“साधनानुभूति”


हम अपने भीतर झाँकना सीखें

व्यक्ति दूसरों के विषय में अधिकाधिक जानने का प्रयास करें अथवा उनकी भावनाओं से परिचित होना चाहे उससे पहले अपने विषय में अधिकाधिक जान लेना चाहिए। अपने मन की भाषा को, अपनी आकाँक्षाओं-भावनाओं को बहुत स्पष्ट रूप से समझा, सुना और परखा जा सकता है। अपने बारे में जानकर अपनी सेवा करना आत्म सुधार करना अधिक सरल है, बनिस्बत इसके कि हम और सुधार कर लेंगे, यह संसार हमें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होने लगेगा।

हम दर्पण में अपना मुख देखते हैं एवं चेहरे की मलिनता को प्रयत्नपूर्वक साफ कर उसे सुँदर बना डालते हैं। मुख उज्ज्वल साफ और अधिक सुँदर निकल आता है। मन की प्रसन्नता बढ़ जाती है। अंतःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और उसे भलीभाँति परखने से उसकी मलिनताएँ भी दिखाई देने लगती हैं, साथ ही सौंदर्य भी। कमियों को दूर करना मलिनता को मिटाना और आत्म निरीक्षण द्वारा पर्त दर पर्त गंदगी को हटाकर आत्मा के अनंत सौंदर्य को प्रकट ही सच्ची उपासना है। जब सारी मलिनताएँ निकल जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वल, साफ और सुँदर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है। फिर बहिरंग में सभी कुछ अच्छा-सत्, चित्, आनंदमय नजर आने लगता है।

हमें अपने आपसे प्रश्न करना चाहिए कि क्या हमारे विचार गंदे हैं? कामुकता के चिंतन में हमारा मन रस लेता है, क्या हमें इन्द्रियजन्य वासनाओं से मोह है, क्या हम उस परमसत्ता के हमारे बीच होते हुए भी भयभीत हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो हमें अपने सुधार में जुट जाना चाहिए। वस्तुतः अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन हमें अपने ऊपर के प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलने लगेगा, उस दिन से हम संसार के सबसे सुखी व्यक्ति बन जायेंगे।


सुख का मूल पंचशील

पंचनंद की प्रजा में कलह, अव्यवस्था, अनुशासनहीनता देखकर सम्राट बहुत दुखी हुए। उन्होंने आचार्य देवधर को कुरु जाने और वहाँ की प्रजा के जीवन का अध्ययन करके आने को कहा, ताकि वह व्यवस्थाएँ अपने यहाँ भी लागू की जा सकें और प्रजा को सुखी बनाया जा सके।

आचार्य देवधर कुरु देश के राजपुरोहित सुनन्द पंडित के पास गए। पंडित सुनन्द ने कहा-”तात! राज्य का राजस्व विभाग मैं सँभालता हूँ। एक बार एक कृषक को जमीन नाप रहा था। नापते समय बीच में गड्ढा आ गया। उसमें एक छोटा-सा प्राणी बैठा था। मेरे सामने एक समस्या आ गई यदि मापदंड गड्ढे में रखता तो जीव हिंसा होती, यदि दंड को गड्ढे से आगे बढ़ाकर रखता तो एक किसान को जमीन कम मिलती। असमंजस में पड़ा था तभी वह जीव गड्ढे के एक बिल में घुस गया। मैंने मापक दंड टेक दिया। इतने में जीव की चिचियाहट सुनाई पड़ी। कह नहीं सकता उसने अकारण आवाज की या मुझसे हिंसा हुई, तब से मन विक्षुब्ध रहता है। आप मेरे सारथी के चले जाइए। वह दया, धर्म का भली प्रकार पालन करता है। सच्चा उपदेश देने का अधिकारी वही है।”

आचार्य सारथी के पास गए और अपनी वही प्रार्थना दुहराई। आचार्य की पूरी बात सुन लेने के बाद सारथी ने बताया, आर्य। मैंने एक बार वर्षा के बचाव के लिए अपने घोड़ों को चाबुक दिख दी, घोड़े डर कर तेज दौड़ने लगे। पर मुझे लगता है कि उस दिन मेरा दया बरतने का शील नष्ट हो गया। आप सेठ सारिपुत्र के पास चले जाइए। वह आपका काम अवश्य कर देंगे।

विचारों में खोए हुए आचार्य श्रेष्ठी सारिपुत्र के पास पहुँचे। प्रणाम अभिवादन के अनंतर सारिपुत्र ने बताया आर्यश्रेष्ठ! मैं वणिक व्यापार करता हूँ एक बार मैंने एक किसान से धन मोल लिए। धान महाराज के सुरक्षित अन्न भंडार के लिए खरीदे गए थे।

खरीदते समय एक ऐसी ढेरी आ गई जो तौली जा चुकी थी। पर मुझे यह स्मरण नहीं रहा कि यह राजा के हिस्से की है या कृषक के हिस्से की। मुझे वापस घर लौटने की जल्दी थी सो उसे राजा के हिस्से में मिलवा दिया। लगता है इससे मेरी वणिक नीति अपराधी हो गई। अब आप ही बताइए कि मैं किस प्रकार धर्मोपदेश कर सकता हूँ। अच्छा हो आप द्वारपाल पुण्यपाल के पास चले जाएँ। वे ही आपको धर्म का मर्म समझा सकने योग्य हैं।

अपनी उलझी पहेली को लिए देवधर-पुण्यपाल के पास गए। द्वारपाल ने बताया-श्रीमान जी मैं दुर्ग का रक्षक हूँ। एक दिन जब कोटद्वार बंद करने का समय हुआ, तब मैंने एक पुरुष को किसी सुँदरी युवती के साथ कुछ विलंब से आते देखा। पास आने पर मैंने उसे डाँटा, तुम इतने समय तक रस-विहार करते हो, समय अंदर क्यों नहीं आते। लेकिन जब मुझे मालूम पड़ा कि युवती आगन्तुक की बहिन थी और वह अपनी ससुराल से आ रही थी, तो मुझे बड़ा पश्चाताप हुआ। दृष्टिदोष के कारण मैं अपने क्षात्र धर्म से च्युत हो गया हूँ। आप उत्पलवर्णा वेश्या के पास जाइए। वह आपको उपदेश देगी।

आचार्य उत्पलवर्णा के पास गए और अपना मंतव्य उसे कह सुनाया। उत्पल बोली-आचार्य श्रेष्ठ! एक बाँम राजकुमार चंद्रसेन मेरे पास आए। मैंने उन्हें वचन दिया कि मैं अपना शरीर केवल तुम्हें ही समर्पित करूंगी। वे बोले मैं बाहर जा रहा हूँ तीन वर्ष मेरी प्रतीक्षा करना। यदि न आऊँ तो तुम किसी भी पुरुष का वरण करने को स्वतंत्र होओगी। तीन वर्ष के पश्चात् भी वे न आए तो मैंने न्यायाधीश से आज्ञा प्राप्त कर पेट पालन के लिए दूसरे पुरुष का आश्रय लेने का निश्चय किया मैं एक व्यक्ति से अभी बातें कर ही रही थी कि चंद्रसेन आ गए। मैं तब से अपने को अपराधिनी पाती हूँ बताइए कैसे उपदेश करूं।

आचार्य देवधर को धर्म का मर्म ज्ञात हो गया। उन्होंने विचार किया-पंचशील में धर्म का सार निहित हैं जिस देश की प्रजा पंचशील का तत्परतापूर्वक पालन करती है, वह सुखी रहता है। यह निश्चय कर वह पंचनंद लौट आए और वहाँ पंचशील का उपदेश करने लगे। जिससे वहाँ की प्रजा ने अपना खोया सुख वापस पाया। पंचशील-अर्थात् अहिंसा, दया, न्याय, सुदृष्टि और सच्चरित्रता।


Quotation

पतन के गर्त में गिर पड़ना ढलान की ओर बहाव की तरह सरल है। उबरना और उठना कठिन है। इतना कठिन जो आत्मविश्वास के बिना और किसी प्रकार संभव नहीं हो सकता।


विशेष लेख- - इस आपत्ति काल में “अपनों” की ढूँढ़ खोज

छोटे काम थोड़े से व्यक्तियों के थोड़े से परिश्रम से ही संपन्न हो जाते हैं, पर विशाल क्षेत्र में फैले हुए असंख्य लोगों से संबंधित सुविस्तृत और विशालकाय प्रयोजन को संपन्न करने के लिए उसी अनुपात से विशेषज्ञों और बड़े साधनों को जुटाये बिना काम नहीं चलता। स्वेज और पनामा की नहर बनाने में, मिस्र के पिरामिड, चीन की दीवार, और भारत का ताजमहल बनाने में कितनी प्रतिभा, कितनी जनशक्ति और साधन शक्ति नियोजित की गई होगी, इसकी कल्पना करने में किसी भी समझदार को कठिनाई नहीं होनी चाहिए। फिर 600 करोड़ व्यक्तियों का ब्रेनवाशिंग करने के लिए कितनी धुलाई का प्रबंध करना पड़ेगा, यह आकलन भले ही कितना ही सुविस्तृत क्यों न हो, पर करना तो पड़ेगा ही। साथ ही उससे बड़ी एक और समस्या इस प्रसंग के साथ जुड़ी हुई है कि इस विशालकाय जनसंख्या की क्रिया पद्धति में जो रोमाँचकारी अवाँछनीयता घुस पड़ी है, उसका परिशोधन-परिमार्जन किया जाना है।

यह तो सफाई पक्ष की चर्चा हुई। उस गंदगी से खाली किये गये स्थान पर शोभा और सौंदर्य से भरा-पूरा अभिनव वातावरण भी प्रतिष्ठित करना हैं यह दुहरी प्रक्रिया हो गई। टूटे हुए खंडहरों का छितराया हुआ मलबा हटाना कम भारी काम नहीं है। उसे कर लेने भर से भी काम नहीं चलता। उस समतल किये स्थान पर ऐसा भव्य भवन भी खड़ा करना है जिसे आज की कीचड़-मिट्टी वाली बनावट की तुलना में किसी पेरिस जैसे शोभायमान शहर से भी बढ़-चढ़ कर समझा जाना चाहिए। सभी जानते हैं कि धरती पर गंगावतरण का समय कितना कठिन था और उसके लिए किन उच्चकोटि की वरिष्ठता को दाँव पर लगना पड़ा। नवयुग की कल्पना भी इससे बढ़कर है। इसी अपनी ऊबड़-खाबड़ धरती पर नंदन वन समेत समूचे स्वर्गलोक को विनिर्मित किया जाना है और अनगढ़ दिग्भ्राँत, अर्धविक्षिप्त स्तर के सुविस्तृत, जन समुदाय का स्तर देवोपम बनाये जाने की योजना है।

इस प्रयास को लगभग वैसा समझा जाना चाहिए मानों निविड़ निशा को मध्याह्न काल के प्रचंड प्रकाश में बदला जा रहा है। नरक को गलाकर स्वर्ग में ढाला जा रहा है। असाधारण परिवर्तन कहा जाता है। उसमें पिशाच को पशु में, पशु को मनुष्य में और मनुष्य को देव कलेवर में बदला जा रहा है। तपते ग्रीष्म के उपराँत जल-थल एक कर देने वाली वर्षा का आगमन हो रहा है। इस परिवर्तन की योजना तो परमेश्वर ही बना सकता है, पर उसे क्रियान्वित करने में तो मनुष्य कलेवर में रहने वाले उच्चस्तरीय प्रतिभा संपन्नों को ही करना पड़ेगा। पटरी से उतर कर जमीन पर पसर जाने वाले इंजन को सीधा खड़ा करने में बड़े आकार वाली क्रेनें ही काम आती है। दल-दल में फँसे हाथी को बलिष्ठ हाथियों का झुँड ही घसीट कर किनारे तक पहुँचाने में समर्थ होता है। इन दिनों ऐसी ही वरिष्ठ प्रतिभाओं को ऐसी भूमिका निभाने की आवश्यकता पड़ेगी मानों विश्वकर्मा ने नई नगरी रातोंरात बनाकर खड़ी कर दी हो।

अति कठिन है, ऐसे दुर्भिक्षकाल में मरणासन्न कंकालों के समूह में से किन्हीं समर्थ शूरवीरों को ढूँढ़कर निकालना। उन्हें अपवाद कहा जा सकता है, पर होते तो वे भी कहीं न कहीं हैं ही। रहते भी हैं। नरपामरों के समुदाय में से ही कई बार महामानव निकल पड़ते हैं। कोयले की खदान से हीरे भी खोजे निकाले जाते हैं। खारे पानी के उपेक्षित समुद्र में डुबकी लगाकर गोताखोर अपना थैला मणि-मुक्तकों से भर लाते हैं। युगधर्म के अनुरूप अपनी विशिष्टता, प्रतिभा, साहसिकता एवं पुरुषार्थ परायणता के परिचय दे सकने वाले कहीं मिले ही नहीं, इतनी बाँझ अपनी धरती अभी हो नहीं गई उसमें महापुरुष उगाने की उर्वरता कहीं न कहीं किसी न किसी मात्रा में अभी भी विद्यमान है। उसे खोज निकालना, उभारना, शिक्षित करना और कार्यक्षेत्र में उतारना कठिन एवं कष्ट साध्य भले ही हो, पर उसे असंभव तो नहीं ही कहा जा सकता।

आरंभ कहाँ से हो? विशाल दुर्ग के निर्माण का शिलान्यास तो किसी एक थोड़ी जगह में छोटे क्रियाकृत्य के साथ ही शुरू होता है। शुभारंभ के उपराँत विस्तृत क्षेत्र में असंख्य लोगों द्वारा किसी बड़े निर्माण का सिलसिला चल पड़ता है। समयानुसार वह प्रयास पूरा भी होकर रहता है। इन दिनों भी नव सृजन का उपक्रम छोटे रूप में थोड़े लोगों द्वारा आरंभ किया जा रहा है। उसकी अभिवृद्धि गुणन चक्र के अनुसार होती रहेगी। एक बीज से विशालकाय वृक्ष खड़ा हो जाता है। बड़ा होने पर उसमें अनेकानेक फल हर साल आते है। उनमें से प्रत्येक में अनेकों बीज विद्यमान रहते हैं। उनके बोये जाने की जब बारी आती है तो देखते-देखते एक विशालकाय उद्यान बनकर खड़ा हो जाता है। सुविस्तृत वनों की उत्पत्ति और अभिवृद्धि इसी क्रम से हुई है। नवनिर्माण के लिए जितनी और जिस स्तर की प्रतिभाएँ अगले दिनों बड़ी संख्या में अपेक्षित होंगी, उसका श्रीगणेश उपलब्ध साधनों के सहारे ही क्रियान्वित होगा। किसी को इस असमंजस में नहीं पड़ना चाहिए कि कम सामर्थ्य वाले कम लोगों द्वारा किया गया उच्चस्तरीय लक्ष्य के पूर्ति हो सकने की बात कैसे बनेगी? दिति और अदिति का प्रजनन ही इस सृष्टि के देव-दानवों के रूप में असंख्य रूप में विभाजित बहुगुणित होकर रहा है।

इक्कीसवीं सदी से आरंभ होने वाले उज्ज्वल भविष्य को सँजोये हुए नवयुग का आगमन हो रहा है। उसका ढाँचा, खाका, मॉडल बनाने का सुनिश्चित प्रयास युग संधि के आगामी बारह वर्षों में बनकर खड़ा हो जाना है। सन् 1995 से 2006 तक की अवधि इसी तैयारी के लिए है। उसके लिए हिमालयवासी ऋषिसत्ता ने दुर्गम इसी क्षेत्र को सूत्र संचालन का केन्द्र बनाया है। सूर्योदय के लिए पूर्व दिशा निर्धारित भी है। दिव्य प्रवाह को गतिशील बनाने की प्रक्रिया भी इसी दिशा से समय-समय पर संचालित होती रही है।

करने के लिए इतने अधिक काम सामने पड़े हैं जिनका स्वरूप और आकलन समय-समय पर सामने आता रहेगा। पर उनमें से एक तथ्य तो सुनियोजित है कि लोकमानस की वर्तमान विचारधारा को अनिवार्य रूप से मोड़ा मरोड़ा जायगा। इतना बन पड़ने पर जो शक्तियां इन दिनों विकृतियों, भूलभुलैया और अवाँछनीयताओं के परिपोषण में लगी हुई हैं, वे उलटकर सृजन, समर्थन एवं उत्थान अभ्युदय के क्रिया–कलापों में जुटी हुई दृष्टिगोचर हो लगेंगी। नवयुग का यही मूलभूत आधार भी है।

इसके लिए सर्वप्रथम सृजन शिल्पियों की आवश्यकता पड़ेगी। वे कहाँ से आयें? सृजन की योग्यता रखने वालों का पुरुषार्थ नियोजित न हो तो गाड़ी कैसे आगे बढ़े? दृष्टि पसारने पर दीख पड़ता है किसी को लालच की ललक से तनिक भी पीछे हटने का साहस नहीं है और उच्चस्तरीय दैवी प्रयोजन में गलने-खपने को तैयार नहीं है। तथाकथित संत तक स्वर्ग मुक्ति-सिद्धि की मनोकामनाएँ पूरी करने से आगे की बात सोचने को तैयार नहीं। फिर सामान्य कहलाने वाले व्यक्ति यदि विलासिता, संपदा और अहमन्यता जैसी तत्काल आकर्षण भरे प्रलोभन को कौन छोड़े? देश, धर्म, समाज, संस्कृति तो मात्र चर्चा भर के विषय बनकर रह गये हैं। उनके लिए कुछ त्याग और श्रम करने के लिए कुछ करने का उत्साह ही एक प्रकार से बुझ गया है। ऐसी दशा में सृजन शिल्पियों की छोटी बड़ी मंडली कैसे खड़ी की जाय तो अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अन्यान्यों में अनुकरण का उत्साह भर सके?

परिस्थिति की विवेचना और आवश्यकता की गरिमा को समझते हुए यही निष्कर्ष निकलता है कि जिन्हें इस उमंग के उभरने की अनुभूति होती है, वे ही अपने को अग्रिम पंक्ति में खड़ा करें। गुरुगोविंद सिंह ने अपने पाँच पुत्रों को उद्देश्य पूर्ति के लिए समर्पित किया था। विश्वामित्र की यज्ञ रक्षा के लिए दशरथ ने अपने दोनों पुत्र खतरे में डाले थे। कुँती ने अपने पाँचों पुत्र महाभारत की संरचना का महान उद्देश्य पूरा करने के लिए कृष्ण के हाथों सुपुर्द किये थे। दूसरों को उपदेश देने से पूर्व यही अच्छा है कि उस कठिन कार्य को अपनों को साथ लेकर स्वयं ही आरंभ किया जाय। नवयुग निर्माण की योजनाएं कई बार सामने आई हैं, तब भी अपने को और अपनों को अग्रिम पंक्ति में ही खड़ा किया गया है। विश्वामित्र ने स्वयं और अपने प्रधान शिष्य हरिश्चंद्र को, रानियों को लेकर ही उस समय मिलजुल कर कदम बढ़ाया था। बुद्ध अकेले ही घर से निकले थे। बाद में उनने अपने पुत्र राहुल को भी साथ ले लिया था। अशोक उस महाअभियान में सम्मिलित हुए, बाद में अपनी पुत्री संघमित्रा और पुत्र महेन्द्र को भी युगधर्म की पुकार को समझाते हुए समर्पित कर दिया। आदर्शों के निर्वाह में अग्रिम पंक्ति में खड़े होने वालों को कभी इस प्रकार की शिकायत नहीं करनी पड़ी है कि उन्हें साथी या अनुयायी नहीं मिले। सप्तऋषि आगे आये थे तो देवर्षियों, महर्षियों,ब्रह्मर्षियों और ऋषि-मनीषियों की बड़ी सेना कार्य क्षेत्र में उतरती चली आई और वातावरण को सतयुगी बनाने तक एक क्षण के लिए भी चैन से न बैठी। जब चोर, उचक्कों, नशेबाजों, व्यभिचारियों, रिश्वतखोरों को साथी सहयोगी मिल जाते हैं, तो कोई कारण नहीं कि उच्चस्तरीय कार्यों के लिए व्रतशील जन अपनी कथनी और करनी को एक कर लेते हैं तो उनको साथी सहयोगी न मिलने की शिकायत करनी पड़े।

गायत्री परिवार अब एक बड़े परिवार के रूप में जुट गया हैं परिवार का अर्थ यहाँ अंश-वंश से नहीं वरन् विचारों की, भावनाओं की एकता है। वस्तुतः सच्चे मित्र वही होते हैं, उन्हीं को कुटुँबी या परिजन कहा जा सकता है। राम काज के लिए बड़े से बड़े त्याग और साहस प्रस्तुत करने वाले रीछ-वानर ही उन दिनों राम रत्न के रूप में गिने जाते थे। बुद्ध के वे साथी वे ही थे, जिन्होंने परिव्राजकों और परिव्राजिकाओं के रूप में धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए अपने को खपा दिया था। गाँधी के कुटुँबी उन्हें ही कहा जा सकता है जिन्होंने सत्याग्रह आँदोलन के लिए अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया। ईसा के कुटुँबी अभी भी पादरियों के रूप में कठिन वन्य प्रदेशों में डेरा डाले पड़े हैं और अपने मार्गदर्शक का विचार क्षेत्र व्यापक बनाने के लिए कष्ट साध्य जीवन जी रहे हैं।

एक समय था जब एक परिपाटी ही चल पड़ी थी कि हर परिवार से एक व्यक्ति युगधर्म के निमित्त समर्पित किया जाय। सिख धर्म के विस्तार हेतु उस समुदाय के लोग घर पीछे एक व्यक्ति समर्पित किया करते थे। जिन दिनों युद्धों का सँजोया जाना अनिवार्य हो गया था, तब हर राजपूत परिवार से एक व्यक्ति सेना में भर्ती कराया जाता था। ब्राह्मण कुटुँबों में से एक को परिव्राजक बनने के लिए प्रेरित किया जाता था। उसकी यदि कोई घरेलू जिम्मेदारी होती थी, तो परिवार के सभी लोग मिलजुल कर पूरा कर दिया करते थे। विश्व युद्धों में आमने-सामने डटे हुए सैनिकों की बड़ी संख्या में आवश्यकता पड़ने की स्थिति में उन देशों के अधिकांश व्यक्ति मोर्चे पर चले गये थे और उनकी स्त्रियों ने, वृद्धों ने किसी प्रकार आश्रित परिवार के निर्वाह की व्यवस्था बनाई थी। अपने समय में भी जब नव-सृजन की आवश्यकता सर्वोपरि बन गई है, तब भावनाशीलों और प्राणवानों में से प्रत्येक को उसी महान परंपरा का निर्वाह करना चाहिए। प्रस्तुत अभूतपूर्व नव सृजन महाक्राँति की गरिमा का मूल्याँकन करते हुए विलासिता और तृष्णा की पूर्ति के लिए कर्तव्य पालन को गौण समझने और मुँह छिपाने की भूल नहीं करना चाहिए। स्मरण रहे, आदर्शों के लिए सुखोपभोग में कटौती करने वाले कभी घाटे में नहीं रहे, वरन् लालच के लिए मरते खपते रहने वालों की तुलना में इतने अधिक गौरवशाली बने हैं, जिनके सौभाग्य पर असंख्यों मनोबल क्षेत्र में अपंग बने हुए लोगों को निरंतर ईर्ष्या करते रहने पड़े।

यह कार्य ऐसा है जिसका श्रीगणेश इन्हीं दिनों किया जाना है। उसे पीछे कभी के लिए नहीं टाला जा सकता। आपत्तिकाल में घर के बर्तन, उपकरण बेचकर भी मरणासन्नों की चिकित्सा करानी पड़ती है। इन दिनों सड़ी कीचड़ में धँसते जाने वाले समुदाय को उबारने के लिए अनेकों भावनाशीलों को कुछ करने के लिए आगे आना पड़ेगा। बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, दुर्घटना आदि के सामयिक विपत्तियों से निपटने के लिए हर सहृदय को अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ योगदान प्रस्तुत करना पड़ता है। ऐसे समय में भी जो समर्थ होते हुए मूक दर्शक बने बैठे रहते हैं, उन्हें भीतर से धिक्कार और बाहर से फटकार सुनते हुए लज्जितों जैसे सिर नवाये किसी कोने में बैठे रहना पड़ता है। सिर उठाकर समुन्नत समुदाय के बीच आँखें मिलाने का साहस करते नहीं बन पड़ता।

हिमालय में सक्रिय सूत्र संचालन केन्द्र ने अपने इर्द-गिर्द नजर पसार कर देखा है कि आड़े वक्त में काम आ सकने वाले ‘अपनों’ की कितनी बड़ी मंडली अपने से जुड़ी हुई है और उसे सरलतापूर्वक किस प्रकार युगधर्म के आह्वान पर कदम बढ़ाने के लिए अधिकारपूर्वक कहा जा सकता है। ये सब वे ही हो सकते हैं जो सदा से श्रद्धा का केन्द्र रही साधु-ब्राह्मण परंपरा को अपनाकर अपरिग्रही और त्याग भरा जीवन जीने का साहस रखते हों।

आदर्शों की दिशा में किन्हीं को अग्रसर करने के लिए सदा ऐसे व्यक्तित्वों की आवश्यकता पड़ती रही है जो अपनी दक्षता, श्रमशीलता ही नहीं व्यक्तिगत जीवन में समाविष्ट त्याग-भावना और प्रामाणिकता का भी बढ़-चढ़कर परिचय दे सकें। प्राचीन काल में ऐसे ही उदार आत्मचेता मार्गदर्शक बन सके थे जो समूचे समाज को ऊँचा उठा सके। अस्तु आज भी ऐसे ही व्यक्तियों की तलाश है जो अपनी सादगी और निस्पृहता का बढ़ा-चढ़ा प्रमाण प्रस्तुत कर सकें। इन्हीं पर युग परिवर्तन का दायित्व अगले दिनों आने वाला है इन्हीं में से महाकाल को कुछ अपेक्षाएँ हैं।


सच क्या है? चेतना या पदार्थ?

पदार्थ विज्ञान के अद्भुत चमत्कार के रूप में हम जो-जो विलक्षणताएँ देख पा रहे हैं और अगले दिनों देख सकेंगे, उनकी यदि योग विज्ञान से तुलना की जाय, तो पायेंगे कि दोनों के बीच तिल और ताड़ जितना भारी अंतर है। भौतिक विज्ञान के आविष्कार निश्चय ही सराहनीय हैं और आश्चर्यजनक भी, पर जब योग विज्ञान की उपलब्धियों की चर्चा होती है, तो यही कहना पड़ता है कि वह यदि प्रखर सूर्य है, तो पदार्थ विज्ञान एक टिमटिमाता दीपक।

योग विज्ञान चेतना का विज्ञान है। उसमें प्रगति और परिवर्तन जैसी क्रियाओं में उसकी इसी शक्ति का प्रयोग होता है, जबकि पदार्थ विज्ञान में विद्युत, ताप, गैस एवं परमाणु ऊर्जा जैसी पदार्थगत शक्तियों का उपयोग किया जाता है। यहाँ विज्ञान के जितने भी कौशल हैं, सब इन्हीं के खेल हैं। यह ऊर्जाएँ सूक्ष्म होते हुए भी पदार्थ स्तर की हैं, इसलिए इनके द्वारा लाये गये वह रसायनों की आपसी क्रिया द्वारा रसायन निर्माण संबंधी हों अथवा धातुओं के मिलन-संयोग द्वारा मिश्रधातुओं के उत्पादन संबंधी, सभी एक ही प्रकार के परिवर्तन के परिणाम हैं।

पदार्थ को प्रभावित करने का यह एक तरीका हुआ, किंतु एक दूसरे उपाय से भी इस प्रक्रिया को घटित किया जा सकता है और क्षणमात्र में रूपांतरित कर किसी वस्तु को दूसरे-तीसरे पदार्थ में बदला जा सकता है। यह प्रणाली चेतना विज्ञान की है। योग विज्ञान इसी से संबंधित है। इसमें पदार्थ सत्ता के साथ किसी प्रकार की छेड़खानी नहीं करनी पड़ती, उसे धारण करने वाली चेतना के अणुओं को सक्रिय मात्र कर देना होता है। इतने से ही एक वस्तु का लोप होकर दूसरे का निर्माण हो जाता है।

चेतना विज्ञान में योगियों द्वारा केवल व्यक्तिगत चेतना-अणुओं को विशेष प्रकार से उत्तेजित कर दिया जाता है। इतने से ही शरीर तंत्र एवं अंग-अवयव प्रभावित होकर उच्चस्तरीय ढंग से स्वयमेव क्रिया करने लग जाते हैं। इस क्रम में कई बार वस्तु तो अपरिवर्तित बनी रहती है, पर उसकी कार्य-पद्धति बदल कर असाधारण हो जाती है और अनेक बार क्रिया के साथ-साथ वस्तु में भी थोड़ा-थोड़ा बहुत रूपांतरण हो जाता है। महाभारत के युद्ध में इसी विद्या का प्रयोग करते हुए लड़ाई लड़ी गई थी।उल्लेखों से ज्ञात होता है कि उसमें प्रयुक्त होने वाले शस्त्रास्त्र देखने में तो बिल्कुल सामान्य से थे, पर प्रयोग के दौरान कहर बरपाने वाले परिणाम प्रस्तुत करते थे। इसे पढ़-सुन कर आज ऐसा लग सकता है कि वे या तो दिव्य ढंग से निर्मित दिव्य आयुध रहे होंगे या फिर वस्तुस्थिति की अतिरंजना मात्र, जिसे उस महासागर को महिमामंडित करने के लिए कथाकारों या इतिहासकारों ने गढ़ दी हो, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं,। तथ्य यह है कि उसमें युद्ध-कौशल और योगबल का अद्भुत समन्वय हुआ था। इसे नहीं समझ पाने के कारण ही इन दिनों उसे अत्युक्ति मान लिया जाता है, किंतु जब संशयशील आँखें उसको प्रत्यक्ष देख लें, तो फिर उसे झुठलाया कैसे जाय?

घटना परमहंस विशुद्धानंद से संबंधित है और उन दिनों की है, जब वे अपने झाल्दा स्थित आश्रम में प्रवास कर रहे थे। एक रोज उद्धवनारायण नामक एक शिष्य ने आकर पूछा कि महाभारत में जिन अग्निबाण, वृष्टि बाण जैसे आयुधों की चर्चा है, क्या ऐसे बाण तब सचमुच ही अस्तित्व में थे क्या? अथवा यह सब अलंकारिक उल्लेख मात्र हैं? परमहंस देव ने सिर हिलाते हुए सहमति प्रकट की और कहा कि निश्चय ही तब ऐसे शस्त्रास्त्र थे। इसके साथ ही उन्होंने सामने उगे हुए सरकंडों में से तीन को तोड़ लाने को कहा और शिष्य से पूछा-”क्या तुम उसे देखना चाहोगे?” शिष्य ने “हाँ” कर अपनी अभिलाषा प्रकट की। इसके बाद उनने एक सरकंडे का छिलका उतारा, उसको प्रत्यंचा बनाकर सरकंडे के दोनों सिरों पर बाँध दिया। इस प्रकार एक धनुष बन गया। फिर कुछ मंत्र पढ़े। इसके साथ ही वह एक सुँदर धात्विक धनुष में परिवर्तित हो गया। तत्पश्चात् दूसरे सरकंडे को अभिमंत्रित किया। वह धातु का तीक्ष्ण नोक वाला बन गया।

अब शिष्य को संबोधित करते किया-”यह एक सामान्य तीर कमान है। योग बल द्वारा अब मैं इसे असाधारण बनाऊँगा।” इतना कह कर बड़े विनीत भाव से ऊपर आकाश की ओर निहारते हुए कोई स्तुति की, तदुपराँत सामने खड़े एक विशाल बरगद वृक्ष को लक्ष्य कर उसे छोड़ दिया। घनघोर गर्जन करता हुआ वह तीव्र वेग से चल पड़ा और पेड़ को विदीर्ण कर दूसरी ओर निकल गया। इसके साथ ही वृक्ष में आग लग गई। विशुद्धानंद का स्वर पुनः उभरा-”विज्ञान की समस्त युक्तियाँ और सारे साधन मिलकर भी इस अग्नि को शाँत नहीं कर सकते। इसके पश्चात् उन्होंने तीसरा सरकंडा उठाया। पूर्ववत् उसे भी धात्विक तीर में बदला। फिर वरुण देवता का आह्वान कर उसमें प्रतिष्ठित किया। पीछे उसका भी संधान सामने के बरगद पर कर दिया। तीर लगते ही तरुवर की आग कुछ ही क्षण में बुझ गई।

तदुपराँत धनुष-बाण को हाथ में लेकर उनने आँखें बंद कर लीं। वह देखते-देखते पुनः तीन सरकंडों में रूपांतरित हो गये।

यह चेतना विज्ञान की उपलब्धि है। योग विज्ञान उसी से संबंधित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें चेतना कणों को सक्रिय निष्क्रिय कर देने मात्र से एक वस्तु का तिरोभाव होकर उसमें दूसरे का आविर्भाव हो जाता है। दूसरे शब्दों में यहाँ किसी भी पदार्थ को प्रकट किया जा सकना संभव है। भौतिक विज्ञान में यह सुविधा नहीं उसमें एक द्रव्य को दूसरे में परिवर्तित करने के लिए उच्चस्तर की साधन-सुविधाएँ चाहिए। इतने पर भी इस बात की कोई गारण्टी नहीं कि इच्छित पदार्थ को प्राप्त कर ही लिया जायेगा।

इस मूलभूत अंतर को जान लेने के बाद यह निश्चय करना हमारी निजी समझ पर निर्भर है कि हम किसे श्रेष्ठ और सर्वोपरि मानें एवं जीवन में किसकी महत्ता को स्वीकार करें-पदार्थ विज्ञान या चेतना विज्ञान को?


साध्य, साधन और सिद्धि

स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व जब लोग लोकमान्य तिलक से पूछा करते थे “स्वराज्य की परिभाषा क्या है।” तब वे कहते थे “स्वदेशी ही स्वराज्य है, राष्ट्रीय शिक्षण ही स्वराज्य है, विदेशी बहिष्कार ही स्वराज्य है।” स्वराज्य की ऐसी परिभाषा थी उनकी। इसके लिए जो साधन मिलता था उसी के बारे में कह देते थे कि यही स्वराज्य है। यही हमारा साध्य है।

ठीक इसी तरह जब गाँधी जी से लोग पूछते थे तो उस समय जो साधन उन्हें जो ठीक लगता था उसी को बताते हुए कहते थे “खादी ही स्वराज्य है” हिन्दू मुस्लिम एकता ही स्वराज्य है” स्त्री शिक्षा ही स्वराज्य है” अस्पृश्यता निवारण ही स्वराज्य है।” इसी तरह की विभिन्न परिभाषायें वे करते चले जाते थे।

उक्त परिभाषाओं से स्पष्ट मालूम पड़ता है कि साध नहीं साध्य है। साधन और साध्य की एकरूपता में ही सिद्धि-निहित है। जैसे साधन होंगे वैसा ही साध्य परिणाम में मिलेगा। मंजिल पर पहुँचना इस-इस बात पर निर्भर करता है कि यात्री पथ को कैसे पूरा करते हैं। राह चलना ही मंजिल को प्राप्त करना है। भली प्रकार अध्ययन करना ही परीक्षा में सफलता का जनक है और दोनों मिलकर सिद्धि बनते हैं।

बापू ने कहा है-”मैं जानता हूँ कि अगर हम साधनों की चिंता रख सकें तो साध्य की प्राप्ति लाजमी है। मैं यह भी अनुभव करता हूँ कि साध्य की ओर हमारी प्रगति ठीक उतनी ही होगी जितने हमारे साधन शुद्ध होंगे।”

स्वामी विवेकानंद ने और भी स्पष्ट करते हुए कहा है-”हम जितना साध्य पर ध्यान देते हैं उससे अधिक साधन पर दें। कारण से ही कार्य की उत्पत्ति होती है। कार्य अपने आप नहीं आ सकता। कारण जब तक उपयुक्त, ठीक और बलशाली न होगा तब तक ठीक परिणाम नहीं मिल सकता। एक बार जब हम अपना लक्ष्य बना लेते हैं और ठीक-ठीक साधनों का निश्चय हो जाय, तो फल तो मिलेगा ही यदि साधन में पूर्णता है। यदि हम कारण की परवाह करते हैं तो फल अपने आप स्वयं की परवाह कर लेगा। साधन कारण है इसलिए उन पर ध्यान देना ही साध्य का रहस्य है।

गीताकार ने भी साधना, क्रिया पर जोर देते हुए कहा है-”स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः।” जो व्यक्ति सच्चाई के साथ अपना कार्य करता है उसे ही सिद्धि मिलती है। कर्म साधना ही साध्य की अर्चना है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि साध्य कितना ही पवित्र उत्कृष्ट महान् क्यों न हो यदि उस तक पहुँचने का साधन गलत है, दोषयुक्त है तो साध्य की उपलब्धि भी असंभव है। जिस तरह मिट्टी का तेल जला कर वातावरण को सुगंधित नहीं बनाया जा सकता उसी तरह दोष-युक्त साधनों के सहारे उच्चस्थ लक्ष्य को प्राप्त करना भी असंभव है। वातावरण की शुद्धि के लिए सुगंधित द्रव्य जलाने होंगे। उत्तम साध्य के लिए उत्तम साधनों का होना आवश्यक है, अनिवार्य है। ठीक इसी तरह उत्कृष्ट साध्य-लक्ष्य का बोध न हो तो उत्तम साधन भी हानिकारक सिद्ध हो जाते हैं।

आज हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम साध्य तो उत्तम चुन लेते हैं, महान लक्ष्य भी निर्धारित कर लेते हैं लेकिन उसके अनुकूल साधनों पर ध्यान नहीं देते। इसीलिए हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में गतिरोध पैदा हो जाता है और साध्य ध्यान उस लक्ष्य ही पर रहता है। उसे कैसे जैसे भी प्राप्त कर लिया जाय यही हमारी साधना होती है और कई बार भ्रम में भटक कर हम गलत साधनों का उपयोग कर बैठते हैं। फलतः साध्य के प्राप्त होने का जो संतोष और प्रसन्नता मिलनी चाहिए उससे हम वंचित रह जाते हैं।

चाहे सामाजिक क्राँति हो या व्यक्तिगत साधना, लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव होगी जब साध्य और साधन को जोड़कर मनुष्य साधन-निष्ठा बनेगा।

परीक्षा में सफलता के लिए मनोयोगपूर्वक अध्ययन की आवश्यकता है। लेकिन बहुत से विद्यार्थियों की मनोदशा ऐसी बन गई है कि कैसे जैसे भी तिकड़म भिड़ाकर चोरी से नकल करके परीक्षा में सफलता पा ली जाय। बहुत से विद्यार्थी अध्ययन में परिश्रम न करके इस तरह के हथकंडों की खोज में रहते हैं जिससे श्रम भी न करना पड़े और सफलता भी मिल जाय।

लोग धनवान बनना चाहते हैं ठीक भी है। धनी बनना कोई बुरी बात नहीं है और इसके लिए पर्याप्त बुद्धि विवेक के साथ लगाया जाय तो कोई कारण नहीं मनुष्य धनवान न बने। लेकिन पुरुषार्थ न करके बिना श्रम किए ही लोग लक्ष्मी अर्जित करना चाहते हैं। जुआ, सट्टा, चोरबाजारी, मिलावट, आर्थिक मुनाफाखोरी न जाने कितने ही अपराधी साधनों का अवलंबन ये लोग लेते हैं और समाज के नुकसान में ही आज व्यक्ति की हानि निहित है। कमजोर छिन्न-भिन्न समाज व्यक्ति की भी रक्षा नहीं कर सकता। जिस तरह चोरी, डकैती, व्यभिचार से अर्जित धन को बुरा समझा जाता है उसी तरह उक्त अनैतिक साधनों से धनोपार्जन गलत है। बहुत कुछ अंशों में ऐसे मनुष्य को असफलता और असंतोष ही मिलता है। ऐसे व्यक्तियों को धन के द्वारा जो सुख आदि मिलना चाहिए वह नहीं मिलता परिणाम में वही उनके लिए क्लेश का कारण बन जाता है।

उच्च पद प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए मनुष्य के सामने विस्तृत संसार पड़ा हुआ है। पुरुषार्थ और प्रयत्न के साथ मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है लेकिन वह राजमार्ग को न अपना कर दूसरों को नुकसान पहुँचाता है, बढ़ते हुओं की टाँग खींचता है, व्यर्थ ही संघर्ष पैदा करता है अथवा किसी की खुशामद मिन्नतें करता है। ये दोनों ही साधन गलत हैं। इसके लिए व्यक्तिगत प्रयत्न आवश्यक हैं। अपने पुरुषार्थ के बल पर मनुष्य क्या नहीं प्राप्त कर सकता?

लोग चलते हैं जन-सेवा का लक्ष्य लेकर लेकिन वे जनता से अपनी सेवा कराने लग जाते हैं। बहुत से ज्ञानी उपदेशक धर्म पर चलने के लिए बड़े लंबे चौड़े उपदेश देते हैं लेकिन उनके स्वयं के जीवन में हजारों विकृतियाँ भरी पड़ी रहती हैं। कई साधु, संन्यासी, संत-महात्मा लोगों को त्याग वैराग्य मोक्ष आत्मकल्याण की बातें कहते हैं लेकिन वे जन-साधारण से भी अधिक माया मोह में लिप्त पाये जाते हैं। देश सेवा के लिए राष्ट्र की उन्नति और विकास की ओर अग्रसर करने के लिए लोग राजनीति में आते हैं लेकिन अफसोस होता है जब वे पार्टीबाजी, सत्ता हथियाने के लिए, गुटबंदी के लिए परस्पर लड़ते झगड़ते हैं कूटनीति का गंदा खेल खेलते हैं अपने घर भरते हैं, जनता की आँखों में धूल झोंकते हैं।

साधनों में इस तरह की भ्रष्टता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अहितकर सिद्ध होती है। इससे किसी का भी भला नहीं होता, सिद्धि उनसे बहुत हट जाती है। जिस तरह साधनों की पवित्रता आवश्यक है। उसी तरह साध्य की उत्कृष्टता भी आवश्यक है। साध्य निकृष्ट हो और उसमें अच्छे साधनों को भी लगा दिया जाय तो कोई हितकर परिणाम प्राप्त नहीं होगा। उलटे उससे व्यक्ति और समाज की हानि ही होगी। उत्कृष्ट साधन, भी निकृष्ट लक्ष्य की पूर्ति के आधार बन कर समाज में बुराइयाँ पैदा करने लगते हैं। बुराइयाँ तो अपने आप भी फैल जाती हैं लेकिन किन्हीं समर्थ साधनों का प्रयोग किया जाय तो वे व्यापक स्तर पर फैलने लगती हैं। अतः जिनके पास साधन है, माध्यम हैं उन्हें आवश्यकता है उत्कृष्ट लक्ष्य के निर्धारण की।

सिद्धि का यही रहस्य है कि उत्कृष्ट लक्ष्य का चुनाव। फिर उसके अनुकूल ही उत्कृष्ट साधनों का उपयोग। साध्य और साधनों की एकरूपता पर ही सिद्धि का भवन खड़ा होता है।


विभाजन रेखा (Kahani)

एक देश का बँटवारा हुआ। विभाजन रेखा एक पागल खाने के बीच में से गुजरी। तो अधिकारियों को बड़ी चिंता हुई कि अब क्या किया जाय। दोनों देश के अधिकारियों में से कोई भी पागलों को अपने देश में लेने को तैयार न था। अधिकारी इस बात पर सहमत हुए कि पागलों से ही पूछा जाय कि वे किस देश में रहना चाहते हैं। अधिकारियों ने कहा पागलों से! देश का बँटवारा हो गया है आप उस देश में जाना चाहते हैं या इस देश में। पागलों ने कहा-”हम गरीबों का पागल खाना क्यों बाँटा जा रहा है। हमने क्या गलती की है? हमसे किसी को शिकायत भी नहीं हैं। हम में कोई आपसी मतभेद भी नहीं है। हम सब मिलकर रहते हैं इसमें आपको क्या आपत्ति?” अधिकारियों ने कहा। आपको जाना कहीं नहीं है। रहना यहीं है। आप तो यह बताएँ कि इस देश में रहना चाहते हैं या उस देश में। पागल बोले। यह भी क्या अजीब पागलपन है जब हमें जाना कहीं नहीं है। तो उस देश से या इस देश से क्या मतलब। अधिकारी बड़ी उलझन में फँस गये। उन्होंने सोचा। व्यर्थ की माथा-पच्ची से क्या लाभ? और उन्होंने विभाजन रेखा पर पागलखाने के बीचों बीच दीवार खड़ी करा दी। कभी-कभी पागल उस दीवार पर चढ़ जाते, और एक दूसरे से कहते। देखा समझदारों ने देश का विभाजन किया है। न तुम कहीं गये न हम। व्यर्थ में हमारा तुम्हारा मिलना जुलना, हँसना-बोलना बंद करके इन्हें क्या मिल गया। एक पागल बोला इन्होंने देश का बँटवारा नहीं, दिलों को बाँटने की कोशिश की है। जब-जब मनुष्य पर बेअकली सवार होती है तो वह जाति, सम्प्रदाय, रंग, रूप, भाषा, और देश के आधार पर विभाजित होता चला जाता है और अपनी शाँति और खुशहाली नष्ट करता रहता है।


चलें काल से परे, समझें महाकाल को

समय का एक नाम ‘काल’ भी है। इसी से ‘महाकाल’ शब्द बना है। महाकाल अर्थात् काल का अधीश्वर। भौतिक जगत में जिसने इस काल को पहचान लिया और उसका सही-सही सदुपयोग करना सीख गया, समझना चाहिए उसने समय-देवता को जीत लिया। समय की आराधना प्रकाराँतर से महाकाल की ही उपासना है।

संसार में समय को सर्वोपरि शक्ति के रूप में मान्यता मिली है। यों शक्तियां प्रायः चुकती, बनती और बदलती रहती हैं, पर एकमात्र काल ही ऐसी शक्ति है, जिसका कभी क्षय नहीं होता। इसी बात को गीता में भी कहा गया है। भगवान कहते हैं-”अहमेवाक्षयः कालो.....” अर्थात् मैं अक्षय काल हूँ। यहाँ इस जगत में सब कुछ क्षणिक और क्षणभंगुर है। सब क्षीण होता रहता है। जो जन्मता है, वह मरता भी है। शाश्वत और सनातन यहाँ कुछ भी नहीं। परिवर्तन चक्र यहाँ सतत् गतिशील है। परिवर्तन अवधि को ही काल कहते हैं। यह काल हमें बदलता प्रतीत इसलिए होता है क्योंकि उसे घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में हम देखते हैं। घटनाएँ घटती और गुजरती रहती हैं। अनादि काल से यह क्रम चलाता आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा, फिर भी समय वही रहेगा। सृष्टि का जब जन्म हुआ था, तब भी समय वही था और आज जब वह बूढ़ी हो चली है, तब भी समय वही है। वह स्थिर है। जो अस्थिर है, वह सृष्टि है। बदलाव उसी में होता है, वही गतिवान और प्रवाहवान है, पर आँखों को बदलता और बहता समय प्रतीत होता है। यही दृष्टिभ्रम है जबकि काल स्वयं में न तो छोटा है, न बड़ा। वह तो सदा एक जैसा स्थिर है। उसका छोटा-बड़ा होना हमारी अपनी गति पर निर्भर है। यदि भ्रमण प्रकाश जितनी गति से कर पाना संभव हो, तो समय को और ज्यादा सिकोड़ा जा सकता शक्य है। इसी प्रकार यदि किसी ऐसे सूक्ष्म लोक में हम जा सकें, जहाँ पर काल की गति और भी तीव्र हो, तो समय सिकुड़ कर वहाँ अत्यन्त छोटा हो जायेगा। ऐसे में जो कार्य पाँच मिनट में संपन्न होगा, उसके पूरा होने में पृथ्वी पर 5 वर्ष जितना लंबा समय लग सकता है। अलौकिक घटनाक्रमों के मध्य काल के इस प्रकार फैलने और सिकुड़ने की अप्रत्याशित अनुभूति कई बार हो जाती है।

घटना हाबड़ा (प॰ बंगाल) के प्रसिद्ध संत शिव रामकिंकर योगत्रयानन्द के जीवन से संबद्ध है। बहुत दिनों से उन्हें पाणिनि व्याकरण पर पतंजलिकृत महाभाष्य पढ़ने की तीव्र इच्छा थी, किंतु बंगाल में उन दिनों इस ग्रंथ का कोई योग्य विद्वान था नहीं। जो थे, वे बनारस रहते थे। अस्तु बनारस जाकर उन्होंने महाभाष्य पढ़ने का निश्चय किया। तब वहाँ व्याकरण आचार्यों में पंडित गोविंद शास्त्री का बड़ा नाम था शिव रामकिंकर ने उन्हीं से शास्त्र अध्ययन करने की सोची और एक दिन इस आशय का निवेदन लेकर उनके समक्ष उपस्थित हुए। उस दिन पंडित जी ने समय नहीं होने का बहाना बना कर उन्हें लौटा दिया। दूसरे दिन जब वे आये, तब भी उन्होंने अवकाश नहीं होने की बात कही। तीसरे दिन शिव रामकिंकर पुनः आये, किंतु आज भी वही पुराना उत्तर मिला, साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे कोई अन्य आचार्य तलाशें। उनके पास पहले से ही इतने विद्यार्थी हैं कि किसी दूसरे को अब समय दे पाना बिल्कुल भी संभव नहीं। दो टूक उत्तर पाकर शिव रामकिंकर एकदम हताश हो गये। चलते समय उन्होंने पंडित जी के पैर पकड़ लिये और बड़े दीन भाव से किंचित समय निकाल लेने की प्रार्थना की। आचार्य इतने दयालु थे नहीं कि द्रवित हो उठते। क्रुद्ध होकर पैर झटकते हुए उन्होंने वहाँ से चले जाने को कहा और स्वयं कमरे से बाहर निकल गये।

आचार्य के इस व्यवहार से वे बहुत दुखी हुए। उसी क्षण उन्होंने संकल्प किया कि ज्ञानार्जन के निमित्त अब वे किसी के पास नहीं जायेंगे। अपमान और उपेक्षा की वेदना इतनी गहरी थी कि वे उस दिन भोजन नहीं कर सके और बिना खाये सो गये, पर नींद भी कहाँ आने वाली थी। बार-बार उनके मन में वही दृश्य उभर उठता और स्वयं को कोसते हुए कहते “कितना अभागा हूँ! जिज्ञासा होने पर भी ज्ञान-दान करने वाला कोई नहीं” यह सोचते हुए मध्य रात्रि के करीब उनकी आँखें लग गईं। एक घंटे पश्चात् नींद अचानक खुली, तो कमरे को दिव्य आलोक से आलोकित पाया। सामने देखा, तो एक सौम्य मानव-मूर्ति जर्जर, किंतु तेजस्वी काया में करुण नेत्रों से उनकी ओर निहार रही है। कुछ क्षण पश्चात् उनकी मधुर वाणी मुखरित हुई-”दुख मत कर। किसी ने तुम्हें महाभाष्य नहीं पढ़ाया तो क्या हुआ? मैं पढ़ाऊँगा। मैंने ही उसकी रचना की है। जा ग्रंथ ले आ।” यह सुनकर शिव रामकिंकर गदगद हो उठे। महापुरुष को साष्टाँग प्रणाम निवेदित किया और महाभाष्य ले आये। इसके बाद वे दिव्य पुरुष ग्रंथ पढ़ाने लगे। आरंभ से लेकर अंतिम सूत्र की विशद् व्याख्या की। ग्रंथ जब समाप्त हुआ, तो वे आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो गये। चेतना लौटने पर शिव रामकिंकर अपने भाग्य को सराहने लगे। खुशी के मारे उनके नेत्र सजल हो उठे, तभी सामने की दीवार पर टँगी घड़ी पर अकस्मात् दृष्टि गई। ठीक 15 मिनट बीते थे। वे कुछ आश्चर्य में पड़ गये। महाभाष्य की ओर नजरें गईं, तो वह इतना मोटा था कि पंद्रह मिनट तो क्या, पंद्रह घंटे में भी उसे पूरी तरह पढ़ और हृदयंगम कर पाना कठिन था। परीक्षा के लिए उन्होंने उसे उलटना-पलटना आरंभ किया, तो यह जानकर घोर अचंभा हुआ कि सारे सूत्र उनके पढ़े हुए हैं। जिस भी सूत्र पर निगाहें जमतीं, उसी की व्याख्या मस्तिष्क में घुमड़ने लगती। इससे उन्हें यह निश्चय हो गया कि उन देवपुरुष ने आद्योपाँत ग्रंथ पढ़ाया है, पर इतने कम समय में अध्यापन कैसे संभव हो सका? इस उलझन को वे किसी भी प्रकार नहीं सुलझा सके।

वस्तुतः उपरोक्त घटना त्रिआयामी विश्व से परे एक ऐसे सूक्ष्म संसार की है जहाँ का टाइम-स्केल स्थूल जगत से भिन्न है। वहाँ कार्य-संपादन की गति इतनी तीव्र होती है कि समय सिकुड़ने लगता है, जबकि प्रत्यक्ष जगत में यह गति इतनी मंद है कि समय फैलता प्रतीत होता है। यही कारण है कि समय के दूसरे आयाम में जो कार्य पार्थिव घड़ी के हिसाब से 15 मिनट में संपन्न होता प्रतीत होता है, उसी को स्थूल विश्व में संपादित करने पर 15 दिन जितना लंबा अंतराल लग जाता है। ऐसा इसलिए होता, क्योंकि दोनों प्रकार के लोकों में समय और क्रिया के बीच की गति में अंतर है। इहलोक में समय का वेग भीषण है, जबकि अदृश्य लोकों में उसकी रफ्तार क्रिया के आगे धीमी पड़ने लगती है। यदि किसी प्रकार क्रिया का वेग बढ़ा कर समय के बराबर कर दिया जाय, तो एक ऐसी भी अवस्था आयेगी, जहाँ समय में ठहराव का आभास मिलेगा, अर्थात् समय का बोध समाप्त हो जायगा। विज्ञानवेत्ताओं के अनुसार यह स्थिति ब्लैक होल में उत्पन्न होती हैं, किंतु आत्मवेत्ता इसे अंतर्जगत की सर्वोपरि उपलब्धि के रूप में स्वीकारते हैं। उनका मानना है कि इस दिव्य उपलब्धि का झण ऐसा होता है, जिसमें समय के अभाव का अनुभव होता है। ऐसा लगता है, जैसे काल के पंख लग गये और वह उड़ गया। यही वह अवस्था है, जिसे अध्यात्म विज्ञान में ब्रह्मानंद-दिव्यानंद की समय-शून्य अवस्था कहकर अभिहित किया गया है।

प्रभु ईशु से एक बार एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया कि आप जिस अलौकिक राज्य की चर्चा करते हैं, वहाँ विशेष बात क्या होगी? उनने उत्तर दिया-”वहाँ ‘समय’ नहीं होगा। यही उसकी सबसे बड़ी विशिष्टता होगी।”

सचमुच महावीर से लेकर मुहम्मद साहब तक सब इस एक तथ्य को अंगीकार करते हैं कि ईश्वर-प्राप्ति के क्षण समय का अस्तित्व नहीं रहता। सभी इस बात पर सहमत हैं कि वह जो पल है वह वास्तव में “टाइमलैस मूवमेंट-कालातीत अवस्था” है। इस अवस्था में योगियों का प्राण कंपन और काल की गति एकदम बराबर होती है। इसके उपराँत यदि प्राण-वेग को और बढ़ा दिया जाय, तो फिर काल के विगत और अनागत वाले हिस्से में प्रवेश कर सकना संभव है। यती लोग इसी प्रक्रिया द्वारा भूत और भविष्य के अंतराल में उतरते और अविज्ञात का ज्ञान प्राप्त करते है। परिष्कृत अभ्यस्त चेतना द्वारा ही यह सब संभव है। जिनकी देह-चेतना अनभ्यस्त और अनाड़ी स्तर की है, उनके लिए यह कार्य आकाश कुसुम खिलाने जैसा है। वहाँ चेतना के काल-गह्वर में उतर पाना तो क्या, शरीर से बाहर निकलना भी अशक्य जैसा बना रहता है, किंतु जो ऐसा कर पाते हैं और जिनने इतनी सामर्थ्य अर्जित कर ली है कि काया से बाहर आ सकें, वे इसे स्पष्ट अनुभव करते हैं कि किस प्रकार इस अवस्था में समय संबंधी अवरोध बिल्कुल समाप्त हो जाता है। यदि इस स्थिति में वर्षों रह कर फिर शरीर में प्रवेश किया जाय, तो प्रवेशार्थी को ऐसा आभास होगा, मानो अभी कुछ ही क्षण बीते हैं। कारण यह है कि प्रत्यक्ष विश्व से परोक्ष विश्व का टाइम-स्केल भिन्न है। जैसे-जैसे अधिकाधिक सूक्ष्म की गहराई में उतरते जायेंगे, वैसे ही वैसे टाइम-स्केल संबंधी पृथकता बढ़ती जायगी और अवधि उत्तरोत्तर और सिकुड़ती चली जायेगी।

सामान्यतः मनुष्य का क्रिया-व्यापार जाग्रत अवस्था में संपन्न होता है। इस अवस्था का जो समय है, वह मानव द्वारा निर्मित है। यह वह काल नहीं, जिसे भगवान ने ‘अक्षय काल’ कहा है। इसलिए पृथ्वी का समय बीतता रहता है। सूर्योदय हुआ-सुबह हो गई, दिन का प्रारंभ हुआ। शाम हुई, अंधेरा घिरा-रात आ गई। दिन समाप्त हुआ। इस प्रकार 24 घंटे बीत गये। काल संबंधी यह विभाजन पृथ्वी और सूर्य पर आधारित है तथा आदमी द्वारा बनाया गया है। पृथ्वी को चौबीस भागों में विभक्त कर दिन-रात को उतने ही घंटों में बाँट दिया गया। घंटे साठ मिनटों में और हर मिनट को पुनः साठ सेकेण्डों में विभाजित किया गया। यह हमारी अपनी व्यवस्था है, प्रकृति की नहीं। निसर्ग में तो वह अविभाज्य है। जाग्रत में सामान्य चेतना की दशा में हम इसी काल विभाजन से अपना काम चलाते हैं। इससे जब कुछ गहराई में उतरते हैं, तो यह विभाजन स्वतः ही समाप्त हो जाता है, किंतु फिर भी भिन्न-भिन्न चेतना स्तर अपनी सूक्ष्मता के आधार पर टाइम-स्केल की पृथकता बनाये रखते हैं। स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय यह चेतना की शेष तीन अवस्थाएँ हैं। काल-विज्ञान के अनुसार चेतना की सबसे मंदगति जाग्रत अवस्था में है, इसी कारण समय उसमें असाधारण रूप से बड़ा प्रतीत होता है। तुरीय अर्थात् समाधि की स्थिति में उसकी गति सर्वाधिक होती है, इसलिए उस दिशा में समय का बंधन समाप्त हो जाता है। तुरीयावस्था प्राप्त एक योगी जितनी अवधि में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है, यदि वही प्रदक्षिणा जाग्रत अवस्था में की जाये तो शायद पूरा जीवन बीत जायगा। स्वप्न, चेतना की दृष्टि से जाग्रत से कुछ उच्चावस्था है, अतएव समय का वेग थोड़ा मंद पड़ जाता है। सपनों की अवधि मुश्किल से पाँच-सात मिनट की होती है, किंतु जब आँख खुलती है और दृष्टि घड़ी पर जाती है, तो आश्चर्य होता है कि इतने स्वल्प काल में स्वप्न द्रष्टा ने जीवन के विशाल भाग का सफर तय कर लिया। उसका विवाह हो गया, नौकरी लग गई, बच्चे हो गये और अब शादियाँ हो रही हैं। घड़ी इस संपूर्ण अवधि को मात्र पाँच मिनट बता रही है, जबकि व्यवहारिक जीवन में इस यात्रा में तीन चौथाई भाग खप जाता। यह कैसे हुआ? हमारी अपनी गति के कारण। उसमें चेतना-कणों का वेग बढ़ गया और उस प्रतिस्पर्धा में समय पिछड़ गया, हम आगे निकल गये, जिससे युगों का कार्य पलों में पूरा होता दिखाई पड़ता है। सुषुप्ति की रफ्तार उससे भी तीव्र है और सर्वाधिक है तुरीयावस्था की, जिसमें फिर समय आड़े नहीं आता। किसी संकटग्रस्त शिष्य ने पृथ्वी के सुदूर कोने में गुरु का स्मरण किया और पलक झपकते ही उसे सहायता मिल जाती है, न तो समय संबंधी रुकावट सामने आती है, न विशाल भौगोलिक दूरी। कारण एक ही है वेग का अत्यधिक बढ़ जाना।

टेलीपैथी, क्लेयरवायन्स आदि भी चेतना की भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हैं, जिनमें समयाँतराल सिमट कर छोटा-सा हो जाता है। गुरु, दुर्गम हिमालय में साधनारत है और शिष्य पृथ्वी के दूसरे छोर-अमेरिका में रह रहा है। दोनों के मध्य कोई भौतिक संचार माध्यम उपलब्ध नहीं, किंतु फिर भी शिष्य का मार्गदर्शन होता रहता है। यह सब घड़ी भर में घटित हो जाता है। यदि उस घटना को जिसे उसने अनुभूति स्तर पर आत्मसात् किया है, लिखें तो कदाचित् घंटे भर का भी समय लग सकता है, किंतु टेलीपैथी क्रम में उतना बड़ा प्रसंग क्षणमात्र में घट जाता है। कारण कि घटनाक्रम को सुस्त बनाने वाले भौतिक व्यवधान वहाँ नहीं रहे।

महाभारत के दौरान भगवान द्वारा गीता का उपदेश भी वस्तुतः ऐसी ही एक प्रक्रिया थी, जिसमें कृष्ण और अर्जुन के मध्य मौन संवाद हुआ था। दोनों ओर की सेनाएँ जब युद्ध के लिए अमादा हों, तो भला इस स्थिति में इतनी फुर्सत कहाँ कि कोई जीवन संबंधी गंभीर दर्शन की शिक्षा दे सके। यदि दे भी तो अर्जुन स्तर का कोई योद्धा, जिस पर युद्ध का बहुत कुछ परिणाम निर्भर है, समयक्षेप कर पराजय को आमंत्रण क्यों कर देगा? नहीं, भगवान द्वारा ऐसा अविवेकपूर्ण कार्य नहीं हो सकता। जो हो सकता है, वह एकमात्र अंतर्संवाद ही है, जिसमें शब्दों का वैखरी प्रयोग न होकर ‘परा’ वाणी प्रयुक्त हुई हो। यह टेलीपैथी है। समरभूमि में यही संभाव्य हो सकती है और व्यवहारिक भी। इसमें समय कितना लगा होगा कहना कठिन है, पर यह निश्चित है कि इस भूमिका में काल का कोई मूल्य और महत्व रह नहीं जाता, बिल्कुल गौण हो जाता है। यही चेतना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू है।

एक बार परमहंस विशुद्धानंद के पास एक श्रद्धालु भक्त आया और अपनी टूटी हुई रुद्राक्ष की माला देकर उसे शास्त्रोक्त ढंग से बना देने का आग्रह किया। परमहंस ने माला अपनी मुट्ठी में बंद कर ली और हाथ को हवा में दो-चार बार लहराया। इसके बाद उस शिष्य की ओर बढ़ाते हुए कहा-”यह लो तैयार हो गई।” माला सचमुच बहुत अच्छे ढंग से गुँथी हुई थी। इतनी जल्दी यह कैसे तैयार हो गई? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने इतना ही कहा कि गुह्य विषय को सामान्य बुद्धि नहीं समझ सकती, फिर भी इतना जान लो कि यह “क्षण-विज्ञान” के प्रयोग द्वारा विनिर्मित की गई, जिसमें पृथ्वी का एक पल एक वर्ष जितना खिंच कर लंबा हो जाता है।

समय को घटा-बढ़ा सकना साधारण स्थिति और अवस्था में भी संभव है। एक महामानव, जो काल के हर कण का सुनियोजित ढंग से उपयोग करता है, समय को इतना लघु बना लेता है कि कब वह जवान से बूढ़ा हो गया, पता ही नहीं चलता। इस मध्याँतर में उसने इतने ढेरों कार्य कर लिये, इसकी प्रतीति तक नहीं होती। जब होती है, तो यह जान कर अचंभा होता है कि इतनी स्वल्प अवधि में कई जन्मों जितने कार्य किस प्रकार बन पड़े। दूसरी ओर वे लोग हैं, जिनके सामने यह पहाड़ की तरह अड़ जाता है, वह काटे नहीं कटता, न बिताये बीतता हैं वस्तुतः समय न तो किसी लिए घटता है, न बढ़ता है-न फैलता, न सिकुड़ता है। यह दो भिन्न जीवनशैलियों के दो भिन्न परिणाम हैं। समय सबको बराबर मिला हुआ है। एक इसी अंतराल में आश्चर्यजनक ढंग से असंख्यों पराक्रम कर दिखाता और महापुरुषों की पंक्ति में आ खड़ा होता है, जबकि दूसरे के लिए पुरुषार्थ तो क्या, जीवन-यात्रा करना भी भारी पड़ने लगता है। एक स्थिति में पलों का अभाव अनुभव होता है, तो दूसरी में वह इतना विशाल कि अनावश्यक मालूम पड़ता है, जबकि दोनों के लिए काल-विस्तार एक जितना है, फिर वह पृथक् परिणतियाँ क्यों? इसे समझने के लिए काल ओर उसकी शक्ति को भली-भाँति जानना होगा, तभी ऐसा कुछ कर पाना शक्य है, जो जीवन में अभिनंदनीय और अभिवंदनीय बनकर प्रस्तुत हो सके।

काल की शक्ति अप्रतिम स्तर की है। इस महाकाली की उपासना भी करते हैं, फिर भी उसके अधिष्ठाता महाकाल और तत्वदर्शन से अनभिज्ञ बने हुए हैं। जिस दिन हम सब ‘काल’ अर्थात् समय को पहचान कर जीवन में उसका समुचित उपयोग कर सकेंगे, समझना चाहिए महाकाल और महाकाली की यथार्थ अभ्यर्थना हमारी उसी दिन से प्रारंभ हुई।


यंत्रों का विज्ञान रहस्यमय भी, निराला भी

साधना विज्ञान में विशेषकर वाममार्गी ताँत्रिक साधनाओं में ‘यंत्र-साधना’ का बड़ा महत्व है। जिस तरह देवी देवताओं की प्रतीकोपासना की जाती है और उनमें सन्निहित दिव्यताओं, प्रेरणाओं की अवधारणा की जाती है, उसी तरह ‘यंत्र’ भी किसी देवी या देवता के प्रतीक होते हैं। इनकी रचना ज्यामितीय होती है। यह बिंदु, रेखाओं, वक्र-रेखाओं, त्रिभुजों, वर्गों, वृत्तों और पद्मदलों से मिलाकर बनाये जाते हैं और अलग-अलग प्रकार से बनाये जाते हैं। कई का तो बनाना भी कठिन होता है। इनका एक सुनिश्चित उद्देश्य होता है। इन रेखाओं, त्रिभुजों, वर्गों, वृत्तों और यहाँ तक कि कोण, अंश का भी विशेष अर्थ होता है। जिस तरह से देवी-देवताओं के रंग, रूप, आयुध, वाहन आदि विशेष गुणों का प्रेरणाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसी तरह यंत्रों में भी गंभीर लक्ष्य धातु या अन्य वस्तुओं के तल पर होता है। रेखाओं और त्रिभुजों आदि के माध्यम से बने चित्रों को ‘मंडल’ कहा जाता है, जो किसी भी देवता के प्रतीक हो सकते हैं, किंतु ‘यंत्र’ किसी विशिष्ट देवी या देवता के प्रतीक होते हैं।

तंत्र विद्या विशारदों के अनुसार यंत्र अलौकिक एवं चमत्कारिक दिव्य शक्तियों के निवास स्थान हैं। ये सामान्यतया स्वर्ण, चाँदी एवं ताँबा जैसी उत्तम धातुओं पर बनाये जाते हैं। भोजपत्र पर बने यंत्र भी उत्तम माने जाते हैं। ये चारों ही पदार्थ कास्मिक तरंगें उत्पन्न करने और ग्रहण करने की सर्वाधिक क्षमता रखते हैं। उच्चस्तरीय साधनाओं में प्रायः इन्हीं से बने यंत्र प्रयुक्त होते हैं। ये यंत्र केवल रेखाओं और त्रिकोणों आदि से बन ज्यामिति विज्ञान के प्रदर्शक चित्र ही नहीं होते, वरन् उनकी रचना विशेष आध्यात्मिक दृष्टिकोण से की जाती है। जिस प्रकार से विभिन्न देवी-देवताओं के रंग-रूप के रहस्य होते हैं, उसी तरह सभी यंत्र विशेष उद्देश्य से बनाये गये हैं। इन यंत्रों में पिण्ड और ब्रह्माण्ड का दर्शन पिरोया हुआ है। भारतीय दर्शन का मत है कि जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, वह सारी देवशक्तियां पिण्ड अर्थात् मानवीकाया में भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान है। मानवी काया-पिण्ड उस विराट् विश्व-ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त संस्करण है, अतः उसमें सन्निहित शक्तियों को यदि जाग्रत एवं विकसित किया जा सके तो वे भी उतनी ही समर्थ एवं चमत्कारी हो सकती हैं। यंत्र साधना में साधक यंत्र का ध्यान करते हुए ब्रह्माण्ड का ध्यान करता है और क्रमशः आगे बढ़ते हुए अपनी पिण्ड चेतना को वह ब्रह्म जितना ही विस्तृत अनुभव करने लगता है। एक समय आता है जब दोनों में कोई अंतर नहीं रहता और वह अपनी ही पूजा करता है। उसके ध्यान में पिण्ड और ब्रह्माण्ड का ऐक्य हो जाता है। वह भगवती महाशक्ति को अपना ही रूप समझता है, फिर उसे सारा जगत ही अपना रूप लगने लगता है। वह अपने को सब में समाया हुआ पाता है, अपने अतिरिक्त उसे और कुछ दृष्टिगोचर ही नहीं होता। वह अद्वैत सिद्धि के मार्ग पर प्रशस्त होता है और ऐसी अवस्था में आ जाता है कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय एक रूप ही लगने लगते हैं। साधक चेतना अब अनंत विश्व और अखण्ड ब्रह्म का रूप धारण कर लेती है। यंत्र पूजा में यही भाव निहित है।

‘यंत्र’ का अर्थ ‘ग्रह’ होता है। यह ‘यम्’ धातु से बनता है जिससे ग्रह का ही बोध होता है, क्योंकि यहीं नियंत्रण की प्रक्रिया दृष्टिगोचर होती है यों तो सामान्य भौतिक अर्थ में यंत्र का तात्पर्य मशीन से लिया जाता है जो मानव से अधिक श्रम साध्य और चमत्कारी कार्य कर सकती है और हर कार्य में सहायक सिद्ध होती है। उदाहरण के लिए मोटर कार, रेलगाड़ी, वायुयान, सेटेलाइट आदि की उपयोगिता एवं द्रुतगामिता से सभी परिचित हैं। इसी तरह माइक्रोस्कोप, टेलीस्कोप जैसे सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तुओं एवं दूरस्थ वस्तुओं को देखा जा सकता है। इसी तरह विराट् ब्रह्म को देखना हो तो भी यंत्र की अपेक्षा रहती है, उसकी भावना करनी पड़ती है। ताँत्रिक यंत्र को निर्गुण ब्रह्म के शक्ति-विकास का प्रतीक माना जाता है। अध्यात्मवेत्ताओं ने यंत्र के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए कहा भी है-”जिससे पूजा की जाये, वह यंत्र है। तंत्र परंपरा में इसे देवता के द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा प्राप्त यंत्र शरीर के रूप में देखा जाता है। यंत्र उस देवता के रूप का प्रतीक है जिसकी उपस्थिति को वह मूर्तिमान करता है और जिसका कि मंत्र प्रतीक होता है।” इस तरह यंत्र को देवता का शरीर कहते हैं और मंत्र को देवता की आत्मा। इसके द्वारा मन को केन्द्रित और नियंत्रित किया जाता है। कुलार्णव तंत्र के अनुसार-”यम और समस्त प्राणियों से तथा सब प्रकार के भयों से त्राण करने के कारण ही इसे ‘यंत्र’ कहा जाता है। यह काम, क्रोधादि दोषों के समस्त दुखों का नियंत्रण करता है। इस पर पूजित देव तुरंत ही प्रसन्न हो जाते हैं।” सुप्रसिद्ध पाश्चात्य मनीषी सर जॉन वुडरफ ने भी अपनी कृति “प्रिंसिपल्स ऑफ तंत्र” में लिखा है कि इसका नाम ‘यंत्र’ इसलिए पड़ा कि यह काम, क्रोध व दूसरे मनोविकारों एवं उनके दोषों को नियंत्रित करता है।

यंत्र-साधना का उद्देश्य ब्रह्म की एकता की सिद्धि प्राप्त करना है। यंत्र द्वारा इस अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए विभिन्न प्रकार की साधनायें करनी पड़ती हैं। इनका संकेत-सूत्र यंत्र के विभिन्न अंगों से परिलक्षित होता है। उनका चिंतन-मनन करना होता है। विचार परिष्कार एवं भाव-साधना से ही उत्कर्ष होता है। यंत्र के बीच में बिंदु होता है, जो गतिशीलता का, प्रतीक है। शरीर और ब्रह्माण्ड का प्रत्येक परमाणु अपनी धुरी पर तीव्रतम गति से सतत् चक्कर काट रहा हैं यह सर्वव्यापक है। अतः हमें भी उन्नति के मार्ग पर संतुष्ट नहीं रहना है, वरन् हर क्षण आगे बढ़ने के लिए तत्पर और गतिशील रहना है, तभी शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा गतिशील हो सकते हैं। बिंदु आकाशतत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि इसमें अनुप्रवेश भाव रहता है जो आकाश का गुण है। बिंदु यंत्र का आदि और अंत भी होता है अतः यह उस परात्पर परम चेतना का प्रतीक है जो सबसे परे है, जहाँ शिव और शक्ति एक हो जाते हैं।

वस्तुतः प्रत्येक यंत्र शिव और शक्ति की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति कराने वाला एक अमूर्त ज्यामितीय संरचना होता है। इसमें उलटा त्रिकोण ‘शक्ति’ का और सीधा त्रिकोण ‘शिव’ का प्रतीक माना जाता है। एक दूसरे को काटते हुए उलटे और सीधे त्रिकोणों से ही यंत्र विनिर्मित होता है। त्रिभुज का शीर्षकोण जब ऊपर की ओर बना होता है तो अग्निशिखा का प्रतीक माना जाता है जो उन्नति का ऊपर उठने का भाव प्रदर्शित करता है। जब यह शीर्षकोण नीचे की ओर होता है तो जल-तत्व का द्योतक माना जाता है,क्योंकि नीचे की ओर प्रवाहित होना ही जल का स्वभाव है। यंत्र में त्रिकोणों के चारों ओर गोलाकार वृत्त-सर्किल बनाये जाते हैं जिसे पूर्णता का और खगोल का प्रतीक कहा जा सकता है। इसे वायु का द्योतक भी माना जाता है, क्योंकि वृत्त में चक्राकार गति के लक्षण पाये जाते हैं। जब एक बिंदु दूसरे के चारों ओर चक्कर लगाता है तो वृत्त बनता है। वायु भी यही करती है और जिसके साथ संपर्क में आती है, उसे घुमाने लगती है। अग्नि और जल के साथ यही स्थिति रहती है।

यंत्र में इस गोलाकार वृत्त के सबसे बाहर जो चार ‘द्वार’ वाला चतुष्कोण या चतुर्भुज बना होता है, उसे ‘भूपुर’ कहते हैं। इसमें बहुमुखता का भाव है। यह पृथ्वी का भौतिकता का और विश्व-नगर का प्रतीक माना जाता है। किसी भी दशा में इसके चारों द्वारों को पार करके ही साधक मध्य में स्थित उस महाबिंदु तक पहुँच सकता है जहाँ परम सत्य स्थित है। यह बिंदु यंत्र के बीच में रहता है और यह अंतिम लक्ष्य माना जाता है। वहीं ईश्वर के दर्शन होते हैं और एकता सधती है।

आगम ग्रंथों के अनुसार यंत्रों में चौदह प्रकार की शक्तियाँ अन्तर्निहित होती हैं और प्रत्येक इन्हीं में से किसी न किसी शक्ति के अधीन रहते हैं। इन्हीं शक्तियों के आधार पर यंत्रों की रेखायें और कोष्ठकों का निर्माण होता है। इन यंत्रों में 36 तत्वों का समावेश होता है, जिनमें पंचमहाभूत, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंचकर्मेन्द्रियाँ और पाँच इनके विषय-रूप, रस, गंध आदि तन्मात्रायें, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति पुरुष, कला, अविद्या, राग, काल, नियति, माया, विद्या, ईश्वर, शिव, शक्ति आदि आते हैं। जिस तरह मंत्रों में बीजाक्षर होते हैं, उसी तरह यंत्रों में भी 1 से लेकर 36 तक की संख्या बीज संख्या मानी गयी है। ये बीज संख्यायें चौदह शक्तियों पर आधारित होकर 36 तत्वों के भावों को भिन्न-भिन्न प्रकट कर रेखाओं, कोष्ठकों के आकार-प्रकार और बीजाक्षरों के अधिष्ठाता देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करती हुई उन देवशक्तियों को स्थान विशेष पर प्रकट कर मानव संकल्प की सिद्धि प्रदान करती हैं। इन्हीं 36 तत्वों के अंतर्गत पृथ्वी जल, वायु, अग्नि आदि जो 25 तत्व हैं, वे वर्णमाला के 25 वर्ण बीजों से संबंध रखते हैं।

यंत्र विज्ञान में 1, 9 तथा (0) की संख्या अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं जिस प्रकार एकाक्षरी बीज मंत्रों के अनेक अर्थ होते हैं उसी तरह प्रत्येक संख्या बीज भी अनेक अर्थों वाले होते हैं। ये अंकबीज विभिन्न प्रकृति के मनुष्यों के ऊपर प्रभाव डालने की अपार शक्ति रखते हैं। मीमाँसाशास्त्र में कहा गया है कि देवताओं की कोई अलग मूर्ति नहीं होती। वे मंत्र मूर्ति होते हैं। वे यंत्रों में आबद्ध रहते हैं और उन पर अंकित अंकों एवं शब्दों का जब लयबद्ध ढंग से भावपूर्ण जप किया जाता है तो उनसे एक विशिष्ट प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं जिसका प्रभाव उच्चारणकर्ता पर ही नहीं पड़ता, समूचे आकाश मंडल एवं ग्रह-नक्षत्रों पर भी पड़ता है। यंत्र शरीर में स्थित शक्ति केन्द्र को मंत्र एवं अंकों के शक्ति के सहकार से उद्दीप्त उत्तेजित करता है। मानवी काया में अनेकों सूक्ष्म शक्ति केन्द्र हैं जिन्हें देवता की संज्ञा दी जा सकती है। यंत्र वस्तुतः इन्हीं विभिन्न शक्ति केन्द्रों के मानचित्र के समान हैं जिनकी साधना से साधक में तद्नुरूप ही शक्तियों का विकास होता है और वह उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए आत्मोत्कर्ष के चरमलक्ष्य तक जा पहुँचता है।

मंत्रों की तरह यंत्र भी बहुविधि एवं संख्या में अनेकों हैं और उनका रचना विधान भी प्रयोजन के अनुसार कई प्रकार का होता है। तंत्रशास्त्रों में इस तरह के 960 प्रकार के यंत्रों का वर्णन मिलता है जिनकी प्रतीकात्मकता की विषद व्याख्या भी की गयी है। इनमें से कुछ यंत्रों को ‘दिव्य यंत्र’ कहा जाता है। ये स्वतः सिद्ध माने जाते हैं और दैवी शक्ति संपन्न होते हैं। उदाहरण के लिए वीसोयंत्र, श्रीयंत्र, पंचदशी यंत्र आदि की गणना दिव्य यंत्रों में की जाती है। इनमें से ‘श्री यंत्र’ सबसे प्रसिद्ध है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में ‘योगिनी हृदय’ में कहा गया है कि “जब परात्पर शक्ति अपने संकल्प बल से ही विश्व-ब्रह्माँड का रूप धारण करती और अपने स्वरूप को निहारती है तभी ‘श्री यंत्र’ का आविर्भाव होता है।”

‘श्री यंत्र’ आद्यशक्ति का बोधक है। इसका आकार ब्रह्मांडाकार है जिसमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति और विकास का प्रदर्शन किया गया है। यह कई चक्रों में बँटा होता है जिनमें से प्रत्येक की अपनी महिमा-महत्ता है। इस यंत्र के सबसे अंदर वाले वृत्त के केन्द्र में बिंदु स्थित होता है जिसके चारों ओर नौ त्रिकोण बने होते हैं। इनमें से पाँच की नोंक ऊपर की ओर और चार की नीचे की ओर होती है। ऊपर की ओर नोंक वाले त्रिभुजों को भगवती का प्रतिनिधि माना जाता है और शिव युवती की संज्ञा दी जाती है। नीचे की ओर नोंक वाले शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हें ‘श्री कंठ’ कहते हैं। ऊर्ध्वमुखी पाँच त्रिकोण पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्रायें और पाँच महाभूतों के प्रतीक हैं। शरीर में यह अस्थि, माँस, त्वचा आदि के रूप में विद्यमान हैं। अधोमुखी चार त्रिकोण शरीर में जीव, प्राण, शुक्र और मज्जा के प्रतीक हैं और ब्रह्माँड में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के प्रतीक हैं। ये सभी नौ त्रिकोण नौ मूल प्रकृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिकोण के बाहर या पश्चात् जो वृत्त होते हैं वे शक्ति के द्योतक हैं। इस यंत्र में पहले वाले वृत्त के बाहर एक आठ दल वाला कमल है तथा दूसरा सोलह दलों वाला कमल दूसरे वृत्त के बाहर है। सबसे बाहर चार द्वारों वाला ‘भूपुर’ है जो विश्व ब्रह्माँड की सीमा होने से शक्ति गति-क्षेत्र है।

इस यंत्र में ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण अग्नितत्व के, वृत्त वायु के, बिंदु आकाश का और भूपुर पृथ्वी तत्व का प्रतीक माना जाता है। यह तंत्र सृष्टिक्रम का है। “आनंद लहरी” में आद्य शंकराचार्य ने इसका विस्तृत वर्णन किया है। वे स्वयं इसके उपासक थे। उनके हर मठ में यह यंत्र रहता है। योगिनी तंत्र में भी इसका वर्णन करते हुए कहा गया है कि आध्यात्मिक उन्नति के विशेष स्तर पहुँचने पर ही साधक इसकी पूजा का अधिकारी होता है। सिद्धयोगी अंतर पूजा में प्रवेश करते हुए यंत्र की पूजा से प्रारंभ करता है जो ब्रह्म विज्ञान का संकेत है।

यंत्रों में बिंदु, रेखा, त्रिकोण, वृत्त आदि ज्यामितीय विज्ञान का असाधारण प्रयोग होता है। इसकी महत्ता प्रदर्शित करते हुए प्रख्यात यूनानी तत्त्वज्ञ प्लेटो ने अपनी पाठशाला (कुछ शब्द मिसप्रिंट हैं) यह घोषणा लिखवादी थी कि जो विद्यार्थी ज्यामिति से अपरिचित हों वह इस पाठशाला में प्रवेश के लिए प्रयत्न न करें। आधुनिक विज्ञानवेत्ता-भी यंत्र रचना पर गंभीरतापूर्वक अनुसंधानरत हैं और उसकी मेटाफिजीकल पॉवर-एवं अद्भुत स्थापत्य को देखकर आश्चर्यचकित हैं। मास्को विश्वविद्यालय रूस के मूर्धन्य भौतिकी विद् एवं गणितज्ञ डॉ. अलेक्साई कुलाई-चेव ने प्राचीन भारतीय कर्मकाण्डीय आकृतियों विशेषकर ‘श्री यंत्र’ के बारे में गहन खोज की है और पाया है कि यह एक जटिल आकृति है जो वृत्त में अंतर्निहित नौ त्रिभुजों से बनी है। उच्च बीज गणित, सांख्यिकी-विश्लेषण, ज्यामिति एवं कम्प्यूटर आदि की मदद से ही वे इस आकृति को बनाने में सफल हुए। उनका कहना है कि विश्व प्रपंच से संबंधित तंत्र की धारणायें बहुत कुछ विश्वोत्पत्ति की ‘बिग-बैंग’ वाली वैज्ञानिक मान्यताओं तथा ‘तप्त विश्व’ के सिद्धाँतों से मिलती जुलती हैं। यंत्र रचना का रहस्य वैज्ञानिकों एवं गणितज्ञों के लिए अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। यंत्रों के अर्थ, उद्देश्य एवं उनमें अंतर्निहित प्रेरणाओं को यदि समझा और तदनुरूप साधना की जा सके तो सिद्धि अवश्य मिलती है, इसमें कोई संदेह नहीं।


दृष्टिकोण (Kahani)

एक वृद्ध साधु, उनका युवा शिष्य व एक कुत्ता तीनों ही निर्जन मार्ग से गुजर रहे थे। मार्ग में देखा कि एक अति सुँदर युवती की नग्न लाश पड़ी हुई है। देखकर लग रहा था कि कुछ देर पहले ही हृदयाघात जैसी घटना से संभवतः वह मृत्यु को प्राप्त हुई थी। साधु ने उस पर एक कपड़ा अपने शरीर का डाल दिया व सोचने लगे कि अच्छा होता इसका दाहसंस्कार करके चलते। समयाभाव के कारण वे आगे बढ़ गए। युवक ने मृत युवती पर पड़ा कपड़ा उठाकर उसे एक बार देखा व आगे चल पड़ा। दृष्टि इसकी कामुकतापरक थी। मन में दुराचार के भाव आने लगे। कुत्ता सोचना लगा, ये दोनों थोड़ा आगे चलें तो बिना किसी रोकटोक के ताजे माँस का स्वाद चखूँ।

एक ही वस्तु व दृष्टिकोण के अनुरूप तीनों के चिंतन अलग-अलग। जिसकी जैसी भावना होती है, वह वैसा ही प्रतिरूप बाहर देखता है।


परोक्षजगत से अनुदान बाँटते हमारे पितर

साधारण मृतात्माएँ वे होती हैं, जो पूर्वजन्म की वासना के कारण अपने स्वजनों, आत्मीयों, बंधु-बाँधवों से ही संबंध बनाए रखने की इच्छा रखती हैं। उनकी दुनिया सीमित ही होती है। अपनेपन का उनका दायरा घर-परिवार तक परिमित होता है। उनकी कामनाएँ भी सीमित और साधारण होती हैं। परिजन-प्रियजन से मृत्यु के उपराँत कुछ दिनों तक मिलते रहना, उन्हें छिटपुट जानकारियाँ देना, प्रणय-निवेदन करा, साथ-साथ थोड़ी देर रह लेना या मृत्यु के पूर्व की अपनी किसी वासना, आकाँक्षा की इस संपर्क द्वारा पूर्ति करा लेना ही उनका उद्देश्य होता है। पितर आत्माएँ इनसे भिन्न हैं। इनका प्रयोजन आत्मकल्याण के लिए पथ-प्रदर्शन करना, परामर्श देना ही होता है। उनकी निज की कोई वासना नहीं होती, न तो कोई क्षुद्र प्रयोजन ही इसके संपर्क के पीछे होता है। वे तो सन्मार्ग दिखाने, सहायता करने के लिए ही सत्पात्रों से संपर्क साधती रहती है। आये दिन इस प्रकार की कितनी घटनाएँ घटती देखी जाती हैं, जिनमें संकट ग्रस्तों को इनका सहयोग मिला हो।

एक घटना इंग्लैण्ड की है। हडसन नदी के किनारे एक वीरान मकान था। वह बड़ा ही भव्य और सुँदर था। खाली पड़ा रहने का कारण उसका भुतहा होना बताया जाता। उसी रास्ते से इकले दंपत्ति अपने खेत में प्रायः प्रतिदिन उनकी नजर इस इमारत पर पड़ती और इसकी सुँदर बनावट की वे बड़ी प्रशंसा करते। भूत-प्रेतों पर उनका विश्वास था नहीं। वह मकान भी सस्ते में मिल रहा था, अतः उन्होंने खरीद लेने का निश्चय कर एक दिन उसका स्वामित्व ग्रहण कर लिया।

उसी रात्रि श्रीमती इकले को ऐसा प्रतीत हुआ कि कोई उनके बहुत समीप खड़ा है। इतना समीप कि उसकी साँस उनकी गर्दन को स्पर्श कर रही है। भूतों से संबंधित सभी कल्पनाएँ उनके मस्तिष्क में घूम गईं। भयभीत होकर वह वहाँ से भागने के लिए जैसे ही पीछे मुड़ी, उन्होंने देखा कि एक छाया उनके मार्ग में खड़ी है। इससे एक क्षीण ध्वनि फूटी-”तुम डर कर भागो मत। अभी तक जितने भी व्यक्ति इस घर में आये हैं, भयभीत होते रहे हैं, जबकि हमारा उद्देश्य लोगों की सहायता करना, उनसे सहानुभूति अर्जित करना है।” इन शब्दों से श्रीमती इकले को साहस मिला, वह आश्वस्त हुईं और बोली-”आप लोग कौन तथा कितने हैं? यहाँ क्यों बने हुए हैं तथा हमसे आपका क्या प्रयोजन सध सकता है? छायाकृति ने जवाब दिया-”हम तीन हैं। यह मकान हमारा ही था। अपने पूर्वजों में आखिरी मरने वाले हमीं तीन हैं। हमारी इच्छा थी कि इतनी भव्य इमारत यों ही खाली पड़ी न रहे, मानवी-निवास इसकी शोभा बढ़ाता रहे। हम चाहते थे कि तुम लोगों जैसा कोई इसमें आकर रहे, और आराम की जिंदगी बिताये, पर अब तक जिन-जिन को बुलाया, वे सब डरपोक निकले और हमें देखते ही डर कर भाग खड़े हुए। इसी क्रम में अब तुम्हें बुलाया है। अपने आने को कोई संयोग मत मानना। तुम लोगों को प्रेरणा देकर हमने बुलाया है। यहीं रहो और सुख से जिंदगी गुजारो। हम तुम्हारी हर प्रकार से मदद ही करेंगे।” इतना कहकर पितर अदृश्य हो गया।

इकले परिवार ने पड़ोसियों की आशा के विपरीत उस घर में ही बने रहने का निर्णय लिया। आये दिन घर के किसी-न-किसी सदस्य की भेंट इन अदृश्य आत्माओं से होती रहती एवं अपने सहायक मनोवृत्ति का परिचय देती।

इकले की पुत्री सिंथिया से इन पितरों का विशेष लगाव था। यदि वह पढ़ाई हेतु सबेरे नियत समय पर न उठ पाती, तो उसका बिस्तर जोरों से हिलने लगता। जब तक वह उठ कर बैठ नहीं जाती, बिस्तर हिलता रहता। छुट्टियों में अक्सर सिंथिया सोते समय प्रार्थना कर सोती कि उसे देर तक सोने दिया जाय। प्रत्युत्तर में आत्माएँ उससे किसी प्रकार की कोई छेड़खानी नहीं करतीं और दिन चढ़ने तक सोने देतीं। कुछ साल पश्चात् सिंथिया का विवाह हो गया। विवाहोपराँत श्रीमती इकले ने जैसे ही अपने कमरे में प्रवेश किया, उन्हें एक मंद आवाज सुनाई पड़ी। कोई कह रहा था “हमारी ओर से भी सिंथिया के लिए कुछ भेंट है जो आशीर्वाद स्वरूप उसे दे देना।” इसके उपराँत अचानक उनकी दृष्टि सामने की टेबुल पर पड़ी। वहाँ कोई चीज कागज में लिपटी पड़ी थी। खोल कर देखा, तो उसमें एक सुँदर नक्काशी किया हुआ चाँदी के चम्मचों का जोड़ा था। वह समझ गई कि पितर द्वारा प्रदत्त उपहार यही है। इसके अतिरिक्त कई बार इन पितरों ने इकले दंपत्ति को जानलेवा दुर्घटनाओं से बचाया था।

एक प्रसंग स्काटलैण्ड का है। राजा जेम्स चतुर्थ इंग्लैण्ड पर आये दिन चढ़ाई के बाद उसके सम्मुख एक मृतात्मा प्रकट हुई और चेतावनी के स्वर में कहने लगी कि यदि आगे उसने आक्रमण किया, तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। राजा पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। चेतावनी की उपेक्षा करते हुए उसने पुनः धावा बोल दिया। परिणाम वही हुआ जिसकी भविष्यवाणी पितर ने की थी। युद्धस्थल में ही उसकी मृत्यु हो गई कहा जाता है कि वह अदृश्य सहायक अनेक अवसरों पर राजा का मार्गदर्शन करता था और उसके दिशानिर्देशक पर काम करने से जेम्स चतुर्थ को कई अद्भुत सफलताएँ भी मिली थीं, पर अंतिम समय में सम्राट ने उसकी अवहेलना क्यों की? कहा नहीं जा सकता।

ए॰ डब्ल्यू हेमिल्टन ने अपनी पुस्तक “इंटरनल लाइफ” में एक ऐसे ही प्रसंग का उल्लेख किया है। हुआ यों कि कैलीफोर्निया के एक पुलिस अधिकारी ए॰ एम॰ बैरी एक दिन प्रातः अपने घर में समाचार पत्र पढ़ रहे कि सामने एक छाया प्रकट हुई और आदेशात्मक स्वर में बोलने लगी-”तुम तुरंत मैकडोनाल्ड एवेन्यू पहुँचो। वहाँ स्ट्रीमलाइनर से एक ट्रक टकरा कर उलट गया है और उसके ड्राइवर की छाती बुरी तरह कुचल गई है।”

इतना कहकर आकृति गायब हो गई। कुछ क्षण तक बैरी महोदय इसे मन का भ्रम मानते रहे, पर जब स्थान का पता और दुर्घटना के ब्यौरे का स्मरण किया, तो आश्चर्य हुआ। सोचने लगे ऐसी सटीक जानकारी मन का भ्रम नहीं हो सकती। वे तत्काल बताये स्थान के लिए चल पड़े। जब पहुँचे तब तक वहाँ वैसा कुछ भी घटित नहीं हुआ था। दिवास्वप्न की बात उन्हें पुनः स्मरण हो आयी। वे लौटने ही वाले थे कि अकस्मात् वह दुर्घटना सामने घट गई स्ट्रीमलाइनर से सामने आ रहा एक ट्रक टकराया और ड्राइवर की छाती चूर हो गई।

इंग्लैण्ड के मूर्धन्य साहित्यकार चार्ल्स डिकेन्स ने एक ग्रंथ लिखा है-”मिस्ट्री ऑफ एडविनहुड।” उक्त पुस्तक में उन्होंने ऐसी अनेकानेक घटनाओं का वर्णन किया है, जिसमें उच्चात्माओं ने अपनी सहयोगवृत्ति के कारण अनेक लोगों को संकटों में सहायता पहुँचायी।

श्रीमती जान कपूर के “टेल्का” उपन्यास ने अपने जमाने में खूब प्रशंसा पायी। यों तो उनके अन्य उपन्यासों की भी साहित्य जगत में काफी प्रतिष्ठा है, पर जो ख्याति “टेल्का” को मिली, वैसी बात अन्य कृतियों के साथ नहीं देखी गई। इस संदर्भ में लेखिका का कहना है कि वस्तुतः वह रचना स्थूल दृष्टि से उनकी अपनी होते हुए भी अपनी नहीं है। वे कहती हैं कि वह पुस्तक किसी अदृश्य आत्मा द्वारा लिखाई गई है।

अमरीकी लेखिका रुथ माण्टगोमरी भी अपने ग्रंथ “ए वर्ल्डबियोण्ड” के बारे में यही कहती पायी गई हैं कि उक्त पुस्तक उनकी अपनी प्रतिभा का सृजन नहीं है। उसमें किन्हीं फोर्ड नामधारी आत्मा की निरंतर सहायता उन्हें मिलती रही है। इसी कारण लोकोत्तर संबंधी बातों को भी इतनी स्पष्टतापूर्वक समझाने में वे अपने ग्रंथ में सफल हो सकी हैं।

पितर की अयाचित सहायता से संबंधित एक घटना दक्षिणी फ्राँस की है। वहाँ बीजरुस नामक एक 70 वर्षीया चित्रकार रहती थीं। एक बार वह कलात्मक सृजन की नवीन प्रेरणा पाने की अभिलाषा से सन् 1936 में पेरिस पहुंची। वहाँ कई महीने रहने, घूमने, के बाद भी उन्हें कोई प्रेरक वस्तु नहीं मिली। महीनों की व्यर्थता ने मात्र व्यग्रता दी। वहाँ आना एक दम निरर्थक प्रतीत हुआ। रात में इसके कारण ठीक से नींद भी न आती। ऐसी ही उदासी और मानसिक थकान से भरी एक रात में वह करवटें बदल रही थीं। देर रात में अंततः उन्हें नींद आयी। नींद के कुछ घंटे ही बीते थे कि जैसे किसी ने जगा दिया। स्वयं को वे काफी तरोताजा अनुभव कर रही थीं, जैसे नयी ताजगी और नया प्रकाश उनके भीतर भर गया हो, तभी उनकी अंतः प्रेरणा उन्हें स्टूडियो की ओर ले चली। उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था, पर यंत्रवत् वह चली जा रही थीं।

स्टूडियो पहुँचने पर अँधेरे में ही कागज पर ब्रुश न जाने कैसे चलने लगा। इससे वह चकित भी थीं और पुलकित भी। हाथ तेजी से चल रहा था। अनुभवी मस्तिष्क ने अँधेरे में ही अनुमान लगा लिया कि निश्चित ही कोई चित्र बन रहा है। देर रात तक यह सब होता रहा। फिर अचानक हाथ रुक गया और अपने कमरे में बिस्तर पर जाने की उन्हें इच्छा होने लगी।

सुबह जगने पर जब रात्रि का घटनाक्रम याद आया, तो वे स्टूडियो की ओर बढ़ गई। वहाँ जाकर जिस चित्र को देखा उससे विस्मय-विमुग्ध हो उठीं। किसी अज्ञात सुँदरी का अनुपम चित्राँकन था वह। उन्हें लगा कि ऐसे ही चित्र किसी प्रख्यात कलाकार का कहीं देखा है।

उनने प्रेतविद्या विशारद एक महिला से संपर्क किया, जहाँ ज्ञात हुआ कि उक्त चित्र गोया की प्रेतात्मा ने आकर बनाया है। इसके सृजन के पीछे आत्मा का क्या प्रयोजन था? इस आशय का प्रश्न करने पर आत्मा ने बताया कि पेरिस में कला संबंधी प्रेरणा नहीं मिल पाने के कारण बीजरुस बहुत परेशान थीं। हमने अपनी विश्व प्रसिद्ध कृति “ग्वालिन” से मिलती जुलती रचना कर इनका मानसिक क्लेश कम करना चाहा। चित्राँकन के पीछे हमारा इतना ही उद्देश्य था और कुछ नहीं। सचमुच वह चित्र विख्यात चित्रकार गोया की रचना “ग्वालिन” से काफी कुछ मेल खाता था।

उच्चस्तरीय आत्माओं की सहायता साकार रूप में, वाणी के द्वारा, परोक्ष प्रेरणा द्वारा सत्पात्रों को निरंतर उपलब्ध होती रहती हैं। कई बार यह सहयोग नूतन विचार और नवीन आविष्कार के रूप में भी मस्तिष्क में कौंध जाता है। विचारक समझता है कि वह उसकी अपनी कल्पना है, पर सच्चाई यह है कि अनेक बार इसमें उच्चात्माओं की प्रेरणा भी सम्मिलित होती हैं। वे अपनी योग्यता, क्षमता और प्रतिभा द्वारा लोगों की मदद करने और उन्हें उच्चस्तरीय बनाने में सदा दत्तचित्त रहती हैं। हमारे लिए इस संदर्भ में इतना ही पर्याप्त होगा कि हम स्वयं को सत्पात्र साबित करें और अपने को सत्कार्यों में नियोजित रखें, उनका अजस्र अवलंबन सतत् हमें मिलता रहेगा, यह सुनिश्चित है।


कठिनाइयों से डरिये नहीं, जूझिए

कभी-कभी देखा जाता है कि प्रयत्न करने पर भी कुछ लोग वाँछित सफलता नहीं पा पाते और तब दृष्टिकोण में इस भ्रम की संभावना हो उठती है कि प्रयत्न और पुरुषार्थ व्यर्थ है, मनुष्य का भाग्य ही प्रबल होता है किंतु यह भ्रम सर्वथा भ्रम ही है, सत्य का इससे दूर का भी संबंध नहीं होता। ऐसे प्रयत्नशील व्यक्ति की असफलता को लेकर भाग्यवाद में आस्था की स्थापना करने लगना मानसिक निर्बलता का लक्षण है। निश्चय ही उस असफल व्यक्ति के प्रयत्न में कुछ न कुछ खोट अथवा कमी रही होगी जिससे कि उसे उस समय असफलता का मुँह देखना पड़ा। यदि प्रयत्न पूरा और सावधानी के साथ किया जाय तो किसी के आने का अवसर ही शेष नहीं रह जाता। पूरा और सुचारु प्रयत्न सफलता की एक ऐसी गारंटी है जो कभी असिद्ध नहीं हो सकती।

किसी एक प्रयत्न से कोई निश्चित सफलता मिल ही जाये, यह आवश्यक नहीं। सफलता के लिए कभी-कभी प्रयत्नों की परंपरा लगा देनी होती है। परिश्रम एवं पुरुषार्थ के रूप में उसका उतना मूल्य चुका ही देना होता है जितना उसके लिए अनिवार्य है। एक बार असफलता का सामना हो जाने पर किसी को असफल मान लेना उसके साथ अन्याय करने के समान है, संसार में लिंकन जैसे हजारों व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने सैकड़ों बार असफल होकर भी, अंत में अभीष्ट सफलता का वरण कर ही लिया। सच्चा पुरुषार्थी वास्तव में वही है जो बार-बार असफलता को देखकर भी अपने प्रयत्न में शिथिलता न आने दे और हर असफलता के बाद एक नये उत्साह से सफलता के लिए निरंतर उद्योग करता रहे। जो पत्थर एक आघात में नहीं टूटता उसे बार-बार के आघात से तोड़ा ही जा सकता है।

असफलता को अंगीकार करने का अर्थ है निराशा को निमंत्रण देना। निराशा के दुष्परिणामों के विषय में अधिक कुछ कहना व्यर्थ है। निराशा की भावना को यदि नागपाश की भाँति कह दिया जाय तो कुछ अनुचित न होगा। निराशा मनुष्य की क्रियाशीलता पर सर्प की भाँति लिपट कर न केवल उसकी गति ही अवरुद्ध कर देती है प्रत्युत अपने विषैले प्रभाव से उसके जीवन तत्व को भी नष्ट करती रहती है।

यों कठिनाइयाँ देखने में गिरि श्रृंखलाओं के समान विस्तृत तथा दुर्भेद्य लगती हैं पर वास्तव में यह भ्रम मात्र है। कठिनाइयाँ आते ही हम उनकी कठोरता की पूर्व कल्पना करके अपनी शक्तियों का विघटन कर लेते हैं और असफलता के भय से कदम आगे बढ़ाने से डरते हैं। अन्यथा वे स्वयं में कुछ भी तो नहीं।

इस बात को ध्यान में नहीं लाना चाहिए कि असफलता मिलेगी। हमारा कर्तव्य तो यह है कि फलाफल की चिंता किये बिना निरंतर कार्य करते रहें। जो चलता है वह गिरता भी है। यदि आज सफलता की ओर एक चरण बढ़ रहा है तो कल मंजिल तक पहुँच ही जायेंगे। परंतु यदि चलेंगे ही नहीं तो मंजिल पास कैसे आयेगी? इसलिये चाहिए यह कि सतत् चलते रहें-आगे बढ़ते रहें।

मनुष्य कठोर परिस्थितियाँ आने पर प्रायः गिड़गिड़ाने लगते हैं, सोचते हैं कि यह अमुक व्यक्ति हमारी सहायता करेगा। परंतु तथ्य तो यह है कि संसार में ऐसे विरले ही व्यक्ति होते हैं जो दूसरों के सुख-दुख को अपना सुख-दुख मान कर सेवा सहायता करने में तत्पर होते हैं। अधिकांश व्यक्ति तो ऐसे होते हैं जो कठिनाइयों में पड़े लोगों की ओर आँखें उठाकर भी नहीं देखना, चाहते-सहानुभूति की बात तो दूर रही।

अपनी परिस्थितियों के लिए हमें किसी पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए क्योंकि स्थितियाँ व्यक्ति की स्वयं की बनायी हुई होती हैं। अन्य कोई व्यक्ति दुख नहीं देता अपितु सुख-दुख तो स्वयं हमारी मनः स्थिति पर निर्भर करते हैं। वह जैसी होगी वैसी ही भावनायें तथा अनुभूतियाँ होंगी। इसी प्रकार यदि इस भय की भावना को हम त्याग देंगे और अपना दृष्टिकोण निर्मल बनायेंगे तो निश्चित ही कठिन अवसर भी हमें विचलित न कर पायेगा।

संसार में न तो कोई शत्रु है न मित्र। हमारा अपना व्यवहार ही शत्रु तथा मित्र बनाने का उत्तरदायी है। जैसा दूसरों से बोलेंगे, व्यवहार करेंगे-उसकी के अनुसार शत्रु तथा मित्र बन जायेंगे। यह संसार मुसाफिर खाने के समान है जिसमें प्राणी आते हैं, थोड़े समय ठहरते हैं और फिर चले जाते हैं। यहाँ पर स्थाई रूप से किसी को भी नहीं रहना। अतएव दूसरों से न तो कटु वचन कहने चाहिए और नहीं बुरा व्यवहार करके शत्रुता की भावना बढ़ानी चाहिए। उन्हें सहयोगी मानकर स्नेह, सौजन्य और सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

आपत्तियाँ अथवा कठिनाइयाँ यदि किसी का मार्ग रोक सकने में सर्वथा समर्थ होतीं तो संसार में कोई भी व्यक्ति सफल एवं समृद्ध न हो पाता संसार में आपत्तियाँ सदा संभाव्य हैं। पग-पग पर यहाँ कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसा कदाचित ही कोई भाग्यवान इस संसार में उत्पन्न हुआ हो जिसे कठिनाइयों का सामना न करना पड़ा हो। तब भी लोग आगे बढ़े हैं, और समृद्ध बने हैं।

कठिनाइयाँ पथ रोकती हैं, रोड़े, अटकाती हैं। किंतु तब, जब मनुष्य उनसे हार मान बैठता है। जरा-सी प्रतिकूलता देखते ही, बाधा के उपस्थित होते ही, जिसके हाथ पैर फूल जाते हैं, साहस टूट जाता है और निराशा का अंधकार घेर लेता है, उसकी उन्नति का पथ अवश्य अवरुद्ध हो जायेगा। उन्नति एवं सफलता अपने हाथ पैरों के बल और आत्म-विश्वास के आधार पर मिलती है। यही वे गुण हैं जो मनुष्य को जीवन पथ पर अग्रसर किया करते हैं। किसी विपरीतता को देखकर जब मनुष्य का यही आवश्यक संबल ही नष्ट हो जायेगा, तो मनुष्य बढ़ेगा किस बल पर? बाधायें निर्बल को घेरती हैं, आत्म अविश्वासी को ही परास्त कर पाती हैं। परिश्रमी, पुरुषार्थी तथा आत्म-विश्वासी को नहीं।

आत्म-विश्वासी आत्म-निर्भर भी होता है। जिसमें चलने की ताकत है। जिसे किसी वैशाखी अथवा सहारे की जरूरत नहीं है उसे उसके स्थान से कौन हटा सकता है आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है?

बाहर की शक्तियाँ भी सहायता किया करती हैं, पर करती उन्हीं की हैं, जो उसके पात्र हैं। एक मनुष्य सहायता की याचना के लिए जाता है, उधार या मुफ्त कोई वस्तु चाहता है तो उसे आसानी से मिल जाती है, देने वाला विश्वास करता है कि मेरी सहायता का यह सदुपयोग करेगा और तुरंत ही प्रसन्नतापूर्वक सहायता करने को उद्यत हो जाता है। एक दूसरा व्यक्ति भी सहायता माँगने जाता है पर उसे देने के लिए कोई तैयार नहीं होता, कारण यह नहीं है कि पहले व्यक्ति का भाग्य अच्छा है, दूसरे का खोटा है या सहायता करने वाले दुष्ट हैं वरन् असली कारण यह है कि दूसरा व्यक्ति अपनी योग्यता और ईमानदारी उस प्रकार प्रमाणित नहीं कर सका जैसा कि पहले व्यक्ति ने की थी। सहायता न करने वालों को आपका गालियाँ देना बेकार है। इस दुनिया में अधिक योग्य को तहजीब देने का नियम सदा से चला आता है। किसान निठल्ले पशुओं को कसाई के हाथ बेच देता है और दुधारू तथा कामकाजी को अच्छी खुराक देकर पालता-पोसता है। संसार में सुयोग्य व्यक्तियों को सब प्रकार सहायता मिलती है और अयोग्यों को अपनी मौत मरजाने के लिए छोड़ दिया जाता है। माली अपने बाग में तंदुरुस्त पौधों की खूब हिफाजत करता है और जो कमजोर होते हैं उन्हें उखाड़ कर उस जगह दूसरा बलवान पौधा लगाता है। ईश्वर की सहायता भी सुयोग्यों को मिलती है, माला जपने और मनौती पर भी अयोग्य बेचारा वहाँ से भी निराश लौटता है।

“उद्धरेत् आत्मनात्मानम्” की शिक्षा देते हुए गीता ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि अपना उत्थान चाहते हो तो उसका प्रयत्न स्वयं करो। दूसरा कोई भी आपकी दशा को सुधार नहीं सकता, श्रेष्ठ पुरुषों का थोड़ा सहयोग मिल सकता है पर रास्ता अपने को ही चलना पड़ेगा, यह मंजिल दूसरे के कंधे पर बैठकर पार नहीं की जा सकती है। यह लोक और परलोक किसी दूसरे की कृपा दृष्टि से सफल नहीं हो सकता-यह सब तो खुद ही करना पड़ेगा, स्वयं ही अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा। अपने पेट के पचाये बिना अन्न हजम नहीं हो सकता, अपनी आँखों की सहायता बिना दृश्य दिखाई नहीं पड़ सकता, अपने मेरे बिना स्वर्ग को देखा नहीं जा सकता, इसी प्रकार अपने प्रयत्न बिना उन्नत अवस्था को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

हम मिमियाना छोड़ें, अपनी शक्ति को पहचानें और तन्मयता से गंतव्य की ओर बढ़ चलें, यह मानकर आगे बढ़ें कि हम उस महान शक्ति के ही स्फुल्लिंग हैं, संसार को स्वर्ग बनाने आये हैं-उसे सेवा, सहानुभूति और प्रेम का संदेश देने आये हैं। अच्छाइयों को शिरोधार्य करने का नाम ही जीवन है। अपनी वर्तमान परिस्थितियों में आगे बढ़कर अपने भविष्य को-समाज और राष्ट्र के भविष्य को उन्नत और उज्ज्वल बनाने का नाम ही जीवन है।


आत्मीयता सुव्यवस्था एवं विवेकशीलता (Kahani)

एक सेठ का पूर्व पुण्य समाप्त हो गया। नया उनने अर्जित नहीं किया। लक्ष्मी जी पुण्य के फल से आती हैं और उसके समाप्त होने पर चली जाती हैं। सो उनने अपने चले जाने की बात स्वप्न में बता दी। सेठ के अनुनय विनय करने पर भी वे रुकीं नहीं। हाँ, इतना भर कह दिया कि मुझे रोको मत, पर कोई और वर माँग लो। सेठ जी ने माँगा मेरा परिवार सहयोगपूर्वक रहे, पराक्रमी और संयमी बना रहे, इतना और देती जाइये। लक्ष्मी ने प्रसन्नतापूर्वक वर दे दिया। वे लोग गरीबी में भी अधिक सद्भाव और अधिक परिश्रम अपनाकर रहने लगे।

कुछ समय बाद लक्ष्मी जी फिर लौट आई सेठ ने कारण पूछा-तो उनने कहा-पारस्परिक सद्भाव और पराक्रम, पुरुषार्थ भी पुण्य में ही गिना जाता है। वह जहाँ रहेगा, वहाँ फिर जाने न पावें-ऐसा आचरण प्रयत्नपूर्वक बनाकर रखने लगा।

यह तथ्य हर परिवार पर लागू होता है। जहाँ भी आत्मीयता के संबंध प्रगाढ़ होंगे, सुव्यवस्था एवं विवेकशीलता संव्याप्त होगी, वहाँ अभाव कभी रह नहीं सकता।

सतयुगी समाज इसी कारण समृद्ध संपन्न था।


अंतर्जगत में प्रवेश करें, सत्य को पायें

ईश्वर-प्राप्ति जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि है। परम सत्य इसे ही कहा गया है। इसको प्राप्त कर लेने के उपराँत फिर कुछ और पाना शेष नहीं रह जाता। मनुष्य को इसी सत्य की उपलब्धि का उपाय करना चाहिए।

सत्य और तथ्य यह दो भिन्न चीजें हैं। तथ्य को खोजा और पता लगाया जाता है, जबकि सत्य के समीप पहुँचना पड़ता है। उसके अनुसंधान की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह सर्वत्र मौजूद है, स्वयं शोधक में भी उसकी विद्यमानता है, इसलिए अन्यत्र उसका संधान नहीं करना पड़ता। खोज उस वस्तु की होती है, जो अपने पास नहीं है, किंतु जो पहले से ही पास में हो, भला उसके लिए शोध कैसी? उसको तो मात्र अभिव्यक्ति चाहिए। उसके ऊपरी आवरणों को अनावृत कर देने भर से यह संभव हो जाता है और उसका प्रकाश साधक में झलकने-झाँकता लगता है। यह अंतर्जगत की यात्रा और अध्यात्म की उपलब्धि है।

किंतु तथ्य बहिर्जगत का अन्वेषण है। पदार्थ विज्ञान की जितनी भी गवेषणाएँ हैं, सब तथ्यों पर आधारित हैं। तथ्य से विज्ञान सशक्त और प्रामाणिक बनता है। यदि विज्ञान से इसे निकाल दिया जाय, तो वहाँ कल्पना-जल्पना के अतिरिक्त शेष कुछ नहीं बचेगा। यह संसार ब्रह्म का प्रकाश है। विज्ञान अपने ढंग से उसकी प्राप्ति का उपाय कर रहा है। उसने जब-जब पदार्थ संबंधी सत्य को खोजने और पाने की घोषणा की, तब-तब वस्तुतः उसने तथ्य को ही ढूँढ़ा है, क्योंकि सत्य तो एक ही है। बाकी सब उस सत्य को साबित करने वाले तथ्य भर हैं। जब यह कहा जाता है कि संसार परमाणुओं से बना हुआ है, जो स्वयं में पदार्थ की इकाई न होकर पुनः कई इकाइयों में विभाजित हो जाता है। यह सूक्ष्म इकाइयाँ नाभिक के गिर्द परिभ्रमणशील हैं, तो प्रकाराँतर से पदार्थ संबंधी तथ्य का ही उद्घाटन होता है। यह तथ्य अंतिम सत्य को सिद्ध करता है। अंतिम सत्य इसलिए, क्योंकि जब मूल कणों की गति पर विचार करते हैं, वहाँ तुरंत एक प्रश्न उठ खड़ा होता है कि गति का स्रोत क्या है? उसे इसकी प्रेरणा कहाँ से मिलती है? कारण कि स्थूल जगत में अनायास कुछ हो नहीं सकता। उसके पीछे प्रेरणा अथवा निमित्त होना अनिवार्य है। जब कोई प्रत्यक्ष हेतु ज्ञात न हो सके, तो इसके मूल में परोक्ष की प्रेरणा होना समझा और स्वीकारा जा सकता है। यह स्वीकारोक्ति ही परम सत्य का सबसे बड़ा प्रमाण है। इसलिए स्थूल विश्व में हम जो कुछ भी ढूँढ़-खोज करते हैं, वह सदा तथ्यपरक होती है। विज्ञान तथ्य का ही अन्वेषण कर सकता है, सत्य का नहीं क्योंकि सत्य अनुभूति और ज्ञानपरक है, जो बुद्धिगम्य हो, वह ज्ञान नहीं, वरन् जिसे समझने की सामर्थ्य महाप्रज्ञा के अतिरिक्त और किसी में भी न हो, वर परमज्ञान।

फूल तोड़ने के कुछ घंटे पश्चात् वे मुरझा जाते हैं वनस्पतिशास्त्री इस संदर्भ में यह कह सकते हैं कि डाल से पृथक् होने के बाद चूँकि बड़े पैमाने पर उसके अंदर की फारमेलिन गैस बाहर निकल जाती है, इसलिए ऐसा होता है। कुम्हलाने का कारण गैस का निकलना है, यह ठीक है, किंतु पुनः यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि इसके लिए उद्दीपन कहाँ से मिलता है? यदि इसे प्लाण्ट फिजियोलॉजी का अंग मात्र माना जाय, तो फिर इसका भौतिक होना भी अंगीकार करना पड़ेगा। भौतिक प्रक्रियाओं के साथ व्यतिक्रम, अव्यवस्था, अनियमितता अभिन्न रूप से जुड़ी रहती है, अस्तु यहाँ भी यह संभाव्यताएँ स्वीकारनी पड़ेंगी। जब यंत्र-उपकरण चलते, बनते और प्रक्रियाएँ ठप्प होती रहती हैं, तो यहाँ फिर भी वह दृश्य दिखाई पड़ने चाहिए, किंतु पादप जगत के इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण अपवाद स्वरूप भी आज तक ढूँढ़ा नहीं जा सका है, जिसमें शाखा से कुसुमों के अलग होने के बाद भी वे वर्षों तक खिली हुई स्थिति में ताजे बने रहे। पुष्प-भेद के आधार पर उसके टूटने और मुरझाने के अंतराल में तो न्यूनाधिक अंतर देखा गया है, पर इससे ज्यादा कुछ नहीं। इससे उक्त भौतिक प्रक्रिया के पीछे किसी अभौतिक कारण को मानना ही पड़ेगा। पदार्थ जगत इस अभौतिक कारण को सदियों से तलाशता रहा है, पर हर बाँम इसकी खोज में वह किसी तथ्य को ही अनावृत करता रहा है। यह तथ्य उस “आदि कारण” का ही सबूत जुटाता है, जिसे चरम सत्य कहा गया है।

शरीर मरणधर्मा है-यह सच है, किंतु मौत आखिर होती क्यों है? इसकी गहराई में यदि उतरें, तो फिर उसी अंतिम बिंदु तक पहुँच जायेंगे, जहाँ से जीवन का प्रारंभ होना बताया गया है। मृत्यु के संबंध में शरीरशास्त्री यह कहते पाये जाते हैं कि मरने वाले की देह एवं अंग अवयव वृद्धावस्था के कारण जीर्ण-शीर्ण हो गये थे और उस जीर्णता का भार वे आगे उठा पाने में असमर्थ थे, इसलिए चेतना ने वृद्ध काया का परित्याग कर दिया, फलस्वरूप मरण घटित हुआ। उक्त तर्क कुछ हद तक मान्य है। असमंजस तो वहाँ उठ खड़ा होता है, जहाँ शरीर भी स्वस्थ, आयु भी औसत, फिर भी शरीराँत हो जाता है। कारण ढूँढ़ने पर ज्ञात होता है व्यक्ति दो-चार दिन ज्वरग्रस्त रहा, तीन-चार उल्टियाँ हुईं और देहाँत हो गया। चिकित्सक इसे मौत का हेतु नहीं मानते और कहते हैं कि यह कोई गंभीर दशा नहीं, जो मृत्यु का निमित्त बने। फिर भी इस प्रकार की मौतें होती रहती हैं। डॉक्टर इसमें अधिक माथापच्ची करने के बजाय इसे अनहोनी कहकर स्वीकार लेते हैं। इसका कोई वास्तविक कारण तलाश भी लिया गया, तो भी यह प्रश्न चिकित्साशास्त्र के समक्ष अनुत्तरित ही बना रहेगा कि अल्पायु और दीर्घायु में कलेवर छोड़ने के लिए चेतना को दिशानिर्देशक कहाँ से मिलता है? इसके पीछे बीमारियों को यदि कारणभूत माना गया, तो फिर सवाल पैदा होगा कि उक्त व्याधि हुई ही क्यों? यहाँ यदि परिस्थिति और पर्यावरण को जिम्मेदार ठहराया गया, तो इस इसका जवाब दे पाना कठिन हो जायगा कि उसी वातावरण में रहने वाले अन्य अनेकों को न होकर यह रोग व्यक्ति विशेष को क्यों हुआ? इस प्रकार प्रश्नों की एक लंबी श्रृंखला के पश्चात् हमें कोई-न-कोई अपार्थिव उद्गम की स्वीकारोक्ति करनी ही पड़ेगी, तभी इस प्रश्न श्रृंखला का समाधान हो सकेगा। यही अंतिम सत्य होगा। इस तरह मृत्यु संबंधी अलग-अलग तथ्य अप्रत्यक्षरूप से परमचेतना ही सिद्ध करते हैं। यही मानव के लिए यथार्थ प्राप्तव्य हैं।

ईश्वरीय चेतना का साकार रूप यह विराट् विश्व है। उसके कण-कण में परम सत्ता की व्यवस्था को देखा और अनुभव किया जा सकता है। जिस प्रकार मिट्टी के बर्तनों से कुम्हार का, मशीन के अवलोकन से निर्माता का एवं मकान को देखकर उसमें रहने और बनाने वाले का अंदाज लगता है, उसी प्रकार सृष्टि के अणु-अणु में समाये नियम को, उसके सुनिश्चित विधि-विधान को निहारने से किसी नियामक सत्ता की उपस्थिति का स्पष्ट आभास मिलने लगता है। यह आभास तथ्य मात्र है। उसकी उपलब्धि कर लेने से सत्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। सत्य का साक्षात्कार उसके आगे के चरण में होता है। तथ्य से परमेश्वर के प्रति विश्वास पैदा होता है। इस विश्वास के आधार पर जब आँतरिक मल विक्षेपों के अवाँछनीयता के आवरण को हटाया मिटाया जाने लगता है, तो आत्मा और ईश्वर का प्रकाश प्रकट होने लगता है। इसी की प्राप्ति मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य है, किंतु इन दिनों उसे पाना तो दूर, उसके आस-पास भी हम नहीं पहुँच सके हैं। कारण कि हमारा आधार असत्य पर टिका हुआ है। सत्य को हस्तगत करने के लिए आधार का सच्चा होना भी निताँत आवश्यक है। झूठा आधार सत्य को कभी भी उपलब्ध नहीं करा सकता। जिस प्रकार लौह कणों को आकर्षित करने के लिए लोहे का चुँबक अभीष्ट होता है, उच्चस्तरीय ज्ञानार्जन के लिए उच्चशिक्षित आचार्य की आवश्यकता पड़ती है, काँटे को निकालने के लिए काँटा चाहिए, उसी प्रकार सत्य तत्व को प्रत्यक्ष करने के लिए व्यक्तित्व भी सच्चा होना चाहिए। मिथ्या व्यक्तित्व में सत्य को प्रकट और धारण करने की सामर्थ्य नहीं।

वर्तमान में जीवन और व्यवहार में हम जैसे बाहर हैं, वैसे भीतर नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति ऐसा दिखलायी नहीं पड़ना चाहता, जैसा कि वह है। जो यथार्थ है,उसे आदमी छिपा लेना चाहता है, और जो झूठ है, मिथ्या है, उसका आवरण ओढ़ लेना चाहता है। फिर वही सत्य-प्राप्ति का उपक्रम करता दिखाई पड़ता है। धर्मग्रंथों का नवाह्न पारायण करने लगता है। कुरान, बाइबिल का नियमित पाठ आरंभ करता है। भगवान की प्रतिमा के समक्ष नित्य हाथ जोड़ता, पूजा करता, भजन गाता, प्रार्थना करता, व्रत-उपवास रखता है, ताकि उसे इष्ट के दर्शन हो जायँ, आत्मोपलब्धि हो जाय, पर वह यह सोचने-समझने की चेष्टा कभी भी नहीं करता कि यदि वह स्वयं असत्य है और उसका संपूर्ण व्यक्तित्व ही असत्य पर स्थित है, तो भला उसे सत्य का ज्ञान कैसे हो सकता है?

सत्य की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम हमें अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को सत्य पर प्रतिष्ठित करना होगा। उसे सीधा, सरल और स्वच्छ बनाना होगा। हम जैसे भी हैं, जो भी हैं-व्यक्तित्व की स्वीकृति भी वैसी ही होनी चाहिए। खराब को खराब तथा बुरे को बुरा मान लेने से कम-से-कम इतना तो अनुमान लगता है कि व्यक्ति में असत्य को असत्य स्वीकारने जितना सत्य अभी बाकी है। आगे इसी का विस्तार करके उसे बीज से वृक्ष जितना विराट् बनाया जा सकता है। इतना यदि संभव हुआ, तो समझना चाहिए कि परमतत्व की उपलब्धि की दिशा में दो तिहाई सफलता मिल चुकी है। शेष एक तिहाई, ईश्वर के प्रति श्रद्धा और उच्च आदर्शों के प्रति समर्पण से पूरी हो जाती है, किंतु वर्तमान समय में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि वह स्वीकृति मन के अंदर कहीं नहीं है। व्यक्ति आज अपने दुर्गुण को दुर्गुण नहीं मानना चाहता। जब अच्छाई की दिशा में उठने वाले प्रथम कदम का ही गला घोंट दिया गया, तो फिर अच्छाई के समुच्चय-ईश्वर को, आत्मा को कैसे प्राप्त किया जा सकेगा? इतने पर भी आश्चर्य यह कि आज जिन्हें भला आदमी कहा जाता है, उन तथाकथितों की निजी जिंदगी में झाँकने पर वह सरलता, सहजता और स्वच्छता नहीं के बराबर बहुत कम देखने में आती है, जिनका कि बढ़-चढ़ कर अनुमान और बखान किया गया था। इसके विपरीत जिन्हें हम बुरा आदमी कहते हैं, अपराधी और चरित्रहीन समझते हैं, वे सरल, सहज हो सकते हैं।

मान्यता संबंधी यह दोष भी सत्य के समीप पहुँचने में अवरोध उत्पन्न करता है। यदि बुरे को बुरा और भले को भला कहने की धारणा सूक्ष्म परख के आधार पर बनायी जाती, तो शायद इनसे दोनों का ही कल्याण होता, पर उलटी अवधारणा अपना लेने और उलटा संबोधन प्रदान करने से जहाँ एक को उलटा करने का समर्थन और प्रोत्साहन मिलता है, वहीं दूसरा अपना सीधा-सच्चा आचरण त्याग कर खराब बनने के लिए मजबूर हो जाता है। सोचता है, जब दुर्जन की पहचान बन गई, तो फिर सज्जन बने रहने में क्या लाभ? इसके विपरीत जो वास्तव में दुष्ट और अधार्मिक हैं, वह शिष्ट एवं धार्मिक होने का और अधिक ढोंग करने लगते हैं। इस प्रकार दोनों ही पतनोन्मुख होते और सत्य तत्व से अधिकाधिक दूर होते चले जाते हैं। यदि प्रच्छन्न अभद्रों की भर्त्सना और वास्तविक भद्रों की सराहना का प्रचलन समाज में रहा होता, तो संभव है मनुष्य अपनी वर्तमान दुरवस्था से काफी कुछ आत्मोन्नति कर एक ऐसी भूमिका में अवस्थान कर रहा होता, जहाँ सच्चे अर्थों में उसे समुन्नत, सुसंस्कृत और सुसभ्य कहा जाता।

पर संसार की आज की स्थिति देखने से ऐसा लगता नहीं कि समाज सचमुच सुसंस्कृत है। इसका एक ही कारण है कि भौतिक प्रगति के साथ-साथ मनुष्य अधिकाधिक बहिर्मुख होता चला गया और बाह्य प्रकृति के अनुसंधान में निरत हो गया, जबकि होना उलटा चाहिए था। उसे अंतर्मुखी बनकर भीतर के आयामों में उतरना और पिछले दिनों की शोध को जारी रखते हुए आगे की उपलब्धि करनी चाहिए थी, पर ऐसा न हो सका। यही कारण है कि पिछले हजार वर्षों में मात्र एक महावीर एक बुद्ध, एक क्राइस्ट, एक मुहम्मद, विवेकानंद और एक श्री अरविंद पैदा हो सके। इतनी बड़ी दुनिया और इतनी विशाल अवधि में मात्र एक विवेकानंद! यह बड़े आश्चर्य, दुख और दुर्भाग्य की बात है। समय आ गया है, जब मनुष्य जाति को अपना यह दुर्भाग्य धो देना चाहिए। अंतः प्रकृति में प्रवेश कर उसे सत्य को पा लेने का प्रयास करना चाहिए, जो तथ्य के रूप में, स्थूल विश्व के रूप में हमारे सामने प्रकट और प्रत्यक्ष है। तथ्य मूर्त है और सत्य तत्व उसका अमूर्त और वास्तविक रूप है। आत्मा, ईश्वर कह कर उसे ही पुकारा गया है। मनुष्य का यथार्थ कल्याण उसी में निहित है। उसी की उपलब्धि का हमें प्रयत्न करना चाहिए।


तंत्र शास्त्र उपयोगी भी, विज्ञान सम्मत भी

भारतीय अध्यात्म का गौरवशाली साहित्य दो भागों में विभक्त है-’आगम’ और ‘निगम’। सामान्यतया आगम तंत्र के लिए और निगम वेदों के लिए प्रयुक्त होता है। वेदों की महत्ता तो सर्वविदित है ही, तंत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण उच्चकोटि के साहित्य में गिने जाते हैं। इसका प्रमाण इसी तथ्य से मिलता है कि आगम शब्द पहले वेदों के लिए प्रयुक्त किया जाता था, परंतु जब तंत्रों का आविर्भाव हुआ तो वेद निगम और तंत्र आगम के अंतर्गत आ गये। जिस तरह वेद ईश्वर की वाणी माने जाते हैं, उसी तरह तंत्र भी भगवान विष्णु, शिव, देवी की वाणी हैं और उन्हीं देवताओं के नाम से वे जाने भी जाते हैं। वेदों के कर्म, उपासना और ज्ञान के तीन विषय प्रसिद्ध हैं, किंतु इनमें यह विषय संक्षिप्त और गुँथे हुए रूप में वर्णित हैं। इन्हें ही सरल रूप में युगानुसार विस्तारपूर्वक तंत्रों में पाये जाते हैं। तंत्रों की महत्ता प्रकट करते हुए ‘मत्स्य-सूक्त में लिखा है कि जिस तरह वर्णों में ब्राह्मण, देवियों में दुर्गा, देवताओं में इन्द्र, वृक्षों में पीपल, पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा और अवतारों में विष्णु हैं। उसी तरह शास्त्रों में तंत्र श्रेष्ठ हैं।’

इस तरह अध्यात्म साहित्य में ‘तंत्र की एक विशिष्ट स्थिति है। यह अध्यात्म विज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसका अवलंबन करके सर्वथा सामान्य व्यक्ति भी साँसारिक स्तर से ऊपर उठकर क्रमशः उच्च जीवन में प्रविष्ट कर सकता है। तंत्र का उद्देश्य साधक को निम्नगामी प्रवृत्तियों में उलझाना नहीं है, वरन् उसे एक ऐसा सुव्यवस्थित मार्ग सुझाना है जिससे वह जीवन में कुछ श्रेष्ठ एवं आदर्शवादी कार्य कर सके। यद्यपि यह सत्य है कि जिस प्रकार से प्रत्येक उच्च और उपयोगी सिद्धाँत एवं संप्रदायों में कालाँतर में अनेक विकार और दोष उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार तंत्र मार्ग का भी अधिकांश में रूपांतर हो गया है और साधारण लोगों ने उसे मारण, मोहन, वशीकरण जैसे निकृष्ट, दूषित कार्यों का ही साधन समझ लिया है। पर अपने मूल रूप में उसका उद्देश्य यही रहा है कि जो लोग घर-गृहस्थी को त्याग करके दीर्घकालीन तप और वैराग्य द्वारा आत्म साक्षात्कार करने में असमर्थ हैं, वे अपने साँसारिक जीवन का निर्वाह करते हुए भी आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नति कर सकें। इस बात को स्पष्ट करते हुए तंत्रशास्त्रों में कहा गया है कि “जहाँ भोग है वहाँ मोक्ष नहीं है और जहाँ मोक्ष है वहाँ भोग नहीं है, किंतु जो मनुष्य भगवती महाशक्ति की सेवा में संलग्न हैं उनको भोग और मोक्ष दोनों ही सहज साध्य हैं।”

जब कभी तंत्र-साधना का प्रचार उच्चशिखर पर था, साधक इससे अनेकों प्रकार की असाधारण सिद्धियाँ प्राप्त करते थे, जो आज सर्वथा असंभव दृष्टिगोचर होती हैं। प्राचीन काल के साधक इससे बड़े-बड़े लाभ उठाते थे। रावण और अहिरावण हजारों मील की दूरी से बिना वैज्ञानिक यंत्रों के आपस में वार्तालाप करते थे। नल-नील ने पानी पर तैरने वाले पत्थरों से पुल बनाया था। हनुमान मच्छर की तरह छोटा बन सकते थे और बृहदाकार पर्वत खंडों को उठाने की सामर्थ्य भी रखते थे। सुरसा अपने शरीर को विशालतम बना सकती थी। मारीच मनुष्य शरीर को पशु-शरीर में परिवर्तित कर लेता था। बिना पेट्रोल के आकाश में उड़न वाले वायुयान उपलब्ध थे। वरुण-अस्त्र से जल की वर्षा कराई जाती थी, आग्नेयास्त्र से चारों ओर अग्नि की लपटें उठने लगती थीं, नागपाश की जकड़ लोहे की मोटी रस्सियों से भी अधिक सुदृढ़ थी। सम्मोहनास्त्र से व्यक्ति को मूर्छित कर दिया जाता था। आज यह विद्या लुप्त हो गयी और उसे मात्र ग्रंथों में ही पढ़ा जा सकता है।

तंत्र-साधनाओं का लक्ष्य बड़ा विस्तृत है। वशीकरण, मारण, मोहन, उच्चाटन, दृष्टिबंध, परकाया प्रवेश, सर्पविद्या, प्रेतविद्या, अदृश्य वस्तुओं को देखना, भविष्य ज्ञान, संतान, सुयोग, आकर्षण, मोहन मंत्र, घात-प्रतिघात आदि की क्रियायें इससे संचालित की जा सकती है। इस साधना द्वारा दूसरों के मन को प्रभावित किया जा सकता है और उसकी गतिविधियों को अपनी इच्छानुसार मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। निर्बल मन व शरीर वाले व्यक्तियों को स्वस्थ बनाया जा सकता है। बिच्छू एवं सर्पदंश तथा विषैले फोड़ों का समाधान भी तंत्र द्वारा मिलता है। अनिष्टग्रह, भूतोन्माद, नजर लगने आदि के उपचार तंत्र द्वारा होते हैं। मानसिक उद्वेग, असहनीय वेदना व अन्य शारीरिक अव्यवस्थाओं में तंत्र सहायक सिद्ध होता है। मैस्मरेजम और हिप्नोटिज्म द्वारा भी कुछ ऐसे ही कार्य कर लिये जाते हैं। तंत्रों द्वारा इनकी अपेक्षा कहीं अधिक शक्ति उपार्जित की जा सकती है और उनसे महत्वपूर्ण लाभ उठायें जा सकते हैं।

किसी समय तंत्रों के इतने विशाल साहित्य का निर्माण किया गया था जिसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती। तंत्रों में ही वर्णन है कि प्राचीनकाल में चौदह हजार तंत्र ग्रंथ प्रचलित थे जिनमें सभी विद्याओं का समावेश था। ये अभ्यास और व्यावहारिक ज्ञान के शास्त्र माने जाते हैं जो जीव की परतंत्रता को समाप्त करके स्वतंत्रता का द्वार खोलते हैं, वह जिन सुदृढ़ बंधनों में जकड़ा हुआ है उनको ढीला करते हैं और ईश्वरीय सत्ता के सर्वोच्च स्थान पर लाकर खड़ा कर देते हैं। तंत्र के लक्ष्यों की ओर संकेत करते हुए मनीषियों ने कहा है-’ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति का जागरण, इन शक्तियों को खोजकर कार्य करना, अपने देवत्व को पहचानना और अपने चारों ओर दृष्टि में विशालतर देवत्व का आलिंगन करना ही वह आदेश है जिसे समस्त आगम उद्घोषित करते हैं। आत्मिक विज्ञान के सिद्धाँतों को क्रिया रूप देना ही वस्तुतः तंत्रशास्त्र का कार्य है। विभिन्न प्रकार की साधनाओं के विधि-विधान का मार्गदर्शन ही इनका मुख्य कार्य है।’

तंत्रों में पंचमकार की साधना की जाती है। इन साधनाओं में मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन के प्रयोग का निर्देश किया गया है। अलंकारिक भाषा में प्रयुक्त इन शब्दों को साधारण कोटि के साधक न समझ सके और इनका प्रत्यक्ष प्रयोग करके इस उच्चस्तरीय साधना क्षेत्र को भ्रष्ट कर दिया, जिससे बौद्धिक क्षेत्र में इनके प्रति घृणा के बीज उत्पन्न हो गये। परंतु वास्तविकता कुछ और ही है। जहाँ ‘मद्य’ के प्रयोग का आदेश है वहाँ नशा उत्पन्न करने वाले पेय से अभिप्राय नहीं है, वरन् वह दिव्य ज्ञान है जिससे साधक बाहरी जगत से नाता तोड़कर आँतरिक क्षेत्र में प्रवेश करता है। परमात्मा को सर्वस्व समर्पित करना ही तो ‘माँस’ का सेवन कहलाता है। ‘मत्स्य’ का अभिप्राय उस स्थिति से है जब सभी तरह के सुख-दुख एक समान हो जाते हैं। दुर्गुणों के त्याग को ‘मुद्रा’ कहते हैं। सहस्रार में शिव-शक्ति का कुँडलिनी के साथ मिलन ‘मैथुन’ कहलाता है। उच्चकोटि के साधक इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत होकर साधना करते हैं। विषयी प्रकृति के व्यक्ति अपनी वासनाओं को तृप्त करने के लिए एक प्रकार का षडयंत्र करते हैं और तंत्रशास्त्र को बदनाम करते हैं जिससे यह व्यावहारिक रूप में जनसाधारण से दूर चला गया है। इसकी वास्तविकता को समझना और तद्नुरूप आचरण करना ही अभीष्ट है जिससे जीवन विकास में इस विज्ञान का लाभ उठाया जा सके।

तंत्र पद्धति में छिपे हुए अर्थों को बताते हुए महर्षि अरविंद ने कहा है कि-”भारत भूमि की आत्मा के क्रमशः विस्तारशील राज्य में यह एक महत्वपूर्ण विकास शिखर था। वैदिक ऋषियों ने एक आँतरिक अनुशासन और धर्म विकसित किया और इसे पूर्ण बनाया जो मूल रूप में सहज बोध पर आश्रित और प्रतीकात्मक था और उस युग की अकृत्रिम विशुद्ध मानवता के अनुरूप था। उपनिषद् में इस प्रारंभ के प्रयास का उल्लेख है जिसमें मानव अपने विभिन्न स्तरों को आलोकित बुद्धि के उच्च स्तर से लेकर नीचे तक के स्तरों को ऊँचा उठा ले जाता है, उन पर आत्मा की ज्योति का प्रकाश डालता है। यह एक प्रणाली है जो कि स्मृतियों के युग से होते हुए आगे बढ़ी और दर्शन में अपनी पूर्णता को पहुँची। ताँत्रिक साधना भगवान के विषय में और भी गंभीर दावा करती है। यह मानव के संवेदनशील और सक्रिय भागों, हृदय, संकल्प और जीवन सत्ता को भी लेती है और उन्हें आत्मा के ढाँचे के अनुरूप विकसित करने का यत्न करती है। इसलिए तंत्र राष्ट्र के प्रगतिशील तथा आत्म–विस्तारशील आध्यात्मिक आँदोलन में एक महत्वपूर्ण और यहाँ तक कि एक अनिवार्य सोपान रहा है।”

वस्तुतः तंत्र एक स्वतंत्र विज्ञान है। प्रकृति की शक्तियों पर काबू पाकर उन्हें अपनी इच्छानुकूल वशवर्ती बनाना इस विद्या का प्रधान कार्य है। परमाणुमयी प्रकृति के आकर्षण-विकर्षण से जगत के पदार्थों में परिवर्तन होता रहता है, उत्पत्ति, स्थिति और लय के परिणाम उपस्थित होते हैं। विज्ञान द्वारा परमाणु की इस स्वाभाविक प्रक्रियाओं को बदल कर अपने अनुकूल बना लिया जाता है। तंत्र विज्ञान के द्वारा अपने अंतर की विद्युत शक्ति को इतना विकसित कर लिया जाता है कि प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं को अपनी इच्छानुसार ढाल सकते हैं। इसी को सिद्धि कहते हैं। तंत्र विज्ञान के अनुसार सूक्ष्म जगत में चेतना ग्रंथियाँ विचरण करती रहती हैं। जिस उद्देश्य से साधना की जा रही है, उसके अनुसार उन्हीं प्रकार की चेतना ग्रंथियों को जाग्रत किया जाता है, ताकि वह क्रियाशील होकर अनुकूल परिणाम प्रस्तुत शरीर से अपने स्वामी को सभी आज्ञाओं का पालन करता है वैसे ही अप्रत्यक्ष शरीर से वह चेतना ग्रंथियाँ सदैव उसके साथ रहती हैं और अपनी शक्ति के अनुसार साधक की आज्ञाओं को पूर्ण करती हैं। जैसे कहा जाता है कि ताँत्रिक को भैरव, छाया पुरुष, ब्रह्मराक्षस, मसान, पिशाच, आदि सिद्ध हैं।

अदृश्य लोक की चेतना ग्रंथियों की प्रक्रिया इस प्रकार से होती है कि तंत्र साधनाओं द्वारा उन्हें पकड़ा जाता है, उनको प्राणवान बनाया जाता है, जाग्रत, क्रियाशील और चैतन्य बनाया जाता है। चैतन्य होने पर वह साधक पर आक्रमण करती हैं। यदि साधक इस आक्रमण से भयभीत न हुआ तो वह ग्रंथियाँ उस साधक के वश में हो जाती हैं और अप्रत्यक्ष शरीर से उसके सभी कार्य सिद्ध करती हैं। यदि वह भयभीत हो जाय तो उसे हानि की भी संभावना होती है। प्राचीनकाल में जब तंत्र अपने विशुद्ध रूप में चरमोत्कर्ष पर था तब अदृश्य लोक की इन चेतना ग्रंथियों को जाग्रत कर वह सभी कार्य कर लिये जाते थे जो आजकल भौतिक विज्ञान की शोधों से यंत्रों द्वारा किये जाते हैं। इस विद्या द्वारा अभी भी आनंददायक परिस्थितियाँ उत्पन्न और उपलब्ध की जा सकती हैं और उनका उपयोग स्वयं के लिए तथा जनहित में किया जा सकता है। इनसे आसन्न विपत्तियों का निवारण भी किया जा सकता है। तंत्र तुरंत फल दाता है और वह परिणाम आश्चर्य जनक होते हैं।

तंत्र का सीधा संबंध चेतना-चित्तषक्ति से है। यह साधना पंचकोशों को पार करने एवं षट्चक्र जागरण कुण्डलिनी उन्नयन की उच्चतम प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करती है। अन्नमय कोष से आनंदमय कोष की ओर बढ़ते हुए चलना इनका उद्देश्य है। तंत्र साधनायें शक्ति के स्रोत हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर में स्थित षट्चक्रों और यौगिक ग्रंथियों-उपत्यिकाओं को जगाकर साधक को एक शक्तिशाली चुँबक बना देती है। अंग-प्रत्यंग से शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और यही आकर्षण शक्ति ईश्वर की विभिन्न शक्तियों, जिन्हें देवता कहते हैं, को अपने अनुकूल बनाकर अपनी ओर आकर्षित करती हैं और मनोवाँछित सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। सूक्ष्म देवताओं के लिए सूक्ष्म साधनों की आवश्यकता रहती है और इस कार्य के लिए मंत्र सर्वोपरि साधन स्वीकार किये गये हैं। तंत्रों ने मंत्रों के साथ बीजाक्षरों का प्रयोग भी बताया है। इन मंत्रों की सूक्ष्म तरंगें सूक्ष्म प्रकृति में हलचल उत्पन्न करती हैं और ईथर तत्व में संव्याप्त अपने अनुकूल तरंगों के साथ मिलकर एक शक्तिपुँज के रूप में परिणित हो जाती हैं। साधक एक चुँबक की तरह इन शक्तियों को आकर्षित करता रहता है और अपने में शक्ति के भंडार को भरता रहता है। इस तरह से मंत्र-तंत्र साधक का दिव्यशक्तियों से संबंध स्थापित कराते हैं और वह आध्यात्मिक विभूतियों एवं भौतिक सिद्धियों का पुँज बनता जाता है।

ताँत्रिक आचार्यों का कहना है कि तंत्र की उच्चतम सिद्धि उसे प्राप्त होती है जिसका गुरु कृपा से सुषुम्ना में प्रवेश हो जाता है और जिसकी कुँडलिनी शक्ति का जागरण होता है। तंत्र का मत ही है कि जो साधक इन्द्रियों और प्राणों को रोककर कुल मार्ग में सक्रिय नहीं हो जाता वह शक्ति की निकृष्ट उपासना का भी अधिकारी नहीं है। मेरु तंत्र के अनुसार जो पर द्रव्य के लिए अंधा है, पर-स्त्री के लिए नपुँसक है, पर निंदा के लिए मूक है और इन्द्रियों को सदा वश में रखता है, ऐसा ब्रह्मपरायण व्यक्ति ही वाममार्गी तंत्र साधना का अधिकारी होता है। यह अधिकार प्राप्त करने के लिए ताँत्रिक सिद्धाँतों का गंभीर अनुशीलन और साधना मार्ग का निष्ठापूर्वक अनुगमन आवश्यक है, तभी दिव्य शक्तियों का वरद् हस्त प्राप्त हो सकता है।


षोडश संस्कारों के मूल में निहित तत्वज्ञान

मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास में संस्कारों का सर्वप्रथम स्थान है। लोगों का सदा से ही विश्वास रहा है कि मनोविचारों का प्रभाव मनुष्य की कार्य करने की प्रवृत्ति और शक्ति पर पड़ता है। इस प्रकार संस्कार भविष्य के लिए प्रगति का संदेश देते हैं और उत्साह बढ़ाते हैं। मानव जीवन की प्रगति के पथ में संस्कार सोपान के समान हैं, जो क्रम से उसको अधिक ऊँचा उठाते जाते हैं। मुनिवर पराशर ने संस्कारों की उपयोगिता का उल्लेख इन शब्दों में किया है-”जिस प्रकार चित्रण अनेक रंगों के द्वारा प्रस्फुटित होता है, वैसे ही विधिपूर्वक संपन्न किए हुए संस्कारों के द्वारा व्यक्ति में ब्राह्मणत्व का विकास होता है।”

भारतीय संस्कृति के अनुसार मनुष्य के जीवन का एक मात्र यही उद्देश्य माना गया है कि वह अपने जीवनकाल में अधिक से अधिक सुख एवं आनंद की प्राप्ति करे और जीवन के पश्चात् उसे स्वर्ग अथवा मुक्ति की प्राप्ति हो। अतः सर्वप्रथम आवश्यकता यह है कि मानव जीवन दीर्घायु हो। उपनिषद्कारों ने सौ वर्ष के कर्मठ जीवन की कल्पना की थी। “कुर्वन्नेवेह कर्माणिजिजीविषेच्छते समाः!” सौ वर्ष के जीवन में पूर्ण आनंद की प्राप्ति के लिए आवश्यक था कि शरीर स्वस्थ रहे और इन्द्रियाँ सशक्त रहें। तभी तो जीवन में आनंद की प्राप्ति संभव हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए ऋषियों ने सभी दिशाओं में व्यक्तित्व के विकास के लिए योजनायें बनाईं। मानव के व्यक्तित्व का विकास जितनी मात्रा में जिस दिशा में हो पाता है, उतनी ही मात्रा में उस दिशा में जीवन की सफलता संभव होती है। देव संस्कृति के अंतर्गत व्यक्तित्व के विकास का प्रथम सोपान संस्कार परंपरा के माध्यम से ही आरंभ हुआ।

आयुर्वेदिक रसायन बनाने की अवधि में उन पर कितने ही संस्कार डाले जाते है। कई बार कई प्रकार के रसों में उन्हें गजपुट आदि विधियों द्वारा अग्नि में जलाया, तपाया जाता है, तब कहीं, वह रसायन ठीक तरह तैयार होती है और साधारण-सी राँगा, जस्ता, ताँबा, लोहा, अभ्रक, सोना, जैसी कम महत्व की धातु चमत्कारिक शक्ति संपन्न बन जाती हैं। ठीक इसी तरह मनुष्य को भी समय-समय पर विभिन्न आध्यात्मिक उपचारों द्वारा सुसंस्कृत बनाने की महत्वपूर्ण पद्धति भारतीय तत्व वेत्ताओं ने विकसित की थी। उसका परिपूर्ण लाभ उस देशवासियों ने हजारों लाखों वर्षों से उठाया है। किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए शिक्षा, सत्संग, वातावरण, परिस्थिति, सूझ-बूझ आदि अनेक बातों की आवश्यकता होती है। सामान्यतः ऐसे ही माध्यमों से लोगों की मनोभूमि विकसित होती है। इसके अतिरिक्त तत्ववेत्ताओं ने मनुष्य की अंतः भूमिका को श्रेष्ठता की दिशा में विकसित करने के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का भी आविष्कार किया है जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं सूक्ष्म अंतः करण पर भी पड़ता है और उसके प्रभाव से मनुष्य को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से समुन्नत स्तर की ओर उठने में सहायता मिलती है।

इस आध्यात्मिक उपचार का नाम “संस्कार” है। संस्कार का अर्थ है किसी वस्तु को ऐसा रूप देना, जिसके द्वारा वह अधिक उपयोगी बन जाये। उपवन में लगाये हुए किसी पौधे को प्रकृति जब अपने ढंग से बढ़ती जाती है तो माली अपनी कैंची से उस पौधे की टहनियाँ और पत्तों को काट-छाँट कर अन्य पौधों के सामंजस्य में लाकर उसका संस्कार करता है। मानव के संस्कार के द्वारा उस योजना का बोध होता है जो उसकी शारीरिक और मानसिक शुद्धि के साथ ही उसके समक्ष भावी जीवन की उत्थानमयी परंपरा प्रस्तुत करती है। संस्कार प्रायः व्यक्तिगत होते हैं पर ऐसा होने पर भी संस्कार संपादन की साधारणतः सारी प्रक्रियायें सामूहिक होती हैं और इस प्रकार समाज के समक्ष समय-समय पर जीवन के उच्चतम आदर्शों की प्रतिष्ठा होती रहती है। भारत की सदा से धारणा रही है कि मानव के व्यक्तित्व विकास के लिए आध्यात्मिक दिशाओं का तत्वानुशीलन और अनुपालन तथा गुरुजनों द्वारा किसी व्यक्ति के आत्मिक प्रगति के लिए कामना करना विशेषतः वैदिक मंत्रों के माध्यम से प्रभावोत्पादक और समर्थ सिद्ध होता है। संस्कार की प्रक्रियाओं में देवताओं के समक्ष शुद्ध, संस्कृत और उन्नतोन्मुख भावी जीवन की प्रतिज्ञा की जाती है। इसके पीछे तथ्य यह है कि भावनाओं और विचारों के अनुकूल हमारी परिस्थितियों की रूपरेखा बनती है और इन्हीं के अनुरूप हमारी शक्तियों और प्रवृत्तियों का विकास या ह्रास होता है।

संस्कार विधि में दिव्य शक्तियों का आवाहन और उनके ग्रहण की कल्पना का उदय धर्म की तत्संबंधी चेतना को प्रकट करता है। यह आयोजन शुभ और कल्याण की अभिवृद्धि तथा अशुभ अमंगल के निवारण के लिए प्रधान रूप से होता रहा है। संस्कृति के आदिकाल से ही मानव के जीवन में नित्य ही ऐसे अवसर आते रहे हैं, जब वह दिव्य शक्तियों का सहारा ढूँढ़ता रहा है। भावी जीवन को कल्याणमय और अभ्युदयशील बनाने का विचार स्वाभाविक है। ऐसी परिस्थिति में वह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि संस्कृति के आदिकाल से ही संस्कारों का प्रचलन किसी न किसी रूप में प्रत्येक भू भाग में सदा ही रहा है और रहेगा।

दैवी संस्कृति के अंतर्गत संस्कार 16 प्रकार के हैं जिन्हें ‘षोडश संस्कार’ कहते हैं। माता के गर्भ में आने के दिन से लेकर मृत्यु तक की अवधि में समय-समय पर प्रत्येक दैवी संस्कृति के अनुयायी को 16 बार संस्कारित करके एक प्रकार का आध्यात्मिक रसायन का रूप प्रदत्त किया जाता रहा है। प्राचीनकाल में प्रत्येक भारतीय इसी प्रकार का एक जीता जागता रसायन होता था। मनुष्य शरीर में रहते हुए भी उसकी आत्मा देवताओं के स्तर की बनती थी। यहाँ के निवासी ‘भूसुर’ अर्थात् पृथ्वी के देवता कहे जाते थे। उनके निवास की यह पुण्य भूमि भारत माता ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ समझी जाती थी, संस्कारवान व्यक्तियों को तथा उनके निवास स्थान को ऐसा गौरव मिलना उचित भी था।

सोलह संस्कारों में गर्भाधान, पुँसवन, सीमंत, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास, व अन्त्येष्टि इस क्रम से वर्णित किये गये हैं, किंतु आज के समय में जो व्यावहारिक नहीं हैं, या जिनकी उपयोगिता नहीं रही, उन छः को छोड़कर तथा जन्म दिवस, विवाह दिवस जैसे आज के दो महत्वपूर्ण संस्कारों को जोड़कर कुल बारह संस्कार ऐसे हैं, जो अपनी वैज्ञानिक महत्ता से समूचे समाज को नयी दिशा दे सकते हैं। इसमें प्रयत्न यह भी किया गया है कि जिन संस्कारों को छोड़ना पड़ा है उनकी महत्वपूर्ण प्रक्रियायें एवं शिक्षायें उन संस्कारों में जोड़ दी जायँ जिन्हें उन्हीं दिनों मनाया जाता है। गर्भाधान, पुँसवन, सीमंत, इन तीनों की प्रमुख प्रक्रिया गर्भवती के लिए नियत एक ही संस्कार में जोड़ दी गयी है। जातकर्म और नामकरण का विधान सम्मिलित बना दिया गया है। वेदारंभ के पश्चात् उपनयन एवं समावर्तन का विधान एक ही यज्ञोपवीत संस्कार में है। अतः उपयोगी संस्कारों में पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, विद्यारंभ संस्कार युवावस्था के पूर्व के हैं। जन्म काल से लेकर युवावस्था तक पहुँचते समय छःहों संस्कार महत्वपूर्ण मोड़ पर लगाये गये दिशा निर्देश पट्टिका का प्रथम भाग, अथवा पूर्वार्ध है। उत्तरार्ध में विवाह, वानप्रस्थ, अंत्येष्टि तथा श्राद्धतर्पण महत्वपूर्ण है। इसमें पारिवारिक सुख शाँति से लेकर मृत्यु जैसी संवेदना पूर्ण स्थिति में मानसिक संतुलन बिठाये रखने का महत्वपूर्ण अभ्यास सम्मिलित है। जन्म दिवस एवं विवाह दिवस संस्कार व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन में आत्म समीक्षा करने के लिए प्रेरित करते हैं। इनके माध्यम से व्यक्तिगत एवं दाम्पत्य जीवन में उगने वाले खरपतवारों की सफाई वर्ष में एक बार की जाती है और नया उत्साह एवं उमंग के वातावरण में भविष्य को उज्ज्वल बनाने का संकल्प किया जाता है। युगानुकूल परिस्थितियों में ये दोनों ही संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

हमारी प्राचीन महत्ता एवं गौरव गरिमा को गगनचुँबी बनाने में जिन अनेक सत्प्रवृत्तियों को श्रेय मिला था उसमें एक बहुत बड़ा कारण यहाँ की संस्कार पद्धति को भी माना जा सकता है। यह पद्धति सूक्ष्म अध्यात्म विज्ञान की अति प्रेरणाप्रद प्रक्रिया पर अवलंबित है। वेद मंत्रों के सस्वर उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें, यज्ञीय उष्मा के साथ संबद्ध होकर एक अलौकिक वातावरण प्रस्तुत करती हैं। जो भी व्यक्ति इस वातावरण में होते हैं या जिनके लिए भी उस पुण्य प्रक्रिया का प्रयोग होता है वे उससे प्रभावित होते हैं। यह प्रभाव ऐसे परिणाम उत्पन्न करता है जिससे व्यक्तियों के गुण-कर्म-स्वभाव आदि की अनेकों विशेषताएं प्रस्फुटित होती हैं। संस्कारों की प्रक्रिया एक ऐसी आध्यात्मिक उपचार पद्धति है जिसका परिणाम व्यर्थ नहीं जाने पाता। व्यक्तित्व के विकास में इन उपचारों से आश्चर्यजनक सहायता मिलती देखी जाती है। परिवार को संस्कारवान बनाने की, कौटुँबिक जीवन को सुविकसित बनाने की एक मनोविज्ञान सम्मत एवं धर्मानुमोदित प्रक्रिया को संस्कार पद्धति कहा जाता है। हर्षोत्सव के वातावरण में देवताओं की साक्षी, अग्निदेव की उपस्थिति, धर्म भावनाओं से ओत−प्रोत मनोभूमि, स्वजन संबंधियों की उपस्थिति पुरोहितों द्वारा कराया हुआ धर्मकृत्य, यह सब मिल-जुलकर संस्कार से संबंधित व्यक्ति को एक विशेष प्रकार की मानसिक अवस्था में पहुँचा देते हैं।

संस्कार के समय जो प्रतिज्ञायें की जाती हैं, वे अपना गहरा प्रभाव सूक्ष्म मन पर छोड़ती हैं और वह बहुधा इतना गहरा एवं परिपक्व होता है कि उसकी छाप अमिट नहीं तो चिरस्थायी अवश्य बनी रहती है। संस्कारों के द्वारा अंतर्मन पर ऐसी छाप डाली जाती है जो किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत सुविकसित, सौजन्ययुक्त एवं कर्तव्य परायण बनाने में समर्थ हो सके। ऋषियों ने अपनी आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक शोधों के आधार पर इस पुण्य प्रक्रिया का निर्माण किया है। वह जितनी प्रभावशाली पूर्वकाल में थी उतनी ही आज भी है, यदि उसे ठीक ढंग से उचित व्यवस्था के साथ, उपयुक्त भारतीय संस्कृति का यह उपादान मनुष्य को महामानव, बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सोपान है।


अपनी समस्याएँ आप सुलझाये

आज की सारी समस्याओं का एक सामान्य हल है-अध्यात्मवाद। यदि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये और अपना दृष्टिकोण सर्वथा आध्यात्मिक बना लिया जाये तो सारी समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे। विषयों में सर्वथा भौतिक दृष्टिकोण रखने से ही सारी समस्याओं का सूत्रपात होता है। दृष्टिकोण में वाँछित परिवर्तन लाते ही सब काम बनने लगेंगे।

अध्यात्मवाद का व्यावहारिक स्वरूप है संतुलन, व्यवस्था एवं औचित्य। शारीरिक समस्या तब पैदा होती है, जब शरीर को भोग साधन समझ कर बरता जाता है। आहार, विहार और रहन-सहन को विचारपरक बना लिया जाता है। इसी अनौचित्य एवं अनियमितता से रोग उत्पन्न होने लगते हैं और स्वास्थ्य समाप्त हो जाता है। सरदी, जुकाम, सिर दर्द, रक्तचाप, हृदय शूल, अजीर्ण, और यहाँ तक कि कभी-कभी असाध्य राज-रोगों का शिकार बनना पड़ता है यह शारीरिक समस्या बड़ी आसानी से हल हो सकती है यदि इसके विषय में दृष्टिकोण को आध्यात्मिक बना लिया जाय। पवित्रता अध्यात्मवाद का पहला लक्षण है। शरीर को भगवान का मंदिर समझ कर उसे सर्वथा पवित्र और स्वच्छ रखा जाय, आत्म-संयम और नियमितता द्वारा शरीर-धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करते रहा जाय तो शारीरिक संकट की संभावना ही न रहे। वह सदा स्वस्थ और समर्थ बना रहे।

लोग अपनी समस्याओं को यथासाध्य सुलझाने का भी प्रयत्न करते हैं, अर्थ संकट आ जाता है, तो सब कुछ भूलकर उसके सुलझाने में लग जाते हैं, शारीरिक समस्या खड़ी हो जाती है, तो उसका उपाय करने लगते हैं और जब कोई मानसिक उलझन में पड़ जाते हैं, तो उसका उपचार सोचते हैं। पर होता यह है कि एक समस्या सुलझाने में लगे रहने से संसार की दूसरी समस्याओं को अवसर मिल जाता है और वे अपना प्रभाव बढ़ा लेती हैं। जैसे शारीरिक समस्या में संलग्न होने पर आर्थिक संकट उठ खड़ा होता है और अर्थ संकट की ओर ध्यान देने पर मानसिक उद्विग्नता आ घेरती है। इस प्रकार एक के बाद एक, कोई न कोई समस्या सामने आती रहती है और मनुष्य का जीवन उसको सुलझाने में ही तबाह हो जाता है। यदि कोई ऐसा उपाय निकल आये जिसको प्रयोग में लाने पर सारी समस्याएँ एक साथ शमन होती रहें तभी कुछ काम बन सकता है।

मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्द्वन्द्व रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है। किंतु खेद है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकार-ग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ और आवेगों का भूकंप उसे अस्त-व्यस्त बनाये रहता है। स्थिरता, प्रसन्नता और सदाशयता का कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होता। ईर्ष्या, द्वेष और रोष क्रोध की नष्टकारी चिताएँ जलती और जलाती ही रहती हैं। लोग मानसिक विकारों, आवेगों और असद्विचारों से अर्थ विक्षिप्त से बने घूम रहे हैं। यदि इस प्रचंड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मनःशक्ति का महत्व समझ और निःस्वार्थ निर्लोभ एवं निर्विकारता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते चलें तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ सकते हैं।

सुदृढ़, स्वास्थ्य, समर्थ मन, स्नेह सहयोग, क्रिया-कौशल, समुचित धन, प्रगतिशील विकास-क्रम, श्रद्धा सम्मान, सुव्यवस्थित एवं संतुष्ट जीवन का आधार केवल एक ही है-अध्यात्म। अपने को सुधारने से संसार सुधर जाता है। अपने को ठीक कर लेने से चारों ओर का वातावरण ठीक बनने में देर नहीं लगती। यह एक निश्चित तथ्य है कि जो अपने को सुधार न सका, अपनी गति-विधि को सुव्यवस्थित न कर सका, उसका इहलौकिक और पारलौकिक भविष्य अंधकारमय ही बना रहेगा। जो इस लोक को नहीं सँभाल सका उसका परलोक क्या सँभलेगा, जो इस जीवन में नारकीय मनोभूमि लिये बैठा है, उसे परलोक में स्वर्ग मिलेगा ऐसी आशा करना व्यर्थ है। स्वर्ग की रचना इसी जीवन में करनी पड़ती है, दुष्प्रवृत्तियों के भव-बंधनों से इसी जीवन में मुक्त होना पड़ता है। परलोक में यही सफलताएं साकार बन जाती हैं। इसलिए मनीषियों ने मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमता उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति को ही माना है।

शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती वरन् उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य नाष के यह प्रधान हेतु हैं जो लोग तन्दुरुस्ती पर अधिक ध्यान देते हैं, स्वास्थ्य के नियमों का ठीक तरह पालन करते हैं वे मजबूत और निरोग बने रहते हैं। योरोप अमेरिका के निवासियों के शरीर कितने स्वस्थ एवं सुदृढ़ होते हैं। हमारी तरह वे भाग्य का रोना नहीं रोते वरन् आहार-विहार के नियमों का सख्ती के साथ पालन करते हैं बुद्धि और विवेक का उपयोग निरोगता के लिए करते हैं, जिससे वे न तो बहुत जल्द बीमार पड़ते हैं, न दुर्बल होते हैं और न अल्पायु में मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं।

यह सब बातें अचरज की नहीं स्वाभाविक हैं। रोज ही आँखों के सामने इस प्रकार की घटनायें घटित होती रहती हैं संस्कृत में एक उक्ति है जिसका अर्थ है, “दैव भी दुर्बलों के लिए घातक सिद्ध होता है।” जितना बल है, जीवन है, प्राण है उसके उतने ही सहायक और प्रशंसक हैं। जब इनमें कमी आरंभ हुई कि अपने बिराने बनने लगते हैं और मित्र, शत्रु का रूप धारण करने लगते हैं। दुर्बलता को देखकर अकिंचन जीव भी आक्रमण करने और आधिपत्य जमाने की चेष्टा करते हैं। रणक्षेत्र में घायल और अर्धमूर्त हुए सैनिकों की आँखें कौए निकाल ले जाते हैं और सियार उनका पेट चीर कर आँतें खींचते फिरते हैं। यदि वह सैनिक इस दशा में न होता, स्वस्थ और जीवित होता तो इन कौए और सियारों की हिम्मत पास आने की भी न पड़ती वरन् उससे डर कर अपने प्राण बचाने के लिए भागते फिरते। जीवित मनुष्य जिन चींटियों को पैरों से कुचलता रहता है मृत होने पर वे ही चींटियाँ उस शरीर को नोंच-नोंच कर खाने लगती हैं। गुलाब-सा सुँदर शरीर वृद्ध या रोगी होने पर कुरूप एवं घृणास्पद बन जाता है।

संसार में अनेकों सुँदर दृश्य, पदार्थ मौजूद हैं पर यदि अपनी आँखें जाती रहें दिखाई न पड़े तो सृष्टि के सभी पदार्थ अदृश्य हो जायेंगे, सर्वत्र अंधकार ही छाया दीखेगा। दृश्य पदार्थों की सारी सुँदरता नष्ट हो जायेगी।

जिस वेश्या पर यौवनकाल में प्रेमीजन चील-कौओं की तरह मँडराते रहते थे वृद्धा होने पर उसके पास कोई दुःख दर्द की भी सुध लेने नहीं जाता। माता से जब तक बालक दूध तथा जीवन धारण करने की सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए उस पर निर्भर रहता है तब तक उससे अत्यधिक प्रेम करता है। माता जरा-सी देर के लिए भी बच्चे को छोड़कर कहीं चली जाय तो वह रोने लगता है। उसी की गोदी में चिपके रहने की इच्छा करता है। पर जब वही माता बूढ़ी हो जाती है, जवान बच्चे के लिए कुछ लाभदायक नहीं रहती तब बेटे का व्यवहार बदल जाता है। वह उपेक्षा ही नहीं करता तिरस्कृत भी करने लगता है।

भोगवाद की बढ़ती अतृप्त लालसा ने जन-मानस को विश्रृंखल बना दिया है। विकसित एवं विकासशील देशों में आये दिन होने वाली आत्महत्याओं और विभिन्न अपराधों में वृद्धि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आत्महत्या में अमेरिका व कनाडा का पहला स्थान है जबकि जापान दूसरे नंबर पर है। विश्लेषण करने वाले कई प्रकार से इसका विवेचन कर सकते हैं किंतु यह सुनिश्चित है कि भोगवादी जीवन अध्यात्मवाद से परे होने के कारण कई प्रकार के संत्रास, विक्षोभ, तनाव एवं कष्ट सभी के लिए लाया है। आत्महत्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं किंतु विशेष कारणों में-निराशा, पारिवारिक कलह, आर्थिक कठिनाई, शराब तथा अनीश्वरवाद की गणना की जाती है।

कहना न होगा कि यह सब कारण भौतिक भोगवाद की ही देन हैं। इतने कारोबारी तथा शक्ति संपन्न देश में निराशा का क्या कारण? क्या कारण है कि इन्हीं देशों में “आत्महत्या करने के एक सौ पचास उपाय” नामक “फाइनल एक्जिट” पुस्तक सर्वाधिक बिक्री वाली पुस्तक है। स्पष्ट है कि भोगवाद का अंत निराशा में ही होता है। भोगवादी शीघ्र ही मिथ्या एवं नश्वर सुखों में अपनी सारी शक्तियाँ नष्ट कर डाला करते हैं, जिससे अकाल ही में खोखले होकर निर्जीव हो जाते हैं। ऐसी दशा में न तो उनके लिए किसी वस्तु में रस रहता है और न जीवन में अभिरुचि। स्वाभाविक है उन्हें एक ऐसी भयानक निराशा आ घेरे जिसके बीच जी सकना मृत्यु से भी कष्टकर हो जाये। पर मुसीबत यह कि उनके आस-पास का भोगपूर्ण वातावरण उन्हें अधिकाधिक ईर्ष्यालु, चिंतित तथा उपेक्षित बनाकर जीने योग्य ही नहीं रखता और वे अनीश्वरवादी होने से, आत्मा-परमात्मा को भूले हुए कोई आधार न पाकर आत्महत्या के जघन्य पाप का ही सहारा लेते हैं।

निश्चित ही अब सभी को समझ में आ रहा है कि भोगवाद-पूँजीवाद व साम्यवाद की मृगमरीचिका के टूटने के बाद अब अध्यात्मवाद ही एक मात्र मार्ग रह गया है जो जन-जन के मनों को शांति दे सकता है। अध्यात्मवाद जीवन जीना सिखाती है। भोग करते हुए कैसे त्याग वाला जीवन जियें इसके सूत्र हमें देता है। अच्छा हो हम समय रहते सँभलें, पाश्चात्य सभ्यता के आक्रमण से स्वयं को बचायें व अपनी संस्कृति के मूल तत्व अध्यात्म को जीवंत जाग्रत बनाए रखें। इसी में हमारा अस्तित्व है तथा यही मार्ग हमें देवत्व की ओर ले जायेगा।


धर्म-श्रद्धा विवेक सम्मत ही वरेण्य

बाजार से कोई वस्तु खरीदते समय खरीददार उसे खूब उलट-पलट कर ठोक-बजाकर संतुष्ट होने के बाद खरीदता है। विवाह संबंध स्थिर किये जाते समय लड़के के माता-पिता लड़की का कुल, गोत्र देखने से लगाकर उसका रंग-रूप, गृह-प्रबन्ध कौशल, शिक्षा-दीक्षा और आधुनिकता तक को देखते हैं। लड़की के माता-पिता भी लड़के के गुण, खानदान व योग्यता को आँके बिना नहीं रहते। जीवन के हर व्यवहार में किसी वस्तु को उसके गुणों के आधार पर ही स्वीकार किया जाता है। पहले उसकी परीक्षा ली जाती है।

सामान्य जीवन व्यवहार के क्षेत्र में भी जब किसी व्यक्ति, वस्तु या संबंधों को स्वीकार करने के लिए उसके गुणों को देख परख कर देखा जाता है। किंतु देखने में यह आता है कि जीवन को सफल व सार्थक बनाने वाले पथ-धर्म को अधिकांश व्यक्ति यों ही अपना लिया करते हैं। उसको वे प्रायः किसी कसौटी पर नहीं कसते। उसकी परीक्षा नहीं लेते-उसके गुणों की ओर ध्यान नहीं देते। निर्जीव परंपरा की चिह्न पूजा की तरह धर्म श्रद्धा का भी उपयोग हो रहा है। यदि उसे देखने-परखने का प्रयास किया जाता रहे तो उसके उपयोगी तत्वों को पुनर्जीवन और अनुपयोगी बाह्योपचारों का परित्याग परिष्कार भी संभव हो सके।

आज धर्म श्रद्धा, धर्मजीवियों और धर्म व्यवसायियों द्वारा लूटी भर जा रही है। धर्म श्रद्धा सामाजिक पुनरुत्थान का नहीं बंधन का कारण इसीलिए बनती जा रही है कि लोगों ने धर्म को देख परख कर स्वीकारना छोड़ दिया है।

धार्मिक हो जाना ही पर्याप्त नहीं है, धर्म के साथ श्रद्धा-भावना जोड़ लेना ही पर्याप्त नहीं है। उसके साथ ही यह देखना भी परमावश्यक है कि वह धर्म, देश, समाज और विश्व के मंगल का पथ और उसमें हमारी उपयुक्त भूमिका प्रस्तुत करता है या नहीं। उसकी उपयोगिता का ह्रास उसे विकृत करके तो स्वार्थीजनों ने नहीं कर दिया?

किसी भी धर्म की सभी बातों को इसलिए नहीं मान लिया जा सकता है कि वह सबसे पुराना है। यह धर्म की कोई उपयुक्त और युक्तियुक्त कसौटी नहीं है। पुराना होना प्रामाणिकता और पात्रता की कसौटी नहीं हो सकता। जो पुराना है वह सच्चा है-ऐसा मान लेना उचित नहीं। कई पुराने भवनों को गिरा देना पड़ता है क्योंकि अब वे आश्रय देने के स्थान पर कभी भी ढह कर प्राणों का भी संकट उपस्थित कर सकते हैं। पुराने वस्त्रों को इसी तरह त्याग देना पड़ता है क्योंकि वे अब शरीर की आतप-शीत से रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं। नयी से नयी बात को यदि धर्म के सिद्धाँतों में इसलिए स्थान नहीं दिया जाय कि वह पुरानी नहीं है तो उस दकियानूसीपन को धर्म की कसौटी कैसे कहा जा सकता है? नये से नया प्रवर्तन यदि तर्क की कसौटी पर खरा उतरता है तो उसके लिए धर्म के द्वार खुले होने चाहिए। यदि उसके लिए धर्म प्रसाद के द्वार नहीं खुलते तो वह कसौटी पर खरा नहीं उतरता। वह समय के साथ बदलना चाहता है।

किसी भी धर्म की सब बातों को इसलिए मान लेना भी कि वह सबसे नया है यह भी कोई सही कसौटी नहीं होती। हो सकता है काल की परीक्षा में वह खरा न उतरे। हो सकता है उसमें पुरातन उपयोगी और आवश्यक तत्वों को सम्मिलित ही नहीं किया गया हो।

यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि मनुष्य कोई धर्म का हो सकता है तो वह एक मात्र मानव-धर्म है। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि धर्मों में वही मानव धर्म आंशिक रूपों में विद्यमान है। उनमें निहित शाश्वत मानवीय सिद्धाँत ही सनातन है। उनके स्वरूप का भी पूर्ण और चिंतन नहीं हो सकता। वह तो समय के साथ परिवर्तन की अपेक्षा करता है। धर्म की कसौटी की उपरोक्त दो बातें स्वामी रामतीर्थ ने बतायी हैं। स्वामी जी का यहाँ धर्म से अभिप्राय मानव धर्म ही है।

धर्म की जो साधारण व्याख्या की गयी है, वह व्याख्या है-”धारणस्य धर्म विज्ञातित” धारणा से धर्म है। यानि जिस चीज के कारण, जिस शक्ति के कारण, जिस व्यवस्था के कारण मानवता टिके वह धर्म है, मानव का।

आज धर्म शब्द के कई जगह अर्थ के अनर्थ भी हो गये हैं। बहुत बार तो धर्म के अंतर्गत वे चीजें भी लागू कर दी गयी हैं जो धर्म के अंतर्गत नहीं आतीं। धर्म एक व्यापक शब्द होते हुए भी जो उसकी छोटी-छोटी चीजें हैं, छोटे-छोटे अंग हैं, उन्हीं को लोग धर्म समझने लगे हैं। मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर में जाना धर्म का एक अंग है पर यही धर्म है ऐसी बात नहीं।

धर्म को कसौटी पर कसने का उद्देश्य यही है कि धर्म की आत्मा-”उसके शाश्वत सिद्धाँत और उसके कलेवर व्यावहारिक स्वरूप का सच्चा सम्मिलन हो सके। किसी एक पक्ष को उपेक्षित नहीं रहने दिया जाय। ऐसा होने पर ही हम धर्म श्रद्धा का सच्चा लाभ उठा सकेंगे और उसको सार्थक भी कर सकेंगे।”

स्वामी रामतीर्थ ने कहा है-”किसी को इस आधार पर मत मान लो कि मानव समाज का बहुत बड़ा वर्ग उसमें विश्वास करता दिखता है, क्योंकि मानव समाज का बहुत बड़ा हिस्सा तो दरअसल शैतान के सिद्धाँत में विश्वास रखता है, अज्ञान के धर्म में विश्वास करता है। एक जमाना था जब मानव समाज का बहुत बड़ा हिस्सा गुलामी में विश्वास करता था, मगर यह तो इसका प्रमाण नहीं कि गुलामी की प्रथा उचित थी।”

वेदाँत के प्रकाण्ड पण्डित और धर्म तत्व के ज्ञाता स्वामी जी का यह कथन इस बात की ओर संकेत है कि प्रचलित धर्म के व्यावहारिक स्वरूप में समय-समय पर जो सुधार होने चाहिए वे तभी संभव हो सकेंगे जबकि व्यक्ति भीड़ के साथ चलने की वृत्ति छोड़कर विवेक को महत्व दें। बहुसंख्यक व्यक्ति तो उसी पथ पर चलते हैं जो प्रचलित किंतु समय के साथ हैं उसमें परिवर्तन तो विवेकीजन ही कर सकते हैं। अतः धर्म की उन सब बातों को इस लिए ही स्वीकार नहीं कर लिया जाय कि उसे बहुसंख्यक लोग मानते हैं।

ठीक इसके विपरीत इसलिए भी नहीं मान लिया जा सकता कि थोड़े से लोग उसे मानते हैं। कई बार वे मुट्ठी भर अल्प संख्यक जिन्होंने कोई धर्म स्वीकार कर लिया है, अज्ञानग्रस्त और गुमराह आदमी होते हैं।

किसी धर्म को किसी महान स्वामी तपस्वी ने चलाया है इसलिए यह आवश्यक नहीं कि वह धर्म समग्र पूर्ण हो। देखने में आता है कि सर्वस्व त्यागी-तपस्वी भी कठमुल्ला हो सकते हैं। त्यागी और तपस्वी होना ही धर्म स्थापना का उपयुक्त पात्रत्व नहीं होता। ऐसे कठमुल्लाओं द्वारा चलाया गया धर्म-धर्म न होकर अधर्म के पथ का पोषक भी हो सकता है।

अत्यधिक उच्च चरित्र वाले व्यक्ति ने कोई धर्म चलाया है इसलिए उसे मान लेना चाहिए। यह भी धर्म की कोई युक्तियुक्त कसौटी नहीं हो सकती। बहुत शानदार चरित्र वाले व्यक्ति भी कई बार सत्य का सही निरूपण करने में असमर्थ रहे हैं। किसी की पाचन शक्ति तेज है तो इसका यह अर्थ नहीं कि उसे पाचन क्रिया का पूरा-पूरा ज्ञान होगा। हो सकता है उसे पाचन क्रिया का क, ख, ग भी ज्ञात नहीं हो। ऐसा भी तो होता है कि कई सुँदरतम कलाकृतियाँ ऐसे लोगों न रची हैं जो स्वयं अत्यंत कुरूप हैं। कुरूप व्यक्ति भी सुँदर सत्यों का प्रचार कर सकते हैं। सुकरात ऐसे ही व्यक्ति थे। सुँदर व्यक्ति सुँदरता का ही सृजन करे, चरित्रवान व्यक्ति चरित्रवान बनने का ही पथ प्रदर्शन करे यह आवश्यक नहीं। अतः उच्च चरित्र के व्यक्ति द्वारा स्थापित धर्म की सभी बातें मान लेने योग्य हैं, यह भी धर्म की कसौटी नहीं बनती।

किसी बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा चलाया गया धर्म आँख मूँद कर मान लिया जाना भी कोई अच्छी बात नहीं है। प्रसिद्धि के साथ सत्य का जुड़ा होना भी आवश्यक नहीं है। सर आइजक न्यूटन बहुत प्रसिद्ध आदमी थे फिर भी प्रकाश के उत्सर्जन का उनका सिद्धाँत अब गलत प्रमाणित हो गया है।

धर्म के नाम पर प्रचलित सब चीजें धर्म ही हों यह आवश्यक नहीं है। हो सकता है कि धर्म के नाम पर जो कुछ प्रथा-परंपराएँ, पूजा-उपासना पद्धतियाँ, साधनायें व सिद्धाँत प्रचलित हैं वे धर्म से दूर का भी रिश्ता न रखते हों। हो सकता है वे विरोधी भी हों। पर वे प्रचलन में आ गई हैं इसलिये धर्म बन गयीं हैं। ऐसी स्थिति में धर्म की कोई उपयोगिता नहीं रह जायेगी।

धर्म में किसी भी चीज को उसकी विशेषता के आधार पर, गुण के आधार पर, उपयोगिता के आधार पर, स्वीकार किया जाना चाहिए। स्वयं उसकी परीक्षा करके देखना चाहिए ठोंक बजाकर देखा जाना चाहिए तब कहीं उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। स्व विवेक की कसौटी पर कसे बिना यह मानकर कि इसे मानव समाज का बहुत बड़ा हिस्सा मानता है। इसे किसी त्यागी तपस्वी ने चलाया है। यह बहुत लंबे काल से प्रचलित है अथवा किसी प्रसिद्ध आदमी ने चलाया है। धर्म की किसी भी बात को मान लेना अंधेरे में लाठी चला लेना जैसे काम हैं। इसमें न व्यक्ति का हित है न समाज का।

धर्म के नाम पर आजकल कुछ ऐसी ही बातों पर विशेष बल दिया जा रहा है उन्हें माना जा रहा है जो धर्म का अंग होते हुये भी समग्र घड़ी नहीं है। केवल उन्हें ही धर्म मानकर चला जाता रहे तो उससे कुछ अधिकांश लाभ होने वाला नहीं है। सामान्य जीवन व्यवहार में बरती जाने वाली सावधानी धर्म के संबंध में भी रखी जानी आवश्यक है। धर्म, श्रद्धा होना चाहिए पर उसके साथ विवेक भी जोड़ा जाना चाहिए उसकी सभी बातों को कसौटी पर कस कर ही स्वीकार करना चाहिए। यदि ऐसा होता रहा तो धर्म का हम पूरा-पूरा लाभ उठा सकेंगे। समाज में स्वर्ग का सा वातावरण तभी उपजेगा।


साधना का मूल है-जाग्रत भाव संवेदना

साधना-उपासना में भावना का होना निताँत आवश्यक माना गया है, अन्यथा पूर्ण लाभ की आशा-अपेक्षा नहीं की जा सकती। भावना को शास्त्रकारों ने पारसमणि कहा है। पारस-पत्थर लोहे को सोना बना देता है, भावना भी मनुष्य को तदनुरूप ही ढाल देती है। कहा भी गया है-”यादृषी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृषी।” अर्थात् जिसकी जैसी भावना होती है उसे वैसी ही सिद्धि मिला करती है। भावना की महिमा-महत्ता का प्रतिपादन करते हुए ‘रुद्रयामल’ ग्रंथ में कहा है-”भावेन लभते सर्व भावेन देव दर्शनम्। भावेन परमं ज्ञानं तस्माह्णा बावलम्बनम्॥” अर्थात् भाव से ही सब कुछ प्राप्त होता है, भावना की दृढ़ता से ही देव-दर्शन होते हैं, भावना से ही ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए भावना का अवलंबन अवश्य लेना चाहिए। कारण कि-”न काष्ठे विद्यते देवो न पाषाणे न मृण्मयो। भावेहि विद्यते देवस्तस्माद्- भावस्तुकारणम्॥” तात्पर्य यह कि काष्ठ, पाषाण और मिट्टी की मूर्तियों में देवता नहीं होते, वे तो मानसिक भावों में ही रहते हैं और वही उनका कारण है।

अध्यात्मवेत्ता मनीषियों के अनुसार भाव मन का धर्म है। मन में ही इसकी उत्पत्ति होती है और मन में ही इसका लय होता है। अतः यह शक्तियों का उदय होता है। इसलिए जो जैसी भावना करता है, वह वैसी ही शक्तियों को प्राप्त करता है, वैसा ही बन जाता है। स्थूल की गति का कारण सूक्ष्म है। शरीर स्थूल है और भावनायें सूक्ष्म। जैसी भावना-विचारणा होगी, वैसे ही कार्य में शरीर प्रवृत्त होगा। भावना का निर्मल, पवित्र, प्रबल और परमार्थमय होना ही आध्यात्मिक क्षेत्र में ऊँचा उठने का अथवा स्थूल से सूक्ष्म की ओर गति करने का चिन्ह है। व्यक्तिगत रूप में ही नहीं, वरन् हर क्षेत्र, हर कार्य में प्रचण्ड और पवित्र भावना सफलता लाने में समर्थ होती है। भावना ही वह प्रमुख आधार है जो प्रसुप्त पड़ी आँतरिक शक्तियों को जगा देती है। उनमें गति उत्पन्न करती है। भावना से साधना-उपासना के फलीभूत होने का तात्पर्य शक्तियों का गतिमान होना ही है।

अनुसंधानकर्ता विज्ञानवेत्ताओं ने भी भावना की महत्ता को स्वीकार किया है और उसे आधुनिक रूप देकर अनेकों प्रकार के भौतिक प्रयोगों में सफलता प्राप्त की है। पाश्चात्य मनः चिकित्सकों ने प्रार्थना में इसका उपयोग किया है और आशाजनक लाभ उठाये हैं। इस संबंध में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. अलेक्सिस कैरेल ने अपनी पुस्तक “मैन दी अननोन” में लिखा है-’भावना से कुछ ही क्षणों में मुँह के घाव, शरीर के अन्य घाव, कैंसर, मूत्राशय के रोग और टी॰ बी॰ आदि के रोगियों के यह रोग पूर्णतः मिटते हुए देखे गये हैं। कोढ़ एवं अन्यान्य त्वचा रोग से पीड़ित लोग स्वस्थ हुए हैं। कनाडा के सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. सी॰ अलबर्ट ई॰ विल्फ भावना के माध्यम से ही चिकित्सा करते थे।

“थ्ज्ञियालाजिया जर्मनकी” पुस्तक के अनुसार विश्वास रखकर ईश्वर से भावनापूर्वक प्रार्थना करने पर बड़ी से बड़ी तथा भयंकर बीमारी से भी मनुष्य छूट जाता है।

भावना से ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त करने, आरोग्य एवं दीर्घायु प्राप्त करने तथा अन्य प्रकार के लाभ उठाने की इस वैज्ञानिक पद्धति को भारतीय ऋषि-मनीषियों ने बहुत पहले खोज लिया था जिसकी पुष्टि आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी कर रहे हैं। उनका मत है कि अभाव की पूर्ति के लिए गिड़गिड़ाना उचित नहीं है। उससे आत्महीनता की भावना उत्पन्न होती है और आशा जनक लाभ भी नहीं होता है। भावना के समय अशुभ के स्थान पर शुभ के, रोग के स्थान पर निरोगता के, अभाव के स्थान पर वैभव और ऐश्वर्य के भाव संकेत मन को देने चाहिए। जिस इष्ट की पूर्ति करने की इच्छा है, उसे अपने भावना नेत्रों से पूरा होते देखना चाहिए। यह भाव-संकेत जितना तीव्र और सुदृढ़ विश्वास पर आधारित होगा, सफलता उतनी ही शीघ्रता से प्राप्त होगी।

इस संदर्भ में ख्याति लब्ध विद्वान अलबर्टविल्फ ने अपनी कृति- ‘‘लेसन्स इन लिविंग” में लिखा है-”परमात्मा से हमें यह कामना नहीं करनी चाहिए कि वह हमें स्वास्थ्य प्रदान करें, वरन् उसका ढंग यह होना चाहिए कि कल के लिए उन्होंने आज मुझे पूर्ण स्वस्थ कर दिया। श्री रिवेका वीयर्ड ने इस विषय का स्पष्ट प्रतिपादन करते हुए अपनी पुस्तक “एवरी मैंस सर्च” में कहा है कि-”शक्ति की धारा को विपरीत शुभ दिशा में प्रवाहित करने के लिए आवश्यक है कि जिस परिणाम को हम उपस्थित देखना चाहते हैं, उस परिस्थिति को हम अपने अंतराल के भाव संस्थान में निर्मित करें और अपनी चिंता के विपरीत भाव का चिंतन करें।” उदाहरण के लिए धन के अभाव को दूर करने के लिए यह नहीं कहना चाहिए कि हे ईश्वर! मैं अत्यंत संकट में हूँ, उसे दूर करो, वरन् मानस नेत्रों से अपने प्रभु के सर्व समर्थ, शक्तिशाली और महान ऐश्वर्यों के रूप को निहारना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि उनके उत्तराधिकारी और ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते इन ऐश्वर्यों पर हमारा स्वाभाविक अधिकार है अतः इस अधिकार को मान्यता देते हुए भगवान स्वयं हमारे रिक्त स्थान की-अभाव की पूर्ति कर रहे हैं, हमारे भंडारों को भर रहे हैं और हम भी ऐश्वर्यशाली बन रहे हैं। इस शुभ भावना के शक्ति का प्रवाह हमारी ओर परिवर्तित होगा, यह सुनिश्चित है।

वस्तुतः भावना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसका सीधा प्रभाव हमारे अचेतन मन पर पड़ता है। अचेतन मन-जिसे गुप्त मन भी कहते हैं, ईश्वर प्रदत्त शक्ति का भाण्डागार है, दिव्य क्षमताओं का वह मूल स्रोत है। ईश्वर से उत्तराधिकार में मिली समस्त शक्तियाँ वही सोयी पड़ी हैं। उन्हें प्राप्त करने के लिए ही विविध प्रकार की यौगिक साधनायें, उपासनायें एवं तपश्चर्या का आश्रय लेना पड़ता है। इनमें भावनाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यही वह सूक्ष्म उपाय-उपचार है जिसकी पहुँच गुप्त मन तक होती है सही भावनायें हमारे गुप्त मन का नव निर्माण करती हैं और हमारे चारों ओर का संसार वैसा ही बनता चला जाता है। भाव प्रवणता से अचेतन मन परिष्कृत होता जाता है और प्रसुप्त पड़ी अतीन्द्रिय क्षमतायें जाग्रत होने लगती हैं। अंदर से बाहर की ओर एक आध्यात्मिक प्रवाह चलने लगता है, परिणाम स्वरूप शक्तियों का नवसृजन होता है, बिखरी शक्तियाँ एकाग्र होकर दिव्यताओं एवं महानताओं का नवनिर्माण करती हैं जिनसे इच्छानुसार भौतिक सिद्धियों एवं आध्यात्मिक विभूतियों के लाभ प्राप्त होते हैं।

इस संबंध में महर्षि वशिष्ठ का मत है कि-”बीज की जाति का ही पौधा उगता है और संकल्पों की जाति की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं। आत्मा जैसी-जैसी भावना करती है, वह शीघ्र वैसी ही हो जाती है और उसी प्रकार की शक्ति से पूर्ण हो जाती है।” इसे प्रत्यक्ष जीवन में सर्वत्र होते हुए देखा जा सकता है कि जिसकी भावना भीतर से भलाई, सच्चाई, प्रेम, सहानुभूति, करुणाशील, वात्सल्य और सद्भावों से ओत−प्रोत होती है वह सदा सुखी रहता है, क्योंकि प्रतिक्रिया से उसमें दिव्य गुणों का बाहुल्य हो जाता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति सदा स्वार्थ, ईर्ष्या, धोखेबाजी, छल-छद्म, कपट, काम-क्रोध, अहंकार, दूसरों को हानि पहुँचाने का भाव रखता है, उसमें यह दुर्गुण दिनों दिन बढ़ते जाते हैं और पाप अत्याचार की ओर उसकी प्रवृत्ति भी बढ़ती जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप वह नाना प्रकार के कष्ट उठाता है। सुख-दुख, उन्नति-अवनति, बंधन-मोक्ष हमारी भावनाओं पर आधारित हैं। जा अपने को अयोग्य, असमर्थ, अभागा व अशक्त मानता है, वह वैसा ही बनता जाता है। इसके विपरीत जो अपने को योग्य, समर्थ, भाग्यवान और शक्तिवान समझता है, वह भी वैसा ही बनता जाता है। अपने आपको नीच या महान, सुखी या दुखी, साधारण या असाधारण, पवित्र या अपवित्र, सदाचारी या दुराचारी, पापी या पुण्यात्मा, चतुर या मूर्ख, निर्बल या सबल, भाग्यहीन या भाग्यवान बनाना भावना के ही खेल हैं, जो जैसी भावना करता है वह वैसा ही बन जाता है।

महात्मा गाँधी ने कहा है-”अपने को निर्बल समझने वाला ही निर्बल है।” जीवन रेखा का लिखना भावना के अधिकार में है। भाग्य को बनाना भावना शक्ति का ही खेल है। वह इसको जिधर चाहे मोड़-मरोड़ ले जाती है। होमियोपैथी के जन्मदाता डॉ. हैनीमेन ने अपने ग्रंथ “आर्गेनन ऑफ मेडिसिन” में लिखा है कि भावनाओं से रोग उत्पन्न भी किये जा सकते हैं और अच्छे भी किये जा सकते हैं। यदि किसी को यह विश्वास दिलाया जा सके कि वह पूर्णतः स्वस्थ एवं सक्षम है तो वह थोड़े ही दिनों में सचमुच स्वस्थ-समर्थ बन जायेगा। पाश्चात्य मनीषी चार्ल्स डिक्सन के शब्दों में “जिस मनुष्य की जैसी आँतरिक भावनायें होंगी, उसकी बाह्य रूपरेखा वैसी ही बन जायेगी।”

भावना की शक्ति अपरिमित एवं महान है। इस भावनाशक्ति ने ही मीरा को दिये हुए विष को अमृत में बदल दिया था। उसी भावनाशक्ति से धन्ना भक्त ने पत्थर को भगवान बनाया था। यह भावना की शक्ति ही थी कि रामकृष्ण परमहंस को माँ काली द्वारा अपने हाथों प्रसाद खिलाते हुए देखा गया था। सुदामा के कच्चे चावलों एवं शबरी के जूठे बेरों में भावना का समावेश होने से उनमें इतनी मिठास आ गयी थी भगवान ने उनको बड़े चाव से खाया था। महर्षि रमण मौन रहते हुए भी अपनी भावतरंगों से संपर्क में आने वाले हर किसी को आप्लावित कर देते थे। भावना स्वयं में एक बड़ी शक्ति है। संत, महात्मा, ऋषि, देवदूत इसी के पुँज होते हैं। उनके हृदय के अंतराल से निकलने वाली प्रचंड भाव तरंगें केवल निकटवर्ती व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहतीं, वरन् परमात्मचेतना से ओत−प्रोत व सृष्टि के समस्त प्राणि समुदाय को चमत्कारिक रूप से प्रभावित करती है। शक्ति की ज्वालायें हर किसी के अंदर धधक रही हैं। ऊपर जमी, कषाय-कल्मष रूपी भस्म को दूर करने से हर कोई इसका अनुभव कर सकता है। आवश्यकता केवल भावनात्मक जागरण की है। साधना-उपासना की सफलता का मूल आधार भावना ही है। इसके अभाव में सारे कर्मकाँड भारभूत ही सिद्ध होते हैं।


जिंदा अध्यात्मवाद ही रहने वाला है

कर्म की श्रेष्ठता में चिंतन की उत्कृष्टता आधारभूत मानी गई है। आधार यदि कमजोर हो तो मजबूत लगने वाली संरचना भी देखते-देखते धराशायी हो जाती है। इस दृष्टि से जीवन में क्रिया-कलाप की महत्ता और उपयोगिता तो है, पर उसकी केन्द्रीय धुरी में क्रियाशील चिंतन की उपेक्षा नहीं की जा सकती। चिंतन का अच्छा और बुरा प्रवाह ही क्रिया और व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।

क्रिया का विश्लेषण किया जाय, तो स्पष्ट होगा कि इसका स्वरूप वृक्ष के सदृश्य है, जिसकी जड़ें चिंतन क्षेत्र में गहरी दबी होने के कारण अगोचर होती हैं। दीख पड़ने वाला कार्य तने और टहनियों जैसा है। इसके परिणाम ही वह फल-फूल हैं, जो उद्देश्यों का स्वरूप अभिव्यक्त करते हैं।

इन दिनों मानवी मूल्यों में जो गुणात्मक ह्रास में अभिवृद्धि दिखाई पड़ रही है, उसके कारण समाज विज्ञानियों में सर्वत्र बेचैनी बढ़ी है। उनके असमंजस का कारण यह है कि सुरसा के मुँह की तरह फैलने वाली इस अभिवृद्धि को रोका और फिर उलटा कैसे जाय? ताकि ध्वंस प्रयोजनों में लगने वाली महत्वपूर्ण शक्ति का सवाल होता, तो किसी कदर राहत महसूस की जा सकती थी, पर जब साधन, संपदा, व्यवस्था सब कुछ चुकने, लड़खड़ाने और गड़बड़ाने लगे, तो इसे संघातिक संकट ही कहना चाहिए। इस संकट के मूल में चिंतन ही निमित्त कारण होता है।

पितिरम ए॰ सोरोकिन अपने ग्रंथ “डाउनफाल ऑफ रोमन एम्पायर” में रोमन साम्राज्य के पतन के अनेक कारणों से सबसे महत्वपूर्ण कारण का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि तब रोमनों में चारित्रिक भ्रष्टाचार इस कदर इतना बढ़ गया था, जिसे रोक पाने में तत्कालीन सम्राट जूलियस सीजर भी समर्थ न हो सके। उलटे उन्हें और अधिक छूट देकर भ्रष्टता को बढ़ाने में उनके सहायक ही हुए। परिणाम यह हुआ कि उन्नति के शिखर पर पहुँचा साम्राज्य भूलुण्ठित होकर धूल चाटने लगा।

विश्व की अगणित दूसरी सभ्यताओं के विनाश के पीछे भी नीति संबंधी गलत निर्धारण ही मूलभूत कारण रहे। वही गलतियाँ पुनः दुहरायी जा रही हैं। नीति-नियम का मूल स्रोत भाव-संस्थान है। जिसे संवेदना की मूल केन्द्रीय धुरी माना जाता है। आजकल यही महत्वपूर्ण तंत्र विकृत हो गया है। विकार हावी होने के कारण व्यक्ति स्वयं को केन्द्र में रख कर ही किसी प्रकार का निर्धारण करता है। जिसमें उसे अधिकाधिक लाभ की संभावना नजर आती है, उसके अनैतिक और स्वार्थपूर्ण होने पर भी समाज और संसार की अपार हानि होने की संभाव्यता दीखने पर भी उनकी उपेक्षा करते हुए उसे अपना लिया जाता है। फलतः जो गतिविधियाँ नहीं होनी चाहिए, जिनके होने में नैतिकता का प्रतिबंध लगना चाहिए, वह सब सामान्य और सार्वजनिक बन जाती हैं। यही कारण है कि इन दिनों भ्रष्टाचार, दुराचार, अत्याचार, पापाचार जैसे दुरित द्रुत गति से बढ़े हैं और सेवा, सहायता, उदारता, करुणा, दया, ममता जैसे देवोपम गुणों का ह्रास हुआ है।

संवेदनाओं का उद्गम स्थल अंतःकरण है। भावनाएँ वहीं उपजती हैं। भावना से विचारणा और विचारणा से क्रिया जन्म लेती है।

क्रिया यदि निम्नस्तरीय हो, तो यह अंतराल की निकृष्टता का स्पष्ट प्रमाण है। अंतराल यदि उदात्त तत्वों से बना हो तो वह अपना प्रमाण-परिचय दिये बिना न रहेगा। उससे भावना, विचारणा और क्रिया सभी प्रभावित होंगी। उनमें उत्कृष्टता का समावेश होगा यह सभी परस्पर सुसंबद्ध है। इनमें से एक के भी लड़खड़ाने से समस्त श्रृंखला प्रभावित होती है और पूरा तंत्र गड़बड़ा जाता है, पर भाव संस्थान का मूल यदि समर्थ-सशक्त हो, तो ऐसी स्थिति उपस्थित नहीं होती। इसीलिए विवेकवान पुरुष अंतराल को समुन्नत बनाने पर विशेष ध्यान देते हैं। इसके परिष्कार से दृष्टिकोण में उच्चस्तरीय आदर्शवादिता का समावेश स्वतः हो जाता है, जिससे क्रिया-कलाप में भी उदात्तता आ जाती है।

अंतः को परिमार्जित और सुविकसित कैसे किया जाय? इसके लिए तत्ववेत्ताओं ने धर्मधारणा का जीवन में समावेश आवश्यक बताया है। नीतिमत्ता, कर्तव्यपरायणता, और ईश्वर-विश्वास-यही इसके केन्द्रीय तत्व हैं। इन्हें प्रकाराँतर से आध्यात्मिकता, धार्मिकता और आस्तिकता भी कहते हैं। यह एक दूसरे से गहन तादात्म्य रखते हैं। इनकी एक कड़ी टूटने से समूची जंजीर बिखर जाती है। वैयक्तिक जीवन में जिसे नीतिमत्ता कहा जाता है, वही सामूहिक जीवन में सामाजिक सुव्यवस्था बन जाती है। नीति और अनीति क्या है? इसे स्पष्ट करते हुए लेस्ली ब्राउन अपनी पुस्तक “इथिकल साइंस ऑफ सोल” में लिखते हैं कि किसी व्यक्ति के कार्य के स्वरूप का बाह्य अवलोकन करके उसे नीति-अनीति की संज्ञा नहीं दी जा सकती। कार्य के पीछे कर्ता की मंशा और भावना क्या थी, इसे भली-भाँति समझने के उपराँत ही किसी कार्य को नैतिक या अनैतिक कहा जा सकता है। कई बार भावना के उच्चस्तरीय रहने पर भी परिणाम ऐसे प्राप्त होते हैं, जिन्हें देखकर यह अनुमान लगाना कठिन हो जाता है कि उक्त क्रिया के मूल में व्यक्ति की स्वार्थपूर्ण भावना नहीं थी। इसी प्रकार अनेक बार कार्य को देखकर ऐसा लगता नहीं कि करने वाले की नीयत में खोट थी। अतः कार्य की परिणति को देखकर अंदर की आस्था का आकलन करना उचित नहीं। यह ठीक है कि मोटे तौर पर नीति-अनीति को निर्धारित करने का यही एक सुगम तरीका है। इतने पर भी इसे प्रामाणिक और विश्वसनीय नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए अंतस् की उत्कृष्टता एवं निकृष्टता की जानकारी आवश्यक हो जाती है। यह संभव है कि नीयत ऊँची रहने पर व्यवहार में भूल अथवा भ्रम से कोई ऐसा काम बन पड़े, जो देखने वालों को भला न लगे, तो भी वास्तविकता यथावत् बनी रहेगी। कर्ता इतने मात्र से अहंकारी अथवा उद्धत नहीं बन जाता। व्यवस्था में व्यतिक्रम होने के कारण उसे दण्डित, लाँछित किया जा सकता है, इतने पर भी उसकी उदात्तता अक्षुण्ण बनी रहेगी। व्यक्तित्व और कर्तृत्व की सही परख उसकी आस्थाओं को समझे बिना नहीं हो सकती। कर्म जो धर्म तत्व का मूल आधार है, की गति को गहन इसीलिए कहा गया है कि उसे मात्र क्रिया के आधार पर नहीं जाना जा सकता। ईमान की व्यापकता ही उसका हृदय केन्द्र है।

इसका निरीक्षण-परीक्षण और विश्लेषण आप्त वचनों और शास्त्र सूत्रों के मार्गदर्शन में किया जा सकता है, पर यह तभी शक्य है, जबकि कर्ता पूर्वाग्रहों से मुक्त हो, अन्यथा शास्त्रीय सूत्र-सिद्धाँत इस प्रकार तोड़े–मरोड़े जाने लगेंगे कि दलील की दृष्टि से चमत्कारी लगने वाला प्रतिपादन भी शास्त्रकारों के मूल मंतव्य की वास्तविकता को कुबड़ा ही बनाने वाला होगा।

विगत काल में सदियों से यही होता आया है। होना यह चाहिए था कि सत्पुरुषों अथवा सद्ग्रंथों के अनुरूप अंतस् की संरचना, भावना, क्रियाविधि और विचारणा को टाला जाता, किंतु हुआ यह कि आप्त वचनों एवं ग्रंथों की व्याख्याएँ स्वार्थपूर्ण ढंग से चित्र-विचित्र रूप में की जाने लगीं, फलतः न अपना अंतराल परिष्कृत हो सका, न लोकमानस के परिमार्जन को क्रियान्वित किया जा सका, उलटे उसे (धर्म को) “अफीम की गोली की” उपहासास्पद संज्ञा दे दी गई।

इसीलिए उपनिषद् की ऋचाएँ स्पष्ट उद्घोष करती हुई कहती हैं-”नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहूना श्रुतेन” अर्थात् परम सत्य की प्राप्ति न बहुत भाषण देने से होती है, न बौद्धिक तार्किकता अथवा लगातार सुनते रहने से होती है। इसके लिए स्वयं की मनोभूमि का परिमार्जन आवश्यक है। साथ ही चिंतन क्षेत्र में व्यापक श्रेष्ठता के तत्वों की प्रतिष्ठापना के अभ्यास के साथ-साथ क्रिया द्वारा उसकी विस्तृत अभिव्यक्ति का गंभीर प्रयास करते रहना होगा।

धर्म का संपूर्ण तत्वदर्शन इन्हीं उच्चस्तरीय आस्थाओं के प्रति निष्ठावान रहने को प्रेरित करता है। उसकी उपयोगिता इसी में है कि वह मानवीय चिंतन और चरित्र को ऊँचा उठाये, उसे आत्म गौरव की अनुभूति के साथ-साथ सज्जनता-शालीनता के व्यवहार में उतारने का साहस प्रदान करे। आधुनिक चिंतकों ने इसके लिए भिन्न-भिन्न उपाय सुझाए हैं। नीत्से ने इस हेतु व्यक्तिवाद का दर्शन प्रस्तुत किया, तो मार्क्स ने समाजवाद की वकालत की। एक व्यक्ति को ही पूरी तरह प्रधान मानकर चलता है, तो दूसरा सामाजिक प्रमुखता को सर्वोपरि स्वीकारता है, पर देखा जाय तो उक्त दोनों ही प्रकार के दर्शन अधूरे और अव्यावहारिक हैं। व्यावहारिकता की कसौटी दोनों को समान रूप से असफल सिद्ध करती है। नीत्से के व्यक्तिवाद को प्रमुख मानकर चला जाय, तो समाज की उपेक्षा होगी और यदि मात्र समाजवाद को ध्यान में रखा गया, समान वितरण प्रणाली को तो किसी प्रकार लागू कर दिया जायेगा, पर व्यक्ति के नैतिक विकास में एक प्रकार से बाधा ही पड़ेगी और स्थिति पिंजरे में बंद रहने वाले शेरों जैसी हो जायेगी, जो कभी मुक्त हुआ, तो तमाम बंधनों को अस्वीकार देगा और अव्यवस्था ही फैलायेगा। कम्युनिस्टों की यह नीति किस प्रकार असफल सिद्ध हुई, इसे पुराने सोवियत संघ के विघटन को देखकर जाना जा सकता है।

अस्तु अध्यात्मवादी दर्शन में व्यक्ति और समाज दोनों पर समान रूप से ध्यान देना अभीष्ट माना गया है। यही एक ऐसा दर्शन है, जो वर्तमान आस्था संकट को टाल सकता है। इसमें यदि व्यक्ति में देवत्व के उदय की संभावना है, तो इस बात की भी पूरी-पूरी गुंजाइश है कि धरती पर स्वर्ग का अवतरण हो सके। व्यक्ति और समाज की आत्मा को स्पर्श करने वाले यदि इस धर्म-दर्शन को अंगीकार किया गया, तो कोई कारण नहीं कि इससे वैयक्तिक चिंतन में उत्कृष्टता और समाज में श्रेष्ठता न आ सके। व्यष्टि से ही समष्टि का निर्माण होता है। मिट्टी यदि अच्छी हो, और मूर्तिकार योग्य, तो उससे बनने वाली प्रतिमा की प्रशंसा हुए बिना नहीं रहती। मिट्टी यदि समाज का प्रतिनिधित्व करे और मूर्तिकार को समाज की इकाई माना जाय, तो दोनों के संयोग से जिस दुनिया की रचना होगी, वह प्रतिमा जैसी सुँदर और श्रेष्ठ होगी। हम भावना को परिष्कृत करें, विचारणा और क्रिया स्वयं परिमार्जित होती चलेंगी। स्वयं और समाज को सुसंस्कारी व समुन्नत बनाने का यही राजमार्ग है। इसे क्रियान्वित किया ही जाना चाहिए।


गायत्री उपासना विज्ञान की दृष्टि में

उपासना का अर्थ है-ईश्वर के आदर्शों के समीप बैठना। उपास्य, आराध्य की स्थिति से जितनी ही अधिक समीप अपनी स्थिति विनिर्मित कर ली जाये, उसके जितना अधिक अनुकूल-समतुल्य बना जाये उसकी क्षमताएँ, शक्तियां,सामर्थ्य उसी अनुपात में अपने अंदर आती और अपने चेतन व भौतिक गुणों से लाभान्वित करती चली जाती हैं। ईश-उपासना का सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार है जो सही अर्थों में संपन्न होने पर शरीर, मन, बुद्धि में आवश्यक परिवर्तन के रूप में परिलक्षित होता है।

“दि ह्यूमन सेन्सेज” नामक अपनी कृति में विख्यात वैज्ञानिक डॉ. गेल्डार्ड ने बताया है कि नक्षत्रीय गतिविधियाँ मनुष्य की मानसिक व शारीरिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। मनुष्य की कोशिकाओं में अनुकूल तत्वों को आकर्षित करने, अवशोषण कर अपने में धारण करने और इस आधार पर शरीर से टूटने वाली ऊर्जा की कमी को पूरा करने की अद्भुत सामर्थ्य है। उनके अनुसार शरीर का प्रत्येक कोष एक लघु उप स्टेशन है जो मुख्य स्टेशन-मस्तिष्क से जुड़ा रहता है। मस्तिष्क में जो भी भाव तरंगें उठती हैं उसका प्रभाव तत्काल शरीर के अणुओं-कोशिकाओं पर पड़ता है। इसी आधार पर मनुष्य आकाश की अदृश्य शक्तियों से तो प्रभावित होता ही है, मन की चुँबकीय शक्ति के द्वारा वह दूरस्थ नक्षत्र पिण्डों से शक्ति प्रवाह भी अपने अंदर आकर्षित कर धारण कर सकता है और अपनी अंतरंग क्षमताओं को विकसित कर सकता है।

प्राचीन भारतीय मनीषियों ने इन्हीं शक्ति प्रवाहों को सूक्ष्म दैवीय शक्ति के रूप में माना था और उनके गुणों की पृथकता के आधार पर उन्हें पृथक्-पृथक् देव शक्तियों की संज्ञा देकर उनकी उपासना की विधियाँ विकसित की थीं। साथ ही साथ उनके अभ्यास द्वारा अपनी क्षमताओं को विकसित कर प्रचुर भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष किया था।

प्रख्यात प्राकृतिक चिकित्साविद् डॉ. हेनरी लिंडर हर ने अपनी पुस्तक “प्रैक्टिस ऑफ नेचुरल थेरोप्युटिक्स”में उपासना की महत्ता बताते हुए लिखा है कि मानवीय मनोभावों को सर्वव्यापी सत्ता किसी देवपुरुष, अदृश्य देवदूत, सिंहपुरुष, महान सद्गुरु यहाँ तक कि लौकिक दृष्टि से किसी प्रेमी के मनोभावों से जोड़कर उनकी विचारणाओं अनुभूतियों को आत्मसात कर न केवल उनकी भावनाएँ समझने की बात स्वीकार की है अपितु यह भी माना है कि इष्ट की भौतिक परमाणु या शारीरिक अनुभूतियाँ भी उस स्थिति में विलक्षण रूप में आकर्षित होती हैं। जब यीशु मसीह क्रास पर कील से ठोके गये थे, उस समय सेन्ट कैथराइन अपने शरीर के विभिन्न स्थलों में वैसी ही पीड़ा अनुभव करती थीं। यह उपास्य से उपासक के गहरे तादात्म्य का ही परिणाम है। न केवल चेतन परमाणु अपितु जड़, पिण्ड और वह भी काल ब्रह्माण्ड की सीमा के परे इस तादात्म्य में जोड़े जा सकते हैं और भूत, भविष्य की घटनाओं की जानकारी ली जा सकती है।

गायत्री उपासना में तल्लीन साधक पर किये गये कुछ वैज्ञानिक अनुसंधान भी इन तथ्यों का आश्चर्यजनक प्रतिपादन करते हैं। उपासना की तल्लीनता के साथ कुछ शारीरिक परिवर्तन होते हैं। उपासना की अवस्था में कम आक्सीजन में भी शरीर का काम चलता है। हृदय व नाड़ियों की गति मंद पड़ने से रक्त विकार कम होते हैं। शयनकाल के बाद शरीर में जो ताजगी आती है वह उपासना काल में ही उपलब्ध होती है।

प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ में “उत्सर्जन” की क्रिया अनिवार्य है। हमारे शरीर में भी विकरण क्रिया चलती और उससे शक्ति क्षरण होता है, किंतु उपासना की अवस्था में विकीर्ण होने वाली तरंगें अपना गुण बदल देती हैं और वे शरीर के विष शोधन एवं नई संरचना में जुट जाती है। गायत्री का देवता सविता अर्थात् गायत्री उपासना के समय सूर्य के ध्यान की व्यवस्था है। उसका अर्थ है सूर्य की अदृश्य शक्तियों-किरणों को उपरोक्त वैज्ञानिक सिद्धाँतों के आधार पर शरीर में धारण करना और उसके आत्मिक व वैज्ञानिक लाभों से लाभान्वित होना। हमारी प्रगाढ़तम, उपासना हमारी मनश्चेतना को ‘सूर्य’ बना देती हैं। उस शक्ति, सामर्थ्य और अनुभूति की कल्पना की जा सके तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि गायत्री सिद्धि के क्या चमत्कार हो सकते हैं?

असंतोष, उदासी, व्यथा, तनाव, निराशा, विषाद आदि ऋणात्मक दबाव से पिट्यूटरी ग्रंथि से जो हार्मोन्स निकलते हैं उनमें एक है- एस॰ टी॰ एच॰ हार्मोन्स। यह शरीर को सीधे प्रभावित करते हैं। इनकी अधिकता से शरीर में व्यग्रता, अधीरता, बेचैनी बढ़ती है एवं आतों में जख्म हो जाता है और पाचन संबंधी अनेक रोग घेर लेते हैं। किंतु उपासना करते समय गहरे ध्यान की अवस्था में मटर के दाने जैसी ‘पिट्यूटरी’ नामक ग्रंथि से बारह प्रकार के ‘हार्मोन्स’ स्रावित होते हैं जो मिल−जुलकर शरीर को स्वस्थ संतुलित रखने हेतु सक्रिय होते हैं।

उच्च रक्तचाप नियंत्रण के लिए मुख्यतः केसरपाइन, स्मेलिन, इंडेरेल आदि औषधियाँ दी जाती हैं। इनके प्रभाव से धमनियों की दीवारों में मुलाइमी आती है और अकड़न के कारण जो अतिरिक्त दबाव पड़ रहा था वह घट जाता है। किंतु यह निदान स्थायी नहीं है। उपासना एवं ध्यान में निमग्न साधक का परीक्षण करने पर पाया गया कि रक्तचाप को नियंत्रित करने में उपासना-साधना महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न करती है।

संवेदना और भावनाओं में आने वाली उत्तेजना के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले तनाव में पिट्यूटरी तथा ऐड्रिनल ग्रंथियों द्वारा सोमोटो ट्रिफिक हार्मोन्स तथा डेसोक्साइकोर्टि कोस्टेरोन नामक हार्मोन्स निःसृत होते हैं। फलतः तनाव के कारण सरदर्द, उच्च रक्तचाप, रुमेटिक अर्थराइटिस, पेप्टिक अल्सर, कोलाइसिस गेस्ट्रिक अल्सर, हृदयरोग, तथा अन्य कितने ही विकार उत्पन्न होते हैं किंतु मानसिक जप, उपासना एवं ध्यान की अवस्था में इन रस स्रावों का बनना पूर्णतः बंद हो जाता है। जिससे साधक स्वस्थ अनुभव करता है। महिलायें स्वभावतः धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण उनमें यह रोग कम ही पाया जाता है।

इन्स्टीट्यूट ऑफ लिविंग, हार्ट फोर्ड के निर्देशक डॉ. वर्नाड सी॰ ग्लू॰ ने भी उपासकों एवं ध्यान-साधकों का गंभीरता पूर्वक परीक्षण किया है। एक ओर उन्होंने शरीर मन में उत्पन्न होने वाले सभी तनावों को शाँत करने वाले सारे उपायों का परीक्षण कर देखा तो दूसरी ओर कुछ रोगियों को ध्यान का अभ्यास किया। इन दोनों प्रकार के प्रयोगों में उन्होंने तनाव मुक्ति और निरापद शाँति के लिए ध्यान को ही सबसे अधिक कारगर तरीका पाया। उपासना करने वालों में त्वचा की विद्युत रोथकता दूसरों की अपेक्षा ज्यादा विद्यमान रहती है। यही नहीं उनकी तरंगों की आकृतियाँ भी दूसरे लोगों की अपेक्षा सरल होती है।

प्रायः सभी धर्मों ने उपासना पद्धति को अपनाया है। भारतीय धर्म में गायत्री उपासना, ईसाई धर्म में’ होर्सचाज्म’ यहूदी धर्म में ‘कव्यालह’ इस्लाम मत में ‘तसव्युफ’ जापान के जैन धर्म में ‘जानेन’ आदि उपासना विधानों का एक ही अर्थ है। अनन्य और सर्वभाव से किया गया ईश चिंतन उपासना को प्रभावशाली और फलवती बनाता है। उनसे उत्पन्न हुई धनात्मक शक्ति व्यक्ति के आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मबल को बढ़ाती है। इसके साथ यदि गायत्री महामंत्र का जप एवं सविता देवता का ध्यान जुड़ जाय तो अनेकानेक आधि-व्याधियों से सहज ही मुक्ति मिल सकती है।


परंपरा (Kahani)

एक बहुत सुँदर वधू ने पति को पूरह वशवर्ती कर लिया। घर में बहुत बूढ़ा बाप था। खाँसता और असमर्थ होने के कारण तरह-तरह की माँगे करता। वधू ने पति से हठ किया कि या तो इस बूढ़े को हटाओ, नहीं तो मैं नैहर चली जाऊँगी और फिर कभी नहीं आऊँगी। पति को वधू के सामने झुकना पड़ा। वह ऊँटों पर माल ढोने का काम करता था। सो एक दिन पिता को नदी पर पर्व स्नान के लिए चलने को तैयार कर लिया। साथ ले गया और रास्ते में मारकर उसे झाड़ी के नीचे गाड़ दिया। दिन गुजरने लगे। पुत्र जन्मा, बड़ा हुआ। उसकी भी सुँदर-सी वधू आई। बाप बूढ़ा और अशक्त हुआ। घटना क्रम पुराना ही दुहराया गया। बूढ़े को हटा देने का निराकरण भी उसी प्रकार हुआ। ऊँट पर बैठाकर पर्व स्नान के बहाने ले जाया गया और मार कर उसी झाड़ी में गाड़ दिया गया, जिसके नीचे बाप गड़ा था। इस लड़के का भी लड़का हुआ। उसके भी सुँदर वधू आई। बुढ़ापा, अशक्तता और खाँसी का दौर चला और नववधू द्वारा उसे भी हटा देने का पुराना प्रस्ताव सामने आया। लड़के ने बाप को ऊँट पर बैठा कर पर्व स्नान के लिए सहमत कर लिया। संयोगवश उसे भी मारने और गाड़ने के लिए वही झाड़ी उपयुक्त पाई गई। बेटा छुरा निकालने वाला था कि बाप ने उसे रोका और कहा यहाँ दो गड्ढे खोद कर देखो। दोनों में दो अस्थिपंजर पाये गये, जो बूढ़े बाप और बाबा के थे। उनका दुःखद अंत भी वधुओं के आग्रह पर किया था। बुड्ढे ने कहा-मुझे मारने पर तो इसी परंपरा के अनुसार तेरी भी दुर्गति होगी। इसलिए इस प्रचलन को तोड़ना ही उपयुक्त है। मैं स्वयं कहीं चला जाता हूँ। तू बिना मारे ही लौट जा। वधू से मार दिये जाने की बात कह देना। बेटे की आँख खुल गयी और वह पिता को वापस घर ले आया। उनकी सेवा करने लगा। वधू को कह दिया कि उसे जो भी करना हो, करे। वह पिता को पीठ न देगा। उफान शाँत हो गया। पत्नी भी न गई। बूढ़ा भी बच गया और परंपरा भी टूटी। जो चलती रहती तो अनेक पीढ़ियों तक इसी प्रकार बूढ़े बापों का वध होता रहता। आज अनेकों परिवार ऐसी ही दुर्गति की स्थिति में हैं। दो पीढ़ियों में पारस्परिक टकराव होता देखा जाता है। समझ-बूझ कर काम लिया जाय, तो आश्रम व्यवस्था के माध्यम से विग्रह टाले जा सकते हैं।


जड़ चेतन गुण-दोषमय

जड़ चेतन के युग्म से बने इस विश्व में गुण दोष दोनों ही हैं। कहीं देवत्व है कहीं असुरत्व। देवत्व का पोषण, अभिवर्धन और सम्मान किया जाना चाहिए, साथ ही असुरता की दुरभि, संधियों, कुटिल नीतियों से तथा होने वाले आक्रमण से अपना बचाव भी करना चाहिए।

देवत्व प्रधान-सज्जन पुरुष अपने आदर्श और व्यवहार पर स्थिर रहते हैं। सज्जनता की रीति-नीति से विलग नहीं होते हैं। उनमें पारस्परिक टकराहट भी नहीं होती। यदि कोई स्वयं उनसे टकरा भी जाय तो टूटते नहीं। अपनी दिव्य सत्ता को अक्षुण्ण रखते हैं। किसी भी विपरीत तत्व के समक्ष उनका आत्म समर्पण नहीं होता। जब कि असुरत्व प्रधान दुर्जनों की ठीक इससे विरोधी स्थिति होती है। ये सदा ही दूसरों से टकराने के लिए उतावले रहते हैं। इस संघर्ष में दूसरों का जितना अहित कर पाते हैं उसकी तुलना में कहीं अधिक कष्ट क्लेश स्वयं उठाते हैं।

यह देवत्व और असुरत्व मात्र मनुष्यों तक ही सीमित, हो, ऐसी बात नहीं है। विश्व ब्रह्माण्ड के कण-कण में यह द्वन्द्व व्याप्त है। दैवी गुण प्रधान सज्जन पुरुषों की तरह परमाणु की भी मूल सत्ता होती है। यह अपनी विशेषताओं को नष्ट नहीं होने देती। सभी परमाणु सृजन के काम में जुटे रहते हैं। वे एकत्रित होते, जुड़ते और हिलमिल कर रहते हैं। उनकी संगठन और सृजन भावना है। विभिन्न पदार्थों का निर्माण करती है। नींव की तरह अदृश्य और अविदित रहकर वे सृजन के कार्य में अथक रूप से जुटे रहते हैं। इस समूचे विश्व में जो कुछ भी सुषमा गोचर होती है वह इन्हीं छोटे-छोटे परमाणुओं के परमार्थिक क्रिया−कलाप का सुखद परिणाम है।

परिणाम एकाकी नहीं है। इनके भीतर और भी छोटा परिवार है। इसमें अच्छे बुरे दोनों तत्वों का निर्वाह होता है। इसमें निहित इलेक्ट्रॉन-प्रोट्रान में पृथकतावादी नीति नहीं होती। ये परस्पर एक सूत्र में बंधे रहते हैं। इसके परिणाम स्वरूप वे परस्पर मिलकर अंतः क्रिया द्वारा नवीन कणों में परिवर्तित हो जाते हैं। परमाणु विधा विशारदों ने इस परिवार के अब तक लगभग बीस सदस्य खोजें हैं। इलेक्ट्रान-प्रोट्रान के अतिरिक्त न्यूट्रान, पॉजीट्रान, मेसान, न्यू मेसान, पाई मेसान, के॰ मेसान, हाइपरान, ड्यूट्रान-न्यूट्रिनो जैसे सूक्ष्म कणों से सारा विश्व विनिर्मित हुआ है। इन्हें विश्व भवन की ईंटें कहा जा सकता है।

इसी दैवी अणु शक्ति में एक विरोधी असुर तत्व भी मौजूद है। समय-समय पर यही गिरगिट की तरह नाना प्रकार के रंग बदलता है। टूटता फूटता है और विग्रह विद्वेष उत्पन्न करता है। कुचक्रों का भी यही शिकार होता है और अंततः विनाश और दुर्गति भी इसी की होती है। इस संसार में मात्र देवत्व ही नहीं असुरत्व भी है। संभवतः इसी का परिचय देने के लिए यह प्रतिकण विद्यमान हैं।

परमाणु के प्रत्येक मूलकण के साथ एक प्रतिकण मौजूद रहता है। जैसे इलेक्ट्रान का प्रतिकण पॉजीट्रान, प्रोट्रान का एण्टीप्रोट्रान, न्यूट्रान का एण्टीन्यूट्रान, न्यूट्रिनो का एण्टीन्यूट्रिनो है। ये सभी प्रतिकण अल्पजीवी होते हैं ये जब अपने समान समान कण से टकराते हैं तो भयंकर विस्फोट होता है।

ये विरोधी कण आते कहाँ से हैं? क्यों अवरोध उत्पन्न करते हैं यह रहस्य अभी अबूझ ही बना हुआ है-विज्ञान-वेत्ताओं का अनुमान है कि इस ब्रह्माण्ड में शायद कोई अन्य विश्व ऐसा है जिसे सर्वथा विपरीत या ‘प्रति विश्व’ कहा जा सके। उसकी संरचना इन विपरीत प्रकृति के प्रतिकणों से हुई होगी। वहाँ सब कुछ यहाँ से उलटा ही होगा। इस लोक में सारा पदार्थ एण्टी मैटर होगा। वहीं से यह प्रतिकणों का प्रवाह धरती पर आता होगा और यहाँ कि अणु रचना के साथ उसका सम्मिश्रण परस्पर विरोधी स्थिति उत्पन्न करता होगा। यह प्रति विश्व कहाँ है? यह तो अभी तक नहीं ढूँढ़ा जा सका है। पर उसका अस्तित्व तो एक प्रकार से मान लिया गया है।

इस तरह यह स्पष्ट हो जाता है कि कण-कण में विरोधी तत्व विद्यमान है। कुछ गुणमय कुछ दोषमय। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी कारण विश्व को जड़ चेतना को “गुण दोषमय” बताया है और कहा है कि “संत हंस गुण गहहि प्य परिहरि वारि विकार।” इस गुण दोषमय विश्व में किसे स्वीकारें किसे छोड़ें? कौन उपयोगी है कौन निरुपयोगी? इसका निर्धारण बाह्य कलेवर उसकी चमक दमक से होना असंभव है। इसके लिए नीर-क्षीर को पृथक् करने में समर्थ विवेक बुद्धि की आवश्यकता है।

यह विवेक परमात्मा ने मनुष्य को विरासत में सौंपा है। जिसके द्वारा वह अपनी विकास यात्रा सुगमता से पूरी कर सकता है। इसका अंजन लगाने से वह दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है जिससे यात्रा पथ के अवरोध समझ में आ जाते हैं। संभव है यह अवरोध आकार प्रकार की दृष्टि से लुभावने दिखें, पर यथार्थ में होते अवरोध ही हैं। इनसे बचना ही उत्तम है। अन्यथा मंजिल पा सकना दुष्कर ही नहीं असंभव भी होगा। इनको त्याज्य मान त्याग करने में ही कल्याण है।

परमात्मा ने गुण दोषमय विश्व की इस प्रकार की अद्भुत संरचना संभवतः मनुष्य के विवेक बुद्धि की परीक्षा करने के लिए ही की है। सामान्यतया देखा यही जाता है कि हम इस परीक्षण में अनुत्तीर्ण घोषित हो जाते हैं। कारण कि विवेक की जगह चालाकी, धूर्तता अपनाने लगते हैं। परिणाम स्वरूप गुण दोषों का विवेचन तो बन नहीं पड़ता उलटे गुणों की जगह दोष ही संग्रह करने लगते हैं। हमारी स्थिति दुर्योधन की तरह बन पड़ती है जो युधिष्ठिर की राज सभा में जल के स्थान पर थल और थल के स्थान पर जल के विभ्रम में आकर जगह-जगह ठोकर खाता और गिरता फिरा। उसकी जग हँसाई भी खूब हुई। इससे उसने अपनी गलती तो स्वीकार नहीं की उलटे तथ्य समझने पर महाभारत रचा डाला।

इसी तरह हम भी संसार की चकाचौंध के सम्मोहन जाल में फंसकर गुण दोषों का विभेद करने में असमर्थ हो जाते है। इस तरह लगातार दोषों को ही इकट्ठा करते रहने के कारण व्यक्तित्व भी असुरत्व से भरने लगता है। परिणाम यही होता है कि संसार हमारे ऊपर हंसता है। यदि कोई इस औचित्य, अनौचित्य का भेद समझाने आता है तो उसकी विवेक-युक्त बातों को सम्मोहित विभ्रमित बुद्धि स्वीकारती नहीं उलटे क्रोधित हो लड़ाई झगड़ा करने हेतु प्रेरित करती है। परिणाम स्वरूप हमें जहाँ प्रगति पथ के सोपानों पर चढ़ते हुए उत्कर्ष की चोटी पर जा पहुँचना चाहिए था, वहीं अपने स्थान से भी लुढ़कते हुए अवगति के गर्त में जा गिरते हैं।

ऐसी स्थिति आने ही क्यों दी जाय? परमात्मा की दी हुई अमूल्य मणि-विवेक के प्रकाश का प्रयोग कर बाह्य जगत की यथार्थता ही नहीं अपने अंतराल की यथार्थता को भी क्यों न पहचाना जाय? संसार में जहाँ जो भी प्रगति के लिए आवश्यक है उसी को ग्रहण क्यों न किया जाय? संत कबीर के शब्दों में-”सार-सार को गहि रहें थोथा देहिं उड़ाय” की नीति अपनाने में ही मनुष्य का कल्याण सन्निहित है।

बुद्धि को विवेक-युक्त बनाये रखने सु असुर सत्ता-जो बाहर भी है और भीतर भी, की सारी कोशिशें न कामयाब हो जायेंगी फिर तो दोष−दुर्गुण या असुरत्व स्पर्श भी न कर पायेंगे और प्रगति का पथ प्रशस्त होता चला जायेगा। यात्रा सुगम और सहजता के लिए हर किसी को विवेक का इस्तेमाल करने की हंस जैसी रीति-नीति अपनानी चाहिए। इसी में कुशलता और मानव जीवन की सार्थकता है।


व्यवहार व वातावरण (Kahani)

मिथिला के सम्राट चमूपति अपने पुत्र राजकुमार श्रीवत्स की उद्दण्डता से बड़े खिन्न थे। गुरुकुल लौटकर आने के कुछ दिनों तक तो वे ठीक रहे। पुनः स्वभाव उग्र होता चला गया। उनके व्यवहार में कुलीनता कहीं से नहीं टपकती थी। सोचा गया कि संभवतः विवाह से समस्या का हल हो। पर स्थिति यथावत् ही रही।

मन बदलने की इच्छा से महर्षि श्यावाष्च के वाजिमेध यज्ञ का आमंत्रण आने पर वे प्रमुख यजमान के रूप में रवाना हुए। रास्ते में प्रथम विराम उन्होंने जहाँ किया, वह संयोगवश-अरण्यजैत के खूँखार दस्यु नायक का कार्य क्षेत्र था। अर्ध निद्रा की स्थिति में राजा ने सुना-एक नन्हा सो तोता कह रहा था-तात आज बहुत अच्छा शिकार लगा है। महाराज हैं तो क्या हुआ? तुरंत सिर धड़ से अलग करो व एक ही दाँव में जीवन भर का हिसाब-किताब पूरा कर लो “नीति वचन याद कर महाराज ने तुरंत वह स्थान छोड़ दिया। अगले दिन प्रातः वे महर्षि के आश्रम में पहुँचे। उनका स्वागत यहाँ भी पुनः एक शुक की मंगल ध्वनि ने किया। आइए महाराज! आपका इस आश्रम में स्वागत है। आप हमारे आज के मंगल-मूर्ति अतिथि हैं।” आश्चर्य से महाराज ने दृष्टि ऊपर उठाई, तो देखा कि वृक्ष पर बैठा शुक यह कह रहा था। सम्राट बोले-”एक आप एवं एक ऐसे ही शुक का स्वर, जिसने मुझे रात्रि में डरा दिया था। कितना अंतर है, दोनों में। नन्हा शुक बोल उठा महाराज! अरण्यजैत का वह शुक मेरा ही सगा भाई है। उसकी धृष्टता के लिए मैं क्षमा माँगता हूँ। वस्तुतः यह संगति का ही फल है। मेरा भाई दस्युओं में रह कर वैसे ही कुसंस्कार पाता रहा है। मुझे सौभाग्य मिला-महर्षि के इस संस्कार भूत आश्रम में रहने का।” स्वागत करने को आतुर खड़े महर्षि श्यावाश्व महाराज के अंतर्मन को पढ़ते हुए बोल उठे “अब समझ में आया महाराज! आपके राजकुमार जिन धीवर पुत्रों-उद्दंड साथियों के साथ रहते हैं, उनके ही कुसंस्कार उनके व्यवहार में परिलक्षित हो रहे हैं। आप साथी व वातावरण बदल दीजिए। राजकुमार को बदलते देर न लगेगी।”


सृष्टि की उत्पत्ति विद्युत से हुई या नाद से?

वृक्ष का मूल बीज है, तो जीवधारियों के संदर्भ में सृजन की भूमिका रज-वीर्य की मानी गई है। चिंगारी में जहाँ विशाल दावानल प्रच्छन्न होता है, वहीं धन एवं ऋण धाराओं के संयोग से विद्युत की उत्पत्ति कोई छिपा तथ्य नहीं। आत्मा परमात्मा की अंशधर है, उसी से प्रकट होकर अंततः उसी में विलीन हो जाती है, इसे भी सब जानते हैं। जहाँ बिंब होगा, वहाँ वस्तु का होना भी अनिवार्य हैं इस दृष्टि से सृष्टि का उद्गम बिंदु भी कोई-न-कोई होना चाहिए।

यहाँ विज्ञान और अध्यात्म में तनिक मतभेद है। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि सृष्टि की अंतिम इकाई ‘विद्युत’ है, जबकि अध्यात्म के पक्षधर मनीषियों का मानना है कि यह इकाई विद्युत न होकर ‘ध्वनि’ है। उल्लेखनीय है कि भौतिकशास्त्र पदार्थगत है, जबकि अध्यात्मशास्त्र चेतनागत। भौतिक विज्ञानियों ने अंतिम अथवा मूल इकाई के संबंध में जब अपना निर्णय प्रस्तुत किया, तो उनका आधार पदार्थपरक अध्ययन था। अध्यात्म-वेत्ताओं ने चेतना की गहराई में उतरकर मूल इकाई की खोज की, तो उन्होंने उसे ध्वनि के रूप में पाया। यों दोनों के निष्कर्ष अपने-अपने स्थान पर एक प्रकार से ठीक हैं। विज्ञानवादी यदि विद्युत को मूल इकाई मानते हैं, तो वह इसलिए सही है कि उनका अनुसंधान पदार्थगत जगत में हुआ है। पदार्थ सत्ता की मूल इकाई विद्युत ही हो सकती है, इसलिए यह अवधारणा सत्य है मिथ्या इस कारण है कि पदार्थ के मूल में चेतना काम करती है, अतएव विद्युत को अंतिम इकाई नहीं माना जा सकता। यहाँ कोई पदार्थवादी दृष्टिकोण रखने वाला यह कह सकता है कि विद्युत और ध्वनि प्रायः एक ही ऊर्जा के दो रूप हैं। उनका पारस्परिक रूपांतरण होता रहता है, अतः वे अभिन्न हैं, किंतु इस प्रकार की विचारधारा रखने वालों को यह भलीभाँति समझ लेना चाहिए कि अध्यात्मवाद में जिस नाद से सृष्टि का उद्भव होना माना गया है, वह प्रचलित ध्वनि से भिन्न है। ज्ञातव्य है कि भौतिक जगत में ध्वनि की उत्पत्ति पदार्थों के पारस्परिक टकराव या घर्षण का परिणाम है। इसे ‘आहत’ नाद या ध्वनि कहते हैं, जबकि चेतना जगत की ध्वनि ‘अनाहत’ होती है। यह किसी रगड़ या टकराहट की परिणति नहीं, वरन् स्वतः स्फूर्त है, इसलिए इसे अनाहत या अनहद नाद कहते हैं। इसकी विशेषता यह है कि यह सार्वकालिक, सार्वदेशिक एवं शाश्वत है। इसीसे अनंत विश्व की सृष्टि होती है और सृष्टि विश्व के अंतर में यह नाद ही प्राण या जीवनी-शक्ति के रूप में निहित रहता है। प्राणियों के हृदय में यही स्पंदित होता रहता है। यह इंद्रियगम्य नहीं, फलतः इसे कानों से नहीं सुना जा सकता। ध्यानावस्था में जाकर इसकी अनुभूति की जा सकती है। अंतराल में जितना गहरा उतरा जायेगा, नाद भी तदनुरूप सूक्ष्म होता जाता है। अंततः एक ऐसी अवस्था आती है, जब सभी प्रकार की ध्वनियों का लोप होकर मात्र शून्य रह जाता है। तत्ववेत्ताओं के अनुसार यह शून्य भी ठीक नहीं। यहाँ भी एक नाद होता रहता है। इसे ही आत्मवेत्ता ‘अनहद नाद’ के नाम से पुकारते हैं। अनहद नाद का तात्पर्य है उस शून्य की नीरवता की अंतिम पकड़। मानव चेतना में अंतिम वस्तु, निराकार में अवस्थान करने के पूर्व की यह अनहद ध्वनि ही है। इसीलिए तत्वदर्शियों ने एकमात्र ध्वनि को ही अंतिम तत्व के रूप में स्वीकार किया है। उनके अनुसार चेतना जगत का आखिरी तत्व ध्वनि के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता।

इस विवेचना के उपराँत ध्वनि और नाद के बीच का अंतर स्पष्ट हो जाता है। ध्वनि भौतिक है, जबकि नाद आत्मिक है। यह उस ध्वनि से पूर्णतः भिन्न है, जो पदार्थ जगत में आये दिन हम सुनते रहते हैं। जब दोनों में इतना फर्क है, तो दोनों के मध्य रूपांतरण भी संभव नहीं। हाँ, भौतिक ध्वनि और विद्युत निष्चच ही एक ही ऊर्जा के दो रूप हैं, उनका एक-से-दूसरे रूप में परिवर्तन होता रहता है। आवश्यकता पड़ने पर ध्वनि विद्युत में बदल सकती है। इसी प्रकार विद्युत भी मौका आने पर ध्वनि में रूपांतरित हो जाती है, किंतु उसका नाद में परिवर्तन संभव नहीं, कारण कि इनमें से एक की प्रवृत्ति भौतिक और दूसरे की अभौतिक है। एक का संबंध अपरा प्रकृति से है, तो दूसरे का परा प्रकृति से। एक का स्वरूप व्यक्त है, तो दूसरा अव्यक्त स्तर वाला है, पर यह सच है कि अव्यक्त स्तर तक पहुँचने के लिए व्यक्त माध्यम का ही सहारा लेना पड़ता है। यही कारण है कि अध्यात्म क्षेत्र में कीर्तन, भजन, संगीत प्रार्थना, मंत्र, जप आदि बहुत महत्वपूर्ण माने गये हैं। यह स्थूल ध्वनियाँ ही हमें सूक्ष्म नाद तक पहुँचा पाने में समर्थ होती हैं, इसलिए अध्यात्म पथ के पथिकों को यात्रा की शुरुआत यहीं से करनी पड़ती है। सफर जहाँ समाप्त होता है, वह भूमिका भी ध्वनि की ही है, अंतर मात्र इतना है कि वहाँ ध्वनि नाद का रूप ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार ध्वनि से यात्रा आरंभ होकर फिर ध्वनि में ही समाप्त होती है। अंतर्यात्रा का यह अंतिम बिंदु और आखिरी सोपान है। इसे ‘शब्द-ब्रह्म’ कहा गया है। यह ध्वनि लोक-लोकाँतरों में सर्वत्र गुँजायमान है। यही सृष्टि का आदि केन्द्र है, किंतु हृदय स्थिति इस बिंदु तक पहुँचने के लिए साधनात्मक प्रवृत्तियों एवं मंत्र-जप और भजन-कीर्तन संबंधी उपासनात्मक उपचारों का लंबे काल तक आश्रय लेना पड़ता है। कारण कि चेतना और मन को प्रभावित करने की जितनी सामर्थ्य शब्द और संकल्प में है उतना सरल और समर्थ उपाय शायद और कोई नहीं। मंत्र ध्वनि के बार-बार के आघात से चेतना-केन्द्र परिष्कृत होने लगते हैं और मन विगलित होकर विकसित होता जाता है। फिर एक शून्य जैसी स्थिति पैदा होती है। इसीसे नाद का स्फुरण होता है। यह नाद पवित्र आकार है। जप के मध्य जब इसका उच्चारण करते हैं, तो जिस ओम् की ध्वनि होती है, वह वास्तविक उद्गीथ नहीं है, क्योंकि इस प्रक्रिया में उसका उच्चारण कर्ता द्वारा संपन्न होता है। हम मुँह बंद कर लें, होंठों को न हिलायें, जीभ बिल्कुल निश्चल रहे और अंदर ही अंदर उच्चारण करें, तो यह भी वास्तविक उच्चारण नहीं होगा। इन दोनों ही प्रकारों में इसका एक निमित्त विद्यमान होता है, अतएव ऐसी दशा में जिस ॐ का ज्ञान होगा, वह वास्तविक न होकर अवास्तविक और कृत्रिम होगा, क्योंकि मानसिक स्तर के उच्चारण में भले ही हमारी बाह्य क्रियाएं और चेष्टाएं निष्क्रिय स्तर की बनी रहें, तो इस पर भी मांसपेशियों का स्पंदन तो बना ही रहता है। जब बाहर की तरह भीतर मन में भी कोई प्रयास न हो, तो एक ऐसी ध्वनि सुनायी पड़ेगी, जो अनायास उत्पन्न हो रही होगी, हम उसके कर्ता न होंगे, मात्र साक्षी होंगे। यही जगत का आदि उद्गम है। यह आँतरिक जगत का अनुसंधान हुआ।

विज्ञान चूँकि बाह्य जगत को सर्वोपरि और महत्वपूर्ण मानता है, इसलिए उसकी शोध पदार्थ सत्ता को लेकर प्रारंभ हुई। इस क्रम में जिन विद्युतीय कणों की खोज हुई, वह विज्ञान की ससीमता की दृष्टि से अंतिम इकाई हो सकती है, किंतु सूक्ष्मता की दृष्टि से विचार करने पर यह अभिमत निरस्त हो जाता है। विद्युत निश्चय ही सूक्ष्म है, पर उतना नहीं, जिसे अंतिम कहा जा सके। उसे पदार्थ और चेतना की मध्यवर्ती कड़ी के रूप में मान्यता मिल सकती है। पदार्थ की श्रेणी में उसे इसलिए नहीं रखा जा सकता, क्योंकि वह सूक्ष्म है और चेतना स्तर की वह इस कारण नहीं मानी जा सकती, क्योंकि द्रव्य जैसी उसकी अनुभूति होती है। विवेकानंद ने ‘राजयोग’ में कहा है कि संसार में जितनी भौतिक शक्तियाँ हैं, वह सब प्राण से उद्भूत है। जिस प्रकार चेतना की अभिव्यक्ति प्राणी और पदार्थ के कलेवर रूप में इस संसार में हुई है, उसी प्रकार प्राण का व्यक्त रूप विद्युत है। जैसे शरीर के भीतर की खोज द्वारा हम चेतना जगत में पहुँच जाते हैं, वैसे ही यदि पदार्थ की विद्युत इकाइयों के अंतराल में उतर कर यात्रा प्रारंभ की जाय, तो उसके मूल स्रोत प्राण तक पहुँच पाना असंभव भी नहीं। यदि विज्ञान की किन्हीं खोजों द्वारा ऐसा कर पाना शक्य हुआ, तो फिर प्राण-चेतना के गर्भ-गह्वर में उतर पाना भी कोई कठिन नहीं रह जायेगा। यदि भविष्य में ऐसा न हो सका, तो उस नाद को सुन पाना विज्ञान के लिए भी सरल हो जायेगा, जो संपूर्ण आकाश में चाहे वह बाह्य जगत का विस्तृत आकाश हो अथवा प्राणी और पदार्थ के अंदर का पोला स्थान, सर्वत्र संव्याप्त है। यदि ऐसा हुआ, तो विज्ञान और अध्यात्म के मध्य की असहमति देर तक टिकी नहीं रहेगी और दोनों ही इस एक तथ्य को स्वीकार कर सकेंगे कि सृष्टि संरचना के मूल में वह अव्यक्त ‘नाद’ ही सर्वोपरि तत्व है। दोनों के बीच वर्तमान मतभेद का एक ही कारण समझ में आता है कि वर्षों की मेहनत से विज्ञान ने जिस तथ्य को खोजा है, उसे उसने अंतिम मान लिया और आगे की गवेषणा बंद कर दी। ऐसी स्थिति में जो सत्य अधूरा है, उसे संपूर्ण स्वीकार कर लिया गया। भूल यहीं हुई। होना यह चाहिए था कि अनंत संभावनाओं को देखते हुए शोध जारी रखनी और मूल तत्व को पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए थी, क्योंकि भारतीय दर्शन इसको आरंभ से स्वीकारता रहा है कि पदार्थ का जो अंतिम अणु है, वह अप्रकट मन है और मन का जो अंतिम अणु है, वह अप्रकट पदार्थ है। इसका मतलब यह हुआ कि पदार्थ और मन अर्थात् चेतना एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं। दोनों में ही एक-दूसरे की संभावना पूरी-पूरी विद्यमान है। पदार्थ से यात्रा आरंभ कर मन तक पहुँच पाना संभव है और मन से चलकर पदार्थ के आदि कारण के दर्शन करना भी अशक्य नहीं स्पष्ट है विज्ञान ने अब तक जो रास्ता तय किया है, वह अधूरा ओर एकाँगी है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए

उसे द्रव्य के मूल में विद्यमान चेतना को भी ध्यान में रखना होगा और अनुसंधान उसका भी करना होगा, तभी उसकी खोज पूरी हो सकेगी। विज्ञानवेत्ताओं ने अभी तक मात्र पदार्थ वाले हिस्से का अन्वेषण किया है, उसका चेतना वाला भाग शेष है। अंतिम निष्कर्ष इस आखिरी भाग के अध्ययन से ही उपलब्ध हो सकेगा। आगे वही होना है।

मतभेद की गुंजाइश वहाँ उत्पन्न होती है, जहाँ दोनों पक्षों का स्तर समान हो। जब एक पक्ष छोटा, अल्पज्ञ और स्थूल दृष्टि वाला और दूसरा विराट् ज्ञान एवं विशाल और सूक्ष्म दृष्टिकोणयुक्त हो, वहाँ असहमति नहीं, अज्ञान आड़े आता है। पदार्थ विज्ञान चूँकि स्थूल जगत का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसका ज्ञान वहीं तक परिमित है। अध्यात्म विज्ञान की गति प्रत्यक्ष से परोक्ष जगत में भी है, इसलिए ज्ञान की उसकी सीमा अनंत और अपरिमित है। ऐसी स्थिति में विज्ञान को अपना दुराग्रह त्याग कर उन संभावनाओं पर विचार करना आरंभ कर देना चाहिए, जिसे अध्यात्म अति आरंभ से प्रकट करता आ रहा है। आगामी समय में यदि ऐसा हुआ, तो विज्ञानवादी यह स्पष्ट अनुभव कर सकेंगे कि प्रत्यक्षवाद पर आधारित उनका निष्कर्ष अधूरा ही नहीं, अपंग एवं असमर्थ भी था।

अज्ञानी की गति ज्ञान को अंगीकार कर लेने में है। अध्यात्म के अंगुलिनिर्देश पर विज्ञान यदि चल सका, तो अगले ही दिनों वह इस सत्य को प्रत्यक्ष और प्रमाणित कर सकेगा कि सृष्टि का आदि मूल विद्युत नहीं नाद है, वह नाद, जिसे तत्वेत्ता ‘अनहद नाद’ के नाम से पुकारते।


यथार्थ को समझें, शब्दों में न उलझें

संसार में दो तरह के लोग हैं। एक शब्दों में, कल्पना और दर्शन में जीने वाले दूसरे यथार्थ में, सत्य और तथ्य में जीने वाले। शब्दों में आकर्षण तो होता है, पर वैसा ही, जैसा रेगिस्तानी मरीचिका में। इसके विपरीत तथ्य कटु सत्य होते हुए भी हमें अंगीकार करने पड़ते हैं। उन्हें स्वीकारे बिना, अपनाये बिना हम शब्दों के जाल-जंजाल में ही उलझे रहते हैं और हमारी प्रगति दिवास्वप्न बन कर रह जाती है।

पश्चिमी दुनिया ने तथ्यों में जीना सीखा है, इसलिए वहाँ विज्ञान विकसित होता चला गया और समाज की उन्नति होती चली गई भारत ने शब्दों को महत्व दिया, इस कारण वह उस मकड़जाले में फंस गया। यहाँ दर्शन तो पैदा हुआ, पर विज्ञान जन्म न ले सका, वैज्ञानिक बुद्धि विकसित न हो सकी। फलस्वरूप जिस भारत को आज पश्चिमी देशों जैसी उन्नति की उच्च श्रेणी में होना चाहिए था, वह पिछड़ गया और शायद यह पिछड़ापन तब तक जाने वाला नहीं, जब तक वह दार्शनिक बुद्धि को त्याग कर वैज्ञानिक बुद्धि न विकसित कर ले और उसे अपना न ले, क्योंकि समाज और राष्ट्र का विकास केवल कल्पना जगत में खोये रहने से नहीं हो सकता। जिंदगी तथ्यों से बदलती है, उन्हें समझ कर अपना लेने से बदलती है, सिर्फ शब्दों से नहीं यदि शब्दों से बदल सकी होती, तो कदाचित् अपना देश इस दिशा में सर्वोपरि सिद्ध होता और विश्व में सभी राष्ट्रों से अग्रणी पाया जाता, क्योंकि शब्दों का वाक्जाल और दर्शन का मायाजाल इस देश में जितना ज्यादा है, उतना शायद किसी दूसरे देश में नहीं। यह भारतीय दर्शन की ही विशेषता है, जो जगत को मिथ्या-धोखा बताता और ब्रह्म को सत्य कहता है। दुनिया के किसी और देश में ऐसी कोई फिलॉसफी नहीं, जिसमें संसार को झूठा घोषित किया गया हो। इसे अपने देश का सौभाग्य ही कहना चाहिए, जिसने इतनी ऊँची फिलॉसफी संसार को दी, पर दुर्भाग्य की शुरुआत वहाँ से आरंभ हुई जब हम तथ्यों की जगह मात्र शब्दों को पकड़ने लगे-वास्तविकता के स्थान पर आडंबरों में जीने लगे। यदि ऐसी बात नहीं होती, तो ब्रह्म-प्राप्ति के नाम पर व्यक्ति वैसा कुछ प्रयास और पुरुषार्थ करते पाये जाते, पर देखा जाता है कि वैराग्य के नाम पर वे सर्वथा अकर्मण्य बन जीते हैं। भला इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है। दर्शन ऐसी मिथ्या बातें नहीं बताता और न पतन की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। यदि वह संसार को ‘माया’ कहता है तो इसका यही अर्थ हो सकता है कि इस अनित्य संसार में नित्य ब्रह्म का प्रकाश समाज रूपी उसका मूर्तिमान स्वरूप ही है। पूजा-उपासना, सेवा-साधना इसी की होनी चाहिए, पर साथ ही ध्यान इस बात का भी रखा जाना चाहिए क भोग-विलास में डूब कर मूल प्रयोजन को ही हम भूल न जायें। त्यागपूर्वक रहते हुए विराट् ब्रह्म की सेवा करें और अंततः उसे प्राप्त कर जीवन-मुक्तों जैसा आनंद लाभ करें। मिथ्या के रूप में संसार का यही तात्पर्य हो सकता है, पर जहाँ मूल को छोड़ कर पत्र-पल्लवों जैसे बाह्य अवयवों में उलझा जायेगा, वहाँ इससे पलायनवाद को ही प्रश्रय मिलेगा। इसमें दोष दर्शन का नहीं, उस बुद्धि का है, जो अपने अंदर सत्य को समझने वाला विज्ञान पैदा न कर सकी और शब्दों में उलझ कर यथार्थ से दूर हटती गई।

जब यह कहा जाता है कि ब्रह्मचर्य युक्त जीवन द्वारा ही ईश्वर-प्रगति संभव है, तो फिर यहाँ व्यक्ति आडंबर में फंस जाता है। वास्तव में ब्रह्मचर्य एक व्यापक शब्द है, जिसका अर्थ ज्ञान, परमात्मा और इन्द्रिय संयम है, पर इसके इस व्यापक स्वरूप को न समझ कर हम इसके इन्द्रिय संयम वाले एकाँगी पक्ष पर ध्यान देने लगते हैं। इन्द्रिय संयम भी ऐसा, जिसमें मात्र स्पर्शेन्द्रिय का ही संयम हो। ब्रह्मचर्य मात्र इतना ही नहीं है। संपूर्ण ज्ञानेन्द्रियों का संयम और इससे आगे विकल्प-संयम भी इसके अंतर्गत के विषय हैं, पर हमारी धारणा स्पर्श के निरोध में ही ब्रह्मचर्य की इतिश्री मानने लगती है और जो यह दिखावा कर लेता है, उसे ब्रह्मचारी कहा जाने लगता है, भले ही वह कानों से कितने ही भद्दे शब्द सुने, आँखों से अश्लील दृश्य देखने में तन्मय रहे-वह ब्रह्मचारी कहलायेगा। नहीं, ऐसा नहीं है। एक को टाल कर दूसरे को संभाल सकना असंभव है। सब इन्द्रियाँ परस्पर जुड़ी हैं। ऐसे में यदि शब्द का, चक्षु का संयम नहीं है, तो स्पर्श का संयम भी नहीं सध सकता। ये सारे उद्दीपन हैं। रस उद्दीपन से पैदा होते हैं। जब उसके स्थायी और संचारी भाव सब सक्रिय हों, फिर उसे रोकना चाहें, तो यह शक्य नहीं। इसके लिए संपूर्ण इन्द्रियों का नियमन आवश्यक है। इतना बन पड़ने के बाद चिंतन, स्मृति के रूप में मानसिक संयम अपनाना पड़ता है। इसके उपराँत उस भूमिका में पहुँच सकना संभव है, जिसमें ब्रह्म-प्राप्ति शक्य हो सके। इतना सब संपन्न कर लेने के पश्चात् ही कोई ब्रह्मचारी कहलाने का वास्तविक अधिकारी बन सकता है, इससे कम में नहीं। इस मर्म को नहीं समझ पाने के कारण ही लोग शब्दों के जाल में उलझ कर भटक जाते और यथार्थ से वंचित रह जाते हैं।

दर्शन जीवन का एक पक्ष है, तो विज्ञान उसका दूसरा पहलू। दर्शन को समझने के लिए वैज्ञानिक सोच निताँत आवश्यक है। यदि यह नहीं हुई, तो जीवन भर भटकाव ही बना रहता है और इसी में जिंदगी बरबाद हो जाती है। हम शब्दों के उलझाव में न उलझें, उसके पीछे सत्य को समझें, तभी कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धि समझें, तभी कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धि की आशा की जा सकती है, अन्यथा नहीं।


सफलता तक पहुँचने में कठिनाइयाँ भी हैं

सफलता का मार्ग सुलभ नहीं है। उसमें पग-पग पर काँटे बिछे हुए हैं। शहद मधुमक्खियों के जहरीले डंकों की बाड़ के भीतर रहता है। जो उन पैने डंकों को सामना कर सकता है वही शहद को पा सकता है। सुँदर व्याघ्रचर्म पाने की इच्छा रखने वालों को काल-सी कराल डाढ़ों वाले व्याघ्र से युद्ध करना होता है। गुलाब के सुँदर फूल की डंठल काँटों से भरी होती है, इन काँटों के खतरे को उठाकर ही कोई उस फूल को तोड़ सकता है। मोती ढूँढ़ने वाले को मगरमच्छों से भरे हुए समुद्र की तली तक दौड़ लगानी पड़ती है। भगवान को प्राप्त करने वाले साधकों को पहले कठोर साधना के कष्टों को सहना पड़ता है। संतति सुख को प्राप्त करने में माता-पिता को अमित कष्ट उठाने पड़ते हैं। कष्ट और कठिनाई का व्यवधान उन्नति की हर दिशा में मौजूद रहता है। ऐसी एक भी सफलता नहीं है जो कठिनाइयों से संघर्ष किये बिना ही प्राप्त हो जाती हो। जीवन के महत्वपूर्ण मार्ग, विघ्न बाधाओं से सदा भरे रहते हैं। यदि परमात्मा ने सफलता का कठिनाई के साथ गठबंधन न किया होता, उसे सर्वसुलभ बना दिया होता तो मनुष्य जाति का वह सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता। तब सरलता से मिली हुई सफलता बिलकुल नीरस हो जाती। जो वस्तु जितनी कठिनाई से, जितना खर्च करके मिलती है वह उतनी ही आनंददायक होती है।

कोई शाक या फल जिन दिनों सस्ता और काफी संख्या में मिलता है उन दिनों उसकी कोई पूछ नहीं होती पर जिन दिनों वह दुर्लभ होता है उन दिनों अमीर लोग उसकी खोज कराके महंगे दामों पर खरीदते हैं। मिठाई का आनंद हलवाई नहीं जानता उसका तो उन्हीं को मिलता है जिन्हें वह कभी-कभी ही प्राप्त होती है। अमीर के लिए एक रुपया ठीकरी की बराबर है पर गरीब को वह चन्द्रमा की तरह बड़ा मालूम पड़ता है। स्वास्थ्य का महत्व वही जान सकता है जो बीमारी में पड़ा हुआ है। स्वर्ण की महत्ता इसलिए है कि वह कम मिलता है पर यदि कोयले की तरह सोने की खानें निकल पड़े तो उसे भी लोग वैसी ही लापरवाही से देखेंगे जैसे आज लोहे आदि सस्ती धातुओं को देखा जाता है। जब लकड़ियाँ घिसकर आग पैदा की जाती थी तब अग्नि का बड़ा भारी महत्व था, देवता की तरह उसकी पूजा होती थी पर अब, जब कि दियासलाई के बॉक्स दुकानों में भरे पड़े हैं तब अग्नि की कौन परवा करता है। जिनके संतति नहीं है उनके लिए एक बालक का होना-किसी देवता के अवतार लेने की बराबर महत्वपूर्ण है, पर जिनके यहाँ हर दूसरे साल नये बच्चे आ टपकते हैं उनके लिए नये बालक का जन्म, चिंता, झुझलाहट, दुर्भाग्य सूचक और कष्टदायक होता है।

दुर्लभता और दुष्प्राप्यता से आनंद का घनिष्ठ संबंध है। जब प्रेमी और प्रेमिका दूर-दूर रहते हैं तो एक दूसरे को चन्द्र-चकोर की भाँति याद किया करते हैं परंतु जब सदा ही एक जगह रहना होता है तो दाल में नमक पड़ने या सिंदूर की बिंदी लाने में भूल हो जाने जैसी छोटी बातों पर कलह होने लगते हैं। जो वस्तुएँ दुर्लभ हैं, सर्व साधारण को आसानी से नहीं मिलती उन्हें ही सफलता कहते हैं जिन कार्यों की सफलता सर्वसुलभ है वैसे कार्य तो सब लोग सदा करते ही रहते हैं उनके लिए न कोई पुस्तक पढ़ने की जरूरत होती है और न लेखक को लिखने की। यदि महत्वपूर्ण को प्राप्त करने में कुछ बाधा न होती तो वे महत्वपूर्ण न रहतीं और न उनमें कुछ रस आता। कोई रस और कोई विशेषता, न रहने पर यह संसार बड़ा ही नीरस एवं कुरूप हो जाता, लोगों को जीवन काटना एक भार की भाँति अप्रिय कार्य प्रतीत होने लगता।

कठिनाइयों के न रहने पर एक और हानि होती है कि मनुष्य की क्रियाशीलता, कुशलता एवं चैतन्यता नष्ट हो जाती है। ठोकर खा-खाकर अनुभव एकत्रित किया जाता है। कष्ट की चोट सह कर मनुष्य दृढ़, बलवान और साहसी बनता है। मुसीबत की अग्नि में तपाये जाने पर बहुत सी कमजोरियाँ जल जाती हैं और मनुष्य खरे सोने की तरह चमकने लगता है। हथियार की धार पत्थर पर रगड़ने से तेज होती है खराद पर चढ़ाने से हीरे में चमक आती है। घात-प्रतिघातों की ठोकर खाकर रबड़ की गेंद की तरह अंतःचेतना में उछाल आता है और वह एक स्थान पर पहुँचने की गतिविधि आरंभ कर देती है। बिना चोट लगे गेंद नहीं उछलती, बिना थपकी लगे मृदंग नहीं बजता, बिना एड़ लगाये घोड़े की चाल में तीव्रता नहीं आती मनुष्य भी ऐसे तत्वों से बना हुआ है कि यदि कठिनाई न हो तो उसकी सुप्त शक्तियाँ जाग्रत न हो सकेंगी और जहाँ का तहाँ पड़ा दिन काटता रहेगा।

सफलता में आनंद कायम रखने और शक्तियों के चैतन्य होकर विकास के मार्ग पर प्रवृत्त होने के लिए जीवन में कष्ट और कठिनाइयों का रहना बड़ा ही आवश्यक है। इतिहास में जिन महापुरुषों का वर्णन है उनमें से हर एक के पीछे कष्टों का, दुर्दुम कठिनाइयों में पड़ने का विस्तृत वृत्ताँत है। उसी के कारण वे महापुरुष बने हुए हैं। यदि ईसामसीह के जीवन से उनकी तपश्चर्या और क्रूस पर चढ़ना, इन दो बातों को निकाल दिया जाये तो वह एक साधारण धर्मोपदेशक मात्र रह जायेंगे। राणा प्रताप, शिवाजी, बंदा वैरागी, हकीकत राय, शिव, दधिचि, हरिश्चंद्र, प्रहलाद, लेनिन, गाँधी आदि को परम आदरणीय महापुरुष बनाने का महत्व उनकी कष्ट सहिष्णुता को है, यदि उन्होंने पग-पग कष्ट सहना स्वीकार न किया होता यदि उन्होंने कठिनाइयों और दुःखों को अपनाया न होता तो वे साधारण श्रेणी के भले मनुष्य मात्र रह जाते, महापुरुष का पद उन्हें प्राप्त न हुआ होता।

आकाँक्षा, जागरूकता और परिश्रम-शीलता से बड़े-बड़े कष्ट-साध्य कार्य पूरे हो जाते हैं तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे शीघ्र ही स्वल्प काल में और बिना कोई खतरा उठाये सफल हो जाते हैं। परमेश्वर बार-बार परीक्षा लेकर मनुष्य के अधिकारी होने न होने की जाँच किया करता है। स्कूलों में तिमाही, छमाही, नौमाही परीक्षाएं होती हैं इसके बाद बड़ी वार्षिक परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है उसे दर्जा चढ़ाया जाता है। ऐसे करीब डेढ़ दर्जन दर्जे पास करने पर ग्रेजुएट की पदवी मिलती है, सफलता की ग्रेजुएटी लेने के लिए भी मनुष्य को अनेकों खतरों, कष्टों, और निराशाजनक अवसरों की परीक्षायें देनी होती हैं। जो उत्तीर्ण होते हैं वे ही आगे बढ़ते हैं, मनोवाँछित सफलता का रसास्वादन करते हैं। जो इन परीक्षाओं से डर जाते हैं, उन्हें पार करने का प्रयत्न नहीं करते, वे उन्नति के शिखर पर नहीं पहुँच सकते। अभीष्ट सिद्धि की महत्ता को प्राप्त नहीं कर सकते।

सफलता की मंजिल क्रमशः और धीरे-धीरे पार की जाती है, कठिनाइयों से लड़ता, मरता, चोटें और ठोकरें खाता हुआ ही कोई मनुष्य सफल मनोरथ होता है। साइकिल की सवारी करने वाले जानते हैं कि चढ़ना सीखते समय कई बार उन्हें पटक खानी पड़ती है, तैरने वाले जानते हैं कि पानी में पैर देते ही वे तैराक नहीं बन जाते। कई बार तो दूसरों के द्वारा विघ्न डाले जाते हैं, कई बार दैवी प्रकोप के कारण अनायास ही कुछ अड़चनें आ जाती हैं, कई बार मनुष्य स्वयं भूल कर बैठता है। अपनी असावधानी या भूल के कारण असफल होना पड़ता है। अपनी भूलों को सुधारने के लिए प्रयत्न किया जाता है पर पुराने अभ्यास के कारण वे दोष फिर उमड़ पड़ते हैं, और बना बनाया काम बिगाड़ देते हैं। कई बार प्रयत्न करते हुए भी सफलता नहीं मिलती तो बड़ी निराशा होती है और खिन्न होकर मनुष्य अपने प्रयास को ही बंद कर देता है।

अपने स्वभाव को बदलने का पूरी शक्ति से प्रयत्न तो करना चाहिए पर यह आशा न करनी चाहिए कि इस दिशा में दो चार दिन में ही पूर्ण सुधार हो जायेगा। स्वभाव का अभ्यास धीरे-धीरे बहुत दिन में पड़ता है किसी दुःस्वभाव से पूर्णतया छुटकारा पाने या किसी अच्छी आदत के डालने में बहुत समय तक प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। यह प्रयत्न धैर्य एवं आशान्वित होकर करना चाहिए और जब भूलें हों तो अपने को अधिक सावधान एवं जागरूक करते हुए आगे से अधिक सावधानी बरतने का निश्चय करना चाहिए। रस्सी की रगड़ से जब पत्थर जैसा कठोर पदार्थ घिस सकता है तो कोई कारण नहीं कि हम अपने दोषों और दुःस्वभावों को परिवर्तित या नष्ट न कर सकें।

क्या कोई विद्यार्थी यह सोचकर पढ़ना छोड़ देता है कि मुझसे नित्य भूलें होती हैं, नित्य अध्यापक के सम्मुख मुझे दोषी बनना पड़ता है। भूलें करते हुए भी विद्यार्थी निरंतर अपना अध्ययन जारी रखता है। भूलों को भुला देता है और सफलताओं को स्मरण रखता है। परीक्षा में किसी विद्यार्थी को जब 80 प्रतिशत नंबर प्राप्त होते हैं तो वह फूला नहीं समाता। सब लोग उसकी प्रशंसा करते हैं। इस छात्र ने यद्यपि भूल भी की हैं, 20 प्रतिशत प्रश्न उसने बिलकुल गलत किये हैं। जितने सवाल उसने गलत हल किये हैं उतने अंशों में वह मूर्ख, बेवकूफ, लापरवाह, नालायक, दोषी, तथा असफल है। फिर भी इन दोषों की मात्रा के होते हुए भी-न तो वह विद्यार्थी स्वयं निराश होता है और न कोई उसकी निंदा करता है। क्योंकि उसने भूल की अपेक्षा सावधानी का परिचय अधिक दिया, असफलता से सफलता का पलड़ा भारी रखा है। इतना होना-ऐसा होना-सर्वथा प्रशंसनीय है। इसलिए आधे से अधिक नंबर लाने वाला, पास समझा जाता है उसकी पीठ ठोकी जाती है और प्रशंसा की जाती है। हमें इन विद्यार्थियों से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। छोटे बालक असफलताओं से नहीं डरते, उनको देखकर पस्त हिम्मत, परास्त, निराश, भयभीत, अस्थिर नहीं होते, वरन् इन छोटी असफलताओं की परवा न करते हुए अपना कार्यक्रम बराबर जारी रखते हैं और अंत में शिक्षा के उच्चशिखर तक पहुँच जाते हैं।

जो वस्तु जितनी टिकाऊ और मजबूत होती है उसके तैयार होने में उतनी देर लगती है, बाजीगर हथेली पर सरसों उगाकर तमाशा दिखाता है पर उस सरसों का तेल किसी ने नहीं निकलवाया है। वह हथेली पर उगी हुई सरसों कुछ ही देर बाद नष्ट हो जाती है। जो पौधे एक दो महीने में ही बहुत बड़े हो जाते हैं वे कुछ ही महीने जीकर नष्ट भी हो जाते हैं। मक्खी अपने जन्म से 60 घंटे बाद युवा हो जाती है और अंडे देने लगती है परंतु तीन सप्ताह में वह बूढ़ी होकर मर भी जाती है। इसके विपरीत आम बरगद जैसे जो पौधे धीरे-धीरे बढ़ते हैं वे बहुत दिन तक जीते हैं। मनुष्य का बचपन एक दर्जन से भी अधिक वर्ष रहता है। फलस्वरूप उसकी आयु भी लंबी होती है। फूँस की झोंपड़ी जल्दी बनती और जल्दी बिगड़ती है, पर वे मकान जो ईंट चूने से बहुत दिन में बन पाते हैं मुद्दतों खड़े रहते हैं धीरज, दृढ़ता और मजबूती के साथ जो कार्य सँभाल-सँभाल कर किये जाते हैं उनमें देर तो जरूर लगती है पर स्थायित्व अधिक होता है वे जल्दी नष्ट नहीं होते। इसलिए यदि कोई कार्य जल्दी ही पूरा न होता हो, प्रगति धीरे-धीरे होती हो, तो अधीर न होना चाहिए, निरंतर प्रयत्न करते रहने वाले को एक न एक दिन सफलता मिलकर रहती है।

कई बार आकस्मिक परिस्थितियाँ आड़े आ जाती हैं और बने काम को बिगाड़ देती हैं। सफलता की मंजिल पूरी हो चुकने के नजदीक होती है कि यकायक कोई ऐसा वज्र प्रहार हो जाता है कि सारे मनसूबे धूल में मिल जाते हैं। पूरा प्रयत्न करने, पूरी सावधानी बरतने, पर भी इस प्रकार के संकट सामने आ जाते हैं, जो बिलकुल ही आकस्मिक होते हैं पहले से उनकी कल्पना भी नहीं रहती। मृत्यु, विछोह, चोरी, अग्निकाँड, रोग, युद्ध, तूफान, वर्षा, शत्रु प्रहार,षडयंत्र, राजदण्ड, घाटा, वस्तुओं की टूट-फूट, विश्वासघात, अपमान, ठगा जाना, दुर्घटना, भूल आदि कारणों से ऐसी भयंकर परिस्थितियाँ सामने आ खड़ी होती हैं, जिनकी पहले से कोई संभावना ही न थी। जिन्हें ऐसी विषम स्थिति में होकर गुजरने का साहस, अनुभव या अभ्यास नहीं होता, वे यकायक घबरा जाते हैं किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं, उन्हें सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें क्या न करें। ऐसे अवसरों पर कई व्यक्ति पागल हो जाते हैं, कई आत्म हत्या कर बैठते हैं, कई घोर निराशावादी होकर कपड़े रंग लेते हैं या अन्य किसी प्रकार से भविष्य को अंधकार के गर्त में पटककर अर्ध विक्षिप्त अवस्था में दिन काटते रहते हैं।

यह स्थिति मनुष्य जैसे विवेकशील प्राणी के गौरव को गिराने वाली है। विपरीत परिस्थितियाँ मनसूबों में मिला देने की क्षमता रखती हैं। यह ठीक है, पर यह भी ठीक है कि सदा ही हर घास की ग्रीष्म की चिल–चिलाती धूप जला डालती है, उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि घास को धूप ने सर्वथा परास्त कर दिया, परंतु यह स्थिति सदा नहीं रहती क्योंकि विध्वंसक तत्वों की सत्ता बहुत ही क्षणिक एवं स्वल्प जीवी हुआ करती है। ग्रीष्म समाप्त होते ही वर्षा आती है और जली भुनी घास फिर सजीव एवं हरी-भरी हो जाती है।

जीवन जीने की यही सही रीति-नीति है कि सतत् अध्यवसायरत रहा जाय। असफलताओं से सीखा जाय, सफलताओं में उन्मत्त न हुआ जाय। स्वयं को सशक्त समर्थ बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझ कर ही जीवन संग्राम लड़ा जाता है।


दान (Kahani)

परमार्थ कार्यों में दान देने की वृत्ति भारतवर्ष में सदा से जीवित रही है। इसी आधार पर वानप्रस्थ-परिव्राजकों की ब्राह्मणोचित आजीविका भी चलती थी। कालाँतर में दान के नाम पर वेशधारी बाबाओं ने इस परंपरा को कलंकित कर दिया।

पंडित मदनमोहन मालवीय ने इसमें छाई विकृतियों को मिटाने का प्रयास किया एवं इस सदी के प्रारंभ में कई धनाध्यक्षों के मन में सत्प्रवृत्तियों के लिए उदारता जगाई।

रक्षा-बंधन का पुनीत पर्व था। बीकानेर नरेश का दरबार लगा हुआ था। राजद्वार पर ब्राह्मणों के मध्य मालवीय जी भी नारियल लिए खड़े थे। शनैः शनैः कतार छोटी होती जा रही थी। प्रत्येक ब्राह्मण नरेश के पास जाकर राखी बाँधता और दक्षिणा के रूप में एक रुपया प्राप्त कर खुशी-खुशी घर लौटता जा रहा था।

मालवीय जी का नंबर आया, तो वे भी नरेश के समक्ष पहुँचे, राखी बाँधी, नारियल भेंट किया और संस्कृत में स्वरचित आशीर्वाद दिया। नरेश के मन में इस विद्वान ब्राह्मण का परिचय जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। जब उन्हें मालूम हुआ कि यह तो मालवीय जी हैं, तो वह बहुत प्रसन्न हुए और अपने भाग्य की मन ही मन सराहना करने लगे। मालवीय जी ने विश्वविद्यालय की रसीद बही उनके सामने रख दी। उन्होंने भी तत्काल एक सहस्र मुद्रा लिखकर हस्ताक्षर कर दिये। नरेश अच्छी तरह जानते थे कि मालवीय जी द्वारा संचित किया सारा द्रव्य विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों में ही व्यय होने वाला है।

मालवीय जी ने विश्वविद्यालय की समूची रूपरेखा नरेश के सम्मुख रखी। उस पर सम्भावित व्यय तथा समाज को होने वाला लाभ भी बताया, तो नरेश मुग्ध हो गए और सोचने लगे, इतने बड़े कार्य में एक सहस्र मुद्राओं से क्या होने वाला है, उन्होंने पूर्व लिखित राशि पर दो शून्य और बढ़ा दिए, साथ ही अपने कोषाध्यक्ष को एक लाख मुद्रायें देने का आदेश प्रदान किया।


नवयुग का भवन बना बसंती


नवयुग का भवन बना बसंती (Kavita)

पूज्य गुरुसत्ता! बसंती रंग, तुम्हारा, रंग लाया। मिशन के सब परिजनों ने हँस, बसंती पट रँगाया॥

पुष्पवासंती-चमन, यह शांतिकुँजी-फल रहा है। सिलसिला-युग सैनिकों के, प्रस्फुटन का चल रहा है॥ जो खिला इस जगह उसने, मनुजता का मन खिलाया॥

है विभा मंडल बसंती-व्यक्ति ये बहुमूल्य हीरे। कार्य निष्ठा और लगन के, हृदय में जिनके जखीरे॥ माल जिनकी पहनने का, देव! तुमने मन बनाया॥

जाएँगे हर ग्राम ये, हर नगर और हर देश में भी। भरेंगे हर हृदय में, अवधारणा अपने मिशन की॥ वह बनेगा देवता-जो व्यक्ति इनके पास आया॥

प्राण में इनके भरी ऊर्जा, तुम्हारे ताप की है। पास इनके शुचि अमल संपत्ति, अपने जाप की है॥ यों मिले जप और तप तो, ज्ञान का सूरज उगाया॥

सद्गुणों, सद्भावनाओं की, चली बेरोक आँधी। जन्म फिर लेंगे हमीं में-बुद्ध, नानक और गाँधी॥ किया संस्कारित पवन को, यज्ञ हर घर में रचाया॥

देव पूजन नित्य करते, बोलते वैदिक ऋचाएँ। है प्रकाश मशाल का-तव जन्मदिन मिलकर मनाएँ॥ मनुजता का प्यार का सबने, विहँस कर गीत गाया॥

यों बसंती रंग से पोता भवन, इस नये युग का। हाँ, करेंगे हमीं कायाकल्प, दुख से, जीर्ण जग का॥ इसलिए देवात्माओं को, जनम लेने बुलाया॥

मायावर्मा


“साधनानुभूति”(Kavita)

तुमने ऐसी वेणु बजाई। जाग गई तरुणाई॥1॥

शक्ति सो रही थी बेसुध सी। भूली थी अपनी सुधबुध सी। तुमने ऐसा राग अलापा, धुन सुनकर लहराई। तुमने ऐसी वेणु बजाई॥2॥

तार-तार झंकृत कर डाले। उनके मोहक मंत्र उचारे। स्वर ने ऐसा रस बरसाया, तर कर दी अंगनाई। तुमने ऐसी वेणु बजाई॥3॥

शब्द-शब्द उतरे अंतर में! भाव-भवन के प्रिय प्राँतर में। छलके संवेदन के प्याले, भावुकता अंगड़ाई। तुमने ऐसी वेणु बजाई॥4॥

ताल और स्वर एक हो गये। श्वासों के स्वर टेक हो गये। छेड़ा ऐसा छंद आपने, तन्मयता गहराई। तुमने ऐसी वेणु बजाई॥5॥

स्वर फूटे समवेत स्वरों में। जनमंगल के स्वर अधरों में। चरण चल पड़े साथ तुम्हारे, गति ऐसी बौराई। तुमने ऐसी वेणु बजाई॥6॥

मंगल विजय ‘विजयवर्गीय’


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- (गुरुपूर्णिमा पर्व-1986) - देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें

परमपूज्य गुरुदेव का प्रस्तुत प्रवचन सूक्ष्मीकरण साधना के तुरंत बाद जन-साधारण के समक्ष पर्वों पर दिये गये उद्बोधनों में अंतिम व अत्यधिक महत्वपूर्ण है। गुरुपूर्णिमा 1986 के बाद वे कभी शाँतिकुँज के मुख्य मंच पर नहीं आए। आइए, 1995 क वसंत की पूर्वबेला में इस अमृत धारा में अवगाहन करें व कुछ निज की आत्म समीक्षा करें।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलें-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ अखण्ड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचम्। तत्पदं दर्शितम् येन तस्मै श्री गुरुवे नमः॥

देवियो, भाइयो! बहुत पुराने समय की बात है जब रावण सीता को चुरा कर ले गया था और सबके सामने यह समस्या थी कि उसका मुकाबला कैसे किया जाय? रावण से युद्ध कैसे किया जाय? बहुत सारे लोग थे, राजा-महाराजा भी थे, पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि रावण से लड़ने के लिए कौन जाये, अपनी जान गँवाये, कौन मुसीबत में फँसे? इसलिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। रामचन्द्र जी कहने लगे कि क्या कोई भी लड़ने हमारे साथ नहीं जायगा? तो फिर क्या हुआ? देवताओं ने विचार किया और कहा कि भगवान के काम में हमको सहायता करनी चाहिए और सुग्रीव की सेना में हनुमान की सेना में सम्मिलित होकर रावण से लड़ने के लिए चलना चाहिए। देवताओं ने बंदर का रूप बनाया, रीछ का रूप बनाया। कहाँ रावण और कहाँ बेचारे बंदर, दोनों का कोई मुकाबला नहीं था, फिर भी वे लड़ने के लिए चल पड़े, क्यों? क्योंकि वे देवता थे। देवता न होते, अगर रीछ-बंदर रहे होते तो पेड़ों पर कुदक रहे होते, मचल रहे होते, बच्चे पैदाकर रहे होते, कुछ और काम कर रहे होते, फिर वे सीता जी को छुड़ाने के लिए रामराज्य की स्थापना के लिए, लंका को तहस-नहस करने के लिए भला इस तरह के कार्य कैसे कर सकते थे? लेकिन उन्होंने किया। आप लोगों को मैं रीछ और बंदर के रूप में देवता मानता हूँ। आज फिर उस ऐतिहासिक घटना की पुनरावृत्ति होने जा रही है। आप लोग पहले जनम के देवता हैं। अकेले में जब कभी आपको शाँति का समय मिले-एकाँत का समय मिले तब आप अपने अंदर झाँक कर देखना कि आप रीछ-बंदर हैं या देवता हैं। वास्तव में आप देवता हैं। देवताओं के सिवाय आड़े वक्त में कोई और काम नहीं आ सकता, देवता ही काम आते हैं। आप लोगों में से हर एक को मुझे यही कहना है कि आपको जब कभी अपने आप में मौका मिले तो कहना कि गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुजी ने कहा था कि हमारे भीतर देवता बैठा हुआ है-देवता विराजमान है। देवता जो काम के लिए अपना जीवन लगाया करते हैं, जिसके लिए पुरुषार्थ हमारे सुपुर्द किया गया है।

एक बात तो मुझे आपसे यही कहनी थी। दूसरी बात यह कहनी थी कि जब महाभारत हुआ था, तब अर्जुन यह कर रहा था कि हम तो पाँच पाण्डव हैं और कौरव सौ हैं और उनके पास विशाल सेना भी है, जबकि हमारे पास सेना भी नहीं है-थोड़े से पाँच-पचास आदमी हैं। ऐसे में भला युद्ध कैसे हो सकता है। हम मारे जायेंगे। इसलिए वह बार-बार मना कर रहा था और कह रहा था कि महाराज हमें लड़ाइये मत, इसमें हमको सफलता नहीं मिल सकती। आप हिसाब लगाइये कि इनसे लड़कर हम फतह कैसे पा सकेंगे? जीत कैसे सकेंगे? तब भगवान ने उससे कहा था कि देखो अर्जुन, इन सबको तो मैंने पहले से ही मार कर रखा है और तुम्हारे लिए सिंहासन सजाकर रखा है। तुम पाँचों को सिंहासन पर बैठना पड़ेगा, राज्य करना पड़ेगा और कौरवों को मारना पड़ेगा। ये तो सब मरे-मराये रखे हैं, तुम तो खाली तीर-कमान चलाओगे इसी तरह जो काम मेरा था सो मैंने करके रखा है। इस युग को बदलने के संबद्ध में जो महत्वपूर्ण कार्य करने हैं उनके संबंध में आपको तो श्रेय भर लेना है। जीतना किससे है और हारना किससे है? न किसी से हारना है, न किसी से जीतना है। न किसी को मारना है और न कोई पुरुषार्थ करना है। आपको तो जो विजयी होने का श्रेय मिलना चाहिए और वही श्रेय आपको प्राप्त करना है। अर्जुन ने भी प्राप्त किया था। इससे पहले जब वह ज्यादा बहस करने लगा था कि मेरे बाल-बच्चे हैं, मेरा काम हर्ज हो जायेगा, फलाना हो जायगा, मुझे टाइम नहीं है, तब कृष्ण भगवान झल्ला पड़े और फिर उन्होंने एक हुक्म दिया-”तस्मात् युद्धाय युजस्व” लड़, दुनिया भर के बहाने मत बना-लड़ाई कर। भगवान हमारा क्या होगा? यह पूछने पर कृष्ण ने कहा था कि तेरी जिम्मेदारी हम उठाते हैं, तू तो युद्ध कर।

साथियों आज गुरुपूर्णिमा का दिन है, आप में से हर एक आदमी की देवता की जिम्मेदारी हम उठाते हैं। देवता जब रीछ-बंदर बनकर चले आए थे। तो पीछे उनके घर बीबी-बच्चे रह गये थे, कुटुम्ब हर गया था, उन सबको भगवान ने संभाला था। आपके घर को संभालने की, व्यापार को संभालने की, हारी-बीमारी को संभालने की जिम्मेदारी हमारी है और आपकी यह सब जिम्मेदारियाँ हम उठाते हैं। आप हमारा काम कीजिए हम आपका काम करेंगे। हम आपको यकीन दिलाते हैं, आप हमारा विश्वास कीजिए हम आपका काम जरूर करेंगे। पिता ने बच्चे का हम काम किया है। पिता से बच्चे ने जब जो माँगा है, दिया है। तुम तो छोटे बच्चे हो, इसलिए माँगते हो। आते ही यह माँगते रहते हो। अब आगे से जो भी कहना हो बेटे लिखकर दे जाना। लिखना और कहना बराबर है और फिर हमारा जवाब सुनते जाना और नोट करके ले जाना कि गुरुजी ने यह वायदा किया है कि चौबीस पुरश्चरणों का जो पुण्य पहले कमाया था उसका, और अब हमको तीन साल हो गये हैं, एकाँत मौन रहकर साधना की है, उसकी पुण्य संपदा जो हमारे पास जमा है, उसमें आपका हिस्सा बराबर है। माँ के पेट में जब बच्चा आता है तब कानूनन उसका हक बाप की जायदाद पर हो जाता है। इसी तरह हमारी कमाई पर आपका हक है। प्रार्थना मत कीजिए, निवेदन मत कीजिए, मनुहार मत कीजिए, वरदान मत माँगिये। आप अपना हक माँगिये कि हम आपका काम करते हैं और आपको हक चुकाना पड़ेगा। आप बीमार रहते हैं तो हम बीमारी को अच्छा करेंगे। आप पैसे की तंगी में आ गये हैं तो हम उस तंगी को भी दूर करेंगे। आप पर मुसीबत आ गयी तो हम आपकी ढाल बनकर उस मुसीबत को रोकेंगे।

श्री कृष्ण ने अर्जुन का रथ चलाया था, आपका रथ हम चलायेंगे। काहे का रथ? आपके कारोबार का रथ, आपके व्यापार का रथ, आपके धंधे का रथ, आपके शरीर का रथ, आपकी गृहस्थी का रथ यह सब हम चलायेंगे, इसका हम वायदा करते हैं, लेकिन साथ-साथ आपसे यह निवेदन भी करते हैं कि आप हमारे रास्ते पर आइये साथ-साथ चलिए। हमारे कंधे से कंधा मिलाइये। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं होगा। आप यह यकीन रखिये हमने उन विरोधियों को मार कर रखा है और विजय की माला गूँथ कर रखी है। पाँचों पाण्डवों के लिए विजय की मालायें बनी हुई रखी थीं, मात्र उनके गले में पहनाना बाकी था। आपके लिए भी मालायें रखी हैं, मात्र आपको पहनाना है, आपको श्रेय भर लेना है। यह जो नवयुग का क्रम चल रहा है, उसमें जब आप भागीदार होंगे तो श्रेय आपको ही मिलेगा। तो गुरुजी हमारे बीबी-बच्चों का क्या होगा? बेटे, उनकी जिम्मेदारी हमारी है। यदि वे बीमार रहते हैं तो हम उनकी बीमारियाँ दूर कर देंगे। व्यापार में नुकसान होता है तो तेरे उस नुकसान को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी है। तेरे व्यापार में जो घाटा पड़ जाय तो तू हमसे वसूल कर ले जाना, लेकिन जब बच्चा बड़ा हो जाता है तो कुछ बड़ी चीज दी जाती है जो छोटे बच्चे को नहीं दी जा सकती। अब आप जवान हो गये हैं। अब कोई बच्चा नहीं दिखाई पड़ता, आप सब जवान हो गये हैं। अब हम सबको काम-धंधे से लगायेंगे और जो हमारे पास बाकी बचा है वह भी आप सबको बाँट देंगे। नहीं गुरुजी जब आप जायेंगे तब अपनी कमायी भी अपने संग ले जायेंगे? बेटे, हम ऐसा नहीं करेंगे। हम आपको यकीन दिलाते हैं कि हमारी जो भी कमायी है वह सब आपको देकर जायेंगे चाहे वह पुण्य की कमायी हो, चाहे वह साँसारिक कमायी हो, चाहे आध्यात्मिक हो, उस कमायी में तुम्हारा हिस्सा है।

साथियों हमने जीवन भर दिया है। बाप-दादों की दो हजार बीघे जमीन थी, वह हम दे आये और स्त्री के पास जेवर था वह भी हम दान में दे आये। बच्चों की गुल्लक में पैसे थे वह भी हम दे आये। अब आपके पास कुछ और धन है? नहीं बेटे, धन के नाम पर एक कानी कौड़ी का लाखवाँ हिस्सा भी हमारे पास नहीं है। आपको तलाशी लेना हो या मरने के बाद पता लगाना हो कि गुरुजी के पास क्या मिला, तो मालूम पड़ेगा कि शाँतिकुँज में एक ऋषि रहा करता था, और यहाँ की रोटी खाया करता था, और सारे दिन चौबीसों घंटे काम करता था। बेटे, धन के नाम पर हमारे पास कुछ भी नहीं है, लेकिन हाँ एक पूँजी है हमारे पास, यदि वह न होती तो हम इतनी बड़ी बात क्यों कहते? हमारे पास वह पूँजी है तप की, जिसको हम सामान्य क्लास का कहते हैं। जिससे हम आपकी मुसीबतों में, कठिनाइयों में सहायता कर सकते हैं। दूसरा वह जिसमें हम आपको संसार का नेता बनाना चाहते हैं। हमको भगवान ने नेता बनाकर भेजा है। चाणक्य को नेता बनाकर भेजा था। वह नालंदा विश्वविद्यालय के डीन थे। अब्राहम लिंकन को, जॉर्जवाशिंगटन को, गारफील्ड को नेता बनाकर भेजा था। विनोबा को नेता बनाकर भेजा है। हम भी आप में से हर एक आदमी को नेता बनाना चाहते हैं, नेता बनाने की हमारी इच्छा है। आपकी इच्छायें क्या हैं, यह हमको मालूम हो या न हो तो आप लिखकर दे जाना। हमारा एक क्रम है। जब हम बैठते हैं तब देख लेते हैं। रात में हमारा क्रम पूजा-उपासना का रहता है। सबेरे से लेकर दोपहर तक हम अपना लेख लिखते हैं ताकि अखण्ड-ज्योति बीस साल तक बराबर निकलती रहे। बीस साल के लिए लेख और जो पुस्तकें लिखनी हैं, वह सब हम लिखकर रख जायेंगे। जब यह युगसंधि समाप्त होगी और सन् 2000 आयेगा, उस वक्त तक आप यह अनुभव करेंगे कि गुरुजी जो लिखकर रख गये थे, उनकी लेखनी में कोई फर्क नहीं आया, उनके अक्षरों में कोई फर्क नहीं आया। उनकी पुस्तकों में, पत्रिकाओं में कोई फर्क नहीं आया है। मिशन में कोई फर्क नहीं आया है और न ही आयेगा। दोपहर बाद तो अब हमने मिलना भी शुरू कर दिया है। पाँच-पच्चीस आदमी को ऊपर बुला भी लेते हैं। यह हमारा दोपहर से शाम तक का क्रम है। इस तरीके से कभी आयेंगे तो जब किसी को बहुत जरूरी काम हो तो मिल लेना। साँसारिक कठिनाइयाँ हों तो माता जी से कह देना। यह महकमा मैंने माता जी के जिम्मे कर दिया है। संसार की आपको जितनी कठिनाइयाँ हों, सब माता जी से कहियेगा। कोई आध्यात्मिक बात हो या कुछ ऊंचा उठना हो, समाज के लिए कोई बड़ा कदम उठाना हो तो फिर हमारे पास आना। बड़ा कदम नहीं उठाना है, अपनी कोई मुसीबत कहनी है तो माता जी से कह दें और कोई बड़ा कदम उठाना है तो हमारे पास आवें। हम आपके बड़े कदम उठाने में मदद करेंगे। हमने इस दुनिया में बड़े कदम उठाये हैं और बड़े कदम उठाने के लिए आपसे भी कहते हैं। दो बातें हो गयी हैं आप ध्यान रखना।

एक और बात मैं आपसे सबूत में आपको बताता हूँ जो विश्व के एक बहुत बड़े भविष्यवक्ता ने सैकड़ों वर्ष पूर्व कही थी। संसार में ऐसे भविष्य वक्ता तो बहुत से हैं जो हाथ देखकर यह बताते हैं कि तेरा विवाह कब होगा, पैसा कब आयेगा, कब क्या हो जायेगा। इसी तरह जन्मपत्री बनाने वाले तो बहुत से लोग हैं, किंतु दुनिया में एक भी व्यक्ति ऐसा हुआ है जिसने सारे संसार की राजनीति के बारे में लिख है जिसमें आठ सौ भविष्यवाणियाँ सही हो चुकी हैं। एक हजार वर्ष पहले हुआ था वह, नाम था नोस्ट्राडेमस। उसने ऐसी भविष्यवाणी की थी जो एकाएक सौ फीसदी सही हो जाती थी। ब्रिटेन का तब नामोनिशान नहीं था जब नोस्ट्राडेमस पैदा हुआ था। स्काटलैण्ड था, आयरलैंड था, इंग्लैण्ड था, पर ब्रिटेन नहीं था, लेकिन उसमें लिखा था कि ब्रिटेन बनेगा, इतने दिनों तक राज्य करेगा और सन् 1942 में इसका सीराजा बिखर जायेगा और तब जितना भी उसका राज्यमंडल है सब खत्म हो जायेगा। वह सब एक-एक अक्षर सही हुआ। यह तो नमूने के लिए बता रहा हूँ। उसकी ऐसी भविष्यवाणियाँ कवितामय पुस्तक में लिपिबद्ध हैं जिसे फ्राँस के राष्ट्रपति मितरा सिरहाने रखकर सोया करते हैं। उस कवितामय पुस्तक पर हजारों आदमियों ने टिप्पणियाँ की हैं। उसी में से एक आप अखण्ड-ज्योति के अगले अंक में पढेंगे जो उसने हिन्दुस्तान के बारे में की है। उसकी भविष्यवाणी है कि हिन्दुस्तान का अध्यात्म और पाश्चात्य का तत्व विज्ञान यह दोनों आपस में मिल जायेंगे पाश्चात्य भौतिक विज्ञान और अध्यात्म मिल जायेंगे। रूस और हिन्दुस्तान मिल जायेंगे। चीन से अमेरिका की लड़ाई हो जायेगी। आदि-आदि बहुत सी भविष्यवाणियाँ हैं। उन बहुत सी भविष्यवाणियों में से आपके काम की एक ही है कि हिन्दुस्तान सारी दुनिया का नेतृत्व करेगा जैसा कि आजकल अमेरिका कर रहा है। चाहे वह बम बनाये, चैलेंजर बनाये, स्टारवार की योजना बनाये, किंतु बाद का नेतृत्व भारत करेगा। हिन्दुस्तान को सारी दुनिया का नेतृत्व करने के लिए बड़े कर्मठ व्यक्ति चाहिए, बड़े शक्तिशाली और क्षमता संपन्न व्यक्ति चाहिए बेटे, तुममें योग्यता नहीं है तो तुम्हें योग्यता हम देंगे। तुम्हारी खेती-बाड़ी को ही नहीं संभालूंगा वरन् योग्यता भी दूँगा ताकि तुम संसार का नेतृत्व कर सको।

नालंदा विश्वविद्यालय की तरीके से हमने यहाँ नेता बनाने का एक विद्यालय बनाया है। नालंदा विश्वविद्यालय में चाणक्य जहाँ पढ़ाता था उसमें दस हजार विद्यार्थी पढ़ते थे एक साथ। हमारी भी इच्छा है कि हम दस हजार विद्यार्थी एक साथ पढ़ायें, पर यहाँ इतने विद्यार्थियों के लिए जगह नहीं है। अभी यहाँ कल तक साढ़े अट्ठाइस सौ आदमी थे, आज चार हजार हो गये हैं। ठूँस-ठूँस कर भी रखना चाहें तो चार हजार से अधिक व्यक्ति नहीं आ सकते, जबकि हमारा मन है कि जिस तरीके से चाणक्य दस हजार आदमियों को पढ़ाता था और पढ़ाकर के हिन्दुस्तान से लेकर सारे विश्वभर में अपने आदमी भेजता था। चन्द्रगुप्त को उसने चक्रवर्ती राजा बनाया था। हमारी भी इच्छा है कि ऐसे-ऐसे नेता बनायें, पर बना नहीं सकते क्योंकि जगह हमारे पास कम है। ऐसे में पढ़ा नहीं सकते। तो फिर क्या योजना है? कुछ नयी स्कीम है जो आज गुरुपूर्णिमा के दिन कहना है और वह यह है कि प्रज्ञा विद्यालय तो चलेगा यहीं, क्योंकि केन्द्र तो यही है, शक्ति का उद्भव यहीं होगा। जेनरेटर तो यहीं लगेगा, लेकिन जगह-जगह प्रज्ञा पाठशालाओं की स्थापना हमें करनी है। इसके लिए आप सब जितने भी आदमी हैं, उनको एक काम सौंपते हैं। एक महीने की प्रज्ञा पाठशालायें तो यहीं होंगी, पर पंद्रह दिन की पाठशाला क्षेत्रों में शक्तिपीठों पर चलेंगी। यहाँ बड़े साइज का प्रमाण पत्र उत्तीर्ण होने पर दिया जाता है, पर वहाँ छोटे साइज का दिया जायगा। परीक्षा ली जायेगी और वहाँ भी हम नेता बनायेंगे। आपको हम हिन्दुस्तान का ही नहीं, सारे विश्व का नेता बनाने वाले हैं। हिन्दुस्तान में हमने दस-दस गाँवों के खण्ड काटे हैं और उन्हें एक-एक व्यक्ति के सुपुर्द किया है और कहा है कि आप अपने यहाँ प्रज्ञा पाठशालायें चलायें। पिछले साल आप लोगों ने हमारे कहने पर किसी ने यज्ञ किये, किसी ने शक्तिपीठ बनाये, किसी ने क्या किया, हजारों काम बताये और लोगों ने किये हैं। इस वर्ष अब आप लोग यह विचार लेकर जायँ कि या तो हम प्रज्ञा पाठशाला चलायेंगे या चलवायेंगे। इस कार्य में कोई रुकावट नहीं आवेगी।

आज गुरुपूर्णिमा के दिन से आप लोग एक काम यह करना कि हमेशा यह अनुभव करना कि आप देवता हैं। रीछ-बंदर का लिबास पहने बैठे हैं। कोई कुर्ता पहने बैठा है, कोई धोती पहने बैठा है, कोई चश्मा लगाये बैठा है, तो कोई कुछ किये बैठा है, पर आप वास्तव में देवता जो किसी खास काम के लिए खास उद्देश्य के लिए किसी खास निमंत्रण पर आप काम करने के लिए आये हैं। यह हुई बात नंबर एक, दो जो आपको मुश्किल जान पड़ती है कि संसार में बुराइयाँ कैसे दूर होंगी? इस संबंध में नोस्ट्राडेमस की राजनीतिक भविष्यवाणी तो हमने बता दी है और अब अपनी स्वयं की भविष्यवाणी बताते हैं कि हमने आपके बैरियों को दुश्मनों को मार दिया है। वे मरे हुए रखे हैं और आपके लिए श्रेय जीवित है-सौभाग्य जीवित है। आपके लिए मुकुट जीवित है, बड़प्पन जीवित है, आप बड़प्पन को उठा लेना। आज आप से तीसरी बात यह कहनी थी कि नालंदा विश्वविद्यालय बनाने का हमने संकल्प लिया था कि एक लाख कार्यकर्ता हम देश को समाज को, विश्व को देंगे। इस काम में आप लोग हमारी मदद कीजिए और पंद्रह-पंद्रह दिन के लिए अपने यहाँ प्रज्ञा पाठशाला चलाने के लिए कोशिश कीजिए। हम वहाँ पढ़ने के लिए तो नहीं जायेंगे, पर अपनी शक्ति देंगे, अपनी बुद्धि देंगे, अपनी भावना देंगे इसलिए जब आदमी जायेगा तो कुछ का कुछ होकर जायेगा।

कितने काम हो गये तीन। एक और काम कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनना। हमने जो लड़ाई छेड़ी है वह दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध छेड़ी है और लंका दमन की छेड़ी है। यह काम बहुत बड़ा है और इसमें कुछ मुसीबतें भी आयेंगी, पर उन मुसीबतों को आप तक नहीं पहुँचने देंगे। उन मुसीबतों को अपने ऊपर लेते रहेंगे। राणा साँगा जो था, उसे जहाँ कहीं भी दीखता कि साथियों पर गाज गिरी, उनके ऊपर तलवार गिरी, वह भागकर वहीं आ जाता था और उनके बदले का भाला, तलवार अपने शरीर पर झेल जाता था। उसने ढेरों आदमी इस तरह बचा दिये थे। जब उसके शरीर पर अस्सी घाव हो गये तब वह बेहोश हो गया और अपना काम बंद कर दिया। अस्सी घाव खाने तक तो कोई भी मुसीबत आपके ऊपर नहीं आयेगी। मुसीबत आयेगी तो हमारे ऊपर आयेगी। पहले भी आयी थी। श्री कृष्ण भगवान के पास आयी थी। रामचन्द्र जी पर भी मुसीबत आयी थी। सीताहरण हो गया था। किसी का क्या हो गया। लेकिन हमारे ऊपर एक और तरह की मुसीबत आयेगी जिसकी जानकारी आपको देना चाहता हूँ। वह मुसीबत इस तरह की है जैसी कि कालनेमि ने पैदा की थी। कालनेमि रावण का कुटुँबी था। स्कंद पुराण में कथा आती है कि वह सबकी बुद्धि बिगाड़ देता था। बड़ा भाई कुँभकरण था। उसने योगाभ्यास किया, तप किया। वह चाहता था कि 6 महीने जगा करूं और एक दिन सोया करूं, लेकिन कालनेमि ने उसकी ऐसी बुद्धि बिगाड़ दी-भ्रष्ट कर दी कि कुँभकरण यह माँगने लगा कि 6 महीने सोया करूं और एक दिन जगा करूं। अगर वह 6 महीने जगा होता तो रावण का ढेर हो गया होता। इसी तरह मारीचि ने भी तप किया था। वह स्वर्ग चाहता था, पर कालनेमि ने उसकी ऐसी बुद्धि भ्रष्ट की और कहा कि तू यह मत माँग कि मैं स्वर्ग जाऊँ, वरन् यह माँग कि सोने का हिरन बन जाऊँ। कारण चमड़े वाले को तो मारता है एक आदमी पर सोने वाले को मारेंगे सौ आदमी। बेचारा छिपा-छिपा बैठा रहता था अपने वेश को बनाये। एक बार सोने का वेश बनाया, सो सीता जी के कहने पर रामचन्द्र जी ने उसे मार डाला।

कालनेमि की कथा सुना रहा हूं- स्कंद पुराण की आपको। पूतना के कोई बालक बच्चा नहीं था। कालनेमि ने उससे कहा कि तेरे बच्चा नहीं होता है तो तू जादू का मंत्र लेकर जा और श्रीकृष्ण को दूध पिला दे। तेरा दूध पियेगा तो अपनी मम्मी को भूल जायेगा और तेरे पास रहने लगेगा। कालनेमि के बहकावे में आकर पूतना बेचारी गयी कि मेरे बेटा नहीं होता तो बेटा ले आऊँ और बेटा तो मिला नहीं, उलटे थुक्का फजीहत और हुई। सूर्पनखा से कालनेमि ने कहा-तू ब्याह करेगी? उसने कहा हाँ। वह बोला-राक्षस तो काले-कलूटे होते हैं, माँस खाते हैं, शराब पीते हैं तुझे गाली भी देंगे और मारेंगे भी। हम तुझे ऐसा दूल्हा बताते है कि उससे खूबसूरत तुझे दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। बस तेरे जाने भर की देर है, तू गयी और ब्याह हुआ। दूल्हे का नाम राम है। उनके पिता के तीन ब्याह हुए थे, राम के भी दो ब्याह करा देंगे। सीता जी भी बनी रहेंगी और तू भी बनी रहेगी ओर राजगद्दी पर बैठेगी। तू गोरी होगी और तेरे बच्चे भी गोरे होंगे। सूर्पनखा कालनेमि के बहकाने पर रामचन्द्र जी के पास गयी और अपनी फजीहत कराकर लौटी। उसकी बुद्धि जो बिगाड़ दी थी कालनेमि ने। मंथर की भी बुद्धि बिगाड़ दी थी उसने-उससे कहा कि भरत के साथ तेरा ब्याह करा देंगे। ये जो कैकेयी है ये जायेगी मर और तू रानी बनेगी-राज्य करेगी उसको समझा करके भरत के लिए राज्य माँग ले। मंथरा की ऐसी बुद्धि बिगाड़ी कि उसने कैकेयी को पट्टी पढ़ा कर अपना काम बनाना चाहा। इस तरह दुनिया भर की अंडम-बंडम करके उसने मंथरा की भी मिट्टी पलीद की।

कालनेमि की जो यह घटना है वह हमारे ऊपर भी लागू होती है। हमारे प्राणों से प्यारे बच्चे, हमारे हृदय के टुकड़ों को अलग करके बहका करके हमसे दूर करने की कोई कालनेमि कोशिश कर रहा है। तो गुरुजी आपका नुकसान हो जायगा? नहीं, बेटा, हमारा क्या नुकसान हो जायेगा। अभी ये लड़के गा रहे थे-’कोई साथ न दे तो अकेला चल।’ अकेले चल देंगे हम। अकेले वामन ने सारी जमीन नापी थी। हमें भी दुख होता हैं जब कोई कालनेमि हमारे बच्चों को हमसे दूर कर देता है-बागी कर देता है। अपने ये चौबीस हजार बच्चे हैं उनकी हमें फिकर है कि कोई कालनेमि उनकी बुद्धि को भ्रष्ट न कर दे। कालनेमि से हमारा नुकसान है। उसकी हमें फिकर रहती है और कोई फिकर नहीं। न मिशन की फिकर रहती है और न मरने की-न काम की। मिशन बढ़ रहा है और वह बढ़ेगा ही। काम भी हो रहा है। उसकी फिकर थोड़े ही है। काम तो बढ़ ही रहा है। गंगा में बाढ़ तो आयेगी, रुकेगी नहीं। उसे कोई रोकने वाला नहीं है। मिशन के लिए हम नहीं कहते कि आप कोई सहायता कीजिए। कहते हैं तो इसलिए कि नफा होगा आपको आप नेता हो जायेंगे। सरदार पटेल, नेहरू, जार्ज वाशिंगटन, अब्राहमलिंकन बन जायेंगे। नेता बनना जिनको पसंद होवे आगे आयें, कदम से कदम और कंधे से कंधा मिलाकर चलें। साथ नहीं चलेंगे तो योग्य आदमी कैसे बनेंगे?

आज और कुछ नहीं कहना है, केवल इतना ही कहना है कि जो हमारे बच्चे हैं, जिनको हमने पैदा किया है, पाला है, वे हमारी छाती से अलग न होने पावें। आप हमारी छाती से अलग हो जायेंगे तो हमें बहुत दुख होगा। किसी और बात से हमें दुख नहीं होगा, पर जब वे छोटे-छोटे बच्चे-जिनसे हमने बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगाकर रखी हैं, वे अगर बागी होते दीखेंगे-विरोधी होते हुए दीखेंगे तो हमें बेहद दुख होगा। कालनेमि से तो कहना ही क्या है वह तो भगवान ने ही बनाया है। अगर वह न होता तो लंका का सत्यानाश नहीं होता? रावण सीताजी को नहीं चुराता जो कालनेमि की ही माया थी तो किसकी हिम्मत थी जो रावण सहित लंका का सफाया करता। जहाँ-कहीं भी कालनेमि गया वहीं हाहाकार पैदा किया। बस चौथी बात यही कहनी है कि हमारा कोई भी बच्चा हमारी छाती से अलग न होने पाये। कोई चोर, कोई बाबाजी इन्हें अपनी झोली में डालकर ले जायेगा तो हमको दुख होगा कि हमारा प्यारा बच्चा हमसे दूर हो गया। कितना कष्ट होगा आप नहीं समझते।

चार बातें हो गयीं बेटा अच्छा ध्यान रखना। हमने एक बात तो यह की है कि आप रीछ-बानर के रूप में देवता है। दूसरी यह कि तुम्हें श्रेय देने के लिए दुश्मनों को मारकर रख दिया है और तुम्हारे लिए राज सिंहासन बनाकर रख दिया है। तुम उसको ग्रहण करना। तीसरी बात यह कि तुम अपनी व्यक्तिगत कठिनाइयों के बारे में परेशान मत होना। तुम्हारी व्यक्तिगत कठिनाइयाँ कौन हल करेगा? हमारा पुण्य-हमारा तप करेगा। हमारा पुण्य जो पिछले समय से आया है वह हर एक के काम आयेगा और किसी के काम नहीं आयेगा। हमारा काम रुकने वाला नहीं है, वह बढ़ता ही जायेगा। बस आप तो अपने आपको कालनेमि से बचाये रखना। बहक जायेंगे तो हमें दुख होगा कि हमारा कैसा प्यारा बच्चा था। कितने प्यार और मोहब्बत से इसको हमने पाला था, और देखो आज यह कहाँ फिर हरा। चोरों के यहाँ फिर रहा है, भिखारियों के यहाँ फिर रहा है। कहाँ-कहाँ धक्के खा रहा है। ऐसा आप लोग मत करना। यह चार बातें कहनी थी आपसे बसंत पंचमी के बाद अब व्याख्यान दिया है। आज इतना ही बहुत है। इन्हीं बातों पर बार-बार विचार करना। आपके काम की देखभाल हम करेंगे। आप देवता हैं-ध्यान रखना आपको श्रेय लेना है-सिंहासन लेना है। आपको नेता बनना है और किसी झोली वाले बाबाजी से होशियार रहना है कि वह झोली में डालकर भाग खड़ा नहीं हो। बस आपसे विदा लेते हैं। ॐ शाँति


राष्ट्र के आर्थिक-साँस्कृतिक नवजागरण हेतु शाँतिकुँज की अभिनव शिक्षण सत्र योजना

श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर देश की मिट्टी से जुड़े एक ऐसे महाकवि थे जिनकी रचनाओं में “जननी जन्म भूमि” के प्रति श्रद्धा-समर्पण का भाव कूट-कूट कर भरा मिलता है। उनने ही लिखा है-”ओ आमार देषेर माटी, तोमार पाये ठैकाय माथा” (हे मेरे देश की मिट्टी मैं अपना मस्तक तेरे प्रति अवनत कर अपनी भावाँजलि तुझे अर्पित करता हूँ)। जिस देश की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था रही हो, जो अपनी रत्नगर्भा-हरीतिमा की चुनरियों से लदी ऐश्वर्यशीलता के कारण कभी विश्वभर में अग्रणी रहा हो, यदि आज वह अर्थाभाव के कारण निर्धनतम देशों में गिना जाता हो, प्रति व्यक्ति कर्जा जिस पर बढ़ता ही चला जाता हो तो उसकी आज की स्थिति पर एक विडंबना भरी दृष्टि डालने पर तरस भी आता है, आक्रोश भी। आखिर क्यों कर यह स्थिति हुई? हमारी आधुनिकता की होड़ में पीछे रहने के कारण या देश की माटी से जुड़े कार्य क्रमों की उपेक्षा होती रहने के कारण? विद्वज्जन बताते हैं कि भारत भौगोलिक स्थिति के नाते एक विलक्षण अनुदान प्राप्त एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जहाँ संसाधनों की कभी-कमी रही नहीं न रहेगी। किंतु इस विशिष्ट स्थिति में होने पर भी यदि वह उसका लाभ न उठा पाया, स्वदेशी के स्थान पर बहुराष्ट्रीयकरण ही इसका होता चला गया, ग्रामीण भारत को जिंदा रखने वाले कुटीर उद्योग समाप्त होते चले गए एवं शहरी सभ्यता के कोढ़ ने कस्बों व ग्रामों पर अपना अधिकार जमा लिया तो इसके लिए और कोई नहीं, हम ही, मात्र हम भारतवासी ही इसके एकमात्र उत्तरदायी हैं। भावीपीढ़ी को उत्तराधिकार में ऋणग्रस्त, भारी भीड़ से भरा प्रदूषित देश इक्कीसवीं सदी के इस शुभारंभ अवसर पर दे कर जाने के दोषी नागरिक भी हम ही हैं, कोई बाहर के लोग नहीं।

परमपूज्य गुरुदेव धर्मतंत्र से जुड़े एकमात्र ऐसे चिंतक-महापुरुष माने जा सकते हैं जिनने गाँधीवादी अर्थव्यवस्था के सहारे देश की माटी व जल को पावन, सुरक्षित रखने के कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता पर सतत् बल दिया व अनेकानेक कार्यक्रम “युगनिर्माण योजना” के शत सूत्री कार्यक्रम के माध्यम से वे हमें बता गए जिन पर अमलकर आज भी गरीबी के अभिशाप से मुक्ति तो पायी ही जा सकती है, शहरों को घिचपिच होने से बचाकर प्रदूषण, मुक्त बनाया तथा ग्रामीण समस्वरता का जीवन जीने के लिए अनेकों को प्रेरित कर इस राष्ट्र को सतयुगी स्थिति में ले जाया जा सकता है।

जब भी पर्यावरण-स्थूल व सूक्ष्म वातावरण को दृष्टिगत रख राष्ट्र के आर्थिक उन्नयन के कार्यक्रम बनाए जाते हैं, समाज को रूढ़िवादिता से मुक्तकर उसके सर्वांगीण विकास की बात सोची जाती है, वहाँ निश्चित ही सफलता मिलती है। मर्यादित, प्रजनन को लक्ष्य रख जब राष्ट्र निर्माण की योजनाएँ गैर सरकारी स्तर पर बनायी जाती हैं तो वे संकल्पनाएँ साकार होने लगती हैं, जिनके लिए आज सभी सरकार का मुँह ताकते हैं। एक छोटा-सा उदाहरण इजराइल का है जिसने अपनी नस्ल भी सुरक्षित रखी है, आबादी अनावश्यक बढ़ने भी नहीं दी है, मरुस्थल में सीमित जमीन में भी सहकारिता के कृषि के नूतन प्रयोगों द्वारा अपनी समृद्धि के द्वार स्वयं खोज लिए, चारों तरफ शत्रुओं से घिरा होने पर भी अपने अस्तित्व को बनाए रखा तथा आज सबके लिए एक उज्ज्वल भविष्य वाले राष्ट्र के रूप में एक ज्वलंत नमूना है।

अपने परिजनों को इतनी लंबी भूमिका बताने का आशय अपनी इस पत्रिका के माध्यम से किस समस्या से है व कैसे वे स्वयं को उससे जुड़े कार्यक्रमों में नियोजित कर राष्ट्र के नवोत्थान में सहयोगी हो सकते हैं यह समझने में संभवतः अब कठिनाई नहीं होगी। गायत्री परिवार के परिजनों को संधिकाल की इस विषमवेला में अब बहुत बढ़े-चढ़े दायित्वों का निर्वाह करना है, जिनमें प्रमुख हैं राष्ट्र का अभिनव निर्माण, उसकी सुरभि-सौंदर्य-हरीतिमा के साथ उसकी एकता-अखण्डता को बनाए रखने का पुरुषार्थ एवं इसके लिए व्यापक स्तर पर ऐसे कार्यक्रम जिनके माध्यम से धर्मतंत्र लोकमानस का शिक्षण कर उसे शिक्षित, सुसंस्कारी एवं स्वावलंबी बना सकें। प्रज्ञाअभियान की दससूत्री योजना के अंतर्गत परमपूज्य गुरुदेव ने पाँच रचनात्मक एवं पाँच सुधारात्मक कार्यक्रम को अंगीकार करने का सभी शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थान-सक्रिय प्रज्ञामंडलों-शाखाओं को निर्देश दिया था। जहाँ आस्तिकता संवर्धन के, आस्था संकट से जूझने के, पतन निवारण के प्रयोग सतत् चलते रहना चाहिए, वहाँ उनने राष्ट्र के पतन पराभव के कारण को समझते हुए योजनाबद्ध कार्यक्रम भी बताए थे। यदि दिलाने के लिए उन्हें यहाँ दुहरा दें-रचनात्मक कार्यक्रम-(1) हरीतिमा संवर्धन (2) स्वास्थ्य संवर्धन, आहार सुनियोजन एवं लाठी आसन व्यायाम जैसी गतिविधियाँ (3) शिक्षा विस्तार, साक्षरता का स्तर समानुपात में नर-नारी में बढ़ाना, (4) स्वच्छता-सामूहिक श्रमदान गंदगी की रोकथाम (5) कुटीर उद्योग स्वावलंबन सहकारिता के प्रयोग। पाँच सुधारात्मक कार्यक्रम हैं (1) नशा-दुर्व्यसन परित्याग आँदोलन (2) विवाह-शादी में अनावश्यक दर्शनात्मक खर्चों की रोकथाम, दहेज व नेग वाली शादियों का विरोध, आदर्श विवाह आँदोलन (3) समाज में बेईमानी को जन्म देने वाली फिजूल खर्ची-अपव्यय की वृत्ति, फैशनपरस्ती को निरुत्साहित करना (4) हरामखोरी व कामचोरी की वृत्ति पर नियंत्रण लगाने के लिए प्रतिरोधात्मक आँदोलन, राष्ट्र के प्रति निष्ठा बढ़ाने के व्यावहारिक कार्यक्रम (5) अंधविश्वास, मूढ़ मान्यताओं, कुरीतियों व अनीति से संघर्ष।

वैसे पूज्यवर ने बड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य में शत सूत्री कार्यक्रम भी युगनिर्माण योजना के अंतर्गत दिए हैं किंतु उपरोक्त दससूत्रों की परिधि में देश को गरीबी से मुक्त करने व स्वस्थ, सभ्य, स्वच्छ, समाज बनाने के सभी सूत्र आ जाते हैं। 1940 से प्रारंभ हुए गायत्री परिवार ने उपरोक्त दसों कार्यक्रमों में बड़ी व्यापक भागीदारी करते हुए काफी कुछ उपलब्धियाँ समाज को दी हैं, फिर भी वे काफी नहीं हैं। व्यावहारिक मार्गदर्शन के अभाव में परिजन कभी भटक जाते हैं, कभी स्थूल या चिकित्सालय खोलकर अपनी जिम्मेदारी पूरी हुई मानते हैं या मात्र उसी को समाज निर्माण का पर्याय मान लेते हैं।

शासन तंत्र व अशासकीय सामाजिक संस्थाओं की भागीदारी समान रूप से उपरोक्त कार्यक्रमों में हो, ऐसी पूज्यवर की इच्छा थी व उसी निमित्त “गायत्री परिवार” के रूप में एक समानाँतर ‘सशक्त’ धर्मतंत्र का एक ठोस स्तंभ खड़ा कर उनने आह्वान किया था कि और भी तंत्र इससे जुड़े व इन रचनात्मक कार्यक्रमों में युवाशक्ति, नारीशक्ति, व हमारे सृजन शिल्पीगणों की समूह शक्ति के साथ जुटकर कुछ कहने योग्य योगदान प्रस्तुत करें। प्रसन्नता की बात है कि दोनों ही ओर से सक्रियता उभरी। शासन तंत्र की ओर से कृषि विभाग ने एक नयी कृषि नीति के अंतर्गत विगत दो वर्षों में जलागम विकास के कार्यक्रम बड़े पैमाने पर लागू करना आरंभ किए। साथ ही ऋचा नामक एक स्वयंसेवी संगठन ने भी जन्म लिया जिसमें राष्ट्र को समर्पित अपने अपने विषयों में निष्णात लोकसेवी, कार्यकर्ताओं की भागीदारी हुई। हमारे राष्ट्र के वर्तमान कृषि सचिव श्री जगदीशचंद्र जी पंत (आय॰ ए॰ एस॰) जो पूज्यवर के चिंतक प्रवाह से काफी वर्षों से जुड़े थे, सक्रिय रूप से सतत् परामर्श भी तंत्र से करते रहते थे इन दोनों ही योजनाओं के कर्णधार के रूप में आगे आए व उनने जन-जन को इससे जुड़कर बेरोजगारी उन्मूलन, मिट्टी व पानी के संरक्षण, अल्पबचत, स्वावलंबन के कुछ व्यावहारिक, कार्यक्रम अपनाकर पूज्यवर के स्वप्नों को साकार करने का आह्वान किया। शासन की ओर से “ऋचा” संगठन उसके सहयोगी तंत्र के रूप में उभरा व जन समुदाय की ओर से “गायत्री परिवार” उसके संरक्षक के रूप में सामने आया व इस प्रकार चार स्तम्भों का निर्माण हुआ। गायत्री परिवार व ऋचा संगठन की भूमिका एक ही निर्धारित हुई शासन तंत्र के निर्धारणों से जन समूह को लाभान्वित कराना, शासन व जनता के मध्य एक पुल का ब्रिज का काम करना।

“ऋचा” शब्द अंग्रेजी के इन शब्दों के समन्वय से कुल चौबीस संस्थापक संरक्षक लोकसेवियों ने मिलकर निर्धारित किया था। “आर” से आशय है रिसर्च (शोध) “ई” से आशय है एक्सटेंशन (विस्तार) “ए” से आशय है ऐसोसिएशन (संगठन समूह) “सी” से अर्थ है कन्जर्वेशन (संरक्षण), “एच” से आशय है हॉर्टीक्लचर (बागवानी) एवं अंतिम “ए” सूचक है “एग्रोफारेस्ट्री” (कृषिवानिकी) का इस प्रकार “रिसर्च एण्ड एक्सटेंशन ऐसोसिएशन फॉर कन्जर्वेशन, हॉर्टीक्लचर एण्ड एग्रोफारेस्ट्री” इस पूरे भाव को लेकर यह स्वैच्छिक संस्था ग्रामीण अंचलों में वीरान क्षेत्रों को ग्रामवासियों के माध्यम से ही हरा-भरा करने के ऐसे कार्यक्रम लेकर आयी जिनका सरकार की कृषिनीति “वरसा” से पूरा तालमेल था तथा जिसके सभी निष्कर्ष वैज्ञानिक शोध के परिणामों पर आधारित थे। ऋचा, वरसा, गायत्री परिवार इन तीनों के समन्वय सहकार से एक प्रशिक्षण प्रक्रिया का प्रारूप बना जिसमें पूरे भारत के हर प्राँत के चुने हुए जिलों के कार्यकर्ताओं को जलागम विकास प्रक्रिया का प्रशिक्षण दिये जाने की योजना बनी। यहाँ वरसा शब्द की व्याख्या परिजन समझ लें। वाटर शेड से डब्ल्यू (ख) एरियाज से ए (्न) रेनफेड से आर (क्र) एग्रीकल्चरल से ए (्न) सिस्टम से एस (स्) एप्रोच से ए (्न) इस प्रकार बना खड्डह्ह्यड्ड वरसा शब्द बना। इसका अर्थ वारानी क्षेत्रों की राष्ट्रीय जलागम विकास परियोजना। वारानी यानी जलसिंचित (रेनफेड वाटर फेड)

तकनीकी शब्दों की व्याख्या के बाद प्रशिक्षण का एक ढांचा समझ लिया जाय। यह प्रशिक्षण मूलतः भारत के ग्रामीण-कृषि प्रधान परिवेश से जुड़ी परियोजनाओं का है जिनके माध्यम से न केवल सुधरी कृषि की तकनीकों द्वारा कम वर्षा या अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भूमि व जल का समुचित प्रबंध सीखा जाना है, अपितु पशुधन के विकास, उस स्थान के योग्य पौधशालाओं की स्थापना, नारीशक्ति व बेरोजगार वर्ग के योग्य उन्हें स्वावलंबी बनाने वाले छोटे-छोटे ग्रामोद्योगों एवं परियोजनाओं के संचालन की व्यवस्था भी सीखी जानी है। इन्हीं के साथ-साथ एक रुपया न्यूनतम प्रतिदिन बचत के अल्प बचत कार्यक्रम के माध्यम से व्यक्ति को अपने उपार्जन का सुनियोजन राष्ट्र की कल्याणकारी योजनाओं में करने की प्रेरणा देने के साथ संस्कार संवर्धन प्रक्रिया के माध्यम से उसे आने वाली समृद्धि के साथ आध्यात्मिक विकास को गतिशील रखने का बहुआयामीय जीवन कला वाला शिक्षण भी दिया जाता है।

इस जटिल प्रक्रिया स्तर पर बैठा अल्पशिक्षित अथवा निताँत निरक्षर एक औसत भारतवासी न समझ पाएं, इसके लिए लोकसेवी कार्यकर्ता वर्ग के लिए भारत सरकार के कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा “वरसा” योजना की निर्देशिका पुस्तिकाएँ प्रकाशित की गयी हैं, साथ ही ऋचा स्वैच्छिक स्वयं सेवी संगठन द्वारा भी हिंदी अंग्रेजी में पुस्तिकाएं प्रकाशित की गयी हैं, जिन्हें इस पते पर लिखकर मंगाया व अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है-”उदितयन” मानव भारती, पंचशील पार्क (दक्षिण), नई दिल्ली 110017। यहाँ पत्र द्वारा ऋचा के प्राँतीय चैप्टर के सदस्य बनने से लेकर पूरी परियोजना के सहभागी कैसे बनें, यह जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है। इन पंक्तियों में तो प्रारंभिक दिग्दर्शन भर है।

शाँतिकुँज में गायत्री परिवार के वरिष्ठ जिलास्तरीय स्तर पर सक्रिय नैष्ठिक परिजनों जो मूलभूत आचार संहिता से सुपरिचित हैं, के लिए 6 दिवसीय प्रशिक्षण सत्र इस क्रम से आयोजित किए गए (1) 5 दिसंबर से 10 दिसंबर 1994 की अवधि में पहला-उत्तर प्रदेश के छः मंडलों के एक सौ दो ब्लाकों के प्रायः दो सौ पचास कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण सत्र (2) 2 जनवरी 1995 से 6 जनवरी 1995 की अवधि में दूसरा मध्यप्रदेश के 44 जिलों के चुने हुए 250 कार्यकर्ताओं का सत्र (3) 9 जनवरी से 14 जनवरी 1995 की अवधि में तीसरा उत्तर प्रदेश का शेष जिलों का प्रशिक्षण सत्र। इनमें कृषि विभाग के उस राज्य के उच्च स्तरीय अधिकारियों तथा केन्द्रीय स्तर पर विशेषज्ञ अधिकारियों एवं ऋचा परियोजना के रीजनल चैप्टर सदस्यों की भागीदारी भी रही है। इस प्रकार पूज्यवर की तपःस्थली शाँतिकुँज संजीवनी साधना एक मास के युगशिल्पी प्रशिक्षण के साथ एक सुनियोजित विधा जलागम परियोजना के द्वारा राष्ट्र के आर्थिक विकास के कार्यक्रमों से भी जुड़ गयी। दो बड़े प्राँत मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के चुने हुए ब्लाकों में आरंभ हुई यह प्रक्रिया प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के द्वारा अब विभिन्न रूपों में दोनों प्राँतों के सभी जिलों में अश्वमेधिक अनुयाज क्रम में पहुँचा दी जाएगी, ऐसा विश्वास किया गया है।

इन कार्यक्रमों में सफलता कितने बड़े व्यापक स्तर पर मिली है, इसका अनुमान प्रथम जलागम विकास दीपयज्ञ के माध्यम से लगाया जा सकता है जिसका आयोजन कृषि विभाग “ऋचा” व शांतिकुंज के समन्वित प्रयासों द्वारा विगत 23-24 दिसंबर 1994 की अवधि में धनंजयतीर्थ उत्तर प्रदेश में किया गया। प्रायः 61 गाँव में विगत मार्च 1994 में आरंभ किए गये कार्य की सफलता का आकलन लगाए जाने के लिए इन सभी गाँवों के, जो कल्याणी नदी के बहाव क्षेत्र से जुड़े थे, सभी निरक्षर-साक्षर निवासियों तक आर्थिक विकास की इस योजना की जानकारी दी गयी, रजवंदन कार्यक्रम संपन्न किए गए तथा 23 दिसंबर को एक विशाल कलशयात्रा के बाद 24 दिसंबर के दीपयज्ञ में प्रायः दस हजार से अधिक ग्रामीणों ने भागीदारी कर राष्ट्र को समर्थ, स्वावलंबी एवं सुविकसित सुसंस्कारी-स्वच्छ बनाने का संकल्प जलते दीपों की साक्षी में लिया। दिये से दिये को जलाने की प्रक्रिया को सतत् चालू रखने व ऐसे छोटे-छोटे दीपयज्ञ प्रतिमास कई ब्लाकों के समूह बनाकर पूरे शिक्षण प्राँत में संपन्न करने के संकल्प भी लिए गए। शाँतिकुँज से व्यवस्थापक श्रीबलराम सिंह परिहार के साथ एक उच्चस्तरीय कार्यकर्ताओं की टीम के साथ, कृषि सचिव भारत सरकार श्री पंत जी कृषि वैज्ञानिकों एवं राज्य के सभी उच्च स्तरीय अधिकारियों ने इस यज्ञ में उपस्थित हो वह आरोपित होते देखा जो आने वाले दिनों में पूरे राष्ट्र में विकसित वटवृक्ष के रूप में दृष्टि गोचर होने लगेगा। यह तो पहला प्रयोग था किंतु ऐसे कार्यक्रम अब सभी प्रखंडों में योजना का पर्यवेक्षण पुनर्मूल्याँकन तथा ग्रामीण स्तर पर जानकारी के विस्तार के निमित्त संपन्न किये जाते रहेंगे।

आगामी प्रशिक्षण क्रम में अब मई 1995 के प्रथम पक्ष में उड़ीसा, अगस्त 1995 में महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिसंबर 1995 में असम एवं उत्तरपूर्व के सभी राज्य तथा राजस्थान एवं जनवरी 1996 में हिमांचल प्रदेश जम्मू-कश्मीर, पंजाब एवं हरियाणा के युगनिर्माण योजना से जुड़े कार्यकर्ताओं के छः दिवसीय सत्र आयोजित किये जायेंगे। कृषि विभाग भारत सरकार द्वारा यह समग्र अनुमोदित कार्यक्रम आ गया है एवं इस प्रकार जनवरी 1996 तक प्रायः दो तिहाई भारत तक ऋचा एवं गायत्री परिवार दो स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से उन्नत कृषि के माध्यम से राष्ट्र के आर्थिक विकास के विभिन्न कार्यक्रम पहुँच जायेंगे। शेष चार प्रति बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु एवं केरल में यह कार्य फरवरी 1996 के हाथ में लेकर दिसंबर 1996 तक पूरे भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरोकर उज्ज्वल भविष्य की एक झाँकी भारतवासियों को दिखाने का अपना मन है।

निश्चित ही जहाँ दैवी आकाँक्षा साथ हो, स्वेच्छा से आगे आकर कार्य करने वाले, प्रशिक्षण प्राप्त कर उसकी जानकारी जन-जन तक पहुँचाने वाले पुरुषार्थी परिजन साथ हों वहाँ परमपूज्य गुरुदेव का व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण का व इस माध्यम से राष्ट्र के अभिनव पुनर्जागरण साँस्कृतिक-आर्थिक-सामाजिक पुनरुत्थान का स्वप्न पूरा होकर ही रहेगा, इसमें किसी को संदेह नहीं करना चाहिए।


परम वंदनीय माताजी पर विशेष- - सेवा साधना की यह तड़प हममें भी आ जाय

अपने दिल में कसक हो, दूसरों का दुख दर्द खुद की पीड़ा बन जाय तो सेवा मनुष्य का स्वभाव बन जाती है। वंदनीय माता जी का यह कथन स्वयं उनके अपने स्वभाव का बोध कराता है। वह जब जहाँ रहीं, वहाँ के अड़ोसी-पड़ोसी हों अथवा घर में काम करने वाले नौकर, मजदूर, रिश्तेदार, कुटुँबी हों या मिशन के काम करने वाले कार्यकर्ताओं का समूह इन सभी की तकलीफों में बराबर की हिस्सेदार नहीं। उनकी सेवा-संवेदना न कभी जाति-पाँति के बंधनों में बँधी और न गरीबी-अमीरी के खाई-खंदकों में फँसी। सतत् एक ही दर्द उनमें समाया रहा कि पीड़ित की पीड़ा का निवारण कैसे हो भले ही इसके लिए उन्हें कुछ भी संकट क्यों न उठाना पड़े।

इतने पर भी उनका सेवाभाव कोरी भावुकता कभी नहीं रहा। इसके पीछे थी एक समग्र जीवन दृष्टि, एक मौलिक चिंतन-प्रणाली, जिसे अपना सकने पर जीवन चेतना-परमात्म चेतना की ऊँचाइयों को छूने लगती है। इसे उन्हीं के भावों में कहें तो “आत्म विकास की ओर अभिमुख गतिविधियों, क्रिया प्रणालियाँ अनेकों स्थानों पर प्रचलित हैं। अलग-अलग पथ अपने दायरे के अनुरूप इनका विशिष्ट स्वरूप घोषित करते हैं। सभी का अपना महत्व भी है, पर समग्रता की दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः एकाँगी मानना पड़ता है। समूची मानव प्रकृति को रूपांतरित कर सके, जिंदगी के हर हिस्से को दिव्यता से भरा-पूरा कर सके, ऐसी प्रणाली ढूँढ़ने पर शायद ही एक-आध मिले। जो मिलेगी भी, वह किसी विशिष्ट योग्यता की अपेक्षा रखती हुई। समग्रता के प्रश्न पर विचार करने पर सर्व जनसुलभ साधना प्रणालियों की खोज बीन कर विभिन्न विचारकों महापुरुषों, श्रेष्ठतम योगियों की दृष्टि एक ही बिंदु पर टिकती है और वह बिंदु-सेवा है।

इसके सभी आयामों को उन्होंने न केवल स्पर्श किया बल्कि जिया और अनुभव किया। उन्होंने सेवा कुछ पाने के लिए नहीं, बल्कि अपने अंदर उभर आए दर्द को कम करने क लिए की। बात उनके घिया मण्डी-मथुरा में निवास के दिनों की है। वही वैरागपुरा में एक विधवा स्त्री एक टूटी-फूटी कोठरी में अपने छोटे बच्चे के साथ रहा करती थी। उसका कोई सहारा न था। जिस किसी तरह गरीबी में दिन कट रहे थे। उसकी उम्र तो बीस बाईस वर्ष रही होगी, पर गरीबी की मार ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था।

बाजार में सामान खरीदते समय एक दिन माता जी की नजर उस पर पड़ गयी। क्या कुछ नहीं था इस नजर में। हृदय की अबूझ भाषा आँखों से वह निकली थी। एक ऐसी भाषा जिसे उन्होंने कहा और गुलाब देवी नाम की उस महिला ने सुना और समझा। वह उसको अपने घर ले आयीं। उसके बालक को स्कूल में भर्ती कराया। गुलाब देवी की आदत हर बात पर ‘ए जू’ कहने की थी। सो परिवार के सभी सदस्य उसे ‘एजू’ कहने लगे। माताजी उसे इसी नाम से पुकारती।

‘एजू’ भोजन पकाने में उनकी मदद करने लगी। परंतु उसका प्रारब्ध भोग अभी बहुत कुछ बाकी था। सो वह अक्सर बीमार रहती। उसके कई काम माता जी स्वयं करतीं। बाद के दिनों में उसे स्तन का कैंसर हो गया। उन्होंने उसे हर तरह के आश्वासन देकर किसी तरह सरोजनी नायडू अस्पताल आगरा भेजा। काफी दिन इलाज चला। आप्रेशन का खर्चा, सवेतन छुट्टी और बच्चे की पढ़ाई, के साथ अखण्ड ज्योति कार्यालय में काम की व्यवस्था उन्होंने की।

इतना करके ही वह संतुष्ट नहीं हुईं। बीमारी के दिनों में उसके हाथ-पैरों में मालिश जैसी सेवाएँ वह स्वयं करतीं। उनसे मालिश करवाना ‘एजू’ को अच्छा नहीं लगता था। रोकने का भरसक प्रयास करने पर भी जब वह सफल न होती तो रो पड़ती। उसकी आँखों से आँसू पोछते हुए वह समझाती-तू रोती क्यों है? यह सब मैं तेरे लिए थोड़े करती हूँ। फिर किसके लिए? गुलाब देवी की आँखों में आश्चर्य सघन हो उठता। अपने लिए उनके मुख से निकले ये दो शब्द आश्चर्य का अद्भुत समाधान थे। हाँ अपने लिए तू बीमार पड़ी है, यह देखकर मुझसे रहा नहीं जाता। जी तड़प उठता है, मन बेचैन रहता है क्या करूं और कुछ तो कर नहीं पाती, मालिश कर देती हूँ, तुझे खाना बनाकर दे देती हूँ, तो मन को तसल्ली मिल जाती है।

सच तो यही है उनकी ‘सेवा’ क्रिया की कुशलता में नहीं विवश, बेबस, व्याकुल भावनाओं में बसती थी। यों आजकल समाज सेवा एक फैशन के रूप में उभर चुकी है। न जाने कितनी सेवा संस्थाएँ कायम हो चुकी हैं, न मालूम कितने अस्पताल खुल चुके हैं। पर इनमें कहीं आध्यात्मिकता का भाव तो दिखाई नहीं देता। लगता यही है कि यदि इससे आध्यात्मिकता उभरती होती, आत्म-विकास की ओर जीवन गतिशील होता, तो सेवा करने वालों की संख्या के अनुरूप साधकों और योगियों की बाढ़ आयी होती, पर स्थिति ऐसी नहीं है। इस संदेह का समाधान करते हुए एक बार उन्होंने अपनी बात-चीत के दौरान कहा था-”यदि समाज-सेवियों की संख्या के अनुरूप आत्म विकसित लोग दिखाई नहीं देते हैं तो साधना के लिए तपस्या के लिए घर से निकलने वालों की संख्या के अनुरूप आत्मोत्कर्ष के धनी संत-महात्मा कहाँ हैं? इसका सीधा मतलब यही है कि बात को समझा नहीं गया। उसे ठीक ढंग से अपनाया नहीं गया।

किसी भी साधना प्रणाली में प्रवेश हेतु अनिवार्य योग्यता है, नैतिकता। पतंजलि हों या गोरखनाथ, कपिल हों या भगवान श्रीकृष्ण, लाओत्से, ताओ, बुद्ध, बाषो कोई भी क्यों न हों, इस अनिवार्य योग्यता के बिना अपनी प्रणाली में प्रवेश नहीं देते। यदि प्रवेश मिलता भी है, तो प्रवेशिका स्तर पर। इसे उत्तीर्ण किए बगैर, पूर्ण नैतिक हुए बिना साधना पद्धति में स्थान नहीं। लोक सेवा के लिए भी यही शर्त है। अनैतिक व्यक्ति कभी सच्चा लोक सेवी नहीं बन सकता।

प्रवेश पाने के बाद शुरू होता है, साधना क्रम। इसमें हठयोग जहाँ अपना समूचा ध्यान शरीर पर जमाता है। राजयोग मानसिकता में फेर-बदल करता है। तंत्र की गुह्य पद्धतियाँ प्राणिक जगत में परिवर्तन व रूपांतरण का रुख अपनाती हैं। किंतु इन तीनों आधारों में एक साथ निखार आए, ये शुद्धात्म चेतना का प्रवाह धारण कर सकें, ऐसी स्थिति नहीं बन पाती है।

लोक सेवा जिसे गुरुदेव ने साधना की समग्र प्रणाली कहा है, इसे अपनाने पर व्यक्ति के तीनों ही आधार न केवल सशक्त होते हैं, निखार आता है, वरन् समूची अंतर्शक्तियां अपने यथार्थ रूप में अभिव्यक्त होने लगती हैं। बात को और स्पष्ट करते हुए वह कहने लगे अपना शरीर पार्थिव चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका गुण है जड़ता। इस तमस् का सत्व में रूपांतरण ही अभीष्ट है। जिन्होंने लोकसेवा को साधना पद्धति के रूप में अपना लिया है, वे इसे प्रथम चरण में ही पा लेते हैं। क्योंकि सच्चे साधक को तो नाम, यश, विहीन क्रियाशीलता चाहिए। इसे ही तमस् का सत्व में रूपांतरण समझा जा सकता है। सारे आवेग, कामुकता, क्रोध, मोह, लोभ आदि प्राणिक स्तर पर अपनी जड़ जमाए रहते हैं। प्रचलित योगों के किसी भी साधक को इनकी जड़े उखाड़ने में पसीने आ जाते हैं। फिर भी कभी-कभी असफलता हाथ लगती है। विश्वामित्र, और दुर्वासा की कहानियाँ कौन नहीं जानता। सालों-साल की तपश्चर्या के बाद भी अनेकों बार काम-क्रोध के हाथों पराजित होना पड़ा, दूसरों का भी यही हाल हुआ।

जबकि अपने भाव में निष्ठा समाज सेवी इस स्तर को कुछ ही वर्षों में रूपांतरित करने में सफल हो जाते हैं। यह रूपांतरण, कामुकता का भावुकता में, क्रोध का बुराइयों के प्रति रोष में, मोह का प्रेम में, और लोभ का उदारता में हो जाता है। इसमें साम्राज्य रहता है कामनाओं का। एक के बाद दूसरी आ धमकती है। यही सिलसिला चलता रहता है। अन्य भागों के पथिक जहाँ अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद स्वर्ग या किसी स्वप्न लोक के सुख सपने नहीं छोड़ पाते। वहीं सेवानिष्ठ साधक सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना से ओत-प्रोत रहता है।

योग के विभिन्न मार्गों की चरम परिणति कैवल्य, स्थिति-प्रज्ञता, समत्व, एकात्मभाव को ही माना गया है। इसी की विभिन्न स्थितियाँ मुक्ति, जीवन मुक्ति, विदेह मुक्ति के नाम से जानी जाती हैं। विभिन्न योगियों की स्थितियाँ कब मिलती हैं यह तो पता नहीं, पर सेवानिष्ठ साधक अपने वर्तमान जीवन में ही इस परम लाभ से लाभान्वित होता देखा जाता है। लोभ, मोह, अहंकार से छुटकारा मिला कि उपरोक्त स्थितियाँ मिलीं। जिसने सर्वहित में अपने स्वार्थों की बलि दे दी उसे लोभ कैसा? वैयक्तिकता से उपराम जो सारे समाज को अपना परिजन, समूचे विश्व को अपना घर मानता है उसमें मोह की गुंजाइश कहाँ? सुहृदं सर्व भूतानां में जिसकी स्थिति है, जो स्वयं को विनम्र सेवक, औरों को सेव्य मानता है उसके पास अहंकार भला कैसे फटक सकता है। यही कारण है कि वह इसी जीवन में मुक्ति का परम लाभ प्राप्त कर जीवन मुक्त की स्थिति में आनंदित रहता है।

वंदनीय माताजी स्वयं तो इस आनंद से विभोर रही हों, औरों को भी उन्होंने दोनों हाथों से यह आनंद लुटाया। अनेकों की उन्होंने लोभ-मोह, अहंता की बेड़ियाँ तोड़ीं। इस तथ्य के सत्य होते हुए भी शंकाकुल मन सवाल करता है साधना की इस समग्र प्रणाली के रहते अपने ऊपर लोक-सेवी का लेबल चिपकाने पर भी जो लोग इसके लाभों से वंचित हैं, इसका कारण क्या है? स्वयं की खामीं, दो टूक जवाब था उनका। गरीबों को गले लगाने तथा कष्ट पीड़ितों की मदद करने की बात हर कोई करता है, लेकिन अपने आस-पास के ऐसे लोगों पर ध्यान देना अनावश्यक लगता है। जिन्हें वस्तुतः सहायता की आवश्यकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक घटना क्रम सुनाते हुए कहा था-मैं नाम तो नहीं लूँगी उनका, यद्यपि उस समय उनका बहुत नाम था। जब कभी हम लोगों को उनसे मिलना होता, वह यही कहते क्या बताऊँ आज अमुक मीटिंग में जाना है। आज दरिद्र बच्चों को दूध बाँटने का कार्यक्रम है। आज माताओं को बच्चों के पालन-पोषण का व्यावहारिक ज्ञान देना है।

एक दिन जब हम लोग (माता जी एवं गुरुजी) उनके घर पहुँचे तो वह घर पर नहीं थे। उनकी नौकरानी थी। वह उनके बंगले के पीछे वाले कमरे में रहती थी। उस दिन उसका बच्चा न्यूमोनिया के कारण बुरी तरह तड़प रहा था। मैंने पूछा-दवा दी। उत्तर में वह मौन रही। मैंने कहा-क्यों दवा क्यों नहीं दी? अपने साहब से कहती तो वे किसी के पास भेज देते। उनकी जान-पहचान के बहुत से लोग हैं। नौकरानी फफक कर रो पड़ी। बोली-दो दिन से कह रही हूँ। लेकिन हम गरीबों की सुनता कौन है? पैसे माँगे थे, वह भी नहीं मिले। बाद में सुनने को मिला-उसका बच्चा दवा न मिलने के कारण गुजर गया।

आजकल ज्यादातर लोग लोक सेवा का सिक्का अपनी प्रतिष्ठा जमाने के लिए उपयोग करते हैं। देखा यही जाता है उनके मन में दीन-दुखियों के प्रति करुणा और सेवा की बात तो दूर, नैतिकता से भी कोई वास्ता नहीं। लोक सेवा उनके लिए वीडियो फिल्म बन जाने, अखबारों में फोटो छपवाने का अच्छा माध्यम है। इस तरह की लोकसेवा का अगर विश्लेषण किया जाय तो वह मात्र फैशन साबित होती है। जिसके पास करने को कोई काम नहीं अथवा जो यह समझते हैं कि इस प्रकार समाज में कुछ इज्जत कमा लेंगे या जिसके पास पूर्वजों की कमाई हुई पैतृक संपदा है कि उससे आराम से निर्वाह हो जाय, वे लोकसेवा का मुखौटा लगा लेते हैं।

कहने का मतलब यह नहीं है कि लोकसेवा कोई करता नहीं। सच्चाई तो यह है कि निष्ठावान लोक सेवी आत्म प्रचार और अपनी सेवाओं का ढोल पीटने के स्थान पर मूक भाव से अहिर्निश जनसेवा में लगे रहते हैं। हमने भी इंसान को भगवान समझकर सेवा की है। सेवा करते गए और धन्य होते चले गए। उनका जीवन उनके इस कथन का प्रमाण है। गुलाब देवी जैसे अनेकों पीड़ितों के आँसू पोछना हो या लोकसेवा के विश्वव्यापी सरंजाम जुटाना हो हर कहीं उनमें आत्माहुति का भाव ही प्रबल रूप से सक्रिय रहा। एक तड़प जो उन्हें जीवन के अंतिम क्षणों तक बेचैन-विफल किए रही यदि हम लोगों को जनसेवा का व्रती बना सके तो समझना चाहिए कि जीवन मुक्ति का आनंद दूर नहीं। बस जरूरत इस बात की है कि जिन आदर्शों की स्थापना हम समाज में होते हुए देखना चाहते हैं उन आदर्शों को स्वयं हम अपने में उतारें। कथनी से नहीं करनी से अपने जीवन को उदाहरण के रूप में रखकर ठीक अपनी माँ की तरह।


रीता बनाना तो सीखें (Kahani)

रूस के महान विचारक आँस्पेंकी एक बार संत गुरजियफ के पास पधारे। गुरुजियफ जानते थे कि आँस्पेंकी अपने विषय का महान पंडित है। अतः सीधी बात करने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।

एक कोरा कागज थमाते हुए गुरजियफ ने आँस्पेंकी से कहा-”जो कुछ तुम जानते हो और जो नहीं जानते हो यह दोनों इस कागज पर लिख दो। जो तुम जानते हो उसकी चर्चा करना व्यर्थ होगा और जो तुम नहीं जानते हो उस विषय पर ही चर्चा करना उचित होगा।” बात एकदम सरल थी। परंतु शिष्य के लिए बड़ी कठिन हो गई। उनका ज्ञानाभिमान चूर हो गया। आत्मा, परमात्मा के विषय वे खूब जानते थे किंतु तत्वतः स्वरूप और भेद-अभेद के बारे में सोचा तक नहीं था। बहुत सोचा। अंततः कागज कोरा का कोरा लेजाकर गुरजियफ के चरणों में रख दिया और बोले महोदय “मैं कुछ भी नहीं जानता आपने तो मेरी आँखें खोल दी। विनम्रतापूर्वक कहे गये आँस्पेंकी के शब्दों से गुरजियफ बड़े प्रभावित हुए और बोले-

“ठीक है। अब तुमने जानने योग्य पहली बात जान ली कि तुम कुछ नहीं जानते” यह ज्ञान की प्रथम सीढ़ी है। अब तुम्हें कुछ सिखाया, बताया जा सकता है। रीते घड़े को भरा जाना संभव है। अहंकार से परिपूर्ण घट में तो बूँद भर भी नहीं भरा जा सकता।” हम स्वयं को रीता बनाना तो सीखें, तभी तो सुपात्र बन सकेंगे।


अपनों से अपनी बात- - अब यह पुकार अनसुनी न रहने पाए मूर्च्छना व व्यामोह कहीं श्रेयार्थी बनने से हमें वंचित न कर दे

त्रेतायुग का अंत का समय चल रहा था। दो महान प्रयोजन उन दिनों उस संधिकाल में संपन्न होने थे। एक अवाँछनीयता-असुरता का उन्मूलन, दूसरा-सतयुग की वापसी वाले उच्चस्तरीय वातावरण का रामराज्य के रूप में स्थापन। दोनों ही कार्य एक दूसरे के पूरक थे। इन महान प्रयोजनों में भगवान श्रीराम की आत्मसत्ता और शेषावतार श्री लक्ष्मण जी की पुरुषार्थ प्रधान कर्तव्य परायणता मिल−जुलकर संपन्न करने में एकनिष्ठ भाव से संलग्न थीं। दोनों प्रयोजनों का मध्याँतर राम-रावण युद्ध के रूप में चल रहा था। इसी बीच एक भयानक दुर्घटना घटित हुई। लक्ष्मण को शक्ति बाण लगा घातक तो नहीं था वह किंतु वे मूर्छित होकर गिर पड़े। अवतार सत्ता का लीला संदोह किसी की समझ में नहीं आ पा रहा था।

बात अवतारी सत्ता की आत्मशक्ति एवं पुरुषार्थ परायणता के समन्वय से ही बनने वाली थी। शालीनता रूपी सीता के अपहरण की परिणति स्वरूप जन्मी वह युद्ध की स्थिति मात्र इतने तक सीमित नहीं थी। यह नीति-अनीति व धर्म-अधर्म के अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न था। लक्ष्मण मूर्च्छना से उत्पन्न अर्धांग पक्षाघात जैसी स्थिति से तो उस अभीष्ट उद्देश्य में भारी व्यवधान उत्पन्न होने जा रहा था।

श्री राम सर्व समर्थ होते हुए भी लक्ष्मण जी के बिना स्वयं को असहाय अनुभव कर रहे थे। प्रश्न अवतारी सत्ता के पंगु होने का नहीं था। वह किसी स्थिति में हो सकती भी नहीं। किंतु क्या अनाचार इस सीमा तक बढ़चढ़ कर नीति पर हावी होगा कि वह स्वयं को असमर्थ अनुभव करें, यह सभी विचार रहे थे। किसी अवलंबन की आवश्यकता अवतारी सत्ता को भी पड़ती है। मनुज देहधारण करने पर व सज्जनों के सहकार की आवश्यकता इसी माध्यम से वे प्रतिपादित भी करते रहे हैं। आवश्यकता यह गुहार मचा रही थी कि लक्ष्मण की मूर्च्छना किसी तरह दूर हो। इसके लिए संजीवनी बूटी का कहीं से भी, किसी भी प्रकार लाया जाना अनिवार्य हो गया था। उसे हिमालय जाकर लाये कौन? वह भी इतने कम समय में ताकि चिकित्सा समय रहते आपातकालीन रूप में मिल सके, विलंब न हो जाय। कौन महाबली इस कठिन प्रयोजन को सँभाले? यह प्रश्न बड़ा जटिल था।

दैवी विभूति की तरह प्रतिभावतरण के रूप में हनुमान जी की साहसिकता उभर कर आयी। असंभव को संभव दिखाने की सामर्थ्य उनमें है, यह आत्मबोध उन्हें जामवंत जी ने कराया ही था। उनने ही यह बीड़ा भी उठाया, चल पड़े और समय की माँग पूरी करने के लिए प्राण हथेली पर रखकर जैसे भी बन पड़ा, संजीवनी बूटी लेकर समय पर वापस लौट आए। लक्ष्मण को वह दी गयी, मूर्च्छना जगी और संकट टल गया। दोनों भाई मिलकर वह करने में जुट गये जिसके लिए कि उनका अवतरण हुआ था। प्रयोजन दोनों ही संपन्न हुए। अवाँछनीयता से पीछा छूटा और वह भी बन पड़ा जो सतयुग की वापसी के लिए अनिवार्य था और अवतारी सत्ता के प्रकटीकरण का प्रयोजन पूरा करता था।

बात त्रेता युग की है, हजारों वर्ष पुरानी है, पौराणिक आख्यान सी लगती है पर उसका एक लघु संस्करण उदाहरण के रूप में हम सभी के समक्ष इन दिनों है। युगाँतरीय चेतना का दिव्य आलोक-देव संस्कृति दिग्विजय अभियान की श्रृंखला में इक्कीस मील के पत्थर पारकर दैवी आकाँक्षा की पूर्ति में जुटा हुआ है। इस महान प्रयोजन की पूर्ति के निमित्त प्रज्ञापुत्रों की सामूहिक संगठित शक्ति निर्धारित क्रिया–कलापों को-ऋषिसत्ता को दिए गये आश्वासनों को पूरा करने के निमित्त जुटी, जिसे तत्परता की पुरुषार्थ परायणता की प्रति रूप लक्ष्मण की सत्ता का पर्याय कहा जा सकता है।

दैवी आकाँक्षा व लक्ष्मण की तत्परता प्रतिभा की शक्ति का समन्वय यदि ठीक तरह से काम करने की स्थिति में रहा होता तो युगसंधि के पिछले दो वर्षों में इतना कार्य संपन्न हो चुका होता कि उसे देखते हुए इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण में किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती। किंतु किया क्या जाय? क्या कहें उस दुर्भाग्य को जो लक्ष्मण रूपी परिजनों की संयुक्त शक्ति को, तत्परता को, मूर्च्छना की स्थिति में ले गया, प्रतिभा को प्रस्तुत बनाता चला गया। जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था, उस अनुपात में प्रचारात्मक कार्य तो अत्यधिक हुआ अनेकों में आकाँक्षाएँ जागीं देवसंस्कृति के निर्धारणों के प्रति जागरूकता बढ़ी, किंतु उस परिमाण में प्रतिभाएँ निकलकर आगे नहीं आयीं। अश्वमेधिक पुरुषार्थ का लक्ष्य हो हल्ला मचाना नहीं था, अपितु अश्व जैसी गतिमान तीव्र-प्रखर मेधा को समाजोपयोगी बनाना था। क्या यह मेघनाद रूपी विग्रह का मायाजाल है जो आड़े समय में परिजनों के समक्ष उदासीनता-उपेक्षा के रूप में आ खड़ा हुआ है? जो वर्षों से सक्रिय-गतिशील-दोषों के समान प्रज्ज्वलित प्रतिभा संपन्न थे, उनकी पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता के रूप में सामने उपस्थित आ पड़ा है एवं समय का अभाव बताते हुए निजी वैभव विस्तार की महत्वाकाँक्षा के रूप में सामने दीख पड़ रहा है।

यहाँ किसी को निरुत्साहित नहीं किया जा रहा, न यह कहा जा रहा है कि पिछले दिनों कुछ भी कहने योग्य हस्तगत नहीं हुआ। ऋषि युग्म की सूक्ष्मता को उत्तर देने योग्य ऐसी कुछ उपलब्धि ‘परिष्कृत प्रतिभा’ के अवतरण के रूप में हम यदि उचित परिमाण में नहीं बता पा रहे हैं तो इसमें दैवी सत्ता के अनुदान-दैवी अनुष्ठान में किसी प्रकार की कमी की बात नहीं, अपितु इसे एक ऐसा दुर्भाग्य कह सकते हैं जो संभवतः प्रातः की उज्ज्वल लालिमा के उदय होने के पूर्व के अंधकार की तरह मात्र सामयिक ही है। आपत्तिकाल की चुनौती सामने होते हुए भी व्यामोह सामने उभरे और जिस तिस बहाने समर्थों के कन्नी काटने जैसी विडंबना चल पड़े तो इसे क्या कहा जाय? असुरता व दैवी सत्ता के संग्राम में इसे असुरता का आक्रमण ही प्रतिभाओं की मनःस्थिति पर हुआ मान सकते हैं। यह तो नहीं मानते कि यह उज्ज्वल भविष्य के आड़े आने वाला दुर्भाग्य है क्योंकि वह तो दैवी आकाँक्षा है, एक सुनिश्चित भवितव्यता है, प्रज्ञापुत्रों द्वारा नहीं तो किन्हीं के हाथों पूरी होनी ही है।

जो भी हो, एक बात स्पष्ट है कि राम रूपी प्रज्ञावतार की सत्ता दुविधा की स्थिति में खड़ी लक्ष्मण रूपी प्रतिभा को मूर्च्छना की स्थिति में पड़ी धीमी-धीमी श्वाँस लेती-पाश्चात्य सभ्यता का देव संस्कृति पर आक्रमण सामने होते हुए भी कुछ न करने की स्थिति में देख रही है। लक्ष्मण के धनुष-बाण यदि वह चमत्कार नहीं दिखा पाए जिसकी अपेक्षा महाकाल को है तथा जो आज का युगधर्म है, तो क्या असुरता जीत जाएगी? अवतारी सत्ता के धर्म की स्थापना का संकल्प अधूरा ही रह जाएगा? नहीं, किसी भी स्थिति में नहीं। यदि जाग्रत व्यक्ति भी बहानेबाजी गढ़कर अपनी भावनात्मक दुर्बलता पर समय की व्यस्तता का पर्दा डालने की विडंबना रचेंगे तो युग के श्रीराम की गुहार को सुनने हनुमान अवश्य आयेंगे। युग परिवर्तन की प्रक्रिया को संपन्न करेंगे अपने आराध्य के लिए उस दैवी आकाँक्षा को पूरा करने के लिए जो “संभवामि युगे-युगे” का आश्वासन देकर उसे चरितार्थ करती आयी है। लिप्सा, तृष्णा का, वासना-कुदृष्टि का आज का बाहुल्य भरा वातावरण बजरंगी पुरुषार्थी को कितना खल रहा है, यह ऋषि चेतना की वेदना के मर्म को जानकर भली भाँति समझा जा सकता है।

अब आने वाले बारह वर्ष में जो बसंत पर्व 2006 पर समाप्त होकर सतयुगी पराक्रम संपन्न होता देखेंगे, हनुमान की भूमिका निभाने वाले-लक्ष्मण रूपी प्रतिभा की मूर्च्छना जगाने वाले पराक्रमी-महाबलियों का समय है। 21 अश्वमेधिक पुरुषार्थ राजकोट यज्ञ तक पूरे हो चुके, 5 और संपन्न होकर सत्ताईसवें मनके के रूप में प्रथम पूर्णाहुति के रूप में आँवलखेड़ा में आराध्य देव-परम पूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली में संपन्न हो अपना प्रथम चरण पूरा करेंगे। जनवरी 1995 से लेकर नवंबर 1995 तक वह सब कुछ हो जाना है जिसे देखकर यह जाना जा सके कि पूज्यवर एवं स्नेहसलिला परम वंदनीय माताजी ने जो अपेक्षा परिजनों से रखी थी, वह कैसे पूरी होने जा रही है। 1996 से लेकर 2006 तक क्या कुछ होने जा रहा है, कैसे देवसंस्कृति बनने जा रही है इसका एक स्पष्ट “ट्रेलर” आगामी 10 माह में हम देख सकें, इसके लिए हनुमान जैसी “रामकाज कीन्हें बिन, मोहि कहाँ विश्राम” वाली जागरूकता व औरों को सोये लक्ष्मणों की मूर्च्छना मिटाने वाली संजीवनी ला सकने की आतुरता दिखाने का यही समय है।

संजीवनी बूटी कहाँ है, यह तो पता है किंतु सबसे बड़ी आवश्यकता उस हनुमान स्तर की भाव चेतना की है जो अभीष्ट पुरुषार्थ की पूर्ति करके बिगड़े काम को बनाने में संलग्न होकर अपनी वरिष्ठता और यशोगाथा को चिरकाल तक स्मरणीय बना दे, चर्चा का विषय बना दे। अनुकरणीय और अभिनंदनीय स्तर का पौरुष प्रदर्शन करने का ठीक यही समय है। निश्चित ही वह भावचेतना जागेगी एवं “प्रतिभाओं” को जाग्रत कर अश्वमेधिक अनुष्ठानों का लक्ष्य शत-प्रतिशत पूर्ण कर दिखाएगी, लक्ष्मण की मूर्च्छना टूटेगी एवं सामूहिक सज्जनता एक जबर्दस्त टक्कर देकर असुरता के मायापाश के बंधनों को समूल उखाड़ फेंकेगी। इस आशावादिता के पीछे अपने इष्ट पर उनके वचनों पर दृढ़ विश्वास तो है ही, साथ ही विशिष्ट स्तर के धर्मानुष्ठानों से स्थान-स्थान पर जाग्रत हुई तपः ऊर्जा के एकीकृत हो क्रमशः शक्ति पुँज के रूप में उभर कर आने का ऋषि सत्ता प्रदत्त पूर्वाभास रूपी सिद्धि भी है। फिर यह सब क्यों कहा जा रहा है? इसलिए कि इतिहास साक्षी है कि असमंजस-व्यामोह ही पौरुष प्रदर्शन में हमेशा आड़े आया है, इसीलिए बजरंगी, पुरुषार्थ के जागरण की हनुमान स्तर की, रामदरबार में जबर्दस्ती घुस पड़ने वाले पवनसुत के स्तर की, श्रद्धा समर्पण की, भावचेतना के जागरण की गुहार बारंबार लगायी जा रही है।

अर्जुन पर भी ऐसा ही व्यामोह एक बार सवार हुआ था। कर्तव्य युद्ध में कटिबद्ध होने से कतरा रहे अर्जुन को चित्र, विचित्र स्तर के बहाने सूझने लगे थे व नारायण को-अवतारी सत्ता को अंततः उसे कहना ही पड़ा-

क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वयुपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोतिष्ठ परंतप॥

अर्थात् “असमय में मोह को प्राप्त हुए हे परंतप! यह नपुँसकता तुझे शोभा नहीं देती। तू हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए कमर कस कर खड़ा हो जा।” यही नहीं योगीराज श्रीकृष्ण ने अर्जुन की दुनिया भर की मोहग्रस्त बहानेबाजी पर करारी चोट लगाते हुए यह भी कहा - ”अनार्य

जुष्टमस्वर्ग्यकीर्तिकरमर्जुन” अर्थात् जो कुछ भी तू कर रहा है और जैसा भी मानस बना रहा है वह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित नहीं है। वह तो अनाड़ियों जैसा है, साथ ही कलंक की कालिख पोतने वाला भी।” गीता के दूसरे अध्याय व तीसरे व द्वितीय श्लोक में जो उद्बोधन छिपा पड़ा है, वह आज के सभी मूर्च्छित लक्ष्मणों एवं मोहान्ध अर्जुनों के प्रति ही है, जिनमें विपुल प्रतिभा का भण्डार भरा पड़ा है किंतु साहसिकता अंदर से उभर कर नहीं आ पा रही है। श्रीकृष्ण के उद्बोधन ने अर्जुन की मूर्च्छना को झकझोर डाला और वह गांडीव उठाकर नये जोश के साथ रथ पर जो बैठा-यह कहते हुए-”स्थितोअस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव” द्वितीय अध्याय व अठारहवें अध्याय में काफी कुछ गीता ज्ञान भरा है किंतु उसे तभी समझा जा सकता है जब अर्जुन जैसी मनःस्थिति में पहुँच कर श्रीकृष्ण की शरण में बैठकर समझा जाय। संधिकाल की इस वेला में इस ज्ञान का इतना सार ही समझना काफी है कि ईश्वर की इच्छा के-दैवी आकाँक्षा के अनुरूप चलने में ही समझदारी है-शेष सारे तर्क बेकार हैं।

अब समय आ गया है जब हम सभी को देखना है कि अर्जुन में श्रीकृष्ण के शब्दों द्वारा तथा लक्ष्मण में हनुमान की साहसिकता द्वारा लायी संजीवनी द्वारा जो प्राण फूँके गए थे, वैसा ही कायाकल्प स्तर का परिवर्तन इन दिनों जीवंतों में हो सकता है कि नहीं। “जीवंत” की परिभाषा पूज्यवर के उस सद्वाक्य में दी गयी है-”जीवंत वे हैं जिनका रक्त गर्म, हृदय नर्म, मस्तिष्क ठंडा एवं पुरुषार्थ प्रखर हो।” साहसिकता तो हो किंतु आतुरता उतावलापन नहीं-ठण्डा मस्तक रखकर तनावग्रस्त न हों जो नर्म हृदय-संवेदनशील अंतःकरण के माध्यम से भावचेतना जगाते हुए अपने परमभक्त का संघर्षशीलता का प्रखर पुरुषार्थ का परिचय दे सकें व भवबंधनों से उबरकर देवमानव का जीवन जीने का आनंद ले सकें। समय की कसौटी संधिकाल की इस मध्य वेला में खरे-खोटे की परीक्षा करने के लिए हठपूर्वक सामने आ खड़ी हुई है। उसे न झुठलाया जा सकता है, न बहकाकर चलती किया जा सकता है।

अश्वमेधिक पराक्रम के इस क्रम में नये जीवंत प्राणवान व्यक्ति बहुसंख्य मात्रा में आगे बढ़कर आए हैं किंतु कार्य की व्यापकता को देखते हुए पुराने प्राणवान समझे जाने वाले, पूज्यवर एवं मातृसत्ता के हृदय के टुकड़े समझे जाने वालों की निष्क्रियता, चिंतन पर छायी अवसाद भरी मानसिकता, समय के साथ न चलकर चिरपुरातन बहिरंगी कर्मकाँडी स्वरूप तक सीमित रह कुछ आगे का न सोच पाने की दीर्घसूत्रता यह कह रही है कि अब पूर्णाहुति तक के शेष दस माहों का यह बहुमूल्य समय गँवाया न जाय। सक्रियता का अनुपात व स्तर बढ़ाया जाय तथा बदलते समय के अनुकूल प्रगतिशील चिंतन में स्वयं को नियोजित कर उन उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए स्वयं को तत्पर किया जाय, जिनसे युग परिवर्तन का उपक्रम पूरा संपन्न हुआ माना जा सके।

यश लूटने, नाम कमाने, समाचार पत्रों में स्मारिका में फोटो या नाम छपाने, कार्य समिति में अपना स्थान बनाने की होड़ के बजाय आदर्शवादिता के क्षेत्र में होड़ मची होती, सक्रियता के स्तर को बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा हुई होती, तो उपरोक्त पंक्तियाँ लिखने की संभवतः आवश्यकता न पड़ती। करना इतना भर है कि जितने व्यक्तियों तक महाकाल की सत्ता का संदेश श्रद्धाँजलि पर्व 1990 से लेकर 1994 की दिसंबर में संपन्न राजकोट अश्वमेध यज्ञ तक पहुँचा, उनको अनुयाज प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति-परिवार एवं समाज के अभिनव निर्माण के सूत्र हृदयंगम करा दिए जायँ। युग संजीवनी के रूप में, पूज्यवर की प्राणचेतना के रूप में, विद्यमान “अखण्ड ज्योति” पत्रिका “युगनिर्माण योजना” “युगशक्ति गायत्री” पत्रिका एवं पाक्षिक प्रज्ञाअभियान के माध्यम से व्यावहारिक कार्यक्रम देने वाली मार्गदर्शिका उन तक पहुँचा दी जाय। युगधर्म के परिपालन के निमित्त दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्यक्रम कैसे संपन्न हों, इनका प्रशिक्षण लेने के लिए अधिकाधिक को प्रेरित कर उन्हें कार्यक्षेत्र में लगा दिया जाय। नवंबर 1995 से दिसंबर 1996 तक के चौदह माह के समय को इसीलिए “अनुयाज वर्ष” घोषित कर पूरे भारतवर्ष की प्रसुप्त प्रतिभा का एक बार तीव्र मंथन करने का निर्देश ऋषियुग्म की सत्ता की ओर से मिला है। यदि हमने आगामी दस-चौदह इन चौबीस माहों का सदुपयोग कर अश्वमेधिक ऊर्जा का समुचित सुनियोजन कर लिया तो श्रेय-सम्मान के भागीदार तो हम बनेंगे ही, 600 करोड़ व्यक्तियों के भाग्योदय-नवयुग के अनुरूप उनके बदलने-ढलने रूपी पुरुषार्थ का एक नमूना भी प्रस्तुत कर सकेंगे आशा है, यह पुकार अनसुनी न रहेगी।

*समाप्त*