दो वस्तुओं के परस्पर घुल-मिल जाने पर तीसरी नयी वस्तु बन जाती है। नीला और पीला रंग यदि मिला दिया जाये तो हरा बन जाता है। रात्रि और दिवस के मिलन को संध्या तथा दो ऋतुओं की मिलन बेला को संधिकाल के नाम से पुकारा जाता है। अध्यात्म क्षेत्र में दो प्रमुख आधार आत्मतत्त्व की उपलब्धि के लिए है। योग एवं तप इन दोनों को सम्मिलित कर देने पर जो तीसरी आकृति सामने आती है, उसे सेवा कहते हैं। जहाँ आदर्शों के साथ तादात्म्य स्थापित करने की प्रक्रिया योग कहलाती है, वीं, लोभ, मोह, अहंकार विलास आदि बंधनों-कुसंस्कारों को निरस्त करने के लिए किया गया संघर्ष तप कहलाता है। यह संघर्ष सत्य प्रयोजनों के सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त ही किया जाता है।
योग व तप के दोनों सरंजाम जुट जाने पर सेवा भावना का उदय होता है। योग ये उदार आत्मीयता के रूप में परमार्थ परायणता की सदाशयता की अंतःप्रेरणा उठने लगती है। उसकी पूर्ति के निमित्त अपव्यय से शक्ति स्रोतों को बचाना और उस बचत को सदुद्देश्यों के निमित्त लगाना पड़ता है। यह नियोजन ही तप है। सेवा साधना में निरत व्यक्ति योगी व तपस्वी का सम्मिलित स्वरूप होता है, यदि यह कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं है।
अध्यात्म क्षेत्र में भज-सेवायाम् से ‘भजन’ शब्द बना है। भजन को सीधा-सादा एक ही अर्थ है सेवा। भजन-बातें दिखावा, कर्मकाण्ड, भक्ति का प्रदर्शन, जोरों से नामोच्चारण इत्यादि नहीं अपितु ‘सेवा’। सेवा भी किस की? इसका एक ही उत्तर है-आदर्शों की। आदर्शों का समुच्चय ही भगवान है। स्थायी सेवा वही है जिसमें व्यक्ति को पीड़ा से मुक्ति दिलाने साधन दिलाने के साथ अपने पैरों पर खड़े करने के साथ, इन सबके एकमात्र आधार आदर्शों के प्रति उसे श्रेष्ठतम बना दिया जाय। यही सेवा सच्ची सेवा है। उसे पतन निवारण व आदर्शों के साथ संयुक्तीकरण भी कह सकते हैं। दुखी को सुखी व सुखी को सुसंस्कृत बनाने का अत्याधिक आधार एक ही है आदर्शों को आत्मसात् करना। किसने कितना भजन किया, कितना आध्यात्मिक परिष्कार उनका हुआ, उसका एक ही पैमाना है। वह यह कि सेवा धर्म अपनाने के लिए उसके मन में कितनी ललक उठी-लगन लगी अन्दर से मन हुलस उठा। यही व्यक्तित्व का सही मायने में परिष्कार भी हैं
इसमें मंत्रणा की क्या आवश्यकता महाराज! महामंत्री बोधायन ने काँवी नरेश देवमित्र से नीति स्पष्ट की-राज परम्परा के अनुसार स्पष्ट की-राज परम्परा के अनुसार ज्येष्ठ राजकुमार को ही आपके बाद राजगद्दी का उत्तराधिकारी होना चाहिए।
सो तो ठीक है महामंत्री किन्तु हर परम्परा विवेक की कसौटी पर खरी सिद्ध हो, यह आवश्यक नहीं। शास्त्र यह भी तो कहता है कि देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार परम्पराओं को बदलते और उन्हें बुद्धि संगत रूप देते रहना चाहिए। सत्ता हर किसी को नहीं सौंपी जा सकती।
तत्पश्चात् सम्राट देवमित्र और महामंत्री बोधायन मंत्रणा करने लगे। देर तक विचार विमर्श हुआ। दूसरे दिन प्रातःकाल होने के साथ ही ज्येष्ठ राजकुमार सुरेश को बिना राज्याभिषेक के ही राजगद्दी सौंप दी गयी। प्रजा चकित थी न कोई उत्सव न अभिषेक यह कैसा राज्याभिषेक? किन्तु महाराज के निर्णय को कौन टाल सकता था। अभी राजगद्दी धारण किए हुए कुल पाँच घण्टे ही हुए थे कि एक ग्रामीण ने आकर दुहाई दी- महाराज न्याय कीजिए। आज स्वयं राजमाता ने हम गरीबों के झोंपड़े जलवा दिए। पहले दिन नहीं यह अन्याय! महाराज न्याय कीजिए।
सुरेश ने पूरी बात तो सुनी किन्तु उन्होंने वृद्ध ग्रामीण को न्याय देने की अपेक्षा डाँट लगाई और कहा रे दुष्ट! राजमाता के खिलाफ फिर कुछ कहा तो तेरी खाल उधेड़ दी जाएगी। ग्रामीण सहम गया और चुपचाप घर वापस लौट आया। यह समाचार राज्य में फैला हो या नहीं पर दूसरे दिन ही यह खबर फैली कि नीति निर्मात्री परिषद् ने राजकुमार सुरेश को गद्दी से उतार दिया है और उनके स्थान पर यहाँ मझले राजकुमार विरथ को राज्यासीन किया गया है। लोग इन आकस्मिक परिवर्तनों पर आश्चर्यचकित थे कुछ समझ नहीं पा रहे थे, बात क्या है?
दूसरे ही दिन फिर वही स्थिति! भरे राजदरबार में एक कलाकार ने आकर गुहार की, दुहाई हो दयावतार! महामंत्री ने मेरी समस्त कलाकृतियाँ पानी में यह कहकर फिंकवा दीं कि इसमें केवल सम्राट की मूर्तियाँ लग सकती हैं-देवी देवताओं की नहीं। यह अन्याय है, कला का अपमान है राजकुमार! न्याय कीजिए।
राजकुमार विरथ को महामंत्री के विरुद्ध अभियोग चलाने का साहस नहीं हुआ, पर उन्होंने मूर्तिकार की मूर्तियों का मूल्य चुका दिया और खबर कहीं भी न फैलाने का आदेश देकर वहाँ से भगा दिया।
तीसरे दिन राजकुमार विरथ भी गद्दी से उतार दिए गए और उनके स्थान पर तीसरे राजकुमार प्रताप गद्दी पर बैठाए गए। उसी दिन एक और पीड़ित ने पुकार लगाई “महाराज! यह क्या अन्धेर है, जब हमने एक बार राज्य कर अदा कर दिया तो पूर्व महाराज जो अब राजगद्दी पर भी नहीं है, देवमित्र ने हमसे कर क्यों माँगा? न देने पर इन्होंने हमें कोड़ों से क्यों पिटवाया?”
महाराज कुमार प्रताप तड़प उठे-मेरी प्रजा के साथ अन्याय! कोई भी क्यों न हो वह मेरे दण्ड से बच नहीं सकता। सैनिक जाओ और अपराधी देवमित्र को पकड़कर कैद अपराधी देवमित्र को पकड़ कर कैद में डाल दो। कल सुनवाई होगी। महामंत्री बोधायन ने टोका “राजकुमार यह आप अपने पिता के लिए कहते हैं?” प्रताप ने उत्तर दिया “शासनाध्यक्ष के समक्ष प्रजा का न्याय बड़ा है, पिता नहीं। पिता शारीरिक सेवा के अधिकारी हैं, न्याय से बच निकलने के लिए नहीं।
प्रातःकाल सम्राट देवमित्र दरबार में उपस्थित किए गए-बन्दी की वेषभूषा में। सारा अभियोग सुनने के बाद प्रताप ने कहा जितने कोड़े इस निर्धन किसान की पीठ पर लगाए गए हैं उतने कोड़े देवमित्र को लगाए जायें। सैनिक ने कोड़े बरसाए और राजकुमार देखते रहे। सजा समाप्त होने के साथ ही राजकुमार प्रताप गद्दी से उतर आए और महामंत्री से बोले “महामंत्री। मुझे अपने ही पिता को दण्ड देना पड़ा। ऐसा सिंहासन मुझे नहीं चाहिए।
किन्तु तभी महाराज देवमित्र हँसते हुए आगे आये और बोले बेटा! यह तो परीक्षा थी, इस राज्य के सच्चे उत्तराधिकारी की। तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। अब तुम्हीं इस साम्राज्य के सम्राट हो।”
उत्तरकाल का परमार्थ-परायण जीवन जीने वालों की मनःस्थिति सदैव उपवन के गुलाब की तरह होती है। प्रातःकाल की पवन लहरी आई और गुलाब को स्पर्श कर चली गई। पत्ते ने हँसते गुलाब को देखा, तो आग-बबूला हो गया। बोला-यह भी कोई जीवन है, माली आता है और असमय में ही तुम्हारी जीवन लीला समाप्त कर देता है, इतने अल्प जीवन में भी क्या आनन्द? मैं रोज देखता हूँ, कितने फूल खिलते हैं और मुरझा जाते हैं। गुलाब ने बड़े स्वर में उत्तर दिया-भाई-जीवन का अर्थ है-सच्ची सुगन्ध। इस प्रकार चारों ओर सुगन्ध को फैलाते हुये आमन्त्रित मृत्यु ही जीवन और अमरता है।
समस्याएँ-चारों ओर समस्याएँ यही आज के समाज का परिचय है। हर नए समाधान की कोशिश उसके औचित्य एवं अस्तित्व पर सैकड़ों सवाल उछाल देती है। जीवन के हर क्षेत्र में दुनिया के हर कोने में हर कोई अपने को विवश-अवश अनुभव कर रहा है। लगता है कोई बुनियादी भूल हो गई। कुछ ऐसा छूट गया जो जिंदगी का सारभूत तत्त्व है। मनीषी बी.डोनाल्ड ग्रे अपनी रचना ‘वन एण्ड मैनी’ में बताते हैं कि यह तत्त्व नैतिकता है। जिसकी हम उपेक्षा कर बैठें हैं। उनके अनुसार कोई भी समाज या राष्ट्र व्यक्तियों की नैतिक शक्ति पर ही पनपता है। इस शक्ति का ह्रास होते ही समस्याओं के रोगाणु समाज को जर्जर बनाने लगते हैं।
आज दुनिया में चारों ओर नैतिक शक्ति की गिरावट का स्पष्ट दर्शन होता है। कहीं भी किसी देश के नेतृत्व में यदि सर्वव्यापी चिन्ता का कोई विषय है तो वह है आज की सर्वव्यापी नैतिक गिरावट। जीवन के समस्त क्षेत्रों में चाहे वह राजनैतिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, सबमें नैतिक स्तर गिरा हुआ है। इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया का हर आदमी अनैतिक है। आज भी हर देश में ऐसे व्यक्ति है जिनकी नीति परायणता ऊँचे दर्जे की है लेकिन ऐसे लोग भी हैं जिनमें नीति-मर्यादा नाम की कोई चीज नहीं और ऐसों की संख्या ज्यादा है। चूँकि बहुजन की स्थिति पर ही समाज की स्थिति निर्भर रहती है और इसलिए आज समूचा समाज जराजीर्ण दिखाई देता है। ऐसी दशा में यदि सभ्य समाज का नवनिर्माण करना है तो उसमें नैतिक बल जगाना होगा।
लेकिन यह नैतिक शक्ति है क्या? इसका विश्लेषण करते हुए प्रख्यात चिन्तक एच.डी.लेविस फिलॉसफी ऑफ रिलीजन” में कहते हैं-विश्व में जीवन निर्माण के साथ जीवित रहने की भावना का निर्माण हुआ। पशु-पक्षियों में यह भावना जीवन व्यापी है। मानव के जीवन में इस भावना शक्ति के साथ विचार शक्ति ने जन्म लिया। मानव की बाल्यावस्था भावनामय अवस्था है। इसके बाद विचार शक्ति का उन्नत स्वरूप विवेक शक्ति है। मनुष्य में विवेक शक्ति जितनी बलवान होगी उतना ही उसका नैतिक स्तर ऊँचा और प्रभावशाली होगा।
विवेक मानव जीवन की निर्णयात्मक सर्वश्रेष्ठ शक्ति है। कौन-सा कार्य उचित है और कौन-सा अनुचित इसका निर्णय यही विवेक शक्ति करती है। यह शक्ति लौट लौटकर अपने विचारों से टकराती है और यदि विचार निम्न श्रेणी के हो तो विवेक न्याय-अन्याय का दर्शन करते हुए भी निर्बल रह जाता है और मनुष्य अन्याय मार्ग से कार्य करता है। उदाहरण के लिए इनसान कई तरह के व्यसनों में फँस जाता है। विवेक कहता है कि व्यसन खराब है हानिकारक है। पर व्यसन शक्ति बलवान रहती है। फलतः मनुष्य व्यसनों को त्याग नहीं सकता। दुनिया की किसी वस्तु को अनाधिकार ले लेना, यह अनुचित विचार है। विवेक कहता है कि यह अनुचित कार्य है पर उसकी आवाज निर्बल रहती है और मनुष्य अन्याय को जानते हुए भी जीवन में उसका अवलम्बन करता है। अतएव मनुष्य की विवेक शक्ति जितनी प्रभावी होगी, उतना ही उसका नैतिक बल प्रभावी होगा। अतः समाज के स्वस्थ नवनिर्माण के लिए सबसे पहले इस बात की आवश्यकता है कि मनुष्य की विवेक बुद्धि इतनी बलवान और जाग्रत हो कि वह अनुचित कार्य के मोह में न फँसे और जो न्याय दिखाई दे उसी मार्ग पर जीवन के निश्चय के साथ अग्रसर कर सके।
नैतिक शक्ति का मूल स्रोत यद्यपि मानव की अन्तस्थ विवेक शक्ति में है, पर यह अन्तस्थ शक्ति बाह्य स्थिति से प्रभावित हुआ करती है और बाह्य शक्तियाँ इस अन्तस्थ शक्ति को अपने अनुरूप ढालने का प्रयत्न किया करती है। ये बाह्य शक्तियाँ हैं। मानव समाज की सामयिक स्थिति और व्यवस्था।
समस्त मानव समाज का यदि अवलोकन किया जाय तो वहाँ नैतिकता मानव मात्र में किसी न किसी रूप में विद्यमान् दिखाई देगी। इस दृष्टि से इसको मानव समाज की सर्वश्रेष्ठ शक्ति कहा जा सकता है और इसकी बुनियाद पर ही नव मानव का एवं नए युग का निर्माण होना सम्भव हो सकता है। नैतिकता यदि विवेक पर आधारित हो विश्वव्यापी बनेगी तो वह आत्म शक्ति प्रेरित नैतिकता होगी। इसमें निर्भयता रहेगी। वहाँ आत्म प्रेरणा का स्रोत रहेगा और मानव को अपनी जीवनी शक्ति का एक नया अनुभव आयेगा। आज इस प्रकार की विश्वव्यापी नैतिकता की माँग संसार में बढ़ रही है और यद्यपि सब जगह राज सत्ता एवं संकुचित धर्म सत्ता की प्रबलता दिखाई देती है। पर इसमें कोई सन्देह नहीं कि आने वाला युग नैतिकता एवं विज्ञान शक्ति के समन्वय का युग होगा।
मनीषी विलियम रोज के ग्रंथ “एन आउट लाइन ऑफ माडर्न नॉलेज” के विचारों का उल्लेख करे तो नैतिकता के क्षेत्र में दो बातों का स्पष्ट दर्शन होना चाहिए (1) अपने मानवीय अधिकारों की रक्षण सामर्थ्य (2) हर कार्य में निर्भयता की वृत्ति। समाज में व्यक्ति के सुखों का और सामाजिक सुखों का समन्वय आवश्यक है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के बल व सुख भिन्न-भिन्न होते हैं और जिनके पास अधिक शक्ति है वे निर्बलों का शोषण करते हैं। निर्बल व्यक्ति शोषण को सहन करता है और जीवित रहता है। यह मानसिक अवस्था नीति युक्त नहीं। नीति का दर्शन वहाँ होगा, जहाँ व्यक्ति अपने सिद्धान्तों एवं अधिकारों की रक्षा करने में समर्थ होगा। और उसके लिए अपनी सारी शक्ति लगा देगा। यहाँ तक कि जीवन समर्पण तक के लिए तत्पर रहेगा, तभी नैतिकता का सही अवलम्बन व्यक्ति के जीवन में दिखाई देगा।
इतना ही नहीं इसके अंतर्गत अपनी अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ दूसरों के अधिकारों को रक्षा का भी समावेश होता है। शक्तिशाली व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा तो करता है पर वह निर्बलों का शोषण करके उनके अधिकारों पर आक्रमण करता है। सभ्य नीतिवान व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। अपने अधिकारों की रक्षा और अन्यों के अधिकारों का आदर उसका जीवन लक्ष्य रहेगा। इस लक्ष्य से ही व्यक्ति और समाज के सुखों का समन्वय होकर शान्तिमय कल्याण ब्रह्म समाज व्यवस्था स्थापित होगी।
नैतिकता का दूसरा लक्षण है, निर्भयता। धर्म और राज्यसत्ता से प्रभावित नैतिकता भय प्रेरित हुआ करती है। किन्तु स्वप्रेरित नैतिकता पूर्णतया निर्भय होती है। इसी ही स्थाई और सच्चे होने की संज्ञा दी जा सकती है। भययुक्त नैतिकता की आड़ में मनुष्य छिपकर अनुचित कार्य करने वाला व्यक्ति असत्य का आश्रय लेता है और जब सारा समाज असत्य की बुनियाद पर नीतिवान बनने का दावा करता है तब अनीति सर्वव्यापी बस जाती है और समाज निःस्वत्व बन जाता है।
स्वप्रेरित नीतिवान व्यक्ति प्रथमतः अनुचित कार्य करेगा ही नहीं। पर किसी भी स्थिति में कर भी डाले तो उसे निर्भयता से स्वीकार कर लेता है। ऐसा करना यद्यपि समाज की दृष्टि से उचित भले न हो पर नीति की दृष्टि से अनुचित न होगा। कोई व्यक्ति भावनावश या अन्याय के प्रतिकार में किसी का खून कर डालता है पर उसकी विवेक शक्ति इतनी बलवान होती है कि वह थाने में जाकर अपने अपराध को स्वीकार करता है। शासन और धर्म के नाते भले ही उसका कार्य अनुचित हो। परन्तु यदि वह निर्भयता से स्वीकार करता है तो व्यक्ति नीतिवान ही कहा जायेगा।
विख्यात चिन्तक टेलीहार्ड द वार्डिन के ग्रंथ एक्टीवेषल ऑफ एनर्जी की भाषा में कहें तो निर्भयता का दर्शन मानव जीवन की आकांक्षाओं की पूर्ति में भी होता है और कार्य की सफलता के लिए उचित साधनों के प्रयोग में भी नैतिकता के क्षेत्र में साध्य की अपेक्षा साधनों की शुचिता का अधिक महत्त्व होता है। नीतिवान व्यक्ति किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए अनुचित साधन का उपयोग नहीं करता है। ऐसी हालत में उसे निर्भय वृत्ति का परिचय देना ही पड़ता है। अनुचित साधनों का प्रयोग निर्भयता के साथ प्रायः नहीं किया जाता। अतः निर्भयता जीवन के कार्य क्षेत्र में बहुत बड़ी शक्ति है और वह शक्ति व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में नीतिमय बनाए रखने में सहायक होती है।
मानव जीवन में अनेक गुणात्मक शक्तियाँ होती हैं। इन सारी शक्तियों की जड़ भी निर्भयता में है। जिस व्यक्ति के जीवन में भय है वह दृढ़तापूर्वक सदा सत्य का पालन नहीं करत सकता, न वह अहिंसा का उपासक हो सकता है और न क्रोध को ही वश में रख सकता है।
सन्मार्ग के अवलम्बन के लिए अनेक गुणों के समन्वय की आवश्यकता है। जीवन की पवित्रता और जीवन की श्रेष्ठता सन्मार्ग पर अवलम्बित है। व्यक्ति और समाज दोनों की महानता व्यक्ति के गुण समन्वय पर आधारित है। सारे सद्गुणों की शान्ति का स्रोत नैतिकता है। नैतिकता में से ही अनेक गुणों का प्रवाह स्रावित होता है, तो जीवन सरिता की सर्वत्र समस्या रहित बनाए रखता है। समाज को आज सर्वाधिक आवश्यकता जीवन के सर्वव्यापी क्षेत्र में नैतिक जीवन का अवलम्बन जन-जन द्वारा उसका दृढ़तापूर्वक पालन है। इसी में व्यक्ति और समाज दोनों ही समस्याओं के नागपाश से पूरी तरह छुटकारा पा सकते हैं।
सरिता के सुरम्य पट पर सुशोभित प्रतिष्ठित शिवलिंग और धोबी का एक पत्थर दोनों कभी एक पर्वत उपत्यिका से साथ-साथ चले थे। कालगति ने एक को शिव प्रतिमा बना दिया, तो दूसरे को धोबी का पत्थर। धोबी का पत्थर आत्महीनता अनुभव कर दुःखी होता। उससे एक दिन रहा नहीं गया, शिवलिंग को सम्बोधित कर कहा-तात आप धन्य हैं। देव मन्दिर में प्रतिष्ठित है। भव-बन्धनों में जकड़े प्राणी आपके पास आकर कितनी शान्ति, कितना संतोष अनुभव करते हैं। काश! यह पुण्य सुयोग हमें भी मिलता।” शिव-लिंग आत्म प्रशंसा सुनकर गंभीर हो उठे। बोले- “तात! आपका दुःख करना निरर्थक है, आप नहीं जानते हम तो मात्र यहाँ आने वाले लोगों को क्षणिक शान्ति और शीतलता प्रदान करते हैं। आप तो निर्विकार भाव से हर किसी का मैल धोते रहते हैं। आप की साधना धन्य है। मेरे पास आने की प्रथम कसौटी तो आप ही हैं। इसीलिये जब लोग मेरी उपासना करते हैं, तब मैं आपकी किया करता हूँ। घाट का पत्थर गदगद हो उठा और दुगुने उत्साह से लोगों का मैल धोने लगा।
मस्तिष्कीय क्षमता के चमत्कार पग-पग पर सामान्य लोक व्यवहार में दृष्टिगोचर होते हैं। सूझबूझ वाले बुद्धिमान मनुष्य हर क्षेत्र में आगे बढ़ते और सफलता पाते हैं। इसके विपरीत मूढ़मति और मंदबुद्धि लोग अनुकूल परिस्थितियाँ रहने पर भी पिछड़ी स्थिति में पड़े रहते हैं। जीवन की गहन समस्याओं को सुलझाने में और आत्मोत्कर्ष का लाभ प्राप्त करने में भी मनःस्थिति की प्रखरता ही लाभ देती है। ज्ञान तंतुओं के माध्यम से यह तत्त्व समस्त शरीर में फैला हुआ है। मस्तिष्क उसका केन्द्रीय कार्यालय है। एक वर्कशॉप है। यह सुविस्तृत ज्ञान-विस्तार अध्यात्म की भाषा में मनः चेतना कहलाता है। बौद्धिक प्रगति के लिए आमतौर पर स्कूली प्रशिक्षण तथा दूसरी तरह के उपाय काम में लाये जाते हैं, पर मनःचेतना के आध्यात्मिक उपचार साधनात्मक है। उनके माध्यम से मनःशक्ति विकसित और परिष्कृत की जाती है।
इस संदर्भ में वैज्ञानिक अनुशीलन ध्यान देने योग्य है। आज से तीन सौ वर्ष पूर्व शारीरिक रोगों का कारण ऋतु प्रभाव एवं विषाणुओं का आक्रमण माना जाता था। नवीनतम शोधें शरीर पर पूरी तरह मनःसत्ता का अधिकार मानती है और बताती है कि बाह्य कारणों से उत्पन्न हुए रोग तो शरीर की जीवनी शक्ति स्वयं ही अच्छे कर लेती है अथवा मामूली से उपचार से वे अच्छे हो सकते हैं। जटिल रोग तो आमतौर पर मनोविकारों के ही परिणाम होते हैं। उनका निराकरण औषधि प्रयोग से नहीं, मानसिक परिशोधन से ही सम्भव हो सकता है।
शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों का भी यही प्रधान कारण है। दुष्कर्म अथवा दुर्बुद्धिग्रस्त व्यक्ति शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों से भी ग्रसित रहते हैं। उन्माद जैसी स्थिति में न आये, तो भी असंतुलन से ग्रस्त व्यक्ति विक्षिप्तों जैसी दशा में पड़े रहते हैं। ऐसे लोगों की मनःस्थिति कितनी दयनीय होती है, यह देखने भर से कष्ट होता है। शारीरिक व्यथाओं से पीड़ितों की अपेक्षा मनोरोगों से ग्रस्त लोगों की संख्या ही नहीं, पीड़ा भी उनकी अधिक है। इन व्यथाओं से छुटकारे का उपाय अस्पतालों में नहीं, साधनाओं पर ही अवलम्बित मनः परिष्कार प्रधान है। वे उपाय-उपचार अन्य प्रकार भी हो सकते हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उसे मनःचेतना की परिष्कार साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
शरीर विज्ञान के अध्येता जानते है कि मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए तन्तु सारे शरीर में फैले हैं। उन्हीं के माध्यम से इस जटिल यंत्र का संचालन होता है। इन्द्रियों की क्रियाशक्ति, अनुभूतियाँ, सरसताएँ मस्तिष्क में ही जाकर खुलती है। इन्द्रिय गोलक तो मात्र सूचनाएँ संग्रह करने और उन्हें मस्तिष्कीय केन्द्रों तक पहुँचाने भर का काम करते हैं। कोई मानसिक कष्ट होने पर सारा शरीर शिथिल हो जाता है और क्रियाशक्ति में स्पष्टतः अस्त–व्यस्तता दीखने लगती है। भय चिन्ता, शोक, निराशा जैसे प्रसंगों पर किसी भी व्यक्ति का चेहरा उदास और सारा शरीर शिथिल देखा जा सकता है। क्रोध, अपमान, द्वेष, प्रतिशोध की स्थिति में किस प्रकार अंग-प्रत्यंगों में उत्तेजना आ जाती है, इसे किसी आवेशग्रस्त पर छाए उन्माद को देखकर सहज ही पता लगाया जा सकता है। और निश्चिन्त रहने वाले स्वस्थ रहते और दीर्घजीवी बनते हैं। इसके विपरीत क्षुब्ध रहने वाले दुर्बल हो जाते हैं और अकाल मृत्यु से असमय मरते हैं। यह तथ्य स्पष्ट करते हैं कि शरीर उससे कहीं अधिक भाव-संस्थान का होता है।
शरीर में स्नायु मंडल द्वारा नलिका वित्तीय ग्रंथियों द्वारा भावनाएँ क्रियाशील होती हैं। हमारे सम्पूर्ण शरीर में स्नायुओं का जला बिछा हुआ है। सामान्यतः स्नायु उज्ज्वल वर्ण होते हैं और तार की तरह ठोस होते हैं। शरीर की समस्त इन्द्रियाँ स्नायुओं के ही मुख्य स्नायु सुतली की तरह मोटा होता है। फिर उसकी अधिकाधिक पतली होती चली जाती है।
सम्पूर्ण स्नायु मंडल के दो भाग हैं-ऐच्छिक और अनैच्छिक। चलने-फिरने झुकने-मुड़ने वस्तुएँ उठाने रखने आदि की क्रियाओं में अपने हाथ-पैर आदि का इच्छानुसार हिलाते हैं। यह स्नायुओं के ही कारण है। अनैच्छिक स्नायुओं पर हमारा ऐसा अधिकार नहीं होता। वे शरीर की आन्तरिक क्रियाएँ सम्पादित करते हैं जैसे हृदय की धड़कनें साँसों का चलना आदि।
अनैच्छिक स्नायु मंडल का केन्द्र मस्तिष्क का एक लघु अंश हाइपोथेलेमस होता है। यही अवयव नारी व पौरुष ग्रंथियों का नियंत्रित करता है, साथ ‘मानोअमीन आक्सीडेज’ नामक ऐंजाइम भी सम्पूर्ण शरीर में विकीर्ण होते हुए भी केन्द्रीय स्नायविक प्रणाली में विशेष रूप से जमा रहता है। हाइपोथेलेमस द्वारा पिट्यूटरी ग्रंथि भी उत्तेजित होती है और उससे विभिन्न हारमोन्स निकलते हैं, जो दुर्भावनाओं का परिणाम भी होते हैं और सद्भावनाओं का कारण भी। किसी नई परिस्थिति के उपस्थित होने पर नलिका विहीन ग्रंथियों पर दबाव पड़ता है और वे विभिन्न हारमोन्स को स्रावित करती हैं। इन हारमोन्स की शरीर में प्रतिक्रिया होती है और यह प्रतिक्रिया उसी के अनुरूप भावना समूहों को जन्म देती है, जैसे किसी रोग के कीटाणुओं के संक्रमण दबाव से पिट्यूटरी ग्रंथि ने कोई हारमोन छोड़ा, इससे शरीर में तेज हलचल मच गई, व्यक्ति को अव्यवस्था और अशान्ति महसूस होने लगी और वह बीमार पड़ गया। इस बीमारी की दशा में तरह-तरह की भावनाएँ, जो अचेतन मन में दबी थीं, उभरने लगीं। उनके परिणाम स्वरूप अनेक प्रकार की शारीरिक प्रतिक्रियाएँ भी पैदा होने लगती है।
मनःचेतना का निवास मस्तिष्क में बताये जाने का अर्थ केवल इतना ही है कि उसका केन्द्रीय कार्यालय वहीं है। उसके सूक्ष्म अवयव, उसकी शाखा प्रशाखाएँ तो सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त-विस्तृत हैं। मस्तिष्क के कोषाणु अन्य कोषाणुओं से अधिक समझदार और अधिक अनुभवी होते हैं, इसीलिए वे शेष कोषाणुओं के नेता कहे जाते हैं। वे जिस दिशा में चलते हैं, शेष कोषाणु भी उसी दिशाधारा में बहने के लिए बाधित हो जाते हैं। सम्पूर्ण सूक्ष्मशरीर को स्वस्थ प्रसन्न, उल्लसित, प्रगतिशील बनाये रखने के लिए मस्तिष्कीय स्थिति वैसी होनी जरूरी है। नेता ही निराश, हताश, कुण्ठित हुआ, तो प्रगति की क्या आशा की जा सकती है। नेता का संवेग समस्त अनुयायियों को प्रभावित करता है।
वियना के मनःचिकित्सक डॉ. फैंकल का मत है कि मानसिक धरातल की शारीरिक स्वास्थ्य का आधार है। मानसिक असंतुलन का कारण जीवन की सार्थकता को न समझना है-ऐसा वे मानते हैं। इसीलिए उन्होंने ‘लोगोथेरेपी’ या अंतर्बोध चिकित्सा नाम की चिकित्सा पद्धति विकसित की है। डॉ. फैंकल की मान्यता है कि जिस व्यक्ति को अपने जीवन और कार्य की सार्थकता का बोध नहीं हो, वह स्वस्थ नहीं रह सकता। मनुष्य जीवन के लक्ष्य और उनकी सिद्धि ही आनन्द का आधार है-ऐसा उनका विश्वास है। इसीलिए उनकी चिकित्सा प्रणाली में रोगी से प्रिय-अप्रिय सभी विषयों पर चर्चा कर उसे जीवन की सार्थकता की तलाश प्रेरणा दी जाती है। व्यक्ति को जैसे ही जीवन में सार्थकता की अनुभूति हो उठती है, वह अपने भीतर निहित शक्तियों का स्मरण कर आत्मविश्वास से भर उठता है और धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगता है। मनःक्षेत्र की स्वस्थता उसके स्थूल शरीर को भी स्वस्थ बना
देती है।
सूक्ष्म शरीर की हलचलों का स्थूल शरीर पर स्पष्ट एवं निश्चित परिणाम होता है। तंत्रिकीय रोगों का कारण दबे हुए गन्दे विचार ही होते है। शरीर शास्त्री भी अब इस मत का समर्थन करने लगे हैं। उनका तो यहाँ तक कहना है कि मात्र मानसिक चित्रों के आधार पर ही अनेक शारीरिक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है। ‘इम्पैक्ट ऑफ माइन्ड आन दि बाड़ी सिस्टम’ नामक पुस्तक में डॉ. एम.पियरगेट लिखते हैं कि जटिल व्याधियों से लेकर फोड़े, फुंसी, एग्जिमा जैसे चर्म रोगों का कारण मात्र मानसिक क्षोभ तथा भावनात्मक उद्वेग होते हैं। मानसिक क्षोभ, भावनात्मक उद्वेग, निषेधात्मक चिन्तन, सूक्ष्म शरीर की विकृतियाँ हैं, जिनका स्थूल शरीर पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण, स्वस्थ-उदात्त चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म शरीर को तेजस्वी व प्रखर बनाती है और उसका श्रेष्ठ प्रभाव भी स्थूल शरीर पर स्पष्ट देखा जा सकता है। विज्ञान और मनोविज्ञान के क्षेत्र में पिछले दिनों इस सम्बन्ध में अनेकानेक प्रयोग किये गये। उनसे इस संदर्भ में किसी प्रकार की शंका की गुँजाइश एकदम समाप्त हो गई कि चिन्तन का तदनुरूप प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता।
अब तक किये गये ऐसे ही विविध आधुनिक प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया है कि मन का, मस्तिष्क का कष्ट प्रत्येक कोषाणु को कष्ट में डाल देता है। घृणा, ईर्ष्या, द्वेष का अनिष्ट प्रभाव समस्त कोषाणुओं में तुरन्त दौड़ जाता है। इन प्रभावों को यदि रोका जा सके, तो स्वस्थता की गारण्टी दी जा सकती है। शरीर वेत्ताओं ने पिछले दिनों ऐसे कुछ प्रयोग किये, जिनसे यह स्पष्ट हो गया कि विज्ञान के सहारे भी मस्तिष्कीय विकृतियों को दूर कर पाना संभव है। आधुनिक विज्ञान इसे विधा को ‘ब्रेन वाशिंग' कहकर पुकारता है। साधना विज्ञान में इसके लिए विभिन्न प्रकार की साधनाओं का सहारा लिया जाता है एवं विकृति के मूल में स्थित विकृति को परिष्कृत कर चेतना को स्वस्थ, सुन्दर और समुन्नत स्तर का बनाया जाता है। अध्यात्म की भाषा में इसे ही मनःशक्ति का विकास कहा गया है। शरीरशास्त्र की भाषा में इसे प्रतिभा परिष्कार कहते है। यह विकास चाहे अध्यात्म साधना द्वारा सम्पन्न हो, चाहे भौतिक उपचारों द्वारा वर्तमान मानव की यह महती आवश्यकता है। इसे उपलब्ध किया ही जाना चाहिए।
प्रकृति की प्रमुख शक्तियों में ताप, प्रकाश एवं विद्युत की भाँति ही ‘शब्द’ की भी गणना होती है। अध्यात्म शास्त्रों में शब्द को ब्रह्म तक कहा गया है, जबकि पदार्थ विज्ञानी शब्द को भौतिक तरंगों का स्पन्दन भर मानते हैं। उनका कहना है कि शब्द अर्थात् ध्वनि टकराव से उत्पन्न होती है और ईथर तथा वायु के सहारे अपना परिचय देती है। सामान्यतया उसे किसी घटना की जानकारी देने वाली समझा जाता है और सर्वाधिक उपयोग शब्द गुच्छकों के माध्यम से वार्तालाप में किया जाता है। परन्तु इसे इतने छोटे क्षेत्र तक ही सीमित नहीं मान लेना चाहिए। शब्द ब्रह्म की अपनी अद्भुत एवं असीम सामर्थ्य है और उसकी प्रभाव क्षमता प्राणि जगत एवं पदार्थ जगत में समान रूप से देखी जा सकती है।
ध्वनियाँ दो प्रकार की होती हैं-श्रव्य तथा अश्रव्य ध्वनियाँ। श्रव्य ध्वनियों का अपना एक प्रसार क्षेत्र होता है। हम उन्हीं ध्वनियों को शब्दों को सुन सकते हैं जो इस सीमा क्षेत्र के अंतर्गत आती हों। प्रायः यह प्रसार क्षेत्र 20 से लेकर 20,000 कम्पन प्रति सेकेण्ड होता है, अर्थात् हमारी कर्णेन्द्रियाँ उन्हीं तरंगों के ग्रहण कर सकती हैं तो उक्त दायरे में हों। इससे कम अथवा अधिक आवृत्ति वाली ध्वनियों को सुनने की सामर्थ्य हमारे कानों में नहीं होती। ऐसी ध्वनियाँ जिनकी बारम्बारता 20 हर्ट्ज से कम है- ‘इन्फ्रासोनिक ध्वनियाँ तथा 20,000 हर्ट्ज से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनियाँ ‘अल्ट्रासोनिक’ कहलाती है। कम आवृत्ति वाली अश्रव्य ध्वनियाँ अपना असाधारण प्रभाव छोड़ती हैं। इनका हमें न तो ज्ञान ही है और अति सूक्ष्म एवं धीमी होने के कारण सुनाई भी नहीं देती फिर भी उनके प्रभावों से हम बच नहीं पाते।
मनुष्यों सहित अन्याय प्राणियों एवं इमारतों पर अश्रव्य ध्वनियों के प्रभाव को कई बार देखा परखा गया है। शक्तिशाली साइरन संचालकों का यह निजी अनुभव है कि जब भी उनका हाथ इस तरह की सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के रास्ते में आता है तो कुछ ही समय में वहाँ गरमी के कारण जलन अनुभव होने लगती है। एक बार एक शक्तिशाली साइरन के अश्रव्य ध्वनि प्रवाह के सामने उसका संचालक अनजाने ही आ गया तो प्रतिक्रिया स्वरूप उसे मिचली का सा आभास होने लगा और संतुलन लड़खड़ाने लगा। इसी तरह के अनुभवों का वर्णन करते हुए चैकोस्लोवाकिया के एक इंजीनियर प्रो. गावराड ने लिखा है कि जब वह अपने ऑफिस के कक्ष में बैठता तो उसे प्रायः प्रतिदिन मिचली आने लगती और सिरदर्द रहने लगता। पर जैसे ही वह अपने कक्ष से बाहर निकलता, सारी व्यथायें दूर हो जाती। एक दिन वह अपने कक्ष में दीवार के सहारे टिका बैठा था तो उसे एक अत्यन्त सूक्ष्म कम्पन का आभास हुआ। स्रोत का पता लगाया तो मालूम हुआ कि समीप के एक औद्योगिक प्रतिष्ठान से यह सूक्ष्म ध्वनि तरंगित हो रही है। इसके उपरांत उसने पराध्वनि उत्पादक एक ऐसा यंत्र बनाया जिससे निस्सृत सूक्ष्म ध्वनि तरंगें कुछ ही क्षणों में बड़े-बड़े जीवधारियों का प्राण हरण कर लेती थीं। इन ध्वनि तरंगों की मारक क्षमता इतनी तीव्र होती कि उसके रास्ते में आये जीवधारियों के अंग-अवयव पिघल कर अर्थ तरल स्थिति में पहुँच जाते, परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो जाती।
कहा जाता है कि इजियन के सैण्टोरिनी द्वीप में कोई भी व्यक्ति एक-दो दिन से अधिक नहीं ठहर पाता, क्योंकि इससे अधिक दिन ठहरने वाले का जी घबराने लगता है, सिरदर्द आरम्भ हो जाता है और एक अजीब-सी बेचैनी घेर लेती है। वैज्ञानिकों ने इसका कारण जानने के लिए जब वहाँ एक भूकम्प मापी यंत्र लगाया तो उसने एक सूक्ष्म, पर चिरस्थायी ध्वनि परक कंपन रिकार्ड किया। उनके अनुसार इसी अश्रव्य ध्वनि कंपन के कारण यहाँ आने वाले सेनानियों को विभिन्न प्रकार की शारीरिक-मानसिक व्यथाओं का सामना करना पड़ता है।
वस्तुतः ध्वनियाँ भली-बुरी दोनों तरह की होती है। कुछ ध्वनियाँ मनुष्य एवं अन्य जीव-जन्तुओं व वनस्पतियों के लिए सत्परिणाम दायक होती है, तो कुछ इसके विपरीत। ध्वनि चिकित्सा आज एक सर्वमान्य उपचार पद्धति के रूप में सर्वत्र प्रयुक्त हो रही है। ब्रिटेन के कैंसर अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने अल्ट्रासोनिक टिष्यू करे क्टराइजेषन की एक नयी तकनीक विकसित की है, जिसमें बिना किसी सर्जरी के ही सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के माध्यम से कैंसर रोग का आसानी से समझा जा सकता और तदनुरूप उपचार भी किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ध्वनि तरंगें जब कोशिकाओं के समूह से टकराकर लौटती हैं तो उनमें कुछ परिवर्तन नजर आते हैं। ऊतकों के भीतर चल रही कोशिकाओं की हलचल को इन्हीं परिवर्तनों के आधार पर सरलतापूर्वक जाना जा सकता है। ‘हिस्टोग्राफ’ इसी प्रकार का एक नशा है जो ध्वनि तरंगों से शरीर के अत्यधिक भीतर के अवयवों के बारे में संकेत देता है। कोशिकाओं में जरा सी निष्क्रियता दिखलाई देने पर ही कैंसर होने की संभावनाएँ सुनिश्चित हो जाती है। इस तरह सरलतापूर्वक रोग की पहचान हो जाने पर उससे बचा भी जा सकता है। इसी तरह आँस्टियोफोनीक विधियों द्वारा टूटी हुई हड्डियों को बिना सर्जरी के ध्वनि तरंगों से पता लगा लेने की नयी तकनीक विकसित की गयी है। चिकित्सा के क्षेत्र में इस तरह की ध्वनि तरंगों पर आधारित अनेक पद्धतियाँ विकसित की जा चुकी है और निरन्तर नये प्रयोग हो रहे हैं।
संगीत भी एक प्रकार की ध्वनि है जिसका शरीर और मन पर आश्चर्यजनक रूप से प्रभाव पड़ता है। संगीत में शरीर और मन को उत्तेजित आन्दोलित करने तथा उसे स्वस्थ और शक्तिवान बनाने वाले तत्त्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसी कारण से प्राचीन भारतीय आचार्यों ने संगीत शास्त्र के विकास में इतनी अधिक रुचि दिखायी थी। भारतीय संगीत उस समय विकास की किन ऊँचाइयों को छू चुका था, इसका अनुमान इसके विभिन्न संग-संगिनियों के अद्भुत सामर्थ्य को देखकर लगाया जा सकता है। इसके इसी सामर्थ्य को देखते हुए चार वेदों में से एक ‘सामवेद’ की रचना संगीत शास्त्र पर आधारित रखी गयी। इसके महात्म्य का वर्णन करते हुए ऋग्वेद (8-33/2) में कहा गया है-यदि संगीत के साथ ईश्वर को अन्तरमन से याद किया जा तो वह प्रार्थी के हृदय में अवश्य प्रकट होता है और उसे अपना प्यार स्नेह प्रदान करता है।’
अब वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में संगीत चिकित्सा को मान्यता मिल चुकी है। वैज्ञानिकों ने भी इसके इस सामर्थ्य को स्वीकारा है। आस्ट्रिया के सुप्रसिद्ध शरीर शास्त्री वी.एम.लेजरलैजारियो ने इस सम्बन्ध में अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति -’हेल्थ थ्रू बीविंग’ में अपने एक अनुभूत प्रयोग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि किस प्रकार ये गठिया को लम्बी बीमारी से सँवारे-साधना के प्रयोग द्वारा चमत्कारिक ढंग से स्वस्थ हो सके। वे कहते हैं कि यदि उसे एक संयोग मात्र मान लिया जाय तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्वर-संगीत की मधुर ध्वनियों से मेरे मनोभावों पर इसका कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने अपनी उक्त पुस्तक में इस बात की भी चर्चा की है कि भिन्न-भिन्न स्वरों का भिन्न-भिन्न अंग-अवयवों पर पृथक्-पृथक् प्रभाव पड़ता है। शब्द-कौतूहल नामक ग्रंथ में मंद मुनि ने इस संदर्भ में विस्तृत वर्णन किया है। इस ग्रंथ में तीन प्रकरण है-प्रथम में रोगी के स्वर द्वारा रोग निदान का उल्लेख है। द्वितीय में विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों का वर्णन है तथा तीसरे प्रकरण में भिन्न-भिन्न रोगों के लिए अलग-अलग प्रकार के वाद्य संगीत निर्धारित हैं।
‘ग्रोब्स डिक्षनरी ऑफ म्यूजिक एण्ड म्यूजीशियन्स ’ नामक ग्रंथ में भी इस संदर्भ में विस्तृत वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ में प्राचीनकाल के मिश्रवासियों द्वारा संगीत को उपचार की तरह प्रयुक्त किये जाने का उल्लेख मिलता है। इस बात की जानकारी वहाँ की एक अति प्राचीन पुस्तक ‘मेडिकल पेपिरी’ से मिलती है। रूस के भौतिक विज्ञानी और संगीत शास्त्री डॉ. बेरिवनिस्की द्वारा वोपिन नामक वाद्ययंत्र बजाकर अनिद्रा रोगियों का सफल उपचार किये जाने का वर्णन भी उक्त पुस्तक में मिलता है। उसमें इस बात का भी उल्लेख है कि तीव्र स्वरों और धुनों के प्रयोग से निम्न रक्तचाप और हल्की धुनों से उच्च रक्त चाप और हल्की धुनों से उच्च रक्तचाप वाले रोगियों को लाभ मिलता है जबकि इनके विपरीत प्रयोग से मरीजों को हानि होती है।
नारद विरचित ‘संगीत मकरंद’ नामक ग्रंथ में (संगीताध्याय, चतुर्थ पाद, श्लोक 80-83 में) भिन्न-भिन्न रोगों द्वारा पृथक्-पृथक् कार्यों की सिद्धि का विशद वर्णन है। स्वास्थ्य लाभ के लिए उसमें औडव रागों के गायन की सलाह दी गयी है। आचार्या विःषंक शारंगदेव ने भी अपने ग्रंथ ‘संगीत रत्नाकर’ में पृथक्-पृथक् स्वरों से सम्बद्ध अंगों, स्नायुओं और चक्रों (षट्चक्र) का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।
भारतीय संगीत में ‘राग’ का अपना विशिष्ट के स्थान है। यह अपने अन्दर भौतिक जगत से अध्यात्म जगत तक की सम्पूर्ण यात्रा का इतिहास संजोए हुए है। कपड़े को रंगने पर उसकी अवस्था पूर्ववत् नहीं रह जाती, उसमें परिवर्तन आता है और वह नवीनता को प्राप्त होती है। यही बात रोग का रंग चढ़ने पर चित्त की हो जाती है। वह अपनी विकास ग्रस्त अवस्था को त्यागकर राग के स्वरों के रंग में रंगकर उसी का रूप प्राप्त कर लेता है। तब उसका मूल रूप उसी प्रकार समाप्त हो जाता है जैसा वस्त्र रंगने के बाद उसका मूल रंग नहीं रह जाता। संगीत की इसी विशिष्टता की अनुभूति करके एक और जहाँ इसे दैनिक जीवन में ओत-प्रोत रखा गया, वहीं दूसरी ओर राग-रागनियों द्वारा नाद ब्रह्म की साधना करके ब्रह्मानंद के समतुल्य परमानन्द को अनुभूति की गयी। राग-रागनियों के रूप में स्वरों के पृथक्-पृथक् व्यक्तित्वों का निर्धारण उनमें देवशक्तियों का अधिष्ठान और उनके माध्यम से ब्रह्म सदृश अपूर्व आनन्द की प्राप्ति होती इस रूप में प्राचीन ऋषि मनीषियों द्वारा भारतीय संगीत को अमरता प्रदान की गई।
पाश्चात्य जगत में भी संगीत को शारीरिक एवं मानसिक चिकित्सक के लिए बग एक प्रभावी माध्यम की तरह प्रयुक्त किया जाने लगा है। स्टैण्ड फोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में अनुसंधानरत सुप्रसिद्ध स्वर-विज्ञानी पाल जे.मोसेज ने मानवी स्वरोच्चारण का विश्लेषण करते हुए उसे पाँच भागों में विभक्त किया है - (1) श्वसन (2) दूरी (3) स्वर-विस्तार (4) अनुवाद (5) लय एवं ताल बद्धता आदि। वह भौतिक प्रयोगों के आगे का वह क्षेत्र है जिसे प्राचीनकाल में वाद योग कहा जाता था। इस विद्या की रहस्यमयी शक्तियों के आधार पर ही मानवी काया में छिपी दिव्य सामर्थ्यों को जागृत किया जाता एवं उनसे लाभान्वित हुआ जाता था। संगीत और योग दोनों ही नाद विद्या के अंतर्गत आते हैं। नादब्रह्म की साधना मन को एकाग्र करने का अच्छा साधन है। इससे मानसिक तनाव और अवसाद जैसे मनोरोगों से सरलतापूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है। इतना ही नहीं स्वर साधना से शरीर की जैव-विद्युत एवं रासायनिक क्रियायें भी परिवर्धित, परिवर्तित और परिष्कृत की जा सकती है।
आधी रात होने के पहले ही अचानक वह जाग उठा। तब क्या वह सो रहा था? वह क्या था? उसका स्वप्न था। वह क्या था? उसका स्वप्न था। वृद्ध रोगी सिद्धार्थ घूम रहा था। गोपा यशोधरा मृत पड़ी थी। महल में हाहाकार मचा था। कितना भयानक था वह स्वप्न आज आनन्द की अखण्ड बेला में वह भी! में वह भीषण यातना का स्वप्न!! सुगन्धित तेल पूर्ण प्रदीज पल रहा था। उसका मंदिम प्रकाश अँधेरे में काँपता हुआ खिल रहा था। उसे लगा उसका जीवन भी वैसे ही एक अनिश्चय और अँधेरे में डगमग कर रहा था।
सिद्धार्थ का मन धड़क उठा। उसने आस-पास देख। कक्ष में अनेकानेक सुन्दरियाँ एक दूसरे से गुँथी बंधी-सी रही थी। वह सोचने लगा बाँधने के लिये कितनी श्रृंखलायें हैं यह और मनुष्य इन्हीं कड़ियों से प्यार करता है। आखिर क्यों? क्या है इसमें? यह सारा प्रासाद एक दिन बियाबान खण्डहर हो जाएगा, उससे सोचा फिर वहाँ क्या पशु चिल्लाया करेंगे? हमारे समस्त सुन्दर स्वप्न दिन इसी तरह काल की ठोकर से धूलि में मिल जाया करते हैं।
यह रूप नहीं रहेगा, बुढ़ापा इस सौंदर्य का ऐसा ढीला कर देगा कि इन्हें देखकर घृणा होने लगेगी। रोगकारक और कुरूप रोग आकर इन सुन्दरियों को डस लेंगे और तब यह साँप के विष जैसी यंत्रणा में छटपटाने लगेगी और फिर मृत्यु ......मृत्यु इनका रक्त चूसने लगेगी। मृत्यु, सर्वनाशी मृत्यु, सर्वव्यापी मृत्यु आएगी और इन सबको अपने जबड़ों में चबाकर फेंकेगी
कौन?
मृत्यु आती नहीं। वह तो अब भी हैं। प्रत्येक वर्ष वह मनुष्य की आयु को एक-एक वर्ष करके अपने मुँह में भरती जाती है, जैसे कोई पशु किसी शिकार को पकड़ता है........
और हठात् उसकी आँखें ठहर गई। यह वह क्या देख रहा है? उसका सिर चकराने लगा? एक सुन्दरी के मुँह से हर श्वाँस के साथ कफ़ सा निकल रहा था। उसको, सुनकर वह झाता था। आज यह कैसी गंदगी निकल रही थी। उफ कितना घृणित है यह सब।
यही जब मुस्कराकर बातें करती थी तब लगता था फूल झड़ रहे हैं और उसके मुख से निकलती बातें कितनी प्यारी लगती थीं। एक-एक शब्द आत्मा को सान्त्वना देता था
आज तब वह इन्हीं में भूला था! यह नारी! कलकण्ठ गायिका!! इसके संगीत में भाव उन्नत होकर उज्ज्वल आलोक विकीर्ण करते थे।
क्या था जो वह समझ नहीं पाया अब तब?
उसके सामने ही यह सब हो रहा था। वह विलास में भूला हुआ जीवन की इस कठोर वास्तविकता को झुठलाये दे रहा था और तब ही किसी सुन्दरी ने करवट ली। उसने देख, वह रमणी अनिन्द्य सुन्दरी थी। उसके शरीर पर अभी तक रक्तवर्ण अंगराग लगा था। किंकिणी बजी। उसकी कटि पर वह कोमल स्वर हुआ जिसमें एक दिन सिद्धार्थ ने आप हाथ डाला था। वह विभोर हो उठी थी और वह अधखुली आँखों से देखकर ऐसे मुस्करायी थी जैसे मालती ने झूमकर गंध फैला दी हो।
सिद्धार्थ ने देखा उसका शरीर उसके मुँह से निकलती लार से भीग गया था।
नींद ने चेतना खोदी है। उस खोने में एक सत्य जागा है। सारे प्राणी अपने अर्धज्ञान में ऐसे ही पड़े हैं। रात में काल के हाथ में रहते हैं दिन में मोहवश अपने को सजाने का प्रयत्न किया करते हैं।
उसे लगा वह रक्त से भीग गयी है। रक्त! यही तो है उसके भीतर
घृणित कफ़। लार। थूक! रक्त! और ऊपर से कितनी स्निग्धता इस घृणा को ढके रहती है। क्या यह सब जीवित है?
क्या यह मृत्यु नहीं है? क्या यह अज्ञान में मृत्यु नहीं है? अज्ञान क्या है?
सत्ता कि वास्तविकता न जानना। अपने आप को सीमित परिस्थितियों में ही बहलाते हैं। मनुष्य कायरता के कारण बड़े सुख को छोड़कर क्षणिक सुख में लगा रहता है। उफ! कितना भयानक है यह सब!!
साधना का पंथ छोड़ कर वह अमर विजय के स्थान पर क्षणिक प्राप्ति में डूबा रहता है।
सारा प्रासाद धधक क्यों रहा है?
कितनी भीषण आग है यह, जो पल-पल एक-एक लपट बनकर सुलग रही है। यह वासना को तृप्त करने वाला शीतल र्स्ष, उस ज्वाला का ही एक रूप है, जो धीरे-धीरे पोषण के नाम पर सब कुछ शोषण कर लेती है। कौन है तू रे विकराल छल! तेरा तो जाल धावा पृथ्वी में ऐसी घिरा हुआ है कि कहीं भी मुक्ति का पथ नहीं दिखाई देता! कहाँ जाय वह व्यक्ति जो इस अति मुमुक्षा की व्याकुलता से मुक्त हो सके।
यही है सुन्दरियों का सौंदर्य?
इसलिये पुरुष व्याकुल रहता है? सिद्धार्थ घृणा से भर उठा था। उसने कहा धिक्कार है सिद्धार्थ तू इसी के लिये अपने आपको भूला रहा। अब तक का तेरा जीवन व्यर्थ गया।
इसमें सौंदर्य क्या है? क्या है इसमें आकर्षण। कुछ नहीं! केवल माँसपिण्ड! चमड़े से मढ़ा हुआ माँस का लोथड़ा!अपने मन से हार कर ही मनुष्य इन सबमें डूब जाता है।
उसका दम घुटने लगा। उसे लगा वह अब सह नहीं सकेगा। वह उठ खड़ा हुआ। उसने नयन मूँद लिए। इसी के लिए सबकुछ है? उसने फिर सोचा।
यह वह चक्र है जिसमें निरन्तर घूमते रहना है।
क्यों? फिर सौंदर्य कहाँ है?
सिद्धार्थ ने नयन खोले। वह सुअलंकृत इन्द्रभवन सा प्रासाद उसे लगा, सड़ती हुई लाशों से भरे कच्चे श्मशान सा था। कितनी बदबू आ रही थी। यह कैसी आग लग रही थी आज, जो उसको आमूल शिखर हिलाए दे रही थी।
इसी अवस्था में रहना है सिद्धार्थ! यहीं सारा जीवन इसी मूर्खता में नष्ट करना है। उसका सिर फटने लगा।
उसने द्वारा के पास आकर कहा “यहाँ कौन है?”
कोई नहीं बोला।
‘सब सो रहे हैं। उसने सोचा।
प्रासाद नितांत नीरव था। उसने फिर पुकारा-कोई है”
मैं छन्दक हूँ।”
“मेरे लिए एक अश्व तैयार कर!” स्वर अजीब था।
इस समय देव।
“अभी”
छन्दक डरा परन्तु प्रश्न करने का साहस नहीं हुआ। कहा “जो आज्ञा देव! अभी लाता हूँ।”
सिद्धार्थ का हृदय छक-छक कर रहा था। कुछ ही देर में जब छंदक तुरंग कंथक को सजाकर लाया तो देखा सिद्धार्थ नहीं है। फिर देखा, आर्यपुत्र धीरे-धीरे आ रहे हैं। वह आगे आ गया, कहा देव! अश्व आ गया है। सिद्धार्थ गम्भीर था। अब वह घबराया हुआ सा नहीं लग रहा था। वह लौटा हुआ एक नया व्यक्ति था।
अम्मणों भर चमेली के फूलों से ढकी शय्या पर यशोधरा अपने पुत्र के साथ सो रही थी। वह माता थी। वह अपने को सफल नारी समझ रही थी।
उसकी बगल में यह कौन है?
मेरा पुत्र! मेरी आत्मा का प्रतिनिधि!!
हृदय उमंग उठा।
किसका पुत्र? कोई चिल्लाया।
सिद्धार्थ का।
नहीं, यह काल श्रृंखला है जो सेवा और पोषण के नाम पर मोह में बाँध लेता है।
यह कौन है? भद्रा कापिलायिनी! गोपा! यशोधरा! देवदहं की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी! छण्डपाणि के लिए खत्तिय की अत्यन्त प्रिय पुत्री।
नहीं यह छलना है। जो झिलमिल कर तेरी राह भुलाती है। उसका मन फिर हिल उठा। प्रथम पग आगे रखते ही एक हवा का झोंका आया। शीतल परन्तु अज्ञात का भय भरे हुए भविष्य जिसमें काला-काला सा दिखाई देता था।
मन में वासना उठी। कहा प्रभु! यह पथ नहीं। इससे भी बढ़कर एक और मार्ग है। उधर भी नहीं चलते? यदि अपनी सीमा की क्षुद्रता तुम्हें ग्राह्य नहीं तो और भी अनेक पंथ है।
तो फिर क्या है वे!! क्या है वे शीघ्र कहो!
“तुम कौन हो?”
मैं राजकुल का उत्तराधिकारी हूँ। मैं स्वायत्त शासन का स्वामी हो सकता हूँ।
तो सात दिन में तुम्हारा चक्र रत्न उदय हो सकता है सिद्धार्थ! यह कैसे?
क्या तुममें पराक्रम नहीं है? तुम क्या तलवार नहीं उठा सकते? तुम क्षत्रिय हो।
फिर क्या होगा उससे?
पृथ्वी मण्डल पर राज्य कर सकते हो। वैभव काँपेगा जयनिनाद गूजेंगे। अखण्ड, पराक्रम का समुद्र विस्तारित होगा। सम्राट सिद्धार्थ! बस!
और उसकी जाग्रत अन्तरात्मा का उद्घोष समस्त
मनोलोक में परिव्याप्त हो गया। कब तक सोयेगा सिद्धार्थ! कहाँ तक विलास के स्वप्न तुझे लुभायेंगे।
नहीं-नहीं अब और-और नहीं! अब मैं जाग गया हूँ। मुझे राज्य नहीं चाहिए। नहीं सोना, मुझे वैभव के सितारों से टंकी विलास की महानिशा में। मैं तो सहस्रिक लोक धातुओं को उन्नादित करके बुद्ध बनूँगा।
और अपूर्व साहस जागा। उसने कहा यही उचित है सिद्धार्थ! यह तेरे योग्य बात है। कामना, द्रोह, हिंसा सबके तर्कों ने सिर झुका लिया।
और वह उठ खड़े हुए। वह ऐसा भव्य ज्योतित गौरव था जैसे शताब्दियों का जय-जयकार पुञ्जीभूत होकर साकार करुणा दया और क्षमता बनकर खड़ा हो गया था। वह क्षुद्रता की सीमाओं में बँधने वाला नहीं वरन् उससे भी ऊपर मनुष्यत्व का उन्नत व्यक्तित्व था जो अब अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीवित रहना चाहता था। यह था वह व्यक्ति जो अब जाग चुका था। एवं जागने के बाद उसने अपने पग औरों का जाग्रत करने के लिए बढ़ाए थे। ये बढ़े हुए पाँव धीर गंभीर गति से बढ़ने लगे। नंगे पाँव मानो पृथ्वी की धूल में क्षणिक जीवन की पर्तों पर अमरता का जीवित संदेश लिखने के लिए बढ़े चले थे।
डार्विन और लैमार्क आदि ने विकासवाद का जो सिद्धान्त दिया है, वह यदि सत्य नहीं है, तो पृथ्वी में मानव की उत्पत्ति को आकस्मिक और ईश्वरीय इच्छा का प्रतिफल ही कहना होगा। ईश्वरीय सत्ता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता को काल्पनिक कहने वाले तब यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि यदि मनुष्य का प्रादुर्भाव आकस्मिक संयोग है और सर्वप्रथम ब्रह्मा का पुरुष वेश में जन्म हुआ, तो उनके द्वारा सन्तानोत्पत्ति कैसे संभव हुई? सन्तान की उत्पत्ति के लिए पुरुष और स्त्री का समायोजन आवश्यक है, फिर अकेले ब्रह्मा जी अमैथुनी सृष्टि उत्पन्न करने में किस प्रकार समर्थ हुए?
यह प्रश्न आज से सौ वर्ष पूर्व विवाद के घेरे में आ सकता था और विज्ञानवेत्ता इस शास्त्र कथन को कपोल कल्पना भर मान कर अमान्य कर सकते किन्तु अब जबकि विज्ञान इतनी प्रगति कर चुका है और अनेक अमैथुनी निर्माण करने में सफल हुआ है, तो इस पृष्ठभूमि में उपरोक्त कथन के नकारना अनुचित ही होगा।
ब्रह्म जी पुरुष होकर एकाकी सृष्टि रचना में कैसे सफल हो सके? इस प्रश्न का जवाब अमैथुनी सृष्टि के मातृ पक्ष द्वारा मिल जाता है, जिसमें केवल स्त्रियों द्वारा संतान पैदा करने की बात आती है। यह प्रसंग केवल भारतीयों में ही प्रचलित नहीं है, वरन् अन्य अनेक धर्मों में ऐसे आख्यान मिलते हैं, जिनमें अमैथुनी प्रजा का यह दूसरा रूप, अर्थात् बिना पुरुष के संयोग के स्त्री द्वारा सन्तानोत्पत्ति का विवरण मिलता है। सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों के लिए यह दोनों ही प्रसंग अप्रामाणिक है। इस संबंध में समुचित जानकारी न होने से ही आज तक अतिमानवता के रूप में उत्पन्न हुई विभूतियाँ कलंकित हुई है।
भगवान राम अपने भाइयों समेत पिता के संयोग के बिना जन्मे थे। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि जब दशरथ की आयु ढलने लगी और उन्हें कोई संतान नहीं हुई, तो उन्होंने गुरु वशिष्ठ के पास जाकर अपना दुःख प्रकट किया। वशिष्ठ ने तब शृंगी को बुलाकर पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। इस यज्ञ में ‘चरु’ में देव शक्तियों का आह्वान कर उसे चारों रानियों को बाँट दिया गया। एक-एक भाग मिलने के कारण कौशल्या और कैकेयी को एक-एक और दो भाग मिलने के कारण सुमित्रा ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया।
इस घटना ने सिद्ध कर दिया था कि देव-शक्तियों को कृत्रिम गर्भाधान द्वारा मानव आकृतियों में लाया जा सकता है। ऐसे जो भी शरीर पैदा हुए हैं, शारीरिक गुणधर्म से वह भले ही मनुष्य जैसे रहे हों, पर उनकी अतीन्द्रिय क्षमताएँ बहुत बड़ी-चढ़ी रही हैं, इसलिए उन्हें देवदूत, पैगम्बर और साक्षात भगवान माना जाता रहा। देव-उपासना के द्वारा पुरुष और स्त्री शरीरों में ऐसी शक्तियों का आवाहन, धारण और प्रजनन आज भी संभव है।
मरियम तब कुँवारी ही थीं, जब उन्होंने महाप्रभु ईसा का जन्म दिया। मरियम की ईश्वर भक्ति और उनकी आत्म-पवित्रता सर्वविदित थी, इसलिए तब उन पर किसी ने दुराचरण का दोषारोपण नहीं किया। पीछे जिन लोगों ने सन्देह किया, वह उनकी अपनी भ्रान्त धारणाएँ थीं, महापुरुष ईसा में जो विशेषताएँ थीं, वह बताती थीं कि इस आत्मा का प्रादुर्भाव वंशगत नहीं, वरन् ब्रह्माण्ड की किन्हीं अदृश्य शक्तियों से है तभी तो वे हर किसी के मन की बात जान सकते थे, किसी भी रोगी को स्पर्श और आशीर्वाद से अच्छा कर सकते थे, कुछ ही रोगियों से अनेकों की भूख मिटा सकते थे।
कर्ण का जन्म कुन्ती के उदर से हुआ था। कुन्ती एक दिन गायत्री मंत्र का जप कर रही थी। महाभारत में कथा आती है कि वे उस दिन अत्यधिक ध्यानावस्थित थीं। उन्हें लगा जैसे भगवान सूर्यदेव उनके पास हैं, उन्हें स्वीकार कर रहे हैं, उनका भर्ग उनके गर्भ में प्रविष्ट हुआ और वे सचमुच गर्भवती हो गई। कर्ण सूर्य के समान तेजस्वी और अप्रतिम दानी थे। वह क्षमता महाभारत के और किसी योद्धा में नहीं थी।
पाण्डु ने एक बार एक ऐसे मृग के जोड़े का वध का दिया था जो उस समय काम-क्रीड़ा में निमग्न था। पाण्डु का मृगों ने शाप दिया- “तुम्हारी मृत्यु भी ऐसे ही होगी।” इसके बाद की घटना है। उनकी दोनों रानियों कुन्ती और माद्री ने देव-शक्तियों के आह्वान द्वारा मैथुन पुत्रों को जन्म दिया। यम के पुत्र युधिष्ठिर साक्षात् धर्मावतार थे। इन्द्र के पुत्र अर्जुन के शौर्य और पराक्रम का कोई और जोड़ीदार नहीं था। भीम मरुत् पुत्र थे। उनमें वायु से भी प्रचण्ड बल विद्यमान था। नकुल सोम के अंश से जन्म होने के कारण ज्योतिर्विद्या के अद्वितीय पण्डित थे। एकमात्र सहदेव ही ऐसे थे, जो सहवास से पैदा हुए थे और वही ऐसे थे, जिनमें अन्य भाइयों की अपेक्षा साँसारिकता का भाव और कामनायें अधिक थीं।
कौरव भ्रूण संतान थे। अंजनी पुत्र हनुमान पितृहीन संतान थे। महापुरुष रामकृष्ण परमहंस का जन्म पिता के संयोग के बिना ही हुआ और उससे यह सिद्ध हो गया कि संसार में ऐसे तथ्य विद्यमान हैं, जा गुण और स्वभाव से मानव प्रकृति के होकर भी ज्ञान, शक्ति और दिव्यता की दृष्टि से बहुत विकसित होते हैं। उनमें अतीन्द्रिय संपर्क स्थापित कर कोई भी स्त्री या पुरुष अपने आपमें उन दैवी प्रतिभाओं को विकसित कर सकता है।
विज्ञान ने इन सम्भावनाओं पर बीसवीं सदी के आरंभ से ही विचार करना शुरू कर दिया था। जब विज्ञानवेत्ताओं ने केंचुए के खण्ड को रिजेनेरेषन प्रक्रिया द्वारा एक नवीन और स्वतन्त्र केंचुए में विकसित होते देखा, तभी से उनके मस्तिष्क में यह विचार बार बार उभरने लगा था कि इस अमैथुनी प्रक्रिया द्वारा मानव रचना संभव है क्या? कल्पना को साकार रूप देने के लिए विभिन्न देशों में कार्य आरंभ हो गया। इस दिशा में पहली सफलता ‘कोलम्बिया प्रेसबा इटेरियन मेडिकल सेण्टर न्यूयार्क’ के प्रो. लैण्ड्र बी. शीटल्स को मिली। उन्होंने फ्लोरिडा निवासी डोरिस डेल जियो के गर्भाशय से कुछ अण्डे निकालकर उसे परखनली में उसके पति के शुक्राणुओं द्वारा निषेचित करने में सफलता हासिल की। भ्रूण-कलल प्रयोगशाला में गर्भाशय के बाहर संतोषजनक ढंग से विकास कर रहा था। कुछ ही दिनों में उसे गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाना था, किन्तु इससे पूर्व भ्रूण को विनष्ट कर दिया गया और इस प्रकार वह प्रयोग अधूरा रह गया। यदि उक्त प्रयोग पूरा हो भी जाता और उससे शिशु जन्म करा लिया जाता, तो भी वास्तविक अर्थों में उसे मैथुनी सृष्टि नहीं कहा जा सकता था, कारण कि शरीर के अन्दर भले ही डिम्ब और शुक्राणु न मिले हों, किन्तु उनके मिलन की आवश्यकता तो हर वक्त बनी ही रही, वह परखनली में मिल रहे हों तो क्या और गर्भाशय में मिल रहे हों तो क्या? पुरुष की आवश्यकता तो सदा बनी ही रहती है। इसलिए इस प्रकार कि निर्माण को मैथुनी रचना ही कहना उचित होगा, जबकि वैज्ञानिक सर्वथा अमैथुनी सृजन करना चाहते थे। इस प्रक्रिया में वे स्त्रियों के डिम्ब की जरूरत तो अनुभव करते थे, पर शुक्राणु की मदद के बिना ही किसी प्रकार उसे भ्रूण में विकसित कर मानव-निर्माण की आकांक्षा रखते थे। उनके अनुसार इस विधि द्वारा नर-नारी में से किसी भी हू-ब-हू अनुकृति बनाया जा सकना संभव है। फ्राँसीसी जीवविज्ञानी जीन रोस्टेण्ड का इस संबंध में विचार था कि ऐसा यदि संभव हुआ, तो किसी की भी नकल को अनन्त काल तक बनाये रख पाना शक्य होगा। डॉ. जेम्स डेनियेली का मत है कि यदि एक ही व्यक्ति की कई-कई अनुकृतियाँ बनाकर उन्हें भिन्न-भिन्न वातावरण में रखा जा सके, तो परिस्थिति और पोषण का मानवी स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभावों का आसानी से अध्ययन किया जा सकता है। डॉ. इलाँफ एक्सेल कार्ल्सन का विश्वास है कि वर्षों एवे मृत ऐतिहासिक पुरुषों की प्रतिकृति इस विधि द्वारा बनायी जा सकेगी। उन्होंने आशा प्रकट की है कि गीजा के पिरामिड में सुरक्षित रखे प्राचीन मिश्री राजा तूतनखामन के मृत शरीर में अब भी इतने पर्याप्त डी.एन.ए. हो सकते हैं किस उससे राजा की कार्बन कॉपी ‘तैयार की जा सके। ज्ञातव्य है कि बहुचर्चित अंग्रेजी फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ इसी कथानक पर आधारित चलचित्र है। उसमें किसी वैज्ञानिक ने जुरासिक युग में प्रचुर संख्या में विद्यमान महाकाव्य डायनासोर के कुछ डी.एन.ए. कहीं से एकत्र करने में सफलता प्राप्त कर ली थी फिर उसी अवशेष से उसने उसका -ब्लूप्रिण्ट’ तैयार कर लिया।
कथाकार की यह कल्पना मात्र थी, पर पिछली दिनों इस दिशा में इतनी द्रुत वैज्ञानिक प्रगति हुई है कि ऐसा लगता है नहीं कि इसे मूर्तिमान् होने में कोई बहुत कम समय लगेगा। पहली बार इस क्षेत्र में क्राँतिकारी उपलब्धि तब हुई जब सन् 1960 में काँरनेल यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ता प्रो. एफ.सी. स्टीवर्ड और साथियों ने गाजर पर प्रयोग किया। शोधकर्मियों ने जब गाजर की कुछ कोशाओं (सोमैटिक सेल्स) को एक विशेष प्रकार के रासायनिक घोल में रखा, तो एक अद्भुत घटना घटी। उन्होंने देखा कि कुछ कोशाएँ विभाजित होने लगी हैं, ठीक वैसे ही जैसे निषेचन के बाद आरम्भ होता है। कुछ समय पश्चात् उससे कलियाँ, पत्ते और जड़ निकल आये। जब इन्हें भूमि में रोपण किया गया, तो उनसे हर प्रकार से सामान्य और विकसित गाजर पैदा हुए। इस प्रयोग से यह सिद्ध हो गया कि प्रत्येक कोशिका में जीव-निर्माण की क्षमता को किसी विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा उत्तेजित कर सक्रिय किया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि उसकी प्रतिमूर्ति का निर्माण न हो।
इसी तथ्य को आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अन्वेषणकर्ता डॉ. जे.बी.गर्डन ने अपने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया। उनने मेढ़क के अनिषेचित डिम्बों में से कुछ के नाभिक (न्यूक्लियस) को अल्ट्रावायलेट विकिरण द्वारा नष्ट कर दिया। तदुपरान्त उन अण्डों में मेढ़क की शरीर कोशाओं से निकाले नाभिकों को प्रत्यारोपित किया शरीर-कोषा में विद्यमान गुणसूत्रों के सम्पूर्ण सेट को देखकर डिम्ब भ्रम में पड़ गये। उन्होंने उसे एक निषेचित अण्डा मानकर विभाजन आरम्भ कर दिया। इस प्रकार कुछ ही दिनों में उससे एक पूर्ण विकसित मेढ़क पैदा हो गया। इसी तकनीक का प्रयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने मानवी-रचना का प्रयास किया। डेविड एम.रोरविक ने अपनी बेस्टसेलर पुस्तक इन हिज इमेज-दि क्लोनिंग ऑफ एक मैन में इस प्रक्रिया द्वारा एक उद्योगपति की अनुकृति बनाने में सफलता अर्जित करने का दावा किया है और कहा है कि शिशु सामान्य तरीके से पल-बढ़ रहा है।
यदि सचमुच ऐसा हुआ है, तो डिम्ब के संदर्भ में निषेचन का तात्पर्य मात्र इतना ही हो सकता है कि उसमें गुणसूत्रों के दो सेट विद्यमान हों। इतना होने मात्र से ही अण्डे उसे निषेचित अवस्था मानकर विभाजन प्रारम्भ कर देते है। बात ऐसी ही है, तो शरीर कोशाओं में गुणसूत्र के दोनों सेट मौजूद होने के कारण उसे कोषा विभाजन के लिए प्रेरित किया जा सकता है। यह यदि संभव हुआ तो हर एक शरीर कोषा से एक पूर्ण मानव विकसित करना शक्य हो जायेगा। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि इस दिशा में एक ही अड़चन सामने आयेगी कि सेल-विभाजन को प्रारम्भ और नियंत्रित करने वाला तंत्र कैसे विकसित किया जाय? अनुसंधान कर्ताओं ने इसके भी कई विकल्प सुझाये हैं। एक के अनुसार यदि डिम्ब के कोषा-द्रव्य (साइटोप्लाज्म) को शरीर कोषा में किसी प्रकार पहुँचाया जा सके, तो इस उलझन से छुटकारा पाया जा सकता है। कुछ शोधकर्ताओं का विचार है कि यदि कोई ऐसा कृत्रिम द्रव्य बनाया जा सके, जो स्वभाव में अण्ड-द्रव्य की तरह व्यवहार करे, तो समस्या का समाधान सरल हो जायेगा।
इसके उपरान्त एक ही प्रश्न शेष रह जाता है, वह है स्त्री के प्रजनन कोषों में ‘वाई’ किस्म के गुणसूत्र की विद्यमानता। अब तक नारी के शरीर में इस गुणसूत्र की उपस्थिति का समर्थन नहीं हो पाया हैं यदि इतना और हो जाय, तो किसी को भी यह मानने में आपत्ति शेष न रहेगी कि अमैथुनी सृष्टि का सिद्धान्त गलत है।
अब तक विज्ञान ‘वाई’ क्रोमोज़ोम को पुरुष प्रधान मानता रहा है और नर शिशु के लिए भ्रूण में उसकी उपस्थिति अनिवार्य बताता रहा है। यह उसकी स्थूल और उथली गवेषणा है। अध्यात्म विज्ञान सूक्ष्म की गहराई में उतर कर इस बात की घोषणा करता है कि नर और नारी गुण दोनों में ही समान रूप से मौजूद है। अन्तर इतना ही है कि नारी में नारी गुण पूर्णरूप से अभिव्यक्त स्थिति में आ जाते हैं, जबकि पुरुष प्रधान लक्षण अप्रकट बने रहते हैं। उसी प्रकार पुरुषों में पुरुष स्वभाव व्यक्त स्तर का बना रहता है, पर यह कहना गलत होगा कि स्त्रियोचित प्रकृति उनमें है ही नहीं। है, पर वह प्रच्छन्न स्थिति में पड़ी रहती है। यदि ऐसी बात नहीं होती, तो सर्वथा क्रूर और कठोर कहलाने वाले रत्नाकर, दस्यु जीवन के उत्तरार्ध में दया और करुणा का प्रतिमूर्ति ऋषि वाल्मीकि नहीं बन पाता और क्रौंच पक्षी के वध पर इतना विकल नहीं होता कि ग्रन्थ लिख डाले। अंगुलिमाल का जब हृदय परिवर्तन हुआ, तो उसने अपने कलुषित जीवन को धिक्कारते हुए बुद्ध का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया। सदन, अजामिल, विल्वमंगल सभी के साथ लगभग ऐसा ही हुआ और जब उनमें परिवर्तन घटित हुआ तो जीवन में नारी सुलभ गुण स्पष्ट हो गये। यों इन्हें स्त्रियोचित गुण कहने की तुलना में आध्यात्मिक स्वभाव कहना ज्यादा उचित होगा, कारण कि जब व्यक्ति का उदात्तीकरण होता है, तो उसका शील नम्र और कोमल और करुणाजनित बन जाता है। यह आमतौर से महिलाओं की नैसर्गिक प्रकृति है, इसलिए इसे स्त्री सुलभ स्वभाव कह दिया जाता है, पर ऐसी बात नहीं कि नारियों में पुरुषोचित लक्षण नहीं पाये जाते। लक्ष्मी बाई, दुर्गा बाई, पुतली बाई, चाँद बीबी और फ्राँस की स्वतंत्रता सेनानी जो ऑफ आर्क इसके ज्वलन्त उदाहरण है। बहादुरी के क्षेत्र में उनने कितनी अद्वितीय भूमिकाएँ निभायी, यह सर्वविदित है।
गुह्यविद्या के आचार्यों का कहना है कि जब कोई योगी हवा से मिठाई उत्पन्न करता है, तो इसका यह मतलब नहीं कि वह शून्य ही उत्पन्न हो सकता है। कहा भी गया है-नथिंग कम्स आउट ऑफ नथिंग’ अर्थात् शून्य से शून्य की ही उत्पत्ति होती हैं ऐसे प्रसंगों में जब कोई पदार्थ प्रादुर्भूत होता है, तो इसके पीछे एक सूक्ष्म एवं सुनिश्चित विज्ञान कार्य करता है। अध्यात्मवेत्ताओं का मत है कि इस संसार में जितने स्थूल पदार्थ हैं, उनके कुछ अंश सूक्ष्म रूप में भी विद्यमान होते हैं। इनमें से जब जिन्हें प्रकट करना होता है, उनके सूक्ष्म उपादानों को इकट्ठा कर सक्रिय कर देने भर से अभीष्ट वस्तु उद्भूत हो जाती है। इस प्रकार किसी वस्तु के स्थूल अभाव मात्र से ही उसकी सत्ता से पूर्णतः इनकार कर देना उचित नहीं।
विज्ञान भी ‘वाई’ गुणसूत्र की स्थूल उपस्थिति पर ही शुरू से ध्यान केन्द्रित किये रहा, इसलिए यह निष्कर्ष निकाल लिया कि स्त्रियों में इस तत्व का अभाव है। यदि उसने तनिक सूक्ष्म भूमिका में उतर कर विचार किया होता, तो उसे स्पष्ट प्रतीत होता कि अनुपस्थिति जैसी कोई बात है नहीं, क्योंकि भ्रूण-कलल में पितृपक्ष का भी एक अंश होता है, इसे विज्ञान भी अब स्वीकारता है। वह यदि किसी कारणवश अदृश्य स्तर का बना रहे, तो इतने मात्र से उसके अस्तित्व से इनकार करने का कोई कारण नहीं। अगले दिनों यदि इस दिशा में शोध कार्य जारी रहा, तो सींव है कोई ऐसा तत्व ढूँढ़ लिया जाय, जो नारी-कोशिका में कार्य और स्वभाव की दृष्टि से ‘वाई’ गुणसूत्र से एकदम मिलता-जुलता हो। ऐसा यदि हुआ तो ‘वाई’ गुणसूत्र संबंधी वर्तमान उलझन समाप्त हो जायेगी तब नारी और नर की पृथक्-पृथक् शरीर कोशाओं से अमैथुनी सृष्टि के अंतर्गत मनचाहा लिंग उत्पन्न कर लेना असंभव नहीं होना चाहिए।
प्रस्तुत उदाहरण भी इस बात की पुष्टि करता है कि यदि अकेले ब्रह्म जी ने इस संसार की रचना अमैथुनी ढंग से की, तो इसमें गप जैसी कोई बात नहीं, यह बिलकुल संभव है।
घटना नाथ संप्रदाय के पुरोधा मत्स्येन्द्र नाथ से सम्बन्धित हैं कहते हैं कि एक बार वे भिक्षाटन करते हुए अवध क्षेत्र के जायस नगर पहुँचे। वहाँ एक विधवा निःसंतान ब्राह्मणी रहती थी। उसकी व्यथा देख कर उन्हें बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने अपनी झोली से थोड़ी भभूति निकाल कर दी और कहा इसे खा लेने पर तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। लोक-लाज के भय से ब्राह्मणी ऐसा नहीं कर सकी और उसको घर से बाहर गोबर के ढेर में फेंक दिया। बारह वर्ष पश्चात् मत्स्येन्द्र नाथ पुनः जायस आये, तो एक बार फिर ब्राह्मणी ने सच बात बता दी। वे गोबर के ढेर के निकट पहुँचे और तनिक तीव्र स्वर में ‘अलख निरंजन’ का घोष किया। चूँकि आशीर्वाद देने और पुनः लौट कर आने के मध्य बारह वर्ष की अवधि बीत चुकी थी, इसीलिए ‘अलख’ शब्द के उच्चारण के साथ ही एक बारह वर्षीय तेजपूर्ण बालक कचरे के ढेर के मध्य से प्रकट हुआ। मत्स्येन्द्र नाथ उसे अपने साथ ले गये। बाद में वही बालक गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इस प्रकार ब्रह्मा जी के द्वारा अमैथुनी सृष्टि रचने संबंधी शास्त्रीय आख्यान सत्य सिद्ध होता है। विज्ञान अपने ढंग से इसकी पुष्टि करने की स्थिति में अब पहुँचता जा रहा है और अध्यात्म की यह सुनिश्चित मान्यता ही है कि ऐसा शक्य है। यदि कोई अन्तःकरण को पवित्र बना कर अपने अन्दर देवशक्तियों को ग्रहण-धारण कर सके तो इसकी पुनरावृत्ति आज भी हो सकती है, ऐसा निगूढ़ विद्या के आचार्यों का मत है।
बेशर्म कहीं का।’ सरदार की आँखें गुस्से से लाल हो गयीं। फड़कते होठों से उन्होंने डाँटा। पास में तो महज एक बूढ़ा ऊँट है और हिम्मत इतनी।
‘कसूर माफ हो।’ अरब अपमान सह नहीं सकता। अगर उसे रोशन का खयाल न होता तो तेग बहार चमकती होती। लेकिन वह समझ नहीं सका था कि उसने गलती क्या की है? आखिर वह काना कुबड़ा नहीं है। बदशकल भी नहीं है और कमजोर भी नहीं है! अरब न तो रोजगार करता है और न खेती। किसी नखलिस्तान की चढ़ाई में वह भी दुश्मन से आधे दर्जन ऊँट और बड़ा-सा तंबू छीन सकता हैं सरदार के और उसका तंबू भी लूट का ही है।
‘जैसे कारुँ का खजाना इनके वालिद ने इन्हीं के लिए रख छोड़ा हो।’ सरदार की तेज जबान पूरे कबीले में मशहूर है। ‘कल की सुबह तुम्हें मेरे कबीले में नहीं मिलना चाहिए। तुम जानते हो कि मैं अपने उसूल का पक्का हूँ और दुबारा माफ की दरखास्त कतई कबूल नहीं होगी। मुँह काला करो।’ बूढ़ा जोर से चिल्ला रहा था। उसकी आदत से वाकिफ होने की वजह से किसी ने खयाल नहीं किया और कोई आया नहीं।
‘मैं तेरे टुकड़े नहीं खाता और कबीला तेरे बाप की पुश्तैनी जायदाद है।’ आदमी के सब्र की भी एक हद होती है। बहुत छोटी हद होती है। बहुत छोटी हद होती है अरब के सब्र की। 'शाम को पंचायत होगी और वही फैसला करेगी कि मैं कबीला छोड़ दूँ या तू अपनी सरदारी कायम रखने के लिए मेरे साथ तेग के दो हाथ करेगा।’ एक झटके से वह तंबू के बाहर चला गया। उसने परवाह नहीं की कि बूढ़ा क्या बड़बड़ा रहा है।
इस कबीले में सरदार ही सब कुछ नहीं हैं वह महज मुखिया है कबीले का। उसका मुखियापन भी तभी तक है, जब तक कोई दूसरा उसे ललकार न दे या हर ललकारने वाले को वह नीचा न दिखाता रहे। कबीले का सरदार सबसे बहादुर और मजबूत आदमी ही रह सकता था। आज बूढ़े सरदार को, जो बूढ़ा होकर भी फौलाद का बना जान पड़ता था, नौजवान महमूद ने ललकार दिया।
‘महमूद!’ उसने देखा कि तंबू के दरवाजे से चिपककर रोशन बाहर खड़ी है। शायद उसने अपने अब्बा की और उसकी बातें सुन ली थीं। कुर्ते का एक किनारा पकड़कर खींच लिया था उसी ने। ‘मेरे अब्बा का लिहाज, उसका गला भरा था। चुपचाप रोती खड़ी रही वह।
‘पगली है तू।’ उसने अपने हाथों से आँसू पोछ दिये। दोनों साथ-साथ खेले हैं और अब भी साथ-साथ बकरियाँ चराते हैं। रोशन से पूछकर ही महमूद उसके अब्बा से कहने गया था कि वह अपनी लड़की का निकाह कर दे उसके साथ। तू समझती है कि मैं बूढ़े को मार डालूँगा?
‘वह खुदकुशी कर लेगा।’ रोशन जानती है कि पंचायत ही सब छोटे बड़े झगड़ों का फैसला करती हैं कभी भी महमूद को कबीला छोड़ने को पंचायत नहीं कहेगी। उसकी ललकार कबीले के मुताबिक़ मंजूर होगी। बूढ़ा सरदार अगर हारा तो एक साधारण अरब की तरह रहने के बदले मरना ज्यादा पसन्द होगा उसे और अगर जीता तो महमूद दोनों हालतें खतरनाक थीं।’ उसके लिए!
‘तेरा अब्बा कारुँ का खजाना चाहता है।’ महमूद ने थोड़ी देर सिर झुकाकर सोचा। ‘मैं वही दूँगा उसे। पंचायत न बुलाएँ। उसे कह देना, मैंने उसका हुक्म कबूल किया। आँखें उठाकर रोशन की ओर देखने की भी जरूरत नहीं समझी उसने। एकदम मुड़ा और चला गया। रोशन पुकार भी तो नहीं सकी। देखती रही वह उसकी ओर। देखती रही तब तक, जब तक वह दिखाई देता रहा और फिर सिर पकड़ कर बैठ गई सिसकियाँ लेते हुए।
दिन बीतते गए, उसकी धुन बढ़ती गयी। बढ़ी हुई दाढ़ी, फटे मैले कपड़े, शरीर की एक-एक हड्डी गिनी जा सकती थी। कोई बहुत गरीब अरब मुफ्ती की कदमबोसी करके उनके कदमों के पास जमीन पर घुटनों के बल बैठा हुआ पूछ रहा था।
‘तुम कहाँ से आए हो?’ मुफ्ती को उसके भोलेपन पर हँसी नहीं आयी। उसकी गड्ढे में घुस गयी आँखें किसी को भी हँसने नहीं दे सकतीं। दयावश मुफ्ती पूछ रहे थे।
‘बहुत दूर-बहुत दूर मेरे मालिक। मैं यत्रान कबीले का हूँ मुझे वहाँ से चले इतने दिन हो गए कि मैंने पूरे छः चाँद देखे रास्ते में।’ दिन को गिनने का कोई तरीका नहीं था उसके पास। महज पूर्णिमा के चाँद से उसने कुछ अन्दाज कर लिया था।
‘ओह इतनी मेहनत काबाए शरीफ के लिए।’ मुफ्ती की आँखें भर गयीं। उन्होंने युवक को बड़े आदर से देखा। काबिल तारीफ है तुम्हारी मेहनत। खुदा तुम्हारा जरूर खयाल करेगा।
‘सो कुछ नहीं मेरे मालिक।’ युवक ने सिर झुकाया।’ मैं हज करने नहीं आया। वैसे मैंने दरबारे शरीफ में बोसा दे लिया है और इस नालायक को आबे जमजम भी नसीब हो चुका है मुफ्ती के लिए यह बताना जरूरी नहीं है कि गरीब से गरीब भिखमंगा मुसलमान भी जब मक्का शरीफ करने निकलता है तो बोसा और आबे जमजम की फीस तो जरूर उसके पास होती है। अपना पेट काटकर भी वह उसे मुहैया कर लेता है।
‘फिर तुमने इतनी बड़ी तकलीफ किस मसलहत से उठायी? मुफ्ती को ताज्जुब था इस फटे हाल अरब पर। उनका ख्याल था कि महज मजहबी जोश ही आदमी को इतनी बड़ी आफत सहने की ताकत दे सकता है।’
‘मेरा बूढ़ा ऊँट रास्ते की आखिरी मंजिल पर दम
तोड़ गया। मुझे तीन-तीन दिन तक पानी भी नसीब नहीं हुआ। बहुत थोड़े नखलिस्तान पड़े मेरे रास्ते में। नखलिस्तानों के अरब हज करने वालों की खातिर करते है। और रास्ते के लिए खजूर-पानी वगैरह साथ दे देते हैं, यह कोई बतलाने की बात नहीं थी।
‘आखिर तुम चाहते क्या हो? मुफ्ती ने अपने कुतूहल को दबाया नहीं।’ दूसरे अरब सरदार जो पास बैठे थे वे भी काफी उकता चुके थे और सुन लेने की जल्दी उन्हें भी थी।
‘कारुँ के खजाने के लिए। मैंने उसी को पाने के लिए इतनी मुसीबत उठायी है। युवक ने फिर कदम बोसी की। मैं जानता हूँ मेरे मालिक कि आपसे दुनिया की कोई बात छिपी नहीं। आप ही मुझे बता सकते हैं कि वह कहाँ है।’
‘कोई नहीं जानता कि वह कहाँ है’ युवक की मजहब परस्ती की वजह से जो आदर मुफ्ती के मन में उसके लिए हो गया था, एकदम दूर हो गया। अरबों ने मुँह फेर कर हँसने की कोशिश की। मुफ्ती ने यह भी नहीं सोचा कि उसको सर्वज्ञ मानने की जो धारणा दूर के अनपढ़ कबीले वालों में है, उसको वह इस जवाब से खत्म कर रहा है।
‘आप जानते हैं आप जरूर जानते हैं मरे मालिक।’ युवक फिर कदमों पर माथा रगड़ने लगा। वह फूट-फूट कर रो रहा था।
‘कोह काकेशस में कहीं पर।’ मुफ्ती ने कहानियों में जो सुन रखा था, बतला दिया। ‘ठीक पता उसका कोई नहीं जानता। मैं भी नहीं। अगर उसका ठीक पता किसी को होता तो क्या अब भी कहीं जमीन में छिपा रहता?’ उसे निकाल न लिया गया होता?’ उसे इस मूर्ख युवक के भोलेपन पर हँसी आ रही थी और लालचीपन पर गुस्सा था।
‘तब वह किसे मिलेगा?’ अरब ने किसी की हँसी का खयाल नहीं किया।
जिसे खुदा दे। मुफ्ती ऊब चुका था उससे।
जरूर तब वह मुझे देगा। अरब ने फिर कदम
बोसी की और उठकर खड़ा हो गया। उसने यह भी नहीं पूछा कि कोह काकेशस है किस ओर?
रात दिनों की यात्रा करके आज जब वह अपनी मंजिल पहुँचा तो उसका दिल बैठ गया। ओह, इतना लम्बा कोह काकेशस। रास्ते की मुसीबतों की परवा नहीं की उसने। लगभग समुद्र के किनारे के शहरों में होता यहाँ तक पहुँचा था और उसकी मुसीबतों का अन्दाज आप भी नहीं कर सकते। मक्का से पैदल बिना दिनार लिए काकेशस की तराई तक। आदमी को यदि सच्ची धुन हो तो नामुमकिन कुछ नहीं।
यहाँ से कई सौ मील ऊपर जाकर यह काकेशस से मिल जाता है। पूछने पर एक शख्स ने उसे बतलाया था। बहुत चौड़ा है। लगभग दो सौ मील चौड़ा। इतना ऊँचा-नीचा है कि तुम उसे सीधे पार करना चाहो तो बहुत थोड़ी खास-खास जगहों से ही कर सकते हो। बतलाने वाले को क्या खबर कि उसका बयान सुनने वाले के दिल पर क्या गुजर रही है।
‘ठीक पता उसका कोई नहीं जानता।’ मुफ्ती के इन लफ्जों की असलियत उसके दिमाग में शक्ल बनकर खड़ी हो गयी थी। ‘मैं पूरी उमर नहीं ढूँढ़ सकता। काकेशस को एक सिरे से दूसरे सिरे तक पूरा-पूरा देख डालना किसी फरिश्ते के लिए मुमकिन हो सकता है। ‘अब भी वह नहीं समझ सका था कि खजाना कहीं बाहर नहीं पड़ा होगा। उसके लिए काकेशस को पूरा खोदना होगा। पता नहीं कितनी गहराई तक।
बैठ गया वह वहीं एक पत्थर पर। रास्ते की सारी थकावट जैसे आज इकट्ठा आकर उस पर लद गयी। सारी मुसीबतें जिनको उसने तिनके से भी छोटी मानकर ठुकरा दिया था जैसे आज उससे पूरा बदला वसूल कर लेगी। सिर चकराने लगा था। देह में कँपकँपी जान पड़ती थी। बड़े जोर से खाँसने लगा था वह।
‘नहीं, अब नहीं चल सकेगा वह अब उसमें एक कदम भी चलने की ताकत नहीं है। यहीं इसी चट्टान पर। अब वह इस पर से उठ भी नहीं
सकेगा। बड़ा भय लग रहा था उसे।
‘उसका यत्राव कबीला। हँसते-खेलते लम्बे तगड़े साथी। उसकी बकरियाँ। छोटे-मोटे टीले। वह खूबसूरती की पुतली रोशन। बूढ़ा खूसट सरदार। सरदार का बिगड़ना। तंबू के बाहर आँखों में आँसू भरे वह सदा की हँसी-खेलती शरारती लड़की गुमसुम बनी। उसका बूढ़ा ऊँट। एक-एक कर सारी तस्वीरें सामने आती जा रही थीं। वह चट्टान पर लेट गया था और आँखें बन्द कर ली थीं। प्यास से गला सूख रहा था। चमड़े के थैले में पानी की एक बूँद नहीं थी और होती भी तो उसमें उठकर खुद पानी पीने की ताकत कहाँ रह गयी थी आज। वह अब बैठ भी कहाँ सकता है।
रास्ते के नखलिस्तान। कबीले वालों की खातिरदारी। जईफों की दुआएँ और हमजोलियों का साथ न दे सकने का अफसोस। जईफ औरतों की स लाहें। मक्का शरीफ काबे का बोला मौलवी-मुल्लों की पैसों के लिए छीना झपटी। डाँट-फटकार बेतादाद तस्वीरें उसके सामने से गुजरती जा रही थीं।
‘जिसे खुदा दे।’ मुफ्ती की तस्वीर आखिर में आयी सामने। कितना आबरुदार है मुफ्ती। लेकिन मुफ्ती का आखिरी कलाम दिमाग में आते ही वह चौंक कर उठ बैठा। उसमें पता नहीं कहाँ से बला की ताकत आ गयी। प्यास पता नहीं कहाँ रफूचक्कर हो गयी। पता नहीं उसके बदन के किस कोने में जिन्दगी का यह जोश छिपा था।
‘मुफ्ती झूठ नहीं बोलता।’ उसके पास मुसल्ला कहाँ रखा था। उसी चट्टान पर उसने अपने फटे फटाए चद्दर को बिछा दिया। जरूर खुदा ही उस खजाने को दे सकता है। अब भी उसे याद था वही जवाब जो चलते वक्त उसने मुफ्ती को दिया था। अपने जवाब पर उसे अब भी पूरा यकीन है। कोई वजह नहीं कि वह अपना इत्मीनान खो दे। जब खुदा को ही देना है तो वह कहीं भी दे सकता है। पता भी बतला सकता है। जोश के सारे बिना वजू किए ही नमाज पढ़ने खड़ा हो गया। पानी कहाँ था वहाँ वजू करने को?
कौन गिनने बैठा था वहाँ कि वह दिन-रात में कितनी नमाजें अदा करता है। बिना रुके, बिना दूसरी बात सोचे वह बराबर एक के बाद दूसरी नमाज पढ़ता जा रहा था। ‘तेरे दरबार में कोई कमी नहीं है और न तेरे लिए कोई मुश्किल है। तेरा यह सबसे छोटा गुनहगार गुलाम कारुँ का खजाना माँगता है। महज कारुँ का खजाना। तेरा जलवा बेशुमार है मेरे मालिक! मेरी दुआ कबूल कर।
उसकी आँखें इतना पानी बहा चुकी थीं कि उनमें अब एक बूँद पानी नहीं बचा था। उसके चमड़े के थैले की तरह वे खुश्क हो चुकी थीं। भूख-प्यास नींद-इनकी हिम्मत नहीं थी कि खुदा की प्रतिष्ठा में लगे। इस बन्दे की छाया भी वे छू सकें। हर नमाज की आखिरी दुआ जब वह दोनों हाथों को इकट्ठा करके हथेली फैलाकर माँगते हुए ऊपर मुख उठाता था, तो जान पड़ता था कि उसकी नजरों से सातों आसमान फट जाएँगे। वह सातवें आसमान का मालिक जरूर कूद पड़ेगा उसकी इन नजरों से मजबूर होकर।
आज उसे पूरे नौ दिन हो चुके हैं। नमाज के लिए उठना बैठना भी अब मुश्किल होता जा रहा है। आखिर बिना खाए-पिए जिस्म कहाँ तक बदस्तूर काम कर सकता है। हाँफ जाता है वह हर बार उठने में। बैठकर उठना दूभर हो जाता है और खड़े होने पर पैर काँपने लगते हैं। सिर में चक्कर आने लगता है। बड़ी दिक्कत होती है झुककर खड़े होने में। लगता है कि वह सामने की ओर लुढ़क जाएगा।
नहीं उठ सका-आखिर जब आफताब उसकी नवें दिन की शाम की नमाज का गवाह होकर कोहकाक के पीछे जा छिपा। तब वह फिर नमाज के लिए किसी तरह उठ ना सका। माथा जमीन में टेकते ही बेहोश हो गया। जैसे का वैसे ही पड़ा रहा। इस सुनसान जगह में कौन था जो उसकी खोज खबर लेता। इन नौ दिनों में कोई चरवाहा भी उधर से नहीं निकला था।
अल्लाह पता नहीं कितनी देर बाद उठाया था उसने सिर। कहीं से उसी वक्त मुर्गे ने बाँग दी। शायद वह बाँग उसके कानों तक नहीं पहुँची। वह ठहाके पर ठहाके लगाता जा रहा था। पेट पकड़ कर हँस रहा था। क्या पागल तो नहीं हो गया।
पता नहीं कहाँ से फिर बदन में ताकत आ गयी। पता नहीं अभी भी उस हड्डियों के ढाँचे में यह ताकत छिपी थी या किसी ने इसमें जान फूँक दी थी। मामूली ताकत नहीं थी वह। वह हँसते हुए चट्टान के नीचे खड़ा हो गया और एक कोना दोनों हाथों से पकड़कर चट्टान उसने दूर फेंक दी।
कई खूबसूरत जीने नीचे जा रहे थे। किसी तहखाने का दरवाजा निकल पड़ा था। उसमें नीचे चाहे जो हो जीनो पर किसी चमकीली चीज की काफी रोशनी थी। उस अँधेरी रात में भी जीने चमक रहे थे। वह जीनो से नीचे उतर पड़ा।
मैं भी कितना नालायक हूँ। वह कुल आधे घण्टे में ही ऊपर आ गया और चट्टान उठाकर उसने फिर जीनो के ऊपर पहले जैसे ही रख दी। माना कि उसमें बहुत बड़े-बड़े बहुत चमकीले पत्थरों के ढेर हैं। पत्थर ही तो हैं वे सब। मेरे मालिक। तूने अपने नापाक बन्दे की दुआ कबूल की और उसे बताया। कौन कहता है कि मैंने ख्वाब देखा था। ये पत्थर, जीने, क्या ख्वाब हैं। लेकिन तूने इसे छिपाया है छिप ही रहने दे इसको। तेरे बन्दे को अब तेरी दुआ के अलावा और कुछ नहीं चाहिए। भाड़ में जाय कारुँ और दोजख में जाय उसका यह खजाना। खूब शैतान ने भी मुझे बेवकूफ बनाया।
उस दिन के बाद वह अलमस्तों की तरह घूमने लगा। यदा-कदा चरवाहे उसे खजूर या रोटी खिला देते। अब उसका एक ही काम रह गया था घूम-घूम कर सब को खुदा की राह पर लगाने लगा। वह सबसे एक ही बात कहता-खुदा सब कुछ कर सकता है खुदा सब कुछ दे सकता है। माँगना है तो उसी से माँगों। वहीं के लोग उसे सुलेमान वीर के नाम से जानने लगे। प्यार से उसे लोग बड़े पीर भी कहते।
फूल का अपना अलग भी महत्व है पर वह नहीं जो माला में गुँथे रहने पर होता है। एकाकी फूल किसी महापुरुष या देवता के गले में नहीं लिपट सकता। यह आकांक्षा तो सूत्रात्मा को आत्म समर्पण कर माला में गूँथने के बाद ही पूरी हो सकती है। व्यक्तिवादी एकाकी, स्वार्थी-संकीर्ण मनुष्य समूहगत चेतना से अपने को अलग रखने की सोच सकता है। दूसरों की उपेक्षा कर सकता है उन्हें क्षति पहुँचा सकता है और इस प्रकार अपने उपार्जन को शोषणात्मक उपलब्धियों को, अपने लिए अधिक मात्रा में संग्रह कर सकता है पर अन्ततः यह दृष्टिकोण अदूरदर्शिता पूर्ण सिद्ध होता है। पृथकता के साथ जुड़ी दुर्बलता उसे उन सब लाभों से वंचित कर देती है, जो समूह का अंग बनकर रहने से ही मिल सकती थी।
उँगली हाथ से कटकर अलग रहने की तैयारी करते समय यह सोचती है कि मैं क्यों सारे दिन हाथ का आदाब बजाऊँ क्यों उसके इशारे पर नाचूँ। इसमें मेरा क्या लाभ? मेरे परिश्रम और वर्चस्व का लाभ मुझे क्यों न मिले? यह लग रहकर ही हो सकता है। इसलिए अलग ही रहना चाहिए। अपने भ्रम और उपार्जन का लाभ स्वयं ही उठना चाहिए। यह सोच कर हाथ से कटकर अलग रहने वाली उँगली कुछ ही समय में देखती है कि उसका अनुमान गलत था। शरीर के साथ जुड़े रहने पर उसे जो जीवनदाता रक्त मिलता था, वह मिलना बन्द हो गया। उसके अभाव में वह सूखकर सड़ गई। उस सड़े टुकड़े को छूने में भी लोगों ने परहेज किया। जब कि हाथ के साथ जुड़े रहने पर वह भगवान का पूजन करती थी। हाथ मिलाते समय बड़ों के स्पर्श का आनन्द लेती थी। महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखती थी। बड़े काम करने का श्रेय प्राप्त करती थी। पृथक् होने के साथ-साथ वह सारी सुविधाएँ भी समाप्त हो गयीं। उँगली नफे में नहीं घाटे में रही।
ठीक भी है, ईंटों के समन्वय से भवन बनते हैं। बूँदों के मिश्रण से बादल बनते हैं। परमाणुओं का सहयोग पदार्थ की रचना करता है। अवयवों का संगठित स्वरूप शरीर है। पुर्जों की घनिष्ठता मशीन के रूप में परिणत होती है। पंच-तत्वों से मिलकर यह विश्व सृजा हैं पंच प्राण इस काया को जीवित रख रहे हैं। दलबद्ध ही समर्थ सेना है। कर्मचारियों का गठित समूह ही सरकार चलाता है। यदि इन संघटकों में पृथकतावादी प्रवृत्ति पनपे और डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग-अलग पकने लगे तो जो कुछ ‘महान’ दिखाई पड़ता था तुच्छ में बदल जाएगा।
तुच्छता अपना अस्तित्व तक बनाए रखने में असमर्थ है। प्रगति सिर्फ पारस्परिक सहयोग पर निर्भर हैं दूसरों को पीछे छोड़कर एकाकी आगे बढ़ जाने की बात सोचने वाले उन संकटों से अपरिचित रहते हैं जो एकाकी के अस्तित्व को ही संकट में डाल सकते हैं। उँगली हाथ से कट कर अलग से अपने बलबूते पर प्रगति की कल्पना भर कर सकती है। व्यावहारिक क्षेत्र में उतरने पर कड़वी सच्चाई सामने आती है कि अलगाव लाभदायक दिखता भर है, वस्तुतः लाभदायक तो सामूहिकता ही है।
मानवीय प्रगति का गौरवशाली इतिहास उसकी समूहवादी प्रवृत्ति का ही सत्परिणाम है। बुद्धि का विकास भी सामूहिक चेतना के फलस्वरूप ही सम्भव हुआ। बुद्धि ने सामूहिकता नहीं विकसित की। सहयोग की वृत्ति ने बुद्धि का विकास संभव किया है। हमें समूह का अंग बनकर रहना चाहिए। अपने को समाज का एक घटक अनुभव करना चाहिए। प्रगति एकाकी नहीं हो सकती। सुविधाओं का उपभोग एकाकी किया जाय तो उसकी अगणित विकृतियाँ उत्पन्न होंगी। बाहर ईर्ष्या-द्वेष बढ़ेगा आक्रमणकारी बढ़ेंगे और व्यसनों की भरमार आ धमकेगी। अन्तर को चोर जैसी आत्मग्लानि खाने लगेगी और परिवार में आपा-धापी पैदा होगी। व्यक्तिगत बड़प्पन के प्रयत्नों को ही तो स्वार्थ कहा जाता है। स्वार्थी सम्मान नहीं तिरस्कार प्राप्त करता है। उस मार्ग पर चलते हुए उत्थान नहीं पतन ही हाथ लगता है। संकीर्णता की परिधि में आबद्ध पोखर का जल सड़ेगा और सूखेगा ही। स्वच्छता और सजीवता प्रवाह के साथ जुड़ी हुई है। बहता हुआ जल ही सराहा जाता है। समुद्र बादलों को देता है। बादल जमीन को देते हैं। जमीन नदियों के द्वारा उस जल को पुनः समुद्र में पहुँचा देती है। यही क्रम विश्व की स्थिरता और हरीतिमा, शान्ति और शीतलता का आधार है। हम अपने को विस्तृत करें। सबको अपने में अपने को सबमें देखें। आत्माओं को चमकती हुई परमात्म सत्ता में समझें। यदि ऐसा कर सके तो हमें व्यक्तिवाद की तुच्छता छोड़कर समूहवाद की महानता ही वरण करनी पड़ेगी।
जीवन में अर्थ के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता। एक निश्चित सीमा के अन्दर वह मनुष्य और समाज के विकास के लिए आवश्यक है, पर सीमा का अतिक्रमण होने से वह अनर्थमूलक बन जाता है और विकास के स्थान पर विनाश का, शोषण और संघर्ष का कारण बनता है।
भौतिकता की दृष्टि से विचार करें, तो यह कहना गलत न होगा कि वर्तमान में हम विकास की जिन ऊँचाइयों को छू रहे हैं, वह इतिहास में अपने प्रकार का अनूठा उदाहरण है। इसका प्रमुख कारण धन है। इसे जितना महत्व इन दिनों मिला हुआ है, उतना कदाचित् ही पहले कभी मिला हो। प्राचीनकाल में अर्थोपार्जन सदा दूसरे नम्बर पर रहा है, इसी कारण से अध्यात्मवाद के आगे भौतिकवाद बौना बना रहा। आज स्थिति सर्वथा उलटी है। अध्यात्मवाद की चर्चा ही मठ-मन्दिरों तक सीमित होकर रह गई, जबकि भौतिकवाद समाज का जीवन दर्शन बना हुआ है। ऋषि काल में अध्यात्म के एकपक्षीय प्रगति से समाज को कोई विशेष हानि नहीं हुई। जो हुई, वह इतनी भर थी कि भौतिक सुविधाओं का उपभोग वह नहीं कर सका। आज भौतिक उन्नति हुई तो सही, पर उस एकांगी विकास से हित के स्थान पर अहित ही अधिक हुआ। अर्थप्रधान दृष्टिकोण ने जितनी अराजकता और अव्यवस्था इन दिनों पैदा की, उतनी शायद ही किसी दूसरे तत्व ने उत्पन्न की हो। इतने पर भी सम्पदा का महत्व यथावत् बना ही रहता है। भौतिक जीवन के लिए उसकी आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। प्रश्न है कि जब धन भौतिक उन्नयन का निमित्त है और अवगति का कारण भी तो, फिर कोई मध्यवर्ती मार्ग ऐसा होना चाहिए, जिसमें उन्नति भी हो और अवनति से भी हम बचे रहें। ऐसा अर्थ के प्रति संतुलित दृष्टि से ही संभव है। यदि दृष्टि असंतुलित हुई और एकदम अर्थोन्मुख बनी, तो आज जैसे पतन की स्थिति पैदा होगी और यदि आर्थिक विकास पर ध्यान नहीं दिया गया, तो उसे गौण माना गया तो साज पिछड़ा कहलायेगा। आज हम प्रगति के उस मुकाम पर पहुँच चुके हैं, जहाँ भौतिक विकास की उपेक्षा कर केवल अध्यात्मवाद की वकालत नहीं कर सकते। प्राचीन समय में भले ही वह स्थिति रही हो, पर अब वह स्वीकार्य नहीं है। इसलिए एक ऐसा समन्वित दृष्टिकोण पैदा करना पड़ेगा, जिसमें भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के उत्कर्ष की पूरी-पूरी संभावना हो। इसके लिए एक ऐसे अर्थशास्त्र की रचना करनी पड़ेगी, जिसमें भौतिक उत्थान के लिए अर्थ की महत्ता को स्वीकारा गया हो, किन्तु साथ ही उसकी शुद्धता पर भी पूरा-पूरा विचार किया गया हो। नैतिक और अनैतिक अर्थ-स्रोतों में स्पष्ट विभेद ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता होगी। जो अनैतिक स्रोत हो, उस उपार्जन से बचा जाय और उसकी निन्दा-भर्त्सना की जाय एवं नैतिक स्रोत की सराहना की जाय, साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा जाय कि आवश्यकता से अधिक उपार्जन को समाज के काम लगा दिया जाय और उस पर उसी का नैतिक अधिकार माना जाय। इतना होने पर ही एक सर्वथा दोष रहित और समानता पर आधारित अर्थव्यवस्था विकसित की जा सकेगी, अन्यथा नहीं। वर्तमान अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा दोष यही है कि वह नीति-अनीति में भेद नहीं करता केवल धन-संग्रह पर विचार करता है, भले ही वह वैध-अवैध किसी भी तरीके से कमाया गया हो। आधुनिक अर्थशास्त्र के प्रमुख पुरुष केनिज का इस सम्बन्ध में विचार है-हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करना है, सबको धनी बनाना है। इस मार्ग में नीति-अनीति का हमारे लिए कोई मूल्य नहीं।” वे तो यहाँ कहते हैं-यह नैतिकता का विचार न केवल अप्रासंगिक है, वरन् हमारे रास्ते में बाधक भी।” जहाँ अनीति की इस तरह खुली वकालत होगी, वहाँ की अर्थव्यवस्था पापपूर्ण न हो, इसकी कैसे आशा की जाय? आज इसीलिए आर्थिक क्षेत्र में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच स्पर्धा छिड़ी हुई है। हर कोई अपने प्रतिद्वन्द्वी से आगे निकल जाना चाहता है। इस होड़ में तरीका शुद्ध है या अशुद्ध-इसका कोई ध्यान नहीं रखा जाता। वर्तमान भ्रष्टाचार का यही मुख्य कारण है। जब अर्थशास्त्र की मूल अवधारणा ही अनैतिकता पर आधारित हो, तो फिर आर्थिक अपराध रोकने की बात करना बेईमानी होगी। अर्थशास्त्र के वर्तमान ढाँचे में यदि भ्रष्टाचार बढ़ता है, लूट-पाट चोरी-डकैती बेईमानी-ठगी जैसे आपराधिक कृत्य बढ़ते हैं, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। यह स्वाभाविक है। अब वर्तमान के इस अर्थशास्त्र की पृष्ठभूमि में आध्यात्मिक अर्थशास्त्र पर तनिक विचार करें। आधुनिक अर्थशास्त्र के तीन मुख्य आधार हैं-इच्छा आवश्यकता और माँग। इच्छा बढ़ाने से स्वयमेव आवश्यकता और माँग बढ़ जाती है। तुलनात्मक दृष्टि से देखें, तो इच्छा का क्षेत्र व्यापक है। आवश्यकता का उससे छोटा है और माँग का क्षेत्र उससे भी छोटा है। इन्हीं तीन पर आधुनिक अर्थशास्त्र की इमारत खड़ी है। मध्यवर्ती अर्थशास्त्र (अर्थात् जो न तो पूरी तरह भौतिक हो और न एकदम आध्यात्मिक हो) के तत्वों पर विचार करें तो वर्तमान अर्थशास्त्र में चार बातें और जोड़ देनी चाहिए-सुविधा आसक्ति, विलासिता और प्रतिष्ठा। आज की आर्थिक मनोवृत्ति में इन बातों की विशेष प्रधानता हैं। आज केवल आवश्यकता-पूर्ति के लिए अर्थ-संग्रह नहीं होता। सुविधा-साधन अधिकाधिक हों, उसे कमाने के पीछे यह भी एक दृष्टि है। किसी वस्तु से आसक्ति बढ़ी, वह अच्छी लगने लगी, तो चाहे उसकी आवश्यकता हो या न हो, वह माँग की लिस्ट में सम्मिलित हो जाती है। उसे प्राप्त करने के लिए धन-संचय होने लगता है। इसलिए वर्तमान अर्थशास्त्र में आसक्ति भी एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में शामिल है। तीसरा तत्व विलासिता है। किसी व्यक्ति के पास अर्थ-संग्रह के स्रोत अगणित हों अथवा एक ही स्रोत से इतनी सम्पदा प्राप्त होती हो कि उसकी सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त उसका एक बड़ा भाग शेष बचा रहे तो फिर उसका उपयोग विलासिता के सामान क्रम करने में होगा। विलासिता में मनुष्य का कहीं पता ही नहीं होता। प्रधान अर्थ बन जाता है। विलासिता न हमारी आवश्यकता है, न अनिवार्यता, वह केवल भोगवृत्ति का उच्छृंखल रूप है। समझदार आदमी उसमें किसी भी सार्थक तत्व को नहीं देख पाता। वहाँ मात्र अर्थ लोलुपता और उसकी पूर्ति के साधन के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचता। अर्थोपार्जन का अन्तिम उद्देश्य प्रतिष्ठा-प्राप्ति है। कोई आवश्यकता नहीं, फिर भी अहं के पोषण के लिए कुछ खरीदना पड़ता है, अट्टालिका खड़ी करनी पड़ती है। जमीन-जायदाद अनावश्यक परिमाण में इकट्ठे करने पड़ते हैं, साधनों का अम्बार लगाना पड़ता है। वह सब नहीं रहते, तो भी जीवन-यात्रा मजे में चल सकती थी, पर प्रतिष्ठा के लिए, मान-सम्मान के लिए ऐसा करना अनिवार्य प्रतीत होता है और जिस धन का उपयोग समाज कल्याण में हो सकता था, उसका दुरुपयोग कोठा भरने में होने लगता है। यह सब आधुनिक अर्थशास्त्र की देन है। केनिज ने इस पर विचार करते समय मनुष्य की आधी प्रकृति पर तो चिन्तन किया, पर शेष आधी प्रकृति को अस्वीकार दिया। मूलभूत गलती यहीं हुई।
प्रसिद्ध इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी ने कहा है कि कोरी रोटी और कोरी आस्था, दोनों अपर्याप्त हैं। मनुष्य केवल रोटी के आधार पर जी नहीं सकता और केवल आस्था के सहारे भी जीना संभव नहीं। वर्तमान व्यवस्था यह है कि रोटी दो तो आचार और आस्था को खण्डित कर दो। आचार और आस्था दो तो रोटी की समस्या रह जाती है। प्रस्तुत व्यवस्था का यह त्रुटिपूर्ण पहलू है। जीवन के लिए आचार भी उतना ही अनिवार्य है, जितना आहार। जेल जीवन जीने वाले कैदियों के लिए तो खाद्य का प्रबन्ध हो जाता है, पर किसी आचारशास्त्र के अभाव में उनका जीवन उस कालकोठरी में भी कितना उद्दण्ड और उच्छृंखल हो सकता है, इसे कोई निकटवर्ती ही जान सकता है। दूसरी ओर केवल नीति-नियमों की चर्चा करना, धर्म अध्यात्म के उपदेश सुनाना-इतने भर से भी काम बनता नहीं। यदि व्यक्ति के सामने रोटी की समस्या मुँह बांये खड़ी है, तो उत्तम बातें भी उसे कानों में गर्म शीरा उड़ेलने जैसा प्रतीत होंगी। शायद, इसीलिए विवेकानन्द ने कहा था कि भारत को अध्यात्म की भिक्षा देने के लिए सबसे पहले उसकी रोटी की समस्या हल करनी पड़ेगी। बात घूम फिर कर वहीं आती है कि व्यक्ति को आहार भी उपलब्ध हो और आचार की अनिवार्यता भी वह अनुभव करे। ऐसा तभी हो सकेगा, जब अध्यात्मवाद और भौतिकवाद का समन्वय कर एक मध्यवर्ती अर्थशास्त्र का निर्माण किया जाय, जिसमें जीवन के भौतिक विकास की भी गुँजाइश हो और आत्मिक उत्कर्ष का भी प्रावधान हो।
वर्तमान समाज में दो प्रकार की अर्थव्यवस्था हैं-एक साम्यवादी, दूसरी पूँजीवादी। दोनों का उद्देश्य एक ही है कि हर व्यक्ति धनी बने। निर्धनता के अभिशाप में किसी को भी नहीं जीना पड़े। प्रयोजन आकर्षक है। इस संदर्भ में दोनों प्रकार की प्रणालियों में कोई विशेष अन्तर नहीं दिखाई पड़ता दर्शन के सम्बन्ध में तो बिलकुल ही नहीं। दोनों के प्रक्रिया और परिणाम में अन्तर हो सकता है, किन्तु फिलॉसफी दोनों की भौतिकवादी ही है। दोनों ही इस एक ही लक्ष्य को लेकर क्रियाशील हैं कि कोई भी व्यक्ति निर्धन न रहे, गरीबी की रेखा के नीचे जीवन-यापन न करे, प्रत्येक व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो और वह चैन की जिन्दगी जिये। यह विकास का एक लक्ष्य बनाया गया। अर्थशास्त्र की दृष्टि से भी विकास की यही परिभाषा हैं आर्थिक विकास-प्रौद्योगिकी का विकास-टेक्नोलॉजी का विकास, प्रति व्यक्ति आय और जीवन स्तर-ये आधुनिक अर्थशास्त्र के विकास के मानदण्ड हैं।
शास्त्र भी उपरोक्त तथ्य का ही समर्थन करते हुए कहा है-अधनं निर्बलतम्” जो निर्धन है, वह निर्बल है। तात्पर्य है कि गरीब और गरीबी कभी वाँछनीय नहीं रहे। वे सदा तिरस्कृत हुए हैं। उन्हें किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं माना गया। इस संबंध में आधुनिक अर्थशास्त्र का कथन है कि यदि मनुष्य को स्वार्थवृत्ति को किसी प्रकार उभार दिया जाय, तो विकास की गाड़ी चल पड़ेगी। आधुनिक अर्थशास्त्र के इस मन्तव्य में सच्चाई नहीं है-ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि व्यक्तिगत स्वार्थ जितना काम मनुष्य से करवाता है, उतना कदाचित् कोई ही और करवाता हो इसलिए विशुद्ध भौतिकवादी दृष्टि से विकास की यह अवधारणा सही कही जा सकती है।
किन्तु यदि अध्यात्मवादी दृष्टिकोण से चार करें, तो विकास की यह अवधारणा अमान्य हो जायेगी, कारण कि जहाँ स्वार्थ आगे आयेगा वहाँ व्यक्ति अपने आगे दूसरे की-समाज की क्यों परवाह करेगा? ऐसी स्थिति में समाज सदा दूसरे नम्बर पर आयेगा। ऐसे में जो अव्यवस्था और आपाधापी उत्पन्न होगी, उसका परिदृश्य वर्तमान समय के रूप में देखा जा सकता है। इसका निराकरण अध्यात्मवादी चिन्तन से ही संभव है। उसका कहना है कि ऐसी दशा में व्यक्ति और समाज दोनों पर साथ-साथ विचार हो, तभी समस्या का हल निकल सकता हे। अभी व्यक्ति एकांगी चिन्तन से अपने धनी बनने की उलटी-सीधी कल्पनाएँ तो कर लेता है, पर उस अनुचित तरीके से समाज को कितना अहित होगा इस पर विचार नहीं करता। वह सिर्फ प्रीतिकर की बात सोचता है और हितकर की उपेक्षा कर देता है। यदि प्रीतिकर एवं हितकर दोनों को ध्यान में रखे, तो शायद वह स्वार्थ को त्याग देगा, क्योंकि स्वार्थवश जो प्रीतिकर लगता है, वह हितकर नहीं होता-इसे वह तब भली-भाँति समझ जायेगा। मार्क्स और केनिज-इन दोनों का एक ही लक्ष्य रहा अर्थ लाभ, सुख एवं संतुष्टि। इतना धन हो जाय कि गरीबी मिट जाय और सुख मिले, किन्तु उस सुख के साथ जो कुछ आ रहा है, उस पर विचार नहीं किया। भूखे को रोटी मिली-सुख मिला, नंगे को कपड़ा मिला-सुख मिला। जहाँ अधिक प्रयोजन हो, वहाँ इससे आगे जाया नहीं जा सकता। अगर अध्यात्म का दर्शन उनके सामने होता, तो सुख की कल्पना कुछ दूसरी होती, किन्तु भौतिक जगत की यह आत्यन्तिक सीमा है। इसलिए वे ‘अर्थ’ से आगे का विचार नहीं कर सके। यदि इस हद को पार कर वे तनिक गहरे चिन्तन में उतरते, तो शायद उनकी सुख की अवधारणा भी बदल जाती और अध्यात्मवादी दर्शन को स्पर्श करने पर एक ऐसे अर्थशास्त्र का सृजन होता, जिसमें पदार्थपरक और आत्मपरक दोनों प्रकार की प्रगति की पूरी-पूरी संभावना रहती और जिसे आज के जमाने के उपयुक्त और आदर्शयुक्त अर्थशास्त्र कहा जा सकता था।
एक राजा था ज्ञानवान् होते हुये भी वह स्वार्थी था। एक दिन सिपाही ने गश्त लगाते हुये देखा एक आदमी कंधे पर पोटली लिये रात में घूम रहा है। उसने आदमी को बन्दी बनाकर दूसरे दिन राजदरबार में प्रस्तुत किया। ‘कौन हो तुम? क्या नाम है तुम्हारा? कहाँ से आये हो? और क्या करते हो?’ राजा ने एक ही साथ कई प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
‘राजन्! कथा कहने वाला पण्डित हूँ मैं? सन्मार्ग पर चलना और दूसरों को उपदेश देना मेरा व्यवसाय है। पास के एक छोटे गाँव में ही रहता हूँ। आपसे भेंट करने की इच्छा थी सो चला आया इस ओर, पण्डित ने बड़ी नम्रता के साथ अपनी बात कही।
‘तो फिर कंधे पर पड़ी इस पोटली में क्या है? राजा ने उँगली के इशारे से पूछा।
‘इसमें तीन मूर्तियाँ हैं एक मिट्टी की, दूसरी लकड़ी की और तीसरी पत्थर की। पर आकृति एक सी ही है। फिर भी मूल्यों में अन्तर है। एक दस रुपये की, दूसरी सौ रुपये की और तीसरी पाँच सौ रुपये की।’
राजा ने पूछा-एक सी मूर्तियों के लिये कीमत अलग-अलग क्यों?” ब्राह्मण ने बताया “आर्या! पत्थर की मूर्ति सौंदर्य और स्थिरता का प्रतीक है। जिनका जीवन सुन्दर होता है। वे शरीर से न रहें, तो भी उनका यश अजर-अमर रहता है। उनकी श्रद्धा-प्रतिष्ठा सामान्य लोगों से बहुत अधिक होती है। दूसरी लकड़ी की मूर्ति का है। स्थिर तो है। पर गिरे तो टूट सकती है। जो साँसारिक परिस्थिति से भयभीत होकर घर छोड़कर आत्मकल्याण के लिये जंगल चले जाते हैं। परिस्थिति बनने पर कभी टूट भी जाते हैं। वह लकड़ी की मूर्ति की तरह हैं। तीसरी मिट्टी की मूर्ति-मनुष्य के निकृष्ट इन्द्रिय परायण जीवन प्रतिदिन बनते-बिगड़ते रहते हैं। उनकी क्या कीमत?”
पंडित की बात सुनकर राजा का विवेक जग पड़ा।
मन क्या है? शरीर से यह क्यों अभिन्न है? इसकी यदि विवेचना करनी हो? तो छान्दोग्योपनिषद् के ‘अन्नमयं हि सोम्य मनः’ (6/6/4) के स्वर में स्वर मिलाते हुए यही -कहना पड़ेगा कि यदि एक ही उपादना से दो प्रकार की सृष्टियाँ हो रही हैं, तो उन दोनों में किसी-न-किसी प्रकार का सम्बन्ध अवश्य है, भले ही आकार भेद के कारण यह तादात्म्य स्थापित न हो पा रहा हो, तो भी इतने से ही उसे अमान्य करने का कोई कारण नहीं। जल से भाप और बर्फ दोनों ही बनती हैं। दोनों के आकार और रूप में भारी अंतर है। एक स्थूलता का प्रतिनिधित्व करती है, तो दूसरी अपने सूक्ष्म अस्तित्व का बोध कराती है। इतने पर भी दोनों में कोई भेद है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अनुकूल परिस्थिति मिलने पर वाष्प बर्फ भाप। शरीर और मन के सम्बन्ध में विज्ञानवादी विचारधारा भी अब ऐसी ही बने लगी है और विज्ञान वेत्ता द्वैत से अद्वैत की वैदिक मान्यता की ओर लौटते प्रतीत हो रहे हैं। इसी आधार पर वे मनोकायिक रोगों का निदान और उपचार ढूँढ़ पाने में सफल हुए हैं।
इस अभेदता को कुछ अन्य उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ तक पदार्थ और ऊर्जा के बारे में मान्यता थी कि वे दो पृथक् वस्तुएँ हैं। द्रव्य भी अनाशवान् है और ऊर्जा भी अनश्वर है। दोनों नित्य हैं। ऊर्जा द्वारा पदार्थ संचालित होते हैं इसके अतिरिक्त पदार्थ सत्ता पर ऊर्जा का कोई हस्तक्षेप नहीं।
सबसे पहले इस अवधारणा पर आइन्स्टीन के ऊर्जा सिद्धान्त;म्.उब2द्ध ने आघात किया। उक्त सूत्र द्वारा उन्होंने सिद्धान्त यह सिद्ध कर दिया कि शक्ति और द्रव्य परस्पर परिवर्तनीय है। इस प्रकार पदार्थ और ऊर्जा के द्वैतवाद से चल कर अब हम उनके अद्वैतवाद तक पहुँच गये हैं। इससे उत्साहित होकर आधुनिक मनोविज्ञान ने अब एक नई घोषणा की है कि द्रव्य और मन दो भिन्न पदार्थ नहीं है। उनके अनुसार यह एक ही सत्ता की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। इस सम्बन्ध में अमरीका के गइस इंस्टीट्यूट में महत्वपूर्ण शोधकार्य हुए हैं। उनने अपने अनुसंधान के आधार पर यह सिद्ध कर दिया है कि मानस तत्व और भौतिक तत्व दो नहीं, एक हैं। विज्ञानवेत्ता मन और पदार्थ को पहले अलग मानते थे, पर हाल के अन्वेषणों ने अब उन्हें यह स्वीकारने के लिए बाध्य कर दिया है कि दोनों एक ही चेतना के दो रूप हैं। ‘न्यू फ्रंटियर्स ऑफ माइन्ड नामक पुस्तक के लेखक ने इस सम्बन्ध में यह तर्क प्रस्तुत किया है कि यदि ऐसी बात नहीं होती, तो मन का पदार्थ पर जो प्रभाव दिखाई पड़ता है, वैसा कुछ देखा-सुना नहीं जाता और पदार्थ सत्ता मन से सर्वथा अप्रभावित बनी रहती, पर व्यवहार में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता है। मन में यदि कोई संकल्प बार-बार उठता है, तो वस्तु को वह इच्छानुरूप प्रभावित करने में सफल होता है। छुरी एवं चम्मचों को टेढ़ा कर देना अथवा तोड़ देना जैसे प्रदर्शन वस्तुतः इसी संकल्प बल के करिश्मे हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका कारण समझाते हुए ग्रन्थकार ने मत व्यक्त किया है कि मन में जब भी कोई संकल्प उठता है, तो वह यथावत् चेतना के समुद्र में संचारित हो जाता है और निर्दिष्ट वस्तु जहाँ कहीं भी होती है, उस तक वह निर्विघ्न पहुँच जाता है। चूँकि इस संबंध के प्राणी और पदार्थ सब एक ही महत् चेतना के अंशधर है, इसलिए मन में उठे संकल्प का परिपालन पदार्थ चेतना आसानी से करने लगती है। जब पदार्थ चेतना पर संकल्प शक्ति क्रियान्वित होती है, तो फिर इच्छानुसार प्रभाव और परिवर्तन भी आरंभ हो जाता है। इसकी पुष्टि के लिए उनने अनेक प्रयोग किये। उदाहरणार्थ एक प्रयोग ताश खेलते लोगों के बीच किया। खेलने वालों में से एक व्यक्त को यह निर्देश दिया गया कि वह अमुक पत्ते के अपने पास आने का बार-बार विचार करे। बाद में जब उसका प्रतिशत निकाला गया, तो प्रयोगकर्ता यह देख कर हैरान रह गये कि ताश का वह पत्ता सौ में से सत्तर बार उसके पास आया था। शेष तीस मौकों पर वह अन्य खिलाड़ियों के हाथ लगा। इसका अर्थ स्पष्ट था कि विचार का वस्तु पर प्रभाव पड़ता है।
यह सब प्रयोग हमें मन और पदार्थ के बीच की द्वैतता को मिटा कर अद्वैतता की ओर ले जा रहे हैं। पिछले दिनों शरीर और मन की अद्वैतता पर भी काफी अध्ययन अनुसंधान हुए हैं। चिकित्साशास्त्री अब यह मानने लगे हैं कि बहुत से रोग मन से सम्बन्धित होते हैं। उनका कोई दृश्य भौतिक कारण न होने के बावजूद भी वे अपना अस्तित्व बनाये रहते हैं, क्योंकि वे मानसिक मूल के होते हैं। वे इसे स्वीकारने लगे हैं कि जब कभी मनः क्षेत्र में विप्लव अथवा संघर्ष पैदा होता है, तो शरीर पर उसका दुष्प्रभाव व्याधि के रूप में सामने आता है। उदरव्रण (पेप्टिक अल्सर) उच्च रक्तचाप आदि रोगों का अध्ययन कर चिकित्सकों ने इस बात का पता लगाया है कि वे सब मन से संबंधित हैं। अनेक प्रकार की शारीरिक पीड़ाओं को, यहाँ तक कि दाँत और हड्डियों के दर्द तक को उन्होंने मन से सम्बन्धित पाया है। ऐसी स्थिति में उनका मानसिक इलाज ही वास्तविक रोगोपचार साबित हो सकता है, किन्तु मानसिक मूल वाले बीमारों के सम्बन्ध में यह कहना उचित न होगा कि वे मात्र काल्पनिक व्याधि के शिकार हैं। यदि किसी की पीड़ा मनोकायिक स्वरूप वाली है, तो यह मान लेना कि रोगी केवल काल्पनिक दर्द में जी रहा है, वास्तविक पीड़ा उसे हो ही नहीं रही है, गलत होगा। शरीरवेत्ताओं की इस सम्बन्ध में जो मान्यता है, वह यह है कि निषेधात्मक मानसिक वृत्तियों के कारण स्नायुसंस्थान और शरीर तंत्र विकारग्रस्त होने लगते हैं, जो अंग विशेष में रोग के कारण बनते हैं, ठीक वैसे ही जैसे जीवाणुओं और विषाणुओं के कारण वे उत्पन्न हुए हों। व्याधि तो हर हालत में सत्य ही होती हैं यह इस बात को प्रमाणित करता है कि शरीर और मन के बीच द्वैत नहीं, अद्वैत स्थिति है।
तो क्या मनःशास्त्रियों का यह कहना उचित है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मन को निरोग रखना पड़ेगा? ‘हाँ’ वर्तमान अध्ययन इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है, किन्तु वास्तविक तथ्य को हम भूलते जा रहे हैं और उसकी उपेक्षा कर मूल की जगह पते का उपचार कर रहे हैं। चिकित्सालयों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है, पर इस बात की ओर तनिक, ध्यान नहीं जाता कि काया की तरह मन स्वस्थ रहे। कायिक बीमारियों का उपचार हो, यह अच्छी बात है, पर यह भी कोई कम तथ्यपूर्ण नहीं है कि कई रोगों की जड़ें मन में घुसी रहती हैं, अतः मन को भी सबल-सशक्त बनाने का उपाय किया जाय। यदि ऐसा नहीं हुआ और भौतिक कारणों उपचारों पर ही अधिकाधिक केन्द्रित रखा गया, तो फिर इस क्षेत्र में पश्चिमी देशों जैसी स्थिति पैदा होते देर न लगेगी। वहाँ जिस दर से मानसिक विकृतियाँ पैदा हुई हैं, उसी अनुपात में नये-नये कायिक रोग भी उत्पन्न हो रहे हैं, किन्तु पश्चिमी चिकित्सक उनका इलाज भौतिक मान कर ही करते रहे, फलतः बीमारियाँ अब नये रूप में नूतन प्रकार से वहाँ प्रकट हो रही हैं। ऐसी व्याधियों को अंग्रेजी में ‘कम्पलसिव आँब्सेसिव डिजिजेज’ कहते हैं।
भौतिकता के साथ-साथ मानसिक व्याधियाँ बढ़ती हैं-पश्चिमी देशों की सम्पन्नता को देखकर इसका अन्दाज आसानी से लगाया जा सकता है, साथ ही पहाड़ी अंचलों में रहने वाले वनवासियों अथवा अनपढ़ ग्रामीणों को देखकर इस निष्कर्ष पर सरलता से पहुँचा जा सकता है कि किस प्रकार धार्मिक मान्यताओं में जीने वाला व्यक्ति मन से स्वस्थ ओर शरीर से सबल होता है। अश्रद्धा, अविश्वास, आशंका, भय, क्रोध, ईर्ष्या द्वेष जैसे अधार्मिक तत्वों की बढ़ोत्तरी प्रगतिशीलता के नाम पर व्यक्ति के अन्दर ज्यों-ज्यों होती जाती है, वैसे ही-वैसे इस बात की संभावना बढ़ती जाती है कि वह मानसिक विकृति के करीब पहुँचता चला जा रहा है। इसी तथ्य की स्वीकारोक्ति प्रो. ब्राउन ने अपनी पुस्तक ‘साइन्स एण्ड इण्डिविजुयेलिटी’ में की है। वे लिखते हैं कि यद्यपि इसे वे वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं कह रहे हैं, फिर भी वह सत्य है कि जो लोग धार्मिक परम्पराओं के अन्दर जीते हैं, उनमें मानसिक आँधियों की न्यूनता होती है। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि धर्म-धारणा के अन्दर कोई ऐसा निवारक तत्व-कोई ऐसी स्वास्थ्यकारी शक्ति है, जिसके द्वारा मानस रोग कम हो जाते हैं। उनका कहना है, कि एक वैज्ञानिक के नाते वे बस इतना ही कह सकते हैं किन्तु यदि किसी को यह जानना हो कि धर्म किस प्रकार मन और फिर उसके द्वारा शरीर को प्रभावित करता है, तो धार्मिक लोगों को धर्म का अध्ययन और अनुसंधान करना पड़ेगा।
यही कारण है कि पाश्चात्य देशों की तुलना में भारत में अब भी मानसिक रोगियों की संख्या कम है। यह और बात है कि अपना देश भी अब यूरोपीय सभ्यता से अप्रभावित नहीं रहा, किन्तु उस प्रभाव के पीछे भी एक प्रच्छन्न धार्मिकता यहाँ के लोगों में अब भी देखी जा सकती है। कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि यहाँ के प्रगतिशीलों में भी धार्मिकता अब भी न्यूनाधिक मात्रा में दृष्टिगोचर हो जाती है। जहाँ जिस अनुपात में यह होती है, उनका भाव और आस्था क्षेत्र उतना ही मजबूत होता है। इस कारण वे मनोविकारों के उतने ही कम शिकार होते हैं। मन स्वस्थ रहा, तो काया भी निरोग बनी रहती है।
मानसिक रोगों का एक कारण मनोविज्ञानी आत्म केन्द्रित होना बताते हैं। व्यक्ति जितना आत्मकेन्द्रित होगा, उतनी ही मानस रोग, एवं शारीरिक रोग की संभावना उसमें बढ़ जायेगी। संभवतः इस तथ्य से हमारे प्राचीन ऋषि परिचित रहे होंगे, इसलिए ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे सिद्धान्त वाक्यों के पीछे उनका एक भाव व्यक्ति और समाज को आत्मकेन्द्रित होने से बचाना ही होगा, ताकि स्वस्थ मन और स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति और समाज की रचना की जा सके।
इस प्रकार मनोकायिक रोगों की उत्पत्ति भी इसी बात को सिद्ध करती है कि देह और मन परस्पर अभिन्न हैं। इस बात को जितनी जल्दी समझा जा सकेगा, उतनी ही जल्दी रुग्ण मन के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों से बचा जा सकता और स्वस्थ रहना सम्भव हो सकेगा।
मनुष्य साहसी प्रकृति का है, इसलिए अनेक ऐसे कार्य करने में वह सफल हो जाता है, जो आमतौर पर असंभव मालूम पड़ते हैं। यह साहसिकता उसमें नहीं रही होती, तो बहुत सारे कार्य अधूरे पड़े रहते और जिन रहस्यों पर से आज पर्दा उठ चुका है, उनका अनावरण करने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाता। इसे मानवी संकल्प का चमत्कार ही कहना चाहिए कि उसने अन्तर्ग्रही यात्रा से लेकर खतरनाक ध्रुवीय प्रदेशों तक की सैर की, दुर्गम पर्वतों से लेकर जानलेवा समुद्रों तक को नाप डाला और उनसे सम्बन्धित अनेक ऐसे तथ्य जुटाये, जिनके लिए हम उनके ऋणी हैं। यह बात और है कि कई बार इस अन्वेषण और यात्रा में उनकी मौत हो जाती है, पर केवल इसी कारण से वे यदि इनको सम्पन्न करने से इनकार करते रहते, तो क्या आज का संसार इतनी जानकारियाँ अर्जित कर पाता, जितनी अब तक कर सका है? शायद नहीं। इस सफलता के पीछे संकल्पवानों का साहस ही नहीं, वीरगति की कथा गाथा भी जुड़ी हुई है। मरते तो डरपोक भी हैं, पर प्रशंसनीय और चिरस्मरणीय वही बन पाते हैं, जिनका जीवन उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए उत्सर्ग हुआ। समुद्री अभियान और अनुसंधान इसी के प्रतीक हैं।
डच मालवाही जलपोत आरैंग मेडान भी ऐसे ही एक अभियान का द्योतक था। फरवरी 1948 में जब वह मलक्का जलडमरूमध्य से होकर इण्डोनेशिया जा रहा था, तो अचानक उससे खतरे की संकेत ध्वनि होने लगी, जिसको आस-पास के सभी जहाजों ने सुना। आसन्न संकट को समझ कर सभी जलयान उस ओर बढ़े। खतरे की ध्वनि जारी थी, तभी रेडियो पर एक संदेश गूँजा। उसमें कहा जा रहा था कि पोत के सभी कर्मचारी और कप्तान मर चुके हैं, उनका निष्प्राण शरीर यान में पड़ा हुआ है। इसके उपरान्त रेडियो पर जो आवाजें उभरीं, वह वस्तुओं के टकराने और टूटने जैसी थीं तत्पश्चात् पुनः एक मानवी स्वर सुनाई पड़ा, वह कह रहा था-अब मैं भी मरता हूँ।’ इसके बाद सब कुछ शान्त हो गया।
पड़ोस से होकर गुजरने वाले जहाजों ने जब संकटकालीन ध्वनि के आधार पर आरैंग मेडान को ढूँढ़ा तो वह जल-प्रवाह में बहा चला जा रहा था। उसकी चिमनी से अब भी हल्का धुँआ निकल रहा था। कप्तान की मौत हो चुकी थी। ह्वील हाऊस, चार्टरुम, डेक में से कहीं भी कोई जीवित नहीं था। रेडियो आपरेटर की प्राणहीन देह कुर्सी पर एक ओर लुढ़की पड़ी थी। उसकी अंगुलियाँ रेडियो ट्रान्समीटर की कुँजी पर थीं। जहाज में सवाल कुत्ता भी जीवित नहीं बचा।
निरीक्षणकर्त्ता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। उनके सम्पूर्ण समुद्री जीवन में ऐसी रहस्यमय घटना उन्हें पहली बार देखने को मिली। दुर्घटना को किसी टक्कर का परिणाम भी नहीं माना जा सकता था, कारण कि शवों पर किसी प्रकार की चोट का कोई निशान नहीं था। जहाज भी बिलकुल सुरक्षित था। अतः इस सिद्धान्त को अमान्य कर दिया गया। यदि इसे किसी विषैली गैस का नतीजा माना गया, तो यह बता पाना मुश्किल होगा कि डेक जैसे सर्वथा खुले स्थान में रहने वाले नाविक इससे कैसे प्रभावित हुए? प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।
ऐसी ही एक घटना का वर्णन ‘इनविजबल होराइजन्स’ नामक पुस्तक में विनसेण्ट गैड्डिस ने किया है। सन् 1923 की गर्मियों में ‘जानसन’ नामक एक ब्रिटिश जहाज की नजर चिली की समुद्री किनारे पर बहते एक जलयान पर पड़ी। चूँकि वह पोत कुछ विचित्र दिखाई पड़ रहा था, अस्तु उसके बारे में कुछ विशेष जानने की जिज्ञासा जानसन के नाविकों को हुई। वे अपना जहाज उसके निकट ले गये। नजदीक पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि जलयान का मस्तूल और पतवार काई से ढके हैं। जहाज का नाम यद्यपि बहुत धुँधला हो गया था, किन्तु उस पर अंकित शब्द ‘मार्लबोरो’ अभी भी स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता था। जहाज की लकड़ी बिलकुल सड़ चुकी थी और उसमें यात्रियों और नाविकों के स्थान पर केवल उनके कंकाल भर शेष थे। गणना में इनकी संख्या बीस थी।
बाद में ज्ञात हुआ कि उक्त जलयान जनवरी 1890 में लिटिलटन, न्यूजीलैण्ड से ऊन लेकर चला था। इसके बाद वह 23 वर्षों तक कहाँ गायब रहा, इस बारे में कुछ भी नहीं जाना जा सका। ऐसा अनुमान है कि वह किसी बर्फीले समुद्र में फँस गया हो, पर निश्चित रूप से इस सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा जा सका।
मिलता-जुलता प्रसंग ‘जेनी’ जलयान का भी है। 22 सितम्बर 1860 को जब ‘होप’ नामक जहाज ‘डे्रक’ जलडमरूमध्य के दक्षिण में एण्टार्कटिक क्षेत्र में ह्वेल का शिकार कर रहा था, तो उसे यह दुर्भाग्यग्रस्त यान दिखाई पड़ा। यान की पतवार क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। बर्फ की पर्त जमीं हुई थी। डेक पर भी बर्फ थी। साज-सज्जा सब गिर चुकी थी। नाविकों के शव अतिशय ठंड के कारण ममी बन गये थे। कप्तान का मृत शरीर एक कुर्सी पर पड़ा था। उसके हाथ में एक कलम थी। लाँग बुक देखने से ज्ञात हुआ कि जहाज विगत 37 वर्षों तक विशाल हिमखण्डों के बीच कैद रहा। उसमें अन्तिम तिथि 4 मई, 1823 की अंकित थी, साथ ही कप्तान की टिप्पणी भी, जिसमें कहा गया था “निराहार स्थिति का आज 71वाँ दिन है। सभी लोग दिवंगत हो चुके हैं। मैं एकमात्र अकेला जीवित व्यक्ति हूँ।”
‘जोइता’ नामक जलयान का भी अन्त दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से हुआ। अक्टूबर 1944 में यह पश्चिमी सामोआ से टोकलू द्वीप समूह की ओर रवाना हुआ। अभी वह उत्तर-पश्चिम दिशा में 160 मील ही आगे बढ़ पाया था कि घने कोहरे में फँस गया। कोहरा इतना घना था कि 10 फुट तक की दूरी भी स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ती थी। इस अस्पष्टता की दशा में भी जहाज कप्तान के निर्देश पर आगे बढ़ता रहा। अभी वह थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि किसी दूसरे जहाज का सायरन सुनाई पड़ा। वह कितनी दूरी पर है और उसकी दिशा क्या है? इसका तनिक भी अनुमान नाविक नहीं लगा सके। फिर भी पूरी सतर्कता बरते हुए कप्तान ने जहाज का इंजन बन्द करवा दिया और सामने वाले पोत को अपनी उपस्थिति का भान कराने के लिए तीन धमाकेदार विस्फोट कराये। इसके बाद सायरन की आवाज बन्द हो गई। कप्तान ने कुछ देर और इन्तजार किया। किसी प्रकार का कोई संकेत न मिलने पर उसने जहाज धीमी गति से आगे बढ़ाने का आदेश दिया। अभी कुछ ही मीटर बढ़ पाया था कि सामने से विशालकाय जहाज पूरी गति से आता दिखाई पड़ा। दोनों एक-दूसरे के इतना निकट आ चुके थे कि अब बचाव किसी प्रकार संभव नहीं था। तीव्र ध्वनि के साथ उनके बीच टक्कर हुई। सामने वाला पोत बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। पानी वेग से उसके अन्दर प्रवेश करने लगा। कुछ नाविक एक छोटी नौका में सवार होकर बच निकले। शेष की जहाज के साथ-साथ ही जल-समाधि हो गई। ‘जोइता’ की भी कम क्षति नहीं हुई। पानी उसके भीतर भी आने लगा। कप्तान को जब यह मालूम हुआ तो उसने सभी कर्मचारियों को तत्काल बाहर निकल जाने का आदेश दिया। सब तीन-चार छोटी नौकाओं में सवाल हो गये। जहाज के अन्दर कप्तान और दो इंजीनियर रह गये। चाहते तो वे भी बाहर आ सकते थे, पर कप्तान और इंजीनियर अपना-अपना दायित्व समझकर जहाज को डूबने से बचा लेने का प्रयास करने लगे। वे छिद्रों को अलकतरे से बन्द करने लगे। एक जगह बन्द करते, तो जल दूसरी जगह से अन्दर प्रवेश करने लगता। उसे रोक पाने में सफल होते, तो कहीं अन्यत्र से पानी आने लगता। किन्तु फिर भी वे हार नहीं माने। जब यह लगने लगा कि रिसाव पर पूर्ण नियंत्रण पा लिया गया है, तभी एक बड़ा छिद्र हो गया। पानी वेग से प्रवेश करने लगा। अब उन्हें अपना जीवन भी खतरे में प्रतीत हुआ। सब बाहर निकलने की तैयारी करने लगे। किन्तु तभी एक अभियन्ता कुछ सोच कर ठिठका। अन्तिम उपचार के रूप में वह जहाज में रखी खाली बोरियों को उसमें ठूँसने लगा। कई बोरियाँ ठूँसने पर जल-प्रवाह में कुछ कमी आयी। इससे शेष दोनों का उत्साह बढ़ा, तो वे भी उनका सहयोग करने लगे। अन्ततः उसे बन्द करने में उन्हें सफलता मिल गई। उन्होंने एक बार फिर से जलयान का निरीक्षण किया। रिसाव पूरी तरह बन्द हो चुका था। किसी प्रकार सुरक्षित इससे वापस लौटा जा सकता है-यह निर्णय कर उनने जहाज को पीछे मोड़ लेने का निर्देश दिया। पोत वापस चल पड़ा और कई दिनों की यात्रा के पश्चात् पुनः सामोआ बन्दरगाह पर पहुँचा। वहाँ उसे खाली कर मरम्मत के लिए भेज दिया गया। सभी ने ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद दिया।
साहसिकता एक आध्यात्मिक गुण है। जहाँ यह जिस अनुपात में रहती है, सफलता की संभावना उसी अंश में आँकी जाती है। सत्साहस से व्यक्ति का अध्यात्म के प्रति लगाव का बोध होता है, दुस्साहस उसे क्रूर और कठोर बनाता है। इन दिनों दुस्साहसी प्रकृति के लोगों द्वारा समाज में अस्थिरता और अशान्ति ही पैदा हुई है। लूट-पाट चोरी, आगजनी, राहजनी, हत्या, अपहरण, उग्रवाद-सब मानवी स्वभाव में विकृति के कारण पैदा हुए हैं। इसका समाधान एक ही हो सकता है कि जो शक्तिशाली और साहसी एवं सामर्थ्यवान हैं और जिनसे व्यक्ति व समाज का कायाकल्प हो सकता है, उन सत्कार्यों में उनका श्रम लगे उनका और श्रेष्ठता का पक्षधर बने समुद्री यात्राएँ इसी की प्रेरणा देती हैं। और बताती हैं कि संकट की घड़ी में यदि साहस को अक्षुण्ण रखा गया, तो न सिर्फ अनेकों की जान बचायी जा सकती है, वरन् लक्ष्य को भी सफलतापूर्वक हस्तगत किया जा सकता है।
मनुष्य की जिजीविषा साधारणतया अदम्य मानी जाती है। हम जीवित रहना चाहते हैं और जीवन को प्यार करते हैं। उसकी सुरक्षा के लिए तरह-तरह के साधन जुटाते हैं। मरण से सबको भय लगता है। प्राण-संकट की घड़ी आने पर पशु-पक्षी तक सबकुछ कर गुजरने पर उतारू हो जाते हैं। आत्मरक्षा के प्रयत्नों में सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को संलग्न देखा जा सकता है। इससे प्रतीत होता है कि न केवल मनुष्य, वरन् हर एक जीवधारी जीवन सम्पदा को सुरक्षित रखने के जिए अपनी सूझबूझ और स्थिति के अनुसार हर संभव उपाय करता है। जीवधारी को जीवन से कितना प्यार है, इसकी झाँकी दृष्टि पसार कर कहीं भी की जा सकती है, इतने पर भी मनुष्य तनिक से कारणों से उसे गँवाने और आत्मसात् करने पर कटिबद्ध हो जाता है।
जीवन शैली बहुमूल्य सम्पदा जिस कारण निरर्थक ही नहीं, असह्य बनती जा रही है, वह है-मानसिक विक्षोभ। देखने में सही प्रतीत होता है कि अमुक घटनाओं या परिस्थितियों ने अमुक व्यक्ति को आत्मसात् करने के लिए विवश कर दिया, पर वास्तविकता कुछ दूसरी ही होती है। इन लोगों को जो स्थिति असह्य प्रतीत हुई और घबराकर यह अवांछनीय कृत्य कर बैठे, वह वस्तुतः उतनी अधिक जटिल थी नहीं। उन्हीं परिस्थितियों को असंख्य लोग सहन करते हैं और कुछ तो इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें जीवन का एक सहज स्वाभाविक अंग मानकर संतोषपूर्वक दिन गुजरते हैं। यदि कठिनाइयाँ सचमुच इतनी असह्य होती तो फिर किसी के लिए भी उनमें रह पाना कितना कठिन होता।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार प्रति एक लाख में 35.09 व्यक्ति डेनमार्क में, 33.72 स्विट्जरलैंड में, 23.35 फीनलैण्ड में, 19.74 स्वीडन, 15.52 अमेरिका, 14.83 फ्राँस, 13.43 इंग्लैण्ड, 13.03 आस्ट्रेलिया, 11.40 व्यक्ति कनाडा में आत्महत्या से मरते हैं।
एमील डर्कहीम अपनी पुस्तक ‘ली स्यूसाइड’ में लिखते हैं कि बीसवीं सदी में जितनी आत्महत्याएँ हुई हैं, उतनी संसार में इससे पूर्व कभी नहीं हुई। वे कहते हैं कि वास्तव में आत्महत्या का सीधा सम्बन्ध मानवी विकास से है। समय के साथ-साथ बौद्धिक विकास जैसे-जैसे होता गया, मानवी जटिलताएँ भी बढ़ती गई। बीसवीं सदी में वह विकास तब अपने चरम पर है, तो उससे जुड़ी हुई समस्याएँ भी उजागर हुई हैं। उनके अनुसार आज के सभ्य समाज की सबसे बड़ी कठिनाई मानसिक अस्वस्थता ही आत्महत्या जैसे कठोर निर्णय का कारण बनती है। वे कहते हैं कि जंगली कबीलों में रहने वाले वनवासी चूँकि सभ्य समाज से दूर रहते हैं, इसलिए उनमें किसी प्रकार के मानसिक रोग नहीं पाये जाते, फलतः आत्मसात् जैसे मामले भी उस समुदाय में कभी प्रकाश में नहीं आते।
ऐसी बात नहीं कि साधारण पढ़ा-लिखा और सामान्य स्तर का नागरिक ही आत्महत्या करता है। कई बार विद्वान और ज्ञानवान समझे जाने वाले लोग भी इस कुकृत्य के शिकार हो जाते हैं। इनमें विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार, संगीतकार से लेकर राजनेता और वैज्ञानिक तक सम्मिलित हैं।
जर्मन विद्वान गेटे आत्महत्या करना चाहते थे, इसलिए एक धारदार चाकू बाज़ार से खरीद लाये। बहुत दिनों तक वे उसे तकिये के नीचे रखे रहे, पर हिम्मत नहीं जुटा सके, इसलिए अन्ततः आत्मघात का विचार त्याग दिया।
वायरन जिन दिनों ‘चाइल्ड हेराल्ड’ के लेखन में व्यस्त थे, उन दिनों अक्सर उन पर आत्महत्या की सनक सवार रहती, पर माँ का प्यार याद कर वे वैसा न कर सके।
यूनान के महान दार्शनिक डायोजनीज़ अपने हाथों फाँसी लगा कर मरे थे। कहा जाता है कि संसार को नजी बनाने का सपना देखने वाले हिटलर ने अपनी पिस्तौल से गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी।
‘मृच्छकटिक’ के लेखक शूद्रक आग में जल मरे थे। ‘जानकी हरण’ महाकाव्य के रचनाकार सिंहल देश के राजा की मृत्यु का शोक न सह सके और और चिंता में जल मरे। चीनी साहित्यकार लाओत्से ने भी अपनी मौत स्वयं बुलायी थी। लैटिन कवि एम्पेदोक्लीज ने ज्वालामुखी में कूदकर आत्मघात किया था। लुकेषियस ने अपने को चिरस्मरणीय बनाने के लिए ऐसा किया था। महाकवि चैटरसन ने दरिद्रता से पीछा छुड़ाने के लिए विषपान करना उपयुक्त समझा। गोर्की ने पेट में पिस्तौल चल कर उसने विदीर्ण कर डाला। आस्ट्रेलियाई साहित्यकार स्टीफेन ज्विग अपने आत्मघात का कारण बताते हुए अपनी पीछे एक पुर्जा छोड़ गये थे “अब संघर्षों से टकराने की मेरी शक्ति चुक गई है। अशक्त जीवन का अन्त कर लेना मुझे अधिक अच्छा जँचा।”
चित्रकार लडवे ने अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े ही स्वयं को गोली मार ली। एक अन्य चित्रकार बानगाँग ने भी अपना अन्त ऐसे ही किया। रॉबर्ट क्लाइव ने अपने जीवन में तीन बार आत्महत्या का प्रयास किया पर निशाना चूक जाने से हर बार वे बच गये।
मूर्धन्यों में भी ऐसे कम नहीं हैं, जिनने तनिक भी परेशानी से उद्विग्न होकर आत्मघात कर लिया हो ऐसे लोगों में सेफो, डेमोस्थनीज, बूटस, केसियस, डेमोक्लीज, गनीवाल, बर्टन, आर्थर कोबेसलर जैसे विश्व प्रसिद्ध व्यक्तित्व सम्मिलित हैं।
आत्महत्या के तरीकों में अगणित प्रकार के उपाय अपनाये जाते रहे हैं। उनमें पानी में डूब मरना, ऊँचाई से कूदना, विष का पान करना, फाँसी लगाना, आत्मदाह करना नस काट कर सम्पूर्ण रक्त को धीरे-धीरे निकाल देना आदि अधिक प्रचलित हैं। एक दुःख को हल्का करने के लिए दूसरा उससे बड़ा दुःख मोल लेना भी एक उपाय सोचा जाता रहा है, यद्यपि वह इच्छित लाभ प्राप्त करने में तनिक भी सहायक नहीं होता। अताई इलाज में एक उपचार यह भी था कि किसी के पेट में दर्द हो, तो लोहे को गर्म सलाख से उसकी छाती दाग दी जाय। इससे जलने का कष्ट इतना बढ़ जाता है कि रोगी पेट के दर्द की बात भूल जाता है। लगभग इसी स्तर का दुस्साहस यह है कि अमुक चिन्ता अथवा आपत्ति से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या जैसी बड़ी आपत्ति को अपना लिया जाय।
जिस प्रकार शरीर में अनेक प्रकार के घातक विषाणु प्रवेश करके विविध लक्षणों वाले रोग उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मनःक्षेत्र में कई तरह की विकृतियाँ अपनी जड़े जमा लेती हैं और परिपूर्ण उन्माद न सही, उसने मिलते-जुलते उतनी ही विघातक मानसिक रोग उत्पन्न करती हैं।
डिमेंषिया प्रिकोक्स अर्थात् किशोरावस्था की हिंसात्मक सनक-डिमेंषिया पैरालिटिख अर्थात् आवेश का सामयिक दौरा मेलनकोलिया अर्थात् स्नायुविक अवसाद ग्रस्तता-न्यूस्थेनिया अर्थात् स्नायुविक असंतुलन जैसी कितनी ही विकृत मनःस्थितियाँ ऐसी हैं, जो विवेक को अस्त-व्यस्त करके रख देती है और समयानुसार जो भी उभार आता है, उसी में मस्तिष्क इतनी तीव्रगति से बहता चला जाता है, जिसमें अपने को सँभाल सकना कठिन पड़ता है।
दूसरों के क्षोभ शान्त करने के लिए स्वयं दुखी होने की स्थिति अपना लेना भी ऐसा ही विचित्र चिन्तन है, जिसे अक्सर सहानुभूति एवं सहायता के लिए अपनाया जाता है। अभिभावकों के कष्ट निवारण के लिये विवाह योग्य कन्याओं का इसलिए आत्मघात कर बैठना कि इससे उनके माता-पिता को अर्थ चिन्ता से छुटकारा मिल जायेगा, ऐसा ही दुस्साहस भरा कदम है। इनमें आदर्शवाद, उदारता, सहानुभूति जैसे तत्वों का पुट तो होता है, पर यह स्मरण नहीं रहता कि इस कदम से अपना बहुमूल्य जीवन ही नष्ट नहीं होगा, अपितु जिनके लिए यह सब किया जा रहा है, उनकी कठिनाई, चिन्ता एवं विपत्ति और अधिक बढ़ जायेगी।
प्राचीनकाल में आत्मघात को धार्मिक प्रशंसा प्रदान करने का भी प्रचलन रहा है। संन्यासियों की स्वाभाविक मृत्यु की अपेक्षा स्वेच्छा मरण की सराहना की गई है। बौद्ध और जैन धर्मों में भी मृत्यु सम्बन्धी ऐसे विधान का उल्लेख उनके धर्मग्रंथों में मिलता है। पाण्डवों का स्वर्गारोहण, मंडन मिश्र का तुषारिन संदाह, ज्ञानेश्वर की जीवित समाधि, रामतीर्थ की जल समाधि, कुमारिल भट्ट का आत्मघाती प्रायश्चित विधान जैसी अनेकानेक घटनाएँ इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है, जिन्हें सराहा ही जाता है। चित्तौड़ की रानियों का सामूहिक आत्मदाह (जौहर) और सतीप्रथा ऐसे कृत्य हैं, जिन्हें महिमामण्डित किया जाता रहा है।
उपरोक्त घटनाएँ कुछ विशेष परिस्थितियों में किन्हीं विशेष को लेकर घटित हुई अतः वह साधारण नहीं, असाधारण कही जायेगी। सबके पीछे तो नहीं पर कुछ के पीछे ऊँचा आदर्श और महान उद्देश्य था, इसलिए आत्महत्या जैसी घटनाएँ भी तब सराही गईं। आज उनकी लकीर पीटना और उन्हें परम्परा का स्वरूप देना किसी भी प्रकार समझदारी नहीं कही जायेगी। छोटी-छोटी बातों पर अथवा राजनैतिक माँगों को मनवाने के लिए आत्मदाह कर लेना, पति के मरने के उपरान्त पत्नी का जिन्दा जलने के लिए विवश करना, जल समाधि लेना सभ्य जन और सभ्य समाज का लक्षण नहीं, अपितु असभ्यता का चिन्ह कहना चाहिए। इसके पीछे भारत की मूल संस्कृति नहीं, वरन् सामयिक विचार-विकृति ही कारणभूत मानी जायेगी।
आत्महत्या को भी दूसरों की हत्या के समान ही गर्हित कर्म माना जा सकता है। दूसरे देशों में पुराने जमाने में इसे बहुत बुरा कहा जाता था और मरने के उपरान्त भी यह कुकृत्य करने वाले की भर्त्सना की जाती थी।
यूरोप में उन दिनों आत्महत्या करने वालों के प्रति बहुत अनुदार दृष्टिकोण था। उनकी लाशें सड़कों के आसपास कूड़े के ढेर में दबा दी जातीं और उसके आगे भयंकर आकृतियाँ खड़ी कर दी जाती थीं, ताकि मरने वाले की निन्दा हो और जो ऐसा करना चाहते हों, वे हतोत्साहित हों। इस प्रचलन को बदलने में डेवड ह्म, वाल्टेयर, रूसी जैसे दार्शनिकों ने आवाज उठायी अन्ततः उसे समाप्त करवा दिया। इसके पीछे उनका तर्क था कि आदमी को जीने की तरह मरने की भी आजादी होनी चाहिये।
कुरान में दूसरों की हत्या करने से भी अधिक जघन्य पाप आत्महत्या को बताया हैं यहूदी धर्म में निन्दनीय कर्म करने वाले के शोक मनाने और उसकी आत्मा की शाँति के लिये प्रार्थना करने का भी निषेध हैं। ईसाई धर्म में भी इसे घृणित पातक बताया गया है। 11वीं सदी में इंग्लैण्ड में एक कानून बना था, जिसमें आत्महत्या करने वालों की सम्पत्ति जब्त कर ली जाती थी और उसके शव को किसी ईसाई कब्रिस्तान में धार्मिक विधि से दफनाया नहीं जा सकता था।
आत्म हत्या का प्रयत्न करने वालों को रोगी माना जाय या अपराधी? इस प्रश्न पर आज भी मनःशास्त्रियों के बीच गंभीर मतभेद है। मनोवैज्ञानिकों का मत कि ऐसे लोगों का उचित स्थान जेलखाना नहीं, पागलखाना है, जबकि विधिवेत्ताओं की दलील है कि यदि हम किसी को दारुण वेदनाओं से मुक्ति नहीं दिला सकते, तो उसे ऐसी मौत मरने का अधिकार होना चाहिये, जिसमें वह पीड़ा झेलने की अपेक्षा राहत पा सके। नृतत्ववेत्ता मध्यवर्ती मार्ग अपनाते हुये उन्हें करुणा का पात्र घोषित करते है ओर ‘यूथेनेसिया’ के नाम पर उन पर सहानुभूति प्रकट करते हुये समाज को उनकी समस्याओं को हल करने का सुझाव देते हैं।
शोध अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जिन-जिन देशों में आत्मघात की दर उच्च है, वहाँ-वहाँ मद्यपियों की संख्या भी उसी अनुपात में ज्यादा है। अनुसंधानकर्त्ताओं का कहना है कि अमेरिका, स्विट्जरलैंड, स्वीडन और डेनमार्क एवं फ्राँस में विश्व की सर्वाधिक आत्महत्याएँ होती है और मद्यपान की लत भी वहाँ उसी अनुपात में देखी गई हैं। इससे यह स्पष्ट है कि आत्महत्या का करण शारीरिक कम मानसिक अधिक हैं।
एरिक फ्राम अपनी उपरोक्त पुस्तक में एक स्थान पर लिखते है कि योरोप के सबसे अधिक शान्त, समृद्ध और लोकतांत्रिक कहे जाने वाले राष्ट्रों एवं विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न देश अमेरिका की मानसिक स्वस्थता के क्षेत्रों में जो वर्तमान अवस्था है, उसे दयनीय ही कहना चाहिए। वे लिखते हैं कि इन राष्ट्रों का सम्पूर्ण सामाजिक आर्थिक उन्नयन का इतना ही प्रयोजन है कि उनका भौतिक जीवन सुखमय हो, सभी सम्पत्तिवान हों और वह शान्तिदायक हों, स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था हो और वह शांतिपूर्ण हो। वे कहते है कि जिन देशों ने इस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया अथवा जो इसकी प्राप्ति के सन्निकट पहुँच गये, वहाँ मानसिक असंतुलन की गंभीर समस्याएँ भी उठ खड़ी हुई है।
एरिक फ्राम के इस निष्कर्ष से स्पष्ट है कि आत्महत्या के मूल में संव्याप्त मानसिक असंतुलन का सबसे प्रमुख कारण समृद्धि है। संभवतः इसी कारण से अध्यात्मवादी चिन्तन में धनोपार्जन की छूट तो है, पर धन संग्रह पर रोक लगायी गई है। यदि यह बात सही है कि वर्तमान मानसिक अस्वस्थता की जड़ में सम्पदा की प्रधान भूमिका है, तो अर्थवेत्ताओं, तत्वज्ञानियों और समाजशास्त्रियों को मिलजुल कर कोई ऐसा हल वर्तमान संदर्भ में ढूँढ़ना चाहिए जिससे समाज भी सम्पन्न बना रहे और मनुष्य भी मानसिक दृष्टि से
विपन्न नहीं कहलाये, तभी सही अर्थों 21 वीं सदी हमारे लिये उज्ज्वल भविष्य लेकर आ सकेगी अन्यथा नहीं।
अर्थ के साथ-साथ समाज की अवांछनीय परिस्थितियाँ भी मनुष्य को विक्षुब्ध करती है। स्नेह-सौजन्य का अभाव, नैतिकता का गिरा स्तर शोषण, ठगी, विश्वासघात बेकारी, हानि बर्बादी जैसे कितने ही कारण मानव को दुःखी बनाते हैं। सामाजिक कुरीतियों के कुचक्र में कितनों को ही पिसना पड़ता है। इन प्रचलनों को बन्द करना सरकार और समाज का काम है। समाज की संरचना ऐसी होनी चाहिये, जिसमें हर व्यक्ति को निर्वाह, प्रगति और सुरक्षा के समुचित साधन प्राप्त हों कोई किसी के भी साथ अन्याय और अनीति नहीं बरत सके। इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य यह भी होनी चाहिये कि स्वास्थ्य रक्षा और अर्थ उपार्जन की तरह ही चिन्तन तंत्र का सही उपयोग कर सकने की क्षमता भी सर्वसाधारण में उत्पन्न की जाय। इसके लिये मानसिक परीक्षा की एक समर्थ प्रणाली खड़ी की जानी चाहिये। इसके बिना आत्महत्या जैसे व्यापक संकट उत्पन्न करने वाले मनोरोगों का भड़कता हुआ दावानल रोका न जा सकेगा।
जीवन जीने के लिये हम सबको मिला है मरने के लिये नहीं यह तथ्य हर स्थिति में याद रखा जाना चाहिए। अनेकानेक योनियों में भटककर मानव योनि में जीव जब आता है तो इसलिये कि कर्म करते हुए अपनी मुक्ति का पथ प्रशस्त कर ले। किन्तु विक्षुब्ध मनः स्थिति में प्रेत-सा जीवन जीते हुए आत्मघाती प्रवृत्ति की ओर उन्मुख होना उसे कदापि शोभा नहीं देता। स्रष्टा के राजकुमार के रूप में मनुष्य को जो पदवी मिली है, उसका तिरस्कार न कर जीवन चुनौती के रूप में, खिलाड़ी की तरह जिया जाय तो हँसते-हँसते पुण्य प्राप्त करते हुए यह जीवन जिया जा सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
सुख दुःख का गहन और विस्तृत, विवेचन-विश्लेषण भारतीय दर्शन में मिलता है। संसार के सभी प्राणी सुख चाहते है और प्रयत्न भी ऐसा करते है कि सुखों में वृद्धि होती रहे। दुःख बिरले ही चाहते है किन्तु वह अयाचित और अनैच्छिक रूप में मिल ही जाता है। सुख के अतिक्रमण में भी दुःख है। साधनों का संग्रह, उनकी और इच्छा, तथा इस इच्छा की पूर्ति न हो पाना भी दुःख का कारण बनता है। यहाँ भौतिक सुखों को प्रधानता नहीं दी गई है। जीवन-यापन की आवश्यक आवश्यकताओं और साधनों को नहीं नकारा गया है।, किन्तु अति संग्रह और स्वार्थपरता से सतर्क किया गया है। यों समय-समय पर जाबालि बृहस्पति, चार्वाक जैसे भौतिक सुखों के समर्थक भारत में भी हुए है, किन्तु येन-केन प्रकारेण सुख के साधनों को प्राप्त करने का सिद्धान्त भारतीय संस्कृति को ग्राह नहीं हुआ इसीलिये समाज में नीतिमत्ता दिखाई देती है।
योरोप में सुखवादी सिद्धान्त के समर्थक सेरेनिक, थामस हाब्स अरस्टीपस थे। इन्हें भी चार्वाक के सिद्धान्तों का समर्थक ही माना गया है। ये भी सुख की प्राप्ति को जीवन का परम लक्ष्य मानते थे। इनके अनुसार सुख के साधन जुटाने में यदि अपमान भी सहन करना पड़े तो भी कुछ बुराई नहीं है, किन्तु ईपीक्यूरस का सिद्धान्त कुछ भिन्न है। वे भोगविलास के पक्ष में तो थे, किन्तु विवेकहीनता के विरुद्ध थे। उनका कहना था कि यदि इसी प्रकार मनुष्य भोग विलास में निमग्न रहा, तब निश्चय ही खोखला, और छूँछ रह जाएगा। वह सुख भोगने की क्षमता ही गवाँ बैठेगा। उनका कथन आज की परिस्थितियों में सटीक कथन आज की परिस्थितियों में सटीक बैठता है। अधिक सुख और भोग-विलास के जीवन में मनुष्य थोड़े दिन के बाद मानसिक और शारीरिक दोनों ही दृष्टि से अशक्त हो जाता है। और बेचैनी महसूस करने लगता है। उसके समीप सुख के साधन, सामग्री रहने पर भी वह सुख का आस्वादन सही कर पाता। अतः ईपीक्यूरस चाहते थे कि जिन्हें जी भर सुख का आनन्द लेना हो, वे संयम बरतें, सन्तुलित रहे और अतिवाद तथा अतिक्रम से दूर रह कर मर्यादित जीवन जिये। वर्तमान काल के सुख बाद का प्रवर्तक बेन्थम और जॉनस्टुअर्टमिल को माना जाता है। ये भौतिक जीवन को आनन्दमय बनाने के समर्थक थे, किन्तु वैयक्तिक सुख बाद विरुद्ध थे। उनके अनुसार आदर्शवादी जीवन वह है, जिसमें समाज के अधिक-से-अधिक लोग सुखी रह सकें। वे व्यक्तिगत सुख के आलोचक इसलिये भी बने-क्योंकि मनुष्य जब अपने सुख की चिन्ता में रहता है, तब वह दूसरों की परवाह नहीं करता। इस प्रकार वह लगभग स्वार्थी बन जाता है। कितने बाद वह दूसरों को ही दुःख पहुँचाने लगता है।
बेन्थम और मिल अपने समय के प्रख्यात समाज सुधारक थे। नास्तिक होने पर भी वे बड़े पवित्र आचरण और उदार मनोवृत्ति के थे। वे चाहते थे समाज में स्वार्थवाद समाप्त हो, अधिक-से अधिक लोग सुखी, सन्तुष्ट हों। उस काम की वे निन्दा करते थे, जिससे थोड़े व्यक्ति लाभान्वित होते हों और बहुसंख्यकों का शोषण होता हो। ऐसे आचरण करने वालों को अनैतिक, अवसरवादी और शीर्षक मानते थे। उनका कहना था कि आदर्श समाज वह है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपने साधन और सुख को बढ़ाने की पूर्ण स्वतंत्रता हो और दूसरों की स्वतंत्रता में किसी प्रकार बाधक न हो। जिस समय बेन्थम और मिल इस प्रकार के सुधार में निमग्न थे, उस समय के समाज में वहाँ भी अशिक्षितों स्वर्ग में सुख के साथ मिलने की बात कहकर बहकाया जाता था और शोषण किया जाता है।
संसार में भोग्य वस्तुएँ परिमित है और इच्छाएँ अनन्त। अतः मात्र सुख के आदर्शों को लेकर चलने से भी सुखी नहीं रहा जा सकता। जहाँ साधनों का अभाव होगा, वहाँ ईर्ष्या कलह, छीना झपटी होना स्वाभाविक है। पिछले दिनों जितने भी युद्ध हुए है, उनमें शोषण और साधनों की लूट खसोट ही प्रमुख रही है।
वस्तुतः सुख, साधनों पर उतना नहीं निर्भर करता जितना कि मनः स्थिति पर। यदि ऐसा न रहा होता तो साधन सम्पन्न व्यक्ति सदैव सुखी और प्रसन्न प्रफुल्लित देखे जाते और अभावग्रस्त किसान मजदूर रोते कलपते, जीवन गुजारते। सुख और सन्तोष में रात-दिन आकाश-पाताल जैसा अन्तर है। सुख भौतिक है तो सन्तोष आध्यात्मिक। सन्तोष अनुभूति परक है तो सुख भोग परक। जो सुख-सन्तोष को एक मानते हैं वे भू करते है। मनुष्य सदा आत्म सन्तोष और आनन्द की प्राप्ति की कामना करता है। इसका अर्थ यह नहीं निकाल लेना चाहिए कि वह सदैव सुख के लिये प्रयत्न करता है। कभी-कभी उसको सन्तोष सुख की प्राप्ति से होता है कभी सुख के त्याग से। यदि व्यक्ति इतना भर समझ ले तो उसका जीवन क्या से क्या हो जाय।
अहंकार का अहंभाव देखने में एक जैसे लगते हैं। और उनको निन्दास्पद समझा जाता है पर वस्तुतः ऐसी बात है नहीं। दोनों में से केवल अहंकार ही निन्दनीय है। अहंभाव शुद्ध अह तो जीवन का मेरुदण्ड है, यदि वह न हो तो सीधा खड़ा रहना ही कठिन हो जाय।
अहंकार कहते हैं भौतिक वस्तुओं और शारीरिक क्षमता पर इतराने को -इन कारणों से अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने को अपनी इस उपलब्धि का ऐसा भौंड़ा प्रदर्शित करने की जिससे औरों पर अपने बड़प्पन की छाप पड़े। वह प्रवृत्ति यह जताती है कि यह व्यक्ति सम्पदाओं का हजम नहीं कर पा रहा है और ओछेपन के रूप में फूट-फूट कर निकल रही है।
अब जब पचता नहीं तो उलटी और दस्त के रूप में फूटता है। जहाँ स्वयं से तो श्रेष्ठ था पर जब वह इस प्रकार घिनौना होकर बाहर निकलता है तो देखने वाले को भी कष्ट होता है। अन्न बुरा नहीं है और न उसका खाया जाना। चिन्ता का विषय ‘हैजा’ है। सम्पदाएँ बुरी नहीं, उनका होना हेय नहीं पर उनका नशा बुरा है, जिसे अहंकार कहते है।
चावल जौ तिल, गुड़ इनमें से कोई भी बुरा नहीं। इन्हें हविष्यान्न कहते हैं। पर इन्हें सड़ा कर जब शराब बनाई जाती है तो वह अहितकर और अवांछनीय बन जाती है। सम्पदा जब विकृत होकर किसी व्यक्ति के मन पर छाती है तो वह नशे जैसा प्रभाव करती है और मनुष्य उन्मत्त उद्धत आचरण करने लगता है। सम्पदाओं की जब ऐसी ही प्रतिक्रिया होती है तो उसे अहंकार कहा जाता है।
अहंकारी व्यक्ति इस भ्रम में पड़ जाता है कि उपलब्धियों के कारण दूसरों से बहुत बड़ा हो गया। उनकी तुलना में और सब तुच्छ है। सबको उसकी सम्पदाओं का विवरण जानना चाहिये और उस आधार पर उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करके सम्मान प्रदान करना चाहिये। इस प्रयोजन के लिये वह विविध विधि, ऐसे आचरण करता है, ऐसे प्रदर्शन करता है जिससे लोग उसका बड़प्पन भूल न जायें भूल गये हों तो फिर याद कर लें। उसके वार्तालाप में आधे से अधिक भाग आत्म प्रशंसा का होता है। बात-बात में अपने वैभव, पराक्रम और बुद्धिमत्ता की चर्चा करता है और अपने को सफल सिद्ध करता है। यद्यपि ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।
शारीरिक बलिष्ठता गुण्डागर्दी में उभरती है। इसमें यही प्रवृत्ति काम करती है कि लोग उसके बल अपना ध्यान केन्द्रित करें, उसे सराहें। यह प्रयोजन अच्छे सत्कार्य करके भी पूरा किया जा सकता था पर ओछे मनुष्य का दृष्टिकोण उतना परिष्कृत होता कहाँ है? उसमें उस प्रकार की योग्यता भी कब रहती है। सरल उद्दण्डता पड़ती है किसी का अपमान कर देना, सताना, तोड़, फोड़, अपशब्द, अवज्ञा उच्छृंखलता, मर्यादाओं का व्यक्तिक्रम यही बातें ओछे व्यक्ति आसानी से कर सकते है। सो ही वे करते है। यह विकृत अहंकार ही गुण्डागर्दी के रूप फूटता है।
किसी का रंग गोरा हो छवि सुन्दर हो, तो उसके नखरे देखते ही बनते है। छवि के सजाने में ऐसा लगा रहता है मानो शृंगार का देवता वही हो। अन्य लोग उसे अष्टावक्र की तरह काले कुरूप दीखते है और कामदेव का अवतार अपने में ही उतरा दीखता है। उसकी इस विशेषता को लोग देखें तो, समझे तो, सराहें तो बस यही धुन हर घड़ी रहती है। तरह-तरह के वेश विन्यास, श्रृंगार सज्जा की ही उधेड़बुन छाई रहती है। दर्पण को क्षण भर के लिये छोड़ने को जी नहीं करता। रूप का प्रदर्शन करने की यह प्रवृत्ति भिन्न लिंग वालों को आकर्षित करने की ओर बढ़ती है। पुरुष स्त्रियों के सामने और स्त्रियाँ पुरुषों के सामने इस तरह बन-ठन कर निकलते हैं जिससे उन्हें ललचाई आँखों से देखा जाय। वर्तमान शृंगारिकता इसी ओछेपन को लेकर बढ़ रही है और उसकी प्रतिक्रिया मानसिक व्याभिचार से आरम्भ होकर शारीरिक व्याभिचार परिणित हो रही है। अहंकार की यह रूप परक प्रवृत्ति उस सुसज्जा श्रृंगार को भी ऐसे जाल-जञ्जाल में फँसा देती है जिससे वह अपनी प्रतिष्ठा और शालीनता गँवाकर विपत्ति ही मोल लेता है।
धन का अहंकार ऐसे ठाट-बाट खड़े करता है जिससे उसकी अमीरी सबको विदित हो। मोटर, बंगले, जेवर, वस्त्र ठाट-बाट का इतना बवण्डर जमा कर लिया जाता है जिसके बिना आसानी से काम चलता रह सकता था। विवाह-शादियों में लोग अन्धाधुन्ध पैसा फूँकते हैं। उसके पीछे अपनी अमीरी का विज्ञापन करने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होता। चीजें सुरुचि के नाम पर अनावश्यक मात्रा में खरीदी जाती है पर वस्तुतः उसका कारण अमीरी की छाप डालना ही होता है। कई व्यक्ति दान पुण्य का ढोंग भी बनाते हैं। यद्यपि उदारता और परमार्थ का नाम भी उनके भीतर नहीं होता पर लोग उनकी अमीरी की बात जानें यह प्रयोजन जिनसे पूरा होता है- उन्हीं दान पुण्यों को अपनाते है। ऐसे लोगों का आधा धन प्रायः इन्हीं विडम्बनाओं में खर्च हो जाता है। इस प्रकार उस अहंकार की पूर्ति का वे महँगा मूल्य चुकाते रहते है।
विद्या का अभिमान और भी अधिक विचित्र है। विद्या का फल ‘विनय’ होना चाहिये। पर यदि विद्वान अविनयशील हो जाय। पग-पग पर अपना सम्मान माँगे और चाहे, उसमें कहीं रत्ती भर कमी दीखे कि पारा चढ़ जाय इस विचलित मनः स्थिति में ही आज के विद्वान कलाकार देखे जाते हैं। कहीं बुलाये जाये तो ऊँचे दर्जे के वाहन, महँगे निवास, कीमती व्यवस्था की शर्त पहले लगाते हैं। उन्हें सम्मानित स्थान मिला कि नहीं पुरस्कार उनके गौरव जैसा हुआ कि नहीं, आदि नखरे देखते ही बनते है, परस्पर कुढ़ने और एक दूसरे का काट करते है इसलिये कि उनका बड़प्पन सम्मान कहीं दूसरे दर्जे पर न आ जाय। जिन्हें सभा सम्मेलनों में कभी ऐसे लोग बुलाने पड़ते है वे देखते हैं कि जो बाहर से विद्वान कलाकार दीखते थे या विद्वान, भीतर अहंकार से ग्रस्त होने से वस्तुतः वे कितने छोटे हो गये है। विद्वानों का संगठन इसी कारण न बन पाता है, न टिक पाता है। परस्पर ईर्ष्या के कारण वे सहयोगी बन ही नहीं पाते-प्रतिद्वन्द्वी ही बने रहते है।
सत्ता का मद पहले से ही बहुत था, ओछापन जैसे-जैसे बढ़ता जा रहा है यह अहंकार ओर भी बढ़ रहा है। ऐसे सरकारी कर्मचारी जो जनता का हित-अहित कर सकते है जिनके हाथ में लोगों को सुविधा देना या असुविधा बढ़ाना है, उनकी शान और नाक देखते ही बनती है। वे लोग बेकार समय गँवाते रहेंगे पर लोगों की बात सुनने में व्यस्तता का बहाना करेंगे। सीधे मुँह बोलेंगे नहीं। बात अकड़ कर ओर अपमान जनक ढंग से करेंगे। इस ऐंठ से आतंकित जनता अपना काम पूरा न होते देखकर रिश्वत के लिये विवश होती है। शासन में या अन्यत्र बड़े संस्थानों में बड़े पदों पर अवस्थित लोगों का रूखा असहानुभूति पूर्ण और निष्ठुर व्यवहार देखकर उन पर छाये हुये अहंकार के मद का कितना प्रभाव छाया हुआ है, इसे भली प्रकार देख जा सकता है।
सन्त तपस्वियों तक में यह अहंकार उन्माद भरपूर देख जा सकता है। पर अपने घरों पर अपने लिये ऊँची गद्दी बिछाते है और दूसरे आगन्तुकों के लिये नीचे बैठने की व्यवस्था रखते है। यह कैसा अशिष्ट और असामाजिक तरीका है। दूसरे के घर में जाये और वहाँ वे लोग ऊँचे आसन पर बिठाये-खुद नीचे बैठें ये बात कुछ समझ में आती है। पर अपने से नीचा आसन नहीं देना चाहिये। बड़प्पन या असम्मानित करना नहीं हैं। आज कल सन्त महन्त, योगी यती गद्दीधारी अखाड़े बात किसी भी तथाकथित धर्म नेता या अध्यात्म वेत्ता के पास जाये तो उनके यहाँ यही व्यवस्था मिलेगी कोई चरण स्पर्श न करे तो मुँह से भले ही कुछ न कहें भीतर ही भीतर बेतरह कुढ़ेंगे। यह भी एक प्रकार की तृष्णा ही तो हुई।
एक सन्त दूसरे सन्त के यहाँ जाने में अपनी हेठी समझता है। मैं क्यों उसके यहाँ जाऊँ-वह मेरे यहाँ क्यों न आये? उसके आश्रम से मेरा आश्रम छटा रहे, ऐसी अहमान्यताओं की अति वहाँ भी कम नहीं होती। दूर से देखने पर जो सन्त योगी दीखने थे, पास जाने और बारीकी से देखने पर वे अहंकार से बेतरह ग्रस्त रोगी की तरह ही दीखते है।
यह अहंकार ओछेपन का चिन्ह है। अन्न हजम न होने पर मुँह से खट्टी डकारें बार-बार निकलती है और सड़ा हुआ बदबूदार अपान वायु शब्द करता हुआ निकलता है। ठीक इसी प्रकार वाणी से आत्म-प्रशंसा शेखीखोरी अपना बखान करने भरमार यह बताती है कि पेट अपच है और यह खट्टी डकारें मुँह से निकल रही हैं।
चकाचौंध उत्पन्न करने वाला ठाट-बाट जमाने में कितना समय श्रम और धन नष्ट होता है, अपनी महत्ता का ढोल पीटने के लिये कितना निरर्थक सरंजाम इकट्ठा किया जाता है इसे देखकर यह समझा जा सकता है कि अपच अपान वायु के रूप में ढोल पीटने और ढिंढोरा करने की विडम्बना रच रहा था।
विभिन्न वर्ग और विभिन्न स्तर के लोग अपनी भौतिक सम्पदाओं का भौंड़ा प्रदर्शन अपने ढंग से करते रहते है। उसमें उनकी आन्तरिक तुच्छता आत्मश्लाघा की खिड़की में झाँकी दीखती हैं श्रेष्ठ व्यक्ति सम्पदा की पचा जाते है हजम किया हुआ अन्न रक्त बन जाता है। सज्जनों की सम्पदा उनके व्यक्तित्व को श्रेष्ठतम बनाने के लिये व्यक्तित्व को श्रेष्ठतम बनाने के लिये प्रयुक्त होती है और उसका लाभ समाज को सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के रूप मिलता है। विवेकवान लोग सम्पत्ति को ईश्वर की अमानत मानते है और बैंक के खजांची की तरह अपने मस्तिष्क को सन्तुलित रखते हुये उसे सत्प्रयोजन के लिये प्रयुक्त करते रहते है। पराई अमानत कुछ समय के संभालने के लिये चौकीदार का मिल जाय या बाँटने-वितरण करने की, गिनने की, ड्यूटी लग जाय तो इसमें अहंकार लग जाय तो इसमें अहंकार की क्या बात है? इस तथ्य को शालीनता समझती है। अस्तु वह बरसाती नदियों की तरह उफनती नहीं समुद्र की तरह मर्यादा में रहती है।
अहंभाव इस अहंकार से सर्वथा से विपरीत है। विवेकवान अहं का अर्थ ‘आत्मा’ लेते। अपने को आत्मा मानते है। आत्मा का गौरव गिराने को पाये, उससे कोई ऐसा काम न बन पाये जिससे आत्मा के स्तर को, गौरव को ठेस लगती हो इसका वे सदा ध्यान रखते है ओर कुमार्ग पर एक कदम भी नहीं धरते। ईश्वर का परम प्रतिष्ठित पुत्र मनुष्य अपनी गरिमा को गिराये और पिता को लजाये इतनी भूल कैसे की जा सकती है? वह इस संदर्भ में पूरी तरह सतर्क रहता है।
उसके विचार उस स्तर के उत्कृष्ट होने चाहिये जैसे परम पवित्र’ आत्मा’ के लिये उपयुक्त है। उसके कार्य ऐसे होते है-जिनसे देवत्व की महिमा टपकती हो। आत्मा के ऊपर आच्छादित हो सकने वाले गुण, कर्म, स्वभाव का आवरण ही अहंभाव स्वीकार करता है और इस बात का ध्यान रखता है कि वह प्रकाश स्वरूप है उसकी ज्योति इतनी शुभ्र होनी चाहिये कि समीपवर्ती लोगों के नेत्रों में चमक उत्पन्न हो और सही मार्ग पाने में वस्तुस्थिति समझने में सुविधा मिल। अहं भाव इसी परिधि में सक्रिय रहता है उसके साथ सज्जनता, शालीनता और नम्रता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहती है। हम अहंभाव को तो अपनाएँ पर अहमन्यता के विषपान से बचते रहे।
महर्षि अंगिरा ने गोपमाल को तिलक किया और-तात! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे अन्तः करण में मुक्ति की आकांक्षा अत्यन्त प्रबल है, तुम जाओ और वर्णाश्रम धर्म की मर्यादानुसार गृहस्थ
धर्म का अनुशीलन करो।
“आपकी आज्ञा शिरोधार्य है गुरुदेव! पर यह संसार तो बन्धन है, वहाँ जाकर मुक्ति जैसे जीवन लक्ष्य को भूल गया तो?” भूलोगे नहीं तात! यदि तुमने कर्म के फल में आसक्ति नहीं रखी तो, गृहस्थी जैसे कठोर उत्तरदायित्व का पालन करते हुये भी, तुम उसी लक्ष्य की ओर अपने आप को अग्रसर पाओगे श्रावस्ती के एक ग्रामीण की कन्या हेमामालिनी के साथ विवाह करो एवं सुख से जीवन बिताओ। गृहस्थ में श्रावस्ती में रहकर ही व्यावहारिक जीवन की साधना करो।
गृहस्थी के कार्य बड़े होते है। एक बार धन के अभाव में गोपमाल की गायें बेचनी पड़ी। गोपमाल पता चला कि उन गायों का वध हो गया। यह स्वयं को इस पाप का कारण मानकर ग्लानि से भर गया, उसका मन छटपटाने लगा एवं गृहस्थी का परित्याग करने का निश्चय कर लिया। हेमामालिनी ने भी उनके मन की बात जान ली, उसने निश्चय कर लिया कि मैं भी पति के साथ ही गृह त्याग दूँगी।
रात्रि के निविड़ अन्धकार में गोपमाल चुपचाप उठा। पत्नी हेमामालिनी भी साथ हो ली। ज्यों ही दोनों आगे बढ़े एक आकृति सामने आयी, गोपमाल ने पहिचाना कि यह तो महर्षि अंगिरा खड़े हैं। उन्होंने दोनों को आशीर्वाद देते हुये कहा-तुम दोनों आत्म कल्याण के इच्छुक हो। परन्तु जो सामाजिक जीवन की परिस्थितियों से ही नहीं लड़ सका, तप–तितिक्षाओं को कैसे सहन करेगा। मनुष्य कर्म करे, सफलता या विफलता, सुख-दुख मान अपमान में स्थिर रहकर फल से प्रभावित न हो। अपने आपको भगवान् का प्रतिनिधि मानकर लोक सेवा में स्वयं को नियोजित रखे। फलश्रुतियाँ तो स्वयं ही मिल जाती है।
गोपमाल ने तत्त्वदर्शन को समझा और लौट पड़ा अपने गृहस्थ रूपी तपोवन में पत्नी के साथ पुनः समर में जूझने हेतु। उसे अब आध्यात्मिकता की सही परिभाषा जो समझ में आ गयी थी।
बच्चों की आदत तत्काल के आकर्षण पर मचलने की होती है। उनमें दूरगामी परिणामों की कल्पना कर सकने जैसी क्षमता नहीं होती। यही कारण है कि उनकी रोकथाम और डाट-डपट करनी पड़ती है। छोटे बच्चे साँप, आग बिच्छू जैसी चमकदार वस्तुओं को पकड़ने की चेष्टा कर सकते है। कारण कि उनके लिये सुहावनी लगने वाली वस्तु ही सब कुछ होती है। वे उसका लाभ-हानि समझे बिना उसे ही पकड़ने की कोशिश करते है। कई बार तो अखाद्य वस्तुओं को भी मुँह में रख लेते है।
यह बचपना शरीर के बड़े हो जाने पर भी मानसिक क्षेत्र में यथावत् बना रहता है और व्यक्ति तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ समझता रहता है। यह अनुमान उसे लग नहीं पाता कि सुहावने लगने वाले कार्य आगे चलकर कितने अनिष्ट कर सिद्ध हो सकते है। स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ सामने आने पर उन्हें प्रायः आवश्यकता से अधिक मात्रा में खा लिया जाता है। फलतः कुछ ही समय में उदरशूल अपच, उल्टी, दस्त आदि की प्रतिक्रिया आरम्भ हो जाती है। खाते समय स्वाद की अधिकाधिक पूर्ति ही ध्यान में रहती है। और यह अनुमान गले नहीं उतरता कि इसका प्रतिफल क्या हो सकता है? कामुकता का अति उत्साह भी ऐसे ही अनर्थ करता है। शरीर खोखला हो जाता है, जीवनी शक्ति घट जाती है, मानसिक कुशाग्रता विदा हो जाती है। साथ ही पत्नी का स्वास्थ्य और बच्चों का मस्तिष्क अन्धकारमय बनता है। यदि यदि अनुमान को सही रीति से जगाया जा सकना संभव हो सके तो उसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति अपने में समर्थता और प्रखरता का भण्डार भरे रह सकता है। ओजस् और तेजस् को अक्षुण्ण बनाये रह सकता है। आलस्य और प्रमाद में श्रम की कठिनाई से बचाव होता है। दीर्घ सूत्रता इसलिये अच्छी लगती है कि उसमें नियमितता अपनाने का बंधन नहीं बँधता। यह आदत अभ्यास में आते रहने पर परिपक्व भी हो जाती है और फिर छोड़ते नहीं छूटती। बहुमूल्य समय ऐसे ही आवारागर्दी में निकल जाता है। यदि समझदारी से काम लिया होता और समय का तत्परता पूर्वक सदुपयोग किया गया होता तो उतने ही समय इतनी प्रगति हो सकती थी कि योग्यता भी बढ़ती और सम्पन्नता की भी कमी न रहती। समय का सदुपयोग समझने और करने वाले इतने ही समय में महामानवों जैसे कृत्य कर गुजरते है। जितने में कि आलसी लोग जीव की गाड़ी को जिस-तिस प्रकार खींच पाते है। अथवा कोल्हू के बैल की तरह चलते हुए निरर्थक जीवन बिताते है।
कुमार्ग पर चलने, कुकर्म करने की आदत भी उन्हीं की पड़ती है, जो उनके परिणामों की भावी संभावना को आँखें खोलकर देख नहीं पाते। जिनमें समझदारी का उदय हो जाता है वे मस्तिष्क का अनुमान सही स्तर पर लगा लेते है और कुकर्म करने से पहले ही सावधान हो जाते है। जिनका शुभारंभ सत्परिणामों की सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुये होता है उन्हें आरम्भ में थोड़ा कष्ट भले ही उठाना पड़े पर वे अन्त में आनन्द भरा जीवन जीते हैं और निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर होते रहते है।
किसान को खेत के साथ कड़ा परिश्रम करना पड़ता है। घर में रखा हुआ बीज खेत में बिखेरना पड़ता है इसके बाद भी खाद पानी लगाने का सिलसिला चलता रहता है। आरम्भिक इस श्रम साधना को देखते हुये कोई अदूरदर्शी इस प्रयास को निरर्थक भी कर समता है। पर वह समय आता है जब फसल पकती है और अनाज से घर को बड़ी-बड़ी कोठरियाँ भरती है विद्यार्थियों को भी यही मार्ग अपनाना पड़ता है। वे स्नातक बनने के लिये चौदह वर्ष का अध्ययन तप करते है। पुस्तकों को खरीदने,फीस चुकने जैसे प्रयासों में प्राण-पथ से लगे रहते है। पढ़ाई के दिनों का वह श्रम उन दिनों बेकार लग सकता है किन्तु समय आता है जब वह कॉलेज व विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी करके निकलता है और बड़ा अफसर बनता है। आरम्भिक दिनों में जो समय लगाना, श्रम करना और धन खर्चना पड़ता है वह समय फल देता है इसी समझदारी को तत्परतापूर्वक लिये गये दूरगामी परिणाम देने वाले निर्णय को विवेकशीलता कहते है। यह जिसमें जाग जाती है, उनमें असीम महानता से भरी सम्भावनाओं का पथ प्रशस्त कर देती है।
बड़ी अजीब से उलझन है, मैं कौन हूँ? सवाल छोटा-सा है पर जवाब ढूँढ़े मिलता। यूँ कहने को हम बहुत बुद्धिमान हैं। अब तक न जाने कितने क्यूँ? क्या? कैसे? किसलिए? की पहेलियाँ सुलझा चुके। धरती आकाश का चप्पा-चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया। इस बौद्धिक कुशलता की खूब प्रशंसा भी हुई। लेकिन इस छोटे से सवाल का समाधान न हो पाने के कारण सारी बौद्धिक करामातें धरी की धरी रह गयीं और बेचारा मैं अपना परिचय न पा सकने के कारण नित नयी परेशानियों में फँसता उलझता चला गया। अनगिनत विडम्बनाएँ विभीषिकाएँ उसे संत्रस्त करती चली गयी।
इससे उबरना तभी सम्भव है, जब 'मैं' अपनी खोजबीन करे। तनिक सोचें जिसे काया को शरीर समझा जाता है, क्या यही मैं हूँ क्या कष्ट चोट-भूख शीत आतप आदि से पग-पग पर व्याकुल होने वाला अपनी सहायता के लिये बजाज, दर्जी किसान, रसोइया, चर्मकार चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही मैं हूँ? दूसरों की सहायता के बिना जिसके लिये जीवन धारण कर सकना कठिन हो। जिसकी सारी हँसी-खुशी और प्रगति दूसरों की कृपा पर निर्भर हो, क्या वही, असहाय, असमर्थ मैं हूँ? मेरी आत्म निर्भरता क्या कुछ भी नहीं है? यदि शरीर ही मैं हूँ तो निस्संदेह अपने को सर्वथा पराश्रित और दीन-दुर्बल ही माना जाना चाहिये।
परसों पैदा हुआ, खेलने-कूदने-पढ़ने-लिखने में बचपन चला गया। कल जवानी आयी थी। नशीले उन्माद की तरह आँखों में, दिमाग में छाई रही। चंचलता और अतृप्ति से बेचैन बनाये रही। आज ढलती उम्र आ गई। शरीर ढलने-गलने लगा। इन्द्रियाँ जवाब देने लगीं। सत्ता बेटे, पोतों के हाथ चली गयी। लगता है एक उपेक्षित जैसी अपनी स्थिति है। अगली कल यही काया जरा जीर्ण होने वाली है। आँखों में मोतियाबिन्द-कमर-घुटनों में दर्द खाँसी, अनिद्रा जैसी व्याधियाँ, घायल गधे पर उड़ने वाले कौओं की तरह आक्रमण की तैयारी कर रही है।
अपाहिज और अपंग की तरह कटने वाली यह जिन्दगी कितनी भारी पड़ेगी। यह सोचने को जी नहीं चाहता वह डरावना और घिनौना दृश्य एक क्षण के लिये भी आँखों के सामने आ खड़ा होता है तो रोम-रोम काँपने लगता है। पर उस अवश्यम्भावी भवितव्यता से बचा जाना सम्भव नहीं? जीवित रहना है तो इसी दुर्दशा ग्रस्त स्थिति में पिसना पड़ेगा। बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। क्या यही मैं हूँ? क्या इसी निरर्थक विडम्बना के कोल्हू के चक्कर काटने के लिये ही मैं जन्मा? क्या जीवन का यही स्वरूप है? मेरा अस्तित्व क्या इतना ही तुच्छ है?
आत्म चिन्तन कहेगा, नहीं-नहीं-नहीं आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता। वह इतना अपंग और असमर्थ-पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़-पौधों जैसा मक्खी मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर मात्र जीने के लिये जीना। सो भी जीना ऐसा जिसमें न चेन, न खुशी, न शान्ति, न आनन्द, न संतोष। यदि आत्मा-सचमुच परमात्मा का अंश है तो वह ऐसी हेय स्थिति में पड़ा रहने वाला नहीं हो सकता। या तो मैं हूँ ही नहीं। नास्तिकों के प्रतिपादन के अनुसार या तो पाँच तत्वों के प्रवाह में एक भँवर जैसी बबूले जैसी क्षणिक काया लेकर उपज पड़ा हूँ और अगले ही क्षण अभाव के विस्मृति गर्त में समा जाने वाला हूँ। या फिर कुछ हूँ तो इतना तुच्छ और अपंग हूँ जिसमें उल्लास और संतोष जैसा गर्व और गौरव जैसा कोई तत्व नहीं है। यदि मैं शरीर हूँ तो हेय हूँ। अपने लिये और इस धरती के लिये सारभूत। पवित्र अन्न को खाकर, घृणित मल में परिवर्तित करने वाले करोड़ों-करोड़ों छिद्रों वाले इस कलेवर से दुर्गन्ध और मलीनता निसृत करते रहने वाला अस्पर्श्य घिनौना हूँ मैं। यदि शरीर हूँ तो इससे अधिक मेरी सत्ता होगी भी क्या?
मैं यदि शरीर हूँ तो उसका अन्त क्या है? लक्ष्य क्या है? परिणाम क्या है? मृत्यु-मृत्यु-मृत्यु कल नहीं तो परसों वह दिन तेजी से आँधी तूफान की तरह उड़ता-उमड़ता चला आ रहा है, जिसमें आज की मेरी यह सुन्दर-सी काया जिसे मैंने अत्याधिक प्यार किया, जिसमें पूरी तरह समर्पित हो गया घुल गया। अब वह मुझसे विलग हो जायेगी विलग ही नहीं अस्तित्व ही गँवा बैठेगी। काया में घुला हुआ मैं, मौत के एक थपेड़े में कितना कुरूप कितना विकृत कितना निरर्थक कितना घृणित हो जाएगी कि उसे प्रिय परिजन तक कुछ समय और उसी घर में रहने देने के लिये सहमत न होंगे, जिसे मैंने ही कितने अरमानों के साथ कितने कष्ट सहकर बनाया था। क्या यही मेरे परिजन है? जिन्हें लाड़-चाव से पाला था। अब ये मेरी इस काया को घर में से हटा देने के लिये उसका अस्तित्व मिटा देने के लिये क्यों आतुर है? कल वाला ही तो मैं हूँ।
मौत के जरा से आघात से मेरा स्वरूप यह कैसा हो गया। अब तो मेरी मृत काया, हिलती-डुलती भी नहीं बोलती-डुलती भी नहीं बोलती सोचती भी नहीं? अब तो उसके कुछ अरमान भी नहीं है। हाय यह कैसी मलीन दयनीय घिनौनी बनी जीन पर लुढ़क रही है। अब तो यह पलंग बिस्तर पर सोने का अधिकार भी खो बैठी। कुशाओं से बान से ढकी गोबर से लिपी गीली भूमि पर यह पड़ी है। अब कोई चिकित्सक भी इसका इलाज करने के लिये तैयार नहीं। कोई बेटा पोता गोदी में नहीं आता। पत्नी छाती तो कूटती है पर साथ सोने से डरती है। मेरा पैसा, वैभव, मेरा सम्मान, हाय रे! सब छिन गया हार रे मैं बुरी तरह लुट गया। मेरे कहलाने वाले लोग ही मेरा सब कुछ छीन कर मुझे इस दुर्गति के साथ घर से निकाल रहे हैं। क्या यही अपनी दुर्दशा कराने के लिए मैं जन्मा? यही है क्या मेरा अन्त? यही था क्या मेरा लक्ष्य, यही है क्या मेरी उपलब्धि!जिसके लिए कितने पुरुषार्थ किए थे क्या उसका निष्कर्ष यही है - यही हूँ में- जो मुर्दा बना पड़ा हैं।
लो, अब पहुँच गया मैं चिता पर। लो, मेरा कोमल मखमल जैसा शरीर जिसे सुन्दर सुसज्जित सुगन्धित बनाने के लिए घण्टों श्रृंगार किया करता था, अब आ गया अपनी असली जलहवा। लकड़ियों का ढेर उसके बीच दबाया-दबोचा हुआ मैं। अरे!यह लगी आग, और अब मैं जला। अरे!मुझे जलाओ मत। इन खूबसूरत हड्डियों में, मैं अभी और रहना चाहता हूँ मेरे अरमान बहुत है, इच्छाएँ तो हजार में से एक भी पूरी नहीं हुई। मुझे मेरी उपार्जित सम्पदाओं से अलग मत करो। प्रियजनों का वियोग, मुझे सहन नहीं। इस काया को जरा-सा कष्ट होता था तो चिकित्सा, उपचार में मैं बहुत कुछ करता था। इस काया को इस निर्दयता पूर्वक मत जलाओ। स्वजन और मित्र कहलाने वाले लोगों! इस अत्याचार से मुझे बचाओ। अपनी आँखों के आगे ही मुझे इस तरह जलाया जाना, तुम देखते रहोगे। मेरी कुछ भी सहायता न करोगे। अरे! यह क्या? बचाना तो दूर उलटे तुम्हीं मुझ में आग लगा रहे हो नहीं-नहीं मुझे जलाओ मत मुझे मिटाओ मत। कल तक मैं तुम्हारा था, तुम मेरे थे, आज हो क्या गया जो तुम सबने इस तरह मुझे त्याग दिया?इतने निष्ठुर तुम सब क्यों बन गए? मैं और मेरा संसार क्या इस चिंता की आग में ही समाप्त हो जाएँगे? अपनों का अन्त अरमानों का विनाश, हाय री चिता। तू मुझे छोड़। मरने का जलने का? मेरा जरा भी जी नहीं है। अग्नि देवता, तुम तो दयालु थे। सारी निर्दयता मेरे ही ऊपर उड़ेलने के लिए क्यों तुल गए?
लो, सचमुच मर गया। मेरी काया का अन्त हो गया यादें भी धुँधली हो चली। कुछ दिन चित्र फोटो जिए। श्राद्ध–तर्पण का सिलसिला कुछ दिन चला। दो-तीन पीढ़ी तक बेटे-पोतों को नाम याद रहे। पचास वर्ष भी पूरे न हो पाए कि सब जगह से नाम निशान मिट गया। अब किसी को बहुत कहा जाय कि इस दुनिया में पैदा हुआ था। बड़े अरमानों के साथ जिया था, जीवन को बहुत संजोया, सँभाला था। उसके लिए बहुत कुछ किया था, पर वह सारी दौड़-धूप ऐसे ही निरर्थक चली गयी। मेरी काया तक ने मेरा साथ न दिया जिसमें मैं पूरी तरह घुल गया था। जिस काया के सुखा को अपना सुख और उसके दुख को अपना दुख समझा। सच तो चह कि मैं ही काया या और जिसके दुख को अपना दुख समझा। सच तो यह कि मैं ही काया या और काया ही मैं था। हम दोनों की एक ही हस्ती हो गई थी, पर यह क्या अचम्भा हुआ मैं अभी भी मौजूद हूँ।
वायुभूत हुआ आकाश में, मैं अभी भी भ्रमण कर रहा हूँ। पर मेरी अभिन्न सहचरी लाने वाली काया न जाने कहाँ चली गयी। अब वह मुझे कभी नहीं मिलेगी क्या। उसके बिना मैं रहना नहीं चाहता था? रह नहीं सकता था, पर हाय-री निर्दय नियति तू ने यह क्या कर डाला। काया चली गयी। माया चली गयी। मैं अकेला हो वायुभूत बना भ्रमण कर रहा हूँ। एकाकी -नितान्त एकाकी। जब काया ने ही साथ छोड़ दिया तो उसके साथ जुड़े हुए परिवार भी क्यों याद रखते? याद रखे भी हों तो अब उससे अपना बनना भी क्या है।
मैं काया हूँ यह जन्म के दिन से लेकर मौत के दिन तक मैं मानता रहा। यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ थी कि कथा-पुराणों की चर्चा में आत्मा काया के अलगाव की बात आए दिन सुनते रहने पर भी गले से नीचे नहीं उतरती थी। शरीर ही तो मैं हूँ उससे अलग मेरी सत्ता भला किस प्रकार हो सकती हैं? शरीर के सुख-दुख के अतिरिक्त मेरा सुख-दुख अलग क्यों कर होगा? शरीर के लाभ और मेरे लाभ में अन्तर कैसा माना जाय? यह बातें न तो समझ में आती थीं और न उन पर प्रत्यक्ष कैसे झुठलाया जाय? काया प्रत्यक्ष है आत्मा अलग है, उसके स्वार्थ सुख-दुख अलग है, यह बात कहने की सुनने भर की ही हो सकती थी सो रामायण भागवत् की गाथाओं में हाँ-हाँ तो कहता रहा पर उसे वास्तविकता के रूप में कभी स्वीकार न किया।
पर आज देखता हूँ कि वह सच्चाई थी जो समझ में नहीं आई और वह झुठाई थी जो सिर पर हर घड़ी सवार रही। शरीर ही मैं हूँ। यही मान्यता शराब की खुमारी की तरह नस-नस में भर रही बोतल पर बोतल छानता रहा तो वह खुमारी उतरती भी कैसे? पर आज आकाश में उड़ता हुआ वायुभूत एकाकी मैं सोचता हूँ झूठा जीवन जिया गया। सचाई आँखों से ओझल ही बनी रही मैं एकाकी हूँ शरीर में भिन्न हूँ आत्मा हैं यह सुनता जरूर रहा पर मानने का अवसर ही नहीं आया। यदि उस तथ्य को जाना ही नहीं माना भी होता तो वह अलभ्य अवसर जो हाथ से चला गया इस बुरी तरह न जाता। जीवन जिस मूर्खता पूर्ण रीति नीति से जिया गया वैसा न जिया जाता।
उलझन अब सुलझी है। शरीर मेरा है, मेरे लिए है, मैं शरीर नहीं हूँ। यह छोटा-सा सवाल यदि समय रहते हल हो गया होता, सचाई समझ में आ गयी होती तब मनुष्य जीवन जैसे देव दुर्लभ सौभाग्य का लाभ ले लिया गया होता। पर अब क्या हो सकता है। अब तो पश्चाताप ही शेष है। चलिए मुझे हाल परी छोड़िए, आप ही समय रहते इस पहेली को हल कर लें समझ लें कि आप कौन हैं? नहीं तो इस भूल भरी मूर्खता के लिए न जाने कितने लम्बे समय तक रुदन करना पड़ेगा?
भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में सूक्ष्म शक्ति की प्रखरता काम करती देखी जा सकती है। जीवन की गरिमा और सफलता उसके स्थूल वैभव में सन्निहित नहीं है, जैसी कि आम मान्यता है। उसका वर्चस्व सूक्ष्म चिन्तन द्वारा किये गये आत्म निरीक्षण और आत्मा-निर्माण में सन्निहित है। इसी कारण चिन्तन की अनगढ़ता न सिर्फ स्थूल अंगों को प्रभावित करती है, अपितु सूक्ष्म अवयवों पर भी अपना असर डाले बिना नहीं रहती।
उदाहरण के लिए उस आम धारणा को लिया जा सकता है, जिसके बारे में मोटे तौर पर यह समझा जाता है कि आहार से रक्त बनता है और रक्त की शक्ति से शरीर में गर्मी और ऊर्जा उत्पन्न होती है, पर बारीकी से देखने पर विदित होता है कि आहार को रुधिर में परिवर्तित करने वाली एक प्रणाली और भी है और वही अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण भी है। स्वचालित नाड़ी संस्थान तथा चेतन द्वारा उनके नियंत्रण संचालन की बात भी अब मोटी बात ही रह गयी है। मस्तिष्क एवं नाड़ी संस्थान को दिशा प्रेरणा और सामर्थ्य प्रदान करने वाले केन्द्र और भी सूक्ष्म है। उनके निरीक्षण से ज्ञात हुआ है कि शक्ति और अशक्ति के मूल आकार और भी अधिक गहराई में छिपे हुए है तथा पिछले दिनों वे प्रायः अविज्ञात ही बने रहे है। यह तथ्य तब और अधिक सुस्पष्ट हो जाता है, जब घी दूध जैसे मोटे बनाने वाले पदार्थों से वंचित व्यक्ति भी मोटे होते चलते है और चिकनाई एवं पौष्टिक आहार में डूबे रहने वाले भी एक उपेक्षित और निरर्थक जैसी अपनी स्थिति है। अगली कल यही काया जरा जीर्ण होने वाली है आँखों में मोतियाबिन्द, कमर-घुटनों में दर्द, खाँसी, अनिद्रा जैसी व्याधियों घायल गधों पर उड़ने वाले कौओं की तरह आक्रमण की तैयारी कर रही हैं।
अपाहिज और अपंग अपाहिज और अपंग की तरह कटने वाली यह जिन्दगी कितनी भारी पड़ेगी। यह सोचने को जी नहीं चाहता। वह डरावना और घिनौना दृश्य एक क्षण के भी आँखों के सामने आ खड़ा होता है तो रोग रोम काँपने लगता है पर अवश्यम्भावी भवितव्यता से बचा जाना सम्भव नहीं? जीवित रहना है तो इसी दुर्दशा ग्रस्त स्थिति में पिसना पड़ेगा। बच निकलने का कोई रास्ता नहीं क्या यही मैं है क्या इसी निरर्थक विडम्बना के कोल्हू के चक्कर काटने के लिए ही मैं जन्मा? क्या जीवन का यही स्वरूप है मेरा अस्तित्व क्या इतना ही तुच्छ है?
आत्मा चिन्तन कहेगा नहीं नहीं आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता वह इतना अपंग और असमर्थ पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़ पौधों जैसा मक्खी मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर मात्र. जीने के जन्मा सो भी जीना ऐसा जिसमें न चैन न खुशी न शान्ति न आनन्द न संतोष यदि आत्मा सचमुच परमात्मा का अंश है तो वह ऐसी हेय स्थिति में पड़ा रहने वाला नहीं हो सकता। या तो मैं ही हूँ नहीं नास्तिकों के प्रतिपादन के अनुसार या तो पाँच तत्वों के प्रवाह में एक भंवर जैसी बबूले जैसी क्षणिक काया लेकर उपज पड़ा हूँ और अगले ही क्षण अभाव के विस्मृति गर्त में समा जाने वाला हूँ या फिर कुछ हूँ तो इतना तुच्छ और अपंग हूँ जिसमें उल्लास और सन्तोष जैसा कोई तत्व नहीं है यदि में शरीर हूँ तो हेय हूँ अपने लिए और विकृत चिन्तन की ओर है। इससे स्पष्ट है कि बुरे चिन्तन के बुरे प्रभाव से सूक्ष्म संस्थान भी सर्वथा अप्रभावित नहीं रहते यह पाश्चात्य दृष्टिकोण है। प्राच्य चिन्तन के मतानुसार बुरे चिन्तन का बूरा असर पड़ता तो है जब उस उत्पन्न विकृत को शोधने और सुधारने की बारी आती है तो मात्र दृष्टिकोण का परिष्कार ही पर्याप्त नहीं होता जैसा कि पश्चिम के मनोविज्ञानी अब मानने लगे है कि विचार तंत्र को सही कर लेने मात्र से विकृतियों का उन्मूलन संभव है पर भारतीय अध्यात्म इससे भी गहराई में उतर कर समाधान ढूँढ़ता और कहता है कि जब तक अन्तःचेतना के उस उद्गम उत्सव का स्पर्श नहीं कर लिया जाय, जिसे साधना क्षेत्र में आस्था श्रद्धा भावना आकांक्षा के नाम से पुकारा जाता है तब तक बनने वाली नहीं इन दिनों इसके अनेक उदाहरण भी देखें जाते है कई बार रोगी को अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बावजूद भी परिणाम निराशा जनक सामने आता है और उसकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है पर जब मरीज की आस्था चिकित्सक के प्रति इस स्तर तक सुदृढ़ बना दी जाती है कि उसे गहन विश्वास हो चलता है कि उक्त डॉक्टर का उपचार उसे अवश्य ठीक कर देगा तो दावा के स्थान पर प्लेसिबो (चीनी की गोली) का प्रयोग भी उसे ठीक करने लगता है और बीमार शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करता दिखाई पड़ने लगता है यह दवा नहीं श्रद्धा की परिणति है जिसका चमत्कारी परिणाम, जादुई असर प्रस्तुत करता है।
विज्ञान आज इसी की उपेक्षा कर रहा है और उथले स्तर के प्रयोग परीक्षणों में इसका समाधान खोजने की कोशिश कर रहा है। यह ठीक है कि अधिकाँश शारीरिक पेचीदगियाँ ‘हारमोन’ नामक रसस्रावों से सम्बन्धित होती है, पर यह भी सत्य है कि ऐसी कठिनाइयाँ बाहर से ऐसे रस अथवा इस स्तर के रसायन शरीर के भीतर पहुँचा कर स्थायी रूप से दूर नहीं की जा सकती। यह तो उपचार का मोटा और उथले स्तर का तरीका है। जब भीतर का उपार्जन ही बन्द हो जा, तो बाहर से पहुँचाई मदद कब तक काम देगी? बात तब बनती है, जब उत्पादन के केन्द्र स्वतः ही अपने स्रावों को घटा या बढ़ाकर शरीर आवश्यकता की पूर्ति करते रह सकें। उपचार का उद्देश्य तो तभी पूरा हो सकता है, पर स्थूल उपादानों से बने विज्ञान को यह स्थिति हाथ आ नहीं रही है। आये भी कैसे? कमरे के अन्दर प्रवेश करने वाले द्वारा की जगह दीवार को टटोला-टमड़ा जाय, तो भीतर घुसना कैसे संभव हो सकता है? विज्ञान के साथ यही विडम्बना जुड़ी हुई है कि उसकी गहराई तक पैठ नहीं हो पा रही है। अगले दिनों अध्यात्म विज्ञान यही सम्पन्न करने जा रहा है। तब न इतनी गंभीर बीमारियाँ समाज में रहेंगी, न पनपेगी।
ओछी भावनाएँ अन्तरात्मा में जमी न हों और क्षुद्रता प्रदान करने वालों पर महानता के संस्कार जम जाएँ, तो शरीर को ही नहीं, मस्तिष्क को भी बड़ा बनाने वाले हारमोन उत्पन्न होंगे। आने वाले समय में यही होगा, यह होकर रहेगा। इन दिनों स्थूल को अधिक महत्व देने के कारण ही शारीरिक -मानसिक विकृतियाँ इतने बड़े पैमाने पर पनपी है। आहार-विहार का प्रभाव इसी पर पड़ता है और औषधियों एवं उपकरणों से उपचार इसी का किया जाता है। इससे तनिक गहराई में उतरने पर सूक्ष्म शरीर की सूक्ष्म चेतना काम करती दिखाई पड़ती है। बोलचाल की भाषा में इसे मन अथवा मस्तिष्क कहते हैं। चिन्तन, वातावरण तर्क, वितर्क, नशा एवं रसायन जैसे तत्वों से इसे प्रभावित-उत्तेजित किया जा सकता है। मनोविज्ञान के माध्यम से इसे ही परिष्कृत संतुलित किया जाता है।
तीसरा भाग इन दोनों से ऊपर है, जिसे कारण शरीर, हृदय, अन्तःकरण आत्मचेतना आदि नामों से पुकारते हैं? इसका सम्बन्ध मनुष्य की आस्था, श्रद्धा, आकांक्षा एवं भावना से है। आस्थाओं के आधार पर जीव की अन्तरंग सत्ता का प्रकटीकरण होता है। हारमोन इसी स्तर की स्थिति में प्रभावित होते हैं, इसीलिए यदि उन्हें चाहें तो संचित प्रारब्ध अथवा संगृहीत संस्कार की एक परिणति भी कह सकते है। यह संचय इस जन्म का भी हो सकता है पिछले जन्मों का भी। परिवर्तन एवं उपचार इस स्तर की स्थिति का भी हो सकता है, पर वे प्रयत्न होने उसी प्रकार के चाहिए, जो आन्तरिक सत्त की गहराई तक प्रवेश कर सकें और अपना प्रभाव उस पृष्ठभूमि तक उतार सके।
किन्तु इन दिनों पाश्चात्य मनोविज्ञान सूक्ष्म शरीर की सूक्ष्म भूमिका तक ही अपनी पहुँच बना सका है, इसलिए विज्ञान से तनिक ही ऊपर उठ मनोवैज्ञानिक सुधार संशोधन के प्रयास करते पाये जाते हैं, जो गहराई में जमी विकृतियों को उखाड़ फेंकने के लिए पर्याप्त नहीं है। विचार संशोधन और परिमार्जन से आगे बीमारी जन्मने और बढ़ने की संभावना को टाला जा सकता है, पर जहाँ प्रश्न कारण सत्ता में समायी विकृति को हटाने-मिटाने का उपस्थित होता है, इस स्तर का प्रयास अपर्याप्त साबित होगा और पुरुषार्थ इतना कठोर करना पड़ेगा कि हम उस भूमिका में पहुँच अन्तस् की उस सत्ता को प्रभावित कर सकें, जिसे समस्त स्थूल शरीर का निमित्त कारण माना जाता है। चूँकि उपचार इसी भूमिका में संभव है, अतः प्रधानता भी इसे ही मिलनी चाहिए।
यह उपचार क्या हों, कैसे हों, यह उतना विस्तार यहाँ नहीं बताया जा सकता किन्तु एक तथ्य स्पष्ट किया जा सकता है कि हमारे ऋषिगणों ने हमारी जीवन जीने की दैनन्दिन प्रक्रिया के इस तरह साधना उपचारों से बाँधा है कि उन्हें जीवन में उतारने वाला कभी कारण शरीर की दृष्टि से व्याधिग्रस्त हो ही नहीं सकता। सिम्पैथेटिक पैश्रासिम्पेथेटिक सिस्टम इड़ा व पिंगला नाड़ी के रूप में हमारे स्नायु संस्थान का हृदय मानी जाने वाली स्पाइनल कार्ड रूपी कुण्डलिनी शक्ति के चारों ओर विद्यमान रह स्थान-स्थान पर पारस्परिक संबंधों के गुच्छक बनाकर रसस्राव करते रहते है। इस पूरे संस्थान को आसन मुद्रा, बंध, प्राणायाम, हठयोग के विभिन्न उपचार ध्यान साधनाएँ आदि गहराई तक प्रभावित करते है। सूक्ष्म से भी गहरे जाकर नाड़ी गुच्छकों को उत्तेजित कर रसस्रावों द्वारा व्यक्ति का भावकल्प कर देने वाले यह प्रयोग स्वयं में अनूठे व रहस्यमय हैं। यदि इनकी गहराई तक जानकारी न भी हो किन्तु प्रारम्भिक प्रयास उचित मार्गदर्शन के साथ किया जा सके तो प्राणाग्नि को उद्दीप्त प्रज्वलित कर अपना व औरों का हित किया जा सकता है। यह विद्याशास्त्र सम्मत भी है व विज्ञान सम्मत भी। जीने का आनन्द लेना ही तो सभी को इस दिशा में एक कदम उठाना ही चाहिए।
तुमने शंख बजाया-स्वर लाखों की नींद उड़ा गये। महाकाल के सहचर तुम-हम तब सहचर बन आ गये॥
बढ़ा धरा पर दुराचरण था, मनुज दुखी था पीर से। महाकाल ने तुमको भेजा-कसो इसे जंजीर से॥
तुम युग व्यापी संकट पर प्रलयानल बन कर छा गये॥ सुप्त समस्त भूमि मण्डल था, रहा बेखबर इस गति से।
बहते थे बस-सब प्रवाह में काम न लेते थे मति से॥ तुमने जी अँगड़ाई हम शैया तज तब संग आ गये॥
करी तपस्या-हिमगिरि की ठंडक में भी जाकर तपे। भोजन की सीमितता रखकर प्राण परिजनों के कँपे॥
तुम थे अंश अनादि ब्रह्म के जगहित जहर पचा गये॥ चली लेखनी, जन जन के, मस्तिष्क विकार सुधारने।
सत शिव के अंकुर बोकर प्रज्ञा का प्राण निखारने॥ पढ़ने वालों के विचार पलटे सत्पथ पर आ गये॥
हमने किया सिर्फ इतना-घर-घर में वह वितरित किया। काम तुम्हारा था पर अपने लिये पुण्य अर्जित किया॥
इतने में ही “पुत्र तुम्हारे” हम सारे कहला गये॥ युग परिवर्तन की मशाल तुमने दी वह है साथ में।
जब तक यह चल रही साँस वह रहेगी हाथ में॥ निकलें प्राण लिये इसकी समझो कि लक्ष्य हम पा गये॥
- माया वर्मा
युग पुरुष, युगऋषि तपस्वी पर यहाँ, कुछ नहीं था परिग्रह के नाम पर।
जिंदगी भर तप किया, पीड़ा सही, कुछ न उनके सहन की सीमा रही,
जिंदगी भर बीज-से गलते रहे, लोकहित में वह अथक चलते रहे,
तप-तितिक्षा वह स्वयं साकार थे, था न कोई दुख दुसह के नाम पर।
वह चमकते दिव्य कुंदन-से रहे, वह बरसते सावनी घन-से रहे,
पात्रता जितनी अधिक जिसने करी-गुरु-कृपा उतनी अधिक उसमें भरी,
कुछ नहीं रक्खा स्वयं के वास्ते, दे दिया सब अनुग्रह के नाम पर।
वह रहे सबके दुखों को काटते, और संचित पुण्य सब को बाँटते,
पीर से पिघले, रहा पर शाँत मन, पथ दिखाया, देखकर दिग्भ्रांत मन,
हर समय थे उल्लसित, कुछ भी न था, द्वेष-ईर्ष्या या कलह के नाम पर।
- शचीन्द्र भटनागर
पूर्णिमा पर पूर्ण-गुरु की वंदना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥1॥
पूर्ण के प्रतिनिधि ‘गुरु’ हैं, बताती गुरुपूर्णिमा। सृजन पोषण और रक्षण में, निरत तप-साधना
‘गुरु’ ब्रह्मा, विष्णु, शिव हैं अर्चना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥2॥
शिष्य-अनगढ़ को बनाती सुगढ़, उनकी साधना। स्नेह का अमृत पिलाती, भव्य उनकी भावना॥
अमंगल के शत्रु-शिव की साधना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥3॥
काटते अज्ञान-तम को, ज्ञान-गुरुता से सदा-ज्ञान-किरणें प्रस्फुटित हैं, देव-सविता से सदा॥
ज्योति के चिरपुँज की आराधना की लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥4॥
ग्रसित हो अज्ञान-तम से, भटकती है मनुजता। दाँव ऐसे में लगाती है मनुज पर, दनुजता॥
मनुजता की मुक्ति की संवेदना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥5॥
प्रज्वलित कर प्राण-दीपक ज्योति को चिरपुँज से। शाँति का संदेश लेकर, शाँति के गुरु-कुँज से॥
अमावस्या को पतन की, पूर्णिमा कर लीजिये॥ ‘पूर्णिमा’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥6॥
ज्ञानमय की ले मशालें, सँवारें उज्ज्वल-भविष्य-लोक मंगल-यज्ञ में गुरुदक्षिणा में दे हविष्य।
गुरुकृपा से ‘स्वर्ग’ की अवतरण कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥7॥
- मंगल विजय ‘विजय वर्गीय’
तुमको कोटि प्रणाम, गुरुवर! तुमको कोटि प्रणाम॥
इस जग ने तुम ही से पायी है मति-गति अभिराम गुरुवर! तुमको कोटि प्रणाम॥
छँटे कालिमाओं के बादल, मिटा क्लेश का, कलुषों का दल, मन के उपवन में लहराये, विह्वल भाव के दूर्वादल, तुमसे ही अनुकम्पित होकर धन्य हुआ यह धाम, गुरुवर! तुमको कोटि प्रणाम॥
सब अपनी-अपनी बोली में-विहंग-वृन्द अपनी टोली में, पालक परमेश्वर के सम्मुख, बालक अपनी हमजोली में, करते हैं गुण-गान तुम्हारा, निशिदिन आठों काम, गुरुवर! तुमको कोटि प्रणाम॥
तोड़ जगत के सारे बन्धन, तप से पूत किया है तन-मन-मानवता की सेवाओं में, किया समर्पित सारा जीवन, प्राप्त परम पद करके भी है, तुम्हें कहाँ विश्राम, गुरुवर! तुमको कोटि प्रणाम॥
पर हित जीने की शिक्षा दी, वासन्ती आभा बिखरा दी, मोद बाँटने को कल्याणी, गायत्री घर-घर पहुँचा दी,
विश्व बन्धुता के चिन्तन की, धारा दी अविराम, गुरुवर! तुमको कोटि प्रणाम॥
निष्ठुरता को दूर भगाये, संवेदनशीलता जगायें, ऐसी हो प्रेरणा पूज्यवर, सब दुखियों को गले लगायें, बने भगीरथ शिष्य आपके, हों संकल्प सकाम, गुरुवर! तुमको कोटि प्रणाम॥
- देवेन्द्र कुमार देव
संत कबीर कहते है कि गुरु गोविन्द दोनों खड़े है। मैं पहले किसके चरण स्पर्श करूं? अंततः गुरु की बलिहारी लेते है कि है गुरुवर! यदि आप न होते तो मुझे गोविन्द की परमतत्त्व की ईश्वरत्व की प्राप्ति न हुई होती गुरु का महत्व इतना अधिक बताया गया है हमारे साँस्कृतिक वाङ्मय में बिना उसका स्मरण किये हमारा कोई कार्य सफल नहीं होता। गुरुतत्त्व को जानने मानने उस पर अपनी श्रद्धा और अधिक गहरी जमाते हुए अपना अंतरंग न्यौछावर करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा व्यास पूर्णिमा।
गुरु वस्तुतः शिष्य को गढ़ता है एक कुम्भकार की तरह। इस कार्य में उसे कहीं चोट भी लगानी पड़ती है कुसंस्कारों का निष्कासन भी करना पड़ता है तथा कहीं अपने हाथों की थपथपाहट से उसे प्यारा का पोषण देकर उसमें सुसंस्कारों का प्रवेश भी वह कराता है। यह वस्तुतः एक नये व्यक्तित्व को गढ़ने की प्रक्रिया का नाम है। संत कबीर ने इसलिए गुरु को कुम्हार कहते हुये शिष्य को कुम्भ बताया है। मटका बनाने के लिये कुम्भकार को अंदर हाथ लगाकर बाहर से चोट लगानी पड़ती है कि कहीं कोई कमी तो रह नहीं गयी। छोटी-सी कमी मटके में कमजोरी उसके टूटने का कारण बन सकती है।
गुरु ही एक ऐसी प्राणी है जिससे शिष्य के आत्मिक सम्बन्धी की सम्भावनायें बनती है प्रगाढ़ होती चली जाती है। शेष पारिवारिक सामाजिक प्राणियों से शारीरिक मानसिक-भावनात्मक सम्बन्ध तो होते है आध्यात्मिक स्तर का उच्चस्तरीय प्रेम तो मात्र गुरु से ही होता है। गुरु अर्थात् मानवीय चेतना का मर्मज्ञ मनुष्य में उलट फेर कर सकने में उसका प्रारब्ध तक बदल सकने में समर्थ एक सर्वज्ञ। सभी साधक गुरु नहीं बन सकते। कुछ ही बन पाते व जिन्हें वे मिल जाते है, वे निहाल हो जाते है।
रामकृष्ण कहते थे सामान्य गुरु कान फूँकते है जब कि अवतारों पुरुष श्रेष्ठ महापुरुष सतगुरु-प्राण फूँकते है। उनका स्पर्श, दृष्टि व कृपा ही पर्याप्त हैं। ऐसे गुरु जब आते है तब अनेकों विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द, गुरु विरजानन्द, संत एकनाथ, गुरु जनार्दन नाथ, पंत निवृत्ति नाथ, गुरु गहिनी नाथ, योगी अनिर्वाण, गुरु स्वामी निगमानन्द, आद्य शंकराचार्य, गुरु गोविन्दपाद कीनाराम, गुरु कालूराम तैलंग स्वामी, गुरु भगीरथ स्वामी, महाप्रभु चैतन्य, गुरु ईश्वरपुरी जैसी महानात्माएं विनिर्मित हो जाती है। अंदर से गुरु का हृदय प्रेम से लबालब होता है बाहर से उसका व्यवहार कैसा भी हों। बाहर से उसका व्यवहार कैसा भी हो। उसके हाथ में तो हथौड़ा है जो अहंकार को चकनाचूर कर डालता है ताकि एक नया व्यक्ति विनिर्मित हो।
गुरु का अर्थ है सोयों में जगा हुआ व्यक्ति, अंधों में आँख वाला व्यक्ति अंधों में आँख वाला व्यक्ति। गुरु का अर्थ है वहाँ अब सब कुछ मिट गया है मात्र परमात्मा ही परमात्मा है वहाँ बस! ऐसे क्षणों में जब हमें परमात्मा बहुत दूर मालूम पड़ता है, सद्गुरु ही उपयोगी हो सकता है क्योंकि वह हमारे जैसा है
मनुष्य जैसा है हाड़ माँस मज्जा का है फिर भी हमसे कुछ ज्यादा ही है। जो हमने नहीं जाना उसने जाना है। हम कल क्या होने वाले है, उसकी उसे खबर है। वह हमारा भविष्य है, हमारी समस्त सम्भावनाओं का द्वार है। गुरु एक झरोखा है, जिससे दूरस्थ परमात्मा रूपी आकाश को हम देख सकते है।
वे अत्यन्त सौभाग्यशाली कहे जाते है जिन्हें सद्गुरु के दर्शन हुए। जो दर्शन नहीं कर पाए पर उनके शक्ति प्रवाह से जुड़ गये व अपने व्यक्तित्व में अध्यात्म चेतना के अवतरित होने की पृष्ठभूमि बनाते रहे, वे भी सौभाग्यशाली तो है ही जो गुरु की विचार चेतना से जुड़े गया वह उनके अनुदानों का अधिकारी बन गया। शर्त केवल एक ही है पात्रता का सतत् अभिवर्धन तथा गहनतम श्रद्धा का गुरु के आदर्शों पर आरोपण। जो इतना कुछ अंशों में भी कर लेता है वह उनका उतने ही अंशों में उत्तराधिकारी बनता चला जाता है। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी दोनों ही आज हमारे बीच स्थूल शरीर से नहीं है किन्तु ऋषियुग्म रूपी गुरुसत्ता की सूक्ष्म व कारण शक्ति का प्रवाह यथावत् और भी प्रखर रूप में हम सबके बीच विद्यमान है। आवश्यकता है सही रूप में उनसे जुड़ने की। यों दीक्षित तो ढेरों उनसे जुड़ने की। ये दीक्षित तो ढेरों उनसे हो सकते हैं किन्तु दीक्षा का मूल अर्थ अपनी इच्छा उन्हें दी अपना अहं समर्पित कर स्वयं को खाली किया ऐसा जीवन में उतारने वाले कुछ सौ या हजार ही हो सकते हैं। ये ही सच्चे अर्थों में उनके शिष्य कहे जा सकते हैं। अनुदान के पात्र भी ये ही हो सकते हैं।
जिसने परमपूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्ष के तथा परमवंदनीय माताजी के सत्तर वर्ष के जीवन के थोड़े से भी हिस्से को देखा है तो उन्हें वहाँ अगाध स्नेह की गंगोत्री बहती मिली है। इतना प्यार इस सीमा तक स्नेह जितना कि सगी माँ भी पुत्र को नहीं दे सकती, गुरुवर ने व मातृ सत्ता ने अपनी पापी से पापी संतान से भी किया। जिसने उनकी इस प्रेम धार में बहकर उनके ज्ञानरूपी नौका में बैठने भर की हिम्मत कर ली, वह तर गया। जो डर गया। जो नहीं देख पाये उस दिव्य गुरुसत्ता को वह उनकी वसीयत और विरासत और धरोहर से उस प्राण ऊर्जा को पाते है। पूज्यवर ने जो कुछ भी लिखकर रख दिया एवं प्रवचनों में कह गये वह एक प्रकार से शक्तिपात का एक माध्यम बन गया। ऋतम्भरा प्रज्ञा का दूरदर्शी विवेकशीलता का जागरण जो परिजनों के मन में उनके सत्साहित्य के पठन मनन उनकी चर्चा से लीला प्रसंगों के श्रवण से हुआ वह शक्तिपात नहीं तो और क्या हैं।
लाखों नहीं, करोड़ों व्यक्तियों के जीवन की दिशाधारा को आमूलचूल बदल देने का कार्य कभी -कभी इस धरती पर सम्भवामि युगे-युगे कहकर आने वाली सत्ता ही करती है। वह कार्य इस युग में भी ऋषि युग्म की कारण सत्ता द्वारा सम्पन्न हो रहा है यह देखा व अनुभव किया जा सकता है। असंभव को भी संभव कर दिखाना महाकाल के स्तर की सत्ता की ही बात है। समय को पहचानना व सद्गुरु की पहचान कर उनसे अनन्य भाव से जुड़ जाना ही इस समय की सबसे बड़ी समझदारी है यह तथ्य भली-भाँति हृदयंगम कर लिया जाना चाहिये।
गायत्री परिवार-युगनिर्माण अनेकों को जलाता रहा है तो उसका भी एक ही कारण है वह है उसकी निष्ठा प्रामाणिकता तथा अविरल बहती स्नेह की धार। गुरुपर्व इसी गुरुता को स्मरण रखने का पर्व है। यदि गुरुसत्ता के जीवन में आ जाय तो हमारा जीवन धन्य बन जाय। शिष्यत्व सार्थक हो जाय।
श्रद्धा की परिपक्वता समर्पण की पूर्णता शिष्य में अनन्त सम्भावनाओं के द्वार खोल देती है। शास्त्र पुस्तकें तो जानकारी भर देते है किन्तु पूज्यवर जैसी गुरुसत्ता स्वयं में जीवन्त शास्त्र होते है। उनकी एक झलक भर देख कर अपने जीवन में उतारने जीवन में उतारने का प्रयास ही शिष्य का सही अर्थों में गुरुवरण है। गुरुवरण का गुरु से एकत्व की अनुभूति का अर्थ है परमात्मा से एकात्मता। गुरु देह नहीं है सत्ता है शक्ति का पुँज है। देह जाने पर भी क्रियाशीलता यथावत् बरकरार रहती है, वस्तुतः वह बहुगुणित हो सक्रियता के परिणाम में और अधिक व्यापक हो जाती है।
हमें विश्वास रखना चाहिये कि गुरुसत्ता देह से हमारे बीच न हो हमारा वह सूक्ष्म कारण रूप में सतत् मार्गदर्शन करेगी। हम गुरुतत्त्व को नित्य जीवन में धारण करते रहने का अपना कर्तव्य पूरा करते रहें तो शेष कार्य वह स्वतः कर लेगी। 1995 से 2005 तक का समय एक विशिष्ट परिवर्तनकारी समय है। इन दिनों ऋषि चेतना सक्रिय हो जन-जन की चेतना में सूक्ष्म स्तर पर परिवर्तन कर रही है। यदि हमें गुरु गीता के इन वाक्यों पर विश्वास हो जो मंत्रमुग्ध मोक्षमूलं गुरुकृपा के .......में तथा अखण्ड मण्डलाकार व्याप्त ....... के रूप में अभिव्यक्त किये गये है तो बिना किसी संशय के हम आत्मिक प्रगति के पथ पर सतत् आगे ही बढ़ते जायेंगे। प्रस्तुत गुरुमंत्र 12 जुलाई 1995। इसी परिप्रेक्ष्य में आत्म चिंतन का अपनी श्रद्धा के अभिवर्धन का पर्व है।
एक सन्त एकान्त में धूनी रमाये बैठे थे। परीक्षा हेतु एक व्यक्ति ने उनसे पूछा बाबाजी धूनी में कुछ आग है बाबा ने कहा इसमें आग नहीं। व्यक्ति ने कहा कुरेद कर देखिये शायद कुछ अग्नि हो? बाबाजी ने अपनी भौंहें तरेरते हुये कहा मैंने तुमसे कह दिया इसमें अग्नि नहीं। उसमें उसे फिर झकझोर बाबाजी कुछ चिनगारियाँ तो है? बाबाजी ने अपना ...........टेकते हुये कहा कि इसमें न अग्नि है न चिनगारी। व्यक्ति कहने लगा बाबाजी मुझे तो कुछ चिनगारियाँ दिखाई दे रही है साधु ने जवाब दिया - तो क्या मैं अन्धा हूँ उसने फिर कहाँ कुछ तो लपट उठती दिखाई देनी है। बाबाजी को क्रोधाग्नि और अधिक बढ़ने लगी तो उस मनुष्य की ओर अपना सड़सा लेकर मारने दौड़ा। व्यक्ति ने बड़ी तेजी के साथ दौड़ते हुये कहा- बाबाजी अब तो अग्नि पूरी तरह भड़क उठीं। अग्नि का अभिप्राय बाबाजी के क्रोध से था संत को बाँध हुआ कि मात्र वेश बदलने से नहीं, स्वभाव से नहीं स्वभाव बदलने से ही पुण्य - प्रयोजन सधता है। अपना व्यवहार बदलने हेतु उन्होंने प्रायश्चित का संकल्प लिया एवं फिर अपने बदले रूप में जन- सेवा में प्रकृत हो गये।
गायत्री मंत्र हमारे हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो प्रचोदयात्।
देवियो-भाइयो, मुनासिब जगह पर मुनासिब चीज पैदा होती है। नागपुर के संतरे अगर आप अपने यहाँ बोना चाहें तो मीठे नहीं होंगे। बम्बई का केला जो कि वहाँ की जमीन में पैदा होता है, दूसरों जगह नहीं हो सकता। लखनऊ का आम सारी दुनिया में मशहूर है। अगर वही आम आप अपने गाँव में बोये तो उतना मीठा नहीं होगा जैसा कि वहाँ का होता है। नीलगिरी का चन्दन कितना खुशबूदार होता है। यदि उसी चन्दन का पेड़ आप ले आवें और अपने गाँव के बगीचे में लगा दें तो इतना खुशबूदार नहीं होगा। देवगण जहाँ हिमालय पर रहते हैं वहाँ एक लम्बी वाली शकरकन्द जैसा कन्द पैदा होता है और वह कई दिन तक खाने के काम आ जाता है। उसी शकरकन्द का बीज .......... दे दें तो आप वे लेंगे? नहीं होंगी। जिसके लिये द्रौपदी से आग्रह किया था कि ब्रह्मकमल ला करके दो। यह कहाँ पैदा होता है? यह उत्तराखण्ड में उसके आगे तपोवन के नजदीक पैदा होता है। वह ब्रह्मकमल का फूल जमीन पर खिलता है, पानी में नहीं। यह अपनी जगह पर होता है। आप कहीं से बीज ले आयें ब्रह्मकमल के, अपने घर में बोना चाहें, तो हो सकता है? ..........वहाँ नहीं हो सकता। जगह की आपसी सहन होती है। हिमालय की अपनी महत्ता है। सार ऋषियों ने वही निवास किया था। स्वर्ग भी पहले वहीं था। ऋषियों की भूमि भी वहीं है। बड़ी सामर्थ्यवान, बड़ी संस्कारवान भूमि है। हमको भी तप करने के लिये वहाँ भेज दिया गया था और अब हम यहाँ सप्तर्षियों की भूमि शान्तिकुञ्ज में है देवात्मा हिमालय का अपना महत्व है। गंगा अपने में आध्यात्मिक शक्तियों को समेटे हुए है। यह न केवल उसके पीने के पानी में है, बल्कि वह जहाँ होकर बहती है, वहाँ का वातावरण भी कुछ विशेष होता है। सप्तऋषियों की भूमि, जहाँ सातों ऋषियों ने तपश्चर्या की थी और जो अभी भी ऊपर आसमान में दिखाई पड़ते है। उनकी जो भूमि है सप्तऋषि भूमि वह भी यहीं है। जहाँ आपका यह शान्तिकुञ्ज बना हुआ है और भी गंगा के किनारे बहुत से ऐसे स्थान है जहाँ सिंह ओर गाय कभी एक घाट पर पानी पीने लगते थे। ऐसे प्राणवान स्थान भी होते हैं और सिद्ध पुरुष भी होते है। हम यहाँ ऐसे स्थान पर ही आये है। यहाँ आकर हमने आपकी भावनाओं को दिव्यता का स्मरण कराने के लिये देवात्मा हिमालय का एक मन्दिर बना दिया है। हिमालय का मन्दिर और कहीं नहीं मिलेगा आपको लोगों ने देवताओं के मन्दिर बनाये है, अमुक के मन्दिर बनाये है, द्रमुक के मन्दिर बनाये है, पर हिमालय का मन्दिर सिर्फ आपको यहीं देखने को मिलेगा। हमने वह भी बनाया है। यह सप्तऋषियों की भूमि है। सप्तऋषियों की भूमि और कहाँ है, बताइये आप? कहीं नहीं है, मात्र यहीं पर, जहाँ आज शान्तिकुञ्ज वाली जमीन में जो पानी हजारों वर्षों से बहता था वह बन्द नहीं हुआ है। वह धारा अभी भी बह रही है, उसके लिये सामने रास्ते बना दिये गये है।
हिमालय-मन्दिर क्या है? ये प्रतीक क्यों बना दिये है? प्रतीकों का अपना अलग महत्व है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य का प्रतीक बना लिया था। रामचन्द्र जी ने शंकर जी का प्रतीक बनाया था। जब वे वनवास गये थे और सीता हरण के कारण दुखी मन से वन-वन भटक रहे थे, उस समय उन्हें जब प्रतीक की आवश्यकता हुई तो उन्होंने शंकर जी के मन्दिर की स्थापना की थी, रामेश्वर में। ये सब प्रतीक हैं जैसे तिरंगा झंडा अपना राष्ट्रीय प्रतीक है। कम्युनिस्टों का भी झंडा होता है। लोग कहते है कि वे प्रतीकों को नहीं मानते। कैसे नहीं मानते? लाओ हम उनके झंडे को उखाड़ फेंके फिर देखो क्या होगा? मुसलमान भी प्रतीकों को नहीं मानती है क्या? मक्का मदीना में प्रतीक ही तो रखा हुआ है जिसका वे चुम्बन लेते है। समस्त देवात्मा हिमालय का मन्दिर कहीं था नहीं। भारतवर्ष का यह एक बड़ा अभाव था। वह हमने दूर किया है, ताकि साधना की दृष्टि से कोई आदमी आना चाहे तो इस स्थान पर आकर वह महत्वपूर्ण लाभ उठा सके। इसलिये यह बनाया गया है। मुनासिब जगह पर मुनासिब काम होते है। हिमालय में बहुत सारे ऋषि रहते है और जो भी आये है। उन्हीं ऋषियों का स्मरण दिलाने के लिये हमने यह कोशिश की है कि जो उन्होंने काम किये थे, उनकी समेट करके पूरा न सही-थोड़ा-थोड़ा काम करें तो अच्छा होगा। हमने वही किया है।
व्यास जी ने अठारह पुराण लिखे थे। दर्शन भी लिखे थे। पुराणों और दर्शनों को हम लिख तो नहीं सके, पर हमने उनका अनुवाद किया है। वेदों का अनुवाद किया है। व्यासजी ने जो काम किये थे, उस रास्ते पर हम भी चले हैं और यहाँ जब शान्तिकुञ्ज में आयेंगे तो देखेंगे कि उसकी निशानी यहाँ भी विद्यमान है। महर्षि पतंजलि ने गुप्त काशी में रहकर योगाभ्यास किया था। आप जब आयेंगे तो देखेंगे यहाँ जो कल्प साधना शिविर कराये जाते है, अन्य दूसरे शिविर कराये जाते है, और यहाँ योगाभ्यासों का, प्राणायामों का विधि-सिखाया जाता है, वह हमने भी किया है और आपको सिखाते है। पुराने जमाने के ऋषियों में याज्ञवल्क्य का महत्वपूर्ण स्थान है? उन्होंने यज्ञ के सम्बन्ध में की थी। यज्ञ से किस तरीके से मनुष्य के शारीरिक और मानसिक रोगों का निराकरण होना सम्भव है और यज्ञ से किस प्रकार पृथ्वी के वातावरण को ठीक किया जाना सम्भव है? ऐसी बहुत-सी बातों महत्ता थी तब, लेकिन लोग उस महत्वपूर्ण यज्ञ को भूल-भाल गये थे। ऐसे ही हवन कर लेते थे सुगन्ध फैलाने के लिये हमने उसको फिर से जीवित किया है शोध करके जैसे कि याज्ञवल्क्य ऋषि ने किया था। लगभग उसी तरीके से यहाँ शान्तिकुञ्ज में भी हमने कोशिश की है कि वह परम्परा चलती रहे।
विश्वामित्र ऋषि थे वे गायत्री के मंत्र द्रष्टा है। गायत्री मंत्र जो हम बोलते है, उसका विनियोग है, सविता देवता है और विश्वामित्र का भी यहाँ स्थान बना हुआ है। गायत्री का मन्दिर भी बना हुआ है शान्तिकुञ्ज में हमने भी गायत्री के पुरश्चरण ये है। विश्वामित्र को भी हम गुरु मानते है। जो हमारे हिमालय वाले गुरु है, ये अगर विश्वामित्र को भी गुरु मानते हैं जो हमारे हिमालय वाले गुरु हैं। वे अगर विश्वमित्र हो तो आप अचंभा मत मानना। भगीरथ का नाम आपने सुना होगा। उनने हिमालय पर तप किया था और तप करके ज्ञानगंगा को लाये थे गंगा जब धरती पर आने लगी तो उनके प्रचण्ड वेग को देखकर भगीरथ ने सोचा कि यह तो हमारे बूते का नहीं है। गंगा जी ने भी कहा कि जब में नीचे जमीन पर गिरेगी तो सुराख हो जायेगा। सो तुम मुझे स्वर्ग से बुलाकर कैसे धारण करोगे। तब भगीरथ ने शंकर जी मदद माँगी शंकर जी ने अपनी जटायें फैलाये इस तरह स्वर्ग से जब गंगा आयी थी तो पहले शंकरजी की जटाओं आयी, पीछे जमीन पर गिरी। भगीरथ आगे-आगे चले, जमीन पर गिरी। भगीरथ आगे-आगे चले, इसलिये गंगा भागीरथी कहलायी यह आपको मालूम है न? भगीरथ तो अब नहीं, मगर उनके तप का स्थान अभी भी हैं, मगर उनके तप का स्थान अभी भी हैं। गंगोत्री के पास गौरीकुण्ड है उसके पास एक शिला है जिसका नाम भगीरथ शिला है, जहाँ भगीरथ ने बैठकर तप किया था। उस स्थान पर बैठकर हमने भी ठीक उसी तरीके से एक साल का अनुष्ठान किया था हम ज्ञान गंगा को लाये हैं। यह ऋषियों की परम्परा है हमने कोशिश की है कि ऋषिगण जिस रास्ते पर चले। हम भी उस रास्ते पर चले हैं, हम भी उस रास्ते पर चले। ऋषियों की वजह से हिमालय धन्य हुआ, नहीं तो हिमालय में क्या बात है? इससे ऊँचे ऊँचे ऊँचे और भी पहाड़ है। सारी दुनिया में पहाड़ों की कोई कमी है क्या? उत्तराखण्ड इसी वजह से प्रख्यात हुआ है कि इसमें चारों धाम भी बने हैं। पाँच प्रयाग भी उसमें है। पाँच गुप्त कोशियाँ भी हैं। पाँच सरोवर भी है। समूचे भारतवर्ष के जो कुछ भी महत्वपूर्ण स्थान है, जो कुछ भी तीर्थ है, सब इकट्ठे होकर इसी एक जगह पर एकत्रित हो गये हैं। हमारा भी प्रयत्न इसी तरीके से रहा है।
परशुराम जी का नाम आपने सुना होगा। उन्हें शंकर भगवान ने एक कुल्हाड़ा दिया था। उसे कुल्हाड़े से उनने लोगों के सिर काट डाले थे। जो खराब दिमाग वाले थे, बददिमाग वाले थे, उन बददिमाग वालों के सिर काटकर परशुराम जी ने फेंक दिये थे और वह भी इक्कीस बार। सिर काटने से मतलब? सिर काटना तो मेरे ख्याल से ऋषि के लिये क्या समीप रहा होगा? यह कथन तो अलंकारिक मालूम पड़ता है। दिमाग बदल जरूर दिये होंगे दिमाग बदलने के लिये विचार क्राँति की दृष्टि से हम लगभग वही काम कर रहे हैं जो कि परशुराम जो ने फरसा लेकर किया था। फरसा तो हमारे हाथ में नहीं है, मगर कलम जिन्दा है। दोनों चीजें हमारे हाथ में है। और उन्हीं के सहारे हम लोगों के दिमागों की बदलने के लिये निरन्तर प्रयत्नशील है। परशुराम जी यमुना जी की भी लाये थे और फरसा भी लाये थे। परशुराम जैसा लगभग वही काम हमने किया है।
प्रायः सभी ऋषि उत्तराखण्ड में ही हुए हैं। ऋषियों ने इसी पुनीत भूमि में रहकर तपस्या की, ताकि अध्यात्म शक्तियों को ठीक ढंग से संभाल सकें। इससे उन्होंने इसी स्थान को चुना था। हमने भी इसे ही चुना है। हमारा और आपका मिलन हो सके,। इसलिये हिमालय की जहाँ से शुरुआत होती है-हरिद्वार से उस स्थान पर हम बैठे हैं ताकि आपके लिये भी यहां आने में में मुश्किल न हो। जहाँ बर्फ पड़ती है ओर अत्यधिक ठंडक रहती है, जहाँ खाने पीने का कोई सामान नहीं है, यदि वहाँ आप जायेंगे तो मुश्किल पड़ेगी आपके लिये। इसलिये हमने हरिद्वार में रहना मुनासिब समझा। यहाँ से हिमालय शुरू होता है। गंगा में यहाँ से पहले कोई गन्दी चीज नहीं डाली जाती और न कोई नाले पड़ते हैं बाद में पड़ते हैं। इसलिये हरिद्वार को हमने मुनासिब समझा।
चरक ऋषि को आप जानते है क्या? चरक ऋषि प्राचीन काल में हुए हैं। उन्होंने दवाओं, प्राकृतिक औषधियों के सम्बन्ध में शोध की थी खोजें की थी। उनका स्थान केदारनाथ के पास था जहाँ सिक्खों का गुरुद्वारा है। केदारनाथ के पास फूलों की घाटी है जो उन्हें बहुत प्रिय थी। अब तो वहाँ तोड़-फोड़ के कारण सब जड़ी-बूटियाँ नष्ट हो गयी हैं। वहाँ तो अब फूलों की घाटी भी नहीं है लेकिन अगर कभी आपको फूलों की घाटी देखने का मन हो तो आप गोमुख से आगे ऊपर तपोवन और नन्दनवन ऐसे स्थान हैं जहाँ विचित्र दुर्लभ फूलों की छटा देखते ही बनती है। इनमें ब्रह्मकमल भी शामिल है। वह आपको वहीं मिलेगा। चरक के रास्ते पर हम भी चले हैं औषधियों के प्राचीन श्लोकों को ठीक तरीके से खोजबीन करने के लिये और उनके सही और गलत होने को बात जानकारी प्राप्त करने के लिये यहाँ ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना की है। जो कुछ भी सम्भव है पुराना और नया अर्थात् पुराने ढंग से कैसे शोध की जाती थी और नये ढंग से कैसे शोध की जाती थी और नये ढंग से कैसे की जाती है? यह हमने यहाँ बनाने की कोशिश की है।
उत्तरकाशी में आरण्यक हैं आरण्यक किसे कहते है? आरण्यक उसे कहते हैं जहाँ लोग वानप्रस्थ लेकर समाज सेवा के लिये समर्पित हो जाते हैं, उनके निवास स्थान को आरण्यक दोनों चलाने की कोशिश की है खास विद्यालय जिसके बारे में कहना चाहिए कि हिन्दुस्तान भर में शायद ही कहीं ऐसा विद्यालय आपको देखने को मिले। प्रचारक और लोकसेवी तैयार करने के लिये हमने यहाँ आरण्यक बनाया है। भगवान बुद्ध ने भी बनाये थे नालन्दा और तक्षशिला में। उनमें प्रचारक और कार्यकर्ता तैयार किये जाते थे हमारे यहाँ भी कार्यकर्ताओं को संगीत की शिक्षा, व्याख्यानों की शिक्षा, समाजसेवा की शिक्षा, चिकित्सा की शिक्षा आदि सारी शिक्षायें यहाँ दी जाती है। यहीं जमदग्नि का आश्रम है। नारदजी का नाम तो सुना है न आपने? वे संगीत के द्वारा ही सारी की सारी भक्ति का प्रचार करते थे और हिन्दुस्तान से लेकर सारे विश्वभर में घूमते थे। चाहे जब भगवान के पास जा पहुँचते थे। उनका स्थान कहाँ था? विष्णुप्रयाग में उन्होंने तप किया था। वहाँ तो हम आपको नहीं ले जा सकते, लेकिन यहाँ पर नारद जी का जो काम संगीत शिक्षा का, वह हमने किया है। क्योंकि इस जमाने में लोक शिक्षा के लिये संगीत बेहद आवश्यक हैं संगीत के बिना देहाती मुल्कों में जहाँ बिना पढ़े लिखे लोग अधिक रहते है, उनको प्रशिक्षित करना बड़ा मुश्किल हैं। हमने उसकी भी यहाँ व्यवस्था बना ली है।
वशिष्ठ जी का तो नाम आपने सुना हैं उन्होंने राजनीति और धर्म दोनों को मिलाया था। राजा दशरथ के यहाँ भी काम करते थे और राजनीति की भी देख-भाल करते थे। ओर राजनीति की देख-भाल करते थे। हमारी भी जिन्दगी कुछ इसी तरह की हो गयी है। पौने चार वर्ष तो जेलखाने में रहना पड़ा। सन् 1920 से लेकर 1942 तक बाईस साल तक हम दिन-रात राजनीति में लगे रहे समाज को ऊँचा उठाने के लिये और अंग्रेजों को भगाने के लिये। देश की आजादी के लिये हमने जो काम किया है, वशिष्ठ भगवान भी यही काम करते थे। पीछे वे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न को अपने पास ले गये थे। हम भी आपको लेकर आये हैं। हमारे बच्चे ते क्या आयेंगे पर आप आ सकते हैं। आप भी हमारे बच्चे हैं शंकराचार्य के बच्चे थोड़े ही थे। रामचन्द्र जी के पिता का नाम वशिष्ठ थोड़े थोड़े ही था? दशरथ जी था। आप भी जो हमारे बालक है? जिस तरीके से राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न-चारों भाइयों को लेकर वशिष्ठ जी आ गये थे, और उनको यह बतलाया था कि धर्म और राजनीति-दोनों का समन्वय कैसे हो सकता है, हम भी आपको यही सिखाने का प्रयत्न कर रहें कि धर्म और राजनीति का विज्ञान और अध्यात्म का सम्मिश्रण समन्वय कैसे हो सकता हैं?
आद्य शंकराचार्य का नाम सुना है न आपने। जिन्होंने चारों धाम बनाये थे। चारों धाम कौन-कौन से है? रामेश्वर,द्वारिका,बद्रीनाथ और जगन्नाथ पुरी चारों धामों में चार मठ उन्होंने स्थापित किये थे। उनका अपना निवास स्थान था ज्योतिर्मठ। ज्योतिर्मठ के पास शहतूत का एक पेड़ था। उसी के नीचे उनकी गुफा थी। वे वहीं रहते थे। वहीं उनने अपने ग्रन्थ लिखे थे और वहीं तप किया था और वही जो कुछ भी काम कर सकते थे, चारों धाम बनाने का, वे भी योजनाएँ उन्होंने वही बनायी थीं। मान्धाता को कहकर वह काम उन्होंने वहीं से कराया था। हमने भी यहीं से बैठकर गायत्री के चौबीस सौ धाम बनाये है। इसके अलावा भी चौबीस सौ छोटे-छोटे धाम है शंकर जी का एक ही धाम है- रामेश्वर में और जगन्नाथ जी का एक ही धाम है, बद्रीनाथ का एक ही धाम है, लेकिन गायत्री के हमने चौबीस सौ धाम बनाये हैं आपने पिप्पलाद ऋषि का नाम सुना है। वह भी यहीं रहते थे हिमालय पर लक्ष्मण झूला के पास पीपल के फल खाकर के ही उनने जिन्दगी काट दी थी, क्योंकि वे जानते थे-जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। यदि हम अपने मन को अच्छा बनाने की फिक्र में है तो सबसे पहले शुरुआत अच्छे अन्न से करनी अच्छे अन्न का मतलब होता है कि बेईमानी से कमाया हुआ अन्न नहीं हों बिना हराम का जो अपने खून-पसीने से कमाया हो, उसी को खा करे रहना चाहिए। पीपल के पेड़ उन दिनों ज्यादा थे उनके फल भी ज्यादा होंगे तोड़-ताड़ कर उन्हें साल भर के लिये रख लेते रहे होंगे और उसे ही खाते रहे होंगे हमारा भी आहार ऐसा ही रहा है आपको मालूम है न, जौ के ऊपर हम कितने दिन तक रहे हैं। अभी भी ठीक तरह से अन्न नहीं खाते हैं।
सूत और शौनक ऋषि की कहानियाँ प्रसिद्ध है। वे कहाँ रहते थे? हिमालय पर। कौन-सी जगह? ऋषिकेश में वह पुराणों की कथायें कहते थे। पुराने जमाने के तो अठारह समय लिखे गये थे। हमने नया प्रज्ञा पुराण ही बना दिया हैं। एक-एक खण्ड तो अभी छप गया है, जो तीन खण्ड और अभी तैयार हो गये हैं, वे भी इसी वर्ष छप कर तैयार हो जायेंगे। आपको अठारह खण्डों का प्रकाशन के रूप में मिलेगा। ये सब ऋषियों के काम है। एक-एक ऋषि ने एक-एक काम किया था लेकिन हमने सारे ऋषियों के कामों समन्वय किया है। ऋषियों के तरीके से यह सब बनाने की कोशिश की हैं। राज हर्षवर्धन थे जिन्होंने हर की पौड़ी पर बैठकर जपना सर्वस्व दान किया था तो उसी से तक्षशिला का विश्वविद्यालय बनाया गया था। हम हर्षवर्धन तो नहीं है पर जो कुछ भी हमारे पास था, वह सब का सब हमने दिया है। हर्षवर्धन की जलो परम्परा सर्वसेध की थी हर की पौड़ी के नज़दीक थी,वह हमने शान्तिकुञ्ज से ही लाकर के स्थापित कर दी। कणाद ऋषि विज्ञान और अध्यात्म को मिलाने के लिये प्रयत्नशील रहा करते थे। उन्होंने एअस के सम्बन्ध से अणु के सम्बन्ध में बहुत सारी खोजे की है। अपना ब्रह्मवर्चस भी विज्ञान और अध्यात्म को मिलाने की कोशिश कर रहा है आप यहाँ जो कुछ भी देख रहे हैं वह ऋषि परम्परा है जिसे हमने जिन्दा रखा है।
बुद्ध का नाम सुना है न आपने? धर्म चक्र प्रवर्तन के लिये उनके कितने शिष्य थे जो आकर समय-समय पर साधनायें किया करते थे और उपासनायें करते थे। वे कहाँ रहते थे बुद्ध के पास? नहीं बुद्ध के पास नहीं रहते थे। कुछ कहीं तो कुछ कही। बुद्ध की परम्परा को भी हमने कायम रखा है। यहाँ शान्तिकुञ्ज में पहले दो विश्वविद्यालय थे, पर अब एक ही है अपनी अपनी तरह का निराला। धर्म-चक्र प्रदर्शन के लिये बुद्ध जैसा क्रिया−कलाप आप शान्तिकुञ्ज से ही पायेंगे। हिमालय की गतिविधियों का एक केन्द्र यह भी है। आर्यभट्ट ने भी इसी हिमालय में तप किया था। उन्होंने ज्योतिर्विज्ञान, ग्रह नक्षत्रों के विज्ञान की खोज की कि किस तरीके से ग्रह-नक्षत्र घूमते है तो पृथ्वी पर क्या असर पड़ता हैं? पृथ्वी के निवासियों पर क्या-क्या असर पड़ता है? ये सारी की सारी खोजें आर्यभट्ट ने अपने जमाने में इसी हिमालय में की थीं। आप कभी शान्तिकुञ्ज आये तो देख लीजिये कि उनके जो सारे क्रिया−कलाप थे, जहाँ से प्रकाशित है। इसमें नौ ग्रह पुराने और तीन जो अभी-अभी नये खोजे गये है, उन बारह ग्रहों का पंचांग भी केवल यहाँ से ही प्रकाशित होता है और कहीं से नहीं होता। नागार्जुन रसायन की खोज की थी। हमारे यहाँ दवाओं का और दूसरे का और दूसरे अन्य रसायनों की खोज का क्रम हैं हम जड़ी-बूटी से कायाकल्प का नूतन अनुसंधान कर रहे है।
शृंगी ऋषि मंत्र विद्या में पारंगत थे। वे लोमय ऋषि के बेटे थे उन्होंने परीक्षित को शाप दिया था कि तुझे सातवें दिन साँप काट खायेगा, तो सातवें दिन साँप ने उन्हें काट खाया था उन्होंने ही राजा दशरथ के यहाँ यज्ञ कराया था राजा दशरथ के बच्चे नहीं होते थे तो पुतिष्टि यज्ञ कराने के लिये शृंगी ऋषि को उपयुक्त समझा गया। वे ब्रह्मचारी थे और मंत्र विद्या के पारंगत भी उन्हीं की मंत्र विद्या की वजह से राजा दशरथ के चार बच्चे पैदा हुये थे यह सब शृंगी ऋषि की मंत्र विद्या थीं वह भी हिमालय में रहते थे। वह भी हिमालय में रहते थे। मंत्र विद्या के बारे में गायत्री के बारे में हम कोशिश करते है। दोनों नवरात्रियों में अनुष्ठान कराते हैं। जो भी आदमी इस महत्वपूर्ण समय पर आते है वे सब गायत्री के बारे में हम कोशिश करते है दोनों नवरात्रियों में अनुष्ठान कराते है। जो भी आदमी इस महत्वपूर्ण समय पर आते है वे सब गायत्री का अनुष्ठान कराते हैं। जो भी आदमी इस महत्वपूर्ण समय पर आते है। वे सब गायत्री का अनुष्ठान करते है। कैलाश पर्वत कहाँ है? यहीं हिमालय पर है। यह स्वर्ग है। हिमालय केवल ऋषियों की ही भूमि नहीं है देवताओं की भी भूमि हैं इसको स्वर्ग भी कहा गया है। सबसे पहले सृष्टि का उद्भव यहीं हुआ। मनुष्य यहीं जन्मे-इतिहास के हिसाब से। हमने भी कहा है कि स्वर्ग कहीं आसमान पर न होकर अगर जमीन पर होगा तो वह देवात्मा हिमालय वाले हिस्से में रहा होगा कैलाश पर्वत नन्दनवन जो स्वर्ग में थे, वह यहीं है। तपोवन भी मानसरोवर भी यहीं हैं गोमुख से जरा आगे चलेंगे जहाँ हमारे गुरुदेव का थोड़ी दूर पर निवास है, वह कैलाश तो अलग था जो तिब्बत में हैं अब वह चीन के हाथों में चला गया। उसकी तो हम कैसे कहें कि शंकरजी को चीन छीन ले गया लेकिन यह कैलाश पर्वत उसी पर है। इसीलिये यह स्वर्ग भी है। हिमालय क्या है? स्वर्ग है। स्वर्गारोहण के लिये जब पाण्डव थे तो यहीं गये थे। स्वर्गारोहण बद्रीनाथ से आगे वसोधरा है और वसोधरा से आगे एक पहाड़ है वहीं स्वर्गारोहण है सुमेरु पर्वत भरी यहीं है सारे देवता उसी पर रहते थे यह सोने का पहाड़ था। हमारे पास उसका फोटोग्राफ भी है। जब हम वहाँ गये थे तो उसका फोटोग्राफ भी साथ में लाये थे वहाँ प्रातः काल एवं सायंकाल के समय सुनहरी छाया रहती है। ध्रुव ने यही तप किया था। श्री कृष्ण भगवान तप करने के लिये बद्रीनाथ गये थे। रुक्मिणी और कृष्ण दोनों ने यहीं तप किया था तप करने के बाद में उनके प्रद्युम्न जैसी सन्तान पैदा हुई।
वाल्मीकि की और सीता की घटना तो आपने सुनी है। रामचन्द्र जी ने जब सीता जी को वनवास दिया था तो वो वाल्मीकि के आश्रम में रहीं थी और वहाँ लव-कुश नाम के दो ऐसे बालक पैदा हुये थे जो रामचन्द्र जी से, लक्ष्मण जी से और हनुमान जी से लोहा लेने के लिये तैयार हो गये थे। आपने शकुन्तला का नाम सुना है? और चक्रवर्ती भरत जिसके नाम इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। शकुन्तला कौन थी? वह ऋषि की बेटी थी, ओं बेटी कहिए और उसके बच्चे भरत का जन्म, पालन जो हुआ था यहाँ कोटद्वार नाम की एक जगह है हिमालय में वहीं हुआ था।
हिमालय की इन सारी की सारी विशेषताओं को सिकोड़ करके हमने उनका विशाल मन्दिर बना दिया है। ये सारी चीजें तो यहाँ आकर देख भी सकते हैं हमने एक छोटी-सी पुस्तक भी छापी है रंगीन। जिसमें उन सब स्थानों को बताने की कोशिश की है कि ये कहाँ है? हिमालय में पाँच प्रयाग है, पाँच काशी है, पाँच सरोवर है। हिमालय में चार धाम है। चार धाम कौन-कौन से है? बद्रीनाथ केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री। चार धाम ये ही कहलाते हैं। ये सारे पवित्रतम स्थान इसमें बने हुए हैं। उसका हमने मन्दिर भी बनवाया है। जो उससे आपका सम्बन्ध जोड़ने की बीच कड़ी है। सीढ़ी पर पहला पाँव जहाँ रखा जाता है। ऊपर चढ़ने के लिये तो पहले पाँव को हम मुख्य मानते है। उसको देहरी कहते हैं। इसीलिये हरिद्वार इसका नाम रखा गया है यहाँ पहाड़ों पर जाने के लिये रास्ता है। पार्वती जी ने तप यहीं किया था। यहाँ एक विल्वकेष्वर मन्दिर हैं वहाँ पार्वती जी ने तप किया था और वहीं नजदीक में ही उनका विवाह हुआ था। यहीं पार्वती जी अपने पूर्व जन्म में जिनका नाम सती था जन्मी थी और सती हुई थी, वह दक्ष प्रजापति नामक स्थान है। दक्ष एक वैज्ञानिक थे, उनका सिर काटा गया था और महादेव जी उनसे नाराज हो गये थे, वह स्थान भी यहीं हैं यह देवात्मा हिमालय है बड़ा शानदार। इसको क्या कहे,
आपसे क्या अनुरोध है? यह कि हम तो सारी जिन्दगी के लिये चले आये। मरेंगे तो भी हम इधर ही कीं मरेंगे, लेकिन हमारी प्रार्थना है कि ऐसे पुनीत स्थान से आपको जीवन में कहीं न कहीं जुड़ी रहना चाहिये। हमको जिन्दगी भर में तीन बार हमारे गुरु ने एक-एक वर्ष के लिये बुलाया बैटरी चार्ज करने के लिये। बैटरी जब धीमी हो जाती है गाड़ियों की तो उसको फिर दोबारा चार्ज कर देते है। फिर वह बैटरी काम करने लगती है। इसलिये जब हमारी बैटरी धीमी पड़ी तब हमको हमारे गुरु ने बुलाया और अब हम यहाँ है। आपको हम निमन्त्रण भेजते है इस व्याख्यान के द्वारा। आपको जब कभी भी मौका मिले, आप यहाँ शान्तिकुञ्ज में आने की कोशिश कीजिये जहाँ सारे ऋषियों की परम्परा हैं। जहाँ हिमालय की सारी विशेषताओं को हमने एकत्रित करके रखा है। जब आपका जन्मदिन हो, विवाह दिन हो तो यहाँ आने की कोशिश कीजिये और बच्चों के संस्कार कराने हों तो आप यहाँ आने की कोशिश कीजिये बच्चों के संस्कार कराने के लिये पुनीत स्थान की लोग तलाश करते है। किसी देवी के यहाँ, किसी मन्दिर में लोग संस्कार कराते हैं आप भी यहाँ आ सकते है। श्राद्ध और तर्पण कराने के लिये भी ऐसा नियम है कि यहाँ बद्रीनाथ के पास में ब्रह्मकमल नाम का स्थान है, वहाँ लोग तर्पण कराते है। यहाँ भी तर्पण कराते है। श्राद्ध कराते है। आप चाहें तो हरिद्वार में करा सकते है। लेकिन वह स्थान कहाँ कैसे? इसके बारे में हमें कुछ कहना नहीं है। लेकिन हमारा जो स्थान है वह बहुत सुन्दर स्थान है यहाँ जो भी आते है, नवरात्र के दिनों में यहाँ अनुष्ठान कराते है। यह अनुष्ठान की भूमि है। शिक्षण की सारी व्यवस्था यहाँ है, शिक्षण के लिये आपका कभी मन हो, गुरुजी ने जो सीखा था उसको आगे चलकर हम भी सीखें तो यहाँ दस दिन शिविर भी होते है। एक महीने के शिविर भी होते है, ये दोनों ही शिविर होते है। यहाँ पर एक छोटा स्थान आप ऐसे मान लीजिये जैसे गणेशजी राम नाम लिखकर उसकी परिक्रमा लगा ली थी और परिक्रमा लगाने के बाद उनको वह सारा का सारा पुण्य मिल गया था जो कि जो विश्व को परिक्रमा से मिलना चाहिये था। गणेशजी को पहला नम्बर मिला। उनका चूहे की सवारी पर बैठकर सारे विश्व भर में घूमना तो सम्भव नहीं था अतः उन्होंने विवेक से काम लिया और परिक्रमा लगा ली। यह छोटा-सा गायत्री तीर्थ है छोटा-सा शान्तिकुञ्ज उन सारी विशेषताओं भरा पड़ा है। हम तो अब ज्यादा समय तक रहेंगे नहीं अभी सन् 2000 तक तो रहने वाले है नहीं किन्तु इस शरीर से नहीं तो सूक्ष्म शरीर से रहेंगे आपको बराबर वह लाभ मिलता रहेगा जो कि मिलना चाहिये। बहुत शानदार जगह है शान्तिकुञ्ज। इन सारे ऋषियों का, यहाँ के चौबीस गायत्री के चौबीस ऋषि है उन चौबीस ऋषियों का सार यहाँ है। वे ऋषि जो करते थे उनकी परम्परा का सार देखना हो तो यहाँ है। यह तीर्थों का ऐसा तीर्थ है कि यहाँ आ कर के आप कभी उपासना करें तो किस तरीके से नागपुर के संतरे, बम्बई के केले फलदायक होते है, ठीक उसी तरीके फलदायक आप अपने को पायेंगे यह शान्तिकुञ्ज तीर्थ हमने बनाया है तो समझना चाहिये कि यह आपके लिये बनाया है हिमालय बना होगा तो हमारे गुरु ने हमें यहाँ खींच कर के हिमालय बुलाया और हमको वहाँ पर रखा हम आपको खींच कर के यहाँ बुलाएँगे कि आप यहाँ शान्तिकुञ्ज में आया करे। यहाँ के आने जाने में जो आपका पैसा लगा है, जो कुछ भी चीजें लगी है वे सब सार्थक सिद्ध होंगे। निरर्थक सिद्ध नहीं होगी। आप शान्तिकुञ्ज आकर करके यह ख्याल नहीं करेंगे कि हम निरर्थक आये है और हमने बेकार में समय और पैसा गँवाया। बस और तो कुछ कहना नहीं आज की बात समाप्त। ॐ शान्ति!
परमपूज्य गुरुदेव ने लोक सेवा के क्षेत्र प्रवेश करने वाले हर कार्यकर्ता के लिये मार्गदर्शक आचार संहिता बनाई थीं 1979 से 1985 तक यह अलग-अलग अंकों में अपने से अपनी बात स्तम्भ में प्रकाशित होती रही व प्रत्येक नये-पुराने कार्यकर्ता के लिये नित्य पढ़ने के निर्देश के रूप में विज्ञप्ति के रूप में प्रकाशित होती रहीं। यहाँ प्रकाशित है उन्हीं में से एक जो हर युग व काल में प्रासंगिक है व हम सबके लिये विशेष रूप से इस गुरुपर्व पर और भी अनिवार्य गुरुसत्ता के एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में।
समुद्र मंथन में चौदह रत्न निकले पर उनमें सर्वप्रथम दो निकले-एक हलाहल विष, तदुपरान्त मद्य हलाहल देखने में अत्यन्त आकर्षक, नील वर्ण था मद्य होठों तक पहुँचते-पहुँचते उन्मुक्त, विक्षिप्त कर देने वाला। फिर भी उसकी ललक ऐसी थी कि जिसको एक बार स्वाद लग जाता है फिर छूटने का नाम ही नहीं लेता। इस प्रथम उपलब्धि को पाने के लिये देव दानव दोनों ही आतुर थे। पर प्रजापति ने दोनों को ही यह समझाने का प्रयत्न किया कि यह देखने और चखने में आकर्षक लगते हुये भी अन्ततः विनाश उत्पन्न करने वाला है। शिवाजी ने हलाहल तो अपने कंठ में धारण कर लिया, पर मद्य के लिये आतुर दैत्यों ने हठ पूर्वक उसे गटक लिया फलतः उनकी सामर्थ्य उद्धत प्रयोजनों में लगी और पतन पराभव का कारण बनी।
लोक सेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले सम्बन्ध में जन साधारण की श्रद्धा उमड़ती है। परमार्थ की साहसिकता अपनाने वाले पर सम्मान बरसता है। उसकी प्रशंसा होती है। प्रशंसा भी एक सम्पदा है। सम्पदाओं की उपयोगिता तो है पर उनके पीछे एक ऐसा आवेश भी रहता है जो हजम न हो सके तो लाभ के स्थान पर विनाश ही उत्पन्न करता है। धन हजम न हो तो दुर्व्यसन उत्पन्न करेगा। बुद्धि हजम न हो तो कुचक्र षड्यंत्र रचेगी। बल हजम न हो तो उद्दंडता के रूप में प्रकट होगा। हजम ने होने पर अमृत भी विष बन जाता है यश हजम न हो तो ऐसा अहंकार बनता है जिसकी तुष्टि के लिये लोक सेवी को अपना चिन्तन, चरित्र, व्यक्तित्व एवं भविष्य को हेय स्तर का बनाकर उतना पतित बनना पड़ता है जितना कि सेवा से सर्वथा दूर रहने वाले सामान्य दूर रहने वाले सामान्य श्रमिक भी नहीं गिरते। लोक सेवियों में से अधिकाँश को अपने व्यक्तित्व और सेवा क्षेत्र में ऐसे विग्रह उत्पन्न करते देखा जाता है जिसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है और सोचना पड़ता है कि यदि यश हजम कर सकने में असमर्थ लोग लोक सेवा के क्षेत्र में न आया करें तो वे अपनी और समाज की अधिक सेवा कर सकते है।
मनुष्य को पतन पराभव के गर्त में गिरा देने वाली तीन दुष्प्रवृत्तियाँ है वासना, तृष्णा और अहंता। शिश्नोदर परायण नर पशु वासना, तृष्णा के लोभ में जकड़े रहकर किसी प्रकार कोल्हू के बेल की तरह नियति चक्र में परिभ्रमण करते हुये दिन गुजार लेते है। पर अहंता, सारा बड़प्पन, सारे अधिकार अपने ही हाथ में रखना चाहती है। दूसरे की साझेदारी उसे सहन नहीं। इसी विडम्बना ने सर्वाधिक विग्रह उत्पन्न किये है लगता तो यह है कि लालच के कारण अपराध होते है, पर वास्तविकता यह है कि अहंता ही जहाँ-तहाँ टकराती और प्रतिशोध से लेकर आक्रमण, अपहरण, उत्पीड़न के विविध अनाचार उत्पन्न करती है अन्याय के अवरोध तो कहने भर की बात है, वह तो जहाँ-तहाँ जब-तब ही दृष्टिगोचर होते है। वास्तविकता यह है कि सामन्तवादी अनाचारों के कारण यही, अहंता ही उद्धत बनी और टकराई है। अनाचारों का विश्व इतिहास पढ़ने से प्रतीत होता है कि अभाव या अन्याय के विरुद्ध नहीं अधिकाँश विग्रह और युद्ध मूर्धन्य लोगों ने अहंता की परितृप्ति के लिये खड़े किये है। कंस, रावण हिरण्यकश्यप, वृत्तासुर, सहस्रबाहु, जरासन्ध जैसे पौराणिक और सिकन्दर नेपोलियन, चंगेजखाँ, आल्हा ऊदल जैसे बर्बर लोगों ने जो रक्तपात किए उनके पीछे उनकी दर्प तुष्टि के अतिरिक्त और कोई कारण था नहीं।
यह चर्चा इन पंक्तियों में इसलिये की जा रही है कि युग शिल्पियों के द्वारा आरम्भिक उत्साह में जो कार्य अपनाया जा रहा है उसमें लोक मंगल का परमार्थ प्रयोजन दृष्टव्य होने के कारण श्रेय, सम्मान एवं यश तो स्वभावतः मिलना ही है। यह पचे नहीं और उद्धत हो चले तो पागल हाथी की तरह अपना, साथियों का तथा उस संगठन का विनाश करेगा जिसके नीचे बैठकर अपनी स्थिति बनाई है। हाथी पागल होता है तो अपनों पर ही टूटता है। इसी प्रकार लोकैषणा जब पागल होती है तो सर्वप्रथम वह साथियों को मूर्ख, छोटा, अनुपयुक्त, दुष्ट सिद्ध कर सके। समान साथियों में मिल-जुल कर रहने में महत्त्वाकाँक्षी का अपना वर्चस्व कहाँ उभरता हैं इसलिये उसे साथी पेड़ पादपों का सफाया करना पड़ता है ताकि समूचे खेत में एक अखंड ही कल्प वृक्ष होने की शेखी बघार सकें।
दृष्टि पसार कर अपने चारों ओर लोकैषणा का नग्न नृत्य देखा जा सकता है। राजनैतिक पार्टियों में होते रहने वाले अंतर्कलह सिद्धान्तों की दुहाई भले ही देते रहें पर वस्तुतः वे व्यक्तियों की महत्त्वाकाँक्षा के निर्मित ही होते है। कल परसों जनता पार्टी का बिखराव हो चुका है। कितनी ही उपयोगी, संस्थाएँ पद लोलुपों ने परस्पर टकराकर अपने ही हाथों शिथिल या समाप्त हो जाने के पीछे लालच छोटा और दर्प को बड़ा कारण पाया जायेगा। धर्म सम्प्रदायों के जो बड़े खण्ड होते चले गये है उनके प्रचलन कर्ताओं में सुधारक कम और श्रेय लोलुप अधिक रहे है। चुनावों के समय या बाद में जो विग्रह दृष्टिगोचर होते है, प्रतिशोध के नाम पर जो अनर्थ होते है उसमें औचित्य कम और दर्प को नंगा नाच करते देखा जा सकता है। सास बहू की लड़ाई में यही विडम्बना उछलती दृष्टिगोचर होती है। पतियों का पत्नियों को आतंकित करने में यही तथ्य प्रमुख होता है।
बात इस संदर्भ में चल रही है कि युग शिल्पियों को सप्त महाव्रतों को अपनाने के लिये इसलिये निर्देशन किया गया है कि उनका व्यक्तित्व उभरे और उस आधार पर आत्मबल बढ़ाते हुये अधिक उच्चस्तरीय सेवा साधना कर सकने में समर्थ हो सकें। यदि उनका पालन किया गया तो वही दुर्गति होगी जो भोजन न करने तथा मल विसर्जन में उपेक्षा बरतने पर प्राण संकट के रूप में उत्पन्न होती है। लोकसेवी को जनता सम्मान देती है, वह वस्तुतः उस सेवा धर्म की पुण्य परम्परा का सूत्र संचालक तंत्र का सम्मान है। सत्प्रयोजनों के लिये लोक श्रद्धा बनी रहे मात्र इसी एक प्रयोजन के लिये सम्मान के प्रकटीकरण की प्रथा चली है। गलती यह होती है कि सेवाभावी उसे अपनी व्यक्तिगत योग्यता का प्रतिफल मानते हैं। अहंकार में डूब जाते है और फिर उसे अपना अधिकार समझने लगते है। जहाँ उसमें कमी होती है वहाँ अप्रसन्न होते है। अधिक पाने के लिये आतुर रहते है। बँटवारा होने के कारण साथियों को हटाने या गिराने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे ही हथकंडे अधिक मात्रा में सम्मान पाने के लिये प्रयुक्त किये जाते है। इस आपाधापी में कौन कितना सफल हुआ यह तो ईश्वर ही जाने पर यह आँख पसार कर सर्वत्र देखा जा सकता है कि यश लोलुपता, पद लोलुपता, अहमन्यता किसी से छिपती। उभर कर ऊपर आती और बदले में घृणा, तिरस्कार पनपने लगता है। अनौचित्य के प्रति तिरस्कार का यह भाव सर्वप्रथम साथियों से आरम्भ होता है। चर्चा आगे बढ़ती है और यश लोलुप के विरुद्ध असंतोष, तिरस्कार का विस्तार क्रमशः अधिक बड़े क्षेत्र में होता चला जाता है। यह है वह प्रतिक्रिया जिसके कारण यश लोलुप तिरस्कार के भोजन बनते और जिस श्रेय सम्मान के, अपनी सेवा साधना के कारण अधिकारी थे उससे भी वंचित होते चले जाते है।
बड़प्पन हर क्षेत्र में महंगा पड़ता है। धन, विद्या, सौंदर्य,पद आदि के क्षेत्रों में जो अपने को बड़ा सिद्ध करना चाहते है उन्हें तरह-तरह के आडम्बर खड़े करके यह प्रकट करना होता है कि उनके पास यह विशेषताएँ है। लोग उसे देखें, समझें और सराहें। फैशन, ठाट-बाट जैसे खर्चीले सरंजाम इसी विज्ञापन बाजी के लिये किये जाते हैं ताकि देखने वाली की आँखें उन पर जायें। यही अनाचरण यश लोलुपों में भी अपनाना पड़ता है। वे किसी न किसी बहाने अपनी शकल बार-बार लोगों को दिखाना चाहते हैं, इसके लिये उन्हें अनेकों ऐसे उद्धत आडम्बर रचने पड़ते है जिसमें उनकी प्रमुखता सिद्ध होती हो। स्टेज पर उठने-बैठने का औचित्य या आमन्त्रण न होने पर भी वहाँ जा धमकते है ऐसी जगह अकारण खड़े होते हैं जहाँ लोग उनकी शकल देखें और किसी महत्वपूर्ण ड्यूटी पर जमे हुये प्रतीत हों। अपना नाम,
फोटो छपाने के लिये आतुर रहना, किसी कार्य में दान दिया हो तो उसकी चर्चा स्वयं करने दूसरों से कराने का रास्ता खोजना दान राशि के पत्थर जड़वाना जैसी बचकानी हरकतें करने वाले प्रयत्न तो यशस्वी बनने का करते हैं पर उनकी शुद्धता अनायास ही प्रकट होती जाती हैं। फलतः वे उल्टे घृणा तिरस्कार के पास बनते है। यश के साथ धन लूटने की भी सम्भावना जुड़ी रहती है। कितने ही इसका लाभ उठाते है। किन्तु स्पष्ट है कि ऐसे हथकंडे अपनाने वाले आन्तरिक दृष्टि से पतित होते चले जाते है। फलतः वे सेवा के क्षेत्र में अन्यत्र की अपेक्षा और घाटे में रहते है। तिरस्कृत, उपेक्षित बहिष्कृत की स्थिति में पहुँचे हुये अनेक तथा कथित नेता ऐसे पाये जा सकते है जो ऐन केन प्रकारेण सम्मान जनक स्थान तक जा पहुँचने, जा बैठने में तो सफल हो जाते हैं। पर संपर्क क्षेत्र में सघन श्रद्धा से क्रमशः अधिकाधिक वंचित होते चले जाते है।
यह अहंता के परिपोषण का प्रतिफल है जिसे लोकसेवी अनजाने ही अपनाने लगते है। स्मरण रखा जाय यह घुड़दौड़ अत्यंत महँगी घाट की ओर मूर्खतापूर्ण है। सड़क पर नंगा नाच कर भी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। पर इससे कुछ बनता नहीं। जिस प्रकार बड़प्पन पाने के लिये उद्धत प्रदर्शन करने वाले नट, विदूषक समझे जाते है उसी प्रकार यश लिप्सा भी व्यंग-उपहास तिरस्कार का कारण बनती है। सामने कोई कहे भले ही नहीं पर इस तथ्य को थोड़ा-सा पर्यवेक्षण करने पर सरलता सूचक चरितार्थ होते देखा जा सकता है कि प्रमुखता सिद्ध करने के लिये चित्र विचित्र स्थान बनाने वाले नाटक में मुखौटे, परिधान, पहनकर कभी ऋषि बनने वालों तरह अपनी अवास्तविकता का ढिंढोरा स्वयं ही पीटते फिरते है। उसमें उन्हें श्रम, समय, धन और चातुर्य का निरर्थक अपव्यय करना पड़ता है। मूर्ख या चमचे इर्द-गिर्द करके उनके बीच रंगे सियार द्वारा वनराज बनने का ढकोसला भर खड़ा किया जा सकता है। पर उससे मिलता क्या है? परोक्ष व्यंग, उपहास अपने साथ जो गहरी अवज्ञा छिपाये रहते है? उससे लोकसेवक विदूषक स्तर का बनकर रह जाता है। इस दुर्गति जन्य दुर्गति का यदि पूर्वाभास रहे तो लोक सेवा क्षेत्र में प्रवेश करने वाले आरम्भ से ही सजग रहें ओर खिलवाड़ रचने की अपेक्षा सतर्क रहने का कार्य चुनें। विज्ञापन बाजी से बचकर नम्रताजन्य स्नेह सौजन्य अपनाने वाले वस्तुतः अधिक श्रेयाधिकारी बनते है। यश लिप्सा भी छाया की भाँति है। उसके पीछे दौड़ने वाले असफल रहते और खीझ पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ पाते नहीं। इनकी अपेक्षा वे कहीं मुनाफे में रहते है जो श्रेय दूसरे को बाँटते है स्वयं पीछे रहते है। विनम्र स्वयं सेवक की तरह जिन्हें अपनी श्रम साधना, परमार्थ परायणता के आधार पर मिलने वाले आत्म संतोष को ही पर्याप्त मानने की विवेक दृष्टि रहती है, वे अनचाहा यश पाते है। उन्हें वह गहरा स्नेह सद्भाव प्राप्त होता है जिसके साथ साथियों, परिचितों का विश्वास और सहयोग प्रचुर मात्रा में जुड़ा रहता है। दूरदर्शिता इसी में है कि लोक सेवी सच्चे मन से यश, पद लोलुपता अहंता छोड़ें विनम्रता अपनाये। दूसरों को आगे रखें। स्वयं पीछे रहें। अपना बखान स्थगित करें। अपना चेहरा चमकाये नहीं वरन् उस तरह रहें जैसा कि सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धान्त में आस्था रखने वाले अपने दृष्टि कोण चरित्र व्यवहार से अधिकारिक शालीनता भरते और महानता के उच्च पद पर अपनी विशेषता के कारण जा पहुँचते है।
बालकों से स्नेह तो किया जाय, पर वह मोह की पराकाष्ठा पर न पहुँचे। वह तो फिर अहितकर बन जाता है। अनेक सुन्दरी उब्बरी राजमहिषी बनी। उनके रूप-सौंदर्य और गुण-स्वभाव की भी ख्याति थी। कुछ समय उपरान्त उब्बरी ने एक कन्या को जन्म दिया, अपनी ही जैसी चन्द्रमुखी उसकी किलकारियों ने राजमहल की शोभा सुषमा में चार चाँद लगा दिये। भाग्य विधान पलटा। कन्या का देहावसान हो गया। माता वज्रपात हुआ। वह विक्षिप्त जैसी हो गयी। जिस श्मशान में अन्त्येष्टि हुई थी, वह उसी में जा पहुँची और विलाप से आकाश हिला देती। दर्शकों की आँखों से आँसू ढुलकने लगते। उब्बरी इस शोक-संताप में सूख-सूख कर कर काँटा हो गयी। किसी के प्रबोधन का उस प्रभाव हो नहीं रहा था।
एक दिन तथागत उस राह से गुजरे। रुदन सुनकर ठिठक गये। विवरण जाना तो क्रन्दन करती युवती के पास जा पहुँची। उब्बरी ने सिर उठाकर देखा और अनुग्रह की याचना करने लगी। बुद्ध ने कहा-देवी इसी श्मशान ने सहस्रों के मृत शरीर भस्मीभूत हुये है। उनके परिजन यदि ऐसा ही क्रन्दन करते, तो इस संसार में शोक के अतिरिक्त और कुछ बचा रहता क्या? विवेक की आँखें और इस मरणधर्मी शरीर की अन्तिम गति पर विचार करो। जो चले गये उन्हें जाने दो अपनी आत्मा का विचार करो, जो पुत्री से भी अधिक प्रिय होनी चाहिये। ऐसा न हो कि तुम पुत्री की तरह आत्मा को भी गँवा बैठो। उब्बरी तथागत का एक-एक शब्द हृदयंगम करती गयी। उसने अन्तरात्मा को पहचाना और मृत का दामन छोड़कर उस जीवन्त का परिपालन आरम्भ कर दिया। कुछ दिन उपरान्त उब्बरी महिला बौद्ध विहार की अधिष्ठात्री बनी, सीमित मोह का व्यापक प्रेम के रूप में परिवर्तन जो हुआ था।
बहिर्मुखी प्रकृति के मनुष्य को अन्तर्मुखी बनाने तथा आज के भौतिकता प्रधान युग में आत्मिक प्रगति के सूत्र समझाने की जो विधा नूतन साधन पद्धति के रूप में युगऋषि ने शोधी, वह अपने आप में विशिष्ट हैं। हर व्यक्ति चाहता है कि उसे भौतिक आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में कुछ उपलब्धियाँ दिलाये। इसके लिये योगसाधना का आश्रय लेना पड़ता हैं सही जानकारी के अभाव में जन समुदाय भटकता रहता है, इधर-उधर हाथ पैर मारकर हठयोग की कुछ क्रियाएँ सीख तो लेता है पर फास्टफूड से लेकर द्रुतगति से चलने वाले वाहनों वाले इस युग में वह इनमें भी उनके पल्ले पड़ जाता है जो योग के नाम पर दुकानें तो चलाते है पर उसका मर्म उसके जीवन नहीं पाते। इसमें कुछ उसकी भी मजबूरी होती है कि वह हर काम जल्दी चाहता है, हथेली पर सरसों उगाना चाहता है किन्तु बहुधा जल्दबाजी दूसरी ओर से होती है क्योंकि वहाँ साधक, जिज्ञासु व गुरु का रिश्ता कम, फिटनेस लाने वाले एक वेतन भोगी शिक्षक का स्वरूप अधिक बन गया है।
कुछ अपवाद अवश्य है पर है। बहुत कम। लोगों की इस आवश्यकता की राहें नजर रख तथा युगसंधि काल में आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों-राष्ट्र के सशक्त नागरिकों के निर्माण की प्रक्रिया को द्रुतगामी बनाने के लिये शान्तिकुञ्ज ने निर्णय लिया है कि इस वर्षाकाल में 15 जुलाई से पाँच-पाँच दिन के योगाभ्यास प्रधान क्षेत्रीय आयोजन पूरे भारत भर में सम्पन्न किये जाये। इनमें शान्तिकुञ्ज से भेजा गया इस विधा में निष्णात पाँच सदस्यीय दल पाँच दिन की अल्पावधि में आहार परिवर्तन से लेकर आसन-प्राणायाम मुद्रा बंध ध्यान आदि के कुछ ऐसे प्रयोगों का जो युग ऋषि ने आज की परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुये आसान बना दिये है, शिक्षण देगा। विस्तार से किन्हीं को समझना हो तो उन्हें शान्तिकुञ्ज के विशिष्ट 9-9 दिन के साधना प्रधान सत्रों में आना होगा जिन्हें नियमित रूप से सम्पन्न तो किया जा रहा है किन्तु कुछ और विशेषताओं के साथ इस वर्ष शीतकाल में उन्हें चार माह तक प्रयोग के रूप में चलाया जायेगा।
प्रस्तुत पाँच दिवसीय योगसाधना सत्रों में आयोजनों में वे सभी भाग ले सकते हैं जो किसी भी आयु, वर्ग, लिंग के है किन्तु अपना आत्मबल मनोबल, शरीर बल बढ़ाने की जिज्ञासा होते हुये भी कभी इतना अवसर अब तक निकाल न पाए। कई शान्तिकुञ्ज न आ जाये वे इतना अधिक सीखने के क्रम में इन साधना उपचारों पर अधिक ध्यान न दे पाये। इन आयोजनों को 25 सितम्बर तक सतत् 12 टोलियों के माध्यम से चलाया जाना रहेगा तथा प्रत्येक के साथ रंगीन 35 एम-एम की स्लाइड प्रोजेक्टर इन विषयों पर विशिष्ट स्लाइड प्रोजेक्टर्स के साथ भेजी जाएँगी। शाम के समय हॉलों में दिखाई जाने वाली इन स्लाइडों से बहुत कुछ वह समझा जा सकेगा जो सामान्यतः पढ़ने आदि से कम समझ में आता है।
प्रथम दिन अपराह्न शान्तिकुञ्ज की टोली निर्धारित स्थान पर पहुँचेगी तथा शाम को पूर्व संध्या के उद्बोधन से अपना कार्यक्रम आरम्भ करेगी। योगाभ्यास का मूल तत्व दर्शन ध्यान हेतु मनोभूमि कैसे बने तथा वस्तु के अनुरूप आहार बना लिया जाय यह प्रथम दिन समझाया जायेगा। दूसरे दिन प्रातः यह 7 से 9 शिव संकल्प के गायन के साथ और आरम्भ होगी तथा इनमें तीन कक्षाएँ होगी जो 35 मिनट की होंगी। प्रत्येक में क्रमशः आसन मुद्रा बंध-प्राणायाम तक ध्यान के विभिन्न तरीकों पर व्यावहारिक क्रियापरक मार्गदर्शन दिया गया। सरस्वती पंचक के साथ प्रातः कामदसत्र समाप्त हो जाएगा ताकि ऑफिस व्यापार आदि से जुड़े व्यक्ति अपने काम पर जा सकें। दूसरा सत्र संध्या 6.30 से 8.30 का होगा जो गायन से आरम्भ होगा। पंद्रह मिनट प्रश्नोत्तरी के क्रम के बाद स्लाइड प्रोजेक्टर द्वारा रंगीन स्लाइडों से उद्बोधन आरम्भ होगा तथा तीन दिन तक भक्तियोग ज्ञानयोग-कर्मयोग की कक्षा के विभिन्न सोपानों के प्रशिक्षण का क्रम चलेगा। चौथे दिन संध्या एक विशिष्ट प्रयोग 2400 वेदी दीपयज्ञ के रूप में साधकों द्वारा लिये गये संकल्प के रूप में होगा। इसमें सभी को महाकाल के साथ साझेदारी का सामूहिक यज्ञ प्रक्रिया से जुड़ने का अवसर मिलेगा। अन्तिम दिन का सत्र विदाई सत्र होगा, जिसमें पिछले चार दिनों की जिज्ञासाओं का समाधान कर विदाई संदेश देकर टोली अगले कार्यक्रम के लिये रवाना हो जाएगी।
यों ये आयोजन प्रातः-सायं के ही है पर प्रति दिन दूसरे, तीसरे चौथे दिन मध्याह्न में 12.30 से 3.30 तक कार्यकर्ता स्तर के व्यक्तियों की गोष्ठी अनुयाज प्रशिक्षण, आँवलखेड़ा पूर्णाहुति प्रयाज शिक्षण, युग शिल्पी शिक्षण स्थान विशेष की आवश्यकतानुसार चलता रहेगा। यदि संयोग से बीच में छुट्टी पड़ जाये तो एक जनस्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन या संस्कार प्रधान सभा भी रखी जा सकती है। दिन में विभिन्न संस्कार व देव स्थापना तो नित्य हो सकते है। वयोवृद्ध-अत्यधिक जीर्ण रोग वाले व बहुत छोटे बच्चों पर तो प्रतिबंध है पर शाम की सभा में सभी आ सकते है। बहनें यदि आये तो साड़ी के साथ कमर पर फेंटा बाँधकर आये या सलवार कुर्ते में प्रातःकालीन सत्र में भाग लें। आयोजनों के प्रति अत्यधिक उत्साह क्षेत्र में उभरा है। जितने अधिक नये परिजन भाग ले सकें उतनी ही इनकी सार्थकता होगी।
*समाप्त*