बहिरंग से अधिक अंतरंग की खोज अभीष्ट

बहिरंग का सौंदर्य आकर्षक है, सम्मोहक है तथा प्रत्यक्ष दिखाई देता है। अंतरंग का सौंदर्य दिखाई नहीं देता किंतु व्यक्ति की मुखाकृति से लेकर उसके शालीन व्यवहार तथा समष्टिगत संवेदना में सतत् मुखरित होता रहता है। जिस सौंदर्य एवं आत्म तेज की शक्ति का भंडार भीतर भरा पड़ा है उसे देखा भले ही न जा सके किंतु उसी के बलबूते किसी की व्यक्तिगत सज्जा बनती है। बाहरी साधनों से तो मात्र कायपिण्ड की सुव्यवस्था व सुसज्जा ही संभव हो पाती है।

किसी भी व्यक्ति में जीवन चेतना को कोई बाहर से प्रविष्ट नहीं करा सकता, थोप नहीं सकता। वह तो आँतरिक क्षमता पर ही निर्भर रहती है और जब यह जीवनी शक्ति खोखली हो जाती है, चुक जाती है तो किसी भी प्रकार का बाह्योपचार रोग की जीर्णता व मृत्यु की अपरिहार्यता को रोक सकने में सफल नहीं हो सकता। अध्यापक पढ़ा सकता है, पर वह मानसिक स्तर नहीं दे सकता जो छात्र को मौलिक रूप में निज के भीतर विकसित करना पड़ता है। बहिरंग की उपयोगिता मात्र इतनी ही है कि वह अंतः से उपजी प्रतिभा को निखार सके।

बीज की उत्पादन क्षमता मौलिक है। किसान उसे उगाने-बढ़ाने में अपने क्रम-साधन-कौशल का अधिकतम उपयोग कर सकता है, पर गेहूँ के दाने से कपास उगा पाना उसके लिए कहाँ संभव हो पाता है। वर्षा के बादल कठोर चट्टानों को न तो गीला कर पाते हैं और न उन पर हरियाली उगा पाने में समर्थ हो पाते हैं।

मनुष्य को यह भलीभाँति समझना होगा कि सौंदर्य और शक्ति-संपदा के अजस्र भंडार अपने ही भीतर भरे पड़े हैं। उन्हें पहचानना, ढूँढ़ा और समेटा जा सके तो कोई भी व्यक्ति अपनी दरिद्रता और कुरूपता से पीछा छुड़ा सकता है, पिछड़ेपन को त्याग कर अग्रगामी बन सकता है। बाहरी साधनों और अनुकूलता के उत्पादन हेतु जितना प्रयास व्यक्ति द्वारा किया जाता है, उससे कहीं कम में अंतः को कुरेद व विकसित कर मनुष्य असीम विभूतियों का अधिपति बन सकता है। शर्त एक ही है कि वह अंतः को खोजे और उसे परिष्कृत करने की तत्परता बरते। हर कोई यह कर सकता है।


श्रद्धाँजलि स्वीकार करो!


श्रद्धाँजलि स्वीकार करो (Kavita)

जगदंबे! अंतिम प्रणाम, सुमनों का अंगीकार करो। अपने इन मानस-पुत्रों की, श्रद्धाँजलि स्वीकार करो॥

तुमने अपनी पलकों से, ममता के सिंधु उड़ेले थे। जिसकी पावन लहरों में, हम सब हँस-हँसकर खेले थे॥

सद्गुण विकसे पर्वत-पर्वत, मैदानों-मैदानों में। बादल बन-बनकर करुणा, बरसी थी रेगिस्तानों में॥

उठो चिता से, स्नेह-सिक्त, वाणी की फिर बौछार करो। अपने इन मानस-पुत्रों की, श्रद्धाँजलि स्वीकार करो॥

मानवता की बगिया सींची, अमृत से उपदेशों के। दौड़-दौड़ कर बालक आये, देशों और प्रदेशों के॥

शिवा-सरीखे दिये सुवन, संस्कृति की रक्षा करने को। शक्ति रूप बनकर उतरी थीं, जग की पीड़ा हरने को॥

दुर्व्यसनों के खड़े राक्षस, उठकर वज्र-प्रहार करो। अपने इन मानस-पुत्रों की, श्रद्धाँजलि स्वीकार करो॥

जीवन-सागर मथकर जो, अनुभव के रत्न निकाले थे। वे देवों के चौदह रत्नों, से भी अधिक निराले थे॥

परमपूज्य के साथ रहीं तुम, हर पल मैत्रेयी बनकर। गायत्री माँ की अनुजा-सी, मुसकाती बैठीं घर-घर॥

फिर होकर साकार हमें, पुचकारो और दुलार करो। अपने इन मानस-पुत्रों की, श्रद्धाँजलि स्वीकार करो॥

शाँतिकुँज के कण-कण का, मन डूबा है दृग के जल में। भावुकता-विह्वलता बनकर, उमड़ रही है पल-पल में॥

संयम, निस्पृहता की जैसे, शिक्षायें बेकार हुईं। आज तुम्हारे बिन इनकी, परिभाषायें लाचार हुईं॥

तुम्हीं अधीरों को धीरज दो, और एक उपकार करो। अपने इन मानस-पुत्रों की, श्रद्धाँजलि स्वीकार करो॥

हम देखेंगे, जननि नित्य ही, तुम्हें सूर्य की लाली में। तम को दूर भगाने वाली, पूनम की उजियाली में॥

कर-तल का सु-स्पर्श मिलेगा, शीतल, मंद हवाओं में। पायेंगे मातृत्व तुम्हारा, हर पल दसों दिशाओं में॥

बनो प्रेरणा शक्ति हृदय की, हम सब का उद्धार करो। अपने इन मानस पुत्रों की, श्रद्धाँजलि स्वीकार करो॥

तुमने जो पथ दिखलाया, हम उसे कदापि न छोड़ेंगे। शपथ उठाते हैं, कर्तव्यों से, न कभी मुँह मोड़ेंगे॥

सत्कर्मों की सद्विचार की, भागीरथी बहायेंगे। एक दिवस, देखना, स्वर्ग हम, इस धरती पर लायेंगे॥

दो हमको आशीर्वाद माँ, आत्म-शक्ति संचार करो। अपने इस मानस पुत्रों की, श्रद्धाँजलि स्वीकार करो॥

-देवेन्द्र कुमार ‘देव’


तस्य वाचकः प्रणवः

भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि उसमें प्रतीकों, चिह्नों, आकृतियों और अक्षरों के मध्य ब्रह्माँड और विश्व के ऐसे रहस्यों को सँजोया गया है, जैसा अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। उदाहरण के लिए ओंकार को लिया जा सकता है। देखने में यह जितना नगण्य और छोटा प्रतीत होता है, उतनी ही बड़ी शक्ति का निरूपक है।

ईश्वरीय सत्ता का प्रतीक-प्रतिनिधि होने के नाते सभी माँगलिक अवसरों पर इसके लिखे और गाये जाने का विधान है, चाहे वैवाहिक आमंत्रण हो, निमंत्रण पत्र या सामान्य चिट्ठी-पूजा की वेदी हो या फिर यज्ञ का पवित्र कलश-सर्वत्र इसकी प्रतिष्ठा होती है। इन स्थापनाओं का अपना मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। जख-दर्पण के प्रयोग में जब प्रयोक्ता की निगाहें लंबे समय तक कालिख पुते नाखून में जमी रहती हैं, तो वह एक प्रकार से स्वसम्मोहन की गिरफ्त में आने लगता है। यही बात ओंकार के साथ भी है। उपासना के समय या शादी के मौके पर जब-जब दृष्टि इस पवित्र वर्ण पर पड़ती है, तो मन अनायास ही परमसत्ता के प्रति श्रद्धासिक्त हो उठता है। ऐसी पवित्र मनोदशा में संपन्न होने वाले अनुष्ठान और आयोजन के हर प्रकार से सफल और सिद्ध होने में फिर कोई संदेह रह नहीं जाता। यह घटना जब सभी उपस्थित जनों के मनों में घटती है, तो अंतःकरण में एक उदात्त भाव पैदा होता है। इस सामूहिक भाव, उत्कृष्टता से एक उच्चस्तरीय वातावरण का निर्माण होता है। देवता ऐसे ही दिव्य वातावरण में पधारते और प्रार्थी को अपने अनुदान-वरदानों से निहाल करते हैं। यह ‘प्रणव’ से उत्पन्न दैवी अनुदान है। इसका मनोवैज्ञानिक लाभ यह है। कि इस संपूर्ण काल में मन विकारग्रस्त होने से बचा रहता है।

ॐ, ‘अव्’ धातु से औणदिक ‘मन्’ प्रत्यय के संयोग से बनता है। इसको व्युत्पन्न कहते हैं। अतएव ‘अव्’ धातु के जितने अर्थ हैं, उन सबका यह बोधक है। इसके प्रायः उन्नीस अर्थ हैं। काँति, तृप्ति, प्रीति, रक्षण, गति, अवगम, प्रवेश, श्रवण, स्वार्म्यथ, याचन, क्रिया, इच्छा, दीप्ति, वाप्ति, आलिंगन, हिंसा, दान, भाग और वृद्धि। इनके पुनः कितने ही अर्थ हों। उन अर्थों को आगे यदि व्याकरण की रीति से विस्तार किया जाय, तो ‘ॐ’ अनन्तार्थ का द्योतक हो जायेगा। इस दृष्टि से वह जिस अनादि-अनंत सत्ता का वाचक है, स्वयं भी उसी प्रकार अपरिमित अर्थों वाला बन जाता है, जो वाच्यार्थ के अनुरूप ही है। जो स्वयं पूर्णता का बोधक हो, भला वह असीमित और अपूर्ण कैसे हो सकता है? इसे गणित के एक उदाहरण से भली-भाँति समझा जा सकता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि ‘अव्’ धातु के 19 अर्थ हैं। इसमें एक और नौ के अंक उपस्थित हैं। गणितज्ञ इससे पूरी तरह परिचित हैं कि एक का अंक अपने में पूर्ण स्वतंत्र है, अतएव इसकी सत्ता का सद्भाव सभी अंकों में विद्यमान है। 9 का अंक स्वतंत्र तो नहीं, किंतु पूर्ण अवश्य है। पूर्ण वह है जो अपने में न्यूनता को न आने दे। यही कारण है कि संख्या एक से आरंभ होकर नौ पर समाप्त हो जाती है। शेष जो कुछ है, इन्हीं अंकों का विस्तार है। एक का अंक सबके आदि, मध्य और अंत में प्रकट हो रहा है, यथा एक, दो में तो हैं, किंतु दो एक में नहीं है। इसी प्रकार छोटी संख्या की सत्ता बड़ी संख्या में पायी जाती है। एक का अंक सूक्ष्म है, शेष सब स्थूल हैं। जिस प्रकार सूक्ष्म का समावेश स्थूल में हो जाता है, उसी प्रकार स्थूल का प्रवेश सूक्ष्म में नहीं हो सकता। नौ की संख्या पूर्ण है, यही कारण है कि इसके आगे संख्या का विधान नहीं है। जिस प्रकार एक और एक मिल कर दो हो जाते हैं और दो के साथ एक के संयोग से तीन बनते हैं, वैसे ही एक की वृद्धि से संख्या में वृद्धि और हानि से हृस का क्रम नौ तक बढ़ता और एकाँत घटता रहता है। नौ अंक की व्यवस्था अन्यों से कुछ भिन्न है। जब एक का अंक इसमें संयुक्त होने के लिए समीप आता है, तो वह वृद्धि को न प्राप्त होकर बिंदु के रूप में बदल जाता है, किंतु अपने गौरव को नहीं घटाता। यह सर्वदा पूर्णता का पक्षधर है, यही कारण है कि इस बिंदु ने ही उत्पन्न होकर गणित विद्या को पूर्ण बना दिया यदि इसको पृथक कर दिया जाय, तो अंक विद्या अपूर्ण और अधूरी बन जाती है।

इस बिंदु और नौ की समानता पर विचार करें, तो ज्ञात होगा कि इनमें स्वरूप भेद के अतिरिक्त और कुछ भी अंतर नहीं यह इस बात से प्रकट होता है कि यदि किसी अंक के आगे से बिंदु को हटाते हैं, तो निश्चय ही वहाँ से नौ को ही प्रकाराँतर से मिटाते हैं। प्रस्तुत दृष्टाँत से इसे भली प्रकार समझा जा सकता है। दस की संख्या के आगे से यदि बिंदु को दूर किया जाय, तो सामने एक बनता है। इस प्रक्रिया में प्रच्छन्न रूप से हम नौ को ही दूर करते हैं। ऐसे ही यदि 101 के मध्य से बिंदु को पृथक करें, तो 90 दूर होंगे। उक्त संख्या में नौ विद्यमान है। पुनः यदि 90 के सामने से बिंदु हटाया जाय, तो 81 मिटते हैं, जिसके 8 और 1 मिलकर नौ का निर्माण करते हैं। ऐसा ही सर्वत्र होता है। किसी भी अंक के आगे बिंदु लाने या हटाने से नौ ही आते अथवा जाते हैं। इस प्रकार प्रस्तुत अंक सर्वत्र अपनी पूर्णता का परिचय देता रहता है। अन्य अंकों को परस्पर गुणा करने से न्यूनाधिक लाभ होता है, किंतु नौ को गुणा करने से प्राप्त अंक का योग नौ ही बना रहता है। यह इसकी पूर्णता को दर्शाता है। ‘अव्’ धातु के उन्नीस अर्थों वाली इस संख्या में उपस्थित 1 और 9 के अंक ओंकार के इस पूर्णता बोधक तत्वदर्शन को ही अभिव्यक्त करता है।

ईश्वरीय चेतना अपरिवर्तनशील है। वह वृद्धि-हृस से परे एक रस बनी रहती है, अस्तु उसे अभिव्यक्त करने वाले अक्षर को भी इन गुणों से युक्त होना निताँत आवश्यक है। व्याकरण की दृष्टि से ‘उद्गीथ’ (ओंकार) पर विचार करने से ज्ञात होता है कि वह हर स्थिति में अपने मूल स्वरूप को बनाये रखता है और किसी भी दशा में कभी भी परिवर्तित नहीं होता। ‘वृक्ष’ से निर्मित वाक्य पर विभक्ति के आधार पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जायेगा। ‘वृक्ष स्थिर है’-यहाँ स्थिति क्रिया का वृक्ष कर्ता है। ‘वृक्ष को स्पर्श करता है’-यहाँ स्पर्श क्रिया का वृक्ष कर्म है। ‘वृक्ष पर से चन्द्रमा को देखता है’ यहाँ दर्शन क्रिया का वृक्ष करण है। ‘वृक्ष के लिए जल सींचता है’-यहाँ सिंचन क्रिया का वृक्ष संप्रदान है। ‘वृक्ष से पत्र गिरते हैं’-इसमें पतन क्रिया का वृक्ष अपादान है। ‘वृक्ष के फल मधुर हैं’-यहाँ फल संबंध से वृक्ष संबंधी है।’ वृक्ष पर पक्षी निवास करते हैं’ इस स्थान पर निवास क्रिया का वृक्ष अधिकरण है। इस प्रकार देखते हैं कि एक वृक्ष को विभक्ति ने भिन्न-भिन्न कारकों में विभक्त कर दिया। ऐसा ॐ के साथ घटित नहीं हो सकता। इसके आगे विभक्ति आते ही अपने स्वरूप को खो देती है, अतः यह अभेद्य है। भेद कारक विभक्ति की शक्ति इसका स्वरूप परिवर्तन नहीं कर सकती। इसमें वह पूर्णतः अक्षम है। अग्नि प्रायः उसी वस्तु को जलाती है, जो दहनशील हो, अदाह्य वस्तु को जलाने अथवा मिटाने की सामर्थ्य उसमें नहीं, वहाँ तो वह स्वयं शाँत हो जाती है। ऐसे ही ‘ॐ’ शब्द सर्वदा अपनी महिमा में स्थिर परिवर्तन से परे है।

व्याकरण के ‘वचन’ और ‘लिंग’ भी इसमें किसी प्रकार का कोई भेद उत्पन्न करने में सर्वथा असमर्थ हैं। वचन से व्यक्त होना-इसको निम्न उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है-जिस प्रकार ‘बालक’ शब्द एक वचन, द्विवचन, और बहुवचन प्रत्यय के संयोग से ‘बालकः, बालकौ, बालकाः’ ऐसे रूपों को धारण कर लेता है और उच्चारण भेद पाकर एक, दो और कई बालक हैं-इन अर्थों का द्योतक बन जाता है-ऐसा ‘ओम’ शब्द में दर्शन, उच्चारण और वचन भेद कदापि नहीं हो सकता।

लिंग दर्शाने वाले प्रत्यय शब्द के साथ जुड़ कर जिस तरह उसे कभी स्त्रीलिंग, कभी पुल्लिंग तो अनेक बार नपुँसकलिंग में रूपांतरित कर देते हैं, वैसा अक्षर ब्रह्म को व्यक्त करने वाले इस अक्षर के साथ कभी होता दिखाई नहीं पड़ता। सदा अपरिवर्तनीय बने रहना इसका स्वभाव है। परम चेतना बदलती कहाँ है। वह तो सदा स्थिर और एक रूप बनी रहती है। ‘प्रणव’ इसी का प्रतिनिधि है।

अव्युत्पन्न ‘ॐ’ अ, उ, म-यह तीन वर्गों के मेल से बनता है। यह वर्ण ‘उद्गीथ’ में अगणित ‘त्रिको’ को धारण किये हुए हैं। भूः भुवः स्वः-स्थूल, सूक्ष्म, कारण-जाग्रति, स्वप्न, सुषुप्ति-ब्रह्मा, विष्णु, महेश-ऋक्, यजुः, साम-वैश्वानर, तेजस्, प्राज्ञ-गार्हपत्य अग्नि, दक्षिण-अग्नि, आह्वनीय अग्नि-सूर्य, चन्द्र अग्नि-विराट् हिरण्यगर्भ, मायादेह-नाश, निर्माण, स्थिति-जीव, प्रकृति, ब्रह्म। इस प्रकार ओंकार अनंत गुणों और विभूतियों को अपने अंदर समाहित किये हुए है। इन सब की विस्तारपूर्वक चर्चा प्रश्न और छाँदोग्य उपनिषदों में मौजूद है। परंतु माँडूक्य में जो रहस्योद्घाटन हुआ है, वैसा आध्यात्मिक वर्णन इसका अन्यत्र कहीं नहीं मिलता।

ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से यदि इसके इन तीन घटकों पर विचार किया जाय, तो हम पायेंगे कि ये केवल ध्वनि मात्र नहीं है, वरन् समस्त ध्वनि जगत का अंतर्भाव करने वाले प्रतीक हैं। इसमें आया हुआ ‘अ’ मात्र एक स्वर या ध्वनि नहीं, अपितु निखिल संगीत जगत का, सृष्टि का, समस्त भाषाओं का मूलाधार एवं मूल प्रकृति है। गीता में विभूति-वर्णन के समय भगवान यह भी कहते हैं-’अक्षराणामकारोऽस्मि’, अर्थात् अक्षरों में ‘अकार’ मैं ही हूँ। निश्चय ही इसकी अनुपस्थिति में भाषा शास्त्र और स्वर विज्ञान अपंग एवं मूक स्तर के साबित होते हैं। इससे इसकी महत्ता स्पष्ट विदित हो जाती है। यह महत्व तब और सुस्पष्ट हो जाता है, जब विभिन्न वर्णों को अकार से पृथक करते हुए उच्चारण का विफल प्रयास किया जाता है। स्वरशास्त्र के अभ्यासियों को यह मालूम होता है कि ‘अ’ का सुदीर्घ उच्चारण करते हुए बाद में जब मुख से निकलने वाली वायु को होंठ सिकोड़ और फैला कर संपीड़ित और विस्तृत किया जाता है, तब उससे ही उ, इ, ए, ओ आदि दूसरे स्वर उत्पन्न होने लगते हैं। इससे स्पष्ट है कि वर्ण विज्ञान का आदि मूल ‘अकार’ है। अपितु ‘प्रणव’ में व्यक्त हो रही ईश्वरीय चेतना की व्यापकता ही है। ‘उ’ और ‘म’ इसी अकार के विकास रूप हैं। इन्हीं तीन ध्वनियों द्वारा संपूर्ण नाद जगत का प्रतिनिधित्व होता है, इसीलिए इनके संयुक्त रूप ‘ॐ’ द्वारा हम उस नाद ब्रह्म-शब्द ब्रह्म को जानने, समझने और उसकी अनुभूति करने का प्रयास करते रहते हैं।

शब्द आकाश का गुण है। आकाश में इसका निर्माण और विलय-विसर्जन होता रहता है। इसके उच्चारण से हम अनायास ही इस तत्व से जुड़ जाते हैं। इस आकाश तत्व पर विज्ञान अथवा दर्शन जिस भी दृष्टि से विचार करें, ज्ञात होगा कि सृजन प्रक्रिया का शुभारंभ यहीं से होता है। यह सूक्ष्मतम है और उत्तरोत्तर एवं स्थूलतम-इस क्रम में सृष्टि की उत्पत्ति उससे (आकाश तत्व से) हुई है। विज्ञान के ‘महा विस्फोट’ (बिग बैंग) वाले सिद्धाँत की इससे संगति बैठ जाती है, जबकि अध्यात्म की यह सुनिश्चित अवधारणा है कि सृष्टि के आदि में सब कुछ इस आकाश तत्व से ही प्रकट हुआ है और सृष्टि के अंत में उसे पुनः उसी में समाहित हो जाना है। हम ओंकार का जब उच्चारण करते हैं, तो नादब्रह्म द्वारा ब्रह्म से अर्थात् सृष्टि के आदि कारण से संबद्ध हो जाते हैं। यह आध्यात्मिक प्रक्रिया किसी संप्रदाय विशेष तक ही सीमित नहीं है, वरन् संपूर्ण मानव समाज इससे जुड़ा हुआ है। हमारी पूजा पद्धति चाहे कैसी ही क्यों न हो, हम किसी धर्म, किसी जाति, किसी क्षेत्र से संबद्ध क्यों न हो, ग्रंथ चाहे किसी भी इष्ट-आराध्य के उपदेश क्यों न करते हों, एकेश्वर या बहुदेववादी हों, फिर भी उक्त सत्य सदा शाश्वत और सनातन बना रहता है। विश्व के इस आदि कारण को चाहे हम ब्रह्म, ईश्वर, गॉड, टसाइटगाइस्ट, एनर्जी कुछ भी कह लें, केवल नामकरण से वह आदिकारण बदलने वाला नहीं। वह सदा एक है और एक ही रहेगा। इस दृष्टि से विचार करें, तो हम पायेंगे कि “ॐ ब्रह्म है। इस जगत में सब कुछ ॐ है।” तैत्तिरीय उपनिषद् की यह घोषणा न तो अनावश्यक है, न अत्युक्ति पूर्ण ऐसा स्पष्ट प्रतीत होगा।

पतंजलि योगदर्शन ओंकार का उल्लेख करते हुए लिखता है-”तस्य वाचकः प्रणवः” अर्थात् उसका (ईश्वर का) वाचक (शब्द) प्रणव है। यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि वाच्य और वाचक का रिश्ता परस्पर अविच्छिन्न होता है। वाचक के उच्चारण से वाच्य स्वयमेव प्रतिभासित हो उठता है गाय एक प्राणी है और उसका वाचक शब्द ‘गाय’ उससे पृथक् है। इतने पर भी शब्द के उच्चारण के साथ ही मन-मस्तिष्क में उस जंतु की तस्वीर स्वतः उभर आती है। इसी प्रकार ‘ॐ’ ईश्वरवाचक है। ईश्वर न तो स्थूल है, न इन्द्रियगम्य, फिर भी उसकी कल्पना-भावना करने और उससे संबंध-सूत्र स्थापित करने में यह अक्षर साधनभूत बनता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो शब्द और अर्थ अभिन्न एवं अन्योन्याश्रित हैं। नाम जप का यही रहस्य है। नामोच्चारण से ईश्वर का अनिवार्य स्मरण होता है-इसी बात को सूत्रकार अपने अगले सूत्र में स्पष्ट करते हुए कहते हैं-

‘तज्जपस्तदर्थ भावनम्’ अर्थात् नाम−जप से अंतः करण में भगवद् भावना उभरने लगती है। इस प्रकार उद्गीथ मनुष्य और महत् चेतना के मध्य संबंध स्थापित करने में सेतु का काम करता हैं

ओंकार-माहात्म्य का बखान आर्षग्रंथों में स्थान-स्थान पर हुआ है मनुस्मृति से लेकर गोपथ ब्राह्मण एवं उपनिषदों में कठ से लेकर अमृतनाद, अथर्वशिरा, अथर्वशिरपा, मैत्रायणी, मैत्रेय, ध्यान बिंदु आदि कितने ही प्रधान-अप्रधान ग्रंथों में इसका उल्लेख है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं-”गिरारम्येम्येकमक्षरम्” अर्थात् वाणी में एक अक्षर ‘ॐ’ मैं हूँ। यजुर्वेद में इसी को ‘ॐ’ एवं ‘ब्रह्म’ कह कर वर्णित किया गया है, अर्थात् आकाश के समान व्यापक परमात्मा ‘ॐ’ नाम वाला है। शिव पुराण के कैलास संहिता में उल्लेख है-’शिवो यो प्रणयो ह्येष प्रणवो या शिवः स्मृतः’ प्रणव ही शिव है और शिव ही प्रणव है। अन्यत्र वर्णन है-’ॐ इति सर्वम्’। यहाँ संपूर्ण जगत को ‘ॐ’ अर्थात् ईश्वरमय बताया गया है इस प्रकार ओम के इस एक अक्षर में ही चराचर जगत और उसकी संपूर्ण शक्तियाँ अभिव्यक्ति पा रही हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो यह जगत ‘ॐ’ (परमात्मा) का व्यक्त रूप है, उसी का प्रकाश हे। इस प्रकाश-प्रेरणा को हम जितने अंशों में लोगों तक पहुँचाते हैं, समझना चाहिए उतने ही अनुपात में ॐ के तत्वदर्शन को आत्मसात किया और आचरण में उतारा गया। हम अपनी आत्मीयता को सीमाबद्ध न रखें, उसे विस्तृत और व्यापक बनायें-ओम का ‘अकार’ उससे आगे की गति-प्रगति का द्योतक है। जब यह विकसित होते हुए विराट् ब्रह्म में दूध-पानी की तरह घुल-मिल जाता है, तो यही ‘मकार’ बन जाता है। जीवन मुक्ति, एकत्व, अद्वैत इसे ही कहते हैं। इस प्रकार अकार से यात्रा आरंभ कर मनुष्य जब अपने को परिष्कृत और विकसित करते हुए चलता है, तो अंतिम परिणति मकार के रूप में, ईश्वर-उपलब्धि के रूप में सामने आती है। यह ‘प्रणव’ की सबसे बड़ी विशेषता है। वह प्रवृत्ति मार्ग में चलाते हुए भी अंततः आदमी को अंतिम लक्ष्य पर ला खड़ा करती है। ऐसी विशिष्टता किसी अन्य शब्द में नहीं।

हम ओम की उपासना और जप तो करते हैं, पर उसमें सन्निहित मर्म और आदर्श की अवहेलना कर देते हैं। आज की दुर्गति का यही प्रमुख कारण है। इसी से उबारने के लिए हमारे संस्कृति-विधायकों ने शब्द और सूत्र रूप में गागर में सागर उड़ेल कर रख दिया है, ताकि जब कभी अपने कर्तव्यों, दायित्वों और आदर्शों की उपेक्षा हो, तभी यह सूत्र-संकेत सामने आकर हमें अपनी विस्मृति और भूल का एहसास कराये इस त्रुटि-परिमार्जन के द्वारा ही हम ‘ॐ’ के सच्चे उपासक कहला सकते हैं, इससे कम में नहीं।


पतन की कैसी परिणति?

प्रवेश करते ही दरबार में बैठे हुओं में प्रायः सभी की आँखें उस पर जा टिकीं। हर दृष्टि आश्चर्य से सनी थी। कोई इस विचित्र वेष-विन्यास में सभी नियमों का उल्लंघन कर निश्चित भाव से आकर बेधड़क सम्राट के सामने खड़ा हो सकता है ऐसी कल्पना किसी ने न की थी। उसकी कमर में मात्र एक कपड़ा लिपटा था। गले और भुजाओं में मानव अस्थियाँ इस तरह धारण की हुई थीं, जैसे सुवर्ण आभूषण हैं। लंबे तड़ंगे- कज्जल कृष्ण वर्ण शरीर को आवृत करती जटाएँ लंबी, घनी किंतु बेतरतीब फैली दाढ़ी, दहकते अँगारों की तरह धधकती आंखें उसके रहस्यमय व्यक्तित्व का परिचय दे रही थीं। भिक्षा पात्र के रूप में हाथ में मानव मुँड थमा था।

‘ताँत्रिक’! कई होंठ अस्फुट स्वरों में बुदबुदाए। लेकिन “यहाँ...क्यों...?” समूचे देश में गरुणध्वज फहराने वाले सम्राट समुद्र गुप्त ने राज्यासन सँभालते ही प्रथम कार्य के रूप में समस्त आसुरी प्रवृत्तियों पर कठोरता से प्रतिबंध लगाया था। राज्य भर में वाममार्गी साधनाएँ और आचार प्रतिबंधित हो चुके थे। लोगों ने आमतौर से धारणा बना ली थी, कि ऐसी क्रियाओं में प्रवृत्त लोग राक्षस होते हैं।

“राजन्! मुझे एक विशेष साधना के लिए नर बलि की आवश्यकता है। मैं इसके लिए आपकी अनुमति प्राप्त करने आया हूँ।” उसके बोलने से ऐसा लगा कि आकाश पर छायी घनघोर घटाएँ एक बारगी गहरा उठीं। अथवा किसी पर्वतीय गुहा से सिंह परिकर ने गर्जना की हो।

सभासदों सहित सम्राट भी आश्चर्य में पड़ गए। अब तक किसी ने भी इस तरह का आग्रह नहीं किया था। वामाचारी लोगों का जिस तरह दमन किया गया था उसी से लोगों में उन साधनाओं के प्रति भय से ही सही, इतनी विरति व्याप गई थी कि कोई उनका नाम तक नहीं लेता था। लेकिन यह साधक तो उन प्रतिबंधों के स्रष्टा-अधिष्ठाता के ठीक सामने खड़ा होकर किस कदर निःशंक भाव से याचना कर रहा था। सम्राट ने दृढ़ता पूर्वक उत्तर दिया-”किसी भी दशा में नर बलि की अनुमति नहीं दी जाएगी।”

“निवेदन भले न मानने पर मेरी एक जिज्ञासा तो पूरी कर दें।” उसने एक जलती दृष्टि सभी सभासदों पर डाली। “निवेदन तो अस्वीकृत हो चुका, जिसकी पहले से आशा थी क्योंकि आप नर बलि का अर्थ समझ न पाए। लेकिन जिज्ञासा तो आप अवश्य शाँत करेंगे, ऐसी संभावना की जा सकती है।” शब्द उसकी रहस्यमयी मुसकान में खोने लगे।

विचित्र पुरुष की जिज्ञासा भी विचित्र होगी। प्रायः हर मन संशय के चक्रवात में घूम रहा था। “कहीं”-सम्राट शाँत स्वर में बोले।

“मैंने शास्त्रों के अध्ययन और सत्पुरुषों के संग से यह जाना है कि पतन के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति नष्ट हो जाता है। किंतु नष्ट हुए की परिणति क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में सभी मौन हैं। राजन् तुम मेरे इस प्रश्न का समाधान करो।” एक बारगी सभी उसके प्रश्न जाल में उलझ कर रह गए। जबकि वह शाँत खड़ा मुसकान बिखेरे जा रहा था।

सम्राट ने राज्य सभा में विराजमान आचार्य पुरगोभिल की ओर देखा। आचार्य दृष्टि का निहितार्थ समझ गए। उन्होंने कनखियों से सम्राट की ओर देखकर कहना शुरू किया-”उस समय मैं गुरुकुल में अध्ययन रत था। एक दिन प्रातःकाल ही एक ब्राह्मण भिक्षा माँगने आ धमका। हम सभी अध्ययन रत थे। अध्ययन में व्यवधान पड़ता देख एक सहपाठी ने उसे दुत्कारते हुए कहा-”बहुत निर्लज्ज हो तुम। हृष्ट-पुष्ट शरीर एवं ब्राह्मण कुल में जन्म पाकर भीख माँग रहे हो।”

“मेरी जुआ खेलने की आदत है मित्र। रात में खेलते-खेलते सब कुछ गँवा बैठा इसलिए भीख माँगने निकलना पड़ा।” ब्राह्मण और जुआ-आश्चर्य से सहपाठी ने उसे देखा। “मैं जुआ खेलते-खेलते मदिरा पान भी करने लगा।” उसने जैसे आश्चर्य का समाधान किया।

“ओह इतना पतन।” सहाध्यायी चकित था।

“मदिरा पान से जगी वासना वृत्ति के शमन के लिए मजबूर होकर वेश्यागमन भी करना पड़ा।” जैसे वह अपनी सारी आत्मकथा सुना देना चाहता हो।

“फिर तो तुम्हारा ब्रह्मणत्व जाता रहा।” सहपाठी के स्वर थे।-इन सबके लिए धन मेरे पास कहाँ से आता। विवश हो चोरी करनी पड़ी। कहता हुआ वह भारी कदमों से आगे बढ़ गया। सभी विद्यार्थीगण चकित थे। सभी में उसी की चर्चा थी। भनक मिलने पर गुरुकुल के कुलाधिपति ने समाधान दिया-”जो एक बार हीन प्रवृत्ति के मार्ग पर चला, उसे उस प्रवृत्ति के संताप से छूटने के लिए अनेकों बार कुमार्ग पर चलना पड़ता है। यही है नष्ट हुए की परिणति।” पुरगोभिल की दृष्टि समूची राजसभा पर बिखरी। रहस्यमय व्यक्ति की जिज्ञासा का समाधान उसके चेहरे पर संतुष्टि भाव के रूप में दिखाई दे रहा था।

लौटने से पूर्व वह बोला-”राजन्! मैं साधक हूँ, प्रतिगामी स्तर का वाममार्गी ताँत्रिक नहीं। मैं तो नरबलि के माध्यम से उन कषाय कल्मषों की मुक्ति का प्रसंग तो तुम्हें समझाने आया था जो वासना, तृष्णा, अहंता के रूप में व्यक्ति को नष्ट करते रहते हैं। इनसे मुक्ति की सिद्धि ही वास्तविक नरबलि है।” राजन् के साथ सारे सभासद उस नवीन तत्व मीमाँसा पर आह्लादित सम्मानपूर्वक उसे विदाई दे रहे थे।


वेदाँत के विज्ञान में निहित है सारा तत्वज्ञान

ईश्वर वह चेतन शक्ति है जो विश्व-ब्रह्माँड के भीतर और बाहर जो कुछ है, उस सब में संव्याप्त है। काँट, हेगल, प्लेटो, एरिस्टाँटल जैसे मूर्धन्य पाश्चात्य मनीषी भी इसे स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि एक ऐसी सत्ता है जो ब्रह्माँड की रचयिता है या स्वयं ब्रह्माँड है, किंतु इनमें से किसी ने पूर्ण विचार देने में अपने आपको समर्थ नहीं पाया। संसार में जितने भी धर्म है, वह सब ईश्वरीय अस्तित्व को मानते हैं। प्रत्येक धर्म अपने ब्रह्म के प्रतिपादन में अनेक प्रकार के सिद्धाँत और कक्षायें प्रस्तुत करते हैं, परंतु उस परम चेतन सत्ता का सविवेक प्रदर्शन इनमें से कोई नहीं कर सकता, तथापि वे उच्च सत्ता की सर्वशक्तिमत्ता पर अविश्वास नहीं करते।

वैसे देखा जाय तो जब चेतना के विकास संबंधी अनुसंधान की वैज्ञानिक प्रक्रिया चार्ल्स, डार्विन से प्रारंभ होती है। डार्विन एक महान विकासवादी प्राणिशास्त्री थे। उन्होंने देश विदेश के प्राणियों, पशुओं और वनस्पतियों का गहन अध्ययन किया और 1849 एवं सन् 1871 में प्रकाशित अपने दो ग्रंथों-”आन दि आरिजिन आफ स्पेसीज” एवं “दि डीसेन्ट आफ मैन” में यह सिद्धाँत स्थापित किया कि संसार के सभी जीव एक ही आदि जीव चेतना के विकसित और परिवर्तित रूप हैं। उन्होंने बताया कि संसार में प्राणियों की जितनी भी जातियाँ और उपजातियाँ हैं, उनमें बड़ी विलक्षण समानतायें और असमानतायें हैं। समानता यह कि उन सभी की रचना एक ही प्रकार के तत्व से हुई है और असमानता यह है-कि उनकी रासायनिक बनावट सब में अलग-अलग है। आनुवाँशिकता का आधार रासायनिक स्थिति है, उसकी प्रतिक्रिया में भाग लेने वाली क्षमता चाहे कितनी सूक्ष्म क्यों न हो।

इसके पश्चात् ग्रीगर मेंडल, हालैंड के ह्यगो द्वीज ने भी अनेक प्रकार के प्रयोग किये और यह पाया कि जीव में आनुवाँशिक विकास माता-पिता के सूक्ष्म गुणसूत्रों-क्रोमोसोम पर आधारित है। हार्वड यूनिवर्सिटी के विख्यात वैज्ञानिक डॉ॰ जेम्सवाट्सन एवं कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी-इंग्लैंड के डॉ॰ फ्राँसिस क्रिक ने भी अनेक प्रयोगों द्वारा शरीर की कोशिकाओं की भीतरी बनावट का विस्तृत अध्ययन किया और क्रोमोसोम-गुणसूत्रों की खोज की। इसी सुविस्तृत खोज की अगली कड़ी गुणसूत्रों पर पायी जाने वाली एक प्रकार अगणित गाठें थीं जिन्हें “जीन्स” कहा गया। इन वैज्ञानिकों ने बताया कि मनुष्य शरीर में डोरे की शक्ल में पाये जाने वाले गुणसूत्रों को यदि खींच कर बढ़ाया दिया जाय तो उससे संपूर्ण ब्रह्माँड को नापा जा सकता है। यद्यपि इससे अधिक और मूल स्रोत की जानकारी वैज्ञानिक नहीं लगा पाये और उनके खोज की दिशा और ही हो गयी। उस एक अक्षर, अविनाशी और सर्वव्यापी तत्व के गुणों का पता लगाना उनके लिए संभव न हुआ जो प्रत्येक अणु-परमाणु के सृजन या विनाश की क्रिया में भाग लेता है। हाँ इतना अवश्य हुआ कि वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया कि (1) सारा जीव जगत एक ही तत्व से विकसित हुआ है, (2) गुणों के आधार पर जीवित शरीरों का विकास होता है।

यद्यपि यह जानकारियाँ अभी निताँत अपूर्ण हैं तो भी मनुष्य को सत्य की यथार्थ जानकारी के लिए प्रेरणा अवश्य मिलती है। “कंटेम्परेरी थाट आफ ग्रेट ब्रिटेन” नामक पुस्तक के सुप्रसिद्ध विद्वान लेखक ए॰ एन॰ विडगरी ने लिखा है कि-”वे तत्व जो जीवन का निर्माण करते हैं और जिनकी वैज्ञानिकों ने जानकारी प्राप्त की है, उनमें यथार्थ मूल्याँकन के अनुपात में बहुत कमी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि साँसारिक अस्तित्व से भी अधिक विशाल मानवीय अस्तित्व क्या है? इसका पता लगाया जाये। विज्ञान से ही नहीं, बौद्धिक दृष्टि से भी उसकी खोज की जानी चाहिए। हमारा भौतिक अस्तित्व अर्थात् हमारे शरीर की रचना और इससे संबंधित संस्कृति का मानव के पूर्ण अस्तित्व से कोई तालमेल नहीं है। इससे हमारी भावनात्मक संतुष्टि नहीं हो सकती। इसलिए हमें जीवन के मूलस्रोत की खोज करनी पड़ेगी। अपने अतीत और भविष्य के बीच थोड़ा सा वर्तमान है, क्या हमें उतने से ही संतोष मिल सकता है? हमें अपने अतीत की स्थिति और भविष्य में हमारी चेतना का क्या होगा? हम संसार में क्यों हैं और क्या कुछ ऐसे आधार हैं जिनसे बँधे होने के कारण हम संसार में हैं, इनकी खोज होनी चाहिए? इन पंक्तियों में वही बात प्रतिध्वनित होती है, जो ऊपर कही गयी है। विज्ञान ने निष्कर्ष भले ही न दिया हो, पर उसने जिज्ञासा देकर मनुष्य का कल्याण ही किया है। “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” ब्रह्म की पहचान के लिए हम तभी तत्पर होते हैं जब उस मूल स्रोत के प्रति हमारी जिज्ञासा जाग पड़ती है।

इस बिंदु पर पहुँच कर हम कह सकते हैं कि ब्रह्मविद्या का अर्थ और इति दोनों ही वेदाँत धर्म में बहुत पहले से है। “एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति”, ‘एक नूर से सब जग उपजिया’, ‘संकल्पयति यत्राम प्रथमोऽसौ प्रजापतिः, तत्त देवासु भवति तस्येदं कल्पनं जगत्।-योगवशिष्ठ 6/2/18/6 के इस सूत्र के अनुसार सृष्टि के आदि में एक ब्रह्मा ही था, उसने जैसे-जैसे संकल्प किया वैसे-वैसे यह कल्पना जगत् बनता गया। छाँदोग्योपनिषद् 6/2/1 के अनुसार वही एक अद्वितीय और ब्रह्म होकर विराजता है। श्वेताश्वतरोपनिषद् (6/11) में भी वही-’एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढ़.........।’ अर्थात् वही एक देव सब भूतों में ओतप्रोत होकर सबकी अंतरात्मा के रूप में सर्वत्र व्याप्त है। वह इस कर्म रूप शरीर का अध्यक्ष है। निर्गुण होते हुए भी चेतना शक्ति युक्त है। पूर्व में क्या किया है, अब क्या कर रहा है, जीव की इस संपूर्ण क्रिया का साक्षी वही है। वही सब भूतों में प्राण धारण करके जीव रूप में वास करता है।’

उपरोक्त आख्यानों और पाश्चात्य वैज्ञानिकों की इस खोज में कि-”संसार के समस्त पदार्थ एक ही तत्व से बने हुए हैं” जबर्दस्त साम्य है। वेदाँत के यह प्रतिपादन आज से लाखों वर्ष पूर्व लिखे गये हैं, इसलिए जब हम अकेले वेदाँत को कसौटी पर लाते हैं तो उसकी परिपूर्णता और वैज्ञानिकता में कोई संदेह नहीं रह जाता। जब तक वह एक था, तब तक “पूर्ण परब्रह्म” था, जब वही अपने कल्मषों के साथ जीव रूप में आया तो अद्वैत से द्वैत बना। जीव जब अपने साँसारिक भाव से अपने शाश्वत अंश और मूल ब्रह्म पर विचार करता है तो वही स्थिति “त्रैत” कहलाती है। इसी का विकास और आत्मा को परमात्मा में लीन कर देने पर शरीरधारी की जो स्थिति होती है-वही “विशिष्टाद्वैत” के नाम से कहा गया है। इसमें न कहीं कोई भ्राँति है, न मत अनैक्य। वेदाँत ने यह प्रतिपादन प्रत्येक स्थिति के व्यक्ति की समझ के लिए किये हैं, वैसे सिद्धाँत में वह वैज्ञानिक मान्यताओं पर ही टिका हुआ है। कैवल्योपनिषद् के सूत्र 16 एवं 20 में पाश्चात्य वैज्ञानिक मान्यताओं पर पूर्वात्य दर्शन को एक स्थान पर लाकर दोनों में सामंजस्य व्यक्त किया गया है और कहा गया है-”जिस परब्रह्म का कभी नाश नहीं होता, जिसे सूक्ष्म यंत्रों से भी नहीं देखा जा सकता, जो इस संसार के इन समस्त कार्य और कारण का आधारभूत है, जो सब भूतों-प्राणियों की आत्मा है, वही तुम हो-तुम वही हो।” और “मैं छोटे से भी छोटा और बड़े से भी बड़ा हूँ इस अद्भुत संसार को मेरा ही स्वरूप मानना चाहिए। मैं ही शिव और ब्रह्मस्वरूप हूँ, मैं ही परमात्मा और विराट् पुरुष हूँ।”

उपरोक्त कथन में और वैज्ञानिकों द्वारा जीवकोश से संबंधित जो अब तक की उपलब्धियाँ हैं उनमें तनिक भी अंतर नहीं है। प्रत्येक जीवकोश का न्यूक्लियस-नाभिक अविनाशी तत्व है। वह स्वयं नष्ट नहीं होता, परंतु वैसे ही अनेक कोशिकायें बना देने की क्षमता से परिपूर्ण है। इस तरह कोशिका की चेतना को ही ब्रह्म की इकाई कह सकते हैं, क्योंकि वह एक आवेश, शक्ति या सत्ता है, चेतन है, इसलिए वह अनेकों अणुओं में भी व्याप्त इकाई ही है। इस स्थिति को जीव भाव भी कह सकते हैं, पर तो भी उसमें पूर्ण ब्रह्म की सब क्षमतायें उसी प्रकार विद्यमान हैं जैसे समुद्र की एक खारी बूँद में पानी के सब गुण विद्यमान होते हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि शरीर में जितनी कोशिकायें हैं, इन सबकी सूक्ष्म चेतना की पूर्ण जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं मिली। पर वेदाँत उसे अहंभाव के रूप में देखता है और यह कहता है कि चेतना की अहंभाव की जिस प्रकार की वस्तु में रुचि या वासना बनी रहती है, वह वैसे ही पदार्थों द्वारा शरीर का निर्माण किया करती है, नष्ट नहीं होती। वही इच्छायें, अनुभूतियाँ, संवेग, संकल्प और जो भी अचेतन क्रियायें हैं, करता या कराता है, पदार्थ में यह शक्ति नहीं है, क्योंकि ब्रह्म दृश्य नहीं विचार है, उसे “प्रज्ञानं ब्रह्म” भी कहते हैं।

राकफेलर इन्स्टीट्यूट-अमेरिका में ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक द्वय वेकाफ और स्टेनली ने जीवित और अजीवित पदार्थों का अंतर बतलाने के लिए अनेक अनुसंधान किये। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि प्रत्येक अणु रासायनिक प्रक्रिया से स्वयं उत्पन्न होते हैं और बढ़ते हैं, पर इसमें विचारणीय बात यह है कि अणु तभी उत्पन्न होते हैं जब तक वे जीवित पदार्थ से संबंधित रहते हैं। इसलिए जीवन की उत्पत्ति सिद्ध करने का प्रयास तो निरर्थक है, उससे तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि चेतना और जड़ दो अलग-अलग वस्तुएँ होकर भी गति और सक्रियता का मूल कारण चेतना ही है। उसकी क्षमताओं का विज्ञान अध्ययन नहीं कर सका, उसे केवल जड़ शक्ति की उपलब्धि हुई है। इसलिए विज्ञान जिन बातों को बताने में असमर्थ है, उसकी जानकारी के लिए विश्व के सामने सिवाय इसके कि वह वेदाँत की शरण ले और कोई दूसरा उपाय शेष नहीं रह जाता। जहाँ से पदार्थ विज्ञान की इति हो जाती है, उससे आगे अध्यात्म विज्ञान अर्थात् आस्था और विश्वास का आश्रय लिए बिना मनुष्य “सत्यमेव” की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकता। मनुष्य को यह विश्वास करना ही होगा कि चेतना के गुण और स्वभाव भौतिक पदार्थों से अलग हैं और उनकी जानकारी भावनात्मक आधार पर ही हो सकती है। भावनाओं को गहरा बनाने एवं परिष्कृत करने के लिए उपाय भले ही कुछ हों।

प्रत्येक जीव से स्वार्थ परायणता का कुछ न कुछ अंश अवश्य रहता है। इसमें स्वयं के प्रति प्रेम और आदर भी सम्मिलित है। यदि यह प्रश्न किया जा सकता है कि “प्रोटोप्लाज्म” कहाँ से उत्पन्न हुआ तो यह भी पूछा जा सकता है कि यह स्वार्थभाव कहाँ से आया? मानव की मूल प्रवृत्तियों जैसे प्रेम, काम, अहंभाव की उत्पत्ति कैसे हुई? मनोविज्ञान उन्हें वंशानुगत संपत्ति के रूप में लेता है। उससे भी सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़े तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि विकास की प्रक्रिया किसी एक बिंदु से प्रारंभ हुई है और तब यह भी मानना पड़ेगा कि वह चेतना आदि अंत रहित है। जीव उसमें से संसर्ग मात्र से पैदा होता रहता है, उससे मूल चेतना के अस्तित्व में न अंतर आता है और न उसे कोई खतरा पैदा होता है।

वेदाँत उस मूल स्वत्व को ही अधिक महत्व देता है और उसे प्राप्त करने को ही जीवन का लक्ष्य बतलाता है। वह अविनाशी, अक्षर, सर्वव्यापी तत्व है। यह वह मूल्यवान निधि है, जो जिसके पास होगी, वह स्वर्ग से भी अधिक सुखी होगा। इच्छानुसार जहाँ चाहे पहुँच सके, जो भोग चाहे भोग सके, उससे बढ़कर सुख क्या हो सकता है। यह स्थिति अंतिम स्थिति है।

ब्रह्म एक भाव है और उसे भावनात्मक स्तर पर उतर कर ही प्राप्त कर सकते हैं और जब उसे पा लेते हैं, तब उस स्थिति से आनंददायक और प्राप्य कुछ रह नहीं जाता। यह प्रक्रिया हम अपने आपको प्रेम करने से प्रारंभ करते हैं। यह प्रेम शरीर के माध्यम से करने लगते हैं तो वह अज्ञान की स्थिति हो जाती है क्योंकि हमारा अपना स्वरूप चेतन तो है, पर अदृश्य है। उसे केवल विश्वास और अपने गुण, कर्म, स्वभाव तथा चिंतन, चरित्र, व्यवहार के विकास एवं परिष्कार के द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। वेदाँत के विज्ञान सम्मत इस तथ्य को मानने से ही ईश्वर दर्शन की-आत्मोत्कर्ष की अगली जानकारियाँ संभव होंगी। इसके अतिरिक्त ईश्वरीय सत्ता को जानने व मानने का कोई और उपाय भी तो नहीं है।


हृदय-परिवर्तन

“तुम हम लोगों के साथ रहो तो हम तुम्हारे लिए सब व्यवस्था कर देंगे।” आगन्तुक के स्वर एवं उसके एक तार की लय पर वह आकर्षित हुआ था या आगन्तुक के सुगठित शरीर ने उसे प्रभावित किया था यह कहना कठिन है। किंतु इतना निश्चित कहा जा सकता है कि यह दया का भाव नहीं था। उसके कठोर हृदय ने कभी किसी कोमल भाव को स्थान ही नहीं दिया। वह जब भी कहीं पिघलता है, अपने स्वार्थ के कारण।

“अब तो भाग्य ने ही मुझे आप लोगों के पास पहुँचा दिया है। भटकते-भटकते मैं थक गया हूँ।” कहने की बात भी नहीं थी, आगन्तुक का शरीर ही इस बात का प्रमाण था। पैर का चर्म क्षत-विक्षत हो गया है, शरीर सूखकर कंकाल सा हो गया है। कितना भी दृढ़ शरीर हो, कोई कहाँ तक सबल रह सकता है। लगभग एक महीने से उसके पेट में जल के अतिरिक्त कुछ नहीं गया। आज यहाँ पहुँचते-पहुँचते वह गिरकर मूर्छित ही हो गया। अब उसे आश्रय देने वाले ये लोग कोई भी हों कैसे भी हों इन्हीं लोगों ने उसे जीवन दिया है। दूध की कुछ घूंट कंठ के नीचे उतर जाने पर ही वह बोलने योग्य हुआ है।

“अच्छी बात है, लेकिन यह स्मरण रखना कि भागने का प्रयत्न किया अथवा हमारे विषय में किसी से बाहर कुछ कानाफूसी की तो मैं क्षमा नहीं जानता। मेरे क्रोध की यंत्रणा तुम्हारे लिये किसी भी नरक से अधिक भयंकर निकलेगी।” दस्युओं के दलपति से और कोई क्या आशा कर सकता है। एक मृतप्राय प्राणी को शरण देते समय भी इतनी सूचना देना वहाँ सामान्य आवश्यक कार्य समझा ही जाता था।

“मैं अब भागकर कहाँ जाऊँगा? मेरा संसार में है ही कौन? जिन्होंने मुझे मृत्यु के मुख में पड़े को जीवित किया है, उनके साथ विश्वासघात करने की बात भी सोचने से तो मर ही जाना अच्छा है।” आगन्तुक के नेत्र सजल हो गए। देश में अकाल है। घर पर उसके रहते उसके देखते-देखते भूख की ज्वाला में उसका बच्चा और पत्नी स्वाहा हो गये। जब पत्ते, वृक्षों की छाल तथा तिनकों के लिए भी लोग परस्पर मारपीट तक करने लगे, एक झोंपड़ी और कुछ भूमि का मोह क्या अर्थ रखता है। फिर किसके लिए अब वह उस स्थान में आसक्त बनता। जिधर पैर बढ़े चल पड़ा। सोचा था वन में या तो वन पशु उसे आहार बनाकर विपत्ति से छुड़ा देंगे या कुछ पत्ते ही मिल जायेंगे पेट के गड्ढे को पाटने के लिए। दुर्भाग्य आगे-आगे चलता है। वन में आजकल पत्तों का नाम नहीं। वृक्षों के कंकाल खड़े हैं। पता नहीं दावाग्नि ने यह दशा की या दुर्दैव ने। वह भटकता बढ़ता आया। हरियाली देखकर उसे कितना हर्ष हुआ था, उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन जब वह हरे-भरे वृक्षों के समीप पहुँचा-मूर्छित होकर गिर पड़ा।

“अभी तुम विश्राम करो! आज तुम्हें केवल दूध पर रहना चाहिए। कल अन्न मिलेगा। एक सप्ताह में स्वस्थ हो जाओगे।” दस्यु प्रमुख ने एक साथी को ओर संकेत किया। सघन वृक्षों की छाया में पत्तों पर एक दरी मिल गयी बिछाने को। लंबे समय से भूखे व्यक्ति को सहसा कोई आहार मिलेगा तो उस पर भूखे बाघ की भाँति टूट पड़ेगा वह। लेकिन उसकी सूखी आंतें फट जाएँगी और यह उसका अंतिम भोजन होगा इस बात से दस्यु असावधान नहीं थे। आगन्तुक के पास न जल रखा गया, न दूध। उसे कुछ देर के अंतर से जल तथा दूध मिलते रहने की व्यवस्था कर दी उन्होंने।

“भगवान कितने दयामय हैं।” शीतल जल, सद्यः शक्तिदायक दूध शरीर में पहुँचा। महीनों से जिसे पत्ते तक दुर्लभ रहे हों, उसे कितनी शाँति मिली होगी। वह दरी पर नेत्र बंद करके पड़ा था।” प्रभु ने पता नहीं क्यों इस अधम को जीवित रहने दिया।” इस समय अपने आश्रय दाताओं के संबंध में सोचने योग्य मनःस्थिति उसकी नहीं थी। कब वह सो गया, यह कैसे पता लगता उसे।

उसे कई दिनों तक तीव्र ज्वर आवा यहाँ। उसका उपचार हुआ। अब वह स्वस्थ हो गया है। सामान्यतया घूम-फिर सकता है। उसके ये भीमकाय, उग्र आकृति, कठोर मुख, बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूछों वाले आश्रय दाता सज्जन पुरुष नहीं हैं यह अब समझ गया है वह। लेकिन इन लोगों ने उससे परिचय तक नहीं पूछा यह आश्चर्य की बात है। आज जब वह दल प्रमुख के पास गया परस्पर परिचय करने तो प्रमुख ने रुक्षता से उसे बताया-”हमारे यहाँ जाति आदि का कोई महत्व नहीं। तुम्हारे अब कोई संसार में नहीं है, इससे तुम और अधिक उपयोगी हो हमारे लिए। तुम्हें अब काम करना चाहिए। तुम्हारे काम का पूरा भाग मिलेगा तुम्हें और उसे तुम चाहे जैसे व्यय कर सकते हो। केवल इतनी सावधानी रखनी चाहिए कि यहाँ किसी को कभी न लाना। यहाँ का पता मत देना और यदि आगे चलकर कुछ पीने लगो तो कभी ऐसी अवस्था में इधर आने का साहस मत करना, जब तुम्हारी असावधानी में कोई तुम्हारा पीछा कर सके।”

“मुझे तो केवल भर पेट सात्विक भोजन चाहिए।” बड़ी अद्भुत लगी उसे वे सूचनाएँ। “मैं यथाशक्ति आप लोगों की सेवा करूंगा। थोड़ी देर मुझे नित्य अपने प्रभु के स्मरण में लगता है, जब शरीर स्मरण के योग्य होता है। मुझे किसी मादक वस्तु का अभ्यास नहीं और न धन का मुझे का कोई लोभ है।” बड़ी सरलता से उसने अपनी भावना व्यक्त कर दी।

“अभी तुम बहुत सीधे हो।” दल प्रमुख खुलकर हँस पड़ा “अच्छी बात है, काम में लगो। आगे की बात आगे देखी जाएगी तुम अपना एकतारा दोपहरी में बजा लिया करो, बस इतना ही अभी पर्याप्त है। सबेरे शाम को या रात्रि में इधर कोई भूला भटका आवे तो एकतारे की झंकार उसे आकर्षित करेगी।”

उसे कोई आपत्ति नहीं हुई इस आदेश को मानने में। अवश्य ही उसका हृदय आशंकाओं से पूर्ण हो गया। यहाँ आ फँसने की अपेक्षा तो मृत्यु बहुत अच्छी थी। लेकिन अब तो प्रारब्ध ने ही ला पटका है उसे इन दस्युओं के मध्य में।

जीवन क्षण-पल दिवस बन कर गुजरता रहा। “तुम अब तक क्या कर रहे थे? क्या ले आए तुम अपने साथ?” दल प्रमुख ने एक यात्रा से लौटकर पर्याप्त समय प्रतीक्षा की थी। सब साथी निश्चित स्थान पर आ गए। नवीन व्यक्ति के न पहुँचने से उनका चिन्तित होना स्वाभाविक था। प्रमुख का रोच तब और भी बढ़ गया जब उसने नवीन साथी को खाली हाथ आते देखा।

“मुझे पूरी आशा है कि मेरी बात सुनकर आप मुझे क्षमा कर देंगे।” नवीन व्यक्ति ने बड़ी नम्रता से प्रार्थना की।” मैंने उस स्थान पर जहाँ स्थित रहने को आपने मुझे आज्ञा दी थी, खड़े-खड़े ही एक बहुत कातर ध्वनि सुनी। इतनी करुण थी कि उसे सुनकर वहाँ न जाना तो निष्ठुरता होती। किसी क्रूर ने एक अच्छे सुन्दर युवक को आहत कर दिया था। मेरे पहुँचने तक वह युवक मूर्छित हो चुका था। मैं उसके सामान्य उपचार में लग गया। उसे एक सुरक्षित स्थान पर रख आया हूँ। अब भी वह चेतना में नहीं आया है। आघात बहुत.......।”

“बको मत।” दस्यु प्रमुख चिल्ला पड़ा। इस प्रकार की बातें सुनना उसकी शक्ति से बाहर था। “हम लोग वहाँ दया दिखाने नहीं गए थे। वहाँ गए थे धन लेने और जो भी हमारे मार्ग में बाधा दे, उसे ठिकाने लगा देना हमारा कर्तव्य था।”

“दूसरे का धन उसकी इच्छा के बिना हरण करना और निरपराध को मारना........।” वह सीधा, सरल व्यक्ति अपनी बात अपने ही ढंग से कह रहा था।

“पाप है-यही तो तुम कहना चाहते हो?” दस्यु ने नेत्रों में विष एकत्र करके व्यंग किया-”पाप और पुण्य नगरों में रहने वाले के समीप रहते हैं। यहाँ यह ढकोसला नहीं चल सकता। यहाँ एक ही पुण्य है धन एकत्र करना।”

“अभी वह बेचारा मूर्छित पड़ा है। आप मुझे आज्ञा दें कि उसकी कुछ ठीक व्यवस्था कर आऊँ।” यह अवसर इस योग्य नहीं था कि दस्यु से विवाद करने में समय नष्ट किया जाय। विवाद करने से कोई लाभ हो, इसकी आशा भी नहीं थी। कर्तव्य की पुकार थी सेवा के स्थान पर शीघ्र पहुँचने की।

“अब उसके जीने या मरने से हमारा कोई हानि-लाभ नहीं।” दस्यु प्रमुख पता नहीं क्यों इस अत्यंत विनम्र व्यक्ति की उपेक्षा नहीं कर पाता। इस सीधे व्यक्ति के साथ कठोर होना उसे भी कठिन जान पड़ता है। उसने अनुमति दे दी-”यदि तुम्हें यह मूर्खता करनी ही है तो जा सकते हो। लेकिन उसे न तुम यहाँ ला सकते हो और न अपना, हम लोगों का तथा हमारे आवास का कोई परिचय ही दे सकते हो।”

“मैं आज्ञा का पालन करूंगा।” वह शीघ्रतापूर्वक चला गया। दस्युओं ने एक दूसरे की ओर देखा किसी भाव से लेकिन आशंका का कोई कारण नहीं था।

लेकिन उसकी यह हरकत उनमें से किसी को बर्दाश्त नहीं हुई वह किसी यात्रा में हमारा साथ नहीं देता। आज दस्यु दल एकाँत जंगल में एकत्र हुआ था। दस्यु प्रमुख ने इस बार जिस नवीन व्यक्ति को शरण दी है उसे लेकर दल में एक झमेला खड़ा हो गया।

“हम सब जानते हैं कि हमारी यात्रा में उस ले जाना केवल व्यर्थ ही नहीं आशंकाजनक भी है।” प्रमुख की बात में दो मत नहीं हो सकते। जो दूसरे का धन उसकी अनुमति के बिना लेने को किसी प्रकार प्रस्तुत नहीं, जो असावधान लोगों पर आक्रमण को अन्याय मानता है, जो प्रत्येक आहत की सेवा के लिए अपने प्राण भी संकट में डालने को उद्यत रहता है, वह भला दस्युओं की यात्रा जो ठीक अर्थ में डकैती है, उसमें साथ जाकर उनकी कठिनाई बढ़ावे और आशंका का कारण हो, इससे अधिक और क्या हो सकता है?

“हम अपने प्राण संकट में डालकर उपार्जन करें और वह बैठा-बैठा एकतारा बजाया करे।” एक दस्यु ने अपनी ईर्ष्या व्यक्त की।

“दल के नियमानुसार कोई कभी भी किसी यात्रा में जाना अस्वीकार कर सकता है, हम सब इस विषय में स्वतंत्र है।” प्रमुख ने स्थिर कण्ठ से कहा-यात्रा से प्राप्त धन का भाग साथ न जाने वाले को नहीं मिलता। उनने कोई भाग लेना अस्वीकार कर ही दिया है। अपने साथ हमारे लिए भी वह फल एकत्र करता है। थोड़ा सा अन्न लगता है उस पर और आज से वह मेरे निजी भाग में से ले लेगा।

“वह दो रोटी के टुकड़े खा लेता है, इसलिए हम कोई विवाद उठावें इतना ओछा हममें से कोई नहीं है।” दस्युओं में से एक तरुण बोला-”विवाद तो यह है कि ऐसा व्यक्ति दल में क्यों रहे जिसे यात्रा में कभी भी साथ नहीं देना है।”

“उसे कह देने पर वह अभी चला जाएगा और इतना सच्चा है कि हमें उससे तब भी कोई आशंका नहीं हो सकती।” प्रमुख ने इस बार अपने हृदय की बात स्पष्ट कर दी-”लेकिन हमें संयोगवश एक ऐसा व्यक्ति मिला है, जो हमारे साथ रहकर भी हमारे सारे दुर्गुणों से अछूता रहता है। यही नहीं हममें प्रत्येक की सेवा सुश्रूषा भी करता है। जिसे डराकर, लोभ देकर, किसी प्रकार हम अपने किसी कुकार्य में साथी नहीं पाते। हमने धर्मात्माओं एवं सज्जनों की बातें बहुत सुनी हैं पर हमें पहली बार ऐसा मनुष्य मिला है जो संत है या नहीं वह भले न कहा जा सके पर यह निश्चित है कि वह सज्जन है। क्या इस अकाल के समय उसे भूखों मरने के लिए फिर निकाल दें?”

कोई कुछ बोलने का साहस न कर सका। प्रबलतर अधर्म भी सच्चाई से भरे धर्म का तिरस्कार न कर सका। उलटे उस आगन्तुक की सज्जनता ने ऐसा चमत्कार दिखाया कि धीरे-धीरे डकैतों का पूरा गिरोह स्वतंत्रता आँदोलन के सैनिकों में बदल गया। उपदेश नहीं अपने आचरण से यह चमत्कार करने वाले परम संत श्री रविशंकर महाराज।


जब आसमान से हुई रुधिर की वृष्टि

मनुष्य सृष्टि का बुद्धिमान प्राणी है। उसमें बुद्धि जिस भूमिका में पहुँची और जिस स्तर पर प्रकट हुई है, उसे सर्वोपरि कहा जा सकता है। इतने पर भी सच यह है कि उसका अंत यहीं नहीं। चेतना स्वर का उसका विकास अभी बाकी है। आगे वही संपन्न होना है। इस धरातल में पहुँच कर बुद्धि वह सब जान-समझ सकेगी, जो अभी उसके लिए अविज्ञात स्तर के रहस्य बने हुए हैं। फिर उस प्रकार की शिकायत की गुंजाइश न रह सकेगी, जैसी विचित्र वर्षा के संदर्भ में की जाती रही है कि प्रकृति ने कहीं कुछ तो कहीं कुछ की वर्षा क्यों करायी?

घटना लुसियाना की है। सन् 1967 का मार्च महीना था। अचानक शुभ आकाश से श्वेत चूर्ण की बरसात होने लगी। यह अनोखी वर्षा लाल नदी के तट से 60 मील लंबी और 5 मील चौड़ी पट्टी में करीब आधे घंटे तक होती रही। मौसम अत्यंत ठंडा था, इसलिए लोगों ने समझा कि शायद हिमपात हो रहा है, किंतु जब उसे हाथों में लिया गया, तो बर्फ से कोई भिन्न पदार्थ मालूम पड़ा। उसे चखने से ही यह ज्ञात हो सका कि वह और कुछ नहीं, वरन् विशुद्ध नमक है। इतने उच्च स्तर का नमक उस क्षेत्र के आकाश में कहाँ से आ गया? यह अब तक अविज्ञात है। इस संपूर्ण घटना का विस्तृत विवरण तत्कालीन समय के दैनिक पत्र “न्यू ओरलियन्स टाइम्स” में विस्तारपूर्वक छपा था।

मिलती-जुलती घटना नापा, कैलीफोर्निया में इससे दस वर्ष पूर्व घटी थी। “रिपब्लिकन” पत्र का संपादक इसका ब्यौरा देते हुए लिखता है कि उसके लिए यह बड़ा ही विलक्षण अनुभव था। एक दिन कार से वह नापा से कैलीफोर्निया जा रहा था। धूप खिली हुई थी और आसमान निरभ्र था। वह एक मील हो आगे बढ़ा था कि अकस्मात् छोटे पत्थरों की बरसात होने लगी। आरंभ में लगा कि ओले पड़ रहे हैं, पर बादल रहित गगन से प्रखर धूप में ओले गिरते उसने कभी देखा-सुना नहीं था, अस्तु गाड़ी सड़क की एक ओर खड़ी कर दी। दरवाजा हल्का-सा खोल कर एक ओला उठाया। पता चला वह ओला नहीं है। उसे सूँघा, तो कुछ मीठी खुशबू आयी। जीभ से लगाया, तो चकित रह गया। वह मिसरी की डली थी। बरसात इतनी सघन हुई थी कि सड़क और संपूर्ण क्षेत्र में इसकी एक पतली पर्त बिछा गई थी। विशेषज्ञ अब तक इस रहस्य पर से पर्दा नहीं उठा सके कि आखिर आकाश में मिसरी कैसे बनी और अचानक किस प्रकार गिरने लगी?

ऊपर से कीचड़ गिरने लगे, तो इसे क्या कहा जाय? बारिश? या प्रकृति का उपहास? जो भी कह लें, पर एक ऐसी ही घटना नेवादा, अमरीका में सन् 1949 में घटी थी। इस बौछार के कारण स्टोन हाउस, नेवादा के निकट एक ट्रेन को घंटों रुक जाना पड़ा था। कीचड़ इतनी बड़ी मात्रा में गिरी थी, कि रेल-लाइन में इसकी मोटी तह पड़ गई थी। इस तह के कारण ट्रेन, लाइन से कहीं फिसल न जाय, इसलिए उसे तब तक रोक दिया गया, जब तक उसकी सफाई न हो गई। संपूर्ण गाड़ी और इंजन देखने से ऐसे लग रहे थे, मानों वह कहीं पंक में से निकल कर आये हों। बरसात लगभग एक घंटे तक जारी रही। ऐसी ही दो बरसातें सन् 1960 और 61 में क्रमशः आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड में प्रकाश में आयी थीं।

रक्त-माँस की बारिश कदाचित् सबसे चौंकाने वाली है, पर यह सत्य है कि ऐसी ही अद्भुत वर्षा टेनीसी, लेबनान में सन् 1941 में हुई थी। एक स्थानीय चिकित्सक डॉ॰ डब्ल्यू॰ पी॰ सेली ने इस लोमहर्षक घटना का विवरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है-लगभग 12 बजे दिन का समय था। लेबनान से करीब पाँच मील पूरब स्थित टेनेसी के आकाश में लाल रंग के बादल का एक टुकड़ा दिखाई पड़ा। इस छोटे से रक्त वर्ण टुकड़े के अतिरिक्त आसमान बिलकुल साफ था। देखते ही देखते उस रक्ताभ टुकड़े से खून और माँस के लोथड़े नीचे गिरने लगे। यह अनूठी खूनी बौछार करीब आधे मील लंबे और 75 गज चौड़े भूभाग में हुई। जिस क्षेत्र में माँस और रक्त गिरे, वहाँ अधिकाँश हिस्से में तम्बाकू के खेत थे। यहाँ से कुछ नमूना इकट्ठा कर डॉ॰ सेली ने उसे अपने एक मित्र प्रोफेसर डॉ॰ ट्रुस्ट के पास भेज दिया और उनके विश्लेषण का अनुरोध किया। डॉ॰ ट्रुस्ट एक रसायन वेत्ता थे। रासायनिक विश्लेषण में वह सब खून और माँस ही साबित हुए, पर ठीक-ठीक यह सुनिश्चित नहीं किया जा सका कि वे किस जंतु के हैं। डॉ॰ सेली के अनुसार रक्त-माँस इतने गिरे थे, जिसे सैंकड़ों पौण्ड में आँका जा सके।

इस प्रकार की दूसरी घटना क्लोवरली वर्जीनिया की है। 1950 का गुडफ्राइडे का दिन था। शाम के चार बजे थे। जी॰ डब्ल्यू बैसेट के फार्म में मजदूर काम कर रहे थे तभी ठीक ऊपर आकाश में उन्हें एक अरुणिम बादल का खंड दिखाई पड़ा। लोग अभी उसके बारे में विचार ही कर रहे थे, कि उसने अपना रहस्य खोल दिया। रक्त और माँस ओले और पानी की बूँदों की तरह उनके ऊपर गिरने लगे। माँस का निरीक्षण किया गया, तो वह बिलकुल ताजा प्रतीत हुआ। टुकड़ों में यकृत, फेफड़े, हृदय के भाग सम्मिलित थे।

एक अन्य रक्त वर्षा उसी वर्ष फरवरी महीने में सिम्पसन काउण्टी, उत्तरी कैरोलीना में देखी गई थी। दोनों प्रकार की बौछारों में समानता होते हुए भी एक भिन्नता यह थी कि क्षेत्रफल की दृष्टि से इसका भूभाग कहीं अधिक विस्तृत था उल्लेखों के अनुसार करीब 30 फुट चौड़े और नौ सौ फुट लंबे दायरे में यह वृष्टि हुई थी। इसमें भी खून के साथ-साथ माँस के टुकड़ों में मस्तिष्क, गुर्दे, आँत आदि आँतरिक अवयव उपस्थित थे।

इन सभी प्रकार की रुधिर-वृष्टि में वास्तविक कारण किसी का भी नहीं जाना जा सका। मिलती-जुलती एक घटना सिनसिनैटी, ओहियो की है। जुलाई 1955 की एक सुबह एड मुट्ज अपने लाँन की घास की कटाई कर रहा था। वह चाहता था कि सूर्य निकलने से पूर्व अपना काम पूरा कर ले। गर्मी के दिन थे, इसलिए बहुत प्रातः ही उसने अपना काम प्रारंभ कर दिया। कार्य बिलकुल सामान्य ढंग से चल रहा था। इसी बीच वह एक छोटे पेड़ के नीचे उगी कुछ बड़ी घासों को उखाड़ने के लिए झुका। उसने हाथ आगे बढ़ाया ही था कि कुछ लाल रंग की बूँदें हाथ में आ गिरीं। वह गर्म, चिपचिपी और तैलीय थीं। उसका रंग रुधिर से भी अधिक गहरा था। कुछ ही क्षण में उस विचित्र द्रव्य की वहाँ बरसात होने लगी, जिसका घेरा अत्यंत छोटा था। एक मुट्ज ने उस परिधि से बाहर आकर आसमान की ओर देखा, तो ऊपर उसे एक बादल का छोटा खंड दिखाई पड़ा। वह लाल, हरा एवं गुलाबी आभा लिये हुए था। इसी में वह अरुण रंग का पदार्थ झर रहा था। इसी मध्य उसे हाथ में कुछ बिंदुओं पर जलन महसूस होने लगी। देखा, तो वह वही स्थान थे, जहाँ-जहाँ बूँदें पड़ी थीं। तुरंत उसे पानी से धोया। जब वह घर से बाहर आया, तो देखा बादल का यह टुकड़ा गायब हो चुका था। इसी के साथ वह विलक्षण वृष्टि भी थम चुकी थी।

दूसरे दिन प्रातः जब एड मुट्ज उठा, तो उसे यह देख कर घोर आश्चर्य हुआ कि सतालू के सभी छः पेड़ सूख चुके हैं। पत्तियाँ भूरी हो गईं थीं और अधिकाँश झड़ चुकी थीं। फल सिकुड़ कर बीज से जा चिपके थे। पेड़ के तने भी सिकुड़ कर कठोर हो गये थे। पेड़ों के नीचे की घास पोली पड़ गई थी।

बाद में जब इस घटना की जानकारी वैज्ञानिकों को मिली, तो दूसरे दिन वे वहाँ से पत्तियों, फलों, घासों और तनों के नमूने ले गये। यूनाइटेड स्टेट्स एयर फोर्स के विशेषज्ञों ने भी घटना स्थल पर पहुँच कर उसकी जानकारी ली और नमूने एकत्रित किये। नमूनों के विश्लेषण से विज्ञानवेत्ताओं ने यह तो पता लगा लिया कि रक्त वर्ण का पदार्थ एक तीक्ष्ण रसायन था, पर उसके बादल आकाश में कैसे बन गये? यह बता पाने में विफल रहे।

मेघ रहित आकाश से प्रखर धूप में पानी बरसने लगे, तो यह हैरानी की बात है, किंतु इस सदी में ऐसी कई घटनाएँ प्रकाश में आयी हैं। एक प्रकरण लुसियाना, एलेक्जेण्ड्रिया का है। नवम्बर 1958 के दूसरे पहर दिन में एक रोज बैबिंगटन नामक एक महिला ने आफिस से आकर गैरेज में अपनी गाड़ी खड़ी की और पिछले दरवाजे की ओर मुड़ी, तभी उसे ढेर सारी पानी की बूँदों के गिरने की आवाज सुनाई पड़ी। वह लान और मकान की छत पर एक छोटे दायरे में गिर रही थीं। पहले उसने सोचा कि बूंदें पड़ोसी के लान में लगे फव्वारे से आ रही हैं पर पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि वहाँ कोई फव्वारा नहीं है। तब उसे पानी की आपूर्ति करने वाले किसी पाइप के फटने का संदेह हुआ। बारीकी से इसकी भी छानबीन कर ली गई, पर संकेत-सूत्र फिर भी हाथ नहीं लगा। धीरे-धीरे बात पूरे मुहल्ले में फैल गई। उपस्थित भीड़ भी यह जानने का प्रयास करने लगी कि आखिर तथ्य क्या है? सभी को यह देखकर भारी अचंभा हुआ कि वर्षा बिलकुल मेघशून्य अंतरिक्ष से हो रही थीं। ढाई घंटे तक यह अद्भुत बौछार सौ वर्ग फुट क्षेत्र में निरंतर गिरती रहीं। इसके बाद अकस्मात् वैसे ही बंद हो गई, जैसे शुरू हुई थी। निकट के इंग्लैंड एयर बेस के विशेषज्ञ और मौसम विभाग के वैज्ञानिकों में से कोई भी इसका उपयुक्त न बता सके।

ऐसे ही एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए 24 अक्टूबर 1886 के अंक में पत्र “न्यूयार्क सन्” लिखता है-उस दिन चेस्टर फील्ड काउण्टी, साउथ कैरोलिना का अंबर एकदम स्वच्छ था। तेज धूप निकली हुई थी। आस-पास कहीं कोई घटा नहीं थी। इस दशा में न जाने कैसे उसके एक निताँत छोटे वृत्त में अनवरत चौदह दिनों तक बरसात होती रही। यह इतनी सघन थी कि छतों पर जल-निकास की विशेष व्यवस्था करनी पड़ी। उल्लेखनीय यह है कि इस संपूर्ण अवधि में मेघों का कहीं नामोनिशान नहीं था।

डासन, जोर्जिया में ऐसी अनहोनी सितंबर 1966 में देखी गई। आकाश बिलकुल साफ था। सूर्य अपना प्रखर प्रकाश बिखेर रहा था, तभी अकस्मात् 25 फुट की छोटी परिधि में तेज बौछार होने लगी, जो लगभग डेढ़ घंटे तक जारी रही। चार्ल्सटन, साउथ कैरोलीना में इसी वर्ष अक्टूबर मास में हुई वर्षा इससे भी विस्मयकारी थी। वहाँ एक ही मकान और उसके बरामदे में एक सप्ताह में चार बार बारिश हुई, जबकि आस-पास का पूरा क्षेत्र सूखा बना रहा। हर बार बादल रहित अंतरिक्ष से तेज धूप में पानी गिरता पाया गया।

यह तो अंबर से खुले में होने वाली वर्षा की चर्चा हुई, पर यदि ऐसा कमरे के भीतर होने लगे, तो इसे क्या कहना चाहिए? अनुमान विज्ञजन स्वयं लगायें। एक इसी प्रकार की विचित्रता का वर्णन जी॰ सैंडरसन ने अपनी पुस्तक “दि मिस्टिरियस वर्ल्ड” में किया है। बात सितंबर 1955 की है। विंडमर, वरमोण्ट निवासी डॉक्टर विलियम वाटरमैन अपनी पत्नी के साथ जिस मकान में पिछले नौ वर्षों से रह रहे थे। वह अचानक रहस्यमय बन गया। एक विहान जब वे सोकर उठे, तो घर के अंदर के प्रत्येक सामान में बड़े-बड़े ओम-बिंदु देखकर विस्मय-विमुग्ध रह गये। उनकी समझ में यह बिलकुल नहीं आया कि कमरा रात में चारों ओर से पूरी तरह बंद रहने के बाद भी यह जल-कण कहाँ से कैसे आये? सोचा शायद कोई खिड़की किसी तरह खुल गई हो, जिससे रात की नम वायु कमरे में प्रवेश करने के कारण ऐसा हुआ हो। सभी वस्तुओं को पोंछा और सुखाया गया, पर यह क्या वे यह देखकर चकित रह गये कि अभी उन्हें सुखाये कुछ ही मिनट बीते होंगे कि फिर से उन पर जल-कण जमने लगे। उन्हें फिर पोंछा गया, किंतु पुनः वही दृश्य। आश्चर्य की बात तो यह थी कि बाहर धूप निकली हुई थी। इस प्रकार की विचित्र बारिश पाँच दिनों तक होती रही, फिर जिस प्रकार अचानक प्रारंभ हुई थी, वैसे ही स्वतः बंद हो गई। इस मध्य वाटरमैन परिवार पड़ोस के दूसरे मकान में टिके रहे और घर का सारा सामान बाहर पड़ा रहा। विशेषज्ञ अंत तक इसका कारण नहीं बता सके और न यह मालूम कर सके कि प्रकृति के नियमों की सर्वथा अवहेलना करते हुए ऐसा क्यों व कैसे हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं कि निसर्ग अपने इस कौतुक द्वारा “वाटरमैन” उपनाम की सार्थकता सिद्ध कर रहा हो?

अनुमान चाहे जो लगा दिया जाय, वह अटकल के अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं हो सकता। वास्तविक कारण तो उस बुद्धि द्वारा जाना जा सकता है, जिसमें घटना की गहराई में उतरने की सामर्थ्य हो। ऐसी बुद्धि प्रदान करने की क्षमता एक मात्र अध्यात्म में ही हे। इसका द्वार हर एक के लिए खुला हुआ है। जो भी चेतना को परिष्कृत कर सकने जितना पराक्रम दिखा सके, उनमें से प्रत्येक को यह सुविधा मिली हुई है कि वह अपनी सूक्ष्म बुद्धि द्वारा घटनाओं का यथार्थ कारण जान ले। इससे कम में भौतिक जगत का ही व्यापार चलता है, अध्यात्म जगत का नहीं। वह तो अविज्ञात का जखीरा है, अणोरणीयान् महतोमहीयान् है।


जीवन पद्धति वही ठीक, जो “मूड” को सही रखे

कई बार व्यक्ति की ऐसी अवस्था हो जाती है, जिसमें काम में मन नहीं लगता, फलतः वह आधा-अधूरा बन पड़ता है, निश्चित कर्तव्यों और दायित्वों की उपेक्षा होने लगती है, व्यवहार असामान्य हो जाता है और जिस कार्य की सफलता सुनिश्चित मानी गई थी, उसमें असफलता हाथ लगती है। ऐसा क्यों हुआ? पूछने पर पता चलता है कि “मूड” ठीक नहीं था।

आखिर यह “मूड” है क्या? मनोविज्ञानी जैजोंक के शब्दों में कहें, तो वह मानसिक अवस्था, जिसके अच्छे या बुरे होने पर व्यवहार क्रिया और परिणाम में तद्नुरूप अंतर दिखाई पड़ने लगे, सामान्य बोलचाल की भाषा में “मूड” कहलाती है। यों तो एक अस्थायी मनोदशा है, पर जब तक रहती है, आदमी को सक्रिय या निष्क्रिय बनाये रहती है। सक्रियता, उत्फुल्लता, स्फूर्ति, उत्साह, उमंग उस मनःस्थिति का नतीजा है, जिसमें वह सामान्य रूप में अच्छी होती है, जबकि बुरी मनःस्थिति में अंतरंग निष्क्रिय, निस्तेज, निराश और निरुत्साह युक्त अवस्था में पड़ा रहता है। इस प्रकार विनोदपूर्ण स्थिति में व्यक्ति यदि दिखाई पड़े, तो यह कहा जा सकता है कि वह अच्छे “मूड” में है, जबकि नैराश्यपूर्ण दशा उसके खराब “मूड” का द्योतक है।

विलियम एन॰ मोरिस ने अपने ग्रंथ “मूड-दि फ्रेम ऑफ माइण्ड” में मूड बनाने और बिगाड़ने वाली परिस्थितियों को चार वर्गों में विभाजित किया है। पहली श्रेणी में उन घटनाओं को रखा है, जो हलके विधेयात्मक या निषेधात्मक स्तर की हैं, दूसरे में संवेगात्मक प्रकरणों को सम्मिलित किया गया है, तीसरी कोटि भूतकालीन आवेगात्मक स्मृतियों की है, जबकि चौथे में वह निरोध शामिल है, जो आवेश उत्पन्न करने वाले प्रसंगों की भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को रोकता है। मोरिस के अनुसार इन सभी स्थितियों में मनोभाव प्रभावित होता है और घटना के भले-बुरे स्वभाव के अनुसार उसका निर्माण होता है। यहाँ तक संपूर्ण मनोविज्ञान जगत एकमत है, पर मूड-निर्माण संबंधी प्रक्रिया में विशेषज्ञों में पारस्परिक सहमति नहीं हो सकी है। “दि साइकोलॉजी ऑफ फीलिंग एण्ड इमोशन” नामक रचना में मनोविज्ञानी सी॰ ए॰ रुकमिक लिखते हैं कि उत्तेजना पैदा करने वाला उद्दीपन जब समाप्त हो जाता है, तो आवेग भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। इस निर्बल संवेग की अवस्था को ही वे “मूड” की संज्ञा देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो घनीभूत आवेश की तीव्रता जब समय के साथ छितराती है, तो वही “मूड” बन जाती है, जबकि “हैण्डबुक ऑफ सोशल काँग्निशन” नामक पुस्तक में एलीस एम॰ आइसेन कुछ भिन्न मत प्रकट करती हैं। उनका मानना है कि उत्तेजना और मूड साथ-साथ उत्पन्न होते और समानान्तर रह कर कार्य करते हैं। दोनों का प्रादुर्भाव एक ही घटना से होता है। वे किसी ऐसी प्रक्रिया से इनकार करती हैं, जो आवेग की निर्बलता के उपराँत “मूड” जैसी स्थिति पैदा करती हो। “मूड” को वह एक अवशिष्ट अवस्था मानती हैं, एक ऐसी सूक्ष्म अवस्था जो मनोवेग के आरंभ से पृष्ठभूमि में रहती तो है, पर तब तक स्वयं को अप्रकट स्तर का बनाये रहती है, जब तक आवेश एकदम क्षीण न हो जाय।

“मूड” संबंधी यह सैद्धाँतिक विवेचन समझ लेने के उपराँत हर एक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि वह सदा स्वस्थ मनोदशा में रहे। यदा-कदा वह कभी गड़बड़ा जाय, तो उसे तुरंत पूर्व स्थिति में लाने की कोशिश करनी चाहिए। जिसका मानसिक धरातल जितना लोचपूर्ण होगा, वह उतनी ही जल्दी अपने इस प्रयास में सफल होता प्रतीत होगा। जो जितना शीघ्र सामान्य मानसिक अवस्था में वापस लौट आता है, मनोविज्ञान की दृष्टि से उसे उतना ही स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कहा जा सकता है। महामानवों और महापुरुषों की मानसिक संरचना लगभग ऐसी ही होती है। वे क्रोधित नहीं होते, यह बात नहीं। गुस्सा वे भी करते हैं, पर जिस तीव्रता से वह प्रकट होता है, उसी गति से विलुप्त भी हो जाता है। सामान्य लोगों में यह विशेषता दृष्टिगोचर नहीं होती, इसी कारण से लंबे समय तक वह उससे प्रभावित बने रहते हैं। लगातार खराब “मूड” में बने रहने के कारण मन फिर उसी का अभ्यस्त हो जाता है और व्यक्ति अवसाद का पुराना रोगी बन जाता है।

मूर्धन्य व्यवहार त्रिज्ञानी एल॰ बुडजिया अपनी पुस्तक “डायमेन्सन्स ऑफ मूड” में अध्ययन का ब्यौरा देते हुए लिखते हैं कि आज के कठिन समय में जीवन की जटिलताएँ इतनी बढ़ गई हैं कि व्यक्ति अधिकाँश समय बुरी मनोदशा में बना रहता है। गाँवों की विरल आबादी से जैसे-जैसे वह शहरों के जनसंकुल वातावरण के निकट आता जाता है, वैसे-ही-वैसे पेचीदगियाँ बढ़ती जाती हैं। इसके बढ़ने से मानस पर उसका दबाव तदनुसार बढ़ता जाता है। प्रकाराँतर से यही दबाव खराब मनःस्थिति का कारण बनता है। उनका मानना है कि सभ्यता के विकास के साथ-साथ जीवन शनैः शनैः जटिल होता चला गया। आज से सौ वर्ष पूर्व मानवी जिंदगी जितनी सरल थी, अब वह वैसी रही नहीं। यही कारण है कि तब लोग खेल और मनोरंजन की तरह जितनी सहजता से तनाव रहित उन्मुक्त जीवन गुजार लेते थे, वैसा आज संभव नहीं। आदि मानवों का जीवन और भी सहज था। उन्हें न भोजन की चिंता थी न भविष्य की फिक्र। जब कभी भूख लगती जंगली कंद-मूलों एवं जंतुओं के शिकार से अपना पेट भर लेते नींद आती, तो पेड़ तले सो लेते, न घर बनाने की आकाँक्षा न संपत्ति जोड़ने की अकुलाहट, आज यहाँ, तो कल वहाँ-यही उनकी दिनचर्या थी। जहाँ इतनी सीधी सादी जिंदगी होगी वहाँ अंतःकरण प्रफुल्ल क्यों न रहेगा? वे कहते हैं कि जटिल जीवन से समस्याएँ बढ़ती हैं और उस बढ़ोत्तरी का असर मन की स्वाभाविकता पर पड़े बिना नहीं रहता।

अशाँत चित्त का दूसरा महत्वपूर्ण कारण गिनाते हुए वे लिखते हैं कि महत्वाकाँक्षाओं यों तो प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है, पर वह अनियंत्रित होने पर दुख-शोक का कारण बनती है। इन दिनों वह इस कदर बढ़ी-चढ़ी है, कि मनुष्य अधिकाधिक दौलत जुटा लेने,यश कमा लेने और वाहवाही लूट लेने की ही उधेड़बुन में हर घड़ी उलझा दिखाई पड़ता है। जीवन इसके अतिरिक्त भी कुछ है, उन्हें नहीं मालूम। बस यही अज्ञानता विषण्ण मनोदशा की निमित्त बनती है। यहाँ वे प्राच्य दार्शनिकों के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहते हैं कि जीवन के वास्तविक लक्ष्य को जब तक स्मरण नहीं रखा जायेगा, तब तक अवाँछनीय आकाँक्षाओं से ध्यान हटा पाना सरल नहीं और यदि ऐसा नहीं हुआ, तो हलके-फुलके जीवनक्रम की अभिलाषा कभी न उपलब्ध हो सकने वाली मृगतृष्णा बन कर रह जायेगी।

यह सच है कि आदमी का रहन-सहन जितना निर्द्वन्द्व व निश्छल होगा, उतना ही अनुकूल उसकी आँतरिक स्थिति होगी। इसके विपरीत जहाँ बनावटीपन, दिखावा, झूठी शान, प्रतिस्पर्धा होंगे, वहाँ लोगों की मनोदशा उतनी ही असामान्य होती है। एम॰ टी॰ मेडनिक और ए॰ मेहराबियन के प्रस्तुत सर्वेक्षण से यह बात स्पष्ट हो जाती है। सर्वेक्षणकर्ताओं ने आस्ट्रिया के कई शहरों में जाकर इस बात का अध्ययन किया कि शहरी वातावरण का मानवी मनोभावों पर क्या प्रभाव पड़ता है? प्राप्त परिणाम इस बात का स्पष्ट संकेत था कि भोले-भाले ग्रामीणों की तुलना में स्वभाव से अधिक चतुर-चालाक और कृत्रिमता को अपनाने वाले शहरी लोगों का “मूड” अपेक्षाकृत ज्यादा बदतर होता है। सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि नगर निवासियों में से 66 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनकी सप्ताह में औसतन पाँच से लेकर छः दिन तक मनोभूमि न्यूनाधिक अच्छी नहीं रहती। 31 प्रतिशत व्यक्ति ऐसे पाये गये, जो सप्ताह में तीन से चार दिनों तक खराब “मूड” के शिकार बने रहते। शेष तीन प्रतिशत में एक प्रतिशत से भी कम लोग ऐसे निकले, जो उस अशाँत परिस्थिति में भी स्वयं को स्थिर चित्त रखने में सफल होते पाये गये, जबकि शेष ऐसे थे, जो बहुत कठिन परिस्थितियों में ही इस रुग्णावस्था की गिरफ्त में आते।

मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि जब कभी मनःस्थिति खराब हो जाय, तो उसे अपने हाल पर अपनी स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया द्वारा ठीक होने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए। इसमें समय ज्यादा लंबा लगता है और शारीरिक-मानसिक क्षति की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए सलाह देते हुए वे कहते हैं कि इससे जिस भी प्रकार संभव हो सके, उबरने का शीघ्र प्रयास करना चाहिए। विलंब करना अपने आप को हानि पहुँचाने के समान है। अमेरिकन साइकियेट्रिक एसोसिएशन के “डायंग्नोस्टिक एण्ड ए स्टेटिस्टिकल मैनुअल” के अनुसार ऐसी मनोदशा, जिसमें रुचि और प्रसन्नता समाप्त हो जाती हो, इस स्थिति से उबर पाना जल्दी संभव नहीं होता। इससे बाहर निकलने और स्वस्थ सामान्य अवस्था में आने में करीब दो सप्ताह जितना समय लग सकता है। इतने लंबे समय तक अवसादग्रस्त स्थिति में बने रहने से शरीर के विभिन्न तंत्रों पर अनावश्यक दबाव पड़ने लगता है, जिसका प्रकट लक्षण विभिन्न प्रकार की असमानताओं के रूप में सामने आता है। ऐसी स्थिति में भूख बढ़ या घट सकती है। इसी प्रकार वजन, नींद, यौन क्रियाएँ आदि सामान्य स्तर से अधिक या कम हो सकती है। थकान, हीनभावना, कल्पना और चिंतन संबंधी अक्षमता जैसे दोष भी इस अवस्था में प्रकट हो सकते हैं। यह तो वे असमानताएं हुईं, जो व्यक्त होती और दिखाई पड़ती है। इसके अतिरिक्त ऐसे कितने ही दोष हैं जो अप्रकट स्तर के बने रहते हैं। इनमें आँतरिक क्रियाएँ और रक्त रसायनों की न्यूनाधिकता शामिल हैं। विशेषज्ञों के मतानुसार व्यथित मनोभूमि में एड्रीनल कार्ट्रेक्स से कोर्टिसोल नामक एक विशेष रसायन स्रावित होने लगता है, जिससे शरीर की चयापचय क्रिया असाधारण रूप से प्रभावित होती है। अवसादग्रस्त अवस्था में थाइराइड ग्रंथि के रस-स्राव पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ते देखा गया है। इसके अतिरिक्त और भी कितनी ही आँतरिक क्रियाओं को यह मानसिक दशा प्रभावित करती है। बाह्य लक्षणों में स्मरण शक्ति की कमजोरी, निर्णय ले सकने की अक्षमता, व्यवहार में चिड़चिड़ापन, क्रोध, आदि अनेक कमियाँ खराब “मूड” की स्थिति में उत्पन्न होते देखी जाती हैं। इसीलिए विशेषज्ञ बराबर इससे बचे रहने की बात कहते हैं।

उनके अनुसार यदि कभी “मूड” खराब हो जाय, ता एकाकी पड़े रहने की तुलना में मित्रों के साथ हँसी-मजाक में स्वयं को व्यस्त कर लेना, उससे उबरने का एक कारगर तरीका हो सकता है, पर इसके साथ जिस एक बात के प्रति मनोवैज्ञानिक सावधान करते हैं, वह यह कि “मूड” को चर्चा का विषय न बनाया जाय। इससे मनोदशा के सुधरने की अपेक्षा बिगड़ने की संभावना और बढ़ जाती है।

मनोदशा को दुरुस्त करने का एक अन्य तरीका भ्रमण भी हो सकता है। मनः शास्त्रियों का विचार है कि प्रकृति के संपर्क से मन जितनी तीव्रता से प्रकृतिस्थ होता है, उतनी तेजी से अन्य माध्यमों के सहारे नहीं होता देखा जाता, अतएव ऐसी स्थिति में पार्क, उपवन, बाग, उद्यान जैसा आस-पास कोई सुलभ स्थल हो, तो वहाँ जाकर मानसिक अवस्था को सुधारा जा सकता है। नियमित व्यायाम एवं खेल का सहारा लेकर भी मन की दरवस्था को घटाया-मिटाया जा सकता है।

आजकल अवसाद आदि मनोविकारों को भूलने के लिए शराब, गाँजा, भाँग, अफीम, ब्राउन सुगर जैसे नशीले पदार्थों का बहुतायत से सेवन हो रहा है। इनके प्रयोग से पूर्व यह बात जान लेनी चाहिए कि गमगलत करने में इनसे राहत जैसी अनुभूति अवसादग्रस्त को हो सकती है, पर यह कोई इलाज नहीं-महज विषाद को भुलाने का उपक्रम मात्र है। इससे स्थिति सुधरने की तुलना में और बिगड़ती चली जाती है, जिससे बाहर निकल पाना बाद में अत्यंत मुश्किल हो जाता है।

अंतिम उपचार अध्यात्म का है। यदि व्यक्ति भौतिकता में आध्यात्मिकता का समावेश करता चले और जीवन में आवश्यक संयम-नियम का अनुपालन करे, आवश्यकता से अधिक की आकाँक्षा और स्तर से ज्यादा की चाह में प्रवृत्त न रहे, तो मूड के खराब होने जैसी किसी भी कठिनाई से वह बचा रहेगा। यदि कभी इस बुरी मनोदशा से ग्रस्त हुआ भी, तो संयम और अनुशासन के कठोर अनुपालन के कारण जल्द ही उस स्थिति से बाहर आ जाता है। इस दृष्टि से अध्यात्मवादी अधिक लाभ में रहते हैं। वे जितनी निश्चिंततापूर्वक जीवन यापन करते हुए अपने सुनिश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ते चलते हैं, उतनी शाँति और संतुष्टि भौतिकता के चकाचौंध में जीने वालों में परिलक्षित नहीं होती। अतएव उत्तम यही है कि वैसा जीवनक्रम अपनाया जाय, जिसमें अवसाद भरी मनःस्थिति में पड़ने की समस्त संभावनाएँ ही निरस्त हो जायँ। जीवन पद्धति वही अच्छी है, जो हमें शाँति और संतोष प्रदान करे एवं चरम लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ाती चले।


दलदल से उबरने की रीति नीति

रेत में अनाज बिखर जाने पर उन्हें एक-एक करके बीनना पड़ता है। इन दिनों यथार्थता और प्रवंचना इस कदर आपस में घुल गई हैं कि उस मिली-जुली स्थिति में से हित-अनहित का, औचित्य-अनौचित्य का वर्गीकरण, विश्लेषण अतिकठिन हो गया है। यह कार्य कोई राजहंस जैसा नीर-क्षीर विवेक के कलाकौशल का धनी ही कर सकता है।

सायंकाल की संध्या के उपराँत सूर्य का प्रकाश धूमिल हो जाता है और अंधकार के घिरते आने का माहौल बनता जाता है। कुछ ही देर में अंध-तमिस्रा आ धमकती है और हाथ को हाथ नहीं सूझता। यही स्थिति मानवी चिंतन-चेतना की इन दिनों हो रही है। यों कहने को तो बुद्धिमत्ता बढ़ी है। शिक्षा में इजाफा हुआ है। चतुरता, कुशलता की बढ़कर ढींग हाँकी जाती है। इसके सबूत में प्रत्यक्षवादी भौतिक विज्ञान की उपलब्धियों को प्रस्तुत किया जाता है। प्रकृति के रहस्यों को जान लेने और उस पर आधिपत्य जमा लेने का दावा करने वाले को मूर्ख कैसे कहर जा सकता है? एक ओर जहाँ प्रस्तुत समझदारी की सराहना करनी पड़ती है। वहाँ दूसरे ही क्षेत्र उसकी स्थूल बुद्धि अविवेकशीलता भी पकड़ में आती है। उपलब्ध समझदारी को तात्कालिक लाभ पर अवलंबित अदूरदर्शिता ही कहा जा सकता है। विवेक की समग्रता इस बात पर निर्भर है कि दूरवर्ती परिणामों का सही अनुमान लगाते हुए किसी निर्णय निष्कर्ष पर पहुँचा जाय क्योंकि अदूरदर्शिता और दूरदर्शिता के आधार पर किए गए मूल्याँकनों में जमीन आसमान जितना अंतर होता है। तुरंत की उपलब्धि को ही सब कुछ मान लेने पर चिड़िया और मछली जाल में फँसती और प्राण गँवाती है। मक्खी चासनी की कड़ाही से उठने वाली गंध और बहुलता को देखकर इतनी आतुर हो जाती है कि धैर्यपूर्वक किनारे पर बैठकर उसका स्वाद लेते हुए पेट भरना संभव नहीं रहता। वह एक बारगी उस सारी संपदा को निगल जाना चाहती है। फल यह होता है कि पर और पैर दोनों ही चासनी में फँस जाते हैं। मजा उड़ाने के स्थान पर तड़पते हुए प्राण गँवाने पड़ते हैं। ऐसे ही प्रलोभनों में पतंगे को दीपक को निगल जाने के लालच में दुर्गति करानी पड़ती है। समझदारी इसमें है कि दूरवर्ती परिणामों पर विचार किया जाय और जो अंततः हितकर सिद्ध होता हो उसी को अपनाया जाय। इसके निमित्त यदि तात्कालिक लाभ छोड़ना पड़ता हो तो उसमें संकोच नहीं करना चाहिए।

किसान आरंभिक दिनों में बीज बोने, खाद पानी देने, निराई गुड़ाई में लगे रहने, रखवाली करने जैसे घाटे उठाता है। उसका विवेक कहता है कि समय आने पर अच्छी फसल उपलब्ध होगी। उसका अनुमान और अनुभव सही सिद्ध होता है। किसान घाटे में नहीं रहता जो त्यागता है उसकी तुलना में कहीं अधिक पाता है। व्यापारी व्यवसाय में पूँजी लगाकर आरंभिक दिनों में पूरी तरह अपनी जेब खाली कर देता है। विद्यार्थी स्नातक बनने की प्रतीक्षा में चौदह वर्ष की राम वनवास जितनी अवधि गुजारता है और इस बीच कड़ा परिश्रम करता है। फीस, पुस्तक, कापी आवागमन आदि के कितने ही दायित्व वहन करता है। पर अंततः वह समूचा श्रम सार्थक होता है। उच्च शिक्षा प्राप्त करके तब वह मूर्धन्य मनीषियों की पंक्ति में बैठता है। कोई बड़ा अधिकारी, अफसर बनता है। पहलवानों को भी दंगल पछाड़ने से पूर्व मुद्दतों अखाड़े में कड़ा अभ्यास करना पड़ता है। यदि उपरोक्त सज्जन अधीरता के वशीभूत होकर एक सोने का अंडा रोज देने वाली मुर्गी के सारे अंडे एक दिन में ही प्राप्त करने के लिए उसका पेट चीर डालें तो उस लालच का बुरा परिणाम विवशतापूर्वक सहन करेंगे।

अधीर लोग तात्कालिक लाभ देखते हैं और दूरगामी परिणामों पर नजर उठाकर भी नहीं देखते। इसी का परिणाम है कि जीभ के स्वाद को सब कुछ समझने वाले चटोरे व्यक्ति अधिक मात्रा में अभक्ष्य उदरस्थ करते रहते हैं और पाचन तंत्र को बिगाड़ कर अनेकानेक रोगों के शिकार बनते हैं। कामुकता के वशीभूत लोगों को तात्कालिक रसास्वादन ही सब कुछ दीखता है। यौनाचार में अति बरतते हैं और जीवनी-शक्ति गँवा कर खोखले हो जाते हैं। मस्तिष्कीय प्रतिभा पलायन कर जाती है। आलसी, प्रमादी लोग तात्कालिक श्रम से बचे रहने में सुविधा समझते हैं फलतः योग्यताओं और सफलताओं से वंचित रहकर अपंग-अपाहिजों की स्थिति अपना लेते हैं। नशे जैसे दुर्व्यसनों के शिकार होकर अपनी स्वस्थता, अर्थव्यवस्था, प्रतिष्ठिता, पारिवारिकता को भारी क्षति पहुँचाते हैं। प्रदर्शन-प्रिय अपव्ययी भी यही करते हैं। सज-धज ठाट-बाट सस्ती वाहवाही, नकली अमीरी के माध्यम से बड़े आदमी बनने की ललक में फँसते हैं। अंततः हर विचारशील की दृष्टि में ओछे, बचकाने, अप्रामाणिक बनते हैं। पैसा और समय अपना गँवाते हैं, साथ ही हर समझदार की दृष्टि में अपना मूल्य गिराते चले जाते हैं।

ऐसा लगता है कि इन दिनों अदूरदर्शिता का ही बोलबाला है। अपराधी गतिविधियाँ अपनाकर लोग तुर्त-फुर्त धनी बनना चाहते हैं। ऐसा अनेकों करते भी हैं और कुछ कमा भी लेते हैं। पर साथ ही इतना गँवाते भी चलते हैं। जिसकी क्षति-पूर्ति किसी भी प्रकार नहीं हो सकती। प्रामाणिकता गँवा बैठने वाला अविश्वासी किसी का भी सच्चा सम्मान, विश्वास या सहयोग प्राप्त नहीं कर सकता। धूर्तता का प्रकट होकर रहना सुनिश्चित है। हींग की गंध बँधी पोटली को छेद कर भी हवा में फैलती है। कच्चे पारे को खाकर हजम नहीं किया जा सकता वह शरीर के अनेक अंगों को छेदकर व्रण रूप में बाहर निकलता है। काठ की हाँडी दूसरी बार आग में नहीं चढ़ती। कागज की नाव पानी में दूर तक नहीं तैरती। छल-प्रपंच से भरा हुआ अपराधी, अनाचार करते रहने पर अधिक देर तक अपनी वस्तु स्थिति छिपाए नहीं रह सकता। पर्दाफाश होने पर पूर्व परिचितों के सामने ठहरते नहीं बन पड़ता। तब उसे अन्यत्र डेरा डालना पड़ता है। एक के बाद दूसरा स्थान बदलना पड़ता है। सारा जीवन इसी प्रकार उलट-पुलट में निकल जाता है। अंततः हिसाब लगाने पर प्रतीत होता है कि यदि कुटिलता का मार्ग न अपनाया होता, सीधे मार्ग पर चला गया होता तो अन्यत्र सज्जनों की तरह अपनी प्रतिष्ठा भी अक्षुण्ण रही होती और महामानवों की तरह लोक सम्मान के आधार पर उच्च स्थिति उपलब्ध करते हुए उस स्थान तक पहुँचा गया होता जिसे चोर-उचक्के भगीरथ प्रयत्न करने पर भी, कभी भी हस्तगत नहीं कर सकते। छद्म अपनाया जाय या सत्य, इनके चयन में अदूरदर्शिता छद्म का पक्ष लेती है। सत्य का अवलंबन लेने के निर्णय तक पहुँचना मात्र दूरदर्शी विवेक के आधार पर ही संभव होता है। इतनी मोटी बात भी उनकी समझ में नहीं आती जो बिना प्रतीक्षा-परिश्रम किए, जैसे भी बने वैसे बढ़-चढ़ कर लाभ प्राप्त करने की आतुरता प्रदर्शित करते हैं। उन्हें कुमार्ग पर चलना और दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है।

बुद्धि-वैभव कितना ही क्यों न हो, चतुरता कितनी ही बढ़ी-चढ़ी हो पर वह दूरदर्शिता अपनाए बिना अँधेरे में ही भटकती है। पग-पग पर ठोकरें खाती है। इसलिए श्रेयस्कर एवं हितकर यही है कि हर प्रसंग को विवेक की कसौटी पर कसा जाय और यह देखा जाय कि किस मार्ग पर चलते हुए अंततः कहाँ पहुँचा जायगा। लक्ष्य निर्धारण को ही इष्टदेव कहते हैं। यह उच्च स्तरीय उत्कृष्ट होना चाहिए। उसे प्राप्त करने के लिए आवश्यक त्याग, पुरुषार्थ करने के लिए अपने आप को तैयार करना चाहिए। सही स्तर की बढ़ी-चढ़ी सफलता का यही राजमार्ग है। उसे छोड़कर कँटीली पगडंडी में हम पाते कम और गँवाते अधिक हैं।

लगता है आस्था संकट की इस वेला में चारों ओर अदूरदर्शिता ही सघन तमिस्रा बनकर हर दिशा में, हर क्षेत्र में छाई हुई है। लोग उसी के कुचक्र में दिग्भ्राँत की तरह भटकते, ठोकरें खाते और एक दूसरे से टकराते हुए देखे जाते हैं। पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि लोग वस्तु स्थिति समझने का प्रयत्न नहीं करते। अंधी भेड़ों की तरह एक दूसरे के पीछे चलते और बेहिचक पंक्तिबद्ध होकर गहरे गर्त में गिरते हैं। बहुमत जिस समुदाय का होता है, वही चुनाव जीतता है। लगता है अदूरदर्शिता का ही प्रबल बहुमत हो चला है। फलतः संचालन और नियंत्रण भी इसी वर्ग का हो रहा है। व्यक्ति का, समाज का, हर वर्ग इसी प्रक्रिया से प्रेरित, नियंत्रित हो रहा है। हम अदूरदर्शिता के दल-दल में इतने गहरे धँस गए हैं कि वस्तु स्थिति समझने और उबर कर नवजीवन प्राप्त करने का प्रयत्न तक नहीं कर पा रहे हैं। जो ढर्रा चल पड़ा है उसी के साथ प्रवाह में बहते पत्ते की तरह निश्चेष्ट होकर किसी अनिश्चित दिशा में अनिष्ट की ओर बहते जा रहे हैं।

एक-एक करके जीवन के सभी क्षेत्रों की परीक्षा करें तो सुविधा रहेगी। दिनचर्या पर दृष्टिपात करें तो प्रतीत होता है कि समय संपदा का मूल्याँकन कोई नहीं करता, यदि किया गया होता तो आजीविका उपार्जन ही नहीं योजना अभिवर्धन के लिए सामाजिक हितसाधना के लिए भी ढेरों समय निकल आता। संत विनोबा भावे ने व्यस्त जीवन के बीच ही संसार की प्रमुख 23 भाषाओं का अध्ययन कर लिया था। अनेक सद्गृहस्थों ने समय का वर्गीकरण और सदुपयोग करके इतने महत्वपूर्ण कार्य कर डाले जिनकी यशगाथा सुनकर हर सुनने वाले को पुलकित होना पड़ता है। पर हम में से कितने हैं जो समय सारिणी सही तरह निर्धारित करते हैं, और अपने समय का ऐसा सदुपयोग करते हैं जिसकी प्रतिक्रिया से न केवल स्वयं लाभान्वित हों वरन् अन्य अनेकों के लिए भी अनुकरणीय बनें। वस्तुतः “टाइम मैनेजमेंट” से बढ़कर व्यवस्था बुद्धि का सही रूप कोई और है नहीं।

जीवन का प्रमुख आधार आहार है। मनुष्य का प्राकृतिक आहार फल-शाक है। उसमें मसालों का सफेद शक्कर का, खनिज नमक का, गरिष्ठ चिकनाई का, माँस का, कहीं कोई स्थान नहीं है। फिर भी देखते हैं कि जो कुछ थाली में आता है, उसमें हितकर का अंश कम और अहितकर का अधिक होता है। स्वाद ही खाद्य के चयन का प्रमुख आधार बनकर रह गया है। स्वाद के लालच में मात्रा भी इतनी उदरस्थ की जाती है जिसको पचा सकना सीमित सामर्थ्य वाले पेट के लिए असंभव तो नहीं पर कठिन अवश्य होता है। यही वह भूल है जो दुर्बलता, रुग्णता, अकाल मृत्यु आदि अनेकानेक अभिशापों को लेकर सिर पर आ धमकती है।

मन, मस्तिष्क की उर्वरता, कल्पनाओं, विचारणाओं पर निर्भर करती है। विचार ही कर्म बनते हैं। कर्म से परिस्थितियाँ विनिर्मित होती हैं और वे ही उत्थान-पतन का आधारभूत कारण बनती हैं। ऐसी बहुमूल्य संपदा को आमतौर से इतना उच्छृंखल, अनियंत्रित बनाया जाता है कि कल्पनाएँ बेलगाम घोड़े की तरह किसी भी क्षेत्र में चढ़ दौड़ती हैं। अपनी सामर्थ्य का अपव्यय करती हैं। इतना ही नहीं, ऐसे प्रसंगों में रुचि लेने लगती हैं जो खरपतवार की तरह असाधारण रूप से उगते और समूची फसल पर छा जाते हैं। कुकल्पनाओं का कारण ही है कि मनुष्य कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाता। शेखचिल्ली जैसे असंभव, अनुपयुक्त सपने देखता है और वह करता है जो नहीं करना चाहिए। वह सोचता है जो नहीं सोचना चाहिए। विचार क्षेत्र में अराजकता छाई रहती है। फलतः सब से मूल्यवान मस्तिष्कीय शक्ति का दुरुपयोग होता रहता है। व्यक्ति अपने ही पैरों आप कुल्हाड़ी मारता रहता है। यदि विचारों को आदर्शों के साथ जोड़कर रखा गया होता तो निश्चित ही हर कोई सामान्य परिस्थिति में जन्मा अभावग्रस्त व्यक्ति अब्राहम लिंकन, जार्ज वाशिंगटन, गारफील्ड की तरह किसी बड़े राष्ट्र का राष्ट्रपति बनने की स्थिति तक पहुँच गया होता। उच्च कोटि का विद्वान, समाजसेवी आदर्शवादी महामानव बनकर रहा होता। पर उस अदूरदर्शिता को क्या कहा जाय, जो न समय सारिणी बनाने देती है, न आहार का चयन करने देती है और न विचार प्रवाह को कोई उपयुक्त दिशाधारा में चलते रहने की स्थिति उत्पन्न होने देती है।

अर्थ-उपार्जन सर्वोपरि उद्देश्य बनकर रह रहा है। यह उचित भी है और आवश्यक भी। पर ध्यान यह भी तो रहना चाहिए कि अपने पसीने का कमाया ईमानदारी की कसौटी पर खरा कसा गया धन ही फलता-फूलता है। उसी का सदुपयोग बन पड़ता है। अनीति युक्त, बिना परिश्रम का, धन भले ही कितनी ही बड़ी मात्रा में जमा कर लिया गया हो पर उसको उस संयम के साथ खर्च नहीं किया जा सकता है जैसा कि “सादा जीवन उच्च विचार” का सिद्धाँत अपनाने वाले औसत नागरिक स्तर अपनाने वालों को प्रयुक्त करना चाहिएं निताँत आवश्यक उपयोग करने की बात को सदा ध्यान में रखने वाले उचित आत्मोत्कर्ष को प्राप्त होते तथा परिवार को सुसंस्कारी बनाते हैं। जन हितार्थ अंशदान में पैसा खर्च करने की सूझबूझ उन्हीं में रहती है जो उपार्जन एवं उपयोग के बीच आदर्शवादी औचित्य का तालमेल बिठाए रहते हैं। धन कमाना, श्रम एवं कौशल पर निर्भर करता है। पर उसका खर्च सही ढंग से कर पाना गहरी सूझबूझ का काम है। देखा जाता है कि लोग अनीतिपूर्वक कमाते हैं और इस तरह खर्च करते हैं मानो वह मुफ्त में कहीं पड़ा हुआ पाया गया हो जिसका दुर्व्यसनों के अतिरिक्त और कोई उपयोग सूझता ही न हो। यदि धन की पवित्रता और उपयोगिता पर ध्यान रखा गया होता तो जितना पैसा लोगों के पास है उतने से ही देवोपम जीवन जी सकना संभव हो गया होता और मिल बाँट कर खाने की प्रवृत्ति अपना लेने से वातावरण स्वर्गोपम सुख शाँति से परिपूर्ण बन गया होता। पर आज तो सब कुछ उलटा ही हो रहा है। अधिक कमाने की ललक किसी हद तक पूरी होते रहने पर भी फूटे घड़े में भरे हुए पानी की तरह उपार्जन अस्त-व्यस्त कामों में खर्च हो जाता है और दरिद्रता-अभावग्रस्तता यथावत् बनी रहती है। नजर पसार कर देखने पर यह स्थिति सर्वत्र दीख पड़ती है। धनी निर्धन सभी अपने-अपने ढंग एवं कारणों से चिंतित दिखाई पड़ते हैं। इस क्षेत्र में सुख संतोष उपलब्ध करते किन्हीं विरलों को ही देखा जा सकता है।

जीवन के साथ जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण पक्ष है परिवार। जो किया या कमाया जाता है वह मात्र शरीर के लिए ही नहीं होता। योजनाओं और गतिविधियों में बहुत बड़ा भाग परिवार पोषण का रहता है। पर यह कार्य किस प्रकार ठीक तरह किया जा सकता है इसकी रूपरेखा बहुत कम लोगों के मस्तिष्क में रहती है।

उचित उपयुक्त यह है कि जिन परिजनों की उपस्थिति पहले से ही है, उन्हें संतुष्ट, सुखी, समुन्नत, स्वावलंबी, सुसंस्कृत बनाने के लिए सामर्थ्य-भर आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक साधन जुटाए जायँ। चूँकि मनुष्य परिवार के बीच ही पलता, बढ़ता है। इसलिए उस संस्था का अत्यधिक ऋण चढ़ा होता है। इस पारिवारिक ऋण का चुकाना आरंभ करने के लिए प्रत्येक को समर्थता आरंभ होते ही प्रयत्नरत होना चाहिए। वयोवृद्ध, जीर्ण-शीर्ण, होने लगते हैं उन्हें शारीरिक सहायता, मानसिक निश्चितता और उचित प्रतिष्ठा की आवश्यकता पड़ती है।

अपने से छोटी आयु वाले योग्यता की दृष्टि से पिछड़े हुए बच्चे तथा महिलाएँ यह सभी वर्ग ऐसे हैं जिन्हें सुयोग्यों की सेवा सहायता अनेक संदर्भों में चाहिए। अपनी सहायता जिसने भी की हो, वे ही उसका प्रतिफल भी प्राप्त करें। परिवार संस्था के किन्हीं सदस्यों ने जिस स्तर के अनुदान दिए थे उन्हें दूसरे रूप में अन्य सदस्यों को चुकाया जा सकता है। हर संयुक्त परिवार में कई सदस्य होते हैं उनकी आवश्यकताएँ भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं। इन साधनों के जुटाने में अपना श्रम, समय और साधन लगें तभी परिवार ऋण से मुक्ति मिलती है। इसलिए यह देवसंस्कृति की मान्यता है कि पिछला ऋण चुकाए बिना नया उत्तरदायित्व ओढ़ना अनुचित है। विवाह करके एक नया सदस्य तो बढ़ता है परंतु तुरंत नये अभ्यागत ला खड़े करना अदूरदर्शिता की निशानी है। परिवार के निर्वाह संबंधी इस जीवन व्यवहार को व्यावहारिक अध्यात्म के हर पक्ष के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए व सोचना चाहिए कि हम से भूल कहाँ व कैसे हुई, कैसे उसे सुधारें, व जीवन की आगामी रीति-नीति का निर्धारण करें?

जीवन जीने की कला हमें यही सिखाती है कि हम समय संपदा से लेकर आहार व विचार प्रवाह तक अर्थोपार्जन व पारिवारिक निर्वाह तक के सभी पक्षों पर सतत् विवेक सम्मत चिंतन करते रहें तो निश्चित ही सफलता, सुख शाँति व आत्मिक प्रगति की लक्ष्य सिद्धि होकर रहेगी।


ईर्ष्याग्नि को शाँत करना ही सच्ची बुद्धिमत्ता

ईर्ष्या मन का सीधा भाव नहीं है। वह कई भावों की संयुक्त प्रतिक्रिया है। ईर्ष्या का जन्म एक तरह की निराशा में से होता है। यह निराशा दूसरे की सफलता को देखकर अपने पीछे रह जाने की भावना से अथवा अपनी असफलता का स्मरण कर दूसरों की सफलता के प्रति होती है। ईर्ष्या का प्रारंभ तो लाभ की सामान्य कामना से ही होता है, किंतु उसका विकसित रूप अत्यंत विकृत हो जाता है। किसी के पास कोई वस्तु विशेष या गुण-विशेष देखकर स्वयं के पास भी उसके होने की इच्छा उत्पन्न होती है। यह लाभ सामान्य कामना मात्र है। उसके प्रति विशेष उत्तेजना बढ़ने पर यह तो भूल जाता है कि निश्चित प्रक्रिया पर चलकर हम स्वयं भी उस वस्तु विशेष को पाने का प्रयास करें, यह राज मार्ग है। इसके स्थान पर ऐसी संकीर्ण भाव भूमि बनने लगती है कि यही गुण या यही वस्तु उसके पास न होकर हमारे पास होती तो अच्छा था। एक बार ऐसी भाव भूमि बन गई तो फिर किसी प्रकार उस व्यक्ति के पास से वह वस्तु या गुण छिन जाय या उसका मूल्य कम कर दिया जाय, उसे नकली सिद्ध कर दिया जाय, गुण को अवगुण या पाखंड प्रचारित कर दिया जाय, ऐसी विकृत योजना मस्तिष्क में बनने लगती है यह सर्वाधिक दूषित मनःस्थिति है। दूसरों जैसी उपलब्धियाँ स्वयं अर्जित कर लेने की सही इच्छा से तो लोक में समृद्धि और गुणों की ही वृद्धि होगी, किंतु दूसरे की संपन्नता-श्रेष्ठता के प्रति बढ़ी हुई ईर्ष्या स्वयं की समृद्धि और उत्कृष्टता का उतना विचार नहीं करती है। इस प्रकार के अपकर्ष की घृणित कामना में बदल जाती है तथा इस प्रकार स्वयं अपना आत्मिक अपकर्ष तो तत्काल ही कर डालती है।

इस प्रकार ईर्ष्या बहुत ही जटिल मनोविकृति का रूप धारण कर लेती है। उससे न तो स्वयं का ही कोई लाभ सधता है, न ही औरों का। तो भी वह एक प्रबल प्रेरक शक्ति है। आज की परिस्थितियों पर दृष्टिपात करें तो चारों ओर ईर्ष्या का ही साम्राज्य फैला दिखेगा। भाई-भाई से ईर्ष्या करता है, पड़ोसी-पड़ोसी से। जातियों, संगठनों, दलों, संप्रदायों, राष्ट्रों के बीच ईर्ष्या की आग फैली हुई है। महिलाएँ ममता, सद्भावना, कोमलता, उदारता, आत्मोत्सर्ग की मूर्ति होती हैं। किंतु उनमें भी ईर्ष्या के भयानक विषवृक्ष की जड़ें गहराई तक प्रविष्ट हो गई दिखाई देती हैं। एक नारी दूसरी नारी के प्रति संवेदनशील उतनी अधिक नहीं रह पाती जितनी कि ईर्ष्या से भर उठती देखी जाती है। यह कुसंस्कार लंबी उपेक्षा के परिणाम स्वरूप उनमें भी गहराई तक प्रविष्ट हो चुका है। समाज में फैले संघर्षों का मूल मुख्यतः ईर्ष्या होती है।

ईर्ष्यालु व्यक्ति स्वयं के उत्कर्ष का प्रयास करना तो भूल ही जाता है, दूसरों के मार्ग में रोड़े अटकाने और उन्हें किसी प्रकार हानि पहुँचाने का प्रयास ही करते रहने में अपनी शक्ति का अपव्यय करता है। यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा नहीं है, अपितु मन की कुटिलता का परिणाम मात्र है।

ईर्ष्या की आग औरों का अहित भी करती है, पर इस अहित से ईर्ष्यालु का तो कोई लाभ होता नहीं, समाज का भी अमंगल ही होता है। स्वयं ईर्ष्यालु को तो यह आग हर क्षण उसी प्रकार जलाती रहती है जैसे अँगीठी की आग संपर्क में आने वाली वस्तु या व्यक्ति को तो कभी-कभी ही जला पाती है किंतु स्वयं अँगीठी के कालेज में हर क्षण तपन ही भरे रहती है। इसी ताप से लोहे की अँगीठियाँ भी थोड़े ही समय में जल-जलकर जीर्ण-शीर्ण बेकार होकर झड़ जाती हैं। ईर्ष्यालु भी ईर्ष्या की दाहकता से निरंतर तृप्त रहता है, उसके मन-मस्तिष्क निरंतर क्षीण से क्षीणतर होते जाते हैं और शरीर डाह से झुलसकर निःशक्त हो जाता है।

ईर्ष्यालु, व्यक्ति उन्नत स्थिति में कदाचित् ही पहुँच पाते हैं, जो उस स्थिति में मिलते भी हैं, वे या तो संयोगवश वहाँ पहुँचे होते हैं या फिर दूसरों के कंधों पर बैठकर। स्वयं के पुरुषार्थ से उन्नति के शिखर पर पहुँचे व्यक्ति में भी यदि ईर्ष्या दिखाई दे तो वह उन्नति के उपराँत औरों से संक्रमित इस रोग के विषाणुओं का प्रभाव होगा, उन्नति मार्ग पर बढ़ते समय तो उनमें लक्ष्यनिष्ठा, श्रमशीलता, प्रखरता और पुरुषार्थ-परायणता की ही प्रधानता रही होगी। फिर यह भी निश्चय है कि उच्च स्थिति में पहुँचने के बाद भी यदि किसी में ईर्ष्यालु वृत्ति आ गई होगी, तो वह उनके पतन का कारण ही बनेगी उन्नति में सहायक सिद्ध नहीं हो सकती।

ईर्ष्यालु व्यक्ति के व्यक्तित्व की प्रभाव शक्ति समाप्त हो जाती है वह सदा दूसरों की बुराई करता, उनके छल-छिद्र ढूँढ़ता देखा जा सकता है। दूसरों की उन्नति और सुख शाँति, तो वह कभी सह ही नहीं पाता। झूठी आलोचनाएँ, मिथ्या दोषारोपण और दूसरों के कार्यों का अवमूल्यन करना उसके स्वभाव का अंग बन जाते हैं। इससे उसके व्यक्तित्व और प्रकृति में रुक्षता एवं कटुता घर कर डालती है। परिणाम स्वरूप दूसरों की निगाहों में वह गिर जाता है। लोगों के मन में उसके जीवन में रिक्तता और अकेलापन बढ़ जाता है। क्योंकि ईर्ष्या का आधार ही आत्मीयता का अभाव हुआ करता है जिसे अपना समझा जाय, इससे ईर्ष्या तो हो ही नहीं सकती। अपनों की प्रगति और सफलता से तो मन प्रसन्न ही होता है।

ईर्ष्या बैर से भी बुरी स्थिति है। बैर उससे होता है, जिससे अपनी किसी वास्तविक हानि की आशंका या संभावना होती है। उस स्थिति में तो अपनी लाभ-हानि का विचार भी नहीं रह जाता। एक अंधी जलन होती है जिसका उद्देश्य तो जिससे ईर्ष्या हो, उस व्यक्ति को जलाकर खाक कर देना होता है किंतु परिणाम, जिसके भीतर वह जलन है उसी के जल-भुन कर खाक बन जाने के रूप में सामने आता है।

यों, ईर्ष्या का जन्म सामाजिक जीवन की विषमता और कृत्रिमता से होता है। किसी के पास कितना भी धन हो, पर उस धन के कारण यदि उसे समाज में अधिक प्रतिष्ठा न मिल रही हो या विशेष सुविधायें न मिल रही हों, तो उसके प्रति ईर्ष्या उत्पन्न नहीं होती। जबकि दूसरों को मिल रही प्रशंसाओं-सुविधाओं और सम्मान से अपनी वास्तविक हानि न हो रही हो, तो भी उसके प्रति ईर्ष्या भड़क उठती है। प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य और गुणों से गुप्त रूप से यदि कोई संतोष-सुख मिलता रहे, तो उससे ईर्ष्या का जन्म नहीं होता। ईर्ष्या तो उन गुणों और ऐश्वर्य से समाज में उत्पन्न होने वाली धारणाओं को देखकर उभरती है। इससे स्पष्ट है कि उसकी पृष्ठभूमि समाज में होती है। जबकि इसी कारण व्यक्ति को समाज में असम्मान और तिरस्कार का भागी बनना पड़ता है। इस प्रकार ईर्ष्या जिस प्रयोजन से उत्पन्न होती है, वह कभी पूरा नहीं हो पाता।

ईर्ष्या की एक दूसरी विसंगति यह है कि वह होती तो उन्हीं के प्रति है, जिनसे अपना कोई न कोई संबंध या तो होता है, या होने की संभावना होती है किंतु उसमें अपनत्व भावना नहीं होती। हरिद्वार में रहने वाले किसी सेठ को सहारनपुर, मेरठ, लखनऊ, दिल्ली के ही किसी धनिक से ईर्ष्या हो सकती है, अमेरिका जापान या जर्मनी में किसी धनपति से तब तक नहीं जब तक कि उसका व्यापार क्षेत्र उन लोगों के व्यापार क्षेत्र से टकराया न हो। एक हिंदी लेखक में जर्मनी के किसी लेखक की प्रतिष्ठा से ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती। विचार कर देखा जाय तो अपनों के प्रति उत्पन्न यह ईर्ष्या अपनत्व के अभाव का ही परिणाम सिद्ध होगी।

यह जलन प्राप्त की कामना से ही नहीं उत्पन्न होती। स्वयं के पास यदि कोई वस्तु या गुण है, जिससे कि प्रतिष्ठा और सुख सुविधा प्राप्त होती है, तो साथ के या आसपास के दूसरे लोगों को वह न मिल पाए, यह भावना भी ईर्ष्या को जन्म देती है। वे भी उस दिशा में प्रयत्न कर रहे हों, तो उन प्रयत्नों की विफलता की कामना बलवती होने पर उस हेतु षड्यंत्रकारी हथकंडे अपनाने की भी प्रेरणा देते हैं।

प्रत्येक स्थिति में ईर्ष्या का एक ही परिणाम होता है-समाज में समृद्धियों-विभूतियों की कमी। दूसरों जैसा स्वयं भी ऐश्वर्य-संपन्न और गुण संपन्न बनने का प्रयास किया जाय, तो इससे स्वयं का भी हित हो और समाज में सुखी-समृद्ध गुणी लोगों की संख्या भी बढ़े, किंतु ईर्ष्या की प्रेरणा और प्रतिक्रिया तो इससे सर्वथा विपरीत होती है। अतः व्यक्ति और समाज का सर्व प्रकार से अमंगल करने वाले इस विषवृक्ष को निकाल फेंकना ही उचित आवश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम तो आत्मीयता का विस्तार आवश्यक है। संपूर्ण मानव समाज एक इकाई है, एक ही माला में बँधे मनके हैं, एक ही वृक्ष के फल हैं, एक ही समुद्र की तरंगें या एक ही विशाल नदी की लहरें हैं। यह सत्य अपने अनुभव क्षेत्र में और चिंतन क्षेत्र में मन-मस्तिष्क अंतःकरण में आत्मसात कर लेने पर ईर्ष्या क्षण भर भी ठहर नहीं सकती।

अपनी असफलता, निराशा और हीन स्थिति के कारण मन में ईर्ष्या को न पनपने दें, अन्यथा यह दुस्थिति बढ़ने ही वाली है, घटेगी नहीं। पहली बात तो यह है कि मनुष्य जीवन में असफलता और सफलता दोनों का ही होना स्वाभाविक है, उसमें ऐसी अधीरता की कोई बात नहीं। दूसरे असफलता, सफलता का मार्ग ही प्रशस्त करती है। असफलता के कारणों पर भलीभाँति विचार कर, पूर्व की त्रुटियों का परिमार्जन कर नये सिरे से प्रयत्न प्रारंभ करें परिश्रम और लगन के साथ अग्रसर हों, तो सफलता मिलनी कठिन नहीं। दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करने के स्थान पर यदि उनकी सच्ची प्रशंसा की गई उन्हें बधाई दी गई तो उनमें से अनेक मित्र, प्रियजन एवं सहायक के रूप में सामने आ सकते हैं और सफलता की दिशा में अग्रसर होने में सहायक हो सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में अनोखा और अद्वितीय है। दूसरे उसका स्थान नहीं ले सकते। उद्यान के प्रत्येक वृक्ष की अपनी शोभा है और खेत के प्रत्येक पौधों का अपना महत्व है। इसलिए परस्पर सहयोग से एक दूसरे को विकसित होने का अवसर दें, इसी में बुद्धिमत्ता है। अन्य सभी नष्ट हो जायँ हम अकेले ही जीवित रहें यह सोचना ओछेपन का चिह्न है। उद्यान में जो शोभा है वह एकाकी रहने पर किस वृक्ष से मिल सकेगी।

जिस समाज में प्रतिभाशाली लोग पर्याप्त होंगे, वहीं प्रतिभाओं की कद्र होगी। पिछड़े लोगों को तो कोई ओछा ठग भी मूर्ख बना लेगा और आपकी प्रतिभा कौड़ी कीमत की सिद्ध हो जायेगी।

इन सब तथ्यों पर विचार करते हुए, मनन शक्ति के आधार पर ईर्ष्या को समाप्त कर दिया जाय, इसी में व्यक्ति का भी उत्कर्ष है और समाज का भी। वेद का यही आदेश है--

“जनाद् विश्वजनीनात् सिन्धुतस्पश्रर्या भृतम्। दूरात्वाभन्य उद्भृतमीपर्यायाऽनाम भेशजम्॥

अग्ने विवास्थ दहतो दावस्य दहतः पृथक्। एतामेतस्ये यमुग्दाग्निमिब शमय॥” (अथर्व 7/44/12)

“समुद्र के समान गंभीर, करुणा रस से पूर्ण है विचार-शक्ति मनन शक्ति मनुष्य के कल्याण के लिए बड़ी कठिनाई से तुझे ईर्ष्या की प्रसिद्ध औषधि के रूप में ग्रहण कर उत्तम प्रकार से तेरा पालन किया और तुझे धारण किया है। दावानल की तरह मनुष्यों को पृथक्-पृथक् जलाती रहने वाली ईर्ष्याग्नि तू उसी प्रकार शाँत कर जैसे जल अग्नि को शाँत करता है।”

“हे समुद्र-सी गंभीर करुणापूरित विचार-सामर्थ्य तू ईर्ष्या की प्रसिद्ध औषधि है। इसी रूप में तूने जन’-कल्याण के लिए ग्रहण किया है और बड़ी कठिनाई से तेरा उत्तम रीति से पालन करते रहते हैं।”

“हे मनस् शक्ति! तू इस मनुष्य को दावानल की तरह पृथक्-पृथक् जलाती रहने वाली ईर्ष्याग्नि को उसी प्रकार शाँत कर, जिस प्रकार जल अग्नि को शाँत करता है।”


मनोनिग्रह का नाम ही संन्यास (Kahani)

एक युवक बड़े उद्धत स्वभाव का था। बात-बात पर आग-बबूला होता और कहने, समझाने पर संन्यासी हो जाने की धमकी देता। परिवार वालों ने आये दिन की खिच-खिच से तंग आकर, उसे संन्यास की छूट दे दी।

समीप ही नदी किनारे एक संन्यासाश्रम था। उसकी जानकारी भी युवक को थी, सो वह सीधा वहीं पहुँचा। उसके संचालक ने पहले ही उसकी उद्दण्डता सुन रखी थी। पहुँचा, तो रास्ते पर लाने का विचार करते हुए, और भी अधिक स्नेह दिखाते हुए पास बिठाया। संन्यास दीक्षा का प्रस्ताव किया, तो उसे दूसरे दिन देने की अनुमति मिल गयी।

दीक्षा के विधान में पहला कर्म था, समीपवर्ती नदी में दिन निकलने के पूर्व स्नान करके लौटना। आलसी प्रवृत्ति और ठंड से डरने वाले स्वभाव में यह निर्धारण उसे अखरा तो बहुत, पर करता क्या, नियम पाले बिना कोई चारा भी न था।

जिन कपड़ों को खूँटी पर टाँग कर युवक नहाने गया था। आश्रम के संचालक ने उन्हें फाड़ कर चिथड़े-चिथड़े कर दिया। काँपता-थरथराता वापस लौटा, तो कपड़े फटे पाये। गुस्सा उसका और बढ़ रहा था।

दीक्षा का मुहूर्त शाम का निकला। तब तक कुछ फलाहार करना उपयुक्त समझा गया, तो उसकी थाली में नमक मिले करेले रख दिए गए। कड़ुवे बहुत थे, सो गले से नीचे न उतरे।

जल्दी उठने, ठंडक में नहाने, कपड़े फट जाने और करेले खाने के कारण, वह बहुत खिन्न-उद्विग्न हो रहा था। संचालक ने उसे फिर बुलाया और कहा-”संन्यास में कोई बारात की-सी दावत नहीं होती। इसमें प्रवेश करने वालों को पग-पग पर मन को मारना पड़ता है। परिस्थितियों से तालमेल बिठाना, संयम बरतना और अनुशासन पालन पड़ता है। इसी अभ्यास के लिए तो संन्यास लिया जाता है।

मुहूर्त आने तक युवक अपने प्रस्ताव पर पुनर्विचार करता रहा। तीसरे प्रहर वह कहते हुए घर वापस लौट गया कि यदि संयम-साधना और मनोनिग्रह का नाम ही संन्यास है, तो उसे घर पर रह कर सुविधापूर्वक क्यों न पालूँ?


“देह नहीं, देहासक्ति का त्याग”

“नारकीय प्राणी!” कलिंग नरेश द्युमान ग्लानि से गले जा रहे थे। शब्द नहीं वज्र से भी तीक्ष्ण अस्त्र थे वे। ऐसे अस्त्र जो मर्म पर क्षण-क्षण में आघात करके उसे विदीर्ण कर रहे थे।

राज्य का अमर आकाँक्ष्य वैभर, विलासिता की अपार सुविधाएँ, दिगंत धवल सुयश, विद्वानों के द्वारा प्रशंसित प्रतिभा जैसे सब सारहीन हो गए थे आनंद के उपकरण। बंदियों का सुयशगान अपना उपहास प्रतीत होता था। मागध जब वंश विरुदावली का वर्णन करते जी चाहता, कहीं ऐसा स्थान पर जा छिपे जहाँ किसी को मुँह न दिखाना पड़े। सूत प्राचीन इतिहास का वर्णन करते हुए जब वर्तमान के वर्णन पर आने लगते, नरेश व्याकुल होकर उठ जाया करते।

“आप सब एक अयोग्य की प्रशस्ति में अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग क्यों करते हैं?” विनय नहीं अंतस् का सच्चा खेद होता था वाणी में। किंतु परंपरा ही ऐसी बन गयी थी कि नरेश के सामने आने वाले कवि, ज्योतिषी तथा अन्य विद्वान अधिक वाक्य व्यय नरपति की प्रशंसा में ही करते थे और इससे अत्यधिक वेदना होती थी उन्हें। पर कोई उनका निषेध सुनता कहाँ है। लोग तो उसे उनकी शिष्टता-विनय मान लेते हैं।

“आप अश्वमेध यज्ञ संपन्न करें।” कुल पुरोहित अपने प्रबल पराक्रम से यजमान को किसी प्रकार उनकी पीड़ा से मुक्ति दिलाने का प्रयत्न कर रहे थे। यदि कोई प्राक्तन पाप होंगे तो उनका प्रायश्चित हो जाएगा। अश्वमेध यज्ञ महापापों का भी परिहारिक है। आपका प्रताप दिग्विजय करने को पर्याप्त है।

“दिग्विजय की मुझे चिंता नहीं है।” कलिंग के वीर पराभव सुनने को कभी अभ्यस्त नहीं रहे। विजय श्री के कर उनके धनुष पर डोरी चढ़ते ही यशोमाल्य के लिए उन्हें अलंकृत करने उठ जाते हैं। नरेश ने उत्साह, नहीं दिखाया, किंतु एक अनाधिकारी नारकीय प्राणी सम्राट बन जाएगा अपने शौर्य के सहारे। धरा रसातल में चली जाएगी। धर्म कहाँ आश्रय ढूँढ़ेगा? द्युमान की दिग्विजय असुरों की विजय से भिन्न होगी क्या वह?

“कोई और उपयुक्त अनुष्ठान या आराधना!” पुरोहित को किसी भी प्रकार अपने इस यजमान के चित्त को आश्वासन देना है। वह सोचने लगे नारकीय प्राणी जैसा संबोधन महर्षि निदाध द्वारा भले क्यों दिया गया उन्हें। पर जिनके मुख से ये शब्द निकले थे, उन पर अविश्वास करने का साहस नहीं था राजपुरोहित में। वे अवधूत श्रेष्ठ निदाध-महर्षिगण उनकी चरण वंदना करते हैं। उन नित्य निस्पृह, निरंतर आत्मलीन में न रोष संभव है और न प्रमाद वहाँ प्रश्रय पा सकता है।

राजपुरोहित शास्त्रज्ञ हैं गंभीर विद्वान पूर्व मीमाँसा शास्त्र के। अनेक बार ऋषियों ने अपने यज्ञों में उन्हें ऋत्विक् अथवा अध्वर्यु वरण करके सम्मानित किया था। वेद के रहस्य एवं धर्म के तत्व को जानने का गर्व वे नहीं करते, किंतु जितना ज्ञान उनका है, अपने यजमान की त्रुटि उन्हें नहीं सूझ पड़ती। पर महर्षि निदाध की वाणी असत्य का स्पर्श करेगी, धर्मराज भी ऐसा सोचने का साहस नहीं कर सकते।

“यह ठीक है कि युवराज का अध्ययन अभी समाप्त नहीं हुआ।” नरेश के चिंतन में बाधा दी कुल पुरोहित ने “लेकिन आपकी छत्र छाया में सिंहासन पर उन्हें बैठाना मात्र ही तो है? आप! आप सिंहासन त्याग..............।” पूरी बात आशंका के कारण मुख से नहीं निकल सकी।

“आप जैसे वेदज्ञ कहते हैं कि तुषाग्नि को शरीर समर्पित कर देना मानव का सबसे बड़ा प्रायश्चित है।” नरेश ने स्वस्थ स्वर में कहा-”तीर्थराज में गंगा-यमुना जहाँ अंकमाल देती हैं, मकर के आगामी पुण्य पर्व पर इस अधम की भस्म वहाँ परिपूत बने ऐसी अनुमति प्रदान करें।”

“कोई इसे स्वीकार नहीं करेगा। प्रजा, सामंत, विप्रवृंद एवं आश्रित जन कोई नहीं।” राजपुरोहित दृढ़ स्वर में बोले-”अल्प पाप में अधिक प्रायश्चित निर्दिष्ट करने वाला ब्राह्मण नरकगामी होता है। यदि यही प्रायश्चित आवश्यक हो तो इसका विधान महर्षि निदाध को ही करना चाहिए।”

राजपुरोहित सोचने लगे उस दिन महर्षि निदाध के राज्य में पधारने का समाचार मिला था। उन्होंने ही उत्साह के साथ महाराज को सूचित किया था। वे दिग्वसन, अलक्ष्य लिंग अवधूत, उनका कोई ठीक पता-ठिकाना हुआ करता है? उन ज्ञान मूर्ति के दर्शन जिसे हो जायँ, सौभाग्य उसका। ऋषिगण भी सदा उन्हें कहाँ पहचान पाते हैं।

उन्मत्त, जड़ के समान अपने को प्रदर्शित करने वाले, गृहस्थ के यहाँ गोदोहन काल से अधिक किसी प्रकार न रुकने वाले उस नित्य परिव्राजक से उपदेश प्राप्ति की आशा तो दुराशा ही है। वे कहाँ प्रवचन करते हैं? किंतु उनके दर्शन ही क्या कम सौभाग्य सूचक हैं।

एक अंतर्वासी उनके दर्शन समीप के वानप्रस्थाश्रम में कर आया था। उसने अपने गुरुदेव को सूचित किया और राजपुरोहित की कलिंग नरेश पर असीम कृपा तो सबको ज्ञात है। वे तत्काल राज्यसदन पहुँच गये थे, “अवश्य ही कुछ श्रम उठाना पड़ेगा उन्हें ढूँढ़ने में।”

“वह श्रम हमारे सौभाग्य को शुभ करने वाली तपस्या बनेगा।” नरेश ने तत्काल रथ प्रस्तुत करने की आज्ञा दे दी।

कोई सेवक साथ नहीं लिया गया। राजपुरोहित ने अपना एक ब्रह्मचारी अवश्य भेज दिया था पहिले ही। रथ वानप्रस्थ तपस्वियों के आश्रम तक पहुँचा भी नहीं था कि वह ब्रह्मचारी मार्ग में लौटता मिला-भगवान भास्कर के प्रधान पीठ की ओर महर्षि चले गए।

एक से दूसरे स्थानों में पूछते-पता लगाते अंत में महर्षि निदाघ मिल गए थे। वे शाद्वल भूमि में एक नारियल के पेड़ की छाया का आश्रय लेकर लेटे थे। एक हाथ पर मस्तक रखकर शाँत पड़ा था उनका श्री अंग। रथ पर्याप्त दूर छोड़ दिया गया।

राजपुरोहित को आगे करके नरेश महर्षि के समीप मंदगति से पहुँचे। भूमि में पड़कर प्रणिपात किया सभी ने। राजपुरोहित का ब्रह्मचारी भी साथ ही था और सारथी भी।

“नारकीय प्राणी!” महर्षि ने तिरस्कार पूर्वक कहा और शीघ्रता पूर्वक उठकर खड़े हो गए। वे इतने वेग से एक ओर दौड़ पड़े कि उनके पीछे दूसरे के लिए दौड़ना भी कठिन था। दौड़ना मर्यादा के अनुरूप भी नहीं होता।

स्तब्ध से रह गए चारों के चारों व्यक्ति। वाक्य किसी एक को लक्ष्य करके नहीं कहा गया था, किंतु उसका लक्ष्य कौन था यह निर्णय कोई समस्या नहीं थी। सारथी को महर्षि संबोधित करते यह संभावना नहीं थी। राजपुरोहित तथा ब्रह्मचारी के लिए वह इस तरह का संबोधन कर नहीं कर सकते थे। आगतों में जो मुख्य था संबोधन उसी को लक्ष्य करेगा। नरेश को लगा कि दिशाएँ अंधकार में डूब गयी हैं। वे मस्तक पकड़ कर बैठ गए। राजपुरोहित के चिंतन प्रवाह में उस दिन की सारी घटनाएँ चल-चित्र की तरह घूम गयीं।

इस घटना को हुए कितने ही दिन बीत गए। महर्षि निदाघ कोणार्क क्षेत्र में ही हैं। राजपुरोहित के ब्रह्मचारी ने ही इस बार भी समाचार दिया था। कई ब्रह्मचारी तथा अनेक राजसेवक महर्षि का पता लगाने चारों ओर घूम रहे थे।

“हम पहिले भगवान नारायण को नमस्कार करेंगे।” कोणार्क पहुँच कर यद्यपि अवधूत का पता लग गया, किंतु राजपुरोहित ने रथ को देवधाम की ओर ले जाने का आदेश दिया भगवान सूर्य की विधिवत् अर्चना उन्होंने की और नरेश से संपन्न करायी।

“हे जगत के परम प्रकाशक! आपके चरणों में यह अज्ञानांधकार में डूबता ब्राह्मण प्रकाश की प्राप्ति की कामना से आया है।” पूजा के अंत में राजपुरोहित ने जब प्रार्थना प्रारंभ की केवल नरेश ही नहीं सभी जन विस्मित हो उठे। यह अद्भुत गंभीर स्वर वैखरी वाणी तो नहीं है। हृदय से उठती घनघोष जैसी यह पश्यंती वाणी “कोणार्क से निराश लौटने नहीं आया यह विप्र। आपने अनुकंपा नहीं की श्री विग्रह के सम्मुख प्राँगण में इस शरीर की भस्म मिलेगी कल प्रातः। भार्गव ब्राह्मण देह दाह के लिए चिता की चिंता नहीं करता। अग्नि की धारणा उसे माता के दूध के साथ मिलती है। यजमान को तुषाग्नि में आहुति बनते देखने से पूर्व योगाग्नि दग्ध न कर दे यह देह तो पौरोहित्य व्यर्थ रहा मेरा।”

किंतु भगवान के चरणों में पहुँची प्रार्थना कभी निराश लौटी है जो आज लौटती। महर्षि निदाघ ही कहाँ निष्ठुर हो सकते थे। जिसमें रज और तम की छाया का स्पर्श नहीं रोष, क्रोध, घृणा, निष्ठुरता का प्रवेश संभव है वहाँ? उनकी वाणी ने अमंगल का स्पर्श कब किया?

“जिज्ञासु है तू। आ आजा।” सागर पुलिंन पर पड़े थे सर्वज्ञ इस दिन। आज भी वे दाहिने हाथ का तकिया बनाए लेटे थे। आज नरेश के साथ राजपुरोहित मात्र थे महर्षि को प्रणिपात करने वाले। शेष सभी लोगों को राजपुरोहित ने रोक दिया था। महर्षि ने किंचित् मस्तक उठाया और अधरों पर मंदस्मित आ गया-”विप्रश्रेष्ठ! आपका यजमान अब प्रकाश के उन्मुख हो चुका है।”

“श्री चरणों की कृपा।” राजपुरोहित ने अंजलि बाँधकर मस्तक झुकाया प्रकाश के अधिदेवता के पादपंकजों में प्रणाम करके ही हम इधर आये हैं।

“आप शास्त्रज्ञ हैं। नरक का स्वरूप क्या है” नरेश और राजपुरोहित दोनों जब समीप पुलिन की रेत पर बैठ गए, दो क्षण रुक कर महर्षि ने पूछा ‘क्या-क्या है नरकों में?’

“अंधकार, घृणित वस्तुएँ।” राजपुरोहित ने विनम्र स्वर में ही उत्तर दिया-”पीड़ा के अकल्पनीय उपकरण मल-मूत्र शोणितादि अपवित्र घृणित पदार्थ।”

“राजन। तुम्हारे इस शरीर के भीतर क्या-क्या है?” महर्षि देर तक मौन रहे। उन्होंने नेत्र बंद कर लिए थे। जैसे राजपुरोहित का उत्तर उन्होंने सुना ही नहीं। एकायक नेत्र पलक खुले और उन्होंने द्युमान की ओर देखा-”कुछ श्रेष्ठ, सुन्दर, सुपवित्र तत्व।”

“भगवन्। इसमें श्रेष्ठ, सुन्दर, सुपवित्र क्या है?” नरेश संकोचपूर्वक बोले “रक्त, माँस, मेद, अस्थि, लोम, मज्जा, त्वचा, मल, मूत्र. ..........।”

“सब अपवित्र, सब दुर्गंधित, सब घृणित।” महर्षि उठकर बैठ गए-”और इस देह ने दुःख ही दुःख दिया प्राणियों को। दारुण वेदना देने वाला यह कारागार। तब यह नरक नहीं है राजन्।”

“इस नरक में देह में पड़ा प्राणी देहासक्त ही नारकीय प्राणी है। जिसकी देह में आसक्ति है, जो देह के भोगों में, विलास सामग्रियों में लिप्त है, उसे नारकीय ही तो कहेंगे। देहासक्ति ही उसे नरक भी ले जाती है। प्रायश्चित करना है तुम्हें? इस देहासक्ति का त्याग तुम्हारा प्रायश्चित।”

राजपुरोहित के साथ नरेश ने श्रद्धाभरित प्रणाम किया वहीं पुलिन पर उन अवधूत श्रेष्ठ को। तब उन्हें महर्षि का उपालंभ समझ में आया एवं अंतर्ज्ञान उपजा जिसने उनकी आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर दिया।


कैसे नकारेंगे आप पुनर्जन्म को?

देवसंस्कृति में आत्मा की अमरता एवं पुनर्जन्म की सुनिश्चितता को आरंभ से ही मान्यता प्राप्त है, किंतु ईसाई एवं इस्लाम धर्मों में मान्यतायें पृथक् हैं। उनमें मरणोत्तर जीवन का अस्तित्व तो माना जाता है, पर कहा जाता है कि वह प्रसुप्त स्थिति में बना रहता है। महाप्रलय के उपराँत पुनः जीवन मिलने की बात उनके यहाँ कही गयी है, किंतु विज्ञान और बुद्धिवाद ने जो नवीन जीवन दृष्टि प्रदान की है उससे पुनर्जन्म सिद्ध होता है। परामनोविज्ञान की एक शाखा के अंतर्गत आज ऐसे अनेकों प्रमाण एकत्रित किये जा चुके हैं जिनसे मनुष्यों के पुनर्जन्म होने के प्रमाण मिलते हैं। ऐसे अन्वेषणों में प्रो॰ राइन एवं एडगर केसी की खोजें विस्तृत एवं प्रामाणिक मानी गयी हैं। उनके आधार पर अन्यत्र भी इस दिशा में बहुत सी जाँच पड़ताल हुई हैं। इस खोजबीन से यह मान्यता और अधिक पुष्ट होती है कि आत्मा का अस्तित्व मरने के बाद भी बना रहता है और उसका पुनर्जन्म होता है।

शरीर के न रहने पर आत्मा का अस्तित्व बने रहने के बारे में जिन पाश्चात्य दार्शनिकों और तत्वेत्ताओं ने और अधिक स्पष्ट समर्थन किया है उनमें राल्फवाल्डो ट्राइन, मिडनी फ्लावर, एला ह्नीलर, विलियम वाकर, एटकिंसन, जेम्स केनी आदि का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। पुराने विख्यात दार्शनिकों में कार्लाइल, इमर्सन, काष्ट, हीगल, थामस, हिलमैन, डाटसन आदि का भी मत इसी प्रकार का था। डेस्कार्ट आत्मा को पीनियल ग्रंथि में मस्तिष्क में अवस्थित मानते थे तथा मृत्यु के बाद नयी काया में अवतरित होने की मान्यता के समर्थक थे। गत शताब्दी के पाश्चात्य वैज्ञानिक आत्मा के अस्तित्व को जितना नकारते थे, अब वे उतने कट्टर नहीं रहे। वे भी मानने लगे हैं कि मरण थकान की परिणति है। थकान मिटते ही पुनर्जीवन का सिलसिला पुनः प्रारंभ हो जाता है।

पुनर्जन्म की घटनाओं को विज्ञान की भाषा में ‘पैरानार्मल फिनामिना’ भी कहा जाता है। पाश्चात्य वैज्ञानिकों में जिनने इस संदर्भ में गंभीरतापूर्वक अनुसंधान किये और प्रमाण जुटाये हैं, उनमें से प्रमुख हैं-सर विलियम वारनेट, सरओलिवर लाज, सर विलियम कुक, अल्फ्रेड रसेल वालेस एवं डॉ॰ ईवान स्टीवेन्सन। वर्जीनिया विश्व विद्यालय-यू॰ एस॰ ए॰ में मनश्चिकित्सा विभाग के संचालक डा॰ ईवान स्टीवेन्सन ने तो विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से पुनर्जन्म की लगभग 600 घटनायें एकत्रित कीं जिनमें अधिकतर भारत और लेबनान की हैं। पुनर्जन्म को उनने आत्मा के चिरस्थायी अस्तित्व का अच्छा प्रमाण माना है और भारत को इस शोध कार्य के लिए विशेष रूप से उपयुक्त पाया है। कारण कि भारतीय संस्कृति में आत्मा की अमरता एवं पुनर्जन्म की मान्यता पर वैदिक काल से ही दृढ़ आस्था रही है, इसलिए पिछले जन्म की स्मृतियाँ बताने वाले बच्चों की बातें यहाँ दिलचस्पी से सुनी जाती हैं और उससे प्रामाणिक तथ्य उभर कर सामने आते रहते हैं। अन्य देशों में यह स्थिति नहीं है। यदि वहाँ कोई बालक इस तरह की बातें करे तो उसे शैतान का प्रकोप समझ कर डरा-धमका दिया जाता है। जिससे उभरते तथ्य समाप्त हो जाते हैं।

डा॰ स्टीवेन्सन ने जिन व्यक्तियों के उनके पूर्वजन्मों के अनुभव एकत्रित किये हैं, इनमें बड़ी आयु के लोग बहुत कम हैं। अधिकाँश तीन से लेकर पाँच साल तक के बच्चे हैं। नवोदित कोमल मस्तिष्क पर पुनर्जन्म की छाया अधिक स्पष्ट रहती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ वर्तमान जन्म की जानकारियाँ इतनी अधिक लद जाती हैं कि उस दबाव से पिछले स्मरण विस्मृति के गर्त में चले जाते हैं। इस संदर्भ में भारत से संबंधित कई प्रामाणिक घटनाओं का उनने अपनी कृतियों में उल्लेख किया है।

पश्चिम-बंगाल के कंपा गाँव की एक घटना का वर्णन करते हुए उनने लिखा है कि इस गाँव के श्री के. एन. सेन गुप्ता के यहाँ सन् 1954 में एक कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया-शकुला। जब वह बोलने लायक हुई तो अचानक ही उसके मुँह से ‘मीनू’ की आवाज प्रस्फुटित होने लगी। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गयी, पूछने पर मीनू के बारे में वह विस्तृत ब्यौरा देने लगी। मीनू को उसने अपनी पुत्री बताया। इतना ही नहीं वह अपने पिछले जन्म के पति, बच्चों तथा घर-परिवार के बारे में सभी बातें बताने लगी। उसने बताया कि पूर्वजन्म में उसका पालन ब्राह्मण कुल में पं. अमृतलाला चक्रवर्ती के यहाँ हुआ था। खोजबीन करने पर उसके सभी कथन सत्य पाये गये। इसी तरह सन् 1937 में दिल्ली की चारी वर्षीय एक हिन्दू कन्या शाँति ने पूर्वजन्म के वृत्तांत को स्पष्ट प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया है। वह पहले जन्म में चौबे कुल में जन्मी थी। उसके पति पं. केदारनाथ चौबे मथुरा में कपड़ा व्यवसायी थे उसने मथुरा का पता जब लोगों को बताया तो पं. केदारनाथ को दिल्ली सादर आमंत्रित किया गया। वह दूसरी शादी भी कर चुके थे। जैसे ही शाँति ने उन्हें देखा तो तुरंत पहचान लिया।

बिसौली उत्तर प्रदेश में प्रवक्ता श्री बाँकेलाल शर्मा के पुत्र प्रमोद कुमार का जन्म 11 अक्टूबर 1944 को हुआ। ढाई वर्षीय प्रमोद ने एक दिन अचानक ही अपनी माँ को भोजन बनाने से मना कर दिया और कहा-यह काम तो मेरी पत्नी का है जो मुरादाबाद में रहती है। कुछ दिन पश्चात् उसने मुरादाबाद स्थित अपनी सोडा और बिस्किट की दुकान की चर्चा की। एक अन्य दुकान मोहनब्रदर्स के नाम से सहारनपुर में बतायी। उसने अपनी मृत्यु का कारण भी बताया कि किस प्रकार अत्यधिक मात्रा में दही खा जाने के कारण उसे अपनी जान गँवानी पड़ी थी। जब प्रमोद को बिसौली से मुरादाबाद और सहारनपुर में मेहरा परिवार के पास लाया गया तो उसने वहाँ के सभी निवासियों को अच्छी तरह पहचाना ही नहीं, वरन् उनका नाम लेकर भी पुकारा। अपने रहन-सहन के तौर-तरीकों से भी उन्हें अवगत कराया। इस पर जाँच-पड़ताल कर रहे वैज्ञानिक दल एवं मेहरा परिवार को यह समझते देर नहीं लगी कि निश्चित ही यह मामला पुनर्जन्म का है और यह वही परमानंद मेहरा है जो गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल एवं एपेण्डीसाइटिस रोग से ग्रसित होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था। उसकी मृत्यु के ठीक सात माह पश्चात् ही प्रमोद का जन्म हुआ। परमानंद मेहरा अपने व्यवसाय का संस्थापक और प्रबंधक था। अपने पीछे वह पत्नी, चार पुत्र और एक पुत्री छोड़ गया था। प्रमोद ने जब उनसे बात की तो उसके पूर्व परिवारजनों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा।

“रिइन्कानेशल” नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में मूर्धन्य मनोवेत्ता विलियम वाकर एटकेन्सन ने ऐसी बहुत सी घटनाओं का वर्णन किया है जो पुनर्जन्म के साथ-साथ जीवात्मा की इच्छा शक्ति की प्रबलता को प्रमाणित करती हैं। टोकियो जापान के प्रख्यात जनमत एवं अध्यातमवेत्ता रस्याओकोवासूटानी ने अपनी कृति दि मिस्ट्री आफ पुनर्जन्म का अनेक प्रामाणिक घटनाओं का विस्तृत रूप से वर्णन किया है और ऐसे तर्क-तथ्य एवं प्रमाण दिये हैं कि पुनर्जन्म के सिद्धाँत की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उक्त पुस्तक का उपनाम “देन एक्सपैरीमेन्टल रिकार्ड आफ रिवर्थ आफ हूमेन बीइंग” है। इसमें उन्होंने जापान की प्रसिद्ध पुस्तक “यामूटानीन” में भी बहुत कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, किंतु उस सबसे अच्छी और प्रामाणिक एक घटना इस प्रकार है-

टोकियो शहर के सुगीनामी नामक स्थान में माटशुटारो नाम का अड़तालीस वर्षीय एक धनी व्यक्ति रहता था। 10 अक्टूबर 1935 में उसकी मृत्यु हो गयी। हैइजाबूरोकजिको उसका बहुत ही घनिष्ठ मित्र था। अपने इस बौद्ध मित्र से माटशूटरा प्रायः कहा करता था कि यदि मैं मर जाऊँ तो मेरे शरीर की रक्षा करना और अच्छी तरह दफनाना, क्योंकि यहाँ मेरा कोई रिश्तेदार नहीं है। कुछ समय बाद जब वह मर गया तो बौद्ध मित्र ने उसके पुनर्जन्म लेने की परीक्षा ली। इस प्रक्रिया में मृतक शरीर पर अभिमंत्रित जल का छिड़काव किया जाता है और प्रार्थना की जाती है। पुनः जन्म लेगा या नहीं इसको परखने के एक प्रकार की स्याही का उपयोग किया जाता है और मृतक के पैर पर उससे उसका नाम और पता लिखा जाता है। साथ ही एक बौद्ध सूत्र भी लिख दिया जाता है और तब अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। उसके अंतिम संस्कार में भी काफी लोग आये और बड़ी धूमधाम से काम समाप्त हुआ।

तीन वर्ष बाद 15 अक्टूबर 1938 को रात्रि के समय एक सिपाही आया और यामजिकी को बताया कि उसके यहाँ एक शिशु ने जन्म लिया है जिसके कंधे पर “माटशूटरो” शब्द अंकित है साथ ही उसका पता एवं एक मंत्र ओर ‘यामजिकी’ शब्द लिखा है। इसे हटाने-मिटाने के लिए उसने प्रार्थनायें की, धार्मिक कर्मकाण्ड एवं पूजन किये, किंतु वे जन्मजात चिह्न नहीं मिटे। इससे वह परेशान रहने लगा। एक दिन स्वप्न में उसे संकेत मिले कि जिस आदमी ने यह लिखा है वही ठीक कर सकता है। सिपाही की याचना पर यामजिकी बच्चे को लेकर माटशूटरो की कब्र पर गया, और अपने बच्चे को बैठाकर कुछ मंत्र पढ़े, प्रार्थनायें कीं तथा अभिमंत्रित जल से अंकित अक्षरों पर रुई के फाहे से पानी लगाया। उपस्थित लोगों के आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा जब उनने देखा कि अब एक चिह्न भी बाकी नहीं था। इस घटना ने मस्तिष्कों को भी सोचने के लिए विवश कर दिया कि शरीर के न रहने पर भी जीवात्मा का अस्तित्व बना रहता है और कर्मफल के सुनिश्चित विधान के अनुरूप उसे नया जन्म धारण करना पड़ता है। जापानी भी भारतीयों की तरह ही पुनर्जन्म एवं कर्मफल की सुनिश्चितता पर विश्वास करते हैं।

इसी तरह जापान के मूर्धन्य अध्यात्मवेत्ता एवं दर्शनशास्त्री शूटन कोडशी एवं टामोकीची स्मृताई में अपनी खोजपूर्ण कृतियों, यथा-”पैगनामल पावर” में पुनर्जन्म संबंधी अनेक प्रामाणिक घटनाओं का उल्लेख किया है। “रिवर्थ आफ कटशूगोरो” नामक अपने प्रसिद्ध ग्रंथ में मनोवेत्ता लाफकाडियो हियरन ने मरणोपराँत दोबारा जन्म लेने का प्रामाणिक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार टोकियो प्राँत के मुशाशी क्षेत्र में सन् 1825 में एक किसान दंपत्ति के यहाँ दूसरे बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया ‘जेनजो’। जब वह कुछ बड़ा हुआ तो उसने बताया कि वह टोकियो के ही दूसरे गाँव ‘होडोक्य्रवो’ का रहने वाला है जो ‘तामा एरिया’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसने अपने पिता का नाम क्यूहेड बतलाया और कहा कि जब वह 6 वर्ष का था तो चेचक निकलने से उसकी मृत्यु हो गयी थी। इस तथ्य का पता लगाने जब वैज्ञानिकों का एक दल बतलाये हुए स्थान पर पहुँचा तो स्थान एवं घटना को सही पाया। मजिस्ट्रेट की फाइल में वही रिकार्ड दर्ज थे जो ‘जेनजो’ ने बताये थे। इसी तरह पुनर्जन्म संबंधी अनेक घटनाक्रम इयान किसी जावाकृत प्रसिद्ध पुस्तक “लेक्वस आफ दि समरी आफ ए जापानीज सूत्रा” में भी वर्णित हैं।

अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि पूर्वजन्म का स्मरण किस प्रकार के लोगों को रहता है? इस संबंध में डा. स्टीवेन्सन का मत है कि जिनकी मृत्यु किसी उत्तेजनात्मक आवेशग्रस्त मनःस्थिति में हुई हो, उन्हें पिछली स्मृति अधिक याद रहती है। दुर्घटना, हत्या, आत्म हत्या प्रतिशोध, कायरता, अतृप्ति, मोहग्रस्तता का विक्षुब्ध घटनाक्रम प्राणी की चेतना पर गहरा प्रभाव डालते हैं और वे उद्वेग नये जन्म में भी स्मृति पटल पर उभरते रहते हैं। अधिक प्यार या अधिक द्वेष जिनसे रहा है, वे लोग विशेष रूप से याद रहते हैं। भय, आशंका, अभिरुचि, बुद्धिमत्ता, कलाकौशल आदि की भी पिछली छाप बनी रहती है। आकृति की बनावट और शरीर पर जहाँ-तहाँ पाये जाने वाले विशेष चिह्न भी अगले जन्म में उसी प्रकार पाये जाते हैं। खोजकर्ताओं के अनुसार पूर्वजन्म की स्मृति संजोये रहने वालों में आधे से अधिक ऐसे थे जिनकी मृत्यु पिछले जन्म में बीस वर्ष से कम थी। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती हैं, वैसे-वैसे भावुक संवेदनायें समाप्त होती जाती हैं और मनुष्य बहुधंधी, कामकाजी तथा दुनियादार बनता जाता है। भावनात्मक कोमलता जितनी कठोर होती जायेगी, उतनी ही उसकी संवेदनायें धीमी पड़ती और स्मृतियाँ धुँधली पड़ती चली जाती हैं। निश्चित ही पुनर्जन्म एक ध्रुव सत्य है व यह चिंतन सतत् हमें आस्तिक बनाता है व अपने कर्मों पर निरंतर एक कड़ी दृष्टि रखने की प्रेरणा देता है।


नारी ही लायेगी अब सतयुग

वर्षा जब आती है तब अनेकों अनुदान साथ लाती है। सूखे क्षेत्र पानी से भर जाते हैं। नदी और सरोवर, झरने सभी लहराते हैं। हरियाली की मखमली चादर सब जगह बिछ जाती है। उद्यानों और कृषि क्षेत्र में नये सिरे से नई उमंग उभरती है। न जाने कितने प्राणियों को नवजीवन उपलब्ध होता है। दुधारू पशु अपनी अपनी दुग्ध संपदा को कहीं अधिक बढ़ा देते हैं। प्रकृति की शोभा देखते ही बनती है। इन्द्रधनुष उगते हैं, मोर नाचते हैं, पपीहे कूकते हैं और भी न जाने क्या-क्या होता है, उन दिनों! धन बरसने की प्रतीक्षा सभी को रहती है। जब वर्षा आती है तो अनेक विभूतियाँ इस धरती के लिए अनुदान रूप में लाती हैं।

“इक्कीसवीं शताब्दी” नारी वर्चस्व की शताब्दी है। उसमें उपेक्षित आधी जनसंख्या को ऐसा महत्व और श्रेय मिलने जा रहा है जिसकी वह अधिकारिणी तो आदि काल से थी, उस पर वैभव का किसी दैत्य दुर्भाग्य ने अपहरण कर लिया था। अब वह उस नये सिरे से, नये रूप में प्राप्त होने जा रहा है। उस शक्ति, समर्थता और साहसिकता के वे बल-वैभव फिर से प्राप्त होने जा रहे हैं जिसके बल पर वह अपनी सत्ता की महत्ता भली प्रकार प्रकट और प्रामाणित कर सके।

इस उदीयमान उषा का सुनहरा आलोक इस रूप में दृष्टिगोचर होगा मानो वह कायाकल्प स्तर का नया कलेवर लेकर स्वर्ग से धरती पर उतरी हो। उसके क्रिया-कलापों में वे सृजनात्मक तत्व ऊँचे स्तर पर उभरेंगे जो अब तक प्रायः अपना कार्यक्षेत्र घर परिवार तक ही सीमित रखे रहते थे। अब वह समाज और संसार के हर क्षेत्र को अपने तेजस् और वर्चस् से प्रभावित करेंगी।

राजनीति में उसे उत्साहवर्धक प्रवेश और अप्रत्याशित सफलता मिलने के आसार बन रहे हैं। इसकी चर्चा और विवेचना भारत में ही नहीं विश्व के कोने-कोने में इन दिनों विशेष रूप से चल पड़ी है। भारत में इस संदर्भ में कुछ ठोस काम होने जा रहा है। ताकि पूर्व से उदय होने वाला सूर्य अपने आलोक से दिग्दिगंत को आलोकित करने की परंपरा का निर्वाह कर सके।

नारी वह गंगा है, जिसके अनुदानों से धरती से लेकर स्वर्ग तक के निवासी कृतकृत्य होते हैं। पर दुर्योग कभी-कभी ऐसा कुछ कर गुजरता है जिसमें हीरा भी काँच के टुकड़ों के साथ कचरे में फेंका, धकेला जाता है। पिछले अंधकार युग में उसकी सत्ता का प्रयोग कामिनी, क्रीत-दासी, भोग्या के रूप में अधिकारियों के स्वार्थ प्रयोजन के निमित्त होता रहा अब वह कुछ ऐसा करने जा रही है जिससे समूची मानवता को अपने नये कलेवर के साथ विकसित, परिष्कृत होने का सुयोग मिल सके। संसार में अनेक क्षेत्र अपने-अपने प्रयोजनों में कार्यरत हैं। जिनमें शिक्षा, संस्कृति कला, संपदा, प्रतिभा आदि को प्रमुख माना जाता है। समाज-संरचना और प्रथा परंपरा के सहारे चलने वाले अनेकों क्रियाकलापों का भी प्रचलन है। इनमें नारी का योगदान पिछले दिनों अप्रत्यक्ष और नगण्य स्तर का ही रहा है। पर वह अगले दिनों कुछ से कुछ बनने जा रही है। निविड़ निशा के सघन अंधकार और प्रभात काल के स्वर्णिम अरुणोदय के बीच एक मध्यान्तर होता है जिसे ब्रह्म मुहूर्त, उषाकाल के नाम से जाना जाता है। उसमें मुर्गे बोलने, पक्षी चहचहाने, फूल खिलने, जैसे अनेक अभिनव दृश्य उभरते हैं। वर्तमान काल को इसी स्तर का समझा जा सकता है। विशेषतया महिलाओं की स्थिति में आशातीत सुधार होने के संदर्भ में।

प्रसव काल की सुनिश्चित संभावना निकट आ गई इसका पूर्वाभास प्रसूता को ही नहीं अन्य निकटवर्ती लोगों को भी शीघ्र हो जाता है। पेट में दर्द जो होने लगता है। नारी उत्कर्ष की संभावना सुनिश्चित हो गई कि अपंगों, असमर्थों, निराश ग्रस्त निर्जीव नारी समुदाय में से हर कोई इस परिवर्तन के प्रति अब प्रसन्नता व्यक्त करने लगा है। उसके साथ आने वाले नये उत्तरदायित्वों के निर्वाह की तैयारियाँ करने लगा है। वर्षा के आगमन से पूर्व चींटियाँ, मकड़ियाँ तक अपने सुरक्षात्मक प्रबंध करने लगती हैं। चूहे नई आवश्यकता के अनुसार नये बिल बनाते पक्षी नये सिरे से घोंसला मजबूत करते हैं। समुन्नत स्थिति उपलब्ध होने की प्रसन्नता में तद्नुरूप तत्परता हर प्राणवान महिला के मन में एक विचित्र उल्लास उत्पन्न कर रही हैं। वे नये ढाँचे में ढलने और नई गतिविधियाँ अपनाने के लिए मानसिकता ही विकसित नहीं कर रहीं, वरन् तद्नुरूप आवश्यक वस्तुएँ जुटाने में भी लग गई हैं। आश्चर्य की बात एक और भी है कि पुरुष इसी बात में अपनी शान और मर्दानगी समझते थे कि संबंधित नारियों के प्रति कितनी उपेक्षा दिखाई और कितनी कठोरता बरती जाय। अब उनका भी मूड बदल रहा है और अब वह समुदाय लाभ को लाभ और हानि को हानि समझ सकने की विवेकशीलता को अपनाने सँजोने में लग गया है। कुछ समय पूर्व जो लोग नारी प्रगति की बात को सुनकर इस प्रकार घबराते थे मानों उनका राजपाट ही छिनने जा रहा है। विरोध के भी सदा उद्यत रहते थे, इसे उद्दंडता कहते और गृहस्थ अनुशासन की बर्बादी मानते थे, उन्हें इसमें पूर्वजों की परंपरा टूटती दीखती थी और हर संभव विरोध करने के लिए उकसाते थे, उनने अचानक अपना मानस कैसे बदला, यह आश्चर्य होता है। नारी की निंदा या उसके वेदाध्ययन संबंधी अधिकारों पर प्रति गामी टिप्पणी करने वाले अब भर्त्सना के पात्र माने जा रहे हैं, चाहे वे कितने ही बड़े महामंडलेश्वर धर्माधिकारी ही क्यों न हों? अब समर्थक तत्व इस अभ्युदय को उचित ही नहीं हितकर और आवश्यक भी मानने लगे हैं और अपने प्रभाव क्षेत्र की महिलाओं को उत्साहित करने के साथ प्रगति प्रयोजन में भरपूर सहयोग देने के लिए तैयार हो गये हैं।

महिलाओं ने पीढ़ियों पूर्व अवगति को नियति मानकर उसके साथ समझौता कर लिया था। वे भी अब तेवर बदल रही हैं और वह कदम उठाने में गर्व-गौरव अनुभव कर रही हैं जैसा कि इससे पूर्व कभी सोचा भी नहीं गया था। दोनों पक्षों की मानसिकता में असाधारण अंतर आना इस तथ्य का पूर्वाभ्यास है कि भवितव्यता सुखद संभावना के रूप में तेजी से निकट खींचती चली आ रही है। मुर्गे की बाँग के भोर के आगमन की पूर्व सूचना देने जैसा ही यह मानसिक परिवर्तन पूर्व सूचना का प्रतीक माना जा सकता है।

पुरुष वर्ग सोचने लगा है कि सभ्य-सुयोग्य और प्रगतिशील नारी अब की अपेक्षा अगले दिनों अनेक गुनी सुखद संभावनाएँ लेकर सामने आ खड़ी होगी। घर परिवार को समुन्नत, सुव्यवस्थित, सुसंस्कृत बनाने का माहौल बनेगा। आये दिन चलने वाले विग्रहों को बढ़ती समझदारी जड़ मूल से उखाड़ कर रख देगा। घर के कोने-कोने में प्रेम, सृजन और सहयोग ही बिखरा पड़ा दिखाई देने लगेगा। सद्भावना और शालीनता के विकसित होने पर सामान्य स्तर की नारी भी गृह लक्ष्मी के रूप में परिवर्तित हुई दीख पड़ेगी। इन परिस्थितियों में सबसे अधिक दाम्पत्य जीवन में सरसता और आत्मीयता की असाधारण अभिवृद्धि होने पर पति को ही लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा स्वर्ग से उतरने वाली परियों की कथा गाथाएँ बड़ी रसीली और मोहक लगती हैं। पर वे होती काल्पनिक हैं। किंतु सुविकसित सहचरी का सान्निध्य तो सचमुच स्वर्गीय वातावरण बना देता है। सावित्री-सत्यवान की, सुकन्या-च्यवन की, नल-दमयंती की, कथाएँ जिनने पढ़ी हैं वे इसकी कल्पना करके भाव विभोर होते रहते हैं कि अगले दिनों अपने घर की नारी पुरानी काया में रहते हुए नये परिवेश में प्रकट होगी और नये आयाम प्रस्तुत करेगी। विकसित और अविकसित, समर्थ और अपंग के बीच क्या अंतर होता है उसे सहज समझदारी के आधार पर भी जाना जा सकता है।

नारी अगले दिनों आत्म परिष्कार की, समाज कल्याण-विश्व उत्थान की तैयारी के लिए सरंजाम जुटा रही होगी। वह उसकी अपेक्षा कर ही नहीं सकती कि घर परिवार के दाम्पत्य जीवन को मर्यादा के अंतर्गत किस प्रकार विकसित किया जाय। शालीनता की पक्षधर सुनयना सदा सब के लिए कल्याणकारी ही होती है। उनका सर्वप्रथम लाभ निकटवर्तियों को मिलता है। चूल्हें में आग जलाने पर निकट बैठने वाले सर्दी से बच जाते हैं, तो विकसित नारी के समीपवर्ती परिजन क्यों लाभान्वित न होंगे?

विकसित स्थिति में आजीविका के बढ़ने तथा अपव्यय के घटने के नये आधार खड़े होते हैं। फलतः ऐसे व्यक्तित्वों की छत्र छाया रहते दरिद्रता, अभावग्रस्तता, अव्यवस्था की हेय स्थिति से बच निकलना सहज संभव हो जाता है। कम आजीविका में भी परिवार को सुखी, संतुष्ट रहने और सुविकसित होने का अवसर मिल जाता है। जबकि फूहड़पन के रहते पर्याप्त आजीविका रहते हुए भी अभाव और दरिद्रता ही घेरे रहती है।

सुसंतति का निर्माण जन्मदात्री के व्यक्तित्व से ही अधिक जुड़ा रहता है। कुँती, सीता, शकुँतला, मदालसा, जैसी देवियाँ ही ऐसी प्रजा उत्पन्न करने में समर्थ हुई थीं, जिनका चरित्र, पुरुषार्थ न केवल अभिभावकों को भरपूर श्रेय प्रदान करता रहा, वरन् दूर-दूर तक अपनी उत्कृष्टता से जन जीवन के वातावरण को श्रेय समुन्नत बनाता रहा। ऐसी सुयोग्य संतानें उपलब्ध करने के लिए जननी की सुसंस्कारिता ही प्रधान भूमिका निबाहती है। ऐसे ही सद्गुणों से संपन्न नर रत्नों को समाज को देना नारी आँदोलन का प्रमुख लक्ष्य है जो विकसित होने पर समस्त नारी समुदाय को समुन्नत बना सकने में अपनी बढ़ती हुई प्रतिभा का परिचय देगा।

ऐसे-ऐसे अनेक लाभ हैं जिनकी कल्पना और आशा करने भर से हर समझदार पुरुष यही सोच सकता है कि घर की महिलाओं को अधिक सुविकसित होने, अधिक सेवा भावी बनने का अवसर देना चाहिए। बंधनों में जकड़े रहने की भूल का दुष्परिणाम नारी को अनाथ रखने और उसके द्वारा पग-पग पर अव्यवस्था उत्पन्न किये जाने के लंबे अनुभव के रूप में भली प्रकार भुगत लिया। अब नई संभावनाओं के उदय होने पर हर दृष्टि से लाभान्वित होने का अवसर जब सामने है तो बदली परिस्थितियों का श्रेष्ठतम सत्परिणाम उपलब्ध होने का अवसर भी नहीं चूका जाना चाहिए।

जिनमें देश, धर्म, समाज-संस्कृति की प्रगति-अवगति का अंतर समझ सकने की दूरदर्शिता है वे तो इस सुयोग के लिए अत्यधिक सहयोगी व विधेयात्मक रुख अपनाते हैं। वे सोचते हैं कि अपने कर्तव्यों में जो कमी रह जाती है उसकी पूर्ति यदि घर की महिलाओं से बन पड़ती है तो उससे भरपूर श्रेय संतोष पाने का प्रयत्न करना चाहिएं घर की महिलाओं को आगे करके व्यापक क्षेत्र की महिलाओं को उसी दिशा में चल पड़ने की स्थिति उत्पन्न करने में सहायक होना ही चाहिए। नासमझी तो सदा अनहित को हित के रूप में हित को अनहित के रूप में अपनाने के माध्यम से उलटी चाल अपनाती रही है। उसका अस्तित्व अभी भी पिछड़े क्षेत्रों में पाया जा सकता है। और अड़ंगे डालने का अनौचित्य जहाँ-तहाँ अपनी उपस्थिति दर्शाता रहा है। किंतु जहाँ प्रगति के लिए उत्साह है, जहाँ अभ्युदय के प्रयत्नों में समर्थन देने का विवेक जीवित है, वहाँ नारी पुनरुत्थान में स्वार्थ और परमार्थ का सुयोग ही अनुभव किया जाता और सहयोग का हाथ बढ़ता देखा जा सकेगा।

महिलाओं में से सभी को प्रतिगामिता ने डस लिया हो, सीमा बंधन के प्रचलनों के रूप में पूरी तरह स्वीकार कर लिया हो ऐसी बात नहीं है। औचित्य के प्रति उत्साह और साहस प्रकट कर सकने वाली महिला जाति का अभी भी सर्वत्र तिरोधान नहीं हुआ है। जिनमें जीवन के चिह्न मौजूद हैं वे इन दिनों अंतरिक्ष में अभ्युदय की कल्पना को सर्वथा अनुपयुक्त नहीं कर सकती। जब नन्हा सा अंकुर ऊपर उठने का क्रम अपनाकर विशाल वृक्ष बन सकता है तो क्यों यह असंभव रहेगा कि उत्कर्ष के लिए सच्चे मन से प्रयास किये जायँ और उनमें सफलता न मिले?

अंतःप्रेरणा द्वारा प्रगति की दिशा में कुछ कदम बढ़ाने की भावना भले ही किसी व्यक्तिगत संभावना द्वारा मिली हो। उसे निताँत ईश्वरीय उद्बोध ही समझा जायगा। समय की पुकार सुन सकने और युग का आह्वान स्वीकार करने वाले ही महामानवों के अग्रणी समुदाय में सम्मिलित हुए हैं। उन्हीं ने अपनी नाव में बिठाकर कुशल मल्लाह की तरह नाव खेने जैसे आत्म गौरव और श्रेय सम्मान के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं।

जिनमें इस संदर्भ को भाव संवेदनाएँ उभरें, उन्हें उस ईश्वरीय वाणी को दबाना नहीं चाहिए वरन् कुछ न कुछ कर गुजरने के लिए कटिबद्ध हो ही जाना चाहिए।


अवरोधों से जूझें तो आदतें छूटें

हिमालय की चोटियों पर जमी बर्फ जब पिघलती है तो तीव्र जलधारा का प्रवाह उमड़ पड़ता है। उसे यदि आगे का रास्ता मिल जाय तो गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र की तरह वे आगे-आगे बढ़ती चली जाती हैं। अपने लक्ष्य समुद्र तक जा पहुँचती हैं पर यदि रास्ते में कोई बड़ा पर्वत अड़ जाय तो उस जलधारा को वहीं रुककर रहना पड़ता है। मानसरोवर जैसी झीलें बन जाती हैं। अग्रगामी प्रवाह रुक जाता है।

मनुष्य का अंतराल जिसमें हिमशिखरों जैसी अकृत जलराशि विद्यमान है उसे सूर्य किरणों जैसी ऊर्जा जितनी मात्रा में मिलती है निर्झर उसी अनुपात में उमगते हैं। गंगोत्री का उद्भव इसी प्रकार हुआ है। प्रपात का प्रत्यक्ष दर्शन गोमुख जैसा होने लगता है। अवरोध अड़ने पर बहाव रुकने पर बाँध खड़े हो जाते हैं। वे भी यदि दबाव सँभाल नहीं पाते तो जिधर-तिधर हिम नदी के रूप में बहते एवं सूखते रहते हैं। मानवी अंतराल की भी यही स्थिति है। उसकी गतिशीलता यदि सुचारु रीति से गतिवान रहे तो जीवन संपदा विशाल सरोवरों, महानदियों के रूप में अपनी महानता का प्रमाण परिचय प्रस्तुत करती है पर अवरोध अड़ने पर तो विग्रह ही खड़े होते हैं। प्रपात उत्पातों का ही सिलसिला चल पड़ता है। प्रगति में बाधा इस कारण पड़ती है। अवगति का निराकरण इसी कारण नहीं हो पाता। ऐसी ही स्थिति में कुत्सायें

और कुँठायें आ घेरती हैं।

चर्म चक्षुओं से प्रत्यक्ष शरीर ही सब कुछ करता दीख पड़ता है। निंदा, प्रशंसा भी उसी की होती है। सुविधा-साधनों का लाभ भी वही उठाता है। सुसंपन्न एवं सुन्दर, आकर्षक भी वही लगता है। उपार्जन एवं अभिवर्धन में निरत वही दीखता है और वैभव का उपभोग भी वही करता है तथा चेतना का अलग अस्तित्व दिखाई नहीं पड़ता किंतु पृथकता रहती अवश्य है। काया की कठपुतली को चेतना का बाजीगर ही विविध विधि नाच नचाता है। इतने पर भी पर्दे की आड़ में बैठा होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं होता। शरीर की हलचलें मस्तिष्क के साथ बँधे हुए और समग्र काया में बिखरे हुए ज्ञानतंतुओं के माध्यम से ही अनुभव होती है। स्पर्श जन्य संवेदना मस्तिष्क तक पहुँचती है, वहाँ अनुकृति होती है साथ ही यह फैसला भी होता है कि किस अंग को उस स्थिति में क्या करना चाहिए। इस प्रक्रिया की समग्र जानकारी होने पर वह वस्तुस्थिति सहज ही समझी जा सकती है कि शरीर द्वारा क्रियाकृत्य कुछ भी क्यों न किए जाते हों पर उनका सूत्र संचालन मन के द्वारा ही होता है। इस तथ्य के आधार पर यह वस्तुस्थिति सहज ही प्रकट हो जाती है कि स्थूल का संचालन सूक्ष्म क्षेत्र के संकेत पर होता है। इसलिए कर्तृत्वशील शरीर की गतिविधियों का निमित्त कारण सूक्ष्म को ही समझा जाता है। जैसे विचार होते हैं वैसे ही क्रियाकलाप बन पड़ते हैं। मनःस्थिति के अनुरूप ही परिस्थितियों का निर्माण होता है।

मन की रचना मधुमक्खी जैसी है। वह जिन फूलों में मधु के अनुरूप गंध पाती है उसी पर जा बैठती है और रस चूसना आरंभ कर देती है। मन तितली की तरह है। उसे एक जगह बैठे रहने में संतोष नहीं होता। रंग-बिरंगे फूलों की विविधता उसे आकर्षित करती है। फलतः वह अनेकानेक रंग रूप वाले फूलों पर यहाँ से वहाँ उड़ता रहता है। उसे बंदर स्वभाव का भी कहा जा सकता है जिसका सहज कौतुक कौतूहल इस डाली से उस डाली तक उचकना-मचकना ही बना रहता है। उसका श्रम, समय इसी आवारागर्दी में खप जाता है। मन भी यही करता है। उस पर अनेक रँगीली कल्पनायें चढ़ी रहती हैं। उन्हीं के द्वारा धकेला जाने पर वह बेकार की रंगीली उड़ाने उड़ता और अपनी बहुमूल्य शक्ति का अपव्यय करता रहता है। ऐसी दशा में शरीर के क्रियाकृत्यों का भी दिशाहीन होना स्वाभाविक है।

अभ्यस्त दिनचर्या में तो अचेतन मन कोल्हू के बैल की तरह निर्धारित विधि व्यवस्था को निपटाता रहता है। पर जब आदर्श का प्रश्न आता है, पतन प्रक्रिया रोकने और उत्कर्ष की दिशा में चलने की आवश्यकता सामने आती है तब वह उसे उपेक्षापूर्वक उड़ा देता है। नये एवं उच्चस्तरीय कदम उठाने का साहस नहीं करता। अड़ियल बैल की तरह जहाँ जी करता है पसर जाता है। ऐसा क्यों होता है? यही विचारणीय प्रश्न है। हित-अनहित का तात्विक विवेचन क्यों नहीं हो पाता? इस संदर्भ में मोटे तौर पर तो यही कहा जा सकता है कि उस प्रसंग को गंभीर नहीं समझा गया। उसे अपनाने के लाभ और न अपनाने पर होने वाली हानि की पूरी तरह कल्पना नहीं की गई। कृत्यों के परिणामों और संभावनाओं को दूरदर्शी, विवेक के सहारे समझने की चेष्टा नहीं की गई। इस संदर्भ में ध्यान एकाग्र नहीं हुआ और दूरगामी निर्धारणों तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं हुआ। बालबुद्धि का यही चिह्न है। उसमें तत्काल का लाभ, लोभ, आकर्षण ही प्रधान रहता है। बच्चे इसी आधार पर हठ करते और मचलते हैं। यही स्तर बड़े होने पर भी बना रहता है। आयु की दृष्टि से प्रौढ़ या बुड्ढे हो जाने पर भी अनेक लोग बचकाने ही देखे गये हैं। वे तात्कालिक इच्छा की पूर्ति भर में लगे रहते हैं। दूरवर्ती परिणामों की बात न वे सोचने हैं और न वैसा अभ्यास ही होता है। इस कारण समझ काम ही नहीं देती कि विवेकशीलों जैसा निर्णायक निर्धारक कार्यक्रम क्या होना चाहिए? इसी अभाव के कारण आत्म सुधार और आत्म, निर्माण के दोनों कार्य नहीं हो पाते। कोई महत्वपूर्ण कदम इसीलिए नहीं उठने पाते। विशेषतया पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को रोकने और सत्प्रवृत्तियों को उभारने की दिशा में कोई कहने लायक कदम उठ नहीं पाता।

सामान्य स्तर पर इस अड़चन के निवारण में स्वाध्याय, सत्संग एवं चिंतन मनन का अभाव भी माना जाता है। यह सही भी है। सर्वविदित प्रतिपादनों में इनका भी कम महत्व नहीं है। हम जो पढ़ते, सुनते, देखते हैं उसी आधार पर मानसिक स्तर का निर्माण होता है। चूँकि शिक्षितों द्वारा सुने गये तत्वदर्शन से लेकर कथा प्रसंगों तक सब कुछ ऐसा होता है, जो विवेक जगाता नहीं वरन् उसे और भी अधिक कुँठित करता है, अंधविश्वासों, मूढ़ मान्यताओं भाग्यवादी परावलंबन शैली का समर्थन करता है अतः चिंतन भी वैसा ही बनता चला जाता है। मनोरंजक समझे जाने वाले साहित्य में तो कामुकता भड़काने एवं छद्म रचने आक्रमण करने के लिए उभारने वाले ही प्रसंग भरे पड़े होते हैं। धर्मसंचों से भी ऐसे ही कथानक सुनने को मिलते हैं जो श्रद्धासिक्त भावुकता को कहीं से कहीं घसीट ले जाते हैं। वास्तविक स्वाध्याय वह है जो अपनी निम्न की तथा संबंधित परिवार की समस्याओँ के हर पहलू पर प्रकाश डाले और पाठक को, श्रोता को सही निर्णय तक पहुँचने में सहायता करे। ऐसी पुस्तकें सर्वथा उपलब्ध न हों ऐसी बात तो नहीं है पर उनकी कमी अवश्य है। उन्हें जहाँ-तहाँ से ढूंढ़कर उपलब्ध भी करना पड़ता है। ऐसा नियमित स्वाध्याय यदि विचारपूर्वक अपनी स्थिति के साथ तालमेल बिठाते हुए किया जाय तो उसका परिणाम विवेकशीलों की जागृति में सहायक सिद्ध हो सकता है। यही है वह परिष्कृत विचारशैली जिसे मेधा कहते हैं। इसके प्रकाश में अपना मार्ग खोजने में सहायता मिल सकती है।

सामान्य परामर्श के अनुसार दूसरा मार्ग सत्संग की उपलब्धि का बताया जाता है। यदि चरित्रवान विचारशील प्राणवान व्यक्तियों के साथ रहने का उनकी जीवनचर्या को गंभीरतापूर्वक समझने, अपनाने का प्रयत्न किया जाय तो अपने अंतराल में भी आदर्शवादी उमंगें उठ सकती है। किंतु ऐसे अवसर इन दिनों प्राप्त कर सकना अत्यधिक कठिन है। महत्वपूर्ण व्यक्ति महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न होते हैं। उनका समय अत्यधिक व्यस्त होता है। उच्चस्तरीय समस्याओं को सुलझाने, उसी संदर्भ में पढ़ने, सोचने, लिखने, मिलने के लिए वे अपना समय लगाते हैं। उनके साथ लंबे समय तक साथ रहने जैसा अवसर मिलना अत्यधिक कठिन ही नहीं असंभव जैसा भी है। जो लोग सत्संग के नाम पर बकवाद करते कराते फिरते हैं वे ऐसे नहीं होते कि उनके फेरे में पड़ा जाय। ऐसे दिग्भ्राँत करने वाले सत्संगी की अपेक्षा तो प्रकृति के सान्निध्य में बैठना, टहलना कहीं अच्छा। उस सुनसान में भी प्रकृति की विधि व्यवस्था को देखने, समझने में निज की बुद्धि विवेक से भी बहुत कुछ पाया जा सकता है।

अपने चारों ओर का परिकर लालचियों, व्यामोहग्रस्त, अनीति अपनाने वाले एवं दुर्गुणी लोगों से ही भरा पड़ा है। उनकी उपलब्धियाँ गौर से देखने वालों को ललचाती हैं और अनुकरण की प्रेरणा देती हैं। जिस प्रकार पृथ्वी को गुरुत्वाकर्षण शक्ति ऊपर से नीचे की ओर खींचती है उसी प्रकार संपर्क क्षेत्र में चलने वाली हलचलें भी ऐसी होती हैं जो सामान्य जन पर यही छाप छोड़ती हैं कि बहुजन समाज जिस दिशा में चल रहा है उसी में अपने को भी चलना सुविधा-जनक रहेगा। यह सहज मान्यता बन जाती है और अयाचित कुसंग अनायास ही शिर पर लाद लेते हैं। इस आधार पर अचिन्त्य चिंतन और अनाचार ही अपने पल्ले बँधता है। इस चक्रव्यूह से निकलने का एक ही मार्ग है कि महामानवों की जीवनचर्या कर्मपद्धति एवं विचारणा को पढ़ा सुना जाय। प्रत्यक्ष मिलन न हो सकने पर भी दिव्य मानवों का यश शरीर दिवंगत होते हुए भी मार्ग दर्शन के लिए सदा सर्वदा उपस्थित रह सकता है। जिन्हें सत्संग का लाभ लेकर अपनी कल्याणकारी मेधा जगानी हो उन्हें इसी उपाय उपचार का अवलंबन करना चाहिए।

स्वाध्याय, सत्संग बाहरी माध्यमों उपकरणों, व्यक्तियों द्वारा उपलब्ध किए जाते हैं। साथ ही दो अवलंबन ऐसे भी हैं जिन्हें भीतरी क्षेत्र में ही खोजा और सींचा जाता है वे हैं चिंतन और मनन। अपने दोष, गुणों को सूक्ष्म दृष्टि में देखना-परखना अपनी मान्यताओं, आकाँक्षाओं, अभिरुचियों को आदर्शवाद की कसौटी पर कसना यही है चिंतन। इसे रोग का निदान कह सकते हैं। निदान के उपराँत ही चिकित्सा बन पड़ती है। आत्म परिष्कार के समस्त पक्षों पर समग्र दृष्टि में विचार करना और साथ ही उनसे पीछा छुड़ाने के लिए सुनिश्चित संकल्प करना, तथा साहसिक दृढ़ निश्चय करना ही ‘मनन’ है। इस निमित्त एक सुनियोजित कार्यक्रम बनाना होता है। दूरगामी योजना बनाते हुए उस पर अंत तक चलते रहने का व्रत धारण करना यही है मनन। चिंतन में भूतकाल से लेकर वर्तमान तक का निरीक्षण-परीक्षण करते हुए खोटों को समझना पड़ता है। मनन इससे अगली आवश्यकता पूरी करना है। यह सुधारवादी योजना बनाकर देता है साथ ही उसे अपनाकर एकाकी चल पड़ने का साहस प्रदान करता है। ऐसे निश्चय यदि कल्पना लोक में ही मँडराते रहे तो बात दूसरी है अन्यथा यदि उन्हें कार्य रूप में विकसित होने का अवसर मिले तो उसका प्रभाव परिणाम किसी को भी सामान्य से असामान्य बना सकता है।

प्रत्यक्ष और प्रचलित सुधारवादी पद्धति यही है। स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन का आश्रय लेकर आमतौर से लोग सुधरते और आगे बढ़ते हैं। इसलिए सर्वमान्य, सर्वसुलभ विधि व्यवस्था यही है। इतने पर भी यह नहीं समझना चाहिए कि बात समाप्त हो गई। अभी उन रहस्यों को समझना शेष है, जो अंतराल की किन्हीं गहरी पर्तों में छिपे बैठे रहते हैं और जब ज्वालामुखी की तरह फूटते हैं तो स्वाध्याय, सत्संग जैसे अवलंबनों से जो हाथ लगा था, उसे लावे की तरह उछालकर दूर फेंक देते हैं यही समझ में आ जाय तो भटकाव की विडंबना से मानव बच जाय। जीवन साधना यही है कि सतत् अपने को श्रेष्ठ विचारों में लीन रखा जाय, पतनोन्मुखी विचार प्रवाह से स्वयं को बहने से रोका जाय तथा विभिन्न व्यावहारिक अध्यात्म के उपचारों से आत्मोत्थान के प्रयास किये जाते रहें।


VigyapanSuchana

प्रस्तावित प्रज्ञा संस्थानों के सत्र स्थगित

पूर्व के अंक में यह घोषणा की गयी थी कि पूरे भारत को प्रज्ञा-मंडलों-स्वाध्याय मंडलों-शक्ति पीठों की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप विभिन्न भागों में बाँट कर 15/11/94 से 28/2/95 तक 5-5 दिन के सत्र शाँतिकुँज में संपन्न होंगे। उन दिनों आश्वमेधिक व्यवस्थाओं में व्यस्तता के कारण उन्हें फिलहाल स्थगित किया जा रहा है। आगामी तिथियों की सूचना हम इस पत्रिका व विशेषाँक के माध्यम से देंगे।

-व्यवस्थापक शाँतिकुँज

जनवरी 95 का अंक मातृस्मृति विशेषाँक के रूप में

पाठकों को दुर्लभ सामग्री तथा चित्रों के साथ आगामी वसंत पंचमी 4 फरवरी 95 से पूर्व जनवरी अंक के रूप में बढ़े हुए कलेवर में एक विशेषाँक हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं। इसमें परम वंदनीया माताजी व ऋषियुग्म से संबंधित विशेष सामग्री होगी, रंगीन व श्वेतश्याम चित्र होंगे। परिजन जिनके पास अनुभूतियाँ, संस्मरण, चित्र, पत्र, आदि हों-यथाशीघ्र शाँतिकुँज हरिद्वार भेज दें।

-सम्पादक


सफलता-असफलता से राजर्षि के अधिकारी का निश्चय (Kahani)

राजा पुरुषोत्तमदास टंडन उन दिनों बीमार थे। उन्हें देखने के लिए उनके एक पुराने सहपाठी मित्र प्रयाग गये। तब राजर्षि ने बातों ही बातों में अपना एक संस्मरण सुनाया-किसी समय में देशी रियासतों में राजाओं का सुधार करने के लिए एक आदर्श योजना बना रहा था। ताकि यह दिखाने का अवसर मिले कि भारतीय अंग्रेजों से अच्छा शासन कर सकता है। इसी उद्देश्य के लिए बनायी गयी योजना को क्रियान्वित करने हेतु मैंने नाभा रियासत में नौकरी की, परंतु मैं असफल रहा। उनके मित्र ने कहा-’यह तो बड़ा अच्छा रहा।’ यही तो मैं भी कहना चाहता था। अंग्रेजों के कारण मैं असफल हुआ, तो मैंने अपना ध्यान अंग्रेजों, को यहाँ से हटाने में लगाया। ईश्वर के प्रति मैं धन्यवाद से भर गया हूँ। नाभा में सफल होने पर संभव था कि मैं कूप मण्डूक बना रह जाता। इस असफलता ने मेरे लिए सफलता और साधन का नया द्वार खोल दिया-टंडन जी बोले।

अपने कार्य में मिली सफलता-असफलता के प्रति यह सृजनात्मक दृष्टि भर अपनाने से ही वे राजर्षि उपाधि के अधिकारी सिद्ध होते रहे। यह प्रसंग हर उस व्यक्ति के लिए जीवनमुक्ति के समान है, जो प्रगतिपथ पर असफलताओं से जूझते हुए आगे बढ़ना चाहता है।


क्या बुढ़ापा रोका जा सकता है?

वार्धक्य की गति को कम किया जा सकता है क्या? यदि हाँ, तो वह कौन-से तरीके हो सकते हैं, जिनसे उसको नियंत्रित कर पाना संभव है? विज्ञान जगत में आज इस लक्ष्य को लेकर नित नई-नई शोधें हो रही हैं और नये-नये उपाय बताये जा रहे हैं।

इनकी चर्चा से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर बुढ़ापा है क्या? शरीर शास्त्र के शब्दों में कहें, तो कोशिकाओं की अक्षमता ही वृद्धावस्था है। अशक्त कोशिकाओं के कारण शरीर तंत्र में ऐसे लक्षण उभरने लगते हैं, जो अधिक आयु वाले वृद्धों से मिलते-जुलते हैं। इसी कारण सामान्य बोल-चाल की भाषा में उन सब को इस श्रेणी में रख दिया जाता है जिसमें ऐसा कोई एक लक्षण भी प्रकट हो जाता है।

विकास की दृष्टि से शरीर में दो प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं एक वह जिनमें मात्र आकार में वृद्धि होती है, दूसरी वे, जिनमें विभाजन होता है। माँसपेशियाँ, मस्तिष्क आदि कुछ ऐसे अवयव हैं, जिनमें केवल आयतन में बढ़ोत्तरी होती है। ऐसे अंगों के साथ कोई दुर्घटना घट जाय, तो वे कमजोर पड़ने लगते हैं, जबकि रक्त, त्वचा आदि ऐसे हिस्से हैं, जिनमें बराबर कोश-विभाजन चलता रहता है। इस क्रम में थोड़े-थोड़े समय में उसका नवीनीकरण होता रहता है। यह क्रिया जीवन के अंतिम दिनों तक चलती रहती है।

गड़बड़ी यहीं पैदा होती है। उम्र के साथ-साथ कोशाणुओं की अनुकृति पैदा करने वाला उसका तंत्र लड़खड़ाने लगता है, जिससे मातृ कोशाओं जितने समर्थ कोशाणु बाद में पैदा नहीं हो पाते। इतना ही नहीं, समय के साथ-साथ वे और कमजोर होते जाते हैं। प्रौढ़ावस्था के त्वचा के कोशाणु अपने यौवनकाल से दुर्बल पाये जाते हैं। उनमें पहले जैसी लोच-लचक का अभाव देखा जाता है। इसी प्रकार तंत्रिका सेल्स अपनी संवेदनशीलता खोने लगती हैं, परिणामस्वरूप संपूर्ण शरीर रोगों के प्रति अधिक सुग्राहक बन जाता है और दबाव, तनाव, चोट आदि झेलने और सहने की उसकी शक्ति क्षीण पड़ जाती है। इस स्थिति में कई बार कोशाणु इतने निर्बल पैदा होने लगते हैं कि शरीर तंत्र सहज में उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता। कई मौकों में वे अस्वीकार कर दिये जाते हैं। यही वार्धक्य है।

इसे विलंबित करने के क्रम में विशेषज्ञों ने कई प्रकार के सुझाव दिये हैं। एक सलाह के अनुसार यदि वृद्धों में रस-स्रावों के स्तर को युवा जितना बनाये रखा जाय, तो कोशाणुओं के नवीनीकरण की क्रिया सही रीति से लंबे काल तक जारी रह सकती है। हारमोन इंजेक्शन के माध्यम से काया में पहुँचाये जा सकते हैं और इस तरह शरीर क्रिया को सशक्त रखा जा सकता है, पर कब, कौन-सा हारमोन कितनी मात्रा में दिया जाय-यह पता लग पाना अत्यंत कठिन है, इसलिए व्यावहारिकता की दृष्टि से यह लगभग महत्वहीन है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के शरीरशास्त्री जेम्स एम. बेरी एवं सहयोगियों का विचार था कि काया का नवीनीकरण तंत्र रासायनिक प्रतिक्रियाओं के कारण क्षतिग्रस्त हो जाता है यदि इसे रोका जा सके, तो वृद्धावस्था को दूर धकेला जा सकना संभव है। उन्होंने शरीर के अंदर की इन प्रतिक्रियाओं को निरस्त करने और प्रक्रिया को पलटने के लिए कुछ चूहों पर प्रयोग किया। उन्हें बड़ी मात्रा में रासायनिक खाद्य खिलाये गये। इससे उनके रक्त में ऑक्सीजन का परिमाण घट गया, जबकि दूसरों को एक विशिष्ट प्रकार का रसायन यकृत के उद्दीपन के लिए दिया गया। इस प्रयोग का परिणाम यद्यपि कुछ चूहों में उत्साहवर्धक देखा गया, किंतु परिणाम के कारणों का सही-सही पता नहीं चल सका।

इस क्रम में अधिक बुद्धिसंगत और व्यावहारिक सलाह फिलाडेल्फिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने दी। दल के प्रमुख डॉ. किप केल्सो का कहना था कि यदि संतुलित भोजन नियमित रूप से लिया जाता रहे तो काफी हद तक बुढ़ापे को नियंत्रित किया जा सकता है। प्रयोग के दौरान बिल्लियों के एक समूह को ऐसा भोजन दिया गया, जिसमें सभी तत्वों की आवश्यक मात्रा निश्चित परिमाण में थी। केवल कैलोरी की मात्रा घटा कर सामान्य स्तर से 3/5 वाँ हिस्सा रहने दिया गया। दूसरे दल के भोजन में सभी तत्वों की उपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया। उनका पेट भर सके, ऐसा कुछ भी आहार दे दिया जाता। कुछ काल पश्चात् दोनों समूहों में शारीरिक अंतर प्रत्यक्ष हो गया। जिन बिल्लियों को संतुलित भोजन मिल रहा था, वे दूसरे ग्रुप से अधिक चुस्त, स्वस्थ और आयु की दृष्टि से जवान दीख रही थीं, जबकि दूसरे समूह में स्फूर्ति का अभाव, आलस्य, निस्तेजता, त्वचा का ढीलापन स्पष्ट झलक रहा था। सामान्य रूप से बढ़ती आयु के कारण जो कठिनाइयाँ पैदा होने लगती हैं, वह भी संतुलित भोजन पा रही बिल्लियों में 40 प्रतिशत पीछे शुरू होती देखी गईं। शारीरिक कमजोरी भी उनमें बहुत बाद में आयी, जबकि दूसरा दल बहुत जल्द ही दुर्बल प्रतीत होने लगा था।

इस आधार पर अनुसंधानकर्त्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि मनुष्यों के मामलों में उनकी वर्तमान आयु को लगभग दुगुना किया जा सकता है। इसकी पुष्टि सोवियत संघ के कजाकिस्तान और उज़्बेकिस्तान के कुछ हिस्सों में निवास करने वाले उन लोगों से हो जाती है, जो आयु के सौ वर्ष पूरे करते देखे जाते हैं। उनके आहार के बारे में शोध दल का कहना है कि वे पूर्णतः शाकाहारी हैं और भोजन में उन सभी आवश्यक तत्वों का समावेश है, जो एक संतुलित भोजन के लिए जरूरी होता है। इस अध्ययन के बाद उनकी लंबी वय संबंधी रहस्य से पर्दा उठ गया, जिसके बारे में अब तक यही मान्यता थी कि रूसियों की लंबी उम्र उस क्षेत्र विशेष की विशिष्ट जलवायु के कारण है।

यह हर किसी के लिए संभव है कि वह अपने आहार को संतुलित बनाकर अपने को दीर्घायु बना ले। आज की विषम परिस्थितियों और विकट स्थितियों से यदि बचा जा सकना संभव हो, तो यह मार्ग प्रत्येक के लिए खुला है। इसे अपनाकर कोई भी वार्धक्य को दूर भगा सकता है और एक लंबी, सक्रिय जिंदगी जी सकता है।


ज्योति साधना की सिद्धिमय फलश्रुतियाँ

अध्यात्म विज्ञान में स्थान-स्थान पर जिस “कला साधना” की चर्चा की गई हैं, वह और कुछ नहीं, वरन् वह परम ज्योति है, जो इस विश्व में चेतना का आलोक बन कर जगमगा रही है। गायत्री का सविता देवता इसी परम तेज को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण-कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर देख सकता है। इस ‘कला’ अथवा ‘ज्योति’ की जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो, समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।

कलायें दो प्रकार की होती हैं- 1-आप्ति और 2-व्याप्ति। आप्ति किरणें वे हैं, जो प्रकृति के अणुओं से प्रस्फुटित होती हैं। व्याप्ति उनको कहा गया है, जो पुरुष के अंतराल से आविर्भूत होती हैं। इन्हें ‘तेजस्’ भी कहते हैं। भौतिक जगत के समस्त पदार्थ पंच तत्वों से बने हैं, इसलिए उनके परमाणुओं से निकलने वाली किरणें अपने प्रधान तत्व की विशेषता भी साथ लिए होती हैं। वह विशेषता रंग द्वारा पहचानी जाती है। किसी वस्तु का प्राकृतिक रंग देखकर यह बताया जा सकता है कि इन पंचतत्वों में कौन-सा तत्व किस मात्रा में विद्यमान है।

यह शरीर भी पंचभौतिक है। काया में जिस तत्व की प्रधानता होती है, उसी का वर्ण व्याप्ति किरणें ग्रहण कर लेती हैं। इसीलिए साधना ग्रंथों में यत्र-तत्र पंचतत्वों को नियंत्रित कर व्याप्ति को व्यवस्थित करने का विधान समझाया गया है। जो इसे जिस अनुपात में संपन्न कर लेता है, उतने ही अंशों में व्याप्ति पर उसका नियमन हो जाता है।

इस ‘व्याप्ति’ कला का उद्गम मस्तिष्क मध्य वह स्थान है, जिसे ‘त्रिकुटी’ कहा गया है। यहाँ से प्रकाश कणों का एक फव्वारा फूटता रहता है। उसकी उछलती हुई तरंगें एक वृत्त बनाती हैं और फिर मूल स्रोत में लौट आती है। यह रेडियो प्रसारण और संग्रहण जैसी प्रक्रिया है। ब्रह्मरन्ध्र से छूटने वाली ऊर्जा अपने भीतर छिपी हुई भाव स्थिति को विश्व-ब्रह्माँड में विद्युत चुम्बकीय तरंगों द्वारा प्रवाहित करती रहती है। इस प्रकार मनुष्य अपनी चेतना का परिचय और प्रभाव समस्त संसार में फेंकता रहता है। फुहारे की लौटती हुई धाराएँ अपने साथ विश्वव्यापी असीम ज्ञान की नवीनतम घटनात्मक तथा भावनात्मक जानकारियाँ लेकर लौटती हैं। यदि इन्हें ठीक तरह समझा जा सके, ग्रहण किया जा सके, तो कोई भी व्यक्ति भूतकालीन और वर्तमान काल की अत्यंत सुविस्तृत और महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है। कला-साधना का वास्तविक उद्देश्य शरीर के भीतर स्थित विभिन्न कला-केन्द्रों को परिमार्जित, परिष्कृत कर ब्रह्माँडव्यापी उन हलचलों और सूक्ष्म जानकारियों को अर्जित करना है, जो परमज्योति की लौटती धारा द्वारा उसके मूल उद्गम में संगृहीत होती रहती है।

प्रख्यात विज्ञानी डॉ. जे. सी. ट्रस्ट अपनी पुस्तक “दि लाइट विदिन दि सोल” में लिखते हैं कि जिस सूक्ष्म तत्व के एकपक्षीय अध्ययन के आधार पर विज्ञान ने उसे विद्युत कहकर अभिहित किया है, वास्तव में वह और कुछ नहीं, वरन् वह प्रकाश है, जिसे अध्यात्म दिव्य ज्योति कहकर पुकारता है। शरीर की भौतिक भूमिका में यही ज्योति देह संचालन जितनी स्थूल क्रिया का संपादन अपने वैद्युतिक गुण द्वारा करती है, जबकि उच्च आध्यात्मिक आयाम में यह आत्म ज्योति बनकर परमात्म तत्व की उपलब्धि कराती है। विज्ञान ने इस उच्चस्तरीय तत्व के जिन दो पहलुओं को अभी तक समझा है, वह चुँबक और बिजली के रूप में शरीर-व्यापार में संलग्न रहते हैं जिस दिन वह इसके अंतराल में प्रवेश कर यह समझ लेगा कि स्वभाव-संस्कार, इच्छा-आकाँक्षा, आस्था-क्रियाशक्ति जैसे व्यक्तित्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष इसी के गर्भ में पकते, पनपते और पलते रहते हैं, उस दिन शायद इसे शोधित-संस्कारित करने की कोई विधा भी वह निकाल ले। यदि ऐसा हुआ, तो यह चेतना विज्ञान के क्षेत्र में पदार्थ विज्ञान की क्राँतिकारी उपलब्धि होगी, कारण कि तब व्यक्तित्वों को तराशने और गढ़ने का उसके पास एक सुनिश्चित आधार होगा, जिसका कि अभी एक प्रकार से अभाव है।

यह सत्य है कि संपूर्ण व्यक्तित्व को एवं उसकी बारीकियों को अकेले उस विज्ञान को समझ कर जाना जा सकता है, जो समस्त शरीर में कला अथवा किरण के रूप में व्याप्त रहती है। बोलचाल की भाषा में इसे ही ‘तेजस्’ कहते हैं। यह तेजस् मुख के आस-पास प्रकाश मंडल की तरह विशेष रूप से फैला होता है। यों तो यह सारे शरीर के इर्द-गिर्द प्रकाशित रहता है, पर सामान्य रूप से चेहरे के ओज के रूप में ही आँखें उसे देख पाती हैं। इसे ही ‘आँरा’ अथवा ‘आभामंडल’ कहते हैं। देवताओं के चित्र में उनके सिर के चारों ओर एक प्रकाश का गोला-सा चित्रित होता है। यह उनकी कला का ही चिह्न है। अवतारों के संबंध में उनकी शक्ति का माप उनकी कथित कलाओं से किया जाता है। परशुराम में तीन, भगवान राम में बारह, कृष्ण में सोलह, बुद्ध में बीस और प्रज्ञावतार में चौबीस कलायें बतायी गई हैं। इसका तात्पर्य यह है कि उनमें साधारण मात्रा से इतनी गुनी आत्मिक शक्ति थी।

साधना द्वारा जैसे-जैसे आत्मिक शक्ति बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे ही व्यक्ति में कलाओं का विस्तार हो जाता है। इस विस्तार क्रम में आगे बढ़ते हुए साधक कला कि किस भूमिका में पहुँच गया, इसे कोई दिव्यदृष्टि संपन्न महापुरुष ही जान सकता है। आमतौर से सामान्य व्यक्ति में शक्ति का दुरुपयोग भौतिक आकाँक्षाओं की पूर्ति में होता रहता है। किंतु साधना मार्ग का पथिक जब इसे संचित करते हुए आगे बढ़ता है, तो अंततः एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है, जिसे कला की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कहा जा सके। इसी के आधार पर उसकी क्षमता का अनुमान लगाया जाता है। जिस प्रकार मोटरों की सामर्थ्य उसकी “हार्स पावर” पर निर्भर करती है और जितनी अधिक हार्स पावर की मोटर होती है उतना ही बड़ा काम ले पाना उससे संभव होता है, वही बात कला शक्ति के साथ भी है। साधक में यह शक्ति जितनी बढ़ी-चढ़ी होगी, उतना ही बढ़ा-चढ़ा पुरुषार्थ कर सकने में वह समर्थ होगा।

संसार में अगणित स्वभाव और प्रकृति के मनुष्य हैं। कोई शालीन, सज्जन, शिष्ट और नम्र, तो कोई उग्र, उद्दंड और अशिष्ट। कोई दुष्ट-दुराचारी, तो कोई परले सिरे का क्रूर और कठोर। यह सब व्यक्ति के कला पुँज पर निर्भर है। इसमें परिवर्तन होने से आचरण भी बदलने लगता है। सामान्य तौर पर कला के रंग के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव का अंदाज लगाया जाता है। जिस मनुष्य में यह श्वेत रंग का होता है, उसमें शाँति, रसिकता, कोमलता, शीघ्र प्रभावित होना, तृप्ति, शीतलता, सुन्दरता, बुद्धि, प्रेम आदि गुण देखे जाते हैं। इसके लाल रंग होने से वह गर्मी, उष्णता, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, शूरता, सामर्थ्य, उत्तेजना, कठोरता, कामुकता, तेज, प्रभावशीलता, चमक, स्फूर्ति आदि का परिचायक है। पीला रंग-क्षमा, गंभीरता, उत्पादन, स्थिरता, वैभव, मजबूती, संजीदगी-हरा रंग चंचलता, कल्पना, स्वप्नशीलता, धूर्तता, गतिशीलता, विनोद, प्रगतिशीलता, पोषण, परिवर्तन-नीला रंग विचारशीलता, बुद्धि सूक्ष्मता, विस्तार, सात्विकता, प्रेरणा, व्यापकता, संशोधन, संवर्धन, सिंचन आदि गुणों को प्रकट करता है। धार्मिक ईश्वर भक्त और सदाचारी व्यक्तियों की आभा केसरिया रंग की होती है। गहरा बैंगनी अस्थिर मति अस्थिर गति का प्रतीक है। इसी प्रकार विभिन्न रंगों का सम्मिश्रण मिश्रित गुण, कर्म, स्वभाव का द्योतक माना जाता है।

कला विद्या का पारखी इन रंगों के आधार पर अपने शरीर-मन की स्थिति का पता लगाता और अपने आत्मबल से ही उसका सुधार-संशोधन कर सात्विकता की मात्रा बढ़ाता चलता है। इतना ही नहीं, वह दूसरों की भी सहायता इसके सहारे कर सकता है। जिसके शरीर के प्रकाश अणुओं की जितनी तीव्रता होगी, वह उतनी ही समर्थ सहायता कर सकने में सक्षम होता है। इसके माध्यम से वह दूसरों के शारीरिक मानसिक रोग दूर कर सकता है। मनोभूमि बदल सकता है और उसमें सात्विकता का संचार कर सकता है। पौराणिक कथाओं में ऋषि आश्रमों के निकट की सरिताओं में गाय और शेर के एक ही घाट पानी पीने का जो उल्लेख मिलता है, वह वस्तुतः कला-परिवर्तन की ही घटना है। ऋषियों के दिव्य प्रकाश-पुँज के प्रभाव में आकर हिंस्र पशुओं के प्रकाश कणों में क्षणिक परिवर्तन आ जाने और उनमें अस्थायी सात्विकता बढ़ जाने के कारण ही ऐसे प्रसंग प्रकाश में आते थे। प्राचीन काल के कई उदाहरण ऐसे भी हैं, जिनमें ऋषियों के संपर्क में आते ही दुष्ट प्रकृति के दुर्जनों का स्वभाव परिवर्तन हो गया। इन सब घटनाओं में प्रकाश अणुओं में रूपांतरण ही एक मात्र निमित्त है।

जड़ या चेतन किसी भी पदार्थ के प्रकट रंग एवं उससे निकलने वाली सूक्ष्म प्रकाश किरण से यह जाना जा सकता है कि इस वस्तु या व्यक्ति का स्वभाव एवं प्रभाव कैसा है? साधारणतः यह पाँच तत्वों की कला है, जिनके द्वारा यह कार्य हो सकते हैं-1-व्यक्तियों तथा पदार्थों की आँतरिक स्थिति को समझना तथा सुधारना 2-तत्वों के मूल आधार पर पहुँच कर तत्वों को गतिविधि तथा क्रियापद्धति को जानना 3-तत्वों पर अधिकार करके साँसारिक पदार्थों का निर्माण, पोषण तथा विकास करना। यह तीन लाभ ऐसे हैं जिनकी

व्यवस्था की जाय, तो वे ऋद्धि-सिद्धियों के समय आश्चर्य जनक प्रतीत होंगे। राजयोगी हठयोगी मंत्रयोगी तथा तंत्रयोगी इसका अपने-अपने ढंग से सदुपयोग-दुरुपयोग करके भले-बुरे परिणाम उपस्थित करते हैं। कला द्वारा साँसारिक भोग, वैभव भी मिल सकता है आत्म कल्याण भी हो सकता है और किसी को शापित, अभिचारित एवं शोक संतप्त भी बनाया जा सकता है।

भारतीय योगियों ने इसके मूल उद्गम को सहस्रार कमल कहकर वर्णन किया है। यह सर्वप्रभुता संपन्न प्रकाश केन्द्र है। कनपटियों से दो-दो इंच अंदर और भृकुटि से करीब तीन इंच भीतर यह स्थान दिव्य तेज पुँज रूप में है। तत्वदर्शियों के अनुसार यह स्थान उलटे छाते के समान 17 प्रधान प्रकाश तत्वों से बना है। छान्दोग्य उपनिषद् में इस दिव्य प्रकाश दर्शन की सिद्धि को निम्न प्रकार से वर्णित किया गया है-’तस्य सर्वेषु कामचारी भवति’ अर्थात् सहस्रार प्राप्त कर सेन बल योगी संपूर्ण विज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।

इस अंतिम प्रकाश तक पहुँचाने वाले मार्ग को ही कला-साधना के नाम से संबोधित किया गया है। इसमें पंचतत्वों के पाँच प्रमुख स्थानों गुदा, पेडू, नाभि, हृदय एवं कंठ प्रदेशों में निवास करने वाले पृथ्वी तत्वों का संतुलन-समीकरण बिठाते हुए, दोष-परिमार्जन करते हुए मूल प्रकाश को इतना निर्मल और प्रखर बना लिया जाता है कि सामान्य स्थिति में जो अनगढ़ बन कर रोग-शोक का कारण बना हुआ था, वही अपने उच्चस्तरीय आयाम में ऋद्धि-सिद्ध का भाँडागार बन जाता है। जो इस साधना मार्ग में प्रवृत्त होकर अपनी कला को जिस अनुपात में बढ़ाते हैं, वे उतने ही ऐश्वर्यवान बनते चलते हैं-ऐसा तत्वज्ञों का मत है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” में इसी की याचना है। गायत्री का भर्ग इसे ही कहा गया है। यही सबका जीवन प्राण है।


लक्ष्य सिद्धि

आज चरणाद्रि के राजकुमार ऋतक्रथु का समावर्तन संस्कार था। राजकुमार पूरे बारह वर्ष महर्षि भरद्वाज के आश्रम में रहे हैं। बारह वर्ष जटा, वल्कल, एवं मौजी मेखलाधारी ब्रह्मचारी राजकुमार के शरीर पर आज कौशेयवस्त्र तथा रत्नाभरण आये हैं। राजकीय रथ अपने राजकुमार को लेने आया है।

अधीतविद्य राजकुमार ने महर्षि को आग्रहपूर्वक गुरुदक्षिणा दी। आश्रम से विदा होते समय सहाध्यायियों को अंकमाल देकर जब उन्होंने रथ पर चढ़ने से पूर्व महर्षि के चरणों में मस्तक रखा, महर्षि का दाहिना हाथ राजकुमार के मस्तक पर आ गया और उनकी आशीर्वाद वाणी गूँजी “लक्ष्यवेध प्राप्त करो वत्स।”

“लक्ष्यवेध प्राप्त करो?” राजकुमार किंचित चौंके थे। महर्षि की सेवा में रहते हुए अपनी शिक्षा के मध्य उनका बाण कभी लक्ष्च्युत हुआ हो यह उन्हें स्मरण नहीं। अपने सहपाठियों में अकेले वे शब्दबेध कर सकते थे। महर्षि ने स्वयं उनके हस्तलाघव की तथा लक्ष्यवेध की अनेकों बार प्रशंसा की है। ऐसी दशा में महर्षि का यह आशीर्वाद?

राजकुमार विनयशील हैं। वे जानते थे कि देवता परोक्ष प्रिय होते हैं। महर्षि सर्वज्ञ हैं। अपने शिष्य की दैहिक एवं बौद्धिक शक्ति उनसे अज्ञात नहीं है। चलते-चलते उन्होंने यह आशीर्वाद दिया है, इसका अर्थ ही है कि वे नहीं चाहते कि उनसे उनका शिष्य आशीर्वाद का स्पष्टीकरण पूछे। अवश्य इसका कुछ गंभीर तात्पर्य है और महर्षि समझते हैं कि उनका अंतेवासी अपने चिंतन से उस तात्पर्य तक पहुँचने में सक्षम है, चिंतन ही करना चाहिए।

आज समावर्तन का दिन है। चरणाद्रि का उत्तरदायित्व अब राजकुमार के कंधों पर आने वाला है। अतः उन्होंने सोचना प्रारंभ कर दिया कि उनके राज्य का, उनके कुल का लक्ष्य क्या है। ऐसी कौन सी महत्वाकाँक्षा है जिसे उनके पूर्व पुरुष अब तक प्राप्त नहीं कर सके हैं राज्य की सीमा का विस्तार? शत्रु का प्रतिशोध? कोई अपूर्ण कृति? किसी मित्र के उपकार का प्रत्युपकार? अनेक बातें ध्यान में आयीं। राजकुमार अभी अपने राज्य के विषय में अधिक जानते भी कहाँ हैं। वे जब केवल सात वर्ष के थे, महर्षि के आश्रम में आए थे। चरणाद्रि समीप हैं प्रयाग से। आश्रम में अनेक बार राजपुरुष महर्षि के दर्शन करने आते थे, किंतु इस प्रकार प्राप्त विवरण पूर्ण तो नहीं है।

राजसदन लौटने पर जो समारोह होता था, पूरे उत्साह से हुआ। नीतिनिपुण राजकुमार ने राज्य के कार्य सम्हालने प्रारंभ कर दिए। महाराज का, महामंत्री का और प्रजा का सहयोग एवं स्नेह अर्जित करने में उन्हें अधिक समय नहीं लगा। वृद्ध महाराज ने जब वानप्रस्थ ग्रहण का निश्चय किया, राजकुमार चरणाद्रि के सिंहासन पर अभिषिक्त हुए।

समय किसी की प्रतीक्षा कहाँ करता है। फल लगता है, बढ़ता है, पकता है और टपक पड़ता है। भगवान काल प्रत्येक परिपक्व फल को खा लेते हैं। जो राजकुमार थे, नरेश हुए विवाह किया, संतानें हुई और श्वेतकेश हो गए। चरणाद्रि नरेश ऋतक्रथु को श्वेतकेशों ने काल भगवान का संदेश दिया-”अब यह देह रूपी फल उनका ग्रास बनने के समीप है।”

जिसने बाल्यकाल में संयम का अभ्यास किया हो, यौवन उसे प्रमत्त नहीं कर पाता। उसके भोग धर्म के नियंत्रण में रहते हैं और जब यौवन में भोग उच्छृंखल न बना सकें, वार्धक्य देह की चिंता नहीं दे पाता। जो भोग में संयमित रहा है, क्षीयमाण देह की आसक्ति उसे अपनी शृंखला में घेरने में असमर्थ रहती है।

चरणाद्रि नरेश ने अपने शासनकाल में राज्य की कोई महत्वाकाँक्षा अपूर्ण न रहने दी। अब देह का भोग का मोह उन्हें किसलिए हो सकता था। पुत्र को सिंहासन पर बिठाया, पत्नी का भार पुत्र पर छोड़ा और एकाकी, निराभरण, नंगे पाँव राजसदन से निकल पड़े।

उन्होंने चित्रकूट के दिव्य क्षेत्र में वानप्रस्थ का काल व्यतीत करने का निश्चय किया था। चरणाद्रि से चलते हुए वे प्रयाग आए और त्रिवेणी स्नान करके गुरुदेव के आशीर्वाद की आकाँक्षा उन्हें महर्षि भरद्वाज के आश्रम में ले आयी।

बाल्यकाल का वह गुरुकुल वास। समिधाचन्दन, हवन, अध्ययन के वे पुनीत दिवस। आज फिर देह निराभरण है। मस्तक मुण्डित है। कटि में कौपीन है और हाथ में कमंडलु है। बार-बार लगता है-जैसे वह दिन फिर आ गया है, जब उपनयन संस्कार के पश्चात् वे इस आश्रम में आये थे।

“आज हमारा आतिथ्य स्वीकार करो वत्स।” महर्षि भरद्वाज ने आशीर्वाद के अनंतर अर्घ्य पात्र जब उठाया, बड़ा संकोच, बड़ा विचित्र लगा ऋतक्रथु को। किंतु महर्षि कह रहे थे-” अब न तुम यहाँ के अंतवासी हो और न चरणाद्रि के नरेश। तपोवन को जाते गृहत्यागी वानप्रस्थ का आतिथ्य करना चाहिए मुझ जैसे आश्रमस्थ को।

महर्षि का आदेश टाला नहीं जा सकता था। यह अनुग्रह किया उन्होंने कि अतिथि अर्चन का कार्य अपने छात्रों पर छोड़ दिया। महर्षि की अग्निशाला में रात्रि विश्राम किया ऋतक्रथु ने और प्रातः त्रिवेणी स्नान करके आह्निक कृत्यों की समाप्ति के पश्चात् प्रस्थान से पूर्व जब उन्होंने महर्षि श्रीचरणों में मस्तक रखा, महर्षि का दाहिना हाथ मस्तक पर आ गया। उनकी वही आशीर्वाद वाणी गूँजी-”लक्ष्यवेध प्राप्त करो वत्स।”

ऋतक्रथु फिर चौंके जैसे वर्षों पूर्व समावर्तन संस्कार के दिन वे चौंके थे। महर्षि ने आज भी प्रस्थान के समय वह आशीर्वाद दिया है। अपने शिष्य की प्रजा में उन्हें आज भी उतनी ही आस्था है। उनके आशीर्वाद का तात्पर्य पूरे शासनकाल में भले उनका शिष्य समझ नहीं सका, किंतु सर्वज्ञ महर्षि जब उसे इसे समझने योग्य मानते हैं, समझना ही होगा उसे।

उस समय अधिक अवकाश नहीं था। आज कोई राजस्थ ऋतक्रथु को लेने नहीं आने वाला था। उन्हें पैदल यात्रा करनी थी। अपने अग्नि तथा अग्निहोत्र के उपकरण स्वयं उन्हें ले जाने थे और त्रिकाल संध्या, स्नान, हवनादि करके ही चलना था उन्हें।

चित्रकूट क्षेत्र में उन्होंने गुपत गोदावरी की गुफा को अपना गृह बनाया। आस-पास उस समय न कोई ग्राम था और न आज के समान कुटीरें थीं। घोर वन-वन पशु और बीहड़ प्रदेश। लेकिन गुफा के मध्य से निकलती कलकल करती जलधारा वानप्रस्थ तपस्वी को अग्नि रक्षामात्र के लिए छाया तथा आह्निक निर्वाह के लिए जल का सामीप्य बस इतनी सुविधा ही तो चाहिए।

वन में बिल्ब, आमलकी तथा कुछ कंद मिल जाते हैं उनका संग्रह गुफा में सुरक्षित रहता है। अन्यत्र घास के बीजों की अपेक्षा उन्हें थी नहीं। अग्निहोत्र के अतिरिक्त वे गुफा में जाते नहीं थे। शीतकाल के दिनों में जलधारा गिरने वाले कुँड में वे ध्यानस्थ रहते और ग्रीष्म की लू तथा वर्षा की झाड़ियाँ शिलातल पर बैठे उस तपस का सत्कार करती थीं।

“लक्ष्यवेध प्राप्त हो।” महर्षि भरद्वाज का आशीर्वाद ऋतक्रथु के मनन का सूत्र बन गया था। शस्त्र का त्याग करके वन को प्रस्थान करने वाले तपस्वी को दिया गया यह आशीर्वाद कोई भौतिक लक्ष्यबेध उसका तात्पर्य नहीं हो सकता था यह बहुत स्पष्ट बात थी। ऋतक्रथु को कोई विलंब नहीं हुआ था यह समझने में कि महर्षि का तात्पर्य क्या है?

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्च्मुच्यते।

यह श्रुति शीघ्र स्मृति में आ गई और उन्होंने यह समझ लिया कि महर्षि ने आशीर्वाद के रूप में उन्हें प्रणव की साधना का आदेश दिया है।

वानप्रस्थ आश्रम की कठोरता लोकविदित है। शरीर रोगी है, देह में तप की, त्रिकाल स्नान की, शक्ति नहीं, किंतु वानप्रस्थ आश्रम में तो नियम त्याग की विधि नहीं है। नियम पालन करो और न कर सको तो अनशन करके या अग्नि में देह की आहुति देकर प्राण त्याग करो। विश्राम, औषधि, तप विरति के लिए कोई स्थान नहीं यहाँ।

ऋतक्रथु ने पूरे बारह वर्ष का नियम लिया था। नियम पूरा हो जाता किंतु प्रारब्ध जब अनुकूल न हो, प्राणी क्या कर सकता है। केवल कुछ ही दिन रहे थे संकल्पित अवधि पूर्ण होने के और देह को ज्वर ने अपना आखेट बना लिया।

लक्ष्यबेध प्राप्त नहीं हुआ। प्राण का मोह तपस्वी को नहीं होता। जीवन रखना वह चाहे, जो देह को भोग दे रहा हो। किंतु ऋतक्रथु को क्लेश यह था कि जीवन का लक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ।

महर्षि की वाणी असत्य का स्पर्श नहीं करती, उनका आशीर्वाद व्यर्थ नहीं जा सकता। ऋतक्रथु अभी तक ज्वराक्राँत रहते हुए भी कभी नियम पालन में शिथिल नहीं हुए। आज लगता है कि अब आसन से उठना कदाचित् संभव न हो और इसी से वे विशेष चिंतित हैं। “आज मनोमंथन प्रबल हो उठा है-कहीं त्रुटि है। कहीं प्रमाद हो रहा है गुरुदेव।”

आर्त प्राणी की पुकार यदि व्यर्थ जाने लगे, विश्वात्मा को कौन सर्वज्ञ और सकरुण कहे? साहसी ज्योति आ गई तपस्वी ऋतक्रथु के मुख पर। वे स्वयं बोल उठे-”तू क्षत्रिय है। धनुर्धर रहा है और ज्या चढ़ाए बिना शिथिल धनुष से तू लक्ष्यबेध करने का प्रयत्न कर रहा है? इतनी सीधी बात तेरी समझ में नहीं आती कि ज्यों पहले चढ़नी चाहिए।”

प्रणव का धनुष। अकार, उकार, मकार इनका एकी भाव ‘प्रणव।’ अकार और मकार इस धनुष की दो नोंके और उकार इसकी प्रत्युच्चा। अकार से उठकर मकार तक पहुँचने में उकार को खींचकर उठाए चलती प्राणों की प्रत्यंचा यदि शिथिल हो प्रणव की साधना सम्यक् पूर्ण कहाँ हुई।

ऋतक्रथु तपस्वी, त्यागी, वासना वर्जित, शम्, दम्, उपरति, तितिक्षा संपन्न श्रेष्ठतम अधिकारी हैं। उनके चित्त में मल तो तब भी नहीं था जब वे तपोवन आये थे। पूरे बारह वर्ष होने को आ रहे हैं। विक्षेप क्या होता है? उनका मन यह बात भी भूल चुका है। अब ऐसे अधिकारी का आवरण कब तक टिका रह सकता है।

बात ध्यान में आती नहीं, विलंब इतना ही था। शरीर कुछ और सीधा हो गया। मूलाधार से उठकर मूर्छा तक गूँजता दीर्घ घंटा नाद के समान प्रणव का नाद प्राणों ने उठाया उसे प्रथम यह ठीक है, किंतु आवृत्ति दस तक पहुँचे उससे पूर्व ही वह अनाहत मेघगर्जन से एक हो गया। नाद केवल नाद। त्रिमात्रा नाद में लीन हो गयी और चन्द्राकार अमृतोज्वल दिव्यनाद चलता रहा। चलता रहा नाद और कब बिंदु में वह लय हुआ कोई साक्षी पृथक् रह गया हो तो वह बतावे।

स्थिर निष्कंप, प्रकाशपुँज देह ऋतक्रथु। जिसका बिंदुबेध-लक्ष्यवेध हो चुका, उससे कौन कहेगा कि अब स्नान, संध्या का समय हो चुका। उसके लिए तो श्रुति ने भी घोषणा कर रखी है -

न तस्य कार्यं कारणं च विद्यते।


जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे

इन दिनों प्रायः लोग कहते सुने जाते हैं कि ईश्वर यदि समदर्शी होता, तो संसार में इतनी विषमता दृष्टिगोचर नहीं होती, जितनी संप्रति दिखाई पड़ रही है। कहीं तो कुबेर जितनी संपदा और कहीं इतनी विपन्नता कि मुश्किल से पेट भरे। कहीं स्वर्ग-सुख का आनंद, तो कहीं नरक जन्य दारुण व्यथा। इन विपरीतताओं को देखते हुए क्या ईश्वर पर यह आरोप नहीं लगता कि वह पक्षपाती है और संसारी लोगों की ही तरह कमीशन लेकर सुख-दुःख बाँटता है? भली बुरी-बुरी परिस्थितियाँ विनिर्मित करता है?

इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में यदि कर्म-फल-व्यवस्था का गहराई से अध्ययन करें, तो हम पायेंगे कि भगवान का इनसे कोई लेना-देना नहीं है। न तो वह किसी की प्रशंसा से बाग-बाग होकर किसी को धनपति बनाता है, न किसी की आलोचना से कुपित होकर उस पर कहर बरपाता है। यदि ऐसी बात रही होती, तो साम्यवादी देशों के नास्तिकों को, जो उस पर विश्वास नहीं करते और गालियाँ देते हैं, बरबाद कर देता, पर देखा जाता है कि समाजवाद के जन्म से लेकर अब तक वे फलते, फूलते और विकास करते आ रहे हैं। केवल उस सत्ता को न मानने से ही उनकी प्रगति रुकी हो और कोई ऐसी हानि हुई हो, जो आस्तिकवादी देशों के लोगों को न होती हो-ऐसा अब तक देखा नहीं गया है। जब प्रत्यक्ष निंदा-भर्त्सना का उस पर कोई असर नहीं पड़ता, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि निजी जीवन में जाने-अनजाने होने वाली गलतियों के फल का जिम्मेदार वह है। किसी ने किसी की हत्या की, तो वह उसे रौरव में झोंक दे और जिसने समाज-सेवा का पुण्य किया, उसे आनंददायक परिस्थितियाँ प्रदान करे। यह काम परमसत्ता का नहीं। भला दुनिया के 600 करोड़ मनुष्यों में से प्रत्येक के पल-पल के कर्मों का सूक्ष्म लेखा-जोखा रखने की झंझट में वह क्यों कर पड़ेगा और क्यों मनुष्यों की नजरों में बुरा बनने का कलंक सिर पर उठायेगा? उसके लिए करने को और भी उच्चस्तरीय काम हैं, फिर अनावश्यक मुसीबत क्यों मोल लेगा?

सच तो यह है कि इस जीवन-उद्यान में कर्म के रूप में हम जो कुछ बोते हैं, वही काटते रहते हैं। यह नगद धर्म की तरह है-क्रिया की प्रतिक्रिया जैसा है। न तो इसमें परमात्मा की कोई भागीदारी है, न इससे कोई सरोकार है। यहाँ अच्छा-बुरा जो कुछ हम भोगते हैं, सब कुछ कर्मों की प्रकृति और फल की स्वसंचालित प्रक्रिया के हिसाब से हमें मिलता रहता है। कुछ हाथों-हाथ तत्काल, तो कुछ फसल बोने और काटने जितने मध्याँतर के बाद। कुछ की प्रतिक्रिया शीघ्र परिणाम प्रस्तुत कर देती है, जबकि कुछ में लंबा समय लग जाता है। किसी ने बेईमानी की, चोरी, डकैती, हत्या, अपहरण जैसे कुकृत्य किये, तो उसकी सजा उसे तत्काल मिल जाती है। समाज दंड के रूप में इसको भोगना और घृणा, निंदा, अवमानना के रूप में सहना पड़ता है। किसी ने किसी का अपमान किया, तो उसे इस कर्मफल व्यवस्था के अंतर्गत सम्मान नहीं मिल सकता। उसका अपना ही दुष्कर्म उसको अपने घेरे में लेगा और समयाँतर में वही अपमान, अपयश बनकर बरस पड़ेगा-यह-क्रिया-प्रतिक्रिया का अकाट्य सिद्धाँत है। इसमें तनिक भी हेर-फेर की गुंजाइश नहीं।

जो गहरे जल में उतरेगा, उसका डूबना संभावित है। सड़क पर असावधानी बरतने पर दुर्घटना घट ही जाती है। ऐसे में कोई ईश्वर को दोष दे, तो इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए। वास्तव में कर्मों के शुभाशुभ परिणाम क्रिया के ही भीतर निहित हैं। जिस प्रकार बीज के अंदर वृक्ष प्रच्छन्न होते हैं, वैसे ही अच्छे का अच्छा और बुरे का बुरा फल कर्मों की प्रकृति के अनुरूप मिलता रहता है। बीज यदि अच्छे हों, तो फसल अच्छी होकर रहेगी, जबकि खराब बीज से अच्छे साधन भी अच्छी फसल नहीं ले सकते। परिस्थितियाँ वातावरण, खाद, पानी जैसे बाह्य कारक तो न्यून अंशों में ही फसल को प्रभावित कर पाते हैं। मुख्य कारक तो बीज के अंदर मौजूद हैं। वह यदि अच्छा हुआ, तो परिस्थितियों की प्रतिकूलता में भी वह अपने स्तर का प्रमाण-परिचय दिये बिना न रहेगा, जबकि घटिया बीज अनुकूल परिस्थिति में भी यथावत् बने रहते हैं। कारण एक ही है-बीज की गुणवत्ता, जो भले-बुरे परिणाम को अपने में सँजोये रहती है।

इस सिद्धाँत के आधार पर उन कर्मों की व्याख्या आसानी से हो जाती है, जिसमें व्यभिचार, पापाचार जैसे अनैतिक कृत्य करने पर भी फल नहीं मिल पाये हों। यहाँ समय की देरी को परिणाम की निष्फलता नहीं मान लिया जाना चाहिए और न यह भ्रम पालना चाहिए कि किया गया कुकर्म समाज और संसार से छिपा हुआ होने के कारण उसके फल से व्यक्ति बच जायेगा। हाँ, यह संभव है कि राजदंड के न्याय विधान से वह बच जाय, पर ध्वनि की प्रतिध्वनि तो होकर रहेगी। काया की छाया सदा साथ चलती है। इसको मिटा पाना असंभव है। देह जैसी होगी, उसी के अनुरूप उसका प्रतिबिंब भी लंबा, पतला, मोटा, छोटा होगा। इसके स्वरूप को बदल पाना संभव नहीं। फिर कर्मफल तो मनुष्य की पहुँच से निताँत परे है। भला उसे वह कैसे बदल सकता है? उससे बच पाना भी शक्य नहीं। उत्थान-पतन, रोग-नीरोग जैसी परिस्थितियाँ भी उन कर्म-बीजों के ही नतीजे हैं, जो कभी पूर्व में बोये गये थे।

इस प्रकार यहाँ जो कुछ बोया जाता है, वही काटने का विधान है। बुवाई और कटाई में यदा-कदा देरी हो सकती है। इतने पर भी सच यह है कि काटा वही जायेगा, जो बोया गया था, इससे न्यूनाधिक कुछ भी नहीं। चूँकि इसमें कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया के अनुसार कर्ता को दंड-पुरस्कार मिलता है, अतः ईश्वर को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार दीवार पर गेंद मारने से वह मारने वाले की ओर उलटी लौट आती है। इसमें न गेंद का दोष है, न दीवार का। स्वसंचालित न्याय-विधान को तब मनुष्य और सरलता से समझ पाता, यदि हर एक को अपने पिछले जन्म देख लेने जितनी दिव्य दृष्टि मिली होती। फिर व्यक्ति आसानी से जान पाता कि आज वह जो कुछ भुगत रहा है, वह उसके कल के कर्मों की परिणति है। किंतु कर्म फल विधान प्रक्रिया के अनुसार यह सब मुहर बंद है।

कर्मफल की उक्त व्याख्या वैज्ञानिकों, कम्युनिस्टों एवं नास्तिकों जैसे अनीश्वरवादियों के लिए भी उतना ही मान्य है, जितना आस्तिकों के लिए। अंतः उन्हें इस भ्राँति में नहीं पड़ना चाहिए कि उनके समाज और समुदाय में ईश्वरीय सत्ता की अवधारणा नहीं होने मात्र से ही वे कर्मों के फल से बचे रह जायेंगे। कर्मफल का वास्तविक कारण स्वयं कर्ता के कर्म हैं। इसे भली-भाँति समझ लेने पर वह सुस्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता आप है।


पंज प्यारों का आश्वासन


पंज प्यारों का आश्वासन (Kavita)

चलेंगे हम जगज्जननी, तुम्हारे ही इशारों पर, न है चिंता कि डूबें, या पहुँच जायें किनारों पर।

भटकते ही रहे अब तक, अँधेरी वीथियों में हम, रहे बस खोजते मोती, तटों की सीपियों में हम,

बड़े सौभाग्य से आये, यहाँ माँ के दुआरों पर। तुम्हारे शब्द में हमने, सुनी गुरुदेव की वाणी,

तुम्हारे स्नेह में देखी, गुरु की दृष्टि कल्याणी, उसी से पार होंगे हम, समय की तेज धारों पर।

हमारे कान में गुरु की, तुम्हीं ने बात दुहरायी, शिथिलता के पलों में माँ, तुम्हीं से प्रेरणा पायी,

हमारी हर प्रगति होगी, तुम्हारे ही सहारों पर। करें हम काम गुरुवर का, हमें वह शक्ति दे दो माँ,

दुखी-असहाय मानव में, हमें अनुरक्ति दे दो माँ, करें हर सुख समर्पित हम, हजारों बेसहारों पर।

कृपा हम पर करो जिससे, सहज संवेदना जागे, घृणा-संकीर्ण स्वार्थों की, हृदय से भावना भागे,

मनुज गौरव करे फिर से, यहाँ सत्संस्कारों पर। सुनिश्चित पतझड़ों के बाद, है मौसम बहारों का,

उमस संकेत कल की सुखद, शीतल फुहारों का, कि कायाकल्प निर्भर है, मनुज के सद्विचारों पर।

सुसंस्कृति की सुरक्षा को, विवेकानंद हम होंगे, कि बंदा बैरागी से हम, जरा भी तो न कम होंगे, जमाना नाज कर लेगा, पुनः इन पंच प्यारों पर।

-शचीन्द्र भटनागर


सुख जीवन का गान बन गया


सुख जीवन का गान बन गया (Kavita)

जो था बस दो दिन का साथी, मालिक वह मेहमान बन गया। आत्मा की आवाज दबाकर-सुख जीवन का गान बन गया॥

अंतरिक्ष में उड़कर आयी, ‘आत्मा’ ने यह आश्रय देखा। पंचतत्व को एकत्रित कर, काया का यह रूप सहेजा॥ आत्म तत्व को भूल गये हम तब अपनी पहचान बन गया॥

रस की गागर भरकर रख ली, पथ में प्यास न ठगने पाये। बिखर गया वह रस कौतुक में, कभी न जी भर कर पी पाये। व्यसनों को जीवन रस माना, कैसा हाय रुझान बन गया॥

जिसने दिव्य चेतना दी थी, पंच तत्व का महल बनाया। भुला दिया हमने उसको ही, और विकारों को अपनाया॥ ब्रह्म मिलन का माध्यम था जो, वह पथ का व्यवधान बन गया॥

मानव यदि मानव बन रहता, यदि प्रज्ञा विकसित की होती। करते दीन-दुःखी की सेवा, तो यह आत्मा कभी न रोती॥ क्षणिक सुखों में उलझा जीवन, चिर-सुख का अभियान थम गया॥

जो था बस दो दिन का साथी, मालिक वह मेहमान बन गया॥ आत्मा की आवाज दबाकर सुख जीवन का गान बन गया॥

-माया वर्मा


परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- - कैसे हो आध्यात्मिक कायाकल्प-2

(कल्प साधना संबंधी प्रवचन का उत्तरार्ध)

गायत्री मंत्र साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

मित्रों, कल्प साधना के संबंध में कल थोड़ी सी जानकारी दी थी कि यह कल्प आखिर है क्या? यह भी बताया था कि कल्प माने है-परिवर्तन। पर यह परिवर्तन क्या होगा? कौन करेगा? कैसे संभव होगा? आप कुछ सहयोग करेंगे और हम आपकी सहायता करेंगे। कल हमने कहा था कि आपको अपने भीतर के दृष्टिकोण को बदल देना चाहिए। क्रिया भी इसमें सहायक है। इसके लिए आपसे जप करा रहे हैं, अनुष्ठान करा रहे हैं, ध्यान करा रहे हैं। भोजन के बारे में-आहार की भी साधना करा रहे हैं। ये क्रियायें हैं। इन क्रियाओं का मतलब सिर्फ इतना है कि आप अपने भीतर वाले दृष्टिकोण, चिंतन, चरित्र, स्वभाव, रुचि और आकाँक्षाओं को बदल दें। अगर आपने यह अनुमान लगा लिया हो कि केवल क्रिया करने से जादूगरी के तरीके से आपको कहीं आसमान से कोई सिद्धियाँ आ टपकेंगी, तो आप इस ख्याल को निकाल दीजिए। करना आपको ही पड़ेगा। आपके किये बिना कोई रास्ता नहीं है। आप अगर चुपचाप बैठकर के गुरुजी के आशीर्वाद, सीधे गायत्री माता के आशीर्वाद से या किसी मंत्र के चमत्कार से बदलना चाहते हों और अपनी परिस्थितियों को सुधारना चाहते हों और स्वयं कष्ट उठाने से इनकार करते हों तो ख्याल रखिये आपको सफलता मिलने वाली नहीं है। एक महीने का समय भी आपका बेकार चला जायेगा। अच्छा हो आप वास्तविकता को पहले समझ लें, फिर कदम बढ़ायें।

कल आपको यह बताया था कि किस तरीके से लोगों ने अपने आपको बदल लिया और मनःस्थिति बदलने के बाद में परिस्थितियाँ किस तरीके से बदल गयीं। कायाकल्प का स्वरूप यही है। फिर कायाकल्प में करना क्या पड़ता है? चलिए इसके लिए एक उदाहरण मैं आपको सुनाऊँगा। वह उदाहरण महामना मालवीय जी का है। महामना मालवीय जी ने एक कायाकल्प किया था। वे भी यही सोचते थे कि शरीर का कायाकल्प होगा। हम कह चुके हैं कि शरीर का कायाकल्प संभव नहीं है, लेकिन मन का कायाकल्प करने के लिए भी प्रक्रिया वही इस्तेमाल करनी पड़ती है जो शरीर के कायाकल्प के लिए कभी की जाती रही होगी, या कभी सफल होती रही होगी। महामना मालवीय जी का कायाकल्प कैसे हुआ था? मथुरा जिले में कोसी नाम की एक जगह है। उसके पास जंगल में एक महात्मा रहते थे-तपसी बाबा उनका नाम था। उन्होंने मालवीय जी से संपर्क स्थापित किया और कहा कि हम आपका कायाकल्प करा देंगे-आपके बुढ़ापे को जवानी में बदल देंगे। यह प्रक्रिया जिस तरीके से इस्तेमाल की गयी, वह आपके लिए बहुत ध्यान देने लायक है और आपके मानसिक कायाकल्प में वह प्रक्रिया जरूर सहायता कर सकती है।

क्या हुआ था उनका? उनके तीन काम हुए थे। मालवीय जी को सबसे पहले पंचकर्म करने पड़े थे। पंचकर्म किसे कहते हैं? पंचकर्म कहते हैं शरीर के संशोधन को। इसमें स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन और वस्ति आदि पंचकर्मों के द्वारा शरीर का शोधन किया जाता है। पंचकर्मों में वमन, विरेचन द्वारा आमाशय में जितना भी मल और जहर भरा पड़ा था उसे निकाल दिया। आँतों में जितना भी जहर भरा पड़ा था उसे उलटी और दस्त कराके बाहर निकाल दिया। यह दो कृत्य हो गये। तीन और रह जाते हैं, जिनमें स्वेदन कहते हैं-पसीना निकालना। पसीना इसलिए निकाला गया कि उनके शरीर में जहाँ कहीं भी कोई विषाणु भरे होंगे या संचित मल भरा होगा, उसको निकालने का प्रयत्न किया गया। इसके बाद उन्हें बार-बार छींक दी गयी। जुकाम के कीटाणु अथवा मस्तिष्क में जो मल भरे पड़े थे, उनको निकाला गया। इस तरीके से सारे के सारे मलों का संशोधन किया गया। इस तरीके से कल्प का पहला कृत्य-पहला अध्याय मलों का संशोधन है। जिनको भी पूरा न सही अधूरा ही शारीरिक कायाकल्प करना होगा तो पहले मलों का निष्कासन करना पड़ेगा। दूसरा, मालवीय जी को यह करना पड़ा कि चालीस दिन एक झोंपड़ी के भीतर कैद रहना पड़ा। चारों ओर से झोंपड़ी बंद थी, न सूरज की रोशनी जाती थी, न हवा जाती थी, न धूप जाती थी। बस उसके भीतर एकाँत कोठरी में चालीस दिन उनको काटने पड़े। उसी में नहाते थे, पूजा-पाठ करते थे। जो कुछ खाना खाते रहे होंगे, वह भी उसी में भेज दिया जाता था। शौचादि क्रिया भी उसी में करते थे। बहरहाल उसमें से निकलना नहीं होता था। टहलना होता तो उसी में टहलते। ठीक इसी तरीके से चालीस दिन उन्होंने काटे।

अध्याय नम्बर दो में मैं आपको यह समझाने वाला हूँ कि इन तीनों क्रियाओं का क्या उद्देश्य है और ये तीनों क्रियायें मनः क्षेत्र का कायाकल्प करने के लिए भी किस तरीके से लागू हो सकती हैं? दो बातें हो गयीं-एक हुआ उनका मल संशोधन और दूसरा हुआ एकाँत सेवन। तीसरा एक और पक्ष यह था कि उनको विशेष पदार्थ खिलाये गये। क्या खिलाये गये? ऐसे पदार्थ खिलाये गये जिससे कि उनके शरीर में नये कोषाणु बने, नया जीवन आर्ये उनमें गिलोय जैसी टॉनिक टाइप की कुछ चीजें ऐसी थीं जिन्हें एक फ्लास्क में बंद करके रखते थे और सात दिन बाद जब वह तैयार हो जाती थी तो पीस कर उन्हें पिलाते थे जिससे कि कायाकल्प में पुरानी खराबियाँ निकल जायँ और नयी अच्छाइयाँ शुरू हो जायँ। यही कृत्य चालीस दिन के बाद क्या लाभ हुआ, ज्यादा तो मुझे नहीं मालूम, पर इतने लाभ तो मालवीय जी ने स्वयं छापे थे कि मेरी स्मरण शक्ति ठीक हो गयी है और सफेद बाल काले हो गये हैं। ऐसे कई लाभ उनको हुए थे। ये लाभ कब तक टिके थे, इस बारे में मुझे कुछ नहीं कहना क्योंकि मैंने शारीरिक कायाकल्प की बाबत कुछ कहा भी नहीं है और कुछ ऐसा कराने की स्थिति में भी मैं नहीं हूँ, लेकिन मानसिक कायाकल्प में भी इन्हीं तीनों सिद्धाँतों को बराबर आपको लागू करना पड़ेगा। इससे कम में कुछ काम चलने वाला नहीं है। एक काम आपको यह करना पड़ेगा कि आपके भीतर जो भी संचित मल, आवरण और विक्षेप हैं, जो भी कषाय और कल्मष भरे पड़े हैं, उनकी ओर गौर करना पड़ेगा। न केवल गौर करना पड़ेगा, वरन् इन्हें निकालना भी पड़ेगा। जद्दोजेहद करनी पड़ेगी, लड़ना पड़ेगा।

आपका पिछला जीवन कैसे कुसंस्कारों से भरा पड़ा है और उन कुसंस्कारों को दूर करने के लिए आपको क्या करना चाहिए और यह कैसे संभव है? हमारी प्रायश्चित प्रणाली इसी के लिए है। प्रायश्चित पद्धति में यह बताया जाता है कि आदमी की आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बड़ी रुकावट उसके पुराने किये हुए कर्म हैं। पुराने दुष्कर्म पत्थर की तरह से रास्ते में खड़े हो जाते हैं और एक कदम भी आगे बढ़ने नहीं देते, बार-बार रोक देते हैं। क्योंकि उसका भविष्य बुरा होता है, उसको दंड मिलने हैं, इसलिए अच्छे काम भी नहीं करने देते और अच्छे कामों की ओर से मन उचाट देते हैं इसलिए पहला काम हर साधक को अपने आपकी धुलाई के रूप में करना पड़ता है। रंगने से पहले धुलाई करनी पड़ती है। धुलाई अगर नहीं की जाय तो कपड़ा रंगा नहीं जाएगा। इसलिए पहला काम यह करना पड़ता है। कल्प साधना में जो आप आये हैं तो यह कार्य पद्धति आपको समझनी होगी। आपके ऊपर दबाव डाला जायगा और आप में उत्साह पैदा किया जायगा कि आपके अंदर पिछले स्वभाव पिछली गंदी आदतें और पिछली क्रिया पद्धति जो जम गयी है, उसको आप हटा दीजिए। उसको निकालिए, उसको छोड़िये। बुरी आदतें यदि छोड़ने से छूटती हों तो उनसे लड़ना शुरू कीजिए। उनके विरुद्ध बगावत कीजिए। उनको अस्वीकार कर दीजिए, उनका असहयोग कीजिए और उनका दबाव मानने से इनकार कर दीजिए। आपके कायाकल्प में यह करने का पहला काम है। आप यह न करेंगे तो कल्प साधना, जिसके रंगीन सपने हमने दिखाये हैं और यह बताया है कि आपका जीवन दैवी जीवन होकर रहेगा और आप अच्छे शानदार आदमी होकर रहेंगे, पूरा हो सकना संभव नहीं है। यह एक काम तो आपको करना ही चाहिए। अगर आप यह नहीं करेंगे और पुराने घिनौने जीवन के ढर्रे पर ही चलते रहेंगे तो फिर हम क्या कर पायेंगे। फिर आपकी पूजा-उपासना क्या कर लेगी आपको जप और अनुष्ठान चमत्कार कैसे दिखा पायेंगे? जादू-चमत्कार जैसा अध्यात्म नहीं है। अध्यात्म तो मानसिक पुरुषार्थ को कहते हैं। मानसिक पुरुषार्थ का यह एक काम तो आपको करना ही पड़ेगा।

दूसरा काम एक और आपको यहाँ करना पड़ेगा। उसका अर्थ है-जैसे मालवीय जी को चालीस दिन तक एक कोठरी में एकाँत सेवन करना पड़ा था, आपको भी यहाँ चालीस दिन तो नहीं, पर एक महीने भर तक एकाँत सेवन करना चाहिए। यह खास बात है। आपको निवास करने के लिए हमने एक कोठरी खासतौर से इसलिए दी है कि आप यह मान कर चलें कि आप एकाकी हैं। आप अकेले रह रहे हैं। इस दुनिया में आप अकेले हैं। अकेले ही आप आये थे और अकेले ही आपको जाना है, चलना है। किसी रास्ते पर हों तो भी आपको अकेले ही चलना है। वही एकाँत सेवन है। इसी को गुफा प्रवेश कहते हैं। प्राचीनकाल के संत-महात्मा गुफा में घुस जाते थे, कोठरियों में रहते थे, एकाँत सेवन करते थे क्यों? क्योंकि उनके बाहर का चारों ओर का जंजाल, जिसने उनको बुरी तरह से चक्रव्यूह में फँसे हुए अभिमन्यु के तरीके से जकड़ लिया है, उसमें से पार हो सकें। उससे अपने आपको अलग अनुभव कर सकें। अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए आपको एकाँत चाहिए। एकाँत अगर आपको नहीं मिलेगा तो आप विचार तक नहीं कर पायेंगे कि क्या करें? हमको क्या करना है? पुरानी चीजों से कैसे आपको छुटकारा पाना है और नयी चीजों को कैसे अपनाना है। इन दोनों के लिए एकाँत सेवन आपके लिए आवश्यक है। एक महीने का यह एकाँत सेवन आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आपको रोका गया है कि आप जगह-जगह मत जाइये, घूमिये मत। तीर्थ यात्रा के बहाने यहाँ-वहाँ मटरगस्ती मत कीजिए, यहाँ-वहाँ चक्कर मत काटिये कहीं मत जाइये। ऋषिकेश मत जाइये। एक महीने भर आपको एक ही जगह रहना है।

आपको ऐसे रहना चाहिए जैसे कि माता के गर्भ में बच्चा रहता है। कल्पना कीजिए कि आप जिस कोठरी में अथवा गायत्री नगर-शाँतिकुँज जिसमें आप निवास करते हैं, यह माताजी का गर्भ है और आप माताजी के गर्भ में पल रहे हैं। आपका नया जन्म हो रहा है। आप अपना कायाकल्प करा रहे हैं। पेट में जो भ्रूण रहता है, वह चुपचाप बैठा रहता है। गड़बड़ नहीं फैलाता है। जो माता देती रहती है, उसी से अपना गुजारा करता रहता है। माता जिस हैसियत में रखती है, उसी में रहता है। आपको भी इसी हैसियत में रहना चाहिए। आपको यह अनुभव करना चाहिए कि आप यहाँ शाँतिकुँज में निवास करते हैं, गायत्री नगर में निवास करते हैं। यह क्या है? गुरु जी का बर्तन पकाने का आँवा है। कुम्हार को आप जानते हैं, वह बर्तन बनाता है और बनाने के बाद में कच्चे बर्तनों को पकाता है। इस आँवे में से खिलौने भी निकलते हैं और न जाने क्या-क्या निकलते हैं। आप चाहें तो यह मान सकते हैं कि गुरु जी ने यह आँवा लगाया हुआ है। कहाँ है आँवा? इस कोठरी में जिसमें कि आप रहते हैं। शाँतिकुँज को आप आँवा मानिये। इस आँवे में आपको कैद कर दिया गया है और आपको पकाया जा रहा है। अगर आप एक महीने तक पकते रहेंगे, गड़बड़ नहीं फैलायेंगे, तो मजा आ जायगा। आप अपने चित्त को इधर-उधर मत ले जाइये। घर वालों को याद मत कीजिए, बाहर वालों की समस्या पर ध्यान मत दीजिए। मन को इधर-उधर भागने मत दीजिए, शरीर को यहाँ-वहाँ भटकने मत दीजिए। यहाँ-वहाँ घूमते रहेंगे तो बताइये फिर काम कैसे बनेगा। कोई बच्चा माँ के पेट में दंगल मचाये कि मम्मी मैं तो अभी नौ महीने पेट में नहीं रह सकता, जरा छुट्टी दे दीजिए मैं बाजार से घूमकर आऊँ। तब आप समझ सकते हैं कि बच्चे का क्या हाल होगा। इसी तरह से अगर कुम्हार के बर्तन चुपचाप बैठे न रहें और यह कहें कि साहब हम शाम को आ जाया करेंगे, पर दिन में तो बाजार में घूमा करेंगे और रात को आंवे में घुस जाया करेंगे। आप ही बताइये, तब बर्तन पकेंगे क्या? सब बिगड़ जायगा। इसलिए आप बाहर की चिंता न कीजिए और न मन को बाहर भागने दीजिए।

तो क्या काम करें? यही मैं बताने वाला था कि अगर आप तीसरा वाला काम पूरा कर लेते हैं तो समझना चाहिए कि आपके कल्प-साधना का उद्देश्य पूरा हो गया और जिस लक्ष्य पर पहुँचने की आप इच्छा करते थे, अथवा जिस लक्ष्य पर हम आपको पहुँचाना चाहते थे, वह निश्चित रूप से सफल हो जायेगा। एक काम और कीजिये कि जिस तरह से मालवीय जी से तीसरा जो काम टॉनिक सेवन कराया गया था, आपको भी टॉनिक सेवन करना चाहिए। टॉनिक सेवन से क्या मतलब है? टॉनिक सेवन से मतलब है कि जिन विचारों का आप में अभाव रहा है, उन विचारों को फिर से सेवन करना शुरू कीजिए। टॉनिक तो आपको मिला ही नहीं। इस संदर्भ में आप तो कुपोषण के शिकार रहे हैं। अथवा विकृत भोजन करते रहे हैं। इसलिए आपका सारे का सारा मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ा गया है। तब क्या करें? तब आपको भविष्य में ऐसी विचारधारा के साथ, ऐसे लोगों के साथ, ऐसे लक्ष्य के साथ, ऐसी महान सत्ता के साथ अपने आपको संपर्क में रखना है जो आपको महान बनाने में समर्थ है , जो आपको सहारा दे सकती है, ऊँचा उठा सकती है। आप उसके संपर्क में आइये। इस बीच आप भगवान से संपर्क मिलाने की कोशिश कीजिए और लोगों से अपने आपको पीछे हटाइये। थोड़े दिनों के लिए यह मान कर चलिए कि आप और आप का भगवान दो ही हैं। फिर लक्ष्य की प्राप्ति आसान हो जायेगी।

भगवान किसे कहते हैं? भगवान सद्गुणों के, सत्प्रयासों के, आदर्शों के समुच्चय का नाम है। एक भगवान तो वह है जो सारे विश्व को सँभालता है, जिसको हम नियामक सत्ता कह सकते हैं। एक भगवान वह है जो विश्वव्यापी है। विश्वव्यापी भगवान के लिए तो आप उसका कायदा पालन कीजिए और फायदा उठाइये। कायदे को तोड़ेंगे तो मार खायेंगे। वह भगवान तो आदमी के लिए न्याय और नियमन के अलावा दूसरा कुछ करता भी नहीं है। लेकिन जो हमारी व्यक्तिगत सहायता कर सकता है, वह हमारी ‘सुपर कान्शसनेस’ है, हमारी अंतरात्मा है। अंतरात्मा को ही परमात्मा कहते हैं गुण-कर्म, स्वभाव की विशेषता का नाम परमात्मा है। उसी को सुपर कान्शसनेस कहते हैं। आप उसके साथ में अपने आपको जोड़ दीजिए। अभी तक आपका संबंध कुसंस्कारों के साथ घिनौनेपन के साथ रहा है। घटिया लोगों के साथ रहा है। चारों ओर जो वातावरण छाया हुआ है, वह आपको गिरावट के अलावा और क्या नसीहत देगा। आपने जो स्वभाव सीखा है वह घिनौने जीवन के अलावा क्या सिखा सकता है आप चारों तरफ से नर-पशुओं से घिरे हैं। आप थोड़े दिनों के लिए इस दायरे से बाहर हो जाइये और बाहर होकर के ऐसे लोगों के साथ रिश्ता बनाइये जिनके समुदाय में जाकर के आपका ऊँचा उठना संभव है। ऋषियों के साथ संबंध बनाइये, संतों के साथ संबंध बनाइये, देवताओं के साथ संबंध बनाइये, भगवान के साथ संबंध मिलाइये।

ये सब हैं क्या? बिलकुल हैं और आपके साथ हैं, आप देख नहीं पा रहे हैं। यहाँ जिस कोठरी में आप रहते हैं, जिस वातावरण में रहते हैं, उसमें चारों ओर संत छाया हुआ है, ऋषि छाया हुआ है, चारों ओर भगवान छाया हुआ है और साथ में आदर्श छाये हुए हैं। दृष्टिकोण छाये हुए हैं, प्रेरणायें छाई हुई हैं और आपको ऊँचा उठाने के लिए जो दिशाधारायें आवश्यक थीं, छाई हुई हैं। आप इनके साथ अपना संबंध मिलाइये। आप पीछे मुड़ करके मत देखिये, आगे की तरफ विचार कीजिए। आप महानता के साथ में जुड़ जाइये, आदर्शों के साथ में जुड़ जाइये। एक महीने तक तो आपको यही करना है, अपने आपको साधना में लगाये रखना है, चिंतन-मनन करना है। इस बीच में आपको जप और अनुष्ठान करना है, योगाभ्यास करना है, और अपने आपका परिशोधन करना है। तो क्या हम अकेले कर लेंगे? नहीं आप अकेले कहाँ हैं। पीठ पीछे हम जो हैं। हम आपकी जरूर सहायता करेंगे। इम्तहान में पास तो बच्चे ही होते हैं, पढ़ना तो उन्हीं को पड़ता है, स्कूल तो वही जाया करते हैं, पर क्या आप समझते हैं कि बच्चे जब स्कूल जाते हैं तो अपने ही बलबूते पर पास हो जाते हैं? माता उनके खाने-पीने का प्रबंध करती है, पिता उनकी फीस का इंतजाम करते हैं, मास्टर उनको पढ़ाने में सहायता करते हैं। तीनों ओर की सहायता मिलती है तब कहीं वह हो पाता है कि उनकी पढ़ने की मेहनत और पुरुषार्थ सफल हो जाये। हम आपके लिए सब तीनों इंतजाम कर रहे हैं। माता आपको खुराक देने के लिए तैयार है। आपको ऊँचा उठाने के लिए पिता का जो कर्तव्य था, उसको पूर्ण करने के लिए हम तैयार हैं। गुरु का हम और हमारे गुरु वह भी इस वातावरण में जिसमें आप निवास करते हैं, आपकी सहायता के लिए हम तीनों तैयार हैं।

गुरु के रूप में वह सत्ता जिसके आधार पर शाँतिकुँज बनाया गया है और जिसकी आज्ञा से ये कल्प-साधना के शिविर लगाये गये हैं, ऐसी परमसत्ता आपको गुरु के तरीके से मार्गदर्शन करने के लिए तैयार है और सहर्ष यहाँ विद्यमान है। आप लोग उसका फायदा उठाइये, वे आपकी सहायता करेंगे। हमको चाहें तो आप वही मान सकते हैं, अभिभावक मान सकते हैं। हमारे पास जो कुछ तप होगा, पुण्य होगा, ज्ञात होगा, चरित्र होगा, दबाव होगा, तो आप यकीन रखिये कि हम न केवल आप पर दबाव डालेंगे, सिखाएंगे, वरन् उसका एक हिस्सा भी देंगे, बाप भी तो अपने बच्चे को शिक्षा, ही थोड़े देता है, सहायता भी देता है। हमारी शिक्षा भी आपको मिलने वाली है और सहायता भी मिलने वाली है। माता जी का भी आपको स्नेह मिलने वाला है, प्यार दुलार भी मिलने वाला है और अनुदान भी मिलने वाला है। तीन तरफ से आपके ऊपर सौभाग्य की वर्षा होने वाली है। आप कैसे भाग्यवान हैं। आप माता जी का स्नेह यहाँ पा रहे हैं, पिता का अनुशासन और उनका सहयोग प्राप्त कर रहे हैं। आप कैसे भाग्यवान हैं जो एक ऐसे महान गुरु से जो न केवल आपको, वरन् आप जैसे लाखों व्यक्तियों को, न केवल लाखों व्यक्तियों को, बल्कि सारे जमाने को और सारे जमाने की प्रवृत्तियों को मार्गदर्शन करने में समर्थ है और जो इस लायक हैं कि सारे जमाने को पलट कर रख देगा। आपको तीनों का सहयोग मिलता रहता है, आपके भाग्य की सराहना किये बिना हम रह नहीं सकते। आपके लिए कल्प की संभावनायें बिलकुल सुनिश्चित हैं। आपका भूतकाल जैसे था, वह यहाँ का यहीं रह जाये, आपका पुराना वाला केंचुल यहीं रह जाये और आप जाये तो ऐसे नये आदमी होकर जायें कि मजा आ जाये।

अभी तक आप जिस पिंजड़े में कैद रहे हैं, उसकी तीलियों को काटने का हमारा मन है। आप भी थोड़ा प्रयत्न कीजिए, थोड़ा हम प्रयत्न करेंगे। अपने पंखों को पैने कीजिए, ताकि जैसे ही पिंजड़े की तीलियाँ कटें आप इसमें से भागना शुरू कर दें। तीलियाँ हम काट देते हैं, पंखों को आप पैना कीजिए। अगर आप अपने पंखों को पैना नहीं करेंगे-सिकोड़ कर रखेंगे, तो हम तीलियाँ काट भी दे तो भी आप पिंजड़े में वहीं बैठे रहेंगे। पंख तो आपको ही उड़ाने हैं, हम उड़ेंगे थोड़े ही। हम तो तीलियाँ काटेंगे। आप हमारे सहयोग का फायदा उठाइये। यहाँ की परिस्थितियों का फायदा उठाइये। यहाँ के मार्गदर्शन का फायदा उठाइये और अपने भाग्य तथा भविष्य को शानदार बनाने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाइये।

आप गुफा में रहिए, एकाँत सेवी रहिए, हृदय की गुफा में घुस जाइये। अंतर्मुखी होकर रहिए, बाहर की बातों में विचार मत कीजिए। केवल अपनी ही समस्या पर विचार कीजिए, अपने भविष्य के बारे में विचार कीजिए, अपने भूतकाल पर विचार कीजिए और अपने भविष्य का निर्धारण करने के लिए वह काम कीजिए जिनकी कि आपको जरूरत है। हमारे सहयोग को आप ग्रहण कीजिए, उसे हजम कीजिए। हम आपको थाली में भोजन परोस कर देते हैं, आप खाइये उसको और उसे पचा जाइये। खाना आपका काम है, पचाना आपका काम है। भोजन ही तो हम दे पायेंगे, आपके बदले हम पचा थोड़े ही देंगे। खाइये आप, परोसते हम हैं। दोनों का सहयोग भगवान करे कितना शानदार हो और आपके उज्ज्वल भविष्य करने में इस शिविर का कितना बड़ा योगदान हो। आप यह देख पायेंगे और यह संभव है जैसी कि हम आशा करते थे और आपको आशा दिलाते थे। थोड़ा सा उत्साह दिखाइये, थोड़ा सा मनोबल बढ़ाइये, फिर देखिये आपको यह कल्प साधना सत्र कितना शानदार और कितना आपके भविष्य को उज्ज्वल करने में सहायक सिद्ध होता है। ॐ शाँतिः शाँतिः


विशेष लेख-2 - ऋषि युग्म का सुनियोजित लीला-संदोह

अक्टूबर सन् 1959 की “अखण्ड -ज्योति” पत्रिका के पृष्ठ 4 पर एक लेख छपा था-”अखण्ड-ज्योति के उत्तरदायित्वों में परिवर्तन-लेखिका के स्थान पर लिखा था-”भगवती देवी शर्मा धर्मपत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य।” लेख का शीर्षक पढ़कर सब चौंके कि अकस्मात् यह परिवर्तन क्यों? संपादक के रूप में तो हम आचार्य श्री को ही जानते क्यों हैं? उनने अपना नाम यो दायित्व क्यों माताजी को सौंप दिया क्या वे अब हमें पत्रों-पत्रिकाओं-स्थूल दर्शनों के माध्यम से नहीं मिलेंगे? तरह-तरह की जिज्ञासायें सभी के मन में थीं। माताजी ने बड़े सरल भाव से उस लेख में लिखा था-”अखण्ड-ज्योति के इस अंक पर संपादक के स्थान पर मेरा नाम पढ़कर पाठकों को आश्चर्य होगा।” काफी दिन हो गये परिवार के परिजनों की भोजन व्यवस्था का कार्य मेरे जिम्मे है”-”वह कार्य मेरे स्वभाव का एक अंग बन गया है। परिवार के परिजनों आगंतुक अतिथियों की आये दिन बड़ी संख्या देखकर मुझे भोजन संबंधी अधिक कार्यभार की वृद्धि से परेशानी होना तो दूर उलटे दूने आनंद की अनुभूति होती है। बहुत दिनों से मेरी यही कार्यशैली रही है। अब उस कार्य से भिन्न “अखण्ड-ज्योति” के संपादन के कार्य भी मुझे संलग्न देखकर पाठकों को निश्चय ही आश्चर्य होगा।” आगे पाठकों को हुए असमंजस का समाधान भी था।

उनने लिखा “आचार्य जी के घर में जब से प्रवेश हुआ है तब से मैंने उन्हें देवता के रूप में पाया और परमेश्वर के रूप में पूजा हे। उनकी प्रत्येक इच्छा और आज्ञा में मुझे अपना सौभाग्य और कल्याण अनुभव होता रहा है। समय-समय पर वे मुझे कड़ी परीक्षाओं में डालते रहे हैं”-”मैंने अपने इस छोटे से जीवन (1943 से 1959) ऐसी अगणित घटनायें देखी हैं जिनमें उनके आशीर्वाद को पाकर तुच्छ व्यक्ति भी महान कार्य संपन्न कर सके हैं। उसी बलबूते पर मेरा संकोच शाँत हो जाता है और “अखण्ड-ज्योति” की गुरुतम जिम्मेदारी को अपने कंधे पर लेने का साहस किसी प्रकार समेट पाती हूँ”-”उन्हें अब फिर साधना क्षेत्र में लौटना है। अखण्ड-ज्योति का यह संपादन परिवर्तन भी इसी योजना का एक अंग है।” “पूरी बात तो उनने अभी स्पष्ट नहीं की है, पर मालूम होता है कि किन्हीं विशेष स्थानों पर किन्हीं विशेष आत्माओं के सान्निध्य में मथुरा से बहुत दूर रहने की उनकी योजना है। वे राष्ट्र के लिए एक विशेष शक्ति का आविर्भाव करने के लिए कुछ विशेष साधनात्मक कार्यक्रम बना रहे हैं।”-”अखण्ड-ज्योति का यह संपादकीय परिवर्तन भी उसी का एक पूर्व भाग माना जा सकता है।”

वस्तुतः परम वंदनीया माताजी के कंधों पर जो जिम्मेदारी मात्र बत्तीस वर्ष की आयु में ही जिन विशिष्ट उद्देश्यों के लिए पूज्यवर ने डाली थी, वह गायत्री परिवार की जीवन यात्रा में एक नया मोड़ था। वे परख रहे थे कि उनकी जीवन संगिनी-शिष्या-समर्पित साधिका उनकी आगामी हिमालय प्रवास की अवधि में जहाँ वे कठोर तप कर ऋषि सत्ताओं के सान्निध्य में प्रचंड ऊर्जा उत्पादन सेतु जा रहे थे-वेदों के अतिरिक्त पुराण-ब्राह्मण-उपनिषद्-आरण्यक सहित समग्र आर्ष ग्रंथों के भाष्य का दायित्व भी पूरा करने को संकल्पित हो प्रस्थान कर रहे थे। इस परिवार की अभिभाविका-संरक्षिका का दायित्व भी सँभाल सकेंगी या नहीं। कुल चौबीस माह की अवधि तक यह परीक्षाक्रम चला। पूज्यवर गुरुदेव वापस हिमालय प्रवास से लौटे। इस बीच दुर्गम हिमालय से जहाँ देवता-ऋषिगण श्रेष्ठ आत्मायें सतत विश्व कल्याण के निमित्त तप करती रहती हैं-हिमालय के हृदय यमुनोत्री से लेकर नंदादेवी के तपःपूत ऊर्जा पुँज क्षेत्र से “एक साधक की डायरी के कुछ पृष्ठ” भी लिख-लिखकर भेजते रहे अखण्ड-ज्योति में छपे। अखण्ड दीप इस बीच जलता रहा व वंदनीया माताजी की परीक्षा लेता रहा। पूज्य गुरुदेव ने आते ही पुनः संपादनक्रम अक्टूबर 1961 से सँभाल लिया और साधकों के मार्गदर्शन के निमित्त पंचकोशी जागरण साधना से लेकर उनके द्वारा आराधना उपक्रम के अंतर्गत युग निर्माण योजना एवं सत्संकल्प रूपी घोषणा पत्र द्वारा मिशन को एक नया मोड़ दिया।

सितंबर 1961 के “अखण्ड-ज्योति” अंक के अंतिम दो पृष्ठों 38, 39 पर बड़ी विनम्रतापूर्वक उनने लिखा कि उनके दुर्बल कंधों ने गुरुदेव की अज्ञातवास की अवधि में जो जिम्मेदारियाँ सँभाली, उनमें कई त्रुटियाँ रही होंगी, जिसके लिए वे क्षमाप्रार्थी हैं। उनने लिखा “सदा की भाँति अब पूज्य आचार्य जी ही अखण्ड-ज्योति का कार्यभार आगामी माह से स्वयं ही सँभालेंगे। यद्यपि पिछले अंकों में भी उनके ही विचार और भावनाओं की प्रतिध्वनि ही पत्रिका के पृष्ठों पर गूँजती रही है पर आगे तो स्वयं ही हम सबका मार्गदर्शन करेंगे”-”अखण्ड-ज्योति अब आत्मविकास के व्यावहारिक मार्गदर्शन की पत्रिका रहेगी”-”दस वर्षीय एक शिक्षण योजना पूज्य आचार्य जी ने बनाई है, उसी से साधनात्मक मार्गदर्शन अब चलेगा।”

एक परीक्षा पूरी हुई। कितना विधि व्यवस्था पूर्ण-सुनियोजित लीला पुरुषों का जीवनक्रम होता है-यह अखण्ड-ज्योति के पिछले पृष्ठों को पलट कर देखा जा सकता है। ठीक दस वर्ष बाद पूज्यवर ने अज्ञातवास पर मथुरा से स्थायी रूप से विदाई लेकर परम वंदनीया माताजी के कंधों पर पूरे मिशन की जिम्मेदारी सौंपकर साधना उपक्रम हेतु हिमालय प्रस्थान किया। दोनों ने जिसे कर्मभूमि बनाया था व अखण्ड-ज्योति संस्थान (घीया मंडी मथुरा) तथा गायत्री तपोभूमि (वृन्दावन रोड मथुरा) से क्रमशः साधना-लेखन एवं सत्र संचालन-प्रचार-संगठन का कार्य बखूबी 30 वर्षों तक संपन्न किया था उसे सदा के लिए छोड़कर पूज्यवर 20 जून को चले गए। परम वंदनीया माताजी को शाँतिकुँज सप्त सरोवर हरिद्वार में अखण्ड दीपक चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने वाली छः कुमारी कन्याएँ व तीन वरिष्ठ कार्यकर्ता गणों के साथ नीरव एकाँत में रहने का निर्देश दे गए। कैसा निष्ठुर सा लगता है यह कदम एक बैरागी संत का, जिसने जीवन भर औरों के हित स्वयं को तिल-तिल कर जलाया था, अगाध स्नेह लुटाकर एक विराट् परिवार का अभिभावक कहलवाया था, किंतु ऐसा लगता भर है। यह एक सुनियोजित कार्य स्थानाँतरण की प्रक्रिया भर थी।

परम वंदनीया माताजी के विषय में अपने विदाई संदेश में “अपनों से अपनी बात” के क्रम में मई 1971 के अंक में पूज्य गुरुदेव लिखते हैं “अभियान का दिशा निर्धारण माता जी ठीक तरह करती रहेंगी। उन्हें हमारी तरह अधिक बातें करना नहीं आता, पर आत्मिक गुणों की दृष्टि से वे हमसे कुछ आगे ही हैं, पीछे नहीं। परिवार को प्यार और प्रकाश देने की जिम्मेदारी उन पर छोड़कर हम एक प्रकार से निश्चित हैं। हमें रत्ती भर भी भय नहीं है कि आँदोलन या संगठन हमारे जाने के पीछे लड़खड़ा जाएगा।” ‘इस बाल-परिवार की साज सँभाल करने के लिए हम माताजी को छोड़ जाते हैं। वे अपनी तपश्चर्या इसी प्रयोजन में लगाती-खर्च करती हमारी परंपरा को जीवित रखेंगी।’ कितना सुव्यवस्थित शक्ति हस्ताँतरण! जबकि स्वयं वे प्रत्यक्ष सशरीर आगामी गायत्री जयंती के पूर्व वहीं शाँतिकुँज आकर रहने वाले थे, किंतु उनने स्वयं को पीछे कर लिया व प्रत्यक्ष भूमिका आमूलचूल परमवंदनीया माताजी को सौंप दी।

इसके पश्चात् पूज्यवर की सुनियोजित पाँच पंचवर्षीय योजनाएँ आरंभ हुईं जिनमें प्रारंभिक चार में दोनों गुरुदेव व माताजी को तथा अंतिम में मात्र परम वंदनीया माताजी को ही सक्रिय भूमिका निभानी थी। 1971 में जब परम वंदनीया माताजी ने पत्रिका संपादन से शक्ति उपार्जन, अनुदान वितरण की महतीं जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली तब यह 1959 की तुलना में और भी अधिक कठिन कार्य था। नया स्थान, नन्ही-नन्ही कुमारी कन्याएँ जिन्हें साधना पथ पर प्रशस्त करना था तथा श्री बलराम सिंह परिहार सहित मात्र तीन कार्यकर्ता। शाँत-साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान, किंतु मथुरा में आते-जाते रहने वाले आगन्तुक दर्शनार्थी यहाँ थे, पूज्यवर भी साथ नहीं थे। अतः यह और भी कड़ी परीक्षा की घड़ी थी।

“अपनों से अपनी बात” के क्रम को जारी रखते हुए जुलाई 1971 की अखण्ड-ज्योति में “पत्रिकाओं का संपादन और-मैं” शीर्षक से वंदनीया माताजी लिखती हैं “मेरे लिए मेरे गुरु, अवलंबन और भगवान आचार्य जी ही हैं। उनकी आज्ञानुवर्तिनी और इच्छा अनुगामिनी बनने के अतिरिक्त और कभी कुछ सोचा नहीं। सो मथुरा छोड़ने, हरिद्वार रहने, चौबीस लक्ष्य के उन जैसे चौबीस पुरश्चरण करने के आदेश शिरोधार्य करने के अतिरिक्त और कुछ सोच ही नहीं सकती थी-”संपादक की जगह पर कानूनी दृष्टि से किसका नाम छपता है, इसका कुछ मूल्य-महत्व नहीं, वस्तुतः स्थिति यही रहेगी कि भूतकाल की तरह भविष्य में भी गुरुदेव के विचार ही परिजनों को निरंतर उपलब्ध होते रहेंगे। “अखण्ड-ज्योति शत-प्रतिशत उन्हीं की अभिव्यक्तियों से आगे भी उसी तरह परिपूर्ण रहेगी, जैसी अब तक रही है।” कितनी सरलता व विनम्रता से दिया गया आश्वासन है पाठकों को? वह पूरी तरह निभा भी। पूज्यवर के प्राण चेतना का प्रवाह “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के रूप में परिजनों तक पहुँचता रहा व क्रमशः पाठकों-उसके निर्धारणों को जीवन में उतारने वालों की संख्या बढ़ती चली गई। अपना पूर्व से चला आ रहा संकल्प उसने पूरी तरह निभाया-लागत मूल्य पर पत्रिका सभी को मिले तथा उसमें किसी प्रकार का विज्ञापन न प्रकाशित हो यह आज भी निभ रहा है।

पूर्व में निर्दिष्ट पंचवर्षीय योजनाओं को जरा हम परिजनों के समक्ष खोल दें कि किस सुनियोजित ढंग से 1971 के बाद से 2001 तक के समय का पूज्यवर पूर्व से विभाजन कर गये थे। इससे महापुरुषों के लीला संदोह को समझने का भी अवसर सभी को मिलेगा। 1972 में जनवरी माह के उत्तरार्ध में कुछ समय के लिए माताजी की अंतर्वेदना को जो कार्य भाराधिक्य एवं अचानक आए हृदय के दौरे से उठीं थीं सुनते हुए पूज्यवर दुर्गम हिमालय में जहाँ थे, वहीं से सीधे शाँतिकुँज आये। माताजी के लिए वह एक अलौकिक रोमाँचकारी क्षण था। सारा कष्ट संताप उनको देखते ही दूर हो गया। ठीक भी है, शक्ति स्वरूपा को हो भी क्या सकता था। इन पंक्तियों का लेखक जनवरी 1972 के उन क्षणों का साक्षी है, जब पूज्यवर ने अपनी सारी आगामी योजनाएं हृदयाघात के कष्ट से उबर रहीं वंदनीया माताजी को समझायीं तथा जैसे आये थे वैसे ही वे चले गये, पुनः गायत्री जयंती तक कभी भी आने का आश्वासन देकर। अप्रैल 1972 की “अखण्ड-ज्योति” की “अपनों से अपनी बात” में “गुरुदेव क्यों आये? क्यों चले गये?” शीर्षक से परम वंदनीया माताजी ने विस्तार से इन सभी घटनाक्रमों का, भावी योजनाओं-प्राण प्रत्यावर्तन से लेकर अन्य सत्रों की भूमिका पर विवेचन प्रस्तुत किया है, जो कि प्रथम पंचवर्षीय योजना में पूज्यवर के अज्ञातवास के बाद प्राण प्रत्यावर्तन के, जीवन साधना के, वानप्रस्थों आदि के महत्वपूर्ण शिक्षण सत्र ऋषि परंपरा के बीजारोपण प्रक्रिया के अंतर्गत चलने थे। 1975 तक यही क्रम चला। इस बीच पूज्यवर पहले विदेश प्रवास पर तेजनिद्या व केन्या की यात्रा पर पानी के जहाज से गये तथा डेढ़ माह बाद फरवरी 1973 में लौट आये। प्रवासी भारतीयों को भी लगा कि कोई हमारा अपना भी है, जो मीलों दूर से हमारी संस्कार परंपरा को पुनर्जीवित करने आया है। देव संस्कृति का विश्वसंस्कृति में विस्तार का यह प्रारंभिक चरण था, जो बाद में 1991 से 1994 में विराट् रूप लेकर सारे विश्व भर में फैल गया “समस्त विश्व को भारत के अस्त्र अनुदान” नाम का ग्रंथ इसी के बाद लिखा गया, जिन्हें संस्कृति-इतिहास का मील का पत्थर माना गया।

1976 तक वंदनीया माताजी की तपःपूत बालिकाएँ अनुष्ठान संपन्न कर नारी जागरण सत्रों का संचालन कर रहीं थीं। पूज्यवर का प्रत्यक्ष शिक्षण ले, एक नयी लहर “नारी जागरण” की पूरे भारत में फैली व पाँच-पाँच देवकन्याओं के जत्थे प्रव्रज्या पर निकल पड़े। तीन-तीन माह के नारी जागरण सत्र शाँतिकुँज में चलने लगे। इसी बीच ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की भी स्थापना हो गयी। गंगा तट पर कणाद ऋषि की तपोभूमि में विनिर्मित इस शोध संस्थान में देश-विदेश से ढेरों शोध ग्रंथ एवं उपकरण जुटाए गए तथा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का ढाँचा खड़ा किया जाने लगा। युवा, सुशिक्षित, चिकित्सक व वैज्ञानिक आवीवन काम करने आ गए। तृतीय पंचवर्षीय योजना 1980 के पूर्वार्ध में आरंभ हुई, जब पूज्यवर ने प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों, स्वाध्याय मंडलों के निर्माण व संगठन को सुव्यवस्थित बनाने का निर्देश किया। देखते-देखते भव्य निर्माण होते चले गए व दो वर्ष तक पूज्यवर स्वयं प्रवास पर गए एवं अनेकों शक्तिपीठों में प्राण प्रतिष्ठा अपने हाथों संपन्न की।

1984 का आरंभ ही चौथी पंचवर्षीय योजना में उनके द्वारा सूक्ष्मीकरण साधना से हुआ। तत्पश्चात् वसंत 1986 से भारत भर में युग संधि महापुरश्चरण साधना का तीव्र गति से संपादन, राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों व 108 कुँडीय महायज्ञों का भारत भर में सम्पन्न होने के साथ दीप महायज्ञों का प्रचलन घर-घर होना उत्तरार्ध की चौथी व अति महत्वपूर्ण योजना का अंग था। अंतिम 6 माह में पूज्यवर ने महाकाल की प्रेरणा के क्राँतिधर्मी साहित्य विरवित कर इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य के रूप में परिष्कृत प्रतिभा द्वारा लाये जाने की घोषणा की। उनने 2 जून 1990 (गायत्री जयंती) को महाप्रयाण के साथ ही सारी शक्ति परम वंदनीया माताजी को सौंप कर सूक्ष्म में स्वयं को विलीन कर मिशन को प्रचंड शक्ति संपन्न बना दिया।

पूज्यवर के श्रद्धाँजलि स्वरूप आयोजित 4 अगस्त 1990 के आगाखाँ आडिटोरियम नयी दिल्ली के कार्यक्रम तथा विराट् श्रद्धाँजलि समारोह (1, 2, 3, 4 अक्टूबर 90) से ही पाँचवीं पंचवर्षीय योजना आरंभ हुई जिसका संचालन परमवंदनीया माताजी को प्रत्यक्षतः 19 सितंबर 1994 तक करना था। शक्ति साधना समारोहों, संस्कार महोत्सवों, रजवंदन समारोहों, विराट शपथ समारोह तथा देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के निमित्त संपन्न 15 भारत में तथा 3 विदेश के अश्वमेध महायज्ञों द्वारा मिशन की गति सौ गुनी बढ़कर मिशन के पक्षधरों की संख्या साढ़े पाँच करोड़ से अधिक जा पहुँची। इन 18 आयोजनों तक की जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से परम वंदनीया माताजी ने ली थी। बुलावा आते ही उनने अपनी चेतना को समेटा व सूक्ष्मीकृत हो अपने इष्ट के साथ जा मिलीं। समय भी चुनकर महालय श्राद्धारंभ का निर्धारित किया, जो भाद्रपद पूर्णिमा 19 सितंबर का था व 11:50 घड़ी में बजे थे।

महाप्रयाण से पूर्व अगली दो पंचवर्षीय योजनाओं के क्रम में 90 और अश्वमेधी पराक्रम आगामी 2005 तक पूरे विश्व में संपन्न किये जाने का निर्देश दे गयी हैं एवं यह अपौरुषेय सा लगने वाला भागीरथी कार्य निश्चिंत ही संपन्न हो कर रहेगा, ऐसा सभी का दृढ़ विश्वास है। तब तक देव संस्कृति विश्वसंस्कृति बन जाएगी एवं घर-घर में गायत्री मंत्र की प्राण ऊर्जा एवं यज्ञ की सुवास संव्याप्त हो सकेगी, मानव में देवत्व व धरती पर स्वर्ग के अवतरण का ऋषि युग्म का स्वप्न साकार होगा, ऐसा आश्वासन दुर्गम हिमालयवासी ऋषि सत्ताओं का है जो विश्व व्यवस्था का इन दिनों संचालन कर रही हैं तथा जिनके साथ ही परम वंदनीया माताजी की सत्ता एकाकार हुई है।


विशेष लेख-3परम वंदनीया माताजी की जीवन-यात्रा - ममत्व लुटाकर जिस महासत्ता ने यह विराट् परिवार बनाया

माताजी, स्नेह सलिला, परम वंदनीया, शक्ति स्वरूपा, सजल श्रद्धारूपा, वात्सल्यमयी माँ कितने ही नामों से जन-जन तक परिचित माता भगवती देवी शर्मा, जिन्हें स्वयं पूज्यवर गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी भी “माताजी” नाम से संबोधित करते थे, का जीवन श्रद्धा और समर्पण का, ममत्व विस्तार एवं अनुदान वितरण से भरी एक ऐसी अनूठी जीवन-यात्रा का परिचायक है, जो विरले ही देखने में आता है। आगरा नगर के हृदय क्षेत्र में जन्मीं माताजी का जीवन परिचय अभी तक हमारे पाठकों-परिजनों तक अविज्ञात ही रहा है। उनने थोड़ी सी झलक भर देखी है, उनके प्रारंभिक जीवनक्रम की। बहिरंग में तो 1958 के सहस्र कुँडीय महायज्ञ से लेकर 1994 के चित्रकूट अश्वमेध महायज्ञ तक वे पूज्य गुरुदेव की एक समर्पित शिष्या-स्वरूप सत्ता दिखाई देती है, किंतु उनका जीवनकाल जो 69 वर्षों का रहा, के प्रारंभिक क्षणों से लेकर अंत तक के ऐसे कई दुर्लभ संस्मरण, घटना, प्रसंग हैं, जो बताते हैं कि गायत्री परिवार रूपी वट-वृक्ष की स्थापना में उनका योगदान कितना बहुमूल्य रहा।

इन अविज्ञात प्रसंगों को परिजनों तक पहुँचाने (दिसंबर 94 विशेषाँक के द्वारा) के पूर्व एक दृष्टि मातृसत्ता की जीवन-यात्रा पर डालना समीचीन होगा। आश्विन कृष्णा संवत् 1982 20 सितंबर 1926 को प्रातः 8 बजे सावलिया बौहरे धारा के श्री जसवंतराय के घर पर उनका जन्म चौथी संतान के रूप में हुआ। जन्म के समय ही द्रष्टा, भविष्यवक्ताओं ने बताया कि एक दैवी सत्ता शक्ति के रूप में उनके घर आयी है। साधारण से असाधारण बनती हुई यह ऐसे उत्कर्ष को प्राप्त होगी कि करोड़ों व्यक्तियों की श्रद्धा का यह पात्र बनेगी, हजारों-लाखों व्यक्ति इन अन्नपूर्णा के द्वार पर भोजन करेंगे व कोई भी कभी भी इसका आशीर्वाद पा लेगा तो खाली नहीं जाएगा। जीवन के प्रारंभिक वर्षों के संबंध में आगरा वासी, जिन्हें वे क्षण देखने को मिले-बताते हैं कि एक ऐश्वर्यशाली संपन्न घर में जन्म लेने के बावजूद सादगी भरा जीवन ही उन्हें पसंद था। रेशमी कीमती वस्त्रों की तुलना में वे गांधी की बात कह कर सभी को खादी अपनाने की प्रेरणा देती थीं व स्वयं भी वही पहनती थीं। औरों को भोजन कराने-उनका आतिथ्य करने-उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार में वे सबसे आगे बढ़ कर चलती थीं व जिसने भी एक बार उनके हाथों प्यार भरे स्पर्श के साथ भोजन कर लिया, वह उन्हें सदा याद रखता था। बड़े भाई व बहन उन्हें प्यार से “लाली” तब भी कहते थे, व अब जब वे करोड़ों की माताजी बन गयीं, तब भी निःसंकोच कहते रहे, वे वैसा ही प्यार व सम्मान उन्हें देती रहीं। अपनी स्वयं की पूजा-स्थली में शंकर जी की स्थापना कर नित्य पूजा करना, सूर्य की ओर देखकर ध्यान करना, परिवार वालों के लिए एक आश्चर्य की बात थी। क्योंकि किसी ने उन्हें यह सिखाया नहीं था। यह ईश्वराधना स्वतः स्फूर्त थी तथा उनके पूर्व जन्म के दिव्य संस्कारों का परिचय दे सबको आने वाले समय में उनके महत्वपूर्ण होने का आभास देती थी।

यह एक विलक्षण संयोग ही है कि 1926 के वर्ष में तीन महत्वपूर्ण घटनाएं एक साथ घटीं। सतयुग के आगमन की संधि वेला में श्री अरविंद ने इसे सिद्धि वर्ष का वर्ष कहा व पाण्डिचेरी से अपने सभी परिजनों को संबोधित करके कहा कि परिवर्तन की प्रक्रिया अब तीव्र वेग लेगी। उसी वर्ष आगरा नगर से यमुना पार उसी जिले की एक तहसील एतमादपुर के छोटे से गाँव आँवलखेड़ा नामक ग्राम में जो आगरा-जलेसर मार्ग पर 15 मील की दूरी पर स्थित था, 15 वर्षीया युवा साधक श्रीराम की पूजा कोठरी में दिव्य प्रकाश के ऊर्जा पुँज के रूप में एक सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकटीकरण हुआ, जिसने उन्हें उनके पूर्व जन्मों का तथा आगामी जीवन के 65 वर्षों के कार्यकाल का बोध कराके प्राण दीक्षा दी-गायत्री महाविद्या को जन-जन तक पहुँचाने के लिए 24-24 लक्ष के चौबीस वर्ष तक 24 महापुरश्चरण संपन्न करने व अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलित कर उस ज्योति के प्रकाश से विश्व-वसुधा के कल्याण के निमित्त स्वयं को तपाने का निर्देश दिया। “श्रीराम मत्त” नाम से संबोधित यही युवा साधक बाद में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य-वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ-युगऋषि-प्रखर प्रज्ञा रूपेण महाकाल की संबा प्राप्त कर गायत्री परिवार के अधिष्ठाता बने तथा उनकी जीवन संगिनी बनने का सौभाग्य भगवती देवी जी को मिला, जो दीपक प्रज्ज्वल वाले वर्ष 1926 में ही जन्मीं थी। 1943 में विवाह के बाद पहले आँवलखेड़ा, फिर मथुरा और बाद के चौबीस वर्षों में वे हरिद्वार के सप्त सरोवर स्थित शाँतिकुँज में रहीं। प्रारंभिक 45 वर्ष ब्रज भूमि में व अंतिम 24 वर्ष पावन पुण्य सप्तर्षियों की तपःस्थली में बीते, पर हर पल समर्पण-साधना में, जनहित के लिए तिल-तिल कर गलने में तथा स्नेह व ममत्व को लुटाने में ही नियोजित हुए।

विवाह के बाद बड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों में वे उस जमींदार घराने में पहुँची, जहाँ आचार्य जी ओढ़ी हुई गरीबी का जीवन जी रहे थे। जैसा पति का जीवन, वैसा ही अपना जीवन, जहाँ उनका समर्पण-उसी के पति अपना भी समर्पण यही संकल्प लेकर वे जुट गयीं, कंधे से कंधा मिलाकर पूर्वजन्मों के अपने आराध्याध्य-इष्ट के साथ। चौबीस वर्ष के चौबीस महापुरश्चरणों का उत्तरार्ध चल रहा था। उनने गायों को जौ खिलाकर गोबर छानकर-उनसे जौ निकालकर उसकी रोटी व छाछ पूज्य गुरुदेव को खिलायी, उनके अखण्ड दीपक की रक्षा की। हर आने वाले अभ्यागत का आतिथ्य कर घर में जो भी था, उसी से उसकी व्यवस्था की। बच्चों के लिए आए दूध में पानी पड़ता जाता व उसी से चाय बनाकर दुःखी-पीड़ितों की सेवा की जाती-कष्ट सुने जाते व घावों पर मलहम लगाए जाते। मात्र 200/- रुपये की आय में दो बच्चे, एक माँ स्वयं दो, पाँच व्यक्तियों की व्यवस्था उन सौ-डेढ़ सौ व्यक्तियों के अतिरिक्त करना, जिनका अखण्ड-ज्योति संस्थान आना नित्य होता ही रहता था, मात्र उन्हीं के वश की बात थी। हाथ से कागज कूटकर बनाना उसे सुखाना व फिर उससे पैर से चलने वाली हैंडल प्रेस द्वारा छोटे-छोटे ट्रैक्ट व “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका छापना, उन पर पते लिखकर डिस्पैच करना, बच्चों की पढ़ाई की, देखभाल की व्यवस्था-यह सब अकेले ही उनने किया। इस बीच उनने पूज्य आचार्य जी की पहली पत्नी से उत्पन्न दो संतानों श्री ओमप्रकाश व श्रीमती दयावती शर्मा की विवाह की व्यवस्था की। भले घरों से बहू आयीं, व लड़की भेजी गयी व अपनों से अधिक प्यार दिया गया, जिसे अंत तक निभाया गया। आज भी दोनों श्री ओमप्रकाश जी शर्मा व श्रीमती दया उपाध्याय अपनी सगी माँ से भी बढ़कर आजीवन मिले, पर वंदनीया माताजी के प्यार को याद कर-करके द्रवित हो उठते हैं।

ऐसे न जाने कितने, संबंधियों के मित्र, व गैर संबंधी दुःखी हैं, जिन्हें परम वंदनीया माताजी का अगाध स्नेह व दुलार मिला है, जिससे उन्हें सदा सही राह पर चलने की प्रेरणा मिली-राहत मिली-संवेदना का स्पर्श मिला। जब गायत्री तपोभूमि की स्थापना का समय आया, तब पूज्य गुरुदेव 108 कुँडीय यज्ञ कर 24 वर्षीय अनुष्ठान की समाप्ति करना चाह रहे थे। स्वयं अपनी ओर से पहल करके उनने अपने सारे जेवर, अपने आराध्य के कार्य को सफल बनाने के लिए दे दिये। उन्हें बेचकर गायत्री तपोभूमि की जमीन खरीदी गयी-जमींदारी के बाण्ड्स बेचकर भवन खड़ा हुआ। निजी उदाहरण प्रस्तुत हुआ तो अगणित अनुदान देने वाले आगे आते चले गये व गायत्री परिवार के बीजाँकुर को फलित-पल्लवित होने का अवसर मिला। 1958 का सहस्र कुँडीय महायज्ञ अपने आप में एक ऐतिहासिक धर्मानुष्ठान था, जिसने गायत्री के सद्ज्ञान व यज्ञ के सत्कर्म की दिशाधारा को घर-घर पहुँचा दिया। गायत्री परिवार की संरक्षिका-दुलार बाँटने वाली-मातृ सत्ता के रूप में उनका आविर्भाव हुआ तथा 1959 से 1961 तक पूज्यवर के हिमालय प्रवास-तप साधना में उनने वह सारी जिम्मेदारी निभाई, जिसकी चर्चा हम पहले के लेख में कर चुके हैं। कड़ी परीक्षा की घड़ी तब आयी, जब साढ़े सात वर्ष पूर्व ही पूज्य आचार्य जी ने अपने हिमालय जाने व कर्मभूमि को स्थायी रूप से छोड़ने का संकल्प ले लिया। बाहर से रुद्र व योद्धा-अंदर से कोमल व यति का रूप लिये पूज्यवर ने वह सब हस्ताँतरण माताजी के कंधों पर करना आरंभ कर दिया, जो उन्हें 1971 के बाद उनके हिमालय प्रवास पर जाने पर सप्तर्षियों की भूमि सप्त सरोवर में शक्ति का स्रोत बनकर प्राप्त होने वाला था।

स्थायी रूप से घर-बार छूट गया-ममत्व देने वाली माँ समान सास जिन्हें “ताईजी” कहते थे, महाप्रयाण कर गयीं, बेटी की शादी हो गयी तो वे अपनी छः गोद ली नन्ही-नन्ही पुत्रियों, जिनसे उन्हें 24-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण अखण्ड दीपक के समक्ष संपन्न कराने थे, को लेकर शाँतिकुँज आ गयीं। 1971 से 1990 की अवधि उनके लिए कड़ी कसौटी वाली थी, जिसकी चर्चा हम पहले के एक लेख में कर चुके हैं। यह समय पूज्यवर के परोक्ष रूप से कार्य करने का तथा परम वंदनीया माताजी के एक संगठक के रूप में आँदोलन का संचालन करने वाली मातृ शक्ति के रूप में कार्य करने वाला समय था। इस अवधि में उनने “नारी जागरण अभियान” का शंखनाद करने वाली भारत की संभवतः पहली व एकमात्र पत्रिका का संपादन किया, चौबीस देव कन्याओं को कई गुना कर अगणित टोलियाँ क्षेत्रों में भेजीं तथा अनेकों नारी जागरण मंडल अथवा शाखाएँ सक्रिय रूप से कार्य करने लगीं। विभिन्न सत्रों का संचालन-शिविरार्थियों को अपने हाथ से बना हविष्यात्र का बना भोजन कराके, उनने लाखों परिजनों को अपने अंतःकरण की प्यार की सरिता में स्नान कराया। पूज्यवर बौद्धिक उद्बोधन देते-स्थूल व्यवस्था संबंधी निर्देश देते कभी-कभी गलती होने पर कार्यकर्ताओं को डॉट भी लगा देते, पर प्यार का मलहम माताजी द्वारा लगाया जाता था। सभी इसी प्यार की धुरी पर टिके रहे। क्रमशः परिवार बढ़ते-बढ़ते तीन करोड़ की संख्या पार कर गया।

1990 का वर्ष वसंत पंचमी की वेला में पूज्यवर द्वारा सूक्ष्मीकरण में प्रवेश व इस घोषणा के साथ आया कि अब वे सूक्ष्म में सक्रिय होंगे, किसी से नहीं मिलेंगे। अपना शरीर गायत्री जयंती 2 जून को छोड़ने की घोषणा वे पूर्व से ही इन पंक्तियों के लेखक एवं परम वंदनीया माताजी के समक्ष कर गये थे। इस अवधि में अपने पर पूरा संतुलन रख 2 जून को अपने आराध्य के महाप्रयाण के बाद करोड़ों बच्चों को हिम्मत बँधाकर उनने 1, 2, 3, 4 अक्टूबर 1990 शरद् पूर्णिमा के श्रद्धाँजलि समारोह में उपस्थित 15 लाख परिजनों के माध्यम से जन-जन को आश्वस्त कर दिया कि यह देवी शक्ति द्वारा संचालित मिशन आगे ही आगे बढ़ता चला जाएगा। कोई भी झंझावात इसे हिला न पाएगा। इसके बाद संपन्न विराट् शपथ समारोह एवं 18 अश्वमेध यज्ञ गीता के 18 अध्यायों की तरह हैं, जिन पर पृथक्-पृथक् लेखमाला लिखी जा सकती है, जिनका वर्णन हम आगामी विशेषाँक में पढ़ेंगे। परम वंदनीया माताजी की 69 वर्षीय जीवन यात्रा का समापन पूज्यवर की सूक्ष्म जगत से अंतर्वेदना भरी पुकार के रूप में गायत्री जयंती से ही आरंभ हो चुका था। चार वर्ष की आराध्य से दूरी की सीमा बंधन वाली परिधि टूट चुकी थी। लगता था, कभी भी वे अपने आराध्य से जा मिलेंगी। पूज्यवर जिस समाज-यज्ञ में समिधा की तरह जले, उसमें अपनी अंतिम हविष्य की आहुति देती हुई परम वंदनीया माताजी भाद्रपद पूर्णिमा 19 सितंबर को अपने जन्मदिवस से 4 दिवस तथा पूज्यवर के काया के जन्मदिवस से 13 दिवस पूर्व महालय श्राद्धारंभ की वेला में महाप्रयाण कर उस विराट् ज्योति से एकाकार हो गयीं। उस महाशक्ति को हम सब शिष्यों का शत्-शत् नमन।


परम वंदनीया माताजी का अपने स्वजनों के लिए अंतिम संदेश

भाद्रपद पूर्णिमा 19 सितंबर 1994

जिन चरणों में अपने आप को समर्पित किया, उनके बिना जीवन का एक-एक क्षण पीड़ा के पहाड़ की तरह बीत रहा है। जिस दिन उनके पास आई, उस दिन का पहला पाठ था-पीड़ित मानवता की सेवा और देवसंस्कृति का पुनरोदय, सो अपने आप को उसी में घुला दिया। यद्यपि यह एक असह्य वेदना थी तथापि महाप्रयाण से पूर्व परमपूज्य गुरुदेव की आज्ञा थी कि अपने उन बालकों की अँगुली पकड़कर उन्हें मिशन की सेवा के मार्ग पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ा दूँ। जिन्हें अगले दिनों उत्तरदायित्व सँभालने हैं। पिछले चार वर्षों में मिशन जिस तरह आगे बढ़ा, वह सबके सम्मुख है, जो मैं देख रही हूँ। आगे का भविष्य तो इतना उज्ज्वल है-जिसे कल्पनातीत और चमत्कार कहा जा सकता है। उसके लिए जिस पुरुषार्थ की आवश्यकता है, हमारे बालक अब उसमें पूर्णतया प्रशिक्षित हो गए हैं।

शरीर यात्रा अब कठिन हो रही है। उनके जाने के पश्चात् से आज तक पीड़ा अब आँसू रोक नहीं पा रही, सो मुझे उन विराट् तक पहुँचना अनिवार्य हो गया है। यह न समझें हम स्वजनों से दूर हो जायेंगे। परम पूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म एवं कारण सत्ता में विलीन होकर हम अपने आत्मीय कुटुँबियों को अधिक प्यार बाँटेंगे, उनकी सुख-सुविधाओं में अधिक सहायक होंगे।

हमारा कार्य अब सारथी का होगा। दुष्प्रवृत्तियों से महाभारत का मोर्चा अब पूरी तरह हमारे कर्तव्यनिष्ठ बालक सँभालेंगे। सभी क्रियाकलाप न केवल पूर्ववत् संपन्न होंगे, वरन् विश्व के पाँच अरब लोगों के चिंतन, जीवन, व्यवहार, दृष्टिकोण में परिवर्तन और मानवीय संवेदना की रक्षा के लिए और अधिक तत्पर होकर कार्य करेंगे। हम तब तक रुकें नहीं, जब तक धरती पर स्वर्ग और मनुष्य में देवत्व का अभ्युदय स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने लगे।

*समाप्त*