा अपने भीतर से ही सड़न से उत्पन्न हुए कृमि कीटकों द्वारा सफाचट कर दिया जाता है।

शरीर को ही हर कोई ‘ हम ‘ कहता है, पर क्या अपनी सत्ता इतनी स्वल्प है कि साँसों का चलना और रक्त का बहना बंद होते ही सदा-सर्वदा के लिए अविज्ञात के गर्त में समा जाय ? बात ऐसी है नहीं। कपड़े बदलने की तरह शरीर बदले जाते रहते हैं आत्मसत्ता परमात्मा का अविनाशी अंश होने के कारण अनंत काल तक चलती रहती है।

शरीरगत जीवन इसीलिए मिला है कि उपकरण के माध्यम से आत्मा को भटकाव से उबार कर सदा सर्वदा के लिए ऐसे आनंद भरे स्तर तक पहुँचा दिया जाय, जहाँ तृप्ति, तुष्टि , प्रगति और शाँति का अनंत और असीम साम्राज्य बना रहता है। पर उसे भी समय की कीमत पर ही खरीदा जाता है। विलास भी उसी स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ द्दरुह्फ्ह् होता है और अभ्युदय का चरम लक्ष्य भी उसी के बदले प्राप्त किया जाता है। यह अपनी इच्छा के ऊपर है कि जीवन के इस सीमित अवधि तक के लिए मिले हुए समय को किस प्रयोजन के लिए खर्च किया जाय। यह वह प्रश्न चिन्ह है, जिस पर किसी की समझदारी, नासमझी मापी, आँकी, जानी जाती है।

संसारी वस्तुएँ ऐसी हैं जो गुम जाने पर फिर भी किसी प्रकार प्राप्त की जा सकती है। , पर कायकलेवर के साथ जुड़ा हुआ जीवन ऐसा है जो मनुष्यकृत नहीं भगवान प्रदत्त है। यह धरोहर के रूप में उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मिला है। उस पूर्ति के लिए जिसमें आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के दोनों ही प्रयोजन समान रूप से जुड़े हुए हैं। इतने बहुमूल्य हीरक हार का एक-एक दाना बहुमूल्य है। समय का एक-एक कण ऐसा है जिसका मूल्याँकन सहज बुद्धि से नहीं हो सकता है। इसका पता तो तब चलता है जब वह हाथ से छिन जाता है और प्रमाद अपनाये जाने के कारण सुखद विभीषिकाओं का घटाटोप अपनी समूची भयंकरता समेट कर सामने खड़ा होता है। उस परिस्थिति में पहुँचने पर पता चलता है कि कितनी बड़ी भूल हुई और कितनी बहुमूल्य संपदा उन प्रयोजनों पर लुट गई जिन्हें कृमि-कीटक तक अपनी गई गुजरी स्थिति में रहते हुए भी प्राप्त कर लेते हैं। पेट और प्रजनन के क्रिया-कलाप तो हर जीव-जन्तु बिना किसी कठिनाई के पूरे करते रहते हैं। फिर यदि मनुष्य ने पैसा बटोरने और दर्प दिखाने जैसी विडंबना में जीवन संपदा को लुटा दिया तो उसकी समझदारी को कोई किस प्रकार सराहेगा। भौतिक-संपन्नता और जीवन-संपदा की तुलना किसी प्रकार नहीं होती। एक मनुष्य उपार्जित है और दूसरी ईश्वर प्रदत्त। संपदा के बदले सुविधा साधन मात्र उपलब्ध हो सकते हैं। फिर क्षण-क्षण बदलते इस संसार की कोई वस्तु ऐसी नहीं जो देर तक एक रूप में टिक सके और सदा एक जैसी प्रसन्नता दे सके। दुरुपयोग करने पर वह वैभव और अहंकार पतन और पराभव से संबंधित अनेकों अनर्थ खड़े कर सकता है। फिर तृष्णा की खाई समुद्र से भी अधिक गहरी जो है, उसे सीमित सुविधा-साधनों से पाटा भी तो नहीं जा सकता। उपलब्धियाँ जिस क्रम से हस्तगत होती जाती हैं, ललक की ज्वाला उसी अनुपात से बढ़ती भी तो जाती है। वैभव कितना ही अधिक अर्जित क्यों न कर लिया जाय, उसके कारण व्यसनों का तापमान उसी क्रम से बढ़ता जाता है। साथ ही नशा पीने की मस्ती जिस प्रकार उत्तर जाती है और बदले में शरीर की नस-नाड़ियों को तोड़ मरोड़ कर रख देती है, उसी प्रकार संपदा के बदले जो पाया सँजोया जाता है वह व्यक्तित्व की गिरावट का ही निमित्त कारण बनता है। इसीलिए तथ्यों के जानकार अपनी दिव्य विभूतियों को खाई खंदक में गिराते रहने की भूल करने की बारी आने पर समय से पहले ही सावधान हो जाते हैं।

यदि अपने को दूसरों से बढ़कर ही सिद्ध करने की अहंता आकुल-व्याकुल कर रही हो तो उसकी पूर्ति के लिए अनेकों मार्ग खुले पड़े है। प्रतिस्पर्धा और महत्वाकाँक्षाओं के लिए अनेकों एक से एक महत्वपूर्ण द्वार खुले पड़े है। आवश्यक नहीं कि इसे लिए निकृष्टता की दिशा धारा ही अपनाई जाय। अहंता उद्दंडता की पूर्ति के लिए प्रेरित करती हे, किन्तु आत्मगौरव का तकाजा दूसरा है। उस संदर्भ में भी सराहनीय प्रगति की जा सकती ह। पुण्य परमार्थ के निमित्त भी बहुत कुछ किया जा सकता है। धर्म धारणा और सेवा भावना को चरितार्थ करने के लिए अनेकों क्षेत्र ऐसे पड़े है जिनमें साहसपूर्वक आगे बढ़ा जा सकता है और महामानवों की पंक्ति में जा बैठने के लिए बढ़−चढ़ कर शौर्य पराक्रम का प्रदर्शन किया जा सकता है। यही क्यों सूझना चाहिए कि निकृष्टता के दल-दल में डूब मरने का ही अपने साहस का प्रदर्शन किया जाय। यों आत्मघात में भी तो हिम्मत जुटानी पड़ती है और दुस्साहस भरे कदम उठाने पड़ते है, पर इसका प्रतिफल अपने या दूसरे किसी के लिए न प्रसन्नता दायक होता है और न सराहनीय। गति तो गर्त में गिराने के लिए देखी जाती है, पर वह अधोगामी होती है। गौरव ऊँचे चढ़ने में है। उसमें अपना स्थान एवं स्तर भी दूसरा की अपेक्षा अधिक ऊँचा उठा हुआ देखा जाता है और जमीन पर खड़े हुए लोग इस उत्कृष्टता के शिखर पर जा चढ़ने वाले का आश्चर्य भरी दृष्टि से देखते हैं और प्रयास की सराहना करते हैं। जब चयन करना पूरी तरह अपने ही हाथ की बात है तो पतन-पराभव की दिशा अपना कर लोग भर्त्सना और आत्म-प्रताड़ना का भाजन क्यों बना जाय ? उस मार्ग को क्यों न अपनाया जाय जिसमें पग-पग पर अपना और दूसरों का कल्याण कही कल्याण है।

गिरने वाला मनुष्य पतित, पराजित, हेय एवं अधोगामी गिना जाता है। मनुष्य जैसा शरीर रहते हुए भी नर-पशु वनमानुष, असभ्य और अनगढ़ गिना जाता है। आत्मा का, परमात्मा का लोकमत का कोप भाजन बनता है और भ्रष्ट चिंतन, दुष्ट-आचरण का प्रतिफल अनेकानेक कष्टों तिरस्कारों, अभिशापों के रूप में सिर पर चढ़ता है। वासना पूर्ति के लिए अनेकों अपव्ययी, दुर्व्यसनी, अनाचारी अपने-अपने कीर्तिमान स्थापित करने के लिए लालायित रहते हैं। उन्हें अधोगामी दुष्प्रवृत्ति को ही क्यों अपनाना चाहिए जिनमें मात्र विक्षोभ उत्पन्न करने और अनाचारी बनने के अतिरिक्त और कुछ सार है। ही नहीं। तृष्णा की पूर्ति के लिए व्याकुल तो रहा जा सकता है, पर उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार संभव नहीं। आगे पड़ने वाली छाया को पकड़ सकने में कोई समर्थ नहीं हुआ। जितनी तेजी से उसे पकड़ने का प्रयत्न किया जाता है उतनी ही तेजी से वह आगे बढ़ जाती है। मनोरथ पूरा करने पर भी कोई चैन से नहीं बैठ सका है। अतृप्ति के क्षणों में बेचैनी रहती है, पर जब जितना कुछ मिलता जाता है, वह घटिया भी लगता है और कम भी। तब प्राप्ति का संतोष तो न जाने कहाँ चला जाता है। अधिक पाने के लिए जो नई लालसा उभरती है, वह जो पाया जा चुका उसके संतोष का भी अपहरण कर ले जाती है। प्यास पहले से भी अधिक बढ़ जाती है और असंतोष उससे भी अधिक उफन पड़ता है जितना कि कम साधनों की स्थिति में पहले रहा करता था।

संसार में एक से एक बढ़कर धनी मानी पड़े है। उन सब की पटतर कैसी की जाय ? इतना समय कौशल, अवसर, साधन आदि को जुटा सकना कैसे संभव हो ? अपने से अधिक संपन्नों पर दृष्टि डालने से अपनी स्थिति बहुत ही पिछड़ी हुई दीख पड़ती है। सोने की लंका वाला अपार भोगों का अधिपति कारण तक जब उस उपार्जन में से कुछ साथ न ले जा सका। सिकन्दर जैसे विपुल वैभव के अधिपति को अपने को अभावग्रस्त ही समझते रहना पड़ा और अपनी निराशा को व्यक्त करते हुए हाथ पसार कर विदा होने की बात सर्वसाधारण के सामने व्यक्त करता रहा तो फिर साधारण लोगों की तो बिसात ही क्या है ? सामान्य परिस्थितियों में तो हर किसी के लिए इच्छा और चेष्टा का उम्र प्रदर्शन करते रहने पर भी उस दशा में कुछ कहने लायक और बटोर सकने का सुयोग भी नहीं बन पड़ता। फिर ऐसी लालसाओं को साती सर्पिणी की तरह क्यों जगाया जाय जो देखने भर के लिए कितनी चमकदार है, पर उसके साथ घनिष्ठता जोड़ने से तो विष दंश चुभने और प्राण जाने का ही खतरा है। कोई चाहे तो अवाँछनीय उद्विग्नता को काबू में रख कर काम चलाऊ साधनों से भी भली प्रकार निर्वाह कर सकता है और संतोष भरी प्रसन्नता का निरंतर रसास्वादन कर सकता है। फिर भारभूत संचय को सिर पर लादने के लिए इतना व्याकुल नहीं रहा जाय जिसमें जीवन संपदा बुरी तरह खप जाय और हाथ कुछ भी न लगे।

अहंकार की पूर्ति दूसरों को गिराने, हराने में हो सकती है या फिर चापलूसों को चाटुकारिता से भरे-पूरे यशोगान कुछ राहत दे सकते है। प्रदर्शन के लिए आत्म-विज्ञापन असाधारण रूप से खर्चीला होता है, उस उसमें वास्तविकता न होने से धुएँ से बनने वाले बादलों की तरह निरर्थकता के अतिरिक्त और कुछ होता नहीं। यश, श्रेय किसी को भी प्रिय लग सकता है। प्रसूति के बाद बच्चे को पाकर गुदगुदी सी तो अनुभव हो सकती है, पर उसमें स्थिरता कहाँ ? चिरस्थायी यश पाने के लिए तो पुण्य परमार्थ के क्षेत्र में दुस्साहस स्तर के त्याग बलिदान का परिचय देना पड़ता है। धर्म धारणा और सेवा भावना की कड़ी कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। इससे कम मूल्य में खरीदा गया बखान, यशगान पाकर बालकों के झुनझुने पाने या गुब्बारा मिलने जैसा कुतूहल तो दीख पड़ सकता है, पर उसमें कुछ भी ऐसा नहीं होता जो किसी का श्रद्धा-सम्मान अर्जित कर सके। प्रामाणिकता का धनी और विश्वास भरे सम्मान का अधिकारी बनी सके। इन्हीं सब बातों को देखते हुए तत्व दर्शियों ने क्षुद्र, जनों द्वारा अपनायी जाने वाली वासना, तृष्णा और अहंता के व्यामोह को भ्राँतियों में भटकना मात्र कहा हे और उस कुचक्र में न फँसने के लिए सावधान किया है।

नीति और प्रीति का राजमार्ग ही हर किसी के लिए सरल और श्रेयस्कर है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते रहने वाले ही जीवन लक्ष्य प्राप्त करने में समर्थ हुए है। अपने लिए भी अवलंबन करने योग्य राजमार्ग यही है। जीवन को धन्य बनाने के लिए और कोई “शार्टकट” है। नहीं संतोष और उल्लास प्रदान कर सकने वाले मणि−मुक्तक उसी उत्कृष्टता पर अवस्थित मानसरोवर के अतिरिक्त और कहीं मिलते नहीं है। कस्तूरी के मृग की तरह जहाँ - जहाँ भटकते हुए बेमौत न मरना हो तो दूसरा विकल्प यहीं है कि अपनी नाभि में अवस्थित कस्तूरी होने का ज्ञान प्राप्त किया जाय और अंतरात्मा की प्रेरणाओं का अनुसरण करते हुए उत्कृष्ट आदर्शवादिता को अपनाया जाय। वह किया जाय जिसे करने में ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति मानवी सत्ता की गौरव गरिमा बढ़ सकें।

जीवन चर्या की प्रतिक्रिया मात्र अपने तक ही सीमित नहीं है समान स्तर के और कुछ छोटे लोग उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। निकृष्टता अपना कर परोक्ष रूप से असंख्यों को वैसा ही अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। चोर लबार, व्यभिचारी, दुराचारी, दुर्व्यसनी जिसे भी संपर्क में आते है, उत्तेजित और अभिभूत मनः स्थिति का अपना प्रभाव और दबाव होता है, पर छूत की बीमारी की तरह समीपवर्तियों पर आक्रमण किये बिना नहीं रहती। तालाब में ढेला फेंकने पर उससे उठने वाली लहरें उस जलाशय की हर दिशा में दौड़ने लगती हैं। इसी प्रकार भ्रष्ट आचरण भी अदृश्य जगत में अपना प्रभाव छोड़ते हैं और अनेकों को वही दिशा अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। नशेबाज और व्यभिचारी असंख्यों को अपनी छूत लगाते हैं और अपने जैसा बनाते रहते हैं। इस पाप विस्तार का दुष्परिणाम लौट कर अपने ही ऊपर आता है। इसलिए आत्मघाती आचरण करने वालों को विश्व विक्षोभ उत्पन्न करने का अपराधी भी ठहराया जाता है। उनके ऊपर न केवल अपने पापों की प्रताड़ना बरसाती है, वरन् उसके प्रभाव क्षेत्र से उत्पन्न हुआ विक्षोभकारी अनाचार भी अपने मार्गदर्शक को ही सहयोगी बनाता है। और न्यायकर्ता के सामने अपराधियों वाले कटघरे में खड़ा करता है।

सदाशयता का मार्ग अपनाने वाले जहाँ अपने पुण्य परमार्थ का सत्परिणाम उपलब्ध करते हों वहाँ उन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में उत्पन्न हुई सत्प्रवृत्तियों के लिए भी श्रेयाधिकारी ठहराया जाता ही। सन्मार्ग अपनाने वालों को दुहरा लाभ मिलता है। अपने सत्कर्मों का भी और दूसरों पर छोड़े गये श्रेयस्कर प्रभाव का भी। इसी तथ्य को देखते हुए अपने सुधार को संसार की सबसे बड़ी सेवा ठहराया गया है। अध्यापक अनेकों को शिक्षित बनाने का श्रेय प्राप्त करते है। अपने प्रतिभावान् प्रयत्नों से हम अनेकों को अपनी तरह गिराने या उठाने का वातावरण बनाते हैं।

विचार क्राँति की आवश्यकता आज की परिस्थितियोँ में इसीलिए निताँत आवश्यक मानी गई है। आस्था संकट, अन्न संकट उत्पन्न करने वाले दुर्भिक्ष से भी अधिक भयंकर है। वस्तुओं के अभाव में मात्र शरीर को ही कष्ट उठाना पड़ता है, पर अचिंत्य चिंतन का अभ्यास तो उपयुक्त परिस्थितियों को भी कुसंस्कारी, दैन्य, दारिद्रय से भर देता है। इसलिए यदि प्रमुखता देने योग्य परमार्थ को अपनाना हो तो उसके लिए विचार परिष्कार का पर्यंत प्राण-पण से करना चाहिए। सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त सुरम्य वातावरण उत्पन्न होने की आशा इसी आधार पर की जा सकती है कि विचारणा, भावना, आस्था, रुझान और क्रियाकलापों में शालीनता की पक्षधर सुसंस्कारिता का अधिकाधिक समावेश किया जाय। यदि औचित्य का मार्ग अपनाया जा से उसके लिए प्रेरणा-प्रद वातावरण मिल सके तो समझना चाहिए कि व्यक्ति और समाज के लिए सर्वतोमुखी कल्याणकारी परिस्थिति उत्पन्न करने का सुयोग बन गया। अनेकों समस्याओं से अलग अलग उपायोँ से जूझने के स्थान पर मूल कारण के समाधान का उपाय भी समस्त समस्याओं का एक ही हल सिद्ध हो सकता है। जन मानस का परिष्कार ही अपने समय का सर्वश्रेष्ठ परमार्थ है। जड़ सींचने से समूचा वृक्ष हरियाने और फूलने - फलने लगता हैं। यदि इस तथ्यान्वेषी दूर दर्शिता से काम न लिया जाय तो हरे पत्ते को पोंछने धोने का ऐसा लम्बा मार्ग अपनाना पड़ेगा जो कष्ट साध्य होने के साथ - साथ इस दृष्टि से भी संदिग्ध ही रहेगा कि उन बहुमुखी प्रयासों से उपयुक्त समाधान निकलेगा भी या नहीं।

चेचक की फुँसियों पर मरहम कहाँ तक लगाई जाय। अच्छा यही हैं कि रक्त शोधन का उपाय - उपचार किया जायें। रक्त में विषाक्तता भर जाने पर चेचक ही नहीं और भी अनेकानेक चित्र-विचित्र आकृति प्रकृति के रोगों का प्रकोप हो सकता हैं। इस लिए चिर स्थायी स्वास्थ्य समाधान ढूँढ़ने हैं। अपने समय में जनता के सम्मुख उपस्थित अनेकों समस्याओं, आपत्तियों, उद्विग्नताओं, आशंकाओं, चिंताओं का एकमात्र कारण है - चिंतन में निकृष्टता की पक्षधर दुष्प्रवृत्तियों की भरमार। उसी कारण दुष्कर्म पड़ते हैं और क्रिया की प्रतिक्रिया का परिपाक अनेकानेक विपत्तियोँ के रूप में प्रस्तुत होता दीख पड़ता हैं।

मनुष्य इतना अशक्त नहीं कि अपने निर्वाह साधन खड़े न कर सके। उसे तो इतना क्षमता संपन्न बनाया गया है कि स्वयं सुख शाँति से रह सके और जलते दीपक कि तरह अपने प्रभाव क्षेत्र में हर्षोल्लास भरा आलोक वितरण कर सके। व्यवधान एक ही है कि अवाँछनीयता के प्रति आकर्षित हो तदनुसार वासना, तृष्णा, अहंता की गुत्थियों में फँसकर अपने लिए और दूसरों के लिए पतन, पराभव का वातावरण विनिर्मित करना।

अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा हैं। इस उद्घोष को उछालने वाले युग मनीषियों ने प्रस्तुत समस्याओं और संकटों के निराकरण का यही समाधान सुझाया है कि हम अपने जीवन का स्वरूप, एवं लक्ष्य समझें, कर्तव्यों का परिपालन करें इसका प्रभाव बाह्य जगत पर पड़े बिना नहीं रह सकता। सुगंध और दुर्गंध के उद्गम अपनी-अपनी प्रतिक्रिया से व्यापक वातावरण को प्रभावित करते हैं, फिर कोई कारण नहीं कि जीवन संपदा का श्रेष्ठतम, उपयोग करने वाला अन्य अनेकों को उसका अनुकरण करने के लिए प्रोत्साहित न कर सकें।

यह बार-बार स्मरण रखने योग्य तथ्य है कि स्रष्टा ने सुर दुर्लभ मानवी काया इसलिए प्रदान की है कि उसके द्वारा आत्म परिष्कार और सत्प्रवृत्ति प्रचलन के रूप में अपनी तथा संसार की दुहरी सेवा-साधनों को अपनाया जाय। वह निश्चित रूप से पेट प्रजनन भर के लिए नहीं है। यदि इतना ही सीमित उद्देश्य रहा होता तो किसी भी जीव जंतु के कलेवर में रहते हुए यह दोनों ही इच्छाएँ भली प्रकार पूरी की जा सकती थीं, तब मनुष्य को अनेकानेक विशेषताओं और विभूतियों से भरापूरा दिव्य जीवन गढ़ने और अनुग्रह-पूर्वक प्रदान करने की आवश्यकता ही न पड़ती है।

उसकी संरचना मात्र इसी प्रयोजन के लिए हुई है कि अपनी और सृजेता की गौरव गरिमा का परिचय उत्कृष्टताओं के साथ दे सके जो स्रष्टा को अपना विश्व-उद्यान सुरम्य देखने के रूप में अभीष्ट है, जिन कृत्यों को अन्य प्राणी नहीं कर सके, उन्हें अपने उच्चस्तरीय आदर्शवादी क्रियाकृत्यों द्वारा संपन्न कर सकें उपलब्धियाँ सौभाग्य की सूचक तो हैं, पर उनका सदुपयोग बन पड़ने पर ही सार्थकता है। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बन जाता है। जो जितना महत्वपूर्ण है उससे लाभ भी उसी स्तर का मिलने की संभावना है, पर साथ ही यह आशंका भी जुड़ी हुई है कि यदि उसका दुरुपयोग होने लगे तो घातक भी इतनी अधिक हो जाती है कि स्थिति सँभालते नहीं सँभलती। हाथी जिस दरवाजे पर बँधा होता है उसकी सुविधा प्रतिष्ठ में भी चार चाँद लगाता है, पर यदि वह पागल हो उठे तो अनेकों को मारता, कुचलता पेड़ों को तोड़ता, फसलों को रौंदता विकराल रूप भी धारण कर लेता हैं। मनुष्य सत्प्रवृत्तियों से सुसज्जित है। जीवन संपदा का श्रेष्ठतम उपयोग करें, तो वह अपना और अन्यायों का कल्याण साधता,स्रष्टा की कलाकारिता को सार्थक करता है, पर यदि वह वासना, तृष्णा और अहंता की अवाँछनीयता पर उतर आये तो उसे दैत्य, दानव, प्रेत, पिशाच के रूप में बदलते भी देर नहीं लगती।


ज्ञान की अनंतता (Kahani)

भगवान बुद्ध एक बार आनन्द के साथ एक सघन वन में से होकर गुजर रहे थे। रास्ते में ज्ञान चर्चा भी चल रही थी। आनन्द ने पूछा “देव ! आप तो ज्ञान के भंडार हैं। आपने जो जाना, क्या, आपने उसे हमें बता दिया ?’

बुद्ध ने उलटकर पूछा-”इस जंगल में भूमि पर कितने सूखे पत्ते पड़े होंगे ? फिर हम जिस वृक्ष में नीचे खड़े हैं, उन पर चिपके सूखे पत्तों की संख्या कितनी होगी ? इसके बाद अपने पैरों तले जो अभी पड़े वे कितने हो सकते हैं ? आनन्द इन प्रश्नों का उत्तर देने की स्थिति में नहीं थे। मौन तोड़ते हुए तथागत ने स्वयं ही कहा-”ज्ञान का विस्तार इतना है, जितना इन वन-प्रदेश में बिछे हुए सूखे पत्तों का परिवार। मैंने इतना जाना, जितना ऊपर वाले वृक्ष का पतझड़। इसमें भी तुम लोगों को इतना ही बताया जा सका, जितना कि अपने पैरों के नीचे कुछेक पत्तों का समूह पड़ा है।

ज्ञान की अनंतता को समझते हुए उसे निरंतर खोजते और जितना मिल सके उतना समेटते रहने में ही बुद्धिमता है।”


एक समग्र अध्यात्म का प्रतिपादक ग्रन्थ है - गीता

संसार के सभी महान धर्मग्रन्थ देश काल की सीमा में अवरुद्ध नहीं, वे इनसे परे है। भगवद् गीता ऐसा ही एक महान ग्रन्थ है। इसके उपदेश किसी जाति विशेष या देश विशेष के लिए नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव समाज के लिए हैं। इसकी शिक्षाएँ सर्वकालिक, सार्वदेशिक हैं।

ऐसे महान ग्रन्थ के अध्ययन में हमारा उद्देश्य मात्र पाँडित्य-पूर्ण या शास्त्रीय आलोचना नहीं होना चाहिए। नहीं नैयायिकों की तरह इसके प्रतिपाद्य विषय को तर्क की कसौटी पर कसना। वस्तुतः हमारा उद्देश्य इस हान ग्रन्थ के पास साहाय्य और प्रकाश पाना हो। हमारा हेतु इससे, इसमें से सच्चा अभिप्राय और जीता-जागता संदेश पाना हो। हम इससे वह चीज पाएँ जिससे हम अपनी पूर्णता और उच्चतम आध्यात्मिक अभितव्यता का आधार बना सकें।

इस सार्वभौमिक ग्रन्थ की शिक्षा एकाँगी नहीं है, जैसा कि कुछ विचारकों ने अपने मत के प्रतिपादन हेतु सिद्ध करने का प्रयास किया है। इसके किसी खास-पहलू या श्लोक को लेकर उसी से आगे बढ़कर बाकी अठारह अध्याय को किनारे रखकर उन्हें गौण या सहायक करार दे दिया है तथा गीता को मात्र अपने ही मत का बोधक या समर्थक मान लिया है।

कुछ लोगों का कहना है कि गीता में कर्मयोग का प्रतिपादन है ही नहीं। वे इसकी शिक्षा को कर्म संन्यास के पूर्व की साधना मानते हैं। जहाँ-जहाँ से गीता के ही श्लोक चुनकर अपने मत को प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं। पर यदि निष्पक्ष होकर विचार करने का प्रयास किया जाय तो इस मत का आग्रह नहीं ठहरता। कारण कि ग्रन्थ में बार-बार कहा जा रहा है, कि अकर्म से कर्म उत्तम है। कर्म की श्रेष्ठता इस बात में है कि कामना का आंतरिक त्याग करके कर्म परम-पुरुष को अर्पण करना होता हैं।

अन्य लोगों में से कुछ का मानना है कि भक्ति मात्र उपदेश है। ये लोग गीता के अद्वैत तत्व की इस सब के साथ आत्मा के ब्रह्म में शाँत भाव से निवास करने की स्थिति को जो उच्च स्थान प्रदान किया गया है, उसकी अवहेलना करते हैं। निस्संदेह गीता में भक्ति तत्व पर जोर है, बार-बार इसे दुहराया गया है। इसमें पुरुषोत्तम सिद्धाँत को प्रतिष्ठापित करके यह सुस्पष्ट किया गया हैं कि भगवान पुरुषोत्तम है और वहीं है जिन्हें जगत के संबंध से ईश्वर कहते हैं। ये सब बड़े मार्कें की बातें है - मानों उसकी जान हैं। तथापि यह ईश्वर वह आत्मा है जिनमें संपूर्ण ज्ञान की परितृप्ति होती है, ये ही यज्ञ के प्रभु हैं, सब कर्म इन्हीं के पास तो जाते हैं और ये ही प्रेममय स्वामी हैं जिनमें भक्त हृदय प्रविष्ट होता है। वस्तुतः गीता इन तीनों ज्ञान, भक्ति, कर्म में समन्वय, संतुलन स्थापित करती है। कहीं ज्ञान पर जोर देती है, तो कहीं कर्म पर तो कहीं भक्ति पर इसका जोर तात्कालिक विचार प्रसंग से संबंध रखता है। इस अभिप्राय से नहीं कि इनमें से कोई श्रेष्ठ या कनिष्ठ है। वस्तुतः जिन भगवान में ये तीनों मिलकर एक हो जाते हैं, वे ही परम पुरुष पुरुषोत्तम हैं।

पर आजकल पाश्चात्य विचारों से रँगे आधुनिक लोगों ने जब से गीता पर नजर उठाई, विचार करने का प्रयत्न किया है तब से लोगों का झुकाव ज्ञान तत्व, भक्ति तत्व को गौण मानकर, उसके कर्म विषयक आग्रह का लाभ उठाकर उसे कर्मयोग शास्त्र, कर्म विषयक सिद्धाँत मानने की ओर दिखाई देता है। निस्संदेह गीता कर्म योग शास्त्र है अवश्य पर उन कर्मों का जो ज्ञान में अर्थात् आध्यात्मिक सिद्धि में परिसमाप्त होते हैं ; उन कर्मों का जो भक्ति प्रेरित हैं। यह उन कर्मों का शास्त्र कदापि नहीं जिन्हें आधुनिक मन, कर्म मान बैठा है, उन कर्मों का तो हरगिज नहीं जो अहंकार वश किए जाते हैं। फिर भी गीता के आधुनिक व्याख्याकार यह दिखाना चाहते है ; कि गीता में कर्म का आधुनिक आदर्श की ग्रहण किया गया है। कितने की विद्वान यह कहने लगे हैं कि निवृत्ति मार्ग तथा साधना में तत्पर शाँति कामियों का गीता विरोध करती है। और सामाजिक कर्तव्यों के निस्वार्थ भाव से करने के आदर्श का प्रतिपादन करती है। वस्तुतः इसमें स्पष्ट ही और उपरोक्त अर्थ ग्रहण करते हुए भी ऐसी कोई बात नहीं है। यह एक प्राचीन ग्रन्थ को अर्वाचीन बुद्धि से समझने का परिणाम है।

गीता मूलतः विशुद्ध अध्यात्मिक ग्रन्थ है। नीतिशास्त्र या आचार शास्त्र का नहीं। पर आधुनिकों की बुद्धि यूरोपीय संस्कृति से ग्रसित है। उन्होंने दार्शनिक आदर्शवाद और भक्ति के स्थान पर तथाकथित आदर्श समाज सेवा का भाव ला बिठाया है और ईश्वर को छुटकारा पा लिया। अथवा यों कहा जाय कि ईश्वर को केवल रवार की छुट्टी के लिए रख छोड़ा है। यद्यपि कर्म निष्ठ-परोपकार की मनुष्य जाति को सुखी करने की अभिलाषा संबंधी बातें बहुत उत्तम हैं। ये भागवत संकल्प का एक अंश ही है। और आज इनकी जरूरत भी है।

जबरदस्ती यह सिद्ध करने का प्रयत्न करना कि निःस्वार्थ अपने सामाजिक, पारिवारिक दायित्वों का पालन ही इसकी सर्वांगपूर्ण शिक्षा है ठीक नहीं है। क्या गीता, गौतम बुद्ध को समाधान दे सकती है कि उन्हें फिर से पत्नी और पति के पास भेज दें और शाक्य राज्य की बागडोर संभालने को कहें, ऐसा संभव नहीं। न यह परमहंस रामकृष्ण से कह सकती है कि तुम किसी पाठशाला में पंडित होकर रहो और निःस्वार्थ भाव से बच्चे पढ़ाया करो। न विवेकानंद को मजबूर कर सकती है कि तुम जाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करो और इसके लिए वकालत, डाक्टरी या अखबार नवीसी का धंधा अपनाओ। इसकी शिक्षा तो दिव्य जीवन बिताने की है। यह एक मात्र परमात्मा का आश्रय ग्रहण करने को कहती है। बुद्ध, रामकृष्ण या विवेकानंद का भागवत् प्राप्ति के साधनों में से एक है-साध्य नहीं।

आधुनिक टीकाकारों ने गीता के पहले तीन-चार अध्यायों पर ही जोर दिया है और इसे कर्मयोग के प्रतिपादन करने वाला शास्त्र बताकर इति कर दी है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन इसी वचन को ये लोग गीता का महावाक्य कहकर आमतौर से उद्धत करते हैं और बाकी के अध्याय और उनमें भरा उच्च तत्व-ज्ञान इनकी दृष्टि में गौण है। आधुनिक मन बुद्धि के लिए यह स्वाभाविक भी है। इसका कारण एक ही लगता है कि तात्विक गूढ़ बातों एवं अति दूरवर्ती आध्यात्मिक अनुसंधान की चेष्टाओं से यह बुद्धि घबराई है।

गीता का महावाक्य परम वचन क्या है इसे ढूँढ़ कर निकालना नहीं पड़ता। गीता स्वयं ही अपने अंतिम श्लोकों में उस दिव्य संगीत को झंकृत करती है।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। त्तप्रसादत्परा शान्ति स्थानं प्राप्स्यासि शारतम्॥ तथा अंत में सर्वधर्मानपरित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज अर्थात् अपने हत्प्रदेश में स्थित भगवान की, सर्वभाव से शरण ले उन्हीं के प्रसाद से तू परा शान्ति और शाश्वत पद को प्राप्त करेगा। मैंने तुझे गुह्य से गुह्यतर ज्ञान को, उस परम वचन को सुन जो मैं अब बतलाता हूँ। मेरे मन वाला हो मेरा भक्त बन, मेरे लिए यज्ञ कर, और मेरा नमन पूजन कर तू निश्चित ही मेरे पास आयेगा क्योंकि तू मेरा प्रिय है। सर्व धर्मों का परित्याग कर मुझ एक की शरण ले। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा। शोक मत कर।

गीता का समग्र प्रतिपादन अपने आप को तीन सोपानों में बाँट लेता है। जिन पर चढ़कर कर्म-मानव स्तर से दिव्य मानव स्तर तक पहुँच जाता है। प्रथम सोपान में मनुष्य कामना का त्याग कर, पूर्ण समता के साथ अपने को कर्ता समझता हुआ यज्ञ रूप से कर्म करेगा, यह यज्ञ वह उन भगवान के लिए करेगा जो परम हैं, एक मात्र आत्मा हैं, यद्यपि अभी तक उसने इनको स्वयं अनुभव नहीं किया है। यह पहला सोपान है। दूसरा सोपान है मात्र फलेच्छा का ही त्याग नहीं अपितु कर्तापन का भी त्याग और यह अनुभूति की आत्मा सम, अकर्ता, अक्षर तत्व है और सब कर्म विश्व शक्ति प्रकृति के हैं जो विषम, कर्ती और क्षर शक्ति है। अंतिम सोपान है परम आत्मा को इस परम पुरुष को जान लेना जो प्रकृति के नियामक है प्रकृतिगत जीव उन्हीं को आँशिक अभिव्यक्ति है, वे ही अपनी पूर्ण परात्परस्थिति में रहते हुए प्रकृति के द्वारा सारे कर्म कराते हैं।

पहली सीढ़ी है कर्म योग, भगवत्प्राप्ति के लिए निष्काम कर्मों का यज्ञ, यहाँ गीता का जोर कर्म पर है। द्वितीय सोपान है ज्ञानयोग आत्मोपलब्धि आत्मा एवं जगत् के सत्यस्वरूप का ज्ञान यहाँ सारा जोर ज्ञान पर है। पर साथ ही साथ निष्काम कर्म भी चलता रहता हैं तृतीय सीढ़ी है भक्तियोग - परमात्मा की भगवान के रूप में उपासना और खोज यहाँ भक्ति पर जोर है पर ज्ञान भी गौण नहीं है। उसमें एक नई जान आ जाती है, कृतार्थ हो जाता है। फिर भी कर्मों का यज्ञ जारी रहता है। द्विविध धाराएँ यहाँ ज्ञान, कर्म, भक्ति की त्रिवेणी में परिवर्तित हो जाती है और यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है अर्थात् परम् सत्ता के साथ योग और परा भागवती प्रकृति के साथ एकत्व प्राप्त हो जाता है।

यही है गीता के उपदेश का सार मर्म जिसे अपनाकर धारण कर व्यावहारिक जीवन में क्रियान्वित कर मनुष्य आध्यात्म की चरम उपलब्धि अर्जित कर धन्य हो सकता है।


जीनों की पाठशाला (Kahani)

किन्तु यही दोनों इस बूढ़े विचारक से शिक्षा प्राप्त कर जब पहली बार घर लौटे तो उनके रहन-सहन, बोलचाल, अदब-व्यवहार ने लोगों का हृदय मोह लिया। फिर तो जो विद्यार्थियों की संख्या बढ़नी शुरू हुई कि विद्यालय पूरा विश्वविद्यालय बन गया। पहले के दोनों छात्रों में एक यूनान का प्रधान सेनापति, दूसरा मुख्य सचिव नियुक्त हुआ। यह वृद्ध ही सुविख्यात दार्शनिक जीनों और उसकी पाठशाला ने जीनों की पाठशाला के नाम से विश्व ख्याति अर्जित की।


गायत्री महासत्ता का सुरक्षा कवच

भगवान। मुझे भय बहुत लगता है। महर्षि का दर्शन करने आए थे महाराज दिव्य भद्र और उनके साथ ही आयी थी राजकुमारी। जब पिता महर्षि से विदा होने की अनुमति लेने लगे तो उस बालिका ने ऋषि के पदों में मस्तक झुकाकर प्रार्थना की।

बालिकाओं के लिए भीरु होना अस्वाभाविक नहीं है। ऋषि ने अंजली बाँधे , मस्तक झुकाए सामने खड़ी उस दस वर्ष की बच्ची की ओर देखा।

सब मेरा उपहास करते हैं। मुझे तो एकाकी कक्ष में दिन में जाते भी भय लगता है। उस राज कन्या के विशाल निर्मल नेत्र भर आये और अरुण , सुकुमार अधर काँपने लगे-

भैया कहते है कि मैं उनके उपयुक्त बहिन नहीं हूँ। जब भय लगे माँ गायत्री का स्मरण कर लिया करो। महर्षि ने सहज भाव से कह दिया।

यह अतिशय चपल हैं। महाराज ने अपनी कन्या की कठिनाई सूचित की। कुछ काल एक स्थान पर तो इसका शरीर स्थिर नहीं रह पाता। इधर से उधर फुदकती फिरती है। इसका मन कैसे स्मरण में लगेगा। नहीं यह बात नहीं है। बच्ची ने भोलेपन से कहा माँ कहती है...... कहते - कहते कुछ अटक सी गई। क्या कहती है तुम्हारी माँ, कहो - कहो। महर्षि उसे उत्साहित करते हुए बोले। कहती हैं स्त्रियों को गायत्री नहीं जपनी चाहिए। बालिका ने सकुचाते, झिझकते अपना वाक्य पूरा किया।

नहीं बेटी ऐसी बात नहीं है। प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले - कन्या और पुत्र दोनों की माता की प्राणप्रिय संतान हैं। भला माँ अपने बच्चों में कहीं भेद भाव करती है। स्त्रियों का गायत्री अधिकार तो पुरुषों से भी पहले है। मातृ जाति भला जगत् माता की उपासना से वंचित क्यों रहेगी ?

भोली बालिका की समझ में बात आ गई। वह प्रसन्न मन से नियमित गायत्री उपासना करने लगी। शीघ्र ही उसका भय जाता रहा। मन में उत्साह और हलकापन आ गया। आँखों में प्रसन्नता की ज्योति झलकने लगी। समूचा जीवन प्रसन्नता की हिलोर बनने लगा।

एक दिन राजकन्या अपनी सहेलियों के साथ राजोद्यान भ्रमण करने निकली थी। अभी थोड़ी ही देर हुई होगी तभी राजकुमार चंडबाहु का संदेश उन्हें मिला। राजकुमार आज अपने रथ से गुप्त रूप से अंग नरेश की राजधानी गए थे। अंग राज महाराज दिव्यभद्र से उनके पिता की शत्रुता है। किंतु कामुकता तो यह सब नहीं देखती। जब से अंग राजकुमारी पर श्री जगन्नाथ की रथयात्रा समारोह में दृष्टि पड़ी , राजकुमार उन्हें किसी प्रकार भूल नहीं पाते। अपने गुप्तचरों की सूचना के अनुसार राजोद्यान में राजकन्या के सम्मुख अकस्मात् उपस्थित होकर उसके चकित कर देने में वे सफल हो गए थे।

अनार्योचित कर्म है यह। राजकन्या ने तुच्छ सेवक की भाँति उसे झिड़क दिया-लज्जा आनी चाहिए आपको। तत्काल आप चले नहीं जाते तो भैया मणिभद्र की गदा के पारुष्य से परिचित होना पड़ेगा और अंडग राज्य का कारागार आपका आतिथ्य करेगा।

राजकन्या ने सचमुच सहेली को सूचना देने भेज दिया था। सिर पर पैर रखकर राजकुमार को भागना पड़ा। इतना तिरस्कार, जीवन में अपमानित होने का प्रथम अवसर था। राजकुमार क्रोध से उन्मत्त हो उठे- इस अभिमानों को अपने पैरों पर डालकर रहना है। संकल्प कर लेना सरल है, किन्तु उसकी पूर्ति के साधन सोचने लगे तो हृदय बैठ गया। नाम मात्र का राज्य है उनका। अंडगं नरेश से युद्ध की कल्पना ही नहीं की जा सकती। अडग युवराज मणिभद्र से द्वन्द्व करने जायँ तो उपचार के लिए भवन भी लौट सकेंगे- कम संभावना है। अंत्तः राजकुमार को कुलेश्वर कौलिक का स्मरण हो आया।

भयावह अंधकार, घोर श्मशान भूमि, उल्लुओं की कभी-कभी कर्णभेदी ध्वनि तथा शृंगालों का शब्द, किन्तु क्रोध एवं क्षेम के आवेश में राजकुमार ने इधर ध्यान ही नहीं दिया था। वे सीधे चलते गए।

जलकर चिता की लपटें शाँत हो चुकी थी, परंतु अंगारों का धूमिल प्रकाश था। कृष्णवर्ण , दीर्घ अवभूत कुलेश्वर कौतिक जैसे शीतकाल की रात्रि में धूनी के समीप पड़े हों, इस प्रकार उस चिता के पार्श्व में भूमि पर पड़े थे।

तू -काम क्षुब्ध आया है। अवधूत ने अपने पदों में प्रणत, हिचकियाँ भरते राजकुमार को तथा उनके द्वारा लाए गए महापूजा के उपकरणों को सहज भाव से देखा।

भगवन्। महापूजा के उपकरण समीप रखकर राजकुमार चंडबाहु दंडवत् प्रणिपात करते भूमि पर पड़े थे। रात्रि के अंधकार में उनके अश्रु भले न देखे जा सके, उनके भरे कंठ के स्वर टूट रहे थे- आपके अतिरिक्त और कोई मुझे अवलंब नहीं दे सकता।

निगम के साधक कामना को निर्मूल करके परिपूत होते हैं और आगम कामना का केंद्रीकरण करके परिपूत होते हैं और आगम कामना का केंद्रीकरण करके उसमें आत्माहुति देने का आह्वान करता है। अवधूत अपनी मस्ती में बोलने लगे- शुद्ध सच्चिदानंद ही महाशक्ति की गोद में -सत्य, रज, तुम होकर प्रतिफलित होता है। महर्षि भित चित् का साक्षात्कार करते हैं आत्म रूप में और कुलेश्वर रजोगण की ख्रम परिणति में आत्माहुति करके शिवोडहं कहता है। भित और कुलेश्वर का कंठ ही व्यक्त कर सकता था। सत्वशरीर भित को तो सौम्यता प्राप्त हुई इस जीवन में।

तू यह सब समझेगा नहीं। अचानक बोलते-बोलते अवधूत चुप हो गए। राजकुमार की और दो क्षण देखकर फिर बोले- तुझे सिद्ध आकर्षण चाहिए। श्रद्धा और संयम सर्वत्र साधना में अनिवार्य है, किंतु तंत्र के साधक में लोकोत्तर साहस भी चाहिए। संपूर्ण ब्रह्मांड विस्फुरित हो जाए तो भी साधक का आसन अविचल रहे-कर सकेगा ?

कर सकूँगा। दृढ़ स्वर राजकुमार ने स्वीकार किया। अहंकार का औद्धत्य अवधूत ने अट्टहास किया।

कोई क्षति नहीं होती शरीरों के शीर्ण होने से। काली का ग्रास है यह देह और तू शाश्वत है। गायत्री से संघर्ष करने चला है तू। महामाया की इच्छा..........।

अवधूत के प्रलाप को राजकुमार ने नहीं समझा, किंतु अपने को उन्होंने हुतार्थ माना, क्योंकि अवधूत ने उन्हें आकर्षण प्रयोग की संपूर्ण विधि समझा दी थी और वे गर्व कर सकते थे कि कुलेश्वर कौल जैसे महासिद्ध ने मंत्र दान किया था उन्हें।

क्या है ? राजकुमारी ने इधर-उधर देखा। अकस्मात् उनकी निद्रा भंग हो गयी थी। कक्ष में मंद प्रकाश था और उनकी सहेलियाँ उनके समीप ही शाँत सो रही थी। आखिर वह क्यों जाग गई ? उसकी निद्रा में विघ्न कैसे पड़ा ? आज उसे भय क्यों लग रहा है?

महर्षि भित ने आज से छः वर्ष पूर्व उसे भय निवारण का उपाय बतलाया था- माँ गायत्री का ध्यान तो अब उसका जीवन बन गया है। जब वह आखेट में अपने अग्रज के साथ अश्रावरुढ होकर निकलती है , बचपन में उसका उपहास करने वाले बड़े भाई मणिभद्र अब कहते हैं- अंग राजकुल की यशोमूर्ति है मेरी अनुजा और आज रात्रि में यह भय अकारण भय उसी राजकुमारी को ? अपनी श्य्या पर ही वह बैठ गई और मंद स्वर में स्तवन करने लगी- वर्णास्त्र कुँडिका हस्ताँ शुद्ध निर्मल ज्योतिषीम्। सर्वत्तवमयी वंदे गायत्रीं वेदमातरम्।

लगा सारा कक्ष स्निग्ध चंद्रिका से परिपूर्ण हो गया है। माँ गायत्री स्वयं आविर्भूत हो गयी हैं और उनसे झर रही है वह स्निग्ध, उज्ज्वल असीम वात्सल्य धारा के रूप में एक शुभ्र ज्योत्सना। राजकन्या ने अपना मस्तक झुकाया और उसे कुछ ऐसा मधुर आलस्य आया कि वह शय्या पर पुनः लुढ़क कर गाढ़ निद्रा में मग्न हो गई।

वह रात्रि भी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की। महारात्रि का मुहूर्त जाग्रत करने राजकुमार चंडबाहु श्मशान में बैठा था। आज अपना आकर्षण प्रयोग संपूर्ण करके ही आसन से उठेगा। इसी रात्रि में इसी श्मशान भूमि में - अभिमानिनी आंग राजकन्या उसके चरणों पर गिरेगी।

‘ठं ठाँ ठूँ वौषट’ अत्यंत कर्कश किंतु दृढ़ स्वर गूंज रहा है श्मशान की नीरवता में। प्रज्वलित चिता में पड़ी पीली सरसों की आहुतियों की गंध वायु में भरी है। नीलवसन रक्त चंदन चर्चित देह राजकुमार सरसों के साथ अपराजिता के पुष्पों की अनवरत आहुति चिताग्रि में डाले जा रहा है।

‘कंकाल देह प्रकट हुए, चिल्लाए नृत्य करते रहे और स्थित खड़े हो गए। शतशः अदृश्य नागों की फुंसकार वायु में उठी और लीन हो गई। ज्वालाएँ स्थान-स्थान पर धधकी, वहीं बुझ गयीं। राजकुमार अविचल रहा, निष्कंप रहा और उसका स्वर स्थिर रहा - ठं ठाँ ठूँ वौषट्।

राजकुमार तब भी निष्कंप रहा जब साक्षात् चामुंडा, श्मशान कालिका, नीलवसना, कराल द्रंष्ट, कपालभालिका अट्टहास करती चिताग्रि से बाहर ऐसे कूद पड़ी जैसे साधक के मस्तक पर ही कूद जाएगी।

ठं ठा ठूँ बौषट्। आनय ताँ ....। अचानक संपूर्ण गगन में जैसे प्रलयाग्रि प्रकट हो गयी। प्रचंड प्रकाश आकाश में आया और चामुँडा श्मशान कालिका ने अपने केश नोच लिए। उसके शरीर कका नीलाँबर वसन भस्म हो गया क्षणार्ध में। ठं। एक अकल्पनीय दारुण शब्द - संपूर्ण ब्रह्माँड जैसे चूर्ण-विचूर्ण हो गया हो, ऐसा विकराल - विकट विस्फोट।

आज विज्ञान की कृपा से परमाणु विस्फोट की भयंकरता का हम सबके अनुमान है। विश्व के मूल में जो मातृका बीज है, उन बीजाक्षरों में किसी का विस्फोट हो जाये तो सृष्टि का कहीं पता न चले। यह तो सर्वेश्वर की महिमा है कि बीजाक्षरों का विस्फोट सदा साधक में व्यष्टि में होता है।

“ठं” बीज का राजकुमार के मस्तिष्क में माँ गायत्री के के स्मरणाघात् से विस्फोट हो गया। राजकुमार उस दिन से एक असाध्य उन्माद से ग्रसित हो गया वह अकस्मात् दौड़ता भागता वस्त्र नोंचता और “ठं” का आर्तनाद करके मूर्छित हो जाया करता था।

तांत्रिकों के समुदाय में तब से यह सुना जाने लगा कि उसी समय, से आकर्षण के अभिसार के लिए चामुँडा श्मशान कालिका का अनुष्ठान आरंभ करते ही वह उन्मादिनी हो उठती है और साधक को ही अपना शिकार बना लेती है। यह सब गायत्री महाशक्ति की साधना का ही प्रताप था।


आदर्शवादी धारणा ही मानवी उत्कर्ष में सहायक

धारण का अर्थ होता है - अंतः करण की गहराई में धर्म धारणाओं की चिंतन धारा को गहराई तक स्थापित करना। देखा जाता है कि मनुष्य कटी पतंग की तरह हवा के झोंकों के साथ दिशा बदलता रहता है। शरीरगत वासनाएं और मनोगत तृष्णाएँ ही हर घड़ी सवार रहती हैं। उन्हीं की पूर्ति के लिए निरंतर ताना बाना बुनने में लगा रहता है। उन्हीं के लिए खटता पिसता रहता है कुछ सफलताएं विशेषताएँ उपलब्ध हुई तो अहमन्यता का भूत सवार होता है। दूसरों पर दर्प जमाने के लिए ठाट बाट रोपता और अपव्यय तथा आतंक की नीति अपना कर अपने को बड़ा सिद्ध करने के प्रयासों में लगा रहता है। इन्हीं विडंबनाओं में उलझते सुलझते जीवन का अंत हो जाता है।

जिनकी अपनी निजी धारणाओं में विवेक शीलता जुड़ी हुई है ऐसे कम ही लोग दीख पड़ते हैं। अधिकाँश तो लकीर के फकीर होते हैं। प्रचलनों की अनुकरण करते रहते हैं। कुरीतियाँ चाहे कितनी ही अहितकर और अनुपयुक्त क्यों न हो, सभी साथियों के द्वारा अपनाए जाने पर अपने लिए भी अनुकरण का विषय बन जाते है अनुकरण प्रियता बन जाते हैं। अनुकरण प्रियता मनुष्य का स्वभाव है पर इस क्षेत्र में भी यह सोचा जाना चाहिए कि किन्हें दृढ़ता - पूर्वक अपनाया जाय ? और किन्हें उथली दृष्टि से देखा और उपेक्षापूर्वक अपनाया जाय। जिन्हें महत्वपूर्ण माना जाय उन्हीं मान्यताओं के अनुरूप दृढ़ता - पूर्वक अपनाया जाय यह भी पूर्व निर्धारण के अभाव में ठीक तरह नहीं बन पड़ता। परिस्थितियों के अनुरूप सद्विचार ही नहीं आचरण भी बदलते रहते हैं। अवसरवादिता ही नीति बनकर रह जाती हैं। बेपेंदी के लोटे की तरह जहाँ भी जिस प्रकार भी स्वार्थ सिद्ध होता दीखता है उधर मुड़ लेते हैं। कुछ ही अच्छे आदमी अपने को बदल पाते हैं। वातावरण को अपने ढाँचे में ढाल सकने की मनस्विता तो किन्हीं विरलों में ही होती है। अधिकाँश परिस्थितियों के अनुरूप अपना मन बदलते रहते हैं तितली की तरह आकर्षण के प्रलोभन में इस फूल से से उस फूल पर उड़ते फिरते हैं। उनका अपना कोई लक्ष्य, निर्धारण या मंतव्य नहीं होता। इस प्रकार के व्यक्तियों की न कोई दिशा धारा होती है और न सुनिश्चित क्रिया पद्धति।

परिस्थितियाँ कही उन्हें हवा के झोंके की तरह जहाँ - तहाँ लिए फिरती हैं ऐसी दशा में न कोई महत्वपूर्ण कार्य नियमित रूप से करते बन पड़ता है और न किसी सराहनीय सफलता का श्रेय उन्हें मिल पता है।

प्रेरणाएँ अंतःकरण में उभरती हैं उन्हीं के आधार पर विचारणा काम करती है। योजना बन पड़ती है और इच्छा की पूर्ति करने के उद्देश्य से क्रिया चल पड़ती है। इसलिए इच्छाओं की पूर्ति की जीवन का स्वरूप बन कर रह जाती है। परिस्थितियों के साथ ताल मेल बिठा कर व्यक्ति स्वार्थ साधना के प्रयत्नों में लगे रहकर अपनी आयुष्य बिता देता है। उसके कोई जिन के उद्देश्य नहीं होते फलतः कुछ क्रम बढ़ रूप में करते धरते भी नहीं बन पड़ता है। इस स्थिति को एक प्रकार से निष्फल जीवन ही कह सकते हैं। जितनी महत्वपूर्ण क्षमताएँ उसे उपलब्ध हुई है। उसकी तुलना में शताँश भी वैसा कुछ नहीं होता जिस पर कि संतोष किया जा सके। उत्साह - पूर्वक जिसका उल्लेख हो सके।

इस उथले स्तर के जीवन यापन के पीछे एक ही कमी काम करती रही है वह है अंतःकरण में आदर्शवादी आस्थाओं का अभाव। यदि उपलब्धि सुरदुर्लभ अवसर का महत्व समझा जा सके और उसे महत्वपूर्ण कामों में लगाने का निर्धारण किया जा सके तो फिर आदर्शों की उत्कृष्टता से अंतराल को सराबोर करने की बात ही प्रमुखता से मन में आती है। इसके लिए उसी स्तर का स्वाध्याय, सत्संग, वातावरण एवं सहयोग तलाशना पड़ता है। इस घेरा बंदी से ही किसी उच्चस्तरीय दिशा धारा को दृढ़ता पूर्वक अपनाने का मन बनाता है। संकल्प उभरता है। मार्ग बनता है और उस पर दृढ़ता पूर्वक चल पड़ना संभव होता है। अन्यथा मन की चंचलता ही प्रधान बन कर रह जाती है। उस बंदर वृति से कौतुक कुतूहल ही होते रहते है। कुछ ऐसा नहीं बन पड़ता जिसे अनुकरणीय कहा जा सके, सराहा जा सके और उसका अनुकरण करके किसी के मन में उमंग उठ सके।

मनुष्य जीवन महान सृजेता की महान कलाकृति है। उसे पेट प्रजनन जैसे पशु प्रयोजनों में ज्यों-त्यों करके पूरा कर लेना ही वह कार्य नहीं है जिसे कर्म योग कहा गया है और जिसके द्वारा कर्म रत होते हुए भी चरम लक्ष्य तक पहुँच सकना संभव हो सकना बताया गया है।

शारीरिक कृत्यों का स्वरूप दृष्टिगोचर तो होता है। प्रस्तुत की गयी घटनाओं का वर्णन होता है। पर पर्दा उठाकर देखा जाय तो प्रतीत होगा कि घड़ी के अनेक पुर्जे जो एक दूसरे के सहयोग से कार्य रत हो रहे हैं; उसके पीछे फिनर वाली चाबी ही काम करती है। चाबी भरी होती है तो घड़ी के पुर्जे चलते रहते हैं। अन्यथा वे भावनाएं व्यापक प्रेरणा के अभाव में शिथिल पड़ते बंद हो जाते हैं। आगे धकेलने का जो काम फिनर वाली चाबी काम करती है उसी प्रयोजन की पूर्ति मानव जीवन में धार वालों, संकल्प वालों के द्वारा बन पड़ती है।

आदर्शवादी उन मान्यताओं को धर्मधारणा कहते हैं जो निश्चय से पूर्व तो उसकी गहराई पर गंभीरता- पूर्वक विचार करें। सभी शंका कुशंकाओं पर विचार कर लें। आगा पीछा सोच लें, किंतु जब निष्कर्ष निकाल ही लिया जाय तो उसे सुदृढ़ विश्वास के रूप में हृदयंगम का जाना चाहिए और उसकी पूर्ति के लिए जितना भी बन पड़े नित्य कुछ न कुछ करना चाहिए। विश्वासों को क्रिया से बल मिलता है। अन्यथा प्रयोजन में न आने वाले विचार कल्पना मात्र बन कर पक जाते हैं और प्रवाह के साथ जिधर से तिधर चले जाते हैं। स्थायित्व लाना हो, मंतव्य सुनिश्चित और सुदृढ़ करना हो तो आवश्यक है कि संकल्प को सदा ध्यान में रखा जाय और उन्हें कार्य रूप में परिणित करने का जो भी अवसर सामने आए उसे हाथ से न जाने दिया जाय। कर्तृत्व ही स्वभाव का अंग बन जाता है तो आदतें उस प्रकार के क्रिया कलाप के लिए अवकाश भी प्राप्त कर लेती है और अवसर भी निकाल लेती हैं।

व्यक्तित्व को विश्वास बनाते हैं। यों अधिकाँश लोग अनास्थावान होते हैं वे तार्किक दृष्टि से किसी भी विषय का धुंआ धार प्रतिपादन कर सकते हैं। पर जब उन्हीं सिद्धान्तों को निजी जीवन में कार्यान्वित करने का अवसर आता है तो अपने ही प्रतिपादनों को भूल जाते हैं, और वह करने लगते हैं, जिन्हें वकालत के उभार में स्वयं ही खंडन करते रहे हैं। मान्यताएं भावना क्षेत्र की गहराई में उगती हैं। पर वे चिरस्थायी रहती हैं। वस्तुतः जीवन में जो कुछ महत्वपूर्ण है वह सब आस्थाओं के ऊपर निर्भर है। अपने को उत्कृष्ट , निकृष्ट , दुर्बल, सबल मान बैठना अपने विश्वास के ऊपर ही अवलंबित है। मायावी जीवन जीने वाले घुमंत गाड़ी वाले अपने उस ढर्रे को अपनाए रहकर दूसरों की तुलना में कहीं अधिक कठिनाइयाँ भोगा करते हैं। पर वे सुविधा, साधन मिलने पर भी उस रीति-नीति को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते हैं उनका कहना है कि वे मेवाड़ के राणा की संतानें हैं और जब तक दिल्ली पर राणाओं का झंडा न फहराएगा तब तक इसी स्थिति में भ्रमण करते रहेंगे। यद्यपि अब उनके उस स्थान का कोई तात्पर्य नहीं रहा फिर भी विश्वास तो विश्वास जो रहा। कुमारियाँ अपना कौमार्य व्रत विधवाएं अपना वैधव्य इसी आधार पर भली प्रकार से निबाह लेती हैं। न्याय निष्ठ, परोपकारी, ईमानदारी स्तर के व्यक्ति अनेकों प्रतिकूलताओं और दबावों के आगे न झुक कर अपनी प्रतिभा पर आरुढ़ बने रहते हैं। प्रतिकूलताएं उन्हें उस व्रत से डिगा नहीं पाती।

धारणाएँ एवं आस्थाएँ तभी सराहनीय बनती हैं जब वे आदर्श-वाद के साथ जुड़ी हुई हों। अन्यथा दुर्व्यसनी भी हेय स्तर की मान्यताएँ बनाएँ रहते हैं। दुराग्रही भी यही करते रहते हैं। दीन-हीनों में से अनेक लोग उसे अपना भाग्य मान लेते हैं और उसमें सुधार लाने के प्रयत्न छोड़ बैठते हैं। धारणाएँ अंध विश्वास भरी भी हो सकती हैं पर जिन्हें अध्यात्म मार्ग में सहचर माना गया है वे आस्तिकतावादी अध्यात्मवादी और धर्मावलंबी मान्यताएँ ही हैं। इन्हीं के सहारे ऊँचा उठा और आगे बढ़ा जा सकता है।


शूद्र से ब्राह्मण बना ऐतरेय (Kahani)

गाय का पुतला बनाकर उनने आश्रम के आँगन में डाल दिया और लाँछन लगाया कि इसे नारद ने मारा है। उसे गौहत्या का दंड मिले।

यथार्थता खुल गई। पुतला नकली था, सो उसे फिंकवा दिया गया।

गौतम गंभीर हो गये। उनने कहा- ‘ ‘ब्राह्मणों ! मैंने जाना कि तुम्हारे क्षेत्र में दुर्भिक्ष क्यों पड़ा ? जहाँ के विद्वान ईर्ष्यालु होते हैं, वहाँ शान्ति का वातावरण नहीं रहता। ‘ ‘

इतरा यों उत्पन्न तो शूद्र कुल में हुई थी ; पर उसे महर्षि शाल्विन की धर्मपत्नी बनने का सुयोग मिल गया। उसके एक पुत्र भी था।

एक बार राजा ने बड़ा यज्ञ - आयोजन किया। उसमें सभी ब्राह्मणों और ब्रह्म कुमारों का सत्कार हुआ। सभी को दक्षिणा मिली। किंतु इतरा के पुत्रों को “शुद्र” कहकर उस सम्मान से वंचित कर दिया गया।

शाल्विन बहु दुःखी हुए। इतरा को भी चोट लगी। बच्चा भी उदास था।

इस असमंजस ने एक नया प्रकाश दिया। तीनों ने मिलकर निश्चय किया कि वे जन्म से बढ़कर कर्म की महत्ता सिद्ध करेंगे।

शिक्षण का नया दौर आरम्भ हुआ। इतरा पुत्र ऐतरेय को धर्मशास्त्रों की शिक्षा में पारंगत कराया गया। देखते—देखते वे अपनी प्रतिभा का परिचय देने लगे।

एक बार वेद ऋचाओं के अर्थ करने की प्रतिस्पर्द्धा हुई। दूर-दूर देशों के विद्वान् और राजा एकत्रित हुई। प्रतियोगिता में सभी की पाँडुलिपियाँ जाँची गयी। सर्वश्रेष्ठ ऐतरेय घोषित किए गये।

इतरा शुद्र थी। उसके पुत्र ने पिता के नाम पर ही, मामात की कुल परंपरा प्रकट करने के लिए अपना नाम ‘ऐतरेय’ घोषित किया। ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ वेद ऋचाओं के भावार्थ को प्रकट करने वाला अद्भुत ग्रंथ हैं। उसका सृजेता जनम से शुद्ध होते हुए भी, पुरुषार्थ से ‘ब्राह्मण’ बना।


मूलभूत है, अपने अंदर का देवत्व

पृथक-पृथक् लगते हुए भी वस्तुतः हम सभी चेतना के धरातल पर एक-दूसरे से जुड़े हुए है। मनुष्य में जो चेतन सत्ता क्रीड़ा-कल्लोल कर रही है, वहीं संपूर्ण जगत और प्राणी-पदार्थ में विद्यमान है। शास्त्रकारों एवं आप्त पुरुषों ने इसे ही व्यक्त करते हुए कहा हे कि ब्रह्माँड और पिंड में - व्यष्टि और समष्टि में जितनी भी शक्तियाँ काम कर रह है, वह सभी प्राण-चेतना के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं। कल्प के आदि में अपने मूल रूप “महाप्राण” से उद्भूत होकर यह शक्तियाँ अंततः उसी में समाहित हो जाती है।

इसी को दूसरे ढंग से पाश्चात्य मनीषियों ने भी स्वीकार किया है। सुविख्यात मनोविज्ञानी कार्लजुँग का कहना है कि परोक्ष एवं सूक्ष्म रूप से हम एक दूसरे से सुसंबद्ध हैं। हम जो भी करते अथवा सोचते हैं, उससे दूसरे अवश्य प्रभावित होते हैं, ऐसा उनका मानना हैं। इस परोक्ष संपर्क को उन्होंने “सामूहिक अवचेतन” नाम दिया है। विज्ञान का “पास्कल्स लाँ” नामक एक प्रसिद्ध नियम है, जिसे अनुसार जब किसी द्रव में दबाव पड़ता है, तो वह दबाव बिना घटे संपूर्ण द्रव क्षेत्र में संचारित होता है। हमारी चिंतन - चेतना जैसी होती है, उसी रूप में वह इस चेतना के समुद्र में संचारित हो जाती है ; हपर इसे ग्रहण करना पूर्णतः ग्रहीता पर इसे ग्रहण पर निर्भर करता है। यहाँ भी ग्रहण-अवधारण नियमानुसार होता है। जिस प्रकार समानधर्मी व्यक्ति और विचार परस्पर मिलते और घनीभूत होते हैं, वही बात चेतना के संबंध में भी कहीं जाती है चिंतन - चेतना जिस स्तर की होती है, वह उसी ओर आकर्षित होती है। उत्कृष्ट स्तर की चेतना सदा सजातीय की ओर खिंचती चली आती है, जबकि निकृष्ट स्तर की प्राण चेतना अनुदात्त स्तर की ओर प्रवाहित होती है।

संसार की समस्त भौतिक शक्तियाँ प्राण चेतना के ही रूपांतरण हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हें चार भागों में विभक्त किया हैं। ये हैं (1) इलेक्ट्रो मैगनेटिक फोर्स (2) वीक न्यूक्लियर फोर्स (3) स्ट्राँग न्यूक्लियर फोर्स (4) ग्रैवीटोश्नल फोर्स। विज्ञानवेत्ताओं ने इन्हीं सत्ताओं के समष्टिगत रूप में चेतना जगत की झाँकी की है।

परामनोविज्ञानी रिचर्ड मोरसि बक ने भी अपनी पुस्तक “कास्मिक काँन्शसनेस” में चेतना के चार स्तर बताये हैं - (1) परसिप्चुअल माइंड (2) रिसिप्चुअल माइंड अथवा (3) कंसिप्चुअल माइंड अथवा (4) काँसमिक काँनसनेस उनके अनुसार परसिप्चुअल माइंड चेतना का निम्नतम स्तर है और बहुत अपरिष्कृत भी। इस स्तर की चेतना अत्यंत निम्नस्तरीय जीवधारियों में पायी जाती है। रिसिप्चुअल माइंड कुछ उन्नत स्तर की चेतना, और विकसित प्राणियोँ में देखी जाती है। कन्सिप्चुअल माइंड को मानवी चेतना कह कर वर्णित किया गया है। और अंतिम श्रेणी को उन्होंने सर्वव्यापी ब्राह्मी चेतना कहा है। उनके अनुसार यह चेतना की सर्वोच्च स्थिति है, जिसमें पहुँच जाने पर व्यक्ति को एकत्व अद्वैत का बोध होता है। सब में स्वयं को और स्वयं में सबको देखने की विशालता इसी अवस्था में विकसित होती है। महर्षि अरविन्द ने भी चेतना को चार मुख्य सोपानोँ में विभाजित किया है। ये हैं - उच्चतर मन, प्रकाशित मन, संबुद्ध मन ओर ओवर माइंड। चेतना के उच्चतर आयाम को उन्होंने “सुपरामेंटल” नाम दिया है। उनके अनुसार चेतना के इस सर्वोच्च स्तर का संपूर्ण मानव जाति में अवतरण तभी हो सकेगा, जब वह अपने गुण कर्म, स्वभाव में परिष्कार लाकर विचारणा, भावना और संवेदना को उच्चस्तरीय बना सके, साथ ही ईश्वर के प्रति श्रद्धाभाव रखते हुए पूर्णरूपेण आत्म समर्पण कर दें। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को उन्होंने इवोल्यूशन इन्वोल्यूशन का नाम दिया है। इवोल्यूशन का नाम दिया है। इवोल्सूशन अर्थात् आरोहण। इसके अंतर्गत आत्म परिष्कार कर स्वयं को ऊँचा उठाया जाता है, और इन्वोल्यूशन अर्थात् अवरोहण यह वह प्रक्रिया हे, जिसमें स्वयं को सत्पात्र बना ले के बाद भगवद् करुणा उतरती हैं, अवरोहण करती है। व्यक्तित्व और चेतना का पूर्ण विकास इसी अवस्था में सींव बन पाता है और देवत्व की उपलब्धि भी तभी शक्य हो पाती है। यह अवस्था प्राप्त व्यक्त को उन्होंने नास्टिक बीइंग अर्थात् टध्यात्मजीवी कहा है। रिचर्ड मोरिस ने चेतना की इसी स्थिति को “ब्रह्माँडीय चेतना” नाम दिया है और कहा कि जब तक मानव जाति अपनी आत्म चेतना की उस दिव्य चेतना के अनुरूप उच्चस्तरीय न बना ले, तब तक उसका अवतरण संभव नहीं हैं।

व्यक्ति जो कुछ भीतर सोचता है, वहीं बाद में शब्द के रूप में बाहर प्रकट होता है। विज्ञान ने शब्द को शक्ति के प में स्वीकारा है। शक्ति का न तो नाश होता है, न निर्माण ; वरन् रूपांतरण होता है। वह अपने मूल रूप में भी रह सकती है अथवा दूसरे में बदल सकती है ; पर उनका विनाश कीज्ञी नहीं होता। इस आधार पर वैज्ञानिक बोली के विकास से लेकर अद्यावधि तक के छोड़े गये विचारों को अंतरिक्ष बताते हैं। आयनोस्फीयर, एटमोस्फीयर की तरह इस क्षेत्र का नाम उन्होंने आइडियोस्फीयर या है। इस क्षेत्र में घूमने-फिरने वाली विचार-चेतना में से वैज्ञानिक अब यंत्रों के माध्यम से उन तरंगों को ग्रहण करने का प्रयास करते हैं, जो महाभारत युद्ध के दौरान गीता के उपदेश के रूप में निकली थीं। यहो वान का अपने ढंग का अपना प्रयास है ; पर सर्वसामान्य तो आइडियोस्फीयर से अपनी स्वयं की चेतना के स्तर के अनुरूप ही लाभ उठा पाते हैं। सम्पूर्ण चेतनात्मक स्तर में से जिस स्तर का प्रतिनिधित्व वह करता हैं, उसी सतर की विचार तरंगें उसकी ओर अंतरिक्ष से खिंची चली आती हैं और अपने अनुरूप क्रिया-कलाप अपनाने को बाधित करती हैं। यह स्थापित नियम है कि समानधर्मी तत्व समाधर्मी कणों को ही आत्मसात् कर पाते हैं। लोहा, लोहे के साथ और सोना, सोने के साथ ही संयुक्त हो सकते हैं। लोहा और सोने को परस्पर घुला−मिला देना कठिन है। अन्य धातुओं, वस्तुओं और तत्वों के साथ भी यही बात देखी जाती है। यही नियम मनुष्य और समाज में भी ला होता है। शराबी, जुआरी, व्यभिचारी जितनी आसानी से अपनी बिरादरी वालों को जान और पहचान लेते एवं जिस सफलता व शीघ्रता से उनकी ओर खिंचते चलते हैं, वैसा शायद व्यसन और व्यभिचार न करने वाले लोग सहजता से न कर पायें। कला, प्रतिभा एवं सदाचार जितनी आसानी से कलाकार, प्रतिभाशाली और सदाचारी व्यक्ति को प्रभावित कर लेते हैं, वह सब विरोधी स्थितियों में संपन्न होता दिखाई नहीं पड़ता। जहाँ फूल खिलते हैं, वहाँ भ्रमर ही मँडराते हैं गंदी नालियों में तो गुबरीले स्तर के कृमि-कीटक ही विचरते हैं।

तात्पर्य यह है कि श्रेष्ठता सदा श्रेष्ठ तत्वों को ही आकर्षित करती है। जहाँ निकृष्टता रहती है, वहाँ अवाँछनीय और अप्रिय तत्व ही घनीभूत होते हैं। इन दिनों हमारी निम्नस्तरीय गतिविधियों के कारण अंतरिक्ष से प्रायः हेय स्तर की चेतना बरसती और हम पर लदती रहती है, फलतः हमसे कुछ भी उदात्त करते-धरते और सोचते नहीं बन पड़ता है। जिन हृदयों में श्रेष्ठता दिखाई पड़ती और उसके लिए भावनाएँ उमंगती हैं, उनके बारे में यह कहा जा सकता है कि उनने आंतरिक सद्विचारों से संपर्क स्थापित कर लिया है।

इसके अतिरिक्त स्थान और वस्तु से जुड़ी भली बुरी चेतना से भी हम अपनी स्थिति और स्तर के हिसाब से प्रभावित होते रहते हैं। वेश्यागामी को जितना आनन्द वेश्यालयों में मिलता है, उतना कदाचित् कहीं नहीं मिलता प्रतीत होगा। उसे वहाँ सँपूर्ण स्वर्ग उतरा अनुभव होता हैं, जबकि देवालयों का पवित्र वातावरण और महापुरुषों का सान्निध्य एकदम नीरस-निरानंद जैसा लगेगा। सत्पुरुषों के साथ स्थिति बिलकुल विपरीत दिखाई पड़ती है। उन्हें पवित्र सरोवरों, तीर्थों, देवमंदिरों में जितनी शाँति और उत्फुल्लता की अनुभूति होती है, वह कहीं अन्यत्र मिलती प्रतीत नहीं होती। दिन-रात मरघट में बिताने वाले अघोरियों को वहीं स्वर्ग - सुख की अनुभूति होती है, जबकि जनसामान्य को उस सन्नाटे की कल्पना से ही रोमाँच और भय होने लगता है। स्थान एक ही है ; पर परिणाम दो तरह के प्राप्त होते है। इसका एकमात्र कारण विरोधी चेतनात्मक स्तर ही है अघोरी की चेतना उतनी ही निकृष्ट होती है, जितना श्मशान का वातावरण, फलतः दोनोँ एक दूसरे में घुल-मिल जाते हैं और किसी प्रकार का व्यतिरेक उत्पन्न नहीं होता ; किंतु जब जब कोई सात्विक प्रकृति का व्यक्ति उक्त वातावरण में प्रवेश करता है, तो उसके अपेक्षाकृत परिष्कृत प्राण दूषित प्राण को स्वीकार नहीं कर पाते, जिससे दोनों प्रकार का संघर्ष छिड़ जाता है, जो मानसिक विक्षोभ, घुटन, अवसाद का कारण बनता है।

मनुष्य दिव्यता प्रधान है। जैसे - जैसे अंतराल की परिष्कृति के कारण उसके अन्दर इसकी मात्रा बढ़ती है, वैसे-ही-वैसे दिव्य चेतना से संपर्क सधने लगता है। जब यह चेतना संपूर्ण रूप में उसके अन्दर व्याप जाती है तो उसे ब्रह्मानंद की अनुभूति होती है। चेतना का अंतिम और चतुर्थ आयाम यही हैं। इसे ही तत्वज्ञानियों ने ‘तुरीय’ एवं मनोविज्ञानियों ने ‘सुपर चेतन’ के नाम से पुकारा है। इसी को जगाना, स्वयं को इस अंतिम स्थिति तक पहुँचाना हम सबका लक्ष्य होना चाहिए। यह सिद्धि हमारे अपने ही अंदर छिपी पड़ी है। कुँजी ढूँढ़ने के लिए ही अध्यात्म के सारे उपचार उपक्रम नियोजित होते हैं। यही हम सब के लिए श्रेय मार्ग भी है।


अनावश्यक आवेश (Kahani)

अनावश्यक आवेश एवं विशेष व्यक्ति को संत्रस्त करना अंततः दुःख पहुँचाता है।

एक साँप को बहुत गुस्सा आया। उसने फन फैलाकर गरजना और फुफकारना शुरू किया और कहा - ‘मेरे जितने भी शत्रु हैं, आज उन्हें खाकर ही छोड़ूँगा। उनमें से एक को भी जिन्दा न रहने दूँगा। मेढ़क, चूहे, केंचुए और छोटे - छोटे जानवर उसके उस गुस्से को देखकर डर गए और छिपकर देखने लगे, देखें आखिर होता क्या है ? साँप दिन भर फुसकारता रहा और दुश्मनों पर हमला करने के लिए दिन भी इधर-उधर बेतहाशा भागता रहा।

फुसकारते-फुसकारते उसके गले में दर्द होने लगा। शत्रु तो कोई हाथ आया नहीं, पर कंकड़ - पत्थरों की खरोंचों से उसकी सारी देह जख्मी हो गयी, शाम को चकनाचूर होकर वह एक तरफ जा बैठा।

गुस्सा करने वाला शत्रुओं से पहले अपने को ही नुकसान पहुँचाता है।


निर्भय जीवन ही श्रेष्ठ जीवन

निर्भीकता मानव जीवन की सर्वोपरि संपदा है। इसके अभाव में मनुष्य पग-पग पर डरता और त्रास सहता रहता है। भयग्रस्त रहना एक ऐसी निकृष्ट मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति का आत्मिक बल गिर जाता है। वह उचित और उत्कृष्ट को कहने और करने का साहस खो बैठता है। शारीरिक कष्ट या भौतिक दुष्परिणाम की आशंका से उसकी इंद्रियाँ और काया शिथिल पड़ जाती हैं और वह अनुचित, असत्य एवं अन्याय के समक्ष घुटने टेक देता है।

आज प्रायः प्रत्येक व्यक्ति, समाज, सरकार और सम्पूर्ण विश्व भयग्रस्त है। व्यक्ति को चोरी, ठगी, बीमारी, अपमान, असफलता, असहयोग, विश्वासघात आदि का भय है, तो समाज को दंगों, भुखमरी, महंगाई, अभाव आदि का भय है। सरकारें आँदोलन, अराजकता और उपदस्थता से डरती हैं और समूचा विश्व गृह युद्ध, शीत युद्ध, परमाणु युद्ध और और सर्वनाश से भयभीत है। इस भय का मुख्य कारण उस शारीरिक,मानसिक, भौतिक, नैतिक, सामाजिक या राजनीतिक स्थिति की कल्पना है जो हमारी आशाओं और आकाँक्षाओं के विपरीत है। न चाहते हुए भी जिसके घटित हो जाने की आशंका है। मूर्धन्य मनीषियों ने इस आशंका के निम्नलिखित कारण बताये है।

कर्तव्य में आस्था का न होना तथा आदर्श कर्तृत्व का अभाव।

संसार के अटल नियमों की या तो जानकारी न होना या जानकारी होते हुए भी उनमें दृढ़ विश्वास और आस्था का अभाव।

भौतिक पदार्थों में सुख की अनुभूति और उनके वियोग में दुःख का भाव।

ईश्वर की न्याय, व्यवस्था तथा दयालुता में अविश्वास।

यदि मनुष्य अपने कर्तव्य को सुख दुःख, हानि लाभ, यश अपयश आदि को समान समझकर केवल कर्तव्य के लिए पालन नहीं करता, तो उसे हानि, दुःख, अपयश का भय लगा ही रहेगा। झूठ बोलने ,चोरी करने, हिंसा करने , रिश्वत लेने जैसे अपराध करने या कर्तव्य पालन में उदासीनता बरतने पर सभी को दंडित होने या अपमानित किये जाने का भय सताता रहता है। इसी तरह अस्वच्छ रहने , अखाद्य वस्तुओं का सेवन करने , अनियमितता और असंयम बरतने , शारीरिक श्रम न करने , मन में निकृष्ट विचार आने देने से शारीरिक मानसिक मशीनरी के विषाक्त हो जाने या जंग लगकर खराब हो जाने का डर बना रहेगा। भय के यह सभी कारण ऐसे है जिन्हें हम स्वयं उत्पन्न करते है और मकड़ी के जाल की तरह उसमें कैद होकर रह जाते है।

शास्त्रकारों ने संसार के पाँच अटल नियम बताये है।

भौतिक जगत में निरंतर परिवर्तन के फलस्वरूप जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म , सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख , लाभ के बाद हानि के पश्चात् लाभ, विजय के बाद पराजय और पराजय के पश्चात् विजय , यश के बाद अपयश और अपयश के बाद यश अमीरी के बाद गरीबी और गरीबी के बाद अमीरी इस प्रकार वृत्ताकार घूमते है जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद होता हैं। जिसे जीवन सुख, लाभ, विजय, यश, धन आदि में आसक्ति रहती है उसे मृत्यु दुःख, हानि, पराजय, अपयश और निर्धनता का भी भय लगा रहेगा।

केवल आत्मा या विश्व की संचालक शक्ति ही अजर, अमर और अपरिवर्तनशील है। आत्मा में स्थित हो जाने पर भय नहीं रहता।

उत्पत्ति , पालन और प्रलय, जन्म, जीवन और मृत्यु संसार का नियम है इस नियम को न जानने के कारण मृत्यु का भय लगा रहता है और यह सताता रहता है।

संसार के सारे काम सहयोग, प्रेम, सद्भावना, विश्वास, ईमानदारी से चलते है। इनके विपरीत आचरण से हमें भय लगता है।

जैसा कर्म किया जाता है उसी के अनुसार फल मिलता है। जैसा बीज बोते हैं वैसा पौधा उगता है। बुरा कार्य करने वाले को बुरा फल मिलने-दुष्परिणाम भुगतने का भय सताता रहता है। वेदों में कहा गया है कि यद्यपि भौतिक पदार्थों में वास्तविक सुख नहीं है, फिर भी यदि मनुष्य सुख का साधन समझकर उनका संग्रह करता है तो उनके विग्रह पर उसे दुःख का भय बना रहना स्वाभाविक है। सभी जानते हैं कि रोगी की स्वादिष्ट- भोजन भी कड़ुवा लगता है। चर्म रोगी को बहुमूल्य वस्त्र भी चुभते है। बिना परिवार के व्यक्ति को शानदार मकान भी काट खाने को दौड़ता है और असाध्य रोगी के लिए अतुल संपदा व्यर्थ है। परंतु इनके वियोग का भय प्रायः सभी को सताता रहता है। इस सृष्टि का एक मात्र संचालक ईश्वर हैं। संपूर्ण विश्व ब्रह्मांड उसके नियोजन और नियमों के अनुसार चलता है। जो भी व्यक्ति उसके सहारे अच्छा काम करता है, वह प्रगति पथ पर आगे ही बढ़ता है। संयोगवश यदि मार्ग में संकट पड़ भी जाते है तो वह दया करके उसे संकट से निकालता है और यदि वह नहीं भी निकालता तो भी उसमें हमारा और विश्व का कल्याण निहित रहता है। यदि हमें ईश्वर की दयालुता में विश्वास नहीं है तो कोई भी कठिन काम प्रारंभ करने और उसे पूरा करने में असफलता का भय बना रहेगा। भय के उपर्युक्त का कारणों को दूर कर दिया जाय तो प्रत्येक मनुष्य में निर्भीकता का दिव्य गुण आ जाएगा। यह निर्भीकता तीन प्रकार से आती है-(1) विज्ञ निर्भीकता (2) विवेक निर्भीकता (3)ईश्वर निष्ठ निर्भीकता विज्ञ निर्भीकता- जीवन में अनेकों कठिनाइयाँ और खतरे आते है, जिनसे मनुष्य को भय लगता है। यदि वह उन कठिनाइयों और खतरों के समाधान का मार्ग जान लेता तो वह उनकी ओर से निर्भीक हो जाता है। एक विद्यार्थी परीक्षा देने जाता है। असफलता से उसे भय लगता है, परंतु यदि उसने पाठ्यक्रम संबंधी प्रश्नों के उत्तर तैयार कर लिए है तो उसे भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। वस्तुतः मनुष्य में अनंत शक्तियों का भाँडागार भरा पड़ा है। जब वह संकल्पबद्ध हो सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है, तो पर्वत जैसी ऊँची बाधायें भी अपने बीच में से मार्ग देने के लिए बाध्य हो जाती है। अतः निर्भीकता लाने के लिए हमें मार्ग में आ सकते वाली बाधाओं और कठिनाइयों से जूझने के लिए तैयार रहता चाहिए। भरत के स्वतंत्रता संग्राम में करोड़ों नर नारी निर्भीक होकर जेलों में गये और अनेक प्रकार की यातनायें हँसते-हँसते सही। प्रचंड मनोबल बने रहने पर ही सफलता हाथ लगती है। विवेक निर्भीकता -जो विवेक से काम लेते हैं, सत्- असत् को जानते हैं और मन तथा बुद्धि को सन्तुलित रखते हैं, उनमें इतना आत्मविश्वास विकसित हो जाता हैं कि फिर उन्हें किसी प्रतिकूल परिस्थिति से भय नहीं लगता। भय की उत्पत्ति विवेक -हीनता से होती है कथा सरित्सागर में कहा गया है “निर्विमर्शा हि भरवः।” अर्थात् भय से भीत होने वाले अविवेकवान हुआ करते हैं।

ईश्वर निर्भीकता - जिस व्यक्ति को ईश्वर की सर्वव्यापकता, सर्वशक्ति संपन्नता, दया और न्याय पर पूर्ण विश्वास है। जो प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का स्वरूप देखता है, जो सृष्टि को ईश्वर की अभिव्यक्ति मानता है भय उसके पास तक नहीं फटकता। भक्त प्रहलाद को भगवान पर, मीरा को अपने गिरधर गोपाल पर पूर्ण विश्वास था। उन्होंने अडिग होकर हँसते-हँसते अनेकों यातनायें सहीं, पर भय उन्हें छू तक न सका।

मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए निर्भीकता परम आवश्यक है। इसलिए श्री भगवद्गीता में दैवी संपदा लक्षणों में निर्भीकता को पहला स्थान दिया गया है। यदि संसार के इतिहास को देखा जाय तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचाना पड़ेगा कि विश्व के सभी महापुरुष निर्भीक, निडर और साहसी थे। वास्तव में निर्भीकता उनकी महानता उनकी महानता का मापदंड और उनकी सफलता का रहस्य रहा है। महात्मा गाँधी विश्व की बड़ी से बड़ी शक्ति से नहीं डरते थे। उन्होंने डटकर उस सरकार का विरोध किया जिससे साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था और पराजित भी किया।

निर्भयता व्यक्ति और समाज के लिए सबसे बड़ी सम्पत्ति हैं। इसके बिना कोई व्यक्ति या राष्ट्र महान नहीं बन सकता। सचमुच वह राष्ट्र महान है जहाँ निर्भीक लोग बसते हैं। भौतिक संपदा उसी समय सार्थक होती है जब वह निर्भीक लोगों के पास रहती है। निर्भयता से मनुष्य को इतना बल मिलता है कि वह बड़े से बड़ा त्याग कर सकता है और कठिन से कठिन परिस्थितियों का भी सामना करने में समक्ष हो सकता है।


बूढ़ा लोभी (Kahani)

जो संस्कार जीवन भर हावी रहते हैं वे अंत तक पीछा नहीं छोड़ते।

एक बूढ़ा बीमार पड़ा। जमीन भर लोभ में बीता था। अपनी दवा पर भी ठीक से खर्च न करदे। कमजोरी बढ़ती गयी। उसी स्थिति में उसने देखा आँगन में बछड़ा झाडू चबा रहा है। उसका मन बड़ा दुखी हुआ। मेरी कमाई इस तरह बरबाद जा रही है। बोलने का प्रयास किया पर कमजोरी में स्पष्ट शब्द नहीं निकल सके।

लड़कों ने समझा शायद भगवान् का नाम ले रहे हैं। दूसरे ने सोचा शायद अपनी गुप्त संपत्ति के बारे में अंत समय में बतलाना चाहते हैं। उन्होंने चिकित्सक को बुलाकर कहा- “कुछ भी खर्च हो, ऐसा प्रयास करके कि इनके कुछ शब्द सुनाई दे जायें।”

कीमती दवाओं का प्रयोग किया गया। दवाओं का मूल्य और फीस मिलाकर हजार के लगभग खर्च हो गये। दवाओं ने सारी शक्ति इकट्ठी कर दी। सुनाई दिया, बछड़ा, झाडू, बछड़ा, झाडू यही में दुहराते हुए प्राण छूट गये।


आत्मिक प्रगति को सरल बनाती है, संयम साधना

ऋषियों, मुनियों, विरक्तों, की तपश्चर्या कष्ट साध्य होती है। उसमें कितनी ही तितिक्षाएं करनी पड़ती है। एकाँत में रहने, विरक्त बनने, मन मारने, ब्रह्मचर्य साधने, शरीर को अनेक प्रकार के कष्ट देने जैसे कृत्यों में एक निष्ठ भाव से दीर्घ काल तक संलग्न रहना पड़ता है। लंबे व्रत, उपवास करने, इच्छाओं को दमन करने के लिए कष्ट साध्य क्रिया कलाप अपनाना पड़ता है जो किन्हीं बिरलों के लिए ही संभव है। साथ ही एक कठिनाई और भी है कि यदि व्रत खंडित हो चले तो उलटे हानि कारक परिणाम भी हो सकते हैं। लेने के देने पड़ सकते हैं। लंबी छलाँग लगाने वाले कभी चूक जाते हैं, तो टाँग टूटने जैसे कष्टदायक जोखिम भी उठानी पड़ती है।

सरल मार्ग तलाश करना सदा सुविधा जनक रहता है। धीमी चाल से चलने में समय तो अधिक लग जाता है पर साथ ही यह सुविधा भी है कि दौड़ने वालोँ की तरह बेचैनी का, उतावली का, सामना भी नहीं करना पड़ता और पिछड़ जाने पर उपहास का पात्र भी नहीं बनना पड़ता मनोबल भी नहीं टूटता। भविष्य में चलने रहने की हिम्मत भी बनी रहती है साथ ही गतिशीलता छोड़ बैठने के आवश्यकता भी नहीं पड़ती।

तप का सर्व सुलभ रूप है - संयम। छुट्टल मन की निर्बाध रूप से किसी भी दिशा में दौड़ चलने की आदत अधिकतर उच्छृंखलता के रूप में देखी जाती है। मर्यादाओं और वर्जनाओं को तोड़ते रहने की कुटेव जब परिपक्व हो जाती है तो फिर नशेबाजी की तरह उससे पीछा छुड़ाना कठिन पड़ता है, विषबेल को फैलने से पहले ही उसे दबोच लेने में उन कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता जो गहरी जड़ जमा लेने पर निर्मूल करने में कठोर प्रयास करना होता है। असंयम एक प्रकार की अनुशासन हीनता है जिसे आरंभ में ही नियंत्रित किया जाना चाहिए। गीली लकड़ी को झुकाया जा सकता है। पर पक जाने या सूख जाने पर तो वह टूटने ही लगती है। गीली मिट्टी के बरतन बनते हैं। सूख जाने पर तो उसकी कठोरता बेकार ही हो जाती है। तब उसे किसी साँचे में ढालना संभव नहीं रहता।

जिन्हें सरल स्वाभाविक जीवन यापन करते हुए तप साधना के लाभों से लाभान्वित होना है, उन्हें सर्वतोमुखी संयम साधना अपनाने के लिए तत्पर होना चाहिए। उस पर संकल्प-पूर्वक निष्ठ भी जमी चाहिए।

इंद्रिय निग्रह में व्रत और उपवास का दर्जा ऊँचा है। उपवास का अर्थ किसी दिन साधारण भोजन का क्रम बदल देना भर नहीं है वरन् यह भी है कि पेट को अपना उलझा हुआ काम सुलझा लेने के लिए एक दिन की छुट्टी देना। अच्छा हो यह दिन केवल जल लेकर बिताया जाय। न बन पड़े तो दूध, छाछ, रस जैसी प्रवाही वस्तुएं सीमित मात्रा में लेकर 24 घंटे का उपवास पूरा किया जाय। जिव्हा की लोलुपता और जल्दबाजी मिलकर निगलने में जल्दबाजी दिखाती है। उस कार्य को बेगार समझ कर जैसे - तैसे निबटाने की कोशिश करते है। यह नहीं होना चाहिए कि आधा भोजन पेट में पचता है और आधा मुंह के लार व स्रावों से। इसलिए ग्रास को मुँह में देर तक रखा जाना चाहिए दाँतों का काम भोजन को चक्की की तरह पीस कर बारीक करना है। साथ ही आहार के स्वाद का आनंद लेना भी। भोजन सात्विक, हरा, सजीव और शाकाहार वर्ग का होना चाहिए, उसमें मिर्च मसाले, शक्कर, चिकनाई, की भरमार न हो। इस प्रकार भूख से कम मात्रा में नियम समय पर किया गया आहार जीवन दाता कहा जाता ह। इन मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए आहार नियमन का व्रत पाला जाता रहे तो शरीर स्वस्थ और दीर्घ जीवी बना रह सकता है। साथ ही उसकी अधिक मात्रा खर्चने बनाने में ढेरों समय खराब करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। “जैसी खाएँ अन्न वैसा बने मन।” की उक्ति शत प्रतिशत सही है यदि आहार में नशों का मिष्ठान्न, पकवानों का, आचार मुरब्बों का समावेश रहेगा तो उससे न केवल शरीर पर वरन् मन पर भी प्रभाव पड़ेगा। अखाद्य खाने वालों की मानसिक चंचलता बढ़ी-चढ़ी रहती है। वे किसी महत्वपूर्ण कार्य पर मन टिका ही नहीं पाते। वे सिर पैर की रंगीली उड़ाने उड़ते रहने में बहुमूल्य मानसिक शक्तियों का अपव्यय ही होता है, उस चेतन ऊर्जा का सदुपयोग बन पड़ने पर जो प्रयोजन सिद्ध हो सकते है, उन पर सदुपयोग ही नहीं बनता। शरीरगत क्रिया कलापों की नियमित दिन चर्या होनी चाहिए। समय विभाजन करने और फिर उसके निर्वाह पर पूरा ध्यान देना, जीवन संपदा की सुव्यवस्था है। जो उसे स्वभाव की अंग बनाएं रहते हैं वे अधिक उपयोगी कार्य अधिक मात्रा में कर पाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जो खाया गया है उसका आधा चौथाई की शरीर में लग पता है। बाकी सब निरर्थक चला जाता है। उल्टे कब्ज उत्पन्न करके अंग-प्रत्यंगों में विषाक्तता बढ़ाता है।

आहार की ही तरह इंद्रिय संयम में ब्रह्मचर्य को प्रधानता दी गयी है। कामुकता को एक प्रकार की विकृति माना गया हे। शारीरिक उत्तेजना तो गर्भधारण की आवश्यकता के लिए ही यदा-कदा उभरती है। खाली दिमाग पर शैतान छाया रहता है। यह कहावत प्रधानतया कामुक विचारों के संबंध में ही लागू होती है। देखा जाता है कि अश्लील चित्रण एवं क्रिया कलाप ठाली बैठने वालों के सिर पर चढ़ रहता है और उसका आकर्षण चिंतन को किन्हीं महत्वपूर्ण प्रयोजनों में लगने से रोके रहता है। वैज्ञानिक, विद्वान, मनीषी, बुद्धिजीवी, कलाकार, साहित्यकार, अपने मन को साधने की कुशलता में निष्णात् होते हैं वे मस्तिष्क में बंदर जैसी उछल - कूद नहीं मचने देते। जिस कार्य को उपयोगी एवं आवश्यक मानते हैं उसी में एकात्म भाव से तन्मयता, स्थापित करते हैं, उथले मन से, सरसरी नजर से जिन भी विकारों को आते देखते हैं, तुरन्त उन पर नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं।

बिखराव का एकीकरण करना कितना चमत्कारी है इसे सभी जानते हैं। तिनकों से रस्से बटे जाते हैं और धागे मिलकर कपड़ा बनाते हैं। भव्य भवन बिखरी ईंटों की एकत्रित करके ही बनाए जाते हैं। विचारों को संबंध में भी यही बात है। जो विद्यार्थी एकाग्र भाव से रुचि पूर्वक पढ़ते हैं वे अच्छे डिवीजन में उत्तीर्ण होते हैं। प्रतिस्पर्धाओं में इसी प्रकार की मनोभूमि वाले सफल होते हैं। आर्चीटेक्ट, इंजीनियर, साहित्यकार, वैज्ञानिक आदि की सफलताओं का श्रेय उनकी एकाग्रता पर ही निर्भर रहता है। बया पक्षी इसी आधार पर सुँदर घोंसला बनाता है। इंद्रिय संयम, की ही तरह विचार संयम भी एक प्रकार की साधना तपश्चर्या है। जिसे साधारण मनुष्य भी जागरुकता अपनाकर अपने अभ्यास में उतार सकता है और अभीष्ट दिशा में उत्साह वर्धक सफलता प्राप्त कर सकता है। मन की एकाग्रता उन्हीं से सधती हैं जो अपने समय को साध लेते हैं। अर्थात् दिनचर्या बनाकर समय के श्रेष्ठतम विभाजन की योजना बनाते हैं। समय का एक क्षण भी बर्बाद नहीं होने देते। आलस्य - प्रमाद से बचते और साहसिकतापूर्वक समय को, जीवन-संपदा को बहुमूल्य समझकर उसके छोटे से छोटे घटक को भी सुव्यवस्थित रूप से प्रयोग में लगाते रहते हैं।

इन्हीं सतर्कताओं में ईमानदारी का श्रम-सिक्त उपार्जन भी सम्मिलित है और उस के उपयोग में औसत नागरिक के निर्वाह स्तर के साथ तुलना करते रहना भी। जो कमाया जाय, वह असीम हो यह आवश्यक नहीं श्रम-पूर्वक ईमानदारी से थोड़ा की कमाया जा सकता है। उतने से ही संतोष करना हो और प्रसन्न रहना हो तो उसका एक उपाय है कि खर्च करते समय इस बात का ध्यान रखा जाय कि उसमें कहीं अपव्यय को स्थान तो नहीं मिल रहा है। आम तौर से लोगों को अपना बड़प्पन जताने के लिए कपड़ों की, जेवरों की श्रृंगार प्रसाधनों की ठाट बाट के प्रदर्शनों की आवश्यकता पड़ती है व इसके लिए ढेरों पैसा और समय बर्बाद करना पड़ता है। सोचा यह जाता है कि इस आधार पर अमीरी की छाप छोड़ी जा सकेगी। बड़प्पन प्रकट किया जा सकेगा। किन्तु होता ठीक उलटा है। अपनी और दूसरों की आँख में बचकाना, ओछा, मनचला और घटिया समझे जाने का ही उपहार मिलता है। यह न हो व अर्थ संयम भी सभी संयमों की तरह सध सके तो व्यक्तित्व विकास की क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न होती रह सकती है।


अनाथ (Kahani)

मगध देश के राजा श्रोणिक के राज्य में मुणिकुक्षि नामक उपवन में एक युवा मुनित तप में संलग्न थे। उनका नव यौवन, सौंदर्य से भरा-पूरा था। राजा ने उनके संबंध में सुना तो दर्शन निमित्त पहुंचें। उनकी काँति देख कर वे बहुत प्रभावित हुए। बोले - “आप राजभवन के निकट चलें, वहाँ मैं आपके लिए सारी सुविधाएँ प्रस्तुत कर दूँगा।” साथ ही उनने यह भी पूछा-कि जीवन के आरम्भिक चरणों में ही आपने क्यों वैराग्य ले लिया ?

मुनि ने उत्तर दिया “राजन् ! मैं अनाथ हूँ, इसलिए धर्म को सर्व समर्थ जानकर उसकी शरण में आया हूँ। फिर आप भी तो अनाथ हैं, मेरी क्या सहायता कर सकेंगे ?

इस अनाथ शब्द ने उन्हें असमंजस में डाल दिया। समाधान करते हुए मुनि बोले - “मैं कौशांबी नगरश्रेष्ठी पुत्र हूँ। किशोरावस्था में नेत्रों में भयंकर पीड़ा उठी। परिवार ने सेवा की ओर चिकित्सा पर विपुल खर्च कराया पर किसी से भी लाभ न हुआ और नेत्र ज्योति चली गई।तब मन में विचार आया कि इस संसार में सहानुभूति प्रकट करने वाले कितने ही क्यों न हों। व्यथाओं से बचाने वाला तो एक मात्र धर्म ही हो सकता है। सो मैं उसी शाश्वत की शरण में आया हूँ। मेरी ही तरह आप भी अनाथ ही हैं। राजा ने वस्तुस्थिति को जान लिया और वे भी मुनि होकर उनकी सहायता करने लगें।”


वार्धक्य को गरिमा युक्त बनाया जा सकता है

वृद्धावस्था की परेशानियों को देख-रेख कर मनुष्य का ऐसा विश्वास हो चला है कि वह एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई समाधान, कोई औषधि हैं नहीं। सामान्य जीवन में जैसे की केशों पर सफेद रंग चढ़ने लगा,चेहरे पर त्वचा सिकुड़ने लगी निराशा और भय की लहर रह-रह कर कौंधने लगती है। किंतु विज्ञ जनों के अनुभव ऐसी कष्टकारक है नहीं केवल जीवन को आधे मूल्यों पर स्थापित कर देने के कारण ही यह दुरावस्था चुनौती बनकर आई है अन्यथा सही तरीके से जीवन को ढाला जाय तो बुढ़ापा मनुष्य के अस्तित्व का शृंगार करने में समर्थ है। चिंतन-चरित्र में चमक पैदा करने की स्वर्णिम स्थिति है। अगर उसे यों ही तृष्णा और निराशा से भरे क्षणों में व्यतीत किया जाता है तब तो यह निश्चित रूप से रोग और शोक का युग्म ही बन जाता है। मानसिकता पथभ्रष्ट हो जाती है। विशेष रूप से इस अवस्था में वाइटल एनर्जी का भारी मात्रा में क्षरण होता है।

इन दिनों की परिस्थितियों में बुढ़ापा बोझ जैसा बन गया है। अनेक रोगों की उत्पत्ति और उनके कसते शिकंजों से मन पर भय का अवतरण सा छाया रहता है। कर्मेंद्रियां और ज्ञानेन्द्रियाँ भी अपनी क्षमता में ह्रास अनुभव करने लगती हैं। प्रायः लोग खीज और दुःख से भरे दिखाई देते हैं लगता है इसी दुरावस्था को देखकर ही दार्शनिक शोपेनहावर ने कहा है कि “मनुष्य के लिए सबसे अच्छी बात तो यही हो सकती थी कि वह यहाँ जन्म ही न लेता और दूसरी सर्वोत्तम बात यौवन में ही मरण हैं।”

मनुष्य प्राणि जगत में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं और सामर्थ्य भी अधिक रखता हैं। सबसे अधिक साधन और सुविधाएँ प्रकृति ने उसे ही प्रदान किये हैं। किंतु मनुष्य के लिए इससे बड़े दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती हैं कि सब कुछ के रहते हुए भी दीन हीन अवस्था में अत्यन्त विवशता के साथ जीवन यापन करना पड़ता है। जीवन का वास्तविक सुख लेने की कला सीखी ही नहीं। जरावस्था तो हर प्राणि को अपने प्रभाव में लेती हैं। पर मनुष्य जैसी अवस्था में और किसी प्राणि को इस वार्धक्य पीड़ा से तपते हुए नहीं देखा जाता हैं। मनुष्य के लिए यह अवस्था कठोर प्रारब्ध का रूप धारण कर लेती हैं। इसमें त्रुटि किसी और कि नहीं स्वयं अपने आपके क्रियाकलापों और चिंतन वृत की हैं।

आग एक है, जो सर्दी से जीवन की रक्षा करती, भोजन पकाने से लेकर बड़े- बड़े कारखानों को चलाने तक का सारा कार्य अनवरत संपन्न करती चलती हैं किंतु किसी ना समझ के हाथ पहुँचकर एक छोटी सी चिनगारी ही भीषण अग्निकांड का रूप ले लेती हैं। औषधि विज्ञान का समूचा तंत्र उत्पादन से लेकर प्रयोग की विधाओं तक गहरी सूझबूझ की अपेक्षा के साथ पुष्पित पल्लवित होता हैं। आवश्यक क्रियाविधि का कुशलता से निर्वाह किये जाने पर यही औषधियाँ अभीष्ट परिणाम देती हैं और बड़े से बड़े रोगों को आसानी से ठीक करके आरोग्यता प्रदान करती हैं। इन्हीं के निर्माण और प्रयोग में मूर्खता का परिचय देने से प्राणघातक संकट उपस्थित हो जाता हैं जबकि कुशल और भैषज्य विद्या में निष्णात् विष के भी मारक प्रभावों को निरस्त करके जीवन रक्षक औषधियों जैसा लाभ उठाया करते हैं। इन सबके पीछे प्रयोक्ता की सूझबूझ का ही महत्व हैं जिससे शुभ और अशुभ लाभ और हानि, दुःख और हर्ष के प्रतिफल देखने को मिलते हैं।

ये समूची विशेषतायें मनुष्य की अपनी जागरुकता और दूरदर्शी विवेकशीलता से उपजती हैं। प्राकृतिक जीवनचर्या, सहयोग-सहकार की निश्चल प्रवृत्ति, प्रसन्नता, प्रफुल्लता का क्रम अपनाने वाले प्रायः बुढ़ापा भी युवकों जैसा व्यतीत करते हुए देखो जाते हैं। ढलती आयु में असाधारण उत्साह से परिपूरित देखे जाते हैं। ग्रेट ब्रिटेन के प्रधान मंत्री कहा करते थे “जवानी खिला हुआ फूल है तो बुढ़ापा पका हुआ मधुर फल।” एक रंगों की चित्र-विचित्रता का समूह दूसरा रस और गुणों का पुंज। दोनों की अपनी विशेषतायें हैं। ऐसा ही उनका उत्कृष्ट चिंतन और कार्यशैली थी जिसे चलते 60 वर्ष की आय में भी बच्चों जैसी निश्चिंतता और युवकों जैसी क्रियाशीलता में रत्तीभर भी गिरावट नहीं आई। मृत्यु पर्यंत शासन को अपनी सूझबूझ द्वारा परामर्श देते रहे।

वृद्धों के जीवन की समस्यायें अनेक प्रकार की गिनाई जाती हैं। शारीरिक अवयवों की क्षीणता, जिम्मेदारियों से छुटकारा पाने के बाद आया मानसिक सूनापन, ये दो प्रमुख कारण हैं जिनसे और तरीके की भी छोड़ी-बड़ी समस्याएं जन्मती है और क्लेश को दिनोंदिन बढ़ाती ह। इन्हीं पर सूझबूझ के साथ अंकुश लगाने का प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया जाय तो दुःखद परिस्थितियों से सुगमतापूर्वक बचाव हो जाता है इसमें संदेह बिल्कुल नहीं हैं।

जर्मनी के प्रसिद्ध चिकित्सक क्रिस्टोफ विल्हेल्स ह्याफलैंड ने वृद्धों की समस्याओं पर गहराई से अध्ययन किया था। उनने जो निष्कर्ष निकाले वे सार संक्षेप में यही हैं कि भावनात्मक आदतें ही बुढ़ापा की अशक्तता का आधार हैं। नौकरी में थे। बड़ी तनख्वाह बड़ा मान था। ढेरों नौकर चाकर मातहत कर्मचारी हुक्म बजाया करते थे। पत्नी, बच्चों, से जुड़ा सारा परिवार हमारा मुँह देखता था। आज इन सब से दूर किसी काम के रहे नहीं। कोई बात नहीं पूछता। क्या करूं कहाँ जाऊँ। इन्हीं सब ऊहापोहों में कुढ़ते रहने से जीवन का सारा सुख चैन छिन जाता है। वास्तव में इस प्रकार का चिंतन तो युवा अवस्था की उमंगों के लिए भी घातक की होता है। व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक अहंकारी बना देता है। अधिकार में बहुत सुख है पर कर्तव्य की महानता और उससे मिलने वाली शाँति की बराबरी कभी नहीं कर सकता। जैसे-जैसे अधिकार क्षेत्र की सीमा का ह्रास होने लगे उसी क्रम से कर्तव्य का क्षेत्र का फैलाते चलने पर इस तरह की दिक्कतें स्वयमेव दूर हो जाती हैं। उपासना, साधना, स्वाध्याय के सतत् अभ्यास और उसके अनुसार कार्यक्षेत्र में उतरने पर सफल और स्निग्ध जीवन की सुवास मिलने लगती हैं।

डॉ0 एच॰ डब्ल्यू हेर्गड ने तो वृद्धावस्था की अनेक कठिनाइयों का कारण काहिल-आलस्य बताया है। परिश्रम - शीलता के अभाव में शरीर की नस-नाड़ियाँ अपने अंदर संचित मलों को निकाल नहीं पाती। उससे भीतर ही भीतर अवयवों को क्षीण और बेकार बना देती हैं। भोजन ठीक से नहीं पचता, और न उससे पर्याप्त मात्रा में जीवन रस ही तैयार हो पाते हैं। कमजोर अवस्था में रोगों के आक्रमण होने लगते हैं। इनसे बचाव बचाव के लिए प्रारम्भ से ही यह मानकर चलना चाहिए कि संसार में आज तक कोई औषधि उपलब्ध नहीं जिसके द्वारा बुढ़ापे को टाला जा सके। सुयोगों की भी स्थिति बिना आधार के आकाश में लटकी नहीं होती है। इसके पीछे भी विगत जन्मों के या इस जन्म के पराक्रम पुरुषार्थ से संग्रहित पुण्य ही होते हैं। जिसने प्रीव से च्यवन को अश्विनीकुमारों का राजा ययाति को उनके पुत्र का अप्रतिम सहयोग मिल पाता है। प्रमादी तो सर्वत्र उपेक्षित ही होते हैं। इसलिए आलस्य और प्रमाद से वृद्धावस्था को बचाये रखने की हर संभव कोशिश ही सारगर्भित है। इसी से हँसती - हँसाती जिन्दगी का अनुपम अनुदान बरसाया जा सकता है। रोग-शोक जरा मृत्यु का भी गरिमायुक्त बनाया जा सकता है।

वृद्ध शब्द का अर्थ ही हैं वर्धनशील- विकासशील। महाभारत कहता हैं कि केवल आयु के बढ़ जाने से ही कोई वृद्ध नहीं हो जाता है। सेमल के फल की गाँठ बढ़ने पर भी सारहीन होने के कारण व्यर्थ है। छोटा और दुबला पतला वृक्ष भी यदि फलों के भार से लदा हैं तो उसे ही वृद्ध जानना चाहिए। इसका अर्थ यह हैं कि मनुष्य को अपने भीतर सद्गुणों के अभिवर्द्धन का अनवरत प्रयत्न करना चाहिए। ज्ञान और शक्ति के सतत् अभ्यास द्वारा बढ़ाने का ही प्रतिफल और अभिलाषा हैं जिसके चलते कठोपनिषद् का नचिकेता मृत्यु द्वारा दिये गये समस्त प्रलोभनों को ठुकरा देता हैं और सच्चे जीवन का वरदान माँगता हैं। सामान्य लोगों की सड़ी- गली जिन्दगी से वह पहले से ही सावधान हैं। तभी तो सुखप्रद जीवन का रास्ता चुनता हैं। जेनोफन के हर्क्यूलीज कथानक भी कुछ ऐसा ही अर्थ देता हैं। प्रेय और सुकृति अनेक प्रकार के सम्मोहनों के साथ दो कुमारियों के रूप में उपस्थित होते हैं। वहाँ पर हर्क्यूलीज ने भी दूरदर्शिता का ही परिचय दिया और प्रेय को छोड़कर सुवृत्ति को चुन लिया। जरा और मृत्यु के दुःखों और प्रताड़नाओं से छुटकारा पाने के लिए एक मात्र तरीका यही हैं कि मनुष्य जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझा जाय और प्रयत्न प्रारम्भ किया जाय। तब मनुष्य अजरा नदी को पार कर जायेगा और फिर बुढ़ापे के कष्टों को भोगने की स्थिति बनेगी ही नहीं। इसी बात को कौषीतकी उपनिषद् इस रूप में कहती है “विजराँ वायं नदीं प्रापत्, न वाऽयं जिगीष्यतीत।”

इस प्रकार देखते हैं कि योग्यता प्रतिभा एवं अनुभवों की दृष्टि से आयु का उत्तरार्ध बहुत महत्वपूर्ण है पर यही व्यर्थ की कुशंकाओं और भ्रांतियों में ही व्यतीत हो जाता हैं। आयु के अनुरूप अवयवों में अन्यान्य चिन्ह दिखाई देने लगते हैं। पर ये अशक्तता असमर्थता के संकेत नहीं है बल्कि आयु के अनुरूप क्रियाशीलता में परिवर्तन लाने के हैं। अब तक का जीवन पारिवारिक जीवन को सुखप्रद बनाने में व्यतीत हुआ हैं तो आगे का शेष समय आत्मनिर्माण लोक संग्रह जैसे उत्तमोत्तम कार्यों में सुनियोजित काने की बात सोची जाय। “मरने के लिए जीवन धारण करना उपयुक्त नहीं। मनुष्य की शोभा जीवन के लिए मरने में है।” छाँदोग्य उपनिषद् का यह सार वाक्य जिस दिन से जीवन अंग बन जायगा जरा और जीर्णता का दुःख मूलक प्रभाव स्वयमेव मिटता चला जायगा।


विपत्ति भी एक वरदान

“भगवन्। इस जीव का भाग्य विधान? “कभी-कभी जीवों के कर्म संस्कार ऐसे जटिल होते हैं कि उनके भाग्य का निर्णय करना चित्रगुप्त के लिए भी कठिन हो जाता है। अब वही जीव मृत्युलोक से आया है। इतने उलझन भरे इसके कर्म हैं - नरक में, स्वर्ग, में अथवा किसी योनि विशेष में कहां इसे भेजा जाय, समझ में नहीं आता। देह त्याग के समय की इसकी अंतिम वासना भी (जो कि आगामी प्रारब्ध की मूल निर्णायिका होती है) कोई सहायता नहीं देती। वह वासना भी केवल देह की स्मृति - देह रखने की इच्छा है। ऐसी अवस्था आने पर चित्रगुप्त के पास एक ही उपाय है, वे अपने स्वामी के सम्मुख उपस्थित हों।”

धर्मराज कभी नहीं समझ सके कि जीव का जो कर्म विधान उनको इतना जटिल लगता है, धर्मराज कैसे उसका निर्णय बिना एक क्षण सोचे कर देते हैं। यम एक मुख्य भागवाताचार्य हैं और भक्ति का -भक्ति के अधिष्ठाता का रहस्य जाने बिना कर्म का धर्म-अधर्म का ठीक-ठीक रहस्य ज्ञान नहीं होता। चित्रगुप्त ठहरे कर्म के तत्वज्ञ और कर्म-अकर्म की कसौटी पर ही सब कुछ परखना चाहते हैं। किंतु जब उनकी कसौटी उन्हें उलझन में डाल देती हैं, यमराज कर्म के परम निर्णायक हैं। उनके निर्णय की कहीं अपील नहीं अतः वे बिना हिचके निर्णय कर देते हैं। यह चित्रगुप्त जी के चित का समाधान है, किंतु धर्म के निर्णायक को आवेश में तो निर्णय नहीं करना चाहिए।

“यह अभागा जीव!” यमपुरी के विधायक यमराज के मुख्य सचिव चित्रगुप्त-उन्हें किसी जीव को नरक का आदेश सुनाते किसी ने हिचकते नहीं देखा और आज वे क्षुब्ध हो रहे थे-कैसे सहन करेगा यह इतने दारुण दुःख इतना दुःखदायी विधान, एक असहाय प्राणी के लिए।

“संयमी के मुख्य सचिव प्राणी के सुख-दुःख के दाता कब से हो गये?” चित्रगुप्त चौंक उठे। उन्होंने अपनी चिंता में देखा ही नहीं था कि देवर्षि नारद आ खड़े उनसे कह रहे हैं। उन्होंने प्रणाम किया देवर्षि को।

धर्मराज को सृष्टा ने केवल जाति आयु और भोग निर्णय का अधिकार दिया है। देवर्षि ने अपना प्रश्न दुहराया-”स्थूल शरीर तक ही कर्म अपना प्रभाव प्रकट कर सकते हैं, किंतु देखता हूँ ; धर्मराज के महामंत्री अब जीव के सुख-दुख की सीमा के स्पर्श की स्पर्धा भी करने लगे हैं।”

असंभव तो नहीं है। शरीर की व्यथा प्राणी को देख ही करे आवश्यक नहीं है। देवर्षि ने चित्रगुप्त के सम्मुख पड़ा कर्म विधान सहज उठा लिया।

“स्वयं धर्मराज ने यह विधान किया है।” चित्रगुप्त डरे ! परम दयालु देवर्षि का क्या ठिकाना, कहीं इतना कठोर विधान देखकर वे रुष्ट हो जायँ-उनके शाप को स्वयं स्रष्टा भी व्यर्थ करने में समर्थ नहीं होंगे।

“कुब्ज, कुरूप, बधिर, मूक, शैशव से अनाथ, अनाश्रय, उपेक्षित, उत्पीड़ित, मान भोग वर्जित, नित्य देह पीड़ा ग्रस्त मरुस्थल निर्वासित ........।” देवर्षि के साथ डरते-डरते चित्रगुप्त भी उस जीव के भोग के कोष्ठक में भरे गए विभाग को पुनः पढ़ते जा रहे थे मन ही मन। कहो तो उसमें कुछ सुख-सुविधा मिलने का कोई संयोग सूचित किया गया होता।

“अतिशय दयालु हैं धर्मराज। चित्रगुप्त की आशा के सर्वथा विपरीत देवर्षि के मुख से उल्लास स्वच्छ कर देने की व्यवस्था कर दी उन्होंने। विपत्ति तो वरदान है श्री नारायण का।”

अब भला इसमें कोई क्या कहें और इन्हें ही इतना अवसर कहाँ कि किसी की बात सुनने को रुके रहें। चित्रगुप्त के विधान का पोथ पटका उन्होंने और उनकी वीणा की झंकार दूर होती चली गयी।

एक दिन राजस्थान के एक राज्य में वहाँ के महाराजा की सवारी नगर दर्शन हेतु निकली। यह भी कोई बात है कि उनके सामने रापथ पर कोई कुबड़ा, गूँगा, काला, कुरूप, चाँडाल बालक आ जाय। राजसेवकों ने उसे पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और घसीट कर मरे कुत्ते के समान दूर फेंक दिया।

“कौन था रह ?” महाराज ने पूछा।

“एक चाँडलिनी का पुत्र। मंत्री ने उत्तर दिया। “ इसके अभिभावक इसे रास्ते से दूर क्यों नहीं रखते?” महाराज का क्रोध शाँत नहीं हुआ था।

“इसका कोई अभिभावक नहीं।” कुछ देर लगी पता लगाने में और तक मंत्री ने प्रार्थना की माता-पिता तो इसके बचपन में ही मर गए। अब तो इसी प्रकार भटकता रहता है।

“नगर का अभिशाप है यह।” महाराजा को कौन कहे कि गर्व के शिखर से नीचे आकर आप देखें तो वह भी आपके समान ही सृष्टिकर्ता की कृति है ; किन्तु धन, अधिकार का मद मनुष्य की विवेक दृष्टि नष्ट कर देता है। महाराज ने आदेश दिया “इसे दूर मरुस्थल में निर्वासित कर दिया जाय। राजधानी में ऐसी कुरूपता नहीं रखनी चाहिए।”

छोसा अबोध बालक। वैसे ही वह दर-दर की ठोकर खाता फिरता था। कूड़े के ढेर पर से छिलके उठाकर उदर की ज्वाला शाँत करता था। लोग दुत्कारते थे। बच्चे पत्थर मारते थे। वृक्ष के नीचे भी रात्रि व्यतीत करने का स्थान कठिनता से पता था और अब उसे नगर से भी निर्वासित कर दिया गया। हाथ पैर बाँधकर ऊँट पर लादकर एक राज सेवक उसे मरुभूमि में ले गया और वहाँ उसके हाथ पैर उसने खोल दिये। अंग में लगे घाव पीड़ा करते थे। मरुस्थल की रेत तपती थी और ऊपर से सूर्य अग्नि की वर्षा करते थे। आँधियोँ मरुभूमि में न आयेंगी तो आयेंगी कहाँ ; लेकनिक मृत्यु उस बालक के समीप नहीं आ सकती थी। उसके भाग्य ने उसे दीर्घायु जो दीथ्भ्। कितनी बड़ी विडंबना थी उसकी वह दीर्घायु।

जब प्यास से वह मूर्छित होने के समीप होता , कहीं न कहीं रेत में दबा मतीरा उसे मिल जाता। खेजड़ी की छाया उसे मध्याह्न में झुलस जाने से बचा देती थी। मतीरा ही उसकी क्षुधा भी शाँत करता था। वैसे उसे मरुस्थल के मध्य में एक छोटा जलाशय भी मिल गया था और वहाँ कुछ खजूर वृक्ष भी मिल गए; किंतु खजूर बारहमासी फल तो नहीं हैं।

इस भाग्यहीन बालक का स्वभाव विपत्तियों को भोगते- भोगते विचित्र हो गया था। बचपन में तो वह रोता भी था। पर अब तो जब कष्ट बढ़ता था तो वह उलटे हँसता था प्रसन्न होता था। अनेक बार उसे मरुस्थल के डाकू मिले और उन्होंने उसे जी भर के पीटा। वह उस पीड़ा में भी खूब हँसा। मानो उसे पीड़ा में सुख लेने का स्वभाव मिल गया हो।

वह क्या सोचता होगा ? वह जन्म से मूक और बधिर था। शब्द ज्ञान उसे था नहीं। अतः वह कैसे सोचता होगा , यह समझ में नहीं आता था। लेकिन वह कुछ काम करता था। दिन निकलता देखता तो सूर्य के सम्मुख पृथ्वी पर बार -बार सिर पटकता। आँधी आती तो उसे भी इसी प्रकार प्रणाम करता और कभी आकाश में कोई दस्यु दल आ जाय तो उन लोगों को तथा उनके ऊंटों को भी वह इसी तरह प्रणाम करता था।

दूसरा काम प्रायः प्रतिदिन वह यह करता कि खेजड़ी की एक डाल तोड़ लेता और विभिन्न दिशाओं में दूर-दूर तक एक निश्चित दूरी पर उसके पत्ते टहनियाँ तब तक डालता जाता जब तक मध्याह्न की धूप उसे छाया में बैठने को विवश न कर देती। अनेक बार उसके डाले इन पत्तों के सहारे मरुस्थल में भटके यात्री एवं दस्यु उसके जलाशय तक पहुँचे थे। अनेक बार उन दस्युओं ने उसे पीटा था। बहुत कम बार किसी यात्री ने उसे रोटी का टुकड़ा खाने को दिया। लेकिन उसने खेजड़ी के पत्ते डालने का काम केवल तब बन्द रखा जब वह ज्वर से तपता पड़ा रहता था।

मरुस्थल की आग में एकाकी , दिगंबर , असहाय , भूख , प्यास से संतप्त रहते वर्ष पर वर्ष बीतते गए उसके। बहुत बीमार पड़ा और बार - बार पड़ा , किन्तु मरना नहीं था। इसलिए जीवित रहा। बालक से युवा हुआ और इसी प्रकार वृद्ध हो गया। उसकी देह में हड्डियों और चमड़े के अतिरिक्त और था भी क्या। अनेक बार यात्री उसे प्रेत समझ कर डरे थे।

दुर्भाग्य ही तो मिला था उसे ! एक अकाल का वर्ष आया वह नन्हा जलाशय सूख गया जो वर्षों से उसका आश्रय रहा था। खेजड़ी में पत्तों के स्थान पर काँटे रह गए थे। उसे वह स्थान छोड़कर मरुस्थल में भटकना पड़ा।

अंधड़ से रेत नेत्रों में गिर गयी। प्यास के मारे कंठ सूख गया। गले में काँटे पड़ गये और अंततः वह मूर्छित हो गया।

सहसा आकाश में मेघ प्रकट हुए जो केवल राजस्थान की मरुभूमि में कभी-कभी कुछ शताब्दियों के अंतर से प्रकट होते हैं। बड़ी-बड़ी बूंदों की बौछार ने उसके संतप्त शरीर को शीतल किया। उसने नेत्र खोलने की चेष्टा की ; किन्तु उसमें भर गयी थी। देह में भयंकर ताप था। वह जीवन में पहली बार वेदना से चीखा-मूक की अस्पष्ट चीत्कार उसके कंठ से निकली।

उतंग मेघ उसके लिए तो आये नहीं थे। मरु की राशि में शातियों से समाधिस्थ महर्षि। उतंक उठे थे समाधि से। उनकी तृषा शाँत करने के लिए मेघ आते हैं। महर्षि ने अपने समीप से आयी हैं। महर्षि ने अपने समीप से आयी वह चीत्कार-ध्वनि सुनी और आगे बढ़ आयें।

कृष्ण वर्ण, कुब्ज, श्वेत केश, कंकाल मात्र एक मानवाकार प्राणी रेत में पड़ा था। महर्षि की दृष्टि पड़ी। वे सर्वज्ञ थे। उन्हें कहाँ सूचित करना था कि उनके सम्मुख पड़ा प्राणी बोलने और सुनने में असमर्थ हैं। लेकिन महर्षि का संकल्प तो वाणी की अपेक्षा नहीं करता। उनकी अमृत दृष्टि पड़ी उस सम्मुख के प्राणी पर और फिर वे अपनी साधना भूमि की ओर मुड़ गए और एक दिन पुनः देवर्षि नारद संयमनी पधारें।

“आपके उस अतिशय भाग्यहीन जीव की अब क्या स्थिति हैं?” धर्मराज का सत्कार स्वीकार करके जाते समय देवर्षि ने सहसा चित्रगुप्त से पूछ लिया-”जीवन में भाग्य का भोग उनको कितना दुखी कर सका, यह विवरण तो आपके समीप होगा नहीं।

“आपका अनुग्रह जिसे अभय दे कर्म के फल उसे कैसे उत्पीड़ित कर सकते हैं ?” चित्रगुप्त ने नम्रता पूर्वक बतलाया-”भोग विवर्जित करके सयंमनी के स्वामी ने उन्हें अनेक दोषों से सुरक्षित कर दिया था। आपत्तियों ने उन्हें निष्काम बनाया। विपत्ति का वरदान पाए बिना प्राणी का परित्राण कदाचित ही हो पाता हैं।”

महर्षि उतंग के अनुग्रह ने उनके निष्कलुष वासना रहित चित्त को आलोकित कर दिया। चित्रगुप्त जी ने बताया-”अब हमारे विवरण में केवल इतना ही है कि अपनी मरुराशि में सुरक्षित कर लिया हैं।” जिसके संबंध में श्रुति कहती है - न तस्य प्राणाश्चोत्क्राँमति तन्नैव प्रत्नीयन्ते

उस मुक्तात्मा के संबंध में इससे अधिक विवरण चित्रगुप्त के समीप हो भी कैसे सकता था?


उदासी पालकर क्यों दुनिया को दुखी करते हैं आप ?

दूसरों को स्नेह एवं सेवा से अनुग्रहीत करने पर औरों की अपेक्षा को लाभ अधिक रहता हैं क्योंकि सन्मार्ग पर चलने एवं उदार व्यवहार करने पर जो प्रफुल्लता उपलब्ध होती हैं वह चित्त को प्रसन्न एवं अंतराल को मजबूत बनाये रहती है। इसके विपरित जिन्हें संकीर्ण स्वार्थपरता - जन्य अपहरण और उपभोग ही रुचिकर लगता है वे लिप्सा , लालसा की , वासना , तृष्णा , और अहंता की आँशिक पूर्ति करने पर भी आदर्श विहीन जीवन क्रम अपनाते और अंततः खिन्न और उदास बने रहते हैं।

अंतराल में संघर्ष चलते रहने का प्रधान कारण हैं- आदर्शहीन जीवन - यापन। इससे मनुष्य न केवल अपनी गरिमा गँवाकर भीतर से खोखला होता जाता हैं वरन् उसका व्यक्ति त्व भी ऐसा हो जाता हैं जिसे दिग्भ्राँत ही कह सकते हैं। ऐसों का कोई साथी भी नहीं रह जाता। उदासी और अकेलापन न केवल जीवनी - शक्ति का क्षरण करते हैं , वरन् आत्मिक प्रफुल्लता का भी हनन करते हैं। फलतः अंतर्द्वन्द्व - ग्रस्त मनुष्य अपनी गतिविधियों को देर तक चलाते नहीं रह सकता। उदासी और खीज स्थायी रोग बन जाते हैं। इस नयी व्यथा को दूर करने के लिए सस्ता उपाय नशा प्रतीत होता हैं, सो ऐसे लोग प्रायः नशा पीने लगते हैं। आरम्भ में थोड़ी मात्रा से भी काम चल जाता हैं पर बाद में उनकी मात्रा बढ़ानी पड़ती है। यह बढ़ोत्तरी स्वास्थ्य और संतुलन दोनों की ही जड़े काटती हैं। ऐसी दशा में मनुष्य जाल में फँसे पक्षी की तरह अपने को संकट के जाल में फँसा हुआ देखता है। उदासी उसकी एक आदत बन जाती हैं।

सामान्य जनों से लेकर बड़े - बड़ों को मानसिक उदासी का शिकार बनते देखा गया हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के सबसे बड़े राजनेता विंस्टन चर्चिल इसके शिकार हो गये थे। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को भी यह जीवनपर्यंत पीड़ा देती रही। मनः चिकित्सकों के अनुसार उदासी का प्रमुख कारण व्यक्ति का निषेधात्मक चिंतक है। उदासी का एक स्वरूप तो अल्पकालीन होता है। जिसे ‘ब्ल्यू फीलिंग के रूप में जाना है। प्रायः यह अप्रिय समाचार सुनने पर उत्पन्न होती है। कुछ ही घंटे अथवा दिनों में यह शाँत भी हो जाती है।

दूसरे प्रकार की उदासी में व्यक्ति की भावनायें कुंठित होने लगती है। जिसका एक मात्र कारण आत्म सम्मान के अभाव को समझा गया है। इससे व्यक्ति की शक्ति एवं उल्लास में कमी आती है, साथ ही जीवनपर्यंत निराशा जन्य स्थिति भी बनी रहती है। अल्पकालीन उदासी का संबंध मस्तिष्क से, तो दीर्घकालीन उदासी का भावनाओं से होता है। मनोविज्ञानियों ने अपने एक सर्वेक्षण में बताया है कि वर्तमान समय में विश्व में प्रायः 90 प्रतिशत व्यक्ति विभिन्न मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं जिनमें से 20 प्रतिशत मानसिक उदासी से त्रस्त हैं। सुप्रसिद्ध मनः चिकित्सक अंथोनी स्टोर के अनुसार इस प्रकार के व्यक्तियों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। (1) स्थिर उदासी या मेलेन्कोलिया (2) परिस्थिति विशेष से उत्पन्न उदासी जिसे ‘ पीरियाडिक डिप्रेशन’ भी कहते हैं जो स्थिति में परिवर्तन के साथ समाप्त हो जाती है। (3) ट्राँजिएण्ट डिप्रेशन या अस्थिर उदासी, जो उत्पन्न होती और समाप्त होती रहती है जिसका आवर्तन क्रम अनिश्चित रहता हैँ।

डॉ0 अंथोनी का कहना है कि अस्थायी अवसाद के अवसर प्रायः हर किसी के जीवन में आते-जाते रहते हैं। शारीरिक अस्वस्थता से उत्पन्न पीड़ा मन के सहज उत्साह को कभी-कभी भंग कर देती है। इसी तरह अप्रिय घटनाएँ पर जाने पर भी मन अस्थिर हो जाता है। उद्देश्य में असफलता, प्रिय वस्तुओं का अभाव, अपनों द्वारा की उपेक्षा, अवमानना या अपमान, किसी कार्य या प्रयास में निराशा का हाथ लगना, शोक प्रद घटनाओं का घट जाना आदि अस्थिर उदासी का कारण बनती है। सुखद प्रसंगों के आ उपस्थित होने, ध्यान के बट जाने पर अथवा रुग्णता का उपचार हो जाने पर कुहासा छाया हुआ छट जाता है और नवीन उत्साह संचारित होने लगता है। उनके अनुसार इसी तरह पीरियाडिक डिप्रेशन विषम परिस्थितियों से उत्पन्न भय का परिणाम होता है। अप्रिय या हानिकर परिस्थितियाँ मासिक तनाव उत्पन्न करी हैं और देर तक बने रहने पर अथवा संकट टलने की दूर तक संभावना न दिखने पर इस प्रकार का मनोविकार पर दबोचता है। इसे मन की विजड़ित अवस्था भी कह सकते हैं। जिसमें यथार्थता तो होती नहीं मात्र काल्पनिक भय का भूत ही सिर पर सवार रहता है। उदाहरण के लिए अमुक स्थान , अमुक वस्तु, जलवायु या वातावरण हमें नुकसान पहुंचाएंगे, अनुकूल नहीं पड़ेंगे, यदि यह आशंका किसी के मन में घर कर जाय और सचमुच उसे ऐसे वातावरण में रहना पड़े तो वह भयभीत एवं उद्विग्न रहने लगता है। किंतु उक्त परिवेश को छोड़ते ही उस विपत्ति से छुटकारा मिल जाता है।

संसार को माया मिथ्या, जीवन को क्षणभंगुर आदि कहते, सुनते रहने पर लोग अपने अस्तित्व और कर्तव्य तक की उपेक्षा करने लगते हैं और वैराग्य की आड़ में अपनी उदासी को आध्यात्मिक रंग देते हैं। कई व्यक्ति अकारण ही अपने दुर्भाग्य को अटल मान बैठते हैं। वे विकृति जीवन दृष्टि को ही सत्य मान लेते हैं और अपनी कायरता एवं आत्महीनता को दार्शनिक आवरण में लपेटने का उपक्रम रचते रहते हैं और गहरे उदासी के गर्त में जा गिरते हैं। ऐसे लोगों को एक प्रकार का आत्महंता ही कहा जा सकता है। इस मनः स्थिति में उनका जीवन-रस सुख जाता है, जीवन भार-भूत प्रतीत होता और दुर्भाग्य अटल विधान जैसा होने लगता है। निष्क्रियता और निराशा की अनुभूतियाँ उनकी स्थायी संपदा बन जाती हैं। ऐसे लोगों को एकाँत बहुत भाता है पर यह एकाँत सच्चे अर्थों में एकाँत नहीं होता। उनकी घुटन और कायरता ही कहीं मुँह छिपाने का अवसर ढूँढ़ती रहती है।

इलीनाँय विश्वविद्यालय शिकागो के विख्यात मनः चिकित्सा विज्ञानी डॉ0 ई॰ जी0 कैप्लर का कहना है कि कार्य का अभाव एवं विकृत चिंतन ही इस महाव्याधि का मूल है। सेवा निवृत्ति के पश्चात् अधिकाँश लोगों को इस मनोव्यथा का शिकार बनते देखा जाता है। कार्य के अभाव में शरीर में जंग लगने लगती है। उत्साह विहीन मन में नीरसता छा जाती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति जीर्ण, शीर्ण, निष्क्रिय एवं वृद्ध दिखाई देने लगता है। मृत्यु भी जल्दी ही आ धमकती है। इसके विपरीत व्यस्त रहने एवं मन में उमंग और प्रफुल्लता संजोये रखने वाले स्वस्थ रहते और दीर्घजीवन का आनंद उठाते हैं। उदासी उनके पास फटकती तक नहीं।

जिस प्रकार कार्य का अभाव या निठल्लापन , अकेलापन उत्पन्न करता और अवसादग्रस्त बनाता है, उसी प्रकार पारिवारिक स्नेह का आत्मीयता का अभाव भी इस महा व्याधि का कारण बनता है। ऐसे व्यक्तियों के मित्रों , संबंधियों का कर्त्तव्य है कि उनमें सरसता उत्पन्न करते हेतु सभी संभव प्रयत्न करें। झूठी सहानुभूति दिखाने एवं बात को बतंगड़ बनाने से तो उदासी और व्यथा की जड़े गहरी ही होती जायेंगी। ऐसे लोगों का सच्चा मित्र एवं सहायक वही होता है, जो उत्साह भरे, आशा दिखाये और साहस जगाकर हँसते-हँसाते दिन गुजारने की मनः स्थिति उत्पन्न करें।

महँगी दवाइयाँ भी उदासीनता का स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकती। टानिकों से नहीं मनुष्य स्नेह देकर स्नेह पाने और सेवा करने के बदले शुभ कामना पाने से प्रफुल्ल रहता है। डॉ0 कैफ्लर के शब्दों में कार्य की व्यस्तता , खेलों के प्रति रुचि, प्रेम भावना का विकास एवं दैवी चेतना के प्रति आदर्शों के प्रति आस्था उक्त व्यथा से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय है।

यही जीवन दर्शन है, जो हमारे सद्ग्रंथों नीति वाक्यों, प्रेरणा प्रद सूत्रों के माध्यम से हमें अपनी संस्कृति में धरोहर के रूप में मिले है। मनुष्य जीवन प्रसन्नता-पूर्वक कुँठाओं से मुक्त रहे तो प्रगति के अन्यान्य आयाम भी हस्तगत होने लगते हैं। उदास-मनहूस व्यक्ति किसे पसंद होगा, कौन उससे मित्रता करेगा? हर व्यक्ति खिले हुए फूल के समान चेहरा पसंद करता है व उसी से मित्रता करने का भाव मन में रहता है। उदासी से दूर रहने वाले, कभी भी मन में हीन भाव न रखने वाले , सदैव समरसता से भरा हँसी खुशी भरा जीवन जीने वाले ही प्रगति के चरम लक्ष्य पर पहुँच पाते है। यही विशुद्ध अध्यात्म है, यही धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है।


तृष्णाएँ (Kahani)

एक राजा ने बकरी पाली और प्रजाजनों की परीक्षा लेने का निर्णय किया कि जो इसे तृप्त कर देगा उसे सहस्र स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार में मिलेंगी। परीक्षा की अवधि 15 दिन रखी और बकरी घर ले जाने की छूट दे दी। जो ले जाते उसे भरपेट खिलाता और पंद्रह दिन उसका पेट भली प्रकार भर देता। इतने पर भी जब वह दरबार में पहुँचती, तो अपनी आदत के अनुरूप, रखे हुए हरे चारे में मुँह मारती। प्रयत्न असफल चला जाता। इस प्रकार कितनों ने ही प्रयत्न किया, पर वे सभी निराश होकर लौटे।

एक बुद्धिमान उस बकरी को ले गया। वह पीछे तो पेट भर देता। जब सामने आता तो छड़ी से बकरी की खबर लेता। वह उसे देखते ही खाना भूल जाती और मुँह फेर लेती। यह नया अभ्यास जब पक्का हो गया, तो वह बकरी को लेकर दरबार में पहुँचा। छड़ी हाथ में थी। उसके सामने हरा चारा रखा गया, तो छड़ी को ऊँचा उठाते ही उसने मुँह फेर लिया और समझ गया कि वह पूर्ण तृप्त हो गयी। उसे इनाम मिल गया।

रहस्य का उद्घाटन करते हुए राजपुरोहित द्वारा बताया गया कि तृष्णाएँ बकरी के सदृश हैं। वे कभी तृप्त नहीं होती। उन्हें व्रत, संकल्प और प्रतिरोध की छड़ी से ही काबू में लाया जा सकता है।


जाग्रत जनशक्ति नव युग के सरंजाम खड़े करेगी

बहुमत की शक्ति चुनावों के समय वोट गणना के आधार पर देखी जा सकती है। किसी शासक समुदाय को पदच्युत करके दूसरे को सिंहासनारूढ़ कर दिखाना उसके बांये हाथ का खेल हैं। यही वह कामधेनु है जिसका चुल्लू भर दूध पीकर राजतंत्र धर्मतंत्र अर्थतन्त्र, कला तंत्र आदि को अपना निर्वाह क्रम चलाने का अवसर मिलता रहता है। इतना ही नहीं अनेकों विलास वैभव तथा कुरीतिपरका चित्र-विचित्र आडंबर अपना पोषण प्राप्त करते हैं। प्राप्त करने के तरीकों में दबाव, अनुरोध, आग्रह, छद्म फुसाना आदि कुछ भी क्यों न हो जो कुछ भव्यता इस संसार में दीख पड़ती है, वह आती इसी बहुमत से है। भले ही वह स्वयं गई गुजरी परिस्थितियों में पड़ा क्यों न दीख पड़ता हो।

जाग्रत इसी को करना है। तनकर खड़ा होने और उपयोगी दिशा अपनाने के लिए सहमत इसी को करना है। यदि उसे अपनी शक्ति का भान हो सके तो जामवंत के उद्बोधन पर हनुमान ने जो पौरुष कर दिखाया था, कृष्ण की प्रेरणा से अर्जुन ने जो चमत्कार दिखाया था, वह जन साधारण कहे जाने वाले लोगों में से प्रत्येक के लिए संभव हो सकता है। परमाणुओं की संरचना में विशेष अंतर नहीं होता। विभिन्न चटकों में अंतर एक ही देखा जाता है कि उनका नियोजन किस प्रकार बन पड़ा।

जनशक्ति के बिखराव को एक टोकरी में समेटना और उसके अवाँछनीय प्रयोजनों को निर्धारित लक्ष्य पर नियोजित करना, यदि यह दो कार्य बन पड़ें, तो समझना चाहिए कि समग्र-प्रगति की संभावना में कोई व्यवधान शेष नहीं रहा। जाग्रत और सुनियोजित सन्मार्ग पर गतिशील होने पर उसी के द्वारा वह सब कुछ संभव हो सकता है जिसके लिए संसार को बिलखते, तरसते देखा जाता है।

तिनके-तिनके मिलकर रस्सा और धागे मिलकर कपड़ा बना सकते हैं तो संगठित जनशक्ति के फलस्वरूप यदि अदम्य, अकूत और अजस्र शक्ति उभरे तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। आज तो हम जाति विरादरियों में, धर्म संप्रदायों में, प्राँतों में, भाषाओं में विभाजित है। नर−नारी के बीच दासी और मालिकी का रिश्ता उन्हें मिलकर संयुक्त शक्ति बन कर रहने नहीं दे रहा है। गरीबी-अमीरी का अंतर आये दिन ईर्ष्या , द्वेष, कलह, विग्रह और अपराध-टकराव बन कर उभरता रहता है। फलतः जनशक्ति जो उपलब्ध है, वह छितराकर अस्त−व्यस्त हो जाती है। जनशक्ति को उसके अंतराल में विद्यमान क्षमता से परिचित और उसे यह तथ्य हृदयंगम कराया जाना चाहिए कि अव्यवस्था को व्यवस्था में बदल देने पर उसकी कैसी अद्भुत परिणति हो सकती है।

अवकाश नहीं कि कठिनाइयों से उबरने और समर्थता प्राप्त करने के लिए किन्हीं बाहरी अनुग्रहों, अनुदानों की अपेक्षा करते हुए निराश, निढाल होकर दीन-हीनों की तरह किंकर्तव्य विमूढ़ बैठे रहा जाय। फूटे घड़े का छेद रोक देने पर भार से उसमें भरा गया पानी शीतलता बनाये रह सकता है और उसमें कितनों की ही प्यास बुझ सकती है।

समय और श्रम मनुष्य का वास्तविक वैभव है। मनोयोग और उत्साह का समावेश हो जाने से उसमें और भी अधिक चार चाँद लग सकते हैं। यदि आलस्य और प्रमाद की रक्त चूसने वाली जोकों से बचा जा सके तो तत्परता और तन्मयता के आधार पर प्रगतिशीलता के अनोखे वरदान किसी को भी हस्तगत हो सकते है। यूरोप के थोड़े से लोगों ने अफ्रीका, अमेरिका , आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे महाद्वीपों की विशाल भूमि पर अधिकार जमा कर कुबेर जैसी संपदा और इंद्र जैसी शक्ति क्षमता अपने हाथों ही उपार्जित की। कोई भी व्यक्ति यदि आलस्य प्रमाद न बरते और उत्साह भरे पुरुषार्थ का दिशाबद्ध प्रयोग करे तो निश्चित रूप से वह प्रगतिशील साधन संपन्न बनने की स्थिति में पहुँच सकता है। इस तथ्य के अगणित उदाहरण हम अपने इर्द-गिर्द ही प्रचुर मात्रा में बिखरे देख सकते हैं।

इन दिनों उद्दंड आतंकवादी, अनाचारी अपने रौब से लोगों को दबाते ओर बाधित करते देखे जाते हैं। जाग्रत जनशक्ति में इस प्रकार की गुँजाइश कभी भी नहीं रहेगी। समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी के साथ मनुष्य की वरिष्ठता जुड़ेगी। सैनिक जैसा अनुशासन और संत जैसा समर्पण भाव हर किसी के व्यक्तित्व में उभरेगा और छलकेगा जाग्रत जन शक्ति के सही चिन्ह हैं। उसी के द्वारा नव सृजन की सभी आवश्यकताएँ पूरी होकर रहेंगी। परोक्ष सत्ता का यह सुनिश्चित आश्वासन है।


प्रजायोगः एक युगानुकूल साधना प्रयोग

कोई समय था जब परिवार के दायित्व स्वल्प थे। निर्वाह साधनों की कमी न थी। जीवन चर्या भी बिना चिंता आकांक्षा के हँसी-खुशी से चलती थी। समस्याएँ, कठिनाइयाँ और उलझने भी न थीं। उस मनःस्थिति और परिस्थिति में एकाँत एकाग्रता सहज उपलब्ध होती थी और लोग लंबे समय तक तप, योग, अनुष्ठान, स्वाध्याय जैसे प्रयोजनों में तत्परता और तन्मयता के साथ लंबे समय तक लगे रहते थे। न किसी को व्यस्तता थी और न अभावग्रस्तता, चिंता, आशंका की कठिनाई। वह समय अनेकानेक साधनाएँ देर तक करते रहने के लिए उपयुक्त रहा होगा। पर अब तो परिस्थितियाँ भिन्न हैं। आत्मपरिष्कार के आधार भी आवश्यक हो गये हैं जो पहले हस्तगत रहते थे।

सामयिक परिस्थितियों और आवश्यकताओं को देखते हुए सर्वसाधारण के लिए ऐसी क्रिया-प्रक्रिया का निर्धारण करना जरूरी है, जो सर्वसुलभ, समय के अनुरूप और पुरातन लक्ष्य की उपलब्धि करा सकने में समर्थ हो। यही है “प्रज्ञायोग“। इस अनास्था युग में ऋतम्भरा प्रज्ञा की-दूरदर्शी विवेकशीलता की महती आवश्यकता प्रतीत होती है। इसलिए इन दिनों उपासना का लक्ष्य प्रज्ञा को बनाना ही समीचीन है। यों गायत्री महामंत्र के रूप में उसकी अभ्यर्थना आदि काल से होती आयी है।

योग कहते हैं जोड़ने को वैयक्तिक अस्तित्व को उत्कृष्ट आदर्शवादिता को जोड़ने का तत्वदर्शन एवं व्यवहारिक स्वरूप है। यों आत्मा और परमात्मा के मिलन को योग कहते है। आत्मा का वास्तविक स्वरूप भी निराकार है। परमात्मा सत्ता भी तत्वतः उसी स्तर की है। आत्मा शरीर ओढ़ कर जिस प्रकार आवश्यकतानुसार शरीरधारी बन जाती है उसी प्रकार निराकार परमात्मा भी आवश्यकतानुसार देवमानवों के रूप में प्रकट और लुप्त होता रहता है। दैवी शक्तियों में भी उसकी झाँकी होती रहती है। फिर भी वह व्यापक होने के कारण है निराकार ही।

ऐसी दशा में आत्मा और परमात्मा का मिलन दो व्यक्तियों के दृश्य सम्मिलन जैसा नहीं हो सकता। हो भी तो वह क्षणिक रहेगा। शाश्वत और सुनिश्चित मिलन तो भावनाओं के रूप में ही हो सकता है। संवेदनाओं, आकाँक्षाओं, आस्थाओं, विचारधाराओं और क्रियाकलापों में इसकी झाँकी मिल सकती है कि आत्मा और परमात्मा का मिलन वस्तुतः बन पड़ा या नहीं।

प्रज्ञायोग को श्रद्धा और विवेक का ज्ञान और कर्म का-मनुष्य और देव का समन्वय कह सकते हैं। यह कोई घटना नहीं, दृश्य भी नहीं, कृत्य भी नहीं। भावना क्षेत्र की एक विशिष्ट उपलब्धि है। उसे प्राप्त करने के लिए जो कृत्य करने पड़ते है। यही है प्रज्ञायोग का उपलब्धियाँ विभूतियाँ हस्तगत करने की क्रिया प्रक्रिया। ज्ञान से कर्म न बन पड़ता है और कर्म से ज्ञान की अभिवृद्धि होती है। दोनों का अन्योन्याश्रित संबंध है।

एक दिन को अन्य जन्म मानकर चिंतन और कृत्यों में कुछ उच्चस्तरीय तत्वों का श्रेष्ठता का समावेश किये रहने की यह प्रक्रिया है। उस दिशा में धकेलने के लिए कृत्य है। उस आधार पर उत्पन्न हुई गतिशीलता को क्रियान्वित होते रहने के लिए उपलब्ध उत्तेजना को गतिशील बनाये रहना बन पड़े तो ही समझना चाहिए कि प्रज्ञायोग का मूलभूत उद्देश्य समझा गया और उससे समुचित लाभ उठाने का मार्ग समझ लिया गया। यदि ऐसा निर्धारण न हो तो इसे भी अन्यान्य चिन्ह पूजाओं में से एक ही कहा जायेगा।


आदर्श की प्रेरणा (Kahani)

स्वतंत्रता संग्राम के समय की बात है। लालबहादुर शास्त्री नहीं चाहते थे कि उनके बंदी बनाये जाने पर उनकी माता, पत्नी और परिवार के लोग रोयें। अतः उन्होंने पहले ही अपनी माताजी को समझाया तो बोली-”लेकिन बेटा मोह-ममता का भी अपना एक स्थान है। प्रियजन के कष्ट में दुःखी हो जाना या रो पड़ना कोई बुरा तो नहीं?”

आप ठीक कहती हैं, पर यदि ऐसे अवसरों पर प्रसन्नता व्यक्त की जाय, तो बच्चों को आदर्श की प्रेरणा मिलेगी। बेटे का यह युक्ति-युक्त कथन माँ का मानना व तद्नुरूप आचरण करना पड़ा।

परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी


चार चारण−साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा

मित्रो-पाठक वृंदों, यो तो परमपूज्य गुरुदेव का संदेश लेखनी व वाणी के माध्यम से मुखरित हो विश्वभर में संव्याप्त हो रहा है, फिर भी उनकी अमृतवाणी-प्रवचनों के जो अंश हमारे पास उपलब्ध हैं, उन्हें आप पढ़ेंगे तो पायेंगे कि इन शब्दों के साथ गुँथी भाव तरंगें आपके अंतरंग को उछाल दे रही है। तथा आपकी भनक ही गणित गुत्थियों को सुलझा रही है। पूज्यवर की स्थूल काया हमारे बीच नहीं है किंतु उनकी लेखनी का अमृत संजीवनी के रूप में अखण्ड ज्योति, युगनिर्माण योजना, युगशक्ति, एवं 3200 पुस्तकों तथा वाणी के रूप में आडियो-वीडियो कैसेट्स एवं अगणित व्यक्तियों द्वारा यथा रूप लिपिबद्ध प्रवचनों के रूप में आज भी अनेकानेकों का मार्गदर्शन कर रहा है। लखनऊ अश्वमेध यज्ञ समिति ने पूज्यवर के दो महत्वपूर्ण प्रवचनों को ही एक विशेष संदेश के रूप में प्रकाशित कर अपने अनुयाज का प्रथम चरण आरंभ कर दिया। यह बहुत अच्छी शुरुआत है। जो साहित्यिक जटिलताओं से भरी लेख मालाओं के प्रारंभ में ग्राह्य करने में कठिनाई अनुभव करते हों उनके लिए यह एक ऐसा जीवंत आहार है जो उनके रोम-रोम में प्राण संचार कर उन्हें जीवन पथ पर कहीं से कहीं पहुंचा देगा। प्रारंभिक पाठकों को तो यहीं से आरंभ कर अध्यात्म दर्शन की गहराइयों में प्रविष्ट होना चाहिए।

इस अंक में अनेकों अमृत वाणियों की शृंखला में प्रस्तुत है। पूज्यवर का एक ऐसा प्रवचन जो आपकी उँगली पकड़कर आगे चलना सिखायेगा-आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करेगा। जून 1980 में शाँतिकुँज परिसर में दिनाँक 13 को दिया गया यह उद्बोधन हम सबके लिए है। पढ़े। अमृतवाणी---

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलें--

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

साथियों, युगनिर्माण परिवार का गठन एक प्रयोगशाला के रूप में हुआ है। प्रयोगशाला में रासायनिक पदार्थ तैयार किये जाते हैं और उसके परिणामों को सर्वसाधारण के सामने उपस्थित किया जाता है। युग निर्माण परिवार का गठन एक पाठशाला के तरीके से हुआ है, जहाँ विद्यार्थी पढ़ाये जाते हैं और पढ़-लिख करके वे समाज के महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों को सँभालते हैं। गायत्री परिवार का गठन एक व्यायामशाला के तरीके से किया गया है जिसमें लोग व्यायाम करते हैं और पहलवान बनकर के दंगल में कुश्तियाँ पछाड़ते है। युग निर्माण परिवार का गठन नर्सरी के तरीके से किया गया है जिसमें छोटे-छोटे फलदार पौधे तैयार किये जाते हैं और यहाँ पैदा होने के बाद दूसरे बगीचों में भेज दिये जाते हैं, जहाँ बड़े-बड़े उद्यान-बगीचे बनकर तैयार होते हैं। युगनिर्माण परिवार का गठन एक कृषि फार्म की तरीके से हुआ है। कृषि फार्म में छोटे-छोटे प्रयोग गन्ने के, सोयाबीन के अमुक के-अमुक के किये जाते हैं और उसके जो निष्कर्ष निकलते हैं, वह सब लोगों को मालूम पड़ते है और इसी आधार पर वे अपने-अपने कृषि कार्य को आरंभ करते हैं। व्यक्तियों के निर्माण की प्रयोगशाला के रूप में, पाठशाला के रूप में, व्यायामशाला के रूप में, नर्सरी और कृषि फार्म के रूप में , युगनिर्माण परिवार का गठन किया गया। हम चाहते हैं कि व्यक्ति बदल जायें और ऊँचा उठें, क्योंकि हम समाज को ऊँचा उठाना चाहते है। समुन्नत बनाना चाहते हैं।

आखिर समाज है क्या? समाज व्यक्तियों का समूह मात्र है। व्यक्ति जैसे होंगे वैसा ही तो समाज बनेगा। समाज कोई अलग चीज नहीं है। वरन् व्यक्तियों के समूह का नाम है। इसलिए व्यक्तियों के श्रेष्ठ बनाने का मतलब है-समय को अच्छा बनाने का मतलब है युग के प्रवाह को बदल देना। “युग का प्रवाह बदलेगा” अर्थात् समाज को बदल देना। समाज को बदल देना अर्थात् व्यक्तियों को बदल देना, यही हमारा उद्देश्य है। इसी क्रिया कलाप के लिए और परिवर्तन के लिए हम लगे हुए हैं और युग परिवर्तन का जो नारा लगाते हैं उसका मतलब ही यह है कि यह युग बदलेंगे, समाज बदलेंगे और व्यक्ति बदलेंगे। बदलने के लिए हम व्यापक क्षेत्र में प्रयोग नहीं कर सकते। अतः छोटे क्षेत्र में हम प्रयोग करते हैं ताकि इसकी देखा-देखी इसका अनुकरण करते हुए अन्यत्र भी यहीं परंपरायें चलें अन्यत्र भी इसी तरीके से क्रिया-कलाप चालू किये जा सकें। बाहर की परिस्थितियाँ मन की स्थिति के ऊपर निर्भर हैं। मन जैसा भी हमारा होता है, परिस्थितियाँ उसी के अनुरूप बननी शुरू हो जाती है। हम इच्छाएँ करते हैं, इच्छाओं से हमारा मस्तिष्क काम करता है। मस्तिष्क की गणनाओं से शरीर काम करता है। शरीर और मस्तिष्क दोनों ही हमारी अंतरात्मा की अंतःकरण ही प्रेरणा से काम करते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की पड़ी कि हमारी आँतरिक अवस्थाओं को आँतरिक मान्यताओं को-निष्ठाओं को परिवर्तित कर दिया जाय तो जीवन का सारा ढाँचा ही बदल जायेगा।

मनुष्य के सामने असंख्यकों समस्याएं है और उन असंख्य समस्याओं का समाधान केवल इस बात पर टिका हुआ है कि हमारी आँतरिक स्थिति सही बना दी जाय। दृष्टिकोण हमारा गलत होता है तो हमारे क्रियाकलाप गलत होते हैं और गलत क्रिया-कलापों के परिणाम स्वरूप जो प्रतिक्रियाएं होती हैं, जो परिणाम सामने आते हैं वे भयंकर दुखदायी होते हैं, कष्टकारक होते है। कष्टकारक परिस्थितियों के निवारण करने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य का चिंतन और दृष्टिकोण बदल दिया जाय, परिष्कृत कर दिया जाय। यहीं हैं हमारे प्रयास जिसके लिए हम अपनी समस्त शक्ति के साथ लगे हुए है।

मनुष्य के आँतरिक उत्थान, आँतरिक उत्कर्ष, आत्मिक विकास के लिए क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए? इसका समाधान करने के लिए हमको चार बातें तलाश करनी पड़ती है। इन्हीं चार चीजों के आधार पर हमारी आत्मिक उन्नति टिकी हुई है और वे चार आधार हैं-साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा। ये चारों ऐसे हैं जिनमें से एक को भी आत्मोत्कर्ष के लिए छोड़ा नहीं जा सकता। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसके बिना हमारे जीवन का उत्थान हो सके। चारों में आपस में अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, जिस तरीके से कई तरह की चौकड़ियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं-मसलन बीज एक, जमीन-दो, खाद-तीन, पानी-चार। चारों जब तक नहीं मिलेंगे कृषि नहीं हो सकती। उसका बढ़ना संभव नहीं है। व्यापार के लिए अकेली पूँजी से काम नहीं चल सकता। इसके लिए पूँजी-एक, अनुभव-दो, वस्तुओं की माँग-तीन, ग्राहक-चार इन चारों को आप ढूँढ़ लेंगे तो उसके लिए ईंट, चूना, लोहा, लकड़ी-इन चारों चीजों की जरूरत है। चारों में एक भी चीज अगर कम पड़ेगी तो हमारी इमारत नहीं बन सकती। सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य का कौशल आवश्यक है, साधन आवश्यक है, सहयोग आवश्यक है और अवसर आवश्यक है। इन चारों चीजों में से एक भी कम पड़ेगी तो समझदार आदमी भी सफलता नहीं प्राप्त कर सकेगा-सफलता रुकी रह जायेगी। जीवन निर्वाह के लिए भोजन, विश्राम, मल विसर्जन और श्रम उपार्जन-चारों की आवश्यकता होती है। ये चारों क्रियाएं होंगी तभी हम जिंदा रहेंगे, यदि इनमें से एक भी चीज कम पड़ जायेगी तो आदमी का जीवित रहना मुश्किल पड़ जायेगा। ठीक इसी प्रकार से आत्मिक जीवन का विकास करने के लिए आत्मोत्कर्ष के लिए चारों का होना आवश्यक है, अन्यथा व्यक्ति निमार्ण का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा।

अब हम चारों चीजों के ऊपर प्रकाश डालते हैं। पहली है उपासना प्लस साधना। उपासना और साधना-इन दोनों को मिलाकर एक पूरी चीज बनती है। उपासना का अर्थ है-भगवान पर विश्वास, भगवान की समीपता। उपासना माने भगवान के पास बैठना-नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें-जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है। पास बैठने का यही लाभ होना चाहिए। बर्फ के पास बैठते हैं, ठंडक में बैठते हैं तो हमारे हाथ ठंडे हो जाते है। पानी में बर्फ डालते हैं तो पानी ठंडा हो जाता है। ठंडक को नजदीक जाने से हमें ठंडक मिलनी चाहिए। गर्मी की समीपता से गर्मी मिलनी चाहिए। सुगंधित चीजों से सुगंध मिलनी चाहिए। चंदन के समीप उगने वाले पौधे सुगंधित हो जाते हैं-उसकी समीपता की वजह से। यही समीपता वास्तविक है। उपासना का अर्थ यह है कि हम भगवान का भजन करें, नाम लें, जप करें, ध्यान करें, पर साथ-साथ हम इस बात के लिए कोशिश करें कि हम भगवान के नजदीक आते जायें। भगवान हमारे से समाविष्ट होता जाये और हम भगवान में समाविष्ट होते जायें अर्थात् दोनों एक हो जायें। एक होने से मतलब यह है कि दोनों कि इच्छाएँ, दोनों की गतिविधियाँ, दोनों की क्रिया पद्धति, दोनों के दृष्टिकोण एक जैसे रहें। हम को ईश्वर जैसा बनने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर जैसे बनें न कि ईश्वर पर हुकुम चलायें और उनको यह आदेश दें कि आपको ऐसा करना चाहिए। आपको किसी भी हालत में हमारी माँगें पूरी करनी चाहिए उपासना का तात्पर्य अपनी मनोभूमि को इस लायक बनाना है कि हम भगवान के आज्ञानुवर्ती बन सकें। उनके संकेतों के इशारे पर अपनी विचारणा और क्रियापद्धति को ढाल सकें। उपासना-भजन इसलिए किया जाता है।

साधना-साधन का अर्थ है कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव को साथ लेना। वस्तुतः मनुष्य चौरासी लाख योनियों में घूमते-घूमते उन सारे के सारे प्राणियों के कुसंस्कार अपने भीतर जमा करके ले आया है, जो मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक नहीं है, बल्कि हानिकारक है। तो भी स्वभाव के अंग बन गये है, और हम मनुष्य होते हुए भी पशु संस्कारों से प्रेरित रहते हैं और पशु-प्रवृत्तियों को बहुधा अपने जीवन में कार्यान्वित करते रहते हैं। इस अनगढ़पन को ठीक कर लेना, सुगढ़पन का अपने भीतर से विकास कर लेना, कुसंस्कारों को जो पिछली योनियों के कारण हमारे भीतर जमे हुए है, उनको निरस्त कर देना और अपना स्वभाव इस तरह का बना लेना जिसको हम मानवोचित कह सकें-साधना है। साधना के लिए हमको वही क्रिया-कलाप अपनाने पड़ते हैं जो कि एक कुसंस्कारी घोड़े या बैल को सुधारने के लिए उसके मालिकों को करने पड़ते हैं-हल में चलने के लिए और गाड़ी में चलने के लिए। कुसंस्कारों को दूर करने के लिए हमको लगभग उसी तरह के प्रयत्न करने पड़ते हैं जैसे कि सरकस के पशुओं को पालते हुए उन्हें इस लायक बनाते हैं कि वे सरकस में तमाशा दिखा सकें। इसी तरह के प्रयत्न हमको अपने गुण, कर्म, स्वभाव के विकास के परिष्कार के लिए करने पड़ते हैं। कच्ची धातुओं को जिस तरीके से आग में तपा करके उनको शुद्ध-परिष्कृत बनाया जाता है, जेवर आभूषण बनाये जाते हैं, उसी तरीके से हमारा कच्चा जीवन-कुसंस्कारी जीवन को ढाल करके ऐसा सभ्य और ऐसा सुसंस्कृत बनाया जाय कि हम ढली हुई धातु के आभूषण के तरीके से अथवा औजार-हथियार के तरीके से दिखायी पड़े। जंगली झाड़ियों को काटकर के माली लोग अच्छे-अच्छे झाड़ और खूबसूरत पार्क बना देते हैं। हमको भी अपने झाड़-झंखाड़ जैसे जीवन को परिष्कृत करके-काट-छाँट करने-समुन्नत करके इस लायक बनाना चाहिए कि जिसको कहा जा सके कि वह सभ्य और सुसंस्कृत जीवन है।

इसके लिए हमको नित्य ही आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। अपनी गलतियों पर गौर करना चाहिए। उनको सुधारने के लिए कमर कसनी चाहिए और अपने आपका निर्माण करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए और जो कमियाँ हमारे स्वभाव के अंदर हैं, उन्हें दूर करने के लिए जुटे रहना चाहिए। आत्म विकास इसका एक हिस्सा है। हमको अपनी संकीर्णता में सीमित नहीं रहना चाहिए। अपने अहं को और अपनी स्वार्थपरता को, अपने हितों को व्यापक दृष्टि से बाँट देना चाहिए। दूसरे के दुःख हमारे दुःख हों, दूसरों के सुखों में हम सुखी रहें, इस तरह की वृत्तियों का हम विकास कर सकें तो कहा जायेगा कि हमने जीवन साधना करने के लिए जितना प्रयास किया, उतनी सफलता पायी। साधना से सिद्धि की बात प्रख्यात है। जीवन की साधना की सिद्धि में ही किसी प्रकार के संदेह की गुँजाइश नहीं है। अन्य किसी बात में तो संदेह की गुँजाइश भी है, देवी-देवताओं की उपासना करने पर हमको फल मिले न मिले कह नहीं सकते, लेकिन जीवन की साधना करने का परिणाम निश्चित रूप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में लाभ के रूप में देखा जा सकता है। यह साधना के बारे में निवेदन किया गया है।

दूसरा है-स्वाध्याय। मन की मलिनता को धोने के लिए स्वाध्याय अति आवश्यक है। दृष्टिकोण और विचार प्रायः वहीं जमे रहते हैं हमारे मस्तिष्क में जो कि बहुत दिनों से पारिवारिक और अपने मित्रों के सान्निध्य में हमने सीखे और जाने। अब हमको श्रेष्ठ विचार अपने भीतर धारण करने के लिए श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करना चाहिए। चारों ओर हम जिस वातावरण से घिरे हुए हैं, वह हमको नीचे की ओर गिराता है। पानी का स्वभाव नीचे गिरने की तरफ होता है। हमारा स्वाभाविक स्वभाव ही ऐसा है जो नीचे स्तर के कामों की तरफ-निकृष्ट उद्देश्यों के लिए आसानी से लुढ़क जाता है। चारों तरफ का वातावरण जिसमें हमारे कुटुँबी भी शामिल हैं, मित्र भी शामिल हैं, हमेशा इस बात के लिए दबाव डालते हैं कि हमको किसी भी प्रकार से किसी भी कीमत पर भौतिक सफलताएँ पानी चाहिए। चाहे उसके लिए नीति बरतनी पड़े। हर जगह से यही शिक्षण हमको मिलता है। सारे वातावरण में इसी तरह की हवा फैली हुई है और यही गंदगी हमको भी प्रभावित करती है। हमारे गिरावट के लिए काफी वातावरण विद्यमान है।

इसका मुकाबला करने के लिए क्या करना चाहिए? श्रेष्ठता के मार्ग पर अगर हमको चलना है-आत्मोत्कर्ष करना है, तो हमारे पास ऐसी शक्ति भी होनी चाहिए जो पतन की ऐसी घसीट ले जानें वाली इन सत्ताओं का मुकाबला कर सके। इसके लिए एक तरीका है कि हम श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ में संपर्क और सान्निध्य बनाये रखें, उनके सत्संग को कायम रखें। यह सत्संग केवल पुस्तकों के माध्यम से संभव है, क्योंकि विचारशील व्यक्ति हर समय बातचीत करने के लिए मिल नहीं सकते। इनमें से बहुत तो ऐसे हैं जो स्वर्गवासी हो चुके हैं और जो जीवित हैं वे हम से इतनी दूर रहते हैं कि उनके पास जाकर के हम उनसे बातचीत करना चाहें तो वह भी हमारे लिए बड़ा कठिन है। हम जा नहीं सकते और उनके पास जायें भी तो उनके लिए भी कठिन हैं, क्योंकि प्रत्येक महापुरुष समय की कीमत को समझता और व्यस्त रहता है। ऐसी हालत में हम लगातार सत्संग कैसे कर पायेंगे? कभी साल दो साल में एक- आध घंटे का सत्संग कर लिया, तो उससे हमारा उद्देश्य पूरा हो जायगा ? इसलिए अच्छा तरीका यही है कि हम अपने जीवन में नियमित रूप से जैसे अपने कुटुँबी और मित्रों से बात करते हैं, श्रेष्ठ महानुभावों से-युग के मनीषियों से बातचीत करने के लिए समय निकालें। समय निकालने की इस प्रक्रिया का नाम है - स्वाध्याय।

स्वाध्याय को आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यधिक आवश्यक माना गया है। स्वाध्याय के बारे में ब्राह्मण ग्रंथों में कहा गया हैं जिस दिन विचारशील आदमी स्वाध्याय नहीं करता उस दिन उसकी संज्ञा चाँडाल जैसी हो जाती है। स्वाध्याय का महत्व भजन से किसी भी प्रकार से कम नहीं है। भजन का उद्देश्य भी यही है कि हमारे विचारों का परिष्कार हो और हम श्रेष्ठ व्यक्तित्व की ओर आगे-आगे बढ़ें। स्वाध्याय हमारे लिए आवश्यक है। स्वाध्याय से हम महापुरुषों को अपना मित्र बना सकते हैं और जब भी जरूरत पड़ती है तब उनसे खुले मन से खुले दिल से बातचीत कर सकते है। जिस तरीके से शरीर को स्वच्छ रखने के लिए स्नान करना आवश्यक है। कपड़े धोना आवश्यक है, उसी प्रकार से स्वाध्याय के द्वारा , श्रेष्ठ विचारों के द्वारा अपने मन के ऊपर जमने वाले कषाय - कल्मषों को मलिनता को धोना आवश्यक है। स्वाध्याय से हमको प्रेरणा मिलती है-दिशायें मिलती है, मार्गदर्शन मिलता है, श्रेष्ठ पुरुष हमारे सान्निध्य में आते है, और हमको अपने मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करते है, मार्गदर्शन करते है। ये सारी की सारी आवश्यकतायें स्वाध्याय से पूरी होती है। इसलिए स्वाध्याय का साधना और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्व समझा जाना चाहिए। तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है, उसका नाम है संयम। संयम का अर्थ है- रोकथाम। अगर हम रोकथाम करें तो जो हमारी शक्तियों का घोर अपव्यय होता रहता है, उसको बचा सकते है। हम अपनी अधिकाँश शारीरिक और मानसिक शक्तियों को अपव्यय में नष्ट कर देते है, कुमार्ग पर नष्ट कर देते है। यदि उनको रोका जा सका होता और उपयोगी मार्ग पर लगाया गया होता तो निश्चित रूप से उन शक्तियों के चमत्कार हमको देखने को मिल सकते थे जो हमारे पास थी। पर हम बर्बादी से कुछ बचा नहीं सके। चार तरह के संयम निग्रह रूप में बताये गये है- इंद्रिय निग्रह, मन निग्रह,समय निग्रह, और अर्थ निग्रह। इंद्रिय निग्रह में जिह्वा और कामेंद्रिय का संयम मुख्य है। ये इंद्रियां हमारी कितनी सारी शक्तियों को नष्ट करती है और स्वाध्याय को किस बुरी तरीके से खोखला करती है, यह सभी जानते है। इंद्रिय निग्रह का महत्व बताने की जरूरत नहीं है। शारीरिक दृष्टि से जिनको समर्थ बनाना हो, निरोग और दीर्घ- जीवी बनना हो उनको इंद्रियां निग्रह का महत्व समझना और अपने आपको संयम का अभ्यासी बनाना चाहिए। दूसरा संयम मनोनिग्रह है। मन में कितने सारे विचार उठते है, लेकिन वे असंगत, असंयमित, बुराइयों एवं मनोविकारों से भरे होते है इससे हमारा मस्तिष्क विकृत होता और बुरी आदतें पड़ती है। मनःशक्तियाँ निग्रहित करके किसी कार्य में लगायी गई होती तो हम वैज्ञानिक बन गये होते। साहित्यकार बन गये होते। जिस भी कार्य में हमने मन लगाया होता , सफलता की उच्च श्रेणी तक जा पहुंचे होते पर अस्त−व्यस्त मन के कारण से कोई सफलता संभव न हो सकी। मनोनिग्रह करके एकाग्रता की सामर्थ्य प्राप्त कर सके , तो उससे हमारी सफलताओं का द्वार खुल सकता है। तीसरा है समय का निग्रह।हम समय को आलस्य और प्रमाद में पड़े- पड़े बर्बाद करते रहते है। कोई योजनाबद्ध कार्य नहीं करते , जब जो आया मनमर्जी से काम कर लिया , मन नहीं हुआ तो नहीं किया। इस तरीके से अस्तव्यस्तता में हमारा जीवन नष्ट हो जाता है, जबकि समय का थोड़ा- थोड़ा या भी उपयोग करते तो न जाने कितना लाभ उठा सकते थे। चौथा निग्रह- अर्थ निग्रह भी ऐसा ही महत्वपूर्ण है। पैसे को विलासिता से लेकर न जाने किस किस काम में,व्यसनों में , अनाचारों में हम खर्च करते है। अगर उसको फिजूलखर्ची से हम बचा सके होते और उस धन को हमने किसी उपयोगी काम में लगाया होता तो भौतिक एवं आत्मिक उन्नति की दिशा में हम कहीं आगे बढ़ गये होते। अर्थ निग्रह, इंद्रिय निग्रह, मनोनिग्रह समय निग्रह इन चारों निग्रहों को हम करें तो संयमशील हो सकते है। हमको संयम बरतना चाहिए अस्वाद व्रत का ब्रह्मचर्य का अभ्यास करना चाहिए मौन का अभ्यास करना चाहिए। ऐसे-ऐसे असंख्य संयम है जिनको अपनाने से हम तपस्वी बनते है और अपनी शक्ति का बहुत बड़ा भाग बचा करके अच्छे काम में लगाते है।

चौथा कार्य सेवा का है। मनुष्य समाज का ऋणी है क्योंकि वह सामाजिक प्राणी है। भगवान ने उसको इसीलिए जन्म दिया है कि वह उसके इस विश्व उद्यान की सेवा करे। उसकी जीवात्मा का विकास और जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सेवा से बड़ा तप और सेवा से बड़ा पुण्य कुछ भी नहीं हो सकता। हमको सेवा करने के लिए समय निकालते रहना चाहिए। सारे का सारा समय अपने लिए ही न खर्च कर दें, वरन् देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा करने के लिए भी कुछ लगायें। हमारा धर्म होना चाहिए कि हम अपनी शक्तियों का एक अंश दुखियारों के लिए और पीड़ितों के लिए पतितों के लिए लगायें। हमारे लिए सबसे बड़ा सेवा का कार्य क्या हो सकता है? ज्ञान यज्ञ से बड़ा कोई और दूसरा पुण्य नहीं हो सकता। इसको ब्रह्मदान भी कहा गया है। यह सर्वोत्तम धर्म है, क्योंकि ज्ञान -यज्ञ से हम मनुष्यों को दिशा दे सकते हैं जिससे वे बुराइयों से बच सकें और उन्नति के मार्ग ऊँचे उठ सकें। ज्ञान, विचारणा, भावना यही तो है शक्ति का अंश, इसलिए ब्राह्मण और साधु हमेशा से ज्ञान यज्ञ को ही सर्वोत्तम सेवा मान करके उसमें संलग्न रहे है और यह प्रयत्न करते रहें है कि हम स्वयं अच्छे बने और अपनी अच्छाई दूसरों पर बिखरें। इसके लिए हमको अंशदान करना चाहिए। सेवा के लिए हमको एक घंटा समय और दस पैसे नित्य का जो न्यूनतम कार्यक्रम दिया गया था ज्ञान यज्ञ विचार क्रांति के लिए, उस पर हमको मुस्तैदी से अमल करना चाहिए। कोई भी आदमी हममें से ऐसा न हो जो कि सेवा के लिए एक घंटा समय और दस पैसे जैसी न्यूनतम शर्त को पूरा न करता हो। इससे ज्यादा ही ‘हम करें’ ज्यादा ही उत्साह दिखायें।

हम केवल भौतिक जीवन ही न जियें। आध्यात्मिक जीवन भी जियें। हमारी क्षमताओं का उपयोग हमारे समय का उपयोग, पेट पालने तक ही सीमित न रहे , बल्कि लोक मंगल और लोकहित के लिए भी खर्च करें। इस तरीके से हम चार आधार जीवन में अपनाये रहकर के आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चल सकते है। अपना परिष्कार और परिवर्तन किया तो समाज का परिवर्तन और समाज का परिष्कार स्वाभाविक और सरल हो जायेगा। युग का परिवर्तन व्यक्ति के परिवर्तन और समाज के परिवर्तन के साथ जुड़ा हुआ है। अपनी छोटी सी प्रयोगशाला में हम इसी का प्रयोग करते है अपनी प्रयोगशाला में सम्मिलित रहने वाले-अपने परिवार में शामिल रहने वाले हर व्यक्ति से प्रार्थना करले है कि आप को आत्मिक उन्नति के लिए अभी बताए गए इन चार आधारों को मजबूती के साथ ग्रहण करना चाहिए और अपने दैनिक जीवन में समन्वित रखना चाहिए। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा दैनिक जीवन में न्यूनतम मात्रा में भले ही हों, पर सम्मिलित अवश्य और अनिवार्य रूप से रहने चाहिए।


VigyapanSuchana

न केवल अखण्ड-ज्योति पाठकों के माध्यम से एक करोड़ से अधिक परिजनों का अपितु पूज्यवर पर संपादित किये जा रहे उनके व्यक्तित्व कर्तृत्व, पत्र लेखन, लेखनी- संजीवनी के एक सर्वांग पूर्ण वाङ्मय द्वारा आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन कर लिए शाँतिकुँज को उन अनुपलब्ध आडियो, कैसेटों की आवश्यकता है जो किन्हीं ने कभी प्रवास में या मथुरा हरिद्वार में हुए शिविरों में रिकार्ड किए थे। सभी के नाम हमें ज्ञात नहीं है, किंतु 1945 से लेकर 1990 तक अनेकों ने उनके संदेश को आडियो, वीडियो, कैसेटों द्वारा रिकार्ड किया अथवा लिपिबद्ध किया है। अपनी थाती अपने पास संरक्षित रखना चाहते हों तो कैसेटों की एक स्पष्ट कापी कराके तथा “स्पूल” पर से टेप पर ट्रांस्फर कर हमें शीघ्रातिशीघ्र पहुँचा दें। यह एक ऐसा पुण्य कार्य है। जिसका अभिनंदन भावी पीढ़ी करेगा। हमें आशा है ऐसे सदाशयता-भावनाशील व्यक्ति उभरकर आयेंगे व शाँतिकुँज हरिद्वार 249499 के पते पर उपरोक्त सामग्री किन्हीं आते-जाते के हाथों, स्वयं या पोस्ट से निश्चित ही भिजवाएँगे। प्रत्येक में तारीख-सन् व संदर्भ का उल्लेख अवश्य हों।


सच्चा श्राद्ध (Kahani)

पिता के श्राद्ध हेतु पंडितों ने यजमान से बहुत सा धन खर्च कराने की योजना बनाई।

पिता को जो प्रिय वस्त्र आभूषण, शस्त्र, वाहन आदि थे, इन्हें दान करके पितृ लोक में पहुंचा देने की बात ठहराई। परिवार के लोगों ने सहमति दे दी और सामान जुटाने की तैयारियां होने लगीं।

ज्येष्ठ पुत्र चतुर था। उसका एक बैल मर गया। उसके सम्मुख चारा, दाना, घास पानी का ढेर लगा दिया और नई झूल लाकर उसे उड़ाई। इन वस्तुओं को स्वीकार करने के लिए वह मृत बैल से प्रार्थना करने लगा। पर वह निर्जीव होने के कारण यथावत् पैर पसारे पड़ा रहा। लोगों ने इस आग्रह को देख ज्येष्ठ पुत्र से कहा “मूर्ख ! हो गये हो, मरे हुये भी कहीं खाया करते हैं। उसने न जोन किस योनि में जन्म लिया होगा। यह साधन उस तक किस प्रकार पहुँचेंगे।”

इस कथन को सुनकर परामर्शदाताओं से पूछा- “तब हमारे मृत पिताजी के पास वह सामान कैसे पहुँचेगा ? जो श्राद्ध के नाम पर उनके पास तक पहुँचाने का प्रयत्न किया जा रहा है।”

परिवार ने अपने विचार बदल दिये और तीनों मूल्य का सामान पंडितों को दिया जाना था, उतने मूल्य की सामग्री दीन-दुखियों को देने का निश्चय किया गया।


आवाज दे रहा महाकाल


आवाज दे रहा महाकाल (Kavita)

उठ पड़ो हाथ लेकर मशाल। आवाज दे रहा महाकाल॥

निद्रा छोड़ो, तंद्रा तोड़ो। बढ़ते मद नद की गति मोड़ों।

उच्छृंखलताओं के प्रवाह। समता से, सन्मति से जोड़ो।

फोड़ो दुर्मति के घट कराल। आवाज दे रहा महाकाल ॥

तुम यज्ञवी! तुम कर्मवीर। मत हो हताश मत हो अधीर।

तुम महाबली! तुम सिंह-सुवन॥ रख दो कलुषों के वक्ष चीर।

क्यों जीते हो बनकर शृंगाल। आवाज दे रहा महाकाल॥

संस्कार-हीन, संसार दीन। अपने में ही जो रहा लीन।

अब स्वयं खोजना चाह रहा। सुख और शाँति के पथ नवीन।

प्रज्वलित करो चेतना ज्वाल। आवाज दे रहा महाकाल।

प्राणों में हो संकल्प शक्ति। मानवता के प्रति अचल भक्ति।

तुम चढ़ो ध्येय के शिखरों पर। इंद्रिय सुख से लेकर विरक्ति।

भेदों कुँठाओं के कपाल। आवाज दे रहा महाकाल।

भटकाव विश्व का और न हो। दुख का कोई भी ठौर न हो।

दुश्चिंतन अथवा दुराचार। सुविधाओं का सिरमौर न हो।

बेधो छल-बल के विकट व्याल। आवाज दे रहा महाकाल।।

-देवेन्द्र कुमार ‘देव’


आश्वमेधिक-बसंत


आश्वमेधिक-बसंत (Kavita)

उफनने लगी है, बसंती-बहारें। चलो! पात्रता संग्रहण की उभारें ॥ 1 ॥

बसंती-बहारें तुली बाँटने पर। विषमता-जनित-खाइयाँ पाटने पर ॥

रहे कोई भी क्यों, अभावों ग्रसित अब। बसंती-बहारें हुई हों द्रवित जब॥

चलो! जीर्णता, शीर्णता को बिसारें। उफनने लगी है, बसंती-बहारें ॥ 2॥

लता, वृक्ष रस छल छलाने लगे हैं। जये अन्न, नव प्राण पाने लगे हैं॥

सुमन खिल रहे है।, कली मुस्कुराई। मुखर कोकिला ने, मधुर धुन सुनाई॥

ये अनुदान क्यों हैं? तनिक तो विचारें। उफन ने लगी हैं, बसंती-बहारें ॥ 3 ॥

बसंत दिव्य-अनुदान देता उन्हें ही। हुआ वाँछित ‘लोकमंगल’ जिन्हें भी॥

उठा आश्वमेधिक-बसंत ज्वार बनकर। बढ़े! आओ अनुदान के पात्र बनकर ॥

चलो! लोकहित हेतु, प्रतिभा निखारें। उफन ने लगी हैं, बसंती-बहारें ॥ 4 ॥

चलो! स्नेह बांटे, न रूखे रहें हम। समय, श्रम, व साधन करें हम समर्पित।

तभी आश्वमेधिक-बसंत हो प्रफुल्लित। मनुज देव बन, स्वर्ग भू पर उतारें। उफनने लगी हैं, बसंती-बहारें ॥ 4 ॥

-मंगल विजय विजयवर्गीय


प्रतीक्षा में न बैठें, स्वयं ही बढ़ चलें

सतयुग की वापसी इसी एक विधि व्यवस्था पर अवलंबित है कि लोक आस्था में यह विश्वास उभरे कि मनुष्य जीवन मात्र पेट और प्रजनन तक सीमित रहकर पशुओं की तरह श्वासों का भार ढोने के लिए नहीं है। वरन् उसमें आत्म कल्याण और लोक निर्माण के आदर्शों की पूर्ति किसी न किसी रूप में की ही जाती रहनी चाहिए।

इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय संस्कृति की रीढ़ कही जाने वाली वानप्रस्थ परंपरा को पुनर्जीवित किया जाय। लोग यह रीति नीति अपनायें कि पूरा न सही आधा जीवन तो उस निमित्त लगाना चाहिए जिसके लिए मनुष्य जन्म की धरोहर स्रष्टा ने सौंपी है। यह उद्देश्य पूजा-पाठ भर से पूरा हो सकता है, इस भ्रम में किसी को भी नहीं रहना चाहिए। शारीरिक स्वच्छता के लिए जिस प्रकार स्नानादि नित्य कार्य आवश्यक है उसी प्रकार मानसिक शुद्धि के लिए उपासना, साधना, आराधना की आवश्यकता है। इतने पर भी आत्म परिष्कार और लोक मंगल में संलग्न रहने की आवश्यकता बनी ही रहती है। इसकी पूर्ति के लिए अधिकाधिक समय दान और अंशदान नियोजित करते रहना चाहिए। इस निर्धारण को कार्यान्वित करने का नाम वानप्रस्थ है। उसी मनः स्थिति में ऐसा कुछ बन पड़ना संभव है जिसमें आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह के विविध लाभों से लाभान्वित हो सकना बन पड़ा।

प्रचलन के अनुसार व्यक्ति संकीर्ण स्वार्थपरता के भव बंधनों में जकड़े हुए ही अपना आयुष्य बिता देता है। युग क्राँति ऐसी होनी चाहिए जिसमें हर विचारशील को परमार्थ का भी ध्यान रहे और उसके लिए समय एवं साधनों का एक बड़ा अंश उपयुक्त वातावरण बनाने में नियोजित रहे। यह प्रवाह चल पड़े तो समझना चाहिए कि उलटे को उलट कर सीधा कर दिया गया और उज्ज्वल भविष्य की संभावना का स्वरूप बन गया, सरंजाम जुट गया।

वानप्रस्थ-पुरोहित शब्द पुराने हैं। इन दोनों के साथ पाखंड की मात्रा इतनी अधिक जुड़ गई है कि इस तत्व-दर्शन का नया नाम देने की आवश्यकता पड़ी है ‘ ‘गुरु’ ‘ शब्द कभी देवोपम स्तर का परिचायक था, पर अब वह धूर्तता के अर्थ में, व्यंग-उपहास के साथ लिया जाता है। इसलिए पुराने शब्दों के स्थान पर ‘ ‘मार्गदर्शक’ ‘ शब्द का उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार पुरोहित को अब व्रतधारी कहा जाय यही उचित जाना। प्रज्ञा परिवार के लिए अपने को ‘ ‘ पुत्र’ ‘ कहते हैं। इसलिए यदि लंबा नामकरण अभीष्ट हो तो व्रतधारी प्रज्ञापुत्र भी कहा जा सकता है। संक्षेप करना हो तो “व्रतधारी” शब्द भी पर्याप्त है। परिव्राजक धर्म की व्याख्या भी इस शब्द में आ जाती है।

विश्व के हर कोने में युगदेवता ने अपना आह्वान गुँजाया है कि प्राणवान जीवंत भावनाशीलों में से जिन्हें भी विषमता का आभास हो वे समय की पुकार को सुन, युग धर्म की समझें और नवसृजन के क्षेत्र में श्रद्धा और साहसपूर्वक उतरें जिन्हें इस दिशा में चल पड़ने की उमंग उठे, उन्हें न्यूनतम नौ दिन के और अधिकतम एक महीने के किसी सत्र में शाँतिकुँज, हरिद्वार आने की तैयारी करनी चाहिए। यों अध्ययन और परामर्श से भी तत्वज्ञान का एक बड़ा अंश प्राप्त हो सकता है। चिंतन आ।र मनन का अध्यवसाय भी दिशा निर्धारण कर सकता है। पर उपयुक्त वातावरण में अभीष्ट ऊर्जा उपलब्ध करने का महत्व भी कम नहीं है। इसलिए समय के अनुरूप अपनी गतिविधियों को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने के लिए इन सत्रों में सम्मिलित होने के लिए कहा गया है। व्रतधारी को अपनी परिस्थिति के अनुरूप भावी कार्यक्रम बनाने में अधिक सुविधा रह सकती है। वैसे कुछ विचार विमर्श तो पत्र व्यवहार से भी संपन्न हो जाता है।

अच्छा होता आँशिक समयदान करने वाले वानप्रस्थों में से एक ऊँची श्रेणी, उभरती। उन्हें प्राचीनकाल के संन्यासियों का आधुनिक संस्करण कहा जा सकता है। कुछ तो आँशिक रूप से सेवा कार्य करते रहने पर भी बन ही पड़ता है, पर यदि पूरा मन, पूरा समय और पूरा जीवन ही लक्ष्य के लिए नियोजित किया जा सके तो उसे सोने में सुहागे की उपमा दी जा सकती है।

यह भ्रम मन में से निकाल ही देना चाहिए कि जो मात्र खुदगर्जी को ही सोचते, समझते और अपनाते हैं वे नफे में रहते हैं। मजे में रहते और मौज उड़ाते हैं। जो परमार्थ में समय और साधन लगाते हैं वे घाटे में रहते हैं वास्तविकता इससे ठीक उलटी। स्वार्थी भले ही कुछ संचय कर लेते और सुविधा-साधनों की दृष्टि से भारी पड़ते हों पर संकीर्णता के साथ और जो अनेक दुर्गुण जुड़े होते हैं उनके कारण व्यक्ति की आँखों में गया गुजरा ही सिद्ध होता रहता है। निष्ठुरता, अनुदारता को सघन बनाये रहने पर कोई आज तक व्यक्तित्व की दृष्टि से न तो ऊँचा उठ सका है, न आगे बढ़ सका। सड़ी-कीचड़ में उपजने और कुलबुलाते रहने वाले घिनौने कीड़ों से अधिक भारी वे बन ही नहीं पाते। अपने परायों की श्रद्धा-सहानुभूति से उन्हें वंचित ही रहना पड़ता है। ऐसे मनुष्य अपने आपको अकेला अनुभव करते रहते हैं, और सुनसान में रहने वाले भूत पलीतों जैसी जिन्दगी जीते हैं। ऐसों के पास कुछ सुविधा साधन रहते भी हों तो व साथी-सहयोगियों के अभाव में, निरानंद एवं भारभूत बनकर ही रहते हैं।

सुख बाँटने की वस्तु है और दुःख बँटा लेने की। इसी आधार पर आँतरिक उल्लास और अन्यान्यों का सद्भाव प्राप्त होता है। महानता इसी आधार पर उपलब्ध होती है। .......... स्तर के श्रेष्ठ जन सहज कर लेते हैं, जिनके आधार पर वे जन जन का सद्भाव अर्जित करते हैं। सराहना के पात्र बनते हैं। लोक परलोक सुधारते और महामानव की पंक्ति में अपना प्रतिष्ठित स्थान बनाते हैं। ऐसे लोग भूखे-नंगे भी नहीं रहते। खुशहाली के लिए जन सहयोग की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। वह उन्हें अनायास ही प्राप्त होती रहती है। उदारता के बदले अन्यान्यों की उदारता भी मिल कर रहती है। प्रसन्नता और प्रफुल्लता इसी पर अवलंबित हैं।

पुरोहित वर्ग को इसीलिए समाज का मूर्द्धन्य माना जाता रहा है कि वे मात्र पदार्थ-जन्य सेवा ही नहीं करते वरन् पिछड़ों को ऊँचा उठाया आगे बढ़ाने वाली प्रेरणाएं भी बरसाते हैं। आर्थिक सहायता तो कुछ समय ही किसी का काम चलाती है। कुपात्रों द्वारा दुरुपयोग बन पड़ने पर तो वह अनर्थकारी भी बन जाती है। ऐसी दशा में ग्रहीता ही नहीं दाता भी नरक जैसे अपयश का भाजन बनता है। किंतु आदर्शवादी प्रेरणाएं ऐसी हैं जिन्हें पाकर कोई भी भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्र में निश्चित रूप से प्रगति ही करता है। इस अनुदान के बदले प्रतिदान न सही कृतज्ञता तो मिलती ही देश, धर्म, समाज, संस्कृति की कुछ कहने योग्य सेवा कर पाते हैं। बदले में वे वह उच्चस्तरीय प्रतिफल प्राप्त कर लेते हैं। जिससे नर वानरों को वंचित ही रहना पड़ता हैं।

आधी आयु परमार्थ में लगाने की प्राचीन देख परंपरा का ही सत्परिणाम था कि सतयुगी वातावरण में जन्में लोग देवमानव कहलाते रहे और इसी धरती को स्वर्गोपम बनाने की भूमिका निभाते रहे। उज्ज्वल भविष्य की संरचना होने की पुण्य वेला में ऐसे ही देवमानवों के प्रयासोँ की आवश्यकता पड़ेगी। उसकी पूर्ति के लिए जिनमें भी भाव संवेदना विद्यमान हो उन्हें उसी राजमार्ग पर चलने का साहस जुटाना चाहिए जिस पर कि अपने पूज्य पूर्वज चलते रहे हैं उच्चस्तरीय लोक-सेवियों की कमी न रहने पर जन-जन की भौतिक और आत्मिक प्रगति प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगेगी। युग की इस माँग को पूरा करने के लिए हमें स्वयं ही सोचना और बिना साथियों की, अग्रगामियों की प्रतीक्षा किये स्वयं ही बढ़ चलने का आदर्श उपस्थित किया भी जाता रहा है। आगे भी ऐसे अनेकानेक व्यक्ति नरपशु के पास से मुक्त हो इस कार्य में जुड़ेंगे-ऐसा विश्वास हैं।


संयम की साधना (Kahani)

बाल ब्रह्मचारी दयानंद ने दो सांडों को आपस में लड़ते देखा। वे हटाये हट नहीं रहे थे। स्वामी जी ने दोनोँ के सींग दो हाथों से पकड़े और मरोड़कर दो दिशाओं में फेंक दिया। डर कर वे दोनों भाग खड़े हुए। ऐसी ही एक घटना और है।

स्वामी दयानंद शाहपुरा में निवास कर रहे थे। जहाँ वे ठहरे थे, उस मकान के निकट ही एक नयी कोठी बन रही थी। एक दिन अकस्मात् निर्माणाधीन भवन की छत टूट पड़ी। कई पुरुष उस खंडहर में बुरी तरह फँस गए। निकलने कोई रास्ता नजर आता नहीं था। केवल चिल्लाकर अपने जीवित होने की सूचना भर बाहर वालों को दे रहे थे। मलबे की स्थिति ऐसी बेतरतीब और खतरनाक थी कि दर्शकों में से किसी की हिम्मत निकट जाने की हो जाय तो बचाने वालों का साथ ही भीतर घिरे लोग भी भारी-भरकम दीवारों में पिस जा सकते हैं। तभी स्वामी जी भीड़ देखकर कुतूहलवश उस स्थान पर आ पहुँचे, वस्तुस्थिति की जानकारी होते ही वे आगे बढ़े और अपने एकाकी भुजा बल से उस विशाल शिला को हटा दिया, जिसके नीचे लोग दब गये थे।

आसपास एकत्रित लोग शारीरिक शक्ति का परिचय पाकर उनकी जयकार करने लगे। उनने सबको शाँत करके समझाया कि यह शक्ति किसी अलौकिकता या चमत्कारिता के प्रदर्शन के लिए आप लोगों को नहीं दिखायी है। संयम की साधना करने वाला हर मनुष्य अपने में इससे भी विलक्षण शक्तियों का विकास कर सकता है।


धारावाहिक विशेष लेखमाला – 14 - युगपुरुष पूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य - युगऋषि जिनने साधना सूत्रों को सरल

अनेकानेक जाल-जंजाल से भरी, कई प्रकार के निग्रहों-निषेधात्मक आदेशों से युक्त साधना विज्ञान की पुस्तकों को देखकर आज के युग के किसी भी व्यक्ति को लग सकता है कि ये सब उसके लिए नहीं है। कोई देवलोक से विशिष्ट क्षमताएँ लेकर आया व्यक्ति ही यह कार्य कर सकता है, एक सामान्य व्यक्ति के लिए तो मात्र पेट-प्रजनन की जिंदगी जीकर जीवन किसी तरह काट देना भर हैं, यही तथ्य, सबको समझ में आता है व लोक-व्यवहार में दृष्टिगोचर भी होता है। लेकिन पूज्यवर गुरुदेव, पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने अपने जीवन के अनुभवों से हर व्यक्ति के समक्ष एक खुली किताब रखते हुए कहा कि साधनहीन व्यक्ति भले ही जीवन जीले किंतु साधना विहीन जीवन न जिये एवं उसके लिए सरलतम योग साधनात्मक पद्धतियों का आहार से लेकर दैनंदिन जीवन व्यवहार का एक ऐसा पहलू प्रस्तुत किया जो हर किसी के लिए सुगम है।

ऐसे व्यक्ति ही युगऋषि कहलाते हैं, जो जटिल साधना पद्धतियों में युगानुकूल हेर फेर कर अपनी जीवन रूपी प्रयोगशाला में उसका भली भाँति प्रयोग कर उन्हें सहज-सुगम बना देते हैं। पूज्यवर का सारा जीवन इसकी साक्षी देता है। उनने स्वयं 24-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण किए। बड़ी कठोर साधना की। मात्र जौ व छाछ पर रहकर उस अवधि को पूरा किया। यों वह अवधि 24 वर्ष की थी किन्तु बीच में अदृश्य गुरु सत्ता का आदेश आने पर वह प्रायः 27 वर्षों में पूरी हुई एवं 1953 में उनकी पूर्णाहुति संपन्न हुई। उनके निज के जीवन के लिए यह साधना अनिवार्य थी। इसके कई गुह्य व परोक्ष पहलू हमें किसी को भी ज्ञात नहीं है। परम वंदनीया माताजी के अतिरिक्त उन्हें कोई जानता भी नहीं है। किन्तु उनने जन-जन को देखा था। यह भी देखा व पाया था कि आत्मबल, अध्यात्म शक्ति के अभाव-वश व्यक्ति दीन−हीन जीवन जीता देखा जाता है। भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जिन दिनों अपने हाथ पाँव फेंक रहा था, अनेकानेक व्यक्ति बढ़चढ़कर आगे आ रहे थे, पूज्यवर के मन में एक ही बात थी कि विराट स्वतंत्र भारत को साँस्कृतिक दृष्टि से आजादी दिलाने वाले मनोबल, आत्मशक्ति-संपन्न मरजीवड़े कैसे व कहाँ से आयेंगे ?

जब श्री अरविन्द व श्री माँ अपने पूर्ण योग का प्रतिपादन कर अतिचेतन के महावतरण की चर्चा पांडिचेरी में कर रहे थे, तब एक ही संकल्प पूज्यवर के मन में उनकी गुरुसत्ता का दिया उभरता रहता था कि अति मानस जो आएगा उसके लिए सुपात्र एक नहीं, अनेकानेक-लाखों-करोड़ों, व्यक्ति चाहिए जो मात्र भारतवासी हों जरूरी नहीं, सारा विश्व उसमें भागीदारी कर सके। इसलिए यह पद्धति जन सुलभ हो, प्रत्येक के लिए सरल हो एवं क्रमशः जीवन में उतारने हुए सभी उसे कर सकें। श्रेष्ठ मानव बनें, ग्रंथिमुक्त-कुँठा-संत्रस्तरहित व्यक्तित्व जन्में, बहुचित्तीय (पाँलिसाइकिक) नहीं बल्कि एकनिष्ठ भाव से काम करने वाले हर श्रेणी के व्यक्तियों से मिलकर बना समुदाय अपनी चिंतन साधना से समष्टि मन का निर्माण कर सके ताकि समूह चेतना के जागरण से व्यक्ति-परिवार ही नहीं समाज की अभिनव संरचना का भी सरंजाम जुट सके। इतने विराट स्तर पर मानव मात्र के कल्याण की बात युगऋषि स्तर की सत्ता ही सोच सकती है।

पूज्यवर बहुधा कहा करते थे, कि भीतर से हर व्यक्ति के अन्दर देवत्व भरा पड़ा है, आवश्यकता मात्र उसे उभारने की है। मनुष्य का स्वाभाविक रुझान की उत्कृष्टता परक है हुआ देवता है, उठा हुआ पशु उसे संयम-शील व उदात्त जीवन जीने की प्रेरणा भी दी जा सकती है। भगवत्प्रेरणा, ब्रह्मांडीय सुव्यवस्था के साथ तारतम्य बिठाकर चलने के लिए दैनंदिन जीवन में जिन अनुशासनों का समावेश करना जरूरी है, वे प्रारम्भिक साधकों के लिए न्यूनतम हों एवं वे इसे दैनंदिन जीवन का ही एक अंग माने, यह समझाने का प्रयास उनने 1940 से प्रकाशित हो रही अपनी अखण्ड-ज्योति पत्रिका को दिये जाने वाले सतत् मार्गदर्शन से आरम्भ कर दिया था।

व्यक्ति का आहार सही हो व विचार करने की प्रक्रिया उसकी सुव्यवस्थित बने, यही वह जीवन योग था। जिसे पूज्यवर ने जन-जन को बताया। तंत्र; कुँडलिनी षट्चक्र वेधन के बारे में तरह-तरह की जिज्ञासाएँ लेकर आने वाले व्यक्ति से वे यही कहते थे कि “पहले तुम आहार सही करली सोचने की पद्धति बदल डालो, फिर पाओगे कि तुम्हारी कुँडलिनी जागरण प्रक्रिया का शुभारंभ हो गया।” वे अध्यात्म को जिंदगी का शीर्षासन कहते थे व बताते थे कि जब भी अध्यात्म किसी के जीवन में पूर्ण रूप से उतर जाता है तो वह उसके व्यक्तित्व का आमूल-चूल परिष्कार कर उसे बदल कर रख देता है। गोय के नाम पर उछलकूद करने वाले, तरह तरह की नाटकबाजी-कलाकारी दिखाने वाले तथा हठयोग की प्रारम्भिक क्रियाओं को ही सब कुछ मानने वालों की हँसी उड़ाते हुए वे कहते थे कि इनने योग का मतलब स्वयं समझा नहीं, औरो को और भ्रम जंजाल में भटकाते रहते हैं।

गायत्री के चौबीस अक्षरों के तत्वज्ञान को उनने समूचे जीवन के उत्कर्ष का मूल माना तथा उसकी विशद व्याख्या के माध्यम से उनने बताया कि गायत्री की महानता के आदर्शों को जीवन-यात्रा का एक अंग बनाने पर संपन्न होती है। इसके लिए जहाँ व्यक्ति का चिंतन सही रखने के लिए आहार सही होना जरूरी हैं, वहीं श्रेष्ठ विचारों को आमंत्रित करने की कला भी उसे सीखनी होगी तभी ध्यान सफल होगा। जीवन जीने की कला के नाम से उनने जिस योग साधना को जनम दिया। वह अपने आप में विलक्षण किंतु सरल हैं। उनने कहा कि नित्यप्रति के अपने आहार पर ध्यान दो कि तुम क्या खा रहे हो पर कड़ा तप करने की कोई जरूरत किसी को भी नहीं है। हम शाकाहारी बनें, सात्विक आहार लें एवं अन्नों वै मनः के तथ्य को ध्यान में रखें कि जैसा हम खाते हैं, वैसा ही हमारा चिंतन बन जाता है। आँवलखेड़ा से आगरा, मथुरा से हिमालय-उत्तरकाशी-सप्तसरोवर व फिर हरिद्वार के शाँतिकुँज में उनके प्रयोग सतत् चलते उनने ‘अस्वाद व्रत जन जन से कराके सबको सिखाया। नमक-शक्कर व मसाला आदि का परित्याग मात्र एक ही दिन व्यक्ति करके देखे तो पाएगा कि इससे उसके स्वादेन्द्रियों की कड़ी परीक्षा हो रही है। जीभ यदि स्वाद के बिना कुछ घंटों रहना भी सीख ले तो दो संयम रसना का व जननेन्द्रियों का स्वयं सधने लगने की प्रक्रिया गतिशील हो जाती है, यह अनेकों ने अपने जीवन में परीक्षा कर सफल होता पाया।

गायत्री तपोभूमि मथुरा में भी उनने कल्प साधना- शाक कल्प, दुग्ध कल्प, फलों के कल्प के प्रयोग किए, कइयों से कराए तथा शाँतिकुँज में कृच्छा चाँद्रायण प्रक्रिया में अमृताशन के रूप में उबले नाम मात्र के मसाले के आहार, हविष्यान्न के प्रयोग तथा पूर्णिमा से अमावस्या व फिर पूर्णिमा तक क्रमशः आहार घटाने व बढ़ाने का प्रयोग कर अन्नमय कोश को साधना व इससे प्राणमय कोश परिष्कार की प्रक्रिया में आगे बढ़ने का सरलतम प्रयोग सबको सिखाया। युग के अनुरूप जो व्यक्ति के शरीर- मन आज ढल गये हैं, उनमें सरलतम पद्धति हो सकती है, इससे लेकर कठिनतम का सत्त विकास पूज्यवर की साधना प्रणालियों में पाये जाते हैं। व्रतों को भी उनने उतना ही महत्व दिया पर उस रूप में नहीं, जैसे वे आज प्रचलित है। आज तो फलाहार के नाम पर अनापशनाप खाकर मनुष्य पेट में और अधिक ठूँसता चला जाता है जबकि व्रत का मोटा अर्थ है- शरीर को थोड़ी छुट्टी -अवकाश दे देना तथा सूक्ष्म अर्थ है मन को निभ्रांत कर श्रेष्ठ चिंतन का सत्त अभ्यास करने की प्रक्रिया सीखना। नवरात्रि साधना के साथ आहार संयम का सरल सुगम रूप पूज्यवर ने दो चीजों का प्रयोग- एक खाने की एक लगाने की या मात्र तरल प्रवाही द्रव्योँ का प्रयोग, यह बताया। नवरात्रि की अनुष्ठान साधना तो ढेरों व्यक्ति करते हैं तो कितने सही अर्थों में मन लगा पाते हैं। यदि वे जल उपवास जैसी या निर्जला जैसी कड़ी तथा फलाहार की अति वाली दो विपरीत धुरियों के बीच एक सामान्य कड़ी के ही प्रयोग चालू करें तो बहुत सफल साधना उनकी होती रह सकती है, यह पूज्यवर ने समय समय पर बताया।

पंचकोशी व कुँडलिनी जागरण साधना, प्राण प्रत्यावर्तन साधना, आध्यात्मिक भावकल्प साधना आदि के रूप में शांति कुँज में समय-समय पर सत्र तो होते रहे हैं किंतु पूज्यवर ने मुख्य ध्यान जन-जन के लिए साधना सूत्रों को सुगम बनाने पर विशेषतः दिया व जीवन साधना सत्र इसी प्रयोजन के निमित्त आयोजित भी होते रहें। इन्हें बाद में संजीवनी साधना नाम दिया गया जिनमें जीवन जीने की कला के शिक्षण के सारे सूत्र गूँथ दिये गए। यह अपने आप में एक विलक्षण संश्लेषित प्रक्रिया बन गयी। दैनिक जप, जप के साथ ध्यान तथा प्रज्ञायोग को नियमित संपादित किया जाना, स्वाध्याय एवं ध्यान योग लययोग-नादयोग के रूप में योग त्रयी का दिनचर्या में समावेश अपने आप में एक साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।

प्राणायाम के माध्यम से वह भी सीधे सादे- सरल, प्राणाकर्षण या लोभ विलाभ सूर्यवेधन या नाड़ी शोधन से कोई व्यक्ति कैसे अपने सूक्ष्म शरीर को प्राणमय तथा मनोमय कोश को परिष्कृत जाग्रत कर सकता है, इसे पूज्यवर ने समझाकर इस भाँति हृदयंगम करा दिया कि आज यह प्रक्रिया अपनाकर अनेकों व्यक्ति न केवल रोगमुक्त, मनो विकारों से मुक्त अपितु शाँत-शीतल मनःस्थिति जीवन जीते देखे जा सकते हैं, जिसमें उन्हीं प्राणशक्ति जीवनी शक्ति तो बढ़ी ही है-आभामंडल भी परिष्कृत हुआ है। पाँच मिनट के इस सरल प्रयोग ने कुँडलिनी जागरण की सामूहिक प्रक्रिया के लिए सुपात्रों का निर्माण आरंभ कर दिया है व स्वयं में यह एक बड़ी विलक्षण प्रक्रिया है। आज देश विदेश में अनेकों व्यक्ति उगते सूर्य के ध्यान से लोम-विलोम सूर्य बेधन प्राणायाम कर अपनी प्रसुप्त क्षमता को जगाकर दिनभर उल्लास भरा जीवन जीते देखे जा सकते हैं।

ध्यान को पूज्यवर ने बड़ा सुगम बनाया, उनने समय-समय पर कहा कि सामूहिक महापुरश्चरण से समूह मन तो विकसित होगा ही एवं प्राण चुँबक निज का बढ़ेगा ही, व्यक्तिगत ध्यान से आने वाले युग की एक निराली ध्यान चिकित्सा पद्धति विकसित होगी। ध्यान के लिए विंदुयोग, त्राटक दीपक की लौ या उगते सूर्य का ध्यान सबसे सरल प्रयोग था जिससे प्रतिभा की प्रखरता ही नहीं, विशिष्ट उपलब्धि अंतः ऊर्जा के जागरण के रूप में सबको मिल रही थी। ध्यान के दौरान विशिष्ट विचारों को आमंत्रित करना, विधेयात्मक चिंतन द्वारा व्यक्तित्व को विचारों का स्नान कराना तथा अपनी अनगढ़ता को सुगढ़ता में बदलने की यह प्रक्रिया अब सारे विश्व में लोकप्रिय हो गयी है। रंगों का ध्यान, रागों का सुनते हुए ध्यान, दृश्य मूर्ति पर साकारो पासना में ध्यान यह प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिन्हें जनसामान्य बिना इस विशिष्ट मार्गदर्शन के कर नहीं सकता था। आज सभी व्यक्ति सारे विश्व में इन साधनाओं को कर रहे हैं एवं लाभान्वित हो रहे हैं।

उपासना परम सत्ता की , साधना अपने आपकी तथा आराधना विराट विश्व ब्रह्मांड की , इस समाज की यह एक निराली त्रिधा साधना प्रक्रिया पूज्यवर के द्वारा ही निर्धारित है। उपासना में आत्मसत्ता को परमतत्व से एकाकार करने की भावना कषाय कल्मषों का परिशोधन, साधना में विचार, अर्थ, समय व इंद्रिय-संयम व उसके लिए सत्त स्वाध्याय तथा आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है। युगसाधना का कायाकल्प कर प्रत्येक के लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त करने वाले उस युगऋषि को महाकाल की सत्ता को बारंबार प्रणाम है।


विरागी (Kahani)

अप्सरा रंभा शुकदेव जी को लुभाने पहुँची। शुकदेव जी सहज विरागी थे। उन्होंने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। रंभा उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने लगी। उन्होंने पूछा- “देवी! आप मेरा ध्यान अपनी ओर क्यों आकर्षित करते का प्रयास कर रहीं हैं?” रंभा ने कहा-”तुम्हें जीवन का ऐसा रस चखने हेतु, जो तुमने नहीं चखा। “

शुक बोले- ‘देवी! मैं तो उस सार्थक रस को पा चुका हूँ। जिससे क्षण भर हटने से जीवन निरर्थक होने लगता है:-

“ न सेवितो येन क्षणे मुकन्दो वृथा गतं तस्य नरस्य जीनम्॥ “

एक क्षण के लिए भी यदि परमात्मा का सेवन न किया जाय, तो मनुष्य का जीवन निरर्थक होने लगता है। इसलिए, देवि में तो उस रस को छोड़कर जीवन को निरर्थक बनाना नहीं चाहता। कुछ और रस हो भी तो मुझे क्या ?

रंभा ने अपने रूप शरीर की विशेषताएँ बतलानी प्रारंभ की शुकदेव ने सुना और बोले- “देवी! आज हमें पहली बार यह पता लगा कि नारी शरीर इतना सुँदर , सुगन्धित होता है। अब आपकी कृपा से यह पता लग गया। अब यदि भगवत् प्रेरणा से पुनः जन्म लेना पड़ा, तो नौ माह सी आप जैसी ही माता के गर्भ में रहकर इसका सुख लूँगा। अभी तो प्रभु कार्य ही प्रधान हैं।”

सहज विरागी शुक ने नारी शरीर की निंदा नहीं कीं केवल अपनी एकनिष्ठ बुद्धि से विधेयात्मक मार्ग चुना।

*समाप्त*