कण-कण में संव्याप्त वह परम सत्ता

दिन ढल रहा था। रात ओर दिन सफर से बिछुड़ जाने को कुछ क्षणों के लिए एक दूसरे में विलीन हो गए रम्य वनस्िजी में एक पर्णकुटी में से कुछ धुँआ-सा उड़ रहा था। कुटीर में निवास करने वाले दो ऋषि शनक तथा अभिप्रतारी अपना भोजन तैयार कर रहे थे। वनवासियों का भोजन ही क्या? कंद फल तोड़ लाए-कुछ दूध से काम चल गया। हे, कन्दमूल को अवश्य आँच में पकाना होता है। भोजन लगभग तैयार हो चुका था आष्र उद से कदली पत्रों पर परोसा जा रहा था।

तभी बाहर किसी आगन्तुक के आने का शब्द हुआ। दोनों ने जाने का प्रयत्न किया बाहर एक युवा ब्रह्मचारी खड़ा था। ऋषि ने प्रश्न किया ‘कहो वत्स! क्या चाहिए? युवक विनम्र वाणी में बोला-आज प्रातः से अभी तक कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता हैं मैं क्षुधा से व्याकुल हो रहा हूँ। यदि कुछ भोजन मिल जाता तो बड़ी दया होती।

कुटीर वासी कहने को वनवासी थे। हृदय उनका सामान्य गृहस्थों से भी कही अधिक संकीर्ण था। मात्र स्वार्थवादी थे ये व्यावहारिक वेदान्तिक थे। सो रूखे स्वर में कहा- “भई तुम किसी गृहस्थी का धर देखें। हम वनवासी हैं अपने उपयोग भर का ही भोजन जुटाते है।”

ब्रह्मचारी की बड़ी ही निराश हुई यद्यपि वह अभी ज्ञानार्जन कर ही रहा था-तथापि कर्तव्य-अकर्तव्य का व्यावहारिक बोध था उसे। निराशा इस बात से नहीं थी कि उसे भोजन प्राप्त नहीं हो सकता था उसकी मानसिक पीड़ा का करण यह था कि यदि काई साँसारिक मनुष्य इस प्रकार का उत्तर तो फिर भी उचित था॥ वह उसके भौतिकवादी मोह से भरे दृष्टिकोण परिचायक होता। किन्तु ये वनवासी जो अपने आपको ब्रह्मज्ञान का अधिकारी अनुभव करते हैं उनके द्वारा इस प्रकार का उत्तर पाकर वह क्षुब्ध हो उठा।

तब चुपचाप चले जाने की अपेक्षा उस युवक ने यही उचित समझा कि इन अज्ञान में डूबे ज्ञानियों को इनकी भूल का बोध करा ही देना चाहिए उसने पुनः उनको पुकारा बाहर से भीतर का सब कुछ स्पष्ट दिख रहा था। झुँझलाते हुए शनक तथा अभिप्रतारी दोनों बाहर आए।तब युवक बोला- “क्या मैं यह जान सकता हूँ कि आप किस देवता की उपासना करते है। “ उन ऋषियों को तनिक क्रोध आ गया व्यर्थ ही भोजन को विलम्ब हो रहा था। पेट की जठराग्नि भी उधर को हीनम की रास मोड़ रही थी। झुझलाहट में दोनों बोल पड़े “तू बड़ा असभ्य मालूम होता हो। समय कुसमय कुछ नहीं देखते। अस्तु! हमारा इष्टदेव या है, जिसे प्राण भी कहते हैं।”

अब वह ब्रह्मचारी बोला-तब तो आप अवश्य ही यह जानते होंगे कि यह प्राण समस्त सृष्टि में व्यापक हैं जड़ चेतन सभी में।”

ऋषि बोले-” क्यों नहीं! यह तो हम भली-भाँति जानते है। “अब युवक ने प्रश्न किया-” क्या मैं यह जान सकता हूँ कि यह भोजन आपने किसके निमित्त तैयार किया है।”

ऋषि अब बड़े गर्व से बोले-हमारा प्रत्येक कार्य अपने उपास्य को समर्पित होता है। ब्रह्मचारी ने मन्द स्मित के साथ पुनः का “यदि प्राण तत्त्व इस समस्त संसार में में व्याप्त हैं तो वह मुझमें भी है आप यह मानते हैं।” ‘ऋषि का अब यह बोध हुआ कि अनजाने में वे इस युवा के समक्ष हारते चले जा रहे हैं। तली में जैसे छेद हो जाने पर नाव पल-पल अतल गहराई में डूबती ही जाती है युवक की सारगर्भित वाणी में उनका अहंकार अज्ञान वैसे ही धँसता चला जा रहा था अज्ञान का थान अब विनम्रता लेती जा रही थी।

शनक धीमे स्वर में बोले-तुम सत्य कहते हो ब्रह्मचारी निश्चय ही तुम्हारे अन्दर वही प्रण वही वायु संव्याप्त हैं, जो इस संसार का आधार है।”

ब्रह्मचारी संयत स्वर में अब भी कह राह था-तो हे महामुनि ज्ञानियों! आपने मुझे भोजन देन से मना करके अपने उस इष्ट देव का ही अपमान किया है, जो कण-कण में परिव्याप्त है। चाहे वश्ज्ञाल पुंज लगा हो, चाहे एक दाना हो, परिणाम में अन्दर हो सकता है, किन्तु उससे तत्व की एकता में कोई अन्तर नहीं आता आशा है मेरी बात का अन्यथा अर्थ न लगाएँगे।”

ब्रह्मचारी का उत्तर हृदय में उतरता चला गया था। सत्य में यही शक्ति होती हैं दोनों ऋषि अत्यन्त ही लज्जित हुए खड़े थे। किन्तु साधारण मनोभूमि के व्यक्तियों में तथा ज्ञानियों में यही तो अन्तर होता हैं वे अपनी त्रुटियों को भी अपनी अन्तर होता हैं वे अपने त्रुटियों को भी अपनी हठधर्मी के समक्ष स्वीकार नहीं करते ओर अपनी भूल का बोध होते ही उसे सच्चे हृदय से स्वीकार कर लेते है, तथा तत्क्षण उसके सुधार में संलग्न हो जाते है।

अभिप्रतारी ने अत्यन्त ही विनम्र वाणी में कहा- हमसे बड़ी भूल हो गया ब्रह्मचारी लगता है तुम किसी बहुत ही योग्य गुरु के पास शिक्षा ग्रहण कर रहे हो। धन्य है वे। तुम उम्र में हमसे कहीं छोटे होते हुए भी तत्त्वज्ञानी और भोजन ग्रहण करके हमें हमारी भूल का प्रायश्चित करने का अवसर दो।”

ओर दोनों सादर उस ब्रह्मचारी युवक को ले गए उसके प्रक्षालन हेतु शीतल जल दिया तथा अपने साथ बैठाकर सम्मानपूर्वक भोजन कराया।

उस दिन से वे अपनी कुटी में ऐसी व्यवस्था रखते कि कोई भी अतिथि अथवा राहगीर कभी भी आए, वे उसे बिना भोजन किए न जाने देते। इष्ट की उपासना का मर्म सच्चा स्वरूप अब उनकी समझ में आ गया था।


कहीं हम जंगली संस्कृति के शिकार तो नहीं हो रहे

पिछले दिनों बुद्धिवाद एवं विज्ञान जो विकास हुआ है, उसने विज्ञान का जो विकास हुआ है, उसने भौतिक सुविधाओं को भले ही बढ़ाया हो, आध्यात्मिक आस्था को दुर्बल बनाया है विज्ञान ने जब मनुष्य को एक पेड़-पौधा मात्र बनाकर रख दिया और उसके भीतर किसी आत्मा को मानने से इनकार कर दिया, ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकृत किया इस सृष्टि को सब कुछ अणुओं की स्वाभाविक गतिविधि के आधार कर स्वाभाविक गतिविधि के आधार पर स्वसंचालित बताया, तो स्वभावतः स्वसंचालित बताया, तो स्वीवतः वान को प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर अति प्रामाणिक मानने वाली बुद्धिवादी नई पीढ़ी उसी मान्यता का शिरोधार्य नई पीढ़ी उसी मान्यता को शिरोधार्य क्यों न करेगी? प्रत्यक्ष है कि विचारशील वर्ग अनास्थावान् होता चला जा रहा हैं और यह एक भयानक परिस्थिति हैं क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग के पीछे जनता के अन्य वर्गों को चलन के लिये विवश होना पड़ता हैं आत के थोड़े से अनास्थावान् बुद्धिजीवी कल- परसों अपनी मान्यताओं से समस्त जन समाज को आच्छादित किये हुए होंगे।

आध्यात्मिक मान्यताएँ सदाचार सहयोग सद्भाव, सेवा सद्भावना, पुण्य, संयम एवं त्याग, बलिदान जैसी सत्प्रवृत्तियों की रीढ़ हैं आत्म कल्याण ईश्वरीय प्रसन्नता, पुण्य मान्यताओं के आधार पर ही मनुष्य अपनी चिरसंचित पशुओं पैशाचिकता पर नियन्त्रण करने और लोक कल्याण के लिए नितान्त आवश्यक सत्प्रवृत्तियों को चरितार्थ करने में समर्थ होता हैं यदि वह आधार ही नष्ट हो गया-यदि वह आधार ही नष्ट हो गया यदि उन मान्यताओं को कपोल-कल्पित मान लिया गया तो फिर न किसी को संयमी बनने की आवश्यकता अनुभव होगी, न सदाचारी होने की, न पुण्य अभीष्ट होगा, न परमार्थ। न त्याग की बात कोई करेगा, न बलिदान की। फिर मनुष्य खाओ पीओ, मौज उड़ाओ, के आदर्श का अपना कर हर अनैतिक कार्य करने के लिए तैयार हो जायेगा। ताकि वह अधिक अवसर प्राप्त कर सके।

कानूनी पकड़ एवं दण्ड से बचने का रास्ता अब अति सरल हैं कानून का रास्ता अब अति सरल हैं कानून बहुत ही ढीले-पोल हैं। फिर जिन पर कानून पालने के लिए विवश करने की-दण्ड देने-दिलाने की जिम्मेदारी हैं, वे राज्य कर्मचारी ही कहाँ दूध के धुले है? अपराधी से साँठ–गाँठ रखने की कला उन्हें भी आ गई है ओर उस दुर्बलता से हर भ्रष्टाचारी हर सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले पुरा-पुरा लाभ उठाया है, उठा सकता हैं केवल कानून के द्वारा अपराध रोक सकने की बात सोचना उपहासास्पद हैं मनुष्य केवल अपनी अन्तरात्मा की पुकार-और ईश्वरीय सत्ता के रोक-अनुग्रह का विचार स्मरण रखकर ही कुकर्म से बचता ओर सन्मार्ग अपनाता हैं यदि आत्मा ओर ईश्वर कोई है ही नहीं, कर्मफल देने की कोई अज्ञात व्यवस्था है ही नहीं, तो फिर पाप-प्रवृत्तियों को अपनाकर शौक-मौज के साधन जुटाने से कोई चूके क्यों? आज यही विचार बुद्धि जीवी पीढ़ी के मस्तिष्क में धूम रहे हैं और उसका नैतिक स्तर दिन-दिन दुर्बल होता चला जा रहा है।

यह विभीषिका इतनी भयानक है कि इसकी भावी सम्भावनाओं का स्मरण करने मात्र से आँखों के समाने अँधेरा छा जाता हैं शुतुरमुर्ग की तरह बालू में मुँह ढक कर खतरा टल गया ऐसा सोचना मूर्खता है सब कुछ अपने आप ठीक हो जाए ऐसी मान्यता वास्तविकता से दूर हैं जहाँ धर्म अध्यात्म का प्रकाश नहीं पहुँचा है ऐसे अफ्रीका आदि प्रदेशों के जंगली लोग अभी भी नर माँस खाते और एक से एक बढ़कर घृणित एवं नृशंस रीति-रिवाज अपनाये बैठे है अपने आप सब कुछ ठीक होने वाला होता तो सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक लाखों वर्षों में वे लेकर अब तक लाखों वर्षों में वे अपने आपको सभ्यता के उच्च स्तर तक ले आने में समर्थ हो गये होते। अपने आप कुछ नहीं होता, सब कुछ करने से होता हैं। ऋषियों ने लाखों वर्ष तक तप, त्याग, मनन-चिन्तन करके अध्यात्म और धर्म का अति महत्वपूर्ण कलेवर खड़ा किया है। उसे जन-मानस में प्रविष्ट कराने के लिए अगणित साधु ब्राह्मणों ने तिल-तिल करे अपनी जीवन जलाया है अगणित धर्म, ग्रन्थ लिखे गये हैं और उन्हें पढ़ने, सुनने, समझने तथा हृदयंगम करने की स्थिति उत्पन्न करने के लिये अगणित मानवतावादी परम्पराओं, या रीति-रिवाजों प्रक्रियाओं, पूजा-पद्धतियों एवं कर्मकाण्डों का प्रचलन किया है लगातार उस विचार-धारा से संपर्क बनाये रखने के लिए उन्होंने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है।

यदि ऋषियों द्वारा प्रादुर्भूत धर्म संस्कृति का आविर्भाव न हुआ होता तो अन्य प्रदेशों को उद्धत जंगली जातियों की तरह समस्त जन-समाज पशु प्रवृत्तियाँ अपनाये होता और उसकी बौद्धिक विशेषता पतनोन्मुख होकर इस संसार में पैशाचिक कुकर्मों की आग जला रही होती। ईश्वर अपने आप सब कुछ कर लेगा यह सोचना ठीक नहीं। इस सदी में संसार का 80 फीसदी भाग बौद्धिक एवं राजनीतिक स्तर पर साम्यवादी शासन के अंतर्गत समा गया सा प्रतीत होता था किन्तु परिवर्तन चक्र सोवियत रूस का तन के आज जिस तीव्रगति से धूम रहा है उसे देखत हुए अगले 5 से 10 वर्षों में आध्यात्मिक साम्यवाद ही विजय सम्मत धर्म के माध्यम से चारों ओर छाया दीखेगा, ऐसा कहना अत्युक्तिपूर्ण नहीं लगता।

बुद्धिवाद ओर विज्ञान के द्वारा प्रतिपादित उन मान्यताओं के सम्बन्धों में हमें सतर्क होना होगा जो मनुष्य का अनास्थावान् एवं अनैतिक अनात्मीय हैं विचारों को विचारों से मान्यताओं के को मान्यताओं से प्रतिपादनों से काटा जाना चाहिए। समय-समय पर यही हुआ भी है। वाममार्गी विचारधारा को बौद्धों ने हटाया और बौद्ध धर्म के शून्यवाद का समाधान जगद्गुरु शंकराचार्य के प्रबल प्रयत्नों, द्वारा हुआ। लोगों को केवल तलवार बन्दूकों की लड़ाइयाँ ही स्मरण रहती है। असली लड़ाइयाँ वो विचारों की लड़ाइयाँ है। वे ही जन-समूह के भाग्य का निर्माण करती है। प्रजातंत्र. सिद्धान्त के जन्मदाता रूसो और विचारधाराएँ पिछली शताब्दियों से मानव समाज का भाग्य निर्माण करती रही है।

पूँजीवाद, समाजवाद, अधिनायक वाद की विचारधाराओं ने भी अपने महत्वपूर्ण धाराओं ने भी अपनी महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्रस्तुत की है। बाह्य संघर्षों की पृष्ठभूमि में मूलतः यह विचार धाराएँ काम करती रही हैं देशों ओर जार्जिया के उत्थान पतन उनकी आस्थाओं और प्रवृत्तियों के आधार पर ही होता है, होता रहा है, हो सकता है।

उत्कृष्ट आदर्शों के प्रति अनास्था उत्पन्न करने वाली आज की बुद्धिवादी और विज्ञानवादी मान्यता जिस तेजी से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती चली जा रही है। उसकी भयंकरता की दुर्धर्ष सम्भावना का मूल्यांकन कम नहीं किया जाना चाहिए। उसका प्रतिरोध करने के लिए तत्परता पूर्वक खड़ा होना चाहिए युग के प्रबुद्ध व्यक्तियों की यह महती जिम्मेदारी है। इसकी न तो उपेक्षा की जानी चाहिए। और न अवज्ञा। हमें एक ऐसा विचार-मोर्चा खड़ा करना चाहिए, जो भौतिकवादी अनास्था से पूरी तरह लोहा ले कसे। यदि यह कार्य सम्पन्न किया जा सका तो समझना चाहिए कि मानवजाति के मस्तिष्क को धर्म संस्कृति और आध्यात्म को अंधकार के गर्त में गिरने से बचा लिया गया। पर यह मोर्चा खड़ा न किया जा सका, उसे सफलता न मिली तो परिणाम प्रत्यक्ष हैं कुछ ही दिन बाद हम जंगली संस्कृति के, नास्तिकता के, पशु-प्रवृत्तियों के पूरी तरह शिकार हो जायेंगे और लाखों वर्षों की मानवीय संस्कृति आत्मदाह करके अपना करुण अन्त प्रस्तुत करेगी।

समय रहते चेतने में ही बुद्धिमानी हैं बुद्धिमत्ता देवोपम उत्कृष्ट जीवन जीने में अपनी शान और बहादुरी समझता था, भले ही उसे उसमें कितना ही बड़ा कष्ट क्यों न सहना पड़ता रहा हो। आगे भी यही रीति नीति बरती जाती रहेंगी। जब भी कोई आदर्श उस युग की मनोभूमि का आधार लेकर सिखाया समझाया और उस पर आचरण भी करेंगे। यदि हम अध्यात्मवादी मान्यताओं का आज विज्ञान, तर्क और प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादन कर सकते हों तो निस्संदेह जन समाज को उसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति न होगी और यह भी निश्चित है कि जो बात अन्तःकरण की गहराई में स्वीकार की जाती है। वह आवरण में भी अवश्य उतरती है।

आज अध्यात्म का प्रतिपादन जिन आदर्शों पर जिस ढंग से किया जाता हैं वे जन मानस में गहराई तक प्रवेश नहीं करते। कथा, पुराणों, धर्म शास्त्रों किम्वदन्तियों एवं परम्पराओं की प्रामाणिकता पर अब लोगों के नाम में संदेह उत्पन्न हो गया है। वे उन्हें किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों की ऐसी कल्पनाएँ माने है जिनकी उपयोगिता एवं वास्तविकता प्रमाणित नहीं होती शंका-शंकित और संदिग्ध मन से हम धर्मोपदेश सुन तो लेते हैं पर उसकी यथार्थता एवं व्यवहारिकता पर विश्वास नहीं करते। यही करण है कि धर्मोपदेशकों का विशालकाय कलेवर, इतने बड़े आडम्बर के साथ विद्यमान रहते हुए भी उकसा जन जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है धर्म के हृ आवरणों को एक पक्षपात के रूप से अपना लेते हैं पर आचरण में उन आदर्शों का प्रवेश तनिक भी नहीं होने देते जो धर्म की आत्मा है। इसका एक ही कारण है कि अध्यात्म का उन आदर्शों पर नहीं समझाया जाता जो आज की जन मनोभूमि के अनुरूप हों आज हर व्यक्ति तर्क, प्रमाण और विज्ञान को आधार मानता हैं इस युग में कोई भी मान्यता केवल इन तीन आधारों पर ही प्रामाणिक एवं ग्राहय बन सकती है।

इन युग के मनीषियों का पवित्र कर्तव्य है कि व अपने समय की आवश्यकता को समझें और उसकी एक व्यवस्थित विचार पद्धति विनिर्मित करने में संलग्न हों। युग निर्माण के महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए यह नितान्त आवश्यक हैं इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए जीवन जीने की कला के व्यवहारिक आध्यात्म का प्रतिपादन शिक्षण किया भी जा रहा है। अखण्ड-ज्योति पत्रिका इसी प्रयोजन की पूर्ति में संलग्न है और आवश्यक गोला बारूद, विचार, प्रवाह प्रस्तुत करती चली आ रही हैं यह प्रयत्न आगे इसी गति से-और भी अधिक तीव्र गति से आगे बढ़ें ऐसे प्रयास चल रहे हैं आत से तीस वर्ष पूर्व यह कहा जाता था कि- ‘जहाँ विज्ञान समाप्त होता हैं वहाँ से अध्यात्म आरम्भ होता हैं विज्ञान और अध्यात्म का क्षेत्र सर्वथा पृथक् एक दूसरे से सर्वथा असंबद्ध है। पर अब ऐसी स्थिति नहीं रही। गत पचास वर्षों में विज्ञान ने अति तीव्रगति से प्रगति की है और उसका हर चरण अध्यात्म के समर्थन की ओर बढ़ा है। लगता हैं कि यह प्रगति क्रम जारी रहा तो अगले पचास वर्षों में अध्यात्म और विज्ञान दोनों इतने समीप आ जायेंगे कि दोनों का एकीकरण एवं समन्वय असम्भव न रहेगा।

सर्व साधारण की जानकारी प्रायः बहुत पिछड़ी हुई बनी रहती है। प्रगति के नवीन चरण उसमें प्रायः अविज्ञात ही बने रहते है। डार्विन का विकासवादी सिद्धान्त नई खोजों के आधार पर उपहासास्पद बनता चला रहा है। और फ्रायड के कामुकता समर्थक मनोविज्ञान के अब धुर्रे उड़ा दिये गये हैं नवीन शोधों ने विकास बाद और मनोविज्ञान को अध्यात्म की दिशा में काफी आगे तक बढ़ा दिया हैं और लगता हैं उनके बढ़ते जाते कदम अध्यात्म के समर्थन की दिशा में ही बढ़ रहे है। अणु विज्ञान के आचार्य आइन्स्टीन की नवीन खोजों ने अणु-सत्ता के (ईश्वर) अस्तित्व को स्वीकार किया है और भी इस दिशा में बहुत कुछ काम हुआ हैं पर वह उतने स्तर के सत्र में है कि सर्वसाधारण तक उसकी जानकारी मुश्तों बाद पहुँचेगी और तब तक अनास्थावादी मान्यताएँ इतनी प्रखर हो जायेगी कि उन्हें हटाना, मिटाना सम्भव न रहेगा।

दर्शन और तत्त्वज्ञान के उद्गम से ही कोई चार पद्धति एवं आचार प्रक्रिया प्रादुर्भूत होती है अध्यात्म का दर्शन और तत्त्वज्ञान प्रतिपादन करने के लिए ही वेद, उपनिषद् दर्शन, ब्राह्मण, आरण्यक आदि का आविर्भाव हुआ। ईश्वर, जीव प्रकृति के विभिन्न भेद-उपभेदों की चर्चा रही। दर्शन ही विचार और आचरण का मूल आधार हैं इसलिए ईश्वर, आत्मा, धर्म, स्वभाव, कर्मफल आदि के दार्शनिक सिद्धान्तों को यही ढंग से प्रतिपादित करना होगा संसार के दिशा मोड़ने वाले दार्शनिकों ने मानवीय आस्थाओं का मूलभूत विश्लेषण अपने ढंग से किया है और यदि वह लोगों को ग्राहय हुआ तो निस्संदेह जनसमूह की गतिविधि भी उसी दिशा में सोचने, करने और बढ़ने के लिए प्रेरित-प्रभावित होगी। अब भी यही किया जाना है हम अध्यात्म के दार्शनिक सिद्धान्तों का विज्ञान, तर्क और प्रमाणों के आधार पर प्रतिपादन कर सकें तो निस्संदेह जन-मानस को पुनः उसी प्रकार सोचने और करने का तत्पर किया जा सकता है, जिस पर कि भारतीय जनता लाखों वर्षों तक आरूढ़ रहकर समस्त विश्व का प्रकाशपूर्ण मार्ग दर्शन करती रही है।

तब सम्भवतः हम संस्कृति के शिकार न होकर उन सभी को सत्पथ दिखा सकेंगे जो भटकते दिखाई देते हैं भविष्य का धर्म वैज्ञानिक धर्म है, एवं यह भारतीय दर्शन की मूल धुरी पर टिका होगा, इससे सम्बन्ध में हमें कदापि अविश्वास नहीं रखना चाहिए।


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भयों में से अधिकाँश कल्पित होते है। असली भूतों की बात संदिग्ध है पर अँधेरे में झाड़ियों के भूत ने केवल डराते हैं वरन् डरपोकों की जान तक ले लेते हैं।


पूर्णता की प्राप्ति कैसे हो?

संसार का हर मनुष्य विकास चाहता है शायद ही कोई एकाध व्यक्ति ऐसा मिले, जो अविकसित, गई-गुजरी स्थिति में पड़ा रहना चाहता है क्या इस विकास की कोई सीमा है? सीमा का पता लगाने पर मनुष्यों की परिस्थिति एवं मनःस्थिति का अध्ययन करने पर एक ही तथ्य स्पष्ट होता हैं कि प्रायः हर व्यक्ति अपनी पहले की स्थिति से आगे बढ़ जाने के बाद भी वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट है। वह और अधिक विकास चाहता है। यदि उससे यह पूछा जाय कि आखिर विकास का भी कोई अन्त है तो एक मात्र उत्तर की प्राप्ति होगी-पूर्णता

निस्सन्देह हर व्यक्ति विकास की पूर्णता पाना चाहता है, पर यहाँ स्वाभाविक ही जिज्ञासा उठती है कि आखिर यह पूर्णता प्राप्ति किसकी हैं स्वयं के व्यक्तित्व की अथवा बाह्य साधनों की। यह प्रश्न हर विकासशील को चक्कर में डाल देता हैं। सचमुच उद्देश्य की होती है, न कि उसकी प्राप्ति के लिए सम्भाव्य साधनों की। आवश्यक साध्य है, न कि साधन। यह एक ऐसा तथ्य है, जो सरल होते हुए भी दुर्बोध हैं सामान्य जीवन में हम देखते है कि किसी काम के लिए कोई मनचाहा साधन न मिले, तो दूसरे से भी काम चला लिया जाता हैं उदाहरण के लिए यात्रा की मंजिल पूरी करने के लिए हवाई जहाज न मिले, तो रेल या मोटर बस से भी काम चला लिया जाता हैं पर इस प्रकार यहाँ आवश्यक मंजिल की प्राप्ति करना है, न कि यात्रा साधनों के पीछे भागना।

सामान्य यात्रा सम्बन्धी इस तथ्य को दैनिक उपयोग में लाते हुए भी जीवन यात्रा के सम्बन्ध में इस भी जीवन यात्रा के सम्बन्ध में इस नियम को हम लागू करना सर्वथा भूल ही जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति यात्रा पूरी करने के लिए साध नहीं इकट्ठा करता रहे,तो इसे अविवेकपूर्ण कहा जायेगा। यात्रा के लिए सामान्य साधन साइकिल आदि तो खरीदे जा सकते है; किन्तु बस, रेल, हवाई जहाज खरीदने की बात सोचना, इसी के लिए चिन्तित रहना, उन पर अपनी मिलकियत जमाने की बात पर बल देना हास्यास्पद ही कहा जायेगा।

सामान्य तथ्य तो यही कि इतना सारा जखीरा जमा करने की जगह उपयुक्त, किराया देकर लोग काम चला लेते, किन्तु आज तथा कथित बुद्धिमान लोग भी यह नहीं सोच पाता कि इस सर्व सुलभ सूत्र को जीवन यात्रा के लिए भी लागू किया जा सकता है।

प्रायः आज ऐसे ही लोगों की भरमार है, जो साधनों के इकट्ठा करने के चक्कर में साध्य भूल चुके। उनका एक मात्र उद्देश्य अधिकाधिक साधन सुविधाएँ जुटाना ही रह गया है। इस एकत्रीकरण में पूर्णता तो सा जीवन जीने को बाध्य होना पड़ता, ऐसे व्यक्तियों को सनकी बताते हुए कहते है। कि ये व्यक्ति उद्देश्य में सफल होना तो दूर उलटे दुःखी हो जाते है। वह इन्हें मानसिक रोगी बताते हैं तथा इनके साधनों की पूर्णता प्राप्ति सम्बन्धी बात को पूर्णता प्राप्त करने का पागलपन।

फिंक की बात कटु अवश्य है किन्तु है सर्वथा सत्यं मानवी व्यक्तित्व की क्या गरिमा है, इसे उससे किस तरह प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए, आदि बातें भूलकर जो व्यक्ति लगातार सुविधा या साधनों की भरमार करने में जुटा रहे, उसके लिए फिंक की शब्दावली ही अधिक उपयुक्त है।

ऐसे व्यक्ति की मनः स्थिति का विश्लेषण करते हुए हैराल्डफिंक कहते हैं कि जब हुए हैराल्ड फिंक कहते हैं कि जब इनमें साधनों के इकट्ठा करने की आदत बढ़ती जाती हैं तो यह बढ़ता हुआ क्रम उन्हें शक्की बना देता हैं उन्हें न तो किसी चीज पर विश्वास रह जाता हैं न ही किसी व्यक्ति पर। उसे हमेशा यह डर रहता है कि लोग उसके विरुद्ध है। वह स्वयं के प्रति भी अविश्वासी हो जाते है इन व्यक्तियों के मनों में अपराधी भावना उपजी हैं जिससे अन्य भी ग्रसित होते हैं वह इन्हें बुनियादी तौर पर असामाजिक एवं आत्म विश्वास से हीन व्यक्ति बताते है।

पूर्णता प्राप्ति के मूल रहस्य को समझा जाना चाहिए। साधनों की अभिवृद्धि एवं पूर्णता की सनक के उलझाव में उलझ न रहकर प्रयास इस ओर किया जाना चाहिए कि स्वयं का व्यक्तित्व निर्मल-परिष्कृत एवं सद्गुणों की पूर्णता प्राप्त की वे समाज के मानदण्ड बनकर रहे है।

आज भी इन्हें पाकर समाज राष्ट्र धन्य हो सकेंगे। समाज में ऐसे ही व्यक्तित्वों का अनुकरण अनुसरण भी होता हैं इस ओर बढ़ चलना और वास्तविक विवेकशीलता और बुद्धिमानी है, जिसे हर कीमत पर पुरा किया ही जाना चाहिए।


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कुदरत की समझ में कमजोरी भी एक गुनाह हैं वह कमजोरी पर दया नहीं करती वरन् कचरे की तरह बुहार कर फेंक देती है।


सदाचारी भक्त की शक्ति

धर्मराज युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। अश्वमेध की प्रथा के अनुसार विश्व विजय के लिए घोड़ा छोड़ा गया। उसके पीछे महाबली अर्जुन पीछे चले। अकेले अर्जुन का नाम ही आर्यावर्त के वीरों को कंप देने के लिए पर्याप्त था। महाभारत के युद्ध ने पाण्डवों की यश पताका समूचे भूमण्डल में फहरा दी थी।

पाण्डव एक महाशक्ति का प्रतीक बन चुके थे। पाण्डव अर्थात् प्रतीक बन चुके थी। पाण्डव अर्थात् भीष्म, दानवीर कर्ण जैसे अति बली योद्धाओं को पराभव देने वाले पाण्डव। वे पाण्डव जिनकी वीरता और कौशल की कहानियाँ घर-घर कही सुनी जाने लगी थी। आज उन्हीं विजयी पाण्डवों का अश्व वसुन्धरा की परिक्रमा करने निकला था।

अश्व जिस ओर से निकलता उधर के राज राजेश्वर बहुमूल्य उपहार सेना के अधिनायक को अर्पित कर धर्मराज युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार कर लेते। जिस किसी ने घोड़े को पकड़ने का साहस भी किया, गाण्डीव की टंकार ने उसकी वीरता के छक्के छुड़ा दिये।

वनों-पर्वतों को अपनी रण भेदी से गुँजायमान करती पाण्डवों की सेना अर्जुन के नायकत्व में बढ़ी चली जा रही थी। घोड़ा विन्ध्याचल को पार कर चम्पापुरी में प्रविष्ट हुआ। चम्पापुरी में महाराज हंसध्वज राज्य करते थे। यों चम्पापुरी राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत बड़ा था। पर सद्गुणों की दृष्टि से उसके उत्कर्ष की गाथाओं से सारा भुवन परिचित था। यथा राजा प्रजा की कहावत यहाँ शत-प्रतिशत चरितार्थ होती है। महाराज हंसध्वज संयमी प्रजापालक, उदार, सहिष्णु होने के साथ अद्वितीय शूर भी थे। चम्पापुरी के नागरिक अपने प्रजावत्सल महाराज के संरक्षण में सर्वथा सन्तुष्ट और प्रसन्न थे। उन्हें अपनी स्वतन्त्रता प्राणों से बढ़ कर प्यारी थी।

महाराज हंसध्वज को साम्राज्य के विस्तार में कोई अभिरुचि न थी, लेकिन उन्हें अपनी स्वतन्त्रता को गँवाना भी प्रिय न था। उन्होंने अपने पुत्र सुधन्वा को घोड़ा पकड़ने की आज्ञा दे दी। सुधन्वा केवल महाराज के पुत्र ही नहीं थे, एक रणबांकुरे योद्धा भी थे।

उनके सदाचार और रण कौशल पर समूची चम्पापुरी को विश्वास अब तक के स्वल्प जीवन में वह अग्नि परीक्षाओं में से सफलता पूर्वक गुजर चुके थे। बड़े-बड़े वीरों को इस अठारह वर्षीय युवराज के सम्मुख मुँह की खानी पड़ी तभी तो मंत्रिमंडल समेत महाराज से हंस ध्वज ने उन्हें सर्वसम्मति चम्पापुरी की चतुरंगिणी वाहिनी की सेनापति बनाया था।

सेनापति ने अपने महाराज की आज्ञा के अनुसार घोड़े को बन्दी बना लिया। अब तक वे अनेकों युद्धों में सफलता प्राप्त कर चुके। थे। लेकिन आज भारतवर्ष के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर वीरवर अर्जुन से मुकाबला था। वे अर्जुन से मुकाबला था। वे अर्जुन जिनके रथ की बागडोर परमात्मा का अवतार कहे जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण सँभालते थे।

रण क्षेत्र में उतरने से पूर्व सुधन्वा अपनी पत्नी प्रभावती से मिलने सुधन्वा अपनी पत्नी प्रभावती से मिलने गए। वीर वेश में पति को समाने खड़ा देखकर वीरबाला प्रभावती की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसने कहा देव! शत्रु से संघर्ष करना ही हम क्षत्रियों का धर्म है, संघर्ष न करे तो सारा संसार अपनी हर अच्छी बुरी इच्छा मनवाने का दुस्साहस करने लगता है।

किन्तु.................................। कहकर प्रभावती चुप हो गयी। सुधन्वा ने पूछा- प्रियतमा। कहो, रुक क्यों गयी? आकांक्षाओं को पूर्ण करने की प्रतिज्ञा की थी, वह मुझे याद है तुम्हारी किसी भी कामना को पूर्ण करना, मैं अपना धर्म समझता हूँ।

स्वामिन! पति के इस अनुरोध पर प्रभावती विनम्र भाव से कहने लगी-’ आज तक अपने विवाहित होकर भी ब्रह्मचर्य मर्यादाओं का पालन किया है। मैं उससे सन्तुष्ट ही रही हूँ। आप युद्ध में जो रहे हैं युद्ध में हमेशा विजय ही नहीं होती पराजय और मृत्यु की संभावनाएँ भी स्वाभाविक होती हैं यदि आपको कुछ हो गया तो मुझे निःसन्तान रहना पड़ेगा। एकाकी जीवन काटना नारी के लिए कठिन हैं। आज काटना नारी के लिए कठिन हैं आज मेरे रजस्वला होने का 16 वाँ दिन हैं आप युद्ध प्रातः काल प्रारम्भ करते तो महान कृपा होती।

सुधन्वा ने पत्नी का अनुरोध स्वीकार कर लिया। प्रजा अस्थिर थी, किन्तु सुधन्वा को किंचित् मात्र भी असंतोष न था। एक सद्गृहस्थ की भाँति उन्होंने गृहस्थ धर्म का पालन हँसी-खुशी के साथ किया।

प्रातः काल होते ही वीरवर सुधन्वा रण भूमि में आ डटे। उनका रथ अर्जुन के रथ के सामने आ गया शंख ध्वनि, हुई और दोनों सेनाओं में बाण वर्षा होने लगी, सुधन्वा के साथ वारण वर्षा होने लगी। सुधन्वा के साथ सुमित, तुष्ट, श्रद्वालू, सुबल, सुरथ आदि अतिरथी योद्धा युद्धरत थे। तो अर्जुन की ओर से सारथी भगवान श्रीकृष्ण और वृषकेतु, प्रद्युम्न, अनुशाल्व, और कृतवर्मा आदि योद्धा युद्ध में भाग ले रहे थे। बड़ा घमासान युद्ध हुआ। युद्ध के प्रथम में भाग हो गया। कि वय में किशोर होने के बावजूद सुधन्वा रण कौशल में भीष्म और कर्ण से किंचित् भी न्यून नहीं हैं

आज युद्ध का अन्तिम दिन था सुधन्वा और अर्जुन दोनों आमने सामने विजय की आकांक्षा से शस्त्र प्रहार कर रहे थे। सुधन्वा के बाणों के आगे अर्जुन ने क्रोध करके प्रतिज्ञा की “यदि मैंने तीन बाणों से सुधन्वा का सिर न काट दिया तो फिर सुधन्वा का सिर न काट दिया तो फिर भी शस्त्र ग्रहण नहीं करूँगा। अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर सुधन्वा ने भी शपथ ली-यदि मैंने अर्जुन के तीनों बाण न काट दिए तो युद्ध में हार मानकर चला जाऊँगा।

अर्जुन को विश्वास था, भगवान कृष्ण उनके साथ हैं, जो जयद्रथ वध कृष्ण उनके साथ है, जो जयद्रथ वध की तरह प्रतिज्ञा तो पूरी होगी ही। सुधन्वा को अपने पर आत्मविश्वास था-मैंने जीवन में कभी कलुषित कर्म नहीं किया। कभी झूठ नहीं बोला, इसलिए मेरी आत्मा की आवाज कभी असत्य नहीं हो सकती। यों प्रतिज्ञाएँ अर्जुन और सुधन्वा ने की थी, पर वस्तुतः टक्कर ईश्वर और सदाचार के बीच थी। भगवान को ही निर्णय करना था कि विजय सदाचारी की होती है अथवा भगवान के कृपा पात्र की।

युद्ध फिर प्रारम्भ हुआ-अन्तिम और निर्णायक युद्ध। अर्जुन ने धनुष पर बाण चढ़ाया और प्रत्यंचा कानों तक खींची। भगवान कृष्णा ने कहा मैंने गोवर्धन लेकर इन्द्र के कोप से गाय और गोपालों की रक्षा की है, उसका जो पुण्य हुआ हो, वह मैं अर्जुन के बाण में जोड़ता हूँ। अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हो।

सुधन्वा भी उसी समय गर्जकर बोला-दिशाओं यदि मैंने जीवन में एक पत्नीव्रत का पालन किया हो। भूलकर किसी पराई स्त्री को कुदृष्टि से न देखा तो तो मेरा यह बाण अर्जुन के बाण को मध्य में की काट दे। यह कह कर उसने भी धनुष चढ़ाकर बाण छोड़ दिया। दोनों बाण एक साथ छूटे और सबने देखा कि अर्जुन का शक्तिशाली बाण सुधन्वा के बाण से बीच में ही कटकर चूर-चूर हो गया। सुधन्वा का बाल भी बाँका न हुआ।

अर्जुन ने दूसरा बाण चढ़ाया और पुनः उसे कान तक खींचा। भगवान कृष्णा ने पुनः शक्ति दी और कहा ऐरावत हाथी को ग्राह के चंगुल से बचाते समय, द्रौपदी को दुर्योधन द्वारा चीर हरण के समय बचाने से और प्रहलाद को हिरण्यकश्यप से रक्षा करने से मुझे जो पुण्य प्राप्त हुआ था, वह पुण्य अर्जुन के इस बाण में जोड़ता हूँ।

उधर अर्जुन को धनुष तानते हुए देखकर सुधन्वा ने भी धनुष पर बाण चढ़ाया और बोल-युवराज होकर भी ग्रहण न किया, हो, प्राप्त धनराशि को केवल प्रजा के ही हित में लगाया हो तो यह मेरा के ही हित में लगाया हो तो यह मेरा तीक्ष्ण बाण अर्जुन के बाण को काट डाले। यह कह कर सुधन्वा ने अर्जुन के साथ ही बाण छोड़ दिया। दोनों बाण युद्धस्थल में टकराये और अर्जुन का बाण निरस्त होकर वही कट गिरा।

अन्तिम बाण आखिरी शक्ति लगाकर अर्जुन ने ब्रह्मास्त्र शर का सन्धान किया धनुष पर बाण चढ़ाते ही सागर खौल उठे, दिशाएँ तेजहीन हो गयी, समूची प्रकृति में मानों एक भूकम्प आ गया हो। इस अमित तेजस्वी बाण को आसुरी शक्तियों से बचाने के लिए मैंने अनेकों बार मनुष्य शरीर धारण किया है। मैंने अपनी सारी शक्ति लोक कल्याण में ही लगायी है, उससे जो कुछ पुण्य हुआ हो, वह सब अर्जुन के इस तीसरे बाण में लग जाए।

उधर सुधन्वा ने आकाश की ओर देखा और कहा है तारागणों! तुम साक्षी हो एक सामान्य व्यक्ति होकर भी यदि मैं सम्पूर्ण जीवन अपने धर्म और अपनी संस्कृति की रक्षा में लगा रहा होऊँ तो अर्जुन का यह तीसरा बाण भी नष्ट हो जाए,। यह तीसरा बाण भी नष्ट हो जाए। यह कहकर उसने भी नष्ट हो जाए। यह तीसरा बाण छोड़ा और उसने अर्जुन के तीसरे बाण की भी काट कर रख दिया।

ब्रह्मास्त्र के कट कर गिरते ही दिशाएँ स्वच्छ हो गयी। अस्थिर प्रकृति पुनः स्थिर होने लगी। अर्जुन ने की ओर दोनों एक दूसरे का मुख ताकते खड़े थे और आकाश से देवतागण सुधन्वा सदाचार की इस विजय पर सारी चम्पापुरी हर्ष मना रही थी और पाण्डवों की सेना इस द्विविधा में पड़ी खड़ी थी कि युद्ध को यहीं विश्राम दे दिया जाय अथवा उसे आगे भी प्रारम्भ रखा जाय। आगे की कथा सभी जानते है।


Quotation

काम की श्रेष्ठता इस आधार पर आँकी जानी चाहिए। कि उसके पीछे कितना बड़ा उद्देश्य था ओर करते समय उसे कितनी रुचिपूर्वक किया गया।

ईमानदार व्यक्ति को देखकर ही उसके यहाँ कोई वस्तु गिरवी रखी जाती है, बड़ा मकान देखकर नहीं। तुम अपना प्रेस और विश्वास उसे दो जो प्रामाणिक है।


भय एक रोग, पाएँ इससे मुक्ति

भय एक मानसिक रोग है जो अच्छे-भले विचार -तन्त्र को लड़खड़ा कर ख देता हैं मनोवैज्ञानिक इसको जीवन की सहज प्रवृत्ति मानते हैं अनुशासन सुव्यवस्था, नियम, आदि पालन के लिए भी इस की अपनी उपयोगिता हैं तथा जीवन की सुरक्षा, बचाव, सावधानी के लिए भी इस तक सहनीय और उपयोगी भले ही हो, किन्तु सदैव डरते सहमे रहना, ही हो किन्तु सदैव डरते सहमे रहना, मूढ़ता जड़ता, संताप और आतंक पैदा करना ठीक नहीं है इससे भीरुता ही नहीं पैदा होती मनोबल भी क्षीण होता है। अधीरता, बेचैनी, व्याकुलता तथा अस्थिरता की मनः स्थिति पैदा होती हैं तथा कुकल्पनाएँ का जाल-जंजाल बुनकर मनुष्य अपने चिन्तन को ही नहीं बिगाड़ लेता वरन् स्वास्थ्य पर भी बिगाड़ लेता वरन् स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जितने व्यक्ति बीमारी से डरते है उससे कहीं अधिक डर और अकरण चिन्ता तथा थोथी कल्पनाओं के कारण मर जाते हैं कितने ही व्यक्तियों को बीमारी में विश्राम दृढ़ हो जाता है कि वे अब न बचेंगे और हर घड़ी मृत्यु के बारे में सोचते रहते है अथवा ज्योतिषी, सयानों, ओझाओं के कथन पर विश्वास कर लेते हैं बैठते हैं! भयभीत मनः स्थिति में रस्सी का सौंप और झाड़ी का भूत दिखाई देने की बात व्यर्थ नहीं है। क्योंकि उस समय विचार तंत्र लगभग लुँज-पुँज स्थिति में रहा होता हैं फ्रांस में एक व्यक्ति को मृत्यु-दण्ड की सजा सुनाई ही गई डॉक्टरों ने प्रयोग के लिए ऐसे व्यक्ति को चुना।

घबराया हुआ व्यक्ति लाया गया और मेज़ पर सुला दिया गया। और गरदन के पास एक सुई चुभो दी गई और गरदन के पास ही एक नली लगाकर पानी की बूँदें गिराना प्रारम्भ कर दिया। टप-टप की आवाज सुनकर लेटा व्यक्ति यही बराबर टपक रहा है। डॉक्टर भी उसे यही बतलाते रहे कि खून अब काफी निकल चुका है वह अब मरने ही वाला है किन्तु वास्तविकता तो यह था कि खून दस पाँच बूँद ही निकला था कि खून दस पाँच बूँद ही निकला था और थोड़ी ही देर में भय के कारण वास्तव में वह व्यक्ति मर गया।

ऐसी ही घटना एक और है जिसमें भय के कारण व्यक्ति की तुरन्त मृत्यु हो गई। एक बार एक व्यक्ति को साँव ने डस लिया। किन्तु उस समय वह समझता रहा कि शायद कुछ चुभ गया है वह अपने काम में लगा रहा किन्तु उस का साथी देख रहा था कि उसे साँप ने डसा है। उस समय उसने साथी की कुछ नहीं बताया।

एक माह बाद जब दोनों मिले तो उस के साथी ने पूछा कि तुम अभी भी स्वस्थ हो। तुम्हें कुछ नहीं हुआ उस दिन मेरे समक्ष ही तो तुम्हें साँप ने डसा था। इतना कहना कि भय के कारण वह व्यक्ति प्राण गँवा बैठा। इसी प्रकार अनेकों मौतें जाने अनजाने में भय और आतंक के कारण होती रहती हैं अज्ञानी अशिक्षित, बहमी, शंकालु और ही विवेक पूर्ण निर्णय लेने लें, परिस्थितियों को आँकलन करने में सक्षम नहीं होते। और भ्रमवश काल के गोल में अकारण चले जाते है। अथवा अपने स्वास्थ्य की बहुत बड़ी हानिकर लेते है। चिन्ता, कुकल्पना, से बुद्धि अस्थिर और निर्णायक शक्ति क्षीण हो जाती है काल्पनिक भय का मन और शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं

भय के कारण अनेकों व्यक्ति ऐसे ही मर जाते हैं, जिन्हें यथार्थ में कोई रोग नहीं होता। प्राण चिकित्सा विज्ञानियों ने इस संदर्भ में गहन खोजें की है। एक घटना के अनुसार स्विट्जरलैंड के एक अस्पताल में एक व्यक्ति लाया गया जिसे बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। साथ के लोगों ने बताया कि इसे साँप ने काटा हैं डॉक्टरों ने परीक्षण किया। किन्तु उसके शरीर में विष के अथवा सर्प दंश के कोई चिन्ह नहीं पाए गये। घबराहट और डर के कारण ही उसकी बेहोशी इतनी गहराती चली गई कि गहन चिकित्सा उपचार करने पर भी उसे बचाया न जा सका। इसी प्रकार एक बेहोश रोगी को लाया गया कि दवा गलत नहीं थी मात्र दवा की बोतल पर जहर का लेबल गलती से चिपका हुआ था।

इसी तरह अस्पताल विचित्र मरीज को लाया गया जिसे कुहराम मचा रक्खा था उसे पेट दर्द की शिकायत थी। वह पीड़ा से छटपटा रहा था। उसने बताया कि सोते समय वह अपने चार नकली दाँत निकलना भूल गया और गली से साँस के साथ वे पेट में चले गये।

डॉक्टर आपरेशन की तैयारी में व्यस्त थे। रोगी के कपड़े उतारे जाने लगें नर्स ने देखा कि उसके नकली दाँत तो कोट की जेब में रक्खे हैं रोगी को बताया गया तो व केवल उसका दर्द शान्त हुआ वरन् वह झेंप कर अस्पताल से उठकर चला गया।

मनोचिकित्सकों का कथन सही है कि रोग शरीर की मल निष्कासन की तरह स्वाभाविक प्रक्रिया हैं किन्तु कितने ही अपरिपक्व मनः स्थिति के लोग इतने बुरी तर लड़खड़ा. जाती है। और और रोग घटाने के बजाय बढ़ता जाता हैं हड़बड़ाहट में इतनी दवाएँ खा जाते है कि जितना भयंकर रोग नहीं होता, इससे लाभ के स्थान पर उलटी हानि उठानी पड़ती है। भय के कारण शरीर के अन्दर की प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है मस्तिष्क का नियंत्रण, उदर की पाचन-प्रक्रिया और हृदय की धड़कन भी प्रभावित होने लगती है। माँस-पेशियों में साधारण से अधिक असन्तुलन पैदा होता है विचार प्रणाली लड़खड़ाने पर खास गति में भी बाधा उत्पन्न होती है। कितने ही भय बड़े काल्पनिक होते हैं, किन्तु फिर भी उनकी प्रतिक्रिया शरीर पर होती अवश्य है। अभाव, बीमारी, जरावस्था, असफलता की कल्पना, कुकल्पनाएँ की उधेड़-बुन में जिनका, कुकल्पनाओं की उधेड़बुन में जिनका समय व्यतीत होता है, उन्हें भली प्रकार जानना चाहिए कि काल्पनिक भय की प्रतिक्रिया का शरीर और मन पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

भय के संस्कार प्रायः बाल्यकाल से ही जम जाते हैं इन्हें छुड़ाने अथवा स्थाई ने बनने देने के लिए प्रयास आरम्भ से ही किया जाना चाहिए। अंधकार का भय, अथवा भूत, पलीत, डाकिन, शाकिन से बच्चों को नहीं डराना चाहिए बालकों की मनोभूमि अच्छी होने, समझ अपरिपक्व होने के कारण भय के संस्कार बीज बड़ी शीघ्रता से जमने के बाद फिर आजीवन उन्हें उखाड़ा जाना सम्भव नहीं हो पता है। इन्हीं विश्वासों के आधार पर बालक का व्यक्तित्व ढलना, विकसित होता हैं समाज में अन्ध विश्वासों, रूढ़ियों का ही अधिक प्रचलन हैं। अतः चारों ओर से इनकी पुष्टि होने से भय के संस्कार और भी सुदृढ़ हो जाते है उनसे स्वयं छुटकारा पाया और अन्यान्यों को दिलाया जाय।

भय केवल एक निषेधात्मक अनुभूति हैं नकारात्मक चिन्तन, कुकल्पनाओं, से इस बढ़ावा मिलता है। उज्ज्वल, भविष्य की कल्पना करने, उसके सरंजाम जुटाने में जो परिश्रमी संलग्न रहते हैं उन्हें ऐसी कुकल्पना करने की फुरसत नहीं होती। अतः अपने लिए न सही दूसरों के लिए ही कुछ करते रहने का अभ्यास बनाना चाहिए। दूरदर्शी विवेक शीलता अपनाकर भय से मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिए।


भय मुक्त (Kahani)

तब युद्ध बन्दियों को मृत्युदण्ड सार्वजनिक के हाथ लें तलवार होती थी। और अपराधी निहत्था रहता अथवा कभी-कभी तलवार भी दे दी जाती। अपराधी कुशल योद्धा के वारों को झेलता। दो-चार बार बचाव करता अन्त में उसे कुशल योद्धा के हाथों मरना होता था।

एक बार योद्धा को ऐसे अपराधी से पाला पड़ा जो थोड़ा साहसी था। उसे तलवार थमाकर कहा गया कि इस योद्धा के दस वार झेलने में वह सफल रहा और मरा नहीं तो वह बंधन-मुक्त कर दिया जाएगा। अपराधी समझता था कि वह कोई कुशल तलवार चलाने वाला तो है नहीं मरना तो है ही! वह बोला व्यर्थ प्रदर्शन से क्या लाभ, यों ही मार दे। लोगों ने कहा व्यर्थ क्यों मरना चाहता है मरना ही है तो जूझ मरो। उसे कुछ हिम्मत मिली, साहस बढ़ा। वह योद्धा से भिड़ गया। उसे दाँव-पेंच कुछ आता-जाता नहीं था। उसने दोनों हाथों से प्राणों की बाजी लगाकर जो तलवार चलाई कि कुशल योद्धा की घिग्घी बँध गई और उसका प्रत्येक बार खाली ही नहीं गया प्राण बचाना दूभर हो गया। भीड़ देखकर स्तब्ध थी कि आज इसे क्या हो गया है। इसके वारों से तो आज तक कोई नहीं बचा हैं योद्धा ने भागकर जान बचाई।

मंत्री यह सब देख रहा था। उसने अपराधी से कहा पहले तुम तलवार पकड़ने में आनाकानी कर रहे थे। तुमने तो ऐसी तलवार चलाई कि सबको हैरानी में डाल दिया। बन्दी बोला “मरता क्या न करता” न जाने कौन-सी सत्ता मुझे साहस और सूझ-बूझ स्वयं भी नहीं पता और वह बन्धन मुक्त कर दिया गया

यदि भय मुक्त हो प्राण-पण से कोई भी कार्य किया जाय तो सफलता मिलना सुनिश्चित है।


सुसन्तति के निर्माण पर ही उज्ज्वल भविष्य निर्भर

अच्छा बीज अच्छी जमीन में बोया जाय तो उससे मजबूत पौधा उगेगा। और उस पर बढ़िया फल-फूल आवेंगे इस तथ्य से क्या शिक्षित, क्या अशिक्षित सभी परिचित, क्या अशिक्षित सभी परिचित है? जिन्हें कृषि एवं उद्यान से अच्छा प्रतिफल पाने की आकांक्षा पाने की आकांक्षा है वे इस तथ्य पर आरम्भ से ही ध्यान रखते है कि उत्पादन के मूलभूत आधारों को सतर्कता के साथ जुटाया जाय और उनका स्तर ऊँचा रखा जाय।

यों विवाह एक निजी मामला समझा जाता हैं और संतानोत्पादन को भी व्यक्तिगत क्रिया-कलाप की परिधि में सम्मिलित करते हैं पर वस्तुतः यह एक सार्वजनिक, सामाजिक एवं सार्वभौम प्रश्न है। क्योंकि भावी पीढ़ियों के निर्माण की आधारशिला यही है। राष्ट्र और विश्व का भविष्य उज्ज्वल एवं सुसम्पन्न बनाने की प्रक्रिया धन-समृद्धि पर टिकी हुई नहीं है, वरन् इस बात पर निर्भर है कि भावी नागरिकों का शरीरगत, बौद्धिक व चारित्रिक स्तर कैसा होगा? धातुएँ इमारतें या हथियार नहीं, किसी राष्ट्र की वास्तविक सम्पदा वहाँ के नागरिक होते है। वे जैसे भी भले या बुरे होंगे, उसी स्तर का समाज, समय एवं वातावरण बनेगा। इसलिए भावी प्रगति की बात सोचने में हमें सुसंतति के निर्माण की व्यवस्था जुटाने की बात की ध्यान में रखनी चाहिए।

घरेलू पशुओं यहाँ तक कि पालतू कुत्ते, बिल्लियों तक के बारे में हमारे प्रयास यह होते है कि उनकी सन्तानें उपयुक्त स्तर की हो। जिन्हें इस उद्देश्य को पूरा करने में रुग्ण, दुर्बल अथवा अयोग्य समझते हैं उनका प्रजनन प्रतिबन्धित कर देते है। इस प्रतिबन्ध प्रोत्साहन में उचित वंश वृद्धि की बात सामने रखी जाती है। क्या मानव प्राणी की नस्लें ऐसे ही अस्त-व्यस्त बनने दी जानी चाहिए, जैसी कि इन दिनों बन रही है? क्या इस संदर्भ में कुछ देख भाल करना या सोचना-विचारना समाज कर्तव्य नहीं है? क्या बच्चे मात्र माता-पिता की ही सम्पत्ति है? क्या उनका स्तर समाज को प्रभावित नहीं करता? इन बातों पर यदि गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि किसी राष्ट्र या समाज का भविष्य उसकी भावी पीढ़ियों पर निर्भर हैं यदि सुयोग्य नागरिकों की जरूरत हो तो, भोजन, चिकित्सा अथवा शिक्षा का प्रबन्ध भर कर देने से काम नहीं चलेगा। इस सुधार का क्रम सुयोग्य जनक-जननी द्वारा सुविकसित सन्तान उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व सन्तान उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व निबाहने से होगा यह तैयारी विवाह के दिन से ही आरम्भ हो जाती हैं यदि पति-पत्नी की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति सुयोग्य सन्तान के उत्पादन तथा भरण-पोषण के उपयुक्त नहीं है तो उनके द्वारा की जाने वाली वंश-वृद्धि अवांछनीय स्तर की ही बनेगी ओर उसका दुष्परिणाम समस्त समाज को भुगतना पड़ेगा।

वंशानुक्रम विज्ञान की चर्चा इन दिनों जोरों पर है। जनन रस में पाये जाने वाले गुण-सूत्रों को भावी पीढ़ियों के निर्माण का सारा श्रेय दिया जा रहा हैं इन जीव कणों में हेर-फेर करके ऐसे उपाय ढूँढ़े जा रहे है जिनके आधार पर मनचाहे आकार-प्रकार की सन्तानों को जन्म दिया जा सके। इस अत्युत्साह में अभी तक आँशिक सफलता में मिली हैं क्योंकि गुण-सूत्रों ने आकृति तक ही अभीष्ट परिवर्तन प्रस्तुत नहीं किया। फिर प्रकृति के परिवर्तन की तो बात ही क्या की जाय?

प्रयोगशालाओं में रासायनिक पदार्थों विद्युत उपचार की ऐसी विधि-व्यवस्था सोची जा रही हैं जिससे अभीष्ट स्तर की सन्तान पैदा की जाए सके। इस दिशा में जी तोड़ प्रयत्न हो रहे है सोचा जा रहा है कि बिना माता का स्तर सुधारे अथवा बिना वातावरण की चिन्ता किये वैज्ञानिक विद्या के आधार पर सुसन्तति उत्पादन की व्यवस्था यांत्रिक क्रिया-कलाप द्वारा सम्पन्न कर ली जायगी।

जनन-रस में पाये जाने वाले गुण-सूत्र में एक व्यक्त रूप-डामिनंट हैं दूसरा अव्यक्त रूप हैं, रिसोसिव। व्यक्त भाग को भौतिक माध्यमों से प्रभावित किया जा सकता हैं पर अव्यक्त स्तर को केवल जीव की निजी इच्छा स्तर को केवल जीव की निजी इच्छा-शक्ति ही प्रभावित कर सकती हैं महत्वपूर्ण परिवर्तन इस चेतनात्मक परिधि में ही हो सकते है। इसके लिए रासायनिक अथवा चुम्बकीय माध्यमों से काम नहीं चल सकता हैं इनके लिए चिन्तन की गलने वाली अन्तःस्फुरणा अथवा दबाव भरी परिस्थितियाँ होनी चाहिये। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यह सोचा जाने लगा है कि माता-पिता का स्वर सुधारे बिना सुसन्तति की समस्या प्रयोगशालाओं द्वारा न हो सकेगी।

वनस्पति अथवा पशुओं में सुधार उत्पादन सरल हैं, पर मनुष्यों में पाये जाने वाले चिन्तन तत्व में उत्कृष्टता भरने की आवश्यकता यांत्रिक गुण सूत्रों में हेर -फेर करके तत्काल जिस नई पीढ़ी कस वचन इन दिनों देखा जा रहा है उसे म्यूटेशन -आकस्मिक परिवर्तन प्रक्रिया कहा जा सकता है मयूटेशन के संदर्भ में पिछले दिनों पैवलब मैकडूगल, मारगन, मुलर, प्रकुति जीन वानियों ने अनेक माध्यमों ओर उपकरणों से विविध प्रयोग किये हैं जनन रस को प्रभावित करने वाली उनने घुतीय ओर रासायनिक उपाय अपनाये सोचा यह गया था कि उससे अभीष्ट शारीरिक ओर मानसिक क्षमता संपन्न होगी पर उनसे मात्र शरीर की दूर दृष्टि थोड़ा हेर फेर हुआ विशेषतया

बिगाड़ प्रयोजन में ही सफलता अधिक मिली सुधर की गति मतिमंद रही गुणों में पूर्वजों की अपेक्षा कोई अतिरिक्त समभाव न हो सकता एक जाति के जीवों में दूसरे जाति के जीवों की कलमें लगाई गई ओर गर्ण सडर सन्तानें उत्पन्न की गई यह प्रयोग उसी जीवधारी तक अपना प्रभाव दिखाने में सफल हुए अधिक से अधिक एक पीढ़ी कुछ बदली-बदली जन्मी इसके बाद वह क्रम समाप्त हो गया घेडढ़ी ओर गधे के याग से उत्पन्न होने वाले खच्चर अगली पीढ़ियों को जन्म देने में असमर्थ रहते है

वर्णसड्ढील्तरल उत्पन्न करके पूर्वजों की अपेक्षा अधिक सशक्त ओर समर्थ पीढ़ी त्रया उपजाने का उत्साह अब क्रमशः घटता चला जा रहा है इस सन्दर्भ में प्रथम आवश्यकता तो यही रहती है कि प्रकृति एक ही जाति के जीवों में संस्करण स्वीकार करती है मात्र उपजातियों से ही प्रत्यारोपण सफल हो सकता हैं यदि शरीर रचाना में विशेष अन्तर होगा तो संस्करण प्रयोगों में सफलता न मिलेगी दूसरी बात यह है कि आया की दृष्टि से थोड़ा सुधार इस प्रक्रिया में हो सकता हैं गुणों में नहीं वर्ण सड्ढील्तर गाये मोटी, तगड़ी तो हुई पर अपने पूर्वजों की अपेक्षा अधिक दुधारू न बन सकी। इन प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकाला है कि उत्कृष्टता जीव के अपने विकास -क्रम के साथ जुड़ी हुई है वह बाहरी उलट-पुलट करके विकसित नहीं की जा सकती हैं

सुसन्तति के सम्बन्ध में वैनिक्रयोग अधिक से अधिक इतना ही कर सकते हैं कि रासायनिक हेर-फेर करके शारीरिक दृष्टि से अपेक्षाकृत थोड़ी मजबूत पीढ़ियाँ तैयार कर दे पर उनमें नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक उत्कृष्टता भी होगी इसकी गारण्टी नहीं दी जा सकती।

उस अत्युत्साह अब वंशानुक्रम लगभग हतोत्साहित हो चला है ओर सोचा जा रहा है कि अभिभावकों को ही सुयोग्य बनाने पर ध्यान दिया जाय। एक ओर अयोग्य व्यक्तियों को अवांछनीय उत्पादन से रोका जाय, दूसरी ओर सुयोग्य, सुसंस्कृत लोगों को प्रजनन के लिए प्रोत्साहित किया जा। विवाह निजी मामला न रहें वरन् सामाजिक नियन्त्रण इस बात का स्थापित किया जाय कि शारीरिक ही नहीं अन्य दृष्टियों से भी सुयोग्य और समर्थ व्यक्तियों को विवाह बन्धन में बँधने ओर सन्तानोत्पादन के लिए स्वीकृति दी जाय।

जर्मनी के तीन प्रसिद्ध जीवन विज्ञानियों ने वंशानुक्रम विज्ञान पर एक संयुक्त ग्रन्थ प्रकाशित कराया है ना है ‘ह्यूमन हैरेडिटी’। लेखकों के नाम है डॉ. आरवेन वेवर, डॉ. फ्रिट्ज लेंज। उन्होंने वासना के उभार में चल रहे अन्धाधुन्ध विवाह सम्बन्धों के कारण सन्तान पर हो वाले दुष्प्रभाव को मानवी भविष्य के लिए चिन्ताजनक बताया है लेखकों का संयुक्त मत है कि - अनियन्त्रित विवाह प्रथा के कारण पीढ़ियों का स्तर बेतरह गिरता जा रहा है उनने इस बात को भी दुखद बताया है। कि निम्न वर्ग की सन्तानें बढ़ रही है और उच्चस्तर के लोगों की संयाति सन्तान घटती चली जा रही है। पीढ़ियों के आकस्मिक परिवर्तन म्यूटेशन-के विशेष शोधकर्ता टर्नियर का निष्कर्ष यह है कि मानसिक द्वति कदाचित् ही पूरी कर सकेगी।

दुर्बलता के कारण गुण सूत्रों में ऐसी अशक्तता आती है जिसके कारण पीढ़ियाँ गई गुजरी बनती है इसके विपरीत मनोबल सम्पन्न व्यक्तियों की आन्तरिक स्फुरणा उनके जनन रस में ऐसा परिवर्तन कर सकती है जिससे तेजस्वी ओर गुणवान् ही नहीं शारीरिक दृष्टि से भी परिपुष्ट संतानें उत्पन्न हो वंश परम्परा से जुड़े हुए कुष्ठ, उपदंश, क्षय, दमा मधुमेह आदि रोगों की तरह निषेधात्मक पक्ष यह भी है कि मनोबल के आधार पर उत्पन्न चेतनात्मक समर्थता पीढ़ी आगे बढ़े ओर उसका सत्परिणाम शरीर मन अथवा दोनों पर प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो सके। चमत्कारी आनुवंशिक परिवर्तन इसी आधार पर सम्भव है। मात्र रासायनिक परिवर्तनों के लिए भौतिक प्रयास इस प्रयोजन की पूर्ति नहीं कर सकते। यह तथ्य हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि जिस प्रकार परिवार नियोजन के द्वारा अवांछनीय उत्पादन रोकने का प्रयास किया जाता हैं उसी प्रकार समर्थ और सुयोग्य सन्तानोत्पादन के लिए आवश्यक ज्ञान, आधार-साधन एवं प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाय।

अनियन्त्रित विवाह व्यवस्था के सम्बन्ध में दूरदर्शी विचारशील व्यक्ति भारी चिन्ता व्यक्त कर रहे है। अगर यह सोच रहे है कि इस सम्बन्ध में विवेक सम्मत नियन्त्रण व्यवस्था किये बिना काम नहीं चलेगा। हिंदू समाज में इन दिनों विवाह व्यवस्था कितनी भेड़ी क्यों न हो गई हो उस पर समाज का आधा-सीधा नियंत्रण अवश्य है नियन्त्रण का स्वरूप क्या हो यह अलग प्रश्न है पर भौतिक समस्या का हल हिन्दू समाज में अभी भी विद्यमान है कि विवाह प्रक्रिया पर समाज का नियन्त्रण होना चाहिए इस भारतीय परम्परा की ओर विश्व के विचार शील वर्ग का ध्यान गया है ओर यह सोचा जा रहा है कि विवाह पर सामाजिक नियन्त्रण का अनुकरण समस्त संसार में या जाना चाहिए बीमा कम्पनियां इस बात की पूरी पूछ-ताछ करती है कि बीमा कराने वाले के पूर्वज जिस आयु में मरे थे। क्योंकि अन्वेषण से ही पाया गया है कि पूर्वजों की आयु से मिलती -जुलती हैं डॉ. रेमण्ड पर्ल ने बहुत शोधें के उपरान्त इस बात पर जोर दिया है कि सन्तान का दीर्घ जीवन यदि अभीष्ट हो तो उसका प्रयोग जननी को पहले अपने ऊपर से प्रारम्भ करना चाहिए सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जेवी हैल्डन के अनुसार आशा है कि अगले दो सौ वर्षों के भीतर योरोप आपे अमेरिका में भी हिन्दुओं की तरह वर्ण व्यवस्था स्थापित होगी और विवाहों के संदर्भ में उसका विशेष रूप से ध्यान रखा जाएगा। जापान में वशं परम्परा के आधार पर जोड़ो का चुनाव कराने में सहायता देने वाली एक सुगठित संस्था स्थापित हुई है ग्राण्ड यूजेनिक कौंसिल।

वंशानुक्रम के आधार पर वर्ण व्यवस्था, समाज व्यवस्था बनाने की उप रेखा प्रस्तुत करने के लिए वान की एक स्वतन्त्र शाखा का विकास हुआ है जिसका नाम हैं -’यूजेमिक्स’।

मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य का प्रश्न बहुत कुछ सुसन्तति निर्माण की प्रक्रिया पर निर्भर है इसके विभिन्न पक्षों पर विचार करना पड़ेगा और आवश्यक आधार जुटाना पड़ेगा। उपयुक्त जोड़े ही विवाह बन्धन में बंधे ओर उपयोगी उत्पादन करे इस संदर्भ में विवाह पद्धति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सामाजिक नियन्त्रण रहना चाहिए यौन-विनोद के लिए विवाह की छूट ओर अयोग्य उत्पादन की स्वतन्त्रता को आबद्ध करने के लिए भी कुछ तो करना ही पड़ेगा।


सृष्टि का निरीक्षण (Kahani)

सृष्टिकार ने एक दिन सोचा कि धरती पर जाकर कम से कम अपनी सृष्टि को तो देखा जाये। धरती पर पहुँचते ही सबसे पहले उनकी दृष्टि एक किसान की ओर गयी। वह कुदाली लिए पहाड़ खोदने में लगा था सृष्टिकर्ता प्रयत्न करने पर भी अपनी हँसी न रोक पाये |

वह किसान के पास गये, उन्होंने कारण जानना चाहा तो सीधा उत्तर था। ‘महाराज! मेरे साथ कैसा अन्याय है? इस पर्वत को अन्यत्र स्थान ही नहीं मिला बादल आते है इससे टकराकर उस ओर वर्षा कर देते हैं और पर्वत के इस ओर जो मेरे खेत आते है वह सूखे ही रहते है क्या तुम इस विशाल पर्वत को हटा सकोगे स्रष्टा ने पूछा। क्यों नहीं मैं इसे हटाकर ही मानूँगा, यह मेरा दृढ़ संकल्प हैं |

सृष्टिकर्ता आगे बढ़ गये तो उन्होंने अपने सामने पर्वतराज को याचना करते देखा। वह हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहा था विद्याता ! इस संसार में सिवाय आप के मेरी रक्षा कोई नहीं कर सकता। सृष्टा ने पूछा कि किसान के कथन से इतने क्यों घबरा रहे हो? तो पर्वत ने कहा, आपने उसकी आस्था नहीं देखी मेरा अनुभव है निष्ठावान् का संकल्प कभी अधूरा नहीं रहा अपनी सबल आस्था पीढ़ी चलती रहती है। संकल्प पूरा होने तक वाम नहीं लेती।

द्वेषग्रस्त व्यक्ति अपनी बड़ी-बड़ी उपलब्धियों को कौड़ी के मोल गंवा देते हैं। दुर्योधन के यहाँ दुर्वासा जी गये। उसने उनके दस हजार शिष्यों, सहित उनका भरपूर आतिथ्य तीन माह तक किया। परम तपस्वी दुर्वासा उसके आतिथ्य से संतुष्ट हुए उन्होंने उससे वरदान माँगने को कहा विवेक पूर्वक सोचकर माँगता तो वह अक्षय राज्य पारिवारिक सौहार्द, सद्गति कुछ भी माँग सकता था परन्तु ईर्ष्यालु विद्वेषी का विवेक साथ नहीं दे पाता दुर्योधन ने सोचा-पाण्डवों का अनिष्ट करना चाहिए, वे अभाव का जीवन जी रहे थे उनके पास सूर्य का दिया अक्षय पात्र भर है जब अन्तिम व्यक्ति भोजन करके उसे धो दे तो फिर उससे भोजन प्राप्त नहीं किया जा सकता था |

दुर्योधन ने सोचा-जब द्रौपदी भोजन करके पात्र धो चुके, तब ऋषि पहुँचे और आतिथ्य न हो पाने से क्रोध करके शाप दे, तो पाण्डवों का अनिष्ट हो सकता है वह प्रकट में बोला-ऋषि आप हम पर प्रसन्न है तो हमारे भाईयों से मिलियेगा। यह मेरी कामना है पर आप उनके पास मध्याह्न में तब पहुँचे जब वे सब भोजन कर चुके हो।

ऋषि भाव समझते हैं समझ गये कि दुर्योधन किस दुराव से यह मीठे वचन बोल रहा है। उन्होंने सोचा अच्छा हुआ, इस दुर्मति को अच्छा वरदान नहीं देना पड़ा उन्होंने तथास्तु कह दिया।

वादे के अनुसार, दुर्वासा दस हजार शिष्यों तुम होकर गए उनका अनिष्ट नहीं हुआ तथा दुर्योधन को मिला एक अलभ्य अवसर उसके दुर्भाव क पेट में समा गया।


संस्कारात् द्विज उच्यते

महर्षि शाल्विन की पत्नी श्लेषा ब्राह्मण कन्या थीं तो द्वितीय पत्नी इतरा शूद्र कन्या। एक ही भवन में, एक ही मूल शाखा सम्बद्ध अवर्ण सवर्ण का यह समन्वय भी अभूतपूर्व था। महर्षि के गृहस्थ में पूर्ण सुख शान्ति विराजती थी। दोनों पत्नियाँ दो सगी बहनों के समान परस्पर प्रेम पूर्वक रहती थीं, इसे ऋषि का प्रताप ही कहा जाता था।

समय पाकर श्लेषा और इतरा दोनों के गर्भ से एक एक पुत्र का जन्म हुआ। दोनों बालक अपूर्व तेजस्वी और सुन्दर थे। कोई भेद नहीं कर सकता था कि इनमें कौन ब्राह्मणी पुत्र है और कौन है शूद्वा पुत्र। इस पहचान की तब किसी को आवश्यकता भी न थी। आत्मा को शिरोमणि मानने वाला ऋषि कुल चर्म भेद,जाति भेद करना जानता ही न था। यह तो मध्य युग की बात है जब शूद्रों को अस्पृश्य भी कहा जाने लगा।

पर यह क्या हुआ? एक दिन दोनों ही किशोर ऋषि कुमार जब पहली बार महर्षि के यज्ञ स्थल पर प्रविष्ट हुए तो महर्षि शाल्विन ने श्लेषा के पुत्र को तो यज्ञ वेदी पर यजमान की तरह

बैठा दिया। किन्तु मानो शूद्वा पुत्र के वहाँ उपस्थित हो जाने से देवार्चना मलीन होने की आशंका पैदा हो गयी थी या और कोई भय। महर्षि ने इतरा के पुत्र को वहाँ बैठने की अनुमति ही नहीं दी, वरन् उसे डपट कर वहाँ से भगा दिया। बालक के लिए यह अपमान असह्य था। घर लौट कर माँ के अंचल में मुख छुपाकर वह जितना रो सकता था रोया। माँ के पास भी तो धैर्य बँधाने के लिए कुछ नहीं था। वह भी सहानुभूति में केवल रोती रही। श्लेषा ने महर्षि के इस व्यवहार को अनुचित ही नहीं निन्दनीय भी ठहराया। पर महर्षि ने न जाने उसके कान में क्या कहा कि श्लेषा ने फिर कोई प्रतिवाद नहीं किया।

अब तक हृदय की सम्पूर्ण वेदना आँसुओं के रूप में घुलकर धुल चुकी थी मन पर्वतीय उत्पित्यका से उतरी हुई उस सरिता की भांति निर्मल हो गया था जो समतल क्षेत्र में अपना विस्तार ही नहीं कर लेती वरन् प्रवाह भी शान्त और मन्द कर लेती है।

बालक ने प्रश्न किया-मा। अब तम ही बता। मैं अपने कल्याण के लिए किसे गुरु वरण करूं। भारी हृ से इतरा ने उत्तर दिया-तात्फ जल महर्षि ने ही तुझे दीक्षा के गह नहीं समझा तब और किसके पास तुझे भेजूं, तू तो अपनी आत्मा को ही गुरु मान और जिस धरती ने तुझे जन्म दिया है उसकी गोद को ही यज्ञ स्थल मानकर अपनी उपासना प्रारम्भ कर मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है भगवान सब मंगल करेंगे। बालक वहां से चल पड़ा भगवती प्रकृति का अध्ययन और आत्मदेव की उपासना करते-करते उसकी गति योगियों सी हो चली। मो के लिए अक्षर न को साधना की कसौटी पर कस-कस कर और भगवती प्रकृति के व्यवहार को देख-देखकर उसने न का अद्वितीय भण्डार अर्जित कर लिया। इतरा के पुत्र का यश संसार में चन्द्रमा की कला के समान विकसित होने लगा।

महर्षि शाल्विन स्वयं चिन्तित हो उठे। उस दिन इतरा से अधिक शोक में श्लेषा डूबी थी और सोच रही थी कि कही महर्षि का प्रयोग तितीक्षा की कसौटी पर असफल तो सिद्ध न हो जायगी। किन्तु सायंकाल इतरा के पुत्र का प्राकट्य ऐसे हुआ जैसे घिरे बादलों को चीर कर सूर्य प्रकट होता है

बालक जो अब युवावस्था को पार कर चुका था अपूर्व तेज से प्रकाशित हो रहा था उसके हाथ में पाण्डुलिपि की दोनों माताएँ तो पुत्र के स्वागत ओर कुशल मंगल पूछते में तल्लीन हो गयी, पर महर्षि ने उस पाण्डुलिपि को उठाकर देखा तो स्नेह और ममत्व से उनकी आँखें छलक उठी। यह पाण्डुलिपि और कुछ नहीं वैदिक मन्त्रों की विशुद्धतः व्याख्या थी जिसे ऐतरेय ब्रह्माणं पढ़े बिना वेो के कुछ विशिष्ट मंत्रों के उपयोग कान ही होता अपने पुत्र की इस उपलब्धि पर महर्षि फूले नहीं समाए। अपनी श्रेष्ठ साधना द्वारा ऐतरेय ने अपनी माता का ही मुख उज्ज्वल नहीं कर दिया वरन् इस बात का प्रमाण भी दे दिया कि शुद्र हो तो क्या संस्कार से ही मनुष्य ब्राह्मण हुआ करते है।


असली स्वरूप (Kahani)

एक दार्शनिक तेली के यहाँ तेल लेने जा पहुँचा। तेली ने जब तक तेल की नाप तौल की वह देखता रहा कि कोल्हू का बैल स्वतः ही चल रहा है उसे कोई हाँक भी नहीं रहा। उसने तेली से कहा आप का बैल बहुत ईमानदार और आज्ञाकारी है कोल्हू चलाने वाला भी नहीं फिर भी चल रहा है तेली बोला देखते नहीं आँखों पर पट्टी बंधी है उसने पूछा ऐसा क्या किया? तेली ने कहा आँखें खुली होने पर बैल का खुलना कठिन है बैल कोई आदमी तो है नहीं कि आँखें होते हुए भी विश्वास न करे और अंधा बन जाय। दार्शनिक की समझ में आदमी का असली स्वरूप आ गया।


प्रेम और उसकी सच्ची अनुभूति

अल्बर्ट श्वाइत्जर जहाँ रहते थे, उनके समीप ही बन्दरों का एक दल रहता था। दल के एक बन्दर और बंदरिया में गहरी मित्रता हो गई। जहाँ जाते साथ-साथ जाते, एक कुंद खाने को पाता तो यही प्रयत्न करता कि उसका अधिकाँश उसका साथी खाये। कोई भी वस्तु उनमें से एक ने भी अकेले न खाई। उनकी इस प्रेम भावना न अल्बर्ट श्वाइत्जर को बहुत प्रभावित किया। वे प्रायः प्रतिदिन इन मित्रों की प्रणय-लीला देखने जाते और एकांत स्थान में बैठकर घण्टों उनके दृश्य देखा करते। कैसे भी संकट में उनमें से एक ने भी स्वार्थ का परिचय न दिया। अपने मित्रों के लिये वे प्राणोत्सर्ग तक के लिये तैयार रहते, ऐसी थी उनकी अविचल प्रेम-निष्ठा

विधि की विडम्बना-बंदरिया कुछ दिन पीछे बीमार पड़ी, बन्दर ने उसकी दिन-दिन भर भूखे-प्यासे पास रहकर सेवा-सुश्रूषा की पर बंदरिया बच न सकी, मर गई। बन्दर के जीवन में मानो वज्रपात हो गया। वह गुमसुम जीवन बिताने लगा।

इन प्राणियों में विधुर विवाह पर प्रायः किसी में भी प्रतिबन्ध नहीं है। एक साथी के न रहने पर नर हो या मादा अपने दूसरे साथी का चुनाव खुशी-खुशी कर लेते हैं इस बन्दर दल में एक से एक अच्छी बंदरिया थीं, बन्दर हृष्ट-पुष्ट था किसी भी नई बंदरिया को मित्र चुन सकता था, उन उनके अन्तः करण का प्रेम तथाकथित मानवीय प्रेम की तरह स्वार्थ और कपटपूर्ण नहीं था, पता नहीं उसे आत्मा के अमरत्व परलोक और पुनर्जन्म पर विश्वास था इसलिये उसे फिर किसी बंदरिया से विवाह नहीं किया।

पर परमात्मा जिस धातु का बना है वह प्रेम के प्रकाश ही ही जीवित रहता है, प्रेम विहीन जीवन तो जीवंत नरक समान लगता है, बन्दर ने अपनी निष्ठा पर आँच न आने देने का संकल्प कर लिया होगा तभी तो उसने दूसरा विवाह नहीं किया पर प्रेम की प्यास कैसे बुझे? यह प्रश्न उसके अन्तः करण में उठा अवश्य होगा तभी तो उसने कुछ दिन पीछे ही अपने जीवन की दिशा दूसरी ओर मोड़ दी प्रेम की सेवा का रूप दे दिया उसने, अभी तक उसने अपनी प्रेयसी बंदरिया को आत्म-समर्पण किया था अब उसने हर दीन-दुखी में आत्मा के दर्शन करने और सबको प्यार करने का सिद्धान्त बना लिया, उससे ही उसे शान्ति मिली।

बन्दर एक स्थान पर बैठा रहता। अपने कबीले या दूसरे कबीले का कोई अनाथ बन्दर मिल जाता तो वह उसे प्यार करता खाना खिलाता, भटक गये बच्चे को ठीक उनकी माँ तक पहुँचा कर आता, लड़ने वाले बन्दरों को अलग-अलग कर देता, इसमें तो वह कई बार अति उग्र पक्ष को मार भी देता था पर तब तक चैन न लेता जब तक उनसे मेल-जोल नहीं करा देता। उसने कितने ही वृद्ध, अपाहिज बन्दरों को पाला, कितनों ही बोझ उठाया। बन्दर की इस निष्ठा ने ही अल्बर्ट श्वाइत्जर को एकान्तवादी जीवन से हटाकर सेवा भावी जीवन बिताने के लिये अफ्रीका जाने की प्रेरणा दी। श्वाइत्जर बन्दर की इस आत्म-निष्ठा को जीवन भर नहीं भूले।

सेन्टियागों की धनाढ्य महिला श्रीमती एनन ने पारिवारिक कलह से ऊबकर जी बहलाने के लिए एक भारतीय मैना पाल ली। मैना जब से आई तभी से उदास रहती थी एनन की बुद्धि ने प्रेरणा दी सम्भव है उसे भी अकेलापन कष्ट दे रहा हो। सो दूसरे दिन एक और तोता मोल ले लिया। तोता और मैना भिन्न जाति के दो पक्षी भी पास आ जाने पर परस्पर ऐसे घुल-मिल गये कि एक के बिना दूसरे को चैन ही न पड़ता।

प्रातः काल बिना चूके मैना तोता को “नमस्ते” कहती। तोता बड़ी ही मोटी वाणी में उसके अभिवादन का कुछ कहकर उत्तर देता। पिंजड़े पास-पास कर दिये जाते फिर दोनों में वार्तायें छिड़ती, न जाने क्या मैना कहती न जाने क्या तोता कहता पर उनको देखकर लगता यह दोनों बहुत खुश हैं। दोनों को प्रेम प्रतिदिन प्रगाढ़ होता चला गया चोंच से दबाकर अपनी चीज बाँट कर खाते।

कुछ ऐसा हुआ कि श्रीमती एनन के एक रिश्तेदार को तोता भा गया, वे जिद करके उसे माँग ले गई ठीक उसी दिन मैना बीमार पड़ गई ओर चौथे दिन सायंकाल 5 बजे उसने अपनी नश्वर देह त्याग दी। तोता कृतघ्न नहीं था। वह बन्दी था, चला तो गया पर आत्मा को बन्दी बनाना किसके लिये सम्भव है वह भी मैना को याद में बीमार पड़ गया और ठीक चौथे दिन सायंकाल 5 बजे उसने भी अपने प्राण त्याग दिये। पता नहीं दोनों की आत्माएँ परलोक में कहीं मिलीं या नहीं, पर इस घटना ने श्रीमती एनन का स्वभाव ही बदल दिया। अब उनके स्वभाव ही बदल दिया। अब उनके स्वभाव में सेवा और मधुरता का ऐसा प्रवाह फूटा कि वर्षों से पारिवारिक कलह में जलता हुआ दाम्पत्य सुख फिर खिल उठा। पति-पत्नी में कुछ ऐसी ही घनिष्ठता हुई कि मानों उनके अन्तःकरण में तोता और मैना की आत्मा ही साक्षात् उतर आई हों उनकी मृत्यु भी वियोगजन्य परिस्थितियों में एक ही दिन एक ही समय हुई।

तोता, मैना, बन्दर छोटे-छोटे सौम्य स्वभाव जीवों की कौन कहे प्रेम की प्यास तो भयंकर खूँखार जानवरों के हृदय में भी होती है। एफ कुवियर के एक मित्र को भेड़िया पालने की सूझी। कहीं से एक बच्चा भेड़िया मिल गया। उसे वह अपने साथ रखने लगे। भेड़िया कुछ ही दिनों में उनसे घुल-मिल गया मानो उनकी मैत्री इस जन्म की ही नहीं कई जन्मों की हो।

कुछ ऐसा हुआ कि एक बार उन सज्जन को किसी काम से बाहर जाना पड़ गया। वह भेड़िया एक चिड़िया घर को दे गये। भेड़िया चिड़ियाघर तो आ गया पर अपने मित्र की याद में दुःखी रहने लगा मनुष्य के प्रेम के लिये पीड़ित हो यह देखकर चिड़ियाघर के कर्मचारी बड़े विस्मित हुए। कोई भारतीय दार्शनिक उनके पास होता और आत्मा की सार्वभौमिक एकता का तत्व दर्शन उन्हें समझाता तो सम्भव था ये भी जीवन को एक नई आध्यात्मिक दिशा में मोड़ने में समर्थ होते उनका विस्मय चर्चा का विषय भर बनकर रह गया।

भेड़िये ने अपनी प्रेम की पीड़ा शान्त करने के लिए दूसरे जीवों की ओर दृष्टि डाली। कुत्ता-भेड़िया का नम्बर एक का शत्रु होता है पर आत्मा किसका मित्र किसका शत्रु-क्या तो वह कुत्ता क्या भेड़िया-कर्मवश भ्रमित अंग-जंग आत्मा से एक है यदि यह तथ्य संसार, जान जाये तो फिर क्यों लोगों में झगड़े हों, क्यों मन-मुटाव दंगे-फसाद मद-भाव उत्पीड़न और एक दूसरे से घृणा हो। विपरीत परिस्थितियों में भी प्रेम जैसी स्वर्गीय सुख की अनुभूति आत्मदर्शी के लिये ही सम्भव है इस घटना का सार-संक्षेप भी यही है। भेड़िया अब कुत्ते का प्रेमी बन गया उसके बीमार जीवन में भी एक नयी चेतना आ गई। प्रेम की शक्ति कितनी बलदायक है कि वह निर्बल और अशक्तों में भी प्राण की गंगोत्री कर देती है।

दो वर्ष पीछे मालिक लौटा। घर आकर वह चिड़िया घर गया अभी वह वहाँ के अधिकारी से बात-चीत कर ही रहा था कि उसका स्वर सुनकर भेड़िया भगा चला आया और उसके शरीर से शरीर जोड़ कर खूब प्यार जताता रहा। कुछ दिन फिर ऐसे ही मैत्रीपूर्ण जीवन बीता।

कुछ दिन बाद फिर जाना पड़ा। भेड़िया के जीवन में लगता हैं भटकाव ही लिखा फिर उस कुत्ते के पास जाकर उसने अपनी पीड़ा शान्त की। इस बार मालिक थोड़ी जल्दी आ गया। भेड़िया इस बार उससे दूने उत्साह से मिला पर उसका स्वर शिकायत भरा था बेचारे को क्या पता था कि मनुष्य ने अपनी जिन्दगी ऐसी व्यस्त जटिल साँसारिकता से जकड़ दी है कि उसे आत्मीय-भावनाओं की ओर दृष्टिपात और हृदयंगम करने की कभी सूझती ही नहीं मनुष्य की यह कमजोरी दूर हो गई होती तो आज संसार कितना सुखी और स्वर्गीय परिस्थितियों से आच्छादित दिखाई देता।

कुछ दिनों बहुत प्रेमपूर्वक साथ-साथ रहे। एक-दूसरे को चाटते, थपथपाते हिलते-मिलते, खाते-पीते रहे और इसी बीच एक दिन उसके मालिक को फिर बाहर जाना पड़ा। इस बार भेड़िये ने किसी से न दोस्ती की न कुछ खाया-पिया उसी दिन से बीमार पड़ गया और प्रेम के लिए तड़प-तड़प कर अपनी इहलीला समाप्त कर दी। उसके समीपवर्ती लोगों के लिये भेड़िया उदाहरण बन गया। वे जब कभी अमानवीय कार्य करते भेड़िये की याद आती और उनके सिर लाज से झुक जाते।

बर्लिन के एक सर्कस कम्पनी में एक बाघ था। नीरो उसका नाम था। इस बाघ को लीरिजग के एक चिड़िया घर से खरीदा गया था। जिन दिनों बाघ चिड़ियाघर में था उसकी मैत्री चिड़ियाघर के एक नौकर से हो गई बाघ उस मैत्री के कारण अपने हिंस्र स्वभाव तक को भूल गया।

पीछे वह क्लारा हलिपट नामक एक हिंसक जीवों की प्रशिक्षिका को सौंप दिया गया। एक दिन बाघ प्रदर्शन से लौट रहा था तभी एक व्यक्ति निहत्था आगे बढ़ा-बाघ ने उसे देखा और घेरा तोड़ कर भाग निकला। भयभीत दर्शक और सर्कस वाले इधर-उधर भागने लगे पर स्वयं क्लारा हलिपट तक यह देखकर दंग रह गई कि बाघ अपने पुराने मित्र के पास पहुँच कर उसे चाट रहा और प्रेम जता रहा है। उस मानव-मित्र तो उसकी पीठ खूब थपथपायी, प्यार किया और कहा अब जाओ समय हो गया। बाघ चाहता तो उसे खा जाता भाग निकलता पर प्रेम के बन्धनों में जकड़ा हुआ बाघ अपने मित्र की बात मानने को बाध्य हो गया। लोग कहने लगे सचमुच प्रेम की शक्ति ऐसी है जो हिंसक को भी मृदु, शत्रु को भी मित्र और संताप से जलते हुये संसार को हिमखण्ड की तरह शीतल और पवित्र कर सकती है।


अपरिग्रह में ही ब्राह्मणत्व निहित है (Kahani)

अपरिग्रह में ही ब्राह्मणत्व निहित है। एक बार किसी महिला ने अमेरिकी दार्शनिक थोरो को एक चटाई भेंट की। चटाई को वापिस करते हुये, वह बोले-श्रीमती जी! न तो मेरे घर में इतना स्थान है, कि मैं चटाई को बिछा सकूँ और न इतना समय ही है कि उसे झाड़ कर साफ करूँ। फिर घर को अनावश्यक वस्तुओं का संग्रहालय बनाने से लाभ भी क्या है? इसी प्रकार उन्होंने अपनी मेज़ पर रखे किसी मित्र द्वारा उपहार में दिये-सफेद सुन्दर पत्थरों के तीन मनोरम पेपर वेटों को फेंक दिया। उनके मित्र ने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने यही उत्तर दिया-भाई अपने मस्तिष्क को साफ करने का कार्य ही क्या कम है, जो बेकार की वस्तुओं को ढेर लगा कर झंझट मोल लूँ।


मर्यादाएँ मत तोड़िए

जिस वृक्ष की जड़ पर पौध काल में ही आघात कर दिया जाएगा क्या आगे चलकर उस वृक्ष के पूर्ण विकसित स्वस्थ और उत्तम फल-फूल युक्त होने की आशा की जा सकती है? नहीं, उससे यह आशा करना कि यह विशाल वृक्ष बनकर पल्लव, पुष्प तथा फलों से परिपूर्ण होगा दीर्घकाल तक छाया फल तथा आश्रय देकर पथिकों तथा पक्षियों की सेवा कर जीवन सफल कर सकेगा, व्यर्थ हैं। जिस भवन की नींव कच्ची और कमजोर होगी वह किसी समय भी धोखा दे सकता है। छोटा-सा आघात होते ही उसका अस्तित्व हिल जायेगा और अधिक दिनों तक आश्रम व छाया न दे सकेगा।

यही बात मानव जीवन भी घटती है। जो किशोर अथवा किशोरियाँ कच्ची आयु में ही विकार-ग्रस्त हो जाते हैं, अपने भविष्य की ओर ध्यान नहीं देते, वे आगामी जीवन में अस्वस्थ तथा असमर्थ ही बने रहते हैं वे दाम्पत्य जीवन से लेकर सामाजिक तथा राष्ट्रीय उत्तरदायित्व वहन कर सकने के सर्वथा अयोग्य ही सिद्ध होते है। यौवन की परिपक्वता पाये बिना वासना की कीचड़ में फँस जाना आत्महत्या करने के तुल्य है। सारे संसार में यह नियम एक जैसा ही है। कहीं भी और किसी में इसका अपवाद न रहा है, न आगे होगा। प्रकृति का यह एक अटल नियम है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

अपने देश में प्राचीन काल में इसका पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता था। गृहस्थों का दाम्पत्य-जीवन पवित्र, संतुलित तथा मर्यादित रहता था। पारिवारिक वातावरण कभी भी विकार ग्रस्त न होता था। इसका सन्तानों के चरित्र तथा जीवन निर्माण पर बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ता था। साथ ही उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध नगरों से दूर आश्रमों में प्रकृति माता की गोद में किया जाता था। गुरुकुल के नियम बड़े ही दृढ़ तथा जीवनोपयोगी होते थे। वहाँ हर उस नियम का पालन किया जाता था जो किशोरों के शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक स्वास्थ्य एवं विकास के लिए हितकर होता था और हर उस गति एवं कार्य विधि का निषेध रहता था, जिसका प्रभाव इसके प्रतिकूल माना जाता था। गुरुकुलों के शिक्षक तथा उपाध्याय ऋषि-मुनि ही हुआ करते थे, जिनका जीवन और आचरण हर प्रकार से शुद्ध तथा निष्कलंक हुआ करता था “संयम, नियम तथा निग्रह उनके दैनिक जीवन के अंग थे। साथ ही जिन विषयों की शिक्षा दी जाती थी वह न केवल उपयोगी हितकर तथा आवश्यक ही होती थी अपितु उससे जीवन में सत्य, तेजस्विता तथा तत्त्वज्ञान का अभिवर्धन हुआ करता था। वेद, शास्त्र, उपनिषदों की शिक्षा के साथ शस्त्र-विद्या अर्थनीति, सामाजिक व्यवहार तथा राजनैतिक विषयों की बड़ी ही स्वस्थ तथा परिष्कृत शिक्षा दी जाती थी। उनके पाठ्य-क्रम में कोई भी ऐसा विषय न होता था जो बालक-बालिकाओं के स्वास्थ्यकर को विकसित करने वाला न होता हो। आचरण घातक साहित्य का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वह तब था ही नहीं फिर उसके पढ़ने-पढ़ाने का प्रश्न ही न था।

इतना विचार इतनी योजना और इतनी सावधानी से शिक्षित तथा दीक्षित किये गये किशोर जब अपनी आयु की परिपक्वता में पहुँचते थे तो उनका व्यक्तित्व चाँद-सूरज की तरह चमकता रहता था। पूर्ण स्वस्थ, सभ्य तथा शिक्षित तरुण ही तो वे धुरी होते हैं जिन पर समाज तथा राष्ट्र का चक्र व्यवस्थित ढंग से घूमा करता है। इस पवित्रता से पले तथा नारियों में ही तो वह शक्ति होती थी जो आगे के लिए सुयोग्य नागरिक दे सकते थे। इसी व्यवस्था का फल रहा है कि भारतवर्ष में एक से एक बढ़कर तपस्वी त्यागी, गृही, वीर, विद्वान् संत तथा महात्मा होते रहते थे जो देश को आगे बढ़ाते और संसार में उसको सम्मानित पद दिलाया करते थे।

जीवन को ऐसी मर्यादा में बाँधकर और इतनी सावधानी, सतर्कता तथा परिश्रम प्रयत्नपूर्वक जो पीढ़ी का पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा की जाती थी, वह कोई निरर्थक बात नहीं थी। सभी ऋषि-मुनि बालक बालिकाओं के निर्माण में इसी प्रकार संलग्न रहा करते थे। इसके पीछे हितकर तत्व सन्निहित था। वे जानते थे कि यदि भावी पीढ़ी का इतने प्रयत्न एवं पवित्रता पूर्वक निर्माण न किया जायेगा तो उसका पतन हो जायेगा। जीवन के सच्चे पथ से भटक कर वह गलत रास्तों पर जायेगी। अपना विनाश के साथ ही समाज तथा राष्ट्र को नीचे, बहुत नीचे गिरा देगी और हुआ भी वही जब से उस पवित्र प्राचीन परम्परा का त्याग कर दिया गया समाज व राष्ट्र दिन-दिन गिरता चला गया। जिसका परिणाम हजारों वर्ष की गुलामी के रूप में सम्मुख आया। असहनीय, तिरस्कार, ताड़ना तथा अपमान सहन करना पड़ा और आज भी उस यातना से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिल सकी है।

चरित्र-निर्माण की असावधानी तथा आत्म-संयम के अभाव में समाज की क्या दुर्दशा हो रही है? काम जो कि कभी एक उत्तरदायित्व माना जाता था जिसका निर्वाह करने के नियम तथा संयम एवं उपयोगिता थी, वह आज एक कौतुक-क्रीड़ा एवं मात्र मनोरंजन बन गया है। होश सँभालते ही किशोर तथा किशोरियाँ इस ओर गतिशील हो उठते हैं। इसी असंयम तथा वासना विषयक कौतुक का ही तो यह फली है कि सारा स्वास्थ्य चौपट हो गया चेहरे तेजहीन हो गये हैं। जरा-सा काम करने पर मस्तिष्क पीड़ा करने लगता है। शरीरों में हर समय थकान बनी रहती है। परिश्रम के नाम से जूड़ी आ जाती है। शरीर की एक-एक नस और प्रत्येक अवयव शिथिल तथा शक्तिहीन हो गया है। घोर अरुचि के साथ जीवन का बोझ किसी प्रकार ढोने का प्रयत्न किया जा रहा है। तरुणों में वह तेज, स्फूर्ति, वह कर्मण्यता दृष्टि-गोचर नहीं होती जो जीवन एवं जवानी का उपहार कही जाती है। वह उपहार प्राप्त भी किस प्रकार हो सकता है, जब यौवन के आने से पहले ही उसकी हत्या कर दी जाती है। उसकी पौध पर ही विष छिड़क दिया जाता है। असंयम का यह काम-कौतुक किशोरों को प्रेत बनकर लग जाता है और वे किशोरावस्था पार करते ही बूढ़ा जाते हैं उस आयु में ही परलोक सिधार जाते हैं जिस आयु में उनका वास्तविक जीवन प्रारम्भ होना चाहिए था। यह काम खेल का विषय नहीं है। इस असावधानी के कारण ही तो न राष्ट्र न समाज का ही विकास एवं विस्तार हो पा रहा है। यदि इस दोष को शीघ्र ही दूर न किया गया तो निश्चय ही राष्ट्र-निर्माण के सारे स्वप्न भंग हो जायेंगे, सुख-सम्पन्नता की सारी योजनाएँ धूल फाँकती रह जायेंगी।

अकालिक काम -कौतुक ने राष्ट्र के सम्मुख भयानक समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। सबसे बड़ी समस्या तो स्वास्थ्य की ही है। हर ओर रोगी क्षीण तथा दीन-हीन लोग ही दिखाई दे रहे हैं। रोगों तथा डॉक्टरों की संख्या बढ़ती जा रही है। जिस देश में जितने डॉक्टर देखे जाएँ, समझ लेना चाहिये कि वह राष्ट्र, रोगों का घर बना हुआ है और वहाँ की पीढ़ियाँ असामयिक काम-क्रीड़ा के प्रभाव में पड़ी हुई हैं। असंयम देश न कभी उन्नति कर सकता है और न प्रतिष्ठापूर्ण जीवन का ही अधिकारी बन सकता है।

अकाल में ही काम-क्रीड़ा का अभ्यास बिगड़ जाने से तरुणों की वृत्ति अत्यधिक कामुक हो जाती है। वे दाम्पत्य-जीवन में वाँछित संयम का निर्वाह नहीं कर पाते। समय-असमय का उन्हें ध्यान नहीं रहता। पारिवारिक मर्यादा का कोई मूल्य महत्व उनकी दृष्टि में नहीं होता। उनका सारा सुख मनोरंजन तथा समस्त वृत्तियाँ कामुकता के वशीभूत हो जाती हैं। जिसका परिणाम अस्वस्थ सन्तानों की विपुल आपत्तियों के सिवाय और क्या हो सकता है?

गृहस्थ-जन अपने दाम्पत्य-जीवन में वाँछित मर्यादा, संयम तथा गोपनीयता में असंयम बर्तते चले जा रहे हैं, जिसका कुप्रभाव बच्चों पर पड़ना ही है और वे अकाल में ही काम-कौतुक के जिज्ञासु बनकर अपने चरित्र तथा जीवन के उपवन में आग लगा लेते हैं। भड़कीला श्रृंगार, फैशन तथा विलासिता पूर्ण रहन-सहन स्वभावतः ही वासनाओं को भड़काने वाला होता है। जब ऐसे वातावरण में रहा और बच्चों को रखा जायेगा तो उससे हितकर परिणाम की आशा किस प्रकार की जा सकती है? आज तो टेलीविजन, मीडिया, सभी पर अश्लीलता का बाहुल्य है?

प्राचीन गुरुकुलों में जब तक किशोरों की शिक्षा-दीक्षा पूर्ण न हो जाती और परिपक्व आयु तक उनके संस्कार दृढ़ न हो जाते थे उनके लिए बाल रखना, तेल सेंट आदि स्प्रे का प्रयोग, दर्पण देखना भड़कीली पोशाक पहनना तथा राजसी भोजन का निषेध रखा जाता था। यह सब बातें निश्चित रूप से कामोत्तेजक होती है। अपना श्रृंगार करने, दर्पण में रूप यौवन को देखने से विकार उत्पन्न हो ही जाते हैं। यह इच्छा जाग ही जाती है कि दूसरों को अपनी ओर आकर्षित किया जाय। तरुण तथा किशोर ऐसा करते हैं और इसी कौतुक के कारण धीरे-धीरे पथ-भ्रष्ट हो जाया करते है। ऐसे में कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि पारिवारिक वातावरण श्रेष्ठ सतयुगी बना रहेगा। गृहस्थ विवाह के बाद काम-वासना प्रधान जीवन जीते हैं। बच्चे भी उसी साये में पलते है। वैसा ही वातावरण टीवी सिनेमा ने इत्यादि से उनके आसपास बनता भी जाता है। इसी कारण उनका विकास भी वैसा ही होता देखा जाता है इस पतन के मार्ग से बचने का एक ही तरीका है कि गृहस्थ जीवन में जो वर्जनाएँ स्थापित हों, उन्हें तोड़ा न जाय। किशोरों के मानसिक भावनात्मक विकास हेतु उन्हें स्वस्थ मनोरंजन प्रदान किया जाय। सहज विकसित हो रही काम भावना को कौतुक के रूप में सर्वभक्षी विभीषिका न बनने दिया जाय, अपितु उसे एक उल्लास का सही सुनियोजित रूप देते हुए क्रीड़ा कल्लोल खेलकूद, शौर्य भावना के विकास में परिणित करने का प्रयास किया जाय तो फिर ऐसी विडम्बनाएँ समाज में नहीं होंगी जो आज धरती पर देखी जाती हैं। यही आज समाज समग्र मनीषी तंत्र से अपेक्षा रखता है। ऐसी ही कला मनोरंजन स्वस्थ रूप के उनसे प्रस्तुत किए जाने की आशा भी की है।


साध्य की संसिद्धिं साधनों पर निर्भर

साध्य ओर साधन मानवी विकास के दो प्रमुख आधार हैं। समग्र प्रगति इन दो बातें पर निर्भर करती है कि हमने साधन और साध्य कैसे चुने। साधन यदि अच्छे हों, तो साध्य की संसिद्धिं सत्य परिणामदायक होती है, पर यदि साध नहीं बुरे हों, तो लक्ष्य ऊँचा होने पर भी साध्य पवित्र नहीं कहा जा सकता।

इस संदर्भ में भूल तब हो जाती है, जब दोनों को दो पृथक् तत्व मान लिया जाता है और साध्य को साधन से अलग रखा जाता है, पर यथार्थ में ऐसा है नहीं। दोनों एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं। एक के आधार पर ही दूसरे का स्वरूप निर्धारण होता है। मार्ग यदि शुभ हो, तो निश्चय ही उससे प्राप्त लक्ष्य भी पवित्र होगा। इसी प्रकार पवित्र लक्ष्य को देख पवित्र साधन का अन्दाज सहज ही लगाया जा सकता है, पर यदि साध नहीं अनुचित हों, तो उनसे उचित और अच्छे ध्येय की प्राप्ति कैसे हो सकती है? ऐसे ही बुरे प्रयोजन के लिए किसी ने अच्छे साधन प्रयुक्त किये जो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। हम शाँति चाहते हैं, हमारा लक्ष्य शान्ति है, तो हमें उसी पथ का अनुसरण करना होगा। बल प्रयोग कर कोई शान्ति लाना चाहे, तो यह असंभव है। हाँ, प्रथम दृष्टि में तो ऐसा प्रतीत होगा कि लक्ष्य की प्राप्त हो गई, पर वस्तुतः उक्त साधन से जिस ध्येय पूर्ति की आशा की गई होती है, वैसा हो नहीं पाता। वह वास्तविक शान्ति नहीं, अशान्ति की शान्ति होती है, समुद्र में तूफान आने से पूर्व की स्थिरता, जिसमें स्थायित्व का पूर्णतया अभाव होता है। ऐसे साधन से ऐसे ही साध्य की अपेक्षा की जा सकती है। अतः यह कहना गलत न होगा कि साध्य, साधन की ही अन्तिम परिणति है। साध नहीं आगे चलकर साध्य बन जाता है। जैसे ह घर और उसका मार्ग आरम्भ में भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं, पर घर वही है, जहाँ रास्ता पूर्ण होता हो। अस्तु, दोनों को पृथक् करके सोचना दोषपूर्ण है। ऐसा सोचने वाले ही यह अनुमान लगा लेते हैं कि अशुभ मार्ग भी शुभ मंजिल तक पहुँचा सकते हैं पर ऐसा कैसे सम्भव है? हम पंक में चल रहे हैं, हमारी दिशा निम्नगामी है, तो वह मार्ग हमें सूखे ऊँचे स्थान तक कैसे पहुँचा सकता है? वह तो दलदल में ही फँसायेगा। तात्पर्य यह है कि जैसे साधन होंगे, साध्य की प्रकृति भी वैसी ही होगी। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अन्तिम रूप अर्थात् (साध्य) सूक्ष्म रूप से आदि रूप अर्थात् (साधन) में विद्यमान रहता है।

हम घृणा से घृणा को नहीं जीत सकते, न तो बुराई, बुराई को निर्मूल कर सकती है। ऐसा भी नहीं हो सकता कि हिंसा, हिंसा को मिटा सके। जो ऐसा करने की कोशिश करते हैं, समस्या उनके लिए ज्यों की त्यों बनी रहती है। उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है, अथवा यदा-कदा यह नीति उन्हें पतन-पराभव की स्थिति में पहुँचा देती है। इस पर समाज का वह वर्ग विश्वास करता है, जो अमंगल साधन द्वारा मंगल की प्राप्ति पर भरोसा करता है, किन्तु यह भ्रान्तिपूर्ण है। सच्चे अर्थों में इससे न तो अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है ओर न स्वयं कर्त्ताः का ही कल्याण हो सकता है। उलटे अशान्ति और अराजकता जैसी स्थिति पैदा होती है, जिसका अन्त परिणाम विनाश के रूप में सामने आता है। यदि क्रोध का प्रतिकार क्रोध से किया जाय, पुनः क्रोध के बदले क्रोध प्रदर्शित किया जाय और यही श्रृंखला आगे बढ़ती चली जाये, तो नतीजा विनाश ही तो होगा और विनाश किसी समस्या का समाधान उस स्थिति में हो सकता है, जिस अर्थ में व्याधि को समाप्त करने के लिए व्याधिग्रस्त को ही समाप्त कर देना।

वस्तुतः यह प्रवृत्ति अज्ञान मूलक है और अधर्म की जड़ है। महामानव महापुरुष चूँकि इसके दुष्परिणाम को समझते और अनुभव करते हैं, इसी कारण वे इससे बचने के लिए उस साध्य-साधन सिद्धान्त की बात करते हैं, जिसमें निम्नता का कोई स्थान ही नहीं है और उच्च साध्य के लिए समानधर्मी उच्च साधन पर बल दिया गया है, जो अनीति के बदले अनीति ओर अधर्म के बदले अधर्म का समर्थन नहीं करता, वरन् इसका विरोध करता है। सम्पूर्ण आध्यात्म इसी पर टिका है। इसी का उद्घोषक करते हुए ऋषि कहते हैं- न पापे प्रति पापः” अर्थात् हमें पापी के साथ पापी नहीं बन जाना चाहिए और पाप के बदले पाप नहीं करना चाहिए।

किन्तु आज का भौतिकवाद ठीक इसके विपरीत सिद्धान्त में संलिप्त है। उसका मत इससे बिलकुल भिन्न है। वह कहता है कि यदि कोई गाली दे, तो प्रत्युत्तर में उसे भी गाली दी जाय कोई किसी को ईंट से मारे, तो उसे पत्थर से जवाब दिया जाय, मगर इस सिद्धान्त से तथा हिंसा-प्रतिहिंसा और क्रोध-प्रतिरोध की समस्त संसार में लहर-सी दौड़ पड़ेगी। जिससे बच पाना फिर किसी के लिए सम्भव न हो सकेगा और सर्वत्र अस्थिरता और अशान्ति ही विराजेगी। हाँ, उन थोड़े लोगों के लिए यह सही हो सकता है, जो नितान्त दुर्दान्त हैं और स्नेह-प्रेम की भाषा ही नहीं समझते, पर यह अपवाद है। ऐसे अपवाद हर काल में हुए हैं। सतयुग, द्वापर, त्रेता भी इनसे अछूते नहीं रहे और इन अपवाद स्वरूप लोगों के साथ व्यवहार भी अपवाद जैसा ही हुआ है, अतः विचारणीय नहीं है। मगर जनसामान्य पर यह नियम लागू करना उचित न होगा जहाँ अज्ञानता अथवा क्षणिक आवेशवश कोई गलती हो जाय, वहाँ तो महात्मा ईसा का वह कथन ही चरितार्थ हो सकता है, जिसमें उनने कहा है कि “कोई एक गाल में मारे, तो दूसरा गाल भी सामने कर दो” यहाँ उनका तात्पर्य मात्र इतना है कि उग्रता का समाधान उग्रता में नहीं, वरन् शालीनता में है। उपरोक्त कथन सुनने में चाहे जितना अव्यावहारिक लगे, पर यह एक सत्य है कारण कि द्वेष का हल प्रेम में ही हो सकता है और क्रोध का अक्रोध में यह एक ऐसा समाधान है, जिसके कई लाभ हैं, समस्या का निवारण होता एवं अपनी आपसी प्रेम सद्भाव बढ़ते हैं, दोनों पक्षों की हानियाँ टलती और समाधान अपनाने वाला पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। इस प्रकार वह रास्ते की प्रतिकूलताओं को भी अपने विकास के सोपान बना लेता है। फिर ऐसी परिस्थितियाँ उसके लिए विकास की गार्मावरोध नहीं रह जाती। विषम-से-विषम अवस्थाओं में भी जहाँ पतन की पूरी-पूरी गुँजाइश रहती है, वह इस सूत्र-सिद्धान्त का अनुसरण का स्वयं को बचा लेता हैं

यह श्रेष्ठ चयन का परिणाम है। शालीनता से उग्रता को जीतने की परिणति। पवित्रता से अपवित्रता पर विजय प्राप्त करने का आधार। इस प्रकार साधन यदि शुभ हो, तो साध्य के शिव होने में कोई संदेह नहीं रह जाता।


ग्लेड्स्टन की सादगी और सरलता (Kahani)

विल्सन इंग्लैण्ड से भारत में चिकित्सा अधिकारी बनकर आये थे। यहाँ आकर उन्हें भारतीय संस्कृति की गम्भीरता का बोध हुआ। उनने संस्कृत भाषा पढ़ी और अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का अनुवाद किया। सरकारी काम से बचा हुआ सारा समय वे इसी कार्य में लगाते थे। भारत से लौटने के बाद वे आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संस्कृत के प्रोफेसर रहे। तब उन्हें और भी अधिक पढ़ने का अवसर मिला। जर्मनी के मैक्समूलर को उनने अपना मानस पुत्र माना, अपना निष्कर्ष उसे समझाया। वेदों के भाष्यकार मैक्समूलर के इतना श्रम करने का साहस विल्सन की प्रेरणा से ही मिलता था।

ग्लेड्स्टन इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री थे। उनकी गणना संसार के सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञों में की जाती है।

वे एक दिन घूमने निकले, तब एक गाड़ीवान् से उनकी भेंट हुई। गाड़ीवान् ने गाड़ी में लोहा भर रखा था। ग्लेड्स्टन ने गाड़ीवान् से लोहा लादकर लाने से मिलने वाले किराये आदि के बारे में पूछ-ताछ की। इतने में रास्ते में एक टीला आ गया। घोड़ा को गाड़ी खींचने में तकलीफ होने लगी। यह देखकर ग्लेड्स्टन ने गाड़ीवान् से पूछा-अब तू क्या करेगा” |

गाड़ीवान् ने कहा-और क्या किया जा सकता जा सकता है, कन्धा लगाना पड़ेगा।”

ग्लेड्स्टन बोले-अच्छा चलो, मैं भी कन्धा लगाता हूँ।

यह सुनकर ग्लेड्स्टन गाड़ी वाले के साथ कन्धा लगाने लगे। थोड़ी देर में गाड़ी टीले पर चढ़ गयी। गाड़ी वाले ने ग्लेड्स्टन का आभार माना और ग्लेड्स्टन अपने रास्ते चले गये।

आगे जाने पर एक आदमी ने गाड़ीवान् से कहा-तुम जानते हो वह आदमी कौन था?” गाड़ीवान् बोला-नहीं तो मैं क्या जानूं?” उस व्यक्ति ने कहा - “अरे, वे तो ग्लेड्स्टन थे-अपने राष्ट्र के प्रधान-मंत्री। नादान गाड़ीवान् आश्चर्यचकित होकर बोला-कौन, ग्लेड्स्टन?”

ऐसी थी उस राष्ट्र के अध्यक्ष की सादगी और सरलता।


चन्द्रमौलि द्वारा दधिचि की परीक्षा

“अभय के लिए तुम्हें महाकाल का ध्यान करना चाहिए।” गुरु ने गम्भीर मुद्रा से कहा-मृत्यु की सतत् स्मृति मानव में वैराग्य का उदय करती है ओर उसको विकारों-विषयों के कण्टकमय पथ से बचाए रहती है। वह तुच्छ को छोड़कर शाश्वत के लिए उत्सुक रहता है। उसे क्षणिक सुख के प्रति घृणा एवं नित्य शान्ति के लिए अभीप्सा प्राप्त होती है।”

“रुद्र का ध्यान क्या हृदय में भय की बढ़ोत्तरी नहीं करेगा?” दधिचि ने हाथ जोड़कर अपनी शंका उपस्थित की। “मन ध्येय के साथ तादात्म्य ही तो स्थापित करता है और रुद्र के साथ उसका तादात्म्य क्या सात्विक हो सकेगा।”

“तुम्हारी विचार करने की शैली एक प्रकार से भ्रान्त है।” गुरु ने अपने सुयोग्य शिष्य को चेतावनी दी-विनाश वैसा नहीं है जैसा कि तुम देखते हो। नव सृष्टि की भूमिका को ही प्रलय कहते हैं। पतझड़ बसन्त का अग्रचर मात्र है। भगवान महाकाल देवता हैं जीवित ज्योति और जाण्टति के।”

“उनके ध्यान से हृदय कोप तथा विनाशकारी भावनाओं को ग्रहण नहीं करेगा?” अब भी शिष्य का समाधान नहीं हो सका था।” क्रोध काम का छोटा भाई ही तो है। वह भी साधक का एक भयंकर शत्रु है।”

“नहीं वत्स!” स्नेह स्निग्ध स्वर में गुरु ने समझाते हुए प्रारम्भ किया-कोप अहं एवं पर दृष्टि से होता है। विश्व के अणु-अणु में विनाश, परिवर्तन की लीला चल रही है। महाकाल के इस अखण्ड ताण्डव का साक्षात् कर लेने के पश्चात् कोप के लिए कोई आधार बचता ही नहीं।”

“रुको।” दधिचि कुछ कहना चाहते थे। उन्हें रोकते हुए गुरु ने कहा- “तुम्हें विनाश से भयभीत नहीं होना चाहिए। साधक को सर्वप्रथम उसी की आवश्यकता होती है। जन्म-जन्म से तुमने अपने संग्रहालय (चित्त) में पशुत्व के अतिरिक्त क्या संग्रह किया है? अपना देवत्व तुम सदा उपभोग करते चले आए जो कुछ भी सत संग्रह हुआ, व्यय हो गया। अब अवशेष को ध्वंस किए बिना यह नित्य का भव्य महत्व किस भूमि पर प्रस्तुत होगा? तुम्हारे लिए विनाश की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जो तुम्हारे हड्डी-माँस में घुले माया-मोह के अन्तिम कण तक भस्म कर दें।”

“क्या यह सत्व की सृष्टि के द्वारा नहीं हो सकेगा?” शिष्य के स्वर में विनम्र प्रार्थना थी।

“हो सकेगा! “गुरु ने शान्त शब्दों में कहा- “यह भी एक मार्ग है, किंतु कण-कण में रुद्र का नृत्य देखना उतना कठिन नहीं है, जितना स्रष्टा के दिव्यकरों को। तीव्र वैराग्य तो महाकाल के ध्यान में निहित है। सात्विकता का संचार दूसरे गुणों का अभाव तो करेगा, लेकिन वह पथ है कठिन।”

“वह कठिन भी तो मृदुल है।” सच्ची बात तो यह है कि स्वभावतः मानव अन्त-करण सरस सुंदर को देखना चाहता है और भयंकर से दूर भागता है। “देखता हूँ कि तुम अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति से अभी परित्राण नहीं पा सके हो।” गुरु ने कुछ कोमल स्वर में कहा-अस्तु! तुम प्रभु के कुन्द के समान उज्ज्वल तथा चन्द्रमा के समान शीतल स्निग्ध प्रकाशमय स्वरूप का ध्यान करो। वह तुम में सात्विक शक्ति का संचार करेगा।”

ध्यान की सांगोपांग विधि का उपदेश करके गुरु ने पज्वाक्षर मंत्र की दीक्षा दी। शिष्य ने आनन्दाश्रु पूरित नयनों से उनकी चरण रज पुस्तक पर लगायी और आज्ञा लेकर महेन्द्र पर्वत पर साधना करने के लिए चल पड़े। दिन बीतते गए और उनकी तप की आभा लोक-लोकान्तर में फैलने लगी। कैलाश शिखर भी इससे अछूता न रहा।

वहाँ चारों ओर अखण्ड हिम का साम्राज्य था। एक शृंग दूसरे से मस्तक ऊँचा करने की होड़ कर रहा था। निर्मल गगन में सूर्य की किरणें चमक रही थीं और हिमशिलाएँ आधार द्रवित होने से खिसकती जा रही थीं। शिलाओं के रूप में ही स्थान-स्थान पर सरिता नीचे जा रही थी। यही शिलाएँ नीचे जाकर रूप लेंगी। कहीं तृण का नाम न था। इस प्रदेश में समतल भूमि और उस पर वह जटाएँ लटकाए, किसी तपस्वी-सा सघन पत्रों की छाया एवं लाल-लाल कोपलों तथा फलों से भरा वट-वृक्ष भगवान शंकर की महिमा ही थी। इस प्रदेश में कोई पखी क्यों आने लगा। वृक्ष-मूल में वेदिका पर व्याघ्राम्बर डाले वे देवाधिदेव शान्त मुद्रा में थे। भगवती उमा ने आकर उन्हें प्रणाम किया।

आओ देवि! स्वागत के स्वरों में बोलते हुए चन्द्रमौली तनिक खिसक गए। वामाँग में बैठने भर को आसन रिक्त हो गया। पार्वती ने उसे भूषित किया। सम्मुख कुछ दूरी पर उत्तुंग वृषभ बैठा हुआ चुपचाप अपने स्वामी की ओर देख रहा था। उसका उज्ज्वल पुष्ट शरीर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो स्वयं हिमालय इस रूप में अपनी सुता एवं जमाता की सेवा से कृतार्थ होने उपस्थित हुआ है। आज कहीं चलेंगे नहीं भगवन्? प्रभु को प्रसन्न देखकर गिरिराज कुमारी ने प्रस्तावना की-मेरी इच्छा आज भ्रमण की हो रही है। यदि स्वामी को असुविधा न हो। उन्होंने मुसकराते हुए मस्तक झुकाया।

“अच्छा! योगीश्वर हँस पड़े” तो तुम मुझे भी कहीं लेकर जाना चाहती हो। कहाँ चलने की इच्छा है? चलना ही है तो आओ आज क्षीर सागर तक हो आवें? श्री हरि के दर्शन किए मुझे इधर बहुत समय हो भी गया है। सब कुछ जानते हुए भी सर्वज्ञ परिहास कर रहे थे।

जैसी स्वामी की इच्छा। संकुचित स्वर में भवानी

कह ही गयी-मेरा विचार तो आज महेन्द्र गिरि को ओर चलने का था किन्तु आप को जहाँ रुचे, वहीं उपयुक्त है।’ उनके स्वरों में अनुरोध था।

कोई विशेष बात है क्या? प्रभु ने मन्दस्मित के साथ प्रश्न किया। यह विचार किसी भाग्यशाली को कृतार्थ करने के लिए तो नहीं उदित हुआ है? कौन है वह जो यहाँ अन्नपूर्णा को आकुल किये हैं?

“आप तो जानबूझ कर पूछते हैं।” उमा ने संकुचित होकर मस्तक झुका लिया। “एक साधारण मानव है। वह प्रभु का ध्यान करते हुए वहाँ कठोर तपस्या कर रहा है। एक बार उसको देखना चाहती थी।”

“जिसने घोर तप किया है वह उसके कष्ट एवं महत्व को जानता है।” प्रभु ने हँसते-हँसते कहा-तुम्हारी सहानुभूति तपस्वियों के प्रति होना स्वाभाविक हैं। अच्छी बात है, चलो तुम्हारे उस तपस्वी कुमार को देख आवें।”

संकेत पाकर वृषभ समीप बैठ गया। तुरंत कहीं से एक गण आया और उसने बड़ा-सा शार्दूल चर्म नन्दी की पीठ पर डाल दिया। आगे उमा को बैठाकर हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए आशुतोष भी बैठ गए।

वहाँ पहुँचने पर देखा-तप में लीन दधिचि को एक दैत्य धमकाते हुए कहा रहा था “अरे भाग यहाँ से?” हाथों में चमकता हुआ भाला लिए, काले पर्वत के समान, लाल-लाल नेत्र तथा खड़े गैरिक केशों वाला वह भयंकर दैत्य बोल रहा था किसने तुझे यहाँ बैठने को कहा?

“मैंने तुम्हारा कोई अनिष्ट किया हो, ऐसा तो मुझे स्मरण नहीं तपस्वी दधिचि के स्वर में कोई कम्पन नहीं था। वे अविचल शांत बैठे थे उपयुक्त स्थल देखकर मैं स्वयं यहाँ आ गया हूँ और आज एक वर्ष से यहीं साधना कर रहा हूँ। मेरे द्वारा तुम्हारी कोई हानि न होगी।”

“तू भागता है या............।” भाले को नोक हृदय


साधना की सफलता मन की तन्मयता पर निर्भर

उपासना में एकाग्रता पर बहुत जोर दिया गया है। ध्यान-धारणा का अभ्यास इसीलिए किया जाता है कि मन की अनियन्त्रित भगदड़ करने की आदत पर नियन्त्रण स्थापित किया जाय और उसे तथ्य विशेष पर केन्द्रित होने के लिए प्रशिक्षित किया जाय।

एकाग्रता एक उपयोग सत्प्रवृत्ति है। मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता तो गहराई में उतरने और महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। यह चित्त की चंचलता ही है जो मनः संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट-भ्रष्ट करती रहती है। संसार के वे महामानव जिन्होंने किसी विषय में पारंगत प्रवीणता प्राप्त की है या महत्वपूर्ण सफलताएँ उपलब्ध की हैं उन सबको विचारों पर नियन्त्रण करने उन्हें अनावश्यक चिन्तन से हटा कर उपयोगी दिशा में चलाने की क्षमता प्राप्त रही है। इसके बिना चंचलता की वानर वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है। और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है। शिल्प, कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है। चंचलता को तो असफलता की सगी-बहिन माना जाता है। बाल-चपलता का मनोरंजक उपहास उड़ाया जाता है। वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे-विचारों की दिशाधारा बनाने और चिन्तन पर नियन्त्रण स्थगित करने में सफल न हो सके तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है। ऐसे लोगों का भविष्य उत्साहवर्धक नहीं हो सकता।

आत्मिक प्रगति के लिए तो एकाग्रता की और भी अधिक उपयोगिता है। इसलिए मेडीटेशन के नाम पर उसका अभ्यास विविध प्रयोगों द्वारा कराया जाता है। इस अभ्यास के लिए कोलाहल रहित ऐसे स्थान की आवश्यकता समझी जाती है जहाँ विक्षेपकारी आवागमन या कोलाहल न होता हो। एकान्त का तात्पर्य जनशून्य स्थान नहीं वरन् विक्षेप रहित वातावरण है। सामूहिकता हर क्षेत्र में उपयोगी मानी है। प्रार्थनाएँ सामूहिक ही होती हैं। उपासना भी सामूहिक हों तो उसमें हानि नहीं लाभ ही है। मसजिदों में नमाज, गिरजा घरों में प्रेयर, मंदिरों में आरती सामूहिक रूप से ही करने का रिवाज हैं इसमें न तो एकांत की कमी अखरती है और न एकाग्रता में कोई बाधा पड़ी है। एक दिशाधारा का चिन्तन हो रहा हो तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितान्त एकान्त में बैठना वैज्ञानिक, तात्त्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूँढ़ते फिरने की ही कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है। सेना का सामूहिक कार्य-साथ-साथ कदम मिलाकर चलना-सैनिकों में से किसी भी ध्यान नहीं बटाना वरन् साथ-साथ चलने की पग ध्वनि के प्रवाह में हर एक के पैर ओर भी अच्छी तरह अपने आप नियत क्रम से उठते चले जाते हैं। सहगमन से पग क्रम को ठीक रखने में बाधा नहीं पड़ती वरन् सहायता ही मिलती है। सहगान की तरह सहध्यान तथा सहभजन भी अधिक सफल और अधिक प्रखर बनता है।

उपासना के लिए जिस एकाग्रता का प्रतिपादन है उसका लक्ष्य है-भौतिक जगत की कल्पनाओं से मन को विरत करना और उसे अंतर्जगत् की क्रिया-प्रक्रिया में नियोजित कर देना। उपासना के समय यदि मन साँसारिक प्रयोग आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझना चाहिए कि एकाग्रता का उद्देश्य ठीक तरह पूरा हो रहा है। विज्ञान के शोध कार्यों में-साहित्य के सृजन प्रयोजनों में वैज्ञानिक या लेखक का चिन्तन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है। इतने भर में एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप में गतिशील रहना पड़ता है। और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जाता है। अपनी निर्धारित परिधि में रहकर कितना ही द्रुतगामी चिन्तन क्यों न किया जाय, कितनी ही कल्पनायें, कितनी ही स्मृतियाँ, कितनी ही विवेचनाएँ क्यों न उभर हरी हो वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप उत्पन्न नहीं करेगी। गड़बड़ तो अप्रासंगिकता में उत्पन्न होती है। बेतुका-वे सिलसिले का-अप्रासंगिक-अनावश्यक चिन्तन ही विक्षेप करना है। एक बेसुरा वादन पूरे आरकेस्ट्र के ध्वनि प्रवाह को गड़बड़ा देता है ठीक इसी प्रकार चिन्तन में अप्रासंगिक विक्षेपों में कितनी ही-कितने ही प्रकार की कल्पनाएँ-विवेचनाएँ करते रहने की पूरी-पूरी छूट है।

कोई व्यक्ति एकाग्रता का अर्थ मन की स्थिरता समझते हैं और शिकायत करते हैं कि उपासना के समय उनका मन भजन में स्थिर नहीं रहता। ऐसे लोग एकाग्रता और स्थिरता का अन्तर न समझने के कारण ही इस प्रकार की शिकायत करते हैं। मन की स्थिरता सर्वथा भिन्न बात है। उसे एकाग्रता से मिलती-जुलती स्थिति तो कहा जा सकता है पर दोनों का सीधा सम्बन्ध नहीं हैं जिसका मन स्थिर हो उसे एकाग्रता का लाभ मिल सके या जिसे एकाग्रता की सिद्धि है उसे स्थिरता की स्थिति प्राप्त हो ही जाय यह आवश्यक नहीं है।

स्थिरता को निर्विकल्प समाधि कहा गया है और एकाग्रता को सविकल्प कहा गया है। सविकल्प का तात्पर्य है उस अवधि में आवश्यक विचारों का मनःक्षेत्र में अपना काम करते रहना निर्विकल्प का अर्थ है एक केन्द्र-बिन्दु पर सारा चिन्तन सिमटकर स्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो जाना।

यहाँ मनः संस्थान की संरचना को ध्यान में रखना होगा। मस्तिष्क की बनावट एक प्रचण्ड विद्युत भण्डार जैसी है। उसके भीतरी और बाहरी क्षेत्र में विचार तरंगों के आँधी-तूफान जितने तीव्र गति सम्पन्न होते है वह मस्तिष्क उतना ही उर्वर और कुशाग्र बुद्धि माना जाता है। जहाँ इन तरंगों में जितनी मन्दगति हो समझना चाहिए कि वहाँ उतनी ही जड़ता, दीर्घ सूत्रता, मूर्खता, छाई रहेगी। हारे-थके मस्तिष्क को निद्रा घेर लेती है अर्थात् उसकी गति शीलता शिथिल हो जाती है। यह कृत्रिम निद्रा नशीली दवायें पिलाकर, क्लोरोफार्म, ईथर आदि सुंघाकर, सुन्न करने वाली सुई लगाकर उत्पन्न की जा सकती है। मूर्छा की स्थिति में मस्तिष्क की गतिशीलता ठप्प हो जाती है। स्थिरता ऐसे ही स्तर की हो सकती है। गड्ढे में बंद होने के प्रदर्शन वाली जड़ समाधि में ऐसी ही स्थिरता होती है। मनस्वी लोग अपनी संकल्प शक्ति से हृदय की धड़कन, और मस्तिष्क की सक्रियता को ठप्प कर देते हैं। स्थिरता जड़ समाधि के वर्ग में आती है। वह संकल्पशक्ति से या औषधियों से उत्पन्न की जा सकती है। स्थिरता का लाभ विश्राम मिलना है। इससे आन्तरिक थकान दूर हो सकती है और जिस तरह निद्रा के उपरान्त जागने पर नई चेतनता एवं स्फूर्ति का अनुभव होता है वैसा ही मन की स्थिरता का-निर्विकल्प समाधि का भी लाभ मिल सकता है। सामान्य रूप में इस स्थिति को शिथिलीकरण मुद्रा का एक प्रकार कहा जा सकता है। उसमें भी शरीर और मन की स्थिरता-शिथिलता-का ही अभ्यास किया जाता है। मैस्मरेज्म हिप्नोटिज्म प्रयोगों में भी इसी का अभ्यास काले गोले के माध्यम से करना पड़ता है। नेत्रों में बंधक दृष्टि उत्पन्न करने के लिए एकाग्र मनःशक्ति को एक स्थान पर केन्द्रित करते हैं। मैस्मरेजम का यही आधार हैं ऐसे ही सामान्य चमत्कार उस स्थिरता से उत्पन्न किये जा सकते हैं जिसके लिए आमतौर से अध्यात्म साधना के विद्यार्थी लालायित रहते है। और जिसके न मिलने पर अपने अभ्यास की असफलता अनुभव करके खिन्न होते हैं।

मन की स्थिरता अति कठिन है। वह हठयोग से ही सम्भव हो सकती है। तीन मिनट की स्थिरता मिल सके तो साधक शून्यावस्था में जाकर निद्रा ग्रस्त हो जाता है। जिन्हें निर्विकल्प समाधि अभीष्ट हो उन्हें ही स्थिरता की अपेक्षा और चेष्टा करनी चाहिए। जिन्हें सविकल्प साधना में स्थिरता की नहीं एक दिशाधारा में मन को नियोजित किये रहने की आवश्यकता है। परब्रह्म में आत्म समर्पण और उस परा-शक्ति का आत्म सत्ता में अवतरण ही ध्यान का मुख्य प्रयोजन है। उसके लिए कितने ही प्रकार की साकार-निराकार ध्यान-धारणाएँ विद्यमान हैं उनमें से जो उपयोगी एवं रुचिकर लगे उसे अपनाया जा सकता है।

स्थिरता स्तर की एकाग्रता हिप्नोटिज्म प्रयोगों में तो काम में आती है, सरकस के अनेक खेलों में मानसिक सन्तुलन ही चमत्कार दिखा रहा होता है। स्मरण शक्ति के धनी भी प्रायः एकाग्रता के ही अभ्यासी होते हैं। गणितज्ञों में तो यह विशेषता पाई ही जायगी। शोध कर्ताओं की सफलता का आधार यही है। उतने पर भी उसे आत्मिक प्रगति की अनिवार्य शर्त नहीं माना जा सकता। अधिक से अधिक उसे सहायक ही कहा जा सकता है। यदि ऐसा न होता तो यह सब एकाग्रता सम्पन्न लोग आत्मबल सम्पन्न हो गये होते और उनकी गणना सिद्ध योगियों में की जाने लगती। इसके विपरीत प्रायः सभी भावुक भक्त भावावेश जन्य चंचलता से ग्रस्त रहे है। मीरा, चैतन्य, रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस आदि इसी वर्ग के थे, जिन पर प्रायः भावावेश ही छाया रहता था। वे एकाग्र चित्त तो कदाचित् ही कभी हो पाते हों।

एकाग्रता के अभ्यास के लिए इष्ट देवताओं की प्रतिमाओं का निर्धारण करना होता है। उनकी चित्र, विचित्र आकृतियाँ, आभूषण, वस्त्र, आयुध, वाहन, इस दृष्टि से बनाये गये हैं कि ध्यान करने के लिए सुविस्तृत क्षेत्र मिल जाय। मन की दौड़ उन सब पर अदल-बदल उछल-कूद करती रहती है। एक परिधि में मन को सीमित दौड़ लगाने का अवसर मिलता रहता है। पूर्ण एकाग्रता या स्थिरता की ध्यानयोग के आरम्भिक चरण में उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कि समझी जाती है।

जिस एकाग्रता की आवश्यकता अध्यात्म प्रगति के लिए बताई गई है वह मन की स्थिरता नहीं वरन् चिन्तन की दिशाधारा है। उपासना के समय सारा चिन्तन आत्मा का स्वरूप, क्षेत्र, लक्ष्य समझाने में लगना चाहिए और यह प्रयास रहना चाहिए कि ब्राह्मी चेतना के गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर आत्मा की बहुमूल्य रत्नराशि संग्रह करने का अवसर मिले। उपासना का लक्ष्य स्थिर हो जाने पर उस समय जो विचार प्रवाह अपनाया जाना आवश्यक है उसे पकड़ सकना कुछ कठिन न रह जाएगा।

मन की स्थिरता एवं एकाग्रता का सार तत्व ‘तन्मयता’ शब्द में आ जाता है। गायत्री उपासना में यह प्रयोजन तन्मयता से पूरा होता है। तन्मयता का अर्थ है-इष्ट के साथ भाव-सम्वेदनाओं को केन्द्रीभूत कर देना। यह स्थिति तभी आ सकती है जब इष्ट के प्रति असीम श्रद्धा हो। श्रद्धा तब उत्पन्न होती है जब किसी की गरिमा पर परिपूर्ण विश्वास हो। साधक को अपनी मनोभूमि ऐसी बनानी चाहिए जिसमें गायत्री महाशक्ति की चरम उत्कृष्टता पर, असीम शक्ति सामर्थ्य पर, संपर्क में आने वाले के उत्कर्ष होने पर, गहरा विश्वास जमता चला जाय। यह कार्य शास्त्र वचनों का, अनुभवियों द्वारा बताये गये सत्परिणामों का, उपासना विज्ञान की प्रामाणिकता का, अधिकाधिक अध्ययन अवगाहन करने पर सम्पन्न होता है। आशंका ग्रस्त, अविश्वासी मन, उपेक्षा भाव से आधे-अधूरे मन से उपासना में लगे तो स्वभावतः वहाँ उसकी रुचि नहीं होगी ओर मन जहाँ-जहाँ उड़ता फिरेगा। मन लगाने के लिए आवश्यक है कि उस कार्य में समुचित आकर्षण उत्पन्न किया जाय। व्यवसाय उपार्जन में, इन्द्रिय भोगों में, विनोद मनोरंजनों के संपर्क सान्निध्य में मन सहज ही लग जाता है। इसका कारण यह है कि इन प्रसंगों के द्वारा मिलने वाले सुख, लाभ एवं अनुभव के सम्बन्ध में पहले से ही विश्वास जमा होता है। प्रश्न यह नहीं कि वे आकर्षण दूरदर्शिता की दृष्टि से लाभदायक है या नहीं। तथ्य इतना ही है कि उन विषयों के सम्बन्ध में अनुभव अभ्यास के आधार पर मन में आकर्षण उत्पन्न हो गया है। उस आकर्षण के फलस्वरूप ही मन उनमें रमता है और भाग-भागकर जहाँ-तहाँ घूम-फिरकर वहीं जा पहुँचता है। हटाने से हटता नहीं भगाने से भागता नहीं। मानसिक संरचना के इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें उपासना के समय मन को इष्ट पर केन्द्रित रखने की आवश्यकता पूरी करने के लिए पहले से ही मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना चाहिए। गायत्री महाशक्ति के संदर्भ में जितना अधिक ज्ञान-विज्ञान संग्रह किया जा सके मनोयोग पूर्वक करना चाहिए। विज्ञ व्यक्तियों के साथ उसकी चर्चा करनी चाहिए। इस संदर्भ में होने वाले सत्संगों में नियमित रूप से जाना चाहिए। जिनने लाभ जुटाये हों उनके अनुभव सुनने चाहिए। यह कार्य यों तद् विषयक स्वाध्याय और मनन चिंतन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है, पर अधिक सरल और व्यवहारिक यह है कि गायत्री चर्चा के संदर्भ में चलने वाले सत्संगों में उत्साहपूर्वक नियमित रूप से सम्मिलित होते रहा जाय।

भूल यह होती रहती है कि किसी प्रकार जप संख्या पूरी कर लेने की ही उतावली रहती है और उसे ज्यों-त्यों पूरी कर लेना ही पर्याप्त मान लिया जाता है। यह स्मरण नहीं रखा जाता कि वाणी से मंत्रोच्चार करने, उँगलियों से माला फिराने के शारीरिक श्रम प्रयोजन में ही इतने महान उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती उसके साथ मनोयोग और श्रद्धा समावेश भी आवश्यक है। चेतना शक्ति के उत्थान परिष्कार में तन्मयता सबसे बड़ा आधार है। शरीर से किये जाने वाले कर्मकाण्डों का प्रयोजन इतना ही है कि उनके कारण मस्तिष्क और अन्तःकरण को साथ साथ चलने का आधार मिल जाय। चिन्तन का गहरा पुट रहने पर ही आत्मिक भूमिका में हलचलें होती है और प्रगति का सरंजाम जुटाता है। यदि मन इष्ट पर जमे नहीं और मात्र उच्चारण का श्रम चलता रहे तो उसका भी लाभ तो मिलेगा पर इतना स्वल्प होगा जिससे अभीष्ट सत्परिणाम की अपेक्षा पूरी न हो सकेगी। अस्तु यह मानकर चलना चाहिए कि उपासना कृत्य में मनोयोग पर लगाया जाना नितान्त आवश्यक है।

तन्मयता की स्थिति उत्पन्न करने के लिए धैर्यपूर्वक देर तक प्रयत्न करना होता है, यह एक दिन में सम्पन्न नहीं हो सकता। मन का पुराना अनुभव अभ्यास भौतिक आकर्षणों के साथ खेल करते रहने का है। उसे इससे विरत करने के लिए उससे अधिक नहीं कम से कम उतना बड़ा आकर्षण तो प्रस्तुत किया ही जाना चाहिए। अरुचिकर प्रयोजन पर जमने की उसको आदत है ही नहीं। आकर्षण के अभाव में उसे बुरी तरह ऊब आती है और वहाँ से उचटने भागने की ऐसी धमा−चौकड़ी मचाता है कि देर तक उस कार्य को चलाते रहना कठिन हो जाता है। तरह-तरह की बहाने बाजी बनाकर वहाँ से उठाने के लिए अचेतन मन कितनी-कितनी तरकीबें खड़ी करता है यह सब देखते ही बनता है। खुजली उठना, जम्हाई आना, कोई साधारण-सा खटका होते ही उधर देखने लगना, पालथी बदलना, कपड़े सम्भालना, जैसी चित्र-विचित्र क्रियाओं का होना यह प्रकट करता हैं कि मन यहाँ लग नहीं रहा, और उस कार्य को छोड़कर जल्दी-जल्दी उठ चलने के लिए बार-बार तकाजा कर रहा है।

इस स्थिति का सामना करने के लिए प्रथम भूमिका यह है कि श्रद्धा बढ़ाने वाले स्वाध्याय और सत्संग का मनन और चिन्तन का ऐसा क्रम बनाया जाय जिससे उस दिशा में चलने के सत्परिणामों के सम्बन्ध में तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों के आधार गायत्री उपासना के लिए श्रम करने की सार्थकता पर श्रद्धा और विश्वास गहरा होता चला जाय।


संगीत-विश्व का प्राण

संगीत की ध्वनि लहरियाँ मानवी काय-संस्थान मनः संस्थान एवं भाव संस्थान तीनों ही क्षेत्रों को तरंगित करती हैं। ध्वनि प्रवाह शरीर के प्रत्येक अंग अवयव पर अपना प्रभाव छोड़ते है। इन स्वर लहरियों में ज्वार-भाटे जैसे गुण पाये जाते हैं। उनमें शमनकारी और उत्तेजक दोनों ही क्षमताएँ प्रचुर परिमाण में विद्यमान पायी जाती है। मनुष्य ने विद्युत, लेसर, ताप, बारूद, अग्नि, धूप आदि का दिव्य वरदानों के रूप में उपयोग किया है। संगीत ऊर्जा का भी सृजनात्मक उपयोग कर उसने न केवल मानव मात्र को लाभान्वित किया है वरन् पशु-पक्षियों जीव-जन्तुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों को भी तरंगित किया है और सभी के लिए उसकी उपयोगिता साबित की है।

देखा गया है कि संगीत की स्वर लहरियों का प्रभाव मनुष्य तक ही सीमित नहीं है, वरन् उसका प्रभाव पशु-पक्षियों पर भी पड़ता है। वेणु नाद सुनकर सर्प अपनी कुटिलता भूलकर लहराने लगता है। कई प्रान्तों में बहेलिये बीन बजाते हैं, उससे मुग्ध हुए हरिण, मृग निर्भय होकर पास चले आते है। हालैण्ड में गायें दुहते समय मधुर संगीत सुनाया जाता है। यहाँ की सरकार ने ऐसा प्रबंध किया है कि जब गायें दुहने का समय हो तब मधुर संगीत किया जाय, ग्वाले लोग रेडियो सैट दुहने के स्थानों पर रख देते हैं। संगीत को गायें बड़ी मुग्ध होकर सुनती है और उनके स्नायु संस्थान पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वे 15 से लेकर 20 प्रतिशत तक अधिक दूध देती हैं। ये प्रयोग भारत में भी किए गये हैं।

दुधारू पशुओं को दुहते समय यदि संगीत ध्वनि होती रहे तो वे अपेक्षाकृत अधिक दूध देते हैं। ऐसा देखा गया है।

सील मछली का संगीत प्रेम प्रसिद्ध है। कुछ समय पूर्व पुर्तगाल के मछुआरे अपनी नावों पर वायलिन बजाने की व्यवस्था बनाकर निकलते थे। समुद्र में दूर-दूर तक यह ध्वनि फैलती तो सील मछलियाँ सहज ही नाव के इर्द-गिर्द इकट्ठी हो जातीं और मछुआरे उन्हें पकड़ लेते।

घरेलू कुत्ते संगीत को ध्यानपूर्वक सुनते और प्रसन्नता व्यक्त करते पाये जाते हैं। वन विशेषज्ञ जार्ज हे्रस्हे ने अफ्रीका के कांगो देश में चिंपांजी तथा गुरिल्ला वनमानुष को संगीत के प्रति सहज ही आकर्षित होने वाली प्रकृति का पाया है। उन्होंने इन वानरों से संपर्क बढ़ाने में मधुर ध्वनि वाले टेप रिकार्ड का प्रयोग किया और उनमें से कितनों को ही पालतू जैसी स्थिति का अभ्यस्त बनाया। नार्वे के कीट विज्ञानी डॉ. हटसन शहद की मक्खियों को अधिक मात्रा में शहद उत्पन्न करने के लिए संगीत को अच्छा उपाय सिद्ध किया है। अन्य कीड़ों पर भी वाद्य मन्त्रों के भले-बुरे प्रभावों का उन्होंने विस्तृत अध्ययन किया है और बताया है कि कोई भी संगीत से बिना प्रभावित हुए नहीं रहते। कितने ही पशु-पक्षियों जीव-जन्तुओं पर यह प्रयोग आजमाया गया है और उसका समुचित प्रतिफल भी सामने आया है। वैज्ञानिकों ने चिड़ियाघरों में बन्द पक्षियों पर यह प्रयोग करने से सुविधा समझी। इसलिए उनके कटघरों से बाहर विविध प्रकार के संगीत टेप बजाये। देखा गया कि वे इसे सुनकर मन्त्र मुग्ध होते रहे। अपने-अपने सामान्य काम छोड़कर वे इकट्ठे हो गये। जहाँ से वह ध्वनि निसृत हो रही थी। पर जैसे ही वादन-बन्द हुआ वैसे ही वह उदास हो गये और मुँह लटका कर इस आशा में बैठे रहे कि कदाचित उसे सुनने का अवसर फिर मिले। बन्दर जैसे चंचल और उपद्रवी जीव आपस में चेंचें करना तक भूल कर उस अवसर पर भोले कबूतरों की तरह बैठे रहे। वह मन्द और मादक संगीत का प्रभाव था, पर जब उत्तेजक आक्रोश भरे और डरावने बाजे बजाये गये तो वे भी उत्तेजित हो उठते। चंचलता बढ़ी और आक्रोश में एक-दूसरे पर हमला करने लगे। कुछ ने दीवारों से टक्करें मारना और उपयोगी वस्तुओं को तोड़ना-फोड़ना शुरू कर दिया। किन्तु वह बदल देने पर उन्हें शांत होने में भी देर न लगी। बच्चे जो बहुत देर से इस प्रवाह से भर गये। थक कर अपने-अपने कटघरों में घुस गये तो झपकियाँ लेने लगे।

चिली के चिड़ियाघरों में यह प्रयोग पक्षियों पर किया गया। सामान्य संगीत से तो भी उड़ना और चुगना छोड़ कर उन पेड़ों पर बैठने की संख्या में आ जमे जहाँ लहराने वाला संगीत स्पष्ट सुनाई दे रहा था। उड़ाने, भगाने पर भी गये नहीं, एक डाली से दूसरी पर फुदकते भी रहें।

ऐसे विचित्र संगीत भी ढूँढ़ निकाले गये हैं जो निराश निढाल, उदास एवं प्रतिभा रहित कर देते हैं। उन्हें सुनते रहने पर माँसाहारी हिंसक जन्तुओं ने भूखे होने पर भी किसी पर आक्रमण का बड़ा साहस नहीं किया। आसपास के कीड़े-मकोड़े खाकर ही सन्तोष करते रहे दुर्बल जीव जन्तु स्थिरता ही नहीं अपने बैठे वरन् आँखों से आँसू भी बहने लगे। शायद वे उनकी प्रसन्नता के सूचक थे।

संगीत का प्रयोग जलचरों पर भी वैसा ही प्रभावशाली सिद्ध हुआ है। आकर्षण संगीत टेप से मछलियाँ कछुए, केकड़े तक उस क्षेत्र में दौड़ते चले आये और बिना किसी झिझक आशंका के वहाँ तक बढ़ते चले गये जहाँ से उसे संगीत की आवाज आरम्भ हो रही थी इसके बाद दूसरा प्रयोग डरावने भयंकर स्वयं बदल कर किया गया तो उस क्षेत्र में जो जीव जन्तु थे, वे अपने जान बचाकर दूर-दूर चले गये। मछली मारो ने उस प्रयोग का शिकार पकड़ने में लाभ उठाया।

पशु-पक्षियों की अपनी भाषा होती है। यद्यपि उनमें थोड़े-थोड़े ध्वनि शब्द ही होते हैं पर उन्हीं के सहारे से आपस में विचारों के आदान-प्रदान करते रहते हैं। विभिन्न जीवों के उच्चारण विभिन्न प्रकार के हैं। इन संकेत स्वयं को टेप करके सुनाने पर उस वर्ग के प्राणी वैसी ही हरकतें करने लगे जैसे कि उनको संकेत उपलब्ध हुए। प्रणय निवेदन के स्वर सुनाकर उस वर्ग की नर मादाएँ को बड़ी संख्या में एकत्रित होते और सम्बन्ध बनाने के लिए आतुर होते देखा गया। ह्यूजफ्रेयर ने जुलूलैण्ड फार्म हाउस की एक घटना का विवरण छपाया है। जिसके अनुसार एक महिला वायलिन वादन को उस जंगल की झोंपड़ी में दो भयंकर सर्पों का सामना करना पड़ा था और वह मरते-मरते बची थी। बात यों थी कि उसे आधी रात बीत जाने पर भी नींद न आई तो उठकर वायलिन बजाने लगी इतने में कोरबा सर्पों का एक अँधड़ जोड़ा उस स्वर लहरी पर मुग्ध होकर घर में घुस आया और फन फैला कर नाचने लगा। वादन में व्यस्त महिला को पहले तो कुछ पता न चला पर जब उसे दो छायाएँ लगातार हिलती-जुलती दिखी दो उसने पीछे मुँह मोड़ कर देखा और पाया कि दोनों सर्प मस्ती के साथ संगीत पर मुग्ध होकर लहरा रहे हैं।

महिला एक बार तो काँप उठी पीछे उसने विवेक से काम लिया और खड़े होकर वायलिन बजाती हुई उलटे पैरों दरवाजे की ओर चलने लगी। दोनों साँप भी साथ-साथ चल रहे थे। दूसरे कमरे में उसका पति सो रहा था। वहाँ उसने जोर से वायलिन बजाया- वह जगा। इशारे में महिला ने वस्तुस्थिति समझाई। पति ने बन्दूक भरी और किवाड़ों के पीछे निशान साध कर बैठा। साँप जब सीध में आ गये तब उसने गोली चलाई एक तत्काल मर गया दूसरा घायल हो गया तब कहीं उस काल रज्जु के रूप में आये हुए मृत्यु से महिला का पीछा छूटा।

भीलवाड़ा राजस्थान के एक गाँव सलेमपुर का समाचार है कि वहाँ का निवासी एक युवक ट्रांजिस्टर बजाता हुआ गाँव लौट रहा था तो संगीत की ध्वनि से मोहित एक सर्प पीछे-पीछे चलने लगा। बहुत दूर साथ चलने पर जब साँप का आभास युवक को हुआ तो वह डर गया और ट्रांजिस्टर पटक कर भागा। सर्प ट्रांजिस्टर के निकट बैठा रहा जब तक कि संगीत बजता रहा। बन्द होने पर चला गया। पीछे सर्प की लकीर देखने से प्रतीत हुआ कि वह एक मील तक इस संगीत श्रवण के लिए पीछे-पीछे चला आया था।

यह घटनाएँ बताती है कि सर्प जैसे भयंकर और काफी क्रोधी प्रकृति के प्राणी को संगीत कितना अधिक प्रभावित एवं भाव-विभोर बना देने में समर्थ है।

पूर्वी जर्मनी के कोटिंगन नगर के संगीत में इलाज करने वाले प्रो. डॉ. जोहोंस एन. शूमिलिन ने यह सिद्ध कर दिया है कि बीमार पशु भी मानव की भाँति संगीत से लाभ ही नहीं उठा सकते वरन् उन्हें रोग-मुक्त भी किया जा सकता हैं उन संगीत का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। गोटिंगन से प्रकाशित एक पत्रिका में उन्होंने लिखा है-दुःखी आँखों में संगीत प्रसन्नता की चमक पैदा कर देता है। मैंने ऐसे कुत्ते और बिल्ली देखे है।, जो लोमवाद्यों के साथ थिरकने लगे हैं। यदि मनुष्येत्तर प्राणियों के जीवन-स्पन्दन को संगीत की सामर्थ्य से मोड़ा जा सकता है तब तो मनुष्य जैसे भावनाशील प्राणी पर उसके प्रभाव का तो कहना ही क्या?”

यह घटनाएँ देखकर नारद संहिता का वह श्लोक याद आ जाता है, जो भगवान् विष्णु ने नारद जी को कहा था-

खगाः भृड़नः पतड़च्च कुरच्चद्योपिजन्तवः। सर्व एव प्रगीयन्ते गीतव्याप्तर्दिगन्तरे॥

हे नारद! पक्षी, भौंरे, पतंगे, हिरण आदि जीव जन्तुओं को भी संगीत से प्रेम होता है। संगीत से संसार का कोई भी स्थान रिक्त नहीं।

भारतीय संगीत-शास्त्र में अन्य राग-रागनियों के साथ दीपक-राग और मेघ-मल्हार-राग का नाम भी पढ़ने को मिलते हैं जानवरों का कथन है कि दीपक-राग के गाने से दीपक स्वयमेव जल जाते थे ओर मेघ मल्हार के गाने से वर्षा होने लगती थी। वर्तमान समय में संगीतज्ञ उस विधि को भूल गये है और कोई इस क्रिया को प्रत्यक्ष करके नहीं दिखा सकता। इससे कुछ लोग इन्हें मनगढ़न्त कल्पना बताने लगे है। पर यदि संगीत की ध्वनि के प्रभाव से पौधों की वृद्धि हो सकती है और गायें अधिक दूध दे सकती हैं तो कोई कारण नहीं कि दीपक-राग और मेघ–मल्लार की बात को गपोड़ा माना जाय। शब्द-शक्ति के सिद्धान्त की दृष्टि से दोनों घटनायें एक-सी है।

कुछ समय से संगीत के विविध राग-रागनियों द्वारा अनेक प्रकार के रोगों को मिटाने की चर्चा भी सुनाई देने लगी है। वास्तव में यह भी भारतीय संगीत-शास्त्र की एक प्राचीन उपलब्धि है। कुछ वर्ष पहले बीकानेर के राजकीय पुस्तकालय में एक हस्तलिखित ग्रन्थ मिला जिसमें बतलाया गया था कि किस राग-रागिनी के द्वारा कौन-सा रोग अच्छा किया जा सकता है। अब विदेशों के कितने ही अस्पतालों में इस विधि का प्रयोग किया जाना आरम्भ हो गया है। वहाँ जिस रोग के लिये जिस प्रकार की संगीत ध्वनि उपयोगी मानी जाती है, उसी का रिकार्ड ग्रामोफोन पर लगाकर रोगी के पास रख दिया जाता है। स्नायु और मस्तिष्क सम्बन्धी रोगों में संगीत का प्रयोग विशेष फलदायक सिद्ध हो रहा है।

स्नायविक रोगों तथा मानसिक विक्षेपों में संगीत के विशेष ध्वनि प्रवाहों के माध्यम से चिकित्सा का एक नया प्रचलन इन्हीं दिनों चला है और बहुत सफल हुआ है। शोक, क्रोध, उद्वेग, तनाव, रक्तचाप आदि को शांत करने में भी उससे बड़ी सहायता मिलती देखी गई है। सम्भावना व्यक्त की जा रही कि अन्यान्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह अगले दिनों संगीत उपचार भी उभर कर आएगा और जन स्वास्थ्य संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करेगा।

इसके अतिरिक्त उसका प्रभाव पशु-पक्षियों को उल्लसित एवं वृक्ष वनस्पतियों को अधिक विकसित करने की दृष्टि से भी बहुत लाभदायक पाया गया है। पशु अधिक दूध देने लगे। बैल घोड़े बिना थके अधिक परिश्रम में समर्थ रहे। मुर्गियों और मछलियों ने अधिक अण्डे बच्चे दिये। डरते रहने और असहयोग करने वाले अन्य प्राणी इस आधार पर नरम पड़े और मनुष्य के अधिक निकट आये। इस आधार पर हिंस्र पशुओं को भी किसी हद तक सौम्य बनाने में सफलता मिली है। सरकस वाले अब पशुओं को कलाकार बनाने के लिए साधने में मात्र हन्टर या लालच का ही उपयोग नहीं करते वरन् संगीत का सम्मोहन चलाकर भी चक्रवर्ती बनाने का एक नया उपाय अपनाने लगे हैं। यह प्रयोग वृक्ष वनस्पतियों पर भी बहुत प्रभावकारी सिद्ध हुआ है।

वेस्टविल अमेरिका की कृषि प्रयोगशाला में ऐसे परीक्षण हुए हैं जिनमें संगीत के प्रभाव से खेती की फसलों को अधिक फैलने तथा फूलने-फलने वाली बनाने में सफलता प्राप्त की गई है। इस सम्बन्ध में विस्कोन्सिन के आर्थर लाके के प्रयोगों की उस देश के वनस्पति विशेषज्ञों में बहुत चर्चा है। उसने फूलों को जल्दी तथा भारी बनाने में इसी आधार पर सफलता पाई। जिन खेतों को संगीत सुनाये गये वे अधिक समुन्नत हुए और जिन्हें इससे वंचित रखा गया वे खाद पानी की दृष्टि से समान लाभ प्राप्त करने पर भी पिछड़े रह गये।

संगीत मनुष्यों की तरह पेड़-पौधों को भी पसन्द है। सुनियोजित संगीत तरंगों से वे प्रसन्न पुलकित होते हैं और उत्साह भरे वातावरण में अधिक जल्दी अच्छा विकास करने लगते है। ब्रिटिश विज्ञानी जार्ज मिलसटान इस संदर्भ में अधिक रुचि लेते रहे हैं उन्होंने सिद्ध किया है कि संगीत में पौधों को भी उल्लसित करने की क्षमता है। न्यूयार्क के डॉक्टर डोरेवों रेटालक ने रुग्ण वृक्षों में चिकित्सा से संगीत की ध्वनि लहरों का उपयोग किया है और कहा है कि जिनका भविष्य संदिग्ध हो रहा था जिन्हें रुग्ण समझा जा रहा ऐसे पौधों को भी संगीत चिकित्सा से माध्यम से रोगमुक्त किया और नया जीवन दिया गया।

कनाडा, ब्रिटेन, इसराइल तथा पश्चिमी जर्मनी में भी यह प्रयोग हुए हैं। प्रयोग-कर्ताओं ने कुछ खेतों और उद्यानों में खाद-पानी के अतिरिक्त संगीत सुनाने का भी प्रबन्ध किया। इस पर जो अतिरिक्त खर्च पड़ा उसकी तुलना में अच्छी फसल का लाभ कहीं अधिक था। इसके विपरीत यह भी देखा गया कि कर्कश स्वर और कोलाहल कुहराम का बुरा असर भी पड़ता है। धड़धड़ाते रहने वाले कारखानों के इर्द-गिर्द के बगीचे सदा मुरझाये-कुम्हलाये पाये गये।

वनस्पतियों के संगीत पर प्रभाव के सम्बन्ध में महाकौशल महाविद्यालय के रसायन शास्त्री प्रो. गोरे ने लम्बे समय तक परीक्षण करने के बाद अपना मत यही बनाया है कि जिस प्रकार मनुष्यों को संगीत प्रिय है उसी प्रकार उसके द्वारा वनस्पति को भी उल्लसित ही नहीं विकसित भी किया जा सकता है।

पिछले दिनों अन्नामलाई विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के एक वैज्ञानिक डॉक्टर सी0टी0एम. सिंह ने स्लाइडों के द्वारा यह प्रमाणित करने का प्रयत्न किया था कि गायें भैंसे संगीत सुनकर अधिक दूध देने लगती हैं। कटक और दिल्ली के कृषि अनुसंधान केन्द्रों में भी ऐसे प्रयोग और परीक्षण हुए है और यह देखा गया है संगीत का प्रभाव पेड़-पौधों तक में उत्पादन शक्ति के रूप में होता है। कोयम्बटूर के सरकारी कॉलेज में भी इस प्रकार के परीक्षण चल रहे है। विदेशों से ऐसे समाचार मिल रहे हैं, जिनमें दावा किया जाता है कि राग-रागनियों का प्रभाव गन्ने, धान, शकरकन्द, नारियल आदि पर भी पड़ता है। उत्तर भारत में अभी भी धान की रोपाई के लिये विशेष रूप से गाँव की उन स्त्रियों को ले जाया जाता है, जो अच्छे और मधुर-स्वरों में गीत गा सकती हों और फिर सामूहिक स्वरों में गीत गाते हुए, धान की रोपाई की जाती है। ऐसे खेतों में और खेतों की अपेक्षा फसल अच्छी तैयार होती है।

डॉ. सिंह ने दस वर्ष तक एक बाग का दो हिस्सों में परीक्षण किया। एक के पौधों को कु. स्टेला पुनैया वायलिन बजाकर गीत सुनाती दूसरे खाद, पानी, धूप की सुविधाएँ तो समान रूप से दी गई किन्तु उन्हें स्वर माधुर्य से वंचित रखकर दोनों का तुलनात्मक अध्ययन किया। जिस भाग को संगीत सुनने को मिला उनके फूल-पौधे सीधे, चने, अधिक फूल, फलदार सुन्दर हुए। उनके फूल अधिक दिन तक रहे और बीज निर्माण द्रुत गति से हुआ। डॉ. सिंह ने बताया कि वृक्षों में प्रोटोप्लाज्मा गड्ढे भरे द्रव की तरह उथल-पुथल की स्थिति में रहता है संगीत की लहरियाँ उसे उस तरह लहरा देती है, जिस तरह वेणुनाद सुनकर सर्प प्रसन्नता से झूमने और लहराने लगता है। मनुष्य शरीर में भी ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया होती है। गन्ना चावल, शकरकन्द जैसे मोटे अनाजों पर जब संगीत अपना चिरस्थायी प्रभाव छोड़ सकता है तो मनुष्य के मन पर उसके प्रभाव का तो कहना ही क्या?

गन्ना, धान, शकरकन्द, नारियल आदि के पौधों और पेड़ों के विकास पर क्रमबद्ध संगीत का उत्साहवर्धक प्रभाव पड़ता है यह प्रयोग भी डॉ. टी. एन. सिंह ने कुछ समय पूर्व किया था। कोयम्बटूर के सरकारी कृषि कॉलेज के अन्वेषण ने पौधों पर संगीत के अनुकूल प्रभाव की रिपोर्ट दी है।

इस समय संसार के कई अन्य देशों में भी संगीत की शक्ति के सम्बन्ध में इस प्रकार के परीक्षण हो रहे हैं। कनाडा में गेहूँ के एक खेत के चारों ओर दूरभाषी यंत्र लाउड–स्पीकर लगे हुये है, जो प्रातःकाल सूर्योदय होते ही चायनिन के संगीत को प्रसारित करते है। अमरीका में भी कई किसान संगीत के भाव से अपनी फसलें बढ़ाने के प्रयत्न में लगे हैं दोवातोसा के श्री आर्थरलॉकर की राय है कि संगीत के प्रभाव से उनके बगीचे के फूल-पौधे सीधे, घने, ज्यादा फल-फूलदार और सुन्दर होने लगे है। उनमें

फूल काफी अर्से तक लगे रहे और बीच निर्माण भी द्रुतगति से हुआ। अमरीका की कितनी ही गौशालाओं में संगीत के प्रभाव से गायों के दूध की मात्रा बढ़ाई गई हैं, यह समाचार भी सामयिक पत्रों में प्रकाशित हुआ है।

लन्दन विश्वविद्यालय के एक वनस्पति इंजीनियर जेम्स स्मिथ ने पौधों के साथ किये गये दुर्व्यवहार और सद्व्यवहार की प्रतिक्रियाओं को जानने के लिए लम्बी अवधि तक अनेक क्षेत्र उद्यानों में विभिन्न प्रकार के पर्यवेक्षण किये है। उनने पाया है कि वनस्पतियाँ प्रताड़ना तथा प्रतिकूलता उत्पन्न करने से खिन्न होती है उनके यह मनोभाव कुम्हलाने मुरझाने के रूप में देखा गया। इसी प्रकार खाद पानी ऋतु प्रभाव की तरह वे सज्जनोचित व्यवहार से भी पोषण प्राप्त करती, बढ़ती और सुखी रहती पाई गई हैं। हँसी-खुशी का वातावरण जिस प्रकार मनुष्यों को पसन्द है वैसा ही अनुभव पेड़-पौधे भी करते हैं। शोक-सन्ताप जहाँ छाया रहता है वहाँ पौधे भी दुःखी निराश एवं कुरूप कठोर स्थिति में रहते हैं। श्मशानों, कसाई घरों के नये और तेजी से बढ़ने वाले पौधों को विकास गति अपेक्षाकृत अधिक मन्द और असंतोषजनक पाई गई है।

वनस्पति विज्ञानियों का यह मत बनता जा रहा है कि संगीत की प्रतिक्रिया पौधों पर स्नेह सद्भाव जैसी होती है। वे गायन वादन से प्रसन्न उत्साहित रहते और जल्दी बढ़ते तथा फूलते-फलते है।

इस तरह मनुष्य पशु-पक्षी कीड़े-मकोड़े ही नहीं वृक्ष-वनस्पतियों पर भी संगीत का उपयोगी प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, समस्त चेतन सृष्टि की तरह जड़ सृष्टि भी उससे प्रभावित होती है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर संगीत को विश्व का प्राण कहा गया है।


सफलता मनःस्थिति के जागरण पर टिकी है

विश्व विख्यात ज्योतिर्विद् और खगोल शास्त्री एरिग्मै बड़ी ही दुर्दिन भरी स्थितियों में पले और बड़े हुए थे। बचपन में उन्हें स्कूल जाने का अवसर बहुत कम मिला। स्कूल की अपेक्षा मेहनत मजदूरी कर उन्हें अपने और अपने परिवार के गुजारे के लिए अधिक समय देना पड़ा और बाद में तो इसे ही प्राथमिकता देनी पड़ी। परन्तु उनके मन में आगे बढ़ने और बड़ा आदमी बनने की आकांक्षा दबी हुई थी। किशोरावस्था में उन्हें सुझाई नहीं देता था कि वे किस प्रकार अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए प्रयत्न करें? उस समय वे एक पुरानी किताबें बेचने वाले एक पुस्तक विक्रेता के यहाँ पुरानी और फटी हुई पुस्तकों की मरम्मत का काम किया करते थे। एक दिन वे किसी पुरानी किताब पर जिल्द चढ़ा रहे थे कि पास में रखी हुई रद्दी कागजी की ढेरी पर उन्हें हाथ से लिखा हुआ एक कागज का टुकड़ा दिखाई दिया। बरबस ही वे उसे उठाकर पढ़ने लगे। वह कागज एक पत्र की नकल था, जो डी. एलर्म्बट नामक व्यक्ति ने अपने किसी मित्र को लिखा था। उस कागज पर लिखा हुआ था, “आगे बढ़ो श्रीमान्! आगे बढ़ो! जैसे-जैसे तुम आगे बढ़ोगे, तुम्हारी कठिनाइयाँ अपने आप दूर हो जायेंगी और तुम देखोगे कि उन कठिनाइयों के बीच में से ही प्रकाश उदित हुआ है, जिसने उत्तरोत्तर तुम्हारा मार्ग आलोकित कर दिया है।”

जिस युवक को यह पत्र लिखा गया था, उसने पता नहीं कितनी प्रेरणा ग्रहण की, परन्तु एरिग्मै के लिए यह पंक्तियाँ मार्ग दर्शक बन गई। उन्होंने यह काम करते हुए ही अपने प्रिय विषय की पुस्तकें पढ़ना आरम्भ किया। दुकान पर मरम्मत के लिए जितनी पुस्तकें, आती थीं, उन्हें भी एरिग्मै उलट-पुलट लेते और इस स्वाध्याय क्रम से उन्होंने इतना लाभ उठाया कि आगे चलकर वे विश्व ख्याति स्तर के ज्योतिर्विद्, खगोलवेत्ता और विविध विषयों के विद्वान बन गए।

संसार में जितने भी व्यक्ति सफल हुए हैं, अपने-अपने क्षेत्र में प्रगति के कीर्तिमान स्थापित कर सके हैं, उनमें से अधिकाँश ने अपना जीवन साधारण परिस्थितियों में ही आरम्भ किया था। यद्यपि दुनिया में दोनों ही तरह के लोग होते हैं कितने ही अच्छी स्थिति में देखे जाते हैं। और कितने ही बुरी तथा दीन-हीन स्थिति में, विषम परिस्थितियों में अपना जीवन ज्यों-त्यों कर व्यतीत करते देखे जाते हैं। दीन-हीन और दयनीय स्थिति में जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति जब अपने से ऊँची और अच्छी स्थिति के लोगों की ओर देखते हैं तो कुढ़कर रह जाते हैं कि भगवान का यह कैसा न्याय है? एक व्यक्ति तो इतना ऊँचा सम्पन्न या विद्वान जबकि उसके समान ही मैंने भी जनम लिया है, मैं भी मनुष्य हूँ, मेरे भी दो हाथ, दो पाँव और दो-दो आँख, कान हैं। फिर भी मेरी और सामने वाले की स्थिति में न पाया जाने योग्य अन्तर।

यह कुढ़न इस सन्तोष या संताप के बिन्दु पर आकर समाप्त होती है कि हमारा भाग्य ही ऐसा हैं। ऐसा हमारी किस्मत में ही नहीं है। कदाचित् हमारे भाग्य में भी ऐसी ही परिस्थितियाँ होती तो हम इससे भी अधिक और अच्छा कुछ कर दिखाते। इस प्रकार निराशा से संतप्त व्यक्ति अपनी दुर्दशा का सारा दोष परिस्थितियों या भाग्य पर मढ़कर चुपचाप मन मसोस कर रह जाते हैं।

वस्तुस्थिति कुछ और ही होती है। जिन परिस्थितियों को अपनी दुर्दशा या दीनता के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है, उनमें से अधिकाँश अपनी ही उत्पन्न की हुई होती है। जिन लोगों को आज ऊँची स्थिति में देखा जा रहा है, यदि उन्हें विरासत के रूप में कुछ मिला न हो तो, वे भी कभी उन्हीं की तरह साधारण और दीन-हीन स्थिति में थे और किसी को विरासत के रूप में कुछ मिला भी है जिनसे विरासत में मिला है, उन्होंने भी कष्टप्रद, बुरे और कठिन दिन देखे थे। उन परिस्थितियों में उन्होंने अपने पुरुषार्थ को तराशा है, प्रतिभा को निखारा है तथा प्रयासों की आग में अपने आपको तपाया है।

इस तरह के अगणित उदाहरण हैं, जिनमें साधारण स्थिति के व्यक्तियों ने परिश्रम, पुरुषार्थ, एकाग्रता, मनोयोग, और निष्ठा के बल पर उन्नति के चरम शिखरों पर पहुँचाया। फोर्ड कम्पनी इस समय संसार में मोटर बनाने वाली सबसे बड़ी और सर्वाधिक विख्यात कम्पनी है। इस कम्पनी के संस्थापक थे-हेनरीफोर्ड फोर्ड के कारखाने में बनी कारें सबसे ज्यादा मजबूत और टिकाऊ समझी जाती है। और फोर्ड परिवार की गणना विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न परिवारों में की जाती है। इस कम्पनी या उद्योग के संस्थापक हेनरी फोर्ड का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जिसमें प्रत्येक सदस्य को जीविका के लिए श्रम करना पड़ता था। उनके पिता एक छोटे से किसान थे। फोर्ड इसलिए अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके थे क्योंकि उनका परिवार उन्हें स्कूल कॉलेज, भेजने का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं था।

किन्तु प्रयत्न, लगन और परिश्रम के बल पर उन परिस्थितियों में भी फोर्ड ने अपना व्यक्तित्व स्वयं निर्मित किया और असफलता की कई मंजिलें तय करते हुए सफलता के शिखर पर पहुँचे। जिनके कारखाने में छोटे से छोटा मजदूर भी साठ रुपये प्रतिदिन से कम नहीं कमाता, उस कारखाने के संस्थापक को इतना पारिश्रमिक प्राप्त करने के लिए महीने भर खपना पड़ता था। फोर्ड ने अपना प्रारम्भिक जीवन जिन परिस्थितियों में गुजारा उसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। उन परिस्थितियों के रहते हुए सफलता के शिखर पर पहुँचने का रहस्य उनकी लगन और निष्ठा को ही समझा जा सकता है।

मजदूरी करते हुए ही फोर्ड ने किशोरावस्था में संकल्प किया था कि वे कार बनाने का कारखाना खोलेंगे। उस समय यदि वे अपने लक्ष्य के बारे में किसी को बताते भी तो वह उन्हें शेखचिल्ली से अधिक महत्व नहीं देता। यहाँ तक कि उनके माता-पिता ने भी उन्हें सनकी और पागल कहा। किन्तु फोर्ड अपने स्वप्न को साकार करने के लिए अपने ढंग से काम करते रहे। वे दिन में मजदूरी करते और रात को एक मोटर कम्पनी में काम सीखने के लिए आया करते। कबाड़ी के सामान से आखिर उन्होंने एक दिन कार का डिजाइन तैयार कर लिया और वह कार कुछ दूर तक चली। यह दुनिया की पहली कार थी। इसके बाद तो सफलता ने जैसे अपना द्वार उनके लिए खोल दिया और वे एक-एक सीढ़ियाँ पार करते हुए मंजिल तक पहुँच गए। किन्तु इन वर्षों में उन्हें जितना कठिन परिश्रम और पुरुषार्थ करना पड़ा उतना श्रम अपने ध्येय के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित व्यक्ति ही कर सकता है।

सुई से लेकर रेल के इंजिन तक छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी वस्तुओं के निर्माता उद्योग समूह टाटा के संस्थापक जमशेद जी टाटा के सम्पन्न जीवन के सम्बन्ध में तो प्रायः सभी लोग जानते हैं, परन्तु यह जानने वालों की संख्या कम ही है कि उनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जिसकी जीविका का आधार पुरोहिताई ही था। नवसारी में जन्मे और वहीं पले जमशेद जी को आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक जातीय बन्धु का सहयोग लेना पड़ा था। विद्यार्थी काल में वे एक ऐसी छत वाले कमरे में रहे जिसकी छत थोड़ी-सी भी बूँदा−बाँदी होने पर टपकने लगती थी। शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने अपनी व्यवहार कुशलता के बल पर ऐसे साथियों की टीम तैयार की, जिनके सहयोग से वे स्वयं का कारोबार चलाने योग्य साधन जुटा सके।

सर्वप्रथम उन्होंने एक कपड़े का कारखाना खोला और इस प्रकार उद्योग जगत में प्रवेश किया। परिश्रम दृढ़ता तथा व्यवहार कुशलता के बल पर उन्होंने अपने कई साथी सहयोगी बनाये और उद्योगपति के रूप में प्रतिष्ठित हो सके। लोग अवसर किसी का सहयोग नहीं होने की बात करते हैं स्मरण रखा जाना चाहिए कि सहयोग न तो घर बैठे मिलता है और न ही अनायास उसके लिए व्यक्ति का उद्यमी होने के साथ-साथ व्यवहार कुशल भी होना चाहिए, तभी वाँछित सहयोग मिल पाता है और अभीष्ट परिस्थितियों का निर्माण होता है, जिसके आधार पर आगे बढ़ पाना सम्भव होता है।

परिस्थितियाँ कितनी ही विषम और प्रतिकूल क्यों न हों, यदि व्यक्ति अपने कार्य को मनोयोग और तन्मयता के साथ पूरा करते रहे तो यह उन्हीं परिस्थितियों में आगे बढ़ता रह सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में यों कितने ही राष्ट्रपति हुए हैं, परन्तु अब्राहम लिंकन का नाम जितने आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है, वाशिंगटन को छोड़कर शायद ही किसी और राष्ट्रपति का लिया जाता हो। अब्राहम लिंकन के पिता कुल्हाड़े ओर बन्दूक के सहारे अपना जीवनयापन करते थे। कुल्हाड़े से वे लकड़ियाँ काटते और बन्दूक से जंगली जानवरों से अपनी रक्षा करते थे। अब्राहम लिंकन के पिता अपने बच्चों को पढ़ाने-सिखाने योग्य सुविधा साधन भले ही न जुटा पाए हों, पर उन्होंने काम चलाऊ अक्षर ज्ञान और पढ़ने की अभिरुचि अवश्य जगा दी थी। यही कारण था कि लेप पोस्ट के उजाले में खाना पकाते समय चूल्हे में जलाई जाने वाली आग की रोशनी में वे पुस्तकें पढ़ा करते, क्योंकि दिया बत्ती का प्रबन्ध भी मुश्किल से हो पाता था और ऐसी परिस्थितियों में पढ़े-लिखे लिंकन जीवन में बराबर असफल होने पर भी हिम्मत न हारे तथा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने में सफल हुए।

अमेरिका में दूसरे दर्जे का जीवन बिताने वाली गोरे लोगों की दासता के चक्र में पिसने वाली मूल जाति नीग्रो में जनम लेने वाले कॉर्बर को भी अपने जीवन में क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़े थे? वे ऐसे परिवार में जन्मे थे, जिसका सारा जीवन ही उसके स्वामी के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचता था। यहाँ तक कि उन लोगों को अपने बच्चों की ब्याह शादी भी अपनी मालिक की मर्जी के अनुसार करनी पड़ती थी। क्योंकि बच्चे उनकी सन्तान नहीं, उनके मालिक की सम्पत्ति होते थे। फिर भी आज्ञाकारिता, नियम-निष्ठा और विश्वास के बल पर र्जा कॉर्बर ने अपने मालिक को प्रसन्न कर उससे कुछ सुविधाएँ हस्तगत कर लीं और उनका उपयोग अपने विकास में करने लगे। भविष्य प्रति आशावान् और वर्तमान के प्रति उत्साहपूर्ण तथा जागरूक रहते हुए उन्होंने अपने जीवन को इस प्रकार सँवारा कि सफलता के उस शिखर पर जा पहुँचे, जिसके कारण कि उन्हें वैज्ञानिक ऋषि कहा जाने लगा।

शिक्षा और विद्वत्ता के सम्बन्ध में तो लोग बहुधा ही परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं, सोचते हैं कि यदि अच्छे घर में जन्म न हो, पढ़ने-लिखने की सुविधाएँ न मिले, उपयुक्त परिस्थितियाँ यदि उपलब्ध न हों तब तो आदमी कुछ कर ही नहीं सकता। जबकि सच्चाई यह है कि अन्य क्षेत्रों में परिस्थितियाँ भले ही कुछ सहायता कर जाएँ, विद्या और ज्ञान के सम्बन्ध में तो उनका जरा भी वश नहीं चलता। अनुकूल परिस्थितियाँ होते हुए कई धनवानों के बच्चे अनपढ़ और गँवार रह जाते हैं तथा परिस्थितियाँ व साधन न होते हुए भी कितने ही गरीब बच्चे विद्वान और ज्ञानी बन जाते हैं। कालिदास, सूरदास, तुलसीदास से लेकर प्रेमचन्द्र, शरतचन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद निराला, रत्नाकर आदि कितने ही विद्वान साहित्यकार हुए है जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत कम अच्छी रही है या दुर्दशाग्रस्त ही रही है। फिर भी उन्होंने निजी प्रयासों और तप और साधनाओं के बल पर जगत को कुछ दे पाने में सफलता प्राप्त की।

सफलता और उत्कर्ष आन्तरिक उपलब्धि है जबकि अच्छी स्थिति और अनुकूल परिस्थितियाँ बाहरी साधन ठीक उसी प्रकार जैसे अन्न भण्डार के मालिक का आहार की दृष्टि से स्वस्थ और पोषक अन्न ग्रहण कर पाना कोई आवश्यक नहीं है। यदि पेट की कोई बीमारी हो तो मनों अनाज भरा होने पर भी पाव भर रोटी हजम कर पाना मुश्किल है और जिसे खुलकर भूख लगती है उसे उद्यम करने के लिए उठ खड़ा होना ही पड़ेगा। आन्तरिक विशेषताओं को, मनःस्थिति और क्षमताओं को यदि उपयुक्त दिशा में मोड़ा तथा जगाया जाय तो लाख परिस्थितियाँ बाधक हों, सूरमा योद्धाओं की तरह विजय के गढ़ पर सफलता के ध्वज लहराने का अवसर आकर ही रहेगा, मिलकर ही रहेगा।


Quotation

जिसका मन हार जाता है वह बाहुबल व बहुत कुछ होते हुए भी अन्त में असफल रहता है। जो शक्ति न रहते हुए भी मन से नहीं हारता उसको दुनिया की कोई शक्ति परास्त नहीं कर सकती।


व्यर्थ की माथा-पच्ची (Kahani)

चर्चिल रिटायर हुए। उनके एक मित्र ने सोचा। क्यों न उनके राजनीति के परिपक्व अनुभवों का लाभ उठाया जाय। वह चल पड़ा बात करने चर्चिल से। उसने देखा, इस बुढ़ापे में भी चर्चिल स्वयं अपनी फूलों की बगीचों में निराई-गुड़ाई में लगे हैं। उसने चर्चिल से कुछ राजनीति के प्रश्न पूछे चर्चिल ने कहा। छोड़ो अब बीती बातें। वे तो समाप्त हो गई वहीं। अब तो मुझ से फूलों की बगीचे की, शास्त्रों के अध्ययन की, ईश्वर चिन्तन की बातें करो तो मुझे अच्छा लगेगा। राजनीति के मील के पत्थर बहुत पीछे छूट गये। व्यर्थ की माथा-पच्ची से क्या लाभ? व्यर्थ से तो सार्थक चिन्तन सब तरह श्रेष्ठ और हितकर है।


लोक मर्यादाओं का अधिष्ठाता धर्मतंत्र

परिचारक ने जाकर सन्देश दिया-महात्मन् महाराज त्रैवृष्ण स्वयं पधारे हैं, आपसे अभी भेंट करने की इच्छा प्रकट की है उन्होंने।

महर्षि जन के पुत्र महर्षि जन के पुत्र महर्षि वंशजान सायंकालीन संध्या से अभी उठे ही थे। परिचारक का सन्देश सुनकर वह स्वयं उठकर द्वार तक आए और सम्राट त्रैवृष्ण का स्वागत कर अपने परामर्श कक्ष की ओर चल पड़े। मार्ग में ही पूछा-महाराज! दिग्विजय के लिए प्रस्थान की सारी तैयारी सम्पन्न हो चुकी होंगी। विजय दशमी को प्रातः कालीन अग्निहोत्र के बाद ही प्रस्थान कर देना होगा।

ऐसा ही होगा भगवन्। हम आपकी आज्ञाओं का अक्षरशः पालन करा रहे हैं। सेवा में तो हम एक अन्य अकिंचन आकांक्षा लेकर उपस्थित हुए हैं। महर्षि! आपके प्रताप से इक्ष्वाकु वंश की विजय पताका रिक मण्डल में फहरा रही है। प्रजा को कोई कष्ट नहीं, कहीं अपराध नहीं, अराजकता नहीं, सब आपका ही आशीर्वाद है। हमारी इच्छा है भगवन् कि इस युद्ध में मेरे राि की रास आप ही सम्भालें आपने पुरोहित का गुरुतर भार सम्भाल कर अपनी शास्त्रज्ञता सिद्ध की है। जब तक आप जैसे समर्थ पुरोहित इस देश में जनम लेते रहेंगे, प्रजा के हित की तब तक चिंता नहीं की जा सकती। पर हम यह भी देखना चाहते हैं कि शास्त्र पुरोहित, शस्त्रज्ञता का निर्वाह कैसे करते हैं। आज तक आपके ब्राह्मणत्व को जानते आए हैं, अब आपमें समाहित क्षात्रत्व को देखने की अभिलाषा भी तीव्र हो उठी है। आशा है निवेदन ठुकरायेंगे नहीं।

वृश हँसे और बोले-ऐसा ही होगा महाराज! जाओ युद्ध की अवशेष तैयारियाँ भी पूरी करो। इस युद्ध में आपके रथ का संचालन हम स्वयं करेंगे।”

और सचमुच सारी प्रजा ने देखा कल तक जो गैरिक वस्त्र धारण किए सारी प्रजा को ज्ञान का उपदेश दिया करते थे, आज वह वीर केसरिया वेश से सज्जित इक्ष्वाकु श्रेष्ठ त्रैवृष्ण के रथ की बागडोर अपने हाथ में लिए चल रहे हैं। वय का पूर्वार्द्ध समाप्त कर वे उत्तरार्ध में चल रहे थे, बाल पकने लगे थे तो भी जटा-जूट सवार कर जब उन्होंने एक योद्धा का रूप लिया, शिरस्त्राण कवच और तूणीर धारण किया तो वह वीर वेश भी देखते ही बनता था। जन्मजात योद्धा सरीखे दीख पड़ रहे थे, वृश। सैकड़ों कलाकारों ने प्रस्थान की उस पुण्य बेला में राजधानी पहुँचकर महर्षि का वह वीर वेश तूलिकाकिंत किया।

दिग्विजय की युद्ध श्रृंखला प्रारम्भ हुई। महर्षि वृशजान ने रथ का संचालन बड़ी कुशलता से किया। वे स्वयं एक सिद्ध योद्धा थे। युद्ध पर युद्ध जीतने गए और एक बार फिर इक्ष्वाकु वंश का ऐश्वर्य सारे विश्व में छा गया।

विजय वाहनियाँ लौट रही थी। स्वागत के लिए प्रजा उमड़ पड़ी। दोनों ओर पंक्ति बद्ध खड़े नागरिकों का अभिनन्दन स्वीकार करता हुआ, राजस्यन्दन आगे बढ़ रहा था। राजधानी में पहुँच कर विजयोत्सवों की धूम मच गयी। महाराज त्रैवृष्ण भी विजयोन्माद में फूले नहीं समा रहे थे। प्रभुता के उन्माद का नशा-मनुष्य की विवेक चेतना का हरण कर लेता है। उसे दूसरों को सम्मान देने की अपने श्रेय में भागीदार समझने की सुध-बुध नहीं रहती। सारे श्रेय का अधिकारी वह स्वयं को समझने लगता है।

महाराज त्रैवृष्ण के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने प्रभुता के मद में महर्षि वृश की उपेक्षा तक सीमित रहती तो भी ठीक था। उपेक्षा के साथ अवमानना अवहेलना, तिरस्कार का क्रम भी शुरू हो गया। वह उनके साथ एक राज कर्मचारी से भी गया, गुजरा व्यवहार करने लगे। कुछ दिन तो महर्षि इस बर्ताव के सहते रहे। पर-धीरे-धीरे उनका मन टूट गया। उन्होंने राजधानी में रहने के स्थान पर एकान्त साधना करने के लिए अरण्य में जाना औचित्य पूरा समझा। अपने इस निर्णय से उन्होंने महाराज को अवगत कराकर एकान्त वन में चले गए।

महर्षि वृश के जाते ही धर्मतन्त्र शिथिल पड़ गया। राज-घराने में होने वाला अग्निहोत्र समाप्त हो गया तो सामान्य प्रजा भी धर्मकृत्यों को छोड़ बैठी। देखते ही देखते राज्य की सम्पूर्ण तेजस्विता नष्ट-भ्रष्ट हो गयी लोग आलसी-कामुक और उच्छृंखल हो गए। व्यापार ठप्प पड़ गया, कृषि टूट चली, देश की दुर्गति होने लगी, तब लोगों को महापुरोहित वृश का अभाव खटका।

एक दिन एक सामान्य नागरिक की पत्नी ने अपने पति की उपेक्षा कर दी, उसके भूखे और थके होने पर भी उसने भोजन नहीं बनाया। पति -पत्नी के मध्य प्रेम और आत्म भाव न रहे। उस युग को दुःख और दैन्य की चर अवस्था कहना चाहिए। उपेक्षा राजवंश में भी न चढ़ पड़े इसकी चिन्ता हो चली। हुआ भी ऐसा ही एक दिन महाराज त्रैवृष्ण की महाराज ने ही महाराज के प्रति कर्तव्य व प्रमाद किया, तब उन्हें धर्मतन्त्र व जागरण की आवश्यकता प्रतीत हुई।

दुःखी नरेश स्वयं वृश को ले गए। वृश को अपनी प्रजा ने समाचार सुनकर बड़ा दुःख हुआ। यद्यपि उन्हें तिरस्कृत किया गया था तो भी लोकहित के लिए अपने अपमान का ध्यान न दिया और पुनः राजधानी लौट आए। उनके आते ही लोक मर्यादाएँ पुनः प्रदीप्त हो उठीं।

महाराज ने धर्म मंच के स्वर को पहचाना और तब अनन्त का तक के लिए पुरोहित का पद शासनाध्यक्ष से भी उच्च घोषित किया।


इन साहसी पक्षियों से हम कुछ तो सीखें

सुगम सुविधाजनक, आराम तलबी की जिन्दगी आज के आदमी का लक्ष्य बनी हुई है। वह अधिक से अधिक शौक -मौज से भरे दिन काटना चाहता है ओर विलासिता में निमग्न रहने के साधन ढूँढ़ता है। तथाकथित बड़े लोगों की आज कल यही प्रवृत्ति है। वे अधिक धन और सुविधा सामग्री इसी प्रयोजन के लिए जमा करते हैं।

छोटा कहा जाने वाला वर्ग धन की कमी की वजह से नहीं, उत्साह और उमंगों की दरिद्रता के कारण छोटा है और दिन-दिन और भी अधिक गिरता जाता है। उसे आलस्य और प्रमाद खाये जाता है। जब भूख विवश करती है तो कुछ करने को खड़ा होता है और उतने ही हाथ-पैर हिलाता है जितने के बिना कि पेट का गड्ढा नहीं भरता। इसके बाद उसे भी आलस्य प्रमाद, व्यसन आदि झगड़े, गप-शप और आवारागर्दी की सूझती हैं अपने आपके सम्बन्ध में बेखबर यह लोग कितना गन्दा गलीज जीवन क्रम अपनाये रहते हैं यह देखकर दया आती है, आवारागर्दी के समय को यदि वे शरीर-वस्त्र-मकान और जो कुछ उनके पास है उसे स्वच्छ बनाने में ही लगा लिया करें तो इतने मलीन तो न दीखें। पिछड़ेपन में निर्धनता और अशिक्षा भी कारण हो सकती है पर सबसे बड़ा कारण है मानसिक छोटापन। उसी व्यापक छूत की बीमारी को हम इस देश के पिछड़ेपन का मूलभूत कारण भी कह सकते हैं।

आरामतलबी या आलसीपन यह दोनों ही संजीव चेतन प्राणी की अन्तरात्मा की मूल प्रकृति के विपरीत है। यदि अन्तःकरण को दुर्बुद्धि ने मूर्छित न कर दिया हो तो उससे सदा साहसिकता का परिचय देने की-शौर्य प्रवृत्ति उमड़ती रहती दिखाई देगी। बहादुरी और वीरता के प्रतिफल ही सच्चा आनन्द और संतोष दे सकते हैं, इसे छोटे पक्षी भी जानते हैं।

चिड़ियों में बहुत ऐसी होती हैं जो बदलती हुई ऋतुओं का आनन्द लेने के लिये लम्बी यात्राएँ करती हैं। इसमें उन्हें काफी श्रम करना पड़ता है और भारी जोखिम उठानी पड़ती है तथा मनोयोग का प्रयोग करना पड़ता है, पर वे बेकार झंझट में क्यों पड़ें-चैन के दिन क्यों न गुजारे की भाषा में नहीं सोचती वरन् इस प्रकार साहसिकता का परिचय देने में आन्तरिक प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभव करती हैं। इसके लिए उनमें भीतर से ऐसी उमंग उठती है जिसे पूरा किये बिना रहा ही नहीं जाता। पेट कहीं भी भरा जा सकता है और दिन कहीं भी काटे जा सकते हैं, यह मरी हुई जिन्दगी है जिसे मनुष्य भले ही पसन्द करे, पर पशु-पक्षियों से लेकर कीट-पतंगों तक कोई भी उसे पसन्द नहीं करता। कुछ चिड़ियाँ तो ऐसी हैं जो अपनी साहसिक यात्राओं द्वारा सम्भवतः मनुष्य को भी उत्साही, परिश्रमी, साहसी और महत्त्वाकाँक्षी होने की प्रेरणा करती हैं।

सितम्बर के प्रथम सप्ताह में भारत में ऐसे अनेक रंग-बिरंगे पक्षी दिखाई पड़ते है जो गर्मी और बरसात में नहीं थे। यह पक्षी जर्मनी, साइबेरिया, चीन, तिब्बत आदि सुदूर देशों से हजारों मील की लम्बी यात्रा करके आते है। तिघारी, चैती, हंसक, पैतरा, सुरखाव, लालसर आदि प्रमुख हैं। इनमें पैर के अँगूठे के बराबर ‘स्वेट पेनिकल’ जैसे छोटे और 25 पौण्ड भारी आदम कद सारस जैसे बड़े पक्षी भी होते हैं। यह लम्बी यात्रा सप्ताहों तथा महीनों की होती है। आहार की सुविधा, ऋतु-प्रभाव से बचाव और सैर-सपाटे का आनन्द यह इस लम्बी यात्रा का उद्देश्य होता है। आश्चर्य यह है कि यह अपनी यात्रा अवधि पूरी करके नियत समय पर ही अपने स्थानों को लौट जाते है और अपने पुराने पेड़ों और पुराने घोंसलों में ही जाकर फिर बस जाते है। भारत में भी वे मारे-मारे नहीं फिरते वरन् यहाँ भी वे अपने नियत स्थान बनाते हैं और जब तक जीवति रहते हैं प्रायः इन दोनों क्षेत्रों में अपने नियत स्थानों पर ही निवास करते हैं।

इन पक्षियों की लम्बी यात्राएँ, ऊँची उड़ानें आश्चर्य जनक हैं। बागटेल 2000 मील की लम्बी यात्रा करके बम्बई के निकट एक मैदान में उतरते हैं और फिर विभिन्न स्थानों के लिये बिखर जाते हैं। गोल्डन फ्लवर पक्षी अमेरिका से चलते हैं। पतझड़ में भारत में विश्राम करते हैं फिर थकान मिटाकर अटलांटिक और दक्षिण महासागर पार करते हुए दक्षिण अमेरिका जा पहुँचते हैं। आते समय वे समुद्र के ऊपर से उड़ते हैं और जाते समय जमीन के रास्ते लौटते हैं। अलास्का में उनके घोंसले होते हैं और वहीं अण्डे देते हैं। हर वर्ष प्रायः वह दो ढाई-हजार मील की यात्रा करते हैं। पृथ्वी की परिक्रमा तीन हजार मील की है। इस प्रकार वे लगभग पृथ्वी की एक परिक्रमा हर वर्ष पूरी करते हैं। आर्कटिक टिटहरी इन सब घुमक्कड़ पक्षियों से आगे हैं। उत्तरी ध्रुव के समीप उसका घोंसला होता है। पतझड़ में वह दक्षिणी ध्रुव जा पहुँचती है। वसन्त में फिर वापस उत्तरी ध्रुव लौट आती है। जर्मनी के बगुले 4 महीने में करीब 4000 मील का सफर पूरा करते हैं। रूसी बत्तखें भी 5000 मील की लम्बी यात्राएँ करती हैं यह पक्षी औसतन 200 मील की यात्रा हर रोज करते हैं। टर्नस्टान इन सबसे अधिक उड़ती है उसकी दैनिक उड़ान 500 मील के करीब तक की होती है साथ ही उसका 17 हजार फीट की ऊँचाई पर उड़ना और भी अधिक आश्चर्यजनक है। समुद्र पार करते समय उड़ने की ऊँचाई तीन हजार फीट से अधिक नहीं होती।

पक्षी विज्ञान के विज्ञानियों ने यह पाया है कि बाह्य दृष्टि से उनके सामने कोई ऐसी बड़ी कठिनाई नहीं होती जिसके कारण उन्हें इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए विवश होना पड़े। आहार की-ऋतु प्रभाव की घट-बढ़ होती रह सकती है, पर दूसरे पक्षी भी तो उन्हीं परिस्थितियों में किसी प्रकार निर्वाह करते हैं। फिर इन सैलानियों चिड़ियों को ही ऐसा विचित्र उमंग क्यों उठती है। इस प्रश्न का उत्तर उनकी वृक्क ग्रन्थियों में पाये जाने वाले विशेष हारमोन रसों से मिलता है। जिस प्रकार कुछ बढ़े हुए हारमोन अपने समय पर काम-वासना के लिए बेचैनी उत्पन्न करते हैं, लगभग वैसी ही बेचैनी इस प्रकार की लम्बी उड़ान भरने के लिए इन पक्षियों को विवश करती है। वे अपने भीतर एक अद्भुत उमंग अनुभव करते हैं ओर वह इतनी प्रबल होती है कि उसे पूरा किये बिना उनसे रहा ही नहीं जाता। यह उड़न हारमोन न केवल प्रेरणा देते हैं वरन् उसके लिए उनके शरीरों में आवश्यक साधन सामग्री भी जुटाते हैं। पंखों में अतिरिक्त शक्ति, खुराक का समुचित साधन न जुट सकने की क्षतिपूर्ति करने के लिए बढ़ी हुई चर्बी-साथ उड़ने की प्रवृत्ति, समय का ज्ञान, नियत स्थानों की पहचान सफर का सही मार्ग जैसी कितनी ही एक से एक अद्भुत बातें है जो इस लम्बी उड़ान और वापसी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन उड़न हारमोन्स को पक्षी के शरीर, मन और अंतर्मन में इस प्रकार के समस्त साधन जुटाने पड़ते हैं जिससे उनकी यात्रा प्रवृत्ति तथा प्रक्रिया को सफलतापूर्वक कार्यान्वित होते रहने का अवसर मिलता रहे।

प्रकृति नहीं चाहती कि कोई प्राणी अपनी प्रतिभा को आलसी और विलासी बनाकर नष्ट करें। प्रकृति इन यात्रा प्रेमी पक्षियों को यही प्रेरणा देती है कि वे विभिन्न स्थानों के सुन्दर दृश्य देखें, और वहाँ के ऋतु प्रभाव एवं आहार-विहार के हर्षोल्लास का अनुभव करें। अपनी क्षमता और योग्यता को परिपुष्ट करें।

मनुष्य में आराम तलबी की प्रवृत्ति इतनी घातक है कि वह कुछ महत्वपूर्ण काम कर ही नहीं सकता। अपनी प्रगति के द्वारा किसी को रोकना हो तो उसे काम से जो चुराने की आदत डालनी चाहिए और साहसिकता का त्याग कर विलासी बनने की बात सोचनी चाहिए। ऐसे लोगों को मुँह चिढ़ाते हुए-उनकी भर्त्सना करते हुए ही यह उड़न पक्षी विश्व निरीक्षण, विश्व भ्रमण करते रहते हैं-ऐसा लगता है।


श्री अरविन्द (Kahani)

राष्ट्र विद्यालय चलाने के लिए योग्य संचालक की नियुक्ति के बारे में बात चल रही थी। किन्तु आर्थिक परिस्थिति कुछ ठीक नहीं थी अतः 75 (पचहत्तर) रुपये से अधिक देने की क्षमता नहीं थी। पर जिस योग्यता वाले व्यक्ति की आवश्यकता थी वह 500 (पाँच सौ ) से कम का नहीं हो सकता था। तो भी हिम्मत कर के विज्ञापन दिया गया।

दूसरे दिन 750( साड़े सात) सौ रुपया पाने वाला व्यक्ति उपस्थित हुआ तो लोग आश्चर्य में डूब गये और कहने लगे। देश समाज की आवश्यकता को समझने वाले त्यागियों की अभी कमी नहीं। यह व्यक्ति बड़ौदा कॉलेज के अध्यक्ष श्री अरविन्द थे जिन्होंने उस सम्मान को ठुकरा कर केवल 75 ( पचहत्तर ) रुपये तक में काम किया।


महाकवि कदम्ब जिनकी रामायण आज भी लोकप्रिय है।

कवि और साहित्यिकों का कर्तव्य मनुष्यों को सत्प्रवृत्तियों की प्रेरणा देना है। प्राकृतिक दृष्टि से मनुष्य एक पशु ही है, उसके खाने, पीने, सोने मलत्याग, प्रजनन की आवश्यकताएँ अधिकाँश में पशुओं से मिलती-जुलती ही है। अंतर तभी पैदा होता है जब विद्या, शिक्षा, साहित्य कला आदि के संपर्क में आकर यह विवेक बुद्धि का अधिष्ठाता बन जाता है। इसी से उसके विचारों का परिष्कार होता है। उदात्त भावनाओं का जन्म होता है, और वह समाजोपयोगी कार्यों के करने में समर्थ बनता है। इसीलिए जो विद्वान अपने ज्ञान भण्डार और परिश्रमपूर्वक अर्जित किये अनुभव को जन साधारण के हितार्थ प्रस्तुत करते हैं वे वास्तव में समाज के बहुत बड़े हितकारी है।

सद्गुणों और सत्कार्यों की प्रशंसा पढ़ कर मनुष्य का चित्त उनकी तरफ आकर्षित होता है और वह भी उनका अनुकरण करके वैसा ही यश और प्रशंसा प्राप्त करने की अभिलाषा करने लगता है। इस प्रकार सत्कर्मों की श्रृंखला आगे बढ़ती जाती है और समाज अधिक सुसंस्कृत बनता जाता है। इस प्रकार सत्साहित्य निर्माण और समाजोत्थान का अटूट संबंध है। इसके विपरीत जो लोग साहित्य के नाम पर अश्लीलता भ्रष्टाचार, अन्याय आदि की दूषित प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देते हैं वे समाज को नीचे गिराने वाले उसके शत्रु कहलाने के पात्र होते है। अतएव यदि कोई व्यक्ति लेखनी का आश्रय लेता है, साहित्यकार के पवित्र कार्य को अपनाने की इच्छा करता है। तो उसका धर्म कर्तव्य है कि वह सत्यं शिवम् सुंदरम् का ही उपासक बने, जन समुदाय को मंगलमय मार्ग की ही प्रेरणा दें। तमिल भाषा के महाकवि कदम्ब इसी तथ्य के उदाहरण थे। उनका जन्म दक्षिण भारत के चोल राज्य के जिरुवलुँदुर नामक गाँव में ब्राह्मण वंश में हुआ था। बहुत छोटी आयु में ही उनके माता पिता का देहांत हो गया और वे अनाथ होकर इधर-उधर मारे-मारे फिरने लगे। उनका एक रिश्तेदार उनको नलूर गाँव में ले जाकर सडैप्प बल्लल नामक धनी किसान के घर के पास छोड़ आया। वल्लल ने कुछ समय बाद इस अनाथ बालक को अपने दरवाजे पर खड़ा देखा तो बड़ी दया आई और उसे अपने घर में रख लिया। बल्लल के तीन पुत्र थे। यह भी उन्हीं के साथ रहने और पढ़ने लिखने लगा। ये जन्म से ही प्रतिभाशाली थे और शीघ्र ही अनेक ग्रंथों का अध्ययन कर के विद्वान बन गये। उनकी रुचि काव्य रचना की ओर हुई और थोड़े ही प्रयास से वे एक अच्छे कवि बन गये। सडैयप्प उस समय के चोल राजा के दरबार में जाया करते थे। उन्होंने राजा से कदम्ब की कविताओं की चर्चा की और गुणग्राही राजा ने उनको बुला लिया। वह उनकी काव्य शक्ति को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और राज कवि बना दिया। कुछ समय बाद राजा ने कदम्ब से तमिल भाषा में बाल्मिकी रामायण की तरह रामचरित लिखने का आग्रह किया। कदम्ब पक्के वैष्णव थे। उन्होंने राजा की सम्मति को सहर्ष स्वीकार किया। रामायण की रचना होने लगी और कुछ वर्ष में बारह हजार पदों का सुंदर ग्रंथ लिखकर तैयार हो गया। यह ऐसा लोकप्रिय हुआ कि समस्त मद्रास प्राँत में इसका प्रचार हो गया। जिस प्रकार उत्तर भारत में तुलसीदास जी की रामायण घर-घर पढ़ी जाती है उसी प्रकार दक्षिण भारत में कदम्ब रामायण का सर्वत्र सम्मान के साथ पाठ किया जाता है। कथा कही जाती है। यद्यपि उन्होंने और भी कई उत्तम ग्रंथ लिखे है, पर उसका नाम इसी रामायण के लिए प्रसिद्ध है। अपने जीवन काल में ही उनकी महान कृति पर मुग्ध होकर उस देश के विद्वानों और महाराजाओं ने उनको कवि सम्राट की पदवी दे दी थी।

कदम्ब की रामायण बाल्मिकी रामायण का केवल भाषान्तर ही नहीं है, वरन् उसमें उनकी बहुत कुछ मौलिकता भी है। उन्होंने राम वनवास में उनके सर्व प्रथम सहायक निषादराज गृह का वर्णन बहुत उच्च और उदात्त रूप में किया है। यद्यपि उनकी गणना नीची जाति के शूद्रों में की जाती थी, पर कदम्ब ने उनको एक स्वाभिमानी और बहादुर सरदार के रूप में चित्रित किया है। लक्ष्मण का स्वभाव यद्यपि सभी रामचरित के रचयिताओं ने उग्र बतलाया है, पर निषादराज से उन्होंने बड़े प्रेमपूर्वक भेंट की और रामचंद्रजी से जाकर निवेदन किया- हे विजय सम्पन्न। माता से भी अधिक स्नेही स्वभाव वाला गुह नाम का व्यक्ति आप से मिलने आया है।

गुह्य वास्तव में रामचंद्रजी से उसी प्रकार प्यार करता था जैसे माँ बेटे को करती है। वह राम के वनवास के कष्टों को सोचकर बड़ा दुखी होता था। वह ख्याल करता था कि जो राम अभी तक महलों में इतने आराम से रहते थे वे अकेले जंगल में किस प्रकार निर्वाह करेंगे? यदि रात के समय उनको प्यास लगेगी तो पानी लाकर कौन देगा? इसी प्रकार की चिंता करते-करते वह बड़ी व्यथा का अनुभव करता था। राम के चित्रकूट

चले जाने के कुछ समय पश्चात् जब भरत भी उसी रास्ते से चित्रकूट जाने को आये और निषादराज को यह संदेश हुआ कि कदाचित वे राम का अनिष्ट करने के उद्देश्य से वहाँ जा रहे हैं तो वह लड़ने-मरने को तैयार हो गया।

गुह्य के इस प्रेम का असर राम की माता कौशल्या पर बहुत अधिक पड़ा और वह उसे अत्यंत स्नेह करने लगीं। जब राम वनवास से लौट कर अयोध्या आये तो उसने कहा-राम-लक्ष्मण का वन गमन एक प्रकार से अच्छा भी हुआ, क्योंकि इससे उनको गुह जैसा सज्जन मित्र मिल गया। अब तुम सब भाई गुह के साथ इस राज्य का पालन करो।

इस प्रकार कदम्ब के निषाद जैसी नीच कहलाने वाली जाति के व्यक्ति को ऊँचा उठाकर उसे राम का प्रिय मित्र बनाकर ऊँची-नीची जाति के मिथ्या अहंकार की जड़ पर कुठाराघात किया है। उनके इस काव्यमय प्रवाह का पाठक के अंतर्मन पर बड़ा गहरा प्रवाह पड़ता है और वह जाति के बजाय चरित्र की उच्चता के सिद्धांत का कायल हो जाता है। राम राज्य का वर्णन करते हुए भी कदम्ब ने अयोध्या में समता के दृश्य का चित्र बड़े निराले ढंग से खींचा है। वह कहते हैं-अयोध्या में कोई नहीं था। वे अमीर-गरीब के भेद से अंजान थे। फिर कहते है-अयोध्या में कोई पुरुष बलवान नहीं था, क्योंकि उन लोगों का सामना कर सके ऐसा कोई वीर नहीं था। अर्थात् अयोध्या वाले सब समान बलवान थे, वे कमजोरी का नाम ही न जानते थे। इस प्रकार कदम्ब ने अपनी रचना द्वारा हर तरह से सद्भावों को अपनाने तथा उनकी वृद्धि की प्रेरणा दी है जो एक सच्चे साहित्यकार का धर्म है। आज आठ-नौ सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी कदम्ब-रामायण वैसी लोकप्रियता बनी हुई है और उसका प्रचार बढ़ता जाता है, यही उसके महान गुणों और कदम्ब की सदाशयता का प्रत्यक्ष प्रमाण है


धर्म–ध्वजाधारियों के भवन (Kahani)

ईसा मसीह केपर नाम के नगर में पहुँचे। वे दुष्ट दुराचारियों के मुहल्ले में ठहरे और वहीं रहना भी शुरू कर दिया। नगर के प्रतिष्ठित लोग ईसा के दर्शन करने पहुँचे, तो उन्होंने आश्चर्य से पूछा-इतने बड़े नगर में आपको सज्जनों के साथ रहने की जगह न मिली या आपने उनके बीच रहना पसंद नहीं किया? हँसते हुए ईसा से कहा-वैद्य मरीजों को देखने जाता है या चंगे लोगों को? ईश्वर का पुत्र पीड़ितों और पतितों की सेवा के लिए आया है। उसका स्थान उन्हीं के बीच तो होगा।

एक महिला समदर्शी मंदिर के द्वार पर खड़ी रो रही थी। उसे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा था। तभी चुपचाप एक व्यक्ति आकर उसके पास खड़ा हो गया। वह सीधा-साधा शाँत और मितभाषी था। वह भी बाहर उस स्त्री के साथ खड़ा रहा। भीतर मंत्र पाठ जोर−शोर से जारी था और वह महिला रोये जा रही थी।

रोती क्यों हो देवि? उस व्यक्ति ने बड़ी करुणा से पूछा। उस व्यक्ति के शब्दों से महिला का मर्माहत मन कुछ हलका हुआ। सिसकियों के बीच महिला ने उत्तर दिया मुझे मंदिर में नहीं जाने देते। शाँत व्यक्ति ने उसे सांत्वना देते हुए कहा-यह तो कोई ऐसी बात नहीं कि जिस पर रोया जाय। मुझे भी तो अंदर नहीं जाने दिया जाता। अकेली तुम ही बहिष्कृत नहीं हे देवि।

“पर तुम कौन हो?” महिला ने प्रश्न किया?

वही समदर्शी जिसके नाम का मंदिर बनाकर मूर्ति के सामने पाठ परायण किया जा रहा है।

महिला सांत्वना और संतुष्टि लेकर लौटी। फिर तो ऐसे निष्प्राण निर्जन भवन में जाना व्यर्थ है। आज के दिग्गज धर्म–ध्वजाधारियों के भवन ऐसे ही है।


विशेष लेखमाला-5 -परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

आप में से अधिकाँश व्यक्ति यह सोच रहे होंगे कि मैं यहाँ था परन्तु व्याख्यान क्यों नहीं दिया। विशेष कारण वश व्याख्यान न दे सका। बेटे। मैं अपने जीवन भर प्रयोग करता रहा हूँ। कौन-कौन से प्रयोग किया हूँ।

पहले ब्राह्मण बनने का प्रयोग किया कि ब्राह्मणत्व के क्या-क्या चमत्कार हो सकते हैं। मैंने उसे अपने जीवन में इसे धारण करके देखा है और पाया है कि इसमें सफलताएँ भी हैं तथा चमत्कार भी है। ब्राह्मण जीवन किसे कहते हैं? किफायतसार जीवन को कहते हैं। ब्राह्मण उसे कहते हैं जो अपना खर्च कम से कम में चला सकता हो तथा अधिक से अधिक अपना धन, अकल, मेहनत, समाज में लगा सकता है जिससे उसके जीवन का लक्ष्य समाज का लक्ष्य पूरा होता हो। जिस आदमी ने अपनी जरूरतें बढ़ा रखी हैं, उस आदमी को कुछ बचता ही नहीं है।

हमें कहना होगा कि अध्यात्मवादी बनने के लिये किफायतशाली बनना होगा, ब्राह्मण बनना होगा। हमने इसका प्रयोग किया है तथा लाभ पाया है। हमने अपना खाने, पीने तथा रहने का ढंग ब्राह्मण का रखा है। अपने जमीन के बाबत जो कुछ हमें मिला था, उसे गायत्री तपोभूमि के लिये दान कर दिया। मैंने अपनी पत्नी से पेशवा ब्राह्मणों की उपमा देते हुये कहा कि आपको भी यह जीवन जीना चाहिये। पेशवा के राम टाँक ने अपने गुरु के पत्नी के आदेश पर सब कुछ दे दिया था। इन्होंने भी अपने सारे गहने गायत्री तपोभूमि के लिये लगा दिया। पैसों के दृष्टि से हम खाली हाथ हो गये, परन्तु शक्ति बहुत मिल गई।

मित्रो! धन की और बल की शक्ति नहीं होती है। वह ब्राह्मणत्व की शक्ति होती है। यह मैं आपको यकीन दिला सकता हूँ। मैं ब्राह्मण था और अब भी ब्राह्मण हूँ। जो कुछ भी आप देख रहे हैं यह ब्राह्मणत्व का चमत्कार है। इस दुनिया में मित्रों, एक ही बिरादरी रह गई है जिसका नाम बनिया है। बाकी सारी बिरादरी मर गई हैं-एक ही जिन्दा है वह है बनिया। सारे के सारे क्षेत्र में बनिया ही बनिया छाया है। ब्राह्मण कही नहीं परन्तु हम ब्राह्मण हैं, इस पर हमें गर्व है तथा संतोष है। अगर कोई अपने को ब्राह्मण बना सकता हो, अपने खर्च और लागत को कम कर सकता हो तथा नीयत में ब्राह्मणत्व है तो हमें प्रसन्नता होगी, परन्तु आपके नीयत में तो चाँडाल बसा हुआ है। आदमी को गरीब भी होना पड़ेगा, यह हमने ब्राह्मण का प्रयोग करके देखा है।

दूसरा साधु का जिसका नाम तपस्वी है। हमने अपने सारे छिद्रों को बन्द कर दिया। यह दूसरा कदम है। काँटे पर चलने वाले का नाम तपस्वी नहीं हैं ठंडे पानी से नहाने वाले का नाम तपस्वी नहीं हैं उस आदमी का नाम साधु और तपस्वी है जिसने अपने आप को तपाया, उसका नाम तपस्वी है, उसका नाम साधु हैं हमने अपने आप को तपाया है। अकल की दृष्टि से आदमी से ज्यादा बेईमान, बहरूपिया कोई नहीं है। हमने अपनी अकल को ठीक कर लिया है। आप भी मारे डंडों से अपनी अकल को ठीक करें हमने अपने हर चीज को तपाया, भीतर वाले हिस्से को भी तपाया। हमने अपने मन को, बुद्धि को तपाया है, पर आपकी बुद्धि तो ऐसी चाँडाल है, ऐसी पिशाचिनी है कि क्या कहें। किसी के जिन्दगी की समस्या को हल करने का सवाल था तो आपकी अकल-आपकी बुद्धि ने ऐसी मक्कारी की, कि क्या कहना। पैसे से लेकर समय तक हमने केवल समाज के लिये खर्च किया। यह कसा हुआ जीवन हमारा तपस्वी का जीवन है। मन्त्रों में शक्ति है, गलत बात नहीं है। देवताओं में शक्ति है, यह भी गलत नहीं है किन्तु अगर कोई आदमी तपस्वी है तो वह हर काम को कर सकता है। अपने अनुष्ठान काल में हमने किसी से बात नहीं की, कोई भी अन्य चीज नहीं खाया। जो की रोटी एवं छाछ बस यही दो चीजें हम खाते रहे।

जैसे हमने अनुष्ठान खत्म किया कि एक व्यक्ति आये जो नकली रेशम बनाते थे, उन्होंने कहा कि हम आपको गुरु बनायेंगे। उन्होंने सवा रुपया हमारे हाथ पर रखा। इस पर हमने सोचा कि तब तो हम ब्राह्मण नहीं हो सकते हैं, हम मजदूर है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण को तो लेना चाहिए। यह आज से लगभग 35-40 साल पहले सन् 1945-1946 की बात है उस सज्जन को लेकर हम बाज़ार गये। उस जमाने में ठण्डी में बिछाने के लिये पुराने कपड़ों के तथा रुई की हाथ से बनी दरिया दो रुपये में मिलती थीं। उससे वही चीजें खरीद कर जरूरतमंदों में बाँट दिया, पर अपने लिये हमने उसे स्वीकार नहीं किया। हमारी अकल एवं जो भी चीज हमारे पास थी उसे हम हमेशा बाँटते चले गये। उस आदमी ने कुछ दिनों के बाद हमारे पास दो सौ रुपये भेजे। हमने उसे गायत्री तपोभूमि के मन्दिर बनाने में लगा दिया। यह वह पहला आदमी था जिसने हमें पैसा भेजा था। यह घटनाएँ सुना रहा हूँ मैं आपको अपने तपस्वी जीवन की। इसी तरह हमारे सारे कार्य होते चले गये। कोई काम हमारा रुका नहीं।

एक प्रयोग वाणी के संयम का हम सुनाते हैं आपको हम चाहते थे कि हम मौन धारण कर लें। तथा बैखरी वाणी का प्रयोग कम करें। हमने जितना व्याख्यान दिया है, दुनिया में शायद ही कोई व्यक्ति व्याख्यान दिये होंगे। हमारे व्याख्यानों से लोगों के कायाकल्प हो गये जैसे रामकृष्ण परमहंस के व्याख्यान से हुआ था जो लोग रीछ का तमाशा, रीछ का व्याख्यान सुनने आये उनको कोई फायदा नहीं हुआ। जिन लोगों को हम व्याख्यान देते हैं, उसे सूँघ कर जब देखते हैं चख कर के देखते है आदमी वैसी है? घटिया है या वजनदार? तो वे हमें छोटे छोटे आदमी घटिया आदमी दिखाई पड़ते हैं। हमें वजनदार आदमी दिखाई नहीं पड़ता है। वजनदार आदमी माने सिद्धान्तों के आदमी” सिद्धान्तों को सुनने वाले, मानने वाले, उस पर चलने वाले, सिद्धान्तों को जीवन में उतारने वाले कोई नहीं दिखाई पड़ता है। लोगों पर गुस्सा न करके अपने पर गुस्सा न करूँ तो क्या करूँ? आपको मालूम है जब आदमी मरने को होता है तो बहुत से आदमी मिलने आते हैं बहुत-सी शक्ति खर्च होती है। कोई कहता है ताऊ जी अच्छे हैं, कोई कहता है कि हमें आशीर्वाद दे दीजिये। इससे बातें करने में बहुत शक्ति खर्च होती है। इसमें भीतरी शक्ति बेहद खर्च होती है। इसलिये हमने विचार किया है हम मिलना बन्द कर देंगे। हम अपनी वैखरी वाणी को दूसरे काम में खर्च करेंगे। वैखरी वाणी कम हो जायगी, तब पश्यति वाणी, मध्यमा वाणी का उपयोग करेंगे। ताकि हम ज्यादा काम कर सकें। बिना बातचीत किये ही हम ज्यादा काम कर सकते हैं। तथा वातावरण को गर्म कर सकते हैं। बेटे! अरविन्द घोष ने महर्षि रमण ने इस प्रकार का प्रयोग किया था और सारा हिन्दुस्तान गर्म हो गया था।

बैखरी वाणी के माध्यम से अनावश्यक शक्तियाँ खर्च होती चलीं जाती हैं। इसलिये मैंने विचार किया कि अब इसका खर्च कम करेंगे। भगवान की शक्ति बहुत है अबकी बार मैंने प्रयोग किया। अब बोलने की बात कम करता जाऊँगा। इस काम में समय को कम खर्च करता जाऊँगा और लोगों से बातें कम करता जाऊँगा, कारण अधिकाँश लोग अपनी राम कहानी लेकर आते हैं अनावश्यक भीड़ आ जाती है और कहती है कि हमारा मन नहीं लगता। बेकार की बातें लोग करते है, यह नहीं कि मतलब की बातें करें। बेकार की बातें करने में अब हम समय खर्च नहीं करेंगे। वाणी से बात नहीं होगी। तो क्या आप निष्ठुर हो जायेंगे। नहीं बेटे हमने ब्राह्मण के बाद संत के रूप में कदम बढ़ाया है। संत उसे कहते है जिसका मन करुणा से लबालब भरा हुआ होता है। जो दाढ़ी बढ़ा लेता है, रंगा हुआ कपड़ा पहन लेता है, ध्यान कर लेता है, उसे संत नहीं कहते हैं। करुणा से भरा हुआ व्यक्ति ही संत कहलाता है। जब तक हम हैं तब तक हम समाज के लिये काम करते रहेंगे। हमारी दुकान बराबर चालू रहेगी।

एक हमारा प्याऊ जो कभी सूखेगा नहीं। जो पसीने से लथपथ हो गये है, थक गये हैं, हमारे प्याऊ पानी हमारे तपस्या में से उनको देते रहेंगे, उन्हें हरा-भरा बनाये रखेंगे। आप हमारे प्याऊ से सब लोग पानी पी सकते हैं। ब्राह्मण, संत का जीवन चलता रहेगा। हम प्याऊ बंद नहीं कर सकते हैं। हमने एक चिकित्सालय डिस्पेन्सरी खोला है। जो भी दुःखी हमारे पास आये, हमने उसे छाती से लगाया। उसकी बीमारी का, दुःखी का बराबर ख्याल रक्खा। संत का काम भाव संवेदना का है। हमें अपने बच्चे को खिलाना है, बच्चों की देख भाल करनी है, बच्चों को गुब्बारा बाँटना है, बच्चों के चेहरे पर मुसकराहट देखनी है। ये चीजें देखकर हमको खुशी होती है हम बच्चों के स्कूल चलाते हैं। इसका मतलब क्या है। हमारा अस्पताल चलता है, डिस्पेन्सरी चलती है। प्याऊ चलाने से क्या मतलब है। यह आध्यात्मिक बात है। यह संत की बातें हैं। तो क्या आप संत की दुकान बन्द कर देंगे? नहीं, बंद नहीं करेंगे, जब तक हम जिन्दा हैं। आगे भी चलता रहेगा।

आप लोगों को हमने काफी बार कहा है हजार बार कहा है कि आपकी जो समस्यायें हैं उसे आप लिखकर देवें। आप आधा घण्टे भी भगवान का नाम नहीं ले सकते हैं आप कहते है कि हम आपके रास्ते पर चल सकते हैं। बेकार की बातें मत करिये। तराजू हमारे पास है। हम जानते हैं, हमारा भगवान जानता है कि आप क्या हैं। इसलिये हमने इस बार यह कहना शुरू कर दिया कि आप हमारा समय नष्ट करने के बजाय लिखकर दे जाइये। आप यहाँ न ध्यान करने आते हैं, न पूजा करने आते है न मतलब की बात करने आते है केवल घूमने आते हैं, किराये खर्च करते है। आप हमें बेअकल समझते हैं। हमें आपकी नस-नस जानते हैं। इसलिये हमने वैखरी वाणी से बोलना बन्द कर दिया। हमारे गुरु हमसे वैखरी वाणी से नहीं बोलते पश्यति वाणी से बोलते है परावाणी से बोलते है। आपकी बातों को हमने सुन लिया है और कहा है कि बेकार की राम कहानी कहकर मेरा समय क्यों खराब करते हैं। मुझे राम कहानी से क्या मतलब है आप मतलब की बात कहिये।

साथियों, हमारे मौन धारण करने का एक और कारण है। आप यह मत सोचिये कि मैं अपना प्याऊ बन्द करने जा रहा हूँ। हमें बच्चों को खिलाने का शौक है। हमें बच्चों को प्यार करना, उन्हें गुब्बारा देना बहुत प्यारा लगता है। स्वयं घोड़ा बन जाना तथा उसकी पीठ पर बैठ लेना तथा घुमाना बहुत प्यारा लगता है।

हम जो भी सहायता आपकी कर सकते हैं, वह अवश्य करेंगे, परन्तु आपको भी स्वयं में संवेदना पैदा करनी होगी। हमने लोगों से वायदे कर रखे हैं, खास का बिहार और राजस्थान वालों से जहाँ हमारा जाना हुआ नहीं गायत्री तपोभूमि से आने के बाद हम कहीं नहीं गये। गुजरात में दो बार चक्कर लगाये, मध्यप्रदेश में दो चक्कर लगाकर आये हैं। यू.पी. में भी एक चक्कर लगा कर आये हैं, बिहार एकदम खाली पड़ा है, और हम राजस्थान में भी कही नहीं गये है। अब इन प्रांतों में जाना ही होगा। दो महीने हम जायेंगे ही, जाना ही होगा। हम जब यहाँ रहेंगे नहीं तो आपसे बातें कैसे करेंगे। इसलिये हमने कहा है कि आप उपासना करिये, जप करिये ताकि आपको उस समय परा एवं पश्यन्ती वाणी से दिशा दे सकूँ। अन्यथा मैं अपने मौन की शक्ति प्रेषित करूँगा तो तो आपको नुकसान होगा।

मेरे गुरु के व्याख्यान देने का कार्य बन्द हो गया तो क्या उनकी शक्ति कम हो गई? हम नहीं बोल रहे हैं, हमारा गुरु बोल रहा है। आप भी उनकी शक्ति से बोलेंगे। प्रज्ञापुराण जब आप पढ़ेंगे, और लोग सुनाएँगे तब वह आपकी वाणी में नहीं बल्कि मेरे गुरु के वाणी में होगा जिसमें अधिक ताकत होगी। आपकी वाणी में कोई ताकत नहीं होगी, आप ऐसे ही बकवास करते रहेंगे। आपका असर दो कौड़ी का होगा हमारे गुरु बोलेंगे तो असर होगा। प्रभाव पड़ेगा। हम मौन हो जायेंगे तो हमारी शक्ति बढ़ जायेगी। हमारी परा एवं पश्यन्ती वाणी व ताकत बढ़ जायेगी। हमारी परा एवं पश्यन्ती वाणी व ताकत बढ़ जायेगी। आप मेरी उस वाणी सुनें तो आपके आँखों में पानी आयेगा, भाव संवेदन जागेगी। इससे हम आपकी सहायता ज्यादा कर सकेंगे।

आप क्या सोचते हैं कि आप लोगों के ऊपर हमारा कोई असर नहीं पड़ता है। यह हमारा मौन ब्राह्मणत्व है। यह तपस्वी की वाणी हैं हमने सेवा करने में संत की इस प्रवृत्ति को जिन्दा रखा है, कि हम समाज की सेवा करेंगे आज व्यक्ति की सेवा ज्यादा है, समाज का सेवा गौण हो गयी है।

हमारे मरने के बाद आप देखेंगे कि गुरुजन के मरने के बाद उनका समय, धन, श्रम किस काम में खर्च हुआ है। हमारी शक्ति एवं सामर्थ्य बच्चों को खिलाने में, अस्पताल खोलकर मरीजों व सेवा में खर्च हुआ है। हमने अभी तक समस्त को चालीस प्रतिशत दिया है और लोगों व दुखियारों को पाँच प्रतिशत दिया है। अब हमारे मन है कि इसका हिस्सा बढ़ाया जा सके। जब हम मौन धारण कर लेंगे तो हमारा ब्राह्मण और जाग जायेगा, उस समय हम व्यक्तियों की भी ज्यादा सेवा कर सकेंगे। इस सेवा कर सकेंगे। अभी तक हमारी सहानुभूति का अंश ज्यादा है, सेवा का हिस्सा कम रहा है। हमने सहानुभूति दिया है तथा पाया है। अगर हमने किसी की एक किलोग्राम सेवा की है तो उसमें पाँच सो पर सहानुभूति भी है। उस समय हम साधन सम्पन्न एवं समर्थ थे पर अगले दिनों जब जीवात्मा व हम और ऊपर उठा लेंगे तब हम अधिक कर सकेंगी। आपके लिये हमने कुछ किया या नहीं? इसका सबूत देखना हो तो दृष्टि पसार कर देखिये कि कुछ हुआ है तो ही या पचास लाख आदमी हमसे जुड़े हैं, अन्यथा इतने आदमी कहाँ से आते? यह हम काम कहते है। कि कुछ नहीं हुआ। 50 लाख आदमी हमारे एक इशारे पर खड़े हो सकते हैं। इतने शक्तिपीठ कहाँ से बन गये? 50 लाख मुट्ठियां 50 लाख लोगों का एक घण्टे का समयदान कुछ मायने रखता है।

हम अपने ब्राह्मण को फिर जिन्दा करेंगे। संत दानी होता है। आदमी को दानी बनने के लिये संत बनना होगा। हम ब्राह्मणत्व और सत, को पुनः जिन्दा करेंगे। ब्राह्मण जमा करता है, संत उसे खर्च कर देता है। हमने निश्चय किया है, विचार किया है कि जिन्दगी के उन आखिरी क्षणों में अपने ब्राह्मण एवं संत को साधकर सबके लिए एक मिसाल स्थापित कर दूँ।

क्या हम जिन्दगी भर, अपने बीबी-बच्चों को ही खिलाते रहेंगे? जिस पर मनुष्य का भविष्य टिका है, क्या उसके लिये कुछ नहीं कर सकेंगे? अपने लिये अधिक, समाज के लिये इतना कम। यह कैसे होगा? मेरे गुरु ने दुखियारों की सेवा, समाज की सेवा कम किया है, परन्तु उसने सारे विश्व को हिला दिया है। दूसरों के दुःखों को देखकर यह सोचते हैं कि इसके लिए हम क्या करें? उस समय मैं रो पड़ता हूँ तथा उसे सहायता किये बिना मेरा मन नहीं मानता है। यह क्रम चलेगा ही। परन्तु एक काम और है इनसान को ऊँचा उठाने का हम सोचते हैं कि और वह है यदि यह काम भी किया होता तो मजा आ जाता। आप जितने लोग बैठे हैं, अगर उनको हम फुटबाल की तरह ऊँचे उठाये होते तो मजा आ जाता। आप लोगों उछाल दे तो आप में से हर एक आदमी हनुमान, ऋषि, विवेकानंद दिखाई पड़ेगा। आप लोगों में से एक भी आदमी ऐसा नहीं जो विवेकानंद न हो। आप में से एक भी आदमी ऐसा नहीं जो रैदास की तुलना में गरीब हो। परन्तु आप इतने भारी हैं कि आपके सेल्स काम नहीं कर रहे हैं, आपके हाथ उठ नहीं पा रहे है। मानसिक दृष्टि से एक-एक बेड़ियाँ इतनी भारी हैं जैसे हजार मन की हों। ऐसे में आपको कैसे उठाऊ। आपकी बेड़ियों को मैं काटूँगा। क्योंकि हमारे बाद इन बच्चों को खिलाने वाला, नर्सिंग होम चलाने वाला कहाँ से लायेंगे। यह अस्पताल बन्द हो जाने पर आपके अनुभव के बिना इनका आपरेशन कौन करेगा? इनसान को उठाया नहीं जा सकता तो बात कैसे बनेगी?

इसी काम के लिए हम समय लगाना चाहते हैं। अकाल हमारे समय का है आप तो केवल पूजा-केवल पूजा के पीछे पड़े हैं। देवी-देवता के पीछे लगे है कि मनोकामना पूरी हो जाये। किसी दिन मेरे दिमाग में गुस्सा आ गया तो पूजा को ही बन्द कर दूँगा और कहूँगा कि इसी के पीछे पड़ा हैं। पूजा के चक्कर में पड़ा है। पूजा से आज्ञा चक्र जागेगा। सुन लेना एक दिन मैं पूजा को गालियाँ दूँगा, यदि यही रटता रहा कि सब पूजा से मिल जायेगा, और यही समझता रहा कि माला घुमाने को पूजा कहते हैं देवी-देवता को पकड़ने का नाम पूजा है। अज्ञानी लोग भ्रमित लोग मनुष्य को दबाने तथा चक्कर में डालने के नाम को पूजा कहते हैं। देवी-देवताओं को पकड़ने के लिये, मनोकामना पूर्ण करने के लिये जो आपने पूजा का स्वरूप बना रक्खा है। वह बहुत ही घटिया रूप है। पूजा ऐसी नहीं हो सकती, देवता ऐसे नहीं हो सकते, आध्यात्म ऐसा नहीं हो सकता, ध्यान ऐसा नहीं हो सकता, जैसा कि आप लोगों ने समझ रखा है, कि अगरबत्तियाँ चढ़ाएँगे, चावल चढ़ाएँगे, शक्कर की गोली चढ़ाएँगे और मनोकामना पूर्ण हो जायेगी। इतना घटिया आध्यात्म नहीं हो सकता है जैसा कि आप लोगों ने सोच रखा है। आपकी पूजा घटिया, आपके देवता घटिया सब घटिया है। इसको समझना चाहिए।

हर रोज चिट्ठियाँ आती हैं, हर शाखाओं में मारकाट-मारकाट। मुझे मैनेजर बनाइये, इस मैनेजर को निकालिये। हमने शाखा तथा शक्तिपीठें इसलिए नहीं बनाई थीं, देवता को इसलिए नहीं बैठाया था कि लोगों का अहंकार बढ़े। हमने ट्रस्टी इसलिए नहीं बनाया कि इसे बरबाद करो हमने स्वयं गलती की इन लोगों मालिक, ट्रस्टी बना कर इनके अहंकार स्वार्थपरता को आगे बढ़ा कर अब पंचायत समितियों में जिस प्रकार झगड़ा होते है। हमारे शक्तिपीठों में भी हर जगह चाँडाल पन है हमें क्या दिखता नहीं। क्या हमने शक्तिपीठें इसीलिये बनाई थीं, पूजा इसीलिये प्रारम्भ किया था, इसलिये संगठन बनाया था कि आप लोग अहंकारी बन जाइये और आपसे में ही एक दूसरे की टाँग खिंचाई कीजिये। आप ऐसी पूजा को बंद कीजिये। पूजा मत कीजिये, यह घटियापन बन्द कीजिये। आप नास्तिक हो जाइये, भले ही, पर आप इस तरह के संगठन बनाना बन्द कर दीजिये। आप शक्तिपीठों को बनाना बन्द कर दीजिये।

यहाँ हम एक बात अवश्य कहेंगे कि आप आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिये। पूजा को पीछे हटाइये, आध्यात्मिकता के मौलिक सिद्धान्तों को समझिये। आप यह मत सोचिये कि गुरुजी ने चौबीस-चौबीस लाख का जप किया था नहीं, हम और चौबीस लाख के जप करने वालों का नाम बता सकते हैं जो आज बिलकुल खाली। एवं छूँछ हैं। जप करने वाले कुछ नहीं कर सकते हैं, हम ब्राह्मण की भक्ति, संत की शक्ति जगाना चाहते हैं। आप राम का नाम लें न लें। अब तो मैं यहाँ तक कहता हूँ कि अब माला जप करें या न करें एक माला जप करे या 81 माला जप करें, परन्तु मुख्य बात यह है कि आप अपने ब्राह्मणत्व को जगाइए। प्याऊ को कौन चलाएगा। हनुमान चालीसा पाठ करने वालों ने कितनों का भला किया है? ब्राह्मणों ने भला किया है, संतों ने भला किया है। ब्राह्मण की वाणी में संतों की तपस्या में बल होता है। आपको इसी प्रकार कोई मिल जायेगा तो आप नास्तिक हो जायेंगे। आप पूजा का महत्व बढ़ाते हैं। खबरदार ब्राह्मणत्व का महत्व बढ़ाइये, संतों का महत्व बढ़ाइये। अध्यात्म इन लोगों के द्वारा ही टिका हुआ है।

आपके पास बैंक में धन जमा नहीं है तो चेक कैसे काट सकते हैं। आपकी बैंक में पूँजी होनी चाहिए पहले जमा तो कीजिये कुछ। केवल पूजा से ही काम चलने वाला नहीं हैं हमारी सबसे बड़ी पूजा समाज की सेवा है हमें लाखों आदमियों की ही नहीं, वरन् सारे विश्व की सेवा की है। हमने अपनी अकल, धन अनुष्ठान, वर्चस् सभी इसी में लगाया है। हमने खेती करने वालों, मकान बनाने वालों को देखा है कि सेवा के नाम नगण्य हैं।

आप अकेले चले। हमारे गुरु अकेले चले हैं। हम अकेले चले है। आप भी अकेले चलिये संगठन के फेर में मत पड़िये। आपको बोलना नहीं आता है। आप कहते हैं कि व्याख्यान सिखा दीजिए? आप कौन है? हमें बतलाइये। भाषण से क्या होगा। आप हमारी बात मानिए। आपको बोलना नहीं आता है तो हम क्या करें। आप पोस्टमैन का काम करिये। हम बोलना सिखा देंगे। लड़कियों को सिखा दिया था। महाराज जी हमें भी बोलना सिखा दीजिये। आप त्याग करके तो हमें बतलाइये। जवाहर लाल नेहरू एवं शास्त्री जी को गाँधी जी ने खादी बेचने को कहा था। वे घर-घर जाकर खादी बेचते थे। घर-घर धकेल गाड़ी लेकर जाते थे तथा लोगों से कहते थे कि आप खादी पहनिये। बेटे खादी बेचते थे। हाँ बेटे खादी बेचते थे।

आप अपने आप को निचोड़िये। ये हमारा बेटा, यह हमारी पत्नी। देखना यही तुझे ऐसा मारेंगे कि तुझे याद रहेगा। हमारा बेटा हमारी पत्नी यही रटता रहेगा कि कुछ समाज के लिए भगवान के लिये भी करेगा। नहीं गुरुजी हम तो हनुमान चालीसा पढ़ते हैं, गायत्री चालीसा पढ़ते है। अरे स्वार्थी कहीं का, तेरी तो अकल खराब हो गयी है। अहंकार बढ़ गया है।

हमने आप में से हर किसी को कहा है कि आप ब्राह्मण बनिये। नहीं गुरुजी, हमने तो चंदा इकट्ठा कर लिया, तो हम क्या करेंगे इसका? आप आदमी तो बने नहीं पहले आप आदमी बनना सीखें। आप घटियापन छोड़िये, सुबह से शाम तक काम कीजिये। पात्रता बढ़ाइये।

ऋषियों ने अपने रक्त को एक घड़े में भरा था, जिससे सीताजी उत्पन्न हुई थीं। आपको भी संस्कृति की सीता की खोज करनी है। समाज के लिए, संस्कृति के लिए आप भी अपना समय अपना पैसा निकालिये, अपना रक्त निकालिये। आप अपने आप को निचोड़िये तो सही। निचोड़ने के नाम पर अँगूठा दिखाते है। त्याग के नाम पर जीभ निकालते हैं बकवास के नाम पर, घूमने के नाम पर बिना मतलब के आडम्बर बना रखे हैं। अपने आप को निचोड़िये। आप अपने को यदि निचोड़ेंगे तो फिर देख लेना आप क्या बन जाते हैं। हमने आप को को निचोड़ा तो देखिये क्या बन गये।

अगर आपने अपने आप को निचोड़ दिया तो हमारा एक काम जरूर करना और वह यह कि हमारे विचार-हमारी आग को लोगों तक पहुँचाना हम लेखक नहीं है। हमारे लिखे शब्दों में से आग निकलती है। विचारों की आग भावनाओं की-क्राँति की आग निकलती है आज जनता भी प्यासी, हम भी प्यासे हमारे विचारधारा ही आग है। हम आग उगलते हैं। हम लेखक नहीं हैं। हमारे लेखनी में से निकलती है आग, मस्तिष्क में से निकलती है आग, हमारी आँखों में से निकलती है-आग हमारे विचारणा की आग, भावनाओं की आग, संवेदनाओं की आग को आप घर-घर पहुँचाइये। आप में से हर आदमी को लाल बहादुर शास्त्री, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल होना चाहिए। गाँधी जी के आदेश पर वे खादी धकेल पर रखकर बेचने गये थे।

ईसाई मिशन की वाली महिलाएँ भी घर-घर जाती हैं और यह कहती हैं कि हमारी 1 पैसा की किताब जरूर खरीदिये। अगर अच्छा न लगे तो कल मैं वापस लूँगी।

अरे यह किताब बेचना नहीं है, बाबा, मेरे विचार को घर-घर पहुँचाना है। आप लोगों के जिम्मे हमारा एक सूत्री कार्यक्रम है। आप जाइये अपने को निचोड़िये। आपके घर का खर्च यदि 1000/- रुपये है तो निचोड़िये इसको और उसमें से बचत को ज्ञान या के लिये खर्च कीजिये। हमारी आग को बिखेर दीजिये, वातावरण को गरम कर दीजिये, उससे अज्ञानता को जला दीजिये। आप लोग जाइये ओर अपने आपको निचोड़िये। ज्ञान घट का पैसा खर्च कीजिये। तो क्या हम अपनी बीबी को बेच दें? बच्चे को बेच दें? चुप कंजूस कहीं के? ऊपर से कहते हैं हम गरीब हैं। आप गरीब नहीं कंजूस हैं।

हर आदमी के ऊपर हमारा आक्रोश है। हमें आग लग रही है और आप निचोड़ते नहीं हैं इनसान का ईमान, व्यक्तित्व समाप्त हो रहा है। आज शक्तिपीठें, प्रज्ञापीठें जितनी बढ़ती जा रहा है। आपस के लड़ाई झगड़े बढ़ते जा रहे हैं, सब हविश के मालिक बनते जा रहे है। हम चाहते है कि अब पन्द्रह-बीस हजार में फूस के शक्तिपीठ प्रज्ञापीठ बन जाते तो कम से कम लोगों का राग-द्वेष अहंकार तो नहीं बढ़ता। आज आप लोगों से एक ही निवेदन है कि आप हमारी आग स्वयं बिखेरिये, नौकरी से नहीं सेवा से आप जाइये एवं हमारा साहित्य पढ़िये तथा लोगों पढ़ाइये, और हम क्या कहना चाहते थे। हम दो ही बात आपसे कहना चाहते हैं-पहला हमारी आग को घर-घर पहुँचाइये। दूसरा ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिये ताकि हमारा प्याऊ एवं अस्पताल चल सके। ताकि लोगों का अपने बच्चों को खिला सकें तथा उन्हें जिन्दा रख सकें तथा मरी हुई संस्कृति को जिंदा कर सकें। आप 11 माला जप करते हैं-आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। यह जादूगरी नहीं है। किसी माला में कोई जादू नहीं हैं मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि मनोकामना की मालायें, जादूगरी की माला में आग लगा दीजिये आग मनोकामना की माला, जादूगरी की माला, आ चक्र जागृत करने की माला को पानी में बहा दीजिये।

तो क्या करें महाराज जी? आप अपने ब्राह्मणत्व को जगा दीजिए, साधु को जगा दीजिये ताकि आप अपनी नाव स्वयं पार कर सकें। अन्यथा हम यहीं कहेंगे कि शायद हमारा तप कम है नहीं तो इसमें से कहीं न कहीं हमें ब्राह्मण, साधु मिल ही जाते।

आपके पास धन नहीं तो अपनी भावना, विचार, श्रद्धा तो समाज में बिखेर ही सकते हैं। वही बिखेरिये, संत बनकर अपना परिचय दीजिये। संत दानी होता है, संत उदार होता है।

हमारा मन था कि अपने बचे हुए शेष दिनों में ब्राह्मण तथा संत के काम अधिक से अधिक कर सकूँ। लोगों की मध्यमा वाणी से-परावाणी से अधिक से अधिक सेवा कर सकूँ यह हमारा मन है, मैं आपको एक ही बात कह सकता हूँ कि आप अपने को निचोड़िये निचोड़िये बचत कीजिए-आपके श्रम, समय, धन और विचारणा-भावना की समाज को जरूरत है संस्कृति को जरूरत है। इसे विलासिता में खर्च मत दीजिये। अगर किसी में ब्राह्मणत्व एवं संत जिन्दा है तो उसे निचोड़िये। उसे आप बिखेर दीजिये। हमने प्रार्थना की है कि यदि आप लोगों में कहीं भी किसी भी कोने में यदि ब्राह्मणत्व या संत जिन्दा हो तो वह जग जाये। उपासना-साधना के नाम पर आप जादूगरी बन्द कीजिये। देवता को गुमराह करने वाली, मनोकामना सिद्ध करने वाली पूजा बन्द कीजिये।

साधना किसे कहते हैं आपको मालूम नहीं? आप हनुमान जी की पूजा करते है, संतोषी माता की पूजा करते हैं यह मंत्र हैं, न यंत्र है न पूजा है। आप हनुमान जी, संतोषी माता को साधते हैं। अरे पहले अपने आपको तो साधिये न, पर यह जो जादूगरी आप करते है वह बदमाशी के सिवा कुछ नहीं है। अगर आप पूजा-उपासना करते हैं तो ठीक यह आपकी मर्जी है, पर यह न तो कोई मंत्र जप है, न भजन है यह मात्र धूर्तगीरी है। पूजा के नाम पर यदि आप ऐसी बदमाशी करते हैं तो आपकी मर्जी पर इससे कुछ होने वाला नहीं है। पहले आप समर्पण करना सीखिये, यह मोटी-मोटी बातें थी, जो हमने किसी तरह से आपसे कह दिया।

हमारे गुरुजी की यही मर्जी है कि हम आप में से हर आदमी में से ब्राह्मण तथा संत को जिन्दा करें और हम यही चाहते हैं कि अगर हमारे अन्दर बल हो तथा आपके अन्दर ब्राह्मणत्व तथा साधु हो तो वह जिन्दा हो जाय। इस विदाई के अवसर पर यही कहकर हम आप लोगों को विदा कर रहे हैं। मित्र, गुरुजी ने हमेशा दिया है आगे भी देते रहेंगे शर्त एक ही है कि आप अपनी ब्राह्मण तथा संत की प्रवृत्ति जिन्दा करें। आप जाइये एवं अपने-अपने कामों में जुट जाइये। ॐ शान्ति।

हर लोकसेवी सृजनशिल्पी के लिए प्रथम पूर्णाहुति की वेला में माननीय-पठनीय


सृजन शिल्पियों के लिए आचार-संहिता

इमारतों का सृजन सीधा-सादा सा होता है। पुल, सड़कों, बाँधों का निर्माण निर्धारित नक्शे के आधार पर चलता रहता है। पर युगों के नव सृजन ने अनेकानेक पेचीदगियाँ और कठिनाईयाँ आ उठतीं है। कार्य का स्वरूप ही ऐसा है, जिसमें प्रवाह के उलटने के प्रयास, जूझने की विद्या ही प्रमुख बन जाती है। विचारक्रांति, युग-परिवर्तन जनमानस का परिष्कार ऐसे संकल्प है, जिनकी पूर्ति में प्रायः उन सभी से टकराना पड़ता है, जो अब तक स्वजन, सम्बन्धी, हितैषी, निकटवर्ती एवं अपने प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत माने जाते थे। इसमें मार-काट न होने पर भी इसे भूतकाल में सम्पन्न हुए महाभारत के समतुल्य माना जा सकता है, भले ही उस टकराहट को दृश्य रूप में न देखा जा सकता हो।

अभिमन्यु चक्रव्यूह में अकेला ही घिरा पड़ा था, सब दिशाएँ शत्रुओं से अवरुद्ध थीं। ऐसी दशा में भी अर्जुन पुत्र ने समय की महती आवश्यकता और न्याय-नीति को विजयी बनाने की ललक में वह सब कुछ या, जो उसके बलबूते में था। इस संदर्भ में उसे प्राण गँवाने पड़े, पर विजय दुन्दुभी इतिहासकार अनन्त काल तक उसी के यशगान की बजाते रहेंगे। इसी स्तर का साहस उन्हें भी अर्जित करना पड़ेगा, जो अवांछनीयता, मूढ-मान्यता लोभ-लिप्सा संकीर्ण-स्वार्थपरता और निकृष्टता के व्यामोह को चीर कर नवसृजन का मार्ग बनाना चाहें।

तथ्यों का पर्यवेक्षण अपने आप से आरम्भ करें। जन्म-जन्मान्तरों के संचित पैशाचिक स्तर के कुसंस्कार, निकटवर्ती क्षेत्र में अधिकाँश लोगों द्वारा अपनाये गए अनाचारियों के प्रभाव में आकर बहुत कठोर हो जाते हैं, उन्हें अपनाई गई हठवादिता से विरत करना, आदर्शवादी परामर्शों के आधार पर भी टेढ़ी खीर हो जाता है। जब अधिकाँश लोग पैसा और वाह-वाही लूटने के अतिरिक्त और कोई तीसरी बात सोचते ही नहीं, तो हमें एकाकी दिशा-निर्धारण की बात सोचकर प्रस्तुत समुदाय के सामने क्यों उपहासास्पद बनना चाहिए? यह प्रश्न पूछती है, वह तथाकथित समझदारी, जो आम लोगों पर पूरी तरह हावी है।

आदर्शों की बात कहने-सुनने भर की बात समझी जाती है। कथा कहने, सुनने भर से स्वर्ग-मुक्ति मिल जाने वाली मान्यता ही सरल मालूम पड़ती है। कठोर कार्य के साथ सम्बन्ध जोड़ने से भी घबराते और काँपते देखे जाते है। फिर अपना मार्ग एकाकी निश्चय के आधार पर किस प्रकार अपनाते बने? ‘एकला चलो रे’ गीत गाने भर से तो उत्साहवर्धक प्रतीत होता है, पर उसे कर दिखाने में नानी याद आती है। अपने निज के कुसंस्कार ही लोभ, मोह और अहंकार के हथकड़ी-बेड़ी जैसे बन्धन बनकर कस जाते है। वे यथा-स्थिति पड़े रहने के लिए ही बाधित करते हैं।

इन बन्धनों को तोड़ न भी सकें, तो उन्हें कम से कम शिथिल तो करना ही पड़ता है। अन्यथा न संकल्प उभरता है और न ऐसा प्रयास करते बन पड़ता है, जिसके सहारे नव-सृजन के संदर्भ में कुछ कहने लायक पराक्रम करते बन पड़े? प्रथम कठिनाई यह कूपमण्डूकता बनाये रहने वाली स्थिति ही है। उछल कर सुविस्तृत विश्व-वसुधा के साथ जुड़ जाने की योजना तक गले नहीं उतरती, फिर उस स्तर का पराक्रम करते किस प्रकार बन पड़े? उदात्त जीवन जीने और ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचने वाले मार्ग पर कदम बढ़ाने की बात कैसे बने? जब समूचा समय और साधना अभ्यस्त विडम्बना में ही खप जाते हैं, तो वह कैसे करते बन पड़े, जिसके लिए महाकाल का आमंत्रण हुँकारने और युगधर्म को अपनाने के लिए अन्तरात्मा में दबाव डालता है। जो अपने भीतरी असमंजस से निपट लेता है, अपनी राह आप बनाने के लिए कटिबद्ध हो जाता है, उसी के लिए यह सम्भव है कि “क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं, त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप” वाले गीता-प्रवचन को जीवन में उतार सके।

यह प्रथम मोर्चे पर जूझने की बात हुई। इससे बिलकुल सटा हुआ ही दूसरा मोर्चा है, जिसे सम्बन्धियों-हितैषियों का परिकर कह सकते हैं धर्म-धारणा और सेवा-साधना के लिए सब कुछ करने पर उतारू व्यक्ति, इन दिनों अपने तथाकथित स्वजनों को ही सर्वाधिक विरोधी पाता है। आज के वातावरण में हर किसी को सम्पन्नता और विलासिता की सुविधाएँ ही सब कुछ प्रतीत होती है। वे अपनी मान्यता के अनुरूप एक ही परामर्श दे सकते हैं कि परमार्थ की कष्ट-साध्य प्रक्रिया से व्यवहारतः कोसों दूर रहना ही लाभदायक है।

उनकी बात, जो जिस हद तक स्वीकार कर लेता है, उसे उसी सीमा तक स्वार्थरत रहना पड़ता है। परमार्थ की दिशा में आगे बढ़ना उसके लिए उतना ही कठिन हो जाता है। कोई वास्तविक कारण न होते हुए तर्कों, तथ्यों और प्रमाणों का इतना बड़ा जखीरा सामने ला खड़ा किया जाता है कि पिछले दिनों की मित्रता को ध्यान में रखते हुए वह कथन-परामर्श ही अभेद्य दीवार बनकर रह जाती है। स्वार्थ में पिंजड़े से बाहर एक कदम भी रहना उस स्थिति में सहन नहीं होता।

इस दूसरे मोर्चे से निपट सकने का अंगुलि-निर्देश तुलसीदास के उस पत्र से ही मिलता है, जो उन्होंने मीरा को उनके पत्र में उत्तर में लिखा था। उसमें कहा गया था कि :-

जाके प्रिय न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि वैरिसम, यद्यपि परम स्नेही॥ पिता तज्यो प्रवाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज वनितन भये मुद मंगलकारी॥

इस निर्देशन में मीरा ने अपना और समस्त समाज का भला देखा और सभी असमंजसों को निरस्त करते हुए, वे आदर्शवादी को नये सिरे से प्रतिष्ठापित करने के लिए निकल पड़ी और बदली जैसी अमृत वर्षा करने में जीवन भर निरत रहीं।

तीसरा मोर्चा उस समुदाय के साथ बनता है, जिन्हें अचिन्त्य-चिंतन से, अनुचित गति-विधियों से पीछे हटने का परामर्श दिया जाता है। वे भी इतने भले कहाँ होते हैं कि भ्रांतियों के विपरीत जो श्रेयस्कर अनुरोध किया जा रहा है, उसे सहज स्वीकार कर लें। पूर्वाग्रहों से जकड़ी मान्यताएँ और आदतें, वह कुछ भी सुनना-स्वीकारना नहीं चाहती, जो अभ्यास में गहराई तक घुसकर बैठ गया है। परामर्श कितना ही तथ्यपूर्ण क्यों न हो, पर नशेबाज के गले वह शिक्षा कहाँ उतरती है कि इस आत्मघाती कुटेव से विरत होने में ही भलाई है। वह परामर्शदाता से तर्क से जीत सकने की संभावना देखते हुए कभी-कभी हाँ-हाँ भी कर देता है। पर वह आश्वासन बहकावा भर होता है। नशेबाजी छोड़ने का न उसका मन बनता है और न वैसा साहस उभरता है। ठीक ऐसी ही कठिनाई तब सामने आती है, जब पैर से सिर तक कीचड़ में धँसे हुए लोगों को अपनी स्थिति बदल लेने के लिए कहा जाता है। दुर्बुद्धि ऐसी पिशाचिनी है कि वह जिसे एक बार पकड़ लेती है, उसे आसानी से चंगुल में से छूटने नहीं देती।

इतना होते हुए युग सृजेताओं के सामने इसके अलावा कोई चारा भी नहीं कि वे अचिन्त्य चिंतन से लोगों को छुड़ायें और कुमार्ग पर चलने से लौटाने का प्रयास करें। यह कार्य प्रत्यक्षतः झंझट भरा है। तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने प्रतिवेदन का औचित्य तो अकाट्य सिद्ध किये किया जा सकता है। पर उस हठवादिता के लिए क्या किया जाए, जो आम आदमी पर विशेषतया अनगढ़ वर्ग पर पूरी तरह सवार रहती देखी जाती है। ऐसी दशा में उपदेष्टाओं का परामर्श भी अरण्य-रोदन बनकर रह जाता है। बहुतों को बहुत बातें समझाते रहने पर भी लोग आदर्शों की ओर मुड़ने को तैयार नहीं है। लाभ को हानि, और हानि को लाभ समझने की दृष्टि, जो उनकी परिपक्व हो गई होती है।

सृजन शिल्पी के करने के लिए काम तो अनेकों सामने ही हैं। पर सबसे बड़ा कार्य एक ही होता है, प्रवाह को प्रतिबंध प्रचलन को अमान्य कर सकने वाले लोकमानस का नव सृजन करना। प्रतिकूलताओं को अनुकूल स्तर की बनाकर दिखाना। युग शिल्पियों को प्रधानतया इस एक ही प्रयत्न में आजीवन निरत रहना पड़ता है। भले ही प्रत्यक्ष क्रिया−कलाप परिस्थिति के अनुरूप बदल जाते हों। जब करना यही है, उसका कोई विकल्प हो नहीं सकता, तो नये सिरे से नया निर्धारण करने और नये हथियार सजाने के लिए कुछ समय वस्तुस्थिति को समझने और उपयुक्त समाधान खोज निकालने की आवश्यकता पड़ेगी।

बड़े काम हलके साधना के सहारे सम्पन्न नहीं हो पाते। उनके लिए अधिक समर्थ साधन जुटाने होते है। बन्दूकों के दाँत खट्टे करने के लिए तोप के गोलों का प्रहार ही विकल्प रहता है। मजदूरों द्वारा न उठ सकने वाले भार को मजबूत क्रेनें उठाती हैं। जिन चट्टानों को हथौड़ों से नहीं तोड़ा जा सकता। उन्हें डायनामाइट के कारतूसों से उड़ाना पड़ता है या हीरे के टुकड़े वाले औजारों से छेदना पड़ता है। बड़ी समस्याओं को बड़प्पन की अनेक विशेषताओं से सम्पन्न मस्तिष्क ही सुलझा पाते है।

युग शिल्पी को अपने व्यवहार में दो अन्य बातों का समावेश करना चाहिए, जो देखने में साधारण मालूम पड़ती है, पर ऊर्जा प्रतिक्रिया असाधारण स्तर की होती है। उनमें से एक है सार्वजनिक पैसे को अत्यंत पवित्र धरोहर मानकर उसकी एक-एक पाई का इतनी सावधानी से प्रयोग करना कि जाँच करने वाले को इसमें कहीं खोट दिखायी न पड़े। साथ ही अपनी अन्तरात्मा और सर्वसाधारण को यह विश्वास बना रहे कि दान के पैसे में कही किसी प्रकार की कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। जिसके भी हाथ में वह धन रहा, उसने संतों निस्पृहता का परिचय दिया है-लोकसेवी द्वारा प्रामाणिकता की दृष्टि से इस प्रसंग में सतर्कता बरती ही जानी चाहिए।

दूसरा प्रसंग है-नर और नारी के मध्यवर्ती संबंधों का। सार्वजनिक क्षेत्र में नर और नारी मिल−जुलकर ही सामूहिक कार्यक्रमों और आयोजनों को सम्पन्न करते हैं। ऐसी दशा में इस आशंका की गुँजाइश रहती है कि कहीं अनैतिक चिंतन और आचरण आड़े न आने लगा हो। भावनाओं की पवित्रता तो ऐसे प्रसंगों में अक्षुण्ण रहनी ही चाहिए, पर साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तरुण और तरुणियों की घनिष्ठता, निकटता और असाधारण सहकारिता भी साधारण जनों की आँखों में खटकती हैं। उतने भर से आशंकाओं का ऐसा बवण्डर बन पड़ता है, जो बदनामी के स्तर तक पहुँचा देता है। ऐसी दशा में न केवल संबंधित व्यक्तियों को, वरन् उस लक्ष्य को भी भारी क्षति पहुँचती है, जिसके लिए एकत्रित हुआ गया था और मिल-जुलकर काम करने में कुछ अनुचित नहीं माना गया था।

अपनी दृष्टि और क्रिया कुछ भी क्यों न रही हो, पर लोग तो लोग हैं। संसार में प्रचलित अनेकानेक विसंगतियों को देखते हुए अशुभ आशंका कहीं भी की जा सकती है। इस लोक मान्यता को ध्यान में रखते हुए, संस्थागत हिसाब-किताब में तथा नर नारी की निकटता वाले अवसरों पर इतनी अधिक सावधानी बरतनी चाहिए कि कुकल्पना के लिए कहीं कोई गुँजाइश ही शेष न रहे।

यहाँ एक बात और हर समाज सेवी को नोट कर लेना चाहिए कि श्रेय पाने, हर प्रसंग में अपने को अग्रणी सिद्ध करने वाले लोग जन साधारण की दृष्टि में ओछे-बचकाने समझे जाते हैं और लोक सेवी का बाना पहनने पर भी बहुत घटिया समझे जाते है। उनको सम्मान यदि धोखे से कभी मिल भी जाय, तो वह कागज के फूल की तरह थोड़े ही समय में अपना आकर्षण खो बैठता है। नेता बनने के लिए लालायित लोग नाम छपाने, चेहरा मटकाने और माइक पर छाये रहने की कोशिश करते हैं। बड़प्पन जताने के लिए व्याकुल लोग, कुछ हाथ में रहा हो, तो उसे भी गँवा बैठते हैं। इनके अनेकों प्रतिस्पर्धी, विरोधी और ईर्ष्यालु उपज पड़ते हैं। ऐसी विग्रहों का परिणाम उस संगठन या मंच को भी बदनाम करता है, जिस पर चलकर वे ऊँचा बनना चाहते हैं। वे स्वयं बदनाम होते हैं और उस संगठन को ले डूबते हैं, जिसके लिए वे नेता कहलाना चाहते थे।

गाँधी जी की सादगी, सज्जनता और विनम्रता प्रसिद्ध थी। इसीलिए वे काँग्रेस के कोई नियुक्ति नेता पदाधिकारी न होते हुए भी उस समुदाय के लिए प्राण बने हुए थे। व्यक्तित्व उभारने का यही राजमार्ग है। नेतागिरी के लिए उछल-कूद करने वाले तो मात्र नट नर्तक स्तर के अभिनेता बन कर रह जाते हैं। प्रामाणिकता के अभाव में कोई भी देर तक श्रद्धास्पद नहीं रह सकता और न उसकी नेतागिरी देर तक चलती है। सृजन शिल्पी इस तथ्य से भली प्रकार अवगत रहे, तो ही ठीक है।


स्वयं भगवान हमारे गुरु


स्वयं भगवान हमारे गुरु (Kavita)

स्वयं भगवान हमारे गुरु, परम सौभाग्य हमारा है। स्वयं नारायण नर तन धरे, हमारे बीच पधारे है॥

गुरु तो आते जाते पर, नारायण कभी-कभी आते। तभी अवतार हुआ करते-पाप धरती पर बढ़ जाते॥

ब्रह्मा ने स्वयं अवतरित हो-धरा का भार उतारा है। स्वयं भगवान हमारे गुरु, परम सौभाग्य हमारा है।

आज भी पापाचारों ने, धरा पर भार बढ़ाया है। मनुजता फिर अकुलाई है, दनुज दल फिर इतराया है॥

देवसंस्कृति ने देवों को, विकल हो पुनः पुकारा है। स्वयं भगवान हमारे गुरु, परम सौभाग्य हमारा है॥

दें सके तो दें जीवनदान, अन्यथा समयदान तो करें। न बन पाये यदि भामाशाह, अपेक्षित अंशदान तो करें॥

समर्पित करें उन्हें प्रतिभा, उन्हीं ने जिसे सँवारा है। स्वयं भगवान हमारे गुरु, परम सौभाग्य हमारा है॥

आरुणी और विवेकानंद, समर्पण की विधि बतलाते। स्वयं गुरु अपने जीवन से, शिष्य की गरिमा समझाते॥

शिष्य ने किया समर्पण तो, गुरु ने उसे निखारा है। स्वयं भगवान हमारे गुरु, परम सौभाग्य हमारा है॥

हमारे गुरु प्रज्ञावतार, चलो प्रज्ञा को धारण करें। दुष्ट चिंतन को करें निरस्त, मनुज का कष्ट निवारण करें॥

करें सद्चिंतन सर संधान ज्ञान से ही तम हारा है। स्वयं भगवान हमारे गुरु, परम सौभाग्य हमारा है॥

गुरु की जन्मभूमि पर आज गुरु को कुछ तो अर्पित करें। बाँटने जन-जन में गुरु ज्ञान-स्वयं को हम संकल्पित करें॥

शिष्य हैं तो सोंचे कितना, गुरु का कर्ज उतारा है। स्वयं भगवान हमारे गुरु, परम सौभाग्य हमारा है॥

--मंगल विजय


सनातन हमारी संस्कृति


सनातन हमारी संस्कृति (Kavita)

अनगिनत बार घिरा संस्कृति का सूरज घोर घटाओं में। किंतु न मिट पाया उसका अस्तित्व कभी विपदाओं में।

दैवी संस्कृति महाद्वीप सी अविचल रही बहावों में, गहराई कम हुई न इसकी सागर के फैलावों में,

वेग आँधियों का इसके तरुवर ने अनगिनत बार सहा-शाखा-पात-कलेवर बदले, किंतु अनाहत मूल रहा,

परिवर्तन हो गया भले ही संस्कृति की सीमाओं में। किंतु न मिट पाया उसका अस्तित्व कभी विपदाओं में।

बदल गयी भाषा, बदला है वेश और व्यवहार यहाँ, किंतु प्राकृतिक अनुदानों के लिए नहीं सम्मान घटा,

देश प्रेम का भाव जगाया इसने सदा शिराओं में। किंतु न मिट पाया उसका अस्तित्व कभी विपदाओं में।

संस्कृति, जिसको आदिकाल से ऋषियों ने सींचा पाला, और लोकहित के साँचे में संतों ने जिसको ढाला,

सबल सेतु यहबना रहा प्रेरणा-त्याग-बलिदानों का, हुआ न इस पर असर विरोधी मौसम का, तूफानों का,

संस्कृति का यह सेतु अखंडित रहा सदा बाधाओं में। किंतु न मिट पाया उसका अस्तित्व कभी विपदाओं में।

आज विश्व है घने अँधेरे में, बढ़ रही है निराशा है, कृत्रिमता बन गयी मानवी, जीवन की परिभाषा है,

है अछोर जंगल अनास्था, संशय, तर्क विवादों का, चारों ओर घिरा है विषमय वातावरण विषादों का,

देव संस्कृति ही आशा है सबकी, घोर निशाओं में। किंतु न मिट पाया उसका अस्तित्व कभी विपदाओं में।

---शचीन्द्र भटनागर


अपनों से अपनी बात - युग संधि का प्रभात पर्व इन्हीं दिनों

इन दिनों प्रगति और चमक-दमक का माहौल है पर उसकी पत्नी उघड़ते ही सड़न भरा विषघट प्रकट होता है। विज्ञान शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र की प्रगति सभी के सामने अपना चकाचौंध प्रस्तुत करती है। आशा की जानी चाहिए कि इस उपलब्धि के आधार पर मनुष्य को अधिक सुखी, समुन्नत, सभ्य, सुसंस्कृत बनाने का अवसर मिलेगा। हुआ ठीक उल्टा। मनुष्य के दृष्टिकोण,, चरित्र और व्यवहार में निष्कृष्टता घुस पड़ने से संकीर्ण स्वार्थपरता और मत्स्य न्याय जैसी अतिक्रमण का प्रवाह चल पड़ा। मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्ट आदर्शवादिता की उपेक्षा अवमानना हुई और विलास, संचय पक्षपात तथा अहंकार का दौर मचल पड़ा। जिस लोभ, मोह और अहंकार को कभी शत्रु मानने, बचने, छोड़ने की शालीनता अपनायी जाती थी अब उसका अता-पता नहीं दीखता और हर व्यक्ति उन्हीं के लिए मरता दीखता है। परम्परा उलटी तो परिणति भी विघातक होनी चाहिए थी। हो भी रही है। शक्ति सम्पन्नता एक ओर विनाश-विभीषिका दूसरी ओर। देखकर हैरानी तो अवश्य होती है, पर यह समझने में भी देर नहीं लगती कि भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण अपनाने पर भौतिक समृद्धि से अपना ही गला कटता है। अपनी ही माचिस से आत्मदाह जैसा उपक्रम बनता है।

चौंधियाने वाली परत का पर्दा उघाड़ते ही प्रतीत होता है कि सब कुछ खोखला हो चला और घुला हुआ शहतीर किसी भी क्षण धराशायी होने की स्थिति में पहुँच गया। जन-जन का स्वास्थ्य खोखला होता जा है। दुर्बलता और रुग्णता से हर काया जर्जर हो रही है। लोग आधी अधूरी आयुष्य पूरी होते-होते मौत के मुँह में घुस पड़ते हैं। मानसिक संतुलन के क्षेत्र में हर किसी को चिंतित, भयभीत, आशंकित, आतंकित, खिन्न, विपन्न, असंतुष्ट एवं उद्विग्न देखा जाता है।

इस समय आर्थिक क्षेत्र का भ्रष्टाचार और नैतिक क्षेत्र का अनाचार समाज व्यवस्था की कमर तोड़े दे रहा है। सामाजिक कुरीतियों के कारण होने वाली बर्बादी को समझते सभी हैं पर उन्हें छोड़ता कोई नहीं। उनके लाभदायक पक्ष को जब छोड़ा नहीं जायेगा तो हानिकारक पक्ष से छुटकारा न मिलेगा। बेटी के विवाह में सुधारवादी और बेटे के विवाह में परम्परावादी बनने वाले उस कुचक्र से छूटते ही नहीं। दुरंगी चाल, दोगली नीति अपनाने वाले कोल्हू के बैल की तरह ही पिसेंगे, पिटेंगे। समाज के हर क्षेत्र में अवांछनीयता का माहौल संव्याप्त है।

राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय भीड़ में सर्वग्राही जनसंख्या वृद्धि, जन-जन के स्वभाव में सम्मिलित अपराधी प्रवृत्ति, वर्ग विद्वेष, संचय और विलास का कूटनीतिक कुचक्रों का कुछ ऐसा माहौल बन गया है कि विग्रह और आक्रमण के अतिरिक्त और किसी को कुछ सूझता ही नहीं। संकीर्णता की बढ़ोत्तरी, भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय, वर्ग आदि की आड़ में कुछ को लाभ कमाने के लिए उत्तेजित करती और दूसरों को बर्बाद कर देने पर उतारू दीखती है। एकता, समता, न्याय, औचित्य और दूरगामी परिणामों की मानो किसी कोई चिंता ही न रह गई हो। ऐसी स्थिति में समस्याओं का समाधान निकले तो कैसे? निकले तो कौन निकाले? पुलिस कानून जेल कचहरी की सीमा नगण्य है वह हजारों अपराधियों में एक दो को दण्डित कर पाती है। जो जेल जाते हैं वे सुधरने के स्थान पर अधिक ढीठ और प्रशिक्षित होकर लौटते हैं। गृहयुद्ध, क्षेत्रीय युद्ध और विश्व युद्ध इसी माहौल की देन है।

पिछले दो महायुद्ध हो चुके हैं। तीसरे अणु आयुधों की खनखनाहट पग-पग पर विश्व विनाश की महाप्रलय की चुनौती देती है। बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्तियों ने अदृश्य वातावरण को विषाक्त से भर दिया हैं और रुष्ट प्रकृति आये दिन दैवी प्रकोप के रूप में अपना कोप बरसाती है। वैज्ञानिक और आर्थिक प्रगति ने वायु प्रदूषण, खाद्य प्रदूषण, रेडियो विकिरण की मात्रा इतनी बढ़ा दी है कि दम घुटने, पीढ़ियाँ अपंग होने से लेकर ध्रुवों के पिघलने, समुद्र उमड़ने और हिमयुग आ धमकने तक की ऐसी विभीषिकाएँ सामने हैं जो इस ब्रह्माण्ड को स्रष्टा की इस सर्वोत्तम कलाकृति धरती की चुटकी बजाते इस अंतरिक्ष में धूल बनकर उड़ा सकता है। संकट काल्पनिक नहीं वास्तविक है। शुतुरमुर्ग को तो अपनी मौत भी दिखायी नहीं पड़ती। पर जिन्हें वस्तु स्थिति के पर्यवेक्षण की सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त है वे जानते हैं कि संकट कितना गहरा हैं और किस प्रकार मानवी अस्तित्व जीवन मरण में इस समय झूल रहा है।

स्रष्टा ने इस भूलोक की व्यवस्था बनाये रहने और प्रगति के लिए प्रयत्नरत रहकर अपने वर्चस्व को प्रमाणित करने और मनुष्य से भी अधिक ऊँचे पद पर ऋषि देवता अवतार के रूप में उपलब्ध करने की सुविधा प्रदान की है। युवराज का गौरव भी है और उत्तरदायित्व भी। यदि उसका निर्वाह ठीक तरह नहीं होता तो पदच्युत होने, अधिकार छीनने और राष्ट्रपति शासन लागू होने का भी प्रावधान है।

अवतार तक तूफानी प्रवाह होता है। उसके अदृश्य उभार को कार्यान्वित करने के लिए जागृत आत्माएँ आगे आती हैं। पर्वत शिखरों पर सर्वप्रथम सूर्य किरणें चमकती हैं। उषाकाल का आभास पाकर सर्वप्रथम कुक्कुट बाँग लगाता है। जागरूक देवता ऐसे समय में भगवान की इच्छा को पूर्ण करने के लिए वाहन बन कर अपने पुरुषार्थ का परिचय देती है। हनुमान, अंगद, अर्जुन, भीम से लेकर बुद्ध, गाँधी आदि की अपने समय में ऐसी भूमिका रही है। यह सब दृश्यमान कठपुतलियाँ थीं उनके पीछे सूत्र संचालन करने वाली अदृश्य शक्ति ही अपनी भूमिका निभाती रही है। अग्रगामियों को श्रेय मिलना तो स्वाभाविक है। आँधी के साथ उड़ने वाले तिनके पत्ते एवं रेत कण भी आकाश चूमते हैं। चक्रवात की प्रचण्डता देखते ही बनती है। यह सब अवतारी शक्ति का साथ देने उसके प्रवाह में सम्मिलित होने का ही चमत्कार है। अवांछनीय को भट्टी में गलाया जा रहा है और पिघलाकर उसे उपयोगी स्वरूप में ढाला जा रहा है। युग संधि का प्रभात पर्व इसी महान परिवर्तन का ऐतिहासिक समय है। तमिस्रा का समापन और दिनमान का उदय इसी बेला में हो रहा है। सन 2000 तक का समय इसी उथल-पुथल से भरा-पूरा समझा जाना चाहिए। इन दिनों असाधारण परिवर्तन हो रहे हैं, होने जा रहे हैं। इस उथल-पुथल के गर्भ से प्रज्ञा युग का जन्म होगा, उसके साथ उज्ज्वल भविष्य की समग्र संभावनाएँ जुड़ी हुई हैं। यों इससे पूर्व प्रसव वेदना भी कम नहीं सहनी पड़ेगी। सड़े फोड़े का मवाद निकाल कर बाहर करने के लिए कष्टकर आपरेशन भी तो होता है।

सन्निकट प्रज्ञा युग के अवतरण की परोक्ष प्रेरणा का वहन प्रत्यक्ष रूप से प्रज्ञा परिजनों को करना होगा। उन्हीं को रीछ बानरों की ग्वाल−बालों की, बौद्ध परिव्राजकों की, सत्याग्रहियों की भूमिका निभानी होगी। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण में उन्हीं को भागीरथी पुरुषार्थ की पुनरावृत्ति करनी होगी।

देखने में ऐसे झंझटों में पड़ना घाटे का सौदा प्रतीत होता है, पर वस्तुतः यह ही असीम नफा कमाने का व्यवसाय। हनुमान ने कुछ खोया तो सही पर पाया उससे भी अधिक, विभीषण, सुग्रीव यदि झंझट में न पड़ते, साथ न देते तो पुराने ढर्रे का गुजारा भर करते रह सकते थे जो ऐतिहासिक श्रेय मिला, प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ उठाया उससे वे वंचित ही रह गये होते। केवट और शबरी को भी कुछ तो त्याग करना पड़ा। गाँधी के सहयोगी विनोबा, नेहरू, पटेल राजगोपालाचार्य, राजेन्द्र बाबू, जाकिर हुसैन आदि आरंभ में तो उन्हीं मूर्खों में गिने गये जो आदर्शों के लिए घाटा उठाते और काम हर्ज करते। इन सब को कुटुम्बी, मित्रों संबंधियों ने रोका भी था और अपने मतलब रखने की चतुरता का परामर्श ही नहीं दबाव भी दिया था। ऐसे आड़े समयों पर भी महामानवों की वरिष्ठता परखी जाती है और वह खरी उतरती है तो केवल उनके लिए वरन् उनके समूचे परिकर के लिए श्रेय प्रदान करती है। आड़े समयों में एक दुर्भाग्य भी है कि जो वरिष्ठ होते हुए भी असमंजस ग्रस्त रहते व अन्तः प्रेरणा को कुचलते रहते हैं उन्हें बाद में पछताना भी बहुत पड़ता है।

साहसी कहाँ से कहाँ चले गये और संकोची भीरु, आलसी यों रहते तो सदा ही घाटे में हैं पर ऐसे स्वर्णिम अवसर गँवा देने पर साथियों की तुलना में जब अपने दुर्भाग्य को देखते हैं तो दुःख और प्रायश्चित भी कम नहीं होता। जेल जाने वालों में से बहुतों को मिनिस्टर बना देखकर कितने ही सिर धुनते हैं और कहते हैं कि उन दिनों हमारी संकीर्णता ही आड़े आई, अन्यथा हमें भी वैसे ही श्रेय पाने में कठिनाई पड़ती।

प्रज्ञा परिवार में ऐसे ही मूर्धन्यों का समुदाय है। युग संधि की प्रथम पूर्णाहुति के समय उन्हें यही परामर्श दिया और अनुरोध आग्रह किया जाता है कि वे संयम को चूके नहीं। इस आपत्ति काल में युग धर्म निबाहें। छोटे-मोटे बहानों को आड़े न आने दें। अग्निकाण्ड भूकंप बाढ़, महामारी, दुर्भिक्ष, दुर्घटना जैसे आपत्तिकालीन अवसरों पर अपना काम हर्ज करके अन्तरात्मा की पुकार पर सहायता के लिए दौड़ना पड़ता है। इससे आर्थिक दृष्टि से घाटा भी पड़ता है। पर वह हानि बदले में जो कहाँ संतोष, लोक सम्मान और पुण्य फल के रूप में दैवी अनुग्रह का लाभ प्रदान करती है उसे देखते ही अन्ततः इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। जो कि खोया था उससे अधिक पा लिया गया। बीज आरंभ में गलता है। पर कुछ ही समय बाद वह अंकुरित, पल्लवित व फूलों से लदा विशाल वृक्ष बनता है तो स्पष्ट हो जाता है कि जो कदम कभी मूर्खता का लगता था अन्ततः चरम बुद्धिमत्ता का ही सिद्ध हुआ। परमार्थ, सो भी उपयुक्त समय पर, उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए बन पड़े तो समझना चाहिए कि सोना-सुगंधि जैसा सौभाग्य बन गया। इस समय को पहचानना ही आज की सबसे बड़ी समझदारी है।


Quotation

अनुकरणीय संकल्प

आँवलखेड़ा में पूज्य गुरुदेव के वांग्मय को देखकर दिल्ली के श्री बी.बी. जी झंवर और जयपुर के श्री रामकृष्ण जी मूँदड़ा भाव विभोर हो गये तथा उन्होंने इस वांग्मय को समाज की बहुमूल्य धरोहर बताया और कहा कि यह वांग्मय भावी पीढ़ी के लिए प्रकाशपुँज सिद्ध होगा।

उन दोनों ने वांग्मय को 108-109 स्थानों पर स्थापित कराने का शुभ संकल्प इस अवसर पर लिया।

*समाप्त*