नर से नारायण बनने का परम पुरुषार्थ

ईश्वर प्राप्ति को जीवन का परम पुरुषार्थ कहा गया है। महान् के साथ तुच्छ की घनिष्ठता स्थापित होने पर लाभ ही लाभ है। इस प्रक्रिया के आधार पर नगण्य को भी महान् बनने का अवसर मिलता है। नाला, गंगा में मिलकर उसी का नाम धारण कर लेता है। बूँद का विसर्जन उसे विराट सागर बना देता है। उपेक्षणीय ईंधन देखते-देखते प्रचण्ड अग्नि का रूप धारण कर लेता है। पाणिग्रहण करने के उपरान्त पत्नी तत्काल अपने पति की समस्त सम्पदा पर सहज अधिकार प्राप्त कर लेती है। वृक्ष से लिपट कर दुबली कमर वाली बेल भी उतनी ही ऊँची उठ जाती है। वादक के होठों से सटने पर पोले बाँस की नली को मनमोहक बंशी के रूप में श्रेय सम्मान मिलता है। कठपुतली का नाच वस्तुतः उन लकड़ी के टुकड़ों का कलाकार की उँगलियों के साथ समर्पित भाव से बँध जाने के अतिरिक्त और कुछ है नहीं।

ऊँचे तालाब और नीचे तालाब के बीच एक सम्बन्ध स्थापित करने वाली नाली बना दी जाय तो दोनों की सतह एक होने तक ऊँचे प्रवाह नीचे की ओर बहता रहेगा। जनरेटर के साथ सम्बन्ध सूत्र स्थापित होते ही बल्ब, पंखे आदि उपकरण तत्काल गतिशील होते हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि परमात्मसत्ता के साथ घनिष्ठता स्थापित करने वाले भगवत् भक्त क्यों कर देवात्मा माने गये? किस कारण अपना और समस्त संसार का कल्याण कर सकने में समर्थ हुए? प्रगति का उच्चतम सोपान यही है कि आत्मा-परमात्मा के स्तर तक जा पहुँचे और सर्वोत्कृष्ट शिखर पर अवस्थित होकर दूसरों के व अपने बीच का आकाश-पाताल जैसा अन्तर देखे।

प्रगति यदि किसी को सचमुच ही अभीष्ट है तो उसे बहिरंग के वैभव में नहीं, अंतरंग के वर्चस् में तलाशा जाना चाहिए। एक ही उपाय का अवलम्बन लिया जाना चाहिए-महानता के साथ अपनी क्षुद्रता को जोड़ देना। कामना का भावना में, संकीर्णता का व्यापकता में, नर का नारायण में विलय-विसर्जन उसी परम पुरुषार्थ का सुनिश्चित स्वरूप है, जिसे ईश्वर प्राप्ति कहते हैं व जिसे पा लेने के बाद फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।


जीवन-यात्रा कैसे सुव्यवस्थित बने?

यह संसार गुण दोषमय बनाया गया है। इसमें जहाँ अच्छे और भले लोगों का निवास है वहाँ बुरे और गन्दे लोगों का निवास है वहाँ बुरे और गन्दे लोग भी रहते हैं। जहाँ सुख-शान्ति और स्वास्थ्य के साधन हैं वहाँ रोग दोष और कलह क्लेश की परिस्थितियाँ भी पाई जाती हैं। इस लिए संसार में पग-पग पर सावधान रहकर चलने का निर्देश दिया गया है। जो मनुष्य इस गुण दोषमय संसार में सावधान रहकर बुद्धिमत्तापूर्वक चला करते हैं वे संसार के दोष दुर्गुणों से प्रभावित नहीं होते और शान्ति तथा सुखकर जीवन के अधिकारी भी बनते हैं। दैनन्दिन जीवन में बुद्धिमत्तापूर्वक चलने, सावधानी बरतने का यही अर्थ है कि हम दोष दुर्गुणों तथा ऐसी प्रवृत्तियों से सदा बचते रहें जो जीवन विकास में बाधक बनकर पतन अथवा निरर्थकता की ओर उन्मुख करने वाली हों।

हम सब जिस समाज में रहते हैं उसमें भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों, स्वभावों, रुचियों, आदतों, उद्देश्यों तथा मानसिक स्तर के लोग रहते हैं। वे अपनी-अपनी बुद्धि तथा मानसिक स्तर के अनुसार संसार के गुण-दोष से प्रभावित भी रहते हैं और उसी प्रकार अच्छे बुरे होकर समाज में व्यवहार किया करते हैं।

समाज के नाते हमें हर प्रकार के मनुष्यों के सम्पर्क एवं संसर्ग में आने के लिए विवश होना पड़ता है। यदि कोई यह चाहे कि उसके जीवन में सदा सर्वदा गुणी और सत्पुरुष ही आये और बुरे तथा दुष्ट व्यक्तियों का समागम न हो तो यह संभव नहीं। समाज में दोनों प्रकार के व्यक्ति रहते हैं इसलिए बुरे लोगों का सम्पर्क में आना अस्वाभाविक नहीं है। वे आयेंगे, परिस्थितियाँ उन्हें ला सकती हैं, आवश्यकता विवश कर सकती है। ऐसी स्थिति में हमारा यही कर्तव्य रहता है कि हम सम्पर्क में आये व्यक्ति के दोषों से बचे रहें। अपने में इतनी दृढ़ता बनाये रहें कि उनके दोष हमें प्रभावित न कर सकें। बुराई के कारण, परिस्थिति वश आये किसी बुरे व्यक्ति तक के दुर्व्यवहार करना अथवा उससे तिरस्कार अथवा बहिष्कारपूर्ण ढंग से भागना या घृणा प्रकट करना अपने आप में स्वयं ही एक दोषपूर्ण क्रिया अथवा प्रतिक्रिया है। ऐसा करने से यदि आवश्यकता अथवा उपयोगिता की होने वाली हानि को छोड़ भी दिया जाय तब भी बुरे आदमी से बुराई और द्वेष का डर रहता है। इसलिए कहा गया है कि “बुराई से घृणा करो, बुरे आदमी से नहीं।”

यदि हमें सद्गुणों में विश्वास है, हमने अपने अन्दर गुणों का स्थान कर ली है और अपनी मनोभूमि का विकास इस प्रकार कर लिया है कि उसमें बुराइयों की छाप पड़े ही नहीं, तो फिर किसी बुरे आदमी के सम्पर्क में आ जाने से किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। इसके अतिरिक्त यदि किसी ने अपने गुणों को तदनुकूल कर्मों में ढालकर उन्हें जीवन में मूर्तिमान् कर लिया है तब तो किसी के दुर्गुणों से प्रभावित हो सकने का प्रश्न ही नहीं उठता। साथ ही मन, वचन और कर्म से परिपालित गुण अपने तेज से अधोगामी पुरुष को भी सच्ची राह दिखा सकेंगे जिससे उसका कम उपकार नहीं होगा। दुर्गुणों से बचने और उन्हें संसार से दूर करने के लिए हर मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने में हर संभव उपाय से सद्गुणों का परिपाक करे।

यह बात अवश्य श्रेयस्कर है कि मनुष्य अपनी मनोभूमि को गुण-ग्राहिका तथा अवगुण अग्राहिका बनाये और अपनी प्रवृत्तियों को इस प्रकार उच्चस्तरीय बनाये रखे कि संसार के दुर्गुण अथवा दुर्व्यसन उन्हें छू ही न सकें। ऐसे उदात्त मन और उच्च प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को अवगुणों से कोई डर नहीं रहता तथापि अपने को गुण सिद्ध मानकर चलने का अहंकार भी एक अवगुण है। मनुष्य कितना ही उच्च गुणों तथा अडिग चरित्र वाला क्यों न हो और क्यों न उसे अपने और अपनी गति पर विश्वास हो तब भी उसे ऐसी स्थितियों परिस्थितियों तथा व्यक्तियों से हर संभव उपाय से बचे रहने का प्रयत्न करना ही चाहिये जो दोष दुर्गुणों से दूषित एवं कलुषित हों। अनावश्यक रूप से अपनी दृढ़ता को परीक्षा में डालना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती।

किन व्यक्तियों से दूर रहना चाहिये, इसकी मोटी-सी पहचान यही है कि जिन व्यक्तियों के संसार से जीवन-विकास के लिये किसी क्रिया की प्रेरणा, प्रोत्साहन अथवा प्रकाश न मिलता ही उनका सम्पर्क निरर्थक समय नष्ट करने के सिवाय किसी प्रकार की उपयोगिता का लाभ नहीं दे सकता। ऐसे निरुपयोगी व्यक्तियों का साथ करना उचित नहीं और ऐसे व्यक्तियों का सम्पर्क तो शतप्रतिशत अनुचित एवं अकल्याणकारी है, जिनका साथ करने से किसी प्रकार को कुरुचि, कुत्सा अथवा कुपरिणाम की संभावना हो। दुर्गुणी व्यक्तियों का सम्पर्क तो जीवन के लिये साक्षात् विष ही है, उससे तो अपने को इस प्रकार बचाये रहना चाहिए जैसे माँ बच्चे को सतर्कतापूर्वक आग से बचाये रहती है किस का साथ करना और किसका न करना चाहिये यह जान लेना कुछ कठिन नहीं। यदि मन उचित संसार के महत्त्व को सावधानीपूर्वक रोपित करने में विश्वास करे तो कोई कारण नहीं कि वह वाँछनीय एवं अवांछनीय व्यक्ति को न परख सके।


अब यह समन्वय अपरिहार्य है

फिलॉसफी एण्ड दि न्यू फिजिक्स” नामक ग्रन्थ में जोनाथन पॉवर्स एक स्थान पर लिखते हैं कि दर्शन और विज्ञान दो भिन्न विधाएँ लगते हुए भी अभिन्न और एक हैं; पृथकता मात्र बाहरी है। तनिक गहराई में उतरने पर इसकी यथार्थता स्पष्ट हो जाती है और यह विदित हो जाता है कि दोनों का ही सम्बन्ध विचार तंत्र से है। दर्शन सोचने की एक प्रणाली है, जबकि विज्ञान चिन्तन को सत्य सिद्ध करने वाली धारा। एक यदि चिन्तन-चेतना को गति देता है, तो दूसरा उसे वास्तविकता से धरातल पर ला खड़ा करता है। इतने पर भी दोनों का अपना-अपना मूल्य और महत्त्व है। केवल काल्पनिक ऊहापोह में पड़े रहने से भी काम चलने वाला नहीं और न विशुद्ध विज्ञानवादी बन जाने से ही बात बनने वाली है। समाज में इन दोनों का समन्वय ही वर्तमान संकट का आत्यन्तिक हल हो सकता है।

पर इन दिनों इनमें एक प्रकार से वैमनस्य दिखाई पड़ता है। वेदान्ती अब भी ब्रह्म की दुहाई देते हुए अपने कल्पना लोक में विचरण करते रहते हैं, जबकि विज्ञानी उस तत्त्व को यथार्थ की कसौटी पर सत्य साबित हुए बिना स्वीकार करने को तैयार नहीं। एक पूर्णतः स्वप्न की दुनिया में जीता है, तो दूसरे का आधार हस्तामलकवत! सत्य है। दोनों अपनी-अपनी अवधारणा से एक इंच भी आगे-पीछे हटने को तैयार नहीं। वेदान्ती आज भी “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” का राग अलापते दिखाई दे रहे हैं तो विज्ञानविद् उस सूत्र के पीछे सच्चाई प्रत्यक्ष करना चाहते हैं। उनकी इस सम्बन्ध में एक ही आपत्ति है कि दिनमान की तरह स्पष्ट दिखाई पड़ने वाला जगत मिथ्या कैसे हो सकता है? और जिसके अस्तित्व का कोई अता-पता नहीं, वह सत्य किस भाँति हो? प्रत्यक्षवाद के लिए इस प्रकार के प्रश्न स्वाभाविक हैं। सम्भव है आज से कुछ सौ वर्ष पूर्व आदि शंकराचार्य को ब्रह्म को सर्वोपरि सिद्ध करने की कोई सामयिक आवश्यकता महसूस हुई हो, इसलिए यह सूत्र उनने रचा हो। सम्प्रति हम कई सौ वर्ष आगे निकल चुके हैं, न सिर्फ समय की दृष्टि से, वरन् बुद्धि, प्रगति और विज्ञान की दृष्टि से भी। अतएव कल के नियम आज ज्यों-के-त्यों लागू नहीं हो सकते और न बीते समय की सारी बातें वर्तमान परिस्थिति के हिसाब से सही ही सिद्ध हो सकती हैं।

यदि सारी पुरानी बातों को दर्शन के अतिरिक्त धर्म के नाम पर चल रही अवैज्ञानिक मूढ मान्यताओं, अंधविश्वासों, प्रथा परम्पराओं को पत्थर लकीर मान लिया गया, तो फिर आगे का अनुसंधान और विकास का पथ ही अवरुद्ध हो जायेगा। यह ठीक है कि नये का आधार पुराना होता है, उसी के सहारे नूतन कदम नई दिशा में उठा और बढ़ा सकना सम्भव है; पर यह भी गलत नहीं है कि पिछले पग का एक ही जगह जमे और पड़े रहना प्रगति को ही ठप्प कर देगा। यह जमाव सामयिक ही होना चाहिए, स्थायी नहीं। जहाँ ऐसी किसी भी मान्यता के स्थायित्व का दुराग्रह होगा, वहाँ अवगति सुनिश्चित है और यह भी निश्चित है कि जब तक धर्म दर्शन की इस दुर्दशा का अन्त नहीं होता, तब तक समाज की दुर्गति बनी रहेगी। ऐसे में यदि ब्रह्म को ही सच मानना हो, तो उस विराट् विश्व रूपी ब्रह्म को क्यों न सत्य माना जाय और जगत को मिथ्या मानने की विवशता आ पड़े, तो भौतिक लिप्सा को क्यों न झूठा करार दिया जाय? कुछ भी हो, समय के साथ-साथ यदि विचार प्रणाली में यह रोचकता और गतिशीलता बनी रहती, तो इस दुरावस्था को बहुत हद तक टाला और समाज को सशक्त समर्थ बनाया जा सकता था। किन्तु दुराग्रही दर्शन की जो परिणति हो सकती थी, वही हुई। उसने समाज को भी निठल्ला बना डाला। किसी समय जब समाज श्रेष्ठ और समर्थ था, तो जीवन के अन्तिम भाग में एकान्त सेवन करते हुए कुछ जप-तप कर लेने में शायद कोई हर्ज जैसी बात नहीं थी, किन्तु आज जीवन के पूर्वार्ध से ही इस प्रक्रिया का अपनाया जाना, न सिर्फ नैतिक अपराध है, वरन् बड़ा पाप भी; क्योंकि बड़ी जिम्मेदारी के रहते उसकी उपेक्षा करना और ब्रह्म प्राप्ति के नाम पर जंगलों, तीर्थ स्थलों एवं नदी तट पर निष्क्रिय बने रहना दायित्वों से विरत रखने वाला पलायनवाद के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? इस मनोवृत्ति ने ही साधु-सन्तों की उतनी बड़ी सेना खड़ी की। यदि यह प्रवृत्ति नहीं पायी जाती, तो संभव है 80 लाख जितनी बड़ी जनशक्ति इन दिनों किसी रचनात्मक कार्य में लग कर राष्ट्र को विकसित बना रही होती, पर ऐसा न होना था, न हुआ। यही दर्शन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

दूसरी ओर विज्ञान की स्थिति इससे भिन्न है। उसे इस सम्बन्ध में अधिक प्रगतिशील माना जा सकता है, कारण कि उसने इस प्रकार की किसी भी पिछली बात से चिपके रहने की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त रखा, फलस्वरूप निरन्तर उन्नति करते हुए आज के उत्कर्ष को प्राप्त कर सका, जबकि फिलॉसफी ने वैसी रीति-नीति नहीं अपनायी, फलतः वह जीर्ण-शीर्ण स्थिति में अब भी पड़ी रह कर सामाजिक मनोदशा भी अपनी ही जैसी बनाये हुए है। यही कारण है कि इतने सौ वर्ष बाद भी समाज में वह वाँछित परिवर्तन न आ सका, जो आना चाहिए था। शरीर में जिस प्रकार मन की भूमिका है और उसके गड़बड़ाने-लड़खड़ाने से जैसे उसका स्वास्थ्य प्रभावित होता है, वैसे ही दर्शन और चिन्तन समाज रूपी काया के मन-प्राण हैं। यदि वही जर्जर हो गया, तो समाज की स्थिति अवसादग्रस्त देह जैसी हो जाती है, जिसमें शरीर समर्थ होते हुए भी कुछ करते धरते नहीं बन पड़ता। दार्शनिकों को इस बारे में बहुत पहले सोचना चाहिए था और समय के अनुरूप फिलॉसफी को ऐसा बनाना चाहिए था कि वैज्ञानिक विचारधारा से उसकी संगति निभती रहे; पर उसकी प्रगति इतनी न हो सकी कि दोनों एक ही आधार पर खड़े होकर एक छप्पर तले रह सकें। परिणामस्वरूप उनमें आकाश-पाताल जैसा अन्तर दीखने लगा।

विज्ञान, दर्शन को यदि आज मात्र मानसिक अय्याशी मानता है तो दर्शन, वान को जड़वादी की संज्ञा देता है। दोनों ही एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं; पर मेल-मिलाप का स्वर कहीं भी किसी बिन्दु पर झाँकता-झलकता दृष्टिगोचर नहीं होता। यहाँ तनिक सूक्ष्म दृष्टि का उपयोग करें, तो विदित होगा कि वास्तविकता इससे भिन्न है। दोनों न कभी पृथक् थे, न ही हो सकते हैं। सच तो यह है कि दर्शन के बिना विज्ञान का जन्म ही नहीं हो सकता। जहाँ विज्ञान है, वहाँ निश्चित रूप से दर्शन भी होगा, भले ही उसकी उपस्थिति वहाँ प्रच्छन्न स्तर की हो। इसीलिए संसार में बड़े-बड़े जितने वैज्ञानिक हुए हैं, वे उच्चकोटि के दार्शनिक भी थे। आइन्स्टीन यदि मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता थे, तो वे एक महान् मनीषी भी थे। आर्थर कोएस्लर गणितज्ञ और भौतिकविद् थे, तो साथ ही एक श्रेष्ठ चिन्तक भी। इसी प्रकार पुराने जमाने में जितने भी ऋषि वैज्ञानिक हुए हैं, उनकी दर्शन में भी असाधारण गति रही है। कणाद परमाणु विज्ञानी थे और फिलॉसफर भी। पतंजलि योग−विज्ञान के निष्णात थे, तो दूसरी और दर्शन में भी उनकी गहरी गति थीं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि दर्शन और विज्ञान आरम्भ से ही साथ फूलते-फलते रहे हैं, किन्तु बाद के समय में उनके बीच उपजी विसंगतियों ने पार्थक्य जैसी स्थिति पैदा कर दी और दोनों दो भिन्न स्वर अलापते प्रतीत होने लगे। आज भी कुछ बिन्दुओं पर उनमें सहमति हो जाय, तो फिर उनकी सहोदर जैसी स्थिति बनी रह सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो समाज के लिए यह अत्यन्त लाभकारी होगा; क्योंकि दोनों ही असाधारण शक्ति सम्पन्न है। दर्शन यदि युगानुकूल व्यावहारिक बन सका, तो समाज को दिशा देने की अपूर्व क्षमता दिखा सकता है और वह परिवर्तन प्रस्तुत कर सकता है, जिसे युगान्तरकारी कहा जा सके। समाज की अगणित क्रान्तियाँ आर्थिक से लेकर धार्मिक तक सब इसी की देन हैं चिन्तन की यह विधा जब निर्माण क्षेत्र में लगती है, तो मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग उतारने की अपूर्व सामर्थ्य प्रदर्शित करती है और विनाश की दिशा में क्रियाशील होने पर हाहाकार मचा देती है। विज्ञान में यह दोनों ही क्षमताएँ हैं, पर मनुष्य का दुःख और दुर्भाग्य यह है कि इन दिनों दोनों ही शक्तियाँ विद्रूप बनी हुई हैं और अनर्थकारी प्रयोजनों में लगी हुई हैं।

कहना न होगा कि शक्तियों का सदुपयोग उच्च आदर्शवादी दर्शन से ही संभव है। जिस देश की सोच सशक्त और समयानुकूल हुई, वह विज्ञान को भी प्रभावित करती और दिशा देती है। ऐसी स्थिति में दर्शन-विज्ञान दो न रह कर एक बन जाते हैं, ठीक वैसे ही, जैसे सिक्का एक होते हुए भी उसके पहलू दो होते हैं। ऐसे में न विरोध-अवरोध की गुँजाइश रह जाती है, न अलगाव-असमानता की। दोनों ही शक्तियाँ तब रचनात्मक भूमिका निभाते हुए मनुष्य और समाज को विकसित बनाने में लग जाती हैं; किन्तु यह स्थिति विनिर्मित तभी हो सकेगी, जब चिन्तन प्रगतिशील और पूर्वाग्रह रहित हो एवं उसमें उन सभी अनिवार्य तत्त्वों का समावेश हो, जो तत्कालीन परिस्थितियों के लिए आवश्यक हों। कोई तथ्य बिलकुल नया होने के कारण ही स्वीकार लिया जाय और दूसरे को इस कारण त्याग दिया जाय, क्योंकि वह पुराना बन चुका-इस आधार पर बात बनने वाली नहीं। हमें निष्पक्ष होकर नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग करते हुए उन सभी नये पुराने आधारों का एक समग्र और सर्वांगपूर्ण दर्शन निर्माण करना होगा, जो हर प्रकार से वर्तमान के अनुरूप हो, तभी विज्ञान भी उपयोगी हो सकेगा अन्यथा सुनिश्चित दर्शन के अभाव में वह भी विकलांग बना रहेगा। इसी मत का समर्थन करते हुए महाकवि कालिदास लिखते हैं-

पुराणमित्येव न साधु सर्वम्। न चापि काव्यं नवमित्य वद्यम्॥

अर्थात् न तो ऐसा है कि सभी पुरानी चीजें अच्छी होती हैं और न यही कि सब नयी वस्तुएँ खराब होती हैं।

महाकवि का समन्वयात्मक स्वर स्पष्ट इन पंक्तियों में गूँजता है और वे भी इस पक्ष में दीखते प्रतीत होते हैं कि नये पुराने का श्रेष्ठता के आधार पर समभाव होना चाहिए। आज की पश्चिम की फिलॉसफी यदि शुरू से ही इस नीति का परिपालन करती रही होती, तो विज्ञान से विलगाव का प्रश्न ही पैदा नहीं होता और न स्वर्ग-मुक्ति का उलझाव भरा आकर्षण व्यक्ति की मुक्ति से संसार की मुक्ति हो सकेगी-यह एकदम अवैज्ञानिक है; किन्तु समाज का एक-एक घटक त्रिविध बंधनों से जिस दिन मुक्त हुआ, उसी क्षण सभी व्यक्ति स्वतः मुक्त हो जायेंगे-इसके पीछे बहुत बड़ा वैज्ञानिक सत्य छिपा हुआ है। हमारा दर्शन इसी सत्य पर आधारित होना चाहिए। जिस दिन यह आधार विनिर्मित होंगे, उसी दिन दो पृथक् लगने वाली धाराएँ भी समन्वित हो जायेंगी, क्योंकि दोनों एक ही सत्य के दो अन्वेषक हैं।


परिष्कृत ‘प्राण’ के चमत्कारी सत्परिणाम

‘कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्’ में एक कथा आती है कि राजा दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन को एक बार स्वर्ग देखने की इच्छा हुई। वह जब स्वर्ग पर पहुँचे, तो इन्द्र ने उनसे प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा; किन्तु प्रतर्दन ने यह कह कर उसे अस्वीकार कर दिया कि वह हर प्रकार की भौतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण है। तब इन्द्र ने लोक कल्याणकारी प्राण विद्या का उपदेश दिया और बताया कि इससे किस प्रकार दूसरों की सहायता की जा सकती है। किस तरह संकटग्रस्त व्यक्ति को विपत्ति से उबारा जा सकता है और कैसे अंतःप्रेरणा द्वारा उस तक अपने विचार सम्प्रेषित किये जा सकते हैं।

आधुनिक काल में यह कार्य यंत्र-उपकरणों के माध्यम से पूरे कर लिये जाते है; किन्तु प्राचीन काल में इस उद्देश्य की पूर्ति प्राण-विद्या के माध्यम से की जाती थी। इतना ही नहीं, इसके अतिरिक्त भी कितने ही कार्य इस विद्या द्वारा सम्पन्न किये जाते थे। इसी में असमर्थों को समर्थ और सामान्य को असामान्य बना देना भी सम्मिलित था। शिष्य इसी निमित्त प्राणी सम्पन्न गुरुओं की तलाश किया करते और उनके सान्निध्य में रह कर स्वयं को व्यक्तित्व सम्पन्न बनाया करते थे। व्यक्तित्ववान बनने में शिष्य को अपने भीतर के सद्गुणों को प्रयत्नपूर्वक उभारना पड़ता है। आचार्य की सहायता से यह प्रक्रिया अत्यन्त सरल हो जाती है। वे अपने प्राण का एक अंश देकर शिष्यों के व्यक्तित्व और उनकी क्षमताएँ बढ़ाने में उनका सहयोग कर पाते थे। इसी कारण से ऋषिकाल में लोग श्रद्धावनत होकर आचार्य आश्रमों में जाया करते थे। वहाँ ऋषि अपनी प्राण क्षमता उपलब्ध करा कर उन्हें तेजस्वी, मेधावान् और पुरुषार्थी बनाया करते थे। महर्षि धौम्य ने आरुणी को, गौतम ने जाबालि को, इन्द्र ने अर्जुन को, यम ने नचिकेता को, शुक्राचार्य ने कच को इसी तरह से उच्च भूमिका में पहुँचाया था। योग्य गुरुओं द्वारा यह परम्परा अधुनातन काल में भी चलती रही है। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को समर्थ बनाया था। विवेकानन्द ने निवेदिता को लोक-कल्याण हेतु जीवन अर्पण करने के लिए सहमत किया था। महर्षि श्री अरविन्द ने ही पेरिस स्थित ‘श्रीमाँ’ को पाण्डिचेरी आने के लिए प्रेरित किया था। इन सभी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कार्यों में प्राण की महती भूमिका होती है। यह प्राण साधारण जन में जब विकृत अवस्था में पड़ा रहता है, तो वह दूषित-घृणित कार्य के लिए व्यक्ति को प्रेरित प्रोत्साहित करता है। डाकू लोग दिन दहाड़े डाका डालते देखे जाते हैं। उग्रवादियों को राह चलते लोगों को गोली से उड़ा देने में तनिक भी भय-संकोच नहीं होता। जो आगजनी और राहजनी में निपुण हैं, उन्हें भीड़-भाड़ का क्या परवाह? जेबकतरे भरे बाज़ार में ही अपनी हाथ की सफाई दिखाते हैं व्यभिचारी और वेश्या को लाज शर्म कहाँ आती? वह तो चौक-चौराहे में भी सीना फुलाये खड़े रहते हैं। बलात्कारियों का वर्ग भी कोई कम दुस्साहसी नहीं होता। ठगी, गुण्डागर्दी, मारपीट जैसे आपराधिक कृत्यों में संलग्न रहने वालों में भी न्यूनाधिक इस विकृत प्राण का अंश होता है। इस प्राण के रहते आत्मोत्थान जैसी बात नहीं बनती। इसी कारण अध्यात्म मार्ग के पथिकों को सबसे पहले इस विकृति को दूर करना पड़ता है। जैसे-जैसे परिष्कृत होते जाते हैं, वैसे ही वैसे उसका संपर्क विश्वव्यापी महत प्राण से जुड़ने लगता है। अन्तिम अवस्था में दोनों मिलकर एकाकार हो जाते हैं। यही आत्मा और परमात्मा का, भक्त और भगवान का, क्षुद्र और महान् का मिलन-संयोग है। इसी को सोऽहम्, अहम् ब्रह्मास्मि, शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् जैसे उपनिषद् वाक्यों द्वारा अभिव्यक्त किया गया है। इस स्थिति में ही व्यक्तित्व की दिव्यता उभरती और असंभव को संभव करती देखी जाती है।

कहते हैं जब राम वनवास में थे, तब लक्ष्मण अपने तेजस्वी प्राणों का संचालन करके प्रत्येक दिन की स्थिति के समाचार अपनी धर्मपत्नी उर्मिला तक पहुँचा देते थे। उर्मिला उन सन्देशों को चित्रबद्ध करके रघुवंश परिवार में प्रसारित कर दिया करती थी और बेतार के तार की तरह के सन्देश सबको मिल जाया करते थे।

अनसूया आश्रम में अकेली थी। भगवान ब्रह्मा, विष्णु ओर महेश वेश बदल कर परीक्षार्थ आश्रम में पहुँचे। अत्रि मुनि बाहर थे। उन्होंने ही भगवान के त्रिकाल रूप को पहचाना था और गुप्त सन्देश अनसूया तक प्राण शक्ति द्वारा ही प्रेषित किया। ऐसी कथा-गाथाओं में सारा हिन्दू शास्त्र भरा पड़ा है।

आज का विकासोन्मुख समाज इन उपाख्यानों को तर्क और अविश्वास की दृष्टि से देखता है। उन्हें यह संदेह है कि भौतिक यंत्रों के अतिरिक्त भी कोई ऐसी संचार प्रणाली हो सकती है क्या, जिसके द्वारा विचार-विनिमय सरलता और सफलतापूर्वक शक्य हो सके? भौतिक साधन न उपलब्ध होने पर भी दूरस्थ व्यक्ति तक संदेश पहुँचाया जा सके?

विचारपूर्वक देखें तो विज्ञान भी इसकी पुष्टि ही करता है। इसे समझने के लिए तनिक ध्वनि संचार प्रणाली को समझना पड़ेगा। जब तक हम स्थूल ध्वनि करते या बोलते हैं तो वह तुरन्त आकाश तत्त्व के माध्यम से प्रसारित हो जाता है। चूँकि बोलते ही वह शब्द सूक्ष्म तरंगाकार रूप ग्रहण कर लेता है, जिसे सुनने की सामर्थ्य हमारे कानों में नहीं, इसलिए हम उसे नहीं सुन पाते हैं; वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसी प्रकार इन ध्वनि तरंगों को ढूँढ़ा और पकड़ा जा सके, तो वर्षों बाद भी उन्हें उपयुक्त उपकरणों के माध्यम से श्रव्य बनाया जा सकना संभव है। ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान की दृष्टि में शक्ति का रूपान्तरण भर होता है, विनाश नहीं। शब्द को विज्ञानवेत्ता शक्ति मानते हैं, अस्तु वह पैदा होते ही समाप्त हो जायेंगे इसे नहीं स्वीकारते। इसी आधार पर वे कहते हैं कि उन्हें लाखों वर्ष बाद भी ग्रहण किया जा सकता है। रेडियो स्टेशनों से प्रसारित होने वाली धुनों और गीतों को हम इस कारण से सुन पाने में सफल होते हैं कि वहाँ शब्द तरंग को विद्युत तरंग में बदल दिया जाता है। यह तरंगें मीलों की यात्रा तय कर जब हमारे रेडियो सेट तक आती हैं, तब एक बार फिर वह उन्हीं को विद्युत से ध्वनि तरंग में परिवर्तित कर देते हैं। इस प्रकार रेडियो स्टेशनों में जो कुछ बजता रहता है, उसे हम ज्यों का त्यों अपने उपकरणों द्वारा सुन लेते हैं।

यह स्थूल ध्वनि की बात हुई। मानसिक स्तर पर जो सूक्ष्म विचार तरंगें उठती रहती हैं, वह अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म होती हैं। यह भी स्थूल तरंगों की तरह तुरन्त प्रसारित हो जाती है, पर सामान्य स्थिति में हम उन्हें ग्रहण नहीं कर पाते, कारण कि हमारी सूक्ष्म कर्णेन्द्रियाँ भी उस स्तर की विकसित नहीं होती हैं। जिसका अन्तःकरण विकसित होता है, वह उन्हें न सिर्फ पकड़ सकने में सफल होते हैं, वरन् समझ कर उपयुक्त उत्तर भी प्रेषित करते हैं। यह सब परिष्कृत प्राण के चमत्कार हैं। शरीर तो उन्हें धारण करने वाला उपकरण मात्र है। बुरे आदत-अभ्यासों के रूप में, कषाय-कल्मषों के रूप में जब विकार को निकाल बाहर कर उसे शोधित किया जाता है, तो वही विलक्षण परिणाम प्रस्तुत करता है, पर इसे शरीर की नहीं प्राण की ही उपलब्धि कही जानी चाहिए। यह बात और है कि प्राण-शोधन के साथ-साथ शरीर शुद्धि भी सम्पन्न होती रहती है, पर इस प्रक्रिया के मूल में प्राण ही प्रमुख हैं। कोई सफाई पसन्द व्यक्ति जिस तरह किसी गन्दे मकान में रहना नहीं चाहेगा, उसी प्रकार शुद्ध प्राण अशुद्ध शरीर में नहीं रह सकता; पर यदि रहने की मजबूरी ही आ जाय, तो वह उसकी धुलाई-सफाई करके ही उसमें रहना चाहेगा। अध्यात्म विज्ञान में इस क्रिया को नाड़ी शोधन प्रक्रिया के नाम से पुकारा गया है। यह कई बार ईश्वरी अनुकम्पा के कारण स्वतः सम्पन्न हो जाती है और अनेक बार उसको प्रयास पूर्व करना पड़ता है।

व्यक्ति में यह प्राण तत्त्व जिस परिणाम में जितना ज्यादा होता है, उसी अनुपात में उसमें प्रखरता पायी जाती है। इसी आधार पर सामान्य बोलचाल की भाषा में उसे प्राणवान कहा जाता है। प्राण और जीवट का परस्पर गहरा सम्बन्ध है। प्राण की सघनता जहाँ अत्यधिक होती है, वहाँ जीवट भी विद्यमान् रहता है। इस जीवट की उपस्थिति ही व्यक्ति को भौतिक क्षेत्र में सफलता और आत्मिक क्षेत्र में समृद्धि के परिपूर्ण करती है। इसलिए आत्मिक प्रगति चाहने वालों को न सिर्फ प्राण के परिशोधन पर ध्यान देना चाहिए, वरन् इस सम्बन्ध में भी पूरी-पूरी सावधानी बरतनी चाहिए कि प्राण के क्षरण को हर प्रकार से रोका जाय और उसके अधिकाधिक संवर्धन की बात सोची जाय। वर्तमान जीवन प्रणाली ऐसी दोषपूर्ण है, जिसमें काम सेवन की तुलना में कामुक चिन्तन से सर्वाधिक प्राण का अपव्यय होता रहता है। इसी कारण से आज के लोग देखने में निर्जीव और क्रिया से निष्प्राण जान पड़ते हैं। इसीलिए आज ब्रह्मचर्य की स्थिति नगण्य जितनी रह गयी है।

अब विज्ञानवेत्ता भी यह स्वीकारने लगे हैं कि यदि प्राण समर्थ, सशक्त और मात्रा में अधिक हो, तो उससे अनेक ऐसे अद्भुत कार्य किये जा सकते हैं, जो शायद भौतिक साधनों द्वारा भी संभव न हो सके। अमेरिकी अनुसंधानकर्ता मोडात्रयूज एवं काउण्ट पुलीगार के शोधों ने यह सिद्ध किया है कि प्राणशक्ति द्वारा रोगोपचार तो एक हल्की-सी खिलवाड़ मात्र है। वस्तुतः उसके उपयोग बहुत ही उच्च स्तर के हो सकते हैं। उसके आधार पर मनुष्य अपने निज के व्यक्तित्व में बहुमुखी प्रखरता उत्पन्न कर सकता है। प्रतिभाशाली बन सकता है। आत्मविकास की अनेकों मंजिलें पार कर सकता है। पदार्थों को प्रभावित करके अधिक उपयोगी बनाने तथा इस प्रभाव से जीवित प्राणों को प्रकृति बदलने के लिए भी प्रयोग हो सकता है। जर्मन गृहविज्ञानी रीकन बेक इसे एक प्रकार को ‘अग्नि’ मानते हैं। वे कहते हैं कि चेहरे के इर्द-गिर्द इसकी जितनी अधिक सघनता होती है, उससे तनिक भी कम जननाँगों के निकट नहीं होती। उनका यह भी कहना है कि दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुली में इस अग्नि अथवा विद्युत की मात्र सर्वाधिक होती है। इसलिए वे अंगुली निर्देश में उसका उपयोग निषिद्ध बताते हैं। उनका मत है कि ऐसा करने में अथवा किसी वस्तु को रगड़ने-घिसने में तर्जनी के उपयोग से शरीर-अग्नि का बड़े पैमाने पर क्षरण होता है। संभवतः इसी कारण से ग्रामीण अंचलों के लोगों में अब भी यह प्रचलन विद्यमान् है कि जब उन्हें किसी फलदार पेड़-पौधे अथवा सब्जी पैदा करने वाली लता बितानों के फलों की ओर इशारा करना होता है, तो तर्जनी अंगुली की जगह वे मुट्ठी बाँध कर फूल की ओर इंगित करते हैं उनका विश्वास है कि तर्जनी के इशारे से सब्जी पैदा करने वाली लताओं के फूलों को नुकसान पहुँच सकता है। वे झाड़ सकते हैं। भले ही यह वान उनमें प्रथा प्रचलन बन कर जी रहा हो; पर वे बिलकुल अवैज्ञानिक हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। तर्जनी में अत्यधिक संघनित ऊर्जा का दुष्प्रभाव इशारे के समय पौधे को प्रभावित करता है और उसे हानि पहुँचाता है-अब यह प्रमाणित हो गया है। इसलिए समस्त ऐसे प्रचलनों को अन्धमान्यता मान लेना बुद्धिमानी नहीं। यदि सम्प्रति विद्यमान् इन प्रचलनों के संदर्भ में अनुसंधान कार्य किये जाएँ तो संभव है इनके पीछे अनेक ऐसे तथ्य मिलेंगे, जो प्राण चेतना की प्रखरता को परिपुष्ट करें और उसे मूढ़ मान्यता के स्थान पर विज्ञान सम्मत सिद्ध करें।

हम प्राण-विज्ञान को समझें और सदुपयोग, दुरुपयोग के आधार पर उसके हानि लाभ को जान सकें, तो न सिर्फ आत्मिक क्षेत्र में, अपितु भौतिक क्षेत्र में भी सफलता ओर सम्पन्नता से परिपूर्ण होते चलेंगे, ऐसे मूर्धन्यों का मत है।


अमृत पुत्र

मृत्यु-हमने आपने मृत्यु नहीं देखी। हम लोगों ने मृतकों के इक्के-दुक्के शव देखे हो सकते हैं। उनको श्मशान पहुँचाने में सम्मिलित रहे हों, यह भी संभव है; किन्तु मृत्यु को ताण्डव करते देखा था उसने और उस महाताण्डव ने उसे लगभग पागल बना दिया था।

वह एक युवक ही था तब। युवक तो अब भी है, किन्तु उस पर उसके तन से अधिक मन पर जो बीती है, उसके कारण उसके केश श्वेत हो गये हैं। अब वह एक प्रौढ़ व्यक्ति दिखलाई पड़ता है। यूरोप के द्वितीय महासमर के प्रारम्भ से पूर्व वह विश्वविद्यालय में विज्ञान का छात्र था। युद्ध प्रारम्भ हुआ और देश के कर्णधारों ने अनिवार्य सैनिक भर्ती का आदेश दिया। पुस्तकों से विदा लेकर उसे कन्धे पर राइफल उठानी पड़ी। शीघ्र ही एक जहाज उसके जैसे ही अल्हड़ युवकों को लेकर इंग्लैण्ड के बन्दरगाह से चला और उन सबको यूरोप की मुख्य भूमि पर उतार गया।

उत्तेजना प्राप्त करने का एक सहारा था-राष्ट्रीय गान। दिन-रात दौड़-धूप राइफल मशीनगन की तड़तड़ाहट, बारूद की दुर्गन्ध और ऊपर आकाश में उड़ने वाले वायुयानों की घरघराहट। इन्हीं सबमें जैसे-तैसे कुछ पेट में भी डालते रहना और रात्रि में कभी खाई में, कभी कैम्प में कुछ समय नेत्र बन्द कर लेना। सैनिक के इस युद्ध कालीन जीवन को भी यदि जीवन मानना हो किन्तु वे सब इसके अभ्यस्त हो चले थे। उछलते-कूदते हथियार साफ करते, बन्दूकें भरते या मार्च करते भी खुलकर हँसते, परस्पर हँसी-मजाक करते रहते। समय मिलने पर पत्र लिखते उनको जिन्हें उनके समाचार की स्वदेश में प्रतीक्षा रहती थी।

एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे शिविर में वह बदलता रहा। मोर्चे पर जाने को ही आया था, पहुँच गया। शत्रु कहाँ है, किधर है, कुछ पता नहीं। ऊँची-नीची झाड़ियों से भरी वनभूमि थी। गोले फटते थे, गोलियों की बौछार आती थी और इधर से भी तोपें, मशीनगनें तथा राइफलें लगातार आग उगल रही थीं।

उसने एक साथी का बांया हाथ बम का एक विस्फोट उड़ा ले गया। दूसरे समीप के सैनिक की कनपटी में गोली लगी और वह ढेर हो गया। युद्धकाल में यह सब देखने की ओट लिए बढ़े जा रहे थे। कभी पेट के बल सरकते थे, कभी उठकर दौड़ पड़ते और कुछ दूर जाकर लेट जाते थे।

एक बार शत्रु को भागना पड़ा। कोई दीखा नहीं भागता; किन्तु जब सामने से गोले-गोली न आते हों, आगे बराबर बढ़ने को अवकाश मिले, शत्रु भग ही रहा हो सकता है। शत्रु-जिन्हें कभी देखा नहीं, जिनसे कभी का कोई परिचय नहीं, जिनका अपन ने कुछ बिगाड़ा नहीं, वे अन्य घोर घृणा के पात्र शत्रु हो गये। कैसे हो गये? यह सोचना भी उसके लिए राष्ट्रद्रोह था।

सहसा शत्रु ने ‘कुमक’ झोंक दी। अपनी ओर के नायकों में कुछ मंत्रणा हुई। एक-दो ट्रक भरकर कुछ दूसरी प्रकार के सैनिक लाए गए। वे लोग दिन भर पता नहीं पूरे मैदान में क्या करते रहे। भूमि में पतली नालियाँ उन्होंने खोदी, कुछ तार बिछाए और भी कुछ करते रहे। किन्तु उसे सब जानने-देखने की न आज्ञा थी, न सुविधा और न जिज्ञासा ही। उसे तो गरम राइफल भी एक ओर रखने की आज्ञा नहीं थी। गोलियों का निरन्तर कानों के पर्दे फाड़ता शब्द और बारूद की धुँआ।

रात्रि का अन्धकार आया। खाइयों में घुटने-घुटने दल-दल में खड़ा रहना पड़ता था। मच्छरों ने दुर्गति कर रखी थी। एक बार निकल कर शत्रु पर टूट पड़ने का आदेश मिलता। वह प्रसन्न ही होता। जीवन की अपेक्षा मृत्यु अधिक वाँछनीय लगने लगी थी उसे।

शत्रु सम्भवतः उसके लोगों का पता पा गया था। विपक्ष से आते गोले-गोलियाँ की बौछार बढ़ती गयी। शत्रु सैनिकों के शब्द आने लगे। संभवतः अगली खाई पर आक्रमण हो गया था। कुछ मिनट गए और शत्रु की एक टुकड़ी उसकी खाई के समीप आ गयी। अन्धाधुन्ध गोली चलाए जा रहा था वह।

‘पानी! हैनरी दो घूँट पानी।’ एक क्षीण स्वर के समीप से उसे पुकारा। उसने झुककर पानी की बोतल खोली और नीचे देखा। गोली लगने से उसका एक साथी खाई की कीचड़ में गिर पड़ा था और तड़प रहा था।

सहसा लगा कि पूरी पृथ्वी फट गयी। चीत्कार से दिशाएँ गूँज उठीं। खाई के बाहर से चिथड़ों की वर्षा उसके सिर पर हुई पूरी वर्दी गरम चिपचिपे पदार्थ से गीली हो गयी। जिसे वह पानी पिलाने झुका था, वह प्यास की सीमा के पार जा चुका था। खाई के दूसरे सैनिकों को उसे स्मरण नहीं। वह राइफल उठाए बाहर निकला और एक ओर दौड़ा।

अन्धकार में लाशों की ठोकरें, रक्त का कीचड़, कटे-फटे शवों पर जब पैर पड़ता था...लेकिन रात्रि से दारुण दिन का प्रकाश। उस प्रकाश में उसने जो कुछ देखा-माँस का ढेर पड़ा था चारों ओर। जहाँ तक दृष्टि जाती थी, पृथ्वी पर रक्त जमा था और उसमें आँतें, लाशें बिछी थीं। राइफलें, मशीनगनें जहाँ-तहाँ पड़ी थीं। कर्णभेदी क्रन्दन अब भी जहाँ तहाँ से उठ रहा था।

वह पागल हो गया। जब तक उसके पास कारतूस रहे, वह उन क्रन्दन करते, छटपटाते, तड़पते लोगों को मृत्यु की निर्मम पीड़ा से शान्ति की निद्रा में सुलाता चला गया। पूरा मैदान पटा पड़ा था। अपने पराए का भेद कैसा, सबके शरीरों के चिथड़े थे। वहाँ। लेकिन उसके कारतूस समाप्त हो गये थे। वह राइफल से ही कई की कपाल क्रिया कर देता, किन्तु ठोकर खाकर गिरा और मूर्छित हो गया।

यह लम्बी मूर्छा एक अस्पताल में टूटी। उसे युद्धभूमि से अस्पताल भेजा गया था और वहाँ से इंग्लैण्ड। अस्पताल वालों ने उसे पागल घोषित कर दिया था, सो उसे बंदीगृह में रहना पड़ा। युद्धकाल में उस जैसे अर्धविक्षिप्त को देश में अटपटी बातें फैलाने के लिए स्वतंत्र नहीं छोड़ा जा सकता था। लेकिन महायुद्ध समाप्त होने के पश्चात् उसे घर लौट जाने की स्वतंत्रता मिल गयी।

मैं मरना नहीं चाहता। वे सबको मार देंगे। मुझे बचाओ। मुझे मृत्यु से बचने का मार्ग बताओ। हैनरी का यही पागलपन है। उसे लगता है कि राष्ट्र के कर्णधार फिर युद्ध करेंगे और जो वीभत्स दृश्य उसने देखा है, वह नगरों में ही उपस्थित होगा। मृत्यु से वह अत्यन्त आतंकित हो गया है। वह अमरत्व उसे कौन दे दे।

मुझे मृत्यु से बचने का मार्ग बताओ। अनेक गिरजाघरों में वह जा चुका है। लाउ विशप तक से रोकर पूछ चुका है। कोई उसकी बात नहीं सुनता। पागल की बात कौन सुने। सुनकर भी कोई क्या कर सकता है। मृत्यु से बचने का उपाय किसके पास धरा है।

मृत्यु से बचने का उपाय है। उस दिन उस भारतीय गेरुआ धारी ने चौंका दिया सबको। वह साधु एक सभा में कुछ कहने खड़ा हुआ था। उसने जैसे ही सम्बोधन किया-अमर पुत्रों! पागल हैनरी दौड़ता मंच पर जा चढ़ा और उसने साधु के हाथ पकड़ लिए। कातर वाणी थी उसकी-मुझे मृत्यु से बचने का उपाय बताओ? तुम्हारे पास वह उपाय है? तुम्हें भारत चलना पड़ेगा। साधु रामकृष्ण मिशन के थे। वे संभवतः उसे अपने गुरु स्वामी ब्रह्मानंद से मिलाना चाहते थे।

“मैं कहीं भी चलूँगा। जो कहो, करूँगा हैनरी दृढ़ था और साधु के आदेश पर वह मंच से नीचे आकर चुपचाप बैठ गया, प्रवचन सुनने प्रवचन समाप्ति पर हैनरी उस साधु के पीछे लग गया। अब वह इस साधु का पीछा छोड़ने को भला कैसे तैयार हो। निवास स्थान पर आकर साधु ने हैनरी से पूछा तुम कौन हो?

मैं हैनरी विलसन सीधा उत्तर था। ‘लेकिन हैनरी विल्सन कौन?’ साधु समझाने के स्तर पर आ गए-तुम्हारी अंगुली मैं काट दूँ तो कटी अंगुली हैनरी विल्सन रहेगी क्या?’

‘वह केवल हैनरी विल्सन की अंगुली होगी।’ हैनरी विज्ञान का छात्र रह चुका था। उसे बहुत शीघ्र यह बात समझ में आ गयी कि शरीर हैनरी विल्सन नहीं है। वह तो हैनरी विल्सन का शरीर मात्र है।

यह शरीर हैनरी विल्सन का नहीं है।’ साधु ने अब एक नयी बात उठायी। प्रतिभाशाली हैनरी चौका’; किन्तु थोड़ी देर में उसने यह तथ्य भी समझ लिया। रोटी, चावल मक्खन आदि से बना यह शरीर जो बचपन में कुछ था, अब कुछ है उसका कैसे हो सकता है।

प्लेट में रखा मक्खन, मक्खन है और पेट में जाने पर वह हैनरी विल्सन?

साधु ने पूछा-फिर तुम जो गन्दगी शौचालय में पेट से निकाल आते हो, वह भी हैनरी विल्सन है या नहीं?’

वाह! बड़ा मूर्ख निकला मैं! खुलकर हँसा हैनरी। वह अर्ध विक्षिप्त उठकर कूदने लगा।

जो हैनरी नहीं है, उसके मरने जीने की चिन्ता हैनरी को क्यों? साधु फिर मूल प्रश्न पर आ गए, वह तो मरेगा ही। उसे मृत्यु से बचाया नहीं जा सकता।

‘मरने दो उसे।’ हैनरी उसी प्रसन्नता में कह गया। लेकिन उसकी प्रसन्नता क्षणिक नहीं थी। सचमुच मृत्यु के भय से वह अपने को मुक्त पाने लगा था।

हैनरी विल्सन को मैंने मृत्यु से बचाने का वचन दिया है। साधु का स्वर स्थिर था-मैं अपने वचन पर दृढ़ हूँ।

‘आप हैनरी को ही मृत्यु से बचने का मार्ग बताए स्वस्थ स्वर था हैनरी का।

हैनरी कभी मरता नहीं। उसे कोई मार नहीं सकता, वह तो अमृत पुत्र है।’ साधु ने कहा।

‘अमृत का पुत्र!’ हैनरी की समझ में बात नहीं आयी। इतनी सीधी सरल बात तो नहीं कि झटपट समझ ली जाय।

‘हैनरी कौन?’ कुछ क्षण रुककर स्वयं हैनरी ने पूछा। वह अब गंभीर हो गया था। चिन्तन करने लगा था। ‘नहीं आज मुझे सोचने दीजिए। मैं फिर आऊँगा आपके समीप।’ साधु को उसने रोक दिया बोलने से। वह उठ खड़ा हुआ। विदा होते-होते उसने कहा-आप ठीक कहते हो। मुझे भारत जाना पड़ेगा। अमरत्व का सन्देश जिस भूमि से उठा, वहीं उसे प्राप्त किया जा सकता है।’

हैनरी भारत आया, वह उस साधु से कदाचित् मिला भी नहीं। हाँ, उत्तराखण्ड की ओर उसे एक बार साधारण भारतीय साधु के वेश में देखा गया था। सर्वथा प्रसन्न उल्लसित, आखिर वह अमृत पुत्र जो था।


गुणसूत्रों में परिष्कार से संस्कार संवर्धन तक

वंशानुक्रम विज्ञान में अब तक जो शोधें हुई हैं, उनके अनुसार सन्तान के व्यक्तित्व का ढाँचा बनाने में जो जीन्स काम करते हैं, वे न जाने कितनी पीढ़ियों से चले आते हैं। मातृकुल और पितृकुल के सूक्ष्म उत्तराधिकारियों से वे बनते हैं। सम्मिश्रण की प्रक्रिया द्वारा वे परम्परागत स्थिरता भी बनाये नहीं रहते, वरन् विचित्र प्रकार से परिवर्तित होकर कुछ-से-कुछ बन जाते हैं। यदि पीढ़ियों को दोषमुक्त, प्रखर एवं सुसंस्कृत बनाना है, तो इस जीन प्रक्रिया को प्रभावित तथा परिवर्तित करना होगा, यह अति कठिन कार्य है। उतनी गहराई तक पहुँच सकने वाला कोई उपाय-उपचार अभी तक हाथ नहीं लगा है, जो इन सूक्ष्म इकाइयों के ढाँचे में सुधार या परिवर्तन प्रस्तुत कर सके।

सों यह कार्य अति कठिन है, फिर भी यह आवश्यक है कि जीन्स जैसी व्यक्तित्व निर्माण की कुँजी को हस्तगत किया जाय, अन्यथा परिस्थिति, वातावरण, आहार-विहार शिक्षा आदि परिष्कार के समस्त साधन जुटाने पर भी व्यक्तियों का निर्माण ‘विधि विधान’ स्तर का ही बना रहेगा। इस संदर्भ में आशा की किरण अध्यात्म उपचार में ही खोजी जा सकती है। साधना प्रयत्नों से शरीर की अन्तः प्रक्रिया में परिवर्तन लाया जा सकता है। उससे जीन्स की स्थित बदलने और पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य की आशा की जाती है। इतना ही नहीं, पैतृक प्रभाव के कारण वयस्क व्यक्ति का जो ढाँचा बन गया है, उसमें भी सुधार-परिष्कार संभव हो सकता है। शारीरिक कायाकल्प-मानसिक ब्रेनवाशिंग की चर्चा होती रहती है। व्यक्तियों के परिवर्तन में साधनात्मक प्रयोग का परिणाम और भी अधिक उत्साहवर्धक हो सकता है।

इस सम्बन्ध में रवीन्द्रनाथ टैगोर अपनी पुस्तक ‘साधना’ में लिखते हैं कि भारत ने अब तक जितने ऋषि पैदा किये हैं, उतना कदाचित् किसी अन्य ने नहीं। इसका कारण एक ही रहा है कि यहाँ साधना प्रधान आत्मिकी को अधिक महत्त्व मिला है, जबकि पश्चिमी दुनिया भौतिकी के मकड़ी-जाले में उलझ कर रह गई। इसलिए उसने मनीषी तो उत्पन्न किये, पर व्यक्तित्व सम्पन्न ऋषियों का उत्पादन नहीं कर सकी। भौतिक चिन्तन प्रधान है, तो आत्मिकी चरित्र प्रधान। अतएव पदार्थ जगत की साधना करने वालों ने मस्तिष्क को विकसित करके चिन्तन व पैनापन तो प्राप्त कर लिया पर इसके आगे समग्र व्यक्तित्व अविकसित स्थिति में ही पड़ा रहा। आत्मजगत के अन्वेषकों का लक्ष्य चूँकि संस्कार कोशों का परिवर्तन, परिवर्धन और जागरण होता है, इसलिए उनकी यात्रा उस मूल इकाई से आरम्भ होती है, जहाँ पर समग्र व्यक्तित्व दबा पड़ा होता है। साधना द्वारा इसी आवरण को हटाना पड़ता है।

अब भौतिक विज्ञानी भी भौतिक उपचारों द्वारा इस स्थिति को प्राप्त करने को कोशिश करने लगे हैं। आनुवांशिकी इसी विधा का नाम है। उसकी खोजों से यह स्पष्ट हो गया है कि जीन्स में मात्र भोजन की पौष्टिकता का तो प्रभाव नगण्य ही होता है, शारीरिक सुदृढ़ता, स्फूर्ति, अभ्यास, कर्म-कौशल व्यवहार, विकास चरित्र का स्तर, मस्तिष्कीय क्षमताओं के विकास, आदि सम्पूर्ण व्यक्तित्व का सारभूत अंश उनमें विद्यमान् रहता है। शरीर की विकृतियों के भी वे कारण होते हैं, पर उससे अनेक गुना महत्त्वपूर्ण तो मनःस्थिति, बौद्धिक क्षमताएँ और चारित्रिक प्रवृत्तियाँ होती हैं। आलस्य और प्रमाद के कारण व्यक्तित्व की क्षमताएँ, प्रखरता बिखरती नष्ट होती रहीं तो शारीरिक सुघड़ता में तो दोष आते ही हैं। एवं व्यक्तित्व का मूलभूत स्तर घटिया होता जाता है, जिससे स्वयं का जीवन भी देवोपम विभूतियों से वंचित रह जाता है, और अपनी सन्तान पर भी उसका विषाक्त प्रभाव छोड़ने का अपराधी बनना पड़ता है।

आनुवांशिकी शोधें इतना भर विश्वास दिलाती हैं कि उपयुक्त रक्त मिश्रण से नई पीढ़ी का विकास हो सकता है। आरोपण-प्रत्यारोपण की संभावना भी स्वीकार की गयी है। वर्तमान स्थिति को बदलने के लिए नहीं, भविष्य में सुधार होने के सम्बन्ध में ही यह आश्वासन लागू होता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि जीन सामान्यतया निष्क्रिय स्थिति में पड़े रहते हैं। उनकी सक्रियता नर-नारी का संगम होने के उपरान्त उभरती है। ‘जीन’ का कार्य युग्म रूप में आरंभ होता है, जिनका एक सदस्य पिता से आता है और एक माता से। यह जोड़ा मिलकर नई संरचना की विधि-व्यवस्था में जुटता है। यदि दोनों पक्ष एक प्रकृति के हुए, तो उनका सृजन ठीक उसी रूप में होगा, किन्तु यदि भिन्नता रही, तो दोनों के सम्मिश्रण का जो परिणाम होगा, वह सामने आयेगा। जो पक्ष प्रबल (डाँमिनेन्ट) होगा, वह दुर्बल पक्ष (डिप्रेसिव) की विशेषताओं को दबाकर अपना वर्चस्व प्रकट करेगा। फिर भी दुर्बल पक्ष की कुछ विशेषताएँ तो उस नये सम्मिश्रित सृजन में दृष्टिगोचर होती रहेंगी एकरूपता मिलते चलने पर आकार भार बढ़ेगा पानी में पानी मिलाते चलने पर रहेगा पानी ही, उसका परिणाम भार बढ़ेगा, किन्तु दो भिन्नताएँ मिलकर आकार ही नहीं, स्थिति और प्रकृति का परिवर्तन भी प्रस्तुत करेगी। पीला और नीला रंग मिला देने पर वे दोनों ही अपना मूल स्वरूप खो बैठेंगे और तीसरा नया हरा रंग बन जायेगा। सोडियम और पानी की संगति से सर्वथा भिन्न तत्त्व आग पैदा हो जाती है। जीनों की परम्परा में पायी जाने वाली विशेषताएँ तथ्य रूप में तो बनी रहेगी, पर उसका प्रत्यक्ष रूप परिवर्तित दृष्टिगोचर होगा। घोड़ी और गधे के संयोग से नई किस्म के खच्चर पैदा होते हैं, ऐसे ही कलमी पौधों के फल-फूलों में नये किस्म की विशेषताएँ उभरती हैं। अभी हाल ही में एक अमेरिका उद्यानशास्त्री ने सेब के एक पेड़ पर इक्कीस प्रकार के सेब पैदा करने में सफलता प्राप्त की है। वे फलते तो साथ-साथ हैं पर सभी के स्वाद और आकार एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं।

आनुवांशिकी के आधार पर अब तक इतना ही संभव हो सका है कि उपयुक्त जोड़े मिलाकर भावी पीढ़ी के विकास की बात सोची जाय। उस क्षेत्र में भी यह प्रश्न बना हुआ है कि निर्धारित जोड़े में जो विकृतियाँ चली आ रही होंगी, उनका निवारण-निष्कासन कैसे होगा? अच्छाई-अच्छाई से मिलकर अच्छा परिणाम उत्पन्न कर सकती है, तो बुराई-बुराई से मिलकर अधिक बुराई क्यों उत्पन्न न करेगी? यदि अच्छाई-बुराई के बीच संघर्ष आरम्भ हो गया तो नई मध्यवर्ती स्थिति बन सकती है, पर प्रगति का अभीष्ट परिणाम किस प्रकार उपलब्ध हो सकेगा?

आनुवांशिकता पर आधारित शोधें तथ्यों पर पड़े पर्दे का तो उद्घाटन करती हैं, पर अभीष्ट सुधार के लिए उपयुक्त एवं सुनिश्चित मार्गदर्शन करना उनके लिए भी संभव नहीं हो सका है। वनस्पति में प्रत्यारोपण क्रिया के उत्साहवर्धक परिणाम सामने आये हैं। कृत्रिम गर्भाधान तथा दूसरे प्रत्यारोपणों का परिणाम भी किसी कदर अच्छा निकला है। मनुष्य की शरीर-रचना में भी थोड़े हेर-फेर हुए हैं। गोरे और काले पति-पत्नी के संयोग से तीसरी आकृति बनी है। एंलो इण्डियन रेस अपने ढंग की अलग ही है। इतने पर भी मूल समस्या जहाँ की तहाँ है। जीन के साथ जुड़ी हुई पैतृक परम्परा में जो रोग अथवा दुःस्वभाव जुड़े रहेंगे, उनको हटाना या मिटाना कैसे बन पड़ेगा? यह तो भावी पीढ़ी के परिवर्तन में प्रस्तुत कठिनाई हुई। प्रधान बात यह है कि वर्तमान पीढ़ी को अवांछनीय उत्तराधिकार से किस प्रकार छुटकारा दिलाया जाय? उसे असहाय स्थिति में पड़े रहने की विवशता से त्राण पाने का अवसर कैसे मिले? इस क्षेत्र में परिवर्तन हो सकने की बात बहुत ही कठिन मालूम पड़ती है।

मनुष्य के एक जीन में करोड़ों इकाइयाँ होती हैं। पर इन विषाणुओं, वायरसों की क्या प्रतिक्रिया होती है, प्रस्तुत शोधें उसी उपक्रम के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। डा.. हरगोविंद खुराना ने जिस एक रसिया कोलाई के कृत्रिम जीन-संश्लेषण में सफलता प्राप्त करके नोबुल पुरस्कार जीता था, वह मात्र 199 इकाइयों वाला था। इन सभी इकाइयों को सही क्रम से जोड़ने में 9 वर्ष लगे। यह तो एक प्रयोग भर हुआ। मनुष्य के एक जीन में पायी जाने वाली करोड़ों इकाइयों को सही क्रम से जोड़ना अतीव दुष्कर है। यहाँ एक बात और भी ध्यान रखने की है कि प्रत्येक कोशिका में ऐसे कई लाख जीन्स होते हैं, जो मानव शरीर के भिन्न-भिन्न अवयवों के निर्माण एवं संचालन का कार्य सम्पन्न करते हैं।

शरीर के विभिन्न अंग-प्रत्यंगों के जीन्स द्वारा निर्माण की प्रक्रिया को अनुशासित रखने का दायित्व एन्ज़ाइम का है। ये ‘एक्जाइम न्यूक्लिक अम्लों के माध्यम से जीन से सम्बद्ध रहते हैं। चुम्बकत्व शक्ति के प्रयोगों उपचारों द्वारा इन एग्जाइमों को प्रभावित कर जींस के विकासक्रम पर प्रभाव डाला जा सकता है। अभी वैज्ञानिक इस दिशा में अध्ययन कर रहे हैं। भारत में अतीतकाल में सुसन्तति के लिए तप साधना का विधान था, जो कि मनुष्य में अन्तर्निहित चुम्बकत्व शक्ति का विकास-अभिवर्धन करता था। कृष्ण और रुक्मिणी ने बद्रीनाथ में बारह वर्ष तक तप कर अपनी प्राण चुम्बकीय शक्ति को अत्यधिक उत्कृष्ट बना लिया था, तभी उन्हें प्रद्युम्न के रूप में मनोवाँछित संतान प्राप्त हो सकी थी।

वैज्ञानिकों का मत है कि जीन्स की विशेषताएँ विकिरणों द्वारा प्रभावित की जा सकती हैं। शरीर के भीतर रश्मियों के केन्द्रीकरण द्वारा ऐसी चिकित्सा व्यवस्था की जा सकती है उनका विश्वास है कि विद्युतीय प्रक्रियाओं द्वारा जीन्स की रासायनिक और विद्युतीय दोनों विशेषताओं में परिमार्जन-संशोधन किये जा सकते हैं। ध्वनियों तथा प्रतिध्वनियों के क्षेत्र में भी खोजे चल रही हैं। ध्वनि चिकित्सा द्वारा इसके स्थूल प्रभावों को तो कब का जाना जा चुका है। अब यह जानने की कोशिश हो रही है कि गहन गहराई में निवास करने वाले सूक्ष्म संस्कार कोशों को प्रभावित-संशोधित किया जा सकना संभव है क्या? उनका विश्वास है कि इस विधा द्वारा भी जीन्स में परिवर्तन की कोई समर्थ प्रक्रिया ढूँढ़ी जा सकती है।

भौतिक विज्ञान से यह संभव हो या न ही, पर अध्यात्म विज्ञान में यह साध्य है। भारतवर्ष में साधना द्वारा शरीरस्थः जैवीय विद्युत को प्रखर बना कर मंत्रों के माध्यम

से उत्पन्न प्रतिध्वनियों तथा यज्ञादि के विकिरण का उपयोग इस दिशा में सफलतापूर्वक किया जाता रहा है। इन्द्र को जीतने में समर्थ वृत्तासुर की उत्पत्ति तभी राजा दशरथ के यहाँ राम-भरत जैसी सुसन्तति को प्राप्ति ऐसे ही प्रयोगों द्वारा संभव हुई थी।

अध्यात्म विज्ञान वहाँ से आरम्भ होता है, जहाँ भौतिक विज्ञान की सीमाएँ प्रायः समाप्त हो जाती हैं। स्थूल की अगली सीढ़ी सूक्ष्म है। अंतःस्रावी ग्रन्थियों से निकलने वाले विचित्र हारमोन स्राव की तरह आनुवांशिकी क्षेत्र के रहस्यमय घटक जीन भी उतने ही विलक्षण हैं। इन्हें प्रभावित करने में भौतिकी सफल न हो सके, तो इसमें निराश होने की कोई बात नहीं है। सुनियोजित अध्यात्म विज्ञान के पीछे वे संभावनाएँ झाँकती हैं, जिनसे न केवल हारमोन और जीन, वरन् ऐसे अनेकों रहस्यमय केन्द्र प्रभावित परिष्कृत किये जा सकते हैं, जो सामान्य मनुष्य जीवन को असामान्य देवोपम बना सकने में समर्थ हैं। इसके लिए कोई बहुत अधिक कष्टसाध्य तपस्या करने की आवश्यकता नहीं। दैनिक जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों की सुदृढ़ स्थापना हो जाय, तो इतने से भी बात बन सकती है और वह प्रयोजन आसानी से पूरा हो सकता है, जिसे आज की भौतिकी उपलब्ध करने में लगभग असफल रही है।


श्रेष्ठता की संसिद्धिं

मानव जीवन, श्रेष्ठतम उपलब्धि मानी गयी है। मनुष्य को मनुष्य रूप में श्रेष्ठता पूर्वक ही जीवन यापन करना चाहिए। ऊँचा आचार-विचार ऊँची-भावनाएँ उन्नत आदर्श और उदार व्यवहार ही मनुष्य को शोभा देते है। जीवन को सार्थक और समृद्ध बनाने के लिये श्रेष्ठता की अवधारणा जीवन के हर मोड़ पर करते रहना ही आवश्यक है। मनुष्य होकर भी जो श्रेष्ठ जीवन का सुख न ले सका, उसको असफल ही माना जाएगा

जिसको सिद्धि वाँछित है उसे श्रेष्ठता का स्वरूप समझ लेना आवश्यक है। श्रेष्ठता क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जायेगा कि शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता, बौद्धिक गरिमा और आत्मिक बोध का भाव मिलकर ही किसी मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते है। पद-प्रतिष्ठा आदर-सम्मान वैभव-ऐश्वर्य शक्ति, बल और बहुत कुछ क्षमताएँ होने पर भी यदि मनुष्य में ऊपर बताए गये चार गणों का अभाव हो तो उसे पूर्ण श्रेष्ठ मनुष्य नहीं माना जा सकता। पूर्ण श्रेष्ठता की सिद्ध के लिये उपर्युक्त चार विशेषताओं का होना अनिवार्य माना जाएगा

शारीरिक स्वास्थ्य क्या है? मोटा-तगड़ा और भारी भरकम होना स्वास्थ्य का लक्षण नहीं है। स्वास्थ्य का लक्षण है शरीर की सुडौलता। अवयवों का गठन, पेशियों का संतुलन, दृढ़ता और आवश्यक माँसलता सुडौलता की शर्तें है। शरीर से सुडौल और संतुलन होने पर भी जिस में स्फूर्ति और कार्यक्षमता की कमी है। उसे पूर्ण स्वस्थ नहीं माना जा सकता। सब लोग हों चाहे न हों, किन्तु पहलवान वर्ग के प्रायः सभी लोग शरीर से सुडौल और सुन्दर होते है। कुश्ती और कसरत के अभ्यस्त काम को छोड़कर पहलवान कदाचित ही स्फूर्ति और कार्यक्षमता का प्रमाण दे पाते हैं। अपने उन दो कामों को छोड़ कर दिन भर अलसाने अथवा सोने के सिवाय और कोई काम उनके वश का नहीं होता।

जो मनुष्य शारीरिक सौष्ठव के साथ-साथ स्फूर्ति और कार्य क्षमता से भी संपन्न है, वही वास्तव में पूर्ण स्वस्थ माना जाएगा ऐसे लोगों के पास आलस्य, सुस्ती तथा थकान नहीं आती। जितनी देर उन्हें कार्य करना होता है एक भाव से अविचलित हुए करते रहते हैं। काम करने, दौड़ने, खेलने, बोलने आदि क्रियाओं तक में उनकी स्फूर्ति प्रकट होती रहती है। अवयवों, पेशियों और अंगों से पुष्ट स्फूर्ति और श्रम संपत्ति से सम्पन्न व्यक्ति के सम्बन्ध में व्याधियों की कल्पना नहीं की जा सकती और प्रकृति परिस्थिति अथवा संयोग से उसके सम्मुख ऐसी कोई परिस्थिति आ भी जाती है तो वह अपनी सुरक्षित क्षमता से जल्दी से जल्दी ही उस पर नियंत्रण पा लेता है।

मानसिक प्रसन्नता का लक्षण है दृढ़ मनोबल, चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण, निरन्तर उत्साह, साहस, निर्भीकता, कर्मनिष्ठा, सद्भावना तथा खिलाड़ी की तरह की मनःस्थिति यही गुण मानव जीवन की सुख शान्ति और सफलता के विधायक तत्त्व होते है। जिसका मन निर्बल, चंचल, निरुत्साही, सदैव भयभीत तथा निष्ठाहीन होगा, निश्चित है कि उसका मन मलीन और विपरीत दिशा में निषेधात्मक चिंतन करने वाला होगा। निर्बल मन का शंकाओं, संदेहों, विक्षेपों आदि के असद् तत्त्वों से भरा रहना स्वाभाविक है। जिसके मन की दशा दयनीय होगी वह श्रेष्ठता की साधना में सफल हो सकेगा। ऐसा नहीं माना जा सकता। जिसका मन निरोग, निर्विकार और निर्मल होगा उसका मन न केवल प्रसन्न ही रहेगा बल्कि प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा आदि की सद्भावनाओं से भरा भी रहेगा। जिसे गुणों की यह सम्पत्ति प्राप्त हो जाये उसे श्रेष्ठता की ओर बढ़ने से कौन रोक सकता है।

बौद्धिक गरिमा के अंतर्गत बुद्धि की निर्णायक शक्ति, संतुलित चिंतन, उच्च विचार, शांति और सुव्यवस्था आदि ऐसे गुण आते हैं जो किसी विषम परिस्थिति में मनुष्य के सहायक होते है। जो अच्छाई-बुराई-कर्तव्य अकर्तव्य, सत्य-असत्य पथ और विपथ में निर्णय कर सकने वाली बुद्धि चंचल, अशान्त और असंतुलित होगी, जिनमें इंद्रियों और मन पर शासन करने की योग्यता न होगी, ऐसे व्यक्ति श्रेष्ठता की दिशा में आवश्यक प्रगति कर सकने की आशा नहीं कर सकते। जिनकी बुद्धि योग्यता पूर्वक निर्णय दे सकती है, ऊहापोह में समय नष्ट करने से बचाये रख सकती है, इंद्रियों तथा मानसिक वृत्तियों पर शासन रखकर उन्हें कर्तव्य पर चला और अकर्तव्य से रोक सकती है, इन्हें किसी भी स्तर की श्रेष्ठता को प्राप्त कर सकने के लिये योग्य माना जा सकता है।

श्रेष्ठता की सिद्धि के लिये सबसे महान् शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण तत्त्व है ‘आत्मबोध’। जिसमें आत्मबोध की कमी है, आत्मा की शक्तियों की प्रतीत नहीं है, आत्मविश्वास का अभाव है और जो यह अनुभव नहीं करता कि आत्मा परमात्मा का अंश है, जो मानव देह में जीव को वह दिव्य प्रकाश देने के लिए अवतरित हुई है, जिसको अपनाकर मनुष्य किसी भी उन्नत ही नहीं उच्चतम शिखर पर चढ़ सकता है, वह मनुष्य सर्व गुण संपन्न बलवान और साधनों से पूर्ण होने पर भी प्रगति के नाम पर एक कदम नहीं बढ़ सकता। जिसने जीवन के मूल तत्त्व को ही नहीं जाना, उसने अन्य सब बातें जान भी लीं तब भी अनजानी ही माना जायेगा। आत्मबोध सम्पन्न व्यक्ति निरन्तर अपने अंदर एक अलौकिक सम्बल एक अविच्छिन्न साथी और एक शक्तिशाली सहायक की अनुभूति करता रहा है। आत्मबोध से आत्मविश्वास और परमात्मनिष्ठा की पुष्टि होती है। इतने बल सम्बल के साथ श्रेष्ठता की ओर बढ़ने वाले का लक्ष्य पूरा न हो, यह संभव नहीं।

किन्तु ये चारों ही गुण किसी को स्वतः प्राप्त नहीं हो जाते। इन्हें उपाय, युक्ति और साधना द्वारा उपार्जित किया जाता है। इन गुणों की सिद्धि के लिये बहुत कुछ छोड़ना और बहुत ग्रहण करना पड़ता है। उन परिस्थितियों में रहना अथवा वैसी परिस्थितियाँ बनानी पड़ती है जो इनकी साधना में सहायक हो सकें।

इन गुणों को विकसित करने का उपाय है सरलता पूर्वक जीवन जीने की कला का अभ्यास करना जो लोग जीवन के विधि क्षेत्रों अथवा विषयों का अनावश्यक फैलाव कर लेते है वे श्रेष्ठता के गुणों का न तो विकास कर पाते है और न उनकी रक्षा। आवश्यकताओं, सम्पर्कों, साधनों सुविधाओं, सुखों, मनोरंजनों, सम्बन्धों तथा परिवार आदि बातों में आधिक्य तथा विस्तार का समावेश कर लेते है, वे प्रायः श्रेष्ठता की रक्षा में असफल ही रहते है। अधिक, और अधिक के पालन में अधिक हाथ-पाव ही फेंकते रहते है। ऐसी विवशता भरी व्यग्रता में श्रेष्ठता सम्बन्धी आदर्शों, नीतियों और मर्यादाओं का पालन कर सकना कठिन होता है। जब-तब और जहाँ-तहाँ क्षमताओं का स्खलन होता ही रहता है।

यदि कोई व्यक्ति जीवन में आवश्यकताओं का अत्यधिक विस्तार कर लेता है तो वह वाँछनीय श्रेष्ठता की रक्षा कर पाता। मनुष्य की मूल आवश्यकताएँ है भोजन, वस्त्र और आवास। यदि मनुष्य परिश्रमी है और उसने इन मूल आवश्यकताओं को सामान्य जीवन क्रम से आगे नहीं बढ़ाया है तो वह मान्य मर्यादाओं और आदर्शों के साथ जीवन-यापन कर सकता है। यदि वह अपने सामान्य आवश्यकताओं को असामान्य बना लेता है तो उसे उनकी पूर्ति के लिये अनुचित गतिविधि अपनाने के लिये मजबूर होना पड़ेगा अनौचित्य की पूर्ति अनौचित्य द्वारा ही करनी पड़ती है। महापुरुषों ने सही कहा है कि प्रसन्न रहने के दो ही उपाय है- अपनी आवश्यकताओं को कम करना तथा परिस्थितियों से तालमेल बिठा लेना यदि इतना बन पड़े तो जीवन जीने के कला व्यक्ति को आ जाती है तो श्रेष्ठता के राजमार्ग पर उसे आरूढ़ कर उसे सिद्ध पुरुष बना देती है। यह राजमार्ग सभी के लिए खुला पड़ा है।


भगवान बुद्ध (Kahani)

भगवान बुद्ध अब्बाली गाँव का लक्ष्य बनाकर पदयात्रा पर निकले। लक्ष्य एक दरिद्र किन्तु कर्मठ किसान को धर्मोपदेश करना था। उसकी पात्रता का आभास तथागत को मिल चुका था।

किसान ने भगवान के आगमन पर अपना सौभाग्य सराहा। तथागत का उपदेश उनके श्रीमुख से सुनने को उसने चिर आकांक्षा भी सँजो रखी था।

दुर्भाग्य ने काम किया। किसान का बैल खो गया। सोचने लगा, बैल ढूँढ़े या उपदेश सुने?

निश्चय बैल ढूँढ़ने का हुआ। सो वह सत्संग का मोह छोड़कर ढूँढ़ने निकल पड़ा। एक दिन रात भटकने के उपरान्त बैल मिला। लौटकर घर आने तक भगवान उसकी प्रतीक्षा ही करते रहे।

लौटा तो बेतरह थका-माँदा भूख प्यास से पैर लड़खड़ा रहे थे। सूखे मुँह से शब्द भी ठीक से नहीं निकल रहे थे।

तथागत ने मण्डली को निर्देश दिया इसके लिए तुरन्त भोजन का प्रबन्ध करो।

पेट भरने पर किसान शान्त चित्त से बैठा और ध्यान लगाकर उपदेश सुनता रहा।

लौटते समय मार्ग में शिष्यों ने भगवान से ऐसे आ श्रद्धालु के यहाँ जाने का कारण पूछा। वे गम्भीर रहे। बोले तीस योजन की कठिन यात्रा करके मैं जिस जिज्ञासु के यहाँ पहुँचा था वह लोक धर्म और उपदेश श्रवण में से किस की प्रधानता है इसे जानता था। ऐसी सूक्ष्मदर्शी विवेकशीलता ही मुझे उसके घर चलने के लिए घसीट लाई थी।

लौटते समय मार्ग में शिष्यों ने भगवान से ऐसे अश्रद्धालु के यहाँ जाने का कारण पूछा। वे गम्भीर रहे। बोले तीस योजन की कठिन यात्रा करके मैं जिस जिज्ञासु के यहाँ पहुँचा था वह लोक धर्म और उपदेश श्रवण में से किस की प्रधानता है इसे जानता था। ऐसी सूक्ष्मदर्शी विवेकशीलता ही मुझे उसके घर चलने के लिए घसीट लाई थी।


आत्मसाक्षात्कार कराने वाला अद्भुत अध्यात्म उपचार

त्राटक योग साधना का एक ऐसा अंग है, जिसका अभ्यास योगीजन दीर्घकाल से करते रहे है। यों तो इसकी अनेक विधियाँ है, कई प्रतीकों का उपयोग बताया गया है पर आकाश त्राटक एक ऐसी विधि है, जिसका यदि सही-सही अभ्यास हो गया, तो साधक आत्म साक्षात्कार तक प्राप्त कर सकता है।

साधना विज्ञान के आचार्यों का मत है कि इसका अभ्यास यदि भस्त्रिका और अनुलोम-विलोम प्राणायामों के उपरान्त उच्चस्तरीय साधकों द्वारा किया जाय, तो अपेक्षाकृत कम समय में ही साधक की स्थिरता परिपक्व होने लगती है और दिव्य अनुभूतियों का द्वारा खुल जाता है।

यह त्राटक बैठ कर या लेट कर किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। जिनका आसन सिद्ध न हुआ होता वे ज्यादा देर किसी एक आसन पर बैठ नहीं पाते ऐसे में बार-बार मन उचटने के कारण उनका ध्यान ठीक प्रकार नहीं लग पाता। ऐसे साधकों को लेट कर यह साधना करना अधिक सुविधाजनक रहता है। अनुभवी लोगों का कथन है कि इस मुद्रा में बैठने की तुलना में कम समय में ही स्थिरता आ जाती है। सुविधानुसार दोनों में से किसी एक के चयन के पश्चात् आकाश की ओर स्थिर दृष्टि से देखने का अभ्यास आरम्भ करना पड़ता है। शुरू में आंखें अनभ्यस्त होती है, अतः उसे धीरे-धीरे कर इसका अभ्यास दिलाना पड़ता है। प्रारम्भ में थोड़े समय की ही अपलक दृष्टि रखनी चाहिए। जितने समय तक आँख खुली रखने में कोई असुविधा महसूस न हो, उतने क्षण तक खुले नेत्र से आकाश पर दृष्टि जमाये रखना चाहिए। दर्द होने पर नेत्र मूँद लेने चाहिए। इस प्रकार धीरे-धीरे कर आंखें स्थिर होने लगती हैं। सही-सही अभ्यास होने पर नेत्र एक-से-दो मिनट के भीतर ही स्थिर हो जाते है। आरम्भ में यह समय 10-15 मिनट भी लग सकता है, किन्तु इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, अन्यथा नेत्रों को हानि पहुँच सकती है।

आमतौर पर आकाश नीलवर्ण का दिखाई देता है, किन्तु जब स्थिरता आती है, तो आकाश के इस स्वाभाविक रंग में परिवर्तन होना शुरू होता है। हल्के गुलाबी, नीला अथवा हरे रंग की एक पर्त आकाश में दृष्टिगोचर होती है। कभी रंग बदल कर मटमैला और हल्का नीला हो जाता है और नीचे प्रकाश युक्त पर्त दिखाई पड़ती है। ऐसा भी हो सकता है कि नीला रंग हरे रंग में परिवर्तित हो जाय और नीला एवं हरा एक साथ अलग-अलग भी दिखाई दे सकते है। जब अभ्यास अधिक बढ़ता है, तो नीलवर्ण पूर्णतः ओझल हो जाता है और केवल प्रकाश ही शेष रह जाता है। इस प्रकाश में नेत्र स्थिर होते ही आनन्द की हिलोरें उठने लगती है। मन चाहता है कि घण्टों इस स्थिति में बैठे रह कर उस उज्ज्वल प्रकाश को निहारते रहें और आनन्द से सराबोर होते रहें। यही स्थिति आत्म साक्षात्कार की भूमिका तक पहुँचने में सहायक बनती है।

अभ्यास के दौरान आँखों के सामने से आकाश का ओझल होना एक अद्भुत घटना है। इसे प्रगति का चिन्ह समझना चाहिए। ओझल होने का अभिप्राय यह है कि स्थूल नेत्रों से गोचर होने वाले भौतिक संसार का अस्तित्व नहीं रहा, वह मिट सा गया। संसार के अभाव का अहसास होने पर ही ईश्वर प्रकट होते है। जब यह अभाव पूर्ण रूपेण भासने लगे, तो विश्व के कण-कण में ईश्वर की अनुभूति होती है। चारों ओर ईश्वरीय चेतना के दर्शन होने लगते है। जगत की स्थूलता का जब नाष होता है तो उसका स्थान उसकी निमित्त सूक्ष्म सत्ता ले लेती है। इस स्थिति में अनेकता और भिन्नता नष्ट होकर एकता की प्रतीति कराने लगती है। सभी प्रकार की साँसारिक वासनाएँ और चिन्ताएँ समाप्त हो जाती है और भीतर आनन्द की अद्भुत निर्झरिणी प्रवाहित होने लगती है, इस आनन्द को पाकर साधक धन्य हो जाता है। इसके सामने सभी भौतिक आकर्षण फीके पड़ जाते है। और अन्ततः समाप्त हो जाते है। यह स्थिति आकाश त्राटक के साधक को सहज ही प्राप्त हो जाती है।

उक्त साधना करते समय नेत्रों के आगे दीवार, तार, खम्भा अथवा अन्य कोई भी वस्तु पड़ती हो, तो वह एक से दो होती प्रतीत होगी। यदि ऊपर गगन में कोई बादल का टुकड़ा हो, तो वह भी पहले दो में विभाजित होता दृश्यमान होगा, पीछे दो के एक हो जायेंगे। यह अनुभूति तब होती है, जब एकाग्रता बढ़ने लगती है और नेत्र करीब-करीब स्थिर हो जाते है। अतः इसे प्रगति का लक्षण कहा जा सकता है।

त्राटक के साधक की इस प्रकार की अनुभूति वस्तुतः उस गूढ़ दर्शन को ही उजागर करता है कि परमात्मा एक है और जीवात्मा उसी की सृष्टि उसी की अंशधर है, वह उसी से उत्पन्न होती और अनन्तः उसी में विलीन हो जाती है। एक का दो होना और दो का पुनः एक बन जाना इसी रहस्य का द्योतक है। अभी तक तो पुस्तकों के अध्ययन और सत्संग के आधार पर ही साधक यह मानता चला आया था कि जीवात्मा परमात्मा का अंश है और उसी से पृथक् होकर उसने पंचतत्वों का यह कलेवर धारण किया है, पर अब जब साधना के मध्य उसे इस प्रकार की अनुभूति होती है, तो वह सोचने लगता है कि यह स्वप्नवत् संसार ही वस्तुतः उस पूर्ण सत्य को समझ पाने के मार्ग में बाधक बना हुआ था। बाह्य संसार के मिटते ही दोनों का विलय-विसर्जन एकत्व और अद्वैत की स्थिति का स्पष्ट आभास मिलने लगता है और ‘पूर्णमदः ‘पूर्णमिदं........ ‘ का तत्त्वज्ञान स्फुट होने लगता है। गणित के साधारण विद्यार्थी को यह असमंजस हो सकता है कि पूर्ण में से पूर्ण को घटाने या जोड़ने पर पूर्ण किस प्रकार शेष रहेगा? परन्तु अध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिए इसमें कोई उलझन नहीं दिखाई पड़ती और साधना क्षेत्र में वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है, वैसे-ही-वैसे सत्य का साक्षात्कार होने लगता है, जिसे वह अब तक सिद्धान्त रूप में स्वीकारा था, उसका प्रत्यक्षीकरण हो जाने से वह पूर्ण संतुष्ट होकर प्रश्न से परे की भूमि में प्रतिष्ठित हो जाता है। इस अवस्था में जब वह जीवात्मा की पूर्णता को अनुभव करता और उत्पत्ति, स्थिति, एवं विनाश की तीनों दशाओं को स्वप्नवत् देखता है, तो उसे इस असार संसार का रहस्य समझ में आता है। इसी के पश्चात् उसके भीतर से एक अलौकिक शान्ति प्रस्फुटित होती है, उसका शरीर भाव मिटता और आत्मभाव जाग्रत होता है। इस स्थिति में परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहता। यही आत्म साक्षात्कार है। ईश्वर दर्शन इसे ही कहते है। जीवात्मा की चरम परिणति यही है। यहीं से उसकी संसार-यात्रा आरम्भ होकर अन्ततः यहीं समाप्त होती है। एक का दो होना तथा दो का फिर से एक ही सत्ता में विलय-विसर्जन इसी मर्म को उद्घाटित करता है। त्राटक का साधक इसे सरलतापूर्वक समझ लेता है।

साधना-अभ्यास ज्यों-ज्यों पुष्ट होता जाता है वैसे-ही-वैसे अनेक प्रकार के दिव्य-दर्शन होने लगते है। पंच तत्त्वों में आकाश सबसे सूक्ष्म है। वह बिल्कुल पोला व शून्य है। उसका कुछ भी आकार नहीं है। जब नेत्र स्थिर होते, तो साधक को विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ दिखाई पड़ने लगती हैं। आकर्षक प्राकृतिक दृश्य, मनमोहक उद्यान, चित्ताकर्षक सरोवर भी दृश्यमान हो सकते है, किन्तु विशेष रूप से ऋषियों और देवी-देवताओं की छवियों की ही इसमें प्रमुखता होती है। एक ही देवी या देवता दृष्टिपटल पर बराबर बने रहें-ऐसा भी नहीं होता। सिनेमा की रील की तरह उसमें दृश्य-परिवर्तन जारी रहता है।

आकाश-त्राटक से जब वृत्ति अन्तर्मुखी होती है, तो वह भीतर के आकाश को स्पर्श करती है। आकाश से तदाकार होने वाला आकाश जैसा ही हो जाता है। वह विराट का रूप धारण कर लेता है। अपना आपा खो देता है। उसका स्वयं का कुछ नहीं रह जाता। बंधनों से मुक्त होकर वह पक्षी की तरह आकाश में उन्मुक्त विचरण करने लगता है। आत्मानन्द की यही अवस्था है। त्राटक के अभ्यासी अन्ततः इसे उपलब्ध कर लेते और आत्मस्थ बन कर रहते है।

आकाश शून्य है। आकाश का अर्थ है-परम शून्यता-नितान्त अभाव जो है ही नहीं। सब कुछ नष्ट हो जाता है, पर आकाश ज्यों-का-त्यों बना रहता है, नहीं मिटता, उसे मिटाने का कोई उपाय भी नहीं है, वह मिटे कैसे? उसे कोई मिटाये कैसे? इसीलिए अन्य को अस्तित्व का परमात्मा का सार कहा जाता है। शाश्वत एकमात्र वही है। शेष सभी नश्वर है- परिवर्तनशील है। सभी प्रकार के नाम-रूप में परिवर्तन होता रहता है। केवल शून्य ही एक ऐसा अस्तित्व है, जहाँ परिवर्तन घटित नहीं होता, तभी तो उसकी एकमेव सनातनता स्वीकार की गई है। कबीर ने इस परम रहस्य को समझ लिया था, कदाचित तभी कहा था-गगन मंडल घर कीजै’ अर्थात् आकाश जैसा शून्य स्वयं को बना लो और शून्यता की स्थिति में निवास करो। स्वयं परमात्मा भी आकाश जैसा शून्य और विस्तृत है। ‘ॐ खं ब्रह्म’ में इसी का उद्घोष है। आकाश त्राटक की साधना करने वाला इस अवस्था को उपलब्ध करने में समर्थ होता है। त्राटक साधना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे पिछले जन्म के सभी संस्कार नष्ट होते जाते है और चित्त-शुद्धि की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। चेतना का शनैः-शनैः परिष्कार होता जाता है और चिन्तन काँच की तरह पारदर्शी और स्वच्छ बन जाता है। उसे परम सिद्धि ही मानना चाहिए। जब निर्विचार अवस्था में चित्त पूर्ण रूप से अवस्थान करता है, तो दिव्य दर्शन के दौरान उभरने वाली झांकियों का अन्त हो जाता है। यह इस तथ्य की परिचायक है कि साधके जाग्रत संस्कारों का क्षय हो गया।

यान आदि उच्च साधनाओं के लिए शरीर के शिथिलीकरण की कल्पना की जाती है, परन्तु त्राटक की यह विशेषता है कि इसमें कल्पना की अपेक्षा नहीं रहती। सफल साधक का शरीर त्राटक साधना पर बैठते ही कुछ ही समय में शिथिल होने लगता है। उसका आन्तरिक जागरण हो चुका होता है। वह हर समय उसका ध्यान साधना के लिए तत्पर और तैयार रहता है। शरीर कई चरणों में धीरे-धीरे गिरता है। बायें, दायें अथवा पीछे किसी भी ओर गिर सकता है। शरीर का लुढ़कना एक आश्वासन है कि एकाग्रता सुनिश्चित है और वह उच्च स्थिति में पहुँचने के लिए तैयार है। आकाश त्राटक में शरीर के शिथिल होने के बाद मन भी शिथिल हो जाता है। उसकी सारी उछल-कूद और चंचलता मिट जाती है। साधक एक ऐसी भूमिका में प्रतिष्ठित हो जाता है, जहाँ मन पर उसका पूर्ण नियंत्रण होता है। इस भूमिका के बाद वह शनैः-शनैः आगे बढ़ते हुए अपनी अन्तिम और चरम अवस्था में विराजमान् हो जाता है। यही आत्मदर्शन और अद्वैत की भूमिका है। इस अवस्था तक पहुँचने में आकाश त्राटक के साधक को कितना समय लगेगा, इसकी कोई निर्धारित सीमा नहीं है, फिर भी यदि वह पूर्ण आस्था और अटल विश्वास के आधार पर साधना जारी रखे, तो लक्ष्य तक पहुँचना सरल-सहज हो जाता है और समय भी अपेक्षाकृत कम लगता है।


गायत्री महाशक्ति रूपी ब्रह्मास्त्र

“मनुष्य अपने कर्म का फल तो भोगेगा ही। हम केवल निमित्त है उसके कर्म भोग के और उसमें हमारे लिए खिन्न होने की कोई बात नहीं है।” आकाश में नहीं, देवलोक में ग्रहों के अधिदेवता एकत्र हुए थे। आकाश में केवल आठ ग्रह एकत्र हो सकते है। राहु और केतु एक शरीर के ही दो भाग हैं और दोनों अमर हैं। वे एकत्र होकर पुनः एक न हो जायें, इसलिए सृष्टिकर्ता ने उन्हें समानान्तर स्थापित करके समान गति दी है। अधिदैव जगत में भी ग्रह आठ ही एकत्र होते है। सिर रहित कबन्ध हेतु की वाणी अपने मुख राहु से ही व्यक्त होती है।

देवराज कह रहे थे-मनुष्य प्रमत्त हो गया है इन दिनों। अतः उसे अपने अकर्मों का फल भोगना चाहिए।” शनिदेव कुपित हैं, भूतल पर मनु की उपेक्षा करने लगती है, मनुष्य जब सन्ध्या तथा सूर्योपस्थान से विमुख होकर नारायण से परांगमुख होता है, शनि कुपित होते है। यह उनका स्वभाव है। सूर्य भगवान के अतिरिक्त वे केवल देवगुरु का ही किंचित् संकोच करते है।”

“कलि का कुप्रभाव मनुष्यों को श्रद्धा विमुख बनाता है। बृहस्पति स्वभाव से दयालु है। उन्हें यह सोचकर ही खेद होता है कि धरा जो रत्नगर्भा है, अब अकाल पीड़ितों, संघर्ष संत्रस्त, रोग पीड़ित होकर उत्तरोत्तर अभाव ग्रस्त होती जाएगी। विश्व सृष्टा की महत्तम कृति मानव अब क्षुत्काम, कंकाल कलेवर, अशान्त, भटकता फिरेगा।

“हम कर क्या सकते है? बुध जो बुद्धि के प्रेरक है, प्रसन्न नहीं थे। उनके स्वर में भी खेद था-हम शक्ति और प्रेरणा दे सकते हैं, किन्तु मनुष्य आजकल ऐसी समस्त प्रेरणाओं को विकृत बना रहा है। वह अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के दुरुपयोग पर उतर आया है।”

देवताओं का मनुष्य अर्चन करे। उन्हें अपने यज्ञीय भाग से पुष्ट करे और देवता मनुष्यों को सुसम्पन्न, स्वस्थ, सुमंगलयोजित रखें, यह विधान ब्रह्माजी ने बनाया था अकस्मात् ही देवराज इन्द्र आ गये थे उस सभा में। वे वज्रपाणि रुष्ट थे- मनुष्यों ने यज्ञ का त्याग कर दिया। पितृ तर्पण से उसने मुख मोड़ लिया। अब वह कुछ हवन-श्राद्ध करता भी है तो स्वार्थ कलुषित होता है वह। सम्यक् विधि न सही, अल्पप्राण, अप्रशिक्षित, नर का अज्ञान क्षमा किया जा सकता है, किन्तु जब उसमें सम्यक् श्रद्धा भी न हो, जब वह दान-पूजन के नाम पर भी स्वजन सेवक तथा अपने स्वार्थ पूर्ति-कर्ताओं का ही सत्कार करना चाहें, उसके कर्म सत्कर्म कहाँ बनते है?

“देवता और पितर हव्य कव्य ही अप्राप्ति से दुर्बल हो रहे है।” देवराज ने दो क्षण रूप कर कहा “हमारे आशीर्वाद की मनुष्य को अपेक्षा नहीं रही है। वह अपने बुद्धिबल से ही सब कुछ प्राप्त कर लेना चाहता है। अतः आपस का यह योग यदि धरा पर आपत्तियों का क्रम प्रारम्भ करता है तो इसमें न आपका दोष है और देवताओं का।”

“युद्ध, अकाल, महामारी-बहुत दीर्घकाल चलेगा यह प्रभाव।” “सुरुकुरु ने दयापूर्वक कहा।” अल्प प्राण वाला कमजोर मनोबल वाला आज का अबोध मनुष्य आपकी कृपा का अधिकारी है। कलि के कल्मष से दलित प्राणी आपके कोप के योग्य नहीं।”

“मैं कोई आदेश देने नहीं आया। आप सब यदि आपकी चर्चा धरा पर हो अथवा आप कृपा करना चाहें तो अपने कुप्रभाव को सीमित कर सकते हैं।” देवराज ने कहा- “वैसे विपत्ति विश्वनियन्ता का वरदान है, मनुष्य के लिए। उसे व प्रमाद से सावधान करके श्रीहरि के सम्मुख करती है। मनुष्य भगवान के अभिमुख हो यही उसकी सबसे बड़ी सेवा है।”

“क्या आप चाहते है कि मनुष्य भोग विवर्जित रहे? संगीत, कला विनोद तथा विलास केवल सुरों का स्वत्व बना रहे?” शुक्राचार्य ने व्यंग किया।

“मैं आचार्य से विवाद नहीं करूँगा वैसे वैभव देकर मनुष्य को विषयोन्मुख कर देना उसका अहित करना है, यह मैं मानता हूँ। मनुष्य तो आज वैसे ही बहिर्मुख हो रहा है।” देवराज ने अपनी बात समाप्त कर दी।” मैं केवल एक प्रार्थना करने आया था। ब्रह्मवर्त के उस तरुण की चर्चा अनेक बार आपने देव सभा में सुनी है। देवताओं, पितरों की ही नहीं, आप सबकी (ग्रहों की) वह सत्ता मानता है, शक्ति मानता है और फिर भी सबकी उपेक्षा करता है। उसे विशेष रूप से आप ध्यान में रखेंगे।

“जो आस्थाहीन है, उन पर दया की जा सकती है। वे अज्ञ अभी समझते ही नहीं, किन्तु जो जानता है, आस्था रखता है, वह उपेक्षा करे मैं देख लूँगा उसे।” क्रूर ग्रह मंगल के सहज अरुण नेत्र अंगार बन गये।

“वह आश्रम वर्ण विवर्जित एकाकी मानव लगता है, कि देवराज के लिए आतंक बन गया है।” शुक्राचार्य ने फिर व्यंग किया। किन्तु वह न तपस्वी है और न शतक्रतु बनने की सामर्थ्य है उसमें। धर्माचरण के कठोर नियमों की उपेक्षा के समान ही वह अपने स्खलनों को भी महत्त्व तो देता नहीं। ऐसी अवस्था में उसका देवराज बिगाड़ भी क्या सकते हैं। वह इच्छा करे तो आज अमरावती उसकी होगी,

यह आशंका हो गयी लगती है। अतः उसे संत्रस्त करने को अब हम सब ग्रहगण इन्द्र की आशा के आधार बने हैं।”

ग्रहगणों की इस चर्चा से बेखबर युवक खाण्डेराव ने ब्रह्मवर्त में गंगा स्नान करे नित्यार्चन किया और जाकर जब ब्रह्माजी के मन्दिर में ठहरे उन साधु को प्रणाम करके बैठ गया तो वे बोल-अष्टग्रही योग तुम्हारे व्यय स्थान में पड़ता है। वैसे भी शनि, मंगल तथा सूर्य तुम्हारे लिए अनिष्ट कर रहें और राहु केतु किसी को कदाचित ही शुभ होते हैं। तुम ग्रह शान्ति का कुछ उपाय कर लो तो अच्छा।”

“आप जैसी आज्ञा करें।” खाण्डेराव ने प्रतिवाद नहीं किया। ये साधु वृद्ध हैं, विरक्त हैं, पर्यटनशील हैं। ज्योतिष के उत्कृष्ट ज्ञाता लोग इन्हें कहते हैं। बिना पूछे अकारण कृपालु हुए हैं उस पर। अतः इनके वचन काटकर इन्हें दुखी करना वह चाहता नहीं। वैसे किसी सकाम अनुष्ठान में उसकी रुचि नहीं है।

“जिसे रुष्ट होकर जो कुछ बिगाड़ना हो, बिना रुष्ट हुए ही वह उससे ले ले।” वह अनेक बार हँसी में कहता है। परिवार में कोई है नहीं। न घर है, न सम्पत्ति। सम्मान अवश्य है समाज में किन्तु वह उससे सर्वथा उदासीन है। बच रहा शरीर। वह कहता है.....”यह कुत्ते, सियार, पक्षियों, कछुओं अथवा कीड़ा का आहार इसे अग्नि लेगी या कोई और लेगा, इसकी चिन्ता करना मूर्खता है। कल जाना हो इसे तो आज चला जाय।”

“मृत्यु उतनी दारुण नहीं है, जितने दारुण हैं रोग। शरीर देखने, सुनने, चलने की शक्ति से रहित, वेदना व्याकुल खाट पर पड़ा सड़ता रहे....।” एक दिन एक मित्र ने कहा था।

“आदि शक्ति माँ गायत्री न कभी असमर्थ होती है, न निष्करुण। उसके स्वभाव में सुधार की भावना तो है, किन्तु ममता का अभाव नहीं। ये सारे अभाव सारे कष्ट तब तक जब तक इनको प्रसन्नता से सहा जाय। ये असह्य बनेंगे तो बालक माँ की पुकार करेगा। इनको विवश सहना पड़े उसे जिसका माँ की ममता से परिचय न हो।”

“मैंने सुना है कि तुम सकाम अनुष्ठान में अरुचि रखते हो। ग्रहों में सबसे उत्पीड़क शनि है। तुम नीलम धारण कर लो। उससे राहु केतु की शान्ति हो जाएगी। शनि अनुकूल हों तो शेष सबके अनिष्ट अधिक अर्थ नहीं रखते।” साधु ने समझाकर कहा।

इस उपदेश का उस पर क्या असर पड़ा कहा नहीं जा सकता। पर तरुण खाण्डेराव ने देखा समूचा ब्रह्मवर्त क्षेत्र अनुष्ठानों यज्ञ के मंडपों से सजा था। शतकुण्डी, सहस्र चण्डी तथा श्रीमद्भागवत के सप्ताह चल रहे थे स्थान-स्थान पर। अष्टोत्तर शत सप्ताह भी हुए। अखण्ड कीर्तन, अखण्ड रामायण पाठ के पवित्र स्वर दिशाओं को उन दिनों गुँजित करते रहते थे। कलि में जैसे सतयुग उतर आया था। आतंक स्वयं तामस सही, उसमें मनुष्य को कितनी सत्वोन्मुख करने की शक्ति है, यह उस समय प्रत्यक्ष हो गया था। गं गणपतये नमः। सर्व विघ्न विनाशक भगवान गणपति की पूजा तो प्रत्येक पूजन, यज्ञ, अनुष्ठान के प्रारम्भ में होनी ही थी। सभी पाठ-पारायण मंडपों में पार्वती नन्दन प्रतिष्ठा, पूजा हुई-हो रही थी।

मं मंगलाय भौमाय भूमिसुताय नमः। युद्धप्रिय, रक्तविकारकारी रक्तोद्गारी अंगार की शान्ति के लिए रक्तवस्त्र, रक्तचन्दन, लाल पुष्प का सम्भार तो था ही लाल गाय, ताम्र, तथा मसूर की दाल का दान भी अनेक लोगों ने किया। बहुतों ने मूँगा पहना।

शं शनिश्चराय सूर्यसुताय नमः। तैल और लोहे का दान तो शनिवार को अनेक लोग नियमपूर्वक करते हैं। उस समय काले तिल, उड़द, काले अथवा नीले वस्त्रों का दान बहुत लोगों ने किया। अनेक ग्रहशान्ति समारोहों में अपराजिता के पुष्प अर्चन में प्रयुक्त हुए। हाथी दान किसी ने किया या नहीं, किन्तु भैंसे का दान सुनने में आया। जौहरियों के यहाँ उन दिनों नीलम के ग्राहक भी पर्याप्त आए।

राहु-केतु की शान्ति के लिए भी मन्त्र जप हुए। काली वस्तुओं का दान हुआ। लहसुनिया की अंगूठियाँ पहनी लोगों ने। इनके अतिरिक्त भगवान सूर्य की भी चर्चा हुई। ॐ आदित्याय नमः पर्याप्त सुन पड़ा। सूर्य को रक्तकर्णिकार पुष्प तथा रक्त चन्दन, रक्त वस्त्र अर्पित हुए। रविवार को नमक रहित एकाहार व्रत भी बहुतों ने किया। लालमणि तो मिलती नहीं। माणिक्य उन लोगों ने अंगूठियों में लगाया, जिन्हें सूर्य प्रतिकूल पड़ते थे।

भले-भले कहि छाँड़िए, खोटे ग्रह जप दान। यह बात उन दिनों सर्वथा सार्थक हुई? जहाँ नवग्रह पूजन हुआ उन स्थानों की बात छोड़ दे तो चन्द्रमा बुध, गुरु और शुक्र की अकेले-अकेले अर्चना प्रायः नहीं हुई। एक जौहरी ने कहा सामान्य समय में अनेक लोग चन्द्रमा की सन्तुष्टि के लिए मोती बुध के लिए पन्ना, गुरु के लिए पुखराज और शुक्र के लिए हीरा लेने आते थे, किन्तु इस काल में इन रत्नों का विक्रय अत्यल्प हुआ। लोग जैसे इनका उपयोग ही भूल गए।

ब्राह्मणों को भी श्वेत, पीला, हरित धान्य, वस्त्रादि केवल, नवग्रह पूजन जैसे अवसरों पर ही प्राप्त हुए।

“तुम्हें नीलम नहीं मिला?” ऐसे समय में खाण्डेराव को अँगूठी रहित देखकर उन साधु ने एक दिन पूछ लिया। वैसे भी उत्तम नीलम कठिनाई से मिलता है और अष्टग्रही के दिनों में उसका न मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

नीलम आपने तो मुझे नीलमणि धारण करने को कहा था। खाण्डेराव ने सहज भाव से कहा। नीलम तो रत्न है, पत्थर है। वह मणि तो है नहीं। विश्व में आज मणि (स्वतः प्रकाश रत्न) कहीं मिलता नहीं। केवल रत्न है जो दूसरों के प्रकाश में चमकते हैं। वैसे भी मैं पत्थरों में नहीं प्रकाश में चमकते हैं। वैसे भी मैं पत्थरों में नहीं, प्रकाश पुञ्ज में आस्था रखता हूँ। इस नश्वर शरीर को सज्जित करने की अपेक्षा मैंने हृदय को प्रकाश की परम श्रोत माँ गायत्री से अलंकृत करना अच्छा माना। आपका तात्पर्य समझने में मैंने भूल तो नहीं की?

“भूल तो मैं कर रहा था” साधु ने खाण्डेराव को दोनों भुजाओं में भर लिया तुम्हारा उपाय तो भव-महाग्रह को शान्त कर देने में समर्थ है। क्षुद्र ग्रहों की शान्ति का अर्थ तब क्या रह जाता है।”

“आप सब एक क्षुद्र मनुष्य का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके?” अष्टग्रही को बीते पूरे छः महीने हो चुके थे। देवलोक में वे देवराज के आमंत्रण पर पुनः एकत्र हुए थे। देवराज को इस पर कोई आक्रोश नहीं था कि पृथ्वी पर कोई महाविनाश नहीं हुआ। जो यज्ञ, अनुष्ठान दान, मनुष्यों ने किए थे, उसे प्राप्त कर देवाधिपति सन्तुष्ट थे। उन्हें क्षोभ केवल यह था कि उन्होंने जिस व्यक्ति विशेष को लक्ष्य बनाया था, वह अप्रभावित ही रह गया।

“किसी का अमंगल करना मेरा स्वभाव नहीं है। वक्र होने पर भी मैं केवल व्यय कराता हूँ और बृहस्पति अशुभ कर्मों में अर्थ व्यय कराएगा नहीं।” देवगुरु ने इन्द्र को झिड़क दिया। वक्री होकर भी जो मैं नहीं करता, व्यय स्थान में स्थित होकर मैंने वह किया है। खाण्डेराव ने अपने छोटे से संग्रह का प्रायः सब कुछ दुखियों, अभावग्रस्तों को दे दिया है।”

व्यय स्थान पर स्थित बुध जब गुरु के साथ हो, केवल सतगुरु की सहायता कर सकता है। आकार से कुछ ठिगने, गठीले, गोल मुँह वाले बुध ने कहा- “देवराज सहस्राक्ष हैं। उन्होंने देखा है कि इसमें मैंने कोई प्रमाद नहीं किया है।”

“आप दोनों से पहले भी अधिक आशा नहीं थी।” देवेन्द्र ने उलाहना दिया। “ आपने तो प्रतिपक्ष को प्रबल ही बनाया। दान और धर्म व्यक्तियों को दुर्बल तो बनाया नहीं करते। संसार में कोई कंगाल हो जाय-इससे हम देवताओं का क्या लाभ?”

देवताओं के अधिपति को जब मालूम ही था तो इस प्रकार की आशा क्यों करने लगे। आचार्य शुक्र व्यंग प्रवीण हैं, उन्होंने अपने स्वभाव के अनुसार व्यंग किया।

“आपने भी तो कुछ किया नहीं।” इन्द्र के मुख से सहज निकल गया।

शुक्र से सुर स्वहित की भाषा कब से करने लगे? “दैत्याचार्य ने फिर कटाक्ष किया। द्वादश भवन में स्थित शुक्र शुभ होता है। शुक्र सूर्य के साथ मेरा प्रभाव अस्त न हो गया होता, तो महाशक्ति के उस आश्रित को अमित ओज दे आता। मैंने उसकी श्रद्धा और संयम को शक्ति नहीं दी, उसे आनन्दोपलब्धि का शुभ मार्ग नहीं दिखाया, यह आक्षेप मेरे प्रतिस्पर्धी बृहस्पति भी मुझ पर नहीं कर सकते।”

महाशक्ति की जिस कान्ति का अंश लेकर मैं कान्तिमान हूँ।” नित्य सौम्य चन्द्रमा उठ खड़े हुए। “उनका कोई आश्रय लेता हो, मेरी अनुकूलता प्राप्ति के लिए उसे क्या और कुछ करना आवश्यक रह जाता है? उसके लिए यह विचार व्यर्थ है कि चन्द्र अष्टम है या द्वादश उसे तो मेरा सदा आशीर्वाद प्राप्त है।”

“हम दोनों तुम्हारे मित्र हैं।” राहु ने रुक्ष सुर में बिना संकेत पाए ही बोलना प्रारम्भ किया। “वैसे भी हमारे साहस की सीमा है। जिन आदि शक्ति गायत्री की एक कला को पाकर सृष्टि की समस्त शक्तियाँ सक्रिय हैं, उनके आश्रित पर हमारी छाया अनिष्ट बनकर नहीं उतर सकती। हम उसका रोष नहीं, कम से कम उदासीनता तो पा सकते हैं, अनुकूल बनकर। उसकी श्रद्धा-पूजा का स्वप्न हम नहीं देखते।”

“ मैंने सुरेन्द्र की आज्ञा का सम्मान किया है।” युद्ध के अधिष्ठाता मंगल उठे। रक्तारुण वस्त्र, विदु्रमभाल, उन ताम्रकेशी के अंगार नेत्र इस समय शान्त थे। “ खाण्डेराव को ज्वर आया, थोड़ी चोट लगी और रोष आया। अब मैं इसका क्या करूँ कि वह अपना क्रोध आदि शक्ति माँ गायत्री के माध्यम से शान्त कर लेता है। जिनकी शक्ति का एक कण पाकर मंगल शक्तिमान उनके लाड़ले शिशु का कुछ आर्थिक अनिष्ट करना मेरे बस में नहीं था। फलतः विजय का नीरव वरदान तो मुझे अपनी धृष्टता का मार्जन करने के लिए देना पड़ा। उसने उसे मनोजय में प्रयुक्त किया, शत्रुजय में भी कर सकता था और सुरेन्द्र, इस समय आप उससे शत्रुता कर रहे हैं, यह आप भूले नहीं होंगे।”

“आदि शक्ति गायत्री के महातेज से ही मैं तेजस्वी हूँ।” भगवान सूर्य ने बड़े मृदुल स्वर में कहा। “महेन्द्र उनके किसी भक्त का अनिष्ट चाहेंगे तो यह चिन्तन स्वयं उन्हें भारी पड़ेगा

“यही बात मैं कहता हूँ।” इस बार कृष्ण वर्ण, निम्न नेत्र भयानक आकृति शनिश्चर खड़े हुए। “जिनकी आराधना स्वयं भगवान शिव करते हैं उन आदिशक्ति वेदमाता के अनुग्रह भाजन का अपकार, कोई कर भी कैसे सकता है। मैंने स्वर्ग की ओर दृष्टि नहीं उठाई - यही मेरा कम अनुग्रह नहीं है।”

“सुरेन्द्र, तुमसे मेरे शिष्य दैत्य-दानव अधिक बुद्धिमान हैं।” शुक्राचार्य फिर बोले। “आदि शक्ति वेदमाता गायत्री को जो भूल से भी माँ कहकर पुकारता है, उसकी ओर ये देखते ही नहीं और तुम आशा करते हो कि ग्रह उसे उत्पीड़ित करेंगे? सम्यक् ग्रह शान्ति-सबकी सर्वानुकूलता वेदमाता गायत्री के श्रीचरणों में रहती है। गायत्री महामन्त्र का आश्रय लेने वाले का अनिष्ट-अमंगल नहीं हुआ करता। गायत्री का ब्रह्मास्त्र जिसके पास है, उसके पास सब कुछ है।” यह सब कुछ सुनकर इन्द्र ने मस्तक झुका लिया था।


सच्चे और आत्मीय मित्र श्रेष्ठतम संपत्ति

मित्रता मानव शक्ति की एक स्वाभाविक वृत्ति है। प्रत्येक व्यक्ति ऐसे साथी की खोज में रहता है जिसके समक्ष वह अपने हृदय को खोलकर रख सके। अपने अन्तर में छिपे हुए भावों को निःशंक होकर व्यक्त कर सके। जो कष्ट मुसीबत के समय हार्दिक सहयोग दे सके। मित्रता का सम्बन्ध मनुष्य के लिए वह वातावरण पैदा करता है जहाँ वह अपने आंतरिक और बाह्य जीवन की अभिव्यक्ति सरलता से कर सके, जहाँ मनुष्य अपने आपको अकेला महसूस नहीं करता। मित्रों के सहयोग से मनुष्य की जीवन यात्रा सहज सरल और निरापद हो जाती है। प्रसिद्ध दार्शनिक सिसरो ने लिखा है-इस संसार में मित्रता से अधिक कुछ भी मूल्यवान नहीं मनुष्य के लिए।”महात्मा गाँधी के शब्दों में “सच्चे मित्र मिल जाना मनुष्य के लिए दैवी वरदान है।”

मित्रता जितनी बहुमूल्य है उतना ही इसे पैदा करना, स्थिर रखना और जीवित रखना, सदा-सदा कायम रखना भी कठिन है। मित्रता भी एक व्यवहारिक साधना है। मित्रता हृदय के निर्बाध आदान-प्रदान पर टिकती है। मैत्री पूर्ण सम्बन्ध एक परिवार के सदस्यों में भी नहीं हो सकते है और दो अनजान व्यक्तियों में हो सकते है।

मित्रता दो व्यक्तियों के बीच स्नेह के आदान-प्रदान और आंतरिक एक्य पर निर्भर करती है। मित्रता का कोई मूल्य नहीं हो सकता वह परस्पर स्नेह प्रेम और सद्भाव पर निर्भर करती है। कोई स्वार्थ साधना या व्यापार नहीं है मैत्री। स्वार्थ पूर्ति के लिए, अपना उल्लू सीधा करने या कोई लाभ के लिए मैत्री जोड़ने वाले ढेरों मिल जाते हैं लेकिन सच्चे मित्र इस दुनिया में बिरले सौभाग्यशालियों को ही मिल पाते है।

मित्र जीवन में साथी ही नहीं मार्गदर्शक सहायक भी होता है इस लिये मैत्री स्थापित करने के लिए मनस्वी, सदाचारी, सद्गुणी व्यक्ति ढूँढ़ता चाहिए। बुरे मित्र मनुष्य को पतित कर सकते है। इसलिए कन्फ्यूशियस ने कहा है- “ ऐसे मनुष्य से मित्रता न करो जो तुमसे श्रेष्ठ न हो।” भले और सज्जन व्यक्तियों से की गयी मित्रता ही स्थिर और हितकारी सिद्ध होती है। सिसरो ने कहा है कि “केवल सज्जनों में ही मित्रता कायम रह सकती है। दुष्ट और असाधु प्रकृति के व्यक्तियों की मित्रता कभी भी हितकर नहीं होगी। पंचतंत्र में कहा गया है -

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लब्धीपुरा वृद्धिमती च पश्चात्। दिनस्य पूर्वार्ध परार्ध भिन्ना छायेव मैत्री खल सज्जनानाम॥

दुष्ट की मित्रता सूर्य उदय के पीछे की छाया के सदृश्य पहले तो लम्बी - चौड़ी होती है फिर क्रम से घटती जाती है और सज्जनों की मित्रता तीसरे पहर की छाया के सदृश्य पहले छोटी और फिर क्रमशः बढ़ती जाती है। स्थायी और फलदायी मित्रता सज्जनों और भले आदमियों के बीच ही स्थिर रहती है। दुष्ट की मित्रता क्षणिक अस्थायी और बनावटी होती है।

मित्रता को स्थिर और दृढ़ रखने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है सहिष्णुता और उदारता की। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ कमी रहती ही है। पूर्ण निर्दोष और गुण सम्पन्न व्यक्ति कोई नहीं होता। हमने जिनसे मित्रता की है वे अपवाद स्वरूप कैसे हो सकते है। मित्रता की स्थिर रखने के लिये एक दूसरे के व्यक्तिगत, स्वाभाविक दोषों को गौण समझना पड़ेगा अन्यथा दोष दर्जन और उससे प्रेरित छींटाकशी, आरोप - प्रत्यारोपणों से तो मित्रता की मूर्ति ही टूट-फूट जायेगी।

मित्रता के सम्बन्ध में दूसरी महत्त्वपूर्ण बात है- एक दूसरे के वैचारिक मतभेदों के कारण मैत्री सम्बन्धों के बीच दरार उत्पन्न न होने दी जाय। समस्त विश्व और मानव प्रकृति अनन्त रहस्यों से भरी पड़ी है। प्रत्येक व्यक्ति के अपने विश्वास होते है, और अपना-अपना दृष्टिकोण। दो व्यक्तियों में चाहें वे कितने ही अभिन्न हों किसी भी विषय पर मतभेद हो सकता है। इस तरह के व्यक्तिगत मतभेदों को मित्रता के प्रसंग से दूर रखना चाहिए अपनी ही सीमा तक अन्यथा वर्षों से चली आई मित्रता क्षण भर में ही नष्ट हो जाती है। ऐसे प्रसंगों को आने ही न दिया जाय जिससे मतभेदों को प्रोत्साहन मिले, व्यर्थ ही बहस छिड़े, ऐसे कार्य और व्यवहार से सर्वथा बचना चाहिए जिनसे मित्र की भावनाओं को आघात लगे या उसे मजबूरी का सामना करना पड़े

चाणक्य ने लिखा है -

इच्छेच्चेव विपुलाँ मैत्री त्रीणि तत्र न कारयेत्। वाग्वादार्थ सम्बन्ध तत्पत्री परिभाषणम्॥

“मित्र से बहस करना, उधार लेना-देना उसकी स्त्री से बात चीत करना छोड़ देना चाहिए। ये तीन बातें मित्रता में बिगाड़ पैदा कर देती हैं।” मित्रता दो व्यक्तियों का हार्दिक संगम है। उनका आंतरिक जीवन अत्यन्त नजदीक होता है तो उससे प्रेरित बाह्य जीवन भी। किसी भी व्यक्ति की मित्रता पूर्ण नहीं होती जब तक कि वह अपने मित्र की अनुपस्थिति, गरीबी और आपत्ति में सहायता नहीं करता एवं मृत्यु के उपरान्त भी उसके अधिकारों की रक्षा नहीं करता।

हमें अच्छे मित्र ढूँढ़ने चाहिए। उनसे मैत्री सम्बन्धों को स्थायी और स्थिर बनाने के लिये पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। सच्चे और आत्मीय मित्रों का पाना वास्तव में सच्ची सम्पत्ति है।


आत्मबल ही सर्वोपरि

सृष्टि में प्रकृति की अनेकानेक शक्तियाँ अपने-अपने ढंग से कार्यरत है। मनुष्य अपनी क्षमता के अनुसार उनसे लाभ भी उठाता रहता है। उसके पास भी आत्मा की अकूत शक्ति है, पर विरले ही उस वैभव का सुनियोजित लाभ ले पाते हैं। प्रायः व्यक्ति शरीर-बल बुद्धि-बल संघ बल और धन-बल के सीमित दायरे में सिकुड़ा सिमटा रहता है और उसी को सब कुछ मानकर तदनुरूप तानाबाना बुनता रहता है। वह यह भूल जाता है कि उसके अन्तराल में भी एक अद्वितीय शक्ति स्रोत विद्यमान् है जो उक्त सभी बलों का-शक्तियों का प्राण है। जब तक यह सामर्थ्य हमारे पास नहीं होती, तब तक धन, बुद्धि स्वास्थ्य, संघ आदि की सामर्थ्यों से भी क्रमबद्ध जीवन-विकास कर सकने और जो उपलब्ध है, उसका समुचित लाभ एवं आनन्द उठा सकने से वंचित रह जाना पड़ता है। इस सर्वोपरि बल-सामर्थ्य का नाम है-आत्मबल आत्मबल के अभाव में सारी भौतिक सामर्थ्य तथा उपलब्धियाँ केवल बलवान होना ही काफी नहीं है। बल का-शक्ति का सही दिशा में सदुपयोग होना ही कौशल है, जिसके आधार पर समर्थता का लाभ उठाया जा सकता है।

आत्मबल के अभाव में वह विवेक-बुद्धि जाग्रत नहीं होती, जो वासनात्मक इन्द्रिय असंयम पर, तृष्णात्मक अनियन्त्रित महत्त्वाकाँक्षाओं एवं आलस्य, प्रमादात्मक, मानसिक असंयम पर नियंत्रण कर सके। अन्तः करण में विद्यमान् दैवी और आसुरी शक्तियों का उभार तीव्र होता है, वे निकृष्ट स्वार्थों की पूर्ति के लिये दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिये प्रेरणा देती रहती हैं, उनके ऊपर नियंत्रण करना भी बिना आत्म-बल के सम्भव नहीं। इन्द्रियाँ, मन और अन्तःकरण में विद्यमान् आसुरी सत्ता दुर्बुद्धि का रूप धारण कर हमारे कठोर परिश्रम द्वारा उपार्जित सामर्थ्यों को अपव्यय एवं दुर्व्यय की ओर धकेल देती है। जब दिशा सही नहीं तो सुख-शान्ति एवं प्रगति का लक्ष्य कैसे मिले? यही वह विडम्बना है, जो हमारे प्रयास और परिश्रम को निष्फल बना देती है। प्रगति की प्रबल आकांक्षा को पूरा करने के लिये हम अपनी समझ के अनुसार निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं। फिर भी दुर्भाग्यवश खाली हाथ ही रहना पड़ता है।

हमें जानना चाहिए कि मनुष्य केवल शरीर मात्र ही नहीं है। उनमें एक परम तेजस्वी आत्मा भी विद्यमान् है। हमें जानना चाहिए कि मनुष्य केवल धन, बुद्धि और स्वास्थ्य के भौतिक बलों से ही साँसारिक सुख, सम्पदा, समृद्धि एवं प्रगति प्राप्त नहीं कर सकता, उसे आत्म-बल की आवश्यकता है। आत्मा के अभाव में शरीर की कीमत दो कौड़ी भी नहीं रहती। इसी प्रकार आत्म-बल के अभाव में उपर्युक्त तीनों शरीर-बल मात्र खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।

आत्म-चेतना की विस्मृति मानव-जीवन की एक भयावह भूल है। यों कहने-सुनने को हम आत्मा शब्द बार-बार पढ़ने, सुनते हैं। उसके सम्बन्ध में कौतूहल भरी विवेचनाएँ भी बार-बार सामने आती-जाती है, पर वस्तुतः यह अनुभव होता कभी भी नहीं है। कि हम आत्मा है। अभ्यास और विश्वास यही है कि हम शरीर के रूप में जो कुछ जाने-माने जाते है, वही हैं- उतने ही हैं। शरीर भावना इतनी प्रबल परिपक्व हो गई है कि यह अनुभव करना अति कठिन है कि हम शरीर से भिन्न एक परम पवित्र एवं परम समर्थ चेतना केन्द्र हैं। यदि ऐसा अनुभव होने लगे तो सोचने का सारा आधार ही बदल जाय।

“मैं आत्मा हूँ शरीर मेरा उपकरण है। मेरा स्वार्थ, आत्मिक स्वार्थ परमार्थ है। उसे शरीर स्वार्थों की वेदी पर बलिदान न करूँगा आत्मसत्ता के प्रति यह विद्रोह जब सजग विवेक द्वारा आरम्भ होता है तो अन्तरंग में एक भावनात्मक महाक्रान्ति उठ खड़ी होती है और सोचने तथा करने की पद्धति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करने के लिए विवश होना पड़ता है। यही वह मर्मस्थल है, जहाँ आत्म-जागरण आत्म-निर्माण आत्म-विकास की सम्भावनायें मूर्तिमान् होती है। यही वह प्रवेश द्वार है, जहाँ से ऋद्धि सिद्धियों-महान् विभूतियों का रत्न भण्डार जगमगाता हुआ दीखता है। जो कि भी व्यक्ति को सफलता के द्वार पर पहुँचा सकता है।

आत्म-ज्ञान के साथ यह मान्यता जगती है कि हमारा स्वरूप और लक्ष्य क्या है? हमें क्या सोचना और करना चाहिए? इन प्रश्नों के उत्तर अन्तःकरण में से अनायास ही, स्वयमेव ही उठते हैं। जीवन के लिये, विचारणा को परिष्कृत करने के लिये, गतिविधियों को व्यवस्थित करने के लिये-एक प्रचण्ड साहस, उत्साह एवं उल्लास यदि अन्तरंग में से फूट पड़े तो समझना चाहिए कि आत्म-जागरण एवं आत्म-साक्षात्कार का एक सौभाग्यशाली शुभ मुहूर्त आ गया। इस विवेक बिन्दु पर खड़ा हुआ व्यक्ति बड़े महत्त्वपूर्ण आश्चर्य चकित करने वाले एवं दुस्साहसपूर्ण निर्णय करता है।

आत्म-बल कर प्रधान लाभ जीवन को सर्वोत्तम सदुपयोग के लिए प्रस्तुत करना है। अपने आपकी समीक्षा कर सकना, अपनी गतिविधियों को निकृष्टता की कीचड़ में से निकाल कर उत्कृष्टता के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर सकना मानव-जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और मानवी चेतना की सबसे बड़ी सफल साधना है। जीवन-क्रम देखने में सामान्य भले ही रहे, अन्तरंग की उत्कृष्टता को जो समुन्नत कर सके वस्तुतः वही महापुरुष है। पुरुष का महापुरुष के रूप में, नर का नारायण के रूप में, क्षुद्र का महान् के रूप में परिणित हो जाना यही जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति है।

यहाँ मनोबल और आत्म-बल का अन्तर हमें समझ लेना चाहिए। मनोबल, इच्छा-शक्ति दृढ़ता, साहस और धैर्य का नाम है। इन गुणों का अपना महत्त्व है। साँसारिक सफलतायें इन्हीं गुणों के आधार पर मिलती है। मनस्वी लोग कठिनाइयों से डरते नहीं वरन् दूने उत्साह से कष्ट सहते हुए संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं। जबकि दूसरे लोग पग-पग पर निराशा आशा के हर्ष-लोक के झूले में झूलते रहते है, तब मनोबल सम्पन्न व्यक्ति अविचल भाव से निर्धारित दिशा में तत्परता पूर्वक गतिशील रहते हैं। साहस के आधार पर बड़े-बड़े कठिन कार्य पूरे होते हैं।

परिश्रमी, उद्योगी पुरुषार्थी लगने वाली सफलतायें प्राप्त कर लेते हैं। उत्साह और स्फूर्ति का चुम्बकीय आकर्षण अनेक दिशाओं से सुविधा साधन तथा सहयोग खींचकर सामने खड़े कर देते हैं। संसार में छोटे-छोटे मनुष्यों ने अभावों और असुविधाओं को चीरते हुए प्रगति की है, उसमें उनके साहस, श्रम, धैर्य और मनोबल का ही श्रेय है। भौतिक पतियों की कुञ्जी मनोबल ही तो है।

मनोबल का अपना महत्त्व है, पर है इसी सीमा तक कि किन्हीं कार्यों को सिद्ध करने में प्रयुक्त हो सके। आत्म-बल इससे ऊँची शक्ति है, उसमें साहस और बल तो होता है पर ऊँचे स्तर का। आदर्शों और सिद्धान्तों पर अड़े रहने, किसी भी प्रलोभन और कष्ट के दबाव में कुमार्ग पर पग न बढ़ाने, अपने आत्म गौरव के अनुरूप सोचने और करने दूरवर्ती भविष्य के निर्माण के लिये आज की असुविधाओं को धैर्य और प्रसन्नचित्त से सह कसने की दृढ़ता का नाम आत्म-बल है। जो वासना और तृष्णा को-स्वार्थ और सुविधा को ठोकर मारकर अपने लिये नहीं, लोक-मंगल के लिए सदाचार से भरा, प्रेम और आत्मीयता से भरा जीवन जी सकता है, उस महामानव को ही आत्म-बल सम्पन्न कहा जाएगा

आत्म-बल आत्मा की उच्च स्थिति का प्रकाश है। उसके आधार पर किसी की आन्तरिक महानता नापी जा सकती है। जो आत्मिक दृष्टि से जितना महान् है। उसे इस संसार का उतना ही बड़ा सम्पन्न और विभूतिवान् मानना चाहिए। ऋषि और मनीषियों के पास यही सम्पदा होती है और वे इसी विभूति के बल पर आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करते हुए चन्दन वृक्ष की तरह अपने समीपवर्ती लोगों को सुरभित-लाभान्वित करते रहते हैं।

मनुष्य शरीर में ईश्वर का अंश उसके आत्म-बल के आधार पर आँका और नापा जा सकता है। जिसमें जितना आत्म-बल हो, समझना चाहिए कि उसके व्यक्तिगत में उतनी ही मात्रा में ईश्वर का निवास है। जहाँ ईश्वर है, वहाँ ऐश्वर्य की क्या कमी। दूसरे उसे गरीब एवं अभावग्रस्त समझते हों तो समझे, पर अपनी विभूतियों का मूल्य समझते हुए वह स्वामी रामतीर्थ की तरह अपने को राम-बादशाह ही समझता है। समझता ही नहीं - उसी स्तर की प्रसन्नता एवं संतुष्टि भी अनुभव करता है।

जिनके प्रकाश से जन समाज को श्रेय पथ पर चलने का मार्गदर्शन मिलता है, जो अपने अनुकरण की प्रेरणा देकर असंख्यों को उठाते, उबारते, बढ़ाते और पार करते हैं। वे आत्म-बल सम्पन्न महामानव ही होते है। चरित्र के धनी, करुणा दया, परिपूर्ण हृदय उदारता और आत्मीयता से ओत-प्रोत व्यक्तित्व आत्म-बल के ही प्रतीक हैं। ऐसे महाभाग देवदूतों की तरह जीवन मुक्त की तरह जीते हैं। संसार उनकी उपस्थिति से सुगन्धित, सुरभित, समुन्नत और व्यवस्थित होता है। वे अपनी सामर्थ्य से दिशायें बदलने और हवायें पलटने में समर्थ होते हैं। उन्हें धरती का देवता ही कहा जायेगा, भले ही साधारण गृहस्थ व्यवसायी के रूप में जीवन यापन करते हों अथवा लोकसेवी परमार्थी के प्रयोजनों में संलग्न हों। उनका आशीर्वाद जिन्हें मिल गया वह कृतकृत्य हो जाता है।

आत्म-बल वह क्षमता है, जिसका जितना अंश मनुष्य के पास होगा, उतना ही वह अपने विवेक को सजग कर सकने में समर्थ होगा। विवेक ही वह सत्ता है जो धन, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की भौतिक शक्तियों को नियंत्रण में रखकर उन्हें सन्मार्गगामी बनाती है। सदुद्देश्य और सत्प्रयोजनों में प्रवृत्त करती है। अध्यात्म स्तर के यह प्रयोग ही हमारी भौतिक उपलब्धियों को सार्थक बनाते हैं।

आत्म-बल वह क्षमता है, जिसका जितना अंश मनुष्य के पास होगा, उतना ही वह अपने विवेक को सजग कर सकने में समर्थ होगा। विवेक ही वह सत्ता है जो धन, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की भौतिक शक्तियों को नियंत्रण में रखकर उन्हें सन्मार्गगामी बनाती है। सदुद्देश्य और सत्प्रयोजनों में प्रवृत्त करती है। अध्यात्म स्तर के यह प्रयोग ही हमारी भौतिक उपलब्धियों को सार्थक बनाते हैं।


शक्ति साधना ही हम सबका लक्ष्य हो

भगवान ने मनुष्य को दिव्य शक्तियों की बहुमूल्य सम्पदायें सौंपी है। यह गरिमा मानव-व्यक्तित्व में जन्मजात सन्निहित है। अतः विवशता और मूढ़ता की दशा में पड़े रहना उसके इस आत्मा गौरव के विरुद्ध है। दरिद्रता और दुर्बलता से चिपटे रहना अपना और अपने आप परमात्मा का अक्षम्य तिरस्कार है, घोर अपराध है।

मानवीय काया के प्रत्येक कल-पुर्जे में असाधारण क्षमताएँ सर्वविदित हैं। मस्तिष्क की दिव्य विभूतियों की अनन्त सामर्थ्य तो आधुनिक विज्ञान के लिये अभी अविज्ञात ही है। पर जो ज्ञात है वही कुछ कम विस्मय कारक और ऐश्वर्य सम्पन्न नहीं है। संसार की सर्वोत्कृष्ट सम्पदायें भी उसके सामने तुच्छ ही है।

हृदय की विशालता का तो कहना ही क्या। उदात्त हृदय मनुष्य ही संत और भक्त बनते है। स्वयं परमात्मा-सत्ता भी संतों-भक्तों की भाव−संवेदनाओं की गहराई और प्रखरता से स्पन्दित-पुलकित हो उठती है। उत्सर्ग, करुणा और प्रेम की एक ही झलक सृष्टि में व्यापक हलचल उत्पन्न करने में समर्थ होती है। हृदय तो ऐसी अनुपम-अनमोल भावसंवेदनाओं का अनंत आकाश है। विपुल समृद्धि-सामग्री की पूँजीभूत प्राण-प्रतिभा यदि दुर्बल बनी रहे तो इससे अधिक दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?

दरिद्र वह नहीं है जिसके पास साधन-सुविधायें पैसा पूँजी नहीं है। इस तरह के अभाव तो व्यक्तित्व परिष्कार के लिये ली जाने वाली महत्त्वपूर्ण परीक्षायें है, साहस पुरुषार्थ को दी जाने वाली चुनौती है। उत्कर्ष के लिये प्रस्तुत किये गये उपहार हैं आत्मसाधना के मार्ग का स्वाभाविक पड़ाव है। इतिहास और शास्त्र इस तथ्य की साक्षी है। आज तक जो भी महामानव हुये है, उनकी सफलता सार्थकता महिमा-महानता का आधार बाह्य साधन और सुविधायें कभी नहीं रहीं। अधिकांश महापुरुषों को तो बाहरी दृष्टि से सफलता प्राप्त ही नहीं हुई। भौतिकता की कसौटियों पर तो वे विफल ही करार दिये जा सकते है। पर उनकी महानता एक असंदिग्ध सत्य है ऐतिहासिक तथ्य है।

महापुरुषों को उपलब्ध सम्पदायें मानव मात्र को प्राप्त हैं। जब उसके दीन-दरिद्र रह आने का कारण क्या है? विचारों-भावनाओं की क्षुद्रता एवं संकीर्णता ही इसका एकमात्र कारण है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि दरिद्रता-दुर्बलता सदैव आंतरिक होती है। इसे ही बाह्य वस्तु या जगत पर प्रक्षेपित कर दिया जाता है। शारीरिक मानसिक आलस्य-प्रमाद के कारण ही मनुष्य अभावों घिरता है। मनोबल का अभाव उसे सदा ही पीछे रखता है। प्रगति पथ में अग्रसर होने का साहसपूर्ण संकल्प उसके भीतर जगता ही नहीं, यही दुर्बलता है, जो प्रगति के मार्ग में अवरोध बनकर खड़ी हो जाती है। आंतरिक दुर्बलता एक प्रकार का आत्म-छल है। इसलिये वह अमृत आचरण छल-कपट-हिंसा-चोरी आदि से कम गंभीर अपराध नहीं, अधिक ही है, इस अपराध का दण्ड सभी को मिलता ही है। प्रकृति सबसे बड़ी न्यायाधीश है। प्रभु प्रदत्त प्रतिभा का प्रयोग न करना आंतरिक शक्ति संचय के लिये आवश्यक उद्यम न करना कर्तव्य हीनता है। अपने शरीर को नष्ट करने का प्रयास करने वाले आत्महत्या के लिये तत्पर व्यक्तियों को पुलिस पकड़ कर न्यायालय के हवाले करती है और उन्हें कारागार भेज दिया जाता है। आंतरिक शक्ति को नष्ट करने वाले भी दण्डित होते है। वे सदैव संकीर्णता के कारागार में बंदी बने रहते है। असाध्य की बात भिन्न हैं। उनके अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति में शारीरिक सामर्थ्य अर्जित करने की भी क्षमता पर्याप्त होती है, यदि वह अपने समय और श्रम का सदुपयोग सीख लें। जिन्हें कैसी भी शिक्षा नहीं प्राप्त है वे यदि दुर्बलता में फँसे रहें तब तो समझा जा सकता है। पर जिसे सामान्य शिक्षा भी प्राप्त है ऐसे व्यक्ति के लिये क्रमशः शक्ति अर्जन के द्वार सदैव ही रहते है। फिर उनका उठ न पाना समझ में नहीं आता।

समय और श्रम सदुपयोग और चरित्र को उज्ज्वल बनायें रखना तथा परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना जिसे भी आ गया, वह शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आर्थिक, भी क्षेत्रों में निश्चित ही संतोषजनक प्रगति कर सकता है। ऐसा करना मनुष्य का सर्वोपरि कर्तव्य भी है। इस कर्तव्य की अवहेलना प्रकृति को असहा है। सृष्टि-उद्यान में ऐसे कर्तव्य विमुख लोग कूड़ा करकट के समान है। प्रकृति उन्हें झाड़ बुहार कर एक ओर फेंक देती है, ताकि वे अपनी संकीर्णता में सिमटे हुये सड़ते रहे, दूसरे सुकुमार पुष्प पौधों को भी रोग न लगा दें।

दुर्बलता ही दुष्टता को पनपाती है। गुण्डों से लेकर भूत−पलीत तक सभी अपनी धाक जमाने के लिये दुर्बलों को ही ढूँढ़ते है। बहुत अधिक सीधापन भी मानसिक सतर्कता की कमी ही है। ऐसे ही लोग ठगी का शिकार होते है। सतर्क रहने पर चोर घर के बाहर ही घूम फिरकर लौट जाते है। जेबकट सदैव उस क्षण की तलाश में रहते है, जब व्यक्ति असावधान हो। भय का भूत और मानसिक दुर्बलता का ही परिणाम होता है।

चारित्रिक दुर्बलता पैसा, प्रतिभा तथा प्रतिष्ठा तीनों को नष्ट करती है। मानसिक दुर्बलता ही चरित्र भ्रष्टता की ओर ले जाती है। निराशा निस्सहायता और आधारहीन चिन्ताएँ आशाएँ भी मानसिक दरिद्रता और दुर्बलता का ही घातक परिणाम होती है जो धीरे-धीरे व्यक्ति को खो डालती है। बड़ी से बड़ी प्रतिकूलता अस्थायी होती है। आंतरिक दुर्बलता ही उसकी अवधि बढ़ाती हैं।

मनुष्य देखने में ही छोटा और साधारण लगता है। वह अपने भीतर भरे अपार शक्ति भण्डार को याद करे तो संसार की उत्ताल तरंगों के बीच भी सदैव अडिग रह सकता है आंतरिक दुर्बलता से हताशा व कायरता उसे असंतुलित कर देते है और वह इन लहरों के थपेड़ों में खो जाता है। हड़बड़ी, उतावली और अदूरदर्शिता मनुष्य की निर्बलता के ही दुष्परिणाम है। सूझबूझ से काम लेने-वाला अपनी शक्तियों को ठीक-ठाक ढँक से ठीक समय पर प्रयुक्त करने वाला और स्नेहबल से दूसरों का सहयोग सद्भाव अर्जित कर लेने वाला व्यक्ति कभी भी दुर्बल-दरिद्र नहीं होता। उसमें प्रगति पथ पर बढ़ सकने योग्य भरपूर शक्ति होती है और कैसी भी सम्पदा प्राप्त करना उसके लिये असम्भव नहीं होता।

वस्तुतः दरिद्र वहीं है, जिसका अंतःकरण मलीन है। इस मलीनता से मुक्ति उसके स्वयं के ही हाथ में है। अपनी संकीर्णता छोड़ने पर उसे अपनी शक्तियों का बोध होने लगता हैं।

मनुष्य एक सहकारी प्राणी है इसलिये महत्त्व मात्र अपनी दुर्बलता दरिद्रतायें दूर कर लेने का नहीं जिसकी आंतरिक दुर्बलता समाप्त हो जाती है, उसके लिये यह संकीर्ण परिधि रह भी नहीं पाती। अतः दूसरों दुर्बलों के कपटों के प्रति भी उसे सहानुभूति होनी स्वाभाविक और अनिवार्य है।

दुर्बलों की सर्वोत्तम सेवा एवं सहायता यह है कि उन्हें उनकी दुर्बलता से मुक्ति होने की प्रेरणा दी जाय। इस हेतु तत्कालीन सहायता भी आवश्यक हो सकती है पर सहायता का यह प्रयोजन सदैव ध्यान में होना ही चाहिये कि दुर्बलता के आधार को ही समाप्त करना आवश्यक है। रोगी की प्राण रक्षा के लिये अनुकूल होने पर अपना रक्त दिया जाना चाहिये, पर जीवन धारणा तो स्वयं उसके अपने उत्पादित रक्त से ही संभव है।

सामाजिक अन्याय, अनीति भी सामूहिक दुर्बलता के ही कारण पनपते बढ़ते है। अपने समाज की इस दुर्बलता का आँशिक दायित्व स्वयं पर भी मानना ही चाहिये। उस हेतु समाज में शक्ति होती है और कैसी भी सम्पदा प्राप्त करना उसके लिये असम्भव नहीं होता। मनुष्य सहकारी प्राणी है। इसीलिये महत्त्व मात्र अपनी दुर्बलता दरिद्रतायें दूर कर लेने का नहीं जिसकी आंतरिक दुर्बलता समाप्त हो जाती हे, उसके लिए यह संकीर्ण परिधि रह भी नहीं पाती। अतः दूसरे दुर्बलों के कपटों के प्रति उसे सहानुभूति होनी स्वाभाविक और अनिवार्य है।

दुर्बलों की सर्वोत्तम सेवा एवं सहायता यह है कि उन्हें उनकी दुर्बलता से मुक्ति होने की प्रेरणा दी जाय। इस हेतु तत्कालीन सहायता भी आवश्यक हो सकती है, पर सहायता का यह प्रयोजन सदैव ध्यान में होना ही चाहिये कि दुर्बलता के आधार को ही समाप्त करना आवश्यक है। रोगी की प्राण रक्षा के लिये अनुकूल होने पर अपना रक्त दिया जाना चाहेंगे, पर जीवन धारणा तो स्वयं उसके अपने उत्पादित रक्त से ही संभव है। सामाजिक अन्याय, अनीति भी सामूहिक दुर्बलता के ही कारण पनपते बढ़ते है। अपने समाज की इस दुर्बलता का आर्थिक दायित्व स्वयं पर भी मानना ही चाहिये। उस हेतु समाज में शक्ति संचार करने के लिये प्रयास आवश्यक है। अनीति को दण्डित करने के लिये सामर्थ्य विकसित की ही जानी चाहिये। प्रतिरोध- प्रक्रिया में स्वयं को आघात के डर से समाज में अनीति-अन्याय को फैलते देना भी दुर्बलता ही है।

परमात्मा का पुत्र दीन-दुर्बल रहने के लिये उत्पन्न ही नहीं हुआ। शक्ति ही परमसत्ता का स्वरूप है। शक्ति साधना जितनी समझ होगी, उतना ही आत्म-विकास हुआ माना जाएगा साधना के केन्द्र पर यदि ध्यान दिया जाय तो समग्र व्यक्तित्व की समवेत साधना होती चलती है मनुष्य-जीवन का यही प्रयोजन एवं सार्थकता है।


लोक शिक्षक को सौ फीसदी आदर्श पालन करना चाहिये(Kahani)

राजा राम मोहन राय, तब बालक ही थे। उन दिनों सती प्रथा पूरे जोर पर थी। उनके बड़े भाई की मृत्यु हो गई। प्रथा के अनुसार उनकी भाभी को सती होने पर विवश किया गया।

धधकती ज्वालाओं में जिन्दा शरीर को झोंक दिया गया। वेदना से छटपटा कर वह चिंता के बाहर दौड़ी। पर क्रूर प्रथा पालकों ने उसे बाँसों से धकेल कर फिर चिंता में डाल दिया। जीवन का करुण-वीभत्स अन्त देखा न गया। हृदय उसकी चीत्कार सुनकर विचलित हो गया। मस्तिष्क में संकल्प उठा कि जब तक इस अमानवीय प्रथा का अन्त कर दूँगा, चेन से न बैठूँगा और उन्होंने यह सब कर दिखाया।

प्रति मास 40-50 हजार रुपये आमदनी वाली वकालत छोड़कर नामी बैरिस्टर देशबन्धु चितरंजन दास स्वराज्य की लड़ाई में शामिल हो गये। बापू के आह्वान पर उन्होंने अपना विपुल वैभव भरा विलासी जीवन छोड़ दिया। दास बाबू को सिगरेट और चाय पीने की बड़ी आदत थी। एक दिन बापू से मुलाकात होने पर उन्होंने कहा- लीजिये आज से सिगरेट भी छोड़ता हूँ।

धूम्रपान छोड़ तो दिया, पर पुरानी आदत होने के कारण बेचैनी महसूस हुई। भाई की बेचैनी देखकर उनकी बहन ने एक दिन कहा भाई बापू के लिये तुमने सर्वस्व त्याग कर दिया है। सिर्फ सिगरेट पीने में क्या हर्ज हैं?

देशबन्धु बहिन को समझाते हुये बोले-लोक शिक्षक को सौ फीसदी आदर्श पालन करना चाहिये। तभी उसको देखकर लोग आदर्श की ओर मुड़ेंगे। मेरे लिये सिगरेट न पीना ही ठीक है, और उन्होंने कभी सिगरेट नहीं पी।


सम्भवामि युगे-युगे

वह कौन है, कहाँ का है, कैसे आया है और क्यों आया है इस दुर्गम प्रदेश में कोई नहीं जानता?सच तो यह है कि इन याक तथा भेड़े के झुण्ड चराते-इधर-उधर तंबू लगाकर दस-बीस दिन रुकते हुये घूमने वाले तिब्बती लोगों के पास भी उसका परिचय जानने का कोई साधन नहीं है। वह उनकी भाषा नहीं जानता और वे लोग उसकी गिटपिट समझ नहीं पाते। तीन-चार दिन के अन्तर से वह उनके पास आता हे। एक ही क्रम है उसका-चुपचाप सोने का एक सिक्का फेंक देगा तंबू वाले के सामने और अपना विचित्र बर्तन रख देगा। उसे ढेर-सा मक्खन, दूध और चाहिये और कुछ सत्तू भी। उसकी अभीष्ट वस्तुएँ सरलता से मिल जाती हैं। एक बार किसी तंबू वाले ने चमड़े, चंवर तथा माँस सामने लाकर रख दिया- कदाचित् इन वस्तुओं का भी वह ग्राहक बन जाय किन्तु उसने अपनी भाव-भंगिमा से प्रकट किया कि उसे यह सब नहीं चाहेंगे

तिब्बत की सर्दी में दूध, दही महीनों खराब नहीं करते। वह खरीदा गया मक्खन, दूध आदि उठा लेता है और चुपचाप चला जाता है दुर्गम पहाड़ों की ओर, उन पहाड़ों की ओर जिधर जाने में ये पर्वतीय लोग भी हिचकते है। सुना है वहाँ बहुत दूर किसी हिमाच्छादित गुफा में एक कोई पुराना भारतीय लामा रहता है। बड़ा सिद्ध लामा (योगी) है वह। अवश्य यह गोरा साहब उसी के पास रहता होगा।

तिब्बत के इन सुदृढ़काय श्रद्धालु जनों में इस गोरे साहब के लिये सम्मान का भाव उत्पन्न हो गया है। ऊनी पतलून उनके बीच-बीच सप्ताह में एक बार आने वाला यह साहब उसके सम्बन्ध में बहुत कुतूहल है इनके मन में। किन्तु कोई साधन नहीं साहब से कुछ जानने का।

हिम की शीतलता से उसका मुख, उसके हाथ, झुलसकर काले से पड़ गये है- यह तो स्वाभाविक बात है, किन्तु उसका एक कान नुचा-कटा है। आधी नासिका है ही नहीं। एक नेत्र उस प्रकार फटा है, जैसे किसी ने नोंच लिया हो। कपोल दोनों कटे-फटे है और मुख में सामने के दाँत है ही नहीं।

वह अवश्य कभी किसी रीछ से भिड़ गया होगा। इन पर्वतीय लोगों के जीवन की जो सामान्य घटना है, उसकी कल्पना की गोरे साहब की आकृति को देखकर इन्होंने। रीछ ने उसे नोंचा-खसोटा और लड़ाई में पहाड़ से वह लुढ़क गया वह नीचे दाँत पत्थर की चोट से उसके प्राण बच गये। अपनी कल्पना का उन्होंने घटना मान लिया है और गोरे साहब के इस साहस ने उन्हें उसके प्रति अधिक श्रद्धालु बनाया है। यह गोरा साहब अपनी एक है तीव्र इच्छा लेकर इस दुर्गम प्रदेश में आया था-कोई योगी-हिमालय का कोई योगी ही मेरी इच्छा पूरी कर सकता है। उसका निश्चय भ्रान्त था, यह कोई नहीं कह सकता। बस उसे एक ही धुन थी, वह जैसे भी खुश होगा, खुश करूँगा

वह कैसे पहुँचा तिब्बत के इन पर्वतों तक और कैसे उन हिमगुफा में स्थित योगी के दर्शन कर सका एक लम्बी कहानी है। उसे यहाँ रहने दीजिये। तिब्बती चरवाहों की जनश्रुति भारत के पर्वतीय जनों में प्रायः पहुँच जाती है और वहीं उसने भी दुर्गम पर्वत की गुफा के लामा की चर्चा सुनी थी। जिस कष्ट डिगा नहीं पाते और मृत्यु कम्पित नहीं कर पाती कौन-सा लक्ष्य है, जिसे वह प्राप्त नहीं कर सकता।

गुफा के भीतर योगी है। एक शिला पर स्थापित मूर्ति के समान निस्पन्द, निश्चेष्ट, स्थिर आसीन। वह नहीं कह सकता, वह योगी का शरीर है जीवित या निष्प्राण? उसने पढ़ रखा है कि भारतीय योगी प्राण को रोककर वर्षों निष्प्राण के समान रह सकते है और कोई निष्प्राण देह भी इस हिम प्रदेश में विकृत होने से तो रहा।

गुफा उसने स्वच्छ कर दी है। शिला पर मूर्ति के सामान जो योगी का निश्चल देह है डरते-डरते उसे उसने धीरे-धीरे साथ लाए स्टोव पर जल गरम करके तौलिये से प्रक्षालित किया। अब तो तेल समाप्त होने से स्टोव उपेक्षित पड़ा है। इससे अधिक कोई सेवा वह इन मूर्ति प्रायः महापुरुष की सोच नहीं पाता। प्रतीक्षा-प्रतीक्षा ही कर सकता था वह और अब संसार में लौटकर करना भी क्या था। उसकी प्रतीक्षा न भी सफल हो इस शिला पर आसीन योगी के पावों में अनन्तकाल तक अविकृत पड़ा रहेगा उसका निष्प्राण शरीर। यहाँ से वह लौटेगा नहीं। ऐसा कुछ नहीं होना था। सृष्टि का एक संचालक है और वह दया सिन्धु है। दृढ़व्रती को उसने कभी निराश नहीं किया है। उस दिन वह गुफा प्रकाश से भर उठी। शिला तल पर आसीन योगी का शरीर जैसे सूर्य के समान प्रकाश पुञ्ज बन गया। देखना सम्भव नहीं था उनकी ओर। गोरा साहब हाथों से अपनी आंखें ढक कर घुटनों के बल भूमि पर सिर रखकर प्रणत हो गया उस तेज पुञ्ज के सम्मुख।

वत्स! ओंकार के सुदीर्घ गम्भीर नाद के अनन्तर कानों में जैसे अमृतधारा पहुँची। एक क्षण केवल एक क्षण रुककर वे सर्वज्ञ उसी की भाषा में उसे सम्बोधित कर रहे थे। आँसुओं से भीग गया उसका मुख और वह बोलने में असमर्थ हो गया।

मैं यहूदी हूँ। अपने घर से देश से निर्वासित असहाय, अत्याचार का मारा एक अधम। कठिनाई से भरे गले वह बोला-आपकी शरण आया हूँ। आपके अतिरिक्त उन पिशाचों से कोई मेरा प्रतिशोध नहीं दिला सकता।

योगी सुनते रहे नीरव ओर वह कहता गया मैं जर्मन यहूदी द्वेष के प्रति कभी अकृतज्ञ नहीं रहा, किन्तु हिटलर की शक्ति से आज संसार संत्रस्त है। उसके अत्याचारों का किसी के पास प्रतिकार नहीं। नाजी पिशाचों ने मेरी पत्नी-मेरे बच्चे की जो दुर्गति की, वे उसकी हत्या कर देते तो मैं उन्हें क्षमा कर देता। किन्तु उन्होंने जिस प्रकार से उन्हें मारा मेरा यह शरीर आह.......वह पीड़ा से कराह उठा- मेरे जीवित शरीर को उन्होंने चिमटों से नोंचा, हंटरों से पीटा। मुझ पर हुये अत्याचारों की सीमा नहीं है। उन पर प्रलय की वर्षा हो उसके नेत्र अंगार हो रहे थे और थर थर काँप रहा था वह क्रोध से।

मैं यहाँ तब पहुँच नहीं पाता, किन्तु मुझ गृह हीन की जो सेवा, जो सहायता उदार पुरुषों ने की मैं उनका कोई प्रत्युपकार नहीं कर सका। उन्होंने मुझे सम्मान दिया सुविधा दी मेरी शुश्रूषा की। आपका आशीर्वाद उनकी उन्नति प्रगति में सहायक बनें। वह तनिक शांत हुआ फिर भी उसके चेहरे पर तनाव के लक्षण थे।

भोले बच्चे! स्निग्ध शान्त स्वर था उन महायोगी का अब तुम क्या चाहते हो?

हिटलर का सर्वनाश एक बारगी वह जैसे चीख पड़ा हिटलर या हिटलरी कुबुद्धि का? बड़ा अजीब सवाल था वह चौंक कर उनकी ओर देखने लगा। उसके मुख मण्डल पर आने वाले उतार -चढ़ावों से बेखबर महायोगी बोले जा रहे थे हिटलर के सारे आतंक की जननी उसकी दुर्बुद्धि ही तो है। एक हिटलर मर भी गया तो क्या?

संसार में फैला दुर्बुद्धि न जाने कितने हिटलर पैदा कर देगी। तो हिटलर मरेगा नहीं? गोरा यहूदी जैसे अपने सवाल पर अडिग था। महायोगी उसकी ओर वात्सल्य पूर्ण दृष्टि डालते हुये बोले हिटलर तो तुम्हारे यहाँ आने के साथ ही मर गया। उसने अपनी जिस दुर्बुद्धि के कारण अनगिनत लोगों को अकारण पीड़ित किया उसी कुबुद्धि के वशीभूत होकर स्वयं अपने को भी समाप्त कर लिया। पर एक हिटलर के मरने से भी क्या बनेगा हिटलरी कुबुद्धि का आतंक तो अभी भी मंडरा रहा है। तब क्या कोई उपाय नहीं? वह कहने लगा हमने तो सुना था हिमालय की सर्व समर्थ ऋषि सत्तायें सब कुछ करने में समर्थ है।

ठीक कहते है महायोगी समझाने लगे इन तपःपूत ऋषियों की प्रार्थना को स्वीकार करके ही भगवान स्वयं प्रज्ञावतार बनकर धरती पर आ चुके है। अभी वह अपनी योजनाओं की पृष्ठभूमि बनाने में गोपनीय ढंग से संलग्न है। समय आने पर वह अपने को प्रकट करेंगे इस बार वह अपने लला सहचरों के साथ कुबुद्धि के आतंक से लोहा लेंगे बोलते -बोलते वह शून्य की ओर ताकने लगे जैसे वह अपनी दिव्य दृष्टि से भविष्यतां के अक्षर पढ़ रहे हों हिमालय की तलहटी से उठने वाले विचार क्रान्ति के तूफान में समूचे विश्व की कुबुद्धि तिनकों की तरह उड़ जाएगी। मानवी बुद्धी परिष्कृत होकर प्रज्ञा का रूप लेगी और सृजनात्मक गतिविधियों में संलग्न होते है।

अहा गोरा साहब जैसे सोते से जगा कुछ पल रुककर उसने महायोगी से वहीं हिमालय की गुफा में रहकर जप की अनुमति माँगी।

नहीं वह समय गुफा में तप करने का नहीं है। तुम वापस जाओ और मुरझाई, कुम्हलाई मानवता के परमात्मा के अवतरण का संदेश देकर नये प्राण का संचार करो। मानव को यह बताओ कि यह समय निजी संकीर्णता की बेड़ियों में बँधे रहकर रोने चिल्लाने का नहीं परमात्मा के साथ भागीदारी निभाने का है। महायोगी के इस कथन को शिरोधार्य कर जर्मन यहूदी बुर्डेर्न्बग ने एक पुस्तक लिखी मिस्टिक हिमालय जिसमें मानव के स्वर्णिम भविष्य की आशा संजोयी है।


Quotation

निर्धन होना दुर्भाग्य है, पर सबसे अभागे वे है जो कृपणता से ग्रस्त है संकीर्णता का अभिशाप साधनों का सदुपयोग नहीं करने देता और वैभव को संकट और पतन का कारण बना देता है।


‘ओजस्’ के संवर्धन का राजमार्ग

अन्नमय कोष यों देखने में अस्थिमज्जा का स्थूल पिण्ड मात्र प्रतीत होता और ऐसा लगता है, जैसे शरीरचर्या की आवश्यकता पूरी करने तक ही यह सीमित है, पर आत्मवेत्ता बताते हैं कि बाह्यावरण से आगे चलकर यदि इसका अध्ययन किया जाय, तो जो स्वरूप सामने आयेगा, वह सूक्ष्म क्षमताओं से भरा हुआ होता है। यह क्षमता उसके प्रत्येक घटक का सम्मिलित प्रभाव है - ऐसा वे मानते हैं।

किसी भी क्षेत्र में उच्चस्तरीय साधक का सारा शरीर उसकी मुख्य साधना में सहयोगी बन जाता है। श्रेष्ठ चित्रकार जब किसी चित्र की कल्पना करता है, तो उसके शरीर की हर इकाई उसके स्पन्दनों से प्रभावित होती है। शरीर की हलचल में उस कल्पना के स्पन्दन समाविष्ट हो जाते हैं। तथा निर्जीव तूलिका सामान्य रंगों में ही जीवन्त चित्र का निर्माण कर देती है। वाणी के साधक गायक के मन में जो भाव उभरते हैं, वह उसके हाव-भाव तथा स्वर लहरी में न जाने कहाँ से कैसे गुँथ जाते हैं और उसमें अद्भुत प्रभाव पैदा कर देते हैं। अपने कार्य के प्रति निष्ठावान् चिकित्सक के चर्मचक्षुओं और माँसपेशियों में न जाने क्या विशेषता आ जाती है कि वह रोग के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म चिन्ह तथा गंभीर-से-गंभीर स्तर को पकड़ लेता है।

इन साधकों के चमत्कारों के पीछे यही तथ्य छिपा है कि उनके अन्नमय कोष की हर इकाई उनके अन्दर की सूक्ष्म सम्वेदनाओं को अनुभव करने, स्वीकार करने तथा उसके अनुरूप प्रभाव पैदा करने में सूक्ष्म हो जाती है। उसके संस्कार उसके अनुरूप हो जाते है। किसी भी उच्चस्तरीय साधना के लिए, विज्ञजन से लेकर उपासना तक के लिए अपने अन्नमय कोष की ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य, सक्षम स्थिति में लाना आवश्यक होता है। उसके लिए उसकी मूल इकाइयों को विशेष रूप से गढ़ना-ढालना पड़ता है। इसे ही अन्नमय कोष का परिष्कार-विकास की साधना कहा जाता है।

प्रश्न उठता है कि अन्नमय कोष की समूल इकाइयों को वाँछित ढंग का बनाया जा सकता है क्या? उत्तर ‘हाँ’ दिया जा सकता है। इसकी पुष्टि भारतीय दर्शन की सनातन मान्यता तथा वर्तमान वैज्ञानिक शोधों, दोनों ही आधारों पर होती है। वस्त्र आदि तो जैसे बन गये, सो बन गये। कैनवास को मखमल में नहीं बदला जा सकता, क्योंकि वह जड़ संस्थान है किन्तु शरीर तो चेतनायुक्त है। उसमें नये कोषों का निर्माण तथा पुरानों का विघटन संभव ही नहीं, वह तो उसकी एक स्वाभाविक एवं अनिवार्य प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया धीमी पड़ने से ही मनुष्य शरीर जरा-जीर्ण होने लगता है। बुढ़ापा और कुछ नहीं, अन्नमय कोष में नवीन स्वस्थ कोशिकाओं की संरचना तथा पुरानों के निष्कासन की गति शिथिल हो जाना मात्र है। इस प्रक्रिया को व्यवस्थित नियमित बनाकर शरीर संस्थान में क्रमशः इच्छित परिवर्तन लाये जा सकते हैं।

सामान्य व्यक्तियों में भी अन्नमय कोष की इकाइयों में परिवर्तन होता ही रहता है, किन्तु उसकी कोई व्यवस्था, योजना न होने के कारण एक ढर्रा भर चलता रहता है। सामान्य रूप से किसी भी फैक्टरी में पुराने पुर्जों तथा पुरानी मशीनों के स्थान पर नये पुर्जे एवं नई मशीनों को स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है। उससे एक ढर्रे का उत्पादन निकलता भी रहता है, किन्तु कोई कुशल उद्योगी जब अपने उत्पादन के स्तर बढ़ाने व नयी वस्तुएँ उत्पादित करने की योजना बनाता है, तो फिर ढर्रे का क्रम पर्याप्त नहीं। उस स्थिति में लक्ष्य को ध्यान में रखकर सूझबूझ के साथ हर परिवर्तन व्यवस्थित ढंग से करना होता है। पुर्जों और मशीनों से लेकर औजार तथा कच्चे माल की व्यवस्था भी उसी योजना के अनुरूप करनी होती है। अपने शरीर की हर कोशिका को एक सजीव पुर्जा, औजार, मशीन मानकर उन्हें लक्ष्य के अनुरूप बनाना, उसके लिए उपयुक्त आहार-विकार अपनाना योग साधना के लिए आवश्यक हो जाता है।

सामान्य व्यक्ति के अन्नमय कोष तथा योगी के अन्नमय कोष में अन्तर क्यों? वह किस प्रकार सम्पन्न होता है? इसे एक सामान्य उदाहरण से समझा जा सकता है। बिजली की लाइन में विद्युत तारों में बहती है। उन्हें सहारा देने के लिये खंभे रहते है। तार और खंभों के बीच में ऐसे उपकरण लगे रहते है, जो बिजली को खंभों से होकर पृथ्वी में प्रविष्ट होने से रोके रहें उन्हें कुचालक इन्सुलेटर कहते हैं सामान्य वोल्टेज की विद्युत के लिये तार खंभे तथा इन्सुलेटर सामान्य ही चल जाते है किन्तु उच्च वोल्टेज की बिजली अधिक मात्रा में प्रवाहित करनी हो तो उसके लिये यह सभी उपकरण वरिष्ठ स्तर के लगाने पड़ते हैं। यहीं बात सामान्य व्यक्ति तथा विशिष्ट स्तर के साधक के साथ लागू होती है। सामान्य जीवनक्रम में सामान्य शारीरिक विद्युत की ही आवश्यकता पड़ती है किन्तु उच्च लक्ष्यों के लिये अधिक प्रखर शक्ति तरंगें पैदा करनी होती है। उनका संवेदन, संचार करने के लिये अधिक शक्ति संस्थान की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से पड़नी ही चाहिये इसीलिये साधक को अपने अन्नमय कोष के परिष्कार उसकी पुष्टि और विकास के लिये ध्यान देना विशेष प्रयास करना होता है, तभी वह प्राणमय, मनोमय विज्ञानमय और आनन्दमय कोशों के विकास में सहायक बनने तथा उनकी विकसित स्थिति के साथ तालमेल बिठाने में समर्थ हो पाता हैं।

उल्लेखनीय है कि तालमेल निर्जीव घटक नहीं बिठा सकते। वह तो चेतना सम्पन्नों के लिये ही संभव है। अन्नमय कोष की हर इकाई हर कोशिका को आज के वैज्ञानिक भी स्वतंत्र जैविक घटक मानने लगे है। हर सेल में उसका हृदय न्यूक्लियस होता है उसके श्वास संस्थान को वैज्ञानिक भाषा में माइट्रोकांड्रिया कहते है। हर कोशिका में गाल्जी एप्रेटस होता है जो उसके पाचन संस्थान का काम करता है। हर कोष अपनी जैसी नई अनुकृति पैदा कर सकता है। हर सेल में विशिष्ट जैवीय विद्युत होती है जिसे उसका प्राण कहते है इस प्रकार हर कोशिका एक स्वतंत्र जैविक घटक के रूप में अपने अस्तित्व को बनाये रखते हुए शरीर संस्थान से अपना तालमेल बिठाये रखती हैं।

सामान्य व्यक्ति की स्थिति में यह तालमेल बढ़ती आयु के साथ बिगड़ने लगता है इसी कारण से शरीर तंत्र में बाधक के लक्षण उभरने और प्रकट होने लगते है। चेतना विज्ञान के मर्मज्ञ साधक इस व्यक्तिक्रम को व्यवस्थित करने में समर्थ होते है अस्तु काल प्रभाव से वे अप्रभावित बने रहते है। अनेक शरीर देखने से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि वे लम्बी उम्र जी चुके। अपनी वास्तविक आयु से भी काफी कम व के दिखाई पड़ते है। यों शोध के उपरान्त विज्ञान ने कुछ ऐसे तथ्य ढूँढ़ निकाले है। जिनका यदि ध्यान रखा जाय तो अन्नमय कोष के स्थायित्व को कुछ समय तक बनाये रखा जा सकता है पर यह अवधि भी अल्प ही है जिसके उपरान्त शरीर कोषों की क्षरण प्रक्रिया पुनः आरंभ हो जाती है और देह अपने स्वाभाविक धर्म की तरह उसे फिर से स्वीकार लेती है। शरीर कोषों पर सुनिश्चित असर पड़ता है कई बात तो यह प्रभाव लक्षण के रूप में अन्नमय कोष में ही पहले उभरता है। विष खा लिया जाय, तो कोशाएं निष्क्रिय बनने लगती है उपचार में विलम्ब हुआ, तो मृत्यु तक आ धमकती है। इसी प्रकार शरीर के स्वभाव के विपरीत यदि बादी प्रकृति का कोई आहार ग्रहण कर लिया गया तो काया सूज जाती है। संग दोष मन के माध्यम से शरीर को कितना नुकसान पहुँचाता है। यह कोई छुपा तथ्य नहीं। प्रतिकूल परिस्थितियों के दबाव से काया जल्द ही ढलने लगती है इसका प्रमाण शरीर पर उभर आयी झुर्रियाँ देने लगती है। परिवेश व्यक्ति करता है-इसका उदाहरण ढूँढ़ना हो तो उस घटना का उल्लेख किया जा सकता है जिसमें एक नाविक को व्हेल द्वारा निगल लिये जाने और फिर उसका पेट चीर का बाहर निकलने जितने मध्यान्तर तक में उसकी त्वचा अपना स्वाभाविक रंग त्याग कर ऐसी श्वेत पड़ चुकी थी, जो लम्बे उपचार के पश्चात् भी सही नहीं हो सकी। पर्यावरण का प्रभाव तो आज प्रत्यक्ष हैं। दूषित वातावरण में रहकर व्यक्ति किस तरह रोग-शोक का शिकार बनता और अपने लिये स्वास्थ्य संकट न्यौत बुलाता है, इसे बताने की आवश्यकता नहीं।

इस प्रकार आहार विहार, परिस्थिति और पर्यावरण के संदर्भ में शरीर विज्ञानियों का स्वास्थ्य से संबंधित जो निष्कर्ष है, वह सही कहा जा सकता है। इन कारकों पर यदि कारकों पर यदि समुचित ध्यान दिया गया, तो शरीर-स्वास्थ्य को कुछ अधिक समय निरोग रखा जा सकता है, इसमें दो मत नहीं, पर एक निश्चित समय के उपरान्त शरीर-कोशाओं का क्षरण पुनः आरंभ हो जाता है और वार्धक्य उभरने लगता है। इस किन्हीं भौतिक उपचारों द्वारा रोक पाना संभव नहीं।

चेतनाविज्ञानियों की इस बारे में एक सलाह है। वे कहते है कि जीवन-ऊर्जा का बड़े पैमाने पर होने वाले हास को यदि रोका जा सके तो इससे भी अन्नमय कोष को प्रभावित किया जा सकना संभव है। उनका सुनिश्चित मत है ऊर्जा की अधिकता देह तंत्र को दृढ़ता और मजबूती प्रदान करती है। दुरुपयोग की स्थिति में काया की आवश्यकता-पूर्ति करने में वह अक्षम होती है, इसलिये आहार के अभाव में व्यक्ति की जो दशा हो जाती है, वैसे ही दुर्बल एवं कमजोर अन्नमय कोष के घटक बनने लगते है। इस अवस्था में वह अपनी स्वाभाविक क्रिया को भली−भाँति करने विफल होते है। यही विफल होते है। यह विफलता विभिन्न प्रकार की गड़बड़ियाँ के रूप में असहयोग के रूप में असहयोग के रूप में सामने आती है।

योग साधक अपनी ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ा कर व्यय को घटा लेते है, अतः शरीरचर्या में प्रयुक्त होने के बाद भी उसका एक बड़ा अंश बचा रह जाता है। इस संरक्षित विद्युत से घटक कोशाओं क्रियाशीलता में मंदता नहीं आने पाती, जिससे उनके मध्य पारस्परिक तालमेल भी निभाता रहता है। तालमेल बने रहने से समस्त कार्य तंत्र चुस्त-दुरुस्त बना रहता हैं यह अवस्था यदि बराबर बनी रहे, तो अन्नमय कोष नित नवीन स्थिति में अवस्थान करता प्रतीत होगा। योग इस स्थिति को आसानी से प्राप्त कर लेते है इसलिये उनके बायोलॉजिकल एज (कायिक आयु) और क्रोनोलॉजिकल एज (मियादी आयु ) भारी अन्तर दिखाई पड़ता है।

विवेकानन्द के समकालीन योगी य वह बाबा के बारे जाता था कि वे कई वर्षों के थे, पर देखने में 60-65 वर्ष से किसी भी प्रकार अधिक नहीं लगते थे। बंगाल के प्रसिद्ध सन्त श्यामाचरण के पिछले जन्म में भी साधना मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ इस बीच उनकी आयु 25-30 वर्ष के नवयुवक जितनी प्रतीत होती थी, जबकि उनके वास्तविक आयु कई सौ वर्ष बतायी जाती थी। हिमालय की कन्दराओं में अब भी अनेक ऐसे होती है जिनकी उम्र के बारे में सही सही अनुमान लगा पाना संभव नहीं।

तालमेल चाहे वह अन्नमय कोष के कायिक घटकों के सम्बन्ध में हो अथवा दैनिक जीवन के क्रिया व्यापार के संदर्भ में यदि व लड़खड़ाया तो समस्त तंत्र की ही तरह जीवन तंत्र भी जिस तरह काया की घटक कोशाओं के बीच सामञ्जस्य से अन्नमय कोष स्वस्थ समुत्र स्थिति में बना रहता है वैसे ही स्वस्थ समाज के लिये व्यक्ति के मध्य का सम्बन्ध सुमधुर होना चाहिए, तभी ओजस्वी अप्रतिम कोष की तरह तेजस्वी समाज का निर्माण हो सकेगा।


सिद्धान्त और व्यवहार के बीच का अन्तर (Kahani)

एक बार एक ब्रह्मबेला अपने पुत्र के साथ किसी धर्म सभा में प्रबन्धन सुनने गया। प्रवचनकर्ता वेदान्ती था। ब्रह्मा के संदर्भ में संसार की व्याख्या करते हुये उसने कहा कि यहाँ का प्रत्येक जीव ब्रह्म का रूप है। उनमें परस्पर कोई भेद नहीं।

पुत्र ने उस शिक्षा का भली−भाँति हृदयंगम कर लिया उसके एक दुकान थी उसमें कई कई अनाज की डेरिया थी। प्रवचन सुनने के पश्चात् वह दुकान खोल कर बैठा, तो सामने से एक गाय आकर अनाज खाने लगी।

पुत्र को वेदान्ती की शिक्षा याद आयी। उसने सोचा यह तो ब्रह्म का ही रूप है। हममें और इसमें बाहरी आकार के अतिरिक्त कोई भेद तो है नहीं। यह सोचकर वह निर्विकार बना रहा। गाय अनाज खाती रही।

इसी बीच पिता आ गये। अनाज खाती गाय को देख कर वह आगबबूला हो उठे। पुत्र को फटकारते हुए कहा। मूर्ख! इस तरह बैठा क्यों है? गाय को भगाता क्यों नहीं? पुत्र ने प्रबंधकर्ता की शिक्षा दुहरायी- ब्रह्म से घृणा कैसी!वह तो अपना ही रूप है।

पिता ने कर्तव्यबोध कराते हुये कहा -नादान सिद्धान्त और व्यवहार के बीच का अन्तर समझ! जीवन व्यावहारिकता पर टिका है। उसे उसी रूप में चलने दे! पुत्र का भ्रम दूर हो गया |


वाणी का तप है मौन

मौन वाणी का शक्ति का संशोधन और संवर्धन करने की साधना का नाम है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसलिये जिस तरह इन्द्रिय संयम के लिये ब्रह्मचर्य आदि का विधान है उसी तरह वाणी के संयम के लिये मौन की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।” की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।” फ्रेंकलिन के शब्दों में चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता और वह मौन रहती हे।” कोर्लाइल ने कहा है-मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्षक्ति होती है।”

मौन प्रकृति का शाश्वत नियम है। चाँद, सूरज, तारे सब बिना कुछ कहे-सुने चल रहे है। संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य मौन के साथ ही पूर्ण होता है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में कोई महान् कार्य करना चाहे तो उसे एक लम्बे समय तक मौन का अवलम्बन लेना पड़ेगा। क्योंकि मौन से ही शक्ति का संग्रह और उद्रेक होता है।

आध्यात्मिक जीवन के विकास के लिये तो मौन बहुत आवश्यक है। योगीराज श्री अरविन्द ने कहा है-आध्यात्मिक जीवन अपने भीतर ईश्वरीय चेतना को प्रतिष्ठित करने और उसे सहज रूप में व्यक्त होने देने की साधना है। और इस साधना बड़ी हमारी वाचालता ही है जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसे आदेशों को सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी उत्तम भाषा बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”

शास्त्रकार ने कहा-” मौन उस अवस्था को कहते हैं जो वाक्य और विचार से परे है। यह एक शून्य ध्यानावस्था है जहाँ अनन्त वाणी की ध्वनि सुनी जा सकती है।” अध्यात्म जगत का साधक तो मौन के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकता। आत्मा से और विश्वव्यापी सूक्ष्म शक्ति से मनुष्य तब तक सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकता, जब तक कि वह वाह्य कोलाहल में उलझा रहेगा, बहिर्मुखी बना रहेगा। अंतर्मुखी होने और अपनी संपूर्ण शक्तियों को एकाग्र और संगठित करने के लिये मौन का अवलम्बन श्रेयार्थी के लिये अत्यन्त आवश्यक है।

व्यावहारिक जीवन में भी मौन अनर्थों को पैदा होने से रोकता है। मौन कभी भी दूसरों को हानि नहीं पहुँचा सकता। समाज में विग्रह, लड़ाई, झगड़े, कलह, आदि की शुरुआत वाणी से ही होती हैं। एक दूसरे को भला-बुरा कहने पर ही लोग उत्तेजित होकर अनीति करते है। लेकिन जब मौन का अवलम्बन किया जाय तो बुरे शब्द मुख से नहीं निकलेंगे और न विग्रह की स्थिति ही पैदा होगी। इतनी ही नहीं कोई लड़ना चाहे, चलाकर छेड़छाड़ करे झगड़ने लगे, ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष यदि मौन का अवलम्बन ले-ले तो झगड़ा कभी हो ही नहीं सकता।

मौन की स्थिति में ही हम दूसरों को अधिक सुन सकते है और अपने ज्ञानकोष को बढ़ा सकते है लोगों को समझने, उनका अध्ययन करने के लिये भी मौन की आवश्यकता होती है। कहावत के अनुसार “मौन बुद्धिमानी रूपी सहयोगी है जो मनुष्य को अच्छे मित्र देता है।” सचमुच जो वाचाल होते है उनसे भले आदमी दूर रहने का ही प्रयत्न करते है। मौन की स्थिति में हम अपने अज्ञान, मूर्खता फूहड़पन को प्रकाशित होने से रोक सकते है। भर्तृहरि ने कहा है-विधाता ने मौन अर्थात् चुप रहना-अज्ञानता का ढक्कन बनाया है। ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों के लिये मौन ही सर्वोत्तम आभूषण और रक्षक कवच है। “अज्ञानी आदमी यदि वाचाल होगा तो जल्दी ही अपनी मूर्खता प्रकट कर देगा लेकिन मौन का अवलम्बन लेकर वह अज्ञान प्रदर्शन से अपने आपको रोक सकता है। जिस तरह गंदगी के दुष्प्रभाव और बदबू को दूर करने के लिये उसे ढक लेना आवश्यक है उसी तरह अज्ञान, मूर्खता, फूहड़पन को छिपाये रखने के लिये मौन अपेक्षित है।

शास्त्रों में तीन तरह के पाप बताये हैं। वाणी कर्म और मन से किये गये दुष्कृत्य ये तीनों ही त्रिपाप हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मौन के अवलम्बन से हम वाणीकृत पापों से तो निश्चित रूप से बच ही सकते हैं। किसी को अप्रिय कठोर, वचन बोलना, गाली देना, झूठ बोलना, चुगलखोरी, आलोचना, आदि वाचिक पापों से मौन ही हमें बचा सकता है, इस तरह मौन की अवलम्बन लेने से हम जीवन में किये जाने वाले एक तिहाई पापों से बच जाते हैं।

हम जीवन में जितना अनर्थक प्रलाप करते हैं, निरर्थक शब्द बोलते हैं। यदि उतने समय में कुछ काम किया जाए तो उतने से एक नया हिमालय, उपवन बन जाय। शब्दों की इस अथाह शक्ति को व्यर्थ ही नष्टकर क्या हम दीन नहीं बन रहें? यदि इन शब्दों का उपयोग हम किसी को सान्त्वना देने में भगवद् भजन, प्रभु नाम स्मरण, संगीत-जप-कीर्तन आदि में करें तो हमारा और समाज का कितना भला हो? साथ ही हम वाचालता से उत्पन्न दोष, जिनसे लड़ाई, झगड़े क्लेश, ईर्ष्या, द्वेष आदि का उदय होता है, उनसे बच जायें

वाचालता, व्यर्थ प्रलाप चाहे वह किसी प्रेरणा से क्यों न हो, हानिकर है। इस सम्बन्ध में एक विद्वान् ने लिखा है “अण्डे देने के बाद जलमुर्गी यह मूर्खता करती है कि वह चहचहाने लगती है। उसकी चहचहाहट सुन कर डोम कौवा आ जाता है वह उसके अण्डे भी छीन लेता है तथा उन वस्तुओं को भी खा जाता है जो उसने अपनी भावी सन्तान के लिये रखी थीं।” कहावत है “ वह कुत्ता अच्छा नहीं होता, जो ज्यादा भौंकता हैं।” इसी तरह वाचाल व्यक्ति को भला नहीं कहा जा सकता। संत ईसा ने कहा था “ अपने द्वारा बोले गये प्रत्येक बुरे शब्द के लिये मनुष्य को फैसले के दिन सफाई देनी होगी।” और यह एक तथ्य है कि बुरे शब्दों से हम मौन के द्वारा ही बच सकते हैं।

स्मरण रहे समाज मौन हमारे ज्ञान की कसौटी है। ”जानने वाला बोलता नहीं और बोलने वाला जानता नहीं।” इस कहावत के अनुसार जब हम सूक्ष्म रहस्यों को जान लेते हैं तो हमारी वाणी बंद हो जाती है। ज्ञान की सर्वोच्च भूमिका में सहज मौन स्वयमेव पैदा हो जाता है। स्थिर जल बड़ा गहरा होता है। उसी तरह मौन मनुष्य के ज्ञान की गंभीरता का चिन्ह हैं। वाचालता पाण्डित्य की कसौटी नहीं है वरन् गहन गंभीर मौन ही मनुष्य के पंडित, ज्ञानी होने का प्रमाण है। मौन ही मनुष्य का विपत्ति में सच्चा साथी है जो अनेक कठिनाइयों से उसे बचा लेता है।

संत रहीम ने प्रतिकूलताओं के दिनों में चुप होकर बैठने की सलाह दी है- ताकि चिंतन-मनन के लिये शक्ति मिल सके।

रहिमन चुप है बैठिये, देखि दिनन कौ फेर

संत कबीर ने भी बाद विवाद को मिटाने का गुरुमंत्र मौन को बताते हुये कहा है-

वाद विवाद विष घना, बोले बहुत उपाधि मौन गहे सबकी सहे, सुमिरे नाम अगाध॥

आत्मा की वाणी सुनने के लिये, जीवन और जगत के रहस्यों को पाप के लिये, लड़ाई, झगड़े वाद–विवादों को नष्ट करने के लिये, वाचिक पाप से बचने के लिये वाणी के तप के लिये तथा अन्याय हितकर परिणाम के लिये हमें मौन का अवलम्बन लेना चाहिये। दैनिक जीवन में मित भाषण और हित भाषण की आदत डालकर हम लौकिक और आध्यात्मिक प्रगति का द्वार प्रशस्त करते है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है।


पुरस्कार (Kahani)

एक दयालु राजा ने चिड़ियों को बहेलियों द्वारा हत्या किये जाने से बचाने के लिये घोषणा की कि जो पकड़ी हुई चिड़ियाँ लायेगा उसे पुरस्कार मिलेगा। जो चिड़ियाँ इस प्रकार लाई जातीं राजा उन्हें मुक्त करा देता। उसकी दयालुता का यश फैलने लगा।

थोड़े ही दिनों में आम लोगों ने यह धंधा अपना लिया ये दिन भर चिड़ियाँ पकड़ते। राजा के पास ले जाते और इनाम लेकर लौटते। हजारों बहेलिये बन गये और राज्य कोष खाली हो चला।

मंत्री ने राजा को रोका और कहा-निष्ठुरों को उपहार देने के स्थान पर उन्हें दंड उपयुक्त रहेगा। राजा ने नीति बदल दी।


अवरोध-विरोध व्यक्ति को और प्रखर बनाते हैं

परमात्मा का यह विश्व-उद्यान विविधताओं से भरा है। यहाँ एक ओर अच्छाइयों का सिलसिला है, वहीं बुराइयाँ भी कम नहीं हैं। देवी सत्प्रवृत्तियों की ही तरह दुष्टता एवं दुर्बुद्धि का प्रसार है। इसी को स्पष्ट करते हुये गोस्वामी तुलसीदास अपनी लोकप्रिय कृति मानस में जड़-चेतन गुण-दोषमय-कह कर निरूपित करते है। प्रायः सभी के मन में यह प्रश्नावली उठती है कि परमात्म सत्ता ने अपनी इस कलाकृति में विसंगतियों को क्यों स्थान दिया? श्रेष्ठता के साथ दुष्टता का क्या प्रयोजन? नीति बनी, तो अनीति की क्या आवश्यकता थी? जब देव थे, तो असुरों की क्या जरूरत पड़ी? हमारा इस तरह सोचना इसलिये बन पड़ता, जो परमेश्वर ने किया हैं। अनुदान कितने ही मूल्यवान क्यों न हो, उनके महत्त्व का आकलन करना, उपयोग में सतर्कता बरतना, तब तक संभव नहीं बन पड़ता, जब तक अभाव एवं प्रतिकूलता की स्थिति सामने न हो। सम्पन्नता बनी रहने पर कठिनाई की कल्पना ही न होगी। साथ ही तुलना का कोई मापदण्ड न रहने पर उपलब्धियों का कोई मूल्य न समझा जायेगा। इस प्रकार उनमें किसी भी प्रकार सुख न रह सकेगा।

जिन्हें प्रचुर सुविधायें प्राप्त है, उन्हें वे भारभूत प्रतीत होती हैं एवं वैसा कोई रस भी नहीं आता, जैसा कि अभावग्रस्त स्थिति वालों को उसी को पाने में स्वर्ग-सौभाग्य जैसा सुख अनुभव होता है। भोजन की स्वादिष्टता का जितना मूल्य है, उससे अधिक, कड़ी भूख लगने का है। अभाव की कठिनाई से ही भाव के मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है। इसी में संतोष-सुख अनुभूति होती है। इसी की आकुल आकांक्षा से कठोर श्रम का साहस जागता है। रुग्णता और दुर्बलता में शरीर की जो दुर्गति होती है, उसी के भय के कारण लोग स्वास्थ्य रक्षा में प्रवृत्त होते हैं। यदि स्वास्थ्य की क्षमताएँ एवं सफलता निश्चित रहे, तो आरोग्य साधन के लिये जो किया और सोचा जाता है, उसकी किसी को आवश्यकता न पड़ेगी और न आरोग्य के महत्त्व का आकलन हो सकेगा, फिर इसके लिये प्रयत्न करना कौन पसन्द करेगा? ऐसी स्थिति में मनुष्य जीवन में सुदृढ़ स्वास्थ्य का जो गौरव व आनन्द प्राप्त होता है, वह समाप्त हो जायेगा।

अनुकूलता एवं प्रतिकूलता दोनों के अपने-अपने लाभ हैं। सुविधा एवं सफलता की प्राप्ति मनुष्य को आत्म गौरव का अहसास दिलाती है। आत्माभिमान, आत्मावलम्बन के विश्वास की झाँकी प्रदर्शित करता है। इसके बाद ही बड़े-बड़े काम करने बड़े-बड़े लाभ पाने की स्थिति बनती हैं। आत्मबल को ही सामान्य भाषा में मनोबल कहते हैं। धनी मनस्वी व्यक्ति साधनहीन होते हुये भी सहयोग एवं समर्थन न मिलने पर भी प्रायः ऐसे काम कर गुजरते है, जिन्हें देख कर दाँतों तले अंगुली दबानी पड़ती है। स्पष्ट है कि यह मनोबल कहीं अन्य लोक से नहीं टपकता, निरन्तर का संघर्ष ही इसका अभिवर्धन करने वाला होता है। स्वाभाविक है यह संघर्ष प्रतिकूलताओं से होगा। इस तरह यह स्थिति शरीर तंत्र व मनः संस्थान के हर कल-पुर्जे को क्रिया-कुशल बनाकर इस स्तर में पहुँचा देती है कि उसे अतिरिक्त समझा जा सके।

असुविधाओं का महत्त्व बताते हुये प्राणि वेत्ताओं मानना है कि जीवधारियों के शरीरों में जो परिवर्तन हुये हैं। उसका कारण असुविधाओं से संघर्ष रहा है। इसे चेतना की अद्भुत शक्ति का प्रत्यक्ष चमत्कार कहा जा सकता है। शाकाहारी प्राणियों ने आत्मरक्षा के लिये माँसाहारी प्राणियों ने शिकार पर आक्रमण करने के लिये आने शरीर में परिवर्तन किये हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में प्राणियों के शरीर वैसे नहीं थे, जैसे आज दिखाई पड़ते है। जीवशास्त्रियों ने अपने शोध निष्कर्षों में इसका कारण स्पष्ट करते हुये कहा है कि उनकी अन्तः चेतना में प्रस्तुत कठिनाइयों के समाधान के लिये अकुलाहट एवं अनुकूलन की अभिलाषा उत्पन्न हुई, जिससे शरीर व मस्तिष्क ने तदनुरूप ढलना आरम्भ किया। अन्य प्राणियों की तरह मानवीय प्रगति की यही इतिहास है। वर्तमान में दिखाई पड़ने वाली प्रखरता प्रतिकूलताओं से होने वाली टकराहट के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।

यदि सभी कुछ आसानी से होता चला जाय, तो मनोरथ भले ही पूर्ण होते चले जाएँ, पर प्रतिभा का विकास मार्ग अवरुद्ध होता चला जायेगा। अमीरों की संतानें आमतौर से आलसी, मंदबुद्धि एवं व्यसनी होती हैं, जबकि कठिनाइयों से जूझने वाले परिवारों के बालक आश्चर्यजनक प्रगति करते देखे जाते हैं। इस तरह की घटनाओं में प्रतिकूलता से टकराने पर उत्पन्न होने वाली शक्ति अपनी भूमिका निभाती देखी जा सकती है।

आम धारणा है कि बंगाली डरपोक प्रकृति के होते है, जब कि पंजाबी निडर और साहसी बुद्धि के सम्बन्ध में इसके विपरीत मान्यता है। बंगालियों को तीक्ष्ण मेधा सम्पन्न माना जाता है, जबकि पंजाबियों के बारे में कहा जाता है कि साहस की दृष्टि से तुलनात्मक दृष्टि से वे बंगालियों से उन्नीस पड़ते है।

यहाँ चर्चा निन्दा-प्रशंसा की नहीं हो रही है। कहा यह जा रहा है कि उपयोग और अकर्मण्यता के अपने-अपने परिणाम-प्रतिफल है। आलसी व्यक्ति शरीर से दुर्बल और मन से डरपोक इसलिये बन जाते हैं कि उनने जीवन में श्रम और पुरुषार्थ का महत्त्व नहीं समझा। जिसने श्रम से जी चुराया, वह साहसी और मनस्वी कैसे हो सकता है? इसके विपरीत जहाँ बौद्धिक वैमनस्य प्राप्त करने के लिए बुद्धि को बार-बार सान पर चढ़ाया गया हो, वहाँ वह मोथरी रह जाय, यह कैसे हो सकता है?

प्राणिशास्त्री भी उपयोग और अनुप्रयोग के इस सिद्धान्त को अब स्वीकारने लगे हैं। सर्वविदित है कि पाश्चात्य विकासवादी मनुष्य को बन्द से विकसित बताते हैं। यदि सचमुच ही तथ्य यही है, तो बन्दर की लम्बी पूछ मनुष्य बनते-बनते कहाँ गायब हो गई? इस संदर्भ में विकासवादियों का तर्क है कि कायान्तरण के साथ-साथ पूँछ की उपयोगिता समाप्त होती गई, इसलिए वह धीरे-धीरे कर छोटी होते-होते मानव शरीर में प्रायः लुप्त हो गई और अब वह एक हड्डी के रूप में बची हुई है। वे कहते है कि बन्दर के शरीर में पूँछ की उपयोगिता थी, इसलिए वहाँ अब भी बनी हुई है। उनका मानना है कि उछलने-कूदने में पूँछ शरीर को संतुलित बनाये रखने में सहायता करती है, इसलिए वैसी काया में उपयोग के कारण उसका अस्तित्व बना रहता है। शरीरान्तर के साथ बन्दर की न सिर्फ आकृति बदली, वरन् प्रकृति में भी आमूलचूल परिवर्तन आ गया। यहाँ उसकी छलाँगने वाली प्रवृत्ति बाई पेडल लोकोमोषन (दो पैरों से सीधे होकर चलने) के रूप में बदल गई। इस स्थिति में गिरने की संभावना भी कम हो गई और संतुलन साधने की आवश्यकता भी, फलतः मानव शरीर में पूँछ का लोप हो गया। दूसरी ओर निरन्तर के दबाव, रगड़ और उपयोग की परिणति दूसरे ढंग से सामने आती है। -एनोटॉमी एण्ड डैस्टिन नामक ग्रंथ में स्टीफन कर्न लिखते हैं कि सन् 1900 के आसपास जर्मन महिलाओं में धात्विक कमरबन्द पहनने का भारी प्रचलन था। लम्बे समय तक कमर के चारों ओर उसे बाँधे रहने के कारण कमर अन्दर की ओर धँस जाती और नितम्ब पीछे की ओर कूबड़ की तरह निकल आते। इसी से उनकी बनावट ऐसी होती चली गयी।

दबाव, रगड़ और निरन्तर के प्रयोग का परिणाम सदा ऐसा ही होता है। कुएँ की जगत पर रस्सी के बार-बार के घर्षण से इतनी ऊष्मा पैदा होती है कि गहरा गढ्ढा हो जाता है। टकराहट से सर्वत्र ऐसी ही प्रगति भी इसका अपवाद नहीं। वहाँ इसके लिए तप-तितिक्षा की साधना करनी पड़ती है। इसमें कष्ट कठिनाइयों भरे जीवन को सहज स्वीकार किया जाता है। प्रायः सभी प्रकार की तपश्चर्याएँ शरीर को कष्ट देने वाली तथा मन को अखरने वाली होती है। उन्हें आमंत्रित करने का उद्देश्य प्रतिकूलताओं से टकराने पर उत्पन्न शक्ति से लाभ उठाने का होता है। जल प्रपातों की धारा से घूमने वाले पहिये जोड़ दिये जाते है। उतने भर से बिजली घर, पनचक्की, टरबाइन और अन्य क्रिया−कलाप गतिमान होने लगते हैं।

प्रखरता भौतिक या आत्मिक किसी भी क्षेत्र की हो, प्रतिकूलताओं के साथ टक्कर लेने से ही उत्पन्न होती है। यह प्रतिकूलता प्रकृति प्रदत्त हो या अपने आप उत्पन्न हुई हो, हर स्थिति में शूरवीर, साहसी, पराक्रमी, पुरुषार्थी बनने का अवसर मिलता है। यही व्यक्तित्व की समर्थता का मूलभूत उद्गम है। चैन से जिन्दगी गुजारने वालों के दिन तो आराम से गुजर जाते हैं, किन्तु उन्हें शारीरिक ओज एवं मानसिक तेज से वंचित रहना पड़ता है। स्वयं को प्राणवान बनाने के लिए ऐसा साहस चाहिए, तो व्यावहारिक जीवन में प्रतिकूलताओं से टकराते-टकराते स्वभाव एवं अभ्यास में घुल गया हो।

तथ्यों को विचारपूर्ण रीति से समझना चाहिए। गुणों के विकास के लिए अवगुणों की आवश्यकता है-यह समझकर अवगुणों को अन्तराल में स्थान देना औचित्यपूर्ण नहीं है, न ही गरीबी एवं दरिद्रता को भाग्य का खेल समझकर ओढ़ रखने से तपश्चर्या होती है। कष्ट में शक्ति नहीं है, वह तो टकराने से उत्पन्न होती है। जितनी तीव्रता से संघर्ष किया जायेगा, उतनी ही शक्ति उत्पादित होगी। यदि दुर्गति तथा दुर्गुणों को सिर झुकाकर स्वीकार लिया गया, तो इसे मन्द स्तर की आत्महत्या ही समझना चाहिए। तपस्वियों द्वारा स्वीकारे गये कष्ट महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए होते है। उनकी तुलना उन अन्वेषकों से की जा सकती है, जो विष में भी औषधि खोज लेते है। हमारा चिन्तन यह होना चाहिए कि प्रकृति व्यवस्था में जो कठिनाइयाँ आ खड़ी हुई हैं, उनसे मल्ल युद्ध करके अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने का लाभ कमाया जाय।

मानव की तेजस्विता उभारना ही सृष्टि निर्माता को अभीष्ट है। वह उसे साहसी पराक्रमी देखना चाहता है। योद्धा के जिए कोई प्रतिपक्ष तो चाहिए ही। अखाड़े में भारी वजन उठाने, मुद्ररों को घुमाने से पहलवानों की कलाई एवं छाती मजबूती होती है। इसमें प्रत्यक्षतः असुविधा एवं कठिनाई अवश्य है, किन्तु परोक्ष लाभ भी है।

नदी में जल-प्रवाह के साथ बहने वाले पत्थरों में से कितने ही शालिग्राम के रूप में पूजित और प्रतिष्ठित होते हैं। यह सौभाग्य किनारे पड़ी शिलाओं को कहाँ मिल पाता है। जो कष्ट-कठिनाइयों से जूझने की तुलना में उनसे किनारा कर लेना पसन्द करते हैं, वे भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में पिछड़ेपन का शिकार होते हैं। घर्षण भिड़ंत और बार-बार की आवृत्ति से टकराने वाले की शक्ति और मजबूती बढ़ती है, किन्तु इसके लिए कोई अवरोध-विरोध तो चाहिए ही।

स्रष्टा ने इसी तथ्य को ध्यान में रखकर विसंगतियों से भरे संसार की संरचना की। इसमें विद्यमान् प्रतिकूलता, पक्षपात, अनीति को देखकर परमसत्ता की अदूरदर्शिता नहीं समझनी चाहिए। इन्हें हमारे लिए प्रगति के महत्त्वपूर्ण साधना के रूप में सजा गया है। उन्हें उसी रूप में देखा समझा जाना चाहिए।


वार्धक्य को सुखमय बनायें

अपने देश में प्रायः पचपन-अट्ठावन साल की उम्र में सरकार अपने कर्मचारियों को रिटायर कर देती है। इस उम्र में व्यक्ति अपने नाती पोतों को भी खिला लेता है। उसके बच्चे उसका दायित्व सम्भालने योग्य हो जाते हैं। इस आयु में व्यक्ति की शारीरिक क्षमता भी परिवार के जटिल दायित्वों को निभाने में अक्षम हो जाती है। शरीर का स्वास्थ्य उम्र के तकाजे से पहले जैसा नहीं रहता, कोई न कोई शिकायत उठने ही लगती है। ऐसी स्थिति में वृद्ध व्यक्ति दिनों-दिन इस चिन्ता में घुलने लगता है कि वह अपने परिवार के लिये अनुपयोगी और भार स्वरूप हो गया है। किन्हीं बातों में उसे यह भी अनुभव होता है कि बहू ही नहीं, नाती पोते भी उसकी उपेक्षा अवहेलना करने लगे हैं। वह सोचता है कि अब मेरा अस्तित्व शून्य होता जा रहा है।

ये धारणायें जिस वृद्ध व्यक्ति में जन्मने लगती हों और जो अपने अस्तित्व को शून्य होता जा रहा अनुभव करने लगा हो, उसके दृष्टिकोण में कहीं न कहीं गलती जरूर आ रही है। अन्यथा वृद्धावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपने जीवन की समस्त व्यस्तताओं से अवकाश प्राप्त कर लेता है और जिन उपयोगी कार्यों को व्यस्तता के कारण वह कल पर टालता चला आ रहा था उनमें उतर का जीवन का अनदेखा आनन्द उठा सकता है। किसी विचारक ने यह बहुत ठीक ही कहा है कि “वृद्धावस्था जीवन का वह किनारा है जहाँ व्यक्ति समस्त संघर्षों को पार कर तूफानों से गुजर कर पहुँचता है और स्वयं को अधिक शान्त, अधिक सुखी तथा समाज के लिये अधिक उपयोगी बना सकता है।”

यह सच है कि व्यक्ति आजीवन समाज के लिए आवश्यक उन कार्यों को जो लोकमंगल की दृष्टि से करना चाहिए था-पारिवारिक दायित्वों की बोझिलता के कारण नहीं कर पा रहा था, इस अवकाश की आयु में उन कार्यों में लग कर जीवन रस को बदल सकता है। प्राचीन काल में प्रचलित वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की व्यवस्था का भी यही उद्देश्य था जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में ज्ञानार्जन और अपनी क्षमताओं का विकास, तदुपरान्त पारिवारिक जीवन में प्रवेश और गृहस्थ के दायित्व का ग्रहण आधी आयु तक वैयक्तिक और पारिवारिक जीवन में अनेकानेक अनुभव प्राप्त हो जाते हैं। जब बच्चे अपना दायित्व सम्हालने योग्य हो जाय तो परिवार की ओर से निश्चित ही कर समाज का कार्य करना चाहिए। फिर समाज उनकी आवश्यकताओं को पूरा करता और उनके भविष्य की संरक्षण देता है।

यह व्यवस्था जब से लुप्त हुई और समाज का ढाँचा बदला तब से वृद्ध व्यक्तियों के सामने अपने वर्तमान के निर्वाह, भविष्य की सुरक्षा और प्रतिष्ठा को बनाये रखने की समस्या उत्पन्न हो गयी है। वृद्ध काल को जीवन का प्रशान्त किनारा कहा जरूर गया है और वह उतना सच भी है पर व्यक्ति इस किनारे पर जितना व्यग्र चिंतित और निराश हो कर उतरता है-लगता है उन्होंने अपने जीवन को बिताने में, इस किनारे पर उतरने से पहले ही कोई त्रुटि कर दी है और वे इस किनारे पर उतरना नहीं चाहते लगता है जबरन ही उतारे जा रहे हैं। जबरन उतारे जाने का अर्थ यह है कि परिवार के जो दायित्व उन पर निर्भर नहीं करते, वे उन्हें ओढ़े रहना चाहते हैं। उदाहरण के लिये वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अब भी उनका आदेश उसी प्रकार मानें जिस प्रकार कि छोटी आयु में मानते थे। वे कहे तो खायें, वे कहें तब सोये और वे कहें तब जागें। अर्थात् उनकी आज्ञाओं का अनिवार्य रूप से पालन किया जाय जब उनकी संतान ज्ञान और अनुभव की दृष्टि से शून्य थी तब पिता के स्निग्ध संरक्षण और मार्ग दर्शन की आवश्यकता आज्ञाकारिता की अपेक्षा रखते हुए पूरी की जाती रहे, यही ठीक था। पर इस उम्र में जबकि उनकी संतानें भी माता-पिता बन चुकी हैं और वे अपनी संतानों के प्रति वही दायित्व निभा रहे हैं जो कभी उनके आज के वृद्धों ने निभाये थे, जब उनसे वह अपेक्षा करना कि वे पूर्ववत् ही आज्ञाकारी रहें, अत्युक्तिपूर्ण है। लकीर के फकीर बनने की आशा वयस्क संतानों से करना गलत है। जबकि वृद्ध व्यक्ति अपने अहं की तुष्टि उसी में देखता है और किसी कारण उचित न लगने के कारण वयस्क पुत्र-पुत्रियाँ वृद्ध माता-पिता के निर्देशों का अक्षरशः पालन नहीं करते तो वे अपनी उपेक्षा निरादर होता अनुभव करने लगते हैं।

सारा दोष वृद्धजनों का ही है यह नहीं कहा जा रहा है। वृद्ध व्यक्तियों को अपनी समस्या का स्वयं हल करने के उद्देश्य से पहले अपने दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन करना चाहिए जहाँ उचित हो वहाँ परामर्श दें, आज्ञा नहीं। क्योंकि युवा पुत्रों को भी अपना अस्तित्व बोध होने लगता है और वे परामर्श के रूप में ही अपने माता-पिता की बातों को स्वीकार कर सकते हैं। यों तो वयस्क संतानें स्वयं ही यह अपेक्षा करती हैं कि वह अपने वृद्ध अभिभावकों के अनुभवों से लाभ उठाये उनके संचित ज्ञान और निष्कर्षों का प्रयोग स्वयं भी करें। पर वह ग्रहण उसी दिशा में किया जा सकता है जबकि परामर्श के रूप में दिया गया हो। इस तथ्य को ऋषि महर्षियों ने पहले ही अनुभव कर लिया था। शास्त्रकारों ने कहा भी है कि युवा पुत्र से पिता, मित्र की तरह व्यवहार करें।

सामान्यतः वृद्धावस्था के सम्बन्ध में यह कल्पना की जाती है कि उस समय हम परवश हो जायेंगे, हमारा कोई आर्थिक आधार नहीं रहेगा, परिवार के लिये हम महत्त्वहीन हो जायेंगे। आदि-आदि बातें जो वृद्ध आयु के सम्बन्ध में सोची जाती हैं निराधार और भ्रामक होती हैं। बार-बार उनकी पुनरावृत्ति हो उन्हें समस्या बना देती है जैसे कि सोचा जाता है हम परवश हो जायेंगे इसका मतलब है कि व्यक्ति का आत्म विश्वास टूटने लगता है। आत्मविश्वास एक ऐसी शक्ति है जो अनायास और स्वयं के अतिरिक्त किसी अन्य द्वारा छीनी ही नहीं जा सकती बल्कि उसे स्वयं ही खोया, फेंका जाता है। परवश होने की आशंका के स्थान पर वह व्यक्ति यह उज्ज्वल पक्ष बार-बार ध्यान में लाये कि मेरे अनुभवों से लाभ उठाने के लिये अब मेरे बेटे पोते या पास पड़ोस के व्यक्ति मुझसे और अधिक आशा पूर्वक अपेक्षा करेंगे। तो परवशता के स्थान पर मार्ग दर्शन की एक नयी क्षमता का विकास होगा।

वृद्ध आयु को समस्याग्रस्त बनाने का मूल कारण है। निराशावादी चिंतन। शरीर साथ नहीं देगा तो शरीर के साथ की बात युवावस्था में भी किसी के लिये निश्चित और अटल संभावना नहीं है। कब कोष्ठ रोग आ घेरे, कब कौन दुर्घटना हो जाय, कब प्राण पखेरू उड़ जाय इसका निश्चित पता ठिकाना युवावस्था और बाल्यकाल में भी कहाँ रहता है? लेकिन उस समय आशावादी और उज्ज्वल पक्षों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखने के कारण उत्साह बना रहता है। यह भी तथ्य है कि निराशा तथा अवसाद, युवावस्था में भी आक्रमण कर दें तो उस समय उत्साही से उत्साही युवक भी निरुत्साही और वार्धक्य के शिकार हो जाते हैं।

सुनी सुनायी बातें और बनी बनायी धारणायें व्यक्ति को उत्तरकाल में साहसहीन बना देती हैं, साथ ही निराश भी। नयी परिस्थितियाँ भया वह रूप इसी कारण ले लेती हैं। अन्यथा बचपन से किशोर में और किशोर से यौवन में प्रवेश करते समय भी परिस्थितियाँ बदली थीं तब तो इतनी चिंता नहीं हुई थी। एकाकी जीवन का छोड़कर परिवार बसाने, पत्नी के साथ रहने की घड़ियों में भी परिस्थितियाँ बदली तब मनोबल क्यों नहीं टूटा? एकमात्र कारण है उन अवस्थाओं के सम्बन्ध में ऐसी कोई धारणा प्रचलित नहीं है जैसी कि वृद्धावस्था के सम्बन्ध में। उन धारणाओं की पुष्टि करते हुए ही व्यक्ति अपना साहस, अपनी आशा और अपना उत्साह खोने लगता है।

वृद्धावस्था को सुख पूर्वक व्यतीत करने के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि इस सम्बन्ध में प्रचलित पूर्व धारणाओं, और भ्रामक विचारधाराओं का शिकार न हुआ जाय। तथ्य और वस्तुस्थिति को विवेकपूर्ण दृष्टि से ग्रहण करने पर व्यक्ति का सामान्य साहस, आत्म विश्वास और भविष्य के प्रति आस्था मजबूत होती है तथा उसकी आशा, उत्साह और संजीदगी को बल मिलता है। तदुपरान्त बदलती हुई अवस्था के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयत्न किया जाय तो वृद्धावस्था में वह आनन्द उठाया जा सकता है जो पिछले समूचे जीवन में कभी मिला नहीं।

वृद्धावस्था को सुख पूर्वक व्यतीत करने के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि इस सम्बन्ध में प्रचलित पूर्व धारणाओं, और भ्रामक विचारधाराओं का शिकार न हुआ जाय। तथ्य और वस्तुस्थिति को विवेकपूर्ण दृष्टि से ग्रहण करने पर व्यक्ति का सामान्य साहस, आत्म विश्वास और भविष्य के प्रति आस्था मजबूत होती है तथा उसकी आशा, उत्साह और संजीदगी को बल मिलता है। तदुपरान्त बदलती हुई अवस्था के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयत्न किया जाय तो वृद्धावस्था में वह आनन्द उठाया जा सकता है जो पिछले समूचे जीवन में कभी मिला नहीं।


परम पूज्य गुरुदेव की पाँच स्थापनाएँ - प्रथम शक्ति-केन्द्र आँवलखेड़ा

संसार में दो प्रचण्ड शक्तियाँ हैं-एक धर्म अध्यात्म, दूसरा शासन-सुरक्षा तंत्र। धर्म उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं उदार व्यवहार की शिक्षा देता है। व्यक्ति को ऐसे ढाँचे में ढालता है, जिससे वह समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी से भरा-पूरा जीवन जी सके। एकता और समता की भावनाओं से भरा-पूरा रह सके। धर्म का तत्त्वज्ञान यही है। उसका तत्त्वदर्शन व्यक्ति की चेतना को मानवीय गरिमा के अनुरूप ढालता है। धर्म की तलवार न हो तो अनीति अराजकता ही चारों ओर छा जाय। आसिक्तता को ही नैतिक मूल्यों का मेरुदण्ड कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी और जन-जन के मनों में आस्तिकता के संस्कारों के बीजारोपण का कार्य धर्म तंत्र ही तो करता है।

दूसरी ओर शासन तंत्र का काम है समाज व्यवस्था बनाना, जनता की समृद्धि और सुविधा का सरंजाम बिठाना, अनाचारी पर नियंत्रण करना, देश की सुरक्षा का प्रबन्ध करना। शिक्षा, चिकित्सा, संचार, परिवहन, संसाधनों की उपलब्धि, उत्खनन जैसे अनेकों उपयोगी कार्य शान ही योजनाबद्ध रूप से करता है।

धर्मतंत्र और शासन तंत्र दोनों के बीच अन्योऽन्याश्रित जैसा सम्बन्ध रहना चाहिए। दोनों के कार्य क्षेत्र अलग-अलग होते हुए भी दोनों को मिला देने से ही समग्र प्रगतिशीलता बनती है। यह व्यवस्था होनी चाहिए कि व्यक्ति को मानवी गरिमा के अनुरूप धर्म ढाले और समाज को सुव्यवस्थित रखने का काम शासन करे। शासन तंत्र का मानवीय तत्त्वदर्शन पर कोई नियंत्रण नहीं। दूसरी ओर धर्म तंत्र में व्यवस्था बनाने हेतु अनिवार्य बहिरंग अनुशासन शक्ति वही है। इसलिए भूतकाल दोनों ही क्षेत्र मिल जुल कर ऐसे कार्यक्रम बनाते और बाँटते थे, जिससे समाज की समग्र प्रगति एवं सुख शान्ति में सहायता मिले।

आज दोनों ही क्षेत्रों में अवांछनीयताओं की घुसपैठ हो गयी है। धर्मतंत्र में, अध्यात्म परिकर में वे बुराइयाँ प्रतियोगिता इसलिए अधिक दीखती हैं कि उस क्षेत्र से आदर्शों के उद्भव की बड़ी-बड़ी आशाएँ की जाती हैं पर जब वहाँ भी ढोंग पाखण्ड, विलगाव, ठगी प्रतिगामिता का ही सम्मिश्रण दीखता है तो लोग खीजते और कटु समीक्षा करते हैं यह सही भी है। उस क्षेत्र को धर्म की मल आस्थाओं को प्रचलित करने में ही संलग्न रहना चाहिए। उसका ऐसा रूप न बनने देना चाहिए जिससे परस्पर कलह बढ़े कुरीतियों के प्रचलन में सहायता मिले अथवा राजनीति की घुसपैठ उसमें होने लगे। धर्म श्रद्धा क्षेत्र तक ही सीमित रहे, व्यक्ति को उत्कृष्ट बनाना ही उसका लक्ष्य हो, धर्मोन्माद में न बदल जाय, यह ध्यान रखा जाना भी जरूरी है। दूसरी ओर शासनतंत्र भी इन बुराइयों से सर्वथा मुक्त नहीं है, भ्रष्टाचार नीचे से ऊपर कि कूट-कूट कर भरा है। किसी को किसी का भय न होने से उच्छृंखलता ही सब पर हावी है। यदि आदर्शवादिता का अंकुश शासन व्यवस्था पर होता तो संभवतः यह निरङ्कुशता की, आपाधापी, पारस्परिक विग्रह व असुरक्षा की स्थिति न आती।

भारतवर्ष के साथ इन गई गुजरी परिस्थितियों में भी एक अच्छी बात यह जुड़ी हुई है कि धार्मिक आस्था का असाधारण प्रभाव जनता पर बना हुआ है। धर्म में पाखण्ड घुस पड़ने के बावजूद उसमें जितना समय, श्रम व धन लगा हुआ है, उसकी हिसाब लगाने पर लगता है कि अभी भी लोगों के मन में धर्म के प्रति गहरी आस्था है, भले ही उसके बहुसंख्य सूत्रधारों ने मात्र वेश ही धर्म का ओढ़ा हुआ है, चिंतन, चरित्र उनका भी आदर्शवादी नहीं है। धर्म–कलेवर के निमित्त जो कुछ भी अर्थ नियोजन किया जाता है, वह उससे थोड़ा ही कम हो सकता है जितना कि शासन को अपना ढाँचा खड़ा रखने में जुटाना पड़ता है।

ऊपर की पंक्तियों में यह हवाला विस्तार से इसलिए दिया गया कि आज की परिस्थितियों में सबसे बड़ी जिम्मेदारी धर्मतंत्र की है जिसे समाज परिकर को धर्म धारणा से अनुप्राणित करना चाहिए। यदि व्यक्ति और समाज को समुन्नत सुसंस्कृत बनाया जा सका तो धर्मतंत्र में अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित कर राजतंत्र को सही दिशा दे सकता है जो समय की आवश्यकता है। इस स्थिति का भाँति-भाँति पर्यवेक्षण कर समय की माँग को पूरा करने हेतु संव्याप्त अनास्था रूपी संकट की विभीषिका को मिटाने के निमित्त एक महामानव ने अपना सारा जीवन इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु खपाते हुए एक ऐसा तंत्र खड़ा किया, जिसके स्वरूप व लक्ष्य को देखते हुए यह आशा बँधने लगी है कि यह प्रयोजन अवश्य पूरा होकर रहेगा। इन महापुरुष का नाम है- वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य इन्होंने अपनी 80 वर्ष की आयु में वह काम कर दिखाया है जो 800 वर्ष में भी पूरा नहीं हो पाता। एकाकी अपनी यात्रा आरम्भ करते हुए महात्मा गाँधी के सन् 1930 में दिए गए सूत्र-धर्मतंत्र से लोक मानस का परिष्कार, राजतंत्र का दिशा निर्देशन एवं नैतिक क्रान्ति का पूर्णतः परिपालन करते हुए उन्होंने अपनी जन्मस्थली आँवलखेड़ा जनपद आगरा से लेकर अंतिम कार्य स्थली व निर्वाण स्थली शान्तिकुञ्ज हरिद्वार (उ. प्र.) तक पाँच स्थान-शक्ति केन्द्र खड़े किये जो उनके उद्देश्यों को पूरा करने में आज भी निरत हैं।

एक ब्राह्मण जमींदार के परिवार में जन्मे आचार्य जी की जन्म स्थली एवं प्रथम बीस वर्ष तक रही कार्य स्थली ‘आँवलखेड़ा’ अब एक दर्शनीय तीर्थ सिद्ध पीठ का रूप ले चुकी है। वहीं पर देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत सत्ताईसवीं कड़ी के रूप में युगसन्धि महापुरश्चरण की प्रथम महापूर्णाहुति आगामी नवम्बर में सम्पन्न होने जा रही है।

दूसरा संस्थान है अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा (घीयामण्डी) जहाँ उनने लेखनी रूपी अस्त्र से सन् 1984 में ‘अखण्ड ज्योति पत्रिका आरंभ की एवं 200 से आरंभ होने वाले गायत्री परिवार को सतत् मार्ग दर्शन देते हुए मनीषी चिन्तन को घर-घर पहुँचाया एवं आज प्रातः साढ़े चार लाख व्यक्ति इस पत्रिका को हिन्दी में पढ़ते तथा दस लाख लोगों को पढ़ाते हैं। इसी के अनुवाद दस भाषाओं में छपकर दस लाख और व्यक्तियों तक पहुँचते हैं। इसी स्थान पर निवास करते हुए उन्होंने हजारों व्यक्तियों से व्यक्तिगत पत्र व्यवहार करते हुए उनको अपना अभिन्न अंग बनाया, उनकी समस्याएँ सुलझाई एवं एक विशाल गायत्री परिवार का सदस्य बना लिया। यही कारण है कि हर जाति, मत, सम्प्रदाय का व्यक्ति उनसे पिता की तरह स्नेह करता एवं उनकी धर्मपत्नी वंदनीय माता भगवती देवी को अपनी माता मानते हुए बदले में अनेक गुना स्नेह ढेरों अनुदान आशीर्वाद पाता रहा। यहीं पर उनने आर्षग्रन्थों का भाष्य कर उन्हें जन सुलभ बनाया, अपने वजन से भी कई गुना साहित्य रचा एवं नियमित अपनी लेखनी चलाते हुए अपनी साधना के शक्ति स्रोत अखण्ड दीपक के प्रकाश में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका एकाकी लिखी, जो कि अपनी लम्बी यात्रा पूरी कर पाँच वर्ष पूर्व ही अपनी स्वर्ण जयन्ती मना चुकी है।

तीसरा संस्थान है ‘गायत्री तपोभूमि मथुरा’ जहाँ उन्होंने आगरा से प्रयाग कर मथुरा आकर धर्म तंत्र के परिष्कार का तुमुलनाद किया, चौबीस वर्ष तक चौबीस-चौबीस लक्ष के महापुरश्चरणों का उत्तरार्द्ध सम्पन्न किया, ऐतिहासिक सहस्र कुण्डीय यज्ञ के माध्यम से उसकी पूर्णाहुति की एवं देशव्यापी संगठन-विस्तार हेतु ‘युग निर्माण योजना’ को जन्म दिया।

मथुरा से सन् 1971 में पूज्य गुरुदेव ने हिमालय के लिए एवं वंदनीय माता जी ने शान्तिकुञ्ज हरिद्वार’ के लिए प्रयाण किया। जिस स्थान पर तीस वर्ष तक साधनारत रह उन्होंने उसे संस्कारित किया था, उसे एक भावनाशील समर्पित समुदाय को सौंपकर हमेशा के लिए उसे नमन कर वे उत्तराखण्ड हिमालय की ओर चल दिये। एक वर्ष की तपश्चर्या के बाद वे पुनः शान्तिकुञ्ज लौटकर वंदनीय माता भगवती देवी के साथ साधना में संलग्न हो गये। यहाँ नियमित शिक्षण सत्रों की शृंखला चलाई गई। साधन, वानप्रस्थी, लोकसेवी परिव्राजक एवं नारी जाग्रति हेतु संकल्पित कन्याओं एवं महिलाओं का शिक्षण चला, साथ ही भारत तथा विश्वव्यापी विशाल प्रज्ञा अभियान युग निर्माण परिवार का संगठन संचालन भी। 1979 में विज्ञान और आध्यात्म के समन्वय हेतु संकल्पित एक संस्थान की वैज्ञानिकों की टीम के संयोजन एवं युग ऋषि के मार्ग दर्शन में स्थापना हुई जिसका नाम रखा गया ‘ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान।’ यह संस्थान शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ से लगभग 1/2 मील दूरी पर गंगा तट के किनारे सप्त सरोवर क्षेत्र में सप्तर्षि मार्ग पर बना है एवं अपनी यज्ञ विज्ञान, शब्द विज्ञान तथा साधना विज्ञान पर बहुमूल्य यंत्र उपकरणों के माध्यम से की जा रही शोध तथा उपलब्धियों के लिए इस अल्प अवधि में ही ख्याति प्राप्त कर चुका है। वनौषधि अनुसंधान, आहार चिकित्सा, साधना से मानसोपचार जैसे विषय अपने हाथ में लेकर इस संस्थान द्वारा न केवल चिकित्सा की एक नई विधा का क्षेत्र जनमानस के लिए खोला गया है अपितु तर्क, तथ्य, प्रमाणों के द्वारा दार्शनिक अनुसंधान की प्रक्रिया से अध्यात्म को विज्ञान सम्मत प्रमाणित करने का प्रयास भी किया गया है, जो कि अपने आप में अद्वितीय है।

ये पाँचों संस्थानों में एक ही धुरी पर टिके हैं, एक ही गंगोत्री से निकले पाँच हिमनद हैं तथा पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी रूपी ऋषियुग्म के संरक्षण में कार्यरत है। प्रथम संस्थान आँवलखेड़ा जो अगले दिनों सक्रिय भूमि का युगपरिवर्तन के क्षेत्र में निभाएगा, संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-आगरा जलेसर मार्ग पर स्थित यह ग्राम जिसकी आबादी मात्रा चार हजार है, अब तक युग तीर्थ का, गुरुद्वारे का स्वरूप ले चुका है। यहीं पर आज से 84 वर्ष पूर्व ईसवी सन् 1911 (संवत् 1968 वि.) में आश्विन बदी 13 का पण्डित रूपराम जी शर्मा के यहाँ एक बालक जन्मा। नाम रखा गया ‘श्रीराम।’ कोई नहीं जानता था कि यही बालक आगे चलकर इस युग के अवतार की भूमिका निभाते हुए विश्वमानस को मथने एवं एक व्यापक परिवर्तन लाने वाला है। उनका बाल्यकाल अद्भुत रहा है। यद्यपि उनके साथ के उस समय के व्यक्ति अब इस दुनिया में नहीं पूज्य गुरुदेव ने स्वयं अपने विषय में अधिक बताया नहीं, पर जितना कुछ भी वहाँ जाकर देखा व समझा जा सकता है, रहने वाले बुजुर्गों से सुना - समझा जा सकता है, उससे उनके जीवन के कई पहलू उजागर होते हैं। लगता है सारे बीजांकुर बाल्यकाल में ही पुष्पित पल्लवित होना आरम्भ हो गये थे। ग्राम के ही विद्यालय में प्राइमरी पाठशाला तक पढ़ाई पूरी की। संस्कृत का अध्ययन अध्यापन स्वयं पिता श्री करते थे। वे ही महामना मालवीय जी से यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाराणसी लेकर गए थे। मालवीय जी ने इस सात वर्ष के बालक को गायत्री मंत्र की विधिवत् दीक्षा देकर कहा था कि यह ब्राह्मण की कामधेनु है। समझाते हुए कहा कि जो गायत्री मंत्र जपता है, वह ब्राह्मण बन जाता है। जन्म से भले ही वह कुछ भी हो, पर जो सही माने में इस तत्त्वदर्शन को जीवन में उतारता है, उसका ब्राह्मणत्व प्रचण्ड प्रखर हो उठता है एवं गायत्री महाशक्ति उसे अगणित अनुदान कामधेनु की तरह देती है। यह बात गाँठ बाँधकर वे आए सीमा बंधन तो पाँच माला प्रतिदिन का था। पर अक्सर देखा जाता कि वे स्कूल से आने के बाद घर की छत पर, पेड़ की कोटर में, कुएँ के समीप वृक्ष की छाया में ध्यानस्थ बैठे हैं। बहुधा इस स्थिति में उन्हें झकझोरकर उठाया जाता एवं वे सामान्य स्थिति में लाये जाते।

समाज के प्रचलनों-चली आ रही परम्पराओं के प्रति असहयोग, उनके बचपन में ही उभर कर आ गया था। गाँव की एक बुढ़िया महतरानी घावों से पीड़ित थी। दस्त हो रहे थे। कोई हाथ लगाने को तैयार न था। बालक श्रीराम ने एक चिकित्सक से उपचार पूछकर दवाओं का प्रबन्ध किया, भोजन-व्यवस्था का सरंजाम जुटाया एवं नियमित रूप से परिचर्या हेतु एवं उसे भोजन देने हेतु जाना आरम्भ कर दिया। पण्डित जी का बेटा गाँव के इस कोने से उस कोने में मेहतरानी की बस्ती में जाकर उसे हाथ लगाए, दवा करे, यह किसी को गंवारा न था। आज से 65 वर्ष पूर्व यह काम पूरा गुनाह माना जाता था। घर वालों से प्रताड़ना मिली व जाति बहिष्कार कर दिया। घर वालों ने प्रवेश नहीं करने दिया। बाहर चबूतरे पर रहकर रात काटते रहे पर सेवा न छोड़ी। पन्द्रह दिन में वह अच्छी हो गयी। हमेशा उन्हें भगवान मानती रही व दुआएं देती रहीं। धीरे-धीरे समाज ने उन्हें पुनः अंगीकार कर लिया। करता कैसे नहीं, मानव धर्म भी तो कुछ है। यह एक छोटी-सी घटना बताती है कि आँवलखेड़ा वासी इस बालक के अन्दर, करुणा, सेवा-भाव आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना कूट-कूट कर भरी थी।

बालक श्रीराम पन्द्रह वर्ष के हो गए। इसी बीच एक घटना घटी जिसने उनके जीवन दिशा बदल दी। बसन्त पर्व के ब्रह्ममुहूर्त में उन्हें उनकी अशरीरधारी हिमालय वासी गुरुसत्ता जिनने उन्हें उनके जीवनोद्देश्य से परिचित कराया, भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा समझाई व बताया कि विगत जन्मों में जो महान् कार्य उनसे पूरे हुए उन्हें किस तरह पूरा किया जाना है। चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण करने, अखण्ड दीपक के प्रकाश में स्वाध्याय जन्म चिन्तन को लिपिबद्ध कर अखण्ड-ज्योति रूपी पत्रिका प्रकाशित किये जाने तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सान्निध्य में जाने, स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के नाते सहयोग देने के निर्देश आँवलखेड़ा की इस बस्ती के उनके विशाल घर की छोटी-सी पूजा की कोठरी में ही मिले। यहीं पर उन्होंने बतलाया गया कि साधना स्वाध्याय व स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के रूप में मातृभूमि की सेवा के त्रिसूत्री कार्यक्रम के साथ-साथ उन्हें चार बार हिमालय यात्रा करनी पड़ेगी संभावित समय व स्थान के निर्देश भी मिले व जीवन यात्रा के आगामी कार्यक्रम का एक स्वरूप उन्हें समझा दिया गया। तब से बसंत पंचमी को ही उनके आध्यात्मिक जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।

उनकी साधना व स्वाध्याय के चमत्कारी परिणाम तो मथुरा व हरिद्वार के वर्णन में अधिक देखने को मिलते हैं। यहाँ तो उनकी स्वतंत्रता संग्राम में सेनानी, स्वयंसेवक एक समाज सेवी के नाते जो भूमिका रही, उसका वर्णन करना ही समीचीन होगा। उन्हें साथियों में ‘श्रीराम मत्त’ नाम से जाना जाता था। 1928 से 1935 की अवधि में वे कई बार अल्पावधि के लिए जेल गए, अंग्रेजों से लाठी की मार सही, किसानों के हित के लिए लगान बन्दी के जुल्म के आँकड़े एकत्र कर काँग्रेस के बड़े नेताओं के पास भिजवाये, जिन्हें देखकर स्वयं वायसराय आश्चर्य चकित हो गये थे कि एक अकेला 18-19 वर्षीय किशोर यह काम कैसे कर सका? तथा मालवीय जी, पं. जवाहर लाल नेहरू की माता स्वरूपा रानी नेहरू, रफी, अहमद किदवई, श्री देवदास गाँधी जैसे स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूतों के साथ आसनसोल जेल में रहने का अवसर मिला। असहयोग आन्दोलन में व सक्रिय क्रान्तिकारी की तरह तोड़-फोड़ के क्षेत्र में भी भूमिका उनने निभाई। जेल प्रवास में उनने एक मंत्र सीखा, उन्हीं महामना मालवीय जी से जिनने उन्हें गायत्री मंत्र दीक्षा के साथ यज्ञोपवीत दिया था। वह मंत्र था हर व्यक्ति को अपने महान् प्रयोजन में सहचर सहयोगी बनाने के लिए मुट्ठी फण्ड चलाना। उनके समय, श्रम व अर्जित सम्पदा का एक न्यूनतम अंश लेकर जन आन्दोलन चलाना। युग निर्माण योजना की अंशदान, समय दान नीति आगे चलकर इसी मूल मंत्र की धुरी पर आधारित हुई।

आज उसी आँवलखेड़ा में 80 वर्ष पुराना वह विशाल घर तो समय के थपेड़ों से जराजीर्ण हो गया है। पर उसके कुछ अंश विद्यमान् हैं जो उनके विगत क्रिया–कलापों की झाँकी देते हैं उसी स्थान पर एक कीर्ति स्तम्भ व स्मारक बनाया गया है जिस पर उनकी जीवनयात्रा लिखी गयी है। यथा उनके हाथों से खोदा गया कुआँ जिसका मीठा पानी हर जाति वालों के लिए अभी भी सुगमता से उपलब्ध है, वह कक्ष जहाँ वे अपने साथियों के साथ बैठकर स्वतंत्रता संग्राम की भावी नीति सम्बन्धी विचार विमर्श करते थे तथा उस बुनता घर के ध्वंसावशेष जो उन्होंने गाँधी जी हथकरघा योजना के अंतर्गत स्वावलम्बन प्रधान शिक्षण हेतु विनिर्मित किया था। वे बूढ़े पेड़ जो अभी आँधी के थपेड़ों के शिकार नहीं बने हैं, गवाही देते हैं, उस महासाधक की, जिसने अपनी जीवन यात्रा को आरम्भ करते समय उन्हीं की छाया में बैठकर गायत्री साधना आरम्भ की थी।

अब आँवलखेड़ा का स्वरूप बदल चुका है। गाँव छोड़ते समय अपनी सैकड़ों बीघा जमीन उन्होंने अपनी माँ के नाम एक स्कूल हेतु दान दे दी। अब उस विशाल जमीन पर माता दानकुँवरि इण्टर कॉलेज स्थापित है। पहले विद्यालय, फिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय व अब यह लड़कियों का महाविद्यालय बन चुका है। इसी के सामने उनने लड़कियों की पढ़ाई की आवश्यकता व विद्यालय न होने से हो रही कठिनाई को अनुभव करते हुए एक और स्थापना की आँवलखेड़ा गायत्री शक्ति पीठ। मन्दिर ज-जाग्रति के केन्द्र बने इस उक्ति को उन्होंने जीवन भर चरितार्थ किया। आँवलखेड़ा की उस भव्य स्थापना में एक लड़कियों का इण्टर कॉलेज विनिर्मित हुआ एवं वह एक डिग्री कॉलेज बनने जा रहा है। जिसमें आस-पास के गाँवों की व स्थानीय अढ़ाई सौ लड़कियाँ पढ़ती हैं तथा एक चिकित्सालय बना जो कि गाँव ही नहीं, आस-पास की एक बड़ी आवश्यकता थी। मध्य में स्थित भव्य शक्ति पीठ में गायत्री माता की मूर्ति स्थापित है, नित्य अग्निहोम होता है, तथा यहाँ से चारों ओर के गाँवों को लक्ष्य बनाकर एक मंडल शक्तिपीठ के रूप में दरिद्रनारायण की सेवा तथा दुष्प्रवृत्ति आंदोलन रूप में हरीतिमा संवर्धन, प्रौढ़ शिक्षा, नशानिषेध कुरीति निवारण जैसी सत्प्रवृत्तियों का संचालन होता है। उनकी जन्मस्थली पर अब एक संगमरमर का चबूतरा बना दिया गया है, जिस पर प्रतीक रूप में एक स्वस्तिक बना हुआ है। जो भी आँवलखेड़ा आता है इस युग तीर्थ के दर्शन करता, शक्ति पीठ व जन्मस्थली जाकर स्वयं को धन्य मानता है। यहीं पर एक स्वास्थ्य केन्द्र भी है तथा एक विराट प्रदर्शनी गुरुसत्ता के जीवन दर्शन पर लगायी जा रही है।

आने वाले पाँच माहों में जब प्रयाग गतिशील होगा एवं नवम्बर माह की 4 से 7 तारीखों में युग संधि महापुरश्चरण की प्रथम अर्धपूर्णाहुति के रूप में एक 1251 कुण्डीय विराट यज्ञशाला में आश्वमेधिक प्रयोगों की शृंखला में सत्ताईसवाँ उपक्रम संपन्न होगा तो एक नूतन संदेश राष्ट्र की इस आध्यात्मिक राजधानी से मानव मात्र के उत्थान का राष्ट्र के नव जागरण का यहाँ से निस्सृत होगा। प्रज्ञा प्रवाह के पाँच शक्ति केन्द्रों में प्रथम आँवलखेड़ा को गुरु जन्मभूमि होने के कारण ही एक सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि प्रायः पचास लाख सृजन सेनानी एक साथ उन दिनों कत संकल्प होकर धर्म तंत्र के परिष्कृत स्वरूप का दिग्दर्शन सारे समाज को करायेंगे तथा यह महाविस्फोट जन-जन के मन में विचार क्रान्ति के बीजों को आरोपित कर प्रज्ञा अभियान के प्रवाह को तीव्रगति देगा, इसमें समयदान, साधना दान, साधन दान के रूप में भागीदारी हो, यह अभी से सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए।


भ्रम जंजाल (Kahani)

अन्तरीप द्वीप से आया जीवन के संघर्ष और आँधियों से दुःखी एक नाविक जहाज से उतर कर बाहर आया। समुद्र के मध्य अडिग और अविचलित चट्टान की स्वच्छता को देखकर उसको कुछ शांति मिली। वह थोड़ा आगे बढ़ा और एक टोकरी पर खड़ा होकर चारों ओर दृष्टिपात करने लगा। उसने देखा समुद्र की उत्ताल तरंगें चारों ओर से उस चट्टान पर निरंतर आघात कर रही हैं तो भी चट्टान के मन में न रोष है और न विद्वेष। संघर्षपरक जीवन पाकर भी उसे कोई ऊब और उत्तेजना नहीं। मरने की भी उसने कभी इच्छा नहीं की।

यह देखकर नाविक का हृदय श्रद्धा से भर गया। उसने चट्टान से पूछा -तुम पर चारों ओर से आघात लग रहे हैं फिर भी तुम निराश नहीं हो चट्टानों ,और तब चट्टान की आत्मा धीरे से बोली- तात निराशा और मृत्यु दोनों एक ही वस्तु के उभय पृष्ठ हैं, हम निराश हो गये होते तो एक क्षण ही सही दूर से आये अतिथियों को विश्राम देने, उनका स्वागत करने से वंचित रह जाते। नाविक का मन एक चमकती हुई प्रेरणा से भर गया। जीवन में कितने संघर्ष आये अब मैं चट्टान की तरह जिऊँगा ताकि हमारी न सही, भावी पीढ़ी और मानवता के आदर्शों की रक्षा हो सके।

राज ज्योतिषी ने सम्राट वसुसेना की श्रद्धा ज्योतिष पर बहुत जमा दी थी। वे बिना मुहूर्त पूछे कोई काम न करते। शत्रुओं को पता चला, तो वे ऐसी घात लगाने लगे कि किसी ऐसे मुहूर्त में हमला करें, जिसमें प्रतिकार का मुहूर्त न बने और उसे सहज ही परास्त किया जा सके। प्रजाजन और सभासद सभी को राजा के इस कुचक्र में फँस जाने पर बड़ी चिंता होने लगी।

संयोगवश राजा एक बार देश पर्यवेक्षण के लिए दौरे पर निकले। साथ में राज ज्योतिषी भी थे। रास्ते में एक किसान मिला। जो हल बैल लेकर समीप के गाँव में खेत जोतने जा रहा था। राजा ज्योतिषी ने उसे उसे रोक कर कहा-मूर्ख जानता नहीं, आज जिस दिशा में दिक्शूल है, उसी में चला जा रहा है। ऐसा करने से भयंकर हानि उठानी पड़ेगी। किसान दिशा शूल के बारे में कुछ न जानता था। उसने नम्रतापूर्वक कहा-मैं तो तीसों दिन इसी दिशा में जाता हूँ। उसमें दिशा शूल वाले दिन भी होते होंगे। यदि आप की बात सच होती तो मेरा कब का सर्वनाश हो गया होता। ज्योतिष सटपटा गये। झेंप मिटाने के लिए बोले-लगता है तेरी कोई हस्त रेखा बहुत प्रबल है। दिखा तो अपना हाथ?

किसान ने हाथ तो बढ़ा दिया किंतु हथेली नीचे की ओर रखी। ज्योतिषी इस पर और भी अधिक चिढ़े। बोले-इतना भी नहीं जानता कि हस्त रेखा दिखाने के लिए हथेली ऊपर की ओर रखनी होती है।

किसान मुस्कराया बोला-हथेली वह फैलाये जिसे किसी से कुछ माँगना हो। जिन हाथों की कमाई से अपना गुजारा करता हूँ, उन्हें क्यों किसी के आगे फैलाऊँ?

प्रसंग समाप्त हो गया, राजा ने नये सिरे से विचार किया और ज्योतिषी के भ्रम जंजाल से पीछा छुड़ा लिया।


क्या गुडाकेश बनना चाहिए?

कितनी आयु में कितना सोना चाहिए इसका कोई सर्वमान्य नियम नहीं बन सका है। जिन्हें जीवन में बहुत कुछ काम करने होते हैं, वे अपने नींद के घण्टे कम कर लिया करते हैं और उतनी ही अवधि में इस स्तर की नींद ले लेते हैं, जिसकी तुलना दूसरे लोगों के 7-8 घण्टे की लम्बी नींद से की जा सकती है।

मनुष्य का संकल्प महान् होता है। कई महापुरुष जिन्हें अपने जीवन में महत्त्वपूर्ण काम करने को थे, वे मात्र तीन चार घण्टे सोकर ही अपनी नींद पूरी कर लिया करते हैं। यह तो अपने संकल्प शक्ति एवं जीवनोद्देश्य पर निर्भर करता है कि हम कितना सोना चाहते हैं। नींद में घण्टों को संकल्प के सहारे कम करके रहा जा सकता है। विंस्टनचर्चिल तथा टामस एडीसन मात्र 5 घण्टों की नींद लेते थे। सर जान हण्टर जो इंग्लैण्ड के जाने माने चिकित्सक थे, कहा करते थे कि 4 घण्टे की नींद ही उनके लिए श्रेष्ठ थी। आचार्य विनोबाभावे ने बताया था कि वे जल्दी ही 8 बजे तक सोते थे और भोर में दो-तीन के पहले ही उठ जाते थे। उनके अनुसार जल्दी सोना और जल्दी उठना दीर्घ जीवन का ही नहीं, अपितु सात्विकता का मूलमंत्र है।

स्वर्गीय प्रोफेसर थियोडोर स्टौकमैन ने अपने जीवन के कई वर्ष निद्रा के विषय में अध्ययन हेतु खपा दिये। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि स्वाभाविक निद्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय 7 से लेकर साढ़े ग्यारह बजे तक का होता है। उनकी बहुचर्चित पुस्तक ‘अर्धरात्रि पूर्व शयन’ में लिखा हुआ है कि बहुत से रोगी जिन्होंने इस परामर्श का पालन का, वे या तो पूर्ण चंगा हो गए या अन्ततः लाभान्वित हुए बिना नहीं रहे। इनमें से बहुत से रोगी स्नायविक दुर्बलता से पीड़ित थे, अपना हृदय रोगों से, पुरानी रुग्णता से या अत्यधिक कमजोरी के शिकार थे। जिन्हें गहरी नींद न आने की शिकायत हो, उन्हें शाम को हल्का भोजन लेना चाहिए। सोते समय यदि पूर्ण या आँशिक स्नान कर लिया जाय अथवा हाथ-पाँव भली-भाँति धो लिए जाये तो रात्रि में गहरी नींद आती है। मालिश करना, प्रसन्न व चिंतामुक्त रहना आदि कुछ ऐसे तथ्य हैं, जो गहरी नींद लाने में सहायक होते हैं।

नींद में लकड़ी के कुन्दे की भाँति शून्य-जड़ स्थिति में पड़े रह जाना एक कहावत मात्र है। वास्तविकता इससे परे है। कोई भी ऐसा नहीं होता जो बोरे की भाँति निश्चल पड़ा रहे॥ कुछ विशेषज्ञ वैज्ञानिकों ने सोने वालों पर उनकी निद्रावधि में ही अध्ययन किया है। मूर्धन्य लेखक लिनपूल ने इसका वर्णन करते हुए लिख है कि इन जिज्ञासुओं ने अस्पताल में दवा के आधार पर सोने वालों से लेकर स्वस्थ पुरुष तथा महिलाओं की निद्रा का अध्ययन किया। इनके अनुसार औसत सोने वाला व्यक्ति, जितनी जल्दी हम सोचते हैं, उससे भी जल्दी करवटें बदलता रहता है। पुरुष और महिलाओं में करवट बदलने का समय औसतन प्रति 12.5 मिनट के बाद आता है। उनकी गणना में सबसे देर में करवट बदलने वाले स्त्री पुरुष ने क्रमशः 14 और 21 मिनट के अन्तर पर करवटें बदली थीं। एक बारगी सबसे अधिक सोने वाला उन्हें एक रोगी मिला जो 7 घण्टे तक तक दवा के आधार पर सोता रहा। शेष लोग तो निद्रावधि में एकाध बार जाते फिर सो जाते हैं। इससे यह तथ्य उभरता है कि पूरी नींद एक साथ नहीं आती है। टुकड़ों-टुकड़ों में भी नींद ली जा सकती।

लिनपूल ने यह भी लिखा है, कि कोई व्यक्ति यदि कहे कि वह विस्तार पर पाँव फैलाते ही निद्रा निमग्न हो उठता है गलत है। उनके अनुसार हमें आभास नहीं होता कि नींद हमें धीरे-धीरे अपनी गोद में लेती है। पहल व्यक्ति ऊँघता है, थोड़ी हलकी-फुलकी झपकी ले लेता है फिर कुछ निद्रा और अन्त में प्रगाढ़ कहाने वाली निद्रा आती है। इसका मापन उस यंत्र से हो जाया करता है जो मस्तिष्क की जागरूकता परखने के लिए आविष्कृत हुई है। उनकी रीडिंग के अनुसार निद्रा के इन चारों अवस्थाओं के आने में प्रायः एक घण्टा लग ही जाता है।

निद्रा विचित्र वस्तु है। कभी-कभी शोरगुल में, रेलगाड़ी निकट से गुजरने में, युद्ध में, बम गोला फटने वाले स्थानों में भी लोग सो लिया करते हैं। नैपोलियन बोनापार्ट घोड़े की पीठ पर सो लिया करता था। अँधेरे मुँह खेत में हल चला लेने वाला किसान दोपहर को खेत की मेड़ पर ही एकाध घण्टे सोकर तरोताजा हो लेता है। महात्मा गाँधी लन्दन की गोल मेज़ परिषद की कार्यवाही आरम्भ होने से चन्द मिनट पूर्व वहाँ पहुँच गये थे। उतनी ही अवधि के लिए सोकर वे पूरी तरह आराम (रिलैक्स) पा चुके थे किन्तु कुछ लोग बाहर से चिल्लाहट होने पर भी नहीं जाग पाते हैं और कुछ लोग तन्द्राजन्य आलस्यवश विस्तार पर पड़े रहते हैं। वस्तुतः यहाँ महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि व्यक्ति कितने घण्टे विस्तार पर पड़ा रहा, वरन् महत्ता इस बात की है कि उसने कितनी देर गहरी नींद ली। कितना हलकापन आया। स्फूर्ति से भरी, मस्ती भरी स्वस्थ हँसती-हंसाती जिन्दगी ऐसों की ही होती हैं।


आदिकालीन ऋषि परम्परा व उसकी पुनरावृत्ति

शान्तिकुञ्ज को देवात्मा हिमालय के आध्यात्म ध्रुव केन्द्र का प्रतीक बनाने और वहाँ की ऋषि परम्परा के समय के अनुरूप एक निराला स्वरूप देने के निमित्त बनाया गया है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है।

यमुनोत्री भगवान परशुराम की तपोभूमि है। वहीं से उन्होंने अनीति का शिरच्छेदन करने के लिए कुल्हाड़ा उपलब्ध किया था। शान्तिकुञ्ज ने अनैतिकताओं अवांछनीयताओं, कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं के विरुद्ध लोहा लिया और अनीति के विरुद्ध जो संभव था उसे करने में कमी न रहने दी। भारत अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण ही दो हजार वर्ष तक पराधीनता के पाश में बंधा रहा। सेना या शौर्य पराक्रम ही उसके पास कमी न थी, पर जाति-पाँति के भेदभाव से भीतर ही भीतर वह नारंगी की फाँकों की तरह अनेक भागों में विभक्त हो गया था। अनेकों कुरीतियों और कुबुद्धियों ने उसे घेर रखा था। उनके प्रति विरोधी मोर्चा खड़ा करने में कोई कमी न रहने दी गई। ब्रेन वाशिंग से विचार क्रान्ति अभियान से भारतीय समाज की एकता और विचारशीलता से प्रभावित करने में इस अभियान द्वारा कोई कसर न छोड़ी गयी।

गंगोत्री में भगीरथ ने तप करके गंगा का धरती पर अवतरण किया था। गायत्री को ज्ञान गंगा कहा गया है। उसे जन-जन के लिए उपलब्ध कराने में शाँतिकुँज का प्रयास असाधारण है। गंगा में सभी स्नान कर सकते हैं स्त्रियाँ भी शूद्र भी। कभी कुछ सिरफिरों लोगों ने प्रतिबंध लगा रखा था कि स्त्री और शूद्र वेद एवं गायत्री की ज्ञान गंगा में स्नान करने के अधिकारी नहीं हैं। इस प्रतिबंध को हटा देने से स्वर्गलोक में अदृश्य बन गई ज्ञान गंगा धरती पर आई और उस पारस से स्पर्श करके अनेक लोहे जैसे घटिया जीवनों ने सोने के रूप में अपने को परिवर्तित किया। अनेकों को इस कामधेनु का पयपान करने का अवसर मिला। असंख्यों इस कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर कृतकृत्य हुए। इसे भागीरथी प्रयास ही कहा जा सकता है।

केदारनाथ महर्षि चरक की तपस्थली है। अभी भी वहाँ के देवालय से आगे बढ़ने पर एक असली फूलों की घाटी विद्यमान् दिखाई देती है। पशु चराने वालों की पहुँच वहाँ नहीं होती इसलिए दिव्य फूलों की भरमार वहीं है। ब्रह्म कमल जिसकी सुगन्धि भर से व्यक्ति समाधिस्थ हो जाता है वह वहीं मिलता है। संजीवनी बूटी जैसी दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ चरक ने वहाँ से ढूँढ़ निकाली। उनके गुण दोष समझाने और समतल क्षेत्र में उगाने का चिकित्सा विधान बनाने का प्रयत्न किया।

यही कार्य शाँतिकुँज ने कर दिखाया सड़ी गली अप्रामाणिक औषधियाँ पंसारियों की दुकानों पर मिलती हैं। उन्हीं के आधार पर वैद्यों की चिकित्सा प्रक्रिया चलती है। फिर भूमि के प्रभाव से विभिन्न क्षेत्रों में उगी औषधियों के गुणों में भी भारी अंतर आ जाता है। शाँतिकुँज ने इस समस्या के समाधान का कार्य हाथ में लिया। दुर्लभ जड़ी बूटियाँ उपलब्ध कीं और उगाई इनमें इन दिनों क्या गण् पाये जाते हैं, उनमें कौन-कौन से रासायनिक तत्त्व मौजूद हैं, उसकी जाँच -पड़ताल के लिए आधुनिकतम यज्ञों से सुसज्जित प्रयोगशाला खड़ी की। इससे पता चला कि कौन जड़ी-बूटी किस रोग के निवारण के उपयुक्त रह गयी कि नहीं। इसी प्रकार यज्ञ प्रयोजन के लिए युद्ध वनस्पतियों की आवश्यकता थी। वे भी उपलब्ध नहीं हो रही थीं। इस प्रयोजन की पूर्ति शाँतिकुँज ने जड़ी-बूटी उद्यान भी यहाँ विकसित किया। फलतः इस विज्ञान ने आधुनिकतम वैज्ञानिक रूप धारण किया और उससे असंख्यों ने शारीरिक मानसिक विकास के हेतु भारी लाभ प्राप्त किया। शाँतिकुँज में कला साधना के निमित्त इसी आधार पर उपचार प्रयोग चलते हैं।

महर्षि सुश्रुत का कर्म क्षेत्र भी चरक के समीप ही था। वे चिकित्सा और साधनों के दोनों ही समन्वित प्रयत्न शल्य क्रिया के साथ करते थे। इसके लिए सर्वप्रथम वे रोगी की शारीरिक और मानसिक स्थिति का गंभीरतापूर्वक पर्यवेक्षण करते और तदुपरान्त साधना एवं चिकित्सा का निर्धारण करते थे। यही रीति-नीति शाँतिकुँज की है। कल्प साधना की एक प्रकार की माइक्रो सर्जरी है। इस में कोई प्रयोग तब बताया जाता है जब व्यक्ति के हर स्तर की गंभीर जाँच पड़ताल कर ली जाती है। इसके लिए ऐसे बहुमूल्य परीक्षण यंत्र लगाये गये हैं जैसे अच्छे-अच्छे अस्पतालों में भी मिलने मुश्किल हैं।

व्यास जी ने बद्रीनाथ से आगे वसोधारा क्षेत्र की व्यास गुफा में पुराणों की संरचना की थी। शाँतिकुँज में प्रज्ञापुराण सृजा गया। उसके चार खण्ड प्रकाशित हो चुके। अभी और भी अनेक खण्ड लिखे जा रहे हैं जिन्हें समय-समय पर प्रकाशित किया जाता रहेगा, वेद, शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन आदि आर्षग्रन्थों का अनुवाद और प्रकाशन तो पहले ही हो चुका है। पुनः वेदादि आर्षग्रन्थों का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण कर प्रथम शृंखला में वेद सर्वसुलभ बनाए हैं।

शाँतिकुँज की, उसके संयोजक संरक्षक ऋषियुग्म की गतिविधियों को अग्रगामी बनाने वाला ऊर्जा स्रोत सुमेरु पर्वत के निकट है। वह युग परिवर्तन की, विनाश की, विकास की भूमिका सम्पन्न करने के लिए अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा ताना-बाना सतत् बुनता और कठपुतली की तरह सभी को नचाता रहता है।

महर्षि नारद अपना विश्राम प्रायः गुप्तकाशी में करते थे। वे संगीत के माध्यम से जन-जन की भावनाओं को तरंगित करते रहते थे। शाँतिकुँज वैसे ही असंख्य प्रचारक बनाने के लिए युग शिल्पीसत्र चलाता है। अपने समय के नालन्दा, तक्षशिला विश्वविद्यालयों से इसकी तुलना की जाती है। जैसे चाणक्य ने अपने तत्त्वावधान में प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचाया था। युगशिल्पी विद्यालय को समय की आवश्यकता के अनुरूप इसी उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त गतिशील किया गया है।

आद्य शंकराचार्य की हिमालय तपश्चर्या प्रसिद्ध है। उनके तत्त्वावधान में चार पीठें बनी थीं। शाँतिकुँज, गायत्री तीर्थ, ब्रह्मवर्चस् गायत्री तपोभूमि, युगनिर्माण योजना की पाँच शक्ति पीठें तो प्रसिद्ध हैं ही। इसके अतिरिक्त चौबीस सौ प्रज्ञापीठें देश के कोने कोने में बनी हैं। महर्षि कौडिन्य ने एशिया के अनेक देशों में भारतीय धर्म संस्थान खड़े किये थे। बुद्ध विहार भी बने थे। इसी स्तर का प्रयास शाँतिकुँज द्वारा हुआ है। प्रायः 84 देशों में बने हुए प्रवासी भारतीयों में ज्ञानपीठों शाखाओं, प्रज्ञामंडलों की स्थापना हो चुकी है और उनके द्वारा विदेशों के हर वर्ग के व्यक्ति में युगचेतना का संदेश पहुँच रहा है।

रुद्रप्रयाग में महर्षि पतंजलि ने योग साधना की थी और अनेकों को इस विद्या में पारंगत बनाया था। शाँतिकुँज की आसन-चिकित्सा प्राणायाम-चिकित्सा आहार चिकित्सा, प्रज्ञायोग साधनाओं ने अपने समय में योग साधना को सर्वसुलभ बनाने में आशातीत सफलता पाई है। साधना सम्बन्धी नये प्रयोग बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

महर्षि विश्वामित्र ने अपने देव प्रयाग आश्रम में बला (सावित्री) अतिबला (गायत्री) को यज्ञ रक्षा के बहाने बुलाकर श्रीराम व लक्ष्मण को प्रशिक्षण दिया था। महर्षि वशिष्ठ ने भी वृद्धावस्था में राम बन्धुओं को इसी क्षेत्र में बुलाकर साधना कराई थी। शाँतिकुँज में प्रज्ञापुत्र उत्पन्न करने के विशिष्ट प्रयास इसी स्तर के चल रहे हैं।

लक्ष्मण झूला में लक्ष्मण जी ने महर्षि वशिष्ठ जी के तत्त्वावधान में साधना की इसके अतिरिक्त पूर्वकाल में महर्षि पिप्पलाद रहते थे। वे पीपल के फलों पर निर्वाह करते थे। यह आहार कल्प है। उनके साथ रहने वाले भी आहार से मन और मन से प्राण परिष्कृत करने की प्रक्रिया चलाते थे। शाँतिकुँज में आज की स्थिति के अनुरूप अमृताशन (उबले अन्न) की कल्प चिकित्सा चलाई जाती है।

ऋषिकेश में सूतशौनिक की कथा वचन परम्परा चलती थी। वह बहुधा नैमिषारण्य में भी जन जागरण के उपयुक्त कथा वाचन और कीर्तन आयोजन एवं शिक्षण करती थी। शाँतिकुँज के युग शिल्पी गणों द्वारा शिक्षार्थियों को इस शैली से अभ्यस्त ही नहीं, प्रवीण पारंगत भी बनाया जाता है।

हरिद्वार राजा हर्षवर्धन के सर्वमेध यज्ञ के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ प्रायश्चित करके अनेकानेक व्यक्ति भविष्य की यंत्रणाओं से मुक्ति पाते रहे हैं। सर्वमेध तो अब कौन करे, पर पापों के प्रायश्चित की लहर नये सिरे से चली है। पिछले दिनों लंका पानी में डुबकी मारने भर से पाप कट जाने की कल्पना करने लगे थे। अब शान्तिकुञ्ज द्वारा अपने विश्वस्त जनों के माध्यम से पापों का प्रायश्चित कराने का नया अध्याय प्रारम्भ किया गया है। इससे आत्मपरिष्कार और लोक मंगल के निमित्त सेवा साधना बन पड़ने के उपाय पक्षीय प्रयोजन सिद्ध होते हैं।

महर्षि वैशेषिक और कणाद की परमाणु विज्ञान सम्बन्धी सफलताएँ विख्यात हैं। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय सम्बन्धी गंभीर शोध कार्य प्रारम्भ किये हैं। इसमें अग्निहोत्री विज्ञान ही नहीं, अनेकानेक साधनाओं की प्रतिक्रिया वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण के आधार पर सम्पन्न की जाती हैं। अब तक इस प्रयोग परीक्षण का उत्साह भरा प्रतिफल सामने आ है। भविष्य के लिए आशा है कि बुद्धिवाद एवं प्रत्यक्षवाद को अध्यात्म की गरिमा से सहमत किया जा सकेगा।

इसके अतिरिक्त अर्वाचीन सन्तों, ऋषियों के अनुकरण का प्रयास शाँतिकुँज द्वारा ही पूरी तत्परता के साथ किया जा रहा है। कबीर, समर्थ गुरु रामदास, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द आदि की कार्यपद्धति में से जितना अंश कार्यान्वित किया जा सका है किया जा रहा है। बुद्ध की 'बुद्धं शरणं गच्छामि’ धर्म शरणम् गच्छामि’ संघं शरणं गच्छामि’ की योजनाएँ बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति, सामाजिक, क्रान्ति, के नाम से कार्यान्वित की जा रही हैं और उन्हें प्रचारकों-परिव्राजकों के माध्यम से व्यापक बनाया जा रहा है। अनसूया अरुन्धती परम्परा का दर्शन भी शाँतिकुँज में आकर इन्हीं आँखों से किया जा सकता है।

वेदांगों की 6 शाखाओं में एक गणना ज्योतिष की भी होती है। उसे भी अनेक ऋषियों के परिश्रम से विनिर्मित एक महत्त्वपूर्ण शास्त्र कहा जा सकता है। इस विद्या के नवीन आचार्य भास्कराचार्य, आर्यभट्ट, वाराह मिहिर आदि प्रसिद्ध हैं। प्रचलित अंकगणित के हिसाब से किसी भी ग्रह की गति पूरे घण्टों या मिनट में नहीं उतरती इसलिए बात तब बने जब प्रत्येक ग्रह-उपग्रह का एक स्वतंत्र पंचांग बने। पर ऐसा संभव न होने से पृथ्वी को ही एक केन्द्र बिन्दु मानकर पंचांग बनाये गए हैं इसके प्रतिपादनों में प्रायः अन्तर पड़ता रहता है। जिसके लिए विधान है कि समय-समय पर दृश्य गणित के आधार पर जो अन्तर पड़े उसे ठीक करते रहना चाहिए। पर ऐसा मुद्दतों से नहीं हुआ। फलतः ग्रहाचार में इन दिनों काफी अन्तर आ गया है। इसे ठीक करने की शुद्ध गणित की दृष्टि से नितान्त आवश्यकता है। फिर इस प्रसंग में एक आवश्यकता यह पड़ती है कि जन्म इष्ट सही निकालने के लिए उसी क्षेत्र को पंचांग होना चाहिए सो इतना परिश्रम कौन करे? जो आदमी जहाँ जन्मा है वहाँ का स्थानीय पंचांग बनाने का कष्ट किससे बन पड़े?

इसके अतिरिक्त पुराने ग्रहों की स्थिति में नई खोजों ने भारी अन्तर डाल दिया है। चन्द्रमा अब पूर्णग्रह नहीं माना जाता। मात्र पृथ्वी का उपग्रह रह गया है। यूरेनस, नेपच्यून, प्लूटो यह तीन ग्रह और सम्मिलित हो गये हैं। राहु केतु के सम्बन्ध में भी झंझट है। ऐसी दशा में ज्योतिष शास्त्र की सही गणना होने के उपरांत ही किसी सही फलित की आशा की जा सकती है। इस महाकठिन कार्य को भी शाँतिकुँज ने अपने कंधों पर लिया है। प्रामाणिक वेधशाला (स्टोन आब्जर्वेट्री) बनाई है। दूरदर्शी मूल्यवान यंत्र खरीदे जा रहे हैं और नया दृश्य गणित ब्रह्मवर्चस् पंचांग पुनः प्रकाशित करना आरम्भ किया जा रहा है। ज्योतिष क्षेत्र की एक महती आवश्यकता पूर्ण होगी। इसे भी ऋषि कार्यों का जीर्णोद्धार ही कहा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त भी और कितने ही प्रयास हैं जो अदृश्य रूप से चल रहे हैं। वृत्तासुर के कारण देवताओं को जब इन्द्रवज्र की आवश्यकता पड़ी थी, उसकी पूर्ति दधिचि ने अपनी अस्थियाँ देकर की थी और संसार को सर्वनाश के मुख में जाने से बचाया था। प्रायः उसी स्तर का संकट अब

पुनः आ खड़ा हुआ है। चारों ओर से सूक्ष्म जगत पर अनेकानेक वृत्तासुरों के आक्रमण हो रहे हैं। ऐसे में गायत्री महाशक्ति की महापुरश्चरण साधना रूपी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान द्वारा जिसकी प्रथम पूर्णाहुति इसी वर्ष 1995 में नवम्बर में 4, 5, 6, 7, कार्तिक पूर्णिमा को आँवलखेड़ा में में सम्पन्न होगी, एक दधिचि स्तर का पराक्रम पूरे गायत्री परिवार द्वारा संपन्न हो रहा है। निश्चित ही उसमें प्रमुख भूमिका उस ऋषितन्त्र की है जिसने गायत्री परिवार की आधारशिला रखी, अपने तपोबल से जिसे इतना विराट बनाकर खड़ा कर दिया। परम पूज्य गुरुदेव व परम वंदनीय माता जी ने जन-जन की सुरक्षा के लिए वह कवच प्रदान किया है जिसे पहनने के बाद कोई भी आसुरी सत्ता आक्रमण नहीं कर सकती, न ही कोई अहित कर सकती है। समय की आवश्यकता है कि जनसाधारण इन सभी प्रयासों की गंभीरता समझें व स्वयं को ऋषियुग्म की तपःस्थली से ऋषि परम्पराओं की कार्य स्थली से जोड़े रहने का प्रयास करें व इस सम्बन्ध को अक्षुण्ण बनाए रखें। इसी में उनका हित है।


प्रार्थना में भावना प्रधान है औपचारिकता नहीं (Kahani)

"प्रार्थना में भावना प्रधान है, औपचारिकता नहीं," इस आशय की एक मार्मिक कथा रूसी सन्त टालस्टाय ने लिखी-

एक पादरी जहाज से यात्रा कर रहे थे। जहाज ने एक द्वीप के पास लंगर डाला। पादरी ने सोचा इस द्वीप पर कोई होगा तो उसे प्रार्थना सिखा आयें। वहाँ उन्हें केवल तीन साधु मिले। उनसे पूछा-कुछ प्रार्थना-उपासना करते हो? उन्होंने बताया “हाँ” हम तीनों ऊपर हाथ उठाकर कहते हैं, हम तीन हैं, तुम तीन हो। तुम तीनों हम तीनों की रक्षा करो।

पादरी हँसे, बोले क्या पागलपन करते हो, तुम्हें प्रार्थना करनी भी नहीं आती। भोले साधुओं ने प्रार्थना सिखाने का आग्रह किया। पादरी ने उन्हें बाइबिल के आधार पर प्रार्थना करना सिखाया अभ्यास हो जाने पर वैसा ही करने को कहकर जहाज पर आ गये। जहाज चल पड़ा।

दूसरे दिन पादरी जहाज के डेक पर टहल रहे थे। पीछे से आवाज सुनाई दी, “ओ पवित्र आत्मा रुको।” पादरी ने देखा वे तीनों साधु पानी पर बेतहाशा दौड़ते पुकारते चले जा रहे थे। आश्चर्यचकित पादरी ने जहाज रुकवाया उनसे इस प्रकार आने का कारण पूछा। वे बोले-आप हमें प्रार्थना सिखा आये थे, रात में हम सोये तो भूल गये। सोचा आपसे ठीक विधि पूछ लें इसलिए दौड़ आये।

पादरी ने पूछा-पर आप पानी में कैसे दौड़ सके? उन्होंने कहा-हमने भगवान् से प्रार्थना की, कहा-हम अनजान हैं, पवित्र पादरी जो सिखा गये थे भूल गये। दौड़ हम लेंगे, डूबने तुम मत देना। बस, इतना ही कहा था।

पादरी ने घुटने टेक कर उनका अभिवादन किया। कहा आप जैसी प्रार्थना करते हैं वही सही है, मैं ही आपको गलत समझा था। प्रभु आपसे प्रसन्न हैं। वे तीनों सन्तुष्ट होकर पादरी का आभार प्रकट करके जैसे आये थे वैसे ही लौट गये। सर्वव्यापी भगवान सबके भाव समझाता है, उसी आधार पर मान्यता देता है।

पादरी ने घुटने टेक कर उनका अभिवादन किया। कहा आप जैसी प्रार्थना करते हैं वही सही है, मैं ही आपको गलत समझा था। प्रभु आपसे प्रसन्न हैं। वे तीनों सन्तुष्ट होकर पादरी का आभार प्रकट करके जैसे आये थे वैसे ही लौट गये। सर्वव्यापी भगवान सबके भाव समझाता है, उसी आधार पर मान्यता देता है।


पाँच प्राण-पंचकोश पाँच देवता - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(5 अगस्त, 1978) शाँतिकुँज परिसर

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों, मैं आपसे एक ‘पाँच देवता’ के बारे में वर्णन कर रहा था। सारा का सारा ब्रह्माण्ड एक पिण्ड के समान है। पिण्ड का मतलब है-हमारा शरीर। यह एक बढ़ते विशाल ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। जो ब्रह्माण्ड में है, वही हमारे शरीर में विद्यमान् है। पिण्ड भीतर क्या-क्या भरा पड़ा है? पंचतत्व भरे पड़े हैं, पाँच प्राण भरे पड़े हैं। ये ही पाँच देवता हैं। मनुष्य अगर भीतर के देवता को जगा ले तो बाहर के देवता स्वयं खिंचे चले आते हैं। भीतर का मैगनेट जब खींचता है तो वे स्वयं खिंचे चले आते हैं। पेड़ों का मैगनेट बादलों को खींचता है। जहाँ-जहाँ घास−पात, पेड़ पौधे होते हैं वे बादलों को खींचते हैं तथा बादल बरसते हैं। जहाँ रेगिस्तान होता है, वहाँ बादल आते तो हैं, परन्तु रेगिस्तान का मैगनेट उन्हें खींच नहीं पाता और वे वापस चले जाते हैं। भीतर का देवता जगे तो बाहर के देवता हमारे पास स्वयं आ जाते हैं। भीतर का देवता मरा हुआ हो तो बाहर के देवता काम नहीं करते हैं।

विवेकानन्द का देवता जगा तो रामकृष्ण परमहंस आये और झल्लाकर कहा तू बी.ए. के फेर में पड़ा है, चल हमारा काम रुका पड़ा है। रामकृष्ण परमहंस विवेकानन्द के अन्दर की कसक को समझ गये। उनके पास नित्य हजारों लोग आते थे, जिनको किसी प्रकार की मुसीबतें होती थीं। वे उन्हें थोड़ा आशीर्वाद, वरदान देकर विदाकर देते थे। परन्तु राधाकृष्ण परमहंस विवेकानन्द के पास रोज जाते थे। एक बार विवेकानन्द ने कहा-आप क्यों आकर हमें तंग करते हैं, हमारा मन जब होगा तो हम आयेंगे, आप हमें परेशान न करें। रामकृष्ण परमहंस ने देखा कि इसके अन्दर कसक है, इसी से हमारा काम हो सकता है और उन्होंने उन्हें धन्य कर दिया। हमारे गुरु भी हमारे पास आये और उन्होंने उन्हें धन्य कर दिया। हमारे गुरु भी हमारे पास आये और हम धन्य हो गये।

मित्रो! मरी हुई लाश का पता लग जाय तो कुत्ते पहुँच जाते हैं तथा लाश को देखकर खत्म कर डालते हैं। देवताओं के बारे में भी यही बात है। हर एक के पास देवता नहीं आते हैं। वे पूजा करने, प्रसाद चढ़ाने वालों को अपनी शक्ति, कृपा नहीं देते हैं। देवता सवा रुपये के प्रसाद के पीछे नहीं दौड़ते। देवता भिखारी नहीं होते। हम कचौड़ी खिलायेंगे, हमारा काम कर दीजिए। उनकी हैसियत इतनी कम नहीं है कि वे कचौड़ी के लिए जायें। बड़े काम के लिए जायेंगे। मित्रों, सवा रुपये में भगवान मनोकामना पूर्ण नहीं कर सकते हैं। हमको भगवान की गरिमा का ख्याल रखना होगा। आदमी के अन्दर के खजाने का ध्यान रखना होगा। पहले जमाने के लोग खजाने का पता लगाते थे कि कहाँ-कहाँ मिट्टी के अन्दर सोना, चाँदी या अन्य धातुएँ गड़ी हैं। उसी प्रकार देवताओं का प्रवेश वहाँ होता है जहाँ ‘व्यक्तित्व के कण’ का खजाना होता है। ऐसे आदमी पर महान् आदमी, तपस्वी, महात्मा, ज्ञानी, देवात्मा’ की कृपा अनुदान बरसने लगता है।

अध्यात्म, जालसाजी, मुहल्ले वालों को फँसाने, ग्राहक को फँसाने, देवी-देवताओं को फँसाने की विद्या का नाम नहीं है। अध्यात्म आदमी के व्यक्तित्व के विकास का नाम है। सुन्दर फूल से जब सुगन्ध निकलती है तो मधुमक्खियाँ स्वयं आ जाती हैं। उसी प्रकार मनुष्य का खिले हुए फूल की तरह व्यक्तित्व होना चाहिए। गुरु, महात्मा, संतों और देवताओं को फँसाने की विद्या मत करो, इसमें फायदा नहीं है। देवता बड़े जबरदस्त हैं। मछली को पकझड़नेे लिए आटे की गोली, बंसी काम आती है। ऐसा देवता नहीं है। देवता से दूर रहो। वह तो हमारे भीतर है-उसे जगा। अपने भीतर वाले देवता को विकसित किये, बिना, बाहर के देवता को हम प्रसन्न नहीं कर सकते हैं। अगरबत्ती; बताशे चढ़ाकर देवताओं का मखौल न करे॥ हमें अपने भीतर के देवता का विकास करना चाहिए। इसी का नाम जप, इसी का नाम ध्यान, इसी का नाम चांद्रायण व्रत है। यह हम आपको भले आदमी बनाने, श्रेष्ठ बनाने के लिए बतला रहे हैं। आपके भीतर सब चीजें विद्यमान् हैं। पंच देवता कहाँ से आते हैं? वे आपके भीतर हैं। मिट्टी की परतें जम गयी हैं, दबे पड़े हैं। उन्हें जगाने की विधा के पहले उन्हें साफ करना होगा। हम उसे सिखाते हैं। पहले अपने आप को विकसित कीजिए। पाँच भंडार, पाँच देवताओं को जगाने की विधि, पंचकोश की उच्चस्तरीय साधना’ कहलाती है। ये गायत्री के पाँच मुख हैं, जिनका सम्बन्ध सूक्ष्म शरीर से है। स्थूल शरीर याने हाथ-पैर से हम आठ घण्टे काम करके किसी तरह आठ-दस रुपये कमा लेते हैं। यह स्थूल शरीर कमजोर है।

हमारे भीतर एक सत्ता सूक्ष्म है। वह स्थूल से ज्यादा शक्तिशाली है। नेपोलियन का वजन, लम्बाई, चौड़ाई, सामान्य व्यक्ति की तरह थी, परन्तु उसका सूक्ष्म महान् था। वह आल्पस पर्वत के पास गया और बोला हमें रास्ता दीजिए, नहीं तो हम आपको उखाड़ कर फेंक देंगे। बेटे! आल्पस पर्वत हिमालय से ज्यादा ऊँचा है। नेपोलियन ने अपनी सेना के साथ उसे पार कर दिखाया। सूक्ष्म की ताकत को अगर हम समझ सकें तो मजा आ जाएगा। गाँधी जी का सूक्ष्म शरीर मजबूत था। वे पाँच फुट दो इंच कद वाले थे तथा उनका वजन छियानवे पौंड था। कोई भी चौदह साल का बच्चा उनसे ज्यादा वजनदार हो सकता है। पर गाँधी जी की ताकत पहलवान से ज्यादा थी। अंग्रेजों का राज्य जो अफ्रीका से हिन्दुस्तान तथा न्यूजीलैण्ड तक फैला था। जिसके राज्य में कभी सूरज अस्त नहीं होता था। गाँधी जी की सूक्ष्म ताकत ने उन्हें मजबूर कर दिया भारत छोड़ने के लिए। गाँधी जी ने कहा क्विट-इंडिया अर्थात् अंग्रेजों भारत छोड़ो। अंग्रेजों ने कहा आपके पास क्या है? बन्दूक है जो हम डर के मारे हिन्दुस्तान छोड़ें। गाँधी जी ने जनता से कहा- डू और डाइ’ करो या मरो। सन् उन्नीस सौ बयालीस के आन्दोलन में सभी ने उनका साथ दिया। इसमें हजारों आदमी गोली के निशाना बना दिये गये, जेल गये, फाँसी के फन्दे पर चढ़ गये। मित्रों, यह गाँधी जी के सूक्ष्म शरीर की आवाज थी।

स्थूल शरीर में क्या रखा है। वह रोटी खाता रहता है, गन्दगी निकालता रहता है। हाड़-माँस के बने इस शरीर को अगर फाड़ दें तो केवल बदबू भरी गन्दगी ही दिखायी पड़ेगी यह बदबू मलमूत्र और पसीने के रास्ते निकलती है। हम लक्स साबुन लगाते हैं, परन्तु ये बदबू समाप्त नहीं होती है। इसके लिए हम मंजन करते हैं, दाँत साफ करते हैं, कभी पान खाते हैं तो कभी सुपारी खाते हैं परन्तु आदमी के भीतर जो जखीरे काम करते हैं, वह ताकत सूक्ष्म की है। इसी सूक्ष्म शक्ति को विकसित करने का नाम अध्यात्म है। बाहर को विकसित करने का ढंग आपको मालूम है। कसरत कीजिए, पौष्टिक चीजें खाइये, विटामिन्स खाइये, स्थूल को विकसित कीजिए। परन्तु सूक्ष्म किस तरह से विकसित होगा, यह कोई नहीं जानता। दिमाग को बढ़ाने एवं कंट्रोल करने की विधि सबको मालूम है। फिजिक्स, इकोनॉमिक्स पढ़िए और दिमाग को बढ़ाइये, पर यह सब भौतिक उपलब्धियाँ हैं। हम जिसे सिखाना चाहते हैं वह ‘चेतनशक्ति’ है। जिसे ऋद्धि-सिद्धि कहते हैं। नेपोलियन के भीतर का वह अंश विकसित हुआ था जो लोगों को प्रभावित करता था, सेना को प्रभावित करता था। एक बार नेपोलियन की सेना ने गिरफ्तार करना चाहा। चारों तरफ से उसे घेर लिया गया। उसने सोचा ये लोग मुझे गिरफ्तार कर लेंगे, अगर गिरफ्तार न हुआ तो गोली मार देंगे। उसकी चेतन शक्ति जागृत हो गयी। उसने कड़क कर कहा रुको। सारे-सिपाही खड़े हो गये। नेपोलियन ने कहा दोस्तो, हम तुम्हारे कप्तान हैं। चलो हमारे साथ, बन्दूकों को नीचे करो। उसने आदेश दिया-पीछे घूमो। सारे के सारे सिपाही नेपोलियन के साथ बिजली के तरीके से पीछे-पीछे चल दिये। नेपोलियन शेर की तरह आगे चल रहा था। वह जबरदस्त आदमी था।

मनुष्य के अन्दर वाला माद्दा आध्यात्म का वह हिस्सा है जो लोगों को, संसार को प्रभावित करता है, चमत्कार दिखाता है-यानी भौतिक चीतों का चमत्कार दिखाता है। यह अध्यात्म तो है परन्तु भौतिक वस्तुओं को प्रभावित करने वाला माद्दा है। एक हिस्सा हमारा वह है जिसे सिद्धि कहते हैं। एक और माद्दा हमारे भीतर है जो दिव्य चेतना को प्रभावित करता है, उसे हम भगवान कह सकते हैं। दैवी सत्ता कह सकते हैं। पदार्थ का भी महत्त्व बहुत है। एक ‘लेसर’ किरणें होती है जिसे छोड़ते ही चन्द्रमा तक जा पहुँचती है। लेसर में वह शक्ति होती है कि एक जगह से छोड़ने पर वह दूसरे स्थान पर जाकर उसे जलाकर खाक कर देती है। एक पदार्थ माध्यम से टेलीफोन का बटन दबाते ही करोड़ों मील दूर बैठे व्यक्ति से हम बातें कर लेते हैं यह ‘फिजिक्स’ की बातें हैं जो पदार्थ को प्रभावित करती है। मनुष्य के सूक्ष्म का एक हिस्सा वह है जो वस्तु यानी पदार्थ को प्रभावित करता है। इसके द्वारा हम चमत्कार दिखा सकते हैं, संसार को प्रभावित कर सकते हैं। यह माद्दा नम्बर दो है जिसे हम सिद्धियाँ कहते हैं।

चेतन शक्ति महान् है। उसमें भावना काम करती है, संवेदना काम करती है, देवत्व काम करता है। अगर दोनों का तालमेल हो जाय तो मनुष्य को ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती है। पहले बड़ी-बड़ी बीमा कम्पनियाँ हुआ करती थीं, जो छोटी-छोटी बीमा कम्पनियों का उत्तरदायित्व उठाती थीं। एक और बीमा कम्पनी है, जिसे हम भगवान कहते हैं। इस बड़ी शक्ति के साथ यदि हमारा तालमेल बैठ जाय, लेन−देन प्रारम्भ हो जाय तो मजा आ जाय। यह ऋद्धि वाला हिस्सा है जो हमारी जीवात्मा से सम्बन्ध रखता है। सिद्धियाँ चमत्कार वाला पक्ष है जिसे दिखाया जा सकता है। ऋद्धि हमारा वैभव है जो हमारी प्रगति करने में सक्षम है। इन दोनों को विकसित करने का नाम ही अध्यात्म है। मित्रों अध्यात्म के और रास्ते हो सकते हैं, यह मैं नहीं कहता कि यही रास्ता है।

ऋषियों की कला-ऋषियों की विद्या यह पंचकोशी साधना है जिसमें पाँच देवों का वर्णन आता है। जिसे हम कल बता रहे थे। गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में हमने आपको अभी ध्यान करना सिखाया था। आगे चलकर हम इसकी सांगोपांग तैयारी करायेंगे, परन्तु इसके पहले हम यह जानना चाहते हैं कि आपके भीतर संकल्प बल है कि नहीं। यह सारा का सारा अध्यात्म संकल्प बल पर टिका है। हम आपको चांद्रायण व्रत में इसी की इम्तहान लेने एवं प्रारम्भिक जानकारी देने हेतु बुलाते हैं कि आप में संकल्पबल है या नहीं। यह हिम्मत वालों का, बहादुरों का काम है, संकल्पबल वालों का काम है। डाका डालने में, चोरी करने में हिम्मत चाहिए। इन्हें कोई पकड़ ले तो कचूमर निकाल कर रख देगा, फिर भी डाकू सोचता है कि चलो जो होगा देखा जाएगा इसी प्रकार स्वस्थ कामों के लिए ऊँचे उद्देश्यों के लिए हिम्मत चाहिए। संसार के हर काम में हिम्मत काम करती है। यही हिम्मत आदर्शवादी जीवन जीने के लिए, अपने आपको नियंत्रित करने के लिए अंकुश लगाने के लिए आवश्यक है।

यहाँ शाँतिकुँज में हम आपको साधना कराते हैं, ध्यान कराते हैं। पंचकोश साधना भी करायेंगे, पर इसके लिए हिम्मत चाहिए। आप में हिम्मत होनी चाहिए। यह इन्द्रियाँ जो बार-बार तंग करती हैं उसे रोकना चाहिए। अभी हम सिद्धान्तों की बात कहते हैं, क्योंकि सिद्धान्त के नाम पर आपके पास कुछ नहीं है। जब स्वार्थ सामने आता है तब उस समय आदमी इतना कमजोर मालूम पड़ता है कि हम कुछ कह नहीं सकते मन जो कहता है हम वही करते हैं। अरे, तूने मन को नहीं मारा। उसे मारना होगा। मन ने इन्द्रियों को वश में कर लिया है। घोड़े को चाबुक से जिस तरह वश में करते हैं उसी तरह मन को चाबुक से मारना होगा। नहीं, साहब मन नहीं लगता है, तो खाना बन्द कर दे। अकेला मन मालिक हो गया। इस पर अंकुश लगाना होगा। यह भी एक राक्षस है। इस राक्षस के साथ लड़ाई लड़ने का नाम अध्यात्म है। जप और ध्यान से मन को वश में किया जाता है।

मित्रों, अब हम आपको उपासना के लिए तैयार करेंगे। नहीं गुरुजी, आप तो ऐसे ही अपनी ऋद्धि-सिद्धि हमें दे दीजिए ऐसे कैसे दे देंगे? तेरे पास उससे लड़ने का माद्दा है कि नहीं। हमारे गुरु ने चौबीस साल तक हमारा इम्तहान लिया। चौबीस साल तक जौ की रोटी और छाछ खाने का आदेश दिया। जौ की रोटी और छाछ के अलावा भी दुनिया में कोई चीज होती है या नहीं, यह हमने नहीं जाना। हमारी इन्द्रियों ने कहा, जीभ ने कहा कि जब सब लोग शक्कर, दाल, नमक आदि खाते हैं तो आप क्यों नहीं खाते? हमने कहा-हम लोगों के रास्ते पर नहीं चल सकते हैं। लोगों के कहने पर हम चलेंगे तो वे हमारे जीवन को तबाह कर देंगे। लोगों के बताये हुए रास्ते पर हम चलते तो अध्यात्म की ओर हम बढ़ नहीं सकते थे। लोग तो बड़े निकम्मे होते हैं जहाँ तक सिद्धान्तों का आदर्शों का सवाल है-वे बेकार हैं। लोग डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं, तुरन्त मकान का नक्शा बना देते हैं, इंजेक्शन दे देते हैं, पर जहाँ तक सिद्धान्तों का आदर्शों का सम्बन्ध है, वे इस रास्ते पर नहीं चल सकते हैं, और न ही ऊँचा उठ सकते हैं। लोगों की सलाह पर चल कर हम अपने जीवन को ऊँचा नहीं उठा सकते हैं।

अगर आपको आध्यात्मिकता के रास्ते पर चलना है तो हम आपको मुहब्बत करते हैं, प्रशंसा करते हैं और यकीन दिलाते हैं कि हम आपकी सहायता करेंगे। लेकिन आप एक बात मत करना-अपनी अकल तथा दबाव हमारे ऊपर लादने की कोशिश मत करना। हम इससे इनकार करते हैं। प्रहलाद ने अपने सम्बन्धियों की बात मानने से इनकार कर दिया था। हमारे शरीर में लोभ, माह, वासना के रूप में जो सम्बन्धी हैं, उनकी बातों को मानने से हम इनकार करते हैं जो हमें एक कदम भी आगे बढ़ने नहीं देते हैं। इनसे लोहा लेने का नाम अध्यात्म है। अपने परिवार वालों की हमें सहायता करनी पड़ती है। हमारी बीबी है, उसे हमने अग्नि की साक्षी देकर पत्नी बनाया, उसके भविष्य की चिन्ता करना हमारा कर्तव्य है। परन्तु जहाँ तक सिद्धान्त की बात है, हम किसी को हावी नहीं होने दंगे। किसी रिश्तेदार को हम हावी होने देंगे। मीरा बाई के ऊपर रिश्तेदार हावी हो रहे थे और कह रहे थे कि तुम्हें हमारे सिद्धान्तों को मानना चाहिए। मीरा अपने स्तर पर जीवन जीना चाहती थी, जैसा कि उसके गुरु राजासिंह ने बताया था। परन्तु उसके खानदान वाले मनाकर रहे थे। मीरा ने गोस्वामी तुलसीदास जी को एक चिट्ठी लिखी कि आप बतलाये कि हम क्या करें? घर वाले इस प्रकार कह रहे हैं और हमारी अन्तरात्मा दूसरी बात कह रही है। हर आदमी सलाह देता है कि आदर्श और सिद्धान्त पर मत चलो। एक हमारा ईमान तथा दूसरा हमारा भगवान के अलावा कोई नेक सलाह नहीं देता है। मीरा की चिट्ठी के जवाब में तुलसीदास जी ने लिखा-जाके प्रिय न राम वैदेही तजिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम स्नेही...।

यह किसकी बात कर रहा था? हिम्मत वालों की, शक्तिशाली-ताकत वालों की बात कह रहा था। यह शरीर की ताकत नहीं है। यह तो डाकुओं के पास भी होती है। अक्ल वालों का तो कहना ही क्या है? सारे अक्ल वाले जेलखाने में रहते हैं। डकैती, चोरी, जालसाजी, समलिंगी आदि सभी में यह माहिर होते हैं अक्लमंद की तलाश करनी है तो कभी जेलखाने चले जाइये। अक्ल हम सही मायने में उसे कहते हैं जो सिद्धान्तों के लिए, आगे बढ़ने के लिए तैयार हो। सिद्धान्तों के मामले में आपकी अक्ल, आपकी हिम्मत यदि आगे-आगे चलने को तैयार हो तो हम आपको अध्यात्म सिखायेंगे क्या-क्या सिखायेंगे? सूक्ष्म शरीर की साधना सिखायेंगे अगर आप पहलवान बनना चाहते हैं तो चलिए हमारे साथ अखाड़े में। अखाड़े में उतरे बिना आप पहलवान नहीं बन सकते। इसी प्रकार जब आपका भीतर वाला हिस्सा हमारी बातों को, दबाव को मान लेगा, तो हम समझेंगे कि आप हमारे इम्तहान में पास हो गये। एक महीने का इम्तिहान आपका इसीलिए रखा गया है। आपके ऊपर एक महीने के अनुष्ठान का दबाव इसलिए रखा गया है जिससे यह पता चल सके कि इसे आप कर सकते हैं या नहीं। कभी 11 माला कर लिया तो कभी 19 माला कर लिया और कह दिया कि गुरुजी अभी हमारा मन नहीं लगता। सितम्बर में कर लेंगे। इस तरह की बहाने बाजी करने वाले के बारे में हमें सोचना पड़ेगा कि उसका सूक्ष्म शरीर जगायें या नहीं। उसके लिए यही कहना पड़ेगा कि बेटा, अभी तू बच्चा है, कमजोर है। तेरे ऊपर हम दबाव नहीं डाल सकते हैं अभी तो हमने तप का थोड़ा-सा नियम बतलाया है। यह शिशु चांद्रायण है। आगे बड़ा चांद्रायण करायेंगे। 24 घण्टे में एक गिलास दाल-दलिया लेना होगा। इससे तेरे बच्चे की बीमारी ठीक हो जाएगी।

जन्माष्टमी के दिन बच्चे उपवास करते हैं। वे अपनी मम्मी से पूछते हैं कि हम रोटी या शाक खायें अथवा दोनों चीजें लें यह भी बच्चों का चांद्रायण है। एक बार लें या दो बार ले लें। बेटे, तू अपने ऊपर अंकुश लगाने में कमजोर है। पेट कहता है कि हमें नहीं भरोगे तो हम जिन्दा नहीं रह सकते हैं और हम कहते हैं कि खबरदार, गुरुजी के पास तू नहीं मर सकता है। हमारे गुरुजी हमें चार दिन के लिए हिमालय बुलाते हैं। हिमालय में न फल है न मूल है। पत्तियों के सहारे जीना पड़ता है। चना की तरह पालक बथुआ की तरह पत्तियाँ होती हैं जिसे उबालकर खा लिया जाता है तथा जिन्दा रहा जाता है। इससे हमारा शरीर कमजोर नहीं होता था। शरीर कमजोर हो भी तो हमारा सूक्ष्मशरीर ताकतवर होता चला जाता है। तू कहता है कि माँस बढ़ा दीजिए। बेटे, माँस बढ़ने से कोई फायदा नहीं है, तथा माँस के घटने से कुछ नुकसान भी नहीं है। असली शक्ति हमारे भीतर है, जिसे हम ‘सूक्ष्म शरीर’ कहते हैं। आगे चलकर हम इसे ही शक्तिशाली बनाने का उपक्रम बताने वाले हैं।

हमारे भीतर शक्तियों के पाँच भण्डार हैं। उनको खोलने का तरीका पंचकोश अनावरण कहलाता है। हमारे स्थूल शरीर एवं सूक्ष्म शरीर में अनेकों ग्लैण्ड्स हैं जिन्हें हारमोन ग्रन्थियाँ कहते हैं। इस तरह की बहुत छोटी-छोटी ग्रन्थियाँ हैं जो हमारे मन को नियंत्रित करती हैं। इनमें प्रमुख हैं आज्ञा चक्र जिसमें पॉजेटिव और निगेटिव दो तरह के करेंट चलते रहते हैं। यह मस्तिष्क को कण्ट्रोल कराती है। मस्तिष्क में जो शक्ति भरी पड़ी है, उसमें से सात प्रतिशत ही काम आती है, 93 प्रतिशत बेकार पड़ी रहती है। फिजियोलॉजी वाले इसे जानते हैं। अगर आज्ञाचक्र हमारा जग जाये तो 93 प्रतिशत को भी हम पकड़ सकते हैं। संयम ने इसके सहारे ही महाभारत का कृत्य दिखाया था। आज्ञाचक्र हमारा टेलीविजन है। अगर यह जागृत हो जाय तो सारे संसार के समाचार हम ज्ञात कर सकते हैं। आज्ञाचक्र ही है जो भीतर की चीजों को पकड़ सकता है।

आज्ञाचक्र जगाने का ध्यान एक हथियार है। ध्यान किसे कहते हैं? हमारे मस्तिष्क की जो शक्तियाँ फैलती रहती हैं, उसे एक जगह एकाग्र करना ही ध्यान है। एक छोटे से शीशे के ऊपर अगर सूर्य की किरणें इकट्ठी कर ली जाएँ तो उससे आग लग जाएगी। यह आग सारे शहर को जलाकर खाक कर सकती है। हमारे मस्तिष्क की शक्तियाँ ही बिखरती हैं। अगर उसे हम एकत्र कर लें तब ऐसा योग बन जाता है कि हम क्या बतलाये बन्दूक की नली में फैली हुई बारूद जमा कर लें तो गोली बन जायेगी और वह कमाल कर दिखायेगी यह है एकाग्रता। जिस प्रकार बिखरी हुई बारूद कोई विशेष कमाल नहीं दिखा सकती, उसी प्रकार हमारे दिमाग की शक्ति भी बेकार पड़ी है, अगर ध्यान द्वारा इन्हें एकाग्र कर लें तो योगी की तरह हम भी इसका लाभ उठा सकते हैं। समाधि लगाने वाले योगी कहते हैं कि हम मरेंगे नहीं। हम भी आप से कहते हैं कि आप भटकना बन्द कीजिए। एकाग्रता लाइये। कन्ट्रोलिंग पॉवर को ही नाम ध्यान है। इसके द्वारा हम ऐसी शक्ति इकट्ठी कर लेते हैं कि उसका क्या कहना। मैस्मरेज्म करने वाले इसी ध्यान शक्ति के सहारे चमत्कार दिखाते हैं। किसी को सम्मोहित या बेहोश कर देते हैं।

आपको हम आरम्भिक ध्यान शाम को आधा घण्टा सिखाते हैं। मैस्मरेज्म अभी नहीं बतलाते हैं। ध्यान के अंतर्गत हम आपको जो ‘काँशन’ देते हैं उसे मानिए इसे जब आप करने लगेंगे तो अगला वाला उच्चस्तरीय ध्यान बाद में सिखायेंगे यह मत कहिए कि गुरुजी हर चीज को जल्दी कर दीजिए। पिताजी मेरी भी मूँछें निकाल दीजिए, आपकी इतनी बड़ी है। आज ही भगवान दिखा दीजिए, भगवान का दर्शन करा दीजिए, सिद्धि दिखा दीजिए चुप, मूर्ख कहीं का, बच्चे के एक दिन में कहीं दाढ़ी निकलती है क्या? इसी तरह पात्रता एवं पवित्रता के विकास के बिना ईश्वर दर्शन भी संभव नहीं। बारूद का सबसे बड़ा जखीरा हमारे भीतर भरा पड़ा है। हम अगर अपने संकल्प बल का कारतूस चला दें तो कमाल हो जायेगा। डायनामाइट के एक सिरे में आग लगा देते हैं तो वह जलाने लगता है तथा बड़े पहाड़ को भी उड़ा देता है। हमारे भीतर भी एक प्रकार का डायनामाइट है। उसके भीतर ध्यान की शक्ति काम करती है। इसके द्वारा हम सब कुछ कर सकते हैं।

बेटे, हमारे भीतर जो शक्ति भरी है, उसका नाम है-चेतना जो जड़ के भीतर काम करती है। चेतना का काम है कि वह जड़ को काबू में रखे। जड़ के ऊपर उसी का कंट्रोल है। जड़-चेतन का सम्मिश्रण जहाँ कहीं भी होता है उसका नाम है-प्राण प्राण एक छोटी-सी चीज है जो जड़-चेतन दोनों से मिली हुई है। एक और चीज है जिसका नाम आत्मा है। यह भगवान का अंश है। साँस प्राण नहीं है। साँस के माध्यम से हम हवा खींचते हैं जिसमें गैस भरी पड़ी है। इसमें हाइड्रोजन, आक्सीजन, नाइट्रोजन, आदि बहुत-सी चीजें भरी पड़ी हैं उसके भीतर प्राण भरा पड़ा है। प्राण को हमारा संकल्प खींचता रहता है। साँस हवा खींच सकती है, प्राण को नहीं खींच सकती। हम प्राणों को जिस उपक्रम के सहारे खींचते हैं, उसका नाम ‘प्राणायाम’ है। प्राणायाम उस विधा का नाम है जिसमें हम संकल्प शक्ति को नियोजित करके साँस के माध्यम से समूचे निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राण शक्ति को खींचते हैं। प्राण-जड़ और चेतन शक्ति का सम्मिश्रण है।

सूक्ष्म शरीर को शक्तिशाली बनाने के लिए हम अभी आपको ध्यान और प्राणायाम की बात बता रहे थे। इन दोनों का ही आपको अभ्यास कराया जायेगा और आपके संकल्पबल की परीक्षा ली जायेगी। महीने भर आप यहाँ रहोगे और ध्यान का अभ्यास करेंगे। डिवाइन लाइट के ऊपर विश्वास रख कर। अगर आप इम्तिहान देने के लिए तैयार हो जायेंगे तो हम पाँच देवताओं को जो आपके भीतर सोचे पड़े हैं, उन्हें जागृत करने की विधा सिखा देंगे। अभी हमने बताया था कि हमारे सारे के सारे शरीर का ढाँचा हाड़-माँस पर नहीं, हारमोन्स पर टिका है। आदमी का वजन, ताकत हारमोन्स पर टिका है। हमारे भी पाँच और ग्रन्थियाँ हैं जिसे हम उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव कहते हैं। सारे के सारे ग्रह-नक्षत्रों का सम्बन्ध इस उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के साथ होता है। इन पाँच ग्रन्थियों के भीतर एक चक्र है जिनमें अन्य अंग-अवयवों की अपेक्षा शक्ति ज्यादा है। इन्हें कोष कहते हैं। कोष भण्डार को कहते हैं। चक्र भी भण्डार को कहते हैं इनमें ताकत भरी पड़ी है। आपने पानी के भंवर को देखा होगा उसमें साधारण पानी की अपेक्षा सौ गुनी ताकत होती है। जब नाँव भँवर में आ जाती है तो मल्लाह घबड़ा जाता है कि अब तो चक्कर काटकर नाव पलट जायेगी। यही विशेषता चक्रवात - साइकलोन में भी होती है। यह गर्मी के दिनों में आता है और बड़े-बड़े पेड़ों को और छप्परों को उखाड़ देता है।

एवं भँवर दोनों के संयुक्त रूप के बारे में यह बतलाया गया है कि आप शक्ति के भण्डार हैं। जो ग्रन्थियाँ हमारे शरीर के भीतर हैं वे पाँच तरह की हैं जिन्हें कोश कहते हैं। पहला है-अन्नमय कोष यह कोई गड्ढा नहीं है। जब तक बच्चा माँ के पेट में रहता है तब तक वह नाभिचक्र के सहारे अपना भोजन माँ के रस-रक्त से खींचता रहता है। यह स्थूल शरीर अन्नमय कोष से बना है। इसी के द्वारा शक्ति अर्जित होती है। अन्नमय कोष क्या है? नाभि के स्थान पर एक ऐसा जखीरा होता है जिसके द्वारा पूरे बाड़ी यानी शरीर को कण्ट्रोल कर सकते हैं। हम शक्तिशाली कैसे हो सकते हैं? दीर्घजीवी कैसे हो सकते हैं, इसका ताल्लुक इसी से है।

दूसरा है-प्राणमय कोष। मूलाधार चक्र इसका केन्द्र है। इसकी ऐसी विशेषता है कि इसमें से उमंगें निकलती रहती है। यह मूलाधार पेशाब एवं टट्टी के स्थान के बीचों बीच रहती है। आदमी को ताकतवर बनाने का नाम मूलाधार चक्र है। मूलाधार चक्र जब कमजोर होता है तो आदमी नपुंसक हो जाता है और किसी काम का नहीं रहता है। मिलिटरी में लोग जोश को देखते हैं जोश का ताल्लुक मूलाधार चक्र से है। मूलाधार की महत्ता न जानने के कारण वह हमारे किसी काम का साबित नहीं होता। उसका उपयोग केवल बच्चा पैदा करने और अपनी तथा अपने बीबी की सेहत खराब करने के अतिरिक्त कुछ नहीं हो पाता। मूलाधार का उपयोग हम केवल सेहत खराब करने में करते हैं। अगर हम उस ताकत को किसी अच्छे काम में लगावें तो न जाने क्या-क्या कर सकते हैं? अगर इसे संतुलित ढंग से प्रयाग करें, तो हम लव-कुश की तरह संतान पैदा कर सकते हैं। अपने आप में यह चक्र बहुत ताकतवर है। अनियंत्रित होने पर यह कामाचार पर उतारू हो जाता है और समाज में अव्यवस्था फैलाता है। इस ताकत को कैसे काम में लाया जा सकता है। यह प्राणमय कोष की साधना से साधित होता है।

तीसरा वाला कोष-मनोमय कोश यह हमारे मस्तिष्क पर कण्ट्रोल करता है। पाँच देवता इसी प्रकार पाँच कोषों में निवास करते हैं। जितनी भी अतीन्द्रिय क्षमताओं का वर्णन मिलता है-जैसे दूर देखने की ताकत, दूर की बात को समझाने की ताकत, दूर श्रवण की ताकत, भविष्य को जानने की ताकत आदि इसी कोश में सन्निहित हैं। सिद्धियों का जखीरा इसी में भरा पड़ा है। इन्हें जगाने का कार्य मनोमय कोष द्वारा होता है। बड़े काम करने के लिए बड़ी ताकत बड़ी मशीन चाहिए। बड़ा दिमाग चाहिए। व्यक्ति को बदलने युग को बदलने-समाज को बदलने के लिए बड़े व्यक्तियों की ताकत वालों की हिम्मत वालों की जरूरत पड़ेगी यह ताकत मनोमय कोष के जागरण से ही संभव है।

चौथा कोष है आनन्दमय कोष। इसे हृदय चक्र कहते हैं। यह संवेदना का-भावना का कोष है। यह आदमी से आदमी को जोड़ता है। यह भगवान से सम्बन्ध रखती है, भगवान को जकड़ लेती है। व्यक्ति से व्यक्ति को आत्मा को परमात्मा से जोड़ देने का काम भाव संवेदना का है। इसका सम्बन्ध हृदय से है। हृदय ही वह स्थान है जहाँ आत्मा-परमात्मा का मिलन होता है।

पाँचवाँ कोष-विज्ञानमय कोष है। इसका केन्द्र सहस्रार चक्र है। सहस्रार चक्र ऐसा है कि आदमी के भीतर जितना भी काम चल रहा है, यह ‘आटोमेटिक’ चल रहा है। अनाज खाकर शरीर खून पैदा करता है। रस पैदा करता है जिसके सहारे हमारे हाथ-पाँव काम करते हैं। पर असल में यह सारी शक्ति हमारे ब्रह्मरंध्र की है जो हमारे मस्तिष्क मध्य में एक छोटे से बिन्दु के रूप में अवस्थित है। विवाह-शादियों में आपने अनार छोड़ते हुए देखा होगा। उसे जलाने पर पेड़ जैसी आकृति की चिनगारियाँ फूटती हुई चारों ओर फैल जाती हैं। उसी प्रकार की गर्मी और प्रकाश स्फुल्लिंग हमारे सहस्रार स्थित ब्रह्मरंध्र से निकलती रहती हैं और सारे शरीर में फैल जाती हैं। बेटे, हम अनाज के ऊपर नहीं, उस गर्मी के ऊपर जीवित हैं जिसे हम सहस्रार कहते हैं इससे हजारों चिनगारियाँ निकलती हैं जिसे हम विभिन्न नामों से पुकारते हैं। जिसे हम कभी साँप या कुण्डलिनी कह देते हैं। यह साँप नहीं है, वरन् यह हमारे शरीर का एक ऐसा कण है जो हमें बारूद की तरह उछालता रहता है। साँ उसी का नाम है। सहस्रार कमल क्या है? यह एक कमल है जिसमें हजारों पंखुड़ियाँ हैं। मस्तिष्क एक तालाब है जिसमें यह कमल खिल रहा है। यह उफपर से निकलता है जिससे आदमी को तृप्ति, शांति, शारीरिक ताकत, मानसिक ताकत मिलती है यह सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर को विकसित करने का मौका देता है। यह हमारे शरीर का पाँचवाँ भण्डार है।

इन पाँचों कोशों को जाग्रत करने की कला की हम आपको प्रारम्भिक जानकारी देते हैं। इसके लिए हम ध्यान कराते हैं तथा सायंकाल की थोड़ी-थोड़ी विधियाँ भी बतलाते हैं। प्राणायाम, मुद्रा, बंध सिखलाते हैं इन सबको आप पूरे मनोयोग से श्रद्धापूर्वक, ध्यान एवं भावनापूर्वक करने का प्रयास करेंगे तो यकीन रखिये कि इस संस्था के संचालक, जो एक बड़ी शक्ति हैं, वह आपको सिखलायेंगे। हम संचालक नहीं है और हम जिंदे भी नहीं रहेंगे। हम तो केवल मेम्बर हैं व्यवस्थापक हैं। बैंक वाले-रेलवे वालों का कहीं से कहीं ट्राँसफर हो जाता है, परन्तु रेलवे बोर्ड कायम रहता है। मैनेजर, गार्ड, ड्राइवर सब बदल जाते हैं परन्तु रेल चलती रहती है। रेलवे बोर्ड काम करता रहता है। यह ब्रह्मवर्चस के द्वारा यानी रेलवे बोर्ड द्वारा चलाया गया है। यह एक योजना है जिसे समर्थ व्यक्ति द्वारा चलाया गया है जो अपने को समर्थ बनाने के साथ-साथ बहुत बड़ा वजन लेकर दूसरों की समधें बनाने हेतु चल रहा है। यह है ब्रह्मवर्चस् का उद्देश्य जिसमें पंचकोशों को उपासना एवं साधना का क्रम भी शामिल है। आज की बात समाप्त ॐ शान्ति।


विशेष संदर्भ गायत्री जयन्ती महाप्रयाण दिवस - हिमालय जैसी विराट सत्ता के चरणों में श्रद्धा-सुमन

एक अकिंचन और अकेले व्यक्ति ने अपने एकाकी प्रयास से इतना बड़ा संगठन कैसे खड़ा किया? आज इसे एक आश्चर्य माना जाता है और यह प्रश्न प्रायः प्रत्येक नवागन्तुक के मन में उठता है, जो स्वाभाविक भी है। इसे यदि उस महापुरुष की सिद्धि कहें, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी,, पर यदि इसका लौकिक आधार ढूँढ़ना हो, तो पूज्य गुरुदेव के पिता जैसे प्यार और वंदनीय माता जी के माँ जैसे दुलार को ही प्रमुख मानना पड़ेगा। जो व्यक्ति एक बार उनसे मिल लिया, वह उन्हें आजीवन भूल नहीं पाया और सदा सर्वदा के लिए उनका ही बन कर रह गया किसी अत्यन्त निकट सम्बन्धी जैसे हर एक से बातचीत करना, घर-परिवार के बारे में पूछना, समस्याओं का ब्यौरा लेना और एक-एक का विशेषज्ञों की भाँति समाधान सुझाना-यह उन जैसे महापुरुष की ही विशेषता हो सकती है, पर जहाँ साधनों से सहायता की आवश्यकता पड़ी, वहाँ भी वे पीछे नहीं रहे, दीन-दुखियों गरीबों-असहायों की खुल कर उनने मदद की। इस संदर्भ में यहाँ एक घटना का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा।

घटना तब की है, जब गुरुदेव मथुरा में निवास कर रहे थे। उन्हीं दिनों एक रोज एक महिला अपने सर्वथा कमजोर व क्षयरोग से ग्रस्त पति का इलाज कराने हेतु चली आ रही थी, पर दुर्भाग्यवश अस्पताल में कोई भी बिस्तर खाली नहीं था, अतः डॉक्टरों ने भर्ती करने से इनकार करते हुए उसे कुछ दिन तक इन्तजार करने को कहा। महिला बिलकुल अकेली थी। जान-पहचान भी उस क्षेत्र में किसी से नहीं थी और न आस-पास कोई सगा-सम्बन्धी ही था। वह किंकर्तव्यविमूढ़ थी और परेशान भी। ऐसी स्थिति में अपने पति को पीठ पर लादे वह तपोभूमि के सामने से चली जा रही थी कि उसने रिक्शे से पूज्य गुरुदेव को उतरते देखा। उनने आज के युग की इस सावित्री की वेदना को समझा व उसे अपने साथ चलने को कहा व उसका नाम ‘सावित्री’ से ही पुकारते हुए वंदनीय माता जी से कहकर उस घीयामण्डी में ही निवास पर ही उसकी व्यवस्था कर दी और न सिर्फ ठहरने की, वरन् भोजन आदि का भी प्रबन्ध कर दिया। दो-चार दिन बाद जब अस्पताल में बैड खाली हुआ तो फिर वह वहाँ चली गयी, किन्तु इस दौरान गुरुदेव द्वारा किये उपकार और दिखायी आत्मीयता को वह नहीं भूल पायी। रह-रह कर उस देवपुरुष के दर्शन की अभिलाषा बराबर सताती रही, जिसने मौके पर उसकी सहायता की थी, पर विवशता जो थी, अपने बीमार पति को छोड़ वह कैसे आ सकती थी? आखिर कुछ दिनों बाद उसके पति को अस्पताल से छुट्टी मिली, तो वह दर्शन के लोभ का संवरण न कर सकी और दौड़ी-दौड़ी चली आयी पूज्य गुरुदेव से मिलने। अब वह एक भक्त ही नहीं समर्पित कार्यकर्ता भी बन गयी थी।

ऐसी थी उनकी प्रेम भरी आत्मीयता जो पतंग और पतंगबाज के परस्पर सम्बन्ध की तरह लोगों को अदृश्य स्नेह-सूत्र में बाँध लेती थी। इस स्नेह-बन्धन में उनकी चिरसंगिनी स्नेह सलिला माता जी का अनन्य योगदान रहा है। आगन्तुकों को अपने हाथों से खाना बना कर, परोस कर अपने सम्मुख बिठाकर प्यार से खिलाना, भले ही कितनी ही रात को परिजन क्यों न आये हों। इस क्रम में ऋषि-युग्म एक बात का विशेष ध्यान रखते थे कि स्वयं कष्ट भले ही उठा लें, पर आने वाले को किसी प्रकार की कठिनाई न होने पाये इसका बराबर ख्याल रखते थे। जहाँ मातृत्व भरा समन्वय हो, भला व्यक्ति उसे कैसे भुला सकता है? प्रत्यक्ष मिलन के बाद सम्बन्ध सूत्र को पत्राचार के माध्यम से यथावत् बनाये रखा जाता अथवा यों कहा जाय कि उसे और प्रगाढ़ बनाने के लिए पत्र व्यवहार का सिलसिला आरम्भ होता। परिजन इस प्रकार से चिट्ठी लिखते, मानो वह अपने सगे माता-पिता के सामने दिल को अनावृत्त कर रहे हों। ऐसी बातें जिसे अपने सगे सम्बन्धी के सामने प्रकट करने में संकोच या झिझक होती, उन्हें वे दिल खोल कर लिखते उनका उत्तर भी पूज्य गुरुदेव की ओर से इतना स्नेह भरा आता, जिसे पढ़ कर आनन्द से उनकी आंखें भर आतीं और प्रायः लोग सोचते कि ऐसा क्या भी हो सकता है। कोई सर्वथा पराया व्यक्ति इतना प्यार लुटा सकता है? पर सच्चाई तो हस्तामलकवत थी, उसे झुठलाया कैसे जाता! पत्र की पहली ही पंक्ति-आत्मस्वरूप लोगों को भाव-विभोर बना डालती और एक ऐसे स्नेह पाश में बाँध लेती, जो कदाचित् ही टूटता। फिर पत्रों के माध्यम से मार्गदर्शन का क्रम आरम्भ होता। यह मार्गदर्शन विभिन्न विषयों से सम्बन्धित होता यथा आत्मिक उन्नति के लिए साधना का निर्धारण, व्यक्तिगत एवं पारिवारिक समस्याओं का निराकरण तथा अपने कुछ समय निकाल कर लोक मंगल हेतु उसका नियोजन। इतना ही नहीं, वे लोगों के स्वास्थ्य का भी पूरा-पूरा ध्यान रखते और जिन्हें आवश्यक समझते उनके पास वे विशेष बलपूर्वक स्वनिर्मित जड़ी-बूटियों का रसायन भी भेजते। यदा-कदा यदि कोई बीमार और अशक्त परिजन मथुरा उपस्थित नहीं हो पाता, और दीक्षा का आग्रह करता डाक द्वारा दीक्षा की सामग्री, जिसमें रोली, कलावा-चन्दन अक्षत, माला, आदि सम्मिलित होते, उसे भेज कर एक निश्चित मंगल तिथि बता देते और उक्त दिन उपवास रख कर उन्हें धारण कर लेने को कह देते। यही परिजन के लिए उनके द्वारा दी गयी दीक्षा होती। कष्ट कठिनाइयों में उनका सूक्ष्म संरक्षण और सहायता मिलती,, सो अलग। जहाँ इतना अपनत्व दिखाया जा रहा हो, वहाँ लोगों का जुड़ना उसका और संगठनात्मक स्वरूप ग्रहण करना स्वाभाविक ही था, हुआ भी ऐसा ही।

यों तो मिशन का सूत्रपात उसी दिन हो गया था जिस दिन गुरुदेव 1926 में हिमालयवासी दिव्य सत्ता से साक्षात्कार हुआ था, पर प्रकट रूप में इसकी आधारशिला सन् 1940 की बसंत पंचमी पर ही रखी गई, जब से अखण्ड-ज्योति पत्रिका का नियमित प्रकाशन आरंभ हुआ एवं धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया का शुभारम्भ। यह योजना उनके दिमाग में बहुत पहले ही बन चुकी थी कि आगे चलकर उन्हें नव निर्माण योजना की विशाल मुहिम खड़ी करनी है और उसके माध्यम से व्यक्ति एवं समाज को दिशा देनी है। अतः इसके अनुरूप पात्रता का विकास भी उन्होंने आवश्यक समझा, क्योंकि इसे वे भली−भाँति समझते थे कि जब तक संचालक का व्यक्तित्व खरा और प्रामाणिक नहीं होगा, तब तक कोई बड़ा संगठन खड़ा करने की आशा दुराशा मात्र ही होगी। इस बात की सच्चाई वे भूतकालीन एवं गाँधी जी जैसे समकालीन व्यक्तियों के जीवन में भी देख-समझ चुके थे। अतः उन्होंने वरीयता एवं अनिवार्यता को समझते हुए स्वयं को साधना और तपश्चर्या की अग्नि में तपा कर खरे सुवर्ण की भाँति प्रामाणिक प्रखर बनाया, ऐसा जिसका अन्दर बाहर एक-सा हो, कथनी और करनी में एकरूपता हो। आज कल अधिकांश संगठन इसलिए असफल हो जाते हैं, क्योंकि संचालक का व्यक्तित्व इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता। वे जैसा कहते हैं, वैसा करते नहीं अथवा बाहर से जैसा उपक्रम अपनाते देखे जाते हैं भीतर से उनका व्यक्तित्व वैसा होता नहीं। गुरुदेव इस व्यतिरेक से बचे और हर क्षण मनसा-वाचा कर्मणा में अटल एकरूपता के साथ-साथ ब्राह्मणत्व जीवन में कैसा उतारा जाता है। प्रस्तुत कर रहे। जहाँ इतनी विश्वसनीयता, एकरूपता व प्रामाणिकता हो, उसके एक इशारे पर जन-समूह और जनसहयोग का इकट्ठा होना क्यों असंभव होना चाहिए? क्यों कठिन होना चाहिए?

हुआ भी ऐसा ही। उनके इशारे भर की देर थी, और देखते-देखते विशाल साधना सुविधा युक्त सृजन सेनानी चतुरंगिणी सेना की तरह आ जुटे। भौंरे भी उन्हीं फूलों के आस-पास मंडराते हैं, जो सुवासित होते और सुगन्ध बिखेरते हैं। सर्वथा गंधहीन और दुर्गन्धयुक्त फूलों से तो वे भी किनारा काट जाते हैं, फिर परम पूज्य गुरुदेव के सम्बन्ध में ही ऐसा क्यों होता? वे तो मलयानिल की तरह अपनी खुशबू यत्र-तत्र-सर्वत्र दसों दिशाओं में बिखेर रहे थे, जिससे खिंची-घिसटती उच्चस्तरीय आत्माएँ अनायास उनकी मादकता के वशीभूत हो चली आ रही थी। यह क्रम उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक तथा उसके बाद भी चलता रहा है।

इस दिशा में जो और माध्यम उनके चिरसहचर रहे, वह थे उनकी प्रखर लेखनी और ओजस्वी। लेखनी ने जहाँ मुर्दों में प्राण फूँकने जैसा काम किया, वहीं उनकी वाणी ने दृश्य-श्रव्य माध्यमों से सम्मोहन जैसी स्थिति पैदा कर दी। लेखनी एक और सुषुप्तों को झकझोरती-जगाती रही, तो वाणी जाग्रतों को अपनी ओर खींचती, बुलाती और मिलती रही। यही कारण है कि 50 वर्ष की

स्वल्पावधि में भी उनने इतना बड़ा संगठन खड़ा कर दिया, जिसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक ही कहा जा सकता है। इसके पीछे उनके हिमालय जैसा विराट् और सागर जैसा विशाल व्यक्तित्व और कर्तव्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी जाय तो कोई अतिरंजना नहीं होगी।

दोनों ही किशन के संस्थापक संचालक हमारे बीच प्रत्यक्षतः नहीं हैं आज यह बात निश्चित ही मन को सालती है, पीड़ा पहुँचाती है, पर हृदय के इस संताप में स्वाति की शीतल-वर्षा तभी हो पायेगी, जब हम उनके कथनानुसार उनके कार्य को अग्रगामी बनाने में प्राणपण से निरन्तर जुटे रह कर उनका वह स्वप्न साकार कर पायेंगे, जिसके लिए उन्होंने मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की कल्पना की थी। यही हमारी उनके प्रति सच्ची, श्रद्धांजलि होगी। आज गुरुसत्ता के महाप्रयाण की पावन वेला (2 जून गायत्री जयंती 1990) में यदि उनके प्रति श्रद्धा यही संकल्प बनकर उतरे तो आगामी छह माह जो प्रथम पूर्णाहुति (आँवलखेड़ा, आश्वमेधिक अनुष्ठान) के प्रयाज के हैं, में हमारे सक्रियता वह सब दिखा कर सकती हैं जिसकी कि अपेक्षा उनने हमसे रखी है।


अपनों से अपनी बात- - पुनर्गठन की इस वेला में आइए, हम सभी आत्मचिंतन करें

हम सबके जीवन का एक सुयोग-सौभाग्य कि जिन दिनों परमपूज्य गुरुदेव परम वंदनीय माता जी का अवतरण इस धरती पर हुआ, उन्हीं दिनों हम सब को भी उनके साथ लीला सहचर बनने का एक स्वर्णिम अवसर मिला। हम सबने उनके नूतन सृष्टि के सृजन के संकल्प को 1926 की बसंत पंचमी का प्रचलित अखण्ड दीपक के उजाले में साकार होते देखा। गायत्री जयन्ती 1990 (2 जून) को हमारी आराध्य गुरुसत्ता हम सबको प्रचण्ड संकल्प शक्ति से अभिप्रेरित कर अपने बाद शक्ति स्वरूपा परम वंदनीय माताजी एवं उनके बाद संघशक्ति की प्रतीक ‘लाल मशाल' को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर इक्कीसवीं सदी की सारी भवितव्यतायें बताकर महाप्रयाण कर गयीं।

गायत्री जयंती से श्रेष्ठ दिन और कौन-सा हो सकता था, माँ गायत्री के वरद पुत्र सिद्ध सन्त युगपुरुष पूज्यवर के स्थूल के बंधनों से मुक्त हो विराट में घनीभूत हो सूक्ष्म व कारण शरीर के रूप में संव्याप्त होने का। आज उसी बेला में हम सब पर दुलार व शक्ति दोनों लुटाने वाले-भव्य को जगाकर समय आने पर ‘सहोऽसि सहोमयि देहि” का संदेश देने वाले तथा उज्ज्वल भविष्य की झलक झाँकी दिखा कर हमारे चिन्तन को सतत् उल्लास भरा विधेयात्मक बनाने वाले अपने पिता को पुनः पाँच वर्ष बाद याद करके हम अपनी अंतः पर्यवेक्षण करने की प्रक्रिया को दुहरा रहे हैं। जब आज से प्रायः 9 माह पूर्व हम सबको संरक्षण देकर पीठ थपथपाकर आगे बढ़ने वाली, एक टीम बनाकर उसके द्वारा देवसंस्कृति दिग्विजय के अनेकानेक पराक्रम सम्पन्न करने वाली मातृ सत्ता के महाप्रयाण व उनके अंतिम संदेश को हम याद करते हैं तो पुनः आत्मचिन्तन की घड़ी आ जाती है। क्या हम वह सब कर पाये हैं जो ऋषियुग्म चाहते थे, क्या हम ‘क्वान्टिटी’ के साथ-साथ ‘क्वालिटी’ बढ़ाने की बात साकार कर पाए हैं? यह सब हम सब के लिए विचारणीय कुछ बिन्दु गायत्री जयंती (8 जून) की इस पावन वेला में।

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि शक्ति के द्वारा संचालित-प्रेरित दैवी आकांक्षा से विनिर्मित मिशन की गति कभी रुकती नहीं। ऐसा मिशन दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति करता चला जाता है। पर यह दायित्व प्रहरियों का है, केन्द्र व क्षेत्र के सभी परिजनों का है जिनने ‘विनम्रता ही वरिष्ठता की कसौटी है’, इस तथ्य को हृदयंगम कर ब्राह्मणत्व का आदर्श क्रमशः अपने जीवन में समाहित किया है। आश्वमेधिक अनुष्ठानों की चकाचौंध में हम एक डेढ़ इंच ही सही, कहीं इधर-उधर भटक तो नहीं रहे। वरिष्ठों की आंतरिक गरिमा स्नेह संवेदना लुटाने की प्रक्रिया ही इस मिशन की धुरी है व वे ही व्यक्ति शक्ति के संवाहक बन सकेंगे। सभी जानते हैं कि इस समय असुरता जीवन-मरण व संघर्ष भरा अंतिम युद्ध लड़ रही है। कहीं वह हमारे चिन्तन में प्रविष्ट हो हमें आदर्शवाद की दृष्टि से तो नहीं, पर और किसी क्षेत्र में महत्त्वाकाँक्षी तो नहीं बना रही है, यह सतत् आत्म चिन्तन करते रहना हमारा आपका सबका कर्तव्य है।

शक्ति द्वारा संचालित मिशन एक आँधी आवेश की तरह होता है। रास्ते में आने वाले हर अवरोध को आँधी उखाड़ फेंकती है। उसके लिए आदर्श जिन पर गुरुसत्ता जीवन भर टिकी रही, वे ही महत्त्वपूर्ण हैं। 25 अश्वमेध हो चुके। सभी एक से एक बढ़कर। किसी एक की नहीं प्रत्येक को जन−जन की गाँव-गाँव में घूमकर पैदल ग्राम प्रदक्षिणा से लेकर यज्ञ संचालन करने वाले तक की सफाई करने वाले से लेकर यज्ञाहुति न कर पाने किन्तु लाखों के लिए भोजन आवास की व्यवस्था करने वाले हर परिजन की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। अब अगला लक्ष्य हमारा आँवलखेड़ा की पूर्णाहुति है जो युग सन्धि महापुरश्चरण का प्रथम अनुष्ठान है। सत्ताईसवें आश्वमेधिक प्रयोग के रूप में गुरु जन्मभूमि 4, 5, 6, 7 नवम्बर 1995 की तारीखों में सम्पन्न होने जा रहा है। इसके प्रयास में नियोजित हो सारे हो चुके अश्वमेधों का अनुयाज आगामी चार माह में सम्पन्न करने के बाद लगातार एक वर्ष तक पुनर्गठन प्रक्रिया के अंतर्गत सारे भारत व विश्व को एक सुव्यवस्थित संगठन के, आचार संहिता के आधारभूत सिद्धान्तों से बँधे मिशन के रूप में विनिर्मित कर गायत्री व यज्ञमय बनाने का, भारतीय संस्कृति को विश्व संस्कृति बनाने का लक्ष्य हमें पूरा करना है। अट्ठाइसवें से लेकर एक सौ आठवें अश्वमेध की यात्रा अक्टूबर 1996 के बाद आरंभ होगी, यह सभी को बार-बार समझा दिया गया है।

आदर्श आचार संहिताएँ जो पूज्यवर विनिर्मित कर गए, अगले अंक से पुनः प्रकाशित की जाती रहेंगी। हर नैष्ठिक क्षेत्रीय परिजन, शक्तिपीठ के ट्रस्टीगणों से लेकर प्रज्ञामंडलों शाखाओं तथा केन्द्रीय कार्यकर्ताओं के लिए ये बनायी जा रही हैं। आशा की जानी चाहिए कि आदर्शों की कसौटी पर खरे उतरने वाले स्वयं को और सक्रिय बनाएँगे व औरों को न देखकर मात्र गुरुसत्ता के जीवन दर्शन को ध्यान में रखते हुए अपनी निष्ठा-साधन श्रद्धा का पुख्ता प्रमाण देंगे।

*समाप्त*