मोक्ष क्या है? मुक्ति क्या है? यह प्रश्न हर भारतीय संस्कृति के पक्षधर मानव के मन में सहज ही उठता रहा है, सदा से ही, उसके पृथ्वी पर आविर्भाव के काल से। कई व्यक्ति यह समझते हैं, मोक्ष मरने के बाद-शरीर रूपी बंधन के छूटने के बाद ही मिलता है। इसके लिए वे दान पुण्य आदि अनेकानेक कृत्य करते भी देखे जाते हैं। किन्तु क्या वास्तविक मोक्ष इससे मिल जाता है? ऋषियों की दृष्टि से देखें तो यह एक ऐसी विधा है जिसका अंतर्चक्षुओं से साक्षात्कार कर समझना होगा।
ऋषि मनीषा कहती है कि जो मोह का क्षय करे वही मोक्ष है। यह संदेह भी जीवन मुक्ति स्थिति में किसी को भी प्रयास करने पर मिल सकता है। मोक्ष वस्तुतः जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा का नाम है। वासना-तृष्णा-अहंता रूपी त्रिविध बंधनों पर मुक्ति प्राप्त कर आत्मतत्व की ओर उन्मुख होने का पुरुषार्थ ही मोक्ष है। इस मोक्ष देने वाले ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है, किन्तु लक्ष्य सभी का एक है- जीव को बंधनों से मुक्त करना। वस्तुतः मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरुषार्थ, जिसे निर्वाण मुक्त या अपवर्ग कुछ भी नाम दे दें, के लिए कर्म कर व परमतत्व की प्राप्ति हेतु इस सुयोग को सार्थक बनायें। मोक्ष प्राप्ति हेतु किए जाने वाले इस कर्म को यदि जीवन जीने की कला कहा जाए तो अत्युक्ति नहीं कहना चाहिए।
गीता में योगेश्वर कृष्ण, इस कला का जिसमें बन्धनमुक्ति या मोक्ष प्राप्ति का संदेश दिया गया है, बड़ा ही सुन्दर शिक्षण धनंजय को देते है। मोक्ष को गीताकार जीवन के एक सकारात्मक पक्ष के रूप में लेता है। कर्म करते हुए व उन्हें मन से परम सत्ता को अर्पण करते हुए यदि कोई पुरुषार्थ करता है (मयि संन्यस्य मतरः) तो वह मोक्ष इस जीवन में ही पा लेता है। कर्म करते हुए व्यक्ति को अनेकानेक बंधनों को काटना पड़ता है जिनमें लोभ प्रधान, मोह प्रधान व अहं प्रधान ये तीन प्रमुख हैं। बंधन सदा दुष्प्रवृत्तियों के ही होते हैं। इनसे छुटकारा पा लेना, ज्ञान द्वारा भवबंधनों से मुक्ति पा लेना ही मोक्ष है। यदि यह दूरदर्शिता हमारे अंदर जाग जाए तो मोक्ष का तत्त्वज्ञान समझते हुए हम जीवन को सफलता की चरमसीमा तक पहुँचा सकते हैं। यह मार्ग ऋतम्भरा प्रज्ञा के आश्रय के रूप में प्रत्येक के लिए खुला है।
मनुष्य का शारीरिक और मानसिक अभ्यास जैसा होगा उसी के अनुसार उसके बाह्य जीवन निर्माण होता है। दूसरों के अहित का विचार करने, वाले दूसरों के लिए बुरे, हानिकारक दुष्कृत्य करने वाले व्यक्तियों के जीवन में इन्हीं तत्वों की प्रधानता हो जाती है। उनका स्वयं का जीवन भी बुराई, अहित एवं हानि की भावना से प्रभावित होता चला जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तत्व है।
सेवा का आधार जितना स्वार्थमुक्त होगा, वास्तव में दूसरों के परमार्थ का, त्याग का होगा, उतना ही बड़ा सुपरिणाम भी मनुष्य को प्राप्त होगा। किन्तु सेवा को ढोंग बना देने पर परमार्थ नहीं, दूसरों के साथ धोखा देही, छल कपट, चालाकी और स्वार्थ साधन मात्र बनकर रह जाती है। बाहर से ऐसी सेवा का आडम्बर कितना भी बड़ा क्यों न हो, कर्ता को उसका रत्ती भर भी वास्तविक सुपरिणाम नहीं मिल सकता। लोगों से प्रशंसा प्राप्त करने या कुछ कमाई कर लेने मात्र तक ही ऐसे सेवा आडम्बरों का लाभ सीमित रह जाता है।
सेवा के लिए कोई स्थूल नियम नहीं बनायें जा सकते। दूसरों के लिए कोई उपयोगी काम करके, उससे प्रेम करने के अभ्यास को बढ़ाया जा सकता है। दूसरों की सेवा करके अपने सद्भावों को विकसित किया जा सकता है। दूसरों के दुःख दर्द को अपना ही दुःख दर्द मानकर उसको दूर करने के लिए पूरा-पूरा प्रयत्न करना, अभावग्रस्तों की अभावपूर्ति में योग देना, दूसरों के दुख सुनना उनकी उन्नति कल्याण में योग देना, दूसरों की हर तरह की सेवा करने के लिए एक सेवक की तरह तैयार रहना, आत्म सुधार के लिए आवश्यक है। जो दूसरों के लिए जितना अपने आप को भुला देगा, वह उतना ही आत्मसुधार के क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकेगा। इस तरह की सेवा से सच्चे प्रेम का उदय होता है। यह मनुष्य के सब कलंकों को धो देता है। अंतर्बाह्य जीवन को निर्मल बना देता है। सेवा के साथ संतोष की वृद्धि हमेशा बनी रहती है।
सेवा जितनी बने उतनी करते हुए स्वयं अपनी सेवा की क्षमताओं का विकास करते रहना आवश्यक है। क्षमताओं के अभाव में सेवा का परिणाम और प्रतिफल स्वल्प ही रहेगा। जितनी व्यापक सेवा होगी उसके लिए उतनी ही व्यापक क्षमता और शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी। सेवा से सम्बन्धित अपनी क्षमताओं का विकास करना भी सेवा का ही एक अंग है। हम चाहते हैं कि गरीबों को भोजन वस्त्र दें किन्तु हमारे पास देने को होगा तभी तो हम कर सकते हैं। हम चाहते हैं कि देश को उन्नति, विकास, कल्याण की दिशा में आगे बढ़ायें, किन्तु तत्सम्बन्धित क्षमताओं पर ही तो इसकी पूर्ति निर्भर है। हम चाहते हैं अधिकाधिक लोगों को सद्ज्ञान देकर जीवन लाभ करायें, किन्तु पहले हमारे पास ज्ञान की कमाई पूँजी का होना भी तो आवश्यक है।
सेवा, परिणाम और फल का ध्येय रखना सेवक के लिए आवश्यक नहीं उसके लिए प्रयत्न करने का आनन्द ही पर्याप्त है। परिणाम और फल की आसक्ति सेवा के आनन्द और स्वरूप को नष्ट कर देती है। फिर तो वह अन्य सांसारिक कार्यों की तरह व्यवसाय बन जाती है।
संवेदनशीलता का जागरण ही दूसरों की सेवा-सहायता-सहानुभूति का मूल आधार है। यह गुण जिसमें जितना होगा, वह उतना ही दूसरों की सेवा करने का अधिकारी बनता चला जाता है। सत् तत्व की स्थापना और हृदय की शुद्धि से ही संवेदनशीलता का जन्म होता है। अतः सेवक को प्रारंभ में अपने हृदय शुद्धि और स्वयं सत् तत्व की स्थापना के लिए प्रयत्न करना आवश्यक मानना चाहिए।
दयावान, सहानुभूतिशील और संवेदनशील होना हर लोकसेवी के लिए आवश्यक है। संवेदनशीलता का अर्थ यह भी नहीं कि कोई दुःख से रो रहा हो तो उसके पास बैठकर हम भी रोने लग जाएँ। इससे क्या लाभ? आवश्यकता तो रचनात्मक संवेदनशीलता की है, जो रोने वालों को हँसा सके, गिरे हुए को उठा सके। इसी का विकास करने के लिए संसार रूपी कर्म क्षेत्र बना हुआ है। हमें याद रखना चाहिए कि परमार्थ किए बिना कभी स्वार्थ सधता नहीं। यदि हम अपनी प्रगति चाहते हैं तो हमें औरों की सेवा सहायता के निमित्त समाज ऋण को चुकाने के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए। यही मानव धर्म है।
बाल बुद्धि लोग अति उतावले होते हैं। वे इस हाथ में काम लेते ही उस हाथ प्रतिफल चाहते हैं। श्रद्धावानों में जिस धैर्य और संकल्प की गंभीरता होनी चाहिए उसके अभाव में कोई महत्वपूर्ण काम नहीं बन पड़ते। एम. ए. पास करने के लिए 17 वर्ष चाहिए। पहलवान बनने के लिए वर्षों अखाड़ा गोड़ना पड़ता है। साहित्यकार, संगीतकार, अभिनेता और चित्रकार आदि बनने के लिए वर्षों निरंतर अभ्यास करना पड़ता है। वट-पीपल के वृक्ष परिपुष्ट होने में वर्षों का समय ले जाते हैं। हथेली पर सरसों बाजीगर जमाते हैं। झोले से निकालकर वे ही फल लगा हुआ आम का पौधा दिखा देते हैं, पर इन चमत्कारों में चालाकी भर होती है। यदि इतनी जल्दी इन कामों को कर सकना संभव होता तो वे कुछ ही वर्षों में धनकुबेर बन गये होते। जल्दी में सिद्धियाँ नहीं मिल सकतीं, बाजीगर से हाथ की चालाकी ही सीखी जा सकती है।
किसान को गेहूँ की फसल काट कोठी भरने में एक साल लगता है। किले और महल बनने में वर्षों लग जाते हैं। छोटे बच्चों को जवान बनने में 25 वर्ष चाहिए। किसी को बहुत उतावली हो तो, चार आने में बिकने बाली नकली मूँछ लगाकर किसी बच्चे को जवान बनाया और दर्शकों को हँसाया जा सकता है।
पार्वती जब शिव से विवाह करने को तपस्या करने लगीं, तो उनकी श्रद्धा परखने के लिए ऋषियों का समुदाय गया और कहा-शिव ने हजार वर्ष की समाधि लगा ली है। तुम उनसे विवाह का विचार छोड़ो और किसी अन्य देवता और राजा से विवाह कर लो, तब पार्वती ने स्पष्ट उत्तर दिया था।
ऋषिगण श्रद्धा की गंभीरता देखकर विवश हो गये और शिव को विवाह करने के लिए विवश होना पड़ा। अनेक साधक ऐसे ही उतावले होते हैं, वे थोड़े बहुत दिनों उलटे सीधे जंत्र-मंत्रों की हेराफेरी करके सिद्ध पुरुष बनना चाहते हैं और कुछ हाथ न लगने पर पूरे साधना विज्ञान को ही कोसने लगते हैं। भविष्य के लिए तो वे श्रद्धा विश्वास ही गवाँ बैठते है। ऐसे लोग यदि उतावली न करें, अधिक कोई साधन न करे, तो भी कम-से-कम आशा तो बनी रहेगी। उतावली में वह भी चली जाती है। गायक वादक अभिनेता अपना अभ्यास नित्य जारी रखते हैं। पहलवानों और सैनिकों को भी नियमित अभ्यास का आश्रय लेना पड़ता है। मनमौजी ढंग से कभी करना, कभी न करना ऐसे प्रयोग कौतूहल सफलता एवं सुदृढ़ता के लक्ष्य तक पहुँचते देखे नहीं गये। बच्चे बालू का महल बना लेते हैं और टहनियाँ जमीन पर गाड़कर बगीचा लगाने की खुशी मना लेते है, पर जिन्हें उद्यान विज्ञान का ज्ञान है वे समझते हैं कि मजबूत पेड़ों की जड़ें जमीन में लगाई जाती है वहाँ से रस चूसकर लाती है और तने से लेकर टहनी तक को मजबूत बनाते हुए उसे फल फूलों से लादती है।
यह कार्य जो कर लेते हैं उनके आम, जामुन, लीची, कटहल मुद्दतों फलते फूलते हैं। मौसमी पौधे तो एक महीने फूल देकर सूख जाते हैं। 'साधना से सिद्धि' प्राप्त करने के लिए अनवरत प्रयास की आवश्यकता पड़ती है। जिन्हें बहुत जल्दी हो, उनके लिए विज्ञजनों का एक ही परामर्श है कि वे इस झंझट से दूर रहें।
जीवित रहने के लिए हमें रोज भोजन करना पड़ता है और नित्य ही मल मूत्र त्यागने की, स्नान करने की, कपड़े धोने, बर्तन मलने, झाडू लगाने की आवश्यकता पड़ती है। हमारे ऊपर भी भीतरी कषाय-कल्मषों का और बाहरी प्रथा-प्रचलनों का प्रभाव पड़ता रहता है। इसके निष्कासन के लिए भी साधना करनी पड़ती है और आत्मिक बल वर्धन के लिए क्षुधा बुझाने वाले सुपाच्य आहार की व्यवस्था करनी पड़ती है। यह नित्य कर्म है। नित्य ही नहीं, अनवरत भी। साँस लेकर शरीर के भीतर ऑक्सीजन पहुँचाई जाती है और साँस छोड़ने के साथ शरीर में उत्पन्न विषाक्तता को निकाल बाहर किया जाता है। यह अपने स्वास्थ्य को सही बनाने के लिए किया जाने वाला आवश्यक कृत्य है। साँस लेना किसी पर अहसान करना नहीं है और न ही उसके बदले हुण्डी भुनाई जाती है। श्वासोच्छवास वह कर्तव्य है, जिसे जीवन धारण करने के लिए करना ही चाहिए। यह किसी देवी देवता पर अहसान करना नहीं है कि उसकी छुट-पुट पूजा-पत्री की चिन्ह-पूजा करके लम्बे-चौड़े वरदानों की आशा, अपेक्षा की जाए।
सिद्धियाँ बाहर से नहीं आती, भीतर से उगती हैं। जड़े जमीन से रस खींचकर, पेड़ को पुष्ट करती हैं भले ही वे जमीन के भीतर रहने के कारण दृष्टिगोचर न हो। फूल और फल उन्हीं की प्रतिक्रिया है। यह सोचना गलत है कि इन्द्र देवता आकाश से विमान पर आते हैं और पेड़ों के ऊपर फल-फूलों की वर्षा करते हुए चिपका जाते हैं। देवता अनुग्रह अकारण नहीं करते हैं। उसके भी कुछ सिद्धान्त हैं, पेड़ अपनी चुम्बकीय शक्ति से बादलों को जमीन पर खींच बुलाते हैं और बरसाने के लिए मजबूर करते हैं। जिस क्षेत्र में पेड़ नहीं होते, वहाँ आकर्षण के अभाव में बादल ऊपर होकर उड़ जाते हैं, बरसते नहीं। हरीतिमा रहित क्षेत्र रेगिस्तान बनते चले जाते हैं। चुम्बक अपने सहधर्मी लौह कणों को रेत में से दूर से घसीट लाता है और खदानों की आकर्षण शक्ति अपने सजातीय कणों की वृद्धि के कारण निरन्तर बड़ी और भारी होती जाती है। साधना के माध्यम से, हम अपने व्यक्तित्व को विकसित एवं परिष्कृत करते हैं, फलस्वरूप अन्तः क्षेत्र की प्रसुप्त गरिमा ऋद्धि सिद्धि बनकर प्रकट होती है। ऐसे ही पराक्रमी लोगों पर देवताओं की अनुकम्पा बरसती है।
धुले कपड़े पर ही रंग चढ़ता है, मैले कुचैले तेल तारकोल में डूबे हुए कपड़े पर कितना भी रंग चढ़ाया जाय, वह चढ़ेगा ही नहीं। बिना जोती ज़मीन में बीज बो देने पर वह उगेगा ही नहीं। रोग मात्र औषधि सेवन से ही नहीं चला जाता, वरन् साथ ही आहार विहार का पथ्य भी सही रखना पड़ता है। केवल मंत्र-तंत्र के क्रियाकृत्य कर लेने पर जो बड़े-बड़े चमत्कारों की आशा करते हैं, वे भूल करते हैं। साधकों को आत्मशोधन की शर्त भी पूरी करनी चाहिए।
देवता इतने दीन-दरिद्र नहीं है, कि उन्हें थोड़ा-सा भोग-प्रसाद चढ़ाकर छोटे बच्चों की तरह फुसलाया जा सके। वे व्यापक हैं। उन्हें दिन में सूर्य का और रात्रि में चन्द्रमा का प्रकाश उपलब्ध है। पुष्प भी वे उद्यानों से चाहे, जितने चाहे जैसे सूँघ सकते हैं। उनकी प्रशंसा उड़ती हुई पवन और खिलती हुई धूप करती है। कोई उनकी स्तुति न करें तो, उनका कुछ बनता-बिगड़ता नहीं जो। निन्दा-स्तुति से ऊपर है, वही देवता हैं। पूजा-उपचार हमें आत्मशोधन क्यों करना चाहिए? इसका स्मरण करने के लिए कराए जाते हैं। पुष्प जैसा जीवन खिले और देवता के चरणों में समर्पित हो चंदन की तरह हम समीप में उगे हुए झाड़-झंखाड़ों को भी सुगंधित बनायें। दीपक की तरह स्वयं जल कर प्रकाश फैलाये। मीठे नैवेद्य की तरह हमारे वचन और व्यवहार मधुरता से भरे-पुरे हो। यह शिक्षण उपचार माध्यमों से अपने आप को ही देना पड़ता है। तनिक से अक्षतों से गणेश जी के चूहे का भी पेट नहीं भर सकता, फिर देवता पर अक्षत किस लिए चढ़ाए जाएँ। इसका उद्देश्य इतना है कि हम अपनी कमाई का, श्रम समय का, एक अंश नियमित रूप से देव प्रयोजनों के लिए, परमार्थ के लिए लगाते रहें।यदि पूजा-उपचार के माध्यम से आत्मशिक्षण की बात भुला दी जाय और देवता को फुसलाने का प्रयत्न करें, तो यह मछलीमार, चिड़ीमार जैसी विडम्बना होगी, जो तनिक-सा लालच दिखाकर उन्हें पकड़ लेते हैं। देवताओं को इस प्रकार वशवर्ती बनाने की आशा किसी को भी नहीं कहनी चाहिए। हमें पूजा उपचार का मर्म समझना चाहिए। भ्रम जंजाल में भटकने की अपेक्षा यही अच्छा है कि हम जो भी काम करें, समझ कर करें, उसके मर्म को आत्मसात् करें। थोड़ी-सी पूजा करके, टोकरी भर गाली देने का झंझट ना पालें।
साधना क्षेत्र में आज जो असफलताएँ देखी जाती है, उपासना फलीभूत नहीं होती, उसका मूल कारण यही है कि उतावलापन बरता गया। बहिरंग कर्मकाण्ड को ही सबकुछ समझ कर उसी से सब कुछ प्राप्त कर लेने-सिद्ध पुरुष बन जाने की, शेखचिल्ली जैसी कल्पना कर ली गयी। निरन्तरता, गहन श्रद्धा एवं सतत् अभ्यास द्वारा जब साधना उपक्रमों के मर्म को समझते हुए उन्हें जीवन में उतारा जाता है तो वह सिद्धियों को फलीभूत करता चला जाता है। यह उस हर सफल व्यक्ति का इतिहास है जिसने जीवन समर में आतुरता, तुरन्त सफलता मिलने की जल्दबाजी न दिखाकर, धैर्य व निष्ठापूर्वक साधना की है, आत्मशोधन किया है वह अपने को निखार कर गुणों की खेती आत्मसत्ता रूपी खेत पर की है। गीताकार ने ऐसे ही व्यक्ति को 'क्षेत्रज्ञ' कहा है व उसी को सफलता सदैव मिलेगी, यह भी बताया है।
हमारी उपासना उस स्तर की हो जैसा की रामकृष्ण नामक पुजारी की थी जो काली की उपासना कर उनसे चर्चा कर उनके हाथों भोजन पाकर परमहंस पद को प्राप्त कर गया। हमारी लगन परमसत्ता के प्रति मीरा के स्तर की हो जो बिना कोई कर्मकाण्ड या मंत्र के श्रीकृष्ण की दीवानी बनकर उन्हीं में समाकर उनका प्रतिरूप बन गई। यही तत्त्वज्ञान पूजा अवधि में अतः करण में से स्वयं ही उद्भूत होता रहे व लगता रहे कि महाप्रज्ञा-आद्यशक्ति अन्तरात्मा में बैठकर हमें अंतर्जगत् व ब्राह्मीसत्ता सत्यों और तथ्यों से अनायास ही परिचित करा रही है, तो उपासना सफल होती चली जाती है। ऐसी साधना से परमसत्ता का प्यार भरा यथार्थवादी शिक्षण अनायास ही अमृतपान की तरह उपलब्ध होता चला जाता है। यही साधना से सिद्धि का मूलभूत तत्त्वदर्शन है। इसी को समझकर इस क्षेत्र में उतरा जाना चाहिए।
बात तब की है जब रूस पर आक्रमण कर नेपोलियन की सेनाएँ तबाही मचा रही थीं। उन दिनों रूसी सेना की कमान जनरल कान्ट टोरस्काफ सँभाले हुए थे। इस मध्य एक दिन जनरल की पत्नी को पूर्वाभास हुआ कि वह किसी सराय के एक कमरे में बैठी हुई है। अचानक कमरे में एक बूढ़ा व्यक्ति प्रवेश करता है। वह पहचान जाती है कि यह उसका पिता है। कुछ क्षण पश्चात् पिता का स्वर उभरता है- "लो, अपने पुत्र को संभालो। अब इसे तुम्हें ही पालना होगा। जनरल टोरस्काफ स्वर्ग सिधार चुके हैं, फ्राँसीसी सेनाओं ने बोरोडिनो में उनका वध कर डाला है।
पूर्वाभास जब कई-कई बार हुआ, तो पत्नी ने टोरस्काफ को इसकी सूचना दी। पहले तो इस पर उसने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। बाद में उसके मस्तिष्क में ये विचार कौंधा कि क्यों न नक्शे में इस स्थान को खोजा और देखा जाय कि आखिर यह है कहाँ? पति पत्नी ने उस क्षेत्र का मानचित्र पलट डाला, पर उक्त स्थान कहीं नहीं मिला।
दिन बीतने लगे, दोनों के मस्तिष्क से वह घटना विस्मृत हो गई। उधर लड़ाई भीषण होती जा रही थी। इसी मध्य 7 सितम्बर 1892 को मास्को के निकट फ्रांसीसी सेनाओं को जबरदस्त मुँह की खानी पड़ी। उसमें दोनों पक्षों के काफी सैनिक मारे गये। रूसी सेना का नेतृत्व टोरस्काफ कर रहे थे। उनकी पत्नी तब तक निकटवर्ती सराय में रह रहीं थी। जब वे कमरे में अकेली थीं, तभी उसके पिता जंगल से पुत्र की कलाई थामे आए और उसे सौंपते हुए पुत्री से कहा- 'जनरल अब इस संसार में नहीं रहे, बोरोडिनो के युद्ध में मारे गये अब संतान की देख-भाल तुम्हें ही करनी पड़ेगी। लो इसे संभालो।'
पूर्वाभास को यथार्थ में परिवर्तित होते देख, टोरस्काफ की पत्नी स्तम्भित रह गई। मरणस्थल भी ठीक वही था, जो दोनों को मानचित्र में कही नहीं मिला था।
यह प्रसंग पूर्वाभास का है, जिसमें घटनायें यदा-कदा समय से पूर्व ही प्रतिभासित हो जाती हैं, और वास्तविकता की इतनी सच्ची जानकारी दे जाती हैं जिसे देखकर आश्चर्य होता है। प्रारम्भ से ही वैज्ञानिकों के लिए यह कौतूहल का विषय रहा है, कि भौतिक घटनाक्रम मानसिक धरातल पर किस तरह उतर आते हैं और समय से पहले उनका प्रकाशन कैसे होता है? इस पर लम्बे काल से शोध-अनुसंधान होते रहे हैं। उनसे प्राप्त तथ्यों से सुनिश्चित हो गया कि घटनायें जब घटती हैं, तो वे उनकी प्रथम अभिव्यक्ति नहीं होती। इसे प्रत्यक्षीकरण कह सकते हैं, पर वास्तविक प्रकटीकरण तो काफी समय पूर्व हो जाता है। यह सत्य है तब वह अगोचर स्तर का अव्यक्त और अप्रत्यक्ष बना रहता है, किन्तु घटनाक्रम का गर्भाधान तभी हो जाता है, ऐसा विशेषज्ञों का मत है। जिस प्रकार बीजवपन के साथ ही वह वृक्ष नहीं बन जाता, दूध को जमकर दही बनने, और कर्म के फल के रूप में आवश्यकतानुसार छोटा-लम्बा समय लगता है, ठीक उसी प्रकार घटनाक्रमों की वास्तविक सत्ता कि शुरुआत उसके इन्द्रियगोचर बनने से काफी समय पूर्व हो जाती है। इसे अब विज्ञानवेत्ता भी भली-भाँति स्वीकारने लगे हैं। उनका तर्क है कि यदि ऐसा नहीं होता तो, समय से पहले उनका आभास होना सम्भव नहीं होता। दूसरे शब्दों में कहें, तो हर व्यक्ति वस्तु और घटना की अपनी एक सूक्ष्म अनुकृति होती है। मानसिक धरातल पर यदा-कदा सत्ताएँ अवतरित होकर समय से पूर्व उनकी जानकारी देती हैं- इसे स्वीकारने में वैज्ञानिकों को अब कोई आपत्ति नहीं रही।
उपलब्ध तथ्यों से यह भी विदित हुआ है कि कोई भी घटना तरंग के रूप में घटित होती है। उसे प्रयास पूर्वक मानसिक स्तर पर ग्रहण किया जा सकता है अथवा मानसिक बिम्ब के रूप में उक्त घटना को एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक संचारित संप्रेषित किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को पकड़ा और इसी पृष्ठभूमि पर अनुसंधान को आगे बढ़ाया। उन्होंने देखा कि दिमाग जब अधिक शान्त और अनावश्यक कल्पनाओं से मुक्त जैसी स्थित में रहता है, तो संप्रेषण कि क्रिया अधिक सरल और सफल होती है, सक्रियता कि स्थिति में वह मंद हो जाती है। इसे देखते हुए शोधकर्मी विज्ञानवेत्ताओं ने एक प्रयोग किया। उन्होंने दो व्यक्तियों में से एक के सो जाने पर, दूसरे को पहले तक कोई ऐसी सूचना मानसिक स्तर पर भेजने को कहा, जिसकी जानकारी पहले को नहीं थी। व्यक्ति जब प्रगाढ़ निद्रा में था, तो प्रयोग सम्पन्न हुआ। उसे मध्य रात्रि में उठकर अपने अभिन्न मित्र को स्मरण करने के लिए कहा गया। अनेक बार संदेश देने के पश्चात् सम्प्रेषण रोक दिया गया। दूसरे दिन जब इस संदर्भ में उससे पूछ-ताछ की गई तो उसने स्वीकार किया कि मध्यरात्रि में अकस्मात् उसकी नींद खुल गई और न जाने उसे अपने अमुक दोस्त की याद आने लगी।
शोधार्थियों ने इस दौरान यह भी अनुभव किया कि यदि सम्प्रेषण उच्च मानसिक धरातल पर सम्पादित नहीं हुआ हो, तो संदेश अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल नहीं हो पाता। दूसरी ओर सूचना ग्रहण करने वाला भी समान भूमिका में नहीं हुआ तो भी जानकारी अग्राह्य स्तर की बनी रहती है। इसलिए पूर्वाभास अक्सर शान्त मानसिक अवस्था के दौरान होते देखे जाते हैं।
अनेक वर्ष पूर्व रूसी परा मनःशास्त्रियों ने इस संदर्भ में एक अत्यन्त रोचक प्रयोग किया। अलमाअता के अनुसंधानकर्ताओं ने इसके लिए कई ऐसी महिलाओं का चयन किया, जिनके बच्चे 1 से 2 वर्ष के थे। सभी को एक बड़े कमरे में इतनी दूरी पर रखा गया कि उनकी दृष्टि से परे दूरस्थ कमरे में स्थित बच्चों की आवाज भी उनको सुनाई न पड़े। इसके पश्चात् हर बच्चे के शरीर से थोड़ा-थोड़ा रक्त निकाला गया। ऐसा करते समय माताओं पर बड़ी सूक्ष्म दृष्टि रखी गई और उनकी गतिविधियों का गहन अध्ययन किया गया। अध्येता यह देख रह चकित रह गये कि माँ और शिशु एक अदृश्य संपर्क सूत्र से परस्पर जुड़े हुए थे।
जिस भी बच्चे का खून लिया गया उसकी माता एक अजीब बेचैनी अनुभव करने लगी। कई तो उठकर टहलने भी लगीं। जब उनसे इस अनुभव के बारे में पूछा गया तो सब ने इसे स्वीकार किया कि किन्हीं अज्ञात कारणों से इस दौरान परेशानी महसूस करती रहीं। क्या यह परेशानी उनकी संतानों से पृथक कर दिये जाने के कारण थी? सभी ने इसके उत्तर में यही कहा, शायद नहीं।
इजराइल की एक संस्था-साइकिकल रिसर्च सोसाइटी इस विषय में लम्बे काल तक शोध करती रही है।
दीपक जल रहा था। घृत चुकने को आया। लौ क्षीण हो चली। वायु के झोंकों ने देखा अब दीपक पर विजय पाना आसान है तो वे वृन्द-वृन्द मिलकर तेज आक्रमण करने लगे। अन्धकार नीचे दबा पड़ा था-अट्ठहासकर हँसा और बोला-दीपक अब तो तुम्हारा अन्त आ गया अब कुछ ही देर में यहाँ हमारा साम्राज्य होगा।
दीपक मुस्कराया और बोला-बन्धु यह देखना काम विधाता का है, मेरा ध्येय है कि प्रकाश के लिए निरन्तर जलना सो अन्त समय उससे विमुख क्यों होऊँ, यह कह कर वह एक बार इतने वेग से जला कि वहाँ का सम्पूर्ण अंधकार सिमट कर रह गया, भले ही दूसरे क्षण दीपक का अस्तित्व स्वयं भी शेष न रहा हो।
इतना जान लेने के उपरान्त भविष्य के गर्भ में छिपी जानकारियों को करतलगत करने की प्रक्रिया स्पष्ट हो जाती है। इस प्रकार पूर्वाभास वस्तुतः अन्तराल के परिष्कार के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा संयोग है। जो परिमार्जन के इस उपक्रम को जिस अनुपात में अपनाते हैं,उतने ही अंशों में भविष्य-ज्ञान के अधिकारी बनते हैं।
रूठे को मना लेने में ही समझदारी है, रूठता कौन नहीं है कमोबेश सभी रूठते हैं लेकिन जो रूठ जाय उससे खुद भी रूठ बैठें तो जीवन चलाना मुश्किल हो जायेगा। कभी पत्नी से अनबन हो जाती है, कभी बच्चों से कहन–सुनन। कभी भाई से मन चाल हो जाती है कभी पड़ोसी से मन मुटाव बन जाता है। इस स्थिति को ऐसे ही रहने दिया जाय अथवा ऐंठ और कड़ी करते रहा जाय तो, काम नहीं चलेगा। उलझन बढ़ती ही जायेगी, जिनके साथ रहना है उनसे मीठे सम्बन्ध बनाये रहने में ही भलाई है।
ऐसा उपयोगी और सामर्थ्यवान साथी अपने से रूठे रहें यह कदापि उचित नहीं। रूठ जाय तो उसे मना लेना जीवन की सर्व प्रथम और अनिवार्य आवश्यकता है। अन्य काम छोड़कर भी इस काम को करना पड़े तो भी उचित है। मनोवैज्ञानिक वाल्टकर होलिस्टर अपनी पुस्तक 'नो युअर माइन्ड' में लिखते हैं 'यूँ मन आँखों से दिखाई नहीं देता, इसलिए उसका रूठा भी नहीं दिखता है। पर विवेक की आँख से देखें तो रूठा हुआ मन प्रत्यक्ष दिखाई देगा।'
रूठने वाली की पहचान है, साथ न देना, कहना न मानना, सहयोग न करना, नुकसान करना। बच्चा रूठ जाता है तो ऐसा ही उपद्रव करता है। घर का सामान तोड़ता-फोड़ता है और अपने हाथ पैर पीटता है।
मन ने यदि साथ दिया होता तो शरीर की ऐसी दुर्गति न होती, जैसी आज है। उसने काया को स्वस्थ और समर्थ बनायें रखने के लिए संयम बरता होता। लिप्सा के फेर में न पड़ा होता। जीभ को, कामेन्द्रियों को व्यवस्था में रखा होता। आहार विहार की नियमितता बरती होती तो काया-गुलाब के फूल की तरह खिली हुई और गेंद की तरह उछलने वाली रही होती। बीमारी और कमज़ोरी को इस घर में घुसने की हिम्मत ही न पड़ती। मन रूठा बैठा रहा, शरीर को देखा संभाला नहीं, रुग्णता ने घेरा डाल लिया। शरीर टूटा, आत्मा को अशान्ति रही और स्वयं मन भी रुग्ण काया में रहकर टूटे मकान में रहने वाले किरायेदार की तरह उद्विग्न अशान्त बना रहा।
देवत्व के सारे उपकरण अपने भीतर विद्यमान थे। एक उँगली के सहारे यह सारा साज झंकृत हो सकता था। अपने भीतर बैठा ऋषि देवता प्रतीक्षा करता रहा, जरा सा सहारा मिले तो ऊपर उभर कर आए। जीवन संध्या निकट आ गई तो भी हाय रे मन, तेरा सहयोग न मिल सका।
मनोवेत्ता रॉबर्ट शुलर के ग्रन्थ 'सेल्फ लव' की भाषा में कहें तो हमें मन से अपनी दयनीय दुर्दशा का वर्णन करना चाहिए। भगवान का समर्थ पुत्र- सकल साधनों से सम्पन्न इस प्रकार दीन-हीन निन्दति, तिरस्कृत, असफल असहाय फिरे यह कितने दुःख की बात है। यदि मन साथ दे, तो महामानव की गरिमामयी स्थिति में प्रकाश और उल्लास भरा जीवन अब भी जिया जा सकता हैं। यदि उतने में भी परस्पर सहयोग रह सके तो अभी भी उतना अवसर है कि अभिशाप को वरदान में बदला जा सके। वासना आग की तरह है, भोग से यह शान्त होने वाली नहीं। फिर उसके कुचक्र में जितना भी फँसा जाय, उतनी ही क्षमता, आयु, प्रतिभा घटती है। क्षणिक चटोरेपन के पीछे समर्थता की सम्पत्ति को घटाने और दिन-दिन दुर्बल होते जाने से क्या लाभ।
आत्मा रोती बिलखती रही, उसके संतोष उत्थान के लिए एक कदम नहीं बढ़ाया गया। उन्हें सींचने के लिए एक लोटा पानी नहीं डाला जा सका। सद्भाव के बालक अपने पोषण की पुकार करते रहे, उनकी आवश्यकताएँ जुटाने से मुँह मोड़े रहा गया।
शरीर को ठाट-बाट जुटाने में, उसी के ताने बाने बुनता रहा। मन तू खुद भी मरा और अपने मित्र शरीर को भी मारा। यदि तू आत्मा का मित्र बन गया होता और जितना श्रम शरीर के लिए किया गया है उतना आत्मा के लिए करता तो आनंद आ जाता।
भूलें बहुत हो चुकीं। बहुत क्या- यूँ कहना चाहिए कि अब तक का सारा जीवन भूल-भुलैयों में भटकते हुए ही बीत गया। कितने ऊँचे पहुँचे होते, कितने आगे बढ़े होते। खीझ क्षीणता, जलन और पछतावे की सिवाय इस भूल भरे मार्ग पर और मिलना ही क्या था।
'माइन्ड- इट्स मिस्ट्रीज एण्ड कंट्रोल' पुस्तक में सुप्रसिद्ध स्वामी शिवानन्द कहते हैं कि ऐसा चिन्तन मनन हमें नित्य करना चाहिए। इस तरह के मनन को निरन्तर अभ्यास से रूठा मन सहज ही मान जायेगा। फिर तो इसके नित नये चमत्कार समूचे जीवन को अलौकिक बना देंगे।
'मैं परीक्षा करूँगा।' यदि कोई राजा किसी हठ पर उतर जाय तो उसे रोकेगा कौन? मैं मानता हूँ कि बुद्धि सन्मति इनकी प्राप्ति तो सत्संग से हो सकती है, किन्तु यश, ऐश्वर्य व अन्य सद्गुणों के लिए किसी सत्संग कि क्या आवश्यकता?
'सद्गुण तो स्वाभाविक हैं।' महाराज इतनी जल्दी नहीं छोड़ना चाहते थे पंडित जी को। कोई दुःसंग न मिले तो मनुष्य कपटहीन सहज स्वभाव का होगा। बड़े आदमी सभी एक ही व्यसन के व्यसनी होते हैं। वो दूसरों की बात सुनना ही नहीं चाहते।
'मैंने तो जो लिखा है, वही सुनाया।' पंडित जी अब छुट्टी चाहते थे। उनका रामायण सुनने का समय समाप्त हो गया था। आप भी ठीक ही कहते हैं।
'मैं भी ठीक कहता हूँ और लिखा भी ठीक ही है।' महाराज हँस पड़े पंडित जी के भोलेपन पर। 'आप यह बताइये कि परीक्षा कैसे हो।'
'परीक्षा?' 'एक लड़का ढूँढ़ा जाय नवजात। महाराज ने स्वयं समस्या सुलझा दी। सब बड़े-बड़े ज्योतिषी जिसे यशस्वी, धर्मात्मा, ऐश्वर्यशाली, बुद्धिमान बतलावें और जो दीर्घायु तथा निरोग भी हो। यह पता लगा लिया जाय की उसकी माँ ने साल-डेढ़ साल से किसी साधू संत का दर्शन न किया हो, नहीं तो आप कहेंगे कि बालक ने गर्भ में ही सत्संग प्राप्त कर लिया।
'आपसे सुन्दर उपाय भला कौन ढूँढ़ सकता है।' पंडित जी ने समझा कि चलो बला टली। परीक्षा में बारह-चौदह वर्ष तो कम से कम लगने ही हैं और तब तक इस बुड्ढे को भगवान यमराज इस नौकरी से अवश्य अवकाश दे देंगे।
उन्हें नवजात शिशु का अन्वेषण हुआ और शिकार कानन के गहनतम भाग में एक विशाल भवन का निर्माण भी। कारीगरों ने भवन को इस प्रकार बनाया कि वह बाह्य पशु पक्षियों के आक्रमण से सुरक्षित रहे और उसमें रहने वाले को बाहर जाने की आवश्यकता न हो।
भवन के बनते-बनते एक शिशु भी प्राप्त हो गया। वह एक कंगाल माता-पिता के यहाँ उत्पन्न हुआ था और सर्वसम्मति से ज्योतिषी उसमें वो सभी गुण बतलाते थे जो महाराज को अभीष्ट थे।
भवन की दीवारें भर उठी चित्रों से। गौरैया, मैना, कबूतर, कौवे इन्हीं सब के चित्र है। बादल तारे-विद्युत वर्षा और चन्द्र के चित्र भी आप देख सकते हैं। कभी बैठे कभी उड़ते, कभी अण्डा देते और कभी बच्चा देते, अनेक दशाओं के चित्र हैं, बड़े सुन्दर और सजीव हैं।
प्रतिभा थी और उसके लिए कोई दूसरा मार्ग न मिला तो वह पूर्ण हो गई एक ही धारा में। कुमार के पास न ही बोलने का साधन था और न लिखने-पढ़ने का। उसने दीवारों पर लकीरें खींचनी प्रारम्भ कर दी। जो देखता, उसी को अपनी रेखाओं में बाँधना चाहता। धीरे-धीरे टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं ने आकृतियाँ धारण की और मोड़ी आकृतियाँ वास्तविकता में बदलती गयीं।
धाय बड़ी प्रसन्न हुई, जिस दिन कुमार ने उसकी एक तस्वीर कोयले से उज्ज्वल दीवार पर बना दी। अनेक आकृतियाँ बनी फिर उसकी। सबसे अधिक श्रम कुमार ने उसी के चित्रण में किया। वह संकेतों से आनंद जो प्रकट करती थी।
स्वच्छता, संकेत और चित्र निर्माण में उसने अपनी प्रतिभा एवं सुरुचि का पूर्ण परिचय दिया। इतना कुशल कलाकार क्या विश्व की आँखों से छिपा रहेगा? आज या कल सुयश उसके चरण चूमेगा और लक्ष्मी तो प्रतिभा की दासी है। ऐश्वर्य का अभाव तभी होता है सफल कलाकार के समीप, जब उसे कोई व्यसन हो।
पूरे चौदह वर्ष हाँ उतने ही वर्ष जितने मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने वन में बिताए थे, उस कुमार ने भी बिताए उस भवन में। अब उन्होंने निश्चय किया उसे नगर में लाने का। बड़ी धूमधाम से महाराज उसे लेने चले। हाथी, घोड़े, वाद्य, बन्दूकों के धड़ाके कुमार ने प्रथम बार ये सब देखा। एक बार उसे झिझक हुई। भय तो वह जानता न था कि क्या होता है, वह उसकी गोंद में छिप जाना चाहता था। दिन बीते वही राजभवन, वही मध्याह्नोत्तर कथा श्रवण का काल। महाराज के कोई पुत्र नहीं था और उन्होंने सद्गुणी, सुशील प्रतिभाशाली, वनवासी कुमार को दत्तक पुत्र मान लिया। आज तरुण युवराज 'मानस का वही प्रसंग सत्संग के प्रभाव की व्याख्या कर रहा था, जिसे महाराज ने कभी वृद्ध दिवंगत राज पंडित से सुना था। अवश्य ही युवराज की भाषा पंडित से कहीं और परिमार्जित थी और उनका अर्थ कौशल उनकी प्रतिभा के अनुरूप था।
'महाराज क्षमा करें।' युवराज सहसा गंभीर हो गये। उनके नेत्र भर गये। गदगद कंठ हो गया उनका। संभवतः मैंने श्रीमान से कभी निवेदन नहीं किया कि मुझे कौओं से चिढ़ थी और जब मैं उन्हें मारने दौड़ता तो मेरी धाय उन नेत्रों से मेरी ओर देखती जो मेरी क्रूरता पर फटकार की वर्षा करती होती। उसने मुझे लकीरें खींचना सिखाया और प्रारम्भिक चित्र खींचना सिखाया और प्रारम्भिक चित्र उसी की देन थी। मैं गढ़ा गया हूँ व मुझे गढ़ने वाली धाय माँ ही वास्तविक सम्मान की पात्र है।'
शरीर और मन के बीच एक पारस्परिक सम्बन्ध है- यह तथ्य अध्यात्म-विज्ञान के लिए कोई नई बात नहीं है, किन्तु भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में इस सत्य की स्वीकारोक्ति अभी पिछले ही दिनों की जा सकी है। अनुसंधान के दौरान शरीरवेत्ताओं को अनेक ऐसे तत्व उपलब्ध हुए है जिसने इस बात को बल प्रदान किया है कि देह तंत्र को नियमित-नियंत्रित करने वाली सत्ता मन है। उसे यदि साध लिया गया, तो समय-समय पर उपस्थिति होने वाली आन्तरिक प्रणाली की विभिन्न गड़बड़ियों और व्याधियों से बचा जा सकता है।
इस प्रयोग को 1984 में स्मिथ एवं विचर ने और आगे बढ़ाया। उन्होंने मन एवं प्रतिरक्षा प्रणाली के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने के लिए ध्यान को उसमें सम्मिलित किया और यह जानना चाहा कि वह किस सीमा तक उसे प्रभावित करने में सफल होता है। इसके लिए निर्धारित लोगों को तत्सम्बन्धी आवश्यक जानकारी दी गई। यह बताया गया कि श्वेत रक्त कणिकाएँ प्रतिरक्षा सम्बन्धी अपना प्रयोजन कैसे पूरा करती हैं साथ ही सूक्ष्मदर्शी यंत्र के सहारे उनका वास्तविक आकार-प्रकार दिखाया गया। इसके उपरान्त उन्हें किस प्रकार ध्यान साधना करनी है और कैसे न्यूट्रोफिल्स के भाव-चित्र बनाने हैं- इस संदर्भ में विस्तारपूर्वक समझाया गया।
मन शरीर की कुंजी है। स्वस्थता को अक्षुण्ण रखना है, तो यह जरूरी है कि मन भी स्वस्थ रहे। मन यदि विक्षुब्ध रहा तो काया के सारे अवयव और समस्त तंत्र गड़बड़ा जाते हैं इसे अब एक तथ्य के रूप में विज्ञान जगत में स्वीकार लिया गया है।
विज्ञान जगत का रहस्य रोमांच-प्रतिपदार्थ
इस जगत में देव और असुर दोनों प्रकार के तत्वों का अस्तित्व है। ध्वनि की प्रतिध्वनि, काया की छाया, घात का प्रतिघात, आक्रमण का प्रत्याक्रमण इसी के प्रमाण हैं। कि असुरता के आक्रमण और कुचक्र से अपना बचाव होता रहे।
देवतत्वों की तरह-सज्जनों की तरह परमाणु की मूल सत्ता होती है। वह अपनी शाश्वत और सनातन विशेषता को नष्ट नहीं होने देती और न अपनी सृजनात्मक प्रकृति में ही कोई कमी आने नहीं देती है। वे इकट्ठे होते हैं जुड़ते हैं, मिल जुल कर रहते हैं। उनकी ये संगठन और सृजन की भावना ही विभिन्न पदार्थों का निर्माण करती है।
यह विरोधी प्रकृति के पार्टिकल आते कहाँ से है? क्यों अवरोध उत्पन्न करते है? कुछ समझ में नहीं आता। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस ब्रह्माण्ड में शायद कोई अन्य विश्व ऐसा है, जिसे सर्वथा विपरीत प्रतिविश्व कहा जा सके। उसकी संरचना इस विरोधी प्रकृति के प्रतिकणों से हुई होगी। उन प्रतिनाभिकों के गिर्द इलेक्ट्रान के स्थान पर पॉजीट्रान भ्रमण करते होंगे।
'एण्टी युनिवर्स- दि नेक्स्ट कवेसट ऑफ दि साइन्स' नामक ग्रन्थ में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रख्यात विज्ञानवेत्ता डॉ. पाल एनिद्रयेन मारिस डिराक अपना मत प्रकट करते हुए लिखा है कि अब तक विज्ञान विश्व की जानकारी प्राप्त करने में उलझा रहा। यह आवश्यक तो है, पर पर्याप्त नहीं। इसके अगले चरण में जगत के प्रतिद्वन्द्वी जगत को जानना और उसकी शक्तियों को प्रयोग में लाना होगा, तभी विज्ञान की उपलब्धि सम्पूर्ण कही जा सकेगी। वर्तमान समय तक उसने जो कुछ अन्वेषण किया है, वह अपूर्ण और एकांगी है। इसकी सम्पूर्णता इसके दूसरे महत्वपूर्ण पहलू को जाने और प्राप्त किये बिना संभव नहीं। अगले ही दिनों इसे सम्पन्न करना होगा, तभी एक कमी दूसरे से पूरी की जा सकेगी और एक का ईंधन दूसरे के काम आ सकेगा। तब विविध यंत्रों के संचालन के लिए तेल, कोयला, भाप बिजली, परमाणु ऊर्जा जैसी शक्तियों की आवश्यकता न पड़ेगी। विश्व और प्रतिविश्व का परस्पर सम्बन्ध समन्वय हो जाने से पदार्थ और प्रति पदार्थ एक दूसरे का अभाव पूरा कर दिया करेंगे और लगभग सभी प्रयोजन एवं संचालित पद्धति द्वारा पेण्डुलम प्रक्रिया की भाँति स्वतः सम्पन्न होते रहेंगे। जब जिस कार्य की आवश्यकता होगी, वह पदार्थ और प्रतिपदार्थ का तालमेल बिठा देने मात्र से गतिशील हो जाया करेगा। तब आज जैसी ऊर्जा संकट की समस्या न रहेगी और न मनुष्य को इसके लिए उन दिनों जैसा सिर खपाना पड़ेगा। यही कारण है कि प्रतिविश्व- प्रतिपदार्थ की ओर जब से वैज्ञानिकों का ध्यान गया है, तब से एक नई दिशा हलचल, एक नई उमंग सर्वत्र दिखाई पड़ने लगी है। उसकी खोज के लिए सिद्धान्त और आधार तलाश किये जा रहे हैं। क्योंकि जिन सिद्धान्तों के आधार पर प्रस्तुत पदार्थ विज्ञान का ढाँचा खड़ा किया गया है, वे प्रति पदार्थ के लिए लागू न किये जा सकेंगे, अपितु उसमें लगभग उलटे आधारों वाले सिद्धान्तों का प्रयोग करना पड़ेगा। जब उसकी रूपरेखा बन जायेगी, तब आशा की जा सकती है कि एक ऐसी प्रति विद्युत शक्ति का आविष्कार किया जा सकेगा, जो उपलब्ध विद्युत से कही अधिक शक्तिशाली होगी। उसके माध्यम से प्रस्तुत विद्युत उत्पादन के लिए जो साधन जुटाने पड़ते है, उनमें से किसी की भी आवश्यकता न रहेगी, मात्र दोनों के पारस्परिक संसर्ग की समन्वयात्मक व्यवस्था कर देने भर से आकाश व्यापी विद्युत और प्रतिविद्युत आपस में मिलकर प्रचुर परिमाण में बिजली पैदा करने लगेंगी। यह क्रम तब तक चलता रहेगा, जब तक उन दोनों को पृथक न कर दिया जाय। यहाँ विज्ञान के लिए एक मुश्किल भरा काम यह होगा कि दोनों को पृथक कैसे किया जाय अथवा दोनों के मिलन को कैसे रोका जाय? क्योंकि प्रतिपदार्थ में एक बुरी आदत यह है कि वह जन्म लेते ही पदार्थ में घुस पड़ता है और उसी में विलीन हो जाता है। यदि प्रति परमाणु बना लिया गया, तो उसे वर्तमान परमाणु में घुस पड़ने से कैसे रोका जा सकेगा? यह एक बड़ा सिर दर्द है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्रह्माण्ड में इस प्रकार के मिलन-संयोग लगातार चलते रहते हैं, और इसी कारण से विद्युत चुम्बकीय विकरण की विशाल ऊर्जा इस विश्व को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती रहती है। इसके स्रोत के बारे बारे में विज्ञानवेत्ता आल्फवेन का कथन है कि 'साइग्लेस' और 'विर्जो' निहारिकाओं में पदार्थ और प्रतिपदार्थ के बीच भयंकर युध्य चल रहा है। इस टकराव से भीषण विकरण पैदा होता है जो नक्षत्रों और निहारिकाओं से परावर्तित हो-होकर धरती तक आता रहता है।
यदि किसी डिब्बे में खचाखच गोलियाँ भर दी जाएँ, तो फिर न तो वे हिल-डुल सकेंगी, न सक्रिय रह सकेंगी। प्रतिकण और कण की सक्रियता का कारण उनके मध्य व्याप्त आकाश है। इस आकाश का यदि पाट दिया जाय, तो कदाचित् यह प्रतिक्रिया न देखी जा सकेगी, जो सम्प्रति न दिखाई पड़ती है। फिर वह हलचल, ऊर्जा और ऊष्मा भी यहाँ न दीख पड़ेगी, जो अनादि काल से संसार की सक्रियता को बनाये रखने में सहयोग करती आ रहा हैं। इसका जितना श्रेय अणु को है उतना ही उस पोल की जो कि उसके गर्भ में समायी हुयी है। यह पोला स्थान ही प्रति कण है। विज्ञानवेत्ता इसे प्रति इलेक्ट्रान का ही एक रूप मानते हैं। इस सिद्धान्त के आधार पर अब तक कितने ही आविष्कार हो चुके हैं। ट्रांजिस्टर का महत्वपूर्ण आविष्कार इस 'होल और इलेक्ट्रान' प्रक्रिया के सहारे ही संभव हो सका है। पर इन इक्के-दुक्के अनुसंधानों के अतिरिक्त कोई बड़ी सफलता प्रतिद्वंद्वी पदार्थों के पारस्परिक सहयोग से अभी तक हस्तगत नहीं की जा सकी है। भविष्य में इन सर्वथा विपरीत संसारों के बीच आदान-प्रदान का दरवाजा किस प्रकार खुल सकता है? इसका गंभीरतापूर्वक पता लगाया जा रहा है। इस दिशा में यदि थोड़ी और सफलता मिल गई, तो पौराणिक आख्यानों में वर्णित देवलोक और असुरलोक की गाथाओं को हम साकार होते देखेंगे और अनुभव करेंगे कि भगवान और शैतान की तरह चिरन्तन काल से दो प्रतिद्वंद्वी संसार आपस में गुँथे हुए चले आ रहे है। उनके सामान्य सहकार को बढ़ाना संभव हो सके, तो अपनी दुनिया इतनी बड़ी सामर्थ्य करतलगत कर लेगी, जिसके सहारे मात्र पृथिवी तो क्या ब्रह्माण्ड के विशाल क्षेत्र पर अधिकार कर लेना और बिखरी संपदाओं से लाभ उठा सकना उसके लिए शक्य हो जायेगा, फिर मनुष्य विश्व का मुकुटमणि नहीं, ब्रह्माण्ड का अधिनायक बन कर रहेगा।
सरस्वती के सौम्य उपकूल में, सामगान से मुखरित, यज्ञ धूम से धूसर हुए पत्तों की छाँव में जहाँ रोष-द्वेष से मुक्त हुए सिंह-शिशु और हरिण-शावक साथ-साथ खेला करते थे। वहीं कलित कुसुमित वल्ली निकुंज में पूर्वाभिमुख कुशाच्छादित वेदिका पर महर्षि जैमिनी एक मृगचर्म वल्कल डाले आसीन थे।
ब्रह्म, आवाहनीय एवं गार्हस्पत्य अग्रियों के विधि विहित आकार निर्मित कुण्डों से सुगन्धित धूम उठ रहा था। सुदूर दक्षिण में अश्वत्थ के नीचे अस्पृश्य की भाँति एकाकी दक्षिणाग्नि का कुण्ड दहकता हुआ दूसरों के गौरव पर अपनी चट्-चट् ध्वनि से अट्टहास कर रहा था। यज्ञशाला में नवग्रह, सर्वतोभद्र आदि वेदियाँ रंगीन अक्षत, तिल आदि से निर्मित, अद्भुत दृश्य उपस्थित कर रही थीं। दिक्पालों के कलश पुष्पमाल्य से पूजित थे तथा उन पर दीपक जगमगा रहे थे। ऊर्ध्वमुख किए पीताभ यवाकुंरों के अगले हिस्से कुछ हरे हो चले थे। ईशान कोण की पताका वन में भटके पथिकों को मार्ग दिखाने के लिए तरूशिखाओं से भी ऊँचा मस्तक करके लहरा रहीं थी।
नारियल के पात्र में आज्य प्रस्तुत था। हवि विधान पूर्वक बन चुकी थी। केले के पत्तों पर अगरू, अक्षत, माल्य तथा फलादि सभी उपयुक्त सामग्रियाँ सुसज्जित थीं। पंचकाष्ठ आदि समिधा शिष्यों ने एकत्रित कर ली थी और अब तो दिक्पालादि के पूजन के पश्चात् वेदध्वनि के बीच अरणिमन्थन चल रहा था।
गौरवर्ण, कृशकाय, श्वेत श्मश्रु-रोम जटाजाल, सुदीर्घ भुज, वक्ष, भाल, बांए हाथ में कुश का ब्रह्म दण्ड एवं दाहिने हाथ में स्रुवा लिए कृष्ण मृगचर्म, मौज्जी मेखला धारण किए हुए तेजोमय महर्षि जैमिनी साक्षात् अग्नि लग रहे थे। कर्मशास्त्र के प्रणेता ने स्वयं आज दीक्षा ली थी। विघ्न उसके नाम से ही काँप उठते। किसी देवता में शक्ति नहीं जो उसके आवाहन की उपेक्षा कर दे। सम्पूर्ण सिद्धियाँ उनके सामने हाथ जोड़े खड़ी थी। प्रकृति के तात्विक रहस्यों को उन्होंने खोज लिया था। पदार्थों, क्रियाओं एवं मन्त्रों की सूक्ष्म कम्पन शक्ति को वह भली भाँति जानते थे। अतः उनके यज्ञ कभी असफल होंगे, ऐसा हो ही नहीं सकता। वे प्रकृति पर शासन करने में पूर्णतः समर्थ थे।
शिष्य वृन्द परिचर्या में प्रवीण था। सभी सम्मान्य ऋषिगण निमन्त्रण पाकर पधारे थे। जिन तपःपूतों के संकल्प ही कभी व्यर्थ नहीं होते, वे ही विधि पूर्वक कोई अनुष्ठान आरम्भ करें तो सफलता करबद्ध खड़ी समझनी चाहिए। आवाहन से पहले ही देवताओं ने आकर अपने आसन ग्रहण कर लिए थे। कौन जाने आवाहन के समय पहुँचने में कुछ विलम्ब हो जाय और किसी महर्षि की भृकुटि पर बल पड़ जाय तो? अथवा महर्षि के संकेत पर वह काले वस्त्र पहने दक्षिणाग्नि के कुण्ड पर सावधान बैठा उनका प्रधान शिष्य स्रुवा उठा ले तो? वह साक्षात् यम के समान दण्डधर बैठा है। उसका काम ही है यज्ञ विघ्नों एवं यज्ञ में प्रमत्त होने वालों को अभिचार मन्त्रों से दण्ड देना। यह अथर्ववेदीय कुमार बड़ा भीषण है।
सिद्धियों के आह्वान की कोई आवश्यकता न थी। वे तो इन आश्रमों के छोटे-छोटे अंतेवासियों से वैसे भी भयभीत रहती थीं। लोकपालों ने अपनी सेवाएँ महर्षि के श्री चरणों में यज्ञारम्भ से ही निवेदित कर दी थी। उनके सर्वथा अचूक मन्त्रों की शक्ति से विवश होकर करने की अपेक्षा स्वेच्छा से करके उनकी मैत्री क्यों न प्राप्त की जाय? इन्द्र चकित थे। अन्ततः महर्षि यज्ञ कर क्यों रहे है? वे इन्द्रासन चाहें तो कौन उन्हें रोक सकेगा? विघ्न करने की तो कल्पना भी नहीं उठती। उनके संकेत पर तो उनके किसी छात्र के लिए भी देवराज सिंहासन त्याग देंगे। ब्रह्मलोक उनकी पितृभूमि है। वहाँ जब चाहें तब वे सशरीर जा विराजें। महर्षि के यज्ञ के संकल्प का पता सबको था। पर उसका स्पष्टार्थ कम से कम मीमांसकों की समझ में तो आया न था। संकल्प था- ‘अन्तस्थस्य अव्रलोकनार्थम्।' इस विचित्र यज्ञोद्देश्य के लिए यज्ञ की पूरी प्रक्रिया का निर्देश स्वयं महर्षि ने किया था उन्होंने ही मन्त्र निश्चित किए, पद्धति निश्चित की और होता, ऋत्विक् को प्रथम शिक्षित किया। सब कुछ पर्याप्त हो जाने पर आज उन्होंने पर आज उन्होंने दीक्षा ली।
मीमांसा शास्त्र, कर्म को ही ईश्वर मानता है। वहाँ कोई विशेष जगत का संचालक है ही नहीं। श्रुतियों का भौतिक दृष्टिकोण से अध्ययन करके महर्षि इसी तथ्य पर पहुँचे थे। कर्मफल के प्रदाता देवता तो प्रत्यक्ष थे, किन्तु वे कर्मानुसार फल देने को बाध्य नियन्त्रक मात्र। पितामह ब्रह्मा ने अपने भीतर ही सम्पूर्ण सृष्टि एवं उसके कर्ता, धर्ता, हर्ता सर्वेश का साक्षात्कार करके उनके आदेशानुसार ही- यथापूर्व सृष्टि प्रारम्भ की। यह श्रुति भी स्वीकार करती है और ब्रह्मा को मिथ्याभाषी भी नहीं कहा जा सकता। महर्षि जैमिनी इसी उलझन को सुलझाना चाहते थे। उन्होंने इस व्यवस्था को प्रत्यक्ष करने का निश्चय किया। यज्ञ ही उनका साधन था।
अभी कुछ ही समय बीता था। 'वरं ब्रूहि!' की पश्यन्ती वाणी में हंसस्थ पितामह ब्रह्मा बोल रहे थे। अपने अरुण परिधान में श्वेत हंस पर विराजमान, नील गगन में वे कुवलय दल पर जो मानसरोवर में विकसित हो पद्यराग जैसे प्रतिष्ठित थे। महर्षि को यह नवीन अनुभव हुआ कि यज्ञ के द्वारा त्रिदेवों को सन्तुष्ट कर अभीष्ट वर भी प्राप्त किया जा सकता है। अभी तक उनके यज्ञ, संकल्प विशेष के प्रदाता थे। संकल्प के बिना ही स्वेच्छा पूर्ति- यह नवीन बात थी।
अग्नि के साथ सम्पूर्ण ऋषि मण्डली ने पितामह को प्रणाम किया। पहले से प्रस्तुत आसन को कृतार्थ करने का ऋषियों का आग्रह सार्थक हुआ। 'मैं उसी अन्तस्थ का साक्षात् करना चाहता हूँ, जिसके दिव्य दर्शन प्रभु को सृष्टि के प्रारम्भ काल में हुए थे।' महर्षि ने पूजा ग्रहण करके विराजमान ब्रह्माजी के श्री चरणों को दोनों हाथों में लेकर निवेदन किया।
'यह तो मेरी शक्ति से परे का कार्य है।' पितामह ने कहा- 'मेरी प्रसन्नता का फल होना ही चाहिए, अतः तुम्हारा अभीष्ट पूर्ण होगा किन्तु उसकी प्राप्ति के लिए तुम साम्बशिव की शरण लो।' परोक्ष वेदवाणी के आद्याचार्य भला स्पष्ट कब कहने वाले थे। अपनी हंस की पीठ थपथपा कर वे उस पर बैठ गए। सृष्टि के महान कलाकार को अवकाश कहाँ?
‘ ॐ हाँ जूं सः त्रयम्बकं यजामहे’ आहुतियों के मन्त्र बदल दिए गए। वही यज्ञ शाम्भव बन गया। महर्षियों की मन्त्र ध्वनि उस तपोवन को गुँजित करती हिमगिरि के एक शिखर से दूसरे को पार करती कैलाश पहुँचने लगी।
‘प्रभु कहीं प्रस्थान कर रहे हैं?' वृषभ की पीठ पर वीरभद्र को व्याघ्राम्बर डालते देखकर जगदम्बा ने विश्वनाथ से पूछा।
'सरस्वती तट पर जैमिनी यज्ञ में मेरा आह्वान कर रहे हैं।' प्रभु ने कहा- 'पर मैं एकाकी कहाँ जा रहा हूँ? तुम भी तो चल रही हो।'
'आप भी देवताओं की भाँति मन्त्राकर्षण से विवश हैं?' मन्त्रात्मक प्रार्थना भवानी के चरणों में भी पहुँच रही थी, किन्तु उन्होंने उसकी उपेक्षा कर दी थी।
'कोई भी क्रिया मुझे विवश नहीं करती।' उन परात्पर प्रभु ने कहा- 'सृष्टा ने महर्षियों को वचन दिया है, और किसी भी प्रकार हो ये भोले प्राणी मेरा स्मरण तो कर रहे हैं। आओ, तुम भी वृषभ पर ही चलो। आशुतोष द्रवित हो चुके थे।
वृषभ के घण्टे से निकली प्रणव ध्वनि ने सम्पूर्ण मन्त्रघोष को तिरोहित कर दिया। तपोवन एक अद्भुत सुरभि से परिपूर्ण हो गया। चकित यज्ञीय विप्रों ने मस्तक उठाया और उन्हें वृषभारूड़ भवानी शंकर के दर्शन हुए। भाल स्थित बालशशि की कोमल किरणों से स्त्रात ऋषियों की सम्पूर्ण क्लान्ति तत्काल तिरोहित हो गयी।
पुरुष सूक्त की सस्वर स्तुति से साम्बशिव संतुष्ट हुए। उन्होंने आसन तो ग्रहण नहीं किया किन्तु अर्चन स्वीकार कर लिया। महर्षि जैमिनी ने अपने को कृतकृत्य समझकर बड़े ही कोमल शब्दों में अपना उद्देश्य निवेदित किया।
'जो सर्वात्मा है, सर्वरूप है, उसका दर्शन किया। वहीं तो यज्ञ पुरुष हैं।' कैलाशपति प्रभु ने कहा तुम उस यज्ञेश को जानते नहीं, यह यज्ञ उसी का तो स्वरूप है। अच्छा, उनका आह्वान करो।’
'यज्ञों वै विष्णुः' महर्षि ने पढ़ा तो था श्रुति में, पर वे उसका अर्थ करते थे। 'यज्ञ ही व्यापक है।' आज उन्होंने यज्ञेश का पता पाया। भगवान शंकर के आदेशानुसार यज्ञ-पुरुष के निमित्त आहुतियाँ पड़ने लगीं। था तो बहाना ही, वैसे तो भगवान शिव का प्रेमपूर्ण संकल्प ही पर्याप्त था।
भोले बाबा ने अपने भुजंगों को कर स्पर्श से आश्वस्त किया। ऋषियों के नेत्र एक बार बन्द हो गए। बड़ी कठिनता से पलकों को खोलने में समर्थ होने पर एक गरुड़ स्थित पीतवसन, घनश्याम, वनमाली चतुर्भुज नील ज्योति का साक्षात् हुआ। उस सायुध साभरण मूर्ति के सम्मुख नेत्र ठहरते नहीं थे।
महर्षि जैमिनी आनन्द विभोर हो गए थे। अर्चन की स्मृति भी रहीं नहीं थी। अपने को ऐसी प्रेमाविष्ट स्थिति में उन कर्मशील ने कभी पाया नहीं था। सावधान होकर अर्चन का उपक्रम करें, तब तक तो वह मनोहारी दृश्य अदृश्य हो चुका था। महर्षि खिन्न होकर मूर्छित हो गए। तुरन्त ही उसी क्षण भगवान शंकर वहाँ प्रकट हुए- बोल उठे 'कर्म करो और उसका फल पाओ यहीं तो तुम्हारा सिद्धान्त है, मीमांसाकार के नाते।
' अब तक तो मैं यहीं समझ सका हूँ।' महर्षि ने स्वीकार किया। 'विश्वात्मा तो कोई फल है ही नहीं।' अध्यात्मशास्त्र के परम प्रवर्तक ने बतलाया- फिर उसे तुम कर्म के द्वारा कैसे प्राप्त कर सकते हो? उसका वाह्य साक्षात् भी यज्ञ का फल नहीं है। वह है भगवान ब्रह्मा के वरदान एवं मेरे दर्शन का परिणाम।
'पितामह ने कहा था कि जगदम्बा के साथ आपका साक्षात् करके मैं उस आत्मस्थ को उपलब्ध कर सकूँगा।' दो क्षण सोचकर महर्षि ने आवेदन किया।
'सृष्टा के परोक्ष वचनों को तुमने समझा नहीं।' श्रुतियों के रहस्य के उद्घाटन का गर्व हरण करते हुए सदाशिव ने कहा- ' के बाह्य द्वारा बाह्य की एवं अन्तस्थ के द्वारा अन्तस्थ की उपलब्धि होती है। मेरे व्यक्त रूप की आराधना करके तुमने व्यक्त यज्ञेश के दर्शन कर लिए। व्यक्त की उपलब्धि अधिकारानुसार काल नियन्त्रित ही होगी, नित्योपलब्धि तो अन्तःकरण में ही शक्य है।' भगवान शिव ने वृषभ की पीठ पर थपकी दी और वह कैलाश की और मुड़ चला।
'यज्ञ की पूर्णाहुति कर दी जावे' एक प्रहर ध्यानस्थ रहने के पश्चात् वे उठ खड़े हुए। उनके मुख पर शान्ति विराजमान थी। पूर्णाहुति हो गयी और सबने स्नान किया। ऋषि मण्डली विदा कर दी गयी।
'इन्द्रलोक एवं परलोक की समस्त विभूतियाँ कर्माधीन हैं।' महर्षि जैमिनी ने कहा- 'कर्म ही उभयलोकों का कर्त्ता है। कर्म के द्वारा तुम उसे निश्चय उपलब्ध कर सकते हो।' शिष्य वर्ग शान्त सुन रहा था।
'इससे परे भी कुछ है या नहीं कह नहीं सकता।' महर्षि ने कहा- 'पितामह कहते हैं और श्रुति साक्षी है कि कुछ है अवश्य। वह अन्वेषण से परे है। यज्ञ उसे प्रदान नहीं कर सकते। उस पर श्रद्धा करनी होती है विश्वास के पश्चात् ही वह उपलब्ध होता है।'
शिष्यों को ऐसी शिक्षा मिली नहीं थी। वे चकित हो रहे थे। लेकिन महर्षि कहते गए- श्रद्धा ही माँ पार्वती है और विश्वास ही सदाशिव है। इनसे ही आत्मस्थ सर्वात्मा का साक्षात्कार हो सकता है। पितामह के गूढ़ वाक्यों का यही अर्थ है।
शिष्यों को वहीं छोड़कर महर्षि जैमिनी सरस्वती के किनारे-किनारे ही ऊपर बद्रीकाश्रम में इस नवीन श्रद्धा-विश्वासमय पथ के आचार्य महर्षि व्यास का साक्षात् करने चल पड़े।
जीवन-समर जीतने उपयोगी और महान् कार्य करने के लिए अपने आत्म विश्वास को प्रज्वलित रखना बहुत आवश्यक है। क्योंकि किसी भी महान् ध्येय की पूर्ति तभी होती है, जब मनुष्य के सारे गुण और सारी शक्तियाँ नियंत्रित और नियोजित होकर कार्य में संलग्न होती हैं। शक्तियों का नियोजन तथा केन्द्रीयकरण का कार्य आत्म-विश्वास के उठते ही सारी शक्तियाँ स्वतः उठ खड़ी होती है और स्वतः ही पंक्तिबद्ध होकर कार्य का सम्पादन करने के लिए तत्पर हो जाती हैं। ऐसे प्रबुद्ध पुरुषार्थी के लिए कौन-सा ध्येय कौन-सा उद्देश्य और कौन-सा लक्ष्य दुःसाध्य हो सकता है। वह तो असम्भव को सम्भव और असाध्य को साध्य बना सकने में समर्थ और सफल हो जाता है। उपनिषद्कार के कथनानुसार मनुष्य अमृत की लड़ी है। उसका प्राण, उसका जीवन नित्य नई आभा लिए आता रहता है। मनुष्य प्रेरणा का केन्द्र है, प्रकाश धारण करने वाला स्तंभ है, वह साक्षात् प्रकाश रूप है, वह प्रकाश है, ज्योति है और अमर आलोक है। मनुष्य में यह सब है तो, किन्तु इसका अनुभव वह तब ही कर सकता है, जब ज्वलन्त आत्म-विश्वास से ओत−प्रोत हो। अन्यथा वह माँस का एक पिण्ड और मिट्टी की एक मूर्ति मात्र ही है। अदम्य आत्मविश्वास ही मनुष्य को साधारण जीव से असाधारण देवपुरुष बनाता है। स्वामी विवेकानन्द ने ठीक ही कहा- 'विश्वास! विश्वास! अपने में विश्वास, ईश्वर में विश्वास अपने आत्मदेव की शक्तियों में विश्वास ही मानव जीवन की सफलता और महानता का रहस्य है।' आत्मविश्वास का वास्तविक अर्थ है- अपनी आत्म-सत्ता में विश्वास करना। अपने को माँस पिण्ड रूप शरीर न मानकर आत्मा मानना और उसी के प्रकाश से प्रेरित होना आत्मविश्वास का ही रूप है। जो अपनी आत्मा की अजेय सत्ता में विश्वास करता है, अपने जीवन की सार्थकता, महत्ता और उपयोगिता को स्वीकार करता है, उसे अनुभव करता है, वही आत्म-विश्वासी होता है। इस प्रकार का सच्चा आत्म विश्वास ही किसी बड़े लक्ष्य का लम्बा रास्ता तय कर सकता है और वही उस पर आई आपत्तियों, संकटों तथा विपत्तियों से टक्कर ले सकता है।
शिक्षा, साधन सम्पन्नता आदि की कोई भी सुविधा मनुष्य को न तो महान् बना सकती है और न उसके व्यक्तित्व में तेज का समावेश कर सकती है। संसार में ऐसे लाखों मनुष्य मौजूद है, जिन्हें साधन सुविधाओं की जरा भी कमी नहीं है तथापि वे मलिन व्यक्तित्व के साथ तुच्छ तथा हेय स्थिति में पड़ें जीवन काटा करते हैं। यदि साधन सुविधायें ही मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास और उसकी महानता का आधार होती तो अवश्य ही हर साधन सम्पन्न व्यक्ति को महान तथा तेजस्वी होना चाहिये। किन्तु ऐसा होता कदापि नहीं। तेजस्विता और महानता का विकास साधनों में नहीं, अपने प्रति महानता, उदात्तता तथा आत्म सत्ता का विश्वास रखने में है। आलोकित पदार्थ के होने पर ही ऊष्मा उत्पन्न होती है। इसी प्रकार जब मनुष्य विश्वासपूर्वक अपने आत्मस्वरूप के निकट आता है, तभी वह प्रकाशित तथा ज्योतिष्मान बनता है। एक मात्र जड़ पदार्थों का सम्पर्क उसे आलोकित अथवा प्रकाशित नहीं कर सकता।
निराश व्यक्ति की कई शक्तियाँ जगाना तो दूर उल्टे उसकी जागरूक शक्तियाँ, कार्य क्षमताएँ, आगे देख सकने की दृष्टि तथा परिस्थितियों का अध्ययन कर सकने वाली सूझ बूझ तक समाप्त हो जाती है। ऐसे निराश व्यक्ति में न तो साहस शेष रहता है और न समाज में कोई व्यक्ति उसकी सहायता करने के लिए उत्साहित होता है। निराशा एवं दुर्दैव का साथ माना गया है। निराशा का अन्धकार आते ही मनुष्य को दुर्दैव का प्रकोप धर दबाता है।
यदि हम आशापूर्ण दृष्टिकोण से अपने अन्दर बैठे महापुरुष पर विश्वास लेकर आगे बढ़ते हैं तो हमारे सामने ऐसे मार्ग आप खुलते चले जायेंगे, जिन पर चल कर अभीष्ट लक्ष्य तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। लक्ष्य सिद्धि का विश्वास और उसकी दुरूहता अथवा दूरी की अकल्पना मनुष्य के मार्ग को बहुत कुछ सुखद एवं सरल बना देती है। विश्वास से जिस मनोबल का जन्म होता है उसमें बड़ी प्रेरक एवं सृजनात्मक शक्ति होती है। वह मनुष्य को भय, शंकाओं एवं संदेहों से दूर रख कर उमंग एवं उत्साह से भरपूर बनाये रहता है। इतने संबलों का भंडार लेकर चलने वाला ऐसा कौन-सा अभागा यात्री होगा जो अपने लक्ष्य तक पहुँचे बिना बीच में ही थक कर बैठ जाये।
अपने भीतर सोये महापुरुष अथवा विशिष्ट व्यक्ति को जगाने के निमित्त कर्म न करके जो व्यक्ति प्रमाद, आलस्य अविद्या अथवा अकर्मों में लगे रहते है, वे साधारण से भी अधिक सामान्य स्थिति में तो उतर सकते है किन्तु असाधारण स्थिति की ओर कदापि नहीं बढ़ सकते। विशिष्ट व्यक्तित्व के लिए जिन कठोर कर्मों तथा अखण्ड पुरुषार्थ की आवश्यकता है, उनकी पूर्ति भोग विलास से भरी और ढीली पीली जिन्दगी में नहीं की जा सकती। जिन महत्वाकांक्षियों को अपनी विशिष्टता में विश्वास और समाज में सम्मानपूर्ण स्थान की लगन होती है वे नियम संयम से आबद्ध एवं व्यक्तिगत जीवन को स्वीकार कर परिश्रम के लिए दिन को दिन और रात को रात नहीं समझते। उन्हें घाम का ताप, शीत का कम्पन और वर्षा की बूँदें प्रभावित नहीं कर पातीं और न ही उनको पथ में कोई प्रलोभनपूर्ण अवरोध ही विरमा पाता है।
एक बार चल कर यदि वे विश्राम करते है, तो अपने लक्ष्य की छाया में, अपने उद्देश्य की तलहटी में और मंजिल की मीनार पर। बीच में उनके लिए विश्राम का कोई भी स्थल नहीं होता और न भटका देने वाले प्रवजक विश्राम भवनों की मरु-मरीचिका में वे विश्वास ही करते हैं उन्हें तो लगन, उमंग और उत्साह का ऐसा नशा चढ़ा रहता है, जो जीवन में पूर्णता प्राप्त किये बिना उतरता ही नहीं।
आत्म-विश्वास मनुष्य को तुच्छता से महानता की ओर अग्रसर करता है। सामान्य से असामान्य बना देता है। स्वेट मार्डेन ने कहा है- 'आत्मविश्वास की मात्रा हममें जितनी अधिक होगी उतना ही हमारा सम्बन्ध अनन्त जीवन और अनन्त-शक्ति के साथ गहरा होता जायेगा।' जब चारों ओर विपत्तियों के काले बादल मँडराते हों, जब सागर में कहीं भी जीवन नैया को खड़ा करने का किनारा न मिल रहा हो, भयंकर तूफान उठ रहा हो, नाव अब डूबे तब डूबे की स्थिति में हो तो कैसे उद्धार हो सकता है? आत्मविश्वास ही ऐसी स्थिति में मनुष्य को बचा सकता है। इसी तथ्य को व्यक्त करते हुए कार्लाइल ने लिखा है- 'आत्मविश्वास में वह शक्ति है, जो सहस्रों विपत्तियों का सामना कर उनमें विजय प्राप्त करा सकती है।'
आत्मविश्वास- परमात्मा पर विश्वास करना है, जिसकी शक्ति अजेय है, अनन्त है। जो अपने आप पर विश्वास करता है, अपनी बागडोर उसके हाथों सौंप देता है, उस पर संसार विश्वास करता है। संसार भर में नेतृत्व शासन पथ प्रदर्शन वे ही करते है, जिन्हें अपने आप पर महान् विश्वास होता है। अपने ऊपर अपार विश्वास रखकर ही वे संसार को प्रभावित करते है। आत्म विश्वास के बल पर एक मनुष्य अफ्रीका के जंगलों में से भी भयंकर जंगली शेर को पकड़ लाता है। हिंसक जन्तुओं के बीच खड़ा होकर उन्हें नचाता है। लेकिन आत्म-विश्वासहीन व्यक्ति शहर के बीच एक कुत्ते से भी डर जाता है। बन्दर भी उसे भयभीत कर देता है। वस्तुतः सभी मनुष्यों का शरीर एक-सा ही होता हैं किन्तु जिस व्यक्ति के चेहरे से, आँखों से आत्मविश्वास का अपार तेज प्रवाहित होता है, जिसके हृदय में आत्मविश्वास का सम्बल है, उसके समक्ष हिंसक जन्तु भी पालतू-सा बनकर दुम हिलाने लगता है। उसका वह तेज ही दूसरों पर जादू सा सा असर डाल देता है।
शायद हमने अपने अन्दर यह पता लगाने का प्रयत्न कभी नहीं किया कि वहाँ कोई विचारक, कलाकार,नेता, समाज-सेवक कोई बड़ा व्यापारी अथवा कोई महान् व्यक्ति तो छिपा नहीं बैठा है? हाँ, हमने अवश्य ही इस बात में प्रमाद बरता है। अन्यथा हम आज इस साधारण स्थिति में न पड़ें होते। अवश्य ही अब तक हम समाज-सेवा कला अथवा वाणिज्य के माध्यम से अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाकर मानव जीवन को काफी दूर तक सफलता की ओर बड़ा चुके होते, किन्तु पछताने से क्या होता है। जब कि यथार्थ का बोध हो जाय हमें अपने अन्दर की प्रसुप्त सामर्थ्य को जगाने हेतु तत्पर हो स्वयं को आत्म-विश्वास सम्पन्न बना लेना चाहिए।
विश्वास रखा जाना चाहिए कि संसार के प्रत्येक मनुष्य के भीतर कोई-न-कोई महान् पुरुष सोया पड़ा रहता है। हमारे अन्दर भी है। यदि ऐसा न होता तो एक साधारण ही नहीं दीन-हीन मजदूर का एक अपढ़ पुत्र अब्राहम लिंकन संसार का महान् व्यक्ति न हो पाता। एक साधारण जिल्दसाज की नौकरी करने वाला लड़का माइकल फैराडे संसार का आश्चर्यजनक वैज्ञानिक न होता। साधारण वकील के स्तर से महात्मा गाँधी विश्व-वंद्य बापू न हो पाते और दो पैसे की रोटी पर जीवन चलाने वाले स्वामी रामतीर्थ अध्यात्म क्षेत्र के महारथी और एक कारखाने में छोटी-सी नौकरी करने वाला लड़का फोर्ड संसार का महानतम उद्योगपति एवं धनकुबेर न हो पाता।
मनुष्यों का यह आश्चर्यजनक विकास और चकित कर देने वाली उन्नति प्रमाणित करती है कि किसी भी मनुष्य के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता कि आगे चल कर वह जीवन के किस शिखर पर पदार्पण करेगा। संसार के सारे मनुष्यों में वे सारी क्षमताएँ तथा विफलतायें सन्निहित रहती हैं, जो किसी एक में भी हो सकती हैं और जो उन्नति पथ पर किसी का संवहन करने वाली होती हैं। आवश्यकता केवल अपने अध्यवसाय द्वारा उन्हें जगाने और काम में लाने की होती है। शक्तियों का उपयोग शक्तियों को बढ़ाता है, और बढ़ी हुई शक्तियाँ मनुष्य को उत्तरोत्तर उन्नति की ओर अग्रसर करती रहती हैं।
मनुष्य जब अपने को कर्तव्य कर्मों की शान पर चढ़ाता है, आत्मबल का उपार्जन कर स्वयं को परिश्रम एवं पुरुषार्थ की आग में तपाता है तो उसके भीतर सोया पड़ा नेता समाज, सुधारक, धर्म प्रचारक, वैज्ञानिक, कलाकार, संत अथवा उद्योगपति जागकर ऊपर उभर आता है। यही सबकी सफलता का जीवन संग्राम में जीतने का एक मात्र आधार है।
भारतीय धर्म एवं संस्कृति में अपरिग्रह को मानवीय सद्गुणों में विशिष्ट स्थान मिला है। जीवन लक्ष्य की प्रथम अनिवार्यता 'यम' के अंतर्गत इसे सत्य, अहिंसा, अस्तेय व ब्रह्मचर्य के समकक्ष स्थान प्राप्त है। इसे पंच महाव्रतों में एक माना गया है। बौद्ध व अन्यान्य प्रशाखाओं में भी परिग्रह को निंदनीय ही ठहराया गया है।
इतर धर्म दर्शन में भी इसके महत्व को पूरी तरह स्वीकार गया है। इस्लाम, ईसाई, पारसी आदि धर्मों में इसे मानवीय कर्तव्य के अंतर्गत माना गया है। परिग्रह को पाप व अपरिग्रह को पुण्य की संज्ञा भारतीय दर्शन में मिली है।
अपरिग्रह से तात्पर्य है- 'प्रकृति व समाज प्रदत्त वस्तुओं को औचित्य से अधिक अपने पास संग्रहित नहीं करना न औचित्य से अधिक उपभोग करना।' परिवार में दस सदस्य होते हैं तो चौके में जो भी रसोई बनती है या बाज़ार से जो मिठाई आती है- कपड़ा व अन्य आवश्यक वस्तुएँ खरीदी जाती है उनमें प्रत्येक को समान भाग मिलता है। ठीक उसी प्रकार संसार के समस्त प्राणियों को-मनुष्यों को एक परिवार मानकर अपने भाग की वस्तुओं का उपभोग व संग्रह करना अपरिग्रह है। यह मनुष्य का धर्म है। औचित्य की इस सीमा का उल्लंघन 'पाप' माना जाता है।
परिग्रह को पाप तथा अपरिग्रह को पुण्य क्यों माना गया है? यह प्रश्न प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के मन में उठना स्वाभाविक है। आज के कई मत व वाद परिग्रह को पाप नहीं मानते। जैसे अर्थ शास्त्र पूँजी को व्यक्ति की अपनी परिग्रह वृत्ति व कष्ट सहिष्णुता का परिणाम मानता है और उसके औचित्य को स्वीकारता है। वह उसके औचित्य-अनौचित्य को नहीं देखता। यह मान्यता व्यक्ति को नहीं देखता। यह मान्यता व्यक्ति को व्यक्तिवादी बनाती है। व्यक्तिवाद समाज की प्रगति का शत्रु है। अपरिग्रह को पुण्य मानने के पीछे मूल कारण यही है कि यह वृत्ति व्यक्ति को समाज से जोड़ती है। यह वह पुल है जो समाज व व्यक्ति के बीच की खाई को पाटता है।
अपरिग्रही व्यक्ति समाज के हित से निरंतर कटता जाता है। उसे अपने हित का तो ध्यान रहता है किन्तु अपने हित के साथ होने वाले दूसरों के अहित को वह नहीं देखता। वह ब्याज कमाने के लिये धन संग्रह करता है। अधिक लाभ कमाने के लिये धन संग्रह करता है। अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से ऐसी वस्तुओं पर साँप बनकर बैठ जाता है जिसके अभाव में जनता दुःखी होती है। आज ऐसे ही व्यक्तियों की समाज में बाढ़ है।
परिग्रह का अर्थ संग्रह करना ही नहीं है। अपने उपभोग, सुख, ऐश्वर्य व अधिक लाभ पाने के उद्देश्य से इकट्ठी की हुई वस्तुएँ व धन संपदा ही परिग्रह की सीमा में आती हैं। जिसके पीछे लोकहित का- परमार्थ का उद्देश्य हो व प्रत्यक्ष-परोक्ष में उसका अपना हित व समाज का अहित न हो, वह परिग्रह नहीं।
जब परिग्रह को मानव धर्म का महत्व पूर्ण अंग निर्धारित किया गया। उन दिनों व्यक्ति की आवश्यकताएँ भी सीमित थीं। व्यक्ति आज की अपेक्षा अधिक आत्म निर्भर था। पारस्परिक निर्भरता की परिधि ग्राम व प्रदेश तक ही सीमित थी। तब अपरिग्रह वृत्ति इतनी अनिवार्य नहीं थी, जितनी आज है। किंतु आज समय बदल गया है। अपनी अनेकानेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य समाज पर निर्भर है। व्यक्ति की आत्म निर्भरता आज के वैज्ञानिक युग में लगभग समाप्त ही हो गयी है। ऐसी स्थिति में अपरिग्रह का महत्व और भी बढ़ जाता है।
अर्थशास्त्र की उपभोगवादी दृष्टि के कारण भी मुद्रा अपनी सार्वदेशिक तथा सार्वभौमिक क्रय शक्ति से सम्पन्न होने के कारण परिग्रह अर्थात् संचय और भी सुलभ कर देती है। एक व्यक्ति आज अरबों-खरबों रुपयों पर अपना स्वत्व आसानी से जमाए रख सकता है। उनके रक्षण तथा स्थानान्तरण में उसे उसे कोई विशेष जोखिम तथा व्यय नहीं उठाना पड़ता। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की तृष्णा भी सुरसा के मुँह की तरह फैलने लगी है।
अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों, मुद्रा की क्रय शक्ति, वैज्ञानिक प्रगति, यांत्रिक सभ्यता, अधिकोष (बैंकिंग) सुविधाओं की प्रचुरता, यातायात व संचार के द्रुत साधनों ने मनुष्य की उपार्जन शक्ति में आश्चर्यजनक वृद्धि कर दी है। वे ही साधन सामाजिक वैषम्य को बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध हो रहे हैं। उसे आज की वैज्ञानिक प्रगति का एक अभिशाप मानें तो अत्युक्ति न होगी।
दूर क्यों जाएँ? हमारे देश की ही दशा देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि व्यक्ति अपने विश्व मानव परिवार के सदस्यों के हिस्से की- उनके मुँह की रोटी को किस निर्दयता से छीनकर अपने खजाने को भर रहा है। इसके लिए वह नीति-अनीति औचित्य-अनौचित्य की चिंता नहीं करता। लोग दाने-दाने को तरसें किंतु स्वार्थ की मदिरा पी मदमस्त हुए लोगों को अपने गोदामों में अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से लाखों टन खाद्यान्न छिपाते हुए लज्जा नहीं आती। यही हाल अन्य उपभोक्ता वस्तुओं का है। अधिक लाभ कमाने का लोभ जिन व्यापारियों के मन में शेर की दाढ़ में खून की तरह लग गया है वे जाने क्या-क्या हथकण्डे अपनाते हैं। यह बताने की आवश्यकता नहीं। उसके परिणाम स्वरूप देश में गरीबी, बेकारी, महँगाई, भ्रष्टाचार आदि अनेकानेक समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं।
यदि रुपये को आधार मानकर देखा जाय कि किस व्यक्ति को कितना प्रतिशत मिल रहा है तो आज की इस लूट खसोट का स्वरूप सामने आ जाता है। हमारे देश की कुल जनसंख्या की मासिक आय पंद्रह रुपये से भी कम है। 24 प्रतिशत की आय 300 से 500 रुपये तथा 27 प्रतिशत उच्च मध्यवर्ग की मासिक आय पाँच से दस हजार रुपये तथा केवल 9 प्रतिशत लोगों की आय इससे अधिक हैं। इसी वर्ष वित्त मंत्री ने प्रति व्यक्ति आय के जो आँकड़े प्रस्तुत किये हैं उनके अनुसार भारत में गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले कुल 32 करोड़ आदमी है। 25 करोड़ से अधिक व्यक्तियों की आय राष्ट्रीय आय से भी कम है। जिसके हाथों में साधन सत्ता व सामर्थ्य है वह हजार हाथों से धन लूट रहा है हिस्सा छीन रहा है उदार अर्थवाद परिग्रह की ऐसी वृत्ति समाज में लाया है कि सारा ढाँचा ही चरमरा गया है।
सोवियत रूस की साम्यवादी क्राँति इसी वैषम्य की पृष्ठ भूमि पर उपजी थी। डंडे के बल पर, शस्त्र के बल पर उन लोगों से उनके वे खजाने छीन लिये गये जो उन्होंने लोगों का रक्त चूस-चूस कर भर थे। किंतु अधिनायकवाद ने इस क्राँति को भी खोखला सिद्ध कर दिया। राष्ट्रीयकरण की गतिविधियाँ हमारे देश में भी चली किंतु इससे समस्या का वास्तविक समाधान तो हो नहीं सका, अपितु सत्ता का ढाँचा जरूर अस्त-व्यस्त हो गया। व्यसन
धर्म के शाश्वत नियमों जिनमें अपरिग्रह मूल है, का पालन आज के युग में और भी अनिवार्य हो गया है। उनके पालन में ही व्यक्ति का अपना तथा अपने समाज का हित है। यदि आज का यह भ्रमित मनुष्य पुनः उस राह पर नहीं चलता व शोषित वर्ग विद्रोह नहीं करता तो प्रकृति की दण्ड व्यवस्था तो ज्यों की त्यों है ही। इसे अक्षरशः सत्य मानना चाहिए कि आध्यात्मिक समाजवाद एक भवितव्यता है, सत्य है। लोगों को धर्म की संवेदना की धुरी पर नियंत्रित कर उन्हें उसी तरह समाजवाद की- साम्यवाद की धारा में वलात् मोड़ा जा सकता है जैसे कभी बुद्ध व महावीर के समय में हुआ था। तब भिखारी बनने में व समाज के नव निर्माण के लिए बढ़-चढ़ कर काम करने में लोग शान अनुभव करते थे। जो परिग्रह करता था वह निंदा की दृष्टि से देखा जाता था एवं सौ हाथों से कमाकर हजार हाथों से लुटाने वाले 'शत हस्तं समाहर, सहस्र हस्तं संकिर' अक्षय कीर्ति को प्राप्त होते थे। आज भी प्रायः वैसा ही समय है। समय रहते यदि मनुष्य न बदले तो समाज की बदलती दिशा धारा उसे स्वयमेव बदल देगी एवं जिनके पास बहुत अधिक है, छीनकर उसे लुटा देगी जिन्हें इसकी आवश्यकता है। इक्कीसवीं सदी यही संदेश लेकर आ रही है कि ओढ़ी हुई गरीबी ही शान की प्रतीक मानी जाने वाली है। मनुष्य समझदारी से यह कार्य स्वयमेव पहले कर ले तो उसी का हित है।
1940 में कार्लीटैकास को हंगरी का सर्वश्रेष्ठ निशानेबाज घोषित किया गया और जापान में होने वाले ओलम्पिक खेलों में सम्मिलित होने के लिए उसका चयन भी हो गया। परन्तु विश्व युद्ध छिड़ जाने से उसे खेल के मैदान की जगह युद्ध के मैदान में जाना पड़ा।
1945 में युद्ध समाप्त हुआ। सन् 48 में होने वाले ओलम्पिक की तैयारी प्रारम्भ हो गई। टैकास ने भी अपना अभ्यास शुरू कर दिया। अभी ओलम्पिक शुरू होने में दो वर्ष का समय बाकी था कि टैकास मोटर दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गया। इस दुर्घटना में उसका दाहिना हाथ कट गया। यह देखकर घर परिवार के लोग मित्र सम्बन्धी सभी दुःखी थे। जब हाथ ही नहीं रहा तो निशानेबाजी कैसी? उनकी सारी आशायें धूमिल हो गई। मगर आशा की ज्योति टैकास के मन में जीवित थी। घर के लोगों को दुखी देखकर वह एक दिन चुपचाप घर से निकल गया। लोग उससे मिलने तक की आशा छोड़ चुके थे।
सन् 48 में लन्दन में ओलम्पिक खेलों का आयोजन हुआ। निशाने बाजी की प्रतियोगिता में प्रथम आये खिलाड़ी का दाहिना हाथ नहीं था। लोग स्तम्भित एवं भरी आँखों से विजेता को निहार रहे थे। हंगरीवासी प्रसन्नता से उछल रहे थे। बायें हाथ से निशानेबाजी की चैम्पियनशिप प्राप्त करने वाला हंगरी निवासी कार्ली टैकास ही था। मनोयोग और परिश्रमशीलता यदि साथ रहें, तो व्यक्ति कुछ भी कर गुजरने में सफल हो जाता है।
'अलख! खोल दे पलक!' पाउडर के समान सफेद कोमल भस्म से सर्वांग लिप्त मूँगे, रुद्राक्ष, तथा स्फटिक की मणियों की मालाओं से विचित्र ढंग का श्रृंगार किए, कमर में बंधे घुँघरुओं से झनकार करते खप्पर लिए, झोली की भस्मी की चिटकी लोगों को बाँटते कानों में बड़ी मुद्राएँ पहिने एक नाथपन्थी साधु ने दरवाजे पर आवाज दी।
प्रायः यह साधु भिक्षा के लिए बहुत कम ठहरते हैं। अतः योगिराज श्यामाचरण लाहिणी ने कहा- 'जल्दी से साधु को भिक्षा दे दो।' पण्डित आशुतोष मुखर्जी स्वयं उठना चाहते थे। किन्तु गुरु के संकोच के कारण ठिठक से रहे। उन्होंने एक पात्र में चावल लिया और द्वार पर आ गये।
'तुम बहुत खिन्न दिखाई देते हो।' खप्पर में चावल डालते हुए भी साधु की दृष्टि मुखर्जी महाशय के मुख पर ही थी। 'जी, संसार के जंजाल पीछे लगे रहते हैं।' आशुतोष ने गोल मोल उत्तर दिया। अंततः एक साधु से और कहा भी क्या जा सकता है? 'तुम संकोच कर रहे हो।' साधु ने खप्पर का चावल बड़ी-सी झोली में डाल दिया। उस गुदड़ी की झोली में पता नहीं कितनी तहें थीं और उनमें क्या क्या भरा था। आखिर साधु की झोली जो ठहरी।
'महात्माओं से संकोच काहे का?' मुखर्जी महाशय ने सरल भाव से कहा किन्तु गृहस्थ के पीछे आपत्तियाँ रहती ही है, उनको सुनकर आपको भी खेद ही होगा।
'गुरु की कृपा से साधु उसे दूर भी तो कर सकता है?' साधु ने हँसते हुए कहा। उन शब्दों में अहंकार नहीं था, ऐसा कहना कठिन ही है। 'महापुरुष कर क्या नहीं सकते?' मुखर्जी बाबू एक सत्संगी साधु सेवी ओर धार्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे। 'किन्तु सबको अपना अपना प्रारब्ध भोगना ही चाहिए। तुच्छ नश्वर वस्तुओं के लिए महात्माओं से प्रार्थना करना मुझे ठीक मार्ग जान नहीं पड़ता।'
'तुम साधु की शक्ति में अविश्वास करते हो?' साधु पढ़ा लिखा तो वैसा नहीं था। उसने मुखर्जी की बातों का यही अर्थ समझा। उसे ऐसा निस्पृह कभी कोई मिला भी तो नहीं। 'नहीं भगवन्!' हाथ जोड़कर पण्डित जी ने कहा- वे जानते थे कि इस सम्प्रदाय में प्रायः सिद्ध होते हैं। यों भी साधु का अपमान करना उन्हें कहाँ अभीष्ट था?
'तब तो पूछता हूँ, बताओ!' आज्ञा का स्वर था।
'सरकारी लगान नहीं दे सका हूँ, उसका दावा हो गया है। एक महाजन ने अपने ऋण की डिग्री करा ली है, और सुनता हूँ कि आजकल में ही इस मकान की कुर्की आने वाली है। घर में स्त्री तथा दो बच्चे हैं और हाथ में कुछ है नहीं।' कहते हुए उनकी आँखों से आँसू की बूँदें गिरने लगी।
'कितने की आवश्यकता हे तुम्हें?' साधु ने इस प्रकार पूछा मानो अभी झोली में से निकाल कर दे ही देगा।
'सौ सरकारी लगान के और बारह सौ महाजन के दे पाऊँ तो रहने के लिए घर ओर खेत बच जावे। पेट के लिए भगवान कुछ करेंगे ही और यों भूखों भी तो दो-चार दिन रहा ही जा सकता है।' अश्रु पोछते हुए उत्तर मिला।
'डेढ़ हजार, अच्छा। चलो भीतर चलें?' साधु ने उत्तर की अपेक्षा नहीं की। वह दरवाजे से भीतर मकान में चल पड़ा और पण्डित जी चुपचाप पीछे हो लिये।
भीतर पहुँचकर साधु ने अपनी झोली में से एक पीतल की डिबिया निकालते हुए कहा- यह मेरे गुरु देव का प्रसाद है। उन्होंने मुझ पर बहुत प्रसन्न होकर दिया था। और इस से तुम प्रारब्ध के बनने बिगड़ने का खेल देख सकोगे।
'इससे क्या?' योगिराज श्यामाचरण लाहिणी ने पूछा।
'श्मशान में जाकर विधिपूर्वक शव सिद्ध करके प्रस्तुत किया हुआ अंजन। साधु ने बतलाया- 'यह साधन बड़ा भयंकर है और वहाँ अनेक प्रकार के भय उपस्थित होते है। यदि तनिक भी डरा तो मृत्यु या पागलपन निश्चित है।'
'तुम्हारे गुरुदेव ने इसे स्वतः सिद्ध किया था?' लाहिणी महाशय को कोई कौतूहल नहीं हुआ और मुखर्जी बाबू भी शान्त थे।
'वे सिद्ध महापुरुष थे। उनके अतिरिक्त इतना भयंकर साधन और कौन करेगा?' साधु ने सगर्व उनकी ओर देखते हुए कहा। अभी तक वह सामान्य वेशभूषा में बैठे लाहिणी महाशय को सामान्य आदमी समझ रहा था। कुछ रुक कर वह कहने लगा- इसमें बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है। बड़ी बुद्धिमत्ता से होता है। तनिक भूल से प्राण संकट में पड़ सकते हैं।
'लोगों की रुचि भी विचित्र है।' लाहिणी महाशय कहने लगे- 'देखा जाता है कि लोग केवल मनोरंजन के लिए हिमालय चढ़ते हैं, शेर से सामना करते हैं तथा और भी भयंकर कर्म करते हैं। अतः यदि कौतूहल के वशीभूत होकर तुम्हारे गुरुदेव ने इसे सिद्ध कर लिया तो कोई आश्चर्य नहीं।'
'और क्या, वे सिद्ध महापुरुष थे। उनको भला इसकी क्या आवश्यकता थी?' साधु ने कहा- उन्होंने तो खेल जैसा किया। मौज आयी और सिद्ध कर डाला।
'इससे तुम क्या करते हो?' उन्होंने पूछा।
'अभी तक तो कुछ नहीं किया है आज करना है।' साधु ने डिबिया खोली उसमें काला-काला अंजन था। अपनी दोनों आँखों में लगाने के उपरान्त उसने लाहिणी महाशय को भी लगाना चाहा। उन्होंने अस्वीकार करते हुए मुखर्जी महाशय की ओर संकेत किया।
'लगा लो, कोई हानि नहीं।' मुखर्जी महाशय लगाना नहीं चाहते थे। पर गुरु का आदेश समझकर उन्होंने दूसरी बार आपत्ति नहीं की।
यह क्या? कहीं दो हाथ नीचे, कहीं दस हाथ, पृथ्वी में चारों ओर द्रव्य ही गड़ा है। स्वर्ण मुद्राएँ हैं, कहीं रजत कहीं सोने की ईंटें है और कहीं चाँदी के पात्र। आभूषण और कहीं चाँदी के पात्र। आभूषण और रत्नों की ढेरी है स्थान स्थान पर। कहीं द्रव्य खुला हुआ हैं, कहीं संदूकों में है। कहीं तहखाने में है, कहीं मिट्टी के पात्रों में है और कहीं ताम्र या पीतल के कलशे भर हुए हैं बन्द पात्र भी बहुतेरे हैं। दो हाथ, चार हाथ अन्तर से सम्पूर्ण पृथ्वी जो नेत्रों के नीचे आती है, सब कहीं द्रव्य ही द्रव्य भरा हुआ है।
'इसे केवल तुम खोद लो।' साधु ने लोटे जैसे ताम्र पात्र को जो दो हाथ नीचे था, संकेत करते हुए कहा। वह स्वर्ण मुद्राओं से भरा हुआ था। आशुतोष महाशय ने योगिराज की ओर देखा। वे मुस्करा रहे थे। यों उन्होंने मना नहीं किया। कुदाल मँगाई गयी और मुखर्जी महाशय ने स्वयं हाथ लगाया। दो हाथ खोदने में लगती कितनी देर है? गड्ढा खुदकर प्रस्तुत हो गया।
लोटा कहाँ गया? वह तो खोदी हुई मिट्टी के नीचे है। मिट्टी हटाई गयी, लोटा वहाँ भी नहीं, वह चार हाथ नीचे भूमि में दिखाई पड़ा। जैसे उसमें जीवन आ गया हो और वह इन लोगों से वैसे ही भाग रहा था जैसे शिकारी से पक्षी। दो−तीन बार खुदाई और की गयी शरीर पसीने से लथपथ हो गया। कुदाली फेंक कर मुखर्जी महाशय बैठ गए। साधु का मुख सूख गया। योगिराज हँस रहे थे।
हँसते हुए वह कहने लगे- 'तुम्हारे गुरु ने क्या यह अंजन इसलिए दिया था कि गड़े धन को खोद लो।'
' प्रारब्ध का खेल देखने के लिए उन्होंने कहा था।' साधु समझ गया था कि गुरु का वाक्य समझने में उससे कहीं भूल हुई है।
'विश्व नियन्ता के खजाने में चोरी नहीं चल सकती। लाहिणी महाशय कह रहे थे। यह अपार कोष सृष्टि के आदि से भूमिसात् होता आया है। जिसका प्रारब्ध समाप्त हुआ वे मिट गए। उनके खजाने पर मिट्टी पड़ गयी अर्थात् विश्व संचालक ने उसे ढकेल दिया। अब जिसका प्रारब्ध जिस द्रव्य को प्राप्त करने का जब होगा, उस समय उसी व्यक्ति को मिलेगा। इस प्रकार खोदने से तो चोरों के प्रयत्न का दण्ड मिला करता है। तुम्हें दण्ड नहीं मिला यही बहुत समझो। द्रव्य तो हटा दिया ही जाएगा। इन्हीं द्रव्यों की रक्षा के लिए तो प्रेतों की एक योनि पक्ष है। वे उसकी रक्षा करते है और जिसके प्रारब्ध में वह है, उसके आने पर देकर छुट्टी पाते है।
'तब इस अंजन से क्या लाभ?' साधु ने पूछा।
'कौतुक। योगिराज ने बताया- 'इतना द्रव्य पृथ्वी में पड़ा है।' इतनी पृथ्वी खोदी जाती है, पर वह मिलता नहीं, लोग दीन-दुःखी हैं। प्रारब्ध समाप्त होते ही वह भूमि में दबा दिया जाता है।
अधिकारी को ही मिलता है। यह सब सर्वेश का कौतुक है। इन्द्रजाल है, इसे देखो और उसकी महिमा का स्मरण करो। इस कौतुक को देखने के लिए ही यह है। यही बात तुम्हारे गुरु ने तुमसे कही भी थी। 'व्यर्थ ही मैंने इसे लिया!' झुंझलाकर साधु ने वह डिबिया सामने की धूनी में डाल दी।
'यह कौतूहल पर निर्भर है।' योगिराज कह रहे थे- तमाशे यदि हमारे लिए व्यर्थ हैं तो बच्चों या देखने की रुचि रखने वालों के लिए व्यर्थ नहीं। हाँ, इसे लेने के बदले यदि तुम श्री गुरुदेव के चरणों को ही अंतर में लेते तो इस द्रव्य के बदले, तुम्हें चारों ओर ईश्वरी चेतना दिखाई पड़ती और तब यों पश्चाताप नहीं करना पड़ता।
मुखर्जी महाशय ने लाहिणी महाशय के चरणों में मस्तक रखा। उसे वे अपने अश्रुओं से भिगो रहे थे ओर दो हजार का बीमा लिए पोस्टमैन उनका द्वार खटखटा रहा था। एक सम्पन्न यजमान ने उनके पिछले वर्ष किए अनुष्ठान का फल प्राप्त कर लिया था और उसी की दक्षिणा आयी थी।
इटली के न्यूरिन विश्व विद्यालय के एक्स-रे विज्ञान के विशेषज्ञ मारियोपोजियो- उन दिनों कैंसर के इलाज के लिए शोध कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने किसी दूसरे प्राणी को न चुनकर अपने शरीर का ही उपयोग करना प्रारम्भ कर दिया।
जब उनकी एक हाथ की अंगुली काटी गई तो उन्होंने चिकित्सक से कहा- डॉक्टर! चिंता न कीजिए। एक तो बांया हाथ है यह फिर एक उंगली का ही सवाल है। चार उंगलियाँ तो बचेंगी ही।
पोजियो देखने में बड़े आकर्षक थे। रेडियम का स्पर्श उनके लिए प्राण घातक सिद्ध होता चला गया। उन्हें अपने दोनों हाथ कटवाने पड़े। उनके अनेक वैज्ञानिक साथियों ने उन्हें रेडियम से दूर रहने के लिए सावधान भी किया। पर उन्होंने अपने क्षीण होते हुए शरीर की तनिक भी चिन्ता न की। उन्होंने उत्तर दिया 'मुझे ही नहीं वरन् प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिए। कैंसर रोग से ग्रस्त व्यक्तियों की प्राण रक्षा के लिए इस प्रयोग का करना अनिवार्य है। यदि मेरे जीवन की आहुति से संसार के अन्य सैकड़ों व्यक्तियों की जीवन रक्षा होती है तो मैं सहर्ष तैयार हूँ और 71 वर्षीय उस तपस्वी वैज्ञानिक की कैंसर की खोज में जीवन लीला समाप्त हो गई।
आहार और आदत का परस्पर गहरा सम्बन्ध है। आहार को बिगाड़ कर आदत को सुधारा नहीं जा सकता, किन्तु भोजन यदि सात्विक हो तो आदत स्वतः सुधरती चली जाती है ऐसा विशेषज्ञों का मत है।
यहाँ आहार का तात्पर्य मात्र हाड़-माँस को पोषण देने वाले खाद्यान्न से नहीं है, वरन् वह सभी तत्व इस श्रेणी में सम्मिलित है जिन्हें हम बाहर से ग्रहण करते हैं। इस दृष्टि से प्राण-परमाणु, चिंतन-परमाणु, वायु-परमाणु आदि का आकर्षण यह सभी एक प्रकार के आहार हैं। व्यवहार परिवर्तन को यहाँ इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए, सिर्फ अन्न के संदर्भ नहीं।
यह सत्य है कि खाद्य-जीवन धारण में सहायक होता है। इस दृष्टिकोण से उसका महत्व तो है पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण वे तत्व है, जो जीवन को सुविकसित ओर समुन्नत बनाते हैं। प्राण हमारी काया को जीवित बनाये रखते हैं- यह सच है; पर मिथ्या यह भी नहीं कि यदि वह विकृत स्तर के अवांछनीय हुए, तो जीवन भी हेय स्तर का हीन बना रहेगा।
प्राण की ही चिन्तन की भ्रष्टता भी सम्प्रति लोगों को बुरी तरह जकड़े हुए है। भौंड़ी सोच सजातीय परमाणुओं को ही आकर्षित कर सकती है। यही कारण है कि विश्व स्तर पर इन दिनों विषम और विषाक्त वातावरण बना हुआ है जिधर दृष्टि जाती है उधर आगजनी राहजनी, चोरी, लूटपाट, डकैती, हत्या, अपहरण जैसे दृश्य ही नये नृत्य करते दिखाई पड़ते हैं।
ऐसा लगता है, मानों सदाचार को ही आज अपराधी के कठघरे में खड़ा होना हो और दुराचार दूध का धुला न्यायनिष्ठ हो, इसलिए निःसंकोच अपने विस्तार में संलग्न हो जबकि सदाशयता लुकती-छिपती शर्माती-सकुचाती बनी रहे। यह स्थिति चिंतन के उन विकृत परमाणुओं को खींचते रहने के कारण ही पैदा होती है जो नीतिमत्ता को अस्वीकारने और अनैतिकता अपनाने में अभिरुचि रखते हैं। जहाँ दुर्बुद्धि रहेगी, वहाँ दुश्चिन्तन ही पैदा होगा। खराब चिंतन सदा अपने समान गुणधर्म वाले अणुओं को आकर्षित करता है। जहाँ ऐसे विकारयुक्त चिंतन कणों की भरमार हो, वहाँ स्वभाव उदात्त बना रहे यह कठिन है ऐसे में यदि अन्न की प्रकृति सात्विक भी बनी रहीं तो परिणाम कोई बहुत उत्साहवर्धक प्राप्त होगा, इसकी आशा नहीं की जानी चाहिए।
ऐसे ही श्रोत, चक्षु, वायु के विकारग्रस्त परमाणुओं को ही लगातार ग्रहण किया जाता रहे और कोई यह सोचे कि मात्र खाद्य को नियंत्रित करके ही स्वभाव को बदल दिया जायेगा, तो यह उसकी भूल है। कान से हम अहर्निश अश्लील शब्द और संगीत सुनते रहें, आँख हमेशा भड़काऊ दृश्य देखती रहे, नथुनों से गन्दी हवा लेते रहें तो एक प्रकार से हम चेतना को और अधिक रुग्ण बनाने में ही मदद करते रहेंगे। चेतना यदि अपरिष्कृत स्तर की बनी रही तो प्रकृति को बदल सकना संभव नहीं। उल्लेखनीय है कि स्वभाव परिवर्तन की बात जब कभी कहीं जाती है तो इसका एकमात्र अर्थ चेतना की पवित्रता और प्रखरता से ही लगाया जाना चाहिए किसी अन्य संदर्भ में नहीं।
इतना सब बन पड़ने के उपरान्त ही अन्न की बारी आती है। इसी स्थिति में वह कोई प्रभावी परिणाम उत्पन्न कर सकता है इससे कम में नहीं। इसके भी अच्छे−बुरे दो प्रभाव हैं। सात्विक सुपाच्य भोजन की परिणति अच्छी देखी जाती है जबकि राजसिक और मानसिक प्रकृति के खाद्य का नतीजा क्रोध उन्माद उत्तेजना आवेश के रूप में सामने आता है। यह असामान्य स्थितियाँ है। व्यक्ति सामान्य संतुलन की अवस्था में न हो तो उससे अच्छे और संतुलित व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती। संतुलित व्यवहार वह है जिसमें व्यक्ति नम्र, शिष्ट, शालीन बनकर प्रस्तुत हो। यह सात्विक आहार द्वारा ही शक्य है। आहार की तामसिकता उस समय प्रकट और प्रत्यक्ष होने लगती है, जब कोई नशाखोर नशा में धुत होता है तो उसे संसार घूमता प्रतीत होने लगता है। सम्पूर्ण दुनिया और समस्त व्यक्ति बुरे दिखाई पड़ने लगते हैं। जगत का अकेला सज्जन सत्पुरुष वही है- ऐसा आभास मिलने लगता है इसीलिए मद्यपी प्रायः दूसरों की उपेक्षा करते गाली गलौज और मार-पीट करते दृष्टिगोचर होते हैं। सामान्य रह कर शिष्टों की भाँति आचरण करना उन्हें नहीं आता। यह आहार का असर हैं इससे रक्त में ऐसे रसायन पैदा होते है जो मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार के भावना, विचारणा, व्यवहार के केन्द्रों को उत्तेजित और सक्रिय करने लगते हैं। चूँकि प्रत्येक केन्द्र में दो विपरीत प्रकार की प्रवृत्तियाँ निहित होती हैं। अतः उनमें से जो पक्ष जाग्रत होता है व्यक्ति का प्रत्यक्ष व्यवहार वैसा ही होने लगता है। मादक द्रव्य एवं अभक्ष्य भक्षण आचरण के मस्तिष्कीय केन्द्रों के उस पहलू को उभारने लगते हैं, जो मानवी गरिमा के प्रतिकूल होते हैं। इसी कारण आदत बदलने के लिए उसमें अनुकूलता और पवित्रता विकसित करने के लिए विज्ञजन भोजन की सात्विकता पर विशेष बल देते देखे जाते हैं। खाद्य-सामग्री के इस प्रभाव को देखते हुए वैज्ञानिक अब मस्तिष्कीय क्षमता को घटाने और बढ़ाने वाले रसायनों की खोज में जुटे हुए हैं। उनका मानना है कि जब आहार के माध्यम से विशेष प्रकार के रसायनों के निमार्ण द्वारा मानवी प्रकृति को प्रभावित कर सकना सम्भव है तो फिर उनके द्वारा बुद्धि को घटा-बढ़ा सकना क्यों कर असंभव होना चाहिए? बुद्धि एक विशेष प्रकार के मस्तिष्कीय उभार का नाम है ऐसा वे मानते हैं और विश्वास करते हैं कि बुद्धि और स्मृति हर एक के लिए जरूरी नहीं। कारण बताते हुए कहते हैं कि मनुष्य की अक्ल जैसे-जैसे बढ़ती है वैसे ही वैसे वह उन्मादी और अहंकारी बनती जाती है। अहंकार जब सिर चढ़ कर बोलता है तो दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती है, जिसकी अन्तिम परिणति हत्या, अपहरण, प्रतिशोध के भिन्न-भिन्न तरीकों के रूप मैं सामने आती है यह बढ़ी-चढ़ी बुद्धि की करतूत है अस्तु ऐसे मामलों में कुशाग्रता को रसायन प्रयोग द्वारा घटा दिया जाना चाहिए जबकि समाज निमार्ण में जगी मानसिक क्षमता को इन उपचारों द्वारा और अधिक समर्थ बनाया जाना चाहिए। यह विज्ञान का तरीका है।
आयुर्वेद ने कुछ दूसरा ढंग अपनाया है उसने स्वतंत्र रसायनों के अनुसंधान की तुलना में जड़ी-बूटियों का अन्वेषण किया और बौद्धिक तीक्ष्णता को बढ़ाने वाला पृथक उपाय आविष्कृत किया। इस प्रकार ब्राह्मी, शंखपुष्पी, शतावरी, गोरखमुण्डी और जटामांसी आदि ऐसी औषधियां उसने खोजी जो स्मृति को बढ़ाती हैं जबकि विज्ञान रसायनों में उलझ कर रह गया। यों दोनों की प्रक्रिया लगभग एक ही है, फिर भी परिणाम में भारी अंतर देखा जाता है।
यहाँ चर्चा खाद्य पदार्थों और उसके प्रभावों की हो रहीं है और कहा मात्र यह जा रहा है कि बुद्धि किस प्रकार उनसे प्रभावित होती और आहार-भेद के हिसाब से शान्त-सात्विक एवं अशान्त-उच्छृंखल बनती रहती है। बुद्धि चिन्तन को संचालित करती और चिंतन से क्रिया तथा व्यवहार बन पड़ते हैं। इसी तरह भोजन के मूल में समग्र व्यक्तित्व छिपा होता है उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति छिपी होती है। इसे नियंत्रित कर लेने से व्यक्तित्व को काफी हद तक नियंत्रित कर सकना संभव है। यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि भोजन किस तरह हमारी आदतों का संचालन करता है। इस सम्बन्ध में शरीर शास्त्रियों का कहना है कि मानवी मस्तिष्क में अनेकानेक चैत्य केन्द्र हैं। इन केन्द्रों मैं से जो जाग्रत और जितने सक्रिय होते हैं, वैसी ही गतिविधियाँ व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती हैं। उनके अनुसार मनुष्य का सोना, हँसना, रोना, कल्पना, चिंतन, आनंद, स्मृति, बुद्धि, क्रोध, प्रेम, दुःख-सुख- यह सब उन उन केन्द्रों की सत्यता या निष्क्रियता पर निर्भर है। अनेक माध्यमों के अतिरिक्त इन्हें आहार से भी उद्दीपन मिलता रहता है। उपरोक्त गुणों में से किसे किस परिमाण में अपने अंदर पैदा करना है यह निर्णय करना व्यक्ति का काम है। इस आधार पर आहार निर्धारणा भी स्वयं करना पड़ता है। तत्संबंधी आहार के लेते रहने से अभीष्ट मस्तिष्कीय उद्दीप्त होने लगते हैं और धीरे-धीरे उनकी विशिष्टता व्यक्तित्व में परिलक्षित होने लगती है।
आयुर्वेद में भोजन की तीन श्रेणियाँ है शमन करने वाले, कुपित करने वाले, और संतुलन रखने वाले। कुछ भोज्य पदार्थ ऐसे है जो वात, पित्त, कफ का शमन करते हैं। कुछ ऐसे होते हैं। जो इन्हें कुपित करते हैं जबकि कई द्रव्य ऐसे भी हैं जो इन्हें संतुलित बनायें रखते हैं। इन त्रिदोषों का स्वभाव से गहरा संबंध है। भोजन द्वारा यदि इनमें से किसी एक को कुपित कर दिया जाय, तो उससे सम्बन्धित गुण भी उत्तेजित हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि चित्त को उत्तेजित करने वाले भोजन द्वारा उसे कुपित कर दिया जाय, तो उससे जुड़ा क्रोध वाला गुण भी कुपित हो जायेगा और व्यक्ति समय-समय पर बात-बेबात इसका प्रदर्शन करने लगेगा। इसी प्रकार यदि कफ कुपित हो जाय, तो लोभ भी भड़क उठता है और व्यक्ति लालची बन जायेगा। लाखों बार इस संबंध मैं कोई उपदेश सुन ले, पर फिर भी उसकी इस मनोवृत्ति में कोई अन्तर नहीं आता दिखाई पड़ेगा। उसकी यह आदत तभी मिट सकती है जब उसके कफ को नियंत्रित कर दी जाय। ऐसे ही वायु कुपित करने वाले पदार्थों के सेवन से व्यक्ति में डिप्रेशन या अवसाद स्वतः आने लगता है। प्रत्यक्षतः इसका कोई कारण नहीं होने पर भी भोजन के प्रभाव से वह उत्पन्न होगा और व्यक्ति को अपनी चपेट में ले लेगा।
इसी प्रकार आहार में मात्रा का निर्धारण भी महत्वपूर्ण माना गया है। तीन चौथाई पेट भरा और एक चौथाई खाली होना चाहिए। ऐसे ही
तत्वों के परिमाण निर्धारण भी अभीष्ट बताया गया है। नमक लाभकारी तभी है जब उसे आवश्यक अनुपात में ग्रहण किया जाय। अनावश्यक अंश में लेने से वह अहितकर साबित होता है। आयुर्वेद का एक सूत्र है- 'पिप्पलक्षारलवणनि नाधिकानि भोज्यानि' अर्थात् पिप्पल, क्षार और लवण का जरूरत से ज्यादा सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि विगत समय में कभी सौराष्ट्र के लोग नमक बहुत खाते थे। चीनी के स्थान पर भी वे नमक का प्रयोग करते थे। यहाँ तक दूध में भी नमक डाल कर पीते थे, इसलिए वे पुंसत्व खो बैठते और हृदय रोगों के शिकार हो जाते। अध्यात्म के आचार्यों का कहना है कि इस मार्ग पर चलने वाले लोगों को नमक का सेवन कम से कम या नहीं के बराबर करना चाहिए। उनके अनुसार ब्रह्मचर्य को साधने के लिए ऐसा नितान्त आवश्यक है, अन्यथा मन के भटकाव को रोक पाना संभव नहीं। रसना के असंयम के कारण मन यदि संयमित नहीं हुआ तो फिर 'काम' पर अंकुश रख पाना असंभव हो जाता है। कहने का आशय इतना ही है कि अन्नाहार न सिर्फ हमारे शरीर को वरन् मानसिक प्रवृत्तियों को भी भड़काने और नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए व्यवहार और आदत को साधने-सुधारने के लिए इस पर भी आवश्यक अंकुश रखना जरूरी है।
इतना जान लेने के उपरान्त इस सम्बन्ध में कोई संशय की गुँजाइश नहीं रह जाती कि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ बाहरी जगत से जो कुछ भी उद्दीपन ग्रहण करती हैं, वह सब चेतना के लिए एक प्रकार का भोजन है। अन्न जिस प्रकार हमारे मन को प्रभावित करता है, वैसे ही यह बाह्य उद्दीपन भी उसे प्रभावित करते रहते हैं। अतएव स्वभाव को संशोधित करने के संदर्भ में इस सम्पूर्ण और समग्र आहार को ध्यान में रखा जाना चाहिए। बात तभी बन सकेगी। इससे कम में नहीं।
यों पलकें तो आँखों की सुरक्षा के लिए होती हैं और सेकेण्ड के दसवें हिस्से से भी कम समय में झपकती रहती हैं; पर यदा-कदा इनका उठना-गिरना और तेज अथवा मंद हो सकता है। ऐसी दशा में वह व्यक्ति की उस स्थिति एवं परिस्थिति का परिचायक होती हैं जिससे वह उस समय गुजर रहा होता हैं। दूसरे शब्दों में सामने वाले की मनोदशा जानने समझने का वह महत्वपूर्ण माध्यम है और एक हद तक व्यक्ति की तात्कालिक अवस्था का पता उनसे लगाया जा सकता है।
वैसे तो पलकों का खुलना-बन्द होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें आँखों की सुरक्षा और सफाई ही प्रमुख होती है, पर देखा यह भी गया है कि जब व्यक्ति असामान्य अवस्था से गुजर रहा होता है, तो उस पर उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। उदाहरण के लिए जब व्यक्ति आवश्यकता से अधिक सावधान या सचेत होता है तो उसकी पलकें कम झपकती हैं। रुचिकर विषय अथवा वस्तु को पढ़ते-देखते समय भी यह गति स्वाभाविकता रूप से कम हो जाती है ऐसे समय इसकी रफ्तार प्रति मिनट लगभग छः बार होती है किन्तु जब विषय वस्तु सामने वाले के मन पसंद की न हो तो यह क्रिया तीव्र हो सकती है। वार्तालाप कर रहे दो व्यक्तियों में से कौन कितना एक दूसरे की बातों में रस ले रहा है यह उनकी पलकों की गिरने-उठने की गति से जाना जा सकता है जो ऊब या आलस्य महसूस कर रहा होगा उसकी अत्यधिक गतिवान पलकें यह बता देंगी कि श्रोता को वक्ता एवं उसकी बातों में कोई रुचि नहीं है।
इसी आशय का एक प्रयोग बर्लिन यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने किया। उन्होंने कुछ लोगों को संगीत की कुछ उबाऊ धुनें सुनायीं। आधे घंटे के इस प्रयोग के दौरान देखा गया कि सामान्य स्थिति में उनकी पलकें जितनी बार झपकती थीं, उसकी आवृत्ति इस मध्य बढ़ गई। परीक्षण को पुनः दोहराया गया; किन्तु इस बार धुन बदल दी गई। अबकी बार का संगीत सरस और सुरीला था, अतः इसका परिणाम भी पहले से विपरीत प्राप्त हुआ। पाया गया कि इस मध्य श्रोताओं की पलकें असाधारण रूप से कम झपकी। इस प्रयोग से यह सिद्ध हो गया कि रुचि-अभिरुचि, पसन्द-नापसन्द का कितना कैसा प्रभाव हमारी दृश्येंद्रिय पर पड़ता है। इस आधार पर सामने वाले का मनोभाव आसानी से जाना जा सकता है।
शोध से यह भी ज्ञात हुआ कि कार्य के दौरान बरती गई एकाग्रता एवं तन्मयता का स्पष्ट आभास आँख के खुलने बन्द होने की गति से सरलता पूर्वक मिल जाता है। उदाहरण के लिए चित्र बनाते समय चित्रकारों की पलकें अपेक्षाकृत कम उठती-गिरती हैं। यह उसके एकाग्र चित का द्योतक है। कवि जब अपनी कल्पना की दुनिया में खोता है, साहित्यकार अपने विचार प्रवाह में बहता है, कर्मयोगी किसी काम में निष्ठापूर्वक निमग्न होता है, संगीतकार कोई नई धुन की रचना कर रहा होता है तब भी उनकी पलकों के झपकने की गति कम होती है।
इसके विपरीत परेशान व्यक्ति की पलकें जल्दी-जल्दी उठती गिरती हैं। यदि व्यक्ति समस्याग्रस्त हो, किंकर्तव्यविमूढ़ हो, असमंजस की दुविधाजनक स्थिति में हो, तो भी आँखों के खुलने-बन्द होने की रफ्तार तीव्र होती है। पलकों का गिरना-उठना यह भी दर्शाता है कि व्यक्ति में कितना आत्मविश्वास है। एक आत्मविश्वासी अपनी बात को प्रकट करते समय अपेक्षाकृत न्यून पलकें झपकाता है जबकि उस व्यक्ति की, जिसका कथन अनिश्चय युक्त हो अथवा उसमें दृढ़ता का अभाव हो, तो उसके नेत्र जल्दी-जल्दी खुलते-बन्द होते हैं। साक्षात्कार के समय इस बात को स्पष्ट रूप से देखा अथवा अनुभव किया जा सकता है। वैसे परीक्षार्थी जिनकी तैयारी अच्छी होती है, अथवा जो आत्मविश्वास के धनी होते हैं, मौखिक परीक्षा के दौरान जवाब देते समय परीक्षक के आगे कम आँखें मुलमुलाते हैं, जबकि जिनकी तैयारी ठीक नहीं होती, जिन्हें स्वयं पर, अपने उत्तर पर भरोसा नहीं होता उनमें यह क्रिया अधिक तीव्र होती देखी गई है। पलक के झपकने की गति व्यक्ति के दबंगपन को भी अभिव्यक्त करती है। पाया गया है कि झेंपू या संकोची प्रकृति के लोगों में पलकों की रफ्तार अधिक तेज होती है, वहीं दबंग व्यक्तित्व की यह सुनिश्चित पहचान है कि उसकी पलकें किसी भी व्यक्ति के समक्ष प्रति मिनट कम झपकती हैं। डरपोक स्वभाव वाले लोगों की भी यही निशानी है कि उनमें आँख मुलमुलाने की प्रवृत्ति अधिक तीव्र होती हैं। कुछ हद तक झूठ और सच की पहचान भी इससे की जा सकती है। झूठ बोलने और सच्चाई को छिपाई का प्रयास करने वालों में पलक संचालन की क्रिया ज्यादा तीव्र होती है। दूसरी ओर सत्यवादियों, न्याय के पक्षधरों में इसकी गति मंद होती है। देखा गया है कि जो झूठ को सच का रंग चढ़ा कर प्रस्तुत करते है।
मशीन खराब हो जाय, तो उसके अन्दर के कल-पुर्जों की सुधार-मरम्मत करनी पड़ती है, कारण कि बाहरी श्रेष्ठता का महत्वपूर्ण आधार भीतरी विज्ञान है। वह यदि गड़बड़ा जाय, लड़खड़ा जाय, तो वाह्य ढाँचा ठीक दीखने पर भी वह किसी काम का नहीं रह जाता।
मनुष्य के साथ भी ठीक यही बात है। उसकी श्रेष्ठता, शालीनता और सज्जनता उसकी भीतरी सुव्यवस्था का सत्परिणाम है और यदि दुष्ट-दुर्जन है, तो इसका भी कारण अंदर की अव्यवस्था है। दोनों का आधार अन्तस् में स्थित है। वह यदि ठीक हो जाय, तो व्यक्ति के सुधरते देर न लगेगी और जहाँ व्यक्ति सुसंस्कृत हों, वहाँ का समाज भी सुसभ्य होगा, इतना सुनिश्चित है। यह एक महान आध्यात्मिक प्रयोग है। इससे गुजरे बिना बदलाव संभव नहीं। आज लोग बदलना तो चाहते हैं और विकास की आकांक्षा भी है, पर वह सब बुद्धि के स्तर पर, चेतना के धरातल पर नहीं। यहाँ एक बात जान लेना जरूरी है कि बुद्धि के स्तर पर परिवर्तन कभी संभव नहीं। जो शक्य है, वह इतना ही कि उस आधार पर नियंत्रण तो हो सकता है, रूपांतरण नहीं। यदि नियंत्रण हुआ भी, तो वह अस्थायी ही होगा और उसके उठते ही सब कुछ पूर्ववत् हो जायेगा। जो पहले परिवर्तन जैसा प्रतीत होता था, वह सब भ्रान्ति, नियंत्रण की तात्कालिक परिणति मालूम पड़ेगी।
संसार में साम्यवादी व्यवस्था एक प्रकार की क्रान्ति का परिणाम थी। वह भी अपने ढंग से समाज को सुधारना चाहती थी। पूँजीवादी व्यवस्था में जिन त्रुटियों से व्यक्ति-व्यक्ति के बीच जमीन-आसमान जितना अन्तर बन गया था, एवं जिसके कारण उस प्रणाली में चोरी, उठाईगिरी, बेईमानी, ठगी, अपराध, अपहरण, हत्या जैसे काण्ड होते थे, उसे मिटा कर एकता-समता जैसा वातावरण पैदा करना चाहती थी, किया भी, पर यह व्यवस्था कितनी, सफल रही, इसे समाजवादी देशों, विशेषकर सोवियत संघ के विघटन से भली-भाँति जाना-समझा जा सकता है। जिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार की कल्पना तक नहीं थी, वहाँ करोड़ों रूबल का घोटाला पकड़ा गया। अपराधी को मार दो-अपराध समाप्त हो जायेंगे-जहाँ सुधार संबंधी यह नीति रही हो, वहाँ इसके बाद भी अपराध और अपराधी प्रच्छन्न रूप से उद्भिजों की तरह पनपते रहे। आखिर क्यों? कारण एक ही है कि यह बुद्धि के स्तर पर अपनाया गया प्रावधान था। इसे परिवर्तन की तुलना में नियमन कहना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि जहाँ परिवर्तन घटित होगा, वहाँ फिर उसके पूर्व स्थिति में लौट आने की संभावना समाप्त हो जाती है। परिवर्तन सदा स्थायी होता है। अस्थायी तो नियंत्रण होता है, जिसके हटते ही पुरानी स्थिति वापस आ जाती है। कानून द्वारा दस्युओं को नियंत्रित करने और उनकी गतिविधियों पर रोक लगा देने का अर्थ यह तो नहीं हुआ कि डाकू, वाल्मीकि बन गये-उनका हृदय परिवर्तन हो गया। शायद इस मर्म को न समझ पाने के कारण संसार में आये दिन ऐसी व्यवस्थाएँ बनती और बिगड़ती रहती है। जिस दिन इसे समझ लिया जायेगा, उसी क्षण परिवर्तन घटित हो जायेगा। फिर बुद्धि के धरातल पर बदलाव सम्पन्न कर लेने का कोई दुराग्रह न करेगा।
इन दिनों यह आग्रह इसलिए बढ़ता दृष्टिगोचर हो रहा है, क्योंकि समय के साथ बुद्धिवाद बढ़ा है और सम्प्रति उसे सर्वोपरि तत्व के रूप में मान्यता मिली हुई है। यहाँ यदि कोई प्रगति करता है, तो उसके पीछे बुद्धिकौशल ही कारणभूत होना स्वीकार किया जाता है और किसी की अवनति होती है, तो उसका निमित्त भी बौद्धिक विपन्नता ही माना जाता है। इसलिए लोग सब कुछ बुद्धि के आयाम में ही सम्पन्न कर लेना चाहते हैं। उनके लिए स्मृति का विकास भी बुद्धि के स्तर पर होना चाहिए और एकाग्रता का विकास भी। यह कितनी बेतुकी बात है। जो केवल चेतना के स्तर पर घटित हो सकते हैं, उन्हें हम बुद्धि के आयाम में सम्पन्न करना चाहते हैं। यह नितान्त असंभव है। संभव यदि कुछ है, तो इतना ही कि तर्क, निर्णय, निष्कर्ष, शंका आदि ही बुद्धि के द्वारा हो सकते हैं। जहाँ इस बुद्धि का प्रयोग होगा, वहाँ शंकाएँ उत्पन्न होंगी, और तर्क भी पैदा होंगे, क्यों और कैसे के सवाल भी खड़े होंगे। यह स्वाभाविक है। भौतिक जीवन में आदमी यदि ऐसा न करे, तो उसे बहुत बड़ा धोखा हो सकता है। दलील न हो, तो प्रवंचना हो सकती है और संदेह के न होने पर ठगी की संभावना बनी रहती है। इससे बचने के लिए बुद्धिवादी मनुष्य को इन बौद्धिक आयुधों का आश्रय लेना ही पड़ता है, तभी वह अपनी लौकिक सफलता को कायम रख पाता है। न्यायालयों के निर्णय का आधार तर्क है। वहाँ इसी के माध्यम से सच-झूठ का फैसला होता है। जो वकील दलील देने में जितना कौशल का प्रदर्शन करते हैं, उनकी सफलता की संभावना उतनी ही अधिक आँकी जाती है, जबकि कमजोर पक्ष मुकदमा हारते देखे जाते हैं। इस हार-जीत में सत्य-असत्य का उतना महत्व नहीं, जितना इस बात का कि किसने कितने सटीक और सबल तर्क प्रस्तुत किये, भले ही वे झूठ क्यों न हों, पर विजय सर्वदा उसी की होगी। सच्चे पर निर्बल तर्क वालों को तो सर्वत्र पराजय ही झेलनी पड़ती है।
यह सब बुद्धि का चमत्कार है। इससे लौकिक प्रगति तो संभव है, पर जहाँ वैयक्तिक परिवर्तन या आत्मोत्थान की बात आती है, वहाँ यह असहाय जैसी बनी रहती है। इसके लिए तो और गहराई में प्रवेश कर प्रयोग के स्तर पर, अनुभव के स्तर पर, उतरना पड़ेगा, बात तभी बन सकेगी, विकास तभी हो सकेगा। सुधार की संभावना इससे कम में फलवती होती नहीं, कारण कि चेतना का जीवन-ध्यान का जीवन ही प्रयोग का जीवन है। कोई व्यक्ति उसे बुद्धि के आयाम में समझना चाहे, तो वह सफल न हो सकेगा-उसे समझ न सकेगा। आज तक ध्यान को जिसने भी समझा है, उसे प्रयोग के आधार पर समझा है-ज्ञान के आधार पर मीमांसा के आधार पर तर्क और बुद्धि के आधार पर नहीं। यही रूपांतरण की कुँजी है। जब यह कहा जाता है कि उसने स्वयं को सुधार लिया, आदतों को परिष्कृत कर लिया तो वास्तव में इसका आशय चेतनात्मक स्तर पर हुए प्रतिशोधन से है-असंतुलन को हटाने-मिटाने से यह सम्पन्न होता है। यह विकृति न हटे, असंतुलन न घटे, तो शायद सुधार-संशोधन की प्रक्रिया भी सम्पन्न न हो सकेगी। सुधार सदा अंदर ही करना पड़ता है, क्योंकि बिगाड़ का मूलभूत कारण वहीं मौजूद होता है। बाहर तो उसकी अभिव्यक्ति मात्र होती है। उसका निमित्त ढूँढ़ना हो, तो हमें चेतना जगत में डुबकी लगानी पड़ेगी और यह देखना पड़ेगा कि उस सूक्ष्म विकृति से कौन-से अवयव और संस्थान प्रभावित हुए हैं? किन ग्रन्थियों ने काम करना बंद कर दिया है? किन उपत्यिकाओं, किन मात्रिकाओं, कौन-से भ्रमरों, कैसी नाड़ियों और किस प्रकार के प्राणों के कारण जान लेने के उपरान्त चेतना विज्ञान के आधार पर उसका निवारण सरल हो जाता है।
आज दुर्भाग्य यह है कि व्यसनियों के दुर्व्यसन और व्यभिचारियों के व्यभिचार को दवा के आधार पर ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है। इससे तात्कालिक लाभ तो मिलेगा, पर कोई स्थायी सफलता मिल सकेगी, इसकी आशा नहीं ही करनी चाहिए। जब तक अन्तःक्षेत्र का परिमार्जन नहीं हो जाता, तब तक बाह्य व्यवहार बदल सकेगा, इसकी उम्मीद कम है। यही कारण है कि पाश्चात्य देशों में रोगों के शारीरिक उपचार के साथ-साथ मानसिक लेखा-जोखा लेने का भी प्रावधान है। मनोवैज्ञानिक पड़ताल के दौरान इसी प्रक्रिया को पूरा किया जाता है। इससे बीमारियों के इलाज में काफी सहायता मिलती है। कई बार जो मर्ज औषधि प्रयोग से ठीक नहीं होते, वे मनोवैज्ञानिक चिकित्सा से समाप्त होते देखे जाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि मनोविज्ञान, चेतना विज्ञान के काफी निकट है। इसमें मन की गहराइयों में व्यवहार की प्रतिकूलता का कारण खोजना पड़ता है कि किस मानसिक विकृति के कारण उक्त प्रकृति-दोष पैदा हुआ। हेतु ज्ञात हो जाने के बाद उस विकार को हटाने के लिए उपयुक्त सुझाव एवं संकेत रूप से अभ्यास किया गया, तो कुछ ही दिनों से रोगग्रस्त स्वस्थ होते देखे जाते हैं। यह अंदर की अध्यात्म जगत के समीप की प्रक्रिया है, इसलिए मनोविज्ञानी लोग आदतों को सुधारने में काफी हद तक सफल होते हैं।
शरीरशास्त्र की खोज इससे स्थूल स्तर की है। वह आदतों, अभ्यासों, दोष-दुर्गुणों का कारण शरीर स्तर का मानता और इसके लिए रस-स्रावों एवं ‘जीनों’ को जिम्मेदार बताता है। इन्हें यदि नियंत्रित किया जा सके, तो आदतों को बदल पाना सम्भव है, ऐसा विज्ञानवेत्ता कहते हैं, पर अभी तक कोई ऐसी विधा उनके हाथ लग नहीं पायी है, जिससे मनोभूमि को मनोनुकूल बनाया जा सके। अपवादों को यदि छोड़ दिया जाय, तो यही कहना पड़ेगा कि रसायनों से व्यवहार-परिवर्तन संभव नहीं। कभी यदि शक्य लगता प्रतीत होता भी है, तो यह स्थिति तभी तक बनी रह पाती है, जब तक औषधि-सेवन जारी रहता है। उसके बंद होते ही दशा पूर्ववत् हो जाती है। अतः इसे स्थायी परिवर्तन न कह कर अस्थायी नियंत्रण कहना ही समीचीन होगा।
यहाँ कहा यह जा रहा है कि बाहर यदि रूपांतरण सम्पन्न करना हो, तो उसका शुभारंभ भीतर से करना होगा। आज इसका उलटा हो रहा है। बाहर से बाहर को बदलने का-ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है। अल्सर पेट में हो और इलाज पैरों का चले, कैंसर रक्त में हो और दवा माँस में लगायी जाय-यह कितना उपहासास्पद है। कुछ ऐसे ही उपक्रम इन दिनों समाज सुधार के संबंध में अपनाये जा रहे हैं। विश्व भर में इस निमित्त बड़े-बड़े आंदोलन और अभियान रचे जा रहे हैं, जबकि समाज की इकाई व्यक्ति की उपेक्षा की जा रही है। सच तो यह है कि व्यक्ति निर्माण हो जाय, तो समाज सुधार स्वतः घटित हो जायेगा, क्योंकि समाज की आत्मा व्यक्ति है। वह यदि कलुषित बना रहे, तो समाजरूपी शरीर की व्याधि दूर होना मुश्किल है। आज भ्रष्टाचार, अन्यान्य, अत्याचार आतंकवाद, शोषण, उत्पीड़न दंगे-फसाद को रोकने के लिए विश्व भर में क्या कुछ उपाय नहीं किये जा रहे हैं, इतने पर भी तथ्य यह है कि दिन-दिन उनमें बढ़ोत्तरी ही हुई है। कारण स्पष्ट है-मूल काटने की जगह पत्तियाँ और टहनियाँ तोड़ने की अदूरदर्शिता अपनायी गई। इससे उसका विकास मंद तो पड़ा, पर सम्पूर्ण नाश न हो सका। इसके स्थान पर यदि व्यक्ति में आत्मानुशासन पैदा करने की कोशिश की गई होती, तो संभवतः अब तक बड़ी सफलता करतल गत हो चुकी होती, पर ऐसा न होना था, न हुआ। इसी कमी की पूर्ति के लिए युग निर्माण मिशन ने एक भगीरथ मुहिम चलायी और व्यक्ति को सुधार कर, समाज को बदल डालने का भीष्म संकल्प किया, जिसमें वह लगातार सफल होता चला जा रहा है। कायाकल्प का यही एकमात्र तरीका है। जहाँ यह सही रूप में लागू होगा, वहाँ परिवर्तन होता चलेगा-यह निर्विवाद रूप से सत्य है।
‘अस्वस्थ देह, अशान्त मानस अहंकार उन्मत्त मानव यदि सफल है, तो असफल कौन कहा जाएगा?’ वह आज पूर्णतः उत्तेजित है। आत्मघात करने वाले की उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर होती है। ऐसा क्षुब्ध व्यक्ति किसी का भी संकोच नहीं करता। वह बलात् खींच लिया गया, जब गंगोत्री में गंगा के प्रवाह में अपना शरीर समर्पित करने जा रहा था। इस बात ने उसे अधिक क्षुब्ध कर दिया था-आप कहते हैं कि मेरे पास सम्पत्ति है, अधिकार है, सम्मान है। मैं इतना सफल जीवन प्राप्त करके यह अनर्थ क्यों कर रहा हूँ। यह बात आपके-एक साधु के मुख से शोभा देती है? मानव जीवन के बहुमूल्य वर्षों को विनष्ट करके सतत् श्रम से स्वास्थ्य की बलि देकर धातु की चमकती राशि, कुछ रंगीन कागज के टुकड़े अथवा मूल्यवान कहे जाने वाले पत्थर पा लिए। मूर्खों के समुदाय ने अपना अग्रणी मान लिया अथवा प्रशंसा के पुल बाँध दिए। इस प्रशंसा एवं अधिकार ने अंतर की शाँति का अपहरण कर लिया इस पर आपका यह महाव्यंग कि मैं अत्यन्त सफल व्यक्ति हूँ?’
‘किन्तु अपघात का यह अनर्थ तुम्हें किस समस्या का समाधान देगा?' साधु ने शान्त स्वर में कहा-शेष प्रारब्ध से छुटकारा मिलना नहीं है। जीवन से असमय भागने का अपराध करके तुम अपने को अधिकतम दण्ड का भागी ही बनाओगे।’
‘हे भगवान्!’ वह दोनों हाथों से सिर पकड़कर बैठ गया और फूट-फूटकर रोने लगा।
‘भगवान करुणा वरुणालय है। उनका असीम अनुग्रह है तुम पर।’ ‘अन्यथा सुयश, सम्पत्ति, अधिकार के पीछे संसार के लोग पागल हैं। उन्हें पता तक नहीं चलता कि यह उन्माद उन्हें किस गर्त में ढकेल ले जा रहा है। अधिकार के साथ अशान्ति, सम्पत्ति के साथ चिन्ता, सुयश के साथ अहंकार आदि दोष रहेंगे ही। मनुष्य की सबसे बड़ी असफलता यही है कि वह इन्हें जीवन की सफलता समझता है। जब यह बात सूझने लगे तो समझना चाहिए कि माया नाथ ने अपनी माया यवनिका उठा लेने का अनुग्रह किया है।’
‘महाराज! मैं अधिक आस्थावान नहीं हूँ।’ उसने सिर उठाया। तत्त्वज्ञान, या आत्मसाक्षात्कार, ईश्वरदर्शन, निर्विकल्प समाधि आदि में मनुष्य की सफलता है मेरा ऐसा विश्वास नहीं है। जैसे सम्पत्ति, सुयश, अधिकार को महत्ता सुनते-सुनते संस्कार बन गया है कि इनकी प्राप्ति जीवन की सफलता है। वैसे ही ग्रन्थ पढ़कर अथवा आप लोगों से सुनकर समाधि आदि में महत्व बुद्धि हो जाती है। एक संस्कार चित्त में डालो अमुक अवस्था परम सफलता है और तब उस कल्पना को साकार करने में जुटो।
‘मुझे बहुत प्रसन्नता है कि तुम सचमुच समझदार हो।’ साधु उसे गंगातट से अपने आश्रम में ले आए। अग्नि के समीप बैठने के पश्चात् बोले ‘देखो, सुख की निर्बाध उपलब्धि ही प्राणियों का स्वाभाविक लक्ष्य है। सच्चा सुखी आप्तकाम पुरुष ही होता है और आत्माराम ही आप्तकाम होता है।’
‘आप्तकाम हुए बिना अशान्ति तो मिटती नहीं।’ उसने स्वीकार किया कामना के पीछे भागने में कितनी भी उसकी पूर्ति प्राप्ति होती रहे विश्राम कहीं नहीं है। भोग उलटे रोग का प्रसाद देता है।
‘अब विचार करके देखो। साधु गम्भीर बन गए मद और मत्सर पामर पुरुषों में होते हैं। पाप करना ही जिन्हें प्रिय है उनकी चर्चा अनावश्यक है। वे पतन के पक्ष पर लुढ़के जा रहे हैं। अब आप्तकाम होने में चित्त के चार विकार बाधक रह जाते हैं-मोह, लोभ, काम और क्रोध। मोह और लोभ विषयी पुरुष को अपनाते हैं। ये स्थायी विकार हैं। प्रत्येक अवस्था में ये बने ही रहते हैं। ये मंद गति से बहते हैं, किन्तु बद्धमूल होते हैं। इनको निर्मूल किए बिना कोई साधक नहीं बनता। लोभ और मोह का उन्मूलन जहाँ हो जाता है, वहाँ से परमार्थ पथ प्रारंभ हो जाता है। साधक में वैराग्य न हो तो साधन कैसे चलेगा और वैराग्य का अर्थ ही है लोभ और मोह का सम्यक् त्याग।’
भगवान ने तुम पर अनुग्रह किया है। तुममें वैराग्य आया है। लोभ, मोह से तुम ऊपर उठ चुके हो।’ कुछ क्षण रुककर साधु बोले अब काम और क्रोध के वेग को सहने की क्षमता उत्पन्न करो। जीवन की सफलता यही है कि मनुष्य इनके वेग को सह लेने में सक्षम हो। विश्वास करो जिस दिन तुम यह शक्ति प्राप्त कर लोगे आप्तकाम हो जाओगे।
‘काम और क्रोध तो निमित्तज हैं।’ वह उस दिन साधु के समीप से उठ आया और धर्मशाला के अपने कमरे में आकर सोचने लगा कोई प्रलोभन सम्मुख आयेगा तो मन में उसे प्राप्त करने की वासना उठेगी। कोई अपने अभीष्ट में व्याघात बनेगा तो उस पर क्रोध आएगा। तब ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता कि निमित्त प्राप्त ही नहीं हों।
गंगोत्री से वह लौटा, किंतु घर न आने का तो निश्चय कर चुका था। तीर्थयात्रा में लगा रहा कुछ काल और यह यात्रा भी उसकी हिमालय के पर्वतीय तीर्थों की ही थी। अन्त में एक एकान्त निर्झर के किनारे एक गुफा को अपना आश्रय बनाकर जम गया। पास के पर्वतीय ग्राम के लोग जैसे ही पहली बार दर्शन करने आए, उसने बता दिया कि केवल शाम को दो घण्टे ही गुफा से निकलकर बाहर बैठेगा और कोई स्त्री अथवा कन्या उसकी गुफा के पास कभी आयी तो यहाँ से चला जाएगा।
जप तथा गीता, भागवत् का पाठ, स्वाध्याय। बड़ा शान्त तथा आनन्दमय जीवन उसे प्रतीत हुआ। अपने साथ थोड़े से वस्त्र, दो कम्बल, एक लोटा, तथा गीता एवं भागवत् की पुस्तकें इतनी ही सामग्री लाया था। ग्राम के लोग उसे आटा, आलू, नमक तथा दूध दे देते थे। शरीर निर्वाह के लिए इतना सब पर्याप्त था।
‘कहो यतीन्द्र! प्रसन्न हो?’ अचानक एक दिन उसकी गुफा पर वे गंगोत्री वाले निरालम्ब स्वामी आ धमके। ये साधु भी बड़े विचित्र स्वभाव वाले होते हैं। हाथ जोड़ो-प्रार्थना करो, धरना तक दे डालो, ध्यान नहीं देंगे तो नहीं देंगे। किन्तु यदि किसी ओर ढल पड़े, फिर उसका पिण्ड भी नहीं छोड़ेंगे। अब पता नहीं कैसे उसका पता लगाकर ढूँढ़ते हुए आए हैं। आए और सीधे उसके आसन पर जाकर विराजमान हो गए।
‘मेरा सौभाग्य!’ वह हर्ष विह्वल हो उठा। चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम किया उसने।
‘सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य की बात पीछे देखी जाएगी। इस समय तो मैं तुम्हें यहाँ से निर्वासित करने आया हूँ। बैठो और स्थिर होकर सुनो। साधु ने उसके बैठ जाने पर कहा-तुमने अपने को भ्रम में डाल रखा है। कोई प्रलोभन सम्मुख न हो या स्वयं में शक्ति न हो, यह अकामता या काम विजय नहीं है। सब लोग सम्मान करें, सब अनुकूल आचरण करें तो क्रोध किसी को क्यों आएगा? साधक के लिए एकान्त आवश्यक है, किन्तु इससे अपने में आप्तकाम होने का भ्रम होता है। अच्छा हो तुम लोक में जाओ, देश और समाज को स्वयं की सेवाओं का लाभ दो। तुम्हारा परीक्षण भी हो जाएगा।
उसके अत्यन्त आग्रह करने पर भी स्वामी जी रुके नहीं। वे उसी समय चले गए। कठिनाई से उन्होंने थोड़ा दूध स्वीकार किया था। जाने पर उसने भी गुफा छोड़ दी।
वह हिमालय की तपोभूमि से समाज के कोलाहल पूर्ण क्षेत्र की ओर चल पड़ा। किन्तु यह अवतरण केवल शारीरिक नहीं रहा। उसे लगा कि वह मानसिक दृष्टि से भी हिमालय से नीचे गिर गया है। यह समाज यह अशान्त वातावरण, उसे लगता कि साधारण व्यक्ति भी उसकी अपेक्षा मानसिक दृष्टि से अधिक सशक्त है।
अब उसे कौन बताये कि उत्तेजक वातावरण में रहने वाले व्यक्ति का चित्त भी क्रमशः क्षीणसत्व हो जाता है। उसे उत्तेजना प्राप्ति के लिए अधिक उपकरण अपेक्षित होते हैं। यह बात भी वह कहाँ समझता है कि चित्त में एक साथ अनेक आवेग नहीं रह सकते। जिनके चित्त में मोह या लोभ जितने प्रबल हैं, उन्हें काम या क्रोध उतने कम अभिभूत कर पाते हैं। लोभी व्यापारी हँस कर अपमान सह लेने में चतुर होता है। किन्तु शुद्ध जल के सरोवर में सामान्य वायु भी लहरें उठाया करती हैं।
समाज में नारी ने अपने को अर्धनग्न रखना सभ्यता मान लिया है। अब कोई कहाँ तक नेत्र बन्द किए चल सकता है। लोग सादे वेश का ही उपहास करते हैं। तनिक वेश से धार्मिकता व्यंजित हो तो उस पर व्यंग करना आज के युवकों को अपना गौरव जान पड़ता है।
बड़ी व्यथा, बड़ी अशान्ति मिली है उसे इस वातावरण में आकर। वह तो उन्मत्त ही हो जाता यदि उसे अचानक वे साधु न मिल जाते। वृन्दावन वह आया तो भी उसे शान्ति नहीं मिली थी। बार-बार रोष आता है। कितना भ्रमित था वह अपने संबंध में।
बच्चे! साधु ने बहुत स्नेह पूर्वक उसके मस्तक पर हाथ रखा व्याकुल मत बन। ऐसा भवन नहीं बनेगा जो जीर्ण न हो मैला न हो। ऐसा शरीर नहीं होगा, जो रोगी न हो। यदि हो भी जाय, जैसा कि कुछ दिव्य देह अमर पुरुषों का है तो उसकी कोई महत्ता नहीं है।
‘शरीर स्वस्थ रहे या रोगी, मैं चिन्ता नहीं करता।’ उसने अश्रु भरे नेत्र उठाए। मैं यही कह रहा हूँ कि शरीर की चिन्ता से पागल मत रहा कर साधु ने स्नेह पूर्वक कहा ‘सूक्ष्म शरीर भी शरीर ही है बच्चे!’
‘भगवन्! यह ऐसे चौंका, जैसे पैरों के नीचे सर्प आ गया हो। भला इस बात से क्या तात्पर्य हो सकता है इन साधु को?’ काम और क्रोध स्थायी वृत्तियाँ नहीं है। वह समझने लगे-ये आवेग हैं, आँधी की भाँति निमित्त के संयोग से आते हैं। आने के पूर्व जिनका पता ही नहीं होता, उन्हें आने से ही तू कैसे रोकेगा? समष्टि में निमित्त आवे ही नहीं, किसी के वश की बात है?’
‘तब?’ केवल नेत्रों के भाव उसके पूछ रहे थे। शब्द वह चाहता भी तो कण्ठ से नहीं निकलते।
‘आँधी तो आएगी। आने का पता लगे तो भवन के द्वार बन्द कर ले।’ साधु ने अपनी बात की व्याख्या कर दी-काम और क्रोध के वेग तो आएँगे। आने पर सावधान होकर इन्द्रिय के द्वार बन्द करा इनका वेग क्रिया से शब्द से, शरीर की भाव भंगिमा से बाहर निकले शरीर छोड़कर ये बाहर जाएँ, इससे पहले ही इन्हें चित्त में शान्त कर ले। इनका वेग भीतर ही सहन कर लेने की क्षमता हो जाय तो तू आप्तकाम हो गया। सुखी हो गया। सफल हो गया।’
श्री बाँकेबिहारी के मन्दिर में एक कोने पर दीवाल से टिके वे दोनों आधे खड़े प्राय थे। मंदिर के पट खुल गए। गोस्वामी ने चिक उठाना प्रारम्भ कर दिया था। दोनों शीघ्रता से सम्मुख आ गये। निरालम्ब स्वामी ने वार्ता का उपसंहार किया थोड़े शब्दों में-अपने प्रयत्न से कोई कदाचित् ही सफल होता है। सफलता तो सदा प्रभु के श्रीचरणों में रहती है। इतना स्मरण रखा, तो तुझे अशान्ति स्पर्श नहीं करेगी। अब जा भारत माता तुझे पुकार रही है। माँ की बेड़ियाँ तोड़ने में अपने शौर्य, साहस का परिचय दे यतीन्द्रनाथ। अपने गुरु से मिलने वाले इस सफलता के सूत्र को समूचे देश ने सराहा और उन्हें नाम दिया-'बाधा जतीन’
प्रेम आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसे रत्नाकर सिन्धु के सदृश समझा जा सकता है। जिस तरह गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा आदि नदियाँ सरिता के रूप में स्थल-खण्डों में जब तक इधर-उधर भटकती हैं, तब तक उन्हें सरिताओं के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जाता है, पर जब ये सरिता-प्रवाह सिन्धु में समा जाते हैं, तब उनकी समूची शक्ति सामर्थ्य भी केन्द्रीभूत हो जाती है। अब उनका अस्तित्व रत्नाकर जैसा विशाल हो जाता है। मनुष्य के गुण भी इन नदियों की तरह हैं और इन सद्गुणों का पुंजीभूत रूप है प्रेम; वह प्रेम जो आत्मा की विशेषता है।
इसमें सारे गुण स्वतः ही समाये रहते हैं अथवा यों कहा जाय कि यहाँ सारे गुण विलीन हो निर्गुणत्व पा लेते हैं। इसी स्थिति को स्पष्ट करते हुए नारद भक्ति सूत्र में ‘सः हि अनिर्वचनीयो प्रेम रूप' कह कर परमेश्वर को प्रेम रूप घोषित किया है। यह ही परम तत्व है। इसी का बोध होने में ज्ञान की सार्थकता है। इसी आशय को संत कबीर अपनी वाणी में कहते हैं ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय।’ अर्थात् ढाई अक्षरों में ही निहित प्रेम के इस तत्व को प्राप्त कर लेने में ही पाण्डित्य की सार्थकता है।
इसमें ऐसा कौन-सा तत्व निहित है, जिसे जानने से सब कुछ जान लिया जाता है? सामान्यतः तो सब यही कहते हैं कि अमुक को पत्नी से प्रेम है। उसे बच्चों से प्रेम है, माँ से प्रेम है। इस सबसे कोई और श्रेष्ठ दूसरा प्रेम है क्या?
इस पर चिन्तन करने से ज्ञात होता है कि पत्नी बच्चों का अन्य किसी से किया जाने वाला प्रेम-प्रेम नहीं मोह होता है। इस मोह और प्रेम में विरोधाभास जैसी स्थिति है। यदि प्रेम को काया कहा जाय, तो मोह को छाया कहा जाना उचित होगा। दोनों में अंतर भी वही होता है, जो काया और छाया में है। एक सजीव होती है, दूसरी निष्प्राण। छाया को देखकर सजीवता का भ्रम तो होना संभव है, पर उससे काया का प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता।
प्रेम और मोह में एक अंतर और है। प्रेम चेतन से होता है मोह जड़ से। पत्नी आदि से किया जाने वाला तथाकथित ‘प्रेम’ उसके रूप लावण्यमय जड़ शरीर से होता है न कि चेतन स्वरूप आत्मा से, अतएव यह मोह ही है। इसकी जड़ की ओर उन्मुखता मात्र हाड़-माँस वाले शरीर धारियों तक ही सीमित नहीं रहती, वरन् लकड़ी, पत्थर, चूने के बने मकान से लेकर विभिन्न प्रकार के सामानों तक बढ़ जाती है; पर इसके विस्तार का क्षेत्र रहता जड़ ही है, जबकि प्रेम तत्व के जानकार महर्षि याज्ञवल्क्य ने बृहदारण्यक उपनिषद् में स्पष्ट किया है कि पत्नी-पत्नी होने के कारण नहीं, अपितु आत्मा के कारण प्रिय हो, सन्तान-सन्तान के कारण नहीं, आत्मा के कारण प्रिय हो, यही प्रेम की सच्ची परिभाषा है। यह स्थिति गीता के शब्दों में ‘यो मयि पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति’ के कारण है। सर्वत्र व्याप्त चेतन तत्व के कारण वह ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की स्थिति में रहता है। मोह जहाँ विभेद उत्पन्न करता है, प्रेम वही अभेद की स्थिति पैदा करता है, प्रेम व्यापक तत्व है, जबकि मोह सीमित-परिमित।
प्रेम का प्रारंभ सम्भव है किसी एक व्यक्ति से हो पर उस तक सीमित नहीं रह सकता। इसका चरमोत्कर्ष ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के रूप में होता है। यदि यह सीमित रह जाता है, कुछ पाने की कामना रखता है, तो समझना चाहिए कि यह मोह है। प्रेम में तो पाने की नहीं, देने की उमंग रहती है, जबकि मोह में लेने की स्वार्थपरता-संकीर्णता ही पनपती है। इसमें अनुदान की नहीं, प्रतिदान की अपेक्षा रहती है। प्रेम वस्तुओं से जुड़कर सदुपयोग की, व्यक्तियों से जुड़कर उनके कल्याण की और विश्व से जुड़कर परमार्थ की बात सोचता है। मोह में व्यक्ति, पदार्थ, संसार से किसी न किसी प्रकार के स्वार्थ सिद्धि की अभिलाषा रहती है। जिसके प्रति मोह रहता है, मात्र उसे ही अपनी इच्छानुसार चलाने उठाने की आगे बढ़ाने की वह बात सोचता है। इसमें तनिक-सा व्यवधान उत्पन्न होने पर खीज असंतोष का उद्वेग उमड़ता है और व्यक्ति को असंतुलित बना देता है। प्रेम में इस तरह की कोई बात नहीं है।
इसका अंकुरण निकट परिकर से आरम्भ होता है, पर जब यही विकसित, पल्लवित, पुष्पित होता है, तो इसकी शाखा-प्रशाखाएँ समस्त समाज-विश्व में फैल जाती हैं। घर परिवार तो प्रेम-साधना की पाठशाला मात्र है। इसमें उनकी प्रसन्नता और विकास की बात सोची जाती है। इसमें उठाये गये कष्ट में संतोष की अनुभूति होती है। यह आरम्भिक प्रशिक्षण है, पर जब अपने सगे संबंधियों की प्रसन्नता-समृद्धि के लिए उचित अनुचित का ध्यान नहीं रहता और आदर्शों की बलि दे दी जाती है, तो वह प्रेम नहीं रहता, मोह बन जाता है। इसे ही गोस्वामी तुलसीदास ने ‘मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला’ कहकर अभिहित किया है। सचमुच, यह स्वयं व जुड़े हुए व्यक्तियों, दोनों के लिए हानिकारक है।
प्रेम तो गंगा की जल की तरह पवित्र व निश्चल है, जिसे जहाँ भी डाला जाय पवित्रता ही पैदा करता है उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। विवेकशीलता, सहृदयता, पवित्रता, सदाशयता जैसे गुण इसमें समाये रहते हैं। प्रेमी जिससे भी प्रेम करता है, उसमें इन गुणों के अभिवर्धन के लिए सतत् प्रयत्नशील रहता है।
भाव-संवेदनाएँ नित्य-निरंतर उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति समर्पित रहें, यही प्रेम है। इसकी सीमा की संकीर्णता अपने में आबद्ध नहीं कर सकता। यह तो सूर्य की तरह है, जो उदयकाल के समय तो मात्र पूर्व को ही प्रकाशित करता है, पर मध्याह्न में इसके प्रकाश से समस्त दिशायें प्रकाशित हो जाती हैं। जिसके अंतराल में प्रेम प्रस्फुटित होता है, वह व्यक्ति देश, धर्म, संस्कृति और मानव जाति की सेवा-साधना में निरत हो जाता है।
जीवन के उत्कृष्टतम रूप में अभिव्यक्ति इसी माध्यम से होती है, यदि इसे हटा दें, तो मानव जीवन में फिर कोई विशेषता नहीं रह जाती। संत कबीर के शब्दों में-'जा घट प्रेम न संघरै सो घट जान मसान’ सचमुच उस भक्ति का हृदय श्मशान की ही तरह होता है, जिसमें विभिन्न दुर्गुण चिन्ता, संताप, असंतोष के भूत मंडराया करते हैं, ऐसा जीवन स्वयं के लिए एवं धरती के लिए भार स्वरूप ही होता है।
प्रेम की ज्योति सामान्य दीपक की ज्योति नहीं, जिसमें अनुताप हो, अपितु यह दिव्य चिन्तामणि की शीतल स्निग्ध ज्योति है, जिससे शरीर, मन, बुद्धि, अन्तःकरण प्रकाशित होते व सारे संताप शांत होते हैं। ऐसे व्यक्ति के सान्निध्य में जो भी आता है, उसे भी निर्मलता शीतलता का अनुभव हुए बिना नहीं रहता।
इसकी परिपूर्णता परमेश्वर में है या दूसरे शब्दों में इसकी पराकाष्ठा ही ईश्वर-प्राप्ति है। तत्ववेत्ताओं ने इसीलिए उसे ‘रसो वै सः’ कह कर वर्णित किया है, अर्थात् वह परम सत्ता रसवत् है, प्रेम व आनंद स्वरूप है। अतः प्रेम के शुभारम्भ को भगवद्-प्राप्ति का प्रथम चरण भी कह सकते हैं। आध्यात्मिक पुरुषों के विश्व इतिहास पर यदि दृष्टि निक्षेप करें, तो सभी का व्यक्तित्व इस दिव्य तत्व से ओत-प्रोत दिखाई पड़ेगा। गौरांग महाप्रभु ने जब प्रेम को परमेश्वर रूप में ग्रहण किया, तो वे ‘चैतन्य’ बन गये। रामकृष्ण ने जब इस तत्व के कर्म को आत्मसात् किया, तो वे ‘परमहंस’ बन गये। ऐसे ही जितने भी महापुरुष हुए हैं, सभी के हृदयों में इसका अजस्र प्रवाह बहता रहता था। बुद्ध का प्रेम जब उमड़ा, तो उनने अंगुलिमाल जैसे दुर्दान्त दस्यु को भी क्षमा-दान कर अपने धर्म में दीक्षित कर लिया। व्यक्ति जब प्रेम को परमेश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में ग्रहण करता है, तो उसे सर्वत्र सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् के ही दर्शन होते हैं और उसकी सारी शक्तियाँ विश्व-वसुधा को वैसी ही बनाने में नियोजित होती हैं।
परम सत्ता के स्थूल स्वरूप-विराट् ब्रह्म के प्रति इस प्रकार की घनिष्ठता से स्वतः ही वह क्षुद्र से महान, लघु से विभु, पुरुष से पुरुषोत्तम जैसी स्थिति में पहुँच जाता है। प्रेम की इस दिव्यता के जीवन में अवतरित होने पर उदात्त भावनाएँ उमड़ने लगती हैं। इस स्थिति में अन्तराल में सत्-चित्त-आनंद की वह त्रिवेणी बहती है, जिसमें अवगाहन कर व्यक्ति ऐसा दिव्य आनन्द प्राप्त करता है, जो प्रत्यक्ष त्रिवेणी-संगम में निमज्जन से भी सम्भव नहीं। ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’, ‘वासुदेवः सर्वमिति’ वेदान्त में वर्णित यही अद्वैत स्थिति है। गीता में इसे ही दूसरे प्रकार सब में अपनी अनुभूति करना कहा गया है। इस चरम स्थिति को पाना ही मनुष्य जीवन का ध्येय है। यहाँ तक पहुँचने के लिए मनुष्य को मोह रूपी छाया को छोड़ना तथा प्रेम की जीवन्त काया को पकड़ना होगा। यही जब परिपक्व होकर व्यापक विस्तार करता है, तो परमेश्वर स्वरूप धारण कर लेता है। इसीलिए प्रेम को परमेश्वर भी कहा गया है। श्री गुरु ग्रंथ साहब में कहा गया है-'जिन्हें प्रेम कियो तिन्हहिं प्रभु पायो, साँच कहौं सुन लेहौ सबही।’ प्रेम किया है, उसने ही प्रभुत्व का साक्षात्कार किया है व यह प्रेम अंतर्जगत से निकलने वाली वह अनुभूति है जो करुणा, स्नेह, संवेदना, आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना के रूप में प्रकट होती है। इसी प्रेम को आधार बनाकर स्वयं को प्रभुमय बनाया जा सकना नितान्त शक्य है।
ईसा ने उस दिन एक वेश्या का निमन्त्रण स्वीकारा और उसके घर भोजन को गये। सारा शिष्य समुदाय भी साथ चला।
चारों ओर काना-फूँसी चल पड़ी। यह कैसा भगवान का बेटा है। जो पापिनी से घृणा तक नहीं करता। शिष्यों में से धनादय और मुखरसिमोन ने अपने मन की बात ईसा से कह भी दी। “उद्धार करना है तो सज्जन ही क्या कम हैं जो आप दुर्जनों के यहाँ जाते और बदनामी सहते हैं।”
ईसा ने उलट कर पूछा-सिमोन यदि तुम चिकित्सक होते तो किसी जुकाम पीड़ित और शस्त्राहत रोगी में से किसे प्राथमिकता देते? तुम्हारा विवेक ऐसी स्थिति में तुम्हें क्या करने को प्रेरित करता?
सिमोन ने शस्त्राहत की प्राण रक्षा के लिए जुकाम पीड़ितों की तुलना में प्राथमिकता देने की बात कहीं।
ईसा ने फिर पूछा-यदि मैं अधिक पापी को सुधारने के लिए कम अपराधी की तुलना में प्राथमिकता देता हूँ तो उसमें भूल क्या हुई?
सिमोन चुप हो गये। वेश्या ने यह प्रसंग सुना तो सन्त की करुणा पर भाव-विभोर हो गई। दूसरे दिन वह वेश्या न रहकर सन्त हो गई। यह परिवर्तन जिसने भी सुना, ईसा के प्रति वह सहज ही श्रद्धावनत हो गया।
शरीर के सभी अंग अवयव स्वस्थ बने रहें, जीवनी शक्ति शिथिल न पड़े-हाथ पैर चलते रहें आँखों से सूझता रहे। कानों से सुनाई देता रहे। पाचन तंत्र ठीक से काम करता रहे और अकल भी ठीक बनी रहे तब यदि बुढ़ापा आ भी जाय तो बुरा क्या है। बुढ़ापा सही अर्थों में नफे का सौदा है। यही वह परिपक्व अवस्था है जिसमें बुद्धि अधिक स्थिर होती है। प्रचुर ज्ञान और अथाह अनुभव का भण्डार जमा होता है। किशोर और युवावस्था खेलकूद और घरेलू कार्यों में खटते ही बीतती है। उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर चैन की साँस इसी अवस्था में मिलती है। लोकसेवा, पर उपकार का उचित अवसर यही है। जिन्होंने बुढ़ापे को हलका-फुलका बिताने की बात पहले तय करली है वे उत्तरदायित्वों का बोझ प्रारम्भ से ही हलका रखते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो जिम्मेदारियों का गट्ठर जीवन के उत्तरार्ध तक सिर पर ढोते रहते हैं। उन नासमझों की बात जाने भी दे तो भी बुढ़ापा न घाटे का सौदा है न भार ही है।
बुढ़ापा भार तब बनता है जब असंयम बरतकर काया जर्जर कर डाली गई है अथवा गुण, कर्म, स्वभाव में इतने घटियापन का समावेश कर लिया गया है कि सामाजिक जीवन के उपयोगी गुण मिलन सरिता, व्यवहार और संबंध ही बिगाड़ लिये गये हैं अथवा समाप्त कर लिए गये हैं। तब निश्चय ही बुढ़ापा भार लगता है। इस अवस्था में अवलम्बन, सहायता, सहयोग की आवश्यकता पड़ती है और यह तभी सम्भव है जब अपना स्वभाव, व्यवहार मधुर विनम्र और अनुकूल हो। यदि हम किसी के काम आये हैं तब ही सम्भव है कि दूसरे का सहयोग समर्थन पा सके। समाज में इस हाथ दे उस हाथ ले का ही प्रचलन है। स्वार्थी, कर्कश और चालाकों को बुढ़ापे में मुसीबतों का सामना इसीलिए ही करना पड़ता है कि इधर उन्हें अशक्तता घेरती है उधर उन्हें सहायता सहयोग सहानुभूति मिलना बन्द हो जाते हैं।
विश्व के मूर्धन्य चिकित्सकों और विशेषज्ञों का कहना है कि बुढ़ापा कोई रोग है न अभिशाप वरन् कतिपय मानसिक क्रियाओं, भावनाओं, विचारणाओं के साथ शरीर में होने वाली विशेष प्रकार की प्रक्रिया है। बुढ़ापे का आयु विशेष से उतना संबंध नहीं है प्रत्येक व्यक्ति के लिए इसका समय भिन्न-भिन्न होता है। बुढ़ापे का कारण आंतरिक और बाह्य परिस्थितियाँ दोनों ही होती हैं। साधारणतः भारत में पचास वर्ष के उपरांत बुढ़ापे के चिह्न परिलक्षित होने लगते हैं। यह समय ऐसा होता है जब नव निर्माण की तुलना में कोशिकाओं का क्षरण अधिक होने लगता है। अतः पाचन−तंत्र, रक्त परिवहन आदि में व्यतिरेक और अव्यवस्था उत्पन्न होने लगती है और त्वचा, हाथ, पैर, आँख, कान आदि इन्द्रियों की कार्यक्षमता घटने लगती है। व्यक्ति में जीवनी शक्ति का अभाव होने लगता है और स्फूर्ति और सक्रियता सिमटने लगती है। यही बुढ़ापे के लक्षण है।
बुढ़ापे का संबंध आयु से कम और मनःस्थिति से अधिक है। कितने ही लोग असफलताएँ मिलने घाटा होने, स्वजन संबंधियों की मृत्यु के दुख से टूट जाते हैं उनकी हँसी-खुशी नीरसता, निराशा और अवसाद में बदल जाती है। वे जैसे-तैसे जीते तो हैं किंतु अंदर से खोखले हो चुके होते हैं। जीवन भी मस्ती और आनंद उनसे छिन जाते हैं। ऐसे लोगों को भी असमय बुढ़ापा घेर लेता है। भले ही सुविधा साधनों का अंबार लगा हो किन्तु वे मानसिक रूप से व्यथित रहते हैं और अनेकों रोगों के चंगुल में जा फँसते हैं। इसके विपरीत जो हानि लाभ, दुःख-सुख मृत्यु और जीवन को शाश्वत नियम मानते हैं और जितना चाहिए उतना पुरुषार्थ करते हैं वे निश्चिंत बने रहते हैं। ऐसे विचारशील, विवेकशीलों को बुढ़ापा भी देर से आता है अपेक्षाकृत उनके ये उतने चिन्तित व्यग्र, व्यथित, बेचैन भी नहीं देखे जाते हैं।
वैज्ञानिकों ने शरीर के हर अंग-अवयव का परीक्षण बड़ी बारीकी से किया है और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हृदय, फेफड़ा और अस्थियों में इस प्रकार की क्षमता है कि वे पाँच सौ वर्षों से भी अधिक सहज रूप से कार्य करते रह सकते हैं। किंतु यह तभी सम्भव है जब प्रकृति के नियमों के अनुरूप जीवन बिताया जाय। नशा, भक्ष्याभक्ष, चटोरेपन से बचा जाय। प्रकृति के नियमों के विपरीत कृत्रिम जीवन शैली अपना कर मनुष्य ने सबसे अधिक अपना अहित किया है। वैज्ञानिकों ने एक नवीनतम सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि शरीर सदैव एक जैसा बना रह सकता है क्योंकि इसके कोशाणु नित्य मरते जन्मते बदलते रहते हैं। यह नूतन प्रक्रिया बंद होती है मनुष्य की स्वयं की लापरवाही और असावधानी के कारण। वह वास्तव में स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के प्रति उतना सजग नहीं है जितना होना चाहिए।
कोलम्बिया विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी डॉ. एच सिक्स भी अनुसंधानों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आहार विहार संयम और मानसिक सन्तुलन यदि ठीक प्रकार बना रहे तो मनुष्य शरीर को रासायनिक प्रणाली को क्षति नहीं पहुँचती जिससे उसके अंग अवयव आसानी से लम्बे समय तक कार्य करते रह सकते हैं। यदि सब कुछ सामान्य बना रहे तो मनुष्य शरीर की भौतिक रचना इतनी सूक्ष्म और बेजोड़ है कि पाँच सौ वर्षों तक जीवित रहने पर भी उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। उनका कहना है कि अत्यधिक चिन्ताएँ, असंयम थकावट और परेशानियों का झंझावात ही शरीर को झकझोर कर रख देता है। इसके अतिरिक्त क्रोध, वासना, उत्तेजना नशा आदि दुर्व्यसन भी उतनी ही हानि पहुँचाते हैं। ये अपना अहित तो करते ही हैं आगामी सन्तति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालते हैं। अतः शांत, सरल, संतुष्ट और प्रसन्न स्थिति में ही जीवनी शक्ति अक्षुण्ण बनी रह सकती है।
बुढ़ापे में जीवनीशक्ति अक्षुण्ण बनी रहे इन्द्रियाँ क्रियाशील बनी रहे शरीर अवयव निरोग और स्वस्थ रहें इसके लिए आवश्यक है कि मस्तिष्क को निष्क्रिय चिन्तित, व्यथित, उत्तेजित होने से बचाया जाय। अन्यथा मानसिक दुर्बलता से शरीर की नवीन कोशिकाओं की वृद्धि पर बुरा असर पड़ेगा। प्रायः देखा गया है कि जिन्होंने शारीरिक परिश्रम अथवा मानसिक व्यस्त रहने की आदत छोड़ दी है उनमें निष्क्रियता पनपती है और उनके स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। सेवानिवृत्त कर्मचारियों का स्वास्थ्य प्रायः इसीलिए गिर जाता है कि उनकी व्यस्तता में कमी आती है ओर दिनचर्या अव्यवस्थित हो जाती है। एक सर्वेक्षण से यह भी ज्ञात हुआ है कि एकाकी जीवन जीने वालों का भी स्वास्थ्य खराब रहता है और अपेक्षाकृत आयु भी कम हो जाती है। साधु, संन्यासी संत वैरागियों की बात अलग है। किंतु पारिवारिक ओर सामूहिक जीवन जीने वाले यदि शुद्ध आचरण, शुद्ध वायु जल और भोजन सेवन करते हैं, तो उन्हें बुढ़ापा भी देर में आता है और दीर्घजीवी भी होते हैं।
डॉक्टर रेमण्ड पर्ल ने 90 वर्ष से अधिक की आयु वाले दो हजार व्यक्तियों का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला है कि उनके जीवन क्रम में सबसे बड़ी विशेषता थी आशावादी दृष्टिकोण, प्रसन्नता और निश्चिंतता। वृद्धावस्था का कारण बतलाते हुए गैलेट वर्केस ने अपनी पुस्तक ‘लुक इलेविन ईयर्स यंगर’ में लिखा है कि एकांत प्रिय मनोवृत्ति के व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक चिंतित, खिन्न, उदास और निराश देखे जाते हैं। ऐसे लोगों को बुढ़ापा जल्दी आ घेरता है। उदासी खिन्नता के रहते यों भी कोई सुखी, सशक्त और प्रसन्न नहीं रह पाता न उसके प्रयत्न उतने कारगर और सफल होते हैं। जिन्हें हलका-फुलका और दीर्घजीवन प्रिय हो उन्हें मिलन सरिता, उदारता विनम्रता जैसे सद्गुणों को अपने स्वभाव और आदत में सम्मिलित करने का प्रयास करना चाहिए प्रायः लोग बुढ़ापा आते ही घबराने लगते हैं कि अब मृत्यु समीप ही है और उन्हें मानसिक बेचैनी घेरने लगती है। किंतु विवेकशील, प्रकृति का शाश्वत नियम मानकर निश्चल बने रहते हैं और कर्तव्य कर्म में लगे रहते हैं। अपने अनुभव ज्ञान सामर्थ्य से फलदार और छायादार वृक्षों की तरह समाज को लाभान्वित करते रहते हैं। महापुरुषों के जीवन पर दृष्टि डाली जाय तो अधिकाँश ने अपनी वृद्धावस्था में महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित किये हैं कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर को उनकी साहित्य साधना के फल स्वरूप वृद्धावस्था में नोबुल पुरस्कार मिला। जर्मन कवि गेटे ने भी 80 वर्ष की आयु में अपनी महत्वपूर्ण कृति “फास्ट” पूर्ण की। इसी प्रकार बुढ़ापा आने से जब लोग निष्क्रिय होकर बैठने की सोचते हैं उसी समय में विश्व प्रसिद्ध उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने 82 वर्ष की अवस्था में अपने पिता से वह उत्तरदायित्व सम्हाला था और उसमें इतनी वृद्धि की कि विश्व के धनाढ्य व्यक्तियों में श्रेष्ठता प्राप्त की।
अकर्मण्य, आलसियों, सनकियों, बहमियों, दुष्ट, दुराचारियों का बुढ़ापा भले ही बुरा व्यतीत होता हो अन्यथा वृद्धों को सम्मान और श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। उन पर हर कोई विश्वास करता है। यह सम्मान और श्रद्धा यथावत् बना रहे ऐसा प्रयत्न हर वृद्ध और परिपक्वावस्था वालों को करना चाहिए। अच्छा हो वे लोकमंगल, लोकसेवा के कामों में रुचि लेकर निष्क्रियता से बचे रहे और व्यस्त बने रहकर अपने अनुभवों का लाभ समाज को देते रहें। यों बुढ़ापा आता सभी को है किन्तु विवेकशील वे हैं जो इसका लाभ पहुँचाते हैं। बुढ़ापा, अनुभव, ज्ञान और जानकारियों से भरी-पूरी फसल है। चतुर किसान की तरह इस संपदा का सदुपयोग और लाभ समाज को उठाना चाहिए।
कभी राम बन कभी कृष्ण बन, आये बारम्बार। लिया प्रभु, हर युग में अवतार॥
जब-जब की नर, ने मनमानी। कम हो गये-संत मुनि ज्ञानी॥
घुटने लगीं धर्म की साँसें। गड़ी मनुजता के पग फांसें॥
तब-तब दौड़े और बाँटा, धरती को प्यार दुलार॥ लिया प्रभु, हर युग में अवतार॥
बढ़े कष्ट भय नर के आगे। बुद्ध बने-वह हरने भागे॥
चली गुलामी की फिर आँधी। पीर मिटायी बनकर गाँधी॥
सत्य अहिंसा, विश्वप्रेम पर झुकता है संसार। लिया प्रभु, हर युग में अवतार॥
आज बढ़ी पाशविक दुष्टता। जीवन में है व्याप्त भ्रष्टता॥
भीत, त्रसित, कुंठित-मानवता-कहीं न दिखती है पावनता॥
बदले-मन मस्तिष्क दिया है प्रज्ञा का हथियार। लिया प्रभु, हर युग में अवतार॥
की है तप साधना निराली। नये सृजन की रास सम्हाली॥
मानव में देवत्व जगाने। स्वर्ग धरा पर ही ले आने॥
सत्साहित्य लिखा, व कर दिया पंथ नया तैयार। लिया प्रभु, हर युग में अवतार॥
-मायावर्मा
शिष्य हैं गुरुदेव के, गुरु-ऋण चुकाना चाहिये। अब समर्पण के सुमन, उनको चढ़ाना चाहिए॥1॥
किस तरह पूजन करें, करके दिखाया है हमें। किस तरह ऋण को चुकायें, यह बताया है हमें॥
बस यही पूजन, हमें करके दिखाना चाहिये। अब समर्पण के सुमन, उनको चढ़ाना चाहिये॥2॥
चल पड़े थे वे गुरु-आदेश का संबल लिये। कर दिया जीवन समर्पित, लोक मंगल के लिए॥
बस हमें भी अब यही साहस जुटाना चाहिए। अब समर्पण के सुमन, हमको चढ़ाना चाहिए॥3॥
पात्र बनने के लिए, गुरुदेव ने संयम किया। और फिर उस पात्र में, अनुदान गुरुवर का लिया॥
पात्र बनने के लिए, खुद को तपाना चाहिये। अब समर्पण के सुमन, उनको चढ़ाना चाहिए॥4॥
जो मिला अनुदान, उसमें तप स्वयं का जोड़ कर। बाँटने पीड़ितजनों को, चल पड़े वे दौड़ कर॥
विश्व पीड़ा शमन में, खुद को खपाना चाहिये। अब समर्पण के सुमन, उनको चढ़ाना चाहिये॥5॥
ज्ञान बाँटा जिन्दगी भर, विश्व के अज्ञान को। भर दिया सद्भावना से, अभावों से त्राण को।
ज्ञान-अमृत आज जन-जन को चखाना चाहिए। अब समर्पण के सुमन, उनको चढ़ाना चाहिये॥6॥
बस वही सामर्थ्य, गुरुवर! आप हम को दीजिये। ऋण चुकायें आपका, इस योग्य हम को कीजिये॥
अब हमें संवेदनाओं का खजाना चाहिए। अब समर्पण के सुमन, हमको चढ़ाना चाहिये॥7॥
- मंगल-विजय
(प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र अप्रैल 1973)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो, कई व्यक्ति हमारे बारे में पूछते हैं कि हिमालय में अज्ञातवास के समय की आपकी क्रम व्यवस्था क्या थी? भावी कार्यक्रम का जानना भी उनकी उत्सुकता का विषय रहता है और यह स्वाभाविक भी है कि जिनके प्रति अपनी आत्मीयता होती है उनके कुशल समाचार जानने के लिए, उनकी गतिविधियाँ जानने के लिए हर आदमी की इच्छा बनी रहती है। अपने ही परिवार के लोगों का ऐसा कुछ जानने की इच्छा रही हो तो कोई अचम्भे की बात नहीं। भूतकाल के संबंध में भी लोगों को थोड़ी ही जानकारी है और उसके साथ में भविष्य का संबंध किस तरह मिला हुआ है इसके बारे में पूरी जानकारी न होने से कई व्यक्ति कई तरह के अनुमान लगा लेते हैं और कई तरह के सवाल पूछते रहते हैं। उनके समाधान किये जायें, यह ज्यादा मुनासिब समझा गया। हममें से प्रत्येक व्यक्ति को जो मुझ में दिलचस्पी रखता हो उसको यह जानना चाहिए कि अपने जीवन का क्रम 15 वर्ष की उम्र से लेकर आज तक एक अज्ञात शक्ति के इशारे पर चलता हुआ चला आया है। 15 वर्ष की उम्र से पूर्व इस संसार में खाया हो, खेला हो, हँसा हो, सोचा हो, किया हो, बात अलग, लेकिन जब मैं 15 वर्ष का हो गया उस समय से लेकर के आज तक की जितनी भी गतिविधियाँ हैं उनका संचालन और उनकी धारणा अपने मन से नहीं की गयी, बल्कि ऐसी शक्ति के इशारे पर की गयी हैं जो अत्यधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं।
जब मैं 15 वर्ष की उम्र में पूजा की कोठरी में बैठा हुआ था तब एक दिव्य प्रकाश सामने आया और वह दिव्य प्रकाश एक दिव्यात्मा का था। वह प्रगट हुये, उन्होंने मेरे को दिव्य लोक के सारे इतिहास और सारे संकेत दिखाये, बताये और सुनाये। इनको जानने के बाद में, मैं समझ गया मैं कौन हूँ और मुझे क्या करना चाहिए। यह है आत्मबोध जो मुझे हुआ, वह हम में से हर एक को मिल सकता है। हम में से हर एक आदमी को यह प्रयास करना चाहिये कि हम ये कहें कि हम भूतकाल में क्या थे। हम भूतकाल में भगवान के अंश थे। हमको भगवान ने विशेष कामों से भेजा है। जिन लोगों में मेरे ही तरीके से आकांक्षायें उत्पन्न हुई हो उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उनके पूर्व जन्म में कोई न कोई दिव्य काम हुए हैं अन्यथा ये आकांक्षायें जो भगवान की इच्छानुरूप हैं उनके मन में पैदा न होती। ये आकांक्षायें हजारों तरीके से फैली हुई हैं और अनेक मनुष्य अनेक तरीके से उनमें दिलचस्पी लेते हैं। लेकिन बात मानने ही लायक है। इस समय भगवान का जो प्रवाह अंतरिक्ष लोकों में चल रहा है वह यह है कि मनुष्य का भावनात्मक नव निर्माण किया जाय। इसका आंदोलन जो युग निर्माण किया जाय। इसका आंदोलन जो युग निर्माण योजना के नाम से विख्यात है, यह भगवान का ही आंदोलन है और उन्हीं का क्रिया−कलाप है और उन्हीं की इच्छा का संकेत है। 15 वर्ष की उम्र में मुझे इसी संकेत की ओर प्रेरित किया गया और अग्रसर किया गया। उसी सत्ता ने जिसका कि मैं इशारा कर चुका हूँ और जिसको मैं गुरुदेव कहता हूँ और अपने आपकी संचालित सत्ता मानता हूँ, उन्होंने मुझे यह आदेश किया कि मुझे 24 वर्ष तक सब साधन करना चाहिए। सब साधन का अर्थ आत्म संशोधन की प्रक्रिया। आत्म संशोधन की प्रक्रिया मैंने 24 वर्ष तक की। जौ की रोटी खायी। जबान पर संयम रखा, कामेन्द्रियों पर संयम रखा और बराबर यह प्रयास किया कि प्रत्येक नारी को माँ, बहन और बेटी के तरीके से मानूँ। ये दो चीजें ऐसी हैं जो मनुष्य के भीतर अनायास ही शक्ति का ह्रास करती हैं। आदमी अपनी जीभ के ऊपर काबू करले और अपनी कामेन्द्रियों पर काबू प्राप्त करले उसको सिद्ध पुरुष बनने में कोई कठिनाई नहीं आती। आत्म बल सहज ही विकसित होता चला जाता है। इसी के लिए उन्होंने मुझे तप अनुष्ठान करने के लिए कहा। गायत्री मंत्र का जप करने के लिए कहा क्योंकि मेरे सामने एक लक्ष्य निर्धारित किया गया था और उस लक्ष्य को मुझे बार-बार समझना था और विचार करना था ‘वह था गायत्री मंत्र।’ गायत्री मंत्र लक्ष्य भी है, पूजा का विधान भी है, कर्मकाण्ड भी है। लक्ष्य क्या है? कि हम अपनी स्वयं की विचारणा की, बुद्धि को और विचारशीलता को ऐसा विकसित करें कि वह जीवन के लक्ष्य की ओर, भगवान की ओर, लोक मंगल की ओर निरन्तर बनी रहे। यही तो गायत्री मंत्र की शिक्षा है-धियो यो नः प्रचोदयात् बार-बार समझूँ, सोचूँ और हृदयंगम करूँ कि रोम-रोम में इस संदेश को और संकेत को बसा लूँ। मेरी बुद्धि का उपयोग मेरी विवेकशीलता का उपयोग मेरी जीवात्मा का उपयोग केवल उन कामों के लिए हो जिनका योग भगवान का संकेत है। यही शिक्षण गायत्री मंत्र का था।
गायत्री का मैंने जप तो किया, लेकिन जप के साथ-साथ में यह भी ध्यान रखा कि वह विचारणाएँ, शिक्षायें और प्रेरणायें मेरे हृदयंगम होती रहें। प्रत्येक जप के साथ प्रत्येक माला के साथ प्रत्येक उपकरण के साथ जप कर लिया करूँ जो कर्मकाण्ड मुझे बताया गया उसमें दीपक के रूप में मैंने एक अखण्ड दीपक की स्थापना की। अखण्ड दीपक जलाया बेशक, लेकिन, साथ-साथ में भावनाओं को भी तदनुरूप बनाया जिस तरीके से अखण्ड दीपक अखण्ड जलता रहता है बुझता नहीं उसी तरीके से हमारा जीवन प्रवाह ज्ञानमय हो, बुझने न पाये, टूटने न पाये श्रृंखला बिगड़ने न पाये। बीच-बीच में हमको अधःपतन की ओर गिरने का मौका न आये, ठोकरें नहीं लगे, चोट नहीं लगें और इस प्रकार निर्धारित नियत और सुनिश्चित निशान की ओर हम बढ़ते हुए चले जायें और दीपक के तरीके से प्रकाशवान होकर प्रकाश पैदा करें, अपने भीतर प्रकाश पैदा करें और अपने बाहर भी। स्नेह से भरे हुए रहें, सद्भावनाओं से भरे हुए रहें-यही तो सब दीपक के संदेश थे। अखण्ड दीपक जलाया गया और वह इम्तहान का दीपक मेरे भीतर और बाहर भी जलता रहा। हर जगह उसकी प्रेरणायें आगे विकसित होती हुई चली गयीं। 24 वर्ष इसी प्रकार से निकल गये। इसके पश्चात् फिर वही मार्गदर्शक वही मेरे गुरुदेव सामने आये। उन्होंने कहा, तुम्हारे अनुष्ठान पूरे हुए हैं? मैंने कहा, इस मायने में पूरे हुए कि मैंने जो नियम लिया था जो व्रत लिया था, उनको बगैर डगमगाये, बिना इधर-उधर पैर हटाये, बिना अवरोध लगाये, बिना दौड़-भाग के शांत चित्त से एक ही स्वर करता रहा। अपनी निष्ठा में रत्ती भर भी कभी भी कमी नहीं आने दी। परिस्थितियाँ खराब आयीं तो क्या, अच्छी आयीं तो क्या, मुसीबतें आयीं तो भी कभी मैंने यह ख्याल नहीं किया कि मेरे अनुष्ठान के कारण से ही यह होता है भगवान मेरी इतनी भी सहायता नहीं करते फिर मैं क्यों अनुष्ठान करूँ? कभी भी संकट में भी श्रद्धा में कमी नहीं आयी, इस मायने में सफल हो गया। सुख आये, सुविधायें आयीं कभी उत्साह नहीं आया। दुख और कठिनाई आयीं तो कभी मैं निराश नहीं हुआ, न मैंने भगवान को दोष दिया, न मैंने भगवान से कुछ इच्छा की। ये बातें अगर अनुष्ठान की सफलता के लिए काफी हों तो सफल हो गया। इस मायने में अगर अनुष्ठान की सफलता साबित की जाय उससे कोई लाभ मिला कि नहीं, कोई चमत्कार दिखायी पड़ा, कोई रोशनी मिली, कोई चमत्कार, कोई लाभ, कोई महात्मा, कोई सिद्धि ऐसा कुछ मिला तो कहूँगा कि मेरा अनुष्ठान सफल नहीं हुआ। ऐसी कोई अनुभूति नहीं हुई इस तरह कि जैसा आम लोगों को ख्याल है कि जप कर लेने के बाद अनुष्ठान कर लेने के बाद, हवन कर लेने के बाद ऐसा दिखायी पड़ता है, ये आता है, वह दीखता है, यह सिद्धि आती है, ये बात आती है ऐसा मुझे कुछ नहीं हुआ। इस मायने में असफल रहा।
गुरुदेव मुझे मिले थे 24 वर्ष बाद प्रकाश के रूप में मेरे घर, और उन्होंने यह कहा, ठीक है तुम्हारा अनुष्ठान सही है। किसी भी तपस्वी का योगाभ्यास असफल नहीं होना चाहिए, मैं यही परखने के लिए आया था। बस, मुझे यह मालूम हुआ कि वास्तव में अब तुम्हारा काम पूरा हुआ। अब तुमको यह देखना चाहिए कि यह जो जप पूरा हुआ है इससे क्या कोई प्रभाव उत्पन्न होता है। इसका शायद विश्वास तुम्हें भी न हो इसलिये इसमें विश्वास कर लेना चाहिए। इसके लिए पुनरावृत्ति के रूप में सहस्र कुण्ड यज्ञ का आयोजन करना चाहिए। मैंने कहा मुझे तो विश्वास है अपने आपके ऊपर और मेरी सत्ता के ऊपर। मुझे अविश्वास करने की जरूरत क्या है। उन्होंने कहा, नहीं ऐसा है यह जो शक्ति है आत्मशक्ति क्या भौतिक जगत में भी कुछ काम कर सकती है? क्या इसके द्वारा संसार में भी कुछ प्रभाव डाला जा सकता है? यह शायद तुम्हें यकीन न हो, इसके लिए हम एक प्रयोग कराते हैं और यह प्रयोग तुम्हारे लिए विशेष उपयोगी होगा, समाज के लिए भी। क्या प्रयोग? सहस्र कुण्डी यज्ञ। सहस्र कुण्डी यज्ञ वास्तव में एक अचम्भे की चीज है। मैंने स्वयं इस बात को महसूस किया है। और लोगों ने भी इसको देखा है। वास्तव में अनोखी चीज ही कहना चाहिए उसको। कहते थे लोग 5000 वर्षों में पाण्डवों का वह यज्ञ जो कि राजसूय के नाम से विख्यात था और जिसे कृष्ण भगवान ने चलाया था उसके बाद में दूसरा ही नंबर इसको कहा जा सकता है। कई विशेषतायें थीं उसकी। आयोजन तो आये दिन होते रहते हैं। काँग्रेस के आन्दोलन और भी बड़े होते हैं। मेरे आयोजन और भी बड़े होते हैं। कुम्भ का मेला और भी बड़ा होता है, लेकिन उसकी कुछ विशेषतायें और ही थीं। एक व्यक्ति द्वारा इतने व्यक्तियों को आमंत्रित किया जाना, उसके बुलाने पर इतने व्यक्तियों का इकट्ठा हो जाना, उनके खाने-पीने का बिना मूल्य लिए हुए प्रबंध करना, उसकी व्यवस्था के लिए कोई पहले से घी या कोई गेहूँ इकट्ठा न किया जाना, धन राशि न लिया जाना, इतने बड़े आयोजन में कोई घटना का न होना, कोई चोरी इत्यादि का न होना, इतने आदमियों को इस तरीके से प्रभावित होते जाना, अनुशासित होते जाना-ऐसी असंख्य व्यवस्थायें हैं जो आज तक किसी आयोजन में नहीं हुई। उन्होंने गुरुदेव ने मुझसे कहा कि आयोजन की सफलता और विशेषतायें तुम्हें इस रूप में लेनी चाहिये कि ये सब तुम्हारे तप और पुण्य का परिणाम है। तप और पुण्य चाहे तुम्हारे पास हो चाहे किसी के पास भी हो, यह परिणाम निकलते हैं कि इस बात के जिसे तुम विश्वासपूर्वक कह सकते हो स्वयं से भी और लोगों से भी। इसीलिये इस आयोजन का विशेष रूप से उल्लेख किया गया।
ऐसा ही हुआ, बहुत सफल आयोजन हुआ। खुद बैठा रहा, कहीं गया भी नहीं, केवल घर बैठे निमंत्रण भेजे जिनको जानता पहचानता नहीं था, लाखों आदमी इकट्ठे हो गये ऐसे व्यक्ति जो अत्यधिक, महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। सामान्य भीड़-भाड़ जो मेरी सभाओं में आती है उस तरह के नहीं, बल्कि गणमान्य व्यक्ति उत्सुकता में आये और यज्ञ सम्पन्न हुआ। सहस्रों लोगों ने उसको देखा, कितना पैसा खर्च हुआ, कितनी व्यवस्था बनी लोग हैरत में रह गये कि आखिर कैसे हो गया। किसी ने जादू समझा, किसी ने तमाशा समझा, किसी ने किसी राजा महाराजा का आयोजन समझा, किसी ने चन्दा समझा, किसी ने क्या समझा, किसी ने क्या नहीं? कह नहीं सकता, लेकिन वास्तविकता यह थी कि वह मेरे गुरुदेव का चमत्कार कहिये अथवा उनकी प्रसन्नता का चमत्कार कहिये, बस, वही हुआ, और वह अपने समय पर बड़ा सफल हो गया और मेरे विश्वास की वृद्धि हुई। मुझे यकीन हो गया कि संसार में भी इस तत्व शक्ति के द्वारा भुगतान किया जा सकता है, इसे गायत्री की शक्ति भी कह सकते हैं, उपासना की शक्ति भी कह सकते हैं, इसको साधना की शक्ति भी कह सकते हैं। बस, वहाँ से इशारा चला मेरा उसी क्रम से मेरे लिये वह भी उतना ही महत्वपूर्ण था कार्य कौन-सा जो कि 24 वर्षों की उपासना प्रारंभ की थी मेरे लिए वह श्रद्धा का विषय था। वह श्रद्धा ज्यों की त्यों बनी रही, बल्कि ज्यादा ही बढ़ी। बस, सहस्र कुण्ड यज्ञ हो गया।
सहस्र कुण्ड यज्ञ से लेकर के मेरे गुरुदेव ने मुझे फिर 20 साल के लिए कुछ काम करने के लिए कहा। दस साल का उन्होंने एक खण्ड बताया। 10 साल में उन्होंने मुझे संगठन और प्रचार का कार्य सौंपा। गायत्री मंत्र और यज्ञ ये भारतीय संस्कृति के मूल हैं और इसी संस्कृति के मूल को देश और देशान्तरों में स्वीकृति करने के लिए मुझे बताया गया। वही किया गया। गायत्री परिवार बनाया गया। उसके लाखों की संख्या में सदस्य बने। हजारों की संख्या में शाखायें स्थापित हुई। जगह-जगह हजारों यज्ञ हुए। ये सारे का सारा प्रचार जो फैलाया गया है, गायत्री का साहित्य लिखा गया है, गायत्री मंत्र और यज्ञ को लेकर के 10 साल मैंने लगाये जो कि 24 वर्ष के बाद आरम्भ हुए थे ओर इसमें यदि 15 वर्ष पहले को भी जोड़ लिया जाय तो 50 वर्ष पूरे हो जाते हैं। इस तरीके से मैं क्रिया−कलाप में लगा रहा। क्रिया−कलाप के बाद में उन्होंने एक वर्ष के लिए मुझे अपने पास बुलाया हिमालय। एक वर्ष के लिए मैं हिमालय चला गया। कहाँ रहा, इसका थोड़ा-सा विवरण ‘सुनसान के सहचर’ नाम से आँशिक रूप में अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुआ था। वह बड़ी महत्वपूर्ण घटना है। लोग कहते हैं जहाँ आप गये थे, कहाँ गये थे? क्या करते रहे थे? हिमालय पर तो बहुत से लोग रहते हैं। हरिद्वार से हिमालय शुरू हो जाता है, कैलाश तक चला जाता है और कहाँ तक चला जाता है-पाकिस्तान में फैला हुआ है और बर्मा तक चला गया है। हिमालय में न जाने कितने हजार आदमी रहते हैं। हिमालय में कोई अच्छी भी जगह है बेकार जगह भी है। हिमालय में जो जन रहते हैं वहाँ झाड़ियाँ हैं, वहाँ बंदर रहते हैं, सिद्ध पुरुष भी रहते हैं। हिमालय अपने आप में न बुरा है न भला है, लेकिन मुझे जहाँ जिस स्थान पर रहने के लिया भेजा गया था वह अत्यधिक महत्वपूर्ण था। उसको हिमालय का हृदय या आध्यात्मिक ध्रुव कह सकते हैं। उस स्थान पर आज से 10-11 वर्ष पूर्व मैं एक साल के लिए रहा। मैं गंगोत्री भी रहा, उत्तरकाशी भी रहा। इन दोनों स्थानों पर रहा लेकिन मूल क्या है जो शक्ति का स्रोत था मुझे वहाँ मिला जहाँ मेरे गुरुदेव रहते हैं। उसको हिमालय का तीर्थ कहा जा सकता है। गायत्री तप का ध्रुव कहा जा सकता है।
पृथ्वी का ध्रुव-उत्तरी ध्रुव व दक्षिणी ध्रुव प्रख्यात है। वहाँ की परिस्थितियाँ बड़े अचम्भे की हैं। लोगों ने पुस्तकें भी पढ़ी हैं। ऐसा मालूम पड़ता है किसी जादू की बात कही जा रही है उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के बारे में। ये ध्रुव ऐसे हैं कि चारों ओर से पृथ्वी पर जो कवच चढ़ा हुआ है उस कवच में से ब्रह्माण्ड की अनेक शक्तियाँ घुसने नहीं पाती। उत्तरी ध्रुव में से ही होकर आती हैं और सारी पृथ्वी पर फैल जाती हैं। ये शक्तियाँ आवश्यकतानुसार पृथ्वी पर रह जाती हैं और बाकी दक्षिण ध्रुव में से होकर के फिर वह ब्रह्माण्ड में फैल जाती है। ऐसा कवच पृथ्वी पर न होता तो ग्रहों से और नक्षत्रों से जो किरणें आती हैं सारे जगत को जला डालतीं और हमारी धरती भी उसी तरीके से वीरान हो जाती जिस तरह से बृहस्पति, मंगल, बुध इत्यादि दूसरे ग्रह सुनसान और वीरान पड़े हुए हैं। यह भी हो सकता है कि इसके ऊपर एक कवच चढ़ा हुआ है और उसके भीतर से शक्ति के सूक्ष्म मात्रा में ही आदान-प्रदान होते हैं। हिमालय का जो केन्द्र ध्रुव हैं जहाँ मेरे गुरुदेव रहते हैं यहाँ का फैलाव बद्रीनाथ से हिमालय की दूसरी छोर तक है। इसके बीच का जो भाग है वही हिमालय का केन्द्र है और इसकी लम्बाई-चौड़ाई में समझता हूँ तीन-चार सौ मील चौड़ी और सौ-पचास मील लंबी होनी चाहिए। यही शंख के नाम से पहले प्रख्यात था। यही पुराणों में भी मिलता है कि यहाँ शिवलिंग पर गंगा का अवतरण हुआ था शिवलिंग पर्वत यहीं है, सुमेरु पर्वत वहीं है सुमेरु यज्ञ पाण्डवों ने वहीं किया था, सुमेरु लिंगम् वहीं हैं, स्वर्ग गंगा वहीं हैं। यही वास्तव में कैलाश था और यह भी प्रतिपादन किया था कि इसके समीप में एक छोटी-सी झील है जिसका नाम मान सरोवर होना चाहिए क्योंकि मानसरोवर और कैलाश के बारे में जो पौराणिक वर्णन मिलता है वह उस तिब्बत वाले कैलाश से जरा भी सम्मति नहीं खाता। तिब्बत वाला कैलाश और मानसरोवर किस कारण से मान लिया गया मैं कह नहीं सकता। लेकिन अगर सही रूप में ढूँढ़ा जाय तो ऐसे असंख्य प्रमाण मैंने अखण्ड-ज्योति में छापे हैं जिनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि असली कैलाश और मानसरोवर वही है जहाँ मेरे गुरुदेव निवास करते हैं।
मैं उस स्थान पर रहा, वहाँ की कितनी ही विशेषताओं को मैंने देखा उसको वर्णन करना सम्भव नहीं है। वहाँ कितने सिद्ध पुरुष रहते हैं और वहाँ के वातावरण में कितनी विशेषता और महत्ता हैं, उसका वर्णन करना सम्भव है लोग यकीन न करें। जब तक देखा नहीं जाता, तब तक गप्प भी माना जा सकता है, इसलिए उस पर विचार करना मेरे लिए मुनासिब नहीं है। उन स्थानों पर चार दिन मैं अपने गुरुदेव के पास रहा। उनको जो कुछ भी मुझसे कहना था उन्होंने कहा, जो कुछ भी संकेत करने थे किये, जो भावी कार्यक्रम के रूप में हिदायत करनी थी वह की, और जो मुझे शक्ति का एक अंश देना था वह चार दिनों में उन्होंने दिया। चार दिन की शक्ति को लेकर मैं चला आया। साल भर तक मैंने उसको पकाया, हजम किया। खाना खाने में तो थोड़ी देर लगती है, भोजन तो आदमी आधे घण्टे में ही कर लेता है, बीस मिनट में भी कर लेता है, लेकिन हजम करने में बारह घण्टे लग जाते हैं। गुरुदेव ने जो शक्ति मुझे चार दिन में दी थी, उसको हजम करने में, पचाने में, और जुगाली करने में साल भर लग गया। इस तरीके से मैं एक साल गंगोत्री और हिमालय और उत्तरकाशी रहा वहाँ जो उन्होंने तप और अनुष्ठान बताये थे वह मैं करता रहा, जहाँ-जहाँ रहा, वह ऐसे स्थान थे जिनको दिव्य कह सकते हैं। भागीरथ ने जिस शिला पर बैठ कर तप किया था, वहाँ मुझे भी तप और अनुष्ठान करने का मौका मिल गया। जहाँ परशुराम जी ने तप करके कुल्हाड़ा शंकर जी से प्राप्त किया था, उसी स्थान पर उत्तरकाशी में रहने का मुझे भी मौका मिला। इस तरीके से एक साल व्यतीत करने के बाद मैं फिर आ गया और दस साल के कार्यक्रम जो मुझे सौंपे गये थे, वह मैंने सँभाल लिये।
दस साल में युग निर्माण योजना का दूसरा अध्याय सौंपा गया। युग निर्माण योजना का कार्यालय तथा गायत्री तपोभूमि का निर्माण मिला कर जो किया वह मेरे पहले दस साल के पूर्व की कमाई थी। मेरा दूसरा कदम-दूसरा काम था युग निर्माण योजना नाम से एक केन्द्र की स्थापना जहाँ से फिर सारी गतिविधियाँ चालित की गयीं। बौद्धिक क्राँति, नैतिक क्राँति और सामाजिक क्राँति को क्रियान्वित करने का प्रबन्ध किया गया। विचारात्मक, रचनात्मक और संगठनात्मक कार्यक्रमों का ढाँचा खड़ा किया गया। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण का नारा लगाया गया। स्वच्छ मन, स्वस्थ शरीर और सभ्य समाज का निर्माण करने की रूपरेखा बनायी गयी। इन सारे के सारे क्रिया–कलापों का दस वर्षों में विस्तार हुआ। मैं समझता हूँ कि इन तीनों कार्यक्रमों के बारे में कितना विस्तार हुआ है, इसका वर्णन करने की यहाँ आवश्यकता नहीं है। वह लोगों को दूसरी जगह से पढ़ना चाहिए और दूसरे तरीकों से मालूम करना चाहिए। इसको संक्षेप में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह कार्य हुआ व असाधारण हुआ। साहित्य लिखा गया वैज्ञानिक व आध्यात्मिक समन्वय की रूपरेखा ठीक समय पर रखी गयी और उसका पत्रिकाओं के माध्यम से विस्तार हुआ। अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और उसका प्रकाशन हुआ। यह सब दस वर्ष के भीतर सम्भव हुआ। एक लाख व्यक्तियों की सृजन सेना बनकर खड़ी हो गयी और वह अपने-अपने क्रिया−कलाप में लग गयी। सक्रिय कार्यकर्ता, कर्मठ कार्यकर्ता और पुरवासी मान कर अपने-अपने क्षेत्रों में अपने दिल से कमर बाँध कर खड़े हो गये और वह कार्य जो असम्भव दिखाई पड़ता था सम्भव दिखायी पड़ने लगा।
मनुष्य में देवत्व का उदय और पृथ्वी पर स्वर्ग का अवतरण किसी जमाने में ख्वाब समझा जाता था। यह माना जाता था कि ऐसे क्रिया−कलाप मनुष्यों के द्वारा संभव नहीं है। कभी भगवान चाहेगा तभी ऐसी बड़ी सफलता मिल सकती है, क्यों मिलेगी, लेकिन ऐसा मालूम होता है कि वह सारी जो कल्पनायें थीं तिलस्मी अब साकार होने जा रही हैं और साथ ही बहुत कुछ सम्भावना है, क्योंकि सामने ही आ रही हैं। लोग यकीन कर रहे हैं कि हाँ ऐसा होना संभव है। पर यह आंदोलन किसी जमाने में छोटे से आंदोलन के रूप में था और यह विश्वव्यापी भी बन सकता है। इस तरीके से 10 वर्ष मुझे वहाँ रहना पड़ा।
जब बैटरी की शक्ति खत्म हो जाती है तो उसे चार्ज करने के लिए भेजा जाता है और उसको डाइनेमो से लगा देते हैं फिर उसको दूसरी बैटरी से संबंध कर देते हैं। जब चार्ज हो जाती है तो फिर वह काम करती है फिर मुझे एक साल के लिए स्वयं बुलाया गया था। मैं गुरुदेव के पास गया, चार दिन उनके पास रहा, जैसे दस साल पहले रहा था। चार दिन उनके पास रहने के बाद में फिर मुझे कहीं दूसरी जगह भेज दिया गया और फिर मैं वहीं रहा और तप करता रहा। मैं कहाँ रहा? क्या करता रहा? वह बताने का विषय नहीं है। पहले बताने की बात थी सो मैंने लोगों को बता दिया था कि मैं गंगोत्री रहा था, और उत्तरकाशी रहा था। अब मेरे मुँह पर पर्दा डाल दिया गया है कि मैं वह न बताऊँ कि मैं कहाँ रहा और मैंने क्या किया, इतनी बात संक्षेप में है कि मैं हिमालय के ही गर्भ में रहा और वहाँ जा करके मैंने अपनी आत्म साधना की क्रियापद्धति को ही काम में लाया। इस तरीके से फिर मुझे जाना पड़ा फिर माताजी के बीमार होने पर पंद्रह दिन के लिए मैं उनके पास आया। फिर तीन दिन के लिए चला गया। इस तरीके से एक वर्ष पूरा करने के बाद फिर मुझे लोक शिक्षण का कार्य सौंप दिया गया। जबकि एक साल पहले तप करने का मुझे मौका दिया गया था। ऐसे ही इस साल भी एक वर्ष का तप करने का मौका दिया गया। इसके बाद फिर मुझे पाँच वर्षीय कार्यक्रम में लगा दिया गया है। अब की मेरी यह कार्य अवधि केवल पाँच वर्ष की है। पहली दस साल की रही, इससे पहले दस साल की थी, उससे पहले चौबीस साल की थी। इस तरीके से 44 साल की जो योजना थी, बढ़ गयी। ये पाँच वर्ष की है। भगवान जाने उसका क्या काम है? अब की बार दस वर्ष का कार्यक्रम मुझे दिया गया है। कह नहीं सकता जीवन का समय कितना रह गया हो। यह नहीं पूछा कि मुझे आगे क्या करना पड़ेगा। मैं मानता हूँ कि जो काम सौंप दिया गया है वह भी क्या कम है। उसमें क्या कमी हो सकती है। उसमें क्या करने के लिए क्या कम गुँजाइश नहीं है जो कि मैं आगे की बात सोचूँ। आगे वाली बात सोचना उनका काम है जिनको मैंने अपने आपको सौंपा हुआ है। आगे मुझे क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए, यह मस्तिष्क का भार मैंने उन्हीं के ऊपर डाल दिया है। अब मुझे पाँच वर्ष का काम है। इन पाँच वर्षों में मुझे क्या करना होगा, यह कार्य मेरे लिए निर्धारित हो गया है ओर यह भी निर्धारित हो गया है कि थोड़े समय में मुझे बार-बार हिमालय जाना पड़ेगा। जिस तरीके से आदमी रात में सो जाता है और जागने पर फ्रेश हो जाता है, इसी तरीके से मैं आध्यात्मिक भोजन के लिए और कुछ शक्ति लेने के लिए और अपनी थकान मिटाने के लिए वहाँ चला जाया करूँगा और इस बीच में हर साल कुछ शक्ति ले कर आया करूँगा। जो कि पाँच साल के लिए निर्धारित कार्यक्रम के लिए मुझे सौंपी गयी है। इस तरीके से यह क्रम बराबर जारी रहेगा।
साँप से नेवले की लड़ाई होती है। नेवला बार-बार जाता है कुछ जड़ी-बूटी खा करके आता है फिर साँप से लड़ाई लड़ता है, फिर साँप काट देता है, और जहर उसके शरीर पर चढ़ जाता है। उस जहर को दूर करने के लिए फिर वह कहीं जाता है और जड़ी-बूटी खा के आता है फिर साँप से लड़ाई लड़ता है। साँप और नेवले की लड़ाई जिन लोगों ने देखी है, उन्होंने यह घटना भी देखी होगी कि नेवला भाग कर के जाता है और कुछ जड़ी-बूटी खा करके आता है। जड़ी-बूटी खाने वाले नेवले के तरीके से मुझे भी बार-बार हिमालय जाना पड़ेगा और बार-बार वहाँ से शक्ति लेकर के आना पड़ेगा, क्योंकि अब की बार जो साँप है बहुत बड़ा साँप है। पहली बार तो सीधे सादे काम थे। संगठन करना सीधा सादा काम था। किसी से लड़ाई लड़नी नहीं थी मुझे संगठन करने से लेकर साहित्य लिखने व अन्य कार्यों तक। ये सभी सुगम काम थे। कोई ऐसा मुश्किल काम नहीं था जिसमें आदमी का कोई जोखिम हो लेकिन अब की बार जो कार्य हैं बहुत ही महत्वपूर्ण और अत्यंत भयंकर अधिक शक्ति खर्च करने वाले हैं।
इस तरह जिस तरीके से मैं वहाँ से शक्ति लेकर आया था, ठीक उसी तरीके से मैं भी एक लाख मनुष्यों का इस बीच में शक्ति का सौवाँ अंश देने वाला हूँ। मैंने 24 वर्ष में जो तपश्चर्या की थी और मुझे जो अंश मिला वह बहुत बड़ा मिला, कारण मैंने अपने को पाक-साफ रखा। अपना परिष्कार किया दूसरे लोगों ने जिन्होंने निखार नहीं किया है उनको इतनी आशा नहीं करनी चाहिये कि उसका अंश मुझको मिल जायेगा, क्योंकि जिसके पास पात्र जितना बड़ा होगा उतना ही तो उसे मिलेगा चाहे बक्सा कितना ही जबरदस्त क्यों न हो। बादल की घटायें कितनी ही बड़ी क्यों न हों। पर पात्र से अधिक कैसे मिलेगा। इसलिए मैंने जिन लोगों को बुलाया है और जिन्होंने पात्रता का जितना विकास कर लिया है उतना उनको जरूर मिल जायेगा। लेकिन जिनकी पात्रता नहीं होगी उनको यह आशा नहीं करनी चाहिये। यद्यपि बुलाया है तो कुछ न कुछ लेकर ही जायेंगे। लेने के लिए जरूरी है कि शक्ति धारण करने के लिए गुँजाइश हो। धारण करने के लिए गुँजाइश न हो तब कैसे हो सकता है? प्राण प्रत्यावर्तन शिविरों में सबको तो बुलाया नहीं जायेगा। लेकिन जिन लोगों को बुलाया है उनको उनकी पात्रता के अनुरूप शक्ति का एक अंश जरूर मिलेगा और यहाँ से जाने के बाद वह ऐसा काम कर सकेंगे जिससे उनको देखकर मुझे भी संतोष हो सके और उन्हें भी संतोष हो सके और समाज को भी संतोष हो सके। इस तरीके से प्रत्येक प्रत्यावर्तन शिविर में एक बार में लगभग 20 व्यक्ति बुलाये जायेंगे। कारण यह है कि जितनी शक्ति संग्रह होगी उससे अधिक लोगों को बुला लेने पर उनको कुछ दिया नहीं जा सकेगा। छोटा-सा मीटर लगा हुआ हो और बत्तियाँ बहुत जला दी जायें तो सब बत्तियों को रोशनी नहीं मिलेगी, कुछ बुझ जायेंगी या टिमटिमायेंगी। ज्यादा बत्तियाँ जला दी जायेंगी तो मीटर खराब हो जायेगा और फ्यूज चला जाएगा। इस तरीके से सीमित व्यक्ति ही बुलाये जायेंगे। लोगों को ज्यादा अपवाद नहीं करना चाहिए। सबको एक साथ बुला सकूँ इच्छा तो है, लेकिन सम्भव नहीं है व्यवहारिक भी नहीं है। इसलिए इंतजार तो करना ही पड़ेगा प्रत्यावर्तन के लिए।
एक काम मुझे यह सौंपा गया है कि लोगों को शक्ति का एक अंश दूँ और उनको आगे बढ़ाऊँ, ऊँचा उठाऊँ। केवल विज्ञान की शिक्षा से जो बात पूरी नहीं हो सकती, उपनिषद् संग्रह से जो बात पूरी नहीं हो सकती, उस शक्ति का अंश दान देने से पूरी की जा सकती है। यही प्रत्यावर्तन है जो मुझे अगले पाँच साल तक थोड़े-थोड़े समय तक यहीं शान्तिकुंज में रहकर पूरे करने पड़ेंगे। एक कार्य मैंने आपको निवेदन किया। दूसरा कार्यक्रम मेरा यह है कि मुझे हिमालय जाते रहना पड़ेगा, अन्यथा इस बार जो शक्ति खर्च होने वाली है उसकी पूर्ति अपने आप नहीं हो पायेगी बार-बार उसको लेने ही जाना पड़ेगा मुझे। इसलिए मेरा हिमालय जाना-आना लगा ही रहेगा। तीसरा एक और कार्य यह है कि अब मुझे अपना कार्य क्षेत्र बढ़ा देना पड़ेगा। अब तक केवल हिंदू समाज अपना मुख्य कार्यक्रम रहा। भारतवर्ष तक ही गतिविधियाँ रही हैं। अब तक मैं केवल भारतवर्ष में रहा हूँ। हिंदू समाज की सभाओं और गोष्ठियों को ही संबोधित किया है। दूसरे और लोगों में मैं कहाँ गया? दूसरे विश्व में कहाँ गया? लेकिन यह वर्ग जो मुझे सौंपा गया था, जो क्षेत्र मुझे सौंपा गया था वे सीमित क्षेत्र हैं क्योंकि शक्ति मेरी सीमित थी इसलिए कार्यक्षेत्र भी सीमित ही सौंपा गया था। अब तो शक्ति को बढ़ा दिया गया है अतः कार्य क्षेत्र भी बढ़ गया है। अब मेरा कार्यक्षेत्र भारतवर्ष तक सीमित न रहकर समस्त संसार है। हिंदू समाज तक सीमित न रहकर समस्त संसार के विभिन्न धर्म तक कार्य क्षेत्र बढ़ा दिया गया है। अब धर्ममंच को ही आगे बढ़ करके अन्यान्य क्षेत्रों में भी वह कार्य करूँगा जिससे कि युग निर्माण करने की पृष्ठभूमि तैयार की जा सके। साहित्य के कितने लोग हैं। संसार में साहित्यकार की बड़ी शक्ति होती है। प्रेस भी उसमें शामिल है, पुस्तक लेखन भी शामिल है, दार्शनिक भी, चिंतक भी, कवि भी शामिल हैं। इस तरीके से जिनके हाथ में जनमानस को प्रभावित करने की प्रचण्ड शक्ति है, मुझे उनके पास भी जाना पड़ेगा और जाकर के केवल परामर्श ही नहीं देना पड़ेगा, उनको मजबूर भी करना पड़ेगा।
अंगद लंका गया था और उसने रावण की सभा में पाँव जमाया था और यह प्रमाणित किया था कि मैं सरल स्वभाव का तो हूँ और यह बात हर एक राक्षस को माननी पड़ी थी कि जिससे उन्हें लड़ाई लड़नी पड़ेगी वह कोई मामूली आदमी नहीं है, कोई बड़ा आदमी नहीं है। मैं भी अपने गुरुदेव का अंगद और संदेशवाहक के रूप में सारे विश्व में जाऊँगा और यह कहूँगा कि भगवान की प्रेरणा और इच्छा यह है कि आप लोगों को अपनी गतिविधियाँ बदल देनी चाहिए। पिछले दिनों जो भी रही हों, किसी प्रकार और स्वभाव की रही हों, सम्पत्ति कमाने की रही हों, अपने स्वार्थ की रही हों। पहले जो भी रही हों, वह रही हों, लेकिन आगे जाकर के उन गतिविधियों में फर्क करना ही चाहिए और अपना मुँह उस ओर मोड़ना चाहिए जो कि युग निर्माण के लिए भगवान की इच्छा के अनुरूप हों। आगे मैं कलाकारों के पास जाऊँगा, क्योंकि कला मनुष्य के हृदय को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती रही है और अभी भी कर रही है। सिनेमा कितना काम कर रहा है। सिनेमा संसार के एक चौथाई जनता को प्रभावित कर रहा है। एक चौथाई जनता को इच्छानुसार ढाल रहा है। बुरा या भला अगर ये बुरी इच्छा में ढालने वाली रीति बदल दी जाय और अच्छी दिशा में ढालने वाला प्रयास किया जाय तो आप समझ सकते हैं, जनता के मस्तिष्क को बदलने में, ढालने में कितना बड़ा काम हो सकता है। गायन को बदल दिया जाय, संगीत को बदल दिया जाय, नारी के चित्र को बदल दिया जाय, कला केन्द्रों में जो कुछ भी चीजें होती हैं। अगर कलाकार और कला के संचालक उसको बदल दें तो युग निर्माण का वह कार्य पूरा हो सकता है जिसको हमने पिछले दिनों धर्ममंच के माध्यम से भारतवर्ष में सम्पन्न किया है। कार्य वह लोग भी कर सकते हैं, साहित्यकार भी कर सकते हैं, कलाकार भी कर सकते हैं।
एक और बात रह जाती है धर्म गुरुओं के संबंध में। धर्म गुरुओं की शक्ति कम है क्या? धर्म गुरुओं की बड़ी शक्ति है। अभी भी आपने देखा न, थोड़े दिन पहले सर आगाखाँ को तोला गया था। कितने करोड़ रुपये का सोना था। अभी भी हो रहा है, कल-परसों ही दिल्ली का समाचार है कि एक स्वामी जी को छः लाख रुपये के नोटों से तोला गया है। उसके पहले किसी को सोने से तोला गया, किसी को चाँदी से तोला गया। तोलने की प्रथा संत महात्माओं में भी चली आ रही है नेताओं का तो कहना ही क्या? किसी समय केवल उनकी सम्पत्ति देखी जाय कि उनका प्रभाव कितना है तो प्रत्येक संत महात्मा का, शंकराचार्य का, इसका-उसका प्रभाव भी हजा�
एक बार सन्त ने राजा को अपनी कुटिया पर आमन्त्रित किया। समयानुसार वे पहुँचे भी। आतिथ्य के उपरान्त सन्त ने आश्रम की छोटी-छोटी वस्तुओं का दिखाना आरम्भ कर दिया। सस्ती और सामान्य वस्तुएँ देखने में राजा को रुचि नहीं थी तो मेरी वे शिष्टाचार वश उन्हें उपेक्षापूर्वक जैसे-तैसे देखते रहे। देर तक जिसकी उपयोगिता बताई गई वह आटा पीसने की हाथ-चक्की। राजा की अरुचि अब अधिक मुखर होने लगी वे बोले -'वह तो घर-घर में रहती है। एक दो रुपये मूल्य की होती है। इसमें क्या विशेषता?' राजा का विवेक जगा और वे उपयोगिता-अनुपयोगिता का अंतर समझने लगे।
अभी भी याद आते ही रोमांच हो उठता है, जब परम वंदनीय माता जी ने चित्रकूट अश्वमेध महायज्ञ के लिए 16 अप्रैल 94 को शासकीय विमान से प्रस्थान करते समय बहुत कुछ ऐसा कह दिया था जो आगे चलकर भवितव्यता बन गया। संक्षिप्त विदेश प्रवास से लौटकर विमानतल से सीधे कुरु क्षेत्र की यज्ञाश्र प्रवेश कि प्रक्रिया में 31 मार्च 1994 को भागीदार बनाने पहुँचे। चेहरे पर भव्य तेज व पास बिठाकर आगे की कई योजनाओं को उनने लिपिबद्ध कराया। यात्रा की थकान देखकर भी उनने पर्याप्त समय देकर आगे के कार्यक्रमों के सम्बन्ध में रीति−नीति बता दी। एकाएक विमान के जॉलीग्रान्ट हवाई अड्डे से दिल्ली होकर सतना हवाई पट्टी के लिए रवाना होते समय वो बोली -'अब मैं शायद विमान यात्रा न कर पाऊँ, विमान की अब आवश्यकता भी क्या पड़ेगी?' वे मुस्कुरा दी- बोल उठीं मेरा मतलब है कि विमान से यह अन्तिम यात्रा है।' 'आगे कि अभी मत सोचो आकर विचार करेंगे।'
कहती रहीं- 'कहाँ गुरुदेव हमेशा तृतीय श्रेणी में सफर करते रहे। मेरे नन्हे बच्चों ने कितना परिश्रम किया है। गाँव-गाँव जाकर रजवन्दन कार्यक्रम करने एवं यज्ञ व्यवस्था जुटाने हेतु। कहाँ ये सम्भव हो पाता है कि प्रत्येक से मिल पायें। कितना विराट बना दिया है, हमारे आराध्य ने इस मिशन को।
पूरी ढाई-तीन घण्टे की सतना तक की हवाई यात्रा के दौरान परम वंदनीय माता जी के शब्द याद आते रहे। कौन जानता था। कि जैसा वे कह रही हैं सम्भवतः यह उनकी अन्तिम यात्रा ही है। कितना विलक्षण इसका आकार है। सचमुच जैसा तुम कहते हो हर ओर से धनुष के आकार का नजर आता है। जब कभी अपने आराध्य के साथ त्रेता के लीला संदोह में उन्हें सम्भवतः इस क्षेत्र में विचरण करना पड़ा होगा। तभी सम्भवतः इतने मणि मुक्त इस धरती ने शान्तिकुंज को स्थाई कार्य कर्ताओं एवं परिश्रमशील अगणित समयदानियों के रूप में दिये। जब सतना से काफिला पिण्डरा शक्तिपीठ की ओर आ रहा है। तब हमने अपने पूर्व के दो प्रवासों की स्मृति को ताजा करते हुए परम वंदनीय माता जी से पहाड़ी से नीचे उतरते समय गाड़ी रोककर ओंकार आकार के उस पर्वत के, जिसके आँचल में पिण्डरा स्थित था जहाँ के शक्तिपीठ की प्राण-प्रतिष्ठा हेतु वे जा रहीं थी-दर्शन की तथा वहीं से दूर दिखाई दे रहे पावन कामदगिरि पर्वत के तथा आस-पास बसे अश्वमेध नगर के दर्शन की प्रार्थना की। वे उतरीं व उनने देखकर अपनी आन्तरिक प्रसन्नता इन शब्दों में व्यक्त की- 'प्रकृति ने इस क्षेत्र को कितना सुन्दर बनाया है। हिमालय तथा अमरकण्टक के बाद अब इस स्थान पर आकर मैं स्वयं को अपनी आराध्य सत्ता के अत्यन्त समीप आ रही हूँ। पिण्डरा शक्तिपीठ में माता जी उतरीं। उन्हें उस स्थान पर ले जाया गया जहाँ कभी स्वयं गुरुदेव भगवान् विराजे थे। उस तत्कालीन हवेली के एक-एक हिस्से को उनने अपनी पद रज द्वारा पवित्र किया था। इतिहास ने बारह वर्ष बाद उसी क्रम को दोहराया, परम वंदनीय माताजी ने उसी पावन स्थान पर नवनिर्मित हॉल में गायत्री माता की प्राण -प्रतिष्ठा पूज्यवर ने की थी व बारह वर्ष बाद उसी अंचल में जो कभी राष्ट्र के प्रति समर्पित शूरवीरों की जन्मस्थली रहा। बेटा शायद यह अंतिम प्राण-प्रतिष्ठा है। मैंने जयपुर में पहली प्राण-प्रतिष्ठा की थी। उसके बाद के क्रम में यह अब अन्तिम की है। कौन समझ सकता था, इन सब के पीछे छिपे गूढ अर्थों को। 16 अप्रैल को उनके कहे गये यह शब्द आज भी सतत् गुँजन करते रहते हैं। 16 से 20 अप्रैल की उनकी यह यात्रा ही नहीं मिशन की जीवन यात्रा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस अवधि में वे उन सभी स्थानों पर।
अपनी शारीरिक अशक्तता के बावजूद गयी जहाँ श्रीराम भाई लक्ष्मण के साथ कभी घनघोर जंगल में तपश्चर्या में लीन रहे थे। अज्ञातवास का एक बहुत बड़ा समय उनका यहीं कटा। उसी क्रम में गुप्त गोदावरी ले गये। वह चढ़ नहीं सकती थी। पर सतना, इलाहाबाद के परिजनों ने एक डोरी-सी बना दी थी। जिस पर बैठा कर अपने कन्धों पर लेकर हम उन्हें अन्दर ले गये। पत्थरों की नक्काशी, गुफा का सौन्दर्य, गुप्त गोदावरी का स्रोत आदि सब देखकर वह अभिभूत थीं, किन्तु उनकी आँखों में इसलिए कि वे नहीं चाहती थी इस तरह लोग उन्हें कन्धे पर उठाकर स्वयं कष्ट सहकर ये सब करें। हम सब की आँखों में इसलिए आँसू थे क्योंकि उठाते समय ही उनने एक वाक्य कह दिया- 'अब उठा तो लिया है ऐसे ही कन्धों पर सीधे अपने आराध्य के पास चली जाऊँगी।'
यही हुआ इसके पश्चात् 19 सितम्बर को हम उनकी पार्थिव काया को अपने कन्धों पर उठाकर शान्तिकुंज आवास से सजल-श्रद्धा प्रखर-प्रज्ञा जब ले जा रहे थे तब यही सब कुछ याद आ रहा था। कैसी अलौकिक होती है लीला पुरुषों की जीवन यात्रा की एक एक घटनाएँ। यदि चित्रकूट क्षेत्र के अंचल से सभी जिलों के अतिरिक्त पूरे भारत के विश्व के परिजन जो अश्वमेधिक पुरुषार्थों में जुड़कर सौभाग्यशाली बन गये, अपना इस धरती पर आना सार्थक सफल बनाना चाहते हैं, सुयश बनाना चाहते हैं तो एक ही पुकार उस मातृसत्ता की है कि 'श्रवण कुमार की तरह मुझे व मेरी गुरु सत्ता को घर-घर पहुँचाओ। घर-घर तक नूतन चेतना का संदेश पहुँचाओ। कर दो आलोकित युग चेतना के प्रकाश से हिमालय से विंध्याचल व विंध्याचल से सतपुड़ा-दण्डकारण्य एवं अरावली से कन्याकुमारी तक के हर क्षेत्र को, इन पावन सरिताओं कि हर बूँद को व पूरे भारत भूमि को सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिला कर इन पुनः देव संस्कृति की चेतना से अनुप्राणित कर दो। सत-सत नमन है उस मातृसत्ता के चरणों में।
पंडित जवाहर लाल नेहरू कार से कहीं जा रहे थे। खिड़की से सिर बाहर निकाल कर देखा कि एक लड़का बस से टकराकर सड़क पर गिर पड़ा है और खून से लथपथ है।
पंडितजी ने अपनी कार रुकवाई और उस लड़के के पास गए। वहाँ पर काफी लोग उस लड़के को घेरे खड़े थे। पंडित जी को देखते ही उन्होंने जय-जयकार शुरू कर दी। वह पास में खड़े लोगों पर बरस पड़ें- जय-जय क्या चिल्ला रहे हो, तुम्हें इस बच्चे को अस्पताल ले जाते हुए शर्म आ रही है, इतना कह कर उन्होंने अपनी कार में उस लड़के को लिटाया और अस्पताल ले गये, इसके बाद ही वह पूर्व निर्धारित स्थान की ओर रवाना हुए।
देवसंस्कृति, दिग्विजय के उपक्रम में ऋषि युग्म के दिव्य संरक्षण में अग्निपरीक्षा की कसौटी पर उतरते हुए 25 भव्य आश्वमेधिक आयोजन कर डाले एवं अब अपने सामने लक्ष्य के रूप में गुरुभूमि आँवलखेड़ा (जनपद आगरा -उ. प्र.) में इस प्रथम चरण की पूर्ण आहुति के प्रयास की तैयारी कर रहे हैं। सारे देश में युग सन्धि की जोर शोर से तैयारी चल रही है। साथ ही अब तक हो चुके 25 अश्वमेधों में से भारत के 22 एवं शेष विश्व के इन आयोजन का अनुयाज भी सक्रिय रूप ले रहा है।
देवसंस्कृति घर-घर पहुँचाने के मूलमंत्र का आरम्भ हुआ अपना दिग्विजय अभियान कितना सफल हुआ, यह इसी से अनुमान लगाया जा सकता है। विश्व राष्ट्रीय एकता संगठन शक्ति एवं समर्थता का एक ही आधार है गायत्री रूप सद्ज्ञान यज्ञीय जीवन का यही लक्ष्य तक प्रयास कार्यक्रम इसी लक्ष्य को लेकर बनाए गये थे।
प्रयाज प्रशिक्षण -शान्तिकुंज से एक-एक दिन का प्रयाज प्रशिक्षण कार्यक्रमों का निर्धारण लेकर कई टोलियाँ 20 अप्रैल को भारत के कोनों-चारों दिशाओं को प्रस्थान कर चुकी हैं। इन्हें एक-एक दिन के प्रशिक्षणों में स्थानीय कार्यकर्ताओं का आँवलखेड़ा पूर्णाहुति के लक्ष्यों की जानकारी, समय साधन-साधना दान के स्वरूप का बोध व तब-तब किए जाने वाले हर कार्य का स्वरूप को समझाया जाएगा। प्रायः 15 अप्रैल से पूर्व ये सभी टोलियाँ अपना-अपना लक्ष्य पूरा कर शान्तिकुंज वापस लौट आएँगी गोष्ठी प्रत्येक स्थान पर अपराह्न 1 से 5 के बीच होगी व न्यूनतम 250 कार्य कर्ताओं की उपस्थित में सम्पन्न होगी। इन गोष्ठियों में आँवलखेड़ा यज्ञ से जुड़ी व्यवस्थाओं का विस्तार तथा क्षेत्रीय ये प्रव्रज्या के स्वरूप का विवेचन एवं सभी जिज्ञासाओं का यथोचित समाधान कर दिया जायेगा।
ग्रामीण चिकित्सा सेवा -
मिशन द्वारा चिकित्सक समुदाय का आह्वान कर अनुरोध किया गया है कि वे प्रतिभा दान-समयदान व औषधि दान द्वारा प्रथम वर्ष के 70,000 गाँव की चिकित्सा सेवा का संकल्प पूरा करने में हमारी सहायता करें। ग्रामीण परिकर में स्वास्थ्य- पोषण- आहार- स्वच्छता सम्बन्धी जानकारी चिकित्सा व नेत्रदान यज्ञ आदि आयोजित कर स्वस्थ समाज की संरचना करने का लक्ष्य जो मिशन का है। उसे हम आँवलखेड़ा प्रारम्भिक स्थिति में व बाद में फिर 100 मील की परिधि में आने वाले गाँव को लेकर करना चाहते हैं। भारी मात्रा में साधनों की, वाहनों की, चिकित्सकों की, औषधियों की, वैक्सीन व हैल्थ एजुकेटर्स पैरामेडिकल स्टॉफ आदि की इसमें आवश्यकता पड़ेगी। जहाँ सरकारी तन्त्र प्रभावी है। वहाँ अपने परिजन उनमें सहायक भूमिका निभाएँगे।
मात्र समय दान - अंशदान ही अपेक्षित
इस मिशन की परम्परा प्रारम्भ से जो रही है, गुरुसत्ता के महाप्रयाण के बाद भी हम उसी को निभा रहे हैं। अब से लेकर आँवलखेड़ा आयोजन के बाद 1996 के अनुयाज कार्यक्रम जो अक्टूबर के अंत तक चलेगा, सभी भावनाशील व यह समझा जा रहा है कि इस समय आड़े समय में कोई मुँह नहीं गाँव-गाँव मिशन को पहुँचाने साक्षरता विस्तार के लिए राष्ट्र को गरीबी के पाश से मुक्त करा भारतीय संस्कृति के रंग में रंगने के लिए ये डेढ़ साल की आयोजनों से मुक्त की गई है। जिन्हें हम पुल कर जन्मभूमि पर उनकी झोली में डाल सकें यह कार्य छोटे-छोटे यज्ञों से संस्कारों से अनुप्राणित परीक्षा जगत के माध्यम से संपन्न होगा आने वाली सन्धि काल की वेला में सुरक्षा रूपी कवच सबके चारों ओर रहे व हम आत्मिक प्रगति करते हुए अपने- अपने घरों को संस्कार मंदिर बनाते हुए अखण्ड यशस्वी राष्ट्र का निर्माण कर सकें यही युग देवता हमसे अपेक्षा रखता है। आशा है हमारे परिजन इन विषम वेला में अवसर न चूककर अपनी भागीदारी बड़ चढ़कर दिखायेंगे।
*समाप्त*