ज्ञान का संबल दुखों से दिलाये मुक्ति

दार्शनिक एवं विद्वज्जन संसार को विषवृक्ष की उपमा देते चले आये है। उनके विचार में यहाँ आपत्तियाँ भी कम नहीं है। जो कुछ भी है सभी यंत्रवत चल रहा है। वे कहते हैं कि दूर रहते और न चाहते हुये भी कष्ट कठिनाइयाँ आती है, व्यक्ति उलझनों में फँसता है व फिर उन प्रतिकूलताओं से लड़कर अपने लिये सुख -सुविधा की स्थिति तैयार करना उसके जीवन भर का एक क्रम हो जाता है। कष्ट उनसे मोर्चा लेना सुख सुविधाओं के लिये प्रयास करना और फिर दुखों का क्रम आरंभ हो जाना यह उनके अनुसार एक चक्रव्यूह है जिसमें हर व्यक्ति को फँसना और एक एक करके उसकी जटिलताओं से जूझते हुये बाहर आना पड़ता है। सारा जीवन इसी प्रयत्न में बीत जाता है। जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो हर व्यक्ति यह कहता पाया जाता है कि सारा जीवन कठिनाइयों में बीत गया। न सुख मिला न शांति। मस्तिष्क को तो सुखों की तृष्णा के अंबार से लाद लिया गया।

योगवशिष्ठ के अनुसार इस दुख को जो व्यक्ति अनुभव करता है, यदि ठीक से समझ लिया जाय तो सही अर्थों में हर व्यक्ति को जीवन कैसे जिया जाना चाहिये था यह समझ में आ जाय। योगवशिष्ठ के विद्वान ऋषि लिखते हैं कि अपने ही अज्ञानवश हम समग्र संसार को जिस समष्टि रूप में वह है उसमें न लेकर सारे जीवन के क्रियाकलापों को प्रकृति की माया के साथ न तौलकर जीवन भर उसे अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी गलती है।

यह संसार वस्तुतः इतना बड़ा है कि हम उसे अपने अनुकूल बना ही नहीं सकते। अपने इसी अज्ञान का फल हमें दुखों के रूप में मिलता है। हम यदि यह मानते कि हम उतने छोटे है कि संसार की राजी में राजी मिलाकर सुखी हो लें तो शायद यह संभव था पर हमने अहंकारवश बड़ा बनना चाहा। हमने यदि ज्ञान का रास्ता पकड़ा होता तो यह अहंकार हमारे पल्ले न बँधता। विद्वानों ने सही कहा है कि यह संसार समुद्र से भी मुक्त हो जाता है। भीगी लकड़ियों को आग नहीं जला पाती, उसी प्रकार ज्ञान से भीगे मनुष्य को ये साँसारिक दुख कभी भी वेदना किसी भी स्थिति में नहीं दे सकते।


हिंसा क्या, अहिंसा क्या

अच्युत! आपके आदेश मेरे लिये सदा शास्त्र रहे है। गांडीवधारी के प्रश्न का समाधान जहाँ प्राप्त हो सकता था, वहीं पहुँचा वह प्रश्न हमने खाण्डव अग्निदेव को अर्पित कर दिया किन्तु वन के तो असंख्य प्राणियों की हत्या हुयी।

बहुत से प्राणी मेरे बाणों से ही मारे गये यह बात भी पूरी कर दो। मंजू स्मित आया मोहन के श्रीमुखकमल पर जो प्रजा का त्राता है वह अहिंसक बन जायेगा तो संपूर्ण प्रजा नष्ट हो जायेगी। प्रजा के प्राण एवं धन की रक्षा के लिये तुम्हारे हाथ में धनुष रहता है। वन्य पशु एवं प्राणी जब मानव के प्राण एवं उत्पादन के लिये संकट बन जायें तो पालक के लिये उनकी हिंसा अनिवार्य हो जाती है।

अर्जुन ने मस्तक झुका लिया। अनेक की हिंसा रुकती हो कुछ थोड़े प्राणों की बलि से तो उन थोड़े प्राणों की बलि अहिंसा भले न हो, कर्तव्य अवश्य हो जाएगी, यह पार्थ को समझना नहीं था उन्हें भी समझना नहीं था कि संपूर्ण प्रजा अपने अहिंसा धर्म का पालन कर सके, इसलिये अनिवार्य हिंसा का कर्तव्य क्षत्रिय अपने सिर लेता है। उसका धनुष उस कर्तव्य पालन रूप हिंसा का प्रजा की रक्षा का और अभय का प्रतीक है।

देव इसी समय दारुक ने आकर मस्तक झुकाया अंजलि बाँधकर अभी कहीं यात्रा करनी है आपको अर्जुन ने श्री कृष्ण के सारथी की ओर देखा और फिर देखा अपने उस अद्भुत मित्र की ओर। इस यात्रा की तो उनसे कोई चर्चा हुई ही नहीं थीं।

“मैं एकाकी कहाँ जा रहा हूँ।” तुम भी मेरे रथ से ही चलो। श्री कृष्ण ने उठते हुये अर्जुन को भी हाथ पकड़ कर उठा लिया।” समीप के अरण्य में अवधूत श्रेष्ठ चण्डकेतु पधारे है। तुत उनके नाम से परिचित हो सुह्म के भूतपूर्व प्रतापी नरेश। राजसदन वे आने से रहे। हम उन्हें प्रणाम कर आयें।

चण्डकेतु वे अप्रतिमभट महा शूर जिनसे जरासंध को भी मैत्री की याचना करनी पड़ी थी और वे अब अवधूत हैं। अर्जुन के मन में अनेक स्मृतियां आयीं। अनेक विचार उठे उनकी मित्रता थी पिता श्री से। किंतु आज उन वीतराग के लिये पुराने स्नेह संबंध कहाँ स्मरणीय है। वे तो इन मयूर मुकुटी के भी दर्शनार्थ नहीं आ रहे नगर में।

चिंतन के इसी सिलसिले में रथ अरण्य में जा पहुँचा। अर्जुन ने देखा कि अवधूत चण्डकेतु ने प्रणाम करते श्री कृष्ण को भुजाओं में भर लिया था और अपने नेत्र प्रवाह से उनकी घुँघराली अलकें सींचते जा रहे थे “आज मेरा शरीर सार्थक हुआ। धन्य हो गये मेरे नेत्र।”

धूलिधूसर देह, अस्त व्यस्त केश राशि, कोपीन मात्र वस्त्र कोई पागल हो ऐसे प्रतीत होते अवधूत देर तक हृदय से द्वरिकेष को लगायें रहे और अंत में वहीं भूमि पर अर्जुन ने अपना उत्तरीय डाल दिया। तीनों ही बैठ गये उस आसन पर।”

“एक एकाकी अकिंचन कहाँ तुम्हारे दर्शन की तृष्णा नेत्रों में सँजोये है, तुम इसे सावधानी से स्मरण रखते हों। अवधूत के अश्रु थमते नहीं थे।

“पार्थ के मन में प्रश्न है कि कभी के अजेय महाराज ने यह वेष क्यों स्वीकार किया? श्याम सुन्दर ने प्रसंग परिवर्तित किया। महाराज धर्म के ज्ञाता है और प्रजा रक्षण रूप क्षत्रिय को परमगति देने में असमर्थ नहीं है।

तुम्हारी कृपा से मैं धर्म का कुछ मर्म समझ सका हूँ, क्योंकि धर्म के प्रभु तुम्हीं हों।” अवधूत ने अपने हाथों से ही नेत्र पोंछ लिये “तुम चाहते हो कि अहिंसा की बात अवधूत ही करें।”

दो क्षण रुककर वे बोले “ प्राणियों को पीड़ा दिये बिना भोग प्राप्त नहीं होते। पदार्थ असीम नहीं है और प्राणियों की कामनायें अनंत है। मैंने देखा मेरे कुछ शस्त्रों के सहारे मकड़ी ने जाला बना लिया है। कई दिन से वे शस्त्र प्रयोग में आये नहीं थे। उस क्षुद्र जीव का भवन नष्ट किये बिना मैं। वे शस्त्र उठा नहीं सकता था।

“वत्स! व्यवहार हिंसा की एक सीमा के औचित्य को स्वीकार करके चलता है। तुम जिन पदार्थों का उपयोग करते हो, वे सभी अन्य प्राणियों के अभिलषित हो सकते हैं। उनकी कामना को नष्ट करके ही हम भोग पाते हैं। अपने एवं अपने आश्रितों की जीवन रक्षा के लिये एक सीमा तक हिंसा को स्वीकार करना अधर्म नहीं है।

“कर्तव्य की भी एक सीमा होती है। उस सीमा से आगे कर्तव्य की मान्यता भी मोह ही है।” मैंने कुलगुरु से जिज्ञासा की युवराज अब प्रजा की रक्षा करने में सक्षम हैं। मेरा कर्तव्य अब संपूर्ण माना जाना चाहिये।”

जब तक शरीर की सार्थकता है, शरीर की सार्थकता है, शरीर के धारण के कर्तव्य शेष है, अंतःकरण की शुद्धि के लिये कर्तव्य कर्म आवश्यक है, अहिंसा सम्यक् संपूर्ण नहीं हो सकती।”अवधूत ने कहा -”इस शरीर के रहने न रहने का आग्रह जब पूर्णतया छूट जाता है, शरीर की अपेक्षा नहीं रहतीं तब संपूर्ण प्राणियों को अभय देकर ही यह सन्यात पूर्ण होता है।”


यह जगत ब्रह्म सत्ता की इच्छा-स्फुरणा मात्र

समूचा विश्व ब्रह्मांड त्रिआयामी है। इसके अस्तित्व की तीन इकाइयां मानी गयी हैं-1- ईश्वर 2-जीव 3- प्रकृति। ईश्वर के तीन गुण हैं- सत् चित्त आनंद। सत् अर्थात् अस्तित्व युक्त। जो है था जो रहेगा उस अविनाशी तत्व को सत् कहते हैं। चित् अर्थात् चेतना। जिसमें सोचने विचारने निर्णय करने एवं भावाभिव्यक्ति युक्त होने की विशेषतायें है, उसे चित्त कहेंगे। आनंद अर्थात् सुख संतोश और उल्लास का समन्वय। ईश्वर अस्तित्ववान है चैतन्य है तथा आनंदानुभूति में भरा पूरा है। इसलिये उसे सच्चिदानन्द कहते हैं।

जीव के दो गुण है सत्त और चित्। वह अस्तित्ववान है ईश्वर से उत्पन्न अवश्य है पर लहरों की तरह उसकी स्वतंत्र सत्ता भी है और वह ऐसी है कि सहज ही नष्ट नहीं होती। मुक्ति में भी उसका अस्तित्व बना रहता है और निर्विकल्प सविकल्प स्थिति में सारूप्य सायुज्य सालोक्य और सामीप्य का अनुभव करता है। प्रलय में सब कुछ सिमट कर एक में अवश्य इकट्ठा हो जाता है, फिर भी आटे की तरह एक दीखते हैं भी जीव कणों की स्वतंत्र सत्ता बनी रहती है। मूर्च्छा स्वप्न सुषुप्तुर्या एवं समाधि अवस्था में भी मूल सत्ता यथावत् रहती है। मरणोत्तर जीवन तो रहता ही है। इस प्रकार जीव की सत्-अस्तित्ववान स्थिति अविच्छिन्न रूप से बनी रहती है।

जीव का दूसरा गुण है चित् अर्थात् चैतन्यता। चेतना उसमें रहती ही है। यह चेतना ही उसका स्व है अहंता ईगो “ सेल्फ या आत्मानुभूति इसी को कहते हैं। तत्वज्ञानियों से लेकर अज्ञानियों तक में यह स्थिति सदैव पायी जायेगी। ईश्वर में आनंद परिपूर्ण है। जीव उसकी खोज में रहता है, उसे प्राप्त करने के लिये विविध प्रयास करता है और न्यूनाधिक मात्रा में, भले-बुरे रूप में उसी की प्राप्ति के लिये लालायित ओर यत्नशील रहता है।

प्रकृति में एक ही गुण है सत्। उसका अस्तित्व है। वह संपूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करने वाली शक्ति जो ठहरी। अणु-परमाणुओं के रूप में, दृश्य और अदृश्य प्रक्रिया के साथ जगत सत्ता के रूप में इसको देखा जा सकता है। ईश्वर और जीव दोनों का क्रियाकलाप इस प्रकृति प्रक्रिया से साथ ही गतिशील रहता है। महाप्रलय में प्रकृति सघन होकर पंचतत्वों की अपेक्षा एक महातत्व में विलीन हो जाती है। इस प्रकार जब कभी इस विश्व ब्रह्माण्ड की लय प्रलय होगी तब ईश्वर के सत्त तत्व में प्रकृति लीन हो जायेगी। जीव चित् में घुल जायेगा और उसका अपना अतिरिक्त गुण आनंद यथावत् बना रहेगा।

महासृष्टि के आरंभ का क्रम भी यही है। तत्वदर्शियों के अनुसार ब्रह्म प्रचुर मात्रा में उसके भीतर विद्यमान है। उनमें से इच्छानुसार जिन्हें चाहें उन्हें वह अभीष्ट मात्रा में विकसित एवं उपेक्षित कर सकता है। मनुष्य की उन्नति-अवनति का, सुख और दुख की स्थिति का पूर्णतया उत्तरदायी वह स्वयं ही है। प्राणियों के भीतर विद्यमान एक स्वसंचालित प्रक्रिया के रूप में ईश्वर उनके भीतर विद्यमान भी है और किसी कार्य में व्यक्तिगत आधार पर हस्तक्षेप करने के झंझट से वह दूर भी है। इसलिये करने के झंझट से वह दूर भी है। इसलिये आत्मवेत्ता उसे निकट भी मानते हैं और दूर भी, उसे भीतर भी कहा जाता है ओर बाहर भी।

प्रकृति की सत्ता भी इसी प्रकार अपनी पटरी पर दौड़ती धुरी पर घूमती है। अणुसत्ता स्पष्टता स्वचालित हैं। वस्तुओं का विकास और विनाश अप्रकटीकरण और विलीनीकरण अपने ढंग से होता रहता है। आगे-पीछे बढ़ने हटने धुरी पर घूमने उठने और गिरने के असंख्य क्रम इस प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष ज्ञात और अविज्ञात प्रकरणों में चलते रहते हैं।

इस सबके भीतर काम करने वाले ‘महत्व प्रकृति के गर्भ में समाविष्ट ईश्वरीय सत्ता को अध्यात्म की भाषा में हिरण्यगर्भ ‘ कहते हैं। दृश्य जगत के बीज में इन्हीं दो शक्ति संस्थानों को काम करते हुये देखा जा सकता हे। पदार्थ की मूल सत्ता महातत्व’ है ओर उसमें जो गतिशीलता पायी जाती है उसे हिरण्यगर्भ ‘ कहते हैं। इस प्रकार चेतन जीवधारियों की तरह ही, किन्तु दूसरे ढंग से ईश्वर सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ माना गया है। ज्ञान इच्छा और क्रिया के त्रिविध स्फुरण जीव के है। किंतु प्रकृति हलचल एवं क्रमबद्धता के आधार लेकर ही अपनी हलचलें गतिशील रखे रहती है।

अध्यात्मवेत्ता मनीषियों के अनुसार महत्व और हिरण्यगर्भ यह दो प्रकृति बीज जब अपनी अव्यक्त स्थिति से आगे बढ़कर व्यक्त होते हैं अर्थात् सूक्ष्म से स्थूल बनते हैं तब उन्हें ताप और प्रकाश के रूप में देखा जाता है। गति की प्रतिक्रिया ताप और प्रकाश है वह चक्राकार घूमती है और आगे बढ़ती है। बस यहीं से वह क्षेत्र आरंभ हो जाता है जिसे हम प्रकृति क्षेत्र कहते हैं।

पदार्थ विज्ञान कार्यक्षेत्र यहीं से आरंभ होता है। भौतिक विज्ञानी यहीं से अपना श्री गणेश करते हैं। ईश्वर जीव एवं अव्यक्त प्रकृति का विवेचन भौतिक विज्ञान का नहीं आत्म विज्ञान का कार्यक्षेत्र है। उसके लिये जिन यंत्रों उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें कलकारखानों में नहीं बनाया जा सकता है। मानवी अंतःकरण के रूप में ईश्वर की प्रयोगशाला में ही उसका निर्माण होता है। तपश्चर्या ओर योगाभ्यास से उसे अधिकाधिक प्रखर एवं संवेदनशील बनाया जाता हे। अनुभूतियों के रूप में उस अविज्ञात समझे जाने वाले क्षेत्र की महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त की जा सकती है। इतना ही नहीं ईश्वरीय महत्ता और जीव सत्ता में सन्निहित प्रकृतिगत ऊर्जा की अपेक्षा असंख्य गुनी आत्मशक्ति के प्रयोग उपयोग का लाभ उठाया जा सकता है। यह क्षेत्र विशुद्ध रूप से आत्म विज्ञान का है। भौतिक विज्ञान के नियम तो काम करते हैं, उनका नियंत्रण भी है, पर कठिनाई यह है कि पदार्थों के बने कोई यंत्र उपकरण उतने संवेदनशील अभी नहीं बन सके है जिनसे विश्व ब्रह्माण्ड में काम करने वाली दिव्य सत्ता की महत्ता को प्रत्यक्ष देखा समझा जा सके।

अव्यक्त प्रकृति के दो आधार ‘महातत्व और हिरण्यगर्भ’ है जिन्हें संक्षेप में पदार्थ का आकार प्रकार और उसके क्रियाकलाप भी कह सकते हैं। भौतिक विज्ञानी इन दोनों के समन्वय का सर्वप्रथम परिचय विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में प्राप्त करते हैं। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि चिर अतीत में पदार्थ एक विशाल ब्रह्माण्ड मात्र था। उसमें विस्फोट हुआ और वह अगणित निहारिकाओं के रूप में बिखर गया। विस्फोट से जो शक्ति उत्पन्न हुई उसने निहारिकाओं में विभिन्न प्रकार की हलचल उत्पन्न कर दी, तदनुसार पदार्थ के कई पदार्थ के कई प्रकार के गुण धर्म प्रकट हो गये।

वैज्ञानिकों द्वारा सृष्टि के आरंभ का किया गया प्रतिपादन यह है कि ब्रह्माण्ड कंदुक में महाविस्फोट से जो बिखराव निहारिकाओं के रूप में विभाजित हुआ, उसमें भ्रमणशीलता के अतिरिक्त मंथन क्रिया भी चल पड़ी। जिस प्रकार दही मथने से मक्खन की परत ऊपर आ जाती है उसी प्रकार प्रकृति की परिचायक प्रक्रिया तीन रूपों में निखर कर ऊपर आयी।1- वैकारिक-वस्तुओं का स्वरूप, आकार प्रकार 2- तेजस शक्ति धारायें 3- अहंकार इन्द्रिय चेतना एवं मनन -चिंतन।

परमाणु की उत्पत्ति यहीं से होती है। वह तीन भागों में विभक्त रहता है 1- नाभिक 2- मध्यवर्ती हलचल 3- आवरण। इन तीनों को सत्व, रज, तम का अधिक स्पष्ट और अधिक स्थूल रूप कह सकते हैं। पंचमहाभूतों के अस्तित्व में आने का स्तर यहीं है। आरंभ में हिरण्यगर्भ स्वयं ही एक महान परमाणु था।

उसमेँ जो हलचल उत्पन्न हुई तो वही आरंभिक क्रम आरंभ हो गया जो पीछे परमाणु की अंतः हलचलों में दिखाई देता है।

हिरण्यगर्भ की गतिशीलता जैसे-जैसे बढ़ी वैसे ही उसमें ताप- तेजस् बढ़ता गया, फलस्वरूप आदि विस्फोट से बने कोटि-कोटि खण्ड अमापनीय दूरियों पर प्रबल वेग से फेंक दिये गये। यह टुकड़े तीव्र गति से आगे बढ़ने के साथ-साथ अपनी धुरी पर भी घूमने लगे जिससे उनमें चुँबकत्व पैदा हुआ। इस चुँबकत्व ने इन खंडों में परस्पर आकर्षण पैदा किया। वे एक दूसरे से उस चुँबकीय धारा के कारण परस्पर आबद्ध हुये। बड़ों ने छोटे को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया। इस प्रकार उनके हिरण्यगर्भ धूल के अनेक खण्ड परिवार बन गये। बड़े पिण्ड के इर्द-गिर्द उसके छोटे खण्ड घूमने लगे। इन्हीं का नाम आकाश गंगा पड़ा। ऐसी अनेक कोटि आकाश गंगायें हिरण्यगर्भ के विस्फोट से बनीं। विस्फोट के बाद हिरण्यगर्भ का जो नाभिकेन्द्र बच गया उस महाध्रुव की परिक्रमा यह आकाश गंगायें करने लगीं।

यहीं क्रम आगे आकाश गंगाओं में चला। वह ताप, प्रकाश की आदि प्रवृत्तियाँ आकाश गंगाओं में भी विकसित हुई, उनमें भी विस्फोट हुये। वे भी क्रमशः वायु गर्भ के ठोस वर्ग में बदलते गये और तारकों की रचना हो गयी। तारकों से ग्रह, ग्रह से उपग्रह में वहीं क्रम चलता रहता है। छितराये हुये खण्ड अपने उद्गम पिण्ड केन्द्र की परिक्रमा करने लगे। यही है वह सृष्टिक्रम जिसे भारतीय दर्शन के विविध प्रतिपादनों और अलंकारिक कथा प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। सृष्टि के आरंभ और उसके क्रियाकलाप के गर्भ में हम उस आध्यात्मिक सत्य को ही प्रत्यक्ष देखते हैं जिससे ईश्वर की स्फुरणा और आकाँक्षा के कारण इस जगत की उत्पत्ति कहीं गयी है। महत्तत्व और हिरण्यगर्भ की व्याख्या में निरत प्रकृतिगत पदार्थों और हलचलों का विवेचन-विश्लेषण भर करते हैं, पर यदि इससे कुछ और ऊंचे उठकर देखना समझना संभव हो सके तो प्रतीत होगा कि यह जगत ब्रह्म सत्ता की इच्छा-स्फुरणा मात्र है, उसी की ये चिनगारियाँ उड़ती दिखायी देती है जिन पर भौतिक विज्ञान इतने उत्साह से शोध कार्य कर रहा है। इन चिनगारियों के उद्गम केन्द्र को भी यदि समझा खोजा जाता तो मनुष्य को वह क्षमता प्राप्त होती जो प्रकृति विज्ञान की उपलब्धियों की तुलना में कोटि-कोटि गुना अधिक प्रचंड और दिव्य है।


न यहाँ भूत है, न वर्तमान, न भविष्यकाल

हवा जब तक गेंद में भरी रहती है तब तक उसे विस्तृत और विशाल वायुमंडल से एकाकार होने का मौका नहीं मिलता, किन्तु उसके ऊपर के मोटे आवरण को ढीला करते हो वह वायु से मिलकर अधिक व्यापक ओर विराट हो जाती है। मनुष्य के साथ भी यही बात है। वह जब तक स्थूलता में जीता है, हाड़ माँस का पुतला भर बना रहता है, पर जैसे-जैसे यह बंधन ढीला होता जाता है वैसे ही वैसे उसकी सूक्ष्मता बढ़ती है और अंततः वह स्थिति पैदा होती है, जहाँ उसकी सूक्ष्म सत्ता सूक्ष्म जगत में प्रवेश कर नवीन जानकारियाँ अर्जित करने लगे। यही वह अवस्था है, जिसमें समय से पीछे चलकर विगत का ज्ञान प्राप्त कर सकना संभव होता है।

यों तो समय के तीन काल खण्डों में मनुष्य सामान्य स्थिति में केवल वर्तमान में जीता है, भूत और भविष्य उसके लिये अविज्ञात स्तर के रहस्य बने रहते हैं। इतने पर भी सच यह है कि वह एक साथ इन तीनों में जीता है या दूसरे शब्दों में कहें, तो वर्तमान शेष दोनों को अपने में संजोयें रहता है। अंतर मात्र इतना है कि विगत और अनागत के सूक्ष्म भूमिकाओं में होने के कारण मनुष्य उन्हें वर्तमान की तरह ग्रहण नहीं कर पाता, किन्तु इतने से ही सत्य बदल नहीं सकता। शब्द और ध्वनि उच्चारण के बाद विलुप्त होते प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है कि उनका अस्तित्व समाप्त हो गया, पर वैज्ञानिक जानते हैं कि उनका नाष नहीं होता। सिर्फ अपनी स्थूलता और अभिव्यक्ति खोकर अव्यक्त स्थिति में चले जाते हैं। काया मरती है, पर आत्मवेत्ताओं को यह भली-भांति विदित है कि जीवन एक सतत् प्रवाह है, वह मरता कहाँ! अग्नि जलती है, फिर भी उसकी वह ऊर्जा अक्षुण्ण बनी रहती है। घटनाओं के संदर्भ में भी यही बात है। वह एकबार अस्तित्व में आने के बाद समाप्त हो जाती है, सो बात नहीं, मात्र व्यक्त बनती हैं।

भौतिक जगत में समय को घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखने का आम प्रचलन है। इस आधार पर जो कुछ सामने दृष्टिगोचर होता है, समय के उस भाग को वर्तमान कह दिया जाता है ओर जो बीत गया उसे ‘भूत’ एवं अनागत वाले हिस्से को ‘ भविष्यत्’ कहा जाता है। इतने पर भी समय न तो केवल भूत है न भविष्य, न वर्तमान। वह एक संपूर्ण इकाई है, जिसमें एक साथ तीनों उपस्थित होते हैं। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है जब रैखिक समय के मध्य भाग वर्तमान को मनुष्य जान सकता है, तो कोई कारण नहीं कि उसके आगे भविष्य पीछे भूत वाले हिस्से को वह न ग्रहण कर सके। सिद्धाँत रूप में वैज्ञानिकों ने इसे संभव बताया है और इसके लिये कई उपाय सुझाए है।

फ्राँसीसी विज्ञानवेत्ता एमाइल ड्राइवेट अपनी पुस्तक “इन दि डेड पास्ट” में आशा व्यक्त करते हुये लिखते हैं कि आने वाले समय में काल के विगत और अनागत वाले हिस्से में पहुँच पाना न केवल यथार्थ सिद्ध होगा, वरन् लोग वैज्ञानिक विधियों द्वारा उनमें आ जा सकेंगे। विगत में पहुंचने संबंधी एक परिकल्पना का उल्लेख करते हुये लिखते हैं कि चूँकि समय स्थिर है और गति हम सब कर रहे है इसलिये भूत में पहुँचने के लिये यह जानना जरूरी होगा कि विगत की उक्त तिथि में पृथ्वी अंतरिक्ष के किस बिंदु पर स्थित थीं चूँकि वह सूर्य के चारों ओर एक कुँडलाकार पथ में परिभ्रमण कर रही है और संपूर्ण सौर तंत्र स्वयं भी कृतिका नक्षत्र की परिक्रमा कर रहा है, अतः बीते समय के एक निश्चित दिन अपने ग्रह की वास्तविक स्थिति का पता लगा पाना बहुत ही मुश्किल काम होगा, इसलिये यह यात्रा भी असंभव स्तर की है या यों कहना चाहिये कि मात्र सैद्धांतिक है।

इसी प्रकार परिभ्रमणशील ब्रह्मांड में आइंस्टीन का सापेक्षवाद का सिद्धान्त भी भूत भ्रमण की संभाव्यता प्रकट करता है इसको आधार मानते हुये कुर्ट गोडेल नामक एक विज्ञानिविद् एवं तर्कशास्त्री ने तो यहाँ तक कह डाला हे कि यदि यह संभव हुआ, तो यात्रा के दौरान हर व्यक्ति अपनी ही युव अनुकृति से मिल सकेगा।

मूर्धन्य भौतिकीविद् जान ह्वीलर का वर्महोल सिद्धांत “ भी इस बात की संभावना दर्शाता है कि यदि दो ब्रह्माण्डों को जोड़ने वाली इस सुरंग में से किसी उपयुक्त में प्रवेश कर पाना शक्य हुआ, तो संभव है कि हम कहीं सुदूर भूत में जाकर बाहर निकलें।

किन्तु यह सब संभावना मात्र है। संभावना भी ऐसी, जो शायद ही साकार हो सके। ऐसे में विज्ञान लगभग निराश हो चुका था और मानने लगा था कि इस प्रकार सफलता शायद इस विधा द्वारा संभव नहीं। इसी बीच एक घटना घट गई। 17 अगस्त 1985 को मियामी हेराल्ड “ नामक समाचार पत्र ने एसोसियेटेड प्रेस के हवाले से एक ऐसे प्रयोग समाचार छापा जो उन दिनों यूनाइटेड स्टेट्स एयरफोर्स में चल रहा था।

विवरण का उल्लेख करते हुये अखबार लिखता है कि एक विशिष्ट प्रकार के अवरक्त कैमरे से एक बार सर्वेक्षण विमान के माध्यम से एक ऐसे भूखंड का चित्र खींचा गया, जो गाड़ियाँ खड़ी करने के काम आता था, पर तस्वीर लेते समय भूमि बिल्कुल खाली थी, वहाँ कोई भी वाहन नहीं था। कुछ घंटे पूर्व जो कारें खड़ी थी, वह सब जा चुकी थी। फोटो जब बनकर आया, तो सब यह देखकर हैरान रह गये कि उसमें असंख्यों मोटरें खड़ी दिखाई पड़ रही थी। इसका अर्थ यह हुआ कि कैमरे ने कुछ घंटे पूर्व के दृश्य को भी अपने अंदर कैद कर लिया था यही महत्वपूर्ण सूत्र साबित हुआ, जिसका कि बाद में सहारा लिया गया।

इस संपूर्ण प्रसंग का वर्णन एण्डू थामस ने अपने चर्चित ग्रंथ बियाण्ड दि टाइम बेरियर में विस्तारपूर्वक किया है उक्त घटना के उपराँत विज्ञानी यह मानने के लिये विवश हो गये कि समय के बीते भाग में इस प्रकार का प्रवेश संभव तो है, पर ऐसा मानसिक धरातल पर ही हो सकता है, शारीरिक स्तर पर नहीं। उनका विचार था कि सामान्य कैमरे से इस प्रकार के चित्र नहीं आने का एक ही मतलब हो सकता है साधारण प्रकाश भूत और वर्तमान के मध्यवर्ती अवरोध को चीरकर भूतकाल के गर्भ में प्रवेश पाने की क्षमता नहीं रखता, जो अपेक्षाकृत सूक्ष्म इन्फ्रारेड में विद्यमान है, अतः वह कुछ घंटे पूर्व ही घटना का फिल्माँकन करने में सफल होता है। इस सफलता के उपराँत वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास करने लगे कि क्या ऐसा सुदूर भूत के दृश्यों ओर घटनाओं के साथ भी शक्य हो सकता है? इस निर्मित उनने भिन्न भिन्न स्थानों के कई स्थानों के कई ऐसे चित्र खींचे जहाँ सदियों पूर्व सुविकसित संभावनाएं थी, पर आज वे बीहड़ों जंगलों या रेगिस्तान में परिवर्तित हो चुके है।तस्वीर जब बनकर सामने आयी तो उनमें वही सारे दृश्य देखे, जिनके चित्र खींचे गये थे। कोई ऐसी विलक्षणता नहीं दिखाई पड़ी, जो उन स्थूलों में नहीं देखी गयी हो। इसमें शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि समय के साथ साथ घटनाएं और दृश्यावलियां अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म स्तरों में प्रवेश करती जाती है फलतः वे विशिष्ट इन्फ्रारेड कैमरे की भी पकड़ से बचती रहती है। यदि कोई और अधिक वेधक सामर्थ्य वाली किरण हो तभी इनका फिल्माँकन कर पाना संभव है, पर विशेषज्ञ अभी ऐसी कोई रोशनी ढूंढ़ पाने में सफल नहीं हो सके है। ऐसी स्थिति में भूतकालीन जानकारियाँ उपलब्ध करने के लिये अनुसंधानकर्ता सूक्ष्म चेतना के महत्व से से इनकार नहीं करते। टाइम दि अल्टीमेट एनर्जी पुस्तक की विद्वान लेखिका महीहोप अपने उक्त ग्रंथ में लिखती है कि चूँकि चेतना विश्व का सर्वाधिक सूक्ष्म तत्व है अतएव व समय के अवरोध को पार करते हुये किसी भी काल खंड में प्रवेश करने में समर्थ होती है। सुषुप्ति की अवस्था में हर एक के साथ ऐसा इसलिये संभव हो पाता है क्योंकि इस दशा में चेतना और शरीर के बीच का बंधन ढीला पड़ जाता है, फलतः वह भूत भविष्य के किसी भी भाग में जाकर स्वप्नों के माध्यम से स्वप्न दृष्टा को अनागत विगत की ऐसी सूचनाएं देने लगती है जिससे वह सर्वथा अनभिज्ञ होता है कई बार यह जानकारियाँ इतनी स्पष्ट होती है और बार बार आती है कि दृष्टा भयभीत हो उठता है और किसी अनिष्ट की आशंका से चिंताग्रस्त हो जाता है। मरी होप ने इस पुस्तक में विगत का ज्ञान कराने वाले ऐसे अनेक स्वप्नों का उल्लेख किया है, जिसके बारे संबंधित व्यक्ति को कोई जानकारी नहीं थी। स्वप्न संकेतों के पश्चात जब संबद्ध स्थानों में पहुँचा गया तभी उनके बार बार आने का रहस्य समझा जा सका।

इतना स्पष्ट हो जाने के बाद अन्वेषणकर्ता यह तो मानने लगे कि सुषुप्तावस्था में बीते काल की उदर दरी में गति कर पाना संभव है पर फिर भी वे इस संभावना से इनकार करते रहे कि जाग्रत अवस्था में भी ऐसा कुछ संभाव्य है। इसका कारण वे एक ही बताते रहे कि इस दशा में चेतना काया से इतनी बुरी तरह आबद्ध होती है कि दोनों परस्पर पृथक कर पाना सरल नहीं। जिन दिनों विज्ञान जगत में इस विषय पर गंभीर चिंतन हो रहे थे। उन्हीं दिनों कुछ एक विलक्षण घटनाएं घट गई जिससे वैज्ञानिक इस पर पुनर्विचार के मजबूर हो गये।

एक घटना स्काटलैंड की हैं टामकिन परिवार की वहाँ बड़ी जागीर थी। एक दिन उसके एक सदस्य थामस टामकिन ने जो प्रायः ही अपने खेतों में दूर तक टहलने जाया करता था उस दिन कुछ नये दृश्य देखने का निश्चय किया। अनेक मैदानों खेतों को पार करने के पश्चात वह एक प्राचीन स्काटिष मुहल्ले के निकट आ पहुँचा। उसे देखते ही वह ठिठक गया और सोचने लगा कि पहले तो इसे उसने कभी नहीं देखा वह भी कितना मूर्ख है ! यह सोचते हुए वह उस ओर तनिक आगे बढ़ा। वहाँ कई झोंपड़ियों मकान तथा जानवर बंधे थे एक झरना भी बह रहा था कुछ और आगे बढ़ा तो कई लोग झोंपड़ियों के बाहर खड़े दिखाई पड़े किन्तु उनकी पोशाक इन दिनों जैसी नहीं थी। कई शताब्दी पूर्व लोग जैसा पहनावा करते थे उनकी ड्रेस उससे मिलती जुलती थी टामकिन ने उन्हें आवाज लगायी पर उसका कोई प्रभाव पड़ता उसे दृष्टिगोचर नहीं हुआ। वे सब स्वयं में ऐसे व्यस्त बने रहे मानों सब के सब बहरे हो और आवाज किसी को भी सुनाई नहीं पड़ी हो। हाँ बाहर खड़े पशुओं ने अवश्य प्रतिक्रिया दिखाई। वे सभी गर्दन घुमा कर टामकिन की ओर देखने लगे। इसके उपराँत टामकिन लौट आया। भवन में पहुँच कर उसने इस नयी बस्ती के बारे में लोगों को बताया पर लोग बार बार यही कहते रहे कि जागीर के उस भाग में कहीं कोई बस्ती नहीं। जब दोबारा टामकिन उन्हें दिखाने के लिये सभी के साथ उक्त स्थल पर पहुंचा तो वहाँ खाली मैदान के अतिरिक्त कुछ भी दृष्टिगत नहीं हुआ। वह आश्चर्य चकित रह गया पर भ्रम मानने के लिये बिलकुल तैयार नहीं था।

इस घटना की गवेषणा करने वाले विशेषज्ञ यह अनुमान लगाने लगे कि जाग्रतावस्था में भी यदि किसी प्रकार देह का बंधन ढीला हो जाय तो चेतना शरीर की परिधि से बाहर भी अपना विस्तार कर विस्तार कर वर्तमान के अतिरिक्त समय के दूसरे खंडों में प्रवेश कर सकती पर ऐसा किसी प्रकार हो?

इसे बता पाने में वे अब तक विफल रहे है किन्तु इतना अवश्य मानने लगे है कि जाग्रत रह कर भी ऐसा किया जा सकना संभव है। विज्ञान भले ही इसके विधान को बता पाने में असफल रहा हो पर अध्यात्म में इसका सुनिश्चित उपाय है जिसका यदि निष्ठापूर्वक अनुपालन किया गा तो इस पथ का कोई भी पथिक इस विभूति को करतलगत कर भूत भविष्य के अविज्ञात हिस्सों में प्रवेश पा सकता है। किन्तु इसके लिये चरित्र चिंतन व्यवहार के परिमार्जन की प्रारंभिक शर्त पहले पूरी होनी चाहिये, तभी अंततः अंतराल की अंतिम परिष्कृति पा सकना संभव है जिसने यह अनुबंध पूरा कर लिया उसके लिये समय संबंधी अवरोध को मिटा सकना सरला हो जाता हे -इसमें कोई दो मत नहीं।


क्रोधी लक्ष्य से वंचित

सब उन्हें पंडितजी कहते थे। सब के प्रति उनका अगाध स्नेह था सगे बड़े भाई भी किसी के इतने स्नेहशील कदाचित ही होते हों। उनका ध्यान हर एक की छोटी से छोटी आवश्यकता पर रहता था किसे कब क्या चाहिये। किसे क्या-क्या साथ ले जाना चाहिये?

“तुम अपना झोला बाक्स और बिस्तर दिखाओ तो सही “ उनमें से कोई ही कभी दस पाँच दिन निवास स्थान पर रह पाता था। प्रायः यात्रा करनी थी। पंडित जी भी नहीं रह पाते थे किन्तु वे हों तो यात्रा को उद्यत होने वाले का बिस्तर बंध जाने पर वे अवश्य उसे खोलने को कहते और फिर उनकी स्नेह भरी झिड़की पता नहीं तुम सबों में कब सावधानी और समझ आएंगी। न मार्ग में काम आने को मिट्टी रखी न दातोन और न कंबल जहाँ जा रहे हो, वहाँ का मानचित्र तक साथ नहीं।

वह कोई सुख सुविधा का जीवन नहीं था। प्रायः सबके पास आवश्यक वस्त्र एवं बर्तनों तक का अभाव बना रहता था जिसे सबसे अधिक आवश्यकता हो कंबल चद्दर लोटा उसका होना चाहिये। हरेक को यही लगता कि दूसरों उससे अधिक आवश्यकता है। फलतः हमारी यात्रा के समय पंडित जी को अब बंधा सामान अपर्याप्त लगना ही था और उनके लिये अपनी तो जैसे कोई आवश्यकता थी ही नहीं।

बात उन दिनों की है, जब देश स्वतंत्र नहीं हुआ था अंग्रेज सरकार का दमन चक्र पूरे वेग पर था। उस समय देश में कुछ ऐसे भी लोग थे, जिनका विश्वास अहिंसा में नहीं था। उन क्रांतिकारियों की मान्यता ठीक नहीं थी, यह कहा जा सकता किंतु उनकी देश भक्ति में कहीं कुछ कमी थी, यह कहने का साहस कभी किसी को नहीं हुआ।

दुर्भाग्यवश कहिये या परिस्थितिवश, देश के सभी क्राँतिकारी दल एक संगठन में नहीं आ सके। यह असंभव भले न रहा हो, पर अत्यंत कठिन अवश्य था। जितना सशंक सतर्क एवं गुप्त उन्हें रहना था, उसे देखते हुए वे अनेक दलों में बिखर गये यह कोई अद्भुत बात नहीं है।

देश में बिखरे उन दलों में से ही एक दल इन सबका भी था। दल का नाम था, हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी। इस दल में सौ से भी कुछ ऊपर युवक रहे होंगे इन लोगों का कार्यक्षेत्र भी स्थानीय नहीं था। पूरे देश में ये सभी सक्रिय रहते थे। बिना संपर्क एवं परिचय के दूसरे दलों और जहाँ तक हो सके सत्याग्रह आँदोलन को भी स्थानीय रूप में अपने ढंग से सहायता देने का प्रयत्न करते थे। सभी अपने कार्य से संतुष्ट थे। उन्हें न यश अभीष्ट था, न सत्ता का स्वप्न उनमें से किसी ने देखा मातृभूमि के लिये अपना मस्तक अर्पित कर देना और वह भी अज्ञात रहकर यही प्रत्येक की अभिलाषा थी।

पंडित जी सबके निर्देशक थे, संचालक थे नायक थे। दल एक शरीर था और उसमें वे मस्तिष्क तो थे ही हाथ पैर का काम भी सबसे अधिक करते थे। शांत और प्रसन्न मन से सदा कर्मरत बने रहना उनकी विशेषता थी। किसी ने उन्हें कभी तनावग्रस्त भयाकुल नहीं देखा।

उस दिन माधव व्याकुल होकर फूट-फूट कर रो रहा था। पंडित जी! मुझे गोली मार दो। मैं अयोग्य सिद्ध हुआ। मैंने एक उत्तम अवसर खो दिया।”बाहर जब नगर में पुलिस उसे पकड़ने के लिये गली-गली- दौड़ती फिर रही थी। इस झोपड़ी में वह उनके पैर पकड़े कह रहा था-” आप दंड नहीं देंगे तो मैं अपने को स्वयं गोली मार लूँगा।”

“तुम न अपने को गोली मार सकते और न पुलिस के सामने सकते”। उनका स्वर गंभीर था- “तुमने अपने आपको मातृभूमि के लिये दे दिया है। अपने संबंध में तुम कोई निश्चय नहीं कर सकते। तुम्हारे संबंध में निश्चय मैं करूंगा और जब मेरे निर्णय से तुम लोग सहमत न होना, मुझे दल के नायकत्व से अलग कर देना।”

मैं उस दुष्ट को जीवित छोड़ आया और...................माधव फटी -फटी नजरों से उनकी ओर देखता रहा। उसे यहाँ के सिटी मजिस्ट्रेट को गोली मार देने का कर्तव्य दिया गया था सिटभ् मजिस्ट्रेट अंग्रेज है और उसने जो निर्मम दमन चक्र चला रखा है, उसे देखते हुये दल ने निर्णय किया था कि उस अब जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं।

उनकी योजनाओं न दल के किसी सदस्य को कभी पुलिस के हाथ पड़ने नहीं दिया। आज हुआ यह था कि क्रिकेट मैच देखने सिटी मजिस्ट्रेट साहब पधारे थे। मैच जब जम चुका था। अचानक खेल के मैदान में कहीं से एक बम आ गिरा। धुएं से मैदान भर गया। सर्वथा अहानिकर बम एक बड़ा सा पटाखा मात्र था। किंतु उसी भीड़ में भाग दौड़ मच गयी।

पुलिस दौड़ी उधर जिधर बम गिरा था और उसी क्षण एक युवक की जेब से पिस्तौल निकली। उसने सामने मजिस्ट्रेट साहब पर लगातार तीन गोलियाँ चलायी और भीड़ में कहाँ चला गया कोई जानता नहीं। घबराहट में गोरा मजिस्ट्रेट कुर्सी पर से लुढ़क गया।

“यदि माधव सरलता से न निकल सके” उनकी योजनाओं में ऐसी अनेक संभावनाएं पहिले से रहती है। आप अनुमान नहीं कर सकते कि मैदान में लगाकर कई ओर से डेढ़ दर्जन बम गिरने पर क्या अवस्था होती। स्वयं पंडित जी उपस्थित थे और उनके साथ पूरे अठारह साथी और थे। उनके झोलों में बम थे और जेबों में दो-दो भरी पूरी पिस्तौलें। साथ ही प्रत्येक को सुरक्षित वहाँ से निकल जाने की व्यवस्था थी। केवल उन्हीं और माधव को आना था उस झोपड़ी में। दूसरे साथी नगर से बाहर जा चुके थे स्टेशन से दो ट्रेनें विपरीत दिशा में जा चुकी थी। इसी समय माधव को भीड़ में से निकलते निकलते पता लग गया कि वो सफल नहीं हुआ। किंतु अब लौटने का समय नहीं था। वे उसे लगभग घसीट कर लाए थे झोपड़ी के भीतर और वह अब फूट -फूट कर रो रही था।

“तुम अब भी नहीं जानते कि क्यों तुम सुफल नहीं हुए। उन्होंने समझाने का प्रयत्न सफल न होता देखकर कहा” मैं यह खतरा लें लूँगा। एक गोली तुम चलाओ और उस वृक्ष के उस फूल को उड़ा दो।

आश्चर्य माधव असफल हुआ जिसका निशाना सबसे अधिक अचूक माना जाता था

“तुम जब तक क्रोध में रहोगे ऐसा होगा।” उन्होंने बताया उस समय भी तुम अत्यधिक क्रुद्ध थे।

“उस नालायक पर क्रोध नहीं आएगा तो क्या दया आएगी। “ माधव सचमुच अब भी कुद्ध था।

पहली बात तो यह कि हमने उसे मारने का निर्णय किया किंतु जो सबके जीवन नियंत्रक है वह उसे जीवित रखना चाहता था। वह अत्यंत गंभीर हो गये दूसरी बात यह कि हमने उसे मार देने का निर्णय किया, उस पर क्रोध करने का निर्णय नहीं किया। वह अपनी समझा से अपना कर्तव्य कर रहा है। अपने देश के प्रति ईमानदार है। तीसरी बात यह कि क्रोध करके तुम स्वयं दुःखी एवं असफल हुए। जिस पर तुमने क्रोध किया उसकी कोई हानि नहीं हुई।

अतः अब से यह समझ लो कि तुम्हें क्रोध कभी नहीं करना है।”

“क्रोध नहीं करना है?” माधव ने आश्चर्य से उनकी ओर देख। वह स्वभाव से अत्यंत क्रोधी है। उसके लिये क्रोध न करना क्या संभव होगा? हाँ क्रोध नहीं करना है केवल कर्तव्य का पालन करना है। वह कहते गये मैं जानता हूँ कि तुम्हारे लिये वह बहुत कठिन हैं, किंतु यह करना है तुम्हें। हम सब निष्काम कर्म के साधक है। अपना लक्ष्य तो हमें ही सिद्ध करना है।”

“मुझमें कौन सी कामना आ गयी?” कुछ चिढ़ उठा था माधव “कामात्क्रोवोभिजायते” अथवा लोभत्क्रोधेभिजायते।”। दोनों बातें कहीं गयी है। हम कुछ चाहते हैं और वह नहीं होता नहीं मिलता तो क्रोध होता है या हमें कुछ मिला है वह कोई मांगे या छीने तो क्रोध होता है। हम चाहते हैं कि अमुक अधिकारी अमुक ढंग से व्यवहार करे और वह नहीं करता तो हमें क्रोध आता। उनके ये उपदेश गले उतरे या नहीं कौन कहा सकता है।”

हम कुछ नहीं चाहते तो क्या व्यर्थ ही ये पिस्तौलें लिये घूमते हैं। माधव खीझ उठा।

“हम देश को स्वाधीन करने के अपने कर्तव्य का पालन करने चले है। “ पंडित जी शांत बने रहे-” तुम केवल इतना स्मरण रखो। शेष सब मुझ पर छोड़ दो और कर्तव्य मानकर आदेश का पालन करो तो आज जैसी असफलता नहीं आएगी।

“क्रोध आएगा नहीं, यदि कामना नहीं आएगी।

चंद्रशेखर आजाद जिन्हें उनके दल के लोग प्यार से पंडित जी कहते थे उनके स्नेह भरे वचन तुम क्रोध मत करो चाहो कुछ मत। केवल कर्तव्य का पालन करो। जहाँ जिस कर्तव्य में लगे हो उस कर्तव्य का पालन करो। कितना उच्चस्तरीय चिंतन रहा होगा स्वतंत्रता की बलि वेदी पर चढ़ने वाले शहीदों का? हमें आजादी यों ही नहीं मिली उसका आधार बड़ा सशक्त व उद्देश्य बड़ा निर्मल रहा है।


मीठी नींद (Kahani)

गाँधी जी के आश्रम में कुछ लड़के भी रहा करते थे। उनमें से एक लड़का गौशाला में सोया करता था। उसके पास कोई बिस्तर भी नहीं था। गाँधी जी एक बार घूमते हुए गौशाला की ओर गये तो उनकी निगाह उस लड़के पर पड़ी। वह सो रहा था गाँधी ने लड़के से पूछा तू रात को भी वहीं सोता है।

लड़के ने कहा हाँ बापू और रात में ओढ़ता क्या है? लड़के का उत्तर था यह सुनकर गाँधी जी तत्काल अपनी झोपड़ी में लोट आये। बाद की दो पुरानी साड़ियाँ ली। पुराने अखबार तथा थोड़ी सी रुई मंगवाई। वा बैठकर गाँधी जी का सहयोग करने लगी। वा की सहायता से थोड़ी ही देर में खोल सिल गया। अखबार के मोटे कागज और रुई मिलाकर कुछ ही घंटों गुदड़ी तैयार कर ली और खुद ही उस लड़के को जाकर दे आये।

दूसरे दिन प्रातः गौशाला जाकर बापू ने पूछा -रात कैसी नींद आई। लड़के ने कहा बहुत मीठी नींद आई तब कहीं जाकर बापू को संतोष हुआ।


मानवी सत्ता विद्युत स्फुल्लिंगों का क्रीड़ा कल्लोल मात्र

इस संसार में गुण और सामर्थ्य की दृष्टि से मनुष्यों की अगणित श्रेणियाँ है यहाँ ऐसे लोग भी है जिनकी क्षमता और योग्यता को देख कर हतप्रभ होना पड़ता है तथा ऐसे भी जिनकी जड़ता, अयोग्यता और मूर्खता पर बुद्धि यह मानने को तनिक भी तैयार नहीं होती कि यह मनुष्य ही है। इस भारी अंतर के कारणोँ की गहराई में प्रवेश कर विज्ञानियों और तत्वज्ञानियों ने जो निष्कर्ष निकाला है। उसके अनुसार इसका निमित्त वह प्राण ऊर्जा ही है जो जिसे अनुपात में जहाँ इकट्ठी होती है उसी स्तर के चमत्कार प्रस्तुत करने लगती है। यहाँ यदि कोई शारीरिक दृष्टि से अधिक तेजस्वी सुन्दर सक्रिय स्फूर्तिवान ओजस्वी प्रतिभावान दिखाई पड़ता है तो इसका मूल होते भी ऊर्जा की अधिक मात्रा में विद्यमानता ही है और यदि किसी में मस्तिष्क की सूक्ष्मदर्शिता दूरदर्शिता बुद्धिमता दृष्टिगोचर होता है तो यह भी उसी एक तथ्य की ओर इंगित करता है कि व्यक्ति प्राण विद्युत संपन्न है।

स्वभाव शालीनता एवं वाणी मिठास को आमतौर पर आकर्षण का मुख्य कारण कहा जाता है। अंगों की कोमलता में भी जिस सौंदर्य की झाँकी होती है, उनमें भी शरीरशास्त्रीय दृष्टि से विद्युत कंपन की ही विशेष थिरकन समायी रहती है।किसी की आंखों में किसी के होठों में किसी की ठुड्डी तो किसी के गालों में विशेष मनमोहकता देखी जाती है। इसका तात्विक विश्लेषण करने पर मानवी शरीर की बिजली ही लहराती सिद्ध होती है। इसमें जब कमी होने लगती है, तो शरीर रूखा नीरस कुरूप शिथिल निस्तेज दिखाई पड़ने लगता है आँखों में दीनता चेहरे पर उदासी छायी रहती है। इस विघटन को देख कर इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि तेजस्विता की तरंगें शिथिल हो गई और अभीष्ट ऊर्जा का अभाव हो गया।

शरीर में रक्त माँस की वृद्धि के लिये उपाय किये जाते हैं, पर इस तथ्य पर पहुँचने में भूल की जाती है कि अग्नि मंद पड़ जाने पर पकने और पचने की क्रिया ही नहीं उमंग और उत्कर्ष का प्रत्येक पक्ष शिथिल पड़ जाता है। यह अभाव समस्त शरीर की दुर्बलता अथवा अंग विशेष की अशक्तता के रूप में प्रकट होकर मनुष्य को रुग्ण बनता है। बीमारों में रोग कीटाणुओं की खोज की जाती है इनकी उपस्थिति कारण नहीं लक्षण मात्र है। जिस तरह निर्जीव प्राण रहित माँस पिण्ड में कीड़े पड़ जाते हैं उसी प्रकार देह में विद्युत की अभीष्ट मात्रा में जहाँ कमी आयी वहाँ उस अर्धमृत काया पर तुच्छ से कीटाणु अपना अड्डा जमाते और वंश बढ़ाते चले जाते हैं। यदि शरीर में गर्मी की बिजली की आवश्यक मात्रा विद्यमान हो तो उसके प्रचंड तेज में किसी विजातीय द्रव्य को रोग कीटक को जीवित रहने का अवसर ही नहीं रहता। बाहर के आक्रमणकारी कीटाणु उसमें प्रवेश करते ही जल भुन कर नष्ट हो जाते हैं।

शरीर विज्ञानियों का मत है सामान्यतया किसी मनुष्य की मृत्यु जब घोषित की जाती है तब उसकी पूर्ण मृत्यु नहीं होती। रक्त प्रवाह रुक जाने के बाद प्रायः 5 मिनट के उपराँत हृदय अपना काम करना बंद कर देता है। इसलिये कृत्रिम श्वास प्रश्वास क्रिया करके मृत तुल्य व्यक्ति के हृदय की गति को पुनः आरंभ कराने का प्रयत्न किया जाता है। मृत्यु क्रमिक होती है। पहले मस्तिष्क मरता है फिर अन्य अवयव मरते हैं। फ्राँस राज्य क्राँति के समय एक विद्रोही का सिर काटा गया। सरकारी रिकार्ड में उल्लेख हे कि कटा हुआ सिर बहुत देर तक इस तरह होठ और मुँह चलाता रहा, मानों वह कुछ कर रहा हो। पुराने जमाने में जब तलवारों से लड़ाइयाँ लड़ी जाती थी। तो मुण्ड के कट कर अलग हो जाने के बाद भी रुण्ड उसी प्रकार तलवारें हवा में लहराते रहते थे जैसे जीवित शरीर युद्ध कर रहे हों। ऐसे ही मुण्ड भी इधर उधर लुढ़कते उछलते देखे जाते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि कानूनी मृत्यु के बाद भी किसी रूप में देर तक जीवन बना रहता है। मरणोपराँत भी क्रिया कलाप चलाते रहने वाली इस सत्ता को आत्मवादी प्राण चेतना ही मानते रहे है।

वस्त्रों स्थानों तथा अन्य उपयोग में आने वाली वस्तुओं के बारे में भी यही बात है। भली या बुरी प्रकृति के मनुष्य उन वस्तुओं पर अपना प्रभाव अधिक छोड़ते हैं जिन्हें वे अधिक रुचि पूर्वक प्रयोग करते हैं। सच्चे साधु संतों की माला जनेऊ खड़ाऊ प्रयुक्त वस्त्रों को कोई व्यक्ति उपहार आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त कर लेते और उनके प्रभाव से देर तक लाभान्वित होते रहते हैं। कलम घड़ी अंगूठी बटन जैसी वस्तुओं का भी ऐसा ही महत्व हैं। भगवान बुद्ध का एक दाँत लंका में सुरक्षित है। ऐसे ही हजरत मुहम्मद साहब का एक बाल कश्मीर की हजरत बल दरगाह मस्जिद में रखा है। जैसे शरीर के साथ जुड़े हुए अवयव बाल या नाखून अपना महत्व रखते हैं वैसे ही उनसे जुड़े हुए स्थलों का भी अपना विशेष महत्व है। जो भी इनके संपर्क में आते हैं वे उनके अच्छे बुरे प्रभावों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते कारण कि इन सब के साथ संबद्ध व्यक्ति की प्राण विद्युत कुछ अंशों में चिपकी रहती हैं। यही विद्युत अपना असर दिखाती रहती है। अभिचार कृत्या घात चौकी मूँठ जैसी क्रियाओं में ताँत्रिक लोग इसी बिजली का प्रयोग कर संबद्ध व्यक्ति में भले बुरे परिणाम उत्पन्न करते हैं।

जीवित व्यक्ति में उक्त बिजली अथवा आभामंडल की व्यक्तित्व पर गहरी छाप रहती है। प्रायः यह जन्म जन्मान्तरों के अभ्यास, प्रयास एवं संस्कार के आधार पर विनिर्मित होता है, पर मनुष्य अपनी स्वतंत्र चेतना का उपयोग करके उसे बदल भी सकता है। सामान्य स्तर के लोग इस बने बनाये तेजोवलय के अनुसार अपना स्वभाव और कर्म बनाये रहते हैं, पर मनस्वी लोग अपनी सुदृढ़ संकल्प शक्ति से अपनी अभ्यस्त आँतरिक एवं बाह्य स्थिति में आश्चर्यजनक परिवर्तन भी कर सकते हैं। तब विनिर्मित प्रभामंडल में भी वैसा ही परिवर्तन हो जाता है। उसके रंगों में कंपनी में इस परिवर्तन का हेर फेर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। सुकरात हत्यारा ही हो सकता था, पर मैंने प्रयत्नपूर्वक अपने को बदलने में सफलता प्राप्त की।

साधारणतः रूप रंग का आकर्षण हर किसी को मुग्ध मोहित करता है पर यदि तेजोवलय तद्नुरूप न हुआ तो कुछ ही समय में वह मूल्याँकन बदल जाता है। रूपवान काया में विषधर सर्प जैसी विद्रूपता प्रकट हो जाती है

और कुरूपों को अष्टावक्र, सुकरात, गाँधी की तरह सिर आँखों पर बिठाया जाने लगता है। शरीर की कुरूपता सज्जा-साधना से एक हद छिपाई भी जा सकती है, पर तेजोवलय के सूक्ष्म शरीर पर किसी भी प्रकार पर्दा नहीं डाला जा सकता। जिनका अंतःकरण थोड़ जाग्रत हो चला है और किसी की भीतरी स्थिति समझने देखने योग्य जिनकी सूक्ष्म दृष्टि जाग्रत हो गई है, वे रंग रूप की उपेक्षा करके तेजोवलय में संव्याप्त सुन्दरता एवं कुरूपता को देख सकते है और उसी के अनुरूप किसी के प्रति श्रद्धालु अश्रद्धालु होने की आवश्यकता अनुभव कर सकते हैं। वस्त्र पहनने का कारण शरीर को सर्दी गर्मी से बचाना या शोभा बढ़ाना भी हो सकता है पर मूल कारण तेजोवलय पर आवरण आच्छादित किये रहना ही है। भीतर की शक्ति बाहर निकल कर बिखरने न पाये इसके लिये वस्त्रों का आवरण चढ़ाया जाता है। नग्न शरीर रहने वाले साधु संन्यासी शरीर पर भस्म या मिट्टी का आवरण चढ़ाये रहते हैं। पूर्ण नग्न शरीर रखना असभ्य आचरण माना जाता है। इसका कारण सामाजिक मान्यता भी है पर आत्मिक कारण यह है कि कोई शरीर नग्न होने की दशा अपनी षक्कित तरंगें बड़ी मात्रा में बाहर बिखेरता रहेगा साथ ही दूसरों के भले बुरे प्रबल प्रभावों से अपने को बचा भी न सकेगा। अनावृत शरीर पर धूप का प्रभाव अधिक पड़ता है उसी प्रकार दूसरों का चुम्बकत्व भी निर्वस्त्र लोगों को अधिक प्रभावित कर सकता है। रेशम एवं उन में शारीरिक विद्युत पर आवरण डाले रहने की क्षमता अधिक होती है।

इसलिये प्रायः पुरश्चरण परक प्रबल साधना प्रयोजनों में सूती वस्त्रों की अपेक्षा ऊनी या रेशमी कपड़ों को अधिक महत्व दिया जाता है। यहाँ एक बात नोट कर ली जानी चाहिये कि वध करने के उपराँत भेड़ों की उतारी हुई उन अथवा कीड़ों को उबाल कर उन्हें मार डालने के उपराँत पाया जाने वाला रेशम आत्मिक उद्देश्यों में काम आने लायक नहीं रह जाता। वध के समय निकला चीत्कार उनकी सूक्ष्म स्थिति को आसुरी प्रकृति का बना देता शरीरगत विद्युत के आवागमन प्रतिरोध उत्पन्न करने की क्षमता तो ऐसे उन या रेशम में हो सकती है पर उनसे आध्यात्मिक प्रयोजनों में तो उलटी बाधा ही पड़ेंगीं उससे तो धुला हुआ सूती वस्त्र ही अच्छा है जो तेजोवलय को अपने सात्विक संपर्क में रख कर कम से कम निर्मल बनाये तो रहता है।

प्रभामंडल में विद्युत कण, चुँबकत्व, रेडियो विकिरण स्तर की चेतनायुक्त ऊर्जा भरी रहती है। इसे यंत्रों से भी जाना व मापा जा सकता है और समीपवर्ती लोग भी इसको अपने शरीर और मन पड़ने वाले अदृश्य प्रभाव के आधार पर अनुभव कर सकते हैं। कई व्यक्तियों की समीपता अनायास ही बड़ी सुखद प्रेरणाप्रद और हितकर होती है। कइयों का सान्निध्य अरुचिकर और कष्टकर प्रतीत होता है इसका वैज्ञानिक कारण व्यक्तियों के शरीर से निकलने वाली इस ऊर्जा का पारस्परिक आकर्षण विकर्षण ही होता है। समान प्रकृति के लोगों की ऊर्जा घुलती मिलती है और सहयोग प्रोत्साहन प्रदान करती है पर यदि समीपवर्ती व्यक्तियों की प्रकृति में प्रतिकूलता हो तो वह ऊर्जा टकराकर वापस लौटेगी और घृणा अरुचि अप्रसन्नता खीज जैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करेगी।

देखा गया है कि कई व्यक्तियों में रास्ता चलते मित्रता हो जाती है। अपरिचित होते हुए भी वे ऐसा अनुभव करते हैं।, मानों चिर−परिचित हों और पास आये, बात किये बिना रह ही नहीं सकते। इस अनायास आकर्षण के पीछे पूर्वजन्मों का संबंध परिचय भी हो सकता हे, पर प्रत्यक्ष कारण दोनों के तेजोवलय की समानता है जो एक दूसरे को समीप खींचती रहती हैं। बात की बात में वे परस्पर परिचित घनिष्ठ और विश्वस्त बन जाते हैं। तर्क के आधार पर यह आकर्षण भावुकता मात्र प्रतीत होता है और ऐसी जल्दबाजी में खतरे की आशंका की जा सकती है पर तथ्य इतने प्रबल होते हैं कि इन संभावनाओं को निरस्त करते हुये घनिष्ठता उत्पन्न कर ही देते हैं। उसी प्रकार यह भी देखा जाता है कि स्वजन संबंधी से भी अकारण अरुचि रहती है और उसकी समीपता में कष्टकर अनुभूति ही होती रहती है। ढूंढ़ने पर वैसा कुछ कारण प्रतीत नहीं होता, तो भी ऐसी विषमता बनी ही रहती है। इसमें आभामंडल के कंपनों की गति में ऐसी असाधारण विपन्नता ही प्रधान अवरोध होती है। इसी को कवियों ने प्रकृति मिले मन मिले अनमिल से न मिलाये की उक्ति के साथ चित्रित किया है। यह प्रकृति मात्र आहार विहार वेष भूषा आदि की समानता पर निर्भर नहीं रहती, वरन् कारण गहरा होता है इसे तेजोवलय के स्तर की समानता में ही खोजा जा सकता है अनुशासन के पालन एवं उल्लंघन में प्रायः इसी समानता असमानता के कारण उत्तेजना उत्साह मिलता है।

श्मशानों में कई बार धुँधले प्रकाश पुँज की लहरें उड़ती देखी जाती है। यह और कुछ नहीं, मृत व्यक्तियों की वह प्राण ज्योतियाँ ही है। जो स्थूल शरीर के नष्ट हो जाने के पश्चात् इधर उधर तैरती फिरती हैं।

इनका नाश देह के साथ नहीं हो जाता है। कब्र में गाड़े गये व्यक्ति की लाश सड़ जाने पर भी उसकी वलय ऊर्जा उस क्षेत्र में उड़ती रह सकती है। इसे कभी कभी आँखों से देखा जाता है। और कभी उधर से निकलने वालों को रोमाँच कँपकँपी, धड़कन वृद्धि के रूप में इसका असुखद अनुभव होता है और वहाँ से जल्दी निकल भागने की इच्छा होती है। ऐसी अनुभूतियाँ भय और आशंका के भी कारण हो सकती है। पर कितनी ही बार पूर्ण निर्भय ओर मरणोत्तर सत्ता को अस्वीकार करने वाले व्यक्ति भी उस तरह की प्रतीति करते और कहते हैं कि उन्हें उस क्षेत्र में कुछ अदृश्य हलचल का आभास होता है। अघोरी कापालिक इन्हीं वलय पुंजों को वशवर्ती कर उनसे अपनी स्वार्थ सिद्धि करते रहते हैं। उक्त स्वतंत्र पुँज जब शरीर में होता है तो उसे सुरक्षित संरक्षित रखने वाले व्यक्तियों में चेहरे के गिर्द आलोक की तरह फैला रहता है। यह इस ऊर्जा पुँज का ऊपरी या उत्तरी ध्रुव है। इस केन्द्र की तरह ही इसका एक दक्षिणी ध्रुव भी है। यह लिंग क्षेत्र वाला भाग है। पर चूँकि उसमें प्रजनन संबंधी आकर्षण अधिक रहता है इसलिये इस वलय का प्रभाव यौन आकर्षण उत्पन्न करने वाला होता है। भिन्न लिंग की समीपता ही उस वलय में अधिक उभार उत्पन्न करती है। समलिंग की निकटता में वह तेजस् उत्तेजित नहीं होता। इन अड़चनों को देखते हुये ही कटि क्षेत्र को ढका रखा जाता है। विद्युत प्रवाह की दृष्टि से वहाँ भी चेहरे की अपेक्षा मात्रा कम नहीं होती पर उपरोक्त बाधाओं ने उसे सीमित प्रयोजनों के लिये ही उपयोगी रहने दिया है। दाम्पत्य स्तर पर ही सर्वसाधारण उसका लाभ उठा पाते हैं, इस कारण ही उसे ढका हुआ, केवल प्रणय प्रयोजन के लिये ही सीमित अवरुद्ध किया गया है यदि यह दोष न होता तो यह वलय ऊर्जा चेहरे पर छाये रहने वाले पुँज से न्यून नहीं अधिक ही प्रभावशाली सिद्ध होती और शक्ति जागरण के कितने ही प्रयोजन पूरे करती। तंत्र मार्ग के पंचमकार मैथुन द्वारा इसी संसिद्धि की जाती है। यह मार्ग काली तत्व से संबंधित होने के कारण इसमें रुद्र ग्रंथि से जब शक्ति संचय करने के लिये कुर्म प्राण को आधार बनाना होता है तो मैथुन द्वारा ही सामर्थ्य भंडार जमा किया जाता है जननेंद्रिय के प्रभाव क्षेत्र में मूलाधार और के कितने ही महत्वपूर्ण संस्थान और प्राण के अवस्थान है। इनमें प्रमुख है वज्र मेरु तड़ित कच्छप कुँडल सर्पिणी रुद्रग्रंथि समान एवं सुशुम्ना आदि। इनका आकुँचन प्रकुँचन जब तंत्र विद्या के आधार पर होता है ता वलय ऊर्जा को संजोने वाले शक्ति संस्थान उत्तेजित होते और शक्ति का उद्भूत प्रवाह उत्पन्न करते हैं। यह प्रवाह दोनों ही दिशा में उलटा सीधा चल सकता है। इस विद्या के ज्ञाता जननेन्द्रिय का उचित रीति से संयोग करके काम शक्ति से आशातीत लाभ उठाते हैं परंतु जो लोग इस विशय में अनभिज्ञ है वे स्वास्थ्य और शक्ति दोनों ही खो बैठते हैं। साधारण जन तो रति क्रिया में गँवाते ही अधिक हैं पर योग साधना के विधानों द्वारा इस क्षेत्र में संकेन्द्रित वलय ऊर्जा से अन्नमय और प्राणमय कोषों की सुप्त शक्तियां जगायी भी जा सकती है।

ठस शक्ति विज्ञान को समझा और लाभ उठाया जा सके, तो प्रस्तुत विपन्नता से उबरा जा सकता है और मनुष्य भौतिक एवं आत्मिक दृष्टि से इतना संपन्न बन सकता है जिसे अद्भुत आश्चर्य स्तर का अचंभा कहा जा सके।


कहीं ! हमें भी सनकने का रोग तो नहीं?

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार चिंता और उन्माद की तरह सनक भी एक प्रकार का मनोविकार है। जब यह अपने पूरे उभार पर होती है। तो व्यक्ति को इस कदर आवेशग्रस्त करती ओर विश्वासों की इतनी गहरी भूमिका में उतार देती है कि वह बेचारा संभव असंभव का भी भेद भूल जाता है अपनी तर्क शक्ति गँवा बैठता और जो कुछ भी सनक ने उसे मान बैठने के लिये कहा था, उन्हीं पर पूरा विश्वास करने लगता है।

घटना अमरीका की है। हैराल्ड बनी नामक एक उच्च शिक्षित व्यक्ति वाशिंगटन में अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता था। वह एक धार्मिक प्रकृति वाला व्यक्ति था। नियमित रूप से गिरजा घर जाना और व्यवसाय से बचे समय का उपयोग समाज सेवा में करना उसकी सामान्य दिनचर्या थी। वह दो करोड़पति कंपनियों का चेयरमैन था भौतिक विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त होने के कारण वह अक्सर विज्ञान विशय पर नई नई बातें सोचता रहता।

इसी कारण से कई छोटे बड़े आविष्कार भी किये।

एक बार उसके मन में अंतर्ग्रही यात्रा करने की कल्पना आयी। वह कोई ऐसा यान विकसित करने का विचार करने लगा। जिसमें विभिन्न ग्रहों की सैर की जा सके। दिन रात ग्रह नक्षत्रों की कल्पना में डूबे रहने के कारण वह चिंतन की इस गहराई में उतर गया। जहाँ उसे ऐसा प्रतीत होने लगा, जैसे शुक्र ग्रह के बारे में वह न केवल बहुत कुछ जानता ही है। वरन् कितनी ही बार वहाँ की यात्रा भी कर आया है। शुक्र के राजकुमार का वह मित्र है और ऐसा अंतरिक्ष यान बनाने की विधि जान चुका है जिससे विभिन्न आकाशीय पिंडों की यात्रा सरलता ओर सुगमता पूर्वक कम खर्च में की जा सके।

राजकुमार यूसीलस उसका परम स्नेही है और एक ऐसी कंपनी बनाने में उसकी सहयोग प्राप्त कर चुका है। जो उसके कल्पित “मैगनेटिक” फलक्स मोड्लर” सिद्धान्त पर आधारित सस्ते सरल और सुविधाजनक यान यात्रा बनाया करेगी। वर्दी ने अपनी कल्पना जगत की इस कंपनी का नाम ......................वह स्वयं की संसार का प्रथम शुक्र ग्रह का यात्री जानने लगा और अपनी दो यात्राओं का विस्तृत विवरण ................शुक्र ग्रह में दो सप्ताह भी लिखी। वह 118 पृष्ठों वाली थी उसकी सीमित प्रतियां ही छपवाई गई क्योंकि विशय अत्यंत गोपनीय था और उसके लीक हो जाने का खतरा था। उसके विचार में यदि ऐसा हुआ तो उसे भारी घाटा उठाना पड़ सकता है और जिस आविष्कार में अरबों खरबों की संपत्ति कमायी जानी है। उससे वह वंचित रह सकता है।

बर्नी अपनी सनक में पूरी तरह खो गया था कल्पना और यथार्थता का भूला देने वाली उसकी मनः स्थिति बन गई थी। उसने आवेश में आकर अपने 1 लाख 61 हजार डालर के शेयर बेच डाले। आश्चर्य यह कि जिसे आत्मविश्वास के साथ सहयोगियों से उसने बातें की उससे प्रभावित होकर अनेक सुसंपन्न लोग उसे पर विश्वास करने लगे और उसके इस महत्वाकांक्षी अभियान में सम्मिलित हो गये। सनक का स्वरूप इतना बढ़ चढ़ और योजनाबद्ध हो सकता है इसका दूसरा उदाहरण कदाचित ही की मिलें।

बर्नी की सेक्रेटरी एजेंलिका भी इस योजना में शामिल हो गई। उसे क्या पता था कि जिस कार्य के लिये वह इतना भाग दौड़ कर रही हे वह एक सनकी मस्तिष्क की कभी भी पूरी न हो सकने वाली बेतुकी योजना है।

एक दिन बर्नी पर और भी विचित्र सनक सवार हुई। उसने शुक्र ग्रह से अपनी सेक्रेटरी को राजकुमार यूसीलस की ओर से फोन कराया कि इस ग्रह पर आकर बर्नी बीमार पड़ गये है और अपने साथियों के नाम अमुक संदेश नोट कराते हैं। जो उन तक पहुँचा दिया जाय। सेक्रेटरी ने वैसा ही किया। इसके पश्चात् कुछ दिन बाद उसके मरने का समाचार आ गया।

सेक्रेटरी ने सोचा इतनी महत्वपूर्ण योजना को अधूरी न रहने दिया जाय। इसके सफल हो जाने से अमरीका का भाग्य बदल सकता है अतः उसने तत्कालीन राष्ट्रपति आइजन हावर से मिलकर संपूर्ण योजना समझा दी और बर्नी की दो शुक्र यात्राओं से लेकर अंतरिक्ष यान बनाने और ब्रह्माण्ड भ्रमण करने की उसकी आकाँक्षा बता दी। और सलाह दी कि वे स्वयं इस कार्य को हाथ में ले और आगे बढ़ायें।

राष्ट्रपति ने इस रोमाँचक एवं अद्भुत समझे जाने विवरण से तनिक भी प्रभावित न होते हुये संपूर्ण प्रकरण को सी. आय. ए. के अधिकारियों को सौंप दिया। पुलिस ने छान बीन की तो शुक्र पर मरा हुआ बर्नी धरती पर ही अर्धविक्षिप्त अवस्था में जीवित पाया गया। वह वाशिंगटन से बहुत दूर इलिन्वाय राज्य में एक साइनबोर्ड बनाने वाले के यहाँ पेट भरने जितने वेतन पर मजबूरी कर रहा था। उसकी स्थिति फटेहाल भिखारियों जैसी हो गई थी। पुलिस ने उसे झूठी अफवाहें फैलाने और धोखाधड़ी करने के मामले में गिरफ्तार कर लिया।अदालत में उसके विरुद्ध मुकदमा दायर किया, जहाँ उसे दस साल की सजा सुनाई गईं वह अपनी पूरी सजा भी नहीं काट सका और कालकोठरी में मर गया।

हम कल्पना तो करे और योजनाएं भी बनाये पर ऐसी नहीं जिसके लिये स्वयं को ही मृत घोषित करना पड़े सनकी तो अर्धमृतकों की तरह जीते हैं। हमें जीवितों की तरह जीना चाहियें और कुछ ऐसा कर गुजरना चाहिये जो समाज के लिये अनुकरणीय साबित हो ऐसा तभी संभव है जब मस्तिष्क को शांत सजग रखते हुए बार बार इस बात पर विचार करे कि जो कुछ किया जा रहा है वह अतिरंजित स्तर का उन्माद तो नहीं।


सफलता, असफलता दोनों ही सिखाती है हमें जीवन जीना

संसार की हर वस्तु में अच्छाई और बुराई पाई जाती है। कुछ वस्तुएं हमें सुख मिलता है। दूसरी कुछ वस्तुएं इसलिये बुरी लगती है क्योंकि वे हमारी इच्छाओं में बाधक है परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। वह हर वस्तु जिसमें हमें केवल अच्छाई ही दिखाई देती है बुराई को भी छिपाये हुये है। हर बुरी दिखाई देने वाली वस्तु अच्छाई से भी पूर्ण है। सफलता सबको प्रिय है और असफलता सब को उदास कर देती है। परंतु वास्तव में सफलता से भी कुछ हानियाँ होती है और असफलता बहुत से कार्यों में हमारे लिये लाभकारी है।

असफलता हमें हमारी भूलों पर विचार करने को विवश करती है कि हम किन भूलों के कारण अपने कार्य को पूरा करने में असफल रहे है।हम अपनी भूलों को सुधारने की इच्छा को भी जन्म देते हैं। हमारे मन में भूलों के सुधार का आधार तैयार होता है। वास्तव में असफलता का कारण मनुष्य की अपनी कुछ निश्चित भूलें है। सामान्य मनुष्य अपनी असफलता का कारण दूसरों को कहने लगता है और स्वयं उससे मुक्त रहना चाहता है। विवेकी मनुष्य ऐसा नहीं सोचता। वह तो भूलों का दोषी स्वयं को मानकर उनकी खोज करता है और सुधारने का मार्ग ढूंढ़ता है। असफलता के कारण असावधानी मन की अस्थिरता श्रम से बचना आलस्य समय का ध्यान न रखना है। अपने व्यवहार की कमियों के कारण भी हम अपनी असफलता का कारण बन जाते हैं हमें हर कार्य में दूसरों के सहयोग की आवश्यकता होती है परंतु उचित व्यवहार का प्रयोग न करने के कारण भी हमें उनका सहयोग नहीं मिलता और हम असफल हो जाते हैं।

असफलता भूल करने वाले पर एक सुधार के लिये दिया गया दंड है। मनुष्य को उचित अनुचित का ज्ञान कराती है। बिगड़े कार्य को बनाने का मार्ग दिखाती।

कार्यों का मार्गदर्शन करती है यह एक स्पष्ट कहने वाले मित्र का कार्य करती है। असफलता कष्टकारक होते हुये चरित्र निर्माण करने वाली है। परंतु सफलता आनन्दमयी होकर भी अहंकार नामक बुराई को छिपाये रहती है जो सावधानी हटी दुर्घटना हुई के आधार पर हानि करने का साधन बन जाती है एक बार सफल होकर मनुष्य अपनी शक्ति और साहस को अधिक महत्व देने लगता है वह अपनी बुद्धि चतुराई और बल को हर कार्य करने योग्य ..................वह समझने लगता है कि मैं भविष्य में हर कार्य को कर ......................किसी कार्य के प्रति ...........आत्मविश्वास उत्पन्न करना अच्छा गुण है यह कार्य में बाधक है। अहंकार कार्य में .............मनुष्य की वास्तविकता ............विश्वास कार्य से संबंधित होते हुये भी भिन्न है।

आत्म विश्वासी कार्य के लिये सद्गुणोँ को आधार मानता है। सावधानी परिश्रम, अध्यवसाय अनुकूल परिस्थितियाँ सहयोग आदि गुणों को आधार बना कर वह कार्य पर दृढ़ता से लग जाता है और परिणाम के प्रति आसक्ति नहीं रखता। इसलिये उसका कार्य आगे बढ़ता रहता है। कर्तव्य पर ध्यान रखते हुये बाधाओं से टक्कर लेना आत्मविश्वासी की पहचान है। अहंकारी छोटी सी सफलता पर इतना इतराता है कि उन सद्गुणों की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता जिन्होंने .................अपने को ही कार्यकर्ता मानता है और भविष्य में हर कार्य को करने की क्षमता रखने वाला मानने लगता है। इस नशे में वह अपनी त्रुटियों पर भी विचार नहीं कर पाता। अहंकार का प्रभाव बुद्धि में विवेक नहीं है। वे छोटा पद या स्थिति प्राप्त करके सज्जनता छोड़ देते हैं। उनका व्यवहार धृष्टता पूर्ण हो जाता है।

व्यवहार की धृष्टता मनुष्य जाति समाज तथा मानव मात्र के लिये हानि कर है। कोई विवेकी ऐसे आचरण की सहन नहीं करेगा केवल कुछ व्यक्ति स्वार्थ सिद्ध होने पर वे भी विरोध करने लगेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अहंकारी का शत्रु बन जाता है।

कोई विवेकशील ऐसे आचरण को सहन नहीं कर सकता। केवल कुछ व्यक्ति अपने स्वार्थ के वशीभूत ही इसे सहन करेंगे। वे भी स्वार्थ पूर्ति हो जाने पर ऐसे आचरण के विरुद्ध हो जायेंगे। इस प्रकार अहंकारी का कोई मित्र नहीं होगा। भगवान भी

अहंकार के विरोधी है। उन्हें यह अवगुण सबसे अधिक अप्रिय है। ईश्वर ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ जीव बनाया है यह महानता ईश्वर की देन है। अपना अस्तित्व तो मानव के लिये तुच्छ है। तुलना करके देखे तो कई बातों में वह पशुओं से भी निम्नतर है। उदाहरण के लिये मनुष्य अपने किसी कार्य को अकेला नहीं करता। उसे दूसरों के सहयोग की आवश्यकता होती है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य में दूसरों का सहयोग विशेष योगदान देता है अकेले मनुष्य में इन गुणों का विकास नहीं हो सकता जिन पर उसे मानव कहलाने का गौरव प्राप्त है। वह वन में जिसे जीव के साथ रहेगा उसका प्रभाव उस पर पड़ जायेगा और उसका विकास नहीं हो पायेगा।

मनुष्य का बाल्यकाल असहाय अवस्था का काल है। जन्म लेने पर उसे यदि सहयोग न मिले तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा।जीवन काल में मनुष्य में कई ऐसे अभाव उत्पन्न हो जाते हैं जो पशु पक्षियों में स्वच्छन्द विचरण करते हुये नहीं होते जैसे बीमारी कमजोरी तथा ज्ञान की कमी। आज के मानव को उपलब्ध सुविधायें सब सहयोग का ही परिणाम है जो उसके पूर्वजों ने उसे प्रदान की है। इतना होने पर यदि मानव अपने को कर्ता समझकर ऐंठ रहा है अहंकार के नशे में चूर है तो इससे बड़ी नीचता क्या हो सकती है कर्ता न होकर कर्ता कहलाने की इच्छा करना हो तो अहंकार है। में करने वाला हूँ यह सब मेरे द्वारा हुआ है में न करता तो यह न होता। ऐसा सोचना ही वह अहंकार है मनुष्य को नीच की श्रेणी में ले जाती है।

सामान्यतया समझा जाता है कि डाकू या हत्यारे का उद्देश्य धन न लूटना है वे मात्र लोभी है परंतु ऐसा उनका भ्रम है। वास्तव में डाकू या हत्यारे का ऐसा रूप लोभ मिश्रित अहंकार देता है। अहंकारी अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये समाज पर अनेकोँ प्रकार के अत्याचार करते हैं ये समाज को हानि पहुँचाने के अतिरिक्त कभी लाभ नहीं पहुँचा सकते।

सिकन्दर, तैमूरलंग, चंगेजखाँ, नादिरीशाह, अहमदशाह, अब्दाली, औरंगजेब तथा नेपोलियन जैसे लोगों ने अपने अहंकार के कारण निर्दोष जनता का खून बहाया और समाज में जाने वाली पीढ़ियों के सम्मुख अहंकार का नमूना प्रस्तुत किया। अहंकार की प्रवृत्ति अपने पर सामान्य मनुष्य जैसी विघटनात्मक कार्य ही अपनायेगी। उसके कार्य में मात्रा का अंतर होता है क्योंकि मात्रा सामर्थ्य और स्थिति पर ही निर्भर रहती है। ऐसे व्यक्ति से समाज पर विपत्ति ही आती रहेगी उससे समाज के हित में आशा रखना बालू में से तेल निकालना है।

अहंकार समाज और व्यक्ति के लिये हानिकारक है। अतः हमें इस कुप्रवृत्ति से सावधान रहना चाहिये कि कहीं यह कुप्रवृत्ति हमारे अंदर न पनप जाये। इससे बचने का सरलतम उपाय यह हे कि हमें अपने हर कार्य में प्राप्त सफलता के लिये अपने भाग्य को बढ़ा चढ़ाकर नहीं आँकना चाहिये बल्कि उसमें सहयोग देने वालों तथा उस कार्य का मार्गदर्शन करने वालों का उचित आभार मानना चाहियें। अनुदानों का उचित मूल्याँकन करें उसकी जाँच पड़ताल करें। ईश्वर का स्मरण करके उसके द्वारा दी गई विभूतियों तथा अनुग्रहों के लिये उसे धन्यवाद देना चाहिये। मनुष्य को हर कार्य के साथ आत्म निरीक्षण करना चाहिये कि वह कितना महान है तथा कितना तुच्छ है और जीवों से महान है तो प्रभु की दृष्टि में कितना तुच्छ है। ईश्वर तो पल में पर्वत को राई कर सकता है। मनुष्य तो एक बुलबुला है। एक कार्य की सफलता दूसरे की गारंटी नहीं वो काल स्थान परिस्थिति पर निर्भर करता हे कि कब और कितना सहयोग और कृपा आने वाले कार्य में मिलेगी। यदि इतना मात्र सोचना हमें आ जाय तो हमं जीवन जीने की कला समझ में आ जायेगी। फिर असफलता से होने वाला दुःख हमारे लिये तप तथा सफलता से प्राप्त होने वाला सुख हमारे लिये योग बन जायेगा।


विधेयात्मक चिंतन (Kahani)

अमेरिकन मनोवैज्ञानिक नैपोलियन हिल तथा डब्लू सी स्टोन अपनी कृति सक्सेज थ्रू अ पाजिटिव मेंटल अटीट्यू में स्पष्ट करते हैं।

महानता उनके पास आती है जिन्होंने अपनी समूची इच्छा व क्रिया को महान उद्देश्यों के प्रति नियोजित कर दिया है।

सफलता उनके द्वारा पायी व सुरक्षित रखी जाती है जिनके चिंतन की दशा धारा विधेयात्मक है मानव की सबसे बड़ी शक्ति उसके संकल्प तथा पुरुषार्थ के सम्मिश्रण में निहित रहती है। स्वयं को संसार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति मानना चाहिये। सफलता स्वास्थ्य प्रसन्नता समृद्धि के बीज स्वयं में निहित हैं। आवश्यकता इनके विकसित करने की है।

असफल होने का दीप ईश्वर पर न पढ़े। सफलता हेतु इच्छा शक्ति को जगाना होगा। साथ ही क्रिया शक्ति को नियोजित करना होगा। यही दोनों वह आधार तैयार करते हैं जिस पर ईश्वरीय अनुकंपा अवतरित होती है।


महानता का मापदंड क्या हो?

प्रतिस्पर्धा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह गुण न हो तो विकास की संभावना ही समाप्त हो जायेगी। पिछले समय की तुलना में इन दिनों संसार की जो असाधारण प्रगति हुई है वह इसी का परिणाम हे हर राश्ट्र और व्यक्ति क्षमता में योग्यता में बुद्धि और गुणों में दूसरों से आगे निकल जाना चाहतेहै जिसे सर्वश्रेष्ठ कहा जा सके। यह स्वस्थ होड़ है। विकृत वह तब होती है जब इस दौड़ में बढ़ी चढ़ी महत्वाकांक्षाएं सम्मिलित होने लगती है। पिछले दिनों यहाँ हुआ। चित्र विचित्र अजूबे खड़े करने की शृंखला ने एक ऐसी परंपरा को जन्म दिया जो न सिर्फ बहुमूल्य समय को बरबाद करती रही वरन् इसने संपदा का भी बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया।

ऐसे प्रथम अजूबे के संबंध में इतिहासकारों का कहना है कि रोड्स की विशालकाय प्रतिमा अब तक की प्राचीनतम ज्ञात अचंभा है। यह भव्य विग्रह कोलोसस आफ रोड्स के नाम से प्रसिद्ध था ईसा पूर्व 292 में इसका निर्माण शुरू हुआ और तैयार होने में कुल 12 वर्ष लगे। मूर्ति जब बनकर खड़ी हुई तो इसकी ऊंचाई 105 फुट थी। दुर्भाग्यवश इसकी यह विशालता ही विनाश का कारण बनी कहते हैं 224 ईसा पूर्व उस द्वीप में एक भयंकर भूचाल आया था जिसमें काँसे की बनी यह प्रतिमा बहुसंख्य भव्य भवनों को नष्ट कर गिर कर चूर चूर हो गई। इसके बाद के 900 वर्षों तक यह भग्न विग्रह और उसके खंड यथावत् पड़े रहे। सन् 672 में इन्हें व्यापारियों के हाथ बेच दिया गया।

रोमन सम्राट नीरो से उस प्रतिमा की प्रतिष्ठा न सुनी गई। उसने उससे विशाल विग्रह बनाने का निर्णय लिया। इस निर्मित तत्कालीन समय के महान रोमन मूर्तिकार जेनोडोरस को बुलाया और 106 फुट ऊंची अपनी ही एक प्रतिकृति बनाने का आदेश दिया। इसके पीछे सम्राट के दो स्वार्थ थे प्रथम तो जो यश मूर्ति निर्माण के कारण प्राचीन समय में रोड्स द्वीप को मिल गया था उसको छीनकर रोमन राज्य के नाम कर लेना और द्वितीय रोमनों के दिलों में अपनी महानता की छाप अंकित कर प्रतिमा के माध्यम से उसे युगों तक बनाये रखना पर नीरो का दुर्भाग्य कहना चाहिये कि वह अपने प्रयास में सफल न हो सका। सन् 68 में उसकी मृत्यु के उपराँत मूर्ति को भगवान अपोलो को समर्पित कर दिया गया। अति आरंभ की यह स्पर्धा यही रुकी नहीं अपितु आगे चली और पिछले से भी अद्भुत संरचनाएं बाद में खड़ी की। इनमें से एक है न्यूयार्क बंदरगाह में स्थित दि स्टेच्यू आफ लिबर्टी। इस नारी प्रतिमा की ऊंचाई पीठिका के आधार तल से लेकर मशाल की लपटों के शीर्ष तक 305 फुट है। फ्राँसीसी शिल्पकाल फ्रेडरिक बारथोल्डी की देख−रेख में यह बनी और सन् 1886 में अमेरिकियों को भेंट स्वरूप प्रदान कर दी गई। अकेली मूर्ति की ऊंचाई 151 फुट 1 इंच है जलो लगभग इतने ही ऊंचे आधार पर स्थित है। ग्रेनाइट और सीमेंट से बने उक्त आधार पर विग्रह का लौह ढाँचा खड़ा है जिसके ऊपर ताम्बे की चादरें मढ़ कर महिला की आकृति गढ़ी गई। मूर्ति का शरीर भीतर से बिल्कुल खोखला है। इस पोले भाग में ऊपर चढ़ने के लिये सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। जिनके सहारे कोई भी व्यक्ति नारी मूर्ति के सिर और मशाल में बनी दर्शक दीर्घाओं तक पहुँच कर समुद्र के विहंगम दृश्य का अवलोकन कर सकता है। इस निर्माण में कुल 2 लाख 50 हजार की लागत आयी बतायी जाती है।

सोवियत संघ के बिखराव से पूर्व तक अमरीका और रूस एक दूसरे के प्रबल प्रतिद्वन्द्वी थे केवल आयुध के क्षेत्र में ही नहीं वरन् उन उन सभी क्षेत्रों में जिसमें कोई एक दूसरे से आगे निकल जाना चाहता और अपना वर्चस्व उस दिशा में स्थापित कर अनुपम बनने की आकाँक्षा रखता। यही कारण है कि जब स्टेच्यू आफ लिबर्टी की प्रतिष्ठा अमरीका में हुई तब रूसी लोग एक प्रकार से अपमानित अनुभव करने लगे। उनने उससे भी वृहद संरचना गढ़ने की योजना बनायी, जिसके अंतर्गत मदरलैंड नामक विश्व की सर्वाधिक ऊंची कृति कर सृजन हुआ। 1967 में बन कर तैयार हुई इस नारी मूर्ति को बोल्गोग्राद के समीप मामायेव की पहाड़ियों में स्थापित किया गया। यों कहने को तो इसको स्टालिनग्राद युद्ध की स्मृति स्वरूप बनाया गया बताया जाता है पर इसके पीछे की मूलभावना उस रिकार्ड को अपने नाम करा लेना था जिसका श्रेयाधिकारी अब तक प्रतिपक्षी बने हुये थे। मूर्ति अपने दाहिने हाथ में एक बड़ी तलवार लिये खड़ी है। तलवार के ऊपरी सिरे से लेकर प्रतिमा के आधार तल तक कुल लम्बाई 270 फुट ज्यादा हैं।

इसके जवाब में अमरीकी वास्तुकार फेलिक्स डी वेल्टन ने उससे भी ऊंची रोड्स आफ क्लोसस की अनुकृति बनाने का कार्यारंभ किया जो अभी भी अधूरी है। इसकी समग्र ऊंचाई 308 फुट होगी जो मूल रचाना से 203 फुट अधिक है। इसके अतिरिक्त और भी कई बड़े कार्य हाथ में लिये गये। एक ऐसा ही कार्य यूनाइटेड डाउटर्स आफ दि कनफेडरेसी के तत्वावधान में आरम्भ हुआ। शिल्पकार थे गटजन बोरगलम। योजनानुसार जाजिया के स्टोन माउण्टेन पर जेनरल राबर्ट ई. ली का 650 फुट का विराट् चेहरा उत्कीर्ण करना था। आठ वर्षों के कठिन श्रम के बाद यह कार्य पूरा हुआ। इसके उपराँत बोरगलम दूसरे कार्य में जुट गये। यह था दक्षिणी डकोटा में ब्लैक हिल्स के माउण्ट रुषमोर की वृहद चट्टानों पर अमरीका के चार महान राष्ट्रपतियों के चेहरे गढ़ना। कई वर्षों की मेहनत के पश्चात उनने वाशिंगटन लिंकन जेफरसन एवं रुजवेल्ट के विशाल चेहरे विनिर्मित किये। प्रत्येक की लम्बाई ठुड्डी से शीर्ष तक 6 फुट है।

ठन निर्माणों से कला कौशल तो प्रकट होता है पर वह व्यक्तित्व और राश्ट्र की महानता प्रदर्शित करते ऐसा नहीं कहा जा सकता। व्यक्तित्व की महानता चारित्रिक और नैतिक श्रेष्ठता से ही आ सकती है स्थूल रचना से नहीं। रचना से जो प्रवृत्ति पनपती है उसे प्रतिद्वन्द्विता कहना चाहिये। यों यह स्वयं में बुरी नहीं। यदि इसका इस्तेमाल जीवन निर्माण के क्षेत्र में हो तो निश्चय ही उससे ऐसा कुछ बना जा सकता है जिसे श्रेष्ठ और सुसंस्कृत कहा जा सके पर इन दिनों तो सर्वत्र इसका हेय पक्ष ही दृष्टिगोचर हो रहा है। जब उत्कृष्टता की उपेक्षा होने लगे और उसकी जगह निकृष्टता अपनायी जाने लगे तो वैर विरोध स्वाभाविक है। संप्रति यही हो रहा है। आज यदि समाज में असंतोष बढ़ा है तो इसका एक प्रमुख कारण होड़ के वाँछनीय पक्ष को न अपनाकर उसे अपनाया जाता जिसे अवाँछनीय घोषित किया गया है। प्राचीन समय में ऐसी बात नहीं थी। तब इसका सृजनात्मक पहलू ही ग्राहय था। जो व्यक्ति अपनी चारित्रिक श्रेष्ठता के कारण उदात्त स्तर के आध्यात्मिक कहे जाते थे। लोग उनका अनुकरण कर उनसे भी उच्चस्तरीय बन जाने की कोशिश करते। यही कारण है कि तब के समाज में चारों और शांति और समृद्धि व्याप्त थी। जिन्हें भौतिक प्रगति करनी होती और कला में क्षमता में योग्यता में विकास करना अभीष्ट होता वे उन उन क्षेत्रों में श्रम को द्विगुणित कर देते। इससे जो प्रतिभा पैदा होती उससे वे अद्वितीयता प्राप्त कर लेते। दोनों प्रकार की उन्नति के तब यही विधि विधान थे।

आज आत्मिक क्षेत्र में स्पर्धा और उसके द्वारा उन्नति तो प्रायः समाप्त ही हो चुकी है जीवित है तो एकदम भौतिक बन कर। वह स्वस्थ होती तो भी संतोश की बात थी किंतु जिससे बैर विद्वेष पनपता और संघर्ष का खतरा बढ़ता हो उसे प्रतिस्पर्धा की तुलना में ईर्ष्या कहना ज्यादा उचित होगा। आजकल के आँतरिक विग्रहों और ग्रहयुद्धों में प्रायः यही हेतु कारणभूत होता है। वर्ग जाति धर्म लिंग क्षेत्र के नाम पर जो विवाद इन दिनों संसार भर में चल रहे है उनके पीछे का मूल निमित्त यदि तलाश किया जाय तो पायेंगे कि उनमें परस्पर ऊंच नीच अमीर गरीब, बड़े-छोटे की ऐसी खाइयों पनपी हुई है कि एक वर्ग दूसरे पर अपना वर्चस्व कायम कर लेना चाहता है, जबकि दूसरा सिर्फ इसलिये उसका विरोध करता है कि कमजोर व गरीब होने मात्र से ही किसी को किसी पर शासन और शोषण करने का अधिकार तो नहीं मिल जाना चाहिये। वह प्रतिपक्षी का जग कर विरोध करता है जबकि दूसरा पक्ष ऐसा करना अपना अधिकार समझता है। बस यही प्रतिद्वन्द्विता खूनी संघर्ष का रूप धारण कर लेती है। आये दिन ऐसी लड़ाइयों में न जाने कितनी मौतें होती और संपत्ति की होली जलती है कुछ कहा नहीं जा सकता।

अपने को बड़ा सिद्ध करने यशस्वी बनाने, प्रतिष्ठित होने के लिये जब तक उद्यम लिप्सा इस दौड़ में शामिल रहेगी तब तक चारों ओर ऐसे ही दृश्य दिखाई पड़ेंगे। सच तो यह है कि आज तक इनसे न तो महानता अर्जित की गई है न आगे की जा सकेगी। उसे तो महान वन कर ही हस्तगत की जा सकती है हम सद्गुणों को सत्प्रवृत्तियों को उच्चादर्शों को अपनायें और दूसरों से अपने को श्रेष्ठ बना लेने की स्वस्थ स्पर्धा करें तभी सही अर्थों में अभिवंदनीय बन सकेंगे, अन्यथा केवल अजूबे खड़े कर देने मात्र से कोई अभिवंदनीय नहीं बनता। वह संरचना भूगर्भीय हलचलों के कारण कब ढह जायेगी और अपने साथ निर्माता का नाम कब मिटा देगी कहा नहीं जा सकता। इसलिये उत्तम यही है कि हम अच्छाइयों अपनाकर उत्कृष्टतक बनें। चिरस्मरणीय बनने का यही एकमात्र तरीका है महापुरुष इसे ही अपनाते और अविस्मरणीय बनते हैं।


Quotation

वेद में कहा है हे अग्नि देव हमें सरल सुपथ से ले जाओ बुरे रास्ते से नहीं। केवल बाह्य समृद्धि नहीं चाहिये सुपथ चाहिये इसी पर चलकर अपनी अंतः शक्तियां जाग्रत होती है उनकी अभिव्यक्ति लौकिक व्यवहार में बन पड़ती है। इंजील में कहा? हे प्रभु हमें सीधी राह चाहिये। गलत राह से हम अपने मुकाम पर नहीं पहुंचेंगे। ऐसा भान होगा। कि हम स्वर्ग में पहुँचे है लेकिन असल में तो हम नरक में पहुँच जायेंगे।


संस्कृति है, सौंदर्य की उपासना

संस्कृति का अर्थ है मनुष्य का भीतरी विकास। उसका परिचय व्यक्ति के निजी चरित्र और दूसरों के साथ किये जाने वाले सद्व्यवहार से मिलता है। दूसरों को ठीक तरह समझ सकने ओर अपनी स्थिति एवं समझ धैर्यपूर्वक औरों को समझा सकने की स्थिति भी उस योग्यता में सम्मिलित कर सकते हैं जो संस्कृति की देन है।

आदान प्रदान एक तथ्य है जिसके सहारे मानवी प्रगति के चरण आगे बढ़ते-बढ़ते वर्तमान स्थिति तक पहुंचे है। कृषि, पशुपालन, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, उद्योग, विज्ञान, दर्शन जैसे जीवन की मौलिक आवश्यकताओं से संबंधित प्रसंग किसी एक क्षेत्र या वर्ग की बपौती नहीं है। एक वर्ग की उपलब्धियों से दूसरे क्षेत्र के लोग परिचित हुये है। परस्पर आदान-प्रदान चले है और भौतिक क्षेत्र में सुविधा संवर्धन का पथ प्रशस्त हुआ है। ठीक यही बात धर्म और संस्कृति के संबंध में भी है। एक ने अपने संपर्क क्षेत्र को प्रभावित किया है। एक लहर ने दूसरों को आगे धकेला है। मिल-जुल कर ही मनुष्य हर क्षेत्र में आगे बढ़ा है। इस समन्वय से धर्मे और संस्कृति भी अछूते नहीं रहे है। उन्होंने एक दूसरे को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित किया है।

अब दुनिया में कोई नस्ल ऐसी नहीं बची जो पूरी तरह रक्त शुद्धि का दावा कर सके। जातियों के बीच प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से रोटी बोटी के व्यवहार चलते रहे है और नस्लों के मूल रूप में आश्चर्यजनक परिवर्तन होता चला गया है। भारत वंशी लोगों के रक्त में आर्य और द्रविड़ रक्त का मिश्रण इतना अधिक हुआ है कि दोनों से मिलकर एक तीसरी अतीव संयुक्त जाति बन गई है। इसी प्रकार एक सभ्यता पर दूसरी सभ्यता के निकट आने का भरी प्रभाव पड़ा है। भारत में पिछले एक हजार वर्ष से मुस्लिम और ईसाई सभ्यताएं आती रही है। उनके अनुयायी कितने बने यह बात पृथक है। सामान्य जनमानस ने बहुत कुछ प्रभाव ग्रहण किया है। प्रचलित भारतीय पोशाक ऐसी नहीं है, जिसे दो हजार वर्ष पुरानी कहा जा सके। इसी प्रकार रीति रिवाजों एवं मान्यताओं में भी अनजाने ऐसे तत्वों का समावेश होता रहा है जिन्हें खुले मन से न सही हिचकिचाहट के साथ समन्वय हुआ स्वीकारा जा सकता है।

यह सभ्यताओं का समन्वय एवं आदान प्रदान उचित भी है और आवश्यक भी। कट्टरता के कटघरे में मानवी विवेक को कैद रखे रहना असंभव है। विवेक दृष्टि जाग्रत होते ही इनके घरों की दीवारें टूटती है और जो रुचिकर या उपयोगी लगता है उसका बिना किसी प्रचार या दबाव के आदान प्रदान चल पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिये कट्टर पंथी प्रयास सदा से हाथ पैर पीटते रहे है पर यह कठिन रहा है। हव उन्मुक्त आकाश में बहती है सर्दी गर्मी का विस्तार व्यापक क्षेत्र में होता है। इन्हें बंधनों में बाँधकर कैदियों की तरह अपने ही धर में रहने के लिये बाधित नहीं किया जा सकता। संप्रदायों और सभ्यताओं में भी यह आदान प्रदान अपने ढंग से चुपके चुपके चलता रहा है भविष्य में इसकी गति और भी तीव्र होगी।

धर्म और संस्कृति के बारे में तो कुछ कहना ही व्यर्थ है। वे दोनों ही सार्वभौम है। उन्हें सर्वजनीन कहा जा सकता है। मनुष्यता के टुकड़े नहीं हो सके। सज्जनता की परिभाषा में बहुत मतभेद नहीं है। शारीरिक संरचना की तरह मानवी अंतःकरण की मूलसत्ता भी एक ही प्रकार की है। मौलिक प्रवृत्तियां भी लगभग एक सी हे। एकता व्यापक है और शाश्वत। पृथकता सामयिक है और क्षणिक। हम सब एक ही परमात्मा के अंश है। एक ही धरती पर पैदा हुये है। एक ही आकाश के नीचे रहते हैं एक ही सूर्य से गर्मी पाते हैं और बादलों के अनुदान से एक ही तरह अपना गुजारा करते हैं फिर कृत्रिम विभेद से बहुत दिनों तक बहुत दूरी तक किस प्रकार बंधे रह सकते हैं। औचित्य को आधार मानकर परस्पर आदान प्रदान का द्वार जितना खोलकर रखा जाएगा उतना ही स्वच्छ हवा ओर रोशनी का लाभ मिलेगा। खिड़कियों को बंद रखकर हम अपनी विशेषताओं को न तो सुरक्षित रख सकते हैं और न स्वच्छ हवा और खुली धूप से मिलने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकते हैं। संकीर्णता अपनाकर पाया कम और खोया अधिक जाता है।

एकता की दिशा में हम आगे बढ़े तो इसमें पूर्वजों के प्रति अनास्था नहीं वरन् श्रद्धा की ही अभिव्यक्ति है पूर्वज अपने पूर्वजों की विरासत को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हुये भी अपने बुद्धिबल और बाहुबल से नये अनुभव एकत्रित करते, लाभ कमाते और साधन जुटाते रह है। इसमें पूर्वजों को संतोश ही हो सकता है साथ ही गर्व भी। अपनी संतान पर कोई अभिभावक यह बंधन नहीं लगाता कि हमसे अधिक शिक्षा या संपत्ति संतान को नहीं कमानी चाहिये। हमसे अधिक यश या कौशल नहीं अर्जित करना चाहिये। बंधन लगाना तो दूर समझदार अभिभावक अपने से अधिक प्रगति करने के लिये अपने उत्तराधिकारियों को उत्साहित और उत्तेजित करते हैं। ऐसी दशा में पूर्वजों की तुलना में एकता के क्षेत्र में हम कुछ कदम और आगे बढ़ सके तो इसमें असमंजस की कोई बात नहीं है। पिता जी यदि 70 वर्ष जिये और बेटा यदि 90 वर्ष जी सके तो इसमें दुख मानने की कोई बात नहीं है। सदाशयता शालीनता एकता और विवेकशीलता की दिशा में प्रगति करना मानवी प्रगति के इतिहास में एक अच्छी कड़ी और जोड़ देना ही कहा जा सकता है।

टब राष्ट्रवाद के दिन लदते जा रहे है। देशभक्ति के जुनून को अब उतना नहीं उभारा जाता जिसमें अपने ही क्षेत्र या वर्ग को सर्वोच्च ठहराया जाय अथवा विश्व विजय करके सर्वत्र अपना ही झण्डा फहराने का उन्माद उठ खड़ा हो। ऐसी पक्षपाती और आवेशग्रसित देशभक्ति तब विचारशील वर्ग में नापसन्द की जाती है और विश्व नागरिकता की वसुधैव कुटुँबकम् की बात को महत्व दिया जाता है। विश्व एकता के सिद्धाँत को मान्यता मिली है और राष्ट्रसंघ सक्रिय हुआ है। इस दिशा में प्रगति के चरण धीमे उठ रहे है। यह चिंता का प्रसंग है। अपेक्षा यही की जाती है कि संसार की व्यापक समस्याओं का समाधान विश्व एकता के बिना और किसी प्रकार संभव न हो सकेगा।

एक भाषा, एक राश्ट्र एक संस्कृति एवं एक धर्म अपनाकर ही उज्ज्वल भविष्य की विश्व शांति की स्थापना हो सकती है यह तथ्य मानवी विवेक ने स्वीकार कर लिया है और विभेद उभारने वाले तत्वों को अमान्य ठहराया जा रहा है। सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में भी ऐसी ही व्यापक एकता उत्पन्न करने के लिये वातावरण बनाना होगा। राष्ट्रवाद संप्रदायवाद की तरह सभ्यतावाद की कट्टरता भी अगले दिनों क्रमशः शिथिल होती दिखाई पड़ेगी ऐसा विश्वास मन में बढ़ता जाता है। नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के लिये ऐसे एकतावादी विवेक को जाग्रत करने की आवश्यकता है जिसमें अपने ही पक्ष को सर्वोपरि ठहराया जाने का आग्रह न हो। अपने पराये का भेदभाव न करके औचित्य न्याय तथ्य और विवेक को ही जब मान्यता दी जाएगी तो फिर उपयोगिता स्वीकार करने की मनः स्थिति बन जायेगी तब जहाँ से भी जितनी मात्रा में तथ्य दृष्टिगोचर होगा स्वीकार किया जाएगा। इसके लिये किसी को खेद मनाने की आवश्यकता न होगी कि हमारी अमुक मान्यताओं को सर्वांश में जाग्रत विवेक ने उठाकर ही अगला पैर आगे रखा जाता है। लंबी मंजिल इसी प्रकार पूरी होती है आगे बढ़ना है तो पीछे का पैर अपने स्थान पर जमे रहने का आग्रह नहीं चल सकता।

अंग्रेजी में संस्कृति का अर्थबोधक शब्द है ‘कल्चर’। इसका तात्पर्य है सभ्यता रहन सहन एवं सोचने समझने का तरीका अपने नाम रूप धन परिवार भाषा आदि की तरह ही अपने रहन सहन की पद्धति भी लोगों को प्रिय लगती है यह प्रियता बहुधा पक्षपात के रूप में बदल जाती है। यद्यपि वह लगा ऐसा है मानो सत्य अपने ही हिस्से में आया है और दूसरे सभी गलत सोचते और झूठ बोलते अन्याय मतभेदों की तरह संस्कृति संबंधी मतभेद एक है जिसके लिये बहुत बर भयंकर युद्ध होते रहे है। व्यक्तिगत जीवन में भी विद्वेष घृणा आक्रमण प्रतिरक्षा जैसी विडंबनाएं अनेक बार संस्कृति के नाम पर भी खड़ी होती रही है और उनसे मनुष्य जाति को धन जन नीति सद्भावना शांति और सुरक्षा की दृष्टि से भारी हानि उठानी पड़ी है।

ठस प्रकार जहाँ संस्कृति का मूल अस्तित्व व्यक्ति और समाज के कल्याणकारी तत्व पर आधारित है वहाँ उसके प्रति अत्युत्साह और दुराग्रह में विद्वेष के विष बीज भी कम मात्रा में भरे हुये नहीं है। योरोप में ईसाई धर्म के प्रति और एशिया में इस्लाम धर्म के प्रति अत्युत्साह के कारण जिस निष्ठुरता का स्वरूप मध्य काल में देखने को मिला उससे उन संस्कृति प्रेमियों का गौरव बढ़ा नहीं। इन संप्रदाओं की गरिमा अंतःकरण की गहराई में प्रवेश न कर सकी। यद्यपि बहुतों ने भयभीत होकर अथवा लोभ लाभ की दृष्टि से उन्हें स्वीकार अवश्य कर लिया। पर यह स्वीकृति अंतः से उद्भूत नहीं बाहर से लादी मानी सकती है।

संस्कृति शब्द को सभ्यता से पृथक रख जा सके तो अर्थ का अनर्थ होने से बचा जा सकता है। संस्कृति देश और जाति में विभाजित नहीं हो सकती। वह मानवीय है और सार्वभौम हैं दूसरे अर्थों में उसे मनुष्यता मानवी गरिमा के अनुरूप उच्चस्तरीय श्रद्धा सद्भावना कह सकते हैं इसके प्रकाश में मनुष्य परस्पर स्नेह सौजन्य के बंधनों में बेधते हैं। सहिष्णु बनते हैं एक दूसरे के निकट आने और समझाने का प्रयत्न करते विभेद की खाई पाटते हैं पर सभ्यताओं के संबंध में ऐसा नहीं कहा जा सकता वे क्षेत्रों जातियों मान्यताओं और परिस्थितियों का कलेवर ओढ़े रहने से स्पष्टतः एक दूसरे से बहुत हद तक पृथक दीखती और कितनी ही बातों में उनके बीच असाधारण मतभेद भी है।

सभ्यताएं टकराती भी है एक सभ्यता के अनुयायी दूसरे लोगों को अपने झण्डे तले लाने के लिये उचित ही नहीं अनुचित उपाय काम में लाते हैं अपनी सभ्यता को दूसरों सभ्यता के आक्रमण से बचाने के लिये लोग सुरक्षा के भारी प्रयत्न करते हैं। ऐसे उपाय सोचते हैं जिनसे परस्पर घुलने मिलने और आदान प्रदान के अवसर न आने पावें धर्मों के बीच कट्टरता इस हद तक देखी जाती है कि दूसरे धर्म के पूर्व उपचारों में सम्मिलित होने पर भी प्रतिबंध रहता है इसी प्रकार एक सभ्यता वाले अपने लोगों को दूसरी सभ्यता वाले के वेश विन्यास को अस्वीकार करते हैं। विचारों की तुलनात्मक समीक्षा करने की तो उनमें गुंजाइश ही नहीं रहती। अपना सो श्रेष्ठतम दूसरों का सो निकृष्टतम यही अहंकार बुरी तरह छाया रहता है। सभ्यतानुयायी और धर्मावलंबी कहलाने वाले व्यक्ति ही इस पक्षपात के सर्वाधिक शिकार पाये जाते हैं।

संस्कृति सौंदर्यपासना है। एक भावभरी उदात्त दृष्टि रहे। वन उपवनों नहीं तालाबों प्राणियों बादलों तारकों जैसी सामान्य वस्तुओं को जब सौंदर्य पारखी की दृष्टि से देखा जाता है। तो वे अँतरात्मा में आह्लाद उत्पन्न करती है श्रद्धा के आरोपण से पत्थर में भगवान पैदा होते हैं। साँस्कृतिक चिंतन हम इस संसार को भगवान का विराट स्वरूप और अपने कलेवर को ईश्वर के मंदिर जैसा पवित्र अनुभव कर सकते हैं। जहाँ ऐसी दृष्टि होगी वहाँ दूसरों से सद्व्यवहार करने और अपनी उत्कृष्टता बनाए रखने की ही आकाँक्षा बनी रहेगी और उसे जितना क्रियान्वित करना बन पड़ेगा उतना ही अपना और दूसरों का सच्चा हित साधन बन पड़ेगा। सुसंस्कृत दृष्टिकोण अपनाकर मनुष्य अपने देवत्व को विकसित करने और वातावरण को सुख शांति से भरापूरा बनाने में आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है।


द्वैत की समाप्ति, अद्वैत की प्राप्ति

गायत्री का एक स्वरूप जप परक है जिसके आधार पर नित्य जप अनुष्ठान पुरश्चरण आदि के विधान संपन्न किये जाते इसका दूसरा स्वरूप है अजपा अर्थात् वह जप जो बिना प्रयत्न के अनायास ही होता रहता हो योगियों का तम है कि जीवात्मा अचेतन अवस्था में अनायास ही इस जप प्रक्रिया में निरत रहता है यह अजपा गायत्री है सोऽहम् की ध्वनि जो श्वास प्रश्वास के साथ साथ स्वयमेव होती रहती है। इसी को प्रयत्नपूर्वक विधि विधान सहित किया जाय तो प्रयास हंस योग कहलाता है। गायत्री महाविद्या के अंतर्गत हंसयोग के अभ्यास का असाधारण महत्व है तंत्र सार में इसे कुण्डलिनी जागरण साधना का महत्वपूर्ण अंग बताते हुये कहा गया है विभर्ति कुण्डल षकिरात्मानं हंसयाश्रिता अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति आत्मक्षेत्र में हंसारूढ़ होकर विचरती हैं।

गायत्री महाशक्ति का वाहन हंस है। यह पक्षी विशेष न होकर हंसयोग ही समझा जाना चाहियें यो हंस पक्षी में भी स्वच्छ धवलधारा नीर क्षीर विवेक मुक्तक आहार आदि विशेषताओं की ओर इंगित करे हुये निमा्रल जीवन सत् असत् निर्धारण एवं नीतियुक्त उपलब्धियों को ही अंगीकार किया जाना जैसी उत्कृष्टताओं का प्रतीक माना गया है किंतु तात्विक दृष्टि से गायत्री का हंस वाहिनी होना उसकी प्राप्ति के लिये हंसयोग की सोऽहम् की साधना का निर्देश माना जाना ही उचित है प्रपंच तंत्र में कहा भी गया है देह देवालय है इसमें जीव रूप में शिव विराजमान है। इसकी पूजा वस्तुओं से नहीं सोऽहम् साधना से करनी चाहिए।

अंतः करण में हंस वृत्ति की स्थापना की यह साधना ही अजपा गायत्री कही जाती है। अजपा गायत्री का महत्व बताते हुये अग्निपुराण में उल्लेख है अजपा नाम गायत्री ब्रह्म विष्णु महेश्वरी। अजपा जपते यस्ताँ पुनर्जन्म न विद्यते॥

अर्थात् अजपा गायत्री ब्रह्मा विष्णु और रुद्र की शक्तियों से परिपूर्ण है। इसका जप करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता। इसी तरह शिव स्वरोदय एवं गोरक्ष संहिता में कहा गया है इसका नाम अजपा गायत्री है जो कि योगियों के लिये मोक्ष देने वाली हैं इसके संकल्प मात्र से सब पापों से छुटकारा हो जाता है इसके समान न कोई विद्या है न इसके समान कोई ज्ञान ही भूत भविष्यकाल में हो सकता है।

श्वास लेते समय सो ध्वनि का और छोड़ते समय हम ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अंतः भूमिका में अनुभव करना यही है संक्षेप में सोऽहम् साधना

वायु जब छोटे छिद्र में होकर वेगपूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है बांसुरी से स्वर लहरी निकलने का यही आधार है। नासिका छिद्र भी बांसुरी से स्वर लहरी निकलने का यही आधार है। नासिका छिद्र भी बांसुरी के छिद्रों की तरह है। उनकी सीमित परिधि में होकर जब वायु भीतर प्रवेश करेगी तो वहाँ स्वभावतः ध्वनि उत्पन्न होगी साधारण श्वास प्रश्वास के समय भी वह उत्पन्न होती है पर इतनी धीमी रहती है कि कानों के छिद्र उन्हें सरलतापूर्वक नहीं सुन सकते। प्राणयोग की साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते हैं। प्राणायाम मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी जितनी मंदगति से ली जा सके लेनी चाहिये और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे धीरे उस वा को पूरी तरह खली कर देना चाहिये गहरी और पूरी साँस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकराकर उत्पन्न होने वाला धवि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है। इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा के। कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेताना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है।

सोऽहम् साधना में चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना होता है और भावना को इस स्तर तक प्रगाढ़ करना पड़ता है कि उससे श्वास लेते समय सो शब्द के ध्वनि प्रवाह की मंद अनुभूति होने लगें उसी प्रकार श्वास छोड़ी जाती है तो यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि हम ध्वनि प्रवाह विनिसृत हो रहा हैं आरंभ में कुछ समय यह अनुभूति इतनी स्पष्ट नहीं होती किन्तु क्रम और प्रयास संयमित रूप से जारी रखने पर कुछ की समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है और उसे सुनने में न केवल चित्त एकाग्र होमता है वरन् आनंद का अनुभव भी होता हे यह प्रक्रिया सामान्य डीप ब्रींदिग प्रक्रिया से बहुत ऊंचे सोपान की है। मात्र फेफड़ों का व्यायाम नहीं है इतना स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिये। सो का तात्पर्य परमात्मा और हम का जीव चेतना समझा जाना चाहिये। निखिल। निखिल विश्व ब्रह्माँड में संव्याप्त महा प्राणचेतना नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करती है और अंग शब्द ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतारी जाती है और हम शब्द के साथ जीव भाव द्वारा इस कायकलेवर पर से अपना कब्जा छोड़कर चले जाने ईश्वर अर्पित हो जो की मान्यता प्रगाढ़ की जाती है।

प्रकारान्तर से परमात्म सत्ता का अपने शरीर और मनः क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित हो जाने की ही यह धारण है। जीवभाव अर्थात् स्वार्थवादी संकीर्णता काम क्रोध लोभ मोह भरी मद - मत्सरता अपने को शरीरी या मन के रूप में अनुभव करत रहने वाली आत्मा की दिग्भ्रान्त स्थिति का नाम ही जीव भूमिका है। इस भ्रमजाल भरे जीव भाव का हटा दिया जाय तो फिर अपना विशुद्ध अस्तित्व ईश्वर के अविनाशी अंश आत्मा के रूप में ही शेष रह जाता है। काय कलेवर के कण -कण पर परमात्मा के शासन की स्थापना और जीवधारण की बेदखली यही है। सोऽहम् साधना का तत्वज्ञान। श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से सो और हम ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जाग्रत किया जाता हे कि अपना स्वरूप ही बदल रहा है। अब शरीर और मन पर से लोभ मोह का वासना तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में

ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। यह एक उच्चस्तरीय चेतनात्मक परिवर्तन की भावी भूमिका है जो क्रमशः अनुभूति स्तर तक प्रगाढ़ होती चली जाती है और अंतःकरण यह अनुभव करने लगता हे कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देव सत्त द्वारा किया जा रहा है।

सोऽहम् साधना का प्रत्यक्ष प्रतिफल तभी दिखाई देता हे जब श्वास ग्रहण करते समय सो और निकालते समय हम की प्रबल धारण की जाय। इसके लिये प्रयत्न यह होना चाहिये कि इन शब्दों प्रारंभ में अति मंद स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। चिंतन का स्वरूप यह होना चाहिये कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ कायकलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे है। यह प्रवेश मात्र वायु का अंगों में आवागमन नहीं वरन् प्रत्येक अंग अवयव पर प्राण सत्ता का आधिपत्य बन रहा है एक एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना करनी चाहिये और अनुभव करना चाहिये कि उसमें भगवान की सत्त चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय फेफड़े पाचन तंत्र आदि में परमात्मा चेतना का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ प्रत्येक नस नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित कर लिया। पंच ज्ञानेन्द्रियों और पंच कर्मेन्द्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देशन पालन करना स्वीकार कर लिया। अंतःकरण चतुष्टय अर्थात् मन मस्तिष्क बुद्धि चित और अहंकार ने निकृष्टता अवाँछनीयता को त्याग कर उच्चस्तरीय आदर्शवादिता अपना ली नर और नारायण जैसा स्वरूप प्राप्त कर लिया।

यही हैं वे भावनायें जो शरीर और मन पर भगवान के शासन स्थापित होने के तथ्य को यथार्थ कल्पनाओं तक सीमित नहीं रह जाना चाहिये कि इस भाव परिवर्तन को क्रिया रूप में परिणत हुये बिना चैन ही न पड़े। सार्थकता उन्हीं विचारोँ की भावनाओं की हे जो क्रिया रूप में परिणत होने की प्रखरता से भरे हों। सोऽहम् साधना के पूर्वार्द्ध में अपने कायकलेवर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुये महाप्राण की परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन भाव प्रवण चिंतन करना पड़ता हे कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगे।

इस साधना का उत्तरार्द्ध कषाय कल्मषों मलीनताओं शरीर में से अवाँछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का आलस्य प्रमाद जैसी दुष्कृत्यों का मन से लोभ मोह जैसी तृष्णाओं का अंतःकरण से जीवभावी अहंता का निवारण निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनाएं अत्यन्त प्रगाढ़ होनी चाहिये। दुर्भावनाएं और दुश्चिंतन निकृष्टताएं और दुष्टताएं क्षुद्रताएं और हीनताएं सभी निरस्त से रही है सभी पलायन कर रही है यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिये। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपराँत जो हलकापन जो संतोश उल्लास स्वभावतः होता हे और निरंतर बना रहता उसकी का प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिये। तभी कहा जा सकता है कि सोऽहम् साधना का उत्तरार्द्ध भी एक तथ्य बन गया।

सोऽहम् साधना के पूर्वार्द्ध में श्वास लेते समय सो ध्वनि के साथ व्यष्टिगत आत्मसत्ता पर समष्टिगत परमात्मा चेतना का आधिपत्य स्थापित होने की स्वीकृति है तो उत्तरार्द्ध में हम को अर्थात् अपनी अहंता को विसर्जित करने का भाव है। यह अहंता ही लोभ मोह की जननी है। शरीराध्यास में जीव उसकी प्रबलता के कारण भवसागर में डूबता है। माया अज्ञान अंधकार बंधन आदि की भ्रान्तियाँ एवं विपत्तियों इस अहंता के कारण ही उत्पन्न होती है। इसे विसर्जित कर देन पर ही भगवान का अंतः क्षेत्र में प्रवेश करना निवास करना संभव होता है।

ठस छोटे से मानवी अंतःकरण में दो के निवास की गुंजाइश नहीं है। पूरी तरह एक ही रह सकता है। दोनों रहें तो लड़ते झगड़ते रहते हैं और अंतर्द्वन्द्व की खींचतान चलती रहती भगवान को बहिष्कृत करके पूरी तरह अहमन्यता को प्रबल बना लिया जाय तो मनुष्य दुष्ट दुर्बुद्धि क्रूरकर्मा असुर बनता है अपनी कामनाएं भौतिक महत्वाकाँक्षाएं ऐषणाएं समाप्त करके ईश्वरीय निर्दोषों पर चलने संकल्प ही आत्म समर्पण है। यही शरणागति है। यही ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त होते ही मनुष्य में देवत्व का उदय होता है तब ईश्वरीय अनुभूतियाँ चिंतन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता भर देती है। ऐसे ही व्यक्ति महामानव ऋषि देवता एवं अवतार के नाम से पुकारे जाते हैं सो में भगवान का शासन आत्म सत्ता पर स्थापित करने और हम में अहंता का विसर्जन करने का भाव है। प्रकारान्तर से इसे महान परिवर्तन का आँतरिक कायाकल्प का बीजारोपण कह सकते सोऽहम् साधना का यही है भावना प्रधान व्यावहारिक स्वरूप। ईश्वर जीव को मनुष्य को ऊंचा उठाना श्रेष्ठ बनाना चाहता है मनुष्य कि अपने तथा कथित पूजा पाठ के आधार पर ईश्वर को अपने इशारे पर नचाने एवं उससे उचित अनुचित मनोकामनायें पूरी कराने की पात्रता कुपात्रता परखने की न्याय निष्ठा को छोड़ देने का आग्रह करता रहता है। दोनों की दिशायें एक दूसरे के अनुकूल कैसे बने? एकत्व की सामीप्य की आशा कैसे पूर्ण हो? इस कठिनाई का समाधान सोऽहम् साधना के साथ जुड़े हुये तत्वज्ञान सन्निहित है। दोनों एक दूसरे से गुँथ जाय, परस्पर एक दूसरे में विलीन हो जाये दोनों में तादात्म्य स्थापित हो जाय तथा अंतःकरण आकाँक्षा एवं अस्तित्व को पूरी तरह समर्पित कर दे उसी के दिव्य संकेतों पर अपनी दिशा धाराओं का निर्धारण करे। इस स्थिति की प्रतिक्रिया द्वैत की समाप्ति और अद्वैत की प्राप्ति के रूप में होती है। साधक ने इष्टदेव को भक्त ने भगवान को जीव ने ब्रह्मा को समर्पण किया है। सो ब्रह्मा की सत्ता स्वभावतः समर्पणकर्ता में अवतरित हुई दृष्टिगोचर होने लगेगी। समर्पण एक पक्ष से आरंभ तो होता है पर उसकी परिणति उभयपक्षीय एकता में होती है। यही प्रेम योग का रहस्य है। यही भक्त के भगवान बनने का तत्वज्ञान है।। तुच्छता का असीम विशालता में परिणत हो जाना बूँद का समुद्र में विलीन हो जाना यही है वेदाँत प्रतिपादित अद्वैत की परमपद की प्राप्ति। शिवोऽहम् सच्चिदानंदोऽहम् तत्वमसि अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति इसी सर्वोत्कृष्ट अंतः स्थिति पर पहुंचे हुए साधक की होती हैं। ईश्वर प्राप्ति आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्मनिर्वाण आदि नामों से पूर्णता के रूप में इसे ही कहा गया है। अजपा गायत्री के हंस योग की साधना से साधक को इस लक्ष्य की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।


जब सभी कामनाएँ चुक जाएँ

महाराज अरिष्टनेमि तीसरे वय में प्रविष्ट हुए। जीवन भर उन्होंने अपने कर्तव्यों का भली प्रकार पालन किया था। बाल्यकाल में विद्यार्जन शरीर साधना आदि से लेकर अधेड़ अवस्था के पारिवारिक एवं राजनैतिक उत्तरदायित्वों एवं राजनैतिक उत्तरदायित्व के निर्वाह में उन्होंने पूरे मनोयोग से कार्य किया था। किंतु न जाने क्यों उन्हें अनुभव होने लगी थी। कर्तव्य पालन के संतोश की शीतलता के अतिरिक्त कुछ आकुलता की अनुभूति भी उन्हें होने लगी। वह कारण न समझ सके और उन्होंने अपने कुलगुरु के सम्मुख अपनी समस्या रखी।

विचारशीलता तथा क्रियाशीलता दोनों जीवन के दो महत्वपूर्ण पहलू है। सुविचार प्रेरित क्रिया कल्याणप्रद होती है जबकि केवल क्रिया अर्थ का अनर्थ भी कर डालती है। इसी प्रकार क्रिया के पूरक के रूप में विचार उपयोगी है स्तुत्य है। अन्यथा केवल विचार भ्रामक हो जाता है। कल्याण लोक सँवारने-सजाने तक ही उसकी सीमा मर्यादा सिमट जाती है। इसी कारण प्राचीन राज्य परंपरा में राजा की शक्ति तथा क्रियाशीलता विचारों के प्रकाश में अधिक उपयोगी बनाने के लिए विचारकों को भी रखा जाता था। मंत्रियों से लेकर राजगुरु तक इसी स्तर के व्यक्ति रहा करते थे।

राजा की समस्या सुनकर राजगुरु मुस्कराए बोले राजन! आपका कथन सत्य है। मनुष्य के जीवन में कई बार ऐसे अवसर आते हैं जबकि वर्तमान कर्तव्यों को भली प्रकार पूरा करते हुए भी उनके मन में हलचल और कौतूहल सा अनुभव होता है। ऐसा होना स्वाभाविक है। शरीर की बदलती हुई अवस्था के साथ जीवन के अगले चरण में प्रवेश के लिए सन्नद्ध होने के लिए आत्मा के संकेत की यह प्रतिक्रिया है।

राजा को बात भली प्रकार स्पष्ट न हो सकी। उन्होंने पूछा यह संकेत क्या है, आत्मा इन्हें स्पष्ट क्यों नहीं करती? कुलगुरु पुनः स्निग्ध हास से बोले वत्स! स्वयं के उदाहरण से ही समझने का प्रयास करें। आपके जीवन में कभी पहले भी ऐसा अनुभव हुआ था। थोड़ा भूतकाल की गइराई में उतरकर सोचें। और राजा को ध्यान आया कि किशोर अवस्था पार करने पर कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ था। तब राजगुरु ने उन्हें ब्रह्मचर्य आश्रम में अर्जित ज्ञान तथा सामर्थ्य का उपयोग लौकिक कर्तव्यों के पालन करने का निर्देश किया था। उसके बाद से अब तक उन्हें शांति व संतोश का अनुभव होता रहा।

राजा ने अपना निष्कर्ष सुनाया। पुरोहित ने साधुवाद दिया धन्य है राजन! आपने ठीक-ठीक विश्लेषण किया बस उस समय जैसे शारीरिक तथा मानसिक शक्ति विकसित होकर लौकिक कर्तव्यों में प्रवृत्त होना चाहती थी उसी प्रकार अब आत्मिक शक्तियों के विकास का समय आया है। नरश्रेष्ठ। आपको अब अंतःकरण अगली उच्चस्तरीय भूमिका में प्रवेश के संकेत दे रहा है। आपको लोकोत्तर भूमिका में प्रवेश का आत्मविकास की तपोमय साधना का नियन्त्रण मिल रहा है। वत्स! अगले सुसंस्कारों के कारण अंतःकरण के संकेत आप अनुभव कर सके है। अब इनको समझकर आचरण में लाने में विलंब न करना ही श्रेयस्कर है।

राजा अमृतोपम निर्देश पाकर तृप्त हो गए। उन्होंने अविलंब युवराज को राज्य भार सौंपने की व्यवस्था की। अपने जीवन के अनुभवों का सार समझाकर एवं उपयुक्त सलाहकारों की व्यवस्था करके उन्होंने होनहार पुत्र को राज्य व्यवस्था सौंप दी। स्वयं विधिवत् वानप्रस्थ ग्रहण कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने चले गए।

अरिष्टनेमि तपस्या में लीन थे। मन अपनी उछल-कूद करके थक गया। प्रकृति परीक्षा लेकर संतुष्ट हो गयी। मन अनुगामी बन गया-प्रकृति सहयोगिनी। राजा को आत्म शांति की शीतलता का अनुभव होने लगा। तभी एक दिन एक देव दूत उनके सामने आ उपस्थित हुआ। बोला देवराज इन्द्र ने आपको ससम्मान भेंट करने के लिए बुलाया है। देवराज इन्द्र ने बुलाया? राजा को कारण समझ में न आया। अपनी साधना को छोड़कर जाने की इच्छा भी नहीं थी। किंतु कोई प्रेम से बुलाए तो तिरस्कार भी उचित नहीं। वह शांत भाव से साथ हो लिए।

स्वर्ग के स्वामी देवराज इन्द्र ने राजा का आगे बढ़ कर स्वागत किया। प्रेम से अपने निकट बैठाया तथा चर्चा प्रारंभ की। वे बोले राजा आपकी तपस्या तथा सत्कर्मों ने आपको उच्च स्वर्ग का अधिकारी बना दिया है। आप चाहें तो उसका दीर्घकाल तक उपभोग कर सकते हैं।

मैंने तो स्वर्ग के निमित्त कोई कर्म या तप किया नहीं है, फिर उस पर मेरा अधिकार कैसे सिद्ध हुआ? राजा ने विनम्र शब्दों में शंका व्यक्त की। देवराज ने प्रशंसात्मक दृष्टि से उनकी ओर देखा और समाधान किया राजन! आपने इस निमित्त नहीं किया यह सही है, किन्तु जो किया है उससे आपको स्वर्ग लोक में उच्चतम स्थान प्राप्त हो सकता है।

अरिष्टनेमि विचार करने लगे फिर बोले देवराज! यह स्वर्ग आपके कथन के अनुसार मुझे अपनी संचित पूँजी के मूल्य पर खरीदना होगा। अस्तु कृपया स्वर्ग के विशय में मुझे अधिक जानकारी दे ताकि मैं निश्चय कर सकूँ कि वह स्वीकार करने योग्य है अथवा नहीं। इन्द्र द्वारा उत्तर देने की स्वीकृति पाकर उन्होंने प्रश्न किया “ उच्च और निम्न स्वर्ग क्या है? क्या दोनों प्रकार के स्वर्गवासियों के बीच प्रेम सद्भावना का व्यवहार रहता है? क्या स्वर्ग में अधिकांश व्यक्ति मेरी तरह के है जिन्हें स्वर्ग की प्राप्ति अनायास हुई है अथवा स्वर्ग सुख की लालसा से एकत्र हुए व्यक्ति ही वहाँ है? क्या अपने अधिकार के स्वर्ग को किसी अन्य व्यक्ति को जिसे उसकी इच्छा या आवश्यकता है, दिया जा सकता है? तथा स्वर्ग निवास की सीमा क्या है?

देवराज कुछ संकोच में पड़ गए। किंतु उत्तर देना आवश्यक था। बोले- “ राजन्! स्वर्ग के विभिन्न स्तर सुकर्मों की पूँजी से प्राप्त होते हैं। अधिकांश स्वर्गवासी स्वर्ग सुख की लालसा से आने वाले ही है। उच्च वर्ग के प्रति ईर्ष्या, हेय के प्रति तुच्छता का भाव स्वर्ग में भी है। अपने हिस्से का भोग भोगने की ही स्वतन्त्रता है उसे किसी को देने की सुविधा नहीं है। सत्कर्मों का प्रभाव समाप्त होने पर पुनः संसार चक्र में वापस लौटना अनिवार्य है।”

राजा अरिष्टनेमि का हृदय दहल गया। ऐसा स्वर्ग किस काम का? जिन साँसारिक हीन वृत्तियों से छुटकारा पाने के लिए वह प्रयत्नशील थे उन्हीं में सड़ने वाला स्वर्ग का जीवन किस बुद्धिमान को ग्राह्य होगा? यह तो जेल से भी बुरा और बदतर है। इन्द्र राजा के मनोभाव पढ़ रहे थे। उन्हें लग रहा था कि पृथ्वी के इस राजा के सामने इन्द्रासन हेय सिद्ध हो रहा है। किंतु कुछ कहने की स्थिति में अपने आपको वह नहीं पा रहे थे तब तक राजा बोले-” देवराज! मैं आपके स्नेह का आभारी हूँ। आपका स्वर्ग उन्हें प्राप्त हो जो उसके लिए प्रयास करते हैं। मुझे तो उसी गंधमादन पर्वत पर भेजने की कृपा करें। वहाँ के शांत वातावरण में साधना की शीतलता से आत्मा तृप्त होती है।

इन्द्र ने उठकर राजा को हृदय से लगा लिया। बोले “राजन! आपके आगमन से मेरा स्थान पवित्र हो गया। आपने मानव शरीर की वह गरिमा जान ली है जिसके कारण स्वर्ग के देवता भी नर देह धारण करने के लिए आतुर रहते हैं। आप वस्तुतः तत्त्वज्ञान के अधिकारी है तथा इस दिशा में आपका सहयोग करके हम भी कृतकृत्य होंगे।”

इन्द्र ने राजा अरिष्टनेमि को महर्षि बाल्मीकि के पास भेज दिया। उनके मार्गदर्शन एवं अनुभव से राजा को शीघ्र ही अभीष्ट लक्ष्य की उच्चस्तरीय आत्म ज्ञान की प्राप्ति हो गई। प्रलोभनों को चीरते हुए महाराज अरिष्टनेमि संसार की विकृतियों से मुक्त रहकर मानव देह की सार्थकता का महत्व जान सके। तब जब वह सब कुछ छोड़ कर भी और अधिक की कामनाओं से मुक्ति पाकर इसी जीवन में बंधनमुक्ति का महत्व समझ सके। काश ! हर कोई साधक इस मर्म को जान ले तो यह संसार धर्मपरायण नैष्ठिक साधकों से भरा-पूरा दिखाई देने लगे।


दूसरों पर निर्भर रहने में खतरा है (Kahani)

एक खरगोश बहुत भला था। उसने बहुत से जानवरों से मित्रता की और आशा की कि वक्त पड़ने पर मेरे काम आवेंगे। एक दिन शिकारी कुत्तों ने उसका पीछा किया। वह दौड़ा हुआ गाय के पास पहुँचा और कहा-आप हमारी मित्र है, कृपा कर अपने पैने सींगों से इन कुत्तों को मार दीजिए। गाय ने उपेक्षा से कहा-मेरा घर जाने का समय हो गया। बच्चे इन्तजार कर रहे होंगे, अब मैं ठहर नहीं सकती। तब वह घोड़े के पास पहुँचा और कहा-मित्र घोड़े! मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर इन कुत्तों से बचा लो। घोड़े ने कहा-मैं बैठना भूल गया हूँ, तुम मेरी ऊँची पीठ चढ़ कैसे पाओगे? अब वह गधे के पास पहुँचा और कहा-भाई, मैं मुसीबत में हूँ, तुम दुलत्ती झाड़ने में प्रसिद्ध हो, इन कुत्तों को लाते मारकर भगा दो। गधे ने कहा घर पहुँचने में देरी हो जाने से मेरा मालिक मुझे मारेगा। अब तो घर जा रहा हूँ। यह काम किसी फुरसत के वक्त करा लेना। अब वह बकरी के पास पहुँचा और उससे भी वही प्रार्थना की। बकरी ने कहा जल्दी भाग यहाँ से, मैं भी मुसीबत में फँस जाऊँगी। तब खरगोश ने समझा कि दूसरों का आसरा तकने से नहीं, अपने बल-बूते से ही अपनी मुसीबत पार होती है, तब वह पूरी तेजी से दौड़ा और एक धनी झाड़ी में छिपकर अपने प्राण बचाए।

अक्सर झूठे मित्र कुसमय आने पर साथ छोड़ बैठते हैं। दूसरों पर निर्भर रहने में खतरा है। अपने बलबूते ही अपनी समस्याओं का सामना किया जाना चाहिए।


अब बारी देवत्व के विकास की है

सभी धर्म-पुराणों में सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय एवं उस पर निवास करने वाले मनुष्य सहित समस्त जीवधारियों तथा वृक्ष-वनस्पतियों के बारे में सुविस्तृत वर्णन मिलता है। इस संबंध में वैज्ञानिकों की भिन्न-भिन्न प्रकार की विचार धाराएँ देखने को मिलती है विशेष कर मनुष्य के विकास के बारे में। चार्ल्स डार्विन ने तो इस विकास प्रक्रिया को प्रकृति के चुनाव का एक सहज क्रम बताया और मनुष्य को बंदर की औलाद ठहराने का प्रयत्न किया है। आधुनिक जैविकी मान्यताओं जीवधारियों को फाइला, क्लासेज, आर्डर्स, फेमिलीज, जेनेरा और स्पेसीज में वर्गीकृत किया गया है। इन सबका अस्तित्व वंशानुक्रम और संघर्ष के कारण दृष्टिगोचर होता है। विकासवाद के आरोह की यही प्रक्रिया है जो छोटे से प्रोटोप्लाज्मिक इकाई अमीबा से लेकर विशालकाय स्तनधारियों पर समान रूप से लागू होती है। लेकिन अब इस प्रकार की परंपरागत रूढ़िवादी मान्यताओं सिद्धान्तों को महत्वहीन समझा जाने लगा है। आरोह और अवरोह जैसी प्रगतिशील मान्यताओं पर नये सिरे से विचार किया जा रहा है। मानवी आकांक्षाओं एवं प्रयास-पुरुषार्थ को आरोह और दैवीय सत्ता की अनुकंपा को अवरोह की संज्ञा दी गयी है और चेतनात्मक विकास के लिए इसे ही निमित्त कारण माना गया है।

प्रख्यात यूनानी हेराक्लिट्स ने कहा है कि सृष्टि का निर्माण किसी देवता या मनुष्य ने नहीं किया, वह तो शाश्वत रूप से प्राणवान अग्नि थी, है और रहेगी जो नियमित रूप से जलती व बुझती रहती है अर्थात् दृश्य या अदृश्य होती रहती है। बाइबिल में कहा गया है कि ईश्वर की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता। दार्शनिक हेगेल के मतानुसार यह संसार मनुष्य के बाहर स्थित किसी वस्तुगत चेतना द्वारा निर्मित है। ज्योतिष विज्ञानी सर फ्रेड हायल का कहना है कि जीवन का बीज सर्वप्रथम धरती पर अन्य ग्रहों की चेतना से अवतरित हुआ है। मांडूक्योपनिषद् में चेतना के प्रथम स्तर को वैश्वानर के नाम से संबोधित किया गया है और कहा गया है कि आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा इसे विकसित करके नर से नारायण स्तर तक पहुँचकर आरोह की स्थिति में आती है और दैवी चेतना से संबद्ध हो जाने पर प्राणि मात्र के लिए कल्याणकारी अनुदानों को बखेरती है।

इस संदर्भ में पिछले दिनों अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय में विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें सृष्टि एवं जीवन की उत्पत्ति तथा विकास पर गंभीरतापूर्वक विचार मंथन किया गया। निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि धरती पर जीवन करोड़ों वर्ष पूर्व समुद्र में रासायनिक प्रक्रिया द्वारा हुआ है। इसमें आद्य तत्व अमीनो एसिड थे जो रासायनिक प्रक्रिया द्वारा जीवित प्रोटीन अणु में परिवर्तित हुए और उपापचय का गुण प्राप्त किया, जो जीवन की एक मौलिक विशेषता है। आरंभ में यह प्रोटीन तथा अन्य जटिल जैव यौगिक अजैव लवणों से मिलकर विशेष बूँद कलल जैसे यौगिक-कोये सेवेन्ट बने। इनमें जातीय पर्यावरण के साथ उपापचयात्मक आदान-प्रदान तथा अन्य जैव द्रव्यों को आत्मसात् करने की क्षमता थी। इसके बाद अधिक स्थिर कोये जटिल बहु आणविक प्रोटीन बने। अनुकूल पर्यावरण में पहुँच कर और उसके साथ उपापचयात्मक आदान-प्रदान स्थापित कर यही प्रोटीन जैवकाय बन गया। उनके अनुसार धरती जैसा जीवन विश्व ब्रह्मांड में अन्यत्र भी हो सकता है। प्रमाण प्रस्तुत करते हुए इस निष्कर्ष में कहा गया है कि उसका पिण्डों में भी अमीनो एसिड पाये गये है जो बताते हैं कि पृथ्वी पर जीवन अन्य ग्रहों की देन है।

विकासवादियों का कहना है कि आज से कोई दो ढाई सौ करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर होने वाली रासायनिक और भौतिक क्रियाओं के फलस्वरूप भौतिक तत्व से जीवत्व स्वयं ही अस्तित्व में आ गया था। प्रारंभ में जीवन की उत्पत्ति समुद्र के छिछले जल के धूप के संपर्क से लसलसी झिल्ली के समान लगने वाले प्राणियों के रूप में हुई। कालान्तर में परिस्थितियों में परिवर्तन होने के कारण उसकी शरीर संरचना सरल से जटिलतम होती चली गयी जिससे विभिन्न प्रकार के प्राणी अस्तित्व में आये। जीव विकास के इस सिद्धाँत का प्रतिपादन सर्व प्रथम फ्राँस के प्राणि विज्ञानी लेमार्क, इंग्लैण्ड के चार्ल्स डार्विन तथा अल्फ्रेड वालेस आदि ने किया। बाद में आँगस्टन वीजमान, ह्यगो द ब्रीज तथा सिम्पसन जैसे विख्यात वैज्ञानिकों ने इसमें कुछ संशोधन किया।

अनुसंधानकर्ता जीव विज्ञानियों ने जीवन के विकास को कई युगों में विभाजित किया है। प्रथम युग को उनने आर्कियोजोइक एज या प्रजीव युग कहा है जिसमें ऐसे सूक्ष्म जीव उद्भूत हुए जिनका अस्तित्व मात्र अनुमान पर आधारित है। इसके बाद प्रोटेरो जोइक एज या प्रारंभिक जीव युग आता है जिसमें लसलसी झिल्ली और कई के सदृश प्राणी और वनस्पतियाँ अस्तित्व में आयी। यह युग 120 करोड़ वर्ष पूर्व से 55 करोड़ वर्ष पूर्व तक चला। तीसरा युग “ पेलियोजोइक एज” अर्थात् प्राचीन जीवयुग कहलाता है जिसका उत्तरार्द्ध प्राइमरी पीरियड तथा पूर्वार्द्ध सेकेन्डरी पीरियड या मेसोजोइक एज के नाम से जाना जाता है।

प्राइमरी पीरियड-प्राथमिक युग में ही प्रथम रीढ़ की हड्डी वाले जीवों का प्रादुर्भाव हुआ। इस काल में पहले विशालकाय जल बिच्छू और बाद में मछलियाँ उत्पन्न हुई। कलप भी कहा जाता है। मत्स्य युग के अंत में उभयचर प्राणी जैसे मेढ़क, केकड़े आदि उत्पन्न हुए। सेकेन्डरी पीरियड में पृथ्वी की जलवायु में अनेकानेक परिवर्तन हुए, फलस्वरूप नये प्राणियों का विकास हुआ। इनमें डायनोसौर जैसे भीमकाय महा सरीसृपों का बाहुल्य था, अतः इसे सरीसृप कल्प भी कहते हैं। यह समय अब से लगभग छः करोड़ वर्ष पूर्व तक चला।

जीव विकास के इतिहास में इसके बाद का युग “ केनोजोइक एज” या नवजीवन युग कहलाता है, जो अभी तक चल रहा है। इस काल में पृथ्वी विविध प्रकार के प्राणियों और पेड़-पौधों से भर गयी।इन जीवधारियों में पक्षी और स्तनधारी प्रमुख है। नृवंशवेत्ताओं के अनुसार इन्हीं स्तनपायी प्राणियों के विकास की अगली कड़ी नर वानर थे जिनके परिष्कार के द्वारा मनुष्य जाति का आविर्भाव हुआ। इस शृंखला में सर्वप्रथम मानव सम प्राणी “ होमिनिड” अस्तित्व में आये जिनसे कालान्तर में पूर्ण मानव जिन्हें विज्ञान की भाषा में होमोसेपियंस कहा जाता है, की उत्पत्ति हुई।

कुछ विकासवादियों का मानना है कि मनुष्य का विकास बन्दर से नहीं, वरन् किसी ऐसे “ एर्न्थोपाएड” से हुआ है जो गोरिल्ला, चिंपांजी और ओरंग उटान से मिलता जुलता होने पर भी उससे भिन्न था। यह प्राणी सीधा खड़ा होकर चलता था और भूमि पर रहता था तथा पेड़ों पर आसानी से चढ़ लेता था। इसकी खोपड़ी कुछ गुम्बदाकार और नाक का अग भाग चपटा था और मस्तिष्क बन्दरों की अपेक्षा बड़ा एवं विकसित था। परंतु मनुष्य का वह पूर्वज कौन था और सर्व प्रथम कहाँ पैदा हुआ? यह सभी तथ्य अभी अज्ञात ही बने हुए है। वैज्ञानिकों ने इसे ‘ मिसिंगलिंक’ अर्थात् लुप्त कड़ी कह कर संतोश कर लिया है।

संत विनोबा के अनुसार यह सृष्टि तो अनादि कही गई है, किंतु जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, उसे दो ढाई सौ करोड़ वर्ग पूर्व अस्तित्व में हो गये है। ऐसा पौराणिक ऋषियों और आधुनिक वैज्ञानिकों का गत है। अनुसंधानकर्ताओं ने भी रेडियो सक्रिय अधिविश्ट पद्धति द्वारा पृथ्वी की आयु चार अरब वर्ष से कम (3.3 अरब वर्ष) आँकी है। प्राणि विज्ञानियों ने अन्य इस तथ्य का भी रहस्योद्घाटन किया है कि विकास क्रम में मनुष्य गर्भ में मछली, मेढ़क, साँप और पक्षी के आकार से क्रमशः विकसित होकर मानव अवस्था तक पहुँचता है। इससे प्रमाणित होता है कि मनुष्य भी इन योनियों से कभी सम्बद्ध रहा है। चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद सुरदुर्लभ मानव जीवन की उपलब्धि होती है, भ्रूणीय विकास सम्बन्धी यह प्रमाण इस दार्शनिक तथ्य की पुष्टि करते हैं।

सुविख्यात प्राणि विज्ञानी डॉ. जी.बी.एस. हाल्डेन ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि भ्रूण अवस्था में जीव एक समान होते हैं और वयस्क मनुष्य का पूरा रूप-आकार वहीं पर निर्धारित होता है जिसका बाद में विकास भर होता है। तुलनात्मक भ्रूण विज्ञान से भी इस तथ्य की पुष्टि हो जाती है। कि परस्पर संबंधित प्राणियों के विकास की प्रारंभिक प्रक्रिया प्रायः एक जैसी होती है। अनेक जीवधारी वयस्क होने पर एक दूसरे से नहीं मिलते, किंतु भ्रूणावस्था में वे भी परस्पर मिलते हैं। मनुष्य भी गर्भावस्था में एक कोषीय से विभाजित होकर क्रमशः मत्स्य, मेढ़क, सर्प और पक्षी के आकार का होकर स्तनधारियों की अवस्था में आता है, जो इस बात को प्रमाणित करते हैं, कि मनुष्य की उत्पत्ति एक कोषीय अमीबा जैसे प्राणी से हुई है, भले ही लाखों योनियों को पार कर यहाँ तक पहुँचने में उसे करोड़ों वर्ष का समय लगा हो। फ्राँस के सुप्रसिद्ध दार्शनिक रोबिने ने भी इसी प्रकार का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए भारतीय संस्कृति की मान्यताओं की पुष्टि की है कि चौरासी लाख योनियों से गुजरने के बाद मानव जन्म मिलता है।

ख्यातिलब्ध प्राणि शास्त्री हाल्डेन ने विकास प्रक्रिया को भारतीय धर्म-संस्कृति में वर्णित ईश्वरीय अवतारों से सुसंबद्ध कर समझाया है। उनके अनुसार लगभग 35 करोड़ वर्ष पूर्व रीढ़ वाले प्राणियों का इस पृथ्वी पर आधिपत्य रहा, जिन्हें मत्स्यावतार कहा जा सकता है। इसके बाद करीब 25 करोड़ वर्ष पूर्व उनका स्थान जमीन पर चलने वाले जीवों ने ले लिया, जिनकी तुलना कच्छपावतार से की जा सकती है। छः करोड़ वर्ष पहले पाये जाने वाले स्तनधारी चौपाये वाराह अवतार से मिलते-जुलते थे। पूर्ववर्ती श्रेणी के प्राणियों से वे बहुत अधिक विकसित थे। डेढ़ करोड़ वर्ष पूर्व उनमें मानवों के कुछ गुण विकसित हो गये थे और वे नरसिंह अवतार के करीब थे। दस लाख वर्ष पूर्व ही इनमें परिवर्तन आया और वे सीधे खड़े रहने वाले बौनों की शकल में रूपांतरित हो गये, जिन्हें वामन अवतार के समतुल्य माना जा सकता है। यद्यपि यह जाति पूर्णतया मनुष्य जाति नहीं थी, किंतु बंदर की तुलना में मनुष्य से बहुत कुछ मिलती जुलती थी। रीढ़ धारी प्राणियों में यह सबसे अधिक विकसित जाति थी। अपने इस कथन की पुष्टि उनने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अब तक पाये गये जीवधारियों के विविध फासिल्स जीवष्यों के आधार पर की है।

हिन्दू धर्म में 24 अवतारों का वर्णन है जिनमें दस प्रमुख है। वस्तुतः ये मानवी विकास क्रम के दृष्टांत है जिनमें क्रमशः चेतनात्मक उत्कर्ष होता चला गया। इनमें आरोह और अवरोह दोनों का सम्मिश्रित स्वरूप स्पष्ट देखा जा सकता है। मत्स्यावतार पृथ्वी और पानी के मध्य निवास कर रहे जल स्थलचरों में हुआ। इस समय इन्हीं प्राणियों का बाहुल्य रहा होगा। नृसिंह भूमि का हे जो मनुष्य और पशु के बीच संबंधों को दर्शाता है। वामन अवतार छोटे और अविकसित लोगों को ऊँचा उठाने के लिये था राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतारों को राजसिक, सात्विक और निष्कलंकता का प्रतीक माना जाता है। यह सभी चेतना के उत्तरोत्तर विकास के प्रतीक है योगीराज व अरविन्द ने इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि मनुष्य जीव चेतना से ऊपर उठकर अर्थ देवता बन चुका है और अब आगे पूर्ण देवत्व की ओर अग्रसर है। बौद्धिक विकास के बाद अब आत्मिक प्रगति का युग आ रहा है। उस अब विकासवादी अपंगों की बैसाखी अथवा मनोवैज्ञानिक सहारे की आवश्यकता नहीं वरन् व्यक्तिगत चेतना को समष्टिगत चेतना के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। सामान्य स्तर के व्यक्ति को अति मानसिक स्तर तक ऊँचे उठने की सामर्थ्य चेतना के अवरोहण से ही संभव है।


अपने समय की सबसे बड़ी आवश्यकता – नारी जागरण

लम्बे समय तक अवगति की स्थिति में रहते-रहते मनुष्य का मनोबल टूट जाता है। कालान्तर तक चलने वाली हेय स्थिति भी स्वभाव का अंग बन जाती है और फिर वह उसी को नियति मान बैठती है। उसे बदलने और छुटकारा पाने की भी चेष्टा नहीं की जाती पिछड़ेपन के गर्त में गिरे हुए असंख्यों की मनोदशा ऐसी ही होती है। प्रतिकूल परिस्थितियाँ तो पिछले लोगों को सताती ही हैं। पर साथ ही यह क्रम भी चलता रहता है कि गई गुजारी स्थिति में रहते-रहते मनःस्थिति अंततः दुर्बल हो जाती है। ऐसी दशा में प्रस्तुत परिस्थितियों में परिवर्तन करने की बात है कहाँ से सोची जाय? सुधार करने जैसी उत्कंठा भी नहीं उठती।

पिछड़े समुदाय के इर्द−गिर्द फैला हुआ समुदाय और वातावरण भी ऐसा बन जाता है जो प्रचलन को ही परंपरा मानने का पूर्वाग्रह की बात उसे परंपरा तोड़ने या निर्धारण करने वाले पूर्वजों का अपमान जैसी दिखती है। प्रगतिशीलता के प्रयासों का समर्थन करना तो दूर, उलटा उसमें यथा संभव अड़ंगे को अटकाने की प्रक्रिया होती रहती है। परिवर्तनों का विरोधी असहयोग ही करता देखा जाता है भले ही वह बात करता देखा जाता है भले ही वह बात कितनी ही उपयोगी आवश्यक ही क्यों न हाँ? मूढ़मति का जहाँ दुराग्रह अड़ जाय वहाँ तर्क, तथ्य और सुझाव समाधान प्रायः ही हो जाते हैं। संसार के पिछड़े समुदाय में नारी वर्ग ही सबसे अधिक विचारशील स्थिति में है। जनसंख्या की दृष्टि से आधी होते हुए भी उसे दूसरे दर्जे का नागरिक होकर रहना पड़ता है। पशु पालक अपने जानवरों को रस्सी में जकड़ कर रखता है। नारी के संबंध में इतनी उदारता बरती गयी है कि उसे बाँधने के लिए जंजीरों की आवश्यकता नहीं समझी गई। उसे वातावरण की दृष्टि से मानसिकता की जकड़न ने इस स्तर का बना दिया गया है कि वह अपने सुधार परिवर्तन के लिए कुछ सोचते या करने तक को स्वेच्छापूर्वक तैयार तक नहीं होती। इसके लिए उसे बाहरी सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी। पक्षाघात पीड़ितों को, पोलियो ग्रस्तों को भी सहारा देकर ही उठाना चलाना पड़ता है।

भूतकालीन इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो प्रतीत होता है कि उसका अतीत बहुत ही शानदार रहा है। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं रहा है जिसमें अवसर मिलते ही उसने अपनी प्रखर प्रतिभा का परिचय न दिया हो। उपलब्ध इतिहास की पुस्तकों में प्रायः राजा सामंतोधनाध्यक्षों का ही उल्लेख प्रधान रूप से मिलता है। आधी जन संख्या में से किसी ने कुछ महान प्रयोजन संपन्न किये है इसकी चर्चा तो इसलिए भुला दी गयी कि वैसा करने में नारी को भी नर की तुलना में समान होकर बैठने का अवसर मिलता और पुरुष की वरिष्ठता का पलड़ा उतना ऊँचा न रहता। पर यदि निष्पक्ष रूप से अनीति का दर्प क्षीण किया जाय तो प्रतीत होता है कि समाज की सर्वतोमुखी प्रगति में नारी का योगदान किसी भी दृष्टि से हलका नहीं रहा। शौर्य पराक्रम, बुद्धिमत्ता, नीतिमत्ता, सुव्यवस्था, साहित्य, संगीत कला जैसे क्षेत्र में उसकी कृतियाँ ऐसी ही है। जिन्हें नर के समतुल्य स्वीकार किया जा सके।

प्रकृति ने नारी को एक विशेष श्रेय, दायित्व एवं गौरव प्रदान किया है। वह है उसकी प्रजनन क्षमता। मातृत्व वंश का अस्तित्व बनाये रहने की गरिमा। यदि इस क्षेत्र में भी वह पुरुष जैसी स्थिति में ही रहती तो निश्चय है कि मानवी सत्ता का पूरी तरह लोप आज से बहुत पहले हो गया होता। अब भी यदि किसी कारण नारी विद्रोह पर उतर आये और इस जोखिम भरे असह्य कष्टों को सहने से इनकार कर दे तो फिर एक शताब्दी से भी कम में इस धरती पर मनुष्य नाम से जाना जाने वाला जीव कहीं ढूँढ़े भी नहीं मिलेगा। लगभग मनुष्य के लिए तो महाप्रलय जैसी स्थिति पैदा हो जायेगी। भले ही अन्य जीवधारी इस पृथ्वी पर किसी रूप में अपना अस्तित्व बनाये रहें।

प्रजनन की अवधि में प्रायः नारी का स्वास्थ्य शारीरिक दृष्टि से कम जरूर होता है। असह्य कष्टकारक स्थिति में होकर गुजरने के कारण का गर्भ धारण और प्रसव वेदना के कष्ट में से गुजरने के अवसर नया जन्म धारण करने जैसा अवसर बाद में दूध के रूप में अपना रक्त पिलाते रहने का असाधारण अनुदान यह सब मिल कर इतना भारी हो जाता है कि उसे नारी की सहनशीलता और धीरज धारण कर सकने की मनःस्थिति ही किसी प्रकार पार लगाती है। फिर यदि जल्दी-जल्दी कई बच्चे पैदा करने पड़े तो समझना चाहिए कि पति की कामुकता शांत करने और उसकी वंश चलने की इच्छा के नाम पर उसने जीवन के महत्वपूर्ण भाग का बलिदान ही कर दिया। जिस रूप लावण्य की लोग प्रशंसा करते-करते नहीं थकते थे वह दो बच्चों की माँ होने के बाद ही न जाने कहाँ चला जाता है और जवानी में बुढ़ापे और रुग्णता की स्थिति आये दिन सताती रहती है। प्रेम प्रसंग की बढ़-चढ़ कर दुहाई देने वाले भी उपेक्षा करने और मुँह मोड़ने लगते हैं। यह सब नारी की उदार स्वीकृति से ही संभव हो पाता है। यदि वह विरोध या असहयोग पर उतर आये तो उस हानि को उठाने की कोई आवश्यकता ही न पड़े जिसके कारण वह जर्जर हो जाती है और जन्मजात उपलब्धियों का एक बड़ा अंश कौड़ी मोल गँवा देती है।

आश्चर्य इस बात का है कि इतने बड़े त्याग के बदले उसे जो सम्मान मिलना चाहिए वह तो दूर उलटा यह समझ लिया गया कि वह तो मात्र दूसरों की तरह जीवित रहने के लिए पैदा हुई है। घर की चहार दीवारी में पिंजड़े में बंद पक्षी की तरह बंद रहना ही उसकी नियति है। उसके लिए उपयुक्त एवं पर्याप्त काम रसोईदारिन, चौकीदारिन, भंगिन एवं सफाई कार्य आदि के स्तर का ही है। यह भी स्वेच्छा सहयोग के रूप में नहीं, बाधित रूप में करने के लिए विवशता लाचारी होने के कारण। उसे कोल्हू में जीवन भर खपते रहना पड़ता है जिससे छुटकारा मृत्यु से पूर्व ही हो पाता है। कवि शास्त्रकार तथा विधि नियति की बातें करने वाले सबल पक्ष की दुविधाओं का समर्थन करने में ही अपना लाभ सोचते रहते हैं। दुर्बल या पीड़ितों का पक्ष लेने में उन्हें धाय ही घाटा दीखता है। शास्त्रों में पतिव्रत का आकाश पाताल जैसा महत्व बताता गया है। पर पत्नी व्रत की चर्चा बिना किसी अनिवार्यता के की गई है। नर के लिए ऐसा कुछ करना उन्हें जरूरी भी नहीं जान पड़ा। घूँघट स्त्रियों को शील की रक्षा की दृष्टि से निकालना चाहिए। पर पुरुष को उस अनुबंध में छूट दी गई है।

यद्यपि अमर्यादित व्यवहार करने में वही अग्रणी देखा जाता है। कभी विधवाओं को मृत पति के साथ सती होना पड़ता था। पर उन दिनों ठीक उसी का अनुकरण किसी पति ने अपनी स्त्री के मरने पर किया हो ऐसा सुनाई नहीं पड़ता विधुर होने पर पति कई बार विवाह कर सकता है पर विधवाओं के लिए वैसी छूट कहाँ?

शिक्षा और स्वावलंबन की दिशा में नारी को बढ़ सकने की सुविधा ही नहीं मिली। स्कूलों में बड़ी आय होने से पहले ही उन्हें रोक दिया जाता है। अल्प शिक्षित और आजीविका उपार्जन क्षेत्र में पिछड़ी, जन संपर्क के अभाव में सर्वथा अनुभवहीन परिस्थिति में यदि नारी को अबला, असहाय और अपंग जैसी स्थिति में रहना पड़ा तो इसमें आश्चर्य ही क्या? इतनी अड़चनों के रहते यदि नारी वर्ग में से कुछ प्रतिभाएँ उभर कर आगे आ सके तो इसे एक आश्चर्य ही कहना चाहिए।

प्रकृति ने नर की तुलना में नारी को कहीं अधिक वरिष्ठ और विशिष्ट बनाया है। उसका रूप-लावण्य, सुगठन तथा स्वर अपेक्षाकृत कहीं अधिक आकर्षण और प्रशंसनीय है। शरीर संरचना की दृष्टि से उसमें जीवनी शक्ति और सहनशीलता का अनुपात सारे वैज्ञानिक कथनों के अनुसार नर से कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ा है। संतुलन बनाये रहने में उसकी स्थिति कहीं अच्छी है। नर तनिक भी प्रतिकूलता आने पर घबराता, संतुलन खोता, आवेशग्रस्त होता देखा गया है। पर नारी उसकी तुलना में कहीं अधिक धैर्य और साहस का परिचय देती देखी गयी है। ताल-मोल बिठा सकने में बढ़ाने और विद्वेष घटाने में कहीं अधिक सफल रहती देखी गयी है। प्रतिकूलता के बीच भी जितने कौशल से समय गुजार लेती है वैसे करते नर को कभी-कभी ही देखा जाता है। झगड़ा खड़ा करने वालो, आत्महत्या करने वालों में पुरुषों का ही अनुपात अधिक रहता है। नशेबाजी जैसे दुर्गुण प्रायः उन्हीं के हिस्से में आये देखे जाते हैं। स्त्रियों में तो ऐसी कुटेवें कदाचित ही कहीं देखी जाती है।

इक्कीसवीं सदी के आने तक अब पाश्चात्य देशों के समृद्ध समुदायों में नारी के बंधन ढीले करने की समझदारी जगी है। विकृत रूढ़ियों और प्रतिगामिताओं से हाथ खींचा गया है और सोचा गया है कि नारी की प्रगति को अवरुद्ध करने का जो सिलसिला चल रहा है उसमें सुधार लाने की आवश्यकता है। इससे न केवल अनीति का परिमार्जन और नीति का मानवोचित समर्थन होगा, भौतिक प्रगति की दृष्टि से भी देश और समाज को अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा। समझ के परिपक्व होते चलने पर नर और नारी का स्तर समान समझा जाने लगा तथा लड़कियों को भी लड़कों की तरह समुचित स्थान प्राप्त करने के अग्रसर मिले सरकारी नौकरियों में उन्हें पुरुषों की तरह ऊँचे पद सँभाल सकने की सुविधा मिली। विवाह को लड़की-लड़कों की इच्छा पर छोड़ दिया गया है। दोनों में से किनकी आयु अधिक या कम होनी चाहिए इसका कोई प्रतिबंध न रहा। फिर विवाह होने पर प्रजनन का दायित्व उठाना, न उठाना भी ऐच्छिक विचार बनकर रह गया। व्यवसाय क्षेत्र में प्रवेश की सुविधा दोनों ही वर्ग को समान रूप से प्राप्त है। इस स्तर का परिणाम यह हुआ कि सभी विकसित देश अपने क्षेत्र की आधी जनशक्ति की योग्यता का समुचित लाभ उठाने लगे है और उस समन्वित लाभ के फलस्वरूप अपने सर्वतोमुखी प्रगति में चार चाँद लगाते चले जा रहे है।

प्रतिगामिता की विडंबना के बीच जीने वाली पिछड़े समुदायों की नारियाँ कूप-मंडूक की तरह एक समुचित दायरे में कैदी की जिंदगी जीती है। उन्हें न तो समुचित शिक्षा मिल पाती है और न ऐसी योग्यता का सुयोग बनता है जिसके सहारे वे अपने अधिक कौशल का परिचय दे सकें और अधिक सक्षम और अधिक सुयोग्य बन सकें। योग्यता के अनुरूप अपनी क्षमता का समुचित मूल्य उपार्जित करके परिवार के लिए अधिक सहायक सिद्ध हो सकें। यह अयोग्यता भी एक प्रकार से पक्षाघात पीड़ितों जैसी स्थिति है। उन्हें पुरुषों की कमाई पर ही निर्भर रहना पड़ता है। कमाने वाला अधिक अहंकार की पूर्ति कर सकता है और अधिक मनमानी भी। ऐसी दशा में पिछड़ी महिलाएँ कमाऊ पुरुषों की इच्छा पर जीवित रहती और उसके गले में बँधे पत्थर की तरह लटकती रहती है।

इसके ठीक विपरीत उन देशों की स्थिति है जिन्हें मानवोचित अधिकार प्राप्त करने में लड़ झगड़ कर या उदार संवेदना को उत्तेजित करके समानता की स्थिति में रहने की सुविधा मिल गई है। यही कारण है उन देशों की महिलाएँ चिकित्सा, विज्ञान समाज-कल्याण के क्षेत्र में तो पूरी तरह जिम्मेदारियाँ सँभाल रही है। इसके अतिरिक्त व्यवसाय, सेना, राजनीति जैसे जटिल समझे जाने वाले क्षेत्रों में भी उनकी स्थिति पहले की तुलना में अनेकों गुनी अच्छी हो गयी है। राजनीति पर पुरुषों का एकाधिकार था। पर वहाँ अब वैसा नहीं रहा। उनकी कूटनीतिक कुशलता भी मूर्धन्य स्तर तक पहुँच चुकी है। वे अनेक देशों में प्रधान मंत्री है तथा मंत्रिमंडल के अति महत्वपूर्ण विभागों को सफलतापूर्वक संचालित कर रही है। उदाहरण के रूप में तुर्की, आयरलैण्ड, बंगलादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, फिलीपीन्स को देखा जा सकता है। तुर्की तो प्रतिगामी धार्मिक कट्टरता के दहशत भरे साये में रहने वाले मुस्लिम राष्ट्रों से घिरा मुस्लिम बहुल देश है किंतु प्रगति की सीढ़ियाँ कूदते-फाँदते वह कहीं से कहीं जा पहुँचा है। इसके विपरीत पाकिस्तान व बंगला देश में नारी नेतृत्व के होते हुए भी कठमुल्लापन तथा पिछड़ापन अधिक है। श्रीलंका में तो अभी-अभी एक ही परिवार बंडार नायके खानदान की दूसरी पीढ़ी की श्रीमती चन्द्रिका ने प्रधान मंत्री का पद सँभाला है।

इतने पर भी नर नारी एक समान माने जाने का लक्ष्य प्राप्त करने में अभी देर है। एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व आदि देशों की समुद्र के मध्य बसे हुए छोटे जंजीरों ही गई गुजरी है जैसे कि मध्यकाल के सामंती आतंकवाद के बीच बनकर रह रही थी। इन दिनों में पुरुषों तक की शिक्षा नगण्य है फिर नारियों का नंबर कैसे आये? जहाँ सुव्यवस्थित उद्योग धंधे हों ही नहीं, वहाँ नारी ही नहीं नर को भी अध-भूखे, अध-नंगे रहकर गुजर करनी पड़ती है। सभ्यता का श्रीगणेश सुसंस्कृत विचार और वातावरण पर निर्भर करता है। वैसा सुयोग न बने तो वनमानुषों जैसा अनगढ़ जीवन जीना पड़ता है। ऐसी स्थिति में अनीति बरतने तथा अनीति सहने के लिए ही उन्हें बाधित रहना पड़ता है। प्रगति की महत्वाकाँक्षा ही न उठे तो विकास सुधार का तारतम्य ही कैसे बने यह स्थिति प्रायः आधे से अधिक जन-समुदाय की है जिसमें नारी वर्ग को और भी अधिक गई गुजरी स्थिति में रहना पड़ता है।

समुन्नत कहे जाने वाले देशों में शिक्षा में अर्थोपार्जन भी, समर्थन संवर्धन के रूप में दिखाई देते हैं। इसलिए आर्थिक कठिनाई को एक हद तक पार कर लिया गया है और बढ़ती शिक्षा के सहारे बुद्धिमत्ता भी अर्जित हुई है फिर भी उन क्षेत्रों तक में दुर्भाग्य ने पीछा नहीं छोड़ा। प्रगति को उत्कृष्टता की दिशा नहीं मिली और वह विलासिता की ओर मुड़ गई। कामुकता की तृप्ति के लिए अतिवादी रुझान बढ़ा, सजधज और शौक मौज के साधन जुटाने में प्रति-स्पर्धा चल पड़ी। जो कमाया गया था वह इसी भट्ठी में झोंका जाने लगा। अतिवादी उपलब्धियों के लालायित लोगों के लिए अनाचार पर उतारू होना ही एक मात्र रास्ता रह जाता है जिसके आधार पर तृष्णा को स्थायी रूप में न सही, सामयिक क्षणों में तो पूरा किया ही जा सके। संक्षेप में यही है तथाकथित सुसंपन्न देशों की मनोदशा और जीवन शैली। एक दूसरे को गिराने और निचोड़ने के दाँव-पेंच इसी आधार पर चलते रहते हैं। इससे शौक मौज की दृष्टि से वे खुशहाल दीखते हुए भी तथ्यतः ऐसी मानसिकता के बिना ही रहते हैं जिसे व्यक्ति और समाज को शांतिपूर्वक रहने देने के उपयुक्त नहीं कहा जा सकता।

समूचे वातावरण के प्रभाव से नारी को और अछूता नहीं रखा जा सकता। अविच्छिन्न सहयोगी होने के वास्ते उन्हें भी बहती हवा के सुख के अनुरूप ही दिशा उनकी अपनी क्षमता जहाँ आबादी की सघनता की स्थिति के कारण दुःखदायी बनी हुई है। वहाँ समुन्नत देशों की नारी अपनी उपलब्धियों का उत्कृष्टता की दिशा न दे पाने के कारण खिन्न-विपन्न स्थिति में ही जी रही है। निजी विश्वस्तता और पारस्परिक वफादारी उठ गई है। दोनों पक्ष चौपड़ की चाल चलते रहते हैं। अपनी गोटी लाल करने की ही फिक्र में रहते हैं। आस्था के अभाव में उन्हें स्थिरता के संबंध में अनिश्चित स्थिति में ही रहना पड़ता है। कौन, किसे कब तलाक दे बैठे और प्रेम प्रसंग के दिनों उभारे गये सपनों को कब कुचल मसलकर फेंक दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। परिवार संस्था को तो उस तथाकथित प्रगतिशीलता ने कुचल मसल कर ही रख दिया है। न वृद्ध पीढ़ी को अपनी संतान से बुढ़ापे के दिनों कुछ सहारा पाने की आशा रहती है और न नई पीढ़ी को यह भरोसा रहता है कि वे पिता-माता की शतरंजी चालों के बीच अपने आपको निराश्रित होने से बचा सकेंगे। अपना भविष्य बनाने में अभिभावकों का सहयोग किस हद तक प्राप्त कर सकेंगे? कहीं उन्हें बचपन से ही अपने भाग्य की नाव अपने हाथों ही तो नहीं खींचनी पड़ेगी? जिन्हें उस परिस्थिति का स्वयं भुक्तभोगी नहीं बनना पड़ा है, वे अनुमान लगा सकते हैं कि जीर्ण शीर्ण पारिवारिकता की छत्रछाया में कौन कितना निश्चिंत रह रहा होगा। अधिक पैसा कमा लेने, अधिक आकर्षक ठाठ-बाट खड़ा कर लेने पर भी वैयक्तिक और सामाजिक दृष्टि से वहाँ भी अवाँछनीयता ही छाई रहती है। वैवाहिक जीवन के संबंध में तो अधिकांश को अनिश्चित स्थिति में रहना पड़ता है।

अविकसित देशों की नारी दरिद्रता और दबाव के बीच घुटती रहती है तो संपन्न देशों में विलासिता के साथ जुड़ी हुई अनिश्चितता उतनी ही दुःखदायी बनकर रहती है। कारण भिन्न हो सकते हैं और देखने में परिस्थितियों के बीच भारी अन्तर दीख सकता है। पर दोनों ही समान रूप से उत्पीड़न के बीच अपने-अपने दड़बो में बैठी रुदन कर रही है। एक को सोने की जंजीरों में बँधा हुआ समझा जा सकता है तो दूसरों को लोहे की शृंखला में जकड़ा। विपन्नता दोनों को ही अपने-अपने ढंग से घेरे हुए है। संपन्न और निर्धन देशों का वर्गीकरण सरलतापूर्वक हो सकता है और उनके पिछड़ेपन एवं सुविधा के स्वरूप को भी पृथक-पृथक दृष्टि से देखा जा सकता है। पर जहाँ तक नारी की विश्वव्यापी स्थिति का संबंध है, वहीं उसमें अपने-अपने ढंग से सुधार करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। अब भी देशों और क्षेत्रों की दूरी मीलों के हिसाब में प्राचीन काल जैसी ही बनी हुई है। पर समय के साथ-साथ गतिशीलता की दौड़ बहुत अधिक तीव्र हो गई है। किंतु नारी के साथ जुड़ी समस्याओं को सुलझाने, विडंबनाओं को मिटाने के लिए ऐसा प्रयास करना होगा जो धरती के एक सिरे से दूसरे सिरे को छू सके और अपनी प्रेरणा से उपयुक्त परिवर्तन के लिए आवेश जैसी मानसिकता पैदा कर सके। नारी का अपना गौरव अनुभव करने दिया जाय। उसे अपनी सत्ता और महत्ता का आकलन करने दिया जाय। प्रगति के लिए दूसरों पर आश्रित कम रहने और प्रतिभा को अपने निज के बलबूते उभारने के लिए जीवट भरा उत्साह उत्पन्न कर सकने योग्य बनाया जाय। इस बदली हुई मानसिकता का प्रभाव आश्चर्य जनक और चमत्कारी हो सकता है। नर पर निर्भर रहने की विवशतः अपनाकर उसने पाया कम और खोया बहुत है। अब परिवर्तन के नये पक्ष को अपनाये जाने और ठीक समय आ गया है। जिसका प्रयोग शीघ्र परीक्षण मुक्त और खुले दिमाग से होने देना चाहिए।

नर अपनी विशिष्टता का आदि काल से ही बखान और प्रदर्शन करता रहा है। उसने अपनी शरीरगत समर्थता का अधिक परिचय दिया है। इस आधार पर उसने अधिक उपार्जन करने तथा प्रतिद्वन्द्वियों से अधिक दृढ़ता पूर्वक निपट सकने का पराक्रम प्रस्तुत किया है। इसी आधार को प्रधानता देते हुए नारी को उसने वशवर्ती बनाने और उसका शोषण करते रहने में अपने आतंक का परिचय दिया है। इससे एक पक्ष का दर्प दिखाने और दूसरे को उसके सम्मुख अपनी दयनीयता स्वीकार करने का अवसर तो अवश्य मिला है पर ऐसा नहीं हो सका, कि शक्ति का समन्वय हुआ होता। दोनों ने एक दूसरे को सक्षम और पूरक समझने की दूरदर्शिता दिखाई होती और दोनों ही पक्षों द्वारा संयुक्त प्रयास से ऐसा कुछ करते बन पड़ा होता जिससे पेड़ से लिपटी हुई बेल को भी समान ऊँचाई तक उठा सकने का सुयोग मिला होता। दोनों ही कृत-कृत्य हुए होते एवं एक दूसरे के प्रति कृतज्ञ रहे होते। इस अभाव के रहते पुरुष का दर्प और नारी का दैन्य इस संकट के लिए सब प्रकार अहित कर ही रहा है।

लेनिन ने नारा लगाया था कि “ दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ” इन दिनों भी ठीक वैसे ही उद्घोष की आवश्यकता है जिसमें दुनिया की नारियों को सर्वज्ञ मिलते-जुलते शोषण का शिकार बने रहने से इन्कार कर सकने का साहस जगे और व्यापक उत्कर्ष के लिए एक क्षेत्र की प्रगति दूसरे क्षेत्र की अवगति को निरस्त करने में हाथ बँटा सके। देश-देशांतरों के विभाजन के कारण यद्यपि एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में आवागमन उतना सरल नहीं रहा तो भी यह बहुत अंशों से संभव है कि प्रगति और अवगति को मिलाकर एक सर्वोपयोगी समतल आधार बनाने का प्रयत्न किया जाय समर्थों द्वारा असमर्थों के लिए अधिक कारगर सहयोगी बन सकना भी संभव हो सकता है।

विश्व के मूर्धन्य विचारकों को नारी की अवगति को क्षेत्रीय समस्या की दृष्टि से देखने और उसका स्थानीय उपचार करने भर से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। इतना भर पर्याप्त न होगा। विश्वव्यापी नारी जागरण आँदोलन का एक जगह से संचालन संभव न हो तो उसे परिस्थितियों के अनुरूप देश-देश में अपने ढंग से चलाया जा सकता है। पर उसका मूल उद्देश्य एक ही होगा कि नर और नारी के मध्य समग्र एकता और समता की संभावना के लिए सुनियोजित ढाँचा तैयार हो सकेगा।

छोटे रूप में यह कार्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर का भी हो सकता है। मानवी सभ्यता और संस्कृति का प्रधान चिह्न यही रहा है कि सुख को बाँट कर और दुःख को बाँट कर चलने की नीति अपनाई जाय और सभी को औसत स्थिति में रहने का सुयोग्य बनने दिया जाय।

बत यदि अपने की ली जा तो भी यह तो हो सकता है कि विकसित स्तर की नारियाँ अपनी अविकसित बहिनों के प्रति अधिक उदार बने और उनके पास जो विलासिता में खर्च करने के लिए समय, चिंतन या साधन मिलता है उसे बचा कर अपने समुदाय के पिछड़े वर्ग को ऊँचा उठाने के लिए नियोजित करने की उदारता दिखायें। यह इसलिए भी संभव है कि वर्तमान प्रचलन में नर और नारियों का सहयोग सहकार चाहे कितना ही ऊँचे उद्देश्य के लिए क्यों न दीख पड़ता हो, उसे संदेह और अविश्वास की दृष्टि में देखा जाता है। अकारण उस पर उँगली उठती है। इसलिए नारी जागरण आन्दोलन में पुरुष के सहयोग को पूरी तरह लिया जाय पर जहाँ तक आन्दोलन चलाने और कार्य रूप में परिणत करने का सवाल है वहाँ तक यही अधिक उपयुक्त होगा कि समर्थ, समृद्ध, प्रबुद्ध और संवेदनशील नारियाँ आगे बढ़े और पिछड़ेपन को सर्व प्रथम मान्यता क्षेत्र में बहिष्कृत करने की पृष्ठभूमि तैयार करे। प्रत्यक्ष उपायों में शिक्षा संवर्धन और गरीबी उन्मूलन को महत्व दिया जाता है। यों सामाजिक कुरीतियों का भी इस प्रस्तुत पिछड़ेपन में कम हाथ नहीं है। इन सभी को व्यावहारिक जीवन में क्रियान्वित करने से पूर्व यह आवश्यक है कि मानसिकता में ऐसा प्रबल परिवर्तन कर सकने वाला आन्दोलन खड़ा किया जाय जिसमें किसी पक्ष का दर्प और किसी को दैन्य से आक्राँत होने की संभावना निरंतर मिटती चली जाय।

विचार बीज है और कर्म उसका पादप। महान परिवर्तन सर्वप्रथम विचार क्षेत्र से आरंभ होते हैं तो ऐसी परिस्थितियाँ बना देते हैं, जिनमें प्रतिगामी प्रतिस्पर्धी को भी नरम होना और औचित्य को अंगीकार करने के लिए बाधित होना पड़े। जिन्हें न्याय पक्ष के समर्थन का साहस है वे भी बढ़ते हुए आन्दोलन में सम्मिलित होने, सहयोगी बनने के लिए अपनी प्रसुप्त प्रतिभा का ज्वलंत करने आगे आ सकते हैं।

नारी जागरण अभियान में विकसित नारी को इसलिए सम्मिलित होना चाहिए कि यह उसकी अपनी पिछड़ी बहिनों का प्रश्न है। सजातीय और समीपवर्ती होने के नाते वे सुधार परिवर्तन की दिशा में अधिक कुछ कर सकती है। भाव संवेदना जहाँ होगी, वहाँ कुछ ऐसे उपयुक्त अवसर निश्चित ही जन्म लेकर रहेंगे। गाँधी के सत्याग्रह में महिलाओं की आश्चर्यजनक भूमिका रही है। बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन में नारियों की संख्या पुरुषों, परिव्राजकों से किसी भी प्रकार कम नहीं थी। पादरियों की तरह नारी के त्याग-बलिदान भी किसी प्रकार कम नहीं है।

पुरुषों को महिला जागरण की इस ऐतिहासिक बेला में इसलिए बढ़-चढ़ कर योगदान करना चाहिए कि उस वर्ग द्वारा अपनाये गये अनौचित्य का चिरकाल से चले आ रहे अनाचार का एक बारगी समग्र प्रायश्चित करने का अवसर मिला है। खाई और टीले की दुहरी अनुपयोगिता का हटाकर उनका पुरुषार्थ ऐसी समतल भूमि बनाने का सुयोग विनिर्मित करना है जिस पर सुरभित उद्यान और नव भवन खड़े किये जा सके।

यहाँ संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं है कि जाग्रत नारी दबाव में आने में इनकार करेगी और इन दिनों जितना शोषण जन्म लाभ मिलना है वह आगे न मिलेगा। समझने की बात है कि बँधुआ मजूर की अपेक्षा कारोबार में सहयोगी मित्र अपेक्षाकृत कहीं अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। संघर्ष खड़ा होने की बात इसलिए भी नहीं सोची जानी चाहिए कि माता और संतान का बहिन और भाई का, पिता और पुत्री का संघर्ष संभव ही नहीं है। दोनों के बीच इतनी सघन आत्मीयता विद्यमान है। एक वह संवेदनशील पक्ष अपने आत्मीय के लिए किसी भी स्थिति में हानिकारक या संघर्षरत नहीं हो सकता।

विकसित नारी पति के लिए अधिक भावुक और स्नेह-सिद्ध, सहयोगी सिद्ध हो सकती है। माता की सेवा सुविधा में हाथ आने वाला कभी घाटे में नहीं रहा। कन्यादान के समय कुछ देते हुए सभी अभिभावक गौरव अनुभव करते हैं फिर ऐसा निरर्थक संदेह क्यों किया जाय कि विकसित होने पर नारी किसी प्रकार का खतरा भी हो सकती है। वह अपने पिता, पति, पुत्र के लिए कुछ प्रत्यक्ष सहायता न कर सके तो भी उसकी भाव संवेदना में कभी भी कमी आने वाली नहीं। अच्छी सहचरी अच्छी परिवार व्यवस्था पिता श्रेष्ठ संतान को विनिर्मित करने वाली, आर्थिक दृष्टि से सहायक नर के लिए हर दृष्टि से कल्याणकारी ही हो सकती है। हित को अनहित समझने की भूल अब किसी को भी नहीं करनी चाहिए।


समग्र परिवर्तन की बेला आ पहुंची

काल गणना के संदर्भ में “ युग” शब्द का उपयोग अनेक प्रकार से होता है। जिन दिनों जिस प्रचलन या प्रभाव की बहुलता होती है उसे नाम से पुकारा जाने लगता है। जैसे ऋषि युग, सामंत युग, जनयुग आदि। रामराज्य के दिनों की सर्वतोमुखी प्रगति शांति और सुव्यवस्था को सतयुग के नाम से जाना जाता है। कृष्ण की विशाल भारत निर्माण संबंधी योजना के एक संघर्ष पक्ष को महाभारत नाम दिया जाता है। परीक्षित के काल में कलियुग के आगमन और उससे राजा के संभाषण अनुबंधों का पुराण गाथा में वर्णन है। अब भी रोबोट युग, कम्प्यूटर युग, विज्ञान युग आदि की चर्चाएं होती रहती है। अनेक लेखक अपनी रचनाओं के नाम युग शब्द जोड़कर करते हैं। जैसे यशपाल जैन का “युग बोध” आदि। यहाँ युग शब्द का अर्थ जमाने से है। जमाना अर्थात् उल्लेखनीय विशेषता वाला जमाना एक एरा एक पीरियड इसी संदर्भ में आमतौर से युग शब्द का प्रयोग होता है।

एक ओर मान्यता पंचांगों में अनेकानेक संवत्सरों के आरंभ से शुरू होती है। ज्योतिष का एक मत ऐसा ही है जब कि युगों का समय लाखों करोड़ों वर्षों का बताया गया है और सभ्यता के विकास को उस आधार पर अरबों-खरबों वर्ष बीत चुके है और अभी अपने समय के तथाकथित कलियुग का अंत होने में लाखों वर्ष शेष है। यह ऐसी काल गणनायें है जिन्हें पौराणिक अलंकारिक भाषा के अंतर्गत ही स्थान मिल सकता है। मिथक ही इन किंवदंतियों के पक्षधर हो सकते हैं। अन्यथा इतिहासकारों, नृतत्व वेत्ताओं और भू भौतिकी के जानकारों के अनुसार विकसित मानवी सभ्यता के जो चिह्न मिले है, वे दस हजार वर्ष से पुराने नहीं है।

यहाँ युग से अर्थ विशेषता युक्त समय के रूप में लिया गया है। युग निर्माण योजना आँदोलन चलाने के प्रयास में भी इसी मान्यता का बाहुल्य रहा है। युग प्रभाव, युग गीत, युग संधि आदि शब्दों का उल्लेख इसी अभिप्राय से किया गया है कि अब की अवाँछनीयता युक्त परिपाटियाँ बदलकर नये स्वरूप में विकसित विनिर्मित होगी। कली खिलकर फूल बनती है। अण्डे उड़ने वाले पक्षी का रूप धारण कर लेते हैं, तो कोई कारण नहीं कि इन दिनों जो प्रचलन स्वभाव-अभ्यास में आ गया है वह उसी प्रकार का सदा सर्वदा बना रहे। वनस्पतियाँ गाय के पेट में जाकर दूध बनती है। दूध का स्वरूप घी में बदल जाता है और घी का स्वरूप घी में बदल जाता है और घी का परिवर्तित स्वरूप मिष्ठान बन कर सामने आता है, तो यही परिवर्तन प्रक्रिया मनुष्य के चिंतन और व्यवहार में परिवर्तित न ला सके ऐसा कोई कारण नहीं। मधुमक्खियाँ फूलों के पराग से जहाँ मधु बना सकती है तो प्रबल प्रयत्न द्वारा परिस्थितियों में वाँछनीय परिवर्तन प्रस्तुत न किया जा सके ऐसी कोई बात नहीं।

इस प्रकार के परिवर्तन और प्रयासों के लिए विशेष प्रकार के आरंभ से लेकर आधार खड़े होने तक के समय को यहिद युग संधि नाम दिया जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। बारह वर्ष की अवधि को व्यावहारिक युग भी कहा जाता है। युग संधि की अवधि जो 1981 से आरंभ होकर 2001 तक चलने वाली है, को भी इसी स्तर का मानकर चला जाय तो उसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे अमान्य किया जाय।

मनुष्य जीवन के हर बारह वर्ष में एक नया मोड़ आता है। इससे पहले चलते रहे स्वरूप में आकृति और प्रकृति बहुत कुछ बदल जाती है। 12, 24, 36, 48, 60 वर्ष 80 आयु का यदि बारीकी से अंतर किया जाय तो प्रतीत होगा कि नाम में तो अंतर नहीं पड़ा है, पर आकार-प्रकार में असाधारण स्तर का अंतर उत्पन्न हो गया। इतना बड़ा अंतर जिसे बाहर वाले सहज पहचान भी न सके। जन्मकाल और जराजीर्ण मरणकाल के अथवा मध्यवर्ती परिवर्तनों वाले विरामों का अंतर यदि मापा जाय तो प्रतीत होगा कि एक ही व्यक्ति के स्तर में असाधारण स्तर के मोड़ आये और परिवर्तन हुए। वह कुछ से कुछ बनता चला गया। इन मोड़ों को भी यदि जीवन प्रवाह का परिवर्तन कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

वृक्षों के तनों पर क्रमशः चढ़ती बदलती परतों का अध्ययन कराने वालो ने सूक्ष्म अध्ययन करके जाना है कि प्रकृति चक्र का प्रभाव उनमें आवश्यक परिवर्तन करता, अनुदान देता चला गया है। इसमें हर बाद नियमित रूप से प्रायः ग्यारह-बारह वर्ष का अंतर रहा है।

वनस्पतियों के बाह्य स्वरूप में तो प्रायः बहुत बड़ा अंतर नहीं होता, पर उनके अंदर पाये जाने वाले सूक्ष्म रसायनों की मात्रा घट-बढ़ जाती है। इसलिए उनकी जाँच-पड़ ताल के आधार पर लोगों की शारीरिक स्थिति में परिवर्तन आते जाने के कारण औषधि निर्धारण के नये निर्धारण करने पड़ने है। यदि न किये जाये तो वह परंपरावादी चिकित्सा पद्धति आधुनिकतम न रहकर अपनी उपयोगिता गँवाती जाती है। अंतरिक्ष में होते रहने वाले परिवर्तनों का प्रभाव वृक्षों और वनस्पतियों पर पड़ता है। उसके पीछे भी एक प्रकृति चक्र काम करता है और वह प्रायः बाहर वर्ष की धुरी पर घूमता है मनुष्य शरीर की कोशिकायें प्रायः पुरानी होकर मरती और नयी जन्मती रहती हैं यह क्रम लगातार चलता है प्रायः बाहर वर्ष में पुराने सभी कोष बदल जाते हैं और उनके स्थान पर नये आ जाते हैं यह कायाकल्प जैसे अंतर शरीर के अंतर क्षेत्र में होते हैं और उसको मोटी दृष्टि से देखने पर बाहर से कुछ भी पता नहीं चलता फिर भी बारह वर्ष में हर शरीर का कोषीय कायाकल्प होते रहने की बात विज्ञान सम्मत है।

स्वभावों में मानसिक चिंतन और आकर्षण निर्धारणों में भी यह परिवर्तन लहराते देखें जाते है। बच्चे और बूढ़े के बीच जो अन्तर पाये जाते हैं। जमाते हुए कहीं से कही पहुँचते हैं।इन बारीकियों को जहाँ ध्यान में रखा जाना संभव होता है वहाँ तद्नुरूप सुधार सहयोग की भी व्यवस्था बन पड़ती है और जिस लक्ष्य तक पहुँचना है उसकी यात्रा बिना गड़बड़ाये सुनियोजित ढंग से चलती रहती है। संस्कार कराने की पद्धति हिन्दू धर्म में प्रायः इसी आधार पर विनिर्मित की गयी है।

समस्त आकाश का स्वरूप निर्धारित करने के लिए उस विशाल क्षेत्र को बारह राशियों में बाँटा गया है। इसी से मिलता जुलता एक छोटा विभाजन सौर मंडल का भी किया गया है। पंचाँगों का निर्माण प्रायः उसी आधार पर होता है। ज्योतिष का ग्रहगणित भी प्रायः इसी पर निर्भर रहता है। अन्तरिक्ष में समुद्री हलचलों में ऋतु प्रभावों में प्रायः इसी के अनुरूप सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं। उन्हीं की आधार मानकर खगोलवेत्ता कई प्रकार के फलादेश प्रस्तुत करते रहते हैं।बारह महीनों का वर्ष माना जाने के पीछे भी काल गणकों ने इसी आधार को अपनाया है।

सूर्य में धब्बे के रूप में जाने-जाने वाले विस्फोट भी लगभग बारह वर्ष के अन्तर से ही अपने उफानों में परिवर्तन करते रहते हैं। उनके प्रभाव प्रायः पृथ्वी समेत और मंडल के अन्य ग्रहों उपग्रहों पर पड़ते हैं। इस प्रभाव को अन्तरिक्ष विज्ञानी अनुभव करते हैं। कीट पतंगों की प्रजातियों में भी धीमे सूक्ष्म-अदृश्य परिवर्तन क्रम गतिशील रहते हैं।

महागज महाव्याघ्र महासरीसृप महागरुण अचानक धरती से विलीन नहीं हुए वरन् क्रमिक परिवर्तन ने ही उन्हें छोटे से बड़ा बनाया था और बड़े से छोटे करते-करते उस स्थिति में पहुँचा दिया जिसमें कि वे सामान्य कलेवर लिये हुए अभी भी विद्यमान है।

परिवर्तन क्रम में बारह का अंक अनेक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। तपश्चर्याएं प्रायः बारह वर्ष में पकती है। बड़े प्रायश्चित परिशोधन भी इतना ही समय मांगते हैं। पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास हुआ था। राम की तपश्चर्या में बारह वर्ष बीते और दो वर्ष युद्ध प्रसंगों में बीते। इसी प्रकार अन्य ऋषियों मनीषियों वैज्ञानिकों मूर्धन्यों का प्रतिभा उभार प्रायः बारह ही एक ढर्रे का रहा है। ध्यानपूर्वक जीवनचर्याओं का वर्गीकरण और अध्ययन करने से यह तथ्य भली प्रकार निखर कर आता है। घड़ी के घण्टे भी तो हर दिन बारह ही बजाते हैं।

युगसंधि के बारे में आम मान्यता यह रही है कि वह सन् 1989 से 2001 तक के मध्यवर्ती बारह वर्ष की होनी चाहिए।उसमें ध्वंस और विकास के दोनों ही उपक्रम अपने-अपने ढंग से सभी क्षेत्रों में चलने चाहिए। अनौचित्य को घटाने और औचित्य को बढ़ाने के लिए प्रकृति प्रेरणा और मानवी पुरुषार्थ परायणता का क्रियाकलाप दीख पड़ना चाहिए। स्थिति सूर्योदय और सूर्यास्तकाल की परिवर्तन परायण एवं संघर्षशील स्तर को होनी चाहिए।

संसार में जो कुछ भला-बुरा घटित या विनिर्मित हो रहा है।

उसके मूल में एक मात्र तथ्य काम करता है-मनुष्य का विचार प्रवाह पारस्परिक व्यवहार की उत्कृष्टता निकृष्टता उसी आधार पर बन पड़ती है। वस्तुओं के उत्पादन विनाश का सदुपयोग-दुरुपयोग का आधार यही है। मान्यता आकाँक्षा; अभिरुचि; उमंग और प्रेरणा ही वह शक्ति है जो अभीष्ट को विनिर्मित; परिवर्तित करती है।परिस्थितियों का उद्भव इसी स्त्रोत से होता है। उत्थान-पतन की यह धुरी विचारणीय ही है।

अगले दिनों यदि अवाँछनीयता को निरस्त और सुखद संभावनाओं को प्रशस्त करना है तो प्राथमिकता जनमानस के परिष्कार को देनी होगी।इस हेतु ऐसी प्रचण्ड विचार क्राँति का व्यापक अभियान आरंभ किया जाना चाहिए। विचार अपने युग की ऐसी प्रचंड प्रक्रिया है जिसके आधार पर समस्त समस्याओं का एक मात्र और सुनिश्चित हल खोजा जा सकता है। तत्वदर्शियों का कहना है कि “मनुष्य एक भटका हुआ देवता है”।भ्राँतियों ने ही उसे ऐसे जाल-जंजाल में उलझाया है कि उस कुचक्र में से निकलने और सही मार्ग पर चल पड़ने का अवसर ही नहीं आता।

विचार मनुष्य की मौलिक विशेषता है उसी के आधार पर वह वनमानुष से नरनारायण स्तर तक सृष्टि का मूर्धन्य कहलाने का अधिकारी बना है। शिक्षा; चिकित्सा; कृषि; पशुपालन; उद्योग व्यवसाय; ज्ञान-विज्ञान आदि की अनेकानेक उपलब्धियाँ इसी आधार पर हस्तगत कर सकना संभव हुआ है। किंतु दुर्भाग्य एक ही बात का है कि नीति व्यवहार लक्ष्य उद्देश्य अनुबंध अनुशासन जैसे महत्वपूर्ण विषयों में उसने औचित्य के स्थान पर अनौचित्य अपनाया है। यह इस कारण बन पड़ा कि आत्मगौरव को एक प्रकार से विस्मृत कर दिया गया। कर्तव्यों उत्तरदायित्वों के संबंध में उपेक्षा बरती गयी। मर्यादाओं का परिपालन और वर्जनाओं का अनुशासन निभा सकना बन नहीं पड़ा। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बन जाता है। विचार पद्धति को अनौचित्य के साथ जोड़कर जो कुछ बन पड़ा उसमें लाभ का अंश स्वल्प और पतन पराभव का ही बहुत बड़ा अंश रहा।

सुधार इसी का किया जाना है। परिवर्तन यही से आरंभ होना है। इतिहास में राजक्राँतियों समाज क्राँतियों; आर्थिक क्राँति के वर्णन है। पर अब तक समग्र विचार क्राँति का एक अनुष्ठान संभव नहीं हुआ जो चक्रवर्ती शासन की तरह विश्व की चिंतन व्यवस्था को उत्कृष्टता के केन्द्र पर केन्द्रित रखे। दार्शनिक हेर-फेर होते रहे है। प्रथा-परंपराओं के परिवर्तन और नये समन्वय होते रहे है। साँस्कृतिक उथल-पुथल भी होती रही हैं। पर विचार क्षेत्र में ऐसी महाक्राँति अभी तक नहीं हुई जो मनुष्य को मानवी दृष्टिकोण के साथ घनिष्ठतापूर्वक जोड़ती औचित्य एवं विवेक को सर्वमान्य बना पाने में सफल होती। इसी कमी का प्रतिफल है। अपने-अपने क्षेत्र में अपने-अपने ढंग की अवाँछनीयताएँ पनपती रही है।

विचारों की सर्वोपरि शक्ति का जिन्हें ज्ञान है उन्हें यह भी विदित है कि विचार जिस ओर भी समग्र संकल्प और पुरुषार्थ को साथ लेकर चल पड़ते हैं उसी क्षेत्र की आश्चर्यजनक प्रगति के सरंजाम खड़े करते रहते हैं। संसार में जो कुछ हुआ है या होने जा रहा है उसे एक मात्र विचार शक्ति की उपलब्धि ही माना जाना चाहिए। भली होने पर वही उत्थान के सरंजाम जुटाती है और बुरी होने पर वही पतन पराभव के अंबार खड़े कर देती है। विलास और वैभव में रुचि लेने लगती है तो उसमें भी कमी नहीं रहती। उद्दंडता पर उतरती है तो हाहाकार खड़े कर देती है। क्रियाकलापों; चेष्टा विधानों; सरंजामों और सफलताओं की चर्चा तो बहुत होती रहती है; उसके मूल में निमित्त कारण क्या रहा है? इसका पर्यवेक्षण करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि विचार प्रवाह ही वह बाजीगर है जिसकी उँगलियों से बंधे हुए तार परिस्थितियों और उपलब्धियों की कठपुतलियाँ नचाते और चित्र-विचित्र कौतुक कौतूहल खड़े करते रहते हैं। होता यह रहा है कि अनपेक्षित क्रिया-कलापों को रोकने के लिए भर्त्सनाओं और प्रताड़नाओं के अवरोध काम में लाये जाते रहे।होता यह भी रहा है कि अभीष्ट प्रगति के लिए सुविधा साधन जुटाने के प्रबंध होते रहे। पर यह भुला दिया गया कि यह सब आवश्यक होने पर भी पर्याप्त नहीं। जब तक विचार विश्वास साहस और पुरुषार्थ का आँतरिक वर्चस्व उभारा न जायेगा तब तक कोई भी प्रयास परिणाम स्थायी न हो सकेगा। विपन्नताओं में फँसने के लिए अवाँछनीय मान्यतायें ही विवश करती है। ऊँचा उठने के लिए वह उत्कृष्टता चाहिए जो सद्गुण और सत्प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट होती और कोयले जैसी परिस्थितियों को उपयुक्त तापमान देकर हीरे में परिणत करती है।

संसार में वस्तुओं का इतना अभाव नहीं कि किसी को निर्वाह साधनों के संबंध में अभावग्रस्त रहना पड़े। परिस्थितियों में साधनों में इतनी शक्ति नहीं है कि वह किसी को विशिष्ट और वरिष्ठ बता सकें। हँसती हँसाती; खिलती-खिलती जिंदगी जीने के लिए वैभव की बहुलता अपनी कारगर भूमिका नहीं निभा पाती। जबकि स्वल्प साधनों के बीच भी व्यक्ति ऋषिकल्प जीवन जी सकता है और नर काया में रहते हुए भी नारायण स्तर की भूमिका निभा सकता है। स्वयं धन्य होता और संपर्क क्षेत्र को कृतकृत्य करता दीख पड़ता है।

साधन जुटाने और बढ़ाने की चेष्टा को उचित ठहराया और सराहा जा सकता है पर इतने भर से यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि उतने भर से ही कोई सुखी रह सकता है और साथियों को सुखी रहने दे सकता है। अभीष्ट उत्पादन और उसके सदुपयोग की समुचित क्षमता उच्चकोटि के विचारों में ही भरी-पूरी है। यदि वह हस्तगत हो सके तो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों से निपटता हुआ अपने अभीष्ट क्षेत्र में अनवरत गति से आगे बढ़ता रहता है।इसके ठीक विपरीत देखा यह भी गया है कि दुर्बुद्धि के रहते प्रचुर साधन संपदा किसी प्रकार हस्तगत हो जाने पर भी उससे केवल अनर्थ ही अनर्थ उपस्थित होता चला जाता है।

इन दिनों संपन्नता; शिक्षा और वैज्ञानिक प्रगति की बात जोर−शोर से कही जाती है। कथन का औचित्य मानते हुए भी इस तथ्य को भी साथ लेकर चलना चाहिए कि गुण-कर्म-स्वभाव में सत्प्रवृत्तियों का समुचित समावेश करने वाली सदाशयता से भी जन-जन को सुसंपन्न किया जाना चाहिए ताकि वह अभावों को अपने बाहुबल से सरलतापूर्वक निरस्त कर सके। हर परिस्थितियों में व्यक्तित्व को प्रतिभा; प्रामाणिकता और प्रखरता से सुसंपन्न करते हुए समग्र प्रगति का अधिष्ठाता बना सके। यह विचार क्राँति ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जन-मानस को परिष्कृत करने की बात को उपेक्षा नहीं टाला जाना चाहिए अन्यथा अपेक्षाकृत संपन्न बनने पर भी मनुष्य न तो चैन से बैठ सकेगा और न संबंधित जनों को चैन से बैठने देगा। निर्धनता बुरी है पर उससे भी हजार गुनी बुरी विचार भ्रष्टता है जिसके कारण दरिद्रता का ही नहीं दुष्प्रवृत्तियों का भी शिकार बनना पड़ता है। समृद्धि का समुचित लाभ उठाने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि सद्विचारों से उद्भूत शालीनता को प्राथमिकता दी जाय और उसे अर्जित करने के लिए प्राणपण से प्रयत्न किया जाय। इसी का नाम है विचार क्राँति। यही है नवयुग की आधारशिला। समग्र परिवर्तन इसी आधार पर होगा।


भावनात्मक परिष्कार ही एकमात्र समाधान

भावनाएँ ही मनुष्य को ऊँचा उठाती और नीचा गिराती है। हम अपने विकास के आरंभिक समय में भावनात्मक उन्नति कर चरमोत्कर्ष पर पहुँचे थे पर अब उसी का दिन-दिन ह्रास होने के कारण नीचे गिरते जा रहे है। पूर्व का हमारा भावनात्मक आरोहण अब-अवरोहण बन चुका है। संवेदना की दृष्टि से हम एकदम निम्न बिंदु पर पहुँच चुके है वही हमारी सबसे बड़ी विडंबना है।

व्यक्ति के भाव-क्षेत्र के परिष्कार के साथ-साथ जैसे-जैसे उसका प्रसार विस्तार होता है; व्यक्ति में तद्नुरूप परोपकारिता एवं सेवा-सहयोग की वृत्ति भी बढ़ती जाती है और वृत्ति की परिधि का विस्तार भी होता जाता है। जब इसकी व्यापकता क्षुद्रता की सीमा लाँघ कर विराट स्तर तक पहुँचती है; तो व्यक्ति को महान बनाती और महामानव; देवमानव भूसुर; देवता जैसी उपाधियों से अलंकृत करती है। इसका प्रारंभ परिवार स्तर से होता है। जब मनुष्य अपने सुख-दुःख को परिवार का सुख-दुःख और परिवार के कष्ट-कठिनाई को अपना समझने लगे अर्थात् अपना अस्तित्व परिवार से पृथक् न मानकर शरीर और उसके अंग-अवयव की तरह अविच्छिन्न रूप से जुड़ा महसूस करने लगे; तो इसे परोपकारिता की दिशा में प्रथम चरण कहा जा सकता है और भाव-विस्तार की प्रथम अभिव्यक्ति।

नृतत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि यदि मनुष्य की भावना का इतना विकास न हुआ होता; तो आज उसका अस्तित्व सुरक्षित न रह पाता और संघर्षरत स्थिति में कब का समाप्त हो गया होता। कारण कि मानव की आरंभिक स्थिति और जंगली जंतुओं के स्तर में कोई बहुत भारी अंतर रहा होगा ऐसा नहीं कहा जा सकता। आज जो बड़ा अंतर दिखाई पड़ रहा है वह तो क्रमिक प्रगति और परिष्कृत भाव-चेतना का परिणाम है। जब आज की विकसित बुद्धि की स्थिति में भी मानव संघर्षशीलता से बाज नहीं आता और तनिक-से हक की होड़ में मरने-मारने पर उतारू हो जाता है; तो आरंभ की अविकसित अवस्था में वह कैसा खूँखार रहा होगा इसकी सहज की कल्पना की जा सकती है। आये दिन तब छोटे-छोटे कुनयों में युद्ध और मान-काट मचते होंगे तथा रक्त की नदियाँ बहती होंगी। समय बीतने के साथ-साथ रोज-रोज की लड़ाइयों से उकता कर वे किसी ऐसी युक्ति की तलाश के लिए विवश हुए होगे जो उन्हें कुछ शांति दे सकें अनावश्यक संघर्ष से बचा सके और कुछ ऐसा हस्तगत करा सके जिससे पारिवारिक कटुता में कमी आये।

मानव विज्ञानी मानते हैं कि इसका सबसे उत्तम उपाय उन्हें यही प्रतीत हुआ होगा कि दूसरे कि कठिनाइयों में दुःख और दर्द में कुछ अपनत्व प्रदर्शित किया जाय सहयोग दिया जाय और स्वयं पर विपत्ति आने पर उन्हें याद किया जाय; उनकी मदद ली जाय नृतत्व शास्त्रियों के अनुसार मनुष्य में भाव विकास का यह प्रथम सोपान था। इससे स्वतंत्र परिवारों का परस्पर मिलन-समागम संभव हुआ और धीरे-धीरे कर यही समुदाय का रूप धारण करता चला गया।ऐसे अलग-अलग समुदायों की अपनी-अपनी विशिष्टताएं और पहचान थी। जब उन्हें एक दूसरे के बारे में पता चला; तो वे पारस्परिक आदान-प्रदान द्वारा अपनी-अपनी विशेषज्ञता का लाभ एक-दूसरे को देने पर सहमत हो गये। समाज-निर्माण की यह आदिम रूपरेखा थी। कालान्तर में इसी से सभ्य समाज का जन्म हुआ। जब समाज का पूर्ण विकास हुआ तो मानव ने विभिन्न क्षेत्रों में आपसी आदान-प्रदान की रीति-नीति अपनायी। परिवार के बाहर भी स्नेह-प्रेम; सहयोग-सहकार घनिष्ठ होने लगे। संवेदना और सहानुभूति की परिधि बढ़ी तो पहले का संकुचित परिवार और बड़ा बना और फिर धीरे-धीरे विकास करते हुए वह एक बृहत्तर परिवार बन गया। यों संरचना और संगठन की दृष्टि से था तो वह समाज ही पर आचरण और व्यवहार की दृष्टि से; आत्मीयता और अनुराग की दृष्टि से उसे एक वृहद् परिवार ही कहना समीचीन होगा एक ऐसा परिवार जिसमें उसकी समग्र उन्नति के लिए सभी का संपूर्ण विकास अभीष्ट था। कार्ल मार्क्स के शब्दों में कहा जाय तो इसे”वन फॉर ऑल; एण्ड ऑल फॉर वन”की नीति का विकास कहना चाहिए। भावनाओं की दृष्टि से आदमी की यह और उन्नत स्थिति थी।

फिर राश्ट्र और विश्व राश्ट्र का विकास हुआ। भूभाग की दृष्टि से सभी की अपनी-अपनी सीमाएँ तो थी; पर सब के भाव-क्षेत्र ऐसी सीमाओं से सर्वथा मुक्त थे। यही वह काल था जब “आत्मवत् सर्वभूतेषु” एवं “वसुधैव कुटुँबकम्”के सूत्र-सिद्धाँत दिये गये। यह प्रतिपादन सिद्धाँत मात्र बन कर नहीं रह गये वरन् आचार-व्यवहार में दूध-पानी की तरह घुले-मिले थे। आँतरिक उत्कर्ष की दृष्टि से मनुष्य का यह चरम विकास था; जिसमें भाव-संवेदनाएँ अपना अधिकतम विस्तार प्राप्त कर चुकी थी।इसी भाव उत्कृष्टता के कारण युगों में इसे सर्वश्रेष्ठ सतयुग कहा गया। फिर धीरे-धीरे इसकी उदारता घटती गई। भाव-विस्तार में कमी आयी और शनैःशनैः उसमें अनुदात्त तत्वों के समावेश से उसका स्तर क्रमशः गिरता गया। हम उस सर्वोच्च स्थिति से लगातार नीचे गिरते गये। आत्मीयता की हमारी परिधि संकीर्ण होने लगी और घटते-घटते इतनी घट गई कि रूखेपन से भरा मध्यकाल का सामंतवादी युग आ पहुँचा। साम्राज्य विस्तार के इस काल में आक्रामकता का इतना विस्तार हुआ कि अपने और परायेपन का भेद घृणित रूप धारण करने लगा। यही से “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का पृष्ठ पोषण करने वाली लूट-खसोट की नीति का उद्भव हुआ। साम्राज्यवादी शासक विस्तारवादी ललक की पूर्ति के लिए आक्रमण-प्रत्याक्रमण के घात-प्रतिघात में निरत रहने लगे। नीति-अनीति का विचार छोड़ जिन्हें जो सूझता; वही करते और जो हाथ लगता उसी को बड़ी मछली की तरह निगल जाते। फिर अगले शिकार के लिए आगे बढ़ते। इस क्रम में भारत को अनेक विदेशी आक्राँताओं के आक्रमण और उत्पीड़न झेलने पड़े। भारतीय राजे-महाराजे भी स्वयं इस शरीरगत प्रवृत्ति और मनोगत वृत्ति से अछूते न रह सके। उनमें भी इस बात की प्रतिस्पर्धा छिड़ी रहती कि किस प्रकार दूसरे की संपन्नता हड़प कर अपनी विपन्नता घटायी और सामर्थ्य बढ़ायी जाय। यह राजतंत्र का जमाना था। फिर लोकतंत्र का प्रादुर्भाव हुआ किंतु हमारा भावनात्मक पतन अब भी नहीं रुका। हम और नीचे गिरे। समय के साथ-साथ यह गिरावट और बढ़ती गई और आज स्थिति यह है कि समाज पर स्वार्थान्धता इस कदर हावी है कि उस ललक को पूरा करने के लिए वह किसी भी सीमा तक जाने में जरा भी संकोच नहीं करता। जब व्यक्ति की उद्दात्त लिप्सा पराकाष्ठा को लाँघ कर कुत्सित बन जाती है। जब व्यक्ति अपना आतंक जमाने और वर्चस्व स्थापित करने के लिए दूसरों के न्यायोचित अधिकार को भी छीनने से नहीं हिचकता तो सदा इन दिनों जैसी ही स्थिति पैदा होती है। ऐसे ही लोगों को भर्तृहरि ने मानवों की सबसे निचली और चौथी कोटि में रखा है। उन्हें कोई विशेष नाम तो नहीं दिया; सिर्फ यह कहकर छोड़ दिया कि “ते के न जानीमहे”।

यहाँ प्रश्न यह है कि आखिर यह स्थिति पैदा ही क्यों हुई? हमारा अधःपतन क्यों हुआ?उत्तर जेम्स डिल्लेट फ्रीमैन अपने ग्रंथ “दि हिलटाँप हर्ट” में देते हैं। वे कहते हैं कि यह ठीक है कि हम कभी चेतनात्मक विकास की सर्वोच्च अवस्था में थे और यह भी सत्य है कि आज हम विनाश के कगार पर है; किंतु यह भी तथ्यपूर्ण है कि उक्त दशा सदा-सर्वदा आज जैसी बनी नहीं रह सकेगी। उनका विचार है कि मानव समेत यह दुनिया परिवर्तनशील है। यहाँ जैसी संप्रति है; कल भी सब कुछ वैसा ही बना रहेगा ऐसा नहीं हो सकता और कब का संसार एवं परसों का विश्व दोनों एक जैसे होगे यह भी नहीं कहा जा सकता।यहाँ सब कुछ क्षण-क्षण में बदल रहा है। भले ही यह बदलाव अदृश्य स्तर का इतना न्यून और सूक्ष्म हो जिसे देखा व अनुभव नहीं किया जा सके। इतने पर भी तथ्य यथावत् बना रहता है। यह परिवर्तन सूक्ष्म अणु से लेकर विराट ब्रह्माँड तक में समान रूप से जारी है। आदमी में भी चल रहा है। वे कहते हैं। आदमी में भी चल रहा है। वे कहते हैं कि आधुनिक मानव इस परिवर्तन का अंतिम प्रतिफल नहीं है वरन् विकास-यात्रा का निर्माण विशेष है। होमोसेपियंस (आधुनिक मानव) को प्रकटीकरण के साथ यह परिवर्तन-प्रक्रिया अवरुद्ध हो जायेगी; उसकी विकास यात्रा बंद हो जायेगी; ऐसा कहना अनुचित होगा की फिर आगामी के व्यक्ति कैसी उत्तर देते हुए ग्रंथ कवि दूसरे ढंग से विचार करें तो ज्ञात होगा कि हमारी गति-प्रगति चक्रीय है। चक्र के प्रत्येक बिंदु से गुजरना हमारी नियति है। इस क्रम में इसके शीर्ष पर कभी हम उत्कृष्टता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए स्थित थे तो आज अर्धबिंदु पर पड़े-पड़े उस गौरव गाथा को याद करके ही संतोश करना पड़ रहा है। उर्ध्व से अधः की यात्रा आसान है। इसमें मात्र गिरना पड़ता है पर निम्न से उच्च स्तर पर प्रतिष्ठित होने के लिए पराक्रम करना पड़ता है बल लगाना पड़ता है। तिनका हवा के सहारे आकाश चूमने लगता है। पतंग को भी गगनचुँबी ऊँचाई छूने के लिए वायु की आवश्यकता पड़ती है। पानी को कई मंजिल ऊपर चढ़ाना हो तो पंप चाहिए। वायुयान; राकेट; उपग्रह सभी को ऊपर उठने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता पड़ती है। मनुष्य भी बिना पुरुषार्थ के अपनी उन्नति के शीर्षस्थ बिंदु पर अधिष्ठान नहीं कर सकेगा। इसके प्रयास के साथ-साथ परिष्कार की भूमिका भी संपन्न होनी चाहिए तभी वह भावनात्मक विकास की उच्च मंजिल तक पहुँचने में सफल हो सकेगा।


सफलता की कुँजी है – संकल्प शक्ति

स्रष्टा ने मनुष्य को अपनी ही अनुकृति का बनाया है और वे समस्त विभूतियाँ उसके भीतर कूट-कूट कर भर दी है जिन्हें जगाने और सदुपयोग कर सकने की क्षमता वाले पूरी तरह लाभान्वित जीवन होते हैं।वे जैसा भी चाहते हैं वैसी ही परिस्थितियां अपने लिए गढ़ लेते हैं। बहुधा लोग समझते हैं कि भली-बुरी परिस्थितियों के लिए विधाता ग्रह नक्षत्र आदि कोई और उत्तरदायी है पर तथ्य दूसरा ही है। मनुष्य के भीतर शुभ-अशुभ सब कुछ भरा पड़ा है। उसमें से इच्छानुसार कुछ भी चुना अपनाया और बढ़ाया जा सकता है। यह अपनी उसी इच्छा-आकाँक्षा पर निर्भर है जो कल्पना; कामना से ऊँचे स्तर की ही नहीं; साहस विवेक और कर्मनिष्ठा से भी भरी पूरी हो। इसी मनःस्थिति को संकल्प कहते हैं। महानता का उच्च पद प्रदान कर सकने में सदुद्देश्यों के लिए संकल्प करने से बढ़ कर और कोई क्षमता इस संसार में है नहीं। कठिनाई तभी तक रहती है। जब तक अपना निश्चय दुर्बल है। यदि महानता की दिशा में चल पड़ने के लिए संकल्पपूर्वक निर्णय ले लिया जाय और तद्नुरूप अपनी गतिविधियों को भी बलपूर्वक आदर्श के साथ जोड़ दिया जाय तो दिशा मिल जाती है धारा बहने लगती है और उस क्रमिक गमन के फल स्वरूप श्रेष्ठता-महानता के उच्च पद तक जा पहुँचना सरल हो जाता है।

योगवशिष्ठ 3/70/30 में उल्लेख है कि सब कुछ अपने संकल्प द्वारा ही साधित होता है। छोटा या महान बन सकता उसी पर निर्भर है। संकल्प ही व्यक्ति के समूचे ढांचे को विनिर्मित करते हैं। इसी आत्मनिर्माण के आधार पर परिस्थितियों का निर्माण होता चला जाता है। शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्मा ने संकल्प किया कि अकेलापन उन्हें अखरता है वे अपने को अनेक बना कर अपने सीधे क्रीडा कल्लोल किया करेंगे। ’एकोहंयहुस्यामि’ की श्रुति इसी रूप से इस नियति की उत्पत्ति का वर्णन करती है। जीवविज्ञानी अपने समस्त अन्वेषण के आधार पर चेतना के विकास का एक ही आधार बताते हैं कि प्राणी के भीतर आकाँक्षा उत्पन्न हुई और अनुकूल कलपुर्जे उनके शरीर तथा मन में उगते चले आये। आकाँक्षा में असाधारण चुंबकत्व होता है। उनकी आकर्षण शक्ति अपने क्षेत्र में ग्रह-तारकों को परस्पर बाँधे रहने वाली चुंबकीय शृंखला से कम सामर्थ्यवान् नहीं है। प्राणियों में जय-जय जितने परिणाम में आकाँक्षायें जितनी अधिक आकुलता के साथ उत्पन्न हुई है तब-तब उतनी ही मात्रा में अनुकूल क्षमता भीतर से विकसित हुई है पुरुषार्थ जागा है और उसी अनुपात से बाह्य जगत से साधन सामग्री क्रमशः खिंचती घिसटती चली आयी है। प्राणि जगत का यह संक्षिप्त तथ्य इतिहास है। विकास के गर्भ में उफनते इसी आधार को हम हर क्षेत्र की प्रगति में संजोया-समाया देखते हैं। जीव शास्त्रियों के अन्वेषण इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि इस धरती पर जब जीवन आरंभ हुआ तब वह एक कोषीय अमीबा जैसी सूक्ष्म प्राणियों की स्थिति में था। उनमें से जिनमें प्रगति की जितनी आकाँक्षा भड़की संकल्प उभरा उसी अनुपात से उनकी शारीरिक बनावट और मानसिक क्षमता विकसित होने लगी और वे अपनी मूल स्थिति की अपेक्षा तेजी से से अधिक साधन संपन्न बनने लगे। अपने पुरुषार्थ से उन्होंने सुविधा-खोजी और अनुकूल परिस्थितियों का सृजन किया। जिन प्राणियों में वह आकांक्षा संकल्प क्षमता जितनी तीव्र थी उन्हें उसी अनुपात से आगे बढ़ने और साधन संपन्न बनने का अवसर मिलता चला गया। जिनमें उत्साह और साहस कम था उनकी प्रगति उतनी ही मंद बनी रही। साधनों की न सृष्टि के आदि में कमी थी न अब है। प्रश्न पुरुषार्थ का था- संकल्प का था। नियति ने आरंभ से ही प्राणियों को सुविधा प्रदान करने में उदार नीति अपनायी है और वह अंत तक अपने उदार उपक्रम को अपनाये रहेगी। जीवाणु समष्टिगत चेतना को प्रतिनिधि होने के कारण जन्मजात रूप से अधिपति और अधिकारी है। प्रकृति का परमाणु सदा से उसका इच्छानुवर्ती अनुचर रहा है और सदा तक अपनी निष्ठावान् स्वामिभक्ति का परिचय देता रहेगा। जीवन की सत्ता इस सृष्टि में सर्वोपरि है उसकी माँग यदि गहरी हो तो उसकी पूर्ति में प्रकृति बाधक नहीं बनती। नियति रोड़े नहीं अटकाती। मात्र साहस की जाँच पड़ताल करने के लिए अड़चनों के चौकीदार कुछ-कुछ पूछताछ और रोक-टोक करते रहते हैं। परिस्थितियों ने कभी किसी मनायी के मार्ग में इतनी कठिनाई उत्पन्न नहीं की जिसके कारण उसे अपना संकल्प बदलते और साहस छोड़ने को विवश होना पड़े।

यह जीव जगत की प्रगति का विकासवादी शोधकर्ताओं द्वारा किया गया पर्यवेक्षण और निकाला हुआ निष्कर्ष है। प्रगति का कारण परिस्थितियों को समझा भले ही जाता हो पर तथ्य तक पहुँचने वाले जगत है कि चमत्कार उत्पन्न करने की परिपूर्ण क्षमता मन स्थिति में ही भरी पड़ी है। बड़ जगत की मूल पता “एनर्जी”है। जीव जगत में यही कार्य संकल्प शक्ति करती है। प्राणियों का भूतकाल तत्वतः उनकी तत्कालीन मनःस्थिति का ही लेखा जोखा है। आज भी वो जिस स्थिति में रह रहा है वह अपने ही संकल्पों कर दंड-पुरस्कार भोगता है। भविष्य में भी जिसका जी बनेगा। उसमें उथली मान्यताओं साधनों और परिस्थितियों को श्रेय या दोष देती रह सकती है। पर वस्तुतः जो कुछ होने जा रहा है। उसमें मनुष्यों की भले बुरे संकल्प आकांक्षायें ही विकास था विनाश के आधार खड़े करेगी।

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इस सत्य के पीछे एक ही तथ्य काम करता है। कि संकल्प शक्ति की प्रचंड ऊर्जा से वह सुसंपन्न है। वह ऊर्जा इतनी प्रखर है कि सामान्य दीखने वाला व्यक्ति उसके सहारे महामानवों की ऐतिहासिक भूमिका निधान में महज ही समर्थ बन जाता है।

इसका एक निकटतम और हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष प्रमाण अपना युग निर्माण अभियान है। उसका शुभारंभ कैसे हुआ इसका आदिम इतिहास बहुत कम लोगों को मालूम है। एक तपःपूत व्यक्ति के अंतःकरण में युग परिवर्तन की-नव निर्माण की-मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की स्फुरणा अवतरित हुई। अवतरित इस अर्थ में कि उसके साथ प्रचंड उत्साह साहस और दृढं निश्चय की समन्वित शक्ति भी जुड़ी हुई थी। यह स्फुरणा देर तक अपनी अवतरण भूमि पर निःचेष्ट नहीं बैठी रही वरन् उसने अग्रगम की गतिशील होने की ऐसी हलचल उत्पन्न कर दी जिसे दूसरे शब्दों में आकुलता कह सकते हैं। यह आकुलता न तो अंधी थी और न अनिश्चित। उसने अपना एक स्वरूप और कार्यक्रम बनाया। दिशाधारा का निश्चय किया। उसी की परिपक्वता का प्रमाण यह युग निर्माण अभियान है। इस क्राँतिकारी तूफान का प्रथम दर्शन अपने सर्वविदित बहु चर्चित युग निर्माण के सत्संकल्प” में हुआ। सर्व प्रथम यही है। अपने मिशन अभियान का अरुणोदय प्रभात दर्शन। इसके बाद का सारा घटनाक्रम लगभग वैसा ही जैसा कि मत्स्यावतार की विशाल विस्तार प्रक्रिया जिसे परिवार दृढ़ निश्चय जब कर्म निष्ठा के साथ जुड़ते हैं। तो उसकी अग्रगामी गतिशीलता आँधी तूफान जैसी होती है। वह अभावों और अवरोधों को उखाड़ती पछाड़ती आगे बढ़ती है। उसका रास्ता रोक सके ऐसा कोई दुर्गम और दुस्तर अवरोध इस संसार में है। नहीं। ईश्वर के ज्येष्ठ पुत्र का ही नाम मनुष्य है। उसमें अपने पिता की सारी क्षमतायें बीज रूप में विद्यमान है। जय परमात्मा के संकल्प से सृष्टि का सृजन हो सकता है तो जीवात्मा के प्रखर परिवेश में काम करने वाले देवताओं का संकल्प क्यों अधूरा रहेगा?

प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने तथा सफलता पाने के लिए छोटे-बड़े सभी कामों में संकल्पों की आवश्यकता पड़ती है। महान कार्यों में तो इस उपक्रम को और भी अधिक दृढ़तापूर्वक अपनाना पड़ता है। बीजारोपण की उपमा संकल्प से दी जा सकती है। संकल्प का तात्पर्य कल्पना की रंगीन उड़ानों से ऊँचा उठकर किसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सुनिश्चित निर्धारण करना है। इसके उपराँत उसे पूरा करने के लिए जो लंबी मंजिल पार करनी है जो साधन जुटाने है उनका स्वरूप सामने आता है। पर प्रायः लोग अनेक मनोरथों के लिए मन चलाते रहते हैं जिन्हें मनोकामना कहा जाता है। उसमें कल्पना भर होती है सुखद प्रतिफल का लालच भर मनः क्षेत्र में छाया रहता है। रंगीन कल्पनाओं की उड़ाने उड़ते रहने वाले ललचाते तो रहते हैं पर अभीष्ट को प्राप्त करने का कोई आधार नहीं पाते और इच्छा पूर्ण न होने का रोना रोते रहते हैं। इसका कारण एक ही है कि इच्छा मात्र निष्प्राण-निर्जीव इच्छा बन कर रही गयी। वह संकल्प के रूप के विकसित न हो सकी जबकि संकल्प के साथ मानसिक साहस और साहसिक पुरुषार्थ जुड़ जाने पर साधन जुटते और सहयोग मिलने का सिलसिला इस प्रकार चलने लगता है मानो प्रगति पहले से ही सुनिश्चित बनी हुई हो। लोग इसी को दैवी वरदान परिस्थितियों का अनुदान विधि विधान आदि न जाने क्या-क्या नाम देते हैं। पर असल में वे और कुछ नहीं मात्र प्रचंड संकल्प के फलितार्थ भर होते हैं। संकल्पवान हर परिस्थिति का सामना करने के लिए साहस उभारते हैं आँतरिक और परिस्थिति अन्य अवरोधों से जूझने का पराक्रम करते हैं। फलतः असमंजस हटता है और पुरुषार्थ की गतिशीलता प्रखर होती चली जाती है। लक्ष्य तक पहुँचने का यही सामर्थ्य है। सुप्रसिद्ध मनीषी निक्टर हागो के शब्दों में मनुष्यों में शक्ति को कमी नहीं होती होती है तो केवल संकल्प की कमी। अगर वह संकल्प कर ले तो क्या कुछ नहीं कर सकता?

नैपोलियन के अनुसार इस प्राणवान संकल्प शक्ति के सामने सचमुच ही असंभव नाम का शब्द उसके अपने शब्द कोश में है ही नहीं।

संकल्प का अपना विज्ञान है।उसे कर्म का बीजारोपण कह सकते हैं। मनुस्मृति 2/3 में कहा गया ”सकल्प भूनः चै यज्ञः संकल्प संभवः। व्रतानि यमधर्माष्च सर्वे संकल्पजाःस्मृताः॥ अर्थात् इच्छा का मूल संकल्प है। यज्ञ संकल्प से होते हैं। सब व्रत यम धर्म आदि संकल्प से ही होते हैं। यही कारण है कि धर्म परंपरा में संकल्प को प्रमुखता दी गयी है। संध्यावंदन से लेकर ब्रह्मभोज तक के धर्मकृत्यों के आरंभ में पुरोहित अपने यजमानों से संकल्प कराते हैं। हाथ में जल अक्षत पुष्प लेकर अमुक धर्म कृत्य संपन्न करने की घोषणा को संस्कृत भाषा की शब्दावली में जोर-जोर से उच्चारित किया जाता है। इससे वह कृत्य प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। पूर्वजों का उल्लेख करके उस संकल्प के साथ उनकी प्रतिष्ठा भी जोड़ ली जाती है। संकल्प विस्मरण न होने लगे इसलिए पुरोहित उस उद्घोष के साथ वंश परंपरा गोत्र वर्तमान तिथि मास का भी हवाला देते हैं। इतना कर लेने पर एक मनोविज्ञान सम्मत सुदृढ़ मनःस्थिति उत्पन्न होती है। संकल्प कृत्य न करने पर धर्मानुष्ठान अधूरे माने जाते हैं। श्रावणी पर्व पर जो उपक्रम किया जाता है। उसमें हेमाद्रि संकल्प ही प्रधान है। अपने गायत्री महायज्ञों में भी संकल्प घोषणा की परंपरा को यथावत् मान्यता दी गयी है। श्रेष्ठता की दिशा में बढ़ने और किसी महान प्रयास को सफलता के लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए संकल्प कृत्य निताँत आवश्यक है।

श्रेष्ठता की साधना संकल्प से ही संभव होती है। संकल्प को ही व्रत कहते हैं। व्रतधारी ही तपस्वी और मनस्वी कहलाते हैं। लक्ष्य की ओर शब्दबेधी बाण की तरह मन मानते हुए चल पड़ने की क्षमता उन्हीं में होती है। जागरुक पुरुषार्थ का प्रथम चरण संकल्प ही है। अतएव हममें से प्रत्येक को प्रस्तुत विषम घड़ी में कुछ न कुछ सृजनात्मक संकल्प अवश्य करना चाहिए। संकल्प ही ऐसा मोड़ है जिसमें श्रद्धा को कर्मठता में परिणत हुआ देखा जा सकता है। कल्पना मान्यता विचारणा श्रद्धा आदि की परिधि मस्तिष्क के छोटे से क्षेत्र में ही उमड़ती-घूमती रहती है। किंतु संकल्प को बिजली की तरह कड़कते और बादल की तरह बरसते देखा जाता है। बीच-बीच में संकल्प की परिपक्वता की परीक्षा तो छुट-छुट कठिनाइयों के माध्यम से होती रहती है। और सोने की तरह तपाये जाने की विपत्ति भी झेलती पड़ती है पर इससे हमारे मनोबल दृढ़ता नहीं। वरन् और अधिक प्रखर होना चाहिए और अपने गौरव की रक्षा के लिए स्वाभिमानी शूर सैनिक की तरह बड़े से बड़ा दाँव लगाने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। विशेष दैवी अनुग्रह ऐसे ही लोगों को मिलते हैं। महाकाल की युगाँतरीय चेतना जिन्हें तब सृजन के लिए अनुदान प्रस्तुत निरर्थक नहीं गँवाना चाहिए और अपनी सजीवता का परिचय देना चाहिए। इसका एक ही उपाय है एक ही प्रमाण है-देवसंस्कृति पुनर्जीवन के सृजन प्रयोजनों के प्रस्तुत कार्यक्रमों को पूरा करने का संकल्प करना चाहिए और उसे पूरा करने के लिए तत्परतापूर्वक जुट जाना चाहिए।


अवसर को पहचान लेने की औचित्य भरी सूझ-बूझ

महानता की अपनी निजी सामर्थ्य है। उसके आधार पर वह स्वयं तो अपनी प्रखरता एवं गरिमा प्रकट करती ही है साथ ही अपने संपर्क परिकर को भी उन विशेषताओं से भरती और कृतकृत्य बनाती देखी गयी है। अतएव महान बनने के लिए जहाँ आत्म साधना और आत्म विकास की तपश्चर्या को आवश्यक बताया गया है वहाँ इस ओर भी संकेत किया गया है कि उसकी -प्रखरता सके संपर्क साधने-सान्निध्य में रहने और लाभान्वित होने का अवसर भी न चूका जाय। यो ऐसे अवसर कभी -कभी ही आते और किसी भाग्यशाली को ही मिलते हैं। किंतु कदाचित वैसा सुयोग बैठ जाय तो ऐसा अप्रत्याशित लाभ मिलता है। जिस ईश्वर के दिव्य अनुदान वरदान के समतुल्य कहा जा सके।

महानता के साथ संपर्क साधना उसके सहयोग का सुयोग पा लेना भी कई बार अप्रत्याशित सौभाग्य बनकर सामने आता है। चंदन के समीप झाड़-झंखाड़ों के सुगंधित बन जाने और उसी मूल्य में बिकने की किंवदंती प्रख्यात है। पानी के दूध में मिलकर उसी भाव बिकने की उक्ति आये दिन दुहराई जाती रहती है। पारस को छूकर काले कुरूप और सस्ते मोल वाले लोहे का सोने जैसे बहुमूल्य धातु में बदल जाना प्रख्यात है। पेड़ से लिपट कर चलने वाली बेल उसी के बराबर ऊँची जा पहुँचती और अपनी प्रगति पर गर्व करती है जब कि वह अपने बलबूते मात्र जमीन पर ही थोड़ी दूर रेंग सकती है। उसकी दुर्बल काया को देखते हुए इतने ऊँचे चढ़ जाने की बात किसी प्रकार समझ में नहीं आती किंतु पेड़ सान्निध्य और लिपट पड़ने का पुरुषार्थ जब सोना सुहागा बन कर समन्वय बनाते हैं तो उससे महान पक्ष की तो कुछ हानि नहीं होती पर दुर्बल पक्ष को अनायास ही दैवी वरदान जैसा लाभ मिल जाता है।

महान अवसर और महान व्यक्ति दोनों ही महानता के प्रतीक माने जाते हैं और उनके अनुग्रह संपर्क का लाभ लेने के लिए सभी दूरदर्शी जागरुक रहते हैं। इसके विपरीत दीर्घ सूचना का आलम-असमंजस जिन पर चढ़ा रहता है वे अभ्यस्त ढर्रे को बदल कर समय के साथ चलने की बात न सोच ही सकते हैं और न सोचने पर इतने साहस का परिचय दे पाते हैं कि अनभ्यस्त मार्ग पर दो कदम भी रख सकें। कोल्हू के बैल की प्रकृति ऐसी ही होती है। कोई संचालन न रहने पर भी वह निर्धारित कुचक्र में स्वेच्छापूर्वक घूमता और मरता-खपता रहता है। परंपरावादियों को आदत इसी प्रकार की होती है। बुद्धिपूर्वक उन्हें किसी उपयोगी प्रयोग का परामर्श दिया जाय तो वे अधिक से अधिक सहमति सूचक सिर हिला सकते हैं। परिवर्तन के लिए जब-तब कुछ उलट-पुलट की बात सामने आती है। तो कितने ही विवशता असमर्थता सूचक बहाने बताने कारण गिनाने लगते हैं। जिन दूसरों ने उस अवसर का लाभ उठा लिया और कृतकृत्य बन गये उनका उदाहरण सामने आने पर वे पछताते भी है कि उनने भी वैसा ही करने में क्या प्रमोद बरता?

पर तब इस पछतावे का कोई महत्व नहीं रह जाता। समय चला जाता है तो फिर लौट कर कहाँ आता है?

महान अवसरों को तो समझ सकना प्रज्ञा मनीषा का काम है। आँख की सामान्य स्थिति होने पर भी पर्दे के पीछे असामान्य को झाँकते हुए कोई सूक्ष्मदर्शी ही देख पाते हैं। किंतु इसी प्रकार के दूसरे आधार महामानवों के संपर्क सहयोग का लाभ अधिक सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। वैसे सुयोगों पर उपयुक्त भूमिका निभाने की बुद्धिमता सामान्य स्तर के लोग भी दिखाने पाये गये है।

राम चरित्र के साथ जुड़ जाने पर कितने ही सामान्य स्तर के प्राणियों ने सामान्य क्रियाकलापों के सहारे असामान्य श्रेय पाया। इस तथ्य को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।

बंदर स्वभावतः इधर-उधर लकड़ी पत्थर फेंकते रहते हैं समुद्र पर पुल बनाने में प्रायः इतनी ही कूद फाँद उन्हें करनी पड़ी होगी पर उसे सुयोग ही कहना चाहिए कि उतनी छोटी सी उदार श्रमशीलता को ऐतिहासिक बना दिया और कयावाचक उसकी भावभरी चर्चा करते-करते अघाते नहीं। ऐसे आदर्शवादी सहयोगों की सफलता में कर्ताओँ को पुरुषार्थ ही नहीं दैवी सहायता भी काम करती है और श्रेय उन अग्रगामी साहसियों के पल्ले बँध जाता है। नल-नील ने समुद्र पर पुल बनाया और पत्थर पानी पर तैरने लगे। इस प्रकार के घटनाक्रम सामान्य स्थिति में देखे नहीं जाते। दैवी प्रयोजनों में दैवी सहायता की असाधारण मात्रा उपलब्ध होती है।

हनुमान का उदाहरण इसी प्रकार का है। वे सदा से सुग्रीव के सहयोगी थे पर जब बालि ने उसकी संपदा एवं गृहिणी का अपहरण किया तो वे प्रतिरोध में कोई पुरुषार्थ न दिखा सकें।

इससे प्रतीत होता है कि उस अवसर पर सुग्रीव की तरह हनुमान ने भी अपने को असमर्थ पाया होगा और जान बचाकर कही खोह-कंदरा का आश्रय लेने में ही भला देखा होगा। इससे स्पष्ट है कि उनकी जन्मजात क्षमता सामान्यों में अधिक नहीं रही होगी। पर जब वे प्राण हथेली पर रखकर रामकाज के परमार्थ प्रयोजन में संलग्न हुए दो पर्वत उठाने समुद्र लाँघने अशोक उद्यान उजाड़ने लंका जलाने जैसे असंभव पराक्रम दिखाने लगे। सुग्रीव -पत्नी को रोकने में सर्वथा असमर्थ रहने पर भी अन्य देश में समुद्र पर बसे अभेद्य दुर्ग को बेधकर वे सीता माता को मुक्त कराने में सफल हो गये। इसमें दैवी सहायता की बात प्रत्यक्ष है। ऐसा अनुग्रह उन सभी को मिल सका जिन्होंने राम की गरिमा को उनके लीलीक्रम को सहयोग देने की परिणति की पूर्व कल्पना कर ली। वयोवृद्ध जामवंत और जटायु अकिंचन गिलहरी दरिद्र केवट और शबरी की सामर्थ्य और भूमिकाओं को देखा जाय तो उनके द्वारा प्रस्तुत किये गये अनुदान अकिंचन जितने ही कहे जा सकते हैं। इतने पर उनकी गाथायें अजर अमर बन गयी। वे श्रेयाधिकारी बने और अपने उदाहरणों से असंख्यों को भावभरी प्रेरणाएं दे सकने में समर्थ हुए। इस सौभाग्य भरी उपलब्धि में प्रमुख श्रेय उस सूझबूझ को है जिसने अपनी श्रद्धा-सहायता को महान व्यक्तित्व और महान अवसर के साथ जोड़कर लाखों गुना अधिक श्रेय कराया।

कृष्णा चरित्र दृष्टिपात करने से भी यह प्रश्न असाधारण रूप ये उभरकर सार धारण है। गोपियों का छाछ पिलाना; थोड़ी सी हँसी-ठिठोली कर देना ग्वाल−बालों का लाठी-सहारा जैसे कृष्णा ऐसे नहीं है जिन्हें दैनिक जीवन में सर्वत्र घटित होने रहने वाले सामान्य उपक्रमों से भिन्न समझा जा सके। इतने पर भी वे सहयोग पुराण-उपाख्यानों में बहुत बार दुहराये-सराहे जाते रहते हैं। युद्ध में अनेकों योद्धा लड़ते और झगड़ते जीतते रहने है पर अर्जुन भीम जैसों को जो खेस मिलन उनकी गरिमा सम्मान्य हो गयी। अर्जुन भीम वे ही व जिन्हें वनवास के समय पेट भरती के लिए और जान बचाने के लिए सात बनकर दिन गुजारने पड़े थे। द्रौपदी को निर्वमन होते आँखों से देखने वाले पाण्डव भी अस्तुत महाभारत जीत सकने जैसी समर्थक के धनी रहे होते तो न तो दुर्योधन; दुशासन वैसी धृष्टता करते और न पाण्डव ही उसे महान कर पाते। कहना न होगा कि पाण्डवों की विजय की में उनकी वह बुद्धिमत्ता ही मूर्धन्य मानी जायगी जिसमें उनने कृष्ण को अपना और अपने को कृष्ण का बनाकर भगवान से रथ के घोड़े हँकवाने जैसे छोटे काम कराने को विवश कर दिया था। यदि वे वैसा न कर पाते और अपने बलबूते जीवन गुजारते तो स्थिति सर्वथा भिन्न‍ होती और यायावरों की तरह जैसे तैसे जिंदगी व्यतीत करते।

सुदामा की कृष्ण से सघन मित्रता जमा सकने की दूरदर्शिता हो उन्हें मित्र के समतुल्य बना देने का श्रेय दिला सकी। कृष्ण-सुदामा की संयुक्त चर्चा अनेकानेक अवसरों पर होता रहती है। कोई कृष्ण की उदारता को तो कोई सुदामा की गौरव गरिमा को प्रधानता देते हैं। जो हो दोनों का सान्निध्य समन्वय अपनी चमत्कारी परिणीत सिद्ध कर सके।

बुद्ध और गाँधी के महान व्यक्तित्वों के के संबंध में दे सके नहीं हो सकती पर इस संदर्भ में इस तथ्य को भी भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि उनके सवान संपर्क आने वाले असाधारण रूप से लाभान्वित हुए और से भाग्यशाली बने। भगवान बुद्ध के साथ जुड़ने का साहस न कर पाते तो हर्षवर्धन; अशोक; आनंद राहुल कुमार जीव संघमित्रा अंबपाली आदि की जीवनचर्या कितनी नगण्य रह गयी होती -इसका अनुमान लगा सकता किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए। महात्मा गाँधी से पाप यदि विनोबा; राजगोपालचार्य; नेहरू पटेल राजेन्द्र बाबू आदि न घुले होते तो वह स्थिति बलबूते उठते बैठने की बात सोचें तो फिर परिणाम भी कुछ दूसरे ही स्तर के होने की बात सामने आती है।

चाणक्य के साथ चन्द्रगुप्त समर्थ गुरु रामदास के साथ शिवाजी रामकृष्ण परमहंस के साथ विवेकानंद विरजानंद के साथ दयानंद की सघनता दोनों पक्षों के लिए कितनी संतोषजनक परिणाम प्रस्तुत कर सकी इसे कौन नहीं जानता। माँधाता ने आद्य शंकराचार्य के साथ जुड़कर चारों धाम बनाने का श्रेय पाया। भामाशाह का अनुदान राणाप्रताप के साथ संबद्ध होने पर ही सार्थक हुआ अन्यथा इतना पैसा तो सेठ-साहूकारों के यहाँ से चोर-ठग भी उठा ले जाते हैं और बेटे पोते दुर्व्यसनों में उड़ाते-फूँकते देख जाते हैं। महामानवों के साथ जुड़ जाने पर श्रेयपथ कितनी द्रुत गति से प्रशस्त होता है इनसे असंख्य उदाहरणों में टिटहरी का वह कण भी सम्मिलित है जिसमें अगस्त्य ऋषि की सहायता से समुद्र सोखे जाने और अंडे वापस मिलने की घटना कही जाती है।

असामान्य पतियों की अर्धांगिनी बनकर कितनी ही नारियाँ ऐसा उच्चस्तरीय श्रेय पा सकी। है जैसा कि अपने बलबूते उनके लिए पा सकना संभव नहीं था। कस्तूरबा गाँधी अहिल्याबाई लक्ष्मीबाई जैसी अगणित महिलायें इसी श्रेणी में आती है। पौराणिक युग की राधा अरुन्धती षबी मैवेयी द्रौपदी आदि की गौरव गरिमा में उनके पतियों के व्यक्तित्वों का कम योगदान नहीं रहा है। इस सौभाग्य के अभाव में उन्हें सामान्य महिलाओं की तरह ही जीवनयापन करना पड़ता। महानता आग के समान है उसके संपर्क में जो भी आता है गरिमायुक्त एवं तद्रृश होना चला जाता है।

अग्रगामी सदा श्रेयाधिकारी होते रहे है। संसार भर के आंदोलनों में जा सर्वप्रथम आगे आये वे प्रख्यात हुए। यों सत्साहस अपनाने त्याग-बलिदान करने की गरिमा तो सदा ही रही है और रहेगी पर इस दिशा में बढ़ाने सोचने वालों में से अत्यधिक भाग्यवान वे है जो किसी महान अवसर के सामने आते ही उसे हाथ से न जाने देने की तत्परता बरत सके। महान व्यक्ति भी सदा नहीं जन्मते। जन्मते हैं तो उनके साथ जुड़कर स्वल्प पराक्रम से असीम यश पाने का सुअवसर हर किसी को कहाँ मिलता है? इस दैवी वरदान या पूर्व संचित पुण्यों का प्रतिफल ही कहना चाहिए कि महानता उभरे और उसके साथ सघनता स्थापित करने का साहस जग पड़े।

युगसंधि के आगामी कुछ वर्ष ऐसे ही है जिनमें मानवी भविष्य का निर्धारण होना है। स्रष्टा को अपने युगाँतरीय अवतार कौशल को भूतकाल की अपेक्षा असंख्य गुनी प्रखरता के साथ प्रकट करना है। धरती के आरंभ से लेकर अद्यावधि इतिहास क्रम में इन दिनों की हलचलों को अनुपम अद्भुत समझा जायेगा। जाग्रत आत्माओं को देवसंस्कृति के संदेश वाहकों को इन्हीं दिनों नव सृजन में योगदान का निमंत्रण मिला है। जो उनकी उपेक्षा करेंगे वे उन अभागों में गिने जायेंगे जो सफल होने की पूर्ण संभावना रहते हुए उच्च पदासीन होने की चुनाव प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित होने से इनकार करके घर बैठे रहे।

दूरदर्शिता जहाँ आत्म प्रगति के लिए निजी योग्यता बुद्धिमत्ता एवं प्रयास-तत्परता को महत्व देती है। वहाँ इस तथ्य की भी अपेक्षा नहीं करती कि यदि संयोगवश कोई सुयोग संयोग महानता के साथ जुड़ सकने का हाथ लग सके तो उसका लाभ हर मूल्य पर उठाया जाय। ऐसी जागरुकता खोज और व्युत्पन्नमति की चिरकाल तक भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती रहती है कि जिसने सुयोगों को खोज निकाला और उससे लाभान्वित होने में आगा-पीछा सोचते रहने का प्रमोद न अपनाया। प्रस्तुत युगसंधि की बेला को इसी प्रकार की सौभाग्यशाली घड़ी कह सकते हैं उसमें जो महाकाल के युग निमंत्रण को सुनने-समझने स्वीकारने और साथ चल पड़ने की बुद्धिमत्ता अपना सकेंगे वे अगले दिनों कृतकृत्य होकर रहेंगे और श्रेय संचित कर सकने वाले दूरदर्शियों में गिने जायेंगे।


तालबद्ध; सुनियोजित जीवनक्रम

यह विराट ब्रह्मांड एक निश्चित निर्धारित क्रम में गतिशील हो रहा है।इसमें कही भी व्यक्तिक्रम दिखाई नहीं पड़ता। सब के भीतर प्राकृतिक ताल एवं लय का संबंध दिखाई पड़ता है और इस गतिशीलता को देखकर किसी सुनियोजित सत्ता के असत् का भान होता है। यह नियमितता विश्व-ब्रह्मांड से लेकर प्रकृति पशु-पक्षियों कीड़े-मकोड़े में मानवीय शरीर में अनिवार्य रूप से परिलक्षित होती है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो यों कहना पड़ेगा कि नियमितता-ता-लय ही जीवन है विश्व रचना है एवं प्रकृतिगत गुण है। इसके महत्व को स्वीकारते हुए लक्ष्य निर्धारित करते हुए उसे जीवन का अनिवार्य अंग समझना चाहिए।

यह सूर्य एक नियमितता लिए हुए उदय एवं अस्त का सरंजाम जुटाता है। उसकी किरणें भी एक नियमित गति के साथ वायुमंडल से संघर्ष करती हुई हम तक पहुँचती है एवं पृथ्वी में नव जीवन का संसार करती है। इस गति के कारण हमें एक निश्चित निर्धारित मात्रा में सूर्य प्रकाश मिल पाता है प्रातः दोपहर संध्या एवं रात्रि की प्रक्रिया भी एक निर्धारित क्रम में संपन्न होती है। घड़ी एक नियमित ताल में टिक-टिक करती हुई एक मिनट में साठ सेकेण्ड बताती हुई 1 घंटे में साठ मिनट की दूरी तय करते हुए 24 घंटों को प्रदर्शित करती है। चौबीस घंटों में एक दिन रात 30 दिन से एक महीना एवं 12 महीनों से एक वर्ष की प्रक्रिया इतना सुसंबद्ध एवं सुनियोजित है कि उसमें एक भी क्षण का फेर-बदल नहीं होता। पृथ्वी चन्द्रमा ग्रह तारे सभी निश्चित गति से सुसंचालित है उनमें जरा सा गतिरोध समूचे ब्रह्मांड को धूल में परिवर्तित करने के लिए पर्याप्त है।

नदियों के बहाव में भी यही प्रक्रिया झलकती है कल-कल झरझर की आवाज उसी की परिणति है। पौधों का विकास भी उसी क्रम में हो रहा है।बीच में अंकुर फूटना कोपलें फूटना पुष्पित एवं पल्लवित होना फलों से लदना इन सबसे एक निश्चित अंतर दिखाई पड़ता है। जीव जंतुओं के विकास क्रम में भी इसी देवी की कृपा दृष्टि देखने को मिलती है। चूहे; बिल्ली; कुत्ते; गाय; बैल; भैंस आदि एक निश्चित समय में जन्म लेते एवं अपनी सामर्थ्य का परिचय देते हुए काल के गाल में समा जाते हैं।

प्रातः कालीन पक्षियों के सुमधुर कलरव का संबंध भी इसी से है। उत्साह; उमंग जैसे वातावरण से भरे ऋतुराज वसंत में कोयलों की कूक बड़ी प्यारी लगती है वह भी सुर और ताल से संबंध रखती है। संगीत शास्त्रियों ने इसी को ध्यान में रखकर सात स्वरों की रचना की जो किसी न किसी रूप में किसी न किसी जीव जंतु से संबंधित है। कोयल की कूक को वे पंचम की उपमा देते हैं। गौरैया का चहचहाना; टिटहरी की चहक मैना बतख तोता आदि की मधुर बोली इसी कारण से कानों कानों को बड़ी मधुर लगती है क्योंकि उसमें भी स्वरों की नियमितता है। इसी कारण से लोग इन्हें पालते हैं। गाय का रँभाना सुन एवं पहचानकर बछड़ा इसीलिए दौड़ा आता है क्योंकि वह उसके स्वरों के विशिष्ट एवं निश्चित अंतर को पहचानता है। हाथी का चिंघाड़ना शेर का दहाड़ना इसीलिए भय का संचार कर देता है।

इस प्राकृतिक लय-ताल रूप नियमितता से भला मानव शरीर अलग कैसे रह सकता है। वह भी एक निर्धारित क्रम में विकसित होता है। शैशवावस्था बाल्यावस्था किशोरावस्था युवावस्था प्रौढ़ावस्था उसी की परिणीत है।रक्त संचार प्रक्रिया पेशियों का आकुँचन प्रकुँचन श्वास-प्रश्वास सभी में ताल का अस्तित्व स्पष्ट परिलक्षित होता है। हृदय की धड़कन लप-डप की ध्वनि एवं उसके बीच क्षण भर का विश्राम-यही है जीवन प्राण जिससे समूचा जीवन तंत्र सुसंचालित है। इस ताल में क्षण भर दी यदि व्यतिरेक पड़ जाय तो इस इस काया का अंत हो जाय। हार्ट अटैक की बीमारियाँ लो ब्लड प्रेशर हाई ब्लड प्रेशर आदि इसी व्यतिक्रम का प्रतिफल है।

वह सुनियोजित सत्ता मानव जीवन में भी इस सम्मिलित कर इसे गतिशील रखने की आशा करती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसका जीवन क्रम निश्चित है। उठना भोजन ग्रहण करना श्रम करना अपनी योग्यता विकसित करना सोना इस क्रम में भी यदि ध्यान दिया जाय तो नियमितता ही दिखाई देगी। आधि−व्याधियों इसके अव्यवस्थित होने की फलश्रुति है। पेट की पाचन क्रिया एक निश्चित मात्रा में आहार लेने से अच्छी तरह संपन्न होती है अन्यथा खट्टी डकार से लेकर कोष्ठबद्धता तक स्थिति पहुँच जाती है।

इस तरह नियमितता के रूप में ताल के महत्व का पता चलता है जो एक निश्चित निर्धारित प्राकृतिक गुण है। इसे अपने जीवन क्रम में स्थान देना उचित है। जहाँ अपने जीवन क्रम को सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है वहाँ यह भी आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन ताल बद्ध हो।


मातृ-वंदना

परम् वंदनीया माता जी के जन्म दिवस आ.क. चतुर्थी 23 सिम्बर की पावन बेला में सादर समर्पण


मातृ-वंदना (Kavita)

जग जननी। दुख हरनी माता। दुख-संताप हरो।

जगत के दुख संताप हरो। हमारे सब; संताप हरो।

सुख पाये; पर शांति न पायी; तन-मन में; व्याकुलता छायी;

अंतःकरण उदार नहीं है; मानवता से प्यार नहीं है, माँ। व्याकुल मानव का अब तो, तीनों ताप हरो।

जगत के, दुख संताप हरो। हमारे सब, संताप हरो।

हर लो माँ। अभिमान हमारा, धन -साधन का, ध्यान हमारा,

पर मन में, निर्मलता भर दो, वाणी में, पावनता भर दो, क्षुद्र स्वार्थ संकीर्ण हृदय का माँ। अभिशाप हरो।

जगत के, दुख संताप हरो। हमारे सब, संताप हरो।

निज संस्कृति से, प्यार हमें हो, भावों पर अधिकार, हमें हो, अपने को हम, हीन न मानें दुर्बल अथवा दीन, न मानें ग्लानि हृदय की हर लो माता। पश्चाताप हरो।

जगत के, दुख संताप हरो। हमारे सब, संताप हरो।


मातृ सत्ता से


मातृ सत्ता से (Kavita)

जन्म दिन पर माँ। तुम्हें, परिवार का शतशत नमन। है इसी आँचल चले रक्षित, हमारा यह बालपन॥

बन मनुज आये जगत में पर नहीं कुछ ज्ञात था। बन मनुज आये जगत में, पर नहीं कुछ ज्ञात था।

बन गया था-किंतु माँ। मुकलित हृदय जलजात था॥ इसे तुमने ही खिलाया दे कृपा की शुचि किरण॥

साधना करना सिखाया, निकट बैठाकर हमें। प्राण पुलकित सा लगा, वह ऊष्मा पाकर हमें॥

दिव्य चेतनता जगायी, कर दिये परिशुद्ध मन॥ दिव्य दृष्ट-युग पुरुष की, तुम बनी अर्धांगिनी॥

शुचि तपस्या लोक सेवा में, रही सह भागिनी॥ थी बराबर युग हृदय में, युग बदलने की लगन॥

हाँ, तभी तो वे गये, तुम कार्य भार उठा रहीं। नवसृजन के हेतु जड़, प्राचीन कलुष हटा रहीं॥

विश्व का निर्माण होना है, पुनः है बस यही एक प्रण॥ जन्म दिन पर माँ। तुम्हें परिवार का शत-शत नमन। शत-शत नमन।


सही ढंग से साँस लें- नीरोग बनें

शरीर में प्राण का एक छोटा सा अंश कार्यरत है, प्रचुर परिणाम में यह अंतरिक्ष की वायु में घुला मिला है। मनुष्य के चारों ओर सूक्ष्म वातावरण में प्राण का सागर लहलहा रहा है जिसे मनचाही मात्रा में विशेष पद्धति द्वारा खींचा और अपने भीतर भरा- अवधारित किया जा सकता है। सामान्य श्वसन-प्रक्रिया द्वारा जो आक्सीजन भीतर आती है उसमें प्राण का उतना अंश हो विद्यमान चल सके। अधिक परिणाम में करतलगत करने के लिए वह वैज्ञानिक विधि अपनानी पड़ती है जिसे योग साधनाओं में प्राणायाम कहा गया है। उसका एक छोटा प्रयोजन डीप ब्रीदिंग अर्थात् गहरी साँस लेने से भी पूरा होता है।

शरीर के अवयवों पर नियंत्रण करने वाले अचेतन मन की दक्षता और व्यावहारिक जीवन की समस्याएं सुलझाने वाले चेतन मस्तिष्क का समुचित परिपोषण प्रधानतया साँस पर निर्भर रहता है। उसकी उपेक्षा करके मानसिक विकास की समग्रता संभव नहीं हो सकती। अतः जितना प्रयास अध्ययन, अनुभव, संपर्क द्वारा ज्ञान अर्जन के लिए किया जाता है, उतना ही इस बात के लिए भी किया जाना चाहिए कि शरीर और मन की समर्थता-स्वच्छता बनाये रखने की पृष्ठ भूमि के प्रति आवश्यक सतर्कता बरती जाती रहे। यह कार्य स्वच्छ वातावरण में रहने और गहरी साँस लेने का अभ्यास डालने पर ही हो सकता है।

वस्तुतः कायकलेवर का समूचा क्रिया संचार उनके निमित्त बने हुए अंग-अवयवों द्वारा होता है पर यह अंग भी मस्तिष्क तंत्र के अधीन काम करते हैं। अचेतन मन के नियंत्रण में हमारा पाचन−तंत्र, रक्त संचालन, श्वास, प्रश्वास निमेष-उन्मेष, आकुँचन-प्रकुँचन आदि की वे क्रियाएं होती रहती है जिन्हें स्वसंचालित कहते हैं। चेतन मस्तिष्क कल्पना, बुद्धि, लोकव्यवहार का अर्जन-अभिवर्धन करके अपनी बौद्धिक प्रतिभा अर्जित करता है।

मस्तिष्क द्वारा विद्युतीय संचालन शरीर का होता है। रक्त सप्लाई हृदय से होती है, किन्तु मस्तिष्कीय क्षेत्र में जो कल्पना तरंगें उठती रहती है, उसकी क्षमता ब्रह्मरंध्र से उठती है। इसी के इर्द-गिर्द बुद्धि, विवेचना, सूझ-बूझ आदि के भी केन्द्र है। समग्र मस्तिष्क एक ऐसी मजबूत पिटारी-खोपड़ी के भीतर कैद है कि वहाँ किसी प्रकार का दबाव नहीं पहुँचता। जिस प्रकार शरीर के अंग-प्रत्यंगों का व्यायाम द्वारा सक्रिय बनाया जाता है, उस प्रकार का उठा पटक वाला व्यायाम मस्तिष्क का नहीं हो सकता। फिर उस क्षेत्र की गंदगी साफ करने निष्क्रियता को सक्रियता में बदलने और चेतनात्मक आहार उपलब्ध कराने का प्रयोजन किस प्रकार पूरा हो?

यह कार्य श्वास-प्रश्वास द्वारा होता है। नाक से भीतर घुसते ही साँस सर्वप्रथम मस्तिष्क में प्रवेश करती है। इसलिए उसका सबसे अधिक दबाव वहीं होता है। इसके उपराँत ही वह फेफड़ों में प्रवेश करती और वहाँ से समस्त शरीर को वितरित होती है। जीवकोषों को रक्त, वायु और विद्युत इन तीनों की ही आवश्यकता पड़ती है। इसकी पूर्ति जितनी अच्छी तरह होती है, उसी अनुपात में घटक निर्धारित क्रियाकलाप ठीक प्रकार कर पाते हैं। इन तीनों में से एक की भी कमी पड़ जाय तो दुर्बल, निस्तेज एवं रुग्ण रहने लगते हैं। इसलिए आवश्यक है कि घटकों की आवश्यक सप्लाई रुके नहीं और उनकी स्थिति समर्थता संपन्न बनी रहे।

इस हेतु रक्त को शुद्ध और पर्याप्त मात्रा में शरीर के अंदर बनाये रखने के लिए भोजन का सही और उसके पचाने के लिए परिश्रम की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरी आवश्यकता पूर्ति के लिए साँस को उथला नहीं, गहरा लिया जाना चाहिए, ताकि उसका वेग और अनुपात फेफड़ों एवं जीव कोषों को समुचित मात्रा में उपलब्ध होता रहे। पूरी साँस लेना जितना फेफड़ों के समस्त परिकर को सुसंचालित रखने के लिए आवश्यक है, उतना ही घटकों के पोषण के लिए भी। साथ ही मस्तिष्क स्वच्छता और सक्षमता की बात भी गहरी साँस से ही बनती है। यदि उससे उथली लिया जाय तो समूचे शरीर को निर्बल होना पड़ेगा। इसलिए शरीर विद्या के विशेषज्ञों ने गहरी साँस देने पर जोर दिया है। गहरी साँस से मतलब है-फेफड़ों से लेकर पेट तक के समूचे धड़ भाग का अधिक से अधिक फैलना और सिकुड़ना। पूरी साँस इसी को कहते हैं।

यह क्रम नियमित रूप से चलता रहे तो काम चले, अन्यथा दौड़ने में हाँफने लगने और आलस में पड़े रहने के व्यतिक्रम से काम नहीं बनता। वह तो ज्वार-भाटे जैसी स्थिति हो जाती है। काम तो नदी जैसे सामान्य से प्रवाह से चलता है। तैरना और नाव चलाना सुव्यवस्थित प्रवाह से ही बन पड़ता है। इसलिए संयोगवश गहरी उथली साँस चलने की अव्यवस्था को दूर करके नियमित रूप से गहरी साँस लेने का अभ्यास करना चाहिए। इसे ही शरीर शास्त्री प्राणायाम कहते हैं, जबकि यह प्राणायाम का प्रथम अभ्यास है जिसका अब तक वे इतना ही महत्व समझ पाये है और देते रहे है कि हर व्यक्ति को गहरी साँस लेने और छोड़ने की आदत डालनी चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह वायु स्वच्छ हो। हरीतिमा और सूर्य-प्रकाश को छूकर आ रही हो। बंद कमरों की सीलन और सड़न भरी हवा जिस-तिस प्रकार शरीर यात्रा का काम तो चलाती रहती है, पर उससे शक्ति और ताजगी उपलब्ध नहीं होती। अतः अन्न के संतुलित और बल के स्वच्छ होने की तरह शरीर में प्रवेश करने वाली वायु की स्वच्छता और पूर्णता पर भी समुचित ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। आमतौर से इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता। साँस अपनी मर्जी से भीतर आती जाती रहती है। वह कैसी है? कितनी है? इसका ध्यान दिये जाने पर भी शरीर को ऐसी क्षति पहुँचाती है जिसकी क्षतिपूर्ति मात्र दवा-दारु से नहीं हो सकती। जीवन में यों तो शरीर के सभी अंग-अवयवों का अपना-अपना महत्व है, पर उन सब में मस्तिष्क की अपनी महत्ता है। विचार तंत्र ही जीवन की दिशाधारा विनिर्मित करता है। गुण, कर्म, स्वभाव के केन्द्र उसी क्षेत्र में है। इसलिए मानसिक क्रियाकलापों को सही और समुचित रखने के लिए मस्तिष्क पर साँस की सप्लाई समुचित मात्रा में होनी चाहिए। उसमें आक्सीजन की उतनी मात्रा घुली रहती है। जितनी शरीर में सामर्थ्य और ताजगी बनाये रखने की आवश्यकता है। साँस उथली लेने पर आक्सीजन की मात्रा पड़ जाती है और एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व से वंचित रहना पड़ता है।

आक्सीजन का अधिकतर भाग हृदय से भी अधिक मात्रा में मस्तिष्क में खर्च होता है क्योंकि काम भी सबसे अधिक अनुपात में और स्तर की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण करना पड़ता है। उसे रक्त से भी अधिक आक्सीजन या प्राणवायु की आवश्यकता पड़ती है। हृदय की धड़कन घट जाय तो रक्तचाप घट जाता है जो दुर्बलता का अशक्ति का चिह्न है। इसी प्रकार आक्सीजन युक्त साँस में जितनी कमी पड़ें, उतना ही घाटा जीवन तंत्र को उठाना पड़ेगा। विशेषतया तय जब वह मस्तिष्क को कम मात्रा में मिले और अस्वच्छ स्तर की हो। इससे मस्तिष्कीय क्षमता घटती है, चिंतन भोंड़ा और भोंथरा हो जाता है। दिनचर्या के ढर्रे वाले कार्यों से ही समझ काम देती है। सूक्ष्म चिंतन, समझदारी, दूरदर्शिता, सूझबूझ जैसी विशेषतायें कम पड़ जाती है।

इस संदर्भ में चिकित्सा विज्ञानियों ने सूक्ष्म अनुसंधान किये है। उनके नवीनतम शोध निष्कर्षों के अनुसार श्वास प्रश्वास शरीर की एक ऐसी जटिल, किंतु महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो विभिन्न तंत्रों एवं उनकी गतिविधियों पर सीधा प्रभाव डालती है। साँस लेने की शैली पर भी बहुत कुछ स्वास्थ्य एवं आरोग्य निर्भर करता है। श्वसन मस्तिष्क के ऐच्छिक तथा अनैच्छिक क्रियाओं के बीच संपर्क सूत्र भी स्थापित करता है। अन्य शारीरिक क्रियाओं की तरह उसका नियमन नियंत्रण तो तंत्रिका तंत्र द्वारा होता है पर तंत्रिका तंत्र द्वारा नियंत्रित उन समस्त क्रियाओं में से एक श्वसन की क्रिया ही ऐसी है जिसमें व्यक्ति स्वयं भी उपासना चेतनात्मक नियंत्रण रख सकता तथा उसमें समय-समय पर परिवर्तन ला सकता है। प्राणायाम प्रक्रिया द्वारा इस एक तंत्र का नियंत्रण सीखकर शरीर के अन्य तंत्रों पर भी नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है जिसमें मस्तिष्कीय तरंग तंत्र, हारमोन्स स्राव, चयापचय क्रियायें आदि मुख्य है।

श्वसन की सामान्य प्रक्रिया में नासा के स्वर बारी-बारी से बदलते रहते हैं, जिसे नाम चक्र कहा जाता है। भारतीय अध्यात्म योग की यह चिर पुरातन मान्यता है कि दांये-बांये स्वरों की गति मनुष्य के स्वभाव एवं प्रकृति को प्रभावित करती है। शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, मानसिक संतुलन के लिए भी दोनों स्वरों का ताल-मेल आवश्यक है और यह प्रक्रिया प्राणायाम द्वारा ही नियंत्रित हो पाती है। प्राणायामों के इस दांये-बांये स्वर सिद्धाँत की वैज्ञानिक मान्यता को आज के विज्ञानी भी उपयोगी ठहराने लगे है। इस संबंध में बुखरेस्ट-रोमनिया के मूर्धन्य चिकित्सा वैनिक डॉ. आई.एन. रिंग एवं डलहौजी यूनिवर्सिटी-नोवास्कोटिया के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक रेमण्ड क्लेन तथा रोजीन आरमिटेज ने महत्वपूर्ण खोजें की है। उनका निष्कर्ष है कि श्वास लेने की प्रक्रिया का मस्तिष्कीय क्रिया प्रणाली से सीधा संबंध है।

श्वसन-शैली बदलने पर मस्तिष्कीय क्रिया-प्रणाली में किस प्रकार का परिवर्तन होता है और अंततः संपूर्ण फिजियोलॉजिकल एवं साइकोलॉजिकल क्रियाकलाप पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसका उत्तर जानने के लिए पेन्सिलवेनिया के वैज्ञानिक अनुसंधान रत है। उनका मत है कि विभिन्न प्रकार की श्वसन शैलियों में सबसे उत्तम एवं लाभदायक प्रणाली डायफ्रामेटिक श्वसन की है। इसमें श्वसन के समय हृदय के नीचे स्थित डायफ्राम पर जोर डाला जाता है। नवजात अवस्था में शिशु इसी विधि द्वारा साँस लेते हैं, फलतः उनका शारीरिक मानसिक विकास भली प्रकार होता रहता है, पर ज्यों-ज्यों बालक बड़ा होता है, इस विधि से साँस लेने की प्रवृत्ति घटती जाती है, परिणाम स्वरूप रुग्णता भी बढ़ती है।

सुविख्यात मनोविज्ञानी डबे अलेकोण्डर लोवेन का कहना है कि श्वसन जितना गहरा होगा, भावनाओं को उतना ही अधिक प्रभावित करेगा। वे अपनी मानसिकता पद्धति में साम्स संबंधी व्यायामों का प्रयोग करते हैं। श्वसन प्रक्रिया का भावनाओं में संबंध जानने के लिए कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के पीरटर न्यूलेवकियेटक इन्स्टीट्यूट में विभिन्न प्रकार के प्रयोग परीक्षण किये गये। इसमें शोधन वैज्ञानिक जे. वी. हार्ट तथा वी. टिम्सन्न ने अपने प्रयोग परीक्षणों कस यह सिद्ध कर दिखाया है कि श्वसन तथा मस्तिष्कीय तरंगें परस्पर संबद्ध है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि गहरे श्वसन की स्थिति में जब लोग शैथिल्यावस्था में रहते हैं तो उस समय अल्फा तरंगों की अधिकता रहती है, किंतु जब व्यक्ति उथली और तेज साँस ले रहा होता है तो इस तरंग की न्यूनता पायी जाती है। एबडोनिनल ब्रीदिंग में अल्फा तरंगें अधिक पायी जाती है, जबकि थौरेसिक से कम। इसी तरह डॉ. रुडोल्फ वैलेन्राइन ने अपने अनेकों प्रयोगों के उपराँत विश्वासपूर्वक घोषणा की है कि श्वसन प्रक्रिया मनुष्य के मानसिक एवं शारीरिक दशाओं-दक्षताओं से सीधे संबद्ध है। यदि यह सही है और श्वसन पर ऐच्छिक नियंत्रण संभव हो तो विभिन्न प्रकार के शारीरिक मानसिक रोगों एवं व्यतिरेकों को ठीक किया जा सकता है।

हारवर्डमोर्डकल स्कूल के सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. हरवर्ट वेन्सन ने अपनी कृति “दि रिलैक्सेषन रिस्पोन्स” में कहा है कि मनुष्य की फिजियोलॉजिकल क्रियायें में जो भावनाओं से संबद्ध है, उचित श्वसन पद्धति द्वारा उन पर नियंत्रण पाना संभव है। डीप ब्रीदिंग-गहरी साँस द्वारा तो प्राण संपन्नता का मात्र एक छोटा सा प्रयोजन हो पूरा होता है, पर विशिष्ट प्राणायामों द्वारा उन क्रियाओं पर नियंत्रण करना भी संभव है जो कभी चेतनात्मक नियंत्रण करना भी संभव है जो कभी चेतनात्मक नियंत्रण के परे की बात समझी जाती है। गहरी साँसों एवं प्राणायामों का अभ्यास बहुत दिनों में हो पाता है इसलिए उस ओर समुचित ध्यान रखना और प्रयत्नशील रहना हमारी दिनचर्या का आवश्यक अंग होना चाहिए।


परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - कैसे ही आध्यात्मिक कायाकल्प?

शांति में सतत् कल्प साधना सत्र चलते रहे है। उन दिनों पूज्यवर स्वयं साधकों को संबोधित कर कल्प प्रक्रिया की जटिलताओं एवं कैसे अपने अंदर परिवर्तन लाया जाय, इस विशय पर उद्बोधन देते थे। इसी विशय पर दो अंकों में प्रकाशित दो प्रवचनों की पहली कई यहाँ प्रस्तुत है। 1983-84 के इन प्रवचनों को जिनने सुना है- हृदयंगम किया है, उनके जीवन को एक नयी दिशा मिली, न केवल स्वास्थ्य सुधरा, चिंतन परिष्कृत हुआ एवं आत्मिक प्रगति का पथ भी प्रशस्त हुआ। पढ़े अमृतवाणी-

गायत्री मंत्र, साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

कल्प साधना के लिए आप सभी यहाँ शांतिकुंज आये है। कल्प आखिर है क्या जिसके लिए हमने आपको यहाँ बुलाया है। कल्प का अर्थ होता है परिवर्तन। आपको बदलने का हमारा मन है। आप यदि अभी तक दुखी जीवन जीते रहे है तो सुखी जीवन जियें। आप बीमार जीवन जीते रहे है तो स्वस्थ जीवन जियें। आप यदि गुत्थियों से उलझा हुआ जीवन जीते रहे है तो अब हँसता-हँसाता जीवन जियें। यदि घिनौना, कमजोर और उपेक्षित जीवन जोते रहे है तो अब ऐसा शानदार जीवन जियें कि जिसको देखकर आपका भी जी बाग-बाग हो जाय और जो कोई भी बाहर इसे देख पाये, उसकी भी खुशी का ठिकाना न रहे ऐसा ही आपके जीवन में कायाकल्प करने का हमारा मन था। आपने हमारे विचारो का पढ़ा होगा और उसी से प्रभावित होकर वहाँ आये है। आइये अब विचार करे कि यह कैसे संभव होगा? इसके लिए क्या करना पड़ेगा? इन सारे प्रश्नों पर गंभीरता से हम और आप विचार करें।

आमतौर से कल्प साधना के बारे में यह भ्रम फैला हुआ है कि कल्प माने बूढ़े से जवान हो जाना, पर यह एक भ्राँति है। बूढ़े का जवान होना संभव नहीं है क्योंकि वह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। प्रकृति के नियमों को कोई बदल नहीं सकता। सूर्य पूर्व से निकलता है और पश्चिम में डूबता है। ऐसा हो सकता कि सूर्य पश्चिम से निकले और पूर्व में डूबा करें। भगवान ने प्रकृति को ऐसा बना दिया है कि वे अपने म्यान पर रहेंगे और जब से बने है तब से और जब तक सृष्टि रहेगी, तब तक बने रहेंगे। इसलिए बूढ़े आदमी का जवान होना नामुमकिन है। पुराणों के कथायें तो है, पर मालूम नहीं वे कहाँ तक ठीक है। आपने च्यवन ऋषि की बात सुनी होगी जो बूढ़े थे और जवान हो गये थे। आपने राजा ययाति की कहानी भी सुनी होगी कि बेटे की जवानी लेकर वह बूढ़े से जवान हो गये थे। लोगों ने कोशिशें तो की है, यूरोप में भी बहुत प्रयत्न हुए है वृद्धों को जवान बनाने के लिए। पर सफलता नहीं मिली। स्टालिन रूस का अधिनायक था। उसको बंदर की ग्रंथियाँ काट-काट कर लगायीं और यह कोशिश की गयी कि वह वह फिर से जवान हो जाय, पर ऐसा नहीं हो सका। प्रकृति से लड़ाई लड़ना नामुमकिन है। किसी को यह आशा नहीं करनी चाहिए कि हमारा बूढ़ा शरीर जवान बन जायेगा, पर हाँ यह आशा हम-आप में से हर व्यक्ति कर सकता है कि कमजोरी और बीमारी जो हमने आपने बुला कर रखी है, उसको इनकार कर दें और यह कह दे कि हम आपको अपने यहाँ रखने की स्थिति में नहीं है, कृपा करके आप चली जाइए। इनको हम भगा सकते हैं, क्योंकि ये प्राकृतिक नहीं है।

जीवधारी पैदा होते हैं और मरते भी है, पर न कोई बीमार रहता है और न कोई कमजोर रहता है। जब कमजोरी आती है तो मौत के मुँह में चले जाते हैं। भला कमजोर जिंदगी जीना कौन पसंद करेगा और ऐसी जिंदगी को पसंद करेगा जो बीमारियों से घिरी हुई हो कमजोरी और बीमारियों से घिरा हुआ होना-यह प्रकृति के विरुद्ध है। इसको आप और हम हटा सकते हैं। शरीर के बारे में यहीं तक मुमकिन है और इसके आगे कुछ नहीं हो सकता। शरीर के कायाकल्प से अगर आप का मतलब हो और इसी ख्याल से अगर आप यहाँ आए हों तो कृपा करके यह बात नोट कर लीजिए शरीर के बारे में कि यह जो उमर है वह आगे ही बढ़ेगी, पीछे की ओर घटेगी नहीं। जवान को तो बच्चा कैसे बना पायेंगे हम? बच्चे का माँ के पेट में तो कैसे धकेल पायेंगे? संभव नहीं है। आपकी उमर तो जरूर बढ़ेगी और आपको शरीर पर जो प्रभाव पड़ेगा, वह सब पड़ना ही चाहिए। लेकिन आपका स्तर बदल जायेगा। आकृति तो ज्यों की त्यों रहेगी, पर प्रकृति बदल जायगी। प्रकृति को बदलना मुमकिन है। यदि आपकी प्रकृति बदल जायेगी तो परिस्थितियाँ भी बदल जायेगी।

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि मनःस्थिति का ही नाम परिस्थिति है।। मनः स्थिति अगर आदमी बदल लें तो परिस्थितियों के बदलने में कोई शक नहीं हैं। बस यही कायाकल्प हैं। इसी को हम कराना चाहते हैं।

आपके भीतर वाला जरूर बदल जाएगा। मनःस्थिति में हेर फेर कर ले तो उसके अनुसार परिस्थितियाँ अपने आप बदल जायेंगी। इसलिये कल्प साधना से आपको जो यहाँ अर्थ लेना चाहिये वह यह लेना चाहिये कि यहाँ जो आपसे कराया जाने वाला है जो आपसे कराने के लिये दबाव डालेंगे कि आपका भीतर वाला हिस्सा जिसका अर्थ होता है मन बुद्धि और चित्त जिसका अर्थ होता है जीवात्मा जिसका अर्थ होता है आपका दृष्टिकोण चिंतन और चरित्र बदल जाय। अगर इसे हम बदल दे तो आप विश्वास रखिये कि आपका जीवन पिछले दिनों जैसा भी कुछ रहा है भविष्य में वैसा रह ही नहीं सकता। आपने इतिहास पढ़ा होगा और आपको उन भक्तों के नाम याद होंगे जो पहले सामान्य स्थिति में गये बीते थे लेकिन जब उन्होंने अपना मन स्तर और दृष्टिकोण बदल दिया तो कितना कमाल हो गया। उनकी जिंदगी कैसी शानदार हो गयी। अगर उन्होंने भीतर वाले हिस्से को अर्थात् दृष्टिकोण को बदला न होता तो बाहर वाली परिस्थितियाँ बिलकुल मामूली आदमी के तरीके की रही होती।

इस संदर्भ में मैं आपके सामने कुछ ऐसे आदमियों के नाम रखना चाहता हूँ। कि परिवर्तन कैसे होते हैं। शंकराचार्य को आप जानते हैं न। शंकराचार्य एक मामूली घर के लड़के थे। उनकी माता यह उम्मीद करती थी कि पढ़ने के बाद में लड़के की शादी ब्याह कर देंगे। बाल बच्चे होंगे नाती पोते खिलायेंगे, लेकिन शंकर ने अपना दृष्टिकोण बदल लिया और माँ से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने भावी लक्ष्य और भावी जीवन का एक स्वरूप बना लिया। यह स्वरूप उनका अपना बनाया हुआ था। यह दृष्टिकोण उन्होंने स्वयं बनाया था। कार्यपद्धति उन्होंने स्वयं बनायी। बाद में सहायता दूसरों ने भी की। शुरुआत तो उन्होंने ही किया। शंकराचार्य फिर क्या हुये? वे शंकर भगवान के अवतार माने जाते हैं। अगर आदि शंकराचार्य ने अपने दृष्टिकोण में हर फेर न किया होता तो तब फिर वहीं होता जो उनकी माँ चाहती थी। वे एक मामूली पंडित पुरोहित होते जन्म पत्नियाँ बनाते फिराते पूजा पाठ कराते फिरते बाल बच्चे बच्चे होते और गये बीते स्तर के होते। पर जब दृष्टिकोण उन्होंने बदल दिया तो आदि शंकराचार्य हो गये।

हर आदमी को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह चाहे जैसा बन जाय। भगवान ने हर आदमी को इस लायक बनाया है कि वह चाहे तो अपने आपको बदल दे। विवेकानंद की बात आपको मालूम है न। वे एक मामूली से विद्यार्थी थे। खास प्रतिभावानों में उनकी शुमार नहीं होती थी। घर की परिस्थितियाँ भी ऐसी थी। पिता जी मरने के घर लेकिन यह निश्चय किया कि अपने सोचने के तरीके अपने दृष्टिकोण और अपने जीवन का लक्ष्य तथा उद्देश्य बदल देंगे। यही उन्होंने किया भी। जब इस बात का फैसला उन्होंने कर लिया तो रामकृष्ण परमहंस ने उनकी सहायता की? नहीं ऐसा मत कहिये रामकृष्ण परमहंस के लिये सहायता करना मुमकिन रहा होता तो हजारों आदमी उनके पास आया करते थे और उनसे दीक्षा लेते थे। हजारों आदमी उनके शिष्य कहलाते थे पर एक भी तो नहीं हुआ। केवल एक आदमी हुआ विवेकानंद। तो क्या रामकृष्ण की कृपा एक पर ही थी? नहीं असलियत यह नहीं है। उनकी सब पर कृपा बरसती थी पर उन्होंने अपने को बदला नहीं जबकि विवेकानन्द ने अपने आपको भीतर से बदल लिया। बदले हुये आदमी की कौन सहायता नहीं करेगा। आप जिस दिशा में भी आगे बढ़ना चाहते हैं, उसमें सहायता करने वालों की दुनिया में कुछ कमी है क्या? विवेकानन्द की भी सहायता हुई।

और किसकी सहायता हुई? सदन का नाम सुना है आपने कि वह कैसा आदमी था। कसाई का धंधा करता था जानवर काटता था पवित्र शालिग्राम पत्थर के बदले माँस तौल तौल कर बेचता था। बेचता ईमानदारी से था हर आदमी की दृष्टि में उसकी कीमत दो कौड़ी की थी। लेकिन जब उसने आपको बदल लिया। ईश्वरीय सत्ता से तादात्म्य बिठा लिया तो भगवान के भक्तों में सदन कसाई मूर्धन्य हो गये। मनः स्थिति बदल जाने के बाद में परिस्थितियों क्यों नहीं बदलेंगी? पहले जिससे लोग नफरत करते थे उसकी को सब प्रणाम करने लगे। मस्तक झुकाने लगे और न जाने क्या क्या करने लगे। बाल्मीकि का नाम आपने सुना है न पहले उसकी कैसी जिंदगी थी। पहले वे घटिया वाली खराब वाली जिंदगी रहे थे। आदमी उससे भयभीत रहता था। हर आदमी उस पर धिक्कार बरसता था। लेकिन जब उन्होंने अपने आपको बदल लिया। तब वह संत बाल्मीकि हो गये, ऋषि बाल्मीकि हो गये। उनका जीवन धर्म पत्नी सीता की हिफाजत के लिये उनकी गार्जियन शिप के लिये और कोई संत न दिखाई पड़ा। बाल्मीकि ही सीताजी द्वारा सुसंतति उत्पादन हेतु सबसे बड़े संत दिखाई पड़े। उनके आश्रम में भगवान राम ने अपनी पत्नी और बच्चों को सहर्ष रहने दिया ताकि उनका पालन पालन पोषण संस्कार और शिक्षण ठीक ढंग से हो सके। वहीं बाल्मीकि जिनका पूर्व का जीवन दस्यु का था उनका कायाकल्प हो गया वे संत ऋषि देव पुरुष बन गये वही कायाकल्प करने के लिये आप लोग यहाँ आये है। भीतर वाले को बदल दीजिये फिर देखिये परिस्थितियाँ बदलती कि नहीं।

हमने आपके सामने बाल्मीकि का उदाहरण पेश किया। अभी मेरा मन कुछ और उदाहरण पेश किया। अभी मेरा कुछ और उदाहरण पेश करने का है। आम्रपाली का नाम सुना होगा आपने। वह एक वेश्या थी जिसको हर आदमी ऐसे समझता था कि हम क्या कहें आप से। उसने कितने आदमियों की जिंदगी खराब की थी। लेकिन जब उसने अपने आपको बदल दिया, तब फिर आम्रपाली-आम्रपाली नहीं रही-वेश्या नहीं रही, वह भगवान् बुद्ध की बेटी हो गयी। सारे सारे एशिया के अधिकांश देशों में वह घूमी। महिला संगठन की दृष्टि से उसने न जाने क्या से क्या कर डाला कैसे हो गया यह सब? उसने अपने आपको बदल दिया और उसका कायाकल्प हो गया। कायाकल्प कैसे होगा? यही मैं आपको बताने वाला हूँ, पर पहले आपको यह जान ही लेना चाहिए कि कायाकल्प भीतर से होता है। बाहरी शरीर के कायाकल्प से कोई मतलब नहीं है। आँतरिक कायाकल्प की विधा प्राचीनकाल में भी रही है और अभी भी है तथा आगे भी रहेगी। इसी के लिए हमने आपको बुलाया है।

ध्रुव का नाम सुना होगा आपने, वह बिलकुल एक सामान्य दर्जे के राजकुमार थे। राजाओं के ढेरों बच्चे होते हैं। एक को गोद में लिया और एक को गोद से उतार दिया। जरासी परिवार की एक घटना। उससे ध्रुव ने अपने आपको बदल लिया। उन्होंने कहा-राजकुमार रहना नहीं है और यदि रहना ही होगा तो भगवान के राजकुमार क्यों नहीं रहेंगे। बस, भगवान का राजकुमार बनने का फैसला कर लिया उसने। दृढ़ निश्चयी की सहायता करने वाले कम हैं क्या? नारद जी आ गये और उनने उसकी सहायता की। नारदजी बाकी बच्चों-ध्रुव के भाई-बहनों के पास क्यों नहीं गये? उनसे क्यों नहीं कहा? नहीं नारद जी उनसे कह नहीं सकते थे, क्योंकि जो आदमी अपना निश्चय स्वयं करता है उसी की सहायता दूसरे करते हैं। आपने वह कहावत सुनी होगा - ‘ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं।’ यह बात बिलकुल सोलह आने सच है। प्रहलाद का नाम जानते हैं न, अगर वह अपने दैत्य बाप के कहने पर चला होता और पुरानी परंपरा पर चला होता तो सिवाय दैत्य के क्या हो सकता था? बाप-दादे तो काम करते थे, वही काम प्रह्लाद भी करता। परंतु प्रहलाद ने अपने आपको बदल दिया। इसी तरह गुरुनानक के पिताजी मामूली सा व्यापार करते थे। वे चाहते थे कि उनका लड़का भी व्यापार करे। व्यापार के लिए एक बार पैसा भी दिया जिसे उन्होंने परमार्थ में खर्च कर डाला। बाप के कहने पर वे चले नहीं उनकी बातें मानने से इनकार कर दिया मित्रों ने, पड़ोसियों ने भी कहा होगा, पर एक का भी कहना उन्होंने नहीं माना। अपने ईमान और भगवान का कहना उन्होंने माना। अपने ईमान और भगवान का कहना मानने वाले नानक का क्या हो गया देखा है न आपने कि सारे संसार में कितनी इज्जत है उनकी। सिक्ख धर्म में उन्हें भगवान मानते हैं। वे महान बन गये, पर अगर बाप की मर्जी पर चले होते तो पुराने ढर्रे पर ही गाड़ी लुढ़कती रही होती और वे बिलकुल मामूली से आदमी होते और एक बनिये की दुकान कर रहे होते। ढेरों बच्चे पैदा करके मामूली आदमी के तरीके से जिंदगी बसर कर रहे होते। पर ऐसा नहीं हुआ। नानक का कायाकल्प हो गया। नानक संत हो गये, ऋषि हो गये, भगवान हो गये, अवतार हो गये।

शिवाजी की भी यही कहानी है। उनके पिताजी मिलिट्री में नौकरी करते थे वे जैसे मामूली घर-गृहस्थी के बच्चे होते हैं, उसी तरह थे। यदि ढर्रे का जीवन जिया होता और उस ढर्रे से इनकार न किया होता तथा अपने लिए कोई नया निर्धारण न किया होता या निश्चय न किया होता तो क्या आप विचार कर सकते हैं कि शिवाजी वैसे ही रहे होते जैसे कि हम उन्हें छत्रपति शिवाजी कहते हैं। यह कैसे हुआ? कायाकल्प हो गया। वह शिवाजी तो माता के पेट में से पैदा हुआ था, घर-गृहस्थी में गुजारा करता था, उसकी तुलना में महापुरुष शिवाजी की रूप रेखा बिलकुल अलग है। इसी तरह चन्द्रगुप्त का नाम अपने सुना होगा। चाणक्य ने उसके अंदर की कसक को देखा और उसे पढ़ लिया। उसकी पात्रता को देखा और उसके भीतर हो रहे मनःस्थिति के बदलाव को देखा। चाणक्य ने उसे क्या से क्या बना दिया। गाँधीजी परिस्थिति से ऐसे ही थे क्या? उनके पिताजी एक दोटी स्टेट के दीवान थे। वह अपने लड़के को वकील बनाना चाहते थे। गाँधीजी यदि उनके अनुसार चले होते तो एक मामूली वकील रहे होते। सफल या असफल यह बात दूसरी है। पर सिवाय वकील के और कुछ नहीं हो सकते थे। लेकिन जब उन्होंने यह निश्चय किया कि हमको कुछ बनना है और जिंदगी का बड़ा उद्देश्य पूरा करना है, तो वे फिर महात्मा गाँधी हो गये, अवतार हो गये, बापू हो गये और युग प्रवर्तक हो गये। लाखों आदमियों को दिशा देने वाले हो गये। आखिर यह हुआ कैसे? भगवान ने कर दिया क्या? नहीं। तो फिर भाग्य ने किया क्या? नहीं। तो फिर किसी आदमी ने किया होगा। नहीं, किसी ने भी नहीं किया। उन्होंने स्वयं अपना कायाकल्प कर लिया था। सहायता जरूर औरों ने की। सहायता का तो दुनिया में द्वार खुला है। बुरे लोगों के लिए भी सहायता का द्वारा खुला हुआ है और अच्छे लोगों के लिए भर खुला है। गाँधीजी के बाबत यही हुआ। बुद्ध के बारे में भी यही बात लागू होती है। बुद्ध भगवान क्या थे? एक मामूली राजा के लड़के थे। छोटी उम्र में विवाह शादी कर दी गयी थी। लेकिन जब उन्होंने यह निश्चय किया कि हमें बड़प्पन की दिशा में चलना है, कुछ महान कार्य करने हैं, तो बुद्ध का कायाकल्प हो गया और वे भगवान बुद्ध हो गये।

उपरोक्त पुराने उदाहरण मैंने इसलिए दिये है कि आप विचार कर सके कि हमारा बदलना संभव है। चलिये आपका यह ख्याल हो शायद के हम तो मामूली आदमी हैं। हमारी घिनौनी और गंदी जिंदगी रही है। जिसके कारण हम नहीं बदल पायेंगे और जिस ढर्रे पर हम चल रहे है, जिस कोल्हू में हम पिल रहे हैं, उसी में हम पिलते रहेंगे ते यह आपकी मर्जी के ऊपर है, अन्यथा मामूली और घिनौने आदमी तो और भी आसानी से बदल सकते हैं। यह आपकी मर्जी के ऊपर है कि आप चाहें तो इस तरीके से भी रह सकते हैं जैसे कि अभी रह रहे हैं। लेकिन अगर आपका मन हो कि हमको बदल जाना चाहिए तो सूरदास का उदाहरण आपके सामने है। सूरदास कैसे आदमी थे? आप जानते हैं न। विल्वमंगल का नाम सुना है न आपने। कैसी घिनौनी और कामुक जिंदगी थी इसकी। पर जब कायाकल्प हुआ तो अंध होने के बाद में भगवान उन्हें अपनी लाठी पकड़ा कर ले जाते थे। तुलसीदास की भी पिछली जिंदगी ऐसी थी कि कामुकता से पीड़ित होकर उन्होंने मुर्दे पर सवार होकर नदी पार की थी। साँप की पूँछ पकड़कर छत पर चढ़ गये और अपनी धर्मपत्नी के पास पहुँचे थे। धर्मपत्नी ने यह कहा था कि जितना प्यार आप हमसे करते हैं यदि उतना ही प्यार आप भगवान से करें तो क्या से क्या हो सकता है? यह बात उकेम न में लग लगी और लगने के बाद में उन्होंने अपने आपको बदल दिया। बदला हुआ तेवर तुलसीदास का आप जानते हैं न। रामायण को बनाने वाले उस तुलसीदास को आप जानते हैं जिनके बारे में प्रसिद्ध है कि ‘तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक देत रघुबीर’।

भगवान राम तुलसीदास को चंदन लगाते थे और श्रीकृष्ण भगवान सूरदास को पकड़कर साथ साथ घूमते हैं। ऐसा हो सकता है क्या? हाँ हो सकता है और आपके लिए भी हो सकता है, यकीन रखिये। यकीन के जिए ही हमने आपको यहाँ बुलाया है। आप चाहें तो जरूर कर सकते हैं। यह क्या होगा? इसमें दो आदमियों के सहयोग की जरूरत पड़ती है, अकेले आप नहीं कर पायेंगे। लेकिन कोई बाहर का आदमी अकेला आपकी सहायता करना चाहे तो वह भी मुमकिन नहीं है। आप प्रयत्न कीजिए हम आपकी सहायता करेंगे। मरीज को दवा खानी होती है और परहेज करना होता है। चिकित्सा करने वाला दूसरा आदमी होता है। हम आपकी चिकित्सा कर सकते हैं, लेकिन परहेज तो आपको ही करना पड़ेगा। दवा तो आपको ही खानी पड़ेगी। आपने देखा होगा कि अंडा किस तरीके से फूटता है। मुर्गी के पेट में से अंडा निकलता है। मुर्गी की दया न हो तो अंडा कहाँ से आये। जन्म लेने से पहले अंडे के भीतर रीने वाले बच्चे को मेहनत करनी पड़ती है और अपनी ताकत के हिसाब से अंडे को भीतर से तोड़ना पड़ता है। कोई और तोड़ने नहीं आता। आपने देखा होगा कि जब बच्चा बाहर आता है तो अंडे के भीतर बैठे उस चूजे को मेहनत करनी पड़ती है। अपनी ताकत से वह अंडे में दरार डालता है और फूट कर बाहर निकल पड़ता है। बच्चे की ताकत, हुकूमत काम नहीं करती, उसके पहले या पीछे उसे जन्म नहीं दे सकती।

आपको अंउ के तरीके से अपना दायरा तोड़ना पड़ेगा, बच्चे के तरीके से बाहर तो निकलना पड़ेगा। आपको जो करना है, यही करना है कि आपके ऊपर जो केंचुली लगी हुई है, यदि आप उसे उतार देंगे तो आप साँप के तरीके से दौड़ते हुए चले जायेंगे। समस्या हल जायेगी, तो यह मुमकिन नहीं है। आप और हम मिलजुल कर कार्य करें। आप हमारा कहना मानें और हम आपके लिए मदद करें। अंधे और पंगे के तरीके से हम लोग मिलजुलकर नदी पार कर लें। तब परिस्थितियाँ भी ऐसी बदल जायेंगी कि मला आ जायगा।

कायाकल्प से हमारा मतलब यही था कि आपके लिए हम सहायता करेंगे कि आप अदल जायें।

आप पर हम दबाव डालेंगे कि जिस तरह की जिंदगी आप जीते रहे हैं, वह मुनासिब नहीं है। आप का जो स्वरूप अब तक का रहा है, वह आपके लिए मुनासिब स्वरूप नहीं है। अगर आपको यह दावत स्वीकार हो तो फिर आप तैयार हो जाइये, हिम्मत कीजिए, उसके लिए संघर्ष कीजिए और अनुशासन पालने के लिए तैयार हो जाइये। फिर देखिये आपका भविष्य कैसे शानदार बनता है। कायाकल्प से हमारा उद्देश्य यही था और आपको भी कायाकल्प का यही उद्देश्य समझना चाहिए और अपनी तैयारी के लिए जो मुनासिब हो, वह करने के लिए कमर खड़े होना चाहिये।


विशिष्ट सामयिक लेख - - महान याचक की महान याचना

परम पूज्य गुरुदेव का व्यक्तित्व और कर्तव्य बड़ा शानदार रहा है। इस विषय पर कितने ही लोगों ने उनके साथ जुड़े हुए विज्ञात विषयों को लिपिबद्ध भी किया है, पर अविज्ञात विषय उसमें नहीं है। उन पर प्रकाश डालने का शरीर रहने तक मनाही जो कर दी गयी थी। इन ज्ञात और अविज्ञात विषयों की शृंखला को गूँथकर जब लोग उनके समग्र जीवन पर दृष्टिपात करेंगे तो पायेंगे कि वे निश्चय ही अपने ढंग का अनुपम जीवन जी सके और इतने प्रचंड पुरुषार्थ का परिचय दे सके जिसकी सामान्यतः कल्पना तक नहीं की जा सकती। उनका कर्तव्य जितना शानदार रहा है उसकी तुलना में व्यक्तित्व की गरिमा और भी असंख्य गुनी उत्कृष्ट है। इसे कुछ वे ही समझ पाये हैं जो उनके निकटवर्ती एवं अधिकतम घनिष्ठ रहे हैं। उनने अनेकों देव परंपराओं को जन्म दिया है। कितने नवनिर्माण और कितने ही जीर्णोद्धार किये हैं। करोड़ों रोते-बिलखते व्यक्तियों में नवजीवन के प्राण फूँके हैं। पर चलते-चलते उन्हें एक अभाव खटकता ही रहा कि वे जिस रूप में चाहते थे उस रूप में साधु-ब्राह्मण की परम्परा का पुनर्जीवन हो सका क्या?

देव संस्कृति की महान परंपराओं को जीवंत रखने के लिए ऐसे व्रतशील प्रहरी चाहिए जो चोर-उचक्कों को घात न लगाने दें। उस महान संपदा को किसी प्रकार क्षति न पहुँचने देने के लिए जागरुक प्रहरी की तरह सतर्कता बरत सकें और प्रमाद को आड़े न आने दें। ब्राह्मण ऐसे ही होते हैं, साधु भी ऐसे ही। उन्हें स्वयं स्वर्ग जाने, मुक्ति पाने और सिद्धि-चमत्कार दिखाने की ललक नहीं होती, वरन् दूसरों को अपने कंधे पर बिठाकर पार लगाने की उत्कंठा रहती है। वह जितना बन पड़ता है, उतनी ही प्रसन्नता भी होती है।

महान परिवर्तनों के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता इसी बात की पड़ती है कि सत्प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए अगली पंक्ति में कौन खड़ा हो? अग्रगमन कौन करे? उत्तर एक ही हो सकता है-आदर्शों के प्रति अनन्य निष्ठा व्यक्त करने वाले संकल्पवान साधु-ब्राह्म। आज भी राजकुमारी मधूलिका संताप-ग्रस्त बैठी है। नास्तिकवादी अनैतिकता के विस्तार में वह मानवी संस्कृति देवसंस्कृति के विनाश का संकट देखती है और अपने एकाकी मन तथा प्रशांत नीले आकाश से पूछती है-”को वेदान् उद्धरस्यसी” अर्थात् वेदज्ञान का उद्धार कौन करेगा? सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन के लिए आगे कौन आयेगा? आज भी उसे इंतजार है कि कोई विद्वान आदर्शवादी कुमारिल भट्ट उधर से निकले और उसके शब्द उसके कानों में पड़े। उसका अंतःकरण इस चुनौती को सुनकर तिलमिला उठे और उसका साहस एवं पुरुषार्थ कहे कि युग की इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए उपयुक्त साधन उन्हें मिला है, फिर भी क्यों आगा-पीछा सोचें? क्यों आनाकानी करें? क्षण भर के सोच विचार के बाद निष्कर्ष पर पहुँचे और दृढ़ निश्चय के साथ वह बोल उठे -”मा विशीद बराररोहे भट्टाचार्योऽसि भूतले” अर्थात् हे देवि! चिंता न करो कुमारिल भट्ट अभी इस धरती पर जीवित है। आदर्शों के प्रति अनन्य निष्ठा व्यक्त करने वाले ऐसे संकल्पवानों की ही आज आवश्यकता है जो भीष्म प्रतिज्ञा के उपराँत उस कार्य में जुट पड़े जिस महान कार्य के लिए महाकाल ने पुकार लगायी है।

महान परंपराओं का नेतृत्व प्रचलन सदा इसी स्तर के साधु-ब्राह्मण करते रहे हैं। आरंभ में उन्हें उपहास, असहयोग, विरोध सहना पड़ा है। लोक मान्यताओं में परिवर्तन लाने वालों को अपनी निष्ठा की परीक्षा देने के लिए प्रतिकूलता की अग्नि परीक्षा में होकर गुजरना ही पड़ता है, किंतु साहसी लोग डरते नहीं। कवीन्द्र रवीन्द्र के इस उद्बोधन को गाते-गुनगुनाते आगे ही बढ़ते रहते हैं जिसकी उन्होंने अपनी प्रसिद्ध बंगला कविता “एकला चलो रे” में हुँकार लगायी है।

आदर्शों के लिए व्यक्तिगत सुख सुविधाओं और महत्वाकाँक्षाओं का परित्याग कर सकने वाले मनस्वी महामानव ही स्वयं धन्य बनते और अपने समय तथा क्षेत्र को धन्य बनाते हैं। युग की माँग ऐसे ही मनस्वी, तेजस्वी और तपस्वी साधु-ब्राह्मणों की है। ऐसे देव मानवों का निर्माण ही वह कार्य है जिसके प्रकाश में यह आशा की जा सकती है कि मानी गरिमा को, सभ्यता और संस्कृति को अक्षुण्ण रखा जा सकेगा और दलदल से उबार कर ऊँचा उठाया जा सकेगा। जो इस कृत्य में सफल हो सकने योग्य अपने निजी व्यक्तित्व का निर्माण कर सकें, समझना चाहिए कि उन्हीं के बलबूते इतना महान कार्य बन पड़ेगा। जो अपने को निर्धारित कसौटियों पर खरा सिद्ध कर सकें, उनके क्रियाकलाप कैसे ऐसे हो सकते हैं जो भारी भरकम उत्तरदायित्वों को बिना अचूकचाये वहन कर सकें।

गुरुदेव ने अनेक ठोस काम किये हैं। उनका परिवार गठन अत्यंत विस्तार वाला है, पर उसमें ऐसे लोग कह ही दीख पड़ते हैं जो माझी की भूमिका निभा सकें और अनेकों को पार उतार सकें तथा भँवरों वाली प्रचंड जल धार को चुनौती दे सकें। ऐसे लोग कम हैं जो अनवरत श्रम करके ऊसर को उद्यान में बदल सकें। पिछड़ों को आगे बढ़ा सकें और गिरों को उठा सकें। ऐसा वे ही कर सकते हैं जिनने अपने आपको निरंतर कसौटियों पर कसा और आदर्शों की आग में बिना धैर्य खोये तपाया होगा।

इस स्तर के लोग ही गुरुदेव के सहचर हो सके हैं। उन्हें प्रशंसकों, समर्थकों और सहयोगियों की कभी कमी नहीं रही। पर इन दिनों विशेष रूप से कठिनाइयों से भरे-पूरे मार्ग पर कंधे से कंधा मिलाकर और कदम से कदम मिलाकर चल सकने वाले साथी चाहिए। ऐसे लोग यदि पूरा समय साथ देते हैं तो साधु और कम समय देते हैं तो ब्राह्मण। साधुओं को प्रव्रज्या पर निकलना पड़ता है और ब्राह्मण अपने निकटवर्ती क्षेत्र में ही प्रकाश फैलाते अलख जगाते रह सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि संकल्प निभे वह बबूले की तरह कुछ क्षण कूद-फाँद करके हवा में विलीन न हो जाय। उफान ठंडा होते ही तली में न बैठ जाय। जीवन को एक लंबी तीर्थ यात्रा मानकर निर्धारित राजमार्ग पर चलता रहे। भले ही चाल कछुए जैसी धीमी ही क्योँ न हो, पर रहे निश्चित और अनवरत। दिशाभ्रम का उसमें कहीं भी व्यवधान न पड़े। कठिनाइयों और समस्याओं के नाम पर दाँत निकाल देने और विवशता व्यक्त कर देने जैसा अवसर न आये। गुरुदेव ने ऐसे ही दस हजार साथ-सहचरों को ढूँढ़ निकालने की अभिलाषा व्यक्त की थी। उनकी आरंभिक कसौटी भी छोटी ही रखी है। जो साधु स्तर का साहस कर सकें वे शांतिकुंज आकर रहे। महत्वाकाँक्षाओं को, लिप्सा-लालसाओं को त्यागें और अथक परिश्रम करते हुए ब्राह्मणोचित निर्वाह में काम चलायें। संचय में से काम चलाते हुए जितना कम पड़े उतना ही मिशन से लें। मिशन कोई जागीर नहीं है। उसमें बीस-बीस पैसे करके लोग अपने बच्चों का पेट काटकर जमा करते हैं। यह मधु संचय मिशन की संपदा है। इसमें गुलछर्रे उड़ाने और नेतागिरी का शौक पूरा करने की किसी प्रकार की गुंजाइश नहीं है। जो इतने में अपने को सिकोड़ सके वे साधु जीवन जीने के लिए कदम बढ़ायें। काम हरिद्वार या मथुरा रहकर करने योग्य भी हो सकते हैं, पर अधिकांश को परिव्राजक का काम सौंपना पड़ेगा। इसलिए बोझिल गृहस्थी का बड़ा सा जंजाल पीठ पर लदा हुआ नहीं होना चाहिए।

व्रतधारी ब्राह्मणों का कार्य ऐसा है जो किसी भी भावनाशील आदर्शवादी के लिए भारी नहीं पड़ना चाहिए। दो से चार घंटे तक का दैनिक समय जन संपर्क के लिए निकालना, किसी कारणवश नागा हो चले तो उसकी पूर्ति आगे कर देना यह दायित्व ऐसा नहीं है जो समय की व्यवस्था बना सकने वाले, आलस्य प्रमाद एवं अस्तव्यस्तता पर अंकुश लगा सकने वाले के लिए भारी पड़े।

स्वाध्याय और सत्संग की सामग्री संपर्क क्षेत्र में उपलब्ध कराते रहने के लिए कुछ राशि भी खर्च करते रहनी पड़ती है। यह न्यूनतम बीस पैसा नित्य की तो होनी ही चाहिए, ज्यादा निकाला जा से तो उससे कार्य विस्तार में और भी अधिक सुविधा होगी। इस संदर्भ में अपने इष्ट-मित्रों का भी सहयोग लिया जा सकता है।

किसी भी व्यवसाय को आरंभ करने में कुछ मूल धन लगता है। कितने ही प्रकार के प्रचार साधन क्रय करने के लिए पाँच-दा हजार की पूँजी चाहिए। इसमें कुछ उपकरण पहले से ही हो तो उतनी कटौती भी हो सकती है। जुगाड़ बिठाने पर कोई उतारू हो जा तो इतनी राशि अपने बलबूते या संपन्न मित्र-संबंधियों पर दबाव देकर या कर्ज लेकर यह व्यवस्था जुटा सकता है।

प्रत्यक्ष साधन इतने ही जुटाने हैं। प्रज्ञायोग के अनुरूप अपनी साधना चलाते रहने की बात निजी जीवन की है। इतनी उपासना कम पड़ती होगी तो उसकी पूर्ति शाँतिकुँज हरिद्वार से उसी प्रकार होती रहेगी जैसा कि गुरुदेव के सूक्ष्म-कारण सत्ता में चले जाने के उपराँत होती रही है।

इन अनुबंधों को पूरा करने वाले वरिष्ठ परिजनों की पहले भी कमी नहीं थी, पर उनमें से सक्रिय ठोस एवं वर्गीकरण नहीं किया गया था और यह असमंजस ही बना रहा था कि परिजनों में से किनकी स्थिति क्या है? युग संधि की प्रस्तुत विशय बेला में उनमें से कौन कितने उत्तरदायित्व निष्ठापूर्वक निबाह सकता है? कौन ऐसे हैं जो शेखी बघारते और उछलकूद करते तो दिखाई पड़ते हैं, पर जब काम का अवसर आता है तो दुम दबाकर बिल में घुस जाते हैं।

वस्तुतः दस हजार की माँग न तो विलक्षण है और न नवीन, केवल ठोस-जीवंतों और ढीले-पोलो का वर्गीकरण मात्र है। जो ठोस हैं - जीवंत हैं, उन पर अधिक ध्यान दिया जायेगा और जो पोले हैं उनसे उतनी ही आशा की जायेगी जितने कि वस्तुतः वे हैं। श्रेय, सुयोग और अनुदान भी उन्हें पात्रता के अनुरूप ही मिलेगा।

प्रसन्नता की बात है कि भावनाशीलों का उत्साह उमड़ पड़ा है। हजारों समर्पण पत्र आ गये हैं। उनमें कुछ साधु स्तर के हैं, कुछ ब्राह्मण स्तर के। उन्होंने विश्वास दिलाया है कि वे मिशन के कार्यों को प्रमुख मानेंगे और निजी कार्यों को गौण। काल ने युग धर्म के निर्वाह हेतु सौंपा है, उसे निश्चित रूप से पूरा करते रहेंगे। वचन निबाहेंगे और प्रतिज्ञा से पीछे न हटेंगे। इतना आश्वासन प्राप्त करने के पश्चात हम निश्चित हो जायेंगे कि पूज्य गुरुदेव ने जो उद्यान लगाया है, वह इतने मालिकों के रहते सूखने न पायेगा, वरन् उसी भूमि में नयी नर्सरी उगाकर उनके माध्यम से सर्वत्र नये उद्यान खड़े करते रहेंगे।

यह निश्चितता हमारे लिए असाधारण संतोष का और उल्लास का प्रसंग होगी। इस प्रयास के विस्तार का स्वप्न साकार होते देखते हुए हम हुलसित होते रहेंगे और उसकी सुरक्षा एवं अभिवृद्धि का पथ प्रशस्त देखकर अधिक उत्साहपूर्वक अपनी उस साधना को करते रहेंगे जिसके ऊपर वातावरण के परिमार्जन, देवसंस्कृति के उन्नयन एवं विश्वमानव के उज्ज्वल भविष्य का बहुत कुछ आधार अवलंबित है।


Quotation

समझदारी इसमें है कि हाथ में आये काम को समग्र मनोयोग और तत्परतापूर्वक निपटाया जाय। काम को सही तरह से निपटाना भविष्य में बड़े काम कर सकने की सफलता उपलब्ध करना है।


संपादकीय - अपनी से अपनी बात- - सशक्त शक्ति उद्गम से जुड़ने का ठीक यही समय

शांतिकुंज की देवसंस्कृति दिग्विजय प्रक्रिया के अंतर्गत पिछले दिनों जो हो चुका है, इन दिनों जो हो रहा है, आगे जो होने ही जा रहा है, उसका विवेचन विश्लेषण करने पर किसी को भी यह असमंजस नहीं रहना चाहिए कि इस मिशन की समर्थता संदिग्ध है। तिनके-तिनके मिलने से मजबूत रस्सा बनता है। धागे मिलकर कपड़े के रूप में विनिर्मित होते हैं। यदि यह तिनके और धागे निजी महत्वाकाँक्षा और निजी अहंकारिता के परिपोषण का उन्माद संजोये अपना अस्तित्व अलग-अलग ही बनायें रहे तो उन्हें अपना अस्तित्व तक बनाये रहना कठिन पड़ जाय। रीछ-वानरों की सेतु बनाने और सीता खोज निकालने की सफलता इसलिए मिल सकी कि उनकी पीठ पर समर्थ सत्ता का हाथ था। एकाकी पुरुषार्थ पर निर्भर रहकर तो वे केवल पेड़ों पर उछलकूद ही करते रह सकते थे। पेट भर लेना ओर जीवित बने रहना ही उनकी सफलता का चरम स्वरूप बनकर रह सकता था। सामूहिकता अपनाने और किसी समर्थ तंत्र के साथ जुड़ने पर ही उन्हें वह श्रेय मिल सका जिसके कारण उनकी तब से लेकर अब तक समान रूप से प्रशंसा होती चली आती है।

शांतिकुंज की अपनी सत्ता और महत्ता किसी दिव्य शक्ति के साथ जुड़ी होने पर ही इस स्थिति में रह रही है कि उसके द्वारा पिछले दिनों कुछ करते धरते बन पड़ा। इन दिनोँ जो हो रहा है उसका एक धूलिकण भी परखने पर पता चलता है कि इतना कुछ व्यक्ति विशेष के बल पर बन पड़ सकना संभव नहीं हो सकता। वर्तमान निर्धारणों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यदि वह किसी व्यक्ति विशेष या संगठन विशेष का प्रयास है तो उसे दुस्साहस से अधिक और कुछ नहीं माना जा सकता। पानी में बबूले कितनी महत्वाकाँक्षाएं लेकर उभरते मचलते और इतराते हैं, पर कोई समर्थ पृष्ठभूमि पीछे न रहने के कारण उनकी उछल-कूद कुछ ही समय में समाप्त हो जाती है। इंद्रधनुष जैसे विशालकाय दृश्य आधार रहित होने के कारण अपनी असाधारण दीखने वाली छाप को कुछ ही मिनटों में गंवा बैठते देखे जाते हैं।

विभिन्न मौसमों में विभिन्न प्रकार की फसलें बोई और काटी जाती रहती हैं, पर इन दिनों तो उन कल्पवृक्षों का आरोपण किया जा रहा है जो युग युगान्तरों तक जीवित रहेंगे और उन प्रयोजनों को पूरा कर दिखायेंगे जिनसे निराशा के स्थान पर आशा का - खिन्नता के स्थान पर प्रसन्नता का वातावरण बन सके, इन कल्पवृक्षों को ब्रह्म कमलों को बढ़ना और फलती-फूलती स्थिति तक पहुँचाया जा सकना नंदनवन जैसी असाधारण उर्वरता से सम्पन्न भूमि पर ही हो सकता है। अगले दिनों जिन महामानवों का समुदाय अवाँछनीयता को निरस्त करने और सुखद संभावनाओं से भरी पूरी योजनाओं के संपन्न होने के लिए कटिबद्ध हो रहा है, उनके पोषण और प्रशिक्षण के तद्नुरूप आधार अवलंबन भी चाहिए। जिन्हें ऐसी खोज करनी हो उन्हें अपने लिए उपयुक्त आधार खोजते समय शांतिकुंज के साथ जुड़ने की बात ध्यान रखनी चाहिए।

सामान्य जीवधारी पंच तत्वों के संयोग से जन्मते और जिस तिस प्रकार दिन गुजारते हुए फिर उसी प्रपंच में विलीन हो जाते हैं पर मनुष्य तो उनकी तुलना में कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ा है। इसलिए उसकी विचारणा आकाँक्षा और क्रिया पद्धति भी नर-पशुओं की अपेक्षा कुछ अधिक ही उत्कृष्ट होनी चाहिए। विशेषतया इन दिनों महाकाल द्वारा प्रामाणिकों और प्रतिभावानों के चयन हेतु परीक्षा प्रतिस्पर्धा संजोई गई है। इस तैयारी के लिए साधारण नहीं असाधारण रीति नीति अपनाने की आवश्यकता पड़ेगी।

ऐसी ही कुछ तैयारी करने के लिए इस वर्ष नैष्ठिक प्राणवान परिजनों के विशिष्ट पाँच दिवसीय सत्र इस वर्ष 15 नवम्बर से 28 फरवरी 1995 की साढ़े तीन माह की अवधि में रखे गए हैं। ये लोकनायक स्तर के सृजेताओं को प्रेरणा देने वाले तथा आने वाले समय की माँग के अनुरूप युग नेतृत्व संभालने वालों के लिए होंगे। ऐसे सौभाग्य भरे प्रसंग कभी-कभी ही किसी के जीवन में आते हैं।

महत्वपूर्ण घटना प्रसंगों व महामानवों से बिछुड़ने की नहीं, जुड़ने की सौभाग्य वर्षा को स्मरण रखा और इतिहास में लिख जाता है। कचरा चक्रवात के साथ जुड़कर आकाश चूमने लगता है। जिस महाशक्ति तंत्र को युग चेतना का उद्गम केन्द्र बनाया है वही अपनी विद्युत धारा उन तक भी पहुँचा कर रहेगी जो उस ट्रान्सफार्मर के साथ जुड़ने में भाव भरा उत्साह प्रदर्शित कर सकेंगे। आगामी शीतकाल की अवधि ऐसा ही कुछ सुअवसर, प्राणवानों के लिए आ रहा है। कैसे अनुदान वितरण संपन्न होगा तथा कौन इनका अधिकारी बनने का पात्र है, इसका विस्तृत विवरण आगामी अंक में पाठक पढ़ सकेंगे।

*समाप्त*