अभिव्यक्तियाँ, बहुरंगी स्मृतियाँ

क्या कुछ नहीं समझा था वंदनीय माताजी के व्यक्तित्व में। आदर्श गृहणी, वात्सल्यमयी माँ, उत्कट तपस्विनी, आध्यात्मिक शक्तियों की दिव्य स्रोत, ओजस्वी वक्ता एवं कुशल व्यवस्थापिका आदि न जान कितने रूपों में वह अपना प्रकाश बाँटती बिखेरती रहीं। उनके जिस रूप को जिसने देखा, मुग्ध होकर देखता ही रह गया। बात हमारी-आपकी, उनके शिष्यों-भक्तों की नहीं उनकी भी है, जिन्हें समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। जिनके हाथ में देश और समाज ने अपनी बागडोर सौंपी है। वे सब भी माताजी के सामाजिक-साँस्कृतिक अनुदानों की चर्चा करते नहीं थकते।

ऐसे विशिष्ट लोगों का आना-जाना-मिलना-जुलना मिशन की शुरुआत से ही रहा है। स्वतंत्रता आँदोलन में पूज्य गुरुदेव की सक्रिय भागीदारी के कारण उस समय के मूर्धन्य व्यक्तित्व उनके घनिष्ठ संपर्क में थे। कुछ से तो उनके गहरे-घने पारिवारिक संबंध भी थे। बाद के दिनों में भी यही सिलसिला चलता रहा। गुरुदेव की प्रतिभा ने यदि उन्हें प्रभावित किया तो माताजी के प्रेम ने उन्हें आत्मीय संबंधों के बंधन में जकड़ लिया। ऐसे विशिष्ट जनों की बहुरंगी स्मृतियों की हलकी-सी झाँकी नीचे प्रस्तुत की जा रही है। समग्र विवरण देने के लिए तो शायद एक ग्रंथ का कलेवर भी छोटा पड़े फिर भी इस झलक में परिजन यह अनुभव कर सकेंगे कि समझदारों की भावनाएँ किस कदर माताजी को समर्पित होने के लिए आतुर-व्याकुल है।

माताजी सचमुच पारसमणि हैं। जिनका प्यार भरा स्पर्श पाकर काले कुरूप लोहे जैसा अनगढ़ मनुष्य भी खरे सोने में बदल जाता है। भगवान से मेरी प्रार्थना है कि आचार्य जी एवं माताजी की भावधा से उत्तर-प्रदेश ही नहीं समूचा देश और दुनिया परिचित-प्रभावित हो।

डॉ. एम. चेन्ना रेड्डी भूतपूर्व राज्यपाल (उत्तर प्रदेश)

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शाँतिकुँज आकर मुझे पहली बार अनुभव हुआ कि माँ का प्यार और उसका प्रभाव क्या होता है। वंदनीय माताजी के प्यार के आकर्षण ने उच्च शिक्षित एवं प्रतिभा संपन्न लोगों को भौतिकता का मोह छोड़कर शाँतिकुँज आने एवं लोक सेवा करने के लिए मजबूर किया है। उनके सान्निध्य में रहने वाले जो सदस्य हैं उनसे इस देश को बहुत उम्मीदें हैं मुझे पूरा विश्वास है कि गायत्री परिवार के कार्यकर्ता सामाजिक बुराइयों को दूर करने के अपने प्रयासों में सफल होंगे और एक नये समाज का निर्माण हो सकेगा।

पुरुषोत्तम कौशिक पूर्व पर्यटन एवं उड्डयन मंत्री भारत सरकार

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शाँतिकुँज आने पर प्रत्यक्षं हुआ कि यह आश्रम राष्ट्र निर्माण के कार्यों में रत है। जिससे न केवल विश्व निर्माण होगा, अपितु एक युग का नव निर्माण होगा। मुझे माताजी के स्नेह भरे व्यवहार ने अत्यंत प्रभावित किया है।

सत्य प्रकाश मालवीय (पूर्व मंत्री, उत्तर प्रदेश)

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समाज को सुधारने वाले यहाँ आकर खुली आँखों से देखें कि वंदनीय माताजी समाज निर्माण के अनेकानेक कार्यों का संचालन किस चमत्कारिक ढंग से कर रही हैं।

पवन दीवान भूतपूर्व, समाज कल्याण तथा सहकारिता मंत्री म. प्र.

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लोपामुद्रा, अनुसुइया जैसी महिला ऋषियों के बारे में अब तक पढ़ता-सुनता रहा हूँ। शाँतिकुँज आने पर माताजी के रूप में उस ऋषि तत्व का साक्षात्कार भी कर लिया। वह और आचार्य जी मानव जाति के कल्याण के लिए जैसी शिक्षा दे रहे हैं-उसकी अत्यंत आवश्यकता है। उनका कार्य आगे भी प्रगति करता रहेगा।

म. र. देवरस, पूर्व सर संघ चालक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

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शाँतिकुँज न आता, तो पता भी न चलता कि नारी शक्ति के विकास का सही स्वरूप क्या है। माताजी भारतीय नारी के आदर्शों की जीवंत मूर्ति हैं। स्नेह, ममत्व करुणा, साहस, सेवा, सदाशयता सभी गुण तो उनमें हैं। उनसे एक बार मिलकर हमेशा-हमेशा के लिए उनका अपना हो गया।

बृजलाल वर्मा, पूर्व संचार मंत्री, भारत सरकार

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इधर काफी अरसे से महसूस हो रहा था कि जैसे जीवन मुझसे बिछुड़ गया है। सब कुछ खोया-खोया सूना-सूना लग रहा था। आज माताजी के पास बैठकर लगा कि मेरा जीवन मुझे वापस मिल गया। उनके सान्निध्य में मुझे जीवन को नया आधार देने वाला अलौकिक तत्व चिंतन मिला। उनका ममत्व मेरे जिंदगी की सबसे बड़ी निधि बनी रहेगी।

जस्टिस वी. रामास्वामी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, पंजाब

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माता जी के पास कुछ देर रहकर मैं शक्ति अर्जित करके जा रहा हूँ। उनके द्वारा संचालित यह केन्द्र वैज्ञानिकों, समाज आँदोलनकारियों, करुण हृदय साहित्यकारों, कलाकारों एवं पत्रकारों के लिए प्रेरणा का केन्द्र है। मेरी इच्छा हे कि इन विविध विधाओं के मर्मज्ञ यहाँ आएँ और सीखें कि अपनी प्रतिभा एवं विशिष्ट क्षमता को नव निर्माण के लिए नियोजित करने की सही तकनीक क्या है?

सुन्दर लाल बहुगुणा प्रख्यात समाज सेवी, पर्यावरणविद्

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इस अंधकार में देश में एक किरण अभी बाकी है। वह युग निर्माण योजना है। जिसे माताजी के आशीर्वाद का मूर्त रूप कहा जा सकता है। माताजी का आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन देश और विदेश के लाखों नर-नारियों को प्राप्त हो रहा है और वे लोक सेवा के लिए जुट रहे हैं। मनुष्य जाति के लिए इससे बड़ा अनुदान और क्या होगा। जब कभी मैं हरिद्वार आया, यहाँ से नया उत्साह, नयी ऊर्जा लेकर गया।

मैं अपने को भाग्यशाली मानूँगा अगर वंदनीय माताजी मुझे जीवन के आखिरी समय इस मिशन की सेवा करने का अवसर प्रदान करें।

विद्याधर जोशी, पूर्व विधायक म. प्र. विधान सभा

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दूर बैठे, बिना देखे, माताजी के व्यक्तित्व की यथार्थ कल्पना करना कठिन है। जिसने भी उनको एक बार देखा, जो भी उनसे एक बार मिला, उनका अपना हो गया। उनके द्वारा संचालित यह संस्था ठीक उनकी ही तरह अद्भुत है। सही मायने में व्यक्तित्व परिष्कार का पुनीत कार्य जो शाँतिकुँज कर रहा है, बहुत ही सराहनीय है। वाणी और आचरण के अद्भुत संगम का नाम है शाँतिकुँज।

सुषमा स्वराज महामंत्री भा. ज. पा. राष्ट्रीय समिति

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गायत्री परिवार से भावनात्मक रूप से जुड़े रहने के कारण गायत्री मंत्र से निरंतर नवीन ऊर्जा प्राप्त होती रहती है। उसी तरह शाँतिकुँज, शांतिकुंज से चिंतन की एक नयी दिशा सदैव मिलती रहती है। विचार कार्य और लक्ष्य का, अद्वैत सार्थकता के नए क्षितिज का, उद्घाटन का जीवन के सात्विक एवं तात्विक मूल्य का, सृजन करता है। इसकी शक्ति, साधन एवं प्रेरणा की स्रोत वंदनीय माताजी हैं। जिनके चरणों में हमारे श्रद्धा सुमन सदैव अर्पित होते रहेंगे।

राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल तत्कालीन अध्यक्ष म. प्र. विधान सभा

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गुरुदेव विचार हैं, तो माताजी क्रिया, गुरुदेव तप हैं, तो माताजी शक्ति, गुरुदेव ज्ञान हैं, तो माताजी भक्ति दो ऋषियों का यह युगल रूप मनुष्य जाति के बीच आज विद्यमान है, मनुष्यों के लिए भगवान का इससे बड़ा वरदान और क्या होगा।

रामानन्द सागर, निदेशक-निर्माता, रामायण सीरियल

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पहले कभी सुना था कि ऋषियों के दर्शन और चरण स्पर्श से जीवन धन्य हो जाता है। आज माताजी के पास बैठकर इसे अनुभव कर लिया। बहुत कुछ पाकर जा रहा हूँ यदि कुछ खोना पड़ा है, तो सिर्फ मन की अशांति।

लोकपति त्रिपाठी पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार

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ऐसे पवित्र स्थान में आने का अवसर मिला और माताजी के दर्शन हुए, यह मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। उनके द्वारा संचालित गतिविधियों में ही समाज का उज्ज्वल भविष्य सँजोया है।

टी. एन. चतुर्वेदी पूर्व कन्ट्रोलर एवं ऑडीटर जनरल भारत सरकार

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माताजी के कार्य की कल्पना हर कोई नहीं कर सकता। वह कल्पनातीत कार्य कर रही हैं। आध्यात्मिक सामाजिक कार्य के साथ देश की अखण्डता, एकता के लिए पूर्व ऋषियों तुल्य चिंतन, मनन, एवं कार्य प्रणाली मेरी राय में शायद ही कोई अन्य कर रहा हो। राजनीतिज्ञों एवं देश के कर्णधारों को उनका मार्गदर्शन लेना चाहिए। मैं जीवन को कृतार्थ समझूँगा। यदि उनके मार्गदर्शन के अनुसार कुछ कर सकूँ।

गिरिराज प्रसाद तिवारी पूर्व अध्यक्ष राजस्थान विधान सभा

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वंदनीय माताजी के दर्शन का शुभ अवसर मिला। थोड़े समय उनके सान्निध्य में बैठकर उनकी बातें सुनीं। उनके मन में देश की सुरक्षा एवं विकास के लिए अगाध प्रेम है। उनका सारा कार्य देश को समृद्ध बनाने के लिए चल रहा है। मनुष्य मात्र का कल्याण उनका मुख्य अभीष्ट है। आध्यात्मिक चिंतन एवं सामाजिक सेवा का अभूतपूर्व संगम यहाँ पर है।

माताजी के दर्शन करने के बाद यहाँ रहने की इच्छा प्रबल हो जाती है। थोड़ी अवधि में मार्गदर्शन मिला जो हर व्यक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है और लक्ष्य की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है मार्ग भी सुगम हो जाता है।

सत्येन्द्र नारायण सिंह पूर्व मुख्यमंत्री बिहार

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आज शाँतिकुँज की अधिष्ठात्री माताजी के दर्शन का सौभाग्य मिला। मानवीय प्रेम का अगाध समुद्र उनमें लहराता है। उसके कुछ क्षणों को पुकार मैं अपने को बड़भागी मानता हूँ।

अमर सिंह पूर्व मुख्य मंत्री, गुजरात

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मानवीय हित ही जिनका सब कुछ है, उनका नाम है माता जी। वह सचमुच में माँ हैं, किसी एक की नहीं सभी की, सारे मनुष्यों की, तभी तो सबके कल्याण की चिंता करती रहती हैं।

माधव सिंह सोलंकी पूर्व मुख्य मंत्री गुजरात

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माताजी एवं उनका कार्य कर्तव्य और धर्म के साथ मनुष्य को अपनी ऊँचाइयों में श्रेष्ठता तथा शाँति देने का अभिनव स्रोत है। माताजी स्वयं में ज्योतिपुँज हैं और उनकी कार्यकर्ता उनसे निकली हुई प्रकाश किरणें।

श्रीपति मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

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माताजी की प्रेरणा मुझे जीवन में सदैव मिली। देश में अनेक आध्यात्मिक विभूतियाँ हुई हैं। पर माताजी तो जैसे विभूतिपुँज हैं। उनमें सभी का सार निहित है। उनकी चेतना का स्पर्श पाकर भारत अपने खोए हुए गौरव को पुनः प्राप्त करेगा।

शिवचरण माथुर पूर्व मुख्यमंत्री राजस्थान

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भारत की प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता की महिमा यदि कोई जानना चाहे तो उसे शाँतिकुँज आकर माता जी से मिलना चाहिए। उनके द्वारा विश्व कल्याण के लिए किया जा रहा कार्य सर्वथा अद्वितीय है। मुझे विश्वास है कि यह कार्य दिन पर दिन आगे बढ़ता जाएगा। मैं इसकी सफलता की कामना करता हूँ।

श्री सत्यनारायण रेड्डी पूर्व राज्यपाल उ. प्र. (वर्तमान उड़ीसा के राज्यपाल)

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मानव कल्याण के लिए वंदनीय माता जी जो कर रही हैं, उसमें सहयोग तो दिया जा सकता है परंतु उसके विस्तार को नापा नहीं जा सकता।

अर्जुन सिंह पूर्व मानव संसाधन एवं विकास मंत्री, भारत सरकार

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इंसानियत, अमन, भाईचारे का पैगाम देने वाले इस आश्रम शाँतिकुँज को देखने की अभिलाषा आज पूरी हुई। इसका संचालन करने वाली माताजी मेरी अपनी भी माँ है।

इब्राहिम कुरैशी महामंत्री म. प्र. मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी म. प्र.

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अपनी माँ की महिमा का बखान भला कौन नहीं करना चाहेगा? उनके ममत्व पर मेरा अधिकार है। मानवीय हितों में एवं उनके हितों में किए जा रहे कार्य, विश्व इतिहास में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेंगे। मैं उनके चरणों में अपने को समर्पित करते हुए मानव सेवा में अपना योगदान देने का संकल्प लेता हूँ।

दिग्विजय सिंह मुख्य मंत्री म. प्र.

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मेरी माँ बचपन में ही मर गईं थीं। आज माता जी को देखकर ऐसा लगा कि फिर से मेरी माँ मुझे मिल गईं।

लालू प्रसाद यादव मुख्य मंत्री बिहार

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सचमुच आप विश्वमाता हैं। उड़ीसा ही क्यों सचमुच विश्व आपकी गोद में है।

बीजू पटनायक मुख्य मंत्री उड़ीसा

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माताजी राष्ट्र की आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत हैं। उनके द्वारा प्रारंभ किया गया अश्वमेध अभियान राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्षम भूमिका निभाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

भजन लाल मुख्य मंत्री, हरियाणा

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माता जी के आशीर्वाद का सुख मिला। भावनाओं एवं विचारों का जितना अद्भुत सामंजस्य उनमें समाया है, उसे बिना देखे कल्पना करना कठिन है। शाँतिकुँज के कण-कण में उनकी प्रेरणा समायी है। गायत्री परिवार उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह है। जिसमें शामिल होकर कोई भी उनकी चेतना का सुखद स्पर्श पा सकता है।

छबीलदास मेहता मुख्य मंत्री, गुजरात

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शाँतिकुँज संस्थान को देखकर मुझे अनिवर्चनीय आनंद की अनुभूति हुई। यहाँ की प्रवृत्तियों का परिचय पाकर प्रतीति हुई कि यह संस्थान आत्मकल्याण के लिए तो प्रयत्नशील है ही साथ ही आत्म कल्याण के द्वारा लोक मंगल भी इसे अभीष्ट है। सबसे बड़ी विशेषता इसकी यह है कि इसके पास अनमोल मानव संपदा है। वस्तुतः इसके पीछे एक महान विभूति की अथक एवं दूरदर्शितापूर्ण साधना है। सादगी-सरलता एवं सात्विकता की त्रिवेणी यहाँ से प्रवाहित है। इसकी अधिष्ठात्री तो प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं। मैं इस संस्थान की उत्तरोत्तर उन्नति की कामना करता हूँ।

यशपाल जैन प्रख्यात साहित्यकार एवं मंत्री सस्ता साहित्य मंडल

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माता जी के श्रेष्ठ कार्यों से मैं बहुत वर्षों से परिचित हूँ। माताजी ने अपने प्रेमपूर्ण वात्सल्य के सूत्र में अनेक लोकसेवी कार्यकर्ताओं की मणिमाला तैयार की है। जिसे वह विश्वमानवता के लिए समर्पित कर रही हैं। उनकी तप साधना के प्रभाव से संपन्न वैभवशाली, और आध्यात्मिकता से भरे पूरे भारत का निर्माण होगा।

प्रो. राजेन्द्र सिंह रज्जू भइया सरसंचालक राष्ट्रीय सेवक संघ

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माताजी के सान्निध्य से स्फूर्ति, प्रेरणा एवं बल लेकर जा रहा हूँ। उनके पास आकर चेतना को नई शक्ति मिली। उनके यह कार्य बढ़ें, केन्द्र अधिकाधिक सामर्थ्यवान बने, यही प्रभु से प्रार्थना है।

मुरली मनोहर जोशी, वरिष्ठ राजनेता, भारतीय जनता पार्टी

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मानवीय संवेदना अगर घनीभूत हो जाए तो कैसी होगी, यह माता जी को देखकर पता चला। उनके द्वारा चलाया गया, अश्वमेध अभियान राष्ट्र निर्माण का वेगपूर्ण प्रवाह है।

अटल बिहारी बाजपेई वरिष्ठ राजनेता, भारतीय जनता पार्टी

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जहाँ से आत्मिक शाँति एवं आध्यात्मिक शक्ति का प्रवाह निरंतर बहता रहता है उनका नाम ही माता जी है। वर्षों से मेरा उनसे परिचय है। जितने दिन होते जाते हैं, उतनी ही आत्मीयता सघन हो जाती है। संक्षेप में इतना ही कह सकता हूँ कि शब्दों में उनके व्यक्तित्व की मर्यादा नहीं बाँधी जा सकती।

भैराँ सिंह शेखावत मुख्य मंत्री, राजस्थान

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समाज में संस्कारों की पुनः प्रतिष्ठा का जो कार्य माता जी कर रही हैं। उसके लिए सदैव यह देश ऋणी रहेगा। अल्प समय में उन्होंने जितना कार्य किया है उस चमत्कार को देखकर ऐसा लगता है कि एक सामान्य मानवी सामर्थ्य से इतना कुछ संभव नहीं। मानवीय शरीर में वह विशिष्ट देव शक्ति हैं। मेरा उनको नमन।

अशोक सिंघल महामंत्री विश्व हिंदूपरिषद

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भारत परिक्रमा के अवसर पर पहली बार शाँतिकुँज आने एवं माता जी से मिलने का सुयोग प्राप्त हुआ। इस सुयोग को पाकर लगा कि जीवन के सभी पुष्पों का पारितोषिक मिल गया। वंदनीय माताजी के व्यक्तित्व से निकलती प्रेमपूर्ण तरंगों ने जीवन में जिस अलौकिक ऊर्जा को प्रवाहित किया, उसे बता सकना शब्दों के बूते की बात नहीं।

डॉ. एम. लक्ष्मी अध्यक्ष विवेकानंद केन्द्र कन्याकुमारी

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भावभरी यादों की इस श्रृंखला का विस्तार बहुत बड़ा है जो अंतहीन है। जिसे आगे भी प्रस्तुत किया जाता रहेगा। अनगिनत रूपों में अपनी ऊर्जा बाँटने वाली अपनी माँ के व्यक्तित्व ने वह सब कुछ सँजोया है, जिसकी स्मृति एवं अनुभूति हम में ऐसी पुलकन देती रहेगी, जिससे हमारा जीवन सुखद रोमाँच से भर जाए।


Quotation

संसार को सभी ईश्वर भक्तों, धर्म परायणों, महामानवों और सत्पुरुषों को अपनी मनोभूमि को वास्तविकता की अग्नि परीक्षा देनी पड़ी है। जो ईंट भट्टी में पकने से पहले इंकार कर दे वह पानी की बूँद पड़ते ही गल जाने वाली निकम्मी चीज बनी रहेगी।

मजबूती प्राप्त करने के लिए तो आग को अपनाना ही होगा। कच्चा लोहा भट्टियों में ही तो फौलाद बनता है। ऊबड़-खाबड़ ओछे और घिनौने स्वार्थी और तृष्णा वासना ग्रसित मनुष्य को आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होने के लिए त्याग और बलिदान का मार्ग सदा ही अपनाना पड़ा है। इसका और कोई विकल्प न तो था और न आगे हो सकता है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

मैंने इतना दिया पर इसका बदला मुझे क्या मिलेगा? ऐसे विचार करने में उतावली न कीजिए। बादलों को देखिये वे सारे संसार पर जल बरसाते फिरते हैं। किसने उसके अहसान का बदला चुका दिया? हम पृथ्वी की छाती पर जन्म भर लदे रहते हैं और उसे मल मूत्र से गंदी करते रहते हैं, किसने उसका मुआवजा अदा किया है? परोपकार स्वयं ही बदला है। त्याग करना आज आपको भले ही घाटे का सौदा प्रतीत होता हो पर जब आप उपकार करने का अनुभव स्वयं करेंगे तो देखेंगे कि ईश्वरीय वरदान की तरह यह दिव्य गुण स्वयं ही कितना शाँतिदायक है।

माता भगवती देवी शर्मा

प्रज्ञा परिजनों से हमारा व्यक्तिगत लगाव है। घनिष्ठता इतनी है कि उसका समापन किसी भी प्रकार से हो सकना संभव नहीं है। इसके कई कारण हैं। प्रथम यह कि हमें अनेक जन्मों का स्मरण है-लोगों को नहीं। जिनके साथ पूर्व जन्मों में सघन संबंध रहे हैं उन्हें संयोगवश या प्रयत्नपूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है। इन सबने हमने एक ही आकाँक्षा सँजोयी है कि वे सब हमारे कदमों की यथार्थता खोजें। सफलता जाँचे और जिससे जितना बन पड़े अनुकरण का, अनुगमन का, प्रयास करें। यह नफे का सौदा है घाटे का नहीं।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


सफलता के मणिमुक्तक पाएँ तो कैसे?

सफलता पानी है तो उसके लिए प्रबल संकल्प शक्ति तथा सतत् अध्यवसाय एक अनिवार्य शर्त है। स्वतः हम हर दिन कार्य में सफल होते चले जाएंगे, कोई दैवी अनुकंपा किसी के आशीर्वाद से कुछ तंत्र-तंत्र कर्मकाण्डादि से हम पर बरसती चली जाएगी यह आशा करना तो शेखचिल्ली का सपना भर है। सफलता के मणिमुक्तक यूँ ही धूल में बिखरे हुए नहीं पड़ हैं। उन्हें पाने के लिए गहरे में उतरने की हिम्मत इकट्ठी करनी होगी, कठोर परिश्रम करने व करते रहने की शपथ लेनी होगी। कठोर, दमतोड़ और टपकते स्वेद कणों वाला परिश्रम ही जीवन का सबसे श्रेष्ठ उपहार है। इसी के फलस्वरूप लौकिक जीवन की समस्त सफलताओं-विभूतियों को पाया जा सकता है।

सुअवसर की प्रतीक्षा में बैठे रहना, कुछ न कर काहिली में उपलब्ध समय रूपी संपदा को गँवा बैठना तो मानव जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता है। उद्यम के लिए हर घड़ी हरपल एक शुभ मुहूर्त है, सुअवसर है। सस्ती सफलता-शीघ्र सिद्धि प्राप्त करने की ललक के फेर में पड़े रहने से वस्तुतः कुछ भी लाभ नहीं। कुण्डली, फलित ज्योतिष-सर्वार्थ सिद्धि योग आदि में समयक्षेप अवसर चूक जाने के बाद काफी पछतावा देता है। चिरस्थायी प्रगति के लिए राजमार्ग पर अनवरत परिश्रम और अपराजेय साहस को साथ लेकर चलना होगा। पगडंडियाँ या “शार्टकट” ढूँढ़ना बेकार है। वे भटका सकती हैं। जिनने भी कुछ सफलता पायी है, जिसे इतिहास में लिखा गया उन्हें गहराई तक खोदने व उतरने के लिए कटिबद्ध होना पड़ा है। विजय श्री का वरण करने के लिए कमर कसना, आस्तीन चढ़ाना और खोदने की प्रक्रिया आरंभ कर देना आवश्यक है, पर ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि अनावश्यक उतावली से कहीं कुदाली से पैर ही न कट जायँ।

परिस्थितियाँ, साधन एवं क्षमता का समन्वय करके आगे बढ़ना ही समझदारी है। यही सफलता के लिए अपनायी गयी सही रीति-नीति है। किंतु यह तथ्य गाँठ बाँध लिया जाना चाहिए कि सफलता केवल समझदारी पर ही तो निर्भर नहीं है, उसका मूल्य माथे से टपकने वाले श्रम सीकरों से ही चुकाना पड़ता है।


चार दिन का ज्वर है, यह सौंदर्य

देवसी पर्णिया के मूर्तिकार चुँक की कन्या थी। मूर्तिकार चुँक अपनी मूर्तिकला के लिए विख्यात था और देवसी अपने सौंदर्य के लिए। कलिंग देश का छोटा-सा ग्राम पर्णिया इन दोनों के ही कारण कलिंग ही नहीं बाहर के देशों में विख्यात था। मूर्तिकार की अपूर्व सुँदरी कन्या की ख्याति चारों ओर इस तरह व्याप्त हो रही थी जिस तरह पूर्णिमा के चन्द्रमा का प्रकाश समस्त भू-मंडल में छा जाता है।

धन-मद, शक्ति की तरह सौंदर्य का अहंकार भी मनुष्य को पागल कर देता है। बेचारी छोटी-सी देवसी भला उससे कैसे बच पाती? पर्णिया ग्राम कुशल कलाकारों की बस्ती थी। भगवान ने भी इस ग्राम में अपनी कला को निखारा था। कई युवक भी सौम्य और सुँदर थे, पर देवसी के मन को एक भी युवक संतुष्ट न कर सका। वह अपने आपको उर्वशी से बढ़कर मानती थी और किसी भी अर्जुन से कम के साथ विवाह करने को राजी न थी।

सौंदर्य के साथ यौवन का चढ़ाव, देवसी की काँति दिनों दिन और द्युतिमान होती गई। नील-ताल की शोभा उसके सम्मुख पानी भरती थी। कलिंग का अंतःपुर और राजकुमारियाँ देवसी का नाम सुनते चौंकती थीं। राज्य भर के श्रेष्ठी सामंतों, सत्ताधारियों और राजकुमारों तक में उसे पाने की प्रतिस्पर्धा थी। किंतु देवसी किसे कब दुत्कार कर भगा दे, इसका कुछ ठिकाना नहीं था। अब तक सैकड़ों लोगों को उसने उँगली पर नचाकर दूर फेंक दिया था। अब तो लोग उसका नाम सुनते भयभीत होते थे।

एक दिन शाम के समय गाँव से एक अनजान युवक निकला। वह किसी कामना से नहीं निकला था। सत्य की शोध उसका लक्ष्य था और गुरु की खोज में वह इधर-उधर भटक रहा था। चलते-चलते शाम हो गई थी। थकावट से चूर युवक मणिभद्र ने पर्णिया में ही विश्राम के लिए डेरा डाल दिया। देवसी के पिता चुँक ने इस युवक को भी अपनी कन्या का हाथ माँगने वाला ही समझा सो उसने अपना परिचय देना प्रारंभ किया। उधर उसकी रूपगर्विता कन्या युवक को जितनी बार देखती हँस देती और अपनी सहेलियों से कुछ तो भी कहने लगती? “बेचारा अपने को न जाने क्या समझता है लगता है इसे भी अपने पर बड़ा घमण्ड है।”

वृद्ध मूर्तिकार युवक मणिभद्र को अपनी एक मूर्ति के पास ले गया और उसे दिखाकर वह मूर्तिकला की बारीकियों को समझाने लगा। सब कुछ सुन लेने पर मणिभद्र बोले-”तात! मूर्तिकारी तो बस उस कलाकार की ही तरह निर्विकार है जिसने इस संसार को बनाया है। उस जैसी विज्ञता और कलाकारिता मनुष्य में कहाँ, जिसने आग-पानी मिट्टी, वायु और प्रकाश को मिलाकर जीवन पैदा कर दिया।”

बूढ़ा कलाकार चौंका-उसने अपने जीवन में पहला युवक देखा था जो शरीर से ही नहीं विचारों से भी लुभावना था, और तो सब रूप के प्यासे पुतले आते थे और देवसी की रूपाग्नि की धधकती ज्वाला में झुलस कर चले जाते थे। पर आज का अभ्यागत रूप से नहीं ज्ञान से प्रभावित होने वाला था। सो कलाकार जान गया कि आज की पराजय प्रतिकूल भी हो सकती है।

कलाकार एक-एक मूर्ति, मूर्तिकला के उपकरण राजाओं द्वारा प्राप्त अलंकार और पदवियाँ दिखाता हुआ मणिभद्र को घर ले गया। अपनी कन्या का परिचय देते हुए वृद्ध ने कहा-”तात! यही है मेरी रूपवती कन्या, जिसके सौंदर्य के सम्मुख राज घराने का सौंदर्य भी प्रतिहत हो चुका है।”

“ओह! देवसी!” मणिभद्र ने उसके मुख मंडल

पर दृष्टि डालते हुए कहा-”मैंने सुना है तुमने कितने ही लोगों का मान भंग किया है। देवी!

किंतु तुम नहीं जानती जिस सौंदर्य को तुम अपनी संपत्ति समझ रही हो, वह चार दिन का ज्वर मात्र है भद्रे!”

“अहंकार किसी वस्तु का हो या गुण का, ज्ञान प्राप्ति में सर्वथा बाधक है। ऐसे स्थान से जितना शीघ्र चल दिया जाय उतना ही अच्छा।” कहकर मणिभद्र ने अपनी लकुट–कामर उठाई और अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ा। देवसी का सौंदर्य अभिमान चूर-चूर हो गया। वह युवक को पाने के लिए तड़प उठी। किंतु जब तक वह कुछ कहे, युवक मणिभद्र उसकी आँखों से ओझल हो चुका था।


Quotation

सब अच्छे रहे होते तो यह स्वर्ग रहा होता और सब बुरे होते तो नरक। पर यहाँ मिली-जुली आबादी है। इसलिए स्वर्ग का आनंद भी लिया जा सकता है और नरक का त्रास भी।


एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति

ठस अपरिमित आकाश में समस्त दृश्य पदार्थ का अस्तित्व एक छोटे घटक के रूप में है। यहाँ जितना कुछ समग्र है, उसमें व्यापकता भी दृष्टिगोचर होती है। उसकी इकाइयाँ अलग-अलग दीखते हुए भी, वे परस्पर इस तरह घुली-मिली हैं, कि उन्हें पृथक् कर पाना किसी भी तरह शक्य नहीं। सामान्य तौर पर किसी द्रव्य को तोड़ा और बिखेरा जा सकता है।

हम पदार्थ की किसी भी भूमिका में दृष्टिपात करें, सर्वत्र एक ही नियम काम करता दृष्टिगोचर होगा, चाहे वह परमाणुओं की आँतरिक संरचना हो, सौरमंडल हो अथवा, ब्रह्माँड में स्थित ग्रह-नक्षत्र, इनमें पारस्परिक विरोधाभास जैसा कुछ भी प्रतीत नहीं होता। ऐसे ही स्थूल सत्ता से परे की परिधि में जितना गहरा उतरा जायेगा, उतना ही यह तथ्य और स्फुट होता जायेगा कि इस जगत में मात्र एक ही दिव्य सत्ता का संचार है। वही अनेकानेक प्रकार की दृश्यावलियाँ और वस्तुएँ अपनी हलचलों से यहाँ विनिर्मित करती रहती है। उसी में पदार्थ-जगत की तीन मुख्य गतिविधियाँ-निर्माण, विकास और विनाश की स्थितियाँ चलती रहती हैं। संसार के इस संपूर्ण पसारे की गहराई में प्रवेश करने पर वहाँ एक ही तत्व शेष रह जाता है, जिसे प्रकृति पुरुष अथवा दोनों का सम्मिश्रण कहा जा सकता है।

यह दर्शनशास्त्र का निष्कर्ष है। विज्ञान इससे पूर्व तक विश्व को जड़ स्वीकारता रहा था, पर देखा जा रहा है कि ज्यों-ज्यों उसकी गति गहराई की ओर हो रही है, त्यों-त्यों वह वेदाँत के जागतिक निर्णय के काफी सन्निकट पहुँचता जान पड़ रहा है और मतभेद लगभग टलता प्रतीत हो रहा है। इतना ही नहीं, अब वे पुरानी असहमतियों को भुलाकर नवीन समझौते की तैयारी करते दीख पड़ रहे हैं। विज्ञान की अधुनातन खोजें पदार्थ सत्ता की मूल तक पहुँचते-पहुँचते यह अनुभव करने लगी हैं कि उस भूमिका में पहुँच कर सर्वत्र एक ही शक्ति शेष बच जाती है। यह शक्ति पदार्थपरक पड़ न होकर ऐसी है, जिसे बुद्धिमान, विवेकपूर्ण कहा जा सके। इसे “सर्वव्यापी ब्राह्मी चेतना” नाम दिया जाय या कुछ और? कुल निष्कर्ष इतना ही है कि यहाँ सब कुछ उस परम सत्ता की ही परिणति है।

यह संभव है कि कोई कोरा बुद्धिवादी इस बात पर आश्चर्य प्रकट करे कि परमाणु का अधिकांश भाग पोला (स्पेस) है, किंतु दार्शनिक विचारधारा के अनुगामियों के लिए इसमें तनिक भी अचंभा नहीं। वे इस बात को भलीभाँति जानते हैं कि जिनकी जिससे उत्पत्ति हुई है, उनमें उस तत्व का कुछ-न-कुछ अंश अनिवार्य रूप से उपस्थित रहेगा ही। वे इस तथ्य से पूरी तरह परिचित हैं कि परमाणु के थोड़े-से हिस्से में ही इलेक्ट्रॉन, प्रोट्रान एवं न्यूट्रोन जैसे विद्युत प्रवाह हैं, शेष पूरा भाग रिक्त है। दर्शन के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति आकाश तत्व से हुई है, इसलिए इसकी प्रत्येक वस्तु में, कण में आकाश की विद्यमानता अपरिहार्य है। परमाणु का जो हिस्सा खाली जैसा प्रतीत होता है, वह भी सर्वथा खाली और निष्क्रिय नहीं उस खाली में ही सब कुछ बिखरा पड़ा है। वहाँ भी एक प्रकार की सक्रियता अति सूक्ष्म स्तर पर विद्युत प्रवाहों की सूक्ष्म प्रक्रिया के कारण होती है वेदाँती लोग इसे ही प्राण के नाम से पुकारते हैं।

यों तो विज्ञान रेडियेशन को अति सूक्ष्म स्तर की वेगवान ऊर्जा मानता है, फिर भी वह पदार्थ की ही श्रेणी में आता है। दार्शनिकों के मतानुसार प्रकाश की भी अपनी सीमा है। उसका प्रसार-विस्तार मात्र सामान्य दिक्काल तक ही सीमित है और उसकी क्रियाशीलता की भी वही परिधि है। परम सत्ता विकिरण क्षेत्र से परे है। कठोपनिषद् में उसका वर्णन करते हुए कहा गया है-”वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चंद्रमा न नक्षत्रगण ही।” विकिरण के ये प्रवाह वहाँ पहुँचने में समर्थ नहीं, फिर अग्नि की तो बात ही क्या।

भौतिक विज्ञानी भी अब पदार्थ की मूल में क्रियारत चेतन सत्ता को स्वीकारने लगे हैं। डॉल्टन ने जब पहली बार यह बताया कि पदार्थ छोटे-छोटे परमाणुओं के बने हैं, तो उसके बाद से परमाणु को पदार्थ का मूल कारण माना जाने लगा, किंतु तब और अब के इस मध्यवर्ती अंतराल में विज्ञान की अप्रत्याशित प्रगति हुई है और सम्प्रति उसकी पदार्थ सत्ता से परे चेतना सत्ता में भी गति दिखाई पड़ने लगी है। इस दृष्टि से यदि वैज्ञानिक मान्यताओं में परिवर्तन होता है, तो कुछ गलत भी नहीं है। यह ठीक है कि परमाणु पदार्थ की इकाई है, पर परम इकाई तो वह अव्यक्त चेतना ही है, जो सबके मूल में है। विज्ञान अब इस तथ्य को भली-भाँति समझने लगा है, अतः पूर्व की परमाणु संबंधी अवधारणा अब पुरानी पड़ गई है।

इस पदार्थ जगत संबंधी हर एक का यही अनुभव है कि वह रूप, रंग और ठोसपन से विनिर्मित है, किंतु इसमें उतनी सच्चाई नहीं, जितनी भासती है-इसे अब विज्ञान अच्छी तरह समझने लगा है। इसी कारण से पदार्थ विज्ञानी एडिंगटन ने अपनी रचना “दि नेचर ऑफ दि फिजिकल वर्ल्ड” में लिखा है-”पदार्थ की कुल तीन अवस्था हैं, किंतु इसके अतिरिक्त भी एक चौथी सूक्ष्म अवस्था है। इसे “प्लाज्मा” के नाम से पुकारा गया है। सामान्य पदार्थ जब अति उच्च तापमान पर पहुँचता है, तो वह आयनीकृत हो जाता है। यही चौथी अवस्था है। इस अवस्था में तापमान को जब और अधिक बढ़ाया जाता है, वह एक अव्यक्त शक्ति में रूपांतरित हो जाता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि पदार्थ की मूल सत्ता अगोचर है। जो गोचर है, वह उसकी छाया मात्र है।”

आरंभ में ऐसी धारणा थी कि पदार्थ के यह सूक्ष्मतम कण अविभाज्य हैं, किंतु वर्तमान में उसका विभाजन और विस्फोट अनंत शक्ति और ज्ञान का स्रोत बन गया है यह पाया गया है कि परमाणु में दो प्रकार की विद्युतधाराएं हैं। केन्द्रीय नाभिक तथा परमाणु के मुख्य भाग में धनात्मक विद्युत होती है। केन्द्र से बाहर चारों ओर ऋणात्मक विद्युतयुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं। केन्द्रीय नाभिक में भी भिन्न-भिन्न कण होते हैं, जिन्हें न्यूट्रोन और प्रोट्रान कहते हैं। अपने मूल रूप में परमाणु विद्युत्तावेषी नहीं होता, क्योंकि उसके भीतर की धनात्मक और ऋणात्मक धाराएँ सदा समान होती हैं। ऋणावेशी इलेक्ट्रॉन और धनावेशी प्रोट्रान परस्पर संतुलन बनाये रखते हैं। इस दृष्टि से देखा जाय, तो परमाणु संरचना और मंडल के बिलकुल समतुल्य है।

विज्ञान जगत में कण-विज्ञान के क्षेत्र में सबसे क्राँतिकारी खोज तब हुई, जब वैज्ञानिकों ने अवयवों को गैस की पर्त से होकर गुजारा। अवयव आर-पार हो गये। फिर तो परमाणु के ठोस होने की मान्यता खंडित हो गई, क्योंकि ये अवयव न तो कहीं टकराये और न किसी अवरोध द्वारा रोके जा सके। परीक्षणों से यह स्पष्ट हो गया कि परमाणु का नाभिक सूर्य की तरह और उसके इर्द-गिर्द परिक्रमारत इलेक्ट्रॉन ग्रह-नक्षत्रों जैसे हैं। यह भी विदित हुआ कि एक इलेक्ट्रॉन का व्यास संपूर्ण परमाणु का 1/50 हजारवाँ भाग है और नाभिक का व्यास भी लगभग उतना ही है। इस तरह पूरे परमाणु का करीब शत-प्रतिशत भाग “स्पेस” है। यदि मानव देह के अंदर के समस्त परमाणु को इस प्रकार दबाया जाय कि वे परस्पर अधिकतम सघन हो जायँ, तो फिर मनुष्य का शरीर एक छोटे-से धब्बे के सदृश्य हो जायेगा, जिसे नंगी आँखों से तो क्या, किसी शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी से भी देख पाना मुश्किलप्राय होगा।

अनुसंधानों से इस बात की पुष्टि अब हो चली है कि पदार्थ का आदि रूप कण की तरह नहीं, तरंग की तरह है। इसी का समर्थन करते हुए “दि लिमिटेशन ऑफ साइंस” में प्रख्यात वैज्ञानिक डी. सुलीवान लिखते हैं-”इस प्रकार यह प्रथम संकेत था, जो कि आधुनिक विज्ञान की ओर से आया कि पदार्थमय जगत का मूलभूत स्वरूप वस्तुतः पदार्थ कण के रूप में नहीं, वरन् तरंगों के रूप में है। विश्लेषण की अंतिम अवस्था में पदार्थ बिलकुल क्षीण हो गया और उसकी सत्ता अज्ञात तरंगों में समाहित होती दीखने लगी।”

इसी प्रकार का मत प्रकट करते हुए “दि फिलॉसफी ऑफ फिजिकल साइंस” में एडिंगटन लिखते हैं-”पदार्थ की वास्तविक सत्ता कण और तरंग दोनों रूपों में है। कण इसलिए कि वह पदार्थ का हिस्सा है। तरंग इसलिए कि वह अत्यंत सूक्ष्म है। “दि मिस्टीरियस यूनीवर्स” में जेम्स जीन्स भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। वे कहते हैं कि वस्तुतः हम जिस पदार्थ की दुनिया में रहते हैं, उसका आदि रूप तरंग है। वस्तुएँ विखंडित होने के उपराँत अंततः इसी तरंग में परिवर्तित हो जाती है।

जिस प्रकार पदार्थ के हर कण “इलेक्ट्रॉन” द्रव्य कण भी हैं और तरंग भी, उसी प्रकार विकिरण के कण “फोटान” तरंग भी हैं और द्रव्य भी। इस प्रकार मैटर और रेडियेशन की पृथक् सत्ताएँ खतरे में पड़ गई हैं और वे दोनों एक ही मूल सत्ता, एक ही यथार्थ के अंग प्रतीत होते हैं। इसीलिए वाल्टर फ्रैंकलीन अपनी रचना “क्वाण्टम गाँड” में लिखते हैं-” पदार्थ और प्रकाश भले ही बाह्य दृष्टि को दो पृथक् अस्तित्व जान पड़ते हों, पर मूलतः वे एक ही सत्ता की दो भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इसे अब विज्ञान भली-भाँति स्वीकारने लगा है और यह भी पुष्ट हो चला है कि विशेष परिस्थितियों में एक का दूसरे में रूपांतरण संभव है।”

उक्त रूपांतरण प्रक्रिया से संबंधित विज्ञान का एक सिद्धाँत है, जिसे संरक्षण का सिद्धाँत कहते हैं। इस सिद्धाँत के अनुसार पदार्थ जगत में जब भी किसी एक का किसी दूसरे रूप में परिवर्तन होता है, तो इस मध्य संपूर्ण ऊर्जा बिलकुल स्थिर रहती है, इसमें किसी प्रकार की न्यूनाधिकता नहीं आती। यही वेदाँत अवधारणा भी है। “पूर्णमदः पूर्णमिदं......पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते।” इसमें उसी तथ्य को प्रकट किया गया है।

विज्ञान की प्रगति से अब दर्शन के रहस्य धीरे-धीरे कर प्रकट और प्रत्यक्ष होने लगे हैं-ऐसा स्पष्ट दीखने लगा है। कुछ समय बाद यदि शेष मतभेद भी समाप्त हो जायँ और दोनों ही अपनी द्वैत अवस्था मिटा कर अद्वैतभाव में प्रतिष्ठित हो जायँ, तो कोई आश्चर्य नहीं। अभी-अभी विज्ञान का एक बड़ा असमंजस यह दूर हुआ है कि पदार्थ सत्ता में चेतना की उपस्थिति किस भाँति हो सकती है, किंतु इस ऊहापोह से उबरने के बाद ऐसी उम्मीद है कि वह अब जल्द ही अध्यात्म की उस सर्वमान्य अवधारणा को स्वीकारने की स्थिति में आ जायेगा, जिसमें कहा गया है-”एकोब्रह्म द्वितीयोनास्ति।” यदि ऐसा हुआ, तो सत्य और तथ्य को प्रकट करने वाली दो धाराएँ मिलकर एक हो जायेंगी और उनके बीच का मतभेद सदा-सदा के लिए समाप्त हो जायेगा।


अंतर्जगत का देवासुर संग्राम

मनुष्य के अंतःकरण में दो प्रवृत्तियाँ रहती हैं जिन्हें आसुरी एवं दैवी प्रकृति कहते हैं। इन दोनों में सदा परस्पर संघर्ष चलता रहता है। गीता में जिस महाभारत का वर्णन है और अर्जुन को जिसमें लड़ाया गया है वह वस्तुतः आध्यात्मिक युद्ध ही है। आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल हैं कौरवों के रूप में उनकी बहुत बड़ी संख्या है, सेना भी उनकी बड़ी है। पाण्डव पाँच ही हैं उनके सहायक एवं सैनिक भी थोड़े ही हैं। फिर भी भगवान ने युद्ध की आवश्यकता समझी और अर्जुन से कहा-लड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। तामसिक आसुरी प्रकृति का दमन किये बिना सतोगुणी दैवी प्रकृति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायगा। इसलिए लड़ना जरूरी है। अर्जुन पहले तो, झंझट में पड़ने से कतराया, पर भगवान ने जब युद्ध को अनिवार्य बताया तो उसे लड़ने के लिए कटिबद्ध होना पड़ा। इस लड़ाई को इतिहासकार ‘महाभारत’ के नाम से पुकारते हैं। अध्यात्म की भाषा में इसे साधना समर कहते हैं।

देवासुर संग्राम की अनेक कथाओं में इसी ‘साधना समर’ का अलंकारिक निरूपण है। असुर प्रबल होते हैं, देवता उनसे दुःख पाते हैं, अंत में दोनों पक्ष लड़ते हैं, देवता अपने को हारता-सा अनुभव करते हैं वे भगवान के पास जाते हैं। प्रार्थना करते हैं। भगवान उनकी सहायता करते हैं। अंत में असुर मारे जाते हैं, देवता विजयी होते हैं। देवासुर संग्राम के अगणित पौराणिक उपाख्यानों की पृष्ठभूमि यही है।

हमारा अंतः प्रदेश ही वह “धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र” है जिसमें महाभारत होता रहता है। असुर मायावी हैं। तमोगुण का असर हमें माया में फँसाये रहता है। इन्द्रिय सुखों का लालच देकर वह अपना जाल फेंकता है और अपने माया पाश में जीव को बाँध लेता है। उस असुर के और भी कितने ही अस्त्र-शस्त्र हैं जिनसे जीव को अपने वशवर्ती करके पददलित करने में वह सफल होता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह छः ऐसे ही सम्मोहन अस्त्र हैं, जिनमें मूर्च्छित होकर जीवन बँध जाता है और वह मूर्छा ऐसी होती है कि उससे निकलने की इच्छा भी नहीं होती है, वरन् उसी स्थिति में पड़े रहने को जी चाहता है।

अर्जुन भीख माँग कर खाने और ऐसे ही किसी तरह जीवन काट लेने को तैयार है। जो दुष्प्रवृत्तियाँ एक ही घर में एक ही कुटुँब में अपने ही शरीर में पैदा हुई तथा पलीपोसी हैं वे उसे स्वजन जैसी लगती है। उन्हें मारने में दुःख लगता है। जो दुर्गुण दुर्भाग्य, दुःस्वप्न, कुविचार और कुसंस्कार अपने मनः क्षेत्र में चिरकाल से साथी बने हुए हैं उन्हें हटाने के लिए जीव की प्रवृत्ति भी नहीं होती। किंतु यह अवसाद आत्मा के लिए अहितकर ही है इसलिए भगवान अपने भक्त के इस अवसाद को हटाने का प्रयत्न करते हैं। अर्जुन को युद्ध में लगना ही पड़ता है।

आत्मा का कल्याण उस तम प्रवृत्ति में पड़े रहने से नहीं हो सकता जिसमें माया मोहित अगणित जीव पाशबद्ध स्थिति में पड़े रहते हैं। इन बंधनों को काटे बिना कल्याण का और कोई मार्ग नहीं। इस तमसाच्छन्न स्थिति को यदि रोका, हटाया या सुधारा न जाय तो उसकी भयंकरता एवं विभीषिका में दिन-दिन वृद्धि ही होती जायेगी और नारकीय यंत्रणाओं एवं यातनाओं के अवसर ही बढ़ते जायेंगे। संसार के अधिकांश प्राणी इसी स्थिति में पड़े-पड़े नाना प्रकार के त्रास सहते रहते हैं। भव-बंधनों में बँधे हुए बिलबिलाते और बिलखते रहते हैं। इस मार्ग से यदि विरत न हुआ जाय तो पाप, पतन एवं पीड़ा के चक्र में गला फँसा कर झूलते रहना पड़ता है।

आत्मा की पुकार ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की है। वह अंधकार से प्रकाश की ओर जाना चाहती है। तम ही अंधकार और सत ही प्रकाश है। यह अंधकार को त्यागने और प्रकाश को धारण करने का प्रयत्न ही ‘साधना’ है। साधना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। तम की दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा केवल इस एक ही उपाय से हो सकता है। सच्ची शाँति और प्रगति का मार्ग भी यही है।

अंतरात्मा में निरंतर चलने वाले देवासुर संग्राम में तामसिकता का पक्ष भौतिक सुख-साधन इकट्ठे करते रहने और सात्विकता का पक्ष आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होने का है। जब दोनों में से कोई एक पक्ष प्रबल हो उठता है तो संग्राम में तेजी दिखाई देने लगती है। यदि असुरता प्रबल हुई तो दुष्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होकर पतन का नारकीय परिपाक सामने आ जाता है और यदि सुरपक्ष प्रबल हुआ तो सत्प्रवृत्तियों का उभार आता है और मनुष्य, सत्पुरुष महामानव, ऋषि एवं देवदूत बनकर पूर्णता के लक्ष को प्राप्त करने के लिए द्रुत गति से आगे बढ़ता है।

एक बीच की स्थिति रजोगुण ही अवसाद भूमिका कहलाती है। इसमें तम और सत दोनों मिले रहते हैं। लड़ाई बंद हो जाती है और काम चलाऊ समझौता-सा करके दैवी और आसुरी तत्व एक ही घर में रहने लगते हैं। भले और बुरे दोनों ही तरफ के काम मनुष्य करता रहता है। पाप के प्रति घृणा न रहने से आत्मिक प्रगति की ओर कोई विशेष उत्साह न रहने से, दिन काटने की वैसी ही स्थिति बन जाती है जैसी मंद विष पीकर मूर्च्छित हुए अर्धमृत प्राणी की होती है। मानव जीवन जैसा अलभ्य अवसर प्राप्त होने पर इस प्रकार का अवसर भी चिंताजनक ही है।

भगवान कृष्ण ने बार-बार उकसा कर अर्जुन को युद्ध के मैदान में खड़ा कर दिया था। गाण्डीव उठाकर शत्रुओं पर सर संधान करने के लिए उसे तत्पर ही होना पड़ा था। हमारा भगवान-अंतरात्मा भी हमसे यही कराना चाहता है। उसकी गीता निरंतर हमारे अंतःकरण में कुरुक्षेत्र में कही जाती रहती है। पर हम उसे सुनते नहीं, मूर्छा छोड़ते नहीं, गाण्डीव को छूते नहीं, हमारा कृष्ण हमें झकझोरते-झकझोरते हार चला, पर हम चेतना शून्य ही बने बैठे हैं।

पुराणों में उस देवासुर संग्राम का वर्णन पग-पग पर किया गया है। प्रत्येक पुराण में किसी न किसी बहाने देवताओं और किन्हीं असुरों की लड़ाई के प्रसंग बार-बार वर्णन किये गये हैं। सच तो यह है कि यह देवासुर संग्राम अनादि काल से चल रहा है और अनंत तक चलता रहेगा। गीता में जिस धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र का वर्णन है और जिस महाभारत में धर्म और अधर्म का पक्ष प्रतिपादन करने वाली कौरव पाण्डव सेनाओं का वर्णन हुआ है वह भी केवल उस शस्त्र युद्ध तक सीमित नहीं है। रीछ-वानर की राम सेना और रावण, कुम्भकरण, मेघनाथ जैसे समर्थ योद्धाओं का युद्ध भी एक प्रकार की हमारी भीतरी स्थिति का ही बाह्य चित्रण है। अध्यात्म रामायण में इसका निरूपण अधिक स्पष्ट रूप से हुआ है। प्रत्येक अवतार पाप को नाष करने और पुण्य की स्थापना के लिए-देवताओं की रक्षा और असुरों के संहार के लिए अवतरित होता है। ऐसा अवतार समय-समय पर हममें से अनेकों के अंतःकरण में अवतरित होते हुए देखा भी जाता है।

प्रत्येक मनुष्य के भीतर पाप और पुण्य के दोनों प्रकार के प्रबल संस्कार मौजूद हैं। दोनों की शक्ति प्रचंड है, दोनों ही उद्भट योद्धाओं के समान हैं। दोनों एक दूसरे से प्रतिकूल प्रकृति के होने से परस्पर लड़ते भी रहते हैं और एक दूसरे को परास्त करने का भी प्रयत्न भी करते हैं। यही देवासुर संग्राम है। हर मनुष्य के भीतर पाप और पतन की असुरता के कुसंस्कार पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। चौरासी लाख निम्न योनियों में लाखों वर्षों तक भ्रमण करने की अवधि में इसने इन्हें जमा किया होता है। पाशविक वृत्तियाँ उन पतित योनियों में उपयुक्त भले ही कही जायँ पर मनुष्य के महान गौरव को देखते हुए वे हेय एवं त्याज्य ही होती हैं। सुरदुर्लभ मानव शरीर में देवत्व की छाया रहती है क्योंकि यह योनि ईश्वर के सबसे निकट है। इस शरीर में आये हुए जीव के लिए ईश्वर तक पहुँचने में छोटी छलाँग लगानी मात्र शेष रह जाती है। इसलिए उसका महत्व एवं उत्तरदायित्व भी अधिक है। देवत्व मनुष्य को अपनी तरह ऊँचा उठाने के लिए खींचता है और असुरता की पाशविक वृत्तियाँ अपनी ओर आकृष्ट किये रहना चाहती हैं। इसी खींचतान में हवा के सहारे उड़ने वाले तिनकों की तरह आमतौर से मनुष्य कभी इधर कभी उधर उड़ते ही रहते हैं। सतत् अवसाद असमंजस का जीवन जीता है। इस अवसाद की स्थिति का अंत करना ही उचित है। देवासुर संग्राम में अपने देवपक्ष को विजयी बनाना ही श्रेयस्कर है। तम को छोड़ें और सत का प्रकाश ग्रहण करें इसी में हमारा हित है। साधना में ही मनुष्य का सच्चा स्वार्थ सन्निहित है।


अंतःचक्षु (Kahani)

बुद्ध को सुनने श्रावस्ती के सभी नर-नारी पहुँचते, किंतु नगर सेठ मृगार कभी नहीं जाता। उसकी पुत्र वधू नित्य बुद्ध के प्रवचन सुनकर आती। और घर का पूरा काम काज भी समय पर कर लेती। एक दिन उसने अपने ससुर को भोजन परोसते समय कहा पिता जी भोजन स्वादिष्ट है? नगर सेठ बोला बहुत स्वादिष्ट है। किंतु यह प्रश्न तूने क्यों पूछा बहु! पुत्र वधू ने कहा-”यों ही पूछ लिया। भोजन बासा था इसलिए।” नगर सेठ बोला “किंतु भोजन तो गरम व ताजा है। बासा कैसे है?” पुत्र वधू ने कहा-”वह तो ठीक है। किंतु आपके यहाँ जो यह धन धान्य मणि-माणिक भरे पड़े हैं वह तो आपके पूर्वजों की कमायी घटाते हैं। आपको तो मैंने कभी कोई पुण्य, परमार्थ पुरुषार्थ करते देखा नहीं इसलिए मैंने बासा कहा है। हो सकता है कभी आपने पिछले जन्मों में पुण्य किये हों जिसके बलबूते आप को बैठे-बैठे यह सब कुछ सुख मिल रहा हो। किंतु आगे के लिए तो मैं आपको कुछ करते नहीं देख रही।”

पुत्र-वधू की बात से नगर सेठ के अंतःचक्षु खुल गए। दूसरे दिन नगर सेठ बुद्ध के प्रवचन में सबसे आगे बैठे और दानदाताओं की सूची में नगर के सब सेठों से ऊपर की पंक्ति में उनका नाम अंकित था।


आत्म देवता की साधना से बनते हैं हम देवमानव

आज संसार में दार्शनिकों की मंडली में से कितने ही ईश्वर प्राप्ति को लक्ष्य मानते और इसके लिए भजन स्तर के कर्मकाण्डों को किसी न किसी रूप में अपनाते रहने की बात कहते हैं। कहने वालों की बातों पर विश्वास करने से पूर्व यह संदेह उठना स्वाभाविक है कि ईश्वर की मनुहार करने और उपचार उपहारों की आवश्यकता आखिर पड़ती क्यों है? और इतने भर से प्रसन्न होकर मनोकामनाओं को पूरा करने लगने की क्षुद्रता पर उतारू हो क्यों जाता है? संदेह काफी वजनदार होते हुए भी कितने ही तथाकथित भक्तजन इसी भ्राँति के इर्द-गिर्द भ्रमण करते रहते हैं। कई आत्म देव की मान्यता वाले व्यक्ति भी इतने भर से अपना समाधान कर लेते हैं और कठोर पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं समझते जिसे तपश्चर्या के नाम से जाना और सच्चाई के अधिक निकट माना जाता है।

आत्मशोधन में अपने आप से संघर्ष करना पड़ता है। कषाय कल्मषों के निवारण में जो कष्ट साध्य होना चाहिए। प्रियजनों का परामर्श भी प्रचलन के अनुरूप ही हो सकता है कि स्वार्थ-सिद्धि के प्रत्यक्ष लाभ से नजर हटा कर और किसी ओर देखना ही नहीं चाहिए। इस दबाव के विरुद्ध भी तनकर खड़ा होना होता है। दुष्प्रवृत्तियों का प्रचलन कितना ही अधिक और आकर्षक क्यों न हो? पर आत्मबल तब साधक को इनके साथ तालमेल बिठाने, अनीति के आगे सिर झुकाने से इनकार ही करता है और ऐसे विरोध में निहित स्वार्थों के आक्रमण आतंक का भी खतरा रहता है। उन सब कष्टों को तल्लीन भाव से सहन करना ही तपस्वी जीवन का स्वरूप हो सकता है। इसकी परिणति तपाये हुए सोने और खरादे हुए हीरे जैसी होती है। महामानवों का इतिहास इसका साक्षी है। इतने पर भी नशेबाजों की तरह अभ्यस्त आदतों से छुटकारा पाना कठिन प्रतीत होता रहता है। आदर्शवाद की दिशा अपनाने के लिए साहस जुट ही नहीं पाता। इस पलायनवादी दृष्टिकोण को जनसाधारण द्वारा अपनाये जाते देखकर यही संदेह होता है कि मनुष्यों को बुद्धिमान प्राणी समझे जाने की मान्यता कहीं किंवदंती या भ्राँत धारणा तो नहीं है।

बुद्धिमत्ता यथार्थता समझने और दूरदर्शी विवेकशीलता से जुड़ी हुई होनी चाहिए। जहाँ वह वस्तुतः होगी वहाँ सद्विचारों को अपनाये जाने, सदाचार पर आरुढ़ होने और सद्व्यवहार के रूप में सेवा साधना के पथ पर अग्रसर होने का प्रमाण मिलना चाहिए। धर्म धारणा में एक ही प्रमाण पाया जाता है कि मनुष्य अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति उदार बने। अपने को तपाये, गलाये और देवमानवों के अनुरूप दृष्टिकोण और क्रिया−कलाप का उपक्रम बना हुआ दृष्टिगोचर होना चाहिए। यदि वैसा कुछ न बन पड़े तो समझना चाहिए कि लोभ-मोह के भव-बंधनों की हथकड़ी बेड़ी जान-बूझकर पहन ली गई है।

परमेश्वर का वरिष्ठ राजकुमार अपने पिता के आदर्शों अनुशासनों का निर्वाह करते हुए दीख पड़ना चाहिए। उसे सूर्य चंद्र की तरह असंख्य को प्रकाश प्रेरणा देते रहने में सतत् निरत रहना चाहिए उसकी आग और ऊर्जा से सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनने में योगदान मिलना चाहिए। इसी भावना, मान्यता, विचारणा और क्रियापद्धति के अपनाने में उसका आत्मगौरव है। उसकी ओर से मुँह मोड़ने पर तो यही कहा जायगा कि सिंह शावक ने भेड़ों के झुँड का अपने को सदस्य मान लिया है और उन्हीं की तरह मिमियाना सीख लिया है। जब आत्म स्वरूप का बोध हो और दिशाधारा में कायाकल्प जैसा परिवर्तन प्रस्तुत हो, तभी समझना चाहिए कि मनुष्य को बुद्धिमान समझे जाने की बात अपने सही स्वरूप में उभर रही है।

सामान्य जन तो किसी प्रकार पेट भरने और औलाद पैदा करने के में ही जिंदगी गुजार देते हैं, पर चतुर और प्रतिभावानों में से भी अधिकांश लोग दौलत बटोरने और जिस−तिस पर रौब गाँठने में ही अपनी क्षमता गँवा देते हैं। इस सब में उन्हें किसी परमार्थी देवमानव की तुलना में कम पराक्रम नहीं करना पड़ता, फिर भी क्षणिक ललक लिप्सा का कौतुक देखने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

इसके विपरीत प्रतिभाशालियों का दूसरा वर्ग आत्म परिष्कार और लोक मंगल को अपना लक्ष्य चुनता है। इसमें भी परिश्रम उतना ही लगता है जितना कि लालची लाभ उठाते और बदले में आत्म प्रताड़ना, लोक भर्त्सना और ईश्वर की नाराजी ही सहन करते हैं। पर जिनने उत्कृष्ट आदर्शवादिता को अपनाया और पुण्य प्रयोजन में क्षमताओं को नियोजित किये रहने का निश्चय किया, वे अपेक्षाकृत अधिक नफे में रहते हैं। उन्हें श्रेष्ठता के साथ जुड़ी हुई उस महानता का रसास्वादन करने को मिलता रहता है जिसको स्वर्ग प्राप्ति के रूप में बहुधा निरूपित किया जाता है। ऐसे लोग अपनी यशगाथा अनुकरणीय और अभिनंदनीय रूप से सर्वसाधारण के सम्मुख प्रकाश भरी प्रेरणा छोड़ जाते हैं। ऐसों को ही अमृतपायी या अजर-अमर कहा जाता है। उपरोक्त तीनों परिस्थितियों में कौन किसका वरण करे, यह उनकी अपनी अभिरुचि व सुसंस्कारिता पर ही पूर्णतया निर्भर है।


राष्ट्र का प्रहरी होता है, साहित्यकार

सम्राट विक्रमादित्य राज कवि का चुनाव करेंगे। यह खबर समूचे देश में फैल गई जिसने जहाँ सुना उसी के मन में आशा की तरंगें हिलोरें लेने लगीं। एक से एक जाने माने प्रतिष्ठित कवि उज्जयिनी पहुँचने लगे। सभी के स्वागत और निवास का अच्छा प्रबंध था। आकर सभी कवि गण अपने-अपने लिए नियत आवासों में ठहरने लगे। नगर कवियों के कोलाहल से इस तरह भर गया मानों साँझ के समय पखेरू अपने-अपने कोटरों में तरह-तरह की ध्वनि से चहचहाट कर रहें हों।

दूसरे दिन कवि दरबार का आयोजन हुआ। सरस्वती के एक से एक बाँके पुत्र समूची साज-सज्जा के साथ मंच पर आ विराजे। उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो वे कविता पाठ के लिए नहीं अपना विवाह रचाने आए हों। कवियों की बाँकी सज-धज और परस्पर रसीली वार्ताएँ देखते और सुनते ही बनती थीं।

महामंत्री बैताल भट्ट ने सभा के प्रयोजन की घोषणा की-कलामंच प्रजा के मन को व्यवस्थित और अनुशासित रखने वाला उन्हें प्रेरणाएँ और प्रकाश देने वाला सबसे श्रेष्ठ साधन है। महाराज चाहते हैं कि उस मंच को चलाने, नियंत्रित और संगठित करने वाला कोई उस विद्या का ज्ञाता ही हो। इसी मकसद को ध्यान में रखकर यह काव्य समारोह आयोजित किया गया है। ‘राजकवि’ की पदवी किसे दी जाय, इसका निर्णय महाराज स्वयं करेंगे।

इसी घोषणा के साथ ही प्रारंभ हुआ कवि सम्मेलन। एक-एक कवि मंच पर आते और अपनी कविता का पाठ कर उपस्थित प्रजाजनों पर अपनी विद्वता की छाप डालने की कोशिश करते। लेकिन उज्जयिनी के नागरिक ऐसे बुद्ध नहीं थे जो हर कवि की विचारधारा से प्रभावित हो जाते।

नायिका भेद, विप्रलंभ, विरह गीत, अभिसार कथाओं के ऐसे-ऐसे रंगीन गीत कवियों ने एक से एक बढ़-चढ़ कर सुनाए। इन्हें सुनकर ऐसा लगा जैसे कवि दरबार में श्रृंगार रस मूर्तिमान हो उठा हो। एक कवि आए और अपनी कविता में सारी शक्ति नारी के नख-सिख वर्णन में लगाकर चले आए। दूसरे ने आकर स्त्री के अंगों एवं कामचेष्टाओं भंगिमाओं का ऐसा सुरम्य किंतु स्पष्ट वर्णन किया मानो वे एक-एक कील को जोड़कर आभूषण बनाने वाले सुवर्णकार रहे हों। किसी कवि ने नारी के परिधानों को उपमाओं और अलंकारों से सजा डाला तो किसी ने उसे साक्षात रति के रूप में ही गढ़ डाला। श्रृंगारवादी कवियों की बाढ़ को देखकर सम्राट विक्रमादित्य को ऐसा लगा जैसे कला तो मर गई और ये सभी उसका मुर्दा ढो रहे हैं? फिर भी वह कुछ बोले नहीं।

तभी आया एक युवक कलाकार। उसने सफेद धोती और कुर्ता पहन रखा था कंधों पर उत्तरीय था। सफेद परिधान में उसे देखकर ऐसा लगा जैसे उपस्थित कवियों के निकम्मेपन को देखकर सरस्वती ने अपना पुत्र भेज दिया हो। उसके रंगमंच पर पहुँचते ही कविगण एक साथ चिहुंक उठे। कल का छोकरा क्या जाने काव्य किसे कहते हैं? किंतु उसके उदात्त स्वर और आदर्शवादी काव्य प्रेरणाओं ने एक बार फिर से महाराज को आश्वस्त कर दिया कि कला के सच्चे उपासक निताँत समाप्त नहीं हुए भले ही चारणों की वंश वृद्धि कितनी ही क्यों न हो गई हो।

इतने पर भी राज कवि का चुनाव नहीं हो पाया। कवि मंडली अपने-अपने आवासों में चली गई। उनके लिए उत्तम स्वादयुक्त भोजन मदिरा और न जाने क्या-क्या बहुमूल्य राज भोग उपस्थित थे। वे सभी उन पर टूट पड़े और सुरा सुन्दरी के ताप से झुलस-झुलस कर थोड़ी ही देर में ढेर हो गए। इतने पर भी एक कवि इन सभी भोगों से सर्वथा अपरिचित अपने कक्ष में दीवट जलाए बैठा था। उसे पता ही न चला कब अर्धरात्रि आ पहुँची। प्रहरी ने टोका-”आर्य! आपको विश्राम करना चाहिए।” युवक ने प्रहरी की ओर देखा और कहा “तात! तुम क्यों नहीं सो रहे हो?” “इसलिए कि” प्रहरी ने उत्तर दिया “कहीं ऐसा न हो कि शत्रु अचानक हमला कर दे और राष्ट्र पराधीन हो जाए।”

“मैं भी प्रहरी हूँ तात! राष्ट्र के जन-मन का प्रहरी।” युवा कवि ने प्रहरी को आश्चर्यचकित करते हुए उत्तर दिया। “प्रजा के जीवन को, उनके चिंतन को दुष्प्रवृत्तियाँ आक्राँत न कर दें, इसीलिए मैं भी सन्नद्ध रहता हूँ।” प्रहरी कोई उत्तर दे इससे पूर्व ही पीछे खड़े सम्राट ने आगे बढ़कर उसे बाहों में भर लिया। उन्होंने भाव-विभोर होते हुए कहा-”तात! मुझे जिसकी तलाश थी, वह मिल गया। आज से तुम मेरे राजकवि हो राजकवि तुलसीदास।”


जगज्जननी-आद्यशक्ति-सजलश्रद्धा को समर्पण

किसी भावप्रवण कवि ने मातृ सत्ता के प्रति अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है-

देवि! तू ही है परम पुरुष या, अतुल, अगम्य, वीर्य पुरुषार्थ। शक्ति रूप है, शक्तिमान या, प्रेय स्वार्थ या तू परमार्थ?॥

जो भी तू है पर या अपरा, यह तू है या वह अभिराम। तुझ को तेरे शिशु अबोध का, देवि! देवि! शतकोटि प्रणाम॥

वस्तुतः शक्ति के रूप में भगवत् सत्ता की आराधना अनादिकाल से होती आयी है तथा ‘वेदोक्ततस्मिह्न तस्थुभुर्वनानि विष्वा’ के माध्यम से इसी आद्यशक्ति की इस संसार का आधार होने की बात बारंबार दुहराई जाती रही है।

ऋग्वेद में मंत्र दृष्टा ऋषि से बारंबार पूछा जाता है-’कस्मै देवाय हविषा विधेम?’ तो ऋषि उत्तर देते हैं-’हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे, भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवी द्यामुते माँ कस्मै देवाय हविषाविधेम्॥’ अर्थात् आरंभ में प्रजापति हुए जो समस्त भूतों के पूर्वज एवं स्वामी थे। वे अपनी शक्ति से पृथ्वी और आकाश को धारण करते हैं हमें चाहिए कि उन्हीं की स्तुति और पूजा करें। इन्हीं देवाधिदेव को ऋग्वेद में कहीं ‘द्यौ’-पिता कहा गया है तथा कहीं मातृ रूप में ‘अदिति’ कहा गया है। यही उल्लेख करते हुए ऋग्वेद (2-6-17) में तथा स्वर्ग और भूलोक के बीच का जो द्युलोक (अंतरिक्ष) है, वहाँ भी विद्यमान है। वह समस्त देवताओं की जननी है और चराचर भूतों को रचने वाली है। सबकी पिता एवं रक्षक भी वही है। वह स्रष्टा और सृष्टि दोनों ही है। अपने उपासकों की आत्माओं को वह अनुकंपा द्वारा पापों से मुक्त कर देती हैं। वह अपनी संतान को देने लायक सब कुछ दे डालती है। वह सभी देवताओं और दिव्य आत्माओं के विग्रह में निवास करती हैं। भूत एवं भव्य सब कुछ उसी का रूप है। वही सब कुछ है।’

ईश्वर की-आद्यशक्ति के रूप में व्याख्या केवल वैदिक संस्कृति की विशेषता है एवं यही कारण है कि हमारे यहाँ मातृसत्ता को ईश्वर समान माना गया है। जब हमें इस बात की अनुभूति होने लगती है कि प्रकृति अथवा ईश्वर का नारी रूप ईश्वर के व्यक्त स्वरूप का ही एक अंश है और विराट पुरुष अथवा परमात्मा के पुरुष रूप से सर्वथा अभिन्न है, तब यह बात हमारी समझ में आ जाएगी कि ईश्वर इस जगत की रचना अपने अंतस् से करता रहता है। संसार के सभी पदार्थ और शक्तियाँ उसके विराट शरीर में ही विद्यमान रहती हैं, बाह्य उपादानों की उसे आवश्यकता नहीं पड़ती।

‘हे शिवे! तुम्हीं परब्रह्म परमात्मा की परा प्रकृति हो और तुम्हीं से सारे जगत की उत्पत्ति हुई है, तुम्हीं विश्व की जननी हो।’ इस शास्त्र वर्णन द्वारा उस शक्ति की महिमा का हम गान करते हैं जो हम सबकी उत्पत्ति व पोषण का मूलकारण है। जगदंबा की यही शक्ति सारी सृष्टि को विकास के पूर्व अपने उदर में रखती है। वही ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर की जननी है, वही समस्त क्रियाओं का मूल है। वही आदि शक्ति जगदंबा ऋग्वेद के दशम मंडल के 125 वें सूक्त में कहती है-’मुझ पर किसी का प्रभुत्व नहीं। मैं पृथ्वी और आकाश से परे हूँ। अखिल विश्व मेरी विभूति है। मैं अपनी शक्ति से यह सब कुछ हूँ।’ यही जगज्जननी जिस के अंदर हम जीवन धारण करते हैं, चलते फिरते हैं और अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं, हम सबकी आराध्य है।’

परम वंदनीय माता जी की स्मृति में यह विशेषांक लिखते हुए सतत् इस आद्यशक्ति का स्मरण आता है व लगता है कि शक्ति का लीला संदोह कितना अद्भुत है जो दृश्य रूप में तो समझ में नहीं आता, अनुभूति उसकी सतत् होती है, किंतु अब स्थूल में न दीख पड़ने पर भी वह और भी व्यापक विस्तार में अपना कार्य करती जब सूक्ष्म दृगों से नजर आती हैं तब ज्ञात होता है हम किस महान शक्ति स्रोत से जुड़े थे व अब भी जुड़े रहकर सतत् पाने के अधिकारी हैं यदि उसकी महत्ता व निजी गरिमा को समझ सकें। परम पूज्य गुरुदेव ने स्थान-स्थान पर शक्ति की आराधना की बात लिखी है व गायत्री महाविद्या द्वारा अशक्ति से मुक्ति, अविद्या से मुक्ति, अभावों से मुक्ति का जो वर्णन किया है उसका उनने देवीभागवत व बाद में ‘कुँडलिनी महाशक्ति व उसकी संसिद्धि’ प्रकरण में बड़ी विस्तृत व्याख्या की है। वस्तुतः शक्ति एक ही है। साकार भाव को प्राप्त परब्रह्म की ही मूर्ति देवी भाव में स्थित होकर सीता, राधा, सरस्वती, लक्ष्मी, महेश्वरी आदि विविध रूपों में विभिन्न उपासकों के द्वारा आराधित होती हैं। रामकृष्ण परमहंस ने उसी को काली के रूप में पूजा था व उसी के दर्शन अपने प्रिय शिष्य नरेन्द्रनाथ दत्त को कराकर साक्षात आद्यशक्ति के दर्शन कराये थे। श्री अरविंद ने महत्चेतना के रूप में सुपर चेतन जगत में विद्यमान सत्ता से अवतरित हो रही सावित्री महाशक्ति के रूप में उसी आद्यशक्ति की व्याख्या की एवं श्री माँ के माध्यम से उसका बहिरंग जगत को अवलोकन कराया। परम पूज्य गुरुदेव शाक्तमत के प्रचारक थे या किसी और सिद्धाँत के, इस विवाद में न पड़ कर हम यही विचार करें कि उन्होंने हमारे समक्ष आद्यशक्ति का मातृस्वरूपा एक जाज्वल्यमान रूप रखा जो स्नेह, ममत्व, करुणा, पोषण लालन-पालन, सुधार-दुलार सभी का समन्वित रूप बन माता भगवती देवी के रूप में हम सबके बीच में आयीं। गायत्री महाशक्ति एक मंत्र छंद के रूप में वेदों में विद्यमान हैं, यदि मानें तो उनमें किन गुणों को देखें, यह उनने परम वंदनीय माताजी के रूप में साक्षात् प्रतिबिंबित कर दिखाया।

सभी जानते हैं कि शक्ति के दो परस्पर विरोधी रूप होते हैं। एक रूप ‘विद्या’ का जो ईश्वरोन्मुख स्वरूप होता है, जिसे संस्कृत में ‘विद्या’ कहते हैं तथा दूसरा संसार प्रधान जिसे संस्कृत में ‘अविद्या’ कहते हैं। पहली मोक्ष और आनंद देने वाली है और दूसरी बंधन और दुःख का कारण है। दूसरी का आवरण पहली पर चढ़ा रहता है। उसे हटाकर ही शक्ति के वास्तविक स्वरूप को देखा जा सकता है। जगज्जननी के उपासक यही कहते हैं कि ‘हे देवि! हम तुम्हारी अविद्या शक्ति से मोहित होकर तुम्हें भूल जाते हैं और संसार के तुच्छ पदार्थों में सुख का अनुभव करने लगते हैं। परंतु जब हम तुम्हारी पूजा करते हैं, तुम्हारे प्रति अपनी श्रद्धा आरोपित करते हैं तुम्हारी शरण आ जाते हैं तब तुम हमें अज्ञान से एवं संसार की आसक्ति से मुक्त कर देती हो और अपने विराट परिवार के बच्चों को सुख-शांति प्रदान करती हो।’

विद्या और अविद्या शक्ति के इन दो आयामों को समझ कर बहिरंग ‘अविद्या’ वाले स्वरूप से नहीं, विद्या वाले स्वरूप को भली भाँति समझ कर यदि शक्ति को समर्पण किया जाय तो वह सब मिल सकता है जो पाषाण की मूर्ति में विद्यमान महाकाली से परमहंस को मिला। वास्तविकता यही है कि मातृशक्ति रूपी देवी सत्ता के प्रति श्रद्धा जिसकी जिस परिमाण में हुई उसे उसी अनुपात में मिलता चला गया परम पूज्य गुरुदेव ने अगस्त 19779 के अपने ‘प्रज्ञावतार अंक’ में स्पष्ट लिखा है कि ‘युगशक्ति का अवतरण श्रद्धा और विवेक के संगम के रूप में होने जा रहा है। अगले दिनों मनुष्य की सबसे बड़ी संपदा एवं उपलब्धि ऋतंभरा प्रज्ञा मानी जाएगी। ऋतंभरा वह जिसमें विवेक और श्रद्धा का समुचित समावेश हो।’ इसमें ‘श्रद्धा’ की परिभाषा करते हुए उनने कहा है कि ‘श्रद्धा उस आस्था का नाम है जो उत्कृष्ट आदर्शवादिता को अत्यधिक प्यार करे और उस स्तर के चिंतन तथा कर्तृत्व से भाव भरे रसास्वादन का आनंद प्रदान करे।’ विवेक और श्रद्धा का जहाँ जितना सम्मिश्रण होता है, वहाँ उतनी ही महानता दृष्टिगोचर होती है। उसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्मे, पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्व निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाते चले जाते हैं।

परम पूज्य गुरुदेव ‘प्रखरप्रज्ञा’ के, विवेक के, बुद्धि के उत्कृष्टतम स्तर के प्रतीक के रूप में, अवतारी सत्ता के रूप में, हम सबके बीच में आए। परमवंदनीय माताजी ‘सजलश्रद्धा’ के रूप में, शक्ति के स्वरूप में हम सबके बीच उनकी पूरक सत्ता के रूप में आयीं। दोनों के सम्मिलित पुरुषार्थ से प्रज्ञावतार की युगाँतरीय चेतना ने जन्म लिया तथा सर्वप्रथम सुसंस्कारिता के जागरण, तत्पश्चात् संकल्पशक्ति व साधना समर्पण के माध्यम से देव संस्कृति विस्तार की प्रक्रिया के निमित्त गीता के अठारह अध्याय की तरह अठारह दिग्विजयी पुरुषार्थ अश्वमेधों के रूप में दो वर्ष की अवधि में संपन्न हो गए। यही शक्ति का प्राकट्य है जो पहले स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ता, फिर अपनी शक्ति का झंझावाती आभास देकर सूक्ष्म में विलीन हो और प्रखर-शक्तिशाली रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है।

परमवंदनीय माताजी के प्रति पूज्यवर के जो विचार थे, वे स्थान-स्थान पर इस विशेषांक में परिजन पढ़ेंगे किंतु सबसे बड़ी उपमा जो उन जैसी महाकाल की सत्ता ने उन्हें सतत् दी है वह है ‘सजलश्रद्धा’ रूपी शक्ति की, जिनसे उन्हें युग परिवर्तन का कार्य कर सकने की ऊर्जा मिली। यह कृतज्ञता ज्ञापन मात्र नहीं, संक्षिप्त परिचय है उस आद्यशक्ति का जो हम सबके बीच आयीं, सीमित अवधि की सामान्य-सी दीखने वाली असामान्य जीवनचर्या को जीती हुई देखते-देखते हमारे बीच से ओझल हो गयीं। यदि हम उनके सही रूप को समझ पाये तो महाकाल के सहचर महाकाली के रूप में उन्हें समझना होगा। एक ही पुरुष महाकाल पुरुष की दस शक्तियों में सर्व प्रसिद्ध प्रथम स्थान पर महाकाली का नाम है। अर्धनारीश्वर की उपासना का मौलिक रहस्य इसी तत्वज्ञान में छिपा है कि हम उन्हें एक दूसरे का पूरक मानें तथा ‘सा च ब्रह्म स्वरूपा च नित्या सा च सनातनी’ के मर्म को समझते हुए अपनी श्रद्धा अपना हृदय से समर्पण उसके प्रति अभिव्यक्त कर उससे एक ही प्रार्थना करें कि माँ! विद्या की ओर सद्बुद्धि की ओर ले चल। हमारी तेरे प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि यही हो कि हम अधिकाधिक को तेरे सच्चे स्वरूप का भान कराकर सुपथ पर चलने को प्रेरित करें। इसी भावना के साथ यह अंक मात्र मातृसत्ता के युगल चरणों में समर्पित है।


शिव और शक्ति के समन्वय का अद्भुत वह लीला संदोह

माता जी भगवान के वरदान की तरह हमारे जीवन में आयीं। उनके बगैर मिशन के उदय और विस्तार की कल्पना करना तक कठिन था। गुरुदेव की इन बातों से माताजी के प्रति उनके दृष्टिकोण का सहज अहसास हो जाता है। पर यह वरदान उनके जीवन में न अचानक आया और न अकस्मात उतरा। इसकी उन्हें वर्षों पूर्व जानकारी थी। उनकी मार्गदर्शक सत्ता ने अपने प्रथम दर्शन के दिन ही इसका संकेत करते हुए कहा था-’तुम्हारे विवाहित होने से मैं प्रसन्न हूँ। इसमें बीच में व्यवधान तो आएगा, पर पुनः पूर्व जन्मों में तुम्हारे साथ रही सहयोगिनी पत्नी के रूप में मिलेगी, जो आजीवन तुम्हारे साथ रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। पिछले दो जन्मों में तुम्हें सपत्नीक रहना पड़ा है। यह मत सोचना कि इससे कार्य में बाधा पड़ेगी। वस्तुतः इससे आज की परिस्थितियों में सुविधा ही रहेगी एवं युग परिवर्तन के प्रयोजन में भी सहायता मिलेगी।’ (हमारी वसीयत और विरासत से)

भगवान की कृपा और भगवान का विधान एक ही है। इस सत्य को कम लोग अनुभव कर पाते हैं। यह अनुभूति कड़वी-मीठी कैसी भी हो, पर होती औषधि की तरह गुणकारक ही गुरुदेव की प्रथम पत्नी का देहावसान भगवान के अकाट्य विधान की तरह उनके जीवन में घटित हुआ। लगभग इसी समय उनके पुराने सहयोगी मिशन के नैष्ठिक कार्यकर्ता बद्रीप्रसाद पहाड़िया की धर्म पत्नी का भी निधन हुआ था। उन्होंने इसकी सूचना पत्र द्वारा पूज्यवर को दी। जिसका जवाब देते हुए उन्होंने लिखा “पत्र में तुम्हारी पत्नी के निधन के बारे में पढ़कर दुःख हुआ। इसे नियति का खेल समझ कर सहन कर जाओ। मेरी पत्नी की मृत्यु भी इन्हीं दिनों हुई है। वर्तमान में हम दोनों को एक सा दुःख झेलना पड़ रहा है। आगे मैं तो दूसरी शादी करूंगा क्योंकि इसका संबंध मिशन के भविष्य से है। फिर मार्गदर्शक का आदेश भी कुछ ऐसा ही है पर तुम शादी मत करना।

अपनी गुरुसत्ता के आदेश को शिरोधार्य करते हुए वह माताजी के साथ दाँपत्य सूत्र में बँधे। उन दिनों वह व्यस्तताओं और विवशताओं से घिरे थे। स्वतंत्रता आँदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण स्वजनों का भरपूर विरोध था। चौबीस पुरश्चरणों की उग्र तपश्चर्या को कुछ लोगों ने पागलपन की सनक करार दे दिया था। भावनात्मक आघातों का सिलसिला जारी था। जरूरत थी टूटी-कुचली भावनाओं को फिर से पोषण देने की। माताजी ने अपने आगमन के साथ ही इस काम को बखूबी सँभाल लिया। इस तथ्य को गुरुदेव के शब्दों में कहें तो-’उन्होंने अपने आने के पहले दिन से ही स्वयं को तिल-तिल गलाने का व्रत ले लिया। विरोध का तत्व तो उनमें जैसे था ही नहीं यदि वह चाहतीं तो साधारण स्त्रियों की तरह मुझ पर रोज नयी फरमाइशों के दबाव डाल सकती थीं। ऐसे में न तपश्चर्या बनती, न लोक सेवा के अवसर हाथ लगते। फिर जो कुछ आज तक हो सका उसका कहीं नामोनिशान न होता।

माताजी के आने के बाद गुरुदेव के जीवनक्रम में एक नया निखार आया। अखण्ड ज्योति का प्रकाशन पहले से ही चल रहा था। पर अभी तक यह एक पत्रिका का प्रकाशन भर था। सामान्यक्रम में पत्रिका और पाठक के रिश्ते पढ़ने-पढ़ाने तक सीमित रहते हैं। माताजी की उपस्थिति के साथ ही अखण्ड-ज्योति पत्रिका ने ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ का रूप ले लिया। पत्रिका को पढ़ने वाले उनके अपने आत्मीय हो गए। इस क्रम में लोगों का घर आने-जाने, ठहरने, खाने-पीने का सिलसिला चल पड़ा। आने वाले किसी व्यक्ति को उन्होंने स्नेह और ममत्व की कमी न महसूस न होने दी।

उन दिनों अखंड-ज्योति पत्रिका से जुड़े एक परिजन ने अपनी यादों की पुलकन उड़ेलते हुए बताया-अहा! वे भी क्या दिन थे। मैंने अखण्ड-ज्योति नयी-नयी पढ़ी थी। एक दो महीने पत्रिका पढ़ने के बाद मन में विचार आया कि लिखने वाला तो बड़े कमाल का आदमी है, उससे मिलना चाहिए। बस फिर क्या मथुरा के लिए रवाना हो गया। मथुरा पहुँचते-पहुँचते ग्यारह बज गए। जैसे-तैसे घर ढूँढ़ा। दरवाजा खटकाते हुए मन बहुत हिचका, इतनी रात गए अजनबी आदमी का दरवाजा कैसे खुलवाए। लेकिन कोई दूसरा उपाय भी नहीं था। मथुरा में किसी और को जानता भी नहीं था। हिम्मत करके कुण्डी खटखटाई। माताजी ने दरवाजा खोला। पूछने पर पता चला-गुरुदेव कहीं बाहर गए हुए हैं। उन्होंने बहुत मना करने पर भी रात बारह साढ़े बारह बजे के लगभग पराठा-सब्जी बनाकर खिलाई। खाने के बाद एक गिलास दूध पीने को मिला। सारी रात उनके ममत्व की छाँव में कटी। सुबह उठकर जब जाने लगा तब अनुभव हुआ कि शरीर से तो जा रहा हूँ, पर मन माँ के पास ही छूट रहा है।

यह अनुभूति किसी एक की नहीं, वरन् उन सैकड़ों-हजारों की है, जो उनके स्नेह ममत्व से पोषित हुए। इन्हीं ममता के धागों से मिशन का विस्तार बुना गया। तभी तो गुरुजी ने एक स्थान पर लिखा है-’मिशन को बढ़ाने में माताजी ने हमारे बांए या दांए हाथ की तरह नहीं, हृदय की भूमिका निभाई है। उन्हीं की भावनाओं के संचार से मिशन पलता और बढ़ता रहा है। औरों की तरह हम भी उनका प्यार-दुलार पाकर धन्य हुए हैं। अन्यथा इतने आघातों के चलते कौन जाने हम कब टूट-बिखर कर चकनाचूर हो गये होते।’ एक अन्य स्थान पर वह कहते हैं-’वह भावमयी हैं, प्यार तो जैसे उनके रोम-रोम में बसता है। उन्हें हमारी तरह बातें-बनाना तो नहीं आता, पर ममत्व लुटाने में वह हमसे बहुत आगे हैं। भले हमारी तरह वह बौद्धिक चातुर्य की धनी न हों, किंतु ममता की पूँजी उनके पास हमसे कई गुना अधिक है। इसी कारण हम उन्हें सजलश्रद्धा कहते हैं। मिशन के प्रत्येक परिजन ने उन्हें इसी रूप में अनुभव किया है।’

इसी विश्वास के सहारे गुरुदेव ने सन् 1950 एवं 1961 में लंबे समय तक हिमालय में अज्ञातवास किया। उन्हें यह भरोसा था कि उनके चले जाने पर माताजी मिशन की साज-सँभाल कर लेंगी। किसी को उनका अभाव न खटकेगा। हुआ भी यही। परिजनों से मिलना, पत्रों के जवाब लिखना, लिखवाना, पत्रिकाओं को संपादित, प्रकाशित करना, इन सारे कामों को वह अकेले सँभालती रही। गुरुदेव के वापस लौटने पर सब कुछ पहले से अधिक अच्छा मिला। परिजन माताजी का गुणगान करते थकते न थे। कुछ ने तो यहाँ तक कह डाला-’गुरुदेव तो मध्याह्न के प्रचंड सूर्य हैं, उनकी ओर तो आँखें उठाकर देख पाना भी संभव नहीं है। माता जी चंद्रमा की तरह शीतल हैं। भले वह सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करती हों, पर उसकी सारी गर्मी अपने अंदर पचाकर हम बच्चों को शीतल प्रकाश देती रहती हैं।’

इन सब बातों को सुनकर वह और प्रसन्न हुए। समय बीतता गया। इतने में हिमालय की ऋषि सत्ता ने अपना तीसरा बुलावा भेज दिया। इस बार तो वापस लौटने के आसार नजर न आ रहे थे माताजी को मथुरा स्थाई रूप से छोड़कर शाँतिकुँज में रहना था। उस समय शाँतिकुँज का इलाका निरा जंगल था। चलो शहर छोड़कर जंगल में बसने की बात सोची जा सकती थी पर बच्चों का मोह छोड़ पाना किसी माँ के लिए कितना कठिन होता है, इसे तो माँ का मातृत्व ही समझ सकता है।

इस विकट स्थिति को गुरुदेव के शब्दों में कहें तो-’यह माताजी की अग्नि परीक्षा थी। बेटी शैल की शादी हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे। मृत्युँजय के विवाह को भी अधिक समय न गुजरा था। उनके सभी सगे संबंधी भी मथुरा के आस-पास ही रहते हैं। वह इन सभी का, बेटे, बेटी, बहू का मोह इतनी आसानी से छोड़कर हरिद्वार के जंगल में बसने के लिए तैयार हो जायेंगी, इसका मुझे भी विश्वास न था। मैंने अपने मन के असमंजस को छुपाते हुए उनसे जब शाँतिकुँज में तप साधना की बात कही, तो वह बिना एक पल की देर लगाए तुरंत तैयार हो गईं। हमें भी उनके इस साहस भरे समर्पण को देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई।’

बात शाँतिकुँज में रहने तक सीमित न थी। इसके साथ अनेकों जिम्मेदारियाँ थीं। इसमें कठोर साधनात्मक प्रक्रियाएँ भी शामिल थीं। जिसे निभालेना सरल न था। पर वह तो जैसे कठिन कार्य के लिए ही जन्मी थीं। गुरुदेव इसे बड़ी मार्मिक भाषा में अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं-’कार्य विभाजन में दूसरी जिम्मेदारी माताजी के ऊपर डाली गई है। यों वे रिश्ते में हमारी धर्म पत्नी लगती हैं, पर वस्तुतः वे अन्य सभी की तरह हमें भी माता की भाँति दुलारती रही हैं। उनमें मातृत्व की इतनी उदात्त गरिमा भरी पड़ी है कि अपने वर्तमान परिवार को भरपूर स्नेह दे सकें। हमारा अभाव किसी आत्मीय जन को खटकने न पाए, स्नेह के अभाव में कोई पौधा कुम्हलाने न पाए, यह भार उन्हीं के कंधों पर डाल दिया गया है।’

‘हमारे जाने के बाद वे हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच सात ऋषियों की तपस्थली जहाँ गंगा की सात धाराएँ प्रवाहित हुई हैं, अपने छोटे से ‘शांतिकुंज’ नामक आश्रम में निवास करेंगी। जिस प्रकार हमने 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण संपन्न किए थे उसी प्रकार वे भी करेंगी। अखण्ड घृत दीप मथुरा से उन्हीं के पास चला जाएगा। अपनी तपश्चर्या की उपलब्धियों से वे लोगों के उस दुःख कष्ट निवारण के क्रम को जारी रखेंगी, जिसे हम जीवन भर निबाहते रहे हैं। हमारे चले जाने पर कोई अपने को असहाय न समझे। अपने बाल-परिवार की साज-सँभाल करने के लिए हम माताजी को छोड़े जाते हैं। वे अपनी तपश्चर्या इसी प्रयोजन में लगाती, खर्च करती हमारी परंपरा को जीवित रखेंगी। (1) नव निर्माण अभियान का प्रत्यक्षतः मार्गदर्शन (2) हमारी बौद्धिक एवं सर्वसाधारण को अवगत कराते रहने का माध्यम (3) अखण्ड दीपक एवं गायत्री पुरश्चरणश्रृंखला को गतिशील रखकर कष्ट पीड़ितों की सहायता-यह तीन काम माताजी के जिम्मे हैं।’

माताजी ने यह जिम्मेदारी किस तरह निभाई, यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है। इस दायित्व को स्वीकारने निभाने का क्रम गुरुदेव के हिमालय से वापस लौट आने के बाद भी चला व 1990 तक चलता चला गया। यह सारा लीला संदोह शिव-शक्ति के समन्वय का हर अवतारी सत्ता के साथ भी यही सब हुआ, यही सब सोच समझकर हम सतत् पुलकन अनुभव करें, अपने को उनके बताये मार्ग पर चलाकर स्वयं श्रेय-सौभाग्य पर संतोष रखें, यही हमारी सच्ची श्रद्धाँजलि है।


इस विराट गायत्री परिवार का पौधा रोपा गया था,गृहस्थी रूपी तपोवन में।

अगर आपस की समझदारी हो तो घर-परिवार का हर दिन खुशियों का त्योहार बन जाता है। माताजी का सारा जीवन इसी समझदारी को अपनाने-सिखाने में बीतता रहा। पूज्य गुरुदेव के साथ दाँपत्य सूत्र में बँधते ही वह एक बड़े परिवार में आ गईं। घर मैं गुरुदेव के तीन बड़े भाई-भाइयों की पत्नियाँ और बच्चों का समूह, कुल मिलाकर बड़ा कुटुँब था। इतने बड़े परिवार का संचालन सूत्र गुरुदेव की माँ के हाथों में था। जिन्हें सब ‘ताई जी’ कहते थे। उनका ऊँचा कद, गौर वर्ण, तेज आवाज, और विशाल-पुष्ट शरीर स्वयं अपनी शान और दबाव रखता। देखते ही सब प्रभावित हो जाते। अंतःकरण से अतीव कोमल होते हुए भी ताई जी स्वभाव से प्रशासक थीं। समूची जमींदारी के क्रिया−कलाप उन्हीं के मार्गदर्शन में चलते थे। लड़कों, बहुओं और परिवार के सदस्यों पर उनका रोब था।

इस घर का पहला दिन, उनके लिए बड़े परिवर्तन का दिन था। मायके की परिस्थितियाँ ससुराल से बिलकुल अलग थीं। माँ का साया बचपन में ही उठ जाने के कारण पिता जसवंत राय ने बड़े लाड़-दुलार से उन्हें पाला था। घर में छोटी होने की वजह से भाई-बहनों की प्रीति-वर्षा कुछ काम न थी। ससुराल में जाकर किसके साथ कैसा व्यवहार करना है? परिवार में कौन समस्या कब उठ खड़ी हो, उसके कब किस तरह से क्या समाधान खोजने हैं? आदि शिक्षाएं उन्हें न मिल पायीं थीं। माँ के अभाव में इन छोटी-छोटी लेकिन बेहद जरूरी बातों को सिखाता भी कौन? ससुराल में सबसे छोटे होने का एक ही मतलब होता है-कर्तव्यों की भरमार किंतु अधिकारों का अभाव।

पारिवारिक जीवन की इस शुरुआत के साथ ही उनके सामने कुछ अन्य कसौटियाँ भी थीं। जिन पर उनके व्यक्तित्व को अनेकों रगड़ खा कर अपना खरापन साबित करना था। इन्हीं में से एक थे गुरुदेव के पहले विवाह की संतानें, भाई ओम्-प्रकाश, और बहिन दया। उन दिनों ये दोनों भोले-भाले अबोध बालक थे। माँ का स्नेह छत्र बचपन से ही हट जाने के कारण इन दोनों के मन प्यार के भूखे थे। ऐसा प्यार जो कभी न चुकने वाला हो। गुरुजी की अपनी सामाजिक व्यस्तताएँ थीं। स्वतंत्रता आँदोलन का जोर-शोर, समाज सुधार की बढ़ती प्रवृत्तियाँ, साधना के नित नए आयामों का विकास। ऐसे में वे अपने बच्चों से प्यार भले ही कितना करते रहे हों पर सान्निध्य-सामीप्य के अवसर तो दुर्लभ ही थे।

बाल मन भला व्यस्तता की बेबसी को कहाँ समझता है। उसे तो आदत होती है बार-बार रूठने की। हर बार रूठ कर वह यही सोचता रहता है, उसे कोई मनाए, प्यार-दुलार करता रहे। उनकी इस चाहत को यद्यपि ताई जी अपने ढंग से पूरा करती रहती थीं। फिर भी उन दोनों के मन में माँ का प्यार पाने की ललक थी-कसक थी। लेकिन इसके साथ ही बाल मन में उठने वाले संदेह भी थे, बचकाना जिदें भी थीं। माँ का ममत्व ही जिसका समाधान था।

पारिवारिक जीवन में प्रवेश के साथ ही माताजी को यह चुनौती स्वीकार करनी पड़ी। इसके साथ कुछ ऐसे अड़ोसी-पड़ोसी भी थे जिनके बारे में गोस्वामी तुलसीदास की भाषा में कहें तो ‘जे बिनुकाज दाहिने बांए’ अर्थात् जो अकारण की टिप्पणियाँ बड़ी मर्माहत करने वाली थीं। इन टिप्पणियों की शुरुआत उसी समय से हो गई जिस क्षण माताजी बहू बनकर डोली से उतरीं। एक पड़ोसन बोली-अरे ये तो ऊँट बकरी की जोड़ी है। दूसरी का स्वर था भाई साँवली तो बहुत है, उस पर चेहरे पर माता के दाग भी हैं। ऐसे न जाने कितने स्वरों को शाँत करते हुए माताजी की जिठानी (शीलावती जीजी की माँ) बोली-”हमारे घर की बहू भगवती है, किसी दिन इसके पैर छुओगी।” इन शब्दों के साथ ही वह उन्हें घर ले गईं।

घर पहुँच कर सबसे एक-एक करके परिचय हुआ। उनका भी, जो माँ के ममत्व के लिए प्यासे थे। माताजी के प्रथम दर्शन को बताते हुए भाई ओम्–प्रकाश की यादें बहुत जीवंत हैं। उन्हीं के शब्दों में-’माता जी उस समय सुनहरे काम की गुलाबी साड़ी पहने थीं। मस्तक पर टीका, नाक में नथ और गले में हार पहने थीं। हाथों में सोने के कंगन पैरों में पाजेब, बिछवे और गहरे लाल रंग की चप्पल पहने थीं। एक बदामी रंग की चद्दर ओढ़े थीं। गाँव की परंपरा के अनुसार घूँघट निकाले हुए थीं।

हम दोनों (ओम्–प्रकाश एवं दया) एक-एक कर चुपके से जाते और इधर-उधर दूर-दूर चक्कर लगाकर लौट आते। मुस्कराकर कहते ये तो बड़ी पतली हैं छोटी हैं, थोड़ी-थोड़ी साँवली हैं। दया कहती इनके हाथ कितने छोटे हैं मुँह तो गोल है। दया जो फ्रॉक पहने थी हिम्मत करके पास खड़ी हो गई। माताजी ने हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा लिया। मेरे मन ने भी जोर मारा मैं भी उनके पास खड़ा हो गया। पास में खड़ी ताई जी तेज आवाज में बोली-देख क्या रहा है, पैर छू। मैंने पैर छू लिए। उन्होंने प्रेम से हाथ पकड़ा और पास बिठाते हुए बोली-तुम्हारा नाम क्या है? कौन-सी क्लास में पढ़ते हो। मैंने कहा-मेरा नाम ओम्–प्रकाश है, कक्षा 5 में पढ़ता हूँ।

यही था ममत्व के प्यासे दो बालकों का अपनी दूसरी माँ से प्रथम परिचय। माँ और बच्चों के पारस्परिक संबंध सगे और सौतेलेपन की रेखा से विभाजित नहीं किए जा सकते। सामाजिक मान्यताओं की ऊपरी सतह से हटकर गहराइयों में भावनाओं की वत्सलता में इनका पोषण होता है। यहाँ वही था जिसे माँ ने अनुभव किया, बेटे अनुभव कर रहे हैं।

पहले ही दिन से माताजी ने अपने स्वजनों को जो अपनत्व आत्मीयता दी, उसे पाकर सबके सब उनके प्रशंसक होते चले गए। शीलवती जीजी (माताजी की भतीजी) उन स्नेह स्मृतियों को समेटते-बटोरते कहती हैं, चाची की तत्परता देखते ही बनती थी। घर बड़ा था। बच्चों से लेकर बड़ों तक सब की अलग-अलग रुचियाँ फरमाइशें थीं। सबके स्वभाव के अनुरूप अपने को ढाल लेना कुछ सरल न था, पर चाची को इसमें जैसे महारथ हासिल थी। हर कोई यही समझता कि वह उसी का सबसे ज्यादा ध्यान रखती हैं। ताई जी तो जैसे उन्हीं पर निर्भर हो गयीं। हर काम के पहले यही पूछती छोटी बहू से पूछ ले। सास-बहू के रिश्तों में इतने मधुरता शायद ही कहीं अन्यत्र मिलें।

आँवलखेड़ा में माताजी का निवास अधिक दिनों नहीं रह सका। देश स्वतंत्र होने की ओर अग्रसर था। गुरुदेव की गतिविधियाँ राष्ट्र-मुक्ति की ओर से हटकर समाज मुक्ति की ओर मुड़ने लगीं। कुरीतियों, कुप्रथाओं, मूढ़मान्यताओं से जकड़-बँधे समाज को मुक्त करने के लिए उनका रोम-रोम दीवाना हो रहा था। उन्होंने अपने अभियान की प्रथम केन्द्र स्थली मथुरा को चुना। स्वभावतः इसका असर उनके पारिवारिक जीवन पर भी आया। माताजी भाई ओम्–प्रकाश एवं बहिन दया को लेकर गुरुदेव के साथ मथुरा आ गई।

मथुरा में आरंभ किया गया पारिवारिक जीवन आँवलखेड़ा की तरह सुविधाओं से भरा-पूरा न था। यहाँ जमींदारी की संपन्नता न थी। यद्यपि यह गरीबी स्वतः की ओढ़ी हुई थी। फिर भी गरीबी तो गरीबी ही है। इस स्वतः अपनाई गई गरीबी में भी उन सारे अभावों का अनुभव मौजूद था, जो किसी गरीब के जीवन में होता है। हाँ ऋषि कल्प मनःस्थिति ने विपन्नता को कभी प्यास न फटकने दिया।

मथुरा के जीवन काल में ही स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद माताजी की अपनी कोख से भी दो संतानें आईं, भाई मृत्युंजय (1949) और बहिन शैलबाला (1953) इस तरह कुल मिलाकर छः लोगों का परिवार ही गया। गुरुदेव का अधिकांश जीवन तप-साधना, सामाजिक क्रिया–कलापों एवं अध्ययन लेखन में बीतता रहता। अपने व्यस्त जीवन में शायद ही कुछ क्षण वह परिवार को दे पाते हों। कुल मिलाकर परिवार का संचालन भार माताजी पर ही था। पिता का प्यार और माँ का दुलार दोनों उन्हें ही जुटाने पड़ते थे।

गुरुदेव और माताजी के दाँपत्य जीवन की तुलना यदि कहीं की जा सकती है, तो शिव-पार्वती से। निताँत विरक्त, भगवान शिव तो प्रायः तपोलीन, समाधि निमग्न ही रहते हैं। माँ पार्वती को ही गणेश, कार्तिकेय के साथ अन्य गणों की भी सार-सँभाल करनी पड़ती है। यहाँ भी कुछ वैसा ही था। परेशानियां कम नहीं आयीं, अभाव जन्य मुसीबतें कम नहीं उठानी पड़ीं। पर उन्होंने अपनी कठिनाइयों, मुसीबतों का रोना रोकर कभी गुरुदेव को तप से विरत करने की चेष्टा नहीं की। अभाव के इस दौर में कुछ क्षण ऐसे भी आए जब माँ का ममत्व छटपटा उठा ऐसी ही एक घटना उस दिन हुई जब उनकी छोटी लड़की बहिन शैल ने रास्ते में एक रुपया का सिक्का पड़ा पाया। एक रुपये के इस सिक्के को देखकर उनका बचपन गुब्बारे, खिलौने के लिए मचल उठा। उन्होंने सोचा आखिर पड़े सिक्के को उठा लेना कोई चोरी तो नहीं है। फिर क्या उन्होंने दुकान जाकर गुब्बारे, खिलौने खरीदे और प्रसन्न मन घर पहुंची।

घर पहुँचने पर माताजी की पहली नजर उनके हाथों में थमे गुब्बारों और खिलौनों पर पड़ी। घटना का विवरण पूछने पर उन्होंने सत्य बता दिया। सब कुछ सुनकर एक बार तो उनका मातृ हृदय तड़प उठा। यदि हम खिलौने दे सकते तो बच्चे के मन में लालच क्यों आता। परंतु दूसरे ही क्षण उन्होंने स्वयं को संयत करते हुए कहा-देखो बेटी-इन सब चीजों को दुकान वापस कर आओ और पैसे को किसी मंदिर में डाल दो। आखिर क्यों? 6-7 साल की बालिका ने आश्चर्य से पूछा-”मैंने तो कोई चोरी नहीं की पैसे तो पड़े मिले थे। पड़े मिले तो क्या हुआ बिना मेहनत का पैसा चोरी का ही है।” बात समझ में आ गई-गुब्बारे-खिलौने वापस किए गये। पैसा पास के मंदिर में चढ़ा दिया गया।

ऐसे एक नहीं अनेकों घटना प्रसंग, उनके पारिवारिक जीवन में आते रहे। पर सभी विपरीतताएँ उनके मन को कमजोर करने की जगह प्रकाशन के साथ ही छः लोगों का छोटा-सा परिवार बड़े गायत्री परिवार का रूप ले रहा था। इसी के अनुरूप लोगों का आना-जाना बढ़ रहा था। इसी बीच गुरुदेव के साधनात्मक प्रयास भी तीव्र होते जा रहे थे। दो हिमालय यात्राएँ भी मथुरा के जीवनकाल में ही हुईं।

गुरुदेव की हिमालय यात्राओं के दौरान-उन्होंने पत्रिकाओं के प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि की देख-रेख का काम भी खूबसूरती के साथ सँभाला। पत्र-लेखन और कार्यालय के काम-काज के साथ उन्होंने बच्चों को किसी बात की कमी खटकने नहीं दी और न ही गुरुदेव को अनुभव होने दिया कि उनका कार्य विस्तार उनके एकाँत वास के कारण मंद पड़ जाएगा और न ही गायत्री परिवार के सदस्यों को इस बात का एहसास होने दिया कि उनके संरक्षण दाता उनके बीच नहीं हैं।

माताजी के पास इन दिनों की लड़कियों, महिलाओं की तरह भारी भरकम डिग्रियाँ तो नहीं थी। पर वह सूझ-समझ अवश्य थी जिससे उन्होंने अपने परिवार को नंदन कानन की तरह नित प्रफुल्लित बनाए रखा। शाँतिकुँज के निवास काल में उन्होंने बाहर से आए हुए एक कार्यकर्ता को समझाते हुए कहा था-’बेटा! घर-परिवार झंझट बोझ नहीं है। बोझ मानकर इसे छोड़ देने से कोई साधक नहीं बना करता। हमने भी साधना की है, पर अपने घर को तपोवन बनाकर। गृहस्थ जीवन में आने वाली तकलीफें, परेशानियां साधनात्मक जीवन की कठोर तप तितिक्षा ही हैं। जिसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकारने पर व्यक्तित्व कुँदन की तरह चमक उठता है।’ फिर हमने तो परिवार को छोड़कर भागने, उसे घटाने की जगह बढ़ाया है। पहले ओम्–प्रकाश, दया, सतीश (मृत्युँजय) और शैल, मैं और गुरुजी। फिर हुआ अखण्ड ज्योति परिवार इसमें 10-20 हजार लोग रहे होंगे। अब तो हो गया है गायत्री परिवार जिसकी संख्या लाखों को पार कर करोड़ों में पहुँच रही है।

इस सबके पीछे उदारता और सहिष्णुता की भावना रही है। भावना हृदय की आँतरिक वस्तु है। यदि हम झूठे भाव से अपने पारिवारिक सदस्यों के बीच अपनत्व, उदारता और त्याग का भाव प्रदर्शन करना चाहेंगे तो कभी न कभी कलई खुल ही जाएगी। कलई खुलने पर परिवार के सदस्यों का दृष्टिकोण हमारे प्रति गलत हो जाएगा। यदि भावना सच्ची है, तो जिनका दृष्टिकोण अपने प्रति गलत भी है तो उसमें भी देर-सबेर सुधार आ ही जाएगा। हमने यही किया है। हम चाहते हैं अपने मिशन का हर परिवार हमारी ही तरह अपने परिवार को नंदन कानन बना ले। जिसमें रोज खुशियों के फूल खिल सकें।


Quotation

आज की परिस्थितियाँ उन सभी समर्थ व्यक्तियों को पुकारती हैं कि इस विश्व संकट की घड़ी में उन्हें कुछ साहस और त्याग का परिचय देना ही चाहिए। पतन को उत्थान में बदलने के लिए उन्हें कुछ करना ही चाहिए, क्योंकि पेट भरने के लिए पशु की तरह जीवित रहना कैसे संभव हो सकता है जब मानव जाति अपनी दुर्बुद्धि से ऐसे दलदल में फँस गई हो जिसमें से बाहर निकलना उसके लिए कठिन हो रहा हो। हमारे परिजनों में से शायद ही कोई इस तरह का अभिशाप जैसा जीवन जीना पसंद करे।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रबुद्ध आत्माओं के सामने यह चुनौती प्रस्तुत हुई है कि वे अपनी तुच्छ, तृष्णाओं तक सीमाबद्ध संकीर्ण जीवन बिता देने की अपेक्षा किसी तरह संतोष से गुजारा चलाते हुये अपनी बढ़ती शक्तियों का उपयोग अपने युग की विषम समस्याओं को सुलझाने के लिए करने को तत्पर हों। चारों ओर जब आग लगी हो और उसे बुझाने की अपेक्षा अपनी चैन की बंशी बजाने में जो संलग्न हो ऐसे प्रतिभावान की सामर्थ्यवान की विकृत गतिविधियों पर विश्व मानव की घृणा ही बरसेगी। भावी पीढ़ियाँ उसे फटकारेंगी।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


माता का संदेश


माता का संदेश (Kavita)

बच्चों! यह न समझना तुमसे, चली गयी मैं कोसों दूर। आँखें बंद करो-पाओगे, अपने को मुझ से भरपूर॥

जाना पड़ा-कि तन में रह कर, अर्जन थोड़ा होता था। यह आत्मा दुखती थी जब, कोई भी बच्चा रोता था॥

अब हम-सूक्ष्म लोक के वासी, खूब कमाकर भेजेंगे। तुम लाखों बच्चों का सुख, संसार सँवार सहेजेंगे॥

बस, तुम काम मिशन का करते रहो, तथा कहलाओ शूर॥ आपस में सब मिलकर रहना, कहीं दरार न आ पाये। प्यार बाँटने की परंपरा, इस माँ की ना मिट जाये॥

सब अपने हैं, घर अपना है, सब कुछ वत्स! तुम्हारा है। योग्य बन गयी संतति ऐसा, दृढ़ विश्वास हमारा है॥

है संतोष यही कि गलत कमलों में, नहीं भरा है नूर॥ हाँ मजबूरी थी, जाना था, हमको जन मंगल के हेतु। बनवाना रावण दलन को, था फिर से इस युग में सेतु॥

हमको भी कम नहीं वेदना है, बालको! बिछुड़ने की। पर न ठीक था बात व्यर्थ ही, महाकाल से लड़ने की॥

कर लो तुम भी यह संतोष कि, ले भागा कोई “अक्रूर”॥ किंतु कहाँ रह सकते हम, माधुर्य भाव का वृज तजकर। शाँतिकुँज में तथा तुम्हारे, हृदयों में हम रहे बिखर॥

कृष्ण कहाँ थे दूर गोपियों से, या मातृ यशोदा से। उनका प्राण वहीं था-पूछो, उस कदम्ब की छाया से॥ उसी प्राण को अमर कर गये, अग्रगण्य कवियों में-”सूर”॥

-माया वर्मा


मानवता का मसीहा


मानवता का मसीहा (Kavita)

वासंती बहार का जिसने, जग उपवन महकाया। मानवता का वही मसीहा, आज धरा पर आया॥

जीवन की लघु सत्ता इस दिन, महाप्राण से युक्त हुई। महाकाल से अरे जोड़कर, कालचक्र से मुक्त हुई॥

धन्य हुई फिर स्वयं साधना, उस जीवन में जुड़कर। प्रगति पंथ पर चला पथिक, फिर देखा कभी न मुड़कर॥

नर तन में नारायण जैसा, ही कर्तृत्व दिखाया। निज चिंतन की प्राण ज्योति ले, ज्योति अखंड जलाई॥ युग प्रवाह को पलट सके, वह व्यापक क्राँति मचाई।

ऋषियों की पावन थाती को, सींचा रख अंतर में॥ गौरवमय अध्याय लिखे जिस, काया के कण-कण ने॥

लख विराट कर्तृत्व कि जिसका, जनमानस चकराया॥ आह हमारे बीच नहीं अब, प्राण तुल्य वह काया। ढूँढ़ रहे हैं वेग विवश मन, व्याकुल हो रो आया॥

मात-पिता गुरु तीनों रूपों की, प्रतिमा साकार रहे। स्नेह प्रेम करुणा से भीगे, हम सब तुम्हें पुकार रहे॥ सतत् साथ रहने का तुमने, क्योंकर वचन भुलाया?

होगा अब संकल्प पर्व यह, वासंतीवानों का। पूरा होगा लक्ष्य तुम्हारे, सारे अभियानों का॥

फहरायेंगे धर्म ध्वजा फिर, केसरिया अंबर में। त्याग और बलिदान बसेंगे, भारत के घर-घर में॥

सदा चलेंगे राह कि जिस पर, तुमने हमें चलाया। मानवता का वही मसीहा, आज धरा पर आया॥

-सुरभि


आत्मीयता, ममता करुणा, यही थी उनकी उपासना

कहते हैं-भगवान वामन ने तीन कदमों में सारी दुनिया नाप ली थी। हम आप को भी यदि वंदनीय माताजी के व्यक्तित्व की गहराइयाँ तीन अक्षरों से नापनी हों, तो वे तीन अक्षर होंगे करुणा। यही उनका स्वभाव था। किसी के भी दुःख कष्ट को देखकर वह विकल हुए बिना नहीं रह सकती थीं। उनकी उफनती भावना का विस्तार मनुष्यों तक ही सीमित नहीं था। वह कहा करतीं ‘अपने आप को सिर्फ मनुष्य जाति का सदस्य मानने की बात संकुचित दृष्टिकोण की उपज है। यदि दृष्टिकोण का विस्तार हो सक तो लगेगा कि अन्य जीवधारी भी अपनी विचित्रताओं, भिन्नताओं और विशेषताओं के कारण भगवान की इस दुनिया में खास स्थान रखते हैं। सभी प्राणी समान हैं, भले आकार में वह छोटे-बड़े हों। परमात्मा के अनगिनत पुत्रों में इंसान भी एक है।’

उनके अपने परिवार में यह भावना बराबर देखने को मिलती। घर में जितना ध्यान परिवार के अन्य सदस्यों का रखा जाता उससे कम देख-भाल पशु-पक्षियों की नहीं होती थी। इनकी बीमारी-आरामी, सेवा, सुश्रूषा में वह कुछ इस तरह से जुटी रहतीं, जैसे ये सब उनके आत्मीय हों। खाने-पीने में भी इनका बराबर ध्यान रखा जाता। कई बार तो वह अपने सामने की थाली छोड़कर दौड़ पड़तीं-अरे देखो! अभी मैंने गाय के लिए इंतजाम नहीं किया और खुद खाने के लिए आ बैठी।

गुरुदेव के चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरण लगभग चौबीस सालों में संपन्न हुए। इन सालों में घर में गाय हर हमेशा रही। क्योंकि गाय की छाछ आदि की आवश्यकता अधिक रहती। इसके अलावा आचार्य जी गौयावक व्रत भी करते थे। अर्थात् गाय को जौ खिलाया जाता। उसके बाद गाय के गोबर में जौ के जो दाने आ जाते, उनको बीनकर गौ मूत्र में धोया जाता। फिर इन्हें सुखाकर-पीस कर एक छोटी-सी रोटी-छाछ के साथ वह खाया करते। यह क्रम लंबे समय तक चला।

इसके लिए सारा इंतजाम माता जी स्वयं करती थीं। हर समय उनको गाय के चारे-पानी, सर्दी, गर्मी उसे जौ देने की चिंता लगी रहती। शुरुआत के दिनों में वह और ताई जी (गुरुदेव की माताजी) आँवलखेड़ा में रहती थीं। उस समय घर में एक कपिला गाय रहती थीं। काले रंग की यह गाय बहुत सीधी थी। छोटे बच्चे तक उसका धन पकड़ लेते, फिर भी वह चुपचाप खड़ी रहती। घर में जब भी जरूरत होती उसका दूध निकाल लिया जाता। बार-बार दुहे जाने के कारण यह कहना कठिन है कि वह कितना दूध देती थी।

एक बार वह बीमार हो गई। चारा खाना छोड़ दिया। गुमसुम खड़ी थी। चिकित्सक वहाँ था नहीं, दूसरे गाँव से उसे बुलाया गया। उसने आयुर्वेद की कई दवाएँ दीं, लेकिन सुधार न हुआ। माताजी की परेशानी बढ़ गई। उन्हें खाना पीना अच्छा न लगता। हर समय यही सोचते बीतता कि गाय कैसे ठीक होगी। उन्हें इस तरह चिंताकुल-परेशान देखकर घर के सभी सदस्य हैरानी में थे उन सबको यह लग रहा था कि पशु तो बीमार होते ही रहते हैं, भला इसमें परेशान होने की क्या जरूरत है? परंतु माता जी के लिए तो जैसे उनका कोई अपना आत्मीय बीमार था। उन्होंने बरहन (पास के गाँव) से चिकित्सक बुलाया। चिकित्सक ने बताया कि उसे गला घोटू है। उसके सारे प्रयासों का कोई खास असर न हुआ।

गाय को जितना शारीरिक कष्ट था, माताजी की मानसिक विकलता उससे कहीं अधिक थी। परिवार के सदस्यों ने उनकी परेशानी देखकर आगरा से पशु चिकित्सक बुलाया। अपनी समझ में उसने अच्छी चिकित्सा की। लेकिन अब तक गाय का पेट फूल चुका था। प्रातः काल 6 बजे वह जोर-जोर से साँस लेने लगीं लगभग 7 बजे एकादशी के दिन सबको अपने प्यार से वंचित कर ‘चिर निद्रा’ में सो गई।

माताजी का तो जैसे सब कुछ लुट गया। वह फूट-फूट कर रो पड़ीं। ढकेल गाड़ी मँगाई गयी। बहुत बड़ा गड्ढा खोदा गया। गड्ढे में पहले वह उतरीं गंगा जल छिड़का? गंगा जल छिड़कते समय वह गायत्री मंत्र पढ़ती जा रही थीं और बिलख-बिलख कर रोती जा रही थीं। गाय को उसमें उतारा गया। उन्होंने अपने हाथों से उस पर लाल कपड़ा ओढ़ाया। गंगा जल छिड़का अपने मस्तक को उसके पैरों पर रखा, फिर उस पर अपने हाथों से मिट्टी डाली। बाद में उस गड्ढे को मिट्टी से भर दिया। अंत में बालू बिछाई गयी। जिस पर उन्होंने अपने हाथों से लिखा ‘श्रीराम’। यह सब करके वह घर आ गई। परंतु कई दिन तक उनका मन अन्यमनस्क रहा। लगभग एक सप्ताह बाद वह ठीक से खाना खा सकीं।

आँवलखेड़ा से उनका मथुरा आना हुआ। यह कहना बहुत कठिन है कि घर में माताजी पहले आयीं या बंदर। क्योंकि उनके मथुरा छोड़कर जाने के बाद बंदर भी घर छोड़ गए।

हाँ यह सच है कि जब तक वह घर पर रहीं, बंदर दिवाली मनाते रहे। बंदरों का भी कमाल था। बीस-बीस बंदर छत पर बैठे रहते, दीवालों पर गश्त लगाते रहते, पर घर का कोई कपड़ा बर्तन न उठाते। जैसे माताजी ने उन्हें पाल रखा हो। उनके लिए रोटी तो वह टुकड़ों में डाल देतीं। दाल-चावल और सब्जी एक निश्चित बर्तन में रख दी जाती। अपने लिए परोसे गए भोजन से वे सभी पूर्ण संतुष्ट हो जाते। आने वाले साधक, मेहमान, रिश्तेदार, अतिथि वगैरह तो बंदरों से खूब डरते। पर घर वाले सभी लोग अभ्यस्त हो गए थे। बंदरों ने कभी किसी को काटा नहीं। जब माताजी के बनाए-परोसे गए भोजन से ही उन्हें तृप्ति मिल जाती तब काटने-खीझने की जरूरत भी क्या थी।

माताजी का जीवों पर प्रेम अबाध था। उनके लिए सभी जीव उनके अपने थे। किसी की सेवा करतीं, तो किसी के साथ हंस खेल लेतीं, यदा-कदा चिढ़ा भी देतीं। हाँ पीड़ा-कष्ट किसी का भी हो उनकी भावनाएँ आँसू बनकर बहने लगतीं। एक दिन वह धूप में कपड़े सुखा रही थीं। गुरुदेव के साधना कक्ष के सामने खुली जगह थी। वहीं धूप में कपड़े सूखने के लिए डाल दिए जाते थे। अपनी धोती को तार पर फैला कर अभी वह हटी ही थीं कि आसमान से एक घायल तोता ‘लुढ़क-पुढ़क’ करता हुआ छत पर गिरा और पंख फैला गया। उन्होंने समझा कि वह मर गया। स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। उसकी गर्दन पर पीछे की तरफ गहरा घाव था। जिससे खून निकल रहा था। मुँह फटा था। आँखें पथरा रही थीं।

उन्होंने अपने गीले कपड़े वहीं छोड़ दिए। दोनों हाथों से धीमे से तोता उठा लिया। उठाकर उसे खुली रसोई की छत पर ले आयीं। उसके मुँह में पानी डाला। इतने में गुलाब देवी ‘एजू’ आ गई। पास आकर वह बोली अरे इसके तो खून निकल रहा है। तो देख क्या रही है-उसे संबोधित करते हुए उन्होंने कहा-जल्दी-हल्दी पीसकर ले आ। ‘एजू’ हल्दी पीसकर ले आई। माताजी ने उसके घाव में हल्दी भर दी। तोता थोड़ा छटपटाया, माताजी यह जानकर खुश हो गई कि चलो अभी जिंदा है।

रसोई में बचा हुआ भोजन रखने की काठ की एक अलमारी थी। बीच के खाने में तोता रख दिया गया। बाद में ख्याल आया कि तोता अल्मारी में बीट करेगा। तुरंत एक बड़ा पिंजरा मँगाया गया। अब उन्होंने तोते को अलमारी से पिंजरे में स्थानांतरित कर दिया। पिंजड़े में कटोरी रखी। कटोरी में दाल, एक हरी मिर्च और अमरूद रखा। एक कटोरी में पानी भर कर रख दिया। पिंजड़े में तोता सिकुड़ कर बैठा हुआ था। माताजी ने शाम को फिर हल्दी लगाई। तीन-चार दिन यही क्रम चलता रहा। हर रोज वह पिंजड़े की खिड़की खोलतीं, हल्दी लगातीं और वापस पिंजड़े में बंद कर देतीं। धीरे-धीरे तोता पूर्ण स्वस्थ हो गया। रोज की तरह अब की बार भी उन्होंने खिड़की खोली, हल्दी लगाई। लेकिन इतने में उसने माताजी की उँगली जोर से काट ली। वह जोर से चीख पड़ीं। इतने में तोता हाथ से छूट कर उड़ गया। आसमान में उसे उड़ते देखकर वह प्रसन्नता से हँस पड़ीं। बोली चलो अपनी सेवा काम कर गई।

पीड़ा किसी की भी हो, विकल होकर उसकी सेवा में जुट पड़ना उनकी आदत बन गई थी। घीया मंडी वाले घर में जीने के पास एक बुखारी थी। उसमें वह सूखी लकड़ी और उपले रखती थीं। एक रोज उसी बुखारी में बिल्ली ने चार बच्चे दिये। बिल्लियों के बारे में आम-तौर पर सोचा जाता है कि वह अपने बच्चों को कई घर घुमाती है। पता नहीं इसमें कितना सच है। कुछ भी हो बच्चे देने के बाद वह बिल्ली लड़खड़ाती हुई छत पर चढ़ी। बाद में कहाँ गई कुछ मालूम नहीं। जब कई दिन बिल्ली वापस न लौटी तो बच्चों का बुरा हाल हो गया। उन छोटे-छोटे बिल्ली के बच्चों का सिसकता क्रंदन, माताजी के हृदय को व्यथित करने लगा।

वह अपने को रोक न सकीं। भागकर बुखारी के पास गईं। उपले पलटने पर देखा, चार बच्चे थे। उनकी आँखें अभी तक खुली न थीं। भूख-प्यास से ये सभी लगभग मरणासन्न थे। वह कटोरी में गाय का दूध लायी, रुई की बत्ती बनाई, धीरे से उनका मुँह खोला और रुई की बत्ती से गाय का दूध उनके मुँह में टपका दिया। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। धीरे-धीरे बच्चे बड़े हो गए। वे जीने से नीचे बाहर घूमने लगे। इस तरह उनका घूमना-फिरना हर किसी के बिस्तर पर जब चाहे चढ़ बैठना, घर वालों के लिए मुसीबत बन गया। अब तक वह दूध-रोटी खाने लगे थे।

घर के सदस्यों को यह सब अच्छा न लगता। क्या मुसीबत घर में पाल रखी है? माताजी की आलोचना घर में चुपके-चुपके होने लगी। बर्तनों में मुँह देंगे, खाना झूठा करेंगे तब पता चलेगा। उस समय जीवदया महंगी पड़ेगी। घर में इस तरह की बातें होती रहतीं। पर माताजी से सीधे-सीधे कहने का किसी को साहस नहीं होता था। इधर बिल्ली के बच्चे एक दूसरे को यदा-कदा माँ का स्तन समझकर काट लेते। इस तरह काटते रहने से उनके शरीर में तकलीफ हो गई। माताजी उन चारों को एक लकड़ी की टोकरी में रखकर पशु चिकित्सक को दिखाने ले गईं। डॉक्टर बोला-बहिन जो इन्हें खाज हो गई है। इनको फेंक दो। जानवर की खाज आदमी को हो जाय तो बड़ी मुश्किल हो जाती है। इस गंदगी का क्या करोगी?

यह सुनकर उनका हृदय बेचैन हो उठा। वह काफी देर तक डॉक्टर से अनुनय-विनय करती रहीं, बोली खाज की कोई अच्छी-सी दवा दे दो। डॉक्टर ने कहा छोटे हैं, खाज की दवा बर्दाश्त न कर सकेंगे। फिर कुछ सोचते हुए उसने कहा-अच्छा ये शीशी ले लो रुई की फरहरी बनाकर दवा लगाना। दवा लगाकर हाथ साबुन से धोना। माताजी बच्चों और दवा के साथ घर आ गईं। डॉक्टर की बताई विधि से उन्होंने दवा लगाई। बच्चे एक दूसरे से चिपट रहे थे। वे एक-दूसरे की दवाई चाट गए। रात को 7 बजे देखा उनमें से एक लंबा पड़ा था। वह रोने लगीं, बोलीं यह तो मर गई। कुछ देर तक रुआंसी घर का काम करती रहीं। थोड़ी देर बाद अपने बड़े लड़के से बोलीं- ओम्–प्रकाश जरा तुम देखना। उन्होंने देखा दूसरा बच्चा भी लंबा पड़ा है। दोनों लंबे चारों खाने चित्त पड़े हैं। दो चिपट रहे हैं। वह सब काम छोड़ कर दौड़ी भागी आयीं और रोते हुए बोली हाय ये भी मर गई। रात को नौ बजते-बजते तीसरा बच्चा भी लंबा हो गया, माता जी सुबक रही थीं।

घर के सभी लोग सो गए थे। वह अकेली बिल्ली के बच्चों को लिए बैठी थीं इतने में चौथा भी मर गया। उन्होंने भाई ओम्–प्रकाश को कई आवाजें दी, पास आकर झकझोरा। बड़ी मुश्किल से उनकी नींद टूटी। नींद खुलने पर उन्होंने पूछा बात क्या है? जवाब में वह रोते हुए कहने लगीं ओम्–प्रकाश वे चारों मर गईं। मुझ से बड़ा पाप हुआ। मैंने दवाई क्यों लगाई। मैंने चारों को मार डाला। उनके दुख की कोई सीमा न थी। सारी रात रोते-सुबकते कटी। सुबह होने पर उन्होंने बिल्ली के मृत बच्चों को रघुवीर (तत्कालीन कम्पोजीटरः को देते हुए कहा बेटा इन्हें लाल कपड़े में बाँध लो। चारों को अलग-अलग कपड़े में बाँधा गया। इन्हें लेकर रघुवीर जब चलने लगा तब उसे रोकती हुई वह बोलीं बेटे। इन्हें दूर जमुना जी डालना, पशु की योनि से छूट जाएँगे। उसके चले जाने पर वह भगवान से प्रार्थना करती रहीं कि इन आत्माओं को पशु योनि से मुक्ति मिले।

किसी का भी कष्ट उन्हें कातर बना देता। वह विह्वल हो उठतीं करुणा का उद्रेक उन्हें बेचैन किए रहता। वह बेचैनी जितनी मनुष्यों के लिए थी, उतनी ही अन्य प्राणियों के लिए। हो भी क्यों न? सभी उन विश्व जननी की संतान ही तो हैं। एक दिन की घटना है-माताजी चटाई पर बैठी छत पर कुछ पढ़ रही थीं। यकायक उनकी नजर बिल्ली पर पड़ी। बिल्ली के मुँह में कबूतर था। कबूतर के पंखों सहित पिछला हिस्सा बिल्ली के मुँह में था। उसकी पेट और गर्दन सुरक्षित थे।

वह तुरंत समझ गईं कि कबूतर की जान बचाई जा सकती है। उन्होंने बिल्ली को घेर लिया। निकल भागने का एक ही रास्ता था और वह रास्ता उन्होंने घेर लिया। बिल्ली उस रास्ते से जिधर को मुड़ती वह उसी तरफ से “हुष” करतीं। उनके हाथ में कुछ नहीं था। बिल्ली भी कुछ कमजोर न थी। वह बराबर उछल-कूद मचा रही थी। वहीं पर एक चप्पल पड़ी थी। उन्होंने चप्पल उठाकर बिल्ली को मारी पर उसे लगी नहीं। खीझ से भरी बिल्ली ने उन्हीं के ऊपर छलाँग लगाई। पास में ही एक लकड़ी पड़ी थी, जिसे हाथ में लेकर उन्होंने बिल्ली को रोकने की कोशिश की। इस धमा चौकड़ी में बिल्ली के मुँह से कबूतर छूट गया।

उन्होंने दौड़कर कबूतर उठा लिया। कबूतर के पेट में नीचे की तरफ बिल्ली के दाँतों से हुए घाव से खून निकल रहा था बांया पैर भी घायल था। बड़ी बुरी हालत थी बेचारे की। काफी देर तक उसे अपने हाथ में लिए वह सहलाती रही। फिर प्रेमवती को पास बुलाकर बोली “जा जल्दी से हल्दी लेकर आ।” प्रेमवती बोली माताजी कबूतर तो मरेगा। बिल्ली के दाँतों का जहर चढ़ेगा। हल्दी से कुछ होने वाला नहीं, तोते की बात और थी।

एक क्षण के लिए उनका चेहरा उतर गया। फिर कुछ सोचकर उन्होंने कबूतर को कमरे में बंद कर दिया। कमरे में उसके लिए दाना-पानी रख दिया। दोपहर में तपोभूमि से कुछ साधक खाना-खाने के लिए आयें उन्हीं में डॉ. जी. के. पारिख भी थे। माताजी ने अपने कबूतर का दुख-दर्द उन्हें कह सुनाया। डॉ. पारिख अहमदाबाद के अच्छे सर्जन थे। कई आप्रेशन उन्हें रोज करने पड़ते। परंतु कबूतर का इलाज उन्होंने कभी न किया था।

वह खाना खाते हुए इस गूढ़ गुत्थी को सुलझाते रहे। मानो, आप्रेशन टेबल पर कोई मरीज मर रहा हो। डॉक्टर को, उसकी एम. एस. की डिग्री को कबूतर चैलेंज कर रहा था। आखिर माताजी का कबूतर था। डॉ. पारिख खाना खाकर बाजार चले गए। दवा, सिरिंज, मरहम न जाने क्या-क्या लेकर लौटे। कोई दवा वहाँ लगाई जहाँ से खून निकल रहा था। बाद में इंजेक्शन लगाया। पैर में मरहम लगाया। उनका यह क्रम तकरीबन पाँच दिन चलता रहा। धीरे-धीरे कबूतर पूर्ण स्वस्थ हो गया।

डॉक्टर ने कबूतर को अपने हाथ से उड़ाया। कबूतर पंख पसार कर आसमान की सैर करने लगा। उन्होंने चरण छूकर माताजी को प्रणाम किया और कहा-कि वह अहमदाबाद के अमुक अस्पताल में सर्जन हैं। सिर्फ दो दिन की छुट्टी लाये थे। अब आठवें दिन जाकर ड्यूटी ज्वाइन करेंगे। माताजी खुश होकर मुसकरायी और बोली “बेटा! बना बात मैंने तुम्हें इतने दिन रोक लिया।”

डॉक्टर चले गए। कुछ समय बाद मथुरा में विदाई समारोह का भव्य आयोजन हुआ और माताजी भी मथुरा छोड़कर शाँतिकुँज में रहने लगीं। यहाँ आकर उनकी ममता और व्यापक हो उठी। उनकी करुणा के सरित प्रवाह में असंख्य लोग स्नान करने लगे। मनुष्यों के अलावा इनमें कुछ अन्य प्राणी भी थे। इन्हीं में से था पूज्य गुरुदेव का कुत्ता मन्टो। भूटान के किन्हीं कर्नल साहब ने इसे गुरुदेव को भेंट दिया था।

उस समय पूज्यवर अपनी तीसरी हिमालय यात्रा से वापस लौटे थे। शाँतिकुँज में प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों का सिलसिला चल रहा था। उन दिनों जो भी परिजन शाँतिकुँज आए हैं। उन्हें मन्टो की आन बान-शान भूली न होगी। वह हमेशा गुरुजी के साथ रहता। सुबह जब वह प्रवचन देने के लिए जाते, मन्टों उनके आगे-आगे चलता। दोपहर में उनके पास सोफे पर बैठता। जमीन पर बैठना उसे पसंद न था। उसे माता का पर्याप्त लाड़-प्यार मिला। जब कभी उसे भूख लगती, दौड़कर माताजी के पास पहुँच जाता और अपना पेट दिखाकर भौंकने लगता जैसे कह रहा हो, मुझे जोर की भूख लगी है-जल्दी कुछ इंतजाम करो। उसका इशारा समझकर माताजी जल्दी ही कुछ खाने के लिए जुटा देतीं। जो धोती पहनकर आता, भारतीय वेषभूषा में गुरुदेव एवं माताजी के चरण स्पर्श करता उन्हें वह कुछ न कहता किंतु विदेशी पोशाक वाले पर भौंक कर तुरंत चेता देता कि अगली बार भारतीय वेश में आना। ऋषि सत्ता से मिलने दो-तीन साल वह माताजी का स्नेह सान्निध्य पाता रहा। बाद में वह मर गया। गुरुजी माताजी ने उसे गंगा के दूसरी ओर बालू में गड़वा दिया।

मन्टो के अलावा माताजी का स्नेह बटोरा पंकज नाम के खरगोश ने। उसे पंकज नाम माताजी ने दिया था। पंकज माता जी के हाथों से दूध पीता, उन्हीं के इर्द-गिर्द मंडराता रहता। जब कभी वह उछलकर उनकी गोद में चढ़ जाता और वह मुस्कुरा उठतीं। इस खरगोश को रूठना बहुत पसंद था तो माताजी को मनाना। कुछ सालों तक वह उनके प्यार से तृप्त होता रहा। बाद में एक दिन मर गया। उस दिन माताजी खाना न खा सकीं। कई दिन तक उनके चेहरे पर उदासी छायी रही जब कभी उसके किस्से बयान करने लगतीं। उनकी इन ममता भरी यादों में बहुत कुछ था। रामायण काल में जब माँ सीता धरती पर आयी थीं। न जाने कितने बंदर भालुओं ने, गीध, गिलहरी ने उनका प्यार पाया। आज के युग में सतयुग का अवतरण करने वाली परमशक्ति माँ भगवती के प्यार में उनकी करुणा में अनगिनत प्राणी सराबोर हुए। वह ठीक ही कहा करती थीं-’प्यार-प्यार प्यार यही हमारा मंत्र है। आत्मीयता, ममता, स्नेह, यही हमारी उपासना है। सो बाकी दिनों अब अपनों से अपनी बातें ही नहीं कहेंगे, अपनी सारी ममता भी उन पर उड़ेलते रहेंगे। शायद इससे हमारे बच्चों को यत्किंचित् सुखद अनुभूति मिले। प्रतिफल और प्रतिदान की आशा किए बिना हमारा भावना प्रवाह तो अविरल जारी रहेगा। अपने बच्चों को भरपूर स्नेह-यही इन बीते दिनों का हमारा उपहार है। जिसे कोई भुला सके तो भुला दे। हम कहीं भी रहें, शरीर रहे अथवा न रहे, धरती पर रहें या किसी और लोक में अपने बच्चों पर ममत्व और करुणा उड़ेलते रहेंगे।’


आशीर्वाद लुटाने वाली माता जी (Kahani)

गेटबिक एयरपोर्ट (लंदन) में माताजी का विदाई समारोह था। माताजी बैटरी चलित गाड़ी में बैठकर अंदर गईं। बाहर 500 परिजन खड़े देख रहे थे। माता जी गाड़ी में बैठी हुई थीं। चैकिंग के लिए ब्रिटिश महिला कैथेरीन आईं। सिर से लेकर पैर तक स्पर्श किया-कहीं कुछ है तो नहीं।

माताजी प्रसन्न थीं परिजनों की ओर पीछे उनका चेहरा था। परिजनों की ओर देखकर कैथेरीन की ओर इशारा किया। हमारे पास कुछ नहीं है (हाथ हिलाकर) हँसती हुईं। फिर जब सिर से टटोलती पैरों तक आई चरणों को स्पर्श किया तो माताजी का तो सहज स्वभाव था, जो चरण स्पर्श करे उनको आशीर्वाद देतीं थीं। सो दोनों हाथ कैथेरीन के सिर पर रखकर आशीर्वाद दे रही थीं।

कैथेरीन अचकचा गईं। आश्चर्य चकित थीं। परिजन कैथेरीन के भाग्य को सराह रहे थे, जगत् जननी स्वयं दोनों हाथ से आशीर्वाद दे रही हैं। काश ऐसा प्यार भरा आशीर्वाद मिलता।

इसके बाद माताजी अंदर चलीं गईं आँखों से ओझल हो गईं। बाद में कैथेरीन बाहर आईं एवं परिजनों से चर्चा की कि कौन थी जिनके लिए आप लोग आये। जब पूरा परिचय दिया गया तो अपने आपको धन्य मान रहीं थीं। अगली बार जब माता जी टोरेण्टो जाने एवं आने, लॉस ऐन्जिल्स से आते समय गेटबिक एयरपोर्ट पर उतरीं तो सबसे पहले चरण स्पर्श करने कैथेरीन आईं एवं आते जाते समय बिना चैकिंग किये हवाई जहाज तक छोड़ने के लिए जाया करती थीं। ऐसी थीं मानव मात्र के लिए आशीर्वाद लुटाने वाली माता जी।


“नारी जाग्रति अभियान” का विशाल वटवृक्ष जिनके संरक्षण में फला-फूला

माता जी को केन्द्र बनाकर नारी शक्ति का विकास होगा। परम पूज्य गुरुदेव के इन शब्दों को वंदनीय माताजी की गति-विधियों-क्रिया–कलापों में साकार होते अनुभव किया जा सकता है। स्वयं गुरुदेव ने महिलाओं की पीड़ा को कम अनुभव नहीं किया। इस अनुभूति के पीछे उनका नारी अंतःकरण था। जिसे उन्हीं की भाषा में कहें तो-’पुरुष की तरह हमारी आकृति बनाई है कोई चमड़ी फाड़ कर देख सके तो भीतर माता का हृदय मिलेगा। जो करुणा, ममता, स्नेह और आत्मीयता से हिमालय की तरह निरंतर गलते रहकर गंगा-यमुना बहाता रहता है।’ हृदय की इन्हीं विशिष्ट धड़कनों में उन्होंने नारी की पीड़ा-व्यथा-वेदना की गहरी अनुभूति की।

वंदनीय माताजी ने तो अंतःकरण ही नहीं शरीर भी नारी का पाया था। ऐसे में स्वाभाविक है उनका हृदय हजारों साल से दलित, शोषित, उत्पीड़ित नारी का जीवन शास्त्र बन जाय। उनके दिल की धड़कनों में हमें बौद्धिक विवेचनाओं के आकर्षण ग्रंथों के भण्डार, लेखमालाओं, वक्तृताओं के अंबार भले ही न मिलें, पर वह आकुलता-आतुरता जरूर देखने को मिलती है, जिसे छूकर कोई भी मन नारी जागरण के लिए कुछ करने को हुलस उठे। प्राणों में वह तड़प भरी बेचैनी पैदा हो जाय, जो अपने समूचे जीवन को इसके लिए उत्सर्ग करने के लिए कृत संकल्पित हो सके।

उनकी यही व्याकुल भावनाएँ हैं जिसका खाद-पानी पाकर ‘नारी जागरण’ का विशाल वटवृक्ष आज युग निर्माण योजना के आँगन में फल-फूल रहा है। जिसकी छाया हजारों-हजार महिलाओं के मन का संताप हरती हैं। इस विशालकाय हो चुके वृक्ष के बीजारोपण की कहानी बड़ी मार्मिक है। उन दिनों माताजी आँवलखेड़ा से मथुरा आई ही थीं। कुछ अधिक साल नहीं हुए थे। एक दिन एक महिला आकर आँसू थमते न थे। बहुत समझाने-बुझाने पर बोली-”भला आपके सिवा मेरा दुख दर्द और कौन समझेगा?”

आखिर सुनूँ भी तेरा दुख दर्द? क्या पीड़ा के दो बोल सुन कर उसने अपनी कथा कह सुनाई। “मेरा नाम फूलवती है। मेरे पति ने मुझे घर से निकाल दिया है। मायके वाले रखने को तैयार नहीं है। इस संसार में मेरा कहीं ठिकाना नहीं।” लगभग तीस वर्ष की इस महिला से अधिक पूछताछ करने पर पता चला कि उसके पति ने उसे इस वजह से घर से बाहर कर दिया है, क्योंकि मायके वालों ने अधिक दान-दहेज नहीं दिया है। अब तो मायके वालों ने भी मुँह फेर लिया है क्योंकि लड़की पराए घर का कूड़ा जो होती है और बाहर किये गए कूड़क को फिर से घर में ले आना कोई समझदारी तो नहीं। लेकिन माताजी के लिए तो उसका कष्ट अपना कष्ट था। उन्होंने समझा बुझाकर प्यार के साथ अपने यहाँ रख लिया। हाँ इस घटना ने उन्हें सोचने के लिए विवश जरूर किया कि आखिर महिलाओं के प्रति इतना दूषित दृष्टिकोण क्यों? कि माँ-बाप उसे पराए घर का कूड़ा मानें। लड़कों की तुलना में लड़कियों का दर्जा निचला हो। पति की नजर में वह कामुकता की आग बुझाने का खिलौना है। जिसे जब तक मन आया इस्तेमाल किया जब मन चाहा बाहर फेंक दिया। ससुराल वालों की दृष्टि में उसकी औकात महज एक दासी की है। जिसे दिन-रात काम में जुटे रहने के बदले किसी सम्मान या सुविधा पाने का अधिकार नहीं।

सिलसिला फूलवती तक सीमित नहीं रहा। इसी तरह की एक अन्य महिला भी आयीं नाम था प्रेमवती देवी। इनकी उम्र लगभग तीस वर्ष थी। विधवा थीं। इनकी लिखावट बहुत सुँदर थी। इन्होंने माता जी का बहुत प्यार पाया। माताजी ने इनको डाक विभाग का काम सौंपा। जिसे वह बड़ी खूबसूरती और निष्ठा के साथ करती थी। एक अन्य महिला भी इस कड़ी में आ जुड़ी-नाम था कौशल्या देवी। इनकी उम्र तकरीबन पचास साल रही होगी। ये लुधियाना की रहने वाली थीं। ये खाना बनाने में मदद करती थीं। कौशल्या की तरह रतन देवी भी आ मिली। इनका निवास स्थान नेपाल में था। इनके पति ने इन्हें छोड़ दिया था। आयु लगभग तीस वर्ष रही होगी। इन चार महिलाओं के साथ पांचवीं महिला थी नारायणी जिन्हें माताजी का सहचरत्व मिला।

इन पाँच महिलाओं के लेकर एक महिला मंडल बनाया गया। अब तो युग निर्माण योजना के अंतर्गत सैकड़ों-हजारों महिला मंडल हैं। परंतु यह पहला महिला मंडल था। यही थी नारी जागरण अभियान की शुरुआत जिसे माताजी ने अपने हाथों संपन्न किया। वह स्वयं इन पाँचों को पढ़ने-लिखने की औपचारिक कला के साथ जीवन विद्या सिखाती उन्हें यह भी सिखाया जाता कि जिंदगी की समस्याओं से किस तरह जूझा और उबरा जाय। शिक्षा के साथ स्वावलंबन का भी क्रम चलता।

शिक्षा और स्वावलंबन का अभाव ही है, जिसकी वजह से पर्दाप्रथा, अनुभवहीनता एवं सामाजिक कुरीतियों में आधी जनसंख्या बेतरह जकड़ी हुई है। इस पराधीनता का एक रूप यह भी है कि उसे पर्दे में, पिंजड़े में, बंदी गृह की कोठरी में ही कैद रहना चाहिए। इस मान्यता को अपनाकर विश्व जननी अबला की स्थिति में पहुँच चुकी है। आक्राँताओं का साहस पूर्वक मुकाबला करने की बात तो दूर अब तो आड़े समय में अपना और अपने बच्चों का पेट पाल सकने तक की स्थिति नहीं रही है। व्यापार चलाना बड़े-बड़े पदों की जिम्मेदारी सँभालना तो दूर, परिवार व्यवस्था से जुड़े साधारण कामों में, हाट, बाजार, अस्पताल तथा अन्य किसी विभाग का सहयोग पाने के लिए जाने में गूँगे-बहरों की तरह व्यवहार करती हैं।

इन परिस्थितियों में बदलाव आना तब तक मुमकिन नहीं जब तक महिलाओं में आत्म बल नहीं जगता। साथ ही नारी के प्रति-मातृ शक्ति के प्रति जन श्रद्धा का जागरण नहीं होता। गायत्री तपोभूमि के निर्माण के साथ इन दोनों कार्यक्रमों को आँदोलन के स्तर पर चलाने की बात सोची गई। नारी आत्म बल संपन्न बने इसके लिए सामान्य सामाजिक प्रयासों के अलावा साधनात्मक उपक्रम भी आवश्यक हैं। इसी को पूरा करने के लिए महिलाओं को गायत्री जप का अधिकार दिया गया। इसका उपयोग सबसे पहले माताजी ने स्वयं किया। फिर गुरुदेव के साथ देशभर में घूम-घूम कर हजारों-हजार महिलाओं को गायत्री मंत्र में दीक्षित किया।

यों गायत्री मंत्र सविता उपासना का मंत्र है। विभिन्न संप्रदायों में इसकी उपासना की अनेक-पद्धतियाँ-विधियाँ देखने को मिलती हैं। परंतु गुरुदेव-माताजी को तो वह उपासना विधि प्रचलित करनी थी जिसे मातृ शक्ति के प्रति जन भक्ति जाग्रत हो। इसी को लक्ष्य करके गायत्री माता की साधना का प्रचार हुआ। ऋषि युग्म के तप प्रभाव से गायत्री शक्ति युग शक्ति बनकर अवतरित हुई। इस काम में संकट कम नहीं आए पंडे, पुजारियों, धर्माचार्यों ने कम विरोध नहीं किया। विरोध का यह क्रम अपमान-तिरस्कार तक ही सीमित नहीं रहा। मृत्यु संकट के कुचक्र भी खड़े किए गए। पर जिसका लक्ष्य ही आत्म बलिदान हो उसने संकटों की कब परवाह की है?

समाज के इन ठेकेदारों ने अपने कुचक्रों के कारण नारी की स्थिति पंख कटे पक्षी की तरह कर डाली है। यद्यपि आज के इन प्रचलनों का प्राचीन भारतीय संस्कृति के साथ कोई ताल-मेल नहीं बैठता स्वर्ग-नरक आकाश-पाताल में जितना अंतर है उतना ही नारी के प्रति प्राचीनकाल में उच्चस्तरीय श्रद्धा रखे जाने और सुविधा दिए जाने की स्थिति में और इस हेय प्रतिबंधन की स्थिति में समझा जा सकता है। सामंती युग के इन अवशेषों ने जिसे नरक का द्वार कहकर उपेक्षणीय ठहराया। वैदिक ऋषिगण उसी की प्रशंसा करते नहीं अघाए। एक स्थान पर तो शास्त्रकार ने यहाँ तक निःसंकोच भाव से कह दिया

नारी त्रैलोक्य जननी, नारी त्रैलोक्य रूपिणी। नारी त्रिभुवनाधारा, नारी शक्तिस्वरूपिणी॥

इसका सबसे बड़ा प्रमाण वैदिक भारत में ईश्वर की मातृ रूप में प्रतिष्ठा है। माँ की गरिमा एवं महत्ता को समझ कर ही ऋषियों ने मातृशक्ति की आराधना एवं पूजा का विधि-विधान बनाया। बुद्धि-विवेक से संपन्न मनुष्य ने सभ्यता की ओर जैसे ही कदम रखना प्रारंभ किया, उसके दिमाग में यह सवाल उभरा वह आया कहाँ से? यहीं से माँ के प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न हुआ और ईश्वर को आदि जननी मानकर आराधना प्रारंभ की। यहीं से प्रेरणा पाकर संसार की सभी संस्कृतियों में मातृशक्ति की उपासना किसी न किसी रूप में प्रचलित है।

चाहे वह इटली की फारचुना के रूप में, रोम की साइवेले ग्रीक की हरा, मध्यपूर्व की मान्ट हो, अथवा उत्तरी अफ्रीका की तिवायत। मैक्सिको की एसिस हो, यूनान में अनोन्का सीरिया में अरन्टीटें, मोआब में आख्तर और अबीसीनियाँ में आसार के नाम से नारी शक्ति ही पूजित रही है। बेबीलोन में यही अर्चना ‘लाया’ और मिश्र ने आइसिस के रूप में संपन्न की। प्रायः विश्व के हर कोने ने परमेश्वर को नारी के रूप में पूजित कर नारीत्व के प्रति अपने श्रद्धा-सुमन अर्जित किए हैं और इसकी प्रेरक शक्ति भारत भूमि रही है।

गायत्री महाशक्ति की उपासना का क्रम और कुछ नहीं प्राचीन का नवीनीकरण था। नारी शक्ति को महाशक्ति बनाने का उपक्रम था। गायत्री साधना से आत्मबल प्राप्त करके महिलाएँ समाज में अपना बहुमुखी विकास कर सकें। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर शाँतिकुँज की स्थापना हुई। इस भाव पूर्ण प्रयास को गुरुदेव के शब्दों में कहें तो-’शांतिकुंज की स्थापना का मूल प्रयोजन माताजी के मार्गदर्शन में महिला जागरण अभियान का आरंभ करके उसे नारी के समग्र उत्कर्ष को अनेकानेक गतिविधियों को विश्वव्यापी बनाना है।’

शाँतिकुँज की स्थापना के तुरंत बाद पूज्य गुरुदेव तो तप साधना के लिए हिमालय चले गए। यहाँ माता जी ने नारी के अभ्युदय एवं विकास के लिए अनवरत साधना का क्रम अपनाया। अनेकों कन्याओं को उन्होंने इसमें भागीदार बनाया। पहले इन लड़कियों की संख्या चार थी, बाद में चौबीस हुई, बाद में बढ़ते-बढ़ते सौ से भी अधिक पहुँच गई। साधना के साथ इन लड़कियों के शिक्षण का काम भी वह स्वयं संपन्न करती रहीं। शिक्षण के इस क्रम में औपचारिक शिक्षा के साथ संगीत-कर्मकाण्ड, पौरोहित्य के साथ वक्तृत्व कला का भी समुचित स्थान रहता।

उन दिनों शाँतिकुँज का कलेवर इतना बड़ा न था। सिर्फ दो-तीन कमरों का छोटा सा परिसर था। आस-पास वनप्रांत, निकट में बहती गंगा की जलधारा, इस सब की सुरम्यता अनुभव ही करने योग्य थी। शब्दों में भला वह सामर्थ्य कहाँ कि इसका वर्णन कर सकें। जैसे-जैसे लड़कियों की संख्या बढ़ती गई नए भवन भी विनिर्मित होते गए। बाद में गुरुदेव के वापस आने पर विधिवत देवकन्या प्रशिक्षण विद्यालय आरंभ किया गया। जिसकी मुख्य अधिष्ठात्री भी माताजी स्वयं थीं।

उनके द्वारा प्रशिक्षित की गई कन्याओं ने सारे देश में कार्यक्रम संपन्न करके नए कीर्तिमान स्थापित किए। पंद्रह से अठारह साल की इन भोली-भाली मासूम कन्याओं का उद्बोधन सुनकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते। ऐसा ही एक कार्यक्रम लखनऊ में संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में उस समय के उत्तर प्रदेश तत्कालीन राज्यपाल एम. चन्ना रेड्डी भी उपस्थित हुए। कार्यक्रम की समाप्ति पर वह इन कन्याओं से मिले, पूर्ण जानकारी प्राप्त की। जानकारी मिलने पर उन्होंने कहा-आप लोगों के कार्यक्रम ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। मैं माताजी एवं गुरुजी से मिलने शाँतिकुँज जरूर आऊँगा और कुछ समय बाद आए भी। माताजी से मिलने पर बड़े भाव विह्वल स्वर में बोले-धन्य हैं आप, जिसने ऐसी कन्याएँ प्रशिक्षित कीं। वैदिक साहित्य में घोषा अपाला के बार में पढ़ा था आज देख भी लिया।

देवकन्या प्रशिक्षण के साथ वंदनीय माताजी ने पूज्य गुरुदेव के सहचरत्व एवं संरक्षण में विधिवत नारी जागरण अभियान शुरू किया। इसे शुरू करते हुए उन्होंने कहा-हमारे नारी जागरण का मतलब है संवेदनाओं का जागरण और भावनाओं का विकास। इसे पश्चिम का ‘नारी मुक्ति आँदोलन’ समझने की भूल न करनी चाहिए। जिसके अंतर्गत नारी पुरुष बनने के लिए उतारू है। पुरुषों ने पहले ही क्या कम उलझने पैदा कर रखी हैं? इन्हें पुरुष बनकर नहीं सुलझाया जा सकता। इन्हें सुलझाने के लिए तो महिलाओं को अपने अंदर मातृत्व का विकास करना होगा। इस अभियान के क्रिया−कलाप उन्होंने चार भागों में बाँटें-

(1) साहित्य प्रकाशन (2) नारी शिक्षण सत्र (3) संगठन द्वारा संघ शक्ति का उदय (4) रचनात्मक कार्यक्रमों का व्यापक विस्तार।

उनके द्वारा चलाया गया यह सिलसिला अभी तक चल रहा है। वह भले ही आज स्थूल रूप से हम सबके बीच नहीं हैं, परंतु उनका शक्ति प्रवाह यथावत है। जिससे ऊर्जा पाकर नारी जागरण अभियान की गति और अधिक तेज हुई है। इसका प्रमाण आँवलखेड़ा अर्ध पूर्णाहुति समारोह में हमें उस समय देखने को मिलेगा जब शाँतिकुँज में प्रकाशित ब्रह्मवादिनी महिलाएँ एक विराट अश्वमेध यज्ञ के समारोह का संचालन करेंगी।

वंदनीय माताजी के श्रद्धाँजलि पर्व पर उठाया जाने वाला यह कदम, उनके द्वारा शुरू किए गये कार्य का ही विराट-विस्तार है। जिसे देखकर हर कोई अनुभव कर सकेगा-’नारी ब्रह्मविद्या है, श्रद्धा है, शक्ति है, पवित्रता है, कला है और वह सब कुछ है जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धि है, ऋद्धि है और वह सब कुछ जो मानव प्राणी के समस्त अभावों, कष्टों एवं संकटों को निवारण करने में समर्थ है। यदि उसे श्रद्धा सद्भावना के साथ सींचा जाय तो यह सोमलता विश्व के कण−कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओत-प्रोत कर सकती है।


Quotation

परोपकार के समान पुण्यदाता कोई भी दूसरा धर्म नहीं है। यदि ऐसा न होता तो तपस्या में निरत महर्षि दधिचि देवों की भलाई के लिए अपना शरीर नहीं दे पाते। वे शरीर की रक्षा करते और तपस्या से बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त और मुक्ति के लिए प्रयत्न करते रहते। किंतु अवसर पाते ही उन्होंने तुरंत ही परोपकार में अपना शरीर दान कर दिया। वे जानते थे कि हजार वर्ष तप करने, पर भी जो मुक्ति कठिनता से मिलती है वह परोपकार में शरीर त्याग देने से तत्काल सरलतापूर्वक मिल जाती है।

-माता भगवती देवी शर्मा विदेश प्रवास-


मातृसत्ता के संस्मरणों के कुछ पुष्प

परम वंदनीय माता जी विदेश प्रवास पर तीन बार गयीं 1993 में। एक बार इंग्लैण्ड, एक बार कनाडा व एक बार अमेरिका। वहाँ की कुछ स्मृतियाँ संस्मरणों के पुष्प के रूप में समर्पित हैं।

लॉस ऐन्जिल्स अश्वमेध महायज्ञ संपन्न हुआ। परम वंदनीय माताजी को प्रज्ञापीठ की प्राण प्रतिष्ठा हेतु सेडियागो (मेक्सिको के पास) 400 मील दूर जाना था। अश्वमेध संचालन हेतु शाँतिकुँज के 10 परिजन वहाँ थे। तीन अश्वमेधों में बराबर मिलने, साथ रहने का क्रम नहीं बन पा रहा था अतः सभी को लग रहा था तीन माह हो गये माताजी का स्नेह चाहिए।

जब सेनडियागो चलने के लिए तैयार हुए तो निश्चित हुआ तीन गाड़ियाँ जायेंगी-किंतु माता जी बोलीं-प्रणव! कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बन सकती क्या जिसमें सभी बच्चे साथ रहें। इन लोगों के साथ रहने का मेरा मन कर रहा है। अतः वहाँ के परिजन डॉ. दिव्यांग के बड़े मोटर होम (एक वाहन जिसमें घर जैसी सुविधा एवं स्थान होता है) की व्यवस्था की गई। शाँतिकुँज के 10 परिजन, स्थानीय दो परिवार मोटर होम में बैठ गये। परमवंदनीय माताजी, शैल बहन एवं डॉ. प्रणव पण्ड्या बीच में बैठे हुए थे। चारों ओर 15 बच्चे। 400 मील की यात्रा 5 घंटे में तय की गई। इस बीच प्रज्ञागीतों की अंताक्षरी, मिशन के अन्य गीत, चुटकुले आदि प्रस्तुत किये गये। परम वंदनीय माताजी ने भी पाँच गीत भावविह्वल हो गाए। कभी-कभी जब भाव विभोर हो जाती थीं तो विषय बदलने के लिए कभी डॉक्टर प्रणव एवं कभी शैल जीजी भी गाने लगते।

सेनडियागो में प्राण प्रतिष्ठा का क्रम संपन्न हुआ। भोजन के बाद तत्काल लौटना था अतः माताजी से निवेदन किया गया कि गाड़ी के पीछे कमरे में (जिसमें बिस्तर बिछा रहता है) चली जायँ और कुछ समय आराम करें। माता जी मना करती रहीं फिर भी बच्चों के बाल हठ को देखकर अंदर चली गईं शैल जीजी भी साथ में थीं।

अभी 10 मिनट ही हुए होंगे सभी आपस में चर्चा कर रहे थे बाहर। इतने में गाड़ी के पिछले कमरे का द्वार खुला। सभी दौड़कर पहुँचे आखिर क्या बात है? किस चीज की आवश्यकता माताजी, जीजी को? तत्काल माताजी भरे हृदय एवं रुँधे कंठ की स्थिति में चलती हुई बाहर आईं। पूछा गया-’माताजी क्या हुआ-आप आराम करिए न!’ माताजी बोलीं-

‘मेरे बच्चे बाहर बैठे हैं, मुझे उनके बीच ही रहना है हँसना है, बोलना है यही आराम है। अंदर तो बच्चों से दूर जेलखाना जैसा लगता है। जब तक शरीर चलता फिरता रहेगा प्यारे-प्यारे बच्चों के पास रहूँगी उनको प्यार दूँगी उनकी पीठ थपथपाऊँगी। यही तो एक मात्र आधार है-शरीर को बनाये रखने का अपने इष्ट से विछोह को कम करने का। यदि बच्चों से मिलना जुलना न होगा तो इस शरीर को टिकाये रखना मुश्किल होगा।’

लाँस ऐन्जिल्स में बोले गये यह वाक्य सत्य प्रतीत हो रहे हैं और अनुभव हो रहा है कि चित्रकूट अश्वमेधों के बाद माताजी ने कैसे बच्चों से विछोह सहन किया होगा? उन्हें कितना कष्ट हुआ होगा अपने बच्चों से न मिलने पर। कितनी व्याकुल रही होंगी वे, स्नेह रस पिलाने को, पलायन कराने को।

लाँएंजल्स (अमेरिका) में अश्वमेध महायज्ञ संपन्न हो रहा था। परम वंदनीय माताजी का प्रवचन हिंदी में जैसे ही प्रारंभ हुआ, पाँच सौ अमेरिकन ध्यान की मुद्रा में बैठ गए। सभी आश्चर्य चकित थे आखिर इन्हें क्या समझ में आ रहा होगा? किंतु जैसे ही प्रवचन समाप्त हुआ कुछ पत्रकार, अमेरिकन के पास गये ओर पूछने लगे-प्रवचन तो माता जी हिंदी में दे रही थीं उस समय आप ध्यान क्यों कर रहे थे तो अमेरिकन बोल पड़े-

“माता जी सामान्य मदर नहीं हैं स्प्रिचुअल मदर हैं-हमें भावनाओं की भाषा से समझाती हैं माँ और बेटे में भावनाओं का ही तो संबंध स्थापित रहता है माताजी जो बोलीं वह हमारे समझ में आ गया।”

जब और स्पष्ट पूछा गया कि प्रवचन में वे क्या बोली विषय वस्तु क्या था? तो आँखों में आँसू भरकर शब्दशः प्रवचन को सबने दुहराया। माताजी के प्रेमपूर्ण उद्गारों ने बैखरी ही नहीं परा पश्यंति वाणी ने ही उन्हें प्रेरित किया।

सच है परम वंदनीय माता जी बैखरी से अधिक परा-पश्यंति वाणी के माध्यम से प्रेरणा देतीं थीं-मार्गदर्शन प्रदान करती थीं-स्नेह भरा संरक्षण सतत् देती रहती थीं।

लीस्टर अश्वमेध के बाद परम वंदनीय माताजी को भारत आना था। गेटविक एयरपोर्ट पर विदाई का क्रम रखा गया। सभी 500 परिजन इकट्ठे थे। सबके हाथों में पुण्य-माला आदि थे। प्रणाम का क्रम चल पड़ा। प्रणाम समाप्त होने पर एयरपोर्ट के वेटिंग एरिया में पुष्प बिखर गये। माताजी को यह अच्छा नहीं लगा। तत्काल बोल पड़ीं-”बेटा! हमारे कारण अव्यवस्था फैले। गंदगी फैले यह अच्छी बात नहीं है। परिजनों ने फूल बिखराये हैं, उसकी सफाई करें। जैसा स्थान था वैसा ही छोड़े तो मुझे जाते हुए और अधिक प्रसन्नता होगी।

सभी परिजनों ने बिखरे फूलादि इकट्ठे किए। कुछ ही समय में एयरपोर्ट का वह क्षेत्र पूर्ववत हो गया। कुछ ब्रिटिश बैठे यह दृश्य देख रहे थे। इतने अनुशासन प्रिय लोगों को देखकर जानने की जिज्ञासा हुई। परिचय होने पर पच्चीस ब्रिटिश नागरिक प्रणाम करने आये जिन्हें परम वंदनीय माता जी ने आशीर्वाद दिया।

निश्चित रूप से परम वंदनीय माता जी हर वक्त हमेशा अनुशासन एवं व्यवस्था प्रिय थीं। उसी की अपेक्षा औरों से भी रखती थीं।


साक्षात अन्नपूर्णा ही तो थीं वे

परम पूज्य गुरुदेव का समग्र जीवन एक खुली किताब के रूप में सबके सम्मुख रहा। अपने बारे में बहुत कुछ वे स्वयं लिख गये अथवा औरों के माध्यम से अपनी जीवन गाथा वे बता गए। किंतु परम वंदनीय माताजी, जिनने उनके पूरक के रूप में शिव-शक्ति के आधे भाग के रूप में निरंतर काम किया, का जीवन तो अधिसंख्य परिजनों के लिए अंत तक एक रहस्यमयी कथा गाथा के रूप में रहा उनका बहिरंग में सामान्य-सा दीख पड़ने वाला व्यक्तित्व उस हिमखंड की तरह था जिसका एक भाग जो छोटा-सा जल के ऊपर होता है उससे कई गुना हिस्सा जल मग्न होता है। जो उनके बहुत नजदीक रहे, वे जानते हैं कि कितनी विशाल शक्ति का सागर थीं वह सामान्य-सी दृष्टिगोचर होने वाली सत्ता। अलौकिक रहस्यमय सिद्धियों के अनेकों वर्णन पाठकगण इस अंक में पढ़ रहे हैं, आगे भी पढेंगे किंतु व्यक्तित्व जिन घटकों से मिलकर बनता है, उसकी पूर्णता का क्या स्वरूप हो सकता है, व्यावहारिक अध्यात्म जीवनचर्या में कैसे जिया जाता है तथा एक विराट हृदय वाली माता कैसी होती है, किस प्रकार समान रूप में सब पर स्नेहममत्व लुटाती रहती हैं? इसका जीता जागता नमूना हम मातृसत्ता परमवंदनीय माताजी के जीवन में देखते हैं।

जब परम पूज्य गुरुदेव स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते घर छोड़ कर गए थे तब बड़ी विषम परिस्थितियाँ थीं जब वे घर से निकले तो इतनी बड़ी जमींदारी, वैभव से भरे घर को छोड़ते समय उनसे कहा गया उनकी देखरेख करने वाली अभिभावक सत्ता द्वारा कि ‘जब सुराज (स्वराज्य) आ जाय तो राजा बनकर आना हाथी पर बैठके, वह घर में घुसना।’ निर्मोही वैरागी जन्म से ही उस काम के लिए तैयार पूज्यवर एक लोहे का तसला व एक लोटा लेकर घर से निकले थे। परम वंदनीय माताजी से विवाह बंधन में बँधने के बाद भी उनने स्वेच्छा से उस घर से कुछ भी न लिया। दैनिक ‘सैनिक’ आगरा समाचार पत्र के संपादन सहयोगी के रूप में जो वेतन मिलता उससे पहले आगरा में, बाद में दस रुपया मासिक राशि पर मथुरा में माता जी के साथ तीन बार घर बदलने के बाद वर्तमान अखण्ड ज्योति संस्थान में घर बसाया गया। करीब 1945 के मध्य की बात रही होगी। जिस महिला ने कभी सूती-खादी के सामान्य कपड़े न पहने हों, वह मोटी कण्ट्रोल की धोती में गुजारा करे एवं चेहरे पर एक शिकन भी नहीं। मथुरा में आसपास रहने वाले ताने कसते किंतु कोई मन में मलाल नहीं, हिम्मत अंदरूनी इतनी कि कोई आँख से आँख न मिला सके। औघड़दानी के साथ निर्वाह करना कोई आसान काम भी तो नहीं है। वे जिसे चाहे कंधे पर हाथ रखे घर ले जाते। घर में कुछ है भी कि नहीं, यह ध्यान नहीं। पत्रिका का चंदा आया तो या कोई दान आदि की राशि आयी, माताजी के हाथ में गुरुजी पकड़ा देते। यह देखने का काम माताजी का ही था कि एक लोहे के तसले व एक लोटे से वे गृहस्थी कैसे चलायें? कैसे वे आतिथ्य का सामान जुटायें तथा हर आने वाले को भोजन करायें? किंतु पूज्यवर भी जानते थे कि उनकी गुरुसत्ता ने जिसे उनकी सहयोगिनी बनाकर भेजा है, वह सामान्य नहीं है साक्षात अन्नपूर्णा है। माताजी ने तरह-तरह की कटौतियाँ की होंगी स्वयं कितनी बार भूखी रही होंगी पर किसी को पता लगने नहीं दिया तथा किसी को भी खाली पेट नहीं जाने दिया। यही तो लीलापुरुषों के सामान्य दीख पड़ने वाले क्रिया–कलापों का “आँकल्ट” पक्ष होता है।

सारे महीने का हिसाब खर्चा माताजी स्वयं रखती थीं। साथ ही अखण्ड-ज्योति पत्रिका की हाथ से बने कागज पर हाथ से छपाई, किताबों की छपाई व सिलाई तथा धीरे-धीरे करके पूर्व में उपेक्षा करने वाले बाद में घर आकर बस जाने वाले नजदीक दूर के सभी रिश्तेदारों व उनके बच्चों की देखरेख-उनकी पढ़ाई का ध्यान व उनसे भी खाली समय काम करा लेना, पूज्यवर के पास आने वाली नित्य की डाक को खोलकर पढ़ते चले जाना व पूज्यवर द्वारा उनका हाथों-हाथ जवाब लिखते चले जाना यही सब नित्य नैमित्तिक दिनचर्या थी। न जाने कितने बच्चे जो आज बड़ी-बड़ी पोस्ट पर मैनेजर हैं, अधिकारी हैं उनके ऋणी हैं कि यदि माताजी ने उन्हें आत्म निर्भर न बनाया होता तो शायद आज वे वह न होते जो बन पाए हैं।

द्रोणाचार्य की कथा सबको याद है कि कभी उनके पुत्र ने दूध पीने की जिद की थी व उनकी स्थिति एक भिक्षाधारी ब्राह्मण मात्र की थी तब उनकी पत्नी ने आटे का घोल बनाकर दूध पिलाया था व बच्चा अश्वत्थामा संतुष्ट हो गया था। इस युग में ऐसा ही एक घटना क्रम फिर दुहराया गया तथा एक दिन जब सब अतिथि भोजन करके चले गए तब माताजी ने मात्र नमक-मिर्च मिले पानी के साथ आधी रोटी खाली व सोने की तैयारी करने लगीं। उनके पुत्र व पुत्री तब जग रहे थे। उनने जिद की कि वे तो हलुआ खायेंगे। उस समय कहाँ से तो सामान आता व कैसे हलुआ बनता? किंतु हँसते हुए माताजी ने अंदर जाकर आटे का घोल बनाकर उसमें गुड़ मिलाकर दोनों बच्चों शैल व सतीश (मृत्युँजय) को हलुआ खिला दिया। प्रेमवती जो साथ रहती थीं, सब देख रही थीं। बोली मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि तुम व तुम्हारी संतानें इतनी संतोषी हैं। बिना किसी आटे का-बिना-घी-शक्कर का हलुआ मैंने आज देखा है। उनने हँसकर उसे सुला दिया। आज भी उनकी बेटी व बेटे को उस हलुए का स्वाद याद है जिसे खाकर संतुष्ट हो वे सो गए थे।

अपने निज के जीवन में कटौती, कठोरता से बरती गयी सादगी ही व्यक्ति को वास्तव में सही अर्थों में ब्राह्मणत्व उतरा वह ऐसा टिका कि उस पर वैभव न्यौछावर होता चला गया। बच्चों को उनने परिश्रम के बदले राशि पुरस्कार रूप में देना आरंभ किया था, एक पैसे से। उन पैसों को कोई चाहे तो मिठाई-कुलचे बर्फ के गोले खाकर भी नष्ट कर देता पर माँ की सिखावन तो चौबीस घंटे काम करती है। उन्हीं पैसों से बच्चों ने अच्छी-अच्छी किताबें खरीदीं व शादी के समय कुछ पहनने लायक कपड़े बनवाए। यह उन्हीं की शिक्षा थी जो आगे भी हरिद्वार में विशाल शाँतिकुँज बनने तक भी चली व वही क्रियापद्धति यहाँ आने वाला भूखा नहीं रहा जैसा कि अखण्ड-ज्योति संस्थान में होता था। प्रश्न यह नहीं है कि पैसे का अभाव है या किसी के पास साधन नहीं है। साधन न्यूनतम होते हुए भी अपने ब्राह्मणत्व के सहारे व्यक्ति बड़े से बड़े अवरोधों से जूझता हुआ चल सकता है व लोक मंगल के निमित्त एक बड़े से बड़ा निर्माण कर सकता है। शाँतिकुँज का गुरुद्वारा उस का लंगर-बापा जलाराम का भोजनालय इसकी साक्षी है कि यहाँ कभी भी किसी बात की कमी नहीं पड़ी।

माताजी साक्षात अन्नपूर्णा ही थीं व संभवतः उनके पास द्रौपदी की तरह का कोई अक्षयपात्र था, ऐसा सोचने में किसी प्रकार का संदेह मन में नहीं आता। यह इस कारण कि लोहे का एक तसला घर से लेकर चला ब्राह्मण जो इस राष्ट्र की परतंत्रता के संघर्ष के लिए उसे लेकर निकला था, व जिसे उसने अपनी भार्या को विवाह उपहार रूप में सौंपा, वह उसने अंत तक अपने पास ही रखा। ओढ़ी हुई गरीबी व्यक्ति को बदले में अनेक गुनी धन-संपत्ति देती है यदि परमार्थ के लिए जीवन जिया गया हो, उसका प्रत्यक्ष नमूना शाँतिकुँज है जहाँ माताजी को दी जाने वाली वस्तु, कोई भी भेंट की बहुमूल्य वस्तु वापस लौटाकर सबमें समान रूप से इस विशाल कुटुँब में बाँट दी जाती है, उसके बदले उतना ही अधिक पुनः आ जाता है।

एक बार परम वंदनीय माताजी व पूज्यवर एक यज्ञ में एक साथ राजकोट, भावनगर आदि की यात्रा पर गए। जिस घर में पूज्यवर आए हों, वह भी 1967-68 के समय में, जब कि मिशन कहाँ का कहाँ पहुँच गया हो, वहाँ भक्तजनों का आना स्वाभाविक है। एक घर में माताजी ने स्वयं चौके में जाकर देखा कि 8-9 व्यक्तियों के लिए ही खाना बना था, इतनी ही उस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति भी थी पर घर के सामने के मैदान में प्रणाम करने वालों की भीड़ थी। सबको भोजन कराए बिना माँ अन्नपूर्णा स्वयं भोजन कैसे करें? यही पशोपेश की स्थिति थी। माताजी ने गुरुदेव की ओर मुस्कराकर देखा और कहा कि पहले सब भोजन के लिए बैठ जायँ तब हम करेंगे। वे भी मुस्कुरा दिए। माताजी ने चौके में जाकर एक दीपक वहाँ प्रज्वलित कर दिया जहाँ राशन रखा था। घर की मालकिन से कहा कि अब वे रोटी बनाना चालू करें व सब्जी तैयार करती रहें। खाना बनता रहा। उसी भोजन सामग्री में दो सौ से अधिक व्यक्तियों ने भोजन कर लिया, सभी ने दर्शन कर लिए तब माताजी व गुरुदेव ने भी भोजन किया। उसके बाद भी घर वालों के अतिरिक्त आठ व्यक्तियों के लिए भोजन बचा था।

इस लीला को बताइए, क्या कहेंगे। चमत्कार अथवा एक गरीब की लाज की रक्षा लीलावतार द्वारा। ऐसे एक नहीं अनेकों घटनाक्रम हैं जो उनके समीप रहने वाले जानते हैं। शाँतिकुँज में रहने वाले हर कार्यकर्ता को उस समय तक की (1983-84) जानकारी है जब तक परम वंदनीय माताजी पर प्रत्यक्षतः पूरा भार नहीं आया था। प्रत्येक को बाजरे की रोटी बनाकर खिलाना, अपने सामने बिठाकर भोजन करा तृप्त करना, कोयले की अँगीठी पर पापड़ सेंककर खिलाना, लगा कि बच्चों की इच्छा है तो बेसन नमकीन हलुवे के रूप में बनाकर खिलाना हम सबको याद है। उस स्वाद की याद आती है तो मन माँ के स्नेह में भीगकर रस से सराबोर हो जाता है व लगता है, कौन-सा पूर्वजन्म का सौभाग्य था जो साक्षात माँ अन्नपूर्णा का इतना सामीप्य मिला। ये स्मृतियाँ हम सबके लिए एक सौगात हैं, अनमोल धरोहर हैं व हर किसी के लिए उस मातृसत्ता के एक अविज्ञात स्वरूप की झलक-झाँकी हैं, जिसे देख-पढ़ कर हर कोई अध्यात्म सिद्धि का मूल जान-समझ सकता है।


कुछ बहुमूल्य पल अंतरंग गोष्ठी के

संकल्प श्रद्धाँजलि समारोह 1-2-3-4 अक्टूबर 1990 की अवधि में पूरा हुआ। अपने आपमें एक अभूतपूर्व आयोजन जिसमें सभी शिष्यों ने मिलकर अपने आराध्य को संकल्प के साथ आश्वस्त किया कि वे शक्ति से कार्यों को आगे बढ़ायेंगे, कभी उस राह में पीछे न रहेंगे। इस समारोह के तुरंत बाद परम वंदनीय माताजी ने 6 अक्टूबर को मध्याह्न 3 से 5 के बीच एक महत्वपूर्ण गोष्ठी ली। रविवार का दिन था। मिलने वाले भी बहुत थे पर सभी कार्य कर्ताओं को संदेश भेजा गया मिलने का समय पूरा होते ही सभी नये बड़े हाल में जो माताजी के साधना कक्ष से लगा हुआ है एकत्र हों। उसी महत्वपूर्ण कार्यकर्ता गोष्ठी के कुछ बिंदु जो हमने अपनी डायरी में नोट किए थे, यहाँ प्रस्तुत हैं।

‘मेरे प्यारे बच्चों। इस समारोह की अभूतपूर्व सफलता के लिए मैं तुम सभी के परिश्रम की, तुम सभी की लगन व निष्ठा की, ऋणी हूँ। जिस समय देश में चारों ओर आतंक छाया था, वहाँ तुम सभी ने कड़ी मेहनत कर सबको संगठित कर एक नमूना खड़ा किया है व अपनी इस माँ को सही अर्थों में आश्वासन दिया है कि गुरुजी का काम किसी भी स्थिति में रुकेगा नहीं।’

‘दिल्ली से लेकर यहाँ तक जहाँ देखो मारकाट तोड़-फोड़ मची हुई है। कोई भी मार्ग निरापद नहीं है। सारी मुख्य गाड़ियाँ कैंसल हो गयीं तब भी रुकते-रुकते कुछ नहीं तों 10-11 लाख व्यक्तियों की भीड़ यहाँ एकत्र हो गयी। यह नमूना है गुरुसत्ता के प्रति श्रद्धाँजलि व्यक्त करने वालों के स्नेह का। यदि देश की हालत ऐसी गंभीर न होती तो आने वाली भीड़ को एक हरिद्वार जिला तो क्या कई जिले मिलकर भी न सँभाल पाते। वास्तव में यह एक महाकुँभ है जिसमें कोई पोथी का पन्ना नहीं लिखा गया व सब इकट्ठे हो गए। दैवी सत्ता ने ही स्पष्टतः इस असंभव कार्य को संभव बनाया है।’

‘लाखों लोगों ने भोजन किया। इतने भोजनालय चले। फिर भी भण्डार की स्थिति जैसी की तैसी ही बन हुई है। आगे चलकर तुम इससे भी बड़े-बड़े चमत्कार देखोगे।’

‘आगे तुम्हें और भी बड़े-बड़े कार्य करना है। सारे राष्ट्र को जगाना है। बड़े कामों का समापन होता है तो दो चार दिन विराम देकर थकान के निकाल लेते हैं। किंतु तुरंत बाद पुनः दूने उत्साह से अपने काम में-लक्ष्य की ओर बढ़ जाते हैं। तुम लोग भी अपने इस उत्साह में लंबा विराम न लगने देना, नहीं किसी प्रकार की कोई कमी ही आने देना। अभी जो स्फूर्ति का ज्वार उठा है उससे आगे धुंआधार कार्यक्रम करना है, सारे राष्ट्र को हिलाकर रख देना है।’

‘तुम सभी बेटों मेरे वशिष्ठ पुत्रों में से हो। अपनी इस परिवार संस्था में अहंकारियों का कोई स्थान नहीं है। तुम सभी अच्छे हो। मुझे आशा है तुम में से किसी का अहंकार टकराएगा नहीं व टीम भावना के साथ तुम करते चले जाओगे। स्वभाव में जहाँ कहीं भी थोड़ी बहुत कमियाँ हैं, उन्हें दूर कर अच्छी आदतों में बदलने की कोशिश करो। अपनी-अपनी योग्यताएँ बढ़ाओ तुम समर्पण करोगे तो गुरुजी की आवाज ही तुम्हारे चोगे से निकलेगी, कुछ और नहीं।’

‘तुम्हारे समर्पण के बाद तुम्हारे शरीर मन पर तुम्हारा अधिकार कहाँ-रहा? जो कुछ है मिशन का है, हमारा है। अपने आपको प्रामाणिकता की कसौटी पर कसो व अधिक से अधिक त्याग के लिए तैयार रहो। तुमने नौकरी छोड़कर जो त्याग किया है, उसको जितनी भी सराहना की जाय कम है। पर अभी तो उससे भी बड़ा कुछ हासिल करना है, जो हम तुम्हें देंगे।’

‘मेरी तो अब चलाचली की बेला है बच्चो। मिशन को तो तुम्हें ही चलाना होगा। पूर्णाहुति के दिन से ही मेरा मन अब जाने को हो रहा है। मुझ से अपने आराध्य का वियोग सहा नहीं जाता। तुम बुज़दिल मत बनना। वो जो बाजीमार ले गए। अस्सी साल में आठ सौ साल का काम करके चले गए। मुझे तुम्हारी देखरेख को छोड़ गए तो बेटो तीन-चार साल जब तक शरीर साथ देगा व देखूँगी कि तुम मजबूत हो गए हो तो मैं भी चल दूँगी। मैं भला ऐसा ही बन रहा है। किंतु तुम निराश मत होना। चार साल बहुत होते हैं।’

‘तुम सबको देखना है कि आगे क्या होता है सन् 1995 से 2000 में जो काम होंगे वे माता जी नहीं बेटे जी करेंगे। यह और भी शानदार होंगे। अब हम मिशनरी भावना की तरह फैलते चले जायेंगे। देखते-देखते कई गुना हो जायेंगे। तुममें से विवेकानंद निकलेंगे दयानंद निकलेंगे और देखते जाओ तुम से वह करालेंगे जो तुमने सोचा भी नहीं था।’

‘अशक्तता की वजह से मेरे हाथ पैर भले ही न चलते हों पर मेरी शक्ति पूरी तुम्हारे साथ हैं। मेरे हाथ और जुबान खूब चलती है। जब मैंने गुरुजी के साथ रहकर यहाँ तक विकास कर लिया तो तुम मेरा आशीर्वाद लेकर चलो, देखो तो सही तुम्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा दूँगी।’

तुम सबको कोटि-कोटि आशीर्वाद। ॐ शाँतिः।


और कुछ नहीं चाहिये

(गुरुसत्ता के प्रति समर्पित एक साधक की अभिव्यक्ति)


और कुछ नहीं चाहिये (Kavita)

वे हमें मुसकराते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं। मन को मन से मिलाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं॥

क्या करें वे भी उनको बहुत काम हैं, पास उनके है इतना समय ही कहाँ। कब-कहाँ और कैसे हमें मिल सकें वे कभी हैं यहाँ तो कभी हैं वहाँ॥

अब कभी आते-जाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं। मन को मन से मिलाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं॥

वे अकेले भला किसकी-किसकी सुनें, क्योंकि उनके लिए हैं बराबर सभी। कुछ न कम हैं हमारे लिये यह कृपा, हमको मिल जाते गाहे-बगाहे कभी॥

चित को चित में चुराते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं। मन को मन से मिलाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं॥

मेरी रचना उन्हीं की रचाई हुयी, वे ही रचना-रचयिता सभी कुछ तो हैं। उनको क्या-क्या कहें वे कथन से परे, वे ही कवि और कविता सभी कुछ तो हैं॥

कोई ध्वनि गुन–गुनाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं। मन को मन से मिलाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं॥

मोह, माया से हमको छुड़ायेंगे वे, वे हमारी दशा जानते ही तो हैं। अब न कोई मेरा एक वे ही तो हैं, इसको वे भी स्वयं मानते ही तो हैं॥

बीन बौद्धिक बजाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं। मन को मन से मिलाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं॥

वे कहीं भी रहें पास मेरे ही हैं, वे तो विश्वास-आकाश मेरे ही हैं। वे दयावान हैं मेरे भगवान हैं, मेरी हर साँस मधुमास वे ही तो हैं॥

गीत मेरा ही गाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं। मन को मन से मिलाते हुये मिल गये, उनसे अब और कुछ चाहिये भी नहीं॥

श्री रामचरण सिंह “अज्ञात”


कुछ अनुभूतियाँ, जो अब हमारी अनमोल धरती हैं

अध्यात्म और आध्यात्मिकता की चर्चा शुरू होते ही सिद्धि चमत्कारों, विभूतियों की कल्पनाएँ मन में जगमगाने लगती हैं। गोरखनाथ, दत्तात्रेय, अगस्त्य, विश्वामित्र, लोपामुद्रा, अनुसुइया, मल्लीबाई आदि द्वारा किए गए चमत्कारों की चर्चा से पुराने शास्त्रों-ग्रंथों के हजारों-लाखों पन्ने भरे पड़े हैं। इन्हें पढ़ने पर मन में सहज सवाल उठता है कि वर्तमान युग में भी कोई ऐसा तपस्वी हुआ है क्या? जिसमें अध्यात्म, समर्थ शक्ति बनकर प्रवाहित होता रहा हो। क्योंकि सामान्य क्रम में इन दिनों अध्यात्म की पहचान वेश और संवादों से होती दिखाई देती है। इस नाटकीय प्रचलन को हर कहीं खुले आम देखा जा सकता है। निराशा के इस घने अंधकार में परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माताजी प्रखर सूर्य बनकर उदित हुए। गुरुदेव की अलौकिक सामर्थ्य परिजनों से छुपी नहीं है। माँ का प्यार बच्चों पर पिता की अपेक्षा कुछ अधिक ही होता है। गुरुदेव के रहते हुए और उनके जाने के बाद भी माताजी का तप-प्राण अपने बच्चों के घर आँगन में आशीर्वाद वरदान बनकर बिखरता रहा है। सिलसिला अभी थमा नहीं है। शरीर न रहने पर भी अपनी मातृसत्ता सूक्ष्म रूप में पूर्ववत सक्रिय है। उनकी अलौकिक विभूतियाँ हम सबके जीवन को धन्य बना रही हैं। ऐसे सभी घटना प्रसंगों को स्थानाभाव के कारण दे पाना तो संभव नहीं। परंतु उनमें से कुछ की चर्चा नीचे की जा रही है। परिजन पढ़ें और अनुभव करें, कि उनका और उनके परिवार का जीवन वंदनीय माताजी के आँचल की छाया में सुरक्षित है।

1991 अगस्त का महीना था। मेरे ऊपर एक झूठा आरोप लगा, जिसके कारण मैं बहुत दुखी थी। मेरे कमरे में शंकर भगवान एवं माता पार्वती की फोटो लगी है। उस फोटो के आगे मैं बहुत रोई। रोते-रोते सो गयी। तब सपने में देखा चारों तरफ हरियाली है, वहाँ एक तख्त पर हरी किनारी की सफेद धोती पहने माता जी बैठी हुई हैं। वह चश्मा लगाए हुए हैं। मैं उनके पास से निकल कर जा रही हूँ। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा-बेटी! तू रात मुझे बहुत याद कर रही थी और अब मेरे पास से होकर जा रही है। मैं उनके चरणों में गिरने को हुई। उन्होंने मुझे गले लगाकर बहुत प्यार किया। अरे! पार्वती माता जी कहकर मैं उनसे लिपट गयी, उन्होंने मुझे बहुत प्यार किया।

इस स्वप्न के समय तक मैं शाँतिकुँज के बारे में जानती तक न थी। स्वप्न देखने के कुछ दिनों बाद मेरी ननद व नंदोई कानपुर से मेरे घर आए। वे दोनों गायत्री परिवार के अच्छे कार्यकर्ता हैं। उन्होंने मुझ पर शाँतिकुँज चलने के लिए दबाव डाला। उनके बहुत कहने पर मैंने कहा-अच्छा नवरात्रि में चली जाऊँगी। अक्टूबर नवरात्रि शिविर में शाँतिकुँज आयी। भेंट मुलाकात के लिए 12 से 3 बजे के बीच जब मैं माताजी के पास पहुँची तो अवाक् रह गई। लगा इनको कहीं देखा है, दिमाग पर जोर डालने पर सपने की बात ध्यान में आयी। सोचने लगी-तब क्या माता जी ही माँ पार्वती हैं? मुझे इस तरह सोचते देखकर माताजी मुसकराते हुए-”हाँ बेटी! तू ठीक सोचती है। हम अपने बच्चों की प्यार करने के लिए रात के समय उनके घर पहुँचते हैं।” उनके इस कथन पर मैं भाव विह्वल हो उठी।

श्रीमती लता दुबे, मुरादाबाद

सन् 1985 में पूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती मनायी जा रही थी। इन दिनों गुरुदेव सूक्ष्मीकरण साधना में थे। शिविर में आने वाले सभी लोग माता जी से मिलते-जुलते थे। मैं भी अपनी पत्नी के साथ पाँच दिवसीय शिविर में शाँतिकुँज पहुँचा। पहुँचने के दूसरे दिन से ही पत्नी को खूनी पेचिश शुरू हो गयी। मुँह से भी खून आने लगा। शाँतिकुँज में चिकित्सक इलाज कर रहे थे। एक दिन शाम में हालत ज्यादा बिगड़ गयी। आश्रम के मेटाडोरे से हरिद्वार-जिला अस्पताल ले जाया गया। वहाँ के चिकित्सकों ने वापस भेज दिया। हालत में कोई सुधार न हुआ। डॉक्टर प्रणव माता जी के आदेश पर देखने गए। उनके साँत्वना देने पर मैंने कहा-पत्नी मर जाएगी तो माता जी क्या करेंगी? वह समझाते हुए बोले-”चिंता न करो, यहाँ लोग रोते हुए आते हैं, हँसते हुए जाते हैं।” अगले दिन मैं माताजी से मिलने गया। उन्होंने कहा-बेटा घर जाओ। मैंने रोते हुए कहा-पत्नी मर रही है, घर कैसे जाऊँ। माताजी ने पत्नी को अपने पास बुलाया और शैल दीदी से कहा-कि सेब हमारी बेटी को दो। उस सेब को खाते ही वह कष्ट से मुक्त हो गई। हम लोग हँसते-खिलखिलाते उसी दिन घर के लिए प्रस्थान कर गए।

दिग्विजय सिंह बधुआ

यों तो सारा जीवन वंदनीय माता जी के अलौकिक अनुदानों से लबालब भरा है। उन सब की चर्चा करने के लिए शायद उतने ही पृष्ठ लिखने पड़ें जितने दिनों का जीवन है, फिर भी विवरण पूरा नहीं लिखा जा सकेगा। लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जिनमें न केवल माताजी के दिव्य संरक्षण का अनुभव हुआ बल्कि उस संरक्षण के प्रभाव से अंतःकरण का कायाकल्प हो गया। जीवन का घना अँधेरा-चमकते-दमकते प्रकाश में बदल गया।

इस घटना के कुछ साल पूर्व मैं चिकित्सा शास्त्र में उच्चस्तरीय अध्ययन के लिए अमेरिका जाने वाला था। लगभग सभी औपचारिकताएँ पूरी हो चुकी थीं। गुरुदेव-माताजी से आशीर्वाद लेने शाँतिकुँज पहुँचा। गुरुदेव तो सदा की भाँति रहस्य में लिपटी बातें करते रहें। परंतु माता जी ने स्पष्ट स्वरों में कहा-तुम्हारा विदेश जाना उचित नहीं है। विदेश चले जाने पर उचित देख देख नहीं हो पाएगी। किस बात की उचित देख रेख? मन में सवाल गूँजा-आखिर मैं कोई बच्चा तो हूँ नहीं। फिर भी आदेश, मन के सवाल को मन में कुचल-मसल कर फेंक दिया। विदेश जाने की कल्पना तिरोहित हो गई।

बात आई हो गयी। इस बीच बी. एच. ई. एल. के अस्पताल में चिकित्सा अधिकारी के अच्छे पद पर नियुक्ति हो गयी। पोस्टिंग हरिद्वार ही हुई। पत्नी-बच्चे के साथ शाँतिकुँज आने-जाने का क्रम लगा रहता। एक दिन बच्चे के लिए खिलौने वाला स्कूटर लाए। छोटा आठ माह का बच्चा माताजी के सामने उससे खेल रहा था। चाभी भरने पर स्कूटर थोड़ी दूर चलता फिर लुढ़क जाता। माताजी इस सबको देख रही थीं। कुछ सोचती हुई मुझसे बोलीं-”तुम हैलमेट क्यों नहीं खरीद लेते?” उस दिन बात समाप्त हो गई। अगले दिन फिर समझाते हुए कहा-”तुम भी कभी स्कूटर से गिर सकते हो, अपना ख्याल रखा करो।” तीन दिन बाद दुर्घटना हो गयी। सिर में भारी चोट लगी, जबड़ा बचने की कोई आशा न रही। उनकी कृपा से नया जीवन मिला। यह कैसे हो सका? इसे न चिकित्सक समझ सकते हैं, न चिकित्सा शास्त्र। स्वयं चिकित्सा विशेषज्ञ होने के कारण मुझे भी आश्चर्य हुआ। बस उसी दिन से उनका प्रदत्त जीवन उन्हीं के लिए अर्पित हो गया।

(निजी अनुभूति संपादक की)

चित्रकूट धाम में अश्वमेध यज्ञ संपन्न कराने का विचार हम सभी क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं के मन में उभरा। विचार को संकल्प का रूप देने के लिए हम लोग शाँतिकुँज पहुँचे। वहाँ पहुँच कर हम सभी लोगों ने माता जी के सामने अपना मंतव्य स्पष्ट किया। अपनी समस्याओं-परेशानियों की चर्चा करते हुए कहा, हम लोग तो माता जी आपके हाथ की कठपुतलियाँ हैं। जैसा नचायेगी वैसा नाच लेंगे। आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा-बेटा! तुम लोग चिंता न करो, यह परमात्मा का काम है और भगवान का काम स्वयं भगवान ही करते हैं। कार्य का माध्यम बनने वाले यश की धरोहर जरूर पाते हैं।

उनके आशीर्वाद और प्रीति वचनों से धन्य होकर हम लोग चलने लगे। यकायक ध्यान आया उस इलाके में तो पानी नहीं बरसा ठंड भी आ पहुँची। पानी के अभाव में फसल नहीं होगी और फसल के अभाव में जन सहयोग कैसे जुटेगा बस अपनी बात उनसे कह दी। कुछ सोचते हुए वह बोली-अच्छा अभी बरस जाए तो कैसा रहेगा। हाँ ठीक रहेगा सभी ने एक स्वर से कहा। अच्छा ठीक है तो फिर अभी बरसाए देते हैं।

हम लोग इस वरदान पर आश्चर्य चकित होते हुए चल दिये। रास्ते में सोचते जा रहे थे-क्या माता जी का प्रकृति की शक्तियों पर नियंत्रण है? गर्मी, सर्दी बरसात को भी वह नियंत्रित कर सकती है? इसी ऊहापोह में पड़े हम लोग चले जा रहे थे। इलाहाबाद तक पहुँचते-पहुँचते बारिश शुरू हो गयी। खूब जोर की बारिश थी। पूरा इलाका माताजी की आशीर्वाद वर्षा से भीग गया। लोगों की फसल भी अच्छी हुई और जन सहयोग मिला। सब कुछ अनुभव करने पर अपनी अंतरात्मा ने समाधान दिया माता जी शक्तियों का मूलस्रोत आदि शक्ति हैं। उन्होंने मानव शरीर धारण कर गुरुदेव की लीला में सहयोग दिया है। उनकी कृपा से सब कुछ संभव है।

निर्मल सिंह, सतना

गुना अश्वमेध के उपराँत ग्वालियर आने पर मेरे छोटे पुत्र चिरंजीव सिद्धार्थ को तेज बुखार आ गया। आठ वर्ष का बालक ज्वर में तड़प उठा। उसे पास के बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाया। उसने उसे दो दिन की दवा दी। दवा खाने के बावजूद कोई असर न हुआ। उलटा दो दिन बाद पहले वह चलने में लड़खड़ाया फिर पैरों से एकदम असमर्थ हो गया। उसका चलना-फिरना एक दम बंद हो गया। हमें पोलियो का भय था सो उसे फिर चिकित्सक के पास ले गए। चिकित्सक ने कहा पोलियो तो नहीं है, पर एक और कठिन बीमारी की आशंका है। पूछने पर उन्होंने बीमारी का नाम यामोसाइटिस बताया और खून का सी. के. पी. एन्जाइमटेस्ट कराने का निर्देश दिया। सामान्यतया यह आठ वर्ष की आयु में 25 से 200 तक होता है, किंतु वह 510 निकला। अतः रिपोर्ट पॉजेटिव आ गई। हम सभी परेशान हो गए। मैंने वंदनीय माताजी के चित्र के सामने बैठ कर प्रार्थना की। प्रार्थना के समय कान में उनकी आवाज सुनाई दी-रो मत, तेरा लड़का ठीक हो जाएगा और आश्चर्य उसी क्षण से चि. सिद्धार्थ ठीक होने लगा। रात्रि को 12 बजे हमने उसे अश्वमेध का प्रसाद दिया, जिसे उसने बड़े चाव से खाया। सुबह होते तक वह बिलकुल ठीक हो गया। अगले दिन जब हमने उसे चिकित्सक महोदय को दिखाया, तो वे भी हैरान हुए। आखिर असंभव जो संभव हो गया था।

श्रीमती सुनीता धर्माधिकारी ग्वालियर

हम, इंग्लैण्ड के कार्यकर्ताओं मिलकर लीस्टर में 108 कुँडीय यज्ञ, का आयोजन किया था। शाँतिकुँज से डॉ. प्रणव पण्ड्या अपने सहायकों के साथ पहुँचने वाले थे। हम सभी ने खूब जोर-शोर की तैयारियाँ की थीं। परंतु इंग्लैण्ड के मौसम का क्या करें, जिसका कोई भरोसा नहीं। मौसम की खराबी में किसी भी आयोजन में अधिक वाहनों के आने-जाने से सड़कें खराब होने की संभावना बनी रहती है। इसी कारण वहाँ बतौर इन्श्योरेन्स 5000 पाउन्ड जमा कराने पड़ते हैं। डॉ. प्रणव की टोली समय से पहुँच चुकी थी। लेकिन जिसका डर था वही हुआ, यानि कि रात से ही पानी तेजी से गिरने लगा। अब क्या करें? सुबह कार्यक्रम कैसे संपन्न होगा? हम सभी विवश थे। सभी ने मिलकर माताजी का ध्यान किया-कातर स्वर में प्रार्थना की, कि जिस किसी तरह पानी बंद हो। पानी का वेग कम हुआ। सुबह डॉक्टर प्रणव जी ने माता जी से फोन पर बात की, यथास्थिति बताकर उनसे अनुरोध किया कि पानी एकदम बंद होना चाहिए। फोन पर उन्होंने हँसते हुए कहा-तुम लोग परेशान न हो, अभी आधे घंटे के अंदर बादल छट जायेंगे और सचमुच आधे घंटे में मौसम खुल गया। दो दिन तक यज्ञ चलता रहा, पानी की एक बूँद भी न गिरी। यज्ञ समाप्त होने पर, तम्बू, शामियाना उखड़ जाने के तुरंत बाद घनघोर बारिश शुरू हो गयी। जिसका वेग तीन दिनों तक न थमा। सभी आश्चर्य विभोर थे।

चन्द्रेश जोश लीस्टर-इंग्लैण्ड

उलझनों भरी इस जिंदगी को कैसे जिएँ? इस सवाल का जवाब सोचते-सोचते थक गया था। व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक संघर्षों की जटिलता से लड़ते-लड़ते अत्याधिक मानसिक दबाव महसूस होने लगा और अनिद्रा रोग की शुरुआत हुई। भिलाई, ग्वालियर आदि सब जगह इलाज कराया, किंतु कुछ भी फायदा न निकला। हाँ परेशानी जरूर बढ़ती गयी।

अंततः अपने छोटे भाई की सलाह के अनुसार फरवरी 1981 में शाँतिकुँज आश्रम पहुँचा। भेंट मुलाकात के दौरान वंदनीय माताजी से अपनी समस्या कह सुनायी। उन्होंने आश्वासन भरे स्वरों में कहा-परेशान मत हो बेटा! तू तो ये सोचा कर मेरी एक माताजी हैं, भला माँ के रहते बालक को परेशान होने की क्या जरूरत। उनके शब्दों में कुछ जादू की मिठास थी, मन गदगद हो गया। चलते समय उन्होंने रक्षा कवच और हवन भस्म की एक पुड़िया दी। रक्षा कवच गले में धारण कर लिया। हवन भस्म रोज रात में सोते समय लगाने लगा। दो वर्षों का अनिद्रा रोग दो दिनों में समाप्त हो गया। शाँतिकुँज से प्रसन्न घर वापस लौटा। घर पहुँचने के बाद धीरे-धीरे अन्य पारिवारिक, सामाजिक, समस्याएँ भी सुलझती चली गयीं। उनके कहे गए शब्द हमारा जीवन संबल बन गए। आज भी मन उन्हें गुनगुनाता रहता है-’भला माँ के रहते, बालक, को परेशान होने की क्या जरूरत।’

श्री किशन देवाँगन, बिलासपुर

मैंने आश्विन नवरात्रि से 40 दिन का, सवा लक्ष का गायत्री महामंत्र के अनुष्ठान का संकल्प लिया। अनुष्ठान शुरू करने के पूर्व हमने संरक्षण एवं दोष परिमार्जन हेतु वंदनीय माताजी को पत्र लिख भेजा। उस पत्र में यह भी लिखा कि चालीसवें दिन अनुष्ठान की पूर्णाहुति के समय परम वंदनीय माता जी स्थूल शरीर से न सही सूक्ष्म शरीर से ही पूजा पीठ पर पधारने की कृपा करें। पत्र के जवाब में लिखा था कि वह सूक्ष्म रूप में अवश्य आएँगी। जवाब पढ़कर प्रसन्नता हुई, मनोबल भी बढ़ा। यह बात एक-आध सप्ताह याद रही, फिर अनुष्ठान की दिनचर्या की व्यस्तता में कुछ भी याद न रहा।

चालीसवें दिन पूर्णाहुति का कार्यक्रम था। मैं सपत्नीक गायत्री महामंत्र की आहुति देकर यज्ञ कर रहा था। बीच-बीच में माँ गायत्री का ध्यान करते हुए आँखें बंद कर लेता। उसी समय एकाएक दृश्य परिवर्तित हो गया। ध्यान तो मैं माँ गायत्री का कर रहा था। पर उनके स्थान पर माताजी का स्वरूप उगते सूर्य के रंग के आभा मंडल के बीच दिख रहा था। यह स्वरूप पूजावेदी के ऊपर रखे फोटो के थोड़ा ऊपर दिखने लगा।

उसके बाद अचानक ही हृदय की धड़कन बढ़ने लगी। शरीर शिथिल हो गया। मुझे यह नहीं मालूम पड़ रहा था कि मैं क्या कर रहा हूँ। यद्यपि मैं अपनी जानकारी में मंत्रोच्चारण कर रहा था, पर यह भान नहीं था कि कब मंत्र प्रारंभ हो रहा है, कब स्वाहा बोला जा रहा है। दो-चार आहुतियाँ बिना स्वाहा के ही डाल दीं। पत्नी ने टोका भी पर मेरी स्थिति अजीब थी। कुछ देर में धड़कने कम हुईं। मैं होश में आने लगा। धीरे-धीरे दृश्य दिखाना बंद हो गया। यज्ञ कर्म समाप्त होने पर कन्या भोज के बाद माताजी की सूक्ष्म रूप में आने वाली बात ध्यान में आयी। साथ ही यह भी समझ में आया कि माँ गायत्री एवं वंदनीय माताजी एक ही महाशक्ति के दो रूप हैं।

पीताँबर प्रसाद शर्मा, ग्रा. पो. साँडा जनपद सीधी (म. प्र.)

पत्नी के पेट में पथरी हो गयी। डॉक्टरों ने एक्सरे के बाद बताया कि आप्रेशन कराना पड़ेगा। हमने शाँतिकुँज पहुँच कर गुरुदेव से बताया, तो गुरुदेव ने कहा वह सब ठीक हो जाएगा। माताजी से रक्षा कवच ले लेना।

गुरुदेव से मिलने के बाद परिजन माताजी से मिल रहे थे। वह शिविर समाप्ति के बाद विदाई का दिन था। माताजी सबको यज्ञ भस्म की पुड़िया दे रही थीं। उसी लाइन में खड़े होकर जब हमने प्रणाम किया, तो उन्होंने हमें भी भस्म दिया। जब हमने बताया कि गुरुदेव ने रक्षा कवच के लिए कहा है तो वह बोलीं भस्म के साथ ही दे दिया है, बेटा। मैंने देखने पर पाया कि भस्म की पुड़िया के साथ ही रक्षा कवच भी था। मैं सोचने लगा कि माताजी तो सबको सिर्फ भस्म दे रही हैं, फिर मेरे बिना बताये उन्हें यह कैसे मालूम हो गया कि लाइन में खड़े इसी आदमी को गुरुदेव ने रक्षा कवच के लिए कहा है। बहुत सोचने पर यही लगा कि वास्तव में गुरुदेव, माताजी दोनों एक ही हैं। ताबीज को धारण करने के बाद डॉक्टर ने कहा पेट में कोई रोग नहीं है।

सत्यमसिंह सरग्रुजा (म. प्र.)

कनाडा के टोरेन्टो शहर में आवमेध यज्ञ की तैयारियाँ चल रही थीं। सभी उल्लास में थे। एकाएक बादलों के घिर आने से सभी के चेहरों पर उदासी छा गयी। प्रायः रोज पानी बरस जाता। टेण्ट हाउस के मालिक ने सलाह दी कि आयोजन का विचार छोड़ दो। भला ऐसे में किस तरह इतना बड़ा यज्ञ संपन्न हो सकेगा। शाँतिकुँज से अग्रिम तैयारी हेतु आए जयंती भाई ने उससे कहा-”आप चिंता न कीजिए। हमारी माताजी आयेंगी, उनके आते ही बरसात बंद हो जाएगी।”

उसने जयंती भाई की ओर अविश्वास भरी नजरों से देखते हुए कहा भला किसी के आने से बरसात बंद होने का क्या संबंध? लेकिन भक्त का मान तो भगवान ही रखता है। वंदनीय माताजी को डॉ. प्रणव और शैल बहन के साथ कनाडा पहुँचना था। वह जैसे ही हवाई जहाज से उतरीं कि पानी बरसना बंद हो गया। यज्ञ समारोह पूरे उल्लास और धूमधाम से संपन्न होता रहा। समारोह के अंतिम दिन मौसम विभाग ने सूचना दी कि आज दो बजे से ओलों के साथ वर्षा होगी। कार्यकर्ताओं ने इसकी सूचना माताजी को दी। उन्होंने कहा तुम लोग चिंता न करो यज्ञ को तीन बजे तक चलने दो। यज्ञ तीन बजे समाप्त हुआ। उसके बाद वह अपने सहायकों के साथ हवाई अड्डे आयीं। वहाँ से वह भारत के आने के लिए हवाई जहाज पर बैठीं। हवाई जहाज उड़ने के बाद ओलों के साथ जोरों से बारिश शुरू हो गई। पायलट ने आकाश में पहुँचने पर यात्रियों को बताया कि आज हमारा आखिरी विमान है जो टोरेन्टो हवाई अड्डे से उड़ सका।

जयंत एवं प्रुल्ल देसाई, टोरेन्टो कनाडा

अक्टूबर सन् 1991 में हमारी दुकान में चोरी हो गयी। दुकान हम दोनों भाई सँभालते थे। पिता जी के डर से हम दोनों भाई घर से भाग निकले। घर में पिता जी के लिए एक पत्र छोड़ दिया, जिसमें लिखा कि दुकान की चोरी के कारण घर से जा रहा हूँ। पर जहाँ भी रहूँगा आपके

सम्मान में आँच न आने दूँगा। घर से जिस किसी प्रकार हम लोग दिल्ली पहुँचे। वहाँ डाक टिकट समारोह में हमने माता जी के प्रणाम दर्शन का सौभाग्य पाया। दिल्ली से शाँतिकुँज आना हुआ। यहाँ स्वागत कक्ष पर हम दोनों को सिर्फ दो दिन रुकने की आज्ञा मिली। परेशानी बढ़ती रही-रोना आता रहा। कैसे करें? क्या होगा? इसी सोच-विचार में मन उद्विग्न था।

जैसे ही हम लोग माता जी के पास चरण स्पर्श के लिए पहुँचे। उन्होंने हम दोनों का तिलक कर दिया। बात कुछ समझ में नहीं आयी। बाद में माता जी ने कहा हमारी दो बेटियाँ गौरी और इन्दू हैं। इन्हें तुम दोनों को दे रहे हैं। यदि ये न चाहो तो हम आशीर्वाद देते हैं, तुम दोनों घर जाओ, दुकान चलेगी, लखपति बन जाओगे। पर लक्ष्मी नहीं माया मिलेगी। हम भाइयों ने कहा-माता जी हमारे पास कुछ नहीं है, शादी करके क्या करेंगे। उन्होंने कहा शादी कर रहे हैं तो सारे जीवन का खर्च उठाने की हैसियत भी हम रखते हैं।

तुम लोग हमारे बच्चे हो। मैं इतने बच्चों को इस शरीर से नहीं पैदा कर सकती थी। इस कारण विभिन्न स्थानों पर पैदा किया, पर हो तुम सब हमारे ही अंश जो बिखर गये हो। तुम्हारी दुकान पर चोरी, भागना, आना, यह सब हमें मालूम है। तुम लोग निश्चिंत रहो। जब शादी संपन्न हो रही थी, उसी समय स्वागत कक्ष पर पिता जी आ पहुँचे। वह हम दोनों को ढूँढ़ते हुए आए थे। उन्हें शीघ्र विवाह स्थल पर भेजा गया।

आशीर्वाद लेते समय मेरे पिता जी ने वंदनीय माताजी से कहा कि शादी तो आपने इन बच्चों की करा दी। अच्छा ही हुआ, आपके ही बच्चे हैं। लेकिन पर इसकी माँ, बहन, भाई हैं, वे सब क्या कहेंगे। सोचेंगे किसकी कहाँ शादी हो गयी, हम लोग देख भी नहीं पाए। माता जी बोलीं-देखने की बात है तो बच्चों की शादी सबको दिखा देंगे और सभी परिवार वालों ने उसी दिन एक ही रात में अपने स्वप्नों में शाँतिकुँज में संपन्न हुई शादी का सारा विधि-विधान देखा। सुबह उठने पर सभी संतुष्ट थे। इस घटना के साथ मैंने अपना जीवन मिशन में समर्पित कर दिया।

ईश्वरी यादव भिलाई नगर

मुझे सन् 1961 से ही परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माताजी की स्नेह छाया में रहने का सौभाग्य मिला है। शुरू से ही मेरा झुकाव गुरुदेव की अपेक्षा माताजी की ओर अधिक रहा है। शायद इसलिए माँ का ममत्व बच्चों को अधिक आकर्षित करता है। कुछ भी हो लेकिन माता जी का प्यार मेरी हर साँस में बसा है। जब कभी कोई परेशानी आयी, मन दुखी हुआ, माताजी यादों में, भावों में, जगमगाने लगतीं।

उस समय भी कुछ ऐसा हुआ। यों यह घटना आज से 29 वर्ष पुरानी है। पर सब कुछ मेरी यादों के खजाने में ज्यों का त्यों सुरक्षित है। भला ऐसी निधि को कौन खोना चाहेगा। बात सन् 1966 की है। इन दिनों मैं कानपुर के जी. एस. पी. एम. मेडिकल कॉलेज में एम. एस. कर रहा था। निवास भी मेडिकल कॉलेज के पोस्ट ग्रेजुएट होस्टल में था। इस होस्टल के कमरा नंबर 16 में मैं अकेला रहता था।

एक दिन अपने कमरे में दुखी मन बैठा था। मेरे मोजे फट गए थे। टूटी-फूटी साइकिल से तीन चार मील दूर उर्सला अस्पताल जाना पड़ता था। पढ़ाई में अलग से कठिनाई थी। क्योंकि उस समय डॉ. सिन्हा के आधीन एम. एस. करना बड़ा कठिन माना जाता था। हम लोग कुल पाँच विद्यार्थी थे। जिसमें एक मद्रास विश्व विद्यालय का गोल्डमेडलिस्ट, एक कलकत्ता यूनिवर्सिटी का टॉपर, एक लखनऊ मेडिकल कॉलेज से आया मेधावी छात्र था, एक विद्यार्थी और था जो चार सालों से फेल हो रहा था। पांचवां मैं था, जिसके लिए एम. एस. की पढ़ाई अति कठिन लग रही थी।

इसी सोच विचार में डूबा माताजी को याद कर रहा था। पुकार रहा था, माता जी को मदद करो! दुखी मन से खूब उनकी याद किए जा रहा था। तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलने पर देखा एक लड़का खड़ा था। वह बोला मैं यहीं एम. बी. बी. एस. के पहले साल में पढ़ रहा हूँ। कानपुर के सूटरगंज मुहल्ले में मेरे माता-पिता हैं। वहीं पास में आपके छोटे भाई के श्वसुर रहते हैं। उन्होंने आपसे मिलने को कहा था। फिर कहने लगा-कि आप पुरानी साइकिल पर उर्सला अस्पताल जाते हैं। आप मेरी नयी साइकिल ले लें। ऐसे भी मैं फर्स्टइयर में हूँ, सीनियर लोग साइकिल ले जाते हैं। कई बार मना करने पर भी जबरदस्ती अपनी नयी साइकिल दे गया।

जब जूते पहनने गया, तो देखा एक नया नायलोन का मोजा जूतों के पास रखा था। अभी तक उसका रैपर तक न खोला गया था। कमरे में मैं अकेला था। समझ में नहीं आया कि मोजा वहाँ तक पहुँचाया किसने? पर सच्चाई सामने थी। शाम को एक और लड़के से मुलाकात हुई। उसने स्वयं अपना परिचय दिया, मेरा नाम डॉ. आर. सी. रेलन है। अपना एम. एस. पूरा करने के बाद मैं यहीं इसी कॉलेज में डिमाँस्ट्रेटर हूँ मुझे बाँस ने तुम्हारे एम. एस. की तैयारी के लिए भेजा है। उन्होंने मेरी बहुत मदद की। परीक्षा में केवल दो ही पास हुए उनमें से एक मैं था। मथुरा पहुँचने पर मैंने पूरी घटना माताजी को सुनाई और पूछा आपको क्या सबके कष्ट मालूम होते हैं? उनका जवाब था-अपने बच्चों का ख्याल तो रखना ही पड़ता है। सचमुच माँ के सिवा बच्चों का ख्याल और कौन रखेगा?

डॉ. अमल कुमाल दत्ता, शाँतिकुँज

मेरे एक घनिष्ठ परिचित सज्जन हैं। उनके लड़के की तबियत काफी अरसे से खराब रहती थी। काफी इलाज करवाया, परंतु सुधार के कई लक्षण नहीं दिखाई दिए। काफी छान-बीन के बाद डॉक्टरों ने पाया कि लड़का ब्लड कैंसर का रोगी है। उसे टाटा कैंसर हास्पिटल ले जाया गया। वहाँ चिकित्सा विशेषज्ञों ने पाया कि लड़के का ब्लड कैंसर थर्ड स्टेज में है। ऐसी स्थिति में चिकित्सा का कोई उपयोग नहीं। उन्होंने कह दिया कि बच्चा कुछ ही दिनों जीवित रहेगा। सब निराश हो गए।

निराशा के इस घने अंधेरे में मेरे लिए आशा का एक ही सूर्य थीं वंदनीय माताजी। मैंने उन लोगों को शाँतिकुँज चलने की सलाह दी। शाँतिकुँज पहुँच कर उन सभी ने लड़के की हालत से माताजी को अवगत कराया। लड़के, माँ-बाप विकल थे, उनकी रोनी सूरतें देखकर माता जी करुण हो उठीं, उनकी आँखें भर आयीं। रुँधे कंठ से कहने लगी बेटा! तू चिंता क्यों करता है, तेरा लड़का ठीक हो जाएगा। परेशान होने की जरूरत नहीं। सभी वापस घर लौटे। सभी ने आश्चर्य से देखा लड़के की हालत दिन पर दिन सुधरने लगी थी। उसे फिर से टाटा कैंसर हास्पिटल ले जाया गया। अब तो डॉक्टरों के चौंकने की बारी थी। सारे परीक्षणों के बाद उन्होंने घोषित किया अब तो लड़के में कोई रोग का निशान नहीं बचा। माँ की करुणा से भला क्या असंभव है?

सुश्री आशा ज्ञानी, बम्बई

नागपुर अश्वमेध महायज्ञ के सिलसिले में हम पाँच स्थानीय कार्यकर्ताओं की टोली लखनादौन तहसील में कार्यक्रम कर रही थी। टोली का नेतृत्व मैं कर रहा था। कार्यक्रम संपन्न करते हुए हम लोग नागनदेवरी के पास टोला नाम के गाँव में पहुँचे। इस गाँव में बीस पच्चीस घर हैं। यहाँ कोई युग निर्माण से परिचित न था। हाँ गाँव वालों ने हमारे दादा स्व. पं. कन्हैया लाल तिवारी का नाम जरूर सुन रखा था। यह जानकर कि मैं उनका नाती हूँ, गाँव के लोग बड़े प्रसन्न हुए।

एक जगह दीपयज्ञ का आयोजन रखा गया। गाँव के प्रायः सभी लोग आ जुटे। दीपयज्ञ की समाप्ति पर वोरा नाम के दस वर्षीय बालक को लेकर उसका पिता आया और कहने लगा कि आप लोग हरिद्वार से आए हैं, महात्मा हैं, मेरे ऊपर कृपा कीजिए। विवरण पूछने पर उसने कहा-यह मेरा लड़का जन्म से गूँगा है इसे ठीक कर दीजिए। डॉक्टरों की राय में तो यह अब जीवन में कभी नहीं बोल सकेगा, अब आप ही कृपा करें। मैं बहुत घबड़ाया-सोचा आज सारी महात्मागिरी धूल में मिल जायेगी। लोग हंसेंगे सो अलग। फिर दिमाग में आया इसमें मेरी प्रतिष्ठा का क्या सवाल है? प्रतिष्ठा तो माताजी की है। हम लोग तो उन्हीं के कहने से भटक रहे हैं और उनकी कृपा से सब संभव है।

यही सोचकर हमने वंदनीय माताजी के चित्र के सामने प्रणाम करके सभी से चौबीस बार गायत्री मंत्र जप करने के लिए कहा। सब लोग गायत्री मंत्र का सस्वर पाठ कर रहे थे और मैं मन ही मन माता जी से कातर भाव से प्रार्थना कर रहा था हे माता जी। इस बालक को बोलने, सुनने की शक्ति दो। गायत्री जप समाप्ति पर माता जी का स्मरण करते हुए उस पर शाँति पाठ के साथ जल छिड़का जल छिड़कते ही बच्चा माँ माँ कहते हुए अपनी माँ से लिपट गया। इस अविश्वसनीय सत्य को सभी ग्रामवासी अपनी आँखों से देख रहे थे। हर कोई माता जी का जयघोष करते हुए प्रसन्नता से नाच रहा था। जिनका नाम स्मरण करने पर असंभव संभव हो सकता है। उनके व्यक्तित्व का गुणगान भला हम निपट अज्ञान कैसे कर सकते हैं। बस हर साँस के साथ यही कहते रहते हैं माँ अपने बालकों पर अपनी कृपा बनाए रखना।

आनन्द तिवारी लखनादौन

मैं नर्स की नौकरी करती हूँ। दौड़-भाग की सैकड़ों परेशानियाँ लगी रहती हैं। छोटे अस्पतालों में नर्स की नौकरी करना कितना कठिन है, इसे तो कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है। हम लोग सभी भाई-बहिन बचपन से अपने माँ-पिता जी के साथ शाँतिकुँज आते रहे हैं। हमारे लिए हर समस्या का एक ही समाधान रहा है-गुरुजी माता जी से कह देंगे। जून 90 में जब गुरुदेव ने महाप्रयाण किया तब भावनाएँ कसमसा उठीं, मन तड़प उठा। भागी-भागी शाँतिकुँज आयी। माता जी से लिपट कर रो पड़ी। उन्होंने दिलासा देते हुए कहा, अरे, चिंता क्यों करती है, मैं तो हूँ। मेरे रहते तुझे परेशान होने की क्या जरूरत है।

बात आई गयी हो गयी। मन माताजी में लग गया। सितम्बर 94 में जब माता जी के महाप्रयाण का हृदय विदारक समाचार सुनने को मिला। मैं जार-जार रो पड़ी। अस्पताल जाना छूट गया। बस रोए जा रही थी। अब मेरा क्या होगा? किसकी शरण में जाकर अपना दुखड़ा सुनाऊँ। उस दिन जिस किसी तरह रोते-रोते झपकी आ गयी। देखती क्या हूँ मेरे सिराहने माता जी खड़ी हैं। उनका पूरा शरीर सूरज की तरह चमक रहा है। मेरे सिर पर हाथ फिराते हुए बोली-पागल कहीं की रोती क्यों है। मैं मरी कहाँ हूँ, देख तेरे पास खड़ी हूँ। मैंने तो सिर्फ शरीर छोड़ा है। शरीर का बंधन हटते ही अब तो और अधिक सक्रियता बढ़ गई है। मैं तेरी पहले से ज्यादा सहायता कर सकूँगी। कभी मेरी याद करके तो देखना, तुरंत मेरी मदद तुम तक पहुँचेगी। सुबह उठने पर मन बहुत प्रसन्न था। शरीर भी काफी हलका लग रहा था। उनकी कृपा से समस्याएँ भी एक-एक करके निबटती जा रही हैं। मेरे मन में पूरा विश्वास है, कि मेरी माँ दूर नहीं गयीं। वह और अधिक हम लोगों के पास हो गयी हैं।

श्रीमती ऊषा उपाध्याय, बाँदा

अपनी लड़की की शादी के लिए मैं इधर काफी दिनों से परेशान था। इधर वंदनीय माता जी के देहावसान की खबर मिली। खबर सुनते ही ऐसा लगा कि अपना सब कुछ लुट गया। एक माता जी ही तो थीं जिनकी गोद में सिर रखकर थके जीवन को नयी ऊर्जा मिलती थी। अब क्या होगा? एक जगह जहाँ बच्ची की शादी के लिए बात चला रहे थे वे सब कुछ तय होने के बाद मुकर गए। परेशानी बढ़ती जा रही थी। समाधान कुछ था नहीं।

एक रात को यही सब सोचते-सोचते सो गया। सोते समय मन बड़ा विकल था। यही विचार कर रहा था कि माता जी अगर आप होतीं, तो आज ये दिन क्यों देखने पड़ते। आपसे कह देते समस्या सुलझ जाती। पर अब किससे कहें, कहाँ जाएँ? नींद आने पर स्वप्न में दिखाई दिया- बेटा। तू परेशान क्यों होता है? शरीर तो मैंने अपनी मर्जी से छोड़ा है। शरीर छोड़ने को तूने मरना मान लिया। मैं कभी नहीं मरूंगी। अपने बच्चों को प्यार-ममत्व हम पहले से भी अधिक देंगे। तुम सभी की समस्याएँ सुलझाने संरक्षण देने का दायित्व हम पर है इसे हम पहले की अपेक्षा अधिक समर्थता के साथ पूरा करेंगे। तेरी लड़की की शादी उसी लड़के के साथ शाँतिकुँज में संपन्न होगी। परेशान होने की कोई जरूरत नहीं। अगले दिन लड़के के घर वाले मेरे यहाँ आए। उन्होंने सारी बातें मिल बैठ कर सुलझायीं। यही नहीं शाँतिकुँज जाकर शादी संपन्न करने के लिए तैयार हो गए। विवाह शाँतिकुँज में गुरुदेव माता जी के सूक्ष्म संरक्षण में संपन्न हुआ। डॉ. प्रणव भाई साहब, शैल दीदी की ओर से सूक्ष्म सत्ता का आशीर्वाद मिला निःसंदेह माता का प्यार भरा सहारा उनके शरीर छोड़ने के बाद घटा नहीं बढ़ा है।

एक परिजन, कानपुर

एक परिजन, कानपुर


शक्तिस्वरूपा माँ भगवती (Kahani)

गीत रिकार्डिंग का क्रम ऊपर वाले कमरे में चल रहा था। जब परम वंदनीय माताजी को अपने परिवार की याद आई बचपन की याद आई तो स्वयं सभी वादक बंधुओं को सुनाने लगीं।

“जब मेरा जन्म हुआ तो लड़की होने के कारण पास-पड़ोसी एवं घर वाले परंपरागत विचार होने के कारण रोने लगे। मेरे नाना जी उच्चकोटि के ज्योतिष थे। जब उन्हें पता चला कि बच्ची के जन्म पर खुशियाँ मनानी चाहिए उसके स्थान पर लोग रो रहे हैं तो गुस्से से भरकर उनने सबको चुप किया और ऊँची आवाज में बोले मूर्खों! तुम्हें समझ में नहीं आ रहा है कौन अवतरित हुई हैं हमारे घर! साक्षात भगवती माँ अन्नपूर्णा-ईश्वर की सहचरी भगवान शंकर की अर्धांगिनी शक्तिस्वरूपा माँ भगवती ने अवतार लिया है घर में। इसके पीछे करोड़ों लोग चलेंगे, करोड़ों को प्यार बांटेंगी उनके आँसू पोछेंगी एवं दुःख कष्टों को दूर करेगी। इसके दर्शन मात्र से ऋद्धि-सिद्धियाँ व्यक्ति के ऊपर बरसेगी। जहाँ जायेंगी जहाँ रहेंगी जहाँ चरण पड़ेगा वह स्थान तीर्थ बन जायेगा।

इस प्रेरणा प्रद उद्गार को सुनकर सभी घरवाले स्तब्ध रह गये उनकी बोलती बंद हो गई।

बात परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद की है। वंदनीय माता जी को ईश्वर के साथ, भगवान के साथ एकाकार वाले गीत पसंद थे और वे उसी में तन्मय हो जाती थीं। इतनी भाव विभोर हो जाती थीं जैसे लगता था कि पूज्यवर स्वयं उपस्थित हैं जिन्हें माँ गीत सुना रही हों। कभी-कभी गीत के अंत में फूट-फूट कर रोती थीं-रिकार्डिंग करना मुश्किल हो जाता था। बाद में कहतीं क्या करूं गाया नहीं जाता।

एक दिन गीत रिकार्ड करने के लिए संगीत के सभी भाई बैठे थे, स्टूडियो के भी भाई बैठे हुए थे अनायास ही माता जी बोलीं-’बच्चों तुम्हें लगता होगा माताजी को गीत क्यों पसंद हैं और इतने गहराई के साथ क्यों गाती हैं? मिलने-जुलने के समय भी 4-5 घंटे संगीत में क्यों देती हैं? तो मैं आज बताती हूँ रहस्य की बात।

‘गीत गाने के बहाने मैं अपने इष्ट, भगवान की उपासना करती हूँ-जब भी गाती हूँ वे साक्षात उपस्थित हो जाते हैं-मुस्कुराते हैं-प्रसन्न होते हैं उतनी देर उनकी स्थूल उपस्थिति का लाभ मिल जाता है जिसके आधार पर उनके विछोह में परेशान नहीं होती इस शरीर को उनके बिना टिकाये रखने का आधार मिलता है। यही मेरी उपासना है, भक्ति है, जो संगीत के माध्यम से संपन्न होती है।’


ममता की मूरतः जगजननी


ममता की मूरतः जगजननी(Kavita)

कोटि-कोटि संतानों को तुम, ममता में नहलाती थीं, इसीलिए ममता की मूरत, जगजननी कहलाती थीं।

तुमने ही अखंड दीपक की, रक्षा का दायित्व लिया, गुरु के पद चिह्नों पर तुमने, निशि-वासर अनुसरण किया,

गुरुवर के दीपक की माता! स्नेहमयी तुम बाती थीं। इसीलिए ममता की मूरत, जगजननी कहलाती थीं।

गुरु-चरणों से अधिक न कुछ भी, जीवन में आकर्षण था, गुरु के सपने सजे, इसीसे, सब कुछ किया समर्पण था,

अपने सुख-साधन देने में, कभी न तुम सकुचाती थीं। इसीलिए ममता की मूरत, जगजननी कहलाती थीं।

गुरुवर ने जब कभी हमें निज, भूलों पर फटकारा था, तुमने ही तब बड़े प्यार से, माता! हमें दुलारा था,

जब भी घिरे व्यथाओं में हम, तुम करुणा बरसाती थीं। इसीलिए ममता की मूरत, जगजननी कहलाती थीं।

गुरु से दूर हुए थे जब हम, तुमने हमें सँभाला था, उस विछोह में मिला तुम्हारी, ममता का उजियाला था,

भटकावों के बीच तुम्हीं, चलने का चाव जगाती थीं। इसीलिए ममता की मूरत, जगजननी कहलाती थीं।

एक आँख में अनुशासन की, अति कठोर लाचारी थी, और दूसरी में माँ! कोमल, करुणा भरी तुम्हारी थी,

अनुशासन के बीच तुम्हारी, आँखें भर-भर आती थीं। इसीलिये ममता की मूरत, जगजननी कहलाती थीं।

हम जैसे भी थे माँ! तुमने, हमें सदा दुलराया था, सुख-दुख सब जीवन के भूले, इतना प्यार लुटाया था,

जहाँ कहीं मरुस्थल मिलता था, तुम रस-धार बहाती थीं। इसीलिये ममता की मूरत, जगजननी कहलाती थीं।

स्नेह और ममता में माता! भीगे सदा रहेंगे हम, लड़ते सदा रहेंगे तम से, झंझावात सहेंगे हम,

करुणा कभी न भूलेंगे, जो हर पल हमें सिखाती थीं। माँ! जिससे ममता की मूरत, जगजननी कहलाती थीं।

शचीन्द्र भटनागर


तुम तो बस ‘माँ’ हो


तुम तो बस ‘माँ’ हो(Kavita)

कैसे समझें तुम क्या-क्या हो? हे माता! तुम तो बस माँ हो॥

वेदमूर्ति बनकर गुरुवर ने, जीवन का जो पाठ पढ़ाया। सींच उसे ममता से तुमने, पाला-पोसा, बड़ा बनाया॥

वे पर्जन्य, बीज से हैं तो, हे माँ! तुम उर्वर वसुधा हो। कैसे समझें तुम क्या-क्या हो? हे माता! तुम तो बस माँ हो॥ युगऋषि ने वन तपोनिष्ठ-गुरु,

कर्मठता हमको सिखलायी। गोद बिठा पयपान कराकर, शील हमें माँ ही दे पायी॥

जिसको पा, साधक पकते हैं, माता तुम ऐसी सुविधा हो। कैसे समझें तुम क्या-क्या हो? हे माता! तुम तो बस माँ हो॥

गुरुवर ने शिवरूप बनाकर, अशिव वृत्ति का घेरा तोड़ा। महाशक्ति बन तुमने माता, कर्मशील को शिव से जोड़ा॥

‘अशिव’ जहाँ ‘शिव’ बन जाता है, तुम ऐसी अनुपम विद्या हो। कैसे समझें तुम क्या-क्या हो? हे माता! तुम तो बस माँ हो॥

उनने तो सद्बुद्धि जगाकर, दिव्य मार्ग पर हमें बढ़ाया। तुमने निर्बल भाव उभारे, उस शुभ पथ को सरस बनाया॥

‘प्रज्ञा प्रखर’ रूप गुरुवर हैं, माँ तुम विमल-सजल श्रद्धा हो। कैसे समझें तुम क्या-क्या हो? हे माता! तुम तो बस माँ हो॥

अग्निरूप तेजस्वी उनने, ‘जीवन यज्ञ’ हमें समझाया। तुमने उज्ज्वल भाव-सोम की आहुतियाँ देना सिखलाया॥

वे हैं ‘यज्ञरूप’ मंगलमय, माँ तुम स्वाहा और स्वधा हो। कैसे समझें तुम क्या-क्या हो? हे माता! तुम तो बस माँ हो॥

महाकाल की तीव्र प्रसन्नता, युग को नयी दिशा दे देगी। वे हैं सतयुग के निर्माता, तुम सतयुग की दिव्य सुधा हो॥ कैसे समझें तुम क्या-क्या हो? हे माता! तुम तो बस माँ हो॥

वीरेश्वर उपाध्याय


मातृवाणी - विशिष्ट वसंत पंचमी व्याख्यान (1989)

इस विशेषाँक में हम दे रहे हैं परम वंदनीय माताजी के श्री मुख से दिया गया वसंत पंचमी का विशेष उद्बोधन संदेश। 1986 के उद्बोधन के बाद परम पूज्य गुरुदेव कभी शाँतिकुँज में मुख्य प्रवचन मंच पर नहीं आए। उसके बाद यह उत्तरदायित्व माता जी ने ही सँभाला। यह उद्बोधन विशिष्ट भी है, प्रेरणादायी भी। पढ़ें! मातृवाणी।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलें-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

हमारे आत्मीय परिजनों! आज वसंत पर्व, उल्लास का पर्व है। यह गुरुजी का जन्म दिन है, बहुत हँसी खुशी और प्रसन्नता-प्रेरणा का पर्व है। आज से ठीक 63 वर्ष पूर्व उनके जीवन में एक क्राँति आई, और उस क्राँति के नाम पर ही उनका नाम पर ही उनका यह जन्म दिन है, और उसी को समर्पित है। क्राँति आई उनके जीवन में उनके गुरुदेव के रूप में, छाया के रूप में, और प्रेरणा के रूप में एवं वही उनका जन्म दिन हो गया। यों तो वह 80 वर्ष के लगभग हो गये, उस दिन को जब वे जन्मे हम जन्म दिन नहीं मनाते। यही जन्मदिन है, जो उनका आध्यात्मिक जन्मदिन है, इसी को हम मनाते हैं और हर वर्ष एक नया संकल्प लिया जाता है, उसी संकल्प को पूरा करते हैं। इसी को उन्होंने जीवनभर जन्म दिन माना। लाखों ने हम से दीक्षा ली है और संभव है उनसे, गुरुजी से कभी ली होगी। अब तो वे दीक्षा नहीं देते किंतु छाया के रूप में सतत् हमारे साथ रहते हैं। मैं समझती हूँ कि उनसे यानी गुरुजी से जिन्होंने दीक्षा ली है लाखों ने संभव है कलावा बंधवाया होगा। मंत्र दीक्षा ली होगी पर क्रिया के रूप में वे उतार पाये क्या? मैं समझती हूँ, अधिकाँश नहीं उतार पाये। लेकिन उन्होंने जिस दिन से अपना दीक्षा का दिन माना उसके बाद उनने जिया। उन का सारा का सारा जीवन क्रम परिवर्तित होता चला गया। कहते हैं कि च्यवन ऋषि जवान हुए थे। मालूम नहीं कि वे जवान हुए थे या नहीं हुए थे। बुढ़ापा तो आखिर बुढ़ापा ही होता है। अवस्था भी एक अवस्था ही होती है। झुर्रियां भी पड़ेंगी, कमर भी झुकेगी, लेकिन एक माने में वे जरूर जवान हो गये होंगे। जिसका मतलब है उत्साह, जिसका मतलब है शक्ति। शक्ति जिस व्यक्ति के अंदर है वह कभी बूढ़ा नहीं होता, गुरुजी कभी बूढ़े नहीं हो सकते। वे न तो आज बूढ़े हैं और न हजार साल बाद बुड्ढे होंगे। यह शरीर तो रहेगा नहीं, सूक्ष्म रूप में रहेगा कहीं न कहीं। यह तो भगवान मालिक है जिसने तय किया है कि जिसने जन्म लिया है वह नहीं रहने वाला। यों तो हम जायेंगे ही लेकिन यह कलंक का टीका लेकर नहीं जायेंगे कि एक ऐसे महामानव हुए जो बूढ़े होकर के गये। बूढ़े होकर के नहीं जवान, जवान। हर समय उनके नस और नाड़ियाँ बेटो! इस रूप से फड़फड़ाती रहती हैं, हर दिशाओं में। आध्यात्मिक क्षेत्र से लेकर, सामाजिक क्षेत्र तक उनको परिवर्तन ही परिवर्तन दिखाई देता है। वही है उनकी तपश्चर्या। जब से उन्होंने शुरू की अपनी साधना तब से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, हमेशा आगे की लाइन में चले। उन्होंने कहा कि क्राँति करेंगे तो जन क्राँति करेंगे। आध्यात्मिक क्षेत्र में क्राँति है तो क्राँति है इसको कोई पीछे नहीं हटा सकता। अवरोध तो आते ही रहते हैं। अवरोधों की परवाह उन्होंने नहीं की। जो आगे-आगे चलता है वह विजेता होता है और जो पीछे चलता है उसका कोर्टमार्शल होता है और वह भगोड़ों में गिना जाता है। वे भगोड़ों में नहीं गये, वे हमेशा आगे की पंक्ति में गिने गये। वे महामानवों में गिने गये। जहाँ कहीं संसार में महामानवों की गिनती होगी उनमें गुरुजी की होगी, बिलकुल होगी। मैं तो यह कहती हूँ कि वे देवताओं के समतुल्य, भगवान के समतुल्य हैं। लोग कहेंगे कि आप भगवान घोषित करती हैं, मैं तो भगवान से भी ऊपर का कहती हूँ और आगे बढ़ा सकती हूँ क्यों। आप इतना बड़ा शब्द बोलती हैं? अरे बेटो तुम साथ में नहीं रहे। जिंदगी का कितना बड़ा अरसा मैंने उनके साथ बिताया है। आप उन गहराइयों में नहीं जा सकते, जिन गहराइयों में मैं गई हूँ और उनसे जुड़ी हूँ। साथ उनके हर क्षण। हम दोनों एक प्राण हैं। एक प्राण की तरह से हम घुले। हमें मालूम है कि कहाँ से कहाँ तक मंजिल पार करके आये। आप उन बातों को सुनेंगे? मैं आपका समय बरबाद नहीं करूंगी, अरे माता जी तो गुरुजी की तारीफ करने ही बैठी हैं और इन्हें कोई काम ही नहीं है, हाँ मुझे तारीफ करने दीजिये और यह तो वास्तविकता है, तारीफ नहीं है।

जिस दिन से उन्होंने पग बढ़ाये आध्यात्मिकता के क्षेत्र में वह कितनी महान क्राँति थी। आज तो दुनिया नहीं समझ सकेगी, गाँधी जी जब तक सामने रहे तब तक लोगों ने उनकी कीमत नहीं समझी, लेकिन जब चले गये तो उन्हें मालूम पड़ा गाँधी जी क्या थे? गुरुजी के भी पीछे यही मालूम पड़ेगा कि एक महामानव आया। आखिर कौन था, क्या था? आपको नहीं मालूम पड़ेगा। वह भगवान की एक शक्ति थी जो आयी थी और वह एक ऐसी जबरदस्त शक्ति थी जो संसार को हिला देने में समर्थ थी, और उसने वही कार्य किया जो करना चाहिये। यों तो भगवान की शक्ति हर मनुष्य में होती है, पर उस शक्ति का उपयोग सब कोई नहीं कर पाता और जिस सत्ता से जुड़े हुए हैं, उसका लाभ नहीं उठा पाते, यह उनका दुर्भाग्य कहिये या नासमझी कहिये या प्रलोभन कहिये, जो भी आप उसको उपमा दें दे सकते हो, वह आप दीजिये, सही बात यह है कि लोग समझ ही नहीं पाते। अपनी शुद्र बुद्धि से केवल क्षणिक लाभ ही उन्हें दिखाई पड़ता है पारलौकिक संपदायें हैं, किसी को नहीं मालूम? विश्व मानव के रूप में जो भगवान हैं, इसकी सेवा हमको दिखाई नहीं पड़ती। नहीं हमें दिखाई नहीं पड़ती। तो कौन-सी दिखाई पड़ती है, वो दिखाई पड़ती है जिनसे हम जुड़े हुए हैं जिनको हम दो पाँच अपने कुटुँबी कहते हैं। उन्हीं में हमारा सारा का सारा जीवन निकलता चला जाता है और एक रोज मरकर हम मौत की भट्टी में चले जाते हैं, कोई अर्थ है? कोई अर्थ नहीं। कोई अस्तित्व नहीं। अस्तित्व तब है, जब मनुष्य अपने जीवन के प्रति जागरूक होता है, सतर्क होता है और उसे भान होता है कि हम किस लिए आए थे? भगवान ने हमको भेजा है आखिर किस उद्देश्य के लिए किस कार्य के लिए भेजा है? यह भूल जाते हैं, उन्होंने उसे गाँठ बाँधकर रखा, कि मुझको जो भेजा रहा है किसी विशेष उद्देश्य के लिए किसी विशेष लक्ष्य के लिए, किसी विशेष कार्य के लिए भेजा गया है, तो वे हर तरीके से गुरु की आज्ञा का पालन करते रहे। उन्होंने उनकी वाणी का महत्व समझ लिया। जो प्रेरणा उनसे मिली, इसके अलावा मुझे कुछ करना ही नहीं है, पीछे मुड़कर देखना ही नहीं। उसे क्या देखना है? आगे की जिंदगी को देखना है, विश्व को देखना है, वर्तमान को क्या देखना है, आगे जो भविष्य है, इसका क्या होगा? जो आज ये समय चल रहा है इसके प्रति कितने चिंतित हैं नहीं मालूम। जितने वो चिंतित हैं, उतने ही आशावादी भी हैं। आशावादी भी हैं कि “21 वीं सदी उज्ज्वल भविष्य” लेकर के आ रही हैं। ये कम नहीं है कि जो भयावह स्थितियाँ हैं परिस्थितियाँ हैं वे दिखाई दे रही हैं देश की, विदेश की, राष्ट्र व अंतर्राष्ट्रीय समस्यायें उनसे आप भी वाकिफ हैं क्योंकि आप लोग भी पढ़े लिखे हैं, और आप बुद्धिजीवी हैं। आप पढ़ते हैं-समझते हैं आपको मालूम है कि कैसा समय गुजर रहा है। तो इस समय में, हम क्या कर सकते हैं, वह सारा का सारा उनके दिमाग में एक नक्शे की तरह से है।

जो दिन भर वे कमाते हैं शाम को पल्ला झाड़ देते हैं। सब का सब दे डालते हैं और बेटे जिनको यह रहता है कि उनको देना नहीं है हमको तो अपना जोड़कर ही रखना है ऐसा संभाल कर रखना है कि चोर न ले जायें, डकैत न ले जावें उनका क्या कहना और बच्चों सही पूछो तो ले ही जाते हैं। एक लड़की आई थी बोली माताजी मेरा इतना नुकसान हो गया, तो मैंने कहा कि क्या किया था तूने? मेरा यह था कि भगवान के चरणों में रखूँगी और अपनी लड़की की शादी में लगाऊँगी इसको। जो तेरी नियत थी, सो हो गया, वह मुड़कर गई और चोर उठा ले गये उसको। तू लगाती अपनी लड़की की शादी में, वह और किसी की लड़की की शादी में लग गया, क्या फरक पड़ता है, कभी यह भी सोचा क्या, कि सारा का सारा समाज यह भी अपना अंग है यह भी तो हमारा ही है। इसके प्रति कुछ जिम्मेदारियाँ हैं, देख। गुरुजी ने जिम्मेदारियाँ समझीं, कि जो दौलत के रूप में मिला उसे सारे समाज का समझना है बेटा कौन-सी दौलत के रूप में मिला? आध्यात्मिक दौलत के रूप में मिला, पैसे के रूप में नहीं, पैसे की कभी अपेक्षा नहीं की, पर आता ही गया, कोई काम रुका भी नहीं, कोई काम रुका है, नहीं। इतने बड़े-बड़े संकल्प उन्होंने जिंदगी में किये हैं, वह सारे के सारे पूरे हुए हैं, अपने लिए किये होते तो एक आध कोठी होती, बंगला होता, राजनीति में बने होते तो न जाने क्या बन गये होते। मंत्री-वंत्री इतने ही बने होते। उन्होंने आध्यात्मिक जिंदगी में प्रवेश किया तब, इसमें आगे बढ़े अपनी संकीर्णता को छोड़ा, तब क्या कमी है इतनी बड़ी दौलत है कि यदि आपको गिनाने बैठें बेटे, तो पसीना आ जायेगा, इतनी दौलत है कि बस आप से क्या कहें, करोड़पति नहीं, अरबपति नहीं जो भी आप कहें इतने बड़े हिन्दुस्तान में इतनी दौलत नहीं, सारी दुनिया की दौलत हमारे पास है। हम इतने जबरदस्त दौलतमंद हैं वह दौलत कहाँ है माता जी, आप तो कहती हैं कि हमारे दोनों का कहीं अकाउन्ट नहीं है, मगर राज को हम जानते हैं आप नहीं जानते। ये जानते हैं कि आप ही तो ट्रस्टी हैं, लाओ साइन करा ले जायें, करा ले जा बेटे, क्या सब मिल जायेगा तुमको खाली हाथ ही लौटना पड़ेगा तुझे क्या पता हमारी दौलत का। हमारे पास वह दौलत है जो सामने बैठी है जो सामने बैठी है यह है, इतनी दौलत, पैसे के रूप में मिली और हमें परिजनों के रूप में मिली उनके प्यार के रूप में मिली। आखिर यह कहाँ से आई? कहाँ से माताजी, यह गुरुमंत्र हमें बता दो तो हम भी दौलत खोदकर ले जावें, नहीं बेटे वह नहीं ला पाओगे, अपने को जब इतना विशाल बना लोगे तब ला पाओगे। इतना विशाल जितना तुम्हारे गुरुजी। अपने को गुरुजी की तरह बनाइये, ऐसा विशाल।

एक आपको छोटी-सी घटना बताती हूँ मैं ज्यादा तो नहीं बताऊँगी क्योंकि अपने जीवन की पर्तें, खोलनी चाहिए, जरूरी है क्या? कोई जरूरी नहीं। लेकिन प्रेरणा के रूप में यदि आप ग्रहण करना चाहें तो आप कर भी सकते हैं कि गुरुजी अज्ञातवास गये और मेरे लिए मनाही थी, कि तुम न आना, मुझे मालूम नहीं था कि कहाँ हैं वहाँ तक की बात अलग है जब मालूम पड़ा अमुक स्थान पर हैं, पर मेरे लिये जाना वर्जित कर दिया था और यह कहा था, कि तुम आना मत, क्योंकि तुम्हारी तबियत खराब हो जाती है, जाने कहाँ से कहाँ पैदल चलना पड़ेगा। जबकि उन्होंने जितना पूजा उपासना का महत्व दिया, समाज सेवा को दिया उससे कम मुझे नहीं दिया मैं ऐसा समझती हूँ अपने मन में, मेरा मान और सम्मान किया, इतना कि मैं योग्य नहीं हूँ जितना कि उनके हृदय में मेरा सम्मान है। हाँ अपार सम्मान है दुःख का दर्द का इतना ध्यान रखते हैं कि शायद ही कोई खुशनसीब उन महिलाओं को भी जिनका पति ख्याल रखता होगा। मेरा तो पति नहीं, परमेश्वर ही है, परमेश्वर ही है, यही कहूँगी। हाँ तो मैं नहीं मानी, मैं चली गई, जाकर के ठहर गई जब कि मुझे मालूम नहीं था कि कहाँ हैं पर ढूँढ़ा व पहुँच गयी। मैं जाकर के जब ठहरी तो देखा कि कुछ पत्तियाँ उबली हुई रक्खी हैं। कुछ खा गये कुछ रक्खी थीं, उनमें नमक भी ज्यादा था, सामने बैठ गये। स्वयं बोलें क्या लाऊँ, मैं तुम्हारे लिये? मैंने कहा कि जो मैं चाहती थी वह मिल गया। मुझे शेष क्या चाहिये। खाने को चाहिये। इतना मेरा कहना था कि मेरे आँसू निकल पड़े उसमें से एक पत्ती अपने मुँह में डाली, वह इतनी कड़वी थी जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकती और मैंने उस पत्ते को उतार लिया मैंने कहा, मैं तो घर में बैठी रही, और बच्चों का पालन पोषण करती रही, जो उनका आदेश था, कि हमने इतना विशाल परिवार बनाया है, इस परिवार की तुम माँ हो, तुम माँ हो, यदि तुम मेरे साथ चलती हो तो यह बच्चे छूट जायेंगे, तुम्हें यह देखना है, तो मैंने कहा जो आपकी आज्ञा है वही मेरे लिए शिरोधार्य है और मैंने आप सबको छाती से लगाये रखा। मैंने कहा कि जो कहा है उसी का पालन होगा मैं बस पानी पीकर उठ गई। इतने गहन चिंतन में चली गई कि मैंने सब कुछ खाया एक साल में और खिलाया भी, और इन्होंने कि तरीके से एक साल निकाला यहाँ। तो बेटी। जब से उन्होंने होश संभाला होगा, उनका जिह्वा पर इतना कन्ट्रोल है, तभी उनकी सरस्वती है आज सरस्वती का जन्म भी है, कला के भी पुजारी हैं तो उनकी जबान पर सरस्वती है जो कह देते हैं, पूरी हो जाती है? आखिर कैसे हो जाती है और क्यों हो जाती है? मैं आपको सुना रही हूँ कि इसलिए हो जाती है कि अपनी जीभ को ऐसे कस रखा है जैसे जम्बू से कस लेते हैं, उतना उनको पर नियंत्रण है, तपस्या पर उनको विश्वास है, गुरु के प्रति आस्था है और श्रद्धा है, जो उनको मिला है उपहार में। कितना मिला है, मिलता हुआ, चला जा रहा है और मिलता हुआ चला जायेगा। आप देखना कि कितना मिला हुआ चला जाता है। कभी अपने लिए उन्होंने चार पैसे भी खर्च नहीं किये। कभी भी उन्होंने अपने आप लाकर कपड़ा नहीं पहना कभी अपने आप लाकर खाया नहीं मैं ही कपड़ा लाती रही हूँ। है तो सब उन्हीं का, मैं तो निमित्त मात्र हूँ लेकिन मैं बताती हूँ उन्होंने कभी भी भौतिक चीजों को महत्व नहीं दिया और एक से एक बड़ा व्यक्ति उनके संपर्क में आता हुआ चला गया। जो लोग ये देखते नहीं, जो ये सोचते हैं कि जो कुछ है हमारा शरीर ही है, जो है वह भौतिक सुविधा है, जो हमको आज मिल रही है वही हमारे जीवन की श्रेष्ठतम है उनके लिए क्या कहूँ बस! मैंने तो आपको गुरुजी का उदाहरण दिया, शिक्षा नहीं यह वह पर्व है कि आप गुरुजी के जन्म दिवस पर शामिल हुए। शामिल हुए हैं तो आप संकल्प लीजिये कुछ करके दिखाइये। उन्होंने अपने जीवन में करके दिखाया है आप भी करके दिखाइये नहीं दिखायेंगे तो आप पछताते रहेंगे कि एक व्यक्ति आया उसने कहा कि मुझे कुछ दीजिये, मेरी झोली में डालिये। मन ने कहा-नहीं। अरे अतिथि ने कहा कि आपकी झोली भरी हुई है अरे उस में से कुछ तो डालिये, लेकिन संकीर्ण, मन कुछ न दे सका, एक दाना उठाया और हाथ में रख दिया उस भिखारी के, भिखारी लेकर चला गया, चला गया जो झोली अनाज से भरी थी, अब आकर के उसने देखा, तो उसमें एक दाना सोने का था, उसने सर पटका अरे मैं कितना मूर्ख था? जो घर आये भगवान को दे न सका क्योंकि यदि सारी झोली उड़ेल दी होती उसके तो सारे के सारे दाने सोने के हो जाते। यदि मेरा संकीर्ण मन न होता, पर अब क्या करूं,य मैंने एक दाना जो दिया था वही एक दाना आ गया सोने के रूप में।

ये भगवान की खेती है इस खेती में जैसा बोया जायेगा वैसा ही वह काटेगा। मक्का बोयेंगे एक दाना, तो हजार दाने के रूप में आ जायेगा। बाजरा बोयेंगे बाजरा आ जायेगा, जो बोयेंगे वही आयेगा। शुभ और अशुभ कर्म जो किये हैं उनके अनुसार ही मिलेगा, करते तो हैं अशुभ कर्म, चाहते हैं शुभ। ऐसे नहीं, जो करेंगे वही पायेंगे। बुरा करेंगे तो अनेक बुरे कामों का फल मिलता हुआ चला जायेगा। अच्छे करिये तो अच्छाइयाँ मिलती हुई चली जायेंगी। जन श्रद्धा वापस अपनी ओर उमड़ेगी। क्यों? सारी की सारी जिंदगी उन्होंने दाँव पर लगा दी उसी के लिये। लौट के आयेगी कैसे नहीं? गुँबज की आवाज, आवाज दीजिये, लौटकर जायेगी, पीछे आयेगी आपके पास ही आयेगी, आजा। जैसा आप बोयेंगे वैसा ही काटेंगे, बोया और काटा यह सिद्धाँत सही है, और जिसने बोया ही नहीं है बोना जानता ही नहीं है। पानी ही नहीं है भूमि बंजर है, भूमि उसकी उपजाऊ नहीं है, निराई गुड़ाई उसने की नहीं है, खाद लगाया नहीं है, अरे तो बीज कोई कहाँ तक डालेगा? बीज डालेगा भी तो सड़ जायेगा, क्योंकि उनके कुसंस्कार हैं, संस्कार नहीं हैं। संस्कार हैं तो ही वह शक्ति के रूप में जुड़ेगा। ऐसे भी व्यक्ति हुए हैं जो महामानव के साथ जुड़ करके महान होते हुए चले गये और ऐसे भी हुए हैं जो महामानव के पास रहे, पर जैसे के तैसे ही रहे ओर गये गुजरे ही रहे। ऐसा कैसे हो गया इनको मिली, उनको नहीं मिली, भगवान के यहाँ कभी पक्षपात नहीं होता, गुरु भी पक्षपात किसी के साथ नहीं करता। जितनी उसकी श्रद्धा होती है, और भावनायें होती हैं उतना ही उसे मिल जाता है। अर्जुन को भी भावनाएँ थीं जो द्रोणाचार्य से सीखा, एकलव्य की आस्था थी तो वह धनुर्विद्या में, उससे भी ज्यादा पारंगत हो गये, अर्जुन से भी ज्यादा पारंगत हो गए, क्योंकि उसकी श्रद्धा थी, उनने का कि मैंने शिक्षा गुरु बनाकर ली है, मेरे गुरु द्रोणाचार्य हैं। यही मुझे सिखायेंगे ओर उसने पा लिया, वरदान उसको मिल गया। मिलता उसी को है जो उनकी शक्ति के प्रति जागरूक होता है, जागरूक नहीं होता तो, वैसा का वैसा ही रह जाता। एक कहानी सुनाऊँ आप को। भगवान बुद्ध से एक शिष्य यह पूछने लगे कि ये बताइये कि महामानव कैसे बन जाते हैं, और छोटे से छोटा व्यक्ति महान कार्य कैसे कर लेता है बड़ा से बड़ा व्यक्ति क्यों नहीं कर पाता, इसमें लखपति, करोड़पति, राजा, महाराजा और बड़े-बड़े अधिकारी ही ये काम नहीं कर सकते और एक छोटे से घर में पैदा हुआ व्यक्ति किस तरीके से छलांग लगा सकता है और बलवान हो सकता है, उसे आत्मबल कैसे मिल सकता है, ये बात आप मुझे बताइये? थोड़ी देर सोचने लगे कि क्या जवाब दिया जाये इसको कैसे समझ में आये कि किस तरीके से शक्ति मिलती है, उस शक्ति का उपयोग करते भी हैं कि नहीं करते यदि आपने उसका सदुपयोग किया है तो शक्ति की कभी कमी नहीं पड़ेगी। बिलकुल कमी नहीं पड़ सकती, उसके अन्दर यदि विश्वास है कि जिससे हम जुड़े हैं उसकी शक्ति हमारे अन्दर आ रही है और वह काम कर रही है फिर देखें काम होता है कि नहीं होता है। हमारे तो जरा-जरा से लड़के हैं आपके इतने बड़े हैं जरा-जरा सी लड़कियाँ गई थीं हमने सन् 1975 में टोली निकाली थी वह तहलका मचा कर आईं। “जरा-जरा सी लड़कियाँ”। यह क्या सिखाकर के भेजा है। मालूम नहीं बेटे। वे देव कन्यायें थीं हमारी, जहाँ जाती थीं लोग दाँतों तले उँगली दबाकर रह जाते थे। जरा-जरा सी बच्चियाँ, क्या से क्या बना दिया है, अभी देखते जाओ क्या से क्या बनाते हैं। जो हमसे जुड़ा है, उसे हम क्या से क्या बनाते हैं। तो उनसे पूछा गया, बताइये? बुद्ध ने कहा अभी सुनाता हूँ। उन्होंने कहानी सुनाई एक राजा था। उसके यहाँ एक हाथी, हाथी था, लड़ाई के मैदान में जाता था। जब जवान था तब लड़ाई के मैदान में काम करता था। खूब काम किया, अब वह हो गया बुड्ढा जब बुड्ढा हो गया, बुड्ढा माने “नाउम्मीद” माने जिसके अंदर कोई हलचल, नहीं, उत्साह नहीं, तमन्ना नहीं कि हमें कुछ करना है, उसे बुड्ढा कहते हैं, हाथी ऐसा हो गया। उसे चारा मिले ना उसे पानी मिले, बेचारा तालाब के किनारे गया और तालाब में उसे पानी नहीं मिला, वह आगे बढ़ता हुआ चला गया और कीचड़ में धँसता हुआ चला गया, अब उससे निकलते ही न बने, निकलते नहीं बना तो उस समय एक सैनिक था बहुत होशियार उसने कहा निकलेगा, इसकी शक्ति का इजहार करना है तो उन्होंने वहीं फौजी पोशाक पहनकर के बिगुल बजाया, तो वह जो हाथी था, उसने सूँड चारों तरफ फेंकी। उनने और तेज आवाज की तो हाथी अपने आप निकल आया। लोगों ने कहा कि यह क्या हुआ। ये हुआ कि उसकी जो शक्ति सोई हुई थी, उसे जगा दिया, इसको जगा दिया उसे भान हो गया कि मुझ में क्या कमी है कि मैं बुड्ढा हो गया, मेरी अंतर आत्मा तो बूढ़ी नहीं हुई। जब मेरी अंतरात्मा बूढ़ी नहीं हुई है तो शरीर कैसे बुड्ढा हो सकता है। बेटे! शरीर बुड्ढा नहीं हो सकता, वह हाथी फिर लड़ाई के मैदान में चला गया, देखते ही रह गये लोग कि जिस बुड्ढे हाथी में जान नहीं थी जो पानी भी पीने में समर्थ नहीं था वही हाथी अब फिर लड़ाई के मैदान में चला गया, देखते ही रह गये लोग कि जिस बुड्ढे हाथी में जान नहीं थी जो पानी भी पीने में समर्थ नहीं था वही हाथी क्या अब लड़ाई के मैदान में लड़ सकता है?

वही शक्ति बेटो अब आपको भी दी जा रही है। आपमें यदि सामर्थ्य होगी और वास्तव में हाथी की तरह आप दल-दल-से-प्रलोभनों-से-लोभ-मोह की जंजीरों से निकल सकते हैं तो आप बराबर आगे बढ़ते चले जायेंगे। जो शक्ति हाथी के लिए नियत थी वह शक्ति आपके लिए भी है। आपमें तो और भी ज्यादा काम लेना है मैंने दो कहानी आपको सुनाई एक तो सुनाई सोने के दाने की, एक यह सुनाई शक्ति की। ये दो कहानियाँ आपको सुनाई हैं। आप इसको पल्ले से बाँधकर ले जाना। अरे ये क्या हुआ, हम तो वरदान लेने आये थे कहीं धन दौलत होगा, कारोबार में फायदा होगा, हम तो आज के दिन आशीर्वाद लेने आये थे यह क्या दे रही हैं हम तो आपको वही दे रहे हैं कि इसी के सहारे आपकी नाव चलती है, वो जो आप माँगने आये हैं क्षणिक हैं। ला वह दिलवा दूँगी, गायत्री माता से कहेंगे गुरुजी से कहेंगे आपकी झोली भर जायेगी, देखना न मानो तो जाकर देखना कि तेरे को मिला कि नहीं मिला। यहाँ जो काम कर रहे हैं सब के सब को फायदा होगा। फिर क्या होगा जहाँ के तहाँ रह जाओगे। आप वह चीज माँगिये जिससे, यह लोक और परलोक दोनों ही सुधर जायेंगे। जो शक्ति आपको मिले, उस शक्ति को विश्वमानस में बिखरते हुए चले जाओ, नहीं तो आप संकीर्ण हो जाओगे, हम अपने बच्चों को संकीर्ण देखना नहीं चाहते। ना हममें संकीर्णता है ना हम संकीर्ण देखना चाहते हैं, और जो संकीर्ण बनकर रहेगा, वो बेटा बौना हो जायेगा, शरीर की दृष्टि से छोटा हो जायेगा। क्योंकि आज की जो आवश्यकता है जो भविष्य की तरफ चेतावनी है उसकी तरफ नहीं देख रहे, अपना ही अपना राग अलाप रहे हैं, अपना-अपना राग अलापेंगे, आप उस संत से जुड़े हुए हैं जिसने कि सारी जिंदगी अपनी दाँव पर लगा दी अब आप उसके साथ हैं। जानते हो कि नहीं कि जो समूह में बैठे रहते हैं, जुआरी वहाँ जुआरी दाँव पर सब लगाता जाता है, उसी प्रकार हमने भी अपना जीवन दाँव पर लगा दिया है। जिस किसी में भी हिम्मत हो वह हमारे साथ चले और यह वायदा दे कि हम आपके जीवन के अंतिम छोर तक आपके साथ चलेंगे, आपको चलाते हुए चले जायेंगे। लेकिन अर्जुन की तरह? तो बेटे आपको उठना ही पड़ेगा, अर्जुन ने मनाकर दिया था यह कहा था कि सब मेरे भाई-भतीजे, कुटुँबी हैं, इनको मैं मारूंगा, मुझ से नहीं मारे जायेंगे। कृष्ण ने कहा अर्जुन तुमसे नहीं मारे जायेंगे, मार तो मैं एक क्षण में दूँगा, लेकिन श्रेय तुझे नहीं मिलेगा, मुझे ही मिलेगा। तू श्रेय ले, मारूंगा मैं। सारथी हूँ तेरे पीछे ये तो अंतःकरण है, विराजमान है अपने रूपों में। जब तक आप उनसे लड़ेंगे नहीं, नहीं मारेंगे इनका ही तो दमन करना है तो आप अर्जुन के तरीके से ज्ञान गांडीव उठायेंगे, अपने अंतर में जो कौरव विराजमान हैं। उनसे लड़ने के लिए, तब तक वह नहीं हो सकेगा जो हम चाहते हैं। जो हमारे अंतर में, समाज में, राष्ट्र में फैले हुए हैं उन कौरवों का कोई भी नाम ले सकते हैं, हम कौरव ही कहेंगे। इस महाभारत को, जीतने के लिये, अर्जुन को गाण्डीव उठाना ही पड़ेगा, अर्जुन जब गाण्डीव उठायेगा तब कृष्ण भी पीछे नहीं रहेगा, पीछे से वह धक्का लगायेगा, कि आनंद आ जायेगा, क्योंकि दायें बायें एक कृष्ण ही अकेले थे। यहाँ तो हम दो हैं, एक और एक दो नहीं एक पर एक ग्यारह। तुम्हारे साथ जब हम दो हैं तो फिर यह अजूबा काम नहीं कर सकता क्या? आप आगे की पंक्ति में नहीं आ सकते? आगे नहीं चल सकते? आपमें क्या कमी है? मेरी निगाह से पूछिये आप प्रत्येक में इतनी शक्ति भरी पड़ी है कि मैं आपसे क्या कहूँ? मैं आपसे कुछ कह नहीं सकती, इतनी अपार शक्ति आपको मिल रही है, यदि आपने इसका उपयोग नहीं किया तो उस सेठ के बच्चे के तरीके से आप पछताते रहेंगे जो सेठ मरते समय अपने बच्चे के गले में कंठा पहना गया था हीरों का और उसने यह कहा था कि अब तो चला चली का ही मेला है तो सेठ ने कंठा बाँध दिया, कि जब हम नहीं रहेंगे ये बच्चा इसमें से निकालता रहेगा और खाता रहेगा और इसके जीवन की नाव किनारे पर लग जायेगी। मैं भी सब के गले में कंठा बाँध दूँगी और बाँध भी दिया है, उसे आप खायेंगे या फेंक देंगे हमें नहीं मालूम क्या कोई और लाभ उठायेगा या आप उठायेंगे। हमें कुछ नहीं मालूम लेकिन आप कंठा बाँधकर जरूर जा रहे हैं। जब दोनों माता पिता नहीं रहे वह छोटा-सा बच्चा रह गया। बच्चा जब थोड़ा बड़ा हुआ तो भूखों मरने लगा, जब भूखों मरने लगा तो एक जौहरी जा रहा था उसने कहा इधर आना बेटे तुम गर्दन में यह क्या पहने हो? पता नहीं क्या है? मेरे माँ बाप पहना कर गये थे, उसमें से एक दाना निकाला और एक दाना बेच करके आ गये। वह तो लाखों का बिका, अरे बेवकूफ! तू तो क्या तेरी पीढ़ी दर पीढ़ी खाती हुई चली जायेगी यह तो इतनी दौलत है बेटे। आज वही दौलत देते हुए जा रहे हैं कि अब जो दौलत आपको दी है आप को ब्याज दर ब्याज होता हुआ चला जायेगा। सारे समाज को लाभ मिलना चाहिये अब उसको हम ही खा लेंगे। नहीं उसे तुम अकेले नहीं खा पाओगे आप लाभ लीजिये और दूसरों को लाभ दीजिये। यह कहानी मैंने आपको बताई जो अनुदान और वरदान मिलते हैं जाने और अनजाने में, झोली भरती हुई चली जाती है और हम उसको नहीं समझ पाते। देने वाला तो हमें इतना देता है पर हम क्या करें। गाने की एक कड़ी याद आ रही है-”बहुत दिया देने वाले ने मुझे, आँचल ही में न समाये तो क्या॥” देने वाले ने तो इतना दिया है, शरीर के रूपों में, हम करोड़ों की संपत्ति से ज्यादा लेकर बैठे हैं हमारे अंग का एक भी हिस्सा खराब हो जाता है तो कितना कष्ट होता है, इतना अनुदान और वरदान से हमारी झोली को भर दिया है, आँचल में ही न जाने कहाँ-कहाँ फेंकते फिरते हैं। हमारा चिंतन न जाने किधर को बखेरते फिरते हैं, कहाँ से मारे कहाँ चलते रहते हैं, हम सोचते ही नहीं, अपने जीवन के बारे में कि हमारा जीवन हम काहे के लिए पैदा हुए थे और किस तरीके से इसका श्रेष्ठतम उपयोग हो सकता है। यदि गहराई से विचारें तो एक-एक क्षण इतना मूल्यवान है कि करोड़ों की संपत्ति एक क्षण के ऊपर फेंकी जा सकती है। यदि इजहार करें तो इतना मूल्यवान यह समय है, समय यदि निकल गया तो पछताते रह जायेंगे अभी लड़कियाँ गाना गा रहीं थीं-”साधना सिर पटकती रहे जिंदगी भर, सिद्धि ऐसी कभी भी नहीं पाएगी।”

हाँ बेटे जिंदगी भर पछताना ही रह जायेगा कि हम इस जिंदगी का सही उपयोग न कर सके क्योंकि जो हमको करना चाहिये या वह हमने किया नहीं। पतन और पीड़ा के रूप में सारा समाज चिल्लाता रहा। सारा राज्य सारा विश्व हमारी तरफ देखता रहा, कहता रहा कि एक संत दुनिया में पैदा हुआ था, जिसने यह बीड़ा उठाया था कि हम सारे संसार में क्राँति लाकर रहेंगे और वह करेंगे बौद्धिक क्राँति। बौद्धिकता से व्यक्ति पंगु हो गया है, बच्चे को लकवा हो गया है, पोलियो हो गया है, इसका उपचार होना चाहिए हम इसको देकर के रहेंगे। लेकिन हाय रे कैसे दुर्भाग्यशाली निकले कि हम उसका जरा भी उपयोग न कर पाये और जो उनसे जुड़े थे ये आशा थी कि इस संत के साथ जो जुड़े हैं इनके द्वारा मार्गदर्शन मिलेगा, इनके द्वारा प्रेरणा मिलेगी क्योंकि इन्हें इस योग्य बना दिया गया है। प्राण फूँक दिये गये हैं। हम कुछ न कर सके यह पछताना न रह जाये, उस समय से पहले आप चेत जाये तो ज्यादा अच्छा है। आप आज के दिन यह संकल्प लेकर जाइये कि जो गुरुजी की आकाँक्षाएँ हैं, कामनाएँ हैं, कामनाएँ तो हम लेकर आये हैं माताजी, यह तो आप सही कह रही हैं, हमारे आप बच्चे हैं, कुटुँबी हैं भाई, भतीजे कुटुँबी सब हमारे हैं आपका जरूर, अधिकार है जब आप माँगे और हर समर्थ हों बेटे देंगे। जो समर्थ नहीं हैं उसकी तो हम कह नहीं सकते भगवान तो हम हैं नहीं, जो सारी की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण कर दें, लेकिन आप विश्वास रखिये कि हम यदि देने में समर्थ होंगे तो आपकी जरूर झोली भरी जायेगी, हम उसमें से नहीं हैं जो बचाकर रखेंगे। हम सारे के सारे दाने आपकी झोली में उड़ेलकर ही जायेंगे, निश्चित ही जायेंगे लेकिन हमारी भी तो कुछ कामना है? आप समर्थ हो गये हैं। दाढ़ी मूँछ वाले हैं, माँ बाप की भी कुछ कामनाएँ होती हैं बच्चों से, कि वह पुरुषार्थ करेगा, कमायेगा, खिलायेगा, हमारे पाँव दबायेगा, कपड़े धोयेगा, पर हमारा तो नहीं है यह उद्देश्य आपका निजी कार्य? बेटे ऐसा कभी न सोचना न सोचेंगे, है ही नहीं काम तो करेंगे क्या। कोई कपड़ा लाता है तो सोचते हैं क्यों इसका तिरस्कार करें। भावनावश लाता है, मना करें तो कहेंगे हमारी भावनाओं का सम्मान नहीं किया, हो सकता है, पहन लें, लेकिन अंतःकरण हमारा ऐसा नहीं है। हमारे स्वार्थ के लिए आवश्यकता है बिलकुल नहीं है। खूब कमा लेते हैं, हमें तो हमारे नाव का खिवइया है लाखों का पेट भर सकता है आप क्या करेंगे हम तो अपने आप भर लेते हैं, गुरुजी के लंबे-लंबे हाथ और माताजी के मोटे-मोटे हाथ। एक भी पड़ जाये तो नानी याद आ जायेगी, कोई कमी नहीं है। काहे की कमी है वह आपकी श्रद्धा की कमी है। आपकी आस्था की कमी है आपके विश्वास की कमी है, आपकी श्रद्धा की कमी है, इतने भर की कमी है और किसी चीज की कमी नहीं है। हमारे पास धन दौलत की कमी है बिलकुल नहीं और किसी चीज की कमी है माताजी बिलकुल नहीं है, कोई चीज की आवश्यकता है? बूढ़े हो गये हैं, कुछ खाने को चाहिये। नहीं बेटे। हमें नहीं चाहिये, रहने को चाहिये, बिलकुल नहीं चाहिये, पहनने को मँगा लेते हैं मथुरा से अभी हमारा दे गया बेटा 6 साड़ी, अभी तो फटी नहीं। मैं क्या करूंगी बता, चल तेरा मान होता है तो रख लेती हूँ वितरित कर देती हूँ लेकिन हमको बहुत आवश्यकता है, किस की? एक-एक लड़के की आवश्यकता है जिस समय लड़ाई छिड़ती है उस समय क्या होता है फौज की आवश्यकता होती है एक जमाना था जब सिक्खों के घर से एक सिक्ख होता था, कभी कोई जमाना था लड़ाई के समय हर घर से एक जाता था और हम भी यही चाहते हैं कि हमारा प्रत्येक परिजन मोर्चे के लिए सतर्क, साहस, जिम्मेदारी भरी सक्रियता लाये, वह सारा का सारा कार्यकर्ता बताते रहते हैं कि किस चीज की आवश्यकता है, आवश्यकता एक ही चीज की है वो कि अंधकार को मिटाना चाहिए, उजाला होना चाहिये। सद्विचार आने चाहिये, कुविचार जाने चाहिये। अब कैसे जायेंगे, करना क्या पड़ेगा? ये तो सब बताते रहेंगे, क्या करना पड़ेगा, यह मेरा विषय नहीं है।

मेरा विषय है तो केवल आस्था, वह है निष्ठा, वह है श्रद्धा। मैं देखती हूँ आप में सब में विद्यमान है, ऐसा कोई नहीं जिसमें श्रद्धा नहीं हो। श्रद्धा है आपके पास, पर बुरा मत मानिये, मैं मार भी लेती हूँ और पुचकार भी लेती हूँ। बाद में कोई बात नहीं जब रूठ जाओगे तो मना लूँगी। माँ में विशेषता होती है, वह यह है वह सतत् देती रहती है। किंतु आपका मन डाल–डाल और पात–पात घूमता रहता है, कि किया क्या जाये न मालूम कौन साथ दे जाये इनमें। शायद शंकर जी दे जायें, हनुमान जी दे जायें, चंडी देवी दे जाये कि संतोषी माता दे जायें, गुरुजी दे जायें, कि माताजी दे जायें जाने कौन हमारे सामने आ जाये, उसे ही हम पकड़ लें। क्या करें? कोई नहीं करे, जैसे बहरूपिया करता है बगुला बैठा रहता है, जहाँ देखी मछली कुडाक निगल जाता है। ये नहीं होना चाहिये एक लक्ष्य होना चाहिये जो हमने फैसला कर लिया, वही होगा। आजीवन निर्वाह करना? यदि आजीवन निर्वाह करेंगे तो हम आपके साथ हैं। आपके जीवन के रूप में चलाने की जिम्मेदारी हमारी है और गाण्डीव उठाना आपका काम है चलिये। जैसे सूरदास की


अपनों से अपनी बात-वसंतपर्व पर विशेष - राष्ट्र के पुनर्गठन का संदेश लेकर आया है प्रस्तुत वसंत

युग वसंत जब आता है तब प्रकृति जगत में जड़-चेतन सभी ओर उसकी हलचलें दिखाई देने लगती हैं। ठिठुरती शिशिर ऋतु के बाद हेमंत का कँपकँपा देने वाला जाड़ा पलायन करता एवं वासंती उल्लास नयी ऊष्मा को लिए वातावरण को सुरभित बनाता चला जाता है। पौधे लहलहाने लगते हैं, पल्लव हुलसते हैं, फूल खिलते हैं और फल लगने लगते हैं। भौंरों का गुँजन व कोकिल की वाणी मुखरित हुए बिना रुकती नहीं। चेतना में जाग्रति-चारों ओर सक्रियता, यही एक मात्र चिह्न है वासंती उल्लास का। इन दिनों चारों ओर यही दृश्य दिखाई दे रहा है। नव निर्माण के लिए गतिमान दैवी हलचलें इस दिनों प्रौढ़ता पर हैं क्योंकि नवयुग आगामी 21 माह अब अनुयाज की सक्रियता के का आगमन अब होने ही वाला है। ऐसी स्थिति में कोई भी आस्थावान निष्क्रिय होकर नहीं बैठ सकता। निष्ठा पुरुषार्थ में परिणत होती है तो श्रद्धा का परिचय मानव मात्र के प्रति उभरती संवेदना-कारुणिकता के रूप में, पीड़ा और पतन-पराभव की आग बुझाने की आकुलता के रूप में दिखाई देता है। इस उभार की कसौटी पर ही किसी युग के ऊँचा उठने-समय के प्रवाह के बदलने का आकलन किया जाता है।

शाँतिकुँज के अधिष्ठाता परम पूज्य गुरुदेव वसंत पर्व को ही अपना आध्यात्मिक जन्म दिवस मनाते आए व सारे नये निर्धारण इस पावनवेला में ही कर इस विराट गायत्री परिवार को एक सूत्र में पिरोते हुए यहाँ तक लेकर आए हैं। अब उनके दृश्य-पटल से सूक्ष्म-कारण जगत में विलीन होने, महाप्रयाण के बाद ब्रह्मबीज के ब्रह्म कमल में विकसित हो, ब्रह्मवर्चस् संपन्न महासत्ताओं के उत्पादन की प्रक्रिया के बाद उनकी अंतरंग सहचर रही माता श्री के आध्यात्मिक पुरुषार्थ का एक विराट रूप हम सभी ने विगत दिनों देवसंस्कृति दिग्विजय के अश्वमेधिक पराक्रम के रूप में अपनी आँखों से देखा है। देवसंस्कृति के प्रचंड प्रवाह में तिनके-पत्ते भी आकाश चूमते देखे गए एवं अगणित व्यक्तियों के संस्कारों में आमूलचूल परिवर्तन हो देव परिवार का परिकर बढ़कर अब छह करोड़ से अधिक हो गया है। यह द्वितीय अध्याय का समापन है। किंतु सतत् चल रही परिवर्तन प्रक्रिया का ही एक अनिवार्य अंग है। दृश्य रूप में यों परमवंदनीय माताजी हमारे बीच नहीं हैं, उनकी स्मृति-स्नेह-ममत्व की थाती सबके साथ है किंतु उनकी शक्ति बहुगुणित हो क्रियाशील है। वे स्वयं सूक्ष्म में विलीन हो अपनी आराध्य सत्ता के साथ एकाकार हो गयीं (स्वयं अपनी की गयी घोषणानुसार-अगस्त 1994 का संपादकीय) फिर भी देवी हलचलों को एक नया मोड़ देकर जाग्रतों-प्रतिभाशालियों को झकझोर कर आगामी ग्यारह वर्षों के लिए अपनी भूमिका वे बता गयी हैं व सतत् उन्हें यह आभास अभी भी करा रही हैं।

प्रस्तुत वसंत पर्व (4 फरवरी 1995) एक विशिष्ट वेला में आया है। इस समय दूध गरम है उबाल पर है, मलाई तैरकर ऊपर आने वाली है। वृक्ष अपने पूर्व यौवन पर हैं-फूलने-फलने की तैयारी में लगे हैं। बादल जल संपदा से अभिपूरित हैं, बस नीचे आकर बरसने को तैयार बैठे हैं। चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ धरती के समीप अपनी चाँदनी बिखरा रहा है-समुद्र में ज्वार भाटे आने ही वाले हैं-पृथ्वी के गर्भ में कितनी ही हलचलें होती दीख पड़ रही हैं यह ईश्वरीय सत्ता के अंशावतारों की सक्रियता का समय है। धर्म के संस्थापन और अधर्म के निराकरण के लिए जो प्रचलित प्रवाह से उलटे चलकर दैवी प्रयोजन को पूरा करने के लिए अंतःप्रेरणा से आगे आएँ वे अवतारी सत्ता के सहयोगी तो हैं ही, वरिष्ठतम स्तर का होने के कारण अंशावतार भी हैं। कभी एकादश रुद्रों में से एक रुद्र मारुति के रूप में, पवनसुत हनुमान के रूप में, भगवान का सहचर बनकर आया था। अब तो और भी विपन्न समय है। अनेकों रावण, कंस, अनाचारी मिलकर जो चुनौती प्रज्ञावतार को दे रहे हैं, उसका सामना करने के लिए ग्यारह रुद्रों की एक-एक करके आगे आने की, सक्रिय हो समय को बदलने की प्रक्रिया पूरी करने की माँग युगदेवता की ओर से सतत् हो रही है।

आने वाले ग्यारह वर्षों में प्रति वर्ष एक एक रुद्र के सक्रिय हो प्रकट होने तथा पवनसुत के स्तर का पराक्रम संपन्न होने की लीला सभी देखें, ऐसी महाशक्ति की इच्छा है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उस रुद्र को पहचान पाते हैं कि नहीं, उसके सहयोगी बन पाते हैं कि नहीं व युग परिवर्तन का सरंजाम पूरा कर पाते हैं कि नहीं। प्रस्तुत वसंत की वेला में परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीय माताजी को सूक्ष्म-कारण सत्ता सर्वाधिक सक्रिय हो पराशक्ति के अवतरण-अभिषेक-अनुष्ठान की भारत भूपर हो रही प्रक्रिया द्वारा प्रसुप्त संस्कारों के जागरण की लीला को संपन्न कर रही हैं। महान प्रयोजन के लिए जीने वाले पेट प्रजनन की वृत्ति से ऊँचा उठकर अंदर की साहसिकता को उमगाकर उलटे को उलटकर सीधा करने का पराक्रम कर दिखाने वाले कई लक्ष प्रतिभावान देवात्माओं का उपार्जन इन दिनों हो रहा है। गुरुसत्ता की जन्मस्थली-प्रज्ञावतार की हलचलों को जन्म देने वाली पावन स्थली आंवलखेड़ा की प्रथम पूर्णाहुति तक का नौ माह का समय इन्हीं देवात्माओं के प्रसव का समय है। वसंत पर्व से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक की अवधि के नौ माह को अवधि में आद्यशक्ति के विराट गर्भ में पककर जो संतानें निकलेंगी वे ही आने वाले ग्यारह वर्षों में सन् 2005 तक सतयुग की वापसी का सारा दृश्य क्रिया−कलाप पूरा करेंगी।

आज से अठारह वर्ष पूर्व परमपूज्य गुरुदेव ने “पुनर्गठन वर्ष” में एक परिपूर्ण मंथन कर मिशन की सारी प्रतिभाओं को नये सिरे से एकत्रकर एक आचार संहिता के अधीन ला खड़ा किया था व नूतन दायित्व सौंपे थे। सारे सक्रिय परिसर से जो मलाई तैयार ऊपर आयी उससे युगनिर्माण मिशन का पुनर्गठन कर ब्रह्मवर्चस्, की शोध-अनुसंधान प्रक्रिया का शुभारंभ क्षेत्रीय जन सम्मेलनों का नव निर्धारण, जाग्रत केन्द्रों के रूप में प्राणवान संस्कारित स्थानों पर शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण व प्राणप्रतिष्ठा का क्रम, नारी जागरण सम्मेलनों के साथ, संजीवनी कल्प स्तर की साधना द्वारा साधक स्तर के कार्यकर्ताओं का निर्माण तथा प्रज्ञापुराण-गीता विश्वकोश- वैदिकवाङ्मय के वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण की घोषणा कर उनने एक नयी करवट ले इस मिशन को शिखर पर पहुँचाने की प्रक्रिया में एक सोपान पूरा किया था। तत्पश्चात, प्रचारात्मक, रचनात्मक, सुधारात्मक, क्रिया–कलापों तथा नूतन प्राणवान सृजन सेना वाहिनी के माध्यम से आज तक की स्थिति में पहुँचा कर ला खड़ा किया है।

अब पुनः एक व्यापक मंथन की अश्वमेधिक अनुयाज को गतिशील बनाकर व्यापक पुनर्गठन की वेला आ गयी है ताकि कमर कसकर आगे आने वाली चुनौतियों का सामना किया जा सके। अपनी हर रणनीति का पुनः पर्यवेक्षण कर हर योद्धा आगे की नीति का निर्धारण करता है, सिंह जब चलता है तो आगे बढ़ने से पूर्व पीछे दृष्टिपात करता है व फिर आगे बढ़ता है-इसे सिंहावलोकन कहा जाता है। कुछ ऐसा सिंहावलोकन अपनी आराध्य सत्ता अपने विगत के क्रिया–कलापों पर कर अब आगे बढ़ने को आतुर है व इस प्रक्रिया में वह प्राणवान-जीवंतों को आगे की रणनीति को भलीभाँति समझकर सारे क्षेत्र को एक बार पूरी तरह मथकर खुलकर युद्ध का मोर्चा खोलने का आमंत्रण दे रही है। उसी के निमित्त आगामी 9 माह की अवधि, जो आँवलखेड़ा पूर्णाहुति तक पूरी होगी, के बाद का बारह माह का समय इस मिशन के द्वितीय पुनर्गठन, व्यापक मंथन का समय कहकर कोई भी विराट स्तर का बड़ा कार्यक्रम एक स्थान पर न करके सारी शक्ति पूरी भारत भूमि व विश्वभर में फैले गायत्री परिजनों की प्रसुप्ति को जाग्रति में बदलने के निमित्त-जाग्रतों की ऊर्जा को सक्रियता में बदलने के निमित्त तथा सक्रियों को साधन अस्त्र-कवच आदि से लैस होकर युद्ध का बिगुल बजाने का पूर्वाभ्यास करने के निमित्त नियोजित कर दी गयी है। आगामी अश्वमेध स्तर के बड़े कार्यक्रम इसी लिए स्थगित कर दिये गये हैं तथा यह पूरा एक वर्ष अनुयाज प्रक्रिया के अंतर्गत राष्ट्र के 450 जिलों, 7 लाख गाँवों तथा विश्वभर के डेढ़ सौ ऐसे राष्ट्रों के कोने-कोने तक प्रज्ञा प्रकाश को पहुँचाने के लिए नियोजित होगा। आगामी अश्वमेधिक कार्यक्रम अब अक्टूबर 1996 के बाद ही निर्धारित होंगे, अतः कोई भी परिजन अभी उस दिशा में विचार न कर अनुयाज को पुनर्गठन को विश्व राष्ट्र रूपी विराट छावनी में गतिशील करने के निमित्त नियोजित करने की बात ही मन में रखें, तदनुसार ही उत्साह दिखायें।

करना क्या होगा? इस बड़े व्यापक स्तर का पराक्रम संभव कैसे होगा? निषेधात्मक तो वे सोचते हैं जिन्हें अपने आराध्य पर विश्वास नहीं। पर यदि हम लक्ष्य को समर्पित हैं तो उस पराशक्ति पर विश्वास करें जो इस मिशन के क्रिया–कलापों की जननी है। आँवलखेड़ा में संपन्न हो रहा अनुष्ठान अब स्थान-स्थान पर साधना सत्रों, मंत्रलेखन-संकल्पित जप अनुष्ठानों के रूप में संपन्न हो रहा है। साधना का यह उपार्जन अनिवार्य है। इस विराट स्तर की तैयारी के लिए जिसका वर्णन ऊपर किया गया। इसके साथ-साथ दैवी प्रवाह के अनुकूलन के लिए जहाँ-जहाँ अश्वमेधिक ऊर्जा बिखरी है जहाँ पर भी अब तक बाईस व आगामी तीन, कुल पच्चीस अश्वमेधिक अनुष्ठान संपन्न हुए हैं, वहाँ उसका सुनियोजन करने के लिए सभी परिजनों को सक्रिय हो जाना चाहिए। संस्कारों की दृष्टि से सुसंपन्न इस राष्ट्र को एक दिशा-दर्शक अग्रगामी की आवश्यकता समय-समय पर पड़ती है। वही अपने परिजनों को बनना होगा। सुनियोजित कार्यक्रम देने होंगे तथा विद्यमान ऊर्जा का समुचित उपयोग करने की विधा का शिक्षण देने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा।

अपने परिजनों की आगामी क्रियापद्धति प्रस्तुत वसंत से इस प्रकार की होनी चाहिए-

1-जहाँ-जहाँ अश्वमेध संपन्न हुए हैं वहाँ साधना आयोजित कर उन सभी याजकों को जिनने भाग लिया था उस सुरक्षा कवच के अंतर्गत लाना जो इक्कीसवीं सदी में उनकी रक्षा करेगा। ये घरों के मुहल्लों के, प्रज्ञा संस्थानों के तथा जिला सम्मेलनों के स्तर पर आयोजित हो सकते हैं। इन सभी के घरों को मंदिर बनाने के लिए देवस्थापना से लेकर ‘वेद स्थापना’ के उपक्रम ताकि वैदिक संस्कृति का प्रकाश घर-घर पहुँचे व हर घर एक संस्कार मंदिर बन जाय।

2-स्वावलंबन की प्रक्रिया को गतिशील कर राष्ट्र को समर्थ व संपन्न बनाने के लिए विभिन्न रचनात्मक कार्यक्रमों का शुभारंभ दूसरा कदम है राष्ट्र के आर्थिक विकास की विभिन्न योजनाओं की जानकारी लेकर उनका प्रशिक्षण लेकर प्रत्येक प्रज्ञा संस्थान को एक रचनात्मक उत्पादन केन्द्र बना देना ताकि राष्ट्र गरीबी व बेरोजगारी से मुक्त हो सके। कुटीर उद्योगों का सहकारिता के स्तर पर विकास हो तथा व्हाइट कॉलर क्लर्कों के स्थान पर अपने पैरों पर खड़े-आत्म निर्भर नागरिक अधिकाधिक संख्या में दिखाई देने लगें। स्वदेशी आँदोलन को गति देकर राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाना हमारा लक्ष्य ही होगा।

3-पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा कर हर परिजन को हरीतिमा संवर्धन, अस्वच्छता निवारण, सामूहिक श्रमदान की प्रवृत्ति की ओर प्रेरित करना, ताकि हमारा आसपास का परिकर स्वच्छ प्राणवान बन सके। इसके लिए विशेष रूप से युवा वर्ग को साथ लेकर उनके माध्यम से सक्रिय कार्यक्रमों को चलाना, व्यापक सफाई अभियान द्वारा सुरुचि भरा वातावरण बनाने की प्रक्रिया को बलवती बनाना होगा। जल व भूमि का संसाधकों का संरक्षण कैसे अधिकाधिक हो वही इस प्रक्रिया का प्राण है।

4-हमारा देश इस सदी के अंत में सारे विश्व का सर्वाधिक निरक्षर देश होगा। राजकीय प्रयास इस कार्य को नहीं कर सकते। हमारे परिजन साक्षरता के प्रचार-प्रसार के निमित्त निकलें तथा एक भी व्यक्ति ऐसा न छोड़ें जो निरक्षर हो। शिक्षा के साथ ही विकास जुड़ा है। यदि राष्ट्र पूर्णतः शिक्षित होगा तो देखते-देखते अपनी शिक्षित तकनीकी दृष्टि से विकसित जनशक्ति के बलबूते विश्व नेतृत्व कर सकेगा। साथ-साथ विद्या−विस्तार के तंत्र को भी सक्रिय करना होगा। घर-घर युग साहित्य पहुँचाना-जन चेतना को श्रेष्ठ साहित्य द्वारा अनुप्राणित करना अनुयाज प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग है।

5-पाश्चात्य सभ्यता तेजी से हम पर आक्रमण कर हमारी संस्कृति धरोहर छीन रही है। शहरों की स्थिति बड़ी विषम है। वहाँ मात्र पश्चिम का भोगपरक अंधानुकरण हावी होता दिखता है। हम आगामी एक वर्ष में साँस्कृतिक नवोन्मेष हेतु मीडिया द्वारा, सेटेलाइट चैनल द्वारा, वीडियो कार्यक्रमों द्वारा, केबलनेटवर्क द्वारा, देवसंस्कृति की प्राण प्रेरणा से जन-जन को अनुप्राणित करना चाहते हैं, ताकि त्याग और बलिदान, ममत्व एवं पारिवारिकता के संस्कार वाली हमारी धरोहर संगीत, कला, नाटकों, सुरुचिपूर्ण प्रदर्शनों, हर माध्यम से सुरक्षित रखी जा सके। ‘मंथन’ धारावाहिक इस दिशा में एक शुरुआत है पर हम शीघ्र ही पूरे विश्व के नेटवर्क में छा जायँ, इसकी तैयारी हमें करनी है।

6-दहेज व अपव्यय भरी शादियों से हो रही बरबादी से सब परिचित हैं। दुर्व्यसन व कुरीतियाँ हमारे राष्ट्र के लिए छिद्र के समान हैं। जब तक इनके खिलाफ मुहिम नहीं छेड़ी जाएगी व व्यापक मोर्चा नहीं खड़ा होगा, यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। अनुयाज क्रम में राष्ट्र की गरीबी के लिए जिम्मेदार खर्चीली शादियों का विरोध, आदर्श विवाहों का अधिकाधिक प्रचलन तथा दुर्व्यसनों से मुक्ति के लिए शपथ अभियान घर-घर जाकर चलाया जाएगा। ग्रामीण-शहरी परिकर को विवश किया जाएगा कि वह राष्ट्र के हित में, स्वयं के हित में इन बुराइयों से मुक्ति हेतु हमारे साथ चलें। समाज व जन-जन का स्वास्थ्य इसी से समृद्ध बनाया जा सकेगा। अल्पबचत अभियान द्वारा इस अभियान से बचे धन को राष्ट्रीय विकास में लगाने की प्रेरणा दी जाएगी।

7-अंतिम कार्यक्रम अनुयाज के अंतर्गत है शहरों का विकेन्द्रीकरण, ग्रामों की समस्वरता लौटा कर वहाँ इस स्तर के प्रचलनों का निर्धारण ताकि हर व्यक्ति उस सुरुचि पूर्ण वातावरण में वापस लौटना स्वयं पसंद करने लगे। गंदी बस्तियों की बढ़ोत्तरी, शहरों के विस्तार की समस्या, एक कोढ़ की बीमारी की तरह हमारे देश में संव्याप्त है। यदि हम चाहते हैं कि हम स्वस्थ-सभ्य-स्वच्छ समाज के नागरिक बनें तो शहरों का विस्तार रोकें एवं ऊपर बतायी प्रक्रिया के अंतर्गत ग्रामों में ही रोजगार, मिट्टी से जुड़े कार्यक्रमों का प्रचार प्रसार कर अधिकाधिक व्यक्तियों को गाँवों की सुरुचि भरे वातावरण में रहने को प्रेरित करें। इससे बहुप्रजनन से ग्रसित इस राष्ट्र की प्रायः सभी समस्याएँ क्रमशः दूर होने लगेंगी।

हमारी उपरोक्त सात सूत्री शैली जो आगामी दो वर्ष में क्रिया रूप में पूर्णतः आ जाएगी, निश्चित ही निहित स्वार्थ वाले, संकीर्ण महत्वाकांक्षी व्यक्तियों को रुचि कर नहीं लगेगी किंतु अश्वमेधों का लक्ष्य ही राष्ट्र को एक सशक्त व अखण्ड राष्ट्र बनाने का था व उसे पूरा करना ही है तो इस प्रक्रिया को अब हम लोकनायकों को हाथ में लेना होगा। हर जनपद अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष, पंचायत के अधिकारियों व जननायकों को इन योजनाओं का उद्देश्य समझा कर उन्हें इसका भागीदार बनाना होगा ताकि नूतन राष्ट्र के निर्माण का एक अभिनव विकल्प खड़ा होता दीख सके।

वासंती बयार अब झंझावाती मोड़ ले रही है। इस प्रचंड बयार में अब महाकाल उनकी ओर दृष्टि लगाए खड़ा है जो रास्ते में अवरोध बन खड़े हैं या बनना चाहते हैं। उन्हें विस्मार होने में तनिक भी देर न लगेगी। जो दैवी प्रवाह के अनुकूल चलना चाहेंगे पराशक्ति उनकी पीठ थपथपा कर उन्हें आगे बढ़ायेगी व नवयुग की आधारशिला रखने का यह महत्वपूर्ण सोपान भी पूरा करेगी। हम मातृसत्ता को आश्वस्त करें इस वसंत पर कि हम इस कार्य में कुछ भी कमी अपनी ओर से नहीं रहने देंगे।

*समाप्त*