काश! मनुष्य “जीवन देवता” के स्वरूप को समझ पाता

मनुष्य जीवन ईश्वरीय सत्ता की एक बहुमूल्य धरोहर है, जिसे सौंपते समय उसकी सत्पात्रता पर विश्वास कर ही, उसे यह दिया गया मनुष्य के साथ और जीवधारियों की तुलना में यह कोई पक्षपात नहीं है, वरन् ऊँचे अनुदान देने के लिए यह एक प्रयोग परीक्षण मात्र है। अन्य जीवधारी शरीर भर की बात सोचते और क्रिया करते हैं, किन्तु मनुष्य को स्रष्टा का उत्तराधिकारी युवराज होने के नाते अनेकानेक कर्तव्य और उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते हैं। उसी में उसकी गरिमा और सार्थकता है। यदि पेट-प्रजनन तक, लोभ-मोह के साथ अहंकार और जुड़ जाने पर तो बात और भी अधिक बिगड़ती है। महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए उभरी अहमन्यता अनेकों प्रकार के कुचक्र रचती और पतन-पराभव के गर्त्त में गिरती है। अहंता से प्रेरित व्यक्ति अनाचारी बनता है और आभ्रमक इन्द्र भी। ऐसी दशा में उसका स्वरूप और भी भयंकर हो जाता है। दुष्ट-दुरात्मा एवं नरपिशाच स्तर की आसुरी गतिविधियाँ अपनाता है। इस प्रकार मनुष्य जीवन जहाँ श्रेष्ठ सौभाग्य का प्रतीक था, वहाँ वह दुर्भाग्य और दुर्गति का कारण ही बनता है। उसी को कहते हैं वरदान को अभिशाप बना लेना। दोनों ही दिशाएँ हर किसी के लिए खुली हैं। जो इनमें से जिसे चाहता है, उसे चुन लेता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप जो है।

मनुष्य ने अपने लिए इष्ट-उपास्य भी बहुत से चुन रखे हैं। किन्तु यदि वह एक ही देवता-इष्ट-उपास्य जीवन देवता की अभ्यर्थना सही रूप में कर ले तो इस कल्पवृक्ष के नीचे वह सब कुछ उसे प्राप्त हो सकता है जिसकी कहीं अन्यत्र संप्राप्त होने की आशा लगायी जाती है। जीवन देवता को परिष्कृत आत्मा या परमात्मा की अनुकृति भी कह सकते हैं। परब्रह्म की सारी क्षमताएँ ऋद्धि-सिद्धियाँ इस काय-कलेवर में समाई हैं। यदि उन्हें जगाया जा सके तो मनुष्य योगी, ऋषि मनीषी, महापुरुष, सिद्ध पुरुष जैसी विभूतियों से सम्पन्न हो सकता है। इस जीवन देवता की साधना से मनुष्य को सभी महासिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। कस्तूरी के हिरण की तरह मनुष्य अपने आप को महानता के मूल केन्द्र नाभिक को बाहर खोजता फिरता है। एक बार वह अपने भीतर झाँक कर उसे अपने अंतःकरण में देख ले तो उसे इस इष्ट सत्ता का दिव्य दर्शन हो जाएगा जो उसे महानता की श्रेष्ठतम ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। जिस दिन यह हो जाता है, उस दिन मनुष्य के सौभाग्य का द्वार खुल जाता है। इसी दिन की प्रतीक्षा सतत् भगवान को भी बनी हुई है।


एक विलक्षण पारितोषिक

कश्मीर के सुल्तान जैनालुद्दीन का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। उनके शरीर में एक फोड़ा निकल आया। कितने ही चिकित्सकों ने उसे देखा, इलाज किया, पर लाभ बिलकुल न हुआ। सुल्तान का कष्ट बढ़ता जा रहा था। अनेक उपचारों के बाद भी फोड़ा-घटने और ठीक होने का नाम ही न लेता था।

असहनीय पीड़ा से सुल्तान कराहता रहा। अब किसी को उसके जीवन की आशा न रही। राज्य की हिन्दू जनता पर अत्याचार करने वाला सुल्तान अब मृत्यु की तैयारी कर रहा था। एक दिन श्रीबट्ट नामक कश्मीरी वैद्य ने सुल्तान के पास सन्देश भेजा “सेवक को भी चिकित्सा करने का एक अवसर प्रदान कीजिए। मैं भी आपके राज्य का निवासी हूँ और आयुर्वेद का साधारण ज्ञान रखता हूँ।

सुल्तान को उसे अपने स्वस्थ होने की तनिक भी आशा न थी, फिर भी श्रीबट्ट को उसने बुलवाया। सोचा कभी-कभी जड़ी-बूटियों की साधारण सी दवाइयाँ चमत्कार दिखा जाती है। अतः श्रीबट्ट को दिखाने में भी क्या हानि है। उन्हें सुल्तान के सम्मुख पेश किया गया। उन्होंने बड़ी बारीकी से फोड़े के कारणों को जानने का प्रयास किया, विभिन्न चिकित्सकों द्वारा किए गए इलाज का पता किया और अन्त में बड़े विश्वास के साथ प्रयोग करने के लिए कई औषधियाँ दीं।

एक सप्ताह के उपचार के पश्चात् घाव से मवाद निकलना बन्द हो गया। पीड़ा में भी कमी आ गई। इलाज निरन्तर चलता रहा, लगभग एक महीने में वह फोड़ा ठीक हो गया। जो सुल्तान हर समय अशान्त और दुःखी रहता था, अब सुख की नींद सोने लगा। शाही चिकित्सक श्रीबट्ट से ईर्ष्या करने लगे, पर सुल्तान उसके इस जादू से बहुत प्रभावित हुए। किसी को आशा भी न थी कि सुल्तान कभी राज दरबार में जा सकेगा। स्वस्थ होने पर वह दरबार में आया और उसने सर्व प्रथम अपने जीवन दाता वैद्य श्रीबट्ट की प्रशंसा की।

डस समय श्रीबट्ट भी वहीं उपस्थित थे। दरबारियों के सम्मुख सुल्तान ने मुँह माँगा इनाम देने का वचन दिया, पर श्रीबट्ट टस से मस न हुए। उस गरीब को धन सम्पदा के प्रति तनिक भी लगाव न था, वह माँगता भी क्या? दरबारियों को ही नहीं सुल्तान को भी उसकी त्याग वृत्ति पर आश्चर्य हुआ। उसने कभी ऐसा निःस्वार्थ तथा सेवा भावी व्यक्ति देखा न था।

सुल्तान की बातें सुनकर श्रीबट्ट के मन में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न हुआ। वह तो मौन हो सुल्तान की सब बातें सुनते रहे। उन्होंने सोचा कहीं ऐसा न हो कि मेरे मौन रहने का दरबारियों द्वारा गलत अर्थ लगाया जाय, अतः उन्होंने अपनी बात कहना उचित समझा। उन्होंने सुल्तान को सम्बोधित करते हुए कहा-बादशाह मैं ब्राह्मण हूँ, मेरी आवश्यकताएँ बहुत कम हैं। जीविकोपार्जन के लिए थोड़े धन की आवश्यकता पड़ती है। ईश्वर की कृपा से उसकी व्यवस्था हो ही जाती है। मुझे धन, स्वर्ण या अन्य किसी प्रकार की सम्पत्ति की आवश्यकता नहीं।”

सुल्तान को समझते देर न लगी कि श्रीबट्ट कुछ और कहना चाहते है। सम्भवतः संकोचवश अपनी बात नहीं कह पा रहे हैं। अतः सुल्तान ने पुनः निवेदन किया-” आपने मुझे जीवन दान दिया है, मैं आपका ऋणी हूँ, अतः मेरा आपसे यही आग्रह है कि अपनी बात स्पष्ट रूप से कह दें।

“नरेश! यदि आप मुझे पुरस्कृत करने पर ही तुले हैं, तो मेरी कुछ बातें मान लीजिए, यही आपके द्वारा सबसे बड़ा उपकार होगा।”

“कहिए! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। आप विश्वास तो रखिए।”

“आपकी नीतियों से असंतुष्ट होकर कितने ही हिन्दू कश्मीर छोड़कर अन्यत्र चले गए हैं। अब तो आपके राज्य में हिन्दुओं के केवल 11 परिवार ही निवास कर रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि सभी हिन्दुओं को वापस बुला लिया जाय और उनके साथ भी वैसा ही बर्ताव किया जाय जैसा कि मुस्लिम जनता के साथ किया जाता है। हिन्दुओं को अपने धर्म के अनुसार कर्म करने, वेशभूषा पहनने तथा बच्चों को शिक्षा देने की सुविधा प्रदान कीजिए। आपके लिए तो राज्य के सभी नागरिक समान होने चाहिए।”

श्रीबट्ट की प्रत्येक बात स्वार्थ रहित थी। उसने अपने लिए सुल्तान से कुछ नहीं माँगा था। इसलिए उसकी धर्म और जाति के प्रति निष्ठा को देखकर दरबारियों को भी आश्चर्य हुआ। सुल्तान पहले ही श्रीबट्ट को आश्वासन दे चुका था, अतः उसने सभी बातें मानकर हिन्दू और मुसलमान दोनों के प्रति समभाव रखना शुरू कर दिया। अब वह हिन्दू-विद्वानों का भी आदर करने लगा था। उसने श्रीबट्ट से गीत गोविन्द, तथा योग वशिष्ठ जैसे ग्रन्थ भी सुने। अनेक तीर्थ स्थानों की यात्रा भी की। सुल्तान के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने का सारा श्रेय श्रीबट्ट की निस्वार्थ वृत्ति एवं सेवापरायणता को था।

आज के परिप्रेक्ष्य में यदि देखें तो ऐसे ही जैनालुद्दीन एवं श्रीबट्ट यदि पुनः मानव में जग उठें तो सारी समस्याएँ देखते-देखते दूर होती चली जायेंगी।


एक ही समस्या और उसका एक ही समाधान

भाग्यवादी लोग मनुष्य के सामने प्रस्तुत व्यक्तिगत और सामूहिक कठिनाइयों का कारण खोजते समय मानते है कि नक्षत्रों की गति, विधि-विधान प्रकृति की परिस्थितियाँ विपरीत हैं। इसी से कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। ग्रह नक्षत्र और विधि-विधान को न मानने वाले लोग भी आसन्न संकटों और विपदाओं के लिए प्रकृति की प्रतिकूलता को दोषी ठहराते हैं और सुविधाएँ बढ़ने की स्थिति में प्रकृति की अनुकूलता को धन्यवाद दिया जाता है। ऐसा होता तो है परन्तु अपवाद स्वरूप ही क्योंकि मनुष्य की विलक्षणता बुद्धि प्रकृति की प्रतिकूल परिस्थितियों से बच निकलने तथा अनुकूलता उत्पन्न करने का मार्ग खोज लेती है।

प्रश्न उठता है कि भली-बुरी परिस्थितियों के लिए प्रकृति जिम्मेदार नहीं है तो फिर कौन से कारण हैं जो ये उतार-चढ़ाव प्रस्तुत करते हैं जो? इसका उत्तर एक ही है मनुष्य का चिन्तन और उसके प्रयास। जो शक्ति प्रकृति को अपने अनुकूल बना सकती है, वही मनुष्य के लिए संकट भी उत्पन्न कर सकती है। प्राकृतिक कारण एक सीमा तक ही प्रतिकूलताएँ उत्पन्न करते हैं लेकिन आदिकाल से अब तक के इतिहास का प्रगतिक्रम प्रमाणित करता है कि मनुष्य उनसे हारता नहीं है। यह बात अलग है कि वह प्रकृति पर विजय प्राप्त न कर सका हो पर उत्पन्न परिस्थितियों से तालमेल बिठा कर अपनी सुरक्षा अवश्य कर लेता है।

प्रकृति की प्रतिकूलता, जमाने का दोष, कलियुग का दौर और भाग्य का चक्र आदि कारण बता कर अपने मन को समझाया ही जा सकता है, उनसे कुछ समाधान नहीं मिलता। राजनीति, धर्म-दर्शन धन, शक्ति आदि को भी वर्तमान परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है पर यह नहीं कहा जा सकता कि जनमानस उससे सर्वथा निर्दोष है, उसका कोई दोष नहीं। किसी भी क्षेत्र में कोई मूर्धन्य व्यक्ति उभर कर आते हैं तो वे कोई आकाश से नहीं उतरते। उसी समाज में वे पैदा होते है, जिसकी स्थिति के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाता है। उस समाज का, जनमानस का स्तर ही प्रतिभाएँ उत्पन्न करता और उन्हें दिशा देता है।

व्यक्ति अपने आप में पूर्ण हैं उसमें अनंत संभावनाएँ बीज के रूप से विद्यमान हैं। उनको उभरने पर व्यक्तित्व का स्तर बनता है और इस आधार पर विनिर्मित प्रतिभा अपना चमत्कार प्रस्तुत करती है। मूर्धन्य प्रतिभाओं के उभरने और पुरुषार्थ द्वारा उन्हें दिशा अपनाने का यही तत्त्वज्ञान है। परिस्थितियों का दोषी ठहराने या श्रेय देने के लिए तो किसी को दोषी अथवा श्रेयांसि ठहराया जा सकता है लेकिन यदि वास्तविक कारण ढूँढ़ना, तथ्य की जड़ तक पहुँचना हो तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि व्यक्ति की अंतःस्थिति ही प्रगति या अवगति के लिए उत्तरदायी है। वर्तमान युग की विषम परिस्थितियों को बदलने की आवश्यकता जिन्हें अनुभव होती हैं। उन्हें मूल कारण तक पहुँचाना पड़ेगा अन्यथा सूखते-मुरझाते पेड़ को हरा बनाने के लिए पत्ते सींचने और जड़ की उपेक्षा करने जैसी गलती होती रहेगी।

प्रत्यक्ष को ही मानने वाले मनुष्य कर्मों को ही उसकी परिस्थितियों का कारण मानते हैं लेकिन जो गहराई तक सोच-समझ सकते हैं वे जानते है कि शरीर तो जड़ पदार्थ का बना हुआ है। वह उपकरण मात्र है। उसमें क्रियाशीलता तो है पर यह विवेक नहीं कि क्या करें और क्या न करें। यह निर्णय निश्चय तो मन को ही करना होता है। शरीर मन का ही आज्ञानुवर्ती और सेवक मात्र होता है मन जैसा कहता है और आदेश देता है, शरीर वैसा ही करने लगता है। अच्छी बुरी आदतें व्यक्त रूप में शरीर के अभ्यास से जुड़ी प्रतीत होती हैं पर सच्चाई यह है कि गुण, कर्म और स्वभाव का सारा ढाँचा मन में विद्यमान रहता है।

व्यक्तित्व का आधारभूत केन्द्र मन से भी आगे है। उस परत को, व्यक्तित्व के मूल मर्मस्थल को आस्था का केन्द्र-अन्तःकरण कहा जा सकता है। यही से भाव संवेदनाएँ उठती हैं। रुचि और इच्छाओं का यहीं पर निर्माण होता है। सामान्य बुद्धि से शरीर द्वारा अपनाये जाने वाले क्रिया कलाप भी भली-बुरी परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी होते है। सूक्ष्म दृष्टि रखने वाले इससे आगे तक खोजते है और मानसिक स्तर को, विचार न्यास को, इसके लिए महत्व देते है। प्रज्ञा इससे भी आगे तक पहुँचाती है और यह परिस्थितियों के लिए विचारणाओं को और कार्यों को एक सीमा तक ही उत्तरदायी मानते हैं। उसका अन्तिम निर्णय निष्कर्ष विवेचन यह होता है कि अन्तःकरण का स्तर ही विचारों के समुच्चय में से अपने लिए अनुकूल विचार अपनाता है और उससे आन्तरिक उमंगें उठती है। काया की किसी दशा विशेष को विचारणा एवं क्रियाशीलता ही प्रभावित करते हैं। व्यक्ति जो कुछ सोचता या करता है वह सब कुछ आस्थाओं एवं आकांक्षाओं के उत्पत्ति केन्द्र अन्तःकरण का ही निर्देश होता है।

सामान्यतः सभी के लिए एक सी परिस्थितियाँ होती है। साधन सुविधा के अवसर किन्हीं-किन्हीं को ही उत्तराधिकार या विरासत में मिल पाते हैं पर आमतौर पर सारा उपार्जन मनुष्य की आँतरिक अभिरुचि के अनुरूप होता है। चुम्बकत्व का यही उद्गम केन्द्र अपने अनुरूप साधनों, विचारों और व्यक्तियों को आकर्षित करता है। इसे व्यक्तित्व की वास्तविक पूँजी या कुँजी कहा जाना चाहिए। कहा तो यह जाता है कि जो जैसा सोचता है वह वैसा ही बनता है पर वास्तविकता यह है कि जिसकी जिस स्तर की आकांक्षा होती है उसे उसी स्तर के विचार सुनने या अपनाने पड़ते हैं। मन में जो विचार जम जाते हैं वे ही शरीर को अपनी मन मर्जी के अनुसार मशीन की तरह चलाते और उपकरणों की तरह घुमाते हैं श्रुति में इसी तथ्य का उद्घाटन करते हुए कहा गया है- ‘श्रद्धामयोऽयं पुरुषः यो यच्छुद्धः स एव सः’ अर्थात्-व्यक्ति श्रद्धा होती है उसका स्तर ठीक उसी के अनुरूप हो जाता है।

कौन से साधन खोजें जाएँ? किन व्यक्तियों से सम्पर्क किया जाय? किस परिवेश में रहा जाय और कैसा वातावरण अपनाया जाय इसका अन्तिम निर्णय बाहरी लोग नहीं करते। ऐसा परामर्श संगति से वातावरण से होता भर दिखाई देता है, अपितु वस्तुतः मनुष्य का ‘स्व’ जो उसके अन्तराल में विद्यमान रहता है, वही इसका निर्णय या निर्धारण करता है। मन और शरीर तो स्वामिभक्त सेवक की तरह अन्तःकरण की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उसका आदेश पालन करने में जुट जाते है।

यही कारण है कि एक ही परिस्थितियों में जन्मे और पले दो व्यक्ति एक जैसा अवसर उपलब्ध रहने पर भी अलग-अलग दिशा में चलते हैं तथा ऐसे परिणाम प्राप्त करते है जिनमें उन दोनों के बीच आकाश पाताल जैसा अन्तर दिखाई देता है। इस अन्तर का कारण उन दोनों व्यक्तियों की आस्था है, जो उन्हें उसी तरह से सोचने, समझने और करने के लिए विवश करती है जिससे वे अपनी आस्थाओं के अनुरूप भली-बुरी परिस्थितियों में धकेल देती है। तत्त्वदर्शी मनीषियों का यह निष्कर्ष अक्षरशः-सही है कि अन्तःकरण ही व्यक्तित्व है तथा आस्थाएँ ही चिंतन और चरित्र की दिशा धारा निर्धारित करती हैं। कौन कैसे जिया है तथा किसे कैसी परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है। इसका कारण उसके अन्तः कारण का स्तर ही है। भाग्य और भविष्य वस्तुतः कहीं लिखा जाता है तो वह अन्तःकरण के मर्मस्थल में ही लिखा होता है।

प्राचीनकाल और वर्तमान समय में भी जो तुलनात्मक विसंगतियाँ देखने में आती हैं, उनका कारण भी परिस्थिति नहीं मनःस्थिति है। परिस्थिति की दृष्टि से तो सुविधा-साधन इन दिनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। आज के लोग पुराकाल की अपेक्षा शिक्षा, सम्पत्ति, चिकित्सा, शिल्प-कला व्यवसाय, विज्ञान आदि की दृष्टि से अधिक समृद्ध और सौभाग्यशाली हैं किन्तु स्वास्थ्य, संतुलन स्नेह, सौजन्य और सहयोग सद्भाव की दृष्टि से चतुर्दिक् वीभत्स भयंकरता व्याप रही है। जब कि होना यह चाहिए कि लोग अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध और सुसंस्कृत दिखाई पड़ते। प्रसन्न रहते और प्रसन्न दीखते। लेकिन हुआ उससे उल्टा ही है। जो क्षमताएँ सृजन और सहयोग में नियोजित होकर संसार में स्वर्गीय वातावरण बना सकती थीं, वे ही एक दूसरे को काटने और गिराने में लगी हुई है। यह विपर्यय क्यों कर हुआ? उत्तर एक है आदर्शवादी आस्थाओं का पलायन, अन्तःकरण के स्तर का अवमूल्यन। इसी की प्रतिक्रिया स्वरूप व्यक्ति और समाज के सामने अनेकानेक समस्याएँ, विपत्तियों और विभीषिकाओं के रूप में खड़ी दृष्टिगोचर हो रही है।

पुरातनकाल के लोग थोड़े से साधनों में गुजारा कर लेते थे। अब की अपेक्षा उस समय साधनों का घोर अभाव था परन्तु वह लोगों को अखरता नहीं था। क्योंकि तब यह सोचा जाता था कि जीवन उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मिला है तथा शरीर निर्वाह के लिए न्यूनतम साधन जुटाने में सन्तोष करने के बाद अपनी क्षमताओं का उपयोग अच्छे उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए और आदर्शवादी जीवन नीति अपनाने में गर्व-गौरव का अनुभव करना चाहिए, प्रसन्नता का आधार परमार्थ होना चाहिए। इन मान्यताओं को अपनाने और जीवनक्रम में उतारने के कारण ही हमारे महान पूर्वज अभावग्रस्त स्थिति में स्वर्गीय आनन्द लेते रहे साथ ही समस्त विश्व को अपने अजस्र अनुदानों से लाभान्वित करते हुए देवमानव कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सके।

इन दिनों साधन सुविधाओं में अभिवृद्धि हुई है पर आस्थाओं का स्तर गिर गया है। आस्थाओं का संकट ही वर्तमान युग की प्रमुख समस्या है। इन दिनों आस्थाओं का दुर्भिक्ष है। यद्यपि समस्याएँ मुख्यतः आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक प्रतीत होती है और उन्हीं क्षेत्रों में सुधार के लिए संघर्ष आन्दोलन किये जाते हैं। स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण असंयम नहीं विषाणुओं का आक्रमण माना जाता है। मनोरोगों का कारण हेय चिंतन नहीं स्वेच्छाचार पर प्रतिबन्ध समझा जाता है। आर्थिक समस्याएँ श्रमशीलता का अभाव, अपव्ययी प्रवृत्ति नहीं पूँजी का असमान वितरण बताया जाता है। आस्तिकता आध्यात्मिकता का तत्व दर्शन हृदयंगम कराया जा सके तो अपराधों की रोकथाम हो सकती है पर इस सत्य की अपेक्षा कर समाधान पुलिस थानों, कचहरी और अदालतों में ढूँढ़ा जाता हैं राजा सत्ता को सुधार की जादुई छड़ी मानकर उस पर आधिपत्य करने के लिए महत्त्वाकाँक्षी लोग लालायित है, पर यह कोई नहीं सोचता कि धर्मतन्त्र को परिष्कृत करके उसके सहारे आस्थाओं का संकट और प्रस्तुत समस्याओं का निवारण निराकरण किया जा सकता है।

इस तरह के सारे प्रयास उथले है। रक्त की विषाक्तता को दूर न करने पर फोड़े फुंसियों का किसी भी तरह उपचार सम्भव नहीं है। उन पर पट्टियाँ बाँधना और दवाएँ लगाना लम्बा कार्य है तथा परिणाम की दृष्टि से अनिश्चित और संदिग्ध भी। फिर भी इन्हीं उथले प्रयत्नों के बवंडर खड़े करने की घुड़दौड़ चलती है। यह तथ्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जड़ को खोजे बिना उथले प्रयत्न कितने दिनों किस सीमा तक कितने सफल हो सकेंगे यह जरा भी निश्चित नहीं है। हजार बार समझना और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि अपने युग की अनेकानेक समस्याओं का विपत्तियों और विभीषिकाओं का एक मात्र कारण मानवी अन्तःकरण में रहने वाली उच्चस्तरीय आकांक्षाओं आस्थाओं का अवमूल्यन ही है।

सड़ी कीचड़ और गन्दी नाली में मच्छर-मक्खी कृमि-कीटक विषाणुओं और दुर्गन्ध के उभार उठते हैं। इनका निराकरण नाली में जमी हुई सड़न को धो डालना ही हो सकता है। आस्थाओं में जड़ जमा कर बैठी हुई निकृष्टता को न हटाया जा सकता तो समझना चाहिए कि बालू से तेल निकालने की तरह सुधार और परिवर्तन के सारे प्रयास निष्फल ही होते रहेंगे तथा उज्ज्वल भविष्य दिव्य स्वप्न की तरह कल्पना का विषय ही बना रहेगा।

बाह्य उपचार सर्वथा निषिद्ध नहीं है। वे होते हैं और होने चाहिए किंतु अन्तः उपचार का महत्व भी समझा जाना चाहिए। युग परिवर्तन का वास्तविक तात्पर्य अन्तःकरण में जमी हुई आस्थाओं में उत्कृष्टता का पुनर्निर्धारण है। व्यक्तिगत और समाज क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं का निराकरण इसी क्षेत्र में गुत्थियों का निर्माण होना है और विकृतियाँ उत्पन्न होती है। खाद्य संकट, ईंधन संकट, स्वास्थ्य संकट, सुरक्षा संकट की तरह आस्था संकट के क्षेत्र और प्रभाव को भी समझा जाना चाहिए। आस्था संकट इन सभी संकटों से कहाँ अधिक गम्भीर है। इस का समाधान किये बिना वर्तमान युग की समस्याएँ नहीं सुलझने की और इसका समाधान कर लिया गया तो इससे अधिक कुछ करने कराने की आवश्यकता नहीं है।

यों सुधार और संवर्द्धन के बाहरी प्रयास भी चलने चाहिए किन्तु ठोस बात तभी बनेगी जब समष्टि के अन्तः करण में उत्कृष्टता की आस्थाओं का आरोपण अभिवर्द्धन युद्धस्तरीय आवेश के साथ किया जाय। यह एक ही समस्या है और इसका एक ही महाकाल यथार्थता से अनभिज्ञ नहीं है। लोकमानस में आस्थाओं को पुनर्जीवित करने के लिए-अनास्था को आस्था में बदलने के लिए प्रज्ञावतार का प्रकटीकरण होने ही जा रहा है।


आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण (Kahani)

आत्म-कल्याण मोक्ष, परम तत्व की प्राप्ति सम्बन्धी बहुत-सी भ्रान्तियाँ व्यक्तियों में पाई जाती है। सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास कहीं भी करते हुए, व्यक्ति अपना व दूसरों का हित साधन कैसे कर सकता है, इसका बड़ा सुन्दर उदाहरण स्कन्द पुराण की एक कथा में मिलता है।

एक बार कात्यायन ने देवर्षि नारद से पूछा-भगवन् आत्म-कल्याण के लिए विभिन्न शास्त्रों में विभिन्न उपाय-उपचार बताये हैं। गुरुजन भी अपनी-अपनी मति के अनुसार कितने ही साधन-विधानों के महात्म्य बतलाते हैं। जप, तप, त्याग, वैराग्य, योग, ज्ञान, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान-धारणा समाधि आदि के अनेक उपायों में से सभी का कर सकना, एक के लिए सम्भव नहीं। फिर सामान्यजन यह भी निर्णय नहीं कर सकते, इनमें से किसे चुना जाय? कृपया आप ही मेरा समाधान करें कि सर्व सुलभ और सुनिश्चित मार्ग क्या है? अनेक मार्गों के भटकाव से निकालकर मुझे सरल अवलम्बन का निर्देश दीजिए।

उत्तर देते हुए नारद ने कात्यायन से कहा- हे मुनि श्रेष्ठ! सद्ज्ञान और भक्ति का एक ही लक्ष्य है कि मनुष्य सत्कर्मों में प्रवृत्त हो। स्वयं संयमी रहे और अपनी सामर्थ्यों को, इन गिरों को उठाने और उठों को उछालने में नियोजित करे। सत्प्रवृत्तियाँ ही सच्ची देवियाँ हैं। जिन्हें जो, जितनी श्रद्धा के साथ खींचता है, वह उतनी ही विभूतियाँ अर्जित करता है। आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण की समन्वित साधना करने के लिए परोपकार-रत रहना ही सर्वश्रेष्ठ है, चाहे व्यक्ति किसी भी आश्रम में हो।”

स्कन्द पुराण के इस वार्ता प्रसंग में कात्यायन की तरह अन्यान्य जिज्ञासु जनों का भी समाधान विद्यमान है।


आज का युगधर्म

“बलिदान” से प्रायः लोग जीवन-बलिदान जीवन-त्याग का अर्थ लगाते हैं, पर बलिदान सदा आत्मोत्सर्ग ही नहीं कहलाता, उसे भी इस श्रेणी में रखा गया है, जिसमें व्यक्ति परहित के लिए अपनी सुविधाओं का, इच्छा-आकांक्षाओं का सहर्ष त्याग कर देता है। यही स्थिति बलिदान था आत्मोत्सर्ग है।

मनुष्य में देवत्व का वास्तविक विकास तब तक शुरू नहीं होता जब तक मनुष्य बृहत् परिवार के लिए अपने स्वार्थ का बलिदान करने और दूसरों को सुख पहुँचाने हेतु अपने आराम तक का उत्सर्ग कर देने के लिए न हो जाये परिवार इस शुभारम्भ का प्रथम चरण हैं। परिवार के बाद समाज या संघ आता है। यहाँ यह सभी को स्वीकार करना ही चाहिए कि मनुष्य पर अपने छोटे परिवार की अपेक्षा समाज को उन्नत एवं सुखी बनाने का कहीं बड़ा दायित्व है। चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार के दृष्टिकोण से समाज के हर नागरिक को उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयास किया गया या नहीं, यही एकमात्र कसौटी है। इसी का छोटा रूप प्राचीन काल में ग्राम संघ अथवा पंचायत के रूप में जीवित था जिसमें लोगों के बीच इतनी घनिष्ठता का सम्बन्ध होता था कि सम्पूर्ण पंचायत ही परिवार कहलाता था एवं एंघ्झा पंचायत के लिए अपने पारिवारिक स्वार्थ की बलि चढ़ाने के लिए सदा तत्पर रहना जीवन की सर्वप्रथम आवश्यकता थी। अगला विशालीकरण है राष्ट्रगत आत्मा के रूप में राष्ट्र का विकास एक ऐसी प्रगति है जो आधुनिक अवस्था में मानवता के लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि मनुष्य परिवार, तथा वर्ग के स्वार्थ को यह समूची जगती अब विशालतर राष्ट्रीय आत्मा में अपने आपको विलुप्त करना चाहती है जिससे कि मानव जाति में भाव स्वरूप का विकास हो सके। इससे भी अधिक ऊँची एक पूर्णता है जिसके लिए कुछ ही व्यक्तियों ने अपने को तैयार दिखलाया है-वह है सारी मानवता को अपने अन्तर्गत कर लेने के लिए आत्मा का विस्तार। इस अवस्था में ही “वसुधैव कुटुम्बकम्” की सूक्ति चरितार्थ होती है।

किसी भी राष्ट्र के जीवन में दो अवस्थाएँ आती हैं, जिसमें राष्ट्र के प्रति व्यक्ति के कर्तव्य की परिभाषा बदल जाती है। पहली तब जब राष्ट्र अपना निर्माण या नवनिर्माण कर रहा होता है, और अपने प्राचीन कुपरम्पराओं प्रचलनों मूढ़-मान्यताओं को बदलने के लिए व्यक्तियों को केन्द्र बिन्दु मानकर उनके प्रगति एवं चारित्रिक दृष्टिकोण से उत्कृष्ट बनाने के लिए ताना-बाना बुन रहा होता है दूसरी जब यह निर्मित गठित और शक्तिशाली हो उठता है, इन दोनों शक्तिशाली हो उठता है, इन दोनों ही अवस्थाओं में जन-जन के प्रति कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों, एवं जिम्मेदारियों का स्तर भी बदल जाता है। पहली वह अवस्था है जब राष्ट्र व्यक्ति के सामने अपनी झोली फैलाकर उसकी सीमित महत्त्वाकाँक्षाओं, आत्म सुख, एवं संकीर्णता त्याग की माँग करता है और आशा करता है कि उसके नागरिक कोई ऐसा कदम नहीं उठायेंगे जिसमें राष्ट्र देवता को क्षति पहुँचे-बल्कि उसके अपने परिकर में रहने वाले कुटुम्बी गण, कर्म स्वभाव की दृष्टि कसे, वैचारिक उत्कृष्टता धारण करें। दूसरी अवस्था में राष्ट्र चाहता है कि व्यक्ति अपने आपको विश्व-बन्धुत्व के रूप में विकसित करे, वैसे ही ढंग से जैसे व्यक्ति अपने आपको परिवार में, परिवार समाज में, समाज राष्ट्र के अन्तराल में, रहने से सुरक्षित अनुभव करता है।

इस समय हमारी अवस्था प्राथमिक या निर्माणोन्मुख है और इस अवस्था में प्रत्येक नागरिक का दायित्व विश्व-मानवता के लिए और भी अधिक बढ़ जाता है। इस अवस्था में राष्ट्रवाद की माँग पूरी करना अनिवार्य है। नवीन राष्ट्रीयता का प्रत्येक कार्य कष्ट सहन और आत्म त्याग के लिए पुकारता रहा है। स्वतंत्रता संग्राम में स्वदेशी, पंचायत, राष्ट्रीय शिक्षा, स्वावलम्बन, खादीकरण ऐसी ही पुकार थी। आज उसका स्वरूप बदल गया है। अब आवाज आ रही है पीड़ा एवं पतन निवारण के रूप में आधी जनशक्ति नारी को अधिकार दिलाने के रूप में चिंतन-चरित्र व्यवहार में उत्कृष्टता समाविष्ट करने के रूप में भाव सम्वेदना जगाने अज्ञान दूर करने के लिए ही वह पुकार उठ रही है। उपरोक्त कार्य व्यक्ति और परिवार का राष्ट्र के हितों पर उत्सर्ग के बिना पूरा नहीं हो सकेगा।

देशकाल परिस्थिति के अनुरूप आज की परिभाषा बदल गई है। अब बलिदान का तात्पर्य है, आत्म-सुख का त्याग, व्यक्तिगत बुराइयों को छोड़ना एवं सदाशयता का अनुगामी बनना, महत्त्वाकाँक्षाओं को दबाना एवं लोभ मोह अहंकार से दूर रहना। इसके स्थान पर सम्पर्क क्षेत्र में उत्कृष्टतों को प्रतिष्ठित करना, और उन्हें जन-जन में मनों में पहुँचा देना, ताकि मनुष्य देव तुल्य बन जाय और यह धरा स्वर्ग के समान दिव्य बना जाय। यही है महर्षि अरविंद के अनुसार दिव्य समाज की भव्य कल्पना, जिसे उन्होंने ‘ह्यूमेन साइकिल बलिदान का सिद्धान्त’ पुस्तक में स्पष्ट किया है।


जप प्रक्रिया का ज्ञान-विज्ञान

जप में शब्दों की पुनरावृत्ति होते रहने से उच्चारण का एक चक्रव्यूह-सर्किल बनता है। क्रमिक परिभ्रमण से शक्ति उत्पन्न होती है। क्रमिक परिभ्रमण से शक्ति उत्पन्न होती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उस परिभ्रमण से आकर्षण शक्ति तथा भूलोक में सन्निहित अनेक स्तर की क्षमताएँ उत्पन्न होती है। यदि पृथ्वी का परिभ्रमण बन्द हो जाय तो उस पर घोर नीरवता, निर्जीवता एवं अशक्तता छाएगी। शक्ति उत्पादन के लिए परिभ्रमण कितना आवश्यक है इसे डाइनेमो के प्रयोगकर्ता जानते हैं। घुमाव बन्द होते ही बिजली बनना बन्द हो जाती है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर में विशिष्ट स्तर के विद्युत प्रवाह उत्पन्न करने के लिए विशिष्ट शब्दों का विशिष्ट गति एवं विधि से उच्चारण करना पड़ता है। मन्त्र जप का सामान्य विज्ञान यही है।

जप में एक शब्दावली को एक क्रम और एक गति से बिना विराम दिये गतिशील रखा जाता है। साधारण वार्तालाप में अनेकों शब्द अनेक अभिव्यक्तियाँ लिये हुए अनेक रस और भावों सहित उच्चारित होते है। वस्तुतः इनमें न तो एकरूपता होती है न एक गति। कभी विराम, कभी प्रवाह, कभी आवेश व्यक्त होते रहते हैं, पारस्परिक वार्तालाप में प्रतिपादन का एक केन्द्र या एक स्तर नहीं होता। अतएव उससे वार्ता-जन्य प्रभाव भर उत्पन्न होता है, कोई विशिष्ट शक्तिधारा प्रवाहित नहीं होती। जप की स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। सीमित शब्दावली ही प्रयुक्त होती है और वही लगातार बोली जाती रहती है। रेखागणित के विद्यार्थी जानते हैं कि एक रेखा यदि लगातार सीधी खींची जाती रहे तो वह अन्ततः उसी केन्द्र से आकर जुड़ जायगी, जहाँ से आरम्भ हुई थी। प्रत्येक गतिशील पदार्थ गोल हो जाता है। पृथ्वी गोल है। ग्रह-नक्षत्र सभी गोल है। भौतिक जगत का छोटा घटक परमाणु और चेतन जगत का छोटा घटक जीवाणु दोनों ही गोल है। गोलाई पर चलते रहा जाय तो उसका अंत आरम्भ वाले स्थान पर ही होगा। ग्रह-नक्षत्रों की भ्रमण कक्षाएँ इसी आधार पर सुनिश्चित रहती है। सीधी रेखा में हम पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े तो लौटकर वहीं आ जायेंगे, जहाँ से चले थे। इस सिद्धान्त के अनुसार मन्त्र-जप की परिणति एक गतिशील शब्द चक्र की स्थापना के रूप में होती है।

कहा जाता है कि वाल्मीकि ऋषि ने उलटा मन्त्र जपा था अर्थात् राम-राम के स्थान पर मरा-मरा कहा था। वस्तुतः यह सुनने-समझने वालों का ही भ्रम रहा होगा। लगातार एक ही गति-क्रम से राम-राम कहते रहने पर उसकी गति गोल हो जायगी और उसे आसानी से मरा-मरा समझा जा सकेगा। इसी प्रकार मरा-मरा मन्त्र का संकल्प लेकर किया गया उच्चारण भी राम-राम प्रतीत होने लगेगा। असल में होता यह है कि एक शब्दावली को अनवरत गति से बोलने पर उसमें आदि अंत का भेद नहीं रहता पूरी शब्दावली एक गोलाई में घूमने लगती है और शब्द-चक्र बनाती है। मन्त्र जप के विधान का निर्देश करते हुए ‘तैलधार वत्’ सूत्र में कहा गया है कि जिस तरह तेल को एक गति से गिराने पर इसकी धारा बँध जाती है, उसी प्रकार मन्त्रोच्चारण का क्रम एक ही गति से चलाना चाहिए। न उसके प्रवाह क्रम में अन्तर आवे और न उच्चारण स्तर में। रुक-रुककर कभी धीमे, कभी तीव्र, कभी उच्चस्वर, कभी मन्द ऐसा जप में नहीं हो सकता वेदमन्त्रों के सस्वर उच्चारण की बात दूसरी है। वे छन्द है इसलिए पाठ करते समय उन्हें स्वरबद्ध अनुशासन का ध्यान रखते हुए गाया जाना अथवा पाठ करना उचित है। जप की व्यवस्था इससे सर्वथा भिन्न है। गायत्री, मृत्युञ्जय आदि वेद मन्त्रों को भी जप करते समय स्वर रहित ही जपा जाता है, साथ ही धारा जैसी एक रस-एक सम गति बनाये रखी जाती है। इनमें कोई अंतर तो नहीं पड़ता इसकी जाँच-पड़ताल माला के आधार पर गई गणना से होती है। गायत्री मन्त्र जप में साधारणतया एक घण्टे में 10-11 माला होती है। नित्य वही क्रम चला या नहीं, इसकी जाँच-पड़ताल घड़ी और माला के समन्वय से हो सकती है। प्रत्येक माला पूरी होने में समान समय लगना चाहिए सभी मन्त्र शक्ति का वैज्ञानिक आधार बन गया ऐसा समझा जा सकता है। भक्ति-विभोर होकर बिना गति का ध्यान रखे भी जप हो सकता है, पर वह भावनात्मक प्रक्रिया हुई उसका परिणाम भावना की शुद्धता और गहराई पर निर्भर है। ऐसे जप को शब्द-शक्ति के आधार पर उत्पन्न होने वाले मन्त्र-जप से भिन्न स्तर का समझा जाना चाहिए। ब्लडप्रेशर नापने की मशीन रोगी की बाँह पर बाँधकर डॉक्टर घड़ी पर निगाह लगाये रहते हैं, हवा का दबाव बढ़ाते रहते हैं, कान में स्टेथिस्कोप से धड़कन गिनते रहते हैं, तभी वे समझ पाते हैं कि रक्त-चाप कितना है। घड़ी और माला-गणना पर ध्यान लगाये रहकर नये साधक को अपने अप की गति को एक रस एक सम बनाना पड़ता है। उतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि शब्द गति का चक्र बन गया और उसके आधार पर मन्त्र विज्ञान के विशिष्ट परिणाम उत्पन्न होंगे। विशेष पुरश्चरणों में जप विद्या के निष्णात साधक इसीलिए बिठाये जाते हैं कि उनकी सही जप-प्रक्रिया सही परिणाम उत्पन्न कर सके।

गति जब गोलाई में घूमने लगती हैं तो उससे उत्पन्न होने वाले चमत्कार हम अपने दैनिक जीवन में नित्य ही देखते रहते है। बच्चे छोटी ‘फिरकनी’ अथवा लट्टू जमीन पर घुमाने का खेल-खेलते हैं। एकबार होशियारी से घुमा देने पर यह खिलौने देर तक अपनी धुरी पर घूमते रहते हैं और गिरते नहीं। जबकि गति बन्द होते ही वे जमीन पर गिर जाते है। यह गति का चमत्कार ही है कि एक बार का धक्का देर तक काम देता है और उत्पन्न गति प्रवाह को देर तक चलते रहने की स्थिति उत्पन्न करता है। जप के द्वारा उत्पन्न गति भी साधना काल के बहुत पश्चात् तक चलती रहती है और साधक की आत्मिक विशेषता को गतिशील एवं सुस्थिर बनाये रहती है।

मशीनों का बड़ा पहिया ‘फ्लाइव्हील’ एक बार घुमा देने पर मशीन के अन्य पुर्जों को न केवल गतिशील ही करता है, वरन् उनकी चाल को नियन्त्रित भी करता है। आरी का उपयोग हाथ से आगे पीछे की गति से करने पर भी लकड़ी कटती है, पर यदि गोलाई में घुमा दिया जाय तो वही आरी कई गुनी शक्तिशाली सिद्ध होगी और अधिक मात्रा में-अधिक जल्दी कटाई कर सकेगी। आरा मशीनें यही करती हैं। वे मोटे-मोटे लट्ठे और कठोर जड़े आसानी से चीर-चार कर रख देती है जबकि आगे पीछे करने पर उसी आरी के लिए वहीं लकड़ी काटना काफी कठिन पड़ता। यह सब गोलाई में घूमने वाले गति प्रवाह का चमत्कार है। तेजी के साथ गोलाई का घुमाव ‘सैन्ट्रीफ्यूगल फोर्स” उत्पन्न करता है। गोफन में कंकड़ रखकर घुमाने और उसे छोड़कर पक्षी भगाने का कार्य पकी फसल रखने के लिए किसानों को बहुधा करना पड़ता हैं।

घुमाव की शक्ति के यह आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम साधारणतया देखने में आते रहते हैं। जप के माध्यम से गतिशील शब्द शक्ति का प्रतिफल भी वैसा ही होता है। झूले पर बैठे बच्चों को जिस तरह अधिक बड़े दायरे में तेजी से घूमने का और गिरने की आशंका होने पर भी न गिरने का आनन्द मिलता है, उसी प्रकार अन्तः चेतना की सीमा परिधि छोटी सीमा से बढ़कर कहीं अधिक व्यापक क्षेत्र तक अपना विस्तार देखती है और दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों के कारण अधःपतन की जो आशंका रहती है, उसके बचाव की सहज सम्भावना बन जाती है। गोफन द्वारा फेंके गये कंकण की तरह साधक अभीष्ट लक्ष्य की ओर द्रुतगति से दौड़ता है और यदि फेंकने वाले के हाथ सधे हुए है तो वह ठीक निशाने पर भी जा लगता है। घुमाव की स्थिति में रहने पर तिरछा हो जाने पर भी लोटे का पानी नहीं फैलता। उसी प्रकार अपने भीतर भरे जीवन तत्व के, संसार के अवांछनीय आकर्षणों में गिर पड़ने का संकट घट जाता है। लोटा धीमे घुमाया गया हो तो बात दूसरी है, पर तेजी से घुमाव पानी को नहीं ही गिरने देता। जप के साथ जुड़ा विधान और भावना स्तर यदि सही हो तो आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों से आये दिन जूझने ओर कदम-कदम पर असफल होने की कठिनाई दूर हो जाती है।

चेतना को प्रशिक्षित करने के लिए मनोविज्ञान में चार आधार और स्तर बताये गये हैं। इनमें प्रथम है शिक्षण-जिसे अंग्रेजी में ‘लर्निंग’ कहते है। स्कूल के बच्चों को इसी स्तर पर पढ़ाया जाता है। उन्हें तरह-तरह की जानकारियाँ दी जाती है। उन जानकारियों को सुन लेने भर से काम नहीं चलता विद्यार्थी उन्हें बार-बार दुहराते हैं। स्कूली पढ़ाई का सारा क्रम ही दुहराते-याद करने के सहारे खड़ा होता है। पहाड़े रटने पड़ते है। संस्कृत को तो रटन्त विद्या ही कहा जाता है। प्रकारान्तर से यह रटाई किसी न किसी प्रकार हर छात्र को करनी पड़ती है। स्मृति पटल पर किसी नई बात को जमाने के लिए बार-बार दुहराये जाने की क्रिया अपनाये बिना और कोई रास्ता नहीं।

एक बार याद कर लेने से कुछ बातें तो देर तक याद बनी रहती है, पर कुछ ऐसी हैं जो थोड़े दिन अभ्यास छोड़ देने से एक प्रकार से विस्मरणीय ही हो जाती है। स्कूली पढ़ाई छोड़ देने के उपरान्त यदि वे विषय काम में न आते रहे तो कुछ समय बाद विस्मृत हो जाते है। फौजी सिपाहियों को नित्य ही परेड करनी पड़ती है। पहलवान लोग बिना नागा अखाड़े में जाते और रोज ही दंड-बैठक करते हैं। संगीतकारों के लिए नित्य का रियाज आवश्यक हो जाता है कुछ समय के लिए भी वे गाने-बजाने का अभ्यास छोड़ दे तो उँगलियाँ लड़खड़ाने लगेंगी और ताल स्वरों में अड़चन उत्पन्न होने लगेगी।

शिक्षण की लर्निंग भूमिका में पुनरावृत्ति का आश्रय लिया जाना आवश्यक है। जप द्वारा अव्यवस्त ईश्वरीय चेतना को स्मृति पटल पर जमाने की आवश्यकता होती है ताकि उपयोगी प्रकाश की अन्तःकरण में प्रतिष्ठापना हो सके। कुएँ की जगत में लगे पत्थर पर रस्सी की रगड़ बहुत समय तक पड़ते रहने से उसमें निशान बन जाते है। हमारी मनोभूमि भी इतनी कठोर हैं एक बार कहने से बात समझ में तो आ जाती है पर उसे स्वभाव की -अभ्यास की भूमिका तक उतारने के लिए बहुत समय तक दुहराने की आवश्यकता पड़ती है। पत्थर पर रस्सी की रगड़ से निशान पड़ने की तरह ही हमारी कठोर मनोभूमि पर भगवत् संस्कारों का गहराई तक जम सकना सम्भव है।

शिक्षण की दूसरी परत है-रिटेन्शन अर्थात् प्रस्तुत जानकारी को स्वभाव का अंग बना लेना। तीसरी भूमिका है-रीकाल अर्थात् भूतकाल की किन्हीं विस्मृत स्थितियों को कुरेद-बीन कर फिर से संजीव कर लेना। चौथी भूमिका है-रीकाग्नीशन अर्थात् मान्यता प्रदान कर देना। निष्ठा आस्था-श्रद्धा एवं विश्वास में परिणत कर देना। उपासना में इन्हीं सब प्रयोजनों को पूरा करना पड़ता है। यह चारों ही परतें छेड़नी होती है। भगवान की समीपता अनुभव कराने वाली प्रतीक पूजा ‘रिटेन्शन’ है। ईश्वर के साथ आत्मा के अति प्राचीन सम्बन्धों को भूल जाने के कारण ही जीवन में भटकाव होता है। पतंग उड़ाने वाले के हाथ से डोरी छूट जाती है तभी वह इधर-उधर छितराती फिरती है। बाजीगर की उँगलियों से बँधे कठपुतली के सम्बन्ध सूत्र टूट जाएँ तो फिर वे लकड़ी के टुकड़े नाच किस प्रकार दिखा सकेंगे। कनेक्शन तार टूट जाने पर बिजली के यंत्र अपना काम करना बन्द कर देते हैं ईश्वर और जीव सम्बन्ध सनातन है पर वह माया में अत्यधिक प्रवृत्ति के कारण एक प्रकार से टूट ही गया है। इसे फिर से सोचने, सूत्र को नये सिरे ढूँढ़ने और टूटे सम्बन्धों को फिर से जोड़ने की प्रक्रिया रीकाल है। जप द्वारा यह उद्देश्य भी पूरा होता है। चौथी भूमिका में में ‘रीकाग्नीशन’ में पहुँचने पर जीवात्मा की मान्यता अपने भीतर ईश्वरीय प्रकाश विद्यमान होने की बनती है और वह वेदान्त तत्त्वज्ञान की भाषा में अयमात्मा ब्रह्म, ‘यत्वमसि’ सोहमस्मि, चिदानन्दोहम्, शिवोऽहम् की निष्ठा जीवित करता है। यह शब्दोच्चार नहीं वरन् मान्यता का स्तर है। जिसमें पहुँचे हुए मनुष्य का गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप ईश्वर जैसे स्तर का बन जाता है। उसकी स्थिति महात्मा एवं परमात्मा जैसी देखी और की जा सकती है।

आत्मिक प्रगति के लिए चिन्तन क्षेत्र की जुताई करनी पड़ती? तभी उसमें उपयोगिता फसल उगती है। खेत को बार-बार जोतने से ही उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है। नाम जप को एक प्रकार से खेत की जुताई कह सकते हैं। प्रहलाद की कथा है कि वे स्कूल में प्रवेश पाने के उपरान्त पट्टी पर केवल राम नाम ही लिखते थे। आगे की बात पढ़ने के लिए कहे जाने पर भी राम नाम ही खिलते रहे और कहते रहे। इस एक को ही पढ़ लेने पर सारी पढ़ाई पूरी हो जाती है। युधिष्ठिर की कथा भी ऐसी ही है। अन्य छात्रों ने आगे के पाठ याद कर लिये, पर वे पहला पाठ ‘सत्यं वद’ ही रटते लिखते रहे। अध्यापक ने आगे के पाठ पढ़ने के लिए कहा तो उनका उत्तर यही था कि एक पाठ याद हो जाने पर दूसरा पढ़ना चाहिए। उनका तात्पर्य यह था कि सत्य के प्रति अगाध निष्ठा और व्यवहार में उतारने की परिपक्वता उत्पन्न हो जाने तक उसी क्षेत्र में अपने चिन्तन को जोते रहना चाहिए।

जप के लिए भारतीय धर्म में सर्वविदित और सर्वोपरि गायत्री मन्त्र का प्रतिपादन है। उसे गुरुमन्त्र कहा गया है। अन्तःचेतना को परिष्कृत करने में उसका जब बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। वेदमाता उसे इसीलिए कहा गया है कि वेदों में सन्निहित ज्ञान-विज्ञान का सारा वैभव बीज रूप से इन थोड़े से अक्षरों में ही सन्निहित है।

जप का भौतिक महत्व भी है। विज्ञान के आधार पर भी उसकी उपयोगिता समझी समझाई जा सकती है। शरीर और मन में अनेक दिव्य क्षमताएँ चक्रों, ग्रन्थि भेद और उपत्यिकाओं के रूप में विद्यमान है उनमें ऐसी सामर्थ्य विद्यमान है जिन्हें जगाया जा सके तो व्यक्ति को अतीन्द्रिय एवं अलौकिक विशेषताएँ प्राप्त हो सकती हैं। साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है।


आत्म-कल्याण (Kahani)

एक व्यक्ति अपने चार बच्चों को अनाथ-छोड़कर ही एक रात्रि घर से भाग निकला, आत्म-कल्याण के लिए। किसी सन्त के पास जाकर वह भगवत् प्राप्ति का उपाय पूछने लगा। उस व्यक्ति ने अपने त्याग की कहानी सुनाते हुए यों कहा-

“मेरी पत्नी उस समय सो रही थी, एकाएक बच्चा चीखा, तो मुझे लगा अब पत्नी जाग पड़ेगी और मेरा घर से निकलना कठिन हो जायेगा, पर पत्नी ने बच्चे को छाती से लगाया, और बच्चा चुप हो गया। मैं चुपचाप निकल आया। महात्मन्! अब संसार की मोह-माया में फँसना नहीं चाहता।”

साधु बोले-मूर्ख! दो भगवान् तो तेरे घर में ही बैठे हैं, जिन्हें तू छोड़ आया। जा, जब तक तू उनकी सेवा नहीं करेगा, तब तक तेरा उद्धार नहीं होगा। पहले परिवार को सँभाल, अपने कर्तव्यों को पूरा कर, फिर सोचना कि पारिवारिक दायित्वों को निभाते हुए तेरा आत्म-कल्याण का लक्ष्य पूरा हुआ या नहीं? अध्यात्म भगोड़ों का नहीं, शूरवीरों का साथ देता है। परिवार में रहते हुए भी, तेरी साधना पूरी होती रह सकती है। त्याग करना ही है, तो अंतः के विकारों एवं भ्रम जंजालों का कर।” व्यक्ति ने वास्तविकता समझी एवं लौट पड़ा अपने घर को-अपनी व्यवहारिक साधना की पूर्ति हेतु।

इसी तरह शिखिध्वज को यथार्थता का बोध हुआ।


अविज्ञात को ज्ञात स्तर पर उतारती है नादयोग की साधना

अभिप्राय उस अनाहत ध्वनि से है जो प्राकृत और पुरुष के संयोग स्थल से निरन्तर प्रसृत और निनादित होती रहती है। ॐ कार वही स्वयंभू ब्रह्मनाद है। उससे सप्त स्वर प्रस्फुटित हुए। श्रुति शास्त्र में प्रयुक्त होने वाले उदात्त, अनुदात्त, स्वरित उसी के आरोह-अवरोह है। संगीत शास्त्र में आगे चलकर वे ही “सा रे ग म प ध नि” के स्वर सप्तक बन गये। सूर्य रथ के सप्त अश्व उसे प्रभा किरणों में सन्निहित रंग है। उसी प्रकार ब्रह्मनाद का ध्वनि गुँजन सप्तधा स्वर लहरी में निनादित होता है।

यों सुनने में सप्त स्वर और उनके आरोह-अवरोह मात्र शब्द ध्वनि का उतार-चढ़ाव प्रतीत होते हैं और उनका उपयोग वाद्य गायन में प्रयुक्त होना भर लगता है पर वस्तुतः उसकी सीमा इतनी स्वल्प नहीं है मनुष्य कृत स्वर लहरी के अतिरिक्त प्रकृति गत स्वर प्रवाह जीवधारियों द्वारा विविध विधि उच्चारण भी कम महत्व के नहीं है। मेघगर्जन, समुद्र तर्जन, विद्युतकड़क, वायु की सन–सनाहट निर्जन की साँय-साँय अग्नि शिखा की धू-धू निर्झर निनाद, प्रकृतिगत ध्वनियाँ हमें समय-समय पर सुनने को मिलती रहती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न पशु, पक्षी आवश्यकतानुसार अपनी-अपनी बोलियाँ बोलते हैं। रात्रि की नीरवता में झिल्ली की झंकार सुनते ही बनती है। सूर्योदय के समय पक्षियों के कंठ कितने प्रकार की कितनी मधुर स्वर लहरियाँ प्रस्तुत करते हैं उन्हें सुनकर मुग्ध हो जाना पड़ता है। लगता है स्वर ब्रह्म अपने अगणित ध्वनि प्रवाहों में न जाने कितने भाव भरे संकेतों और संदेशों को इस विश्व ब्रह्माण्ड में भरता बहाता रहता है।

यह सब आहत ध्वनियाँ हैं जो कानों में सुनी जा सकती है। विज्ञान को पकड़ में वे ध्वनियाँ भी आ गई हैं जो मनुष्य के कानों से सुनी जा सकने वाली मर्यादा से या तो ऊँची हैं या नीची। हमारे खुले कान उन्हें सुन नहीं सकते फिर भी साधन उपकरणों द्वारा उन्हें उसी प्रकार सुना जा सकता है जैसे खुली आँख से न दीखने वाले लघुकाय जीवाणु माइक्रोस्कोप जैसे सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों से भली प्रकार देखे जा सकते है। यह प्रकृतिगत ध्वनियाँ हैं। यह प्रकृतिगत ध्वनियाँ है। कान की पकड़ से बाहर होने के कारण ही इन्हें सूक्ष्म कहा जाता है अन्यथा वस्तुतः यह स्थूल ही हैं क्योंकि यन्त्रों के माध्यम से उन्हें हमारे कान भी सुन समझ सकते है।

इसमें ऊँचे स्तर की ध्वनियाँ वे ही हैं जिन्हें जड़-जगत के अण्ड परमाणुओं द्वारा स्पन्दित नहीं कहा जा सकता। उनका सम्बन्ध चेतन जगत के जीवन प्रवाह से है। उन्हें एक प्रकार से अतीन्द्रिय भी कह सकते हैं। उनका मूल स्रोत चेतना तत्व है। इसलिए उन्हें ब्रह्म-वाणी भी कहते है। इन्हीं ध्वनियों का अलंकारित वर्णन शिव के डमरू घोष, सरस्वती के वीणा वादन एवं कृष्ण के बंशी दुर्गा के निनाद, ताल नृत्य एवं भैरव नाद जैसे सरस उपाख्यानों और घटनाक्रमों के रूप में किया गया है।

यह दिव्य ध्वनियाँ अनन्त अन्तरिक्ष में बिना किसी प्रकृतिगत हलचल का आश्रय लिये स्वयमेव विनिर्मित होती रहती हैं। ये चेतन हैं दिव्य हैं, अलौकिक, अभौतिक और अतीन्द्रिय हैं। इसलिए उन्हें देववाणी भी कहते है। उन्हें ध्यान योग के माध्यम से हमारा चेतन अन्तःकरण सुन सकता है। श्रवण का सम्बन्ध कर्णेन्द्रिय से है, अस्तु सूक्ष्म एवं चेतन श्रवण भी शब्द संस्थान के इसी प्रतिनिधि केन्द्र का सहारा लेकर सुना जाता है। प्रत्येक इन्द्रिय की तन्मात्राएँ स्थूल से सूक्ष्म का सम्बन्ध बनती है। शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श शरीर को पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से पाँच तत्व के सान्निध्य से उत्पन्न होने वाली अनुभूतियों से ही हमें अवगत कराती हैं। यह स्थूल का सूक्ष्म की ओर गति का एक चरण हुआ। उसके अगले चरण विशुद्ध चेतन एवं अभौतिक हो जाते है। जिन दिव्य ध्वनि प्रवाहों की चर्चा इन पंक्तियों में हो रही है वह उसी चेतन जगत के उच्चस्तर से सम्बन्धित हैं। ब्रह्मवाणी-देवध्वनि के इसी रूप में समझा जाय।

नादयोग का केन्द्र बिन्दु उपरोक्त पंक्तियों के आधार पर सरलता पूर्वक जाना जा सकता है। योगशास्त्र के साधना विधानों में एक महत्वपूर्ण धारा नादयोग की भी है। कानों को उँगलियों से, शीशी वाले कार्क से, कपड़े की गोली से इस प्रकार बन्द किया जाता है कि बाहर की वायु का स्थूल आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। इस स्थिति में कानों को बाहरी ध्वनि आधार से विलग किया जाता है और ध्यान को एकाग्र करके यह प्रयत्न किया जाता है कि अतीन्द्रिय जगत से आने वाले शब्द प्रवाह को अन्तःचेतना द्वारा सुना जा सके। यों इसमें भी कर्णेन्द्रिय का-उसकी शब्द तन्मात्रा का योगदान तो रहता है पर वह श्रवण है, वस्तुतः उच्चस्तरीय चेतन जगत की ध्वनि लहरी सुनने के लिए, कर्णेन्द्रिय और अन्तःकरण का इसे संयुक्त प्रयास भी कह सकते है।

कृष्ण द्वारा रात्रि की नीरवता में बंशी बजाये जाने और गोपियों के घरबार छोड़कर उस रास आहान के लिए निकल पड़ने का सविस्तार वर्णन भगवत् आदि पुराणों में वर्णित है। यह व्यवहारिक, सामाजिक भौतिक व्यवस्था के सर्वथा प्रतिकूल होते हुए भी अध्यात्म परम्परा के पूर्णतया अनुकूल भी है वस्तुतः कथा गाथाओं में रहस्यमय पहेली की तरह गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों का ही उद्घाटन किया गया है। रास लीला के पीछे नाट्योग की व्याख्या विवेचना ही सन्निहित है। भगवान बंशी बजाते हैं-मधुर रस चखाने का आह्वान करते हैं। गोपियाँ समस्त साँसारिक बंधनों को तोड़कर उस ओर दौड़ पड़ती है। संकेत आहान के स्वागत करती हैं, और उसी के लिए आकुल-व्याकुल होकर अपना समर्पण कर देती है। अपना आपा खोकर दिव्य ध्वनि के साथ थिरक कर, नाचना आरम्भ कर देती है। यही तो रासलीला है। कृष्ण अर्थात् परमात्मा-बंशी ध्वनि अर्थात् ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए चल पड़ने का संकेत-गोपियाँ अर्थात् आत्मा की भौतिक एवं आत्मिक सम्पदायें रास नृत्य अर्थात् दिव्य संकेतों के अनुरूप कठपुतली जैसे भाव-विभोर आचरण हैं।

रासलीला में सम्मिलित गोपियों के आनन्द मुग्ध होने का तथ्य सर्वविदित है। उसी का स्थूल रूप देखने-दिखाने के लिए जहाँ-तहाँ रासलीला के अभिनय किये जाते हैं। यों एक पुरुष के साथ इतनी नारियों का कामुक नृत्य न तो अभिनन्दनीय ही हो सकता है और न अभिनीय। फिर भी आत्मा और परमात्मा के बीच आदान-प्रदान का जो भाव भरा अलंकारिक चित्रण रासलीला में किया गया है वह पहले जैसा लगते हुए भी अर्थपूर्ण और तथ्यपूर्ण ही कहा जाएगा। रास की प्रधानता नायिका राधा है और अन्य सभी सखियाँ सहेलियाँ उनके साथ पूर्ण स्नेह सहयोग के साथ सहनृत्य में तल्लीन होती है।

राधा अर्थात् आत्मा-उनकी सहयोगिनी सखियाँ-अन्तरंग की सत्प्रवृत्तियाँ बौद्धिक विभूतियाँ और साँसारिक सम्पदाएँ-क्षमताएँ प्रतिभाएँ-यह सभी आत्मा की आकांक्षा में स्नेहित सहयोग देती है। कोई अवरोध उत्पन्न नहीं करती अर्थात् आत्मा के परमात्मा से मिलने के सदुद्देश्य सत्प्रयत्नों को सफल बनाने के लिए अपना पूर्ण समर्पण-समग्र नियोजन प्रस्तुत कर देती है। आत्मा की दिव्य आकांक्षा की पूर्ति के लिए उनका पूरा-पूरा समर्थन मिलता है। यह स्थिति प्राप्त हो सके तो हर आत्मा को-हर राधा को-रासलीला का दिव्य आनन्द मिल सकता है। आत्मा और परमात्मा के मिलन का ब्रह्मानन्द उपलब्ध हो सकता है।

नादयोग में कान को सूक्ष्म चेतना की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। कई बार ये अति मन्द होती हैं। कई बार कुछ प्रखर। इनमें प्रायः कृष्ण की बंशी जैसी-सर्प पकड़ने में काम आने वाले बीन जैसी ध्वनियाँ रहती हैं। रास में प्रयुक्त वेणुनाद की चर्चा ऊपर हो चुकी है। कुमार्गगामी-भौतिक तृष्णा और वासना का विष पिण्ड मन-एक प्रकार से विषधर सर्प है। उसे भी आनन्द उल्लास की-दिव्य प्रेरणाओं के अनुगमन के रूप में लहराने का अवसर इस बीन की ध्वनि सुनने से मिल सकता है। सपेरा विषधर सर्पों को पकड़ने के लिए बीन बजाता है। जब वह लहराने लगता है तो उसे चुपके से पकड़कर पिटारे में बन्द कर लेता है। मन के निग्रह में-प्राणों के निरोध में-नादयोग का ध्वनि प्रवाह बहुत सफल रहता है। दिव्य ध्वनि श्रवण के साथ-साथ उपरोक्त दो विचार धाराओं का अदल-बदल कर समन्वय करना चाहिए। भगवान के वेणुनाद पर राधा और उसकी सखियों का रासनृत्य करना और मन सर्प का इस दिव्य नाद में तन्मय होकर अपना आत्म-समर्पण कर बैठना, यही है नादयोग की विधि साधना के साथ जुड़ा हुआ अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्व दर्शन।

बंशी और बीन के अतिरिक्त और भी कई प्रकार की ध्वनियाँ नादयोग के साधकों को सुनाई पड़ती है। इनकी संगति इस प्रकार बिठाई जा सकती है-भगवती सरस्वती अपनी वीणा झंकृत करते हुए ऋतम्भरा प्रज्ञा और अनासक्त भूमा के मृदुल मनोरम तारों को झनझना रही हैं और अपनी अन्तःचेतना में वही दिव्य तत्व उभर रहे हैं भगवान शंकर का डमरू बज रहा है। उससे प्रलय के-मरण के संकेत आ रहे हैं और सुझाया जा रहा है कि इस नश्वर काया का अंत करने वाला ताण्डव किसी भी क्षण सम्मुख आ सकता है इसलिए प्रमाद से न उलझा जाय, लक्ष्य की प्राप्ति में आलस्य एवं उपेक्षा भाव न बरता जाय। माया-मोह छोड़कर यथार्थता को समझा जाय। शंखनाद की ध्वनि को महाभारत के पाञ्चजन्य का महाकाल के भैरव-नाद का-उद्घोष माना जाय और अनुभव किया जाय कि अब महाप्रयाण का ऐसा समय आ पहुँचा जिसमें आनाकानी या सोच-विचार करने की गुँजाइश नहीं है। युग की कर्तव्य की पुकार गूँज रही है और उभार रही है कि अविलम्ब जीवनोद्देश्य की दिशा में कदम बढ़ाया जाय। बिजली की कड़क, दावानल की धू-धू बादलों की गर्जन, समुद्र का तर्जन इस संकेत को लेकर आते हैं कि अपनी गतिविधियों का कायाकल्प होना ही चाहिए। पशु स्तर को निरस्त करके दिव्य स्तर अपनाया ही जाना चाहिए और उस उलट-पुलट में जो उफान-तूफान प्रस्तुत होते हैं उनका सामना किया ही जाना चाहिये। कभी झिल्ली की झंकार कभी चिड़ियों की चहचहाट के शब्द सुनाई पड़ते हैं इन्हें छोटे जीवों द्वारा मानवी प्रमाद को हिला देने वाला उद्बोधन समझा जाय। जब इतने छोटे जीव अपने नियत-नियमित आनन्द बिखेरने वाले क्रिया-कलाप में निरत रहते हैं तो मनुष्य के लिए यह कैसे शोभनीय होगा कि वह जीवनोद्देश्य के साथ जुड़े हुए अपने महान कर्तव्य का परित्याग करके मात्र पेट और प्रजनन के लिए जीवन सम्पदा को कौड़ी मोल गँवा देने की मूर्खता अपनाये?

नादयोग में कितने प्रकार ध्वनियाँ सुनाई पड़ सकती हैं इनकी सीमा नहीं। प्रायः परिचित ध्वनियाँ साधक उनके पीछे उच्च संकेतों को विवेक बुद्धि के द्वारा सहज संगति बिठा सकते है। कोयल की कूक, मुर्गे की बाँग, मयूर की पीक, सिंह की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ शब्द सुनाई पड़ें, तो उनमें इन प्राणियों को उच्चारण समय की मनःस्थिति की कल्पना करते हुए अपने लिए प्रेरक संकेतों का तालमेल बिठाया जा सकता है। कई बार रुदन, क्रन्दन, हर्षोल्लास, अट्टहास, उच्छ्वास जैसी ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं उसे अपनी अन्तरात्मा का सन्तोष-असन्तोष समझा जा सकता है। कुमार्गगामी गतिविधियों से असन्तोष और सत्प्रवृत्तियों का सन्तोष स्पष्ट है। आत्म निरीक्षण करते हुए आत्मा को समय-समय पर अपनी भली-बुरी गति विधियों पर संतोष-असन्तोष प्रकट करने के अवसर आते हैं इन्हीं की प्रतिध्वनि, हर्ष क्षोभ व्यक्त करने वाले स्वरों में सुनाई पड़ती रहती है। किस ध्वनि के पीछे क्या संकेत, संदेश, तथ्य हो सकता है उसे नादयोगी की सहज बुद्धि ही समयानुसार निर्णय करती चलती है। उसकी विस्तृत चर्चा यहाँ अभीष्ट नहीं। तथ्य इतना भर है कि इन दिव्य ध्वनियों में किसी न किसी स्तर की उच्च प्रेरणाएँ होती हैं और इन सब का प्रयोजन एक ही रहता है कि हमें आत्मा की स्थिति से ऊपर उठकर उच्च भूमिका के लिए द्रुतगति से अग्रसर होना चाहिए-साहस पूर्ण कदम बढ़ाना चाहिए।

कानों के छिद्र बन्द करके अन्तर्जगत् को दिव्य ध्वनियाँ सुनने की साधना जब परिपक्व होने लगती है तो भावोत्कर्ष क्षेत्र से आगे बढ़ कर सुविस्तृत अन्तरिक्ष में संव्याप्त हलचलों को समझने का अवसर मिलता है। इस संसार को प्रभावित करने वाली अगणित ब्रह्म प्रेरणाओं के प्रवाह बहते रहते हैं। उनके स्पन्दन हमारी कर्णेन्द्रिय से शब्दरूप में टकराते हैं। उन्हें पहचानने और पकड़ने की सफलता, साधना में परिपक्वता आने के साथ-साथ सहज ही बढ़ने लगती है और यह प्रतीत होने लगता है कि सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है। और क्या होने जा रहा है। किसी व्यक्ति विशेष क्षेत्र, देश अथवा लोक के सम्बन्ध में इस प्रकार की सही स्थिति का पूर्वाभास होने लगता है। अविज्ञात को ज्ञात स्तर पर उतारने में नादयोग की साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है। यों शब्द, रूप, रस, गन्ध स्पर्श, की किसी भी प्रक्रिया के आधार पर बनी हुई साधना पद्धति से भी वही प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। पर नादयोग का इसी प्रयोजन के लिए अपना अत्यधिक महत्व है।

बाद संकेत वे सूत्र हैं जिनके सहारे परमात्मा के विभिन्न शक्ति स्रोतों के पास हमारे आदान-प्रदान सम्भव हो सकते है, टेलीग्राम, टेलीफोन, वायरलैस, टेलीविजन पद्धतियों का आश्रय लेकर हम दूरवर्ती व्यक्तियों के साथ अनुभूतियों का आदान-प्रदान करते हैं। इतना नहीं यह ध्वनि प्रवाह सड़कों का भार वाहनों का भी काम करते हैं। व्यक्ति की व्यथाएँ लाद कर परमात्मा तक पहुँचाना और परमात्मा के अनुदान वरदान लाद कर व्यक्ति तक पहुँचाना भी इन ध्वनियों के माध्यम से सम्भव हो सकता है। सिद्ध पुरुष प्रायः ऐसे ही साधना माध्यमों के आधार पर अपने को परमेश्वर के साथ जोड़ कर अभीष्ट आदान-प्रदान का लाभ प्राप्त करते हैं।

भावनाशील मनः स्थिति के लोग नादयोग जैसी सुकोमल ध्वनियाँ भाव संवेदनाओं के आधार पर सुन लेते हैं पर यह हर किसी के लिए आवश्यक अनिवार्य नहीं कि वह उस प्रकार का दिव्य श्रवण कर ही सके। किन्हीं-किन्हीं को बहुत करने पर भी ऐसी कुछ अनुभूतियाँ नहीं होती। उन्हें निराश होने की तनिक भी आवश्यकता है नहीं, वे अपनी अन्तः चेतना को प्रत्यक्ष ध्वनियों के सहारे नादयोग जैसी स्थिति में उद्वेलित कर उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रगति का लाभ सहज ही ले सकते हैं।


साधनों को बढ़ाये बिना भी आवश्यकताएँ कम करके भी गुजर हो सकती है (Kahani)

अकबर ने दरबारियों की बुद्धि परखने के लिए एक चादर मँगाई, जो उनकी लम्बाई से छोटी थी। सभी से ऐसा प्रश्न पूछा जा रहा था कि बिना चादर को घटाये-बढ़ाये उसका शरीर कैसे ढँक जाय?

औरों ने उत्तर न बन पड़ा तो बीरबल ने कहा-हुजूर अपने पैर सिकोड़े, मजे में उसी चादर में तन ढँक कर सोये।”

बुद्धिमानी की बात सभी को पसन्द आई। साधनों को बढ़ाये बिना भी आवश्यकताएँ कम करके भी गुजर हो सकती है।


“मैं सेवक सचराचर, रूप स्वामि भगवन्त

उन्हें यहीं रहना पसन्द है। यद्यपि उन्हें अधिकार है स्वर्ग, ब्रह्मलोक या वैकुण्ठ जब चाहें जाएँ और रहें। उनके लिए सृष्टि के किसी भी प्रदेश में प्रवेश निषेध नहीं। जब मन में आता है, घूम आते हैं स्वर्ग का सिंहासन तथा वैकुण्ठ के अधिपति समान रूप से उनके स्वागत को समुत्सक रहते हैं सभी चाहते हैं, उनकी चरण रज उनके भुवनों को पवित्र करें। किन्तु उन्हें यहीं रहना स्वीकार है।

न कल्प वृक्ष हैं और न सुधा कुम्भ। गन्धर्वों की मधुर तंत्री दिशाओं को मुखरित नहीं करती, और न अप्सराओं का मनमोहक नृत्य ही वहाँ के सौम्य सत्व में रजस का संचार करता। आप उसे भोग लोक नहीं कह सकते। यों वह कर्म लोक भी नहीं है। एक प्रकाशमय शान्ति, स्थिर शान्ति। महाप्रलय का प्रत्यावर्तन भी उसके सौम्य भाव को स्पर्श करने में असमर्थ रहा करता है। निम्न-लोकों के आकुल प्राणियों की करण पुकार ही कभी-कभी विक्षोभ की मृदुल लहरी उठा पाती है।

एक ही जीवन-भगवत् चर्चा, एक ही भोग-सत्संग एक ही क्रिया है-चिन्तन अद्भुत है वह तपः लोक सब परिपूर्ण है, सब आप्तकाम हैं, सब दूसरों को अपने से परम श्रेष्ठ मानते हैं सब सुनना ही चाहते हैं। अखण्ड अनवच्छिन्न श्रवण। सुनाने में भी न कोई बहाने बाजी करता है, न आनाकानी।

हम लोग सुनते ही सुनते हैं। अमूर्त ने बड़े विनम्र स्वरों में जिज्ञासा प्रकट की। किन्तु हमें करना क्या चाहिए, यह हमने अभी तक नहीं सोचा। उन तपो मूर्तियों की श्रद्धा ही मृदुल उज्ज्वल सिंहासन के रूप में घनीभूत हो गयी थी और उस पर पंचवर्षीय चिरशिशु पूर्वजों के परम पूर्वज सनत्कुमार आसीन थे। जहाँ स्थूल और सूक्ष्म का भेद नहीं होता, वहाँ आसन आस्तरण और अधिष्ठाता भाव-भेद ही है।

“कृति की अवशेषता का अनुभव अपूर्णता का परिचायक है।” ब्रह्मपुत्र तनिक गम्भीर होकर बोले अपूर्णताएँ प्रवेश नहीं पा सकती किन्तु सर्वेश की इच्छा अबाध है। कोई नहीं जानता, उनकी किस क्रिया में किस मंगल क्रीड़ा की पृष्ठभूमि निर्मित होती है।” श्रोताओं के नेत्र अमूर्त की ओर घूम चुके थे। आज कुछ होने वाला है। यह सत्संग की परम्परा तो नहीं है? किसी अकल्पित के घटित होने की सम्भावना ने सबको उत्सुक बना दिया था।

“आपको एक बार अपनी उपस्थिति से पुनः साधन भूमि को सार्थक करना चाहिए।” बिना किसी हलचल के सनत्कुमार ने आदेश दे दिया और सबने देखा कि अमूर्त उस दिव्य लोक से सूर्य मण्डल की ओर जा रहे हैं। मृत्यु लोक में पहुँचने के लिए क्रमशः सूर्य, सोम वायु मेघ, वृष्टि औषधि से होकर ही तो जीव वीर्य, रज से विनिर्मित गर्भ में प्रवेश करता है।

महर्षि अमूर्त ने कौशल राज्य के राजकुमार के रूप में जन्म लिया उपनयन संस्कार के बाद वह वेदाध्ययन के लिए महर्षि देवल के आश्रम में गए। थोड़े ही समय बाद महर्षि देवल ने महाराज बृहद् बाहु को सूचित किया-राजकुमार ने अध्ययन समाप्त कर लिया है।” अर्थ के अनन्तर सिंहासन पर बैठते हुए महर्षि की इस सूचना ने महाराज को ही नहीं मन्त्रियों एवं सभासदों को भी चकित कर दिया। वह कहे जा रहे थे-अलौकिक प्रतिभा समय की अपेक्षा नहीं करती और राजकुमार कोई अद्वितीय संस्कारी महापुरुष है।”

महाराज ने समझा था, महर्षि उनके बालक के किसी अपराध का अभियोग लेकर उपस्थित हुए होंगे। कोई भी धारण नहीं कर सकता था कि उपनयन के पश्चात् इन थोड़े से महीनों में कोई बालक श्रोता शिक्षा समाप्त कर लेगा। महाराज ने राजकुमार को गोद में बैठा लिया। उनके नेत्र प्रेमाश्रुओं से पूर्ण हो चुके थे। इतने विनयशील पुत्र से अपराध की आशंका करनी ही उचित नहीं थी।

“मैं शस्त्र-शिक्षा का विशेषज्ञ नहीं हूँ। युवराज को कुछ दिनों के लिए महर्षि विश्वामित्र के श्री चरणों में रहना चाहिए।” कुलगुरु देवल ने अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए विदा चाही। “महाराज का मंगल हो आयुष्मान् कुमार परम कल्याण प्राप्त करें।”

“गुरुदेव।” पिता की गोद से उठकर उस तेजोमय बालक ने महर्षि के श्रीचरणों पर मस्तक रखा। शस्त्र-शिक्षा संघर्ष के लिए, संघर्ष राज्य के लिए होते है। और राज्य होता है, भोग के लिए।” सब जानते हैं, बचपन से ही राजकुमार खेलकूद, वस्त्राभूषण तथा भोजनादि के प्रति उदासीन रहते है। इस अद्भुत बालक में जैसे अल्हड़ शैशव ने प्रवेश पाया ही नहीं, चपल कौमार्य एवं मादक तारुण्य जैसे वह बहुत पीछे छोड़ आया हैं एक प्रशस्त गाम्भीर्य उसमें सदा रहा है। सदा से उसकी शान्ति अदम्य रही है। जैसे वह इस जगत से बहुत ऊपर का किसी और ही धातु का बना हो।

“वत्स” महर्षि ने दोनों हाथों से उस कुमार को उठा लिया, पुचकारा, मस्तक पर हाथ फेरा “समय आने दो और तब यह तुम्हें शोभा देगा। अभी तुम्हें शोभा देगा। अभी तुम्हें मर्यादित पथ का अनुसरण करना चाहिए।”

“मैं अवज्ञा नहीं करूँगा बड़े विनम्र शब्दों में राजकुमार कह रहा था, मैंने श्री चरणों से अध्ययन किया है। मृत्यु किसी समय की अपेक्षा नहीं करती। जिस सुख एवं शान्ति के लिए अनेक प्रवृत्ति होते है ........................ में कही प्रतीत नहीं होती। यह सब .....................भी मैं आज्ञा पालन करूँगा जैसे व्रतादि की आज्ञा, आज्ञा समझकर पालन की जाती है। मुझे कब तक इस अनिच्छित कार्य में प्रवृत्त रहना होगा।

बड़ी विकट समस्या थी, महाराज का एक मात्र पुत्र, साम्राज्य का एक मात्र उत्तराधिकारी वैराग्य के लिए आदेश माँग रहा था। कुलगुरु राजवंश के उच्छेद की आज्ञा कैसे दें, दूसरी तरफ एक उत्कट विरक्त सच्चा अधिकारी तीव्रतम अभीप्सु ज्ञान की भिक्षा माँग रहा था। एक महर्षि कैसे उसे ‘न’ कर दे।

अंततः महर्षि ने निश्चय किया और कातर स्तब्ध राजसभा को भी एक क्षीण आश्वासन मिला। “युवराज अभी कुछ दिन मेरे आश्रम में ही रहेंगे।” महर्षि उठे, युवराज ने भी कमण्डलु और मृगचर्म उठा लिया।

आश्रम पहुँच कर युवराज नियमित साधना में तल्लीन हो गए। योग का उद्देश्य क्या है? सायंकालीन हवन समाप्त हो चुका था, धवल ज्योत्सना में स्फटिक की शिला पर मृग चर्म के ऊपर महर्षि देवल इस प्रकार आसीन थे, जैसे ब्रह्मचारियों के सामगान तथा सोम मिश्रित आज्य की आहुति से संतुष्ट अग्निदेव आवाहनीय कुण्ड से मूर्तिमान् होकर अपने कृष्ण मेष की पीठ पर आ विराजे हों। शिष्यों के धूम्राक्त जटा-जाल चरणों में क्रमशः अवनत हुए और आज्ञा पाकर बैठ जाने के अनन्तर एक ने उस गम्भीर शान्ति को जाग्रत किया।

आत्म दर्शन निर्विकल्प समाधि। वह अखण्ड शान्ति जैसे शब्दों में स्वयं बोल रही हो महर्षि जानते थे, प्रश्नकर्ता इनसे वंचित नहीं है। दूसरा उत्तर भी नहीं था। शिष्य जब साधन और योग्यता में गुरु की कक्षा को अतिकानत कर लेता है। तब उसका श्रद्धावनत शिष्यत्व इतना महत्तम होता है कि गुरु के लिए उसे वहन करना सम्भव नहीं रहा जाता। उसे तो वह गुरुओं का परम गुरु ही सम्हाल सकता है, जो शिष्य के लिए प्रत्येक गुरु में प्रत्यक्ष है।

“एक क्रिया अनुभूति शून्य स्थिति जो तमस् से भिन्न है।” प्रश्नकर्ता ने स्पष्टीकरण किया। अनन्त आनन्द अविरल शान्ति कहाँ है वहाँ और यदि हो भी तो अनुभूति के अभाव में क्या उपयोग। साधनों का पर्यवसान यहीं होता है, ऐसा हृदय स्वीकार नहीं करता। इस स्थिति को उत्थानहीन एवं शाश्वत बनाए रखना एक और समस्या है।

‘बाल ऋषि’ राजकुमार अब महर्षि देवल के आश्रम में इसी नाम से पुकारा जाता है। आश्रमवासियों की उसके प्रति अपार आदर भावना है। यद्यपि वह युवक है, किन्तु उसकी प्रकाण्ड प्रतिभा एवं नैसर्गिक साधना सम्पत्ति महर्षि को भी संकुचित करती है उसका प्रणाम स्वीकार करने में। संसार की कर्मभूमि में जीवन वृक्ष की अवस्थिति साधन सुमनों का प्राकट्य करके ही परिपूर्ण होती है। ज्ञान और समाज यही इन सुमनों के सौरभ और मधु में मकरन्द और पराग की उपलब्धि ही सुमन की सम्पूर्णता है।

सुमन की पूर्णता सौंदर्य और आकर्षण रुचि और परिपक्वता समाधि तक ठीक है। प्रश्नकर्ता पूर्ववत् गम्भीर था सुमन की पूर्णता ही तरु की पूर्णता नहीं है, वह फल की अग्रचर्या मात्र है, और तरु की सार्थकता फल में ही है। भले वह सुरभित और मधुमय न हो, किन्तु सुरभि एवं मधु उसके निर्माण के उपादान मात्र है।

“सच्ची बात तो यह है कि यह प्रश्न मेरी शक्ति सीमा के बाहर है।” महर्षि ने बिना किसी संकोच के कह दिया।” फिर भी मैं प्रयत्न करूँगा कि तुम्हें समाधान मिले वह भी कल मध्याह्न पूर्व।” जिनके हृदय वासनाओं की कालिमा से कभी कलुषित नहीं हुए, जिनके संकल्प पर अविश्वास की अन्धी छाया नहीं पड़ती जिनकी भावना विकारों की वन्या में भ्रान्त नहीं होती उनके आह्वान असफल हो नहीं सकते महर्षि देवल ने प्रातः हवन के अनन्तर भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर जब दूसरा ऊर्ध्यपात्र अपने दोनों हाथों में सम्हाला, शिष्य वर्ग ने समझ लिया आज उन्हें किसी ऊर्ध्वलोक वासी के स्वागत का सौभाग्य प्राप्त होता है। वे आतुरता पूर्वक आसन, पाद्य एवं पुष्पों के प्रणयन में लग गए।

महर्षि ने भाव भरे नेत्र ऊपर उठाए। नेत्रों की मूक प्रार्थना क्षितिज सूर्यमण्डल शून्य को पार करती कहाँ तक जा रही थी कौन कुछ जाने। कुछ ही क्षणों में सारा वन प्रान्त अद्भुत सुरभि से झूम उठा और महर्षि ने आकाश से उतरते हुए सहस्र-सहस्र सूर्यों के समान आलोक मण्डल को मस्तक झुकाया।

अशोक के नीचे स्फटिक वेदिका पर किसलय एवं सुमनों के आसन को सनकादि कुमारों भूषित किया। महर्षि की पूजा सार्थक हुई। शिष्यों के सन्देह उनके दर्शन से ही उच्छिन्न हो गए थे। आदेश पा कर सब बैठ गए।

महर्षि को कुछ पूछने का अवकाश नहीं, मिला कुमारों ने स्वयं कहना प्रारम्भ किया-सत्संग में जिसकी प्रतीति होती है, प्रचण्ड साधना में जिसकी समीपता का आभास होता है समाधि में जिसका साक्षात्कार होता है, लोक सेवा में उसी परमतत्व की सघन अनुभूति होती है। मैं सेवक सचराचर, रूप स्वामी भगवन्त इस भाव से की गयी सेवा ही समस्त साधन सुमनों का फल है।”

यही तो आनन्द की अनुभूति है। प्राजंलि राज कुमार भी नेत्रों से बोल रहे थे और अब तुम्हें यह पूछने की आवश्यकता न रहेगी, कि हमें क्या करना चाहिए। सनत्कुमार के वचनों ने एक प्रगाढ़ यवनिका उठा दी। उन्हें तत्व एवं सत्य प्रत्यक्ष हो गया।


खोल कर तो देखिये, - चमत्कारों से भरी इस पिटारी को

मस्तिष्कीय क्षमताएँ ईश्वर प्रदत्त हैं। उनके उपार्जन अभिवर्द्धन में अपना कोई हाथ नहीं ऐसा सोचना गलत है। मनुष्यों की मस्तिष्क संरचना की तरह नगण्य-सा अन्तर रहता है। किसी की समर्थता-असमर्थता देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्रसुप्ति को जगाने के संदर्भ में कहीं कम नहीं अधिक प्रयत्न हुए। “मेग्नेटिक रेजोनेन्स इमेजिंग” एवं “पॉजीट्रान एमीशन टोमोग्राफी” जैसे शक्तिशाली वैज्ञानिक यंत्रों ने मानवी मस्तिष्क के सम्बन्ध में अनसुलझे प्रश्नों को सुलझा दिया है। ‘टाइम’ पत्रिका के जुलाई 95 में छपे लेख में सेनडियागो (कैलीफोर्निया) यूनिवर्सिटी को प्रोफेसर पेट्रिका का चर्च लैण्ड लिखते हैं- “कितना मजेदार एवं गंभीर तथ्य है कि अब वह क्षण आ गया है जब जो प्रश्न ग्रीक दार्शनिकों के द्वारा उठाये गये थे उसका समाधान एवं तथ्य अब विज्ञान प्रस्तुत कर रहा है। जानकारी के नये आयाम प्लेटो, देकार्ते अरस्तू एवं वेदों में वर्णित मस्तिष्क के दार्शनिक एवं चेतनात्मक पक्ष को तर्क तथ्यों के साथ प्रमाणित कर रहे हैं।

मनोविज्ञानी, जीवविज्ञानी, तंतुविज्ञानियों के अनुसार अब यह स्पष्ट हो गया है कि शरीर संचालन में स्वास्थ्य के निर्धारण में, भावनात्मक उतार-चढ़ाव में मस्तिष्क की महत्वपूर्ण भूमिका है ईश्वर प्रदत्त यह धरोहर इतनी बहुमूल्य है जिसमें प्रतिभा, निर्णयात्मक बुद्धि, ग्रहणशीलता, जागृति एवं अपने अस्तित्व की अनुभूति आदि बहुमूल्य चीजों का निवास है। इसका स्थान कहाँ हैं? यह कार्य कैसे करता हैं? क्या यह विशुद्ध भौतिक प्रक्रिया है जिसे आँखों से देखा जा सकता है, या सूक्ष्म प्रक्रिया है जो मस्तिष्कीय सूक्ष्म सेल के आपसी विद्युतीय आवेशों का परिणाम है, जो कोई रासायनिक प्रक्रिया है जो जटिल है, या कोई ऐसा चमत्कार है जो भौतिक विज्ञान से दूर सूक्ष्म एवं आध्यात्मिक मानदण्डों के निकट है, इन प्रश्नों का उत्तर अब विज्ञान देने लगा है। जिसे दार्शनिकों, अध्यात्मवादियों, विचारकों में देख अनुभव किया एवं वेदों, उपनिषदों आर्य वाङ्मय में जिसका उल्लेख मिलता है।

दार्शनिक विचारकों ने इस सम्बन्ध में सोचने में कहीं कमी नहीं रखी है, प्लेटो ने स्पष्ट इंगित किया है “चूँकि मस्तिष्क का आकार ब्रह्माण्ड की तरह गोल है अतः जीवन संचालन का केन्द्र बिन्दु मस्तिष्क के अंदर ही है जिसे मन कहा जाता है। अरस्तू के अनुसार मनुष्य का संचालन केंद्र हृदय है उनने कारण बताते हुए कहा कि-हृदय का पम्प खून को गरम रखता है यही उष्णता, मनुष्य को जीवन प्रदान करती है। मध्यकाल में दार्शनिक का एक मत था कि मन का स्थान मस्तिष्क है किन्तु इसके सम्बन्ध में स्पष्ट जानकारी किसी को नहीं थी। परन्तु सत्रहवीं शताब्दी में फ्रेंच दार्शनिक रेनेदेकार्ते द्वारा स्पष्ट किया गया कि मस्तिष्क के ज्ञान-तंतु ही शरीर का संचालन करते हैं। इसके लिए वे एक पंक्ति बोला करते थे-कोगिटी अगौसम” मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ। अर्थात् मानवी चेतना ही अपने आप में प्रमाण है कि ‘मेरा अस्तित्व है।

अन्ततः कुछ वर्ष पहले विज्ञान पर पड़ा पर्दा उठा कि मन और मस्तिष्क का सम्बन्ध प्रयोग एवं परीक्षण के परे है। परन्तु विज्ञान ने दर्शन को प्रयोग परीक्षण के आधार पर स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया। एम. आर. आई. एवं केट स्केन जैसे अति संवेदनशील उपकरणों के इलेक्ट्रोड्स के माध्यम से उनने जीव-जंतुओं तथा मनुष्यों के मस्तिष्क के ग्रे मैटर का परीक्षण करना प्रारम्भ कर दिया। जानना यह चाहते थे इनका मस्तिष्क, भावनात्मक, स्मरण शक्ति के केन्द्र कैसे कार्य करते हैं। इतना स्पष्ट शोध कार्य सफल होने के कारण जॉन हापकीन्स ने जेन वाइल क्रेजर माइण्ड ब्रेन इंस्टीट्यूट एवं विज्ञानी हार्वर्ड ने “माइण्ड ब्रेन बिहेवियर संस्थान” की स्थापना की। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ जैसे दूसरे संगठनों की प्रार्थना पर तत्कालीन राष्ट्रपति श्री जार्ज बुश ने 1990 की दार्शनिक को “ब्रेन डिकैड” (मस्तिष्कीय शोध की दशाब्दी नाम दिया)।

आयोवा विश्वविद्यालय के तंतु विज्ञानी (न्यूरोलॉजिस्ट) एन्टानियोडायमेसो ने अपनी पुस्तक “देकार्ते ऐरर” में यह तर्क प्रस्तुत किया है कि “देकार्ते का यह कहना गलत है कि मन और शरीर दोनों का सम्बन्ध नहीं है, दोनों स्वतंत्र है।” उनने अपने शोध निष्कर्षों में बताया है” शरीर मस्तिष्क द्वारा संचालित होता है। जिस तरह इन्द्रधनुष प्रकाश एवं वर्षा के सम्मिलित स्वरूप का परिणाम है वैसे ही मस्तिष्क एवं शरीर का सम्बन्ध शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध के इन्द्र धनुष को प्रदर्शित करता है। संवेदना निश्चित रूप से विशेष भूमिका निभाती है तभी तो भाव संवेदना के आधार पर शरीर में रासायनिक परिवर्तन होते हैं। यहाँ तक कि स्मरण शक्ति, भाषायी ज्ञान एवं अनुवाद करने की सामर्थ्य भी मस्तिष्क पर निर्भर है! जैसे-जैसे न्यूरोलॉजिस्ट गहरे ज्ञान के सागर में गोते लगा रहे हैं वैसे-वैसे मस्तिष्क के चमत्कार के दर्शन उन्हें हो रहे हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा के न्यूरोबायोलॉजी के प्रोफेसर सेमीर जेकी ने केट स्केन के आधार पर मस्तिष्कीय इलेक्ट्रोड्स द्वारा देखा कि यह यंत्र खून के रंग एवं जीवनी शक्ति के आधार पर ट्रेकिंग करता है। जब मस्तिष्क का कोई हिस्सा काम करता है तो वह क्षेत्र प्रकाशित हो उठता है। यह प्रकाशित भाग न्यूरान कहलाता है जो दूसरे 15,000 ट्रिलान्स से जुड़े रहते हैं। जब कोई व्यक्ति सोचता है तब मस्तिष्क के न्यूरान सक्रिय होते स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं जबकि पढ़ते या बोलते समय नहीं मातृभाषा में सक्रियता नहीं होती जबकि अन्य भाषाओं में मस्तिष्क पर जोर अधिक पड़ने के कारण सक्रिय हो उठता है।

हम सोचते हैं कि स्मरण शक्ति का कोई अलग कार्यक्षेत्र होगा किन्तु ऐसा नहीं है। मस्तिष्क में जब कोई भी ज्ञान प्रवेश करता है तो वह तत्काल ‘विद्युत इम्पल्स” में बदल जाता है। यह विद्युत प्रवाह मिलियन सेकेण्ड में समाप्त भी हो जाता है और इतने ही समय में न्यूरान्स से सम्बन्ध जुड़ जाता है। जिससे पिछली स्मृतियाँ सजीव हो उठती हैं। सामान्य क्रम में देखा या सोचा गया तथ्य स्मृति में नहीं जाता क्योंकि वह इम्पल्स में नहीं बदलता इसलिए जिसमें हमारी रुचि नहीं, उसकी स्मृतियाँ मस्तिष्क में नहीं होती। वृद्धावस्था में याददाश्त कमजोर हो जाती है। क्योंकि इम्पल्स नहीं बनते। उसके लिए यदि बाह्य साधनों से विद्युतीय इम्पल्स को भेजें तो स्मरण शक्ति बढ़ सकती है, यह प्रक्रिया जब हम ध्यान करते हैं-एवं मन को एकाग्र करते हैं, जो कि ब्रह्ममुहूर्त में हो तो सुनिश्चित रूप से होता है। अर्थात् जो व्यक्ति नित्य ध्यान करते हैं उन्हें बुढ़ापे में “याददाश्त कमजोर” की शिकायत रहती है। विशेषकर ध्यान के साथ किसी मंत्र का उच्चारण, प्रार्थना, संगीत स्मरण शक्ति को प्रभावित करते हैं, ऐसा विचार एवं शोध कार्य विज्ञानी लैरी स्ववेयर का है। इसी आधार पर मासैल प्रोस्ट ने “ रिमेम्बरेन्स आल थिंग पास्ट” जैसे ग्रन्थ को लिखा है।

प्रतिभावानों की स्मृतियों एवं भावनाओं का क्षेत्र। "हिप्पोकेम्पस" है। एक व्यक्ति का ब्रेन सर्जरी के दौरान हिप्पोकेम्पस समाप्त हो गया था फलस्वरूप सर्जरी के पहले वाली घटनाओं की स्मृति है किंतु नई स्मृति, कला, संगीत, साहित्य क्षेत्र की स्मृतियाँ सदैव के लिए समाप्त हो गई हैं।

स्मरण शक्ति बाल्यावस्था से ही प्रभावित होती है। यदि जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में इन स्नायुकोषों को जाग्रत नहीं किया गया तो मस्तिष्क काम करना बन्द कर देता है। बाल्यावस्था में जिन बच्चों को स्मृति वाले काम नहीं दिये जाते-दिमाग वाले काम नहीं दिये जाते, तो आगे चलकर स्मृति वाला तंत्र कार्य करना बंद कर देता है। अमेरिका में प्रकाशित आँकड़े इन तथ्यों को स्पष्ट कर करते हैं। वहाँ बाल्यावस्था में ही कम्प्यूटर मस्तिष्क, कैलकुलेटर के अत्यधिक प्रयोग के कारण प्रतिभावान बालक नहीं बन पाते। देश में कार्य कर रहे नब्बे प्रतिशत डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों का समुदाय एशिया से आया हुआ है। सिलिकान वेली अमेरिका (जहाँ कम्प्यूटर चिप्स बनते हैं) में सत्तर हजार इंजीनियर भारतीय हैं। यह हम पर निर्भर रहता है कि फर्मोट बाल्यावस्था में जो बनता है (किसी कम्प्यूटर फ्लॉपी की तरह और अनुपयोगी होने पर समाप्त हो जाता है। उसका या तो हम उपयोग करें या उसे गँवा बैठें।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के न्यूरोसर्जन डॉ. जार्ज ओजमेन ने यह पता लगाया है कि महिलाओं एवं पुरुषों की मस्तिष्कीय सामर्थ्य अधिक प्रतिभाशाली, भावनाशील, एवं जटिल समस्याओं को सुलझाने में दक्ष होती है। इस सम्बन्ध में तथ्य प्रस्तुत करते हुए उनने बताया कि महिलाओं के दोनों गोलार्ध कार्य करते हैं जबकि पुरुषों का एक। समस्याओं के समाधान में पुरुष दायें गोलार्ध का प्रयोग करते हैं, अतः जोर पड़ता है जबकि महिलायें दोनों गोलार्ध का, इन्हीं कारणों से भावनाओं को समझने में महिलायें पुरुषों से कहीं आगे हैं।

निश्चित रूप से शरीर पदार्थ विज्ञान है तो मस्तिष्क ब्रह्म विज्ञान। दोनों का अन्योऽन्याश्रित सम्बन्ध है। दूसरे शब्दों में कहें तो ब्रह्म विज्ञान-मस्तिष्क शरीर-पदार्थ विज्ञान को संचालित करता है-यही ध्रुव सत्य है जिसे अब विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है। मस्तिष्क ब्रह्माण्डीय चेतना का परमात्मा का प्रतीक है। मस्तिष्क जिस व्यापक चेतना केन्द्र के साथ आदान प्रदान स्थापित करने में समर्थ है उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि परमात्मा और आत्मा के बीच विद्यमान एकात्मता की तरह मस्तिष्क भी विश्व चेतना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहने के कारण उतना ही समर्थ-विशिष्टता से ओत-प्रोत है। इस चमत्कारी पिटारी को मनुष्य को खोलकर ऋद्धि-सिद्धियों से लाभान्वित होने का मौका मिला है तो उसका भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए। साधना विज्ञान के व्यवहारिक स्वरूप को समझकर यह कार्य कोई भी सहज रूप में कर सकता है। हम नर पथ का जीवन जियें, जीवनावधि के एक पल का-कायपिंड के एक-एक कृपा का सदुपयोग करें, यही विधाता चाहता है।


विकास के दो सोपान चरित्र निष्ठा एवं आत्म विश्वास

अप्रिय, अरुचि एवं असंतुष्ट करने वाली परिस्थितियाँ न्यूनाधिक मात्रा में हर किसी के सामने आती हैं। इनसे कोई भी पूर्णतया सुरक्षित नहीं रह सकता पूरी तरह नहीं बच सकता।

परन्तु यह बात अवश्य है कि यदि हम चाहे उन विपत्तियों के पीछे आने वाले बड़े भयंकर और सत्यानाशी आपत्ति जंजालों से आसानी के साथ बचे रह सकते हैं और आसानी से उस आकस्मिक विपत्ति को थोड़े ही समय में क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। कठिनाई से लड़ने और उस परास्त करके अपने पुरुषार्थ का परिचय देना यह मनोवृत्ति ही सच्चे वीर पुरुषों को शोभा देती है। बहादुरों को किसी का डर नहीं होता इन्हें अपना भविष्य सदा ही सुनहरा दिखाई पड़ता है। ‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’ की भावना उसके मन में सदा ही उत्साह एवं आशा की ज्योति प्रदीप्त रखती है। बुरे समय के सच्चे तीन साथी होते हैं धैर्य, साहस, और प्रयत्न। जो इन तीनों को साथ रखता है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जिसने कठिन समय में अपने मानसिक सन्तुलन को कायम रखने का महत्व समझ लिया है, जो बुरी घड़ी में भी दृढ़ रहता है, अन्धकार में रहकर भी जो प्रकाश पूर्ण प्रभात की आशा लगाये रहता है वह वीर पुरुष सहज में ही दुर्गमता को पार कर जाता है। मानसिक संतुलन के कायम रहने से न तो शारीरिक अस्वास्थ्य नष्ट होता है और न मानसिक गड़बड़ी पड़ती है न तो उससे मित्र उदासीन होते हैं और न शत्रु उबलते हैं इस प्रकार स्वनिर्मित दुर्घटनाओं से वह बच जाता है। अब केवल आकस्मिक विपत्ति की क्षतिपूर्ति का प्रश्न रह जाता है। अत्यधिक उम्र आकांक्षा और पूर्व अनुभव के आधार पर वह अपनी विवेक बुद्धि से ऐसे साधन जुटा लेता है, ऐसे मार्ग तलाश कर लेता है कि पहली जैसी या उसके समतुल्य अन्य किसी प्रकार की सुखदायक परिस्थिति प्राप्त कर ले। जो बुरे समय में अपने साहस और धैर्य को कायम रखता है वह भाग्यशाली वीर योद्धा जीवन भर कभी दुर्भाग्य की शिकायत नहीं कर सकता। कष्ट की घड़ी उसे ईश्वरीय कोप नहीं वरन् धैर्य, साहस और पुरुषार्थ की परीक्षा करने वाली चुनौती दिखाई पड़ती है। वह इस चुनौती को स्वीकार करने का गौरव लेने को सदा तैयार रहता है।

दार्शनिक चुनिंग तो हाँग कहा करते थे कि-कठिनाई एक विशालकाय भयंकर आकृति के, किंतु कागज के बने हुए सिंह के समान है, जिसे दूर से देखने पर बड़ा डर लगता है पर एक बार जो साहस करके पास पहुँच जाता है उसे प्रतीत होता है कि वह केवल एक कागज का खिलौना मात्र था। बहुत से लोग चूहों को लड़ते देखकर डर जाते हैं पर ऐसे भी लाखों योद्धा हैं जो दिन रात आग उगलने वाली तोपों की छाया में सोते हैं। एक व्यक्ति को एक घटना वज्रपात के समान असह्य अनुभव होती है परन्तु दूसरे आदमी जब वही घटना घटित होती है तो वह लापरवाही से कहता है “ऊँह, क्या चिन्ता है, जो होगा सो देखा जाएगा ऐसे लोगों के लिए वह दुर्घटना ‘स्वाद परिवर्तन की एक सामान्य बात होती है। विपत्ति अपना काम करती रहती है। वे अपना काम करते रहते है। बादलों की छाया की भाँति बुरी घड़ी आती है और समयानुसार टल जाती है। बहादुर आदमी हर नई परिस्थिति के लिए तैयार रहता है। पिछले दिनों यदि ऐश आराम के साधनों के उपभोग भी वही करता था और अब मुश्किल से भरे अभावग्रस्त दिन बिताने पड़ेंगे तो इसके लिए भी वह तैयार है। इस प्रकार का साहस रखने वाले वीर पुरुष ही इस संसार में सुखी जीवन का उपयोग करने के अधिकारी है। जो भविष्य के अन्धकार की दुखद कल्पनाएँ कर करके अभी से शिर फोड़ रहे हैं वे एक प्रकार के नास्तिक है, ऐसे लोगों के लिए यह संसार दुखमय, नरक रूप रहा है और आगे भी वैसा ही रहेगा।

पहले सम्पन्न अवस्था में रह कर पीछे जो विपन्न अवस्था में पहुँचते हैं वे सोचते हैं लोग हमारा उपहास करेंगे। इस उपहास की शर्म से लोग बड़े दुःखी रहते हैं। वास्तव में यह अपने मन की कमजोरी मात्र है। दुनिया में सब अपने-अपने काम से लगे हुए हैं, किसी को, इतनी फुरसत नहीं है कि बहुत गंभीरता से दूसरों का उपहास या प्रशंसा करें। टेढ़ी टोपी लगाकर बाज़ार में निकलने वाला मनुष्य सोचता है, सड़क पर निकलने वाले सब लोग मेरी टेढ़ी टोपी को देखेंगे, और उसकी आलोचना करेंगे, परन्तु यह उसका मानसिक बालकपन मात्र है। सड़क पर चलने वाले अपने काम के लिए चल रहे हैं टोपी की आलोचना करने के लिए नहीं। सैकड़ों व्यक्ति ऊँची, नीची, टेढ़ी-तिरछी काली-पीली टोपियाँ पहने निकलते हैं, कोई किसी की तरफ अधिक ध्यान नहीं देता यदि देता भी है तो एक हलकी उमंग भरी दृष्टि एक क्षण के लिए डालकर दूसरे ही क्षण उसे भूल जाता है। लोगों की इतनी ..................................................या उपहास के मद से अपने आपको ऐसी सजा में डुबाये रहना, माना कोई भी अपराध किया हो मनुष्य की भारी भूल है। चोरी करने में बुराई, दुष्टता, नीच कर्म पाप या अधर्म करने में लज्जा होनी चाहिए। यह कोई लज्जा की बात नहीं कि कल दस पैसे थे आज दो रह गये, कल सम्पन्न अवस्था थी आज विपन्न, हो गई। पाण्डव एक दिन राजगद्दी पर भी शोभित थे, एक दिन उन्हें मेहनत मजदूरी करके अज्ञातवास में पेट भरने और दिन काटने के लिए विवश होना पड़ा। प्रताप और राजा नल का चरित जिन्होंने पढ़ा है वे जानते है कि ये प्रतापी महापुरुष समय से एक बार बड़ी दीन-हीन दशा में रह चुके है। पर इसके लिए कोई वा पुरुष उनका उपहास नहीं करता। मूर्ख और बुद्धिहीनों के उपहास का कोई मूल्य नहीं, उनका मुँह तो कोई बन्द नहीं कर सकता वे तो हर हालत में उपहास करते हैं। इसलिए हँसी होने के झूठे भाग को कल्पना में से निकाल देना चाहिए और जब विपन्न अवस्था में रहने की स्थिति आ जाय तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

कोई योजना निर्धारित करने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निश्चित कार्यक्रम में विघ्न भी पड़ सकते हैं, बाधा भी आ सकती है कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। सफलता का मार्ग खतरों का मार्ग है। जिसमें खतरों से लड़ने का साहस और संघर्ष में पड़ने का चाव हो उसे ही सिद्धि के पथ पर कदम बढ़ाना चाहिए। जो खबरों में डरते हैं, जिन्हें कष्ट सहने से भय लगता है, कठोर परिश्रम करना जिन्हें नहीं आता उन्हें अपने आपको उन्नतिशील बनाने की कल्पना नहीं करनी चाहिए। अदम्य उत्साह अट्ट साहस, अविचल धैर्य, निरन्तर परिश्रम और खतरों से लड़ने वाला पुरुषार्थ ही किसी को सफल बना सकता है। इन्हीं तत्वों की सहायता से लोग उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ते हैं। और महापुरुष कहलाते हैं। जैसे परदेश जाने के लिए कुछ सामान की एक पेटी साथ ले जाना आवश्यक होता है उसी प्रकार सफलता के शिखर पर चढ़ने वालों को भी उपरोक्त गुणों वाली मानसिक दृढ़ता को साथ रखना जरूरी है।

आत्म विश्वास और दृढ़ चरित्र की ऐसी मजबूत नींव अपनी मनोभूमि में जाननी चाहिए कि बुरे लोगों की बुराई उससे टकराकर उसी प्रकार विफल हो जाय जैसे गडत्रे की खाल से बनी .................. से टकराकर तलवार का वार विफल हो जाता है। ............................................ और आत्मगौरव का ध्यान रखते हुए सभी दुष्प्रभावों को निरस्त करते रहना चाहिए जो चारों ओर से निरन्तर अपने ऊपर करते रहते हैं। उनकी ओर घृणा और तुच्छता के भाव रखकर हेय व्यक्तियों के दुष्कर्मों का हमें तिरस्कार करते रहना चाहिए। कभी भी उनके सामने आत्म समर्पण नहीं करना चाहिए। पाप के प्रति घृणा और पुण्य के प्रति श्रद्धा रखकर हम अपनी सत्प्रवृत्तियों को विकसित करते रह सकते हैं और साथ ही दुष्प्रवृत्तियों से आत्मरक्षा कर सकने में समर्थ भी हो सकते हैं।


उद्धरेदात्मनात्मानम् (Kahani)

दैत्य हिरण्यकश्यप जन्मा तो भगवान ने नृसिंह अवतार लिया और उसका विनाश कर वापस चले गये। अहंकारी बलि का दर्प चूर करने वामन रूप में अवतरित होना पड़ा। रावण के अत्याचारों से दुखी ऋषि-मुनियों के उद्धार के लिए राम रूप में आकर रावण से संग्राम करना पड़ा और आतातायी कंस, चाणूर और कौरव-पाण्डवों से जूझने और उन्हें परास्त करने में श्रीकृष्ण भगवान का जीवन बीत गया।

कहते हैं कि इस सब मारा-मारी से दुखी होकर भगवान पीपल के वृक्ष के नीचे लेटे-लेटे चिन्तन कर रहे थे कि किसी व्याध ने तीर का वार कर दिया। जिससे उन्हें प्राण छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा।

उस समय उनके पास उनका सारथी खड़ा था। भगवान का अन्तिम समय देखकर सारथी ने पूछा “प्रभो कोई अन्तिम संदेश या उपदेश हो तो कहते जाइए”। अब आप अगली बार किसी रूप से प्रकट होंगे। भगवान बोले। मैं बार-बार पृथ्वी पर आकर मनुष्य की सहायता करते-करते थक गया हूँ। इस प्रकार की प्रत्यक्ष सहायता से मनुष्य में परावलम्बन ही बढ़ा है। आगे मेरा अवतार लेने का मन नहीं है। सारथी बोला किन्तु देव! हम मनुष्यों का उद्धार कैसे होगा कौन करेगा? भगवान बोले-मैंने गीता में उपाय बता दिया है। “उद्धरेदात्मनात्मानम्” मनुष्य अपना उद्धार करने में स्वयं समर्थ है। वह पुरुष है। पुरुषार्थ की सामर्थ्य उसे परमपिता परमात्मा से विरासत में मिली है। देवी-देवताओं के सामने गिड़गिड़ाते उसे शोभा नहीं देता। सारथी बोला-फिर भी प्रभो आपकी सहायता आवश्यक है। भगवान बोले-ठीक है अब आगे से पुरुषार्थ तो पुरुषार्थी पुरुष को ही करना पड़ेगा। मैं मार्ग दर्शन करने और संघबद्ध करने किसी न किसी रूप में आता रहूँगा। तब से बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर, समर्थ, रामकृष्ण, ईसा, मूसा के रूप में अनेक बार भगवान आते रहे हैं और अपना काम करके चले जाते हैं।


समग्र वातावरण को प्रभावित करने की क्षमता है गायत्री मन्त्र में

योग वशिष्ठ में मन्त्र शक्ति पर प्रकाश डालते हुए लिखा-

यथाविरेकम् कुर्वन्ति हरीतक्य स्वभावतः भावनावशतः कार्यं तथा यरलवादयः /-/

अर्थात्-” हे राम! जिस प्रकार हर्र खाने से पाचन संस्थान में तीव्र गति होती है और दस्त लग जाते हैं उसी प्रकार दृढ़ और समर्थ भावना से मन्त्रों के अक्षर शरीरों को तीव्रगति से प्रभावित करते हैं।”

रामायणकार ने “मन्त्र परम लघु जासुवस, विधि हरिहर सुर सर्व” बताया। इन आख्यानों के पीछे नितान्त विज्ञान सम्मत प्रक्रिया कार्य करती है। केवल मात्र कल्पना या विश्वास नहीं सुप्रसिद्ध विद्वान श्री गोविन्द शास्त्री ने एक शोध लेख में एक ऐसे मन्त्रज्ञ का विवरण दिया है जो काँसे की थाली में हाथ रखवा कर मन्त्र बोलता था। धीरे-धीरे थाली में भरा पानी पीला पड़ता गया और रोगी रोग मुक्त हो गया। गाँवों में आज भी सर्प और बिच्छू के इलाज मन्त्र शक्ति से होते हैं और वह आधुनिक चिकित्सा से कहीं अधिक कारगर सिद्ध होते हैं।

मन्त्रों में सन्निहित यह शक्ति वस्तुतः शब्द की पराशक्ति का ही चमत्कार है। इसमें अतिशयोक्ति जैसी कोई बात नहीं मन्त्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है। ध्वनि भी क्रमबद्ध, लयबद्ध, तालबद्ध, और वृत्ताकार एक क्रम से निरन्तर एक ही शब्द विन्यास का तो उसका एक गति चक्र बन जाता है। रस्सी में पत्थर का टुकड़ा बाँधकर उसे तेजी से चारों ओर घुमाया जाय तो उसके दो परिणाम होंगे, एक यह कि वह एक गोल घेरा जैसा दीखेगा। रस्सी और ढेले का एक स्थानीय स्वरूप बदल कर गतिशील चक्र के रूप में बदल जाना एक दृश्य चमत्कार है दूसरा परिणाम यह होगा कि उस वृत्ताकार घुमाव से एक असाधारण शक्ति उत्पन्न होगी। इस तेज घूमते हुए पत्थर के छोटे टुकड़े से किसी पर प्रहार किया जाय तो उसकी जान ले सकता है। यदि इसी तरह उसे फेंक दिया जाय तो तीर की तरह सनसनाता हुआ बहुत दूर निकल जाएगा। मन्त्र जप से यही होता है। कुछ शब्दों को एक रस, एक स्वर, एक लय के अनुसार बार-बार दुहराते रहने से उत्पन्न हुई ध्वनि तरंगें-सीधी या साधारण नहीं रह जाती। वृत्ताकार उनका घुमाया जाना अन्तरंग पिण्ड हमें तथा बहिरंग ब्रह्माण्ड में एक असाधारण शक्ति प्रवाह उत्पन्न करता है। उसके फलस्वरूप उत्पन्न हुए परिणामों को मन्त्र का चमत्कार कहा जा सकता है।

शब्द या ध्वनि की शक्ति को एक दूसरे प्रकार से भी समझा जा सकता है। किसी बच्चे ने कभी शेर न देखा हो, न ही उसकी प्रकृति से परिचित हो तो भी उसे कहीं शेर की दहाड़ सुनाई पड़ जाये तो वह काँप उठेगा। इसी तरह कोयल की कूक सुनते ही लोग मुस्कराने लगते हैं। यह तो शब्द का अन्तरंग कलेवर पड़ने वाला अत्यन्त स्थूल प्रभाव मात्र है, पर जिस तरह दही को निरन्तर आलोड़ित करने से उसमें से मक्खन निकलना सम्भव हो जाता है उसी प्रकार यदि कर्णातीत ध्वनि तीव्र भावावेग के साथ गुंजित की जाय तो वह शरीरस्थ चक्रों, ग्रन्थियों, गुच्छकों और उपत्यिकाओं से एक ऐसी “संवहन” शक्ति पैदा करती है जो किसी रोगी को अच्छा कर सकती है, किसी को अपने मनोनुकूल बना सकती है, मारण, मोहन उच्चाटन आदि प्रयोग भी उस शक्ति से किये जा सकते है। कृत्या और घात उसी शक्ति का तान्त्रिक भाग है। गायत्री मन्त्र जैसे परम कल्याणकारी मन्त्र में उस तरह की बातों की उपेक्षा की गई है। किन्तु दूसरी तरह के वाममार्गी उनका खुलकर उपयोग करते है। भले ही उन्हें उनके लिए अनिष्ट क्यों न भुगतने पड़ें।

गायत्री मन्त्र की शब्द रचना की विलक्षणता ही उसके सर्वोपरि होने का आधार है। इसी अनुसंधान पर राजर्षि विश्वामित्र को अविलम्ब ब्रह्मर्षि पद पर पदोन्नत कर दिया गया था। समझने वाली बात है कि राजर्षि की सामर्थ्य की तुलना राजाओं-महाराजाओं से की जाती है तो ब्रह्मर्षि की सामर्थ्य की तुलना राजाओं-महाराजाओं से की जाती है तो ब्रह्मर्षि की शक्ति की तुलना-ब्रह्म से की जाती है। जिसका अर्थ यह हो सकता है कि वह सृष्टि के स्वामी संचालक और नियन्त्रक की क्षमताओं से ओत-प्रोत होता है।

मन्त्र में इतनी शक्ति हो सकती है यह आश्चर्य का विषय हो सकता है अयथार्थ नहीं। भारतीय मन्त्र विद्या में शब्दों की जिस “संवहन शक्ति” का उपयोग किया जाता है उसका एक छोटा-सा रूप पराध्वनि (अल्ट्रासाउण्ड) के रूप में भौतिक शास्त्रियों ने भी जान लिया है और उसके विभिन्न प्रकार के चिकित्सकीय उपयोग होने लगे हैं। इसे चिकित्सा जगत में क्रान्ति की संज्ञा दी गई है।

ध्वनि का वह क्षेत्र तो बहुत स्वल्प है जो हमारे कानों की पकड़ में आता है और जिसे हम सुन सकते हैं। जिन ध्वनियों के कम्पन प्रति सेकेंड 20 से लेकर 20 हजार तक होते हैं उन्हें ही मनुष्य के कान आसानी से सुन सकते हैं। किंतु ध्यान कम्पन तो इससे बहुत कम और बहुत अधिक सामर्थ्य के भी होते हैं उन्हें अनसुनी ध्वनियाँ कहा जाता है। इससे उनकी सामर्थ्य में कमी नहीं होती वरन् सच तो यह है कि यह कर्णातीत-अनसुनी ध्वनियाँ और भी अधिक सामर्थ्यवान होती हैं। ‘सुपर सोनिक रेडियो मीटर’ की सहायता से अन्तरिक्ष में संव्याप्त अगणित ध्वनि प्रवाहों को सुना, जाना जा सकता है। मन्त्र साधना में इन श्रवणातीत ध्वनियों का उत्पादन अतिरिक्त रूप से होता है और वे अपने क्षेत्र में असाधारण प्रभाव डालती हैं।

विज्ञान ने श्रवणातीत ध्वनियों की एक अति प्रभावोत्पादक शक्ति माना है और उनसे अनेक प्रकार के महत्वपूर्ण काम लेने की व्यवस्था बनाई है। इन दिनों वस्तुओं की सही मोटाई गहराई नापने में, धातुओं के गुण-दोष परखने में इनका प्रयोग होता है। कार्बन ब्लैक का उत्पादन, वस्त्रों की धुलाई, रासायनिक सम्मिश्रण वस्तुओं की कटाई, पिसाई, गीली वस्तुओं को सुखाना, धातुओं की ढलाई, प्लास्टिक धागों का निर्माण जैसे अनेकों उद्योगों ध्वनि तरंगों की सामर्थ्य का उपयोग करके चल रहे है। आयोवा स्टेट कॉलेज, अल्ट्रासोनिक कारपोरेशन, बी. एफ. गुडरिच कम्पनी आदि कितने ही व्यापार संस्थानों ने ऐसे यन्त्र बनाये हैं जिनमें श्रवणातीत ध्वनियों की सामर्थ्य का उपयोग होता है और उससे महत्वपूर्ण लाभ कमाये जाते हैं।

ध्वनियों को आकाश से पकड़ कर उन्हें ऊर्जा के रूप में परिणत करने की तैयारियाँ भी बड़े जोरों से हो रही हैं। उन्हें ताप, प्रकाश, चुम्बक एवं बिजली के रूप में परिणत किया जा सकेगा और इस आधार पर ईंधन का एक सस्ता और सुविस्तृत स्रोत हाथ में आ जाएगा। कान के माध्यम से मस्तिष्क में ध्वनियाँ पहुँचती हैं और हमें शब्द-श्रवण का लाभ मिलता है। जिनके कानों की झिल्ली खराब हो गई है, उन बहरे लोगों को दृष्टि मार्ग से ध्वनि तरंगों को मस्तिष्क तक पहुँचाने और सुनने का लाभ देने के लिए चल रहे प्रयोग सफल होने के निकट पहुँचते जा रहे है। इसी प्रकार गूँगे बहरे, अन्धे व्यक्ति भी अपनी आवश्यकता अन्य छिद्रों के सहारे पूरी कर लिया करेंगे। राडार जैसे यन्त्र अभी भी ध्वनि प्रवाह को पकड़ कर ही बहुमूल्य जानकारियाँ संग्रह करते हैं।

मन्त्रों में भी ध्वनि शक्ति का ही स्वरूप कार्य करता है जिसके उपयोग की विधि आप्त महर्षियों ने अपने ढंग से खोजी थी। मन्त्र शक्ति की इतनी महत्ता होते हुए भी सभी लोग उसके द्वारा वह सामर्थ्य नहीं जुटा पाते। यह प्रश्न अक्सर उठा करता है और मन्त्र शक्ति में सन्देह का कारण बना रहता है। उसका कारण और कुछ नहीं अन्तःकरण का गहरा और उथला होना ही है। मन्त्र में सन्निहित भावनाओं को प्रखर बनाने के लिए जिस परिष्कृत और समर्थ व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है। वह न जुट पाने से मन्त्र अपना सामान्य प्रभाव ही अभिव्यक्त करके रह जाता है। उससे विशेष कुछ लाभ मिलता नहीं। व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने का कार्य वाणी की सत्यनिष्ठा सरलता और मधुरता से प्रारम्भ होता है और जीवन के प्रत्येक क्रिया−कलाप में छा जाता है। जिस तरह मैले शीशे पर पड़ने वाली प्रकाश की किरण अपना कोई प्रभाव नहीं दिखा पाती उसी तरह मलिन अन्तःकरण में पड़ने वाले मन्त्र का प्रकाश केवल मात्र उसी सफाई में ही लगा रहेगा। यदि व्यक्ति की जीवन दिशा अपने दोष दुर्गुणों की ढूँढ़ निकालने और उनके स्थान पर सद्गुणों की प्रतिष्ठा की हुई हो तब तो इस प्रयोजन का भी महत्व है और उस स्थिति में मन्त्र जप का प्रभाव अविलम्ब ही सही देखने को मिल जाता है, पर यदि आहार-विहार रहन-सहन वाणी व्यवहार द्वारा अन्तःकरण को मन विक्षेप से लादते रहा गया हो तो कितना ही अच्छा और अधिक मन्त्र आप भी कोई परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगा।

मन्त्रों में भी ध्वनि शक्ति का ही स्वरूप कार्य करता है जिसके उपयोग की विधि आप्त महर्षियों ने अपने ढंग से खोजी थी। मन्त्र शक्ति की इतनी महत्ता होते हुए भी सभी लोग उसके द्वारा वह सामर्थ्य नहीं जुटा पाते। यह प्रश्न अक्सर उठा करता है और मन्त्र शक्ति में सन्देह का कारण बना रहता है। उसका कारण और कुछ नहीं अन्तःकरण का गहरा और उथला होना ही है। मन्त्र में सन्निहित भावनाओं को प्रखर बनाने के लिए जिस परिष्कृत और समर्थ व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है। वह न जुट पाने से मन्त्र अपना सामान्य प्रभाव ही अभिव्यक्त करके रह जाता है। उससे विशेष कुछ लाभ मिलता नहीं। व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने का कार्य वाणी की सत्यनिष्ठा सरलता और मधुरता से प्रारम्भ होता है और जीवन के प्रत्येक क्रिया−कलाप में छा जाता है। जिस तरह मैले शीशे पर पड़ने वाली प्रकाश की किरण अपना कोई प्रभाव नहीं दिखा पाती उसी तरह मलिन अन्तःकरण में पड़ने वाले मन्त्र का प्रकाश केवल मात्र उसी सफाई में ही लगा रहेगा। यदि व्यक्ति की जीवन दिशा अपने दोष दुर्गुणों की ढूँढ़ निकालने और उनके स्थान पर सद्गुणों की प्रतिष्ठा की हुई हो तब तो इस प्रयोजन का भी महत्व है और उस स्थिति में मन्त्र जप का प्रभाव अविलम्ब ही सही देखने को मिल जाता है, पर यदि आहार-विहार रहन-सहन वाणी व्यवहार द्वारा अन्तःकरण को मन विक्षेप से लादते रहा गया हो तो कितना ही अच्छा और अधिक मन्त्र आप भी कोई परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगा।


संत तुकाराम (Kahani)

संत तुकाराम की पत्नी बड़े कर्क स्वभाव की थी। एक बार उनके लिए किसी किसान ने गन्नों का एक गट्टा भेजा। रास्ते में जो परिचित बच्चे मिले, उनने एक-एक करके सभी गन्ने माँग लिए। घर के लिए एक बचा, सो उनने पत्नी को थमा दिया।

पत्नी गट्ठे की प्रतीक्षा में थी। एक मिला, तो कारण पूछा। बताने पर बहुत क्रुद्ध हुई। उस गन्ने को सन्त की पीठ पर इतनी जोर से मारा, कि टूट कर दो टुकड़े हो गए। चोट जोर की लगी। इतने पर भी संत ने सन्तुलन नहीं खोया। उलटे मारने वाले हाथों की प्रशंसा करने लगे। कैसे सधे हुए हाथ हैं वे कि गन्ना ठीक से टूटा। मुलायम वाला भाग पत्नी को थमाते हुए, कड़ा वाला स्वयं ले लिया, न क्रोध किया न उलाहना दिया।


विकास के मर्म को समझें

हर वर्ग और समाज से सम्बद्ध सभी मनुष्य गरीब मजदूर से लेकर धनी व्यापारी, अनपढ़, गँवार से लेकर उच्च शिक्षित विद्वान, सभी अपने द्वारा किये जाने वाले छोटे-बड़े कार्यों को विकास के निमित्त बताते हैं। अपनी वर्तमान स्थिति से एक कदम आगे बढ़ना ऊँचा उठना। यह मनुष्य की स्वाभाविक ललक भी है। जो इसकी प्राप्ति में कम तत्पर है उसे विकास हीन, जो पूरी तरह से जुआ हुआ है उसे विकासशील और जो इस पथ पर बहुत दूर तक चला गया है, उसे विकसित कहकर संतोष किया जाता है।

अर्थशास्त्री हो या वैज्ञानिक, समाज-शास्त्री मनोवैज्ञानिक हो या दर्शन-शास्त्री सभी अपने चिन्तन एवं विचारणा की पोथियाँ रचने उनके ढेर लगाने के उद्देश्य के पीछे एक ही तथ्य उजागर करते हैं कि इन सब का तात्पर्य उन सूत्रों का निर्माण है जिससे मनुष्य जाति अपने विकास पथ पर बढ़ सके।

इतना सब होने के बाद भी प्रगति का मार्ग अवरुद्ध प्रायः है। इसका एक मात्र कारण है कि चिन्तकों के सामने यह तत्व सुस्पष्ट नहीं है कि विकास क्या है? इसका सीधा-सादा अर्थ बनता है कि वर्तमान स्थिति से आगे की ओर बढ़ चलना ही प्रगति है। यह बात पुनः एक नये प्रश्न को जन्म देती है? वर्तमान स्थिति क्या है? इससे आगे कहाँ बढ़ा जाना चाहिए?

वर्तमान स्थिति पर विचार करने पर पाते हैं कि मनुष्य ने शारीरिक परिपक्वता पा ली है। शारीरिक स्तर पर आवश्यकता इसी चीज की है कि इसे स्वस्थ एवं सुव्यवस्थित रखा जाय। प्राणिक स्तर की परिपक्वता मानव अर्जित कर चुका है। इस धरातल को सुसंचालित करने के लिए यही आवश्यक है कि इसका अनावश्यक क्षरण न हो। तीसरा स्तर जिसे मनुष्य पा चुका है वह है चिन्तन का स्तर जिसे मानसिक स्तर कहा जा सकता है। मनुष्य की वर्तमान स्थिति इसी पर आधारित है। विकास की सर्वमान्य परिभाषा के अनुसार तो प्रगतिशीलता इसी को कहा जायेगा कि इसके आगामी स्तरों पर आरोहण हो। यदि ऐसा न होकर गति अधोमुखी हो तो उसे विनाश ही कहा जायेगा।

मानसिक धरातल पर आधारित मानव जीवन की छानबीन व सुसम्बद्ध अध्ययनों के अनेकों प्रयास मनोवैज्ञानिकों ने किए है। आधुनिक युग में इसकी प्रायोगिक शुरुआत वुण्ट ने की। वुण्ट के काल से लेकर हिंचनर के संरचनावाद, जान ऐंजेलों के प्रकार्यवाद, जान वी. वाट्सन के व्यवहार वाद और फ्रायड के मनोविश्लेषण वाद तक सभी मनोविज्ञानी अध्येताओं ने अपने-अपने अध्ययन के आधार पर यही स्वीकारा कि मनुष्य मानसिक धरातल पर जीता है। अब उसे आगे बढ़ना चाहिए तो कहाँ यह तथ्य आधुनिकतम मनोवैज्ञानिकों की समझ के परे है। एरिक फ्राम, एडलर तथा युँग ने इस सम्बन्ध में कुछ प्रयास अवश्य किये हैं। पर उसमें सुस्पष्टता नहीं है।

व्यापारी जहाँ धन बटोरने को विकास मानता है, पहलवान वहीं शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाने को, वहीं विद्वान बुद्धि की कुशलता और प्रवीणता को, किन्तु ये सारी पक्ष एकांगी एवं अधूरे हैं। यदि ऐसा होता तो गड़े धन पर कुण्डली मारे सर्प, शक्ति सम्पन्न हाथी, गेंड़े बुद्धि की कुशलता से नित नये कारनामे दिखलाने वाला नर विकसित कहे जाते।

इन एकांगी मान्यताओं के कारण मानव जाति स्वयं ही अपनी राह अवरुद्ध कर बैठती है। उसे किसी ऐसे समाधान की तलाश है जो उसके इस मार्ग की अवरुद्धता को समाप्त कर दे। यही नहीं वह उसे भौतिक प्राणिक मानसिक सभी स्तरों पर संतुष्ट करने वाला ही। उसे सभी प्रकार की मूढ़ मान्यताओं एवं भ्रान्तियों से उबारे।

इन सभी भ्रान्तियों, ऊहापोह से मानव जाति को उबारने वाले सूत्र जिनसे जाति को उबारने वाले सूत्र जिनसे विकास के वास्तविक मर्म का पता चलता है। उपनिषदीय चिन्तन में पाये जाते हैं इसमें यही तो बताया गया है कि हमारे पूर्व विकास यात्रा के प्राणिज मानसिक भौतिक संस्कार होने के लिए बाधक हैं। परन्तु फ्रायड की तरह यह कह कर हार नहीं मानी गई कि अचेतन गतिशील और आदिम है तथा शैशव के अनुभवों एवं प्रवृत्तियों से पूर्ण हैं। वह मानव में पशु संस्कारों के रूप में सक्रिय हैं और निरन्तर मानव को गुलाम बनाये रखता है इसके चिन्तक मानव को फ्रायड के इपीपस कांप्लेक्स तथा लिबिडो का गुलाम ठहराकर कोल्हू के बैल की तरह इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमने की बात नहीं करते। इनके विकास सिद्धान्त एडलर के अधिकार प्रेरणा और क्षतिपूर्ति की सिद्धान्त की तरह संकुचित नहीं हैं।

उपनिषदीय सूत्रों का अध्ययन स्पष्ट करता है कि विकास का यथार्थ तात्पर्य दिव्यता आत्म-ज्योति अतिमानस में प्रतिष्ठित होना है। मानव की सामान्य क्रिया विधि भी उद्देश्य के अनुरूप संचालित होनी चाहिए। श्री महर्षि अरविन्द ने अपनी पुस्तक “दी सिंथेसिस ऑफ योगा” में इसका समुचित वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उन्होंने मनुष्य को वर्तमान आधार मन से ऊपर उठने को प्रेरित करते हुए आगामी आधारों की भी चर्चा की है। इन स्तरों को उन्होंने उच्चतर मन प्रकाशित मन अधिमानस तथा अतिमानस कहा है मन से ऊपर उठकर अतिमन में प्रतिष्ठित होना ही वास्तविक अर्थों में विकास है। जो इसमें प्रतिष्ठित हुआ है, वही विकसित है तथा जो इसके लिए प्रयत्नशील है वहीं विकासशील।

अन्य विधाओं के विशेषज्ञ विकास की इस धारणा पर आक्षेप प्रकट करते हुए यह कह सकते हैं कि मनुष्य इस स्तर पर प्रतिष्ठित होकर निम्न स्तरों से विमुख हो जायेगा। इस तरह समाज में उदासीनता फैलेगी। इस तरह का आक्षेप एक भ्रम ही है। मानसिक धरातल पर जीकर भी शरीर के प्रति किसी तरह की उदासीनता नहीं आती है। यह अवश्य होता है कि अन्य जीवों की तरह उसमें शरीर बुद्धि नहीं रहती। वह शरीर को यंत्र समझता है इसी तरह अरविन्द अपने ग्रन्थों में स्पष्ट करते हैं कि अति मानसिक विकास को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति भी निम्न स्तरों से उदासीन न होकर उनका प्रयोग भी यंत्र की तरह करेगा। इस तरह सामाजिक जीवन अपेक्षाकृत उन्नत हो सकेगा, क्योंकि मनुष्य की गतिविधियाँ दिव्य चेतना से संचालित होंगी न कि फ्रायड के पशु संस्कारों से।

विकास के इस मर्म को हृदयंगम करने की आवश्यकता है। चिन्तन की अन्य विधाएँ भी आवश्यक हैं। साँसारिक वस्तुओं की भी आवश्यकता है पर वे मात्र साध नहीं है जिनको आवश्यकतानुसार उपयोग करना ठीक है न कि इनमें डूबे रहना। वास्तविकता को समझ कर विकास पथ पर आरूढ़ होने चल पड़ने में ही सार्थकता है। इस पर चलकर ही हम सही माने में विकासशील कह सकेंगे।


धैर्य (Kahani)

एक सेठ जी का नौकर लापरवाह और कामचोर था। घर के लोगों ने कहा-इसे निकाल दिया जाय। सेठ जी की पत्नी ने कहा-इसे निकालेंगे नहीं, सुधारेंगे।”

दूसरे दिन गरम पानी और तौलिया लेकर ठीक समय पर उपस्थित हुई और जगाते हुए, नौकर से बोली “स्नान कीजिए, जब तक मैं चाय बनाकर लाती हूँ।” नौकर पानी-पानी हो गया। मालकिन की इस सज्जनता को देखकर वह दूसरे दिन से सब काम समय पर करने लगा। उसे निकालना नहीं पड़ा, बाद में वह घर के अपने सदस्य के समान हो गया।

गाँधी जी ने विनोबा जी को अपने आश्रम में रहने और साथ-साथ कार्य करने का आमन्त्रण भेजा।

सर्व प्रथम विनोबा जी गाँधी जी से मिले तो उन्होंने कहा-बापू आपकी अहिंसा का आदर्श मेरे भले नहीं उतरता। यह ठीक है कि अहिंसा उन्नति कारक है। हिंसा मुक्त समाज मानवता की उन्नति और उत्कर्ष के लिए आवश्यक है। भविष्य में भले ही इस की उपयोगिता हो किन्तु आज की परिस्थितियों में हिंसा के बिना स्वराज्य सम्भव दिखाई नहीं देता। स्वराज्य मुझे जान से भी प्यारा है इसके लिए मैं किसी भी हिंसा के लिए तत्पर हूँ त्याग बलिदान के लिए कटिबद्ध हूँ। ऐसी हालत में भी क्या आप मुझे अपने आश्रम में रख सकेंगे?

गाँधी जी मुस्कराते हुए बोले “जो तुम्हारे विचार हैं वही सारी दुनिया के हैं। तुम्हें आश्रम में न लूँ तो किसे लूँ।”

“मैं जानता हूँ कि बहुमत तुम्हारा है किन्तु मैं सुधारक हूँ। आज अल्पमत में हूँ सुधारक सदैव अल्पमत में रहता है अतः हमें धैर्य के साथ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। सुधारक अगर बहुमत की बात बर्दाश न करे तो दुनिया में उसी को बहिष्कृत होकर रहना पड़ेगा। किन्तु सीमा के परे जिनमें धैर्य है ऐसे ही विरले लोग समाज को नई दिशा, नवजीवन प्रदान कर पाते हैं।”


प्राण ऊर्जा से ओत−प्रोत है, यह कायपिंजर

ताप का मोटा नियम यह है कि अधिकतम ताप अपने संस्पर्श में आने वाले न्यून ताप उपकरण की ओर दौड़ जाता है। एक गरम दूसरा ठण्डा लौह खण्ड सटा कर रखे जाएँ तो ठण्डा गरम होने लगेगा, गरम ठण्डा वे परस्पर अपने शीत व ताप का आदान-प्रदान करेंगे और समान स्थिति में पहुँचने का प्रयत्न करेंगे बिजली की भी यही गति है। प्रवाह वाले तार को स्पर्श करते ही सारे सम्बद्ध क्षेत्र में बिजली दौड़ जायेगी। उसकी सामर्थ्य उस क्षेत्र में बँटती चली जायेगी।

प्राण विद्युत का प्रभाव भी शीत ताप के सान्निध्य जैसा ही होता है। प्राणवान व्यक्ति दुर्बल प्राणों को अपना बल ही नहीं, स्तर भी प्रदान करते हैं। इनके प्रचण्ड व्यक्तित्व का प्रभाव क्षेत्र बहुत व्यापक होता है। अपने प्रभाव से व्यक्तित्वों को ही नहीं परिस्थितियों को भी बदलने में सफल होते हैं ऋषियों के आश्रम में सिंह और गाय के प्रेम पूर्वक निवास करने का तथ्य इसलिए देखा जाता था कि प्राणवान ऋषि अपनी सद्भावना से उन पशुओं को भी प्रभावित कर देते थे। महर्षि रमण की गुफा में नियमित रूप से जंगली जानवरों का आना और शाँत भाव से बैठकर वापस चले जाना, इसी प्राण प्रवाह से अनुप्राणित होने का उदाहरण है। बिजली, लोहे-सोने में, संत-कसाई में कोई भेद नहीं करती, वह सब पर अपना समान प्रभाव दिखाती है। जो भी उससे जैसा भी काम लेना चाहे, वैसा करने में उसकी सहायता करती है। पर मानव शरीर में संव्याप्त विद्युत की स्थिति निष्ठा है। वह मात्र शक्तिः ही नहीं, सम्वेदना भी है। विचारशीलता उसका विशेष गुण है। वह नैतिक और अनैतिक तथ्यों का अनुभव करती है।

जीव भौतिकी के नोबुल पुरस्कार प्राप्त विज्ञानी एच. हक्सले एवं एकल्स जिन्होंने मानवी ज्ञान तन्तुओं में काम करने वाली विद्युत आवेग की खोज की है, का कहना है कि निस्सन्देह मनुष्य एक जीता जागता बिजली घर है, किन्तु झटका मारने वाली, बल्ब जलाने वाली सामान्य विद्युत से, प्राण विद्युत असंख्य गुनी परिष्कृत एवं संवेदनशील है। ज्ञान तन्तु एक प्रकार के विद्युत संवाही तार है, जिनमें निरन्तर बिजली दौड़ती रहती है। पूरे शरीर से इन धागों को समेट कर एक लाइन में रखा जाय, तो उनकी लम्बाई एक लाख मील से ज्यादा बैठेगी। विचारणीय है इतने बड़े तंत्र को विभिन्न दिशाओं में गतिशील रखने वाले यंत्र को कितनी अधिक बिजली कि आवश्यकता पड़ेगी।

परा मनोविज्ञानी महिला एलीन गैरट की पुस्तक “अवेयरनेस” में अनेकों शोध विवरण छपे हैं, जिसमें उन्होंने शरीर के इर्द-गिर्द एक विद्युतीय कुहरे का चित्रांकन किया है। वे इस कुहरे के रंगों एवं उभारों में होते रहने वाले परिवर्तनों को विचार के उतार-चढ़ाव का परिणाम मानती है। सोवियत विज्ञानी कोरलियन ने इन कुहरे में हुए परिवर्तन को मात्र विचारों का ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य का प्रतीक भी माना है। उसके आधार पर अन्तराल में छिपे हुए रोगों के कारण भी परखे गये। इस प्रकार के परीक्षणों में मास्को मेडिकल इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष पावलोव ने विशेष ख्याति प्राप्त की है। उन्होंने रोग निदान के लिए इस अध्ययन को बहुत उपयोगी माना है।

मनुष्य शरीर में विद्युत की तेज तरंगें विद्यमान हैं, यह बात सर्व प्रथम 1969 में फ्राँस से निकलने वाली “मेडिकल टाइम्स एण्ड गजेट” पत्रिका में डॉक्टर द्वारा निरीक्षण के ताजे बयान के रूप में आई। डॉक्टरों ने परीक्षण करके पाया कि एक सात माह के बालक के शरीर के स्पर्श करने पर विद्युत के झटके का अनुभव होता हैं। यह बच्चा थोड़े ही दिन जीवित रहा। मरने से पूर्व उसके शरीर से हल्का नीला प्रकाश प्रस्फुटित हुआ। डॉक्टरों ने इस प्रकाश की तस्वीर भी उतारी पर वे उसका कुछ विश्लेषण न कर सके। मृत्योपरांत मृत शरीर में न कोई गर्मी थी न कोई झटका। इससे यही साबित होता है कि मनुष्य में प्राण विद्युत जैसी कोई शक्ति है चाहे वह ग्रहण किये हुए अन्न से उत्पन्न होती हो या किसी और आकाशस्थ माध्यमों से, पर यह निश्चित है कि यह विद्युत ही जीवन गति और चेतना को धारण करने वाली है।

येल विश्वविद्यालय में न्यूरोलॉजी के प्रो. हेराल्डवर ने प्रमाणित किया है कि प्रत्येक प्राणी एक “इलेक्ट्रो डायनेमिक” आवरण से घिरा है। उसकी चेतनात्मक क्षमता को इसी क्षेत्र के कारण बाहर भागने और दूसरे प्रभावों को पकड़ने की सुविधा होती है। इस विद्युतीय आवरण की शोध में आगे चलकर विज्ञानी लिनयोनाई रोविग्स ने यह प्रमाणित किया कि यह लौह कवच नहीं है, वरन् मस्तिष्क के प्रभाव से उसे हल्का, भारी, गहरा और उथला किया जा सकता है। उसकी कार्य क्षमता घटाई या बढ़ाई जा सकती है।

भौतिक क्षेत्र में विद्युत की अनेकानेक विदित एवं अविदित धाराओं की महत्ता को समझा जा रहा है। इसके प्रभाव से जो लाभ उठाया जा रहा है, उससे भी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अगले दिनों मिलने की अपेक्षा की जा रही है। ठीक इसी प्रकार मानवी विद्युत के अनेकानेक उपयोग सूझ पड़ने की सम्भावना सामने हैं।

चैकोस्लोवाकिया पोलैण्ड बुल्गारिया के जीव-शास्त्री मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमताओं के बारे में विशेष रूप से दिलचस्पी ले रहे हैं। उनने पिछले पैंतीस वर्षों में आश्चर्यजनक सफलताएँ प्राप्त की है। दूरदर्शन, विचार संग्रहण, भविष्य कथन अब पुराने विषय हो गये हैं। उसमें नई कड़ी “सायकोकिनेसिस” की जुड़ा है। इसका संक्षिप्त संकेत पी0 के0................................. जिसका अर्थ है-विचार विद्युत से वस्तुओं को प्रभावित एवं परिचालित करने की सामर्थ्य। जिस प्रकार आग या बिजली के सहारे वस्तुओं का स्वरूप एवं उपयोग बदला जा सकता है, उन्हें स्थानान्तरित किया जा सकता है, वैसी ही सम्भावना इस बात को भी है कि मानव शरीर पाई जाने वाली विशिष्ट स्तर को विद्युत धारा से चेतना स्तर को प्रभावित किया जा सकेगा। इससे न केवल अतीन्द्रिय क्षमता के विकसित होने से मिलने वाले लाभ मिलेंगे वरन् शारीरिक और मानसिक रोग निवारण में भी बहुत सहायता प्राप्त है।

आवश्यकता इस बात कि है कि मनुष्य अपने अन्दर छिपी हुई इस सामर्थ्य को पहचाने एवं उभरने के लिए तदनुरूप प्रयास पुरुषार्थ करें। इस प्रयास में स्वयं को भलाई एवं सामाजिक हित दोनों को सन्निहित हैं।


बाबू चितरंजन दास (Kahani)

सिन्धुराज के राज्य में बकमुआर नामक एक भयंकर दस्यु हुआ। उसने युवावस्था के 20 वर्षों में हजारों का कत्ल किया और प्रचुर सम्पदा लूटी। पकड़े जाने पर उसे मृत्यु दण्ड मिला।

उस समय उसके सम्बन्धी मिलने आये, तो उसने अपनी माता से मिलने से इनकार कर दिया। कारण पूछने पर कहा-बचपन में मैं स्वर्ण मुद्रा चुराकर लाया और वह माता को दी, तो उसने मेरी चतुरता को सराहा ही नहीं, प्यार भरा पुरस्कार भी दिया। उस दिन के बाद से बदला जीवन आज इस परिणति के रूप में है उसी माँ के प्रोत्साहन का प्रतिफल है कि मैं इतना नीच बना और मृत्युदण्ड का भागी हुआ।

एक बार एक वृद्ध ने, कोठी से निकलते हुये किसी भद्रपुरुष से पूछा-क्या आप मुझे इस कोठी के स्वामी से मिला देंगे।”

“क्या काम है उनसे, मुझसे कहिये?” भद्र पुरुष ने कहा।

“मेरी बेटी का विवाह है। तीन सौ रुपये चाहिये, हुजूर! यदि रुपये मिल गये, तो मैं अपनी बेटी का विवाह कर सकूँगा” वृद्ध ने कहा।

“आओ मेरे साथ” और भद्र पुरुष वृद्ध को कार में अपने साथ बैठाकर ले गया। थोड़ी दूर जाकर कार रुकी। भद्र पुरुष उतरे और सामने खड़ी बिल्डिंग में प्रवेश कर गये। जाते-जाते वह वृद्ध को भी पास के एक बरामदे में बैठने को कह गये।

थोड़ी देर बाद एक चपरासी बरामदे में आया और वृद्ध को पाँच सौ रुपये सँभालवाते हुए बोला-भाई यह पाँच सौ रुपये है। तीन सौ में अपनी बेटी का विवाह करना और बाकी दो सौ से विवाह के बाद कोई धन्धा कर लेना जिससे आगे की आजीविका चलती रहे।

वृद्ध ने रुपये तो ले लिये, किन्तु बोला - “भाई! मुझे उस कोठी के स्वामी तो मिले नहीं।”

अभी-अभी जिनके साथ बैठकर आप इस दफ्तर में आये हैं, वे ही हैं उस कोठी के स्वामी "बाबू चितरंजन दास" चपरासी ने कहा।

सारा समाज जिनके लिए एक परिवार है, उन्हें दूसरों की पीड़ा भी लगती हैं। वे दुःखी पीड़ितों को न केवल साधन देकर अभाव की पूर्ति करते हैं, अपितु ऐसी प्रेरणा भी देते हैं कि वे स्वावलम्बन भरा जीवन जी सकें यही सरलता व्यवहार की सदाशयता का उन्हें महामानव पद से विभूषित करती है।


जब अहंभाव धुल गया............

“अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” तात्! जिसकी ब्रह्म-दर्शन की जिज्ञासा जितनी प्रबल होती है, वह उतनी ही शीघ्रता से नारायण के दर्शन करता है। ब्रह्म ही क्यों वत्स! जिज्ञासा तो मनुष्य को किसी भी कला, किसी भी विद्या का पारंगत बना देती है। हमारे आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं तुम आश्रम में रहो, तप करो एक दिन तुम्हें निश्चित ही भगवान का साक्षात्कार होगा।” इतना कहकर महर्षि ऐलूष ने राजकुमार नीरव्रत की पीठ पर हाथ फेरा उन्हें सामान्य शिक्षार्थियों की तरह छात्रावास के एक सामान्य कक्ष में रहने का प्रबन्ध कर दिया।

नीरव्रत ने पहली बार अपना सामान अपने हाथों से उठाया। वे प्रथम बार एक ऐसे निवास में ठहरे, जिस तरह के निवास में उनके दास-दासियाँ भी नहीं ठहरते थे। नीरव्रत ने उस दिन ही उतना सादा भोजन ग्रहण किया था। आश्रम व्यवस्था के अपमान की बात न रही होती, तो वह उस थाल को, जो उनके लिए परोसा गया था, दूर फेंक देते। सायंकाल में विलम्ब होगा, पर जीवन की इन विपरीत दिशाओं ने अविलम्ब ही मस्तिष्क में क्रान्ति विचार मंथन प्रारम्भ कर दिया। इतना शुष्क जीवन नीरव्रत ने पहले कभी नहीं देखा था। इसलिए उससे अरुचि होना स्वाभाविक थी।

शयन में जाने से पूर्व, उन्होंने एक अन्य स्नातक को बुलाकर पूछा “तात आप कहाँ से आए हैं? आपके पिता क्या करते हैं आश्रम में निवास करते आपको कितने वर्ष हो गए? क्या आपने सिद्धि प्राप्त कर ली? क्या आपने ईश्वर का साक्षात्कार कर लिया?”

प्रश्न करने की शैली पर स्नातक को हँसी आ गयी। उससे कहा-मित्र! शेष प्रश्नों का उत्तर बाद में मिलेगा। अभी आप इतना ही समझ लें कि मैं उपकौशल का राजकुमार हूँ और यह मेरा समापन वर्ष है, जब आप यहाँ पर प्रवेश ले रहे हैं इतना कहते हुए तरुण स्नातक ने अपने तेजस्वी ललाट को वक्ष स्थल उन्नत कर, ऊपर उठाया और ऋषि ऐलूष जहाँ रहते थे, उस ओर चला गया।

नीरव्रत किंकर्तव्यविमूढ़। यह ठीक है कि इनकी मुखाकृति किन्हीं राजकुमारों से कम नहीं, पर ये सभी स्नातक इतनी सरल वेशभूषा में, इतने मौन-व्रत धारी, और इतने अनुशासन बद्ध, क्या इनकी अपनी इच्छाएँ कुछ है ही नहीं? क्या इनकी सुखाकाँक्षाएँ नष्ट हो गयी हैं? सच पूछा जाय तो नीरव्रत का माथा फट गया होता, किन्तु अच्छा हुआ उन्हें निद्रा देवी ने विश्राम दिया।

प्रातः काल सूर्योदय से दो घड़ी पूर्व ही जब भगवती ऊषा के आगमन की तैयारी हो रही थी, सब स्नातक जाग पड़े, उसी हलचल में उसकी भी निद्रा टूट गयी। उसने शैया परित्याग किया। शरीर हलका था। शौच स्नान से निवृत्त होकर वह गायत्री वंदन के लिए आसन पर बैठे। आज आश्रम जीवन का प्रथम दिन था। ध्यान तो नहीं जमा, पर चिन्तन में एकल बात सामने आयी-जब देह नष्ट हो जाती है, तब भी क्या राजा एक स्त्री-पुरुष बाल-वृद्ध का भेद रह जाता है, नहीं! फिर मेरे राजकुमारत्व को क्या अमर रहना है? नहीं-नहीं। मन ने कहा-नहीं जीवन के दृश्य भाग नश्वर हैं, क्षणिक हैं, असन्तोष प्रद हैं। जब तक मनुष्य पूर्णता प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसे ऐसी कोई मान्यता नहीं बना लेनी चाहिए, राजकुमार नीरव्रत ने मान लिया कि वह भी शरीर में अभिव्यक्त अव्यक्त आत्मा है, और उसे पाने के लिए अहंभाव छोड़ना पड़ता है।

किन्तु यह अहंभाव भी कितना है मनुष्य को बार-बार अपने शिकंजे में कसता रहता है। उससे यदि कोई बचाव कर पाता है, तो वह है निरन्तर विचार भावनाओं के प्रवाह और प्रबल निष्ठाएँ। नीरव्रत ने विचार करने की कला सीखी, भावनाओं को उभार देना सीखा तो भी अहंभाव का अवरोध अभी पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह कभी-कभी सह स्नातकों से ही झगड़ बैठते, कभी-कभी शिक्षकों से भी दुराग्रह कर बैठते। उस समय उन्हें लगता कि उनके पक्ष में न्याय है, पर जब कभी विचार की तुला उठाते और विराट् जीवन की तुलना में अपनी छोटी-सी ईकाई को तौलते तो अहंकार तिरोहित हो जाता।

मान-मर्यादा मोह-दम्भ दुराग्रह सब कुछ तिरोहित हो जाता। नीरव्रत अपने को शुद्ध चेतन, अद्वैत आत्मा अनुभव करते। शिक्षण का यह क्रम ही उनके अंतर को परिवर्तित, परिष्कृत और विकसित करता हुआ चला जा रहा था। मान्यताओं के प्रति दृष्टिकोण परिवर्तन के साथ-साथ इनका व्यक्तित्व भी विकसित होता जाता। तो भी अभी वे अविराम स्थिति में ही थे। अपरिपक्व अवस्था में ही थे।

आश्रम का नियम था कि सभी स्नातक भिक्षाटन के लिए जाया करते थे। तब भिक्षा केवल सत्कार्य के लिए संन्यासियों को भोजन के रूप में, और आश्रमवासियों ब्रह्मचारियों को धान्य के रूप में दी जाती थी। इसके अतिरिक्त और कोई व्यक्ति भिक्षा नहीं माँग सकता था। आश्रम राजाओं के दान से चलते थे तो भी यह परम्परा थी कि स्नातक अपने आपको समाज का एक बालक ही समझे, वे कभी अहंकार न करें, इसलिए भिक्षावृत्ति प्रत्येक स्नातक के लिए आवश्यक थी।

नीरव्रत को इस तरह का आदेश प्रथम बार मिला था। एक बार फिर उनका वर्षों का प्रसुप्त अहंभाव पुनः जाग पड़ा था। एक राजकुमार कभी भिक्षा नहीं माँग सकता। इस तरह का प्रतिवाद उनके अन्तःकरण ने किया था, किन्तु पुनश्च वही-अथातो ब्रह्म जिज्ञासा.............नीरव्रत को अपने आप को दबाना ही पड़ा।

भिखारी नीरव्रत। भिक्षापात्र लिए एक ग्राम में प्रविष्ट हुए। किसी के दरवाजे जाते उन्हें लज्जा अनुभव हो रही थी। ग्राम प्रमुख की कन्या विद्या ने उस संकोच को पहचाना। उसने एक मुट्ठी धान्य लिया और नीरव्रत के समीप भिक्षापात्र में डालने की अपेक्षा भूमि पर गिरा दिया स्नातक ने पूछा-भद्रे! यदि जान-बूझकर अन्न को फेंकना ही था तो आप उसे लेकर यहाँ तक आई ही क्यों?

विद्या ने हँसकर उत्तर दिया-तात मैं अकेली ही क्यों, संसार भर ऐसा करता है। हमने जीवन किसके लिए ग्रहण किया और उसका उपयोग कहाँ से करते हैं? हम किस उद्देश्य से आते हैं और वह उद्देश्य हमें पूरा करते कितना संकोच कितना भारीपन लगता है। धान्य बाहर गिराने की तरह ही अपराध नहीं हुआ।

नीरव्रत की आँखें खुल गई। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दृढ़ता अपेक्षित है ऐसा निश्चय कर लिया, तब लज्जा और अहंभाव धुल गया। और वे प्रसन्नतापूर्वक साग्रह भिक्षाटन के लिए आगे बढ़ गए।

भिक्षापात्र को आश्रम के कोष में पहुँचा आए नीरव्रत अब उस बोझ से हलके हो चुके थे, जिसने अब तक के जीवन को जटिल, भ्रमपूर्ण और असन्तोष में रखा था। नीरव्रत जब एक सायं कालीन सन्ध्या करने के लिए बैठे तो शून्य की शान्ति में इस तरह खो गए, जैसे उनका वाह्य जीवन से सम्बन्ध ही न रहा हो। उनकी इन्द्रियाँ उनका मन, उनकी सम्पूर्ण-चेतना देह के अहंभाव से उठकर अनन्त अन्तरिक्ष में फैली गईं थी। वे अब संकीर्ण परिधि से निकलकर अनन्ताकाश की अनुभूति कर रहे थे। आपने आपको निर्मल, स्वच्छ, धुला हुआ, शान्त, सन्तुष्ट और बहुत हलका, फलका अनुभव कर रहे थे।


डैथ हिल्टन (Kahani)

आदमी को कितनी जमीन चाहिए? टालस्टाय अपनी एक विश्व विख्यात कहानी में उत्तर देते हैं-सिर्फ उतनी जितने में उसका मुर्दा दफनाया जा सके। यानी उतनी कोई तीन फीट चौड़ी और छः फीट लम्बी किन्तु मरे हुए आदमी का इतनी जमीन अनन्त काल तक रोके रखना अब समस्याएँ पैदा करने लगा है।

इंग्लैण्ड में अब बहुत से लोग अपने शव को दफनाये जाने के बजाय उसका जलाया जाना पसन्द करने लगे है। फिर भी वहाँ प्रतिवर्ष मृतकों को 200 एकड़ जमीन चाहिए। पुराने कब्रिस्तान भर गये है। पर पुरानी कब्रें बिना ग्रह मंत्रालय की विशेष अनुमति के तोड़ी नहीं जा सकतीं। उत्तरी लंदन के सेंट मेरी कैथोलिक कब्रिस्तान जैसे कुछ कब्रिस्तानों ने पुरानी कब्रों पर कई फीट ऊँची मिट्टी डलवा कर नयी जमीन बनवा ली है। मगर कितने ही कब्रिस्तानों में कब्रों की जमीन शाश्वत पट्टे पर बेची गई होती है। उन पर मिट्टी नहीं डाली जा सकती। आस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड के कुछ कब्रिस्तानों ने यह समस्या यों हल की है, उनमें शव केवल 15 साल तक कब्र में रहता है फिर अस्थि शेष निकालकर निकट के समाधिगृह में रख दिये जाते है।

अमेरिका में टेनेसी राज्य के नैशविल नगर में सुप्रसिद्ध कब्र व्यापारी रे लिग्नान ने बीस मंजिल का एक समाधिग्रह बनाया है। जिसका नाम लोगों ने “ डैथ हिल्टन ” रख दिया है। इसमें आले बनाए गये है। लगभग दो लाख रुपये में कोई भी अपना शव वहाँ कयामत के दिन तक के लिए रखवा सकता है। सारे परिवार के लिए पाँच लाख रुपये में बड़ा आला मिलता है। अभी आला “बुक” करा कर किश्तों में भी पैसा भरा जा सकने की सुविधा है। मजाक में लोगों ने नारा बनाया है “अभी पैसा भरिये-जी चाहे तब मरिये” (क्कड्डब् ठ्ठशख् स्रद्बद्ग द्यड्डह्लद्गह्) 1 लाख 30 हजार लोगों ने अग्रिम बुकिंग करा ली है। पुराने ढंग के कब्रिस्तान में इतने मुर्दों को 192 एक सौ बानवे एकड़ जमीन चाहिए। पर डैथ हिल्टन में सिर्फ सात एकड़ में सब समा जायेंगे। इस प्रकार यह किफ़ायती मुर्दा घर है जो आज की परिस्थिति में सब प्रकार उपयुक्त है और किफ़ायती भी।


दुराग्रही न बनें, समझदारी अपनाएँ

दृष्टि जब संकुचित हो, तो उससे उपलब्ध होने वाली जानकारी भी अर्धसत्य स्तर की ही होती है। इसके विपरीत व्यापक दृष्टिकोण वस्तुस्थिति का समग्र और सही जानकारी देता है। फुटबाल के ऊपर रेंगने वाली पिपीलिका यही सोच कर सदा हर्षित होती रहती है कि वह इस संसार की अकेली स्वामिनी है। इससे परे भी कुछ विस्तृत और विशाल हो सकता है-इसकी वह कल्पना तक नहीं कर सकती। कुएँ में रहने वाले मेंढ़कों का भी यही हाल है। वह सम्पूर्ण जगत को उसी में समाया अनुभव करते हैं।

यह चिन्तन की कूपमण्डूकता है। सीमाबद्धता और पूर्वाग्रही दृष्टिकोण भी इसी को कहते हैं। मनुष्य जब अपने चिंतन को सीमाबद्ध बनाता है, तो वास्तविकता के सन्दर्भ में उसकी भी स्थिति मेढ़कों जैसी हो जाती है। फिर जो सामने और प्रत्यक्ष है, उसी को सर्वोपरि सत्य मानने की भूल करने लगता है। वस्तुस्थिति का भान तो तभी हो पाता है, जब मस्तिष्क को खुला और दृष्टिकोण को व्यापक रखा जाता है। तभी यह ज्ञात हो पाता है कि सच्चाई के सम्बन्ध में अपनी जो मान्यता थी, वह कितनी एकांगी, अपूर्ण और भ्रामक थी। यह सम्भव है कि किसी परिस्थिति, वातावरण, देश व काल विशेष में कोई अवधारणा सच जैसी प्रतीत हो सकती है, पर सर्वोपरि और सनातन सत्य यही है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। बदली परिस्थितियों में तथ्य भी बदल सकता है। उदाहरणार्थ गुरुत्वाकर्षण शक्ति के सापेक्ष वस्तुओं के वचन को लिया जा सकता है। यह भार हर स्थान पर स्थिर नहीं होता। आकर्षण शक्ति में न्यूनाधिकता के आधार पर यह बदलता रहता है।

ध्यान देने योग्य तो ये है कि गुरुत्वाकर्षण बल द्रव्यमान, दूरी और घनत्व के हिसाब से बदलता रहता है। इस आधार पर पृथ्वी पर भी किसी एक वस्तु का भार सदा स्थिर नहीं होता, अपितु सदा परिवर्तित होता रहता है। उसके केन्द्र में चूँकि आकर्षण शक्ति शून्य होती है, अतः प्रत्येक वस्तु का वजन वहाँ शून्य होगा। यदि किसी प्रकार वहाँ पहुँचना सम्भव हो सके, तो मनुष्य स्वयं वहाँ भारहीनता जैसी स्थिति अनुभव करेगा। इसी प्रकार पृथ्वी सतह से जैसे-जैसे ऊपर उठा जायेगा अर्थात् पृथ्वी केन्द्र से ज्यों-ज्यों व्यक्ति अथवा वस्तु की दूरी बढ़ती जायेगी भार में तदनुरूप न्यूनता भी परिलक्षित होने लगेगी। इस आधार पर समुद्र सतह पर वस्तुओं का भार सर्वाधिक होता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण शक्ति वहाँ अधिकतम होती है, जबकि पहाड़ की चोटियों पर उसके कम होने के कारण वजन में भी कमी आ जाती है। ऊपर उठते-उठते पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से बाहर निकल जाने पर एक बार पुनः भारहीनता की स्थिति पैदा होती है। अन्तरिक्ष यात्रियों को इसी मुश्किल का सामना करना पड़ता है। उन्हें इससे छुटकारा दिलाने के लिए पृथ्वी में ही कृत्रिम रूप से शून्य गुरुत्व उत्पन्न करके उस वातावरण में अभ्यस्त बनाया जाता है।

गुरुत्व-बल के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पृथ्वी पर भारी लगने वाले पदार्थ दूसरे खगोलीय पिण्डों पर उससे भी हल्का अथवा वजनदार बन सकते हैं। यदि उक्त आकाशीय पिण्ड की आकर्षण शक्ति पृथ्वी की तुलना में कम है, तो वहाँ वस्तुएँ पृथ्वी से अपेक्षाकृत हलकी लगेंगी, जबकि विपरीत दशा में भारी। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति पृथ्वी पर एक क्विंटल वजन उठा कर आसानी से चल सकता है। तो चन्द्रमा की धरती पर उसे लेकर वह दौड़ सकता है, क्योंकि उसका आकर्षण बल पृथ्वी के वस्तुओं का वजन वहाँ छः अंशों में कम हो जायेगा। धरती पर एक क्विंटल भार चन्द्र तल पर 17 किलो के लगभग होगा। सूर्य चूँकि पृथ्वी से करीब 30 गुना बड़ा है, अतः कोई व्यक्ति किसी प्रकार वहाँ चला भी जाय और धधकती आग से किसी तरह सुरक्षित भी बच जाये तो कि नितांत असम्भव है तो भी वह वहाँ की धरती पर किसी भाँति जीवित न रह सकेगा और अपने ही भार से दब कर मर जायेगा। मंगल, बुध ग्रहों पर आकर्षण बल कम है, तदनुरूप वजन भी कम होगा जबकि बृहस्पति का अधिक बल होने के कारण वहाँ खड़ा होना और चल पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होगा। पृथ्वी पर किसी 30 फुट वाले असाधारण ऊँचाई के व्यक्ति का चल फिर पाना समस्या मूलक हो सकता है, पर चन्द्रमा पर उसकी समस्या समाप्त हो जायेगी। हाइट ड्वार्फ में माचिस की डिबिया जितनी मिट्टी का वजन एक डबल डेकर बस जितना होगा, जबकि न्यूट्रान स्टार की धरती और अधिक सघन व ठोस होने के कारण चम्मच के बराबर मिट्टी का भार वहाँ हाथी जितना होगा। ब्लैक होल की सघनता इतनी अधिक बढ़ जाती है कि उसका आकर्षण बल असाधारण हो जाता है। उससे होकर प्रकाश भी नहीं गुजर नहीं पाता। यदि कभी ऐसा प्रयास होता है, वह उसी में अवशोषित होकर रह जाता है। किसी प्रकार कोई वस्तु अथवा व्यक्ति वहाँ पहुँच जाये तो वह अपने मूल आकार में नहीं रह पायेंगे। असामान्य आकर्षण बल से उसका कणों में विभाजन क्षणार्थ में सम्पन्न हो जायेगा। वजन की तो वहाँ कल्पना ही नहीं की जा सकती।

प्रत्येक ग्रह पिण्ड के आकर्षण बल का वहाँ की परिस्थितियों से सघन सम्बन्ध है। पृथ्वी के गुरुत्व बल का यहाँ की परिस्थिति और जीवन से गहरा तादात्म्य है विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि पृथ्वी का आकर्षण बल समाप्त हो जाय, तो यहाँ की परिस्थिति और वातावरण में व्यापक परिवर्तन हो जायेगा। नदी-नाले फिर पहले जैसे न तो धावमान रह सकेंगे और न उनका कोई अस्तित्व ही रह जायेगा। वायुमण्डल विलुप्त हो जायेगा। वनस्पति और जीव-जन्तुओं का नामोनिशान न रहेगा। पृथ्वी जीवनहीन हो जायेगी।

वजन के संदर्भ में ही नहीं, दृश्य के सम्बन्ध में भी वास्तविकता सदा एक-सी नहीं रहती। जो आकाशीय पिण्ड पृथ्वी से जैसा दिखाई पड़ रहा है, अन्य ग्रहों से भी वह वैसा ही प्रतीत होगा-यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। पृथ्वी से सूर्य सुनहले रंग का दीखता है, पर चन्द्रमा की धरती से वह और अधिक चमकीला और कुछ नील वर्ण का प्रतीत होता है। आकाश का रंग पृथ्वीवासियों को नीला लगता है, किन्तु चंद्र तल से वह श्याम रंग का भासता है। पृथ्वी हमें मलिन, अनाकर्षक और आभाहीन दिखाई, पड़ती है पर चन्द्रमा से अवलोकन करने पर यह तथ्य सर्वथा विपरीत लगता है। वहाँ से वह अत्यन्त चमकीली और आकर्षक लगती है। पृथ्वी पर सूर्योदय से पूर्व अरुणोदय होता है, जबकि चन्द्रमा में इसका अस्तित्व ही नहीं है। इसी प्रकार वहाँ की धरती पर गेंद को पटकने से मीलों ऊपर उछल सकती है। घोड़े हवा से बातें करते हुए दौड़ सकते हैं मनुष्य अधिकाधिक भाग दौड़ वाला श्रम कर सकता है। तात्पर्य यही है कि सब कुछ गुरुत्वाकर्षण, वातावरण, और वायुमण्डल के सापेक्ष है। सम्पूर्ण सत्य इन्हें नहीं मान लेना चाहिए।

जो इस प्रकार के अगणित तथ्यों से अपरिचित होते हैं, वही पूर्वाग्रह करते और किसी मान्यता से चिपके रहने का दुराग्रह अपनाते हैं। ऐसी कितनी ही मान्यताएँ व्यवहारिक जीवन के सम्बन्ध में प्रचलित है, जो एक स्थान पर सत्य, तो दूसरी जगह असत्य जान पड़ती है, एक समय में प्रासंगिक तो बाद में अप्रासंगिक लगती है। ऐसी स्थिति में सही-गलत का, सत्य-असत्य का निर्णय करने में दृष्टिकोण को व्यापक बनाना और लचीलापन अपनाना चाहिए। बदले समय और परिस्थिति के आधार पर सत्य को परिवर्तित रूप में अपना लेने में कोई हर्ज नहीं समझदारी इसी को कहते हैं।


किलेन्थिस (Kahani)

ग्रीस में किलेन्थिस नामक एक बालक एथेंस के तत्त्ववेत्ता जीनों की पाठशाला में पढ़ता था। किलेन्थिस बहुत ही गरीब था। उसके बदन पर पूरा कपड़ा नहीं था। पर पाठशाला में प्रतिदिन जो फीस देनी पड़ती थी, उसे किलेन्थिस रोज नियम से दे देता था। पढ़ने में वह इतना तेज था कि दूसरे सब विद्यार्थी उससे ईर्ष्या करते। कुछ लोगों ने यह सन्देह किया कि किलेन्थिस जो दैनिक फीस के पैसे देता है, सो कही से चुराकर लाता होगा, क्योंकि उसके पास तो फटे चिथड़े के सिवा और कुछ है नहीं और उन्होंने आखिर उसे चोर बताकर पकड़वा दिया। मामला अदालत में गया। किलेन्थिस ने निर्भयता के साथ हाकिम से कहा कि ‘मैं बिलकुल निर्दोष हूँ मुझ पर चोरी का दोष सर्वथा मिथ्या लगाया गया है। मैं अपने इस बयान के समर्थन में दो गवाहियाँ पेश करना चाहता हूँ। गवाह बुलाये। पहला गवाह था एक माली। उसने कहा ‘ यह बालक प्रतिदिन मेरे बगीचे में आकर कुएँ से पानी खींचता है और इसके लिये इसे कुछ पैसे मजदूरी के दिये जाते हैं।’ दूसरी गवाही में एक बुढ़िया आई, कहा-मैं बूढ़ी हूँ। मेरे घर में कोई पीसने वाला नहीं है। यह बालक प्रतिदिन मेरे घर आटा पीस जाता है और बदले में अपनी मजदूरी के पैसे ले जाता है।’

इस प्रकार शारीरिक परिश्रम करके किलेन्थिस कुछ आने प्रतिदिन कमाता और उसी से अपना निर्वाह करता तथा पाठशाला की फीस भी भरता। किलेन्थिस की इस नेक कमाई की बात सुनकर हाकिम बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे इतनी सहायता देनी चाही कि जिससे उसको पढ़ने के लिये मजदूरी करनी पन पड़े, परन्तु उसने सहायता लेना स्वीकार नहीं किया और कहा कि ‘मैं स्वयं परिश्रम करके ही पढ़ना चाहता हूँ किन्हीं से दान लेने के स्थान पर स्वावलम्बी बनकर आगे बढ़ना ही मेरे माँ-बाप ने मुझे सिखाया था।’

बाल्यकाल के जीवन में समाविष्ट ये संस्कार ही व्यक्ति को आगे चलकर महामानव बनाते एवं समुदाय को श्रेष्ठ नागरिक देते हैं।


शक्ति जागरण हेतु प्राणयोग की उच्चस्तरीय साधना

उच्चस्तरीय गायत्री साधना में सोऽहम् साधना की प्राणयोग प्रक्रिया भी सम्मिलित है इन दोनों में कमर को सीधी रख कर, पालथी मार कर सुखासन में बैठना पड़ता है। ध्यान साधनाओं में शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है इसलिए उनमें आराम कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने की आवश्यकता पढ़ती है। गायत्री उपासना और सोऽहम् साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदण्ड को सीधा रख कर ही एवं पालथी मार कर ही बैठना पड़ता है।

श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम्’ ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अन्तः भूमिका में अनुभव करना यही है संक्षेप में ‘सोऽहम्’ साधना।

वायु जब छोटे छिद्र में होकर वेग पूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बाँसुरी से स्वर लहरी निकलने का यही आधार है। जंगलों में जहाँ बाँस बहुत उगे होते हैं वहाँ अक्सर बाँसुरी जैसी ध्वनियाँ सुनने को मिलती हैं। कारण कि बाँसों में कही-कही कीड़े छेद कर देते हैं। और उन छिद्रों से जब हवा वेग पूर्वक टकराती है तो उसमें उत्पन्न स्वर प्रवाह सुनने का मिलता है। वृक्षों से टकरा कर जब द्रुत गति से हवा चलती है तब भी सनसनाहट सुनाई पड़ती है। यह वायु के घर्षण की ही प्रतिक्रिया है।

नासिका छिद्र भी बाँसुरी के छिद्रों की तरह है। उनकी सीमित परिधि में होकर जब वायु भीतर प्रवेश करेगी तो वहाँ स्वभावतः ध्वनि उत्पन्न होगी। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी वह उत्पन्न होती है पर इतनी धीमी रहती है कि कानों के छिद्र उन्हें सरलता पूर्वक नहीं सुन सकते। प्राणयोग की साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते है। प्राणायाम मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी, जितनी मन्दगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे-धीरे उसे वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए, गहरी और पूरी साँस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकरा कर उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता हैं इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा सके। कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है।

चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना चाहिए और भावना को इस स्तर की बनाना चाहिए कि उससे श्वास लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि प्रवाह की मन्द अनुभूति होने लगे। उसी प्रकार जब साँस छोड़ना पड़े तो यह मान्यता परिपक्व करनी चाहिए कि ‘हम्’ ध्वनि प्रवाह विनिसृत हो रहा है। आरम्भ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी स्पष्ट नहीं होती किन्तु क्रम और प्रयास जारी रखने पर कुछ ही समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है। और उसे सुनने में न केवल चित्त ही एकाग्र होता है वरन् आनन्द का अनुभव होता है।

‘सो’ का तात्पर्य परमात्मा और ‘हम्’ का जीवचेतना-समझा जाना चाहिए। निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त महाप्राण नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है और अंग प्रत्यंग में जीवकोष तथा नाड़ी तन्तु में प्रवेश करके उसको अपने संपर्क संसर्ग का लाभ प्रदान करता है यह अनुभूति ‘सो’ शब्द ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतरनी चाहिए और ‘हम्’ शब्द के साथ जीव भाव द्वारा इस काय कलेवर पर से अपना कब्जा छोड़ कर चले जाने की मान्यता प्रगाढ़ की जानी चाहिए।

प्रकारान्तर से परमात्म सत्ता का अपने शरीर और मनः क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित हो जाने की ही यह धारणा है। जीव भाव अर्थात् स्वार्थवादी संकीर्णता, काम, क्रोध लोभ मोह भरी मद मत्सरता अपने को शरीर या मन के रूप में अनुभव करते रहने वाली आत्मा भी दिग्भ्रान्त स्थिति का नाम ही जीव भूमिका है। इस भ्रम जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया जाय तो फिर अपना विशुद्ध अस्तित्व ईश्वर के अविनाशी अंश आत्मा के रूप में ही शेष रह जाता है। काय कलेवर के कण-कण पर परमात्मा के शासन की स्थापना और जीव धारणा की वेदखली यही है सोऽहम् साधना का तत्त्वज्ञान। श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से-सो और हम् ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जाग्रत किया जाता है कि अपना स्वरूप बदल रहा है अब शरीर ओर मन पर से लोभ-मोह का, वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारों शासनसत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान सत्य न्याय ओर प्रेम संविधान वाली धर्म सत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।

सोऽहम् साधना के अभ्यास में प्रायः पौन घण्टा प्रतिदिन लगता है। इसमें से आरम्भ के पन्द्रह मिनट श्वास ध्वनि ग्रहण करते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की धारणा में लगने चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए कि इन शब्दों के आरम्भ में अतिमन्द स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। इसके उपरान्त शेष आधा घण्टे में चिन्तन का स्तर यह होना चाहिए कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है वरन्! प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय, फुफ्फुस, आमाशय, आँखें, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि में भगवान का प्रवेश हो गया रक्त के साथ प्रत्येक नस-नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित किया।

बाह्य अंगों ने पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देश पालन करना स्वीकार कर लिया। जीभ वही बोलेगी जो ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक हो। देखना, सुनना, बोलना चखना आदि इन्द्रियजन्य गति-विधियाँ दिव्य निर्देशों का ही अनुगमन करेंगी। जननेन्द्रिय का उपयोग, वासना के लिए नहीं मात्र ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए निवापर्य आवश्यकता का धर्म संकट सामने आ खड़ा होने पर ही किया जाएगा। हाथ पाँव मानवोचित कर्तव्य पालन के अतिरिक्त ऐसा कुछ न करेंगे जो ईश्वरीय सत्ता को कलंकित करता हो। मस्तिष्क ऐसा कुछ न सोचेगा जिसे उच्च आदर्शों के प्रतिकूल ठहराया जा सके। बुद्धि कोई अनुचित न्याय विरुद्ध एवं अदूरदर्शी अविवेक भरा निर्णय न करेगी। चित्त में अवांछनीय एवं निकृष्ट स्तरीय आकांक्षाएँ न जमने पायेंगी। अहंता का स्तर नर कीटक जैसा नहीं नर नारायण जैसा होगा।

यही है वे भावनाएँ जो शरीर और मन पर भगवान् के शासन स्थापित होने के तथ्य को यथार्थ सिद्ध कर सकती है। यह सब उथली कल्पनाओं की तरह मनोविनोद भर नहीं रह जाना चाहिए वरन् उसकी आस्था इतनी प्रगाढ़ होनी चाहिए किस भाव परिवर्तन को क्रिया रूप में परिणत हुए बिना चैन ही न पड़े। सार्थकता उन्हीं विचारों की है जो क्रिया रूप में परिणत होने की प्रखरता से भरे हों, अन्यथा स्वप्नदर्शी शेखचिल्ली ऐसे ही बैठे-ठाले मन मोदक खाते रहते है। उनसे कुछ प्रयोजन सिद्ध हो नहीं सकता। सोऽहम् साधना के पूर्वार्द्ध में अपने काय कलेवर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की-परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के-प्रत्यक्ष तथ्य के-रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगे।

इस साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है। शरीर में से अवांछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का-आलस्य प्रमाद जैसी दुष्कृतियों की, मन से लोभ-मोह जैसी तृष्णाओं का, अन्तराल से जीव भावी अहन्ता का, निवारण-निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनाएँ अत्यंत प्रगाढ़ होनी चाहिए दुर्भावनाएँ और दुष्कृतियाँ और दुष्टताएँ-क्षुद्रताएँ और हीनताएँ सभी निरस्त हो रही हैं-सभी पलायन कर रही है यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरान्त ही हलकापन जो सन्तोष-जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरंतर बना रहता है उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना ही चाहिए। तभी यह कहा जा सकेगा कि सोऽहम् साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बना गया।

भावोत्कर्ष की दृष्टि से ‘सोऽहम्’ साधना के साथ-साथ उपर्युक्त भाव चित्रों को मनः क्षेत्र पर अति सघन चित्रित किया जाना चाहिए इससे वह चिन्तन कुछ ही समय में जीवन का एक प्रवाह बन जाता है और साधक का आन्तरिक कायाकल्प होने से बाह्य जीवन अनासक्त कर्मयोगी जैसा उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सांसारिक दृष्टि से कृषक, पशुपालक, श्रमिक, व्यवसायी जैसे सामान्य आजीविका में निरत होने के कारण छोटा भले ही समझा जाय पर वस्तुतः आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण वह होता अत्यन्त महान ही है अध्यात्म मूल्याँकनों की कसौटी पर कसने से उसे महामानव एवं ऋषिकाय ही ठहराया जा सकता है। राजा जनक यों साँसारिक दृष्टि के कारण से सदा ब्रह्मवेत्ता ही माने गये। किसी को साधारण स्तर का जीविकोपार्जन करना पड़े इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं यदि सोऽहम् साधना स्तर की मान्यताएँ गहराई तक अन्तःकरण में जड़ जमा लें और वे कार्य रूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठें तो समझना चाहिए इस एक ही साधना ने जीवन लक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा कर दिया।

यों सोऽहम् साधना का चमत्कारी प्रयोजन भी कम नहीं है। यह प्राणयोग की महती साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण इस प्रकार चौंसठ प्राणायामों का साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताये गये है। इन सबमें सर्वप्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्’ साधना से सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि है उसकी प्राणयोग के विविध साधना विधानों से सर्वोच्च मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायामों का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।

षट्चक्र वेधन के लिए प्राण तत्व के बरमे ही छेद करने का काम करते है॥ आज्ञाचक्र तक नालिका द्वारा प्राण-तत्व खींचने का कार्य एक ही ढंग से चलता है। पीछे उसके दो भाग हो जाते हैं, एक भावपरक दूसरा शक्ति परक। भावपरक में फेफड़ों में पहुँचा हुआ प्राण समस्त शरीर के अंग-प्रत्यंगों में समाविष्ट होकर सत् का संस्थापन और असत् का निवारण सम्पन्न करता है। आज्ञा चक्र में एक दूसरी प्राणधारा पिछले मस्तिष्क को स्पष्ट करती हुई मेरु-दण्ड में निकल जाती है। वही ब्रह्म नाड़ी का महाशक्ति नद है। इड़ा और पिंगला की दो विद्युत धाराएँ इसी में प्रवाहित होती हैं। वे मूलाधार चक्र तक पहुँचती हैं और सुषुम्ना सम्मिलन के बाद वापस लौट आती है। षट्चक्र इसी मेरुदण्ड में स्थित ब्रह्मनाड़ी महानन्द के अंतर्गत पड़ने वाले भँवर हैं। इनमें ही लोक लोकान्तरों से-अति मानवी शक्ति संस्थानों से-सम्बन्ध मिलाने वाली रहस्यमय कुञ्जियाँ सुरक्षित रखी हुई है। षट्चक्रों में से जो जितने रत्न भण्डारों से सम्बन्ध स्थापित करले वह उतना ही महान् बन सकता है। कुण्डलिनी शक्ति को भौतिक और आत्मिक शक्तियों का आदान-प्रदान सम्पन्न करने वाली महत्त्व भूमिका कह सकते है। उसका जागरण षट्चक्र वेधन के उपरान्त ही होता है चक्रवेधन के लिए प्राणतत्त्व पर आधिपत्य स्थापित करने वाले वेधक प्राणायामों का अभ्यास करना पड़ता है। जो प्राणायाम षट्चक्र वेधन में सहायता करते है उनसे सोऽहम् का प्राणयोग सर्वप्रथम और सर्वसुलभ है। पंचकोशों के अनावरण का क्रम भी चक्रवेधन स्तर का ही है। उसके लिए प्राण-प्रखरता बढ़ानी पड़ती है। यह प्रयोजन भी सोऽहम् साधना से ही पूरा होता है।

कहा जा चुका है कि सोऽहम् की भावना साधना वाला पक्ष आज्ञाचक्र से मुड़कर फेफड़ों की तरह श्वास-प्रश्वास का रूप धारण करता है और वहीं से दूसरी धारा मेरुदण्ड की ओर मुड़कर शक्ति जागरण का काम करती है। सोऽहम् साधन के हिमालय से निकलने वाली गंगा, यमुना भावोत्कर्ष एवं शक्ति संवर्धन के दोनों प्रयोजन पूरे करती है-इससे भौतिक और आत्मिक प्रगति के दोनों ही प्रयोजन पूरे करती हैं। शक्ति सम्पन्न और भावोत्कर्ष की उभय पक्षीय उपलब्धियाँ ही समग्र अध्यात्मिक हैं। उसे प्राप्त करने में सोऽहम् साधना कितनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।

स्वरयोग अपने आप में एक स्वतन्त्र शास्त्र है। इड़ा और पिंगला नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चन्द्र सूर्य स्वर, शरीर और मन की स्थिति में ऋण और धन विद्युत के आवेश घटाते-बढ़ाते रहते हैं। इस स्थिति का सही ज्ञान रहने पर मनुष्य यह जान सकता है कि उसकी अन्तः क्षमता किस कार्य को कर सकने में समक्ष अथवा क्या करने में असमर्थ है। अन्तर्जगत् की वस्तुस्थिति का सही ज्ञान होने पर मनुष्य के लिए ऐसा कदम सरल हो जाता है, जिसके आधार पर सफलता का पथ अधिक प्रशस्त हो सके। किस स्वर की स्थिति में मनुष्य दूसरों की क्या सहायता कर सकता है। इसकी जानकारी भी स्वरयोग से मिलती है। तदनुसार दूसरों की स्वल्प सहायता करके भी उन्हें अधिक मात्रा में लाभान्वित किया जा सकता है। सामान्य वृद्धि से जो अविज्ञात जानकारियाँ प्रायः नहीं जानी जा सकतीं उन्हें भी स्वरयोग के माध्यम से अधिक खूब और खूबसूरती से समझा जा सकता है।

स्वरयोग की साधना के यों कई अभ्यास हैं, पर उनमें अधिक सरल और अधिक सफल सोऽहम् साधना ही रहती है। यह विशुद्ध रूप से प्राणयोग है। उसमें प्राणायाम के, षट्चक्रवेधन, ग्रंथिवेधन, कुण्डलिनी जागरण, स्वर साधन, गन्धानुभूति, भावोत्कर्ष जैसी योगाभ्यास की अनेक ऐसी धाराएँ समाविष्ट हैं जिनके माध्यम से साधक को उच्चस्तरीय आत्मविकास का लाभ मिल सकता है।


विवेकानन्द (Kahani)

विवेकानन्द विदेश जा रहे थे। वे माता शारदामणि के पास आशीर्वाद लेने पहुँचे। माताजी ने कहा-पहले मेरा काम कर। बाद में आशीर्वाद दूँगी। सामने तलवार पड़ी थी इशारा करते हुए कहा-उसे उठा कर ला विवेकानन्द ने माता के हाथ में मूँठ थमा दी और धार वाली नोंक उसने हाथ में रखी।

माताजी ने आशीर्वाद देते हुए कहा-जो दूसरों की कठिनाई को समझता है और मुसीबत अपने हिस्से में लेता है, उसी पर भगवान् का आशीर्वाद बरसता है। तुम्हें भगवान का अनुग्रह सदा मिलता रहेगा।

विवेकानन्द जी कहते थे महानता के ढेरों गुण मुझे परमहंस जी के पारिवारिक वातावरण में सीखने-विकसित करने का लाभ मिला। अन्यथा वे दुर्लभ ही रहते।


गुरुनानक देव के बेटे तपःपूत श्रीचन्द्र

भगवत् भक्ति से ओत-प्रोत योग साधन में कितनी शक्ति होती है। इसका उदाहरण सन्त श्रीचन्द्र के जीवन की अनेक घटनाओं से मिलता है। महात्मा श्रीचन्द्र गुरुनानक के सबसे बड़े पुत्र थे। उन्होंने अपने पिता से ही योग साधना तथा भगवत् भक्ति की भिक्षा-दीक्षा ली थी। कुछ समय तक गृहस्थ धर्म में रहकर उन्होंने साधना की ओर बाद में समय आने पर जब उन्हें सहज वैराग्य हो गया तो वे संन्यासी हो गए। महात्मा श्रीचन्द्र ने एक सौ पचास साल की आयु पाई थी और उनके सामने सिक्खों के छः गुरु गद्दी पर बैठे थे।

गुरुनानक जी ने शरीर त्याग के कुछ समय पूर्व श्री अंगद देव को गद्दी दे दी थी। श्री अंगद देव स्वयं ही बड़े त्यागी व्यक्ति थे और सदा भगवान के ध्यान में निमग्न रहा करते थे गुरु का पद पा लेने के बाद भी वे महात्मा श्रीचन्द्र के पास गए और विनयपूर्वक बोले-आप गुरू के सबसे बड़े पुत्र है और बड़े भारी महात्मा है। उनकी गद्दी के आप ही सच्चे उत्तराधिकारी हैं। कृपा पूर्वक गुरु की गद्दी पर बैठिए और शिष्यों को उपदेश कीजिये। आप गुरु-पुत्र हैं और मेरे लिए गुरु के समान ही हैं। गद्दी पर बैठना और शिष्यों को उपदेश देना आपके लिए ही योग्य है।”

श्री अंगद देव की बात सुनकर श्रीचन्द्र प्रेम से विभोर हो उठे और गदगद कंठ से बोले-हे स्वरूप आप मुझसे ऐसा क्यों कह रहे हैं। मुझे तो सारा संसार एक भगवत् रूप ही मालूम होता है। मैं भला लोगों में गुरु और शिष्य का भेद करके उपदेश किस प्रकार का सकता हूँ मेरा हृदय तो परमात्मा के अखण्ड प्रेम में डूबकर मतवाला हो चुका है। शिक्षा-दीक्षा देने की योग्यता मुझमें नहीं रह गई है। गुरु की कृपा से आप में यह शक्ति और योग्यता अवश्य है कि आप आवश्यकतानुसार जब चाहें मन को समाधि में स्थित कर सकते हैं और जब चाहे संसार में उतर कर लोगों को उपदेश कर सकते है इसलिए गुरु की गद्दी पर आप ही बैठिए और उनका मंतव्य आगे बढ़ाइए। श्री अंगद देव ने बहुत कुछ अनुरोध किया किन्तु महात्मा श्रीचन्द्र ने गद्दी पर बैठना स्वीकारा नहीं किया।

महात्मा श्रीचन्द्र अधिकतर जंगल में ही रहा करते थे और वही आने वाले जिज्ञासुओं को धर्म का उपदेश किया करते थे। एक बार साप्ताहिक समाधि से उठने के बाद उन्होंने भोजन के नाम पर थोड़ा-सा गुड़ खाने की इच्छा प्रकट की। एक शिष्य भागा-भागा पास के गाँव में गया और वहाँ के दुकानदार से कहा-भाई थोड़ा-सा गुड़ दे दो। गुरु ने खाने की इच्छा प्रकट की है।” बनिए ने समझ लिया कि यह पैसे देने वाला तो नहीं हैं। उसने कह दिया कि गुड़ नहीं है। लेकिन उसका बड़ा भारी कोठा गुड़ से भरा हुआ था।

शिष्य ने कहा, “भाई तुम्हारे पास कोठे के कोठे गुड़ भरा है लेकिन तुम थोड़ा-सा देने के लिए झूठ बोलते हो। दुकानदार ने कह दिया उसमें तो मिट्टी भरी है गुड़ नहीं।” शिष्य निराश होकर वापस आ गया और महात्मा श्रीचन्द्र से दुकानदार की शिकायत करते हुए बोला-महाराज दुकानदार के पास आ गया और महात्मा श्रीचन्द्र से दुकानदार की शिकायत करते हुए बोला-महाराज दुकानदार के पास गुड़ के कोठे भरे हैं लेकिन उसने न देने के लिए झूठ बोल दिया और कहा उसमें तो मिट्टी भरी है गुड़ नहीं।

स्वरूप! क्या तुमने उसका कोठा खोलकर देखा था। गुरु ने पूछा। शिष्य ने कहा नहीं महाराज! गुरु ने फिर कहा-तब तुम बिना देखे दुकानदार को झूठा कैसे कहते हो। यह तो ठीक नहीं हो सकता। उसके कोठे में मिट्टी ही भरी हो या उसका गुड़ खराब होकर मिट्टी हो गया हो और वह दुकानदार सच बोलता हो। बिना प्रमाण पाए किसी को झूठा कहना भले आदमियों को शोभा नहीं देता।”

बताया जाता है कि जब उस दुकानदार ने दूसरे दिन गुड़ का कोठा खोला तो उसका सारा गुड़ खराब होकर मिट्टी हो गया था। दुकानदार ने अपना परिवार बुलाया और कहा अब इस गाँव से चलो। यहाँ तो ऐसे-ऐसे योगी आ गए हैं कि जो कुछ कह देते हैं वही हो जाता है। दुकानदार गाँव छोड़कर चला गया।

महात्मा श्रीचन्द्र को जब पता चला तो वे दुःख के मारे रोने लगे और बोले धिक्कार है मुझे जो मेरे भय से एक आदमी गाँव छोड़ गया। उन्होंने दुकानदार को बुलवाया और कहा “भाई! तुम गाँव में आ जाओ।” वह बोला महाराज हम संसारी आदमी हैं कहीं फिर कोई गलती हो गई हो तो आप शाप दे देंगे और हमारा नाश हो जाएगा। श्रीचन्द्र उसे समझाते हुए बोले भाई मैंने तो कोई शाप नहीं दिया तुम्हारे कहे का समर्थन कर दिया था। हो सकता है तुम्हारे वचन तुम्हें फलीभूत हुए हों। तुम गाँव में आ जाओ और अच्छे आदमियों की तरह सत्य ओर ईमानदारी का पालन करते रहो। मैं क्या किसी महात्मा का शाप तुम्हें नहीं लग सकता। दुकानदार गाँव में चला आया।

महात्मा श्रीचन्द्र ने समझ लिया कि भगवत् भजन से उनकी वाणी में शक्ति आ गई है इसलिए वे आगे किसी के लिए भी कुछ कहने के लिए बहुत सावधान हो गए। शब्द शक्ति तपःपूत जिह्वा के तरकश से ........ की तरह निकलती है इसका यह प्रत्यक्ष प्रमाण है।


भक्तिः पंचम एवं परम पुरुषार्थ

गगन से जैसे मयंक भूमि पर आ जाय, इस प्रकार मन्दराचल के शिखर पर उतर आया अमितौजा। वह उतर तो आया किंतु उसे स्मरण नहीं है कि क्यों आया है वहाँ। उसके पाँव कब नृत्य करने लगी, कब उसका कष्ट उस संकीर्तन ध्वनि का साथ देने लगा उसे कुछ याद नहीं। वह तो आत्म विस्मृत हो गया कुछ क्षणों में

“तुम्हारा जनम अयोध्या में हुआ है।” भगवान ब्रह्मा ने उससे कहा था-ज्ञानियों के मुकुटमणि श्री उगज्जनेय ही तुम्हारे गुरु हो सकते है। मन्दराचल पर तुम उनके दर्शन कर सकते हो।”

वह हिमालय के गर्भ में स्थित दिव्यपुरी कलापग्राम से ब्रह्मलोक गया था और सृष्टिकर्ता ने उसे मन्दराचल पर भेज दिया, किन्तु वह तो भूल ही गया कि क्यों वह यहाँ आया और उसे क्या करना है। मन्दराचल का वायुमण्डल वैसे भी हृदय को भक्ति विभोर कर देने वाला है। काकभुसुण्डि का प्रभाव ही वहाँ एक अद्भुत उन्माद वातावरण बनाए रखता था ओर जब से श्रीरामदूत वहाँ आए हैं, देवताओं और गन्धर्वों में तो यह प्रसाद प्रसारित हो गया है स्वर्ग में रहना हो तो मन्दरगिरि का प्रकाश जहाँ तक जाता है, उतने क्षेत्र से दूर रहो। वहाँ जो गया वह कदाचित् ही लौटकर आयेगा। देवर्षि नारद जैसे परिव्राजकों का सम्प्रदाय उस पर्वत पर बढ़ने लगा है।

कलापग्राम का अविचल योगी अमितौजा जब वह ब्रह्मलोक से चला था तो किसी अप्सरा ने कहा था-मुनिवर! यह गम्भीरता बनाए रखनी हो तो मन्दार का मार्ग मत अपनाना!” अप्सरा-अपवर्ग के साधकों के पथ में विघ्न के रूप में ही अमितौजा इस वर्ग को जानता है। उसने दृष्टि उठाकर देखा तक नहीं कि उसे चेतावनी किसने दी। उसका गाम्भीर्य उसकी शान्ति उसकी स्थिरता क्या कृत्रिम है कि उनके भंग होने का भय हो?

अप्सरा का कार्य ही विघ्न डालना है। अमितौजा को चेतावनी केवल विघ्न का प्रयत्न जान पड़ी थी। लोक स्रष्टा ने उसे मन्दराचल ही जाने की आज्ञा दी थी। अब इस अद्भुत गिरि पर पहुँचकर उसे स्वयं का ही पता नहीं तो उसके द्वारा क्या हो रहा है, इसको वह कैसे समझ सकता है।

जब मर्यादा पुरुषोत्तम के आत्मज कुश ने अपनी राजधानी अयोध्या बनायी, उस समय उसका जन्म हुआ था। ब्राह्मण का पुत्र बचपन से ही शान्त-गम्भीर हो, उचित था। पाँच वर्ष की ही अवस्था में उपनयन संस्कार करके माता-पिता ने गुरुकुल भेज दिया उसे। अपनी सेवा से श्री वशिष्ठ नन्दन महर्षि शक्ति को उसने सन्तुष्ट किया।

महाराज कुश को यज्ञ करना था। गुरुदेव शक्ति यज्ञीय ऋत्विक् कलापग्राम से ले आना चाहते थे। स्वयं अपनी योगशक्ति से तो वे उस दिव्य क्षेत्र में गए ही, साथ में बालक अमितौजा को भी लेते गए। क्योंकि उसका आग्रह गुरुदेव के साथ युगजीवी उन महापुरुषों के दर्शन का था।

“इसे तुम यहीं रहने दो!” महायोगी वृद्धश्रवाः ने आदेश दे दिया अकस्मात्।” इस बालक में योगसिद्ध पुरुषों के लक्षण हैं। संसारी इसे बनना नहीं है।

महर्षि शक्ति को उन ज्ञान वय तपोवृद्ध का आदेश स्वीकारना पड़ा। बालक अमितौजा को बहुत प्रसन्नता हुई कि वह इस अतिमानवी क्षेत्र में निवास का सुयोग प्राप्त कर सका।

आरम्भ के केवल तीन दिन उसे महायोगी वृद्धश्रवाः के दर्शन हुए। उसकी खोज खबर इससे अधिक रखने की आवश्यकता नहीं थी। अलकनन्दा के हिम प्रवाह में उसे छाती तक खड़ा करके कुछ दिव्य औषधियों का सेवन कराया गया और कुछ सामान्य आदेश दिए गए।

कलापग्राम दिव्य देही योगियों की भूमि है। स्थूल वाके व्यवहार वहाँ चलता नहीं। अमितौजा को जब आवश्यकता हुई, उसे सदा ऐसा लगा कि कोई उसके भीतर ही बैठा उसे समझाता है, उसे आदेश देता है, उसे सम्हालता है। अध्ययन और साधन साथ-साथ चलते रहे, किंतु दैहिक दृष्टि से वह अपनी गुफा में एकाकी नहीं ही था। काल का उसके लिए महत्व नहीं रह गया था। क्षुधा पिपासा आलस्य-तन्द्रा-निद्रा रोग, शोक का प्रवेश उस दिव्य क्षेत्र में थी ही नहीं। देह जहाँ क्षण-क्षण क्षीण होता है, आयु को लेकर ही काल गणना वहाँ होती है। कलापग्राम में तो काल जैसे स्थिर हो गया है।

आत्मतत्त्व की प्रत्यक्षानुभूति क्या है? अन्तःकरण निर्मल हुआ, विक्षेप रहित हुआ और श्रुति-शास्त्र का सम्यक् अध्ययन हुआ तो जिज्ञासा को जाग्रत ही होना था। आश्चर्य यह था कि जैसे अन्य सभी प्रश्नों के उत्तर उसे अपने भीतर मिल जाते थे, जैसे वहाँ अलक्ष्य रहने वाले महापुरुष संकल्प की भाषा में अब तक उसके अध्ययन एवं साधन का संचालन करते आ रहे थे वैसे इस जिज्ञासा का उत्तर उसे नहीं मिला। किसी ने उसे उत्तर देने की अनुकम्पा नहीं की।

आत्मा प्रति शरीर भिन्न है, तो कोई सर्वव्यापक सत्य सम्भव कैसे है? वह चिन्तन करके किसी निश्चय पर पहुँच नहीं पा रहा था। आत्मा विभु है, श्रुति कहती तो यही है किन्तु इस सत्य का साक्षात् क्यों नहीं होता?

लगता था कि उसे यहाँ के महापुरुषों ने एकाकी छोड़ दिया है। कलापग्राम में किसी का भी दैहिक अन्वेषण व्यर्थ है, यह वह जानता था। जब तक वे योगसिद्ध महापुरुष स्वयं दर्शन न देना चाहें उनका दर्शन पाया नहीं जा सकता। उसने मानसिक रूप से आर्तपुकार की, किन्तु लगता था कि उसका संकल्प उनमें से किसी तक पहुँच नहीं रहा था। सबके सब महापुरुष एक साथ ही समाधि में स्थित हो गए हो, यह भी असम्भव नहीं था।

तब श्रुति के परमोपदेष्टा ही मेरा मार्गदर्शन करेंगे। उसने सीधे ब्रह्मा जी के दर्शन करने की इच्छा की। दीर्घकालीन साधना ने उसे समर्थ बना दिया था। ब्रह्मलोक पहुँचना उसके लिए कोई समस्या नहीं थी।

‘मुझसे क्या त्रुटि हुई कि मेरा प्रश्न अनुत्तरित रह गया है?” उसने भगवान ब्रह्मा से पूछा- “किस अपराध के कारण महात्माओं ने मेरा त्याग किया है?”

“कोई त्रुटि कोई अपराध नहीं।” पितामह ने सस्नेह उसकी ओर देखा। “प्रत्येक साधक का एक अधिकार होता है।” जो जिस कुल का है, उस कुल का परमाचार्य ही उसका पथ प्रदर्शक है। तुम कलापग्राम के योगनिष्ठ कुल के नहीं हो। तुम्हारे परिमार्जन परिशोधन तक की सहायता ही वहाँ से उपलब्ध हो सकती थी।”

“आप सृष्टि के परम गुरु हैं। समस्त कुलों के आप कुलपति है।” अमितौजा ने स्त्राष्टार की स्तुति करके प्रार्थना की। इस अज्ञ शरणागत पर आप अनुग्रह करें।

लोक पितामह बहुत व्यस्त रहते हैं। इस व्यस्तता में उपदेश देने का अवकाश कहाँ से निकालें वे? उन्होंने अमितौजा को मन्दराचल पर श्री हनुमान जी के समीप जाने को कह दिया।

वह कब पहुँचा, पहुँचकर कितना समय यह प्रश्न ही व्यर्थ है। क्योंकि जहाँ काल की कला नहीं व्यापती वहाँ समय का बीतना कैसा। “भद्र तुम?” श्री हनुमान जी स्वयं सावधान न होते, उनकी तन्मयता इतनी प्रबल थी कि अमितौजा को ब्रह्म संज्ञा आती ही न थी।

“सृष्टिकर्ता ने मुझे श्री चरणों में भेजा है।” चरण वन्दन के अनन्तर परिचय देकर अमितौजा ने कहा। धन्य हो गया यह जीवन।

“अनन्त का स्वभाव ही है कि वह स्वयं को भी सम्पूर्ण रूप में देख नहीं सकता और चेतन होने से प्रकाशित करना भी उसका स्वभाव है।” श्री रामदूत ने समझाया। जब आपने को ही अपूर्ण रूप में वह प्रकाशित करता है अहं इदं की भ्रान्ति अवकाश पा जाती है। इदं के रूप में प्रतीयमान समस्त प्रपञ्च ‘अहं’ से अभिन्न है।

आवरण हो तो निवृत्त हो। अपरोक्षानुभव शब्द से जिसका संकेत किया जाता है, वह स्थिति अर्थात् अविद्या निवृत्ति तो कभी हो गयी थी, जब वह इस आश्रम की सीमा में आया था। दो क्षण मौन बना रहा जैसे उस शब्दातीत स्थिति में पुनः तन्मय हो गया हो।

“यह निर्गुण बोध बहुत कुछ बुद्धिगम्य है।” अमितौजा ने अब नवीन जिज्ञासा प्रकट की। किन्तु स्वयं सृष्टिकर्ता जिन्हें ज्ञानियों का मुकुटमणि कहते हैं, उनका यह भक्ति तन्मय भाव बुद्धिगम्य नहीं हो रहा है।

“भद्र! स्वयं प्रमाण हो इस सम्बन्ध में।” श्री रामदूत ने कोई व्याख्या नहीं की।

अपरोक्षानुभव शब्दातीत स्थिति है। अमितौजा गम्भीर हो रहा था। ‘किन्तु आपके सान्निध्य में आकर जिस उच्छलित आनन्द का जिस तन्मयता का अनुभव हुआ, वह अपूर्व है, अचिन्त्य हे। इसकी किसी कला की तुलना नहीं यह क्या है प्रभु?” कैसे प्राप्त हो यह अवस्था?”

“यही भक्ति है, भद्र।” गदगद स्वर हुआ वायुनन्दन का। “भक्ति की नहीं जाती। जो की जाती है, वह तो साधना है। भक्ति तो कृपासिन्धु भगवान का प्रसाद है। इसे समस्त साधनाओं का फल भी कह सकते हैं।

यह सगुण तत्व सगुण परमेश्वर में ही भक्ति सम्भव है, किन्तु अमितौजा कहते हुए भी स्वयं संकुचित हो रहा था। विचार करने पर सगुण की उपलब्धि बहुत कठिन लगती है।

“तुम संकोच कर रहे हो वत्स!” स्नेह से हनुमान जी ने समझाया।” बुद्धि के द्वारा परमतत्व के रूप में सगुण को उपलब्धि नहीं होती। यह तुम्हारा मन्तव्य उचित है। निर्गुण बोधगम्य है, अतः उसमें बुद्धि का प्रवेश है। सगुण बोधगम्य है श्रद्वैकगम्य है और श्रुति शास्त्र उसमें प्रमाण है। सगुण-निर्गुण उभय अभिन्न रूप एक अद्वितीय सच्चिदानन्द परमतत्व है। सत् के रूप में उसकी उपलब्धि का अर्थ है, अपरोक्षानुभव ज्ञान में अवस्थिति। किन्तु आनन्द के रूप में उपलब्धि तो श्रद्धा के माध्यम से ही सम्भव है।”

“आनन्द ही तो प्राणिमात्र का परम प्राप्तव्य है। अचानक अमितौजा चौंका। उसे अर्थ, धर्म और काम कभी पुरुषार्थ जान नहीं पड़े थे। पुरुष का अर्थ प्राप्तव्य धन नहीं हो सकता। धन धर्म के लिए या भोग के लिए। भोग विषयी पामर पशुओं का अज्ञानियों का प्राप्तव्य होता है। भोग का फल दुःख है। दुःख किसी का प्राप्तव्य नहीं है। धर्म का फल धन या भोग-व्यर्थ बात। धर्म का फल अन्तः कारण की शुद्धि और इस शुद्धि का फल आत्मज्ञान मोक्ष। मोक्ष ही एकमात्र मनुष्य का पुरुषार्थ है प्राप्तव्य है। लेकिन मोक्ष परम शान्ति ही क्या जीव चाहता है? जीव तो चाहता है आनन्द उच्छलित, अभंग, अखण्ड आनन्द।

पुरुषार्थ पुरुष के श्रम से साधन से जो प्राप्त हो सके वह परमाभीष्ट मोक्ष ही है। हनुमान जी के उसके प्रश्न की अपेक्षा नहीं की। अतः लौकिक दृष्टि से शास्त्र चार ही पुरुषार्थ कहता है। अपने व्यक्तित्व को उन कृपामय के चरणों पर उत्सर्ग करके उनके प्रसाद रूप से प्राप्त होने वाली भक्ति पुरुष के प्रयत्न से साध्य नहीं है। इतना होने पर भी परमाभीष्ट होने से भक्ति पंचम एवं परम पुरुषार्थ है।


कर्म का कौशल ही योग

जीवन की सफलता की बात यदि गम्भीरता से सोची गई हो, सच्चे मन से उसके लिए प्रयास करने का उत्साह उठा हो तो उसके लिए एक उपाय है कि दैनिक कार्यों का स्वरूप और स्तर ऊँचा उठा दिया जाय।

परिस्थितिवश कार्य का स्वरूप कुछ भी हो सकता है। जो भी काम करने पड़ें उन्हें सामान्य-असामान्य का भेद किए बिना उत्साहपूर्वक करना चाहिए। अमुक काम समाज में सम्मानित समझा जाता है अमुक छोटे लोगों का मान जाता है इस झंझट में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। काम न कोई छोटा है, न बड़ा अपने-अपने स्थान पर सभी की उपयोगिता है। जो व्यक्ति अपने हाथ से काम नहीं करता और आराम तलबी में पड़ा रहता है। वहाँ बड़ा आदमी है ऐसे उल्टे विचारों को जितना जल्दी हो, समाप्त किया जाना चाहिए। खेलों और कारखानों में होने वाले उत्पादन के अभाव में सर्वत्र भुखमरी फैल जायेगी। परिस्थिति और आवश्यकता के अनुरूप जहाँ जो कार्य मिले, उन्हें ही अपनाया जा सकता है। तथाकथित सम्मानित काम ढूँढ़ने के लिए बेकार बैठना सर्वथा अनुपयुक्त है।

आजीविका के लिए किया जाने वाला कार्य हो या निजी कहलाने या नित्यकर्म समझे जाने वाले क्रिया−कलाप, इन्हें करने की प्रक्रिया और दृष्टि समुन्नत होनी चाहिए। यह समावेश हो जाने से छोटे काम भी बड़े व्यक्तित्व बनाने की श्रेणी में गिने जाने योग्य हो जाते हैं। काम छोटे-बड़े का महत्व नहीं, वरन् कार्य करने की पद्धतियाँ कर्म में पूर्ण सफलता दिलवाती हैं। विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार एच. जी. वेल्स के जीवन में कार्य को सही गति से सम्पन्न करने की विधा ही कारण सफलताएँ मिलती चली है। गरीबी के कारण छोटी उम्र में ही एक कपड़े की दुकान पर सेल्स मैन की नौकरी करनी पड़ी, परन्तु उस किशोर से भाग्य के सहारे जीवन नैया को नहीं छोड़ा, वरन् कर्मनिष्ठा की पतवार लेकर उसे मनचाही दिशा में खेने लगा। इसी बीच समाज को अपनी लेखनी से दिशा देने का संकल्प उसके मन में उभरा, बस उसने इसी दिशा में अपने सारे प्रयत्न अपनी समस्त गतिविधियाँ मोड़ दीं। सुबह से शाम तक दुकान में काम करते। रात को छुट्टी पाते तो घर आकर पढ़ने लगते। देर रात तक अध्ययन चलता। कुछ दिनों पश्चात् दुकान में भी पुस्तकें साथ लाने लगे और जितने समय कोई ग्राहक न आता, वे पढ़ाई में लगे रहते। वर्षों इस प्रकार अध्ययन के लिए समय निकालते रहे। फिर उन्होंने लेखन प्रारम्भ किया और व्यक्ति व समाज को दिशा देने वाले लख कहानियों की धूम मच गई। साधारण स्थिति में रहकर भी असाधारण कार्य तभी सम्भव बन पड़ते हैं, जब अपने अन्दर कार्य के प्रति लगन उत्साह और निष्ठा हो। हिन्दी साहित्य की महान विभूतियाँ मुंशी प्रेमचन्द्र, जयशंकर प्रसाद, महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला आदि के जीवन में भी यही कर्मनिष्ठ दिखाई देती है। इसी कारण जीवन के आरम्भिक दिनों में वे छोटे कार्य करके भी साहित्य क्षेत्र में दे दी नक्षत्र की भाँति उभरे और दूसरों को प्रकाश प्रेरणा देते रहें।

धर्म निष्ठा होने का गौरव प्राप्त करना अन्य सभी सफलताओं से बढ़कर है। यदि काम ईमानदारी और दिलचस्पी के साथ किया जाय तो उसका परिणाम ऐसा सुन्दर एवं सुखद होता है, जिस पर सहज गर्व किया जा सके। बेगार भुगतने की तरह हाथ के कार्य को किसी तरह निपटाने वह निश्चित रूप से आधा-अधूरा काना-कुबड़ा ही बन सकेगा, किन्तु उसे प्रतिभा का प्रश्न बनाकर और सारी कुशलता को दाव लगा दिया जाय, तो जो उपलब्धि होगी, उसे निःसन्देह उत्कृष्ट कहा जायेगा। भारत के लब्ध प्रतिष्ठित अभियन्ता एवं समाजसेवी श्री विश्वेश्वरैया ने अपनी पुस्तक “मेरे कामकाजी जीवन के संस्मरण” में एक घटना का उल्लंघन किया है उन दिनों वे मैसूर राज्य के दीवान थे। एक दिन सरकारी काम से कहीं दौरे पर जा रहे थे। मार्ग के एक स्कूल में एक सूचना किसी प्रकार पहुँच गई। स्कूल के अध्यापकों ने श्री विश्वेश्वरैया से बच्चों के लिए कुछ कहने का अनुरोध किया। विश्वेश्वरैया बिना पहले से सोचे समझे और तैयारी किए किसी सार्वजनिक संस्था में नहीं बोलते थे। पर बच्चों के प्रेमवश उन्होंने यों ही दो-चार बातें कह दीं बच्चे और अध्यापक सभी खुश हो गये, पर विश्वेश्वरैया को संतुष्टि नहीं मिली उन्होंने बाद में सूचना देकर फिर से अपना कार्यक्रम निर्धारित कराया। फिर उन्होंने एक सारगर्भित और शिक्षाप्रद भाषण दिया, जिससे छात्रवृन्द ही नहीं, समस्त ग्रामवासियों को बहुत प्रेरणा मिली। अगर वे यह सोचकर रह जाते कि छोटे लड़के अच्छे और साधारण भाषण के अन्तर को नहीं समझ सकते तो उनसे कोई कुछ कहने वाला नहीं था, पर उनका आरम्भ से ही सिद्धान्त था कि कोई भी काम कभी घटिया ढंग से नहीं करना चाहिए। उथले स्तर द्वारा कार्य की खानापूर्ति भले ही कर दी जाय, पर उसमें स्थायित्व नहीं आ सकता। इसलिए कैसा भी अवसर क्यों, न हो, मनुष्य को अपना स्तर नहीं घटाना चाहिए। ऊँचा स्तर रखने से उसका प्रभाव अच्छा ही पड़ता है।

काम साधारणतया थकान उत्पन्न करता है। उसमें शक्ति व्यय होती है अस्तु हर कोई श्रम से बचना और आराम से समय काटना चाहता है। वास्तविकता में इसे प्रारम्भिक अवस्था कहा जा सकता है। यदि किसी भी प्रकार कार्य में रुचि जाग जाय, निष्ठा उत्पन्न हो जाय, तो फिर थकान की शिकायत समाप्त हो जाती है। फिर वह खेल का रूप ले लेता है। उसे जितना भी किया जाय, प्रसन्नता मिलती जायेगी और उत्साह बढ़ता जायेगा। बच्चे उठने से लेकर सोने तक खेलते रहते हैं। इसमें उन्हें कितनी उछल-कूद करनी पड़ती है। इसका लेखा-जोखा लिया जाय तो शरीर के अनुपात को देखते हुए वह लगभग उतना ही हो जाता है जितना कि किसी श्रमिक को आठ घंटे की मजूरी में करना होता है। इतने पर भी बच्चों में थकान और उदासी के चिन्ह दिखाई नहीं पड़ते। काम को भार या पराया समझकर उदास मन से किया जाता है तो ही वह भारी पड़ता है। विनोद की तरह किये गये कामों में जितनी शक्ति खपती है, उतना ही विनोद के मनःस्थिति में कारण दूसरी ओर से मिलती जाती है। इस प्रकार पूरी निष्ठा व लगन के साथ किये गये काम से मनुष्य की सुषुप्त शक्तियों का जागरण होता है। कार्य करने की क्षमता और शक्ति का विकास होता है।

कार्य की सफलता के साथ व्यवस्था, सफाई, स्वच्छता का होना भी आवश्यक है। इससे सौंदर्य आकर्षण तथा उत्कृष्टता कर्म में उत्पन्न होती है। गन्दगी वातावरण को अशुद्ध बनाकर घृणा को जन्म देती है।

छोटे-मोटे रूप धारण करके कर्म सफलता के द्वार को खटखटाना है। किन्तु छोटा काम समझकर उसके प्रति उपेक्षा रखना, सफलता के सोपान से गिरने के समान है। प्रत्येक महान व्यक्ति अपने नन्हें-नन्हें कामों के पुञ्ज से ही महान बनते हैं। यदि मनुष्य इच्छानुसार कार्य की प्रतीक्षा करता रहे, तो अपना सम्पूर्ण जीवन यों ही खो बैठेगा। अरुचिकर कामों की सूची बनाना इस बात प्रतीक है कि वह व्यक्ति आलसी प्रमादी है। ऐसे लोग काम टालने और काम से जी चुराने की वृत्तियों के कारण सदैव हीन अवस्था में पड़े रहते हैं।

कर्म में धैर्य और निष्ठा का होना सफलता के लिए आवश्यक है। जिस भाँति कलाकार अपनी कला को तल्लीनतापूर्वक निखारता है कर्मठ व्यक्ति को अपने कर्म में उसी प्रकार की तल्लीनता और आनन्द प्रदर्शित करना चाहिए। कर्म को व्यापार मानकर करने से आनन्द का अतीव बना रहता है।

“योगः कर्मसु कौशलम्” गीता का यह वाक्य कार्य पद्धति की कुशलता पर जोर देता है। कुशलता पूर्वक किये गये काम में कभी भी असफलता नहीं मिलेगी। छोटे से छोटा कार्य भी यदि कुशलता पूर्वक निर्वाह किया गया तो उस कार्य की सफलता किसी महान कार्य की श्रृंखला भी कड़ी बनकर जीवन के महत् मार्ग को खोल देने में समर्थ होती है।

समाज के विकास के साथ ही व्यक्ति के विकास की सम्भावना जुड़ी है। समाज में पृथक् रह कर अथवा उसके हित की ओर से विमुख होकर कोई व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता। जब-जब मनुष्यों के बीच सामाजिक भावना का ह्रास हो जाता है तब-तब समाज में कलह और संघर्ष की परिस्थितियाँ बढ़ने लगती हैं। चारों ओर अशान्ति और असुरक्षा का वातावरण व्याप्त रहने लगता है। समाज की प्रगति रुक जाती है। और उसी के साथ व्यक्ति की प्रगति भी। इसी हानि को बचाने के लिए हमारे समाज के निर्माता ऋषियों ने वेदों में स्थान-स्थान पर पारस्परिक सहयोग और सद्भावना का उपदेश दिया है- बताया गया है-

“अज्येष्ठा सो कनिष्ठासः सं भ्रातरो वावध सौभागाय”

इस वेद वाक्य का आशय यही है कि हम सब प्रभु की संतान एक दूसरे के भाई है। हममें न कोई छोटा है और न बड़ा। यह एक उत्कृष्ट सामाजिक भावना है। इसी भावना के बल पर ही तो भारतीय समाज संसार में सबसे पहले विकसित और समुन्नत हुआ। इसी भावना के प्रसाद से उसके व्यक्तियों ने संसार में सभ्यता का प्रकाश फैलाने का श्रेय पाया है और इसी बंधुत्व की भावना के आधार पर वह जगद्गुरु की पदवी पर पहुँचा है।

इसके विपरीत जब से भारतीय समाज की यह वैदिक भावना क्षीण हो गई वह पतन की ओर फिसलने लगा और यहाँ तक फिसलता गया कि आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक गुलामी तक भोगनी पड़ी है। किन्तु अब वह समय फिर आ गया है कि भारतीय समाज अपनी प्राचीन बंधु भावना को समझे, उसे पुनः अपनाये और आज के अशान्त संसार में अपने वैदिक आदर्श की प्रतिष्ठा द्वारा शान्ति की स्थापना का पावन प्रयत्न करे।

शाश्वत सिद्धान्त है कि दूसरों को उपदेश देने और मार्ग दिखलाने का वही सच्चा अधिकारी होता है इसका आचरण स्वयं उसके आदर्श के अनुरूप हो। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि पहले हम अपनी भावनाओं और व्यवहार में सुधार करें उसमें पारस्परिक भाई-चारे का समावेश करें और तब संसार के सामने वसुधैव-कुटुम्बकम् का आदर्श उपस्थित करें। इस सुधार को सरल बनाने के लिए सबसे पहले व्यक्ति और समाज और सम्बन्ध समझ लेना होगा। एक के विचारों और कार्यों का दूसरे पर क्या प्रभाव पड़ता है यह जान लेना होगा।

जीवन में निवास करने के लिए कुछ साधन परिस्थितियाँ और कुछ सहयोग अपेक्षित होता है। यह सब सुविधाएँ समाज में समाज द्वारा ही प्राप्त होती है। एक अकेला व्यक्ति न तो इन्हें उत्पन्न कर सकता है और न इनका उपयोग। इनके लिये ऐसे समाज पर ही निर्भर होना होगा। विभिन्न शिक्षण संस्थाएँ, उनमें कार्य करने वाले व्यक्ति जीवन निर्वाह के साधन, ज्ञान-विज्ञान की सुविधाएँ अन्वेषण आविष्कार, व्यापार, व्यवसाय अनुभव और अनुभूतियाँ आदि मानव विकास के जो भी साधन माने गये है उनकी उत्पत्ति समाज के सामूहिक प्रयत्नों द्वारा ही होती है। किसी का मस्तिष्क काम करता है तो किसी के हाथ पाँव, किसी का धन सहयोग करता है तो किसी का साहस इस प्रकार जब पूरा समाज एक गति ओर एक मति होकर अभियान करता है तभी व्यक्ति समूह दोनों के लिए कल्याण के द्वार खुलते चले जाते है और एक अकेला व्यक्ति संसार में कभी कुछ नहीं कर सकता।

समाज में पृथक् रहकर अथवा समाज के सहयोग के बिना व्यक्ति एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। कोई विशेष प्रगति कर सकना तो दूर इस पारस्परिकता के अभाव में जीवन ही संदिग्ध हो जाय। जीवन की सुरक्षा और उसका अस्तित्व समाज के साथ ही सम्भव है। समाज की शक्ति का सहारा पाकर ही हमारी व्यक्तिगत क्षमताएँ एवं योग्यताएँ प्रस्फुटित होकर उपयोगी बन पाती है। यदि हमारे गुणों और शक्तियों को समाज का सहारा न मिले तो वे निष्क्रिय रहकर बेकार चली जाएँ। उनका लाभ न तो स्वयं हमको ही होगा और न समाज को। सच्ची बात तो यह है कि व्यक्तिगत जीवन नाम की कोई वस्तु ही संसार में नहीं है। हम तब व्यक्ति रूप में दीखते हुए भी समष्टि रूप में जीते हैं। व्यक्तिवाद को त्याग कर समष्टिगत जीवन को महत्व देना ही हम सबके लिये हितकर तथा कल्याणकारी है। समष्टिगत जीवन और समूहगत उन्नति ही हमारा ध्येय होना चाहिए। वह कितना विकसित और शक्तिशाली बनता जायेगा उसी अनुपात से हमारा व्यक्तिगत जीवन भी बढ़ता जाएगा।

समाज जब समग्र रूप से निर्बल हो जाता है तो उस पर सामूहिक संकटों का सूत्रपात होने लगता है। उस सामूहिक संकट से व्यक्तिगत रक्षा कर सकना सम्भव नहीं होता। निर्बल समाज पर जब बाहरी आक्रमण होता है अथवा कोई संक्रामक रोग फैलाता है तब व्यक्ति उससे अपनी रक्षा कर पाने में सफल नहीं हो पाता फिर वह अपने आप में कितना ही शक्तिशाली एक स्वस्थ क्यों न हो। ऐसी समूहगत संक्रान्ति से सामूहिक रूप से ही रक्षा सम्भव हो जाती है। समाज की शक्ति ही व्यक्ति की वास्तविकता शक्ति है। इस सत्य को कभी भी न भूलना चाहिए। अपनी शक्ति का उपयोग एवं प्रयोग भी इस दृष्टि से करना चाहिए। जिससे हमारी व्यक्तिगत शक्ति भी समाज की शक्ति बने और उलटकर वह व्यापक शक्ति हमारे लिये हितकर बन सके।

समाज की शक्ति ही व्यक्ति को वास्तविक शक्ति मानी गई है व्यक्ति का अकेला शक्तिशाली होना कोई अर्थ नहीं रखता-अस्तु समाज को शक्तिशाली बनाने के लिये हमें चाहिए कि हम अपने समग्र व्यक्तित्व को उसमें ही समाहित कर दें जो कुछ सोचें समाज को सामने रख कर सोचें, जो कुछ करें समाज के हित के लिये करें। यदि हम ऐसी समष्टि प्रबन्ध चेतना को स्थान नहीं देते और अपने व्यक्ति की सत्ता को अलग कल्पना कर उसी तक सीमित रहते हैं तो एक प्रकार से समाज को निर्बल बनाने की गलती करते हैं हमारी यह अहंकार पूर्ण भावना का समाज विरोधी कार्य होगा। इसका कुप्रभाव समाज पर पड़ेगा ही पर हम सब स्वयं भी इस असहयोग से अछूते न रह सकेंगे। यह हमारा यह सामाजिक पाप प्रकाश में आ जायेगा और तब हमको पूरे समाज के आक्रोश तथा असहयोग का लक्ष्य बनाना पड़ेगा। हम जैसा करेंगे वैसा ही भरा होगा। इस न्याय से बच सकना सम्भव नहीं। इस संकीर्ण मनोवृत्ति का कुप्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व पर एक प्रकार से और भी पड़ता है। वह है उसका मानसिक पतन। ऐसे असामाजिक वृत्ति के लोगों का अंतर आलोक हीन होकर दरिद्री बन जाता है। उसके सोचने और समझने की शक्ति न्यून हो जाती है। उसकी क्षमताओं, योग्यताओं और विशेषताओं का कोई मूल्य नहीं रहता।

असामाजिक भाव वाले व्यक्तियों की शक्ति को समाज अपने लिये एक खतरा समझने लगता है और कोशिश करता है कि वे जहाँ की तहाँ निष्क्रिय एवं कुण्ठित होकर पड़ी रहे। उन्हें विकसित अथवा सक्रिय होने का अवसर न मिले। ऐसे प्रतिबन्धों के बीच कोई असहयोगी व्यक्ति अपना कोई विकास कर सकता है-यह सर्वथा असम्भव है। समाज के निषेध से जहाँ व्यक्ति की असाधारण शक्ति भी सीमित ओर वृथा बन जाती है, वहाँ समाज में समाहित होकर किसी की न्यून एवं साधारण शक्ति भी व्यापक और असाधारण बन जाती है। अपनी एक शक्ति समाज के लिये संयोजित कर व्यक्ति असंख्य शक्तियों का स्वामी बन सकता है।

समाज को अपनी शक्ति सौंप कर उसकी विशाल शक्ति को अपनाने के लिये हमें चाहिए कि हम अपने भीतर सामूहिक भावना का विकास करें। हमारा दृष्टिकोण जीवन के क्षेत्र में अपने पर से प्रेरित न होकर समाज की मंगल-भावना से प्रेरित हो। हम अपना कदम उठाने से पूर्व अच्छी तरह यह सोच लें कि इसका प्रभाव समाज पर क्या पड़ेगा। यदि हमें अपने इस कदम से समाज का जरा भी अहित दिखलाई दे तो तुरन्त ही उसे स्थगित कर देना चाहिए। हमारे लिये वे सारे प्रयत्न त्याज्य होने चाहिए। जिनमें व्यक्तिगत लाभ भले ही दिखता हो पर उससे समाज का कोई अहित होने की सम्भावना न हो। व्यक्ति की वास्तविक शक्ति समाज की शक्ति है, समाज के हित में ही उसका हित है, इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति को पीछे रखकर जीवन के हर क्षेत्र में सामाजिक दृष्टि को ही आगे रखा जाय।


जगद्गुरु शंकराचार्य (Kahani)

पिता ने स्वयं बालक का यज्ञोपवीत संस्कार कराया। विद्वान पिता के विवेकवान पुत्र ने पूछा पिता जी यह धागे गले में डालने का क्या मतलब है। पिता बोला-मनुष्य जीवन को विवेक से बाँधकर रखा जाय ताकि मनुष्य साँसारिक आकर्षणों में ही उलझ कर न रह जाय वरन् अपना पारमार्थिक लक्ष्य भी पूरा करने के लिए सजग रहे।

बालक के मन में पिता की दी गई शिक्षा ऐसी गहरी बैठी। कि आगे चलकर यही बालक विश्व-विख्यात जगद्गुरु शंकराचार्य नाम से विख्यात हुआ।

कामेच्छा का सुनियोजित न होने के कारण वासना ही मन-मस्तिष्क पर हावी हो जाती है एवं व्यक्ति को अन्ततः पतन के गर्त में ले जाती है।

महाराज ययाति वैसे तो बड़े ही विद्वान् और ज्ञानवान् राजा थे, किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें वासनाओं का रोग लग गया और वे उसकी तृप्ति में निमग्न हो गये। स्वाभाविक था कि ज्यों-ज्यों वे इस अग्नि में आहुति देते गये, त्यों-त्यों वह और भी प्रचण्ड होती गई और शीघ्र ही वह समय आ गया, जब उनका शरीर खोखला और शक्तियाँ बूढ़ी हो गई। सारे सुकृत खोये, बेटे के प्रति अत्याचारी प्रसिद्ध हुए परमार्थ का अवसर खोया और मृत्यु के बाद युग-युग के लिए गिरगिट की योनि पाई, किन्तु वासना की पूर्ति न हो सकी। पाण्डु जैसे बुद्धिमान राजा पीलिया रोग के साथ वासना के कारण ही अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए। शान्तनु जैसे राजा ने बुढ़ापे में वासना के वशीभूत होकर अपने देवव्रत-भीष्म जैसे महान् पुत्र को गृहस्थ सुख से वंचित कर दिया। विश्वामित्र जैसे तपस्वी और इन्द्र जैसे देवता वासना के कारण ही व्यभिचारी और तप-भ्रष्ट होने के पातकी बने। वासना का विष निःसन्देह बड़ा भयंकर होता है, जिनके शरीर का पोषण पाता है, उसके लोक-परलोक पराकाष्ठा तक बिगाड़ देता है। इस विष से बचे रहने में ही मनुष्य का मंगल हैं।


एक विशेष लेख- - सब कुछ कहने के लिए विवश न करें

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि में लिखी गयी ये पंक्तियाँ पुनर्प्रकाशित की जा रही हैं। इसमें उनने एक वर्ष के समयदान की बात कही है जो कि आज पुनर्गठन की वेला में और भी सामयिक है। आँवलखेड़ा की पूर्णाहुति जो कि अन्तिम पूर्णाहुति के पूर्व की युग संधि महापुरश्चरण रूपी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की प्रथम पूर्णाहुति कही गयी है, एक मध्यविराम के रूप में हमारे समक्ष आयी। इसमें एक ही सन्देश दिया गया कि हमें अब बड़े विराट् आयोजन न सम्पन्न कर एक वर्ष तक युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को साकार रूप देने के लिए आगामी पाँच वर्ष की अपनी क्रियापद्धति का निर्धारण करने के लिए अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करनी है तथा गाँव-गाँव में महाकाल का सन्देश पहुँचा देना है। यह अनुयाज प्रक्रिया एक वर्ष तक सक्रिय रूप में चलनी है। यह आगामी एक वर्ष हम सब के लिए परीक्षा का समय है। इस एक वर्ष में अधिकाधिक व्यक्तियों का समयदान महाकाल को पुनः चाहिए क्या हम देने की स्थिति में हैं? हैं तो क्या चिन्तन हमारा हो, यह उस समय की परिस्थितियों में लिखी गयी पंक्तियों के परिप्रेक्ष्य में सभी पढ़ें, मनन करें और कुछ दृढ़ निश्चय लेकर शान्तिकुञ्ज हरिद्वार से पत्र व्यवहार करें। प्रस्तुत है एक विशेष लेख-सब कुछ कहने के लिए विवश न करें।”

युग परिवर्तन के महान प्रयोजन में एक वर्ष के समयदानी की याचना महाकाल ने की है। काम बड़ा है और लम्बे समय का भी। किन्तु एक वर्ष की ही माँग क्यों की गयी है जबकि इक्कीसवीं शताब्दी को आने में अभी पन्द्रह वर्ष और बाकी हैं और इस अवधि में महान घटनाएँ होने वाली है। अशुभ से लड़ने और सृजन में जुटने के लिए असंख्यों एक से एक महत्व के काम सामने आने वाले है। ऐसे समय में तो एक जनम लग जाना भी तय है। पूरा जीवन दान कर भी दिया जाय तो भी आवश्यकता और उपयोगिता को देखते हुए भी वह कम है। फिर विचारणीय है कि बारम्बार एक वर्ष के समयदान की याचना ही क्यों दुहराई जा रही है?

फिर एक वर्ष की शर्त ही क्यों? किसलिए? पिछले वर्षों में भी कितने ही व्यक्तियों ने अपने जीवनदान मिशन के लिए दिये हैं और वे अपनी प्रतिभा का भली प्रकार निर्वाह कर रहे हैं। पूछने पर बताते हैं कि “जिस प्रकार जीवन दान, कन्यादान आदि को वापस नहीं लिया जाता, उसी प्रकार जीवनदान को भी वापस लेकर प्रतिज्ञा तोड़ने की अपेक्षा और कुछ कर बैठना अच्छा। इसलिए जीवन यदि लोक मंगल के लिए समर्पित किया है तो इसी भूमि में प्राण त्यागेंगे। इसमें हेरा−फेरी करना न हमें शोभा देता है और न इसमें मिशन का, गुरुदेव का गौरव है। हमारी तो प्रत्यक्ष बदनामी ही है, जो सुनेगा वह धिक्कारेगा। इसलिए निश्चय तो निश्चय ही है। इस छोटी-सी आयु में ऐसा कलंक सिर पर लाद कर क्यों चलें जिसकी कालिख कालिमा फिर कभी छूटे ही नहीं।”

ऐसे कुछ दृष्टिगोचर होने वाले केन्द्र व क्षेत्र में सक्रिय कार्यकर्ताओं तक ही यह संख्या सीमित नहीं है। अगणित ऐसे व्यक्ति हैं जो न्यूनाधिक रूप में अपने समय, श्रम एवं विभूतियों का सुनियोजन अपने-अपने क्षेत्र में तब से कर रहे हैं जब से वे उस पारस के सम्पर्क में आये। भले ही अभी उनके क्रिया-कलापों का मूल्याँकन न हो पाया हो, पर जब युग परिवर्तन का इतिहास लिखा जायेगा तब ज्ञात होगा कि किसने किस प्रकार इस महायज्ञ में अपना सहयोग दिया। किन्तु बात इतने तक ही सीमित नहीं है। प्रसंग एक वर्ष के समयदान का तथा वह भी अभी ही दिए जाने का चल रहा है। यह एक असमंजस हो सकता है किसी को भी वैचित्र्यपूर्ण आह्वान लग सकता है। पर किया क्या जाय? समय की माँग के आगे तो युग देवता भी नतमस्तक है। जितना रहस्यमय यह आमंत्रण किसी को लग सकता है। उससे कम विचित्र एवं अलौकिक यह युगान्तरकारी कार्य है नहीं। ऐसे में किस प्रश्न का उत्तर, क्या दिया जाय यह हमारे समक्ष भी एक असमंजस हैं

“अब तक एक सौ से अधिक जीवनदानियों का समुदाय प्राणपण से अपनी प्रतिज्ञा पर आरूढ़ है तो हमारे ऊपर क्यों ऐसी शर्त लगायी जा रही है कि एक ही वर्ष के लिए समय दिया जाय?” इसका मोटा उत्तर तो प्रश्न कर्ताओं का यही लिखाया जा रहा है कि यह दोनों पक्षों के लिये परीक्षा का समय है। आप लोग मिशन को देख लें, भली−भाँति परख लें, साथ ही हमें भी। साथ ही यह अवसर परखने का हमें भी दें कि आप इस ‘क्षुरस्यधारा’ तलवार की धार पर चढ़ सकेंगे या नहीं? अपना चिंतन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध कर सकेंगे या नहीं? बीच में कोई पक्ष अनुत्तीर्ण होता है तो उसके लिए यह छूट रहनी चाहिए कि वापस जाने या भेजने का उपाय अपना लिया जाय। जीवनदान बड़ी बात है। यदि वह दूसरों के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत कर सकने की स्थिति में बना रह सकता हो तो उस अनुदान का गौरव है। अन्यथा मिथ्या वचन देने और उसे वापस लौटाने में किसी का भी गौरव नहीं है।

घटिया कदम ओछे लोग ही उठाते हैं हम में से किसी, पक्ष को भी अपनी गणना ओछे लोगों में नहीं करना चाहिए। इसलिए परीक्षा-काल एक वर्ष की जाँच पड़ताल रखने में ही उत्तम है। बाद में फिर नए सिरे से विचार किया जा सकता है और नया कदम उठाया जा सकता है।

आमतौर से एक वर्ष की बात के सम्बन्ध में सन्देह उठाने वालों को यही उत्तर लिखाये जा रहे है। किन्तु इतने भर से किसी को संतोष नहीं होता। वे इसके अतिरिक्त और भी कई तरह की कल्पनाएँ करते दिये हुए उत्तर को पर्याप्त नहीं मानते। उसके पीछे कोई रहस्य खोजते हैं मनुष्य का स्वभाव भी है कि हर गम्भीर प्रश्न का कई प्रकार से सोचे इसे अनुचित भी नहीं कहा जा सकता।

कितने ही पत्रों में इस सन्दर्भ में कितनी बातें पूछी गई हैं। उनमें से कुछ का उल्लेख यहाँ भी किया जा रहा है। कितनों ने ही पूछा है कि (1) आप की आयु एक वर्ष ही शेष रह गई है क्या? जिसमें उतने ही समय में अपने घोषित संकल्पों को पूरा करना चाहते हैं? (2) एक वर्ष बाद हिमालय चले जाने और तपस्वियों की ऊँची बिरादरी में सम्मिलित होने का मन क्या है? (3) अगले वर्ष कोई भयावह दुर्घटनाएँ तो घटित होने वाली नहीं है? (4) एक वर्ष बाद आपको प्रज्ञा अभियान दूसरों के जिम्मे छोड़कर कोई असाधारण उत्तरदायित्व वहन करने की भूमिका तो नहीं निभानी है? (5) कहीं माता जी का स्वास्थ्य तो नहीं गड़बड़ा रहा है? (6) जिनके मन में इतने दिनों से अद्भुत उत्कण्ठाएँ उठाई जाती रही हैं, उन्हें ऐसा तो नहीं समझा गया है कि यह समय चुका देने पर फिर कभी उन्हें ऐसा अवसर नहीं मिलेगा? (7) युग परिवर्तन के घटना के सम्बन्ध में कोई ऐसी घटना क्रम तो घटित नहीं होने जा रही जिसकी सुरक्षा के लिए इन्हें अपने पास बुला रहे हों? (8) किन्हीं को कोई ऐसा सौभाग्य तो प्रदान करने वाले नहीं है, जिन्हें निकटवर्ती लोगों को ही दिया जा सकता है? भविष्य में ऊँचे उत्तरदायित्वों के साथ जुड़ा हुआ महामानवों जैसा श्रेय तो नहीं मिलने जा रहा है, जिसका रहस्य अपनी विशिष्ट क्षमताओं का वितरण विभाजन तो नहीं कर रहे हैं।

ऐसे-ऐसे अनेकों प्रश्न हैं, जिनमें से कितनों का ही उल्लेख अप्रकाशित रहना ही उपयुक्त है। इस प्रकार के रहस्यमय प्रश्नों में से किसी का भी उत्तर न या हाँ में नहीं दिया जा सकता। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें स्वीकार कर लिया जा सकता है। कुछ को अस्वीकार करने में भी हर्ज नहीं होता। पर कुछ बातें ऐसी होती है, जिनके सम्बन्ध में मौन धारण करना, कुछ न कहना ही उचित है। कई बातें ऐसी होती हैं, जिनके सम्बन्ध में गोपनीयता को रखना ही लगभग सत्य के समतुल्य नीतिकारों ने बतलाया है।

जिन प्रश्नों की झड़ी इन दिनों लगी हुई है, उन्हें किसी महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन की आशा नहीं करनी चाहिए। उन्हें इतना ही पर्याप्त समझना चाहिए जितना कि एक दूसरे की जाँच पड़ताल का हवाला देते हुए कहा गया है।

हमने अपने भूतकाल की घटनाओं का भी पत्रिका के अंकों में सीमित ही उल्लेख किया है। पूछने पर भी नपा-तुला ही वर्णन किया है। जो नहीं प्रकट किया गया, वह इसलिए सुरक्षित है कि उसे हमारा शरीर न रहने से पहले न जाना जाय। उपरान्त जो लोग चाहें, अपने अनुभव प्रकट कर सकते हैं। यदि इन घटनाओं की चर्चा होती है तो इन्हें प्रत्यक्ष कहने पर सिद्ध पुरुषों की श्रेणी में अपने को प्रख्यात करने की महत्त्वाकाँक्षा आँकी जा सकती है।

शासक संचालकों को जो शपथ दिलाई जाती हैं, उनमें एक गोपनीयता की भी होती है। हमें भी ऐसा वचन अपने मार्गदर्शक को देना पड़ा है कि लोकसेवी-ब्राह्मण के रूप में ही अपनी जानकारी सब साधारण को दी जाय। जो अध्यात्म की गरिमा सिद्ध करने के लिए आवश्यक समझा जाय, उतना ही प्रकट किया जाय। जो हमारी व्यक्तिगत साधना तपश्चर्या, सिद्धि जिम्मेदारी एवं भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं से सम्बन्धित है, उन्हें समय से पूर्व वर्णन न किया जाय।

युग परिवर्तन की अवधि में अनेकों घटनाएँ घटित होंगी। अनेकों महत्वपूर्ण व्यक्तियों के वर्तमान रूप एवं कार्यक्रम में जमीन-आसमान जैसा अंतर उत्पन्न होगा। ये बातें अभी से नहीं कही जा सकती। रहस्यमयी भविष्यवाणियाँ करने के लिए अपनी सिद्धियाँ प्रकट करने के लिए हमें मनाही की गई है। उस प्रतिज्ञा का निश्चित ही पालन किया जायेगा। इसलिए कोई सज्जन वे प्रश्न इस “एक वर्ष” के सन्दर्भ में न कहने के लिए हम वचनबद्ध है, उन्हें नहीं ही कहेंगे।


पुनर्प्रकाशित विशेष लेखमाला’-6 - लोकसेवी की प्रामाणिकता व्यक्तित्व के स्तर पर निर्भर

नवसृजन के क्षेत्र में उतरने वाले युग नेतृत्व हेतु इच्छुक हर क्षेत्रीय-केन्द्रीय कार्यकर्ता को अपना व्यक्तित्व कैसा विनिर्मित करना चाहिए इस सम्बन्ध में पुनर्गठन की इस अनुयाज वेला में आइए पुनः पढ़ें परम पूज्य गुरुदेव के इन विचारों को जिनमें उनने कुछ अपेक्षाएँ रखी हैं लोकसेवी वर्ग से। विगत पाँच अंकों से प्रकाशित हो रही यह लेखमाला सब के लिए है हर तंत्र में आगे बढ़कर, आकर कुछ काम करने वालों से लेकर अग्रणी मनीषी गणों एवं वरिष्ठ कहलाने का अग्रह रखने वालों से लेकर भविष्य के निर्माताओं तक।

जीवनयापन और जीवन की रीति-नीति को आदर्शों के अनुरूप ढालने के लिए, लोकसेवी की गरिमा को सुरक्षित और स्थिर रखने के लिए अपने गुण-कर्म स्वभाव के परिष्कार की आवश्यकता पड़ती है। इस सम्बन्ध में समग्र रूप रेखा निश्चित नहीं की जा सकती, परन्तु कुछ मोटी बातों को समझ लिया जाए और उन्हें अभ्यास में शामिल कर लिया जाए तो लोकसेवी का व्यक्तित्व अपने आदर्शों के अनुरूप ढलने लगता है। लोकसेवी का व्यक्तित्व ही इतना उत्कृष्ट और जीवन्त होना चाहिए कि जो भी उसके संपर्क में आए, वह उससे प्रभावित हुए बिना न रहे।

सेवा परक क्रिया-कलापों का अभीष्ट प्रभाव इसी कारण नहीं मिलता कि प्रायः प्रभावित करने वाले उन गुणों का अभाव रहता है, जिनकी तुलना पारस से की जाती है और उनके संस्पर्श से ही क्षुद्र व्यक्ति नर से नारायण, पशु से मानव और निम्न से उच्च श्रेणी की व्यक्ति बनने लगता है। अपने विचार अच्छे ढंग से प्रतिपादित कर लच्छेदार वक्तव्यों द्वारा लोगों को कुछ देर के लिए चमत्कृत तो किया जा सकता है, परन्तु उसका स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता। स्थायी प्रभाव के लिए तो व्यक्ति को स्वयं अपने भीतर चरित्र बल भी उत्पन्न करना पड़ता है। एक प्रसिद्ध विचारक का कथन है-विचारों में तो सभी आदर्शवादी होते हैं। योग्य-अयोग्य का ज्ञान या पुण्य-पाप की अनुभूति तो मूर्ख और पापी को भी होती है, किन्तु व्यवहारिक जीवन में हम उसे भूल जाते है। धर्म को जानते हुए भी उसमें प्रवृत्त नहीं होते और अधर्म को जानते हुए भी उससे निवृत्त नहीं होते।” दुर्योधन ने यही बात भगवान् कृष्ण से तब कही थी जब वे शान्तिदूत बन कर गये थे। अर्थात् धर्म-अधर्म का विवेक सभी को रहता है, सभी उन बातों को जानते हैं। लोकसेवी भी यदि उन्हीं बातें की कोरी चर्चा करते हुए घूमें तो, कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। इसलिए लोकसेवी को अपने व्यक्तित्व के माध्यम से सर्वसाधारण की स्थिति को शिक्षित करना चाहिए।

सेवा और व्यक्तिगत जीवन को अलग-अलग कर देखने वालों को समझना चाहिए कि लोकसेवा उनकी साधना है, व्यवसाय नहीं सेवा को व्यवसाय के रूप में अपनाने वालों की बात ओर है। कर्मचारी, नौकर, अधिकारी वर्ग भी जनसेवक की गणना में आते है, पर जनसेवा के प्रति न उनमें टीस होती है न लगन। जिन्होंने सेवा को ही अपना पाथेय चुना है, उन लोकसेवी कार्यकर्ताओं को तो सेवा का स्तर साधना की तरह ही रखना चाहिए।

अपना व्यक्तित्व जीवन यदि निकृष्ट रहा, तो सेवा साधना के प्रयासों का कोई प्रभाव नहीं होगा। स्वामी रामतीर्थ का यह वचन “लोकसेवियों को याद रखना चाहिए कि सामाजिक कार्यकर्ता की वाणी ही नहीं उसका पूरा व्यक्तित्व ही बोलता है और वाणी की अपेक्षा उसका व्यक्तित्व सुना जाता है। वाणी और कर्म जब मिल जाते हैं तो व्यक्तित्व प्रखर बन जाता है। लोकसेवी ही नहीं अन्य प्रकृति के व्यक्तियों का भी तभी प्रभाव होता है, जबकि उनके विचार और कर्म एक हों। एक वेश्या किसी साधारण व्यक्ति को आकर्षित करती है, तो उसमें वेश्या की वाणी ही सफल नहीं होती, उसके कर्म भी उसी स्तर के होते हैं। मानसिक वासना मनुष्य मन की कमजोरी है, इसलिए वह व्यभिचार की ओर आकर्षित होता है। लेकिन शराबी में भी प्रभावित करने की यही क्षमता रहती है। वह अपने विचार और कर्म के द्वारा अपने साथियों को प्रभावित करता है तथा उन्हें भी मद्यपान का व्यसन डाल देता हैं।

लोकसेवी के विचार और उसके क्रिया-कलापों में समानता हो, तो उसका व्यक्तित्व भी इतना प्रभावशाली बन सकता है कि वह अपना सेवा क्षेत्र में अभीष्ट परिणाम प्राप्त कर सके। आरम्भ में अपने अन्तरण विचारों को पूर्णतः एकात्म कर लेना एकदम चरित्र को आदर्श बना लेना भी आसान नहीं है, पर इसका यह अर्थ नहीं है कि इसके बहाने विचार और अनाचार में साम्य स्थापित करने की बात नजरअंदाज की जाती है। इनमें स्तर का अन्तर हो सकता है, लेकिन दिशा भिन्न नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए लोकसेवी खर्चीले और दान-दहेज वाले विवाहों का विरोध करता है। लोगों को अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च न करने की प्रेरणा देता है। उसके घर में कभी विवाह हो रहा ओर परिवार काफी बड़ा हो, तो थोड़ी धूमधाम तो रहेगी, पर इसके लिए खूब ठाट-बाट और शान-शौकत का प्रदर्शन किया जाए यह सर्वथा अनुचित है। कोई कार्यकर्ता दूसरों को सादगी से रहने और मितव्ययी जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देता है तथा कथित रूप से उच्च बनाये रहता है, तो इसका प्रभाव कुछ नहीं होगा।

इसलिए प्राचीन काल से अब तक लोकसेवियों की यह परम्परा रही है कि आवश्यकताएँ कम से कम रखी जाएँ। आवश्यकताओं का विस्तार किया जाए तो उनका अंत नहीं है। सुविधाएँ कितनी ही बढ़ाई जाएँ कोई भी सुविधा अनावश्यक नहीं जँचती। रहने के लिए जैसे साधारण से मकान में गुजारा हो सकता, है पर सुविधा की दृष्टि से सोचें, तो उसमें तमाम सुविधाएँ आवश्यक प्रतीत होंगी। गर्मी के कारण जी को बड़ी बेचैनी होती है, कूलर चाहिए, एयरकन्डीशन कमरे चाहिए। कूलर के द्वारा गर्मी से तो बचा जा सकता है, पर एयरकन्डीशन व्यवस्था नहीं होगी, तो सर्दियों में क्या करेंगे? ऐसा इन्तजाम चाहिए, जिससे सर्दियों में भी गरम रहा जा सकता हो। जो भी सुविधाएँ होती हैं, आवश्यकताओं का अप्रतिबन्धित रूप से औचित्य ढूँढ़ा जाय, तो सभी जरूरी लगेंगी। लोकसेवी को इस सम्बन्ध में औसत और न्यूनतम का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्हें कम करते चला जाय, तो हम देखेंगे कि हमारी आवश्यकताएँ कितनी कम हैं। एक सामान्य व्यक्ति को खाने के लिए पौष्टिक आहार, पहनने के लिए वस्त्र और रहने के लिए मकान उपलब्ध हो, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य का प्रबन्ध हो, तो समझना चाहिए कि इतने साधन हमारे लिए पर्याप्त है।

वेशभूषा के बाद मुख्य रूप से आती है लोकसेवी की आहार व्यवस्था। सेवा-साधना में प्रवृत्त कार्यकर्ताओं को अपनी आहार व्यवस्था सादगी पूर्ण और औसत स्तर की ही रखनी चाहिए। इससे एक तो स्वास्थ्य की सुरक्षा हो जाती है, दूसरे लोगों पर उसका प्रभाव भी पड़ता है। भोजन के सम्बन्ध में कुछ व्रत भी लिए जा सकते हैं। घर में रहते हुए तो सादा भोजन सभी करते हैं, पर लोकसेवी बाहर जनसंपर्क या सेवा कार्यों के लिए निकलता है, तो लोग सम्मान और श्रद्धा के वशीभूत होकर कई तरह की स्वादिष्ट वस्तुओं की व्यवस्था करते हैं। उनकी सद्भावना को उपेक्षित न करते हुए भी इस बात का ध्यान रखा जाए कि हमारा चटोरापन न बढ़ जाए। इसके लिए लोगों को पहले से बता दिया जाय कि हम लोग सादा भोजन ही करेंगे, इसके लिए कोई विशेष व्यवस्था न की जाय तो अच्छा रहता है। आतिथ्य करने वाले व्यक्ति तो अतिथि की व्यवस्था अतिथि की तरह करता है। इसलिए विशेष व्यवस्था भी की जाती है, लेकिन अतिथि स्वयं जब सामान्य व्यवसायी का आग्रह करता है, तो उससे पूरे परिवार में अतिथि के प्रति आत्मीयता और पारिवारिकता की भावना उद्भूत हो जाती है।

स्वाद लिप्सा से बचाव तो अपने आप में ही एक सद्गुण है, जिसकी गणना संयम साधना में होती है, इसके लिए एक नियम बना कर चला जाए। जैसे रोटी के साथ एक लगाव साग ही खायेंगे या एक ही दाल खायेंगे। थाली में भोज्य पदार्थों की संख्या दो या तीन से अधिक नहीं होने देंगे। बाहर क्षेत्रों में सेवा कार्य करने निकलने पर लोग श्रद्धा और स्नेह के वशीभूत होकर कुछ न कुछ चीजें बनाकर खिलाने के लिए आते है। यहाँ यह धर्म संकट भी उत्पन्न होता है कि यदि उन्हें लेने से एकदम इनकार कर दिया जाय, तो उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचती है और ले लिया जाय, तो अपना व्रत टूटता है, मर्यादा भंग होती है। ऐसी स्थिति में लायी गयी वस्तुओं का नाम मात्र अंश लिया जा सकता है। वे जिस स्नेह भाव से आतिथ्य रूप में आहार प्रस्तुत किया गया था, उसकी सराहना की जानी चाहिए।

खानपान की तरह ही लोकसेवी को और दूसरी बातों में भी इतना सतर्क रहना चाहिए कि उन्हें असुविधा हो रही है ऐसा किसी को आभास ही न हो, अपनी आदतों को इतना लचीला बना लिया जाय कि हर परिस्थिति में, हर स्थान पर किसी प्रकार की असुविधा न लगे। जैसे बहुत से व्यक्तियों को रात में सोने से पूर्व या दिन में किसी खास समय दूध पीने की आदत है। इस अभ्यास विशेष को बाहर रहते हुए स्थगित कर दिया जाय यही ठीक है।

दिनचर्या में स्वावलम्बन, नियमितता और अनुशासन भी लोकसेवी की एक मर्यादा है। स्वावलम्बन, नियमितता और अनुशासन मनुष्य के व्यक्तित्व को संवारता तथा उसे उज्ज्वल बनाता है। स्वावलम्बन का अर्थ है अपने काम अपने हाथ से ही किये जाएँ। घर में हों अथवा बाहर इन गुणों को अपने स्वभाव में सम्मिलित कोई कठिन कार्य नहीं है। परिवार में रहते हुए भी जहाँ तक हो सके अपने काम अपने हाथ से ही किये जाने चाहिए। अपने हाथ से कपड़े धोने, स्वयं हजामत बनाने ओर दूसरे जरूरी काम भी स्वयं ही करने जैसे काम स्थूल दृष्टि से किसी के लिए भले ही महत्व न रखते हों, पर इससे व्यक्तित्व में स्वावलम्बन की जो सद्वृत्ति आती है। वह व्यक्तित्व को प्रखर बनाती है।

बाहर सेवा के लिए निकलते समय लोकसेवियों को चाहिए कि वे अभीष्ट कार्य स्वयं सम्पन्न करने के लिए आगे बढ़े। आमतौर पर होता यह है कि लोकसेवी स्वयं कोई कार्य करने की अपेक्षा सेवकों को उसके लिए निर्देश देते हैं और उनसे यह अपेक्षा करते है। जैसा वे चाहते है वैसा ही कार्य वे कर लेंगे। जैसे श्रमदान या स्वच्छता संवर्धन का कार्य करना है। इसके लिए कार्यकर्ता गाँव में गये और वहाँ के निवासियों को सफाई, का महत्व तथा श्रमदान की आवश्यकता समझाने लगे। केवल समझाने पर ही कोई तैयार हो जायेगा यह तो अपेक्षा नहीं की जा सकती। ठोस परिणाम के लिए श्रमदान से गंदगी निवारण का कार्यक्रम भी बनाना पड़ेगा। उसका व्यवहारिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने पर कुछ उत्साही लोग तैयार हो सकते है उन्हें साथ लेकर सफाई के लिए निकल पड़ें और स्वयं उसमें भाग नहीं लिया, तो लोगों पर उसका जरा भी प्रभाव न होगा, लोग समझेंगे कि हमारे ऊपर हुक्म चलाया जा रहा है और उससे कार्य के प्रति महत्व बोध भी कम होगा तथा लोकसेवी के प्रति श्रद्धा भी घटेगी। ऐसे समय पर उचित यही रहता है कि लोकसेवी स्वयं पहले उस काम में जुट जाए और लोगों को सहयोग देने लगे। स्मरण रखना चाहिए कि लोकसेवी अपने आप को विशिष्ट व्यक्ति कदापि व्यक्त न करें। जन साधारण से उनके व्यक्तित्व का स्तर ऊँचा है अवश्य, पर उसे स्वयं अपनी ओर से विज्ञापित नहीं करना चाहिए।

लोकसेवी को निरहंकारी, स्वावलम्बन होने के साथ-साथ निर्लोभी भी होना चाहिए। यह लोभ ही है जिसके वशीभूत होकर अनेकों व्यक्ति सार्वजनिक सम्पत्ति का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। लोकसेवी को ऐसे सार्वजनिक कार्यों का नेतृत्व भी करना पड़ सकता है। जिनमें कि आर्थिक साधन जुटाये जाते हैं और लोकसेवी को उनका उत्तरदायित्व सम्हालना पड़ता है। ऐसी स्थिति में लोकसेवी को अपनी प्रामाणिकता रखनी चाहिए। प्रामाणिकता साबित करने भर से काम नहीं चल सकता। सिद्ध तो झूठा भी किया जा सकता है। लोकसेवी का अपनी ईमानदारी और प्रामाणिकता के प्रति सघन निष्ठा रखनी चाहिए। लोगों को उस सम्बन्ध में कोई सन्देह न हरे इसके लिए धन के हिसाब-किताब से लेकर उपयुक्त कार्यों में खर्च करने तक सभी बातें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित की जाएँ, यदि किसी बड़ी संस्था के लिए कार्य किया जा रहा है, तो उसके प्रति उत्तरदायी रहने का कर्तव्य निबाहा जाय, वहाँ व्यक्तिगत रूप से भी कुछ दिया जाए जैसे मार्ग-व्यय आदि के लिए, तो उसे भी संस्था को दिया गया समझा और उसके एक-एक पैसे का हिसाब दें।

धन सम्बन्धी प्रामाणिकता के बाद चरित्र सम्बन्धी प्रामाणिकता को भी समान महत्व दिया जाय। लोगों की निगाह इस सम्बन्ध में बड़ी बारीकी होती है और वे चारित्रिक मर्यादाओं को धन सम्बन्धी मर्यादाओं से भी अधिक महत्व देते हैं। इसलिए लोकसेवी यदि पुरुष हैं तो स्त्रियों के प्रति और स्त्री है तो पुरुषों के प्रति अपनी-अपनी दृष्टि को पवित्र रखें। पुरुषों के साथ व्यवहार में मर्यादा का अधिक ध्यान रखना चाहिए। पुरुष कार्यकर्ता स्त्रियों के साथ एकान्त में तो चर्चा नहीं ही करें, सबके साथ भी उनसे अनावश्यक बातें न कहे। जो कार्य पुरुष ही कर सकते है उनके लिए महिलाओं को उनके निभाने का कार्य करने दिये जाएँ और पुरुष पर नियत काम करें। इसमें व्यक्तित्व आने देना चाहिए। साथ ही स्त्रियो के बार-बार संपर्क को भी टालना जरूरी है। जरूरी बातें एक ही बार में समझा देनी चाहिए। बार-बार उनसे संपर्क करने में लोगों की दृष्टि जाती है और बुरी भावना न होते हुए भी लोग टीका-टिप्पणी करने लगते है।

आज की स्थिति में सेवा स्वार्थ तथा उसमें प्रवृत्त होने वाले सेवा वृत्ति लोगों की भारी आवश्यकता अनुभव होती है। यदि उसकी पूर्ति की जा सके, तो निश्चित रूप से समाज में सुखद परिस्थितियाँ पैदा करना और भी कठिन न रहेगा। किन्तु यह लोग तभी जब लोग सेवा धर्म का जाने समझें। उसके अनुरूप अपने दृष्टि कोण व्यक्तित्व एवं व्यवहार को ढालें तथा साहसपूर्वक उल्लसित होकर उस मार्ग पर चल पड़ें। सेवा के महत्व के साथ-साथ उसके लिए आवश्यक मनोभूमि एवं व्यक्तित्व बनाने का क्रम चल पड़ेगा जो उस मार्ग पर सफलताओं के ढेर लाते चलेंगे तथा सर्व साधारण में भी उस दिशा में चलने का उत्साह जागेगा।

युगशिल्पियों से यही अपेक्षा की जाती है कि सेवा का महत्व समझ कर जो भी व्यक्ति आगे आएँ वे ऐसा व्यक्तित्व बनाने में सक्षम हों कि उनका भी गौरव बड़े तथा समाज का हित साधन हो। इन सूत्रों को जीवन में उतारने वाले कभी भी मार्ग से भटकेंगे नहीं, वे युग नेतृत्व का यश गौरव प्राप्त करके रहेंगे।


सतयुग की तैयारी


सतयुग की तैयारी (Kavita)

दीपयज्ञ से अश्वमेध तक यज्ञों का क्रम जारी है। इस धरती पर फिर से सतयुग लाने की तैयारी है॥

पीले परिधानों में लगती कितनी प्यारी-प्यारी सी। बिखराती माधुर्य चेतना है केसर की क्यारी सी॥

हर मन में ममता लहराती, हर तन है अनुशासन में। सद्गति का वैभव बिखरा माँ गायत्री के शासन में॥

दूर भागने को दुर्मति दुर्जयः दुर्गा हुंकारी है इस धरती पर फिर से सतयुग लाने की तैयारी है। 1

वंदनीय माँ के चरणों के प्रति असीम अनुराग लिये। वीर पुत्र चल पड़े सुपथ पर उस में पुण्य पराग लिये॥

नहीं स्वयं सेवक यह केवल यह संस्कृति का प्रहरी है। जिसके प्रण में उमड़ रही जनहित की गंगा लहरी है॥

दुःख हरने को मातृ रूप में, निश्चय शक्ति पधारी है। इस धरती पर फिर से सतयुग लाने की तैयारी है॥ 2

अब शिक्षा का अर्थ फलेगा बागों में व्यवहारों के। सद्भावों के स्रोत सजेंगे रूपों में त्योहारों के॥

परम्पराओं में विवेक की पुनः प्रतिष्ठा जागेगी। पराधीनता इस समाज से मुँह दुबकाकर भागेगी।

संस्कारों के महापर्व ने कलियुग की मति मारी है। इस धरती पर फिर से सतयुग लाने की तैयारी है॥3

महामंत्र के कालचक्र का दर्प भरा मुख मोड़ दिया। कर्तव्यों का बोध नित्य आनंद भर रहा जन-जन में।

बरसाती अनुदान प्रकृति हर निश्छल मन के आँगन में॥ हर मानव भव-सिंधु तर रहा, गुरुवर की बलिहारी है।

इस धरती पर फिर से सतयुग लाने की तैयारी है। 4

कहता है उज्ज्वल भविष्य, जल्दी ही वह दिन आयेगा। जब यह भारत देश पूर्व सा विश्व गुरु कहलायेगा॥

फिर से इसके मुख मण्डल से ज्ञान-रश्मियाँ फूट रहीं। द्वेष, ईर्ष्या कलुष, क्लेश की सब करायें टूट रहीं॥

परस रहा देवत्व विश्व को तत्पर हर नर-नारी है। इस धरती पर फिर से सतयुग लाने की तैयारी है। 5

-देवेन्द्र कुमार ‘देव’


अनूठे-रंगरेज


अनूठे-रंगरेज (Kavita)

मैली चादर धो न सके हम, रंगवाने को आ गये। आप मिले रंगरेज-अनूठे सबके मन को भा गये।

हर पल धोते, हर पल मैली, धोने में कुछ खोट है। शायद पूरे मनोयोग से, कर न सके हम चोट॥

षड् विकार का मैल न निकला, मात सभी से खा गये। मैली चादर धो न सके हम, रंगवाने को आ गये।

धो न सकें हम तो इसको, जीवन भर का रोना है। अपने ही हाथों से इसका, मैलापन प्रभु। धोना है।

भाग्य हमारे चेत गये है, करुणा कर को पा गये। मैली चादर धो न सके हम, रंगवाने को आ गये॥

हमने तो ऐलान कर दिया, चादर रंगने डाल दी। लाजवाब-रंगरेज आप हैं, आप हैं चर्चा यही उठाल दी॥

अब सब की ही नजर लगी है, सब पर ही तुम छा गये। अब सब की ही नजर लगी है, सब पर ही तुम छा गये।

आप मिले रंगरेज-अनूठे सबके मन को भा गये॥। आप मिले रंगरेज-अनूठे सबके मन को भा गये॥।

आप इसे धो देना ऐसी, रंग आपका चढ़ जाये। और छपाई ऐसी करना, कीमत इसकी बढ़ जाये॥

अपनी-अपनी मैली चादर, कितने ही रंगवा गये। मैली चादर धो न सके हम, रंगवाने को आ गये॥॥

रत्नाकर, अंगुली माल ने, अम्बपाली ने धुवाली। रत्ना के कामुक-तुलसी ने, राम-रंग में रंगवाली॥

वेद पुराण आपके रंग के गुण की गरिमा गा गये। आप मिले रंगरेज-अनूठे सबके मन को भा गये॥॥।

-मंगल विजय ‘विजयवर्गीय


साधना समर्पण एवं वातावरण -परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(कल्प साधना सत्र 1982-83 में शान्तिकुञ्ज परिसर में दिया गया प्रवचन)

गायत्री मन्त्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

मित्रों, कुछ काम ऐसे होते हैं जिसे बाहर के लोग कर सकते हैं, किन्तु कुछ काम ऐसे हैं जो स्वयं करने चाहिए। दोनों मिलकर एक पूर्णता बनाते है। अकेले बाहर के आधारों से आज तक किसी का काम नहीं चला और न ही अकेले के प्रयास से ही कोई आदमी आज तक सम्पन्न बना है। जब दोनों का सहयोग होता है अर्थात् बाहर का अनुदान और अपना पुरुषार्थ दोनों को मिलाकर के फिर एक बात बन जाती है। खाना पकाकर किसी ने दिया, भोजन बहुत सुन्दर और पौष्टिक भी है, लेकिन उसे हजम तो आपको ही करना पड़ेगा। मुँह से तो उसे आप ही चबायेंगे। ऐसा नहीं हो सकता कि बाहर वाला ही चबाकर उसे आपके पेट में बैठकर उसे हजम करके खून में शामिल कर दे। यह काम मुश्किल ही नहीं असम्भव भी है। यह काम तो हर हालत में आपको ही करना चाहिए। बाहर का आदमी अधिक से अधिक यह कर सकता है कि आपको बहुमूल्य भोजन बिना कीमत के भी पका कर दे दे और आपको सम्मान पूर्वक खिलाये। इतने से ही उसका काम पूरा हो जाता है, अब आपका काम है कि उसको आप संभाले। आपकी जब शादी हुई थी तब आपको एक अच्छी-खासी धर्म पत्नी मिली थी न किसने दी थी उसे? उस लड़की के माता-पिता ने बड़ी मेहनत से अच्छी सुयोग्य लड़की बना करके, पाल-पोश कर सुशिक्षित बनाकर उसे आपके हवाले किया था। उनका काम पूरा हो गया, लेकिन आपका काम बाकी रह गया है कि घर में धर्म पत्नी के आने के बाद उसकी देख−भाल करें, उसकी जिम्मेदारियों को वहन करें। अगर आप उसकी जिम्मेदारियाँ वहन नहीं कर सकते, उसके रहन-सहन एवं खान-पान का प्रबन्ध नहीं कर सकते और आप उसको इज्जत देकर सहयोग प्राप्त नहीं कर सकते तो उनके माता-पिता का दिया हुआ अनुदान आपके लिए निरर्थक चला जाएगा और वह जो धर्म पत्नी आपको मिली है, आपके लिए भार बनकर रहेगी।

मित्रों, हमने यहाँ जो कुछ भी बनाया है-आपके लिए बहुत कुछ बनाकर रखा है, वह बहुत सुन्दर और शानदार है, लेकिन उसे महसूस तो आपको ही करना है, हजम तो आपको ही करना है। हमारी करने की जो सीमा थी वह हमने पूरे तरीके से कर दिया। क्या कर दिया? आपके लिए एक वातावरण बनाकर के हमने रख दिया यहाँ क्यों बुलाया है आपको? वातावरण का लाभ उठाने के लिए बुलाया है। यहाँ जो भी क्रिया-कृत्य आपसे कराये जा रहे हैं वह तो आप अपने घर पर भी कर सकते है। कौन-सी ऐसी चीज है जो आप घर पर नहीं कर सकते थे? खान-पान सम्बन्धी जो नियम-बन्धन आपको बताये गये हैं, क्या आप उसे घर पर नहीं कर सकते थे? क्यों नहीं कर सकते थे। कौन-सी ऐसी वजह है जो आप नहीं कर सकते हैं? यहाँ जो जप और अनुष्ठान कराया जाता है, क्या आप घर पन नहीं कर सकते थे? जरूर कर सकते थे। जो नियम और मर्यादा पालन करने के लिए यहाँ कहा गया है, वह हमारी पुस्तकें पढ़कर आप घर पर भी कर सकते थे, लेकिन यहाँ क्यों करना पड़ा?

यहाँ का वातावरण ही ऐसा होता है। वातावरण को बनाने के लिए उसने बहुत मेहनत की है। आग को जलाने की कीमत समझिये। वातावरण की कीमत यदि आप नहीं समझ पायेंगे तो बहुत बड़ी भूल करते है।

एक बार गुरु वशिष्ठ ने रामचन्द्र जी से कहा है राम अगर बुढ़ापे का समय आ गया है, अतः अब भगवान की भक्ति और जीवन को ऊँचा उठाने के लिए कुछ प्रबल करना चाहिए। रामचन्द्र जी ने कहा तो फिर बताइये इसके लिए क्या किया जाय? उन्होंने कहा-यहाँ क्या बताऊँ, इसके लिए तो उपयुक्त वातावरण में चलना पड़ेगा। यहाँ ऐसा वातावरण कहाँ हैं? यहाँ अयोध्या के जिस वातावरण में आप रहते हैं, राजपाट के लोग आते रहते है। कितने ही आप से विचार विमर्श करते रहते हैं। कितनों से आपको खीझ पैदा होती है। कितनों से आपको सहयोग-समर्थन मिलता रहता हैं। कितनों से आपका लगाव हैं तो कितनों से आपको न खुशी है। यहाँ के वातावरण में आध्यात्मिकता को पनप पाने की कोई संभावना नहीं है। अतः आपको अयोध्या छोड़नी चाहिए। अयोध्या के साथ जुड़े हुए जो बंधन आपके साथ हैं, वह जब तक आपको जकड़े हुए रहेंगे, मन भगवान की तरफ चलेगा ही नहीं। भक्ति आप कर सकेंगे ही नहीं और न अध्यात्म की तरफ का रास्ता ही खुल सकेगा। इसलिए आपको यहाँ से चलना पड़ेगा। रामचंद्र जी ने कहा-तो फिर कहाँ चलना पड़ेगा। गुरु वशिष्ठ ने कहा-हमारे नजदीक ही, जहाँ हम रहते हैं। गुरु वशिष्ठ की गुफा हिमालय पर थी। वहीं उन्होंने चारों भाइयों को बुला लिया। रामचंद्र जी देव प्रयाग में रहने लगे। लक्ष्मण जी वहाँ रहने लगे, जहाँ आज लक्ष्मण झूला है। भरत जी ऋषिकेश में जाकर जम गये और शत्रुघ्न ने मुनि के रेतों पर अपना स्थान बना लिया। चारों भाई अलग-अलग रहकर गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन में शिक्षण प्राप्त करने लगे। तो अयोध्या में क्या कमी थी? अयोध्या में वह वातावरण नहीं था जो हिमालय का वातावरण है-संस्कारी वातावरण, जिसमें कि हजारों वर्षों से लोगों ने तप किसे हैं, साधनायें की हैं। वह वातावरण अयोध्या में कहाँ था। वहाँ तो राजपाट होता था, लड़ाई झगड़े होते थे, मुकदमें होते थे, दूसरी बातें होती थीं, पर वहाँ तप का वातावरण नहीं था। हजारों वर्षों से विश्वामित्र सहित अन्यान्य ऋषि-मुनियों ने जो तप किया है उससे हिमालय का वातावरण उच्चस्तरीय बन गया अतः श्री रामचंद्र जी को भी गुरु वशिष्ठ की आज्ञा मानकर देव प्रयाग में रहना पड़ा। अयोध्या में रहकर गुरु वशिष्ठ जी रामचंद्र जी के योग वशिष्ठ नहीं पढ़ा सकते थे। वहाँ वे केवल सलाह दे सकते थे कि राजपाट इस तरह से चलाइये, लेकिन अध्यात्मिक विषयों के लिए उन्होंने भी देव प्रयाग को मुनासिब समझा और हिमालय के उसी वातावरण में साधना करायी। चारों भाइयों समेत भगवान वहीं रहे।

आध्यात्मिक जीवन में उच्च स्तरीय वातावरण की अपेक्षा होती है। केवल आध्यात्मिक जीवन में ही नहीं, साँसारिक जीवन में भी वातावरण की जरूरत होती है। आप साँसारिक जीवन की बात जानते हैं न? साँसारिक जीवन में भी अगर वातावरण न मिले तो बहुत मुश्किलें पैदा हो जाती है। खुशबूदार चंदन मैसूर और केरल में पाया जाता है। इसी चंदन के पेड़ अगर आप वहाँ ले आयें और दूसरी जगह लगा दे तो चंदन तो पैदा हो जायेगा, पर उसमें से वह सुगंध नहीं आयेगी जो पहले वाली पेड़ में थी। ऐसी क्या बात है जो सुगंध को भी बदल देती है? वह है वातावरण जो जलवायु पर टिका हुआ है। नागपुर के संतरे और बम्बई के केले के बारे में आप जानते है न? क्यों साहब वहीं संतरे और केले आप यहाँ ले आइये और लगा कर देखिए कि वैसे मीठे वे नागपुर में और बम्बई में होते हैं, यहाँ भी हैं क्या? नहीं, वैसे मीठे वे आपके यहाँ नहीं हो सकते। कारण एक ही है कि वहाँ के वातावरण की अपनी विशेषता है। बंगाल निवासियों के स्वास्थ्य आपने देखे होंगे वे दुबले पतले और कद में छोटे होते हैं और सीमा प्राँत के लोग लंबे और मोटे होते हैं। क्या खाते हैं वे लोग? वही दाल-रोटी खाते हैं। फिर क्या बात है कि वे इतने मोटे हो जाते हैं और बंगाल वाले कैसे कमजोर रह जाते हैं। यह सब वातावरण का कमाल है।

इस संदर्भ में एक और भी पुरानी बात याद है। श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कंधे पर बिठाकर उन्हें तीर्थयात्रा कराने के लिए ले जा रहे थे। यू. पी. मेरठ के पास एक जगह है जहाँ आकर वह रुक गये और अपने माता-पिता से कहा-क्यों जी! आपकी आँखें ही तो खराब है, टाँगें तो खराब नहीं हैं। हम आपकी लकड़ी पकड़ लेंगे और आप लोग हमारे पीछे-पीछे चलिए न क्यों हमारे कंधे पर सवार होते हैं। श्रवण के माता-पिता अचंभे में रह गये। कंधे पर बैठकर चलने से उनका तो मतलब यह था कि हमारा लड़का सारे संसार भर में अजर-अमर होकर रहे, सारी दुनिया उसका नाम लिया करे, अपने बच्चों को प्यार देने के लिए उसका जीवन एक गाथा बन जाय। उदाहरण बन जाय। उनका मतलब सवारी गाँठने से थोड़े ही था। उन्होंने कहा-अच्छा बेटे जैसे तुम कहोगे हम वैसा ही करेंगे। पर काम करो आज रात को हम ठहरेंगे नहीं यहाँ। यहाँ से हमको बहुत दूर चलना चाहिए और इस क्षेत्र को पार कर लेना चाहिए। श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता का कहना माना और उस इलाके में बहुत दूर चला गया। जैसे ही वह इलाका खत्म हुआ, वैसे ही श्रवण कुमार को बहुत आश्चर्य हुआ। अपने ऊपर और वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसने कहा पिताजी मैंने कैसे कह दिया था कि आप अपने पैरों पर चलिए। मुझे यह कितना बड़ा सौभाग्य मिला था जिसे मैं छोड़ना चाहता था। पिता ने कहा-बेटे डरने की बात नहीं है। वस्तुतः जहाँ तुम्हारे मन में वह विचार आया था वह स्थान ऐसा था जहाँ एक मय नाम का दानव था। वहाँ उसने अपने माता-पिता को मार डाला था। बस उसी स्थान से होकर हम चल रहे थे। और उसके संस्कार भूमि में पड़े हुए थे। भूमि के संस्कारों की वजह से तुम्हारे मन में वह विचार आये थे। अब हम उस क्षेत्र से निकल आये हैं अतः सब कुछ सामान्य हो गया है।

अब आप समझ गये होंगे कि वातावरण का कितना भारी असर होता है। आपको हमने इसलिए यहाँ के वातावरण में बुलाया है हिमालय के नजदीक बुलाया है। हिमालय यहीं से शुरू होता है। यहीं शिव और सप्तर्षियों का स्थान था। स्वर्ग कहाँ था? स्वर्ग हिमालय के उस इलाके में था जिसको नंदनवन कहते है। गोमुख से आगे। स्वर्ग जमीन पर था। सुमेरु पर्वत भी वहीं है। देवता भी इसी इलाके में रहते थे हिमालय वाले क्षेत्र में। सारे के सारे महत्वपूर्ण ऋषि व सप्तर्षियों से लेकर सनक-सनन्दन तक एवं नारद से लेकर आदि गुरु शंकराचार्य तक जितने भी महत्वपूर्ण व्यक्ति हुए हैं, उनकी साधना इसी स्थान में हुई है। इसलिए हिमालय का अपना वातावरण है। गंगा की महत्ता तो आप जानते हैं न? गंगा की कितनी बड़ी महत्ता। गंगा को सारा संसार जाने क्या-क्या मानता है। भौतिक दृष्टि से भी और आध्यात्मिक दृष्टि से भी। यहाँ गंगा जी प्रवाहित होती है। जिस स्थान पर हमने यह शान्तिकुञ्ज बनाया है। हमारे गुरुदेव ने इस स्थान का महत्व बताया था कि यहाँ सात ऋषियों का तप हुआ था। यहाँ सात ऋषियों की सात गंगाएँ थी। दो गंगाएँ गायब हो गयी हैं, परंतु पाँच गंगाएँ अभी भी दिखायी देती हैं।दो गंगाएँ जो गायब हो गयी हैं, वह कहाँ गयी? वह इसी स्थान पर थी जहाँ आज शान्तिकुञ्ज बना है। एक धारा यहाँ बाहर बहती थी जिसे बाँध बनाकर रोक दिया गया था तब भी गंगा का पानी जमीन में से उछलता रहता है। आप कहीं भी जरा सा गढ्ढा खोदिए, गंगा जल तैयार है। यह गंगाजी की विशेषता है। शान्तिकुञ्ज हिमालय के द्वार पर बना है। यहाँ ऐसा प्राणवान सान्निध्य है जहाँ शेर और गाय प्राचीनकाल की भाँति एक साथ पानी पीते हैं। ऐसा ही वातावरण है यहाँ शान्तिकुञ्ज में। यहाँ ऐसे लोगों का सान्निध्य आपको मिला है जिसके लिए अगर आप सारे हिंदुस्तान में घूमे और यह तलाश करें कि ऐसे प्राणवान सान्निध्य कहीं मिलेंगे क्या? ऐसे प्राणवान सान्निध्य प्राचीनकाल में तो शायद हुए हों, पर आज आपको ऐसा आध्यात्मिकता का सही वातावरण अन्यत्र मिलेगा नहीं जैसे कि शान्तिकुञ्ज में हमने बनाकर रखा हैं और आपको यहाँ साधना करने के लिए बुलाया है।

तो गुरुजी क्या इतने भर से बात पूरी हो जायेगी? नहीं बेटे, इतना ही पर्याप्त नहीं। आपको इसके साथ में अपनी श्रद्धा सँजो करके रखनी पड़ेगी। श्रद्धा को आप सँजोकर अगर नहीं रखेंगे तब फिर यह जमीन भी वैसी ही है जैसे की मछली पकड़ने वाले गंगा जी में घूमते रहते हैं, पर श्रद्धा उनमें नहीं है तो उससे कोई फायदा नहीं। अगर श्रद्धा के भाव हैं तो यही गंगा तरण-तारिणी बन जाती है और अपने बच्चों का उद्धार कर देती हैं और श्रद्धा के अभाव में यही केवल नहर रह जाती है, सामान्य-सा पानी रह जाती है। आपको अपनी श्रद्धा समुन्नत करनी पड़ेगी। अगर आप यहाँ निवास करते हैं तो कृपा करके अपनी श्रद्धा को जीवंत कीजिए और यह अनुभव करना शुरू कीजिए कि आप किसी ऐसे स्थान पर निवास करते हैं तो कृपा करके अपनी श्रद्धा को जीवंत कीजिए और यह अनुभव करना शुरू कीजिए कि आप किसी ऐसे स्थान पर निवास करते हैं जहाँ का वातावरण आपकी साधना को सफल बनाने में समर्थ है। यह सप्तर्षियों की तपस्थली गायत्री के ऋषि विश्वामित्र जिन्होंने गायत्री महामंत्र का साक्षात्कार किया था, ठीक इसी स्थान पर तप करते थे। सात ऋषि हैं, उनमें से एक विश्वामित्र भी हैं। विश्वामित्र कहाँ रहते थे? उनकी कुटिया कहाँ थी? यहाँ थी, जहाँ आज शान्तिकुञ्ज है। यह विश्वामित्र का स्थान है।

वातावरण का कितना असर पड़ता है, देखा है न आपने। टिड्डा बरसात के दिनों में हरे रंग का होता है और गर्मी के दिनों में पीले रंग का हो जाता है। क्यों पीला हो जाता है? इसलिए हो जाता है कि चारों ओर सूखी हुई घास, फैला हुआ रेत दिखायी पड़ता है। उसको देखते-देखते वह पीले रंग का हो जाता है, जबकि बरसात में चारों ओर हरा रंग छाया रहता है, अतः वह हरा हो जाता है। भट्टी गरम होती है तो उसके नजदीक बैठने वाले भी गरम हो जाते हैं। बरफ की छतरी में आप कभी घुसे तो उसमें ठंडक पड़ती रहती है और उसमें जो भी घुसता है वह भी ठंडा हो जाता है। आपको भी यही अनुभव होगा यहाँ। यह आपको तो अनुभव करना ही होगा यहाँ। यह आपको तो अनुभव करना ही है लेकिन एक बात और रह जाती है जिसके बिना यदि आप चाहें कि यहाँ के वातावरण का पूरा लाभ मिल जाय तो वह मिल नहीं सकेगा। इसके लिए श्रद्धा बहुत जरूरी है। श्रद्धा अगर आपके अंदर न हो और आप केवल इसकी इमारत देखते हों, आश्रम देखते हों, कोई क्वार्टर देखते हों, कोई होटल या धर्मशाला देखते हों तो फिर आपके लिए ठीक वही है जो आप देखते हैं। आपकी श्रद्धा अगर जमी तो वह तीर्थ है। गायत्री का हमने इसे तीर्थ बनाया है। इसमें तीर्थों की जो भी विशेषताएँ पैदा की है। हमने इसमें कोई कमी नहीं छोड़ी है जो कि एक शानदार, श्रेष्ठ समर्थ तीर्थ बनाने के लिए किसी स्थान के लिए जो प्रयत्न किये जाने चाहिए, वह सारे प्रयत्न किये गये है।

रामचंद्र जी ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे, इसीलिए दशाश्वमेध घाट तीर्थ हो गया। दुनिया में और भी बड़ी-बड़ी बातें होंगी, बड़े-बड़े स्थान होंगे, पर सब तीर्थ थोड़े ही हो जायेंगे। प्रकृति के सभी स्थान ऐसे ही ऐसे ही थे, लेकिन जब कोई महान घटना घटित हो गयी और कोई महान कार्य सम्पन्न हो गये तो वही स्थान तीर्थ बन गये। तीर्थ के लिए भूमि को संस्कार बनाना पड़ता है। प्राचीनकाल में ऋषियों ने गुरुकुल बनाये थे, आश्रम एवं आरण्यक बनाये थे, जहाँ साधना के बड़े-बड़े अनुष्ठान सम्पन्न होते थे। हम सभी यही कर रहे हैं। यहाँ चौबीस-चौबीस लक्ष्य के कितने अनुष्ठान हो चुके हैं, आप जानते हैं न। हर साल यहाँ नवरात्र में चौबीस करोड़ का पुरश्चरण हो जाता है। हर दिन वहाँ नौ कुण्डीय यज्ञ में हजारों आहुतियाँ दी जाती हैं। यहाँ अखण्ड दीपक जलता रहता है। यहाँ हमारी और माताजी की नियमित रूप से कठोर तपश्चर्या अभी भी चलती रहती है। इससे वातावरण बनता है तो हमारे गुरुदेव परोक्ष रूप से आते ही रहते हैं। आपके अंदर श्रद्धा हो तो यहाँ गायत्री माता का प्रकाश और आलोक आप चाहे जिधर अनुभव कीजिए कि आप यहाँ माता जी के गर्भ में निवास करते हैं। मुर्गी अपने अंडे को छाती से लगाकर जिस तरह बैठी रहती है और अंडे पकते रहते हैं, हम लोग भी उसी तरह से आपको अपनी छाती से लगाये बैठे रहते हैं और आपको पकाते रहते है। इतना होते हुए भी इस बात के लिए विशेष रूप से निवेदन किया जा रहा है कि आपकी स्वयं की श्रद्धा जीवंत रहनी चाहिए। अगर आपने अपनी श्रद्धा का परित्याग कर दिया तो इस वातावरण से आपको कतई कोई लाभ नहीं मिलेगा। जैसे दूसरे लोग भी यहाँ आते हैं, कोई चोर, उचक्के-उठाईगीर भी आते होंगे, कोई मेहनत मजदूरी करने वाले भी आते होंगे। स्कूटर वाले, मोटर ड्राइवर भी आते हैं, बीड़ी पीते रहते हैं और खाली हाथ चले जाते हैं। कारण उनके लिए शास्त्र का, श्रद्धा का कोई महत्व नहीं। श्रद्धा के अभाव में बाहरी चीजें कोई ज्यादा लाभ नहीं दे सकती।

आपको आज मैं भावश्रद्धा के ऊपर बहुत जोर देना चाहता हूँ। अगर आप यहाँ से लाभ उठाना चाहते हो तो आप श्रद्धा मत छोड़ना, श्रद्धा को जागृत-जीवंत कर लिया तो आप के यहाँ के कण-कण में अमृत बरसता हुआ और आलोक उछलता हुआ उभरता हुआ देखेंगे अगर श्रद्धा है तो नहीं हैं तो फिर सब कुछ मिट्टी है और दूसरी इमारतें जैसी होती हैं, वैसी ही यह भी दीखेंगी। मीरा को एक पत्थर का टुकड़ा दे दिया गया था। उस पत्थर के टुकड़े को लेकर के मीरा ने यह मान लिया था कि ये हमारे पति हैं, और ये भगवान हैं। उनकी श्रद्धा ने उस पत्थर को साक्षात भगवान बना दिया। उस गिरधर गोपाल ने मीरा को भेजा गया जहर का प्याला भी पी लिया था और मीरा बचे हुए पानी को पीकर के ज्यों की त्यों बनी रही। साँप का पिटारा आया था तो गिरधर गोपाल साँपों से खेलते रहे। मीरा ने आखिर में पिटारे को बंद कर दिया। मीरा को किसी ने नहीं काटा और न ही कोई नुकसान हुआ। यह कैसे हो गया? गिरधर गोपाल के कारण। गिरधर गोपाल कौन? पत्थर का टुकड़ा। नहीं, मीरा की श्रद्धा सिक्त प्रगाढ़ भावना के मिल जाने से ही पत्थर गिरधर गोपाल बन सका। अब वही पत्थर जहाँ का तहाँ पड़ा हुआ है। आप जाकर देख सकते हैं, उसमें कोई चमत्कार नहीं है। पत्थरों में क्या चमत्कार हो सकता था, और क्या होगा? श्रद्धा ही है जो पत्थर को भी भगवान बना सकती है। एकलव्य की बात सुनी है न आपने। वह भील का एक लड़का था जिसमें मिट्टी के वह द्रोणाचार्य इतने समर्थ हुए कि जो कौरवों और पाण्डवों को बाण विद्या असली द्रोणाचार्य ने सिखायी थी उससे कहीं ज्यादा उस एकलव्य का आ गयी।

रामकृष्ण परमहंस काली के अनन्य उपासक थे। लोगों ने रानी से शिकायत कर दी कि जो भोग है वह स्वयं खा जाते हैं और जूठन फैला देते हैं। रानी रासमणि एक दिन छत पर गयीं और वहाँ से छिप करके देखती रही सारा नजारा। सही बात यह हुई कि रामकृष्ण काली से कहने लगे -माँ आप भोजन कीजिए। वह चुप रही क्या कहतीं। रामकृष्ण ने कहा -अच्छा पहले बेटा खा लेगा तब माँ खायेगी। उन्होंने ऐसा ही किया। आधा भोजन स्वयं कर लिया और जब काली से कहा तो -माता अब आपको करना पड़ेगा। तभी रानी रासमणि ने देखा कि पत्थर की मूर्ति के हाथ हिलने लगे और उन्होंने थाली में जो भोजन था वह उठाया और निगल लिया। सारा भोजन वे खा गयीं। खाली थाली धोने के लिए रामकृष्ण परमहंस बाहर निकल रहे थे तभी रानी रासमणि आयीं और उनके चरणों में गिर पड़ी। उन्होंने कहा-देव आप साक्षात काली हैं। यह बात सही है, कि रामकृष्ण परमहंस साक्षात काली थे, क्योंकि अपनी श्रद्धा से उन्होंने पत्थर की मूर्ति को साक्षात काली बना दिया था। रामकृष्ण ने जब विवेकानंद से कहा कि काली माँ के पास जा और नौकरी माँग ले तो विवेकानंद ने वहां जाकर देखा कि विशालकाय काली जमीन से लेकर आकाश तक को छू रही थी। वहां कहाँ से पैदा हुई थीं-उसी पत्थर में से पैदा कर दी थी रामकृष्ण परमहंस ने। वह उनकी श्रद्धा से बनी थी। अब भी वहीं मूर्ति को सोने की जीभ चुरा ले गये थे। तब वह पत्थर ही रह गयी थीं पत्थर को साक्षात् काली बना देने का श्रेय रामकृष्ण परमहंस को है।

कबीर को दीक्षा देने के लिए स्वामी रामानंद तैयार नहीं थे। कबीर सीढ़ी पर जाकर सो गये। रामानंद उधर से निकले तो उनका पैर अँधेरे में कबीर के ऊपर पड़ गया। राम-राम कहकर वे पीछे हट गये। कबीर ने कहना शुरू कर दिया कि मेरे गुरु स्वामी रामानंद है। उन्होंने मंत्र दे दिया है दीक्षा दी है। स्वामी जी ने पूछा-तू गलत–सलत बात क्यों कहता है। कबीर ने कहा-नहीं आपने मेरे सीने पर पैर रख दिया था और आपने सीढ़ियों पर राम-राम कह था। बस मेरे लिए तो आप ही गुरु हो गये। आप लोग भी इस श्रद्धा के महत्व को समझें। अगर श्रद्धा का अभाव रह गया तो आप बिलकुल खाली हाथ चलें जायेंगे और हमारा परिश्रम बेकार चला जायेगा। आप कृपा करके अपनी श्रद्धा जगाइये। आपको अंध श्रद्धा के लिए यहाँ कुछ नहीं कहा जा रहा है। यहाँ का परिपूर्ण वातावरण है। आप चाहें तो सच्चाई के साथ इसको परख भी सकते हैं। श्रद्धा उत्पन्न कीजिए, अभी आपके हिस्से का काम पूरा कर दिया। आप और हम दोनों अपने-अपने हिस्से का काम पूरा कर लें तो हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि यह कल्प साधना आपके लिए सौभाग्य से भरा पूरा होगा और हमारे लिए संतोष का। आज की बात समाप्त। ॐ शाँति


अपनों से अपनी बात- - अनुयाज क्रम में हमें अब यह करना है

पुनर्गठन-अनुयाज यही अब आँवलखेड़ा कार्यक्रम के बाद चलेगा और कहीं भी बड़े भव्य आयोजन नहीं होंगे,” यह जानकारी परिजनों को विगत वसंत पर्व (जनवरी 1995 की अखण्ड-ज्योति से बराबर दी जा रही हैं किसी को असमंजस हो सकता है कि इतने बड़े कार्यक्रम से उत्पन्न ऊर्जा को आप बेकार क्यों जाने दे रहे हैं? क्यों नहीं आप पुनः बड़े आश्वमेधिक कार्यक्रम कर रहे है? क्या आपका संकल्प इतने तक का ही था? क्या परिस्थितियों ने थका डाला या केन्द्रीय तंत्र इस स्थिति में नहीं है कि अब बड़े कार्यक्रम कर सकें? इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि निश्चित ही बड़े-बड़े कार्यक्रम-भव्यतम् स्तर के कार्यक्रम और अधिक भीड़ के साथ सम्पन्न होते रह सकते थे किन्तु उससे पूज्य गुरुदेव के बताए मूल उद्देश्यों के अनुरूप न चलकर हम गड़बड़ा जाते। कार्यकर्ता को कार्य क्षेत्र में उत्पन्न ऊर्जा का सुनियोजन करना है- सृजनात्मक बड़े आयोजनों में अपनी शक्ति गँवाना है। यही सोचकर अभी अक्टूबर ९६ तक के समय को अनुयाज-पुनर्गठन वर्ष घोषित कर विभिन्न कार्यक्रम उसके लिए बनाकर प्रस्तुत ही नहीं किए गए, उनका बार-बार स्पष्टीकरण इस पूर्णाहुति समारोह में देवमंच व ज्ञानमंच से किया जाता रहा।

“पुनर्गठन” शब्द से भी पाठक चौंक सकते है। पुनर्गठन किसलिए, किसका। क्या अभी तक जो गायत्री परिवार विनिर्मित हुआ था, उसमें गलत आदमी घुस गए हैं जो पुनर्गठित कर आप उनकी छँटनी करना चाहते हैं? जिन्हें गुरुदेव-माताजी ने जोड़ा था उनकी छँटनी का वर्तमान तंत्र को क्या अधिकार है? यह बात भी किसी के मन में आ सकती है। “पुनर्गठन” से एक ही आराम है सुव्यवस्थित संगठित गायत्री परिवार। मात्र नारा लगाने से-जय-जयकार करने से तो युग निर्माण होगा नहीं। युगऋषि ने महाकाल की सत्ता ने जो भी कुछ कहा है-वह सब होकर रहा है। इसी प्रकार युग परिवर्तन भी सुनिश्चित है। वह कार्य निर्माण स्तर का है जिसमें न जाने कितने बुलडोजर, इरेक्शन करने वाले उपकरण आदि एवं विश्वेश्वरैया स्तर की प्रतिभाओं का नियोजन होना है। प्रतिभा यदि मात्र प्रचारात्मक कार्य में लगी रही तो उसकी शक्ति का सही उपयोग न होकर बिखराव ही बिखराव होगा। इसीलिए पुनर्गठन के माध्यम से नवसृजन के निमित्त एकत्र हुए प्रतिभाशीलों को सुनियोजित कार्य क्रम देकर उनके द्वारा एक नीति के अंतर्गत योजनाबद्ध व्यवस्था बनाई गई। यह कहा गया कि अब सब अपने-अपने क्षेत्र जिम्मेदारी संभालने अपने-अपने महकमों वालों पर प्रभाव डालकर उन्हें परिवर्तन हेतु सहमत करने की व्यवस्था बनाएँ। नारों को क्रिया में बदलने के लिए धर्मतंत्र के माध्यम से एकत्र हुए भावनाशीलों के एक सैलाब को यूनिफार्म पहने सैनिकों की सुव्यवस्थित परेड वाला स्वरूप देने के लिए इतना तो समय अपेक्षित ही था जितना एक वर्ष के लिए सोचा गया है।

कोई यह भी मन में विचार न करे कि इसके बाद अश्वमेध यज्ञ पुनः आरम्भ हो जाएँगे व हम भी बड़े-बड़े अश्वमेध करेंगे, भले ही एक वर्ष बाद ही सही। सभी जानते हैं कि यह मिशन दैवी शक्ति द्वार संचालित है। ऋषियों की चेतना हिमालय में बैठी इसका संचालन कर रही है एवं पूज्यवर एवं मातृश्री की सूक्ष्म-कारण सत्ता सब पर सतत् निगाह रख इस युग परिवर्तन प्रक्रिया की “मानिटरिंग” कर रही है। जैसे-जैसे संदेश वसंत पर्व पर सूक्ष्म जगत से आते रहे हैं, वैसे-वैसे निर्धारण समय-समय पर होते रहे हैं। परमपूज्य गुरुदेव वसंत पर्व की वेला में ही सारी घोषणाएँ करते रहे हैं। अब भी उनकी प्रेरणा से ही आगामी वसंत पर्व पर जो सन्देश सूक्ष्म निर्देश प्राप्त होंगे, उनके अनुसार ही अक्टूबर ९६ के बाद के कार्यक्रमों का स्वरूप बनेगा। हो सकता है अश्वमेध से भी बड़े स्तर के सम्मेलन स्तर के बड़े आयोजनों की कोई रूपरेखा बने हो सकता है छोटे-छोटे दीपयज्ञों द्वारा घर-घर देव संस्कृति का आलोक फैलाने की भूमिका बने, संस्कारों के माध्यम से जनचेतना को आंदोलित करने का स्वरूप बने अथवा सर्व-धर्म समभाव परक साँस्कृतिक मेलों या यात्राओं जैसा कोई कार्यक्रम बन जाए। क्या निर्धारण होता है, यह भविष्य के गर्भ में पक रहा है एवं गुरु सत्ता जैसा चाहेगी, वैसा ही होगा। किन्तु एक तथ्य सुनिश्चित रूप से याद रख लिया जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति अकेला या समूह अपने निर्देशों से न तो उस मिशन को चला रहा है, न चला सकता है। यह तो शक्ति का खेल है। क्रीड़ा कल्लोल है।

किसी को इसमें निराश होने की भी जरूरत नहीं है। मात्र यही भाव मन में रखना चाहिए कि जब देव शक्तियों ने कठपुतली बनाकर हम सबसे उतना सब कुछ करा लिया है कि आज हमारी अंतर्राष्ट्रीय पहचान है, जनता का ही नहीं गुरुकृपा से अविश्वास भरे वातावरण में गायत्री परिवार को प्रशासन, प्रतिभाओं के तंत्र, धन सम्पन्ने सभी का विश्वास प्राप्त हो एक श्रेय प्राप्त हो चुका है, तब उसी समर्पण भाव को बनाए रख इस विराट जन शक्ति के सहारे हम क्या-क्या नहीं कर सकते। परमपूज्य गुरुदेव बार-बार कहते थे कि “यह तुम सबका सौभाग्य है कि युगसंधि की इस वेला में तुम सब एकत्र हुए एक परिवार के रूप में सारे मोती पिरोकर हमने एक माला बना दी अब न जाने कितने मोती इसमें और पिरोते चले जाएँगे व युग परिवर्तन की वेला में इस माला को भगवान के गले में डालेंगे। यह सौभाग्य इसी परिवार गायत्री परिवार को मिला है, नवयुग की अगवानी करने का, उसको लाने के निमित्त कुछ कुरबानी देने का इसके लिए हर स्तर पर प्राणवानों के संगठनों की तैयारी तुम्हें रखनी चाहिए। कहीं भी कोई कच्चा न निकल जाए-हरेक को पक्का ही होना चाहिए हर कसौटी पर कसा जा सके-ऐसा मजबूत।”

अब यह हम पर है कि घर आए श्रेय सौभाग्य को परे हटा दें, अथवा नवसृजन की इस वेला में अपनी डोर को ऋषि चेतना के हाथों सौंपकर जैसा वे बताएँ चलते चले जाएँ। न इतराएँ, न रूठें न भटकें। जो ऐसा करेंगे उनका ही अहित होगा, यह सोच कर उन्हें देखकर उनका अनुकरण करने की न सोचकर यदि सभी ऋषि प्रवाह में बहेंगे तो अभी प्रतिकूलताओं से भरे आगामी छह वर्ष के समय में और भी परीक्षाओं को पास कर अनेकों गोल्ड मेडल प्राप्त करने का सौभाग्य भी प्राप्त करेंगे, यह विश्वास मन में दृढ़ बनाए रखना चाहिए।

तो फिर क्या करें? अपने व्यक्तित्व का परिमार्जन ही छँटनी अभियान है, अपनी सामर्थ्य का सुनियोजन ही पुनर्गठन है यह मानते हुए सभी को पहले स्वयं को श्रेष्ठ साधक के रूप में विनिर्मित करने की मनःस्थिति बनानी होगी। यदि हमने समझदारी के साथ अवसर को पहचाना है, ईमानदारी वे साथ अपने उत्तरदायित्वों को स्वीकारा है तो हमें जिम्मेदारी के साथ उन्हें पूरा करने का संकल्प लेना होगा एवं बहादुरी के साथ सारी बाधाएँ चीरते हुए अवरोधों से जूझते हुए आगे बढ़ते चलने का साहस जुटाना होगा। प्राणवान परिजनों को संगठित कर अब हम सभी को लोकनायक स्तर की भूमिका निभाने आगे आना है। अपने क्षेत्र के एक-एक हिस्से का सर्वेक्षण कर निर्धारित करना है कि हम निम्नलिखित कार्यक्रमों में से प्रथम दो को अनिवार्य मानकर शेष में से किन-किन को सक्रिय रूप दे सकते हैं। यही हमारा अनुयाज है जो इस गीता जयंती से आरम्भ होकर आगामी शरदपूर्णिमा तक चलना चाहिए। ये कार्यक्रम जो आँवलखेड़ा में बताए गए इस प्रकार है।

(1) आध्यात्मिक पुनर्जागरण (2) नारी जागरण परिवार निर्माण (3) पर्यावरण संतुलन हरीतिमा विस्तार (4) वेद स्थापना आस्था जागरण (5) लोक रंजन से लोक मंगल कलामंच का दिशा निर्धारण एवं (6) ग्राम्य स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम-संवेदना विस्तार।

इनमें से प्रथम कार्यक्रम तो विशुद्धतः व्यक्ति निर्माण से आरम्भ होकर अपने घर को एक प्राणवान संस्कारों से अनुप्रमाणित मन्दिर बनाने का आस्तिकता के जागरण का कार्यक्रम है। यह दैनिक गायत्री उपासना से लेकर आस्तिकता संवर्धन के अनेकानेक प्रयोगों यथा मंत्रलेखन, नियमित स्वाध्याय, परिवार गोष्ठी एवं युगसंधि महापुरश्चरण की द्वितीय चरण में भागीदारी से सम्बन्धित हैं यह सभी के लिए अनिवार्यतः अपनाने योग्य है। इस प्रक्रिया को जितने घरों तक पहुँचा जा सके, घर मन्दिर, संस्कार मन्दिर, ज्ञान मन्दिर राष्ट्र सेवा मन्दिर स्थापना क्रम द्वारा फैलाया जा सके उतना ही पुण्य व श्रेय के अधिकारी हम बनेंगे।

दूसरों कार्यक्रम की शुरुआत काफी पूर्व हो चुकी है किन्तु अब नारी शक्ति को पौरोहित्य क्रम में जहाँ आँवलखेड़ा में शीर्ष स्थान मिला, वहाँ अब समाज के हर क्षेत्र में उसके लिए अवसर प्रदत्त किये जाने की योजनाएँ बननी चाहिए। सदियों से बेड़ियों में जकड़ी नारी शक्ति को पूज्यवर ने आगे लाकर खड़ा कर दिया किन्तु अभी भी नारी का अपमान भिन्न-भिन्न रूपों में बराबर हो रहा है। चाहे वे चलचित्र हों, चाहे विज्ञापन हों, चाहे टेलीविजन के धारावाहिक हों, नारी अभी भी उपभोक्ता बनी है, उपभोग करने वाला पुरुष वर्ग है। क्या उस सत्ता को जो संस्कार देकर परिवार में नूतन प्राण संचार करती है राष्ट्र को एक नागरिक देती है-हम उस शिकंजे से निकाल सकते हैं जहाँ आज के समाज ने उसे लाकर खड़ा कर दिया है? क्या अभी भी अविवाहित विकसित लड़कियों के कारण माता-पिता हृदय घात से या आत्मघात कर मौत को प्राप्त होते रहेंगे? क्या दहेज का दानव इसी प्रकार नारियों को अग्नि में जलाता रहेगा व हम मूक देखते रहेंगे? जवाब सभी को देना है क्योंकि हम अब सबके लिए जवाब देह हो गए हैं? नारी जागरण का नारा अब व्यवहारिक परिप्रेक्ष्य में लागू होकर परिवार संस्था के मूल्यों की पुनर्स्थापना तक गुँजायमान होना चाहिए, यही समय की माँग हे। इसके लिए हमें विधिवत् योजना बनानी है।

तीसरा कार्यक्रम पर्यावरण संतुलन संरक्षण का है जो परमपूज्य गुरुदेव की दस-सूत्री योजना का एक अनिवार्य अंग है एवं मिशन की राष्ट्रीय जलागम विकास परियोजना में भागीदारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिना हरियाली का कवच बढ़ाए भूमिका जल स्तर ऊँचा नहीं किया जा सकता है। ऐसे वृक्ष अधिक से अधिक संख्या में लगें, जिनसे भूमि का जल स्तर ऊँचा उठे, अधिक बरसात हो व उस जल का संरक्षण किया जा सके, इस कार्य को मिशन पहले ही विज्ञान सम्मत विधि से सम्पन्न कर रहा है। हमारे परिजनों को तो अब बड़ी जिम्मेदारी से इस कार्य को व्यापक रूप देना है ताकि सरकार का मुँह देखे बिना एक समानान्तर तंत्र हमारे माध्यम से ही विनिर्मित हो सके। जड़ी-बूटी पौधशाला, 5-5 एकड़ के वनौषधि उपवन एवं उनसे जुड़े छोटे लघु उद्योग भी इसी योजना में आते हैं। स्वास्थ्य संरक्षक योजना भी इसी से जुड़ी है जिसका त्रैमासिक प्रशिक्षण प्रारंभिक प्रारूप पूरा होते ही सम्भवतः जून ९६ से शान्तिकुञ्ज में आरम्भ होने की सम्भावना हैं।

वेदस्थापना का चौथा कार्यक्रम देव संस्कृति के प्रति आस्था जागरण का एक महत्वपूर्ण सोपान हैं गायत्री परिवार कटिबद्ध है हर घर में वेदों को अपनी संस्कृति की मूल थाती के रूप में पहुँचाने को। हमारे आदि ग्रन्थ हैं वेद। इन्हें केवल पुस्तक या ऋचाओं का संग्रह नहीं मानते अपितु वेद भगवान कहा जाता है, पूजन कर इनका-पठन पाठन किया जाता है। हमें इन्हें वही स्तर दिलाना चाहते हैं जो प्रत्येक संप्रदाय के उनके मूल आदि ग्रन्थ को प्राप्त है, हम काल प्रभाव के कारण उस गरिमा को भुला बैठे हैं। शान्तिकुञ्ज द्वारा अब उपनिषद् एवं गीता विश्व कोश पर भी कार्य आरम्भ हो चुका है। प्रयास यही है कि आर्ष साहित्य का पूज्यवर के निर्देशानुसार पुनः प्रकाशन कर उन्हें घर-घर पहुँचा देना ताकि आज के परिप्रेक्ष्य में युगधर्म को समझते हुए सभी इन से मार्ग दर्शन पा सकें।

जहाँ वेदों को लोग घरों पर ले गए हैं, वहाँ शान्तिकुञ्ज से आने वाली टोलियों द्वारा उनका पूजन कर उन्हें विधिवत् प्रतिष्ठित करा दिया जाएगा, ऐसी योजना बनी है। वेद अब आठों जिल्दों में शान्तिकुञ्ज से उपलब्ध हैं। इसी के साथ सम्भव हो तो परमपूज्य गुरुदेव के वाङ्मय को भी कम से कम प्रत्येक शक्तिपीठ, समर्थ प्रज्ञा मण्डल अथवा 5 से लेकर 10 व्यक्तियों को समूह द्वारा समग्र रूप में स्थापित करने के महत्व को अब सबको समझना है इस वाङ्मय में पूज्यवर का सारा चिन्तन एक स्थान पर आ गया है। अभी सत्तर खण्ड प्रस्तावित हैं। इन्हीं को सात हजार रुपये मूल्य में अखण्ड-ज्योति संस्थान द्वारा दिया जा रहा है। इसके लिए हिन्दी भाषी क्षेत्रों के लिए टोलियाँ अखण्ड-ज्योति संस्थान को वाङ्मय लेकर केन्द्र की ओर से भेजी गयी है। इस स्थापना को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाय जितना हमने वैदिक वाङ्मय को माना हैं।

पाँचवाँ कार्यक्रम लोककला को नयी दिशा देने लोक-मंगल परक मोड़ देने का है। अभी-अभी सभी परिजनों ने आँवलखेड़ा में कलामंच के माध्यम से प्रगतिशील लोककला का लोकरंजन परक स्वरूप देखा है। आज के टी.वी. मीडिया से आ रहे निषेधात्मक जहरीले प्रभाव को निरस्त करने के लिए गाँव-गाँव घर-घर लोककला को माध्यम बनाते हुए हमें पूज्यवर की आकांक्षाओं को पूरा करते हुए इस पूरे तंत्र का परिष्कार करना है। आँवलखेड़ा से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर एक परिपूर्ण योजना इस क्षेत्र में बनायी जा रही है। अभिनय-कला एक्शन नुक्कड़ नाटक छोटे-छोटे धारावाहिकों के निर्माण की बात सोची जा रही हैं।

ग्राम्य स्वास्थ्य सेवा विस्तार जो कि छठा व अंतिम कार्यक्रम है, का प्रथम चरण आँवलखेड़ा से ही आरम्भ किया गया हैं जहाँ माता भगवती देवी चिकित्सालय इसी प्रथम पूर्णाहुति के अनुयाज क्रम में आरम्भ होने जा रहा है। हर ग्राम को आदर्श ग्राम बनाना है तो उसमें स्वास्थ्य सेवा का विस्तार करना होगा, चिकित्सकों का समयदान माँगना होगा तथा ऐसे कैम्प सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित करना है जहाँ इन सुविधाओं का नितान्त अभाव है। हम हर ग्राम में वैसा चिकित्सालय तो नहीं बना सकते जैसा कि आँवलखेड़ा में बनने जा रहा है। किन्तु यह तो कर सकते है कि हमारे जाग्रत प्राणवान परिजनों के माध्यम से न्यूनतम चिकित्सा सुविधाएँ उनको उपलब्ध हो सकें जिन्हें सरकारी तंत्र के माध्यम से उनके पूरा होने की बात मात्र एक दिवास्वप्न ही है व आने वाले पचास वर्षों में भी सम्भवतः पूरी न हों। भारतीय चिकित्सा पद्धति का अनिवार्य ज्ञान देकर स्वास्थ्य संरक्षक योजना से भी उसे करने की योजना है किंतु वह कार्य समय साध्य है अभी तो उपलब्ध उदारमना चिकित्सकों के समयदान को ही सुनियोजित कर दें तो देखते-देखते हम एक वर्ष में एक लाख गाँवों में तो संपूर्ण स्वास्थ्य का लक्ष्य पूरा कर ही सकते हैं।

ऊपर बताई सभी योजनाएँ उन प्रामाणिक सुव्यवस्थित सशक्त इकाइयों द्वारा सम्पन्न होती रह सकती है जिन्हें प्रज्ञामण्डल शाखा संगठन काम दिया गया था। अब पंचायत राज्य व्यवस्था पूरे देश में लागू हो गयी है। हम आदर्श ग्रामों के निर्माण से लेकर सभी प्रगतिशील योजनाओं को क्रियान्वित करने का तंत्र स्थापित करने में समर्थ हैं, यह विश्वास शासन तंत्र को भी है। ऋषियों के तंत्र ने इसीलिए इस मिशन के प्राणवान परिजनों ने बड़ी-बड़ी उपेक्षाएँ रख इतना बड़ा कार्य सौंपा है जो देखने में अभी छोटा लगता है किन्तु जैसे-जैसे अनुयाज क्रम पूरी स्वरूप लेगा-यह एक सुव्यवस्थित राष्ट्र निर्माण तंत्र के रूप में दिखाई देने लगेगा।

राष्ट्र के हर जिम्मे में एक ब्लॉक गोद लेकर उसे एक आदर्श गाँवों के समुच्चय के रूप में विकसित करने का दायित्व यदि हम पूरा कर सकने की स्थिति में हों तो इसे प्रशासकीय सूझ-बूझ के साथ अपने अपने क्षेत्र को भौगोलिक-सामाजिक स्थिति का गहरा अध्ययन करते हुए ग्राम पंचायतों से लेकर स्थानीय निकायों तक सूत्र इस प्रकार बिठाने होंगे कि सारी प्रगतिशील योजनाओं की कुँजी हमारे परिजनों के पास आ जाय। हम उन्हें मात्र जन-जागरण द्वारा हर ग्रामवासी तक पहुँचा भर दें। शेष कार्य स्वतः होता चला जाएगा।

अनुयाज-पुनर्गठन की व्यूह रचना को परिजन भली भाँति समझे, पढ़े और तदनुसार ही अपनी क्रिया पद्धति का निर्धारण करें तो आज से एक वर्ष बाद हम एक बड़ा सशक्त स्थिति में खड़े हो धर्मतंत्र से राष्ट्र के पुनर्गठन-नवनिर्माण की प्रक्रिया सम्पन्न कर रहे होंगे।


VigyapanSuchana

क्षेत्रीय स्तर पर लोग असमंजस में हैं कि किस स्तर के कार्यक्रम, अब हम करें। क्या आगामी एक वर्ष ऐसे ही क्षेत्र को खाली छोड़ दें? ऐसा नहीं है। इस योजना को पूरी तरह पढ़ें व समझें। केन्द्र से अनुयाज क्रम सम्पन्न करने के लिए अब वसन्तपर्व से श्रावणी तक ऐसे दल भेजे जा रहे हैं जो मात्र क्षेत्रीय पुनर्गठन का कार्य करेंगे। आँवलखेड़ा में हुए विचार-विमर्श के बाद अब क्षेत्रीय स्तर पर विगत अश्वमेध व इस पूर्णाहुति के अनुयाज क्रम को सम्पन्न करने हेतु केन्द्र अब जिन टोलियों को भेज रहा है, उनके लिए खर्चीले आयोजनों की आवश्यकता नहीं हैं। 5 दिवसीय इन आयोजनों में चार दिन तक सायंकाल प्रज्ञा-पुराण परिवार खण्ड की कथा एवं अंतिम दिन दीपयज्ञ की व्यवस्था की गयी है। सवेरे सामूहिक जप-ध्यान संस्कारादि एवं कार्यकर्ताओं से परामर्श के बाद दिन में क्षेत्र विशेष के कार्यकर्ताओं के साथ व्यूहरचना बनाकर अनुयाज को गतिशील बनाने का कार्य होगा। यह कार्यक्रम शक्तिपीठ स्तर के बड़े स्थानों पर अथवा जहाँ बहुत अधिक व्यवस्था न करनी पड़े, वहाँ दिये जाएँगे। इनके बारे में विस्तार से 1 व 15 दिसम्बर का पाक्षिक प्रज्ञा अभियान सभी पढ़ लें। शान्तिकुञ्ज से पत्राचार भी कर लें।