कर्ज (Kahani)

अदालत में रोते हुए व्यक्ति को देखकर एक सहृदय ने कारण जानना चाहा, तो पता चला कि उसने बहुत पहले अपनी पुत्री के विवाह के लिए कर्ज लिया था कर्ज समय पर चुका नहीं पाया, तो ब्याज पर ब्याज बढ़ता गया और अब तीन सौ रुपये हो गये। ऐसे धनी जो दिया हुआ कर्ज माफ कर दें, बहुत कम होते है। वह तो दुगुने का कागज लिखवा कर हर ढंग से वसूल करने का प्रयास करते है। वह कर्जदार तो अवधि बढ़ाने की फरियाद करने आया था। पर अदालत में भी कोई सुनवाई न हुई, क्योंकि मामला बहुत पुराना था। वह रोते हुये घर चला गया। उसकी पत्नी ने बताया कि डिग्री करने वाले कई व्यक्ति आये थे और दरवाजा घेरे काफी देर खड़े रहे। अनत में किसी दयालु व्यक्ति ने कर्ज चुका कर उन्हें विदा किया। अब समझते देर न लगी कि जो व्यक्ति अदालत में मुझसे बार कर रहा था, शायद यहाँ आकर उसने मेरा दुख हल्का करने के लिए रुपये चुका दिये हों।

वह व्यक्ति उनका पता लगाते हुए घर पहुँचा और बड़े ही विनम्र शब्दों में कृतज्ञता व्यक्त करने लगा। उन्होंने कहा-भाई रुपये चुकाये तो मैंने ही है पर कहकर किसी से मत। क्योंकि थोड़ा पैसा जेब में होने के कारण यह तो मेरा कर्तव्य ही था, जिसे मैंने पूरा किया। “ यह व्यक्ति थे ईश्वरचंद्र विद्या सागर, जो स्वयं गरीबी में पले थे; किन्तु अन्त तक नहीं भूले नहीं। माँ की सिखावन उन्हें हमेशा याद रही- “ समर्थ होने के नाते अन्य गरीबों -पिछड़ों के दुख कष्ट मिटाने की जिम्मेदारी पूरी लगन से निभाना”। उन्होंने कोई भी ऐसा अवसर हाथ से जाने न दिया।

जिनका अन्तःकरण सदाशयता से लबालब भरा होता है, इनको विश्व के समस्त नागरिक अपने ही परिजन से प्रतीत होते है। जो सेवा-उपकार भाव वे अपने सगे-सम्बन्धियों के प्रति रखते हैं, वहीं इनका विश्व रूपी इस विराट् कुटुम्ब के प्रति भी होता है। इसे वे अपना कर्तव्य मानते है, अहसान नहीं।

एक अधेड़ दम्पत्ति रात को आँधी -तूफान और मूसलाधार वर्षा के बीच फिलाडेल्फिया के एक होटल में पहुँचे और ठहरने के लिये स्थान माँगा। होटल पूरा भरा हुआ था। कहीं तिल रखने को जगह नहीं थी। मालिक ने अपनी असमर्थता प्रकट करके छुट्टी ली। घोर शीत और वर्ष की इस भयानक रात में दम्पत्ति एक कोने में सिकुड़े खड़े थे। रात कहाँ कटे, कुछ सूझ नहीं पड़ रहा था। होटल के एक कर्मचारी ने बिस्तर में पड़े-पड़े यह दृश्य देखा। वह बाहर निकला ओर दम्पत्ति को अपनी छोटी-सी कोठरी में टिका दिया। स्वयं किसी प्रकार इधर-उधर खड़े-टहलता रात काटता रहा। सवेरा हुआ। दम्पत्ति उस कर्मचारी की उदार सज्जनता के लिये धन्यवाद देते हुए चले गये। इस कृपा का पुरस्कार देने का उनने प्रयत्न किया, पर उस कर्मचारी ने इसे मनुष्यता का फर्ज बताया और उसका मूल्य लेने से इनकार कर दिया। कुछ ही दिन बाद उस कर्मचारी को न्यूयार्क से बुलावा आया। चिट्ठी के साथ हवाई जहाज का टिकट था। कर्मचारी पहुँचा, हवाई अड्डे पर स्वागत के लिए वहीं दम्पत्ति खड़े थे, जिन्हें उसने अपनी कोठरी में ठहराया था। वे थे न्यूयार्क के करोड़पति विलियम वालडोर्फ।

उन्होंने अपने उस रात के मेजबान का स्वागत करते हुए कहा कि -”हमने एक नया होटल बनाया है, उसके मैनेजर के पद तु आपको सम्मानित करना चाहते है।” उस व्यक्ति के संकोच को देखते हुए वे बोले, ‘इसे अन्यथा न लें। यह उस रात की मेजबान का पुरस्कार नहीं है। उसे तो हम राशि में कभी चुका ही नहीं सकते। यह कर्तव्य निष्ठा एवं उदार आत्मीयता का एक सम्मान भर है। आप जैसे सज्जन, जिनके लिए दूसरों का कष्ट भी अपना ही हैं, अतिथि सेवा जैसे कार्य का सँभालने के हकदार है। हमें तो अपने कर्तव्य की पूर्ति भर की है।’’


इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी

आज जिस नारी को हमने घर की वंदनीय, परदे की प्रतिमा और पैरों की जूती बनाकर रख छोड़ा है और जो मूक पशु की तरह सारा कष्ट, सारा क्लेश, विष घूँट की तरह पीकर स्नेह का अमृत ही देती है उस नारी के सही स्वरूप तथा महत्व पर निष्पक्ष होकर विचार किया जाये तो अपनी मानवता के नाते सहधर्मिणी होने के नाते, राष्ट्र व समाज की उन्नति के नाते उसे उसका उचित स्थान दिया ही जाना चाहिये। अधिक दिनों उसके अस्तित्व, व्यक्तित्व तथा अधिकारों का शोषण राष्ट्र का ऐसे गर्त में गिरा सकता है जिससे निकल सकना कठिन हो जाएगा। अतः कल्याण तथा बुद्धिमत्ता इसी में है कि समय रहते चेत उठा जाये और अपनी इस भूल को सुधार ही लिया जाय।

नारी का सबसे बड़ा महत्व उसके जननी पद में निहित हैं यदि जननी न होती तो कहाँ से इस सृष्टि का सम्पादन होता और कहाँ से समाज तथा राष्ट्रों की रचना होती! यदि माँ न हो तो वह कौन-सी शक्ति होती जो संसार में अनीति एवं अत्याचार मिटाने के लिये शूरवीरों को धरती पर उतारती। यदि माता न होती तो बड़े-बड़े वैज्ञानिक, प्रचण्ड पंडित, अप्रतिम साहित्यकार, दार्शनिक, मनीषी तथा महात्मा एवं महापुरुष किस की गोद में खेल-खेलकर धरती पर पदार्पण करते। नारी व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की जननी ही नहीं वह जगज्जननी हैं उसका समुचित सम्मान न करना, अपराध है पाप तथा अमनुष्यता है।

नारी गर्भ धारण करती, उसे पालती, शिशु को जन्म देती और तब जब तक कि वह अपने पैरों नहीं चल पाता और अपने हाथों नहीं खा पता उसे छाती से लगाये अपना जीवन रस पिलाती रहती है। अपने से अधिक संतान की रक्षा एवं सुख-सुविधा में निरत रहती है। खुद गीले में सोती और शिशु को सूखे में सुलाती है। उसका मल-मूत्र साफ करती है। उसको साफ-सुथरा रखने में अपनी सुध-बुध भूले रहती है। इस सम्बन्ध में हर मनुष्य किसी न किसी नारी का ऋणी हैं। ऐसी दयामयी नारी का उपकार यदि तिरस्कार तथा उपेक्षा से चुकाया जाता है तो इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है।

पत्नी के रूप में उसका महत्व कुछ कम नहीं हैं नारी पुरुष की अर्धांगिनी हैं पत्नी के बिना पति का व्यक्तित्व पूरा नहीं होता। उसी की महिमा के कारण पुरुष गृहस्थ होने का गौरव पाता है और पत्नी ही वह माध्यम है जिसके द्वारा किसी की वंश परम्परा चलती है। यह पत्नी की ही तो उदारता है कि वह पुरुष के पशुत्व को पुत्र में बदल कर उसका सहारा निर्मित कर देती है। पुरुष के प्यार, स्नेह तथा उन्मुक्त आवेगों को अभिव्यक्त करने में पत्नी का कितना हाथ है इसे सभी जानते है। परेशानी, निराशा, आपत्ति अथवा जीवन के निविड़ अंधकार में वह पत्नी के सिवाय कौन है जो अपनी मुस्कानों से उजाला कर दिया करे अपने प्यार तथा स्नेह से हृदय नवजीवन जगाकर आश्वासन प्रदान करती रहे। पत्नी का सहयोग पुरुष के सुख में चार चाँद लगा देता और दुःख में वह उसकी साझीदार बनकर हाथ बँटाया करती हैं दिन भर बाहर काम करके और तरह-तरह के संघर्षों से थककर आने पर भोजन स्नान तथा आराम-विश्राम की व्यवस्था पत्नी के सिवाय और कौन करेगा।

पुरुष एक उद्योगी उच्छृंखल इकाई है। परिवार बसाकर रहना उसका सहज स्वभाव नहीं हैं यह नारी की ही कोमल कुशलता है जो इसे पारिवारिक बनाकर प्रसन्नता की परिधि में परिभ्रमण करने के लिये लालायित बनाये रखती है। पत्नी ही पुरुष को उद्योग उपलब्धियों की व्यवस्था एवं उपयोगिता प्रदान करती हैं पुरुष पत्नी के कारण ही गृहस्थ तथा प्रसन्न चेता बनकर सामाजिक भद्र जीवन बिताया करता पत्नी रहित पुरुष का समाज में अपेक्षाकृत कम आदर होता है। परिवारों में सामाजिकता के आदान-प्रदान उन्हीं के बीच होता हैं पारिवारिकता तथा पत्नी की परिधि पुरुष को अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों से बचाये रहती है। पत्नी के रूप में नारी का यह महत्व कुछ कम नहीं है। यदि आज संसार में नारी का सर्वथा अभाव हो जाये तो कल से ही पुरुष पशु हो उठे, सारी समाज व्यवस्था उच्छृंखल हो उठे, और सृष्टि का व्यवस्थित स्वरूप अस्त-व्यस्त हो जाये।

नारी को अर्धांगिनी ही नहीं सह-धारिणी भी कहा गया है। पुरुष का कोई भी धर्मानुष्ठान पत्नी के बिना पूरा नहीं होता। बड़े-बड़े राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों में भी यजमानों को अपनी पत्नी के साथ ही बैठना पड़ता था और आज भी षोडश संस्कारों से लेकर तीर्थ स्नान तक का महत्व तभी पूरा होता है जब गृहस्थ पत्नी को साथ लेकर पूरा करता है। किसी भी गृहस्थ का सामान्य दशा में अकेले धर्मानुष्ठान करने का निषेध हैं इतना ही नहीं भारतीय धर्म में तो नारी को और भी अधिक महत्व दिया गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे देवताओं का क्रिया-कलाप भी उनकी सह-धर्मियों, सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती के बिना पूरा नहीं होता। कहीं किसी स्थान पर भी यह अपनी शक्तियों से रहित नहीं पायें जाते। विद्या, वैभव तथा वीरता की अधिष्ठात्री देवियों के रूप में भी नारी की प्रतिष्ठा व्यक्त की गई है और उसे शारदा, श्री दुर्गा शक्ति के नामों से पुकारा गया है।

नारियों की धार्मिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय सेवाओं के लिये इतिहास साक्षी है। जिससे पता चल सकता है नारी पुरुष से किसी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं अनसूया, गार्गी, मैत्रेयी, शतरूपा अहिल्या, मदालसा आदि धार्मिक सीता, सावित्री, दमयंती तथा पद्मावती वीरबाला वीरमती, लक्ष्मीबाई व निवेदिता कस्तूरबा प्रभृति नारियाँ राष्ट्रीय व सामाजिक क्षेत्र की प्रकाशवती तारिका है। वेद इतिहास के ग्रंथों का अनुशीलन करने से पता चलता है कि प्रारम्भिक समय में जब साधनों की कमी होने से पुरुषों को प्रायः जंगलों से आहार सामग्री प्राप्त करने तथा आत्म शिक्षा के कामों में अधिक ध्यान देना पड़ता था तब व्यवस्था, ज्ञान-विज्ञान तथा सभ्यता संस्कृति सम्बन्ध विषयों में अधिकाँश काम नारियाँ ही किया करती थी। इसलिये अनेक तत्त्ववेत्ता अन्वेषक मनुष्यों को आदिम सभ्यता की जन्मदात्री नारी को ही मानते है। ऐसा महत्वपूर्ण तथा जीवनदायिनी नारी की उपेक्षा करना कहाँ तक ठीक है यह विचारणीय विषय है।

नारी संसार की सुंदरता तथा श्रृंगार है। यदि नारी का मोहक रूप न होता तो बर्बर पुरुष बर्बर ही बना रहता है। हिंसा, आखेट तथा युद्ध में ही लगा रहता है यह नारी का ही आकर्षण तथा परामर्श था जिसने उसे हिंसा से विरत कर पशु पालन तथा खेती-बाड़ी के काम में लगाया। उसकी स्नेहमयी करुणा ने ही पुरुष की कठोरता जीतकर उसे सद्गृहस्थ में बदल दिया पारिवारिक बना दिया। यदि नारी न होती तो पुरुष में न तो सरसता का जागरण होता और न कला-कौशल से प्रेम। रूप की अय्याशी उसकी आँख संसार में अपना केंद्र खोजते-खोजते थककर पथरा जाती। आखेट खोल लाने के अतिरिक्त उसकी आँखों का वह मूल्य महत्व तथा उपयोग न रहता जिसके आधार पर उसे प्रकृति के सुन्दर दृश्य और आकाश के सुंदर रंग अनुभूत करने की चेतना मिल सकी है। नारी के प्रति स्नेह आकर्षण ने पुरुष हृदय में न केवल कला का ही स्फुरण किया अपितु काम को भी जन्म दिया। नारी के रूप में भी नारी का महत्व कुछ कम नहीं है।

नारी अपने विभिन्न रूपों में सदैव मानव जाति के लिये त्याग, बलिदान, स्नेह श्रद्धा, धैर्य, सहिष्णुता का जीवन बिताती रही है। नारी धरा पर स्वर्गीय ज्योति की साकार प्रतिमा मानी गई है। उसकी वाणी जीवन के लिये अमृत स्रोत है। उस नेत्रों में करुणा, सरलता और आनन्द के दर्शन होते है। उसके हास में संसार की समस्त निराशा और कटुता मिटाने की अपूर्व क्षमता है। नारी संतप्त हृदय के लिये शीतल छाया और स्नेह सौजन्य की साकार प्रतिमा है। नारी पुरुष की पूरक सत्ता है। वह मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। उसके बिना पुरुष का जीवन अपूर्ण है। नारी ही उसे पूर्ण बनाती हैं जब मनुष्य का जीवन अंधकार युक्त हो जाता है तो नारी की संवेदना पूर्ण मुस्कान उसमें उजाला बिखेर देती है। पुरुष के कर्तव्य शुष्क जीवन की वह सरलता

प्रकट करते हुए श्रीमती महादेवी वर्मा ने एक स्थान पर लिखा है-

नारी केवल माँस-पिंड की संज्ञा नहीं है। आदिम काल से आज तक विकास पथ पर पुरुष का साथ देकर उसकी यात्रा को सफल बनाकर उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर और अपने वरदानों से जीवन में अक्षय शाँति भर कर मानवों ने जिस व्यक्तित्व, चेतना और हृदय का विकास किया है, उसी का पर्याप्त नारी है।

कहना न होगा कि नारी का सहयोग तथा उसका महत्व मानव जीवन में उन्नति एवं विकास के लिये सदा अनिवार्य रहा है, आज भी है और आगे भी रहेगा। वह समाज, राष्ट्र, परिवार अथवा व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता जो किसी भी रूप में नारी का आदर नहीं कर सकता। जो समाज परिवार अथवा राष्ट्र नारी का जो कि उनका आधार तथा भक्ति स्रोत है अधिकार छीन लेता है वह पंगु होकर पर-दलित अथवा पतित अवस्था में पड़ा रहता है। इस बात को सत्य सिद्ध करते हुए शास्त्रकार ने लिखा है-

“यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवताः’’ “जहाँ नारी की पूजा की जाती अर्थात् आदर-सत्कार होता है वहाँ देवता निवास किया करते है।”

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले हजार बारह-सौ वर्षों से हम भारतीय लोग नारी का तिरस्कार उसकी उपेक्षा करते चले आ रहे है और जिसके अभिशाप पतन के गहरे गर्त में गिर पड़े है। अब हमें अपनी चेतना में आना चाहिए और नारी को उचित स्थान देकर अपना तथा अपने राष्ट्र का कल्याण करना चाहिए। हमें ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि हमारे राष्ट्र की नारियाँ, समाज की जननी अब असहाय अबला भीरु बनकर न रहे बल्कि वे देवी, दुर्गा, शक्ति बनकर शीघ्र ही उठे और समाज की नव रचना में बराबर का हाथ बँटायेंगे। हम अपनी राष्ट्र निर्मात्री का घर की बंदिनी, परदे की प्रतिमा अथवा पैर की जूती न रखकर उसे स्वतंत्रता शिक्षा तथा प्रकाश की सुविधा दें जिससे कि वे सुसंस्कृत, संस्कारी सुयोग्य तथा स्वावलम्बी बनकर खड़ी हों ओर वर्तमान में राष्ट्र की सेवा में हाथ बँटायें और भविष्य के लिये सुन्दर स्वरूप तथा संस्कारवान् सन्तानें दे सकने में समर्थ हो सकें। नारी जीवन माता, पत्नी तथा भगिनी हर रूप में पूज्य है, उसका आदर होना ही चाहिए।

तथा उजड़ी जिन्दगी की हरियाली मानी गई है। नारी के वास्तविक स्वरूप पर विचार करने से विदित होता है कि वह पुरुष के रूप में सृष्टि के निर्माण, पालन-पोषण और संवर्धन का कार्य कर रही है। उसका महत्व


सभ्यता की पूँजी एक सर्वश्रेष्ठ निधि

सोने की परीक्षा आग में डालकर कसौटी पर कसने से होती है। मनुष्य का व्यक्तित्व एवं स्तर इस कसौटी पर रखा जाता है कि वह दूसरों के सम्पर्क में आने पर किस प्रकार का आचरण करता है। एकाकी मनुष्य के बारे में दूसरा कोई कुछ नहीं जानता कि वह क्या है- कैसा है। पर जब दूसरों के संपर्क में आता है तो कुछ प्रतिक्रिया होती है और यह पता चलता कि वह कितना सभ्य और सुसंस्कृत है। जिन्हें दूसरों के साथ सज्जनोचित व्यवहार करना नहीं आता उनकी गवार असभ्य आदि संबोधनों से निन्दा की जाती है। ऐसे लोग अप्रमाणिक माने जाते है और किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अयोग्य समझे जाते है। सामूहिक कार्यों में उन्हें सदा पिछली पंक्ति में रखा जाता है ताकि अपने असभ्य आचरणों से कोई विक्षेप उत्पन्न न करें।

प्रत्येक मनुष्य सम्माननीय है। हर किसी का जन्मजात अधिकार है कि वह दूसरों से सम्मान एवं सद्व्यवहार की अपेक्षा करें साथ ही दूसरों के साथ वैसा ही शालीन व्यवहार करना उसका कर्तव्य है जैसा कि दूसरों से अपने लिए अपेक्षा करता है। इस सज्जनोचित सद्व्यवहार के आदान-प्रदान का नाम शिष्टाचार है। यदि समाज में रहना तो समाज व्यवस्था की प्रथम आचार संहिता शिष्टाचार का पालन सीखना ही चाहिए। जो इससे अनभिज्ञ अथवा अनभ्यस्त है वह समाज का प्रामाणिक सदस्य न माना जा सकेगा उसे असभ्य अविकसित विक्षिप्त या उद्दण्ड कहलाने की भर्त्सना सहनी पड़ेगी। ऐसे लोग दूसरों का सम्मान एवं सहयोग प्राप्त करने से वंचित रहते है। और अन्य गुणों के रहते हुए भी केवल इसी एक कमी के कारण सदा तिरस्कृत उपेक्षित रहना पड़ता है।

आदम काल में मनुष्यों का पारस्परिक व्यवहार कुछ ठीक रहा है। संपर्क में सबसे पहले कुटुम्बी जन आते है जीवन का अधिकाँश समय उन्हीं के साथ रहकर व्यतीत करना पड़ता है। उसे अपने सज्जनता का विकास अभ्यास परिपक्व करने के लिये परिवार क्षेत्र में ही सर्वप्रथम शिष्टाचार पालन करना चाहिए। इसका श्री गणेश बालकपन से ही आरम्भ कर देना चाहिए अन्यथा बड़े होने पर गंवारपन की आदत पड़ जड़ पकड़ लेती है और उसका छूटना कठिन हो जाता है। समझा जाता है कि अपने तो अपने है। उनके साथ कैसा भी व्यवहार करने से हर्ज नहीं, शिष्टाचार तो बाहर वालों से बरतना चाहिए। ऐसा सोचना भारी भूल है। अपनी शिष्ट आदतों तो इसी घर की पाठशाला, व्यायामशाला में सीखनी परिपक्व करनी पड़ती है। प्रत्येक आदत चिरकाल न अभ्यास से स्वभाव का अंग बनती है। अचानक अजनबी व्यवहार किया जाय तो वह बन ही नहीं पड़ता। प्रयत्न करने पर भी अटपटापन बना रहता है। संगीत अभ्यास की तरह अच्छी आदतों को भी निरन्तर काम में लाना पड़ता है अन्यथा वे कलात्मक विशेषताएँ धूमिल पड़ती जाती है।

घर में बराबर वाले छोटे और बड़े तीन वर्ग के लोग रहते है। तीनों ही समान रूप से दूसरे का सम्मान प्राप्त करने के अधिकारी हैं। समझा जाता है। कि मात्र छोटों को बड़ों का सम्मान करना चाहिए। बड़े छोटों के साथ असभ्यता बरत सकते है। “बराबर वाले तो बराबर वाले ठहरे उन पर कोई विशेष प्रतिबंध नहीं है। “ यह मान्यता गलत है। छोटे बड़े या बराबर वाले होने से अंतर नहीं आता है। आयु या रिश्तों के छोटे-बड़े होने से पारस्परिक सम्मान या सद्भाव प्रदर्शन में कोई अन्तर नहीं आता है। छोटे को तो बड़ों के साथ विनम्र होना ही चाहिए पर बड़ों को यह छूट नहीं हैं कि किसी को इसलिए तिरस्कार करें कि वह छोटा है। छोटा होना कोई कसूर रूप से सहन करना पड़े। बराबर वाले यदि अपनी प्रतिष्ठा चाहते है तो बराबरी की हैसियत के कारण सत्कर्म और भी अधिक बरतनी पड़ेगी। एक ओर से असभ्यता बरतनी पड़ेगी। एक ओर से असभ्यता बरती गई तो दूसरी से भी उसकी प्रतिक्रिया होगी। छोटी बड़े का प्रतिबंध न होने से वह प्रतिक्रिया और भी स्वाभाविक ही जायेगी। इसलिये उनके साथ सम्मान बरतना प्रकार में अपने सम्मान को सुरक्षित रखने की एक महत्वपूर्ण शर्त ही समझनी पड़ेगी।

शिष्टाचार के नियम हर देश और समाज में अलग-अलग होते है। यह परम्परायें बदलती भी रहती है पर उनके मूल सिद्धान्त सदा सुस्थिर ही रहते है। हम दूसरों का सम्मान करते है।, उनके मिलने से प्रसन्न होते हैं, सद्भावनाओं का आश्वासन देते हैं और सहयोग के इच्छुक है- इन भावनाओं की अभिव्यक्ति दूसरों पर किस प्रकार की जा सकती है उसी को अपनी प्रथा परम्पराओं के अनुरूप अभिव्यक्ति को शिष्टाचार कहा जाएगा। इससे न केवल दूसरों के प्रति अपने सम्मान का प्रकटीकरण है वरन् इस बात के प्रमाण का प्रस्तुतीकरण भी है कि हमारा व्यक्तित्व कितना परिष्कृत एवं सुसंस्कृत हैं। दूसरों के साथ भद्दा और रूखा व्यवहार करके हमें उन्हें ही चोट नहीं पहुँचाते वरन् यह भी सिद्ध करते है कि मानव समाज में बरती जाने वाली आचार संहिता का प्रामाणिक ज्ञान भी हमें नहीं हो पाया है। यह कभी किसी भी भले आदमी के लिये लज्जा की बात है।

सभ्य परिवारों को अपने सामान्य व्यवहार में शिष्टाचार की परम्परा स्थापित करने में पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए, अन्यथा उसके सदस्य न केवल बाहर असभ्यता का लाँछन पाने और तिरस्कृत होने का दुःख सहेंगे वरन् परस्पर सौजन्य सद्भाव के अभाव में मनोमालिन्य उपेक्षा एवं असहयोग बढ़ाते रहेंगे और आये दिन टकराव होता रहेगा। यह किसी परिवार के टूटने बिखरने और गई गुजरी स्थिति में रहने की दुर्भाग्यपूर्ण पूर्व सूचना है। जो परिवार शिष्टाचार और परम्पराओं की स्थापना में जितनी अपेक्षा करते हैं वे अपनी सुदृढ़ता और प्रगति के पैरों आप कुल्हाड़ी मारते है। परिवार संचालकों को न केवल घर में अर्थ व्यवस्था का सुख सुविधा का उत्कृष्ट मनोरंजन का ध्यान रखना चाहिए कि पारस्परिक सद्व्यवहार की शिष्टाचार की नींव गहरी जा रही है या नहीं। जड़े गहरी न होने नर पेड़ पनपते नहीं इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह समझ लिया जाय इतना ही अच्छा है।

बड़ों का कर्तव्य है कि वे अपने शिष्ट व्यवहार में अग्रणी रहकर पूरे परिवार को उस प्रकार के अनुकरण की परम्परा डाले। उपदेश देने से जानकारी भर मिलती है। उदाहरण प्रस्तुत किये बिना किसी को अनुकरण के लिये तैयार नहीं किया जा सकता। आचरण के सम्बन्ध में तो यह तथ्य स्पष्ट है कि जैसा बड़े करते है, छोटे उनका अनुकरण करते है। यह बड़प्पन आयु और रिश्ते के हिसाब से भी होता है और सहज प्रतिभा के आधार पर भी। घर के कमाऊ एवं सुयोग्य व्यक्ति अपना वर्चस्व अनायास ही पूरे परिवार पर स्थापित कर लेते है। गुणों के कारण उनकी दाब सब मानते है। आयु, रिश्ता, प्रतिभा, कोई भी आश्रय इनमें से कई का सम्मिश्रण बड़प्पन के कारण हो सकता है। घर के बड़ों का यह विशिष्ट उत्तरदायित्व है कि वे परिवार के सदस्यों को शिष्ट एवं सभ्य बनावें। इसके लिये उनका सर्वप्रथम कर्तव्य यह हो जाता है कि स्वयं अपना उत्कृष्ट आचरण प्रस्तुत करें और पूरे परिवार को उसका अनुकरण की अनवरत प्रेरणा प्रस्तुत करते रहें।

यह कदम उठाने के साथ-साथ परिवार के सभी छोटे-बड़ों को उनके स्वभाव एवं व्यवहार में रहने वाली त्रुटियों को बताने उनके निवारण का उपाय समझाने का प्रयत्न निरन्तर जारी रखना चाहिए। हर व्यक्ति इतना समझदार नहीं होता है कि अपनी गलती बाप ढूँढ़ सके और सुधार सके। वरन् स्थिति बिल्कुल उल्टी होती है। आमतौर से लोग अपने साथ वे हिसाब पक्षपात करते है। अपने को निर्दोष कहते ही नहीं समझते भी है-और हर अप्रिय प्रसंग में दूसरों को दोषी ठहराते है। अपनी गलती बताने वाले पर नाराज होते हैं। गलती को प्रतिष्ठा का प्रश्न बताते हैं और भूल को न्यायोचित बताने के लिए अड़ जाते हैं अधिक कहा जाय तो प्रतिशोध पर उतारू होते है। इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए ही सुधार कार्य हाथ में लिया जा सकता है। अन्यथा किसी की गलती बताना उलटे विग्रह विद्वेष का कारण बन सकता है। समझने वाला खिन्न होकर भविष्य के लिये मौन साथ सकता है। अथवा कोई अवांछनीय कदम उठा सकता हैं सुधारक को यह कठिनाई आरम्भ में ही समझ लेनी चाहिए और उससे निपटने के लिए उपयुक्त मनः स्थिति बनाकर ही सुधार की प्रक्रिया में लेनी चाहिए। यह झंझट का काम है- बुराई बँधने का डर है- यों सोचकर यदि चुप बैठे रहा जाय तो गलती क्रमशः बढ़ती ही जायगी और एक दिन ऐसी स्थिति आ जायगी जब चुप रहकर बुराई न बाँधने की नीति बहुत ही महँगी पड़ेगी।

उचित यही है कि अशिष्टता के खरपतवारों को निरन्तर उखाड़ते रहा जाय ताकि गृह उद्यान के बहुमूल्य वृक्षों के पनपने में भारी व्यवधान उत्पन्न करने वाली आदतों का प्रश्रय मिलने ही न पावे। परिवार के वरिष्ठ लोगों को शिष्टाचार पालन में स्वयं को आगे रहना ही चाहिए साथ ही अन्य सदस्यों की समय-समय पर उनकी छोटी-मोटी भूलों को समझाते रहना चाहिए और उन्हें छोड़ने का अनुरोध करना चाहिए यह कार्य स्नेह, सौजन्य एवं सद्गुण का गहरा पुण्य लगाकर ही ठीक तरह सम्पन्न किया जा सकता है। झिड़की, डाँट-डपट मार-पीट गाली-गलौज निन्दा, उपहास -व्यंग जैसे उपायों से गलती सुधरती नहीं वरन् और भी अधिक बढ़ती है। उल्टी प्रतिक्रिया होती है। और गलती करने वाला इसी बात पर अड़ जाता है। घर या बाहर कि किसी भी व्यक्ति, कभी भी गलती बताने और सुधारने की बात करनी हो तो फूँक-फूँक कर कदम धरना चाहिए कि कहीं सामने वाले के अहम् को चोट न लगे, वह अपना अपमान अनुभव करते हुए अपने स्नेह सद्भाव का स्मरण दिलाना चाहिए और उसे लाँछन लगाने निकालने की दृष्टि से नहीं वरन् अधिक सुसंस्कृत बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों को अपनाने पर अधिक उज्ज्वल भविष्य बनाने की सम्भावना का प्रसंग प्रस्तुत करना चाहिए। उसी बात को दोष दर्शन के रूप में कह कर भर्त्सना की जा सकती है और उसी पथ्य को गुण अभिवर्धन के साथ जुड़े हुये प्रस्तुत किया जा सकता है। इनमें से पहला तरीका गलत और दूसरा सही है। यदि दूसरा तरीका अपनाया जाय तो परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य उस सुधार चर्चा को ध्यान पूर्वक सुनेंगे और अपनी कठिनाई सफाई बताते हुये बहुत हद तक सुधार के लिये तैयार हो जायेंगे।

परिवार के प्रत्येक वयस्क एवं समझदार व्यक्ति को अपने स्वभाव में शिष्टाचार के नियमों का कूट-कूटकर समावेश करना चाहिए। यह सर्वोत्तम तरीका है, जिसके आधार पर घर के प्रत्येक सदस्य को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाया जा सकता है। धर के बड़े लोग यदि इस कसौटी पर खरे उतरे तो फिर अन्य सब लोगों को वैसे ही अनुकरण की प्रेरणा मिलती रहेगी। यदि ऐसा वातावरण हो तो भी प्रत्येक वयस्क, अवयस्क, नर-नारी को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसके स्वभाव में सभ्यता के सभी पक्षों का समावेश होता चले। वस्तुतः यही सबसे बड़ी सम्पत्ति है जिसके आधार पर मनुष्य ऊँचे उठते और आगे बढ़ते है। साथियों का सहयोग, सविचार लिये बिना कोई व्यक्ति एकाकी कदाचित ही कुछ कहने लायक प्रगति कर सकता है। दूसरों की सहायता बिना हँसी-खुशी भी स्थिर नहीं रह सकती। कष्टों और कठिनाइयों में दूसरों का सहारा चाहिये ही। यह सब जुटा सकना उस ही के लिये ठीक है जो अपने मधुर स्वर से दूसरों को प्रभावित एवं आकर्षित कर सकता है। ऐसा सजीव चुम्बकीय शिष्टाचार में ही समर्पित रहता है।

घर में गरीबी हो या अमीरी इसका चलता है, चले भी तो उससे किसी को क्या लेना देना हो सकता है। पर यदि सभ्यता की पूँजी पास में है तो उस सुसंस्कृत परिवार के सदस्य प्रत्येक आगन्तुक पर सम्पर्क में आने वाले पर गहरी छाप छोड़ेंगे और उसकी भी यही आकांक्षा जगायेंगे कि हे भगवान्! और न सही तो हमारे परिवार को भी इतना सभ्य बना दें जैसा कि अमुक व्यक्ति को देखकर आयें है। शालीन परिवारों के साथ लेन-देन चलन-व्यवहार ब्याह-शादी करने में हर किसी को प्रसन्नता होती है हर कोई उन्हें सम्मान देता हैं और सहयोग भी। अध्यात्म का पहला पाठ है सभ्यता का अपने आप से, अपने घर से शुभारम्भ, सभ्य, सुसंस्कृत बनायें, फिर औरों को उपदेश दें।


पतन क्रम (Kahani)

अबोध बालक को भैरव की प्रतिमा के सम्मुख बलि चढ़ाते हुए एक तान्त्रिक पकड़ा गया। उसे विक्रमादित्य के दरबार में अपराधी की तरह उपस्थित किया गया। परिचय पूछने पर उसने बताया। कुछ वर्ष पूर्व मैं वेद पाठक ब्राह्मण था। कुत्साओं के कुचक्र में फँसकर एक के बाद एक बड़े कुकर्म करता गया। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची कि बात हत्या की नृशंसता अपनाने में भी कुछ अखरा नहीं। विक्रमादित्य ने आश्चर्य से पूछा-आपका पतन क्रम किस कारण आरम्भ हुआ किस प्रकार बढ़ा और स्थिति यहाँ तक कैसे पहुँची? इसका विवरण बतायें। अपराधी ब्राह्मण ने लम्बी साँस खीचते हुए कहा-राजन्! कभी मैं अपरिग्रही जीवन जीता था। स्वल्प साधनों में सुखपूर्वक निर्वाह करता और ब्रह्म कर्म में रत रहता था। पड़ोसी का विलास-वैभव देखकर मन ललचाया। सोचा-ऐसा ही ऐश्वर्य भोगा जाय। संतोष, अपरिग्रह और ब्रह्म में क्या धरा है। दिशा मुड़ी तो हर कदम अधिक बड़े अनाचार की ओर उठता चला गया।

राजा ने पूछा-उस पतन -क्रम की श्रृंखला भी बताये। अपराधी ने एक-एक करके उन आदतों और घटनाओं का वर्णन किया, जिनके कारण दुष्टता का दुस्साहस बढ़ता और प्रचण्ड होता चला गया था। ब्राह्मण ने कहा-स्वल्प श्रम में अधिक धन कमाने के लिए जुआ खेलना आरम्भ किया। जुए के लिए अधिक धन की आवश्यकता पड़ी, तो चोरी करने का सिलसिला चल पड़ा। चोरी से मुफ्त का माल मिला तो मदिरा पान और वेश्यागमन की आदत पड़ गई। उन दुराचार के अड्डों से अधिक संपर्क रहने पर बड़े अपराधों का शिक्षण मिला और अभ्यास पकता चला गया। अनाचारी तन्त्रियों की शाखा में जाते, उनसे बलि कर्म द्वारा भैरव प्रसन्न करने, अनायास ही बहुत धन पाने की कामना करने का उपाय मुझे भी बहुत रचा। क्रूर कर्मों में निरत रहते-रहते बाल वध में भी न दया आई और न आत्मग्लानि हुई। यही है मेरे पतन क्रम की श्रृंखला जो चिनगारी की तरह हुई और ईंधन का आश्रय मिलते ही दावानल की तरह बढ़ती चली गई।


क्या मृत व्यक्ति में प्राण संचार संभव है?

लेनिन ग्राह के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. एल. लोजिन लोजिनस्को, ने सन् 1964 में एक प्रयोग किया। उन्होंने मक्के में लगने वाले कीटकों को शून्य से चार डिग्री नीचे हीलियम द्रव में जमा दिया। साढ़े छः घण्टे इसी दशा में रखने के बाद उन्होंने ताप देकर उनमें क्रमिक रूप से चेतना लाने का प्रयत्न किया 20 में से 13 कीटक फिर से जीवित हो गये; किन्तु शेष 6 में से किसी की चेतना लाना सम्भव न हो सका। इससे एक सम्भव न हो सका। इससे एक सम्भावना विज्ञान जगत में यह जगी कि शरीर कोशिकाओं को सुरक्षित रख कर लम्बे समय तक उपरान्त भी उसमें चेतना का संचार सम्भव है।

जब यह प्रयोग चल रहा था, उन्हीं दिनों सोवियत रूस में एक घटना घट गई। 23 वर्षीय युवा कृषक ब्लादिमीर खारिन एक दिन अपने खेत पर ट्रेक्टर चला रहा था कि अचानक जोर का बर्फीला तूफान आ गया। ब्लादिमीर उसकी चपेट में आ गया। वह छः घंटे बर्फ में दबा पड़ा रहा। जब उसे ढूँढ़ा गया, तब तक उसका शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसको मृत घोषित कर दिया।

नेगोवस्की एक प्रतिष्ठित स्थानीय वैज्ञानिक थे। उनको जब इस घटना की जानकारी मिली, तो वे वहाँ पहुँचे तथ्यों का पता लगाया और एक प्रयोग करने का निश्चय किया। उन्होंने मृतक के पाँवों को गर्म पानी में डाला और उसे एड्रिनेलीन का इंजेक्शन देकर कृत्रिम साँस देना प्रारम्भ किया। शरीर में बाहर से थोड़ा रक्त भी पहुँचाया गया और समस्त काया की सेकाई की गई। उष्णता का संचार होते ही धीरे-धीरे साँसें चलने लगी। थोड़ी देर पश्चात् वह पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति की तरह चलने फिरने लगा।

इस घटना के विश्लेषण से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि मृत्यु है क्या? साधारण तया हृदय ओर साँस गति रुक जाने को मृत्यु कहते है, किन्तु अब वैज्ञानिक यह बात नहीं मानते। आपरेशन करते समय हृदय गति रुक जाती है, डॉक्टर मालिश करके उसे फिर प्रारम्भ कर लेते है। इन दिनों हृदय बदलने के अनेक प्रयोग हो रहे है। इस क्रिया में दूसरा हृदय प्रत्यारोप करने से पूर्व पहले को निकालना होता है। इस प्रकार आपरेशन सफल बनता और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है।

लोगों की यह कल्पना मनुष्य को ऑक्सीजन भोजन या पानी नहीं मिले, तो उसकी मृत्यु हो जायेगी-यह मान्यता भी निराधार सिद्ध हो चुकी है। शरीर को गर्म रखने के लिये यह वस्तुएँ निमित्त मात्र है। यदि हवा, पानी और भोजन न भी मिले, तो भी मनुष्य जीवित रह सकता है। समाधि लगाने वाले योगी इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है। जनसामान्य के लिए योगियों का यह प्रमाण यदि अग्राह्य स्तर का हो, तो फिर अंतरिक्ष विज्ञान की साक्षी उनके समक्ष प्रस्तुत है।

अन्तरिक्ष अनुसंधान से जब तक तो तथ्य उपलब्ध हुए है, उनके अनुसार यदि अपने सौर मंडल के किसी दूरतम ग्रह की कोई यात्रा करना चाहे, तो शायद इसमें उसका पूरा जीवन ही खप जाय और यदि वहाँ पहुँच कर वह वापिस लौटना चाहे, तो कदाचित् उसका मृत शरीर ही धरती पर आयेगा। कोई भी व्यक्ति अपना सम्पूर्ण जीवन इस प्रकार बर्बाद करना नहीं चाहेगा। इस स्थिति से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने कई विकल्प ढूँढ़े है। एक के अनुसार यदि मनुष्य को सुषुप्तावस्था में लाया जा सकें, तो बिना कुछ खाये-पिये और साँस लिये भी वह लम्बी अवधि अवधि तक जीवित बना रह सकता है। कि मस्तिष्क को यदि अर्धचेतनावस्था में योगियों की तरह लम्बे समय तक रखा जा सके, तो लम्बी आयु की सकना हर किसी के लिए संभव है। वैज्ञानिकों के इस निष्कर्ष से पता चलता है कि इसके समान सुषुप्तिकरण भी एक अवस्था है। जीवन और मृत्यु के बीच की इस अवस्था की व्यापक खोज की जा रही है। आशा है निकट भविष्य में ही जीवन और मृत्यु की तरह इसे भी जीवन के एक सामान्य स्तर के रूप में स्वीकार लिया जायेगा।

पिछली दिनों इस मध्यवर्ती दशा को लेकर वैज्ञानिकों के बीच विवाद छिड़ा रहा। इनमें से अधिकाँश का मत था कि बहुत लम्बे समय तक बिना भोजन-वायु के जिन्दा रह सकना सम्भव नहीं, किन्तु कुछ वर्ष पूर्व वैज्ञानिकों को कुछ ऐसे प्रमाण हाथ लगे है, जिनसे उनमें एक बार फिर आशा का संचार हुआ है। सोवियत विज्ञानवेत्ता प्रो. पी. कोप्तरेव ने ‘डाफनिया ‘ नामक जल कीट और शैवाल को उन क्षेत्रों से ढूँढ़ निकला है, जहाँ स्थायी रूप से बर्फ जमी रहती है। हिसाब लगाया गया, तो पता चला इनमें से कुछ कीटक 25 हजार वर्ष प्राचीन थे। प्रो. कोप्तरेव ने उनमें से अधिकाँश को गर्मी देकर फिर से जिन्दा कर लिया। इतनी लम्बी अवधि तक निष्क्रिय अवधि में पड़ा रहना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि चेतना तब भी यथावत् बनी रहती है, केवल यह सुषुप्त की दशा में चली जाती है। यदि इस अन्तराल में शरीर कोशों को क्षति से बचाया जा सकें, तो गर्मी और आक्सीजन देकर उन्हें पुनर्जीवित कर सकना शक्य हैं

अब वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रह है। कि रासायनिक तत्वों का कार्बनिक पदार्थों से संश्लेषण किस प्रकार हो सकता है? इस सम्बन्ध में वे ‘क्लोरेला’ नामक पौधे लगाने की कोशिश कर रहे हैं और इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे है कि क्या इनकी नर्सरी उगा कर अन्तरिक्ष यानों से संश्लेषण की क्रिया पूरी की जा सकती है क्या? यदि ऐसा हुआ, तो इससे सुषुप्ति की दशा में पड़ा शरीर अपने शारीरिक उच्छिष्ट से ही जीवन उसी प्रकार बनाये रख सकता है, जैसे मनुष्यों और पशुओं द्वारा छोड़ी हुई साँस और मलमूत्र से पौधे जीवनी शक्ति प्राप्त करते है। यह प्रयोग सफल हुआ, तो मानवी शरीर को लम्बे काल तक मूर्च्छित स्थिति में रखने के उपाय उसे इच्छानुसार जिलाये जा सकना सम्भव हो सकेगा।

इन प्रमाणों और प्रयोगों के आधार पर वैज्ञानिकों को मृत्यु सम्बन्धी परिभाषा के अनुसार उन्होंने यह निश्चित किया कि जब तक मस्तिष्क कोशिकाएँ सक्रिय बनी रहती है, तब तक बाह्य रूप से मृत्यु जैसे लक्षण उपस्थिति होने पर भी व्यक्ति की मृत्यु न मानी जाय। जब मस्तिष्क कोशिकाएँ पूर्ण रूप से कार्य करना बन्द कर दें, तभी व्यक्ति की वास्तविक मौत की स्वीकारोक्ति हो। इस तथ्य की पुष्टि भी उन घटनाओं द्वारा होती रहती है, जिनमें हृदय और श्वसन की क्रियाएँ पूर्णरूपेण बन्द हो चुकी हों। इतने पर कृत्रिम विधि द्वारा इन्हें सक्रिय कर व्यक्ति को पुनर्जीवित करने में चिकित्सा विज्ञानियों को सफलता मिलती रहती है। इससे यह निर्विवाद साबित होता है कि चेतना का सम्बन्ध शरीर से नहीं, मानसिक स्थितियों से है। यह शक्तियाँ अर्धमूर्छित स्थिति में पड़ी हुई हो और बाह्य लक्षण मौत की साक्षी उपस्थित कर रहे हों, तो भी व्यक्ति में जीवन की संभावना बनी रहती है। यदि अच्छे साधन और उपयुक्त उपचार इस समय व्यक्ति की उपलब्ध हो सकें, तो उसके पुनर्जीवन की शत-प्रतिशत गुँजाइश बनी रहती है।

मृत्यु कैसे होती है? इसका आसान-सा जवाब यह है कि हृदय गति रुकने से मस्तिष्क को शुद्ध रक्त मिलना बन्द हो जाता है। इसी क्रिया द्वारा मस्तिष्क को शक्ति मिलती है। किन्तु देखा गया है कि रक्त न मिलने पर भी वह छः मिनट तक आपातकालीन सहायताओं की अध्ययन करके मस्तिष्क का सीधा संबंध कार्बनिक पदार्थों के संश्लेषण से जोड़ने के प्रयत्न में है। यदि ऐसा कोई उपाय निकल आया, तो योगियों की समाधी के समान वैज्ञानिक भी मनुष्य का अर्ध जीवित (सुषुप्ति) अवस्था में सैकड़ों वर्ष तक बनाये रख सकते है।

विज्ञान के लिए जो सम्भावना है, वही योगियों के लिये स्वेच्छया हैं देखना यह है कि इस सम्भावनाओं को विज्ञानवेत्ता किस हद तक साकार कर पाते है। यदि ऐसा सम्भव हुआ, तो यह चेतना विज्ञान के क्षेत्र में पदार्थ विज्ञान की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। अध्यात्म जगत में तो ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते है, जिसमें महीनों और वर्षों तक जीवात्मा को शरीर से बाहर रख कर स्थूल देह को निर्जीव जैसी स्थिति में सुरक्षित रखा गया हो और फिर प्रयोजन पूरा हो जाने के उपरान्त चेतना वापिस देह में लौट लायी गई हो। ऐसा एक प्रसंग तो आदि शंकराचार्य का है, जिसमें उन्हें शास्त्रार्थ सम्बन्धी सवाल का जवाब ढूँढ़ने के लिए अपनी देह अस्थायी रूप से त्याग कर मृत राजा के शरीर में प्रवेश करना पड़ा। प्रश्न का उत्तर मिल जाने के बाद वे उधार की काया को छोड़कर पुनः अपनी देह में लौट आये।

इन प्रसंगों से इस दिशा में विज्ञान के प्रयास की सार्थकता समझी जा सकती है। वह यदि इस बात का पता लगा सके कि परकाया प्रवेश की क्षमता रखने वालों में अपना शरीर त्याग कर दूसरे के शरीर में प्रवेश करने और वाँछित समय तक उसका उपभोग करने के पश्चात् पुनः आपने देह में लौटने जितने मध्यान्तर तक काया अनायास कैसे सुरक्षित बनी रहती है, तो शरीर शास्त्रियों को इस प्रयास में सफलता की शत-प्रतिशत गारण्टी मिल जायेगी। विज्ञान के स्तर पर पुनर्जीवित तभी सम्भव है, जब मस्तिष्क की आधी चेतना बनी रहे अथवा एक-दो कोशिका भी यदि जीवित रही, तो भी कई बार पुनः जीवित शक्य बनते देखा गया है; पर विज्ञान के लिए यह अत्यन्त जटिल कार्य होगा कि शरीर को अर्धचेतना की स्थिति में कैसे रखा जाय?

यह पदार्थ स्तर के प्रयास है। अध्यात्म विज्ञान में चेतना स्तर पर प्रयोग सम्पादित होते है। पदार्थ विज्ञानी यह जान सकें कि मृत्यु के उपरान्त चेतना को शरीर छोड़ने पर क्यों विवश होना पड़ता है, तो कदाचित् इस सम्बन्ध में उन्हें कोई महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग जाय। ऐसे किसी सूत्र के अभाव में सिर्फ पदार्थ गत परीक्षणों से कोई बहुत बड़ी सफलता मिल सकेगी, ऐसी आशा नहीं ही करनी चाहिए। विज्ञान की अब तक की खोजें चेतना के शारीरिक सम्बन्धों तक ही सीमित रही है। उसके आगे की लक्ष्य पूर्ति अब आध्यात्मिक सिद्धान्तों द्वारा ही सम्भव है। हम उन सिद्धान्तों को जीवन में लागू करें, तो सम्भव है कि चेतना हीन स्थिति की अनुभूति कर सके। यदि ऐसा हुआ तो फिर विज्ञान की वह गवेषणा सम्पूर्ण हो जायेगी, जिसके लिए अब तक वह पदार्थपरक परीक्षणों में उलझा रह कर समय और सम्पदा बर्बाद करता रहा।


महाप्रभु की महाकृपा

“यह कैसे हो सकता है। हम कोई रईस तो है नहीं जो तुम्हें किसी गाड़ी पर बैठा लेंगे या किसी टट्टू पर चढ़ा देंगे।” बहुत बार मनुष्य जो नहीं करना चाहता वह भी उसे करना पड़ता है और जो करना चाहता है। उसे भी परिस्थिति नहीं करने देती। “तुम चल तो सकते नहीं हो और कोई अपने गाँव का रास्ता है जो घिसटते हुए चले जाएँगे।

माताजी के हाथ पैरों पर बँधी पट्टियों पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी। उसके गलित कुष्ठ के घावों पर पीव निकल रही थी। उसकी ओर देखने में मिचली आती थी। कमर के चारों ओर मोटा टाट लपेटे रहता है वह। चल पाता नहीं, बैठें-बैठे ही किसी प्रकार घिसटते रहता है।

द्वार से बाहर हो रुक गया था। भीतर आता तो पीटा जाता। कोढ़ी को कौन अपने द्वार पर चढ़ने देता है। घर वाले तो आने नहीं देते द्वार पर। गाँव से बाहर एक झोपड़ी डाल दी है लड़कों ने। वहीं पड़ा रहता है। उसके घड़े में एक बार पानी भर जाता है लल्लो और उसे दोनों समय बड़ी लड़की कुछ रूखी रोटियाँ दे जाते है। उसके एल्युमिनियम के बर्तन कभी मले नहीं जाते। कौन मले उन्हें। वहीं पानी डालकर गिरा देता है किसी प्रकार।

अपने गन्दे बिछौने पर टूटी खाट पर पड़े-पड़े वह आम और कटहल की रखवाली तो क्या करता है। लड़कों को गाली अवश्य देता है। शरारती लड़के उसकी गाली पर ताली बजाते है चिढ़ाते है और फल तोड़कर भाग जाते है। इन्हीं लड़कों से तो वह गाँव भर का समाचार पाता है। लड़कों से एक-एक घर की छोटी-मोटी बातों की जानकारी हासिल करने में पता नहीं कौन-सा रस आता है उसे।

एक दिन बच्चों ने बताया ‘गाँव के बड़े ठाकुर प्रयाग जा रहे है। उनके साथ कल्लन, घुरहू, पाँडे भी जायेंगे।’ उसने सोचा ‘ वही क्यों पड़ा रहे यहाँ। माँगता खाता चला जाएगा। यहाँ इस झोपड़ी में सड़ने से तो गंगा मैया के किनारे पड़ा रहना कहीं अच्छा है। वहाँ हजारों यात्री आते होंगे। इस कोढ़ी पर दया करके वे कुछ न कुछ दे ही देंगे। पेट की चिन्ता नहीं रहेगी। यही कौन हलुआ पूड़ी उड़ाता है। पिछले जनम में पता नहीं कौन-सा पाप किया था, इस जन्म में भोग रहा है। दान-पुण्य या कोई व्रत तो कर नहीं सकता। अब यदि तीर्थराज में गंगा किनारे पड़ा मर जाय तो अगला जन्म सुधर जाय।

‘ठाकुर दादा।’ अन्ततः उसने कमर में किसी प्रकार टाट लपेटा और घिसटते हुआ अपनी झोपड़ी से चल पड़ा गाँव की ओर। लड़कों ने देखा तो घेर लिया दूर से उनके लिए कुतूहल हो गया। दूसरों ने भी पूछा आश्चर्य से। वह कभी गाँव में आया तो नहीं था।

चन्द्रशेखर सिंह बड़े दयालु है। दीन-दुखियों पर उनकी सदा कृपा रहती है। एक-दो भिखमंगे राज ही शाम को उनके दरवाजे पर टक्कर ठोंकते हैं। साधु महात्माओं में बड़ी भक्ति है उनकी। हर पूर्णमासी को सत्यनारायण की कथा सुनते हैं। भगवान ने दिया है और एक ही लड़का है। वृद्धावस्था में तीर्थ करने का निश्चय उन्होंने ठीक ही किया था।

माताजी की पुकार सुनते ही तने ठाकुर उठकर बाहर आ खड़े हुए उनका अनुमान था कि उसे किसी ने सताया होगा या लड़के ठीक प्रकार भोजन न देते होंगे उनके यहाँ गाँव के उत्पीड़ित प्रायः अपना कष्ट निवेदन करने आते है। सरपंच जो है। वे गाँव के। उन्हें आश्चर्य हुआ जब अपने टूटे हाथ से मक्खियाँ उड़ाते हुए पृथ्वी पर सिर टेककर गिड़गिड़ाते हुए कोढ़ी ने प्रयाग जाने की इच्छा प्रकट की।

“भोजन की तो कोई बात नहीं।” ठाकुर का हृदय उसके रोने पर द्रवित हो गया था, लेकिन वे समझते थे कि ऐसा सम्भव कैसे हो।’ मैं कैसे साथियों को विवश करूँ कि तुम्हारे साथ कछुए की चाल चले और हम इसे मान भी ले तो भी तुम क्या इतनी दूर घिसट सकोगे। हम तुम्हारे लिए यही गंगाजल ले आयेंगे। प्रेमपूर्वक समझाकर ही अस्वीकार किया उन्होंने।

इस अस्वीकार से उसे बड़ा दुख हुआ उस दिन। जी में तो आया कि वह तीर्थ राज के लिए चल दे। जो जी में आवे वह सब काश मानव के पाता। कुटिया तक लौटते-लौटते ही हाँफ गया। आज वह कुष्ठ होने के पश्चात् पहली बार उतनी दूर तक घिसट कर गया था। ठाकुर ने ले जाना स्वीकार भी कर लिया होता, तो क्या वह जा पाता। ओह, उसकी जिन्दगी यह भी कोई जीना है। कुछ सोचता रहा रात भर और सबेरे से उसने राम-राम की रट लगा दी। जोर-जोर से चिल्ला रहा था वह।

“राम राम राम राम।” चैतन्य महाप्रभु की मण्डली ने देख लिया कि उस फूस की कुटिया से ही निरन्तर ध्वनि आ रही है। दूर से ध्वनि सुनाई पड़ रही थी। वे लोग चार-पाँच मील चल चुके थे और आवश्यकता थी कहीं आसन जमाने की। सूर्य मस्तक पर आ चुके थे। भगवान के भोग की सामग्री प्रस्तुत करने में भी तो घण्टे लगेंगे। गाँव के ठाकुर बड़े साधु सेवी है, यह वे सुन चुके थे और वहीं जा रहे थे। लेकिन नाम ध्वनि ने महाप्रभु को आकृष्ट कर लिया। वह बोले “गृहस्थ के द्वार ठहरने से साधु की कुटी पर ठहरना अधिक अच्छा है।” वे कुटिया की ओर चल पड़े।

कौवे काँव-काँव करते उड़ गए। कोयल ने कूक दी। दो-तीन गिलहरियां दौड़ आयी सामने की डाल पर यह देखने कि यह नए एंड से बोलने वाले उनके मित्र है या शत्रु। नीचे पत्ते खड़के और फतिंगा फर–फर करके दूर जा उड़ें। कुटिया में कोढ़ी चौंक उठा और हड़बड़ा कर टूटी चारपाई से नीचे लुढ़क गया। उसके घावों में चोट लगी और उनसे रक्तिम पीव फँसी ये निकल गयी। फिर भी वह यथा सम्भव शीघ्रता से खिसकने लगा द्वार की ओर।

“महाराज, दण्डवत्।” आवेश में पृथ्वी पर सिर पटक दिया उसने। उसकी कुटिया पर साधु आ रहे है। उसे हर्ष भी था और आश्चर्य भी मैं महापापी हूँ। कोढ़ी हूँ। आप लोग तनिक दूर ही ठहरे। उसने शीघ्र ही अपने आपको संभाल लिया और जोर से चिल्लाया। समझ लिया था उसने कि किसी दुष्ट ने साधुओं के साथ हँसी की हैं उन्हें धोखा देकर मेरे यहाँ भेजा है। उसकी कुटिया के पास उसके ही पेड़ों के फल चुराने वाले लड़के तक नहीं आते। वे भी दूर से उससे बात करते है। यह कैसे सम्भव हैं कि सन्त जानबूझ कर वहाँ आ रहे होंगे।

“वह तो कोढ़ी है! प्रभु।” मण्डली में सबसे पीछे चल रहे एक साधु ने कहा। उसके दोनों कंधों पर बड़े-बड़े झोले लटक रहे थे आगे-पीछे एक हाथ में बड़ा-सा लोटा था, दूसरे में तूंबा आगे खिसक आया जल्दी से वह। यों सबसे आगे गौराँग प्रभु स्वयं थे।

उसकी बात सुनकर गौराँग प्रभु मुस्कराए-छोटे हरिदास, साधु क्या कोढ़ी नहीं हो सकता।” जिन नेत्रों से उन्होंने सम्मुख सम्भव नहीं था आगे बोलना। वह चुपचाप पीछे खिसक गया। महाप्रभु स्वतः रुक गए चलते-चलते

“यहाँ क्या मुरली मनोहर का भोग होगा।” साहस करके उनके पीछे चलने वाले तरुण साधु ने पूछा। “क्या होगा इस कोढ़ी के पास। यदि हो भी तो क्या उसके अन्न से प्रसाद प्रस्तुत होगा? छिः।” कहने वाले का हृदय घृणा से भर गया था। “सौ तो उसकी श्रद्धा पर निर्भर है।” महाप्रभु जैसे घृणा एवं लौलिकी से बहुत ऊपर से बोल रहे थे। राम नाम का इस लगन से जप करने वाला यदि साधु न हो तो विश्व में कोई साधु नहीं। तुम कह सकते हो कि जब श्रद्धा से प्रभु को प्रसाद के लिए पुकारता होगा तो वे अस्वीकार कर देते होंगे तुम्हारी तरह? न ग्रहण करना प्रसाद, पर क्या एक दिन पेट को कुछ न मिले तो जीवन न रहेगा। क्या साधु को वहीं जाना चाहिए, जहाँ अच्छे-अच्छे पकवान मिलने की आशा हो?”

कोढ़ी पुकारता रह गया। उसने देखा कि उसके निषेध का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। हँसते हुए चैतन्य महाप्रभु पूरी मण्डली के साथ टीले पर चढ़े आ रहे है। कही बहरे तो नहीं हो गए ये लोग।

और फिर जो कुछ घटा, वह जीवन का अनिवार्य अनुभव कुछ पल की तरह बीत गए। कोढ़ी का कायाकल्प हो गया था। इसी बीच ठाकुर साहब भी यात्रा पूरी कर घर लौट आए। इधर घर पहुँचते ही ठाकुर चन्द्रशेखर सिंह ने उस कोढ़ी को स्मरण किया “ यह गंगाजल पहले दे आओ मातादीन को। वह स्वयं आ गया! सेवक ने शीशी लेकर मुड़ते ही देखा कि मातादीन द्वार के सम्मुख चला आ रहा है। “लो भाई अपना गंगाजल! ठाकुर तुम्हारे लिए वहाँ से ले आए है।” प्रणाम करे वह ठाकुर को, इससे पहिले ही सेवक ने शीशी आगे बढ़ा दी। प्रशंसा का कुछ अंश उसे भी तो पाने की ललक थी। “मातादीन तुम? ठाकुर चौक पड़ें वे तो पहचान न सकते यदि सेवक इस प्रकार परिचय न देता। आगे बोलने के लिए उनके पास शब्द नहीं थे। नीचे से ऊपर तक बार-बार वे उसे देख रहे थे। आश्चर्य की बात थी ही। टीला चंगा, हृष्ट-पुष्ट मातादीन नयी धोती की कछनी लगाए उनके सामने खड़ा था। वह चलकर आया था। उसके शरीर पर कोढ़ तो दूर एक चिन्ह भी नहीं था किसी घाव का। कौन कह सकता है कि उसे कभी गलित कुष्ठ भी हो चुका है।

“जी मैं-मैं अच्छा हो गया “ ठाकुर को प्रणाम करने के अनन्तर उसने उनके आश्चर्य को दूर किया। “मैंने बहुतेरा मना किया पर वे नहीं माने। ऊपर मेरी कुटिया के सामने आकर खड़े हो गए मेरे पास। इस अधम के शरीर से निकलती दुर्गन्धि की उन्होंने उपेक्षा कर दी उन्होंने पीव भरे घावों की। मैंने पृथ्वी में लेटकर प्रणाम किया उन्हें। और कर भी क्या सकता था? दोनों हाथों से झुककर उठा लिया उन्होंने मुझे और छाती से चिपका लिया। कोढ़ी में पता नहीं क्या हो गया था। इतना प्यार तो मुझे जीवन में किसी ने नहीं दिया था। किसी प्रकार रोते-रोते सुनाया उसने।

सन्तों की महिमा का वर्णन कर कौन कर सकता है। ठाकुर ने उसे गले लगा लिया। “हम तो केवल पृथ्वी के प्रयाग में स्नान कर आए। और तुमने उस दिव्य प्रयाग को अपने यहाँ बुला लिया अपनी श्रद्धा से। जो तीर्थ को भी पावनता तीर्थ बना देते है। जिनके दर्शनों का फल तुरन्त प्रत्यक्ष हो जाता है। हमारी प्रयाग यात्रा सच पूछों तो तुम्हारे दर्शन से पूरी हुई।” ठाकुर के नेत्र भी निर्झर बन बरस रहे थे।


प्रज्ञायोग की साधना - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गायत्री मन्त्र हमारे साथ-साथ

‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥’

देवियो, भाइयो! भगवान के अवतार समय-समय पर हुये है, और जब, जिस काम के लिए, जरूरत पड़ी है, तब-तब उसी काम के लिए उन्होंने अवतार उसी तरह का धारण किया है। यह समय इस तरह का है कि इसमें आस्था संकट छाया हुआ है। सब जगह आस्थाएँ कमजोर पड़ गयी हैं। आदर्शों के लिए कहिये, उत्कृष्टताओं के लिए कहिए सबके बल आस्थाएँ कमजोर पड़ने के वजह से जो आदमी काम कर रहा है, चिन्तन कर रहा है, यह गलत कर रहा है। उसका निवारण करने के लिए भगवान का नया अवतार होना चाहिये। वह प्रज्ञा-अवतार होना चाहिये। निष्कलंक भी इसी को कहते है दसवाँ अवतार या चौबीसवें अवतार निष्कलंक अवतार है। जिसे प्रज्ञा अवतार कहते है। प्रज्ञा-दूरदर्शी विवेकशीलता को कहते है। केवल वही निष्कलंक है और सब में कलंक लगा हुआ है। इसलिये यह महाप्रज्ञा के अवतार का जो समय है, इसको आप बहुत महत्वपूर्ण मानें और इसी का स्मरण करें। अपनी उपासना में इसी का समावेश करे।

गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। सरस्वती, काली, लक्ष्मी, इसके ही भीतर आ जाती है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी इसी के अन्तर्गत आ जाती है। ब्रह्मा जी को तप करके सारे विश्व को-सृष्टि को बनाने के लिए जो शक्ति मिली थी, इसी के,द्वारा मिली थी। अब यही महाप्रज्ञा आदि-शक्ति गायत्री के रूप में नया अवतार ग्रहण कर रही है।, आस्था संकट का निवारण करने के लिए। कैसे होगा यह अवतार? आपको मालूम है न कि सीता जी का जन्म क्यों हुआ था। रावण को मारने के लिए जब सीता जी की जरूरत थी। तक ऋषियों ने अपना रक्त एकत्र करके एक घड़े में बन्द किया था। उसे जमीन में गाढ़ दिया था। राजा जनक ने उस घड़े को निकाला और सीता जी को जन्म हुआ। दुर्गा का अवतार कैसे हुआ, आपको मालूम है? सब के सब देवता इकट्ठे होकर प्रजापति के पास गये और प्रजापति से कहा” अब ये दैत्य हमसे सँभालने में नहीं आते आप ही कोई तरकीब बताइये। उन्होंने कहा कोई तरकीब बताइये। उन्होंने कहा कि ”तुम सब की शक्ति को इकट्ठा करके अभी हम दुर्गा का अवतार करेंगे और वह सारे के सारे दैत्यों का संहार कर देगी।

भगवान सब को समान मानते है। आप भी उसमें शामिल है और जो नहीं आये है वे भी शामिल है। सब मिलकर के एक ऐसी सामूहिक उपासना करेंगे-प्रज्ञा की-महाप्रज्ञा की-आदि -शक्ति की जिससे इस समय का जो आस्था संकट है और जिसने सारे के सारे इस विश्व को अस्त्र -व्यस्त कर रखा है, उसका निवारण किया जा सकना संभव हो सके। कैसे करना चाहिये? क्या करना पड़ेगा इसके लिए इसका नाम प्रज्ञा-योग रखा है हमने क्योंकि इसमें कई चीजें शुमार है। इसलिए प्रज्ञा-योग योग की साधना, हम सब लोगों को करनी चाहिये। प्रज्ञा-योग क्या है? प्रज्ञा-योग में ज्ञान, कर्म और भक्ति की जिनको आप सरस्वती लक्ष्मी, काली, कहते है। ये तीनों शक्तियाँ शामिल है। जिन्हें आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहते है, तीनों ही चीजों का इसमें समावेश है। यह आपको करना पड़ेगा। कैसे करना पड़ेगा? चलिये, आप लोग नोट करते जाइये इनको या फिर ध्यान में रखिये। छपा हुआ भी है। प्रज्ञा-योग कैसे करना चाहिये? प्रज्ञा-योग कैसे करना चाहिये? प्रज्ञा-योग का पहला चरण है कि आप चारपाई पर से करे चारपाई पर पड़े हुये। जब सबेरे उठें तो उठने से पहले जमीन पर पैर रखने से पहले आप यह विचार करें कि हमारा नया जन्म हुआ है और आज हम नया जन्म ले रहे है। रात में जब आपका बिस्तर लगे और जब आप सोने की तैयारी करें, उस समय आप इस तरीके से करें कि हमारा आज मृत्यु का दिन आ गया। और अब हम भगवान की गोद में जा रहे है। चौरासी लाख योनियों में घूमने के बाद मनुष्य का जनम बड़ी मुश्किल से मिलता है। आप यह विचार कीजिए कि हम अच्छे से अच्छा आज का उपयोग करेंगे। आज का दिन बेकार नहीं जाने देंगे। और रात को जब आप सोये, तब आप समझिये कि आज का दिन, जन्म खत्म हुआ। आज की बातों की समीक्षा कीजिये। सबेरे प्रातःकाल सारे दिन की स्कीम बनाइये कि आज हमको करना क्या है? और आज हमको करना क्या है और शाम को इसकी समीक्षा कीजिये कि हमने कोई गलती तो नहीं की है और की है तो उसका सुधार कैसे होना चाहिए और परिमार्जन कैसे होना चाहिये? सुबह और शाम को यह आपका प्रातः कालीन, संध्या कालीन क्रम होना चाहिए।

इस तरह सायंकालीन संध्या आपकी बिस्तर पर ही होनी चाहिये। बिस्तर के बाद कर्म-योग का नम्बर आता है। कैसा कर्मयोग? कर्मयोग का जबाब यह है कि आपको करना क्या है? यह तो केवल विचार हुआ। ज्ञान कहते हैं विचार करने को और कर्म-योग कहते हैं काम करने को। काम करने में क्या करना है? आप स्नान करके, कपड़े, कपड़े बदल कर झाडू लगा करके, अपने पूजा के सारे सामान को साफ करके बैठिए। सबसे पहला कम शुद्धता है। अगर आपका मन शुद्ध है, शरीर शुद्ध है, जीवन शुद्ध है, आजीविका शुद्ध है तो समझना चाहिये कि आपकी उपासना की शुरुआत हुई और यदि आपका मन गन्दा है, आपका शरीर भी गन्दा है, आपकी कमाई भी गन्दी है, आपके विचार भी गन्दे है तो आप समझिये कि आप जो पूजा कर रहे है उसका परिणाम नहीं मिलेगा। इसलिए शुद्धता पहला काम है। शुद्धता के लिए कुछ विधियाँ बताई गयी है। कौन-कौन सी विधियाँ है? पवित्रीकरण है, आचमन है, प्राणायाम है, न्यास है। ये आपने हमारी सब पुस्तकों में पढ़े होंगे। इन सब क्रियाओं का मतलब यह होता है कि आप अपने मन को, अपने वचन को, अपनी वाणी को, अपनी क्रियाओं को और अपने इष्ट चिन्तन को, इन्द्रियों को सबको पुनीत बना रहे है। पवित्र बना रहे है। जो मलिनताएं उनके अन्दर छायी हुई होगी, उनको हम निकालेंगे। न्यास का अर्थ यह ही होता है कि हमारी जो इन्द्रियाँ हैं पाँचों इनका उपयोग हम ठीक तरीके से तरीके से करेंगे। अच्छे काम में करेंगे। गलत या गन्दे रूप में नहीं करेंगे प्राणायाम का अर्थ होता है कि जो साँस हम लेंगे तो हमारी वह हर साँस इस तरीके से चलेगी कि इसमें कहीं कोई कमी और खामी न हो। इसी तरीके से जो आप सारे शरीर के ऊपर जल छिड़कते है, तीन वार आचमन करते हैं, उसका भी अर्थ यह है कि हमारे मन, वचन और कर्म तीनों ही स्वस्थ बनेंगे। इसके लिए सबसे पहले उपासना की आवश्यकता होगी।

इसके बाद में आपको देवपूजन करना पड़ेगा। “देव पूजन किसका? भगवान का? भगवान तो निराकार है।” मगर पूजा के समय पर उनको साकार बनाया जाता हैं। गायत्री का कोई चित्र आपने रखा हो, कोई मूर्ति रखी हो, कुछ न कुछ तो आपको रखना ही पड़ेगा। बिना प्रतीक पूजा नहीं हो सकती। प्रतीक -पूजा होना आवश्यक है। भगवान निराकार है तो साकार भी होते है। आपने हमें शरीर में देखा है तो हम यह शरीर थोड़े ही है। हम तो जीवात्मा है। उसको आपको दिखायें? नहीं दिखायेंगे आपको। वह तो निराकार है। गायत्री-माता की मूर्ति या चित्र जो भी आपने रखा हो, उसके सामने पाँच चीजों से पूजन किया जाता है। पाँच चीजें क्या है? वैसे सोलह चीजें भी है। जल एक, अक्षत दो, धूप या सुगन्ध तीन, पुष्प, चार और मीठा या प्रसाद पाँच। वे क्यों? उनको फूलों की जरूरत नहीं पड़ गई। आपको स्मरण दिलाया गया है कि भगवान की आपकी पूजा तब सार्थक मानी जायेगी, जब आप इन चीजों को प्रतीक मानकर के अपना जीवन भी उसी तरीके का बनायें। जल सरस होता है, प्रवाही होता है। आपको सरस होना चाहिए। जल के समान कोमल होना चाहिये। अक्षत? अक्षत का मतलब यह है कि जो आप कमाते है उसमें से एक अंश भगवान के लिए लगाइये। धूप? चाहे आप धूप जलाये, कुछ भी जलाये सुगन्ध जगायें तो आपका जीवन चन्दन के तरीके से सुगन्ध फैलाने वाला हो। फूल? फूल कैसा कोमल होता है? कैसा सुन्दर होता है? आपका जीवन ऐसा सुन्दर होना चाहिये। याचक की सार्थकता इसमें है कि वह भगवान के चरणों पर चढ़े, गले में पड़े। आपका जीवन ऐसा होना चाहिए। मिठास या मीठा? कोई मीठी चीज भगवान को खिलाते है, नमकीन नहीं। “ इसका अर्थ यह होता है कि आपकी वाणी, आपका व्यवहार ऐसा हो जिसमें मिठास भरी हो। जब आप कोई व्यवहार करें तो ऐसा व्यवहार करें जिसमें मिठास भरी हुई हो। इस तरीके से देव-पूजन में पाँचों चीजों का मतलब यह होता है कि हम स्वयं शिक्षा ग्रहण करें उनसे। ऐसा नहीं कि भगवान को इनकी आवश्यकता है। धूपबत्ती आप जलाएँगे नहीं तो भगवान के लिए कोई मुश्किल आयेगी। दीपक आन नहीं जलाएँगे तो भगवान को इनकी आवश्यकता है। धूपबत्ती आप जलाएँगे नहीं तो भगवान के लिए कोई मुश्किल आयेगी। दीपक आप नहीं जलाएँगे तो भगवान को दिखाई नहीं पड़ेगा। यह मतलब नहीं है। भगवान के लिये नहीं, बल्कि अपनी याददाश्त को सही करने के लिये और अपनी जीवन-क्रिया की माप-तौल करने के लिये उसका मापदण्ड रखने के लिए ये क्रम लिखें गये है।

चलिए, अब इसके बाद क्या करना चाहिए? इतना सब कुछ कर लेने के बाद जप और ध्यान करना चाहिए। जप किसका करना चाहिये? कितना करना चाहिये? गायत्री-मंत्र का जप करना चाहिये क्योंकि प्रज्ञा की देवी वह ही है। कितनी माला, करनी चाहिये? तीन-तीन तो कम से कम करनी चाहिये। ज्यादा कर सकें तो, आप ज्यादा कर लीजिये। तीन क्यों? तीन इसलिए कि आत्म-परिष्कार के लिए, एक। जीवात्मा का नित्य संशोधन हो इसके लिए दो। तीसरी माला वातावरण संशोधन के लिए। इसका उद्देश्य यह है कि जो सारा का सारा वातावरण गन्दा हो रहा है, उसकी सफाई करने के लिए, एक माला और एक यह कि हम और आप मिलकर काम कर रहें। जो मिशन है,- जो प्रज्ञा-अभियान है, उसकी सफलता के लिए एक और वातावरण के परिशोधन के लिए अपनी जीवात्मा के संशोधन के लिए एक। तीन मालाएँ तो कम से कम आपको करनी ही चाहिये। ज्यादा कर सकें तो ज्यादा करिये। ज्यादा में कोई मनाही नहीं है। यह नियमित है। मैक्सीमम-ज्यादा कर सकते हैं आप। ज्यादा के लिए कोई सीमा नहीं है आपके लिए। अच्छा यह गायत्री का जप हुआ। इस तरीके से जप कीजिए कि किसी पास बैठे को पने किया है, सूर्य भगवान को। पूजा-उपासना करने के पीछे, यह भावना करनी चाहिये। क्या करना चाहिये? पूजा उपासना के बाद में आप जल चढ़ायें और साथ-साथ में यह भावना करें कि भगवान को अर्थात् भगवान के संसार को, हम अपने सुखों को बाँटेंगे और संसार में अर्थात् भगवान का विराट रूप है, विराट विश्व है, इसमें जो दुख फैले हुये है, उनको घटाने के लिए हम कोशिश करेंगे। सूर्य अर्घ्य देते समय यही भावनाएँ होनी चाहिए। हमारे पास जो भावनाएँ होनी चाहिए। हमारे पास जो सम्पदा है, वह जल के रूप में भगवान के चरणों पर गिरे और वह फैल जाये। यह भावना सूर्य अर्घ्य की है।

अब एक और रह जाती है और वह ‘तप’ आपको विशेष रूप से ध्यान देना है और गौर करना है। रविवार के दिन या गुरुवार के दिन, में से कोई एक दिन चुन लीजिये। सप्ताह में एक दिन तो तप करना ही चाहिये। वैसे तो रोज ही करना चाहिये आदमी को पर अगर रोज नहीं कर सकता तो कम से कम एक दिन तो अवश्य करना चाहिये। रविवार और गुरुवार में से आपको ठीक पड़ता हो उसे चुन ले। छुट्टी वाले दिन प्रायः लोग पकौड़े-कचौड़ी बनाते रहते है। मित्र, यार-दोस्त आते रहते है। उस दिन और कोई दिन अच्छा होता हो, ऐसा मालूम पड़ता हो आपको तो उस दिन भी कर सकते हैं लेकिन एक दिन आपको तप का अभ्यास अवश्य करना चाहिये, अपने आप को तपाने का। तपाने से ईंटें पक्की हो जाती है। तपाने से सोना साफ हो जाता है। तपाने से लोहा साफ हो जाता है। तपाने से पानी का स्टीम बन जाती है। अपने आपको तपाना आवश्यक मानिये। यह तो था भगवान का योग और यह अब शुरू होता है तप। तप में क्या काम करना चाहिये? तप का आपको प्रतीक बताता हूँ। थोड़ा-थोड़ा कर लीजिये। उसका सिद्धान्त आपको याद रहना चाहिये। सिद्धान्त आप भूल जायेंगे तो मुश्किल पड़ेगी। एक तो है अस्वाद व्रत का परिपालन। आप उसे एक समय का ही रखिये अगर दोनों समय आपके लिए सम्भव नहीं है तो स्वाद का त्याग कीजिए। नमक और शक्कर दोनों चीजों का त्याग करने का मतलब यह है कि आपने स्वाद पर विजय प्राप्त कर ली। जिह्वा इन्द्रिय पर ध्यान रखिये। आपको डुबो देने वाली, आपको परेशान करने वाली, हैरान करने वाली यह इन्द्रिय, बड़ी खराब है। आगे से आन जब कोई जप करेंगे, तप करेंगे, कोई मन्त्र का उच्चारण करेंगे तो ध्यान रखेंगे। इसलिए पहला काम है जीभ पर कंट्रोल करना। वाणी पर भी कंट्रोल करना चाहिये, लेकिन खाने पर तो करना ही करना चाहिये, स्वाद पर। एक समय नमक मत मिलाइये। तब ज्यादा नहीं खायेंगे फिर आप पेट के लिए खायेंगे। फिर आप स्वाद के लिए भोजन नहीं करेंगे। तो अस्वाद का अभ्यास हममें से प्रत्येक आदमी को करना चाहिये। चाहे सप्ताह में एक टाइम ही हो। यह एक तप हुआ।

नम्बर दो? वाणी जो हमारी है इससे हम उच्चारण करते है तो समझ-सोच कर उच्चारण नहीं करते-कि हमको क्या कहना है? किससे क्या बात करनी चाहिये? जो हम कह रहे है वह दूसरे के लिए फायदेमन्द है या नुकसान देय है और दूसरे आदमी का दिल दुखाने वाली है? क्या, क्या नहीं है? हम कुछ नहीं सोचते। जो मुँह में आता है उलटा–सुलटा वही हम बकते रहते है। यह न बग करके एक-एक शब्द को समझ-सोचकर बोलना चाहिये। अभ्यास के लिए हमको मौन धारण करने की जरूरत है। दो घण्टे को मौन रहिये आप। तमाम दिन कैसे मौन रहेंगे। कभी बोलेंगे, कभी चिट्ठी लिखेंगे, कभी हाथ से लिखेंगे, कभी क्या करेंगे? कम से कम दो घण्टे का मौन तो रखिये ही। उस समय रखिये जब लोग, मिलने-जुलने वाले, आपके पास ज्यादा आते-जाते है। मौन के लिए सुबह का वक्त ठीक हो सकता है और शाम का वक्त भी ठीक हो सकता है। दिन में आपको अपनी दुकान से टाइम न मिलता हो तो आप सबेरे-शाम का रख लीजिए। नहीं साहब, हम तो सोया करेंगे तब मौन रखा करेंगे। रात को सोने में क्या मौन रखना? उस तरह के टाइम पर जिस पर कि लोगों के मिलने-जुलने की संभावना हो। घर वाले तो आपसे मिलते ही है सुबह-शाम और रात को घर वालों को तो आप बता भी सकते है। समझा भी सकते है। कह भी सकते है भई, बोलना मत हमसे। यह समय हमारे मौन धारण करने का हैं मौन भी एक तप है। हम आजकल मौन का अभ्यास करते है। इससे पहले भी ऋषियों ने मौन के अभ्यास किये है। वाणी से वाणी का मौन जिसका अभ्यास करने से वाणी में तेजस्विता आती है। वाणी से हम जो कुछ कहते है उसका दूसरों पर असर पड़ता है, पर जब हमारी आचरण अस्त-व्यस्त है तो किसी पर असर नहीं पड़ेगा। इससे आप संगीत गाये, गाना गाये, व्याख्यान दें, परामर्श दें, प्रवचन दें, कोई नहीं करेगा वह काम। अतः वाणी हमारी शुद्ध हो, इसके लिये हमको मौन का अभ्यास करना चाहिये। स्वाद का अभ्यास करना चाहिये। इतना ही नहीं हमारा आहार भी पुनीत हो। आहार को पुनीत करने के लिए आपको अस्वाद का अभ्यास करना चाहिये।

इसके सिवाय दूसरी बात है- ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य में दो-बातें आती है- एक तो शारीरिक संयम। उस दिन, जिस दिन आपको व्रत रखना है, उस दिन आपको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। धर्मपत्नी आपकी है तो भी करना चाहिये और धर्मपत्नी नहीं है तो भी करना चाहिये। धर्मपत्नी नहीं है तो कैसे करें? वास्तव में ब्रह्मचर्य जो खण्डित होता है, आदमी की कल्पनाओं से होता है। शरीर की कोई बात नहीं है। शरीर तो स्वप्नदोष भी हो जाते। स्वप्न-दोष से पानी का क्षय हो जाना कोई नुकसान का नहीं है जितना कि हम महिलाओं के सम्बन्ध में गलत दृष्टिकोण रखें। उस दिन आप खासतौर से अपने मन में यह विचार कर लीजिये कि कोई विचार आपके मन में इस तरह का न आयें। आये तो इस विचार के ठीक उलटे विचार शुरू कर दीजिये। कोई गन्दा विचार आपके दिमाग में आया है तो उसके ठीक उलटा विचार शुरू कर दीजिए। लीजिये आपको खाने के सम्बन्ध में आता है तो उन लोगों का ध्यान रखिये जिन लोगों ने अस्वाद व्रत रखे थे। काम वासना का विचार आया है तो यह ध्यान रखिये कि हनुमान जी थे, भीष्म पितामह थे, स्वामी दयानन्द थे, शंकराचार्य थे, इन लोगों ने किस तरीके से अपना जीवन जिया? किस तरीके से शक्ति संग्रह किया? इस बात का विचार कीजिए। विचारों को विचारों से काट दीजिये। विचारों को रोका नहीं जा सकता। एक तरह के विचारों को हटा करके दूसरे तरह के विचारों को उस स्थान पर ले आयें तो हमारा विचारों पर कण्ट्रोल करना सुगम हो जायेगा। ब्रह्मचर्य माने संयम। इस तरीके से वाणी का तप और काम-इन्द्रिय का तप, इन दोनों तपों को करना चाहिये।

तप चार के होते है। सारी इन्द्रियों का जप-तप पैसे का तप दो, समय का तप तीन और विचारों का तप चार इन्द्रियों की बात हो चुकी। अब दूसरा तप है- पैसे का आप जो भी पैसा खर्च करें, उसमें एक-एक पैसे को ध्यान में रखिये कि कहीं यह गलत खर्च तो नहीं हो रहा है। कहीं किसी पैसे का आप गलत खर्च तो नहीं कर रहे है। हमने दो सौ रुपये महीने में बहुत सारी जिन्दगी काट डाली। यहाँ आने से पहले हम अखण्ड-ज्योति कार्यालय में जितने समय तक रहे है, हमने दो-सौ रुपये महीने में अपना समय काटा है। पैंतीस साल के करीब हम अखण्ड-ज्योति कार्यालय में रहे है। वहाँ भी, हमारी गवाही सुरक्षित है ताकि कोई आदमी यह न कहे कि पाँच आदमियों की गृहस्थी दो सौ रुपये में नहीं चल सकती? जरूरत चल सकती है। पैसे का संयम कीजिये। पैसे का संयम करेंगे तो बुरे कामों से बच जायेंगे। नशाखोरी से बच जायेंगे। दुर्व्यवहारों से बच जायेंगे। अगर पैसे खर्च करते है तो फिर आपके अन्दर लम्बे बुराइयाँ पैदा हो जायेंगी और उनको फिर आप रोक नहीं पायेंगे।

इस तरीके से इन्द्रियों का संयम एक पैसे का संयम दो, अब तीसरा संयम आता है-समय का, समय का भी आप टाइम-टेबल कर सकेंगे। टाइम-टेबल बनाकर आप काम करेंगे जो बिनोवा ने इतनी लम्बी यात्रा भी पूरी कर ली थी और इसके साथ-साथ में पढ़ने-लिखने का काम भी जारी रखा। तेईस भाषाओं के विद्वान थे वे। उन्होंने अपने समय का विभाजन इस तरीके से किया हुआ था कि एक सेकेण्ड भी बेकार नहीं जाता था। विश्राम भी समय पर था। बिनोवा शाम को छः बजे सो जाते थे। “ गर्मियों में सात बजे सूर्य अस्त होता है तो भी वे छः बजे सो जाते थे। उन्होंने यह कभी नहीं देखा कि सूरज आगे चलता है कि पीछे चलता है। उन्होंने घड़ी के ऊपर जिन्दगी को नियमित रखा। जितने भी संसार में महापुरुष हुये है उन्होंने काल को पार्टी से बाँधकर रखिये। घड़ी को अपनी कलाई से बाँधकर रखिये। घड़ी के कहने पर अपना चलने का, फिरने का, खाने का पीने का सोने का, उठने का कार्यक्रम बनाये। अपना समय आपके अधिग्रहीत होना चाहिये समय आपका अस्त-व्यस्त नहीं जाना चाहिये। ऐसा न हो कि समय को आप बेमिसाल और बेहिसाब खर्च करे। समय का निग्रह है यह।

समय संयम के बाद आता है विचारों का निग्रह। विचारों का निग्रह कर नहीं पाते लोग। चाहे जो सोचते रहते है। रात को सोते हुए आँख खुल गई तो न जाने कहाँ के विचार कर रहे है? किस तरह कर हरे है? असम्भव बातों के भी विचार कर रहे है।” रात को सिनेमा देखा था। फलाँ औरत देखी थी। कैसी अच्छी है वो उसकी हम ओटोग्राफ लेकर आयेंगे। अरे बाबा। कहाँ तक का किराया तो दे नहीं पायेंगे फिर ओटोग्राफ कैसे लेकर के आयेंगे। इस तरीके के विचारों का निग्रह करना आना चाहिये। विचार जिस काम में लगाना चाहिए, उसी काम में अगर आप लगायें तो आप वैज्ञानिक हो सकते है साहित्यकार हो सकते है। जितने भी संसार में सफल जीवन के मनुष्य हुये है उन लोगों ने अपने विचारों पर कण्ट्रोल करना सीखा था। विचार को इस तरीके से खत्म किया कि जहाँ करना है बस उसी जगह करना हैं जहाँ नहीं करना है, उस जगह नहीं करना। मन के ऊपर नियंत्रण करने की विधि यही है कि विचारों को अस्त व्यस्त न होने दे। विचारों को काम में लगा दे। आप अस्त-व्यस्त है। कहीं घूमने के लिए विचार बन रहा है। तो वहाँ से हटाइये और जो आपके पास में ढेरों की ढेरों समस्यायें है, उनके ऊपर बनाइये। बच्चों को कैसे पढ़ायेंगे? धर्मपत्नी का स्वास्थ्य कैसे अच्छा करेंगे? अपने जीवन को भी ठीक कैसे बनायेंगे? आप इस तरीके से योजनायें बनाने में, विचार करने में विचारों को लगने दीजिए, जब खाली समय हो तब। और जब खली नहीं है तब? अपने काम को अपने सम्मान का प्रश्न बनाकर के सारे मन को उसी में लगा दीजिए। मन को एक मिनट खाली मत रहने दीजिये। कोई काम आपके पास है तो उस काम को इस तरीके से करिये मानो यह हमारे लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी का काम है, जो काम आपने हाथ में ले रखा है, उसे पूरी जिम्मेदारी का काम है, जो काम आपने हाथ में ले रखा है, उसे पूरी जिम्मेदारी समझकर कीजिये। फिर देखिये आपका काम कैसा बढ़िया, कैसा शानदार, कैसा अच्छा खूबसूरत काम हो गया?

इस तरीके से विचारों का संयम एक समय का संयम दो, पैसे का संयम तीन, और इन्द्रियों का संयम चार। चार संयम अगर आप करने लगें तो मैं आपको तपस्वी कहूँगा। इसकी शुरुआत करने के लिए आप जीभ से और कामेन्द्रिय से कामवासना के विचार और स्वाद के विचार, इन दोनों को निकालना शुरू करें। यह यह सबसे पहला शुरुआत का चरण है। इसके बाद के जो चरण है वे वही है जो मैंने अभी आपको निवेदन किया। इस तरीके से रविवार या गुरुवार के दिन आप शुरुआत करें ओर पीछे तो आप तमाम दिन कीजिए। यह तो हर दिन करने की चीज है। आपको यह नहीं कहा जा रहा है कि आप केवल गुरुवार को ही करेंगे। फिर आपको चाहे जो छूट मिल जायेगी। फिर चाहे जब आप करेंगे। गुरुवार से आप शुरुआत करेंगे। प्रज्ञायोग यही है। दूसरा काम आपको यह करना है कि सोते और उठते समय नये जन्म और पुराने जनम को याद रखेंगे। शुद्धता रखेंगे। शुद्धता रखने के लिए पवित्रीकरण, प्राणायाम और न्यास सब करेंगे। जल, अक्षत, धूप के अनुरूप अपना जीवन बनायेंगे। भक्ति-योग के लिये तीन मालाएँ करेंगे एक अपने लिये, एक अन्तःकरण संशोधन के लिये और एक अपने शरीर को सामर्थ्यवान बनाये रखने के लिए। और सविता का ध्यान करेंगे गायत्री जप के साथ-साथ में सविता आपको बल दे और ज्ञान-बुद्धि दे। अर्घ्यदान करते हुये बराबर यह बात कहेंगे कि “अपने सुख बाँटेंगे और दूसरों का दुख बाँटेंगे और दूसरों का दुख बँटायेंगे। रविवार और गुरुवार में से किसी एक दिन आप यह करेंगे। बस, इतना ही प्रज्ञा-योग हैं प्रज्ञा-योग आप नियमित रूप से कीजिए। हमारी छपी हुई किताब है। समझ में न आये तो फिर आकार सीख लेना कभी। प्रज्ञा-योग की आप साधना कीजिये। इस समय यह आपके लिये पर्याप्त है। आज की बात समाप्त।

॥ ॐ शान्तिः॥


अन्तःकरण की हूक


अन्तःकरण की हूक (Kavita)

क्या न इतनी कृपा, अब करेंगे प्रभो! आप के हाथ के, उपकरण बन सकें।

शेष जी भी बचे, नाथ! कण और क्षण, लोक सेवाएँ वे समर्पण बन सकें॥1॥

मोह में, लोभ में, अभी तक खपे, व्यक्ति, परिवार में ही बँधे रह गये।

जिन्दगी घिस गई, बस इन्हीं के लिये, स्वार्थ में ही, अभी तक सधे रह गये।

किन्तु होकर द्रवित आप करुणा करें, तो क्षणिक प्राण, तन की शरण बन सकें।

क्या न इतनी कृपा, अब करेंगे प्रभो! आप के हाथ के, उपकरण बन सकें॥ 2॥

यह सही है कि तन, पात्र तो है नहीं, भोग में, वासना में घिसी अस्थियाँ।

और यही सही है कि, समिधा कहाँ, बन सकें, शेष साँसों की आहुतियाँ।

आप के हाथ, यदि साध ले प्यार से, तो सुनिश्चित है फिर, ये हवन बन सकें।

क्या इतनी कृपा, अब करेंगे प्रभो! आप के हाथ के, उपकरण बन सकें॥3॥

लोकमंगल, महायज्ञ तो चल रहा, बस उसी में हमें, सम्मिलित कीजिये।

आप ब्रह्मा बने है, महा यज्ञ के, नाथ! मन, प्राण, पावन बना दीजिये।

क्या न पावन बने, यह अपावन, पतित, आप हो यदि द्रवित, आचमन बन सके।

क्या न इतनी कृपा, अब करेंगे प्रभो! आपके हाथ के, उपकरण बन सके॥4॥

आप स्रष्टा बने है, नये विश्व के, स्वर्ग का इस धरा पर, सूजन कर रहे।

सुप्त-देवत्व को, मानवों में जगा, आप उज्ज्वल-भविष्य आगमन कर रहे।

आपके शिल्प की ही, कृपा दृष्टि से, क्यों न अनगढ़, सुगढ़-आचरण बन सकें।

क्या न इतनी कृपा, अब करेंगे प्रभो! आपके हाथ के, उपकरण बन सके॥5॥

-मंगल विजय


मानव मस्त फकीर रे!


मानव मस्त फकीर रे! (Kavita)

सारे बंधन तोड़ हुआ यह मनवा मस्त फकीर रे! लाँघ चला सारी सीमाएँ, तोड़ चला जंजीर रे!

हमने घर-परिवार न छोड़ा, स्वजनों का भी प्यार न छोड़ा, जिसका ऋण है जनम-जनम का हम पर, वह संसार न छोड़ा,

अपनी जैसी लगी हमें तो सब के मन की पीर रे! सारे बंधन तोड़ हुआ यह मनवा मस्त फकीर रे!

क्षुद्र स्वार्थ से नाता तोड़ा, रिश्ता सारे जग से जोड़ा, श्रेष्ठ लोक-मंगल के पथ पर, हमने हर चिंतन है मोड़ा,

जनहित के कारण अब तो बस साधना हुआ शरीर रे! सारे बंधन तोड़ हुआ यह मनवा मस्त फकीर रे!

आडम्बर न सुहाता हमको-छापा-तिलक न भाता हमको, धरती पुत्रों का पद रज-कण-है पावन -सुखदाता हमको,

चंदन-सी इस मातृभूमि की माटी बनी अबीर रे! सारे बंधन तोड़ हुआ यह मनवा मस्त फकीर रे!

सज्जनता को नमन करेंगे, दुश्चिंतन का दमन करेंगे, जीवन भर जन-सेवा में हम गुरुवार का अनुगमन करेंगे,

संस्कृति की रक्षा को आए बनकर सब रघुवीर रे! सारे बंधन तोड़ हुआ यह मनवा मस्त फकीर रे!

मन में संवेदना भरेगा, मुख से शीतल वचन झरेंगे जप-तप-तीरथ भले न हो पर। हम सेवा-साधना करेंगे,

हर दुखियारों का आँसू है पावन गंगा-नीर रे! सारे बंधन तोड़ हुआ यह मनवा मस्त फकीर रे!

शचीन्द्र भटनागर


पुनर्स्थापित विशेष लेखमाला-2 - प्रज्ञा परिजनों के सप्त महाव्रत

प्रज्ञापरिजनों अर्थात् हर एक वह व्यक्ति जो लोक सेवा के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहता है, आँशिक या पूर्ण समय-दानी के रूप में। इन सभी के लिए जो सृजेता बनना चाहते है उस देव ने जो आचार संहिता विनिर्मित की थी, उसको प्रथम लेख के रूप में अहमन्यता के विषपान से बचे रहने के रूप में विगत अंक में प्रकाशित किया गया था। यहाँ प्रस्तुत है उसी कड़ी में परिजनों के लिए सप्त महाव्रत जो जन-जन के लिए भी उतने ही उपयोगी है जितने कि लोक सेवी के लिए।

प्रज्ञा परिजनों को आत्म-कल्याण और लोक मंगल का दुहरा उत्तरदायित्व संभालना है इसमें उन्हें अपना व्यक्तित्व अपेक्षाकृत अधिक पवित्र, प्रखर एवं व्यवस्थित बनाना है इसके लिए कुछ विशेष सद्गुणों को बढ़ाने के लिए अनवरत प्रयत्न करना चाहिये। जो समझना, अपनाना और बढ़ाना है वह इस प्रकार है-

लक्ष्य और चिंतन-

जीवन को ईश्वर प्रदत्त सर्वोपरि उपहार समझें और उसका उद्देश्य स्रष्टा के विश्व उद्यान को अधिकाधिक समुन्नत सुसंस्कृत बनाना माने। इस प्रयास में आत्म कल्याण के दोनों उद्देश्य पूरे होते हैं।

बड़प्पन की महत्त्वाकाँक्षाओं को घटाये। महानता प्राप्ति की उत्कंठा उभारें। वासना-तृष्णा के, लोभ मोह के भव बंधनों में न जकड़े। सदुद्देश्यों के आकाश में सत्प्रवृत्तियों के पंख पसारे और जीवन मुक्तिं की तरह परम लक्ष्य की उपलब्धि के लिए उड़ चलें। पीछे मुड़कर न देखें। वर्तमान को संभाले, भविष्य की सोचें।

ज्ञान योगी की तरह सोचे। कर्मयोगी की तरह पुरुषार्थ करें। सहृदयता उभारें और उसे पतन-पराभव के निराकरण में नियोजित रखें।

प्रातः उठते ही एक दिन का जन्म, सोते ही एक रात का मरण सोचें और अवसर के श्रेष्ठतम सदुपयोग का भाव भरा निर्धारण करें। महाप्रज्ञा के अवतरण में सहकर्मी बने। प्रज्ञा अभियान में सम्मिलित रहें। हर दिन गायत्री मंत्र की न्यूनतम तीन माला का जप तथा सविता का ध्यान-धारणा श्रद्धा पूर्वक चलाये, उसमें व्यतिरेक न करें।

श्रमशीलता -

समय ही जीवन है। जिसने समय का जितना सदुपयोग किया वह उतना ही जिया, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए एक-एक कण क्षण की सुनियोजित विधि व्यवस्था में श्रम निरत रखें। आलस्य प्रमाद को पक्के शत्रु समझे और उन्हें पास न फटकने दें। इस सम्बन्ध में अपनी अभ्यस्त आदत को स्वयं सुधारे पैनी नजर से देखें कि काम उदास मन से, उपेक्षापूर्वक, मंदगति से तो नहीं हो रहा है? समुचित तत्परता और स्फूर्ति बरती गयी या नहीं? समय श्रम और परिपूर्ण मनोयोग से ही काम का स्वरूप निखरता और प्रयोजन पूर्ण होता है।

किसी काम को छोटा न माने। हाथ में आये काम को ठीक समय पर, सही रीति से, समुचित योग्यता लगाकर करने को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर चले। खाली समय होने पर दूसरों द्वारा बताये जाने की प्रतीक्षा न करके स्वयं क्षेत्र से अव्यवस्था हटाने के रूप में वह कहीं भी प्रचुर मात्रा में मिल सकता है। प्रगति का एक ही मापदण्ड है- किसने अपने कार्यों में कितना उत्साह दिखाया और उछल कर आगे आया।

सुव्यवस्था-

सौंदर्य उपासक बने। स्वच्छता, सादगी और सुरुचि का समावेश ही सौंदर्य है। अपने शरीर, वस्त्र बिस्तर,निवास एवं कार्य क्षेत्र पर इस सन्दर्भ में पैनी दृष्टि रखें कि कहीं गन्दगी कुरूपता अस्त-व्यस्तता तो दिखाई नहीं पड़ रही है। जहाँ दीखे वहाँ फिर कभी के लिए टालने, की अपेक्षा तुरन्त सुधारने का प्रयत्न करें।

निजी कार्यक्षेत्र को सुन्दर, सुव्यवस्थित बनाने के अतिरिक्त साथियों को भी अपना मानें और उस परिकर को भी अधिक सुव्यवस्थित बनाने की बात सोचें। जो समझ में न आये उस विनय एवं सद्भावना पूर्वक करायें भी, भूल बताने, दोष लगाने व्यंग्य-उपहास करने पर तो सेवा सहायता भी कटुता उत्पन्न करती है, यह ध्यान में रख कर ही साथियों से सुव्यवस्था में योगदान दें।

रात को जल्दी सोये। प्रातः जल्दी उठे। डायरी लिखे। अपने समय, श्रम, चिन्तन, धन एवं प्रभाव की सम्पदा के अनुपयोग, दुरुपयोग एवं सदुपयोग का लेखा-जोखा रखें। अव्यवस्था ढूँढ़ें और उसे साहस पूर्वक सुधारें अभ्यस्त ढर्रों की समीक्षा करें और उसमें अधिकाधिक प्रगतिशीलता का समावेश करने के लिए प्रयत्नशील रहें।

ध्यान रखे! योजनाबद्ध काम करने, प्रसंगों के हर पहलू पर विचार करने, परिवर्तन सोचने, साधन जुटाने, सहयोग पाने की व्यवस्था बुद्धि ही स्तर उठाती, सम्मान दिलाती एवं सफल बनाती है।

शिष्टता-

दूसरों को सम्मान और अपना विनय वचन व्यवहार में समन्वित रखने को शिष्टता कहते हैं। उस सत्प्रवृत्ति को अपने स्वभाव का अंग बनायें, उच्छृंखलता न बरतें, उसे अपनी गिरावट और दूसरों की अवहेलना द्वारा दुःखद परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाली निकृष्टता समझें। यह दोष स्वभाव में घुस गया हो तो उसे कड़ी आत्म समीक्षा करके खोजें और निरस्त करने के लिए संकल्प पूर्वक प्रयत्न करें। अभ्यास वश जब भी ऐसे प्रसंग बन पड़ें कान पकड़ने जैसी छोटी आत्म प्रताड़ना देकर प्रायश्चित करें।

मिलन और विदाई का शिष्टाचार न भूलें। चित प्रसन्न रखें और मंद मुस्कान बनाये रहने की आदत डालें। न थकान प्रकट होने दें, न उदासी। कहें कम, सुने अधिक। शेखी न बनायें। “मैं” के स्थान पर’ ‘हम लोग” शब्द का प्रयोग करें। चापलूसी न करे पर सज्जनोचित सद्व्यवहार में कमी न पड़ने दें। आवेश, उत्तेजना, कर्कशता, खीझ, झल्लाहट से दूर रहे। जो कहना है, शान्त चित्त और शालीन शब्दावली में कहें। गाली-गलौज तक न उतरे। रोष प्रकट न करने, सुधारने, दबाने के ऐसे भी तरीके है जिनमें अपनी शालीनता न गँवानी पड़े। उतावली में किसी निष्कर्ष पर न पहुँचे। तथ्य समझने का प्रयत्न करें और पक्ष-विपक्ष की स्थिति को समझाते हुए निर्णय पर पहुँचे।

नागरिक कर्तव्यों का पालन करें। सामाजिक नीति-मर्यादा का ध्यान रखे। आलोचना से बचें व्यंग्य-उपहास निन्दा-चुगली के दुुर्गुण न अपनाये। जहाँ सुधार की आवश्यकता है वहाँ आत्मीयता का समावेश रखते हुए हानि-लाभ के पक्ष रखें और अनुरोध युक्त सुझाव भर प्रस्तुत करें।

संयमशीलता-

अपनी श्रम, समय, चिंतन, धन एवं प्रतिभा के रूप में उपलब्ध क्षमताओं का महत्व समझें और उनके सदुपयोग से प्रगति-पथ पर अग्रसर होने की बात सोचें। इन विभूतियों का एक कण भी बर्बाद न होने दें। अपव्यय अपने ही उज्ज्वल भविष्य का विनाश है।

इन्द्रिय संयम बरतें। चटोरेपन से बचें और कामुक चिन्तन की हानियाँ समझें दिनचर्या बनायें और कठोरता पूर्वक पालन करें। न श्रम से जी चुरायें न समय को प्रमाद में गँवाये। स्वाध्याय की आदत डालें। आत्म-निर्माण की योजना बनाने के चिंतन मनन में मन को लगायें। कुविचार आते ही उनके प्रतिपक्षी सुविचारों की सेना उनसे लड़ने के लिए खड़ी कर दें। नित्य हिसाब रखें किंतु सत्प्रयोजनों में, कृपणता भी न बरतें। संग्रही न बनें पर आमदनी से खर्च कम रखें, कुछ बचत रखें, उधार लेने की आदत न डाले। अपने प्रभाव का ऐसा उपयोग करें जिससे सम्पर्क क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ घटे और सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण और परिपोषण उभरे। सादा जीवन उच्च विचार को हर समय ध्यान में रखे। विलासिता और मूर्खता और ठाठ-बाट की क्षुद्रता से इसलिए बचें कि उनसे अपना व्यक्तित्व गिरता है और अनुकरण करने वालों का पतन होता है।

अभ्यस्त कुसंस्कारों को खोजें और उन्हें संकल्प पूर्वक बुहार फेंके। इस सम्बन्ध में कठोरता बरतने, मन मारने और प्रतिकूलता सहने को ही तप कहते है। तप संयम से मनुष्य सच्चे अर्थों। में शक्तिशाली बनता है।

उदार आत्मीयता-

आत्म निर्माण की दृष्टि से अन्तर्मुखी तो बनें पर एकाकीपन का अभिशाप न अपनाये। हिल-मिलकर रहें। मिल−जुलकर काम करें और बाँट-बाँट कर खायें। अपने को समाज का एक घटक भर माने और सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझें। अन्यों की अपेक्षा अपनों के प्रति आपाधापी की संकीर्ण स्वार्थपरता न अपनाये। चिंतन और व्यवहार में पारिवारिकता के सिद्धान्तों का अधिकाधिक समावेश करे।

सामूहिकता के साथ जुड़ी हुई शक्ति और प्रगति को गंभीरता पूर्वक समझे और बिखराव की अपेक्षा सम्मिलित सहयोग की व्यवस्था बनायें। पारस्परिक सहयोग का आदान-प्रदान जितना भी बन पड़े, करते रहे किन्तु वह होना सदुद्देश्य के लिए ही चाहिए। कुचक्र रचना और षड्यंत्र करने वाले संगठन सहयोग न अपनाये।

आत्मीयता का क्षेत्र व्यापक करें। कुछ लोगों को ही अपना मानने और उन्हीं की फरमाइश पूरी करने, उपहार लादते रहने के व्यामोह दलदल में न फँसे। अपनी सामर्थ्य को सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाये। देश, धर्म और समाज संस्कृति को प्यार करें। आत्मीयता को व्यापक बनायें। सबको अपना और अपने को सबका समझें। इस आत्मविस्तार का व्यावहारिक स्वरूप लोक मंगल की सेवा साधना से ही निखरता है। उदारता बरतें और बदलें में आत्म-संतोष लोक सम्मान तथा दैवी अनुग्रह की विभूतियाँ कमाएँ।

प्रगल्भता-

दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाएँ और उसी आधार पर नीति निर्धारित करें। प्रचलित ढर्रे में से उतना ही स्वीकार करें जो उचित हो। लोक-मंगल का ध्यान रखें किन्तु लोक मत पर ध्यान न दें। जन समूह का प्रचलित प्रवाह अवांछनीयता की ओर है उसके साथ न बहे। हर प्रसंग पर न्याय नीति अपनाये और कौन क्या कहता है उसकी उपेक्षा कर सकने का साहस जुटायें। एक आँख प्यार की, दूसरी सुधार की रखें। औचित्य को समर्थन सहयोग न दें। सम्भव हो तो विरोध भी करें और संघर्ष भी। यह नीति अपनों के साथ भी बरती जाय और दूसरों के साथ भी। मित्र या स्वजन होने पर भी उसकी अवांछनीयताओं में सहयोगी न बने।

इन दिनों सामाजिक प्रचलनों में अनैतिकता, मूढ़, मान्यता और अवांछनीयता की भरमार है। उलटा करके सीधा करने की नीति अपनानी चाहिए। इसके लिये नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति आवश्यक अनुभव करें और उसे पूरा करने में कुछ कसर उठा न रखें। आत्म सुधार में तपस्वी, परिवार निर्माण में मनस्वी और सामाजिक परिवर्तन तेजस्वी की भूमिका निबाहें। अनीति के वातावरण में मूक दर्शन बन कर न रहें। शौर्य, साहस के धनी बनें और अनीति उन्मूलन तथा उत्कृष्टता अभिवर्धन में प्रख्यात पराक्रम का परिचय दें।

जन संपर्क के कुछ सामान्य अनुशासन

प्रज्ञा परिजनों में से जिन्हें भी लोक सेवा के क्षेत्र में प्रवेश करना है उन सभी को कुछ मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए। सेवा कार्य जितना महत्वपूर्ण है उससे भी अधिक लोक सेवी के व्यक्तित्व को प्रखरता का मूल्य हैं मिशन को लोकप्रिय बनाने में, दूसरों को प्रभावित, परिवर्तित करने, सुधारने, उभारने में प्रयासों का जितना प्रभाव होता है, उससे कहीं अधिक सफलता लोक सेवी के चिंतन, चरित्र, स्वभाव पर आधारित व्यक्तित्व का पड़ता है। इस प्राथमिक आवश्यकता की पूर्ति प्रज्ञा अभियान के हर सदस्य-युग शिल्पी को पूरी करनी चाहिए-इस संदर्भ में मोटी में मोटी मर्यादाएँ यह हैं-

(1) चटोरेपन की आदत छोड़े। किसी के घर जा कर अपनी स्वाद लिप्सा को प्रकट न होने दे। (2) महिलाओं से एकान्त वार्ता न करें। जब उनसे कुछ कहना हो तो आँखें नीची रख कर वार्ता करें। (3) दिमाग शीशे की तरह साफ रखें। जहाँ से जो पैसा प्राप्त हो उसकी रसीद भिजवायें। खर्च का हिसाब प्रमाण सहित नोट करायें। (4) वार्ता तथा व्यवहार में अपनी नम्रता तथा दूसरों के सम्मान का समुचित ध्यान रखें। (5) वेश विन्यास में ब्राह्मणोचित सादगी रखें। विशेषतया केश सज्जा तथा अन्य प्रकार की श्रृंगार से बचे।

इसके अतिरिक्त भी सज्जनता, शालीनता, शिष्टाचार से सम्बन्धित अन्यान्य नियम मर्यादाओं का जितना अधिक पालन किया जा सके उतना ही व्यक्तित्व निखरेगा और उस आधार पर सेवा कार्यों का अधिक ठोस परिणाम निकलेगा।


VigyapanSuchana

ज्ञातव्य

अखण्ड-ज्योति बंगला जो कलकत्ता से प्रकाशित होती है, अब जन-जन में लोकप्रिय हो रही है। इसका जुलाई-अगस्त 15 का अंक एक विशेषांक के रूप में मातृसत्ता के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में बृहत् आकार में प्रकाशित हो रहा है। जो भी परिजन इसे बंगला भाषी मित्रों-परिचितों रिश्तेदारों को देना चाहें इसका सदस्य बनाना चाहें-इस पते पर सम्पर्क कर लें- युग निमार्ण योजना

न02, मल्लिक स्ट्रीट पहला माला, पहला तल्ला बड़ा बाज़ार-कलकत्ता 700007, दूरभाष-2393808


युगव्यास पूज्यपाद गुरुदेव कर- - सम्पूर्ण वाङ्मय अब सबके लिये उपलब्ध!

परमपूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्ष के जीवन का एक-एक पल इतना विलक्षण है कि उसकी विवेचना उपलब्धियों- कर्तृत्व का वर्णन करने का प्रयास यदि किया जाय तो संभवतः ढेरों कागज भी कम पड़े। एक असाधारण स्तर का व्यक्तित्व युगऋषि का था, जिनने अपने 80 वर्ष के 29000 दिनों की अवधि का एक क्षण भी निरर्थक नहीं जाने दिया। यदि इसमें से बाल्यकाल के 15 वर्ष के 7 हजार दिन निकाल भी दिये जाएँ तो यह कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं है कि चौबीस हजार दिनों के एक-एक क्षण को उनने गायत्री के लघु अनुष्ठान की तरह गायत्री मय बनाकर जिया है। उनने जीवन भर साधना की, अगणित पुस्तकों का स्वाध्याय किया किंतु जो एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि उनकी रही है, जिसने गायत्री परिवार रूपी विराट संगठन को भी जनम देने का मुख्य निमित्त बनने का श्रेय प्राप्त किया, वह है उनकी लेखनी की साधना। युगव्यास की तरह जीवन भर वे लिखते रहें व अपने वजन से भी अधिक भार का साहित्य, हर विषय पर युग-संजीवनी के रूप में लिख गए।

मूर्च्छितों में भी प्राणों को लौटा दें, उदास मनों में नूतन शक्ति का संचार कर दें, जीवन जीने की कला का शिक्षण करते हुए कैसे इस यात्रा को आगे बढ़ाया जाय, भौतिक आध्यात्मिक लाभ कैसे अर्जित किये जाये, गुह्यविज्ञानी से लेकर उच्चस्तरीय योग साधनाएँ कैसे सम्पन्न कैसे सम्भव बनाया जाय, शारीरिक-मानसिक-आध्यात्मिक स्वास्थ्य कैसे हस्तगत किया जाय एवं राष्ट्र के नवनिर्माण का परिवार -संस्था रूपी प्रजातंत्र के मेरुदण्ड का पुनरुत्थान कैसे हो, ऐसे हर विषय पर पूज्यवर छूटा नहीं। जिस विषय को उनने छुआ, पूरी गहराई से उसकी तह तक जाकर उसके सरल व्यावहारिक पक्ष को जन समुदाय के समक्ष रखा। यह उनकी लेखनी का जादू ही था कि ममत्व में लिपटे उनके शब्द लाखों व्यक्तियों को उनके अंग-अवयव बनाते चले गए व एक विराट गायत्री परिवार विनिर्मित हो गया। शब्द, भाव-संवेदना को छलकाते हुए हर लेख में ऐसे, मानों किसी विशेष राग पर मन को शाँति देने वाली-तपन में तनाव लाने वाली कोई धुन कहीं बज रही हो।

उनका स्पर्श पाकर लेखनी भी धन्य हो गयी, इस युग का साहित्य समुदाय भी धन्य हो गया एवं एक विलक्षण कीर्तिमान स्थापित हो गया। 1940 से अनवरत प्रकाशित अखण्ड-ज्योति पत्रिका जो बाद में और कई सहचरी पत्रिकाओं युग निर्माण योजना मासिक-पाक्षिक-साप्ताहिक प्रज्ञा अभियान (पाक्षिक), युगशक्ति गायत्री, महिला जागृति अभियान, युगसाधना आदि अनेकों के साथ मिल कर पत्रकारिता का एक इतिहास विनिर्मित करती चली आयी है। इस पत्रिका को अब प्रायः अट्ठाईस वर्ष प्रकाशित होते हो गये हैं, क्योंकि पहला अंक 1937 में पूज्यवर ने हाथ से बने कागज पर छापा था पर यह मासिक नियमित न रहकर दो-ढाई वर्ष तक एक पाती का ही काम करता रहा। बाद में नियमित रूप से वसन्तपर्व 1490 से यह पत्रिका पहले आगरा व फिर मथुरा से प्रकाशित होने लगी। इस व अन्य सारी पत्रिकाओं को अकेले एक व्यक्ति द्वारा लिखा जाना एक ऐसा पुरुषार्थ है, जो अवतारी स्तर की सत्ता द्वारा ही संभव है। व्यास जी को भी लेखनी के लिए गणेश जी की आवश्यकता पड़ी थी किंतु पूज्यवर अकेले लिखते चले, अगणितों को प्रेरणा देकर पत्रकारिता के क्षेत्र में जोड़ते चले गए, शताधिक व्यक्तियों को इस क्षेत्र में प्रशिक्षित कर उनने रोजी-रोटी कमाने योग्य बना दिया व स्वयं इस पत्रिका के अतिरिक्त 2700 पुस्तकें भी लिख गए। इन पुस्तकों में आर्ष ग्रन्थों का आमूलचूल भाष्य (सरल हिन्दी में विज्ञान सम्मत टिप्पणियाँ के साथ ) भी सम्मिलित है जो उनने 1559 से 1962 की अवधि में किया व जिसे अब पुनः संशोधित मुद्रित परम वंदनीय माता जी के सम्पादन में उन्हीं के निर्देशों के अनुरूप किया जा रहा है। इन पुस्तकों में गायत्री साधना सम्बन्धी पहला विश्वकोष जो गायत्री महाविज्ञान के रूप में प्रकाशित हुआ, भी सम्मिलित है तथा इस विषय पर लिखी गयी ढाई सौ से अधिक पुस्तकें। यही एक मात्र प्रामाणिक साहित्य विश्वभर में है जो गायत्री साधना पर उपलब्ध है। ऋषि स्तर की सत्ता जिसने गायत्री मय अपने को बना लिया हो, यही यह सृजन कर सकती है।

विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय पर नूतन चिंतन- नितान्त मौलिक चिन्तन पूज्यवर ने ही पहली बार जन-जन के समक्ष प्रस्तुत किया। प्रामाणिक आँकड़ों के माध्यम से साधना विज्ञान का विज्ञान सम्मत प्रस्तुतीकरण से लेकर सर्वधर्म संभव, यज्ञ विज्ञान व यज्ञोपैथी, मनोविकारों का आध्यात्मिक उपचार, मरणोत्तर जीवन व मानवी काया से लेकर सृष्टि-ब्रह्माण्ड की विलक्षण गुत्थियों को उनने अपने साहित्य के द्वारा जनसमुदाय के समक्ष रखा। व्यक्ति परिवार और समाज निर्माण के आधारभूत सिद्धान्त क्या हों, कैसे दाम्पत्य जीवन को शुचिता पूर्ण तथा परिवार संस्था को अटूट गरिमामय बनाया जा सकता है, नारी का उत्थान कैसे सम्भव है यह युग ऋषि के चिंतन-नवनीत के रूप में प्रकाशित वह निधि है जो प्रत्येक के लिए मार्गदर्शिका के रूप विद्यमान है। रामचरितमानस से प्रगतिशील प्रेरणा से लेकर प्रज्ञापुराण रूपी 19 वें पुराण के अठारह खण्डों का निर्माण कर उनने वह साहित्य निधि समाज को दी जो जीवन के कायाकल्प का माध्यम बन गयी। सामाजिक जीवन में छाई कुरीतियों-मूढ़-मान्यताओं से कैसे मोर्चा लिया जाय, अंधविश्वासों को मिटाकर कैसे भव्य समाज की अभिनव संरचना हो, राष्ट्र एक व अखण्ड कैसे बने, यह मार्गदर्शन भी पत्रिका व पुस्तकों के माध्यम से युगऋषि ने सतत् किया। संस्कार परम्परा का उनने पुनर्जागरण किया व षोडश संस्कारों को लोक प्रचलित कर धर्मतन्त्र से लोक शिखर का एक सशक्त माध्यम खड़ा कर भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने, इसे विश्व संस्कृति बनने के सारे आधार खड़े कर दिए।

इतना विराट परिणाम में प्रकाशित साहित्य व और भी जो अभी अप्रकाशित है काफी कुछ दुर्लभ होने के कारण अब अनुपलब्ध है, परिजनों तक पहुँचे, यह चिंतन काफी समय से चल रहा था। पूज्यवर ने महाप्रयाण से पूर्व संकेत दिया कि युगसंधि महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के आने तक उनका समग्र साहित्य क्रमबद्ध, विषय बद्ध, रूप में जन-जन तक पहुँचे, इसका प्रयास उनके उत्तराधिकारियों द्वारा किया जाय। इस साहित्य में यह ही नहीं जो उनने लिखा बल्कि जो उनने अगणित उद्बोधन वक्ताओं के रूप में समय समय पर अमृतवाणी के रूप में अभिव्यक्त किया, वह भी सम्मिलित किया जाना था। अंततः एक विशाल स्तर के पं. श्री राम शर्मा आचार्य वाङ्मय की योजना बनी एवं सारा साहित्य प्रारंभ से लेकर अब तक का संकलन करने की रूपरेखा बनाई गयी। इसमें वह सब भी देने का विचार किया गया जो शक्तियों आदर्शवादियों-प्रेरणाप्रद निर्देशों के रूप में वे समय-समय पर लिखते या अभिव्यक्त करते रहे। साथ ही उनकी प्रेरणा से काव्य क्षेत्र में गोता लगाकर मणिमुक्तक खोज लाने वाले लोकमंगल पर कविताओं का सृजन करने वाले कवियों व स्वयं पूज्यवर द्वारा रचित काव्य को भी संकलित कर प्रस्तुत करने की रूपरेखा बनी।

अब यह समग्र वाङ्मय प्रायः पाँच-पाँच सौ पृष्ठों के, जो अखण्ड-ज्योति आकार के होंगे, साठ खण्डों के रूप में इस वर्ष के अंत तक प्रकाशित होने जा रहा हैं प्रथम पूर्णाहुति तक प्रायः चालीस खण्ड जन-जन के लिए उपलब्ध हो सकेंगे, ऐसी व्यवस्था त्वरित स्तर पर छपाई का प्रबन्ध बनाकर की गयी है। यह ऐसा दुर्लभ संकलन है जो सम्भवतः साहित्य जगत के इतिहास में स्वयं में एक अभूतपूर्व स्थापना के रूप में सामने आएगा। प्रत्येक खण्ड में परमपूज्य गुरुदेव उनकी जीवनचर्या में क्षण-क्षण साथ कहीं शक्ति स्वरूपा परम वंदनीय माताजी तथा इन दोनों के जीवन से गुँथे मिशन की भूमिका भी प्रस्तुत की जा रही है। कपड़े को जिल्द पर एक प्रोटेक्टिंग कवर एवं अच्छी गुणवत्ता वाले कागज पर छपाई के साथ एक विशेषता है प्रत्येक में गुरुदेव माताजी के भिन्न-भिन्न मुद्राओं में भिन्न अवस्थाओं के रंगीन चित्र। ब्रह्मवर्चस् द्वारा सम्पादित तथा अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा द्वारा मुद्रित-प्रकाशित इस समग्र वाङ्मय का मूल्य एक साथ लेने पर 6000/- रुपये रखा गया है। यों अलग-अलग खण्डों का मूल्य लागत के आधार पर 125/- है। पूर्णाहुति के अवसर पर चालीस खण्ड उपलब्ध होंगे, शेष बीस खण्ड परिजनों को बाद में भेज दिए जाएँगे। प्रत्येक खण्ड पर विषय अनुक्रमणिका, परिशिष्ट के साथ-साथ साठ की विषय सूची भी सम्मिलित होगी।

परमपूज्य गुरुदेव का जीवन एक जीती-जाती प्रेरणा गाथा के रूप में चमत्कारों-विलक्षण अनुदानों की थाती के रूप में सभी परिजनों के समक्ष रहा है। जिनने उन्हें नहीं देखा, न उनके साहित्य के संपर्क में कभी आए, वे सभी अब इस माध्यम से उन्हें अंतरंग तक जान पायेंगे व इस संग्रह से लाभान्वित ही जीवन दिशा को एक नया मोड़ दे सकेंगे। इन खण्डों में अनेकों नेक अनुभूतियाँ जो लोगों के जीवन में प्रत्यक्ष फलीभूत हुई, प्रस्तुत की जा रही हैं, साथ ही महापुरुषों के जीवन चरित्रों से लेकर इक्कीसवीं सदी की रूपरेखा क्या होने जा रही है, कैसे नवयुग सम्भावित है, मानव में देवत्व व धरती पर स्वर्ग अगले दिनों कैसे आएगा, यह सब उनकी ही लेखनी के माध्यम से परिजन पढ़ सकेंगे। यही नहीं, समय-समय पर पूज्यवर द्वारा परिजनों को लिखें गए प्रेरणाप्रद, मार्गदर्शक, साधनात्मक परामर्श प्रधान ममत्व व स्नेह की स्याही में लिखें गए दुर्लभ पत्र भी प्रकाशित किया जा रहे है। अपने आप में अनूठा यह संकल्प परिजनों के लिए अपने घरों में रखने योग्य है। स्वाध्याय मण्डलों, शक्तिपीठों पर अमूल्य निधि की तरह रखने के लिए, उपहार आदि के लिए देने हेतु, वाचनालय में अपनी ओर से स्थापना कराने के निमित्त, दहेज व विरासत के रूप में बच्चों या रिश्तेदारों के देने योग्य श्रेष्ठतम भेंट इससे अधिक और कोई नहीं हो सकती। पितरों के प्रति श्रद्धा निमित्त श्रद्धा निमित्त श्राद्ध-तर्पण के साथ-साथ यह साहित्य विद्यालयों में, संगठनों में भेंट के रूप में या प्रतिभाशाली छात्रों को पारितोषिक रूप में दिया जा सकता है। इतने विराट परिमाण में प्रकाशित हो रहे साहित्य का पुनर्रचना न मिशन के बढ़ते दायित्वों को देखते हुए सम्भव नहीं है, अतः यह अवसर चूका नहीं जाना चाहिए।

प्रस्तावित साठ खण्डों में प्रथम खण्ड किसी भी विश्वकोष परपीड़ा ‘ की तरह होगा जिसमें समग्र इतिहास, परमपूज्य गुरुदेव की एवं परम वंदनीय माताजी की जीवन यात्रा विस्तार से दी जाएगी। यह प्रारंभिक खण्ड एक प्रकार से भूमिका खण्ड समझा जा सकता है जिससे शेष 57 खण्डों के माहात्म्य की जानकारी सबको मिल सकेगी। पहली बार परमपूज्य गुरुदेव एवं शक्ति स्वरूपा माताजी के जीवन के कई गुह्य पक्ष भी लोगों के सम्मुख आयेंगे

इसके बाद के खण्ड इस प्रकार से है-(2) जीवन देवता की साधना-आराधना (3) उपासना समर्पण योग (4) साधना पद्धतियों का ज्ञान एवं विज्ञान (5) गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन (6) गायत्री साधना का गुह्य विवेचन (7) गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार (8) गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना (9) गायत्री की पंचकोशी साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं। जो भी कुछ साहित्य पूज्यवर ने अवधि लिखा है, जो भी कुछ उनने कहा है अथवा जो भी कुछ उनने चिंतन कर लाखों को उद्वेलित अनुप्रमाणित कर श्रेष्ठ राह पर चलने योग्य बना दिया है, वह सब कुछ इस संग्रह में है। वाङ्मय का प्रारूप जब सबके समक्ष आएगा तब ही वास्तविक मूल्याँकन सभी कर सकेंगे किंतु अभी तो यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि यह ‘न भूतो, न भविष्यति’ की उपमा वाला एक ऐसा संकलन है, जिससे वंचित रहने वाला हाथ ही मलता रह जाएगा।


अपनों से अपनी बात- - प्रज्ञावतार के लीला संदोह में भागीदारी का अब यह अंतिम अवसर

भगवान की बनायी इस सृष्टि की सुव्यवस्था, सौंदर्य एवं कलाकारिता वस्तुतः देखने योग्य है। सृष्टि क्रम में पतन और उत्थान के, ध्वंस व सृजन के दोनों ही पक्ष दिखाई देते हुए भी यहाँ सृजन व उत्थान प्रमुख हैं। ऋतुओं के प्रभाव पशु-पक्षी कृमि-कीटकों की अपनी नष्ट करने की प्रक्रिया चलती रहने के बावजूद यहाँ एक सत्य अटल है कि इसके बाद पुष्पों की शोभा, फल-संपदा न हरीतिमा का वैभव दिखाई पड़ेगा व वह अधिक समय तक रहेगा। उत्पादन का क्रम चलता रहे, इसके लिए अनिवार्य है कि दोनों ही क्रम-नष्ट होने व बनने के यथाविधि सतत् चलते रहें। सूर्य का उदय, अस्त होना, प्राणियों को जन्म लेना व फिर मृत्यु को प्राप्त होना इन तथ्यों की साक्षी देते है।

प्रगति क्रम के इस इतिहास को देखते हुए जिसमें पतन और पराभव के तत्व भी अपना काम करते हैं तथा उत्थान व ऊर्ध्वगामी की प्रक्रियाएँ भी साथ चलती रहती हैं, मनुष्य को कभी कोई परिस्थिति विशेष को देखकर कभी निराश नहीं होना चाहिए। पहिए नीचे जाते व फिर ऊपर उठते हैं। अभी जन्म लिया शिशु क्रमशः शैशव, किशोर्य, यौवन पूर्ण कर जरा को प्राप्त कर मरण को प्राप्त होगा किंतु उसी दिन से नवजीवन की भूमिका भी आरम्भ हो जाती है। निराशा की सघन अँधियारा रात्रि को प्रत्यक्ष देखते हुए भी ऊषा की लालिमा द्वारा नवीन अरुणोदय को उपलब्ध हो सकता है

विश्व के इतिहास में संकट की घड़ियाँ अनेकानेक बार आई हैं, जब लगा है कि कहीं सर्वनाश तो होकर नहीं रहेगा। किंतु स्रष्टा का हर समय आश्वासन रहा है। कि अपनी इस अद्भुत कलाकृति को विश्व वसुन्धरा व श्रेष्ठतम संरचना मानवी सत्ता को वह कभी नष्ट नहीं होने देगा। परिस्थितियों को उलटकर स्रष्टा द्वारा चमत्कार दिखाना ही अवतार की प्रकटीकरण क्रिया कहलाती है। कुछ ऐसा ही इन दिनों भी होने जा रही है जब हम चारों ओर निराशा भरी परिस्थितियाँ देखते व अनैतिकता, पतन-पराभव के उपक्रम को बढ़ते देखकर अपनी आस्था को क्रमशः ईश्वर पर डगमगाते पाते है। आज का समय असामान्य स्तर की विपन्नता का समय है। ऐसे में हर प्रज्ञावान को विश्वास रखना चाहिए कि अगले 5-10 वर्षों में जो कुछ होने जा रहा है, वह असाधारण है।

इन दिनों जन जीवन में सृजन की चेतना को उच्चस्तरीय बनाये रखने के लिए धर्मतंत्र अध्यात्म तत्त्वदर्शन पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गयी हैं। वह है भावनात्मक पृष्ठ भूमि खड़ी कर जन श्रद्धा का सृजनात्मक सुनियोजन। अकर्मण्यता की स्थिति से निकल कर आस्तिकता का घर-घर बीजारोपण। प्रखरता भरा पराक्रम दिखाकर निकृष्टता को निरस्त करने के निमित्त अपने शौर्य साहस का परिचय देना। यह एक जाना माना तथ्य है कि सृजन के तत्व जब भी दुर्बल पड़ेंगे, आत्मिक क्षेत्र में अज्ञान और भौतिक क्षेत्र में दरिद्रता की विभीषिकाएँ जोर मानने लगेंगी, पूरा प्रयास करेंगी कि उनके इस उपक्रम से ध्वंस का संग्राम जुटने लगे। ऐसी ही परिस्थितियों में पतन से मोर्चा लेने वाली प्रखरता भी अपनी वरिष्ठता भुलाकर ललक लिप्सा वासना-तृष्णा के गर्त में गिरने लगती है। निकृष्टता को खुला क्षेत्र मिल जाता है अपनी विनाशलीला दिखाने के लिए। आज का समय कुछ ऐसा ही है जिसमें सृजन की शिथिलता और विनाश की स्वच्छन्दता का असंतुलित रूप ही साम्प्रदायिक विग्रह, जातिगत विद्वेष, भ्रष्ट आचरणों, गिरते नैतिक मूल्यों राज-तंत्र व समाज-तंत्र के अग्रणी नेता गणों के आदर्शों की दृष्टि से पतन, पारस्परिक संघर्षों एवं अंततः आस्था संकट की विभीषिका के रूप में दिखाई दे रहा है। देवतत्व के दुर्बल पड़ने और दैत्यों के स्वच्छन्द घुमाते रहने, सम्मान पाते दीखते पर यह असमंजस स्वाभाविक है कि अब इस धरित्री का क्या होगा?

हम सब बड़े सौभाग्यशाली है कि हम देवभूमि भारतवर्ष में जन्मे। यद्यपि हमने 1500 वर्षों से अधिक का अंधकार युग देखा है फिर भी हमारी साँस्कृतिक धरोहर अपने मूल बीज रूप में कहीं न कहीं मत्स्यावतार के सुरक्षित रखे गये बीज की तरह विद्यमान है, गायत्री और यज्ञ रूपी तत्त्वदर्शन की अमूल्य निधि एक पारस की तरह हमारे पास है और अभी भी हमने उम्मीद छोड़ी नहीं है। यह अच्छा चिन्ह है। जितने महापुरुष भारत भू पर विगत छह सौ वर्षों में कबीर के जन्म लेकर अपना संदेश फैलाने से लेकर अब तक जन्मे है।, उतने संभवतः पहले कभी भी एक समय, एक श्रृंखला में नहीं जन्मे। किन्हीं ने भक्ति की धारा बहाये, किन्हीं ने सुधारवादी आंदोलनों की, किन्हीं ने कर्मयोग द्वारा पुरुषार्थ परायणता की, किन्हीं ने पराक्रमी जीवनक्रम अपनाकर अपनी दीन दुर्बलता मिटाने की बात कहीं तथा कहीं ने एकाकी तप साधना कर सूक्ष्म जगत को प्रचण्ड ऊर्जा से अनुप्राणित करने की। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम आचार्य इसी धारा में इस सदी के प्रथम दशक में भारत भूमि के उत्तर क्षेत्र में आगरा, जनपद के आँवलखेड़ा गाँव के जन्मे, एक साधारण किसान के पुत्र से महासाधक युगऋषि बनते हुए गायत्री की गंगा का अवतरण करने वाले भागीरथी पुरुषार्थ को सम्पन्न कर करोड़ों व्यक्तियों में आशा का संचार करने वाले एक प्रकाश पुँज करते चले गए। ऐसे ही महापुरुष की जन्मस्थली करोड़ों भारतवर्ष में तथा विश्वभर में निवास करने वाली आस्थावानों की प्रेरणा स्थली है। आगामी नवम्बर माह में होने वाली अनुष्ठान जो आस्था संवर्धन व अनीति से संघर्ष के निमित्त किया जा रहा है, प्रथम पूर्णाहुति तो है ही एक उद्घोषक है सबके समक्ष कि देवतत्व अब संगठित हो रहे है तथा असुरता से लड़ने को कटिबद्ध हो उठे है। यह इस तथ्य का भी परिचायक है कि जब-जब आस्था संकट की घड़ी में मनुष्य का पौरुष लड़खड़ाता है, वहाँ गिरने से पूर्व ही सृजेता के लम्बे हाथ असंतुलन में बदलने के लिए अपना चमत्कार प्रस्तुत करते इस रूप में दिखाई पड़ते है। यही है स्रष्टा का लीला अवतार प्रकटीकरण।

अवतारों की क्षमता और विशिष्टता का मूल्याँकन उनकी कलाओं के मापदण्ड से आँका जाता है। परशुराम जी तीन कला के रामचन्द्रजी बारह कला के श्रीकृष्ण सोलह कला के तथा बुद्ध बीस कलाओं के अवतार थे। पूर्णकलाएँ चौंसठ मानी जाती है। अपने युग का दसवाँ अवतार निष्कलंक प्रज्ञावतार है जो गायत्री के चौबीस अक्षर चौबीस कलाओं के रूप में प्रकट हो सतयुग वापस लाने की तैयारी करता दिखाई दे रहा है। गायत्री, महाशक्ति जो लुप्तप्राय सी हो गयी थी, सम्भवतः कट्टरवादी के कारण मात्र पुरुषों, वह भी ब्राह्मण वर्ण तक सीमित होकर रह जाती, युग ऋषि पूज्यवर गुरुदेव के सत्पुरुषार्थ से घर-घर पहुँच गयी। करोड़ों व्यक्ति अब गायत्री उपासना में निरत हो सच्चिन्तन करते दिखाई देते है। यही गायत्री महाशक्ति निराकार रूप में लोगों के चिंतन को मनःस्थिति को परिष्कृत कर उन्हें आमूलचूल बदलने के लिए धरती पर अवतरित हुई है व ज्ञान गंगा को इस तरह लाने का भागीरथी पुरुषार्थ करने का श्रेय जाता है उस सत्ता को जिसने आँवलखेड़ा गाँव में जन्म लेकर लघु से विराट बन एक विश्वव्यापी गायत्री परिवार की स्थापना कर डाली, लाखों सद्गृहस्थ पैदा कर दिए व संस्कारों के बीजारोपण की प्रक्रिया आरम्भ करवा दी।

गायत्री के चौबीस अक्षरों में से प्रत्येक को एक कला-किरण माना जा सकता हैं इन दिव्य धाराओं में बीज रूप में वह सब कुछ विद्यमान है जो मानवी गरिमा को स्थिर एवं समुन्नत बनाने के लिए अनिवार्य है। सूर्य जो गायत्री का देवता है, के सप्त मुख, सप्त अश्व, सप्त आयुध, सप्त रश्मियाँ प्रसिद्ध हैं परन्तु सविता की प्राणशक्ति गायत्री की शक्ति धाराएँ इससे अधिक है। गायत्री के चौबीस अक्षरों में साधनाएँ सिद्धियाँ और व्यक्तित्व परक ऋद्धियाँ अनेकानेक है। उनका वर्गीकरण चौबीस भागों में करने से विस्तार को समझने में सुविधा होती है। अन्तरंग के परिष्कार और साधन सुविधाओं के विस्तार यह दोनों ही तथ्य मिलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय और समाज में स्वर्णिम परिस्थितियों के विस्तार की संभावनाएँ प्रशस्त होने लगती है। प्रज्ञावतार का कार्य क्षेत्र यहीं है। वह व्यक्ति नहीं शक्ति नहीं शक्ति के रूप में प्रकट होने जा रहा है। जिस व्यक्ति में इस प्रज्ञा तत्व की मात्रा जितनी अधिक प्रकट होगी, उसकी गिनती युग सृजेताओं की अवतार के लीला सहचरों में हो सकेगी।

निराकार सत्ता कैसे युगपरिवर्तन का सरंजाम जुटाती है, इसे जन समुदाय आने वाले दिनों में युगसंधि महापुरश्चरण की प्रथम पूर्णाहुति के रूप में प्रत्यक्ष देख सकेगा। यह निराकार चेतन सत्ता का ही चमत्कार है कि आज के आस्था संकट की इस वेला में लाखों व्यक्ति अपना संस्कारों की दृष्टि से गया-गुजरा अशक्ति -उद्विग्नता लौकिक आकर्षणों प्रलोभनों से भरा जीवन क्रम छोड़कर सच्चिन्तन के प्रवाह में जुड़ने चले आ रहे है। पच्चीस अश्वमेध इसके प्रमाण है। लाखों व्यक्तियों की दुष्प्रवृत्तियाँ छूट गयी। दुर्व्यसनों को त्यागकर देवत्व से जुड़ने को प्रायः छह से दस करोड़ व्यक्ति संकल्पित होते चले गए। श्रेष्ठ संकल्प लेते हुए उनमें अपना जीवन क्रम बदलकर संस्कारों को अपने जीवन में स्थान देना आज का युग धर्म माना और यही सतयुग की आधार शिला बनता चला जा रहा है। कोई विश्वास करे न करें, किंतु जब आगामी दश वर्षों में हुए ऐतिहासिक परिवर्तनों का इतिहास लिखा जाएगा तब सबको वास्तविकता समझ में आएगी कि अभी जो कुछ लिखा जा रहा हैं, उसके पीछे चेतना का कौन-सा प्रवाह कार्य कर रहा था।

आँवलखेड़ा की पूर्णाहुति मात्र 1259 कुण्डों के माध्यम से सम्पन्न होने वाला एक महायज्ञ अश्वमेध स्तर का प्रयोग मात्र नहीं है। इसका स्वरूप-प्रयोजन व लक्ष्य अत्यन्त विशिष्ट व स्पष्ट है। यह देव भूमि भारतवर्ष की, इस राष्ट्र की कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण, मनुष्य में देवत्व के अभ्युदय और धरती में स्वर्ग के अवतरण का ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान है। इसके अभूतपूर्व पुण्यफल हर स्थिति में सुनिश्चित समझे जाने चाहिए। सारे राष्ट्र के कोने-कोने से गायत्री साधकों द्वारा वहाँ किये जा रहे अखण्ड जप के क्या परिणाम होंगे, राष्ट्र भर में इस पूर्णाहुति की सफलता के निमित्त की जा रही अनवरत साधना-मंत्रलेखन-संस्कार संवर्धन की प्रतिक्रिया क्या होगी इसे स्थूल नेत्रों व तर्क बुद्धि से नहीं देखा व समझा जा सकता। इसे तो ऋषि रक्त के संचय व देव शक्तियों के सम्मिलन से उपजने वाली महाकाली के जन्म लेने की प्रक्रिया माना जाना चाहिए जो चेतना के स्तर पर सूक्ष्म जगत में छाए प्रदूषण को मिटाकर वह कार्य सम्पन्न करेगी जो कभी रक्त बीजों को शुम्भ निशुम्भ, मधु-कैटभ जैसे दैत्यों महाराक्षसों के विनाश के लिए उसने संपादित किया था। दुर्गावतरण सामूहिक धर्मानुष्ठान व विशिष्ट तान्त्रिक स्तर के उपचार की प्रक्रिया से ही होता है। वही अब नवम्बर 15 से होने जा रहा है व सतत् विस्तार लेते-लेते पूरी विश्ववसुधा को अपनी परिधि में ले लेगा।

राष्ट्र के नवनिर्माण का आधार किस तरह धर्म प्रधान होगा, संस्कारों के द्वारा घर-घर के वातावरण को कैसे स्वर्ग मय बनाया जाएगा, नारी शक्ति जो वर्षों से पददलित रही है। कैसे उठकर आगे आएगी एवं आधी जनशक्ति को भावसंवेदना का समुच्चय है, को उबार कर साँस्कृतिक नवोन्मेष का आधार खड़ा करेंगी, उसकी झाँकी प्रस्तुत पूर्णाहुति के माध्यम से देखी जा सकेगी। प्रजातंत्र के रक्षकों को उनके दायित्वों का बोध करा उन्हें ग्रामीण प्रधान इस देश को आर्थिक सामाजिक साँस्कृतिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ाने का मार्गदर्शन यह महाअनुष्ठान देगा। प्रवासी भारतीयों से लेकर समाज में सोई पड़ी प्रसुप्त प्रतिभा को बुद्धिजीवी समुदाय को झकझोरने तथा राष्ट्र के निर्माण के निमित्त जुट पड़ने का आह्वान ही नहीं वलात् उस दिशा में ले जाने का कार्य इस विराट पूर्णाहुति के द्वारा सम्भव होगा। आज इण्टर नेट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सारे विश्व को एक “ग्लोबस अम्ब्रेला” (विराट ब्रह्माण्डीय छाते ) के नीचे लाकर खड़ा कर दिया है। वह सृजनात्मक भूमिका निभा कर कैसे लोकनायक से लोकमंगल की भूमिका अदा कर सकता है इसका मार्गदर्शन भी यहीं से होगा। प्रतिभा सम्पन्न हीरकों की पूज्यवर एवं शक्ति स्वरूपा माताजी के आदर्शों लक्ष्यों के निमित्त मर खपने वाले लाखों समयदानी कार्यकर्ताओं की भेंट महाकाल के युगदेवता के चरणों में इसी अनुष्ठान के द्वारा चढ़ायी जाएगी परिणाम सोचे जा सकते है कैसे अद्भुत होंगे। हर किसी को विश्वास करना चाहिए। कि स्रष्टा का आश्वासन कभी अधूरा न रहा है, न रहेगा। उसे तो अपना कार्य करना ही हैं, हम स्वयं को उस धारा में न जुड़ा पाते हों वे ढेरों की जिन्दगी ही जीना चाहते हों तो बात अलग है। जो समझदार है, वे दूर आने वाली अवतारी सत्ता को आँधी देख रहे हैं व अपना तन, मन, धन समय का हर क्षण उसके लिए अर्पित कर रहे है। यदि यह समझदारी, दूरदर्शी विवेकशीलता अभी से बिना अवसर चूके हृदयंगम की जा सके तो आज से कुछ वर्षों बाद आ रहे सतयुग रूपी भवन की आधारशिला का एक नींव पत्थर बनकर स्वयं पर गर्व किया जा सकता है।


VigyapanSuchana

जन-जन तक युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति जो आँवलखेड़ा में सम्पन्न होने जा रही है, की जानकारी पहुँचाने के लिए शान्तिकुञ्ज से दस वरिष्ठ कार्यकर्ता गण अगस्त व सितम्बर प्रथम सप्ताह में राष्ट्र की बत्तीस प्रमुख महानगरों में प्रबंधकर्ता हेतु निकल रहे हैं। वे दो दिन प्रत्येक स्थान रुकेंगे तथा एक दिन पत्रकार वार्ता व विशिष्टों से मिलकर उनकी शंका समाधान करेंगे तथा दूसरे दिन कार्यकर्ताओं की एक गोष्ठी लेकर आगे बढ़ जायेंगे। शान्तिकुञ्ज से महानगरों के प्रेस आदि से जुड़े परिजन इस विषय में सम्पर्क कर लें कि उनके यहाँ या समीप कौन-सी टोली कब आ रही है।?

आँवलखेड़ा पूर्णाहुति की तैयारियाँ जोरों पर है। अपने युग के अभूतपूर्व, इस शताब्दी का सर्वाधिक विराट इस महाकुम्भ के लिए समयदानियों 15 सितम्बर तक पहुँचने के लिए कहा जा रहा है। सभी समयदानियों को उनकी योग्यताओं के अनुरूप विभिन्न खण्डों में बाँटकर उन्हें दायित्व सौंप दिए जाएँगे अभी भावावेश में आकर अनगढ़ रूप में शान्तिकुञ्ज या आँवलखेड़ा पहुँचने के स्थान पर सभी विस्तार से अपने अनुभव, योग्यता, आयु शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी विवरण शान्तिकुञ्ज महापूर्णाहुति प्रकोष्ठ के नाम भेज दें। यहाँ से पत्र व एक नामधारी परिपत्र मिलने पर ही दी गयी तिथियों में पहुँचने का अपना कार्यक्रम बनाएँ। इससे जनशक्ति का सही सुनियोजन हो सकेगा।

*समाप्त*


आत्मविजेता ही विश्वविजेता

मानवी व्यक्तित्व का निर्माण मनुष्य की अपनी कलाकारिता, सूझबूझ, एकाग्रता और ऐसे पराक्रम का प्रतिफल है जो संसार के अन्यान्य उपार्जनों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण एवं कहीं अधिक प्रयत्नसाध्य है। उसमें संकल्पशक्ति, साहसिकता और दूरदर्शिता का परिचय देना पड़ता है। जनसाधारण द्वारा अपनायी गयी रीति-नीति से ठीक उलटी दिशा में चलना उस मछली के पराक्रम जैसा है जो प्रचण्ड प्रवाह को चीरकर प्रवाह के विपरीत तैरती चलती है। जन सामान्य को तो किसी भी कीमत पर सम्पन्नता और वाहवाही चाहिए। किंतु इसके विपरीत आत्म निर्माताओं को जहाँ “सादा जीवन उच्च विचार” की नीति अपनाकर स्वल्प संतोषी, अपरिग्रही बनना पड़ता है, वहाँ साथियों के उपहास, असहयोग ही नहीं, विरोध का भी सामना करना पड़ता है।

जिस किसी ने भी इस आत्मनिर्माण के मोर्चे को फतह कर लिया, वह सस्ती तारीफ से तो वंचित हो सकता है, पर लोक श्रद्धा उसके चरणों पर अपनी पुष्पाञ्जलि अनन्त काल तक चढ़ाती रहती हैं सघन आत्म संतोष, अनुकरणीय आदर्श परिपालन तथा अनुगामियों के लिए पद चिन्ह छोड़े जाने वाली गौरवगरिमा मात्र इसी क्षेत्र के विजेताओं को हस्तगत होने वाली विभूतियाँ है। महानता चिंतन, चरित्र और प्रयास में आदर्शवादिता घुली रहने पर ही उपलब्ध होती है। आत्म विजेता को विश्व विजेता की उपमा अकारण ही नहीं दी गयी है। दूसरों को उबारने-उछालने दिशा देने और कुछ से कुछ ढाल देने की क्षमता मात्र इन्हीं लोगों में होती है। सेवा

आत्मनिर्माण -व्यक्तित्व परिष्कार कर लेने वाले व्यक्ति एक दूसरा कदम और उठाते है-वह है परिष्कृत व्यक्तित्व का सत्प्रवृत्ति संवर्धन में नियोजन परमार्थ सँजोना और पुण्य कमाना। महामानवों में से प्रत्येक को लोक मंगल में लगना पड़ा है। शाश्वत सुख-संतोष रूपी सौभाग्य मात्र में बदा है, जिनने स्रष्टा के विश्व उद्यान को सुरम्य समुन्नत बनाने के लिए अपनी क्षमता को भावविभोर मनःस्थिति के साथ नियोजित किया है। ऐसे लोगों पर ही सतत् दैवी अनुग्रह सहज ही बरसता है। हम सब भी अपना इष्ट कुछ ऐसा ही चुनें।


एक साधना, एक योगाभ्यास

“तुम्हारा साहस प्रशंसनीय है पुत्री! फिर भी मुझे सन्देह है कि तुम यहाँ टिक पाओगी।” जागरूकता के नगर सेठ अंबपाली ने चुहिया को स्नेह वत्सल दृष्टि से निहारते हुए कहा। उनका स्वभाव जितना मृदुल और सौम्य था। उनकी भार्या बिन्दु मति उतनी की कर्कश और कुटिल थी। कोई भी परिचारिका उनकी गृह सेवा में आज तक एक महीने से अधिक न टिक पायी थी। नगर के सेठ निराश हो चुके थे। और उन्होंने निश्चय कर लिया था कि विन्दुमति को कितने ही कष्ट क्यों न उठाने पड़ें अब और किसी को परिचारिका नियुक्त नहीं करेंगे।

फिर भी एक दिन उनके एक सेवक ने एक निर्धन कन्या को उनके सामने ला खड़ा किया। चौलिया नाम की इस कन्या के माता-पिता स्वर्ग वासी हो चुके थे। आश्रय की खोज में भटक रही इस बालिका को देखते ही उनकी करुणा छलक आयी। उन्होंने उसके सिर पर प्रेम पूर्ण हाथ फेरा और कहा-बेटी! सेविका तो क्या तुम मेरी पुत्री के समान इस घर में रह सकती हो। किन्तु दैवयोग से गृह स्वामिनी का स्वभाव बहुत तीखा और कर्कश है। उसे सहन करना ............अपना वाक्य अधूरा छोड़कर नगर सेठ अनंगपाल उसकी ओर देखने लगे।

आपने मुझे पुत्री कहा-आर्य आपकी यह शालीनता और सज्जनता इतनी बड़ी है कि उसके सम्मुख कोटि कर्कशताएँ भुलाई जा सकती है। यह कहते हुए चौलिया के चेहरे पर एक अद्भुत स्थिरता और शान्ति थी। वह कह रही थी - “सेवा का सच्चा अधिकार भी तो उन्हें ही है जो ऊबे उत्तेजित और संसार से खीझे व निराश जैसे हैं। माताजी के स्वभाव की चिन्ता न न करें। मुझे सेवा का सौभाग्य प्रदान करें।”

वह अब इस घर की परिचारिका बन गयी। घर की एक-एक वस्तु की व्यवस्थित किया उसने। गन्दी-भद्दी-टूटी-काली-कलूटी-बेढंगी वस्तुओं को साफ-सुथरा ठीक किया, सजाया उसने। प्रातः चार बजे जब दूसरे लोग सो रहे होते वह जागती और सायंकाल सबको सुला कर रात गए सोती। एक क्षण भी उसने निरर्थक नहीं खोया, किन्तु बदले में मिला क्या? विनदुमती की फटकार अपमान और मार।

एकान्त पाकर एक दिन अनंगपाल ने उससे कहा-” बेटी! तू मुझसे निर्वाह साधन लेकर कहीं सानन्द रह। इस नारकीय यंत्रणा में क्यों प्राण दे रही है।” चौलिया ने उत्तर दिया-तात! यदि मैंने माँ विन्दुमती की कोख से जन्म लिया होता तो क्या आप मुझे यों हटाते।। मुझसे भूल होती होगी तभी तो माँ जी डाँटती और मारती है, इसमें बुरा मानने की क्या बात!” अनंगपाल चुप हो गए।

उस रात विन्दुमती को एकाएक ज्वर हो गया। चौलिया उनकी देख-भाल के लिए नियुक्त की गई। एक दिन-दो दिन और क्रमशः कई दिन बीत गए, ज्वर सन्निपात में परिवर्तित हो गया। चिकित्सकों ने ज्यों-ज्यों चिकित्सा की स्थिति त्यों-त्यों बिगड़ती गयी। इस बीच घर के सब लोगों ने अपनी दैनिक क्रियाएँ यथावत् निबटाए। किन्तु चौलिया को किसी ने न स्नान करते देखा न शयन करते। अपनी सगी माँ की कोई क्या सेवा करेगा, चौलिया ने जैसी सेवा विन्दुमती की की। लेकिन दैवयोग भला किसके टाले टलता है। एक रात विन्दुमती की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ उसने आँखें खोली-सामने चौलिया खड़ी थी। अनंग को बुलाया बिन्दु की आँखें छलक पड़ी, कुछ कहना चाहा पर निकले कुल दो शब्द -”बेटी चौलिया ......और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। विन्दुमती का देहावसान हो गया।

इधर अर्थी जा रही थी श्मशान को उधर चौलिया किसी नए आश्रय की खोज में। अनंगपाल ने समझाया-बेटी! यह घर तेरा घर है तू कहाँ जा रही हैं? तो चौलिया बोली- “माँ थी जब तक, तब उसकी सेवा के लिए मेरी आवश्यकता थी और मुझे भी अपनी सहनशीलता का अभ्यास करने के लिए उनकी आवश्यकता थी। अब वे नहीं रही तो मुझे अन्यत्र वैसी ही परिस्थिति ढूँढ़ने के लिए जाना चाहिए। जहाँ मेरा रहना सार्थक हो सके।”

अनंगपाल देखते ही रह गए और चौलिया वैसी ही स्थिति वाला कोई और दूसरा स्थान ढूँढ़ने के लिए आगे बढ़ गई।


गृहस्थ जीवन का मर्म (Kahani)

एक गृहस्थ एक बार परेशान होकर अपने गुरुदेव के पास आया और बोला-मैंने कई प्रयास कर लिए, पर मेरी पत्नी से मेरी पटरी नहीं बैठ पायी। वह तो अपनी ओर से कुछ कहती नहीं, पर जैसा मैं चाहता हूँ, वैसा वह अपनी क्रियाओं में नहीं ला पाती। बताइये, मैं क्या करूँ?”

गुरुदेव ने बिना कुछ कहे, दो बाल्टी जल मंगवाया। एक बाल्टी में एक बूँद तेल डाल दिया एवं एक बाल्टी में एक अंजलि दूध। तेल की परत पानी पर फैल गई जबकि दूध पानी के साथ एकाकार हो गया। अपना परीक्षण समझाते हुए, उन्होंने कहा-तुम्हें पारिवारिक जीवन में दूध की तरह घुल-मिल जाना चाहिए, तेल की तरह हावी होने का प्रयास नहीं करना चाहिए?

गृहस्थ जीवन का मर्म उसकी समझ में आ गया एवं वह उत्साह से भर कर घुल-मिलकर जीवन निभाने पुनः लौट आया।


माया से उठ कर ही होती है परमसत्ता की अनुभूति

माया क्या है? विज्ञान की दृष्टि से इस पर यदि विचार करें, तो ज्ञात होगा कि यह चार तथ्यों पर आधारित है। यह है-टाइम स्पेन, मौसम और कजेशन। यही हमें बन्धन में बाँधते है। इनसे ऊपर उठना ही मुक्ति है।

इस दिशा में प्रथम कदम तब उठा, जब सापेक्ष बाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया और यह बताया गया कि जब तक हम एक-चौथे आयाम (समय) की कल्पना नहीं करते, तब तक वस्तुओं के स्वरूप को भली-भाँति समझ सकना संभव नहीं, कारण कि इस संसार में सब कुछ समय की सीमा से बँधा है। मानवी जीवन भी उस सीमा बन्धन का ही एक भाग है। हम यहाँ जो कुछ भी सोचते -विचारते हैं, वह सब बातें आयु के अंतर्गत की ही होती है। जीवन से पूर्व ओर मृत्यु के बाद की कल्पना कर सकना कहाँ सम्भव होता है? इसलिए हमारी गतिविधियों का सीधा सम्बन्ध इस ‘समय’ से ही है। उसके बाहर का कोई भी संसार हमारे मस्तिष्क में नहीं आता।

होना चाहिए कि हम परम समय (एबसाँल्यूट टाइम) को ध्यान में रख कर ही अपने क्रिया−कलाप निर्धारित करें। भारतीय आचार्यों ने आचार-संहिता तैयार करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखा था और इस बात की व्यवस्था की थी कि मनुष्य उपासना, साधना, संयम, सेवा, सदाचार का पालन करता हुआ अपने भौतिक कर्तव्य पूरे करें। इस प्रकार आध्यात्मिक जीवन द्वारा अपनी आत्मशक्ति संवर्धित करता हुआ अन्ततः उस भूमिका में पहुँचें, जहाँ समस्त लौकिक बन्धन ढीले पड़ जाते है। इस विज्ञता का ही परिणाम है कि भारतीय जीवन शैली आज भी अपने ही ढंग की है। उसमें पाश्चात्य ढंग के विचारों के लिए कोई स्थान नहीं।

‘समय’ की ही तरह हम स्पेस अर्थात् ‘देश’ से बंधे हैं अब जब विज्ञान और समाजशास्त्र ने इतनी उन्नति कर ली है कि सारी पृथ्वी एक परिवार की तरह हो गई है हम अपने तक, अपने देश तक सीमित होकर नहीं रह सकते। हमारी प्रत्येक क्रिया का प्रभाव समस्त विश्व पर पड़ता है और सम्पूर्ण संसार के क्रिया–कलापों से हम प्रभावित होते है। पिछले दिनों पश्चिम के कुछ समृद्ध देशों द्वारा सी.एफ. सी गैस का निर्माण इतने बड़े पैमाने पर हुआ कि पर्यावरण पर उसका दुष्प्रभाव तत्काल सामने आया इसे देखते हुए संपूर्ण विश्व में इसके निर्माण पर रोक लगाने की बात जोर पकड़ रही है, ताकि पर्यावरण की सुरक्षा की जा सके। इस प्रकार आज स्वार्थवश कोई भी कार्य ऐसा नहीं किया जा सकता, जिससे कुछ लोगों को लाभ हो और शेष समुदाय को हानियाँ उठानी पड़े। हमें कुछ भी कार्य करने से पूर्व सम्प्रति उसके लाभ-हानि का लेखा जोखा लेना पड़ता और यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि जो कार्य हमारे लिए लाभकारी है, वहीं विश्व-समुदाय के लिए कहीं नुकसान देह तो नहीं सिद्ध होने जा रही है। इस प्रकार इन दिनों हमें सम्पूर्ण पृथ्वी के बारे में सोचना पड़ता है। कबीले वासी सिर्फ अपने समुदाय का विचार करते है, कारण कि उनकी दुनिया उतनी ही बड़ी होती है। आज मनुष्य इतना सीमित-संकीर्ण बना नहीं रह सकता। उसे संसार के शेष लोगों के हित-साधन पर ध्यान देना अनिवार्य हो गया है। इस तरह ‘स्पेस’ या स्थान हमें यह बताता है कि हम जितने बड़े संसार से परिचित है, बस उतने के ही दायित्व से जुड़े रहते है और उतने ही लोगों की भलाई या बुराई को ध्यान में रख कर काम करते है।

तनिक गहराई में उतरें; तो यह भी ज्ञात होगा कि हम ‘गति’ के नियमों से आबद्ध है। मनुष्य ही नहीं, प्रकृति का प्रत्येक परमाणु इस नियम का परिपालन करता है। जड़ हो या चेतन-यहाँ स्थिर कुछ भी नहीं। सभी गतिशील है। टीले-बढ़ कर कालक्रम में पहाड़ बन जाते है। छोटे-छोटे नाले, नदियों का आकर ग्रहण कर लेते है। गड्ढे, तालाब बन जाते हैं। इतना ही नहीं, यदि पचास वर्ष पूर्व की इनकी स्थिति का पता लगाया जाय, तो विदित होगा उक्त स्थान को छोड़कर अब ये आगे निकल चुके है और सर्वथा नई जगह में प्रवाहित हो रहे है। वृक्ष-वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। बीज गलते, पौधे बनते, वृक्ष के रूप में बदलते और फिर उनका फलना-फूलना बीज और पौध बनता-यह सब उसी सृजनात्मकता का परिणाम है। इसे परिवर्तनशील भी कह सकते है। मनुष्य समेत अन्य प्राणी भी जन्मते, बढ़ते, बदलते और मरते रहते है। पुनः वही चक्र आरम्भ होता है। और सतत् चलता रहता है। इस प्रकार यह भौतिक जगत गतिशील है। यहाँ के समस्त पदार्थ और प्राणी चलायमान है। इसका पग-पग पर प्रमाण हमारे जीवन में उपस्थित होता रहता है।

आज हम जिस स्थिति में है। वह अनेक घटनाओं का क्रमबद्ध इतिहास हैं यह इतिहास हर एक के जीवन का भिन्न-भिन्न होता है ऐसा क्यों? इसकी व्याख्या कार्य-कारण सिद्धान्त द्वारा भली-भाँति हो जाती है। इस प्रकार इस संसार में जो कुछ भी है, वह पूर्व से ही घटना बद्ध है। यहाँ कोई भी प्रभाव, परिणाम या कार्य कारण के बिना सम्भव नहीं।

यह चार चीजें ऐसी है, जिनका बन्धन ही माया है। इन चारों से प्रत्येक जीव बँधा है। इनसे ऊपर उठना ही बन्धन-मुक्ति है। कोई इनके जितने छोटे दायरे में बँधा होता है, उसके बारे में कहा जा सकता है, कि वह उतना ही स्वार्थी, संकीर्ण और भोगवादी है। जो व्यक्ति केवल वर्तमान की बात सोचता है, भूत और भविष्य के निष्कर्षों का लाभ नहीं लेता, वह स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों में संलग्न रह कर दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करता है। इन्हें अविवेकी और अदूरदर्शी कहना चाहिए। इसी प्रकार जो मात्र अपने या अपनों के ही हित की बात सोचते है, उसके भी कार्य संकीर्ण और दुःखद होते है। विकास सम्बन्धी अवस्था को भी जो बहुत छोटी सीमा में आँकते है, और भौतिक जगत में होने वाली गतिविधियों में किसी दूरवर्ती कारण को नहीं देखते, वह गलत लक्ष्य अपनाते है। संकीर्णता की यह मनोवृत्ति ही संसार में दुःख का कारण है। मोह,माया, भ्रम कह कर इसी की वेदान्त में चर्चा की गई है।

मानवीय लक्ष्य का विस्तृत अध्ययन, चिन्तन और मनन करने वाले किसी भी विवेकशील व्यक्ति का यह निष्कर्ष हो नहीं सकता कि समय, देश, जाति या कारण की संकीर्णताओं में बँधे रहना मनुष्य की प्रगति की निशानी है। आइन्स्टीन की भी लगभग ऐसी ही मान्यता थी। उनका कहना था कि इनकी वास्तविक सत्ता वस्तुतः है ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान (देश) का, न गति का, यह न किसी भौतिक कारण या परिणाम का। यह चारों ही मस्तिष्क की उपज हैं हम जब तक इनसे आबद्ध रहेंगे, तब तक अंतिम सत्य की अनुभूति कर ही नहीं सकते। अन्तिम सत्य वह हैं, जो इन चारों से बँध कर नहीं, इनको बाँध कर रखता है। उनका मानना था कि मस्तिष्क में जो तत्व भरा है, वह वस्तुतः एक बहुआयामी संरचना है। उसको यदि इन चारों चीजों से मुक्त कर दिया जाय, तो उस परम स्थिति को अच्छी तरह जाना जा सकता है, जिसे परमात्मा, परमपद, स्वर्ग, मुक्ति आदि कह कर संबोधित किया गया है। संसार का निरपेक्ष और अन्तिम सत्य (एवसौल्यूट टूथ) यही है, शेष सभी सापेक्ष (रिलेटिव टूथ) है।

यहाँ विज्ञान और वेदान्त की पारस्परिक सहमति स्पष्ट झलकती हैं वेदान्त ने जिस आधार पर संसार को मिथ्या करार दिया है, उसी को आइन्स्टीन ने वैज्ञानिक तथ्यों के द्वारा प्रमाणित करने का प्रयास किया और यह समझाना चाहा कि यहाँ वास्तविक कुछ भी नहीं, सब अस्थिर सत्य है। जो अभी सत्य है वह दूसरे ही पल झूठा कहा गया था, वह सच कहला सकता है। उदाहरण के जिए ‘समय’ को लिया जा सकता है। पृथ्वी में सूर्योदय से सूर्यास्त तक की अवधि 24 घंटे की मानी गई है, पर यदि कोई चन्द्रमा पर बैठ कर इस अवधि की गणना करे, तो उसे प्रतीत होगा कि यह 24 घंटे जितनी छोटी नहीं, वरन् 12 घंटे 84 घंटे जितनी लम्बी है। पृथ्वी के एक घंटे के आधार पर हिसाब लगायें, तो वहाँ का एक दिन 100 घण्टे से भी बड़ा होगा। सूर्योदय और सूर्यास्त की घटना धरती और चाँद पर एक ही पर ग्रह -भेद के साथ समय सम्बन्धी अनुभूति बदल जाती है, इसीलिए समय को स्थिर वस्तु या शाश्वत सत्य नहीं माना गया है, कारण कि जो सनातन होगा, वह देश, काल, पात्र के आधार पर बदलना नहीं रहेगा। हम जहाँ से सृष्टि प्रारम्भ हुई है, वहाँ से लेकर सृष्टि जहाँ समाप्त होगी, वहाँ तक को समय की इकाई क्यों न माने? क्योंकि अन्तिम सत्य तो यहीं दो घटनाएँ होंगी। समय सम्बन्धी बाकी इकाई तो इस विशाल अवधि के सापेक्ष होंगी, अतएव जब तक हम उस अन्तिम समय (एवसौल्यूट टाइम) को नहीं जान लेते, समय सम्बन्धी सारे माप और कार्य एक प्रकार से अप्रमाणिक और गलत होंगे।

इस दृष्टि से केवल वही कार्य और कर्तव्य हमारे लिए सच्चे होते है, जो समय की इस परमगति की प्रभावित करें। शेष कार्य भौतिक दृष्टि से जीवन-यापन के लिए आवश्यक जैसे प्रतीत हो सकते है पर परम तत्व की अनुभूति की दृष्टि से उनकी समीक्षा की जाय, तो उनमें से अधिकाँश इस स्तर के ऐसे मालूम पड़ेंगे, जिनकी सार्थकता नगण्य जितनी ही आँकी जा सकती है। इसलिए व्यक्तिगत जीवन में उन्हीं कार्यों को शुद्ध, यथार्थ और मानवोचित माना जाता है, जिनसे परम कालशक्ति की प्रतीति में सहायता मिलती हो। केवल भौतिक सुख के लिए किये गये सभी कार्य व्यर्थ हैं, भले ही उनमें हमारा कितना ही श्रम, बुद्धि, कौशल और साधन क्यों न प्रयुक्त हो रहा हो। परम काल और परम तत्व की उपलब्धि इससे ऊँचा उठ कर ही की जा सकती है।

हमारे लिए कोई भी स्थान तात्त्विक दृष्टि से सत्य नहीं है। वस्तुओं को पहचानने के अतिरिक्त हमारे लिए स्थान का कोई अर्थ नहीं। जिस प्रकार समय अनुभव के सिवाय कुछ नहीं है, उसी तरह देश या ब्रह्माण्ड (स्पेस) हमारे मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न काल्पनिक वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं इसके द्वारा वस्तुओं की समझने तथा उनकी व्यवस्था जानने में सहायता मिलती है, इसलिए स्थान (स्पेस) की कल्पना को हम सत्य मान बैठते है, अन्यथा यह कुछ निश्चित तरीके के परमाणुओं के अलावा और है भी क्या? परमाणु इलेक्ट्रान युक्त होते है। इलेक्ट्रान एक प्रकार की ऊर्जा उत्सर्जित करते रहते है। जिन वस्तुओं के इलेक्ट्रान जितने मन्द गति के होते है, वह उतने ही स्थूल दिखाई देते है। यह हमारे मस्तिष्क के देखने की स्थिति पर निर्भर है। यदि हम पृथ्वी को छोड़ कर किसी सूर्य जैसे तारे पर बैठे हो तो पृथ्वी एक प्रकार के विकिरण के अतिरिक्त और कुछ न दिखाई देगी। इसलिए देश या ब्रह्माण्ड भी वस्तुओं की संरचना का सापेक्षिक रूप है। उसकी यथार्थता भी परम अवस्था पर ही हो सकती है।

यदि अन्तरिक्ष में और कोई सूर्य, चन्द्रमा और तारे नहीं होते, तब क्या हम कह सकते थे कि पृथ्वी एक सेकेण्ड में 18 मील प्रति घंटे की गति से दौड़ रही है। गति का ज्ञान भी हमारी सापेक्ष बुद्धि का ही परिणाम है। स्थिरता और स्थिति की अनुभूति भी उसी का नतीजा है। कोई यह कहे कि हमारा कमरा स्थिर है, तो सामान्य बुद्धि से इसमें कुछ गलत भी नहीं है किन्तु यदि कोई पृथ्वी की गति के कारण स्वयं को गतिशील माने तो इसे भी त्रुटिपूर्ण नहि कहा जा सकता। इसे दूसरे प्रकार से यों समझा जा सकता है। यदि दो समानान्तर पटरियों पर दो रेलगाड़ियाँ समान वेग से दौड़ रही हों, तो दोनों के सवार स्वयं को स्थिर अनुभव करेंगे, कारण कि दानों का वेग समान है इसलिए प्रतीति की दृष्टि से यह सत्य जैसा लग सकता है। पर तथ्य की दृष्टि से नहीं। अनुभूति कितनी गलत जानकारी देती है, इसका आभास तब मिलता है, जब समान वेग की दो रेलगाड़ियों में से एक पूर्व से आ रही हो और दूसरी पश्चिम से, तो दोनों गाड़ियाँ जिस स्थान पर साथ-साथ होंगी, वहाँ एक-दूसरे की गति ठीक दूनी अनुभव करेंगी। इससे यह सिद्ध होता है कि गति भी किसी परम गति की सापेक्ष है। उसमें भी कोई वास्तविक सत्य नहीं। सौर मंडल की तुलना में, सूर्य की गति 18 मील प्रति सेकेण्ड की समझ में आती है;पर यदि हम अपनी आकाश गंगा के किसी अन्य तारे पर बैठ कर अवलोकन करें, तो उस तारे की गति के हिसाब पृथ्वी की गति के हिसाब पृथ्वी की गति बढ़ी या घटी अनुभव होगी। इस तरह गति सम्बन्धी हमारी भौतिक गणनाएँ कितनी सापेक्षिक है, यह स्पष्ट हो जाता है।

पदार्थों के कारण (कॉजेशन) के सम्बन्ध में भी हम पूर्ण निरपेक्ष नहीं हैं। थोड़े से तत्व चाहें उन्हें पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु कहें अथवा हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन, सल्फर, जिंक, कोबाल्ट कहें, इन्हीं से मिलकर भौतिक पदार्थों का बनना-बिगड़ना जारी रहता है। कोई भी कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ इन तत्वों की पारस्परिक रासायनिक क्रिया का ही परिणाम होते है, किन्तु जब हम पदार्थ के अन्तिम कण-परमाणु की संरचना पर विचार करते है, तो पाते है कि सम्पूर्ण पदार्थों में आवेश के अन्तर के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। एक पदार्थ का दूसरे में परिवर्तन इसी आवेश मुक्ति के कारण होता है। इसी प्रकार शक्ति की भी एक अन्तिम स्थिति होनी चाहिए। इसका आभास प्रकाश की क्वाण्टम थ्योरी से होता है, अर्थात् संसार का कारण भी भौतिक नहीं, कोई परम तत्व ही है।

उस परम अवस्था को कैसे अनुभव करें, जब आइन्स्टीन से यह प्रश्न किया गया, तो उनसे कहा-हम समय, स्थान, गति और कारण की सापेक्ष अवस्था से यदि अपने मस्तिष्क को ऊपर उठा दें, तो उस परम अवस्था की अनुभूति कर सकते है। हमारी सापेक्ष अवस्था की प्रतीति ही माया या भ्रम है। यदि हम इन चारों से ऊपर उठ कर संसार कर अनुभव करें, तो अन्तिम सत्य या परमसत्ता की अनुभूति कर सकते है। वेदान्त की भी ऐसी ही मान्यता है। स्वर्ग-मुक्ति का तात्त्विक विवेचन यही हो सकता है। इसी की कोशिश हमें करनी चाहिए।


एलिजाबेथ नोरथ (Kahani)

उन दिनों घायलों की सेवा एक घृणित कार्य समझा जाता था मर्द डॉक्टर भी कम न थे, फिर महिला डॉक्टर तो बने ही कौन? संसार भर में एक महिला डॉक्टर अमेरिका में रजिस्टर हुई थी। इंग्लैंड के शाही परिवार की लाड़ली एलिजाबेथ नोरथ ने डॉक्टर बनने की हठ ठानी और उसे सभी सम्बन्धियों का विरोध सहते हुये पूरा किया। घर में पैसे की कमी न थी। वह डॉक्टर बनकर व्यवसाय नहीं करना चाहती थी। उद्देश्य मात्र पीड़ितों की सेवा-सहायता करना था। जब उसका निश्चय न बदला, तो प्रधान सर्जन ने उसे पहले नर्स कोर्स कर लेने की शर्त रखी। यह और भी छोटा पद था पर उसने सहर्ष स्वीकार किया और बड़ी आयु में डॉक्टर बन सकी।

एलिजाबेथ की पहली मान्यता प्राप्त डॉक्टर थी। उनके आगे बढ़ने से इस दिशा में बढ़ सकना अन्य लड़कियों के लिए सम्भव हुआ।


भोगी बनें कि उद्योगी?

सुवर्णजात प्रतिदिन सहस्र मुद्राओं का दान करते थे। कोई भी याचक उनके पास से निराश खाली हाथ नहीं लौटता था। तो भी यह एक रहस्य ही था कि उनके निजी सेवक अनुराग ने कभी कुछ माँगा तो वह एक ही नपा तुरंत उत्तर देते “ तुम्हें जब कुछ भी देने के लिए हाथ बढ़ाता हूँ, सूर्य देवता हाथ पकड़ लेते है। क्या करूँ, विवश हूँ।

अनुराग जड़ बुद्धि नहीं था। वह निरन्तर अवसर की प्रतीक्षा में रहने लगा। एक बार अमावस्या का पूर्ण सूर्य ग्रहण पड़ा। उस समय अनुराग अपने स्वामी के समीप ही था। ग्रहण प्रारम्भ होते ही उसने कहा ”स्वामी इस समय तो सूर्य को राहु ने पकड़ लिया है। अब तो वे रोक नहीं सकते अब तो कुछ कीजिए।” सुवर्णजात पकड़ में आ गए, इस बार इनकार नहीं कर सके। उन्होंने अपने सेवक को बहुत साधन एवं सुवर्ण मुद्राओं का दान कर दिया।

अनुराग के मन की दमित इच्छाएँ जो धन के अभाव में प्रसुप्त पड़ी थी, एकाएक भड़क उठी। अब तक जहाँ उसका संयमित जीवन बीत रहा था, अब भोग-विलास का भूत उस पर चढ़ा बैठा। मकान बनाने से लेकर विवाह करने तक की जा भी महत्त्वाकाँक्षाएँ तत्काल पूर्ण हो सकती थी, अनुराग ने पूरी कर ली। देखते-देखते न केवल सारा धन स्वाहा कर लिया बल्कि अनेक रोग और दुर्बलताएँ भी उसने पैदा कर ली।

जब तक धन रहा-काम की कौन पूछता। निदान धन्धा भी उसने छोड़ दिया था। अब, जब उसके पास कुछ न बचा, तो फिर सुवर्णजात के पास गया और काम पर रखने की याचना करने लगा। सुवर्णजात ने उत्तर दिया-तात रिक्त स्थान की पूर्ति कर ली गई। अब उस सेवक को हटाना नीति विरुद्ध है। अतएव उसे हटाकर तुम्हें काम पर रखना तो असम्भव है। अलबत्ता तुम्हें ऐ उपाय बता सकता हूँ। तुम ‘श्री’ बीज लगाकर यदि भगवती लक्ष्मी की उपासना करो तो उनसे तुम्हें अवश्य ही धन प्राप्त हो सकता है।

अनुराग उस दिन से देवी की उपासना करने लग गया। काफी दिनों तक उपासना करने के बाद भगवती लक्ष्मी प्रसन्न हुई और वर माँगने को कहने लगी। धन सम्पत्ति की आकांक्षा करने पर वह बोली-वत्स! घर जा कुछ काम कर उद्यम उद्योग जुटा, तो मैं। स्वतः मेरे पास आ जाऊँगी। किन्तु भोग वृत्ति में आसक्त अनुराग के पास इतना समय कहाँ था। वह लक्ष्मी जी से हठ करता रहा। लक्ष्मी जी बोली अच्छा तो तुम भोगी लाल और उद्योगी लाल के पास जाकर देख आओ। दोनों में से किसकी लक्ष्मी तुम्हें पसन्द है, वहीं मैं तुम्हें दे दूँगी।

अनुराग ने क्रम-क्रम से जाकर दोनों स्थान देखे। भोगी लाल के पास धन सम्पत्ति तो बहुत थी। उसका वह मनमाना उपभोग भी करता था। पर अपनी भोगवृत्ति के कारण उसने अपना स्वास्थ्य चौपट कर लिया था। घर पर लड़कों में दिन भर कलह मची रहती। ‘कर’ को लेकर आए दिन राजकीय कर्मचारी उसे सताते रहते। बेचारा तीन रोटी खाता और मुश्किल से तीन घंटे सो पाता। सारा जीवन आतंक, भय, चिन्ता, निराशा और व्याधियों से ग्रस्त।

उधर उद्योगी लाल के पास जाकर देखा तो उनका कारोबार खूब फैल रहा था। घर का हर सदस्य श्रम के प्रति एकनिष्ठ भाव से समर्पित था। यहाँ पारस्परिक सद्भाव, प्रेम, सहकार की छटा देखते ही बनती थी। घर के सभी सदस्य खूब स्वस्थ प्रसन्न दिखे।

वापस लौट कर अनुराग ने देवी से कहा-भगवती! अब मुझे धन नहीं चाहिए। सारा मर्म समझ लिया। धन का यथार्थ लाभ भोग में नहीं उसका सदुपयोग करने में है। धन का सदुपयोग वही कर सकता है जो नीति और परिश्रम पूर्वक अपनी कमाई आप करता है। इसलिए अब मुझे वरदान का धन नहीं चाहिए आवश्यकतानुसार आप पैदा कर लूँगा।


द्रौपदी की विशालता (Kahani)

द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते समय द्रोण पुत्र अश्वत्थामा ने मार डाला। पाण्डवों के क्रोध का ठिकाना न रहा, वे उसे पकड़ लाये और द्रौपदी के सामने ही उसका सिर काटना चाहते थे।

द्रौपदी का विवेक तब जाग्रत हो गया। बोली-पुत्र के मरने का माता को कितना दुःख होता है। यह मैं जानती हूँ। उतना ही दुःख तुम्हारे गुरु द्रोणाचार्य की पत्नी को होगा। गुरु-ऋण को समझो और उसे छोड़ दो। अश्वत्थामा को छोड़ दिया गया। करुणा के बदले की भावना पर विजय हुई। द्रौपदी की विशालता का परिचायक यह मार्मिक प्रसंग महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण सूत्रों में से एक है।


सहस्रार जगायें, दिव्य क्षमता पायें

मानवी सत्ता का मौलिक केन्द्र-स्रोत ब्राह्मी चेतना है। पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिण ध्रुव के समान ही मानवी सत्ता के भी दी ध्रुव है-सहस्रार और मूलाधार। सहस्रार को उत्तरी ध्रुव के समतुल्य समझा जा सकता है। जिस समतुल्य समझा जा सकता है। जिस प्रकार सूर्य के अनुदान उत्तरी ध्रुव पर बरसते है और सम्पूर्ण पृथ्वी इस केन्द्र से आवश्यकता के अनुरूप शक्ति प्राप्त करती है। उसी प्रकार ब्राह्मी चेतना का चैतन्य प्रवाह अन्तरिक्ष में सतत् प्रवाहित होता रहता है। मनुष्य के शरीर में वह सहस्रार के माध्यम से अवतरित होता है तथा दक्षिणी ध्रुव मूलाधार तक पहुँचता है।

सहस्रार चक्र मस्तिष्क मध्य में अवस्थित बताया गया है। सिर के मध्य में एक हजार पंखुड़ियों वाला कमल हैं उसे ही ‘सहस्रार चक्र’ कहते है। उसी में ब्राह्मी शक्ति या शिव का वास बताया गया है। यहीं आकार कुण्डलिनी महाशक्ति शिव से मिलती है। यही से सारे शरीर की गतिविधियों का उसी प्रकार संचालन होता है जिस प्रकार पर्दे के पीछे बैठा हुआ कलाकार उँगलियों को गति देकर कठपुतलियों को नचाता है। इसे आत्मा की अधिष्ठात्री स्थली भी कहते है। विराट् ब्रह्म में हलचल पैदा करने वाली सारी सूत्र शक्ति और विभाग इसी सहस्रार के आस पास फैले पड़े है।

सहस्रार का शाब्दिक अर्थ है-हजार पंखुड़ियों वाला। शास्त्रों में इसी का अलंकारिक वर्णन रूपों में किया गया है। सहस्र दल कमल, कैलाश पर्वत, शेषनाग, क्षीरसागर जैसे दिव्य सम्बोधन इसी के लिए प्रयोग किये गये है। उपाख्यान आता है कि क्षीर सागर में शेष नाग पर भगवान विष्णु शयन करते है। इस अलंकारिक वर्णन में इस तथ्य का उद्घाटन किया गया है कि जीव सत्ता के ऊर्ध्व स्थल अर्थात् देवीय गुणों सम्पन्न चेतना में ही परमात्मा अवतरित होते-निवास करते है। सहस्रार को कैलाश पर्वत के रूप में इंगित करने तथा भगवान शंकर के तप रत होने में भी उसी तथ्य का वर्णन हुआ है। यही वह केन्द्र है जहाँ जागृत होने पर कुण्डलिनी सन्मार्ग का भेदन करती हुई ब्रह्मलोक में पहुँचकर मोक्ष प्रदान करती है। इस सहस्रार चक्र तक पहुँचने पर ही साधक को अमृतपान का सुख, दिव्यदर्शन, संचालन की शक्ति ओर समाधि का आनन्द मिलता है और वह पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त कर अनन्तकाल तक ऐश्वर्य और सुखोपभोग करता है।

योग शास्त्रों के अनुसार सहस्रबाहो दोनों कनपटियों से दो-दो इंच अन्दर और भौंहों से भी लगभग तीन-तीन इंच अन्दर मस्तिष्क मध्य में महावीर नामक महारुद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योति पुँज के रूप में अवस्थित है। तत्त्वदर्शियों के अनुसार यह उलटे छोटे या कटोरे के समान दिखाई देता है। छान्दोग्य-उपनिषद् में सहस्रार दर्शन की सिद्धि का वर्णन करते हुए कहा गया है-तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचोर भवति।’ अर्थात् सहस्रार को जागृत कर लेने वाला व्यक्ति सम्पूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धियाँ हस्तगत कर लेता है। यही वह शक्ति केन्द्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है ओर विश्व में जो कुछ भी मानवहित विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है, उसका सम्पादन करता है। मस्तिष्क मध्य स्थित इसी केन्द्र से एक विद्युत उन्मेष रह-रह कर सतत् प्रस्फुटित होता रहता है जिसे एक विलक्षण विद्युतीय फव्वारा कहा जा सकता है। वहाँ से तनिक रुक-रुक कर एक फुलझड़ी सी जली रहती है हृदय की धड़कन में भी ऐसे ही मध्यवर्ती विराम- सिस्टम और डायनेमो ‘ अर्थात् लपडप–लपडप के मध्य रहते है। मस्तिष्कीय मध्य में स्थित इस बिन्दु से भी तरह की गतिविधियाँ संचालित होती रहती है। वैज्ञानिक इन उन्मेषों को मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों की सक्रियता-स्फुरणा का मुख्य आधार मानते है। संत कबीर ने इसी के बारे में कहा है- हृदय बीच अनहत बाजे, मस्तक बीच फव्वारा यह फव्वारा ही रेटीकूलर ऐक्टिवेटिंग सिस्टम ‘ है।

मस्तिष्क में विलक्षण शक्ति केन्द्रों की बात अब वैज्ञानिक भी मानते है। प्रख्यात न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. स्मिथ के अनुसार ‘प्यारे इन्टेलिजेन्स’ सद्बुद्धि मानवी मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों से नियंत्रित होती है यह सबकी साझेदारी का उत्पादन है। यही वह सार भाग है जिससे व्यक्तित्व का स्वरूप बनता और निखरता है। स्मृति, विश्लेषण, संश्लेषण, चयन, निर्धारण, आदि की क्षमताएँ मिलकर ही मानसिक स्तर की बनाती है। इनका सम्मिश्रण, उत्पादन कहाँ होता है? वे परस्पर कहाँ गुँथती हैं? इसका ठीक से निर्धारण तो नहीं हो सका, पर समझा गया है कि वह स्थान लघु मस्तिष्क-सेरिवेलम में होना चाहिये। यही वह मर्मस्थल है, जिसका थोड़ा सा विकास-परिष्कार संभव हो सके तो व्यक्तित्व का ढाँचा समुन्नत हो सकता है। इसी केन्द्र स्थान को अध्यात्म शास्त्रियों ने बहुत समय पूर्व जाना और उसका नामकरण ‘सहस्रार चक्र’ किया है।

शरीर शास्त्र के अनुसार मोटे विभाजन की दृष्टि से मस्तिष्क को पाँच भागों में विभक्त किया गया है- (1) बृहद् मस्तिष्क-सेरिव्रम (2) लघु मस्तिष्क- सेरिवेलम (3) मध्य मस्तिष्क-मिड ब्रेन (4) मस्तिष्क सेतु-पाँन्स (5) सुषुम्ना शीर्य -मेडुला आँवलाँगेटा। इनमें से अन्तिम तीन को संयुक्त रूप से मस्तिष्क स्तम्भ ब्रेन स्टीम भी कहते है। इस तरह मस्तिष्क के गहन अनुसंधान में ऐसी कितनी ही सूक्ष्म परतें आती है जो सोचने-विचारने सहायता देने भर का नहीं, वरन् समूचे व्यक्तित्व के निर्माण में भारी योगदान करती है। वैज्ञानिक इस तरह की विशिष्ट क्षमताओं का केन्द्र ‘फ्रन्टललोब ‘ को मानते है जिसके द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व, आकांक्षायें, व्यवहार प्रक्रिया, अनुभूतियाँ संवेदनाएँ आदि अनेक महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों का निर्माण और निर्धारण होता हैं इस केन्द्र को प्रभावित कर सकना किसी औषधि उपचार या शल्य क्रिया से सम्भव नहीं हो सकता। इसके लिए योग साधना की ध्यान धारण जैसी उच्चस्तरीय प्रक्रियायें ही उपयुक्त हो सकती है, जिन्हें कुण्डलिनी जागरण के नाम से जाना जाता है।

अध्यात्म शास्त्र के अनुसार मस्तिष्क रूपी स्वर्ग लोक में यों तो तैंतीस कोटि देवता रहते, पर उनमें से पाँच मुख्य हैं। इन्हीं का समस्त देव स्थान पर नियंत्रण है। उक्त मस्तिष्कीय पाँच क्षेत्रों को पाँच देव परिधि कह सकते है। इन्हीं के द्वारा पाँच कोशों की पाँच शक्तियों का संचार-संचालन होता है। गायत्री की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना में इन पाँचों को समान रूप से विकसित होने का अवसर मिलता है तदनुसार इस ब्रह्मलोक में, देवलोक में निवास करने वाला जीवात्मा स्वर्गीय परिस्थितियों के बीच रहता हुआ अनुभव करता है।

यह एक प्रकार से विभाजन की बात हुई है। अनेक विद्वान एक ही तथ्य को विभिन्न प्रकार से विवेचन करते है। मस्तिष्क के विभाजन तथा सहस्रार चक्र के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार एक ही तथ्य के भिन्न-भिन्न विवेचन मिलते है। शास्त्रों में इसी को अमृत कलश ‘ कहा गया है। उसमें से सोमरस स्रवित होने की चर्चा है। देवता इसी अमृत कलश से सुधा पान करते अजर अमर बनते है। वर्तमान वैज्ञानिक की मान्यतानुसार मस्तिष्क में एक विशेष द्रव भरा रहता है जिसे ‘सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड’ कहते है यही मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को पोषण और संरक्षण देता रहता है। मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को पोषण और संरक्षण देता रहता है। मस्तिष्कीय झिल्लियों से यह झरता रहता है और विभिन्न केन्द्रों तथा सुषुम्ना में सोखा जाता हैं।

अमृत कलश में सोलह पटल गिनाये गये हैं। इसी प्रकार कहीं-कहीं सहस्रार की सोलह पंखुड़ियों का वर्णन है। यह मस्तिष्क के ही सोलह महत्वपूर्ण विभाग-विभाजन है। शिव संहिता में भी सहस्रार की सोलह कलाओं का वर्णन करते हुए कहा गया है- ‘कपाल के मध्य चन्द्रमा के समान प्रकाशमान सोलह कलायुक्त सहस्रार की यह सोलह कलायें मस्तिष्क के सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड से सम्बन्धित मस्तिष्क के सोलह भाग है। इन सभी विभागों में शरीर को संचालित करने वाले एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं से युक्त अनेक केन्द्र है। सहस्रार अमृत कलश को जागृत कर योगीजन उन्हें अधिक सक्रिय बनाकर असाधारण लाभ प्राप्त करते है। योग शास्त्रों में इन्हीं ही ऋद्धि-सिद्धियाँ कहते है षट्चक्रों निरूपण नामक योग ग्रंथि के अनुसार इस सहस्रार कमल की साधना से योगी का चित्त स्थिर होकर आत्म-भाव में लीन हो जाता है। तब वह समग्र शक्तियों से सम्पन्न हो जाता हैं। और भव-बंधन से छूट जाता है। सहस्रार से निस्सृत हो रहे अमृत पर भी विजय प्राप्त कर लेता है।

सहस्रार क्या है? इसका उत्तर शरीर शास्त्र के अनुसार अब इतना मात्र जा सकता है कि मस्तिष्क के माध्यम से समस्त शरीर के संचालन के लिए जो विद्युत उन्मेष पैदा होते है, वे आहार से नहीं, वरन् मस्तिष्क के एक विशेष संस्थान से उद्भूत होते है। वह मनुष्य का अपना उत्पादन नहीं, वरन् दैवी अनुदान हैं अध्यात्मवेत्ता इसे ही ‘सहस्रार चक्र’ कहते है जिसका सम्बन्ध ब्रह्मरंध्र से होता है। ब्रह्मरंध्र को दशम द्वार कहा गया है। नौ द्वार है- दोनों नथुने, दो आँखें, दो कान, एक मुख, दो मल-मूत्र के छिद्र। दसवाँ ब्रह्मरंध्र है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी में होकर निकले और ऊर्ध्वगामी प्राप्त करे। योगशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्ता का ब्रह्मसत्ता का ब्रह्माण्डीय चेतना का मानव शरीर में प्रवेश सहस्रार स्थित इसी मार्ग से होता है। इसी के माध्यम से दिव्य शक्तियों तथा दिव्य अनुभूतियों का आदान-प्रदान होता है। सहस्रार और ब्रह्मरंध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई यूनिट के रूप में काम करते है। अतः योग साधना में इन्हें संयुक्त रूप में प्रयुक्त प्रभावित करने का विधान है।

मानव काया की धुरी उत्तरी ध्रुव सहस्रार और ब्रह्मरंध्र ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क बनाकर आदान-प्रदान का पथ प्रशस्त करता है। भौतिक ऋद्धियाँ और आत्मिक सिद्धियाँ जागृत सहस्रार के सहारे निखिल ब्रह्माण्ड से आकर्षित की जा सकती है। सहस्रार में जैसा भी चुम्बकत्व होता है। उसी स्तर का अदृश्य उपार्जन उसके स्तर एवं व्यक्तित्व का सूक्ष्म निर्धारण करता है। चेतन और अचेतन मस्तिष्कों द्वारा जो इन्द्रियगम्य और अतीन्द्रिय ज्ञान उपलब्ध होता है, उसका केन्द्र यही है। ध्यान से लेकर समाधि तक और आत्मिक चिन्तन से लेकर भक्ति योग तक की समस्त साधनायें यहीं से फलित होती और विकसित होती है। ओजस् तेजस और ब्रह्मवर्चस् के रूप में पराक्रम, विवेक एवं आत्मबल की उपलब्धियों का अभिवर्धन यहीं से उभरता है। ईश्वरीय अनुदान इसी पर अवतरित होता है। इस सहस्रार चक्र की साधना द्वारा वह क्षमता विकसित की जा सकती है जिसमें चैतन्य प्रवाहों को ग्रहण कर अपने को दैवीय गुणों से सुसम्पन्न बनाया जा सकें।


कुछ अनसुलझी गुत्थियाँ

आमतौर से शरीर मृत्यु के उपरान्त तेजी से सड़ने लगता है और स्वयमेव बिखर जाने के लक्षण उत्पन्न हो जाते है। भीतर से कृमि-कीटक उत्पन्न होते है और वे उसे खा-पीकर समाप्त कर देते है। यह कार्य और भी जल्दी हो, इसके लिए प्रकृति ने कुछ ऐसे प्राणी उत्पन्न किये, जो मृत शरीरों की तलाश करते रहते है और जहाँ कहाँ वे मिलते है, उन्हें समाप्त कर देने के कार्य में जुट जाते है। पक्षियों में गिद्ध और चील इसी वर्ग के है। सियार और कुत्तों को भी किसी मृतक पशु की काया का अस्तित्व समाप्त करने की जल्दी पड़ती है और वे गन्ध पाते ही दौड़ कर वहाँ जा पहुँचते हैं कुटुम्बी जन अपने ढंग से इस कार्य को पूरा करते है। प्रचलनों के अनुसार उन्हें जलाया, गाड़ा या बहाया जाता है।

यह प्रकृति व्यवस्था की बात हुई। मृत शरीर को सुरक्षित रखने प्रयास मनुष्य भी करता रहा है। मिश्र के पिरामिड में मसाले से लिपटे हुए ऐसे शरीर पाये गये हैं, जो हजारों वर्ष बीत जाने पर भी पूरी तरह नष्ट नहीं हुए और पहचाने जाने योग्य स्थिति में बने रहे। इस संदर्भ में रूसी वैज्ञानिकों का वह प्रयास भी अनुपम है, जिसके अनुसार लेनिन के शरीर को उसी रूप में रखने का प्रयत्न हुआ है। इस मृत काया को देखने के लिए अभी भी सुदूर देशों के लोग पहुँचते है और इस मानवी कौशल पर आश्चर्य व्यक्त करते है।

इसी प्रकार के प्रयोग अमरीका में भी हुए है। पिछले दिनों तक वहाँ ऐसे 11 शव सुरक्षित रखे गये थे, ताकि उन्हें पुनर्जीवित किया सके। इन सभी शवों से मलादि निकाल कर उनमें चाँदी की पतली पर्त लपेटी गई है और फिर दो परत वाले ताबूत में उन्हें बन्द कर वहाँ हवा न पहुँचे, ऐसी व्यवस्था की गई है

प्रकृतिगत और मनुष्यकृत उपरोक्त उपाय-उपचारों के अतिरिक्त इस संदर्भ में कभी-कभी आत्म शक्ति को भी कुछ विलक्षणता प्रकट करते हुए देखा गया है। ऐसी घटनाएँ सामने आती रहीं है, जिनसे लम्बे समय तक मृत शरीरों का अस्तित्व इस रूप में बना रहा, जिसमें उनमें किसी ऐसी प्राण चेतना की असंभाव्य पायी गई, जिसने उन्हें सड़ने नहीं दिया। ऐसी घटनाओं में सन्त स्तर के शरीरों की प्रमुखता रही है। उनमें गोवा के सन्त फ्राँसिस का उदाहरण प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है, जहाँ लाखों क्रिश्चन नर-नारी उनके दर्शन करने पहुँचते है। एक निश्चित दिन ही दर्शन हेतु सबके लिए चर्च खोला जाता है।

अनाया, लेबनान के सेंट मेरोन मठ के मठाधीश चार्बेल मेंकोफ की 1818 ई. में मृत्यु हो गई। मठ के नियमानुसार अन्य मठाधीश की तरह उन्हें भी एक कब्र के चारों ओर एक विशेष प्रकाश कई सप्ताह तक बना रहा। एक दिन तीव्र मूसलाधार वर्षा के कारण चार्बेल का शव उफनता हुआ कब्र से बाहर आ गया। शरीर पर सड़ने-गलने के नामोनिशान तक नहीं थे। शव को धोकर साफ किया गया ओर लकड़ी के एक ताबूत में बन्द करके मठ के एक प्रार्थनालय में सुरक्षित रख दिया गया। कुछ दिनों बाद उस शरीर से एक विलक्षण तैलीय पदार्थ बाहर निकलने लगा और इससे रक्त और मीठे की सम्मिश्रित सुगंध निकल कर वातावरण में चारों ओर फैलने लगी। इस तरह पदार्थ से शरीर पर ढके कपड़े भीग जाते थे, जिससे एक सप्ताह में उन्हें दो बार बदल कर पहनाया जाने लगा।

सन् 1927 में चार्बेल की मृत्यु के 29 वर्ष बाद उनके शरीर का चिकित्सकों द्वारा निरीक्षण किया गया और उसे निर्दोष पाया। चिकित्सकों की रिपोर्ट ओर उपस्थित जनसमुदाय के साक्षात्कार को लिपिबद्ध करके जिंक के एक ट्यूब में बन्द करके ताबूत को सामने वाली दीवाल में रख कर ईंटों से चिनाई करा दी गई।

सन् 1950 में रक्षकों ने सूचित किया कि ताबूत के सामने मठ की दीवार से एक विचित्र-सा तरल द्रव बाहर निकल रहा है। कब्र को तोड़कर ताबूत को बाहर निकाला गया और पादरी तथा चिकित्सा अधिकारियों के सामने शरीर का निरीक्षण परीक्षण किया गया। चार्बेल के शरीर को देखने पर लगता था, जैसे चार्बेल गहन निद्रा में सो रहे हों शरीर पर ढके कपड़े फट गये थे और विशेष प्रकार के एक तैलीय द्रव में भीगे हुए थे। ताबूत में तीन चार मोटी तैलीय परत जम गई थी, जिसे निकाल कर ताबूत की सफाई की गई। ताबूत के पास दफन की गई जिंक ट्यूब खोला गया, जिसमें वर्णित पूर्व घटना की तुलना वर्तमान घटना से की गई तो दोनों में समानता ही निकली। चार्बेल का शव फिर से ताबूत में बन्द करके वहीं दफना दिया गया।

ईसाई महिला मारिया अन्ना का शरीर उसकी मृत्यु के 107 वर्ष वा सन् 1739 में एक खुदाई में प्राप्त हुआ। मूर्धन्य चिकित्सकों और सर्जनों की ग्यारह सदस्यीय टीम ने मारिया की मृतक देह का परीक्षण किया। शरीर पर कहीं विकृति उत्पन्न नहीं हुई थी। सम्पूर्ण शरीर कोमल, सुन्र ओस से परिपूर्ण था एवं उससे एक विशेष प्रकार की सुगंध निकल रही थी। शरीर के बाहरी अंगों एवं अंतरंगों में एक प्रकार की चिकनाई लगी हुई थी।

अनुसंधान की कड़ी में कुछ नया पाने के लालच में चिकित्सकों ने शरीर का श्वच्छेदन किया। कोई नई कड़ी तो उनके हाथ नहीं लगी, परन्तु विशेष प्रकार की खुशबू से उनके हाथ कई दिनों तक सुवासित बने रहे।

पोलैण्ड के जेसूइट सन्त एण्डयू बोबोला रूस से रूढ़िवादियों के मध्य अपने मिशन का प्रचार-प्रसार बड़ी सफलतापूर्वक कर रहे थे। अपने इस कार्य के लिए वे प्रतिष्ठित हो चुके थे। सर्वत्र अनेक कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही थी। सन् 1232 में इन्हें सन्त की पदवी प्रदान की गई। मृत्यु के 430 वर्ष बाद किन्हीं कारणों से उनकी कब्र खोदनी पड़ी तो लोग यह देख कर चकित रह गये कि उनकी मृत काया जीवितों के सदृश्य प्रतीत हो रही थी। सन्त की सम्पूर्ण काया भूरे रंग की धूलि में लिपटी थी।

बहाई धर्म के महात्मा बाबा की मृत्यु आज से करीब एक शताब्दी पूर्व हुई। मृत्यु के उपरान्त उनके शव को धार्मिक कर्मकाण्डों के साथ दफना दिया गया। पर शायद जीवित अवस्था की तरह मृत्यु के उपरान्त भी लोग उनके शरीर को कब्र में चैन से नहीं रहने देना चाहते। इस लम्बी अवधि में उनकी मृत देह को अनेक कारणों से दो बार निकालना पड़ा। सब यह देख कर हैरान रह गये कि महात्मा मृत्यु के बाद अतिनिद्रा में जिस प्रकार सोये पड़े थे, उन अवसरों पर भी उनकी उस अवसरों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था। गाल और पेट अन्दर की ओर कुछ पिचक गये थे। पर शरीर की त्वचा जीवन्त और तरोताजा प्रतीत होती थी।

सत्रहवीं सदी के फ्राँसीसी सन्त एण्ड्रयू इमेनुअल के बारे में कहा जाता है कि अस्सी वर्ष की अवस्था में जब उनकी मृत्यु हुई, तो दर्शनार्थियों की भारी भीड़ के कारण चार दिनों तक उनके शरीर को पेरिस के एक हाल में दर्शनार्थ रखा गया। इस दौरान न तो इसमें कोई सड़न देखी गई और न ऐसी कोई प्रक्रिया आरम्भ हुई, जिसके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सके। कि देह का विघटन अब प्रारम्भ हो गया। इन चारों दिनों में उनके शरीर के चारों ओर एक विशेष आभा देखी गई और यह भी अनुभव किया गया जैसे कोई विशेष सुगन्ध उनके शरीर से निकल कर वातावरण को सुवासित कर रही हो। चार दिनों बाद जब उनके शरीर को दफनाया गया, तब वह आभा यथावत् बनी हुई थी।

ऐसी ही एक घटना एलिसबरी चर्च के फादर लैंग के बारे में विख्यात है। कहा जाता है कि फादर को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था। 1880 में 17 अक्टूबर को जब उनकी मृत्यु हुई, इससे एक माह पूर्व से ही वे धार्मिक कर्मकाण्डों में अत्यधिक व्यस्त देखे गये, जबकि सामान्य जीवनक्रम में वे उतने व्यस्त कभी दिखाई नहीं पड़े। अधिकाँश समय ईसा के चित्र के समक्ष प्रार्थना करते देखे गये। इस बीच उनने बोलना एकदम कम कर दिया था। कहाँ जाता है कि उनने अपने प्रमुख शिष्य थियोडोर से इस बात की चर्चा की थी कि यदि मृत्यु के उपरान्त उनकी देह एक सप्ताह तक भी यों ही पड़ी रही, तो भी उसमें विकृति नहीं आयेंगी और बराबर एक खुशबू उससे निकल कर वातावरण को सुगंधित बनाये रखेगी। हुआ भी ऐसा ही। एक सप्ताह तक उससे लगातार एक सुगन्धि निकलती रही और शरीर देखने से ऐसा लगता था, जैसे फादर गहरी निद्रा में सोये हों।

चेतना का तनिक भी अंश मृत्यु के उपरान्त देह में बना रहा, तो शरीर की सड़न रुक जाती है, इसे अब विज्ञान भी अपने ढंग से स्वीकारने लगा हैं सम्भवतः इन सभी में ऐसा ही कुछ हुआ हो व प्रकृति के नियम झुठला दिये गये हो।


सूक्ष्म के जागरण की विधाः गायत्री साधना

आध्यात्मिक दौर भौतिक दोनों ही प्रकार की सूक्ष्म शक्तियों से गायत्री माता ओत-प्रोत है। आध्यात्मिक क्षेत्र में वह प्रधानतः ब्रह्मतेज के रूप में परिलक्षित में वह प्रधानतः परब्रह्म परमात्मा का प्रकट स्वरूप है। वह साधक को ब्रह्म निर्वाण पर तक सुविधा पूर्वक पहुँचाती है। देवी भागवत् पुराण में इस बात को स्पष्ट कर दिया गया है’

परब्रह्म स्वरूपा च निर्वाण पद दायिनी। ब्रह्म तेजोमयी शक्तिस्तधिष्ठातृ देवता॥

अर्थात् गायत्री परब्रह्म स्वरूप तथा निर्वाण पद देने वाली वह ब्रह्मतेज शक्ति की अधिष्ठात्री देवी है।

यह महाशक्ति सत्, रज, मत, इन तीनों गुणों से प्रभावित कर मनुष्य जीवन में ज्ञान, क्रिया और धन के रूप में प्रकट होती है। उपासक को ज्ञानवान, क्रियावान तथा धनवान् बना देती है।

इन तीनों शक्तियों का कोष इन चक्रों में भरा हुआ है, गायत्री महाशक्ति की साधना द्वारा वे सूक्ष्म चक्र भी जागृत होते है-

इच्छाशक्ति भूः कारः क्रिया शक्तिर्भुवस्तथा। स्वःकारः ज्ञाते शक्तिश्च, भुर्भुवः स्वः स्न रुपंक॥

भूले पद्मश्च भूर्लोकी विशुद्धं्च भुवस्थता। सुर लोकः सहस्रा गायत्री स्थान निर्णयः॥

भूः इच्छाशक्ति। भुवः क्रियाशक्ति। स्वः जनशक्ति। यह भूर्भुवः स्वः का रूप है। भूः मूलाधार चक्र-भूलोक स्वः सहस्रार चक्र-सुरलोक यही गायत्री का स्थान है।

मनुष्य के मेरुदण्ड में छः प्रधान चक्र है। इन चक्रों में जो शक्तियाँ और सिद्धियाँ भरी हुई है उन्हें प्राप्त करने के लिए गायत्री उपासना द्वारा ही इन छहों चक्रों पर अधिकार है। इस कुण्डलिनी को गायत्री का ही स्वरूप माना गया है। मनुष्य के अन्तः जगत को प्रकाशवान् बनाने वाले दस प्राण अवस्थित है। तथा जिनके कारण जिन सूक्ष्म दस महाविद्याओं का ज्ञान होता है वह सभी विज्ञान भी गायत्री पर निर्भर है।

कुण्डलिनी समुद्भूता गायत्री प्राण धारिणी। प्राण विद्या महाविद्या यस्य वेत्ति से वेदवित्॥

अर्थात् कुण्डलिनी के रूप में प्रकट होने वाली, चैतन्य प्राण को धारण करने वाली चैतन्य शक्ति गायत्री, यह गायत्री ही प्राण विद्या है, यही महाविद्या है, जो इस रहस्य को जानता है वही तत्त्वदर्शी है।

मूलादि ब्रह्यरंध्रान्ता गीयते मननाद्यतः। मनतात् त्रातिषट् चक्रं गायत्री गायत्री तेन कथ्यते॥

मूलाधार चक्र से लेकर ब्रह्मरंध्र पर्यन्त षट्चक्र जिसकी उपासना से खुल जाते है उसे गायत्री कहते है।

मानव शरीर अनेक स्थूल शक्तियों का भण्डार है, परन्तु उसका बाह्य जगत के व्यर्थ विचारों एवं कार्यों। में अपव्यय होता रहता है। उस अपव्यय को रोककर यदि उस वृत्तियाँ अन्तर्मुखी बना ली जाएँ और अन्तर जगत में ही काम करने लगें तो निश्चय ही प्रचण्ड प्राप्त कर सकता है।

अंतर्जगत का अत्यन्त विस्तृत विज्ञान है। वह दस विद्याओं के रूप में दस भागों में बँटा है। वैदिक वाङ्मय में इन विद्याओं का विस्तार से वर्णन है- (1) उद्गीथ विद्या (2) संवर्ण विद्या (3) मधु विद्या (4) पंचाग्नि विद्या (5) उपकौशल विद्या (6) शाँडिल्य विद्या (7) दहर विद्या (8) भूमा विद्या (9) मनध विद्या (10) दीर्घायुष्य विद्या। ये दस विद्यार्थियों ऋषियों की सम्पत्ति थी। इन सम्पत्तियों के द्वारा ही वे अपरिग्रही एवं साधनहीन होते हुए भी इस भूलोक में कुबेर भण्डारी बने हुए थे। जो कुछ देवताओं के पास है, उसे वे इसी मानव शरीर से इसी लोक में करतल गत कर लेते थे।

तन्त्र विज्ञान में भी दस विद्याएँ नामों से उपलब्ध है। यद्यपि आसुरी वाम मार्गी तंत्रिका विधान देव सम्प्रदाय के दक्षिण मार्गी वैदिक विधान से भिन्न है। फिर भी उसके द्वारा भी उन्हीं सिद्धियों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। तंत्र मार्ग में (1) इन्द्राणी (2) वैष्णवी (3) ब्रह्माणी (4) कौमारी (5) नारसिंही (6) वाराही (7) माहेश्वरी (8) भैरवी (9) चण्डी (10) आग्नेयी, इन दस नामों से दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। इन महाविद्याओं का विस्तृत वर्णन इन पंक्तियों में संभव नहीं। यहाँ तो इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि गायत्री के तीनों अक्षर एक प्रकार से आध्यात्मिक त्रिवेणी के समान है। जिस प्रकार गंगा, यमुना और सरस्वती के मिलन से तीर्थराज प्रयाग की भौतिक त्रिवेणी बनी है उसी प्रकार गायत्री के तीन अक्षरों से निहित इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की तीन महाधाराओं के मिलन से आध्यात्मिक त्रिवेणी बनती हैं प्रयाग की त्रिवेणी में खान करने का जो महाफल है उसका तो वर्णन ही हो सकना कठिन है। शास्त्रों में उल्लेख है कि-

इड़ा भोगवती पिंगला यमुना नदी इड़ा पिंगल योर्मऽध्ये सुषुम्प्रा स सरस्वती॥

इड़ा नाड़ी गंगा है, पिंगला यमुना है। इन दोनों के बीच में सुषुम्ना है वही सरस्वती है।

त्रिवेणी योगः सा प्रोक्ता तत्र स्रानं महाफलम्।

यह योग की त्रिवेणी है इसमें स्नान करने का महाफल होता है।

जो कुछ इस विशाल ब्रह्माण्ड में है वह सब इस शरीर रूपी पिण्ड में भी सूक्ष्म रूप से मौजूद है। जो वस्तु हमें बाहर से उपलब्ध होती है उन सबको साधना के द्वारा अन्तर जगत से भी प्राप्त का जा सकता है। बाहर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जो भीतर न हो। शिव संहिता में कहा गया है- कि ‘इस देह में मेरु सप्तद्वीप, सरिता, सागर, शैल, क्षेत्र, क्षेत्रपाल, ऋषि मुनि, नक्षत्र, ग्रह, पीठ, पीठदेवता, शिव, चन्द्र, सूर्य, आकाश, वायु, अग्नि जल, पृथ्वी, तीनों लोक सब प्राणी निवास करते है। जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में है। इस रहस्य को जो जान लेता है वही योगी है।’

आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा जो इन अन्तरंग शक्तियों पर अधिकार कर लेता है उसके लिए वे वैसी ही उपयोगी हो जाती है जैसी बिजली एटम, भाप आदि की शक्तियों पर अधिकार प्राप्त करके आज वैज्ञानिकों ने उन्हें मानव की सेवा में प्रयुक्त कर दिया हैं भौतिक जगत में जो शक्ति भौतिक क्षमता सम्पन्न दिखाई पड़ती है वहीं अंतर्जगत में आध्यात्मिक क्षमता के रूप में प्रकट होती है। गायत्री की आध्यात्मिक शक्ति साधक के सम्मुख सिद्धियों के रूप में सामने आती है। उसे हर क्षण लगता है कि अदृश्य लोक के कोई देव, दानव हर पल उसकी सेवा में उपस्थित रहते है और उसकी आज्ञा पालन करने के लिए हर क्षण तत्पर रहते है। यक्ष, राक्षस, गंधर्व, अप्सरा, किन्नर, आदि उसके वश में हो जाते है और उसकी सेवा में उपस्थित हो जाते है।

यहीं मातृ तत्व संसार में परमाणु शक्ति स्थूल, सूक्ष्म, प्राण, भाव आदि रूपों में काम कर रहा है। उसे अभिवादन करते हुए जगद्धात्री स्रात में उल्लेख है कि-परमाणु स्वरूप, द्विअणु रूपिणी, स्थूलातिस्थूल, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, प्राण, अपान, व्यान आदि रूपिणी, भावाभाव स्वरूपा जगद्धात्री आपको नमस्कार है।

यह भौतिक शक्ति गायत्री 24 अक्षरों के अनुसार 24 प्रकार की है। हमारे प्राचीन वैज्ञानिक ऋषियों की भाषा में इन्हें 24 मातृका कहा गया है। इनके नाम इस प्रकार है- (1) चन्द्रमेश्वरी (2) अजितबाला (3) दुहरतारि (4) नालिका (5) महाकाली (6) श्यामा (7) शान्ता (8) ज्वाला (9) तारिका (10) अशोका (11) श्रीवत्सा (12) चण्डी (13) विजया (14) अकुशा (15) पन्नगा (16) निर्वाणी (17) बला (18) घारिणी (19) धरणप्रिया (20) नरदत्ता (21) गान्धारी (22) अम्बिका (23) पद्मावती (24) सिद्धाियका। भौतिक विज्ञान के विज्ञानियों ने इनकी शोध अपने ढंग से की है। वे इस शक्ति को “एनर्जी ऑफ फोर्स” के नाम से पुकारते है। हीट पावर (ताप), इलेक्ट्रिकल एनर्जी, (ताकत), एनर्जी ऑफ स्टैस्टिमिटी (स्थिति), एनर्जी ऑफ ग्रवीटेशन (मध्याकर्षण ), एनर्जी ऑफ मोशन (गति), कॉइनेटिक एनर्जी (क्रिया) कॉस्मिक इलेक्ट्रिसिटी (विश्व विद्युत ) इन्टेलिजेन्स (ज्ञान ), सुपर फोर्स (उच्च शक्ति) आदि अनेकों भेदों में इस शक्ति को विभक्त किया गया हैं और इसके गुण कर्मों को जानकर आविष्कारों का तारतम्य मिलाया गया है।

शरीर में काम करने वाली विद्युत शक्तियों का भी वैज्ञानिकों ने पता लगाया है ओजस् के औडिलिक फोर्स तथा उँगलियों तथा नेत्रों के तेज में शारीरिक चुम्बकत्व जैसे नामों से इसके भेदों का पता लगाया है। पाश्चात्य वैज्ञानिक डॉक्टर किलनर ने औरोस्कोप नामक एक ऐसे यंत्र का आविष्कार किया है जिसके द्वारा मानव शरीर अंतर्गत विभिन्न प्रकार की विद्युत शक्तियों की संख्या तथा मात्रा का पता लगाया जा सकता है। यह शरीर विद्युत योग साधनों से उत्पन्न सूक्ष्म दृष्टि भी स्पष्टतः देखी जा सकती है। तत्वदर्शियों ने उसके स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि “बिजली के बल्ब के समान तपते हुए चन्द्रमा के समान अग्निमयी वह शक्ति दृष्टिगोचर होती है।

योग शास्त्रों में शरीर के अन्तः प्रदेशों में काम करने वाले सहस्रों तत्वों का पता लाखों वर्ष पूर्व लगा लिया गया था। आधुनिक विज्ञान ने भी इस मार्ग पर कदम उठाने शुरू किये है और पिछले दिनों तक जो शोधे हुई है, उनके अनुसार ईथेरिक बौडी (प्राण भण्डार) माइस्टिक रोज (हत पदम्), सोलर प्लेक्सस (सौर जगत), कॉर्डियक प्लेक्सस (अनाहत चक्र), थायराइडलैण्ड (कंठ ग्रन्थि) पीनियल (आज्ञाचक्र ) पिट्यूटरी बॉडी (शक्ति ग्रन्थि) आदि का पता चलाया है और यह माना है कि इन विलक्षण संस्थानों द्वारा मनुष्य की प्रसुप्त प्रतिभाओं और विशेषताओं के भाव, अभाव से मंदता और तीव्रता से भारी सम्बन्ध है। फिर भी वे यह नहीं जान सके कि औषधि, सर्जरी आदि की सीमा के बाहर के इन सूक्ष्म संस्थानों का विकास किस प्रकार सम्भव है। इसका उत्तर एवं मार्गदर्शन तो योगशास्त्र ही दे सकता है और देता रहा है।

इन सूक्ष्म शक्ति-संस्थानों के जागर के लिए साधना विज्ञान के अनुसार बन्ध एवं मुद्राओं का विधान शास्त्रों में मौजूद है गायत्री के 24 अक्षरों से सम्बन्धित इस प्रकार की 24 साधनायें प्रसिद्ध हैं (1) महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियानबंध (4) जालन्धर बन्ध (5) मूलबन्ध (6) महाबन्ध (7) खेचरी (8) विपरीत किरणें (9) योनि मुद्रा (10) वज्रोली (11) शक्ति चालिनी (12) तडापी (13) माण्डवी (14) शाम्भवी (15) आश्विनी (16) पाशिनी (17) काक्री (18)मातंगी (19) भुंजगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कयकी (24) आकाशी। इसके अतिरिक्त आठ प्राणायाम (1) सूर्यभेदन (2) उज्जायी (3) सीत्कारी (4) शीतली (5) भस्रिका (6) भ्रामरी (7) मुर्छा (8) प्लाविनी। यह भी इन्हीं सूक्ष्म संस्थानों के जागरण के लिए है।

ये सभी गायत्री उपासना के माध्यम से सम्पन्न किये जा सकते है यह कहा गया है कि ‘6 गायत्री द्वारा योग साधना के पिपीलिका मार्ग दादरा मार्ग, विहंगम मार्ग यह तीन मार्ग है। इन पर चलने से परा पश्यन्ती, मध्यमा वैखरी चारों वाणियाँ प्रस्फुटित होती है। अविद्या होती है। अविद्या अस्मिता राम, द्वेग अभिनिवेश यह पाँचों क्लेश दूर होते है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय यह चारों अवस्थायें परिमार्जित होती है। मूलाधार स्वाधिष्ठान, मणिपूर अनाहत, विशुद्ध आज्ञाचक्र, यह छहों चक्र जाग्रत होते है एवं मस्तिष्क के मध्य भाग में व्यवस्थित सहस्रार कमल में ब्रह्मतेज विकसित होने लगता है। आकाश, महाकाश पराकाश, तत्वाकाश, सूर्याकाश, इन पाँचों आकाशों में उसकी गतिविधियों विस्तृत होने लगती है। स्रातों भूमिकाओं में शुभेक्षा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापति असंसक्ति, पदार्थ भाविनी, तुर्यगा अपनी नियमित गतिविधि से विकसित होती जाती है। गायत्री के माध्यम से योगसाधना करने वाला साधक योगमार्ग के नौ विघ्नों व्याधि, भ्रांति संशय, प्रमाद, आलस्य, आदि पर विजय प्राप्त कर उच्चस्तरीय प्रगति को प्राष्ठ होता है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।


कष्टों का अर्थ यह तो नहीं कि ईश्वर है ही नहीं

ईश्वर और धर्म पर अविश्वास रखने वाले प्रायः यह प्रश्न उठाया करते है कि जब ईश्वर दयालु और दुःख की अधिकता क्यों? आस्तिक लोग स्वयं भी कहते है कि संसार में धर्मात्मा कम और धर्मविमुख ज्यादा है। ईमानदारों की अपेक्षा बेईमानों की संख्या अधिक है। ऐसी स्थिति में इस बात पर कैसे विश्वास किया जाय कि एक महान चैतन्य सत्ता इस सृष्टि की रचयिता और संचालक है? यदि वास्तव में इसकी रचना किसी बुद्धिमान शक्ति द्वारा हुई होती तो संसार में सर्वत्र सुख, आनन्द और पुण्य कर्मों का ही प्रसार देखने में आना चाहिए था।

वास्तव में यह एक ऐसा जटिल प्रश्न है, जिसका उत्तर देने में बहुत से आस्तिक भी लड़खड़ा जाते है। जिन पश्चिमी ईश्वरवादियों ने इसका उत्तर दिया है।, उन्होंने कही-कहीं अपनी असमर्थता भी स्वीकार की है। “थीइज्म’ पुस्तक के लेखक फ्निण्ट ने इसका उत्तर देते हुए कहा है-यदि आप मुझसे पूछें कि ईश्वर ने सबको धर्मात्मा क्यों नहीं बनाया, तो इसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका कोई उत्तर हो ही नहीं सकता और न उससे कुछ लाभ है। यदि आप कहें कि ईश्वर ने मनुष्य को देवताओं की तरह क्यों नहीं बनाया, तो यह भी प्रश्न करेंगे कि उसने देवताओं से भी ऊँचे दर्जे के प्राणी क्यों नहीं बनाये। इस प्रकार ‘अनास्था दोष ‘ उत्पन्न होता है। “

जिस प्रकार का सापेक्ष लोग पाप के विषय में करते है, वैसा ही भव दुःख के विषय में भी प्रकट करते है वे कहते है कि जब ईश्वर सर्वशक्तिमान है और जीवों का भला भी चाहता है, तो उसने ऐसी व्यवस्था क्यों चाहता है, तो उसने ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की कि संसार में दुःख का नाम ही नहीं रहता? इस शंका का उत्तर देते हुए अल्फ्रेड रसेल वालेस अपने ग्रन्थ ‘दि वर्ल्ड ऑफ लाइफ’ में लिखते है- “कुछ आलोचकों को संसार के दुःख देख कर प्रायः घृणा हो जाता है। और वे कहने लगते है कि यह सृष्टि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और दयालु सत्ता की बनायी नहीं हो सकती; पर इन लोगों ने कभी भी दुःख की जड़ तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं किया। उन्होंने यह नहीं सोचा कि दुःख या कष्ट विकास के लिये कितने आवश्यक है। स्वयं डार्विन ने इस नियम पर बड़ा बल दिया है कि कोई इन्द्रिय शक्ति या वेदना किसी प्राण में उस समय तक नहीं उत्पन्न होती, जब तक वे उस जाति के लिए उपयोगी न हों। इस नियम पर यदि गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाय तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर प्रत्येक प्राणि वर्ग में उतना ही दुःख उत्पन्न करता है, जितने की उसके लिए आवश्यकता है।

फ्लिण्ट ने इसका समाधान अपनी उपरोक्त पुस्तक पुस्तक में कुछ भिन्न प्रकार से किया है। वे कहते है “दुःख परिश्रम द्वारा ही हमारा जीवन, हमारी शक्तियाँ नियमित और विकसित हो सकती है। इच्छा आवश्यकता का अनुभव ही दुःख माना जाता है; किन्तु यदि जीवों में इच्छाएँ और आवश्यकताएँ न हों, तो फिर जीव रहेंगे क्या? क्या वह ऐसे ही सुन्दर और सक्रिय होंगे, जैसे अब है? यदि मनुष्य को समय-समय पर संघर्ष न करना पड़े तो क्या वह ऐसा प्रयत्नशील, चतुर, बुद्धिमान शिक्षित होगा, जैसा आज है? इस प्रकार आवश्यकता से उत्पन्न दुःख प्राणियों की प्रगति और पूर्णता का साधना है, इसलिए जो ‘दुख’ इस प्रयोजन की पूर्ति करता है, उसे बुरा कैसे कह सकते हैं?”

दूसरी बात यह भी है कि दुःख पूर्णता का ही साधन नहीं है,वरन् वह सुख का भी साधन है। शायद प्राणियों की संरचना ही ऐसी है कि यदि वह दुःख का अनुभव न करे, तो सुख की प्रतीति भी न कर पाये। ीले ही यह तथ्य शत-प्रतिशत सही न हो; परन्तु एक बात स्पष्ट है कि समस्त जीव जगत में दुःख वास्तव में आनन्द का साधन होता है, जो प्राणियों को परिश्रम के लिए उत्तेजित करता है। दुःख की उपयोगिता का परिचय छोटे प्राणियों में उतना ही मिलता, जितना विवेकयुक्त मनुष्य में मिलता है। दुःख का महत्व जितना शारीरिक बातों में हैं, उसमें कहीं अधिक मानसिक बातों में मिलता है। यह दुःख आत्मा को शुद्ध बनाने और शिक्षा देने में परम सहायक है। दुःख से हृदय की कठोरता कम होती है दुःख वस्तुतः एक प्रकार का तप है। दुःख से अधिमान का दमन होता है। इससे साहस और धैर्य बढ़ता है। एवं दूसरों के प्रति सहानुभूति पनपती है। ऐसी अवस्था में कोई भी संसार में दुःखों को देख कर उसके लिए परमात्मा को दोषी बताने की तुलना में उसे धन्यवाद ही देगा।

जो बात फ्लिण्ट ने आज कही है, वह महाभारत में हजारों वर्ष पूर्व कह दी गई थी। जब भगवान कृष्ण ने वनवास के पश्चात् कुन्ती से इच्छित वर माँगने को कहा, तो कुंती ने कहा -”भगवान्! मुझे जीवन में दुःख-ही दुःख मिले, इतनी कृपा बनाये रखे।” “ऐसा क्यों?” - कृष्ण के यह पूछने पर कुन्ती ने कहा -”इससे आपका स्मरण निरन्तर बना रहेगा। सुख में तो लोग आपको और आपके प्रेम को भूला बैठते है।”

इस प्रकार जब सृष्टि-रचना और विभिन्न परिस्थितियों से होकर प्राणियों के विकास पर विचार करते है, तो हमें ईश्वरीय योजना में दोष लगाने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता।

ऐसे व्यक्तियों की भर्त्सना करते हुए ‘थियोसोफी ‘ की संस्थापिका मैडम ब्लैवटस्की ने जोरदार शब्दों में कहा है कि ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व को नकारना वास्तव में एक विनाशकारी कल्पना है। यह एक ऐसे उन्मत्त का प्रलाप है, जो अपनी दूषित कल्पना के आधार पर विश्व-रचना को उद्भिजों की तरह उगने वाली सामग्री के रूप में देखता रहता है और उसका कर्ता किसी को नहीं मानता। वह कहता है कि यह सामग्री स्वयं ही प्रकट हुई, स्वयं ही स्थित है, स्वयं ही विकसित होती है। यह समस्त सृष्टि अनायास उत्पन्न हुई और चलती जा रही है। इसका कोई उद्गम नहीं और न कोई निमित्त है। इस प्रकार उसकी दृष्टि में यह ‘अनन्त चक्र’ अकारण और संयोग का परिणाम है।

हेन्स आइसेंक अपनी पुस्तक ‘एथीइस्टिक सोसाइटी’ में लिखते हैं कि ईश्वर पर कोई विश्वास करे या न करे इसके लिए उसे किसी पर कोई विश्वास करे या न करे इसके लिए उसे किसी प्रकार विवश तो नहीं किया जा सकता; पर इस अवधारणा को अपना लेपे पर जीवन संबंधी कई जटिलताएँ सरल हो जाती है। अमरीका जैसे अत्यन्त समृद्ध, सभ्य और सुशिक्षित देश के प्रत्येक अस्पताल में आजकल पचास प्रतिशत बैड पागलों के लिए सुरक्षित रहते है।

लगभग हर पश्चिमी राष्ट्र की स्थिति ऐसी ही है, जबकि भारत जैसे पौर्वात्स देश में विक्षिप्तों की संख्या उतनी है। कारण एक ही है। कि वहाँ सफलता, असफलता, लाभ-हानि जैसे प्रसंगों में केवल लौकिक दृष्टि से ही विचार नहीं किया जाता, वरन् प्रारब्ध और कर्मफल को भी उसमें सम्मिलित किया जाता है और अप्रिय प्रकरणों में उसे ईश्वरीय न्याय मानकर संतोष कर लिया जाता है। तथाकथित बुद्धिवादी देश अपनी अनीश्वरवादी मान्यता के कारण उस गहराई तक नहीं उतर पाते और सब कुछ इसी जीवन का परिणाम-प्रतिफल मान बैठते है। ऐसे में जब कोई बड़ी सफलता थोड़े-से प्रयास में उनके हाथ लगती है, तो वे फूले नहीं समाते और अतीव प्रसन्न हो उठते है; किन्तु जब कोई विफलता सामने आती है, तो जीवन ही नीरस व भारभूत प्रतीत होने लगता है।

वे कहते है कि नास्तिकवादी चिन्तन को सबसे बड़ी हानि अपराधवृत्ति को बढ़ावा देना है। शायद इसी कारण से पश्चिमी राष्ट्र, आज अपराधों के जाल-जंजाल में उलझे हुए है। जहाँ यह मान लिया गया हो कि अपराधी को मार देने से अपराध समाप्त हो जायेंगे, वहाँ कदाचित् इसका अन्त कभी न हो, कारण कि अपराध के लिए दण्ड या फाँसी -यह सामाजिक व्यवस्था है और सरकारी कानून। इससे दुष्कृत्यों पर नियंत्रण तो रखा जा सकता है; पर अपराध विहीन समाज की कल्पना को साकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए नियमन नहीं, आत्मानुशासन आस्तिकवादी चिन्तन के बिना सम्भव नहीं। नीतिमत्ता, कर्तव्यपरायणता, सेवा सहायता-यह सब इसी चिन्तनधारा के अंतर्गत बन पड़ते है; क्योंकि कर्ता का दृढ़ विश्वास होता है कि कर्म के परिणाम आज नहीं तो कल मिल कर सराहेंगे। इसलिए वह प्रायः बुरे कर्मों से बचता है।

हेन्स कहते हैं कि आज हम भले ही वैज्ञानिक प्रगति के चरमोत्कर्ष पर पहुँच गये है और अपराधियों की धर-पकड़ के लिये नये-नये परिष्कृत क्षेत्र विकसित कर लिये गये है; किन्तु यह कहना कि अपराध आगे नहीं होंगे-गलत होगा।

इसका एकमात्र उपचार आस्तिकवादी विचारधारा को अंगीकार करना ही हो सकता है। यदि सृष्टि रचना के पीछे किसी सर्वोपरि सत्ता को स्वीकार लिया गया, तो सुख-दुःख लाभ-हानि सफलता-असफलता रोग-शोक जैसे न समझ में आने वाले कारणों से सरलतापूर्वक पिण्ड छुड़ाया और संतोषपूर्वक जिया जा सकता है। आगे इस चिन्तन की गहराई में उतरने पर यह स्पष्ट अनुभव होने लगता है कि संसार में भगवान ने अवरोध-विरोध क्यों खड़े किये अथवा लाभ, सुख, प्रसन्नता के साथ-साथ इनके विपरीत तत्वों को क्यों गढ़ा?

वास्तव में अपने ज्येष्ठ पुत्र की प्रगति और प्रसन्नता भगवान को भी अभीष्ट है। यदि मनुष्य के सामने अवगति का भय न हो, तो उसके लिए प्रगति का महत्व भी नगण्य जितना रह जाता। इसी प्रकार उसे यदि दुःख और शोक की पीड़ा की अनुभूति न हो, तो प्रसन्नता की ही क्या महत्ता रह जाती। सच तो यह है कि रात की सघन तमिस्रा के उपरान्त ही दिन के स्वर्णिम उजाले का यथार्थ आनन्द मिलता है। जहाँ उजाला ही-उजाला हो अथवा अँधेरा हो वहाँ जीवन नीरस व निरानन्द बन जायेगा। यदि इस दृष्टि से विचार किया जाय, तो ईश्वर पर लगने वाले आरोप निरस्त हो जायेंगे और यह स्पष्ट विदित होगा कि इसके पीछे उसकी कल्याणकारी भावना ही प्रमुख हैं।


महाकाली का पुत्र

सावधान! घोर वन, तीन हजार सत्रह फुट सत्तासी! सत्तासी! सत्तासी! ‘ हवाई जहाज की सूचना नालिका से आदेश मिला। एक खटका हुआ, एक झटका लगा और वह आकाश में पत्थर की भाँति नीचे गिर रहा था।

‘एक, दो, तीन, चार’ हाथ पैराशूट की रस्सी पकड़े हुए थे। यदि गिनने में तनिक भी गड़बड़ हुई शीघ्रता से या अधिक एक-एक कर गिना गया तो प्राण बचेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं। ‘पाँच, छः, सात, आठ’ वह सहज स्वाभाविक ढंग से गिन रहा था तीन हजार सत्रह, फुट ऊपर आकाश से फेंक दिये जाने पर भी मस्तिष्क व्यवस्थित रखकर ठीक-ठीक गिनता था। गिनने में विलम्ब हो तो धरती पर टकराकर हड्डियाँ चूर-चूर हो जाएँगी और जल्दी हो जाय-तो पैराशूट वायु के प्रवाह में कहाँ ले जाएगा, इसका क्या ठिकाना। नीचे चारों ओर शत्रु की छावनियाँ है। कोई पैराशूट से उनका स्वागत कैसे होगा-कोई भी समझ सकता है।

‘नौ, दस, ग्यारह.............मिनट जा रहा है वह।’ पिच्यासी, छियासी, सत्तासी, अीसरुत हाथ ने रस्सी खींच दी। एक अच्छा झटका लगा। पीठ पर गठरी के समान बँधा पैराशूट खुलकर आकाश में हंस के समान तैरता धीरे-धीरे उतरने लगा।

कृष्णपक्ष की त्रयोदशी की रात्रि है। वह जानता है कि उसे जहाँ गिराया गया है, वहाँ नीचे घोर वन है। यह प्रारब्ध पर ही निर्भर है कि पैराशूट उसे कहाँ पटकता है।

माँ! जगदम्बा! गिनती बन्द होते ही मन ही मन वह अपनी आराध्य मूर्ति का ध्यान और उनका स्मरण करने लगा। नीचे कुछ देखने का प्रयत्न उस घोर अन्धकार में व्यर्थ था। उसे मृत्यु का भय नहीं है। मृत्यु को तो उसने जान-बूझकर आमंत्रित किया है।

“माँ! मातृभूमि की, तुम्हारी पावन पीठ भारत धरा की थोड़ी-सी सेवा यह शिशु कर सके।” दयामयी ने जैसे उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। उसके पैरों का स्पर्श किसी वृक्ष की ऊपरी टहनी से हुआ। एक क्षण में पैरों की पकड़ में एक डाली आ गयी। उसने दोनों पैर डाल में लपेट दिया। शरीर की नस-नस उखड़ जाएगी, ऐसा उसे लगा और पैराशूट उलट गया।

पैराशूट को टहनियों की उलझन से अलग करके तह करने में दो मिनट लगे। पेड़ से नीचे उतर आया वह। चारों ओर घोर वन है, यह अनुमान करते ही उसने समझ लिया। उसके दूसरे चार साथी भी कहीं आस-पास उतरे हो सकते है। तनिक झुटपुट हो जाए तो निश्चय करे कि किधर जाना चाहिए।

सैनिक जब युद्ध क्षेत्र में होता है- उसका प्रत्येक क्षण बहुमूल्य होता है और जब कोई सैनिक पैराशूट से शत्रु प्रदेश में बतार दिया जाता है- उसका प्रत्येक क्षण कितनी सावधानी से काम में लिया गया, इसी पर उसका जीवन र्नीर करता है। प्रातःकाल होने से पहले उसे बहुत कुछ कर लेना था। बिना आधे क्षण रुके वह अपने काम में लग गया। पैर के पास ही कमर से छेरा निकालकर उसने गड्ढा खोदना प्रारम्भ किया। पैराशूट छिपा देना चाहिए और अग्नि जलाई नहीं जा सकती। उससे तो आस-पास के लोग चौकेंगे। बड़ी सावधानी से पैराशूट को उसने मिट्टी में दबाया। बूटों से मिट्टी कुचलकर उस पर थोड़े सूखे पत्ते समेटकर डाल दिए, जिससे उधर से कोई निकले तो नयी खोदी मिट्टी देखने से उसे संदेह न हो।

इतने सबके बावजूद संयोग और नियति को व्यूह रचना ने उसे अंग्रेजों के खेमें के पास पहुँचा ही दिया। अब वह अंग्रेज अफसरों के सामने खड़ा था।

तुम बंगाली हो? उस पर से एक सवाल गुजरा।

बंगाली तो मैं पीछे हूद्द, पहले भारतवासी हूँ।

‘कहाँ घर है तुम्हारा!’ उस धूर्त सैनिक अफसर ने बंगला बोलना प्रारम्भ कर दिया। अंग्रेज होते हुए भी बंगाल में रहकर उसने बंगला सीख ली थी। ‘हम तुम्हारे घर, तुम्हारे स्वस्थ और सुरक्षित होने का समाचार भेज देंगे।

‘मेरा घर है महाकाली के चरणों में।’ वह सुनकर हँस पड़ा। वहाँ रुपये नहीं, मस्तक भेंट किए जाते है।

‘तुम घर का पता न देना चाहों तो कोई बात नहीं।’ अफसर ने पूरी कूटनीति की परीक्षा करने का निर्णय कर लिया था। तुम्हें सेना में ले लिया जाएगा। कैप्टन बनाया जाय-यह मैं लिख दूँगा। और प्रयत्न करूँगा कि चार महीने की छुट्टी देकर घर जाने की सुविधा दी जाय तुम्हें।

‘मैं। सेना में हूँ। अवकाश लेने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। ‘ उसने गम्भीरता से कहा।

‘यह तो मैंने तुम्हारी सुविधा की दृष्टि से कहा था।’ अफसर ने जान-बूझकर उसकी बात का उल्टा अर्थ लिया-तुम अगले मोर्चों पर रहना चाहोगे तो बड़ी प्रसन्नता से रह सकोगे।

लेकिन भारत को पराधीन रखने वालों का विनाश करने के लिए मैं सैनिक बना हूँ। उसने अपने स्वर को अब कठोर कर लिया उनकी दासता करना स्वीकार होता तो मातृभूमि से बाहर भटकता न फिरता।

‘अभी तुम युवक हो। जापानियों ने तुम्हें भटका दिया है। अफसर शान्त बना रहा-कदाचित् तुम नहीं जानते कि अंग्रेजों ने भारत को स्वराज्य देना निश्चित कर लिया है और उसके लिए योजनाएँ बनायी जा रही है। ‘

‘बहुत खूब!’ उसने हँस कर व्यंग किया-बड़े दयालु है आप लोग!

‘अभी तुम परिस्थिति से परिचित नहीं हो।’ अफसर को बुरा लगा, पर शान्त ही रहा वह कुछ दिनों में ही तुम्हें सब बातों का पता लग जाएगा। अभी तो तुम इतना करो कि मैं जो पूछता हूँ उसे ठीक-ठीक बता दो। केवल जापानियों के सम्बन्ध में तुम्हें बतलाना है। अपने देश की सेवा ही करोगे इससे तुम।

मैंने आपको स्पष्ट बता दिया है कि मैं कुछ नहीं बताऊँगा। उसने चौथी बार कहा-

‘तुम जानते हो कि क्या परिणाम होगा?’ अफसर ने भी रुख बदल दिया-तुम शत्रु के जासूस हो युद्धबंदी बनाने का तुम्हारे लिए प्रश्न ही नहीं उठता। एक बार और सोच लो। सेना मैं कैप्टन हो कते हो और घर जा सकते हो पर वैसे तुम्हारे तीन साथी और पकड़े गए है।। उन्होंने वह सब बता दिया है, जो वे जानते है। तुम उनके नायक हो, उनसे कुछ अधिक बता सकते हो, उनकी बतायी बातें तुमसे फुट हो जाय इतना ही हम चाहते है। तुम कुछ भी न कहोगे, तो भी हमारी कुछ भी हानि नहीं होनी है। “

तीन साथी और पकड़े गए है। उन्होंने सब कुछ बता दिया है।’ उसने मस्तक झुकाकर सोचा।इसका केवल यह अर्थ है कि कोई ऐसा एक भी साथी पकड़ा नहीं गया है। किसी ने कुछ बताया नहीं है। यह धूर्त केवल धोखा देना चाहता है। भेदनीति से।

‘तुम सोचना चाहो तो मैं आधे घण्टे पीछे आ सकता हूँ।’ अफसर ने कहा-

मैं सोच चुका हूँ जो कुछ कहना था, वह कह चुका हूँ। ‘वह स्थिर रहा परिणाम नहीं सोचा तुमने। अफसर ने चेतावनी दी।

‘तुमसे अधिक मैं जानता हूँ।’ उसने उपेक्षा से कहा-मैं महाकाली का पुत्र हूँ। मेरा परिणाम तुम्हारे हाथ में नहीं, मेरी दयामयी माँ के हाथ में है।

‘आज शाम को ही तुम्हें गोली से उड़ा दिया जाएगा।’ अफसर मुड़ा-मैं एक आर और आऊँगा।’ जवाब में वह मुस्करा दिया।

उन दिनों जापान की सेनाएँ बर्मा में बढ़ती जा रहीं थीं। बार-बार अंग्रेजी सेना को बड़ी वीरता के साथ पीछे हटने को विवश होना पड़ता था। टोकियो में श्री रासबिहारी बोस के यहाँ भारतीय देशभक्तों की बैठकें प्रायः नित्य होती थीं। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस उस समय बर्लिन में थे। उन्हें बर्मा लाना है। यह योजना कुछ गिने चुने उच्च अधिकारियों तक सीमित थी।

बर्मा में पर्याप्त भारतीय थे। वे अपनी मातृभूमि को स्वतन्त्रता के लिए किसी से कम उत्सुक नहीं थे। लेकिन अंग्रेजों के प्रचार ने बहुतों को भ्रांत कर दिया था। वे जापान के प्रति संदिग्ध हो गए थे। साथ ही उन्हें प्रोत्साहित एवं संगठित करने के सूत्र भी वहाँ नहीं थे। कुछ जापानी अधिकारियों और रासबिहारी बोस में पहले ही यह मन्त्रणा हो चुकी थी।

परिणाम का कुछ पता नहीं है मातृभूमि के लिए मस्तक देना है। बिना किसी भूमिका और आश्वासन के स्पष्ट स्थिति जापान स्थित भारतीय देशभक्तों के आगे स्पष्ट कर दी गयी। ‘देश के निमित्त प्राण देने वाला धन्य है। ‘जापान में रहकर देश के लिए आत्मबलि की जागृत भावना का नित्य आदर्श देखा जा सकता था। भारतीयों के रक्त में त्याग का स्रोत निहित है। जापानी बलिदानी वीरों ने उ प्रदीप्त कर दिया था। सभी भारतीय युवकों एवं तरुणों ने अपने रक्त से हस्ताक्षर किए प्रतिज्ञा पत्र पर।

कुछ उपयुक्त व्यक्ति चुन लिए गए सामान्य सैनिक शिक्षा तो सबके लिए आवश्यक थी। किन्तु कुछ लोगों को पैराशूट से नीचे उतरना सिखला गया। उन्हें सब आवश्यक बातें बतला दी गयी। केवल आवश्यक बातें बतला दी गयी। केवल सप्ताह की शिक्षा-अधिक के लिए अवकाश ही नहीं था। एक जापानी हवाई जहाज पाँच भारतीय तरुणों को एक रात्रि बर्मा वनभूमि पर आकाश से उतार गया।

पास में नक्शे नहीं थे। कहाँ कौन-सी बस्तियाँ है, किन बस्तियों में है, किन बस्तियों में जाना चाहिए, किन स्थानों एवं बस्तियों में सावधान रहना चाहिए यह सब बतला दिया गया था। टोकियो में सोचा यही गया था कि पाँच में से एक भी बच सका तो सफल समझना चाहिए इस प्रयत्न को। सचमुच केवल एक शत्रु की आँख से बच सका। चार पकड़ लिए गए।

पैराशूट ठीक बिन्दु पर किसी को गिरा सकें, यह सम्भव नहीं है। मील-इधर-उधर हो जाना साधारण बात है। अपरिचित भूमि में-वन में कोई कहीं तक रटे हुए नक्शों के आधार पर मार्ग पा सकता है। इधर-उधर भटकना पड़ा। सावधान शत्रु के जासूसों ने देख लिया। पकड़ लिए गए चार देशभक्त भारतीय सूर्योदय होने के कुछ देर के भीतर।

वन्दे मातरम्। चारों अलग-अलग रखे गये। उन्हें प्रलोभन दिए गए, धमकाया गया और जहाँ तक बना यातनाएँ दी गयी। चारों ही अडिग थे। जापानी सेना बड़ी बा रही थी अंग्रेजी सेना के सेनापति ने वीरता पूर्वक हट जाने में कुशल समझ ली। प्रातः पकड़े गण् चारों भारतीय एक छोटे मैदान में एकत्र किए गए दण्ड देने के लिए। उन्होंने हवाई जहाज से गिराये जाने के बाद पहले-पहले एक दूसरे को देखा। जय ध्वनि को उन्होंने।

महाकाली की जय! उसने यह दूसरी जय ध्वनि भी की। उसने का-मित्रो! यह नाटक बहुत देर नहीं चलेगा। डरने की कोई बात नहीं।

‘हम मृत्यु से नहीं डरा करते। हमारे ऋषियों ने कहा है-जीवन शाश्वत है।’ दूसरे तरुण ने कहा-शरीर तो मिट्टी हमें दी उसी की सेवा में विसर्जित करने का अवसर तो मिला।’

अभी वह अवसर नहीं आया। उसकी इस बात को कोई समझ नहीं सका। उन सभी को आश्चर्य था-उन्हें अफसर के सुख से निकले केवल एक शब्द की प्रतीक्षा। चार भारतीय जिनके हाथ हथकड़ियों से पीछे जकड़े थे, उनके सामने खड़े थे। बड़ा आश्चर्य हो रहा था उन सैनिकों को मृत्यु की उस अन्तिम घड़ी में भी ये परिहास करने वाले-कैसे है ये लोग?

‘वन्दे मातरम्।’ एक तरुण ने कहा।

‘महाकाली की जय!’ पहले जयनाद के बाद उसने अकेले जयनाद किया। माता जन्मभूमि की वन्दना और उसकी सेवा के लिए तो अभी पूरा जीवन पड़ा है। यह अवसर तो महाकाली की मनोहर क्रीड़ा देखने की है।

‘क्रूर उत्पीड़न ने इसे उन्मत्त कर दिया है।’ साथियों के नूत्र सहानुभूति से भर आए।

इतने अंग्रेज अफसर ने आदेश दिया- ‘फाय’ ..........’ लेकिन शब्द पूरा हो सके इससे पहले एक, दो चार-लगातार धमाके होते चले गए। धुएँ से दिशाएँ भर गयी। सैनिकों ने बन्दूकों का उपयोग किया भी हो तो उन धमाकों में कुछ पता नहीं लगा। जंगल में यह अनुमान लगाना कठिन था कि शत्रु कहाँ है, कितना बड़ा दल है, धमाके होते ही जा रहे थे।

‘वन्दे मातरम्।’ मैदान में खडत्रे किसी कन्ठ ने पुकारा।

‘वन्दे-मातरम्।’ मैदान में खड़े चारों बन्दियों ने उत्तर दिया।

देखते-देखते स्थिति बदल गई। अंग्रेज अफसर और हब्शी सैनिकों के शरीर छिन्न-भिन्न हुए पड़े थे। अंग्रेजी सेना जारियों में बड़ी उतावली से पीछे हट जाने के लिए तंबू, शस्त्रागार के शस्त्र करने का उसके पास अवकाश नहीं था।

माँ! माँ! दयामयी माँ!आज एकान्त पाते ही वह रो पड़ा वैसे एकान्त पाते ही वहां माँ माँ पुकारकर रो लिया करता था। और जब मृत्यु के भयंकर पंजे प्रत्यक्ष से दीखते थे-वह र्नीय रहता। अनेक बार लोगों को भ्रम हुआ करता था कि वह पागल है।

उसे तो उस दिन भी हताश होते हुए नहीं देखा गया, जब नेताजी जापान लौट रहे थे। आजाद हिन्द सेना के वीर रो रहे थे और वह चुपचाप खड़ा था। उसने केवल इतना कहा-मैं स्वदेश जाऊँगा।’

अकेले? किसी ने मना नहीं किया। मना करने का कुछ अर्थ भी नहीं था। प्रारब्ध ने सारे प्रयत्न को कुचलकर धर दिया था। जापान हथियार डाल चुका था-अब तो भाग्य के विधान के सम्मुख मस्तक झुकाना था। उसे अनुमति मिल गई थी। एक साथी ने पूछा भी बड़े खेद से-इस प्रकार मरने की अपेक्षा हम सबके साथ भाग्य की प्रतीक्षा करना अच्छा नहीं।

मुझे मारेगा कौन? उसे भय का कारण नहीं जान पड़ता था। यों वह इस बात से अनजान नहीं था कि मार्ग बहुत लम्बा है। वन हिंस्र पशुओं और उनसे भी हिंस्र नरीक्षी जातियों से भरा है। अंग्रेजी सेना ने सब पगडण्डियाँ घेर रखी है। लेकिन उसकी आस्था यह सब देखने नहीं देती। महाकाली के पुत्र को मारने के लिए हाथ उठाने वाला मरे बिना रह नहीं सकता।

महाकाली की जय। पैरों में छाले पड़ गए थे। वस्त्र चिथड़े हो गये थे। दाढ़ी और नाखून बढ़ गए थे। वन पशु तो उसके मित्र थे नरभक्षी लोगों ने उसका आखेट करने के बदले उसे फल-कन्द खिलाए। कोई विश्वास करे या न करें, लेकिन पता नहीं क्यों नरभक्षी लोगों ने उसे देखते ही साधु समझ लिया था। उसकी सेवा उन लोगों के लिए पुण्य बन गयी थी।

तू मुझे जाने देगा या मारेगा। सैनिक प्रहारियों से सीधा सवाल करता था वह।

अबे जा। एक नि’शस्त्र फटेहाल भिखारी किसी सैनिक से इस प्रकार तो सैनिक उसे पागल न समझे तो समझे क्या? गोली तो दूर, उसे गाली भी किसी ने नहीं दी।

कलकत्ते पहुँचकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। काली मन्दिर के पुजारी के लिए उस दिन उसकी भक्ति एक समस्या हो गयी। लेकिन उसे हटाने या रोकने का किसी में साहस नहीं हुआ। आद्याशक्ति पर अपनी अडिग आस्था के बलबूते सभी चुनौतियों को चुनौती देने वाले आजाद हिन्द फौज के कैप्टन अनिल विश्वास बाद के दिनों में स्वामी जगदम्बानन्द के नाम से प्रख्यात हुए। उनके ग्रन्थों में जहाँ एक ओर नेता जी के रोचक प्रसंग है वहीं भक्ति विश्वास और आस्था को जीवंत करने वाली रोमांचक घटनाएँ भी।


यदि प्रसुप्त को जगाया जा सके

स्थूल मस्तिष्क की ज्ञान-परिधि सीमित हैं वह असीम को नहीं जान सकता। यदि उसमें जानने की ऐसी क्षमता रही होती, दुनिया में आज सब कुछ सुविज्ञात होता, पर विश्व में अब भी ऐसे कितने ही रहस्य मौजूद हैं, जो मानवी बुद्धि के लिए चुनौती बने हुए है।

ऐसा ही एक रहस्य कर्नाटक के शिमोला जिले के सपीगेहल्ली गाँव के सघन वन के प्राचीन मन्दिर का खण्डहर है, निकट में कुआँ है।

एक बार विल्फ्रेड नामक एक अंग्रेज शिकारी यहाँ हेतु आया। मन्दिर को छिपने का उपयुक्त स्थान समझ कर वह यहीं दुबककर बैठ गया और शेर का इन्तजार करने लगा। आधी रात के करीब शेर अचानक कुएँ के नजदीक प्रकट हुआ। वह निशाना साध ही रहा था कि कुएँ के अन्दर से सीटी की आवाज सुनाई पड़ी। वी सीटी बड़ी ही सुरीली थी। कुछ क्षण के लिए तो वह उसमें खो सा गया, तभी पुनः उसे शेर का ध्यान आया। वह कुएँ की ओर मुँह किए निश्चल बैठा था। उसने फिर बन्दूक का निशाना साधा। गोली छूटने ही वाली थी कि एक बार पुनः वहीं मोहक ध्वनि गूँजी। विल्फ्रेड अजीब बेचैनी अनुभव करने लगा। थोड़े अन्तराल बाद तीसरी सीटी पुनः सुनाई पड़ी। इसी के साथ शेर कुएँ में कूद पड़ा। विल्फ्रेड को भी ऐसा लगने लगा, जैसे वह भी कुएँ में छलाँग लगा दें। उस ओर वह एक विचित्र खिचाव महसूस कर रहा था, पर बड़ी मुश्किल से वहाँ से भागने में सफल हुआ। जब निकटवर्ती गाँव पहुँचा, तो लोगों ने बताया कि आज ही के दिन हर वर्ष यहाँ इस घटना की पुनरावृत्ति होती है। लगभग दर्जन भर शिकारियों ने इसी प्रकार अपनी जान गँवा दी। एकमात्र विल्फ्रेड ही ऐसा था, जो वहाँ से जीवित लौट सका।

मिलता-जुलता प्रसंग नीलगिरी का है। यहाँ एक

गाँव है-चमनथ बताया जाता है कि टीपू सुल्तान के समय में यह गाँव एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र था और बहुत समृद्ध था। इसके अनेक चिन्ह अब भी वहाँ मौजूद है। इन्हीं में से एक है-काले ग्रेनाइट पत्थरों से बना भव्य मन्दिर का भग्नावशेष। समीप ही एक कुआँ है।

कहते है जिन दिनों अस ग्राम की यशगाथा गायी जाती थी, उन्हीं दिनों वहाँ एक रहस्यमय बीमारी फैली, जिसमें वहाँ की पूरी की पूरी आबादी ही समाप्त हो गई। कई साल पश्चात् कैप्टन नेड नामक एक अंग्रेज अफसर नीलगिरी में नियुक्त हुआ बातचीत के दौरान उसे चमनथ के मन्दिर की जानकारी मिली। वह एकान्त और कला प्रेमी था। एक बार उसने मन्दिर के दर्शन का कार्यक्रम बनाया। वहाँ गया और हर दृष्टि से उपयुक्त पाकर उसने वहीं रात बिताने का निश्चय किया।

आधी रात तक सब कुछ सामान्य रहा। मध्यरात्रि के उपरान्त मन्दिर में रखा पीतल का दीपक अचानक जल उठा और साथ ही साथ उसकी ज्वाला से कुछ अस्फुटी ध्वनि निकलने लगी।

कैप्टन् नेड को हिन्दी और संस्कृत से गहरा लगाव था। भारत रहते हुए उसने उन दोनों भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। ध्वनि पर ध्यान दिया, तो पता चला कि यह कोई स्त्री पाठ है। गौर करने पर विदित हुआ कि वह रावण रचित शिव स्तोत्र है, जो अत्यन्त मन्द स्वर में उच्चरित हो रहा था। स्तोत्र पाठ से नेड ने अन्दाज लगाया कि इसे कोई शिव मन्दिर होना चाहिए। वे ध्यानपूर्वक उसे सुनते रहे। पाठ समाप्त हुआ, तो दीपक बुझ गया। नेड दीपक की घर ले आया। इसके साथ ही नेड बुरी तरह बीमार पड़ गया। बहुतेरे उपचार कराये गये। पर स्थिति सुधरने के स्थान पर गंभीर बनती गई। अन्ततः एक रात कैप्टन नेड की पत्नी को एक साधु ने सपने में आदेश दिया कि दीपक जहाँ से लाया गया है, वहीं पहुँचा दिया जाय। जीवन रक्षा का अब यही एक मात्र उपाय है। नेड ने ऐसा ही किया और वे धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे और जल्द ही एकदम ठीक हो गये।

मानवी मन स्थूल जगत को समझने का एक उपकरण भर है। विज्ञान जैसी विधा में इसके इसी स्तर का उपयोग होता है। चूँकि इसमें वह हर कार्य के पीछे स्थूल कारण की तलाश करता है, इसलिए अवसर रहस्यमय प्रसंगों को सुलझाने में असफल होता है। यह इसके 7 प्रतिशत शक्ति की चर्चा हुई। इस भूमिका से ऊँचा उठकर यदि उसकी शेष 13 प्रतिशत प्रसुप्त खमता को जगाया जा सके, तो फिर अज्ञात स्तर का रहस्य दुनिया में कुछ भी र नहीं। ऐसा अध्यात्म उपचार के बिना सम्भव नहीं। इसी के माध्यम से योगी-यति सोयी पड़ी शक्ति को जगाते और अपने लिए ऋद्धि -सिद्धियों के द्वार खेलते है। अविज्ञात को ज्ञात बनाने का यही एक मात्र उपाय है। इसे अपनाया जाना चाहिए।


देखते-देखते वे धरती के गर्भ में विलुप्त हो गए

प्रकृति को सृष्टि की संचालिका के रूप में मान्यता मिली हुई है मानव भी सृष्टि का एक अंग है, अतः वह भी इस व्यवस्था के अधीन है। उसके जीवन में भले-बुरे जो भी प्रसंग उपस्थित होते है, उन्हें अकस्मात् या अकारण कह कर नहीं टाला जा सकता। वह क्रिया की सुनिश्चित और स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। भले ही हमारी बुद्धि इन दोनों के बीच कोई तारतम्य बिठाने में असफल रहे,

ऐसी ही एक घटना ब्रिस्टल इंग्लैण्ड की है 9 दिसम्बर 1873 की सुबह जब एक गश्ती पुलिस पार्टी स्थानीय स्टेशन के निकट पहुँची, तो वहाँ एक दम्पत्ति को अत्यन्त भयभीत स्थिति में पाया। दोनों रात्रिकालीन पोशाक में थी। पति के हाथ में एक पिस्तौल थी और वह लगातार उससे गोली दाग रहा था। यह देखकर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। टामस बी. कम्पस्टन नामधारी वह व्यक्ति इतना आतंकित था कि थाने में भी मुश्किल से ही कुछ बोल सका। उसने बताया कि वह पति-पत्नी कल लीड्स शहर से यहाँ आये थे और पड़ोस के विक्टोरिया होटल में एक कमरा किराये पर लेकर ठहरे हुए थे। थके होने के कारण रात गहरी नींद आयी। अभी वे सो ही रहे थे कि एक विचित्र ध्वनि से उनकी नींद खुल गई। फर्श पर दृष्टि गई तो देखा कि वह एक ओर खिसक रहा है और उसमें एक विवर पैदा हो रहा है। उसकी असाधारण शक्ति से कम्पस्टन उसमें सामने लगे। बड़ी मुश्किल से उसकी पत्नी ने उसे उसके अन्दर खींचने से रोका। इस घटना से वे दोनों इतने डरे कि खिड़की से बाहर कूद पड़े और दौड़ते हुए स्टेशन पहुँचे। तब से वे यहीं बैठे दिन निकलने का इन्तजार कर रहे थे।

बाद में कम्पस्टन की पत्नी ने घटना को और विस्तार से बताया। उसका कहना था कि रात जब वे सोने की तैयारी कर रहे थे, तो एक अनोखी ध्वनि से चौंक उठे। होटल मैनेजर से इस सम्बन्ध में पूछताछ करने पर उसे सामान्य ध्वनि कहकर आश्वस्त कर दिया। लगभग 4 बजे प्रातः पुनः वहीं ध्वनि सुनाई पड़ी। वे दोनों उठ बैठे। फर्श हिलता प्रतीत हो रहा था। जब नीचे दृष्टि गई, तो उसमें एक छिद्र पैदा होता दिखाई पड़ा, जो धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा। डर से उनकी चीखें निकल गई। विवर अब तक काफी बड़ा हो चुका था और उसी अनुपात में उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ गई थी। कम्पस्टन उस ओर खिंचने लगे और भीषण संघर्ष के बाद ही उसे बाहर निकाला जा सका।

होटल मैनेजर ने भी यह स्वीकार किया कि कुछ अजीबोगरीब आवाजें पिछली रात सुनाई पड़ी थी, पर इसके अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार की असामान्यता से उसने स्पष्ट इनकार किया। पुलिस ने जब उस कमरे की जाँच की, तो उसमें सब कुछ सामान्य नजर आया, पर कम्पस्टन दम्पत्ति बार-बार यही कहते पाये गये कि वे जो कुछ कह रहे हैं, वह शत-प्रतिशत सच है।

मिलती-जुलती घटना इंग्लैण्ड के ही शेफ्टन मैलेट शहर की है। ओवेन पारफिट एक भूतपूर्व सैनिक था। अवकाश ग्रहण के बाद वह पक्षाघात का शिकार हो गया। उसकी दोनों टाँगें बेकार हो गयीं। एक और दुर्भाग्य आया कि दायें हाथ को भी आँशिक लकवा लग गया। इस प्रकार वह दूसरे की सहायता के बिना एक इंच भी नहीं खिसक सकता था। उसकी देख-रेख उसकी बड़ी बहन एवं एक अन्य महिला करती थी। उन दोनों ने ऐसा नियम बना लिया था जब एक किसी काम से घर के अन्दर होती तो दूसरी उसके सामने मौजूद अवश्य रहती।

उस दिन सुसाना स्नूक नामक दूसरी स्त्री किसी कारणवश बाहर गयी हुई थी। ओवेन के समक्ष उसकी बहन बैठी थी। दोनों किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे, तभी एक गगनभेदी घोष सुनाई पड़ा। दोनों बुरी तरह डर गये। ओवेन तो इतना भयभीत हुआ कि देर तक सामान्य नहीं हो सका। जब कुछ ढाढ़स बँधा, तो पानी का इशारा किया। बहन जब जल लेकर वापस आयी, तो देखा कि ओवेन कुर्सी से बाहर एक ओर लुढ़का पड़ा है और मुँह से गों-गों की आवाज आ रही है। फर्श में दरार पड़ी हुई थी। उसने गिलास को एक ओर रखा और भाई को उठाना चाहा, पर समीप पहुँचने पर तीव्र खिचाव का अनुभव किया। वह तुरन्त दूर हट गई। दरार का फैलाव बढ़ता जा रहा था। ओवेन उसके तीव्रतर आकर्षण से शनैः-शनैः उस ओर घिसट रहा था। कुछ ही देर में उसके दोनों हाथ दरार में झूल गये। बहन भय से चीख उठी। चिल्लाहट सुनकर पास पड़ोस के लोक इकट्ठे होते और बचाने का कुछ उपाय सोचते, इससे पूर्व ही धरती उसे निगल चुकी थी। बहन सब कुछ असहाय बनी देखती रह गई। भीड़ जब जमा हुई, तब तक फर्श भी पहले जैसा जुड़ चुका था। और अब दरार का कोई निशान भी वहाँ शेष नहीं था।

एक अन्य घटना लिमिंगटन, इंग्लैंड की है। जेम्स वार्सन नामक एक मोची रहता था। वह बहुत मद्यपी था। जब शराब के नशे में होता, तो अपनी शारीरिक क्षमता का बहुत बढ़-चढ़ का बखान करता और अक्सर शक्ति -परीक्षण संबंधी अत्यन्त मूर्खतापूर्ण शर्तें रख देता।

एक दिन ऐसी ही हालत में उसने अपने एक मित्र से बाजी लगायी कि वह काँवेण्ट्री तक 40 मील की पूरी दौड़कर ही तय कर सकता है और फिर दौड़ते हुए ही वापिस भी लौट सकता है। शर्त के अनुसार दौड़ प्रारम्भ हुई उसके तीन मित्र गाड़ी पर पीछे-पीछे चल रहे थे। आरंभ की कुछ दूरी वार्सन ने बड़ी सरलता से तय कर ली। शरीर पर थकान के बिलकुल ही चिन्ह नहीं थे। वह बढ़ा जा रहा था। तभी अचानक वार्सन लड़खड़ाया गिरा, उसकी तेज चीख निकल गई, पर यह कहाँ अन्तर्धान हो गया। गाड़ी तुरन्त रोकी गई। तीनों मित्र उतरे, उस स्थान का निरीक्षण किया। वहाँ अब भी एक अत्यन्त छोटे व्यास का सुरंगनुमा छिद्र मौजूद था। उसमें निकट से आँख लगाकर देखा, कुछ दिखाई तो नहीं दिया, पर तीनों ने ही उसमें एक विचित्र प्रकार का खिचाव महसूस किया। उनके लिए सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि यदि वार्सन सचमुच ही पृथ्वी में समा गया था, तो उस जैसे डील-डौल वाले व्यक्ति का इतनी संकीर्ण सुरंग में प्रवेश कर जाना कैसे संभव हो सका? यह बात समझ में नहीं आ रही थी।

अवध नरेश भगवान श्री राम की धर्मपत्नी सीता माता का धरती में समा जाना भी ऐसी ही एक घटना ही तो है। लव-कुश से युद्ध के पश्चात् जब भगवान राम का परिचय अपने पुत्रों से आ, तो वे उन पर मुग्ध हुए बिना न रह सके। योग्य संतति का सारा श्रेय भगवान सीता को दे रहे थे। उधर सीता भी इस मिलन से मन-ही-मन हर्षित हो रही थीं कि “माँ। मैंने बहुत संताप झेले है। अब अपनी शरण में ले लो।” प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। धरती फटी और धरती पुत्री धरती की गोद में समा गई।

रसिक सन्त जयदेव के जीवन से सम्बन्धित एक घटना है। एक बार उन्होंने अपने श्रद्धालु शिष्य के आग्रह पर उसके गाँव की यात्रा की। शिष्य अत्यन्त समृद्ध और उदार था। वह जानता था कि विदाई के समय वे किसी प्रकार का धन स्वीकार न करेंगे। उनका परम धन तो गोविन्द है। फिर पद्मावती के लिए कुछ स्वीकार कर ले। सन्त शिष्य की बात अस्वीकार न कर सके। एक गाड़ी में बहुत सारी सम्पदा रख दी गई। गाड़ीवान और जयदेव चल पड़े। चलते-चलते वे एक घने वन में पहुँच गये। वहाँ चोरों ने उनकी सम्पत्ति लूट ली और उनके हाथ-पाद्द काटकर एक कुएँ में डाल दिये। जयदेव इसे भगवान का मंगल विधान समझ कर वहीं कीर्तन करने लगे। उसी समय राजा लक्ष्मणसेन की सवारी वहाँ से गुजर रही थी। संकीर्तन ध्वनि सुनकर वे कुएँ के निकट आये और जयदेव को बाहर निकाला अपने साथ ले गये। उपचार से जल्द ही उनके घाव सूख गये।

थोड़े दिन पश्चात् राजप्रासाद में एक भोज का आयोजन हुआ। इसमें साधु और भक्तगण आमंत्रित थे। ऐसी ही एक मण्डली में साधु वेशधारी वे चोर भी थे, जिन्होंने जयदेव की दुर्गति की थी। सन्त ने पहली ही दृष्टि में उन्हें पहचान लिया। उनके धनाभाव से द्रवित होकर जयदेव ने उन्हें प्रचुर सम्पदा देने का राजा से निवेदन किया। अच्छी आवभगत के उपरान्त बहुत-सा वैभव देकर उन्हें विदा किया गया। जयदेव ने उनकी रक्षा के लिए कुछ कर्मचारियों भी साथ कर दिये। रास्ते में उन कर्मचारियों ने साधुदेव वाले उन ठगों से जयदेव के विशेष अनुग्रह का कारण जानना चाहा। उन्होंने कहा-जयदेव इससे पूर्व एक राजा के मंत्री थे। राजा ने उनके एक बड़े अपराध पर उन्हें प्राण दण्ड दिया था, पर हमारी कृपा से जीवित बच गये। हमने केवल उनके हाथ-पैर बाँध कर, मारपीट कर छोड़ दिया। जयदेव हमारे आभारी है, इसलिए उन्होंने विदा के समय हमें विपुल धनराशि दिलाई। ठगों का इतना कहना था कि पृथ्वी फट गयी और वे दोनों उसमें समा गये। राजा ने इस सम्पूर्ण प्रकरण का रहस्य जयदेव से जानना चाहा। उन्होंने बताया कि धरती माता को क्यों हस्तक्षेप करना पड़ा।

पाप जब बढ़ जाता है, तो प्रकृति यदा-कदा ऐसा ही दण्ड पापियों का देती और उनके अवांछनीय भार से पृथ्वी को मुक्त कराती है। अनेक प्रकरणों में यह तथ्य समझ में तो आता है, पर अगणित प्रसंगों में यह अनसुलझी पहेली-सा बना रहता है कि कर्ता के सर्वथा पापमुक्त जीवन में भी ऐसे मामले क्यों कर देखने को मिलते है, जिनमें वह धरित्री द्वारा निगल लिया गया हो अथवा निगलने का प्रयास किया गया हो? इसके पीछे कोई सूक्ष्म निमित्त होना ही चाहिए, जिसे हमारी बुद्धि अभी जान नहीं सकी है ओर न विज्ञान उसे पहचान सका है। इसके लिए हमें सूक्ष्म की भूमिका में जाना पड़ेगा, तभी सत्य-तथ्य की सही जानकारी मिल सकेगी और यह जाना जा सकेगा कि प्रकृति अनगढ़ नहीं है, यहाँ सब कुछ सुव्यवस्थित सुनियोजित एवं किसी क्रम के अधीन है।


प्रतिभा और संकल्प शक्ति का केन्द्र -मन

प्रगति पथ पर होने के लिए अभावों ओर असुविधाओं से लड़ने के लिए प्रतिकूलताओं की अनुकूलताओं में बदलने के लिए न के वल साधन सामग्री की अभिवृद्धि आवश्यक है, वरन् यह और भी अधिक अभीष्ट है कि मानवी संकल्प शक्ति को बढ़ाया जाय। मात्र साधनों की बहुलता से तो मनुष्य विलासी और आलसी ही बनता चला जाएगा। इससे उसकी अकर्मण्यता, अशक्तता और अदक्षता ही बढ़ेगी। प्रगति के इतिहास में साधनों एवं परिस्थितियों का उतना योगदान नहीं है जितना कि विचारणा और आकांक्षा का हैं संकल्प इन्हीं के समन्वय को कहते है। संकल्प इन्हीं के समन्वय को कहते है। संकल्प इन्हीं के समन्वय को कहते है। संकल्प की प्रखरता ही प्रगति का पथ-प्रशस्त करती है। जहाँ इसकी कमी होगी वहाँ प्रगति का रथचक्र उतना ही अवरुद्ध एवं दलदल में फँसा दिखाई पड़ेगा।

विकासवाद के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में एककोशीय एवं बहुकोशीय जन्तुओं की शरीर रचना बहुत ही सरल थी। प्राचीनतम प्राणी “प्रोटोजोन्स “ वर्ग के थे। वे एक कोशीय थे। अमीबा, यूग्लीना, पैरामीसियम, वर्टीमेला का आरम्भ इसी रूप में हुआ था। पीछे उनमें संकल्प शक्ति जगी, वे सुरक्षा और सुविधा की आवश्यकता अनुभव करने लगे इसके लिए उन्हें पारस्परिक सहयोग का उपाय सूझा और उसके लिए वे सम्मिलित प्रयास करने में जुट गये। ‘बालकाक्स’ एवं ‘स्पंज’ वर्ग के जीव छोटे परिवार बनाकर रहने लगे। उनने मिल-जुल कर काम करने व्यवस्था बनायी। कर्तव्य और उत्तरदायित्व बाँटे। इनमें से कुछ आहार जुटाने में, कुद स्फथ्व्ध्ज्ञज्ञ स्मप्ज्ञछन् म्।, क्फद वयव्स्ज्ञिज्ञ संचालन में लग गये। आदिम काल की वर्ण व्यवस्था यहीं से आरम्भ हुई। सहयोग के आधार पर न केवल सुविधा बँटी, वरन् उनका निज का स्वरूप एवं अस्तित्व भी विकसित होता चला गया। एककोशीय जन्तुओं ने अपना काय कलेवर बहुकोशीय ‘मल्टी सेल्यूलर’ वर्ग के जन्तुओं में विकसित कर लिया। वे सरल से जटिल होते गये। इसी चेतनात्मक स्फुरणा को प्रकृति की मौलिक क्रिया माना गया है। विकास के मूल में यही तत्व काम कर रहा है। इसी को संकल्प शक्ति का चमत्कार भी कह सकते है।

एककोशीय जीवों की तुलना में बहुकोशीय जीवों की काया काफी समुन्नत, बनावट की दृष्टि से जटिल बनती गयी। स्पंज, हाइड्रा, जेलीफिश, कोरल, एनीमोन आदि बहुकोशीय जीवों की स्थिति तक पहुँचने पर भी उनके शरीरों में भोजन और मल विसर्जन के लिए एक ही छिद्र था। इन दो प्रयोजनों के लिए दो द्वार तो आगे चल कर बने। विकास का रथ इसी मार्ग पर बढ़ता चला गया। हड्डियाँ विकसित हुई, मेरुदण्ड बने, बिना खोपड़ी वाले जीवों के शरीर में मस्तिष्कीय चेतना की उपयोगिता देखते हुए खोपड़ी के मजबूत किले बनकर खड़े हो गये। जलचरों ने थल में रहना सीखा। उनमें से कुछ तो हवा में उड़ने की हिम्मत करने लगे। यही विकासक्रम उद्धिज, स्वेदज, अंउज, जरायुज प्राणियों के स्प में अग्रार हुआ। इसी मार्ग कोशीय जीवन वर्तमान स्थिति तक पहुँचा है।

विकास की इस प्रक्रिया के आधारभूत कारण खोजने में वैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंग से प्रयत्न किये है और अपने-अपने दृष्टिकोण, निष्कर्ष प्रस्तुत किये है। लेमार्क और ह्यूगोडिव्राइस जैसे विकासवादी वैज्ञानिकों ने इस सम्बन्ध में बहुत कुछ खोजा और बताया है। अपनी शताब्दी में चार्ल्स डार्विन ने बहुत ख्याति प्राप्त की है। प्रायः सभी प्रगतिशील देशों में इस संदर्भ में काफी खोजें हुई है। इन प्रतिपादनों में जीवतत्व को मात्र रासायनिक पदार्थ मानकर विज्ञानवेत्ता एक विचित्र उलझने में फँस गये है। ‘प्रोटोप्लाज्मा ‘ में काय कलेवर को बनाने और चलाने की क्षमता तो है पर क्रमिक विकास की ओर बढ़ सकने जैसी क्षमता उसमें किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होती। फिर विकास क्रम किस प्रकार निरन्तर अग्रसर होता चला आया?

नये वैज्ञानिक प्रतिपादनों के अनुसार प्रोटोप्लाज्मा के समतुल्य ही एक दूसरे जीवतत्व की सत्ता स्वीकार की गई है। वह है ‘ईडोप्लाज्मा’। वंश परम्परा में अब दोनों का समान योगदान माना जाने लगा है। ‘ईडोप्लाज्मा’ के संयोग से वह बात बनती है। यह दोनों तत्व एक नहीं है। उनकी सत्ता स्वतन्त्र है। वे एक दूसरे के पूरक भर है। यहाँ प्रोटोप्लाज्मा को पदार्थ सत्ता का और ईडोप्लाज्मा को चेतना का प्रतिनिधित्व करते हुए पाया जाता है।

मूर्धन्य जीव विज्ञानी ई. के. लैंकास्टर का कथन है-भौतिक जगत में चल रही हलचलों के साथ जीवन सत्ता का तालमेल नहीं बैठता। उस निरूपण के पक्ष में प्रस्तुत किये गये प्रतिपादन ओछे पड़ते है। जीवन का एक स्वतन्त्र विज्ञान होना चाहिए। पदार्थ विद्या के बटखरों से उसकी नाप तौल ठीक प्रकार से हो सकना सम्भव नहीं दीखता।”

पदार्थ में केवल अस्तित्व है। उसमें न तो जीवन है और न हलचल। वनस्पति में अस्तित्व के साथ-साथ जीवन भी है। प्राणियों में अस्तित्व, जीवन और अनुभूति तीनों है। किंतु विवेचना बुद्धि और स्वतन्त्र इच्छा की न्यूनता है। जीवन निर्वाह आवश्यकताओं के अनुरूप ही उनके चिन्तन की गाड़ी एक बनी बनायी पटरी पर लुढ़कती जाती है। मनुष्य की चेतना सुविकसित स्तर पर पहुँची हुई इसीलिए मानी जाती है कि उसकी संकल्प शक्ति, विवेचनात्मक क्षमता ने काफी प्रगति कर ली है जब कि अन्य जीवधारी शारीरिक दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक बलिष्ठ होते हुए भी चेतना की आणविक हलचलों में समानता हो सकती है। पर यह सम्भव नहीं दीखता कि पदार्थ कभी चेतन के समतुल्य प्रगति कर सकने में समर्थ हो सकेगा। जीवन को रासायनिक सिद्ध करने के प्रयत्नों से काम चलता न देखकर कोल्बिन, हैमरीज, किचनर, अरर्हेनिस आदि वैज्ञानिकों ने अपने-अपने शब्दों में यह कहा है कि” जीवन किसी अन्य लोक से भूलता-भटकता पृथ्वी पर आ पहुँचा है, पर वह है पदार्थ से भिन्न।

पास्टयूर और टैण्डल ने कहा है-जीवन पदार्थ से नहीं जीवन से ही उत्पन्न होता है, हो सकता है।” विकास-इतिहास की पृष्ठभूमि का पर्यवेक्षण करते हुए वे कहते है-आदिम काल में “सैल’ किसी दबाव से नहीं स्वेच्छा से वंश−वृद्धि करते थे। पीदे वे नर और मादा के रूप में बँट गये। संयोग का आनन्द लेना और उत्तरदायित्व संभालना शुरू किया। ऐसी-ऐसी अनेक उलट-पुलट करते -करते जीवधारी वर्तमान स्थिति तक बढ़ते चले आये है।

आइन्स्टीन कहते थे-” अणु सत्ता पर किसी अविज्ञात चेतना का अधिकार और नियन्त्रण है। पदार्थ मौलिक नहीं है उसका उद्भव चेतना की प्रतिक्रिया से ही संभव हुआ है। आज यह तथ्य प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं होते तो भी मेरा विश्वास है कि आज न सही कल यह सब सिद्ध होकर ही रहेगा।”

जीवन का मूल स्वरूप उसकी चिन्तन स्फुरणा के साथ जुड़ा हुआ है। विचारणा और आकाँख के समन्वय से जो संकल्प उठता है, उसी में प्रगति की समस्त संभावनाएँ सन्निहित है। विकासवादी प्रगति पर दृष्टिपात करने पर हमें किसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। एक जैसी परिस्थितियों में रहने पर भी एक की प्रगति, दूसरे की यथास्थिति और तीसरे की अवगति का अन्तर देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि संकल्प शक्ति की न्यूनाधिकता का ही प्रभाव है। साधनों के अभाव में भी आगे आगे बढ़ते है। सहयोग के बिना भी प्रगति करते है। इसके पीछे उनकी प्रखर संकल्पशक्ति ही काम करती है। संकल्प ही मानव जीवन की सर्वोपरि शक्ति है। उसके सहारे सामान्य स्थिति से आगे बढ़कर असामान्य स्तर तक पहुँचा जा सकता है। प्रगति का मूलतन्त्र ‘संकल्प ‘ को मानकर चला जाय और सर्वप्रथम उसी के उपार्जन, अभिवर्धन का प्रयत्न किया जाय तो यह निश्चित रूप से व्यावहारिक एवं बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयास माना जायगा।

वस्तुतः मनःसंस्थान ज्ञान, अनुभव एवं कौशल का ही नहीं प्रती का भी क्षेत्र है। उत्कृष्टता के प्रति आस्था के बीज भी इसी भूमि में जमते है। संकल्प शक्ति का उद्भव केन्द्र यही है इस संदर्भ में हृट मेक्स ए लाइफ सिग्नीफिकेण्ट’ नामक पुस्तक में सुप्रसिद्ध मनः शास्त्री विलियम मोक्स ने कहा है कि मन के भीतर अतिमानवी सामर्थ्य विद्यमान है, जिन्हें करतलगत कर सकना हर किसी के लिए संभव है। इसका आरम्भिक क्रियात्मक चरण है-ढर्रे की गतिविधियों को उलटने तथा दूरदर्शिता युक्त महानता के मार्ग का अवलम्बन करने के लिए अपने संकल्पों को परिपुष्ट तथा दृढ़ करना-इच्छा शक्ति को प्रखर बनाता है। संकल्प की दृढ़ता पशुवत् अभ्यस्त स्वभावों से छुटकारा पाने तथा आत्मविजय प्राप्त करने का प्रमुख आधार है। इसका सम्पादन तथा अभिवर्धन निरन्तर के अभ्यास से संभव है।, जो जितना अधिक संकल्पवान है वह उतना ही अधिक संकल्पवान है। वह उतना ही अधिक समर्थ है। प्रगति के विकास का यहीं सुनिश्चित मार्ग है।

मानवी संकल्पशक्ति की क्षमता असीम है। उसको जागृत करना और सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त कर सकना संभव हो सकता है। योगवाशिष्ठ में कहा गया है-

फलं ददाति कालेन तस्य-तस्य तथा तथा-तपोवा देवता वापि भूतवा स्वैव चिदन्पथा। फलं ददात्पथ स्वैरं नभः फल पिनातवत्।

कहने का तात्पर्य यह है कि जीव अपनी इच्छा से संकल्प शक्ति से ही देवता, तपस्वी बनता रहता है। प्रगति और अवनति का आधार मनुष्य का अपना कर्तृत्व ही है।


अमरत्व सृष्टि के नियमों के विपरीत

लोग पागल कहते है वैद्यराज चिन्तामणि को, यद्यपि सबको यह स्वीकार है कि उनके हाथ में यश है। नाड़ीज्ञान में अद्वितीय है और उनके निदान में धूल नहीं हुआ करती। वे जब चिकित्सा करते है मरते को जीवन देते है; किन्तु अपने पागलपन से उन्हें जब अवकाश मिले चिकित्सा करने का।

इतना निपुण चिकित्सक-दसके हाथ में लोहे को सोना करने वाली विद्या थी। वह अपना व्यवसाय किए जाता -लक्ष्मी पैर तोड़ उसके घर बैठने को प्रस्तुत कब नहीं थी; लेकिन पता नहीं कहाँ से एक जटाधारी साधु आ गया उनके यहाँ। उसके दिए ताड़पत्रों में क्या लिखा है। कोई कैसे बताए। वैद्यराज प्राणों के साथ उन्हें चिपकाए फिरते है। घर की जमा पूँजी भी इसमें फूंक गई। धुन चढ़ी है इन्हें पारद भस्म बनाने की। घर आता सोना छोड़कर स्वप्न के सोने के पीछे अपना घर भी फूँक डाला।

उनसे कोई पूछे, समझाए तो हँस देते है। सारे संसार को मूर्ख मान लिया है उन्होंने। अब उन्हें अमर बनने की समन चढ़ी है। बहुत उम्रग में होंगे तो अपने उन सड़े-गले ताड़पत्रों के एक-आ श्लोक बोल देंगे। यूँ ऋषियों मुनियों की बातों पर हमें सन्देह नहीं करना चाहिए; किन्तु ये बातें ऋषियों के योग्य है। इनका रहस्य वे ही जानते थे। ऐसी बातों में पड़ने की इस समय कोई जरूरत नहीं।

आज बारह वर्ष तो हो गए चिनतागणि को। क्या पाया उन्होंने? कितने माशे स्वर्ण बना सके। अब तक अपने काम में लगे रहते तो सोने का महल बना लेते। मोटर की कौन कहे-हवाई जहाज पर चलते। लेकिन उनकी सनक जो ठहरी जिसकी वजह से बच्चे भूख के मारे पड़ोसियों के घर चक्कर काटते है। पण्डितानी की साड़ी में पेबन्द लगते हैं। लोग-ब्राह्मण समझकर अन्न पर न पहुँचा दिसर करें तो चूल्हें में कभी रोटी न सिकें।

इस सब कुछ के बावजूद उन्हें अवकाश नहीं। आज नर्मदा किनारे जाने को टिकट कटा रहे है। और कल-हरिद्वार या कामरूप को। इतनी लम्बी यात्रा करके, इतना कष्ट उठाकर जब लौटेंगे शरीर सूखकर काँटा हुआ मिलेगा। लायेंगे कुछ घास-फूस और उनकी बातें सुनो उस समय तो लगेगा जैसा संसार का सारा खजाना लूट लाए हों, इस बार वह किसी को बताकर नहीं गए, केवल चले गए घर से। इस बार अकस्मात् चले गए घध्र से बिना किसी से कुछ कहें और अब महीना बीत गया, घर वालों को उनका कोई समाचार नहीं।

इधर वह गिरनार के शिखरों के पास खड़े कुछ सोच रहे थे। गिरनार के शिखरों की चढ़ाई आज भी सुगम नहीं है। यद्यपि श्रद्धालु सम्पन्न जनों ने सीढ़ियाँ बना दी हैं, फिर भी दत्त शिखर तक पहुँचते-पहुँचते जितनी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती है, कौन हाँफ नहीं जाएगा। उससे पर्याप्त आगे वह महाकाली शिखर-दूर से ही उसे प्रणाम कर लिया जाता है। कोई अत्यधिक साहस करे तो भी उसे रात्रि गौरव शिखर पर व्यतीत करनी चाहिए। और प्रातः भगवान् दत्तात्रेय की पादुका का वंदन करते आगे बढ़ना चाहिए। इसी प्रकार वह महाकाली की गुफा में उनके श्री चरणों ते पहुँच सकता है।

महाकाली शिखर तक कदाचित् ही कोई यात्री पहुँच पाता है। इससे अधिक एकान्त चाहिए तो फिर कहीं शेर की माँद चुननी होगी। वैसे शेर तो आते है। -गिरनार के पद प्रानत तक। यह महाकाली गुफा तो उनके क्रीड़ा क्षेत्र में है। सिंह वाहिनी के भवन में सिंह न आवे तो आवेगा कहाँ।

आजकल वैद्यराज चिन्तामणि आ बैठे है, महाकाली गुफा में। गौरवर्ण तनिक दुहरा देह जिस पर झुर्रियाँ पड़ती है। मस्तक के समस्त केश उज्ज्वल बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी मूंछें; किन्तु वह साधु नहीं हुए है। उनके शरीर पर एक कुर्ता है मैला-सा और कमर में फैली धोती है। सम्भवतः यात्रा ने उनके वस्त्र मैले कर दिए है और यहाँ उन्हें स्वच्छ करने को साबुन कहाँ से पायें वह। उसके पास एक लोटा है, एक कम्बल है बिछाने को एक चद्दर हैं बहुत सीमित सामग्री है उनके साथ।

पास के स्रोत में स्नान कर लेते है और लोटे के जल से जगदम्बा की मूर्ति को भी स्नान करा देते है। इसी को कोई पूजा कहता होता तो कह ले। क्योंकि पूजा का और कोई उपकरण उनके पास नहीं हैं आज सात दिन उसे यहाँ आए हो गए। ये सात दिन उन्होंने केवल समीप के स्रोत के जल पर काटे है। अब चाहें तो भी शरीर में इतनी शक्ति नहीं कि गिरनार की चढ़ाई पार करके गोरख शिखर तक भी पहुँच सके।

‘वहाँ शेर आते है। सन्ध्या से पहले गोरख-शिखर लौट आना।’ सात दिन पूर्व जब वह जूनागढ़ से चले थे, उनका विचार जानकर एक स्थानीय सज्जन ने उन्हें सावधान किया था। उन्होंने काई उत्तर नहीं दिया था। लौट जाने के लिए तो वह आए नहीं थे। सिंह वाहिनी की शरण में जो पड़े है उसे शेर कैसे खा जाएगा। आज सातवीं रात्रि प्रारम्भ हुई है। पिछली छः रात्रियों में तो उन्होंने शेर को देखा भी नहीं। वैसे वन में वन पशु की दहाड़ आती है।, इसमें अद्भुत क्या है?

आज उन्हें स्नान करने में कष्ट हुआ है।अब उठने में चक्कर आता हैं चलते समय आँखों के आगे अन्धकार छा जाता है। कदाचित् कल स्रोत तक खिसककर जाना पड़े। अन्न में प्राण है इस युग में और सात दिन से वह केवल जल पीकर रहता रहा है।

माँ! जगज्जननी! यदि मैं अधिकारी नहीं हूँ तो मुझे तुमने इधर क्यों आकृष्ट किया? आज वह जगदम्बा की मूर्ति के सम्मुख घुटने टेके बैठा है रात्रि के प्रहर से ही ‘ अब मैं यहीं से जाने वाला नहीं हूँ। शरीर यही छूटेगा। भगवान दत्त को मैं कहाँ ढूँढूँ। तुम सर्वेश्वरी हो, सर्वशक्तिमयी हो और यहाँ गिरनार की -दत्त के आराम की अधिष्ठात्री होकर बैठी हो। मैं तुम्हें ब्रह्महत्या देकर मरूँगा। कपालिनी! इस ब्राह्मण का कपाल तुम्हारी मुण्डमाला में रहकर भी तुम्हें कोसता रहेगा।

ब्राह्मण का कपाल तुम्हारी मुण्डमाला में रहकर भी तुम्हें कोसता रहेगा।

ब्राह्मण अपनी हठ पर उतर आया था। उसका परम बल है अनशन और वह अनशन किए बैठा था जगद्धात्री जगदीश्वरी के द्वार पर उस द्वार पर जहाँ से कोई कभी निराश नहीं लौटा। पागल ब्राह्मण -अरे माँ के यहाँ अनशन की क्या आवश्यकता? जहाँ सहज स्नेह से माँ से से कुछ भी माँग लिया जा सकता है, अपनी अश्रद्धा से आकेल विश्वस्त ब्राह्मण वहाँ अनशन किए बैठा है।

‘हैं!’ मरण इतना सरल नहीं है। ब्राह्मण भय से चौंक पड़ा। उसे लगा कि गुफा में शेर आ गया है और वह पीछे से उसे सूँघ रहा है। उसने चौक कर पीछे देखा कुत्ता केवल एक कुत्ता था उसके समीप। सिर से पैर तक काला सुपुष्ट कुत्ता और वह अब भी पूँछ हिलाता ब्राह्मण को स्नेह पूर्वक सूँघे जा रहा था। जैसे वह प्रयत्न रहा था पहचानने का कि यह व्यक्ति उसका कोई परिचित है या नहीं।

‘कुत्ता! यहाँ! इस मय अर्धरात्रि में! ब्राह्मण उस तगड़े सुन्दर काले कुत्ते को इस प्रकार देख रहा था जैसे कोई अद्ीत प्राणी देख रहा हो कैसे आया यह? मुझे क्यों सूँघ रहा है? भौंकता क्यों नहीं?

ब्राह्मण को अधिक सोचते रहने का अवसर मिला नहीं। कुत्ता उसके कुत्ते का छोर मुख में लेकर बार-बार खींचने लगा था। ब्राह्मण को लगा वह कुछ कर रहा है। ‘क्या चाहते हो तुम? कहाँ ले चलना चाहते हो मुझे? तुम्हारे साथ चलूँ?

वह किसी प्रकार उठ खड़ा हुआ। कुत्ते ने कुर्ता छोड़ दिया और आगे-आगे चलने लगा। अब ब्राह्मण ने उसका अनुगमन करना स्वीकार कर लिया था।

कुछ देर बाद उसने देखा धवल चाँदनी के उजाले में नहायी स्वच्छ शिला पर जल स्रोत के समीप एक ज्योतिर्मयी मूर्ति आसीन थी। दो कुत्ते शिला से नीचे बैठे थे। तीसरा भी ब्राह्मण को कुछ दूर छोड़कर दौड़ आया था। और उनके पास ही शान्त बैठ गया था। ब्राह्मण की दृष्टि गयी उधर धन्य हो गया जीवन। प्राणिपात करते वह धरती पर गिर पड़ा। कुछ क्षण लगे आश्वस्त होकर उठने में। प्रभु के संकेत पर वह शिला के समीप श्रद्धाञ्जलि बैठ गया था। प्रभु अपने मुघ गम्भीर स्वर में कह रहे थं -”अक्षीणवासन सत्पुरुष अपनी साधना से सृष्टि में सत्वगुण को सुरक्षा देते रहे, उनका संकल्प लोक मंगल का विस्तार करे इसलिए मैंने रस सिद्धि का प्राकट्य किया। “

‘यह क्षुद्र आज्ञा का अनुवर्तन करेगा।’ किसी प्रकार ब्राह्मण कह सका।

‘आज्ञा के अनुवर्तन का बात नहीं भगवान दत्तात्रेय प्रशान्त बने थे। ‘रससिद्धि किसी की किसी कामना की पूर्ति का साधना नहि। वह सृष्टि का निगूढ़ रहस्य है और केवल उन सिऋद्ध सत्व अधिकारियों के लिए है, जिनका ‘अहं’ सर्वात्मा को अर्पित हो चुका है।

‘श्री चरणों के समीप आकार भी मैं अभागा ही रहूँगा।’ वह क्रन्दन कर उठा। अच्छा तुम देखो! प्रभु की अर्धोन्मीलित दृष्टि एक बार उठ गयी ब्राह्मण की ओर।

हे भगवान! कुछ क्षण में वह चीत्कार कर उठा। वह क्या देख रहा है- उसकी स्त्री मर गयी, पुत्र वृद्ध हुए और मर गए। पौत्र मरणासन्न पड़ा है.............उसके कुल में कोई नहीं रहा। कोई नहीं रहा उसके परिचितों में। वह जिससे स्नेह करता है, वह मर जाता है मृत्यु-मृत्यु! आज यह कल वह परसों-तीसरा वर्ष जैसे छोटे हो गए। उसे रोना केवल मरने वालों के लिए रोना रह गया है। क्यों जीता रहे किसके लिए? अमरत्व का प्रसाद मिला है रुदन। चिल्ला उठा वह नहीं चाहिए ऐसा रुदन।