मानव में छिपी अनंत सामर्थ्य तथा गौरवगरिमा के बहिरंग में प्रकटीकरण का एक ही उपाय है- अनवरत श्रम। सतत् अध्यवसाय। खाली न बैठे रह स्थूलशरीर का परिपूर्ण उपयोग कर इस उद्यान को जो स्रष्टा ने बनाया है, और भी सुन्दर बनाना। श्रमनिष्ठा का यह नहीं हैं कि शरीर को थका डाला जाय। यह एक प्रकार की साधना है, जिसमें निराकार को साकार में परिणत किया जाता है और साकार को सुविकसित-सुसज्जित बनाया जाता है। जड़ता की स्थिति को प्रगति में बदलने की सामर्थ्य केवल श्रम में है। श्रम से ही व्यक्ति का अहंकार गलत तथा सेवा साधना की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। जिसने श्रम की अवज्ञा की वस्तुतः उसने अपनी प्रगति का मार्ग अवरुद्ध कर लिया।
पदार्थ का छोटा परमाणु भी बिना विश्राम किये अनवरत गति से सक्रिय है। पवन को एक क्षण के लिए भी चैन नहीं है। वह सतत् प्रवाहित होता रहता है। हिम ग्लेशियर से पिघलकर बहता , जल सतत् प्रवाहित हो समुद्र में मिलता रहता है। सूर्य और तारे सभी अपने-अपने नियत कर्मों में संलग्न है। कभी अवकाश लेने की मन में नहीं सोचते।
धरती को हम माता कहते हैं व पृथ्वी के हम पुत्र है। “माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्याम्” तो फिर उसके स्वप्नों को कि उसे अधिक शोभायमान बनाया जाय, पूरा करने का दायित्व भी हम पुत्रों का ही है। हर मनुष्य से नियंता की यही अपेक्षा है कि मानवी पुरुषार्थ का पूरा उपयोग हो और सुखद संभावनाओं से सारा वातावरण अभिपूरित हो जाय।
वस्तुतः पसीने से पवित्र और कुछ नहीं। जिस ललाट पर वह झलकता है, उसे समुन्नत बनाता चला जाता है। जिस भूमि पर गिरता है, उसे नंदन वन बना देता है। अनगढ़ पत्थरों को देवप्रतिमा के रूप में पूजनीय बनाने का श्रेय श्रम के देवता को ही दिया जा सकता है। जो भी कुछ इस संसार में शुभ है , सुखद है, श्रेयस्कर है , उसे केवल श्रम साधना से ही पाया जा सकता है। समस्त सिद्धियाँ श्रम देवता के अनुग्रह से ही पायी जाती रही है और भविष्य में भी पायी जाती रहेंगी।
कोई समय था जब हनुमान का पता लगाते-लगाते भगवान राम ऋष्यमूक पर्वत पर गये थे और उनके द्वारा सहयोग की प्रार्थना स्वीकार कर लिये जाने पर बड़े प्रसन्न भी हुए थे। हनुमान मात्र सुग्रीव के सेवक थे और किसी प्रकार अपनी और अपने मलिक की सुरक्षा व्यवस्था भर कर पाते थे। पर जब उन्होंने उच्च प्रयोजन के लिए अपने को समर्पित किया तो वे राम के प्राण प्यारे बन गये और इतनी समर्थताएं उपलब्ध करने में सफल हुए जिनकी चर्चा सुनने भर से हृदय हुलसित और पुलकित होने लगता है। समुद्र लाँघने, लंका को ध्वस्त करके रख देना, दुर्दांत दैत्यों से लोहा लेना, संजीवनी बूटी वाला पर्वत उखाड़कर लाना, लक्ष्मण को पुनर्जीवित कर सकने में प्रमुख भागीदार होना जैसी उपाधियाँ उन्हें इसी आधार पर मिली कि भगवान की उच्चस्तरीय आवश्यकता के महत्व का अनुमान लगाते हुए वे उस प्रयोजन में तत्काल जुट पड़ते। यदि पशुवृत्तियों के साथ जुड़ी हुई संकीर्ण स्वार्थपरता ही उनके गले बँधी रहती तो हनुमान भी अन्य पशु पक्षियों की तरह अपनी जीवन लीला समाप्त करके कभी के विस्मृति के गर्त में चले गये होते। जबकि आज वे राम पंचायत में छठे सदस्य के रूप में चित्रित भी किये जाते हैं और राम से अधिक संख्या में हनुमान के मंदिर बने दीख पड़ते हैं।
अर्जुन का प्रसंग भी कुछ ऐसा ही है। कृष्ण, विखंडित भारत को सुगठित विशाल भारत को सुगठित विशाल भारत बनाना चाहते थे। इसके लिए महाभारत योजना बनी भी। कृष्ण अपने मित्र अर्जुन को उस महान प्रयोजन का प्रमुख भागीदार बनाने के लिए कह रहे थे। अर्जुन अपनी व्यक्तिगत सुविधा क्षुद्रता और मानसिकता को छोड़ना नहीं चाहते थे। कृष्ण ने उसे समझाया ही नहीं दुत्कारा भी और अंततः इसके लिए सहमत कर लिया कि दैवी निर्धारणों में सहयोगी बनना ही श्रेयस्कर है। भले ही वह कष्टकर ही क्यों न हो। समर्पित होने पर अर्जुन महानता की पक्षधर ईश्वरेच्छा के साथ जुड़ गया और आज गीता के जनक कृष्ण की तरह ही अर्जुन की भूमिका को सराहा जाता है।
समय की माँग को ध्यान में रखते हुए रामकृष्ण परमहंस ने दबाव देकर विवेकानंद को उच्च प्रयोजनों की पूर्ति में लगाया। उनके माध्यम से जो कार्य बन पड़े, उससे वह लाभ हुए जो आगे पढ़ते उससे वह लाभ हुए जो आगे पढ़ते रहने पर कोई छोटी बड़ी नौकरी पा लेने पर नहीं मिल सकता था। विनोबा कोई छोटी बड़ी नौकरी पा लेने पर नहीं मिल सकता था। विनोबा कोई दुकानदारी करते हुए मरते तो उनकी गरिमा को आकाश तक पहुँचाने वाले वे क्रियाकलाप कैसे बन पड़ते जिनके कारण उनका जीवन ही नहीं दर्शन भी भूर-भूर सराहा जाता है।
मनुष्य की सीमित क्षमता छोटे बड़े निर्माणों तक ही सीमित है। वह छोटे बड़े सीमाबद्ध सुधार परिवर्तन भी कर सकता हे। पर समस्त संसार में बसने वाले 600 करोड़ मनुष्यों का चिंतन स्तर रुझान एवं क्रियाकलाप आमूलचूल परिवर्तन प्रस्तुत करना केवल निर्याता के लिए ही संभव है। उसी ने यह निश्चय और संकल्प किया भी है कि इसे बदला जाय बिना मानवजाति का सहयोग प्राप्त किये भी वह अपना प्रयोजन पुरा कर सकने में पूरी तरह समर्थ है। उसके अभी तक हुए अवतारों और धर्म संस्थापन की प्रक्रिया पूरी होती रहीं है। उनका “यदा यदा हि धर्मस्य” वाला आश्वासन समयानुसार सदा ही पूरा होता रहा है फिर इस बार वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाने पर सुधार परिवर्तन का दैवी निर्धारण पूरा न हो, ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता।
इन दिनों परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही विशिष्ट है कि नये सिरे से नये रूप में मानवमात्र का भाग्य बदला जाय व सतयुग को अवतरित कर सृष्टि का और भी सुन्दर व समुन्नत करेंगे ही परन्तु समाज में चहुँ और विद्यमान प्रतिभा यदि यों ही प्रसुप्त पड़ी रही, इस बारह वर्ष की 2005 तक की संधिवेला को आलस्य प्रमाद में नष्ट करती रहीं तो इस श्रेय से तो वंचित होगी ही जो उन्हें समय रहते समझदारी अपनाने से मिलता, वे अपयश-धिक्कार के भी भागी बनेंगे तथा दैवी प्रकोप भी उन्हें सहना पड़ेगा। अच्छा हो समय रहते हम समझदारी अपनालें।
गरीबी अपने आप में कोई अपमान जनक वान नहीं है। उसे दुत्कारा तब जाना है, जब वह मूर्खता आलस असावधानी यह दुर्व्यसनों की वजह से आयी है।
प्रेम की उपलब्धि परमात्मा की उपलब्धि मानी गई है। प्रेम परमात्मा का भावनात्मक स्वरूप है, जिसे अपने अंतर में सहज ही अनुभव किया जा सकता है। प्रेम प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग हैं। परमात्मा को पाने के अन्य साधन कठिन कठोर दुःसाध्य तथा दुरूह है। एकमात्र प्रेम ही ऐसा साधन है, जिसमें कठिनता, कठोरता अथवा दुःसाध्यता के स्थान पर सरसता सरलता और सुख का समावेश होता है प्रेम की आराधना द्वारा परमात्मा स्वरूप ही ही जाता है।
प्रेम जो लौकिक अर्थों में था, उसमें भी भावनाओं के समर्पण के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं था। भावनायें नहीं रह जाती तो अपनी स्त्री पुत्र पुत्री और भाई−बहिनों के लिए भी तो कोई प्रेम नहीं रह जाता पंच भौतिक पदार्थों के प्रति प्रेम भावनाओं का प्रतिरोपण मात्र है। भावनायें आवेश है, विद्युतीय चुम्बक है। उन्हें तो जहाँ भी प्रतिरोपित कर दिया जाता है वहीं प्रेम का सुख मिलने लगता है।
पत्थर भी तो पंच भौतिक पदार्थ ही है। आने वाली ध्वनि को प्रतिध्वनित करने का रगड़कर अग्नि पैदा करने का उनके सूक्ष्म कणों में जल और आकाश का अंश होने का प्रमाण तो आज वैज्ञानिक भी दे रहे है कोई भी जड़ से जड़ वस्तु में भी चेतना का नियम सर्वत्र भावनाओं की उपस्थिति का प्रमाण ही तो है। तब फिर क्या पत्थर की मूर्ति हमें बदले में कुछ नहीं दे सकती। यदि हमारे अंतःकरण का प्रेम अपने स्वार्थ की सीमा को तोड़कर प्रत्येक वस्तु में तू ही तू के दर्शन करने लगे तो इन पत्थर की गढ़ी हुई मूर्तियों में ही भगवान् के दर्शन किये जा सकते हैं।
इस तरह के सभी प्रेम “तस्वैवाह” अर्थात् मैं उसी का हूँ की सीमा के अन्दर आते हैं। उसमें प्रेम का आकर्षण का भाव तो है पर वह पर्दे में है। उसमें अपनापन अपना स्वार्थ जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। दूसरी प्रकार का प्रेम ‘तस्वैवाह’ मैं तेरा ही हूँ परमात्मा की अमुख उपस्थिति का बोध कराता है। हम अनुभव करते हैं कि हम अपने आप में अपूर्ण है। इस अपूर्णता को जब तक भरा नहीं जाता तब तक संतोष नहीं होता शाँति नहीं मिलती प्रसन्नता नहीं होती। संसार में मनुष्य स्वार्थ-ही-स्वार्थ चाहकर भी जिंदा नहीं रह सकता। उसे अपने स्वार्थ को जब कहीं प्रतिरोपित होने का अवसर मिलता है, ऐसा प्रेम अपनी पत्नी के प्रति हो सकता है। पत्नी से हमारा कोई रुधिरगत संबंध नहीं होता। एक व्यक्ति पूर्व से चल कर आता है दूसरा पश्चिम से आकर मिलता है दोनों एक दूसरे को जानते भी बहुत कम है किंतु समर्पण के भाव ने साँसारिक दूरी को इतना कम कर दिया है कि जोड़े में से एक-दूसरे को देखे बिना रह ही नहीं सकता। मिलन के प्रारंभिक दिनों में एक की, दो-एक दिन की बिछुड़न भी दूसरे के लिये कई वर्षों के समान असह्य हो जाती है। समर्पण प्रेम की इस भावना में शक्ति-सुख का स्थान अधिक तो है पर उसमें भी परमात्मा सम्मुख ही था, अपने भीतर मिल नहीं सका। ऐसे कोई नियम नहीं थे कि चाहते हुए भी स्त्री-पुरुष दोनों एकाकार हो जाते-दो न रहकर एक ही शरीर में समा जाते। न रहकर एक ही शरीर में समा जाते। काम-वासना उसी की भटक है, जिसमें मनुष्य पाता तो कुछ है नहीं, अपना आकर्षक और आकर्षण और कम कर लेता है। काम रूपी बीज को यदि प्रेम रूपी वृक्ष व भक्ति रूपी फल में बदल लिया जाय तो फिर आनंद ही आनंद आ जाता है। प्रेम के विकास की तब एक तीसरी और अंतिम भूमिका जो पत्थर को भी भगवान् बना देती है, वह है त्वमेवाह अर्थात् मैं तो तू ही हूँ। यह समर्पण की चरमसीमा है। इसमें मैं व तू दोनों मिलकर एकाकार हो जाते हैं।
सच कहें तो मानव जीवन का आज तक जो भी विकास हुआ है, वह सब प्रेम का संबल पाकर हुआ है। आज घृणा और ईर्ष्या द्वेष के कारण लोगों के दिल-दिमाग बेचैन उदास और खिन्नमाना बने रहते हैं। निर्माणकर्ता प्रेम है, जिससे विशुद्ध कर्तव्य-भावना का उदय होता है। हम यदि इस भाव अपने जीवन में धारण कर पायें तो अमीरी हो या गरीबी, शहर में रहते हो या गाँव में मकान पक्का हो अथवा कच्चा, एक ऐसा जीवन जी सकते हैं, जिसे सूखी खुशहाली शाँति भरा जीवन कह सकते हैं।
चरित्र का उत्कृष्टतम रूप सच्चा प्रेम है। यह मानवता की सर्वश्रेष्ठ साधना है, जिससे आत्मबल प्राप्त होता है। निर्भीकता, दृढ़ता साहस, पवित्रता त्याग, सत्यनिष्ठा और कर्तव्य-भावना का आधार शुद्ध और पवित्र प्रेम है। इसे अपने जीवन में धारण करने वाला पुरुष मानव न रहकर महामानव और देवता बन जाता है। व्यक्ति का जीवन खिल उठता है। ऐसे कर्तव्य-निष्ठ नागरिकों के बाहुल्य से ही राष्ट्रों के हित फलते-फूलते रहते हैं। प्रेम मानव-जीवन की सार्थकता है। प्रेमविहीन जीवन तो पशुओं का भी नहीं होता।
प्रेम एक निर्मल झरना है। उसके प्रवाह में जो भी आ जाता है, वह निर्मल हो जाता है। पात्र और कुपात्र की घृणा जैसे झरने के स्वच्छ प्रवाह में नहीं होती है वैसे ही प्रेमी के अंतःकरण में किसी प्रकार की ईर्ष्या-विद्वेष या घृणा की भावनायें नहीं होती। महात्मा गाँधी अपने आश्रम में अपने हाथों से एक कोढ़ी की सेवा-सुश्रूषा किया करते थे। इसमें उन्हें कभी भी घृणा पैदा नहीं होती थी। प्रेम की विशालता में ऊपर से जान पड़ने वाली मलिनतायें भी वैसे ही समा जाती हैं जैसे हजारों नदियों कूड़ा कबाड़ समुद्र के गर्भ में विलीन हो जाता है। प्रेम आत्मा के प्रकाश से किया जाता है। आत्मा यदि मलिनताओं से ग्रसित है तो भी उसकी नैसर्गिक निर्मलता में अंतर नहीं आता। यही समझकर उदारमना व्यक्ति अपनी समानुभूति से किसी को भी वंचित नहीं करते।
प्रेम हृदय की उस पवित्र भावना का शब्द रूप है जो अद्वैत का बोध कराती है। मैं और तुम का विलगाव का भाव वहाँ नहीं होता। इसलिए समष्टिगत विशाल भावना का नाम प्रेम माना गया है। यह विशुद्ध बलिदान है। त्याग और आत्मोत्सर्ग की भावना है जिसमें मनुष्य अपने हितों का अपने प्रेमी के लिये हवन करते हुए असीम तृप्ति का अनुभव करता है। बदले की भावना से नहीं जो केवल प्रेम के लिये प्रेम करता है। वही सच्चा प्रेम है।
भले बुरे, सत्य-असत्य कल्याण अकल्याण की तर्क बुद्धि इस संसार में प्रायः हर मनुष्य में समान रूप से पाई जाती है किंतु कोई ऐसी स्थिर वस्तु दिखाई नहीं देती जिसे हम प्रत्येक परिस्थिति में सत्य मानते रहें। आज देखते हैं कि अपना एक परिवार है, माँ है स्त्री है बच्चे है, घर जमीन, जायदाद सभी कुछ है। इन पर आज अपना पूर्ण स्वामित्व है। क्या मजाल कि इन्हें कोई हमारी मर्जी के बिना अपने पूर्ण स्वामित्व है। क्या मजाल कि इन्हें कोई हमारी मर्जी के बिना अपने अधिकार में ले ले। क्योंकि यह हमारी संपत्ति और विभूतियाँ है। इसमें कही असत्य नहीं कोई संदेह नहीं। किंतु कल परिस्थितिवश जमीन बेचनी पड़ी घर गिरवी रख दिया, कौन जाने कब किस प्रियजन की मृत्यु हो जाय। ऐसी दशा में कोई सत्य वस्तु समझ में नहीं आती है यह घर किसी का न रहा अंत में अपना भी न रहेगा। यह संसार परिवर्तनशील है। इसका प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण अपना स्वरूप बदलती रहती है। किंतु एक अंतिम सत्य भी है इस संसार में। वह है प्रेम। अपने परिजनों पर, विचारों और सिद्धाँतों का प्रेम स्वत्व और सम्मान के प्रति देश और राष्ट्र-धर्म और संस्कृति के प्रति व्यक्ति को अगाध प्रेम होता है। इसी के बल पर संसार के सभी क्रिया व्यवसाय चलते हैं। यह सारा संसार व्यवस्थित ढंग से चल रहा है सभी जानते हैं कि यह संसार मिथ्या है, भ्रम है किंतु सभी जी रहे है, मरने से सभी डरते हैं केवल प्रेम के लिये। यह अलग बात है कि उनका प्रेम साँसारिक है, वस्तु या पदार्थ के प्रति है अथवा प्रेम स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति के लिये। दिशायें दो हो सकती हैं किंतु आस्था एक है। इसी पर सारा टिका है। इसी से विधि व्यवस्था भली भाँति चल रहीं है। यह प्रेम बना रहे, और भी अभिव्यक्त हो समष्टि के प्रति विश्व मानव के प्रति समर्पण के रूप में तो सच्चे अर्थों में आस्तिकता का साम्राज्य चहुँ ओर छा जाय। वस्तुतः प्रेम ही परमेश्वर है की उक्ति निताँत सत्य है यदि प्रेम को सही मायनों के समझ कर जीवन में उतार लिया गया हो।
राबिया हँसती भी और रोती भी। दोनों काम साथ-साथ करतीं। तो लोगों को हैरानी हुई। लोगों ने कहना शुरू कर दिया। राबिया पगला गई है। किंतु चतुर लोगों को विश्वास नहीं हुआ इतनी बड़ी संत आत्मा अचानक कैसे पागल हो सकती है। लोगों ने पूछा-आप हँसती भी हैं और रोती भी है। ऐसा क्यों?”
राबिया बोली हँसती मैं उसे देखकर हूँ जो छाया की तरह चारों ओर हर समय साथ रहता है और रोती तुम्हें देख कर हूँ कि तुम्हें वह फिर भी अनुभव में नहीं आता, विश्वास भी नहीं होता। हँसती हूँ उसे देखकर जो मुझे आज अनुभव में नहीं आता विश्वास भी नहीं होता। हँसती हूँ उसे देखकर जो मुझे आज अनुभव में आ रहा है और रोती हूँ कि कल तक जिसे माना था झुठलाया था, अविश्वास करती रही वह कितना गलत था इसी नादानी पर हँसती रोना आता है।
संतों की लीला ऐसी ही होती है जो विरलों को ही समझ में आती है।
मनुष्य को अधिक बलिष्ठ और वरिष्ठ माना जाता है। सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में तो वह कितने ही प्रसंगों में पिछड़ा हुआ है। वह हाथी गेंडा, ऊँट ह्वेल जितना विशाल है न बलवान। चीते के साथ वह दौड़ में बाजी नहीं जीत सकता। पक्षियोँ की तरह वह स्वच्छंद आकाश में उड़ भी नहीं सकता। बंदर की तरह इस पेड़ से उस पेड़ पर कूदने की क्षमता भी इसमें नहीं है। फिर भी उसे सृष्टि का मुकुटमणि इसलिए कहा और माना जाता हे कि वह बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अन्य सभी से आगे है।
यदि वह बुद्धिमत्ता चतुरता, कुटिलता, और संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि में सीमित बना रहता है तो उसे श्रद्धा और सम्मान का भाजन नहीं कहा जा सकता। ऐसे दाव घात लगाने में तो हिंस्र जंतुओं की गतिविधियाँ मनुष्य से किसी प्रकार भी कम स्तर की नहीं ठहराती फिर गर्व किस बात का?गौरव क्या? वरिष्ठता किस आधार पर?
सराहनीय बुद्धिमत्ता वह है जो दूरदर्शी विवेकशील की पक्षधर हो, जिसके साथ मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादाओं का परिपालन और वर्जनाओं के संदर्भ में संयम अनुशासन भी जुड़ा हुआ हो। जो इन कसौटियों पर खरी न उतरे उस दक्षता को धूर्तता का ही नाम दिया जा सकता है। इस दृष्टि में तो सियारों और लोमड़ियों को भी चिरकाल से ख्याति प्राप्त है। यदि वस्तुतः मनुष्य बुद्धिमान है, तो उसे क्रिया की प्रतिक्रिया से परिचित होना चाहिए था नीति और अनीति के बीच अंतर करना चाहिए था और क्रिया की प्रतिक्रिया पर विश्वास करना चाहिए था वस्तुस्थिति समझने और उपलब्धियों का सदुपयोग कर सकने में भी उसे समर्थ होना चाहिए था।
आश्चर्य इस बात का है कि बुद्धिमत्ता का विपुल वैभव उपलब्ध होने पर भी मनुष्य अपने हित-अनहित का सही मार्ग ढूंढ़ नहीं पाता। सीधी चाल चलने तक में आये दिन चूक करता रहता है। अपनी बहुमूल्य समझदारी को, क्षमता और दक्षता को उन कामों में व्यय करते देखा जाता है, जो भ्रांतिवश लाभ जैसे प्रतीत होते हैं, पर वस्तुतः हानिकारक ही सिद्ध होते हैं
उदाहरण के लिए चटोरेपन का स्वाद चखने के लिए सहज ललक-लिप्सा बनी रहती है पर यह भुला दिया जाता हे कि इस संदर्भ में अतिवाद बरतने पर जिस उपलब्धि की आशा की गई थी, उसके ठीक विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। भोजन प्राणी की प्रथम आवश्यकता है और उसका सही चयन करना प्राणियों की प्रकृति प्रदत्त सहज बुद्धि के साथ जुड़ा होता है, किंतु अपवाद में अकेले मनुष्य की ही गणना की जा सकती है जो अभक्ष्य आहार को गले उतारता और अनावश्यक मात्रा में पेट जैसे कोमल अवयव पर निर्दयतापूर्वक भार लादता है। इसका प्रतिफल भी अपच के रूप में हाथोंहाथ सामने आता है कई बार तो दर्द दस्त उल्टी जैसी विपन्नताएं भी उसी कारण उठ खड़ी होती है। बिना पचा आहार सड़ता है और उस सड़न जन्य विष के रक्त के साथ शरीर में प्रभाव पड़ने लगने पर जहाँ भी अवसर पाता है, वही से चित्र-विचित्र बीमारियों के रूप में फूट निकलता है।
तथ्य को समझने पर भी कितने लोग है जो इंद्रिय संयम बरतने के अनुशासन का निर्वाह करते हैं। अधिकाँश व्यक्ति तो इंद्रियजन्य ललक-लिप्साओं को ही सुख और लाभ की दृष्टि से देखते और उसी के साधन जुटाने में अपनी बहुमूल्य क्षमता को गलाते-जलाते रहते हैं। सृष्टि के अन्यान्य प्राणी इंद्रियों का मर्यादा के अनुरूप प्राणी इंद्रियों का मर्यादा के अनुरूप ही उपयोग करते और नीरोग जीवन जीते हैं। किंतु उस समझदारी का दावा करने वाले को क्या कहा जाय जो चटोरेपन के साथ जुड़े हुए अनौचित्य की परवाह नहीं करता और लुकमान के शब्दों में अपनी कब्र चटोरेपन के भोंथरे हथियार से खोदता है। जानकारियों की कम न होने पर भी, संचित आदत है-जो अपनी दुराग्रह से पीछे नहीं हटती और सार्वजनीन स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती है। कामुकता के क्षेत्र में अतिवाद बरतने पर कितने लोग अपनी जीवनी शक्ति को फुलझड़ी की तरह जलाते और कौतुक का मजा लेते रहते हैं। यह भूल ही जाते हैं कि उसमें कितना समय और पैसा बरबाद होता है, साथ ही खोखले घाटा भी सहना पड़ता है।
लोग तो लोग जो ठहरे, आँखें मूँदकर संतान वृद्धि के लिए उत्साही बने रहते हैं और जब जननी पर स्वास्थ्य संकट अभिभावकों पर अर्थ संकट बच्चों पर प्रगति अवरोधों का संकट और समस्त समाज पर समस्याओं का संकट गहराने लगता है, जो भी अपना मानस गहराने लगता है तो भी अपना मानस नहीं बदलते जिन कठिनाइयों से स्वयं लदते रहते हैं उनसे अन्यान्य स्वजन साथियों को सावधान करने तक का मन नहीं बनाते। इस प्रकार की विडंबनाओं को मनुष्य की बुद्धिमत्ता के साथ कैसे जोड़ा जाय यह समझते नहीं बन पड़ता।
तुरंत का लाभ देख कर लोग अनाचार अपनाते और अपराधी प्रवृत्तियों को क्रियान्वित करने के लिए चल पड़ते हैं। जो हाथोंहाथ मिला, उसका गर्वोक्तियों के साथ वर्णन भी करते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि इस उपक्रम को अपनाकर वे आत्म धिक्कार जन आक्रोश की प्रताड़ना सहते हैं, साथ ही प्रामाणिकता गँवा बैठने पर दूसरों का विश्वास और सहयोग गँवा कर गयी गुजरी परिस्थितियों में फँसे रहने के लिए विवश होते हैं।
भ्राँतियों अपने आप में अनेकानेक विपत्तियों की जन्मदात्री हैं। रस्सी को सांप और झाड़ी को भूत समझ कर कई बार लोग इतने भयाक्राँत हो जाते हैं कि किंकर्तव्यविमूढ़ होकर प्राण तक गँवा बैठते है। मृगतृष्णा की चर्चा आये दिन सुनने को मिलती रहती हैं। उजली रात में बालू के मैदान के पानी का तालाब समझ कर प्यासा हिरन उस हेतु दौड़ लगाता है और निराशा भरी थकान से चूर होकर दम तोड़ देता है। कस्तूरी वाले हिरन सुगंध की तलाश में जिस तिस दिशा में भटकते रहते हैं, पर अपनी ही नाभि में उसका उद्गम है, इस पर विश्वास नहीं कर पाते। मछलियाँ और चिड़ियां चारा देखती और उस पर उतावली के साथ लपकती हैं, पर यह नहीं समझ लपकती हैं पर यह नहीं समझ पाती कि यह प्रपंच किसी उदार ने नहीं बहेलिये ने बुना है। भ्रांति ही है जो फँसने वाले को विषम वेदनाओं का दंड दिये बिना किसी प्रकार भी बख्श देने के लिए तैयार नहीं होती। जुआरी अक्सर लाभ के लालच में दाँव पर दाँव लगाते चले जाते हैं और जो कुछ पास पल्ले था, उसे गँवा कर घर खाली हाथ वापस लौटते हैं।
मनुष्य भी ऐसी ही कुछ गलतियाँ जीवन भर करता रहता है। शरीर को ही अपना अस्तित्व मान कर काया को सुख-सुविधाओं से सँजोने में अहिर्निशि निरत रहता है। यहाँ तक कि आत्मा की चर्चा करते और सुनते रहते हुए भी उसके लाभ हानि की बात ध्यान तक में नहीं उतरने देता। उस मालिक को क्या कहा जाय जो घोड़े को मखमली झूल कीमती जीन सुनहरी लगाम से सजाता है इत्र फुलेल लगाने और दूध जलेबी खिलाने में तो विपुल खर्च करता रहता है किंतु उस वाहन का मालिक होने पर भी अपनी रुग्णता और दुर्बलता का उपचार कराने में एक पाई भी खर्चने का मन नहीं करता। जनसाधारण को शरीर साधन में ही जीवन भर निरत रहते देखा जाता है और उसमें इतना तन्मय होता है कि आत्म कल्याण के संबंध में कुछ सोचने और करने तक के लिए फुर्सत नहीं निकाल पाता।
पैसे को, साधनों को लोग सँभाल कर रखते हैं, पर यह समझा नहीं जाता कि मनुष्य जीवन का सुर-दुर्लभ सुयोग है और उसे प्रदान करने में स्रष्टा का कोई विशेष अनुबंध भी सन्निहित है। खजाँची की तिजोरी में भारी धनराशि इसलिए नहीं रखी रहती है कि वह उसे अपनी निजी संपदा समझे और मनचाहे जैसे खर्च करे। सरकारी अफसरों को बड़े अधिकार और सशक्त साधन प्रदान किये जाते हैं, पर उनका प्रयोग सौंपे गये उत्तरदायित्वों की पूर्ति में ही हो सकता है। कोई उन्हें अपनी बपौती समझकर स्वार्थ सिद्धि के लिए मनचाहे ढंग से प्रयोग करने लगे, तो पदच्युत होगा और अनाचार के लिए दंड का भाजन भी बनेगा। सेनाध्यक्ष के तत्वावधान में विपुल शक्ति भंडार केन्द्रित रहता है पर वह है मात्र राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ही। निजी लाभ के लिए उस शक्ति का उपयोग कर लेने वालों को कोर्ट मार्शल कर मृत्युदंड देकर उचित नसीहत दी जाती है।
जो सुविधाएँ अन्य प्राणियों की उपलब्ध नहीं है, उन्हें मात्र मनुष्य की ही उपलब्ध कराने में स्रष्टा का पक्षपात एवं अन्याय प्रतीत होता है पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। यह सर्वोपरि कलाकृति जिन हाथों में सौंपी गई है, उनसे यह भी अपेक्षा रखी गई है कि वे उसे मात्र विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने के लिए ही प्रयुक्त करे। अन्य प्राणियों के लिए ही प्रयुक्त करे। अन्य प्राणियों के लिए निर्वाह ही इतना भारी पड़ता है कि उसे जुटाने में ही उन्हें अपनी समूची क्षमता खपानी पड़ती है, किंतु मनुष्य के लिए मुट्ठी भर आटे की इतनी स्वल्प आवश्यकता है, जो कुछ ही समय के श्रम से भलीभाँति पूरी हो सकती है। इसके बाद जो कुछ समय, श्रम कौशल एवं साधन बचता है वह मात्र इस प्रयोजन के लिए है कि उसका सदुपयोग करके आत्म परिष्कार का स्वार्थ और लोक मंगल का परमार्थ दुहरे लाभ के रूप में अर्जित कर लिया जाय।
संचित कुसंस्कार और वर्तमान के हेय प्रचलन ऐसे है जो पतन-पराभव की ओर चल पड़ने के लिए ही प्रेरित करते हैं। धरती की आकर्षण शक्ति ऊपर वाले को नीचे खींचने और गिराने के लिए प्रसिद्ध हैं। ऊपर चढ़ने के लिए ऊँचा उठने के लिए अतिरिक्त क्षमता की जरूरत पड़ती है। मानवी संसाधन इसी विशेष उपलब्ध कराये गये है पर यदि उन दायित्वों की उपेक्षा करके विलासिता, तृष्णा और अहंता की गर्वोक्तियों के अधिष्ठाता और लाभकारी कृतार्थता अर्जित करने में सफल होते हैं। यह तथ्य समझते-समझाते रहने पर भी अपनी दुराग्रही हेय गतिविधियों को ही अपनाये रहना ऐसा है, जिसे अत्यंत कष्टकर प्रताड़ना के साथ वहन करना पड़ता है।
आप्तजनों ने सच ही कहा है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। उसकी एक मुट्ठी में स्वर्ग और दूसरी में नरक सँजोया हुआ है। उत्थान और दूसरी में नरक सँजोया हुआ है। उत्थान और पतन में से किसी का भी चयन कर लेना उसकी अपनी मर्जी की बात हैं। खेद इस बात का है कि हित को अनहित और अनहित को हित समझ कर किया जाने लगता है। उसे उलटी दिशा में उलटे पैरों चलने का बौढमपन भी कहा जा सकता है। बच्चों की बात दूसरी है एवं साँप, बिच्छू, काँतर, कनखजूरा, छिपकली जैसे भयंकर प्राणियों को भी खिलौना समझ कर पकड़ने के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं। पर उन विचारशीलों को क्या कहा जाय, जो परमार्थ के स्थान पर उस स्वार्थ को ही अपनाते हैं, जो अनर्थ बनकर सामने आता रहता है।
वस्तुतः मनुष्य की समझदारी इस आधार पर आँकी जानी चाहिए कि किसने बरबादी भर्त्सना शान−शौकत सद्गति में से किसका कितने मनोयोगपूर्वक चयन किया। कौन दुर्गति के गर्त में धँसता चला गया और किसने अपने को नर रूप में नारायण समझे जाने वालो की पंक्ति में जा बैठने का साहस किया। यों तो के लिए मेहनत हर किसी को करनी पड़ती है। भले बुरे अवसर सभी के सामने आते हैं, पर सराहनीय वह दृष्टिकोण रहता है जिसके आधार पर ऋषि-मनीषियों देवमानवों और युग निर्माताओं जैसी श्रेय साधना करने का सुयोग मिलता और उसके आधार पर हर दृष्टि से धन्य बनने का अवसर मिलता है।
निंदा, प्रशंसा हर भले बुरे की होती रहती है। अपनी विकारी वालों को सभी सराहते और भिन्न मत वालों के प्रति निंदा करते देखे जाते हैं। यदि इसी को कसौटी मानकर चला जाय तो किसी को किसी दिशा में चल सकने का अवसर ही न ही न मिल सकेगा। कुमार्गगामी तक जब समीक्षाकारों की परवाह नहीं करते और अपने दुस्साहस को अपनाये रहते हैं तो सन्मार्गगामियों को ही इतना दुर्बल मन क्यों बनाये रहना चाहिए कि बहुमत वाले लोग उनकी हँसी उड़ायेंगे बेवकूफ कहेंगे और अनुपयुक्त लाँछन लगायेंगे। यदि साहस का अवलंबन अपनाये रहा जाय तो अनेक विरोधों और अवरोधों के आड़े आने पर भी उर्ध्वगमन का प्रयास निश्चितता और निर्भीकतापूर्वक अपनाये रहा जा सकता है और उस लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है जिसके लिए कि मनुष्य जन्म का सुरदुर्लभ सुयोग हस्तगत हुआ है।
सही चुनाव कर सकना ही बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी कसौटी है। जीवन जैसी महान संपदा को किस प्रयोजन के लिए नियोजित किया जाय, इसका चुनाव जो कर सके उन्हीं को बुद्धिमान कहा जायगा। युग परिवर्तन की इस विषम बेला में इस प्रकार के चुनाव में उत्तीर्ण होना प्रशंसनीय माना जा सकता है।
आनंद को अपने भीतर ढूंढ़ पाना बहुत कष्ट साध्य है। पर बाहर किसी अन्य में ढूंढ़ निकालना तो सर्वथा असंभव है।
“बाबू जी ! आज तो आप कही न जायँ।” बेटी की इस गुहार के बीच कोई नीचे से गिड़गिड़ा रहा था। उसका लड़का बीमार था और उसकी दशा बिगड़ती जा रही थी। आज कंपाउन्डर आया नहीं था। अस्पताल बंद रखना कल शाम को निश्चित हो चुका था। वृद्ध डाक्टर अपने मकान के ऊपरी तल्ले में बैठे अपनी लड़की से श्रीमद्भागवत का बंगला अनुवाद सुन रहे थे।
“मैं डाक्टर हूँ बेटी।” स्निग्ध स्वर में उन्होंने कहा मेरी आवश्यकता हिंदू-मुसलमान को समान रूप से है। कोई इस बुड्ढे को मारकर क्या पावेगा?
“उत्तेजना मनुष्य को पिशाच बना देती है।” दूर से अल्ला हो-अकबर का कोलाहल सुनाई दे रहा था।” दादा कलकत्ते गए और पूरे दो सप्ताह हो गए लौटे नहीं। मैं अकेली रह जाऊँगी यहाँ नहीं आप इस दंगे के समय कहीं नहीं जा सकते।” पिता के हाथ के हैंड बैग को पकड़ लिया उसने।
“डाक्टर साहब।” नीचे से करुण आवाज आयी। “मेरी बच्चा। खुदा आपका भला करेगा। बच्चे को बचाइए।”
“मैं डाक्टर हूँ। मेरा कर्तव्य है यथा संभव रोगी को बचाने का प्रयत्न। बड़े स्नेहपूर्वक पुत्री के मस्तक पर हाथ फेरा उन्होंने। “मुझे कर्तव्य से विमुख करेगी रुक्मा? श्याम सुन्दर तो है ही तेरे समीप सिंहासन पर विराजमान” श्रीकृष्ण के भव्य चित्र की ओर संकेत था डाक्टर का।
“ तो तुम शीघ्र लौट आना।” हैंडबैग छोड़ दिया रुक्मिणी ने। “आज कुछ न कुछ होकर रहेगा। लक्षण अच्छे नहीं दिखाई पड़ते हैं।” आप जानते हैं कि नोआखाली जिले के श्री रामपुर के लिए वह दंगे का प्रथम दिवस कितना भयंकर था।
“ जो सर्वेश की इच्छा।”डाक्टर कच्चे आस्तिक नहीं हैं “जो वह चाहेगा वही होगा मैं यहाँ रहूँ तो भी क्या? उसकी इच्छा में बाधा थोड़े ही दे सकूँगा? उसी के विश्वास पर है बेटी।”वातावरण से वृद्ध अपरिचित नहीं थे और न उसको छिपाने का प्रयत्न किया उन्होंने। एक हाथ में हैंडबैग और दूसरे में इंजेक्शन बॉक्स लिए वे खट् खट् सीढ़ियों से नीचे उतर गए।
“दादा कलकत्ते से नहीं लौटे।” डाक्टर के ज्येष्ठ पुत्र किसी कार्यवश कलकत्ता गए थे और उन्हीं दिनों वहाँ दंगा हो गया था। अब तक उनका कोई पता लगा नहीं। पिता-पुत्री बराबर चिंतित रहते हैं। आशंका उठती है- कहीं ......। स्नेह मना करता है अमंगल धारण को। “ वे अवश्य जीवित होंगे। आने का मार्ग न मिलता होगा। रेले भी तो रुकी पड़ी है।”
रुक्मिणी ने पुस्तक वहीं खुली छोड़ दी। वह खिड़की के समीप आकर खड़ी हो गयी। और अपने वृद्ध पिता की ओर एकटक देखती रहीं। जब वे एक मैले-कुचैले मुसलमान के पीछे सड़क पर चले जा रहे थे, वही दृश्य बार-बार याद आ रहा था।
“ बेचारे बापू” एक दीर्घ निःश्वास लिया उसने। कोलाहल समीप आता जा रहा था। “श्रीद्वारिकानाथ उनकी रक्षा करें।” खिड़की बंद कर दी उसने। सीढ़ियों से नीचे उतर का द्वारा भी बंद कर दिया। आज न तो नौकरानी आयी थी और न मजदूर। सबको अपनी-अपनी पड़ी थीं। ऊपर आकर वा सीधे पूजा की कोठरी में चली गयी चित्रपट के सम्मुख सुन्दर कश्मीरी आसन बिछा था। बैठने के बदले आनन पर मस्तक रख दिया उसने।
“इतने में धम्-धम् धड-धड की आवाजें आयीं वह उठी और खिड़की खोलकर नीचे झाँका उसने समीप का मकान धूँ-धूँ करके जल रहा था। कुछ लोग पेट्रोल के पीछे खोल रहे थे। कुछ मकानों पर छिड़क रहे थे। हाथों में छुरे भाले तलवार लाठी उद्धत भीड़ चीख रही थी। गालियाँ बक रही थी। कौन कह सकता था कि वे मनुष्य है पिशाचों का ताँडव हो रहा था नीचे सड़क पर।”
“तेल डालो और माचिस लगा दो।” उसका हृदय धक से हो गया बाहरी फाटक से कूदकर सामने छोटे से मैदान में भीड़ भर गयी थी। पेट्रोल के पीपे सड़क से घेरे में फेंके किस ने। कुछ लोग मकान का दरवाजा पीट रहे थे। “इस बुड्ढे खूसट के यहाँ रखा भी क्या होगा। एक नंबर का काइयाँ है। बैंक में ही रखता होगा पूरा मालमता। दरवाजा नहीं टूटता तो लगाओ माचिस और पार करो।”
“गजब की खूबसूरत हैं।” किसी दुष्ट की दृष्टि खिड़की पर पड़ गयी। भद्दे ढंग से हँसते हुए वह चिल्लाया “चाँद है चाँद रुक्मिणी ने पीछे हटकर खिड़की बंद कर ली। उसने देख लिया था कि एक टीन फोड़ डाला गया है और कई गुँडे पेट्रोल छिड़कने लगे है उसके मकान पर।
“फूँको मत। मैं तो उस ख्बरु को लेकर रहूँगा। आज अभी........। उसके अश्लील शब्दों पर असुरता को भी लज्जा आयी होगी। दरवाजे पर और भयंकर आघात होने लगे।
“दादा, बापू।” वह उन्मत्त सी चिल्ला उठी। इधर उधर कमरों में दौड़ने लगी। डेस्क संदूक भड़भड़ा डाले उसने। कोई तो बचाने आता। कहीं भी तो ऐसा स्थान नहीं जहाँ इन पिशाचों से परित्राण मिले छिपने पर। कोई भी ऐसा अस्त्र-शस्त्र तो नहीं जिसे लेकर वह एकाकी अबला इन नृशंस असुरों का सामना कर सके।
साड़ी पृथ्वी में लोट रही थी। शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था। नेत्र टेसू के फूल बन गए थे। उनमें का पानी सूख गया था। वह काँपती लड़खड़ाती एक से दूसरे कमरे में दौड़ रही थी।
“बापू का पिस्तौल !” दौड़कर बैठक में पहुँची। “हाय डेस्क तो बंद है। टूटता भी तो नहीं।” पत्थर दे मारा उसने डेस्क पर। द्वार पर प्रहार बढ़ते जा रहे थे। वह चरमरा रहा था। भीड़ चिल्ला रही थी। वह डेस्क पर पत्थर पटक रही थी।
“अरर धड़ाम।” कर्राकर द्वार भीतर की ओर गिर पड़ा। भीड़ का तुमुलनाद गूँजा “अल्ला हो अकबर।” डेस्क टूटा नहीं था। भागी वह बैठक से ऊपर को। ऊपर बड़ी भीड़ मकान में पिल पड़ी थी।
“तुम हाँ तुम्हीं अब मुझे बचाओ। श्याम सुन्दर।” सीधे दौड़ती हुई पूजा की कोठरी में पहुँची। उस कोठरी का द्वार बंद करना भी भूल गयी थी। मस्तक पटक दिया उसने मूर्ति के सम्मुख बिछे अपने ही नित्य बैठने के आसन पर।” रुक्मिणी तुम्हारी है हाँ तुम्हारी है हाँ तुम्हारी ही है। अपनी रुक्मिणी की ही भाँति हाथ पकड़ कर दस्युओं के बीच से उठा लो या फेंक दो इन भूखे भेड़ियों के सम्मुख एक माँस खंड के समान।”
उसे लगा कि कमरा आलोक से जगमगा उठा है। दिन में भी कमरे में कोई दूसरा सूर्य उदित हो गया है। आगे कुछ देख न सकी वह। संज्ञा-शून्य हो गया था उसका शरीर।
“भागों ! भागों! पेट्रोल के खुले पीपे में कोई चिनगारी पड़ गयी थी। मकान पर छिड़के पेट्रोल ने अग्नि पकड़ ली थी। लपटें क्षितिज को चूमने ऊपर दौड़ रही थीं और मकान ने घुसी भीड़ सिर पर पैर रखकर मकान से बाहर भाग रही थी।”
“अपनी कोठी से उठती आग की लपटों की एक झलक वृद्ध डाक्टर ने उस मुसलमान के घर से देखी और वह जाने के लिए उतावले हो उठे।” डाक्टर साहब। इस समय आप मेरे घर से बाहर हरगिज नहीं जा सकते। वही मैला कुचैला मुसलमान सामने खड़ा था, जो डाक्टर को यहाँ तक ले आया था। द्वार बंद कर दिया था उसने।
“तुम्हारे लड़के को अब दूसरे इंजेक्शन की जरूरत नहीं होगी।” अनुनय किया डाक्टर ने। “ मैं दवा दे चूका हूँ। उसका ज्वर उतर रहा है। हाय, मेरी रुक्मा। उधर ही से शोर आ रहा है। वह देखो मेरी कोठी के पास लपटें उठ रही है। तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ।”सचमुच वृद्ध ने उसके पैरों पर मस्तक रख दिया।
“लड़का मर भी जाय तो भी मैं परवाह नहीं करता मुझे आपकी चिंता है।” जल्दी से पीछे हटकर उसने डाक्टर को उठाया अपने पैरों से। “वहाँ शैतानों के बीच में मैं आपको नहीं जाने दे सकता। किसी भी तरह नहीं। मौत के मुँह में आप जा रहे हैं। वे सब आज न मुसलमान हैं और न आदमी। शैतान सवार है उनके सिर। कुछ नहीं देखेंगे वे। आप उम्मीद नहीं कर सकते कि वे आपको जिंदा छोड़ देंगे।” दरवाजे से पीठ लगाकर वह अटल अडिग खड़ा हो गया।
“मरने दो फिर एक काफिर को।” डाक्टर अधीर हो रहे थे। पिस्तौल लाये होते तो अवश्य उसे गोली मार देते और निकल जाते सड़क पर। “ हाय रुक्मा का पता नहीं क्या हाल होगा। मुझे जाने दो सवाब होगा, तुम्हें”
“अपना सवाब मैं खूब जानता हूँ।” इस भयानक परिस्थिति में भी वह हँस पड़ा। “मैं इनसान हूँ और मुसलमान हूँ। मैं जानता हूँ कि मुझे अपने पड़ोसी के साथ कैसे रहना चाहिए। अपने पर एहसान करने वाले के लिए क्या करना चाहिए। मुझे शैतान धोखा नहीं दे सकता। क्योंकि मैं एक ठीक मुसलमान हूँ।”
“मुझे किसी भी तरह जाने दो।” डॉक्टर फिर गिड़गिड़ाए। मैं पहुँचते ही तुम्हें पाँच हजार रुपये दूँगा।”
उनकी वाणी में आग्रह अनुनय एवं करुणा सब भर गयी थी। कोलाहल इधर ही बढ़ता आ रहा था।
“ डाक्टर साहब!” जैसे सावधान कर रहा हो वह। “ आप मुझे फुसला नहीं सकते। बच्चा नहीं हूँ मैं। लोग इधर ही आ रहे हैं। हमीदा की माँ ! अगर कोई आवाज दे तो तू कह देना कि कोई घर में नहीं है। वह भी तो तुम लोगों के साथ भीड़ में ही गए हैं। अपनी स्त्री को आदेश दिया उसने।”
“मैं झूठ नहीं बोलता।.......”
“अच्छा, मेहरबानी करके जबान बंद कीजिए। कतई बंद।” उसने कठोर स्वर से कहा। भीड़ का कोलाहल बहुत पास आ गया था। “अगर आपने फिर कुछ कहा तो मैं मजबूत हो जाऊँगा कि आपके हाथ पैर बाँध दूँ और मुख में .........। “ अपना तेल से चीकट बदबूदार गमछा दाहिने हाथ से उठाकर डाक्टर के सामने कर दिया उसने।
बेचारे डाक्टर-वे समझ गए कि आज बुरे फँसे है। यह कठोर आदमी जो कुछ भी कह रहा है, उसको करने में उसे एक मिनट भी नहीं लगेगी। उनके वृद्ध शरीर में इस हट्टे कट्टे तरुण का प्रतिकार करने की शक्ति नहीं है। नेत्रों में अश्रु भर कर बड़ी दीनता से उन्होंने उसकी ओर देखा।
“ आप वहाँ बैठ जाइए।” कंठ स्वर मृदुल हो गया था। एक खाली चारपाई की ओर संकेत था। एक खाली चारपाई की ओर संकेत था उसका जो एक कोठरी में बिछी थी। भीड़ को निकल जाने दीजिए। मैं जाकर बिटिया का पता ले आता हूँ। हो सकेगा तो उसे यही लिवा लाऊँगा। आपका वहाँ जाना ठीक नहीं है जब तक हालत सुधर नहीं जाती आपको इसी गरीब खाने को अपना मकान मानना होगा।”
उसने जाकर देखा सारी कोठी जल गयी थी। मकान का बहुत सा भाग टूटकर गिर पड़ा था। अभी भी लपटें इधर-उधर उठ रही थी। मेज, कुर्सी तथा दूसरे लकड़ी के जलने योग्य पदार्थ अब भी धधक रहे थे। उस्मान का ही साहस था उस आँवे से तपते भट्टे में प्रवेश करने का।
“ जल तो नहीं गयी। वे सब उठा तो नहीं ले गए?” वह बार बार पुकार रहा था। कुछ आधी गिरी कोठरियों में भीतर जाना किसी प्रकार संभव नहीं था। भीतर धुंआ भरा था और लपटें फुफकार रही थी। झाँककर पुकार कर वह इधर उधर ढूँढ़ रहा था किसी को।
“ओह मेरी बिटिया।” जैसे कोई निधि मिल गयी हो। जीने का पता नहीं था। गिरी हुई ईंटों पर से ही बचता बचाता ऊपर आया था वह। आधी छत गिर चुकी थी मोटे देशी जूते के भीतर भी पैरों के तलवे भुने जा रहे थे। एक कोने में एक कोठरी पूरी खड़ी थी। उसका बाहरी भाग तो जल गया था, लेकिन दरवाजा बचा था और शायद अग्नि की लपटें उसमें घुसने की हिम्मत नहीं कर सकीं थी। धुंआ जरूर भर गया था उसमें।
दूर से ही उसने देख लिया कि कोई लड़की जमीन पर सिर रखे औंधी पड़ी है और कुछ देखने के लिए न अवकाश था और न वह देखना ही चाहता था। धड़धड़ा कर कमरे में घुस गया। लड़की मूर्छित थी। उसने खुले सिर पर हाथ रखा।
“ श्याम सुन्दर।” स्पर्श ने उसे चौका दिया। चीख पड़ी वह। अपने आप घुटनों में अधिक सिकुड़ने का प्रयत्न किया उसने। वह समझ गया कि बुरी तरह डर गयी है लड़की।
“बापू। चेतना लौट आयी। उसने उठने का प्रयत्न करते हुए बिना देखे ही प्रश्न किया।” बापू कहाँ हैं? “तुम यहाँ कैसे आए? बापू का क्या किया तुमने? उसे देखते ही लड़की ने पहचान लिया। चौंक पड़ी डर गयी और ढेर प्रश्न कर डाले।
“मैं दुश्मन नहीं हूँ। डरो मत।” आश्वस्त करना पहले जरूरी था। स्निग्ध स्वर का प्रभाव लड़की पर पड़ रहा हैं, यह उसने लक्षित कर लिया। “ तुम्हारे बापू मेरे घर सुरक्षित हैं। भले चंगे है वे।”
“बापू अच्छे हैं?” बड़ी उत्सुकता से पूछा उसने। हाँ वे अच्छे हैं। तुम्हें भी उन्होंने बुलाया है। तुम्हारा यहाँ रहना अब भी खतरे से खाली नहीं है बहुत धीरे धीरे कह गया वह।
“तुम्हारे घर?” एक मुसलमान के घर? आशंका से उसका हृदय भर गया।” नहीं- मैं तुम्हारे घर नहीं जाऊँगी। तुम यहाँ से चले जाओ।” उसने फिर भरी दृष्टि से अपने सिंहासनस्थ भगवान की ओर देखा। उसे लगा वह चित्र मुस्कुरा रही है।
“मुसलमान के घर नहीं अपने बाप के घर अपने घर।” उस गंदे कपड़ों वाले मुसलमान के नेत्रों में पवित्र उज्ज्वल अश्रु झिलमिला आए। बेटी! क्या मुसलमान इनसान नहीं होता। “
“हो सकता है।” अविश्वास की भी एक सीमा होती है। हृदय अच्छी प्रकार हितेच्छु हृदय को पहचानने की शक्ति रखता है। “मैं अपने श्याम सुन्दर को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती।”
“इनको भी ले चलो बेटी।” उसके नेत्र झरने लगे। दूसरों की धार्मिक भावना का आदर करना वह खूब जानता है।” इस गरीब बाप के झोंपड़े को भी इनके कदमों से पाक बनने दो। मैं तुम्हारे और इनके लिए एक पूरी कोठरी खाली कर दूँगा बेटी! कोई दिक्कत नहीं होगी तुम्हारी पूजा में।
वचनों में अंतर की सच्चाई थी। उसने चित्रपट को उठाकर हृदय से लगा लिया और उसी मुसलमान के पीछे पीछे चल पड़ी। हृदय से लगा वह नटनागर ज्यों का त्यों मुस्कुरा रहा था।
क्या ये घटनाक्रम अब फिर से नहीं दुहराये जा सकते? मानव धर्म तो यही कहता है कि सभी बंदे उसी परवरदिगार के परम पिता परमात्मा के ही बेटे बेटियाँ है। फिर नासमझी क्यों? जाति पंथ संप्रदाय के नाम पर ऐसे हिंसक ताण्डव रचवाती है? संभव है, यह संधिकाल की परीक्षा घड़ी हो, जब असुरता अपनी चरम सीमा पर है। देवत्व कहीं न कहीं तो है। प्रसुप्त है तो जायेगा अवश्य हर हिंदू में से मुसलमान में से क्रिश्चियन व पारसी में से। यही वक्त का तकाजा भी है।
यह मत देखो किसको प्रिय लगा- किसको अप्रिय। कौन को हानि हुई किसको लाभ पहुँचा। मात्र आदर्श को अपनाओ।वे ही अपना पराया वास्तविक हित साधन करते हैं।
आसक्ति एवं अतृप्त कामनायें मनुष्य को मृत्यु के बाद भी चुपाती रहती है और प्रेत अथवा पितर योनि में सूक्ष्म रूप में रहते हुए भी वे प्रियजनों या वस्तुओं के पास बराबर चक्कर काटती रहती है। उनकी आसक्ति प्रियजनों के हित के भी निमित्त होती है व कभी कभी उन्हीं की आध्यात्मिक प्रगति के अवरोध का कारण भी बनती है।
घटना इंग्लैंड के ब्राइषम नामक एक कस्बे की है। एक रात जॉन स्नो नामक एक बैंक कर्मचारी अपने कमरे में अकेला से रहा था। पत्नी बच्चे किसी संबंधी के यहाँ गये हुए थे। ठीक आधी रात को उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई जगा रहा हो। आँखें खोली तो समाने सचमुच ही कोई जगा रहा हो। आँखें खोली तो सामने सचमुच ही कोई खड़ा दिखाई पड़ा। बेड लाइट की रोशनी में उसने गौर से देखा तो वहाँ उसके दिवंगत पिता खड़े थे, जिनकी मृत्यु को करीब दो वर्ष बीत चुके थे। मृत बाप को सामने खड़ा देख डर के मारे वह चीख पड़ा। भय से उसकी घिग्घी बँध गयी किंतु इसी बीच आकृति जॉन के कुछ और करीब आ गयी तथा भय निवारण करते हुए कहा-”जॉन। मेरे बेटे डरो मत, मैं तुम्हारा पिता हूँ। मैं तुम्हें कोई हानि पहुँचने यहाँ नहीं आया हूँ वरन् एक महत्वपूर्ण संदेश देने आया हूँ। तुम जिस बस से कल यात्रा मत करना।” इतना कह कर प्रेतात्मा अदृश्य हो गयी। दूसरे दिन शाम को जॉन स्नो को पता चला कि जिस बस से यात्रा नहीं करने की चेतावनी उसके मृत पिता ने रात को दी थी, वह सचमुच ही दुर्घटनाग्रस्त हो गयी और उसमें सवार सभी यात्री मारे गये। पितर स्तर पर पिता की आत्मा के संदेश ने उसकी जान बचा दी।
मूर्धन्य वैज्ञानिकों तथा परामनोविज्ञानियों द्वारा भूत मरणोत्तर जीवन संबंधी अध्ययन अनुसंधानों से अब जो नये तथ्य सामने आये है, उनसे यह बात स्पष्ट हो गयी है कि जिन व्यक्तियों को मरते समय अत्यधिक आवेश रहा है अथवा जो अत्यधिक आवेश रहा है अथवा जो अत्यधिक मोहग्रस्त या कामना ग्रस्त रहे है उन्होंने उसी मनः स्थिति का परिचय अपने सूक्ष्म कलेवर में भी दिया जाता है। जैसे परिचय, धन व मकान , वस्तु आदि से अत्यधिक प्यार करने वाले मरते समय उन वस्तुओं मोह प्रकट करते हुए विलग हुए तो उनकी प्रेतात्मा उन्हीं स्थानों के ईद-गिर्द मंडराती रहती है। जमीन में गड़े हुए धन की उन्होंने चौकीदारी की है। और यदि किसी ने उसे निकाल भोगा है तो उसको तरह-तरह से परेशान किया और वास दिया है। वस्तुओं का मोह उन्हें मरणोत्तर जीवन में कष्टकारक पहरेदारी के लिए विवश कर कैदी जैसी बनाये रखता है और उन वस्तुओं से मोह करने वाले अन्य देहधारी लोगों को भी इन अशरीरी प्रेमियों का कोप भाजन बनाना पड़ता है।
प्राण चेतना अपनी संबंधित वस्तु के साथ चिरकाल तक जुड़ी रहती है और उनका मोह उन पर छाया रहता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिश्र के पिरामिडों एवं कब्रों की उखाड़-पछाड़ करने वालो पर बीती घटनाओं से मिलती है।अध्यात्म विज्ञान के अनुसार प्राणी के अन्यत्र जन्म लेने या लोक को चले जाने पर भी उसकी प्राण विद्युत उन वस्तुओं का घेरा डाल कर चिरकाल तक अपना आधिपत्य जमाये रहती है जिनके साथ उसका मोह अहंकार जुड़ा हो। भूत-प्रेतों का अस्तित्व प्रायः इसी स्तर का होता है। जीव के जन्म ले-लेने के बाद भी लंबे समय तक उसकी छाया का प्रेत में बने रहना संभव है।
अठारहवीं शताब्दी में अफ्रीका के बहुत बड़े भाग पर योरोपीय लोगों का अधिकार था। उन देशों के पुरातत्त्ववेत्ता इस बात के बहुत उत्सुक थे कि मिश्र के पिरामिडों तथा दूसरे मृतक स्मारकों के पीछे छिपे रहस्यों पर से पर्दा उठाया जाय। इसलिए उन्होंने इस संदर्भ में उठाया जाया। इसलिए उन्होंने इस संदर्भ में काफी खोजबीन की-और कितनी ही पुरानी कब्रों को उखाड़ा।
इस कार्य में शोधकर्ताओं का एक उत्साही दल सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. व्रेस्टेड के नेतृत्व में काम कर रहा था। उनके सहायक हार्वर्ड कार्टर, आर्थर बीगल, लार्ड कार्नवर्ग आदि कितने ही मूर्धन्य पुरातत्व वेत्ता अपने-अपने ढंग से काम कर रहे थे। इन लोगों ने बहुत धन खर्च करके प्राचीनकाल के अवशेषों को प्राप्त किया था और उस आधार पर प्राचीनकाल की परिस्थितियों तथा मान्यताओं का पता लगाया।
इसी संदर्भ में सन् 1922 में ‘तूतन खामक ‘ नामक स्थान से एक ऐसे वृद्ध फकीर की कब्र खोदी गयी जिसके संबंध में कितनी ही चमत्कारी दंतकथायें प्रचलित थी। खुदाई का एक उद्देश्य उस क्षेत्र में फैले हुए अंधविश्वासों का निरस्त कब्र खोदली गयी और उसके अवशेष भी प्राप्त कर लिये गये। अब उनका रासायनिक विश्लेषण होना आरंभ हुआ। इस बीच एक से एक बढ़कर आश्चर्यजनक और भयानक घटनाएं घटित होना आरंभ हो गयी। डा. व्रेस्टेड अपनी प्रयोगशाला में अवशेषों, लकड़ी के टुकड़े का विश्लेषण करने के लिए एक बर्तन में कुछ रासायनिक पदार्थों के साथ उबाल कहे थे कि इतना भयंकर विस्फोट हुआ कि प्रयोगशाला की छत काला नाग वैज्ञानिक कार्टर के घर जा पहुंचा। वे स्वयं तो किसी प्रकार बच गये , पर उनकी पत्नी को उसने डस लिया ‘ और वह देखते-देखते मर गयी। एक महीना बीता होगा कि वैज्ञानिक कार्नवर्ग को एक नन्हे मच्छर ने काटा और दो दिन के भीतर ही वे मर गये। मच्छर काटने का स्थान बिलकुल सांप के काटने जैसी स्थिति का बन गया था। इतना ही नहीं कार्नवर्ग का हट्टा-कट्टा बेटा भी उन्हीं दिनों दो दिन की मामूली बीमारी से चल बसा।
अनुसंधान के प्रमुख वैज्ञानिक व्रेस्टेड कब्र खुदवाने के दो सप्ताह के भीतर ही मर गये। अपनी पत्नी को गंवाकर भी कार्टर साहसपूर्वक अंधविश्वासों का खंडन करते रहते थे और शोध कार्य को शिथिल नहीं पड़ने दिया था, पर न जाने क्या कुयोग उत्पन्न हुआ कि वे एक छोटी सी तलैया में जा फँसे और उस कीचड़ में ही फंसे हुए असहाय स्थिति में मरे पाये गये। इस प्रकार अनुसंधानकर्ताओं का वह पूरा दल ही समाप्त हो गया।
इसी तरह अमेरिका और ब्रिटेन के कुछ वरिष्ठ वैज्ञानिक मिलकर मिश्र की पुरातात्त्विक महत्व की समाधियों की खोज कर रहे थे।उस खोज के पीछे मात्र विषयक रहस्यों का जानना ही नहीं था, पर उनमें दबी हुई विपुल स्वर्ण संपदा एवं रत्न राशि से लाभान्वित होना भी था। इसके अतिरिक्त एक और भी बात थी-उन किंवदंतियों की वास्तविकता जानना जिनमें कहा जाता था कि खाली की रक्षा प्रेतात्माएँ करती है जो उन्हीं छेड़ेगा, वह खतरा उठायेगा। एक समाधि पर तो स्पष्ट शब्दों में चेतावनी भरा हुआ शिला लेख लगा था जिस पर अंकित था- जो फराऊनी कब्रों को छेड़छाड़ कर मृतात्माओं की शाँति भंग करेगा उसे अकाल मृत्यु खा जायेगी।
कब्रों की खुदाई का काम सबसे पहले लार्ड कानर्विन नामक इंग्लैंड के एक धनपति ने अपने हाथ में लिया था। उनका परिवार भी उस कार्य में दिलचस्पी ले रहा था और सहयोग दे रहा था। इसका भयंकर परिणाम सामने आया। एक-एक करके उस अभियान से संबंधित 22 व्यक्ति कुछ ही समय के अंतराल से काल के गाल में बड़े विचित्र घटना क्रम के साथ चले गये। लार्डवेस्टवरी अनायास ही छत पर से कूद पड़े और मर गये। उनका बेटा जा खुदाई का इंचार्ज था, रात को अच्छा खासा सोया था, पर सुबह मरा हुआ पड़ा मिला। डॉ आर्चवाल्ड डगलस रीड नामक एक वैज्ञानिक ममी का एक्सरे कर रहे थे कि एकाएक उनका हार्टफेल हो गया। आर्थर बाइगाल को मामूली बुखार ही खा गया। आर्वे हर्बर्टन सहसा पगला गये और आत्महत्या कर बैठे। देखते देखते सारा शोधकर्मी दल अकाल मृत्यु का ग्रास बन गया।
यह प्रख्यात था कि नील नदी की घाटी में अवस्थित तूतन खामन की समाधि सबसे अधिक रहस्यमय साथ ही सर्वाधिक संपत्ति से भरी पूरी है। इसका लोभ खोजी लोग छोड़ नहीं पा रहे थे। सो इतनी मौतें देखते देखते हो जाने के कारण सारे इंग्लैंड में आतंक छाया हुआ था, और प्रेतात्माओं की बात का मखौल उड़ाने वाले लोग भी आश्चर्यचकित होकर इस प्रकार मृत्यु में होने की बात को संयोग मात्र नहीं कह पा रहे थे वे भी इच्छा न रहते हुए भी उन खाली के आगे सिर झुका रहे थे जिनमें कब्रों के साथ छेड़खानी करने वालो को जोखिम उठाने की चेतावनी दी जाती रही थी।
देखा गया है कि जीवंत स्थिति में मनुष्य अत्यधिक मोह पाल लेने के कारण मरणोपराँत भी वह अपनी प्रिय वस्तु के साथ चिपके रहना चाहता है और वह वस्तु जहाँ-कहीं भी पहुँचती है वहीं उसकी आत्मा भी प्रवेश करने एवं उपयोग करने वालो को वास पहुँचाने का प्रयत्न करती है। इंग्लैंड के विख्यात वैज्ञानिक एवं सरल संस्मरणों में इसी तरह की सन् 1962 में घटित एक प्रामाणिक घटना का उल्लेख किया है। उसमें इंग्लैण्ड के विल्ट शायर स्थान में नियुक्त मि. मौक्सन नामक एक न्यायाधीश की अदालत में आये एक विचित्र मामले का वर्णन है। एक अधपगला सा व्यक्ति किसी कबाड़ खाने से पुराना नगाड़ा खरीद लाया। वह उसे सड़क पर खड़ा होकर विचित्र ढंग से बजाता, भीड़ इकट्ठी करता और पैसे बटोरता। पुलिस ने उसे रास्ता रोकने और पैसे बटोरता। पुलिस ने उसे रास्ता रोकने और अनावश्यक भीड़ जमा करने के अपराध में पकड़ कर नगाड़े समेत अदालत में पेश किया। अदालत ने उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया और नगाड़े को जब्त करने का हुक्म दिया कुछ दिन बाद बेकार पड़े नगाड़े को पुलिस ने उस मजिस्ट्रेट के घर ही पहुँचा दिया। वहाँ उसे घर के एक कोने में पटक दिया गया।
जिस दिन से नगाड़ा उनके घर में पहुँचा उसी दिन से वहाँ प्रेतों के उपद्रव शुरू हो गये। किवाड़ों को खटखटाने की छप्पर पर धमाचौकड़ी और आँगन में उछल कूद होने की घटनायें निरंतर होने लगी। बहुत तलाश करने पर भी कोई दिखाई नहीं पड़ता था, पर घटनायें बराबर होती थी। स्वयं प्रयत्न करने और नौकरों पड़ोसियों की सहायता लेने के बाद भी जब उपद्रव का समाधान न हो सका तो पुलिस की सहायता ली गयी, पर वे लोग भी देखते सुनते समझते हुए भी कुछ कर न सके। जो दिखाई ही नहीं दे उसकी रोका या पकड़ा कैसे जाय?
एक दिन मजिस्ट्रेट ने देखा कि किसी मजबूत आदमी ने जोर का धक्का देकर किवाड़ें खोल दी चटखनी टूट गयी और वह व्यक्ति ओवरकोट पहने हुए घर के भीतर घुसता चला आया और आँगन में होता हुआ जीने के रास्ते छत पर चढ़ गया। आश्चर्य यह था कि ओवरकोट तो आँखों से दीख रहा था परंतु पहनने वाले के हाथ पैर चेहरा आदि सभी नदारद थे। लगता था अकेला कोट ही यह सब हरकतें कर रहा है। इसके बाद तो उसे एक प्रकार से इन उपद्रवों की किसी प्रेतात्मा की करतूत ही मान लिया गया।
अभी यह खोज बाकी थी कि आखिर थोड़े ही दिनों से यह उपद्रव क्यों खड़े हुए इससे पहले यह नहीं थे। ऐसी कौन सी वस्तु आ गयी जिससे यह सब घटित हो रहा है। ढूंढ़ खोज की गयी तो कौने में पड़ा वह नगाड़ा ही नजर आया जिसे पुलिस द्वारा एक पगले व्यक्ति से छीना गया था। नगाड़ा हटाया गया और साथ ही उन उपद्रवों का भी अंत हो गया। इतना ही नहीं उस पगले का भी पता लगाया गया तो पता चला कि वह सदा से ही विक्षिप्त नहीं था। सस्ता माल देखकर जिस रुदन से उसने कबाड़खाने में उस नगाड़े को खरीदा था, उसी दिन से वह खाली और शोर मचाने भीड़ इकट्ठी करने की करतूत करने लगा था। जिस दिन से पुलिस द्वारा उस चोडे को जब्त कर नष्ट कर दिया गया उसी दिन से परिस्थितियाँ सामान्य स्वाभाविक स्थिति में पहुँच गयी। इसी तरह जिस दिन मजिस्ट्रेट मौक्सन के घर से वह नगाड़ा हटाया गया इसी दिन से उनके यहाँ भी शांति आ गयी। खाली रस नगाड़े के असली मालिक की खाली प्रिय वस्तु के साथ छाया बनकर चिपकी रही है और वह वस्तु जहाँ कहीं भी पहुँची है उससे वहाँ भी प्रवेश पा लिया है। उपरोक्त घटनायें सरमोतुर जीवन के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती है और उनके लिए चुनौती देती हैं जो शरीर के साथ ही जीवन का अंत होने की बात करते रहते हैं साथ ही वस्तुओं परिजनों से अत्यधिक माह होने पर मृत्यु कि बाद भी जीवात्मा के इन्हीं वस्तुओं के इर्द गिर्द मोहग्रस्त होकर मँडराते रहने की दयनीय स्थिति को भी स्पष्ट करती है यह मोह आसक्ति मृतात्मा की प्रगति अन्यत्र जन्म लेने और कुटुँबियों की सुविधा की दृष्टि से अवांछनीय है। इसलिए भारतीय संस्कृति में अन्त्येष्टि एवं मरणोत्तर संस्कार के साथ इस प्रकार के धर्मोपबार जोड़े गये हैं जिससे मृतात्मा का मोह एवं शोक शाँत हो सके और उसे विकास क्रम के अनुरूप अन्यत्र जन्म लेने अथवा मुक्ति का अवसर मिल सके।
शारीरिक स्वस्थता और अस्वस्थता हाड़-माँस की देह में प्रकट और प्रत्यक्ष होती दीखती है। इतने पर भी तथ्य यह है कि इसका मूल कारण न तो काया में निहित है न किसी अन्य स्थूल अवयव में। अध्यात्म विद्या के विशेषज्ञ जानते हैं कि जिस स्थूल शरीर को हम सजाने सँवारने और सुधारने का प्रयत्न कराते रहते हैं वास्तव में वह पर्याप्त नहीं है। उसे आवश्यक तो कहा जा सकता है, पर संपूर्ण नहीं। उसकी परिपूर्णता स्थूल के मूल में निहित सूक्ष्म के सुधार परिष्कार में है। समग्र स्वास्थ्य का यही मूलाधार है।
अध्यात्म विज्ञानियों के अनुसार हमारे समस्त शरीर में नाडियों का एक प्रकार का जाल बिछा हुआ है। यह केंद्र के स्थान से निकल कर पूरी काया में फैली हुई है। इसकी संख्या 72 हजार बतायी जाती है। योगियों का कहना है कि स्वास्थ्य की वास्तविक कुँजी यही है। उपचार इन्हीं का होना चाहिए। जो रोग की जड़ में जीवाणुओं और विषाणुओं को कारण भूत मानते हैं विशेषज्ञों के अनुसार वे भूल करते हैं। इसका आधारभूत कारण नाडी संबंधी विकृति में अंतर्हित है। इस विकृति में अंतर्हित है। इस विकृति के फलस्वरूप शरीर में व्याप्त प्राण जर्जर हो जाता है, जिसके कारण काया में रोगाणु यव तव अपना अड्डा बना लेते और पलते बढ़ते रहते हैं। इनका उपचार तो होना चाहिए पर वास्तविक निमित्त की यदि उपेक्षा की गई तो उक्त उपाय बहुत कारगर सिद्ध हो सकेगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इससे अस्थायी लाभ तो मिल सकता है, पर संपूर्ण नहीं और इलाज के रुकते ही लक्षण पुनः प्रकट होने लगते हैं। इसीलिए वे इन सूक्ष्म मर्मस्थलों के संशोधन की बात बार बार कहते पाये जाते हैं।
साधना विज्ञानियों का कहना है कि नाडी जाल देह में नाडी गुच्छक के रूप में फैला होता है इन्हें अध्यात्म की भाषा में उपत्यिका कहते हैं। इनकी कई जातियाँ है। कई स्थानों पर ज्ञान तंतुओं जैसी बहुत पतली नाड़ियां परस्पर चिपकी रहती है। कई बार यह रस्सी की तरह आपस में लिपटी और बटी होती है। कई स्थानों पर गुच्छक गाँठ की तरह ठोस गोली जैसे बन जाते हैं। कितनी ही बार यह साँप की तरह समानाँतर लहराते हुए चलते हैं। अनेक जगहों में इनसे बरगद की भाँति शाखा प्रशाखाएँ निकलती दिखाई पड़ती है। कितने ही अवसरों पर अनेक प्रकार के गुच्छक परस्पर मिलकर एक घेरे का निर्माण कर लेते हैं। इनके रंग और आकार में जाति के हिसाब से अंतर पाया जाता है। षड्मव महारत्न में ग्रंथकार ने लिखा है कि यदि सूक्ष्म स्तर का गहन अनुसंधान किया जाय तो इन सूक्ष्म नाडी गुच्छकों के तापमान अणु परिभ्रमण एवं प्रतिभा पुँज में स्फुट अंतर दिखाई पड़ने लगेगा।
शरीर शास्त्री इन गुच्छकों के कार्य और स्वभाव का कोई विशेष परिचय अब तक प्राप्त नहीं कर सके है, पर अध्यात्मवेत्ताओं का मत है कि यह उपत्यिकाएँ कामत है कि यह उपत्यिकाएँ शरीर में अन्नमयकोश को बंधन ग्रंथियां है। यह अन्नमय कोश वस्तुतः है क्या? इसे भलीभाँति समझ लेना आवश्यक है। इस रहस्य को स्पष्ट करते हुए मृगेन्द्र आगम में शास्त्रकार लिखते हैं कि वास्तव में इस रक्त माँस के कलेवर को अन्नमय कोश समझने की जो आम धारणा है, वह सही नहीं है। यह माँस पिण्ड अन्नमय कोश होता तो मृत्यु के उपराँत जीवात्मा को स्वर्ग नरक भूख प्यास सर्दी गर्मी जैसी सुखद और दुःखद स्थितियों की अनुभूति नहीं होनी चाहिए पर मरणोत्तर जीवन में ऐसा होता देखा जाता है। स्पष्ट है कि अन्नमय कोश शरीर का संचालक कारण उत्पादक उपभोक्ता आदि तो है, पर उससे पृथक् भी है। इस पृथक आपे में जब गड़बड़ी आती है तो उसकी स्थूल सत्ता भी लड़खड़ाने लगती और रुग्ण बन जाती है। ऐसे शरीर की उपत्यिकाएँ भी रोगग्रस्त हो जाती है। उपत्यिकाएँ अन्नमयकोश से संबद्ध है। इसलिए इनकी विकृति को जानकर अन्नमयकोश से संबद्ध है। इसलिए इनकी विकृति को जानकर अन्नमयकोश के विकार को समझा जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि पशु-पक्षी उतने बीमार नहीं पड़ते जितने कि मनुष्य पड़ते देखे जाते हैं। इसकी गहराई में जान से एक ही प्रधान कारण दिखाई पड़ता है वह है मानव का प्रकृति के विरुद्ध आचरण। जीव जंतु प्रकृति प्रेरणा से कार्य करते प्रकृति के अनुरूप व्यवहार करते इसलिए यदा कदा ही बीमार पड़ते देखे जाते हैं, जबकि मनुष्यों के अधिकाँश कार्य प्रकृति के विपरीत होते हैं। इस विपरीतता से भीतर और बाहर का तारतम्य बिगड़ता है और असंबद्धता पैदा होती है। दोनों स्तरों पर संबद्धता नहीं रह पाने के कारण तरह तरह के रोग उपजते और व्यक्ति को अपने गिरफ्तार में लेते रहते हैं। अन्नमय कोश में असंबद्धता पैदा होने का सबसे प्रमुख कारण आहार दोष है। अन्न यदि विकारग्रस्त प्रकृति के विरुद्ध अनीति उपार्जित हो तो इन सबसे नाड़ियां और अन्नमय कोश विकृत बनते हैं। विकृति-विज्ञान का उल्लेख करते हुए साधना विज्ञान के मूर्धन्य आचार्य सघोजात लिखते हैं कि जिसे अन्न से हम अपना पेट भरते हैं और शरीर रक्त माँस का निर्माण करता है वास्तव में वही अन्न हमारे अन्नमय कोश और उपत्यिकाओं को बनाता-बिगाड़ता रहता है। उनके अनुसार अन्न के स्थूल सूक्ष्म कारण तीन भाग है। स्थूल से रस रक्त का सृजन होता है। सूक्ष्म वाला हिस्सा मानवी प्रवृत्तियों को जन्म देता है, जबकि उसका कारण भाग संकल्प और संस्कार के लिए जिम्मेदार है। भोजन का यह अंश अच्छा बुरा जैसा होता है, वैसे ही संस्कार हमारे अन्न से संबंधित इस कोश में जमने लगते हैं। अच्छे सात्विक खाद्य से संस्कार अच्छे बनते हैं जबकि कुधान्य से अखाद्य से उसकी प्रकृति असात्विक हो जाती है। यही कारण है कि अंडा माँस जैसे अभक्ष्य को खाने से शरीर तो माँसल हो जाता है पर उसकी कारण प्रकृति इतनी अवाँछनीय और अप्रिय स्तर की होती है कि अन्नमय कोश को बीमार बना देती है। यह अस्वस्थता समग्र व्यक्तित्व को प्रभावित करती और व्यक्ति को व्यवहार की दृष्टि से अत्यंत फूहड़ असभ्य और असंस्कृत बना देती है। यह स्पष्ट है कि रुग्ण उपत्यिकाओं वाला व्यक्ति अपने रुग्ण स्वभाव से निर्मित अस्वाभाविक और असुखकर परिस्थितियों में सर्वदा क्षुब्ध और अशाँत बना रहता है। इतना ही नहीं कोश की अपरिष्कृति में सर्वदा क्षुब्ध और अशांत बना रहता है। इतना ही नहीं कोश की अपरिष्कृति का परिणाम अदृश्य रूप से आकस्मिक रोगों के रूप में तथा जन्म जन्मान्तर तक कुरूपता एवं शारीरिक अपूर्णता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इसलिए इस तथ्य से परिचित लोग सदा सात्विक और संस्कारी अन्न पर जोर देते हैं ताकि स्थूल शरीर में किसी प्रकार की अपंगता अस्वस्थता आलस्य और कुरूपता की वृद्धि न हो।
जिस प्रकार देह के तापमान को देख कर शारीरिक स्वस्थता अस्वस्थता का पता चल जाता है उसी प्रकार नाडी गुच्छकों के गुण दोषों के आधार पर सूक्ष्म शरीर की स्थिति ज्ञात हो जाती है। किसी एक जाति की नाडी के दोषों की अधिकता इस बात की प्रतीक है कि सूक्ष्म शरीर असंतुलन की ओर बढ़ रहा है तब उसे संतुलित- नियंत्रित करने की आवश्यकता पड़ती है। इंधिका जाति के नाडी गुच्छकों की अधिकता व्यक्ति में चंचलता अस्थिरता उद्विग्नता पैदा करती है। इंध्का प्रधान व्यक्ति स्थिर वैउकर काम करने में अयोग्य होता हे जिनमें वैउकर काम करने में अयोग्य होता है। जिनमें दीपीकि जाति की उपत्यिकाएं अधिक होती है उनमें वर्भ रोग फोड़ा फुन्सी पीला पेशाब आँखों में जलन जैसी शिकायतें पैदा होने लगती है। जब मोविकाओं की वृद्धि होती है तो दस्त जुकाम कफ संबंधी समस्याएँ बढ़ने लगती है। आप्यायिनी अधिक निद्रा अतुत्साह आलस्य भारीपन के लिए जिम्मेदार होती है। पूषा की बढ़ोत्तरी व्यक्ति को अति कामुक बनाती है। कपिला डर दिल की धड़कन में वृद्धि आशंका अस्थिर चिंतता नपुँसकता जैसे रोग पैदा करती है। धूसार्वि गुच्छक क्रोध और श्वास की तीव्रता को बढ़ाता है ऊष्मा की अधिकता के कारण जाड़े में भी व्यक्ति को गर्मी महसूस होती है। आमाया मनुष्य को जिद्दी और दुराग्रही बनाती है। ऐसे शरीरों में दवा कदाचित् ही कभी असर करती है। ऐसे मानव अपनी इच्छा से ही होगी और नीरोग बनते देखे जाते हैं। उद्गीथ की अभिवृद्धि व्यक्ति को संतानहीन बना देती है। जिनसे इस जाति के गुच्छक ज्यादा होंगे वे हर प्रकार से स्वस्थ होते हुए भी संतानोत्पादन के अयोग्य होंगे। असिता की जिस शरीर में संख्या ज्यादा होती है वह काया अपने ही लिंग की संतानें पैदा करने की विशेष क्षमता रखती है। स्त्री शरीर में यह कन्या पैदा करने लगती है और पुरुष शरीर में इनकी बहुलता बालक उत्पन्न करती है। युक्त हिंसा दुष्टता क्रूरता अनाचार अत्याचार जैसे कृत्यों की प्रेरणा देती है। इनसे संपन्न व्यक्ति जुआरी व्यभिचारी लंपट ठग बेईमान होते देखे जाते हैं।
इन ग्रंथियों की न्यूनाधिकता शारीरिक स्थिति को मनोनुकूल रखने में बाधक होती है। मनुष्य चाहता है कि वह अपनी स्थिति और अवस्था को अमुक प्रकार की बना कर रखें। इसके लिए वह प्रयत्न भी करता है पर अनेक बार वह उपाय असफल होते देखे जाते हैं, कारण कि ये उपत्यिकाएं अन्दर ही अंदर ऐसी क्रियाएँ उत्पन्न करती है जो बाहरी प्रयास को सफल नहीं होने देती और मनुष्य अपने को बार बार असफल एवं असहाय अनुभव करता है।
उपत्यिकाओं का यह जाल शरीर एवं मन द्वारा किये गये दुरितों दुष्कर्मों दुराचरणों से विकारग्रस्त बता तथा सत्कर्मों से संतुलित और सुव्यवस्थित होता है। इन्हें ठीक बनाये रखने के लिए आहार बिहार का संयमित एवं सात्विक होना, दिनचर्या सही बनाये रखना, प्रकृति के निर्देशों को पालना आवश्यक माना गया है। इनके अतिरिक्त कुछ योग साधनात्मक उपाय उपाय उपचार भी है जिन्हें यदि नियमित रूप से करता रहा जाय , तो इन नाडी गुच्छकों का शोधन एवं संभव हो जाता है। बाह्योपचार जहाँ इन्हें परिमार्जित करने में एक प्रकार से निष्फल बने रहने हैं, वही आध्यात्मिक अवलंबन रामबाण सिद्ध होता है।
उपवास इन्हीं में से एक सशक्त उपाय है, जो नाड़ियां को संशोधित करने में बहुत कारगर सिद्ध होता है। इसी होता है। इसका एक सुविस्तृत विज्ञान हैं। इसी विज्ञान के आधार पर प्रावीन ऋषियों ने मास, मुहूर्त फल को ध्यान में रखते हुए त्यौहारों से इसकी ऐसी संगति बिठायी थी कि उक्त ऋतु , मास और तिथि में जिस ग्रह की कल्याणकारी किरणें बरसती है, उन्हें उपवास के माध्यम से आकर्षित-अवशोषित कर अंतः को सुविकसित बनाया जा सकता था। शास्त्रों में जो जगह-जगह अमुक उपवास के अमुक और अमुक के अनुकूल फल गिनाये गये है, वस्तुतः वह इसी विज्ञान पर आधारित है। उन्हें यदि आवश्यक नियमों और निर्देशों के साथ संपन्न किया जा सके , तो आज भी इनके सहारे काफी लाभ हस्तगत किये जा सकते हैं। उपवासों के कई प्रकार है। सभी की अलग-अलग विशेषताएँ है। किस व्यक्ति को कौन-सा उपवास उपयुक्त होगा और उसके नियमोपनियम क्या होने चाहिए, इसके निर्धारण के लिए सूक्ष्म विवेचन की आवश्यकता है। इस विद्या का कोई विशेषज्ञ ही इसका निर्णय भलीभाँति कर सकता है। वस्तुतः इसके निर्धारण के समग्र जिन बातों को ध्यान में रखना पड़ता है, वे है- साधक का अन्नमय कोश किस स्थिति में है? कौन से नाडी-गुच्छक विकार युक्त हो रहे है? किस उत्तेजित संस्थान को शाँत करने एवं किस मर्म स्थल को सतेज करने की जरूरत है? इतना सब जानने के पश्चात् ही इस बात का निश्चय हो सकता है कि कौन-सा व्यक्ति किस प्रकार का उपवास करे।
उपवासों के उपराँत आंतरिक के उपराँत आँतरिक संस्थानों को सही करने के लिए के लिए आसनों की बारी आती है। आसन इतने उपयोगी व्यायाम हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि में भी आवश्यक हैं, और मर्मस्थलों को क्रियाशील बनाने में भी महत्वपूर्ण साबित होते हैं, इनके द्वारा आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार शरीर के भीतर की हव्यवहा कव्यवहा नामक विद्युत शक्ति संतुलित और सक्रिय बनी रहती है एवं उपत्यिकाएँ भी नियंत्रण में रहती है।
इन सब पर ध्यान दिया और दिनचर्या आहार विहार आदि को संयमित रखा जा सके, नियमित तप, उपवास आसनों द्वारा भीतरी सूक्ष्म तंत्रों पर जमा होने वाले कषाय-कल्मषों को बराबर परिमार्जित करते रहने का कोई सुनिश्चित क्रम बन सके तो कोई कारण नहीं कि हम स्वस्थ नीरोग न रह सकें। बाह्य स्वास्थ्य का आधार अंतर की नीरोगता और सुव्यवस्था का आधार अंतर की नीरोगता और सुव्यवस्था में निहित है इसे यदि समझा जा सके तो हर कोई व्याधि रहित जीवन जी सकता और स्वस्थ प्रसन्न बना रह सकता है।
युग परिवर्तन अपने समय का सबसे बड़ा काम है। सामान्य परिवर्तन भी कठिन जटिल और कष्टसाध्य होते हैं, फिर 600 करोड़ से अधिक मनुष्यों की मनःस्थिति और परिस्थिति बदल देना कितना दुरूह हो सकता है इसकी कल्पना भर से रोमाँच होता है। इस प्रकार के सामान्य प्रयोजनों में भी अत्यंत सतर्कता बरतनी योजना बनानी व्यवस्था जुटानी एवं सामग्री एकत्रित करनी पड़ती है।यह कार्य हर कोई नहीं कर सकता। प्रतिभाएँ ही इस प्रकार के उत्तरदायित्व को कंधों पर उठाती और उन्हें पूरा करके दिखाती है। सामान्य मनुष्य तो ढेर का जीवन जी सकते हैं। अभ्यस्त परिपाटी अपनाये रह सकते हैं। बदलती हुई आवश्यकताओं का सामना कैसे किया जाय इसका समाधान ढूंढ़ने के लिए दूरदर्शी प्रतिभा दक्षता और साहसिकता चाहिये, जिनमें इस प्रकार की विशेषता होती है वे ही महत्वपूर्ण परिवर्तनों की समग्र भूमिका निभा सकने में समर्थ होते हैं।
पुल बाँध कारखाने जिनने बनाये है, जंगल काटकर उद्यान जिनने लगायें हैं वे ही जानते हैं कि अनगढ़ परिस्थितियों से निपटना और सृजन के समग्र साधन खड़े करना कितना कठिन होता है। उसमें कितनी अड़चने आती है और कितने व्यवधान खड़े होते हैं। अप्रत्याशित कारणों से निपटने के लिए कितनी पैनी सूझ बूझ की जरूरत पड़ती है और अभाव अवरोधों के साथ किस कुशलता से बच निकलने तालमेल बिठाने एवं टूट पड़ने की रणनीति अपनानी पड़ती है। सामान्य मनुष्यों के लिये सत्साहस जुटाना तो दूर परिचर्या परिकल्पना तक से पसीना छूटता है।
युग परिवर्तन का प्रथम चरण विचार क्रांति अभियान से आरंभ होता है। लोक चिंतन को उलटने आस्थाओं आकाँक्षाओं एवं अभ्यासोँ का कायाकल्प करने की प्रथम प्रक्रिया प्रचार परक है। धर्मतंत्र से लोक शिक्षण की क्रिया प्रक्रिया जन संपर्क साधने और जन-जन तक नवयुग का संदेश पहुँचाने की है। आलोक वितरण जन जागरण के लिये घर घर अलख जगाने के लिये इन दिनों जाग्रत आत्माएँ संलग्न है। लेखनी वाणी और संगठन उद्बोधन की प्रक्रिया अनेकों रचनात्मक क्रियाकलापों द्वारा अग्रगामी बनाई जा रही है। धर्मानुष्ठानों में श्रद्धा-संपन्न लोगों को लगाया गया है और साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाने के लिये कहा गया है। यह वातावरण बनाने की योजना है। इसे भूमि जोतना कह सकते हैं। बीज बोने खाद पानी का प्रबंध करने और गिराने मोड़ने रखवाली का प्रबंध करने से लेकर फसल काट कर घर लाने की सुविस्तृत क्रिया प्रक्रिया इसके बाद आरंभ होती है।
थ्वचारों का महत्व कितना ही क्यों न हों किंतु इतने से ही जीवन में प्रगतिशीलता का समावेश और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण नहीं हो सकता, इसके लिये अन्यान्य कितने साधन चाहिये। उन सभी को जुटाना होता है। विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है। रोटी कपड़ा मकान जैसे निर्वाह साधनों से लेकर परिवार पोषण आजीविका उपार्जन स्नेह विग्रह सामाजिक उतार चढ़ाव जैसी अनेक समस्याओं से निपटना होता है। प्रतिकूलता हटाना और अनुकूलता बनाने का काम जादू की छड़ी घुमाने से नहीं होता। इसके लिये अभीष्ट पुरुषार्थ और साधना संचय पर आधारित अन्य अनेकों कार्य करने होते हैं। व्यक्तित्व जीवन संघर्ष में जिन्हें जूझना पड़ा है वे ही यह अनुभव कर सकते हैं कि युग की समस्याएँ कितनी विस्तृत एवं भारी होती है। उन्हें हल करने के लिये कितने भारी भरकम व्यक्तियोँ की आवश्यकता पड़ती है।
युग परिवर्तन के दो पक्ष है, एक अवाँछनीयता का निवारण, दूसरा उपयोगिता का निर्धारण। इन दोनों में से एक को युद्ध लड़ना और दूसरे की उसके लिये साधन सामग्री सैन्य शक्ति जुटाना कहा जा सकता है। दोनों का अपना अपना महत्व है। युद्ध जीतने वाले योद्धाओं की वीरता और प्रवीणता का तो उपयोग करना ही पड़ता है। साथ ही वे समस्त साधन भी जुटाने होते हैं जो राशन वाहन आयुध, उपकरण आदि के रूप में उस प्रयोजन के लिये निताँत आवश्यक होते हैं। दोनों पक्षों में से एक भी कमजोर पड़ेगा तो जीतने का लाभ उठाना तो दूर हारने से हानि ही हानि उठानी पड़ेगी। फिर जीत लेना ही एक काम नहीं है। उसके बाद की क्षतिपूर्ति करना और नई परिस्थितियों के अनुरूप नई आवश्यकताओं की पूर्ति करना युद्ध में विजय से बड़ा काम है। आपरेशन कुछ मिनटों में ही पूरा हो जाता है। किंतु घाव भरने में समय श्रम साधन और सतर्कता की आवश्यकता देर तक पड़ती रहती हैं।
नवयुग का अवतरण प्रातःकाल के सूर्योदय जैसी सहज सुलभ प्रक्रिया नहीं है। इसके लिये भागीरथी प्रयत्नों की आवश्यकता पड़ रही है। लंका-दहन करने वाले हनुमान ओर पुल बनाने वाले नल नील बड़ी संख्या में इन दिनों अभीष्ट हैं। लंकाकाण्ड से उत्पन्न समस्याएँ भारत के दक्षिण भाग के थोड़े से इलाके को प्रभावित करती थी। उस सीमित कार्य को सीमित लोगों ने कर लिया होगा, किंतु युग निर्माण का क्षेत्र तो उससे लाखों गुना बड़ा है। धरती के कोने-कोने में नव-सृजन का उद्यान अनुमान बालबुद्धि नहीं अपितु परिपक्व प्रौढ़ता ही लगा सकती है।
अनुपयोगी उत्पादनों को हटाना ही एकमात्र काम नहीं है। उसकी स्थान पूर्ति उपयोगी साधनों से नये सिरे से नये स्तर के उत्पादनों से ही हो सकती हैं। साहित्य, कला, शिल्प, स्वास्थ्य शिक्षा विज्ञान, शासन जैसे मानवोपयोगी असंख्य क्षेत्रों में नये साधन खड़े करने पड़ रहे है उनके लिये उन्मूलन के समय प्रयुक्त हुये पुरुषार्थ से भी अधिक पुरुषार्थ करने होगे। रीछ वानरों का लंका विजय में नियोजित हुआ पुरुषार्थ सदा सराहा जाता रहेगा किंतु राम राज्य की स्थापना में जिनकी प्रतिभा सृजन प्रयोजनों के नये आधार खड़े करने में लगी होगी उन्हें भी भुलाया नहीं जा सकता। उनका योगदान लड़ाकू स्तर का भले ही न रहा हो पर वे जिस सृजन कौशल का उपयोग जिस मनोयोग और सदुद्देश्य के साथ करते होंगे उनका विवरण उपलब्ध न होने पर भी सहज श्रद्धा उनके चरणों में नत मस्तक होती रहेगी। युग परिवर्तन में लाल मशाल लेकर विचार क्राँति में संलग्न शूरवीरों की जैसी आवश्यकता आज पड़ रही है कल वैसी ही नहीं वरन् उससे भी अधिक खोजबीन उनकी करनी पड़ेगी जो सृजन प्रयोजनों को पूरा कर सकें। पुरानी पीढ़ी ने स्वतंत्रता संग्राम जीता। वर्तमान पीढ़ी उसके उपराँत की सृजन प्रक्रिया का कौशल न दिखा सकी फलतः शहीदों के त्याग बलिदान का लाभ अधूरा ही बन कर रह गया। युग सृजन में यह भूल न होने पाये इसके लिये अभी से सतर्कता बरतने और तैयारी में लगे रहने की आवश्यकता है।
साहित्य और कला का लोक चिंतन की दिशा धारा विनिर्मित करने में अत्यधिक योगदान रहता है। साहित्य सृजन करते हैं। उस रुझान से प्रेरित होकर लोग अपनी गतिविधियाँ चलाते हैं। इससे वे परिस्थितियाँ और प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे भला या बुरा समय सामने आ खड़ा होता है। यों देखने में साहित्यकार किन्हीं परिस्थितियों के लिये जिम्मेदार प्रतीत नहीं होता पर वास्तविकता यह है कि सच्चे अर्थों में वही उसके लिये उत्तरदायी है। विष बीज बोने वाला चाहे तो यह कह सकता है कि विष फल खाकर मरने की घटना में उसका कोई दोष नहीं है पर न्याय बुद्धि यही कहती रहेगी कि जिनने रुझान उत्पन्न की वे प्रशंसा या भर्त्सना से बच नहीं सकते। आज की युग समस्याओं के लिये लोक मानस में घुसी हुई जिस निकृष्टता का रोल है उसके उत्पादन में उन साहित्यकारों की प्रधान भूमिका रही है जो लेखन प्रकाशन एवं विक्रय के रूप में विकृत साहित्य के सृजन एवं प्रचार के लिये जिम्मेदार है। उन्हें अपनी कूटनीतिक करतूतें यथावत् चलाते रहने की छूट नहीं मिल सकती। नव युग में इनकी करतूतें बंद तो होगी ही। इनके स्थान पर नयी पीढ़ी के नये साहित्यकारों का सृजन करना होगा। इस वर्ग में वे लोग भी शामिल होते हैं, जो प्रकाशन एवं विक्रय में अपने पूँजी लगाते और आजीविका कम हैं। युग सृजन के लिये नया वर्ग अपने से तैयार किया जाना चाहिए। नस् में इस पौध का आरोपण उद्यान लगने से पूर्व ही करना होगा।
कला के संबंध में भी ठीक या बात कही जा सकती है। संगी काव्य गायन वादन अभिनय लोक मानस के निर्माण में साहित्य समतुल्य ही प्रभाव पड़ता है। भारत में सिनेमा व टेलीविजन दर्शकों व संख्या पत्र पत्रिकाओं के पाठक अधिक है। सिनेमा व टी. वी. प्रभाव शक्ति सर्व विदित है। वर्तमान पीढ़ी और नई पौध का जो स्वर आँखों के सामने है उसमें सिनेमा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष योगदान को मूर्ध माना जा सकता है। सिनेमा न देखने वाले भी देखने वालो की छूत प्रभावित होते हैं, और लोक चिरे पर सिनेमा की प्रेरणाएँ हावी है। यह अभिनय कहीं जीवित होगा तो उस भी फिल्म प्रेरणा का अनुयायी होते ही रहना पड़ रहा होगा। संगीत नाम पर जो कुछ कानों को सुनने के लिये मिलता है उसमें कुरुचि प्रेरणाएँ वाले उतरती है। रिकार्डों लेकर संगीत सम्मेलनों गोष्ठी गाय तथा व्यक्तित्व गुनगुनाहटों में रस के साथ जो विष घुला रहता है उससे लोक चिंतन के निकृष्टता की दिन में गिरने का ही पथ प्रशस्त होता है
इस क्षेत्र की सड़न गंदगी व बुहारना ही पर्याप्त नहीं हैं उस स्थान पर सुरुधि की प्रतिष्ठापना करनी होगी। आज की सबसे बड़ी कमी यही है कि सुरुचिपूर्ण सदाशय का सृजन तो नहीं हो रहा रिक्त कुरुचिपूर्ण प्रस्तुतीकरण से भरी न रही है और क्षेत्र अत्यंत व्यापक है गीत रचने से लेकर गीतकार उत्पन्न करने तक संगीत विद्यालय चलाने लेकर अभिनय मंडलियाँ खड़ी कर तक इस क्षेत्र में प्रयुक्त होने यो कितनी ही योजनायें हैं जिन्हें हर मूल्य पर क्रियान्वित किया ही जाना चाहिये। भारत का अर्थ है देहात। शहरों में सिनेमा का तथा अब दूरदर्शन का भी आधिपत्य है पर यदि देहात के लिये उपयुक्त है पर यदि देहात के लिये उपयुक्त अभिनय की व्यवस्था की जा सके तो उसके लिये भावभरी गुंजाइश मौजूद है। जिनके पास पैसा हो रिकार्ड बनाने और सुरुचिपूर्ण फिल्म बनाने के उद्योग में प्रवेश कर सकते हैं। इसमें लोक रंजन लोकमंगल के अतिरिक्त यश और धन उपार्जित करने की भी परिपूर्ण संभावना विद्यमान है।
सरकारें संभवतः भौतिक जानकारियाँ देने वाली शिक्षा का ही भार वहन कठिनाई से कर सकेगी। व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत अगणित समस्याओं का बौद्धिक समाधान एवं व्यावहारिक अनुभव प्रस्तुत करने के लिये लोक शिक्षण की अतिरिक्त आवश्यकता पड़ेगी। स्कूली पाठ्यक्रम जितने बड़े है उतने ही नहीं वरन् उनसे भी बड़े पाठ्यक्रम व्यक्ति निर्माण एवं समाज निर्माण के विभिन्न पक्षों को समझने के लिये भी बनाने होगे। मात्र पुस्तकें छापने से भी यह कार्य पूरा न होगा उसके लिये अनुभव और कौशल प्रदान करने वाले निर्माता स्तर के शिक्षकों एवं संस्कारवानों की भी आवश्यकता होगी। भले ही वे अवकाश के समय रात्रि पाठशालाओं की उन्हें अध्ययन की शिक्षा देने वाले तंत्रों की स्थापनाएँ करने की आवश्यकता पड़ेगी। इसे समानान्तर शिक्षा की विद्या के विस्तार की योजना कहा जा सकता है। इसका सूत्र संचालन करने के लिये प्रतिभाएँ चाहिए। बचकाने व्यक्तित्व दूसरों को प्रभावित न कर सकेंगे और पाठ्यक्रम चिह्न पूजा जैसा बन कर रह जायेगा।
अगले दिनों भौतिक क्षेत्र में सहकारिता एवं कुटीर उद्योगों का व्यापक प्रसार होगा। अर्थ तंत्र की सुव्यवस्था इन्हीं दोनों पर आधारित होंगी। बड़ी मिले व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पादन तो जादुई तमाशे मात्र है। इनमें मात्र सुई, खाली उत्पादन कुटीर उद्योग की तरह पनपे ऐसी व्यवस्था बनानी होगी। सहकारिता और कुटीर उद्योगों का समन्वय ही गरीबी और बेकारी का हल है। नया अर्थशास्त्र अर्थतंत्र इस आधार पर खड़ा करना होगा कि सभी मिलजुल कर कमाये और हंस बाँट कर खाये।
शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करना समूचे समाज का-विशेष, सुसंपन्नों का, प्रगतिशीलों का कर्तव्य है। अपराधियों के लिये खुल कर खेलने की परिस्थितियाँ न बनने देना, सुरक्षा और प्रतिरोध की पंक्ति सुदृढ़ रखना जागरूकों का समर्थों का उत्तरदायित्व है।
युग सृजन के इस कार्य के लिये पग-पग पर प्रतिभाओं की आवश्यकता पड़ रही है। जन सहयोग उनके समर्थन में एवं अनुगमन भर की भूमिका निभा सकता है। अग्रगामी और मूर्धन्य ही संसार के समस्त महान कार्यों ओर मूर्धन्य ही संसार के समस्त महान कार्यों नाभिक की केन्द्रीय सत्ता बन कर समय और समाज का नेतृत्व करने में समर्थ करने में समर्थ हुए हैं उनने अपने को श्रेयाधिकारी बनाया है और असंख्यों को अपनी नाव में बिठा कर पार किया है। आत्म शक्ति संपादन में भी ऐसे ही मनस्वी सफल होते हैं, अन्यथा रोते कलपते पूजा पाठ की चिह्न पूजा करते रहने वालो की निराश जन संख्या सर्वत्र देखी जा सकती है। समय की एक ही माँग है प्रतिभा के धनी ऐसे व्यक्तित्व जो दूरदर्शिता और साहसिकता के धनी हो तथा आत्म कल्याण और लोककल्याण का दुहरा प्रयोजन पूरा करने में निरंतर संलग्न रह सके।अब चुप न बैठे रहे आगे आएँ।
तीन पहाड़ थे पास ही पास। उनसे लगा हुआ लंबा गहरा खड्ड था। उसके कारण उस ओर किसी का आवागमन नहीं होने पाता था। एक बार देवता उधर से निकले पहाड़ों से कहा इस क्षेत्र का नामकरण करना है। तुम तीनों में से किसी के नाम पर नामकरण किया जायगा। तुम तीनों अपनी एक-एक इच्छा पूरी करा सकते हो। एक वर्ष बाद जिसका जितना विकास होगा उस आधार पर नामकरण किया जायगा।”
पहले पहाड़ ने कहा में सबसे ऊँचा हो जाऊँ। ताकि सबसे दूर से दिखाई दूँ। दूसरे ने कहा मुझे खूब हरा भरा प्राकृतिक संपदा से भरा-पूरा बना दे, ताकि सब मेरी ओर आकर्षित हों। तीसरे पहाड़ ने कहा मेरी ऊँचाई छीलकर इस खड्ड करे समतल बना दें, ताकि यह सारा क्षेत्र उपजाऊ हो जाय और लोग यहाँ सुविधा से आ जा सके, देवता तीनों की व्यवस्था बना कर चले गये।
एक वर्ष बाद परिणाम देखने देवता पुनः पहुँचे। पहला पहाड़ ऊँचा हो गया था दूर से दिखता था, पर वहाँ कोई जाता नहीं था। हवा, सर्दी गर्मी की मार सबसे अधिक उसे ही सहनी पड़ती थी।
दूसरा पहाड़ प्राकृतिक संपदा से भर गया था, पर बीहड़ इतना था कि किसी के जाने की हिम्मत न पड़ती थी। वन्य पशुओं का आतंक भी उससे खूब बढ़ गया था।
तीसरा पहाड़ खड्ड पाटने से समतल हो गया था। पर सारे क्षेत्र में फसलें उगायी जा रही थीं। खड्ड पर जाने से लोग वहाँ जाने लगे, बसने लगे। उपजाऊ भूमि का लाभ सबसे मिलने लगा।
गीत संगीत नृत्य वादन साहित्य और कविता यह स्वस्थ मनोरंजन तथा मानसिक विकास के सर्वोत्तम तथा मानसिक विकास के सर्वोत्तम साधन है। शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यों से एक प्रकार की ऊब पैदा होती है जो मानसिक सरसता के अभाव में दूर नहीं होती। उसके बने रहने से जीवन एक प्रकार से निरानन्द बन जाता है। नीरसता खीज पैदा करती है, जो मानसिक असंतुलन का प्रमुख कारण है? जो मानसिक असंतुलन का प्रमुख कारण है? असंतुलन को प्रतिक्रिया पारिवारिक जीवन में विचार विग्रह के रूप में सामने आती है? जबकि सामाजिक जीवन में उसका स्वरूप संघर्ष और शोषण के रूप में प्रकट होता है।
इससे बचा कैसे जाय? मनःशास्त्रियोँ ने इस संबंध में विस्तृत खोजबीन की है, उनमें से मूर्धन्यों का निष्कर्ष यह है कि ऊब तथा उसकी प्रतिक्रियाओं से बचना हो तो हर क्रियाशील व्यक्ति को अपने ढर्रे के कार्यों के अतिरिक्त जीवन में किसी कलात्मक हॉबी का विकास करना चाहिए, ऐसी हॉबी जो सही अर्थों में मन को सरसता प्रदान करे और उसे परितृप्त करे। वह कुत्सा को भड़काने वाली नहीं जीवन के प्रति विधेयात्मक दृष्टि पैदा करने वाली हो साथ ही उसका स्वरूप कुछ ऐसा हो जिससे मन को कल्पना करने तथा शरीर को बिना किसी दबाव के व्यस्त रहने का सुअवसर मिलता हो।
इस दृष्टि कलात्मक अभिरुचियों का महत्व बढ़ जाता है। हर व्यक्ति में कला के बीज विद्यमान है। न्यूनाधिक रूप से किसी न किसी रूप में कोई न कोई अतिरिक्त विशेषता हर व्यक्ति को प्राप्त है। उसे उभारा और विकसित किया जा सकता है। अपनी रुचियों का विश्लेषण करके यह मालूम किया जा सकता है कि गति किस दिशा में उपयुक्त रहेगी। गायन वादन पेंटिंग ड्राईंग कविता साहित्य सुसज्जा बागवानी जैसे किसी भी क्षेत्र को अपनाया जा सकता है। इनसे अपना भी मनोरंजन होता है और लोकप्रेरणा की समाज सेवा भी मधती है। खेलकूद को भी इस निमित्त अपनाया जा सकता है। स्वस्य मनोरंजन के यह सपर्ध साधन है। खाली का अतिरिक्त लाभ अनायास मिल जायगी।
यूनिवर्सिटी ऑफ र्होफ्स्ट्रा के शोधकर्मी वैज्ञानिकों डोनाल्ड हेस, ब्रुस केमेल्स्की एवं मेल्विन पावर ने प्रयोगों की एक नई शृंखला शुरू की। उनका शोध विषय था कलात्मक अभिरुचियों के मानव मस्तिष्क एवं मनःसंस्थान पर पड़ने वाले प्रभावों की जाँच पड़ताल करना। बच्चों पर किये गये अध्ययन के दौरान उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि कलात्मक हाथियों से मस्तिष्क की प्रखरता बढ़ती है। ऐसे बच्चे जो स्मृति दोष से पीड़ित थे, उन पर उन्होंने प्रयोग किये। उनका ध्यान कलात्मक जीवन की ओर आकर्षित किया गया और उनमें गायन वादन कविता चित्रकला ड्राईंग के प्रति आकर्षण पैदा किया गया। बताया गया कि इनसे व्यक्तित्व में निखार आता है और आँतरिक लयात्मकता पनपती है। छः महीने तक जारी इस प्रयोग के पश्चात बालकों का पुनर्निरीक्षण किया गया। प्राप्त परिणाम काफी उत्साहवर्धक रहा। देखा गया कि जिन बालकों को पाठ याद नहीं होने कमी आयी और एकाग्रता बढ़ी है।
इसी प्रयोग को ऐसे दूसरे बालकों पर दुहराया गया, जिनमें दोष नहीं था। उनकी दो टोलियाँ बनायी गयी। दोनों में एक जैसे बौद्धिक स्तर वाले बालक रखे गये। दोनों के शिक्षण तथा साधनों की व्यवस्था एक सी की गई। अंतर मात्र इतना रखा गया कि एक ग्रुप को कला विषयक शिक्षण और उसका अभ्यास भी अतिरिक्त विषय के रूप में थोड़े समय के लिए कराया जाता जबकि दूसरे ग्रुप को इस लाभ से वंचित रखा गया। परिणाम में पुनः अंतर पाया गया। जिन बच्चों को कलात्मक शिक्षण और अभ्यास की विशेष सुविधा दी गई थी, उनकी मानसिक एकाग्रता उन बच्चों से बड़ी चिड़ी पायी गई जिन्हें इस प्रकार के लाभ में वंचित रखा गया था।
इससे स्पष्ट है कि नीरस और कुँठाग्रस्त जीवन से यदि बचा जा सके तो मानसिक प्रखरता को बढ़ाया जा सकता है और बुद्धि को इतना और इस स्तर का बनाया जा सकता है और प्रखरता को बढ़ाया जा सकता है, जिसे असाधारण नहीं तो कम-से कम सामान्य तो कहा ही जा सके। जड़ मशीनों से लेकर चेतन प्राणियों तक का यह स्वभाव है कि वे क्षमता से अधिक कार्य लिया गया , तो अक्षमता और असामान्यता के लक्षण भी जल्दी ही उभरने लगते हैं। उपकरण अपनी शक्ति से अधिक और समय से ज्यादा काम करने पर गर्म हो जाते हैं, उसने अस्वाभाविक आवाजें आने लगती है और अधिक उपयोग होने पर खराब हो जाती है। विशेषज्ञों की इस निमित्त सलाह यही होती है कि यंत्रों को लंबे समय तक दुरुस्त रखने के लिए सामर्थ्य से अधिक काम न लिया जाय और कार्य के बीच-बीच में उन्हें थोड़े-थोड़े क्षणों के लिए विश्राम दिया जाय। दूसरे प्राणियों और शरीर के अंगों के साथ भी यही बात है। यदि उनसे क्षमता से अधिक कार्य लिया गया ओर विश्राम का ध्यान न रखा गया तो सामर्थ्य में ह्रास और थकान के लक्षण स्पष्ट उभरने लगते हैं। मानसिक श्राँति को दूर करने के लिए कार्य की प्रकृति को बदल देना पर्याप्त है श्रेष्ठ स्तर वाले मनोरंजन से यह सहज संपन्न हो जाता है। इससे एकरसता और थकान दोनों घटती मिटती है। इनके हटते ही मन मस्तिष्क पुनः सक्रिय और सतेज बन जाते हैं और अपनी क्षमता का परिचय पूर्ववत् देने लगते हैं। एकाग्रता ओर स्मृति बढ़ जाती है। असंतुलन घटने लगता है, जिससे विग्रह विद्वेष में भी कमी आती है। ऊब से पैदा होने वाले लक्षणों पर यदि उचित ध्यान दिया गया तो बहुत हद तक मानसिक निरानन्द से मुक्ति पायी जा सकती है और उन दुर्गुणों से बचा जा सकता है, जो मन की सरसता के अभाव में पैदा होते हैं।
संसार के सभी महत्वपूर्ण कार्य के लिये एक विशेष योग्यता और शक्ति की आवश्यकता होती हैं अनेक व्यक्ति कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने की आकांक्षा तो करते हैं पर उनको करने के लिए जिस क्षमता एवं शक्ति की आवश्यकता है उसे संपादित नहीं करते फलस्वरूप उन्हें सफलता से वंचित ही रहना पड़ता है। जिनने भी कोई बड़ा पुरुषार्थ किया है बड़ी विजय प्राप्त की है बड़ी विजय प्राप्त की है उनने तात्कालिक परिस्थितियों से ही सब कुछ नहीं कर लिया होता वरन् उनकी पूर्व तैयारी ही उस सफलता का मूल कारण रही होती है।
जन मानस में से दुष्प्रवृत्तियों हटाकर उनके स्थान पर सद्प्रवृत्तियों की स्थापना करना अत्यंत ही उच्चकोटि का अत्यंत ही महत्वपूर्ण कार्य है। उसकी तुलना में और सभी सत्कार्य तुच्छ बैठते हैं। विवेकशील उच्च आत्माएँ समय समय पर इस आवश्यकता को अनुभव करती है और वे लोक मानस में सत्प्रवृत्तियां बढ़ाने के लिये प्राणपण से प्रयत्न करती रहती है। यह कार्य जितना ही महान है उतनी महान ही क्षमता और शक्ति भी इसके लिये अपेक्षित होती है। यदि उसका अभाव रहा तो इस प्रकार की कामना और भावना रहते हुए भी कुछ विशेष सफलता नहीं मिलती।
आज का वातावरण बहुत हद तक दूषित हो चला हे। उसमें आसुरी तत्व एक बड़ी मात्रा में उत्पन्न हो रहे हैं। अनीति अन्याय अधर्म और अकर्म का चारों ओर बोलबाला है। स्वार्थ पाप वासना तृष्णा ममता और अहंकार की तमती बोल रही हे। एक दूसरे का शोषण करके सताकर अपना सिद्ध करने में कटिबद्ध हो रहे है। प्रेम की उदारता सहृदयता सेवा ओर सज्जनता की मात्रा दिन दिन घटती जा रही है फलस्वरूप ऐसी घटनाओं की बाढ़ आ रही हे जिनमें चीत्कार एवं हाहाकार की भरमार रहती है। लगता हे कि यह प्रवृत्तियाँ बढ़ती रही तो मानव सभ्यता ही खतरे में पड़ जायगी। विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में विनाश की एक बड़ी शक्ति दे दी है। एटम शक्ति के आधार पर किसी सिर फिरे का एक छोटा सा पागलपन कुछ ही क्षणों में सारे संसार के लिये तबाही उत्पन्न कर सकता है। ऐसे जमाने में इस बात की अत्यधिक आवश्यकता है कि लोग सज्जनता और मानवता के आवश्यक गुणों से संपन्न हो अन्यथा विज्ञान से प्राप्त हुई शक्ति दुर्गुणों से ग्रसित मानव शोक संताप के गहन गर्त में आसानी से बात की बात डूब मरने की परिस्थिति पैदा कर लेगा।
इस ओर विवेकशील लोगों का ध्यान गया है। वे लोग सुधार के लिये अपने अपने ढंग से काम भी कर रहे है। प्रवचन और लेखन द्वारा यह कार्य सरल ही सकता है। उस विचार से अनेकों उपदेशक प्रवचनकर्ता लेखक पत्रकार बहुत प्रयत्न कर रहे है। अनेक सभा सोसाइटियां इसी उद्देश्य के लिये विविध मनोरंजक आयोजनों की व्यवस्था करती रहती है। सरकारें भी इसके लिये सचेष्ट है। राजनीतिक कर्णधार जनता की सज्जनता अपनाने की अपीलें करते रहते हैं। उनके प्रचार साधन रेडियो चलचित्र बुलेटिन विज्ञानी पत्रिकाएँ आदि कार्य भी इसी उद्देश्य के लिये विविध विविध मनोरंजक आयोजनों की व्यवस्था करते रहते हैं, किंतु जब विचारपूर्वक इन सब कार्यों के परिणामों को देखा जाता है तो भारी निराशा होती है। लगता है कि प्रयत्नों की तुलना में परिणाम की मात्रा नगण्य है। बुराइयाँ जितनी तेजी से बढ़ रही है और सुधार के प्रयत्न जिस प्रकार निष्फल से सिद्ध हो रहे है उसे देखते हुए हर विचारशील व्यक्ति के मन में व्यथा होना स्वाभाविक है।
यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण हे कि लोक मानस में से दुष्प्रवृत्तियों को हटाकर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को स्थापित करने का वास्तविक उपाय क्या है? इसका उतर ढूंढ़ने के लिये हमें इतिहास के पृष्ठ उलटने पड़ेंगे और यह देखना पड़ेगा कि जिन महापुरुषों ने इस प्रकार की विषम परिस्थितियों से अपने समय में जन मानस को सुधारा था उनमें क्या विशेषता थी जिसके कारण वे स्वल्प साधनों से ही चमत्कार उत्पन्न कर सके जब कि हमारे आजकल के सुधारक विविध विधि साधनों से संपन्न होने पर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं।
पूर्व काल में लाखों करोड़ों वर्षों तक सतयुग की सुख शाँति भरी परिस्थितियाँ इस संसार में बनी रही है। इसका कारण एक ही रहा है उस समय के लोकनायक और मार्गदर्शक आत्म शक्ति से संपन्न रहे केवल वाणी से नहीं अपनी आँतरिक महानता की किरणें फेंक कर मानस को प्रभावित करते रहे, मस्तिष्क की वाणी मस्तिष्क तक पहुँचती है और आत्मा की आत्मा तक। कोई सुशिक्षित व्यक्ति अपनी ज्ञान शक्ति का लाभ सुनने वालो को जानकारी बढ़ाने के लिये दे सकता है पर अंतः करण में जमी हुई आस्था में हेरफेर करने का कार्य ज्ञान से नहीं आत्म शक्ति से ही संपन्न होना संभव हो सकता हे। प्राचीन काल के लोकनायक, ऋषि मुनि इस तथ्य को भली भाँति जानते थे इसलिये वे दूसरों के उपदेश देने में उनकी बाह्य सेवा करने में जितना समय खर्च करते थे उससे कहीं अधिक प्रयत्न वे अपना आत्मबल बढ़ाने के लिये तप करने में लगाते थे। तप से ही वह आत्म शक्ति प्राप्त होती है, जिसकी प्रेरणा से किसी के मन पर जमे हुए बुराइयों के आकर्षक कुसंस्कारों को हटाकर अच्छाइयों के कष्ट साध्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जा सके। प्राचीन काल के इतिहास पुराणों में यह तथ्य बिलकुल स्पष्ट है। पिछले दो हजार वर्षों में भी इसी आधार पर जन मानस का सुधार एवं परिवर्तन करना सींव होता रहा है। भगवान बुद्ध के मन में अपने तथा संसार के दुखों का निवारण करने की आकांक्षा जगी। इसके लिये वे 25 वर्ष की आयु में घर से निकल पड़े और 20 साल तक निरंतर विभिन्न स्थानों पर आत्म निर्माण एवं तप साधना में संलग्न रहें। 41 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने अंदर परिपक्वता अनुभव की तो दूसरों को शिक्षा देने के कार्य में हाथ लगाया। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन चौथाई भाग तप में और एक चौथाई भाग धर्मोपदेश में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेश उतने दिये जितने आज के मामूली उपदेशक दे देते हैं। तब भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक चौथाई जनता उनकी शिक्षाओं पर आस्था रखती है।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने उत्तराखण्ड में जोशी मठ स्थान पर उग्र तप किया था। बत्तीस वर्ष की आयु लेकर आये थे। विद्या पढ़ने के बाद लगभग 12 वर्ष उनके जीवन में काम करने के लिये शेष थे। इनमें से भी आधा समय उनने तप में लगाया और शेष 6-7 वर्षों में ही अपनी आत्मशक्ति के बल पर वैदिक धर्म के उद्धार के लिये अत्यंत प्रभावशाली कार्य कर डाला। गुरु नानक की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। गुरु गोविन्द सिंह ने हिमालय में लोकपत स्थान पर जहाँ घोर तप किया था वह स्थान आज भी सिख धर्मानुयायियों का तीर्थ बना हुआ है। यदि इन गुरुओं के पास तप की पूँजी न रही होती तो वे दुर्धर्ष यवन काल में हिंदू धर्म रक्षा के लिये इतना अद्भुत कार्य कर सकने में कदापि समर्थ न हो सके होते।
समर्थ गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी सरीखे कितने ही महापुरुष शिवाजी सरीखे कितने ही महापुरुष तैयार किये थे। इतिहास के पृष्ठो पर उनमें से अकेले शिवाजी ही चमके पर उस तरह के सैकड़ों धर्म सैनिक उनने बना कर दिये थे। इस निर्माण में उनकी आत्मा का प्रभाव ही प्रधान रूप से काम करता था। स्वामी दयानंद 19 वर्ष की आयु में घर से निकले और 14 की आयु में अपने आपको धर्म प्रयास के योग्य बना सके। संवत् 1927 के कुंभ में हरिद्वार में उनने प्रखण्ड खण्डिनी पताका फहराई और धर्मोसंदेश किये पर उनका कुछ विशेष प्रभाव न पड़ा। इसका कारण उनने अपनी आत्म बल की न्यूनता समझी और तीन वर्ष के लिये पुनः तप करने उत्तराखंड के अज्ञात स्थानों को चले गये। गंगोत्री के पास कराली की गुफाओं में रहकर उनने तपस्या की और जब अंदर आत्म प्रकाश देखा तो कार्य क्षेत्र में उतरे। उस समय उनकी वाणी में दैवी तेज था। उसी बल पर वे अकेले ही इतना कार्य कर गये। जितना भी आज नहीं कर पा रही है।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस 41 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हुए 40 वर्ष की आयु तक वे विशुद्ध रूप से साधनारत रहे। एक दिन उन्हें लगा कि उनके शिष्य होने वाले है एक वर्ष तक वे शिष्यों की प्रतीक्षा करते रहे फिर ब्रह्मानंद शिवानंद विवेकानंद जैसे थोड़े से प्रतिभा संपन्न शिष्य घर बैठे प्राप्त हुए और उन्हीं के सहारे उनकी आत्मा ने संसार को इसी प्रकार संसार में आदि काल से लेकर अब तक एक ही तथ्य समय समय पर स्पष्ट होता रहा है कि तपश्चर्या द्वारा आत्मबल संपादित करने वाली आत्माएँ ही संसार का सच्चा मार्ग दर्शन करने और जन मानस को शुद्ध करने में समर्थ हो सकती हैं।
आज लोक मानस निम्न में से निम्नस्तर की ओर तेजी से गिरता जा रहा है। उसे सँभालने और सुधारने की निताँत आवश्यकता है। पर यह कार्य आत्मबल से रहित तपश्चर्या से विहीन व्यक्तियों द्वारा संपन्न नहीं हो सकता भले ही वे सभा सोसाइटियों के द्वारा भाषणों, लेखों,योजनाओं, प्रदर्शनों के द्वारा इसके लिये सिर तोड़ प्रयत्न करते रहें। यह महान कार्य महान आत्माओं के अनेक गुणों में प्रमुख एक तपश्चर्या भी है। जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकता।
अतीत इतिहास के पृष्ठ हमें इसी ओर निर्देश करते हैं। लोकमानस की शुद्धि का महान भार वाचालों के नहीं तपस्वियों के कंधे पर रहेगा। युग की प्रतीक्षा कर रही है।
लोक नायकों को चाहिए कि वे जनता को अपने उच्चस्तरीय कार्यों आदर्शों व करनी द्वारा प्रेरणा दे। श्रेष्ठ वातावरण बनने के लिए सृजेता स्तर के तपस्वी ही सच्चा योगदान दे पाएँगे।
हेनरी फोर्ड अमेरिका के मूर्धन्य धनाढ्य थे। तो भी वे बहुत सादगी से रहते थे। फोर्ड का एक सूट पुराना हो गया था। फटने भी लगा था।सचिव ने कहा नया सिला लेना चाहिए। लोग क्या कहेंगे?
फोर्ड मुस्कराये। बोले अभी इसकी मरम्मत करा लेने से काम चल सकता है। मिलने वाले सभी जानते हैं कि मैं फोर्ड हूँ। सूट बदलने या न बदलने से मेरी स्थिति में क्या अंतर पड़ता है।
बात गई गुजरी हो गई। मरम्मत किये पैण्ट कोट से काम चलता रहा। बहुत दिनों बाद फोर्ड को इंग्लैंड जाना था सो सेक्रेटरी ने फिर उनसे सूट बदलने की आवश्यकता बताई और कहा नये देश वालो के सामने तो पोशाक बढ़िया ही होनी चाहिए।
फोर्ड गम्भीर हो गये और बोले उस देश में मुझे जानता ही कौन है, जो मैं उन पर रोब गाँठने के लिए बढ़िया पोशाक सिलाऊँ। अजनबी के कपड़ों पर कौन ध्यान देता है?
हिन्दू संस्कृति का महान संदेश दिया। स्वामी विवेकानंद का धर्म प्रचार कयं प्रसिद्ध है पर उससे पहले उनने भी रामकृष्ण परमहंस के बताते अनुसार कई वर्ष तपश्चर्या करके आत्म को तपाया था।
योगी अरविंद घोष , महर्षि रमण, स्वामी रामतीर्थ की तपश्चर्या रमण, स्वामी रामतीर्थ की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। वैष्णव आचार्यों में से रामानुजाचार्य, निम्बकचार्य कधवाचार्य प्रभृति आचार्यों ने जितना मान संचय किया था। उतनी ही तप साधना भी की थी। संसार के अन्य वे महापुरुष जितने लोगों को उच्च भूमिका की ओर बढ़ाया निश्चित रूप से तपस्वी थे। महात्मा ईसा के जीवन में 27 वर्ष तपश्चर्या में लगे। मुहम्मद साहब ने 25 वर्ष की आयु में साधना की ओर कदम बढ़ाया। 40 साल तक वे उसी में संलग्न रहे। 65 वर्ष की आयु में उनने धर्मोपदेश और और इस्लाम की स्थापना का कार्य आरंभ किया। यहूदी धर्म के संस्थापक यहोवा और पारसी धर्म के देवदूत जरथुस्त्र की दीर्घ कालीन कोर तपश्चर्याएं प्रसिद्ध हैं।
पूरी निष्ठा और ढंग से साधा गया गृहस्थ धर्म किस प्रकार फलता है, यह प्रस्तुत उदाहरण से स्पष्ट है। महाभारत में सुधन्वा और अर्जुन के बीच भयंकर द्वंद्व युद्ध छिड़ा। दोनों महाबली थे और युद्ध विद्या में प्रवीण-पारंगत भी। घमासान लड़ाई चली। विकरालता बढ़ती जा थी। निर्णायक स्थिति आ नहीं रही थी।
अंतिम बाजी इस बात पर अड़ी कि फैसला तीन बाणों में ही होगा या तो इतने में ही किसी का वध होगा, अन्यथा युद्ध बंद करके दोनों पक्ष पराजय स्वीकार करेंगे।
जीवन मरण का प्रसंग सामने आ खड़ा होने पर कृष्ण को भी अर्जुन की सहायता करनी पड़ी। उनमें हाथ में जल लेकर संकल्प किया कि गोवर्धन उठाने और ब्रज की रक्षा करने के पुण्य मैं अर्जुन के बाण के साथ जोड़ता हूँ। आग्नेयास्त्र और भी प्रचंड हो गया।
काटने का सामान्य उपचार हलका पड़ रहा था। सो सुधन्वा ने भी संकल्प किया कि एक पत्नीव्रत पालने का मेरा पुण्य भी इस अस्त्र के साथ जुड़े।
दोनों अस्त्र आकाश मार्ग में चले। दोनों ने दोनों के अस्त्र बीच में काटने के प्रयत्न किये। अर्जुन का अस्त्र कट गया और सुधन्वा का बाण आगे बढ़ा किंतु निशाना चूक गया।
दूसरा अस्त्र फिर उठाया, अबकी बार कृष्ण ने अपना पुण्य उसके साथ जोड़ा और कहा ग्राह से गज को बचाने और द्रौपदी की लाज बचाने में मेरा पुण्य अर्जुन के बाण के साथ जुड़े। दूसरी ओर सुधन्वा ने भी वैसा ही किया और कहा मैंने नीतिपूर्वक ही उपार्जन किया है और चरित्र के किसी पक्ष में त्रुटि न आने दी हो तो पुण्य इस अस्त्र के साथ जुड़े।
इस बार भी दोनों अस्त्र और शेष था। इसी पर अंतिम निर्णय निर्भर था। कृष्ण ने कहा मेरे बार बार अवतार लेकर धरती का भार उतारने का पुण्य अर्जुन के बाण के साथ जुड़े। दूसरी और सुधन्वा ने कहा- यदि मैंने स्वार्थ का क्षय भर चिंतन किये बिना मन को निरंतर परमार्थ में निरत रखा हो तो मेरा पुण्य बाण के साथ जुड़े। इस बार भी सुधन्वा का बाण ही विजयी हुआ। उसने अर्जुन का बाण काट दिया।
दोनों पक्षों में से कौन अधिक समर्थ है, इसकी जानकारी देव लोक तक पहुँची तो वे सुधन्वा पर आकाश से पुष्प बरसाने पहुँचे। युद्ध समाप्त कर दिया गया। भगवान् कृष्ण ने सुधन्वा की पीठ ठोकते हुए कहा नर श्रेष्ठ तुमने सिद्ध कर दिया कि नैष्ठिक गृहस्थ साधक किसी भी तपस्वी से कम नहीं होता।
आहार और आवेग का परस्पर गहरा संबंध है। संवेग के गड़बड़ाने घटने या बढ़ने से खुराक प्रभावित होती है यह सर्वविदित है। खुराक यदि प्रभावित हुई तो उसके दो प्रकार के परिणाम सामने आते है-दुर्बलता अथवा मोटापा। भोजन की मात्रा कम होने से कमजोरी आती है और ज्यादा होने पर स्थूलता बढ़ती है। स्थिर स्वास्थ्य तभी बना रह पाता है, जब आवेग नियंत्रित हो।
एम एस गजेनिगा अपनी रचना पैटर्न्य ऑफ इमोशन्स” में लिखते हैं। कि हमारा पूरा शरीर तंत्र और उसकी गतिविधियाँ संवेगों पर आधारित है। इसके अच्छा होने पर बुरी प्रकृति समस्त प्रणाली को असामान्य स्तर का बना देती है। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने वाले सूक्ष्म आँतरिक क्रियाकलाप भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। भूख चूँकि सूक्ष्म आभ्यन्तरिक हलचल की परिणति है, अतः उस पर भी भावनात्मक उथल पुथल का स्पष्ट असर दिखाई पड़ता है। वे कहते हैं कि अध्ययनों के दौरान यह देखा गया है कि आहाद एवं तनाव की स्थिति में आहार की मात्रा बढ़ जाती है, जबकि उदासी और निराशा उसे अस्वाभाविक रूप से घटा देती है।
यह सच है कि बार बार अधिक मात्रा में अधिक कैलोरी युक्त भोजन के लेने से मोटापा बढ़ता है, आखिर तनाव के दौरान भोजन लेने की बार बार आवश्यकता क्यों महसूस होने लगती है? इस संबंध में शरीर शास्त्रियों का कहना है कि इसे आवश्यकता या इच्छा कहने के बजाय शरीर क्रिया का एक अंग मानना ज्यादा उपयुक्त होगा। उनके अनुसार शरीर जब तनावग्रस्त होता है तो भीतरी प्रणालियाँ उसे मिटाने के लिए अपने ढंग से प्रयास आरंभ कर देती है जो आँतरिक दबाव को घटा सके। इस क्रम में भूख उत्तेजित करने वाले रस स्राव भी पैदा होने लगते हैं। इस स्राव के द्वारा काया तनाव को न्यून करने का उपक्रम करने लगती है। यही कारण है कि भोजन के मध्य व्यक्ति तनाव से कुछ राहत अनुभव करते हैं। यह राहत यो तो अस्थायी और अस्थिर होती है, पर जब तक रहती है, व्यक्ति को आरामदायक स्थिति प्रदान किये रहती है।
इसी प्रकार जब कभी कोई बहुत गहरा भावनात्मक धक्का पहुँचता है,तो एक बार फिर समस्त आँतरिक संस्थानों का व्यक्तिक्रम हो जाता है और उससे आदमी दूसरे ढंग से प्रभावित होता है चूँकि तनाव और विषाद में बाह्य लक्षणों के साथ साथ आँतरिक संरचना में भी फर्क होता है इसलिए देह संस्थान उन दोनों के साथ पृथक ढंग से पेश आता है। तनाव में जहाँ भूख उत्तेजित होती है वहीं अवसाद में वह घटती है दबाव की स्थिति में यदि यदि क्षुधा बढ़ती है तो इसका एक ही मतलब है शिथिलता लाना और कस्बा को अस्वाभाविकता से मुक्त बनाये रखना। चूंकि उदासी की दशा में शरीर प्रायः तनाव रहित होता है, अतः भूख बढ़ा कर उसे बटाने मिटाने का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसी कारण से ऐसे समय में भीतरी तंत्र क्षुधावर्धक रस उत्पन्न नहीं करते।
हाल की शोधों से भी इस तथ्य को बल मिला है।कि भोजन और आवेश के बीच गहरा लगाव है। शिकागो मेडिकल स्कूल के अनुसंधानकर्त्ताओं का कहना है कि डाइटिंग करने वाले लोग सामान्यजनों की तुलना मेँ तनाव आवेग और उत्तेजना के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। उनके अनुसार यदि ऐसे लोग डरावने दृश्य देख ले तो उन्हें संवेग में असामान्य ढंग से वृद्धि हो जाती है। इस बढ़ोत्तरी के कारण इस मध्य उनकी आहार की मात्रा में भी आश्चर्य जनक वृद्धि होती देखी गई। इस स्थिति में मोटापा भी बढ़ने लगता है।
एक प्रयोग के दौरान वहाँ के अन्वेषणकर्ताओं ने इसके 14 स्त्रियाँ ऐसी थी जो डाइटिंग करती थी। इन सभी को निश्चित संख्या में कुछ सुखं खाद्य पैकेट दिये गये। इसके उपरांत उन्हें एक भयोत्पादक फिल्म हलोबीन के कुछ डरावने दृश्य दिखाये गये। आधा घंटा पश्चात फिल्म की समाप्ति पर जब उसकी खाद्य सामग्री का लेखा जोखा लिया गया तो अध्ययनकर्ता यह देख कर विस्मय में पड़ गये कि जो महिलाएँ नियमित डाइटिंग करती थी, उन सबने डाइटिंग नहीं करने वाले ग्रुप में दुगुने परिमाण में भोजन उदरस्थ किया था।
उक्त परीक्षण से वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि डरावने दृश्यों से तनाव जन्य आवेग में वृद्धि होती है। काया उसे अपने ढंग से सुधारने के क्रम में आंतरिक क्रिया विधि में परिवर्तन लाती है। अंतर के इस बदलाव के कारण भूख बढ़ाने वाले रसों का निर्माण होता है। इससे जठराग्नि की ज्वाला भड़कती है। क्षुधा बढ़ती है, तो बार बार खाने की आवश्यकता अनुभव होती है, जिसके कारण मोटापे में उत्तरोत्तर विकास होने लगता है। उस वृद्धि के साथ शारीरिक कठिनाइयाँ भी बढ़ने लगती है, जिससे व्यक्ति तब छुटकारा नहीं पा सकता जब तक इसके पीछे के निमित्त को नियंत्रित न किया जाय। देखा गया है कि भावनात्मक संवेग को साथ लेने पर फिर इस प्रकार की शिकायत देर तक टिकी नहीं रह पाती। इसलिए विशेषज्ञ इस संबंध में प्रायः यह सलाह देते देखे जाते हैं कि आवेग और उत्तेजना पर यदि अंकुश लगाया जा सका तो एक सीमा तक मोटापे को नियंत्रित किया जा सकना संभव है।
यो तो चर्बी बढ़ने के कई अन्य कारण भी है, पर सबसे प्रमुख भावनात्मक अव्यवस्था ही है पर सबमें प्रमुख भावनात्मक अव्यवस्था ही है। इससे भीतरी तंत्रों पर दबाव पड़ता है, जो चर्बी को बढ़ाने लगता है। इन दिनों अमरीका में पिछले समय की तुलना में 51 प्रतिशत लोगों में यह शिकायत बढ़ी है। इसका प्रमुख कारण वहाँ डरावने और हिंसक फिल्मोँ के प्रति बढ़ती लोकप्रियता है। स्वास्थ्य संतुलन वस्तुतः अधिकाधिक इस बात पर निर्भर है कि हमारे आहार विहार और दिनचर्या क्या है? किस वातावरण और परिवेश में हम रहते है? हमारी संवेगात्मक स्थिति कैसी है? इन बातों पर समुचित ध्यान दिया जा सके और इन्हें यदि असामान्य बनने से रोका जा सके तो उन कारकों को भी नियंत्रित किया जा सकना शक्य है जो शारीरिक स्थूलता वृद्धि के लिए जिम्मेदार है।
पंडित यही नाम पड़ गया है उनका लोगों में। रुई की गाड़ियों की दलाली करते हैं। रुई बाजार के समीप ही उनकी छोटी सी झोंपड़ी है। अकेले ही है। अपने हाथ से टिक्कर मेक लेते हैं और बरतन मलने को काई मजदूर नहीं रखा है। एक तखत दो-चार बरतन कुछ मिट्टी की कितनी बड़ी है कि उसमें ढेरों सामान आ जावे।
एक अलमारी में छोटी-बड़ी शीशिया भरी है। किसी में विफला है और किसी में त्रिकुटा। समीप मजदूर बस्ती में कोई बीमार हो तो दवा पंडित जी ही देते हैं। दवा के दाम की बात न कीजिए, कभी कभी अनुपान के लिए शहद भी उन्हीं को देना पड़ता है और अदरक के लिए पैसा भी।
सामने पीपल के नीचे चबूतरे पर खा-पीकर रात्रि के आठ नौ बजे मजदूरों की मंडली एकत्र होती है। पंडित जी मध्य में बैठते हैं श्री रामचरित मानस लेकर। उनके व्यासासन को संभवतः कभी कोई रामायणी छोनने नहीं आवेगा। क्या मिलेगा उसे इन श्रोताओं से? ये अनपढ़ मजदूर ठिकाने से प्रशंसा करना भी तो नहीं जानते। उनके मूक दृगों की श्रद्धा से किसी की जेब भरने से की।
रुई की गाड़ियां बाजार में सायंकाल से ही आने लगती हैं। दूर के किसान दो तीन दिन में पहुंचते हैं और उनके आने का कोई समय नहीं होता। प्रायः आठ बजे से भी पहिले दलालों के चक्कर होने लगते हैं। सुनहले बटनों से चमकते सफेद कोटो में सजे मिल के एजेंट आ धमकते हैं। कोई डाँटता है, कोई फुसलाता है कोई बहकाता है। सभी चेष्टा करते हैं कि किस प्रकार उस गाड़ी पर बैठे किसान का मा जिसे उसने अपने रक्त को पसीना बनाकर प्रस्तुत किया है, कम से कम मूल्य देकर खरीद लिया जाय। किस प्रकार उससे कुछ अधिक दलालों ऐठी जाय।
किसान शीघ्रता में होता है। उसके पास भूसा समाप्त हो रहा होता है। उसके हृदय के टुकड़े ये बैल जो गाड़ी ही नहीं उसकी जीवन गाड़ी को भी खींच रहे है। भूखे न रह जावे। घर में एक समय का ही आटा छोड़ आया है। उसके लौटने की आशा में चूल्हा ठंडा पड़ा होगा। कोई दीप जलाए रात्रि के पिछले प्रहर तक उसकी प्रतीक्षा करती होगी द्वार खोले। मुन्ना बार बार गाँव से बाहर तक आकर बापू की गाड़ी देखना चाहता होगा। बापू मिठाई लेकर आवेंगे शहर से। किसान के हृदय में जाने क्या क्या होता है। वह ढेरों सामग्री घर ले जाने का स्वप्न देखता है। सब आशा का आधार है रुई। वह गिड़गिड़ाता है पैर छूता है, दलालों के निहोरे करता है। उसे छल कपट कहाँ आता है। दो पैसे अधिक चाहिए और माल शीघ्र बिक जाय तो ही ठीक।
पंडित जी आते हैं बाजार में पूजा पाठ से निवृत्त होकर पूरे दस बजे। उन्हें चिंता नहीं कि उनको सहयोगियों से कम गाड़ियां मिलेगी। सीधे मिल एजेण्ट से पूछते हैं कितनी गाड़ियां चाहिए? किस भाव तक? कैसा माल? इधर उधर की हाँकना आता नहीं। व्यर्थ प्रशंसा की नहीं जाती। एजेण्ट भी जानते हैं। कुछ न कुछ आर्डर मिल ही जाते हैं। वैसे तो आज जी हुजुरी का युग है।
किसान आँखें बिछाए रहते हैं। पंडित जी की प्रतीक्षा में कुछ देर रुकते भी है वैसे उनकी अकुलाहट बहुत रुकने नहीं देती। जो उन्हें जानते हैं मोल भाव करते ही नहीं। पता होता है कि वह ठीक दाम दिलावेंगे। जिन्होंने ऊपर कुछ नीचे कुछ भरा है। पानी से वजन बढ़ाया है वे सीधे कह देते हैं। पंडित जी आपके योग्य माल नहीं है। कोई सहयोगी व्यर्थ झगड़ा करे “वह गाड़ी मैंने तय की है।”
वह झगड़ेंगे नहीं। अच्छा नहीं। अच्छा मैं भूल से इधर आ गया। फिर भी उन्हें कुछ गाड़ियां मिल ही जाती है और दो बजे वे अपनी झोपड़ी में पहुँच जाते हैं।
किसान चाहे उन्हें गाड़ी देवे या दूसरे दलाल को। रुपए लेकर उन्हीं की झोपड़ी पर पहुँचते हैं। पंडित जो बड़े प्रेम से सुनते हैं कि क्या ले जाना चाहिए और कितना बचा लेना चाहिए। कौन सी वस्तु कहाँ से अच्छी और सस्ती मिलेगी यह भी वही बतलाते हैं और प्रायः बाजार साथ ही चले जाते हैं। यो उन्हें किसानों के लाए बैंगन लौकी के उपहार भी मिल जाते हैं अब यह हिसाब कौन लगावे कि उन उपहारों का मूल्य अधिक है या गाड़ीवानों को पानी पिलाने लकड़ी देने का जिससे वे भोजन बनाते हैं।
नित्य का यही क्रम है। एक दिन दलालों की मंडली बाहर खड़ी थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर निकल आए। चलिए पंडित जी रुपया निकालिए एक!” होली के लिए रंग और बूटी छानने का चंदा था यह।
“मुझे तो आप लोग क्षमा करे।” पंडित के शब्दों में नम्रता थी।
आपने दीवाली को एक दीपक ही जलाया अपनी कुटिया में तो हम लोगों से कोई मतलब नहीं था, पर यह तो होली है। रोब से कहा एक ने।
मेरे पास इस समय कुल दो रुपये हैं। उनका स्वर शाँत था। रंग की अपेक्षा किसी की औषधि में वे लगें तो ठीक और भग पीने के तो मैं विरुद्ध हूँ।”
पर्याप्त बकझक हुई। मंडली ने देख लिया कि यहाँ से कुछ मिलने वाला नहीं है। किसी ने व्यंग किया किसी ने डाँट लगायी किसी ने धमकाया। लेकिन वह अपने निश्चय से टलने वाले थे नहीं अंततः रुष्ट होकर लोग लौटने लगे।
“ यह तो रुई की दलाली करते करते रुई की भाँति ही नीरस हो गया है। किसी ने कहा।
“खूसट है पूरा।” झल्लाया स्वर था दूसरा।
“तभी तो सूत की भाँति मरियल हो रहा है।” एक ने दुर्बलता पर व्यंग किया उनकी।
“प्रभु करे सूत की भाँति में आच्छादन भी बन सकूँ। उन्होंने सुन लिया था और कुटिया में जाते हुए अपने आप कह रहे थे।
“आज ही तो होली जलनी है। एक काने दलाल ने आँख मटकाते हुए कहा “बच्चू की पूरी झोपड़ी होली में न डलवा दूँ तो मेरा नाम.......।” कहकहा लगा समर्थन में।
लड़के स्वभावतः उत्पाती होते हैं और फिर कोई उभाड़ने वाला हो तो कहना ही क्या। रात्रि के आठ बजे वह पीपल के पेड़ के नीचे बैठे कथा सुना रहे थे। पता नहीं अँधेरे में कहाँ से एक दल छिपा आया। कथा में श्रोता वक्ता तल्लीन थे। किसी ने नहीं देखा कि कब उनकी झोपड़ी के फूस के दोनों छप्पर उतार लिए गये। जब भीड़ उन्हें लेकर कुछ दूर हट गई तब लड़के ने कहकहा लगाया।
उन्होंने देख तो लिया पर उटे नहीं व्यायासन से। श्रोताओं में से बहुतेरे दौड़े किये था दौड़ना। लड़कों ने समीप ही रुई बाजार की होली में छप्पर पटके और भाग खड़े हुए काना दलाल ठहाके लगा रहा था। होली में पड़ी वस्तु निकाली तो जा नहीं सकती। लोग आए उदास होकर।
बड़ी कठिनता से दूसरे दिन उनकी झोंपड़ी पर ज्वार के डंठलो के पूले रखकर छाया की जाय सकी। अब छप्पर तो तभी बने जब उसके लिए पर्याप्त अर्थ संग्रह हो सके। ज्वार के पूले तो मजदूरों ने एक एक दो दो करके दे दिए थे, जिनके पास थे। किसी प्रकार धूप का बचाव तो ही ही गया। उन्होंने इतने पर भी किसी से कुछ कहा नहीं।
घटना आई गई हो गयी किंतु एक दिन एक पूर्णतः उत्तेजित भीड़ उन्हें घेरे थी। वह बेचारे मूर्छित पड़े थे। सारे शरीर पर लाठियों और जूतों के दाग थे। सिर फट गया था और उससे तथा शरीर के अन्य हिस्सों से रक्त से लथपथ पड़े थे। किसी की सहानुभूति नहीं थी उनसे। कोई नहीं था उन्हें उठाने वाला।
“अब पता चलेगा कि क्या फल होता है विश्वासघात का।” किसी ने व्यंग किया।
“मैनेजर से मोटी रकम मिली होगी।” दूसरा स्वर उठा।” नोटों के बंडल किसे नहीं फोड़ लेते पता नहीं कितनी समालोचनाएँ चल रही थी।
पुलिस आ रही है। एक लारी आती दिखाई दीं। भीड़ पलक झपकते इधर उधर बिखर कर लुप्त हो गई। खंभे पर लगी बिजली के प्रकाश में खून से आदमी को देखकर लारी रुकी। घायल को पुलिस वालो ने उठा लिया और लारी चली गयी। केवल लारी के दो व्यक्ति वहीं उतर गए।
नर्मदा मिल में हड़ताल चल रही थी। मिल का फाटक पंडित जी के झोंपड़े के सामने ही था किसी ने मैनेजर से मिलकर कुछ बाहर के मजदूरों को गुन चुप मिल में पहुँचा दिया था। यद्यपि उन नए मजदूरों की संख्या अत्यल्प थी। परंतु हड़तालियों को भड़काने के लिए यही पर्याप्त था। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि वे उस व्यक्ति का पता लगा ही लेंगे जो इन मजदूरों को लाया है। उसे वे क्षमा नहीं कर सकते।
“ उनका झोपड़ा मिल के सामने है। उन्होंने देखा है कि रात्रि के अँधेरे में दो दिन से एक व्यक्ति कुछ आदमियों के साथ आता है। संतरी उसके आते ही द्वार खोल देता है। उसे उन्होंने पहचान लिया। मिल के फाटक पर जो प्रकाश है उसमें उन्होंने उसे भली प्रकार देखा हे कि बाहर से आने वाले मजदूर देहाती किसान है। वे बिना सीखे मिल में कुछ कर नहीं सकते। मिल वालो वे हड़तालियों का साहस तोड़ने को यह जाल मात्र रचा है।”
“आज संध्या को जब मजदूर फाटक पर एकत्र होकर मजदूर लाने वाले के संबंध में विचार कर रहे थे, उन्होंने उनकी समझता चाहा। समझने को कोई प्रस्तुत नहीं था। प्रश्नों की झड़ी लग गयी। जब मजदूर छिपकर पता लगाने को तले ही थे तो आज बात छिप न सकेगी। उनका हृदय कांप उठा काने दलाल के प्रति करुणा जाग पड़ी। एक आदमी और उत्तेजित भीड़ की भीड़। उन्होंने कुछ निश्चित कर लिया।”
“अपराध तो मेरी ही है भीड़ को समझाते हुए उन्होंने कहा। आगे को कौन सुनता है? पूरा वाक्य सुनने का धैर्य किसमें भीड़ उत्तेजित तो थी ही। मारो मारो इस धूर्त को। भली प्रकार पीटो। गालियों के साथ साथ चलने लगे। कहाँ तक कोई सह सकता है। पंडित लड़खड़ा कर गिर पड़े। कौन जाने कितनी चोटें गिरने पर की।
अब तो पुलिस ने उन्हें अस्पताल पहुँचा दिया था। हम रुई के दलाल है। हमें सूत ही बनना चाहिए सुई नहीं। बड़े कष्ट से अस्पताल की खाट पर पड़े वह बोल रहे थे। नर्स उन्हें बोलने से रोक रही थी। सुई छिद्र करती है किंतु सूत दबकर बटा जाकर भी छिद्र ढकता है।”
“आपको मैंने कितना सताया है। झोपड़ी तक ...........” काना दलाल हिचकियाँ ले रहा था और बार बार पैरों पर लुढ़क रहा था। नर्स उसे हट जाने को कह रही थी इसकी उसे कोई चिंता नहीं थी। आपने मुझे बचाने के लिए मेरा दोष छिपाने के लिए अपने सिर पर ले लिया।
उसके परिताप का अंत नहीं था।
“व्यर्थ पश्चाताप कर रहे हो तुम।”कराह उठे थे वह हाथ उठाने पर भी। शरीर का कोई भी भाग चोटों से खाली नहीं था। अंततः तुम मेरे समव्यवसायी हो। मैंने तो कर्तव्य मात्र किया है।
अस्पताल के बाहर मजदूरों की भीड़ चिल्ला रही थी। उसे अपनी भूल का पता लग गया था। काना दलाल भावावेश में बाहर निकला। भीड़ आगे बढ़ी किंतु सीढ़ियों पर से गर्स ने हाथ उठाकर रोक दिया। यदि तुम्हें पंडित जी का ध्यान है तो उन्होंने कहलाया है कि इनको क्षमा कर दो। आज भीड़ ने जयनाद के साथ स्वीकार कर लिया था। कि उनके पंडित सच्चे साधु है रुई के नहीं भगवान के दलाल। इन्हीं पंडित जयरामदास रामायणी ने राम कथा के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में लोक क्राँति का बिगुल बजाया।
संत सत्पुरुष की तलाश में फिरते रहते हैं। उपयुक्त पात्र मिल जाने पर वे उनकी सहायता करते हैं और मार्गदर्शन भी। जनसामान्य उनके अनुग्रह से इसलिए वंचित रहते है कि कृपा प्राप्त करने के लिए व्यक्ति में जो योग्यता होनी चाहिए, उसे वह संपादित नहीं कर पाते जितना संपन्न करते हैं, वह उनकी कृपा के लिए पर्याप्त नहीं होता इसलिए अक्सर यह देखा जाता है। कि समर्थों का अनुदान विपन्नों को उपलब्ध नहीं होता जबकि आँतरिक संपन्नतायुक्त साधक उसे अनायास ही प्राप्त करते रहते हैं।
घटना 1937 की है। काशी में केदार मालाकर नामक एक सोलह वर्षीय बालक बंगाली टोला के अपने मकान में माँ बहन के साथ रहता था। जिन दिनों की यह बात है, उन दिनों उसके पिता का देहाँत हो चुका था। परिवार में माँ बहन और भानजा रह गये थे। केदार पास के ही एक स्कूल में पढ़ता था। इन्हीं दिनों बालक के साथ अकस्मात् एक अद्भुत घटनाक्रम जुड़ गया था। वह अपना स्थूल शरीर छोड़कर घंटों बाहर रहता और फिर स्वतः उसमें प्रवेश कर जाता। जब यह बार बार का क्रम हो गया तो एक दिन उसके परिवार वालों ने उससे प्रश्न किया कि आखिर अचानक यह विद्या उसमें कहाँ से आ गयी। उसका कहना था कि वह ऐसी कोई विद्या नहीं जानता जिसे असाधारण कहा जा सके। जो कुछ घटित हो रहा है उसमें न तो उसकी स्वयं की कोई शक्ति है न इच्छा ही। यह सब एक देव पुरुष की सहायता से संपन्न होता है। जब वह आकर सामने प्रकट होते हैं, तो सूक्ष्म शरीर देह से स्वतः पृथक हो जाता है फिर उनका अनुसरण करते हुए वह उसी दिव्यात्मा वासी होते हैं वहाँ उसे अलग अलग स्थलों पर ले जाया जाता है और अगणित प्रकार के ज्ञान विज्ञान के रहस्यों की जानकारी दी जाती हे। कार्य पूरा होने के उपराँत वह पुनः पृथ्वी पर अपनी स्थूल काया में लौट आता है।
केदार प्रायः कहा करता था कि ले जाने वाला देवदूत एक ही है सो बात नहीं। भिन्न भिन्न भुवनों के भिन्न देवदूत है जिस भुवन में ले जाया जाना अभीष्ट होता उसके दूत आते ओर अपने साथ ले जाते। इसमें उसकी अपनी आकांक्षा कार्य करती ऐसी बात नहीं थी या तो दूत अपनी इच्छा से अथवा उक्त लोक के अधिष्ठाता की मर्जी से आते और उसे साथ ले जाते। कहाँ जाना है? क्या करना है? इन सब मामलों में केदार परतंत्र था। इनके लिए उसे दूत पर निर्भर रहना पड़ता था। वह जहाँ जाता केदार को साथ साथ चलना पड़ता मानों उसकी सूक्ष्म सत्ता दूत के आकर्षण से स्वयमेव खिंची चली जाती हो।
शरीर से बाहर निकलने (आउट ऑफ बॉडी एक्पीरियेन्स ) और लोक लोकान्तरों का भ्रमण करने संबंधी इस अद्भुत क्रिया का आरंभ कब और कैसे हुआ? इस बारे में कहता कि एक बार वह दशाश्वमेध बाजार में खरीददारी करने गया था। रास्ते के एक पेड़ पर उसे एक ज्योतिर्मय सत्ता दिखाई पड़ी। उसे देखकर वह विस्मय विमूढ़ हो गया। सोचा उसे दूसरे को भी दिखाऊँ। आस पास देखा कोई था नहीं इसलिए किसी राहगीर के आने का इंतजार करने लगा। यह विचार मन में जैसे ही आया वह दिव्य शरीरधारी आँखों से ओझल हो गया। इसी क्षण उसके अंदर कुछ अजीबोगरीब परिवर्तन महसूस हुआ। ऐसा क्योँ हो रहा है? वह समझ नहीं पाया। इसके बाद आवश्यक सामग्री क्रय करने के उपरांत वह घर आ गया। घर आने पर उसकी स्थिति और बिगड़ती सी प्रतीत होने लगी। शरीर अस्वाभाविक रूप से तपने लगा। असह्य पीड़ा भी शुरू हो गई। परिवार वाले चिंतित हो उठे पर दो दिन तक यह दशा रहने के पश्चात् उसकी अवस्था में सुधार आने लगा और फिर जल्द ही तकलीफ ठीक हो गई और वह भी ठीक हो गया। उस देवात्मा से संपर्क का प्रथम अनुभव था। इसके बाद वह सत्ता अक्सर आने लगी। जब आती , तो अब पहले जैसी वेदना का अनुभव तो नहीं होता, किंतु उसकी उपस्थिति से केदार की सूक्ष्म देह निकल कर उसके साथ चल पड़ने के लिए विवश हो जाती। यह क्रम अंत तक जारी रहा।
शरीर से बाहर निकले पर उसे कैसा अनुभव होता है? इस बारे में उसका कहना था कि देह के बंधन से मुक्त होने पर अचानक उसकी काया और यह दुनिया एक प्रकार से अदृश्य हो जाती है एवं एक शून्य का सा आभास होने लगता है मार्गदर्शक सत्ता के आकर्षण से वह उसी शून्य को भेदते हुए अग्रसर होता है। इस क्रम में आगे बढ़ते हुए दोनों एक ऐसे स्थल पर पहुँचते हैं जो भयंकर तरंग युक्त होता है। यहाँ काया को ऐसा महसूस होता है जैसे उसे तीव्र विद्युतीय झटके लग रहे हो। उसके इसी प्रकृति के कारण केदार ने उस स्थान का नाम झटिका रख दिया। इसके आगे इन्द्रियाँ निष्प्रभावी हो जाती है फलतः बाद का ज्ञान अग्राह्य बन जाता है।
लोकान्तर यात्रा का प्रायः यही क्रम रहता जिसके उपराँत केदार हमेशा एक नये भुवन में पहुँचता और वहाँ की नई जानकारी अर्जित करता किंतु इस क्रम में कई बार उसे गंभीर वेदना सहनी पड़ती और यात्रा अधूरी छोड़ कर शरीर में वापस लौटना पड़ता। ऐसा प्रायः तब होता जब पृथ्वी पर उसकी चेतनाहीन काया को कोई अशुद्ध शरीर मन से स्पर्श कर देता।
इस प्रकार समय बीतने के साथ साथ बालक का यह अद्भुत विकास भी उत्तरोत्तर बढ़ता गया। उसकी इस प्रगति को देखकर सूक्ष्म जगत में गति रखने वाले महापुरुष प्रायः यही मंतव्य प्रकट करते कि उस पर ऊर्ध्वलोक के किसी देवपुरुष की कृपा हुई है अन्यथा साधारण बालक के लिए ऐसा कौशल दिखा पाना संभव नहीं था। शरीर से बाहर निकलने की प्रक्रिया में क्रमिक विकास होता गया और अंत में तो उसके निज के पुरुषार्थ की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं रही। विकास की मध्यावस्था में प्रत्यक्ष दूत की मदद तो जरूरी नहीं होती किंतु फिर भी परोक्ष प्रेरणा अपरिहार्य थी। अपने बूते ही शरीर से बहिर्गमन कर किसी भी लोक में अप्रतिहत आने जाने की अवस्था जब प्राप्त हो गई तब लोग इतर लोक संबंधी उससे तरह तरह के प्रश्न करने लगे। वह हर एक की जिज्ञासा का समुचित समाधान करता। ऐसे ही एक अवसर पर जब उससे यह कहा गया कि इस विश्व से बाहर जाकर इसकी ओर दृष्टिपात करो और यह बताओ कि यह कैसा लग रहा है? प्रश्नकर्ता इस सवाल के द्वारा बालक की परीक्षा लेना चाहते थे कि क्या सचमुच उसकी बति लोक लोकाँतरों तक है क्या? क्षणमात्र में वह देह से बाहर निकल कर पलक झपकते ही लौट आया और सवाल का सटीक उत्तर यह कहते हुए दिया कि यह जगत बाहर से ऐसा दिखाई पड़ता है मानो कोई मनुष्य अपने दोनों हाथों को दांये-बांये फैलाये हुए निश्चल खड़ा हो ठीक वैसे ही जैसे ईसा मसीह का क्रास। उपनिषदों में वर्णित वैश्वानर विद्या यही है। जैन आचार्य भी ऐसा ही गत प्रकट करते हैं। एक अन्य अवसर पर जब महाशून्य से वैकुँठ के स्वरूप के बारे में पूछा गया और उसका सही सही वर्णन करने को कहा तो पुनः केदार अपनी काया से बाहर निकला और पल भर में तथ्य का पता लगा आया।उसका कहना था कि महाशून्य से वैकुँठ दक्षिणावर्त शंख जैसा बाहर से दिखाई पड़ता है। शास्त्रों के पुरुषोत्तम क्षेत्र में इसका ऐसा ही उल्लेख मिलता है। इस प्रकार देखा गया कि वह न सिर्फ कलेवर से बाहर निकल सकता है, वरन् तथ्यों का सही सही पता लगाने में भी समर्थ है।
वह जिन जिन भुवनों में जाता वहाँ की भाषाएँ भी सीख आता और यदा कदा इसका प्रयोग स्थूल देह में लौटने के पश्चात् पृथ्वी पर भी करता देखा जाता। लोकव्यवहार में वह कई बार उन उन लोकों की सर्वथा अनजान ओर अपरिचित शब्दावलियों का प्रयोग भूल वश कर देता। सामने वाला जब उनके प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट करता और आशय न समझ पाने की स्थिति में मौन बना रहता तभी केदार को अपनी त्रुटि का भान हो पाता।
संध्या समय वेदपाठ करना, उसका नियमित क्रम किंतु उसका वेद प्रचलित वेद से भिन्न था। उसके पाठ में उदात्त अनुदात्त एवं त्वरित स्वरों का स्पष्ट समावेश होता पर शब्द उसके बिलकुल भिन्न थे, न तो वे संस्कृत के शब्द होते न हिंदी के अपितु इनसे पृथक और ही प्रकार के उनके उच्चारण थे। सुनने वालो ने समझा कि देवलोक सीख ली हो और उसी वाणी में वहाँ का वेदपाठ कर रहा हो। जिज्ञासा समाधान के लिए जब इस आशय का प्रश्न किया गया तो आश्चर्य व्यक्त करते हुए उसने कहा लौकिक भाषा की तरह वहाँ की देववाणी पढ़ या सुन कर नहीं सीखनी पड़ती सीखने समझने की वह प्रक्रिया पृथ्वी से बिलकुल भिन्न है। जिस भी लोक में धरती का कोई सूक्ष्म शरीर धारी मनुष्य जाता है और वहाँ के जिस भी देवपुरुष से वार्त्तालाप करना अभीष्ट होता है उसके भ्रूमध्य से एक ज्योति किरण निकल कर सामने वाले के भ्रूमध्य को स्पर्श करती है। इतने से ही वह मनुष्य वहाँ के भाव और भाषा का जानकार हो जाता है। इसके वाद वह न सिर्फ वहाँ की बोली समझने लग जाता अपितु स्वतंत्र रूप से विचार विनिमय भी कर सकता है। जो कुछ उसे कहना होता वह सब वहाँ की भाषा शब्द और ध्वनि के हिसाब से प्रकट होने लगता है। पृथ्वी की तरह वहाँ शब्दों और वाक्यों के स्मरण करके रखने की जरूरत नहीं पड़ती।
विभिन्न लोकों का भ्रमण करना अब केदार का एक प्रकार से नियमित क्रम बन गया था। वह दिन रात जब भी इच्छा होती दिव्य लोकों की यात्रा पर निकल जाता और इच्छानुसार देवपुरुषों के दर्शन स्पर्शन कर लौट आता। केदार की यह अलौकिक क्षमता केवल कौतुक कौतूहल मात्र बन कर रह गई हो सो बात नहीं। इसके माध्यम से उसने अनेक प्रकार के अलौकिक ज्ञान विज्ञान के रहस्य प्राप्त किये थे। जिनका समय समय पर वह प्रयोग और प्रदर्शन भी करता था। एक ऐसे ही अवसर पर काशी की सिद्धि माँ नामक एक सिद्ध स्त्री भी उपस्थित थी। केदार का चमत्कार देख कर उनने कहा कि यह सब ठीक है। ब्रह्माँड घूमना लोक लोकान्तरों की सैर करना और वहाँ उपलब्ध हुए विज्ञान के आधार पर चमत्कार करना इन्हें अद्भुत तो कहा जा सकता है, पर पर्याप्त नहीं जीवन का चरम लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है। सद्गति तभी संभव है। यह तब तक शक्य नहीं जब तक व्यक्तित्व को अंदर बाहर से सरल और समान न बना लिया जाय। जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार यही है। इस एक को संपादित कर लेने पर शेष ऋद्धि सिद्धियाँ स्वयमेव हस्तगत होती चली जाती है अस्तु जीवन का प्रथम और प्रमुख लक्ष्य आत्म परिष्कार होना चाहिए तभी वह स्थिति उपलब्ध हो सकती है जिसे साधना का सर्वोपरि चमत्कार और संयम का दिव्य उपहार कहा गया है। तुम्हें उसी को लक्ष्य बनाना चाहिए।
यह सत्य है कि अंतस् के परिमार्जन के बिना बाह्य स्तर का दिव्य सहयोग भी अपर्याप्त साबित होता है। इसलिये महापुरुषगण वैसे सत्पात्रों की तलाश में रहते हैं। जिनकी आँतरिक भूमि उर्वर हो जिसमें अनुदान का बीजारोपण करने पर अंकुरित होकर पल्लवित पुष्पित हो सके। अतएव अनुदान पाने के लिए हम सिद्ध पुरुषों की खोज में अपना समय न गंवाये। अपने अंतस् को सुविकसित और सुसंपन्न करे हमें उनकी अयाचित अनुकंपा मिलती चलेगी। देने और पाने का आध्यात्मिक आधार यही है इसी पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए।
ईसा मसीह जिनके अनुयायी आज दुनिया में एक तिहाई से अधिक है एक बढ़ई के पुत्र थे और कुछ लोगों की यह भी मान्यता है कि वे कुँवारी माँ के गर्भ से उत्पन्न हुए थे विश्व विजय का स्वप्न देखने वाला सिकन्दर यद्यपि एक राजपुत्र था पर आरंभ से ही उसे दुर्दिनों का सामना करना पड़ा था। अपने प्रेमी के प्रणय जाल में अँधी होकर सिकंदर की माँ ने अपने ही पति राजा फिलप की हत्या करवादी थी और सिकन्दर का भी तिरस्कार कर दिया। परंतु परिस्थितियों पर हावी होने का संकल्प इतना मजबूत था कि सिकन्दर ने अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिणत कर दिखाया।
एक मूर्तिकार के बेटे सुकरात जो देखने में बड़ा कुरूप था, ने अपना जीवन सैनिक के रूप में आरंभ किया था। उसकी माँ दाई का काम करती थी। कुछ ही दिनों बाद सुकरात को पितृ स्नेह से वंचित हो जाना पड़ा पर पुरुषार्थ ओर अध्यवसाय के बल पर यह दर्शन शास्त्र के जनक गौरव से मंडित हुआ। एक संपन्न परिवार में जन्म लेने वाला लियोनार्दो जन्म के कुछ ही समय बाद माँ के साथ पिता से अलग हो गया था। कारण था पति पत्नी का मनमुटाव। बड़ी विपन्न परिस्थितियों में माँ ने अपने बेटे का पालन पोषण किया। थोड़ा समझदार होते ही लियोनार्दो आत्म निर्भर हो गया तथा इटली ही नहीं संसार भर में अपनी चित्रकला और शिल्प द्वारा अमर हुआ। उसकी कुछ कलाकृतियाँ अमर हो गयी।
भारतवर्ष को सर्वप्रथम एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने वाले चंद्रगुप्त मौर्य ने मुरा नाम की एक दासी से जन्म लिया था ओर गरीबी तथा अभावों के बीच पल कर बड़ा हुआ वह चाणक्य जैसे गुरु का मार्गदर्शन पाकर अपनी प्रतिभा व पुरुषार्थ के बल पर भारत को एक अखण्ड राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ बनाने में समर्थ हुआ। प्रसिद्ध विचारक और दार्शनिक कन्फ्यूशियस को जन्म के तीन वर्ष बाद ही पितृ स्नेह से वंचित हो जाना पड़ा। अपने पिता को अभी ठीक प्रकार पहचान भी नहीं पाया था कि वह अनाथ हो गया और छोटी उम्र में ही उसे जीविकोपार्जन के कठोर कर्म में लग जाना पड़ा लेकिन बड़ा बनने की इच्छा उसमें आरंभ से ही थी। यद्यपि 19 वर्ष की आयु में ही उसका विवाह हो गया तथा तीन संतानों भी हो गयी एवं उसे गरीबी और तंगहाली में रहना पड़ा लेकिन पुरुषार्थ और पराक्रम ने शीघ्र ही अपना चमत्कार दिखाया तथा वह अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हुआ सफलतम पूर्वार्त्त दार्शनिक कहलाया।
कार्ल मार्क्स यद्यपि गरीब परिवार का था और गरीबी में ही मरा मरते दम तक उसे कई स्थानों पर भटकना पड़ा लेकिन अपनी संकल्पशक्ति व दृढ़ विचारो द्वारा दुनिया के करोड़ों लोगों को अपना भाग्य विधाता आप बना गया। सत्रह बार की उसकी लिखी दास कैपिटेल अठारहवीं बार सही रूप में सामने आयी तथा साम्यवाद की आधार शिला बन गयी।
नूरजहाँ जिसके इशारे पर जहाँगीर अपना राजकाज चलाता था एक निर्वासित ईरानी की बेटी थी जो शरणार्थी बनकर सम्राट अकबर के दरबार में आया था। अपने संगठन कौशल दूरदर्शिता और दाँव पेंचों से सीमित साधनों और थोड़े से लोगों के बल पर औरंगजेब के नाकों चने चबा देने वाले शिवाजी के पिता शाइजी को अपने पिता का किसी प्रकार का सहयोग या आश्रम नहीं मिल पाया मात्र माता की शिक्षा व गुरु का मार्गदर्शन मिला। वे साहस और पराक्रम के बल पर स्वराज्य के लक्ष्य की ओर सफलतापूर्वक बढ़ते गये तथा यवनों से जूझकर एक छत्रपति राष्ट्राध्यक्ष बने। शेक्सपियर जिनकी तुलना संस्कृत के महाकवि कालिदास से की जाती है एक कसाई के बेटे थे। परिवार के निर्वाह हेतु उन्हें भी कुछ समय तक यही धंधा करना पड़ा पर बाद में अपनी अभिनय प्रतिभा तथा साहित्यिक अभिरुचि के विकास द्वारा अंग्रेजी के सर्वश्रेष्ठ कवि तथा नाटककार बन गये।
न्याय और समानता के लिये अपने प्राणों की आहुति दे देने वाले अब्राहमलिंकन को तो अपने जीवन में असफलताओं का मुँह इतनी बार देखना पड़ा कि यदि उनके जीवन के सभी कार्यों का हिसाब लगाया जाय तो वे सौ में से निन्यानवे बार असफल हुए। जिस काम में भी उन्होंने हाथ डाला असफल हुए। रोजमर्रा के निर्वाह हेतु एक दुकान में नौकरी की तो दुकान का दिवाला निकल गया। किसी मित्र से साझीदार की तो दुकान ही डूब गयी। जैसे तैसे वकालत पास की पर वकालत ही नहीं चली। चार बार चुनाव लड़े और हर बार हारें। जिस स्त्री से शादी की उससे जीवन भर नहीं पटी। जीवन में एक बार उनकी महत्वाकाँक्षा पूरी हुई जब वे राष्ट्रपति बने और इस एक अवसर में ही उन्होंने इतनी बड़ी सफलता हासिल कर ली कि वे विश्व इतिहास में अमर हो गये। वह सबसे बड़ी सफलता उनकी जीवन भर की आकाँक्षा भी थी। वह थी काले गोरों का भेद मिटाकर एक विशाल राष्ट्र की स्थापना की।
उन्नीस वर्ष की मार्जास्वली दीवास्कर जो आगे चल कर मैडम क्यूरी के नाम से प्रसिद्ध हुई थी,अपने गुजारी के लिए किसी कुलीन परिवार में नौकरी करती थी। काम था बच्चों की देखभाल करना और घर की साफ सफाई करना। उसी परिवार के एक युवक ने मार्जा से विवाह की आकाँक्षा की तो घर वालो ने अपने बेटे को तो डांटा फटकारा ही मार्जा को भी नौकरी से निकाल दिया। नौकरी छूट जाने के बाद उसने पढ़ना शुरू किया और छुटपुट काम कर अपना गुजारा चलाने लगी। आगे चल कर उसने पीयरे क्यूरी से विवाह कर लिया। क्यूरी दंपत्ति ने विज्ञान की प्रयोगशाला में चार वर्ष तक दिन रात लगे रह कर रेडियम नामक तत्व खोज निकाला जा सभ्यता के आधुनिक विकास में मील का एक पत्थर सिद्ध हुआ एवं उसे नोबुल पुरस्कार मिला।
एक अध्यापक के पुत्र जो अध्यापन द्वारा ही अपना जीवन निर्वाह चलाना चाहते थे बाल गंगाधर तिलक ने देश काल की परिस्थितियों के अनुसार अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित किया और स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है के मंत्र दृष्टा बन गये। उनके पिता की मृत्यु तभी हो गयी थी जबकि सोलह वर्ष के थे और इसी अवस्था में उनपर परिवार का दायित्व आ गया, जिसे पूरा करते हुए वे राष्ट्र सेवा क्षेत्र में उतरे। मरने के बाद ही सही वे अपने देशवासियों को जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त कराने में सफल हुए?
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के पिता की मोरोपत चिपणाजी अप्पा के दरबार में कुल पचास रुपये मासिक वेतन मिलता था। लक्ष्मीबाई की माता का देहाँत बचपन में ही हो गया था फिर भी उनके व्यक्तित्व का विकास स्वाभाविक रूप से हुआ और शौर्य पराक्रम तथा साहस के बल पर वे राजरानी के पद पर आसीन हुई।
विख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टाइन, जिसने परमाणु शक्ति का उपयोग मानव कल्याण में करने की विद्या खोजी बचपन में मूर्ख और सुस्त थे उसके माता पिता को चिंता होने लगी थी कि यह लड़का अपने जिंदगी कैसे गुजारेगा लेकिन जब उन्होंने प्रगति के पथ बढ़ना आरंभ किया तो सारा संसार चमत्कृत होकर देखता रह गया।
सफलता के लिए अनुकूल परिस्थितियों की बाट नहीं जोही जाती संकल्प शक्ति को जगाया उभारा व विकसित किया जाता है। आशातीत सफलता जीवन के हर क्षेत्र में प्राप्त करने का एक ही राज मार्ग है प्रतिकूलताओं से टकराना अंदर छिपे सामर्थ्य को उभारना।
महावीर प्रव्रज्या पर थे। उनके आगमन की सूचना पाकर एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला बनाने की कृपा करेंगे कि अब तक आपने कितनों की स्वर्ग कितनों को मुक्ति और निर्वाण दिलाया। महावीर ने कहा- अभी तो हम दूर से चलकर आये है। तुम्हारी बात का उत्तर कल देंगे प्रातः आना। यह कागज लो। गाँव में सब लोगों के पास जाकर कहना। महावीर आये है। अपनी अपनी कामनाएँ इच्छाएँ दुख तकलीफ अभाव वे जो भी हम से चाहते हो नोट करा दे।
व्यक्ति चल पड़ा। उस गाँव में 500 के लगभग व्यक्ति रहते। सब के पास गया वह व्यक्ति सबने अपनी आर्थिक तंगी बीमारी भौतिक लालसाएं स्वार्थ की ही बाते लिखाई। निर्वाण स्वर्ग मुक्ति ज्ञान वैराग्य एवं परमार्थ की इच्छा किसी ने व्यक्त नहीं की। व्यक्ति वापस लौट आया। सूची महावीर को प्रस्तुत कर दी। वे बोले देखा वत्स। किसी ने भी मोक्ष मुक्ति निर्वाण लोक कल्याण अथवा परमार्थ की इच्छा व्यक्त की? अनवाहे किसी की झोली में स्वर्ग मुक्ति निर्वाण लोक कल्याण अथवा परमार्थ की इच्छा व्यक्त की? अनवाहे किसी की झोली में स्वर्ग मुक्ति निर्वाण कैसे डाले जा सकते हैं? व्यक्ति समझ चुका था कि जब जनमानस की मनोवृत्ति ही भौतिक लाभ पाने तक सीमित हो तो आध्यात्मिक लाभ की बात कैसे सोची जा सकती है?
मनुष्य में एक दूसरे के साथ आदान प्रदान की परंपरा प्रवाहित करने के लिए सबसे प्रमुख माध्यम हे वाणी। धन का आदान प्रदान तो किसी विशेष अवसर पर विशेष कारण से ही होता है। शरीर सेवा का क्षेत्र भी सीमित है। श्रम सहयोग के अवसर तो कभी कभी किसी किसी के साथ ही आते हैं। पर वाणी को विशेषता ऐसी है कि उसके द्वारा रास्ता चलने सहज भाव से कुछ कहने सुनने का सिलसिला चल सकता है। पदार्थ परक आदान प्रदान की स्थिति आने से पूर्व हर किसी का उपक्रम वार्तालाप से ही आरंभ करना पड़ता है। यह मनोरंजन के लिए जिज्ञासा पूर्ति के लिए निस्तब्धता तोड़ने के लिए सहज भाव से भी होता रह सकता है। जिन में महत्वपूर्ण मंत्रणा भी करनी पड़ती है और वे गोपनीय भी होती है। तब उसमें अधिक तन्मयता और दूरदर्शिता का समावेश रहता है। घर सदा वैसा ही नहीं होता। आम तौर से सहज वार्तालाप स्वजनोँ मित्रों साथी सहयोगियों परिवार वालो के साथ चलता ही रहता है। चलना भी चाहिए। अन्यथा चुप रहने वालो को अहंकारी या मूर्ख समझा जाने लगता है। मौन व्रत धारी योगी महात्माओं की बात दूसरी है। वाणी यद्यपि मुँह से निकलती एवं कानों से सुनी जाती हे और मस्तिष्क को एक जानकारी देती हैं। किंतु यह साधारण बात हुई। इसके साथ एक परोक्ष रूप से रहने वाली क्षमता है जो बताती है कि बोलने वाले का स्वभाव चरित्र व्यक्तित्व एवं स्तर कैसा है? यह जानकारी इस एक ही परीक्षण से मिल जाती है कि उसकी वाणी के साथ जुड़े हुए तत्व और तथ्य क्या प्रकट करते हैं। यह हो सकता है कि कोई चुगल चाटुकार ठग अथवा जाल में फँसाने वाला मीठी मीठी बाते करे अपनी सज्जनता बखाने और स्वयं का हित चिंतक सिद्ध कर दे पर यह सभी बाते तनिक सी गंभीरता अपनाने पर सहज ही प्रकट हो जाती हैं और विवेकवान उस प्रपंच से सहज ही बच जाते हैं। मात्र उथले चिंतन वाले सहज विश्वासी ही प्रपंच में फँसते और उथली भावुकता के प्रवाह में धोखा खाते हैं। अस्वाभाविकता अतिवादी होती है। उसमें बिना जाँच पड़ताल किये किसी पर विश्वास कर बैठने की दुर्बलता रहती है। इसी कमजोरी को देखकर चाटुकार अपना जाल बिछाते और चिड़ियां फँसाते रहते हैं। किंतु जो कार्य कारण की संगति बिठा सकते हैं, अहैतुकी अतिशय मात्रा में बरसती मिठास का कारण समझ कर समय रहते जागरुक हो उठते हैं, उन्हें ठगे जाने की शिकायत आमतौर से नहीं करनी पड़ती।
जब धूर्तों की कपट प्रक्रिया वाणी की मिठास से सफल हो जाती है तो कोई कारण नहीं कि भावना आस्था और निष्ठा के साथ घुली हुई वाणी अपना स्थिर एवं उपयोगी प्रभाव न दिखा सके। यह ठीक है कि कठोर चट्टानों पर अनवरत वर्षा का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता। पूरी बरसात गुजर जाने पर भी एक पता नहीं उगता पर साथ ही यह भी ठीक है कि जिन स्थानों में थोड़ी से भी मुलायमी गहराई है वहाँ के दिनों जल संपदा जमा होती और हरीतिमा लहलहाती सरलतापूर्वक देखी जा सकती है।
वाणी में अपनी शक्ति है उसका उपयोग करके प्रवक्ता अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं और कोई कारण नहीं कि सद्भावना युक्त व्यक्ति सत्प्रयोजन के लिए उसका कारगर प्रयोग न कर सके। यदि किसी को उपहार अनुदान नहीं दिये जा सकते तो कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि वाणी से संपर्क में आने वालो को साँत्वना दे सकें उत्साह बढ़ा सके प्रशंसा करके आत्मविश्वास जगा सके और ऐसे परामर्श दे सके जिससे उनका भटकाव दूर होता हे और सन्मार्ग पर चल पड़ने का आधार बनता है।
वाणी के व्यवसायी अपने अपने प्रयोजन अपने अपने ढंग से पूरे करते हैं। प्रवचनकर्ता कथावाचक भाषणकर्मी गायक प्रायः समुदाय को एकत्रित करके अपनी अपनी मान्यता एवं इच्छा के अनुरूप भाषण करते रहते हैं कई ऐसे भी है कई ऐसे भी है जो किसी हद तक कितनों को ही प्रभावित भी करते हैं और लाभ उठाते हैं। इसे वाणी का चमत्कार कह सकते हैं। चुनावों के समय ऐसी वाचालता की धूम रहती है। दलाल बीमा एजेन्ट सेल्समैन अपनी वाक् चतुरता के आधार पर ही अच्छी खासी कमाई करते हैं वकील और लैक्चरर इसी माध्यम से अपनी रोजी रोटी चलते हैं विदूषक अभिनेता भी इसी कला में प्रवीण होते हैं। गायकों के पास तो वाणी ही सबसे बड़ी संपदा है। वे उसी के आधार पर लोगों का मन मोहते और अपनी छाप छोड़ते हैं। दूसरों को प्रभावित करने और वापस उसकी उपयोगी प्रतिक्रिया करने और वापस उसकी उपयोगी प्रतिक्रिया लौटाने की जैसी सरल और बिना खर्च की क्षमता वाणी में है। वैसी किसी और में नहीं हैं।
कटुवचन दूसरोँ को चोट पहुँचाते हैं उन्हें आहत और रुष्ट करते हैं। अपमान किसी से सहन नहीं होता। प्रतिशोध लेना तत्काल संभव न हो तो भी उस आघात को घाव की तरह मन में दबाये रहते हैं और अवसर मिलने पर बदला चुकाते हैं। निंदा चुगली आदि का भी ऐसा ही बुरा प्रभाव होता है अपना अहंकार और दूसरे का अपमान मिलकर वाणी को विषैली बना देते हैं। ऐसी वाणी दूसरों पर बूरा प्रभाव छोड़कर है और उलट कर अपने लिए अहित कर परिणाम लेकर लौटती है इस प्रकार के प्रयोग आये दिन देखने को मिलते हैं कौए और कोयल की वाणी का अंतर लोकोक्ति का प्रत्यक्ष रूप है। संत और दुष्ट के वचन सुनकर उनका स्तर सहज ही जना जा सकता है।
वाणी की मधुरता जहाँ अपने को संतोष आनंद देती है वहाँ साथी सहयोगियों स्वजन परिजनों के आनंद तथा उल्लास में वृद्धि करती है। मधुरभाषी सभी को प्रिय लगते हैं उसकी निकटता सभी चाहते हैं। आदान प्रदान संपर्क व्यवहार में प्रसन्नता अनुभव करते हैं। वाणी की मधुरता का अमृत ऐसा है जो बिना खर्च किये अर्जित किया जाता है और वितरित करने पर अपने की तथा अनेकों को धन्य बनाता है।
दान प्रक्रिया में क्या वाणी का उपयोग हो सकता है? इसका उत्तर उत्साहवर्धक सहमति में ही दिया जा सकता है। संस्कृत में एक शब्द है - कन्या दान। जिसका अर्थ होता है अपनी ओर से वचन देना। प्रायः विवाद संबंधों में उभय पक्ष की स्वीकृति के लिए इसे प्रयुक्त किया जाता है। अन्य प्रकार के पारिवारिक अनुबंध में भी वाग्दान शब्द प्रयुक्त किया जाता है। एक कदम और भी आगे बढ़ा कर देखा जाय और इस संदर्भ में अधिक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि वाणी के माध्यम से सर्वतोमुखी उत्कर्ष हेतु जितना ठोस अनुदान दिया जा सकता है उतना अन्य किसी प्रकार नहीं यो अपने को सर्वांगपूर्ण और सर्वोपरि मानने वाले किसी को भी कुछ भी आदेश परामर्श देते रहते हैं। उसमें अहंकार की अनाधिकार की गंध देखकर प्रायः इस कान से उस कान में निकाल देते हैं कई बार तो उपहास भी उड़ाते हैं। किंतु ऐसा सज्जतो के सौम्य अनुरोध या विचार विनिमय के संदर्भ में नहीं होता। कहा जा चुका है कि व्यक्तित्व के स्तर की अभिव्यक्ति वाणीं के साथ जुड़ी होती है। शब्द विन्यास प्रायः काम नहीं आता। लच्छेदार बातों के पीछे उद्देश्यों को लोग सहज ताड जाते हैं। शब्द संरचना से अधिक प्रभाव उस स्तर का होता है जो व्यक्तित्व के अंतराल में से उभरकर आता है। सीधे साधे शब्द भी कई बार भारी प्रभाव छोड़ते हैं। इसके विपरीत लच्छेदार भाषा में रचे हुए शब्द जंजाल भी अपने पीछे रहने वाले कपट भाव को बिना प्रकट किये नहीं रहते। इसलिए जिन्हें वरदान देकर दूसरों का हित साधन करना है उन्हें सर्व प्रथम अपने व्यक्तित्व ओर वाणी को प्रामाणिक बनाना चाहिए। स्वार्थपरता और अहंता की दुष्प्रवृत्ति को चिंतन और व्यवहार में से पूरी तरह छोड़ना चाहिए। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि वार्तालाप में सद्भाव और सदाशयता का सहज समावेश रहने लगेगा। जो कहा जाय उससे सुनने वाले का वास्तविक हित साधन दृष्टिगोचर होगा। इसका प्रभाव सुनने वाले पर पड़े बिना न रहेगा। वाणी निरर्थक तभी होती है जब कहने वाले की दुरभिसंधि कुटिलता के रूप में उसके पीछे काम करती है। यह विष घुला होने पर अविश्वास संदेह और छंद जुड़ा रहने से सुनने वाले का अंतराल चौकन्ना हो जाता है और परामर्श को मानने के बजाए उपेक्षा भाव भी आरंभ कर देता है ऐसी वाणी निरर्थक होती है और प्रतिकूल प्रभाव छोड़ती देखी गई है।
अपनी नम्रता दूसरों का सम्मान आत्मीयता का पुट इन तीनों का संमिश्रण का पुट वाणी में मिठास आती और प्रभाव बढ़ता है। ऐसी परिष्कृत वाणी से बोले गये शब्द यदि सिद्धांतों और आदर्शों पर अवलंबित है तो उनका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। इसके लिए आवश्यक होता हो संभावना बन सके तो विचार गोष्ठियां सभा आयोजनों का भी प्रबंध किया जा सकता है और उपस्थित जन समुदाय की आवश्यकता एवं परिस्थिति के अनुसार परामर्श उद्बोधन दिया जा सकता है उपयोगी सारगर्भित और सामयिक मार्गदर्शन करने वाली शिक्षा सब प्रभावशाली सिद्ध होती है। उसने भटकाव दूर होते हैं और ऐसा राज मार्ग हस्तगत होता है जिस पर चलते हुए सुलझी स्थिति तब पहुँचा जा सके कठिनाइयों को उबारा व सके।
इस संसार का कण कण अद्भुत और आश्चर्यजनक है। फिर जादूगरों की झोली पर लट्टू होने का क्या प्रयोजन। वस्तुतः इस संसार में परमात्मा ही सबसे बड़ा जादूगर है।
अनीति का उपार्जन ऐसा है मानों कच्चे घड़े में पानी भरना। वह घड़ी आने में देर नहीं लगती जब घड़ा फूटता और पानी बिखरता है।
राजमार्ग पर चलने वाले लंबी मंजिल भी आसानी से पार कर लेते हैं मील के पत्थर बताते चलते हैं कि कितनी दूरी पार हुई और कितना चलना शेष है। ऐसी सड़कों के किनारे छायादार पेड़ लगे होते हैं। पानी का प्रबंध रहता है। थोड़ी थोड़ी दूरी पर सराय धर्मशाला आदि ठहरने के स्थान बने होते हैं और भोजन आदि दैनिक आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त करने के लिए छोटी बड़ी दुकानें रहती है। जरूरत पड़ते पर सवारियाँ भी मिल जाती है। और राहगीर साथियों की कमी नहीं रहतीं। चिकित्सालय डाकखाने मनोरंजन आदि की सुविधाएँ भी विराम स्थलों पर मिलती है। इस प्रकार राजमार्ग अपनाकर लंबी यात्रा पर निकलने वाले भी अपनी मंजिल आसानी से निर्धारित अवधि में पूरी कर लेते हैं।
उतावले लोग सोचते हैं कि सम्भवतः राजमार्ग थोड़ा घूम-फिर कर जाने के कारण लंबा होगा। इसलिए इन्हीं पहुँचने की उतावली में साडडियाँ तलाशते और जिधर की कुछ आड़ी टेढ़ी लकीरें दीख पड़ती है उधर ही चल पड़ते हैं। भले ही वे लकीरें भेड़ बकरियों के उधर बन जाने के कारण ही क्यों न बनी है
उतावलेपन की पहचान एक ही है कि इसमें व्यक्ति कम से कम श्रम में चर्त फुर्त अभीष्ट अभिलाषा की पूर्ति चाहता है। यह सोचने की हमें फुरसत ही नहीं होती कि कितना हो कुछ करने पर भी बरगद का पेड़ बढ़ोत्तरी नियम अवधि पूरी करने पर ही संपन्न कर पाता है। हथेली पर सरसों जमाने का तमाशा तो मात्र बाजीगर दिखाते हैं। उस सरसों के अंकुर भर देखे गये है किसी ने भी उन्हें फूलों फलियों से लदते नहीं देखा और न किसी ने उनके तेल से घर का डिब्बा भरा है। बाजीगर तो हवा में से रुपये ही उतारते हैं और उनसे अपने गिलास भरते जाते हैं। उतावले लोगों को यह बहुत प्रिय लग सकता है और सोचा जा सकता है कि इसी जादू विद्या को सीखें और हर दिन एक घड़ा भर कर रुपये बना लिया करे। उतावली इतनी आकुल व्याकुल होती है कि वस्तुस्थिति समझने के लिए सोच विचार कर सकने की गुंजाइश भी न मिलने दे। यदि इतना अवसर उस आवेश के झटके में मिल गया होता तो यह संदेह उठ सकता था कि बाजीगर तमाशा दिखाने के उपराँत दर्शकों से पैसों की भीख क्यों माँगता है। घड़े भर रुपये नित्य बनाकर धन कुबेर क्यों नहीं बन जाता। उसे नुक्कड़ तमाशा दिखाने के लिए सारे दिन दौड़ धूप क्यों करनी पड़ती है? तथाकथित ओझा ताँत्रिक सिद्ध बाबा भी आमतौर से इसी प्रकार की ठगी का धंधा करते हैं। कुछ छोटी मोटी हाथ की सफाई दिखाकर लोगों के लालच को भड़काते हैं। आतुर हो जाने वाला आशंका वाले पक्ष को देख सोच तक नहीं पाता ओर जल्दी जल्दी बहुत कुछ पा जाने के लिए भी उनके चंगुल में जा फँसता है जिनके पास धूर्तता के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है। रंग बिरंगे जाल बुनकर वे आतुर स्तर की चिड़ियों को फँसाते रहते हैं। इनमें बालक ही नहीं तरुण, वयस्क और पढ़े-लिखे कहलाने वाले लोग भी शामिल होते हैं।
पगडंडियाँ इसी मनोभूमि के लोगों के कल्पना सरोवर में तैरती रहती है। वे उचित मूल्य देकर उचित वस्तु खरीदने के मूड में नहीं होते। गड़ा खजाना बताने के लिए इन्हीं देवी देवताओं, सिद्ध कहलाने वालो की मनुहार कस्ते रहते हैं। इसी युक्ति से बहुत कुछ ठगाते भी रहते हैं। किंतु देखा गया है कि ऐसे लोगों कुछ कमा लेने के स्थान पर निरंतर गंवाते ही रहते हैं।
पगडंडियों के सहारे चलने का मानस बनाने वाले प्रायः ऐसी दिशा में भटक जाते हैं, जिनसे पैरों में काँटे चुभने और झाड़ियों से कपड़े फटने के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त होता ही नहीं। भटकाव से दिशा भ्रम होना स्वाभाविक है। वे इस ओर भी चल पड़ते हैं जो लक्ष्य से सर्वथा उलटी दिशा होता है। यह जल्दबाजी जल्दी पहुंचाने की अपेक्षा इतनी देर हो जाने पर उसी रात उसी भयानक माहौल में किसी प्रकार बितानी पड़े और रात्रि को खोज में घूमने वाले हिंस्र जीव-जंतुओं का शिकार भी बनना पड़ सकता है। समझ जब वापस लौटती है तो मनुष्य ही सीखता है कि उतावली अवाँछनीय थी। चतुरता समझकर अपनाई गई यह मूर्खता अतीत घाटे का निमित्त कारण भी बनेगी।
जुआरी, सट्टे वाले लाटरी लगाने वाले प्रायः एक ही कमाई वाला पक्ष देखते हैं। यह भूल जाते हैं कि दाव उलटा भी पड़ सकता है और कमाने के साथ गंवाना भी पड़ सकता है। शेख चिल्ली की कहानी इसी प्रकार के तथ्यों से भरी पड़ी है। वह लाभ पक्ष ही सोचता था और उसकी पूर्ति तुर्त-फुर्त होते चलने की योजना बनाता है। यह नहीं सोचता था कि इतना सब करने के लिए कितने समय की कितने श्रम की आवश्यकता पड़ेगी और किन साधनों को जुटाने के लिए कितने प्रयास और किन-किन के कितने प्रयास और किन-किन के कितने सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी। इसी अधूरेपन के कारण शेखचिल्ली घाटे में रहा। उपहासास्पद बना। एक पक्षीय बात सोचने वालों को प्रायः ऐसी ही हैरानी का सामना करना पड़ता है।
मन का काम कल्पनाएँ करते रहना है। वे बिना पंख की रंगीली उड़ानें उड़ने जैसी वे सिर पैर की भी हो सकती है। उनमें से वर्तमान परिस्थितियों में क्या करना संभव और उचित होगा, यह निष्कर्ष निकालना दूरदर्शी बुद्धिमता का काम है। उसी की तथ्यान्वेषी समीक्षा यह बता पाती है कि इन दिनों कितने ऊँचा उठ सकते हैं कितना वजन वहन किया जा सकता है। देखना यह भी पड़ता है कि जो उचंग जैसी उमंग उठ सकते हैं कितना वजन वहन किया जा सकता है। देखना यह भी पड़ता हे कि जो उचंग जैसी उमंग उठी है उसका प्रतिकूल पक्ष क्या है। कठिनाइयाँ क्या क्या आ सकती है। किन किन संभावित अवरोधों के सामने उपस्थित होने पर उनसे निपटने के लिए क्या तैयारी करनी होगी? इस पक्ष को भी पूरी तरह ध्यान में रखना चाहिए। अच्छी कल्पनाएँ और ऊँची इच्छाएँ रखना अच्छी बात है पर साथ ही यह भी समझ कर चलना चाहिए कि हर लक्ष्य को पूरा करने के लिए समुचित योग्यता अर्जित करनी होती है। प्रबल प्रयास करना पड़ता है। समुचित सतर्कता की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही हर काम का एक विपरीत पक्ष भी होता है, जो अनेकानेक अड़चनों को अग्नि परीक्षा के रूप में कहीं न कही से बटोर कर ले आता है। इन्हें ध्यान में रखा जाय। जितना इन प्रयासों का सरंजाम जुटाने में तन्मय होना पड़ता है उतना ही यह भी ध्यान रखना आवश्यक हो जाता है कि प्रतिकूलताओं से कब कितना और कैसा पाला पड़ सकता है। उनसे निपटने के लिए आवश्यक सूझ बूझ हिम्मत और सहयोगियोँ साथियों का तालमेल बिठायें रहना भी आवश्यक है।
उतावली हर हालत में अवाँछनीय मानी जाती है और ऐसे परिणाम उत्पन्न करती है जिनके लिए सदा सर्वदा पश्चाताप करना पड़े। नित्य कर्मों को यथा समय फुर्ती से पूरा करना अच्छा बात है और महत्वपूर्ण कार्यों के विषय में भले बुरे दोनों पक्षों पर विचार करने के लिए संतुलित मानस बनाने के लिए समय लेना सर्वथा दूसरी
भावुकता के आवेश में प्रायः गलत कदम ही उठते हैं। की श्मशान वैराग्य में उत्तेजित होकर क्षणभर में वैराग्य धारण कर लेते। और पीछे उसके न निभने पर हैरान होते हैं। क्रोधावेश में ही हत्या आत्महत्याएँ होती है। कभी कभी प्रतिशोध का आक्रोश इतना बढ़ा चढ़ा होता है कि उस उन्माद में कुल भी अनर्थ बन पड़ सकता है।
होना यही चाहिए कि पगडंडियों में न भटका जाय शालीनता का राजमार्ग अपनाये जाय। प्रगति के लिए आवश्यक प्रयत्न तो किया जाय पर इतना आतुर न बड़ जाय कि इसी क्षण जो चाहा गया। वह पूरा होकर ही रहें यह समझदारी का रास्ता है।
एक सम्राट ने अपनी मृत्यु के पश्चात कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियों लिखने का आदेश दिया। इस कब्र में अपार सम्पत्ति गाढ़ी गई है। जो व्यक्ति अत्यंत निर्धन हो और असहाय हो वह इसे खोदकर प्राप्त कर सकता है।
समय बीता हजारोँ दरिद्र कंगाल भिखारी उस राह से गुजरे किंतु किसी ने उस कब्र को खोदने का प्रयास नहीं किया। किंतु किसी दूसरे सम्राट ने जब उस देश पर फतह हासिल कर ली तो कब्र पर उक्त पंक्तियाँ लिखी देख कर उसका लोभ जाग्रत हो गया और धन के लालच में उसने कब्र खोदे जाने का आदेश दिया। कब्र में धन राशि तो नहीं मिली। मात्र एक शिलालेख मिला। जिस पर लिखा था। मूर्ख क्या तू मनुष्य है? फिर असहाय और निर्धन कैसे? जरा सोच तुझे तो ईश्वर ने वेश कीमती अकल और दो मजबूत हाथ दिये है जिनसे अपना ही नहीं दूसरों की भी सहायता कर सकता है। राजा का सिर शर्म से झुक गया। मृतात्मा की कब्र को पुनः ढक दिया गया।
कहते हैं कि मनुष्य ने लिखना बाद में सीखा चित्र बनाने की कला उसने पहले ही आविष्कृत कर ली थी मनुष्य ने अपनी आदिम प्रकृति से आगे कदम बढ़ाया और परिवार बसाना सीखा तो जाय कभी उसे अपने स्वजनों के लिये कोई संकेत छोड़ने की आवश्यकता पड़ती तो वह चित्रों द्वारा ही अपने संदेश को अंकित करता था। स्वाभाविक है कि मनुष्य में बोलचाल और लिखने पड़ने के लिये चित्र बनाना सीख लिया हो क्योंकि देखी गयी घटनाओं और आकृतियों को चित्रों के रूप में अंकित करने की प्रेरणा ही सहज लगती है बच्चे भी वर्ण माला सीखने समझने से पहले चित्र बनाना और उन्हें समझना आरंभ कर देते हैं यहाँ तक कि उन्हें वर्णमाला सीखने के लिये चित्रों का ही प्रयोग करना पड़ता है और चित्र बना कर ही अक्षर समझाना पड़ता है।
चित्र भाषा की अपेक्षा मनुष्य के अधिक निकट है। पढ़ना लिखना सीखने के लिये भाषा को समझने का अभ्यास कठिन तथा समय और श्रम साध्य है। पर गँवार से गँवार व्यक्ति भी चित्रों को आसानी से समझ जाता है भाषा के माध्यम से भाव अभिव्यक्त करना और उन्हें समझना चित्रों द्वारा भाव को समझने की अपेक्षा कठिन है क्योंकि भाषा के द्वारा भावों को व्यक्त करने में बड़ी कुशलता और साहित्यिक सूझ बूझ को अपेक्षा रहती है यो चित्रकारिता में भी कला कौशल और सूझ बूझ रहती पर वह अधिक जीवंत है तथा लोगों पर उसका अधिक प्रभाव पड़ता है।
चित्रों का उपयोग भी ज्यादा होता है किसी घर में आपको किताबें भले न दिखाई दे पर चित्र मानव मन के अधिक निकट है इसलिये वह उसे प्रिय भी है और प्रभावित भी अधिक करते हैं चित्रों के माध्यम से हम जो कुछ भी देखते हैं उसका सीधा प्रभाव हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। किसी चित्र या दृश्य को बार बार देखने पर अंकित होने लगता है और जितनी बार उसे देखा जाता है उतना ही वह स्थायी तथा परिपक्व बनता है। मनुष्य मन की तुलना कैमरे की उस फोटो प्लेट से की जा सकती है जिसके लेन्स पर से जो भी छवि गुजरती है। हम अच्छा या बुरा जो कुछ भी देखते हैं उसका सीधा प्रभाव हमारी अंतश्चेतना पर पड़ता है,क्योंकि प्रत्येक चित्र का अस्तित्व केवल उसमें चित्रित की गयी आकृति और प्रयुक्त किये गये रंगों तक ही सीमित नहीं रहता वरन् उसके पीछे विचार नहीं रहता वरन् उसके पीछे विचार होते हैं भावनायें होते हैं चित्र की भाषा होती है जिसके द्वारा वह चित्र हमारी चेतना से संवाद करता है। यही कारण है कि कोई भी चित्र देखते समय हमारे मन में कुछ संकेत उठने लगते हैं और उससे संबंधित धारणायें तथा विचार हमारे मन पर अंकित हो जाते हैं।
इष्ट देवता की आराधना करते समय ध्यान के लिये हम जो चित्र प्रयुक्त करते हैं और उपासना के समय उस पर हमारी दृष्टि गड़ी रहती है तो हमारी चित्र स्पंदित होने लगता है शाँत और गंभीर मुद्रा में महान तत्व के चिंतन में लीग बुद्ध के चित्र को हम एकाग्रतापूर्वक देखें तो हमारे चित्त में गंभीर शाँति की प्रेरणा उठने लगती है। किसी वीर योद्धा का चित्र देखने पर वैसे ही साहस और वैसे ही शौर्य के भाव उदित होने लगते हैं। गाँधी की प्रतिमा देखे तो उनके चेहरे से छलकने वाली करुणा दया और अहिंसा के भाव हमारे अंतःकरण में रिस रिस कर आने लगते हैं किसी लोकसेवी परमार्थपरायण शहीद की चित्राकृति देखकर देश और समाज के लिए हममें भी मिटने का भाव उदित होने लगता है। किसी देवी देव या अवतारी पुरुष की छवि देखकर किसी मंदिर मस्जिद या गिरजाघर में जाने पर ईश्वर तथा उसके दिव्य गुणों का अनायास ही स्मरण आने लगता है। कहने का अर्थ यह है कि देखे गये चित्रों का भाव और उनकी भाषा हमारी चेतना को अनायास ही आँदोलित कर उठती है।
प्रत्येक परिवार में जिसके सदस्य शिक्षित हो या अशिक्षित थोड़े बहुत चित्र जरूर लगे रहते हैं। इन चित्रों को लगाने का उद्देश्य निस्संदेह रूप से घर के वातावरण को सुन्दर बनाना होता है अधिकाँश लोगों का ध्यान इस ओर नहीं जाता चित्रों का हमारे चित्त पर क्या प्रभाव पड़ता है और वे हर तरह के चित्र पर क्या प्रभाव पड़ता है और वे हर तरह के चित्र जैसे उन्हें बाजार में मिलते हैं या जैसे पसंद आते हैं लगा जो मनुष्य में कई एक पाशविक वृत्तियों को जमा कर बुराइयों की ओर धकेलते हैं। जिस प्रकार अच्छे चित्र अच्छे भाव और अच्छे विचारों को प्रेरित करते हैं उसी प्रकार गंदा या अश्लील चित्र देखने वाले के मन में गंदगी और अश्लीलता की भावनाएँ भड़कती हैं। चूँकि मन की बनावट ही ऐसी विचित्र है, बार बार उन्हें देखने को मन करता है व क्रमशः पतन के गर्त में गिरने की प्रक्रिया को बलवती बना देता है।
यह एक निश्चित तथ्य है कि चित्रों को देख लेने से ही बात खत्म नहीं हो जाती। बात वहाँ से तो शुरू होती है जो प्रभाव के रूप में आगे बढ़ती है। उस दशा में भी जब कोई चित्र विशेष सामने न हो तो भी मान पटल पर अंकित वह दति उभर आती है और समय में भी मनुष्य को वैसी ही प्रेरणायें देती है। जब भी विश्राम की स्थिति होती है वह खाली समय रहता है तो पूर्व स्मृति के आधार पर वैसे ही विचार तथा वे भाव उदित होने लगते हैं। दिन में देखी गयी बाते और कई दिनों बाद भी रात में सोते समय स्वप्न में दिखाई देती है। यह इस बात का प्रतीक है कि दृश्य दिखाई पड़ने के बाद भी हमारे मानस में अमिट चिन्ह छोड़ जाता है जो समय पड़ने पर उभर कर सामने आता है और इस प्रकार हम जो भी देखते हैं वह धीरे-धीरे हमारी प्रकृति हमारे स्वभाव, हमारे आचरण और हमारे व्यवहार में उतरता रहता है। इस दृष्टि से उनको देखना हमारे जीवन में अच्छाइयाँ उत्पन्न करता है, तो बुरे चित्र लगाने और उन्हें देखने से हमार जीवन में बुरी प्रवृत्तियाँ बल पकड़ती है। अतः आवश्यक यह है कि बुरे चित्र और बुरे दृश्य देखने की बजाय उस ओर से आँख ही मूँद ले, अपने घर में वैसे चित्र लगे है तो उन्हें हटा हो दे और लगाना ही है तो अच्छे चित्र ही लगाये।
लेकिन खेद है कि आज कल अच्छे चित्रों का अभाव है। कला के नाम पर चल-चित्रों के माध्यम से बाजार में अश्लील और भद्दे चित्रों की बाढ़ सी आ गयी है। चित्रकारों का उद्देश्य कला की सेवा करना न रह कर धन कमाना ही रह गया है और वे ऐसे चित्र बनाने में ही अपनी शान तथा सफलता समझते हैं जो कि अधिक मात्रा में बिके। लोग उन चित्रों के भड़कीलेपन से प्रभावित इसलिये होते हैं कि वे उनकी पाशविक भावनाओं की तृप्त करते हैं। यत्र तत्र बाजारों में चित्र कैलेण्डर पुस्तकों और पत्रिकाओं के आवरण इसी स्तर की तस्वीरों से पेट है। तिलमिला देने वाली बात तो यह है कि बहुत धार्मिक कहे जाने वाले चित्र भी इस श्रेणी में आते हैं। सीताराम राधाकृष्ण शिव पार्वती लक्ष्मी विष्णु आदि देवी देवताओं के चित्र भी बहुधा इसी स्तर के देखने को मिलते हैं। परिणाम यह होता है कि मानवी मन के अधिक निकटवर्ती होने के कारण यह पवित्र कलारूपी विद्या अपने ओछे स्तर के कारण आज मनुष्य का अहिर्निशि जतन करने में लगी हुई है।
लेकिन खेद है कि आज कल अच्छे चित्रों का अभाव सा है। कला के नाम पर चल चित्रों के माध्यम से बाजार में अश्लील और भद्दे चित्रों की बाढ़ सी आ गयी है। चित्रकारों का उद्देश्य कला की सेवा करना न रह कर धन कमाना ही रह गया है और वे ऐसे चित्र बनाने में ही अपनी शान तथा सफलता समझते हैं जो कि अधिक मात्रा में बिके। लोग उन चित्रों के भड़कीलेपन से प्रभावित इसलिए होते हैं। कि वे उनकी पाशविक भावनाओं की तृप्त करते हैं। यत्र तत्र बाजारों में चित्र कैलेण्डर पुस्तकों और पत्रिकाओं के आवरण इसी स्तर की तस्वीरों से पटे पड़े है। तिलमिला देने वाली बात तो यह है कि बहुत धार्मिक कहे जाने वाले चित्र भी इस श्रेणी में आते हैं। सीताराम राधाकृष्ण शिव पार्वती लक्ष्मी विष्णु आदि देवी देवताओं के चित्र भी बहुधा इसी स्तर के देखने को मिलते हैं। परिणाम यह होता है कि मानवी मन के अधिक निकटवर्ती होने के कारण यह पवित्र कलारूपी विद्या अपने ओछे स्तर के कारण आज मनुष्य का अहिर्निशि पतन करने में लगी हुई है।
विचारशील व्यक्तियों को चाहिए कि वे इस तरह के चित्रों की बाढ़ को रोके और लोगों को समझा बुझाकर इस बात के लिये तैयार करे कि वे अपने घरों में अच्छे प्रेरणादायक चित्र ही लगायें अच्छे चित्र ऐसे स्थान पर लगायें जाने चाहिए जहाँ से कि उन पर हर समय नजर पड़ती रहे। उठते बैठते चलते फिरते हुए हर घड़ी अच्छे चित्रों पर नजर पड़ते रहने से हमें हर घड़ी उत्कृष्ट प्रेरणायें मिलती रहेंगी। पुस्तकों का प्रभाव तो उन्हें पड़ने और उनका मनन चिंतन अध्ययन करने पर ही पड़ता है पर चित्र तो देखने मात्र से प्रभावित करते हैं। अपने घर में समझ बूझ के साथ चित्र लगायें, ऐसी प्रेरणा सबको मिले इसी में समय को समझदारी है।
पुत्र गुरुकुल से लौटा। उसे अहंकार था कि उसने सभी विद्याएँ सीखली सब पढ़ लिया। पिता बोला बेटा अभी जीवन के अनुभवों से भी बहुत कुछ सीखना होगा। अभी विद्या कहाँ पूरी हुई? ज्ञान भी अधूरा है। पुत्र मानने को तैयार न होता था।
पिता ने उसे पका फल दिया। बेटे को कहा इसे काटो। फल काटा वो अनेकों बीज निकल पड़े। पिता ने पूछा क्या तुम बता सकते हो कि वृक्ष कहाँ से उगता है। पुत्र बोला बीज में से। तो फिर बीज को काटो। बीज काटा गया। किंतु उसमें कोई वृक्ष नहीं दिखाई देता फिर कहाँ से उगता है। अब पुत्र निरुत्तर रह गया। पिता ने कहा बस बेटा यही अनुभव से सीखने की बात है। सब कुछ महाशून्य में से आ रहा है। और उसमें ही विलीन होता चला जा रहा है।
विस्तार और वैभव के आधार पर पदार्थ और मनुष्य के मूल्याँकन करने की प्रथा अब पुरानी पड़ चुकी है। इसके स्थान पर अब गुण को महत्व मिलने लगा है, जो उचित ही शक्तिशाली जो जितना धनवान वह उतना बलवान एवं सुखी पिछले दिनों की इन मान्यताओं की विज्ञान ने गलत सिद्ध कर दिखाया है और कहा है कि आकार प्रकार एवं बाहरी बड़प्पन की तुलना में निर्णय निर्धारण का मूल आधार आँतरिक होना चाहिए। शक्ति का वास्तविक उद्गम वहीं है। हर छोटे से छोटे पदार्थ व्यक्ति एवं साधन में यह शक्ति इतने आश्चर्यजनक परिणाम में मौजूद है कि यदि उसे बारीकी से ढूंढ़ने परखने और सही रीति से प्रयुक्त करने की विद्या हम जान जायँ तो छोटे कण से लेकर तुच्छ जैसे दीखने वाले व्यक्तित्व भी ऐसे अद्भुत परिणाम प्रस्तुत कर सकते हैं जिन्हें देख कर दाँतों तले उँगली दबानी पड़े।
कण के भीतर रहने वाली परमाणुओं की शक्ति इस तथ्य को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित करती है। व्यर्थ का छोटे-से-छोटे घटक अणु कितना सशक्त है और वह कितने बड़े कार्य कर सकता है, इसे देखने समझने पर इस सच्चाई को हृदयंगम करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि छोटा समझा जाने वाला व्यक्ति भी यदि अपने को समझा जाने वाला व्यक्ति भी यदि अपने को समझ सके, और जो कुछ वह है, उतने का ही नहीं उपयोग कर सके, तो वह कर सकता है, जिसके लिए सामान्य बुद्धि बहुत बड़े साधनों की आवश्यकता अनुभव करती है।
अब परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई नहीं रहा। उसके भीतर सौ से भी अधिक प्राथमिक कण खोज निकाले गये है। इनको भी अंतिम इकाई नहीं कहा जा सकता।इनके भीतर जो सूक्ष्मता के अनुपात से अधिक रहस्यमय स्पंदन, स्फुरण भरे पड़े है, उनका रहस्योद्घाटन होना अभी शेष है। अब विज्ञान अधिक गहनतम स्तर में प्रवेश कर रहा है। पिछले समय के प्रतिपादन अब झुठलाये जा रहे हैं। ‘ईथर’ को पहले इस मान्य तथ्य के रूप में स्वीकार किया गया था, पर अभी उसकी मान्यता का कोई बहुत समय भी नहीं गुजरा था कि मार्स तथा माइकेलसन नामक वैज्ञानिकों ने उसके अनस्तित्व को प्रमाणित कर दिया। शब्द तरंगों को वह करने वाले इस ईथर की खोज पर फिट्ज गेराल्ड और लारेण्ट्ज को बहुत ख्याति मिली थी और उनकी शोध को बड़ी उपयोगी मानकर सर्वत्र मान्यता मिली थी, पर अब उसके नकारात्मक प्रबल प्रतिपादन ने विज्ञान की अन्य मान्यताओं के भी खोखली होने की आशंका उत्पन्न कर दी है। आइन्स्टीन का सापेक्षवाद अब उतना उत्साहवर्धन नहीं रहा। उसमें बहुत सी शंकाओं और त्रुटियों की संभावना समझी जा रही है।
महर्षि कणाद ने अपने वैशेषिक दर्शन में अपने ढंग से यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि यह संसार छोटे छोटे कणों से मिलकर बना है। ईसा से 400 वर्ष पूर्व यूनानी दार्शनिक देमोक्रितु भी अणुवाद का प्रतिपादन करते थे। इससे पूर्व यह जगत पंचतत्वों का बना माना जाता था। अब पंचतत्व का बहुत मोटा वर्गीकरण है। पानी अपनी आप में मूल सत्ता नहीं रहा। उसे कुछ गैसों का सम्मिश्रण मात्र अंगीकार किया गया है। वायु की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं। पुरानी धारणाएँ अपने काल में बहुत सम्मानित थी, पर व अब त्रुटिपूर्ण ठहरा दी गई हैं।
न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धाँत एक सीमा तक ही सत्य है। यदि कोई राकेट “इस्केप वेलोसिटी” से गति करने लगे, तो गुरुत्वाकर्षण नियम गलत हो जायेंगे। भू उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करना और अंतर्ग्रही सभ्यता की खोज में निकलने वाले यानों को इसी गति से पृथ्वी के आकर्षण से बाहर निकाला जाता है।
रेडियम धातु द्वारा उत्पन्न होने वाले विकिरण की खोज होने से पूर्व तक यही समझा जाता था कि पदार्थ को ऊर्जा में नहीं बदला जा सकता है। दोनों का अस्तित्व स्वतंत्र है, पर अब अणु विस्फोट के पश्चात् यह स्वीकार लिया गया है कि पदार्थ और ऊर्जा वस्तुतः एक ही सत्ता के दो रूप हैं और उन्हें आपस में बदला जा सकता है। चुम्बक संबंधी पुरातन मान्यताओं में रदरफोर्ड ने नये तथ्य जोड़े। उनने सिद्ध किया कि रेडियोधर्मी विकिरण का एक भाग जब एक दिशा में मुड़ता है, तो उसे अल्फा विपरीत दिशा में मोड़ता है तो वीटा और बिलकुल न मुड़ने वाला प्रवाह गामा किरणों के रूप में निस्सृत होता है। यह तीनों प्रवाह अपने अपने ढंग के अनोखे हैं। अल्फा विकरण को कागज की पतली झिल्ली में रोका जा सकता है किंतु वीटा विकिरण अल्युमिनियम की कुछ मिली मीटर मोटी चादर को भी पार कर सकता है। गामा विकिरण को सकती है।
पुरानी मान्यता का परमाणु ठोस था। पीछे उसमें भी ढोल की पोल पायी गई है। आकाश में घूमने वाले पिंडों की तरह परमाणु के गर्भ में कुछ प्राथमिक कण भ्रमण तो करते हैं,फिर भी उसमें खाली जगह बहुत बच जाती है। यदि इलेक्ट्न सहित परमाणुओं के नाभिकों को पूरी तरह सटा कर दबाया जा सके, तो एक घन से.मी. नाभिकीय द्रव्य का भार 10 करोड़ टन के लगभग हो जायेगा।
अणु शक्ति की झाँकी तो कर ली गई, पर साथ ही यह खतरा भी था कि विस्फोट से जो हानिकारक विकिरण उत्पन्न होगा, उस पर नियंत्रण कैसे किया जा सकेगा। अणु विज्ञान के उदय काल यह कल्पना की गई थी कि अत्यंत छोटे आकार के प्लूटोनियस इंजन लगाकर मोटरें चलायी जा सकेगी पर वह अब पूरी होती नहीं दीखती क्योंकि अणु विस्फोट में जो नाभिकीय विकिरण फैलता है वह न केवल पदार्थों को वरन् जीवकोषों को भी नष्ट करके रख देता है। उससे बचाव करने के लिए छोटे आकार के अणु इंजन के निमित्त किले जैसी मोटी दीवारें खड़ी करनी पड़ेगी। ऐसी दशा में वह कल्पना मस्तिष्कीय उड़ान बन कर ही रह जायेगी।
फिर भी अणु बिजली घर बनाये जा रहे हैं और प्रयत्न किया जा रहा है कि इस शक्ति को वशवर्ती बनाकर मनुष्य की शक्ति आवश्यकता को पूरा किया जाय। इस दिशा में सफलता भी मिली है और आशा भी बँधी है। वह दिन दूर नहीं जब हानि रहित अणु बिजली घर सामान्य बिजली घरों की तरह ही कार्यान्वित होने लगेंगे। अब तक जितना यूरेनियम प्राप्त कर लिया गया है, वह 100 खरब टन कोयले से मिलने वाली शक्ति के बराबर है।
अणु ऊर्जा हमारे लिए कितने ही प्रयोजन सिद्ध कर सकती है। चिकित्सा जगत, कृषि, उद्योग, यातायात युद्ध कौशल आदि कितने ही उद्देश्य उससे चमत्कारी स्तर पर पूरे किये जा सकते हैं।
कैंसर चिकित्सा के लिए अणु शक्ति द्वारा विनिर्मित विशिष्ट कोबाल्ट बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। रेडियो सक्रिय अणुओं के द्वारा एनीमिया का इलाज सफलतापूर्वक होने लगा है। पैलीसा इथोमिया वीरा नामक कष्टसाध्य रक्त रोग के उपचार में रेडियो सक्रिय फास्फोरस के इंजेक्शन सफल रहे है। एजाइना पेक्टोरिस नामक हृदय रोग में तथा थाइराइड कैंसर में रेडियो सक्रिय आयोडीन अच्छा काम करता है। शरीर के पोले भागों में जहरीला पानी भर जाने की स्थिति में रेडियो सक्रिय स्वर्ण तथा ट्यूमर और आँख के कैंसर में रेडियो सक्रिय स्ट्रान्सियम ने चमत्कार दिखाया है। रेडियो सक्रिय आइसोटोपों से मनुष्यों तथा पशुओं के कितने ही रोगों की सफल चिकित्सा होने लगी है। अमेरिका में इस प्रकार के उपचारों के लिए विशेष रूप से अतिरिक्त आणविक अस्पताल खुले हुए है।
कृषि क्षेत्र में अणु ऊर्जा की सहायता से अधिक मात्रा में एवं अधिक पौष्टिकता युक्त अन्न, शाक फल आदि उगाने के संबंध में सुविस्तृत खोज हो रही है और पता लगाया जा रहा है कि बलिष्ठ पौधे सशक्त खाद, कीड़ों से फसलों की रक्षा एवं अधिक उत्पादन में अणु ऊर्जा किस प्रकार और किस हद तक सहायक हो सकती हैं। शोध संस्थानों को उम्मीद है। शोध संस्थानों को उम्मीद है कि आने वाले समय में ऐसी पादन नस्लें तैयार की जा सकेंगी जो हर प्रकार की प्रतिकूलता का सामना करते हुए अच्छी पैदावार दे सके।
अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष ने वैज्ञानिकों की एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कुछ समय पूर्व कहा था अणु शक्ति की खोज बड़े मौके पर हो गई। यदि उसमें विलंब हुआ होता, तो ईंधन के अभाव में समस्त संसार की प्रगति का क्रम बेतरह ठप्प पड़ जाता।
अभी अणु शक्ति उत्पादन में यूरेनियम धातु का उपयोग प्रधान रूप से होता है पर आगे चल कर उसका स्थान थोरियम के ले लेने की आशा है। यूरेनियम का भंडार बहुत छोटा है, पर थोरियम विश्वभर में बड़े पैमाने पर संव्याप्त है।
अब कोयले की कमी पड़ने की भावी चिंता से मुक्ति पायी जा सकेगी 9 पौण्ड जितने यूरेनियम से उसकी ऊर्जा प्राप्त की जा सकेगी जितनी 1500 टन कोयला जलाने पर प्राप्त होती हैं।
अतीत काल में जब आग मनुष्य के हाथ लगी थी, तब भी उसके सामने यही समस्या थी कि उसकी हानियों से कैसे बचा जाय और लाभ
कैसे उठाया जाय? देर सबेर में उसने इसका रास्ता भी निकाल लिया। अब हम आग से बेखट के लाभ उठाते हैं और उसकी भयंकर संभावना से अपना बचाव कर लेते हैं। अगले दिनों अणु ऊर्जा के संबंध में प्रस्तुत कठिनाई को भी हल कर लिया जायेगा और इस महादैत्य को मनुष्य की सेवा करने के लिए बाध्य किया जा सकेगा।
मनुष्य के भीतर जड़ अणु शक्ति से भी उच्चकोटि की जीवाणु शक्ति से भी उच्चकोटि की जीवाणु शक्ति मौजूद है। अणु से जीवाणु की क्षमता अधिक प्रचंड होना स्वाभाविक है अणु समूह का थोड़ा सा यूरेनियम जब इतनी शक्ति उत्पन्न कर सकता है, तो असंख्य जीवाणुओं के समूह मानवी व्यक्तित्व की क्षमता कितनी महान हो सकती है, इसका अनुमान लगाया जाना कुछ कठिन नहीं होना चाहिए। इतने पर भी हम दीन हीन स्थिति में पड़े रहकर कष्ट कठिनाई इसलिए भोगते रहते हैं क्योंकि हमने एक गलत धारणा यह बना ली है कि जो लौकिक रूप से वैभववान् है, वही सौभाग्यवान हो सकता है, जबकि अन्दर के ऐश्वर्य का लेखा जोखा लिया जाय तो वह वाह्य वैभव से अनेकों गुना बढ़ा चढ़ा ज्ञात होगा। मनुष्य इससे अनभिज्ञ है इसी कारण आज वह पतनोन्मुख बना हुआ है जिस दिन उसे सही सही आत्मबोध हो जायेगा, उसी क्षण उसको दीनता समाप्त होकर एक ऐसा उपलब्ध हो जायेगा, जिसे उच्च और गरिमामय कहा जा सके। फिर बहृ से दरिद्र होते हुए भी मनुष्य अन्दर से महान और बलवान बन का सदा इस तथ्य को सिद्ध करता रहेगा कि अंतस् की विशालता और अपना के आगे बाहरी बड़प्पन तुच्छ और होगा है।
गायत्री उपासना के महिमा बखान से शास्त्र भरे पड़े है। इससे भौतिक और आत्मियता सफलताएँ जिस प्रकार साथ साथ अर्जित की जा सकती हैं, वैसा सुयोग अन्य मंत्रों के साथ कदाचित् ही देखने को मिलता है यह इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है। इसी के साथ इसमें एक कड़ी यह भी जुड़नी चाहिए कि जितनी सामर्थ्य महापुरुषों की अहैतुकी कृपा को आकर्षित करने की इसमें है उतनी शायद किसी अन्य में नहीं।
घटना खिदिरपुर (चिनसुरा) कलकत्ता की है। फणीद्रंनाथ घोष तक वहाँ सब डिप्टी मजिस्ट्रेट थे एवं अच्छे गायत्री साधक भी। नित्य प्रति ब्रह्ममुहूर्त में उपासना करना फिर कचहरी जाना और वहाँ से लौटने के उपरोक्त लोकसेवा में जुट पड़ना यह उनको नियमित दिनचर्या थी। पिछले इस वर्षों से अप्रतिहत उसका उक्त क्रम सुना आ रहा था। समय ज्यों गुजरता जा रहा था, वैसे ही वैसे उसमें इष्ट दर्श की अभीप्सा भी जीव में तीव्रतर होती जा रही थीं एक प्रातः जब वे उपासना की तैयारी करने में जुटे थे, तो उन्होंने अपने पूजा कक्ष की खिड़की से एक छायामूर्ति को अन्दर आते देखा वह छायामूर्ति उनसे करीब छः फूट की दूरी पर आकर सामने खड़ी हो गई। दरवाजा अन्दर से बंद था और कक्ष के दोनों खिड़कियों में लोहे की छड़ें लगी हुई थी, इसलिए निकट खड़ी मानव मूर्ति के स्थूल देहधारी होने की संभावना समाप्त हो गई। उनके मन में विचार उठा कि यह कोई दिव्य देहधारी महापुरुष हैं और निश्चय ही किसी विशेष प्रयोजन के लिये यहाँ उपस्थित हुए हैं यह बात मानव में उठते ही छाया पुरुष ने एक स्निग्ध मुसकान बिखेर दी, स्वीकृति में सिर हिलाया और कही” तुम्हारी उपासना और अकुलाहट ने मुझे यहाँ आने के लिए विवश कर दिया। शायद न भी आता पर जहाँ स्वयं आद्यशक्ति विराजमान हों, वहाँ मेरा नहीं आना, विश्वमाता के अपमान के समान होता इसलिए उपस्थित होना पड़ा। चलो चले। इतना कहकर मुण्डित मस्तक, गौर वर्ण काषाय वस्त्र धारी महात्मा ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया, किंतु फणीन्द्रनाथ ने यह कहते हुए असमंजस दर्शाया कि आप तो सूक्ष्म शरीर धारी हैं, इस प्रकार की दिव्य देह धारण कर सकने की क्षमता मुझमें नहीं। फिर भला मैं आपके साथ कैसे चल सकता हूँ? यह प्रश्न सुनकर उन अल्पवयस्क महापुरुष ने अपना बांया हाथ आगे बढ़ाया उससे उनकी दाहिनी कलाई पकड़ी कहा चलो अब कोई समस्या नहीं। इतना कहते ही उन्होंने देखा कि दोनों के शरीर हवा में तैरते हुए कमरे से बाहर निकल गये।
वह दिव्य पुरुष फणीन्द्रनाथ के हाथ थामें बड़ी द्रुत गति से ऊपर अंतरिक्ष में बढ़े चले जा रहे थे। काफी ऊँचाई पर पहुँचने पर उन्होंने पृथ्वी की ओर इशारा करते हुए बताया कि जितनी मंथर गति इसकी मालूम पड़ती है, वस्तुतः उतना मंद वेग इसका है नहीं। फणीन्द्रनाथ ने देखा कि सचमुच पृथ्वी बहुत भीषण वेग से घूम रही है। दोनों और आगे बढ़े। रास्ते में पड़ने वाले मंगल ग्रह की ओर महात्मा ने इंगित किया और उसके लाल रंग एवं गति के बारे में विस्तार समझाया।
देवपुरुष एक ऐसे मार्ग से आगे बढ़ रहे थे, जो सूर्य से काफी फासले से होकर निकल रहा था। उनकी गति और भी क्षिप्र हो गई। अब वे ऐसे वेग से बढ़ रहे थे, जिसकी तुलना किसी भी भौतिक गति से नहीं की जा सकती थी। कुछ दूर इस प्रकार चलने के बाद प्रकाश पुरुष का स्वर गूँजा। रुको। दोनों रुके, तो उन योगी ने अंतरिक्ष के उस विशेष भाग का परिचय देना आरंभ किया। कहा-देखो यह वह स्थान हैं, जहाँ रात दिन एक जैसी स्थिति बनी रहती है। न प्रकाश है, न अंधकार ही। कोई शब्द भी नहीं। पूर्ण शाँति छायी हुई है।” इस स्थल पर पहुँच कर फणीन्द्रनाथ को ऐसा आभास होने लगा, जैसे उनका सूक्ष्म शरीर और अधिक हल्का हो गया हो और उन्होंने कोई अन्य और भी ज्यादा सूक्ष्म देह धारण कर लिया हो।
कुछ क्षण रुक कर वहाँ देखने के बाद उनकी यात्रा पुनः आरंभ हुई। देवमूर्ति ने कहा- जितनी दूर हम आये हैं उससे भी ज्यादा दूर अभी चलना है, इसलिए गति को और वेगवान बनाना होगा। इतना कह कर गति को उनने और अधिक बढ़ा दिया। वे किस वेग से चल कर कितनी देर में अंतरिक्ष की किस गहराई में प्रवेश कर चुके थे
कहना मुश्किल है। थोड़ी दूर चलने के उपराँत देववाणी उभरी मन को तनिक एकाग्र करो और सुनो।” चित्त स्थिर होते ही गंभीर ओंकार ध्वनि कर्ण कुहरों से टकराने लगी। फणीन्द्रनाथ को ऐसा प्रतीत हुआ मानों शत शत मृदंग और झाँझे निनादित होकर यह नाद पैदा कर रहे है। नाद कुछ ऊपर उठ कर एक बिंदु पर केन्द्रीभूत हो रहा है, ऐसा आभास मिल रहा था। जहाँ यह दिव्य निनाद पुँजीभूत हो रहा था उस बिंदु से एक ज्योति धारा निस्मृत हो रही थी। बिंदु को घेरे हुए एक वृत्त था। उसके भीतर शुभ्र प्रकाश हो रहा था। केन्द्र से झरने वाली ज्योति कोटि सूर्य की आभा से भी अधिक उज्ज्वल और प्रकाशवान थी, ज्योत्स्नों से भी अधिक शीतल और शाँतिदायक थीं। इस प्रकाश धारा का निचला हिस्सा लाल नीला एवं बैगनी आभा लिए हुए था।
फणींद्रनाथ उस दिव्य ज्योति को निहार और नाद के सुनकर एक प्रकार से समाधिस्थ हो गये थे, तभी महात्मा की गंभीर वाणी प्रस्फुटित हुई यह जो शब्द सुनाई पड़ रहा हैं, वह ब्रह्माँडव्यापी है। अन्यत्र यह अव्यक्त बना हुआ है, पर प्रयासपूर्वक इसे सुना जा सकता है पर प्रयासपूर्वक इसे सुना जा सकता है। सृष्टि के आदि मूल यही है। इसी से इस विश्व की उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार से उत्पन्न जगत के अंतर में यह नाद ही प्राण या जीवनीशक्ति के रूप में प्रकट होता है अनंत विश्व को गर्भ में धारण किये यही प्रसुप्त भुजंग के आकार में रहता है। इस अवस्था में इसका नाद भाव अभिभूत और प्राणात्मक भाव उन्मुक्त होता है। जब यह विश्व को गर्भ में धारण किये रहता है, तब इसका नाम पराकुँडली होता है। जब यह नादात्मक रूप में स्फुरित होता है, तब इसे वर्णकुँडली कहते हैं और जब यह नादरूप भी डूब कर गहरी सुषुप्ति में अवस्थान करता है तो इसे प्राणकुँडली के नाम से पुकारते हैं।
इतना कहकर मार्गदर्शक सत्ता मौन हो गई। फणीन्द्रनाथ अब भी उस तेज बिंदू की ओर मुग्ध भाव से देख रहे थे। जब उनसे न रहा गया, तो कह ही डाला मेरी उत्कट इच्छा हो रही है कि उस प्रकाश बिंदु में प्रवेश करूं और देखूँ कि वह क्या और कैसी अनुभूतियों से युक्त है। आप मुझे छोड़ दीजिए। मैं कुछ क्षण अन्दर रहकर फिर वापस आ जाऊँगा।
देवविग्रह मुसकराये बोले जितना सरल प्रकट रूप में यह लग रहा है, वास्तव में उतना आसान है नहीं जो शब्द तुम सुन रहे हों, वह और कुछ नहीं ब्रह्म है शब्द ब्रह्म और यह जो ज्योति केन्द्र है, वही ब्रह्मबिंदु हैं। उसको घेरे हुए जो प्रकाश पुँज है, वहाँ सत, रज तम यह तीनों गुण साम्य की अवस्था में है। सृष्टि वहाँ नहीं है। वहाँ से प्रस्फुटित होकर नीचे की ओर जो प्रकाश धारा फैल रही है, उसके अधोभाग में जो रंगीन आभा दिखाई पड़ती है, वहीं से सृष्टि बीज ब्रह्माँड में विकीर्ण होता है। इस समय तुम उस ब्रह्मबिंदु में प्रवेश के लिए मचल रहे हो, पर शायद तुम्हें नहीं मालूम कि यदि वहाँ प्रविष्ट हो गये, तो फिर बाहर न निकल सकोगे, कारण कि उस व्यूह से बहिर्गमन का रास्ता तुम्हें नहीं ज्ञात है। यदि ऐसा हुआ, तो पृथ्वी पर जो तुम्हारी स्थूल काया है, उसकी ओर सूक्ष्म शरीर के बीच का संबंध सूत्र भंग हो जायेगी। ऐसे में उत्तम यही है कि तुम कुछ समय और प्रतीक्षा करो मैं दुबारा आऊँगा और तुम्हें साथ लेकर ब्रह्मबिंदु में प्रवेश करूंगा। तब उससे बाहर आने का मार्ग भी बता दूँगा। आज यही तक रहने दो।”
इसके पश्चात् महात्मा मौन हो गये और अत्यंत वेग से फिर पीछे वापस लौट चले।कुछ ही समय में वे दोनों चिनसुरा वाले मकान में पहुँच गये। थोड़ी देर उपराँत स्थूल शरीर की तंद्रा टूटी तो फणीन्द्रनाथ पूजा कक्ष से बाहर आये। नीचे वाले तल में आते ही सामने उनकी भानजी मिल गई। छूटते ही उसने कहा मामा ! लगता है आज कोई अद्भुत बात हुई है। आपकी दिव्य मुखाकृति और अपार्थिव सुगंध यह दोनों ही इस बात के प्रमाण है। बाद में फणीन्द्रनाथ को विदित हुआ श्वास प्रश्वास से एक विशिष्ट प्रकार की सुगंधि उत्सर्जित हो रही थी यह स्थिति लगभग एक सप्ताह तक बनी रही, फिर धीरे धीरे सामान्य हो गई।
इस प्रकार के दिव्य सहयोग से गायत्री साधकों का उपासनात्मक जीवन भरा पड़ा हैं। जो निष्ठापूर्वक वेदमाता का आँचल पकड़ते हैं, वे निहाल हुए बिना नहीं रहते। उन पर देवपुरुषों का अनुग्रह बरसता रहता है और समय समय पर आपत्तियों में कठिनाइयों में अथवा साधनात्मक जीवन में उनकी समर्थ साधनात्मक जीवन में उनकी समर्थ सहायता एवं मार्गदर्शन मिलते रहते हैं। जिनका साधनात्मक जीवन एकांगी बना हुआ है और जो मात्र जप तक स्वयं को सीमाबद्ध रखते हैं, संभव उन्हें गायत्री के वास्तविक फलितार्थ और महापुरुषों के अपूर्व सहयोग से वंचित रहना पड़े, पर जा उपासना साधना और आराधना रूपी त्रिपदा के त्रिविध आधार को अपनाये हुए है, वे कृतकृत्य होकर रहते हैं, इसमें दो मत नहीं।
(4-8-83 को शाँतिकुँज परिसर में दिया गया उद्बोधन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ - ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों, भाइयों! मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार के सौभाग्य आते हैं और उन सौभाग्यों के लिए आदमी सदा अपने आपको सराहता रहता है। पर ऐसे सौभाग्य कभी कभी ही आते हैं हमेशा नहीं। शादी ब्याह कभी-कभी ही होते हैं रोज नहीं। कन्वोकेशन में डिग्री रोज नहीं मिलती वह जीवन में एकाध बार ही मिलती है जब हाथ में डिग्री लिये और सिर पर टोप पहने हुए फोटो खिंचवाते हैं। सौभाग्य के ऐसे दिन कभी कभी आते हैं, उनमें लाटरी खुलना और कोई ऊँचा पद पाना भी शामिल है। लेकिन आदमी का सबसे बड़ा सौभाग्य एक ही है कि वह समय को पहचान पाये। आदमी समय को पहचान ले तो मैं समझता हूँ कि इससे बड़ा सौभाग्य दुनिया में कोई हो ही नहीं सकता। खेती बाड़ी सब करते हैं लेकिन जो किसान वर्षा के दिनों सही समय पर बीज बो देते हैं वे बिना मेहनत किये अपने कोठे भर लेते हैं। गेहूँ की फसल लेने के लिए जो समय को पहचान कर बीज बोते हैं वे अच्छी फसल कमा लेते हैं अगर बीज बोने का समय निकल जाये तब फसल की पैदावार की आप उम्मीद नहीं कर सकते। शादी ब्याह की एक उम्र होती है और जब समय निकल जाता हे तो आदमी को कई बार बहुत हैरानियाँ बरदाश्त करनी पड़ती है, लगभग असफलता के नजदीक पहुँच जाता है। वह। जो आदमी समय को पहचान लेते हैं वे बहुत नफे में रहते हैं। विज्ञापन निकलते रहते हैं और जो अखबारों को देख लेते हैं कि हमारे लिए जगह खाली है तुरंत अर्जी भेज देते हैं गाड़ियों में रिजर्वेशन होता है जो समय पर पहुँच जाते हैं लाइन में लग जाते हैं उन्हें गाड़ी में सीट मिल जाती है। जो टाइम को पास कर देते हैं निकल जाने देते हैं वे बहुत हैरान होते हैं।
अभी मैं समय की महत्ता बता रहा था आपको। किसलिए बता रहा था? इसलिए कि जिस समय में हम और आप रह रहे है वह ऐसा शानदार समय है कि आपकी जिंदगी में वह इतिहास में फिर नहीं आयेगा। आप लोगोँ की जिंदगी में तो दूर आने वाली नयी पीढ़ियां भी इसके लिए तरसती रहेगी और कहेंगी कि हमारे बाप दादे ऐसे समय में पैदा हुए थे। जो इसका फायदा उठा लेंगे उनके घर परिवार में सराहना होती रहेगी समाज में इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा और जो सनक में बैठे रहेंगे भूल में बैठे रहेंगे वे स्वयं पछताते रहेंगे और बाद में उनकी पीढ़ियां पछताती रहेगी और बाद में उनकी पीढ़ियां पछताती रहेगी और कहेगी कि ऐसे शानदार समय में हमारे बाप दादों ने क्यों मुनासिब कदम नहीं उठायें? यह कैसा शानदार समय है चलिए मैं इसके कुछ आपको उदाहरण देना चाहता हूँ जिससे कि आप समझ सके कि यह कैसा समय है इस शानदार समय में आप थोड़े से मुनासिब कदम बढ़ा सकते हो तो मजा आ जायगा। आपको मैं अवतार के किस्से सुनाता हूँ।जब कभी भी अवतार हुए है, जब कभी भी महापुरुष हुए है तब उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले लोगों को मैं बहुत भाग्यवान कहता हूँ और बहुत समझदार मानता हूँ। उनमें से एक का नाम था हनुमान, हनुमान कौन थे? सुग्रीव के वफादार नौकर का नाम था हनुमान। सुग्रीव को जब उसके भाई ने मारपीट कर भगा दिया, बीबी बच्चे छीन लिये, तब सुग्रीव अपने वफादार नौकर के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगे एक समय आया जब रामचंद्र जी आये तो सुग्रीव ने हनुमान को भेजा था। हनुमान जी वामन ब्राह्मण का रूप बनाकर उनके सामने गये थे कि कही ऐसा न हो कि हमारे साथ मारपीट होने लगे। तो क्या हनुमान जी कमजोर थे? न होते तब बालि के साथ लड़ाई की होती और अपने बाँस की बीबी को नहीं छिनने दिया होता और अपनी जायदाद नहीं छिनने दी होती लेकिन जब हनुमान जी ने समय को पहचान लिया और राम चन्द्र जी के कंधे से कंधा मिलाया कदम से कदम मिलाया तो क्या आप समझ सकते हैं कि किसी महत्वपूर्ण शक्ति के साथ कंधा मिलाने की क्या कीमत हो सकती है? क्या फायदा हो सकता है? आप तो अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं लेकिन हनुमान जी ने लगा लिया था और वह हिम्मत दिखाई थी जो आदर्शों को जीवन में उतारने के लिए आवश्यक है। आदर्शों को पालन करने के लिए शक्ति की जरूरत नहीं है साधनों की भी जरूरत नहीं है। साधन तो आप सबके पास है, पर अध्यात्म एक ही चीज का नाम है ऊँचे आदर्शों के लिए हिम्मत। इसी अध्यात्म को हनुमान जी ने पकड़ लिया और पकड़ने के बाद में रामचन्द्र जी से कहा कि हम आपके काम आयेंगे और आपकी मदद करेंगे। बस यह शानदार हिम्मत हनुमान जी ने दिखायी और उस समय को पहचानने के बाद में आपको नहीं मालूम वे शक्ति के स्त्रोत बन गये और गजब के काम करने लगे। पहाड़ उखाड़ने लगे, समुद्र छलाँगने लगे और लंका में रावण और उसके सवा दो लाख राक्षसों को चैलेंज करने लगे। कुँभकरण जैसों के साथ हनुमान जी अकेले लड़ने लगे।
क्यों साहब क्या बात थी कि हनुमान जी में इतनी ताकत कहाँ से आ गयी? यह वहाँ से आ गयी जहाँ से उन्होंने अध्यात्म को अपने जीवन में उतार लिया था। अध्यात्म जीभ की नोक तक पूजा की चौकी तक सीमित नहीं रहता। अध्यात्म उस चीज का नाम है याद रखना ऊँचे सिद्धांतों को अपने जीवन में धारण करने की हिम्मत को अध्यात्म कहते हैं। इससे कम भी कोई अध्यात्म नहीं है। हनुमान जी ने वही अध्यात्म ग्रहण कर लिया। पूजा की थी, अनुष्ठान किया था जप तप किया था? नहीं तो फिर कैसे हो गया? ऊँचे उद्देश्यों के लिए भगवान के कंधे से कंधा मिलाकर वे चल पड़े थे और निहाल हो गये। इससे बड़ी कोई तपस्या नहीं होती है। नल नील ने पत्थरों का पुल बनाया था जो पानी पर तैरता था। इतने बड़े समुद्र पर पत्थरों से पुल बना दिया था कि जिसमें न पायें लगे हुए थे, न झूला लगा हुआ था, न गार्डर फँसे थे और न सीमेंट की जरूरत हुई। ऐसे ही खाली पत्थर फेंकते गये और उनका बन गया पुल। क्यों साहब यह हो सकता है? हाँ यह हो सकता है। कैसे हो सकता? ऊँचे उद्देश्यों के लिए खासतौर से उस समय जबकि भगवान अवतार लिया करते हैं तब जो आदमी उनके कंधे से अपना कंधा मिला लेते हैं वे शानदार हो जाते हैं और अपनी भूमिका निभाते हैं। रीछ वानरों ने भी भगवान की सहायता के लिए वही काम किये थे लकड़ी ईंट पत्थर ढोकर लाते और नल नील के पास जमा करते जाते थे। क्यों साहब यह कोई बड़ा काम था क्या बताइये? कोई बड़ा काम नहीं था, लेकिन भगवान के अवतार के साथ उनकी क्रिया पद्धति के साथ जुड़ जाने की वजह से वे रीछ बंदर भी न जाने क्या से क्या हो गये। हम उनकी कितनी प्रशंसा करते हैं संतों महात्माओं योगियों की भी उतनी नहीं करते और रीछ बंदरों का जब तक उनका इतिहास में जिक्र आता रहेगा वे अजर अमर होते रहेंगे। क्यों उनकी क्या विशेषता थी? एक तो यह कि सही समय है। सीता जी वापस आ जाती तब कोई हनुमान कहता कि हम तो रामचंद्र की सेना में भर्ती होगे और सीता जी को तलाश करके लायेंगे यह मौका हमको भी दीजिए। तब रामचंद्र जी यही कहते कि नहीं हनुमान भाई साहब अब समय निकल गया। आप समय भी नहीं देखते क्या? ऐसे समय कभी कभी ही आते हैं।
इसी तरह गिलहरी ने क्या किया था? अपने बालों में बालू भर कर लाती और समुद्र में पटक देती थी। बालों में बालू भर लेना कोई मुश्किल और बड़ा काम नहीं है। गिलहरियाँ ऐसे ही घूमती रहती है बालू में बैठी रहती है और बाल भर जाती है फिर क्या खास बात थी उसमें? यह थी कि उसने समय को पहचान लिया था कि अब भगवान की जरूरत में आवश्यकता में मदद करनी चाहिए। यह समझदारी उसने की और फिर गिलहरी कैसी हो गयी। मैं क्या कहूँ गिलहरी के लिए भाई साहब कि वह कितनी शानदार हो गयी भगवान का काम करने से। रामचन्द्र जी ने उसे उठा लिया और छाती से लगाया उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। उससे बहुत मुहब्बत की। किसके लिए। बालू के लिए, नहीं राई भर बालू से क्या होता है। उन्होंने सिद्धांतों है। उन्होंने सिद्धांतों के प्रति उसकी हिम्मत के लिए, निष्ठा के लिए उसकी जुर्रत के लिए उसको प्यार किया। मैंने सुना है कि जो गिलहरी रामचंद्र जी की सहायता करने आयी थी उसकी पीठ पर उनने प्यारे से अपनी अँगुलियाँ फिराई थी और वे धारीदार विज्ञान आज भी गिलहरियों की पीठ पर पाये जाते हैं। धन्य हो गयी थी वह गिलहरी जी रामचंद्र जी के लिए बालू लेकर आयी थी। उसने समय को पहचान लिया था। समय को आप नहीं जानते क्या?
मित्रो भगवान जब भी आते हैं तो उसके कई मकसद होते हैं। एक तो आपने पहले ही सुन रखा है कि वह धर्म की स्थापना करने के लिए और अधर्म का नाश करने के लिए आते हैं। यह दो मकसद तो आपको मालूम ही है रामायण में भी आपने पढ़ा है सब जगह पढ़ा है। यह दो ही बातें पढ़ी है न आपने अच्छा तो एक और बात हमारी ओर से आप जोड़ लीजिए जो रामचंद्र जी ने या कृष्ण भगवान ने अपनी ओर से तो नहीं कहीं है लेकिन हम अपनी ओर से कहते हैं एक तीसरी बात क्या कहते हैं? जो सौभाग्यशाली है उनके सौभाग्य को चमका देने के लिए भी भगवान आते हैं। उनको उछाल देने के लिए भी भगवान आते हैं। उनको इतिहास में अजर अमर बना देने के लिए भी भगवान आते हैं। जो इस मौके को पहचान लेते हैं वे वन्य हो जाते हैं। केवट को उन्होंने धन्य बना दिया। केवट ने क्या काम किया था? नाव में बिठाकर के रामचन्द्र जी को पार लगा दिया था बिना कुछ कीमत लिए। तो गुरुजी चलिए हम भी आपको कार में बिठाकर घुमा लाये और आज हमें केवट बना दीजिए। नहीं भाई साहब अब मुश्किल है। अब हम नहीं बना सकते तब वे खास मौके थे तब आपने पहचाने नहीं और अब शिकायत करते हैं अपने कर्म को दोष देते हैं कि ऐसा वक्त आया था और हम कुछ कर नहीं सके। मित्रों शबरी ने भगवान को बेर खिलाये थे जिसकी प्रशंसा करते करते हम थकते नहीं। भगवान ने शबरी से कहा शबरी हम भूखे है। भगवान की जरूरत पड़ी थी वे भूखे थे आपकी अपनी जरूरत है पर कभी कभी भगवान को भी जरूरत होती है और मनुष्य के लिए वही सौभाग्य के वक्त है। शबरी ने मौके को पहचान लिया था कि भगवान को खाली है वे माँग रहे है सो उसको भूख बुझाने के लिए बेर खिलाये थे। केवट वे भी भगवान की जरूरत को पहचान लिया था कि उनके पास नाव नहीं है। वे इंतजार में खड़े हुए है कि कोई आये और हमको नाव में बिठाकर पार लगा दे।
मित्रों आदमियों को अपनी जरूरत होती है यह तो नहीं कहता कि जरूरत नहीं कहता कि जरूरत नहीं होती पर कभी कभी भगवान को भी आदमियों की जरूरत होती है। हमेशा नहीं कभी कभी जरूरत पड़ती है और उस कभी कभी को मौके को जो पहचान लेते हैं वे गिलहरी के तरीके से केवट के तरीके से शबरी के तरीके से और रीछ कतरो के तरीके से उनकी सहायता के लिए चल पड़ते हैं जब वे बूढ़े हो जाते हैं तो आपस में लड़ाई झगड़ा करने लग जाते हैं। गिद्धों का मरना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन एक गिद्ध ने समय को पहचान लिया था कि हमारी जरूरत है किसको? सीता जी को जरूरत है कि कोई हमारी सहायता करे और वह चल पड़ा और धन्य हो गया। क्यों साहब हम भी बूढ़े हो जायँ और ऐसा कुछ करें? नहीं भाई साहब अब वह वक्त चला गया आप समय को तो पहचाने नहीं। भगवान कभी कभी हाथ पसारता है। आदमी तो भगवान के सामने हमेशा हाथ पसारता रहता है पर भगवान आदमी के सामने कभी कभी हाथ पसारता है और जब कभी वह हाथ पसारता है तो उसकी हथेली पर कोई भी कुछ रख देता है तो रवीन्द्रनाथ की कविता के मुताबिक उसकी झोलियाँ सोने से भर जाती है। टैगोर की एक कविता है मैं गया भीख माँगने द्वार द्वार इकट्ठी कर ली झोली गेहूं के दानों से एक आया भिखारी उसने पसारा हाथ। मैंने एक दाना उसकी हथेली पर रखा चला गया भिखारी उसने पसारा हाथ। मैंने एक दाना उसकी हथेली पर रखा चला गया भिखारी। घर आया तो मैंने अनाज की झोली को पलटा। उसमें एक सोने का दाना रखा हुआ था। टैगोर ने बंगला गीत में गाया-मैं सिर धुन धुन के पछताया कि मैंने क्यों नहीं अपनी झोली के सारे दाने उस भिखारी को दे दिये। उस भिखारी से मतलब भगवान से है समय से है। समय समय पर जब कभी भगवान हाथ पसारता है और जो कोई उस समय को मौके को पहचान लेते हैं और भगवान के पसारे हुए उस हाथ पर कुछ रख देते हैं वे न जाने क्या से क्या हो जाते हैं।
भगवानों के और किस्से सुनाऊँ आपको? वक्त बहुत चला गया, इसलिए और भगवानों की तो मैं नहीं कहता, पर एक भगवान को जो कल परसों ही के चुका है उसकी बात मैं कहता हूँ उसने भी हाथ पसारा था। उसका नाम था गाँधी। गाँधी जी ने भी हाथ पसारा था और उनकी हथेली पर जिन लोगों ने रखा था उनका क्या क्या हो गया आपको मालूम नहीं है। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हो गये ताम्र पत्र धारी हो गये और तीन तीन सौ रुपये पेंशन पाने लगे। यह खानदान त्यागियों का खानदान है। मित्रों मिनिस्टर उसी में से हुए है। अब तो बात दूसरी है, लेकिन शुरू के दिनों में जब आजादी आयी थी तो सिर्फ वे ही मिनिस्टर बने थे। जो स्वाधीनता सेनानी थे। आप वक्त को नहीं पहचानते आप भगवान को नहीं जानते कि वह कभी कभी हाथ पसारता है। जिस समय हमने आपको बुलाया है आप यकीन रखें यह वह समय है जिसमें दुनिया बेतरीके से बदल रही है। अभी तो आपको दिखाई नहीं पड़ता कि क्या हो रहा है। आप तो यह भी नहीं देख पाते कि पृथ्वी घूम रही है। आपकी अक्ल कहती है कि पृथ्वी घूम रही है। आपकी अकल कहती है कि पृथ्वी घूम रही है। आपकी अक्ल कहती है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर सनसनाती हुई चलती जा रही है पर आँखें कहती है कि घूम रही होती तो हमारा मकान पूर्व से पश्चिम की ओर हो जाता। हकसी को अपनी मौत कहाँ दिखाई देती है? इसी तरह आपको जमाना बदलता हुआ दिखता है क्या? नहीं दिखाई पड़ता। आपको भगवान का चौबीसवां अवतार होता हुआ दिखाई पड़ता है क्या? दुनिया का कायाकल्प होता हुआ दिखाई पड़ता है क्या कि किस बुरी तरीके से गलाई ढलाई हो रही है। आपको दिखाई न पड़ता हो तो देखिये कि हिंदुस्तान का ही पिछले बीस तीस साल में क्या हो गया। कभी यहाँ राजा छाये हुए थे। तीन चौथाई हुकूमत राजाओं की थी। अब है कोई राजा? पच्चीस साल में सब तबाह हो गये। जागीरदार और जमींदार देखे है आपने न देखें हो तो राजस्थान चले जाइये। वहाँ जगह जगह किले गाँव गाँव किले जो अब खंडहर के रूप में पड़े है उन्हीं के अवशेष है। सब कुछ समय बहा ले गया। राजा भी चले गये जमींदार भी चले गये और कौन चले गये? साहूकार भी चले गये जो कभी गिरवी रखने और अच्छा खासा ब्याज कमाने का धंधा किया करते थे। बीस सालों में बहुत कुछ बदल गया।
मित्रो इन दिनों दुनिया दो तरीके से बदल रही है। इसे कौन बदल रहा है? बीसवीं सदी का अवतार जिसे हम प्रज्ञावतार कहते हैं। आदमी की अक्ल बहुत ही वाहियात है। इस अकल ने सारी दुनिया को गुत्थियों में धकेल दिया है। जितनी ज्यादा अक्ल बढ़ी है। आप कालेजों में विश्वविद्यालयोँ में चले जाइये पहले वहाँ अराजक तत्व अवांछनीय तत्व कहाँ रहते थे, पर देखिये सारी खुराफातें कहाँ जन्म ले रही है? आपको बदलता हुआ जमाना दिखाई नहीं पड़ता आजकल बहुत हेरफेर हो रहा है। इस अक्ल ने दुनिया को हैरान कर दिया है। इस अक्ल को अक्ल से धुलाई करने के लिए एक नयी अक्ल पैदा हो रही है, जिसका नाम है महाप्रज्ञा। चौबीसवाँ अवतार प्रज्ञा के रूप में जन्म ले रहा है। आपको तो नहीं दिखाई पड़ता होगा शायद पर आप हमारी आँखों में आँखें डालकर देखें। हमारी आँखें बहुत पैनी हैं और बहुत दर की देखने वाली है। हमारी आँखों में टेलिस्कोप लगे हुए है। आप आइये जरा हमारी आँखों में आँखों डालिये क्या हो रहा है। जमाना बेहद तरीके से बदल रहा है। यह कौन बदल रहा है? भगवान बदल रहा है। भगवान के अवतार जब कभी भी दुनिया में हुए हैं तब भक्तजनों को अपना सौभाग्य चमकाने का मौका मिल गया हे। ऊपर हमने भगवान राम का उदाहरण दिया है, अभी और दूँ उदाहरण। अच्छा तो बुद्ध का और श्रीकृष्ण भगवान का उदाहरण देता हूँ आपको। कुब्जा जो चंदन लगा देती थी उसके उदाहरण दूँ। कितने उदाहरण दूँ। आपको। भगवान के अवतारों के साथ में जिन्होंने थोड़े से भी अहसान कर दिये वे धन्य हो गये। भगवान तो क्या महापुरुषों के साथ भी जिन्होंने थोड़ा सा भी कंधा लगा दिया वे राजेगोपालाचारी हो गये बिनोवा हो गये। उनका नाम पटेल हो गया, नेहरू हो गया जाकिर हुसैन हो गया राधाकृष्णन हो गया राजेन्द्र बाबू हो गया। जिनका मैं नाम गिना रहा हूँ वे सभी हिन्दुस्तान के बादशाह हो गये। वे इसलिए बादशाह हुए कि उन्होंने समय को पहचान लिया था कि कोई खास अवतार युग को बदलने आया है और उसी की बिरादरी में शामिल हो गये उसके कंधे से कंधा मिलाकर साथ साथ चलने की अपनी जुर्रत हिम्मत दिखा दी।
आज का वक्त भी ऐसा ही है आप देखिये न। उस अवतार के साथ अगर आप कंधे मिला सकते हों चरण मिला खाली आप उसके पीछे चल सकते हो खाली बँटा सकते हो तो मैं आप में से खाली कहूंगा कि अगले दिनों आप खाली भाग्यवान व्यक्ति कहलायेंगे कि आपका सौभाग्य आपके लिए सहायता ही देगा। हमने क्या किया है? आप क्या समझते हैं कि हमने किताबें लिखी है, लेख लिखें हे लेक्चर देते हैं पूजा करते हैं। अरे भाई साहब पूजा तो हम चार हो घंटे करते हैं पहले छः घटे करते थे। या अब चार ही घंटा करते हैं। आपको हम आदमी बता सकते हैं जो हमसे चौगुनी पूजा करते हैं। दुनिया में और दिल्ली में चले जाइये वहाँ ढेरों के ढेरों आदमी रहते हैं ओर लिखने का धंधा करते हैं पैसा कमाते हैं और अपने बाल बच्चों का पेट पालते रहते हैं। स्कूलों में कालेजों में लेक्चर होते हैं, लेक्चर देना उनका धंधा ही है रोटी ही इस बात की मिलती है उनको। फिर आपको इस तरह के मौके क्यों मिलते चले जा रहे है? क्या वजह है इसकी? इसकी एक ही वजह है कि हमने यह पहचान लिया है कि भगवान का अवतार होता हुआ चला आ रहा है। अवतार के साथ कंधे से कंधा मिला कर उसके कदम के साथ कदम बढ़ाकर चलने का हमने निश्चय कर लिया कि साथ साथ रहेंगे। उसके साथ अपने जानकी बाजी लगायेंगे। तब परिणाम क्या होता है? वही जो आग और लकड़ी का होता है। दो कौडी की नाचीज लकड़ी जब आग के साथ मिल जाती है तो उसकी कीमत आग के बराबर हो जाती है। जिस लकड़ी को कल बच्चे उछाले फिर रहे थे, आग के साथ रिश्ता हो जाने की वजह से आज वही कहती है कि हमें छूना मत आप हमारा गलत इस्तेमाल मत करना। आज आपने यदि हमको फेंक दिया तो हम आपके छप्पर को जला देंगे गाँव को जला देंगे। एक घंटे पहले मैं लकड़ी थी पर अब मैं आग हूँ। तो आग कैसे हो गयी आप? हमने एक ही हिम्मत की है कि अपने आपको आग के साथ में बुला दिया है मिला दिया है। अगर आप भी ऐसा कर सकते हो तो मैं आपको सौभाग्यवान कहूंगा
साथियों भगवान तो अपने काम आयेंगे ही आप करें तो न करें तो भी। तो क्या रामचंद्र जी रावण को मार सकते हैं बिलकुल मार सकते थे। रामचंद्र जी खाली शक्ति थी कि रावण सहित एकोंएक खाली मार डालते और अकेले अपने बलबूते पर सीता जी को छला जाते। लेकिन उनको श्रेय देना था। भक्तों को श्रेय ऐसे ही मौके पर दिया जाता है। भक्त की परीक्षा ऐसे ही मौके पर होती है और वे समय शानदार होते हैं। इम्तहान रोज रोज कहाँ होते हैं? भक्तों के भी इम्तहान हमेशा नहीं होते बहुत दिनों बाद होते हैं। जिसमें आपको बुलाया गया है, उसमें नवरात्रि का अनुष्ठान करने के लिए ही आपको नहीं बुलाया है। आप अनुष्ठान करते हैं बहुत अच्छी बात है। यहाँ गंगा का किनारा हिमालय की गोद गायत्री तीर्थ के पवित्र वातावरण में आप गायत्री का जप कर रहे हैं यह बहुत ही प्रसन्नता और सफलता की बात है, पर आप याद रखिये हमने केवल अनुष्ठान करने के लिए ही आपको नहीं बुलाया। हमारे मकसद बड़े हैं और वे यह है कि आप ऐसे सौभाग्य वाले समय में क्या कुछ लाभ उठा सकते हैं? क्या आप समय को पहचान सकते हैं? क्या आप भगवान की सहायता कर सकते हैं? क्या आप अपने जीवन में कुछ हिम्मत इकट्ठी कर सकते हैं? हम इसलिये बुलाते हैं और हर एक आदमी से बार बार यही सवाल पूछते रहते हैं कि क्या आप इस शानदार समय को पहचान सकते हैं? क्या आपकी अक्ल इतनी मदद करेगी कि आप इस शानदार समय को पहचान लें? अगर आपकी अक्ल इतनी सहायता कर दे और यह बता दे कि यह बहुत ही शानदार समय है तो फिर हम आपको एक और सलाह देते हैं कि ऐसे वक्त आप एक और हिम्मत कर डालना। कौन सी हिम्मत? आप भगवान की माँग को तलाश करे और उसको पूरा करने की कोशिश करे। भगवान की भी कुछ माँगा है। उन माँगों को पूरा करने के लिए जरा आप कोशिश करे तो मजा आ जाये।
क्या माँगें हैं भगवान की? आप अखंड ज्योति के सब पाठक है और जानते हैं। कि प्रज्ञावतार ने क्या माँगा है? प्रज्ञावतार ने यह माँगा है कि हम लोगों के दिमागों की सफाई करे विचारोँ की सफाई करे। प्रज्ञा इसी का नाम है। आदमियों के दिमाग पैने तो हो गये है, अक्ल तो बहुत पैनी हो गयी हैं। अक्लमंद तो इतने हो गये है कि आप देखेंगे तो हैरान रह जायेंगे। अक्लमंद आदमियोँ ने जहाँ एक ओर बड़ी बड़ी इमारतें बनाई है। वही दूसरी ओर इन्हीं अक्लमंदों ने लोहा सीमेंट सब के सब हजम कर लिये है। जहाँ भी जिस भी डिपार्टमेन्ट में चले जाइये सब जगह अक्लमंद लोग मिलेंगे। वे अक्ल लोग तो बेचारे चप्पल चुरा सकते हैं। अक्लमंद लोगों ने सारी दुनिया को धोखा दिया है। दुनिया का सफाया करने की पूरी जिम्मेदारी अक्लमंदों की है। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान का बँटवारा कराकर लाखों आदमियों का खून करा देने की जिम्मेदारी अक्लमंदों की ही है आम बेचने वालो की नहीं। यह सब बड़े दिमाग वालो की है। यह सब बड़े दिमाग वालो की है। इसलिए बड़े दिमाग वालो के मस्तिष्क की सफाई करने के लिए ही तो ऐसी लहर आ रही है जो दुनिया में सोचने के तरीके को बदल देगी। प्रज्ञावतार इसी का नाम है। प्रज्ञावतार की क्या माँगे है इसको हम बराबर छापते रहे है। इसको फिर से कहने की जरूरत नहीं है। पर प्रज्ञा अभियान के रूप में आप इस लहर को समझ सकते हैं यह प्रज्ञा अभियान लहर को समझ सकते हैं। यह प्रज्ञा अभियान इंसान का नहीं है अगर इंसान का होता तो हमारे जैसे आदमी इसके लिए कमजोर पड़ते। लेकिन उस महाशक्ति का काम करने के लिए जब हम अमादा है तो फिर आप हमारी सफलताओं को नहीं देखते। आपको हमारी सफलतायें दिखाई नहीं पड़ती। आप देखिये। हमारी सामर्थ्यों प्रतिभा क्षमता और अक्ल को भी देखिये सिद्धियों को भी देखिये सब कुछ देखिये पर मैं एक और बात कहता हूँ आप से कि आप तो इसको देखने की परिस्थिति में भी नहीं हैं क्योंकि जिस आँख से आप देखना चाहते हैं वह आंखें ऐसी नहीं है जो हमारी आध्यात्मिक सफलताओं को और हमारे प्रयासों द्वारा संसार में जो हेरफेर हो रहे है और होने जा रहे है, उनको आप देखने में समर्थ हो सकें।
मित्रो, आप देखें या न देखें पर सारी सफलतायें शानदार है। आप जरा फिर देखना, अभी तो हम है, कब तक जियेंगे कह नहीं सकते लेकिन आप लोगों में से अधिकाँश आदमी जियेंगे। जियेंगे तो फिर देखना और नोट करना कि हमारी सफलतायें कितनी शानदार होती है?क्यों होती है। क्योंकि हमने अवतार के साथ में कंधे से कंधा मिलाकर हनुमान के तरीके से काम करने का निश्चय कर लिया है। राधा एक साधारण से ग्वाले की लड़की का नाम था, किंतु नाचने के लिए वह थोड़े दिन तक कृष्ण का साथ देती रही और राधा हो गयी। किसको किसको कहें शानदार शक्तियों का साथ देने वाले न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गये और क्या से क्या हो गये। इसलिए इस शिविर से हमने आपको खासतौर से यह दाबन देने के लिए बुलाया है कि अगर आपका मन बड़े फायदे का है और बड़े फायदे लायक अगर आपका व्यक्तित्व है तो आप आइये इस मौके को गंवाइये नहीं इस मौके से पूरा पूरा फायदा उठाइये लोगों अब लोगों में से हर एक को हम झकझोरते हैं खासतौर से उनको जो सेवा निवृत्त हो चुके है घर से निवृत्त हो चुके है, जिनके पास कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ नहीं हैं उन सबसे हम प्रार्थना करते हैं अनुरोध आग्रह करते हैं कि अगर आप किसी तरीके से अपना गुजारा कर सकते हो तो आप आइये और हमारी मिलिट्री में भर्ती हो जाइये आप में से हर आदमी को प्रज्ञावतार के कंधे से कंधा मिलाने के लिए हम दावत देते हैं विशेषकर उन लोगों को जिन्होंने अपनी आदतें ठीक कर रखी है, परिश्रमी हैं चरित्रवान है और जिनका वजन भारी नहीं है अर्थात् जिम्मेदारियों का बोझ हल्का है। ऐसे लोगों के लिए सबसे बेहतरीन काम यह है कि अपना गुजारा करने के बात में वे समाज के काम आयें। देश के काम आयें।
मित्रों आप में से हर उन आदमियों को भी हम दावत देते हैं, जो भावनाशील है जिनके ऊपर बहुत भारी वजन नहीं है, तब तो हम ठहरने के लिए कहेंगे। लेकिन थोड़ा वजन है तो उनकी भी सहायता करेंगे। हमें 24 हजार शक्तिपीठों के लिए उतने ही कार्यकर्ता चाहिए। इन इमारतों में प्राण भरने के लिए हमें कार्यकर्ताओं की जरूरत है। चौबीस हजार की कार्यकर्ताओं की जरूरत है। चौबीस हजार की भर्ती करनी है हमें। आप स्वयं अपना इंतजाम कर सकने की स्थिति में हो तो ठीक है, अन्यथा हम आपके खाने का कपड़े का जेब खर्च का इंतजाम बिठा देंगे। आपके बीबी बच्चे के लिए भी जो मुनासिब खर्च होगा वह भी हम देंगे। कौन है हमारी पीठ के पीछे आपको तो दिखाई नहीं पड़ता। आप आँख खोलिए और देखिये कि हमारे पीछे बहुत शानदार शक्ति है। हम खाली हाय है तो क्या हुआ हमारा गुरु तो खाली हाथ नहीं है। हम अपने बाँस के बारे में विश्वास करते हैं हमें यह भी विश्वास हे कि अगर हमें दो हजार कार्यकर्ता रखने पड़े तो भी पैसों का इंतजाम हम कर देंगे। उनमें से अधिकाँश नौकर रखने पड़े तो भी पैसों का इंतजाम हम कर देंगे। इसलिए एक विज्ञापन निकाल देंगे कि जिसे नौकरी करनी हो सीधे शांतिकुंज चले आवें। एक लाख आदमी अगले ही महीने में एप्वाइंट करके दिखा दूँ आपको युग बदलने के लिए बहुत बड़े काम करने पड़ेंगे परंतु यह काम नौकरों से नहीं हो सकेगा। यह काम भावनाशीलों का है, त्यागियों का है। इसलिए हम आपकी खुशामदें करते हैं कि हमको भावनाशील आदमियों की जरूरत है उनको हम प्रामाणिक कह सकें जिनको हम परिश्रमी कह सके। जो परिश्रमी है वे प्रामाणिक नहीं है और वे जो प्रामाणिक है वे परिश्रमी नहीं है और जो प्रामाणिक एवं परिश्रमी है उनको विश्व की जानकारी नहीं है। हम इनको कब तक दिखायेंगे। कितना सिखाएंगे इनको सिखाने में कितना समय लगेगा? हमारे पास समय बहुत कम है हमको आदमियों की जरूरत हे अगर आप स्वयं उन आदमियोँ में शामिल होने चाहते हो तो आइये हम स्वागत करते हैं और आपको यह विश्वास दिलाते हैं कि आप जो भी काम करते हैं उन सब कामोँ की बजाय यह बेहतरीन धंधा हैं इससे बढ़िया कोई धंधा नहीं हो सकता। हमने किया है, इसलिए अनेकों को यकीन दिला सकते हैं कि यह बहुत फायदे का धंधा है।
इन दिनों हमारे पास केवल दस लाख आदमी है जो बहुत कम है। सारी दुनिया में चार सौ पचासा करोड़ आदमी रहते हैं। अकेले हिंदुस्तान में इन दिनों सत्तर करोड़ से ज्यादा आदमी हो गये है। इन सब तक पहुँचने के लिए दस लाख आदमी बहुत थोड़े है। अब हमें अपने कार्य क्षेत्र का विस्तार करने के लिए आपकी सहायता की जरूरत है। इसके लिए अब हमको वह वर्ग ढूंढ़ना पड़ेगा जिसको विचारशील वर्ग कहते हैं भावनाशील वर्ग कहते हैं त्याग और बलिदान के लिए आगे बढ़ने वाला वर्ग कहते हैं। अब हमें इंजीनियरों की जरूरत है, ओवरसियरों की जरूरत है। हमको उनकी जरूरत है जो राष्ट्र के निर्माण के काम आ सके। नये वर्ग में नये क्षेत्र में जाने के लिए आप सब हमारी मदद कर दीजिए। क्या काम करेंगे? हमने एक बहुत ही शानदार भवनी तलवाल निकाली है। ऐसी शानदार योजना दुनिया में आज तक नहीं बनी। क्या बनी है? हमने हर दिन हर पढ़े लिखें को नियमित रूप से बिना मूल्य युग साहित्य पढ़ाने की योजना बनायी है। आप पढ़े लिखे लोगों तक हमारी आवाज पहुँचा दीजिए। लोगों में आप यह मत कहना कि गुरुजी बड़े सिद्ध पुरुष है बड़े महात्मा है और सबको वरदान देते हैं वरन् यह कहना कि गुरुजी एक ऐसे व्यक्ति का नाम है जिसके पेट में से आग निकलती है, जिनकी आँखों में से शोले निकलते हैं आप ऐसे गुरुजी का परिचय कराना सिद्ध पुरुष का नहीं। विचारक्रांति अभियान को हमने युग साहित्य के रूप में लिखना शुरू कर दिया है और हर आदमी को स्वाध्याय करने के लिए मजबूर किया है हमारे विचारो को आप पढ़िये और हमारी आग की चिनगारी को जो प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत युग साहित्य के रूप में लिखना शुरू किया है उसे लोगों में फैला दीजिए जीवन की वास्तविकता के सिद्धाँत को समझिये ख्वाबी दुनिया में से निकलिए और आदान प्रदान की दुनिया में आइये। आपके नजदीक जितने भी आदमी है उनमें आप हमारे विचार फैला दीजिए। यह काम आप अपने काम करते हुए भी कर सकते हैं आप युग साहित्य लेकर अपने सर्किल में पढ़ाना अपने पड़ोसियों को पढ़ाना शुरू कर दीजिए। उनको हमारे विचार दीजिए हमको आगे बढ़ने दीजिए संपर्क बनाने दीजिए और हमारी सहायता कर दीजिए ताकि हम उन विचारशीलों के पास शिक्षितों के पास जाने में समर्थ हो सके। इससे कम में हमारा काम चलने वाला नहीं है और न ही हमें संतोष होगा। मित्रो हमारे विचारो को लोगों को पढ़ने दीजिए। जो हमारे विचार पढ़ लेगा वही हमारा शिष्य है। हमारे विचार बड़े पैने है तीखे हे हमारी सारी शक्ति हमारे विचारो में सीमाबद्ध है। दुनिया को हम पलट देने का जो दावा करते हैं वह सिद्धियों से नहीं अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप इन विचारो को फैलाने में हमारी सहायता कीजिए। अब हमको नयी पीढ़ी चाहिए इसके लिए आप पढ़े लिखे विचारशीलों में जाइये उनके घर में जाइये खुशामद करिये उनका जन्मदिन मनाइये दरवाजा खटखटाइये। यह हमारा नया कार्यक्रम है।
मित्रों युग साहित्य पढ़ाना प्रज्ञा अभियान पढ़ाना जन्म दिन मनाना यह तीन कार्यक्रम प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत आते हैं। आप में से जो आदमी प्रज्ञापुत्रों के रूप में हमारे साथ शामिल हो सकते हैं, वे अंगद के तरीके से आये नल नील के तरीके से आये हनुमान के तरीके से आये केवट के तरीके से आये। आये तो सही कुछ करे तो सही हमारे लिए। हम आपके लिए करेंगे आप हमारे लिए करिये। हमने गायत्री माता के लिए किया है और गायत्री माता ने हमारे लिए किया है। हमने अपने गुरु के लिए किया है और गुरु ने हमारे लिए किया है। क्या आप हमारे काम नहीं आयेंगे? आप हमारे काम आइये और हम आपके काम आयेंगे। अब हमारा हर एक कार्यक्रम में जाना नहीं हो सकेगा, लेकिन आप में से हर एक सक्रिय कार्यकर्ता को साल भर में एक बार अपने गुरुद्वारे में अवश्य आना चाहिए। अभी तक आप हमारे पास वरदान माँगने के लिए आते रहे हैं पर अब हम आपसे वरदान माँगते हैं आपके पसीने का वरदान आपकी मेहनत का। जब आप देने के लिए आना कुछ पसीना बहाने के लिए आना कुछ समय देने के लिए आना कुछ अकल देने के लिए आना। मित्रो अब हमें उन लोगों को बुलाना हे जो आशीर्वाद देने में समर्थ हो सके हमारे कंधे से कंधा मिला सके। जो हमारा गोवर्धन उठाने में लाठी का टेका लगा सके। जो हमारे कंधे से कंधा मिला सके। जो हमारा गोवर्धन उठाने में लाठी का टेका लगा सके। जो हमारे समुद्र पर पुल बाँधने में ईंट और पत्थर ढो सके और गाँधी जी के कंधे से कंधा मिलाकर जेल जा सके। हमने सारे विश्व को अपना कार्य क्षेत्र बना लिया ह
कौन कहता है, गये हो दूर हमसे? हर घड़ी हर पल हमारे पास हो तुम।
तुम रहे, हो कामनायें , जग जननी की , कामनाओं का कभी, क्या अंत होता?
तुम रहे हो भावनायें, लोक हित की भावनाओं का कभी, क्या अंत होता?
तेज का होता नहीं है, अंत, गुरुवर ! तेज का होता नहीं है, अंत, गुरुवर!
मुग्ध प्राणों का, अटल विश्वास हो तुम। विश्व के संताप, हरने की दिशा में,
जन्मते ही तुम समर्पित हो गये हो , सृष्टि क्रम की शाश्वत उस शृंखला में,
एक जीवन जागकर फिर सो गये हो अस्त होकर सूर्य भी, होता उदित ही,
इस हठीले सत्य का, आभास हो तुम। मानवों को, वेदना से मुक्त करना,
है रहा संकल्प जीवन का तुम्हारे, मोह बंधन में पड़ी चैतन्यता के,
मोक्षकारी स्वप्न, पलकों में उतारे स्वप्न यह साकार जो करने चले, उन,
कोटि कोटिक केंठ की उच्छ्वास हो तुम। भोर होते ही प्रभाकर की , प्रभा में,
देखते हैं हम, मनोहर छवि तुम्हारी, वायु का सु-स्पर्श, कोमल अँगुलियों सा,
जो सदा हरता रहा, पीड़ा हमारी, भूल पायेंगे कहाँ गुरुदेव तुमको,
एक अद्भुत सौख्य का, इतिहास हो तुम। यज्ञ तप जन जागरण अभियान जैसी
माँगलिक आराधनायें चल रही है दैन्य दुःख घटने लगे है, मेदिनी के,
साधकों की साधनायें, फल रही है, अज्ञता, असमानता, अविनय, अविद्य, अनय-नाशक सत्व के, मृदुहास हो तुम।
देवेंद्र कुमार देव
आपने जो अपेक्षा करी मातु श्री ! अब उसे पूर्ण करके दिखाएँगे हम। आप सी माँ मिली श्रेय सौभाग्य से, योग्य संतान का व्रत निभाएँगे हम॥
पूज्यवर की बताई डगर हम चले, जिस दिशा में कहा बस उधर हम चले, पर थके पाँव या कंठ, सूखा,तभी, आपके स्नेह में भी, भीगकर हम चले,
आप जो स्नेह हम पर लुटाती रही, स्नेह का पूर्णतम ऋण चुकाएँगे हम। आप सी माँ मिली श्रेय सौभाग्य से, योग्य संतान का व्रत निभाएंगे हम॥
हर तरफ छा गया जब कभी घोर तम, थे भ्रमित जब, नहीं पा सके पंथ हम, थाम उँगली, चलाया हमें आपने , जब कभी डगमगाने लगे थे कदम
आपकी प्रेरणा की सुखद छाँह में, संयमित हो सदा पग बढ़ाएंगे हम। आप सी माँ मिली श्रेय सौभाग्य से, योग्य संतान का व्रत निभाएंगे हम॥
हो भले ही, प्रलय मेघ छाये रहे, ज्वार आकंठ हमको डुबाये रहे, स्नेह ममता मिली आपसे इस कदर, कष्ट हम जिंदगी के, भुलाये रहे
मातु! विश्वास दो हम सभी को पुनः युग-युगों तक वही स्नेह पायेंगे हम। आप सी माँ मिली श्रेय सौभाग्य से, योग्य संतान का व्रत निभाएंगे हम॥
शक्ति दो माँ ! कि हम, प्राणपण से चलें, सूर्य की जगमगाती, किरण से चले, हम लिये स्नेह संदेश गुरु शक्ति कर, काँधे काँवर लिये हम श्रवण से चलें
ज्ञान-गंगा लिये मातृ गुरुदेव की, विश्व के हर नगर गाँव जाएँगे हम। आप सी माँ मिली श्रेय सौभाग्य से, योग्य संतान का व्रत निभाएंगे हम॥
हम न देखे, सुबह दोपहर शाम को, विघ्न बाधा, थकान या कि विश्राम को,
हम सजग सैनिकों से सदा चल पड़े, लोकहित के, कठिन से कठिन काम को ,
आपने सिंह शावक कहा है हमें दूध माँ का न बिलकुल लजाएँगे हम। आप सी माँ मिली श्रेय सौभाग्य से, योग्य संतान का व्रत निभाएंगे हम॥
शचीन्द्र भटनागर
महाप्रयाण से पूर्व परमपूज्य गुरुदेव ने जितनी घोषणायें की वे मिशन के भावी स्वरूप कार्यक्रम और उपलब्धियों की भविष्यवाणी थीं 1. स्वयं के महाप्रयाण 2. ब्रह्म यज्ञों के विस्तार 3. ब्रह्म बीज के उत्पादन और ब्रह्मवर्चस् संपन्न (प्रचंड आत्मिक क्षमता संपन्न) सवा लक्ष महापुरुषों के उपार्जन और 4. सतयुग की वापसी तब कल्पनातीत बातें लगती थी पर आज इस मिशन से जुड़ा हर भावनाशील परिजन इक्कीसवीं सदी का भारतीय संस्कृति से सराबोर उज्ज्वल प्रभात स्पष्ट अपनी आँखों से देख रहा है।
ठन संभावनाओं को साकार बनाने के लिए परमपूज्य गुरुदेव ने 1989 में 24 करोड़ गायत्री महामंत्र के प्रतिदिन ज पके ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की थी। उस समय इस अनुष्ठान में दो लाख व्यक्ति सम्मिलित हुए थे। उन्हें प्रतिदिन ग्यारह मालाओं की श्रद्धांजलि चढ़ानी थी। इस तरह 24 करोड़ दैनिक गायत्री मंत्र जप से प्रारंभ हुआ। युग संधि महापुरश्चरण 2400 करोड़ गायत्री महामंत्र जप तक जा पहुँचा है। छोटा सा उदाहरण पटना अश्वमेध यज्ञ का है जहाँ 2 लाख तिहत्तर हजार लोगों ने दीक्षा ग्रहण कर इस अनुष्ठान की भागीदारी निश्चित की। इस तरह उत्पन्न ऊष्मा शक्ति का सहज ही अनुमान किया जा सकता है
एक पुरुषार्थ है ऊर्जा का उत्पादन दूसरा और उससे भी बड़ा पुरुषार्थ है उसका नियंत्रण नियोजन यह अपेक्षाकृत कठिन कार्य है। यह कार्य यज्ञों के माध्यम से संपन्न होना है। देव ऊर्जा को पचाने के लिए जप के साथ शताँश आहुति यज्ञ का शास्त्रों में विधान है। इतने बड़े अनुष्ठान की पूर्णाहुति एक बार में संभव नहीं थी। इसलिए परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य दृष्टि ने उसे 1995 में प्रथम और 2000 में दूसरी पूर्णाहुति की घोषणा की थी उन्होंने कहा था दूसरी पूर्णाहुति में एक करोड़ व्यक्ति भाग लेंगे। तब संभव है शाँतिकुँज की इस बात पर जनसामान्य को विश्वास न हुआ हो पर जिन्होंने लखनऊ नागपुर पटना भिलाई अश्वमेध देखें होगे उन्हें अब कथनोँ पर पूर्ण विश्वास हो गया होगा, रत्तीभर संदेह नहीं रहा होगा।
प्रथम पूर्णाहुति वर्ष 1995 अब ठीक सामने आ पहुँचा। पिछले चार वर्षों में इस मिशन का मत्स्यावतार विस्तार हुआ है अतएव यदि उसमें 50 लाख व्यक्ति भाग ले तो इसे अतिरंजित न माना जाये। यह एक चुनौती और जोखिम से भरा कार्य है पर खतरों से खेलने के अभ्यस्तों की तरह अब इसे प्राण पण से संपन्न करना शांतिकुंज की नियति बन गया है। एक नवम्बर धनतेरस 14 को संपन्न होने वाली शोभा यात्रा और परमपूज्य गुरुदेव वंदनीया माताजी की जन्मभूमि आंवलखेड़ा (आगरा) में संपन्न हो रहा शक्ति कलश स्थापन समारोह इसी प्रथम पूर्णाहुति का शुभ मुहूर्त है। यही से इस प्रथम पूर्णाहुति की तैयारी सारे देश भर में व्यापक रूप से प्रारंभ हो जावेगी। एक वर्ष तक निरंतर प्रयाग कार्यक्रम की तिथियाँ 4,5,6,7 नवम्बर 15 कार्तिक पूर्णिमा रखी गई है।
आंवलखेड़ा जो कि पूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली है का निर्धारण देश भर के करोड़ों परिजनों की भावनाओं से जुड़ा है। ग्रामीण अंचल जहाँ न पर्याप्त विद्युत व्यवस्थायें होगी और न ही आवासीय सुविधायें इस क्षेत्र के जल संसाधन बहुत कठिन हैं अन्य साधनों की दिक्कतें सहज समझ में आने वाली हैं पर जब पृथ्वी पर भावनाओं का संवेदना का संसार ही उतारा जाना हो तो फिर इन कठिनाइयोँ से डरकर पीछे लौटना भी संभव नहीं है। अब तो गायत्री परिवार के मरजीवडों के लिए कठिनाइयोँ से जूझकर सफलता का वरण एक आनंददायी अभिव्यक्ति बन गया है सो पूरा मिशन उत्ताल तरंगों से आप्लावित है। यह अपने समय का अभूतपूर्व आयोजन होगा जिससे सामाजिक अव्यवस्थाओं की चूले हिलेंगी राजनीतिक दिशा हीनता कुछ सोचने को विवश होगी प्रशासनिक भ्रष्टाचार को सेवा साधना में बदलने को विवश होना पड़ेगा। मनुष्य में देवत्व के द्रुत विकास का यह दीपमालिका पर्व जो देखेगा वह अपने आप को धन्य अनुभव करेगा जो सुनेगा वह सन् दो हजार के लिए तिल तिल प्रतीक्षा में समय गुजारेगा।
ब्रह्मतेज का महानता का उपार्जन राष्ट्र के चरणों में सवालक्ष राष्ट्र संतों का महापुरुषों का प्रतिभा परिष्कार और समर्पण ही इस प्रथम पूर्णाहुति का मूलभूत प्रयोजन है। आज दिखाई देने वाले विशालकाय भवनों की भव्यता का शुभारंभ उस दिन होता है जिस दिन बढ़िया वाली मिट्टी कूट छान और गूँथ कर ईंटें पाथी जाती है। दूसरा चरण वह होता है जिसमें वह भट्टों में पकाई जाती हैं तीसरा चरण वह होता है जब कुशल शिल्पी पाचीरें खड़ी करते हैं। यह सब एक बार में न दिखने वाली प्रक्रियायें हैं जिन पर लोग अविश्वास भी कर सकते हैं पर गगन चूमते प्रासाद देखकर उस कारीगरी का सहज बोध हो जाता है। महाकाल भी यही तीन चरणों वाला विश्वकर्मा अभियान छेड़े हुए है जिसके समूर्त होने में अब बहुत अधिक समय नहीं है।
1979 से अब तक एक एक भावनाशील परिजन को जोड़कर मिट्टी की ईंटें पाथने का गुरुतर कार्य ऋषियुग्म द्वारा पूरा हुआ युगसंधि पुरश्चरण उस भट्टे को पकाने में लगा है सतयुग का भवन निर्माण कार्य अब इस प्रथम पूर्णाहुति से प्रारंभ होने जा रहा है। जिसमें बोधिसत्व जैसे अहिंसावादी गाँधी जी जैसे सत्यनिष्ठ सूरदास जैसे अग्नि दीक्षा में प्रविष्ट साधक ईश्वर चंद विद्यासागर जैसे अपरिग्रही महर्षि दयानंद जैसे ब्रह्मचारी इन्द्रिय निग्रही दधिची जैसे साधक व्यास जैसे विद्वान निवेदिता जैसी सेवानिष्ठ आत्मायें जन्मेगी विकसित होगी कार्यक्षेत्र में पदार्पण करेगी। भगवती गायत्री के सविता तेज ने इस देश के स्वामी विवेकानंद जैसे संसार को आलोक देने वाले सरदार बल्लभ भाई जैसे लौह पुरुष प्रखर व्यक्तित्व भगवान् शंकराचार्य जैसे निरंतर गतिशील रहना भारतीय धर्म आध्यात्म और हजारी किसान जैसे सृजन चेतना द्वारा इस देश और विश्व को सुरक्षित करने वाले महापुरुषों के उपार्जन की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। भौतिक जगत में इस देश और विश्व को सुरक्षित करने वाले महापुरुषों के उपार्जन की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। भौतिक जगत में इस देश में आचार्य द्रोण जैसे सेनापति वराहमिहिर और आर्यभट्ट जैसे वैज्ञानिक नागार्जुन जैसे विश्व विख्यात सुशिक्षित व संस्कारवान भैषजज्ञों के इस देश में अवतरण की पृष्ठभूमि पक चुकी है यह सब अनायास ही नहीं होने वाला महाकाल प्रकृति प्लाज्मा में यह चुपचाप पकाने में लगा है। विशालकाय अट्टालिकाओं के रूप में उसके अभिव्यक्त होने में भी अब अधिक समय नहीं है। युग शिल्पियों को अब उसी में जुटना है।प्रथम पूर्णाहुति समारोह इसी दिशा में मील का एक पत्थर सिद्ध होने जा रहा है।
इस कार्यक्रम के लिए परमपूज्य गुरुदेव की जन्मभूमि के चयन के पीछे कुछ आधार भूत तथ्य हैं। गंगा वाराणसी पटना और कलकत्ता में वही है बड़ा विराट रूप ले चुकी है पर गोमुख की पवित्रता और सिद्धि के कारण ही यह संभव हो पाया। इसी तरह महानता का उपार्जन जिस ब्रह्म बीज से होने जा रहा है वह गोमुख आंवलखेड़ा ही है जिसने विराट् पुरुष को अपनी कोख से जन्म दिया अब यह कोख सारे भारत वर्ष की कोख बनेगा पहले इसने एक कुँडलिनी शक्ति का शक्तिमान पुत्र पैदा किया अब समूचे राष्ट्र की कुँडलिनी महामाया का विस्तार यहीं से होगा। 1995 में हो रहे इस आयोजन की कई मौलिक विशेषतायें होगी 1. दो यज्ञ स्थल समानाँतर विनिर्मित होगे एक का संचालन पुरुषों के लिए पुरुष आचार्यगण करेंगे दूसरों का विदुषी ब्रह्मवादिनी महिलाएँ करेगी उसका समग्र संचालन भी महिलाएँ ही करेगी। यह उन लोगों के लिए चुनौती होगी जिन्होंने देश के नारी जीवन को इस तरह दबाकर रखा कि उन्हें कभी महापुरुषों को जन्म देने के योग्य नहीं रखा उन्हें आत्महीनता के भँवर में एकाकी डूब जाने के लिए विवश किया गया। यह कुचक्र अब टूट कर रहेगा 2. पहली बार प्रजातंत्र की रक्षा और पवित्रता का पाठ पढ़ाया जायेगा। देश भर के उन सभी भावनाशील राजनीतिज्ञों को वे चाहे जिस पार्टी के हो पर जिनके हृदय अभी भी राष्ट्रीय चिंतन से विरत नहीं हुए अभी भी जिनकी कथनी करनी में अंतर नहीं हैं उन्हें बुलाकर समझाया जावेगा जन जीवन से खिलवाड़ करते बहुत समय हो गया अब आदर्शों सिद्धांतों के लिए भी कुछ स्थान मिलना चाहिए। 3. पहली बार अपने प्रवासी भारतीयों को एकजुट करके उन्हें पश्चिमी देशों तक भारतीय संस्कृति दृष्टि से जर्जर इस देश के उपकार में पुनर्निर्माण में योगदान के लिए सहमत किया जावेगा। 4. पहली बार मीडिया को मोड़कर देश की खाली कोने तक पहुँचाने को अभ्यर्थना की जायेगी। वंदनीया माताजी को श्रद्धाँजलि स्वरूप सेवा के लिए प्रतिभा संपन्न सवालाख हीरकों (पूर्ण समयदानी युगशिल्पियों) की माला भेंट की जायेंगी। यह तो उद्देश्य है उसके लिए की जाने वाली तैयारियाँ व्यवस्थाएँ इतनी दर्शनीय होगी जिन्हें लोग लंबे समय तक भूल नहीं पायेंगे।
निस्संदेह यह आयोजन भारी साधन माँगेगा अभूतपूर्व श्रमशक्ति अपेक्षित होगी, नारी जाति को पहली बार स्पर्द्धा में उतरना पड़ेगा। अभी से अभ्यास करने पड़ेंगे। बड़ी संख्या में मूर्धन्यों को समय और प्रतिभा देनी पड़ेगी। साहित्य लेखन चित्रकला, निर्माण कार्य गायक वादक और प्रत्येक क्षेत्र की विभूतियों को शाँतिकुँज के बैनर के नीचे संगठित होना पड़ेगा तब कहीं यह भव्य पूर्णाहुति कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न होगा। हम अपनी तरह से अपने परिजनों तक जाकर उन्हें जिम्मेदारियाँ तो सौंपेंगे पर इस मिशन के उस नींव के पत्थरों को उठकर स्वयं ऊपर आना पड़ेगा जिन्होंने अब चुपचाप अपने क्षेत्र में कार्य किया पर उनकी प्रतिभा और नेतृत्व का लाभ मिशन को नहीं मिल पाया। अतएव इन विनम्र अनुरोध है कि इस गोवर्धन पर्वत उठाने जैसे भागीरथ कार्य में अपनी तरह सेवा का संकल्प लें।
कौन परिजन किस तरह सहायता कर सकते हैं सेवाएँ दे सकते हैं उस सब के लिए शाँतिकुँज में एक स्वतंत्र प्रभाव बनाया गया है सभी वरिष्ठ परिजन उसके लिए अभी से पत्राचार प्रारंभ करे ताकि परमपूज्य गुरुदेव शक्तिस्वरूपा माताजी के संकल्पों को पूरा करने की प्रथम श्रद्धाँजलि उतने ही गौरवपूर्ण ढंग से प्रस्तुत की जा सकें।
माँ का कार्य है प्यार बाँटना दुलार देना इतना कि पुत्र को कोई शिकायत न रहे। बिगड़ने तो न पाये किंतु अंतराल की संवेदना की गंगोत्री कभी सूख न सके। जब मातृसत्ता को गुरुसत्ता की भूमिका भी निभानी पड़े तथा अभिभावक तंत्र में पिता का साया उठ जाने पर पिता का साया उठ जाने पर पिता की भी तो हम कल्पना कर सकते हैं कि यह कार्य कितना दुरूह होगा उस सत्ता के लिए। किंतु जो शक्ति का ही एक अंग हो-स्वयं साक्षात् माँ पार्वती रूपा हो उनके लिए यह कार्य कठिन नहीं।
परमवंदनीया माताजी जिनने विगत भाद्रपद पूर्णिमा महालय श्रद्धारंभ की पावन बेला में स्थूल शरीर को छोड़कर सूक्ष्म में प्रवेश किया सतत् उस अखण्ड दीपक में घृत बनकर परहित के निमित्त अपनी एक एक बूँद होम करनी रही जो उनकी आराध्य सत्ता ने 1926 में प्रज्वलित किया था व अब भी जल रहा है। उसी के प्रकाश में मिशन के सभी महत्वपूर्ण निर्धारण संपन्न हुए। उस अखण्ड दीपक को यदि समष्टि के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाए। ऋषियुग्म की तपः ऊर्जा का घृतरूपी स्नेह में परम वंदनीया माता जी की सत्ता का तथा बाती के प्रखर प्रकाश से परमपूज्य गुरुदेव के ब्रह्मवर्चस् का परिचय मिलता पाया जाए तो इस मिश्रण के सही स्वरूप को समझने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होगी। उसी प्रखण्ड दीपक की उनने न केवल सावधानी से देखभाल की इसकी प्रशंसा लेकर प्रकाशित होने वाली अखण्ड ज्योति जो महाकाल के प्राण प्रवाह के रूप में जन जन में अभिनव उत्साह का संचय खाली को भी संभाला। संचय क्या नहीं करा देती? जब अपना सारा आपा ही गुरुसत्ता को सौंप दिया तो फिर ज्योति बनकर जलने अथवा घी की बूँद बनकर बाती को स्नेहसिक्त बनाये रखने में कोई कमी कैसे हो सकती थी?
अखण्ड ज्योति के पाठकों को हम पूरी तरह आश्वस्त करना चाहते हैं कि गायत्री परिवार रूपी भवन जिन ईंटों पर रखा गया है वे प्रयासपूर्वक गुरुसत्ता द्वारा पकायी गयी है। इसलिये इसके किसी भी हिचकोले से हिलने की तनिक भी गुँजाइश नहीं है। इस भवन की नींव बड़ी मजबूत है। अखण्ड ज्योति का दायित्व अब जिन कंधों पर आया है, वे कमजोर भले ही दिखाई दे पर इनका आश्वासन इतना अवश्य है कि गुरुसत्ता की सजलता व प्रखरता दोनों को ही पाठकों तक उसी रूप में पहुँचाने की महाकाल की व्यवस्था में सहायक की भूमिका में वे कोई कमी नहीं आने देंगे। परम वंदनीया माताजी की ममता करुणा स्नेह से विगलित अंतःकरण को तथा परमपूज्य गुरुदेव की दूरगामी भविष्य की रीति नीति बनाकर नवयुग का स्वप्न रचने वाली प्रखर प्रज्ञा को वे परिजनों को पहुँचाने का प्रयास करेंगे।
अगणित घटनाक्रम गुरुसत्ता से जुड़े ऐसे है, जिन पर दृष्टि डालने मात्र से परिजनों को लगेगा कि किस दृढ़ नींव पर यह भवन रखा गया है ब्राह्मणत्व को जीवन में उतार कर दधीचि स्तर की तपः ऊर्जा से स्वयं को पकाकर तथा उदार परमार्थ परायणता को रोम रोम में पिरोकर जीत हुए यह मिशन खड़ा हुआ है। किसी एक या कुछ धनी संपन्न का अनुदान लगकर यह मिशन बना होता तो कोई असमंजस भी हो सकता था किंतु जहाँ समर्पण की उच्चतम अवस्था हो वहाँ किसी को भी रंचमात्र भी संदेह नहीं रहता।
पूज्यवर के 24 वर्ष के 24-24 लक्ष के महापुरश्चरण 1926 से लेकर 1953 तक की अवधि में गुरुसत्ता की प्रेरणानुसार बीच में अन्य निर्देशों का भी पालन करते हुए 27 वर्ष में संपन्न हुए थे। जब पूर्णाहुति का समय आया तब तक गायत्री तपोभूमि रूपी दुर्वासा ऋषि की तपस्थली देख ली गयी थी। किंतु उसे खरीदने का मन होते हुए भी इतना बड़ा सौदा करने को मन झिझक रहा था। तब मध्यम वर्ग के कुछ भावनाशील ही जुट पाए थे, अखण्ड ज्योति लागत मूल्य पर अब तक निकलती है, तथा कतिपय पुस्तकें (जो श्रद्धाँजलि सेट के रूप में पुनः प्रकाशित हुई हैं) के माध्यम से कुछ व्यवस्था बना पा रहे थे। प्रामाणिकता छपाई की इतनी रखी जाती थी कि एक बार गलत फार्म अलग किताब में चला जाने से पूरा स्टाक ही पूज्यवर ने जला दिया था। ऐसे में धनराशि कहाँ से आए? असमंजस माताजी ने दूर किया। श्री ओमप्रकाश जी व दयावती बहन पूर्व पत्नी से उत्पन्न दो संतानों के विवाह की व्यवस्था परम वंदनीया माताजी के ही माध्यम से बनी थी। अब जो घड़ी सामने आयी उसमें तो सब कुछ दाँव पर लगाने की बात थी क्योंकि इससे कम में गायत्री परिवार की कर्म भूमि प्रचार प्रसार स्थली की आधारशिला रखी नहीं जा सकती थी। उनने अपने ढाई सौ तौले जेवर जो पूरी जमा पूँजी थी लाकर पूज्यवर के पास रख दिए व कहा कि इससे जमीन खरीदने की व्यवस्था पर ले भवन के लिए भी किसी खाली व्यवस्था होगी ही। उदारता (खाली ). जेवर पति के कार्यों के निमित्त अनुदान देने के रूप में निकली बीज बन गई उस गायत्री परिवार का जो गलकर एक विराट् वृक्ष के रूप में पुष्पित पल्लवित होता चला गया। अपने घर से आरंभ की गयी इस प्रक्रिया में अन्यान्य व्यक्तियों के उपहार के बावजूद उनने पूरी अंतरात्मा के साथ अपने इष्ट का साथ दिया बच्चों को भी वैसा ही जीवन जीने को प्रेरित किया यह एक उदाहरण बना व देखते देखते विस्तार के लिए अनुदान बरसने लगा।
बड़े पुरुषार्थ इससे कम समर्पण में पूरे नहीं होते। स्नेह सलिला माताजी वास्तविक अर्थों में जगन्माता थी व उसी रूप में पूज्यवर ने भी उन्हें ठीक ठाकुर रामकृष्ण की तरह रखा उनके जिम्मे एक विराट परिवार के पालन पोषण का भार सौंपा जिसे वे निभाती चली गयी।
परम वंदनीया माताजी के लिए ही सप्तसरोवर में शांतिकुंज आश्रम का निर्माण करने के लिए 1967 में भूमि क्रय के बाद वे बारंबार हरिद्वार आते रहते थे? यहाँ आकर वे सप्तऋषि आश्रम में रुकते विश्वमित्र कुटीर में तथा जब तक अस्थायी निर्माण नहीं हो गया वही बने रहते। अज्ञातवास के दौरान भी एक माह के लिए वर्ष में वे यही आकर रुके भी थे। बिना किसी पूर्व सूचना के परम वंदनीया माताजी मथुरा से चल दी अपने आराध्य से मिलने। किंतु न पहले आयी थीं न पता था कि कहाँ है? बरसते पानी में पहले दिल्ली व फिर बस पकड़कर प्रायः बीस घंटे में भूखी प्यासी सप्तऋषि आश्रम पहुँची उन दिनों हरिद्वार की 1-2 बसे ही चला करती थी। जब वे कुटिया पहुँची तो कुटिया खुली थी, आचार्य श्री गंगातट पर गए थे। देखा कि भगोने में खिचड़ी बनी रखी है। गंगा तट पर जाकर अपने आराध्य के साथ आयी व भोजन प्रसाद लेने बैठी। खाया तो नमक का या कंकर पर आचार्य श्री पूरे स्वाद के साथ निष्ठा भाव से खा रहे थे। देखते ही आँसू आ गए कि वहाँ रहते तो मैं बिठाकर जैसा वे चाहते हैं खिलाती किंतु यहाँ कैसे निर्वाह कर रहे है। बिना चेहरे पर किसी शिकन के पूज्यवर ने कहा कि अनगढ़ हाथों से बनी है, खालो फिर कल तुम बना देना। बीस घंटों से भूखी आराधिका ने इष्ट का प्रसाद प्रेम से ,खाया व तृप्ति अनुभव की। सोचा जिसके हृदय में सारी दुनिया का दर्द भरा है वह अपने सुख की क्या चिंता करेगा। एक दो दिन बाद तीनों वापस लौट गए पर यह घटना माताजी के लिए चिर स्मृति बन गयी। स्वाद पर नियंत्रण किस स्तर का होना चाहिए तभी तप सधता है, यह मूलमंत्र उनने 24 वर्ष के अनुष्ठान के उत्तरार्ध में जान लिया था पर इसे कैसे अंत तक निभाया जाता है, यह भली भाँति समझ में आ गया।
परिजनों की आँखें जो आज वृहत अट्टालिकाएं गायत्री तपोभूमि ब्रह्मवर्चस् शांतिकुंज गायत्री तीर्थ तथा विश्वभर में फैली अरबों की लागत की शक्तिपीठों को देखती है, उन्हें पहले ऋषियुग्म के गलने के इतिहास को उनके समर्पण को समाज निर्माण के संकल्प को पूरा करने के निमित्त किये गए तप का समझना पड़ेगा , तभी वे जान पाएँगे कि कैसे यह सब कुछ बन कर खड़ा हो गया।
पूज्यवर सतत् कहते थे मेरी शक्ति का स्त्रोत माताजी है व माताजी कहती थी-मेरे इष्ट मेरे गुरुदेव-आप सबके गुरुदेव है। दाम्पत्य जीवन में कैसे परस्पर दूध पानी मिलकर एक होते हैं एकाकार हो एक सत्ता एक रूप बन जाते हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम ऋषियुग्म की जीवन यात्रा में देखते हैं वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं को जब भी कुछ भूलचूक होने व्यावहारिक मार्गदर्शन में नासमझी से कुछ समझ न पाने के कारण गलतियाँ होने पर कड़ी रुखाई भरी डाँट पूज्यवर की पड़ती थी, जिसके हम सभी परिजन साक्षी है, तो प्यार का मलहम परम वंदनीया माताजी ही लगती थी। अभी वरिष्ठ गिने जाने वाले कार्यकर्त्ताओं का स्वरूप निखारने में गुरुदेव की डाँट ने जहाँ अहंकार गलाने का कार्य किया वहाँ उस रुक्षता में स्नेह संरक्षण का नवनीत माता ने चखाया व ऐसा चखाया कि फिर कोई स्वाद नहीं भाया। कितना कुछ गुरुसत्ता किसी को सुधारने उसके प्रारब्ध को बदलने के लिए करती है यह गुरुदेव व माताजी के जीवन प्रसंगों को देखकर जाना समझा सकता है।
महाप्रयाण से कुछ दिन पूर्व की बात है। निज की ओढ़ी हुई अशक्तता व कष्ट को उनने कभी किसी के समक्ष जाहिर नहीं होने दिया। इन पंक्तियों के लेखक ने कई बार पूछा कि कही कोई तकलीफ तो नहीं है? बदले में माताजी ने उसके हाथ में लगी चोट पर हाथ सहलाकर कहा कि यह कैसे लग गयी? ध्यान रखना कही लिखने में दिक्कत न आए। कैसे भुलाएँ वे क्षण जिनमें उनकी ममता दुलार सदा बाद आता रहता है जिसने हमें हम सबको व एक विराट् परिवार को सदा के लिए एक सूत्र में पिरोकर रख दिया। अपना कष्ट तनिक भी मन में न विचार कर जो सीढ़ियां छलाँगती अश्वमेधी यज्ञों में मंचों पर चढ़ जाती थी रात्रि को लौट कर कितनी सूजल घुटनों व पैरों पर होती थी यह संभवतः किसी की जानकारी में न होगा पर उनका ध्यान रहता था उनका हाथ पकड़ कर लेकर ऊपर चढ़ने वालो पर जिनके दर्द के लिए वे चिंतित बनी रहती थी। कोई कल्पना कर सकता है, कि कितनी करुणा अपार स्नेह, ममत्व एवं सुधारने एवं सुधारने वाला दुलार उनके रोम रोम में बसा था? जब भी यह सब याद करते हैं तो उनका एक ही संदेश याद करते हैं यही प्यार सबको बाँटना यही मिशन की धुरी है एक मात्र निधि है इसे जिन्दा रखना सबके बढ़ाते रहना संगठन इसी आधार पर चलेगा। क्या हम सभी मातृसत्ता को आश्वस्त कर सकते हैं कि जबकी यह निधि हम सुरक्षित रखेंगे?
हमारी मार्गदर्शक सत्ताएँ जिनके ममत्व के सूत्रों से बँधकर यह विराट् गायत्री परिवार विनिर्मित हुआ ,स्थल काया का बंधन छोड़कर सूक्ष्म-कारण जगत में शून्य सविता में विलीन हो गयी। भाद्रपद पूर्णिमा 1994 11 सितम्बर 1994 को परम वंदनीया माताजी के महाप्रयाज के साथ ही स्थूल रूप से दृश्यमान संरक्षण अब हम सभी के ऊपर से उठ गया , यह सारे गायत्री परिवार के लिए निश्चित हो एक असहाय वेदना देने वाली बेला है। ऐसे में हमारा-आपका मनोबल-आत्मबल बढ़ा रहे, यही सूक्ष्म रूप में सतत् हमारे चारों विद्यमान गुरुसत्ता -ऋषियुग से प्रार्थना है।
अखण्ड-दीपक जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा सन् 1926 में प्रज्वलित किया गया था, आज भी शाँतिकुँज में प्रदीप्त है व आने वाले परिजनों को नूतन प्रेरणा का संचार करता रहता है, हम सभी को नित नये उत्साह बढ़ाने वाले संकल्पों का दायित्व उठाने की क्षमता देता है। उसी का जाग्रत ज्वलन्त, दृश्यमान रूप अखण्ड-ज्योति पत्रिका है जो पूज्यवर द्वारा आज से 57 वर्ष पूर्व स्नेह सान्निध्य से भरा भावनाशीलों का एक परिवार बनाने के लिए आरंभ की गयी थी। वह पत्रिका चेतना सत्ता के प्राण प्रवाह के रूप में सूक्ष्मजगत से ऋषि सत्ताओं की प्रेरणा से निकलती है। इसकी पाठ्य सामग्री के साथ वह जीवन्त ऊर्जा जुड़ी हुई है जो हमें हमारी गुरुसत्ता से प्रतिमास-प्रतिदिन-प्रतिपल अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखने का प्रयास करती है। चौबीस चौबीस कक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण जो परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 से 1953 तक के समय में तथा 240 करोड़ जप के कुमारी कन्याओं के अनुष्ठान 1975 तक उस अखण्ड दीपक की उपस्थिति में संपन्न हुए है जिसकी तप ऊर्जा में ही अखण्ड ज्योति के माध्यम से करोड़ों व्यक्तियों तक पहुँचकर उनके व्यक्तित्व को बदला उन्हें परिवार समाज व राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए प्रेरित किया तथा उनके माध्यम से लोकसेवियों का एक बड़ा परिकर खड़ा करके दिखा दिया। निश्चित ही इस आलोक ऊर्जा वितरण तंत्र में अभी भी किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आएगी यह और भी प्रचंड प्रवाह के रूप में जन जन तक पहुँचता रहेगा व उन्हें उल्लास भरा प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन देता रहेगा।
अखण्ड ज्योति पत्रिका का दायित्व अपने कंधों पर लेते समय परिजनों से एक ही निवेदन करने का अपना मन है कि अब यही एक मात्र स्नेह सूत्र है जो पाती के रूप में स्वजनों को जोड़ने की प्रक्रिया संपन्न करने का कार्य करेगा। इस पत्रिका को जो मात्र कुछ छपे हुए लेखों का पुलिंदा मात्र नहीं है वरन् स्नेह सलिला शक्तिस्वरूपा माता भगवती देवी जी का सजल श्रद्धा स्वरूप स्फूर्त होता ममत्व तथा प्रातः स्मरणीय वेद मूर्ति तपोनिष्ठ परमपूज्य बनाने वाला क्रांति चेतना से भरे ओज को धारण कर आप तक पहुँचने वाला शक्ति प्रवाह है। इसके पाठकों की संख्या बढ़ाकर अधिकाधिक व्यक्तियों को प्रेरणा स्त्रोत से जोड़ना आप सभी का दायित्व है जो आप पूरा करेंगे ऐसी हमारी आशा है। हम आश्वस्त करना चाहेंगे कि इस ऊर्जा प्रवाह के सतत् आप तक पहुँचने में कभी भी कोई बाधा नहीं आएगी।
बड़े ही संकोच के साथ किंतु इस विश्वास के साथ कि पाठक हमारी दुविधा समझते हैं, हम नये वर्ष से बिना लाभ बिना घाटे के नाम पर अत्यधिक घाटे में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति पत्रिका का वार्षिक चन्दा 40 बढ़ाकर 47 की इसे स्वीकार करने का सभी से भावभरा अनुरोध करते हैं। विगत तीन वर्षों से हम सारी प्रतिकूलताओं के बीच इसका प्रकाशन कर रहे थे। कागजों स्याही वृद्धि के साथ अभी अभी घोषित नयी कागज नीति तथा व्यापार कर ने इस बढ़ोत्तरी के लिए हमें विवश कर दिया है। पाठकों को सामग्री और भी श्रेष्ठतम स्तर की बढ़े हुए पृष्ठो के साथ मिलती रहेगी इसकी ओर से वे आश्वस्त रहे प्रारंभ से ही विज्ञापन न छापने की नीति इस पत्रिका की रही है। उस संकल्प को तोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे में सभी पाठकों के कलेवर बढ़ाने के आग्रह जो हमें समय समय पर मिलते रहे को ध्यान में रखते हुए मूल्यवृद्धि बढ़े कलेवर के साथ की जा रही है जो फिर भी घाटे की आँशिक पूर्ति ही करेगी।
परिजनों की श्रद्धा मिशन के आदर्शों व निर्धारणों के प्रति लगन तथा गुरुसत्ता के प्रति समर्पण पर हमारा पूर्ण विश्वास है। हमें पत्रिका के संबंध में यह आश्वासन सतत् आपके पत्रों से मिलता भी रहता है व कई सुझाव भी जिनके माध्यम से इसे कैसे और आकर्षक सरल व सुगम भाषा के साथ तर्क तथ्य प्रमाणों के नूतनतम प्रतिपादनों के साथ प्रस्तुत किया जा सके। आशा है यह क्रम जारी रहेगा।
सतयुग नवयुग के आगमन तक यह प्रेरणा प्रवाह हम सतत् आपकी ओर से चाहते हैं। ऋषि सत्ताएँ जो संदेश आप तक पहुँचाना चाहती है, वह पहुँचाने का दायित्व हमारा है। हम अपना दायित्व निभायेंगे। आप पाठकों की संख्या अधिकाधिक बढ़ाकर अपना कर्तव्य पूरा करे ऐसी हमारी कामना है।
*समाप्त*