आस्तिकता का यथार्थ

आज लोगों की सामान्य धारणा यही है कि भगवान मोर-मुकुट धारी रूप में होते हैं व समय-समय पर पाप बढ़ने पर पौराणिक प्रस्तुति के अनुसार वे उसी रूप में आकर राक्षसीं से मोर्चा लेते व धर्म की स्थापना करते हैं। बहिरंग के पूजा कृत्यों से उनका प्रसन्न होना व इस कारण उतने भर को धर्म मानना, यह एक जन-जन की मान्यता करते हैं। व इसी कारण कई प्रकार के भटकाव भरे धर्म के दिखाने वाले क्रिया-कलाप अपनी इस धरती पर दिखाई देते हैं। जोर से आरती गाई जाती है। नगाड़े -शंख आदि बजाए जाते हैं, एवं चरणों पर मिष्ठान के ढेर लगा दिए जाते हैं सवा रुपये व चंद अनुष्ठानों के बदले भी उनकी अनुकंपा खरीदने के दवे किये जाते हैं। प्रश्न यह उठता है कि आस्तिकता के बढ़ने का क्या यही पैमाना है जो आज बहिर्जगत में हमें दिखाई दे रहा है? विवेकशीलता कहती है कि “नहीं"

ईश्वर विश्वास तब बढ़ता हुआ मानना चाहिए जब समाज में जन-जन में आत्मविश्वास बढ़ता हुआ दिखाई पड़े, आत्मावलम्बन की प्रवृत्ति एवं श्रमशीलता की आराधना में विश्वास अभिव्यक्त होता दीखने लगे। आस्तिकता संवर्धन तब होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति के प्रकरण अधिकाधिक दिखाई देने लगें व वस्तुतः समाज के एक−एक घटक में ईश्वरीय आस्था परिलक्षित होने लगें। कोई भी अभावग्रस्त हो एवं अपना अंतःकरण उसे ऊँचा उठाने के लिए छल छला उठे तो समझना चाहिए कि वास्तव में भगवद् सत्ता वहाँ विद्यमान् है। अनीति-शोषण होता हुआ देखकर भी यदि कहीं किसी के मन में किसी की सहायता का आक्रोश नहीं उपज रहा है तो मानना चाहिए कि बहिरंग से आस्तिक यह समुदाय अभी अंदर से उतना ही दिवालिया? भीरु व नास्तिक है। जब ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास बढ़ने लगता है तो देखते-देखते लोगों के आत्मबलों में अभिवृद्धि, संवेदना की अनुभूति के स्तर में परिवर्तन तथा सदाशयता का जागरण एक सामूहिक प्रक्रिया के रूप में चहुँ ओर होता दीख पड़ने लगता है।

आज का समय ईश्वरीय सत्ता के इसी रूप के प्रकटीकरण का समय है। प्रसुप्त सम्वेदनाओं का जागरण ही भगवत् सत्ता का अंतस् में अवतरण है। आस्तिक संकट की विभीषिका इसी से मिटेगी व यही अस्तित्व का संवर्धन कर जन-जन के मनों के संताप को मिटाएगी। हमें इसी प्रज्ञावतार को आराध्य मानकर अपने क्रिया−कलाप तदनुरूप ही नियोजित करना चाहिए।


तप की सिद्धि

गृहस्थाश्रम का अंत निकट आ चला किंतु महाराज दिलीप को कोई संतान नहीं हुई। वानप्रस्थ ग्रहण करने से पूर्व राज्य के लिये योग्य उत्तराधिकारी की उन्हीं चिंता थी और सुदक्षिणा को निःसंतान होने का दुःख। अंततः दोनों ने मंत्रणा की और समुचित समाधान के लिये गुरु वशिष्ठ की शरण जाने की निश्चय कर लिया।

दिलीप और सुदक्षिणा समित्पाणि महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचें और गुरु को प्रणिपात कर अपना दुःख निवेदन किया। एक क्षण मौन रहकर त्रिकालदर्शी महर्षि ने देखा पूर्वजन्म में दिलीप से एक गाय बहुत दुःखी हुई थी। आत्मा अबूझ रहे तो भी उसकी सर्वशक्तिमत्ता नष्ट तो नहीं होती। भरे हृदय से उसने श्राप दिया था और उसी कारण महाराज दिलीप को इस जन्म में संतान सुख से वंचित होना पड़ा था।

अपनी महत्ता छिपाये रखने का ऋषियों में स्वभाव होता है, इसलिये उन्होंने पूर्वजन्म का तो कोई उल्लेख नहीं किया पर उन्होंने कहा-दिलीप यदि तुम तप करने के लिए तैयार हो तो ही संतान का सौभाग्य मिल सकता है, तुम्हें ज्ञात हो परमात्मा भी निरंतर तप करता है, तभी वह संसार का स्वामी बन सका।

महर्षि का सीधा उद्देश्य दिलीप से पूर्व-कृत-पापों का प्रायश्चित कराना था। तत्त्वदर्शी आचार्य आश्रमों में आये आगन्तुकों की इच्छाएँ उनके मनोरथ सब कुछ जानते हैं, उन्हें पूरी करने की सामर्थ्य नहीं कर सकते। देते है वे भी पर जब प्रायश्चित द्वारा उनकी मलीनताओं और कुसंस्कारों को दूर कर लेते हैं। दुष्ट-दुराचारी पाप और वासनाओं में डूबे हुए को कोई वरदान देकर उस अलौकिक आत्म-शक्ति के दुरुपयोग का अपराध वे कभी नहीं करते, नहीं करते, भले ही सारा संसार एक ओर हो जाये और अपने सिद्धांतों पर उन्हें अकेले ही तटस्थ होकर खड़ा रहना पड़े

दिलीप! और सुदक्षिणा! तुम दोनों ही मुझे मेरे प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। राजवंश की रक्षा हमारा धर्म भी है-वशिष्ठ बोले किंतु ईश्वरीय न्याय के सिद्धांत प्राणिमात्र के लिए एक से है, जिस तरह तुम अपनी प्रजा का न्याय करते समय छोटे-बड़े अपने-पराये का भेद नहीं करते क्या उसी प्रकार ईश्वर की सत्ता पर यह विश्वास न करोगे कि वह प्राणिमात्र के प्रति समान न्याय भाव रखता है।

यह तो हमारा धर्म हे गुरुदेव! दिलीप ने दोनों हाथ जोड़कर कहा-आप जो कहेंगे उसमें हमारा हित ही होगा।” इससे आगे की बात सुदक्षिणा ने पूरी की-देव आपकी कोई भी आज्ञा हमें शिरोधार्य है, हम तप करने के लिये राजी है।”

वशिष्ठ ने राज-दम्पत्ति को आशीर्वाद दिया आश्रम के प्रबंधकों ने उनके निवास का प्रबंध किया जिस तरह आश्रम में विद्याध्ययन और साधनायें करने वाले स्नातक और वानप्रस्थ पर्ण-कुटीरों में रहते थे, उन्हें भी एक पर्ण-कुटीर रहने के लिये दे दी गई। बिलकुल सामान्य, राज-वंश की शान के अनुकूल विशेषता का एक भी अंश उसमें नहीं था।

एक दिन सायंकाल उनके द्वार आये दो बटुकों के साथ महर्षि की नंदिनी गाय थी- उन्होंने बताया- कल से आपको इस गाय को चराने जाना होगा। इस गाय की संपूर्ण व्यवस्था का उत्तरदायित्व आगे आप लोगों पर ही होगा, ऐसा महर्षि का आदेश है।

सुदक्षिणा और दिलीप दोनों ने नंदिनी के चरण स्पर्श किये और उसे पर्ण कुटीर के सम्मुख एक अन्य पर्ण कुटीर में रख दिया।

प्रातःकाल नंदिनी वन के लिए चलीं कटि में परिकर और पीठ पर तूणीर, जिन में बाण भरे हुए थे, धारण कर दिलीप गाय के पीछे चले। दक्षिण स्कंध पर प्रत्यंचा चढ़ा हुआ धनुष-दिलीप का वीर वेश देखते ही बनता था। उनके पीछे पादत्राण रहित सुदक्षिणा। जिसने कभी एक योजन भी पैदल न चला था, जिसकी देह पर वर्षों से सूर्य का भरपूर प्रकाश भी न पड़ा था, वही सुकुमारी सुदक्षिणा कंटकाकीर्ण वन में पति दिलीप के साथ नंदिनी चराने जाने लगी।

नंदिनी जब चरती उसकी सुरक्षा के लिये धनुषधारी दिलीप उसके पीछे-पीछे चलते नंदिनी बैठ जाती, तभी उन्हें बैठने को मिलता नंदिनी कभी अस्वस्थ दीखती तो दिलीप और सुदक्षिणा रात-रात जागकर उसका उपचार करते। जप, तप, हवन, ब्रह्म-भोज सब कुछ उनके लिये नंदिनी की सेवा ही थी। गुरुदेव की गाय को वे अपने प्राणों से भी अधिक बचाकर रखते थे

शीत, बरसात, ग्रीष्म ऋतुयें बदलती गई पर दिलीप की साधना में कोई अंतर नहीं पड़ा एक शरद गई दूसरी ने प्रवेश किया। कार्तिक के सुहावने दिन प्रकृति की हरीतिमा और नव्य-कुसुमों की शोभा वन-श्री को नई आभा प्रदान कर रही थी। नंदिनी चरते-चरते कैलाश शिखर तक जा पहुँची दिलीप प्रकृति के अजस्र सौंदर्य का पान करते उसके पीछे-पीछे चलते चले गये।

संध्या हो चली पर नंदिनी ने पीछे मुड़ने का नाम भी न लिया। भगवान् सूर्यदेव थक कर में हलकी आभा से उदय हो चला। विलक्षण शांति थी उस समय। सघन क्षेत्रों का कोलाहल वंदना इस शांति पूर्ण वेला में एकाग्र हो गया प्रकृति के सौंदर्य में वे एक क्षण के लिये खो गये नंदिनी थोड़ा आगे निकल गई।

तभी एक सिंह की गरज ने उनका ध्यान भंग किया। वह अभी नंदिनी पर टूट पड़ने वाला था कि दिलीप का धनुष गति कर उठा। तीखा बाण तूणीर से काढ़कर उन्होंने प्रत्यंचा चढ़ाई। श्रवण तक खींचकर अभी वे बाण को छोड़ना ही चाहते थे कि हाथ धनुष से चिपक गये और वे अपने को सर्वथा असहाय, असमर्थ अनुभव करने लगे। सिंह समझते हो, वह नहीं हूँ मैं भगवान् आशुतोष का गण हूँ मुझे नंदिनी को भक्षण करने के लिये भेजा गया है। तुम उसे बचा नहीं सकते।”

दिलीप आर्तनाद कर दौड़े और नंदिनी को अपने पीछे कर बोले “जब तक मेरा शरीर है वनराज! तब तक तुम नंदिनी पर प्रहार नहीं कर सकते" अब तक सुदक्षिणा भी आगे पहुँच चुकी थी, उसने हाथ जोड़कर याचना की-"मृगेन्द्रः आप पहले मुझे भक्षण करें तब मेरे पतिदेव पर हाथ उठाये"

एक निमिष में सब कुछ हो गया। सिंह वहाँ था कहाँ महर्षि वशिष्ठ शिला पर खड़े मुस्कुरा रहे थे उन्होंने आशीर्वाद दिया-अब तुम आश्रम लौट आओ दिलीप! तुम्हारी तपश्चर्या पूरी हो गई।”

इसी साधना के प्रताप से दिलीप और सुदक्षिणा ने रघु को जन्म दिया। जिनके नाम पर दिलीप के वंश का नाम ‘रघुवंश’ पड़ा।


प्रगति का एक मात्र अवलंबन “अध्यात्म”

भारतीय जन-जीवन का उज्ज्वल अतीत इस कारण शानदार रहा कि तब आदर्शवादिता को विचारणा एवं क्रिया में महत्त्वपूर्ण स्थान मिलता था। सोचने का स्तर उदारता एवं विवेकशीलता से और क्रिया का स्तर लोकहित एवं आदर्शों की रक्षा से भरा पूरा रहता था। जहाँ इस रीति-नीति को प्रश्रय मिलेगा वहाँ सुख-शांति का, प्रगति समृद्धि का बाहुल्य रहना स्वाभाविक है। इस आधार को जब कभी भुलाया जाएगा उपेक्षित किया जाएगा। तभी पतन एवं संकट की विपन्नताएँ इकट्ठी होती चली जाएँगी। साधनों की दृष्टि से हम पहले की अपेक्षा बहुत अधिक बढ़े-चढ़ें हैं अतएव हमें पहले से कहीं ज्यादा शांत-प्रसन्न संपन्न एवं सफल होना चाहिए। लेकिन हो ठीक उलटा रहा है। इसका कारण हमारी विचारणा में घटियापन आ जाने से क्रियाओं का अवांछनीय हो जाना ही है। इस स्थिति को जब तक न बदला जाएगा तक अन्य छूट–पुट कोशिशें मन बहलाव की बाल क्रीड़ाएं भर सिद्ध होती रहेंगी।

अध्यात्म का समस्त कलेवर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुआ है कि मनुष्य आंतरिक दृष्टि से-भावनात्मक स्तर पर अपनी उत्कृष्टता सुरक्षित रखने एवं बढ़ा सकने में समर्थ बना रहे और बाह्य दृष्टि से-क्रिया स्तर पर आदर्शवादिता भरे संयमित, मर्यादित एवं बढ़ा सकने में समर्थ बना रहे और बाह्य दृष्टि से-क्रिया स्तर पर आदर्शवादिता भरे संयमित, मर्यादित एवं बढ़ा सकने में समर्थ बना रहे और बाह्य दृष्टि से-क्रिया स्तर पर आदर्शवादिता भरे संयमित, मर्यादित एवं लोक मंगल के लिए गतिविधियाँ अपनाए रखने की तत्परता बरते। हिन्दू साइकोलॉजी नामक सुप्रसिद्ध ग्रंथ के लेखक स्वामी अखिलानन्द के अनुसार पूजा, उपासना कथा, वार्ता तीर्थ मंदिर, व्रत, अनुष्ठान जप-तप तथा नियम-संयम आदि की आध्यात्मिक क्रियाओं के आधार पर यदि बारीकी से नजर डाली जाय तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना कि इन मनोवैज्ञानिक क्रिया–कलापों का प्रयोग व्यक्ति की अंतरंग उत्कृष्टता का अभिवर्धन करना है। आस्तिकता का मतलब है, ईश्वर विश्वास। ईश्वर विश्वास का अर्थ है-एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना जो सर्वव्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है। यदि यह विश्वास कोई सच्चे मन से कर ले तो उसकी विवेक बुद्धि कुकर्म की दिशा में एक कदम भी न बढ़ने देगी। हम आग नहीं छूते, जहर नहीं खाते तो कोई कारण नहीं कि सर्वव्यापी कर्मफल के अनुरूप सुख-दुःख देने वाली ईश्वरीय विधि व्यवस्था तोड़ने और अनाचार अपनाने का दुस्साहस करें। आस्तिकता हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है। वह हमें विवश करत ही है कि यदि सुख शांति के लिए तनिक भी आकर्षण है तो सत्प्रवृत्तियों एवं सद्भावनाओं का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिए। थोड़े में आस्तिकता का तत्त्वज्ञान हमारे अंतरंग में उत्कृष्टता एवं बहिरंग में आदर्शवादिता की अधिकाधिक मात्रा का समावेश करने वाला अंतः विश्वास ही कहा जा सकता है।

इसी केन्द्र बिंदु पर आस्तिकता का समस्त दार्शनिक एवं प्रयोगात्मक आधार खड़ा किया गया है। समस्त ग्रंथों में विविध-विधि कथा उपाख्यानों द्वारा इसी का प्रतिपादन हैं। धार्मिक कर्मकाण्डों के द्वारा इसी आस्था को हृदयंगम कराने का मनोवैज्ञानिक उपचार कहा जा सकता है। योगशास्त्र का प्रयोजन कुसंस्कारों एवं लिप्साओं से संघर्ष करके ऊर्ध्वगामी मनस्विता को प्रखर बनाना है। मनुष्य ईश्वर का पुत्र है, उसमें अपने पिता की समस्त विभूतियाँ एवं महत्ताएँ बीज रूप से विद्यमान् हैं। साधना का प्रयोजन अंतःकरण पर चढ़े हुए उन मल, आवरणों, विक्षेपों को हटाना है, जो हमें देवत्व से वंचित कर नर पशु की स्थिति में डाले हुए हैं। तपश्चर्या इसी मलिनता को स्वच्छ करती और इसी मलिनता को स्वच्छ करती और प्रसुप्त ऋद्धि सिद्धियों को जाग्रत करके दैवी वरदान की तरह लघु को महान् बना देती है।

आस्तिकता और उपासना का सारा आधार यही है। धार्मिकता का कलेवर कितना ही बड़ा क्यों न हो, बीज मूल की तरह तथ्य इतना ही है कि व्यक्ति अपनी महान् महत्ता को समझे उसी के अनुरूप सोच और गतिविधियाँ अपनाए। व्यक्ति और समाज की प्रगति एवं सुख शांति का आधार इतना ही है। उत्थान और पतन का सौभाग्य दुर्भाग्य इन्हीं तथ्यों पर पूर्णतया निर्भर है। सद्गुणी, सदाचारी, उदार और जनकल्याण की भावनाओं से ओत-प्रोत मनुष्य ही सच्चा मनुष्य है। देवता उसी को वहाँ स्वर्ग अनायास ही अवतरित होकर रहता है। परिस्थितिवश कुछ कष्टकर स्थितियाँ भी सामने आ जाएँ तो भी उच्च दृष्टिकोण रखने वाले उनका कोई बहुत बुरा प्रभाव उत्पन्न नहीं होने देते बल्कि अपनी सत्प्रवृत्तियों को और भी अधिक उत्तमता से प्रस्तुत करने का एक ईश्वरीय परीक्षा का सौभाग्य सुअवसर मानते हैं और अपनी प्रखरता के साथ प्रस्तुत करते है इस प्रकार सामान्य लोगों के लिए जो घटनाएँ विपत्ति जैसी लगती है, वे ही अध्यात्मवादी के लिए अधिक प्रखर एवं यशस्वी होने की ईश्वरीय अनुकंपा सिद्ध होती है। इस बात में दो मत नहीं कि मनुष्य जाति का सारा सौभाग्य अध्यात्म सूर्य से प्रभावित होता है। इसकी विमुखता घोर अंधकार और आपत्ति भरी अस्त-व्यस्तता ही उत्पन्न करती है। आज की विपन्न परिस्थितियों का तात्त्विक कारण अध्यात्म से हमारी विमुखता ही है। उच्च आदर्शों से विमुख होकर संकीर्ण स्वार्थपरता अपनाने वालों की सदा ही दुर्गति होती रही है। प्रकृति के इस अटल नियम को कोई चुनौती नहीं दे सकता निकृष्ट स्तर के व्यक्ति कभी दे सकता निकृष्ट स्तर के व्यक्ति कभी शांति से न रह सकेंगे। उनके बाहुल्य वाला समाज कभी भी समुन्नत न बन सकेगा।

“आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ लाइफ” नामक कृति के रचनाकार प्रख्यात दार्शनिक डॉ. राधाकृष्णन के शब्दों में कहें तो यदि हम व्यक्ति और समाज के उत्कर्ष की बात सोचते हों तो हमें उसके मूल आधार ‘अध्यात्म’ की ओर ध्यान देना होगा और उसको स्वस्थ स्थिति में लाकर जनमानस में गहराई तक प्रतिष्ठित करने के लिए घोर प्रयत्न करना होगा यदि इस ओर ध्यान न दिया गया तो राजनीतिक सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, वैज्ञानिक क्षेत्रों में कितने ही कुछ भी प्रयत्न किए जाते रहें, उनका तनिक प्रयत्न किए जाते रहें उनका तनिक भी संतोषजनक परिणाम उत्पन्न होगा। कोई योजना कितनी ही उत्तम क्यों न हो उसे चलाने वाले कार्यान्वित करने वाले उत्कृष्ट व्यक्तित्व और आदर्शवादी गतिविधियाँ अपनाने वाले न होने पर परिणाम संतोषजनक न निकलेगा। ओछे और संकीर्ण चिंतन वाले लोग जो भी कार्य हाथ में लेंगे उसे अपने दुर्गुणों के कारण कलुषित कर देंगे और वही लाभदायक की जगह हानिकारक बन जाएगा। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम हर क्षेत्र में देखते हैं। उच्च आदर्शों के लिए बनी हुई संस्थाएँ आज पद लिप्सा और धन लोभ के कारण संघर्ष का अखाड़ा बनी हुई हैं।

मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र आज कंटकाकीर्ण और असुविधाओं से भरा हुआ है। जो आधार हमें प्रगति और प्रसन्नता में सहायक सिद्ध होने चाहिए थे, वे ही हमें शोक और संताप देकर दुखों में वृद्धि कर रहे हैं शरीर रुग्ण मन अशान्त, परिवार उद्विग्न, समाज विक्षुब्ध, धन अपर्याप्त, विज्ञान घातक, राजनीति विस्फोटक, धर्म जंजाल, शिक्षा अनुपयुक्त किसी भी दिशा में दृष्टिपात करें, सर्वत्र उलझन भरी विभीषिकाएँ ही दिखती है। लगता है सुख शांति के सारे आधार उलट कर दुःख दैन्य के कारण बन गए हैं। इस विडंबना का एक मात्र कारण अध्यात्म की उपेक्षा है। अध्यात्म मानव जीवन का प्राण है, उसे जिस क्षेत्र से भी तिरस्कृत, बहिष्कृत किया जाएगा उसी में विपन्नता हो जाएगी। जल के बिना मछली नहीं जी सकती मानवीय शांति भी अध्यात्म की उपेक्षा करके जीवित नहीं रह सकती। आज की श्मशान जैसी सर्वव्यापी जलन का एक मात्र कारण यही है।

अर्थशास्त्री प्रो. जे. एस. बेन का अपने शोध निबंध ”रिथिकिंग आन इकोनॉमिक पालिसीज”में कहना है कि आर्थिक क्षेत्र में उत्पादन काफी बढ़ा है। पैसा पहले की अपेक्षा कम नहीं अधिक है। लेकिन इतने पर भी हम आर्थिक तंगी चौगुनी, सौगुनी अनुभव कर रहें हैं। कारण यह है अपव्ययी और विलासी बनते चले जा रहें हैं और व्यापारिक क्षेत्र में जमाखोरी, मुनाफाखोरी तस्करी मिलावट, धोखाधड़ी पनप रही है। उत्पादन बढ़ता है पर महंगाई नहीं घटती। कमाई बढ़ती है, पर तंगी दूर नहीं होती। इस गोरखधन्धे के पीछे उत्पादक, उपभोक्ता और व्यापारी वितरकों की ओछी दृष्टि ही झाँकती है। लोग उचित आवश्यकता पूर्ण करने भर के लिए उचित श्रम एवं संग्रह करने का आदर्श अपना लें तो जितनी कुछ अर्थ व्यवस्था आज उपलब्ध है, उसी में बड़े संतोष, आनंद और हर्षोल्लास के साथ सारे समाज का काम चल सकता है और वास्तविक प्रगति के सभी अवरुद्ध मार्ग सहज ही खुल सकते है।

बढ़ते हुए अपराधों की संख्या आर्थिक नहीं अध्यात्म के अभाव में बढ़ रही है। नीति, धर्म और सदाचार का बाँध टूट जाए, व्यक्ति, ईश्वर परलोक और कर्मफल की सुनिश्चितता पर विश्वास न करे तो फिर अनीति अपनाकर तत्काल लाभ कोई नहीं बचा सकता फिर वह राजदंड और समाज दंड से बचने की हजारों तरकीबें ढूँढ़ निकालेगा और गुप्त या प्रकट रूप से परिस्थिति के अनुसार अपनी योजनानुसार दुष्कर्म करता रहेगा। किसी भी धूर्त और सूझ-बूझ वाले व्यक्ति के लिए प्रलोभन अथवा आतंक की स्थिति उत्पन्न का शासन अथवा समाज में दंड से बहुत ही सरलतापूर्वक बचते हुए अपराधपूर्ण दुष्कर्म करते रह सकना सरल है। आज आध्यात्मिकता का अभाव ही है कि दुष्ट-दुराचारी दिन दूने रात चौगुने बढ़ते चले जा रहें है।

गिरते हुए स्वास्थ्य का एक मात्र कारण असंयम है। जब तक विलासिता और वासना के प्रति वर्तमान आकर्षण बना रहेगा, जब तक आहार-विहार की मर्यादाओं को तोड़कर अप्राकृतिक रीति नीति को अपनाए रहा जाएगा, सार्वजनिक स्वास्थ्य की स्थिति निरंतर गिरती ही चली जाएगी। औषधि उपचार स्वास्थ्य संरक्षण एवं संवर्धन की भ्रांत धारण मृगतृष्णा की तरह है। उससे मन बहलाव तो हो सकता है पर प्रयोजन की पूर्ति संभव नहीं। अव्यवस्थाजन्य कष्ट बढ़ते ही जाएँगे, बीमारियों का प्रकोप और प्रवाह दिन-दिन प्रबल ही होता चला जाएगा।

मनुष्य जब कभी सच्चे मन से स्वास्थ्य की कामना करेगा और सशक्त शरीर का महत्त्व समझेगा तब उसे अध्यात्म की ही शरण में आना पड़ेगा और संयम-नियमितता और प्रकृति के अनुसरण का अवलंबन प्रकृति के अनुसरण का अवलंबन लेना पड़ेगा वर्तमान अस्त-व्यस्त और अप्राकृतिक रहन-सहन अपनाए रहा गया तो जन स्वास्थ्य में निरंतर गिरावट आती चली जाएगी और अंततः जीवित रहना एक भार मात्र बन जाएगा। इस दुष्परिणाम से उबरने का उपाय चिकित्सा विज्ञान की प्रगति नहीं संयम शिक्षा ही है, जिसे अध्यात्म की शरण में गए बिना पा सकना असंभव है।

परिवार एक छोटा समाज है, जिसमें व्यक्ति को उसी तरह जुड़ा रहना पड़ता है जैसा कि शरीर के साथ-साथ पाँव आदि अवयव जुड़े रहते है। संसार के समस्त सुखों की तुलना में पारिवारिक सौहार्द का महत्त्व भारी बैठता है। माता पिता का वात्सल्य पत्नी का प्रेम, भाई-बहिनों का सहयोग जिसे उपलब्ध है यह जिस मूल्य पर मिलती है वह गहन अंतस्तल से निकलने वाला सद्भाव है और इसे वही उपलब्ध कर सकते है जो स्वयं उदार, सहृदय और सेवा भावनाओं से परिपूर्ण है। परिवार में स्वर्गीय वातावरण का सृजन केवल आध्यात्मिकता के आदर्श ही कर सकते हैं। जब वह तथ्य लोगों के अंतःकरणों में प्रतिष्ठापित हो जाएगा तभी यह आशा की जा सकेगी कि गरीब रहते हुए भी छोटे घर-घरौंदे में रहकर व्यक्ति आनंद और उल्लास से भरे दिन बिता सके।

मानसिक शांति और संतुलन का आधार यों लोगों की समझ में धन की बहुलता और परिस्थितियों की अनुकूलता ही माना जाता है, पर असलियत स्थिति संतोष एवं शांति से भरी पूरी पायी जाती है। यदि ऐसा होता तो धनी मानी लोगों की आंतरिक स्थिति संतोष एवं शांति से भरी-पूरी पायी जाती। किंतु देखा इसके प्रतिकूल जाता है। संपन्न लोग बाहर वालों को ही सुखी दिखते है। कोई भीतर से उन्हें देख सके तो पता चलेगा कि वैभव का सदुपयोग न कर सकने की, बुद्धि न होने के कारण वह संपदा उनके लिए अनेक उलझने, चिंताएँ, कुण्ठाएँ, आशंकाएँ और विभीषिकाएँ उत्पन्न करने वाली बनी हुई हैं। बाहर से मित्र दिखने वाले ही भीतर से उनके शत्रु बने हुए है। घात प्रतिघातों ने उनकी मनःस्थिति को विक्षुब्ध किया हुआ है और अति अशांति भरा जीवन वे जी रहे हैं। मानसिक शांति वैभव पर आधारित नहीं है। वह तो सोचने की सही दिशा पर अवलंबित है। जिसे विचारों को क्रम से सजाना सँभालना मोड़ना, बदलना एवं सुधारना आता है केवल वही सुखी, संतुष्ट और हर्षोल्लास भरा जीवन जी सकता है। “द इन्ट्रिग्रिटी ऑफ परसनैलिटी के लेखक मनोवैज्ञानिक स्टोरर एन्थोनी के अनुसार विचार करने की कला अध्यात्म तत्त्वज्ञान का प्रधान अंग है। जिसने इसे सीख लिया उसकी शिक्षा पूर्ण हुई समझी जानी चाहिए।

जिसकी विचार पद्धति व्यवस्थित है। उसे हर स्थिति में आशा उत्साह संतोष संतुलन आनंद उल्लास और उज्ज्वल भविष्य का प्रकाश परिलक्षित होता रहेगा। गरीबी में भी अमीरी का आनंद विचारशील लोग उठाते हैं और अविवेकी लोग अमीरी में भी अभाव और उद्वेग की आग में जलते है। दृष्टिकोण की परिष्कृत, विवेकशीलता लोग उठाते है और अविवेकी लोग अमीरी में भी अभाव और उद्वेग की आग में जलते है। दृष्टिकोण की परिष्कृति, विवेकशीलता और दूरदर्शिता यदि अपने में हो तो मनुष्य अपने को हर अनुभव करता रह सकता है यह मनःस्थिति आध्यात्मिक दृष्टिकोण पर ही निर्भर है। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी रहते हैं सुख-शांति के स्वर्गीय वातावरण का सृजन करते है।

समाज में व्यापक रूप से फैली हुई कुरीतियों और अनैतिकताओं ने उसे जर्जर, विसंगठित और दीन-दुर्बल बनाकर रख दिया है ऐसे अशान्त एवं असुरक्षित ही अनुभव करेगा उसे अपने चारों ओर घिरा वातावरण आक्रमणकारी, आशंका भरा और अविश्वस्त ही अनुभव होता रहेगा। समाज में अवांछनीय परंपराएँ चल पड़ें तो उसके सदस्यों का स्तर हर दृष्टि से दयनीय बना रहेगा। अपने समाज में नारी जाति के रहेगा। अपने समाज में नारी जाति के प्रति जो ओछी मान्यता प्रचलित है, उसने आधी जनसंख्या को अविकसित, असमर्थ और असंतुष्ट बनाकर रख दिया हैं जाति पाँति और ऊँच नीच की मान्यताओं ने एक ही जाति को हजारों टुकड़ों में खंड-खंड निष्कर्ष करके इतना दुर्बल बना दिया है कि विदेश शक्तियाँ उतनी आसानी से इतनी बड़ी जाति को लंबे समय तक पद दलित बनाए रह सकी जैसा कि भेड़ों के झुंड पर ग्वाले के लिए भी संभव नहीं होता।

समाज, सुधार के लिए यों न जाने कितनी तरह के आंदोलन चलते रहते और उनकी असफलता और निरर्थकता भी सामने आती रहती है। समाज का बिगाड़ अविवेक और अनौचित्य को अस्वीकार करने के साहस की कमी से हुआ है सुधार उस दिन से आरंभ होगा जिस दिन लोग अनीति और अनौचित्य का प्रतिरोध करने के लिए खड़े हो जाएँगे और यह न देखेंगे कि वह अवांछनीयता कितने दिनों से प्रचलित किसके द्वारा प्रतिपादित और कितनों के द्वारा व्यवहृत हैं। अनौचित्य के विरुद्ध एकाकी लड़ने का शौर्य संभव है यह उपलब्धि जिस दिन अपने लोगों में जड़ जमाने लगे, समझना चाहिए कि समाज सुधार का शुभारंभ हो गया।

कहना न होगा कि सामाजिक वातावरण का उसके सदस्यों पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। उत्कृष्ट का निर्माण होता है और फिर ये उत्कृष्ट व्यक्तित्व ही समर्थ समाज की रचना करते है। यदि हमें अपना समाज सुविकसित सभ्य और समर्थ बनाना हो तो उसकी मान्यताओं और गतिविधियों में आध्यात्मिकता का समुचित समावेश करना होगा। यह समावेश ही हमें अपने अतीत की गौरवपूर्ण स्थिति तक पुनः पहुँचा सकने में समर्थ होगा।

राजनीति में आज की गंदगी हर किसी को निराश कर देती है। लगता है स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अतीत में जो महान् बलिदान हुए थे, वे व्यर्थ चले गए। नित नई योजनाएँ बनाती है और जनता पर कर और ऋण का भार बढ़ता चला जाता है। जिन लाभों के उसे सब्ज बाग दिखाए जाते है, वे अंत तक आकाश कुसुम ही बने रहते है। न देश में प्रगति न विदेश में प्रतिष्ठा। डींगे हाँकने से काम क्या बनना है। खोखलापन कहाँ तक छिपाया जा सकता है। अंग्रेजों के गए लगभग आधी शताब्दी बीत चुकी है इतने समय में युद्ध जर्जरित जापान जर्मनी ब्रिटेन फ्राँस पहले से भी अच्छी स्थिति में जा पहुँचे। अफीमची चीन ने अपना कायाकल्प कर लिया। यह देखकर जहाँ हर्ष मिश्रित आश्चर्य होता है वहाँ अपनी ओर देखकर दुःख भी होता है कि हमारा नेतृत्व अपने संकीर्ण स्वार्थों में किस बुरी तरह उलझा हुआ है भाषा, प्रांत संप्रदाय आदि के संकीर्ण स्वार्थों को प्रमुखता देने की होड़ लगी हुई है।

तथ्य तो यह है कि राजनीति को कूटनीति मात्र बना दिया गया है। उसके साथ जिन आदर्शों का समावेश होना चाहिए कहने सुनने भर के लिए रह गए है। नेता लोग जोड़ तोड़ मिलाकर उल्लू सीधा करने की नीति पर विश्वास करते है देश की उत्साहजनक राजनीतिक स्थिति के लिए तब हमें प्रतीक्षा ही करने पड़ेगी जब तक हर राजनेता के व्यक्तित्व को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता की कसौटी पर कसे जाने और खरे उतरने के लिए विवश नहीं कर दिया जाता। आज की राजनीतिक विपन्नता का यही एक मात्र हल है। घोषणा पत्रों में भरी हुई डींगों का जंजाल कुछ प्रयोजन सिद्ध न कर सकेगा। काम विशाल दृष्टिकोण वाले ऊँचे व्यक्तित्वों से चलेगा और यह उत्पादन केवल आध्यात्मिकता के क्षेत्र में ही संभव है। यदि हमारी राजनीति आध्यात्मिक आदर्शों से जुड़ जाय तो स्वराज्य और सतयुग के दृश्य उत्पन्न होने में देर न लगे।

बात राष्ट्र की राजनीति तक ही सीमित नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में में आध्यात्मिकता का समावेश ही विश्व बंधुत्व और विश्व परिवार की परिस्थितियाँ उत्पन्न करेगा। तब सेना पर होने वाला व्यय शिक्षा पर किया जाएगा। युद्ध की तैयारियों में लगने वाली धन जन एवं बुद्धि की शक्ति बेकार बीमारों गरीबी एवं अनीति के निवारण में लगेगी। संसार में इतनी साधन संपदा मौजूद है कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवनयापन कर सकने तथा आनंद उल्लास के साधन प्राप्त कर सकने की सुविधा मिल सके।

गरीबी और अमीरी को सबमें बाँट दिया जाय तो हर एक के हिस्से में पर्याप्त आ जाएगा और उससे संसार का प्रत्येक व्यक्ति रह सकेगा।

जब अनैतिकता एवं असामाजिकता के कारणों का ही निवारण हो जाएगा तो फिर व्यक्ति को अवांछनीय करने एवं अनुपयुक्त सोचने का कोई आधार ही शेष न रह जाएगा। धन की अनावश्यक मात्रा जब संचय करने का अवसर ही न मिले तो कोई क्यों चोरी बेईमानी करेगा। प्रतिस्पर्धा करने और ललचाकर अमीरी भोगने का जब अवसर नहीं है तो वे दुष्प्रवृत्तियाँ जियेगी कैसे?जब आतंक और अनाचार की हर दिशा से भर्त्सना एवं गुण्डागर्दी बढ़ने की कोई गुँजाइश न रहेगी प्रेम संयम, सहयोग, समन्वय, सहिष्णुता और समझौता ही जब मानवीय आचार में सर्वत्र घुल दीखेंगे तो वे प्रवृत्तियाँ जन्मजात संस्कारों के रूप में हर व्यक्ति को मिलेंगी और विघटनात्मक दिशा में व्यय होने वाली शक्तियाँ रचनात्मक प्रयोजनों में संलग्न होकर इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण करेंगी।

विज्ञान का नियंत्रण जब विवेक करेगा तो वह बेकारी, गरीबी आलस्य विलासिता एवं आतंक उत्पन्न करने वाला न रहेगा। थोड़े से व्यक्तियों को असीम सुविधाएँ होने का कारण न बनेगा। वरन् केवल उपयोगी आविष्कारों तक सीमित रहकर मानवीय प्रगति में सहायक सिद्ध होगा। आज की तरह आतंकवादी एवं विलासी उपयोग जब निषिद्ध घोषित कर दिया जाएगा, तब विज्ञान से किसी का विरोध न सुविधाओं में सहायता करने वाला उपयोगी अनुभव किया जाने लगेगा।

अध्यात्म एक ऐसा तथ्य है जिसके ऊपर मानव कल्याण की आधार शिला रखी हुई है। उसे जिस सीमा तक उपेक्षित एवं तिरस्कृत किया जाएगा उतना ही दुःख-दारिद्रय बढ़ता जाएगा। उतना ही दुःख-दारिद्रय बढ़ता जाएगा। हमारी संपन्नता, समृद्धि शांति समर्थता एवं प्रगति का एक मात्र अवलंबन अध्यात्म हैं। यदि हमें सुखी प्रगतिशील होकर जीना है तो यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि आदर्शवादिता का समुचित समन्वय नितांत अनिवार्य है। इसकी विमुखता सर्वनाश को सीधा निमंत्रण देने के बराबर है।

हम मानवीय गुणों को जीवित रखना चाहते है। इसलिए उसके प्राण अध्यात्म को असुर प्रवृत्तियों के आक्रमण से बचाए रखना होगा। पर देखते हैं कि असुरता ने पूरी शक्ति से मानवीय आदर्शों को समाप्त करने के लिए चढ़ाई की है। आत्म रक्षा के इस धर्मयुद्ध में लड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं असुरता के सम्मुख प्रस्तुत अविवेक शीलता और अनैतिकता के सम्मुख हथियार डालकर आत्म समर्पण करने का तात्पर्य आत्महत्या के लिए प्रस्तुत होना ही माना जाएगा आदर्श विहीन मनुष्य तो पशु और पिशाच ही बन सकता हैं देवत्व की प्रतीक मनुष्यता की ऐसी दुर्गति होते देख सकना किसी सच्चे साहसी के रहते संभव नहीं। अध्यात्म की जीवन रक्षा के लिए भगवान महाकाल धर्मयुद्ध की घोषणा कर चुके है। उनके प्रत्येक सहचर का दायित्व है कि रक्त की अंतिम बूँद और श्वास के अंतिम प्रवाह तक युद्ध करने के लिए तैयार रहे।


बुढ़ापे का अर्थ निष्क्रियता तो नहीं?

आयु का स्मरण-शक्ति के साथ कोई संबंध है क्या? यदि है, तो वह किस प्रकार का है? क्या उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेधाशक्ति घटती है? स्मृति कमजोर पड़ने लगती है?

इन प्रश्नों के उत्तर के संदर्भ में पिछले दिनों तक मनोविज्ञान में परस्पर टकराव जैसी स्थिति थीं दोनों की मान्यताएँ एक दूसरे के बिलकुल विपरीत थीं। मनोवेत्ताओं का मानना था कि आयुष्य का याददाश्त पर सुनिश्चित असर पड़ता है जबकि शरीरशास्त्र की अवधारणा इससे ठीक उलटी है। उसका तर्क है कि नई मशीनें भी निष्क्रिय पड़ी रहने पर बेकार बन जाती है तो मस्तिष्कीय निठल्लेपन के कारण यदि स्मृति की कमी महसूस की जाती है तो इसका कारण बढ़ती वय नहीं है तो इसका कारण बढ़ती वय नहीं है अकर्मण्यता को ही माना जाना चाहिए जबकि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हर वस्तु की अपनी आयु और सीमा होती है, जिसे पार करने के उपरान्त उसकी क्षमता प्रभावित होना स्वाभाविक है।

दलील की दृष्टि से दोनों के तर्क अकाट्य स्तर के माने जाते है इतने पर भी तथ्य यह है कि मानसिक क्षमताओं का ह्रास शारीरिक सामर्थ्य की तरह नहीं होता। विज्ञान के आधुनिक अनुसंधानों ने भी यही सिद्ध किया है और कहा है कि सर्वसाधारण में जो अवस्था सठियाना के नाम से जानी जाती है वस्तुतः वह मनोविज्ञान की देन है वास्तविकता से दूर-दूर तक उसका कोई रिश्ता नहीं। विशेषज्ञों का कथन है कि मनुष्य में बुद्धि और स्मृति के लिए जिम्मेदार भाग सेरेब्रल कार्टेक्स है। जब तक इस हिस्से में किसी प्रकार की कोई स्थायी क्षति नहीं पहुँचती तब तक उसकी क्षमता में कोई कमी नहीं आ सकतीं। उल्लेखनीय है कि मस्तिष्क ही एक मात्र ऐसा अवयव है, जिसमें शुरू से अन्त तक कोशिका-विभाजन नहीं होता है जो होता है वह मात्र इतना है कि तंत्रिका कोशिकाओं में आयु के साथ-साथ आकार प्रकार और क्षमता में अभिवृद्धि होती जाती है अबोध बालक शिशु से किशोर किशोर से वयस्क वयस्क से प्रौढ़ बनता चलता है। इस क्रम में वह अपनी हर प्रकार की क्षमता योग्यता और अनुभव में बढ़ोत्तरी ही करता चलता है। कमी मात्र इतनी भर होती है कि उसका आरंभिक स्वरूप यथावत् बना नहीं रह पाता बौनापन घटता मिटता है और व्यापक विस्तार ग्रहण करता है। यह विस्तार चाहे कलेवर में हो विचारशीलता में अनुभव संपादन में अथवा शिक्षण प्रतिक्षण के कला कौशल में होता अवश्य है। मस्तिष्क के संबंध में भी यही बात लागू होती है वह अपनी इकाइयों के संख्यात्मक विस्तार की तुलना में गुणात्मक वृद्धि करता है। विकासवाद का यह नियम ही है कि जिन अंगों की जितनी अधिक सक्रियता होगी उनका विकास भी उतना ही उत्तम होगा और कालक्रम से वे सुदृढ़ होते चले जायेंगे पहलवान इसी आधार पर अपनी देहयष्टि को सुन्दर सुदृढ़ बना लेते है। मस्तिष्क के साथ भी ऐसा है कुछ होता देखा गया है। अध्ययनों से विदित हुआ है कि जो दिमाग बराबर किसी न किसी कार्य में नियोजित रहता है उसमें न्यूट्रिनो के आकार प्रकार बड़े होते है। जिस अनुपात में ये बड़े होते है उतनी ही बढ़ी चढ़ी उनकी क्षमता होती है मृत्यु उपरांत आइन्स्टीन के मस्तिष्क पर हुए अनुसंधान से पता चला है कि उनकी तंत्रिका कोशिकाएँ असाधारण रूप से आकार में बड़ी थी। दूसरे शब्दों में उनके मस्तिष्क की कॉर्टिकल पत्र काफी मोटी थी। इसके अतिरिक्त अन्य संरचनाएँ सामान्य मस्तिष्क जैसी ही थी। जानने योग्य तथ्य यह भी है कि आरंभ में वे बड़े फिसड्डी किस्म के विद्यार्थी थे।

तंत्रिका विज्ञानी बुद्धि का सीधा संबंध कॉर्टेक्स से बताते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि आरंभ में आइन्स्टीन के दिमाग का वह हिस्सा उतना विकसित नहीं था, किन्तु बार-बार के और उपेक्षा-अपमान के कारण संभवतः वे क्षुब्ध हो उठे हों और तत्संबंधी मान्यता को झूठा साबित करने के लिए तत्पर हो गये हो मानसिक सक्रियता बढ़ी तो शनैः शनैः उसकी क्षमता में भी विकास आरंभ हुआ जिसकी चरम परिणति मूर्धन्य मस्तिष्क के रूप में सामने आयी और वे प्रख्यात विज्ञानवेत्ता बन गये। ऐसी स्थिति में यह कैसे स्वीकार किया जाय कि आयुष्य के साथ-साथ स्मृति घटती है? ऐसे में इसे एक मनोवैज्ञानिक भ्रम कहना ही ज्यादा उचित होगा जिसकी कि बाद में प्रयोगों द्वारा पुष्टि भी हो गई।

प्रायः ऊँचे पर्वतारोहण करने वाले लोगों की यह आम शिकायत होती है कि उत्तुंग शिखर पर उनकी स्मृति कमजोर पड़ जाती है आरंभ में इसे वातावरण का प्रभाव मान लिया गया, किन्तु सन् 1988 में एक अमरीका पर्वतारोही दल के सदस्य नेलसन ने माउण्ट एवरेस्ट पर 21 हजार फुट की ऊँचाई पर इस बात की परीक्षा करनी चाही। उसने अपने साथियों से सामान्य ज्ञान व दैनिक जीवन से संबंधित प्रश्न पूछे, साथ ही हर व्यक्ति से पृथक् पृथक् उनकी स्मृति संबंधी राय जाननी चाही। लगभग प्रत्येक ने इस संबंध में एक जैसे विचार प्रकट किये। उनका मानना था। कि उनकी स्मृति क्षीण पड़ गई है, जबकि परीक्षण से प्राप्त निष्कर्ष कुछ और ही तथ्य प्रकट कर रहा था। उससे इस बात की स्पष्ट जानकारी मिल रहीं थी कि दिमाग के याद रखने की सामर्थ्य में राई रत्ती जितना भी अन्तर नहीं आया है। अनुभव और परीक्षण के परिणाम में दिखाई पड़ने वाले इस स्फुट अन्तर्विरोध को मानस में जिस दृढ़ धारणा का प्रतिफल माना गया, जिसके यथार्थ में ऐसा कुछ घटित होता नहीं था।

लगभग ऐसी ही स्थिति वृद्धों की होती है। वे तत्संबंधी इतनी दृढ़ न्यूनता न आने के बावजूद उन्हें ऐसा अनुभव होने लगता है कि बुढ़ापे के साथ-साथ उनकी स्मरण शक्ति घट रही है। वस्तुतः यह एक पूर्णतः मनोवैज्ञानिक समस्या है इसे अब मानवशास्त्र भी स्वीकारने लगा है। उसका कहना है कि यदा कदा स्मरण शक्ति का ढीला पड़ जाना और उसके कारण दैनिक जीवन में छोटी मोटी कठिनाई उत्पन्न हो जाना यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। यह तो बुद्धि संपन्न कहे जाने वाले लोगों के साथ भी घटित हो सकती है। इसका एकमात्र मारण तत्संबंधी प्रकरण में एकाग्रता अथवा अभिरुचि की कमी है इसे तो कोई व्यक्ति स्वयं अनुभव कर जान सकता है कि किस प्रकार जब किसी घटना अथवा बात पर तत्परता-पूर्वक ध्यान नहीं दिया जाता है, तो वह उसका विवरण उस रूप में याद नहीं रख पाता, जिस रूप में वह घटित हुई है या कही गई। अतः ऐसे प्रसंगों में स्मृति को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसे उपेक्षा जैसे संबोधनों से संबंधित किया जाना चाहिए। स्मरण शक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं। यह सामान्य बात है। यह सामान्य बात है। स्थिति गंभीर तब मानी जानी चाहिए, जब काम करते अथवा कहीं जाते हुए व्यक्ति को यह पूरी तरह विस्मृत हो जाय कि उसे करना क्या था या जाना कहाँ था? ऐसी दशा में विशेषज्ञों की राय लेनी आवश्यक हो जाती है।

इस प्रकार अब लगभग यह सिद्ध हो चुका है कि बुढ़ापे के साथ मानसिक क्षमताओं में न्यूनताओं की जो बात की जाती है उसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह एक मिथक मात्र है एवं परंपरागत मान्यता बन जाने के कारण सभी इसी को सच मानने लगे है। वास्तविकता तो यह है कि ज्यों ज्यों आयु बढ़ती है, स्वाध्यायशीलता बढ़ती है, अनुभव बढ़ता चला जाता है त्यों त्यों व्यक्ति की स्मरण शक्ति व सोचने की विधि भी परिमार्जित होती चली जाती है। कबीर एक सौ बीस वर्ष जिए व श्रीमान दामोदर सातवलेकर जी शताधिक आयु जीकर जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य 75 वर्ष के बाद ही कर गए। जब ऐसा है तो क्यों कर हम अपना आयुष्य रिटायरमेण्ट के बाद पूर्णतः निरर्थक जीवन जीते हुए किसी तरह काट देते है। यदि बढ़ती आयु के साथ बढ़ती स्मृति व विवेक बुद्धि का सुनियोजन समाज निर्माण के निमित्त होने लगें तो समाज का कायाकल्प उस बहुत बड़ी संख्या में हो सकता है जिसे हमने वार्धक्य के कारण उपेक्षा के गर्त वानप्रस्थ परंपरा परिव्रज्या का नव संन्यास परंपरा का पुनर्जीवन ही दूसरा एकमेव समाधान है ताकि हर बुढाता व्यक्ति अपने महत्त्व को पहचाने अपने अनुभव व विवेक का क्रमशः बढ़ रही स्मरण शक्ति का लाभ समाज को देने की सोचे, न कि ज्यों त्यों समय काटने को या पोतों पोतियों को खिलाने तक अपना जीवन सीमित मानकर किसी तरह जीता रहे। इस बहुत बड़ी संख्या का राष्ट्र के नवनिर्माण में सुनियोजन समय की एक सबसे बड़ी आवश्यकता है।


Quotation

फार्म-4

प्रकाशन स्थान-मथुरा

प्रकाशन अवधि-मासिक

मुद्रक का नाम-मृत्युंजय शर्मा

क्या भरत का नागरिक है-हाँ जन जागरण प्रेस, वृन्दावन मार्ग मथुरा।

प्रकाशक का नाम-मृत्युंजय शर्मा

सम्पादक का नाम- डॉ. प्रणव पाण्डया

क्या भारत का नागरिक है- हाँ

पता- शान्तिकुञ्ज हरिद्वार

उन व्यक्तियों के नाम व पते- मृत्युंजय हरिद्वार जो समाचार पत्र के स्वामी हों अखण्ड ज्योति संस्थान तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत मथुरा से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हो।

मैं मृत्युंजय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिए गये विवरण सत्य हैं

प्रकाशक के हस्ताक्षर -मृत्युंजय शर्मा


गायत्री उपासना-शंकाएँ एवं समाधान

गायत्री मंत्र अपने आप में पूर्ण है। उसमें तीन ॐ पाँच ॐ बीज संपुट आदि लगाने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। ऐसे प्रयोग तो तांत्रिक प्रयोगों में जहाँ तहाँ आते है सर्वसाधारण को उस जंजाल भटकाने की आवश्यकता नहीं है।

हर धर्म का एक मुख्य मंत्र होता है जैसे मुसलमानों में कलमा, ईसाइयों में बपतिस्मा जैनों में नमो ओंकार तिब्बतियों में ॐ मीठा पधे हुँ आदि। इसी प्रकार भारतीय धर्म में एक ही गुरु मंत्र है गायत्री।

यह कहना भी बेतुका है कि हर जाति की एक-एक अलग गायत्री है। ब्राह्मणों की अलग, क्षत्रियों की अलग वैश्यों की अलग कायस्थों की अलग। यह जाति पाँति की ऊँच-नीच की बीमारी अध्यात्म क्षेत्र में उस गहराई तक प्रविष्ट नहीं होने देना चाहिये जहाँ तत्त्व ज्ञान, धर्म और ईश्वर एक है। इन्हें बिरादरी बाद में नहीं फँसाया जा सकता।

कइयों का कथन है गायत्री गुप्त मंत्र है। इसे कान में कहना चाहिये यह बात कदाचित तांत्रिक मंत्रों के संबंध में लागू भी होती है। पर वेद मंत्रों को तो सस्वर पढ़ने का विधान है। इसके संबंध में ऐसा कोई प्रतिबंध लागू नहीं हो सकता। छिपकर कानाफूसी के रूप में एकांत में दुरभि संधियों संबंधी चर्चा होती है गायत्री मंत्र में ऐसा कुछ नहीं जो गुप्त रखना पड़े और जिसे किसी दूसरे को न सुनने दिया जाय।

कई व्यक्ति कहते है, गायत्री में पुलिंग शब्दों का प्रयोग हुआ है, फिर उसे माता कैसे कहा जाता है? यह समझना चाहिये कि शक्तियों का व्यापक और निराकार रूप स्त्री पुरुष के झंझट से कहीं ऊँचा है। अग्नि, पवन आदि शब्दों में स्त्रीलिंग पुलिंग दोनों का ही प्रयोग होता है। भगवान की प्रार्थना का प्रसिद्ध श्लोक है-

त्वमेव माता च पिता त्वमेव तुम्हीं माता हो तुम्हीं पिता। सविता पुलिंग हो सकता है पर उनकी शक्ति सावित्री तो स्त्रीलिंग हुई। शास्त्रों के अलंकारिक रूपों को प्राणियों के मध्य पाये जाने वाले नर-मादा भेद में नहीं घसीट लेना चाहिये।

इसी प्रकार गायत्री के एक मुख दो हाथ, पाँच मुख दस भुजाओं का किसी जीवधारी का स्वरूप मानकर भ्रम में न पड़ना चाहिये। नारी की नर की तुलना में अधिक उत्कृष्टता मानते हुये नारी के प्रति नर का भोग्या रूपी कुदृष्टि वाला स्वरूप हटे इसलिए उसे नारी का माता का रूप दिया गया है। हाथ में कमंडल और पुस्तक होने का तात्पर्य ज्ञान और विज्ञान की ओर संकेत है।

पंच मुखी और दस भुजा वाला प्राणी इस संसार में न कभी हुआ है न भविष्य में होगा। यह अलंकारिक संकेत हैं। पाँच कोश अर्थात् पाँच मुख। धर्म के दस लक्षण अर्थात् गायत्री की दस भुजाएँ

हंस वाहन के संबंध में भी ऐसा ही संकेत है कि उसका अनुग्रह प्राप्त करने के लिये मनुष्य को अपना आंतरिक स्तर राजहंस जैसा परम हंस जैसा बनाना चाहिये। राजहंस जैसा परम हंस जैसा बनाना चाहिये। राजहंस के संबंध में मान्यता है कि वह नीर क्षीर विवेक रखता है। उचित अनुचित का अंतर करता है जो उचित है उसी को ग्रहण करता है। मोती ही चुगता है। कीड़े-मकोड़े नहीं खाता। यह परम हंस की मनः स्थिति का विवेचन है साधारण हंस तो कीड़े मकोड़े ही खाते है, उन बेचारों को दूध कहाँ उपलब्ध होता है? इसी प्रकार गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर मोती भी नहीं पा सकते।

गायत्री अपनाने के संबंध में स्त्रियों और शूद्रों को उसे अपनाने का निषेध भी किसी ऐसे ही प्रतिगामी दिमाग की उपज है। भगवान की बनाई वस्तुओं का उपयोग उसकी हर संतान कर सकती है। सूर्य की गर्मी चन्द्रमा की चाँदनी पवन का प्राण, अन्न, जल नदी, सरोवर आदि सभी का उपयोग कर सकते हैं। उन पर किसी बिरादरी का कब्जा सिद्ध नहीं किया जा सकता। ईश्वर सबका है। शक्ति गायत्री भी सबकी है।

यदि बिरादरीवाद का झगड़ा ही करना हो तो मात्र क्षत्रिय मुकदमा जीतेंगे और समस्त बिरादरी हार जाएगी विश्वामित्र ही गायत्री के .ऋषि है। उन्हीं ने उसे सिद्ध किया था इसलिये उनके वंशज तो अपने पूर्वजों का अधिकार होने का तर्क प्रस्तुत भी कर सकते है और अन्य किसी उसकी रॉयल्टी का दावा कर सकते है। ऐसी बातें करना बाल बुद्धि से बढ़कर और कुछ नहीं है।

इसी प्रकार यदि भारत देशवासियों का गायत्री पर दावा प्रस्तुत किया जाय तो उन प्रवासी भारतीयों को भी रोकना पड़ेगा जिनने अन्य देशों की नागरिकता स्वीकार कर ली है यदि हिन्दुओं की गायत्री कही जाय तो विदेशों में इस प्रसंग पर जो वैज्ञानिक खोज कर रहे है उन पर भी प्रतिबंध लगाने का कोई उपाय सोचना पड़ेगा वस्तुतः इस बुद्धिवाद और विवेकशीलता के युग में ऐसी ऊटपटाँग बातें कहना भी और सुनना भी बुरा लगता है। वास्तविकता यह है कि सभी मनुष्य भगवान के बनाये है। उसके यहाँ जाति वंश लिंग वर्ण के कारण मनुष्य भगवान के बनाई है उन पर सभी का समान अधिकार है।

गायत्री मंत्र सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी पर प्रकट हुआ। उनने उसकी व्याख्या चार मुखों से चार वेदों के रूप में की। यह ज्ञान मनुष्य मात्र के लिए है। गायत्री मंत्र को अपनाने का अधिकार सभी जाति वर्ण लिंग वालों को समान रूप से है।

दुर्भाग्य से मध्यकाल में सामंतवादी अंधकार युग ऐसा आया जिसमें नीच-ऊँच का नीच की खाई बनी और मनुष्य जाति अनेक भागों में विभक्त हुई उनके अधिकार भी न्यूनाधिक किये गये।

स्त्रियों और शूद्रों को दुर्बल समझ कर उन्हें शिकंजे में कसे रहने की दृष्टि, उन्हें अपने-अपने आप को हेय समझने की मनःस्थिति बनाने के लिए कई प्रचलन ऐसे बनाये गये जिसमें सवर्णों के पुरुषों को सभी अधिकारी थे और स्त्रियों शूद्रों दासों को उन अधिकारों से वंचित किया गया। इसी संदर्भ में गायत्री मंत्र के संबंध में प्रतिबंध लगाया गया कि उस पर स्त्री और शूद्रों का अधिकार नहीं है। सामंतों के इशारे पर पंडितों ने जिस तिस ग्रंथ में ऐसे श्लोक भी गढ़ कर लिख दिये जिसमें मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद-भाव की बात पुरातन परंपरा या ईश्वर की इच्छा मानी जाय।

अब समझदारी का समता का, मानवी मौलिक अधिकारों का युग है। स्त्री और शूद्रों की गणना भी मनुष्य समुदाय के अंतर्गत होने लगी है जो कि समय की बड़ी आवश्यकता थी। संविधान ने भी उन्हें समता के अधिकार दिये है। गायत्री मंत्र के बारे में भी यही बात समझी जानी चाहिए। वह मनुष्य मात्र का है। किसी भी देश, जाति लिंग धर्म का व्यक्ति उसे प्रसन्नतापूर्वक अपना सकता है और लाभ उठा सकता है ब्राह्मणों या द्विजों तक उसको सीमित नहीं किया जा सकता। गायत्री परिवार ने इस तथ्य का विज्ञान संगत प्रतिपादन कर तथ्य का विज्ञान संगत प्रतिपादन कर तथा कथित महामंडलेश्वरों से मोर्चा लेकर इसे जन-जन तक पहुँचाया हैं।देखा जाय तो भगवान के यहाँ बेटी और बेटे में कोई अंतर नहीं। ऐसा भेदभाव तो पिछड़ी मनोभूमि के व्यक्ति ही कर सकते हैं किसी के भी बहकावे में आकर किसी महिला को यह संदेह न करना चाहिए कि महिलाओं को गायत्री अधिकार नहीं है। वे उपासना की भाँति यज्ञ भी कर सकती है। इसके लिए उनकी व्यस्तता और सुविधा का ध्यान रखते हुए यज्ञ समेत गायत्री उपासना का छोटा-सा सकता है कि महिलाएँ उपासना तो कर ही लिया करें।

महिलाएँ प्रायः प्रातः काल सबसे अधिक व्यस्त रहती है। सफाई नाश्ता, नित्यकर्म आदि इसी समय करने पड़ते है। बच्चे स्कूल जाते है। पुरुष अपने दफ्तर कारबार पर। उन सभी को अपने-अपने कामों की जल्दी पड़ती है। यह सब महिलाओं को प्रातःकाल ही करने पड़ते है। बच्चियाँ और वृद्धाएँ भी किसी न किसी रूप में इन कामों में हाथ बटाती है। इसीलिए महिलाओं के लिए प्रातः सायं का समय उपयुक्त नहीं पड़ता सायंकाल भी प्रातः उपरोक्त प्रकार के दबाव ही उन पर रहते है।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए उनके लिए बारह से लेकर तीन बजे तक ही सुविधा जनक समय निकलता है। अनुष्ठान आदि के लिए उनके लिए यही समय उपयुक्त पड़ता है स्नान के उपरांत एक माला का जप तो प्रातःकाल भी कर सकती है।

भोजन बनाते समय, मानसिक जप करती रहें तो उस आहार का सभी खाने वालों पर उपयुक्त असर पड़ेगा

जिन दिनों मासिक धर्म हो उन दिनों नियमित जप रखना चाहिए मानसिक जप तो कोई किसी भी स्थिति में कर सकता है।

जो महिलाएँ यज्ञोपवीत पहनती हों उन्हें रजो धर्म के उपरांत नया यज्ञोपवीत बदल देना चाहिए।

कहा जाता है गायत्री पवित्र मंत्र है इसकी उपासना करने वालों को शुद्धतापूर्वक रहना चाहिए यज्ञोपवीत पहनना चाहिए और मद्य माँस आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। नशा आदि न करना अच्छी बात है। जितनी शुद्धता रखी जा सके उतनी ही अच्छी है। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि मलिनता की स्थिति में रहने वाले को औषधि ही नहीं देनी चाहिए। गायत्री मंत्र की यह विशेषता है कि इसकी उपासना करने पर मनुष्य के दोष-दुर्गुण अनायास ही घटने लगते है। जिस प्रकार गंगा में नहाने पर हर स्तर का प्राणी पवित्र ही होता है। उसमें घुसने से किसी को भी नहीं रोका जा सकता। गाय, भैंस, गधा, घोड़ा तक रुक नहीं सकते है। इसी प्रकार गायत्री मंत्र की साधना हर स्थिति का हर स्तर का, मनुष्य कर सकता है। उस पर कोई रोक नहीं है। उसके दुर्गुण तो अपने आप ही समयानुसार घटने लगेंगे।बीमार को दवा नहीं देनी चाहिए। जैसे जिस प्रकार यह तर्क अनुचित है। उसी प्रकार यह कथन भी सही नहीं कि आहार बीमार की अशुद्धता हो तो उनसे छुड़ाने वाले उपचार गायत्री साधक को भी नहीं अपनाना चाहिए।

यज्ञोपवीत गायत्री का रूप है। मन्दिर में बैठ कर देव प्रतिमा के सामने पूजा करना अधिक अच्छा है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि यदि भी नहीं करना चाहिए। बिना उपवीत के भी गायत्री साधना की जा सकती है। इच्छा हो तो उसे पहने भी रहना चाहिए।

कई बाल की खाल निकालने वाले कुतर्की गायत्री महामंत्र को भी साधारण पद्यों में गिनते है और उसमें साधारण पद्यों में गिनते हैं और उसमें 24 के स्थान पर 23 होने की छंद रचना परक पिंगल शास्त्र की भूल चाहिए कि पिंगलशास्त्र की दृष्टि में उपभेद बताये गये है और उनमें 21 से लेकर 24 तक अक्षर है। यथा-निचृद गायत्री अर्ग्वी, विराड, चिराडार्थी, प्रजापात्या, भूरिम्, वर्धमाना, पिपीलिका, मध्या, आदि आदि।

इतने पर भी किसी का आग्रह 23 अक्षर मानने का ही हो तो उसे वह निचृद वर्ग का गायत्री छंद कह सकता है। पर उसे अशुद्ध नहीं कह सकता। वैसे लिखने में “णियम्” बोलते हैं इस प्रकार भी वे चौबीस अक्षर हो जाते है।

तांत्रिक साधनाओं के विधान में त्रुटि रहने पर उनके असुरता प्रधान इष्ट देव नाराज होकर अनर्थ भी कर सकते है। किंतु गायत्री तो क्षमा ओर करुणा से भरी पूरी सहृदय माता है। वह तो अपने बच्चे की तोतली बोली सुनकर भी प्रसन्न होती है। यह ऐसी कामधेनु गौ है जो किसी को लात मारना जानती ही नहीं।

सात्विक प्रयोजनों में तो उलटी सीधी उपासना भी श्रद्धा के आधार पर फलवती होती है। वाल्मीकि के बारे में कहा जाता है कि वे राम नाम का शुद्ध उच्चारण न कर सकने पर उलटा नाम ‘मरा-मरा’ जपने लगे और उतने भ्रम से ब्रह्म समान हो गये। दक्षिण मार्गी साधनाओं में विधानों का कम और भावनाओं का अधिक महत्त्व है। गायत्री उपासना विधि में कोई भूल रह जाने पर भी किसी का अनर्थ नहीं हुआ। फिर भी भय हो तो किसी सिद्ध पुरुष को साधना का संरक्षण करते रहने के लिये उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता है।

जन्म मरण का सूतक होने के अलावा बीमार पड़ने प्रवास में होने पर स्नान आदि की नियत समय की सुविधा नहीं रहती। ऐसी दशा में बिना होंठ हिलाये मानसिक जप किसी भी स्थिति में किया जो सकता है। रात्रि के समय भी बिस्तर पर पड़े होने पर भी। रास्ता चलते भी मानसिक जप किया जा सकता है।

कलियुग में गायत्री मंत्र कीलित है। शापित है। निष्फल जाता है। ऐसी आशंका किसी को भी न करनी चाहिये भगवान को कौन शाप देगा। फिर किसी के शाप का उस पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यह लोगों की श्रद्धा डगमगाने और अपने पक्ष वाले संप्रदाय की उपासना करने के लिये रचा गया भ्रम जंजाल मात्र है। कदाचित दूसरा अर्थ सुयोग्य गुरु का वरण भी तो हो सकता है अन्यथा प्रतिबंध जैसी कोई बात नहीं है।


फंदा (Kahani)

एक व्यक्ति गाय के गले में रस्सी बाँधे उसे घसीटते लिए जा रहा था। उसी समय एक फकीर अपनी शिष्य मंडली समेत उधर से गुजरा। उसने उस व्यक्ति की ओर इशारा कर अपने शिष्यों से कहा-देखो किस प्रकार गाय मालिक को बाँध कर अपने पीछे घसीट रही है।”

शिष्य चौके कहा दूर अधिक होने से शायद आप स्पष्ट नहीं देख पा रहे हैं। जो कुछ आपने कहा, बात उसके ठीक उलटी है मालिक गाय को बाँधें लिये जा रहा हैं

फकीर तनिक मुसकराये, बोले-नहीं मैं बिलकुल ठीक देख रहा हूँ गाय मालिक को अपने पीछे घसीट रही है।

पहेली शिष्यों की समझ में नहीं आयी क्योंकि वह इसके विपरीत देख रहे थे शिष्यों के असमंजस को ताड़ कर गुरु गाय के निकट पहुँचें और उसके गले की रस्सी काट दी वह भागने लगी। उसके पीछे पीछे उसका मालिक भी दौड़ने लगा।

एक बार पुनः फकीर ने शिष्यों को संबोधित किया

देख! क्या मैंने गलत कहा था?” शिष्य गुरु का संकेत समझ गये।

आज हमारी भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। भोगियों को ऐश्वर्य ने और संन्यासियों को त्याग ने उनके गले में फंदा डाल रखा है और उन्हें अपने पीछे घसीट रहे हैं। बँधे हुए दोनों ही हैं एक धन के फंदे से, तो दूसरा त्याग के फंदे से। फिर भी वे यही सोचते हैं कि वे सुख की ओर शांति की ओर अग्रसर हो रहे हैं पर जब दोनों ही अपने अपने प्रयास में नितांत विफल रहते हैं तब उन्हें यथार्थ का पता चलता है वस्तुतः जहाँ बंधन है वहाँ शांति हो ही नहीं सकती। वह न तो भोग में है न दिखावे में, न बाह्य आडम्बर में, वरन् उसकी उपलब्धि तो आंतरिक त्याग द्वारा ही संभव है। हम अपने अहंकार का ईर्ष्या द्वेष का कामनाओं वासनाओं का अनुचित इच्छा आकांक्षाओं का परित्याग करें। इसी में शाश्वत शांति और संतोष करतलगत हो सकता है।


आ रहा है अतिशीघ्र ही- प्रज्ञायुग

प्रज्ञायुग सतयुग एक भवितव्यता है सच्चाई है अगले दिनों हम इसे अवतरित होता हुआ अगले दिनों हम इसे अवतरित होता हुआ अपने इन चक्षुओं से ही देखेंगे भविष्यवक्ता इस संबंध में बड़े ही आशावादी है। वे कहते है अगले दिनों सारा विश्व एक सूत्र में आबद्ध होकर एक कुटुंब में बदल जाएगा। एकता की तरह ही समता भी सर्वत्र दीख पड़ेगी जाति के और रंग के कारण कहीं कोई असमता नहीं बरती जाएगी। नर और नारी में से कोई ऊँच-नीच या असमान न रहेगा। सभी शक्ति भर काम करेंगे, आवश्यकता भर लेंगे कोई धनी निर्धन न रहेगा। असमानता के सभी भेदभाव मिट जायेंगे। शरीर छोटा बड़ा हो सकता है पर मनुष्य का कर्तव्य, अधिकार, सम्मान तो एक जैसा होना चाहिए।

एकता के अभाव में बिखराव ही शेष रह जाता है। टूटे हुए पत्ते और बिखरे हुए तिनके अपने अस्तित्व तक की देर तक रक्षा नहीं कर सकते फिर उनके द्वारा कोई बड़ा कार्य तो संपन्न हो ही कैसे सकेगा? संगठन की शक्ति मानी गई है। यह मात्र जमघट नहीं वरन् मिल-जुल कर एकात्मकता की परिणति है। चींटियों और टिड्डियों का दल तक अपनी सहकारिता के आधार पर समस्त प्रतिकूलताओं से लड़ता हुआ अपना अस्तित्व बनाए रहता है। समर्थता सर्वत्र साधनों पर नहीं घनिष्ठ सहयोग पर निर्भर रहती हैं उसी के आधार पर संसार पर नहीं घनिष्ठ सहयोग पर निर्भर रहती है। उसी के आधार पर सारे के सारे बड़े कार्य संपन्न होते रहे हैं। अगले दिनों लोग बिखराव की व्यथा और अपनाने की हानियाँ और मधुमक्खियों की तरह सृजनात्मक संगठन बनाकर रहेंगे।

इन दिनों लोग अमीरी के प्रदर्शन में अपना गौरव मानते हैं अगले दिनों यह प्रचलन बदल जाएगा जहाँ भी अनावश्यक संग्रह लोग देखेंगे वहाँ उँगली उठायेंगे और अनैतिकता एवं निष्ठुरता अपनाने का आरोप लगावेंगे व्यक्तिगत पूँजी अवांछनीय मानी जाएगी। इसका सेवन करने वाले भी सब ओर से ईर्ष्या घृणा, बरसती देखेंगे और स्वयं दुर्गुणों दुर्व्यसनों के शिकार बनकर अपनी गरिमा गिरायेंगे। इस घाटे के सौदे को करने के लिए किसी का भी मन न होगा। पुरुषार्थ और कौशल के बल पर जो अधिक कमाया जा सकता है उसे लोकोपयोगी कार्यों में नियोजित क्यों न किया जाय। यह तथ्य सभी को सहज गले उतरेगा और लोग औसत नागरिक की तरह रहने में अपना गौरव अनुभव करेंगे

कामुकता एक आवेश है, क्रोध जैसा, नशे जैसा, उन्माद जैसा। इस दिनों लोग उसका रस लेते अधर्मी अपनी जीवनी शक्ति तथा शालीनता को निचोड़ते है। फलतः दाम्पत्य जीवन अविश्वास से परिवार विघटन से समाज अस्थिरता से भरता जाता है। अगले ही दिनों लोग नर-नारी के बीच कलात्मक भावभरा स्नेह, सद्भाव स्थापित करेंगे और अतृप्ति के स्थान पर आनन्द उल्लास का अनुभव करेंगे नर-नारी के बीच का शालीन सहयोग इतना सुखद होगा कि किसी के लिए भी हँसती-हँसती जिंदगी जीने जैसा सुयोग दुर्लभ न रहेगा।

शिक्षा का उद्देश्य होगा-व्यक्तित्व का विकास। जानकारियों का संवर्धन तो उसका एक छोटा पक्ष रहेगा। शिक्षा प्रणाली हर किसी को स्वावलंबन स्वाभिमान संयम और शालीनता प्रधान कर सकने योग्य बनेगी। आजीविका के लिए शिक्षा वाली आज की मान्यता बदल जाएगी। निर्वाह के लिए तो आवश्यक श्रम कौशल जो लोग कुटीर उद्योगों व्यवसाय जैसे कामों से निकाल लिया करेंगे। शिक्षा मात्र व्यक्तित्व को समग्र बनाने की परिधि में कार्यरत रहेगी। तब उसका स्वरूप ही बदल जाएगा जो अब की अपेक्षा काफी भिन्न होगा।

कुटीर उद्योगों के ग्रामीण क्षेत्र में बिखर जाने से गाँव कस्बे बन जायेंगे वहाँ प्रदूषण से बचाव भी रहेगा। लोग शहरों की ओर भागना तो छोड़ ही देंगे वरन् वापस गाँव की ओर लौटेंगे इस प्रकार शहरों का व आबाद होंगे। प्रकृति संतुलन भी इस प्रकार सहज बना रहेगा।

दूरदर्शिता का उदय होते ही प्रजनन घटने लगेगा। जिस तेजी से जनसंख्या बढ़ी है उसी गति से वह कम होने लगेगी फलतः न तो जंगल कटेंगे और न पशुओं के लिए निर्वाह कठिन पड़ेगा। प्रदूषणजन्य समस्यायें हल होगी और सभी को निर्वाह सरल हो जाएगा। निर्वाह तक मर्यादित रहने और शालीनता को मानवी गौरव के साथ जुड़ जाने का परिणाम यह होगा कि सभी को निर्वाह तक मर्यादित रहने ओर शालीनता को मानवी गौरव के साथ जुड़ जाने का परिणाम यह होगा कि सभी अपनी मर्यादायें समझेंगे और वर्जनाओं को पालेंगे तब अपराधों के लिए गुँजाइश ही न रहेगी। उद्दण्डता को करना पड़ेगा जिससे देखने वालों तक की हिम्मत टूट जाय।

नीतिनिष्ठा और लोक निष्ठा का समन्वय ही मानवी धर्म का आधार बनेगा। सामाजिक परम्परायें भी उसी आधार पर नए सिरे से विनिर्मित होगी। लोग दुराग्रही न रहेंगे औचित्य को समझने और अपनाने का वातावरण बनाने में ही बुद्धिवाद का प्रयोग होने लगेगा।

अच्छा समाज बनाने की दिशा में लोग उस रीति-नीति की ओर कदम बढ़ायेंगे जिस पर चलाने की योजना ऋषि चेतना ने इन दिनों बनायी है।


अपरिग्रही का वैभव

सम्राट चक्कवेण अपनी न्यायकारिता और प्रजावत्सलता के लिए विश्व विख्यात रहे हो से बात नहीं उनकी ख्याति का प्रमुख कारण यह था कि वे सम्राट होकर भी अपनी आजीविका अपने परिश्रम से कमाते थे।

यद्यपि उनके राज्य का विस्तार दूर-दूर तक था। करोड़ों स्वर्ण मुद्रायें कर में आती थी। करोड़ों स्वर्ण मुद्रायें कर में आती थी। किंतु वह सब राज व्यय में प्रयुक्त होती थी। अपने आहार वस्त्र ओर आवश्यकताओं का प्रबंध वे आप करते थे। कृषि योग्य भूमि उनके अधिकार में थी। अपनी आजीविका के लिए सम्राट साम्राज्ञी स्वयं कृषि करते थे। उनका सामान्य स्वयं कृषि करते थे। उनका सामान्य स्वयं कृषि करते थे। उनका सामान्य जीवन विशुद्ध कृषक का था। 6 घण्टे उसमें लगाते थे, इससे बचा हुआ समय राजकार्यों पर।

अपने परिश्रम से मनुष्य आजीविका भर कमा सकता है। परिग्रह तो तब होता है, जब मनुष्य परिश्रम करे कम और आवश्यकताओं का काई अंत न हो। लोभ लालच वासनाएँ और तृष्णाएँ उनसे कोसों दूर थी। इसलिए अर्थ संचय की उन्हें कभी आवश्यकता भी नहीं पड़ी।

अपने हाथ से उत्पन्न किया हुआ अन्न खाने के कारण उनकी शक्ति और स्वाभिमान का कोई अंत नहीं अपने खेतों से उत्पन्न कपास से बनी वस्त्र बुनती वही दोनों के पहनने के काम आते। परिश्रम का जीवन और कृत्रिमता से विरक्ति के कारण ही दोनों के पहिनने के काम आते। परिश्रम का जीवन और कृत्रिमता से विरक्ति के कारण ही दोनों में विलक्षण तेजस्विता थी।

यथा राजा-तथा प्रजा, मार्गदर्शक उसे ही तो कहते हैं। जिसके चरण चिह्नों का सारी जनता अनुसरण करती हो। जो तेजस्विता सम्राट के जीवन में थी, वही सभासदों पदाधिकारियों और संपूर्ण प्रजा के जीवन में भी थी। किसी को कोई अभाव न था। कहीं दैन्यता न थी रोग और शोक इस परिश्रमी और स्वावलंबी राज्य में कभी प्रवेश नहीं पा सकें।

घटनाएँ न हो तो इतिहास का निर्माण कैसे हो? इतिहास न हो तो पीढ़ियाँ प्रेरणाएँ कहाँ से ग्रहण करें। एक दिन सम्राट के जीवन में भी अग्नि परीक्षा का दिन आ ही गया।

प्रजा की स्थिति जानने के लिए नृपति प्रतिवर्ष राजकीय समारोह आयोजित किया करते थे। अब तक उसमें पुरुष ही सम्मिलित हुआ करते थे। राजनायकों के माध्यम से राज्य की विदुषी महिलाओं हुआ करते थे। राजनायकों के माध्यम से राज्य की विदुषी महिलाओं ने अपना संदेश भेजकर पूछा क्या स्त्रियों को परिस्थितियाँ अवगत कराने और सार्वजनिक समस्याओं में भाग लेने का अधिकार नहीं है? यदि है तो राज्य की आधी प्रजा को उनके अधिकार से वंचित रखना कहाँ का न्याय है?

बात उचित थी मानी गई। सत्य बात को स्वीकार करने में सम्राट ने अभी तक कभी भूल न की थीं। इसीलिए राज्य का एक भी नागरिक उनका विरोध नहीं कर सकता था निश्चय यही हुआ कि सम्मेलन में महिलाएँ भी भाग लेंगी। उनके शिविर स्वतंत्र होंगे। जिनका संचालन स्वयं महारानी करेगी। इस समाचार से स्त्रियों को बड़ी प्रसन्नता हुईं। सम्मेलन में भाग लेने के लिए वह भी तैयारी में जुट गई।

अंतःपुर में महिलाओं का निजी सम्मेलन हुआ। उसमें परस्पर हितों की चर्चा भी हुई। किंतु स्वभाववश वे सब अपनी मानसिक दुर्बलता भी व्यक्त किए बिना न रह सकी। महारानी को अत्यंत सादे वस्त्र और आभूषण विहीन देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। उन्होंने महारानी को उसके लिए कुछ ऐसा व्यंग भाव भी दर्शाया जिसे सहन कर सकना उनके लिए संभव न हुआ। उन सब ने कहा- “हम सब आभूषण पहने और राजमाता की वेशभूषा एक ग्रामीण की तरह हो, यह राज्य के लिए अपशकुन जैसा हैं स्त्रियों का शिविर इसी चर्चा के साथ समाप्त हो गया।

अपशकुन अब तक न था, अब हो गया। दुर्बलता का एक छोटा से छिद्र भी मनुष्य के पतन के लिए काफी है। वह दुर्बलता महारानी के मन में प्रवेश कर गई। उस दिन अवकाश पाकर उन्होंने सम्राट च्क्कवेण से महिलाओं द्वारा चर्चित सारी बात कह सुनाई। राजा ने बहुतेरा समझाया पर महारानी के मन में आभूषणों की लिप्सा ने ऐसा तीव्र प्रभाव डाला था। कि वे अपने हठ से एक इंच भी मुड़ने के लिए तैयार न हुई।

ऐसी दुर्बलताएँ मनुष्य जीवन में स्वाभाविक है, पर सामान्य मनुष्य उन्हें बहुत बढ़ा चढ़ा कर देखने लगते है। इसलिए एक ही दुर्बलता से अनेक बुराइयों के द्वार खुलते चले जाते है। महाराज चक्कवेण इस बात को समझाते थे। इसी कारण उन्होंने कोई बात शीघ्रता में नहीं की। ऐसे समय में मनुष्य की अपनी स्वार्थ वृत्ति या कामुकता आदर्शवादियों को भी पथभ्रष्ट कर देती है। इसीलिए चक्कवेण ने आज तक कोई भी कार्य सकाम दृष्टि से नहीं किया था। निष्काम कर्म योग का पालन करने से ईश्वर प्राप्ति का मार्ग खुलता है। क्योंकि निष्काम कर्म करने से सेवा संयम और सदाचार की जड़ें गहरी होती चली जाती है। चक्कवेण अपनी आजीविका की दृष्टि से जहाँ प्रजा से निष्काम थे वहाँ अपनी पत्नी के लिए भी उनकी निष्कामता में कोई अंतर नहीं आया था।

उन्होंने समझाया प्रजा से और कर लेकर अपने खर्च में नहीं लगाया जा सकता और अपनी कमाई इतनी नहीं है कि आभूषण बनवाई जा सके। इसलिए अपनी इच्छा पर पुनर्विचार कर सकें तो अच्छा है। इन बातों का रानी पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। वह अपनी माँग पर दृढ़ रहीं।

चक्करवेण ने सचिव को बुलाया और कहा-लंकाधिपति रावण मेरे मित्र है तुम उनके पास जाओ और महारानी के लिए आभूषण बन सकें उतना स्वर्ण उनके पास से ले आओ।” सचिव आज्ञा शिरोधार्य करके लंका की ओर चल पड़ा रावण से उसने सब समाचार कह सुनायें। आज तक चक्कवेण ने रावण के सामने कभी सिर नहीं झुकाया था। अहंकारी रावण के लिए यह सुनहरा अवसर था। उसने सचिव से कहा-निः संदेह हम तुम्हारे राजा के लिए अपने राजकोष के द्वार खोल देंगे, किंतु अभी नहीं तुम जाओ और मुझसे याचना करें। जितनी स्वर्ण राशि की आवश्यकता होगी हम सहर्ष प्रदान करेंगे।

सचिव को महारानी की आकस्मिक लोभ वृत्ति पर जितना दुःख नहीं हुआ था, उतना दुःख उन्हें अपने सम्राट के प्रति इन दंभपूर्ण वाक्यों को सुनकर हुआ। पर उसे मालूम था, महाराज को अपने लिए किसी वस्तु की इच्छा नहीं है वे महारानी को ही अपनी प्रजा मानकर उनके हित का संरक्षण करना चाहेंगे इसलिए कहीं ऐसा न हो याचना के लिए वे स्वयं चल पड़े स्वाभिमानी राज्य का नागरिक होकर भला मैं यह कैसे सहन कर सकूँगा।

सचिव समुद्र तट पर आए। उन्होंने समुद्र की मिट्ठी से एक कृत्रिम किंतु कलाकारिता पूर्ण लंका बनाई। फिर लेकर लंका गए और रावण को वहाँ लाकर दिखाया तो यह रही तुम्हारी लंका अभी चाहूँ तो इसे समुद्र में डुबा दूँ अथवा तोड़ फोड़ कर नष्ट कर दूँ देख लो यह लंका तुम्हारी ही है न।

रावण ने ध्यान से देखा था तो घरौंदा पर बिलकुल लंका जैसा सचिव की कला की प्रशंसा करते हुए रावण ठहाका लगा कर हँसा और बोला-सचिव! इस लंका के टूटने फूटने या डूबने से भला मेरा क्या बिगड़ेगा?

प्रत्यक्ष देखना चाहते हों तो लो देखो सचिव ने अपने मन को एकाग्र करते हुए घरौंदेनुमा लंका के कँगूरे तोड़ डाले। इनके टूटते हुए जोर का शब्द हुआ सभी ने देखा रावण की लंका कँगूरों से विहीन हो चुकी है। उन्हीं कँगूरों से जिन पर रावण अपने मस्तकों की तरह गर्व करता था। इस चमत्कार को देखकर सभी हतप्रभ थे। रावण स्वयं आश्चर्यचकित होते हुए बोला इस तरह तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

उसके आश्चर्य का समाधान करते हुए सचिव ने स्वाभिमानपूर्वक कहा-क्या तुम इतना भी नहीं समझ पाए कि चक्कवेण के राज्य का प्रत्येक नागरिक अपने कठोर परिश्रम की बौद्धिक और आत्मिक प्रतिभाएँ बहुत तीक्ष्ण है। यह लंकाकृति उसी का प्रमाण है। तुम नहीं समझे पर मैंने एक दृष्टि में जहाँ तुम्हारे वैभव का मूल्यांकन कर लिया है वहाँ तुम्हारी प्रत्येक दुर्बलता का भी। तुम्हें यही दिखाने लाया था, यदि तुमने चक्कवेण को नीचा दिखाना चाहा तो हम राज्य के नागरिक तुम्हें एक दिन में नष्ट कर देंगे

सचिव की बात सुनकर रावण सारी स्थिति समझ गया। जिस राज्य की प्रजा इतनी आत्मबल संपन्न हो वहाँ के सम्राट से मित्रता के बंधन में बँधे ही रहना चाहिए यह सोचकर रावण ने स्वर्ण राशि सहर्ष प्रदान कर दी।

किंतु सचिव जब तक राजधानी पहुँचे महारानी अपनी भूल स्वीकार कर चुकी थी। उन्होंने वह स्वर्ण राशि पुनः रावण के पास वापस भिजवा दीं। अपनी इस भूल सुधार से उन्होंने प्रजा को लोभ, लालच के त्रुटिपूर्ण प्रोत्साहन से बचा लिया।


जार्ज वाशिंगटन (Kahani)

1725 ई. में उत्तरी वर्जीनिया के जंगल में एक पार्टी आयोजन हो रहा था एक स्त्री के आर्तनाद ने उनको चौका दिया वे लोग उस ओर चल पड़े स्त्री ने इन लोगों में से एक युवक को देखकर पुकारा कि देखिये ये लोग मुझको छोड़ते नहीं है। मेरा लड़का नदी में गिर गया है। मुझे इन लोगों से छुड़ा लीजिए जिससे मैं अपना लड़का नदी से निकाल सकूँ।” जिन लोगों ने स्त्री को पकड़ रखा था सोचा कि यदि वे इसे छोड़ देंगे तो वह अवश्य पानी में जाकर नदी में कूद पड़ा। जहाँ बच्चे का वस्त्र दिखाई दे रहा था, जल प्रवाह को पार करता हुआ, वह वहाँ जा पहुँचा उसने बच्चे को हाथ से पकड़ तो लिया पर वह हाथ से फिर निकल गया। फिर जल के वेग ने उन दोनों को डूबो दिया।

बड़ी देर में परिश्रम और साहस के साथ वह युवक अंत में उस लड़के को ऊपर उठाए चट्टान पर आ गया। दर्शक लोग और वह स्त्री दौड़कर दोनों के पास पहुँचे। बच्चा और युवक दोनों बेसुध और अशक्त हो गये थे थोड़ी देर बाद दोनों को होश आया स्त्री ने बच्चे को छाती से लगाया और युवक को आशीर्वाद देती हुई चली गई। वह संवेदनशील साहसी युवक थे जार्ज वाशिंगटन (मिस)


“अर्थ” तो हो पर धर्म प्रधान ही

व्यक्तिगत जीवन और फिर समाज को ऊँचा कैसे उठाया जाय? उनमें शांति सुव्यवस्था, शालीनता और सदाचार कैसे कायम किया जाय? इसके लिए भारतीय मनीषियों ने पुरुषार्थ चतुष्टय का एक सुगम उपाय बताते हुए उसे व्यक्तिगत जीवन में अपनाये जाने पर विशेष बल दिया था, पर दुर्भाग्य यह है कि वह वार्तालापों के मध्य होने वाली दार्शनिक चर्चा मात्र बन कर रह गया हैं।

धर्म अर्थ काम मोक्ष-यह जीवन के चार महत्त्वपूर्ण पहलू है। धर्म अर्थात् नीतिमत्ता। अर्थ अर्थात् संपदा काम अर्थात् कर्तव्यपरायणता और मोक्ष अर्थात् विदेह जैसी स्थिति-आंतरिक प्रफुल्लता-आनन्द का अवतरण। जीवन के प्रस्तुत अध्यायों में से आरंभिक तीन को संपन्न कर लेने मात्र से अंतिम का संपादन स्वतः ही हो जाता है। इन तीन में से भी प्रथम दो विशेष महत्त्व के बताये गये ही प्रधानता मिली हुई है और इसी के गिर्द जीवन घूमता रहता है। शेष तीन की उपेक्षा हो जाने के कारण ही न शांति और सुव्यवस्था दिखाई पड़नी चाहिए थी। संपत्ति व्यक्ति यदि धनकुबेर बन भी गया, तो उसे ही चैन कहाँ हैं? उसकी अशान्ति इस बात की है कि संपदा कही कोई चुरा न ले जाय, जबकि दरिद्रों को यह चिंता सताती रहती है कि कुछ पैसे जुड़ जाएँ तो अमीरों जैसा ठाट अपनाया और मौज-मस्ती की जाय। संपत्ति आज हर एक को बेचैन किये हुए है। आखिर इसका कारण क्या है? इन दिनों अर्थ और जीवन क्यों एक दूसरे के पर्याय बने हुए है? जबकि पूर्वकाल में अर्थ को अनर्थमूलक माना और उसके सीमित उपयोग पर जोर दिया जाता था।

गहन विचार मंथन से यही ज्ञात होता है कि इस लंबे अंतराल में मनुष्य का उत्कर्ष के बजाय अपकर्ष ही हुआ है परमार्थपरायण बनने की तुलना में वह अधिकाधिक स्वार्थी बना है। स्वार्थ जब जहाँ भी पैदा होता वह निजी सुख-सुविधा की माँग करता है। सुविधाएँ अनुचित संचय और दूसरों के अधिकारों के अपहरण के बिना संभव नहीं। यह दोनों बातें ऐसी है जो प्रच्छन्न रूप से वैभव से संबंधित है संचय की आम प्रवृत्ति धन के प्रति होती है यही हर प्रकार के संग्रह की मूल है दौलत यदि नहीं हुई तो दूसरे प्रकार का संचय भी असंभव स्तर का बना रहता है इसलिए लोग संपदा को ही इकट्ठा करना ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि इसके माध्यम से बाद में काई भी अन्य सुविधा आसानी से खरीदी जा सकती है। इसी तरह अपहरण की बात जहाँ आती है, वहाँ भी अर्थलोलुपता की विकृत भावना ही दिखाई पड़ती है। लोग पद का, धन का, जमीन का, मकान, दुकान, सामान का अपहरण करते देखे जाते है, क्योंकि वे सब संपदा के स्रोत है, किंतु इन दिनों एक नये प्रकार का अपहरण बड़े पैमाने पर घटित होता देखा जा रहा है। यह है-आदमी का। व्यक्ति अपहरण के अधिकांश मामलों में अर्थ का घटना से सीधा संबंध होता है और धन हस्तांतरण के साथ ही अपहृत व्यक्ति छूट भी जाता है। कुछ ही प्रकरण उनमें ऐसे होते है, जिनमें घटना का संबंध सीधे रुपये-जैसे से न होकर अपहरणकर्ता के किसी स्वार्थ से होता है पर ऐसे मामले उँगलियों में गिनने जितने होते है। अधिकांश में इसका उद्देश्य फिरौती की रकम प्राप्त करना हैं स्पष्ट है जैसे जैसे मनुष्य में स्वार्थपरता बढ़ी वैसे ही वैसे उसमें धन भी अस्तित्व में आया हैं इसलिए धन के प्रति आकर्षण के नये-नये अवैध धंधे भी अस्तित्व में आये हैं इसलिए पहले जो लक्ष्मी धन की पर्याय मानी जाती थी कल्याणकारक समझी जाती थी, अब वही परेशानी का कारण बनी हुई है। भला लक्ष्मी के आगमन से किसी को कठिनाई क्यों कर होनी चाहिए? जो स्वयं मंगलकारी है, उससे अमंगल की संभावना कैसे हो सकती है? ऐसा वस्तुतः लक्ष्मी संबंधी तत्त्वदर्शन भली−भाँति नहीं समझ पाने के कारण ही है। लक्ष्मी का तात्पर्य मंगल और कल्याण साधन की देवी से है। शब्दकोष में इसीलिए लक्ष्मी को उद्योगी पुरुषों के द्वारा प्राप्य या पुरुषार्थियों को अपनाने वाली बताया गया है। स्वयं पाणिनि ने भी कुछ ऐसा ही अर्थ करते हुए “लक्षयति प्श्यति उद्योगिनं इति लक्ष्मी” कहा है। इन अर्थों से स्पष्ट है कि जहाँ पुरुषार्थ और पराक्रम होंगे वहाँ लक्ष्मी भी होगी। पुरुषार्थ और पराक्रम नीतिवाचक शब्द है, अनीतिबोधक नहीं आज चूँकि पग-पग पर अनीति अपनायी जा रही हे इसलिए धनोपार्जन जैसा सरल मार्ग भी सर्वथा नैतिक नहीं रह सका या यों कहा जाय कि बिलकुल अनास्तिक बना हुआ है तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। जहाँ पुरुषार्थ की जगह बेईमानी हो, भला वहाँ लक्ष्मी कैसे विराज सकती है? वह तो नीतिवानों की सहचरी है। इसीलिए आज के अधिकांश लोग धन कमाने में सफल हो तो जाते हैं पर लक्ष्मी तत्त्व के अभाव में सदा अशान्त और असंतुष्ट बने रहते है।

आर्ष वाङ्मय में असुर शब्द उन लोगों के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो न स्वयं चैन से रहते न दूसरों को रहने देते है। इस बिंदु पर वर्तमान धनाध्यक्षों की मनोदशा भी ठीक उन जैसी ही दिखाई पड़ती है। यह बात और है कि वे वैसे अवांछनीय आचरण में निरत नहीं रहते पर माना कि अस्थिरता उन्हें बेचैन तो बनायें ही रहती है। ऋग्वेद में ऐसे कितने ही मंत्र है जिनसे विदित होता है कि असुरों की संपदा देवताओं की तुलना में में कही अधिक थीं इनकी रक्षा में ही निमग्न रहने के कारण वे “राक्षस” हो गये जबकि देवता वे कहलाये जो अपरिग्रह पूर्वक रहते और अभावग्रस्तों को दान करके खाते थे, अतएव वे लक्ष्मीवान् बने रहे।

प्राचीन समय में वस्तुतः संपदा की अपेक्षा श्री की प्रतिष्ठा नीति यही कारण है कि तब समाज में हर प्रकार से शांत बनी हुई थी। जहाँ श्री रहेगी वहाँ समृद्धि और संतोष होना स्वाभाविक है। वर्तमान में संपत्ति सर्वोपरि है। लक्ष्मी की स्थापना की बात तो बाद में सोची जाती हैं। जहाँ वैभव आगे और श्री पीछे हो, वहाँ लक्ष्मी का कोई महत्त्व रह नहीं जाता ऐसी स्थिति में नियंत्रणकारी अंकुश लक्ष्मी के पास न रहकर धनवान् के हाथ आ जाता है जब मंगल चाहने वाली देवी का दौलत पर नियम नहीं नहीं रहा तो उसके सदुपयोग की बात कैसे सोची जा सकती है? जहाँ दुरुपयोग होगा वहाँ दुर्गति भी पैदा होगी उससे व्यक्ति में असंतोष और समाज में अराजकता उत्पन्न होना सुनिश्चित है। यही आज की स्थिति है।

प्रस्तुत दशा से बचने के लिए ही हर भारतीयों के घर पर प्रति वर्ष कार्तिक अमावस्या के दिन लक्ष्मी की पूजा की जाती थे। यह पूजन जहाँ आडम्बर युक्त उपचार बन कर रहा, वहाँ की स्थिति में सुधार की रत्ती भर भी गुँजाइश नहीं रहती, किंतु जहाँ लक्ष्मी के तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करते हुए उसे व्यावहारिक जीवन में अपनाने का प्रयास किया जाता है, वहाँ श्री वृद्धि प्रत्यक्ष देखी जा सकती है। प्रति वर्ष लक्ष्मी उपासना का विधान इसलिए भी है कि जिस आदर्श को जीवन का अभिन्न अंग बनाये रखने का संकल्प किया गया और जिंदगी आदर्शहीन श्रीहीन होकर न रह जाय उस निमित्त भी लक्ष्मी की आराधना की जाती है, किंतु इन दिनों तो इस पूजा का अर्थ देवी की उपासना से मालामाल हो जाना लगाया जाता है। यही सबसे बड़ी विडंबना है यदि ऐसी बात रही होती, तो लक्ष्मीनारायण मंदिर के पुजारी अब तक विपुल वैभव के स्वामी बन गये हो तो पर वर्षों की पूजा के बाद भी उनके जीवन में ऐसा कुछ घटित होते कहाँ देखा जाता है? इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मी अर्थ तंत्र के श्रेष्ठतम सदुपयोग और सुनियोजन की देवी है। गाँवों में कन्या को प्रायः लक्ष्मी कहा जाता है। यहाँ इसका भाव उसकी उपस्थिति से पिता के धनपति बनने जैसा नहीं वरन् इतना है कि वह अपने व्यवस्था कौशल से घर को एक सुखद-सुन्दर वातावरण प्रदान करती है। सही अर्थों में देवी लक्ष्मी की भूमिका भी इतनी ही है।

इस प्रकार अर्थ अनर्थ के बीच का भेद समझने और लक्ष्मी संबंधी तत्त्वदर्शन के अपना लेने के उपरांत कोई कारण नहीं कि शेष तीन पुरुषार्थ साथ-साथ संपादित न होते चलें। जहाँ अर्थतन्त्र की नियामक श्री रहेगी वहाँ धर्म तत्त्व भी रहेगा और कर्तव्यपरायणता भी निभती चलेगी। इन तीनों के समन्वय से जीते जी मोक्ष जैसा आनन्द न मिले यह हो नहीं सकता। इस तरह जिस समाज में उक्त चारों पुरुषार्थों का संतुलन समीकरण बना रहेगा, वहाँ की धरती पर देवता निवास करेंगे और वह धरती स्वर्ग जैसी सुखद एवं सुन्दर होगी इसमें दो मत नहीं।


स्वच्छता का पाठ (Kahani)

सन् 1936 की बात है गाँधीजी वर्धा में सेवाग्राम चले गये वहाँ रहकर उन्होंने आसपास के ग्रामीण लोगों से संपर्क से साधना शुरू किया। व नियमित रूप से निकटवर्ती गाँवों में जाते रहते लोगों को स्वच्छता का महत्त्व समझाते स्वयं झाडू लेकर गली कूचों की सफाई करते तथा गरीब गंदे बच्चों को स्नान कराते। ग्रामीणों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने का यह क्रम महीनों तक नियमित रूप से चलता रहा। बापू के इस प्रयास का कोई विशेष परिणाम निकलता न देखकर एक कार्य कर्ता ने कहा बापू! इन पिछले लोगों को समझाने एवं आप के स्वयं सफाई करने से भी इन पर कोई प्रभाव तो पड़ता नहीं फिर भी आप क्यों तन्मय होकर इस कार्य में लगे रहते हैं?

गाँधी जी ने कहा-बस इतने में ही धैर्य खो दिया। सदियों के संस्कार इतनी जल्दी थोड़े ही दूर हो जायेंगे। लंबे काल तक इनके मध्य रहकर इनमें शिक्षा स्वास्थ्य सफाई के प्रति अभिरुचि एवं जागरूकता पैदा करनी होगी।


निराली-अनुपम है-धर्म की भाषा

धर्म की अपनी भाषा है जिसकी तुलना सामान्य बोलचाल के शब्दों से कदापि नहीं की जा सकती। धर्म को भाव-सम्वेदनाओं का उद्गम नहीं उपचार है जिसके सहारे दिव्य चक्षुओं पर चढ़ी हुई धूल की अनुभूतियों का आनंद ले सकना संभव है।

लैंग्वेज ट्रुथ एण्ड लॉजिक नामक कृति में सुप्रसिद्ध मनीषी ए. जे. एअर ने सत्यापन सिद्धांत का प्रतिपादन करके समूची मानव जाति के अंतराल में यह मान्यता बिठाने का प्रयत्न किया है कि धर्म की भाषा निरर्थक नहीं वरन् अर्थपूर्ण और महत्त्वपूर्ण है। गणित के वाक्यों के साथ इसकी संगति नहीं बैठती। वे तो प्रायः विश्लेषणात्मक स्तर के ही हुआ करते है। दो और दो मिलकर चार होते है। धार्मिक वाक्यों के निर्माण में इस तरह की कोई नियमावली लागू नहीं होती। ईश्वर सत्य है, प्रेम है आदि वाक्यों की व्याख्या विवेचना गणितीय नियमों को आधार मानकर नहीं की जा सकती। परमात्म सत्ता में आस्था और उसके आदर्शों के अनुरूप अपने को ढालने की भावनाएँ ही इस भाषा को सुन-समझ सकती है।

कुछ लोगों का कथन है कि नैतिकता पूर्ण वाक्यों को ही धार्मिकता की परिधि में सम्मिलित किया जा सकता है, पर यह भी एक प्रकार की भ्रांतिमूलक मान्यता ही समझी जावेगी। धार्मिक वाक्य नैतिक वाक्यों से सर्वथा भिन्न स्तर के होते है। नैतिकता का स्वरूप तो योजना बनाने वाला जैसा होता है। चोरी नहीं करनी चाहिए वाले वाक्य को पढ़कर व्यवहार के किसी नियम विशेष का बोध भर होता है दूसरे शब्दों में इसे धार्मिक प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाला उत्प्रेरक भी कहा जा सकता है। दार्शनिक पॉल स्मिथ ने रिलीजियस नॉलेज नामक पुस्तक में इस तथ्य की पुष्टि करते हुए बताया है कि धार्मिक अनुभूतियाँ सामान्य स्तर की नहीं, वरन् एक प्रकार की स्वजनित प्रक्रिया है जो व्यक्त की मनोवृत्तियों को आदर्शवादी उत्कृष्टता की ओर मोड़ने ओर सन्मार्ग पर प्रेरित करने में महती भूमिका निभाती है।

धार्मिक भाषा का अपना पृथक् अस्तित्व है। इसके प्रयोग की विधि व्यवस्था वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षणों से बिलकुल भिन्न है। उदाहरण के लिए ईसा मसीह ईश्वर के पुत्र और राम दशरथ के पुत्र है। दोनों वाक्यों में पुत्र शब्द का प्रयोग तो हुआ है पर विवेक दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होता है कि पहले वाक्य में पुत्र का अर्थ असामान्य है तो हमारे कहने का अभिप्राय यह नहीं कि ईश्वर हमारे जैसा हाड़ माँस का कोई जीव है जो बोलने की शक्ति रखता और निर्देश देता है। ऐन एनालिटिकल फिलॉसफी ऑफ रिलीजन में डब्लू. एफ. गुरजीएफ ने धार्मिक भाषा की अभिवृद्धि को एक ऐसी स्ववृत्ति बताया है जो मनुष्य के सर्वांगीण व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती और सामान्य से असामान्य अवस्था में जा पहुँचाती है। इसी को संप्रत्यात्मक अभिवृत्ति को एक ऐसी स्ववृत्ति बताया है जो मनुष्य के सर्वांगीण व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती और सामान्य से असामान्य अवस्था में जा पहुँचाती है। इसी को संप्रत्यात्मक अभिवृत्ति (काँन विक्शनल ऐटिच्यूट) के नाम से जाना जाता है।

अब प्रश्न उठता है कि धार्मिक भाषा को कैसे सुना समझा जाय? तामस एक्वीनस ने सुम्नाथियों -लाँजिका में बताया है कि धर्म की लिपि एवं शैली प्रतीकात्मक एवं साम्यानुमानिक हुआ करती है। उनके मतानुसार जब हम किसी भी शब्द को पूर्ण परमेश्वर तथा अपूर्ण मनुष्य दोनों के लिए प्रयुक्त करते है तो उस शब्द का अर्थ दोनों ही अवस्थाओं में एक जैसा नहीं हो सकता। ईश्वर अच्छा है और वह मनुष्य एक अच्छा व्यक्ति है दोनों वाक्यों में अच्छा व्यक्ति है दोनों वाक्यों में अच्छा व्यक्ति है दोनों वाक्यों में अच्छा शब्द का प्रयोग तो अवश्य हुआ है, पर विविधता और भिन्नता जमीन आसमान जितनी स्पष्ट परिलक्षित होती है ईश्वर की अच्छाई में सामान्य नहीं असामान्य भिन्नता होती है। परमात्म तत्त्व गुणातीत है इसलिए उसके गुणों को वर्णन करने के लिए एनोलॉजीकल यानी साम्यानुमानिक पद्धति का प्रयोग करना ही अधिक प्रासंगिक एवं प्रामाणिक होगा।

वस्तुतः धार्मिक भाषा का स्वरूप प्रतीकात्मक होने की विवेचना ही अधिक विवेक संगत सिद्ध होती है पॉल टीलिख ने “डाइनेमिक्स ऑफ फेथ” पुस्तक में अपने अभिमत प्रकट करते हुए बताया है कि प्रतीक एक प्रकार का चिह्न है जो अपने से परे किसी वस्तु व्यक्ति तथा सत्ता की ओर संकेत करता और उनके अस्तित्व का प्रमाण परिचय देता है। लेकिन अपनी स्वयं की सत्ता को वह प्रकट नहीं होने देता। ध्यान रहे कि प्रतीक कोई सामान्य चीज नहीं है यह अपरिवर्तनीय ओर वास्तविक है वस्तु या व्यक्ति की सचाई को ही दर्शाता है सफेद झंडा को मात्र साधारण-सा कपड़ा ही नहीं समझ बैठना चाहिए वह तो शांति का प्रतीक है। इसमें शब्द रूपी आकृति से भावना रूपी प्रकृति की महत्ता और उपयोगिता अधिक होती है। प्रतीक प्रतीक्य के रूप में व्यक्ति की भावनाओं में समाविष्ट होकर अपनी सत्ता को प्रकट करता है चिह्न का काम तो केवल संकेत भर करने का होता है?लेकिन प्रतीक सत्ता के प्रतिनिधित्व सँभालने की जिम्मेदारी का निर्वाह भली प्रकार करत है। वस्तुतः इस प्रतीकात्मक प्रकटीकरण की प्रक्रिया को जितनी सरलता से धार्मिक भाषा में किया जा सकता है कदाचित ही किसी और प्रकार की शैली में संभव हो सकें।

ऐसे भी लोग है जिन्होंने धार्मिक भाषा में विरोधाभास उत्पन्न होने का भ्रम फैलाया है पर वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। विरोधाभास को विरोध नहीं कहा जा सकता। ईश्वर सर्वव्यापी है और कहीं भी नहीं। ब्रह्माण्ड से भी बड़ा और अणु से भी छोटा आदि कुछ उक्तियाँ ऐसी है जिन्हें धर्म की भाषा में विरोधाभास के नाम से पुकारा जाता है फिलाँसफीकरल फ्रैगमेंट्स नामक पुस्तक में सी किर्केगार्ड ने इसे विचार शील लोगों की जिज्ञासा का मूल स्रोत बताया है जिसके अभाव में उपयुक्त एवं औचित्यपूर्ण धार्मिक अनुभूतियाँ हो ही नहीं सकती।

भारतीय दार्शनिकों में डॉ. राधाकृष्णन का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। कंटेम्परेरी इण्डियन फिलॉसफी में उनने लिखा है कि परमसत्ता असीम और अखण्ड है जिसके बारे में शाब्दिक कथन कदापि साँव नहीं हो सकता। शब्दों की अभिव्यक्ति तो केवल देश काल और परिस्थितियों की घटनाओं तक ही सीमित है। परमसत्ता को एकमात्र प्रतीकात्मक शैली में ही अनुभव किया जा सकता है उसी प्रकार धर्म भी अनादि और अनंत है, तदनुरूप ही उसकी भाषा का निर्माण हुआ है। भले ही इसका कोई स्वतंत्र शब्द कोष नहीं बन पाया हो, फिर भी इसकी गरिमा को विस्मृत नहीं किया जा सकता। अधार्मिक प्रवृत्ति के लोग भले ही इसके प्रति अनदेखा-अनसुना रुख अपनाकर बैठते और इसकी भ्रांत निरर्थक अथवा पहेली जैसी भ्रामक कल्पना करते रहें पर हर धर्मपरायण व्यक्ति को इसकी अभिव्यञ्जनाओं को समझकर अपने चिंतन और चरित्र को ढालना चाहिए। ईशोपनिषद में ठीक ही लिखा है कि यह गतिमान है अगतिमान भी दूर भी है और निकट भी सबमें समाहित है और सबसे बाहर भी धर्म के इस ब्रह्म रहस्य को समझकर ही लोग सुख शांति का अनुभव करते है और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी वस्तुतः धार्मिक भाषा एक ऐसी सुनहरी चाबी है जो अज्ञेय मंदिर के स्वर्ण द्वार को खोलती और परमानंद की अनुभूति कराती है। मौलाना रूप ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मसनवी में कहा है कि लफंगों में मत फँस मानी की तरफ जा अर्थात् भाषा की शब्दावली के भ्रम में न पड़कर व्यक्ति के मनोभावों का समझना ही विवेकशीलता का परिचायक है। चिकित्सा की अनेकानेक प्रणालियों को अपनाकर उपचार का उपक्रम बिठाने वाले चिकित्सक अपनी-अपनी पृथक् पृथक् शब्दावली अथवा भाषा का प्रयोग करके ही रोगी को परामर्श देते है। चिकित्सा पद्धतियों की विविधता होते हुए भी उपचार उपक्रम एक ही है ठीक उसी प्रकार है। मौलवी पंडित पादरी अलग-अलग दिखते हुए भी एक ही है। एक सूफी संत ने ठीक ही कहा है अपने सीने में उससे जाय जो बात वाइज किताब में है अर्थात् तू किताबों के शब्दों और रस्मों से खुदा को नहीं पा सकता अपने दिल की नहीं पा सकता अपने दिल की किताब को पढ़ क्योंकि इससे बढ़ कर कोई किताब नहीं है अतः व्याकरण के जानने वालों को चाहिए कि वे शब्दों के दृश्य कलेवर पर अधिक ध्यान न देकर उसके मूल भाव को समझ कर ही आचरण करे यही धर्म है और यही उसकी भाषा का सच्चा स्वरूप

एक तांत्रिक ऐसी विद्या सीखकर आया कि उस अनुष्ठान की पूर्णाहुति रात्रि को बारह बजे हो। मंत्र पूरा होते ही उबलते पानी में मक्का के दाने डाले जाये तो वे सभी मोती बन जाय

तांत्रिक अपने काम में लग गया। पत्नी को पास बिठा लिया और सावधान कर दिया कि वह जैसे ही पूर्णाहुति सूचक हुंकार भरे वैसे ही खौलती हाँडी में मक्का डाल दें। विधान चल पड़ा।

पत्नी स्वभाव की आलसी भी थी और अविश्वासी भी। उसने उपेक्षा पूर्वक सुना, पर आज्ञा पालन में भलाई देखी सो चूल्हे में आग जला कर पानी चढ़ा दिया। मक्का का कटोरा भी पास था। रात बीतते-बीतते उन्हें नींद आने लगी सो पैर सिकोड़ कर वहीं सो गई।

पूर्णाहुति की हुंकार तांत्रिक ने कई बार की, पर पत्नी तो सोई हुई थी। वह उठा, जगाया और पानी में मक्का डाली। पर कुछ हुआ नहीं। समय निकल चुका था। अविश्वास और आलस्य ने सारा प्रयास व्यर्थ कर दिया।

दूसरे दिन पड़ोस की बुढ़िया एक कटोरा भर कर मोती लेकर तांत्रिक के पास आई। उन्हें सौंप दिये और कहा-आपकी बात मैं दीवार के छेद में से सुन रही थी। चूल्हे पर पानी उबालती रहीं और हुंकार की प्रतीक्षा करती रही। आपका संकेत सुनकर मैंने तत्काल पानी में मक्का डाल दी। उसी से बने यह मोती है।

जागरूकता और तत्परता सफलता की अनन्य सहायिका है।


स्वार्थ परायणता अर्थात् ईश्वर से विश्वासघात

शरीरगत लाभों का अनुचित रीति से संचय करना स्वार्थ कहलाता है। शरीर की तनिक-सी आवश्यकताएँ है। चार मुट्ठी अनाज, छः गज कपड़ा और एक बिस्तर भर की छाया मिल जाने से उसका काम चल जाता है। इतने साधन जुटाये के लिए दो घंटे नित्य का कड़ा परिश्रम काफी हो सकता है। बचते हुए समय को पुण्य परमार्थ में लगाया जा सकता है। मनुष्य की लिप्सा लालसा तृष्णा अहंता का कौतुक देखिए कि वे इतनी अधिक इच्छा आकांक्षाएँ बटोर कर सिर पर लाद लेती है जिनकी खाई में पर्वत भी समा सके और जो समुद्र उड़ेल देने पर भी समा सके और जो समुद्र उड़ेल देने पर भी खाली रहे इसी ललक की पूर्ति के लिए किए गए प्रयास को स्वार्थ कहते है। उसमें अपना लाभ ही ध्यान में रहता है। साथ ही इतनी जल्दी वैभव बटोर की अकुलाहट होती है कि औचित्य अपनाने के लिए धैर्य नहीं रहता। उतावली यह रहती है कि जितनी जल्दी जितना अधिक विलास वैभव हस्तगत किया जा सके उसे बिना नीति मर्यादा का विचार किए बटोरते चला जाए। जितनी असीमता की परिधि तक संचय किया जाय यह दूसरी बात है कि भाग्य साथ न दे। पात्रता योग्यता और परिस्थिति उतना न मिलने दे जितना कि चाहा गया था।

स्वार्थी व्यक्ति प्रयत्नशील तो होता है पर औचित्य की मर्यादाओं को भूला देता है। उपलब्धियों को विलासी साज सज्जा में खर्च करता है। व्यसन व्यभिचार जैसी अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ पाल लेता है। जिन मुट्ठी भर आदमियों को अपने परिवारी कहता है उन्हीं के लिए मरता खटकता रहता है। जो कमाता है उस का उपयोग स्वयं तो कर नहीं सकता क्योंकि हर व्यक्ति के उपभोग स्वयं तो कर नहीं सकता क्योंकि हर है। उससे अधिक जो बटोरा गया है उसे कहीं तो फेंकना ही पड़ेगा इसके लिए परिवार की छोटी परिधि ही आत्मीयता के दायरे में आती है। उन्हीं के लिए कमाई को निछावर करता है। उन्हीं के लिए इतनी जमा पूँजी छोड़ कर मरने की बात सोचता है जिसे वे सात पुश्त तक बैठे खाते रहे। पर होता यह है कि जैसा चाहा गया था वैसा करने के लिए धैर्य रखने की दूरदर्शिता उनमें भी नहीं होती। जो मेहनत से कमाया गया जिसमें औचित्य का समावेश किया गया है। इतना जिसमें अपना और परिवार का औसत भारतीय स्तर का निर्वाह हो सके। पर जो तुर्त-फुर्त अत्यधिक मात्रा में संचित किया गया है उसे देर तक रोककर नहीं रखा जाता है वह इच्छा तो संपदा पर लगा कर पक्षी की तरह उड़ना चाहती है। और बदलें में चित्र विचित्र दृश्य देखने, चित्र विचित्र स्वाद खाने के लिए इतनी जल्दी में होती है कि अपव्यय के हर रास्ते निकालती है अनेक दुर्व्यसनों दुष्प्रवृत्तियों को न्योता बुलाती है मुफ्त का धन प्रायः इसी प्रकार खर्च होता है वह इतने दिन के लिए रुकता भी नहीं कि अगली पीढ़ियाँ उसे समझदारी से खर्च करे और सुख पूर्वक जिंदगी काटे स्वार्थी स्वयं तो बुरी तरह खटता है। कमाता भी अधिक है पर उस पर शैतान की तरह ममता हावी रहती है। तथा कथित अपनों के लिए उसे लुटाता रहता है तथा कथित अपनों के लिए उसे लुटाता रहता है। अपनी ही तरह अमीरी का चस्का उन्हें भी लगा देता है।

अमीरी का शौक तो फूटे घड़े की तरह है जिसमें पानी डालकर चाहें जितना भर दिया जाय तो भी वह कुछ ही समय में खाली हो जाता है। अमीरी का नशा जिस पर सवार हुआ उसे स्वार्थी बनाया और उसकी ममता की परिधि में जो भी आया वह आलसी प्रमादी अपव्ययी दुर्व्यसनी बना। पैतृक उत्तराधिकारी या उपहार के रूप में जो मिला था, फुलेल की गंध की तरह कुछ ही समय में उड़ ही जाता है कुछ भी हाथ न लगने का पश्चाताप हाथ लगता है। जिन्हें अनावश्यक दुलार देकर सजाया उछाला गया था वे बड़े होने पर इस स्थिति में नहीं रहते जिनके उपहारों का मजा उड़ाया था उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रख सकें या आड़े वक्त में सहायता दे सके। हराम में पाई विपुल कमाई उन स्रोतों के साथ इसलिए लड़ाई ठाने बैठी रहती है कि जो मिला कम मिला उन्हें अधिक मिलना चाहिए था और अधिक! और अधिक!!

स्वार्थ परायणता ईश्वर के साथ विश्वासघात है। मनुष्य को अनेक सुविधाओं से भरा पूरा शरीर अद्भुत सूझ-बूझ बल मस्तिष्क साधनों से भरा हुआ संसार मिला। मनुष्य के साथ स्रष्टा ने पक्षपात नहीं किया है। वरन् उसे दिव्य धरोहर के रूप में अपनी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति किसी उद्देश्य विशेष के लिए दी है। बैंक के खजांची के पास बड़ी धन राशि होती है पर वह बैंक की अमानत है। निजी खर्च के लिए तो उसे थोड़ा-सा वेतन मिलता है। सेनापति के अधिकार में हथियारों के गोदाम रहते है पर उनका उपयोग वह राष्ट्र रक्षा के लिए ही कर सकता है। शासनाध्यक्षों, अफसरों के पास विपुल अधिकार होते हैं पर उन्हें वह सब जन कल्याण के लिए ही खर्च करने की छूट है। जो हाथ आया उसे अपने निजी स्वार्थ साधन के लिए खजांची, शासनाध्यक्ष या सेनाध्यक्ष या सेनाध्यक्ष उपयोग करने लगें परिवार वालों को अमीर बनने लगे तो उनका यह कृत्य अमानत को काटकर अपना बनाने लगे तो उनका यह कृत्य अमानत में खयानत अपना घर भरने लगें परिवार वालों को अमीर बनाने लगें कहा जाएगा और दंडनीय अपराध कहा जाएगा मनुष्य के पास जमा हुई संपदा विधा, कला, कुशलता आदि के संबंध में भी यही बात है। वह लोक मंगल के निमित्त दी हुई स्रष्टा की पवित्र धरोहर है। उसे जिस हेतु सौंपा गया है उसे उसी निमित्त दी हुई सौंपा गया है उसे उसी निमित्त खर्च किया जाना चाहिए।

वैभव वर्चस्व, मनुष्य ने भले ही अपनी मेहनत या बुद्धिमत्ता से कमाया है पर उस पर अधिकार समूची विश्व वसुधा का है। जो शरीर और मस्तिष्क समूची विश्व वसुधा का है। जो शरीर और न मस्तिष्क पास में है वह किसी का निज का बनाया हुआ नहीं है। वह स्रष्टा ने बनाया और उसी ने दिया है। पर साथ ही यह अनुबंध भी रखा है कि उस महती उपलब्धि का उपयोग मात्र उसके विश्व उद्यान को सींचने सँजोने एवं सुसंस्कारित बनाने में ही खर्च किया जाय। यही परम स्वार्थ है इसी को परमार्थ कहते है।

स्वार्थ शरीर द्वारा शरीर के लिए उतावली में अनीतिपूर्वक कमाया जाता है किंतु परमार्थ में आत्मा की आकांक्षा भावना आवश्यकता तथा कल्याण की संभावना जुड़ी होती है आत्मा शरीर नहीं है। शरीर की अधिष्ठात्री हैं वह ईश्वर की अंशधर है देवत्व से भरी पूरी उसके अपने स्वार्थ है ईश्वर के आदर्शों का परिपालन। लोक मंगल के लिए अधिकाधिक साहस और त्याग का प्रदर्शन इसमें शरीर और अंतःकरण दोनों का ही वास्तविक हित साधन होता है दोनों ही फलते फूलते हैं। किंतु स्वार्थ संचय की ललक भरी व्यस्तता ऐसी होती है जिसके कारण आत्म कल्याण के लिए न कुछ सोचना बन पड़ता है न करते धरते ऐसी दशा में आत्मा की स्थिति भूखे प्यासे दीन दरिद्र जैसी हो जाती है। शरीर संभव हो किसी अंश में फूलों-सा दिखाई दे पर आत्मा तो निरंतर क्षीण होती जाती है। उसे आत्म तो निरंतर क्षीण होती जाती हैं। शरीर संभव हो किसी क्षीण होती जाती है। उसे आत्म तो निरंतर क्षीण होती जाती है। उसे आत्म हनन करना पड़ता है और आत्म प्रताड़ना सहनी पड़ती है शरीर जिसकी सुख सुविधा के लिए समूचा जीवन खपा दिया गया वह भी देर तक साथ नहीं देता। विलासिता में अतिवाद का समावेश करने से वह दिन-दिन क्षीण होने लगता है। दुर्बल तथा रोगी बनता है। बुढ़ापा जवानी में ही आ घेरता है और अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है। स्वार्थी अपनी निष्ठुरता एवं लिप्सा के कारण बदनाम भी होता है। चरित्र को सुरक्षित नहीं रख पाता। अकरणीय कार्य करने में लोक निंदा, आत्म प्रताड़ना और अनुचित रीति अपनाने की दंड विद्या उसका पीछा नहीं छोड़ती उसका परिवार भी उसी ढाँचे में ढाल जाता है। जा सीखा है उसका प्रथम प्रयोग उसी पर होता है जिसने सिखाया है। शरीर और परिवार दोनों ही स्वार्थी को पीसते और निचोड़ते है। क्रिया की प्रक्रिया जब सामने आती है तब पता चलता है कि स्वार्थपरता के गठबंधनों में अपने आपको जकड़ना ऐसा ही है जैसा कि जान बूझकर किसी गहरे दल दल में फँस जाना। इस अनुपयुक्त मार्ग पर चलने वाले काँटों में उलझते, ठोकरें खाते, थकान से ग्रसित होते और भूल पर असाधारण रुदन जैसा पश्चाताप करते है।

शरीर की अमीरी महत्त्वाकाँक्षाएँ और परिवार की अनेकानेक तृष्णाएँ मिलकर इतनी भारी हो जाती है कि उनके ढोने में व्यक्तित्व का कचूमर निकलता है। वह ओछा घटिया, बनावटी, छिछोरा, अनगढ़ असभ्य माना जाता है। भले ही पैसे की दृष्टि से उसने कुछ संपन्नता ही संचित कर ली हो। प्रशंसा और प्रतिष्ठा उनकी होती है जो परमार्थी है आत्म संतोष और लोक सम्मान, जन सहयोग ही नहीं उन्हें दैवी अनुग्रह भी मिलता है। महामानव सिद्ध पुरुष-देवात्मा ऋषि मनीषी एवं भगवान का पार्षद, विशेष अंशधर उन्हें ही माना जाता है। जिनने परमार्थ को ही अपना सच्चा स्वार्थ माना। जिनने लोक मंगल में रस लिया उसके लिए समय निकाला और काम किया समझना चाहिए कि उसने सही मार्ग अपनाया और जीवन रथ को उस राह पर चलाया जिस पर कि दूरदूर्शी स्वयं चलते तथा दूसरों को चलाते है। स्वयं पार उतरते और दूसरों को अपने कंधों पर बिठा कर पार उतारते है।

परमार्थ के बल पर चलते हुए यह देखना होता है कि क्या कार्य विधि अपनाई जाय? इसके लिए दो ही निर्विवाद मार्ग है। एक प्रत्यक्ष दूसरा परोक्ष। प्रत्यक्ष में अपंग, असहाय, असमर्थ मुसीबतग्रस्त पिछड़े अनगढ़ लोग आते है। उन्हें मार्गदर्शन तथा आर्थिक सहयोग दे कर किस प्रकार स्वावलंबी बनाया जाय इसका यथा संभव प्रयास करना चाहिए। इस हेतु आर्थिक आधार पर आवश्यक साधन खड़े किए जा सकते है। कोई सेवा भावी इन कार्य में श्रम, समय का भी योगदान कर सकते है। यदि उनके लिए निर्वाह की आवश्यकता हो तो उसे भी दुखियारों की सेवा में ही गिना जाना चाहिए। चिकित्सालय, पाठशाला गृह उद्योग आदि की स्थापना के लिए धन नहीं योग्य कार्य कर्ताओं की भी आवश्यकता पड़ती है उनके लिए निर्वाह जुटाना भी प्रत्यक्ष परमार्थ मार्ग में ही आती है।

दूसरा इससे ऊँचा प्रयास है लोक मानस का परिष्कार सत्प्रवृत्ति संवर्धन इसे मानवी का परिष्कार, सत्प्रवृत्ति संवर्धन इसे मानवी व्यक्तित्व में दबी चेतना या प्राण फूँकना कह सकते है। जिन्हें यह सुयोग उपलब्ध हो समझानी चाहिए कि उनका कल्याण ही होगा। मनुष्य में स्वयं इतनी शक्ति सामर्थ्य है कि अपने दोष दुर्गुणों अभाव दरिद्रियों कष्ट-संकटों से स्वयं जूझ सके, उनसे निपट सके, निरस्त कर सके, कमी केवल प्रकाश मिलने की रहती है मार्ग दर्शन की। यदि मनुष्य सही सोच सके। सही कर सके। आदर्शों को गले उतार सके एवं पच सके तो समझना चाहिए कि विपत्तियों से ही छुटकारा नहीं मिला वरन् प्रगति का पथ भी प्रशस्त हो गया। मनुष्य न पराधीन है न परावलम्बी उसमें सामर्थ्य के इतने विपुल भण्डार भरे पड़े है कि प्रतिकूलताओं को वह तोड़-मरोड़ सकता है और परिस्थितियों को भी अनुकूल बना सकता है। कठिनाई एक ही है कि वह आत्मा को समझने, उसके स्वरूप उद्देश्य को चेतना के अंतराल तक पहुँचा नहीं पाता। वह अपने शरीर को, परिवार को ही सब कुछ मानता रहता है। उसी के लिए मरता खपता रहता है, मृत्यु तक को भूल जाता है न कर्म फल की स्मृति ध्यान में रहती है और न परलोक में भगवान के सम्मुख उपस्थित होने की। जिस कार्य के लिए जीवन मिला था। उस का उपयोग कितना सही हो सका इसका विवरण तैयार करने की भी अभिलाषा नहीं उठती। इस अर्ध मूर्छित स्थिति में नशे की गहरी खुमारी से न उबरना उबारना ही बन पड़ता है। इस तत्त्वज्ञान को जीवन दर्शन को जन मानस में उतारा उबारना ही बन पड़ता है। इस तत्त्वज्ञान को जीवन दर्शन को जन मानस में उतारा जा सके तो इन्हीं सामान्य मनुष्यों में से अनेकों ऐसे नर निकल सकते है जो मानवी गरिमा को उच्च स्तरीय बनाने के अतिरिक्त समाजगत प्रचलन में भी उच्चस्तरीय आदर्शवादिता भर सके। आदर्शवादिता जीवन में ढल जाती है तब समाज बदलने लगता है। स्वार्थपरायणता जो आज समाज में संव्याप्त है को परमार्थ परायणता में बदलना ही आज की परिस्थिति में सर्वोपरि युगधर्म है।


कैसे हो अंतस् में सत्य का अवतरण

सत्य का अर्थ है यथार्थता। जो बात जैसी है उसे उसी रूप में समझना मानना और प्रयुक्त करना सत्य की साधना हैं दुर्भाग्य से हम इन दिनों बनावट विडंबना भ्रांति और दुर्बुद्धि से भरे युग में रह रहे है। अज्ञान भरे अंधकार युग ने कुछ ऐसा कृत्रिम वातावरण बना रखा है जिसने बरसात की काली घटाओं में छिपे हुए सूर्य की तरह सत्य को एक प्रकार से छिपा दिया है। छल और कृत्रिमता का दूसरा नाम ही सभ्यता पड़ गया है। जो जितनी कृत्रिमता बरत सकता है, कुछ को कुछ बनाकर दिखा सकता है वह उतना ही बड़ा सभ्य और कलाकार माना जाता है। पिछली शताब्दियों और सहस्राब्दियों से असत्य और कृत्रिमता की आराधना में मानवीय मस्तिष्क संलग्न रहे है और अब वह उपार्जन इतना विशालकाय इतना सघन और प्रचलित हो गया है कि आमतौर से उसे ही सत्य माना जाने लगा है। आज सामान्य बुद्धि के लिए यह ढूँढ़ निकालना अति कठिन है कि प्रचलित मान्यताओं प्रथा परिपाटियों विश्वासों रीति-नीतियों एवं विचारणाओं में सत्य का कितना अंश है।

जिस कसौटी पर यथार्थता को कसा जा सकता है वह है विवेक। विवेक उस साहस का नाम है जिसके आधार पर बहु प्रचलित मान्यताओं की उपेक्षा करके भी सचाई को ढूँढ़ निकालने का भावना उत्पन्न होती है यही भावना है जिसके आधार पर कोई व्यक्ति सत्य का दर्शन कर सकता है। जो यह सोचना है कि समाज का वर्तमान प्रचलन ही ठीक है और उसी का समर्थन ठीक है तो फिर उसके लिए सोचने और ढूँढ़ने के सारे रास्ते ही बंद हो जाते है। प्रचलन के ढर्रे से लुढ़कते लुढ़कते अभ्यास परिपाटी के प्रति मनुष्य को मोह उत्पन्न हो जाता है, उसी के साथ पक्षपात जुड़ जाता है। अपनी यह दुर्बलता समझ में भी नहीं आती। लगता है हम जो सोचते है वही सत्य है जो करते है वहीं सत्य है, जिस रास्ते पर चल रहे है वही सत्य है। विभिन्न व्यक्ति अपनी प्रचलित परिपाटियों और रीतियों नीतियों को सत्य मानने लगते है चूँकि सत्य का निरूपण तो किसी ने किया नहीं अपनी-अपनी परिपाटियों को ही सत्य मान लिया है। इसलिए उनकी मान्यताएँ स्वभावतः एक दूसरे से भिन्न अथवा विपरीत होती है।

इस भिन्नता एवं विपरीतता को स्वभावतः वे वर्ग नापसन्द करते है, कई बार घृणा भी करते वे वर्ग नापसन्द करते है कई बार घृणा भी करते है और यदि असहिष्णुता की मात्रा अधिक हुई तो परस्पर संघर्ष भी खड़ा हो जाता है। एक दूसरे को असत्यवादी मानते है। उनकी लड़ाई का आधार तो सत्य का समर्थन और असत्य का निवारण होता है पर वस्तुतः दोनों ही असत्य का निवारण होता है पर वस्तुतः दोनों ही असत्य का समर्थन और सत्य ढूँढ़ने की किसी ने चेष्टा नहीं की। अपने चारों ओर घिरे मानसिक अथवा सामाजिक वातावरण को ही सही माना जब कि वस्तुतः वह एक पक्ष मात्र था। इतिहास के अगणित पृष्ठ इसी सत्य के आवरण में छिपे पक्ष मात्र था। इतिहास के अगणित पृष्ठ इसी सत्य के आवरण में छिपे पक्षपात से लाखों करोड़ों मनुष्यों के शोणित तर्पण की करुण कथा से कलंकित हो रहे है गोरी गजनबी नादिरशाह औरंगजेब आदि ने धर्म की सेवा के नाम पर क्या नहीं किया था। ईसाई और गैर ईसाई मुसलिम और गैर मुसलिम आर्य और अनार्य आदि की भिन्नताओं ने कितनी नृशंसताएँ उपस्थित की इसका लंबा इतिहास पढ़ने पर लगता है कि मनुष्य सत्य के अवलंबन की डींग मात्र हाँकता है वस्तुतः सत्य से कोसों दूर है।

आज के तमसाच्छन्न युग में यह नितांत आवश्यक है कि सत्य और असत्य का नए सिरे से विश्लेषण किया जाय और उसका आधार विवेक, न्याय एवं औचित्य को माना जाय। दूसरों के प्रति जो व्यवस्था लागू की जा रहीं है। वहीं यदि अपने प्रति भी लागू हो तो कैसी लगे? इस कसौटी पर न्याय अन्याय का निरूपण आसानी से हो सकता है। उसी प्रकार यदि यह मानकर चला जाय कि संसार के बहु संख्यक व्यक्ति अनुपयुक्त विचारणा और क्रियापद्धति के अभ्यस्त है तो फिर तथाकथित लोकभय से मुक्ति पायी जा सकती है और स्वतंत्र चिंतन के लिए उपयुक्त दिशा मिल सकती है। अपनी मनोभूमि के पक्षपात को भी समझना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि हम जिस परंपरा में जन्मे पले और बड़े हुए है स्वभावतः उसी के समर्थन में बुद्धि काम करेगी। इसलिए स्वतंत्र चिंतन, सत्य का अन्वेषण, करने के लिये इतना साहस भी एकत्रित करना होगा कि अपनी अभ्यस्त बुद्धि की भी उपेक्षा करके विश्वव्यापी सत्य का निरूपण कर सकने की भावना सही रूप का निरूपण कर सकने में समर्थ हो सके।

‘हमारा सो सही आपका सो गलत’ आज सही गलत की सही मात्र परख है। अपनी जाति, भाषा देश, वंश परिवार संप्रदाय, रहन-सहन रीति रिवाज एवं विचार पद्धति का जो अनावश्यक पक्षपात है उसे हटाया जाना चाहिए और निष्पक्ष विश्व के निष्पक्ष नागरिक की तरह एक न्यायनिष्ठ जज की तरह हमें हर प्रचलित रीति नीतियों और विचारणाओं पर गंभीरता-पूर्वक विचार करना चाहिए। न तो प्राचीन के प्रति मोह रहे और न नवीन के प्रति द्वेष। प्राचीन हो या नवीन इससे यथार्थता में कोई अंतर नहीं आता। किसी सड़ी गली मृतप्राय वस्तु को इसलिए सँजोकर नहीं रखा जा सकता है कि वह पुरानी है।

जिस प्रकार दूसरे लोगों के बारे में गलत राह अपनाने वाला सोचा जा सकता है उसी प्रकार बहुत संभव है कि विवेक की कसौटी पर अपनी मान्यताएँ अथवा गतिविधियाँ परखी जाय तो वे असत्य निकले। ऐसी दशा में हमें इतनी निष्पक्षता तो अपने भीतर उत्पन्न कर ही देनी चाहिए कि जो सत्य होगा उसे स्वीकार करेंगे अपने और पराए का प्राचीन और नवीन का कोई भेद भाव एवं पक्षपात पैदा न होने देंगे इतना आधार यदि तैयार हो सका तो ही आशा की जा सकती है कि सत्य का अवतरण संभव हो सकेगा।


तप का उद्देश्य आत्म परिष्कार

जीवात्मा अपने साथ जन्म जन्मान्तरों के संस्कारों को सूक्ष्म रूप में लेकर अवतरित होता है जिस परिवेश में मनुष्य रहता है विकसित होता है उसके संस्कार भी साथ में जुड़ते चले जाते हैं। कुसंस्कारों का परिमार्जन न हो तो आत्म साधना की गति अवरुद्ध हो जाती है। जप और ध्यान की साधनाएँ भी उतनी सहयोगी नहीं बन पातीं जितनी कि होनी चाहिए, क्योंकि परिशुद्ध अंतःकरण में ही ईश्वरीय सत्ता का प्रकाश अवतरित होता है। वह स्थिति नहीं बन पड़ने पर दिव्य अनुदानों से वंचित रहना पड़ता है। प्रायः देखा भी जाता है कि अनेक लोग घंटों जप-ध्यान करते है, पर उनकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है, कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल पाती। इस विफलता का एक ही कारण है कि अंतः की मलिनता का परिमार्जन नहीं हो सका। अध्यात्म मनीषियों ने इस अवरोध को दूर करने का उपयुक्त माध्यम तप बताया है। अभ्यास ही स्वभाव बनता और संस्कार के रूप में परिणत हो जाता है अनुपयुक्त अभ्यासों को तोड़ना तप का प्रमुख लक्ष्य है। वे शारीरिक क्रियायें व मानसिक चिंतन सभी में सम्मिलित है। प्रायः तन मन एवं अंतःकरण के अभ्यास ही अगणित स्थूल, सूक्ष्म क्रियायें व मानसिक चिंतन सभी में सम्मिलित है। प्रायः तन मन एवं अंतःकरण के अभ्यास ही अगणित स्थूल सूक्ष्म क्रियाओं को गति देने का कारण बनते है। मानवी अंतरात्मा के प्रतिकूल उनका स्वभाव होने पर पतन-पराभव का सिलसिला शुरू हो जाता है अस्तु उनका परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो जाता है।

तप स्वयं को तपाने की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मल विक्षेपों अवाञ्छनीय वृत्तियों कुसंस्कारों को जलने गलने का अवसर मिलता है साथ ही प्राण ऊर्जा का उत्पादन संवर्धन भी होता है। यह दो क्रियाएँ इसमें साथ साथ चलती है इसी का मृदु रूप तितिक्षा है, जो शारीरिक मानसिक दोनों प्रकार की होती हैं। सामान्य स्थिति में मनुष्य अपने मन व इच्छाओं का दास होता है। किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं होने से इच्छाएँ इन्द्रियों को विषय वासना के आकर्षणों के पीछे दौड़ती रहती है और उनकी प्राप्ति के लिए मनुष्य तरह-तरह के उपक्रम करता रहता हैं। एक बार मन को इनके सेवन का अवसर मिल गया तो अगली बार उनकी यह लिप्सा द्विगुणित हो उठती है। वह इसी की प्राप्ति के अवसर ढूँढ़ता रहता है इस प्रकार मनुष्य अवगति की ओर बढ़ता जाता है। मन की इसी हेय प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए तप का विधान है इस योगाग्नि में तप कर मनुष्य सोने की भाँति शुद्ध खरा व प्रखर बन जाता है। इसलिए तप को साधना का प्राण कहा गया है। उसमें जो कुछ भी शाश्वत उदात्त उपादेय तथा महत्त्वपूर्ण है वह सब तप से संभूत है।

तप की महत्ता और उपयोगिता का बखान करते हुए वैदिक ऋषि कहते है कि तपस्या से वेदों की उत्पत्ति हुई। तप से ही ऋत और सत्य उत्पन्न हुए इसी से ब्रह्म की खोज संभव है। मृत्यु पर विजय और ब्रह्मलोक की प्राप्ति एक तपस्वी ही कर सकता है। तपने में ही व्यक्ति समाज और संसार का कल्याण है। यह साध नहीं नहीं साध्य ब्रह्म भी है।”

नीति शास्त्र के प्रवर्तक महर्षि मनु का कथन है “तप से ऋषिगण त्रैलोक्य जगत के चराचर प्राणियों का साक्षात्कार करने में समर्थ होते थे। जो कुछ भी दुर्लभ और दुष्प्राप्य इस संसार में है वह सब तपश्चर्या द्वारा साध्य है।”

मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है- यह आत्मा तप और सत्य के द्वारा ही जाना जा सकता है।” पातंजलि योगसूत्र में वर्णन है-तप से अशुद्धि के क्षय होने से शरीर और इन्द्रियों की शुद्धि तथा सिद्धि की प्राप्ति होती है।

इस तरह जिस प्रयास से शोधन की क्रिया संपन्न होती है, अथवा जिसमें इस प्रकार का प्रयोजन निहित हो उन सभी प्रकार के कृत्यों को योगशास्त्र में तप की संज्ञा दी गई है किंतु जिनसे यह प्रयोजन नहीं सधता जो मात्र प्रशंसा प्रदर्शन के निमित्त किये जाते है उन्हें तप की श्रेणी में नहीं रखा गया है। तप का एकमात्र उद्देश्य आत्म-परिष्कार हैं। इसे क्रियायोग का एक अनिवार्य अंग माना गया है। साधनाएँ इसके साथ जुड़कर ही फलीभूत होती रही है एवं रहेगी।


अपने पराये का भेद (Kahani)

यमराज की पत्नी का स्वर्गवास हो गया वह इस असामयिक निधन पर शोकाकुल होकर लगातार रोता रहा। पुरोहित उसे सान्त्वना देने गये। ब्रह्म ज्ञान सुनाते रहे और उसके शोक को मूर्खता बताते रहे।

कुछ दिन बाद पुरोहित की लँगड़ी गाय मर गई। बच्चों के उसी के दूध का सहारा था। इस क्षति से पंडित जी को भारी चोट लगी। आँखों से आँसू बहने लगे और हिचकी बँध गई।

जिनने पुरोहित को यजमान से ब्रह्मज्ञान बघारते सुना था। उनमें से कुछ पड़ोसी गाय के निधन पर किये जा रहे विलाप को भी सुनने आ पहुँचे। उनमें से कई ने कहा देखा, अपने पराये का भेद।


आसक्ति ही मनुष्य को भटकाती है भूत बनाकर

अत्याधिक आसक्ति व्यक्ति को न केवल इस जीवन में अशान्त बनाये रखती है वरन् मृत्यु के बाद भी वह उसी तृष्णा वासना से मनुष्य को घुमाती और बेचैन बनाये रहती है। भूत-प्रेत बने रहने और मारे-मारे भटकते फिरने की दयनीय विवशता का यह आसक्ति का अतिरेक ही कारण बनता है। आसक्ति का अतिरेक ही कारण बनता है। आसक्ति और आवेश की अधिकता, उद्विग्नता से विक्षुब्ध अशान्त अतृप्त लोग भूत प्रेत बनकर भटकते है और अपनी आसक्ति की तृप्ति के प्रयास में यों ही एक लंबी अवधि गुजार देते है।

घटना दक्षिण पूर्व इंग्लैण्ड में बोले गाँव के एक गिरजाघर की हैं वर्ष 1939 में फागुन मास की घोर अँधियारी रात को जूहा नामक पादरी के मकान में अचानक आग लगी। गाँव वालों को जब इस दुर्घटना के बारे में पूछा गया तो उनने एक ही उत्तर दिया कि आग लगने से 15 माह पहले ही एक भिक्षुणी की आत्मा ने बता दिया था कि पादरी का आवास जलकर नष्ट हो जाएगा उनका कहना है कि इसके बाद फिर हमने उस भूतनी आत्मा को नहीं देखा है।

बोले गाँव के गिरिजाघर से सटे इस पादरी के मकान का निर्माण कार्य सन् 1863 में पूरा हुआ था। लाल ईंटों से विनिर्मित छोटी छोटी खिड़कियों वाले इस मकान की बनावट बड़ी फूहड़ किस्म की थी। फिर इसके साथ भूत की कहानी जुड़ जाने से तो दृश्य ओर भी अजूबों गरीब हो गया। इस ग्राम के निवासियों के अनुसार तेरहवीं सदी में इस मकान के स्थान पर एक मठ बना था। जिसमें एक नवयुवती भिक्षुणी रहती थी। मठ के ठीक सामने कानवेन्ट का एक नवयुवक पादरी रहने लगा। मसीही धर्म की आड़ में पल रहे दोनों में प्रेम प्रसंग का दौर चल पड़ा चूँकि गिरिजाघर के अनुशासन ही ऐसे थे कि अविवाहित रहकर ही सेवा धर्म का निर्वाह हो सकता था, वे विवाह संस्कार संपन्न नहीं कर सके क्यों कि उनसे संकल्प पत्र भरवा लिए थे। जवानी में वासना की बाढ़ इतनी प्रबल निकली कि संकल्पों के बाँध को टूटने में तनिक भी देर नहीं हुई। परस्पर एक दूसरे को निहारते, वार्तालाप करते और मिलने जुलने का क्रम बनाते चले गये। इस सघन संपर्क के साये में पल रही आसक्ति मोह की बेल इतनी तेजी से फैली कि दोनों के सिर के ऊपर होकर निकल गई। धार्मिक समाज ने जब उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और ऐसा करने पर कठोर सजा देने का आदेश दे दिया तो दोनों ने गाँव छोड़कर किसी अन्य स्थान पर चले जाने का निश्चय कर लिया। रात्रि के समय वे एक घोड़ा गाड़ी में छिप कर भागने की कोशिश करने लगे तो पकड़ में आ गये। नवयुवक पादरी को तुरंत सूली पर चढ़ा दिया और भिक्षुणी को उस मठ की दीवार में जिंदा चुन दिया गया तभी से श्वेत वस्त्र धारी भिक्षुणी की आत्मा अतृप्त, अशान्त होकर भटकाती चली आ रहीं है।

भिक्षुणी की उदास, हताश और निराश प्रेत-छाया प्रायः देखने को मिलती रहीं है। जिस मार्ग से इस परछाई को घूमते फिरते देखा गया उसका नाम ही “भिक्षुणी का पथ” पड़ गया। सन् 1929 में पादरी के इस भुतहा मकान का रहस्य तब समझ में आया जब इस मकान का रहस्य तब समझ में आया जब इस भूतहे मकान का रहस्य तब समझ में आया जब इस मकान के पादरी स्मिथ ने डेरी मिरर के संपादक को एक पत्र लिखा कि इस तथ्य को उजागर किया जाय। संपादक महोदय ने इंग्लैंड के ही सुप्रसिद्ध परा मनोविज्ञानी हैरी प्राइस ने घोड़ा गाड़ी की आवाज पर संदेह किया कि तेरहवीं सदी में इसका कोई प्रचलन ही नहीं था फिर भी उनने इस भूतहे दृश्य को सही साबित किया है। कहते है कि हैरी प्राइस के मकान में पहुँचने पर तो भूतही हलचलें और भी अधिक बढ़ गयी। जलती मोमबत्ती का अचानक गिर पड़ना-कंकड़-पत्थर फिनाइल की गोलियाँ गिरना अचानक ही गिरिजाघर की घंटी का बजना तथा चाबी का गुच्छा ताले से दूर गिर जाना आदि। गतिविधियों को देखकर हैरी हतप्रभ रह गये। डेली मिरर रिपोर्टानुसार हैरी प्रइस को अंततः वह मकान खाली ही करना पड़ा और डेढ़ वर्ष तक वह वैसा ही पड़ा रहा।

सन् 1931 में फायस्ट रनाम का एक पादरी इस मकान में सपरिवार आ बसा। अब तो प्रेतात्मा और भी उग्र हो गयी। पत्थर बरसाने और मारपीट करने का सिलसिला चल पड़ा श्रीमती फायस्टर ने ऐसी 2000 घटनाओं के प्रमाण अपनी डायरी में नोट किये जिनके कारण वह अत्यधिक उत्पीड़ित रही इस भूतही आत्मा को भगाने के उनने अनेकों प्रयास किये किंतु विफलता ही हाथ लगी। फायस्टर दंपत्ति ने बड़ी मुश्किल से दस मकान में चार वर्ष बिताये अंततः इसका परित्याग करना ही पड़ा तदुपरान्त गिरिजाघर के पादरियों की एक संगोष्ठी बुलाई और निर्णय किया गया कि अब इस मकान में कोई भी व्यक्ति नहीं रहेगा।

चर्च के पादरियों ने जब इस आवास को न रहने योग्य सिद्ध कर दिया तो हैरी प्राइस ने अपने प्रयोग - परीक्षण हेतु चुन लिया और किराये पर रहने लगे। उनने टाइम्स नामक लंदन के समाचार पत्र में विज्ञापन दिया कि जो लो भूत प्रेत के अस्तित्व पर विश्वास न रखते हो कृपया यहाँ आकर देख लें। प्रत्युत्तर में अनेकों वैज्ञानिक इंजीनियर चिकित्सक तथा प्रबुद्ध वर्ग के लोगों ने हैरी से संपर्क स्थापित किया तो उनने भिक्षुणी की अतृप्त आत्मा को भटकते हुए स्पष्टतः देखा। भटकी हुई प्रेतात्मा उस मकान की दीवार पर भी कुछ लिखते हुए नजर आई इन समूतों से यही सिद्ध हुआ कि भिक्षुणी का नाम मैरी था। वह फ्राँस की रहने वाली थी। प्रेम प्रसंग चलने के कारण उसकी हत्या कर दी गयी थी। सन् 1939 में अचानक ही इस मकान में आग लगी तो भिक्षुणी की अस्थियाँ भी जलकर भस्मसात् हो गयी। यही उसकी प्रेत लीला पर विराम लग गया।

भारतीय ऋषि आसक्ति मोह के अतिरेक को दूर करने का परामर्श और प्रेरणा सतत् देते रहे हैं। ताकि चित्त पर स्मृतियों आसक्तियों का बोझ न रहे और हलके-फुलके होकर यह जीवन भी जिया जा सके और अगले जीवन में भी सहज गति में कोई बाधा न रहे। वासनाओं और आवेशों का आधिक्य न केवल इस जीवन को भारभूत बना डालता है अपितु अगले जीवन को भी अभिशाप मय बनाकर रख देता है। उनसे मुक्त रहने पर ही जीवन का सहज स्वाभाविक आनंद प्राप्त हो सकता है।


प्रेम की विराट् परिधि

प्रेम क्या है? विज्ञान के अर्थ में कहें तो सुविधा-साधनों की दृष्टि से संसार को समुन्नत बनाना। दर्शन की दृष्टि से विचार करें, तो उत्कृष्टतावादी चिंतन देना। कर्मयोग की भाषा में कर्मनिष्ठा पैदा करना और समाजशास्त्र के मत में सुव्यवस्था लाना।

इन आरंभिक व्यक्तिवादी कार्यों के माध्यम से स्नेह जब विराट विस्तार पाता है तभी वह वास्तविक प्रेम बनाता और वरेण्य साबित होता है पूर्ण सत्य का यही पूर्ण प्रकाश है। विज्ञान, दर्शन कर्म समाजशास्त्र यह सब संपत्ति जिस लक्ष्य के प्रति समर्पित है उनमें उनका प्रेम तो झाँकता है, किंतु वह न्यून और अपूर्ण है। उसका संपूर्ण प्रकाश अध्यात्म के उस संक्षिप्त सूत्र में सन्निहित है जिसमें आत्मवत् सर्वभूतेषु कह कर उसे अभिव्यक्त किया गया है। निस्संदेह समाज के लिए सुविधा-साधनों का विकास कर विज्ञान ने एक प्रकार से प्रेम का ही प्रदर्शन किया है। पर यह तुच्छ प्यार तब तक महत्त्वहीन है जब तक वह अपने निखिल अंश में न प्रकाशित हो। विज्ञान का दायित्व समाज को प्रगति की ओर ले चलना है किंतु जब क्षुद्र स्वार्थ में पड़ कर वैज्ञानिक अवगति के सरंजाम जुटाने लगे तो समझना चाहिए कि जिस अनुराग का अभ्युदय अंतर में हुआ था, वह निजी सुख से कुछ ही आगे बढ़कर छोटे दायरे में सीमाबद्ध हो गया। यह परिमित स्नेह इस परिधि को पार कर असीम न बना, तो फिर वैज्ञानिक विकास भी शोषण-उत्पीड़न का निमित्त ही बना रहेगा और सुविधाओं का दुरुपयोग ही करता रहेगा। जहाँ दुरुपयोग हो हानि हो वहाँ विशुद्ध अनुराग की आशा नहीं की जा सकती। इसके विपरीत जहाँ विकार रहित प्रेम होगा, वहाँ अपनत्व होगा और अपनत्व की पीड़ा भी होगी यह पीड़ा ही सदुपयोग को प्रोत्साहित और दुरुपयोग को हतोत्साहित करती है। इसके अभाव का नाम ही स्वार्थ है। स्वार्थियों में न तो वात्सल्य होता है, न उपकार की भावना ही उल्टे वे अपकार में निरत रह कर दूसरों को हानि पहुँचाने की ही चेष्टा करते रहते है इस प्रकार विज्ञान का विकास वास्तविक स्नेह की अनुपस्थिति में विनाश का हेतु साबित होता है।

दर्शन चिंतन की एक विधा का नाम है। समयानुकूल दर्शन से समाज का मार्गदर्शन होता है और यह ज्ञात होता है कि समस्त लोगों को वह उन्नति की दिशा में आगे बढ़ा ले जाने की उत्कंठा रखता है। इतने पर भी सब कुछ चिंतन क्षेत्र तक ही सीमित रहे और व्यावहारिकता के धरातल पर जीवन में न उतरे तो इसे भी पूर्ण सत्य का-पूर्ण प्रेम का अपूर्ण अंश ही कहना चाहिए। इतने से भी बात बनने वाली नहीं। दर्शन प्रभावोत्पादक तब होता है जब वह प्रतिपादक के जीवन में उतर कर कर्म में परिवर्तित हो जाय। यदि इतना न हो सका जीवन सामान्य स्तर से ऊँचा न उठा तो फिर दोहरे व्यक्तित्व का कलंक सिर पर लदता एवं अपमान अपयश का भागी बनना पड़ता है। इसलिए दर्शन की पूर्णता उस अंतिम सत्य में निहित मानी गयी है जहाँ दार्शनिक मात्र चिंतक बना नहीं रहता वरन् एक आदर्शनिष्ठ पुरुष की तरह समाज के साथ व्यवहार करता है। यही अनुराग है, जिसकी की आखिरी परिणति के बारे में श्रुति कहती है “आनन्दरुपममृतं यद्विभाति” अर्थात् वह (प्रेम) आनन्द रूप में प्रकाशित होता है। यह सत्य है कि आनन्द की उपलब्धि वात्सल्य के बिना संभव नहीं। दोनों एक-दूसरे के सहोदर -सहचर है। जहाँ प्रेम का प्रकाश है आनंद का उल्लास वहीं दिखाई पड़ता है।

प्रीति का चौथा स्वरूप कर्मनिष्ठा है। यह दो प्रकार की मानी गई है। एक वह जो व्यक्तिगत कार्यों के प्रति उपजाती है, तब वह स्वार्थलिप्सा मात्र बनकर रह जाती है, ऐसी लिप्सा जहाँ केवल अपने ही उन्नयन की चाह हो। दूसरी वह जहाँ अपने और परायेपन का लोप हो जाता है और सभी कार्य अपने निजी प्रतीत होने लगते हैं भले ही वह पारिवारिक हों सामाजिक राष्ट्रीय नैतिक धार्मिक कुछ भी हों। जहाँ स्तर भेद समाप्त होकर सभी का एकीकरण हो जाय वही कर्तव्य बोध का प्रथम उदय होता है। इस कर्तव्य बोध का विकास ही कर्मयोग का प्रारंभ है। जब कर्म योग में रूपांतरित होने लगे तो समझना चाहिए कि उस यथार्थ की उपलब्धि हो गई जिसका बाह्य स्वरूप ‘प्रेम’ है।

समाज की इकाई व्यक्ति है, इस दृष्टि से व्यक्तिगत जीवन में शांति और सुव्यवस्था की प्रतिष्ठापना अभीष्ट और आवश्यक तो है पर साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना पड़ेगा कि यह अनुशासन समाज में स्थापित हो सका या नहीं। यदि नहीं तो वह कौन से उपाय उपचार हो सकते है। जिनके माध्यम से सामाजिक अशान्ति और असंतोष को दूर कर उसे उत्कर्ष की ओर ले जा सकना संभव है? यह सोचना समाजशास्त्री का दायित्व है। जिस परिमाण में वह इसे पूरा करता

है उतने ही अंशों में वह प्रेम रूप ईश्वर को प्राप्त करता चलता है। इस मार्ग में बढ़ते हुए जब उसे यह अनुभव होने लगे कि उसके वैयक्तिक और वैश्य शरीर में कोई अंतर नहीं ओर इनकी भी देख रेख काया की तरह होनी चाहिए, तो वह प्रीति के चरमोत्कर्ष पर प्रतिष्ठित हो जाता है। यही पूर्णता प्राप्ति है। इस अवस्था में उसे निजी देह के कोश-कोश ऊतक ऊतक के बीच जिस प्रकार का जितना संतुलन सामंजस्य दिखाई पड़ता है वही तालमेल वह इस विराट् वैश्व-देह के मानव-मानव और संस्था-संगठन के मध्य स्थापित करने के लिए आकुल-व्याकुल होने लगता है। यही वह अवस्था है जब परम सत्य वात्सल्य बनकर फूट पड़ता है। एकाकी व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में शान्ति और सुव्यवस्था अपना कर प्रशंसा का पत्र तो बन सकता है पर जिस यात्रा की शुरुआत परम तत्त्व की उपलब्धि कराने में सफल हो सकती थी उसकी यदि इतिश्री निजी जीवन में मान ली गई तो समझना चाहिए कि पूर्णता की देरी नाप न सके और स्वार्थ-सुख में उलझ कर छितरा गये। इस दुर्भाग्य को सौभाग्य को सौभाग्य सुख में बदल सकना विराट् स्तर पर किये गये प्रेम द्वारा ही संभव है।


भय का मनोविज्ञान

अकड़न की बीमारी जब शुरू होती है, तो सारे शरीर को बुरी तरह जकड़ लेती है अंग सीधे नहीं होते चलना उठना कठिन हो जाता है रक्त ठंडा पड़ जाता और दिमाग सोचना बंद कर देता है, चाहने पर भी शरीर कुछ काम नहीं करता। यह लक्षण अन्य बीमारियों के भी हो सकते है पर सर्वसाधारण में तो इनका प्रकटीकरण भय के दौरान ही होता है। सिंह को देखकर हिरन चौकड़ी भरना भूल जाते हैं और कर्तव्य विमूढ की सी स्थिति में पड़े रह कर बेमौत मारे जाते हैं। जब कोई अप्रत्याशित संकट सामने आ खड़ा होता है फिर तो उससे कुछ भी सोचते नहीं बन पड़ता हाथ पाँव फूलने लगते हैं और जो नहीं घटने चाहिए वह सब घटित हो जाते हैं।

जो कृष्णमूर्ति अपनी पुस्तक प्रथम और अंतिम मुक्ति में लिखते है कि जैसा कि भय के बारे में सोचा और समझा जाता है वास्तविकता वैसी है नहीं, डर हमेशा ज्ञात के प्रति ही हो सकता है अज्ञात के प्रति भीत बनने का कोई कारण नहीं है जहाँ ऐसा प्रतीत होता है वहाँ समझने में भूल हो जाती है। वे कहते हैं कि आम धारणा में मृत्यु को भयकारक माना जाता है पर यह सच नहीं है कारण कि साधारण स्थिति में न तो मौत को जाना जा सकता है, न उसकी अनुभूति की जा सकती है। जिसे देखा नहीं जिसकी भयंकरता समझी नहीं भला उससे डर कैसा? त्रास के वास्तविक कारण का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि संकट व्यक्ति को उस विलगाव में दिखाई पड़ता है जहाँ वह अपने प्रिय कुटुंबियों वस्तुओं संपदाओं भोगों से स्थायी पृथकता की कल्पना करता है। अलग हो जाने की यही धारणा भय का यथार्थ कारण है।

कोई भूत जिसके बारे में बालक ने कुछ सुना नहीं कभी देखा नहीं वह यदि अचानक उसके सामने प्रकट हो जाय तो इतना निश्चित है कि वह उसे देखकर भागेगा नहीं वरन् और प्रसन्न होगा कि एकांत ओर सुनसान राह पार करने के लिए एक साथी मिल गया यह अज्ञानता की निर्भयता हैं। यही कारण है कि दुनिया में बालक जितने निडर ओर निर्भय होते है उतने शायद ही साधारण जन बनते देखे जाते है। उनको न तो क्षणमात्र में भस्मसात् कर देने वाली आग के स्वभाव के बारे में जानकारी रहती है, न साँप बिच्छू की भयंकरता का परिचय होता है। इसीलिए आये दिन अग्नि के स्पर्श से उनके जलने और जहरीले कृमि कीटकों को पकड़ लेने और पीड़ा भोगने के समाचार प्रकाश में आते ही रहते है।

दूसरी ओर धर्मभीरु लोग ईश्वर से इसलिए डरते है क्योंकि उन्हें उसकी कर्मफल व्यवस्था और दंड-विधान का पता होता है। वे अपंगों बीमारों कोढ़ियों के रूप में उनके पापकर्मों का दारुण फल-भोग देखते ही रहते और ऐसा प्रयास करते है जिससे जीवन में कोई अनैतिक कर्म न बन पड़े जिसका दंड आने वाले समय में आगामी जीवन में भीषण त्रास की तरह झेलना पड़े

इसके विपरीत ऐसे भी लोगों की कमी नहीं जिन्हें भयंकरता का ज्ञान होते हुए भी भयकारक वस्तुओं प्राणियों परिस्थितियों से आँख मिचौनी खेलते रहते है सपेरे रोज ही काले विषधर नाग पकड़ते है शिकारी शेर-बाघ का शिकार करते ही रहते है। उन्हें वे जरा भी डरावने नहीं लगते, वरन् उन्हें ढूँढ़ते रहते है और मिल जाने पर प्रसन्न होते है जबकि अजनबी व्यक्ति को साँप शेर की तस्वीर देखने ओर चर्चा सुनने भर से पसीना छूटता है।

अँधेरे में घुसने में डर लगता है। सुनसान में प्रवेश करते हुए पैर काँपते है। मन में तरह-तरह की आशंकाएँ उठती है कि उस अँधेरे सुनसान में न जाने क्या विपत्ति होगी न मालूम कैसे जहरीले जीव-जंतु हो इतना सोचते ही दिल बेतरह धड़कने लगता है पर जब उसमें निधड़क प्रवेश किया जाता है दीपक लेकर देखा जाता है तो प्रतीत होता है कि वहाँ डरने जैसा कुछ भी नहीं था मन की दुर्बलता ही है जो जरा-सा आधार मिलते ही तिल का ताड़ बनाती है काल्पनिक भय गढ़कर उन्हें इस तरह चित्रित करती है माने प्राणघातक सर्वनाश संकट आ गया अब बचना कठिन है जबकि वस्तुतः जरा-सा कारण ही वहाँ रहा होता है और वह भी इतना छोटा कि उसके साथ आसानी से निपटा जा सके।

दुनिया में लाखों करोड़ों लोग अँधेरे में रहते और आते जाते है वन्य प्रदेशों में यदा-कदा ही दीपक का प्रयोग होता है। किसान खेतों पर सोते है और रात को रखवाली करते है छोटी झोपड़ियाँ बना कर सघन जंगलों में वनवासी परिवार समेत रहते है। धनी लोग सघन बस्ती से हटकर खुले बंगलों में रहते है। चोर डकैत भूत पलीत कहाँ किसी को खाते है? यदा कदा तो दुर्घटनाएँ दिन दहाड़े बीच बाज़ार में भी हो सकती है संकट के वास्तविक अवसर कम ही आते है अधिकतर तो लोग काल्पनिक संकट गढ़ते है और अपने बनाये मानसिक चित्र को देख देख कर डरते मरते रहते है।

भय वस्तुतः कायरता की प्रतिकृति है। अपना चेहरा जैसा भी होगा, वैसा ही दर्पण में दीखेगा आँखों में पीला चश्मा चढ़ा लेने पर हर चीज पीले रंग की दिखाई देगी। भीरु मनुष्य की आंतरिक दुर्बलता इस संसार दर्पण में विपत्ति बनकर दीखती है संकट का सामना करने की उससे उलझने निपटने का क्षमता अपने में नहीं है ऐसा मान लेने के बाद ही डर आरंभ होता है। जिसे यह भरोसा है कि कठिन परिस्थितियों का सूझ-बूझ के साथ मुकाबला करेंगे उन्हें हटाने मिटाने के लिए जूझेंगे इसके लिए अवश्य समझ और बल अपने पास है मित्र और ईश्वर भी साथ देंगे इस प्रकार की हिम्मत यदि अपने में मौजूद हो तो काल्पनिक डरो से छुटकारा मिल जाता है और मन का अधिकांश बोझ हलका हो जाता है।

विख्यात हंगेरियन मनोवैज्ञानिक फेरेज नैडेस्डी ने अपनी पुस्तक फियर आँर फ्रीडम में भय का एक अन्य कारण गिनाते हुए लिखा है कि डर वही उत्पन्न होता है जहाँ एक विशेष प्रकार के ढाँचे में जीने की इच्छा होती है एक विशेष प्रकार के जीवन की चाह होती है। इस ढाँचे को चाह को ढह और त्याग कर व्यक्ति कुछ समय के लिए भय-मुक्त हो सकता है पर ऐसा तभी है जब वह इस सत्य को भली भाँति जान ले कि उक्त आकांक्षा ही भय का कारण कर रहा है वे कहते है कि किसी एक ढाँचे को तोड़ देने मात्र से ही कोई पूर्णतया भय मुक्त नहीं हो सकता। इससे इतना ही अंतर पड़ सकता है कि हम एक शैली को छोड़ कर किसी दूसरी जीवन शैली में प्रवेश कर जायेंगे वह दूसरे प्रकार का भय उत्पन्न करेगी। इसे भी यदि तोड़ा गया, तो कोई तीसरी जीवन शैली के हम अधीन हो जायेंगे वह पुनः अपने तरह का भय पैदा करेगी तथ्य यह है कि इस प्रकार किया गया कोई भी कार्य जो ढाँचा तोड़ने की प्रवृत्ति पर आधारित हो केवल एक दूसरी प्रणाली उत्पन्न करेगा और भय का कारण बनेगा। अंततः वे भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचते है। कि इस प्रकार तोड़ने और बनाने की क्रिया से भय मुक्ति संभव नहीं। स्थायी शांति तभी संभव है जब मूल निमित्त मन को साधा और सुधारा जा सके।

अनैतिकता को भी भीरुता का एक कारण माना जाता है। जिसकी अंतरात्मा कलुषित और पाप कर्म से लिप्त है वह कभी चैन की नींद न सो सकेगा। उसे दूसरे की ओर से तरह-तरह की आशंकायें रहेगी उन्हें उनसे धोखा होने का बदला लेने का फँसा देने का डर बना ही रहेगा। पोल खुल जाने पर बदनामी फैलेगी। और लोग सतर्क होकर उसके जाल में फँसने तथा देने से अलग हो जायेंगे निंदा और असहयोग की स्थिति में उसका भविष्य ही अंधकारमय हो जाएगा इससे उसका मन सदा आशंकित रहता है। पापकर्म के फलस्वरूप समाज का दंड राजदंड तथा ईश्वरीय दंड मिलते हैं तीनों इकट्ठे होकर या पृथक्-पृथक् से वे कभी न कभी मिल कर ही रहेंगे इस भय से भीतर ही भीतर बड़ी बेचैनी रहती है। इस आत्मदेव की पीड़ा उसे निरंतर टोकती रहती है बाहर वाले दंड मिलने में तो देर सबेर भी हो सकती है पर आत्म दंड नेह कुमार्ग पर कदम धरते ही मिलना आरंभ हो जाता है और वह निरंतर दुःख देता रहता है।

ब्रिटिश मनःशास्त्री रिचर्ड गार्नेट अपने ग्रन्थ ‘साइकोलॉजी ऑफ फियर’ में लिखते है कि शारीरिक कष्ट एक स्नायुगत अभिक्रिया है किंतु मानसिक कष्ट तब उत्पन्न होता है जब व्यक्ति का किसी वस्तु से गहनतम तादात्म्य हो जाता है ऐसी स्थिति में वस्तु से उसकी निकटता उसका लगाव शांति और संतोषदायक होता है क्योंकि तब वह उस व्यक्ति या वस्तु से भयभीत रहता है, जो उन वस्तुओं को उससे अलग सकते है। वे कहते है कि जब मनोवैज्ञानिक रूप से संचित अनुभवों में कोई बाधा नहीं पड़ती, वे मनोवैज्ञानिक कष्ट को रोकते है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि व्यक्ति इन समाहारों की, अनुभवों की एक गठरी है और यह किसी गंभीर विक्षोभ पैदा करती है। इस तरह आदमी ज्ञात से भय पीड़ित रहता है। वह शारीरिक अथवा मानसिक रूप से संचित उन अनुभवों से डरता रहता है, जिन्हें उसने अथवा कष्ट से बचने के लिए एकत्रित किया है। इस प्रकार वे भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह ज्ञान भी कष्ट को दूर करने का एक साधन मात्र है, भय मुक्ति का उपाय नहीं।

डर का एक बड़ा कारण अज्ञान भी माना गया है आदिमकाल में मनुष्य को सूर्य ग्रहण बिजली की कड़क पुच्छल तारे आदि के बारे में कुछ पता न था। वह इनसे डरता था और देवता समझ कर उनके कोप से बचने के लिए तरह-तरह के पूजन बलिदान करता था, पीछे जब वास्तविकता समझ में आ गई तो वह डर सहज ही चला गया। भूत-प्रेत का डर अब धीरे-धीरे समाप्त होता चला जा रहा है पर उसके स्थान पर अब नये भय पैदा होते जा रहे है।

मनुष्य की विडंबना यह है कि जिसका वास्तव में भय करना चाहिए, उससे वह निडर स्तर का बना रहता है और जहाँ भय का काई कारण नहीं वहाँ भयभीत होता रहता है। उसे पाप से डरना चाहिए कर्मफल से डरना चाहिए, कर्मफल से डरना चाहिए ईश्वर के न्याय से डरना चाहिए, पर इनसे वह भयभीत होने की आवश्यकता नहीं समझता। चोरी करते हुए भोले लोगों को ठगते हुए, छल प्रपंच रचते हुए षड्यंत्र अपनाते हुए चुगली नशेबाजी व्यभिचार बेईमानी असत्य भाषण मिथ्या प्रलाप करते हुए कौन डरता है? डरते है मिट्टी के पुतले मनुष्य से काल्पनिक भूत प्रेत से दीन दुर्बल कुकर्मी आतंकवादियों से। हमें अपने इस अज्ञान को समझना चाहिए और उन अकिंचन व्यक्तियों वस्तुओं एवं परिस्थितियों से डरने से इनकार कर देना चाहिए, जो वस्तुतः तुच्छ एवं असमर्थ है। डरना ही हो तो ईश्वरीय विधान और दुष्प्रवृत्तियों से डरना चाहिए। वास्तविक दुःख के निमित्त यही है और सुख के कारण भी इन्हीं में प्रच्छन्न हैं इस तथ्य को जितनी जल्दी समझा जा सकें, उतना ही अच्छा।


आत्मोन्नति के पाँच सोपान

जो भी जीवित है, सजग है, सचेत तथा स्वस्थ मस्तिष्क वाला है उसमें निरंतर बढ़ने महान् बनने की इच्छा रहती है जो व्यक्ति जिस स्थिति में है उससे ऊपर उठने का प्रयत्न करना ही वास्तविक कर्मशीलता है। उन्नति की अभिलाषा ही अधिकांश में मनुष्य की क्रियाशीलता को उत्तेजित करती है सामान्य व्यक्ति को ही क्यों न देख लिया जाय, चाहे वह रोटी दाल तक ही क्यों न सीमित हो, तब भी वह आज की अपेक्षा कल अच्छी जिसमें अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़ने की इच्छा नहीं है उसे एक प्रकार से मृत ही मानना चाहिये। अगति जड़ता का लक्षण है, जीवन का नहीं। जो जीवन है वह एक स्थान पर खड़ा ही नहीं रह सकता।

जीवन में आगे बढ़ना प्रगति करना कोई आकस्मिक घटना नहीं है और न यह कोई स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसके प्रवाह में कोई आगे बढ़ ही जायेगा। आगे बढ़ना उन्नति करना एक सुनियोजित कर्तव्य है जिसे विभिन्न चरणों और सोपानों में प्रयास-पूर्वक पूरा करना पड़ता है मनुष्य अपने बल पर संघर्ष करता हुआ एक-एक कदम ही आगे बढ़ पाता है। इस भीड़ से भरी दुनिया में जहाँ लोग एक दूसरे को ढकेल कर अपना स्थान बनाने का प्रयत्न कर रहे है वहाँ किसी लक्षित स्थान पर पहुँच सकना कोई ऐसा काम नहीं है जो यों ही बैठे बिठाये हो जायेगा इसके लिये मनुष्य को परिश्रम, पुरुषार्थ तथा त्याग और तपस्या करनी पड़ती है। जो संघर्ष भीरु है, स्वार्थी है, सुख लोलुप और पलायनवादी है वह कभी भी उन्नति पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता। उन्नति और प्रगति कर्मवीरों का ही लक्ष्य है।

संसार में, उन्नतियाँ प्रगतियाँ तथा सफलताएँ असंख्यों प्रकार की हो सकती है नित्य ही लोग उन्नति करते देखे जाते है। छोटी-सी दुकान बड़ी फर्म में बदल जाती है, मशीन मिस्त्री मिल मालिक बन जाता है, संसार में नित्य ही यह परिवर्तन होते रहते हैं किंतु इनको वास्तविक उन्नति नहीं कहा जा सकता। वास्तविक उन्नति वह है, जिसमें अवनति अथवा ह्रास का कोई अवसर न हो। जिस प्रकार मनुष्य निर्धन से धनवान् बनता है उसी प्रकार धनवान् से निर्धन बन सकता है। कोठी बिक सकती है मिल मिट सकती है और फर्म बंद हो सकती हैं।

इस प्रकार की उन्नतियाँ साँसारिक व्यवहार तथा गति विधियों का फल है पुरुषार्थ तथा परिश्रम का समन्वय होने पर भी ये उन्नति की उस कोटि में नहीं आती जिनके आधार पर कोई व्यक्ति महान् कहा जाता है। मनुष्य की महानता कोई सामयिक वस्तु नहीं है कि आज वह है कल न रहेगी। पतन तथा परिवर्तन से मुक्त उच्चता ही वास्तविक उन्नति है महानता है।

इस प्रकार की महानतायें केवल वे ही व्यक्ति प्राप्त कर सकते हैं जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण पर हित के लिये ही होता है। जो मनुष्य मात्र की उन्नति के लिये अपने जीवन का दाँव लगा देते है अपना सर्वस्व समष्टि को समर्पित कर देते है वे ही उस उच्च शिखर पर पहुँचते हैं जहाँ से पतन की कोई आशंका नहीं रहती।

उच्चता के अविजित शिखर पर पहुँचने के लिये मनुष्य को अपने जीवन को एक सुगढ़ साँचे में ढालना होता है। जो अपने जीवन को सुघड़ सुन्दर नहीं बना सकता वह कितना ही प्रतिभावान, धनवान् और ज्ञानवान क्यों न हो महानता की कोटि में नहीं पहुँच सकता।

महानता के उपयुक्त साँचे में ढलने के लिये मनुष्य को सबसे पहले अपने व्यक्तित्व का विकास करना होगा। जिसका व्यक्तित्व का विकास करना होगा। जिसका व्यक्तित्व अविकसित है अपूर्ण है वह बहुत कुछ आगे बढ़ जाने पर भी पूछे हट सकता है। जब तक उसे निम्न अथवा समकक्ष व्यक्तियों से पाला पड़ता रहेगा, तब तक तो वह बढ़ता जा सकता है किंतु ऊँचा व्यक्तित्व सामने आते ही उसे ठिठक जाना पड़ेगा अथवा जब वह सामान्य समूह से उठकर स्तरीय समाज में पहुँचेगा तब उसके व्यक्तित्व के दब जाने की संभावना रहेगी।

उन्नति का प्रथम सोपान व्यक्तित्व को पूर्ण विकसित कर लेना है। व्यक्तित्व को पूर्ण विकसित कर लेना है। व्यक्तित्व विकास की सबसे पहली शर्त है स्पष्ट एवं असंदिग्ध होना। मनुष्य जो कुछ है, वह साफ दिखाई देता चाहिये जो साफ नहीं बन पाता। ईमानदार होते हुये भी लोग उसे गैर-ईमानदार तथा महान् होने पर भी निम्न समझ सकते है।

व्यक्तित्व की दूसरी शर्त है एक समता। मनुष्य जो स्वरूप समाज के सामने रखता है उसका आचरण भी वैसा ही होना चाहिये। दूसरों को कितना ही सन्मार्ग दिखलाने वाला कितना ही हित चाहने वाला यदि अपने निजी आचरण में यथावत नहीं है, तो लोग उसे छली मतलबी अथवा स्वार्थी समझ कर दूर भागेंगे।

व्यक्तित्व की तीसरी शर्त है-शिक्षा स्वास्थ्य, स्वच्छता सुघड़ता, शिष्टता सभ्यता आदि गुण। जो अशिक्षित हैं, रोगी है मलीन अथवा अनपढ़ है, लोग सहज ही उनकी ओर आकर्षित नहीं होते। किसी भी फूहड़ अवस्था में, फूहड़ भाषा अथवा फूहड़ शैली में कितनी ही महान् एवं हितकारी बात क्यों न कहीं जाये कोई उसे सुनना पसंद न करेगा और यदि उनकी बात सुनी भी जाएगी, तो उपहास की दृष्टि से, जिसका न कोई प्रभाव होगा और न फल।

उन्नति का दूसरा सोपान है- शक्ति! जिसका शरीर, मन और आत्मा शक्तिशाली है वह ही उन्नति पथ पर आये अवरोधी से टकरा सकता है। समाज विरोधी तत्त्वों से मोर्चा ले सकेगा। जो निर्बल है, साहसहीन है वह एक छोटे से विरोध को भी सहन न कर सकेगा और शीघ्र ही मैदान छोड़कर भाग जायेगा। जो संयमी है ज्ञानवान है निस्पृह और निःस्वार्थ है मन प्राण शरीर और आत्मा उस ही के स्वस्थ एवं समर्थ हो सकते हैं। इसके विपरीत जो असंयमी है, अज्ञानी है लिप्सालु और लोलुप है उसका निर्बल होना निश्चित है अटल है।

उन्नति का तीसरा सोपान है। अनुशासन। जो व्यक्ति अनुशासनहीन है अस्त-व्यस्त है बिखरे मन चंचल बुद्धि और कंपित आत्मा वाला है उसके विचारों तथा कर्मों में वांछित तेजी नहीं आ पाती जिसके अभाव में वह जनमानस में प्रवेश कर सकने में असफल रहता है मन जीते बिना जन-समुदाय को अनुशासित रखकर उपयुक्त दिशा में नहीं चलाया जा सकता। अनुशासनहीन व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली, प्रतिभाशाली, प्रभावकारी और प्रतापवान् क्यों न हो किसी को अपने वश में नहीं रख सकता। उन्नति के इच्छुक व्यक्ति के लिये आत्मानुशासन उतना ही आवश्यक है जितना समुद्र के लिये मर्यादा।

उन्नति का चौथा सोपान है-परिश्रम तथा पुरुषार्थ। इन दोनों गुणों से रहित व्यक्ति आलसी प्रमादी तथा दीर्घसूत्री होता है जो उन्नति पथ में पहाड़ जैसे अवरोध है, उन्नति पथ के पथिकों के लिये क्या दिन, क्या रात, क्या जाड़ा, क्या गरमी, क्या धूप और क्या छाया समान होते है। उसके पास हर समय काम रहता है उसके पास हर समय काम रहता है और हर समय उस काम का समय है। जो आलसी है, प्रमादी ओर दीर्घसूत्री हैं वह आज के काम को कल टालेगा, दूसरों पर निर्भर रहेगा ऐसी दशा में उन्नति के शिखर पर चढ़ने का उसका स्वप्न ही रहेगा। बिना पुरुषार्थ परिश्रम तथा तत्परता के संसार का कोई भी काम नहीं हो सकता।

उन्नति का पंचम सोपान है निष्काम कर्म-भाव निष्काम कर्मभाव के बिना कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से काम नहीं कर सकता। कभी उसे सफलता असफलता आंदोलित करेगी कभी निंदा रुष्ट और प्रशंसा प्रसन्न करेगी। महान् पथ पर जिस राग द्वेष से रहित होना आवश्यक है बिना निष्काम कर्मभाव से उसकी उपलब्धि संभव नहीं और यह निष्काम कर्मभाव तभी प्राप्त हो सकता है, जब मनुष्य अपने प्रत्येक कर्तव्य को परम प्रभु का आदेश समझकर उसकी शक्ति से ही उसके लिये ही करता हुआ अनुभव करें। जो अपने प्रत्येक कर्म को परमात्मा का ही काम समझकर करेगा वह उसे पूर्ण दक्षता पूर्णमनोयोग तथा पूर्ण श्रद्धा से करेगा। जिसके फलस्वरूप उसे उस सर्व शक्तिमान, से सामर्थ्य एवं शक्ति प्राप्त होती रहेगी। जिसने अपनी सीमित शक्ति को ईश्वर की परम शक्ति में तिरोधान कर दिया है वह उन्नति के किस शिखर पर पहुँच सकता है, यह बतलाना कठिन है।

इस प्रकार जो व्यक्ति उन्नति के इन पाँच सोपानों पर पाँव रखता हुआ आगे बढ़ता है वह निश्चय ही उस महानता को प्राप्त कर लेता है जिसका न ह्रास होता है और न पतन ऐसी ही महानता के पद पर प्रतिष्ठित महापुरुषों को इतिहास लिखता है और संसार याद करता है।


मन में गुँजाइश (Kahani)

एक साधु ने छोटी झोंपड़ी बना रखी थी। उसी में गुजारा करता। जगह इतनी भर थी कि वह अकेला पैर पसार कर सो सके और करवट बदलता रह सके।

एक दिन जोर की वर्षा हुई। एक भीगता हुआ साधु रात के समय उस झोपड़ी पर आ पहुँचा दरवाजा खटखटा कर बोला उसे भी उस झोपड़ी में भीगने से बचने और रात बिताने के लिए जगह मिले।

भीतर वाले साधु ने दरवाजा खोला और अतिथि को भीतर ले लिया झोपड़ी में एक के सोने की जगह थी पर बैठ कर तो दो भी समय काट सकते थे सो बैठ कर समय बिताने लगे।

इतने में एक और व्यक्ति भीगता हुआ आ पहुँचा। दरवाजा खुला था उसने कहा मुझे भी जगह मिल जाय तो भीगने से बचाव हो सके।

साधु ने तीसरे को भी भीतर ले लिया। कहा इसमें एक के सोने की जगह थी। बैठ कर हम दो भी समय बिता लेंगे तुम्हें आना हो तो खुशी से आओ। खड़े होकर हम तीनों भी रात काट लेंगे

तीनों ने खड़े-खड़े उस छोटी झोपड़ी में रात बिताई। इसे कहते है मन में गुँजाइश होना।


साधु बनाम बहरूपिया

बहरूपिया, राजा के दरबार में पहुँचा महाराज की जय जयकार हो! अन्नदाता की यश पताका आकाश में सदैव फहराती रहे। बस पाँच रुपए का सवाल है, महाराज से और बहरूपिया कुछ नहीं चाहता।

“मैं कला का पारखी हूँ। कलाकार का सम्मान करना राज्य का नैतिक कर्तव्य है मैं तुम्हारी कला पर प्रसन्न होकर पाँच रुपए का पुरस्कार दे सकता हूँ पर दान के लिए मजबूर हूँ। राजा ने कहा।”

“कोई बात नहीं मैं आपके सिद्धांत को तोड़ना नहीं चाहता। मुझे अपना दूसरा स्वाँग दिखाने के लिए तीन दिन का समय तो दीजिए। “ इतना कहकर वह वहाँ से चलता बना।

दूसरे दिन नगर से बाहर एक टोकरी के ऊपर समाधि मुद्रा में एक साधू दिखाई दिया। मेरुदंड सीधा नेत्र बंद, तेजस्वी चेहरा और लंबी जटाएँ। इधर उधर पशु चराने वाले चरवाहों ने उस साधु को देखा। वे सब उत्सुकतापूर्वक उसके पास पहुँचे।

तपस्वी मृगछाल पर ध्यानावस्थित था। उसे पता ही न चला कि सामने कौन खड़ा है?

स्वामी जी! आपका आगमन कहाँ से हुआ है? कुछ क्षण रुककर फिर दूसरा प्रश्न क्या आपके लिए कुछ फल, दूध और मेवा आदि की व्यवस्था की जाय?

मुख से कुछ शब्द का निकलना तो दूर की बात रही उसका शरीर भी रंच मात्र न हिला।

शाम को सभी चरवाहे अपने पशुओं को लेकर नगर वापस आए। उनके द्वारा घर-घर में तपस्वी संत उनके द्वारा घर-घर में तपस्वी संत की चर्चा होने लगी। दूसरे दिन सुबह ही नगर के अनेक सभ्य, शिक्षित नागरिक, दरबारी, धनिक तथा श्रद्धालु व्यक्ति अपने-अपने वाहन लेकर नगर से बाहर की ओर दौड़ पड़े किसी की थाली में मेवा फल और मिष्ठान्न थे। कोई साबूदाना और मखाने की खीर लेकर गया था। किसी की बाल्टी दूध से भरी थी और कोई तरह-तरह के पकवानों से अपने थाल भरकर ले गया था। सबका एक ही आग्रह था कि उसमें से एक ग्रास लेकर श्रद्धालु भक्तों को कृतार्थ किया जाए।

सबके आग्रह व्यर्थ गए। साधु ने आँख तक न खोली। वह तो अविचलित रूप से वहीं बैठा रहा संत के ध्यान की कहानी महामंत्री के पास तक पहुँच गयी। वह अनेक प्रकार की स्वर्ण और रजत मुद्रायें रथ में भरकर उस टीले पर पहुँचा। मुद्राओं का ढेर लगा दिया संत के आस-पास संत से बड़े विनम्र स्वर में निवेदन करते हुए प्रधान मंत्री ने कहा “बस! एक बार नेत्र खोलकर कृतार्थ कीजिए। में किसी भौतिक लालसा से आपको परेशान करने नहीं आया हूँ।”

प्रधान मंत्री का निवेदन भी बेकार गया। अब उसे निश्चय हो गया कि यह संत अवश्य पहुँचा हुआ है राग विराग लोभ मोह सभी से मुक्त है तभी तो इतने बड़े बड़े उपहारों की ओर आँख उठाकर नहीं देखता।

प्रधानमंत्री ने राजा के महल में जाकर सारी वस्तुस्थिति से अवगत कराया। राजा को सोचते देर न लगी। वह मन ही मन पछताने लगे। जब मेरे राज्य में इतने बड़े तपस्वी का आगमन हुआ है तो मुझे अवश्य उनकी अगवानी करने जाना था। उन्होंने दूसरे ही दिन सुबह उस तपस्वी के दर्शन करने जाने का निश्चय किया। गाँव भर में यह खबर बिजली की तरह फैल गई। जिस मार्ग से राजा की सवारी निकलने वाली थी वह मार्ग साफ करा दिए गए। रास्ते में सैनिकों की व्यवस्था कर दी गयी।

राजा ने तपस्वी के चरणों में एक लाख अशर्फी का ढेर लगा दिया और अपना मस्तक उनके चरणों में टेक कर आशीर्वाद की कामना करने लगें, पर तपस्वी विचलित नहीं हुआ। अब तो प्रत्येक व्यक्ति को यह निश्चय हो गया कि साधु बहुत त्यागी और पहुँचा हुआ है। साँसारिक वस्तुओं से उसका तनिक भी लगाव नहीं है।

चौथे दिन बहरूपिया फिर दरबार में पहुँचा हाथ जोड़ कर कहने लगा-राजन् टब तो आपने मेरा स्वाँग देख लिया होगा और पसंद भी आया होगा। अब तो मेरी कला पर प्रसन्न होकर अधिक नहीं तो पाँच रुपए का पुरस्कार तो दे ही दीजिए, ताकि परिवार के पालन पोषण हेतु आटा दाल की व्यवस्था कर सकूँ।”

“छिः छिः। तुझ जैसा मूर्ख व्यक्ति मैंने आज तक नहीं देखा जब संपूर्ण राज्य की जनता अपना सर्वस्व लुटाने के लिए तेरे चरणों के पास आतुर खड़ी थी। तब तूने धन दौलत के उस ढेर पर एक नजर तक नहीं डाली और अब पाँच रुपए के लिए ऐसे चिरौरी करता है।”

बहुरूपिये ने कहा राजन् उस समय एक तपस्वी की मर्यादा का प्रश्न था। एक साधु के वेश की लाज रखने की बात थी। भले ही साधु के रखने की बात थी। भले ही साधु के रूप में बहरूपिया हो, पर था तो एक साधु ही फिर वह धन दौलत की ओर दृष्टि उठाकर कैसे देख सकता था, उस समय सारे वैभव तुच्छ थे ओर अब पेट की ज्वाला शांत करने के लिए अपने श्रम पारिश्रमिक और पुरस्कार की माँग है आपके सामने।


स्वाध्यायः एक जागृत देवता

ज्ञान की वृद्धि के लिए ज्ञानोपासना के लिये, पुस्तकों का अध्ययन एक महत्त्वपूर्ण आधार है। मानव जाति द्वारा संचित समस्त ज्ञान पुस्तकों में संचित है। खासकर जब से लिखने और छापने का प्रचार हुआ तब से तो मानव द्वारा उपलब्ध ज्ञान लिपिबद्ध करके संचित किया जाने लगा। इसलिये उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करना ज्ञान प्राप्ति के लिये बहुत ही आवश्यक होता है। अच्छी पुस्तकों एक विकसित मस्तिष्क का ग्राफ होती है। मिल्टन ने कहा है अच्छी पुस्तक एक महान् आत्मा का जीवन रक्त है।” क्योंकि उसमें उसके जीवन का विचार सार सन्निहित होता है। व्यक्ति मर जाते है लेकिन ग्रंथों में उनकी आत्मा का निवास होता है। ग्रंथ सजीव होते हैं। इसीलिये लिटन ने कहा है ग्रंथों में आत्मा होती है। सद्ग्रन्थों का कभी नाश नहीं होता।

विकासशील जीवन के लिये पुस्तकों का साथ होना आवश्यक है अनिवार्य है क्योंकि पुस्तकों में उसे जीवन का मार्ग दर्शन प्रकाश में उसे जीवन का मार्ग दर्शन प्रकाश स्रोत मिलता है। वस्तुतः संसार के सभी भीषण सागर में डूबते उतरते मनुष्य के लिये पुस्तकें उस प्रकाश स्तम्भ की तरह सहायक होती है जैसे समुद्र में चलने वाले जहाजों को मार्ग दिखाने वाले प्रकाशगृह।

सितरो ने कहा है “ग्रंथ रहित कमरा आत्मा रहित देह के समान हैं। तात्पर्य है है कि उत्तम पुस्तकें नहीं होने से मनुष्य ज्ञान से वंचित रह जाता है और ज्ञान रहित जीवन मुर्दे के समान व्यर्थ होता है। जो व्यक्ति दिन रात अच्छी पुस्तकों का संपर्क प्राप्त करते है उनमें मानवीय चेतना ज्ञान प्रकाश से दीप्त होकर जगमगा उठती है। ज्ञान का अभाव भी एक तरह की मृत्यु है।

उत्तम पुस्तकों में उत्तम विचार होते हैं। उत्तम विचार उदात्त भावनाओं भव्य कल्पनाओं जहाँ है वहीं स्वर्ग है। लोकमान्य तिलक ने कहा है मैं नरक में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूँगा क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि जहाँ ये रहेंगी वहाँ अपने आप ही स्वर्ग बन जाएगा स्वर्ग का दृश्य अस्तित्व कहीं नहीं है। मनुष्य की उत्कृष्ट मनःस्थिति जो उत्तम पुस्तकों का सान्निध्य मनुष्य की बुद्धि को जहाँ भी मिलता है वहीं उसे स्वर्गीय अनुभूति होने लगती है।

सच्चे, निःस्वार्थी आत्मीय मित्र मिलना कठिन है। इसमें से बहुतों को इस संबंध में निराश ही होना पड़ता है। लेकिन अच्छी पुस्तकें सहज ही हमारी सच्ची मित्र बन जाती है। वे हमें सही रास्ता दिखाती है जीवन-पथ पर आगे बढ़ने में हमारा साथ देती है महात्मा गाँधी ने कहा है “अच्छी पुस्तकें पास होने पर हमें भले मित्रों की कमी नहीं खटकती वरन् में जितना पुस्तकों का अध्ययन करता हूँ उतनी ही वे मुझे उपयोगी मित्र मालूम होती है।”

मानव-जीवन संसार-का ज्ञान असंख्यों अनेकताओं से भरा पड़ा है। मनुष्य का अपना मानस ही एक इतने अधिक विचारों से भरा रहता है। क्षण-क्षण नई लहरें उत्पन्न होती रहती है। इन अनेकताओं का परिणाम होता है मनुष्य के अंतर-बाह्य जीवन में अनेकों संघर्ष। विचार संग्राम में पुस्तकें ही मनुष्य के लिये प्रभावशाली शस्त्र सिद्ध होती है। एक व्यक्ति का ज्ञान सीमित एकांगी हो सकता है लेकिन उत्तम पुस्तकों के स्वाध्याय से मनुष्य अपने आपका सही-सही समाधान ढूँढ़ सकता है। खासकर विचारों के संघर्ष में पुस्तकें ही सहायक सिद्ध होती है।

पुस्तकें मन को एकाग्र और संयमित करने का सबसे सरल साधन संयमित करने का सबसे सरल साधन है अध्ययन करते करते मनुष्य जीवन में समाधि अवस्था को प्राप्त कर सकता है। एक बार लोकमान्य तिलक का आपरेशन होना था। इसके लिये उन्हें क्लोरोफार्म सुँघाकर बेहोश करना था। लेकिन इसके लिए और कहा मुझे एक गीता की पुस्तक ला दो मैं उसे पढ़ता रहूँगा और आप आपरेशन कर लेना। पुस्तक लाई गई। लोकमान्य उसके अध्ययन में ऐसे लीन हुए कि डॉक्टरों ने आपरेशन किया तब तक वे तनिक हिले भी नहीं न कोई दुःख ही महसूस किया। पुस्तकों के अध्ययन में ऐसी तल्लीनता प्राप्त हो जाती है जो लंबी योग साधनाओं से भी प्राप्त नहीं होती है।

पुस्तकों के अध्ययन के समय मनुष्य की गति एक सूक्ष्म विचार लोक में होने लगती है। दृश्य जगत, शरीर यहाँ के कई व्यापार हो हुल्लड़ भी मनुष्य उस समय भूल जाता है। सूक्ष्म विचार लोक में भ्रमण करने का यह अनिवर्चनीय आनंद योग की समाधि अवस्था के आनंद जैसा ही होता है। इस स्थिति में मनुष्य दृश्य जगत से उठकर अदृश्य संसार में, सूक्ष्म लोक में विचरण करने लगता है और वहाँ कई दिव्य चेतन विचारों का मानसिक स्पर्श प्राप्त करता है ध्यानावस्था में। पुस्तकों का अध्ययन ऐसा साधन है जिससे मनुष्य अपने अन्तर्बाह्य जीवन का पर्याप्त विकास कर सकता है।

मनोविकारों से परेशान, दुःखी, चिंतित मनुष्य के लिये, उसके दुःख-दर्द के समय उत्तम पुस्तकें अमृत है, जिनका सान्निध्य प्राप्त कर वह अपना उस समय दुःख दर्द क्लेश सब कुछ भूल जाता है। अच्छी पुस्तकें मनुष्य को धैर्य शांति सांत्वना प्रदान करती है। किसी ने कहा है सरस पुस्तकों से रोग पीड़ित व्यक्ति को बड़ी शांति मिलती है जैसे स्नेहमयी जननी की मीठी-मीठी थपकियाँ बच्चों को मीठी नींद में सुला देती है वैसे ही मन या शरीर की पीड़ा को शांत करने के लिये उत्तम पुस्तकों का अवलंबन लेना सुखकर होता है।

उत्तम पुस्तकें आदर्श ग्रंथ बहुत बड़ी संपत्ति हैं। अपनी संतति के लिए उत्तराधिकार में छोड़ने के लिये सर्वोपरि मूल्यवान् वस्तु है संसार में। जो अभिभावक अपनी संतान के लिये धन, वस्त्र सुख आमोद प्रमोद के साधन न छोड़कर उत्तम पुस्तकों का संग्रह छोड़ जाते है वे बहुत बड़ी संपत्ति छोड़ते है। क्योंकि उत्तम पुस्तकों का संग्रह छोड़ जाते है वे बहुत बड़ी संपत्ति छोड़ते है। क्योंकि उत्तम ग्रंथों का अध्ययन करके मनुष्य ऋषि देवता महात्मा महापुरुष बन सकता है। जिन परिवारों में ज्ञानार्जन का क्रम पीढ़ियों से चलता रहता है उनमें से पंडित ज्ञानी, विद्वान् अवश्य निकलकर आते है। जहाँ पुस्तकें होती है वहाँ मानों देवता निवास करते है वह स्थान मंदिर है जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक किंतु ज्ञान के चेतनायुक्त देवता निवास करते है। वे माता-पिता धन्य है जो अपनी संतान के लिये उत्तम पुस्तकों का एक संग्रह छोड़ जाते है क्योंकि धन, संपत्ति, साधन सामग्री तो एक दिन नष्ट होकर सकती है किंतु उत्तम पुस्तकों के सहारे मनुष्य भवसागर की भयंकर लहरों में भी सरलता से तैरकर उसे पार कर सकता है।

जीवन में अन्य सामग्री की तरह हमें उत्तम पुस्तकों का संग्रह करना चाहिये। जीवन के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालने वाले विविध विषयों के उत्तम ग्रंथ खरीदने के लिए खर्च के बजट में सुविधानुसार आवश्यक राशि रखनी चाहिए। कपड़े भोजन मकान की तरह ही हमें पुस्तकों के लिये भी आवश्यक खर्चे की तरह ध्यान रखना चाहिए। स्मरण रखा जाना चाहिए कि उत्तम पुस्तकों के लिए खर्च किया जाने वाला पैसा उसी प्रकार व्यर्थ नहीं जाता जिस तरह अँधेरे बियाबान जंगल में प्रकाश के लिये खर्च किये जाने वाला धन।

धन कमाना कोई बड़ी बात नहीं है। पढ़े लिखें और विचारवान व्यक्तियों के लिए तो वह सबसे छोटी समस्या है। ज्ञान का उद्देश्य व्यक्तिगत जीवन में शांति और सामाजिक जीवन में सभ्यता और सामाजिक जीवन में सभ्यता और व्यवस्था लाना है वह भी शिक्षा और ज्ञान के अभाव में पूरा नहीं हो सकता। इसलिये पढ़ना सब दृष्टि से आवश्यक है। पुस्तकालय एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ औसत नागरिक भी अधिकतम ज्ञान और विचार अर्जित कर सकता है।

पुस्तकालय समाज की अनिवार्य आवश्यकता है। मनुष्य को भोजन कपड़े और आवास की व्यवस्था हो जाती है तो वह जिंदा रह जाता है शेष उन्नति तो वह उसके बाद सोचता है। समाज यदि विचारशील है तो वह शांति और सुव्यवस्था की अन्य आवश्यकतायें बाद में भी पूरी कर सकता है इसलिये पुस्तकालय समाज की पहली आवश्यकता है क्योंकि उससे ज्ञान और विचारशील की उससे ज्ञान और विचारशील की सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति होती है, किंतु इतना ही काफी नहीं है कि एक स्थान पर पुस्तकें जमा कर दी जायें, उनके विषय चाहे जो कुछ हो।

गंदे और दूषित विचार देने वाली पुस्तकों से तो अनपढ़ अच्छा जो बुराई करता है पर बढ़ाता नहीं जितनी बुराइयाँ बन चुकी है उन्हीं तक सीमित रह जाता है। यथार्थ की आवश्यकता की पूर्ति उन पुस्तकों से होती है जो प्रगतिशील विचार दे सकती है जो समस्यायें हल कर सकती है जो नैतिक और साँस्कृतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक सामाजिक और विश्वबन्धुत्व की प्रेरणाएँ और विश्वबन्धुत्व की प्रेरणाएँ और शिक्षायें भी दे सकती है।


सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी (Kahani)

राष्ट्रीय महासभा के प्रारंभिक काल के प्रमुख कर्णधार सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी बहुत ही सुलझे हुए विचारों के नेता थे। जब राष्ट्र निर्माण की ठोस योजना पर कभी गंभीर विचार विमर्श होता तो वे सदैव यह कहा करते थे। सुदृढ़ स्वास्थ्य ही वह नींव है जिसके ऊपर सुदृढ़ राष्ट्र खड़ा हो सकता है” उनका विश्वास था कि सब से अधिक रचनात्मक कार्य यह है कि देशवासियों को उत्तम स्वास्थ्य बनाने की शिक्षा दी जाय। कसरत व्यायाम लाठी तलवार आदि के द्वारा शारीरिक शक्तियों को विकसित किया जाय। क्योंकि उत्तम शरीर में उत्तम मस्तिष्क का और उत्तम मस्तिष्क में उत्तम आत्मा का निवास हो सकता है। शारीरिक उन्नति के बिना कोई भी उन्नति आगे नहीं बढ़ सकती।

वृद्धावस्था में सर बनर्जी के सारे बाल पक गये थे, दाढ़ी सूत की तरह सफेद हो गई थी, फिर भी वे हजार काम छोड़ कर कसरत नित्य करते। अपने व्यक्तित्व से जिस किसी को भी उसने प्रभावित किया, उस पर अवश्य डाली कि शरीर को बलवान बनाने के लिए स्वास्थ्य के नियमों का बड़ी सावधानी से पालन करें।


विकास जड़ का नहीं, चेतना के स्फुल्लिंगों का

भारतीय दर्शन और संस्कृति आदिकाल से ही आत्म चेतना की अखंडता पर आस्थावान् है। आत्मा अणुमात्र होकर भी वह संपूर्ण शरीर पा आधिपत्य रखती है भावनात्मक परिष्कार से आत्मबल बढ़ता है और अपने स्वरूप को जानने वाला जीवात्मा परमात्मा सत्ता से एक रूप हो जाता है आत्मिक विकास की यह स्वाभाविक प्रक्रिया है इस रहस्य को न जान पाने के कारण मनुष्य काया को ही सब कुछ मानकर उसी को सँजोने सँवारने में सारी जिंदगी खपा देता है और अंततः खाली हाथ इस संसार से विदा होता है।

शरीर मरणधर्मा है किन्तु ईश्वर का अविनाशी अंश आत्मा अजर अमर है इस तथ्य को पाश्चात्य मनीषी एवं नोबुल पुरस्कार विजेता भौतिकविद् डॉ. पियरे दि कोम्ते ने स्वीकार करते हुए कहा है कि आत्मा विश्वात्मा से संबंधित है इसी आधार पर वह अमर है, क्योंकि विश्व चेतना अमर है और आत्मा उसी की छोटी इकाई मात्र है मनोविज्ञानी जिसे ईगों कहते हैं इलेक्ट्रोडाइनेमिक सिद्धांतों के अनुसार उसकी छानबीन किये जाने पर यह तथ्य सामने आये है कि जन्म−मरण चक्र में परिभ्रमण करती हुई भिन्न-भिन्न आकृति प्रकृति अपनाते हुए भी मूल सत्ता अक्षुण्ण बनी रहती है जो चेतन सत्ता की अखंडता का परिचायक है।

विभिन्न खोजों के बाद विश्वविख्यात वैज्ञानिक फ्रेड हाँयल तथा भारतीय विज्ञानविद् डॉ. जयत विष्णु नार्लीकर ने यह स्थापना की है कि विश्व रचना के कारणभूत अणु और मानवीय काया की संरचना में भारा लेने वाले कारणभूत अणु की मूल संरचना एक सी है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य का विकास प्रकृति परमाणुओं से एक नियम विशेष के तहत हुआ है जिसका नियंत्रण चेतना करती है। आइन्स्टीन ने भी सृष्टि के मूल में चेतना को सक्रिय माना था। जे.ए. थामसन, स्वर जेम्स जीन्स ए.एस. एडिंगटन आदि प्रख्यात वैज्ञानिकों ने विज्ञान की नवीन दिशाओं का अलग-अलग विवेचन करते हुए एक ही बात कही है कि विज्ञान के पास जीवन के प्रारंभ होने की कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। अब वैज्ञानिक अन्वेषण चेतना और विचार जगत की ओर बढ़ रहे हैं।

आज का विज्ञान यों आत्मा के अस्तित्व तक पहुँच गया है, पर ध्यान और अनुभूति जन्य ज्ञान के अभाव में वह इस तथ्य को मानने को तैयार नहीं होता। मनुष्य शरीर जिन छोटी-छोटी प्रोटोप्लाज्म को इकाइयों से बना है वह दो भागों में विभक्त है 1. नाभिक-न्यूक्लियस

2. साइटोप्लाज्म जिसके अंतर्गत जल, कार्बन, नाइटोप्लाज्म जिसके अंतर्गत जल कार्बन नाइट्रोजन फास्फोरस आकाश आदि सभी पंच भौतिक ठोस द्रव तथा गैस अवस्था वाले पदार्थ पाये जाते है। विभिन्न प्राणधारियों में यहाँ तक कि मनुष्य मनुष्य के साइटोप्लाज्म फर्क होता है। वह वंशानुगत आहार पद्धति और जलवायु आदि पर आधारित है और परिवर्तनशील भी है। आहार के नियमों तथा एक स्थान से दूसरी जलवायु वाले स्थान में परिवर्तन के फलस्वरूप हमारे शरीरों के स्थूल भाग में अंतर आ सकता है। पर अभी तक चेतना की अर्थात् नाभिक की क्रियाओं पर वान कोई नियंत्रण नहीं पा सका हाँ वैज्ञानिक शोधों से यह जरूर सिद्ध हो चुका है कि नाभिक में ही मनुष्य की सारी बौद्धिक चेतना काम करती है। उसमें न केवल अमर व अविनाशी गुण सूत्र विद्यमान् है वरन् वह सूत्र ब्रह्माण्ड को नाप सकने की क्षमता से परिपूर्ण हैं। समूचे शरीर में यह चैतन्य तत्त्व एक शक्ति एक तरंग की भाँति विद्यमान् है, उसी के न रहने पर शरीर भी नहीं रहता।

यह चेतना ही है जो मनुष्य शरीर से लेकर सृष्टि के स्थूल कणों तक में व्याप्त हो रही है। जहाँ तक चेतना का अंश प्राकृतिक परमाणुओं से शक्तिशाली होना है वहाँ तक तो जड़ और चेतन का अंतर स्पष्ट प्रतीत होता रहता है पर एक अवस्था ऐसी आती है जब जड़ता चेतनता पर पूरी तरह घटाटोप हो जाती है। यही वह अवस्था है जब चेतना पर पूर्णरूप से जड़ गुणों वाली अर्थात् कंकड़ पत्थर जैसी स्थिति में चली जाती है। मुख्य रूप से सृष्टि की चेतना एक ही है पर वह गुणों के द्वारा क्रमशः जड़ होती चली गई है जो जितना जड़ हो गया, वह उतना ही उपभोग्य हो गया, पर जिसने अपनी चेतना का जितना अधिक परिष्कार कर लिया, वह उतना ही उपभोक्ता अर्थात् महामानव-देवमानव होता चला जाता है।

डार्विन जैसे विकास शास्त्रियों ने मनुष्य को अन्यान्य जीवों का विकसित रूप बताया है। थ्योरी ऑफ यूज एण्ड डिसयूज” के सिद्धांतों से यह सिद्ध किया है कि मनुष्य शरीर विकसित हुआ है। कहा नहीं जा सकता यह सिद्धांत कितने सच है क्योंकि इसमें एक शरीर से दूसरे शरीर में विकास की जो कड़ियाँ बिठायी है, उनके विकास का समय इतना लंबा है कि उन परिवर्तनों को सही मान लेना बुद्धि संगत नहीं जान पड़ता प्रकृति के परमाणुओं में भी ऐसी व्यवस्था नहीं है कि एक बीज से दूसरे बीज के गुणों का सर्वदा अभाव नहीं हो सकता। विकासवाद के सही रहस्य को समझने के लिए हमें आत्म चेतना की गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा तभी यह समझा जा सकेगा कि आत्म चेतना ही सर्वत्र जड़ एवं चेतन में क्रियाशील है। पेड़ पौधों को जड़ और चेतन के बीच की की नीचे की कड़ी कहा जा सकता है और जीवित ग्रहों को उच्च कड़ी यही प्रतिपादन जड़ता से असीम चेतना के विकास का प्रमाण माना जा सकता है।

आत्मा एक दिव्य चेतना स्फुल्लिंग है जिसका विकास ही मानव के लिए अभीष्ट हैं स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन-मनन से लेकर और जप-तप एवं योगाभ्यास परक ध्यान-धारणा समाधि की समस्त प्रक्रियाओं का निर्धारण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किये गये है। इस प्रकार अपूर्णता से पूर्णता की ओर जब कदम बढ़ चलते है, तब जीवन का वह स्वरूप बन जाता है जिसमें आत्मा भवबंधनों से मुक्त होकर नर नारायण बनने की ओर प्रगति यात्रा को अग्रगामी कर पाती है।


सच्चा त्याग

उस दिन प्रातःकाल वाणिज्य ग्राम में एकाएक घोषणा हुई कि भगवान महावीर नगर के प्रांगण में पधारे हैं। वे नीलमणि उद्यान में सुवासित हैं। सारा परिवेश उनकी कैवल्य प्रभा से जगमगा उठा है। बात की बात में यह खबर सारे नगर में फैल गई। हजारों नर-नारी नए-नए वस्त्रों में सज कर प्रभु के वंदन को चल पड़े

आनंद गृहपति को लगा, कि जैसे उसी की पुकार पर त्रिलोकी के तारनहार उसके आँगन में स्वयं ही पधारे हैं। उसने चीन देश के बहुमूल्य रेशमी कपड़े और कीमती रत्नाकर धारण किए। चंदन-केशर का तिलक ललाट पर लगाया और अपने समस्त वैभव परिकर के साथ श्री भगवान के वंदन को चल पड़ा। ही

प्रभु के श्री मुख का दर्शन करते ही, जैसे उसके मन के सारे परिताप और प्रश्न अनायास शांत हो गए। भावाकुलता के कारण उसका बोल फूट नहीं रहा था। प्रभु की धर्म देशना उस क्षण थम गई थी। उस गहरी नीरवता में उद्बोधित होते हुए आनन्द गृहपति ने निवेदन किया।

“श्री चरणों में शरणागत हूँ, भगवन् अंतर्यामी मेरे तन-मन की सारी वेदनाएँ जानते हैं। मुझे इस पीड़ा से उबार लें भगवन्।”

चुप्पी अनाहत व्याप्त रही।

आनंद गृहपति फिर अधीर होकर बोला-

मैं प्रभु का व्रती श्रावक होना चाहता हूँ। मुझे पाँच अणु व्रत और सात शिक्षा व्रतों में दीक्षित करें, स्वामिन्!”

महावीर चुप रहे। आनंद का मन इस कठोर निरुत्तरता से व्यथित हो उठा। वह अपने की रोक न सका। उसका मन अर्हत् का उपासक बनने के लिए उतावला हो रहा था। उसने निवेदक किया।

श्री भगवान की साक्षी में मैं इस प्रकार श्रावक के पाँच अणुव्रत धारण करता हूँ।

“मैं आज से किसी जीव को कष्ट न पहुंचाऊंगा। किसी को बाँधूंगा नहीं, किसी का वध नहीं करूँगा किसी का शोषण न करूँगा इस प्रकार मैं अहिंसा अणु व्रत धारण करता हूँ भन्ते प्रभु!”

“स्वार्थ साधन के लिए झूठ नहीं बोलूँगा। खोटी सलाह न दूँगा, खोटे लेख न लिखूँगा, खोटी गवाही न दूँगा। इस प्रकार मैं सत्य अणुव्रत धारण करता हूँ।

मैं चोरी का माल नहीं रखूँगा। चोर–बाजारी न करूँगा मिलावट करके बनावटी वस्तु को मूल वस्तु के स्थान पर नहीं बेचूँगा। इस प्रकार मैं अस्तेय अणुव्रत धारण करता हूँ भन्ते भगवन्।”

“स्वपत्नी में ही संतोष धारण करूँगा वेश्यागमन न करूँगा कुमारी या विधवा से संसर्ग न करूँगा इस प्रकार मैं आज से ब्रह्मचर्य अणुव्रत मैं प्रतिबद्ध हुआ। “

“एक निश्चित परिमाण में ही संपत्ति और भोग सामग्री रखूँगा। शेष संपदा का स्वामित्व त्याग दूँगा। इस प्रकार मैं आज से परिग्रह परिमाण अणु व्रत का व्रती हुआ भगवन्।”

क्षण भर रुक कर आनन्द ने अर्हत् महावीर की ओर देखा और प्रभु के इंगित की अपेक्षा की। लेकिन उसे कोई उत्तर या इंगित न मिला। प्रभु की इस उदासीनता से वह मर्माहत हो आया। फिर भी मन को जुटा कर उसने फिर निवेदन किया।

मैं एक नियमित प्रतिज्ञा के अनुसार प्रतिदिन उर्ध्वदिशा, अधोदिशा तिर्यग दिशा की सीमा का उल्लंघन न करूँगा इस प्रकार मैं दिग्व्रत में दीक्षित हुआ भगवन्।

मैं एक निर्धारित मर्यादा में ही भोजन, वसन, अलंकरण अंग राग अन्य भोग सामग्री ग्रहण करूँगा इस प्रकार मैं भोग-परिभोग परिमाण व्रत का धारण हुआ।”

“ मैं कामोत्तेजक कथा वार्ता न करूँगा मुशल कुदाली तलवार शस्त्र अस्त्र आदि अनर्थकारी साधनों से संयुक्त न रहूँगा। यों मैं अनर्थ दंड व्रत में कटिबद्ध होता हूँ प्रभु।”

मैं प्रतिदिन नियमित एक निश्चित समयावधि तक सामयिक ध्यान में बैठकर मन वचन, कर्म की चंचलता को रोकूँगा। भाव, भाषा और देह का दुष्ट प्रवृत्ति में प्रयोग न करूँगा यों मैं आज से सामयिक का व्रती हुआ भन्ते भगवन्।”

“अष्टमी, चतुर्दशी, अष्टान्हिका, पर्युषण आदि पवित्र तिथियों और धर्म पर्वों पर मैं प्रोषधोपवास धारण करूँगा इस प्रकार मैं प्रषधोपवास का व्रती हुआ, स्वामिन्।”

“आज से प्रतिदिन मैं तपस्वी, साधु, परदेशी, भोजनपेक्षी सुपात्र अतिथि को आहार दान देकर ही भोजन ग्रहण करूँगा इस प्रकार मैं चिरकाल के लिए अतिथि संविभाग का व्रती हुआ, प्रभु।”

“इस तरह मैं पाँच अणुव्रत और सात शिक्षा व्रत वाले प्रभु के श्रावक धर्म को अंगीकार कर जीवन पर्यन्त के लिए अर्हत् महावीर का श्रमणोपासक होता हूँ स्वामिन।”

आनंद गृहपति ने अत्यंत उत्कंठित और उत्साहित होकर फिर प्रभु की उस समदर्शी चितवन पर टकटकी लगा दी। वह पारदर्शी वीतराग चितवन उसके आर-पार देखती रही। पर वे आंखें आनंद की ओर न उठी। प्रभु से उसे कोई प्रत्युत्तर प्राप्त न हुआ। आनंद हताहत कुंठित, उदात्त देखता ही रह गया। सिर से पैर तक काँप-काँप आया। उसके रोमों में काँटे उग आए। हाय क्या सर्वज्ञात महावीर ने उसे न स्वीकारा? प्राणिमात्र के अकारण बंधु और बल्लभ सुने जाते तीर्थंकर महावीर क्या इतने निर्मम और बेदर्द भी हो सकते हैं? कि उन्होंने उसकी दारुण वेदना समर्पण और उसके व्रत ग्रहण की ऐसी घोर अवमानना कर दी?

फिर सिहरते-थरथराते आनंद गृहपति की आँखों से अविरल आँसू बहते आए। पर जैसे प्रभु ने उसके आँसुओं को भी अनदेखा कर दिया वह मेरु की तरह निश्चल और अप्रभावित दिखे उनकी दृष्टि अनिमेष नासारंध्र पर टिकी थी। मानों कि उन्होंने आनंद के इस व्रत ग्रहण और महात्याग को लक्ष्य ही न किया हो।

आनंद का हृदय एक गहरा झटका खाकर टूक-टूक हो गया। उसके जी में एक तीखा रोष और विद्रोह-सा उमड़ने लगा। मन ही मन वह बोला-क्या मेरे त्याग का कोई मूल्य नहीं अर्हत् महावीर की दृष्टि में?

तब अकस्मात् तल्लीन अर्हत् वाक्मान हुए।

“जो वस्तु भूल में ही तेरी नहीं उसका त्याग कैसा, देवानुप्रिय आनंद? ये जो करोड़ों सुवर्ण मुद्रायें और माणिक्य-मुक्ता तूने अपने निधानों में बटोरे हैं तो उसकी खातिर तूने करोड़ों मनुष्यों को वंचित, तृषित, शोषित, पीड़ित रखा है। करोड़ों को भूखे नंगे रखकर ही तू कोट्याधिपति हुआ है, देवानुप्रिय। क्या यह संपदा तेरी है जो तू इसे त्यागने का दंभ करता है?”

भगवान महावीर कुछ क्षणों तक चुप रहे। प्रश्न वातावरण में मंडराता रहा। आनंद काँप गया, उसे कोई उत्तर न सूझा। फिर सुनाई पड़ा।

“अपनी यह परम सुन्दरी पत्नी जिसे तू भोगने की बात करता है क्या वह तुम्हारी है? क्या तुम उसको कभी भोग सके हो, क्या उसे त्रिकाल में भी कभी भोग सकोगे? और नारी क्या केवल तुम्हारी भोग्या होने के लिए है? अपने सिवाय अन्य को भोगना स्वभावतः ही शक्य नहीं, फिर उसका त्याग कैसा आनंद? शिवानंदा को तुमने भोग्य माना, अन्य नारी मात्र को त्याज्य माना। किंतु इनमें से कोई भूल में ही तुम्हारी भोग्या नहीं। तो भोग और त्याग ग्रहण और निवारण किसका करते हो? वेश्या, कुमारी, बाला या विधवा के भोग और त्याग का निर्णय क्या तुम्हारे हाथ है? क्या वे अपने आप में कोई नहीं? तुम्हें क्या अधिकार है उन्हें ग्रहण करने या त्याग देने का? उन पर अपने अहम् और स्वामित्व की मोहर मारना चाहते हो? क्या वे तुम्हारी क्रीड़ा पुतलियाँ है, कि जब चाहें भोगो, जब चाहे त्याग दो?”

प्रभु फिर विराम हो गए। उस नीरवता में प्रश्न तीव्र से तीव्रतर होता गया। आनंद काठमरा-सा चुप हो गया। फिर अनहर नाद शब्दाय मान हुआ।

यहाँ कौन किसी को भोग सकता है? हर व्यक्ति स्वयं अपने को भोगता है। हर वस्तु स्वयं अपने को भोगती है। पर द्वारा पर का भोग स्वभाव नहीं सद्भूत नहीं। निमित्त नैमित्तिक संबंधों के कारण परस्पर को भोगने की भ्रांति होती है। बहते पवन और बहते पानी को भोगने ओर त्यागने की छलना में पड़ें हो गृहपति आनंद? स्वीकीया शिवानंदा हो या परकीया अन्य नारी हो जो स्वयं ही अपने तन-मन की स्वामिनी नहीं, उसे भोगने और त्यागने वाले तुम कौन होते हो?

प्रभु की इस देशना में वस्तु स्वभाव का कोई अपूर्व ही आयास प्रकट हो रहा था। जो परंपरागत जिन वाणी में कहीं पढ़ने सुनने में न आया था। देव गुरु बृहस्पति से लगाकर सारे पार्श्वानुसारी यति, आचार्य और वेदांत वारिधि गौतम तक यह अश्रुतपूर्ण वाणी सुनकर चकित थे। बौखला गए थे। तब बेचारे आनंद गृहपति की क्या बिसात?

उस अबूझ निस्तब्धता को तोड़ते हुए आर्य गौतम ने सबके हृदयों में उठ रहे तीव्र प्रश्न को उच्चारित किया।

“पूछता हूँ हे सर्वदर्शी सर्वज्ञानी प्रभु! जिनेश्वरी परंपरा में जो श्रावकों के बारह व्रत तथा श्रमणों के महाव्रतों का विधान है वह क्या हेय हैं भगवन्?”

परम्परा केवल प्रज्ञा की होती है, विधि-विधान की नहीं होती गौतम! नीति नियम आचार, विचार विधि, विधान युगानुरूप बदलते रहते है। आज का तीर्थंकर विगत कल के तीर्थंकर को दुहरा नहीं सकता।

लेकिन भन्ते स्वामिन् शास्त्रों में तो विधि-विधान आचार मार्ग है ही। व्रत नियम का विधि विधान है ही क्या वह गलत है और उसकी अवगणना की जा सकती है?

“शास्त्र तात्कालिक होता है, वह त्रिकालिक नहीं होता गौतम! त्रिकालिक आत्म वस्तु का अंतिम निर्णय, तात्कालिक शस्त्र कैसे कर सकता है? शास्त्र शाश्वत नहीं सामयिक है और जानो गौतम शास्त्र की शब्द सीमा में, अनंत पदार्थ उनके गुण पर्याय कैसे बँध सकते है? आज और यहाँ जो नैतिक और वैध है वह कल या और कहीं अनैतिक और अवैध भी हो सकता है। आज जो त्याज्य दिखता है, वह कल ग्राह्य भी हो सकता है। “

तो भगवान् क्या मान लेना होगा कि आपके युगतीर्थ में लोग स्वेच्छाचारी और स्वैर विहारी होंगे? क्या धर्म का कोई राज मार्ग न होगा?

“ मेरे युगतीर्थ में लोग बाहरी प्रतिज्ञा से नहीं आंतरिक प्रज्ञा से चलेंगे। जानो गौतम, हर बाहरी प्रतिज्ञा टूटने को होती है। वह अंततः अधोगामी होती है। लेकिन प्रज्ञा आत्मोत्थ और अचूक होती है। सो प्रज्ञा आत्मोत्थ और अचूक और अचूक होती है। सों वह अचूक और अचूक होती है। मेरे युगतीर्थ में लोग विज्ञानी और प्रबुद्ध होकर व्रत-आचार के सारे बाहरी साँचों ढाँचों और शृंखलाओं को तोड़ देंगे। उन पाखण्डों और प्रपंचों का भंडाफोड़ कर देंगे।”

प्रभु को इस खरधार वाणी ने, आनंद गृहपति की जड़ों में बद्धमूल उसके सारे संस्कारों को ध्वंस कर दिया। वह क्षत-विक्षत होकर अपनी स्थिति का संरक्षण खोजने लगा। उसने तड़प कर पूछा।

क्षमा करें, भन्ते, क्षमा श्रमण आप श्रावक श्रेष्ठियों के प्रति कठोर नहीं?

इसलिए कि पानी तक छानकर पीने वाले ये दया के पालक श्रावक श्रेष्ठ, आदमी के लहू का मूल्य पानी से कम आँकते हैं। मनुष्य का सर्वस्व छीनकर भी वे दया के अवतार बने रहते हैं। अपनी एक-एक दमड़ी के बदले, आदमी की चमड़ी पर्त दर पर्त उतार सकते हैं। उसके रक्त की एक-एक बूँद से, अपनी एक-एक कौड़ी वसूल कर लेते है। फिर भी इनकी मृदुता और मिठास का जवाब नहीं। इनका षड्यंत्र आदिकाल से आज तक इतिहास में अखंड रूप से अंतर्व्याप्त है। करोड़ों अरबों मानवों की अनगिनत पीढ़ियों को कर्म विधान की ओट में अज्ञानी और असंस्कृत रखकर अपने चालाक शोषण से ये उन्हें चिरकाल तक दीन दरिद्र और पराधीन बनाए रखते है और यों अपनी संपत्ति और अभिजात्य की जड़ परंपराओं को अटूट और अक्षुण्ण रखते हैं। महाजनी सभ्यता के इस सर्वनाशी अभिशाप को खुली आँखों से देखो आनंद ये सारी मनुष्य की जाति को सौदागर बना देने पर तुले है। तुम स्वयं इसके ज्वलन्त उदाहरण हो।”

“इसी से तो सर्व के तारनहार प्रभु के श्रीचरणों में अपने परिग्रहों भोगों संपदाओं का त्याग करने आया हूँ।”

“सारे लोक से चुराई संगति का त्याग और परिग्रह परिमाण करने आए तुम मेरे पास? जो मूल में ही तुम्हारा नहीं, जो औरों से छीना झपटा हुआ है उस तस्करी की संपत्ति पर अपने त्याग की मुद्रा आँकने आए हो तुम मेरे पास? कितना हास्यास्पद, निराधार और प्रपंची है यह तथाकथित त्याग, तप, व्रत, आचार का सुविधा जीवी धर्म मार्ग।”

अचानक भगवान चुप हो गए। सारे वातावरण में लपटें उठती सी अनुभव हुई। आनंद गृहपति बिल–बिलाकर रो आया। प्रभु के एक-एक शब्द से मानों उसके जन्मान्तर व्यापी कंचुकी एक के बाद एक उतरते चले गए। उसने बड़ी कातर दृष्टि से भगवान महावीर को निहारा।

उसकी दृष्टि की कातरता के प्रत्युत्तर में महावीर की आँखों में अपरिमित वात्सल्य उमड़ आया। वह उसकी ओर देखते हुए बोले-यदि त्यागना ही चाहते हो तो अपने अहंभाव को त्यागो यदि व्रती होना चाहते हो तो लोक सेवा का व्रत लो

विराट पुरुष के लिए स्वयं का विसर्जन तुम्हारी आत्मचेतना को चरम और परम तक पहुँचा देगा। तुम यथार्थ धर्म लाभ कर सकोगे।”

खुल गए श्रेष्ठी के ज्ञानचक्षु एवं एक एक नये व्यक्तित्व का अंदर से जन्म हुआ जिसने जैन धर्म के कार्य को आगे बढ़ाने में आजीवन स्वयं का काम स्वर्णाक्षरों में लिखा लिया।


संस्कृति संतति (Kahani)

बूढ़े और अशक्त सियार का पेट भरना दूभर हो गया। उसे एक उक्ति सूझी। वह चूहों के बिल के समीप जाकर एक पैर के बल तपस्वी की मुद्रा बनाकर खड़ा हो गया। कंठमाला पहने आसमान की ओर मुँह फाड़े एक पैर पर बिल के द्वार पर सियार को खड़ा देखकर चूहों का मुखिया ठिठका। घबराया यह क्या नई मुसीबत आ गई। सोचा अब हमारी खैर नहीं। परिवार को बचाने हेतु यहाँ से भागना पड़ेगा? किंतु साहस बटोर कर मूषक सरदार सियार के पास जाकर बोला आप कौन हैं? हवा में मुँह फैलाए एक टाँग पर क्यों खड़े हैं। कपटी सियार मीठे स्वर में बोला। शांत रहे बच्चा। तप में विघ्न मत डालो हम दंडक बन से आये है। क्षुद्र जीवों के कल्याण हेतु तप में रत हैं। देखते नहीं हमारी कृषकाय तप करते-करते सूख गई है। सरदार ने पूछा आसमान की ओर मुँह फाड़ने से आपका क्या प्रयोजन है? तपसी सियार ने उत्तर दिया “पौहारी हैं भोजन नहीं करते।” मात्र वायु के सहारे जीते है।

सरदार ने साथियों को महात्मा का मंतव्य कह सुनाया। सब निश्चित हो गये सभी रात भर इधर-उधर जाते प्रातः अँधेरे में ही वापस लौट आते। कुशल पूर्वक जीवन व्यतीत होता। कालांतर में परिवार के सदस्यों की संख्या घटती देखकर मूषक सरदार ने पूछा क्या कुछ सदस्य बाहर चले गये है। पहले तो हमारा बिल में खड़े होकर भी गुजारा नहीं होता था। बूढ़े का माथा ठनका कही यह वेशी महात्मा बनने वाला सियार ही तो हमारे सदस्यों को नहीं खा जाता? छिपकर देखा तो ज्ञात हुआ प्रतिदिन लौटते झुंड में से अंतिम सदस्य को अँधेरे में कपटी सियार चट कर जाता है। चूहों के सरदार ने सिर पीटा और पछताया गलती मैंने की है। छद्म वेश और मीठी बातों से प्रभावित हो कर मैंने ही अपने परिवार का नाश कराया है।

कहीं हम भी ऐसे छद्मवेषधारी लोगों के हाथों अपनी संस्कृति संतति को गँवा तो नहीं रहे।


अप्रतिम है विचारों की सामर्थ्य

मनुष्य के उत्थान-पतन सफलताओं असफलताओं में विचारों का बड़ा महत्त्व है। आदिकाल से ही इस तथ्य पर विचार किया जाता रहा है। गीता एवं ऋग्वेद की ऋचा से भी स्पष्ट होता है कि इस संबंध में ऋषि मनीषियों का बहुत पहले ध्यान चला, गया था। तभी उन्होंने लिखा है ”वैज्ञानिक भी इस तथ्य की पुष्टि करते है कि मनः स्थिति से ही परिस्थितियाँ निर्मित होती है। राबर्टथियों बाल्डी जैसे विचारकों का भी कहना है कि सृजनात्मक विचार धाराओं द्वारा जीवन को परिवर्तित परिवर्धित किया जा सकता है, पर कम ही व्यक्ति हैं, जो इस तथ्य को समझते और लाभ उठा पाते है।

प्राण शक्ति की मात्रा के अनुरूप ही विचारों में शक्ति होती है। इसी मात्रा के आधार पर उसे मंद मध्यम, और प्रचंड तीन वर्गों में विभाजित किया गया है। अनियमित अस्त व्यस्त टूटे फूटे विचारों की शक्ति क्षीण और वेग भी मंद होता है। उनकी संप्रेषण गति धीमी और प्रभाव क्षेत्र सीमित होता है। अविकसित व्यक्तियों की विचार शक्तियों की विचार शक्ति के लोगों में जीवन की सतही जानकारी होती है। वे उसी के सहारे अपना ढर्रा घुमाते है। अतः इनकी विचार शक्ति भी उतनी विकसित और शक्तिशाली नहीं होती, जितनी संयमी और सदाचारी की। गंभीर और विचारशील विवेक संपन्न व्यक्तियों में प्राण शक्ति का अंश अधिक होता है। उनके विचारों की शक्ति भी बढ़ी-चढ़ी और उत्कृष्ट होती है।

विश्व विख्यात जीवन-कला विशेषज्ञ डेल−कार्नेगी से जब पूछा गया कि अब तक की जानकारी के श्रेष्ठ अंश पर कृपया प्रकाश डालें, तो उन्होंने नपे-तुले शब्दों में छोटी-सा सारगर्भित उत्तर दिया-मैंने सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह देखी कि विचारों की शक्ति से बढ़कर इस संसार में कोई शक्ति नहीं है इसी के सहारे मनुष्य जो बनना चाहता है, बन सकता है।” आगे वे कहते है कि “यदि सोचने का सही तरीका जान लिया जाय, तो समझता चाहिए कि संतोष, सहयोग और सफलता प्राप्त करने की कुँजी हाथ लग गई।” शेक्सपियर के विचार भी इससे मिलते जुलते है। वे लिखते है कि हमारे विचार ही प्रतिकूलता अनुकूलता गढ़ते है, वे ही है जो उदासी या प्रसन्नता देते है सहयोग या असहयोग सम्मान या तिरस्कार पाने में दूसरों का उतना दोष नहीं होता, जितना अपने स्वभाव, एवं विचारों का होता है।

कितने ही व्यक्ति विकलांगता को अभिशाप और दैवी प्रकोप मानकर रोते कलपते भाग्य और विधाता पर दोषारोपण करते रहते हैं एवं अकर्मण्यों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते है किंतु अंधे कवि मिल्टन के विचार ऐसे लोगों से भिन्न थे। वे कहते-65 इंच लंबे चौड़े शरीर में आँखों की 2 इंच लंबे चौड़े शरीर में अनुपयोगी ठहराना कहाँ की बुद्धिमानी है। वे पूरे जीवन ज्ञान-साधना में लगे रहे। ऐसे परिपक्व विचारों के कारण ही विश्व विख्यात कवियों की श्रेणी में उनका नाम आज भी बड़े गौरव और आदर से लिया जाता है।

विद्वान् मोन्टेन के अनुसार मनुष्य की परिस्थिति में ईश्वर का क्रम, स्वयं की बुद्धि और विचारों का हस्तक्षेप अधिक रहता है स्वयं की मनः स्थिति ही परिस्थितियों के निर्माण में उत्तरदायी है। रोम के दार्शनिक मार्क आण्डेलियस के अनुसार हर मनुष्य की दुनिया अलग है जो उसके विचारों द्वारा गढ़ी गई है। सुख-दुःख कष्ट अभाव, समृद्धि उसके स्वयं के विचारों पर निर्भर करते है।

व्यक्ति अजस्र शक्तियों का भाण्डागार है। उसमें प्रचुर सामर्थ्य है। भाण्डागार है। उसमें प्रचुर सामर्थ्य है। यदि वह अपनी विचारणाओं मान्यताओं में दूरदर्शी विवेकशीलता का समावेश कर ले तो दुर्बल और दुर्भाग्यग्रस्त रहने वाला व्यक्ति भी अपने जीवन में सौभाग्य की स्थिति का आनंद उठा सकने में समर्थ हो सकता है। उसे केवल चिंतन के प्रवाह को उलट कर सीधा करना है, मन बिखराव को रोकना है और एकाग्रता में नियोजित करना है। इसके लिए चिंतन,मनन, स्वाध्याय, संयम, सेवा जैसी सुगम विधियाँ भी बताई गई है और मनोनिग्रह, ध्यान, धारणा, त्राटक प्राणायाम जैसी यौगिक क्रियाएँ भी। मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप किसी का भी चयन किया जा सकता है। लक्ष्य मात्र एक ही होना चाहिए विचारों की शुचिता। यदि विचार सही व विधेयात्मक हुए तो व्यक्ति का निर्माण सही होता चला जाएगा।


ऋषित्व का अर्जन ही चरम सिद्धि

लता-वितान और झालरों से सजायी गयी यज्ञशाला की सौंदर्य छटा देखते ही बनती थी। आखिर सम्राट रथवीति स्वयं जो यज्ञ के संरक्षक और यजमान थे। संपूर्ण नगर की प्रजा इस यज्ञ की सफलता के लिए प्राण-पण से जुटी थी। नगर की गली-गली स्वच्छता ओर सजावट के मारे दमक रही थी। प्रजा का उत्साह देखते ही बनता था।

जल यात्रा का विशाल जुलूस मंडप पर आ रुका। यज्ञ कलश प्रतिष्ठित कर दिए गए। ऋत्विज्गणों ने अपने-अपने आसन सँभाल लिए। तभी इस यज्ञ के आचार्य और ब्रह्मा महर्षि अर्चनाना आत्रेय अपने ज्येष्ठ पुत्र श्यावाश्व आत्रेय के साथ वहाँ पहुँचे।

कोलाहल निस्तब्ध-नीरवता में परिवर्तित हो गया। महाराज और राजमहिषी ने आगे बढ़कर उन्हें साष्टांग प्रणिपात किया और प्रधान यज्ञ मंडप तक ले आए। महर्षि का तेज सूर्य के समान तो पुत्र चन्द्रमा के समान शीतल और तेजस्वी। उनके पांडित्य का तो कहना ही क्या? सम्पूर्ण राष्ट्र में उस समय अर्चना का यश पूर्णमासी की धवल चन्द्रिका की भाँति फैल रहा था।

यज्ञ सकुशल संपन्न हुआ। स्विष्टकृत होम और देवों को वसोधारा समर्पित कर दी गयी। पुष्पाञ्जलि और विसर्जन तक की संपूर्ण क्रियाएँ बड़े आनंद और उल्लास के साथ संपन्न हुयीं। प्रजा प्रसाद पाकर चलने लगी। उधर एक विशिष्ट आसन पर बैठे अर्चनाना राज्य प्रमुखों सहित महाराज रथवीति से विचार विमर्श कर रहे थे। तभी उनकी दृष्टि एक ओर हठात् खिंच गयी। क्षौम परिधान धारण किए नवयुवती के अद्वितीय सौंदर्य पर दृष्टि पड़ते ही महर्षि अर्चनाना की दृष्टि एक क्षण के लिए रुक सी गयी। देखने से ऐसा लगता था, उसे देखकर महर्षि के मस्तिष्क में कोई विचार उठ पड़ा हो।

देव! यह मेरी पुत्री मनोरमा है रथवीति ने परिचय कराते हुए कहा-रथवीति ने परिचय कराते हुए कहा- “यही हमारी अकेली संतान है देव! इसे हमने कला निष्णात बनाने का हर संभव प्रयत्न किया है। व्याकरण और साहित्य में आचार्य है।

“अतीव प्रसन्नता की बात है राजन्। बालिकाओं का शिक्षित होना तो आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। उसी से तो राष्ट्र में श्रेष्ठ संतति का निर्माण होता है। महर्षि ने उधर से मुख फेरते हुए एक दीर्घ निश्वास लेकर सारी बात ऐसे कहीं मानों उनके हृदय में कोई पीड़ा उमड़ उठी हो।

गुरुदेव! आप अपने अंतर्मन में कुछ बेचैनी अनुभव कर रहे है। असंभव न हो तो कृपया हमें बताएँ हम आपकी क्या सेवा कर सकते है, रथवीति ने बड़ी विनम्रता से पूछा। उपस्थित श्रीमंत गण अभी कुछ सोच में थे। उन्हें आश्चर्य था कि महर्षि के मन में यह अटपटा प्रसंग क्यों उठ पड़ा।

महर्षि ने एक बार सभी उपस्थित की ओर ऐसे देखा मानों वे एकांत चाहते हों। धर्मपरायण रथवीति ने सबको सादर विदा कर दिया। तब महर्षि अर्चनाना ने कहा- रथवीति मेरे जीवन में कभी कोई इच्छा उत्पन्न नहीं हुई पर इस बालिका को देखते ही मेरे हृदय में वात्सल्य उमड़ पड़ा है। समझ में नहीं आता ऐसा क्यों कर सोचता हूँ यह कन्या मेरी पुत्र वधू हो सकी होती तो श्यावाश्व को एक उपयुक्त जीवन साथी मिल जाता और मुझे अपने वात्सल्य भाव को तृप्त करने का आधार।

रथवीति महर्षि का यह कथन सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-देव मेरी पुत्री का संबंध तेजस्वी अत्रि कुल में और श्यावाश्व जैसे होनहार युवक के साथ हो, इससे बढ़कर कन्या और हम सबके लिए गौरव की क्या बात हो सकती है। गौरव की क्या बात हो सकती है। मनोरमा भी धन को नहीं, योग्यता और सदाचरण को महत्त्व देती है। यह तो उसकी इच्छा की पूर्ति ही हुई किंतु। कहते-कहते एक क्षण को रथवीति रुक गए और कुछ सोच में पड़ गए।

किंतु क्यों राजन्! स्पष्ट कहो न। हमने अपनी इच्छा व्यक्त की है बाध्य तो नहीं किया। संपूर्ण स्थितियों पर विचार करके उत्तर दे सकते हो। अपने पुत्र के लिए योग्य वधू की खोज मेरा धर्म था। ऐसा लगा श्यावाश्व के लिए मनोरमा सर्वथा उपयुक्त है।

आपका कथन सत्य है, भगवन्। किंतु मुझ से अधिक मनोरमा पर राजमहिषी का अधिकार है। माँ होने के कारण उसके हित की बात वे मुझसे अधिक सोच सकती है। आप ठहरें हम अभी उनसे पूछकर आते है यह कहकर रथवीति अंतः पुर की ओर चल पड़े

साम्राज्ञी ने महाराज रथवीति की सारी बातें ध्यान से सुनी। एक बार वह मुस्कराई फिर थोड़ा गंभीर होकर बोलीं “महाराज यों तो यह संबंध बहुत ही उपयुक्त है। किंतु श्यावाश्व की योग्यता पर मुझे संदेह है। मनोरमा की योग्यता ऋषि पत्नी बनने की है। कदाचित महर्षि अर्चनाना ने श्यावाश्व को मनोरमा के सौंदर्य से न तोला होता। उसकी योग्यता से श्यावाश्व की योग्यता की तुलना भी कर ली होती तो मुझे प्रस्ताव स्वीकार करने में कोई आपत्ति न होती। पर अब मैं क्या कर सकती हूँ।

स्पष्ट असहमति। रथवीति उदास लौटे। राजमहिषी ने जो कुछ कहा था, ज्यों का त्यों कह दिया। श्यावाश्व अब तक मनोरमा को अंतरात्मा से अपनी सहचरी मान चुका था। उसकी स्थिति ऐसे हो गयी, जैसे किसी ने मछली को जलाशय से निकाल कर मरुस्थल में डाल दिया हो। जैसे किसी को आकाश में चढ़ाकर नीचे धकेल दिया गया हो।

अर्चनाना उदास होकर आश्रम लौटे। श्यावाश्व की स्थिति कुछ और ही थी। प्रेम जीवन की चरम उपलब्धि एक बार जब कभी हृदय में प्रेम की पीड़ा उमड़ती है तो मनुष्य की स्थिति न जाने क्या हो जाती है। उसे प्रेमास्पद के अतिरिक्त कुछ सूझता भी तो नहीं। श्यावाश्व की भावनाओं में मनोरमा के प्रेम की छाया साधना बनकर उत्तर चुकी थी और वह उसका मूल्य चुकाना अच्छी तरह जानते थे।

सवेरा हुआ, महर्षि अर्चनाना अपने स्वाध्याय शिक्षण और आश्रम व्यवस्था में व्यस्त हो गए। पर श्यावाश्व अपने योगाभ्यास में अभी भी संलग्न थे। एक समय का आहार-मिताहार यम नियम, ध्यान -धारणा का अभ्यास करते-करते श्यावाश्व ने अपने जीवन की रही सही महत्त्वाकाँक्षाओं का भी हवन कर दिया। साधना साधना साधना शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिए वे अविराम तप करने लगे।

एक दिन जब वह उपासना के लिए बैठे तो उनका ध्यान नीलाभ आकाश की निस्पन्दता में ऐसा खो गया, जैसे उनकी आत्मचेतना का कोई पृथक् अस्तित्व ही न रहा हो। करोड़ों सूर्य सम प्रभा वाले ग्रह नक्षत्रों के बीच उन्होंने दिव्य आभा वाले कुछ पुरुषों के दर्शन किए। श्यावाश्व ने आराध्य मरुद्गण को पहचाना और उनकी प्रार्थना ऋचा बन गयी।

संपूर्ण आश्रम एक अनुपम दिव्य आभा और सुगंध से भर गया। अर्चनाना दौड़े ऋषि पद प्राप्त अपने पुत्र को उन्होंने अपनी छाती से लगा लिया। आँखों से प्रेमाश्रुधारा बहाते ऋषि को वह दिन याद आया, जब इसी योग्यता के लिए श्यावाश्व को ठुकरा दिया गया था। चोट खाया हुआ हृदय यदि साधना में लग जाय तो वह क्या नहीं कर सकता। यह उनकी समझ में आज आया।

श्यावाश्व अपने आश्रम से चलकर सर्वप्रथम पितामह अत्रि के पास पहुँचे। पौत्र को देखते ही अत्रि ने कंठ में पहनायी हुई मरुद्गणों की माला को पहचान लिया। पुत्र के साथ पौत्र के भी ऋषि हो जाने का हर्ष उनसे सँभाला नहीं गया। उन्होंने कहा-श्यावाश्व अब तुम रथवीति के पास जाओ और उनकी कन्या मनोरमा को वधू बनाकर साथ ले आओ।

पर उसके लिए तो यह कठिन बात थीं। उनके हृदय में मनोरमा के प्रति अपार प्रेम था। किंतु स्वाभिमान वहाँ जाने के लिए आज्ञा नहीं दे रहा था। तब अत्रि ने भगवती संध्या को दूत बनाकर भेजा। पर उनके वहां पहुँचने से पूर्व ही रथवीति और राजमहिषी को उनके ऋषि हो जाने की बात पता लग गयी थी। वहाँ मनोरमा के विवाह की तैयारियाँ भी हो रही थी।

समय पर श्यावाश्व के लिए महर्षि अत्रि के आश्रम में रथ पहुँच गया। वह उस पर चढ़ कर राजमहल पहुँचे। उनके स्वागत के लिए राजमहिषी सब से आगे उपस्थित थी। श्यावाश्व को देखते ही उन्होंने कहा क्षमा करो वत्स। उस दिन पहचानने में भूल हुई। तुम्हें पाकर हम अतीव गौरव अनुभव करते है। श्यावाश्व ने उन्हें प्रणाम करते हुए कहा-क्षमा करो वत्स। उस दिन पहचानने में भूल हुईं। तुम्हें पाकर हम अतीव गौरव अनुभव करते है। श्यावाश्व ने उन्हें प्रणाम करते हुए कहा-क्षमा का पात्र तो मैं हूँ। आपने उस दिन सही मूल्यांकन न किया होता और उसके लिए साहस न दिखाया होता तो आज मुझे यह स्थिति कहाँ मिलती?


असलियत (Kahani)

एक बिल्ली की गरदन दूध के बर्तन में फँस गई। मुश्किल से बर्तन टूटा फिर भी उसका घेरा गले में फँसा था।

उसने चूहों से कहा वह केदार यात्रा से लौटी है। प्रमाण के लिए यह केदार कंगन गले में बँधा है तुम लोग निर्भय रहो और मेरा सत्संग सुनने आया करो।

मूर्ख चूहों ने विश्वास किया और वे आने लगे। बिल्ली उनसे पीछे वाले को पकड़ लेती और पेट भरती। इस प्रकार एक एक करके सभी घटते गये। उनमें से एक कटी पूँछ का सरपंच था वह भी उदरस्थ हो गया। तब चूहों की आँख खुलीं। सच्चा बोध हुआ। बिल्ली की असलियत समझी और दूर से ही नमस्कार करने लगे।


विज्ञान अध्यात्म के साथ चले, तो ही समग्र प्रगति संभव

आज के तथाकथित बुद्धिवादी लोग वर्तमान वैज्ञानिक प्रगति की दलील देकर आस्तिकता, अध्यात्मिकता तथा धार्मिकता जैसे महान् सिद्धांतों का प्रतिवाद करते है। कहते है प्रत्यक्षवाद में इनका कोई अस्तित्व नहीं पर वास्तविकता क्या है? यदि इसका गंभीर अध्ययन द्वारा अन्वेषण किया जाय, तो ज्ञात होगा कि विज्ञान की दुहाई देने वाले इन लोगों का विज्ञान की दुहाई देने वाले इन लोगों का विज्ञान संबंधी ज्ञान कितना उथला है जिन्होंने गहन परीक्षणों के उथला है जिन्होंने गहन परीक्षणों के उपरांत कोई महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है उन वैज्ञानिकों में से कदाचित् ही कोई ऐसा है, जिसने जीवन को गरिमा प्रदान करने वाले इन तथ्यों से इनकार किया हो। अधिकांश ने सिद्धांतत इनके अनुशासनों को स्वीकार है और उनके अपनाये जाने पर बल दिया है।

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि पिछली दो शताब्दियों में ज्ञान−विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ है जिससे निकट भविष्य में और अधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों की आशा बँधी है। फोटोग्राफी का प्रचलन अब से लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व हुआ था और आज उसका अतिविकसित रूप त्रिआयामी चित्रों एवं रंगीन तस्वीरों के रूप में देखा जा सकता है। टेलीफोन के रूप में देखा जा सकता है। टेलीफोन ने विकास के छः दशक लिये रेडियो ने साढ़े तीन दशक राडार ने डेढ़ दशक टी.वी. एक दशक तथा अणु शक्ति ने लगभग आधा दशक समय लिया। यह निरंतर सिकुड़ती सीमा-अवधि इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान की विभिन्न दिशाओं का जितना विकास होता है, विज्ञान की उतनी ही प्रगति तीव्र होती है इन तथ्यों ने ज्ञान की सार्थकता सिद्ध करके निश्चय ही यह बता दिया है कि ज्ञान के अभाव में मनुष्य किसी भी दिशा में बढ़ नहीं सकता। ज्ञानार्जन की प्रवृत्ति को सर्वोपरि आवश्यकता के रूप में स्वीकार करके ही उन्नति संभव है।

किंतु इतने भर से पूर्णता का दंभ करना बौद्धिक औचित्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं। भौतिक ज्ञान का भी क्षेत्र सीमित नहीं, वह इतना अगाध है, जितना अभेद्य यह ब्रह्माण्ड इसे अब विज्ञान ने भी स्वीकार लिया है कि मात्र बौद्धिक ज्ञाने के सहारे इस विस्तृत ब्रह्माण्ड और जीवन के रहस्यमय पक्षों की जानकारी का प्रयास मनुष्य को गंभीर समस्याओं में उलझा सकता है अस्तु इसका समाधान बुद्धि से परे के स्तर में ही जाकर ढूँढ़ना श्रेयस्कर होगा।

ऐसी दशा में बुद्धिवाद की चुनौती देना दर्प के अतिरिक्त और कुछ नहीं बौद्धिक दृष्टि से इन दिनों संसार ने जितनी प्रगति की है, अपने पूर्वज उससे तनिक भी पीछे नहीं थे। धर्म और अध्यात्म ने प्रदान किये है उनके ज्ञान की सामर्थ्य अतुलनीय थीं। यदि विज्ञान को, टेक्नोलॉजी को ही ज्ञान का मापदण्ड माना जा रहा हो तो इस क्षेत्र में भी पूर्वज अग्रणी थे। उनकी उपलब्धियों पर दृष्टिपात करने से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है।

आज की सबसे बड़ी उपलब्धि आकाश गमन को माना जाता है। वायुयानों द्वारा पृथ्वी को कुछ ही घटों में लाँघ जाना निश्चय ही आश्चर्य की बात है पर ऐसी बात नहीं कि ऋषिकालीन विज्ञान इस क्षेत्र पिछड़ा हुआ था। वेदों के मर्मज्ञ जर्मन वैज्ञानिक डॉ. ड्रइच के अनुसार प्राचीन भारत ने इस दिशा में जो उन्नति की थी वहाँ तक पहुँचने में आधुनिक विज्ञान को शताब्दियाँ लग जायेंगी अत्यंत सही कथन है क्योंकि तब का विज्ञान अध्यात्म की सीढ़ियों के सहारे उस उत्तुंग ऊँचाई पर पहुँचा था, जबकि आज का विज्ञान मात्र बुद्धिवाद के सहारे ऐसा करने का दुस्साहस कर रहा है जो असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। प्राचीन वैमानिकी से संबंधित सबसे प्रामाणिक ग्रंथ महर्षि भारद्वाज रचित यंत्र सर्वसव” के 40 प्रकरणों में से 28 वां प्रकरण माना जाता है इसमें विमानों के विभिन्न किस्में यथा शकुन रुक्म सुन्दर त्रिपुर जैसे 25 प्रकार के विमानों की चर्चा है। सुन्दर विमान शुँडालु से निकलने वाले धुएँ ये चलते थे त्रिपुर जल, थल, वायु, तीनों मार्गों में चलने की समान क्षमता रखते थे। इसमें लगा “सीत्कारी यंत्र” उसे पनडुब्बियों की विशेषता प्रदान करता था, जिससे पानी के भीतर भी लोगों को शुद्ध व शीतल वायु मिलती रहती थी। ग्रंथ के उक्त प्रकरण में विमानों के रेखापथ, दम्भोक्ति गुहादर्भादर्श यंत्र ़स्यवात, निसन आदि यंत्रों को विस्तृत उल्लेख है, जो दूरवर्ती ग्रहों की यात्रा के अवरोधों को भी हटाने में सक्षम थे। यह सब अत्यधिक वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ही संभव रहा होगा। फिर चरमोत्कर्ष के बाद अपना बौद्धिक ज्ञान का अभिमान उचित प्रतीत नहीं होता

यहाँ यह सवाल उठ सकता है कि यदि यह सब वास्तविकता थी तो आज क्यों नहीं? अब तक तो इस विकास को पूर्णता की स्थिति में होना चाहिए था, पर ऐसा न हो सका? आखिर क्यों? उत्तर के लिए पुनः उस युग से वर्तमान युग में आना पड़ेगा तब विज्ञान का चरम विकास होने पर भी लोगों ने आस्तिकता आध्यात्मिकता ओर धार्मिकता के मूल मानवीय लक्ष्य का परित्याग नहीं किया था। विचारशीलता ने तर्क की गुँजाइश नहीं रखी थी विज्ञान विराट् की साकार परिकल्पना का माध्यम मात्र था। उसे भौतिक दंभ का आधार नहीं बनाया गया। तब ज्ञान श्रद्धाभूत था। उसे भौतिक दंभ का आधार नहीं बनाया गया। विश्वास की शक्ति के लिए तर्क से अधिक श्रद्धा और सम्मान को मान्यता मिली हुई थी इसी कारण सामाजिक जीवन में नैतिकतापूर्वक मर्यादा, पारस्परिक एकता और बंधुत्व की भावना संव्याप्त थी सर्वत्र सुख शांति का हेतु यही था।

वर्तमान में भौतिक उपलब्धियों की चकाचौंध ने धार्मिक आध्यात्मिक अनुशासनों की सर्वथा उपेक्षा कर दी, जिससे निरंकुश भौतिकवाद का जन्म हुआ और चार्वाक एवं नीत्से जैसे दर्शन कुकुरमुत्तों की तरह उगने लगे। परिणाम स्वरूप लोभ-मोह की वासना-तृष्णा की ललक इस कदर बढ़ी जिसमें नैतिकता की नीतिमत्ता ही जल कर खाक हो गई। शेष बचा अध्यात्म का कंकाल इसी ढकोसले में लोग जब तब जहाँ तहाँ तरह तरह के रंग रोगन चढ़ा कर आध्यात्मिक होने का प्रपंच रचते और दूसरों की आँखों में धूल झोंकते है। आज का अध्यात्मवाद यहीं तक सीमित है जबकि भौतिकवाद एक बार पुनः आदिम युग की ओर ले चलने को उतारू है। संभवतः कभी पूर्व में इन्हीं परिस्थितियों में परमाणु संकट उत्पन्न हुआ होगा, जिसके प्रमाण अब भी देश-विदेश में मिल रहे है।

कुछ वर्ष पूर्व लेबनान में शीशे की तरह चट्टान के टुकड़े मिले है इन्हें टेक्टीटेस कहते है अमेरिका के परमाणु विज्ञानी डॉ. स्टेयर ने इनमें रेडियोधर्मी एल्युमिनियम आइसोटोपों का अध्ययन किया, तो जो निष्कर्ष सामने आया, उससे वे स्तब्ध रह गये उनका कहना था, “ऐसा लगता है जैसे परमाणु युद्ध पहले कभी हो चुके है। यह काले पत्थर न सिर्फ लेबनान वरन् भारत फ्राँस, आस्ट्रेलिया दक्षिण अफ्रीका, चिली आदि देशों में भी मिले है जिनमें एल्युमिनियम तथा बैरीलियम बड़ी मात्रा में विद्यमान् है। अध्ययनों से पता चला है कि यह अत्यंत उच्च ताप वाले भयंकर अणु विस्फोटों के परिणाम स्वरूप बने है। विशेषज्ञों ने इनका रचना-काल महाभारत युग के आस-पास बताया हैं। महाभारत युद्ध में प्रयुक्त अस्त्र शस्त्र वैज्ञानिक आयुधों से काफी कुछ मिलते जुलते है। इस आधार पर इसकी संगति महाभारत युद्ध से ठीक ठीक बैठ जाती है। वह स्थिति दुबारा आ सकती है, यदि दुर्योधन की सी दुर्बुद्धि को त्यागा नहीं गया।

मनुष्य प्रायः अपनी पिछली भूलों से सबक लेता है। जो गलती पहले वह कर चुका उसके प्रति सावधानी बरतता और जागरूक रहता हैं। इन दिनों हम लगभग उसी स्थिति में है। इन दिनों हम लगभग उसी स्थिति में है, जब एक बार फिर वैसा ही खतरा सिर पर मँडरा रहा है। पुनः वह हृदयविदारक दृश्य उपस्थित न हो, इसके लिए विज्ञान पर अध्यात्म का अंकुश लगे और उसे उच्छृंखल बनने से रोके, क्योंकि ज्ञान की गरिमा शालीनता में है उच्छृंखलता में नहीं। सम्मान तभी मिलता है श्रद्धा इसी स्थिति में उपजाती है। जहाँ श्रद्धा का अभाव है वहाँ ज्ञान भी शुष्क होता है। विज्ञान शुष्क न हो, वह श्रद्धायुक्त बने और अध्यात्म के साथ एकाकार होकर चले। समय की माँग यही हैं।


निन्यानवे का फेर (Kahani)

सेठ के पड़ोस में एक मजूर रहता था। जो कमाता उसे संतोषपूर्वक खाकर चैन की जिंदगी बिताता। सेठानी महल पर से झाँककर मजदूर परिवार की मस्ती देखती रहती और पति को उलाहना देती, तुम कोल्हू के बैल की तरह पिलते रहते हो। कभी न चैन न फुरसत न खुशी न मस्ती।

सेठ ने कहा-इस मजदूर को निन्यानवे के फेर में नहीं फँसना पड़ा है। अन्यथा सारी हँसी-खुशी चली जाती। सेठानी ने पूछा-निन्यानवे का फेर क्या होता है? सेठ ने उसे दिखा देने का वायदा किया।

रात्रि को सेठ ने एक पोटली रुपयों की बाँधकर चुपके से मजूर के आँगन में फेंक दी। उठकर सवेरे पोटली खोली तो परिवार बहुत प्रसन्न हुआ? विचार होने लगा कि जो एक कम है उसे भी मिलाकर पूरे सौ कर लिये जाएँ इसके लिए एक ही उपाय था अधिक श्रम अनेकों योजनाओं बनी और पूँजी बढ़ाने का निश्चय हुआ। फलतः अकेला मजदूर ही नहीं उसकी स्त्री बच्चे तक कमाने बचाने के फेर में व्यस्त रहने लगे। रात्रि को देर में आते और थके माँदें से जाते। सवेरा होते-होते उन्हें फिर कमाने के लिए दौड़ना पड़ता।

सेठ जी सेठानी को ऊपर से सारे परिवर्तन दिखाते रहते और कहते देखा निन्यानवे का फेर। अब इन लोगों का घर सुनसान पड़ा रहता है न? कहीं मस्ती दीखती है क्या?

सेठानी समझ गई कि पैसा पाकर आदमी और अधिक लालची हो जाता है।


वैराग्य की पहली पाठशाला, गृहस्थ रूपी तपोवन

देवदत्त संत थे पर साँसारिक संत। यों नहीं कि उन्होंने गृहस्थ सुख का परित्याग न किया हो, वरन् इसलिए कि वे भजन साधन सदाचार का आचरण करते हुए, कभी-कभी क्रोध का व्यवहार कर जाते थे। धैर्य स्थित रख सकना उनके लिए कठिन हो जाता था और घर में जब कभी ऐसी स्थिति आती, धर्मपत्नी को डाँटने लगते-देख यदि तूने अमुक कार्य नहीं किया तो संत पुनीत के आश्रम में जाकर संन्यासी हो जाऊँगा। सहिष्णुता का उनमें नितांत अभाव था।

धर्मपत्नी को उनसे तो नहीं धमकी से बड़ा भय लगता था। नन्हे नन्हे बच्चों का पालन-पोषण का प्रबंध कौन करेगा? यदि ये संन्यासी हो गए, यह कल्पना करते ही वह डर जाती और वे जैसा कहते करने लगती। किंतु वह देवदत्त के इस आचरण से बड़ी दुखी थी। इन्हीं देवदत्त की गाँव के लोग कितनी श्रद्धा करते है, कितना स्नेह और आदर देते मीठे मीठे बोलते है। इस पर ध्यान जाता तो उसे शंका होने लगती कि क्या दूसरों के लिए मीठा होना और घर के निरीह सदस्यों को दबाना और लक्षण है। दिन रात वह इसी उधेड़-बुन में डूबी रहती।

संत पुनीत का आश्रम समीप ही था। वह कभी कभी गाँवों में चले जाते और लोगों के दुःख कष्ट पूछते औषधि वितरण करते, ज्ञान दान देकर शाम तक आश्रम लौट आते। एक दिन वे इसी प्रकार उस ब्राह्मणी के घर भी जा पहुँचे। ब्राह्मणी को दुखी देखकर उन्होंने पूछा विद्यावती। तू दिन पर दिन दुबली होती जाती है, तुझे कोई कष्ट है क्या?

दुःखी आत्माएँ करुणा की प्यासी होती है। संत के स्नेहवचन सुनकर उसकी आंखें भर आयी। उसने भरे कंठ से कहा-भगवान् और तो कोई दुःख नहीं वे पूजा भक्ति करते है वह मुझे भी अच्छा लगता हैं पर क्या भगवान पाने के लिए घर छोड़ना जरूरी होता है। अगर ऐसा न होता तो यों कहकर धमकाने नहीं कि मैं घर छोड़कर संत पुनीत के आश्रम में चला जाऊँगा और संन्यासी हो जाऊँगा।”

“ नहीं नहीं बेटी! संत ने आश्वासन का हाथ उठाया और बोले मनुष्य अपने घर पर रहकर यदि मानवीय गुणों का आचरण निष्ठापूर्वक कर सके तो उतनी ईश्वर भक्ति पर्याप्त हैं। जो यहाँ अपना अहंकार न छोड़ सका, वह मेरे आश्रम में आकर क्या वैराग्य करेगा। फिर कुछ देर रुक कर बोले अच्छा बेटी! तू चिंता मत कर मैं ऐसा कर दूँगा कि देवदत्त फिर कभी ऐसे वचन न बोले। पर हाँ तू भी थोड़ा साहस करना। इस बार जब कभी वह कहे कि मैं संत के आश्रम चला जाऊँगा तो तू भी कह देना हाँ चले जाइए। आगे हम सँभाल लेंगे

बात बात में थोड़ा विलंब हो गया और उस दिन भोजन तैयार होने में थोड़ा अधिक समय लग गया। देवदत्त घर लौटे और भोजन तैयार न मिला तो उन्होंने वही चिर-परिचित अस्त्र उठाया। लेकिन आज विद्यावती के मुख पर भय नहीं मुसकान थी। हलकी हँसी हँसती हुई बोली- चले जाइए और संन्यासी हो जाइए।”

जलती आग में घृत डालो तो आग और तीव्र हो उठती है। फिर यहाँ तो घृत उलीचा गया। देवदत्त ने पीछे मुड़कर नहीं देखा तुरंत आश्रम की ओर चल पड़े आश्रम पहुँच कर उसने संत पुनीत से कहा- भगवन्! संन्यास दीक्षा लेना चाहता हूँ। उसका प्रबंध आज ही अभी अभी करा देने का अनुग्रह करे।

उसी तरह मुसकराते हुए संत पुनीत ने कहा-हाँ वत्स! तू वस्त्र उतार कर यहाँ रख दे और गोदावरी स्नान कर, शीघ्र वापस आ जा। अभी अभी दीक्षा का प्रबंध किए देता हूँ देवदत्त उठे अपने वस्त्र उतार कर एक ओर चल पड़े

इधर संत ने उनके सब कपड़े फाड़ कर फेंक दिए। खाने के लिए कुछ कड़ुए और कसैले फल मँगा लिए। देवदत्त स्नान करके आए तो अपने कपड़े माँगे। संत ने चिथड़ों की ओर संकेत किया-देवदत्त फटे कपड़े देखकर हो तो उठा क्रुद्ध, पर कुछ बोल न सका। महर्षि ने कहा-क्या देखते हो संन्यासियों को अपरिग्रही बनना पड़ता है। अच्छा ले भोजन कर ले। “यह कहकर वही कड़ुए फल आगे कर दिए।

देवदत्त से एक फल कठिनाई से खाते बना। दूसरा तो मुख में रखते ही थूक दिया और बिगड़ कर कहने लगा -”मैं ऐसे कड़ुवे फल खाऊँगा? यह तो जानवर भी नहीं खाते? शांत हो वत्स।” महर्षि कहने लगे ईश्वर को पाना एक बड़ी भारी कसौटी है। वैरागी को संतोषी, धैर्यवान् और सहिष्णु होना पड़ता है। यदि तुम पहले यही नहीं

सीख सके तो क्या बनोगे ईश्वरनिष्ठ दया करुणा उदारता, संयम ही नहीं मिष्ट भाषण धैर्य और सहिष्णुता भी ईश्वरनिष्ठा के आवश्यक गुण है। इनका तुम्हें अनिवार्य रूप से अभ्यास करना पड़ेगा

अपनी अब तक की क्षुब्धता से उबलते हुए देवदत्त ने कहा “तो फिर इसका अभ्यास तो मैं अपने घर में भी कर सकता था। आपके पास तो मैं इस कामना से आया था कि आप हमें कुछ विशेष विभूतियाँ और साधनाएँ सिखाएंगे।”

महर्षि ने हँस कर कहा-तात यह बाद की बात है अभी तो तुम घर लौट जाओ और वहीं रहकर सद्गुणों का अभ्यास करो। देवदत्त की समझ में बात आ गई वे घर लौट आए और धर्मपत्नी से क्षमा माँगते हुए कहा-मुझे पता नहीं था कि वैराग्य की पहले पाठशाला गृहस्थ है। अन्यथा अब तक तुम्हें जो कष्ट दिया, वह न दिया होता।


दृष्टिकोण के परिवर्तन से जहान बदल सकता है

आनंद प्राप्त करना हमारा मुख्य लक्ष्य है दिन रात उसी की प्राप्ति में लगे रहते हैं जो जिस स्थिति में है उसे उसी स्थिति में आनंद की अनुभूति हो रहीं हैं। गाँव में रहने वाला इसलिए प्रफुल्ल है कि उसे मुक्त प्रकृति स्वस्थ आब हवा और अनेक प्राकृतिक साधनों का भोग भोगने को उसके कम प्रसन्न नहीं है उसे अपनी तरह के साधन प्राप्त है। शिक्षा मनोरंजन के साधन आदि कई तरह के प्रसाधनों की दृष्टि से वह अपेक्षाकृत अधिक सुख से वह अपेक्षाकृत अधिक सुख अनुभव करता है। कोई एक स्थान पर स्थायी रहकर सुखी है किसी को चलते रहने में आनंद आता है।

किसी को कृषि में आनंद है किसी को रोजगार में। सैनिक को अपना ही जीवन प्रिय है दुकानदार को अपनी ही जीवन प्रिय है दुकानदार को अपनी स्थिति। नौकरी पेशा अपने ही इर्द−गिर्द जाल बुनकर आनंदित है तो छोटा-सा धंधा करने वाला, नित्य प्रति मजदूरी करते हुए पेट भरने वाला मजदूर भी आनंदित है। अपनी मौज की सामग्री हर कोई ढूँढ़ कर उसमें ही आनंद का अनुभव करते रहते है। जानवर को भी अपनी स्थिति से असंतोष नहीं है, क्योंकि मृत्यु से उसे भी भय है, वह भी चोला बदलने से हिचकिचाहट जताता है। गंदे नाली में कुलबुलाने वाले कीड़े की भी यही दुर्दशा है वहीं वह आनंद अनुभव करता है 11 लाख योनियों में भटकने वाले जीव जंतुओं की यही स्थिति है। तात्पर्य यह है कि यहाँ सभी आनंद का ही जीवन जी रहे हैं। आनंद सार्थक है या नहीं उचित है या अनुचित सात्विक है या असात्विक विचारने के लिए इतना ही शेष रह जाता है।

‘भोग से रोग उत्पन्न होते है इस कहावत के अनुसार उन सभी सुखों को जिनसे इन्द्रियों के विषय तृप्त होते हों वास्तविक आनंद की कोटि में नहीं रखा जा सकता। स्वाभाविक आनंद से ही यदि आत्म तृप्ति हो जाती तो संभवतः यह प्रश्न उतना महत्त्वपूर्ण न होता जितना लोगों के सामने है। पूर्ण आनंद वह है जहाँ विकृति न हो। किसी तरह की आशंका अभाव या परेशानी न उठानी पड़ती हों। स्वाभाविक जीवन में जो आनंद मिल रहा है, उसमें हमारा अभ्यास बन गया है इसलिए वह अनुचित हो तो भी वैसा नहीं लगता। आनंद से शुद्धतम आनंद प्राप्ति के लिए दृष्टिकोण परिमार्जन करने की आवश्यकता अनुभव की जाती है। लौकिक आनंद सिद्धांत नहीं है। इससे जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता। विचार बुद्धि तर्क विवेक की जो साधारण तथा असामान्य शक्तियों मनुष्य को प्राप्त होती हैं ये केवल भौतिक सुखों के अर्जन में ही लगी रहें तो उसमें कुछ अनोखापन नहीं।

जीवन दीपक बुझने के पूर्व क्या हमने अपने आपको पहचान लिया है कि हम कौन हैं”? इस प्रश्न का सुलझ जाना ही तो सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। आत्मज्ञान आनंद का मूल है। इस विषय में अज्ञान बना रहा तो लौकिक जीवन में ही भटकते रहना पड़ेगा सिद्धि आत्मा की शरण में ही जाने से मिल सकती है यह बात दृष्टिकोण बदल देने से भली भाँति मालूम पड़ जाती है हम जो प्रतिदिन आनंद प्राप्ति के साधनों में परिवर्तन और प्रयोग किया करते है उससे भी यह स्पष्ट है कि हमें थोड़े आनंद की अपेक्षा अधिक शुद्ध और पूर्ण आनंद की तलाश है।

चिर आनंद अक्षय, आनंद लौकिक जीवन में उपलब्ध नहीं है। तब फिर पारलौकिक जीवन की बात सामने आती है और आत्मा परमात्मा पर भी ध्यान जमने लगता हैं। यह सिद्धि भगवान की शरण में जाने से ही मिल सकती है फिर भी लोगों की समझ में यह बात नहीं आती और वे लौकिक सुखों में ही आसक्त बने रहते है, क्योंकि हमारा दृष्टिकोण जैसा बन गया है उसमें कुछ परिवर्तन नहीं करना चाहते।

सूर्य प्रतिदिन अपने उसी क्रम से निकलता है उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण प्रतिदिन उगते रहने वाले सूर्य जैसा ही होता है, किंतु यदि अपना दृष्टिकोण प्रतिदिन उगते रहने वाले सूर्य जैसा ही होता है किंतु यदि अपना दृष्टिकोण बदलें और विराट जगत के महान् क्रियाशील शक्तितत्त्व के रूप में उस सूर्य का चिंतन करें तो वह महाप्राण अनेक विचित्रताओं से संयुक्त और जीवन दाता समझ में आयेगा। दृष्टिकोण के बदलती है और अधिक आनंद की ओर अग्रसर होने लगते है। दैनिक जीवन में ऐसी अनेकों बातें आती है जो यों सामान्य-सी लगती है किंतु वे अपने भीतर बहुत बड़ा अनोखापन छिपाये होती है।

हमारा दृष्टिकोण बोधक न होकर उथला, गहराई तक न जाने वाला होता है इसलिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण वस्तुओं को छोड़ जाते है और केवल उन्हीं सुखों के चिंतन में लगे रहते है जो स्थूल प्रयोग में आ चुके होते है। दृष्टिकोण बदलता है तो सारी चीजें बदली नजर आती है। दृष्टिकोण बदल जायेगा तो सर्वत्र आनंद ही बिखरा दिखाई देगा। कहावत भी है नजरें तेरी बदली तो नजारे बदल गये किश्ती ने मोड़ा रुख तो किनारे बदल गये। दृष्टिकोण बदलते ही वाल्मीकि का डाकू से संत बन जाना, कामुक राम बोला से संत तुलसी बन जाना अंगुली काटने वाले अंगुलिमाल से बौद्ध भिक्षु बन जाना, आम्रपाली वेश्या से भिक्षुणी बनकर बौद्ध धर्म का प्रचार करना, बैरिस्टर गाँधी से महात्मा गाँधी बापू बन जाना इस तथ्य के प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि दृष्टिकोण बदलने के लिए किसी एक स्फुल्लिंग का स्पर्श किसी माध्यम से हो जाय तो व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है।


महामहिमामयी माता

वृहर्द्धभ पुराण, पूर्व खण्ड अध्याय-2 में परम गुणमय मातृ स्तोत्र का वर्णन है जिसमें माता भगवती के नामों का उल्लेख करते हुए कहा गया है-

माता धरित्री जननी दयाद्रहृदया शिवा-

अर्थात् माता, धरित्री, जननी, दयार्द्र, हृदय शिवा त्रिभुवन श्रेष्ठ देवी निर्दोष सर्वदुःखहा, परम आराधनीय, दया शांति क्षमा, धृति, स्वाहा, स्वधा, गौरी, पद्म विजया, जया तथा दुःख हन्त्री ये माता के ही इक्कीस नाम हैं। जो मनुष्य इन नामों को सुनता और सुनाता है, वह सब दुखों से मुक्त हो जाता है। बड़े से बड़े दुखों से पीड़ित होने पर भी भगवती माता का दर्शन करके मनुष्य को जो आनंद मिलता है उसे वाणी द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता है।

इस संदर्भ में महर्षि अरविंद का कहना है कि यद्यपि माता एक ही है पर वह हमारे सामने विविध रूपों में आती है उनकी अनेक स्फुल्लिंग और अनेक विभूतियाँ है जो इस विश्व में उनका कर्म करती है। जिनको हम पूजते है वह एक ही है और यही भगवान् की वह दिव्य चैतन्यमयी शक्ति है जो सर्वमिंद के ऊपर खड़ी है है एक पर इतनी अनेक रूप है कि उन की गति को देखना या समझाना तेज से तेज गति वाले मन और मुक्त से मुक्त तथा व्यापक से व्यापक बुद्धि के लिए भी असम्भव है मात्र पुरुषोत्तम का चैतन्य है, पुरुषोत्तम का चैतन्य है पुरुषोत्तम की शक्ति की शक्ति है।

वही सारी सृष्टि करने वाली आदि शक्ति है और अपनी इस सारी सृष्टि से बहुत ऊँचे पर रहती है। पर उनकी यह विविध विलक्षण झाँकी देखी जा सकती है, समझी जा सकती हैं। उन्हीं की प्रतिमाओं उन्हीं के ऐसे रूपों को देखकर जो अपने स्वभाव ओर कर्म में मूल रूप से अधिक व्यक्त और मर्यादित होने के कारण अधिक हृदयंगम करने योग्य है और जिनके द्वारा माता अपनी संतानों के सामने प्रकट होने में अनुमत होती है।

माता की सत्ता के तीन रूप है जो तुम जान सकते हो जब तुम हम को और इस विश्व को धारण करने वाली विन्मयी शक्ति के साथ अपनी एकता (अभिन्नता) का अनुभव करने लगोगे। लोकातीत परा आद्य शक्ति के रूप में वह अनंत कोटि ब्रह्मांडों के ऊपर खड़ी है और पुरुषोत्तम के नित्य अव्यक्त रहस्य तथा उनके इस विश्व ब्रह्माण्ड के बीच की लड़ी है। फिर है विश्व शक्ति विश्वव्यापी महाशक्ति कोटि शक्तियों को धारण करती है इसके बाद है व्यक्ति शक्ति जो माता के वे दो विराट् स्वरूप हमारे लिये ज्वलंत और निकटतर हो जाते है और जो मनुष्य तथा दिव्य प्रकृति के बीच में मध्यवर्ती शक्ति के तौर पर है।

महाशक्ति जगत् की जगन्माता वहीं सृजन करती है जिसका संकल्प परमेश्वर से उन्हीं के परम चैतन्य के द्वारा प्रेरित किया जाता है। महाशक्ति इस प्रकार सृष्टियों को रचकर उनके अंदर प्रवेश करती है। इनकी सत्ता ही इन लोकों को भागवत् शक्ति और आनंद से भर देती है जिनके होने से ही ये लोक ठहरे हुए है जिसे होने से ही ये लोक ठहरे हुए हैं। जिसे हम प्रकृति कहते हैं वह इस महाशक्ति का केवल अत्यंत बाह्य सर्ग (कर्म) रूप है। महाशक्ति ही अपनी शक्तियों और गतियों का संचालन और व्यवस्थापन करती है, वही प्रकृति से कर्म कराती है और उन सब कर्मों के अंदर गुप्त अथवा प्रकट रूप से रहती है। जो कुछ हम देख सकते या अनुभव कर सकते या जिसे जीवन गति दे सकते है उन सबमें महाशक्ति की ही सत्ता है। प्रत्येक लोक और कुछ नहीं एक विशेष लोक समूह या जगत की महाशक्ति का एक विशेष खेल है और इन सब लोकों में वह महाशक्ति भगवती माता की विश्वव्यापी चित्शक्ति और विश्वव्यापी व्यक्ति है। प्रत्येक लोक का उन्हीं के सौंदर्य और शक्तिमयी हृदय में एकत्र घनीभूत होकर वह उनकी आनंद स्फुरण से सृष्ट होता है।

माता ऊपर से सब का शासन करती है यह नहीं, बल्कि इस छोटे से त्रिविध संसार में वह उतर आती है। केवल दिव्य अक्षर रूप की ओर दृष्टि निबद्ध करने से मालूम होगा कि यहाँ की सारी गतियाँ भी अपनी शक्ति को प्रच्छन्न करती हुई स्वयं माता ही है। अपने सारतत्त्व में अल्पीकृत (घटी हुई) उन्हीं की सृष्टियाँ है, उन्हीं की प्रकृति शरीर और प्रकृति शक्ति है। और ये सब है इसी कारण से कि अनन्त की प्रभाव सम्भावनाओं में कुछ ऐसा था जिसे चुन कर प्रकृत रूप प्रदान करने का रहस्यमय आदेश परमेश्वर से पाकर वह इस महान् आत्मबलि के लिए समस्त हुई और उन्होंने छद्मवेशी की तरह अज्ञान की आत्मा और रूपों को धारण कर लिया। पर व्यक्ति रूप में भी उन्होंने अपने के यहाँ तक नीचा कर दिया कि वह इस अंधकार में उतर आयी इसलिये कि इसे ज्योति की ओर ले जाऊँ झूठ में और भ्रम में आ गयी इसलिये कि इसे क्लेश में इस हठी शोक और दुःख में पहुँच गयी इसलिये कि इसके इस रूप का अंत करके अपने महत् अत्युच्च आनंद की दिव्य रूप प्रदान करने वाली प्रगाढ़ता में इसे परिणत कर दूँ।

अपनी संतानों के प्रति उनका मातृ प्रेम प्रगाढ़ और महान् है। इसी से उन्होंने अंधकार का यह आवरण ओढ़ना स्वीकार कर लिया है। तमस् और मिथ्या की शक्यों के दारुण दुर्भाव और दुराग्रह सह लेना मंजूर कर लिया है जो जन्म मृत्यु ही है उसके तोरण द्वार के पार होने की वेदना को धार लिया है। सृष्टि को सारी व्यथा, सारा शोक और सारा कष्ट उठा लिया है क्योंकि ऐसा मालूम हुआ कि यही एक उपाय है जिससे यह सृष्टि उठ कर आलोक आनंद सत्य और सनातन जीवन की प्राप्त हो सकती है यह महायज्ञ है जिसे कभी कभी पुरुष का यज्ञ कहते हैं पर जो इससे अधिक गंभीर अर्थ में प्रकृति की ही पूर्ण आत्मबलि है, भगवती माता का ही महायज्ञ है।

जो ज्ञानी है उन्हें वह अधिकाधिक एवं और भी विशद ज्ञान देती है। जिनमें दर्शन शक्ति है उन्हें अपनी कल्पना और अभिप्राय में शरीक होने का अधिकार देती है। जो विरोधी है उन पर उस विरोध का परिणाम लादती है। जो अनजान और मूर्ख है उन्हें की अंधता के अनुसार रास्ता दिखाती है। प्रत्येक मनुष्य के स्वभाव के भिन्न-भिन्न अंशों की आवश्यकता और प्रेरणा के अनुसार और जिस प्रतिदान के लिए वे आहुति देते है उसके अनुसार माता (माहेश्वरी) प्रत्युत्तर देवी है और उनका प्रयोग करती है उन पर आवश्यक प्रभाव डालती है या उन्हें अपनी प्रीत स्वाधीनता के भरोसे छोड़ देती है जिसमें या तो अविद्या के पथ पर समृद्धि लाभ करे या ध्वंस को प्राप्त हों। कारण वह सब के ऊपर हैं जगत् में किसी से बँधी नहीं किसी में आसक्त नहीं। तथापि उनका जो हृदय है वह विश्व जननी का हृदय है ऐसा मातृ स्नेह इतना और किसी में नहीं है।

कारण इनकी दया अनंत और अक्षय है। उनकी दृष्टि में सभी उनकी संतान है उसी एक के अनेक अंश है असुर राक्षस पिशाच और जो उन से विद्रोह करते या शत्रुता करते है वे विद्रोही और शत्रु भी उनकी दृष्टि में अपनी संतान नहीं है उनका प्रत्याख्यान केवल विलम्बन मात्र है, और उनका दंड विधान तो करुणा ही है।

ज्ञान और शक्ति केवल ये ही दो रूप परमा परमेश्वरी माता के नहीं है उनकी प्रकृति में और भी सूक्ष्मतम एक रहस्य है और वह एक ऐसी चीज है कि जिसके बिना ज्ञान और शक्ति अपूर्ण ही रह जाएँगे और पुर्णत्व भी पूर्ण न होगी इन ज्ञान और शक्ति के ऊपर सनातन सौंदर्य की अलौकिक चमत्कृति है दैवी समन्वय का अगम्य रहस्य है अप्रतिहत जगद्व्यापिनी मनोहरता और आकर्षण का ऐसा वशीकरण है कि वह अपनी ओर उन्हें एक दूसरे के साथ मिलने और एक होने को विवश करता है जिनमें वह आनंद जो परदे के अंदर छिपा हुआ है वहाँ से अपना खेल खेल और उन्हें अपने स्वर और रूप बनाये यह शक्ति है महालक्ष्मी की और कोई रूप इससे अधिक मोहक या आकर्षक नहीं हैं। माहेश्वरी इस पार्थिव-प्रकृति की क्षुद्रता के लिये इतनी अविचल और महान् और दूर मालूम हो सकती है कि यह वहाँ तक पहुँच न सके या उनका भाव धारण भी न कर सके। महाकाली भी इतनी द्रुतगति और प्रचंड है कि इस पार्थिव प्रकृति की दुर्बलता उनका भाव वहन न कर सके पर महालक्ष्मी की ओर सभी बड़े आनंद और लालसा के साथ दौड़ पड़ते है कारण वह भगवान के उन्मादक माधुर्य का मोहनास्त्र फेंकती है। उनके समीप रहने में अगाध सुख होता है और अपने हृदय के अंदर उन्हें मालूम करना जीवन को आनंदोन्माद ओर कौतुकमय बना देना हैं। शोभा और मोहकता और मृदुता उनसे वैसे ही प्रवाहमान होती है जैसे सूर्य से ज्योति। जहाँ कहीं वह अपनी आश्चर्यमयी दृष्टि डालती है या अपनी स्मित काँति बरसाती है वहाँ आत्मा अभिभूत हो जाता है और अथाह आनंद की गंभीरता में निमग्न हो जाता है उन के हाथों का स्पर्श चुम्बक के समान है और उनका रहस्यमय मृदु प्रभाव मन, प्राण और शरीर में लालित्य मय सूक्ष्मता ले आता है और जहाँ उनके चरण अवस्थित होते है वहाँ उन्मत्त कर देने वाले आनंद के अपूर्ण स्रोत बहने लगते हैं।

राम कृष्ण परमहंस ने मातृशक्ति को सर्वोपरि माना हैं उनके अनुसार माँ तो सब कुछ है वह त्रिगुणमयी और साथ ही साथ शुद्ध सत्वगुणमयी भी है। वे उस महाशक्ति को चिन्मय ब्रह्मशक्ति कहते हैं जिसने अपनी इच्छा से इस संसार का सृजन किया हैं। बंगला भाषा में एक गीत है।

माँ त्वं हि तारा। तुमि त्रिगुणधरा परात्परा..... जिसे वे प्रायः नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद) से सुना करते और समाधिस्थ हो जाया करते थे।

स्वामी रामतीर्थ ने अपनी स्वानुभूति प्रकट करते हुए कहा है कि ईश्वर की उपासना मातृशक्ति के रूपों में नहीं। बच्चे के लिए ममतामयी माता से बढ़कर भला इस संसार में दूसरा और कौन हो सकता है? वे सच्चे भक्त की तुलना उस नन्हे शिशु से करते है जो अपने को माता की गोदी में समर्पित कर निर्द्वन्द्व निश्चिन्त हो जाता है और तब उसके लिए सारे संसार का ऐसा कौन-सा सुख और आराम है जो शेष रह जाता हो? आँधी हो वर्षा हो या तूफान भूकंप हो उसका बाल बाँका नहीं होता कारण सारे झंझावातों को माता स्वयं झेल जाती है। हमारा इष्ट अनंत ज्ञान, अनंत शक्ति एवं अनंत शांति का अक्षय भंडार है। निश्चल मन से शिशुवत् अपना नन्हा-सा तन और भोला भाला मन आद्यशक्ति माँ भगवती की गोदी में समर्पित कर हम भी निश्चिन्त हो सकते है और वह सब निश्चिंत हो सकते है जो एक सच्चे साधक को उपलब्ध होता है।


प्रकृति की इस माया में मात्र सत्य को तलाशे

प्रकृति का विस्तार बहुत बड़ा है। जो कुछ हम आँखों से देखते कानों से सुनते त्वचा से स्पर्श करते या अन्य किसी प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव करते है वह बहुत थोड़ा है। इससे अनेक गुनी वस्तुएँ ऐसी है जो इन्द्रियों से अनुभव में नहीं आती किंतु वे इस संसार में मौजूद है स्थूल या दृश्य की अपेक्षा सूक्ष्म या अदृश्य अधिक है। दृश्य जगत को लोक और अदृश्य जगत को परलोक कहते हैं।

डॉ. गोपीनाथ कविराज अपनी पुस्तक विशुद्ध वाणी में लिखते है इस संसार में हर पदार्थ की प्रत्येक तत्त्व की मूल सत्ता सूक्ष्म है पर वह कभी कभी दूसरे पदार्थों के साथ मिलकर स्थूल हो जाती है। चूँकि विश्व के रासायनिक पदार्थ सदैव गतिशील रहते है इसलिए जब उस रासायनिक सम्मिश्रण में कुछ कमी आ जाती है तो वह स्वरूप बदल जाता या नष्ट हो जाता है। ऐसी दशा में वह पदार्थों की मूल सत्ता पुनः सूक्ष्म रूप धारण कर लेती है अदृश्य बन जाती है किसी वस्तु की मूल सत्ता कभी भी नष्ट नहीं होती, वरन् किसी न किसी दृश्य या अदृश्य रूप में बनी ही रहती हैं। प्रकृति के समस्त परमाणु अनादि और अनंत है।

विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है। उसके संरक्षण के सिद्धान्त के अनुसार किसी वस्तु का नाश या निर्माण नहीं होता जो होता है वह इतना ही है कि उसका रूप अदृश्य हो जाता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वस्तु नष्ट हो गई। इतने पर भी सच्चाई यह है कि उसकी मूल सत्ता यथावत् बनी रहती है। यदि एक मन लकड़ी जलायी जाय तो मुश्किल से राख की थोड़ी-सी ढेरी बनेगी लकड़ी का शेष वजन कहाँ गायब हो गया? मोटी दृष्टि से मालूम पड़ता है कि वह जलकर समाप्त हो गया, पर यदि इस अग्नि संस्कार के मध्य जो गैसें बनती है जो भस्म शेष बचती है उनका यदि वजन लिया जाय तो वह बिलकुल लकड़ी जितने भार का ही ज्ञात होगा। इससे विदित होता है कि लकड़ी का जितने भार का ही ज्ञात होगा। इससे विदित होता है कि लकड़ी का रूपांतरण हो गया। उसका कुछ भाग अगोचर स्तर गैस में परिवर्तित हो जाता है तथा कुछ राख में बदल जाता है पर उसका कोई परमाणु विनष्ट नहीं होता। वे अदृश्य बन जाते है। उनके दर्शन नहीं होते तो भी इसी संसार में सूक्ष्म रूप से बादलों की भाँति यहाँ वहाँ फिरते है। मिर्चें जलायी जाएँ तो दूर-दूर बैठे हुए लोगों को खाँसी या छीकें आती है हवन की सुगंध दूर-दूर तक फैलती है इससे उस एक ही तथ्य की पुष्टि होती है कि जलने के बाद भी वस्तुओं का अस्तित्व किसी-न -किसी रूप में मौजूद रहता है वही अंश वायुभूत रूप में अप्रकट परमाणुओं की तरह हवा के साथ इधर उधर उड़ते रहकर सुगंध अथवा दुर्गंध के रूप में अपना परिचय देते है।

तालाबों का नालों का पानी गर्मी के दिनों में बड़ी तेजी से सूख जाता है यह कहाँ गया? क्या नष्ट हो गया? नहीं सूरज की गर्मी के कारण वह भाप बन कर आकाश में उड़ गया। यह पानी उड़ते समय दिखाई नहीं देता, पर जब बहुत से तालाबों नदियों और समुद्र का उड़ा हुआ पानी एक जगह जमा हो जाता है तो बादलों के रूप में दिखाई पड़ता है। बादल उस भाप का स्थूल रूप है पर जब वह भाप बहुत ही हलकी और थोड़ी होती है तो दिखाई नहीं पड़ती प्रायः हवा में थोड़ा बहुत पानी सदा ही उड़ता रहता है पर वह दिखाई नहीं पड़ता क्योंकि उस समय वह सूक्ष्म रूप में होता है। सूक्ष्म वस्तुओं को आंखें देखने में असमर्थ होती हैं।

एक खेत में लगातार बीस वर्ष तक ईख की खेती की जाय तो उसमें इतना गुड पैदा होगा कि उस खेत में कई फूट की पर्त बिछ सकती है इतना गुड कहाँ से आया? ईख की जड़े जितनी गहरी जमीन में जाती है उतनी मिट्टी खोद कर वैज्ञानिक जाँच की जाय, तो मालूम होगा कि उस खेत में शक्कर के परमाणु एक दो मन से ज्यादा नहीं है पर उससे कई गुना हर साल पैदा होता है। यह खेत की मिट्टी में से नहीं आकाश से आता है वायु से करोड़ों टन शक्कर उड़ती फिरती है ईख का पौधा पत्तियों द्वारा साँस लेता है और अपनी आवश्यकता की वस्तु शक्कर उस वायु से खींच लेता है।

डॉक्टर लोग बताते है कि रोगों के कीटाणुओं एक प्रकार के जानदार प्राणी है वे आकाश में उड़ते रहते है और जिस प्राणी को कमजोर देखते है उस पर आक्रमण कर देते है तपेदिक हैजा अतिसार आदि के संक्रामक रोग कीट मक्खियों की तरह एक मनुष्य पर से उड़ भी बीमार बना लेते है प्लेग कालरा मलेरिया चेचक आदि मक्खियों के रोग कीट मक्खियों की तरह झुंड के झुंड अरबों खरबों की संख्या में उड़ते हैं। और एक स्थान से दूसरे में दल समेत जा पहुँचते है यह कीटाणु आँखों से इन्द्रियों से दिखाई नहीं पड़ते तो भी इस लोक में उसी में उसी तरह रहते, काम करते और जीते है जैसे कि मनुष्य पशु पक्षी और कीड़े मकोड़े इस दृश्य लोक में जीवनयापन करते है।

भौतिक विज्ञान के शोधक अन्वेषक और आविष्कारक जानते है कि अदृश्य जगत में बहुमूल्य पदार्थों का खजाना छिपा पड़ा है। गैस बिजली विद्युत चुम्बकीय तरंगें ब्रह्मांडीय विकिरणों आदि अदृश्य लोक में छिपी हुई शक्तियों को ढूँढ़ निकाला गया है अब विज्ञान इस दिशा में प्रयत्नशील है कि उन अगोचर सूक्ष्म पदार्थों को इच्छानुसार स्थूल रूप में कैसे परिवर्तित किया जाय।

किसान लोग जानते है कि वर्षा का पानी खेती के लिए कितना उपयोगी होता है। कारण यह है कि वर्षा की बूँद के साथ आकाश के अन्य पदार्थ भी बरसते है। पीछे उन्हें पाकर बहुत जीवनी शक्ति उपलब्ध करते है। स्वास्थ्य विज्ञान का यह सर्वविदित तथ्य है कि जहाँ की आबोहवा में अमुक तत्त्वों के परमाणु अधिक मात्रा में होते है वहाँ रहना स्वस्थता की दृष्टि से लाभदायक होता है। स्वास्थ्य सुधार के लिए लोग उन स्थानों में जाते हैं, जहाँ की आबोहवा में उपयोगी परमाणु होते है यह सब बातें बताती है कि अदृश्य लोक भी इस दृश्य लोक की तरह ही है। उसमें भी सजीव और निर्जीव सत्ताएँ प्रचुर परिमाण में मौजूद है।

हर एक वस्तु कालचक्र के फेर से कभी दृश्य कभी अदृश्य हो जाती है भाप से पानी पानी से भाप इस चक्र में पड़ा हुआ पानी दृश्य और अदृश्य होता है मनुष्य भी जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म धारण करता है। जब तक स्थूल शरीर है, जब तक स्थूल शरीर है तब तक वह इस लोक में है और जब शरीर छूट गया, तो परलोक में चला जाता है जीव को लोक ओर परलोक दोनों में रहना पड़ता है दोनों ही उसके घर हैं। लड़कियाँ अपने पिता के घर रह कर भी पति ग्रह में आने वाली स्थिति की जानकारी प्राप्त करती और तैयारी करती है क्योंकि वे जानती है कि हमें मायके की भाँति भविष्य में ससुराल से भी काम पड़ेगा। हमें भी चाहिए कि निकट भविष्य में जिस लोक में जाना है उसका ज्ञान प्राप्त करें। उस लोक को सुधारने के लिए अपना लौकिक जीवन सुधारें।

परलोक कहाँ है? वह कितनी दूर किस स्थान पर किनके बीच में है? इस प्रश्न के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि लोक परलोक की सीमाएँ आपस में मिली हुई है पृथ्वी के ठोस धरातल को छोड़ कर जहाँ से पोला आकाश शुरू होता है वहाँ से ही सूक्ष्म लोक आरंभ होता है। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति करीब सात सौ मील चारों ओर मानी जाती है यही घेरा परलोक का है कारण यह है कि जिन रासायनिक तत्त्वों से पृथ्वी का संबंध है जो पृथ्वी पर प्रकट होते रहते है वे अदृश्य होकर भी पृथ्वी के आकर्षण की सीमा के भीतर रहते है पृथ्वी उन्हें खींचे रहती है अपनी परिधि से बाहर नहीं जाने देती। वे परमाणु इस भूलो के ही अदृश्य अंश है इसलिए उनका आकर्षण भी भूलोक से ही जुड़ा रहता है अन्य ग्रह उपग्रहों के जो रासायनिक तत्त्व है वे इस लोक के तत्त्वों से भिन्न है इसलिए भी यहाँ के परमाणु का वहाँ कोई मेल नहीं बैठता और वे विजातीय होने के कारण किसी दूसरे लोक में प्रवेश नहीं कर पाते।

इतना सब जान समझ लेने के उपरांत हमें स्थूल-सूक्ष्म लोक परलोक के फेर में न पड़ कर संशोधक की भाँति सत्य के अन्वेषण में निरत रहकर उस सत्य के अन्वेषण में निरत रहकर उस सत्य की उपलब्धि करनी चाहिए, जो मनुष्य का जीवन लक्ष्य है। तभी यह जीवन सफल सार्थक कहलायेगा।


महताशैसा (Kahani)

सीलोन में एक जड़ी बूटी बेचकर गुजारा करने वाला व्यक्ति रहता था। नाम था उसका महताशैसा। उसके घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब थी। कई कई दिन भूखा रहना पड़ता उनकी माता चक्की पीसने की मजदूरी करती बहिन फूल बेचती तब कहीं गुजारा हो पाता। ऐसी गरीबी में भी उनकी स्थिति सावधान थी।

महता एक दिन एक बगीचे में जड़ी बूटी खोद रहे थे कि उन्हें कई घड़े भरी हुई अशर्फियाँ गढ़ी हुई दिखाई दीं। उनके मन में दूसरे की चीज पर जरा भी लालच न आया और मिट्टी से ज्यों का त्यों ढक कर बगीचे के मालिक के पास पहुँचे और उसे अशर्फियों गढ़े होने की सूचना दी।

बगीचे के मालिक लरोटा की आर्थिक स्थित भी बहुत खराब हो चली थी। कर्जदार उसे तंग किया करते थे। इतना धन पाकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। सूचना देने वाले शैसा को उसने चार सौ अशर्फियाँ पुरस्कार में देनी चाही पर उसने उन्हें लेने से इनकार कर दिया और कहा इसमें पुरस्कार में देनी चाही। पर उसने उन्हें लेने से इनकार कर दिया और कहा इसमें पुरस्कार लेने जैसी कोई बात नहीं मैंने तो अपना कर्तव्य मात्र किया है।

बहुत दिन बाद लरेटा ने अपनी बहिन की शादी शैसा के साथ कर दी और दहेज में कुछ धन देना चाहा। शैसा ने वह भी न लिया और अपने हाथ पैर की मजदूरी करके दिन गुजारे।


शांति मन की एक स्थिति का नाम

मन के पूरी तरह स्वस्थ एवं संतुष्ट रहने की स्थिति को ही शांति कहा जाता है इसी स्थिति को अध्यात्म मनोविज्ञान में मन की निरुद्ध अवस्था कहा गया हैं। वर्तमान मनोविज्ञान इसी को इण्टीग्रेटेड स्टेट ऑफ माइन्ड के नाम से बताता है। जो भी हो हर कोई मानसिक रूप से स्वस्थ व संतुष्ट रहना चाहता है। संभवतः एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जिसे अस्वस्थता और असंतुष्टि भली लगती हों।

सभी के द्वारा इसे पाने की इच्छा करने पर भी न पा सकना एक ही बात को सिद्ध करता है कि पाने का जो रास्ता अपनाया गया है उसमें कहीं न कहीं भूल जरूर है अन्यथा इसकी प्राप्ति अवश्य हो गई होती। डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी रचना प्रिंसिपल उपनिषद् में सारे प्रयासों व क्रिया–कलापों को दो वर्गों में विभाजित किया है। पहला है बाहर की वस्तुओं स्थानों में इसकी ढूँढ़ खोज। दूसरी है अपने अंदर ही कहीं ऐसी स्थिति की तलाश उन्होंने एक चीज और बताई है वह यह कि इस ढूँढ़ खोज में लगे लोगों में कुछ तो बिना जाने समझे इसे खोज रहें है कुछ ऐसे है जो जागरूक होकर प्रयास कर रहे है। जागरूक होकर प्रयास करने वालों में भी अधिकतर ऐसे है जो भूल भुलैया में भटक गये है वनवासी समझते हैं कि शहर में शांति है जबकि शहर वाले वन में शांति की कल्पना में खोए रहते है। यह विडंबना ही है कि गृहस्थ समझाता है कि पत्नी बच्चे घर परिवार की जिम्मेदारियाँ न होने के कारण साधू शांति से होगा, जबकि साधु समझता है आराम से बने बनाए पकवान मिष्ठान खाने वाला सर्दी गर्मी बरसात से सुरक्षित रहता हुआ गृहस्थ निश्चित ही शांति में होगा। इसी तरह काम करने वाला विश्राम में आनंद की कल्पना करता है बैठे ठाले रहने वालों की अपनी स्थिति उबाऊ लगती है और इससे छुटकारा पाकर काम करना उन्हें भला लगता है।

वस्तुतः शांति की खोज इधर उधर भटकने वस्तु स्थान और परिस्थितियों के बदलने से मिले यह असम्भव है। जो चीज जहाँ है ही नहीं वहाँ मिलेगी कैसे? इसे न तो एकांत में पाया जा सकता है न समाज के सुविधा साधनों में पाया जा सकता है न समाज के सुविधा साधनों में। यह तो मन की एक अवस्था है। इसका पाना तभी संभव है जब मन उस अवस्था में पहुँचें।

वर्तमान मनोविज्ञान मन की मुख्य दशाएँ बतलाता है पहले अस्त व्यस्त और खंडित दूसरी इन्टीग्रेटेट। पहली में दुःख परेशानियाँ मनोरोगों आदि का अनुभव होता दूसरी में शांति सुख प्रसन्नता का। अध्यात्म-मनोविज्ञान में इसे और बढ़िया तरह से समझाया गया है। इसके अनुसार मन की पाँच अवस्थाएँ है। क्षिप्त मूढ विक्षिप्त, एकाग्र निरुद्ध।

पहली में मन खूब चंचल रहता है पर ज्यादा परेशानी नहीं होती है। यह अवस्था बच्चों के मन की है जो थोड़ी देर में सुखी थोड़ी देर में दुःखी प्रतीत होती है आज का मनोविज्ञान इसे आसिलेशन ऑफ अटेन्सन कहता है दूसरी में जड़ता रहती है न कुछ करने का मन करता है न सोचने का तीसरी स्थिति औसत आदमी की है जो कभी तो अपने को शांत और अच्छा महसूस करता है। चौथी अवस्था वह है जिसमें वैज्ञानिक दार्शनिक मनीषी जीते है यह मन की स्थिरता की दशा है। इसमें पूरी तरह से शांति का अनुभव तो नहीं होता है पर उद्विग्नता हताशा का भी एहसास नहीं होता मन सीधी पटरी पर चलने लगता है बाहरी परिस्थितियों से बिना परेशान हुए काम करने की योग्यताओं जाती है पाँचवीं अवस्था ऐसी है जिसे पूर्ण शांति की अवस्था प्रमाणित किया गया है। इसमें मन की स्थिरता के साथ अंतःकरण के भाव भी जुड़ जाते है। एकाग्र अवस्था में उद्विग्नता परेशानी तो नहीं रहती पर कोई आनंद भी नहीं मिलता। बस ऐसा ही कुछ अनुभव होता है जैसे कोई सही स्थिति में मशीन चल रही हो। उसमें कोई खराबी न हों। एकाग्रता की दशा में जहाँ मन की बागडोर बुद्धि के हाथों रहती है वहीं शांति की दशा में अंतःकरण के उच्च भावों के हाथ में इसी कारण ऐसी स्थिति में आनंद का अनुभव होता है।

सही माने में यदि हम इसे पाना चाहें तो हमें अपने अंदर व्यापक फेर बदल करनी होगी। हमें अपनी दुर्दशाओं इंद्रिय लिप्साओं मन की वासनाओं संकीर्णताओं से ऊपर उठना होगा। इसके लिए जरूरी है जागरूक होना। सही कहा जाय, तो हमारा अधिकांश समय बेहोशी में कटता है ऐसी बेहोशी जिसमें कुछ करने को जी नहीं करता बस जिस किसी तरह दिन काटे जाते है।

शांति पाने के लिए जो फेर बदल जरूरी है उसमें वासनाओं और कामनाओं को भावनाओं में बदलना होगा। इसका मतलब है कि अपने काम का दायरा शरीर और कुटुंबियों से बड़ा करना होगा इससे हृदय की क्षुद्रता विशालता में बदलेगी शांति के बंद दरवाजे खुलेंगे जिससे उसका अजस्र प्रवाह सहज ही आ सकेगा।

आस्कर ब्राउन “इण्टीग्रेशन ऑफ माइन्ड में कहते है किसी भी काम में उच्च और व्यापक भावनाओं तथा पूर्ण मनोयोग घोल देने पर मन के सारे द्वन्द्व समाप्त होते हैं और वह शांत होता चला जाता है इस प्रक्रिया में मन विक्षिप्तता से उठकर एकाग्र होता है और एकाग्रता से बढ़कर निरुद्ध होता है छोटा दीखते हुए भी प्रभाव की दृष्टि से यह एक बड़ा प्रयोग है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति काम करते हुए उसी तरह शांत और स्थित बना रहता है जैसे तेजी से घूमता हुआ लट्टू। गीताकार के शब्दों में जिस प्रकार सारी नदियों के जल को अपने अंदर लेता हुआ पुरुष सारे कर्तव्य कर्मों को करता हुआ परम शांति को प्राप्त होता है। यही है यथार्थ शांति


कलाकार प्रेत

नगर अभी दूर था। बन हिंसक जंतुओं से भरा पड़ा था। सो विशाल वटवृक्ष सरोवर और शिव मंदिर देखकर आचार्य महीधर वहीं रुक गए। शेष यात्रा अगले दिन पूरी करने का निश्चय कर थके हुए आचार्य महीधर शीघ्र ही निद्रा देवी की गोद में चले गए।

आधी रात सघन अंधकार जीव जंतुओं की रह रहकर आ रही भयंकर आवाजें आचार्य प्रवर की नींद टूट गयी। मन किसी बात पर विचार करे इससे पूर्व ही उन्हें कुछ पास में कोई अंधकूप है उसमें कोई पड़ा हुआ रुदन कर रहा है। अब तक सप्तमी का चन्द्रमा आकाश में ऊपर आ गया था। हलका हलका प्रकाश फैल रहा था। आचार्य कुएँ के पास आए झाँककर देखा तो उसमें पाँच प्रेत बिलबिला रहे है।

यों दुखी अवस्था में पड़ें प्रेतों को देखकर महीधर को दया आ गई उन्होंने पूछा तात! आप लोग कौन है यह दुर्दशा क्यों भुगत रहे है? इस पर सबसे बड़े प्रेत न बताया हम लोग प्रेत हैं मनुष्य शरीर में किए गए पापों के दुष्परिणाम भुगत रहे है आप आप संसार में जाइए और लोगों को बताइए जो पाप कर हम लोग प्रेत योनि में आ पड़े वह पाप और कोई न करे। आचार्य ने पूछा आप लोग यह भी तो बताइए कौन कौन से पाप आप सबने किये है? तभी तो लोगों को उससे बचने के लिए कहा जा सकता है।

मेरा नाम पर्युषित है आर्य पहले प्रेत ने बताना शुरू किया मैं पूर्व जन्म में ब्राह्मण था, विद्या भी खूब पढ़ी थी किंतु अपनी योग्यता का लाभ समाज को देने की बात को तो छुपा लिया हाँ अपने पांडित्य से लोगों में अंधश्रद्धा अंधविश्वास जितना फैला सकता था फैलाया और हर उचित अनुचित तरीके से केवल यजमानों से द्रव्य दोहन किया उसी का प्रतिफल आज इस रूप में भुगत रहा हूँ मैं क्षत्रिय था पूर्व जन्म में अब सचीमुख नामक दूसरे प्रेत ने आत्मकथा कहनी शुरू की। मेरे शरीर में शक्ति की कमी नहीं थी मुझे लोगों की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया। रक्षा करना तो दूर उलटे मैं सबको सताने लगा। एक दिन मैंने एक स्त्री को देखा जो जंगल में अपने बेटे के साथ जा रही थी। मैंने उसे भी नहीं छोड़ा उसका सारा धन छीन लिया यहाँ तक कि उनका पानी तक लेकर पी गया। दोनों प्यास से तड़प कर वहीं मर गए उसी पाप का प्रतिफल प्रेतयोनि में पड़ा भुगत रहा हूँ।

तीसरे शीघ्राग ने बताया मैं था वैश्य। मिलावट कम तौल ऊँचे भाव तक ही सीमित रहता तब भी कोई बात थी। व्यापार में अपने साझीदारों तक का गला काटा। एक बार दूर देश वाणिज्य के लिए अपने एक मित्र के साथ गया। वहाँ से प्रचुर धन लेकर लौट रहा था। रास्ते में लालच आ गया मैंने अपने मित्र की हत्या कर दी और उसकी स्त्री, बच्चों को भी धोखा दिया व झूठ बोला। उसकी स्त्री ने उसी दुःख में अपने प्राण त्याग दिए। उस समय किसी की पकड़ में नहीं आ सका पर मृत्यु से कौन बचा है तात! मेरे पाप ज्यों ज्यों मरणकाल समीप आता गया मुझे संताप की भट्टी में झोंकते गए और आज जो मेरी स्थिति है वह आप देख ही रहे है। पाप का प्रतिफल ही है जो इस प्रेत योनी में पड़ा मलमूत्र पर जीवन निर्वाह करने को विवश हूँ। अंग अंग में ब्रणू फूट रहे हैं दुःखों का कहीं अंत नहीं दिखाई देता।

जब चौथी की बारी थी उसने अपने घावों पर बैठी मक्खियों को हाँकते और सिसकते हुए कहा तात। मैं पूर्व जन्म में रोधक नामक शुद्र था। तरुणाई मैं मैंने ब्याह किया कामुकता मेरे मस्तिष्क पर बुरी तरह सवार हुई। पत्नी मेरे लिए भगवान हो गई। उसकी हर सुख सुविधा का ध्यान दिया पर अपने माता पिता भाई बहनों का कुछ भी ध्यान न दिया माता पिता बड़े दुःख और असहाय पूर्ण स्थिति में मरे। एक स्त्री से तृप्ति नहीं तो और विवाह किए। पहली पत्नी को सताया घर से बाहर निकाला। उन्हीं सब कर्मों का प्रतिफल भुगत रहा हूँ।

चार प्रेत अपनी बात तो कह चुके किंतु पाँचवाँ प्रेत तो आचार्य की ओर मुख भी नहीं कर रहा रहा था। पूछने पर अन्य प्रेतों ने बताया यह तो हम लोगों को भी मुँह नहीं दिखाते बोलते बात चीत तो करते है अपना मुँह इन्होंने आज तक नहीं दिखाया।

आप भी तो कुछ बताये आचार्य प्रवर ने प्रश्न किया इस पर इस पर घिघियाते स्वर में मुँह पीछे ही फेरे फेरे पाँचवें प्रेत ने बताया मेरा नाम कलाकार है। मैं पूर्व जन्म में अच्छा लेखक था। पर मेरे कलम से कभी नीति धर्म, सदाचार कभी नहीं लिखा गया। कामुकता अश्लीलता और फूहड़पन बढ़ाने वाला साहित्य ही लिखा, मैंने ऐसे ही संगीत नृत्य और अभिनय का सृजन किया जो फूहड़ से फूहड़ और कुत्साएं जगाने वाला रहा हो। मैं मूर्तियों और चित्र एक से एक भावपूर्ण बना सकता था। किंतु उनमें भी कुरुचिपूर्ण वासनाएँ और अश्लीलता गढ़ी सारे समाज को भ्रष्ट करने का अपराध लगाकर मुझे यमराज ने प्रेत बना दिया। किंतु मैं यहाँ भी इतना ही लज्जित हूँ कि अपना मुँह इन प्रेत भाइयों को भी नहीं दिखा सकता।

आचार्य महीधर ने अनुमान लगाया अपने-अपने कर्तव्यों से गिरे का हुए ये कुल पाँच ही थे इन्हें प्रेतयोनि का कष्ट भुगतना पड़ रहा है और आज जबकि सृष्टि का हर ब्राह्मण हर क्षत्रिय हर वैश्य हर शुद्र कर्तव्यच्युत हो रहा है हर कलाकार अपनी कलम की परवाह किए बगैर वासना की गंदी कीचड़ उछाल रहा है तब आने वाले कल में प्रेतों की संख्या स्थिति क्या होगी सो लोगों को कर्तव्य की ओर प्रेरित करना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अब तक प्रातःकाल हो चुका था आचार्य महीधर यह संकल्प लेकर चल पड़े कि पाँचों प्रेतों की कहानी सुना सुनाकर मार्ग भ्रष्ट लोगों का सही पथ प्रदर्शन करेंगे


समझदारी का अनुगमन व श्रेय का वरण

पिछले दो हजार वर्षा में समय की गति अत्यंत द्रुतगति से चली है इसी अवधि में ज्ञान और विज्ञान की इतनी प्रगति हुई है जितनी कि भूतकाल के लाखों वर्षा में संभव नहीं हुई। इतने पर भी एक दुर्भाग्य इन उपलब्धियों के साथ जुड़ा रहा है की उनका सदुपयोग बनने के स्थान पर दुरुपयोग ही बन पड़ा और जो सुखद सत्परिणाम सामने आने चाहिए थे उनके स्थान पर दुःख दरिद्रता के घटाटोप ही सामने आये।

विज्ञान ने प्रचुर सुविधा साधना उपलब्ध करने के लिए यंत्र उपकरण कारखाने लगाये पर वही दूसरे हाथ से वायु प्रदूषण जल प्रदूषण तापमान में वृद्धि जैसी विकट समस्याएँ उत्पन्न कर ली। मनोरंजन के लिए कामुकता उभारने वाले अनेक कुचेष्टाएँ चली जनसंख्या स्वरूप तलाक और जनसंख्या वृद्धि का संकट सामने आया। हर काम के लिए जमीन की कमी पड़ने लगी। आवास व कृषि की समस्या सामने आयी किंतु उसे अनदेखा कर देशों के बीच शीत युद्ध भड़काये और इसी शताब्दी में दो विश्व युद्ध और प्रायः 200 स्थानीय युद्ध उभरे।

प्रकृति के प्रदूषण से भरे जाने पर असंख्यों का आरोग्य गड़बड़ा गया। जीवनी शक्ति क्षीण हो गई। मनोविकारों लोभ लिप्सा और अहंता की जकड़न से मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया और मनुष्य एवं अशक्तता रुष्ट खिन्न विपन्न दीखने लगा। इन दिनों अच्छे भले लोग भी आलस्य प्रमाद तनाव आक्रोश जैसे कारणों से अर्धविक्षिप्त स्थिति में जी रहे हैं। महत्त्वाकाँक्षाओं और विद्वेषियों ने पारस्परिक विश्वास और सद्भाव को बुरी तरह समाप्त कर दिया है। अनगढ़पन के कारण बेतहाशा महंगाई अशान्ति और अनीति दिन-दिन बढ़ती जा रही है। इन सब को देखते हुए लगता है कि हमने पिछले दिनों प्रगति के नाम पर अवगति को ही अपनाया है और हँसते-हँसाते उठते -उठाते दुःख-सुख मिल बाँट कर खाने वाला स्नेही जीवन एक प्रकार से समाप्त कर लिया है। पतन और पराभव जिस रूप से बढ़ रहे है उसे देखते हुए लगता है कि अणु युद्ध जैसी कई विभीषिकाएँ भी सर्वनाश पर उतारू हो सकी हैं अश्रद्धा अनीति ओर अविवेक के बढ़ते जाने पर ऐसा भी हो सकता है कि रक्त में घुसे विषाणु ही चुपके चुपके कुछ ही समय में महामरण का सरंजाम जुटा दे। नर पिशाच स्तर पर पहुँचा हुआ आज का भटका मनुष्य कहीं अपनी आत्महत्या स्वयं ही न कर ले।

परिस्थितियों को प्रत्यक्ष करने वाली भावी सम्भावनाओं का तथ्यपूर्ण अनुमान लगाने वाले यही सोचते है कि लोगों की रीति नीति में आमूल चूल परिवर्तन न हुआ तो बढ़ता प्रदूषण और पृथ्वी में छिपी संपदा का दोहन भयंकर रूप धारण कर आगत भविष्य को हर दृष्टि से अंधकारमय बनाकर रहे तो एक शताब्दी के भीतर यह धरती ने केवल मनुष्यों के वरन् प्राणियों तक के रहने लायक रह नहीं जायेगी।

विधाता की इच्छा इससे सर्वथा विपरीत है। उसने सारा कौशल दाँव पर लगा कर इस सुन्दर धरती को बनाया है मनुष्य उसकी सर्वोत्तम कलाकृति है इसकी रचना इस प्रकार की है जिसकी तुलना और किसी से नहीं हो सकती। अपनी ऐसी कलाकृतियों को बरबाद होते देखना स्रष्टा को स्वीकार नहीं। बच्चों को एक सीमा तक ही मस्ती की छूट दी जाती है जब वे उद्दंडता पर उतर आते है तो कान भी मोड़े जाते हैं प्रांतीय शासन लागू हो जाता हैं। वह अनुबंध तभी वापस लौटाया जाता है जब सही राह पर चलने का पथ प्रशस्त हो जाय, आश्वासन पूर्णतः विधाता को न मिल जाय।

दुर्दिन आने से पूर्व ही सृजन की शक्तियाँ जाग्रत हो गई है और असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए जुट गई और वह कार्य भी उतनी ही तेजी से हो रहा है। जितने वेग से बिगाड़ का प्रदूषण प्रजनन दुश्चिंतन भ्रष्ट आचरण की पिछले दिनों उलटी गंगा बहती रही है अब उसे नये सिरे से उलट कर सीधा किया जाएगा दुष्कृत्यों का दंड भुगतान और प्रायश्चित के रूप में क्षति पूर्ति करने का सिलसिला इस बीच भी चलता रहेगा।

तथ्यों के आधार पर वरिष्ठ आत्मवेत्ता तपस्वी सिद्ध पुरुष पिछले दिनों कहते रहे कि अवांछनीयता अधिक दिन टिकेगी नहीं। उसमें परिवर्तन निश्चित रूप से होगा। इसके लिए इक्कीसवीं सदी के आसपास का समय बताया गया है प्रकृति का तत्त्वदर्शन भी यही है कि वह असंतुलन को संतुलन में बदल कर ही रहती है अदृश्य सत्ता को विध्वंसकारी शक्तियाँ पनपने न पाएँ इसकी चिंता सतत् लगी रहती है विपन्नता आते ही तदाऽऽत्मन् सृजाम्यहम् का उसका वचन पूरा होता रहा है। अब भी उसकी पूर्ति होने जा रहा है। परिस्थितियों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए सृष्टि विषयों में विशेषज्ञ भी यही अनुमान लगाते है कि अँधेरा देर तक नहीं टिकेगा प्रभात का अरुणोदय अब निकट ही है।

अपने समय के मूर्धन्य दिव्यदर्शी भी ऐसे परिवर्तन की पुष्टि करते है जिसमें इक्कीसवीं सदी में उन भूलो का परिमार्जन होना चाहिए जिनके कारण पिछली सहस्राब्दी में अनौचित्य का असाधारण सिलसिला चला है वह बंद होकर के ही रहेगा। दिव्यदर्शियों के वरिष्ठ और बढ़ें समुदाय का यही अभिमत है पाश्चात्य जगत के महामनीषियों में से अधिकांश ने ऐसे ही अभिमत व्यक्त भी किये है।

सूर्य पूर्व से उदय होता है भारत ऐसे आंदोलनों में अग्रणी रहा है जिसमें सृजन की शक्तियों का उत्कर्ष और अवांछनीयता का निवारण व्यापक रूप से होता है।

युग संधि की अवधि सन् 1989 से 2005 तक की है। इस महापरिवर्तन के माहौल में शान्तिकुञ्ज हरिद्वार का महापरिवर्तन केन्द्र के रूप में विकास हुआ है इन में प्रथम बारह वर्षों में सन् 2000 तक यहाँ तथा संबंधित हजारों क्षेत्रों में युग संधि पुरश्चरण नियमित रूप से निरंतर चल रहे है। इसमें भागीदारों की संख्या इन दिनों पचास लाख के लगभग है। अगले छह वर्षों में यह संख्या न्यूनतम तीन करोड़ हो जाएगी। इस वसंत पर बारह वर्षीय साधना की दूसरी पूर्णाहुति बारह वर्ष में 2001 के वसंत पर होगी जिसमें प्रायः छह करोड़ भागीदार सम्मिलित होंगे। विश्वास किया गया है कि वह दिव्य शक्तिसम्पन्न अनुष्ठान इस युग का ऐसा धर्मानुष्ठान होगा जिसे न भूतो न भविष्यति कहा जा सके। बाद के पाँच वर्ष नव सृजन का बचा सरंजाम पूरा होने के है उस समय क्या किया जाना है वह समय समय पर बताया जाता रहेगा।

मिशन के संचालक परम पूज्य गुरुदेव का शरीर लगभग 80 वर्ष का हो चलने पर भी पूर्णतः स्वस्थ रहा और नियमित रूप से बीस घंटे कार्यरत रहा परम वंदनीय माताजी ने उनके कार्य का आगे बढ़ाया दोनों ही सत्ताओं के माध्यम से अब यह दिव्य संदेश मिलता है कि वर्तमान की विभीषिकाओं और भविष्य की सुखद सम्भावनाओं के लिए हनुमान अर्जुन भगीरथ दधिचि जैसों की भूमिका निभाने के लिए ही उन्हें स्थल शरीर छोड़ कर सूक्ष्म शरीर की हजार गुनी बढ़ी शक्ति द्वारा कितनी ही अतिशय महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाने हेतु सक्रिय होना पड़ा और स्थूल शरीर को छोड़कर सूक्ष्म तथा कारण शरीर में संचित दिव्य शक्तियों का प्रयोग करने के निमित्त नियोजित होना पड़ा।

इसकी तैयारी ऋषि चेतना ने कर ली है अब बारी हमारी है। शान्तिकुञ्ज का पुरश्चरण संकल्प यथावत् पूरे विश्व भर में चल रहा है। उसमें कोई खामी या कमी न पड़ने पाये इसका उत्तरदायित्व गुरु सत्ता समर्थ हाथों में सौंप कर गयी है। करोड़ों की भागीदारी वाली पूर्णाहुति का भी। शरीर न रहते हुए भी शान्तिकुञ्ज आने वाला कोई व्यक्ति इसी कारण यह अनुभव नहीं करता कि जो प्रज्ञा श्रद्धा स्नेह ममत्व निष्ठा का अनुदान पहले यहाँ मिल रहा था उसमें कोई कमी पड़ गई है।

इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्ध भर ऋषि सत्ता को तीनों शरीरों से स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों से इतना प्रचंड संघर्ष करना है जिससे प्रस्तुत विपत्तियाँ के अनुकूलन में परम पुरुषार्थ में कोई कमी न आने पाये। श्रेय हमें लेना है। यदि हम सक्रिय रहें व उनके बताये अनुशासनों को पाल कर युगधर्म का निर्वाह आपाद् हमारा नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। समझदारी का अनुगमन कौन करता है यही सब महाकाल ऊपर से देख रहा है।


रामनाम (Kahani)

एक शिष्य किसी संत पुरुष की सेवा में निरत था और ऐसा मंत्र चाहता था। जिसके सहारे वह ऋद्धि सिद्धियाँ दिखा सके। पर संत थे जो सबको रामनाम ही बताते थे शिष्य को चमत्कारी मंत्र चाहिए था। रामनाम तो मामूली बात है से निराशा होने लगी। गुरु ने मनः स्थिति को ताड़ लिया।

एक दिन गुरु ने उस शिष्य को एक चिकना पत्थर दिया ओर कहा इसे सब्जी वालों से पूछकर आओ कितने में खरीदेंगे। शिष्य दिन भर घूमा। बटखरे के काम में आ सकता है यह सोचकर उनने दो चार पैसे भर की कीमत लगाई।

दूसरे दिन वही पत्थर लेकर सुनारों के मुहल्ले में भेजा वहाँ उसका दाम एक हजार तक लगाया गया तीसरे दिन उसे जौहरी बाज़ार में उसकी कीमत मालूम करने को कहा गया। कइयों को दिखाने पर उसकी कीमत बढ़ते बढ़ते एक लाख तक पहुँच गई।

गुरु ने शिष्य को समझाया पत्थर तो वही था, पर पारखियों ने अपनी अपनी जानकारी के आधार पर उसका मोल बताया रामनाम है तो एक ही पर पात्रता के अनुरूप उसका मोल और महत्त्व घटता बढ़ता रहता। है।


उज्ज्वल भविष्य के लिए किये जाने वाले विशद गायत्री महायज्ञ - परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

परम पूज्य गुरुदेव का प्रस्तुत प्रवचन सूक्ष्मीकरण साधना के तुरंत पश्चात् का है जो दिसम्बर 1986 में जन साधारण के समक्ष नव वर्ष की पूर्व वेला में दिया गया। इस अमृत धारा में उज्ज्वल भविष्य के लिए किये जाने वाले विशद गायत्री महायज्ञों की विस्तृत झाँकी प्रस्तुत की गयी है और सब को उसमें सहयोग देने के लिए कहा गया है। आइये इस अमृत धारा का अवगाहन करे।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धियो यो नः प्रचोदयात्।

भाइयों! लंका दहन के पश्चात् राक्षस तो मारे गये, लेकिन वातावरण ज्यों का त्यों गंदा बना रहा। वातावरण में राक्षसपन बराबर बना हुआ था। फिर उसका निवारण कैसे हो? वातावरण का मुकाबला कैसे किया जाये? तो रामचन्द्रजी ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे। दशाश्वमेध घाट कभी आप बनारस जाये तो वहाँ देखें कि वहाँ घाट पर भगवान् राम के किये हुये दस अश्वमेधों का चिह्न है कि नहीं और उन्हीं के वजह से घाट का नाम दशाश्वमेध घाट रखा गया है। कौरवों के जमाने में कंस से लेकर के जरासन्ध तक जो अत्याचार कर रहे थे वो महाभारत में मारे तो सब गये लेकिन वातावरण नहीं मारा गया। वातावरण वैसे ही गंदा बना रहा, और वैसे ही उसमें दृष्टता भरी रही। उसका शमन कैसे हो? इसका एक ही उपाय भगवान् ने बताया इसके लिये यज्ञ करना चाहिए। राजसूय यज्ञ उसी समय हुआ था। और उसका उद्देश्य था वातावरण का संशोधन।

वातावरण दिखायी नहीं पड़ता उसका प्रभाव ऐसा बुरा होता है कि चारों ओर हाहाकार फैल जाता है। आज भी वातावरण वैसा ही दूषित है जैसा कि दो घटनायें मैंने सुनायी जो उस समय था। आज भी चारों ओर अशान्ति फैली हुयीं है। सारे विश्व में वातावरण की वजह से दुर्घटनायें बराबर हो रही है। कहीं सूखा पड़ रहा है? कहीं पानी बरस रहा है कही बाढ़ आ रही है कही बीमारियों फैल रही है ये तो यहाँ है सारे संसार भर में देखिये लड़ाई का वातावरण बन रहा है जगह जगह युद्ध चल रहे है जगह जगह द्वेष हो रहे है जगह जगह मारकाट हो रही है मार काट हो रही है और आतंकवाद फैला हुआ है बहुत-सी बातें हो रही है यह कैसी हो रही है? ये वातावरण के दूषित होने की वजह से हो रही है। इसकी प्रेरणा वातावरण से मिलती है वातावरण से प्रकृति भी नाराज है आज प्रकृति भी संग नहीं दे रही है। फसल ठीक तरह से पैदा नहीं हो रही है मनुष्यों में जो शान्ति और चैन होना चाहिए वह भी नहीं मिल पा रहा है।

क्या उपाय करना चाहिए वातावरण संशोधन करने के लिए? वायुमंडल भी दूषित है वातावरण ही नहीं वायुमंडल भी। कैसे? ये कारखानों चलते है मिले चलती है इनका धुँआ निकलता है इन धुओं की वजह से वायुमण्डल भी दूषित हो रहा रहा है उसकी वजह से विकिरण फैल रहा है और विकिरण की वजह से संतानें खराब हो रही है। बुरे स्वभाव की हो रही है अंधी पंगी हो रही है वातावरण का प्रभाव वायुमंडल का प्रभाव विकिरण का प्रभाव सारे संसार भर में छाया हुआ है। इसका क्या उपाय करना चाहिए? ये पुस्तकीय उपायों से काम नहीं चल सकता। इसके लिए तीर तलवार काम नहीं दे सकते। मनुष्य का साँसारिक पुरुषार्थ में यज्ञ की बड़ी महत्ता बतायी गई है यज्ञ को पिता बताया गया है और गायत्री को माँ बताया गया है गायत्री और यज्ञ मिलकर के दोनों माता पिता होते है गायत्री यज्ञों से वह शक्ति पैदा होती है जो कि नया दर्शन पैदा कर सके और वातावरण में जो गंदगी भरी है उसको झाड़ बुहार कर साफ कर सके। यह सफाई करने की शक्ति केवल यज्ञ में है यज्ञ से आप सारे संसार भर की सेवा कर सकते है।

एक संत थे उन्होंने एक चवन्नी भेजी दूसरे संत के पास और यह कहा कि इस चवन्नी की कोई चीज लेकर तुम्हारी जमात में जितने आदमी है सबको खाना खिला दीजिए। उन्होंने चवन्नी का घी मँगाया और उसमें से ही हींग और लौंग मँगाया और दाल में बघार लगा दिया सभी खाने वाले ने खाया और सबने कहा- हमने खा लिया फिर दूसरे संत के पास परीक्षा लेने के लिए उन्होंने एक पैसा भेजा और एक पैसा भेजकर कहा कि इससे आप सारे संसार भर का भोजन करा दीजिए सारे संसार भर को थोड़े से आदमी को भी तो करा सकते है पर एक पैसा में से सारे संसार भर को भोजन कैसे कराया जाये? उन्होंने कहा कराया जा सकता एक पैसा घी और हवन सामग्री उन्होंने उठा कर लिया। उस जमाने की बात कह रहा हूँ जबकि एक पैसे बात बहुत कीमती थी तो उसको लिया और यज्ञ कर दिया। हवन करने से सारे के सारे वायुमंडल में उसकी सुगंध फैल गयी और जिस किसी ने साँस ली इन सबकी साँस में हवन की वह सूक्ष्म सामग्री गयी उससे सारे संसार के मनुष्यों को ही नहीं पशुओं को पक्षियों को प्राणियों को सबको खाने को मिला। वायु जो मिली उससे उसका परिपोषण हुआ। उनके शरीर के रोग निवारण हुए उससे एक पैसा कितना काम आया। किसी को एक पैसा दान दे दे या खिला दे तो उससे क्या हो सकता है? लेकिन यज्ञ कर दे तो यज्ञ हवा में शामिल होकर के इस तरीके से फैल जाता है जैसे पानी में तेल डाल दे आप तो वह तमाम जगह फैल जाता है इसी प्रकार से यज्ञ में जो चीज हवन में आती है उन सबका सारे वातावरण पर असर पड़ेगा सारे वायुमंडल पर असर पड़ता है।

वायुमंडल का संशोधन करने के लिए प्रकृति का संशोधन करने के लिए और सारे संसार में सुख शांति लाने के लिए कलह क्लेशों को दूर करने के लिए यज्ञ सबसे बड़ी चीज है भारतीय धर्म में। इसके बारे में इतने ज्यादा प्रशंसा की गई है इतने गुणगान किये गये है कि यज्ञ से बड़ा कोई पुण्य और परोपकार कोई और नहीं हो सकता। आप लोग यज्ञ कर रहे है इससे वायुमंडल को संशोधन होने से बहुत मदद मिलेगी। वायुमंडल का संशोधन होने से बीमारियों को दूर होने से लेकर के लड़ाई झगड़े क्लेश कुपात्र संतान पैदा होने से लेकर के जो भी इस तरह की कठिनाइयाँ है उनके समाधान होने में मदद मिलेगी। इसलिए यह करके जो आप बड़ा पुनीत कार्य कर रहे है इसके लिये हम बधाई देते है।

इस समय इसकी क्या आवश्यकता पड़ गई इस समय एक और नयी बात पैदा हो गयी इस समय युद्ध के संकट और दूसरे संकट तो प्रत्यक्ष है ही जो दिखायी पड़ रहे है। आतंकवाद का भय भी आपको सब तरफ फैला दिखायी पड़ रहा है सारे विश्व में दिखाई पड़ रहा है। हिन्दुस्तान में ही नहीं पंजाब में ही नहीं सारे विश्व में ही यह वातावरण दूषित हो रहा है इस दूषित वातावरण का संशोधन करने के लिए यज्ञ से बड़ी कोई और वस्तु नहीं है जिससे कि हम सूक्ष्म जगत का परिष्कार कर सकें। इनकी वजह से ही यज्ञों को पुनरावृत्ति के रूप में करना पड़ा।

हमारे जीवन को पचहत्तर पन्ने की किताब है इसमें सारे अध्यात्म के रहस्य हमने खोल खोल के रखे है आपने कोई किताब न पढ़ी हो जीवन में तो हमारा जीवन पढ़ लीजिए कि अध्यात्म सार्थक कैसे हो सकता है? इसकी हीरक जयंती सब लोगों ने मिलकर मनायी है तो कोई हो सकता है? इसकी हीरक जयंती सब लोगों ने मिलकर मनायी है तो कोई नाराजगी नहीं हुयीं प्रसन्नता ही हुयीं हैं अखण्ड ज्योति परिवार के चौबीस लाख के करीब आदमी है पत्रिकाएँ बहुत निकलती है इन सबकी इच्छा थी कि हीरक जयंती मनायी जाये। हीरक जयंती में ही यह संकल्प किये गये थे कि एक एक लाख के पाँच बड़े यज्ञ होंगे जो आपने पढ़े ही है। जो आप कार्यान्वित कर ही रहे है। यहाँ का नालंदा विश्वविद्यालय सबसे ज्यादा सफल रहा है इसमें एक जार आदमी के करीब शिक्षण प्राप्त करने के लिए हमेशा आते रहते है प्रत्येक महीने। जब तक एक लाख आदमियों को शिक्षित न कर लेंगे तब तक चैन नहीं लेंगे पहला संकल्प था। इसके अलावा था एक लाख जन्मदिन मनायेंगे एक लाख पेड़ लगाएँगे और बहुत-सी बातें थी वे हमारी हीरक जयंती से संबंधित है उसकी पूर्णाहुति इसी यज्ञ के साथ हो रही है जो आपके के यहाँ होगा इस वर्ष। इस वर्ष उसकी भी पूर्णाहुति है। हमारे हीरक जयंती की भी पूर्णाहुति है।

दूसरी बात अखण्ड ज्योति की यह स्वर्ण जयंती है अखण्ड ज्योति की वजह से हमने संगठन किया है इतने विचार लोगों को दिये है जो पत्रिकाएँ आजकल निकलती है उनमें दो लाख से ज्यादा अखण्ड ज्योति निकलती है। एक लाख से ज्यादा गुजराती की निकलती है मराठी की पत्रिका निकलती है उड़िया की निकलती है हिन्दी का एक दूसरा पत्र निकलता है। सब मिलाकर के छः सात लाख पत्रिकाएँ निकलती है इनके द्वारा हमारे विचारों ने दुनिया में एक बड़ा संगठन खड़ा कर दिया है चौबीस लाख आदमियों का एक संगठन है यह संगठन इसी वजह से बना है कि हमारे विचारों को अखण्ड ज्योति के द्वारा हमारी वाणी को लोगों ने सुना और हमारी लेखनी को चखा। लेखनी और वाणी दोनों का सम्मिश्रण है यह अखण्ड ज्योति इसका पचासवाँ वर्ष शुरू होता है उनचास वर्ष पूरे हो गये और अब इसी महीने से इसी साल से पचासवाँ वर्ष शुरू होता है उनचास वर्ष पूरे हो गये और अब इसी महीने से इसी साल से पचासवाँ वर्ष प्रारंभ हुआ है तो इसकी स्वर्ण जयंती है स्वर्ण जयंती मनाने में यज्ञ और गायत्री ये ही दो तो हमारे माता पिता रहे है गायत्री का तो इसके साथ में जप होगा ही आहुतियाँ तो दी ही जायेगी गायत्री यज्ञ है ही। इससे हम अपने माता पिता को अखण्ड ज्योति को भी पूर्णाहुतियाँ के ज्योति का स्वर्ण जयंती वर्ष मनाते हैं।

इसके सिवाय तीसरा हमने जो कार्य किया वह तीन वर्ष का सूक्ष्मीकरण अनुष्ठान किया था तीन वर्ष पूरे होते ही अधिकांश समय हमें एकांत में रहना पड़ा मौन में रहे और क्या-क्या किया? उन सब बातों को बताने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए आपको जनवरी की अखण्ड ज्योति पढ़नी चाहिए जनवरी की अखण्ड ज्योति को हम कुण्डली जागरण अंक के नाम से छाप रहे है इस सावित्री साधना का क्या विज्ञान है? किस तरीके से संभव हुयीं? ये हम अखण्ड ज्योति के जनवरी के अंक में बतायेंगे और इक्कीसवीं सदी का फरवरी अंक होगा इक्कीसवीं सदी का फरवरी अंक होगा इक्कीसवीं सदी कैसे आयेगी? नया युग कैसे आयेगा? नये युग में क्या क्या बातें होगी? यह सब बातें फरवरी के अंक में होगी अखण्ड ज्योति का जो स्वर्ण जयंती वर्ष है यह भी बड़ा शानदार वर्ष है क्योंकि बहुत कम पत्रिकाएँ ऐसी है हिन्दुस्तान में जो पचास वर्ष से ज्यादा चल रहीं है इनकी संख्या उँगलियों पर गिनने लायक है कोई पत्रिका दो वर्ष निकलती है कोई एक वर्ष निकलती है तो कोई चार वर्ष निकलती है प्रायः बंद हो जाती है इतने लंबे समय तक लगातार जिसका कभी विराम न हुआ हो जिसके कभी साप्ताहिक अंक न निकले हो जिसकी कभी नागा न हुयीं हो इस तरह की पत्रिका शायद ही कही कोई हो भारत वर्ष में। इसकी भी स्वर्ण जयंती मनायी जा रही है।

आपका जो यज्ञ है यह उस स्वर्ण जयंती का भी यज्ञ है हमारी ये तीन वर्ष की जो साधना हुई है वह भी सारे विश्व कल्याण के लिए हुईं है वातावरण संशोधन के लिये हुई है और जो संसार में पाप-अनाचार फैले हुये है उसके साथ संघर्ष के लिए उसके साथ में लोहा लेने की शक्ति पैदा करने के लिए हुई है। ये साधना बड़ी महत्त्वपूर्ण है न केवल संसार है बल्कि हमारा सारा कुटुंब जो है उसके लिए भी अपने कुटुंब के लिए इतनी बड़ी सेवायें जो की है उसके हमको अभी संतोष नहीं हो रहा है अब ये हमारा मन कि हमारे जो कुटुंबी है गायत्री परिवार के परिजन है इनकी कुछ और ज्यादा सेवा करे ज्यादा सेवा के लिए पूँजी की आवश्यकता है संपदा तो होनी ही चाहिए। हमारे पास कुछ साधन तो हो जिससे हम सेवा करें। सेवा मुँह जबानी थोड़े ही हो जाती है। उसके लिए तीन वर्ष इसीलिए बीत गये है कि संसार का वातावरण संशोधित हो और अपने प्रज्ञा-परिवार के जितने भी व्यक्ति है उनकी सेवा करने का उनकी सहायता करने का उनके लायक शक्ति एकत्रित करने के लिए उपार्जित करने के लिए भी ये यज्ञ है।

इन यज्ञों के साथ यह तीन बातें साथ में जुड़ी हुई है वातावरण वायुमंडल और विकिरण संबंधी समस्यायें जो सारे संसार भर में फैली हुई है उनके समाधान के लिए यह यज्ञ देखने में छोटासा मालूम पड़ेगा आपको। लेकिन सौ कुण्डीय यज्ञ भी कम है इस समस्या को देखते हुये कितनी बड़ी समस्या है ओर उस समस्या से संघर्ष करने के लिए कितना बड़ा काम हम करने जा रहे हैं सौ कुण्डीय के हिसाब से जो यज्ञ करने जा रहे हैं वे एक लाख कुण्ड में समाप्त होंगे एक लाख कुण्ड में समाप्त होंगे। एक लाख कुण्डों तक चलेंगे सौ को सौ से गुणा कर दे तो एक लाख होते हैं तो जूनियर और सीनियर यज्ञों को हमने संकल्प किया है। ये पूरा होकर के रहेगा। हमारा कोई संकल्प छपा था। आपने पहली पुस्तक हमारी देखी होगी। उसमें चौबीस स्थान भी दिये थे कि चौबीसों स्थानों में गायत्री शक्तिपीठ बनाकर के रहेंगे बस वह संकल्प प्रकाशित हुआ और उसके बाद में चौबीस सौ बनी यानि सौ गुनी ज्यादा हो गयी। अभी हमारा एक लाख कुण्डों का तो बड़ी आसानी से पूरा हो जायेगा इसमें किसी तरह कोई और तरह की दिक्कत पड़ेगी

केवल यज्ञ ही इसमें शामिल नहीं है। इसके साथ-साथ में राष्ट्रीय एकता सम्मेलन भी जुड़े हुये है। आजकल छिन्न-भिन्न होता हुआ दिखायी पड़ता है देश भाषाओं के नाम पर संपदाओं के नाम पर और जाति बिरादरियों के नाम पर हजारों चीजें ऐसी है जो हमारे बीच बिखराव पैदा करती है इस बिखराव को एकता में बदलने के लिए सबको एक सूत्र में बाँधने के लिए सबको एक परिवार के रूप में गठित करने के लिए हमने ये राष्ट्रीय एकता सम्मेलन प्रत्येक यज्ञ के साथ जूड़े हुए रखे है चाहे जूनियर यज्ञ हो चाहे सीनियर यज्ञ हो चाहे एक कुण्डीय यज्ञ हो चाहे पाँच कुण्डीय यज्ञ हो। सबमें राष्ट्रीय का नाम दिया जायेगा और उस विषय में व्याख्यान और प्रवचन और उपस्थित जनता को उनका मार्गदर्शन करने का भी क्रम रहेगा।

इस तरीके से इसमें दोहरा लाभ है। इन समस्त लाभों को देखते हुये जो खर्च इसमें आयेगा वो तो नगण्य है उसी तो बहुत कम कीमत है इसमें तो हमने और भी सब बातों की किफायत कर दी हैं। यज्ञ का सारे का सारा सामान यहीं से भेजा जा रही है और वहाँ के लोगों को जहाँ ये आयोजन होंगे वहाँ तो कम पैसे ही खर्च करने होंगे इस तरीके से योजना क्रमबद्ध रूप से बनायी गयी है। इन सबसे सारे भारतवर्ष के कोने -कोने में यज्ञों की हवा बनाने का उद्देश्य है इस हवा को बनाने में आप मदद दीजिए। इसमें सम्मिलित होइए और यहाँ से हमारे प्रवचन सुनने के बाद में ये विचार लेकर के जाइये कि हमको अपने गाँव में अपनी बस्ती में अपने इलाके में भी इन यज्ञों को करना है छोटे यज्ञ भी होंगे आगे जाकर के छोटे हो चाहे बड़े हो पर कहीं न कहीं इन यज्ञों की हवा फिर सारे भारतवर्ष में पैदा करनी है हमको तो उसमें आपके सहयोग की जरूरत है सहायता की जरूरत है अगर आप सहायता करेंगे सहयोग करेंगे तो आप खाली हाथ नहीं रहेंगे यज्ञ भगवान ने कहा है हे यज्ञ करने वालों! तुम चम्मच सामग्री लाये। हमने तुम्हारी मुट्ठीयों को खाली हाथ नहीं रहने दिया है। तुम्हारी मुट्ठीयों में हजार गुनी कीमती चीजें भर दी है।

इस यज्ञ में शामिल होने वालों का जो समय लगेगा श्रम लगेगा पैसा लगेगा हम आपको यकीन दिलाते हैं कि उसका सौ गुना होकर के आप उससे ज्यादा लाभ उठायेंगे शारीरिक लाभ भी उठायेंगे मानसिक लाभ भी उठायेंगे पारिवारिक लाभ उठायेंगे आध्यात्मिक लाभ भी उठायेंगे सब होंगे। ऐसा हम आपको यकीन दिलाते है इन शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त करते है। ॐ शांति


ममता की सुरसरि


ममता की सुरसरि (Kavita)

माँ! तुम्हारे स्नेह की छाया हमें मिलती रही तो, हम कही पर म्लान मुरझाया सुमन रहने न देंगे।

आचरण की गंध पावन, वायु में फैली रहेगी-मन-सुमन की पाँखुरी कोई न अब मैली रहेगी,

एक भी प्रतिभा अविकसित झर न पाएगी कहीं पर, रश्मि कुहरे में न कोई कसमसायेगी कहीं पर

आपके तप की तनिक ऊर्जा हमें मिलती रही तो, हम गगन में वंदिनी कोई किरण रहने न देंगे

अब नहीं संकीर्णता का भाव मन पल सकेगा, अब न भीड़ में अकेलापन किसी को खल सकेगा,

अब न कोई छल कपट के स्वार्थ के नाते रहेंगे, सब परस्पर काम अब दुःख दर्द में आते रहेंगे,

आपकी वरदायिनी वर्षा हमें मिलती रही तो, हम विषैला विश्व का वातावरण रहने न देंगे

हम विवेकी बन चलेंगे चाल जीवन की बदलकर, जो बँधे थे दायरों में आएँगे आगे निकल कर

लोकहित में वे समय-श्रम और साधन दे सकेंगे, लोकसेवा के लिये वे शेष जीवन दे सकेंगे

आपके मन की सघन करुणा हमें मिलते रही तो, हम किसी को स्वार्थ-लिप्सा में मगन रहने न देंगे।

शक्ति को हम संगठित करके नया परिवेश देंगे, आपका प्रेरक उजाले -सा सृजन-संदेश देंगे,

फिर न हृदयों पर हताशा के घन घिर सकेंगे-पथ-विमुख होकर न कोई पग भटकते फिर सकेंगे

सुरसरी जैसी सहज ममता हमें मिलती रही तो, एक भी निस्तेज हारे-से नयन रहने न देंगे


सविता -गरिमा गान


सविता -गरिमा गान (Kavita)

आप ही सविता! दिवाकर भास्कर, दिनमान है। आप से जड़ और चेतन सभी कुछ क्रियमाण है॥1॥

रोशनी का आपने वरदान सबको दे दिया और तम के शिकंजे से, मुक्त जग भर को किया॥

आप ही तप तेज ऊर्जा शक्तियों के केन्द्र है। आप ही पर्जन्य वर्षक आप ही देवेन्द्र हैं॥

स्रोत है संवेदना के, प्रखरता के प्राण है। आप से जड़ और चेतन सभी कुछ क्रियमाण है॥2॥

आप है सर्जक नियामक प्रकृति के हर काण्ड के। नियंत्रक ऋतु चक्र, ग्रह नक्षत्र के ब्रह्माण्ड के॥

गुरुत्वाकर्षण विकर्षण संतुलन है आप से। भाव संवेदन जगत में स्फुरण है आप से॥

साधकों को आपसे मिलते अमित अनुदान है। आप से जड़ और चेतन सभी कुछ क्रियमाण है॥॥3॥॥

आपसे सूरज अनेकों पा रहे है रोशनी। चाँद शीतल-सौम्य हो छिटका रहे है चाँदनी॥

ज्ञान प्रकाश सुलभ सभी को कर दिया है आपने। मुक्ति का अज्ञान तम से वर दिया आपने॥

आप ही अज्ञान तम में भटकनों के त्राण है। आपसे जड़ और चेतन सभी कुछ क्रियमाण है॥4॥

विश्व भर करता नमन, अब दिव्य सविता देव को। ज्ञान के विज्ञान के आधार सविता देव को॥

फिर तिमिर की तेवरे बदली हुई लगती प्रभो। रूप बहुविधि धार कर छल छन्द से ठगती प्रभो॥

कर रहे सविता-उपासक आपका ही ध्यान हैं। आप से जड़ और चेतन सभी कुछ क्रियमाण है॥5॥

प्रभो! सविता साधकों को तेज अपना दीजिए। साधकों को आप अपना प्रखर प्रतिनिधि कीजिये॥

दे सकें तुमको चुनौती मुक्त जग को कर सके। आपको आलोक से संसार भर को भर सकें॥

रश्मि शर संधानकर्ता! आप के हम बाण है। आपसे जड़ और चेतन, सभी कुछ क्रियमाण है॥6॥


राष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण एवं प्रथम पूर्णाहुति

साधना समर के लिए मूर्धन्य महारथी आगे आएँ, भीरु न कहाए

कहते है कि प्राचीन काल में भारतवर्ष में एक पारस पत्थर हुआ करता था। उससे स्पर्श कर लोहे को सोने में बदल लेते थे। उस समय में जीवन का प्रत्येक क्षेत्र सुख-शांति और समुन्नति से भरा पड़ा था। न केवल भौतिक दृष्टि से अपितु आध्यात्मिक दृष्टि से भी इस देश ने बुलंदियों का स्पर्श किया था। अणिमा गरिमा लघिमा महिमा प्राप्त प्राकट्य शित्व वशित्व ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त हुई थीं उनके प्रभाव से देश विश्ववन्द्य था।

प्रश्न यह है कि वह पारस गया कहाँ? नये सिरे से उसे प्राप्त करने का काई विधान भी कही उपलब्ध नहीं है जिससे उसे फिर प्राप्त किया जा सके। वह पुरुषार्थ पदार्थपरक तो नहीं आध्यात्मिक संदर्भ में शास्त्रों में गायत्री को अवश्य ही एक ऐसे पारस के रूप में निरूपित किया गया है जिसके स्पर्श से लोहे जैसे काले कुरूप जंग लगने वाले जीवन को सोने जैसा सुंदर खरा और आप्तकाम बनाने वाला बताया हैं। अथर्ववेद का कथन है-स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ताम् पावमानी द्विजानाम् आयुः प्राण प्रजा पशु कीर्ति द्रविणम् ब्रह्मवर्चसम् मह्म दत्वा ब्रजत् ब्रह्मलोकम्।”

वेदमाता भगवती गायत्री की उपासना, आराधना करने वाला साधक दीर्घजीवी होता है तेजस्वी होता है सुंदर गृहस्थ साँसारिक साधनों का स्वामी यशस्वी संपन्न श्रीमतं एवं ब्रह्मबल संपन्न होकर जीवन जीता है और अंत में अपने जीवन लक्ष्य को ब्रह्मलोक को प्राप्त करता हैं। तुलनात्मक दृष्टि से यह दोनों ही उपलब्धियाँ एक ही बिंदु पर आ टिकती है स्पष्ट है गायत्री महाविद्या ही

प्राचीन काल का वह पारस है जिसने भौतिक दृष्टि से भी और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी इस देश को उच्च शिखर पर प्रतिष्ठित किया था।

दुर्भाग्य यह हुआ कि यह पारस अंधकार में कहीं खो गया तो कुछ लोगों ने अपने पास गुप्त पारस होने का ढोंग रचाकर लोगों का दिग्भ्रांत दुर्गति होनी ही होनी थी सो हुई भी वैभव का स्वामी भारतवर्ष सब कुछ गँवाकर प्रायः डेढ़ हजार वर्ष तक दासता की जंजीरों में जकड़ा रहा।

ज्ञान इस देश में जन्मा, विज्ञान को यहाँ से प्रगति मिली अक्षर ज्ञान और अगणित संसार को हमने सिखाया, ब्रह्मवैवर्त इस धरती पर हुआ, यह इस तथ्य का प्रतीक है कि परमात्मा ने यदि कहीं अपना ठिकाना बनाया किसी से अधिक प्यार किया तो वह यह अपना प्यारा भारत देश ही है उसका आधार यहाँ के जीवन की पवित्रता रही है यही कारण है कि जब जब इस तरह की दुःखद परिस्थितियाँ आयी अंधकार छाया तब तब कोई न काई मसीहा इस पुण्य भूमि पर आया और उलटी परिस्थितियों को उलटकर फिर सीधा किया।

इस युग संधि की इस विषम बेला में परम पूज्य गुरुदेव का अवतरण ऐसे ही देवदूत के रूप में हुआ उन्होंने प्रभुता संपन्न सार्वभौम राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए युद्ध लड़ा विजय मिली दूसरे लोग तो स्वाधीनता का स्वाद स्वयं चखने एवं अपना घर भरने में लग गए। परन्तु वे थे कि एकाकी उस पारस को ढूँढ़ने व उसका जन-जन को स्पर्श कराने निकल पड़े ज्ञानगंगा गायत्री तो कब से अपने घर लौटने अपने प्रज्ञा पुत्रों को गोद में खिलाने का आनंद लेने के लिए समुद्यत थी पर कोई ऐसा शव नहीं मिल रहा था जो उनके वेग को सँभालता और फिर मुरझाई संतति पृथ्वी में प्रवाहित कर देता। उसके लिए कैलाश जैसा उत्कृष्ट जीवन जीना एक टेढ़ी खीर थी वेदों की रक्षा के लिए विषपान करना सरल नहीं था।

परम पूज्य गुरुदेव ने यह दायित्व सँभाला और कठोर तपश्चर्या के द्वारा भगवती गायत्री महाविद्या पर एक-एक पैसे के ट्रैक्टों से लेकर तीस तीस संस्करण तक छप जाने वाले गायत्री महाविज्ञान लिखकर उन्होंने इस पतित पावनी गंगा की धारा बहायी। गायत्री परिवार की शाखाएँ बनी पत्रिकाएँ छपी घर घर उपासना का प्रशिक्षण सत्रों एवं यज्ञों का क्रम चल पड़ा।

अगले चरण में सप्तसरोवर क्षेत्र हरिद्वार में शान्तिकुञ्ज ब्रह्मवर्चस् की स्थापना हुई। प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों का क्रम प्रारंभ हुआ गायत्री शक्तिपीठों प्रज्ञामंडलों की स्थापना हुई गायत्री यज्ञ अभियान गाँव गाँव पहुँचा इस दौर में उन्हें कितनी अवमाननायें मिली कितने लोगों ने अपमानित किया कितने आघात किये किंतु हिमालय जैसे अडिग परम पूज्य गुरुदेव की साधना सफल हुई। देश को आत्मबोध हुआ करोड़ों लोगों की आराध्य अवलंबन हुआ करोड़ों लोगों की आराध्य अवलंबन बन गई भगवत् गायत्री। फिर से यज्ञ धूम्र उठा वैदिक ऋचाएँ गूँजने लगी।

देवसंस्कृति का तुमुलनाद चारों ओर गूँजने लगा। प्रतिगामियों ने भी दिशा के साथ-साथ दीक्षा ली और अब इस अमृत गंगा के स्नान का सभी आनंद लूट रहे है।

महाक्रान्ति का महाभियान

परम पूज्य गुरुदेव ने घोषणा की अब इस राष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण हो तब राष्ट्र फिर से भू-मंडल का स्वामी बने। उन्होंने इस पुनीत उद्देश्य से युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की। उसके अंतर्गत इस समय देश विदेश में लगभग 20 से 24 लाख व्यक्ति इस महान् साधना में जुटे है और प्रतिदिन लगभग 240 करोड़ गायत्री मंत्र जप का महाअनुष्ठान अग्रसर हो रहा है उसकी प्रथम पूर्णाहुति 1995 में संपन्न करने की घोषणा भी उन्होंने ही की घोषणा भी उन्होंने ही की ताकि उपासना के माध्यम से उपार्जित प्राण सत्ता को परिपक्व किया जा सके।

इस प्रक्रिया के अंतर्गत अनगढ़ता असंस्कृति के कुचक्र को काटने के लिए देवसंस्कृति की दिग्विजय अभियान की आवश्यकता सामने आयी। युग का यह महाभारत तो जीतना ही होगा यह ठीक ही है कि कौरवों की सेना विकराल है, पाँच पाण्डवों वाला गायत्री परिवार तो नितांत साधनहीन दीखता है। उसे तो गुजारे के लिए 20 पैसे प्रतिदिन अनुदान से काम चलाना पड़ता है फिर महाभारत कैसे लड़ा जाय? पूज्य गुरुदेव ने तब अपना विराट रूप दिखाया। पाण्डवों को युद्धाय कृतनिश्चयः की प्रेरणा दी और स्वयं उसका सारथी होने का आश्वासन देकर प्रत्यक्ष युद्ध से तो विरक्ति ले ली पर अप्रत्यक्ष युद्ध के लिए महाकाल की भूमिका सँभाल ली। उनके महाप्रयाण के पश्चात् का यह दृश्य सारा देश एवं विश्व 24 अश्वमेधिक पराक्रमों के माध्यम से देख चुका हैं। यहाँ तक का इतिहास गायत्री उपासना की प्रारम्भिक कक्षा का बोध समझा जाना चाहिए।

कुण्डलिनी साधना गायत्री की उच्चस्तरीय साधना है जिसके माध्यम से रोम रोम को प्राणों की प्रखरता से भरा जाता है सामान्य गायत्री उपासना जब आरोग्य प्रदान कर सकती है दीर्घजीवन देती है तब असामान्य युग संधि महापुरश्चरण साधना की फलश्रुति की तो कल्पना भी कठिन हैं। समूचे राष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण तो एक प्रकार से भव्यतम अभियान है जिसका सूत्रपात परम पूज्य गुरुदेव ने इस उसकी प्रथम पूर्णाहुति 4,5,6,7,नवम्बर 1995 में परम पूज्य गुरुदेव की पावन जन्मभूमि आँवलखेड़ा (आगरा) में सुनिश्चित की गई है विगत 1 नवम्बर को उसका कलश स्थापना समारोह संपन्न हुआ अब इस अनुक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अनुष्ठान को षट्चक्रवेधन साधना में प्रवेश कराने के लिए परम पूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माता जी की कारण सत्ता मचल रही है। महाभारत जैसा यह पुरुषार्थ गायत्री परिवार के पाँडवों द्वारा ही संभव होगा।

देवी भागवत् में साधना को समर अर्थात् युद्ध की संज्ञा दी गई है। छः द्वारों वाले किले के भीतर सप्तपुरी में बैठी भगवती को जाग्रत् कर पृथ्वी आदि स्थल तत्त्वों से बने महिषासुर मन को मारकर उसे ज्योति रूप प्रदान करना किसी भी महाभारत प्रारंभ में ही बताया गया है कि यह चेतन ऊर्जा निर्बलों निर्जीवों को नहीं बलवानों पुरुषार्थियों को मिलती है अब जब राष्ट्र की कुण्डलियों के जागरण का मोर्चा खुल रहा है तो मूर्धन्य महारथियों के दुम दबाने से काम नहीं चलेगा उन्हें चक्रव्यूह वेधन जैसे अभिमन्यु पुरुषार्थ के लिए तत्काल तत्पर होना पड़ेगा अब प्रतीक्षा का समय नहीं रहा। अब तो 21 वीं सदी के लिए मात्र छः वर्ष शेष रहे हैं तब तक तो महामाया का अवतरण हो चुका होना चाहिए। कल्पना की जा सकती है कि इस अवधि में साधना समर की गति को कितना तीव्र करना पड़ेगा

अपना अलग आचरण

राष्ट्र कुण्डलिनी के जागरण के लिए षट्चक्रवेधन का कार्य अब तत्काल अप्रैल के प्रथम सप्ताह से ही प्रारम्भ होने जा रही है अपने खेत को तो नहर की छोटी नाली से या अपने ट्यूबवैल से खींचा जा सकता है पर समूचे पृथ्वी को पानी देने का कार्य तो बादलों की वर्षा से संभव है पर उन बादलों को गाँवों गाँवों घर घर तक पहुँचाने वाला दूत तो पवनदेव पवनपुत्र ही बन सकते हैं।

कुण्डलिनी जागरण अर्थात् राष्ट्र के कण कण को जन जन को दिव्य ऊर्जा से भर देना जहाँ हम पहुँच सकें सभी जगहों पर प्राणों की प्रचंड मंथन प्रक्रिया चलानी होगी यही लड़ते है कायर नहीं। अतएव अब वीरों की कसौटी का समय है वे अपने अंदर सोयी भवानी को जगाएँ संवाहक बनने का गौरव प्राप्ति करें यह कार्य आगे दर्शायें गये छः द्वारों पुरुषार्थ दिखाने से सिद्ध होगा। परिजन उसके लिए किस तरह आगे आते है?

यह परीक्षा की घड़ी सामने है।

प्रथम चक्र : ग्राम ग्राम गायत्री उपासना

इस समय देश के छः हजार से अधिक गायत्री परिवार की शाखाएँ 14 हजार स्वाध्याय मंडल 24 हजार प्रज्ञा एवं महिला मंडल 4 हजार प्रज्ञा संस्थान जन-जन को गायत्री महाशक्ति का संदेश दे रहें है। यह कुल मिलाकर 50 हजार स्थान भी नहीं होते है जबकि सारे देश में गाँवों की संख्या ही 7 लाख से अधिक है विराट् जनसंख्या वाले नगर तो उससे अतिरिक्त है जब तक इन गाँवों नगरों में युग शक्ति संचरित न हो तब तक राष्ट्र कुण्डलिनी के जागरण का अर्थ क्या हुआ?

परम पूज्य गुरुदेव ने बहुत पहले यह कार्यक्रम बनाया था कि उन गाँवों में पहुँचा जाए जहाँ अब तक न कही कोई गायत्री परिवार है न प्रज्ञा संस्थान है उसके लिए समूचे देश के प्रत्येक जिले के लिए टोलियों बनाकर भेजी जाएँ दो-दो टोलियाँ एक साथ चले। एक टोली आगे आगे नितांत अपरिचित क्षेत्रों में डेढ़ दिवसीय संस्कार विस्तार कार्यक्रम निश्चित करती चले दूसरी टोली उसके पीछे पीछे चले। वह एक या पाँच कुण्डीय गायत्री यज्ञ करे गायत्री उपासना पर प्रवचन करे और विचार गोष्ठी करके वहाँ एक प्रज्ञा मंडल की स्थापना करके आगे बढ़ जाएँ।

यह टोलियाँ यज्ञ आदि का सारा सामान साथ लेकर चलेगी। यह कार्यक्रम अप्रैल से ही सघन रूप से प्रारंभ हो जायेंगे इसलिए प्रतिक्रियाएँ अपनी ओर से माँग इस मार्च महीने से ही आ जानी चाहिए अभी तत्काल कार्यक्रमों के स्थल चयन अनिवार्य नहीं है यह तो उसी समय साथ साथ होता चलेगा कहाँ वर्षा पहले पवन (प्रज्ञा) पुत्र केन्द्र के परामर्श से स्वयं करते रहेंगे।

द्वितीय चक्र : प्रज्ञा मंडलों की प्रतिष्ठा

शक्तिपीठों का तंत्र बनाने के लिये पूज्य गुरुदेव के निर्देशों का उल्लंघन होने से जहाँ जहाँ अपरिपक्व या अप्रामाणिक व्यक्तियों के हाथों उनका तंत्र चला गया, इसलिए ढेरों स्थानों पर पदप्रतिष्ठा की आपाधापी के झगड़े चल पड़े जबकि इस देश और जातीय जीवन को केवल सेवाभावी मरजीवडे ही संवार सकते हैं गाँवों में जो पौधे रोपा जाय उसको खाद पानी देकर अभिषिंचति करते रहने के लिए जो संगठन स्थापित हो उसमें उत्तरदायी व्यक्ति भले ही कम पढ़ें हो पर सच्चरित्र ईमानदार और उसके लिए से निस्पृह व्यक्ति का चयन हो उठाने की आकांक्षा रखते हो जहाँ ऐसे प्रज्ञा मंडलों की स्थापना हुई वहाँ भगवती गायत्री जन्म जन्मान्तरों के लिए प्रतिष्ठित हुई समझाना चाहिए।

तृतीय चक्र- यज्ञीय पराक्रम का विस्तार

माँ गायत्री का पयपान करने वाले साधक स्वार्थ से ऊपर उठकर यज्ञीय पुरुषार्थ करने में समर्थ हो जाने चाहिए। इन प्रज्ञा मंडलों को प्रारंभ में व्यक्तिगत उपासना के लिए सघन संपर्क गायत्री साहित्य का पठन पाठन साप्ताहिक या मासिक गायत्री यज्ञों और उसी के साथ साथ संस्कारों का प्रचलन दोनों नवरात्रियों एवं प्रमुख पर्वों पर सामूहिक जप और सामूहिक यज्ञ तथा बन पड़े तो कुछ अन्य रचनात्मक न्यूनतम घरों में तुलसी की स्थापना जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करना चाहिए।

चतुर्थ चक्र : समयदान

महाकाल का प्रमुख अनुदान और बल काल अर्थात् समय है उसके कार्य तभी संभव होंगे जब बड़ी संख्या में समयदान मिले। संक्षिप्त हवन कर लेने और गायत्री उपासना पर प्रकाश डाल सकने वाले मुख व्यक्तियों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे इसे युगधर्म आपर्द्धम समझकर न्यूनतम दो माह अधिकतम जितना संभव हो समय दे। उन्हें एक एक सप्ताह का प्रशिक्षण देकर इन कार्यक्रमों में भेजने की व्यवस्था की जा रही है। जिनकी भावनाएँ पूरी तरह मर चुकी है। उनसे तो कुछ कहना व्यर्थ है पर अपनी देवसंस्कृति के लिए जिनके मन में रत्ती भर भी अनुराग हो वे तत्काल शान्तिकुञ्ज पत्र लिखकर यथासंभव यहाँ पहुँचने की तैयारी करें। कम समय दे सकने वाले हो। महाकाल के प्रति आस्थावान् कोई भी व्यक्ति सार्थक समयदान से वंचित रहने का कलंक स्वीकार न करें।

पंचम चक्र : साधनदान

समयदान को अधिक प्रभावी बनाने के लिए श्रद्धायुक्त साधनों की आवश्यकता पड़ती है क्षेत्र में शक्ति मंथन के लिए निकलने वाले सृजन सैनिकों के लिए साज सामान की व्यवस्था के साथ अपने वाहन भी चाहिए। जिनके पास जीप कार मोटर साइकिल थ्रीव्हीलर जैसी छोटी या टाटा 407 टैम्पों ट्रैक्टर जैसी बड़ी गाड़ियाँ है वे तत्काल गाड़ियों का साधनदान दे। ड्राइवर तो उन्हें देना चाहिए। श्रीमंतों से उस अवधि का पूरा पेट्रोल खर्च अथवा आँशिक जो भी संभव हो खर्च उठा लेने का भी अनुरोध है वह न बन पड़े तो भी वे लोग श्रद्धा प्रेरित होकर गाड़ियाँ तो दे ही सकते है भले ही उन्हें समय पड़ने पर व्यक्तिगत उपयोग के लिए पब्लिक वाहनों का उपयोग करना पड़े

एक बार पहले भी अपने परिजनों ने इस माँग को उदारता पूर्वक वहन पूरा किया है। युग संधि महापुरश्चरण की इस प्रथम पूर्णाहुति को तो परम पुण्य मानकर उन्हें गाड़ियों का साधनदान देना ही चाहिए। उनकी गाड़ी उसी क्षेत्र में चलायी जाएगी और साधनदान की अवधि पूर्ण होने पर वहीं लौटा दी जाएगी। विनम्र अनुरोध है कि टूटी फूटी जर्जर गाड़ियाँ न दे। कार्यक्रम शृंखला के बीच कोई बड़ी मरम्मत करानी पड़े तो कार्यक्रम भी प्रभावित होते है तथा अनाप शनाप धन भी खर्च करना पड़ता हैं।

जो गाड़ियाँ नहीं दे सकते वे अनुदान लेकर दे या स्वयं दे तथा एक नियमित अंशदान देकर भी इस भागीरथ पुरुषार्थ को अपनी अभिव्यक्त आहुति प्रदान करें।

षष्ठ चक्र : विचार क्राँति तीव्रतर बनाना

जो परिजन इन कार्यक्रमों में किसी भी तरह भाग न ले सकें आयोजन की पूर्णाहुति तक प्रतिदिन वे अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना युग शक्ति गायत्री के सदस्य बनाने का प्रयास करे। गायत्री साहित्य साहित्य घर घर जाकर लोगों को पढ़ाने का कार्य करे। अपने अपने क्षेत्रों में गायत्री उपासना के विस्तार का क्रम अपनाएँ। भावनाओं व विचारणाओं के परिष्कार के क्रम में तत्परता से जुटे रहे।

यह छः सूत्र छः चक्रों के समान है। इनका जितना प्रखर वेधन होगा राष्ट्र की कुण्डलिनी शक्ति का जागरण और प्रबलता उतने ही द्रुतगति से उभरेगी। परम पूज्य गुरुदेव वंदनीय माता जी के चरणों में समर्पित होने वाली इस श्रद्धांजलि से कोई न चूके कोई भी वंचित न रहें। महाभारत में जीत तो अवश्यम्भावी है ही।

*समाप्त*