गहना कर्मणोगति

वेद में ऋषि कहते हैं- उद्यान ते पुरुष नावयानम्” अर्थात् हे जीव। तुझे उठना है, नीचे नहीं गिरना है। मानव योनियों में आकर तो तू ‘स्व’ की गरिमा व स्वयं को ऊँचा उठा। “कितने है जो इस मर्म को समझ पाते हैं कि मनुष्य जीवन हमें अपने पशुत्व को उभारने के लिए नहीं देवतत्व को विकसित करने के लिए मिला है। कर्मों की श्रेष्ठता द्वारा मनुष्य निश्चित ही उस पुल को पार कर सकता है जो देवत्व एवं पशुत्व, के बीच बना सत् अनन्तकाल से हम सबकी प्रगति की यात्रा का राज मार्ग बना हुआ है। इस पुल तक पहुँचना देवत्व को पहचानना व फिर उस यात्रा पर चल पड़ना जिनसे भी संभव हो पाता है, वे सभी विवेकशील, दूरदर्शी देवमानव कहे जाते है।

गीताकार के अनुसार किसी भी काल में क्षण मात्र भी कोई कर्म किए बिना रह नहीं सकता। भगवान स्वयं कहते हैं कि यदि वे भी एक क्षण कर्म करना बन्द करना बन्द कर दे तो सारा विश्व नष्ट हो जाय। सारा लोक व्यवहार नष्ट हो जाए। कर्म करते रहना, कर्त्तव्य परायण बने रह मनुष्य जीवन को सतत् प्रगति की ओर देवत्व की ओर बढ़ाते चलना ही मनुष्य की सहज नियति है। यह बात अलग है कि कर्म का स्वरूप जाने बिना जब मनुष्य अशुभ कर्मों में अकर्मों विकर्मों में निरत हो जाता है तो वह जीवन यात्रा को चलाते हुए भी पतन की ओर ही जाता देखा जाता है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं- कर्म क्या है, अकर्म क्या है इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते है, इसीलिए सभी को कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए अकर्म का भी विकर्म का भी क्योंकि कर्म की गति गहन है। (गहना कर्मणोगति)

अकर्म उन्हें कहा जाता है जिन्हें न करने से पुण्य तो नहीं होता किन्तु किये जाने पर पाप लगता है। विकर्म उन्हें कहते है जो परिस्थिति विशेष के अनुसार वास्तविक रूप से कुछ अलग स्वरूप ले चुके हैं तथा निषिद्ध कर्म के लिए गीताकार मार्गदर्शन करता हुआ कहता है कि मनुष्य को यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों को बिना किसी आसक्ति के लिए। जो भी कर्म इस भाव से किये जायेंगे वे सत्कर्म कहलायेंगे व बंधनों से परे व्यक्ति को जीवन्मुक्तिः की ओर ले जायेंगे। हम इस छोटे से तत्त्वदर्शन को समझ लें कि परमार्थ में ही स्वार्थ है तो दुनिया की माया जंजाल से भवबंधनों से मुक्ति की ओर ले जायेंगे। हम इस छोटे से तत्त्वदर्शन को समझ लें कि परमार्थ में ही स्वार्थ है तो दुनिया की माया जंजाल से भवबंधनों से मुक्ति सहज ही मिल सकती हैं


गड़रिये से राजा

“मुझे इस सुनहरे रंग के मेमने की आवश्यकता है। तुम इसके बदले जितना धन चाहोगे मैं देने को तैयार हूँ। “ परशिया के राजा ने हंगरी के राजा मत्थियस के गड़रिये को प्रलोभन देते हुए कहा।

मैं राजसिंहासन के सम्मुख असत्य भाषण नहीं कर सकता। यह सब राजा की भेड़े हैं। मैं उनकी आज्ञा के बिना एक भी भेड़ देने को तैयार नहीं हूँ गड़रिये ने उत्तर दिया।

गड़रिया बड़ा ईमानदार और सत्यवादी था। हुआ यह कि एक दिन परशिया के राजा अपनी अविवाहिता युवा पुत्री के साथ मत्थियस के अतिथि बने। बातों ही बातों में गड़रिये की चर्चा चल पड़ी। मत्थियस ने अतिथि को बताया मेरे गड़रिये की प्रशंसा परशिया के राजा को अच्छी न लगी। उसने कहा- “देखना एक दो दिन में ही मैं उससे झूठ बुलवा दूँगा

“असम्भव ऐसा हो ही नहीं सकता”

यदि मैं उससे असत्य भाषण न करवा सका तो आधा राज्य हार जाऊँगा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा मैं आपके सामने करता हूँ। “मत्थियस ने जोश में कहा।

रात्रि के भोजनोपरान्त परशिया का राजा अपने शयन कक्ष में आया और पलंग पर लेटे-लेटे काफी राज तक यहीं सोचता रहा कि इस गड़रिये से कैसे असत्य भाषण करवाया जाय। फिर उसे ध्यान आया कि आज शाम को जब वह भेड़े चराकर वापस लाया था तब उनमें एक छोटा-सा मेमना सुनहरे रंग का था। यदि अधिक धन का प्रलोभन देकर उसे खरीद लिया जाय तो उसे मेमने के गायब होने की कोई कल्पित कहानी गढ़कर राजा के सम्मुख कहनी होगी। जिससे मत्थियस का अहं चूर चूर हो जाएगा।

कंचन से अधिक प्रलोभन कामिनी का होता है। ऐसा सोचकर राजा ने अपनी अपूर्व सुंदरी कन्या को गड़रिये के पास भेजा। उसे अपने ऊपर पूर्ण विश्वास था कि हमारा वार खाली न जाएगा। बड़े-बड़े ईमानदार और संयमी व्यक्ति भी कंचन और कामिनी के प्रभाव में आकर फिसलते देखे गए है। फिर यह तो एक साधारण-सा पशुपालक है। राजकन्या गड़रिये के पास जाकर कहने लगी-तुम्हारी भेड़ों में यह छोटा-सा मेमना देखने में कितना सुन्दर लगता है। काश! यह प्यारा मेमना मेरे पास होता तो मैं इसे और लाड़ दुलार से रखती। इसके केश और मेरी केश राशि में कितना साम्य है। तुम यह मेमना मुझे दे दो। इसके बदले तुम जितना द्रव्य चाहोगे मैं तुम्हें अपने पिता से दिलवा दूँगी और मैं सदा तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगी मैं तुम्हारी लिए एक शीतल पेय भी लायी हूँ।”

गड़रिये को उस समय प्यास लग रही थी। उसने राज कुमारी के हाथ से जल पात्र लेते हुए कहा- ‘‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम चाहती हो। पर मैं किसी भी मूल्य पर अपनी ईमानदारी और जिम्मेदारी बेच नहीं सकूँगा।”

गड़रिये ने पात्र को होठ से लगाया और उसे रिक्त करके राजकुमारी को वापस कर दिया। वह समझ गया कि वह मधुर पेय जल नहीं तीखी मदिरा है। शनैः शनैः उसे मूर्छा आने लगी। मौका पाकर राजकुमारी ने उस मेमने को उठा लिया और राजभवन वापस आ गई। पिता ने जब पुत्री की गोद में मेमना देखा तो वह खुशी से चीख पड़ा- “बेटी! तुमने आज मेरे मन की मुराद पूरी कर दी अब मैं मत्थियस को लज्जित कर सकूँगा।”

राजभवन में मत्थियस, परशिया के राजा, उनकी युवा पुत्री तथा अन्य कई मंत्री भी बैठे चर्चा कर रहे थे। उसी समय गड़रिया आया। उसने सबको उचित अभिवादन कर बड़े शिष्टाचार के साथ कहा-राजन् आज मैंने सुनहरे मेमने को उससे भी सुन्दर मेमने से बदल लिया है। मेरा विश्वास है कि अपने लिए यह घाटे का सौदा नहीं है और यह सुन्दर मेमना यह रहा। “गड़रिये ने राजपुत्री की ओर संकेत करते हुए कहा।

सारी बात सामने आई। परशिया के राजा का सारा प्रयास व्यर्थ गया। एक सामान्य से गड़रिया की ईमानदारी और सत्यवादिता पर सब मुग्ध थे। परशिया नरेश पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार आधा हार चुके थे।

मत्थियस ने यह जीता हुआ राज्य गड़रिये को देते हुए कहा - “वत्स! तुम्हारी कर्तव्य निष्ठा से मैं प्रसन्न हूँ आज तुमने मेरे सम्मान की बहुत बड़ी रक्षा की है। में भी तुम्हें अपने राज्य का एक भाग पुरस्कार स्वरूप प्रदान करता हूँ और अब तुम दोनों खण्डों के राजा हुए।”

परशिया का राजा खड़ा हो गया। उसने कहा - “ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। मैं ऐसे ही वर की तलाश अपनी लड़की के लिए कर रहा था। मुझे ऐसा साहसी और सत्यव्रती युवक बहुत खोज के बाद पहली बार मिला है। अतः मैं अपनी कन्या का हाथ भी इसके हाथों में सौंप कर निश्चिंत हो जाना चाहता हूँ।

परशिया के राजा ने अपनी पुत्री का हाथ उस गड़रिये के हाथ में देकर बड़ी प्रसन्नता और संतोष का अनुभव किया। गड़रिये से राजा बनने वाले सम्राट इनोसेन्थ की कथा गाथा अभी भी मध्य एशिया के देशों में बड़ी भाव-श्रद्धा के साथ कही सुनी जाती है।


क्या ईश्वर सचमुच मर गया?

इक्कीसवीं सदी की और बढ़ते कदमों के साथ यह सोच उठना स्वाभाविक है, कि नए युग की विचारधारा क्या होगी? किस सोच को लेकर नया जमाना अपने उज्ज्वल भविष्य की रचना करेगा? इन सवालों का जवाब पाने से पहले जरूरी है कि बीसवीं सदी की चिन्तन प्रणालियों की छान बीन करें। आखिरकार अपने समय में नितान्त मूल्यवान समझी जाने वाली इन चिन्तन धाराओं पर अब क्यों ढेर सारे सवालिया निशान लग गए?

आज स्थिति कुछ भी क्यों न हों, पर पिछले दिनों बीसवीं सदी का समूचा ताना बाना रूस के प्रजातंत्र मार्क्स के साम्यवाद और नास्तिकवाद के इर्द गिर्द बुना जाता रहा है। इनके प्रतिपादनों पर विचार करने के लिए हर किसी को बाध्य होना पड़ा है। क्या समर्थक क्या विरोधी दोनों ही पक्ष प्रस्तुत तर्कों पर विचार करने के लिए बाध्य हुए हैं।

इस तिकड़ी के प्रतिपादनों को उपहास उपेक्षा भर्त्सना के प्रहार कम नहीं सहने पड़े परम्परा समर्थक लोगों ने उनका विरोध करने में कुछ कमी नहीं रखी। पर कुछ कारण ऐसे हैं जिनके कारण वे समस्त प्रतिबन्धों का उल्लंघन करते हुए आगे बढ़ते चले गए। प्रजातन्त्रवाद की पिछली दशाब्दियों में अच्छी खासी धूम रही है। युग-युग से चले आ रहे राजतंत्र की जड़ें उस प्रजातन्त्रवादी तूफान ने उखाड़ कर फेंक दी। दुनिया के अधिकांश देशों में प्रजातंत्र शासन स्थापित हुए। यों अब अनुभव ने उसमें भी खोट निकाल दी है कि अज्ञ और अनुत्तरदायी लोगों के हाथ में वोट का अधिकार चले जाने से चुने हुए लोगों में अवांछनीय तत्त्वों की भरमार हो जाती है। फिर तो जिन लोगों द्वारा प्रजा पर राज्य होने के पवित्र उद्देश्य से भटक कर निहित स्वार्थों की पूर्ति में लग जाते हैं और प्रजा के हाथ ऐसा कुछ नहीं लगता जिसे पाने के उसे स्वप्न दिखाए गए थे। इस खोट के निराकरण का उपाय न देखकर अब प्रजातन्त्र के प्रति आरम्भिक आकर्षक शिथिल होने लगा है और यह सोचा जा रहा है कि चुनाव पद्धति में कोई ऐसा मौलिक और क्रान्तिकारी परिवर्तन होना चाहिए जिससे प्रजाद्रोही तत्त्वों को प्रजापति बनने की घुसपैठ से रोका जा सके।

दूसरी विचारधारा है मार्क्स का साम्यवाद। इसके लिए भी लोगों का आरम्भिक उत्साह कम नहीं था। आर्थिक समानता का नारा निर्धन और अभावग्रस्त वर्ग को बहुत आकर्षक लगा। गरीबों! तुम्हें साम्यवादी बनकर सिर्फ गरीबी ही खोनी है। “इस आश्वासन ने सहज अर्थ लाभ के सुखद स्वप्नों की वजह से बहुमत को साम्यवाद समर्थक बना दिया। इस की राज्य क्रान्ति के बाद साम्यवाद मात्र दर्शन न बनकर प्रचण्ड तूफान बन गया। एक के बाद एक देश उसकी चपेट में आने लगे। जहाँ शासन सत्ता नहीं हथियाई जा सकी, वहाँ भी साम्यवादियों की मान्यताओं से प्रभावित लोगों की संख्या कम नहीं रहीं।

परन्तु समय बदलते देर नहीं लगी। प्रजातंत्र की तरह साम्यवादी तंत्र के खोट भी अनुभव ने सामने लाकर रख दिए। व्यक्ति को शासन का मूक बधिर गुलाम बनाकर जिस प्रकार अनुगमन के लिए प्रताड़ित होना पड़ा है, उस लोभहर्षक दबाव के कारण लोक चेतना भयाकुल होकर थर्रा उठी। साम्यवादी बनने का मतलब है व्यक्तिगत चेतना की समाप्ति। वह कुछ नए सुधार, सुझाव संशोधन प्रस्तुत करने में असमर्थ होकर बौद्धिक अपंग की तरह सिर्फ जी सकता है। उच्च सत्ता के विरुद्ध कुछ करना तो दूर सोचा भी नहीं जा सकता। साम्यवाद के साथ अधिनायकवाद, जिस प्रकार अविच्छिन्न बनकर प्रकट हुआ, उससे सम्भव है उन देशों की आर्थिक वैज्ञानिक अथवा दूसरी प्रगतियों में सहायक हुई हो। पर व्यक्ति की मौलिकता एवं

स्वतन्त्रता का एक प्रकार से अन्त हो गया है।

यह घाटा इतना बड़ा था जिसकी वजह से सामान्यजन विद्रोह पर उतारू हो गया। इस विद्रोह का ही परिणाम रहा कि रूस में उपजे साम्यवाद की कब्रगाह भी वहीं बन गई। प्रख्यात बर्लिन की दीवार टूटने के साथ ही एक मृग मरीचिका का समापन हो गया।

यूँ सम्पन्न वर्ग की समाप्ति से विपन्न वर्ग की ईर्ष्या को थोड़ा समाधान जरूर मिलता है। हम दुखी तो दूसरे सुखी भी क्यों रहें इस भाव विद्रोह से अवश्य ही साम्य सिद्धान्तों को राहत मिलती है, किन्तु दूसरा स्वप्न पूरा नहीं होता। प्रजा की स्थिति सुधारने की क्वचित् ही गुँजाइश बचती है। राजतंत्र या प्रजातन्त्र वाले देशों की तुलना में साम्यतंत्र के अंतर्गत रहने वाली प्रजा की स्थिति कुछ अच्छी नहीं गई जरूरी ही है। प्रतिपादन ने साम्यतंत्र को अंगीकार करने का अर्थ स्वर्ग राज्य में प्रवेश करना बताया था। पर अनुभव ने बताया कि वह सामंती गुलाम प्रथा की दुःखद स्मृतियाँ ही ताजा कर रही है।

प्रजातंत्र और साम्यवाद की तरह ही तीसरी प्रचण्ड विचारधारा नास्तिकवाद की है। जिसने बुद्धिवाद को बहुत प्रभावित किया है। यों अनीश्वरवाद कोई शासन पद्धति नहीं है फिर भी यह तो मानना पड़ेगा कि जीवन की गतिविधियों को प्रभावित करने में उसका बहुत बड़ा हाथ है। ईश्वरवाद मात्र पूजा उपासना की क्रिया-प्रक्रिया नहीं हैं। उसके पूछे एक प्रबल दर्शन भी जुड़ा हुआ है जो मनुष्य की आकांक्षा, चिन्तन, प्रक्रिया और कर्म पद्धति को प्रभावित करता है। समाज संस्कृति, चरित्र, संयम, सेवा, पुण्य, परमार्थ आदि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने से व्यक्ति की भौतिक सुख सुविधाओं में निश्चित रूप से कमी आती हैं। भले ही उस बचत का उपयोग लोक कल्याण में कितनी ही अच्छाई के साथ क्यों न होता हो। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते हुए जो प्रत्यक्ष क्षति होती है उसकी पूर्ति ईश्वरवादी स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वरीय प्रसन्नता आदि विश्वासों के आधार कार्य करने के आकर्षण सामने आने पर वह ईश्वर के दण्ड से डरता है। नास्तिकवादी के लिए न तो पाप के दण्ड से डरने की जरूरत रह जाती है और न पुण्य परमार्थ का कुछ आकर्षण रहता है। आत्मा का अस्तित्व अस्वीकार करने और शरीर की मृत्यु हो जाने की मान्यता उसे यही सुझाव देती है कि जब तक जीना हो अधिकाधिक मौज मजा उड़ाना चाहिए।

उपासना से भक्ति को अथवा भगवान को क्या लाभ होता है यह सवाल पीछे का है। प्रधान तथ्य यह है कि आत्मा ओर परमात्मा की मान्यता मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व की एक रीति नियम के अंतर्गत बहुत हद तक जकड़े रहने में सफल होती है। इन दार्शनिक बंधनों को उठा लिया जाय तो मनुष्य की पशुता कितनी उद्धत हो सकती है और उसका दुष्परिणाम किस प्रकार समस्त संसार को भुगतना पड़ सकता है। इसकी कल्पना भी कँपा देने वाली है।

निःसन्देह इस युग के महान् दार्शनिकों में से रूसो और मार्क्स की भाँति ही फ्रेडरिक ीनत से की भी गणना की जाती हैं इन तीनों ने ही समय की विकृतियों को ओर उसके कारण उत्पन्न होने वाली व्यथा-वेदनाओं को सहानुभूति के साथ समझने का प्रयत्न किया है। उन्होंने मनःस्थिति के अनुरूप उपाय भी सुझाए है। दुर्बलता बस इतनी रहीं कि समग्रता के स्थान एक पक्षीय सोच प्रस्तुत की गई।

शासन तन्त्र पिछले दिनों निरंकुश राजाओं और सामंतों के हाथ चल रहा था उनके स्वेच्छाचार का दुष्परिणाम निरीह प्रजा को भुगतना पड़ता था। प्रजातंत्र का एवं तदुपरान्त साम्यतंत्र का विकल्प सामने आया। बौद्धिक जगत में ईश्वर की मान्यता सबसे पुरानी और सबसे सबल लोक समर्थित होने के कारण बहुत प्रभावशाली रहीं। लोक मानस को दिशा देने में उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि ईश्वरवाद के नाम पर भ्रान्तियों का इतना बड़ा जंजाल खड़ा कर दिया गया हैं। जिससे आस्तिकवादी दर्शन का मूल प्रयोजन ही नष्ट हो गया। निहित स्वार्थी ने नष्ट हो गया। निहित स्वार्थों ने भावुक जनता का शोषण करने में कोई कसर न रखी। इतना ही नहीं अनैतिक ओर अवांछनीय कार्य भी ईश्वर की प्रसन्नता के लिए करने का विधान बन गए। राजतंत्र की दुर्गति ने जिस प्रकार रूसो और मार्क्स को उत्तेजित किया। ठीक वैसी ही चोटीनत से को ईश्वरवाद के नाम पर चल रही विकृतियों ने पहुँचाई।

उसने अनीश्वरवाद का नारा बुलन्द किया और जनमानस पर से ईश्वरवाद की छाया उतार फेंकने के लिए तर्क शास्त्र एवं भावुकता का खुलकर प्रयोग किया। उसने जन चेतना को पुकारते हुए कहा-ईश्वर की सत्ता मर गई, उसे दिमाग से निकाल फेंको, नहीं तो शरीर पूरी तरह गल जाएगा। स्वयं को ईश्वर के अतीव में जीवित रहने का अभ्यास डालो। अपने पैरों पर खड़े होओ। अपनी उन्नति आप करो और अपनी समस्याओं का समाधान आप ढूँढ़ो अपने सत् को अपनी इच्छाशक्ति से स्वयं जगाओ और उसे ईश्वर की सत्ता के समकक्ष प्रतिद्वन्द्वी के रूप में प्रस्तुत करो। अतिमानव बनने की दिशा में बढ़ो पर जमीन से पाँव उखाड़कर आसमान में मत उड़ो वस्तुस्थिति की उपेक्षा कर कल्पना के आकाश में उड़ोगे तो तुम्हारा भी वहीं हश्र होगा जो ईश्वर का हुआ हैं।”

नीत्से की संगीत की आत्मा से त्रासदी का जन्म प्रकाश की पहली झलक जरथुस्त्र बोला, प्रफुल्लता विवेक पुण्य और पाप से दूर नीति वाक्यों की वंश परम्परा वैग्नर एक चरित्र एंटीक्राइस्ट एके होमों’ इच्छा शक्ति से समग्र समर्थता तक’ पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुई। इन सबमें उसने प्रचलित ईश्वरवाद के साथ जुड़ी हुई भ्रान्तियों और तथ्य परक विश्लेषण किया है और बताया है कि इस मान्यता को इसी रूप में अपनाने से व्यक्ति और समाज की कोई भलाई नहीं हो सकती। एक कदम और आगे बढ़कर उसने एक आकर्षक घोषणा की और लोगों से कहा ईश्वर मर गया। हमने और तुमने मिलकर उसे मार दिया।”

जहाँ तक घोषणा की बात थी लोगों को विपर्यवादी मनोवृत्ति को बहुत भाई और उनके प्रतिपादन खूब पढ़े गए। उन पर घर-घर में, चौराहे-चौराहे पर चर्चा हुई। किसी ने भला कहा-किसी ने बुरा माना। जो हो इस प्रतिपादन ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। सर्वत्र उसमें पूछा जाने लगा-यदि ईश्वर नहीं रहा तो उसका स्थानापन्न कौन बनेगा?

जीवन का लक्ष्य क्या रहेगा? संस्कृति किस आधार पर टिकेगी? मर्यादाओं की रक्षा कैसे होगी? समाज का बिखराव कैसे रुकेगा? धर्म आर नीति को किसका आश्रम मिलेगा? प्रेम परमार्थ में किसे क्यों रुचि रहेगी? यही प्रश्न भीतर से भी उभरे। कुछ दिन तो हेकड़ी से वह यही कहता रहा -” जो सत्य है वह असत्य नहीं हो सकता। समस्याओं की आशंका से यथार्थता को झुठलाया नहीं जा सकता। ईश्वर तो मर ही गया है, अब अपनी समस्याएँ स्वयं सुलझाओ।”

नीत्से की विचारता क्रमशः यह स्वीकार करती चली गई कि ईश्वर भले ही मर गया हो, पर एक अनुशासन के निर्धारक कर्ता का स्थान रिक्त होने से जो शून्यता उत्पन्न होगी, उसे सहज ही न मारा जा सकेगा। उद्देश्य, आदर्श और नियंत्रण हट जाने से मनुष्य जो कर गुजरेगा, वह ईश्वरवादी भ्रान्तियों की अपेक्षा अधिक दुखदायी ही सिद्ध होगा। इसके समाधान में उसने अतिमानव बनने का लक्ष्य सामने रखा। मनुष्य को अपनी इच्छाशक्ति इतनी प्रखर बनानी चाहिए जो उसके व्यक्तित्व को अतिमानव स्तर का बना सके। वह निखरा हुआ व्यक्ति इतना प्रचण्ड होना चाहिए कि जन प्रवाह के साथ बहती हुई विकृतियों पर नियंत्रण स्थापित करने के साधन जुटा सके। मनुष्य जीवन का लक्ष्य अतिमानव के रूप में विकास होना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन में उसे इतनी इच्छा शक्ति, उत्पन्न करनी चाहिए जो संकल्पों के मार्ग में आने वाले हर प्रतिरोध का निराकरण कर सके। सामाजिक जीवन में उसे इतना प्रतिभाशाली और साधन सम्पन्न होना चाहिए कि प्रचलित अवांछनीयताओं पर नियंत्रण कर सकने की क्षमता का अभाव अखरे नहीं।

अतिमानववादी की बैसाखी के सहारे लंगड़ा अनीश्वरवाद समग्र माना जाने लगा। इसका पोषण भौतिक विज्ञान ने यह कह कर किया कि ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व का ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता जो प्रकृति के प्रचलित नियमों से आगे तक जाता हो। इस वैज्ञानिक प्रतिपादन ने मनुष्य की उच्छृंखल अनैतिकता पर और भी अधिक गहरा रंग चढ़ा दिया। तदनुसार वह मान्यता एक बार तो ऐसी लगने लगी कि आस्थाओं का अन्त वाला समय अब निकट ही आ पहुँचा। अतिमानववाद के अर्थ का भी अनर्थ हुआ और यूरोप में हिटलर मुसोलिनी जैसे लोगों के नेतृत्व में नृशंस अतिमानवों की एक ऐसी सेना खड़ी हो गई जिसने समस्त संसार को अपने पैरों तले कुचल देने की हुंकारें भरना आरम्भ कर दिया।

खोट प्रजातंत्र और साम्यवाद की तरह अनीश्वरवाद में भी है। इसका उचित समाधान “आध्यात्मिक समाजवाद” में ही निहित है।

इक्कीसवीं सदी के इस तत्त्वदर्शन को यदि युग दर्शन कहें तो अत्युक्ति न होगी। आध्यात्मिक समाजवाद के तत्त्वचिंतन में आध्यात्मिकता को वैयक्तिक और सामाजिक क्रिया–कलापों का प्रेरणा केन्द्र ऊर्जा स्रोत माना गया है। इससे समर्थता पाकर परिष्कृत और समाज में अनोखी जीवन कला को शिल्प कर सकेगी। समाजवाद को प्रजातंत्र एवं साम्यवाद के मिले-जुले रूप में समझा जा सकता है इसमें आध्यात्मिकता का समावेश होने से एक ऐसी रचना सम्भव हो सकेगी जिसमें व्यक्ति की मौलिकता नष्ट न ही-वह अपने उत्कर्ष और उन्नति के चरम तक पहुँच सके। साथ ही उसमें ऐसी कोमल भावनाएँ विकसित हो सकें कि वह अपनी उपलब्धियों को सर्व जन हिताय-सर्वजन सुखाय प्रस्तुत करे। साथ ही इस तत्त्व चिन्तन से प्रेरित हुआ समाज स्वयं को ऐसी प्रयोगशाला के रूप विकसित करें जहाँ सभी सुविकसित और सुव्यवस्थित हो रह सकें। नए युग की इस विचार पद्धति में जहाँ प्रचलित दर्शन अपनी पूर्णता खोज सकते है। समाधान तलाशे जा सकते है।


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आखिर नींद आती क्यों नहीं?

अनिद्रा को प्रायः मनः जनित रोग समझा जाता है। यह सत्य है। अधिकांश मामलों में इसका कारण भी मानसिक ही होता है, पर सदा यह मानसिक अव्यवस्था को ही दर्शाती है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। कई बार इसके पीछे कई ऐसे सामान्य कारक जिम्मेदार होते है, जो अनिद्रा जैसी स्थिति पैदा कर देते है, यथा सोते समय हाथ-पैर न धोना बिछावन का गंदा होना, पलंग की वस्तु, सोने की दिशा एवं पृथ्वी का भू चुम्बकीय क्षेत्र आदि भी नींद नहीं आने के निमित्त कारण हो सकते है।

आज विज्ञान का युग है। औद्योगिक एवं विभिन्न प्रकार के परिष्कृत यंत्र उपकरणों के निर्माण क्षेत्र में इसने जितनी प्रगति की है, उसी अनुपात में ही भौतिक सम्पन्नता भी बढ़ाई है, विभिन्न प्रकार के सुविधा साधन भी जुटाये है। यहाँ तक कि लोगों ने ओढ़ने बिछाने तक के कपड़ों में भी कृत्रिमता का जाल बुन रखा है। शरीर को कड़ाई और कठिनाई से बचाने के लिए रजाइयों में ऊँचे स्तर की रुई भरी जाती है, पर ओढ़ने वाले इस तथ्य से सदैव अनभिज्ञ ही बने रहते हैं कि सिंथेटिक कपास के तकिये ओर रजाई एलर्जी के रूप में प्रकट होकर लोगों को चैन से नहीं सोने देते। इस संबंध में एक जर्मन कहावत बड़ी लोकप्रिय बन चुकी है “अच्छा तकिया अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक है। “नारमन डाइन की पुस्तक में संगीत ध्वनियुक्त तकिये का उल्लेख मिलता है। स्त्री पुरुष के सिर की भार-भिन्नता को ध्यान में रखते हुए इनका निर्माण किया गया है। जो गहरी नींद आने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं कहीं कहीं तो चुम्बकीय चिकित्सा प्रणाली का समावेश भी तकिये में देखने को मिला हैं लंदन के बैल एण्ड क्रायडन डिपार्टमेंटल स्टोर में स्लंबर एड पिलो इसी आवश्यकता की पूर्ति करते है। फोम के बीच में महीन और अस्थिर चुम्बक संलग्न तरंगों का संचार हो उठता है, जिससे मानसिक तनाव दूर होकर नींद आसानी से आ जाती है।

पलंग के पाये रबर अथवा शीशे के न बनाये जाएँ रोगोपचार संबंधी क्लीनिकों की जन्मदात्री मेरीस्टोप के अनुसार पृथ्वी से प्रवाहित विद्युत स्पंदन का संबंध शरीर से अवश्य जुड़ा रहना चाहिए। स्वास्थ्य रक्षा के लिए उनने भूमि शयन की परम्परा को पुनर्जीवित करने पर बल दिया है।

शास्त्रों में सोते समय की उपयुक्त-अनुपयुक्त दिशाओं का वर्णन है। दिशाओं का निर्धारण व्यक्ति की मनोदशा को पूरी तरह प्रभावित करके छोड़ता है। शयन कक्ष में पलंग की स्थिति भी तदनुरूप रखनी चाहिए। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्स डिकेंस तो सोते समय दिशासूचक यंत्र को जेब में रख लिया करते थे। मेरी स्टोप ने नींद नामक एक पुस्तक लिखी है जिसमें पलंग के सिर वाला भाग उत्तर या दक्षिण में होने पर बल दिया है। परन्तु यह स्थिति योग साधना में निरत रहने वालों के लिए ही उपयुक्त बैठती है। क्योंकि पर्यावरणीय तनाव क्षेत्र को सहन करने की सामर्थ्य सामान्य लोगों की अपेक्षा योगी संयमी लोगों में अधिक होती है।

चिकित्सा शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार सामान्य स्तर के व्यक्ति को उत्तर दक्षिण की दिशा में सिरहाना नहीं रखना चाहिए। उनके स्वास्थ्य के लिए तो पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोना ही अनुकूल पड़ता है। मद्रास के वी.एच. मेडिकल सेंटर के अनुसंधान कर्ताओं के कथनानुसार उत्तर की दिशा में सिरहाना रखने से परिधीय रक्त प्रवाह में अप्रत्याशित कमी आती देखी गयी है, जिससे स्वभाव में चिड़चिड़ापन तथा भ्रमग्रस्तता और तनाव की स्थिति उत्पन्न होने लगती है। परीक्षणों उपरान्त उनने पाया कि जो व्यक्ति पूर्व दिशा को सिर करके सोये उनके परिधीय रक्त प्रवाह में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होने लगी। कहने का तात्पर्य है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का प्राणि जगत पर पूरा प्रभाव पड़ता है। उत्तर दिशा में यदि सिर रहेगा, तो मस्तिष्क के विद्युतीय क्रिया−कलाप में विशेष अड़चन एवं अवरोध खड़ा होता है। जबकि पूर्व में सिर करके सोने से यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती इस दशा में मस्तिष्क के विद्युतीय क्रिया−कलाप तीव्र हो जाते है। इतना ही नहीं अब इस चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव से आमवात, गठिया और मिर्गी रोग के उपचार में भी सफलता मिल रही है।

अतः सोने से पूर्व यदि सामान्य लगने वाले इन तथ्यों पर ध्यान दिया जा सके, तो व्यक्ति अनिद्रा जैसी दुःखदायी स्थिति से बच सकता है।


शतहस्तं समाहर, सहस्त्रहस्तं संकिर

हममें से न जानें कितने लोग यह सोचते रहते हैं कि उनके पास जितनी धन सम्पत्ति इकट्ठी होगी, उसी हिसाब से उनके भाग्य और पुरुषार्थ का लोहा मानेंगे। उन्हें बड़प्पन का गौरव मिलेगा। इनमें से ज्यादातर अपनी इस सोच को पूरा करने के लिए कुछ भी करने के लिए उतारू हो जाते है। भले इसके लिए उन्हें खुद को कितना भी बुरा और घिनौना क्यों न बनाना पड़े? इसी सनक ने अनेकों को बढ़-चढ़ कर बहुमूल्य सम्पदा का स्वामी बनने के लिए प्रोत्साहित किया। वे उस संचय का उद्धत प्रदर्शन करके लोगों की आँखों को चौंधियाने की कोशिश भी करके रहे। हो सकता है उनके आस-पास घिरे चापलूसों ने उनकी इन सनक का समर्थन भी किया हो। पर अन्ततः इसके जो परिणाम सामने आए, उस समय इनका साथ देने वाला कोई न रहा।

ऐसों का साथ देता भी कौन है? इनकी सम्पत्ति का प्रदर्शन देखकर तो लोगों के मन में ईर्ष्या ही पैदा होती है। उसे अपने अधिकार में करने के लिए अनेकों के मुँह में से लार टपकती है और जैसे भी बने वैसे उसे हथियाने के लिए दाँव–घातों में से हर एक का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार के आक्रमणों को आमंत्रित करने का श्रेय या दोष उस अनावश्यक सम्पत्ति के संग्रह और उसके उद्धत प्रदर्शन को दिया जा सकता है।

कोहिनूर हीरे की कहानी कुछ इसी तरह की है। वह जहाँ भी गया, जहाँ भी रहा अपने साथ अनेकों विपत्तियाँ समेट बटोर कर ले गया और उसे रखने वाले के लिए प्राण संकट के सरंजाम जुटाता रहा। शाहजहाँ ने तख्तोतास इसीलिए बनवाया था कि वह संसार के सबसे वैभवशाली लोगों में गिना जा सके। उसकी पीढ़ियाँ उस पर बैठकर पुरखों के पुरुषार्थ के गीत गाती रहे। पर वैसा हो न सका जैसा चाहा गया था। वैभव का सम्पादन करने वालों की दुर्भाग्य से एक आँख कानी होती है। वे एक पक्षीय एकांगी विचार करते है। यह नहीं देख सोच पाते कि सम्पत्ति संग्रह का एक विपरीत पक्ष भी है और वह इतना घातक है कि महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति को अत्यन्त कष्टकारक परिस्थितियों में बदल सकता है।

कोहिनूर की बात भी कुछ ऐसी ही है। भागवत् पुराण में इसका उल्लेख स्यमतं मणि के रूप में मिलता है। द्वारिका के एक नागरिक सत्राजित के पास वह थीं। कृष्ण ने उससे कहा यह मणि राजा के लायक हैं। उसे महाराज उग्रसेन के पास पहुँचाना चाहिए। सत्राजित इस पर तैयार न हुआ, तो घटनाक्रम ने दूसरा ही मोड़ ले लिया। सत्राजित का भाई प्रसेनजित उसे सदा छाती से लगाए फिरता था। एक दिन सिंह ने प्रसेनजित को मार कर वह मणि छीनी, सिंह को रीछ ने मारकर उस पर कब्जा जमाया। रीछ की भी खैर नहीं रहीं। श्रीकृष्ण भी उसे पाकर चैन से न बैठ सके और बहेलिए के हाथों मारे गए। इसके बाद वह पाण्डुवंशियों के पास पहुँचा। परीक्षित जन्मेजय चन्द्रगुप्त मौर्य, बिम्बसार अशोक ब्रहद्रथ पुष्पमित्र एक के बाद एक के पास पहुँचने की कथाएँ भी बड़ी कष्टकर है। उसका हस्तांतरण शान्ति और सद्भावना पूर्ण नहीं हुआ वरन् दुरभिसंधियाँ और हत्याएँ ही उसे इधर उधर लिए फिरी।

कनिष्क, चन्द्रगुप्त, हर्षवर्धन के बाद वह मालव नरेश यशोवर्मा के पास पहुँचा। उनके वंशज राजा रामदेव पर अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया और मालव देश को पद दलित करके उस हीरे को हथिया लिया। इसके बाद दिल्ली के बादशाहों के अधिकार में वह देर तक बना रहा इब्राहिम लोदी की पराजय के बाद उसकी बेगम दिल्ली छोड़कर आगरा आ गयी थी। उस पर हुमायूं ने हमला कर दिया। इज्जत बचाने के लिए बेगम को हीरा हुमायूं को भेंट करना पड़ा।

हुमायूं की मौत सीढ़ी पर से फिसलने के कारण हो गयी। वह कई पीढ़ियों तक उसके वंशजों के पास बना रहा। मुहम्मदशाह पर ईरानी लुटेरे नादिरशाह ने हमला कर दिया और उसकी पगड़ी में छिपा हीरा झटक कर अपने कब्जे में कर लिया। नादिरशाह के मुँह से उसे देखते ही शब्द निकला कोह ए नूर अर्थात् प्रकाश का पर्वत। इसे लेकर प्रचुर सम्पदा के साथ वह वापिस लौटा तो रास्ते में भयानक तूफान में उसकी सेना तथा सम्पदा का बड़ा भाग नष्ट हो गया। वह चैन से न बैठ सका। उसके भतीजे अली कुलीखाँ ने ही उसका काम तमाम कर दिया। उसका यह लाभ अफ़गान सेनापति अहमदशाह अब्दाली से न देखा गया, उसने अली कुली खाँ को मौत के घाट उतारा और कोह-ए-नूर अपने कब्जे में कर लिया।

अहमदशाह अब्दाली के बाद उसका पुत्र तैमूरशाह उस हीरे का अधिकारी बना। वह जब मरा तो अपने पीछे तेईस बेटे छोड़ गया। उनमें सत्ता के लिए घमासान युद्ध हुआ। उसमें जमानशाह जीता। उससे हीरा छीनने के लिए उसके विश्वासी भाई महमूदशाह ने ही उसे कैद में डाल दिया और यंत्रणा देकर आँखे निकलवाई। महमूद को कुचल कर शाहशुजा ने उसे पाया। शुजा कैद में पड़ा हुआ था। उसने अपनी मुक्ति के लिए पंजाब के महाराज रणजीत सिंह से अपनी बेगम को कोहिनूर देने का वायदा किया। महाराजा ने काबुल के वजीर फतह खाँ को साथ लेकर शाहशुजा ने छूटने पर हीरा देने में आनाकानी की तो उसे महाराज ने यंत्रणा देकर विवश कर दिया। उसे देना तो पड़ा पर वह अन्य हीरों के साथ भाग खड़ा हुआ और अंग्रेजों के साथ जा मिला।

महाराजा रणजीतसिंह के मरने के बाद उनका राज्य अंग्रेजों के हाथों में चला गया और साथ ही बहुमूल्य हीरा भी। कोहिनूर प्रख्यात है बड़ा है इसलिए उसकी चर्चा भी बड़ी है। छोटी-मोटी रत्न राशियाँ भी ऐसी ही विपत्ति भी ऐसी होती है जो सम्बद्ध लोगों को संत्रस्त करें पर ऐतिहासिक घटनाओं में स्थान न पा सके। हश्र प्रायः एक जैसा ही होती है।

ऐसी ही दुर्गति शाहजहाँ के उन अरमानों की हुई जिनमें वह विपुल सम्पदा का स्वामी बनकर गौरवशाली बनने के स्वप्न देखता रहता था। मयूर सिंहासन शाहजहाँ ने बनवाया था। उसमें 12 करोड़ रुपए के रत्न जड़े थे। उसके निर्माण में सात वर्ष लगें और तत्कालीन श्रेष्ठतम रत्नशिल्पियों ने उसे बनाने में अपना पूरा श्रम, समय एवं मनोयोग लगाया। इसमें पन्ने से बने पाँच मनोयोग लगाया। इसमें पन्ने से बने पाँच खम्भों पर मीनाकारी का छत्र बना हुआ था। पाये ठोस सोने के बने थे। खम्भों पर दो-दो मोर नृत्य करते हुए बनाए गए थे। प्रत्येक जोड़े के बीच में हीरे लाल मोती पन्ने आदि रत्नों से जड़ा एक एक पेड़ था। बैठने के स्थान तक पहुँचने के लिए तीन रत्न जटित सीढ़ियाँ थी। उसमें कुल मिलाकर ग्यारह चौखटें थी। मीनाकारी का स्वर्ण छत्र देखते ही बनता था। तख्तताऊस को अपने समय की अद्भुत और बहुमूल्य कलाकृति माना जाता था।

जिन अरमानों के साथ शाहजहाँ ने उसे बनवाया था, वे पूरे न हुए। वह कुछ ही दिन उस पर बैठ पाया था कि उसके बेटे औरंगजेब ने उसे पकड़ कर कैद में डाल दिया। औरंगजेब के बाद मुगल साम्राज्य का पतन आरम्भ हुआ। मुहम्मदशाह राज्याधिकारी था। उस पर ईरान का नादिरशाह चढ़ दौड़ा और भारी लूट खसोट के अतिरिक्त तख्त ताऊस भी फारस उठा ले गया। उसी के एक कुटुम्बी ने उसकी हत्या कर दी और उसका सारा माल असबाब छीन लिया, जिसमें यह मयूर सिंहासन भी सम्मिलित था। लुटेरों ने उसके टुकड़े टुकड़े कर डाले और उन्हें आपस में बाँट दिया। बटवारे में उस शानदार शामियाने की भी कतख्योत कर दी गई जो उस सिंहासन के ऊपर ताना जाता था और रत्नों की झिलमिलाहट में आकाश में चमकने वाले सितारों की बहार देता था।

इसके कुछ समय बाद ईरान की सत्ता आगा मुहम्मद शाह ने सम्हाली। उसने नादिरशाह के लुटेरे वंशजों को पकड़ कर भारी यातनाएँ दी और लूट का सारा माल उगलवा लिया। इस वापसी में मयूर सिंहासन के टुकड़े शामिल थे। जौहरियों ने उन टुकड़ों की जोड़ गाँठ कर एक नया सिंहासन बनाया इसके बाद कभी वहाँ अराजकता और गृह युद्ध का सिलसिला चलता रहा और उसे फिर लूट लिया। रत्नों को उखाड़ लिया और कीमती पत्थरों को फिर भी काम आने की दृष्टि से समुद्र में किसी खास जगह छिपा दिया गया। छिपाने वाले उस स्थान को बता नहीं सके और वे अवशेष अभी भी ईरान के समुद्र तट के निकट उथली जल राशि में छिपे पड़े हैं। ढूँढ़-खोज में अभी तक उनका पता नहीं चल सका।

सम्पत्ति का जखीरा जमा करने की सोच मनुष्यता पर न जाने कितने आघात करती रहेगी। बड़ा आदमी बनने की साध में न जाने कितने आघात करती रहेगी। बड़ा आदमी बनने की साथ में न जाने कितने रावण हिरण्यकश्यप से लेकर नेपोलियन सिकन्दर अपनी प्रतिभा को नष्ट कर चुके और दुखदायी अन्त देख चुके। हमारी आंखें यदि उनके अनुभवों से सीख सकें और संग्रह की अपेक्षा सदुपयोग के लिए अपना उपार्जन प्रयुक्त कर सके तो कितना अच्छा है।


भ्रम का नशा (Kahani)

बोझ भरी गाड़ी को मजबूत बैल ढो रहे थे। उसके नीचे एक कुत्ता भी चल रहा था। उसे भ्रम हुआ कि गाड़ी उसी के बलबूते चल रही है। अहंकार से वह चला जा रहा था। गाड़ीवान् ने कुत्ते की विचित्र भाव-मुद्रा देखी तो उसके भ्रम को ताड़ लिया।

कुत्ते की पीठ पर गाड़ीवान् की एक चाबुक पड़ी वह तिलमिलाकर दूर जा खड़ा हुआ। गाड़ी चलती रही।

भ्रम का नशा उतरा तो कुत्ते ने समझा कि उसका अहंकार अवास्तविक था।


जीवन खिलाड़ी की तरह जिए, वही सच्चा कलाकार

संसार में ऐसे न जाने कितने व्यक्ति देखने को मिल सकते है, जो हर समय कुछ सोचते विचारते से रहते है। उनका मुख मलीन और मुद्रा गंभीर रहती है। काम करते है काम कर रहा है उसमें उसका मनोयोग रंचमात्र भी नहीं हैं। यों ही हाथ पैर चलाता हुआ सक्रियता को अभिव्यक्ति भर कर रहा है। केवल उनकी क्रिया देखने से ही नहीं काम का स्वरूप देखकर भी पता चल जाता है कि यह काम उत्साहपूर्वक, मनोयोग द्वारा नहीं किया गया है। बेगार टाली गयी है या कोई मजबूरी पूरी की गई है।

इस प्रकार की असफल अभिव्यक्तियों वाला अवश्य ही कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो व्यग्र चिंतित खिन्न और अप्रसन्न रहने की हो जाती है वे एक प्रकार से मानसिक रोगी ही होते है। किसी काम, किसी बात और किसी व्यवहार में उनका मन नहीं लगता। उनके अंदर एक तनाव की स्थिति बनी रहती है और वे प्रतिक्षण मानसिक खींचातानी में पड़े रहते है। जिसका फल यह होता है कि उनकी बहुत-सी ऐसी जीवनी शक्ति जलकर भस्म हो जाती है जिसका सदुपयोग करने से सफलता के पथ पर उन्नति के शिखर पर अनेक विश्वस्त कदमों को बढ़ाया जा सकता है।

परमात्मा ने मनुष्य को जीवन दिया, जीवनी शक्ति दी, सक्रियता तथा कार्य के लिए अभिरुचि प्रदान की इसलिए कि वह अपने कर्तव्यों में सुचारुता का समावेश करके संसार को सुन्दर बनाने सुखी करने में अपना योगदान करे और उसी माध्यम अथवा मार्ग से स्वयं अभ्युदय की ओर बढ़े, अपना और अपनी आत्मा का उपकार करे सुखी संपन्न और संतुष्ट जीवन पाकर अनुभव कर सके कि मानव जीवन में सुन्दरताओं के भंडार भरे पड़ें है। किंतु होता यह है कि लोग अपने अंदर खिन्नता अप्रसन्नता अथवा निराशा का रोग पालकर सर्व संपन्न, मानव जीवन को आग और अंगारों के मार्ग बना लेते हैं। सफलता अभ्युदय प्रकाश की ओर अग्रसर होने के स्थान पर विफलता अवनति और अंधकार के शिकार बन जाते है। यह बहुत खेद का विषय है, किंतु इससे अधिक दुःख यह है कि वे यह नहीं समझते कि इस प्रकार की मनोदशा से वे अपनी और इस संसार की कितनी गहरी क्षति कर रहे है, और यदि समझकर भी अपना सुधार करने खिन्नता की बेडिय़ों से छूटने का प्रयत्न नहीं करते तब तो इस पर होने वाले दुःख का पारावार ही नहीं रह जाता। खिन्नता अथवा अप्रसन्नता की स्थिति अकल्याणकारी है। इससे शीघ्र ही छूट लेना अच्छा है। खिन्न रहकर जीवन को नष्ट करने का किसी भी मनुष्य को अधिकार नहीं है।

खिन्न मनः स्थिति वाले व्यक्ति को विक्षेप का रोग लग जाता है, कहीं भी किसी बात में उसका मन नहीं लगता। घर में प्रसन्न बच्चों की क्रीड़ा उनका उछालना, कूदना खेलना और प्रसन्न होना उसे ऐसा अखरता है मानों वे भोले भाले बच्चे उसका कोई अहित कर रहे हो। वह उनकी क्रीड़ा देखने पर प्रसन्न होने हँसने और उनके कल्लोल में सहभागी होने की बजाय उन्हें डाँटने-मारने लगता है अथवा उनसे विरक्त होकर दुःखी होकर दूर हट जाता है अथवा बाहर चला जाता है। यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि उसका घर प्रसन्नता और उल्लास का सागर बना हुआ है किंतु खिन्न व्यक्ति उसका आनंद नहीं ले सकता उलटे अपने मासिक विपर्यय के कारण वह पारिवारिक सुख उसे कष्ट देता रहता है। इसे भाग्य की वंचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।

बच्चों की क्रीड़ा ही नहीं ऐसे व्यक्ति को अपनी पत्नी का विनोद उसकी मुसकान उसका कथन, अथवा अन्य प्रियवादी बातें अच्छी नहीं लगतीं। पत्नी हँसती है तो वह गुर्रा उठता है। पत्नी कोई बात कहती पूछती अथवा सुनाती है तो काटने दौड़ता है। अस्वस्थ मन वालों की अनुभव शक्ति कुछ इस प्रकार की उलटी हो जाती है कि उन्हें अनुकूल से अनुकूल बात भी प्रतिकूल और सुन्दर से सुन्दर वातावरण दुःखदायी लगने लगता है।

खिन्न व्यक्ति घर पर बाल-बच्चों के बीच तो त्रस्त रहता ही है बाहर जाकर भी उसे शांति एवं समाधान नहीं मिल पाता। कुछ ही समय में मित्रों के संपर्क से उनके साथ मनोविनोद और वार्तालाप से ऊब उठता है। उसे उपयोगी से उपयोगी बातचीत बेकार की बकवास लगती है। उसे बाह्य संसार का कोलाहल उसकी हलचल उसका क्रिया−कलाप काटने को दौड़ता है। उपवन अथवा एकांत में भी उसका चित शांति से वंचित रहता है। खिले हुए फूलों का सौंदर्य और कलरव करती हुई चिड़ियों का सुख उसके लिए असंभव रहता है कुछ ही देर में उपवन का सौंदर्य उसके लिए वन की भयानकता में बदल जाता है। एकांत अथवा निर्जन स्थान में तो उसकी दशा और भी खराब हो जाती है। वहाँ पहुँचते ही उसके मन की भयानकता, बाह्य निर्जनता से मिलकर वातावरण इतना असह्य बना देती है कि उसे वह स्थान श्मशान जैसा लगने लगता है। उसे अपने से अपनी छाया से, भय लगने लगता है, जिससे वह उस शांत स्थान श्मशान जैसा लगने लगता है, जिससे वह उस शांत स्थान में भी शांति नहीं पा पाता, जिसमें पहुँच कर किसी भी स्वस्थ चित्त व्यक्ति को नए विचार नूतन भाव, और एक अलौकिक निस्तब्धता की उपलब्धि हो सकती है।

सुख-शांति के स्थानों घर और बाहर किसी का उद्विग्न रहना, त्रास एवं संताप पाना कितना बड़ा दंड हो सकता है। यह दंड किसी बड़े पाप का ही परिणाम हो सकता है और वह पाप निश्चित रूप पिशाचिनी खिन्नता ही है। जिसे अज्ञानी व्यक्ति अपने मन मंदिर में बसा लेता है। जहाँ उसे सद्विचारों और शांति-संतोष के देवी-देवताओं की आराधना करनी चाहिए। जितना शीघ्र इस पाप से छूटा एवं बचा जा सके उतना ही कल्याणकारी है।

खिन्नता के दोष से मनुष्य के मन में विक्षेप का विकार उत्पन्न हो जाता है। जिससे न तो उसका मन किसी काम में लगता है और न किसी स्थान में उसे शांति मिलती है। जहाँ आस-पास लोग हँसते-बोलते अपना काम-काज करते, संसार के सभी व्यवहारों को निभाते, उन्नति एवं प्रगति करते दिखाई देते है, वहाँ मलीन मन व्यक्ति हर समय शोक संताप में जलता एवं कोई भी काम वह ठीक से नहीं कर पाता। अभी एक काम प्रारंभ किया कि शीघ्र ही उसे छोड़कर दूसरा करने लगा। अभी कहीं जोन का उत्साह जागा कि दूसरे ही क्षण अंदर बैठी खिन्नता की डायन ने उस क्षीण उत्साह का गला दबा दिया। खिन्न व्यक्ति का मनोबल नष्ट हो जाता है, उसका आत्म विश्वास उसे छोड़कर चला जाता है। जिससे वह संसार में आगे बढ़ने अपनी आत्मा का उद्धार करने के लिए पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता। किसी भी काम करने से पहले ही उसे असफलता हानि अथवा निरर्थकता के भाव दबा लेते है। तिस पर भी उसे यदि कुछ करना ही पड़े तो सिवाय- असफलता एवं निराशा के उसके हाथ कुछ भी नहीं लगता।

सवाल यह उठता है कि जब खिन्नता इतनी अकल्याणकारी प्रवृत्ति है तब लोग उसको प्रश्रय ही क्यों देते है? निश्चय ही कोई व्यक्ति जान-बूझ कर इस दोष को नहीं पालता। कोई भी खिन्न अप्रसन्न अथवा असंतुष्ट नहीं रहना चाहता। किंतु फिर भी ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती है, जिनमें खिन्नता के कारण निहित रहा करते है और मनुष्य न चाहता हुआ भी उनसे प्रभावित हो जाता है। उदाहरण के लिए खिन्नता के कारणों में से अनेक कारण इस प्रकार हो सकते है किसी प्रियजन का विछोह अथवा परिजन का रुग्ण हो जाना। किसी आकस्मिक विपत्ति का आ पड़ना, आर्थिक अथवा शारीरिक हानि किसी से विवाद खड़ा हो जाना, अथवा किन्हीं विषय परिस्थितियों में फँस जाना आदि।

इस संसार की रचना और उसका विधान ही कुछ इस प्रकार का है कि कोई भी व्यक्ति एक समान स्थिति में नहीं रह सकता यहाँ पग-पग पर संघर्ष और प्रतिकूलता के अवसर आते ही रहते है। किसी भी समय कोई भी कारण खड़ा होकर विवाद को पैदा कर सकता है। किन्हीं निर्दिष्ट व्यक्तियों को ही नहीं इस विषमतापूर्ण संसार में सभी व्यक्तियों को थोड़ी बहुत प्रतिकूलताओं से गुजरना ही पड़ता है। तथापि हम देख सकते है हजारों-लाखों और करोड़ों आदमी ऐसे है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी प्रफुल्ल एवं प्रसन्न बने रहते है। खिन्नता के कारण न तो उन्हें अकर्मण्य बना पाते हैं और न उनकी जीवन-रुचि छीन पाते है। वे हर प्रतिकूल कारण से टकराते हुए आगे बढ़ते जाते है। न तो वे बैठकर विवाद मनाते हैं और न अपने जीवन तत्त्व को जलाते ही हैं।

संसार की एक जैसी परिस्थितियों में यदि सभी व्यक्ति समान रूप से निराश एवं निष्क्रिय हो जायें तो क्या यह संसार एक क्षण को भी स्थिर रह सकता है। क्या ऐसी दशा में इसकी प्रगति संभव है। क्या ऐसी दशा में इसकी प्रगति संभव है।

आज प्रति दिन होने वाले चमत्कार सामने आने वाली उपलब्धियाँ और उन्नति की ओर बढ़ते हुए मानवता के कदम जहाँ और शीघ्र ही यह हरा-भरा और चलता फिरता संसार श्मशान की तरह नीरस एवं निर्जीव बन जाय।

दुःख अथवा विषादों से छुटकारा पाने का उपाय निराश होकर बैठे रहना नहीं है। उसका उपाय है कर्मठता एवं पुरुषार्थ। हँसना और मुस्काना जीवन की सफलता-असफलता में समदृष्टिकोण रखकर साहस न हारना। हँसने मुसकाते हुए अपना कर्तव्य करिए। विषमताओं एवं प्रतिकूलताओं से हारिए नहीं उन पर अपने शारीरिक और मानसिक बल से विजय प्राप्त करिए। खिन्नता निरुत्साह की जननी है। यह जीवन का सारा रस सारा सौंदर्य और समस्त पुण्यों को नष्ट भ्रष्ट करके मनुष्य को निस्सार बना देती है। इससे दूर रहना ही ठीक है। इसे जीवन से निकाल फेंक देना चाहिए। खिन्नता कायर और कमजोर मन वालों का दंड हैं। पुरुषार्थी एवं वीर-पुरुष का पुरस्कार प्रसन्नता एवं संपन्नता है। हम सभी प्रयत्न करें और उसे प्राप्त कर जीवन को सफल एवं प्रसन्न बनाएँ।


अध्यात्म महासागर है, विज्ञान की विभिन्न धाराओं का

मानव जैसे ही माँ धरित्री का प्रथम स्पर्श करता है उसके साथ ही उसकी जिज्ञासा प्रादुर्भूत होने लगती हैं। विश्व ब्रह्माण्ड के विविध क्रिया−कलाप प्रकृति का मनमोहक सौंदर्य इसके सहचरों की विविध अठखेलियाँ उसे मुग्ध करतीं और उल्लास प्रदान करती है। जिज्ञासु मन कुछ देर के लिए भले ही मोहित हो जाय किंतु समय-समय पर जिज्ञासा की तरंग मानस सागर को आंदोलित करती रहती है। आखिर ये सब है क्या? बड़े होने पर जीवन की इन भूल–भुलैयाओं में मन के बहिर्मुखी हो जाने पर भी तरंगों का आन्दोलित होना शांत नहीं होता है। किसी न किसी तरह किसी किसी रूप में जिज्ञासा मन को मथती रहती है।

शैशव काल में जिन सगे संबंधियों के शरीर को दुलारा सँवारा था, बड़े होने पर वे कहाँ चले गये? आदि अनेकानेक जीवन दर्शन की समस्यायें मन को चिंतन हेतु प्रेरित करती है। बालक सिद्धार्थ का मन भी ऐसी ही विविध समस्याओं की तरंगों से आन्दोलित हुआ था? कालक्रम के प्रवाह में बहिर्मुखी हो जाने के कारण युवराज कुछ सम्मोहित भले ही हो गये हों, पर मानस सागर की जिज्ञासा एक तरंग-प्रचंड लहरों में बदलती चली गई। इनके समाधान हेतु उनने अंतराल में प्रविष्ट हो अन्वेषण प्रक्रिया की शुरुआत की और बोधि का सारभूत फल प्राप्त किया, जिसके प्रभाव से लहराता गरजता, उफनता मनस्-लहराता गरजता, उफनता मनस्-सागर उद्वेलित स्थिति से प्रशांत स्थिति में पहुँच गया अनेकों को शांति पहुँचाने में सफल हुआ।

इन सारी जिज्ञासाओं के समाधान हेतु जिस तरह से राजकुमार सिद्धार्थ ने प्रयत्न किया उसी तरह सहस्राब्दियों पूर्व आर्यावर्त के देवभूमि के ऋषियों ने निरंतर प्रयास का जागृतिक सत्य के स्वरूप को जानने परमार्थिक निरपेक्षित स्वरूप ऋत् से एकाकार होने में सफलता प्राप्त की। इन्हीं शोध निष्कर्षों के विभिन्न सिद्धांत, संहिताओं आरण्यकों ब्राह्मणों उपनिषदों में स्थान-स्थान पर संकलित है। कालान्तर में महर्षि पतंजलि के तद्विषयक सूत्रों का गहन अध्ययन कर स्वानुभूति के बल पर उसको अभिनव स्वरूप प्रदान किया। इसे भारतीय चिंतन के एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ योग दर्शन के रूप में जाना जाता है।

अतः प्रकृति का अध्ययन करने तथा बाह्य प्रकृति को समझने के रूप में ऐसा विशद वैज्ञानिक अध्ययन भू-मण्डल के किसी और भाग में नहीं ही हुआ। कालक्रम के प्रवाह में पड़कर मानव मन की स्वाभाविक बहिर्मुखी प्रवृत्ति अपने अंतराल की संपदा तथा इसके अन्वेषण विधियों को विस्मृत करती चली गई। बाह्य प्रकृति के सम्मोहन का जादू मन पर चढ़ता चला गया। इसी को समझने, विश्लेषित करने, नूतन घटकों तथा इनकी सामर्थ्य का अन्वेषण करने में बौद्धिक क्षमता का उपयोग हुआ। इन गवेषणाओं को ही आधुनिक विज्ञान के नाम से जाना जाता है।

मानव की अहंवृत्ति अपनी वाह्य उपलब्धियों पर इतराती गई। दिन-दिन उद्घोष कर यह प्रचारित किया गया कि योग, धर्म आदि हठी, पूर्वाग्रही एवं अंधविश्वास से परिपूर्ण है जबकि विज्ञान तर्कसंगत तथ्य पूर्ण एवं सत्य का पथ-प्रदर्शक है। यह व्याख्या तुरंत रुचिकर भले ही प्रतीत हो-पर है बालुका प्रकार में भारी भरकम प्रतीत होने पर भी सागर के एक थपेड़े में ही तितर-बितर हो जाती है।

प्रकृति स्वभावतः सापेक्ष और नित्य परिवर्तनशील है। इसका यह स्वाभाविक गुण विज्ञान वेत्ताओं के सम्मुख नित्य नूतन पहेलियाँ रखता जाता है। आज जिन सूत्रों की गवेषणा की गई थी कल वही असत्य हो जाता है। आज जिन सूत्रों की गवेषणा की गई थी कल वही असत्य हो जाता है। प्रो. माइकल मर्फी डॉ. एलिजावेथ रौशर डॉ. फेड बुल्क आदि ले इसको विज्ञान का पथ प्रशस्त करने वाला प्रकाश संकेतक माना है।

वस्तु स्थिति भी यही हैं। योग की प्रक्रियाएँ इसके अंग उपांग पूर्णतया वैज्ञानिक एवं तर्क सम्मत हैं। जिस तरह से विज्ञान विद् बाह्य प्रकृति का अध्ययन कर इसके विविध रहस्यों का पता लगाते है। ठीक उसी तरह से परमात्म तत्त्व का जिज्ञासु अंतः प्रकृति की विविध परतों को भेद कर आत्म तत्त्वों को प्राप्त करता-निरपेक्ष सत्ता से एकाकार होता है।

योग के आठ अंगों में यम-नियम आसन-प्राणायाम नामक चार प्रक्रियाएँ ऐसी है जिन्हें वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला उसे व्यवस्थित करना तथा संदर्भ ग्रंथ के संकलन जैसा कहा जा सकता है। जिस प्रकार प्रयोगशाला एवं विभिन्न संदर्भ-ग्रंथ वैज्ञानिक शोध का आधार है। उसी प्रकार आत्मपथ का जिज्ञासु भी इन माध्यमों से शरीर एवं मन को सुव्यवस्थित कर अपने को तद्विषयक शोध कार्य में प्रवृत्त करता हैं। इस शोध के प्रयोग कार्य में जुटने से पूर्व जो प्रक्रिया है वह है प्रत्याहार इस के बिना न तो आत्मविज्ञानी का काम चलेगा, न ही पदार्थ विज्ञानों का। कारण यह है कि प्रत्याहार का तात्पर्य मन को इन्द्रिय विषयों के जाल जंजालों में उलझा मन किसी प्रकार के अन्वेषण करने में नितांत अक्षम है।

धारणा से प्रयोग की शुरुआत होती है। एक प्रारंभ करता है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा से दूसरे का प्रारंभ होता है। अर्थात् प्रकृति जिज्ञासा” से। जिज्ञासा के एक ही पर्वत शिखर से निःसृत इन द्विविध धाराओं के बाह्य स्वरूप में वैषम्य होते हुए भी प्रक्रिया में अद्भुत साम्य है। ध्यान का अंतर गंभीरता अतः प्रकृति का विश्लेषण करती इसके चक्रव्यूह की विविधताओं को भेदती तथा आत्मतत्त्व की ओर प्रवृत्त होती है। ध्यान की बाह्य गंभीरता पदार्थों एवं उसके विविध घटकों का विश्लेषण करती हुई उसके रहस्योद्घाटन के लिए उन्मुख होती है।

इस तरह यह प्रयोग कुछ दिन करने-फिर छोड़ बैठने से काम नहीं चलता है। इसी कारण सूत्रकार ने योगदर्शन में साधन पाद के चौदहवें सूत्र में कहा है “स तू दीर्घकाल वैरर्न्तय सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि” अर्थात् बहुत कुछ समय तक निरंतर उद्देश्य के प्रति सत्कार भाव से दृढ़ मनोबल-पूर्वक प्रयोग करते जाना चाहिए। इसी तरह वैज्ञानिकों का एक्सपेरिमेंट एक्सपेरिनस शब्द से उत्पन्न हुआ। इसके दो भाग हैं एक्स और पेरिल इसमें एक्स का तात्पर्य है निरंतरता। पेरिल का तात्पर्य है खतरा उठाना कष्ट झेलना अर्थात् विविध कष्टों से जूझते हुए दत्तचित्त हो निरंतर उद्देश्य के प्रति जुटे रहना ही “एक्सपेरिमेंट” है।

यह प्रयोग परीक्षण की निरंतरता जिसे योग भाषा में ध्यान करते है, निष्कर्ष की ओर कदम बढ़ाती है। इस निष्कर्ष तक पहुँचने में अनेकानेक विघ्न बाधाएँ भी है जो विविध स्वरूपों में आती है। योग विज्ञानी इन्हें सिद्धियाँ कहते है। आत्मिक प्रगति की यात्रा में पुरस्कार रूप में प्राप्त होते रहने पर भी इनका महत्त्व आत्मिकी के लिए अधिक है। इनका सम्मोहक सौंदर्यशाली स्वरूप प्रायः सभी को अपने में उलझा देता है। प्रकृति गत होने के कारण इनमें चंचलता होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि प्राचीन और आधुनिक काल के जिज्ञासु इनके सम्मोहन में पथ भ्रष्ट हुए। यह विविध सिद्धियाँ मात्र अंतः प्रकृति में हो ऐसा नहीं बाह्य प्रकृति में हों ऐसा नहीं, बाह्य प्रकृति में स्वरूप भेद होने पर भी इनको उपस्थित देखा जा सकता है।

आधुनिक समय के विज्ञानवेत्ता अब बहिरंग से अंतरंग की यात्रा करते दिखाई देते हैं क्योंकि वे वास्तविकता की समझ चुके है। यही कारण है कि क्वाण्टम भौतिकी के पिता माने जाने वाले मैक्स प्लाँक की बातों में स्वामी विवेकानंद प्रति ध्वनि सुनाई देती है गैरी जुकोव भी एक चितरंजन सत्ता के सर्वत्र व्याप्त होने की बात कह गीता के कथन “मयि सर्वमिदं प्रोक्तं सूत्रे मणिगणाइव” का समर्थन करते है। डेविड वाँम कार्ल प्रीवाम आदि है। हाइज़ेनबर्ग अपनी पुस्तक “दी पार्ट एण्ड होल” में अपने सिद्धांत प्रिंसिपल ऑफ अनसर्टेनिटी के प्रतिपादन में अपने को वेदांत दर्शन का ऋणी मानते है। आधुनिक भौतिकी की गवेषणायें भी भारतीय चिंतन की ही पुष्टि करती है। इनके निष्कर्ष के अनुभूत होने की स्थिति को ही तो योग विज्ञानी समाधि का नाम देते है। समाधि स्वरूप सजीव व निर्जीव है। विज्ञान की स्थिति अभी सजीव की ओर पहुँचने को है। निष्कर्ष के अनुभव अकथनीय अवर्णनीय होते हैं इनको बता पाना मात्र संकेतों से ही संभव है। कोई भी भाषा इन अनुभवों की अभिव्यक्ति करने में असमर्थ है।

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो हुई विश्व धर्म परिषद में हिन्दुत्व पर अपने निबंध को पढ़ते हुए 19 सितम्बर 1893 में कहा था विज्ञान की गति भी वेदांत की ओर है इसकी विविध धारायें विभिन्न मार्गों से एकत्व की खोज में है। उनका कथन आज विभिन्न वैज्ञानिकों की विविध शोधों से प्रमाणित होता दीखता हैं। मनीषियों का कथन सही ही है-रुचीनाँ वेचित्रयादृजु कुटिल नाना पथ जुषाँ। नृणामेकों गम्यस्त्वमसि पथ सामार्णव इव” जिस तरह से विविध धारायें विभिन्न स्थानों से सीधा उलटा मार्गों को तय कर सागर की ओर जाती है। उसी तरह से विविध मार्गों से मनुष्य परम तत्त्व की ओर उन्मुख होती हैं।”


जीवन पद्धति बदले, सामूहिकता पनपे

विश्व सभ्यता अब विकास के उस स्तर तक पहुँच गयी है कि एकाकी रूप से कोई अपना काम आप चला ले यह लगभग असम्भव हो गया है। कहने को तो प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका स्वयं उपार्जित करनी पड़ती है तथा प्रत्येक आवश्यक वस्तु स्वयं ही खरीदनी पड़ती है, पर अपनी आवश्यकताओं के लिये अधिकांशतः दूसरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। जैसे प्रत्येक व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता पड़ती है और उसके लिये अनाज, ईंधन बर्तन आग शाक सब्जी आदि वस्तुओं की जरूरत पड़ती है। अनाज और शाक सब्जियाँ किसान पैदा करता है। ईंधन की आवश्यकता लकड़हारों या कोक भण्डार से जुटानी पड़ती है। बर्तन की मदद से और आग माचिस द्वारा। कहने का अर्थ यह है कि एक एक रोटी में कई व्यक्तियों का श्रम लगा होता हैं। माना कि हम ये वस्तुएँ पैसा देकर खरीद कर लाते हैं पर यदि हमारे पास पैसा हो तथा इन चीजों के उत्पादनकर्ता उन्हें उत्पादित करना बंद कर दे तो पैसे का क्या होगा?

एक समय था जबकि मनुष्य जंगल में वास करता था। पेड़ों से फल तोड़कर लाता पत्थरों से जानवर मार लेता और उनसे अपनी भूख मिटा लेता था। उस समय एकांकी और नितांत स्वावलम्बी जीवन बिताने में कोई कठिनाई नहीं थी। पर तक मनुष्य क्या था? उसकी सभ्यता ओर संस्कृति क्या था? निरे पशुओं जैसी जिंदगी जीनी पड़ती थी और जैसे ही मनुष्य ने कुछ सोचना विचारना आरंभ किया, उसे कबीलों के रूप में सामूहिक जीवन की ओर अग्रसर होना पड़ा। एक व्यक्ति पूरी तरह एक क्षेत्र में काम करता रहे और दूसरा दूसरे क्षेत्र में। तथा अपने उपार्जन के आदान-प्रदान द्वारा एक दूसरे का काम चलाते रहें इसी आधारशिला पर पाँव रखकर मानवी सभ्यता का भवन अब तक इतना विकसित हो चुका है कि हमें कदम-कदम पर सामूहिकता का आश्रय लेने की बात सोचनी पड़ेगी

जैसे-जैसे सभ्यता का विकास होता गया वैसे व्यक्ति का एकाकी जीवन दुष्कर और सामूहिकता का प्रयोग सरल सुगम होता चला गया। यहीं नहीं उसके अभाव में पतन ग्रस्त दुर्दशा में भी पड़े रहना पड़ा। उदाहरण के लिए अभी पाँच सौ वर्ष पहले की बात को ही लें तब न स्कूल थे और न पाठशालाएँ उस समय शिक्षा के लिये प्रत्येक परिवार को अपनी व्यवस्था करनी पड़ती थी-एक-एक शिक्षक की नियुक्ति की जाती। यह सभी के बस की बात तो थी नहीं। अतः राजघरानों और कुलीन परिवारों के सदस्य ही शिक्षित हो पाते। लेकिन जब शिक्षा की आवश्यकता अनिवार्यतः अनुभव की जाने लगी तो सामूहिक व्यवस्था करनी पड़ी ओर स्कूल खोलने पड़े। एक-एक अध्यापक के जिम्मे पचास- पचास छात्र आये और शिक्षा प्राप्ति का सुगम तरीका चल पड़ा इससे शिक्षा का क्षेत्र सबकी पहुँच की सीमा में आ गया और खर्च का अधिक दबाव भी किसी पर नहीं पड़ा इस सामूहिक व्यवस्था का परिणाम ही है कि शिक्षा का विकास द्रुत गति से होता जा सका है। हमारे देश में भी जब सामूहिक व्यवस्था ने परिष्कृत रूप लिया तो आजादी के बाद से अब तक के आश्चर्यजनक परिणाम सामने आये है। सन् 1959-52 में जहाँ साक्षरता का औसत 14 प्रतिशत था वहीं अब 35 प्रतिशत के लगभग है, निश्चित ही यह आँकड़ा संतोषजनक नहीं किंतु व्यवस्था के समाजगत होने का परिणाम दर्शाता है। सामूहिकता आज के युग में हर क्षेत्र में कल्याणकारी ही सिद्ध हो रहीं है। यह तथ्य प्रगति की विभिन्न योजनाओं को देख-सुन-समझकर आत्मसात् किया जा सकता है। अब पुनः आवश्यकता आ पड़ी है कि हम अपनी जीवन पद्धति पर दृष्टिपात करे और सामूहिकता के अभाव में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आने वाली बाधाओं से बचने की दिशा में विचार करें। अभी भी हमारे समाज और जीवन में सामूहिकता के आधार पर पुनर्निर्मित किया जाय तो कई व्यवस्थाएँ हैं जिन्हें सामूहिकता के आधार पर पुनर्निर्मित किया जाय तो कई समस्याओं का समाधान निकल सकता है।

उदाहरण के लिये एक मुहल्ले में 100 परिवार रहते हैं उनमें दो पति-पत्नी और दो-तीन बच्चे माने जाएँ तो तीन व्यक्तियों के पीछे एक व्यक्ति भोजन बनाने वाला चाहिए। घरों में गृहिणी के पास भोजन बनाने और परिवार के सदस्यों को खिलाने का काम ही रहता है। अर्थात् एक चौथाई जन संख्या केवल भोजन बनाने में ही लगी हुई है। व्यक्तिगत व्यवस्था में अधिक समय और श्रम लगना स्वाभाविक ही है। यदि एक मुहल्ले के लिये भोजन बनाने में ही लगी हुई है। व्यक्तिगत व्यवस्था में अधिक समय और श्रम लगाना स्वाभाविक ही है। यदि एक मुहल्ले के लिये भोजन की सामूहिक व्यवस्था बना ली जाय तो दस बारह व्यक्ति आसानी से ढाई-तीन सौ लोगों का भोजन बना सकते है और शेष व्यक्तियों का समय तथा श्रम अन्य कामों में लग सकता है। समाजवादी देशों में प्रायः यही पद्धति अपनाई जाती है। वहाँ अलग-अलग चौके चूल्हे बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती लोग मेस में खाना खाते हैं। कुछ लोग इसी काम पर नियुक्त रहते है और शेष निर्माण के अन्य मोर्चे सम्हालते है। देर-सवेर प्रगति के इच्छुक सभी समाजों में यही पद्धति व्यवहारिक सिद्ध होगी यह कम्यून सिस्टम ही अंततः हमें लागू करना होगा।

सामूहिक भोजन व्यवस्था का एक लाभ आर्थिक पहलू से भी संबंधित है। एक व्यक्ति का खाना बनाने में उतना ही समय और श्रम लगता है जितना कि पाँच व्यक्तियों के लिये बनाने में लगता हैं। अनाज और सब्जी की मात्रा भले ही थोड़ी कम हो जाय अन्यथा ईंधन समय श्रम का तो उतना ही खर्च पड़ता है। पाँच व्यक्तियों के लिये संयुक्त भोजन व्यवस्था सस्ती पड़ती है। पचास व्यक्तियों के लिये संयुक्त भोजन व्यवस्था सस्ती पड़ती है। पचास व्यक्तियों के लिये और भी कम। तो कहना नहीं होगा कि इस व्यवस्था में कम आमदनी वाले भी भर पेट और संपूर्ण आहार प्राप्त कर सकते है। जिस प्रकार पूरे गाँव के लिये बने स्कूल में गरीब बच्चा भी पढ़ सकता है। मध्य वर्ग के समान निजी व्यवस्था उसके लिये संभव नहीं है। उसी प्रकार सामूहिक भोजन व्यवस्था में गरीब आदमी जो अलग-अलग भोजन बनाता है और खाली पेट सोता है उसके लिये भी कम लागत और कम खर्च के कारण भर पेट भोजन प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान रहेगा।

भोजन व्यवस्था के बाद अभिभावकों का सर्वाधिक ध्यान बच्चों के लालन-पालन और लाड़ दुलार में ही अधिक लगता है इसी कारण समय और श्रम भी। यही नहीं इस पद्धति के गहरे मानसिक परिणाम भी होते है व्यक्ति की माया-ममता परिवार के दायरे में ही सिमट कर रह जाती है और न वह मोहल्ले के अन्य लोगों में आत्मीयता की अनुभूति करता है न समाज और न राष्ट्र में। बच्चों के सामूहिक विकास का इजराइल ने सफल प्रयोग किया है। वहाँ पैदा होने के बाद बच्चों को माँ बाप से अलग कर दिया जाता है तथा सब बच्चों को एक साथ पाला जाता है। यह कार्य बाल मनोविज्ञान कुशल ज्ञाता नर्सों द्वारा किया जाता है। नर्सों में भी बच्चों की ममता केन्द्रीभूत न हो जाये इसलिये एक नर्स को तीन महीने से अधिक नहीं रहने दिया जाता। माता-पिता को भी यह चिंता नहीं करनी पड़ती है कि हमारे बच्चों के लिये हम कमा कर छोड़ जायें। क्योंकि वे जानते है कि इन पाठशालाओं में जिन्हें किबुल्स कहा जाता है बच्चे इतने योग्य होकर निकलेंगे कि वे समाज और राष्ट्र पर भार नहीं बनेंगे “किबुल्स” के बच्चों को किशोरावस्था या युवावस्था में माँ-बाप से भले ही मिलने दिया जाता हों पर तब उनमें प्रौढ़ता आ जाती है और उनकी चेतना परिवार तक ही सीमित नहीं रह जाती वरन् वे राष्ट्र को सर्वोपरि मानते है।

मनोवैज्ञानिकों ने पारिवारिक जीवन की अस्त-व्यस्तता का कारण भी वर्तमान पद्धति को माना है और इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि माँ के पास रहकर ही बड़े होने वाले बच्चे के अचेतन मन में माँ की प्रतिच्छाया इस तरह अंकित हो जाती है कि वह उसी स्वभाव वाली स्त्री के पास रहना चाहता है। एक ही प्रकार के स्वभाव वाले दो व्यक्ति आज तक इस संसार में नहीं हुए। स्वभाव तो दूर की बात शक्ल सूरत और व्यक्तित्व भी किसी का समान नहीं होता। जब पत्नी से अपेक्षित विशेषताएँ नहीं मिलती हैं तो दाम्पत्य जीवन में क्लेश कलह और असंतोष जन्म लेता है।

बच्चों को सामूहिक रूप से पालने की बात पढ़ने सुनने में भले ही अटपटी लगती हों। पर जब हम प्राचीन संस्कृति से इनकी तुलना करते हैं तो अनायास ही इस तरह की व्यवस्था की महत्ता का परिचय मिल जाता है। आश्रम व्यवस्था में यही तो होता था उस समय बच्चों को तीन चार वर्ष का होते ही गुरुकुल में भेजते समय किये जाने वाले उपनयन संस्कार की


कौन बड़ा है (Kahani)

एक दिन कर्म और भावना दोनों इकट्ठे हुए। बात-चीत में विवाद बल पड़ा कि दोनों में कौन बड़ा है। दोनों ही अपनी अपनी बड़ाई बखानने लगे कोई छोटा बनने को तैयार न हुआ। जब विवाद बढ़ा तो निर्णय कराने उन्हें ब्रह्माजी के पास जाना पड़ा।

ब्रह्माजी ने दोनों की बात सुनी और मुस्कुराये उनने कहा-परीक्षा से ही वास्तविकता का पता चलेगा। तुम दोनों आकाश छूने का प्रयत्न करो। जो पहले आकाश छू सकेगा वही बड़ा माना जायेगा।

भावना ने उछाल लगाई तो आकाश तक जा पहुँची। छूने में भी सफल हो गई। पर आकाश की ऊँचाई इतनी अधिक थी कि बेचारी को अधर में ही लटकना पड़ा पैर धरती से बहुत ऊपर थे।

अब कर्म की बारी थी। उसने आकाश तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनानी शुरू कर दीं। कई दिनों वह लगातार लगा भी रहा। पर उत्साह के अभाव में उसे उदासी ने आ घेरा और अपने औजार पटक कर वह सुस्ताने सरोवर के तट पर चला गया।

ब्रह्माजी पता लगाने गये तो देखा कि भावना आधार में लटकी है और कर्म एक घने वृक्ष की छाया में औंधे मुँह पड़ा सुस्ता रहा है उन्होंने दोनों को बुलाकर कहा तुम दोनों ही अकेले अपूर्ण हो। बड़प्पन तभी है जब तुम दोनों एक साथ रहो। उसी में तुम्हारी उपयोगिता भी है।”

आयु सातवाँ वर्ष ही तो निर्धारित की गई थी। उस समय तक बच्चों को गुरुकुल भेज देना पड़ता था। अन्यथा उसे वाव्यसंज्ञक (पतित) कहा जाता और इस अवस्था से लेकर पच्चीस वर्ष तक परिवार से दूर-गुरुकुल में ही वह विभिन्न वय स्थिति और अवस्था के लड़कों के साथ पढ़ता।

इस प्रकार सामूहिक रूप से बच्चों को पालने का प्रथम सत्य परिणाम यह होता था कि बच्चों में परिस्थितिजन्य अहंकार द्वेष समाप्त ही हो जाता। राजा का बेटा, साधारण कर्मचारी के बेटे के साथ पढ़ता और भाई-भाई की तरह सौ से लेकर पाँच सौ बच्चे सामूहिक रूप से पढ़ते उन परिस्थितियों में बच्चे की चेतना सीमित दायरे में ही कैद रह जाने से बच जाती। तथा उसका दृष्टिकोण इतना उदार और इतना विशाल बन जाता कि सारा समाज ही उसे अपने परिवार की तरह लगता। इसी पद्धति से भारतीयों मनीषियों ने वसुधैव कुटुम्बकम् का लक्ष्य अपने सामने रखा हो तो वह केवल आदर्श या अव्यावहारिक नहीं कहा जा सकता। वरन् यही मानना पड़ेगा कि वे अपने लक्ष्य की ओर सही ढंग से बढ़ रहे थे।

लेकिन खेद है कि हम सामूहिकता की ओर बढ़ने की अपेक्षा विघटन की ओर ही बढ़ रहे है। पचास वर्ष पूर्व अधिकांश परिवार संयुक्त थे। सामूहिकता का एक छोटा ही सही पर रूप तो था और संयुक्त परिवारों में चाचा ताऊ के बच्चों में परस्पर जो स्नेह आत्मीयता ,श्रध्दा तथा त्याग की भावना थी वह आज सगे भाई-भाइयों में भी नहीं है। इसका क्या कारण है? आत्यंतिक स्वार्थपरता और सुविधा साधनों की लालसा ने लोगों को इतना स्वकेंद्रित बना दिया है कि वे अपने अतिरिक्त किसी और की सुख सुविधा का ध्यान ही नहीं रखते है।

बच्चों को जैसे घर में पाला जाता है, वैसे ही परिवार उनके जीवन का केन्द्र बन जाता हैं। न राष्ट्र बनता है और न समाज ही। बच्चों को मिल जाती है तो पर्याप्त है और माता को सुविधा मिल जाती हो तो सुविधा का प्रश्न ही नहीं उठता। बच्चों को जब सामूहिक रूप से बोला जायेगा तो जाने अनजाने उसके जीवन का केन्द्र सारा समाज बनेगा और समाज के सभी वृद्धों का उसी प्रकार ख्याल रहेगा जिस प्रकार कि वर्तमान समय में अपने वृद्ध पिता का रहता हो।

सामूहिकता का सिद्धांत सार्वभौम और सार्वकालिक उपयोगी रहा है। पर आज के समय में वह न केवल उपयोगी वरन् आवश्यक भी हो गया हैं। पथ्य और खानपान का संयम अच्छे स्वास्थ्य के लिये सदैव उपयोगी होता है पर जब रुग्णावस्था में जो उसकी आवश्यकता अनिवार्यता की भूमिका में पहुँच जाती है। इस समय समूचा मानव समाज रुग्णावस्था में ही समझा जाना चाहिए। अशान्ति उद्वेग स्वार्थपरता और संकीर्णता के समय-समय की विकासमान् धारा भी लगभग बीमार है। जिस प्रकार रोग की स्थिति में देख-भाल सतर्कता के स्तर पर अनिवार्य हो जाती है, उसी प्रकार रुग्ण मानवता के साथ बदलती समय धारा में हमें अपनी जीवन पद्धति और समाज व्यवस्था को अनुकूल धारा में ढालने की भी आवश्यकता है।


बीमारियाँ (Kahani)

बीमारियों को सभी ने दुत्कारा तो वे पहाड़ के पास गई और वे बोली अपनी सहनशीलता और उदारता प्रख्यात है। हमें सभी दुत्कारते हैं आप हमें आश्रय दे तो यही रहकर दिन गुजारे पहाड़ ने स्वीकार कर लिया। वे चैन से रहने लगी। रोज ही पूछती पिताजी कोई सेवा हो तो बताना। पहाड़ हँस भर देता।

एक बार उस क्षेत्र के किसानों का मन आया कि पहाड़ काटकर खेत बनायें और नई जमीन हथियाये एक ओर से किसानों की सफलता देखकर चारों ओर लोग चिपट गये और पहाड़ का बहुत-सा हिस्सा कट गया। बीच का टीला भी गिरने जैसा हो गया।

पहाड़ चिंता में बैठा था। बीमारियों ने चिंता का कारण पूछा और कोई सेवा हो तो बतायें सदा की भाँति पूछा।

पहाड़ को एक सूझ सूझी। बीमारियों से कहा। तुम लोग इन काटने वालों से चिपट पड़ो और यहाँ से भगा दो। नहीं तो हमारा सफाया हो जाएगा तुम्हें भी भगाना पड़ेगा बीमारियाँ बहुत दिन से खाली बैठी थी। उत्साहपूर्वक चल पड़ी और पहाड़ काटने वालों से पूरी तरह चिपक गई। फिर भी पहाड़ कटना रहा। काटने वालों ने हार नहीं मानी।

कितने ही दिन बीत गये। पहाड़ ने बीमारियों से पूछा- इतने दिन में क्या किया? एक भी बीमार नहीं पड़ा और खुदाई ज्यों कि त्यों चलती रही।

बीमारियों ने अपनी हार पर बड़ी लज्जा प्रकट की और कहा यह लोग इतना पसीना बहाते है। कि उनके साथ-साथ हमें भी बाहर निकलना पड़ता है, ठहरने की जगह ही नहीं मिलती।


प्रकाश पथ का पथिक

चलते-चलते संध्या का झुटपुटा हो गया। समय के रथ पर सवार भगवान भास्कर अस्ताचलगामी होने लगे। अमावस्या की अन्धकारमयी रात्रि थी। हाथ को हाथ नहीं दिखाई देता था। मंजिल अभी दो कोस दूर थी। वह वहाँ पहुँचा और बड़े दीन भाव से साधू से निवेदन करने लगा-महात्मन्! मुझे अपनी मंजिल पर इसी समय पहुँचना है। अँधेरी रात है। बीहड़ मार्ग है। यदि मैं आज न पहुँच सका तो जीवन का अलभ्य अवसर हाथ से निकल जाएगा। ऐसे विपत्तिकाल में आप मेरी सहायता कीजिए।’

कुटिया में रखा दीपक यदि आपके काम आ सके तो सहर्ष ले जा सकते हो। शाम का भोजन मैं कर ही चुका। केवल विश्राम करना है उसके लिए प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं।”

यात्री प्रसन्न हुआ। उसे एक सहारा मिल चुका था। उसने दीपक उठाया और यथावत् चल पड़ा मंजिल की ओर। दो-चार खेतों को ही पार किया होगा कि उसके कदम मंजिल की ओर न बढ़कर कुटिया की ओर लौट पड़े दीपक को यथा स्थान रखते हुए उलाहने के स्वर में उसने कहा-इस दीपक का क्षीण प्रकाश चार-पाँच कदम से आगे पहुँचता ही नहीं, फिर मैं दो कोस की मंजिल कैसे तय करूँगा यह स्वर्ण अवसर भले खो जाय, पर इस क्षीण प्रकाश के सहारे यात्रा करके मैं अपने जीवन को संकट में नहीं डालना चाहता। महात्मन्। मुझे तो आप अपनी कुटिया में रात बिताने की आज्ञा दीजिए। मैं एक किनारे पड़ा रहकर रात्रि काट लूँगा। विश्वास करें मेरे रहने से आपकी साधना में किसी तरह की बाधा न आएगी सुबह होते ही मंजिल की ओर तेजी से कदम बढ़ाकर पहुँचने का प्रयास करूँगा

यात्री को ठहराने में भला साधु को क्यों आपत्ति होती। उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी। यात्री थका हुआ तो था ही लेटते ही गहरी नींद में खो गया।

लगभग एक घंटे के बाद एक अन्य यात्री उधर से निकला। उसके हाथ में दीपक था। जो क्षीण प्रकाश बिखेरता हुआ उसके मार्ग को प्रशस्त करता जा रहा था। यात्री ने कुटिया की ओर एक दृष्टि डाली और बिना रुके आगे की ओर बढ़ने लगा। साधु कुटी के बाहर आया। उसने यात्री को रोकते हुए कहा-ऐसा लगता है कि आप काफी लंबी यात्रा तय करके आ रहे है। बहुत थक गए होंगे। दिन भर यहीं विश्राम कर लें। प्रातः काल होते ही यहाँ से चले जाना। एक अन्य यात्री भी कुटिया में विश्राम कर रहा है। उसे भी इसी ओर जाना है। दोनों का साथ हो जाएगा। बातचीत करने से रास्ता कब कट गया, पता भी न चलेगा।”

साधु ने पुनः आगे कहा-यात्री ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा-यह प्रकाश तो मुझसे चार-पाँच कदम आगे ही रहता है। इसलिए मंजिल की ओर बढ़ने में मुझे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होतीं। आप देख ही रहे है। इसी के सहारे में दो कोस की यात्रा कर आया हूँ। अब आगे तो उतना ही और चलना भर है।”

“लेकिन इस तरह तो जीवन संकट में पड़ सकता है। साधु ने तनिक हिचकिचाते हुए सवाल किया। आखिर क्यों? यात्री के चौंकने की बारी थी। आगे रास्ता जो कठिन है, और तुम्हारे पास प्रकाश का कोई समुचित साधन भी नहीं। मुसाफिर ने साधु की ओर आश्चर्य पूर्ण नजर डालते हुए कहा-” लक्ष्य के प्रति समर्पित समय का अर्थ ही जीवन हैं।” जो समय साधन मंजिल की ओर बढ़ने में अपनी निष्ठा न सिद्ध कर सके, उसे व्यर्थ ही समझना चाहिए। बिना रुके, बिना थके जो लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे, यथार्थ में वही जीवित हैं।”

साधु यात्री के उत्तर से संतुष्ट हो गया। वह तो उसके मनोबली की परीक्षा ले रहा था। उसने मनोबली की परीक्षा ले रहा था। उसने आशीर्वाद देते हुए कहा- “वत्स! मैं तुमसे संतुष्ट हुआ तुम्हारी यह यात्रा बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो मेरी यहीं कामना है।”

यात्री के पास अधिक कहने सुनने के लिए समय कहाँ था। वह तो दीपक के क्षीण प्रकाश में आगे बढ़ गया। जबकि स्वल्प प्रकाश और घने अंधकार को उलाहना देने वाला विराम की निद्रा में लंबी तान कर सो रहा था।


आदर्शवादी आस्थाएँ पुनर्जीवित की जाएँ

कहा जाता रहता है कि आर्थिक कारणों से मनुष्य को पीड़ा का, पतन का सामना करना पड़ता है। इसलिए सुविधा साधन बढ़ा देने पर भारी समस्याओं का हल निकल आयेगा, अर्थशास्त्री इसी का ताना-बाना बुनते रहते है। विज्ञान का एक छोटा पक्ष तो बुद्ध भड़काने वाले विनाशात्मक साधनों में लगता है किंतु उसका एक बहुत बड़ा भाग सुविधा संवर्द्धन में भी लगा है। शिक्षा का सम्पूर्ण ढाँचा प्रायः इसी लक्ष्य को लेकर खड़ा किया गया है।

इसके औचित्य से इनकार नहीं किया जा सकता किंतु देखना यह है कि क्या इतने भर से ही काम चल जायेगा। यदि अभीष्ट सुविधा साधन विनिर्मित कर लिये जाएँ तो क्या उन समस्याओं का समाधान हो जायेगा जो इन दिनों हर किसी को संत्रस्त किये हुए हैं। इस संदर्भ में हुए प्रयोगों का प्रतिफल सामने है। आर्थिक दृष्टि से सुसम्पन्न देशों में इन दिनों जापान एवं अमेरिका सबसे आगे है। इन देशों जितने सुविधा साधन अन्यत्र कहीं भी नहीं है। दूसरी तीसरी श्रेणी में तो योरोप के इंग्लैण्ड, फ्राँस, जर्मनी आदि कई देश आते है। एशिया में अब तैवान एवं कोरिया की जापान के साथ सम्पन्नता प्रख्यात हैं। तेल के अधिपति कई अरब देश भी धन कुबेर समझे जाते है। धन के साथ जुड़ी हुई अन्य सुविधायें भी इन देशों की अधिकांश जनता को उपलब्ध हैं। इन देशों की पिछली जनता को एक ओर रख दें और मात्र सुसम्पन्न वर्ग का ही पर्यवेक्षण करें तो प्रतीत होता है कि सम्पन्नता के साथ जो आशायें जोड़ी गई थी वे निक्षेप सिद्ध होती है।

उपरोक्त देशों के अतिरिक्त पिछड़े देशों में भी सुसम्पन्न वर्ग है। उनके ऊपर भी दृष्टि डाली जा सकती हैं। यों कहना चाहिए कि मौलिक दृष्टि से पिछड़े हुए और साधन संपन्न वर्गों को पृथक् करके यह देखा जा सकता है कि आखिर सम्पन्नता से मानवी समस्याओं के समाधान में किस सीमा तक अब तक जन जन को योगदान मिल सका है।

बारीकी से देखने पर बात इतनी भर समझ में आती है कि पिछड़े और समृद्ध कहे जाने वाले वर्गों की समस्याओं के स्वरूप तो अलग-अलग अवश्य है पर विपन्नता और उद्विग्नता की दृष्टि से कोई भी कम दुःखी नहीं है। किसी की भी उलझन दूसरे नहीं है। किसी की भी कम दुःखी नहीं है। किसी की भी उलझन दूसरे की तुलना में कम नहीं है हाँ उन कठिनाइयों के नाम रूप पृथक अवश्य है। गरीबों के लिए अभाव अभिशाप है तो अमीरों के लिए वैभव भी संकट ही बना हुआ है। वैभव का उपयोग कहाँ किया जा सकता है उसके उपार्जन एवं संग्रह का औचित्य किन मर्यादाओं से बँधा हुआ है? इसका ध्यान न रहने से अवांछनीय मात्रा में अनुचित रीति से कमाया हुआ धन जमा होता है और उसकी प्रतिक्रिया अनियंत्रित विलासिता के रूप में सामने आती है। दुर्व्यसन बढ़ते है। उपभोग की आतुरता चरम सीमा तक पहुँचती है व उपार्जन से लेकर उपभोग तक का सारा ढाँचा विकृतियों से भर जाता है। फलतः वैभव का रसास्वादन जितना मिलता है उसकी तुलना में विग्रह और संकट कहीं अधिक मात्रा में बढ़ जाता है। फलतः वह सम्पन्नता दरिद्रता से भी महंगी पड़ती है।

एक भूख से संत्रस्त है दूसरा अपच का मरीज। एक को कुपोषण की शिकायत है दूसरे इन्द्रिय शक्ति के दुरुपयोग से खोखले हो रहे हैं यौन रोग मधुमेह, अनिद्रा रक्तचाप, हृदय रोग प्रायः सुसम्पन्न वर्ग को ही होते हैं और वैभव जन्य सभ्यता की देन समझे जाते हैं। नैतिक खोखलेपन में भी अमीर ही गरीबों से आगे है। असंतोष और विक्षोभ की मात्रा भी उन्हीं के पास अधिक है। शारीरिक दुर्बलता, रुग्णता के अतिरिक्त अकाल मृत्यु भी उन्हीं के हिस्से में अधिक आती हैं मानसिक दृष्टि से चिंता आशंका और विक्षोभ ग्रस्त भी उन्हीं को अधिक पाया जाता है। पिछड़े लोग चोरी उठाईगिरी करते पायें जाते हैं किन्तु सम्पन्न और समझदार लोगों के द्वारा जो प्रपंच रचे जाते हैं उनके कुचक्र में पिसकर तो अगणित लोगों का कचूमर निकल जाता है। शोषण की बाजीगरी से वे उतना कमा लेते हैं जितना कोई चोर उठाईगीरा सौ जन्मों में भी उपार्जित नहीं कर सकता। सम्पन्नता से एक प्रकार की विपत्तियाँ उत्पन्न होती है। दरिद्रता में दूसरी तरह की। इसके विपरीत दोनों ही पक्षों में सुखी और संतुष्ट लोग पाये जाते है। झोपड़ियों में भी स्वर्ग बरसता है। किसान और मजदूर स्वल्प साधनों से निर्वाह करते हुए हँसते-हँसते सुखी संतुष्ट जीवन यापन करते है। अफ्रीका के मसाई वनवासी अर्द्धनग्न स्थिति में रहते आधा पेट खाते हुए भी काया को इतनी बलिष्ठ रखे रहते हैं कि भयानक बर्बर शेरों से गुत्थम–गुत्थी करके मात्र भाले के सहारे विजय प्राप्त कर सकें। साधु और ब्राह्मणों का ऋषियों और तत्त्वज्ञानियों का जीवन प्रत्यक्षतः अभावग्रस्त स्थिति से ही गुजरता था पर इससे उनकी गरिमा प्रतिभा प्रतिष्ठा एवं विशिष्टता पर कोई आँच नहीं आती थी। इसी प्रकार राजा जनक-नसिरुद्दीन जैसे अनेक सुसम्पन्न व्यक्ति वैभव को सार्वजनिक अमानत मानकर उसके बीच कमल पत्रवत् निस्पृह निर्वाह करते रहे है।

इन तथ्यों पर विचार करने से वह प्रतिपादन सही सिद्ध नहीं होता, जिसमें संपन्नता की न्यूनाधिकता को मानवी कठिनाइयों का कारण माना जाता है। यही बात शिक्षा के सम्बन्ध में भी है। यदि शिक्षा का अर्थ भौतिक जानकारी देने वाली स्कूली पढ़ाई तक सीमित हो तो उसके फलस्वरूप बहुलता कुशलता एवं अधिक उपार्जन क्षमता के लाभ ही जोड़ें जा सकते है। मूल प्रश्न फिर भी अप्रभावित ही रहता है। शिक्षितों को अशिक्षितों की तुलना में अधिक ठाट-बाट से रहते ही अवश्य पाया जायेगा किन्तु यदि उन्हें इस कसौटी पर कसा जाय कि अपने निजी जीवन में वे कितने सन्तुष्ट और संयुक्त हैं तो पाया जायेगा कि वे भी अशिक्षितों की तुलना में कुछ अधिक अच्छी स्थिति में नहीं है। व्यक्तित्व की उत्कृष्टता जहाँ होगी वहाँ पारिवारिक जीवन में सौजन्य-सौमनस्य का बाहुल्य मिलेगा। इसी प्रकार संपर्क क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग-सद्भाव उमड़ रहा होगा।

तथाकथित शिक्षा का सज्जनता और शालीनता से सीधा सम्बन्ध नहीं जुड़ा है, फलतः सुशिक्षित कहलाने वाले लोग भी व्यक्तित्व की दृष्टि से अशिक्षितों से किसी कदर अच्छी स्थिति में नहीं रह रहे हैं। सम्पन्नता और शिक्षा की दुहाई इन दिनों बहुत दी जाती है और उन्हें ही जादू की छड़ी बताया जाता है यह अतिवादी प्रतिपादन है। सम्पन्नता और शिक्षा की अभिवृद्धि की व्यवस्था की जानी चाहिए। ऐसे प्रयत्नों का हर कोई स्वागत करेगा। इनकी उपयोगिता आवश्यकता से इनकार कौन कर सकता है। इतने पर भी उनका महत्त्व उतना ही माना जाना चाहिए जितना कि वस्तुतः है या हो सकता है। प्रस्तुत समस्यायें न आर्थिक अभावों से उत्पन्न हुई है और न शिक्षा की कमी से। उनका मूल कारण व्यक्तित्व का स्तर गिर जाना है। अभाव और अशिक्षा को भी व्यक्तित्व की गिरावट के अन्य कारणों की तरह एक और कारण गिना जा सकता है पर सारा दोष इन्हीं पर थोप देना और इन्हीं उपलब्धियों के सहारे उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न देखना-कठिनाइयों के हल हो जाने की बात सोचता निरर्थक है। अतिवादी प्रतिपादनों से दुराग्रह भले ही उत्पन्न कर लिया जाय। वस्तुस्थिति को समझने में उससे कोई सहायता नहीं मिलती।

यथार्थवादी पर्यवेक्षण से युग समस्याओं का स्वरूप समझने का प्रयत्न किया जाय तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि भौतिक कारणों से ही विपत्तियाँ उत्पन्न नहीं होती उनका प्रधान कारण व्यक्तित्व का वह स्तर है जिसे अप्रत्यक्ष एवं चिन्तन परक कह सकते हैं। सोचने की मशीन गड़बड़ा जाने से कैसे कैसे विचित्र आचरण बन पड़ते हैं उसके आश्चर्यजनक कौतूहल आये दिन सामने आते रहते है। सोते समय आदमी इतना बेखबर हो जाता है कि लज्जा ढँकने के कपड़े उतर जाने तक का ध्यान नहीं रहता।

नशा पी लेने वाले का अटपटापन कितना विचित्र होता है उसे कौन नहीं जानता। नशे की खुमारी में जीभ से अटपटे शब्द निकलती है। पैर बेढंगी चाल चलते और हाथ बेतुकी हरकतें करते है। बेढंगे आचरण उसे राजदंड समाज तिरस्कार, शरीर रोग, आर्थिक तंगी आदि कितनी विपत्तियों में फँसते हैं यह सर्व विदित हैं। इन सब कठिनाइयों के अनेक विश्लेषण करके एक ही मूल कारण ढूँढ़ना हो तो कहा जा सकता है कि चिन्तन की मशीन गड़बड़ा जाने से ही यह अनेक प्रकार की अवांछनीय समस्यायें उत्पन्न हुई है।

वस्तुतः पिछली अभावग्रस्त पीढ़ियों की तुलना में हम हर दृष्टि से पिछड़े हुए है। दो सौ वर्ष पहले आज जितने सुविधा साधन कहाँ थे? विज्ञान की प्रगति इतनी कहाँ हुई थी? यातायात संचार चिकित्सा शिक्षा व्यवसाय आदि के साधन बहुत स्वल्प थे। उनकी तुलना में आज के साधन आश्चर्यजनक रीति से बढ़े हैं। फिर भी स्वास्थ्य बेतरह गिर गया-चिकित्सा साधन जितने बढ़े हैं उनकी तुलना में दुर्बलता और रुग्णता ही अधिक बढ़ी है। मन को प्रसन्न करने वाली सुविधायें अब कितनी अधिक है फिर भी उद्विग्नता, अशान्ति असंतोष विक्षोभ चरम सीमा को छूते जाते है। ऐसी दशा में प्रगतिशीलता का दावा स्वीकार करने में भारी असमंजस होता है। साधनों की दृष्टि से निश्चित रूप में हम देवताओं से बाजी मार रहे है। पर साथ ही परिस्थितियों की दृष्टि से नरक में कराहने वाले प्राणियों के समतुल्य बनते जा रहे है। इस विडम्बना का कारण एक ही है कि हमारी अंतः चेतना की उत्कृष्टता बेतरह गिर रही है। आदर्शों पर विश्वास, उनका सम्मान और चलन में व्यवहार घट रहा है।

यदि तथ्य को समझा जा सके तो व्यक्ति और समाज की समस्त समस्याओं का एकमात्र कारण और एकमात्र समाधान यही प्रतीत होगा कि व्यक्ति अन्तः चेतना का स्पर्श किया जाय और उसके स्तर में आदर्शवादी आस्थाओं को पुनर्जीवित किया जाय निकृष्टता से विरत होकर हमारे अंतःकरण जिस दिन उत्कृष्टता की ओर अभिमुख होने लगें समझना चाहिए कि अब समस्त समस्याओं के समाधान की शुभ घड़ी निकट आ गई। इसके लिए बिना प्रगति के लिए किये जाने वाले प्रयत्न हमें मृगतृष्णाओं में ही भटकाते रहेंगे।


हमारा सच्चा सहचर-ईश्वर

जिन्दगी को ठीक तरह जीने के लिये एक ऐसे साथी की आवश्यकता लिये एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे रास्ता बतायें प्यार करे सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनों से ही सम्पन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर जिन्दगी की लम्बी मंजिल बड़ी हँसी-खुशी और सुविधा के साथ पूरी हो जाती है। अकेले में यह लम्बा रास्ता भारी हो जाता है और कठिन प्रतीत होता है।

ऐसा सबसे उपयुक्त साथी जो निरंतर मित्र सखा सेवक गुरु सहायक की तरह हर एक घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न माँगे केवल एक ईश्वर ही हो सकता है। ईश्वर को जीवन का सहचर बना लेने से मंजिल इतनी मंगलमय हो जाती है कि यह धरती ही ईश्वर सबके साथ है और वह सब की सहायता भी करता है पर जो उसे समझते और देखते है। वास्तविक लाभ उन्हें ही मिल पाता है, किसी के घर में सोना गढ़ा है और उसे वह प्रतीत न हो तो गरीबी ही अनुभव होती रहेगी, किन्तु यदि मालूम हो कि हमारे घर में इतना सोना है तो उसका भले ही उपयोग न किया जाय मन में अमीरी का गर्व और विश्वास बना रहेगा। ईश्वर को भूले रहने पर हमें अकेलापन प्रतीत होता है, पर जब उसे अपने रोम-रोम में समाया हुआ, अजस्र प्रेम बरसाता हुआ और सहयोग लुटाता हुआ अनुभव करते हैं तो साहस हजारों गुना अधिक हो जाता है। आशा और विश्वास से हृदय हर घड़ी भरा रहता है।

जिसने ईश्वर को भुला रक्खा है अपने बलबूते पर ही सब कुछ करता है और सोचता है उसे जिन्दगी बहुत भारी प्रतीत होती है, इतना वजन उठाकर चलने में उसके पैर लड़खड़ाने लगते है। कठिनाइयाँ और आपत्तियाँ सामने आने पर भय और आशंका से कलेजा धक धक करने लगता है। अपने साधनों में कमी दीखने पर भविष्य अंधकारमय प्रतीत होने लगता है। परन्तु जिसे ईश्वर पर विश्वास है वह सदा वही अनुभव करेगा कि कोई बड़ी शक्ति मेरे साथ है जहाँ अपना बल थकेगा वहाँ उसका बल मिलेगा। जहाँ अपने साधन कम पड़ रहे होंगे वहाँ उसके साधन कम पड़ रहे होंगे वहाँ उसके साधन उपलब्ध होंगे। इस संसार में क्षण-क्षण पर प्राणघातक संकट और आपत्तियों के स्थल मौजूद है। जो उन से अब तक अपनी रक्षा करता रहा वह आगे क्यों न करेगा? अब तक के जीवन पर यदि हम ध्यान दे तो ऐसे ढेरों प्रसंग याद आ जायेंगे जब चारों ओर अँधेरा छाया हुआ था और यह प्रतीत होता था कि नाव अब डूबी और तब डूबी। पर स्थिति बदली, विपत्ति की घटाएँ हटी और सुरक्षा के साधन बन गए। लोग इसे आकस्मिक अवसर कह कर ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को भूलते रहते है। वास्तविकता यह है कि समय-समय पर हमें दैवी सहायता मिलती है और अपने स्वल्प साधन रहते हुए भी कोई बड़ी शक्ति सहायता करने के लिये आ पहुँचती है। कृतघ्नता को हमने अपने स्वभाव में यदि सम्मिलित नहीं किया है तो अपने निज के जीवन में ही अगणित अवसर दैवी सहायता के ढूँढ़ सकते है और यह विश्वास कर सकते हैं कि उसकी अहैतुकी कृपा निरन्तर हमारे ऊपर बरसती रहती है।

अब तक जिसने समय-समय पर इतनी सहायता की है, जन्म लेने से पहले ही हर घड़ी गरम मीठे और ताजे दूध से निरन्तर भरे रहने वाले दो-दो डिब्बे जिसने तैयार करके रख दिये थे, माता के रूप में धोबिन, भंजन, डॉक्टर, नर्स आया, तथा मनमाना खर्च और दुलार करने वाली एक चौबीस घंटे की बिना वेतन की सेविका जिसने नियुक्त कर रखी थी, प्रत्येक अवसर पर जिसकी सहायता मिलती रहीं है वह आगे भी मिलेगी ही और अपना भविष्य उज्ज्वल बनेगा ही, यह विश्वास नहीं हो सकता। उसकी हिम्मत नहीं हो सकता। उसकी हिम्मत बढ़ती है और साहसी शूरवीरों जैसा कलेजा बना रहता है।

डरता वह है जिसे ईश्वर का डर नहीं होता। जो ईश्वर से डरता है उसके आदेशों का उल्लंघन नहीं करता उसे इस संसार में किसी से भी डरना नहीं पड़ता संसार की हर वस्तु से डरने और सशंकित रहने का एक ही कारण है-ईश्वर से न डरना, उसकी अवज्ञा करना जो ऐसा नहीं करते उसे अपना मित्र सहायक और मार्गदर्शक मानते हैं उन्हें सबसे पहला उपहार निर्भयता का प्राप्त होता है। उन्हें फिर किसी से भी डरना नहीं पड़ता आपत्तियाँ उन्हें खिलवाड़ सरीखी दीखती है। वस्तुतः इस पुण्य उपवन संसार में डरने का कहीं कोई कारण नहीं है। ईश्वर द्वारा कागज का डरावना चेहरा पहन कर छोटे बच्चों को डराने का विनोद भर किया जाता है।

पिता अपने बच्चों को तलवार घुमाकर डराना चाहे तो क्या बच्चा कभी डरता है? ईश्वर के हाथ में इस संसार की सारी बागडोर हैं। दीखने वाली कठिनाइयाँ भले ही तलवार जैसी हो, उनकी मूँठ तो अपने परम स्नेही के हाथ में है फिर डरने की क्या बात रही? ईश्वर विश्वासी का सोचना इसी ढंग का होता है। हर डराने वाली घटना उसे खिलवाड़ जैसी लगती है और विषम घड़ियों में भी न तो उसे घबराहट होती है और न परेशानी।

अपना सहायक पिता-माता स्वामी सखा, भ्राता मित्र परिजन और धन जिसने ईश्वर को मान रखा है उसे बड़े से बड़े अमीर से, राजाधिराज से अधिक आत्म विश्वास बना रहेगा। राजा रईसों के लड़के अपने पिता की जरा सी संपत्ति पर गर्व कर सकते हैं तो अनंत सामर्थ्य और असीम विभूतियों के स्वामी ईश्वर को जो अपना पिता मानेगा उसे इस संसार में फैला हुआ सब कुछ अपना ही अनुभव होगा। इतना अतुल वैभव जब अपना, अपने पिता का ही है तब दरिद्रता और गरीबी की बात सोचने का प्रश्न ही नहीं उठता। गरीब वे है जो केवल अपनी संपत्ति को ही अपनी मानते है। ईश्वर को अपने से पृथक् दूर एवं असम्बद्ध मानने वाले को ही गरीबी दुःख देती है और उसे ही तृष्णा सताती है। जब सब कुछ अपने ईश्वर का ही है तो फिर असंतोष किस चीज का?

रास्ता वह भूलता है जिसे बताने वाले की बात सुनने की फुरसत नहीं होती। अन्तरात्मा में बैठा हुआ ईश्वर उचित और अनुचित की, कर्तव्य और अकर्तव्य की प्रेरणा निरंतर देता रहता हैं जो इसे सुनेगा उसका महत्त्व समझेगा और सम्मान करेगा उसे सीधे रास्ते चलने में कोई कठिनाई न होगी और जो सीधे रास्ते चलता है उसे लोक में सुख और परलोक में शान्ति की कमी नहीं रहतीं। यश प्रतिष्ठा, और सम्मान उसके पीछे फिरते हैं भले ही धन की दृष्टि से वह ऐसा न हो पावे पर महत्ता उसके चरणों पर लेटती रहती हैं। महापुरुषों और नर रत्नों में ही वह गिना जाता है। ईश्वर को जिसने पहचाना और अपनाया वह नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बन कर रहता है। सदाचार और कर्तव्य परायणता, आत्म विश्वास और निर्भयता, आशा और धैर्य आनंद और संतोष यही सब तो आस्तिकता के चिन्ह है। जैसे-जैसे ईश्वर विश्वास बढ़ता है वैसे ही यह महानतायें अपने आप उत्पन्न होती जाती है। जीवन की सार्थकता और सफलता उन्हीं तत्त्वों पर तो निर्भर है।

ईश्वर की उपेक्षा करने में परमेश्वर की कोई हानि नहीं। हमारे भजन-ध्यान से उनका कुछ बनता बिगड़ता नहीं उसकी कृपा में इससे कोई अंतर पुत्रों का हित चिंतन वैसे ही करते हैं जैसे माता-पिता छोटे शिशु का करते हैं। उपेक्षा में हानि अपनी ही है। अकेलापन सदा ही अखरता है। दूसरे स्वजन सम्बन्धी एक समय तक ही साथ रह सकते है उनका प्रेम भी बदले की ही प्रक्रिया पर निर्भर रहता है। फिर उनकी क्षमा और उदारता भी उतनी बढ़ी चढ़ी कहाँ होती है। सबसे श्रेष्ठ ओर सबसे सस्ता साथी ईश्वर ही हो सकता है। उसकी उपेक्षा करके अपना ही सबसे अधिक अहित होता है। हम उन सब लाभों से वंचित रह जाते है जो भगवान के सान्निध्य में रहने से प्राप्त होते थे हो सकते थे। गाड़ी दो पहिये से चलती है। अपनी गाड़ी में एक पहिया एक ईश्वर का और लगा लें तो जो गति आती है वह एक लगा लें तो जो गति आती है वह एक पहिये से नहीं आ सकती। ईश्वर विहीन जीवन ऐसा ही है जैसा बिना शरीर के प्रेत-पिशाच की योनि में विचरण करने वाली आत्मा। उसे अशान्ति ही मिलती है। असंतोष द्वेष क्लेश से ही ऐसी मनोभूमि जलती और संत्रस्त रहती है। परमात्मा से विमुख होकर हम पाते कुछ नहीं खोते बहुत हैं समय रहते इस भूल को सुधार लिया जाय तो ही अच्छा है।


Quotation

गायत्री परिवार की ग्रामीण चिकित्सा सेवा

इस पूर्णाहुति वर्ष में मिशन द्वारा 70,000 गाँवों में चिकित्सा सहायता पहुँचाने का संकल्प लिया गया है। इसके लिए चुने हुए गाँवों में जहाँ चिकित्सक या स्वास्थ्य निरीक्षक नहीं पहुँच पाते, कैम्पस् आयोजित किये जायेंगे तथा नेत्रदान यज्ञ से लेकर बाल रोग निदान व उपचार नारी रोगों की चिकित्सा निष्णात चिकित्सकों द्वारा की जाएगी। चिकित्सक बन्धुओं अपेक्षा है कि वे स्वयं तथा अपने परिचय की फार्मेस्युटीकल कम्पनियों के माध्यम से अधिक से अधिक दवाएँ शान्तिकुञ्ज तंत्र को उपलब्ध कराएँ ताकि पोषण व रोगों की रोकथाम की व्यवस्था का ग्रामीण भारत की दरिद्र नारायण की सेवा का प्रयोजन पूरा हो सके। चिकित्सकों से समयदान की भी अपेक्षा की जा रही हैं। वे संभव हो तो एक सप्ताह से लेकर एक माह का समयदान आगामी 7 माह में इस पुनीत-पुण्य कार्य हेतु दें। इसके लिए ग्रामीण चिकित्सा सेवा प्रकोष्ठ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से संपर्क करें। प्रथम इसी अप्रैल माह से आँवलखेड़ा गुरुवर की जन्मभूमि के आसपास के 700 गाँवों से आरंभ किया जा रहा है।


गायत्री साधना कुछ स्पष्टीकरण

गायत्री महामंत्र की साधना हर सुपात्र को अनेकानेक अनुदान देती है तथा उसके जीवन की अनगढ़ताओं को मिटा कर उसे सत्पथ पर चलना-व्यक्तित्व को सुव्यवस्थित बनाकर जीन जीना सिखाती है। गायत्री मंत्र मात्र एक वैदिक छंद या कविता नहीं अपितु समग्र धर्मशास्त्र अपने में छिपाए एक महान् शक्तिशाली मंत्र हैं। जो भी कुछ लाभ इसके बताये गए हैं वे मिलते तभी है जब व्यक्ति पात्रता का अर्जन करे, स्वयं को पवित्र निष्कलुषित बना ले तथा आचरण में आदर्शों को उतार कर भाव विह्वल होकर इस का जप करे। स्वयं जप करने से ही वह लाभ मिल पाता है जो शास्त्रों में वर्णित है। कइयों को भ्रांति है कि जप किसी और से करा के स्वयं लाभान्वित हुआ जा सकता हैं।

अपने बदले का जप किसी दूसरे से पैसा देकर करा लेना, एक प्रकार से उसके समय और श्रम को खरीद कर उसका लाभ ले लेना है। इसका यत्किंचित् ही परिणाम हो सकता है। पर कुछ महत्त्वपूर्ण काम ऐसे है जिन्हें स्वयं ही करने से काम चलता है। वे दूसरों से कराने पर उपहासास्पद ही बनते हैं। अपने बदले का भोजन किसी और से करा लिया जाय, अपने बदले में पढ़ाई नौकर से करा ली जाय, अपने बदले की नींद लेने का काम किसी अन्य को सौंपा जाय। संतानोत्पादन के लिए किसी अन्य की नियुक्ति की जाय तो बात कुछ बनती नहीं है। अपने रोग के लिए किसी दूसरे से दवा खाते रहने के लिए पैसा दिया जाता रहे तो रोग कैसे जाएगा इसी प्रकार भगवान की समीपता, श्रद्धासिक्त उपासना भी स्वयं ही करनी चाहिए। तपश्चर्या स्वयं ही की जाती हैं। मित्रता स्वयं ही निभाई जाती है। कसरत स्वयं ही करानी पड़ती है। यही बात उपासना के सम्बन्ध में भी है।

गायत्री सद्बुद्धि की देवी है। उसका तत्वार्थ हृदयंगम करने या उपासनारत रहने से दूरदर्शी विवेक बुद्धि का उदय होना निश्चित है। यह एक ही कारण ऐसा है जो जीवन प्रक्रिया को सन्मार्ग पर चला कर अनायास ही शोक संतोष का कष्ट कठिनाइयों का निराकरण करता है। जो टल नहीं सकता उसे सहन करने योग्य धैर्य प्रदान करता है। प्रगति पथ पर बढ़ने का साहस उत्पन्न होने से कितनी ही साँसारिक सफलतायें भी सरलतापूर्वक मिलने लगती है।

स्वर्ग-मुक्ति भी दृष्टिकोण के परिष्कृत होने तथा कार्यपद्धति में उत्कृष्टता का समावेश होने का ही प्रतिफल है। इन दोनों सफलताओं को विवेकशील इसी जीवन में प्राप्त कर लेते है। मरने के बाद इनके मिलने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती भव बंधनों से मुक्ति का तात्पर्य लोभ रूपी हथकड़ी मोह रूपी बेड़ी और अहंता रूपी रस्सी की जकड़न है। जो गायत्री का तत्त्वज्ञान अपना कर अपने अंतरंग को उत्कृष्ट बना लेता है उसको भव बंधनों से मुक्ति होने में कोई संदेह नहीं रह जाता। संदेह की बात तब उत्पन्न होती है जब तप का कर्मकाण्ड भर किया जाय और उस तत्त्वज्ञान को हृदयंगम करने-जीवनचर्या में सम्मिलित करने-जीवनचर्या में सम्मिलित करने से कतराते रहा जाय।

इस साधना को गुप्त रखने का आधार इतना ही है कि एक बार सारी शंकाओं का निराकरण करके साधना में निरत हुआ जाय और अविचल भाव से उस मार्ग पर चलते रहा जाय। अनेकों से अपनी साधना की चर्चा करने व विधि बताते रहने पर लोग अपनी अपनी नुक्ताचीनी निकालते और नये विधान बताकर साधक के मन को शंका सिक्त करते रहते है। जितनों से पूछा जाय उतनी ही कुछ नयी मीनमेख निकलेगी और मन भ्रमजाल में फँस कर श्रद्धा गँवा बैठेगा। विधियों में परिवर्तन करेगा और उस शंकास्पद स्थिति में लाभों से विधान को सुनिश्चित मान कर उसे श्रद्धापूर्वक अपनाये रहने की मनोभूमि बनानी चाहिए।

निराकारवादी प्रायः यह संदेह उठाते हैं कि उपासना में प्रतिमा पूजन की चित्र स्थापन की क्या आवश्यकता है। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि उपासना का महत्त्वपूर्ण अंग ध्यान-धारणा है और ध्यान के लिए नाम रूप की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। भावनाओं को परिष्कृत करने के लिए हर वर्ग के लोगों को भावना और प्रतीक का समन्वय करना पड़ता है। सभी देशों के अपने अपने झंडे होते है। उस देश के नागरिक उसका सम्मान करते है। नास्तिक कहे जाने वाले कम्युनिस्ट भी लाल झंडे को सलाम करते है और रूस जाने पर लेनिनग्राड में अवस्थात लेनिन के शरीर को सुरक्षित रख कर बनाये हुये प्रतीक का दर्शन करने जाते है। मुसलमान निराकारवादी हैं पर काबा की ओर मुँह करके नमाज पढ़ते है। मक्का में अवस्थित संगे असवद-स्याह मूसा के बने पत्थर का बोसा लेते हैं। आर्यसमाजी भी ॐ अक्षर और अग्निहोत्र में दैवी श्रद्धा व्यक्त करते है। कारण यह है कि प्रतीकों के माध्यम से धारणा जमाने में सुविधा मिलती है। छोटे बच्चों को भी वर्ण माला सिखाते समय क-कबूतर ख-खरगोश ग-गधा घ-घड़ी जैसे प्रतीकों को जोड़ देने से सीखने का काम सरल हो जाता है। यही तथ्य प्रतिमा स्थापन के संबंध में भी काम करता है।

कहा गया है कि गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है। कई श्लोकों में द्विजों को ही उसके अधिकार की बात कही गयी है। तब क्या अन्य जाति के लोग-विशेषतया शूद्र वर्ण के लोग गायत्री के अधिकारी नहीं?

इसका उत्तर स्पष्ट है। वर्ण जन्म से नहीं कर्म से माने जाने चाहिए। प्राचीन काल में यही परम्परा थी। द्विज शब्द या ब्राह्मण का तात्पर्य सदाचारी जीवन जीने वाले से है। किसी जाति विशेष से उसका तात्पर्य नहीं है। सदाचारी कर्त्तव्य परायण व्यक्ति यदि अपने को कषाय कल्मषों से मुक्त करके साधना करते हैं तो धुले कपड़े पर अच्छा रंग चढ़ने की तरह विशेष लाभ होता है। अन्यथा दुराचारी पर भी कोई रोक नहीं है। उसकी पाप नाश का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। उसका तात्पर्य पाप फल का नाश होने से नहीं वरन् पाप वृत्तियों से छुटकारा मिलने से है।

नियमित उपासना करने वालों की साधना किसी कारणवश किसी दिन छूट जाय तो उसका विकल्प यह है कि अगले दिनों थोड़ा थोड़ा जप बढ़ा कर उस छूटी गई साधना की संख्या पूर्ति कर लेनी चाहिए। स्त्रियों के अनुष्ठान के दिनों मासिक धर्म का व्यवधान पड़ जाय तो चार दिन बाद उसकी पूर्ति उतने दिन आगे बढ़ा कर या जप संख्या बढ़ा कर उसकी पूर्ति कर लेनी चाहिए।

अशिक्षित लोग जिन्हें गायत्री मंत्र का शुद्ध उच्चारण नहीं आता वे केवल “ॐ भूर्भुवः स्वः” इस पञ्चाक्षरी गायत्री का जप कर सकते हैं। यह भी ठीक तरह न कहा जा सके तो ‘‘हरि ॐ तत् सत्” का जप कर लें। प्रकारान्तर से यह भी पञ्चाक्षरी गायत्री है।

गायत्री का साकार या निराकार दोनों ही रूप में ध्यान किया जा सकता है। साकार उपासना वाले उसकी स्थापना माता के रूप में करें तथा निराकार वाले प्रकाश पुँज के रूप में। उदीयमान स्वर्णिम सूर्य या दीपक की लौ को सविता का प्रतीक मानें। एक प्रश्न यह सब में आता है कि जप के साथ अर्थ का भी चिन्तन करना चाहिए क्या? जप के साथ वस्तुतः ध्यान करना चाहिए। अर्थ चिन्तन के साथ जप करने में व्यवहारिक कठिनाई यह है कि शब्दार्थ के कल्पना चित्र मस्तिष्क में बनाते हुये देर लगती है इतनी देर जप को रोका नहीं जा सकता। उसका प्रवाह रुकना नहीं चाहिए। वह “तैल धारवत्” अविरल चलना चाहिए। गायत्री मंत्र का अर्थ भली-भाँति समझ तो लेना ही चाहिए मस्तिष्क में शब्दों के तात्पर्य के कल्पना चित्र बनाने हों तो वह कार्य किसी सुविधा के समय विस्तारपूर्वक करना चाहिए। जप के साथ नहीं। दोनों की संगति साथ-साथ बैठती नहीं।

गायत्री मंत्र के अतिरिक्त किसी और मंत्र का जप या पूजन करना हो तो करना चाहिए या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि श्रद्धा को एक केन्द्र पर केन्द्रित रखा जाय तो ही सर्वोत्तम है। साधक को पतिव्रता स्त्री की तरह एक ही पति दृष्ट पर श्रद्धा केन्द्रित रखना चाहिए। वेश्या की तरह अनेकों से अनेक लाभ प्राप्त करने का मन नहीं डुलाना चाहिए। फिर भी किसी का मन न माने तो कई देवताओं का जप पूजन करने में भी विशेष हानि नहीं है।

उसका निषेध नहीं है।

गायत्री को वेद माता देव माता विश्व माता इसीलिए कहा गया है कि तत्त्व ज्ञान और धर्म शास्त्र का सार संक्षेप होने से वेद माता है। उसकी उपासना से देवत्व की सतोगुण की मात्रा निरंतर बढ़ती है इसलिए वह देव माता है। उसका अंतिम लक्ष्य वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को कार्यान्वित करना है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की पारिवारिक भावना जगाना है। एक देश एक भाषा एक धर्म एक संस्कृति बनाते हुये हर प्रकार की विषमताओं को मिटा कर समता, ममता एकता का प्रचलन करना है, इसलिए वह विश्व माता है।

गायत्री का वैयक्तिक आधार सद् बुद्धि की स्थापना है और उसके “नः” शब्द से हम सबको सामूहिकता-सहकारिता की प्रवृत्तियों को ही उभारना चाहिए। इसी में वैयक्तिक व सामाजिक दोनों क्षेत्रों का कल्याण ही कल्याण है।


पराक्रम और पुरुषार्थ (Kahani)

देवता, चिरकाल से अनुरोध करते रहे कि लक्ष्मी जी असुरों के यहाँ न रहें। पर लक्ष्मीजी ने असुर परिकर छोड़ा नहीं। एक दिन अनायास ही लक्ष्मी जी देवलोक में आ गई। देवताओं ने असमंजस व्यक्त किया कि वे असुरों को छोड़कर चल क्यों पड़ी |

लक्ष्मी ने कहा-सुर और असुर होने का पुण्य-पाप भगवान देखते है। मेरा काम पराक्रम और पुरुषार्थ की जाँच पड़ताल करना है। अब वे बदल गये है आलस्य और दुर्व्यसन अपनाने लगे है ऐसे लोगों के साथ मेरा निर्वाह कैसे हो सकता था।


परिवर्तन, सतत् परिवर्तन ही सत्य है

सत्य के संबंध में तथ्यान्वेषियों का मत है कि कुछ प्रकरणों को छोड़ दिया जाय, तो “सत्य शाश्वत होता है।” वस्तुतः यह सत्य नहीं है। सत्य तो परिवर्तनशील है। उसका स्वरूप बदलता रहता है। जो आज सच है, अगले दिनों मिथ्या साबित हो सकता है और जो झूठ जैसा प्रतीत होता था, वह सच बन सकता है। यही प्रगतिशीलता हैं। उन्नति का आधार है जो इस प्रक्रिया से गुजरना चाहते है उन्हें अपना मस्तिष्क खुला रखना पड़ता है। पूर्वाग्रहों से चिपके रहने का अर्थ होगा उसी अनुपात में सत्य से दूर हटना और अवगति की ओर चल पड़ना

यह मानवी स्वभाव है कि वह एक बार जिसे सत्य मान लेता है उसके संबंध में स्थायी मान्यता बना बैठता है कि वह गलत हो ही नहीं सकता। इस क्रम में परिवर्तन की उन संभावनाओं को भी मानने से इनकार कर देता है जो वर्तमान में असत्य जैसी लगती तो हैं पर उनके यथार्थ साबित होने की पूरी-पूरी गुंजाइश है। मानवी प्रकृति की इस दुराग्रहपूर्ण नीति से कितनी ही महत्त्वपूर्ण जानकारियों से आये दिन वंचित रहना करने एवं तदनुरूप अनुकूलता अपनाने के अभाव में अनेकों प्रकार की कठिनाइयाँ का सामना करना पड़ता है।

परिवर्तन एक सच्चाई हैं। इसकी आवश्यकता को स्वीकार करने के उपरान्त ही अधिकाधिक प्रगति की दिशा में अग्रसर हो पाना संभव हैं। उदाहरणार्थ पृथ्वी को लिया जा सकता है जिसकी परिवर्तनशील प्रकृति ने ही उसे आज वृक्ष-वनस्पतियों से सज्जित और प्राणियों से आबाद बनाया है अन्यथा आरंभ में तो यह एक आग का तपता हुआ गोला भर थी। यदि वह ठंडी होकर ठोस न बनती तो शायद उसे यह सौभाग्य प्राप्त न होता। उसका यह परिवर्तन क्रम यहीं रुक नहीं गया, वरन् एक बार आरंभ हुआ तो फिर आगे चलता ही रहा। उसके मानचित्र में परिवर्तन का सिलसिला जारी रहा। शोध से समय-समय पर इस बात की पुष्टि होती रहीं है कि पृथ्वी के जिन हिस्सों में इन दिनों समुद्र सागर है वहाँ कभी पूर्व में स्थल भाग रहे थे और जहाँ समतल मैदान है, वहाँ पर्वत श्रृंखलायें थी। इसी बात को सत्यापित करने वाली दो सर्वथा प्राचीन चट्टानें कनाडा के मानिटोबा प्रांत के उस भाग में प्राप्त हुई है जहाँ इन दिनों सपाट मैदान है? पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार यह चट्टानें लगभग दो अरब तीस करोड़ वर्ष पुरानी है। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि उन दिनों उधर एक महाखण्ड था। दक्षिण अमेरिका अफ्रीका, भारत का दक्षिण खंड व आस्ट्रेलिया इससे परस्पर जुड़े हुए थे। तब एटलाँटिक एवं हिन्द महासागर का अस्तित्व नहीं था। एशिया का अधिकांश भाग जलप्लावित था। बाद में परिवर्तन प्रक्रिया के दौरान जल में थल प्रकट हुआ।

भूगर्भवेत्ता बताते हैं कि इन परिवर्तनों के पीछे भूकंप ज्वालामुखी विस्फोट बाढ़ जैसे अनेक कारण हो सकते है। इसमें हिमयुगों की भूमिका भी कोई कम नहीं रही। उनके अनुसार पृथ्वी पर पहले चार बार ऐसा ही हिमयुग आ चुका है। पिछले हिमयुग में पृथ्वी के विभिन्न खण्ड बर्फ से ढके थे बर्फ के पिघलने के उपरान्त जल के स्थान पर स्थल और थल के स्थान पर जल हो गया। यह सिलसिला आगे भी जारी रहे, तो कोई आश्चर्य नहीं। भूगोल के जानकार कहते है कि पिछले हिमयुग के दौरान बर्फ के जमाव के कारण बरसात के पानी के प्रवाह में अवरोध उत्पन्न हुआ, जिससे समुद्रों में उसका जाना रुक गया। इससे समुद्र सूखते गये और स्थल भाग बढ़ता गया। इसी के परिणामस्वरूप भाग बढ़ता गया। इसी के परिणामस्वरूप ब्रिटेन आज एक खाई के माध्यम से पृथक् होते हुए भी यूरोप से जुड़ा हुआ है दो लाख वर्ष पूर्व भारत और लंका भी एक ही भूभाग के रूप में परस्पर जुड़े थे। तब थल मार्ग द्वारा ही भारत से लंका पहुँचा जाता था। आज एक समुद्री चैनल ने उसी तरह दोनों को पृथक् कर दिया।

विद्वानों का मत है कि आज का आँध्रप्रदेश का तटीय विस्तार भूमि की दृष्टि से आस्ट्रेलिया से जुड़ा था एवं पूरा क्षेत्र “आँद्राचलम” कहलाता था। बाद में वह अलग होते हुए बहुत दूर चला गया। एशिया के साइबेरिया तथा अमेरिका के अलास्का के मध्य समुद्र के सुख जाने के कारण एशिया निवासी पशुओं को साथ लेकर अमेरिका जा बसे। आज के अमेरिकी दो लाख वर्ष पूर्व के एशियावासियों के ही वंशज हैं। हिमयुग के दिनों में एशिया चीन एवं कोरिया के मध्य विद्यमान् पीले समुद्र खाड़ी अनुपस्थित थी। इण्डोनेशिया तथा फिलीपीन्स के द्वीप एक दूसरे से जुड़े थे। यूगोस्लाविया और एड्रियाटिक के बीच समुद्र सूख गया था। जिब्राल्टर का जल डमरू मध्य न रहने के कारण स्पेन (यूरोप) से मोरक्कों (अफ्रीका) तक की पैदल यात्रा सहज संभव थी। हिमयुग के उपरान्त जमीन पर जमी बर्फ पिघल कर समुद्र की ओर बहने लगी जिससे कितने ही द्वीप जो परस्पर जुड़ें थे, पृथक् पृथक् होकर स्वतंत्र टापू बन गये।

बदलाव का यह क्रम यहीं नहीं थमा। आगे भी बना रहा। वर्षों पूर्व कच्छ के मरुप्रदेश की कुछ भूमि उठ कर ऊपर आ गई। उस स्थान पर पहले सिंधु नदी प्रवाहित होती थी। अब वह क्षेत्र अल्लाह का बाँध” नाम से प्रसिद्ध है। रेगिस्तानों का इतिहास भी इस बात की पुष्टि करता हे कि जहाँ इन दिनों मरुस्थल है वे कभी पृथ्वी के उपजाऊ भूभाग थे। परिवर्तन प्रक्रिया ने उन्हें कालक्रम में ऊसर बंजर भूमिखण्ड में बदल दिया।

पृथ्वी पर सतत् चलने वाले यह रूपान्तरण इस बात के द्योतक है कि यह सृष्टि की शाश्वत एवं सनातन प्रक्रिया है उसका हर कण हर क्षण परिवर्तन के लिए उद्यत है जड़ ही नहीं चेतन प्राणियों में भी यह क्रिया निरंतर चल रहीं है। उनके स्वरूप स्वभाव में अनवरत परिवर्तन हो रहे है। जड़वादी मान्यता के अनुसार मनुष्य का विकास “अमीबा” जैसे एककोशीय जीव से हुआ। इस विकास-यात्रा में सदियों बीत गये। उसके बाद ही वह वर्तमान आकार प्रकार प्राप्त कर सका। मनुष्य के उद्भव के संदर्भ में विकासवादी मान्यता यही है। क्रांतिकारी इसे ही सच मानते है तथ्य चाहे जो हों पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य को परिवर्तनों की एक लम्बी शृंखला से होकर गुजरना पड़ा है इस अवधि में आदि मानवों के नाक-नक्शे में ही परिवर्तन नहीं आये दृष्टिकोण विश्वास स्वभाव एवं क्रिया–कलापों में भी भारी अंतर देखा गया। जो कभी असभ्य अनपढ़ की तरह जंगली और गँवार थे, आज वह सभ्य संस्कृत बन कर गर्व-गौरव अनुभव करते है। संसार अगले ही दिनों उन्हें प्रगति के अग्रिम पड़ाव की ओर प्रयाण करते देख सकेगा। महामानवों का निर्माण इसी शृंखला की कड़ी होगा। सापेक्षवाद के अनुसार मान्यताएँ स्वयं में सच या झूठ नहीं होती। वह एक दूसरे के सापेक्ष होती है। इस आधार पर व्यक्तियों वस्तुओं या स्थानों के संबंध में कोई भी बात बिलकुल सत्य है ऐसा नहीं कहा जा सकता उनमें सुधार संशोधन की पूरी संभावना रहती है। विज्ञान का इतिहास इसी तथ्य की पुष्टि करता है। गतिशीलता इसी को कहते है। यह परिवर्तन प्रक्रिया का ही परिणाम है। सत्य के करीब इसी के सहारे पहुँचा जा सकता है। प्रकृति का यही नियम है।

मनुष्य मात्र को एक तथ्य समझना होगा कि प्रगति शील हुये बिना, प्रगति से गतिशीलता, परिवर्तन शीलता का शिक्षण लिये बिना प्रगति सम्भव नहीं। अध्यात्म का परिष्कृत स्वरूप ऐसे तत्त्वदर्शन को व्यवहारिक ठहरता है। जिसमें हठ न हो कि जो कहा जा रहा है वही सत्य है। तर्क तथ्य प्रमाणों की कसौटी पर कसकर यदि मान्यताओं को युगानुकूल बनाया जा सके तो प्रगति के अनेकानेक झरोखे सहसा खुल जाते है। सत्य को यदि पाना है तो मनुष्य मात्र को स्वयं को इतना लचीला चिन्तन अपनाना होगा। इसके सत्परिणाम मानवी विकास के अनेकानेक सोपानों के रूप में हस्तगत होते रह सकते है यही युगानुकूल भी है।


नदी तैरकर पार करने वाला यदि किनारा पकड़े बैठा रहे तो उसका नदी पार करना बेकार(Kahani)

महावीर का एक शिष्य हुआ है गौतम। वह परम ज्ञानी था। बड़ा पंडित था। प्रखर तथा कुशाग्र बुद्धि का था। किंतु अन्य अनेक शिष्य ज्ञान को प्राप्त करते चले गये वह नहीं प्राप्त कर सका। उसे भी यह बात खटकती थी कि आखिर उसमें क्या कमी है जो पीछे आते है वे आगे बढ़ जाते हैं और वह नहीं बढ़ पाता। उसकी कभी महावीर से पूछने की हिम्मत भी न होती। उसकी पीड़ा बढ़ती गई। वह प्रव्रज्या पर था। महावीर के अंतिम दिन थे। उन्होंने उसे लौटने के लिए संदेश भिजवाया। यह लौटा तो किंतु तब तक महावीर ने प्राण छोड़ दिये गौतम को गाँव के बाहर जब सूचना मिली कि महावीर नहीं रहे तो वह रोने लगा। ग्रामवासियों ने कहा रोते क्यों हो। वह बोला अब मेरा क्या होगा। क्या मेरे लिए कोई संदेश छोड़ गये है।

ग्रामवासियों ने कहा हाँ मरते समय तुम्हारी बड़ी याद की थी और कहा गौतम को इतना कह देना कि वह पूरी नदी पार कर गया अब किनारा पकड़े क्यों बैठा हैं। नदी तैरकर पार करने वाला यदि किनारा पकड़े बैठा रहे तो उसका नदी पार करना बेकार।”

कहते हैं कि महावीर के अंतिम वचन सुनते ही गौतम ज्ञान को लब्ध हो गया। मृत्यु के समय का यह संदेश उसके जीवन को बदल गया क्योंकि उसे पता था कि कौन-सा किनारा पकड़े वह बैठा था। अकड़ और अहंकार का किनारा छोड़ते ही वह ज्ञानी ही नहीं शिष्यों में प्रमुख हो गया।


वर्जनाओं का उल्लंघन ही पतन का कारण

स्वार्थपरता की मात्रा जब मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगती है तब मनुष्य किसी भी मार्ग से अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिये तत्पर हो जाता है। उचित अनुचित का विचार छोड़कर जैसे भी बने अपना स्वार्थ सिद्ध करने की नीति अपनाई जाने लगती है तो मनुष्य का व्यक्तित्व असुरता से परिपूर्ण हो जाता है। असुरता की जहाँ वृद्धि होगी वहाँ सुख-शांति का ठहर सकना संभव न होगा अनैतिक दृष्टि अपनाये हुए व्यक्तियों का समाज असभ्य हो कहता सकता है। वहाँ निरंतर क्लेश कलह ही नहीं सर्वनाश के अवसर भी उपस्थित होते रहते है आज हमारे समाज में अपराधों क्लेशों संघर्षों अभावों चिंताओं और समस्याओं का घटाटोप दिखाई पड़ता है उसका एक मात्र कारण व्यक्तियों के मन में बँटी हुई स्वार्थपरता, चरित्रहीनता एवं संकुचित दृष्टि ही है। आदर्शवाद का धर्म-नीति एवं मर्यादा का उल्लंघन जब कभी भी अधिक मात्रा में होने लगता है तब उसका परिणाम सारे समाज को भुगतान पड़ता है।

स्वार्थ से मनुष्य कैसा निर्मोही हो जाता है इसके अगणित उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। स्वजन संबंधियों के रिश्ते भी स्वार्थ-परता के तूफान में नष्ट भ्रष्ट हो जाते है और औरंगजेब अपने सगे भाई दारा को अपने रास्ते का काँटा समझाता है और उसका सिर काटकर अपने बाप के पेश करता है सगे भाई के प्राण लेना और बाप का अपने प्राण प्यारे बेटे का कटा हुआ सिर दिखाकर मृत्यु से अधिक यंत्रणा सहने को विवश करने वाली यह डाकिनी स्वार्थपरता ही तो है। बाली ने अपने सगे भाई सुग्रीव की स्त्री का अपहरण कर लिया। रावण ने आने भाई विभीषण को भरी सभा में सदुपदेश देने के कारण लात मारकर तिरस्कृत किया। कौरवों ने पाण्डवों को क्या क्या दुःख नहीं दिए। एक ओर राम लक्ष्मण और भरत का आदर्श प्रेम है दूसरी ओर औरंगजेब वाली रावण और कौरवों के कुकृत्य है। इस अंतर को प्रस्तुत करने का कारण धर्म और अधर्म की आस्था-अनास्था ही हो सकती हैं।

बाप बेटे का कितना पवित्र सम्बन्ध है। पिता की आज्ञा पालन करने लिये जहाँ राम श्रवण कुमार भीष्म पुरु आदि ने अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किये वहाँ ऐसी भी परम्परा मौजूद है जिनमें बेटे ने बाप को तिरस्कृत पददलित और मौत के मुँह में धकेल देने में कसर न रखी। जहाँगीर ने अकबर को कैद किया था खुसरो ने जहाँगीर के खिलाफ बगावत की। औरंगजेब शाहजहाँ को कैद कर उसकी गद्दी पर आप बैठ गया और सलीम ने औरंगजेब के साथ वही व्यवहार किया। बेटों की बापों के प्रति की गई वह करतूतें किस समाज के लिये गौरवास्पद हो सकती है?

कंस ने अपनी बहिन देवकी के बच्चों को पत्थर पर पटक कर मार डाला। गुरुभक्ति के स्थान पर उनके साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले शिष्यों की भी कमी नहीं रही है। भस्मासुर अपने गुरु शिवजी पर उनके दिये हुए वरदान का उलटा प्रयोग एवं उन्हें भस्म करके पार्वती का अपहरण करने को उतारू हो गया। गुरु गोविन्दसिंह की हत्या उनके एक शिष्य ने ही कर दीं। दयानन्द को उनके प्रिय सेवक जगन्नाथ ने ही विष खिला दिया। ईसा मसीह को उनके एक शिष्य ने ही तीस रुपये के लोभ में गिरफ्तार कराके फाँसी पर चढ़वा दिया। जहाँ गुरु भक्ति के एक से एक ऊँचे उदाहरण मौजूद है वहाँ ऐसी निकृष्ट घटनाएँ भी कम नहीं है। अपने स्वामी की रक्षा के लिये बड़े से बड़ा त्याग करने वाली संयमी पन्नाधाय जैसे उदाहरण मौजूद हैं।

वहाँ सिराजुद्दौला से विश्वासघात करके उसके राज्य और जीवन को नष्ट करा देने वाले मीरजाफर जैसे नौकरों के कुकृत्य भी देखने को मिलते रहते है।

पतिव्रत भारतीय नारी की विशेषता रही है पर शूर्पणखा जैसी भी नारियाँ हुई है जो विवाहित पति को छोड़ कर पुरुषों की कल्पना से स्वच्छन्द विचरण करती रहीं और समाज में भयंकर काण्डों की निमित्त बनी। एक नारी वृत्त का उल्लंघन जिनने किया उनने विपत्ति को ही आमंत्रण किया है। उत्तानपाद ने एक स्त्री के रहते दूसरी से विवाह किया। उस ईशा से पहली रानी के पुत्र ध्रुव का अपनापन हुआ और बच्चे को घर छोड़ देना पड़ा। दशरथ ने तीन विवाह करके कौन शांति पाई? पाण्डु ने कुन्ती के रहने से माद्री से और विवाह कर लिया तो उन्हें भय ग्रस्त होकर अकाल मृत्यु के मुख में जाना पड़ा। रावण ने सीता का अपहरण करके कई स्त्री घर में रखनी चाही कीचक ने द्रौपदी पर कुदृष्टि डाली। अलाउद्दीन चित्तौड़ की रानी पद्मावती पर ललचाया। इन सबका क्या परिणाम हुआ? यह किसी से छिपा नहीं है कुमार्ग पर जिसने भी कदम बढ़ाया है उसने अपनी लिये ही नहीं वरन् दूसरों के लिये भी संकट उत्पन्न किया है।

रावण, कंस, जरासन्ध, हिरण्यकश्यप, वेन नहुष, दुर्योधन, औरंगजेब, नादिरशाह आदि नृशंस शासकों ने अपने मुँह पर कालिख पोती और अन्य अगणित लोगों को उत्पीड़न एवं यंत्रणा सहने के लिये विवश किया। मुहम्मद गौरी अपनी महत्त्वाकाँक्षाएँ पूरी करने के लिये क्या-क्या नहीं करता रहा? क्या नैपोलियन और सिकन्दर ने असंख्यों अपराधों के खून से धरती नहीं रंगी? कुमार्ग पर चलने वाले व्यक्ति सारे समाज को ही दुःख देते है। जयचंद ने देशद्रोह करके मोहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने को बुलाया तो उस कुकृत्य का परिणाम राष्ट्र को आद्यावधि सहना पड़ रहा है। दूसरी ओर एक व्यक्ति की देश भक्ति के कारण इंग्लैंड के मालामाल और समुन्नत हो जाने का भी उदाहरण मौजूद है। शाहजहाँ की पुत्री जहानआरा का इलाज एक अंग्रेज डॉक्टर ने किया था। उससे जब बादशाह ने पूछा कि आपने क्या पुरस्कार दूँ। तो उसने अपने लिये कुछ न माँगते हुये इतना ही कहा कि मेरे देश से आने वाले माल पर से चुंगी माफ कर दीजिये। शाहजहाँ ने उसे स्वीकार कर लिया और भारत के बाज़ार में इंग्लैंड जैसा पिछड़ा हुआ देश संसार का अग्रणी बन गया। मनुष्य हाड़-माँस का पुतला एक तुच्छ प्राणिमात्र है उसमें न कुछ विशेषता है न न्यूनता। उच्च भावनाओं के आधार पर वह देवता बन जाता है तुच्छ विचार के कारण वह पशु दिखाई पड़ता है और निकृष्ट पाप बुद्धि को अपना कर वह असुर एवं पिशाच बन जाता है। इस लोक में जो कुछ सुख शांति समृद्धि और प्रगति दिखाई पड़ती है वह सब सद्भावनाओं ओर सत्प्रवृत्तियों का परिचय है। जितनी भी उलझने पीड़ायें और कठिनाइयाँ दीखती है उनके मूल में कुबुद्धि का विष बीज ही फलता फूलता रहता है। सैकड़ों हजारों वर्ष बीत जाने पर भी पुरानी ऐतिहासिक इमारतें लोहे की चट्टान की तरह आज भी अडिग खड़ी है पर हमारे बनाये हुए बाँध स्कूल पुल इधर बनकर बिखरना शुरू हो जाते है। सामान और ज्ञान दोनों ही आज पहले की अपेक्षा अधिक उच्चकोटि का उपलब्ध है पर उस लगन की कमी ही दिखाई पड़ती है, जिसके कारण प्राचीन काल में लोग स्वल्प साधन होते हुए भी बड़ी बड़ी मजबूत चीजें बनाकर खड़ी कर देते थे। कुतुबमीनार ताजमहल आबू के जैन मंदिर मदुरा के मीनाक्षी के देवालय अजंता की गुफाएँ मिश्र के पिरामिड और चीन की दीवार उस समय के बौद्धिक ज्ञान का नहीं उत्कृष्ट वस्तु निर्माण करने की भावना का प्रमाण प्रस्तुत करती है।

मशीनों कारखानों नहरों बाँध और सड़कों के आधार पर हमारी सुख शांति नहीं बढ़ सकती इनसे थोड़ी आमदनी से अनर्थ ही बढ़ने वाला है। देखा जाता है कि कारखानों के मजदूर और दूसरे श्रमिक 40 फीसदी तक पैसा शराब, तंबाकू सिनेमा आदि में खर्च कर डालते हैं। आमदनी बढ़ती चलने पर तरह तरह की फिजूल खर्ची के साधन बढ़ते जाते है जिन्हें ऊँची तनख़्वाह मिलती है वे भी अभाव और कमी का रोना रोते रहते हैं। धनी लोगों का व्यक्तिगत एवं पारिवारिक सामाजिक जीवन क्लेश और द्वेष से भरा रहता है। पैसे के साथ-साथ दुर्गुण बढ़ते रहने पर वह दलित उलटी विपत्ति का कारण बनती जाती है इसलिये आर्थिक उन्नति के साथ साथ विवेकशीलता और सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि भी अवश्य रहेगी। यदि इस दिशा में उपेक्षा बरती गई तो प्रगति के लिये आर्थिक सुविधा बढ़ाने के जो प्रयत्न किये जा रहे है वे हमारी समस्याओं को सुलझा सकने में कदापि समर्थ न हो सकेंगे

जब तक मजदूर ईमानदारी से काम न करेंगे कोई कारखाना पनप नहीं सकेगा। जब ताक चीजें अच्छी और मजबूत न बनेंगी उससे किसी खरीदने वाले को लाभ न मिलेगा। जब तक विक्रेता और व्यापारी मिलावट कम तोल नाप, मुनाफाखोरी न छोड़ेंगे तब तक व्यापार की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी। सरकारी कर्मचारी जब तक अहंकार रिश्वत कामचोरी और घोटाला करने की प्रवृत्ति न छोड़ेंगे तब तक शासन यंत्र का उद्देश्य पूरा न होगा। यह सत्प्रवृत्तियाँ वर्गों में अभी उतनी नहीं दिखाई देती जितनी होनी चाहिए। यही कारण है कि हमारी प्रगति अवरुद्ध बनी पड़ी है। साधनों की कमी नहीं है आज जितना ज्ञान धन और श्रम साधन अपने पास मौजूद है उसका सदुपयोग होने लगे तो सुख सुविधाओं की अनेक गुनी अभिवृद्धि हो सकती हैं।

आत्म कल्याण की लक्ष्य पूर्ति तो सर्वथा सत्प्रवृत्तियों पर ही निर्भर है ईश्वर का साक्षात्कार स्वर्ग एवं मुक्ति को प्राप्त कर सकना केवल उन्हीं के लिए संभव है जिनके विचार और कार्य उच्चकोटि के आदर्शवादी एवं परमार्थ भावनाओं से ओत−प्रोत हैं। कुकर्मी और पाप वृत्तियों में डूबे हुए लोग चाहे कितना ही धार्मिक कर्मकाण्ड क्यों न करते रहें कितना भजन-पूजन कर लें, उन्हें ईश्वर के दरबार में प्रवेश न मिल सकेगा। भगवान घट-घट वासी है वे भावनाओं को परखते है और हमारी प्रवृत्तियों को भली प्रकार जानते हैं, उन्हें किसी बाह्य उपचार से बहकाया नहीं जा सकता। वे किसी पर तभी कृपा करते हैं जब भावना की उत्कृष्टता को परख लेते है। उन्हें भजन से अधिक भाव प्यारा है। भावनाशील व्यक्ति बिना भजन के भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है पर भावना हीन व्यक्ति के लिये केवल भजन के बल पर लक्ष्य प्राप्ति संभव नहीं हो सकती।

लौकिक और पारलौकिक भौतिक और आत्मिक कल्याण के लिये उत्कृष्ट भावनाओं की अभिवृद्धि नितांत आवश्यक है। प्राचीन काल में जब भी अनर्थ के अवसर आये हैं तब उनका कारण मनुष्य की स्वार्थपरता एवं पाप बुद्धि ही रही है और जब भी सुख शांति का आनन्दमय वातावरण रहा है तब उसके पीछे सद्भावनाओं का बाहुल्य ही मूल कारण रहा है। आज भी हमारे लिये वही मार्ग शेष है। इसके अतिरिक्त और रहेगा। सभ्य समाज की स्थिति जब जब रही तब धर्मबुद्धि की ही प्रधानता रही है। हमें वर्तमान दुर्दशा से ऊँचे उठने के लिये जनमानस में की स्थापना करनी होगी। इसी आधार पर विश्वव्यापी सुख शांति का वातावरण बन सकना संभव होगा।


सत्य बोलना और सुनना ही पर्याप्त नहीं (Kahani)

महात्मा भगवान दीन की सभा में यदि कभी लोग ताली बजा देते तो थे बड़े उदास हो जाते। सोचते कि कहीं कोई असत्य बात मुँह से निकल गई? एक बार वे सत्य पर ही बोल रहे थे। लोगों ने तालियाँ बजाई वे थोड़ी देर के लिए रुके। चारों ओर देखा पुनः बोलने लगे और थोड़ी देर के बाद लोगों ने फिर तालियाँ बजाई वे फिर रुके और बोले। मेरे द्वारा सत्य के विषय में कही जा रही बातों से आप सब सहमत होकर ही समर्थन में ताली बजा रहे है? भीड़ एक स्वर में जो सत्य आचरण भी करते हैं। अब लोग एक दूसरे का मुँह ताकने लगें। महात्मा बोले, ताली बजाने से पूर्व यह बात सोचनी चाहिए थी सत्य बोलना और सुनना ही पर्याप्त नहीं आचरण में उतारा जाना चाहिए।


VigyapanSuchana

अपने वाहन व साधन प्रथम पूर्णाहुति हेतु समर्पित करें

आँवलखेड़ा पूर्णाहुति सारे भारत व विश्व स्तर की पुरश्चरण महायज्ञ प्रक्रिया है। इसमें सारे राष्ट्र को गायत्रीमय बनाने का प्रचण्ड पुरुषार्थ सम्पन्न किया जाना है। इसके लिए उदार सदाशयी मनोभूमि वाले परिजनों पाठकगणों से अपने वाहनों को तय करने के लिए मिशन को समर्पित करने का आह्वान किया जा रहा है। दुपहिया वाहनों से लेकर जीप, कार टाटा 407 जैसी गाड़ियाँ जो इस सीमित अवधि के लिए दे सकें वे अपनी अन्तः की उसी उदारता के परिमाण में यज्ञ की फलश्रुतियों को प्राप्त करेंगे। साधन सभी को पूर्णाहुति के बाद लौटा दिए जायेंगे इसके लिए व्यवस्थापक शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से सम्पर्क करे।


फूल और काँटा (Kahani)

एक था फूल एक था काँटा। दोनों हरे-भरे उद्यान में आजू–बाजू पल रहे थे। मानों प्रकृति ने उनको यह संदेश देने को नियुक्त किया हो कि इस संसार की बनावट उभयनिष्ठ है, यहाँ सब कुछ सुखद और सौंदर्ययुक्त ही नहीं दुःखद और कुरूपता भी उसका आवश्यक अंग है।

काँटे ने कहा प्यारे दोस्त? तुम्हें भी भगवान ने व्यर्थ ही बनाया कितने कोमल हो तुम कि शीत और ताप के हलके झोंके भी सहन नहीं कर सकते? एक दो दिन खिलकर मुरझा जाने की तुम्हारी इस क्षण भंगुरता पर तरस आता है इधर देखो कितने दिनों से जी रहा हूँ तुम्हारे कितने ही पूर्वजों को इसी डाली पर खिलते और मुरझा जाते मैंने देखा पर मेरा अब तक भी कुछ नहीं बिगड़ा, जानते हो क्यों? इसलिये कि मैं अपना जो कुछ है तुम्हारी तरह लुटाता नहीं जो भी मेरे पास आता है काट खाता हूँ लोग मुझसे भय खाते है, हाथ भी नहीं लगाते। एक तुम हो जो चाहे जब तोड़ ले और मरोड़ कर फेंक दे।

फूल ने कहा बन्धुवर! तुम्हारा कहना यथार्थ है, किंतु मैं क्या करूं। मुझे मरने जीने का तो कभी ध्यान ही नहीं आता उत्सर्ग मेरे जीवन का ध्येय बन गया है। मैं चाहता हूँ कि मेरा जीवन एक पल के लिये ही क्यों न हो पर ऐसा हो जो भी देखे प्यार और प्रसन्नता से गदगद हो जाये। किसी को यह कहने का अवसर न मिले कि भगवान ने मेरे संसार को सुखद और सुन्दर न बनाकर दुःखदायी और कुरूप ही बनाया है।

काँटे का घमण्ड चकनाचूर हो गया उस दिन से उसने ऐंठ छोड़कर फूलों की रक्षा को ही अपना कर्तव्य मान लिया।


कामुक चिन्तन-आत्महनन

साधनों में ब्रह्मचर्य का विशेष महत्त्व बताया गया है और उसकी आवश्यकता का स्थान स्थान पर प्रतिपादन किया गया है। उसका कारण, मात्र शरीर की एक धातु के क्षरण से होने वाली नगण्य-सी क्षति का बढ़ा चढ़ाकर तूल देना नहीं वरन् यह समझना है कि शरीर में एक ही धातु ऐसी है जिसमें मात्र में सन्निहित रहता है। मुख्य हानि इसी के क्षरण की है।

शरीर शास्त्रियों ने स्वाभाविक और सामान्य कामसेवन में कोई हानि नहीं देखी है वरन् उसे लाभदायक भी बताया है। आँकड़े प्रस्तुत करके यह बताया जाता है कि विवाहितों की अपेक्षा अविवाहित अधिक बीमार पड़ते और अधिक मरते हैं। मानसिक रोगी भी अविवाहित ही ज्यादा होते है। फ्रायड आदि मनोविज्ञान वेत्ताओं ने तो काम-वासना को जीवन की एक आवश्यकता और उपयोगी प्रवृत्ति बताया है और चेतावनी दी है उस पर आवश्यक रोक-बाँध करने से शरीर और मन दोनों को अनेक रोगों का शिकार एवं क्षतिग्रस्त होना पड़ सकता है।

भारतीय योगियों ने भी वीर्यपात में जो शारीरिक तत्त्व चले जाते हैं उनकी बहुत परवाह नहीं की है क्यों नये रक्त के रूप में जिस तरह जल्दी ही उसकी पूर्ति कर दी जाती है उसी प्रकार वीर्य की क्षति भी पूरी होती रह सकती है। इसलिए अपने यहाँ स्वप्नदोष से होने वाली हानि को आध्यात्मिक दृष्टि से कोई बहुत बड़ी चिंता की बात बताया गया है। उसे शारीरिक विकार मात्र कह कर चिकित्सा कराने भर का निर्देश देकर बात समाप्त कर दी है।

प्राण वीर्य के साथ घुलने से पूर्व ही ऊर्ध्वगामी होकर मस्तिष्क में चला जाय और वहाँ ओजस् विद्युत के रूप में परिणत हो कर स्थूल शरीर के समस्त प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष अवयवों को परिपुष्ट करे इसके लिये वज्रोली क्रिया वज्रोली मुद्रा आदि की साधना बताई गई है। वीर्य से खींचा गया यह स्वत्व या तत्त्व जिसे ओजस् कहते है न केवल स्थूल शरीर को प्रभावित करता है वरन् सूक्ष्म शरीर, और कारण शरीर को भी प्रभावित एवं रक्त का मंथन होकर रेतस ग्रन्थियों द्वारा वीर्य का निर्माण उसका एक नियत थैली में संचय और स्खलन के साथ उसका मूत्रेन्द्रिय द्वारा बाहर निकल जाना इस मोटी बात को शरीर शास्त्र का सामान्य विद्यार्थी भी जानता है पर यह जानकारी किसी-किसी को ही है कि कामवासना के विचार समस्त शरीर में फैले हुए प्राण तत्त्व का मंथन करते है और सम्भोग के समय वीर्यपात के साथ साथ ही इस प्राण प्रवाह का एक अंश भी बाहर जाता है। फलतः इससे व्यक्ति क्रमशः दुर्बल हो जाता है। शरीर दृष्टि से उतना नहीं जितना कि मानसिक दृष्टि से उतना नहीं जितना कि मानसिक दृष्टि से।

इसलिये ब्रह्मचर्य का जहाँ भी आध्यात्मिक चर्चा के संदर्भ में जिक्र आये वहाँ प्राण के प्रवाह को नष्ट न होने देने की चिन्ता को ही प्रधान कारण माना जाना चाहिए मन से कामवासना के विचार एवं उत्तेजना को हटा कर उस कृत्य को विशुद्ध धर्म भावना से करने के लिये अपने यहाँ गर्भाधान को एक दिव्य संस्कार मात्र माना गया है। इस मनोदशा में विकारी हलचलें मन में न रहने से वरन् मात्र संतानोत्पादन अथवा शारीरिक प्रयोजन पूरे करता है। मनोविकारों से रहित कामसेवन से ब्रह्मचर्य की मूल आवश्यकता को विशेष क्षति नहीं पहुँचाती। इसके विपरीत यदि शारीरिक ब्रह्मचर्य तो निभाया जाय पर मानसिक अभिलाषा और आकांक्षा उद्दीप्त रहे तो उससे लगभग कामसेवन जितनी ही क्षति पहुँचती रहेगी।

प्राण तत्त्व की उत्तेजना कामवासना से जुड़ी हुई है वासना प्रदीप्त हुई कि प्राण भड़के और उफना हुआ दूध जिस प्रकार कड़ाही से निकल कर इधर उधर बिखर जाता है उसी प्रकार वासना की उद्दीप्तता प्राण का हरण और क्षरण निरंतर करती रहती है। ऐसे व्यक्ति जिनके मस्तिष्क निरंतर विकार ग्रस्त रहते है यदि शरीर शास्त्रियों के अनुसार औरों की अपेक्षा अधिक मरते और अधिक अस्वस्थ रहते हों तो आश्चर्य की बात नहीं।

साधु जीवन और सौम्य सरल मनोवृत्ति की भला कौन निन्दा करेगा। पवित्र दृष्टि रखने की महत्ता से कौन इनकार करेगा? नारी के प्रति पवित्र और श्रद्धा भरी-माता भगिनी और पुत्री की भावनायें रखकर उनके बारे में उक्त भावना रखकर विचार करने की विधि मालूम होने से नारियों के संपर्क में रहने से भी कुछ बिगड़ता नहीं इसके विपरीत बन जंगलों में एकाकी रहने और एकान्त सेवन करने पर भी यदि मन में रहती हो तो कहा जाना चाहिए कि वहाँ भी व्यभिचार ही चल रहा है।

नारी स्वयं बुरी नहीं है उसका वासनात्मक पक्ष ही बुरा है। जब कामिनी रमणी और रूपसी के रूप में दुर्बुद्धि पूर्वक उसे देखा जाता है तभी सर्पिणी डाकिनी बनती है अन्यथा वह पवित्रता और शक्ति की प्रत्यक्ष देवी है। उसका सान्निध्य एवं चिन्तन उत्कर्ष का ही कारण बनता है भारतीय धर्म में देवियों की प्रतिमायें युवा और अति सुन्दर नारियों के रूप में ही बनाई गई है लक्ष्मी दुर्गा सरस्वती गायत्री सावित्री आदि की अति सुन्दर ओर सुसज्जित युवती के कलेवर में ही विनिर्मित हुई होंगी। उनके अंगों में उभार ही रखें गये है। इसलिये कि साधक नारी के इस स्तर के रूप में भी श्रद्धा और पवित्रता का समुचित समावेश कर सके। यदि हम इस रूप में नारी को देवी मान पवित्रता का अभिवर्धन करते रहें तो हमारी साधना सफल सार्थक बन सकती है।


अपने समय की महाक्रान्ति

छोटे सामयिक, स्थानीय एवं वैयक्तिक समस्याओं के उपाय उपचार छोटे रूप में भी सोचे और खोजे जा सकते हैं, पर जब विपन्नताएँ व्यापक हो तो उनसे निपटने के लिए बड़े पैमाने पर व्यापक तैयारी करनी होती हैं। नल का पानी कुछ लोगों की जल आवश्यकता पूरी कर सकता है, किंतु सूखाग्रस्त विशाल भूखण्डों के स्थायी समाधान बड़े उपायों से ही बन पड़ते है। नल का पानी कुछ लोगों की जल आवश्यकता पूरी कर सकता है किंतु सूखाग्रस्त विशाल भूखण्डों के स्थायी समाधान बड़े उपायों से ही बन पड़ते हैं। भागीरथ ने यही किया था। हर वर्ष बृहत्तर भारत के उत्तरी भूखंड को जल के अभाव में जो त्रास सहने पड़ते थे, उनका समाधान एक दो कुआँ बावड़ी बना देने से नहीं हो सकता था। अस्तु दूरदर्शी भागीरथ, हिमाचल में कैद पड़ी विशाल जल राशि को गंगा के रूप में विशाल क्षेत्र में दौड़ाने के लिए कटिबद्ध हो गये। फलस्वरूप उसके प्रभाव में आने वाले क्षेत्र समुचित जल व्यवस्था बन जाने से सुरम्य और समृद्ध बन गये।

तथाकथित बुद्धिमान और शक्तिशाली इन दिनों की समस्याओं और आवश्यकताओं को तो समझते हैं पर उपाय खोजते समय यह मान बैठते हैं कि यह संसार मात्र पदार्थों से सजी पन्सारी की दुकान भर है। इसकी कुछ चीजें इधर से उधर कर देना, अनुपयुक्त को हटा देने और उपयुक्त को उस स्थान पर जमा देने भर से काम चल जाएगा समूचे प्रयास इन दिनों इसी दृष्टि से बन और चल रहे है। इन्हें ख्याली पुलाव कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।

चोट लगी हो तो मरहम पट्टी की जा सकती है, पर समस्त रक्त में फैले रक्त कैंसर या रक्त की विषाक्तता से तो उस उपाय से नहीं जूझा जा सकता। एक दिन तो कोई किसी को भी मुफ्त में रोटी खिला सकता हैं पर आये दिन की आवश्यकताएँ तो अपने बलबूते ही हल करनी होगी। किसी भी दानवीर के सदावर्त भण्डार से सभी का गुजारा चलता रहे, यह भी तो संभव नहीं।

इन दिनों समाज के सामने अगणित विकृतियों का अवांछनीय प्रचलनों का घटाटोप छाया हुआ है जिससे निपटा तो जा सकता, भले ही वह पहलवान जैसा हृष्ट−पुष्ट एवं लखपति-करोड़पति-जैसा समृद्ध ही क्यों न हो। महान् परिवर्तन सदैव सामूहिक प्रयासों से ही संभव होते रहे है आगे भी वैसे ही संभव होंगे। दूरदर्शी मनीषा को प्रस्तुत माहौल में एक काम अवश्य करना होगा- प्रस्तुत समस्याओं के कारण एवं निवारण के विषय में धैर्यपूर्वक शान्तचित्त से सोचना।

वस्तुतः आज मानवी चिंतन चरित्र तथा व्यवहार बुरी तरह गड़बड़ा गया है और उसकी स्थिति विक्षिप्तता ग्रस्तों की तरह हो गई है। इसी कारण ऐसे ऊटपटाँग काम होने लगे है जिनसे अपने व दूसरों के लिए विपत्ति ही चारों ओर छायी दीख पड़ती है। पगलाए व्यक्ति द्वारा की गयी तोड़ फोड़ की मरम्मत तो होना चाहिए पर साथ ही उस उन्माद की रोकथाम भी वैसी ही उद्दण्डता करते रहने की आदत अपना ली हैं।

सोचने पर घबराहट होती है कि आसमान में टँगे ग्रह नक्षत्र तारक यदि अचानक नीचे गिर पड़ें तो अपने घर परिवार का तो कचूमर ही निकल जाएगा। सोचा जा सकता है कि जब वे अरबों-खरबों वर्षों से आसमान में टँगे पड़ें है तो कम से अपनी जिन्दगी और गाँव मुहल्ले की जिन्दगी और गाँव मुहल्ले की जिन्दगी तक तो टँगे ही रहेंगे मनुष्य का भटकाव अनावश्यक भय अथवा पगलाना चिन्ता तो अवश्य उत्पन्न करता है पर ऐसा कुछ है नहीं जिनका सहज समाधान न निकल सके। मनुष्य को गड़बड़ियाँ करते रहने की जहाँ छूट मिली है वहाँ उसे समझ भी दी गई है कि उलझनों को सुलझाने में सफल हो सके।

अड़चनों से निपटने के लिए योजना बनानी और तैयारी करनी चाहिए। निराशा होने से तो मात्र आशंका ही का आतंक रहेगा। यहाँ यह तथ्य भी स्मरण रखने योग्य है कि सामान्य जन अपनी निजी समस्याओं को ही जिस तिस प्रकार सँभालते सुधारते रहते है पर व्यापक विपत्ति से तो मिलजुल कर ही निपटना पड़ता है। बाढ़ आने महामारी फैलने जैसे अवसरों पर सामूहिक योजनाएँ ही काम देती है पुरातन भाषा में ऐसे ही महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों को युगपरिवर्तनों अथवा अवतार जैसे नामों से पुकारा गया हैं ऐसे तूफानी परिवर्तनों का महाक्रान्ति भी कहते है। क्रांतियाँ प्रतिकूलताओं से निपटने के लिए संघर्ष रूप में उभरती है पर महाक्रान्तियों के लिए तो दूरगामी योजनाएँ बनानी पड़ती है, पर महाक्रान्तियों के लिए तो दूरगामी योजनाएँ बनानी पड़ती है। अनौचित्य के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने के साथ साथ नव सृजन के निर्धारण करने एवं कदम उठाने पड़ते है। इसे अपने समय की अदृश्य में पक रही खिचड़ी को महाक्रान्ति के रूप में जाना जाय तो भी ठीक है और युग परिवर्तन कहा जाय इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की संरचना जैसा कुछ नाम दिया जाय तो भी कोई हर्ज नहीं।

अत्यधिक विशालकाय सुविस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करने वाले 500 करोड़ मनुष्य के चिन्तन प्रवाह को अवांछनीयता से विरत करके, वाँछनीयता के साथ जोड़ देने वाले कार्य को कोई एक व्यक्ति न कर सकेगा पर इस तथ्य पर अविश्वास नहीं करना चाहिए कि ऐसे अवसर भूतकाल में भी अनेकों बार आये है और जब मनुष्य निराश होने लगे है तब उनमें नये सिरे से नई हिम्मत भरने के लिए प्रभात काल के अरुणोदय की तह नये तूफानी प्रवाह उदय होते रहे हैं जिनके लिए बड़ी से बड़ी उथल पुथल भी असंभव नहीं होती।

व्हेल मछलियाँ जब इकट्ठी होकर समुद्र के किसी क्षेत्र में मस्ती मचाती है तो उस परिधि में भी ऐसे तूफान खड़े कर देती हैं जो छोटी मोटी नाव को देखते देखते डूबो दें। अमावस्या पूर्णमासी को समुद्र में उठने वाले ज्वार भाटे भी ऐसे ही लगते हैं मानो वे शांत सागर को ज्वार भाटों के सहारे आकाश तक उछाल कर रहेंगे। मनुष्य के लिए यह सब कर सकना कठिन हो सकता है। पर उस प्रकृति के लिए तो ऐसा उठक पटक क्रीड़ा विनोद मात्र है जो आये दिन विशालकाय ग्रह पिण्ड रचने और मिटाने का खेल-खिलवाड़ करते रहने में अलमस्त बालकों की तरह निरत रहती है। स्रष्टा की सत्ता और क्षमता पर जिन्हें विश्वास है उन्हें इसी प्रकार सोचना चाहिए कि गंदगी कितनी ही कुरूप पूर्ण क्यों न हो वह तूफानी अंधड़ के दबाव और मूसलाधार वर्षा के प्रवाह के सामने टिक नहीं सकेगी। आज किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि मनुष्य दुष्ट चिन्तन और भ्रष्ट आचरण पर ही उतारू रहता है मनुष्यता समय समय पर ऐसी आश्चर्य जनक करवटें लेती रही है, जिसके अनुसार देव मानवों का नया वसन्त नये कोपलें नये खेत और नये फल फूलों की सम्पदा लेकर सभी दिशाओं में अट्टहास करता दीख पड़ता रहा है महामानवों देव पुरुषों मनीषियों सुधारकों सृजेताओं का ऐसा उत्पादन होता रहा है मानो वर्षा ऋतु में अगणित वनस्पतियों और जीव जंतुओं की नई फसल उगाने की सौगन्ध खाई हो। अगले ही दिनों आने वाले दशक में नये सृजेताओं की एक नई पीढ़ी ऐसी विकसित होगी जिसके सामने अब तक के सभी संतों सुधारकों और शहीदों के पुरुषार्थ छोटे पड़ जायेंगे ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए।


Quotation

अपने विचारों पर पैनी नजर रखिए क्योंकि वे कुछ ही दिनों में शब्द बनकर मुखर होने लगेंगे अपने शब्दों पर और भी तीखी नजर रखिए क्योंकि वे धीरे -धीरे कर्म बनकर प्रकट होते है अपने कर्मों का परीक्षण करते रहिए क्योंकि वे अब नहीं तो फिर आदत बनकर रहेंगे। अपनी आदतों को भुलावे में मत डालिए। क्योंकि वे चरित्र बने बिना नहीं रह सकती। अपने चरित्र पर दृष्टि रखें क्योंकि यही आपके भविष्य का जन्म दाता है।


आत्मावलम्बन (Kahani)

एक बार मेढ़कों को अपने समाज की अनुशासन हीनता पर बहुत खेद हुआ और वे शंकर भगवान के पास एक राजा भेजने की प्रार्थना लेकर पहुँचे। प्रार्थना स्वीकृत हो गई और शिवाजी ने नन्दी को राजा बनाकर भेज दिया। मेंढक इधर उधर निःशंक भाव से कूदते फाँदते से नन्दी के पैरों से दब कर कुचलने लगे। मेढ़कों को ऐसा राजा पसन्द नहीं आया फिर वे शिवलोक पहुँचे और पुराना हटाकर नया राजा भेजने का अनुरोध करने लगे।

यह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। नन्दी वापस बुला लिया गया। अब की बार अपने गले का सर्प शासक बनाकर भेजा। उसे जब भी भूख लगती वह मेढ़कों को पकड़ कर खा जाता। इस नई विपत्ति से मेढक बहुत दुखी हुए और भगवान के पास जाकर शिकायत करने लगे।

शिवाजी ने गम्भीर होकर कहा पहले मैंने अपना वाहन नन्दी भेजा फिर सर्प भेजा इस तरह शासक बदलने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। शासन से बड़ी बड़ी आशाएँ अपेक्षाएँ रखने की अपेक्षा स्वयं अनुशासित रहना सीखते तो ज्यादा अच्छा। यह सुनकर बेचारे अपने प्रबंध में जुट गये।

हम भी शासन का मुँह अधिक ताकते हैं आत्मावलम्बन पर निर्भर नहीं रहते।


एक मृतात्मा की भविष्यवाणी

“मुझे अनुभव हो रहा है कि पिछले जन्म में मैं बौद्ध भिक्षु के रूप में धार्मिक जीवन बिता रहा था। सात्विक एवं परमार्थरत जीवन का प्रभाव मेरे अंतःकरण में बीज रूप में पड़ता गया और इस जन्म में कुछ विशेष योग्यता लिये उत्पन्न हुआ। पवित्र अन्तःचेतना को इस जन्म में भी दूषित नहीं होने दिया। लोभ मोह अहंकार को तृप्त करने वाले आकर्षक अवसर भी आये, किन्तु उन्हें प्रभावी होते देकर समाज सेवा एवं परमार्थ परायणता को समाप्त नहीं होने दिया।”

उपरोक्त वक्तव्य न्यूयार्क शहर के कैट्स केट्सकिल माउन्टेन क्षेत्र में रहने वाले विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न डेनियल लोगेन का है, जिन्हें प्रकारान्तर से भविष्यवक्ता भी कह सकते हैं इस संबंध में उनका कहना है कि इसमें मेरी अपनी कोई विशेषता अथवा विशिष्टता नहीं है, यदि थोड़ी है तो बस पवित्र आत्मा उतरती है, और भविष्य में घटने वाली सारी घटनाओं को मुझे स्फुट दिखाती चली जाती है। इस प्रकरण का उल्लेख दि पीपुल्स एलमेनेक नामक ग्रन्थ में डेविड वालेकनिस्की एवं इरविंग वैलेक द्वारा विस्तारपूर्वक किया गया है।

भविष्यवाणी के संदर्भ में उन्होंने सन् 74 से लेकर आने वाली ती दशाब्दियों को नारी जागरण का समय कहा है जिसमें नारियों को पुरुष के समतुल्य मान्यता मिलेगी। इसके सम्बन्ध में उन्होंने संकेत देते हुए बताया है कि 75 के प्रारम्भ होते ही यह प्रक्रिया आरम्भ होते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जायेगी और अमेरिका में महिलाओं को सर्वप्रथम एकेडेमी अवॉर्ड मिलेगा। उनका यह कथन सत्य निकला।

उन्होंने आने वाले 25 वर्षों को (1975-2000) विषम काल घोषित किया और इसमें पृथ्वी के ही नहीं अपितु समूचे ब्रह्माण्ड के क्रिया−कलाप में आमूल-चूल परिवर्तन की ओर संकेत भी दिया है अपनी विशेष वेधक दृष्टि से देखकर उन्होंने विकास एवं विनाश के दोहरे प्रयोजन की भी घोषणा की। एवं 2000 के बाद आने वाले समय को उज्ज्वल भविष्य की सुखद संभावनाओं से भरा-पूरा बताया।

विनाश की ओर इंगित करते हुए कहा कि इस अवधि में मनुष्य अपने बुद्धिबल से उत्तरी ध्रुव में विभिन्न परमाणु परीक्षण करने का प्रयास करेगा जिसके कारण पृथ्वी के वातावरण में विनाशकारी परिवर्तन होंगे भूकम्प ज्वाला मुखी एवं बर्फ पिघलने के कारण तटीय देशों को जल प्लावन का खतरा बढ़ेगा किंतु फिर भी मनुष्य जाति के लिए यह प्राकृतिक आपदाएँ सर्वग्राही न सिद्ध हो सकेगी।

उनके अनुसार 1983 से 1990 के बीच किसी भागवत् सत्ता की कार्य योजना का सभी को अच्छा खासा संकेत मिलने लगेगा। प्रारम्भ में तो लोग अपरिचित रहेंगे किन्तु 90 का दशक प्रारम्भ होते ही विस्फोट जैसा प्रभाव दृष्टिगोचर होगा और समूचा विश्व उससे आप्लावित होकर और समूचा विश्व उससे आप्लावित होकर उसके बताये क्रिया–कलापों को सम्पादित करने के लिए कटिबद्ध होता नजर आयेगा। उस नवीन विचारधारा में किसी धर्म सम्प्रदाय जाति भाषा का समर्थन नहीं होगा अपितु मानवीय मूल्यों को स्थापित करना एवं मनुष्य को ध्वंस की अपेक्षा सृजन प्रयोजनों की ओर मोड़ने का ही एकमात्र उद्देश्य निहित होगा।

“1990 के दशक के प्रारम्भ से मध्य तक विचार क्राँति अपने पूर्ण यौवन में उभरकर सामने आयेगी और तथाकथित साम्यवादी तानाशाही राष्ट्रों में गृहयुद्ध होगा। जन शक्ति में वह सामर्थ्य दृष्टिगोचर होगी जिससे वह सत्ता चाहे बिठा ले अथवा उतार दे। विभिन्न राष्ट्रों का नेतृत्व ऐसे ही व्यक्ति कर सकेंगे जो स्वार्थपरता को छोड़ कर सच्चे अर्थों में परमार्थ परायणता का परिचय देंगे। यही एकमात्र कसौटी रहेगी जिसके आधार पर प्रत्येक राजनेता को कसा जाएगा

उनके अनुसार 1991-1996 के मध्य एक ऐसे शक्ति स्रोत का पता चलेगा, जिससे ऊर्जा संकट के संबंध में नया मार्गदर्शन मिलेगा। मानवीय मूल्यों को बदलते परिवेश में किस स्वरूप में अपना अस्तित्व रखना चाहिए एवं उसके परिपोषण-अभिवर्धन के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए इसका भी उत्तर इसी काल में मानव समुदाय को प्राप्त होगा।

सन् 1995 तक लोगों को यह पूर्ण विश्वास हो जाएगा कि विभिन्न औषधियों से ही मात्र रोगों का निदान संभव नहीं है। व्यक्ति की प्राण शक्ति एवं जीवनी शक्ति में कभी आने से आधि व्याधि पनपती बढ़ती एवं मनुष्य को संत्रस्त करती है। जनमानस में यह मान्यता धीर धीरे प्रगाढ़ होती चली जायेगी। “एड्स कैन्सर जैसे रोग इन्हीं कारणों से उत्पन्न होते हैं यह सभी चिकित्सक अब खुले स्वरों में कह रहे हैं।

इस प्रकार डैनियल लोगेन ने अपनी भविष्यवाणी में लगभग वही सारी बातें कही हैं जो आये दिन अपनी सूक्ष्म दृष्टि के आधार पर कहते आये है। यदि आने वाले समय में उनका उपरोक्त कथन सत्य सिद्ध होता प्रतीत हो तो उसे परोक्ष जगत में पहले ही घट चुकी भवितव्यता की स्थूल अभिव्यंजना भर माना जाना चाहिए, आश्चर्य अचम्भा जैसा कुछ नहीं क्योंकि जो कुछ घटने वाला होता है, उसका “ब्लूप्रिंट” अदृश्य जगत में बहुत पहले ही तैयार हो जाता है द्रष्टा पुरुष उसे अपनी दिव्य दृष्टि द्वारा अभिव्यक्त मात्र कर देते है। एक सामान्य और सूक्ष्म द्रष्टा में यही स्थूल अंतर है।


हम सतत् चलते रहेंगे प्रज्ञावतरण


हम सतत् चलते रहेंगे प्रज्ञावतरण (Kavita)

रात हो कितनी भयंकर, हो चुका अवतार प्रज्ञा रूप रखकर प्रभु पधारे। वायु का विकराल हो स्तर, तभी जागृति शंख बजता हर नगर हर द्वार द्वारे॥ माँ! प्रतिज्ञा है हमारी, हम सतत् चलते रहेंगे, हम सतत् चलते रहेंगे।

घर बने मंदिर मनों के दीप अर्चन के जले है। माँ! तुम्हीं ने तो हमें तप-त्याग का जीवन सिखाया, लोकहित चिंतन-समर्पण स्नेह अपनापन सिखाया।

इस धरा के व्यक्ति ही अब देवता बनने चले है॥ आरती के स्वर सुनो प्रति गेह में संध्या सकारे॥ पाठ वह भूलें अगर हम, स्वार्थ की पकड़े डगर हम, ते अविद्या है हमारी जन्म-जन्मों का जमा था धुल गया वह जाप से मल।

हम सतत् चलते रहेंगे दीप से जलाते रहेंगे। की कृपा गुरु ने बना दी आत्मा यह अधिक प्रांजल निष्कपट मन से सभी से प्यार हम करते रहेंगे, नवल स्त्रजन में लगाया-भाग्य ही खोले हमारे। हर दुःखी जन के दुखों का भार कम करते रहेंगे, श्रेष्ठ ब्राह्मण बन रहेंगे,

कष्ट हँस हँस कर सहेंगे लिख सविता साहित्य नाम मिटा दिया अज्ञान-तम का। यह प्रव्रज्या है हमारी, दी-विवेक फुहार-मिटा इस जगत से ताप गम का दीप्ति-विजय मशाल की-दुर्भावना के असुर हारे॥

हम सतत् चलते रहेंगे, बीज-से गलते रहेंगे माँ! तुम्हारे नयन तारे पूत बनकर जाएँगे हम, विश्व के हर देश में युग-दूत बनकर जाएँगे हम। विश्व से मिटा असुन्दर-ताज सत शिव को पहनाया॥ सो गया था सतोगुण-गाकर प्रभाती वह जगाया॥ दुष्ट की अन्त्येष्टि सज्जन साधु खुद गह बाँहें तारे॥

यदि न माँ की बात मानी, पीर औरों की न जानी, तो अवज्ञा है हमारी, हम सतत् चलते रहेंगे अब न प्रण टलते रहेंगे।

शचीन्द्र भटनागर-माया वर्मा


एक ही साधे सब सधे

मेरी साधना विफल हुई। गुर्जर राजकुमार ने एक लंबी श्वास ली। वे अपने विश्राम कक्ष में एक चंदन की चौकी पर धवल वस्त्र डाले विराजमान् थे। ग्रंथ पाठ समाप्त हो गया और जप भी पूर्ण कर लिया था उन्होंने ध्यान की चेष्टा व्यर्थ रही और वे पूजा स्थान से उठ आए।

राजकुमार ने स्वर्ण भरण तो बहुत दिन हुए छोड़ रख थे। शयनगृह से हाथी दाँत के पलंग एवं कोमल बिछौने कब के दूर हो चुके है। उनकी भ्रमर कृष्ण घुँघराली अलकें सुगंधित तेल का स्पर्श न पाकर इधर उधर उड़ा करती है। रेशमी कपड़ों की जगह सफेद रंग का हलका मलमल ही उनकी धोती! एवं उत्तरीय बनता है।

चिंता ने उस भव्य भाल पर हलकी लकीरें डाल दी थीं। अरुणिमा लिए गौरवर्ण के मुख पर किंचित् मलिनता आ गई थी। पतला शरीर और भी क्षीण हो गया था। उनकी बड़ी बड़ी आँखों में जल-कण झिलमिलाने लगे थे।

सुबह का दुग्ध पान छूट चुका था। दोपहर में थोड़ा शाक और कुछ फल मात्र। रात्रि को तो कुछ लेते ही न थे। गान-वाद्य में ही पहले ही रुचि न थी और सखा सहचरों में अब रहना अच्छा नहीं लगता था। राजोउधान का मालती कुँज, सरोवर तट, तथा अपने विश्राम कक्ष। सदा उदासीनता टपका करती थी। एकाकी दिन और एकाकी रात्रि।

सेवक सेविका को समीप आने की सहमति थी। एकांत उदासीन मुद्रा देखकर जो समझाने या हँसाने जाता, वे स्वयं आँसू बहाता और खिन्न मन लौट आता। उस उदासीनता में व्यापक शक्ति थी, क्योंकि सच्चाई थी उसमें। बढ़ती जाती थी वह, उत्तरोत्तर और विस्मृत होते जा रहे थे उनके भोजनादि कर्म।

महाराज का एक अपने मात्र पुत्र पर अपार स्नेह था इसी स्नेह के कारण महारानी का स्वर्गवास होने पर भी उन्होंने दूसरा विवाह किया। आज कल उनका हृदय चिन्ता से सूखता जा रहा था। युवराज की उदासीनता, शोकाकुल मुद्रा, उन्हें मर्म, व्यथा देती।

मैं नहीं चाहता कि वे राज्य भोग ही करे। महाराज ने राजकुमार की आध्यात्मिक अभिरुचि में कोई भी बाधा नहीं डाली। उनके साधन के सम्बन्ध में कभी प्रश्न नहीं किया। यहाँ तक कि राजकुमार भोग सामग्रियों का त्याग कर राजभवन को ही वन बना लिया, तब भी महाराज शांत रहे, वह वीतराग हो तो भी मुझे आपत्ति नहीं। मेरा सौभाग्य होगा, यदि वे सिद्धि के मार्ग में आगे बढ़े। कुछ हो वे प्रसन्न रहे। उसका क्लेश मैं नहीं देख सकता।

अब व्यथा सीमा पर पहुँच गयी थी। युवराज के प्रधान परिचारक ने समाचार दिया था कि राजकुमार की आंखें सूज गई है। ऐसा लगता है कि वे रात भर जागते रहे है और रोते रहे है। महाराज तिलमिला उठे। उन्होंने एकान्त में परम धार्मिक मंत्री को बुला लिया चाहे जैसे भी हो राजकुमार की चिन्ता का कारण ज्ञात करना होगा। महाराज ने भरे कंठ से कहा मुझे तुम ही जीवन दान दे सकते हो। कुछ भी करो किन्तु उसे प्रसन्न करो स्वर में आज्ञा नहीं, अनुनय था।

महाराज आकुल न हो। मस्तक झुका कर प्रार्थना की मरी जितनी बुद्धि व शक्ति है कोशिश करूँगा आप विश्वास रखे ये सेवक अपने प्रयत्न में भगवान की कृपा असफल नहीं हुआ है।

मैं समझता था कि वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली है। महामात्य को राजकुमार ने अभिवादन के अनन्तर आसन दे दिया था ओर वे बैठ गये थे। जितने स्नेह स्निग्ध स्वर में पूछा था, उसकी अपेक्षा सम्भव नहीं थी। राजकुमार खुल पड़े थे। मेरी धारणा व्यर्थ सिद्ध हुई देखता हूँ कि मेरा तो और भी पतन ही हुआ है। दोनों आँखों से अश्रु धारा चलने लगी। आश्वस्त हो युवराज महामात्य ने अपने उत्तरीय से राजकुमार की आंखें पोछी। वृद्ध आमात्य का युवराज से पुत्र की भाँति स्नेह था और वे भी उनका आदर भाँति करते थे मैं अन्तः संघर्ष में न तो मैं पड़ा हूँ और न कुछ मेरा ज्ञान है। इतने में ही सम्भव है कि मैं आपकी कुछ सहायता कर सकूँ आप अपनी स्थिति स्पष्ट करे तो कृपा होगी।

युवराज ने बताया कि किस प्रकार साधना के आरम्भ काल में वासना विलीन हो गई थी। मन एकाग्रं हो जाता था। उन्हें अपार शान्ति एवं आनंद प्राप्त होता था। अब ये स्थिति है कि मन एक क्षण टिकता नहीं लक्ष्य पर। जिन वासनाओं को वह अत्यन्त हेय समझते रहे है, वे भी अब विक्षिप्त किये रहती है पाठ और जप के समय भी मन विषय−वासनाओं की ही उधेड़ बुन में लगा रहता हैं। पता नहीं कहा ये भोग लिप्सायें एवं भौतिक महत्त्वाकाँक्षाएँ छिपी पड़ती है।

बस? मुसकराये महामात्य अभी आप बालक हैं। अरे इतना तो मैं भी बता सकता हूँ कि शत्रु प्रथम आक्रमण में मस्तक झुका लेते है यदि आक्रमण प्रचंड हो और देख ले उनके मूलोच्छेदन की कोशिश हो रही है तो उद्धत हो जाते है। उनका वेग प्रबलता की सीमा पर पहुँच जाता है।

तब क्या मैं असफल ही रहूँगा? महामात्य के हास्य ने तकनीक आश्वासन दिया आश्वासन दिया था। एकटक उनके मुख की ओर द्रंगों से राजकुमार देख रहे थे।

यह तो आप देखते ही है कि कमरों में झाडू लगाते समय धूल आधिक उड़ती है। रोग का निदान ठीक कर लिया गया था और निदान ठीक होने पर चिकित्सा में कठिनाई नहीं हुआ करती। झाडू लगाना छोड़ा नहीं जा सकता। धैर्यपूर्वक प्रचंड आक्रमण एवं शत्रु के एक-एक अंग का उच्छेद दुर्बल आगे पर प्रथम प्रहार। यदि यह नीति काम में ली जाय तो विजय सुनिश्चित हो सकती है।

अमात्य की बातों से युवराज का मन कुछ हलका हुआ। अमात्य ने उन्हें स्नेह के साथ वन भ्रमण के लिए तैयार किया। दोनों कुछ सैनिक अश्वारोहियों के साथ वन मार्ग की ओर चल पड़े सघन वन प्रांत में पहुँचते ही उनकी नासिका मधुर सुगंधि से भर गईं। मंद शीतल वायु से मिलकर वह रही सुरभि न उन्हें चौंका दिया। सबने लंबी साँसें खींचकर उस पवित्र गंध को भली प्रकार ग्रहण करने का बार-बार प्रयास किया।

सुगंध जितनी व्यापक थी उसे देखते हुए उसका उद्गम कही समीप होना चाहिए था। पवन मार्ग का अनुसरण करने से सौरभ में अभिवृद्धि हो रही थी। सहसा सौरभ प्रांत संकुचित होने लगा। सुगंधि की तीव्रता एक निश्चित केन्द्र को सूचित करने लगी। पूरे एक योजन चले होंगे वे। अश्वारोही सैनिक और वनवासी भील अचकचा कर खड़े हो गये। उन्होंने झुरमुट की ओर राजकुमार को देखने का संकेत किया। एक खूब सघन तमाल का वृक्ष था। नीचे पारसीफ कालीन की भाँति कोमल हरित दूर्वा दल फैला था। एक हाथ की कुहनी पृथ्वी पर टेककर उसी की हथेली पर मस्तक रखे कोई महापुरुष लेटे थे। पूरा लंबा शरीर, माँसलकाय विशाल भुजाएँ क्षीण कटि तथा विस्तृत वक्ष। उनकी हथेलियाँ तथा फैले हुए पैरों के तलवों की लालिमा एवं कोमलता किसी सद्योजात शिशु का स्मरण कराती थी।

प्रकाश का एक मंडल बन गया था चारों ओर यह उनके अंग का काँति का प्रकाश था। घुँघराली काली रूखी अलकें धूल से भर गई थी और मुख-मंडल के चारों ओर बिखर रही थी। संपूर्ण दिगम्बर थे वे और शरीर पर धूल छाई थी। मंद-मंद मुसकान प्राणों में वह मादकता फैला रही थी जिससे युवराज-वृद्ध अमात्य और अनय सभी साथियों के साथ मंत्र मुग्ध हो रहे थे। जिस सुगंध का अन्वेषण करते वे यहाँ तक पहुँचे थे, वह उनके शरीर से निकल रही थी।

आश्चर्य से सभी ने पृथ्वी पर दंडवत की अश्व से उतर कर। पर उन्होंने जैसे न कुछ देखा और न सुना। राजकुमार अपने अंतर में विस्मयकारी परिवर्तन अनुभव कर रहे थे। थोड़ी देर रुक सभी वापस चल पड़े

रास्ते में युवराज ने वृद्ध मंत्री की ओर प्रश्न भरी निगाह से देखा। आशय समझते हुए मंत्री बोले हमारा सौभाग्य है कि वीतराग होकर अवधूत वेश में भारत सम्राट भगवान् ऋषभदेव अपने श्री चरणों से हमारी वनभूमि को आजकल पावन कर रहे है।

“भगवान ऋषभदेव।” राजकुमार और भी चौके “एक सम्राट में यह शक्ति इतनी शांति, इतना व्यापक प्रभाव?”

सम्राट तो अब उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत है। वे तो अब साधना साध्य और सिद्धि के जीवंत रूप है। श्रीमान ने सुना नहीं कि लोक प्रसिद्ध योगाचार्य उनके श्री चरणों में उपस्थित होकर अपने मार्ग के लिए प्रकाश की याचना करते रहते है।

मैंने अनुभव किया उनके पास उपस्थित होते ही वासनाएँ स्वतः विलीन हो गई हृदय स्निग्ध प्रकाश और शांति से भर गया। मन चंचलता भूल गया।

पर मेरा दुर्भाग्य एक दीर्घ श्वास ली युवराज ने। उनके स्वर में असमंजस उभर आया यदि उनके पास अधिक जाऊँ तो न पाठ हो सकेगा न जप समस्त दैनिक कृत्य अव्यवस्थित हो जाएँगे।

यह पाठ और जप, नियम और संयम धारणा और ध्यान आखिर किसलिए? स्नेह स्निग्ध कंठ था अमात्य का-ये सब मनोनिग्रह के लिए स्वयं को सुसंस्कारित बनाने के लिए ही तो हैं। इन सब के द्वारा प्रयत्नपूर्वक दीर्घकाल में भी जो नहीं होता उसे महापुरुषों के अस्तित्व और सुवास से संस्कार झरते और साधना उफनती है। संस्कृति की गरिमा इन्हीं में प्रतिष्ठित है। अतः आपको इस प्रपंच से परित्राण पाना चाहिए। दृढ़ होना चाहिए। उसी (सत्संग) की साधना कीजिए। (एक मात्र) उसी की (निश्चयपूर्वक) साधना कीजिए। इस सत्संग की साधना का ज्योति स्थल शान्तिकुञ्ज के रूप में आज हम सब के लिए सौभाग्य स्रोत के रूप में स्थित है बस देर है यहाँ आने और स्वयं के अस्तित्व यहाँ चैतन्य प्रवाह में निमग्न करने की है।


हम कभी भी पूर्णतया आत्मनिर्भर नहीं!

संसार का सर्वाधिक गौरव प्राप्त प्राणी होने की विशेषता के साथ ही मनुष्य कितना छोटा है? यह हमें उस समय स्पष्ट दिखाई देता है जब हम उसे जीवन के प्रारंभ से निर्वाण तक परावलंबित निर्भर ही पाते है। मनुष्य का कितना असहाय दीन-हीन स्वरूप उभर कर सामने आता है उसके जीवन का कोई अंश कहीं से भी पूर्णतया आत्म निर्भर नहीं है संसार के अन्य प्राणी जन्म के कुछ समय बाद ही आत्म निर्भर हो जाते है पर मनुष्य तो वर्षों की लंबी सेवा शुश्रूषा लेकर भी पूर्ण स्वावलंबी नहीं बन पाता।

मनुष्य रूप धारण करने की प्रक्रिया में सर्वप्रथम वह मातृ-शक्ति का सहारा पाता हैं। शिशु काल में धाय माँ कुटुंब परिवार की दया तथा स्नेह पाकर बढ़ता है। बालक बनकर माता पिता मित्रों तथा गुरुजनों की दया पर सुसंस्कृत बनता है। किशोर तथा युवा अवस्थाओं में भी उसे अभिभावकों की कमाई देख-भाल द्वारा ही स्वावलंबी बनने की दिशा प्राप्त होती है। अपने पैरों पर खड़े होने के योग्य बनने तक वह पूर्ण आश्रित ही रहता है इस निर्भरता से मुक्ति पाना भी तो उसके वश की बात नहीं है। उसे इस सामाजिक सहयोग सद्भावना का सदा ही आभारी रहना है। यह ऋण उसके निर्माण के गरिमा के साथ कितना भारी है यह तो मनुष्य अपनी अपनी स्थिति दशा के अनुसार समझ ही सकता है।

कुछ करने की योग्यता पाकर क्यों वह आत्म निर्भर बन जाता है? शरीर को चलाने के लिए उसे भोजन चाहिये भोजन जीवन को जाग्रत ही रखता है उसकी रक्षा नहीं कर सकता। जीवन ज्वाला की जाग्रति मनुष्य के अस्तित्व हेतु अति आवश्यक है। किंतु यदि उसे वस्त्र निवास आदि सहित रक्षा कि साधन न प्राप्त हुए तो वह जीवित कैसे रह सकता है? उसका जीना असंभव यदि नहीं तो कठिन अवश्य हो जायेगा। पेट भरा होने पर भी, ग्रीष्म की लू-लपट शीत की बर्फीली ठंड तथा वर्षा की अति वृष्टि अनावृष्टि आदि से रक्षा के साधनों से हीन कितने ही मनुष्य प्रति-वर्ष जीवन से हाथ धो बैठते हैं। भोजन द्वारा पोषित जीवन को सुरक्षित तथा गतिमान रखने के लिए मनुष्य को अन्य अनेक साधनों की आवश्यकता है। इन साधनों का भी मनुष्य के जीवन में महत्त्व है।

गतिमान, प्रगतिशील जीवन के लिए बहुत कुछ चाहिये और वह सब उसे एक साथ चाहिये तभी यह गाड़ी चलेगी। अन्यथा केवल पेट्रोल-तेल से भरी उस मोटर-गाड़ी की सी दशा होगी जिसके ऊपर न कोई ड्राइवर था। और न छाया की व्यवस्था। कुछ दिनों बाद ही उसके कल पुर्जे जम गये, तेल भी जमने लगा और चलने वाली मोटर गाड़ी अचल बन कर कबाड़ के रूप में नीलाम कर दी गई। कबाड़ी चतुर था। पूरी मोटर गाड़ी की धुलाई सफाई कराकर जाँच लिया। जमा हुआ तेल निकलवा कर गाड़ी पर छाया की व्यवस्था के साथ-साथ अच्छा पेट्रोल तथा तेल भरवा दिया। चलाना वह स्वयं जानता था। प्रयास करने पर गाड़ी चलने लगी। अब वह सवारियाँ ढोती थी। अच्छा लाभ होता देख स्वामी भी सुखी था। इस शरीर रूपी गाड़ी को भी सुचारु रूप से चलाने के लिये इसकी प्रकृति के अनुकूल अनिवार्य साधनों की आवश्यकता है शिक्षा उचित देख-भाल और सुरक्षा भी तो महत्त्वपूर्ण आवश्यकतायें है।

शरीर को रक्षा, सज्जा तथा लोक मर्यादा के निर्वाह हेतु मनुष्य को वस्त्र चाहिये वस्त्रों का निर्माण वृक्षों की छाल पशु चर्म ऊँट भेड़ आदि पशुओं के बाल रेशम के कीड़े वृक्षों के दूध लकड़ी बाँस कपास आदि के अलावा कृत्रिम यार्न द्वारा भी होता है। इनके लिये बड़े-बड़े कल-कारखानों की स्थापना की गई है। औद्योगीकरण की दिशा यहीं से प्रारंभ होती है। बड़े शहरों में कपड़ा मिलों का जाल फैला हुआ है और देहातों में हाथ से वस्त्र उद्योग चलता है। इस बस में लगे कर्मचारी, प्रशासक, नियंत्रक निरीक्षक आदि ओर इसके द्वारा फैलने वाले वायु दूषण से प्रभावित नागरिकों का योग दान वस्त्र धारण करने वाले मनुष्य के जीवन में ही है। इतना तो वस्त्र के सादे रूप में ही है। उसकी काट छाँट साज सज्जा तथा सिलाई में भी अलग-अलग शिल्पकारों का सहयोग लेना होगा। इस सहयोग का प्रतिफल मनुष्य को देना ही है। इस दिशा में भी हम किसी न किसी स्तर पर ऋणी हो रहे है।

आवास के लिए झोपड़ी ही बनाई जाय तो क्या किसी अवलंबन की आवश्यकता नहीं होती? किसी न किसी पर आश्रित तो होना ही पड़ेगा हवेली बनाने में बड़े बड़े सहयोग सहारे चाहिये तो झोपड़ी के लिये भी तो कुछ सहयोग सहारा अवश्य ही लेना होगा। जिन अवलंबी की देन आवास जैसी महान् वस्तु के रूप में हो मनुष्य उन अवलम्बनों का ऋणी ही कहलायेगा। हम उनके ऋण को नकार नहीं सकते। ऐसी स्थिति में हमारा मानवीय कर्तव्य होता है कि हम उस ऋण का भुगतान भी कर दे।

भावनात्मक ऋण की माप तौल और उसका मूल्यांकन बुद्धिमानी की बात नहीं है। उपकार का कोई मूल्य नहीं हो सकता। सद्भावना सहयोग-वृत्ति की जाग्रति में छिपे हृदय के करुणा दया तथा ममत्व जैसे कोमल भावों का मूल्य आँकना सर्वथा उपहासास्पद ही है गणित के सूत्र में तो ऋण तथा धन के अंकों की समानता शून्य का परिणाम देती है। यह गणित की शैली हमारे दैवी-गुणों की सूक्ष्मता को छूने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकती। अतः जब परंपरा गुण तथा स्वरूप से रहित अदृश्य भावना की तौल करनी है तो वह हमारी भावानुभूति पर आधारित आंतरिक संतुष्टि के रूप में ही हो सकती हैं जितना लिया है उतना ही देंगे यह बात इस संबंध में कभी नहीं लागू होती। इस सबके लिए हृदय की उदात्त भावना से प्रेरित सद्विचारों के संकल्प का निर्वाह कार्यों में कर देना ही सीधा और सरल उपाय है इस उपाय द्वारा मनुष्यता को ऋण मुक्त कर के देवत्व में बदला जा सकता है।

कहा जा सकता है कि ऋण किसका और कैसा? प्रकृति प्रदत्त गुणों के द्वारा या ईश्वर की प्रेरणा से सब अपने कर्तव्यों का पालन अलग-अलग रुचि तथा ढंग से कर रहे है। ठीक है कर्तव्यों का पालन अलग-अलग रुचि तथा ढंग से कर रहे है। ठीक है कर्तव्यों के पालन का ही निर्वाह तो वाँछित है फिर तो हमारा ऋण चुकाने का हल स्वयं प्रस्तुत हो जाएगा पड़ोसी का बच्चा चोट खाने वाला था कि आपने उसे झपट कर बचा लिया। हो सकता था कि आप झपट कर क्रिया करने में स्वयं चोट खा जाते पर उस समय आपको अपने लिये सोचने का अवसर ही न था। एक क्षण भी रुक कर अपना हित-अनहित सोचे बिना ही कर्तव्य बोध और निर्वाह स्तुत्य है। किसी ने किसी असहाय की सहायता की निःशुल्क पाठशालाओं द्वारा निर्धनों की शिक्षा का प्रबंध कर दिया तो क्या वह अपना ऋण चुकाने में नहीं लगा हुआ है।

मनुष्य की भावनात्मक दृष्टि में समस्त संसार का हित निहित है। मनुष्य को अपने जाग्रत अंतःकरण द्वारा प्राणि जगत मात्र की सेवा हेतु स्पष्ट संकेत मिलते रहते है इस सेवा भावना का ऋणी प्रत्येक मनुष्य है। समाज सेवित जब समाज सेवी का स्पष्ट संकेत रूप प्रदर्शित करता हुआ अपना अस्तित्व समाज में आवश्यक सिद्ध कर देता है तो समाज उसकी प्रशंसा करता नहीं अघाता। उपकार के बदले उपकार सिद्ध कर देता है तो समाज उसकी प्रशंसा करता नहीं अघाता। उपकार के बदले उपकार की भावना निकृष्ट बात है। यह बिलकुल साधारण स्तर तक ही सीमित है। यही प्रत्युपकार ही सीमित है। यही प्रत्युपकार की भावना है। विचारों में केवल कल्याणकारी कार्यों द्वारा लाभ हित तथा सुख पहुँचाने की दृढ़ता ही श्रेष्ठ है। यथेष्ट भी यही है। अँगरेजी कहावत जियो और जीने दो की भावना इसी आधार पर परिकल्पित पढ़ता सुनता दुहराता देखता हुआ भी अपने कर्मों की अनुरूपता देकर अपना बोझ नहीं उतारता। संकोच लोभ भय आदि के भूतो द्वारा वह आंतरिक शुद्ध प्रेरणा से विलग ही कर्मरत रहता है।

मर्यादा का निर्वाह तथा उत्कृष्टता की स्थापना अपने उत्तर दायित्वों तथा दायित्वों के निर्वाह द्वारा ही होती है। इसके लिए कठोर साधना से सधा हुआ तन और मन चाहिये। विवेक का तराजू देकर ईश्वर ने मनुष्य में अपनी स्थिति जताई है। फिर हम उसका निर्वाह करने में पीछे क्यों रहें? क्यों न आलस्य निद्रा मोह त्याग कर अदम्य साहस और श्रम द्वारा समाज को युग-बौद्ध युग निर्माण की सज्जा के उपयुक्त बना डाले। यही वस्तुतः युगधर्म है आज के लिए हम सबके लिए निर्धारित एक राजमार्ग जिस पर चलकर परमार्थ करते हुए कोई भी सच्चे अर्थों में स्वार्थ निभाता चल सकता है। जीवन दर्शन का सार यही है।


पुरुषार्थ (Kahani)

एक श्रमिक पत्थर काटते काटते थक गया तो सोचने लगा कि किसी बड़े मालिक का पल्ला पकड़े ताकि अधिक लाभ मिले और कम मेहनत पड़े

सोचते-सोचते वह पहाड़ पर चढ़ गया और शिखर अवस्थित देवों की प्रतिमा से याचना करने लगा। उसने भी बात सुनी नहीं तो सोचा बड़े देवता की आराधना करे। बड़ों में बड़प्पन अधिक होता है।

बड़ा कौन? यों उसे सूर्य सूझा। सूर्य की आराधना करने लगा। एक दिन बादल आये और सूर्य को अपने अंचल में छिपा लिया। श्रमिक सोचने लगा-सूर्य से बादल बड़ा है। यों उसने अपना इष्ट देव बदला और बादलों की अभ्यर्थना करने लगा।

फिर सोचा बादल तो पहाड़ से टकराते और सिर फोड़कर वहाँ समाप्त हो जाते है। इसलिए पहाड़ का भजन क्यों न कर।

इसके बाद वह सबको छोड़कर अपने आप को सुधारने लगा और कुछ दिन बाद पुरुषार्थ के सहारे उस क्षेत्र के बड़ों में गिना जाने लगा।


प्रेय बने श्रेय

विद्या विहार का उस दिन दीक्षांत समारोह था। आचार्य रौहित्य स्नातकों के सम्मुख समापन का प्रवचन कर रहे थे। सुनने वालों में अंतेवासी ही नहीं सुदूर देशों के हजारों जिज्ञासु और गणमान्य नागरिक भी सम्मिलित थे। उस सत्र में जो ज्ञान गंगा वह रही थी उसमें अवगाहन करके श्रोता मंत्र मुग्ध हो रहे थे। हर एक के मुख से यही निकल रहा था ऐसे अमृत वर्षण का लाभ कभी कदाचित ही किन्हीं सौभाग्यशालियों को मिलता है।

उस समारोह में स्वयं कौशल नरेश उपस्थित थे। विद्या विहार के समापन समारोह में उनकी उपस्थिति अनिवार्य तो नहीं थी पर आचार्य रौहित्य द्वारा ओजस्वी वाणी में जो तथ्यान्वेषी प्रतिपादन होता था उससे अवगत होने का लोभ संवरण कर सकना उनके लिए भी कठिन था। सो वे उपस्थित रहें ही उपस्थिति का एक और कारण था विद्या विहार को निर्माण कराने से लेकर उसके संचालन तक का सारा दायित्व राजनर्तकी मधुलिका के कंधों पर था। राजाधिराज उसे प्राणाधिक प्यार उनका मन मयूर नाचता रहता था। एक क्षण के लिए भी उससे विलग पर उनका मन मयूर नाचता रहता था। एक क्षण के लिए भी उससे विलग रहना उनके लिए कठिन था। मधुलिका उन दिनों सत्र समारोह में पूरी तरह व्यस्त थी सो कौशल नरेश की उपस्थिति इस कारण भी सहज स्वाभाविक हो गयी।

आचार्य की अमृत वर्षा कई दिन चली वे मेघगर्जन जैसे अपने ओजस्वी प्रतिपादनों में तत्त्व दर्शन के गंभीर विषयों पर प्रकाश डालते जा रहे थे। इस प्रकार उनका प्रधान विषय था, तथ्य और सत्य इस संदर्भ में अधिकाधिक प्रकाश डालते हुए वह यह सिद्ध कर रहे थे कि सत्य अविच्छिन्न रूप से तथ्य के साथ जुड़ा हुआ है। तथ्य के आधार पर ही सत्य को पहचाना और पाया जा सकता है। तथ्य रहित सत्य भ्रांति मात्र है। सत्य को पाना हो तो तथ्यों का अवलंबन करना होगा।

विषय गंभीर था। प्रवाह की धारा इतनी वेगवती थी कि उसके साथ बहने के अतिरिक्त सामान्य बुद्धि के लिए और कोई चारा ही न था। करतल ध्वनि कर रहे थे। समारोह का क्रम बड़े उत्साह वर्धक वातावरण में चल रहा था।

मधुलिका राजनर्तकी थी। उसका रूप यौवन समय की परिधि का उल्लंघन करके उस स्तर पर जा पहुँचा था जिसे सर्वोपरि कहा जा सके। प्रकृति ने उसकी काया जिस कला का आश्रय लेकर रची थी, मानो वह अनुपम और अपूर्व रही हो। कौशल नरेश उसके सौंदर्य पर इतने मुग्ध थे कि और कुछ देखना सुनना उन्हें फीका लगता था। धन के उसके पास भंडार भरे पड़े थे। महाराज ने उसे सुसम्पन्न बनाने में कुछ छुपा न रखा था। राजकोष की चाबियां उसके संकेतों पर खुलती बंद होती थी।

यह सब तो तथ्य था। वह अपनी माँसलता को बेचकर महाराज को अपने मोह पाश में बाँधने वाली मायाविनी समझी जाती थी। राजकोष खाली करके अपना घर भर लेने का दोष भी उस पर मढ़ा गया था और यह दोनों ही आरोप अपने स्थान पर तथ्य थे। किंतु यदि यही सत्य भी है तो उस नगर वधू का व्यक्तित्व कितना हेय और पतित हो सकता है, इसकी कल्पना करने से मधुलिका का हृदय विदीर्ण होने लगा वह रूपवती ही नहीं बुद्धिमती और सूक्ष्मदर्शी भी थी। दूसरों की तरह उसने आचार्य रौहित्य का प्रवचन कानों से ही नहीं सुना बल्कि उसके प्रकाश में अपने आपको भी देखा परखा। एक बारगी वह तिलमिला गयी।

अब तक मधुलिका के स्वप्न कुछ दूसरे ही थे। वह कुलीन परिवार में उत्पन्न हुई थी। उदर पूर्ति के लिए अथवा वासना के लिए उसे राजनर्तकी बनना पड़ा हो सो बात भी नहीं थी और न किसी ने उसे इसके लिए बाध्य किया था। यह उसका स्वेच्छा चयन ही था। अपने प्रयास में वह सफल हुई थी इसके पीछे एक विशेष उद्देश्य था। वह चाहती थी कि कौशल देश का विद्या विहार धर्म संघ की महती आवश्यकता पूरी करें और मानवी अंतरात्मा पर छायी हुई मोह कालिमा को धोने के लिए बढ़-बढ़ कर काम करे। हजारों सुयोग्य भिक्षु तैयार हों और वे विश्व के कोने-कोने में संव्याप्त अधर्म के उन्मूलन में अपने ज्योतिर्मय जीवन द्वारा महती भूमिका प्रस्तुत करे। ऐसे सुसम्पन्न विद्या केन्द्र के लिए प्रचुर साधनों की आवश्यकता थी। धर्म के प्रति लोक रुचि के अतीव में वे साधन बड़ी मंदगति से जुट रहे थे और लगता था इस क्रम से तो दिग्भ्रांत वातावरण को दिशा देने में युगों तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी मधुलिका ने सोचा क्यों न वह अपने रूप यौवन को बेचकर एक धर्म संघ को समर्थ बना सकने वाला विद्या बिहार चलाए।

वर्षों वह उस विचार के सित-असित पक्षों पर ऊहापोह करती रही थी और इस निष्कर्ष पर पहुँची थी। कि लोगों की दृष्टि में तथ्य कुछ भी क्यों न रहे वह सत्य के लिए सदुद्देश्य के लिए अपने सर्वस्व का बलिदान करेगी। यहाँ तक कि गौरवगरिमा को भी श्रेय और परलोक को भी। लोग उसे वीराँगना ही कहेंगे न? मायाविनी ही समझेंगे? वासना की अग्नि को जलाने वाली एक काष्ठ खंड की तरह उसे अपना अस्तित्व खोना पड़ेगा न? यह उसकी व्यक्तिगत क्षति हुई। समष्टि के कल्याण का संपादन करने में यदि व्यक्ति को अपना शील भी होमना पड़े तो हानि तो उसी की होगी। संसार को तो उसका लाभ ही मिलेगा। मधुलिका का यही विचार पक्ष क्रमशः प्रबल होता चला आया था और अंततः उसने इसी निष्कर्ष के आधार पर राजनर्तकी बनने का प्रयास किया था। जिसमें उसकी माँसलता ने सहज सफलता भी प्रस्तुत कर दी थी।

मधुलिका ने जान बूझकर अपने मोह-पाश में कौशल नरेश को जकड़ा था। चतुरता का समग्र उपयोग करके राजकोष से विपुल धन प्राप्त किया था। किंतु उसका समस्त उपयोग विद्या विहार के चलाने में ही होता था। उसका शयन कक्ष बहुमूल्य उपकरणों से सुसज्जित था। यों सामान्य उपयोग के लिए उसे राजसी साधन उपलब्ध थे फिर भी उसका भूमि शयन आस्वाद आहार अपने रहस्यमय ढंग से चलता रहता था। वीतराग संत की तरह उसकी मनःस्थिति थी। बाहर से निंद्य और भीतर से श्रद्धास्पद जीवन क्रम का अद्भुत सफलता मिली इस पर वह स्वयं आश्चर्यचकित थी। उसे इस बात का भरपूर संतोष था कि उसे जो सहना या करना पड़ रहा है वह एक समर्पित बलिदानी के स्तर से छोटा या हेय नहीं है।

पर इन दिनों आचार्य रौहित्य के जो प्रवचन हो रहे थे उनसे मधुलिका को लगा वह भूल कर गई। तथ्य और सत्य को वह अलग मानती रही। सत्य को वह वीराँगना ही है न? सत्य का क्या मूल्य? उसका मकसद कुछ भी क्यों न हो वह रहेगी तो वहीं जो तथ्य की कसौटी पर सिद्ध करेगी। मधुलिका का चेहरा पीला पड़ गया। उसके रोम रोम में हजारों बिच्छू काटने जैसी पीड़ा उमड़ने लगी। प्रवचन को जहाँ श्रोताओं द्वारा अमृत वर्पण की उपमा दी जा रही थीं, वहाँ मधुलिका को वे मर्मभेदी शूल के समान पीड़ादायक लग रहे थे। अंततः वह अस्वस्थता का बहाना करके समीपवर्ती विश्राम कक्ष में जा लेटी और अंचल परिधान से मुँह छिपा कर सुबकने लगी। आँसू उसके मर्मस्थलों को बेधकर निकल रहे थे।

आचार्य रौहित्य का प्रवचन समाप्त हुआ। विद्याविहार के कनिष्ठ प्राध्यापक विशालाक्ष का भी एक छोटा प्रवचन इसके उपरांत होने वाला था सो वे उठे और नम्रता पूर्वक बोले आचार्य श्री का परिपूर्ण सम्मान करते हुए भी मुझे यह मतभेद है व्यक्त करना है कि तथ्य और सत्य, एक नहीं है। दोनों एक दूसरे के लिए सहायक हो सकते है पर यह संभावना भी झुठलायी नहीं जा सकती कि किसी व्यक्ति के भीतर और बाहर की स्थिति परस्पर सर्वथा भिन्न हो। साधु जैसा वेश–विन्यास बनाए हुए दस्यु भी हो सकते है और किसी दस्यु भी हो सकते है और किसी दस्यु जैसा आचरण करने वाले व्यक्ति का बोधिसत्व होना भी संभव है। तथ्य और सत्य अपने स्थान पर दोनों ही महान् है फिर भी वे दोनों एक नहीं हो सकते। उनमें मौलिक अंतर बना ही रहेगा।”

वरिष्ठ आचार्य से उसका तत्त्व मंथन किसी तरह से कम नहीं। आँसू सूख गए और वह अँगड़ाई लेती हुई कौशल नरेश के साथ राजभवन चली गयी।

भाव भरी आवभगत के अतिरिक्त तत्त्व चर्चा भी चली पर वह तो अपने को खोया सा अनुभव कर रही थी। इतने में आचार्य विशालाक्ष भी वहाँ आ पहुँचे उन्हें देखकर वह विह्वल हो उठी। समीप खिसकती हुई आयी और उनकी गोदी में मस्तक रखकर ऐसी भाव विभोर हो गई मानो उसे इष्ट की प्राप्ति हो गई हो जिन देवता के चरणों में वह अपना पुष्प चढ़ाना चाहती थी वह मूर्तिमान् होकर सामने आ बैठा है।

इस अप्रत्याशित स्थिति को देखकर एक क्षण के लिए तो विशालाक्ष हतप्रभ और किंकर्तव्य विमूढ हुए किंतु दूसरे ही क्षण संभल गए। उन्होंने अपनी सहज करुणा ममता भरे वात्सल्य के साथ सिर पर स्नेह भरा हाथ फिराते हुए कहा-सत्य और तथ्य पृथक् रखे जा सकते है। सघन आत्मीयता को विलास आचरण से अछूता भी रखा जा सकता है। कल्याणी श्रेयस्कर यही है पूर्णता के लिए प्रेम से आगे बढ़कर श्रेय की शरण में जाना होता है।”

मधुलिका ने आंखें खोली उसने कातर होकर पूछा क्या सत्य को तथ्य के अनुरूप नहीं बनाया जा सकता? विशालाक्ष की करुणा उनके कमल जैसे अधखुले नेत्रों से बूँद−बूँद करके टपकने लगी बोले भद्र सत्य और तथ्य का एकीकरण करना हो तो तथ्य को ऊँचा उठा कर सत्य का बंधन करना चाहिए सत्य को तत्त्व के अनुरूप बनने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए प्रेय और श्रेय बनाना चाहिए श्रेयों को प्रेय नहीं विशालाक्ष का ये प्रतिपादन भी मधुलिका को मर्म स्पर्श प्रतीत हुआ उसने सिर को गोदी में से हटा लिया और भाव कुल होकर कहा देव मेरी अतृप्त आकुलता की साध का समाधान कैसा होगा? विशालाक्ष फफक उठे और रुंधे हुए कंठ से संघ महामंत्र ही देर तक लगातार गुनगुनाते रहे ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’’ ‘‘संघं शरणं गच्छामि’’ ‘‘धम्मं शरणम् गच्छामि’’ यह गुनगुनाहट मधुलिका का गुरुमंत्र बन गयी उसके मुख से भी इन्हीं त्रिविधि महासत्यों की रट विनिसृत होने लगी कुछ दिन महल प्रसादा के कपाट बंद रहे पीछे देखा गया मधुलिका ने राजकीय वेश विन्यास का परित्याग कर दिया। वह भिक्षुणी के चीवर परिधानों से लिपटी हुई विद्या विहार की एके विनम्र अध्यापिका बनकर रह रही थीं। कोटि कोटि सुवर्ण मुद्राओं की उसकी समस्त संपदा विद्या विहार के कोष में जमा हो गयी थीं। कौशल थे। लेकिन राजनर्तकी का भोगविलास देखने नहीं महासती का पद वंदन करने और उसके चरणों की धूल अपने मस्तक पर चढ़ाने


खलीफा (Kahani)

अरब के एक खलीफा थे। जब मरने का समय आया तो वे पैसे का हिसाब किताब करने बैठे। अब तक राजकोष से मैंने कितना लिया? हिसाब लगाने पर पता चला। छः हजार दिरहम ले चुके। खलीफा ने अपने उत्तराधिकारियों को बुलाया और कहा मेरा घर बेचकर यह पैसा राजकोष में जमा कर देना।

दूसरा प्रश्न उनने अपने परिवार वालों से पूछा-खलीफा बनने के बाद मेरी निजी संपत्ति में कितनी वृद्धि हुई?

हिसाब लगाने पर पता चला एक गुलाम एक ऊँटनी और एक दुशाला। खलीफा ने वसीयत की कि इन्हें हजरत उमर के पास भेज दिया जाय।

तीसरी वसीयत उन्हें और करनी थी दफनाते समय मेरे जिस्म पर सिर्फ तीन कपड़े हो। दो वे धो ली जाय जो इस समय मेरे जिस्म पर लिपटी है। तीसरा टुकड़ा ही नया खरीदा जाय।

मित्रों ने पूछा-तीनों नये कपड़े हम लोग आसानी से खरीद सकते है फिर पुराने क्यों इस्तेमाल करें।

खलीफा ने कहा नये कपड़ों की मुर्दों की बनिस्बत जिंदों को अधिक जरूरत है।

महापण्डित कौत्स्य कालिन्दी तट पर बैठकर नित्य प्रवचन करते। उनका प्रधान विषम होता था लोभ से विनाश। कथन, श्रवण ही उन्हें सब कुछ लग रहा था। इतना ही नहीं प्रलोभन और व्यक्तिक्रम का अवसर न आने से वे अपने को आत्मजयी अनुभव करने लगे।

गहरे जल में रहने वाले घड़ियाल ने उनकी वाचालता, अपरिपक्वता और अहमन्यता को ताड़ा और एक अतिरिक्त प्रसंग प्रस्तुत किया। अवसर पाकर एक दिन उसने बहुमूल्य मोतियों के दाने तट से लेकर उनके आसन तक बखेर दिये।

ध्यान बटा तो चमकते मोतियों के बटोरने के लिए वे पुस्तक और माला एक ओर रखकर उठ खड़े हुए। एक एक करके बीनते हुए वे धारा के समीप तक जा पहुँचे।

घड़ियाल ने साष्टांग दंडवत करते हुए कहा जलचर होने के कारण आपके आसन तक पहुँच नहीं पाता था सो मोती बखेर कर आपको ही यहाँ तक पधारना और दर्शन देने का कष्ट दिया। मैं धन्य हो गया।”

घड़ियाल की संपन्नता और उदारता और श्रद्धा देखकर कौत्स्य बहुत प्रसन्न थे। उसे आशीर्वाद देने लगे। तो घड़ियाल और भी गिड़गिड़ाया बोला आप तो करुणा निधान है। मेरी एक और मनोकामना पुरी कर दें। त्रिवेणी स्नान की मेरी इच्छा है पर मार्ग देखा नहीं। आप मेरी पीठ पर सवार होकर वहाँ तक मार्गदर्शक करते चले तो मेरे सहस्र मणिमुक्तकों वाला जो हार है उसे भी भेंट करूँगा

लोभ के प्रथम आक्रमण आकर्षण में महापण्डित का पांडित्य हवा में उड़ गया। इतना बड़ा लाभ उनसे छोड़ते न बना सो मगर की पीठ पर जा चढ़े। बीच धारा में पहुँच कर दोनों सुखपूर्वक प्रवाह का आनंद लेने लगे।

घड़ियाल ने जिज्ञासा की आप प्रतिदिन लोभ से विनाश का जो उपदेश देते रहते थे वह उतनी जल्दी विस्मृत कैसे हो गया।

उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही घड़ियाल ने करवट बदली और जल में बहते महापण्डित को उदरस्थ कर लिया?


आवरण हटे तो सत्य का दर्शन हो

जीवन यदि सरल सहज और पवित्र हो बनावटीपन से सर्वथा रहित हो तो दिव्य चेतना की प्रकाश प्रेरणा पा सकना असंभव नहीं महामानवी महापुरुषों के जीवन का अध्ययन करने से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि सीधा सादा जीवन जीकर वे घाटे में न रहे अपितु उस परम लक्ष्य को प्राप्त करने में वे नितांत सफल रहे जो मनुष्य जीवन का ध्येय है।

देवमानवों के जीवन और कथन को देखने सुनने और पढ़ने से यह बात और स्पष्ट हो जाता है। ऐसे ही एक बालक का जन्म 13 नवम्बर 354(ए. डी.) को अल्जीरिया राष्ट्र के एक छोटे से गाँव में हुआ औरीलिस औगस्टाइनसृ नाम के बालक के माता पिता द्वारा गाँव के विद्यालय में प्रवेश तो दिला दिया गया पर बालक की अरुचि को देखकर उन्हें निराश ही होना पड़ा मानवी दुर्बलताओं का समावेश होने के कारण किसी को यह विश्वास उत्पन्न नहीं होता था कि बालक का भविष्य उज्ज्वल बन सकेगा। जनमानस में एक ही धारणा थी कि वह समाज और राष्ट्र के लिए भारभूत ही साबित होगा। लेकिन धर्मपरायण जीवनचर्या निर्धारित कर लेने के पश्चात् व्यक्ति को असंभव दिखने वाला कार्य भी संभव दीखने लगता है। जीवन की दिशाधारा के परिवर्तन से औरीलियस में दिव्य चेतना का प्रकाश आया, जिसे उनने अपरिवर्तनीय प्रकाश (अनचेंजेबल लाइट) की संज्ञा दी है। ऐसी स्थिति में उन्हें अपने सही स्वरूप अंतर्निहित क्षमताओं विशिष्टताओं प्रतिभाओं का आभास हो उठा और उसी प्रकाश पुँज की एक किरण अपने को मानने लगे। फलतः सत्य धर्म का वास्तविक स्वरूप समझ में आया। इसके बाद वे धर्म की रूढ़िवादी और अनगढ़ मान्यताओं का खंडन करने लगे। पारसी धर्म की मान्यताओं के अनुरूप मैनीसियंस संप्रदाय में सम्मिलित होने के कारण उन्हें मणि के नाम से भी पुकारे जाने लगा।

लोक मंगल के लिए अंतरात्मा, की पुकार ने उन्हें लेखनी उठाने के लिए प्रेरित किया उनने लगभग 200 पुस्तकें लिखी। जिन्हें पढ़ सुन कर जनमानस में परमात्म सत्ता के प्रति आस्था का संचार होने लगा और अनेकों ने अपने जीवन की गलत दिशा का परित्याग करके उनके द्वारा दिखायें गये सन्मार्ग का अनुसरण किया। लोगों ने अंधपरम्पराओं के स्थान पर विवेकशीलता को महत्त्व दिया। इस प्रकार पूर्व से चली आ रही अनेकों कुप्रथाओं का या तो अंत कर दिया गया अथवा सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप उनका रूपांतरण किया गया। तत्कालीन प्रतिगामिता को प्रगतिशीलता की ओर मोड़ सकने में समर्थ होने और अपना संपूर्ण जीवन समाज निर्माण में लगा देने के कारण ही तब के औरीलियंस बाद में संत आंगस्टाइन के नाम से जाने गये।

जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने एक पुस्तक लिखी दि सिटी ऑफ गाँड” उक्त पुस्तक में उन्होंने एक बात पर विशेष रूप से बल दिया है कि यदि व्यक्ति शुद्ध सात्विक जीवन जी सके और भगवान के इस शहर संसार को समुन्नत बनाने में कुछ समय दे सके तो कोई कारण नहीं कि उसे ब्राह्मी चेतना की अनुभूति न हो सके जो उसके शहर (संसार) के कण-कण में विद्यमान् है।

इसी का समर्थन करते हुए सेंट कैथराइन अपनी पुस्तक दि ऑल परवेडिंग गाँड” में लिखती है कि असंभव और अशक्य जैसे शब्द उन्हीं व्यक्तियों के लिए होते है, जो अकर्मण्य बने रह कर शेखचिल्लियों की तरह आकाश कुसुम खिलाने की बात सोचते रहते है किंतु जो प्रयास-पुरुषार्थ दिखाने का साहस सँजो लेते है उनके लिए आल्पस जैसे दुर्लभ पर्वत को भी झक मार कर रास्ता देना पड़ता हैं। वे लिखती है कि आज हमारी सबसे बड़ी विडंबना यह कि हम उस परमात्म सत्ता का साक्षात्कार करना तो चाहते है, पर उसके लिए जो अनुबंध है उसे पूरा करने की बजाय व्यर्थ के टण्ट घंटों में अपना समय, श्रम और सबसे बड़ा यह बहुमूल्य मानव जीवन बर्बाद कर देते है जबकि सच्चाई तो यह है कि इस सर्वव्यापी सत्ता का अनुदान पाने के लिए हमें कुछ अतिरिक्त करने की आवश्यकता नहीं है। भगवान ने जिस रूप में हमें इस संसार में भेजा है, वही सही सच्चे इनसान का स्वरूप हम बनाये रख सकें तो आज जैसी इस क्षेत्र में सर्वव्यापी निराशा हमें नहीं देखने को मिलेगी।

यह सत्य है कि आज जिस बनावटीपन का आवरण हमने ओढ़ रखा है उसी ने उस चेतन सत्ता और उसके अंशधर इंसान के बीच दीवार जैसा अवरोध के कारण हमें उसकी अनुभूति प्रतीत नहीं हो पाती है जिस दिन आडम्बर की वह दीवार ढह जायेगी ओर मनुष्य अपने सहज सरल व स्वाभाविक रूप में आ जायेगा उसी दिन उस सर्वव्यापी सत्ता से उसका एकाकार संभव हो जायेगा।


नवरात्र सत्र की विदाई- परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

आश्विन मास अक्टूबर (दिनाँक 29 अक्टूबर 1977)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों भाइयों आज से पचपन वर्ष पूर्व हमारे जीवन में एक बहुत बड़ी घटना घटी। अपने गुरुदेव ने पूजा की कोठरी में प्रकाश के रूप में दर्शन दिये। मैंने उनका प्रकाश के रूप में दर्शन क्रिया शक्ल भी दिखायी पड़ी उसी स्मृति में हमने अखण्ड दीपक जलाये इसलिए कि वह प्रकाश मेरे जीवन में बना रहे जो पहले दिन गुरुदेव ने अपनी शक्ल और सूरत के रूप में हमें दिखायी। कही भूल न जाये कहीं पथ से दूर न हो जाये इसलिए अखण्ड दीपक के रूप में उनकी स्थापना कर दी गयी। उस प्रकाश के साथ अपना जीवन भर संपर्क और सम्बन्ध बनाये रखने के लिए। गुरुदेव जब मिले तो घटना थोड़ी-सी है एक आधे घंटे की। आधा घण्टे में वह घटना समाप्त हो गयी।

तब मैं पन्द्रह वर्ष का बालक था, पूजा की कोठरी में बैठा हुआ जप और ध्यान के कार्य में लगा था। यकायक एक प्रकाश कोठरी में घूमता हुआ दिखाई पड़ा उस प्रकाश के भीतर एक मनुष्य की आकृति दिखायी पड़ी। मैं तो डर गया कि क्या बात है?भूत प्रत है क्या कोई?काँपते देखकर उस प्रकाश में बैठे हुए मनुष्य ने आवाज दी बच्चे डरने की जरूरत नहीं है। तुम किसी विशेष काम के लिए आये हो। आंखें बन्द करो आंखें बन्द की मैंने और तीन जन्मों का दृश्य फिल्म की तरीके से दिखायी पड़ा मैं कौन हूँ? और कब कब जन्म लिया और यह शक्ल जो मुझे गुरुदेव के रूप में दिखायी पड़ती है, कब कब मेरे साथ नृत्य करती रही? बस इतनी घटना घटित हुई और मेरे जीवन का कायाकल्प हो गाय। मैंने उनके चरणों झुकाया और कहा आप मुझे लम्बे समय से राह बताते रहे है अब इस जीवन की भी राह बताइये। उन्होंने एक राह बतायी चौबीस साल तक चौबीस गायत्री के महापुरश्चरण करने के लिए आज्ञा दी और कहा तुझे लोहे का स्टील का बनना पड़ेगा बड़े काम करने के लिए मजबूती की जरूरत है। मजबूत व्यक्तित्व न होगा तो बड़े काम नहीं कर सकते। हम चाहते है कि भगवान की धारायें तेरे पास आयें। भगवान की धारायें को अपने भीतर धारण करने के लिए कमजोर आदमी समर्थ नहीं हो सकते। कमजोर आदमी जायेगा मर जायेगा। देवता की शक्ति जब आती है तो आदमी को पागल बना देती है उसकी सामर्थ्य को धारण करने के लिए समर्थता फरमानी चाहिए। भगवान की शक्ति धारायें हम तेरे ऊपर डालना चाहते है तेरे माध्यम से कुछ काम करना चाहते है तो मैंने कहा कराइये। उनने कहा ऐसे नहीं हो सकता। कच्चे आदमी-कमजोर आदमी जरा सा नाम लेते ही पागल हो जाते है। जरा सी सम्पदा मिलते ही विक्षिप्त और उन्मत्त हो जाते है। जाने क्या से क्या करने लगते है?”

मजबूत चीजों को ग्रहण करने के लिए मजबूत चीजें चाहिए। एटॉमिक भट्टी बनायी जाती है तो उसके चारों ओर घेरे इतने मजबूत बनाये जाते हैं कि उसके भीतर से रेडियेशन निकलकर कही आसपास के इलाकों में न फैल जाय। ये घेरे बहुत मजबूत बनाये जाते है इसी तरह आध्यात्मिक शक्तियों को भीतर से जिस किसी आदमी को अवतरित करने की इच्छा हो हनुमान जी को शंकर जी को भीतर अवतरित करने की इच्छा हो तो उसे अपने को इस लायक बनाना पड़ेगा कि शंकर जी आये तो वहाँ निवास कर सके। कमजोर आदमी स्वार्थी चालाक विलासी आदमी उसको धारण नहीं कर सकते। यदि आती भी है तो या तो टक्कर मारकर वापस चली जाती है या फट जाती है। फट जाने से मतलब पागल हो जाता है। दिमाग खराब हो जाता है जैसे रावण का हो गया था कंस का हो गया था। दैवी शक्तियों को प्राप्त कर लेना सुगम है पर उनको पचा डालना बड़ा मुश्किल है। वे हजम नहीं होती। पारा हजम नहीं होता। आध्यात्मिक शक्तियाँ हजम नहीं होता। हजम करने का वक्त आता है तो आदमी पागल हो जाता है लोकैषणा पुत्रैषणा और वित्तैषणा के आधार पर।

आध्यात्मिकता जब आती है तो भीतर जो कुछ भी है उसको पहले बाहर निकालती है। दुर्वासा ऋषि के भीतर आध्यात्मिकता आयी थी तो क्रोध काबू से बाहर हो गया था। जो कुछ भी हमारे भीतर चीजें है वे बढ़ेगी हमारे अन्दर कामुकता है तो कामुकता बढ़ जायेगी आप नव रात्रि का अनुष्ठान कीजिए यदि आप के पास संयम के विचार नहीं है तो निश्चित रूप से कामुकता बढ़ेगी क्रोध आपके भीतर भरा है और उसका परिशोधन नहीं किया गया है और आध्यात्मिक शक्तियों का अनुष्ठान आपने किया है तो मैं बताता हूँ कि क्रोध आपके भीतर बढ़ जायेगा। जो भी चीजें आपके भीतर है ज्ञान आपके भीतर है जो ज्ञान बढ़ जायेगा। भक्ति है तो भक्ति बढ़ जायेगी। अनुष्ठान का काम शक्ति उत्पन्न करना है। यह शक्ति किस में खर्च होगी? जो कुछ भी है उसी में खर्च होगी प्राप्त करना कोई मुश्किल नहीं है तप करना कठिन है गुरुदेव ने मुझे सामर्थ्यवान और शक्तिशाली बनाने के लिए तपस्वी होने के लिए आज्ञा दी है और मैं चौबीस साल तक तप करता रहा जिह्वा के तप के बारे में आपको मालूम है न कि चौबीस साल तक जौ कि रोटी और छाछ के ऊपर निकाले हैं और बाकी तप की बातें कैसे बतायें कि कैसे रहे, किसी ने देखा नहीं? हम बराबर तप करते रहे और अपने आपको मजबूत बनाते रहे चौबीस साल तक। गुरुदेव की कृपा रही और लोहा पारस को छूकर सोना हो गया।

मेरे गुरुदेव ने दो चीजें दी पहले दिन जिनको पाकर मैं धन्य हो गया। उन दो चीजों से मेरी जिन्दगी पार हो गई जो पहले दिन मुझे उन्होंने दी। तीसरी चीज की मुझे कोई जरूरत नहीं पड़ी वही वरदान काफी था क्या थी वो दो चीजें? एक तो मेरी उन्होंने कुण्डली शक्ति जगा दी पहले दिन और दूसरा उन्होंने मेरे ऊपर शक्तिपात कर दिया। गुरुकृपा का यह अनुग्रह रहा मेरे ऊपर। इसी तरह का आपको कोई लाभ मिल सके आप भी सौभाग्यवान हो जायेंगे मैं भी सौभाग्यवान् हूँ मैं अपने गुरु को पाकर धन्य हो गया हम दोनों एक दूसरे को पाकर धन्य हो गये। उन्होंने मेरी शक्तियों को जगा दी मेरे ऊपर शक्तिपात कर दिया।

शक्तिपात क्या होता है? कुण्डलिनी क्या होती है? आपको मुझसे यह बातें पूछनी चाहिए आपकी जानकारियाँ बच्चे जैसी है बच्चों की जानकारियाँ बहुत छोटी होती है बहुत कमजोर होती है कुण्डलिनी के बारे में आप लोगों का ख्याल है कि कोई मूलाधार चक्र है जहाँ साँप टाइप की चीज की चीज सोती रहती है और जब जागती है तो पीठ से रीढ़ की हड्डी में से निकल कर सिर पर जा बैठती है और आदमी को चमत्कार दिखाती है तमाशे दिखाती है आपके हिसाब से ये कोई शारीरिक रियाज है फिजीकल एक्शन है इसी प्रकार शक्तिपात के बारे में आप समझते है न कि शक्तिपात जब होता है जब गुरु सिर पर हाथ रखता है तो आदमी के भीतर करेंट मारता है झटका मारता है बिजली जैसी कोई चीज बढ़ जाती है ताकत बढ़ जाती है बेटे ये तो मैस्मरेज्म है हिप्नोटिज्म है और इस तरह के सैकड़ों ख्वाब दिखा सकता हूँ पर उससे कुछ होने वाला नहीं है। मैं आपको ऊँचे स्तर की कुण्डलिनी बताना चाहता हूँ जिसका सम्बन्ध चेतना से है। चेतना में कोई हलचल नहीं होती ओर चेतना कोई करेंट नहीं मारता। चेतना जो हमारा प्राण है जीवात्मा है इसमें से न कोई साँप निकलता है न कोई बिच्छू निकलता है ये सारी बातें मैटर से सम्बन्धित है फिजिकल है और शरीर से सम्बन्ध रखती है आत्मा से इन बातों का कोई ताल्लुक नहीं है।

बेटे जो लोग कुण्डलिनी जगा देने और दिखा देने की बात कहते है मैं उन्हें बाजीगर कहता हूँ और देखने वालों को बच्चा कहता हूँ बचकाना कहता हूँ। प्रकाश दिखा दीजिये बेटे आत्मा में आंखें नहीं होती। आंखें हमारे स्थूल शरीर में है लेकिन हमारी आत्मा कोई आंखें नहीं होती आत्मा में केवल संवेदना है तो दो तरीके से मेरी कुण्डलिनी जगी। कुण्डलिनी किसे कहते है? कुण्डलिनी विवेकशीलता को कहते है विवेकशीलता मेरी उसी दिन जग गई और मैंने देखा कि मेरी समझ और दुनिया की समझ में जमीन आसमान का अंतर है दुनिया की अपनी समझ और अकल है और वह उसी के हिसाब से हमको प्रभावित करती है तथा अपने रास्ते पर चलना चाहती है संस्कारों का कुटुम्ब का दबाव और सारे समाज दबाव एक ओर और मेरी कुण्डली एक ओर अर्थात् विवेकशीलता एक ओर मेरी विवेकशीलता एक ओर जगी और उसने कहा हम और हमारा भगवान हमारी आत्मा और परमात्मा एक ओर ये दोनों मिलकर जो फैसला करेगी वह सबसे बड़ा है यह दुनिया पागलों की है जाहिलों की है दुष्टों की है इनमें से एक का भी कहना नहीं मानेंगे हम अपनी मर्जी से चलेंगे जो बात हमको ठीक मालूम पड़ेगा हमारा भगवान जो कहेगा हम वही करेंगे किसी का नहीं मानेंगे हम अकेले फैसला करेंगे हम अकेले चलेंगे

कुण्डलिनी शक्ति का थोड़ा-सा परिचय रवीन्द्रनाथ टैगोर ने दिया है उन्होंने “कहा एकला चलो रे” अकेला चलो फैसला जो करना है अकेले करो सूर्य अकेला चलता है चन्द्रमा अकेला चलता है पृथ्वी अकेली चलती है जब से यह कुण्डलिनी शक्ति हमारे भीतर जगी लोगों की सलाह मशविरा को उठाकर एक ओर फेंक दिया और कहा आपकी राय आपको मुबारक हो। इस तरह की कुण्डलिनी शक्ति जिनकी जगी है उसको मरने के बाद मैं नहीं कहता उसे इसी जीवन में महानतायें मिली है समर्थ गुरु रामदास के ब्याह की तैयारी हो चुकी थी दूल्हा मंडप में बैठा था। पंडित चिल्लाया लड़की लड़का सावधान। समर्थ गुरु रामदास ने सोचा जरूर कोई चक्कर है। दाल में कुछ न कुछ काला है अन्यथा पंडित क्यों कहता सावधान। उन्होंने आंखें बन्द की तो सारा माजरा समझ में आ गया उनके भगवान ने कहा यह जिंदगी का मोड़ है इधर चल या उधर चल समर्थ ने कहा मैं तो आपके साथ चलूँगा बस एक ही क्षण में उनकी कुण्डलिनी जग उठी और मुकुट उतार फेंका कंगन तोड़कर फेंक दिया और मंडप भाग खड़े हुए। समर्थ गुरु रामदास ने वहाँ से निकलने के बाद क्या किया? आप कभी भी महाराष्ट्र जाये तो वहाँ एक ही संत का नाम सर्वत्र पायेंगे जिसका नाम है-समर्थ गुरु रामदास उन्होंने शिवाजी को बनाया और हिन्दुस्तान को आजादी दिलाई।

ऐसे शानदार जिन्दगी और किसी की हो सकती है क्या?हाँ एक और है और वह है शंकराचार्य उनकी मम्मी रोज कहती थी कि बेटे तेरा ब्याह करूँगी शंकराचार्य को एक सपना दिखाई पड़ा कि मैं शंकर का दूसरा रूप हूँ। मैं चाहूँ तो दुनिया का क्या क्या कर सकता हूँ। मेरे पास ज्ञान की अगाध शक्तियाँ है। बस उनने अपने भगवान से पूछा मुझे क्या करना चाहिए। आपका कहना मानना चाहिए या मम्मी का? भगवान ने कहा-हमारा शंकराचार्य ने निश्चय कर लिया और क्या से क्या बन गये। कितनी शानदार जिन्दगी उनकी व्यतीत हुई। बेटे यह उनकी कुण्डलिनी शक्ति थी जिसने उनके विवेक को जगा दिया।

कुण्डलिनी शक्ति और किसी ने जगाई थी क्या? हाँ बेटे एक और ने जगा दी थी। गोस्वामी तुलसीदास ने मीराबाई की कुण्डलिनी जगाई थी। दोनों समकालीन थे। मीराबाई ने तुलसीदास को एक पत्र लिखा था कि हमारे खानदान वाले हमारे बड़े शुभ चिंतक हैं, लेकिन असल में यही सबसे ज्यादा हमारे लिए बाधक है। वे हमको सत्संग और भजन नहीं करने देते न भगवान के मार्ग पर चलने देते है। मीरा के पत्र के जवाब में तुलसीदास ने एक कविता लिखी जो बहुत ही मार्मिक है। यह कविता तो मुझे बहुत ही प्रिय है। यदि अन्तरात्मा से पढ़े तो आपका भी वैसा ही कायाकल्प हो सकता है जैसा कि मीरा का हो गया था। कविता इस प्रकार है जाके प्रिय न राम वैदेही तजिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही।”

सारा समाज हमारा खानदान ही है और हमारे भीतर वाले? चोर? इनका वर्णन करते हुए तुलसी दास ने कहा है कि हमारे मित्र-हमारे सहायक हमारे सम्बन्धी जो हमारे भीतर कामना के रूप में लोभ के रूप में इसके रूप में उसके रूप में विद्यमान् है बड़े बड़े प्रलोभन दिखाते है और हमको पकड़े रखते है। ये भी हमारे भीतर के है। समाज के बाहर के भी हैं। सारे के सारे लोगों की समझ एक ओर मेरी एक ओर। बस यही मेरी कुण्डलिनी है। छोटी-सी मछली पानी के बहाव को चीरती हुई उल्टी दिशा में चली जाती है पर सीधी दिशा में हाथी तक बह जाते है। बड़े बड़े समझदार अकलमन्द तक बह जाते हैं लेकिन जिनके भीतर का विवेक जागृत होता है वे अपने रास्ते पर भगवान के रास्ते पर हम और हमारा भगवान दो के हिसाब से निश्चयपूर्वक आगे चढ़ते चले जाते है। मेरी कुण्डलिनी जी थी और उसने मुझे वहाँ से देहात में जहाँ घर में खेती बाड़ी का धन्धा होता था बाप दादा पंडिताई का धन्धा करते थे बढ़ते हुए मैं कहाँ से कहाँ चला आया। कुण्डलिनी ने मुझे कहाँ से कहाँ बिठा दिया। अब मैं उस गाँव का आदमी नहीं हूँ सारे विश्व का आदमी हूँ। और अभी बहुत बढ़ रहा हूँ। अभी दस-पाँच वर्ष मेरी जिन्दगी के है और मैं बढ़ता ही चला जाऊँगा। कुण्डलिनी ने मेरा दायरा कितना अधिक बढ़ा दिया मेरा व्यक्तित्व बढ़ा दिया चिन्तन बढ़ा दिया मेरी आत्मा बढ़ा दी आस्थायें बढ़ा दी आत्मज्ञान बढ़ा दिया मेरी सामर्थ्य बढ़ा दी। हमारा मन था कि आप लोगों को बुलाकर आपकी भी ऐसी ही कुण्डलिनी जगा पाऊँ तो कितना अच्छा। मालूम नहीं मेरे सौभाग्य में वैसा कुछ सुयोग है कि नहीं जैसा कि मेरे गुरुजी में था।

मेरे गुरु ने एक और चीज दी थी। क्या दी थी? शक्तिपात किया था। शक्तिपात किसे कहते हैं? शक्तिपात-बेटे उसे कहते है जिसमें उच्चकोटि के विचारों को कार्य रूप में परिणित करने के लिए जिसे ताकत की जरूरत पड़ती है, जिस बहादुरी और हिम्मत की जरूरत पड़ती है जिस बहादुरी और हिम्मत की जरूरत पड़ती हैं उसका नाम है शक्तिपात। हर चीज के लिए हर विचार को आगे बढ़ाने के लिए शक्ति चाहिए। मोटरकार आपके पास है लेकिन उसे चलाने के लिए पेट्रोल चाहिए पेट्रोल नहीं होगा तो कार चलेगी किससे? कुण्डलिनी से विवेक आ गया विचार आ गया निश्चय करने का हौसला आ गया कि कौन-सी बात उचित है और कौन-सी अनुचित है। लेकिन जो बात उचित है उसको करने के लिए ताकत चाहिए और कौन-सी अनुचित है लेकिन जो बात उचित हैं उसको करने के लिए ताकत चाहिए और जो अनुचित हैं उसको छोड़ने के लिए भी ताकत चाहिए। जो अनुचित है वह छूटता नहीं नशे की आदत छूटती नहीं शराब की आदत छूटती नहीं दुराचार की आदत छूटती नहीं कुसंस्कार छूटते नहीं दुराचार की आदत छूटती नहीं कुसंस्कार छूटते नहीं। प्राण शक्ति है नहीं जिससे कि हम अपने कुसंस्कारों को चैलेंज कर सके कि आप हटिए ओर आप हमें छू नहीं सकते। हमें अपनी विकृतियों से लोहा लेने के लिए ताकत चाहिए। ओर किसके लिए शक्ति चाहिए। किसी भी श्रेष्ठ काम करने के लिए शक्ति चाहिए? श्रेष्ठ काम करने के लिए शक्ति चाहिए। किसी भी श्रेष्ठ काम करने के लिए शक्ति चाहिए। किसी भी श्रेष्ठ काम के लिए फैसला कर लेना ही काफी नहीं है किताब पढ़ लेना विचार सुन लेना काफी नहीं है जरूरत इस बात की है कि हमारे भीतर से एक साहस एक हिम्मत उभरे जो श्रेष्ठ कामों के लिए चल पड़े और दुष्प्रवृत्तियों से लड़ पड़े श्रेष्ठता के मार्ग पर चलने के लिए इतनी बहादुरी की जरूरत है जितनी कि सिपाहियों को भी नहीं पड़ती सिपाहियों को कम ताकत की जरूरत है लेकिन अपने मासिक चोरों के विरुद्ध लड़ने के लिए बहुत बड़ी ताकत की जरूरत है लेकिन अपने मानसिक चोरों के विरुद्ध लड़ने के लिए बहुत बड़ी ताकत चाहिए हम जिस चक्रव्यूह में फँसे हुए है उससे निकलने के लिए बड़ी बहादुरी की जरूरत है हिम्मत की जरूरत है।

मेरे गुरुदेव ने मुझे यही हिम्मत दी और मेरा शक्तिपात हो गया। शक्तिपात होने के पश्चात् में बढ़ता हुआ चला आया। उन दो चीजों के आधार पर मैं आगे बढ़ा हमें हमेशा भगवान ने ही आगे बढ़ाया श्रद्धा और विश्वास के रूप में भगवान होते है। भगवान ने मुझे कन्धे पर बिठाकर और अंगुली पकड़कर चलाया है। भगवन् क्या है? वह एक कायदा हैं कानून है एक नियम है। खुशामद से वह बिलकुल दूर है उसके हाँ न पूजा करने वालों के लिए रियायत है और पूजा न करने वाला ही के लिए शिकायत भी नहीं है। भगवान तो कायदे को देखता है बिजली का उपयोग आप कायदे से करेंगे तो वह बड़ी दयालु है और यदि कायदे करें तब बड़ी दयालु है और यदि बेकायदा करेंगे तब बड़ी दुष्ट भी है जान भी ले सकती है। जिन चीजों ने हमको उठाया उसे हम कुण्डलिनी जागरण कहते है शक्तिपात कहते है हमारे गुरु का एहसान है हमारे ऊपर जो उन्होंने हमारी दबी हुई क्षमता को जगा दिया। बीज के भीतर वृक्ष का छोटा-सा हिस्सा बैठा रहता है खद पानी और जमीन तीनों मिलकर उस बीज की क्षमता को जगाते है उभरते है हमारे भीतर जो महानतायें है उनको उठा देना यही है संतों का काम यही है भगवान का काम यही है देवी देवताओं का काम जब वे किसी पर दया करते है तो उसके भीतर की सोयी हुई क्षमता को उभार देते है देखिये मेरे जीवन में यही हुआ। मैं भी यही चाहता था। कि आपको बुलाकर इसी तरीके से आपकी सेवा करूँ जैसे मेरे गुरु ने की।

तो गुरु जी आप करिये न सेवा नहीं बेटे मैं अकेले नहीं कर सकता। अगर सीप ने अपना मुँह बंद करके रखा है यदि हम अपने कमरे के किवाड़ों को सूरज खिड़कियों को बन्द कर दे तो दुनिया का कोई सूरज हमारे कमरे में प्रकाश नहीं फैला सकता। इसी तरह हमारी मर्जी के बिना हमारे जीवन में कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता। इसमें भगवान भी शामिल है संत भी शामिल है भगवान अपना तो है पर हमारी मर्जी के बिना वह हमारी जिन्दगी में प्रवेश नहीं कर सकता इस सम्बन्ध में हम अपने गुरु से बहस करते रहते है। हम अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उनसे कहते है कि आपका अनुग्रह है आपकी कृपा है जो आपने हमें धन्य कर दिया वे भी कभी भी ठीक इन्हीं शब्दों को दुहराते है वे कहते है कि अगर तेरे अन्दर पकड़ने का ग्रहण करने का माद्दा न रहा होता प्रकट करने का माद्दा न होता तो इतने लाखों लोग दुनिया में है उनमें से हर किसी को हम बना सकते थे पर किसी को नहीं बना सके। तेरे अन्दर वह चीज थी जो तूने पकड़ ली हमारी कृपा को सार्थक बना दिया। हम दोनों अपनी नम्रता प्रकट करते रहते है अगर भगवान किसी पर अनुग्रह करेंगे तो उस पर कृपा करेंगे जिसने अपने आपको इस लायक बना रखा है।

मैंने यह कोशिश की कि आप किसी तरह अपने आपको इस लायक बना सकें तो मजा आ जाये। भगवान से माँगने की अपेक्षा अप अपने आप से माँगना शुरू करे तो बहुत करे तो बहुत अच्छा आप मेरी बात माने तो देने वालों की तलाश मत करे देने वाले बहुत है पर असल में लेने वाले नहीं है पात्रता का अभाव है महाराज जी कोई ऐसा संत दिखा दीजिए जो हमको वरदान दे सके। बेटे महात्मा के कितने वरदान दिला दूँ? मैं तो तेरे हाथ में मिट्टी का ढेला दे दूँगा वही तेरे लिए वरदान बन जाएगा मीरा को गिरधर गोपाल का एक मिट्टी का ढेला वरदान दे गया था और एकलव्य को मिट्टी का एक ढेला द्रोणाचार्य बनकर आ गया था। तेरे भीतर जो क्षमता है जहाँ कही भी भीतर की वह रोशनी रिफ्लेक्ट होगी वहीं चीज चमत्कारी हो जाएगी अपने आप को देख यदि आपको असीम देने के लिए तैयार है आप यह क्ष्याज मत कीजिये कि हम छोटे हैं हमारी को और सहायता करेगा आप छोटी हैसियत के है तो हम आपको मदद लायेंगे लेकिन आप कायदे पर चलिये कानून पर चलिये आप किस काम के लिए माँगना चाहते हैं बताइये हम गवाह पेश करेंगे कि कम हैसियत के कम योग्यता के होते हुए भी दैवी शक्तियाँ आपको मदद करने के लिए तैयार है दैवी शक्तियों ने किन किन की सहायता की चलिये गवाही पेश करता हूँ।

छः फूट लम्बे चौड़े सुराख से मैंने गंगा जी को गोमुख से निकलते देखा है गोमुख में जो धारा पतली-सी दीख पड़ती है वहीं आगे चलकर बंगाल में मीलों चौड़ी हो जाती है गंगा माता घर में छोटी थी व्यक्तित्व छोटा था, लेकिन रास्ते में हजारों नदी नदियों ने मदद की और उनका विस्तार होगा यह मदद की और यमुना की है। नर्मदा अमरकण्टक में एक छोटे से गड्ढे से निकलती है सभी तालाब सूख गया क्योंकि उन्होंने अपने दायरे को सीमित करके रखा लेकिन नर्मदा ने कहा था कि हम अकेले कष्ट उठाएँगे निरंतर श्रम करेंगे लोकहित के लिए। चलिए अब मैं मनुष्य का उदाहरण देता हूँ राजस्थान के एक स्वामी जी हुए है नाम था केशवानन्द जिसने वास्तव में संत की अभिव्यक्ति पेश की उन्होंने गाँव गाँव में स्कूल खुदवाया बाद में वे हिन्दुस्तान की पार्लियामेण्ट में भी कई साल तक मेम्बर रहे। इसी तरह छोटी-सी हैसियत से पैदा हुआ राजस्थान का एक छोटा-सा प्राइमरी स्कूल का मास्टर नौकरी छोड़कर चला गया और गाँव में छप्पर के नीचे कन्या पाठशाला प्रारम्भ कर दी। उसके पश्चात् क्या हुआ? देखिये उसकी नीयत भगवान भी एक ही चीज देखता है और वह है नीयत। भगवान ने उस मास्टर की नीयत को देखा और उसके हाथ का चलाया हुआ विद्यालय आज हिन्दुस्तान के कन्या महाविद्यालयों में अग्रणी माना जाता है। बाबा साहब आमटे नागपुर के एक बहुत छोटे वकील जो गुजारे लायक पैसा कमा लेते कि वकालत छोड़ दी और कोढ़ियों को लेकर एक आश्रम स्थापित किया। उनका आश्रम अब एक विश्व विद्यालय बन गया है जहाँ अंधों के लिए कोढ़ियों के लिए काम करने का प्रशिक्षण मिलता है। जार्ज वाशिंगटन जिसका बाप एक लकड़हारा था। उसकी माँ उसे एक झोपड़ी में बन्द कर जाती थी कि यदि मैं तुझे खुला हुआ छोड़ जाऊँगी तो भेड़िये खा जायेंगे जब तू बड़ा हो जायेगा तब तू लकड़ियाँ काटना भेड़ियों का मुकाबला करना।

कहने का तात्पर्य यह है कि जब आदमी की परिस्थितियाँ आदमी की अक्ल कमजोर हो तो भी क्या उसकी उन्नति के लिए गुँजाइश है जार्ज वाशिंगटन आपको गवाह देंगे और कहेंगे हमारे पास योग्यता साधन बुद्धि कौशल कुछ भी नहीं था सिर्फ एक ही साधन था वह था हमारा लक्ष्य। लक्ष्य ऊँचा था। आदर्श ऊँचे थे, इसलिए सारी दुनिया ने हमारी सहायता की। सहायता इस तरीके से बरसी जैसे अमृतवर्षा स्नेहवर्षा शक्तिवर्षा। ईमान साफ होना चाहिए। यदि आप अपना व्यक्तित्व अपना अन्तरंग इतना ऊँचा उठा सकते हैं जितना उस बालक का हो सकता है तो बाकी कमी आप हमारे ऊपर छोड़ सकते हैं। किसी देवता की कृपा हमको मिलेगी बेटे मैं यह जिम्मेदारी उठा सकता हूँ। देवताओं से मेरी बड़ी जान पहचान है। मेरा गुरु भी बड़ा समर्थ है। मैं गुरु की हिमायत कर लूँगा, गुरु का पल्ला पकड़ लूँगा। उनसे कहूँगा कि जो आपने मुझे भी है उसे छीन लीजिए और इसको दे दीजिए। आप संतों की तलाश मत कीजिए। देवताओं का मंत्र भी आपको सिद्ध नहीं करना पड़ेगा मैं देवता के हाथ जोड़ूंगा और कहूँगा कि मेरे पास कोई पुण्य हो तो मेरी शक्ति इसे दे दीजिए।

आपको इसके लिए जप भी नहीं करना पड़ेगा आपके बदले मैं जप कर लूँगा। आप तो एक ही काम करें कि अपना कायाकल्प करके यहाँ से जाएँ कायाकल्प वैसे तो शरीर के कायाकल्प को कहते है बुड्ढे से जवान बनने को कायाकल्प कहते है लेकिन मैं आपके अंतरंग को बदल देना चाहता हूँ हम चाहते है कि आपकी नीयत आपका ईमान आपका व्यक्तित्व चिन्तन और चरित्र जिस स्तर का था, उसे बदल दे। अगर आपके अंतरंग वाला हिस्सा बदल जाय तो मजा आ जाय। अभी तो आपके मन के ऊपर एक ऐसी छाप जम गई है एक ऐसा संस्कार जम गया है कि आप अपने को शरीर मानते है। छोटा आदमी बीमार आदमी कंगाल या अमीर मानते है। अभी तो आप शरीर को मान्यता देते है। यदि संभव हो सके तो आप यह कोशिश करना कि हम शरीर नहीं शरीर हमारा औजार है हथियार है और हम आत्मा है आप कोई न कोई समय ऐसा जरूर निकाले जब आत्मचिन्तन कर सके सोचे जब हम शरीर से बाहर निकल जाते हैं और ऊँचाई पर मीनार पर पहाड़ पर जाकर बैठ जाते है वहीं से आपको देखते रहे कि हमारा वह मरा हुआ शरीर पड़ा हुआ है और हम उससे अलग बैठे है हमारे हित अलग है और आत्मा की अपनी अभी तो सब गुड गोबर कर रखा है आपने जो किसी काम का नहीं है।

अभी तो हमने अपनी चेतना को शरीर में इस कदर घुला रखा है कि शरीर के अलावा अपने बारे में कुछ विचार ही नहीं कर पाते कि हमारी आत्मा भी है या नहीं आत्मा का भी कुछ लाभ होता है हमें मालूम ही नहीं। आत्मा का भी कुछ स्वार्थ होता है उसकी भी कुछ आवश्यकतायें होती है हमें मालूम ही नहीं सिवाय शरीर की आवश्यकताओं के हम कुछ सोच ही नहीं पाते यदि संभव हो सके तो यह कोशिश करना कि आप शरीर से अलग हो सकें अगर आप अलग होने कि कोशिश करेंगे तो आपके सामने नये विचार आयेंगे, नये कार्यक्रम आयेंगे कि हमको क्या करना चाहिये और कैसे करना चाहिए। शरीर व आत्मा को अलग करने कि कोशिश करना। दोनों के हित अलग-अलग करने कि कोशिश करना चाहिए-ऐसा जब आप जब आप विचार करेंगे तो आपको दिशा मिलेगी।

जब आप यहाँ से जाये तो माली होकर जाये। अहम् मालिकी को यहीं छोड़ जाएँ दुनिया में मालिक होना बन्द कर दें जहाँ कहीं भी जाये माली होके जायें मालिक मत होना। जब तू मालिक हो जायेगा तो दुनिया इतनी भारी हो जायेगी तेरे लिये कि तेरे प्राण ले जायेगी जब तू माली हो जायेगा तो दुनिया हँसती भी रहेगी और तेरे साथ रहेगी। जब मक्खी चासनी में घुसती है तो पंखों को लपेट लेती है और मर जाती है और जब किनारे बैठी रहती है तो उसका जायका चखती रहती है जुड़ो मत उससे। मालिकी को छोड़ अपना कर्तव्य पूरा कर बस अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर। अपनी स्त्री के लिए, बेटे के लिये,बाप के लिए,बहन के लिये,समाज के लिये हर एक के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करना है मालिकी मत जताना,मुनीम की तरीके से रहना सो जो तेरे पास पैसा है उसका ठीक उपयोग कर सकेगा। मालिक बनेंगे तो आपको दुनिया में पाप कमाने पड़ेंगे न्याय में आप चल नहीं चल सकेंगे जो वस्तु आपको मिली है, उसका कोई उपयोग नहीं कर सकेंगे आपके पास समय की सम्पदा है, श्रम की सम्पदा है बुद्धि की सम्पदा है, उसका उपयोग है यही काया कल्प करना है यदि संतों का अनुग्रह प्राप्त करना है देवताओं की कृपा प्राप्त करनी हों तो भगवान जितना उदार है उतनी उदारता सीखे। शरीर की अपेक्षा अपनी जीवात्मा पर विचार करे जो आप के पास सम्पदा है उसका उपयोग कीजिए और जो नहीं है उसका रोना बन्द कीजिए। जो है उसका उपयोग यदि करेंगे तो सहायता अपने आप मिल जायेगी। आप पहले उदार बनिये अपनी योग्यता और पात्रता के सम्बन्ध में विचार कीजिए आप अपनी नीयत को ईमान को इस तरह बनाये कि भगवान को समाज को पड़ोसियों को पता चल जाए की आप इस लायक है तो आप के पास उनका स्नेह सहयोग और आशीर्वाद बरसेगा। आप के पास हर चीज बरसेगी जिसकी आप को आवश्यकता है माँगने की अपेक्षा देने की परम्परा जो ऋषियों की परम्परा है बनाए। अपनी स्त्री को देंगे प्यार बच्चों को देंगे संस्कार, अपनी भाई-बहन को देंगे स्नेह समाज को देंगे ज्ञान और सारे विश्व को देंगे श्रेष्ठ परम्परायें यदि हम कुछ नहीं दे सकते तो रास्ता तो दिखा सकते है अपनी शानदार जिन्दगी जी कर के ताकि दूसरे आदमी हमारे चले हुए रास्ते पर चले अपने आप को तो श्रेष्ठ और शालीन बना ही सकते है हम निर्धन है, गरीब है तो भी ऐसा कर सकते है चारों ओर जो गहरा अंधकार छाया हुआ है, लोगों को रास्ता चलने के लिए अपने चरण चिन्ह छोड़ते हुए चले जाए हम विश्वास ले कर चले थे, आप भी विश्वास लेकर चले तो भी ये धन्य हो जायेंगे मैं कहता हूँ आप कष्टों का तकलीफ का रास्ता नहीं चलेंगे तो आप नहीं फलेंगे आप बीच की तरह से गले तो वृक्ष की तरह फलेंगे वृक्ष के तरीके से फलने की लिए बीज की तरह गलना आवश्यक है इसके लिए बड़ा कलेजा होना चाहिए वे तपस्वी होंगे, महापुरुष होंगे जिन्होंने अपने कलेजे चौड़े किए कृपणता पर अंकुश रखा। लोक हित के लिए, देश के लिए त्याग और बलिदान किया। ये ऐतिहासिक लोग है। वे समाज का सम्मान पाने के लिए अधिकारी हुए है, ऊँचे पदों पर पहुँचे है नेता हुए है। जो कुछ भी वैभव और वर्चस्व मिला है, गलने की वजह से मिला है आप भी बीज की तरह से गले ताकि वृक्ष की तरह से फलने की सम्भावना हो सके। अपने अंदर विवेक शीलता को जगाएँ यदि आप के अन्दर इतनी हिम्मत हो जाये तो आप के अन्दर शक्तिपात कर सकने में हम समर्थ हो सकते है

आज की बात समाप्त ॐ शान्ति


Quotation

परमपूज्य गुरुदेव की अमृत वाणी के चुने हुए छत्तीस प्रवचनों का संकलन युग निर्माण योजना द्वारा “गुरुवर की धरोहर” नाम से प्रकाशित किया जा रहा है अप्रैल अंत तक वो सबके लिए उपलब्ध होगा परिजन -गायत्री तपोभूमि मथुरा से सम्पन्न करे।


जिसने जीता मन उसने जीता संसार

कठिनाइयों से डर कर यदि हिम्मत हार बैठा जाय तो बात दूसरी है अन्यथा प्राण धारियों की अदम्य जीवनक्षमता इतने प्रबल है कि इतने बुरी से बुरी परिस्थितियों में जीवित ही नहीं फलता फूलता भी रह सकता है उत्तरी ध्रुव पर एस्किमो नामक मनुष्य जाती चिर काल से रहती है, वहां घोर शीत रहती है सदा बर्फ जमी रहती है कृषि तथा वनस्पतियों की कोई सम्भावना नहीं सामान्य मनुष्यों को उपलब्ध होने वाले साधनों में से कोई नहीं जीवित ही नहीं परिपुष्ट ही नहीं सुखी भी है हम अपने को जितना सुखी मानते है वह उससे कम नहीं कुछ अधिक ही सुखी मानते है और संतोष पूर्वक जीवन यापन करते है जरा-सी ठंड हमें परेशान कर देती है पर एस्किमो भोर शीत में आजीवन रहकर भी शीत से प्रभावित नहीं होते है किसी गाँव में एक बालक रहता था। उसने हाथी रेल मोटर आदी भी सवारियाँ चढ़ी थी ऊँट के विषय में उसने सुना था। चढ़ा नहीं था उसकी इच्छा सदैव ऊँट की सवारी करने को हुआ करती थी एक बार वो घर लौट रहा था रास्ते में एक व्यापारी अपने ऊँट को बैठा कर नदी में स्नान करने चला गया ऊँट को विश्राम देने के लिए काठी और नकेल दोनों खोल दी थी। ऊँट देखते ही बालक प्रसन्नता से नाचने लगा वर्षों से अधूरी आस पूरी करने का इससे सुन्दर कहा मिलता? छलाँग लगाई ऊँट के पीठ पर जा बैठा अपने स्वभाव के अनुसार ऊँट एकाएक उठा और रास्ते को भाग चला इसका लड़का घबराया पर अब क्या हो सकता था नकेल थी ही नहीं ऊँट को काबू कैसे करता जिधर जी आया अधर ऊँट भागता बालक की घबराहट भी बढ़ती गई मार्ग में दो पथिक जा रहे थे बालक की घबराहट देखकर उनने पूछा बालक कहा जाओगे? लड़के ने सिसकते हुए जवाब दिया” भाई जाना तो घर था किन्तु अब तो जहाँ ऊँट ले जाना चाहे ले जाए “ इसी बीच वो पेड़ के डाली से टकराया और लहूलुहान होकर भूमि पर जाकर जा गिरा।

बालक की कहानी पढ़ कर लोग मन ही मन उसकी मूर्खता पर हँसेंगे पर आज संसार की स्थिति ठीक उस बालक जैसी है मन के ऊँट पर चढ़ कर उसे बेलगाम छोड़ देने का ही परिणाम है कि आज सर्वत्र अपराध स्वेच्छा चरित्र कला और कुटिलता के दर्शन हो रहे है मन के नियंत्रण में न होने के कारण लोग पारलौकिक जीवन की यथार्थता आवश्यकता और उपयोगिता को भूल कर लौकिक सुख और स्वार्थ की पूर्ति में संलग्न हो गये है की उन्हें भले बुरे अनुचित का ज्ञान भी नहीं रहा।

मनुष्य के शरीर में सभी कुछ महत्त्व का है और तो और नाखून पंजे, उँगली और पाँव, हाथ तक बड़े उपयोगी है, परन्तु मन का महत्त्व सर्वाधिक है। इसकी विलक्षण शक्तियाँ है। मनुष्य का सुखदुःख बंधन और मोक्ष ये सभी मन के आधीन है शास्त्र कार ने कहा है” मन एवं मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयौ” मनुष्यों के बंधन मोक्ष दोनों का मन नहीं है साँसारिक वैभव चाहिए तो उसके भी मन प्रदान करते है और परम सुख, मोक्ष चाहिए तो उसका प्रदाता मन ही है। मनुष्य की सेवा में हर घड़ी मन ताबेदार सेवक की तरह तैयार खड़ा रहता है वह कभी थकता नहीं, कभी वे रुकता नहीं। कभी वृद्ध नहीं होता, सतत् उद्योग का स्वभाव है। इच्छाएँ करते रहना और उनकी पूर्ति के पीछे भागते फिरने में ही उसे आनंद आता है मन की सामर्थ्य अपार है वह सब कुछ कर सकता है। किन्तु उसमें स्वेच्छाचारिता की बुराई भी है वह अनियंत्रित मन नकेल रहित ऊँट की तरह ही मनुष्य को पथ भ्रष्ट करता और घर जीवन लक्ष्य की ओर ले जाने की अपेक्षा इन्द्रिय सुखों बीहड़ में ले जाकर किसी रोग शोक, कलह कुटिलता, कुसंग, कुमार्ग, कुटेव से टकराकर पटक देता है मनुष्य का जन्म जिस उद्देश्य पूर्ति के लिए हुआ उसका स्मरण भी नहीं आता, उलटे ये जीवन भी नारकीय भी बन जाता है।

सारी सिद्धियों का मूल मनः संयम में है। परन्तु वे केवल साधारण पुरुषार्थ से मिल जाने वाली नहीं मन की साधना किसी भी पुरुषार्थ से, योग से बढ़कर है। इसलिए शास्त्रकार ने कहा-जिते जगत केन? मना ही येन” जिसने मन का लिया उसने संसार को जीत लिया।


सामूहिक पुरुषार्थ द्वारा ही अदृश्य का परिशोधन-युग शक्ति का अवतरण सम्भव

देवसंस्कृति दिग्विजय करती चली आ रही है चतुरंगिणी सेना पच्चीस पराक्रम दिखाती हुई अपनी मंजिल के उस मुकाम पर आ पहुँची है जहाँ वे पीछे मुड़कर कुछ क्षण रुक कर सिंहावलोकन कर अपनी प्रगति की समीक्षा कर सकती है एवं इष्ट आराध्य-गुरु सत्ता इस संधि काल में दिये गये महत्त्वपूर्ण दायित्वों पर एक दृष्टि डाल सकती है-युग परिवर्तन करने के लिए अवतरित महाशक्ति का अवतरण इस माध्यम से विगत दिनों कहा कहा हुआ, किस किस रूप में यह प्रकाश, सद्ज्ञान, सत्कर्म एवं सद्भावनाओं कि स्थापना के रूप में घर घर तक पहुँचा व कैसे इसने मानवीय आस्थाओं में प्रविष्ट अवांछनीयताओं की जड़े समूल काटने में मदद की? ये एक सुनिश्चित है कि अब तक जितने भी अवतार हुए है मत्स्यावतार से भगवान बुद्ध तक सभी में व्यक्ति-दृश्य असुरताओं से लड़ना पड़ा जो कि अपेक्षाकृत एक सुगम कार्य था किन्तु इस युग में जबकि असुरता जन जन के मनों में मानवीय आस्थाओं में आधिपत्य जमा चुकी हो, वैसे ही प्रकाश पूर्ण और प्रखर सत्ता की आवश्यकता भी थी जो भावनाओं की गहराई उतरकर इतना महत्त्वपूर्ण कार्य कर सके दशावतार की प्रज्ञावतार की अश्वमेधिक लीला को सर्व समर्थ गायत्री महाशक्ति ब्राह्मीचेतना के अभूतपूर्व क्रिया−कलाप के रूप में देखा जाना चाहिए एवं उसका अवतरण सुनिश्चित रूप में इस भारत भूमि पर से ही हुआ समझा जाना चाहिए

शक्ति का प्राकट्य एक तथ्य है और उसकी सक्रियता द्वारा समस्त युग को प्रभावित करना दूसरा पक्ष है। देवात्माएँ भगवत् सत्ता के इस प्रयोजन को पूरा करने के लिए ही चिरकाल से अवतरित होती चली आई है। गायत्री माह शक्ति को व्यापक बनाने के लिए, हर घर को आस्तिकता के ऋतम्भरा प्रज्ञा के प्रकाश से आलोकित करने के लिए युग सैनिकों की एक पूरी कुमुक पूरी तरह सन्नद्ध हर मोर्चे पर लड़ने को तैयार खड़ी है। चूँकि असुर का रूप धर कर-कभी बड़प्पन-प्रदर्शन ठाठ बाठ दहेज कि धूमधाम भरी अपव्यय वाली शक्ल लेकर सामने आ खड़ा होता है नैतिकता के पतन से लेकर के आप अपना रूप बदल कर अपराधी नशे ग्रसित की सी मानसिकता एवं निष्ठुरता के पिशाच वाले रूप में कभी नजर आता है उससे कैसे लड़ा जाय, ये समझने के लिये भी लक्ष्मण स्तर की मेधा तपः ऊर्जा एवं आत्मबल चाहिए। राम रावण युद्ध में मेघनाथ भेष बदल बदलकर रूप बदल बदलकर आक्रमण कर रहा था। किन्तु अपने आराध्य श्री राम के साथ जंगल में एकाकी तक तप करने वाले लक्ष्मण को किसी तरह की कठिनाई इसमें आ नहीं रही थी। उनने अपनी दिव्य दृष्टि से मायावी असुर को ढूँढ़ निकाला वह उसके तांत्रिक अनुष्ठान को भंग कर उसका संहार कर रावण का बचा शेष मनोबल भी तोड़ डाला। आज का लक्ष्मण जो आस्था संकट के युद्ध में मायावी असुर के आक्रमण के भूमि पर खड़ा है-वही तपोबल व दिव्य दृष्टि की अपेक्षा रखता है एवं उसके गायत्री महाशक्ति की साधना से मिल सकती है। गायत्री उपासना के व्यापक विस्तार से वह प्रयोजन पूर्ण हुआ माना जाना चाहिए, जिससे की सतयुगी सम्भावना ही साकार की ही जा सके।

1989 की बसंत पंचमी परम पूज्य गुरुदेव ने 240 करोड़ प्रतिदिन गायत्री जप के ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का युग संधि महापुरश्चरण का शुभारंभ किये जाने का उल्लेख किया एवं उसकी प्रथम पूर्णाहुति 1995 में किये जाने कि बात कही थी, तब बहुतों को आज की स्थिति की कल्पना भी नहीं थी। यह भी आभास नहीं था कि यह पुरुषार्थ किस प्रकार किन रूपों में बन पड़ेगा? कैसे इतनी लम्बी यात्रा पूरी होगी? किन्तु सहजता से कुछ लाख व्यक्तियों से आरम्भ हुआ आज 6 करोड़ विश्वासी गायत्री परिजनों का आधार भूत संकल्प बन चुका है। पूरे विश्व की आबादी 6 अरब समग्र भारत की 19 करोड़ हिन्दू कही जाने वाली जन शक्ति की 65 करोड़ तो है ही ऐसे में यह मात्र दसवाँ भाग पूरा हुआ ही समझा जाना चाहिए। युग परिवर्तन की आशा की अपेक्षा कैसे रखी जाय जबकि कल्पना हमारे अधिष्ठाता युगऋषि पूज्य वर की विश्व को गायत्रीमय बनाने की थी वह नूतन सृष्टि के सृजेता विश्वामित्र के रूप वह इसका आभास सबको अपने जीवित रहते एवं सूक्ष्म-कारण शरीर से विगत पाँच वर्षों में करा चुके है। यदि सारे विश्व को ही गायत्रीमय बनाना है तो सारे वातावरण को इस व्यापक रूप में मथने डालने की आवश्यकता पड़ेगी अपने अपने समय में श्रीराम, श्रीकृष्ण व बुद्ध ने अपने परिधि के क्षेत्र को आन्दोलित करके रख दिया था इस प्रकार एक-सी विचार धारा और आदर्श निष्ठा के संस्कारों से ओत प्रोत से वातावरण से ही वे शक्ति व प्रेरणाएँ निराश्रित हो सकेगी जिनसे चिरकाल तक मानवीय आस्थाओं में शान्ति और प्रशाँता के, सहयोग और सहकारिता के, धर्म-लीपी और सदाचार के समाविष्ट होने के अवधारणा हो सकती है।

वैज्ञानिक अनुसंधान भी आज एक निष्कर्ष में पहुँचे है कि किसी क्षेत्र विशेष के लोगों की एक विशिष्ट प्रकार की विचारों की अटूट निष्ठा एवं उनके मस्तिष्क से होने वाले” मस्तिष्कीय विकिरण ब्रेनरे डियेशन से सघन तरंगें वहाँ के वातावरण में छा जाती है, और चिरकाल तक बनी रहती है इससे उनने एक” आइडियोस्फियर” बनने और उसके माइक्रो से मेक्रोकेंस्मास में बदल कर प्रभावित वातावरण बनाने भूमिका की महत्ता भी प्रतिपादित कि है। अनुसंधान ये भी बताते है कि एक बार किसी वातावरण को शक्तिशाली भावनाओं में मथ दिया जाय तो वह चिरकाल तक लोगों को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ उस वातावरण में पैदा हो जाती है आज प्रायः यही प्रयोग पुनः दोहराया जा रहा है, जब घर घर गायत्री की सच्चिन्तन की वह यज्ञ की सत्कर्म की प्रेरणा पहुँचा कर उज्ज्वल भविष्य की स्थापना हेतु संस्कारों का घर घर अभिवर्धन करने की एक अस्त्र के रूप में प्रयुक्त कर इससे वातावरण में छायी विक्षिप्तता, चारित्रिक पतन वाली मानसिकता घुटन पैदा करने वाली अनास्था कि विभीषिका से मोर्चा लेने के लिए वह वातावरण निर्मित किया जा रहा है जिससे श्रेष्ठ विचारों से दुश्चिंतन की काट सम्भव हो सके युग शक्ति गायत्री के अवतरण यही मूल परिजन है इसे इस युग की जागृत आत्माओं को समागत वातावरण बनाकर पूरा करना ही पड़ेगा, चाहे इसमें उन्हें अपनी सम्पूर्ण शक्ति क्यों न झोंक देनी पड़े

नवरात्रि की वेला संधिवेला कहलाती है। उन दिनों सूक्ष्मजगत कहलाती है उन दिनों सूक्ष्मजगत विशिष्ट कम्पनों से अनुप्राणित रहता है वातावरण में असुरता भी अपना प्रभाव दिखाने की जोर आज़माइश करती है व श्रेष्ठता भी, देवत्व भी उन दिनों वातावरण में प्रचुर मात्रा में विद्यमान् होता है। सामूहिक अनुष्ठानों द्वारा संधिकाल की विशिष्ट तप प्रक्रिया द्वारा आहार का संयम अपनाते हुए विशिष्ट रूप अनुष्ठान संपन्न कर उन दिनों यही प्रयास किया जाता है कि एकाकी नहीं सामूहिक रूप में किये गये साधनात्मक पुरुषार्थ को बल मिले। पुरश्चरण इसी स्तर के जप पुरुषार्थ माने गये है जिनमें ढेर सारी एक विचारधारा की साधक मनः स्थिति की जनशक्ति मिलकर अपनी समन्वित विचार तरंगों से श्रेष्ठ वातावरण का निर्माण करे। संधिकाल की नवरात्रि वेला में यदि यह पुरुषार्थ किया जा रहा हो तो यह प्रक्रिया और भी बलवती होती चली जाती है एवं सारे वातावरण के आंदोलित होकर उससे माहौल को फिजा को एक “एरा” को ही बदल डालने की शक्ति उत्पन्न होती देखी जा सकती है। मनः स्थिति प्रचण्ड बल,द्वारा अपने योग्य वातावरण का निर्माण करती है व वैसा ही झंझावात आवेश पूरे परिकर में बनाने की शक्ति रखती है यह एक नितान्त सत्य है। मनुष्य ही वातावरण बनाता और ढालता है और उसी में एक समग्र तत्कालीन मानवजाति ढलती चली जाती है यह ऐतिहासिक तथ्य है। प्रचण्ड मनःशक्ति व भावविह्वलता के आधार पर किये गये ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान जैसे शक्ति साधना स्तर के पुरुषार्थी आश्वमेधिक स्तर के प्रयोगों से चिरकाल से प्रवाहित होते रहने वाले संस्कारों की ऋषि कालीन-सतयुगी विचार-चिन्तन की विलक्षण फौज न जाने ब्रह्माण्ड के किस कोने से दौड़ती आती चली जाती है और बादलों की तरह आच्छादित हो बरसने लगती है।

सामूहिकता के आधार पर की गयी गायत्री साधना में असत् में सत् अंधकार में प्रकाश तथा अज्ञान में ज्ञान की स्थापना की वह विलक्षण शक्ति है जो अपने आप में अनूठी है। यदि एकाकी साधना द्वारा वह साधक का ब्रह्मवर्चस् जगाती है तो सामूहिक उपासना, प्रार्थना में सारे वातावरण को हिला देने की शक्ति होती है इसी आधार पर अगले दिनों सभी धर्म सम्प्रदायों के व्यक्तियों द्वारा सामूहिक स्तर पर अपनी अपनी उपासना के प्रयोग मानव मात्र के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के निमित्त एक ही संयम किये जाने का प्रयोग पूरे भारत के महानगरों कस्बों देहातों में प्रयोग स्तर पर आँवलखेड़ा की प्रथम पूर्णाहुति तक बारबार सम्पन्न किये जाने की योजना बनी है ताकि युग परिवर्तन का माहौल बन सके। किसी को अपना धर्म बदलने उपासना पद्धति में परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है धियो यो नः प्रचोदयात् की भावना से सब एक साथ सन्मार्ग पर चले इस संज्ञा व सूक्त की भाव श्रद्धा के साथ उज्ज्वल भविष्य का पथ सभी के लिए एक साथ प्रशस्त हो इसी चिंतन चेतना के उदात्तीकरण के साथ यह सामूहिक प्रयोग जप उपासना दीपयज्ञों अनुष्ठानों आदि रूप में सम्पन्न किये जाते रहेंगे एवं देखते देखते सारा वातावरण गायत्रीमय विवेक श्रद्धा से परिपूरित होता देखा जा सकेगा। गायत्री महामंत्र की प्रेरणा सभी को समान रूप से अनुष्ठान के पूर्व के आगामी सात माहों में यह भी प्रयोग किया जा रहा है कि इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवादों का मंत्र व भावार्थ का सीमित ही सही बड़े व्यापक पैमाने पर लेखन का क्रम चल पड़े जो मंत्र जप सके वे जपे किन्तु जो लिख सके वे पाँच ही सही पर अपनी अपनी भाषा में उसी भावचेतना से अनुप्राणित हो मंत्र? के भावार्थ का भी लेखन करें। वे उर्दू गुरु अंग्रेजी तमिल तेलगू असमी बंगाली कन्नड़ मलयालम मलयाली गुजराती किसी भी भाषा में हो सकता है बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इस अभियान में सम्मिलित हो प्रसुप्त संस्कारों को जगाने की प्रक्रिया को साकार कर सकते है यह प्रयोग सारे भारत व विश्व में एक साथ चल पड़े तो देखते देखते वातावरण के बदलने युग शक्ति के व्यापक होने की सुखद कल्पना सहज की जा सकती है।

जड़े यदि बनी रही तो यह टहनी कटने पर भी कुछ उद्देश्य पूरा होता नहीं है। जड़े नई कोपलें उगाती रहती है वह वृक्ष पनपता रहता है। प्रथम विश्व युद्ध इस सभी के द्वितीय दशक में लड़ा गया तुरन्त बाद ही दूसरा विश्व युद्ध चौथे दशक में लड़ा गया दूसरे के बाद तीसरी तैयारी महाविनाश की विभीषिका इन दिनों बड़ी चढ़ी दिखाई देती है प्रत्यक्ष भोगवादी लिप्सा के परिणाम सामने होते हुए भी चिन्तन का रुझान उसी ओर जाता दिखाई देता है सब जानते है कि स्वच्छता का समुचित प्रबन्ध न किया जाने पर ही सड़न से मक्खी मच्छर पैदा होते बीमारी फैलती है लाखों उपचार के बावजूद ढीठ मच्छर अपना उत्पाद वैसा ही फैलाता ही दिखाई देते है वे मलेरिया छः जैसे रोग आधुनिकतम चिकित्सा साधनों के बावजूद साधन सम्पन्न देशों में दिखाई दे रहे है। वस्तुतः प्रत्यक्ष उपचार सब कुछ नहीं है गंदगी नमी का निराकरण होने पर (खाली) का अभिवर्धन करने हेतु युग ऋषि द्वारा एक सौ आठ अश्वमेधों का शृंखला चलाई गई है जिसका प्रथम चरण आगामी जुलाई माह के शिकागो (यू. एस. ए.) अश्वमेध (28,29,30,जुलाई 95) में समाप्त हो अपनी प्रथम पूर्णाहुति द्वारा नवम्बर में एक कड़ी के रूप में समाप्त होगा इसी के साथ साथ आगामी शृंखला के वर्ष के बाद प्रारम्भ होने तक तथा अब से आँवलखेड़ा पूर्णाहुति तक घर घर तक गायत्री महाशक्ति की स्थापना का आस्तिकता के बीजारोपण का सूक्ष्म जगत के अनुकूलन के नियमित शब्द शक्ति के प्रयोगों का क्रम अनवरत चलता रहेगा दीपयज्ञों-छोटे कुण्डीय यज्ञ संस्कार महोत्सव की शृंखला इस ऊर्जा के विस्तरण की प्रक्रिया पूरी करेगी। सामूहिक विपत्ति टालने के लिए इन दिनों इससे कम में काम नहीं चल सकता है।

इसी वर्ष दीपावली के दिन खग्रास सूर्यग्रहण है जो भारत में भी देखा जा सकेगा। इस ग्रहण के साथ सौर कलंकों सूर्य पर पड़ने वाले धब्बों (सन स्पॉट्स) की संख्या इस सदी के अन्त तक बढ़ती चली जाएगी। सौर-ऊर्जा का यदि गायत्री द्वारा संयोजन कर उसका सुनियोजित विस्तार विज्ञान सम्मत आश्वमेधिक प्रयोगों द्वारा किये जाने का क्रम चलता रहा तो निश्चित ही सारी मानव जाति को आसन्न विभीषिकाओं से मुक्ति दिलाई जा सकेगी। सज्जनों की संयुक्त शक्ति जागे संघर्ष शक्ति दुर्गा शक्ति का अवतरण हो तथा युगशक्ति गायत्री की प्रेरणा से सभी अनुप्राणित हो सतयुग की वापसी का सरंजाम बनाएँ ऐसी ही कुछ इन आकांक्षा है बुद्धिमानी इसी में है कि सभी समय के प्रवाह के साथ चलते हुए इस विराट साँस्कृतिक अभियान से जुड़े जिसमें हर जाति वर्ग वर्ण संप्रदाय लिंग के व्यक्ति सम्मिलित होते देखे जा सकेंगे यदि इस युग वातावरण को विचारक्रांति गायत्री उपासना व यज्ञों संस्कारों के विस्तार द्वारा गायत्रीमय बनाया जा सके तो युगशक्ति का यह अवतरण सम्ल सार्थक होकर रहेगा उससे अपने राष्ट्र एवं विश्व को चिरकाल तक समृद्ध सशक्त एवं सुसंस्कारित सुगठित बनाये रखने वाली ऊष्मा का उत्पादन भी संभव हो सकेगा। जितने अधिक व्यक्ति जोड़े जा सकेंगे अंतः करण से कटिबद्ध हो सकेंगे उतना ही युगशक्ति का अवतरण तथा सही समय पर इस धरती पर ऋषि युग्म का आने का सुयोग्य सौभाग्य व सबका उससे जुड़ना सार्थक माना जाएगा

*समाप्त*