भगवान पवित्रता के क्षीर सागर में विराजते हैं

मनुष्य जीवन व्यापार में सतत् अपने आपको एक धोखा देता रहता है कि कहीं न कहीं से उस पर उसकी बाह्योपचार प्रधान पूजा-प्रार्थना-आरती आदि से अनुदान बरसेंगे एवं उसके अभाव दूर हो जायेंगे। भगवान का नाम लेकर लोग लाटरी का टिकट खरीदते देखे जाते हैं व यह मान बैठते हैं कि इसके बदले उन्हें जरूर कहीं न कहीं से छप्पर फाड़ कर भगवान धन बरसा देंगे। बाहरी पूजा स्वयं करने का मौका नहीं मिलता तो किसी और से करवा के यह समझते हैं कि उसका लाभ अपने को मिल गया, चाहे स्वयं ने कितने ही पाप क्यों न किये हों, अचिन्त्य चिन्तन क्यों न विगत में किया जाता रहा हो तथा वर्तमान के क्रिया−कलाप भी वैसे ही क्यों न चल रहे हों। यह एक छलावा है, भ्रान्ति है तथा आत्मप्रवंचना मात्र है। भगवान को नितान्त घटिया मान बैठना, यही समझ बैठना कि जरा-सी प्रार्थना से बिना अन्तरंग साफ किये बिना औरों के प्रति संवेदना जीवन में धारण किये भगवान प्रसन्न हो अनुदान बरसा देगा तो फिर इससे बड़ी नासमझी दुनिया में कोई नहीं हो सकती।

आज बहुसंख्य व्यक्ति धर्म के इसी रूप को जीवन में धारण किये-दिखाई देते हैं। यदि इनने सही मायने में धर्म समझा होता तो सबसे पहले अपने अन्तरंग को निर्मल बनाया होता। भगवान तो इतने दयालु-क्षमा वत्सल हैं कि वे भक्त के निष्काम भाव से, उनकी शरण में आ जाने पर उसके पूर्व के सब पापों का बोझ अपने पर लेकर उसे न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा देते हैं। शर्त एक ही है कि निश्छल भाव से समर्पण कर फिर खोदी खाई को पाटने का पुरुषार्थ किया जाता रहे तो भगवत्कृपा व सत्कर्म दोनों मिलकर व्यक्ति की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर देते हैं। भगवान ने गीता में स्वयं यह कहा है कि पापियों से भी अधिक पाप करने वाला भी मेरी शरण में आ जाय तो वह ज्ञान रूपी नौका द्वारा सम्पूर्ण पाप समुद्र से भली भाँति स्वयं को तार सकता है(4/35)। फिर व्यक्ति आत्मोन्मुख हो उस ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास क्यों नहीं करता जो उसे पवित्रता के अनन्त स्रोत से जोड़ता है। यदि अध्यात्म का यह मर्म समझा जा सके तो बहुत से व्यर्थ के समयक्षेप करने वाले उपचारों से बचकर स्वयं को अपने समय व सारी विभूतियों को भगवत्परायण बनाते हुए निहाल हुआ जा सकता है। इस तत्व दर्शन को समझने में ही मनुष्य का हित है।


एक नारी की निश्छल साधना

जम्बुद्वीप का नृत्य-संगीत विद्यालय और आचार्य कुमारदेव को उन दिनों आर्यावर्त ही क्यों, सारा संसार जानता था। वह संगीत सिद्ध थे। संगीत की ऐसी कोई विद्या बाकी न थी, जिसका मर्म वह न जानते रहे हों।

मगध, कौशल, कौशाम्बी, सिन्धु, पाँचाल, उरु, कुरु, मिश्र, यूनान आदि अनेक देशों की राजकुमारियाँ और सामन्तों की पुत्रियाँ उनके गुरु कुल में नृत्य, संगीत सीखती थीं। पर आचार्य देव को आज तक कोई ऐसा योग्य शिष्य नहीं मिल सका था, जिससे वह आशा करते कि वह नाद योग संगीत की परम्परा को उन्हीं के समान जीवित रख सकेगा।

उस दिन पहली बार आशा की सुनहली किरण आचार्य कुमारदेव के हृदय में उतरी, जिस दिन मगध की राजनर्तकी सुनन्दा की ज्येष्ठ कन्या कोशा ने आश्रम में प्रवेश लिया। आचार्य देव जानते थे कि संगीत और नृत्य कलाएँ योग साधनाएँ हैं। उन्हें वही प्राप्त कर सकता है, जिसमें असीम श्रद्धा, निष्ठा और चारित्रिक पवित्रता भी हो। यह संस्कार आत्मा से सम्बन्ध रखते हैं-समृद्धि सवर्णता और कुल की श्रेष्ठता से नहीं। सो जब उन्होंने कोशा को उस रूप में पाया तो उनकी वर्षों की निराशा दूर हो गयी। कोशा को पाकर उनका आचार्यत्व एवं वात्सल्य दोनों एक साथ उमड़ पड़े। उन्होंने पूरे परिश्रम से उसे आरती, अभिसारिका, परकीय, प्रमोद, मधुमिलन, संगोपन, सूचिका, ताँडव आदि गूढ़ और सूक्ष्म भावनाओं से ओत-प्रोत नृत्य सिखाये। कोशा ने उसे सीखा, कला पारंगत हुई और एक दिन मगध की राजनर्तकी का यशशील पद भी प्राप्त कर लिया।

योग साधनाएँ कठिन बतायी जाती हैं, पर सिद्धि का संवरण उससे भी कठिन बात है। वह जिस दिन मगध की राजनर्तकी घोषित हुई, उसी दिन से उसे प्राप्त करने के लिए श्रीमन्तों, सामन्तों, राजकुमारों तक में होड़ लग गयी। स्वयं मगध नरेश की दृष्टि भी निष्कलुष न रह सकी। पर उसके मस्तिष्क में आचार्य देव के वह शब्द अभी सुप्त नहीं हुए थे जो उन्होंने आश्रम से विदा करते वक्त कहे थे− “भद्रे! राजनर्तकी का गौरव प्राप्त हुआ तो क्या, तुम भारतीय नारी हो, भारतीय नारी सदैव एक पुरुष का वरण करती है और उसके आदर्शों के लिए अपने को न्योछावर करती रही है, उस परम्परा को भूलना मत।”

दीपक की लौ में जल जाने वाले पतंगों की तरह अनेकों कामुक व्यक्तियों की लालसायें बढ़ीं और कोशा की दृढ़ता की अग्नि में भस्मसात् होती गयीं। कोशा महामंत्री शकटार के पुत्र स्थूलिभद्र को प्रेम करती थी। उनके अतिरिक्त उसने स्वप्न में भी किसी पुरुष का स्मरण नहीं किया।

कोशा जितनी पवित्रता से स्थूलिभद्र को प्रेम करती थी, उतनी ही तीव्रता से रथाध्यक्ष राजकुमार सुकेतु उस पर आसक्त था। जिस दिन उसे यह पता चला कि कोशा स्थूलिभद्र को वरण कर चुकी है, उसका प्रतिशोध उमड़ उठा। उसने शकटार की हत्या करा दी, ताकि स्थूलिभद्र का कोई प्रभाव शेष न रहे। इस घटना से स्थूलिभद्र इतना आहत हुए कि उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया और वन में जाकर तप करने लगे। यह कोशा के जीवन में वज्रपात की तरह था। किन्तु उसकी चारित्रिक दृढ़ता में रत्ती भर भी प्रभाव नहीं पड़ा।

तपस्वी स्थूलिभद्र चातुर्मास के लिए मगध आने वाले हैं, यही नहीं वे कोशा के ही अतिथि होंगे। एक क्षीण आशा अभी भी उसके मन में बनी हुई थी। पर जब वह आये और चातुर्मास साधना पास रहकर कर चुके, किन्तु उनके मन में एक क्षण के लिए भी काम-विकार और साँसारिक आकर्षण जाग्रत न हुआ तो कोशा की रही-सही आशाएँ टूट गईं।

स्थूलिभद्र चातुर्मास समाप्त कर निर्विकार लौट गये। वह रात कोशा के लिए जीवन की सबसे निराश और भयंकर रात थी। आशा जीवन को बाँध रखने वाली एक प्रबल आकर्षण शक्ति है, वह टूट जाए और फिर जीवन में प्रसन्नता दिखाई न दे तो विरक्ति स्वाभाविक ही है। रात का एक-एक पल उसके लिए भारी पड़ रहा था। एक परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कोई आश्रय समझ में नहीं आ रहा था, पर उस दिव्य सत्ता को समझ पाना यकायक सबके बस की बात कहाँ? वह तो योगियों को ही कठोर तपश्चरण से मिलता है।

रात्रि के समय, कोशा उठी और द्वार से बाहर की ओर चल पड़ी। वह घर से एक ही क्षण में निकलकर कहीं प्राणान्त कर लेना चाहती थी, पर जैसे ही वह द्वार पर आयी, सम्मुख खड़े आचार्य कुमारदेव को देखकर अवाक् रह गयी। आगे बढ़कर उसने सजल नेत्रों से प्रणिपात किया- "यह जीवन बड़ा कठिन है गुरुदेव!" बस वह इतना ही कह सकी। आँखों से आँसुओं की अविरल धारा फूट पड़ी।

आचार्य देव ने उसे उठाकर हृदय से लगाते हुए कहा- "पुत्री उठो, तुम्हारा चरित्र स्थूलिभद्र की साधना से कहीं अधिक पवित्र है। अब तुम आश्रम में रहकर शिक्षा कार्य करो, तुम्हारी गाथा चिरकाल तक भारतीय नारी को चरित्र का उपदेश देती रहेगी।"


जप के साथ ध्यान-यही है साधना का महाविज्ञान

सन् 1962 की बात है, शिकागो के टेड सीरियस नाम के एक व्यक्ति ने कल्पना द्वारा दूरवर्ती वस्तुओं के चित्र फिल्म कैमरे पर उतार कर न केवल वैज्ञानिकों को अचम्भे में डाल दिया अपितु विज्ञान के समक्ष एक चुनौती खड़ी कर दी-क्या उसे प्रकृति, पदार्थ और ब्रह्माण्ड की जानकारियों के लिये मात्र भौतिक उपकरणों तक ही सीमित रहना पड़ेगा? क्या मनुष्य शरीर उससे भी समर्थ उपकरण नहीं है जिसके द्वारा ब्रह्माण्ड व्यापी हलचलों की इतनी स्पष्ट जानकारी ली जा सकती है जितनी भौतिक उपकरणों के द्वारा भी सम्भव नहीं है?

वस्तुतः बात यह हुई कि एक दिन टेड सीरियस नामक उक्त व्यक्ति अपने एक फोटोग्राफर मित्र से फोटो खिंचवाने जा रहा था। रास्ते में किसी परिचित ने बताया कि वह अभी उसकी ससुराल से आ रहा है जहाँ उसकी धर्मपत्नी अत्यंत संकटग्रस्त अवस्था में बीमार है। टेड सीरियस को प्रातःकाल ही धर्मपत्नी का पत्र मिला था। जिसमें किसी तरह की अस्वस्थता की कहीं कोई उल्लेख नहीं था, तो भी इस समाचार से उसकी स्मृति धर्मपत्नी के लिये घनीभूत होती चली गई। जिस समय वह कैमरे के सामने बैठा, उस समय वह पूरी तरह अपनी पत्नी के ही विचारों में खोया हुआ था, उसी स्थिति में जोहान्स नामक उसके फोटोग्राफर ने उसका फोटो लिया, जब उसने फिल्म धोई तो वह यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि जिस नम्बर की फिल्म में उसने टेड सीरियस का चित्र उतारा था, उसमें चारपाई पर लेटी हुई एक महिला का चित्र था उसके आस-पास एक पुरुष, एक महिला, दो युवतियाँ खड़े थे और एक अन्य व्यक्ति जो डॉक्टर लगता था, स्टेथिस्कोप से उस महिला के शरीर की जाँच कर रहा था। पीछे पता चला कि सचमुच उसकी पत्नी बीमार थी और उसी स्थिति में सचमुच उसी डॉक्टर ने उसका मुआइना किया था।

टेड सीरियस ने यह चित्र देखा तो चिल्ला पड़ा अरे यह स्त्री तो मेरी धर्मपत्नी है, पास खड़े लोग उसी की ससुराल के ससुर, सास व कुटुम्बी थे, डॉक्टर उन्हीं का फेमिली डॉक्टर था जिसे टेड अच्छी तरह पहचानता और नाम आदि भी जानता था।

यह विशेषता फिल्म की थी? या कोई फोटोग्राफर को हिप्नोटाइज कर रहा था टेड के दिमाग में कोई चक्कर था? इस प्रश्न से फोटोग्राफर के दिमाग में पर्त के पर्त उमड़ते रहे। उसने कई तरह की फिल्मों से, कैमरे बदल बदल कर स्वस्थ चित्त से टेड के चित्र लिये। वह हर बार यह देख हैरान रह जाता कि टेड जिस भी वस्तु का ध्यान कर रहा होता कैमरे की फिल्म में वही ध्यान वाला चित्र उतरता। यह एक ऐसी घटना थी जो वैज्ञानिकों को भी आश्चर्य चकित करने वाली थी सो उसने उसकी सूचना पत्रकारों को दी, पत्रकारों की उपस्थिति में टेड के चित्र खींचे गये तब भी टेड की सशक्त कल्पना के ही चित्र आये। टेड अखबारों के आकर्षण का विषय बन गया, उसकी कल्पना के फोटो सहित उसके तरह-तरह के फोटो अखबारों में छपे, उसे देखने परीक्षण करने वालों का ताँता लग गया। इस बीच उसके परीक्षण के तौर पर जो फोटो लिए गये उसमें, नैपोलियन बोनापार्ट, उसकी सेना, इटली और कोर्सिका के किले, मिश्र के पिरामिड तथा कुछ ऐसे ऐतिहासिक स्थलों के चित्र भी कल्पना से खींचे जो अब केवल पुरातत्व सामग्री के रूप में ही उपलब्ध थे। इन कल्पना चित्रों और यथार्थ में उतना अन्तर तो होता था कि कल्पना चित्र कुछ धुँधले होते थे पर आकृति, कटाव और वस्तु में राई रत्ती भर भी अन्तर नहीं होता। नैपोलियन बोनापार्ट की सेना जो सैकड़ों वर्ष पूर्व थी, के चित्र देखकर पुरातत्व वेत्ताओं ने यह सिद्ध किया था कि नैपोलियन बोनापार्ट के सिपाही ठीक यही वेशभूषा धारण करते थे। नवम्बर 1968 की कादम्बनी अंक में फतेहपुर सीकरी के बुलन्द दरवाजा और लाल किले के उसके ध्यान फोटो छाप कर उन्हें कैमरे के फोटो से मिलाया गया है उनमें रत्ती भर भी अंतर नहीं है जबकि टेड सीरियस ने भारतवर्ष का मात्र नक्शा देखा है, भारतवर्ष की भूमि पर पैर रखने का उसे कभी कोई सुयोग नहीं मिला।

इन आश्चर्य जनक घटनाओं से दो प्रश्न उभरते हैं- (1) क्या सचमुच ही ध्यान से “ध्येय और ध्याता” के बीच कोई भौतिक सम्पर्क स्थापित हो सकता है ओर उस सम्पर्क से दोनों के बीच कोई रासायनिक आदान प्रदान की क्रिया संभव हो सकती है? (2) क्या सृष्टि में ऐसे भी कोई तत्व हैं जो मानवीय चेतना का सम्बन्ध भूत और भविष्य से जोड़ सकते हैं?

इस समय तक माइक्रोवेव, माइक्रो फिल्म तथा माइक्रो ट्रान्समीटर का आविष्कार हो चुका था, जिससे यह बात तो सिद्ध हो चुकी थी कि “शब्द” और “आकार” को शक्ति तरंगों (एनर्जी वेव) में बदल कर उन्हें नियन्त्रित अवस्था में एक स्थान से दूसरे स्थान में भेजा जा सकता है। इस प्रणाली को “टेलीविजन” कहते हैं जिसके द्वारा एक स्थान से शक्तिशाली विद्युत तरंगों के सहारे चित्र और ध्वनियाँ चारों ओर प्रक्षेपित की जा सकती हैं। यह तरंगें जितनी अधिक विद्युत शक्ति से अनुप्रेरित होंगी प्रेषण उतनी ही दूर तक ग्रहण किया जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि टेलीविजन प्रसारणों में जबर्दस्त विद्युत शक्ति नियोजित की जाती है अन्यथा इन प्रसारणों को एक दो मील में भी पकड़ना असंभव हो जाये।

उपरोक्त घटना की वस्तु स्थिति की जाँच वैज्ञानिकों, फोटोग्राफरों, बुद्धिजीवियों की एक सम्मिलित टीम ने की जिसकी अध्यक्षता “इलिनाएस सोसायटी फॉर साइकिक रिसर्च” की उपाध्यक्षा पालिन ओहलर ने की। जाँच कमेटी ने जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किये उनमें इन घटनाओं की पुष्टि तो की गई पर यह स्पष्ट स्वीकार किया गया कि विज्ञान अभी तक तथ्यों का पता लगाने में असमर्थ है।

सुप्रसिद्ध अमेरिकी “जीव रसायनज्ञ” डॉ. कैमरान ने चूहों पर तरह-तरह के प्रयोग करके यह बताने का प्रयास किया कि मनुष्य शरीर जिन कोशाओं (सेल्स) से बना है। उनमें “न्यूक्लिक एसिड” नामक ऐसा तत्व पाया जाता है जिसे ध्यान के द्वारा निरन्तर प्रशिक्षित करने के बाद बहुत शक्तिशाली रूप में कहीं भी प्रक्षेपित किया जा सकता है। उससे दो वस्तुओं के बीच जो संबंध स्थापित होते हैं उसमें विचार प्रणाली का आदान प्रदान हो सकता है, ऐसा तो अभी खोजने में नहीं आ पाया किन्तु यह सुनिश्चित तथ्य है कि एक के कुछ तत्व और उनके गुण दूसरे में और दूसरे के पहले में निश्चित रूप से हस्तान्तरित होते हैं। ध्यान द्वारा जब किसी वस्तु को एक व्यक्ति के मन से जोड़ा जाता है तो इस न्यूक्लिक एसिड की विचार माला के माध्यम से उस वस्तु का प्रतिबिम्ब परिलक्षित हो सकता है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि भारतीयों का ध्यान-विज्ञान एक दुर्लभ खोज थी उसी के माध्यम से ऋषि मुनि तपस्वी योगी सृष्टि की सुदूर हलचलों को अपनी मस्तिष्क के टेलीविजन प्लेट पर उतार लिया करते थे और भूत भविष्य वर्तमान को खुली हुई पुस्तक के रूप में पढ़ लिया करते थे।

इंग्लैण्ड की बी. एफ. गुडरिच कम्पनी के रिसर्च डाइरेक्टर डॉ. डब्लू. एल. सेमान तथा इटली के जीन विशेषज्ञों ने ध्यान के साथ जप की महत्ता को भी सूक्ष्म ध्वनि तरंगों का आविष्कार कर प्रतिपादित कर दिया है। उन्होंने एक प्रयोग में देखा कि रात के अन्धकार में भी बिजली के बहुत से तार फैले होने पर भी चमगादड़ वहाँ उड़ते समय तारों से टकराता नहीं। उन्होंने चमगादड़ की आँखों पर पट्टी बाँधकर उड़ाया और जिस स्थान पर उड़ाया गया वहाँ बहुत बारीक से बारीक धागे असंख्य मात्रा में बाँध दिये, इस जटिल स्थिति में भी चमगादड़ बिना धागों से टकराये उड़ते रहे। बिना आँखों की सहायता के चमगादड़ वस्तुओं की उपस्थिति का किस तरह पता लगाता है, इस अध्ययन के दौरान पता चला कि चमगादड़ उड़ते समय मुँह से अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि निकालता है, यह कर्णातीत ध्वनि तारों से टकराकर चमगादड़ के रेटीकूलर फार्मेशन(मस्तिष्क का वह भाग जहाँ हिन्दू शिखा रखते हैं) से टकराती है और ध्यान वाले स्थान तक पहुँचकर चमगादड़ को वस्तु की उपस्थिति का भान करा देती है।

मंत्रोच्चारण में कर्णातीत ध्वनि के निरंतर कम्पन को ध्यान द्वारा, “नाभिकीय रसायन” बहुत दूर से दूर अज्ञात स्थान तक पहुँचाने तक समर्थ हो जाता है। टेड सीरियस की तरह लक्ष्य के सन्देश, प्राण और प्रकाश अन्तः करण में उतरने लगते हैं इसे ही अपने इष्ट का स्वप्न, संदेश, सहायता आदि जो भी कहें मान सकते हैं।

गायत्री मंत्र की ध्वनि तरंगें तार के छल्ले की तरह ऊपर उठती हैं और ब्रह्माण्ड के सूक्ष्म अन्तराल को माध्यम बनाकर सूर्य तक जा पहुँचती हैं। यह ध्वनि वहाँ से प्रतिध्वनित होकर अपने साथ गर्मी, प्रकाश और विद्युत अणुओं की फौज जप करने वाले के शरीर में उसी तरह उतारती चली जाती हैं जिस तरह टेड सीरियस के ध्यान करने पर ध्येय का प्रतिबिम्ब उसके मस्तिष्क में छाया चित्र की तरह उतरता चला आता है। टेड इस प्रयास में भी है कि वह टेलीविजन की तरह आकृतियों को समय की निर्धारित सीमा में लगातार उतार दे अर्थात् मस्तिष्क के चित्र मूवी कैमरे में उतारे जिससे प्राचीन काल में हुई घटनाओं को भी टेलीविजन की तरह देखा जा सके।

सूर्य हमारे ब्रह्माण्ड का केन्द्र नाभिक अथवा आत्मा है, हमारी सृष्टि का प्रारम्भ विकास और विनाश यहीं से होता है। यदि कोई चेतना से पूरी तरह सूर्य में आत्मसात् हो सके तो टेड सीरियस भले ही मूवी कैमरे में चित्र उतार पाये अथवा नहीं, पर उस तरह का व्यक्ति निःसन्देह न केवल भूत, भविष्य का ज्ञाता अपितु सृष्टि के सूक्ष्मतम रहस्यों का ज्ञाता भी हो सकता है। सिद्धावस्था ध्यान द्वारा चेतना की इसी प्रगाढ़ मिलन की अवस्था को कहते हैं, जिसमें साधक और इष्ट, गायत्री उपासक और गायत्री माँ, साधक का मन और सविता के प्राण दोनों एक हो जाते हैं।

सिद्धावस्था न भी प्राप्त हो तो भी क्रमिक जप, उपासना और ध्यान से साधक उसी मात्रा में प्रत्यावर्तित प्राण और आत्मबल सम्पन्न होता चलता है। गायत्री उपासना में जप के साथ सविता देवता के ध्यान के पीछे यही महाविज्ञान काम करता है। जिसे न जानने वाला भी लाभान्वित होता है और जानने वाला तो लाभान्वित होता ही है।


स्वप्नों के झरोखे से अन्तर्जगत् का अवलोकन

मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि कोई भी व्यक्ति बिना स्वप्न देखे एक पल भी नहीं सोता। जागृत स्थिति में आँखें कुछ न कुछ देखती रहती हैं, मन में कई तरह के विचार और कल्पनाएँ घुमड़ती रहती हैं। मनःशास्त्र के अनुसार वही विचार और कल्पनाएँ सुप्तावस्था में भी उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं और तरह-तरह के चित्र-विचित्र दृश्य दिखाती हैं। स्वप्न को सामान्यतः इच्छाओं और कल्पनाओं की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति भी कहा जाता है। चूँकि निद्रित अवस्था में शरीर तो सोता रहता है, किन्तु मन मस्तिष्क के क्रिया-कलाप चिन्तन, विचार और कल्पनाओं की उड़ान चलती ही रहती है। मन मस्तिष्क के यही क्रिया-कलाप स्वप्न के रूप में दिखाई देते हैं। मनोविज्ञान अब तक इसी रूप में स्वप्न को व्याख्यायित करता रहा है। किन्तु अब मनोवैज्ञानिक के अनुसार स्वप्न का एक ओर पक्ष उद्घाटित हुआ है, जिन्हें अतीन्द्रिय स्वप्न कहा जाता है। रूसी मनःशास्त्री पावलोव के अनुसार मनुष्य का अवचेतन मन अनन्त सम्भावनाओं और सम्वेदनाओं का भण्डार है, उसे सामान्य रीति से समझ पाना अति दुष्कर है। इस सन्दर्भ में सन् 1883 में वोस्टल ग्लोब नामक अमरीकी समाचार पत्र के संवाददाता द्वारा प्रालेप द्वीप में भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट का स्वप्न दृश्य देखने और उसे खबर के रूप में प्रकाशित होने की घटना उल्लेखनीय है। इस तरह की और भी अगणित घटनाएँ हैं, जिनमें लोगों ने स्वप्न द्वारा किसी सुदूर स्थान में घट रही घटनाओं की जानकारी प्राप्त की, भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का आभास प्राप्त किया और हजारों मील दूर स्थित अपने प्रियजनों के हाल जाने। इस तरह के सैकड़ों प्रसंग अब विश्व विख्यात हो चुके हैं जिनकी वैज्ञानिकों द्वारा छान-बीन किये जाने के बाद उन्हें सही पाया गया। मनःशास्त्रियों के अनुसार इस तरह के स्वप्न अतीन्द्रिय स्वप्न होते हैं और सामान्य लोगों को भी स्वप्न में कभी-कभी ऐसी अनुभूतियाँ हो जाती हैं।

भारतीय मनीषियों ने इस तरह के स्वप्नों को आध्यात्मिक स्वप्न कहा है और बताया गया है कि आत्म-चेतना ही मन के द्वारा जाग्रत अवस्था में लौकिक दृश्यों को और सुप्तावस्था में स्वप्न जगत को देखता है। आत्मा की शक्तियों का विवेचन करते हुए ऋषि ने कहा है-स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येना्नुपश्यति। महान्तं विभुभात्माभूत्वा..........॥ − कठोपनिषद्

अर्थ-निद्रा की स्थिति में स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत अवस्था में प्रत्यक्ष अनुभूत दृश्यों को मनुष्य बार-बार देखता है, वह शक्ति आत्मा से ही प्राप्त होती है और आत्मा महान् विभु परमात्मा ही है।

ऋषि के अनुसार परमात्मा चेतना सर्वव्यापी है। आत्म-चेतना उसी का एक अंश है। किन्तु विकारों, कषाय-कल्मषों के कारण उसका संबंध परमात्म सत्ता से एक तरह टूटा हुआ रहता है। दोनों के बीच माया का, भ्रान्ति का, अज्ञान का आवरण है जो दोनों को एक-दूसरे से पृथक् करता है। फिर भी यदा-कदा बिजली की चमक के समान आत्म-चेतना में परमात्मसत्ता की दीप्ति चमक उठती है और उस स्थिति में व्यक्ति को इस स्तर की अनुभूतियाँ होने लगती हैं जिन्हें इन्द्रियों और मस्तिष्क द्वारा न अनुभव किया जा सकता है तथा न ही जाना जा सकता है। स्वप्नों के माध्यम से अतीन्द्रिय संकेत प्राप्त करना और आध्यात्मिक अनुभव करना भी उसी स्तर की अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ कहा जा सकता है।

कहा जा चुका है कि व्यक्ति का अवचेतन मन अनन्त सम्भावनाओं का गढ़ है और स्वप्न के माध्यम से अतीन्द्रिय दर्शन, दूरानुभूति उन्हीं सम्भावनाओं की एक झलक मात्र है। इस तथ्य को समझने के लिए योगनिद्रा का थोड़ा परिचय देना आवश्यक होगा। योगनिद्रा वस्तुतः अवचेतन पर से चेतन का दबाव हटा लेने की विद्या है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की अन्तःचेतना अनन्त ब्रह्मसत्ता की तरंगों की गतिविधियाँ देख पकड़ पाने में समर्थ हो जाती हैं और तब वह अतीत की बीत चुकी घटनाओं, वर्तमान में घटित हो रही तथा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को सहज ही जान समझ लेती है। उस स्थिति में देशकाल की कोई सीमाएँ चेतना की पहुँच के मार्ग में बाधा नहीं बनती।

अतीन्द्रिय दर्शन का आभास देने वाले स्वप्न भी उसी स्तर के होते हैं। चूँकि जाग्रत स्थिति में चेतन मन अधिक जाग्रत और सक्रिय रहता है इसलिए उस दशा में अवचेतन मन प्रायः प्रसुप्त और निष्क्रिय अवस्था में चेतन मन अपेक्षाकृत शिथिल पड़ जाता है तो अवचेतन को थोड़ा जागने और सक्रिय होने का अवसर मिलता है। यदि व्यक्ति का अन्तःकरण शुद्ध, पवित्र और निष्कलुष होगा तो उस स्थिति में व्यक्ति की आन्तरिक शक्तियाँ उतनी ही अधिक विकसित होने का अवसर प्राप्त करेंगी और उन पर से चेतन मन का अनावश्यक दबाव हटा रहेगा तब न देखे हुए और न सुने हुए को भी देखने और सुनने का अवसर प्राप्त हो सकता है। प्रश्नोपनिषद् में गार्ग्य मुनि के तीसरे प्रश्न के उत्तर में महर्षि पिप्पलाद यही बताते हैं−

अत्रैव देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्ट दृष्टमनु पश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थनु श्रृणोति॥

देश दिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्ट चादृष्ट च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूत चाननूभूतं च सच्चासच्च सर्व पश्यति सर्वः प्रश्यति। − प्रश्नो. 4/5

गार्ग्य मुनि का प्रश्न था कि कौन देवता स्वप्नों को देखता है? उत्तर में महर्षि पिप्पलाद बताते हैं कि इस स्वप्न अवस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूतियों का अनुभव करता है। इसका पहले जहाँ कहीं भी, जो कुछ बार-बार देखा, सुना और अनुभव किया होता है उसी को वह स्वप्न में बार-बार देखता, सुनता और अनुभव करता रहता है। परन्तु यह नियम नहीं है कि जाग्रत अवस्था में इसने जिस प्रकार और जिस ढंग से, जिस स्थान पर जो घटना देखी, सुनी या अनुभव की है उसी प्रकार यह स्वप्न में भी अनुभव करे। स्वप्न में तो मन स्वच्छन्द, विचरण के लिए स्वतंत्र रहता है इसलिये वह किसी भी घटना का अपने अनुकूल और वाँछित अंश लेकर उसे अनुभव करने लगता है। ऐसी भी होता है कि शुद्ध-बुद्ध पवित्र और निर्विकार आत्मा न देखे हुए को भी देखने लगे, न सुने हुए को भी सुनने लगे और न अनुभव किये हुए को भी अनुभव करने लगे।

महर्षि पिप्पलाद ने मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा जीवात्मा को ही स्वप्न देखने वाला बताया है और जब जीव चेतना इतनी पवित्र तथा प्रखर हो जाय कि ब्रह्माण्ड-व्यापी चेतना से सम्पर्क करने में कोई व्यवधान न रहे तो सुनिश्चित रूप से वह आध्यात्मिक अनुभूतियों का अधिकारी बनता चला जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आत्मा को पवित्र, निष्कलुष और निर्विकार बनाने के बाद व्यक्ति दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करने की क्षमता से सम्पन्न होता चला जाता है। अतीन्द्रिय स्वप्न मनःशास्त्रियों के अनुसार अवचेतन की जागृति मात्र है और संस्कार शुद्ध व्यक्ति का अवचेतन भी शुद्ध होने से उसके स्वप्न भी यथार्थ की अभिव्यक्ति करा सकते हैं। यह यथार्थ सुदूर वर्तमान का भी हो सकता है तथा सूक्ष्म जगत में सुनिश्चित हो चुके भविष्य का भी।

व्यक्ति जब संस्कार शुद्धि के लिए योग तप का अनुष्ठान करता है तो उससे साधक की मनोभूमि का दिशा विशेष में निर्माण होने लगता है। श्रद्धा, विश्वास तथा संस्कार शुद्धि के लिए किये गये प्रयासों से उसकी अन्तःचेतना में आध्यात्मिक एवं सात्विक प्रवृत्तियाँ प्रमुख होने लगती हैं और उस स्थिति में निरर्थक स्वप्न बहुत ही कम आते हैं।

शास्त्रकारों ने तो स्वप्नों के माध्यम से साधन मार्ग में प्रगति का लेखा-जोखा लेने की कसौटियाँ भी निर्धारित कर रखी हैं। कौन से और कैसे स्वप्न किन तत्वों की वृद्धि और निष्कासन की सूचना देते हैं, यह बहुत व्यापक और विस्तृत विषय है। सामान्यतः इस तरह के स्वप्नों को चार भागों में विभक्त किया गया है− (1) पूर्व संचित कुसंस्कारों के विसर्जन, निष्कासन की सूचना देने वाले स्वप्न (2) श्रेष्ठ तत्वों के अभिवर्धन का स्वप्नों में प्रकटीकरण (3) भावी सम्भावना का पूर्वाभास और (4) दिव्य दर्शन।

साधना मार्ग पर अग्रसर होते हुए साधक में जब आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि होने लगती है तो उन तत्वों का स्थान नियुक्त होने से पूर्व संचित का निष्कासन आवश्यक हो जाता है। उन संस्कारों के निष्कासन की प्रतिक्रिया स्वरूप जो विक्षोभ उत्पन्न होता है, उसे स्वप्नावस्था में भयंकर, अस्वाभाविक, अनिष्ट एवं उपद्रवकारी रूप में देखा जाना स्वाभाविक ही है। दूसरी श्रेणी के स्वप्न वे होते हैं, जिनसे इस बात का पता चलता है कि साधक के भीतर सात्विकता की वृद्धि हो रही है। सात्विक कार्यों को करने या किसी अन्य के द्वारा इस तरह के कार्य होते दिखाई देने वाले स्वप्न ऐसा ही परिचय देते हैं।

श्वेताश्वतरोपनिषद् में योगाभ्यास के ठीक चलने की कसौटी भी कुछ विशेष दृश्यों के रूप में दिखाई देने के रूप में विवेचित की गई है। इस उपनिषद् में दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में कहा गया है−

नीहार धूमाकी निल्मनल्पनाँ, खद्योतेविद्युतस्फटिक शशीनाम्। एतानि रूपाणि पुरः सराणि, ब्रह्मण्यभिव्यक्ति कराणियोगे॥

अर्थात्− परमात्मा की प्राप्ति के लिए किये जाने वाले योग में साधना में कुहरा, धुँआ, सूर्य, वायु और अग्नि के समान तथा जुगनू बिजली, स्फटिक मणि और चन्द्रमा के समान बहुत से दृश्य योगी के सामने प्रकट होते हैं। ये सब योग की सफलता को स्पष्ट रूप से सूचित करते हैं।

योगसाधना में चेतन मन के उत्पातों को रोकने के लिए शिथिलता, शून्यावस्था, समाधि, शवासन आदि को बहुत महत्व दिया जाता है। इन्हें योगनिद्रा कहते हैं। ................. संस्थान पर से तनाव दबाव हटाकर यदि श्राँत, विश्राँत और सौम्य मनःस्थिति प्राप्त की जा सके तो उसे जाग्रत निद्रा समतुल्य माना जा सकता है। स्मरणीय है ध्यान धारणा की सीढ़ियाँ पार करते हुए समाधि तक पहुँचना साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है। स्वप्नावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रहता और न ही स्वसंकेत देने तथा अपने बलबूते पर अपने को इच्छित दिशा में मोड़ पाना सम्भव है। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाओं में कृत्रिम योगनिद्रा की स्थिति लाने का अभ्यास आवश्यक समझा गया है। इस स्थिति में मन और बुद्धि तो तन्द्राग्रस्त हो ही जाते हैं, पर चित्त में संकल्प जीवन्त रखे जा सकते हैं। इन संकल्पों से अचेतन मन को प्रशिक्षित किया जाता है। अतीन्द्रिय स्वप्न व्यक्ति चेतना और विराट् चेतना के बीच कोई सेतु होने का परिचायक है और सिद्ध करते हैं कि स्वप्नों के माध्यम से भी आत्म-परिष्कार सम्भव है, लेकिन उसके लिए योगनिद्रा जैसी स्थिति प्राप्त करना आवश्यक है। आत्म-परिष्कार की प्रधान योगसाधना इसी प्रकार सम्भव होती है। मंत्र जप में, ध्यान तन्मयता में चित्त के भीतर उच्च स्तरीय संकल्प जाग्रत रखे जाते हैं। यदि इन प्रयोगों का सही उद्देश्य समझकर सही रीति से कार्यान्वित किया जाये जो उसके आशाजनक परिणाम सामने आना सुनिश्चित है। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने इसीलिए योगनिद्रा एवं समाधि के स्तर सामान्य असामान्य सभी तरह के साधकों की मनोभूमि को ध्यान में रखते हुए बनाये हैं। इनमें सचेतन को तन्द्रित करने और अन्तर्मन को प्रशिक्षित करने के तीनों ही उद्देश्य पूरे होते हैं। इस दिशा में जितनी सफलता मिलती है उतने ही सामान्य स्वप्नों में भी ऐसी अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलने लगती हैं जिन्हें दिव्य-दर्शन अथवा अतीन्द्रिय प्रतिभा का नाम दिया जा सके। इस प्रकार स्वप्न अतीन्द्रिय सामर्थ्य रूपी दिव्यलोक का द्वार खोलते हैं व झरोखों से भविष्य के गर्भ का भी ज्ञान कराते हैं। इन्हें निरर्थक न मानें।


शिष्य की विनयशीलता (Kahani)

देश विदेश के पण्डितों का एक शास्त्रार्थ हुआ। राजा ज्ञानसेन इसी बहाने विद्वानों का सत्कार करते थे। धन और मान सभी को मिलता था। पर शास्त्रार्थ में जो विजयी होता था, उसके मार्गदर्शन में अन्यान्यों को चलना पड़ता था। उन दिनों अपनी-अपनी हाँकने और मत-मतान्तर खड़े करने की एक प्रकार से प्रथा-सी चल पड़ी थी।

उस शास्त्रार्थ समारोह में विद्वान् भारवि विजेता घोषित किए गए। उपस्थित विद्वानों ने नेतृत्व स्वीकार किया।

विजेता का सम्मान प्रदर्शित करने के लिए राजा ने उन्हें हाथी पर बैठाया और स्वयं चँवर डुलाते हुए उनके घर तक ले गये। भारवि जब इस सम्मान के साथ घर पहुँचे, तो उनके माता-पिता की खुशी का ठिकाना न रहा।

घर लौट कर सर्वप्रथम उनने अपनी माता को प्रणाम किया। पिता की ओर उपेक्षा भरा अभिवादन भर कर दिया।

माता को यह अखरा। झिड़क कर साष्टांग दण्डवत् के लिए संकेत किया, उनने उसका भी निर्वाह कर दिया। पिता ने सूखे मुँह से “चिरंजीव” भर कह दिया।

बात समाप्त हो गयी, पर माता और पिता दोनों ही खिन्न थे। उन्हें वैसी प्रसन्नता न थी, जैसी कि होनी चाहिए थी। गुरुकुल से लौटे हुए छात्र जिस शिष्टाचार से गुरु का अभिवादन करते थे और गुरु जिस प्रकार छाती से लगाकर शिष्य के प्रति आत्मीयता भरा आशीर्वाद प्रदान करते थे, उसका सर्वथा अभाव था। राजा द्वारा हाथी पर बिठाकर चँवर डुलाते हुए घर तक लाने का अहंकार जो था भारवि को। इसमें उसने शिष्टाचार को, विनम्रता को भुला दिया था। मात्र चिह्न पूजा भर की।

पिता की मुख मुद्रा पर खिन्नता देखकर, भारवि माता के पास कारण पूछने गए।

माता ने बताया। विजयी होने पर लौटने के पीछे, तुम्हारे पिता की कितनी साधना थी, यह तो तुम भूल ही गये। शास्त्रार्थ के दसों दिन उन्होंने जल लेकर सफलता के लिए उपवास किया और इससे पूर्व पढ़ाने में कितना श्रम किया, इसका तो तुम्हें स्मरण ही नहीं रहा। विजय की अहंता तुम्हारे चेहरे पर झलकती है और अभिवादन में चिह्न पूजा भर का शिष्टाचार था।

भारवि को अपनी भूल प्रतीत हुई। विद्वत्ता का अहंकार गल गया और एक शिष्य एवं पुत्र का जो विनय होना चाहिये, वह उदय हुआ।

माता की आँखों में आँसू आ गये। उनने कहा-वत्स तुम्हारी विजय के पीछे पिता की साधना है, उसे विस्मरण मत करो। विद्वत्ता की विजय के पीछे शिष्य की विनयशीलता का विस्मरण नहीं होना चाहिए।”


देवाधिदेव आत्मदेव को ही साधे

व्यक्तित्व के उत्थान और पतन का सम्बन्ध एक सीमा तक ही शिक्षा और वातावरण से है, क्योंकि जहाँ से इस प्रकार का परिवर्तन आरम्भ और परिपक्व होता है इसे अचेतन मन का मर्मस्थल कहते हैं। मस्तिष्क का सचेतन भाग जानकारियाँ संग्रह करने और तदनुरूप व्यवस्था बनाने में काम आता है। शिक्षा एवं अनुभव के सहारे इसी भाग को विकसित किया जा सकता है। चतुरता एवं कुशलता जैसी उपलब्धियाँ इसी केन्द्र में पनपती और प्रखर बनती हैं। इतने पर भी जहाँ तक गुण, कर्म, स्वभाव पर आधारित व्यक्तित्व का सम्बन्ध है यह नहीं कहा जा सकता है कि विद्वान् और बुद्धिमान होने पर भी कोई मनुष्य उस क्षेत्र में उत्कृष्ट एवं सुसंस्कृत सिद्ध हो सकेगा या नहीं। शिक्षा और कुशलता की दृष्टि से सुयोग्य ठहरने वाले व्यक्ति भी दुर्बुद्धि, दुर्भावना एवं दुष्प्रवृत्तियों में लिप्त पाये जाते हैं। जबकि अशिक्षित और अकुशल समझे जाने वालों में से भी कितने ही आदर्शवादी, सद्गुणी और उदार जीवन जीने तथा लोक मंगल की दृष्टि से महान् प्रयोजन सम्पन्न करते देखे गये हैं।

तथ्यों पर विचार करने से प्रकट होता है कि अचेतन मस्तिष्क ही अपने क्षेत्र में आदतों की जड़ें गहराई तक जमा लेता है और उन्हीं के सहारे व्यक्तित्व का स्तर उठता गिरता रहता है। उस क्षेत्र में कारगर परिवर्तन करने से ही ऐसे परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं जिनके सहारे सामान्यों को असामान्य, दुर्बलों को समर्थ और पिछड़ों को अग्रगामी बनाया जा सके।

व्यक्तित्व को अभीष्ट दिशा में अग्रगामी बनाने के लिए विज्ञान क्षेत्र में मानवी चेतना के पक्ष की इन दिनों गहरी कुरेद बीन की जा रही है और देखा जा रहा है कि मस्तिष्क की उन रहस्यमयी परतों को किस प्रकार प्रखर, परिष्कृत, सक्षम एवं मनुष्य को अधिकाधिक समुन्नत बनाने में उन्हें किस प्रकार प्रयुक्त किया जा सकता है।

कहना न होगा कि व्यक्तित्व मान्यताओं, आदतों, इच्छाओं का समुच्चय मात्र है। वह इन्हीं तीनों के सहारे गढ़ा गया है। इनमें हेर-फेर करने से ही मनुष्य को किसी दिशा में प्रवीण-परिपक्व तत्पर सफल बनाया जा सकता है। अचेतन को मर्मस्थल एवं अन्तराल कहा गया है। इसे प्रभावित करने में सामान्य परामर्श काम नहीं करता। उसके लिए ऐसे उपाय अपनाने पड़ते हैं जिनकी पहुँच अन्तराल की गहराई तक सम्भव हो सके।

मस्तिष्क को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है और शरीर के अन्यान्य अवयवों की तरह उसे भी अपने ढंग का एक विशेष घटक माना गया है। बुद्धिमानी की गणना लगभग पहलवानों के स्तर से की जा सकती है। बहुत हुआ तो उसे कलाकारिता प्रतिभा, प्रवीणता के रूप में प्रतिपादित किया जाता है। इतने भर से महानता की उत्पत्ति नहीं होती। महामानव स्तर का व्यक्तित्व निखारने में सबसे अधिक सहायक यही सामर्थ्य स्रोत होता है जिसे वैज्ञानिक ‘अचेतन मन’ एवं अध्यात्मवादी चित्त कहते हैं। चित्त का परिष्करण इतना बड़ा पराक्रम है कि उसके बाद संसार की हर सफलता उपलब्ध की जा सके।

व्यक्ति का आज सबसे बड़ा दुर्भाग्य है-स्वयं के बारे में भ्रांति पूर्ण मान्यता। वस्तुतः मनुष्य वह नहीं है जो उसने मान रखा है। स्काटिश दार्शनिक डेविड ह्यूम कहते हैं− “हम अपने मस्तिष्क पर स्वयं की जो आकृति आरोपित कर देते हैं, वह त्रुटिपूर्ण है।” ‘स्व’ की वास्तविक अनुभूति जिस विवेक बुद्धि के सहारे होती है, उसे ही इण्ट्यूशन, प्रज्ञा या अन्तर्चक्षु कहते हैं।

चेतन मन प्रकृति का, ज्ञानेन्द्रियों एवं वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा निरीक्षण करता है जिसके फलस्वरूप विज्ञान का इतना विकास सम्भव हो सका है इसके अतिरिक्त चेतन मन आगमन-निगमन प्रक्रिया से तर्क करता है जिससे शास्त्रों का निर्माण हुआ है।

अचेतन मन में अन्तर्ज्ञान एवं अन्तःप्रेरणाएँ उत्पन्न होती हैं। इनके द्वारा ही वैज्ञानिक, मनीषी सन्त नये आविष्कार करने में एवं समाज को नवीन विचार, भावनाएँ आदि भेंट करने में सक्षम होते हैं।

‘सर पीटर मेडावार-नोबुल पुरस्कार विजेता का कथन है-तर्क बुद्धि की पहुँच अचेतन तक नहीं है। तर्क शक्ति के उपयोग की एक मर्यादा है। विभिन्न परीक्षणों एवं निरीक्षणों के संग्रह को सूत्रबद्ध करके सार्थक सिद्धान्तों में परिवर्तित कर देना तर्क शक्ति के परे की बात है। यह कार्य अन्तःप्रेरणा के माध्यम से हुआ करता है।”

उनका कहना है कि ‘सुपरमाइण्ड’ मन के ढर्रे में चल रहे चिन्तन से ऊपर की स्थिति है। ढर्रे का चिन्तन ‘कण्डीशण्ड’ यथास्थिति चिन्तन कहलाता है। इसे ही जाग्रत मन ‘चेतन मन’ कह सकते हैं। इसे भारतीय अध्यात्म शाँत अतिचेतन मन तथा "न्यूटेस्टामेंट" स्वर्ग साम्राज्य कहता है। यही हमारा वास्तविक ‘स्व’ है।

इसे ऐसे समझाया जाये कि यह क्या है, इसकी संरचना क्या है, इसके बजाय यह देखा जाना चाहिए कि यह क्या नहीं है? यह कण्डीशण्ड माइण्ड नहीं है। इसमें निषेधात्मक चिन्तन को कोई स्थान नहीं इसमें भय, ऐषणा, शंका की कोई जगह नहीं है। यह सदैव प्रसन्नता से युक्त है तथा आत्मिक एवं भौतिक दृष्टि से सबल सम्पन्न जीवन के यह सपने देखता है।

कण्डीशण्ड मन को हम चित्त या अचेतन कह सकते हैं जो कुसंस्कारों से युक्त है जो रह-रहकर सचेतन पर हावी होते हैं एवं नरपशु का जीवन जीने को बाध्य करते रहते हैं। जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार इसमें भरे पड़े हैं। चित्त का स्वभाव है कि वह स्वचालित जीवन जीता है। अधिकाँश का जीवन क्रम इसी प्रकार का होता है जिसका स्वाभाविक एक ही स्वरूप होता है-भोजन एवं प्रजनन। इससे परे इससे ऊँची भी कोई स्थिति हो सकती है, इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।

चित्त या कण्डीशण्ड मन हमारी मान्यताओं, पूर्वाग्रहों, विश्वास, संस्कारों, शंकाओं, प्रतिक्रियाओं एवं दुराग्रहों का समुच्चय है। ये सारे पक्ष हमारे व्यावहारिक जीवन को कष्ट में डालते हैं। यह मनुष्य का वास्तविक ‘स्व’ या सेल्फ नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि मनुष्य अपनी इस कारा से अपने को मुक्त करे-इन बन्धनों से स्वयं को निकाल बाहर करे।

रोजमर्रा का मन आत्मिक प्रगति में सहायक नहीं हो सकता। अपनी समस्त समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना हो तो मन को ऊँची स्थिति में ले जाना होगा। वास्तविक अध्यात्म यही है जिसमें मन को अज्ञात उच्चतम स्थिति की ओर मोड़ना होता है।

सुपरमाइण्ड हर व्यक्ति के अन्दर है, पर यह सोया हुआ है। मनुष्य का सबसे बड़ा पुरुषार्थ यही हो सकता है कि वह इसे जगा ले। अपनी निराशा एवं असीम भ्रम जंजालों से मुक्ति पाने के लिए मानव ने क्या-क्या प्रयास नहीं किये हैं-विज्ञान मनोविज्ञान, समाज, शास्त्र, शान्ति सम्मेलन, नैतिक विधि-विधान धर्म मत, दार्शनिक प्रतिपादन सभी मार्गों से व्यक्ति ने अपनी प्रगति का पथ खोता है, पर ये प्रयत्न गम्भीर एवं आन्तरिक ज्ञान की पिपासा से प्रेरित नहीं थे। जब सुपर मन जागता है तो बाह्य परिस्थितियाँ स्वतः ठीक होती चली जाती है। उठी हुई मनःस्थिति बाह्य जीवन की सारी परि-स्थितियों को बदलकर रख देती हैं। वास्तव में परिस्थितियों का उद्गम स्थल अन्तःकरण ही है। जैसे-जैसे हमारा स्तर ऊँचा उठता चला जाता है बहिर्जीवन का स्वरूप भी बदलता चला जाता है एवं परिस्थितियाँ अनुकूल हो जाती हैं। यदि हम अपने दैनिक जीवन में आने वाली परिस्थितियों के नियंत्रक होना चाहते हैं तो हमें मात्र एक चीज सीखनी होगी, वह है अपने ‘स्व’ पर, ‘इनर सेल्फ’ पर आधिपत्य।

जिसका मन ऊँचा उठ गया, सुपर मन बच गया, वह भय से दूर होता चला जाता है। तैतरीयोपनिषद् कहता है-जिसने अन्तः की शरण ले ली, उसे कोई भी भय नहीं प्रभावित कर पाता।"

एक साधारण व्यक्ति को यह जानकर बड़ा आश्चर्य होता है कि एक ओर जगत् हमारी कामनाओं, ऐषणाओं से परे हैं। बहुसंख्य व्यक्ति यह नहीं जानते कि हमारी आदतों से-संस्कारों से गढ़े मन (चित्त) एवं अति मन के बीच एक क्षीण-सी विभाजन रेखा है। मानव विनिर्मित कल्पनाएँ एवं मान्यताएँ, चिन्तन का जन प्रचलित ढर्रा ही इस रेखा की एनोटॉमी है। यदि इस बैरियर को तोड़ दिया जाये तो अन्तः के जगत में प्रवेश कर सकना सम्भव है, उस प्रकाश को पाना शक्य है जो अतिमन की जागृति का प्रथम चिन्ह है।

वस्तुतः आदमी का व्यक्तित्व विभाजित है। एक ओर वह सम्पर्क के व्यक्तियों तथा संचित सुख साधनों में अपनी सुरक्षा समझता है तो दूसरी ओर उनमें उसे खालीपन, एक शून्यता की भी अनुभूति होती है। उसे लगता तो है कि अन्तः में प्रवेश करना चाहिए, यह जानना चाहिए कि वस्तुतः हमारे जीवन का मकसद क्या है, पर इस सम्भावना से वह भयभीत है कि आत्म निरीक्षण मुझे कहीं निराश न कर दे, मेरा सही स्वरूप न उजागर कर दे। वह घोषणा तो करता है कि वह कुछ बड़ा काम करेगा, पर कर नहीं पाता। वह अपने आपको दूसरों के साथ सम्मिलित तो करना चाहता है पर ‘स्व’ को भुला व घुला नहीं पाता। रह-रहकर वे ही चिर संचित संस्कार आड़े आ जाते हैं जो उसके अनगढ़ मन के महत्वपूर्ण घटे बन गये हैं। उसकी मुस्कराहट में एक चिन्ता की झलक दिखाई पड़ती है। वह अपनी चिन्ता को दूर करने के लिये स्वयं को विभिन्न गतिविधियों में उलझाता है, पर जब वे समाप्त होने लगती हैं तो सम्भावित नीरवता उसे भयभीत कर देती है।

आज का व्यक्ति अत्यधिक भयभीत है। उसका तनाव उसे अस्थायी उत्तेजनाजनक सुखों में शरण लेने को बाध्य करता है, पर धीरे-धीरे भटकाव उसे वापस उसी स्थान पर बल्कि आत्मिक प्रगति के मार्ग पर कुछ पीछे ले आता है।

फ्रायड का कथन है− “सचेतन बुद्धिमुक्त मस्तिष्क की तुलना में अचेतन अत्याधिक समर्थ, सुदृढ़ और दूरगामी परिणाम प्रस्तुत कर सकने वाला है और लोक व्यवहार में विचार शक्ति का महत्व कितना ही क्यों न हो, व्यक्तित्व का स्वरूप बनाये रखने तथा निखारने में अचेतन कार्य क्षमता ही प्रभावी सिद्ध होती है।”

मनोविज्ञानी प्रिंसहार्न का कथन है-भौतिक सफलताएँ चातुर्य पर निर्भर हैं किन्तु मनुष्य का असामान्य एवं प्रतिभा सम्पन्न होना पूर्णतया उसके अचेतन पर निर्भर है। महामानवों को साधारण स्थिति से उबारने और ऊँचा उछालने में उनके पुरुषार्थ का उतना योगदान नहीं रहा जितना अन्तरंग से उमड़ने वाली प्रेरणा एवं आस्था का।”

ये सारे प्रतिपादन एक ही तथ्य का समर्थन करते हैं कि साधना और कुछ नहीं अचेतन का परिष्कार एवं स्व का उभार है। इस पुरुषार्थ में जिसने अपने को खपा दिया उसने आत्मोत्थान की प्रगति की दिशा में कुछ चरण आगे बढ़ाये। व्यक्तित्व का विकास इसी कटघरे से आरम्भ होता है और चलते-चलते अतिमन की स्थिति में व्यक्ति को महामानवों की श्रेणी में पहुँचाता है। साधना इसी आपे की जाती है। वेदान्त में जिस देव की ............................


पुण्य का सही अर्थ ज्ञात हुआ (Kahani)

कुशी नगर का राजा लोगों के पुण्य खरीदने के लिए प्रसिद्ध था। उसने तराजू लगा रखी थी। पुण्य बेचने वाले अपनी ईमानदारी की कमाई का विवरण लिखकर एक पलड़े में रखते। उस कागज के अनुरूप तराजू स्वयं स्वर्ण मुद्राएँ देने की व्यवस्था कर देती।

जय नगर पर शत्रुओं का आक्रमण हुआ और वहाँ के राजा को स्त्री-बच्चे समेत रात्रि के अँधेरे में भागना पड़ा। पास में कुछ न था। वे मार्ग व्यय तक के लिए कुछ साथ लेकर न चल सके।

दूर पहुँचने पर एक वृक्ष की छाया में बैठकर राजा-रानी विचार करने लगे कि अगले दिनों उदरपूर्ति किस प्रकार होगी? रानी ने सुझाया आपने जीवन भर बहुत दान-पुण्य किया था, उसी में से थोड़े से कुशी नगर नरेश को बेचकर धन प्राप्त कर लिया जाय।

राजा सहमत हो गये, पर भूखे पेट कुशी नगर तक पहुँचा कैसे जाये? रानी को एक उपाय सूझा बोली-ग्रामीणों के घरों में जाकर आटा पीसूँगी और नित्य के खाने में से जो बचेगा उसे जमा करती जाऊँगी। राजा रोटी बनायेंगे।”

राजा उस दिन रोटी सेंक रहे थे। कई जगह से अपने हाथ जला भी चुके थे। भोजन के पूर्व ही एक भिखारी वहाँ आ पहुँचा। उसने जब क्षुधित मुद्रा में रोटी माँगी, तो राजा हतप्रभ रह गए। अगर यह भी दे दिया, तो खाएँगे क्या? खाएँगे नहीं, तो दूसरे राज्य कैसे पहुँचेंगे?

रानी मदद को सामने आयीं। बोलीं-हम एक दिन और भूखा रह लेंगे, पहली वरीयता इसकी है। रानी की सलाह पर राजा ने सारी रोटियाँ उसे दे दीं व पूरा परिवार आगे चल पड़ा भूखे पेट।

मार्ग व्यय के लायक आटा हो गया, तो उसे लेकर राजा बनाते-खाते दस दिन में कुशी नगर पहुँचे। राजा को अपना अभिप्राय सुनाया। उत्तर मिला-धर्म काँटे पर चले जाइये, जो ईमानदारी का कमाया हो, उसे एक पलड़े में रख दीजिए। काँटा आपको उसी आधार पर स्वर्ण मुद्राएँ दे देगा।

जय नगर राजा ने अपने पुराने पुण्य स्मरण किये और उनमें से कई विवरण काँटे के पलड़े में रखा, पर उससे कुछ भी न मिला। उपस्थित पुरोहित ने कहा-आपने परिश्रमपूर्वक जो कमाया और दान किया उसी का विवरण लिखें।”

राजा को पिछले दिनों भिखारी को दी हुई रोटियाँ याद आई। उनने उसका ब्यौरा लिखकर तराजू में रखा। दूसरे पलड़े में उसके बदले में सौ स्वर्ण मुद्राएँ गिन दीं।

पुरोहित ने कहा-उसी दान का पुण्य फल होता है, जो ईमानदारी से परिश्रमपूर्वक कमाया गया हो।”

राजा ने रानी की उस दिन की सलाह को, परोपकार वृत्ति को धन्यवाद दिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुण्य का सही अर्थ ज्ञात हो सका व प्रतिफल मिल सका।


भोगी नहीं, ऊर्ध्वरेता बनें

साँसारिक भोगों में एक विचित्र आकर्षण होता है। यही कारण है कि वे मनुष्य के सहज ही अपनी ओर खींच लेते हैं, किन्तु इससे भी अद्भुत बात यह है कि यह जितनी ही अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं, मनुष्य का आकर्षण उतना ही उनकी ओर बढ़ता जाता है और शीघ्र ही वह दिन आ जाता है, जब मनुष्य इनमें आकण्ठ डूब कर नष्ट हो जाता है। यह प्रवृत्ति ठीक नहीं। संयम मनुष्य की शोभा ही नहीं, शक्ति भी है। अपनी इस शक्ति के सहारे उसे अपनी रक्षा करनी चाहिए। मनुष्य जीवन अनुपम उपलब्धि है। इस प्रकार सस्ते में उसका अंत कर डालना न उचित है, न कल्याणकारी।

यह निर्विवाद सत्य है कि भोगों की अधिकता मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार की शक्तियों का हास कर देती है। भोग, जिनमें भ्रमवश मनुष्य आनन्द की कल्पना करता है, वास्तव में विष रूपी ही होते हैं। यह रोग युवावस्था में ही अधिक लगता है। यद्यपि उठती आयु में शारीरिक शक्तियों का बाहुल्य होता है, साथ ही कुछ-न-कुछ जीवन तत्व का नव निर्माण होता रहता है। इसलिए उसका कुप्रभाव शीघ्र दृष्टिगोचर नहीं होता; किन्तु अवस्था का उत्थान रुकते ही इसके कुपरिणाम सामने आने लगते हैं। लोग अकाल अशक्त हो जाते हैं। नाना प्रकार की कमजोरियों और व्याधियों के शिकार बन जाते हैं। थोड़ी आयु और ढलने पर सहारा खोजने लगते हैं। इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और जीवन एक भार बन जाता है। शरीर का तत्व वीर्य जो कि मनुष्य की शक्ति और वास्तविक जीवन कहा गया है, का अपव्यय होता चला जाता है, जिससे सारा शरीर एकदम खोखला हो जाता है।

शंकराचार्य, ईसामसीह आदि महापुरुष जीवन भर ब्रह्मचारी रहे। ऊँचे उठे हुए बुद्धिजीवी लोग अधिकतर संयमी जीवन ही बिताने की चेष्टा किया करते हैं। वैज्ञानिक, दार्शनिक, विचारक, सुधारक तथा ऐसी ही उच्च चेतना वाले लोग संयम का ही जीवन जीते दृष्टिगोचर होते हैं। संयम से तात्पर्य मात्र शारीरिक ही नहीं, मानसिक व आध्यात्मिक ब्रह्मचर्य से भी है।

ब्रह्मचर्य की महिमा बतलाते हुए वेद भगवान ने तो यहाँ तक कहा है कि “ब्रह्मचर्येगा तपसा देवामृत्युमुपाघ्नत” ब्रह्मचर्य के प्रभाव से मनुष्य बलवान तथा शक्तिवान ही नहीं, वरन् मृत्यु तक को जीत सकता है। छान्दोग्य में इसकी महिमा बताते हुए यहाँ तक कहा गया है-एक तरफ चारों वेदों का उपदेश और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य यदि दोनों को तौला जाय तो ब्रह्मचर्य का पलड़ा वेदों के उपदेश के पलड़े के बराबर रहता है।” आयुर्वेद ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ में कहा गया है-सज्जनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास, धर्म शास्त्र के नियमों का ज्ञान और अभ्यास आत्मकल्याण का मार्ग है।

विदेशी प्रचारकों ने भी इसकी कम प्रशंसा नहीं की है। प्रसिद्ध प्राणी विज्ञानी डॉ. बोनहार्ड ने अपनी पुस्तक “सेलिबेसी एण्ड रिहेबिलिटेशन” में लिखा ‘ब्रह्मचारी यह नहीं जानता कि व्याधिग्रस्त दिन कैसा होता है। उसकी पाचन शक्ति सदा नियंत्रित रहती है और उसको वृद्धावस्था में भी बाल्यावस्था जैसा आनन्द आता है।” अमेरिकी प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. बेनीडिक्ट लुस्टा ने अपनी पुस्तक ‘नेचुरल लाइफ’ में कहा है कि जितने अंशों तक जो मनुष्य ब्रह्मचर्य की विशेष रूप से रक्षा और प्राकृतिक जीवन का अनुसरण करता है, उतने अंशों तक वह विशेष महत्व का कार्य कर सकता है। स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे कि जैसे दीपक का तेल बत्ती के ऊपर चढ़कर प्रकाश के रूप में परिणत होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अंदर का वीर्य तत्व सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान दीप्ति में परिवर्तित हो जाता है। रेतस का जो तत्व रति करने के समय काम में लगता है, जितेन्द्रिय होने पर वही तत्व, प्राण, मन और शरीर की शक्तियों को पोषण देने वाले एक दूसरे ही तत्व में बदल जाता है।

आधुनिक विज्ञान इतना विकसित हो जाने पर भी वीर्य की उत्पत्ति का कोई सिद्धान्त निश्चित नहीं कर पाया है। सामान्य रासायनिक रचना के अतिरिक्त उन्हें इतना ही पता है कि वीर्य का एक कोश (स्पर्म) स्त्री के डिम्ब (ओवम्) से मिल जाता है। यही वीर्य कोश पुनः उत्पादन आरंभ कर देता है और अपनी तरह तमाम कोश माँ से प्राप्त आहार द्वारा कोशिका विभाजन-प्रक्रिया के अनुसार विभक्त होता चला जाता है। कहना न होगा कि वीर्य का सूक्ष्मतम स्प चेतना का एक अति सूक्ष्म अंश है। इनकी लम्बाई 1/1600 से 1/1700 इंच तक होती है, जिसमें न केवल मनुष्य शरीर, वरन् विराट विश्व के शक्ति बीज छिपे होते हैं। सृष्टि को बहुगुणित बनाने की व्यवस्था भी इन्हीं बीजों में निहित होती है। उसकी शक्ति का अनुमान किया जाना कठिन है।

प्राचीन काल के योगियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से बिना किसी यंत्र के, महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त की थीं। आज वह विज्ञान द्वारा सही सिद्ध हो रही है। उदाहरण के लिए-भ्रूण काल के निर्माण के बाद शिशु जब विकसित होना प्रारम्भ करता है, तो ओजस उसके मस्तिष्क में ही संचित होता है। यही कारण है कि गर्भ में सन्तान का सिर नीचे की ओर होता है। जन्म के समय 10 रत्ती वीर्य बालक के ललाट में होता है। भारतीय तत्वदर्शियों का मत है कि इसी कारण परमहंस जैसी प्रकृति का विशुद्ध आनन्दवादी, निश्चिन्त और ‘केवलो हं’ होता है। शास्त्रों के अनुसार नौ से बारह वर्ष तक वीर्य शक्ति भौंहों से उतर कर कण्ठ में आ जाती है। प्रायः इसी समय बच्चे के स्वर में सुरीलापन आता है। इससे ठीक पूर्व दोनों की ध्वनि एक जैसी होती है। 12 से 16 वर्ष तक की आयु में वीर्य मेरुदण्ड से उपस्थ की ओर बढ़ता है और धीरे-धीरे मूलाधार चक्र में अपना स्थायी स्थान बना लेता है। काम विकार पहले मन में आता है, उसके बाद तुरन्त ही मूलाधार चक्र उत्तेजित हो उठता है और उसके उत्तेजित होने से वह सारा ही क्षेत्र जिसमें कि कामेन्द्रिय भी सम्मिलित होती है, उत्तेजित हो उठती है, ऐसी स्थिति में ब्रह्मचर्य की संभावना कठिन हो जाती है। 24 वर्ष तक की आयु में यह शक्ति मूलाधार चक्र में से समस्त शरीर में किस प्रकार व्याप्त हो जाती है इसका उल्लेख करते हुए शास्त्रकार कहते हैं कि जिस प्रकार दूध में घी, तिल में तेल, ईख में मीठापन तथा काष्ठ में अग्नि तत्व सर्वत्र विद्यमान रहता है, उसी प्रकार वीर्य सारी काया में व्याप्त रहता है।

यदि 25 वर्ष की आयु तक आहार-विहार को दूषित नहीं होने दिया जाय और ब्रह्मचर्य पूर्वक रहा जाय तो इस आयु में शक्ति की मस्ती और विचारों की उत्फुल्लता देखते ही बनती है। ऐसे बच्चे प्रायः जीवन भर स्वस्थ रहते हैं एवं इस प्रकार रेतस का रचना-पचना प्रायः हर क्षेत्र में उत्साह और सफलता के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

ऊर्ध्वरेता बनना अर्थात् जीवन को, ओज को अपने उद्गम स्थल ललाट में लाना, जहाँ से वह मूलाधार तक आया था, योग विद्या का काम है। कुण्डलिनी साधना में विभिन्न प्राणायाम साधनाओं द्वारा सूर्य चक्र की ऊष्मा को प्रज्ज्वलित कर इसी वीर्य को पकाया जाता है और उसे सूक्ष्म शक्ति का रूप दिया जाता है, तब फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मेरु दण्ड से ऊपर चढ़ने लगती है। साधक उसे क्रमशः अन्य चक्रों में ले जाता हुआ फिर से ललाट में पहुँचाता है। शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुँच जाना और सहस्रार चक्र की अनुभूति कर लेना ही ब्रह्म निर्वाण है। ऐसे व्यक्ति को ही भगवान शिव ने अपने समान सिद्ध और पूर्ण योगी बताया है।

कठिन साधनाएँ न करने पर भी जो वीर्य को अखण्ड रख लेते हैं, वे अपने अन्दर शक्ति का अक्षय भण्डार अनुभव करते हैं और कुछ भी कर सकने की क्षमता रखते हैं। सामाजिक कर्तव्यों के पालन द्वारा भी ऐसा सम्भव है, पर उसके लिए आज की पारिवारिक परिस्थितियों से लेकर शिक्षा पद्धति तक में परिवर्तन करना पड़ेगा। वीर्य, सृष्टि का मूल उपादान है। उसकी सामर्थ्य को समझा जाना चाहिए उसकी रक्षा की जानी चाहिए तथा ऊर्ध्वरेता के लाभों से लाभान्वित होकर जीवन को सफल-समुन्नत बनाने का प्राणपण से प्रयत्न करना चाहिए।


विशाखा सन्त के रूप में प्रख्यात हुई (Kahani)

नगर सेठ अनंगपाल जितने मृदुल स्वभाव के थे, उनकी पत्नी बिंदुमती उतनी की कर्कशा। इस कर्कशता का परिणाम यह होता कि कोई नौकरानी उनके पास टिकती नहीं थी। इतने बड़े घर की साज सँभाल उनसे अकेले होती नहीं थी। तब उनका क्रोध पति पर बरसता।

संयोगवश एक सेविका ऐसी मिली, जिसने कर्कशता के बीच जीवन गुजारा, घबराई नहीं, वरन् सुधार के बाद तक दृढ़तापूर्वक रुकी ही रही। सब कुछ ठीक होने पर ही वह अन्य ऐसे ही घर को सुधारने के लिए नया आश्रय ढूँढ़ते-ढूँढ़ते नगर सेठ के यहाँ पहुँची। आवश्यकता थी ही, सो तुरन्त नियुक्ति मिल गयी। सेविका की श्रमशीलता और मृदुलता ने गृहस्वामिनी का मन जीत लिया और न केवल व्यवस्था ही बनाई, वरन् स्वभाव भी बदल दिया।

काम पूरा हुआ, तो विशाखा अन्यत्र किसी कर्कशा गृहिणी के परिवार में आश्रय पाने के लिए निकली। गृह-स्वामी और सेठ उसे सभी सुविधा और साधन देते थे। फिर भी विशाखा मानी नहीं, उसने दूसरा वैसा ही घर तलाशा, जहाँ कलह और दारिद्रय का बोलबाला हो।

इस अद्भुत प्रकृति के बारे में पूछने वालों को विशाखा एक ही उत्तर देती-प्रवचन द्वारा धर्मोपदेश करने की अपेक्षा विपन्न लोगों के साथ रहकर उन्हें अपनी सदाशयता के सहारे सुधार लेना अधिक उपयुक्त है।

विशाखा के गुणों और उपदेशों की सर्वत्र चर्चा हुई। अन्ततः वह ब्रह्मावर्त क्षेत्र में प्रसिद्ध सन्त के रूप में प्रख्यात और सम्मानित हुई।


चरित्र रक्षा से बढ़कर कोई सिद्धि नहीं

हे तात्! मरकत मणि, सुवर्णनिस्क, मुक्तामाल यह सब बहुमूल्य आभूषण यदा-कदा धारण किए जाते हैं। अधिकाँश समय तो उनकी सुरक्षा व्यवस्था में ही जाता है। इसलिए इन्हें प्रत्येक व्यक्ति अपने पास नहीं रख सकते। किन्हीं सम्राट-साम्राज्ञियों श्री सामन्तों के पास ही वे सुरक्षित रह पाते हैं। सिद्धि भी ऐसी ही एक बहुमूल्य सम्पदा है, जिसे सुरक्षित रख सकना सबके लिए सम्भव नहीं। साँसारिक सुखोपभोग के आकर्षण में अधिकाँश योगी उसका विनिमय कर डालते हैं। उनकी अन्तःगति तो राज्य से निष्कासित चक्रवर्ती सम्राट और मणिहीन सर्प की सी दयनीय हो जाती है। इसीलिए विधान है कि जो उपयुक्त पात्र हो, जिसे तितीक्षा की कसौटी पर भली प्रकार कस लिया गया है उसे ही सिद्धि का अधिकार प्रदान किया जाये।

यह कहकर महामुनि क्रौष्टक चुप हो गए। उनकी मुख मुद्रा देखने से ऐसा प्रतीत होता था, जैसे अब उनकी चेतना विचारों के अगाध सागर में विलीन हो गयी हो। वे कुछ गम्भीर चिन्तन में निमग्न हो गए हैं-ऐसा समझकर कुछ आगे की बात न करके शिष्य सौभरि भी चुप हो गए और वहाँ से उठकर आचार्य देव के लिए संध्यादि के प्रबन्ध में जुट गए।

देर तक विचार करने के बाद भी क्रौष्टक अन्तिम निर्णय न कर सके कि सौभरि को सिद्धि प्रदान करने वाली उच्चस्तरीय साधनाओं का अधिकार प्रदान किया जाये अथवा नहीं। उनकी करुणा, उनका सहज स्नेह उमड़ता और कहता सौभरि ने तुम्हारी बड़ी सेवाएँ की हैं, उसे यह अधिकार मिलना ही चाहिए। किन्तु शास्त्र, अनुभव आड़े आ खड़े होते और पूछते-क्रौष्टक सिद्धि पाने के बाद भी क्या तुझे विचलित करने वाली परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा? क्या तुझे इन्द्रिय लालसाओं के दमन में अत्यधिक कठोरता बरतनी नहीं पड़ी? क्या यह सम्भव है कि सिद्धि पाने के बाद सौभरि को ऐसे सामाजिक जीवन के अनिवार्य सन्दर्भों का सामना नहीं करना पड़ेगा? मान लो यदि सौभरि तब अपने को न संभाल पाया, तो होगा न सिद्धि का दुरुपयोग? क्या यह ठीक नहीं, कि पहले उसे अग्नि दीक्षा में कस कर देख लिया जाये? पीछे पंचाग्नि साधना में प्रवेश दिया जाये?

क्रौष्टक का अन्तिम निर्णय यही रहा। दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही शिष्य सौभरि को उन्होंने अपने समीप बुलाया और बड़े स्नेह के साथ कहा-वत्स आश्रम जीवन की कठोरता के कारण तुम थक गए होंगे। आओ मैं तुम्हारे पैरों में एक अभिमंत्रित लेप करता हूँ। उससे तुम जहाँ भी पहुँचने की इच्छा करोगे, वायुवेग से वहीं जा पहुँचोगे और जब तक चाहोगे वहाँ पर विचरण करते रह सकोगे। इससे तुम्हारा श्रम, तुम्हारी उद्विग्नता दूर हो जाएगी।

गुरुदेव के वचन और इस अप्रत्याशित परिस्थिति पर सौभरि को आश्चर्य अवश्य हुआ किन्तु देश-भ्रमण की लालसा वेगवती हो उठी, सो उसने गुरुदेव की योजना का कोई विरोध नहीं किया।

क्रौष्टक ने सौभरि के पाँवों में अभिमन्त्रित औषधि का लेप कर दिया। अब मुझे महेन्द्र पर्वत(हिमालय) चलना चाहिए-ऐसी इच्छा करते ही सौभरि क्षण भर में उत्तर दिशा की ओर उड़ चले। उस रमणीय हिम और पुष्प लताओं से आच्छादित सुरम्य शिखरावली तक पहुँचने में उन्हें कुछ ही क्षण लगे। यहाँ की वन श्री, वन सौरभ स्वर्ग से भी बढ़कर अतुलित सौंदर्य वाले देखकर सौभरि का मन बड़ा प्रसन्न हुआ। वे भूमि पर उतरकर बहुत देर तक वहाँ विचरण करते रहे।

सुख की अभीप्सा है ही कुछ ऐसी कि व्यक्ति के विवेक, चातुर्य और जागरूकता को थोड़ी ही देर में नष्ट कर डालती है। ध्यान रहा नहीं। सौभरि के पैर शीतल तुषार में चलते रहे और धीरे-धीरे पैर में लगा सारा अनुलेप खुल गया। जब उनके मन में वापस लौटने की इच्छा हुई, तब पता चला कि वहाँ से वापस लौटा ले चलने वाली शक्ति तो नष्ट हो चुकी। सौभरि बड़े दुखी हुए और पश्चाताप करने लगे। आज पहली बार उन्हें किसी सिद्धि के प्रति घृणा और मानवीय पुरुषार्थ के प्रति विराट् आस्था का बोध हुआ। उन्होंने अनुभव किया-यह सामर्थ्य आत्म पराक्रम में ही है, जो व्यक्ति को चरम सीमा तक पहुँचाकर वहाँ से उद्धार भी कर सकती है।”

सौभरि अभी इसी तरह के विचारों में खोए ही थे कि उन्हें उस पर्वतीय उपत्यिका में शनैः शनैः समीप आती हुई सी पायलों की मधुर झंकार सुनायी दी। सौभरि सोचने लगे-यहाँ और कौन हो सकता है? तभी तिलोत्तमा के समान अप्रतिम सौंदर्य वाली मौलेया अप्सरा वरुथिनी आ उपस्थित हुई। सौभरि को उसने दूर से ही देख लिया था। वह सौभरि की सुगठित देह यष्टि और उनके दीप्तिमान सौंदर्य के प्रति आसक्त हो उठी थी। सौभरि को आकर्षित कर प्रणय जाल में बाँध लेने की इच्छा से वह जितना श्रृंगार कर सकती थी, किया था। स्वर्ण थाल में लाए वस्त्राभूषण, सुगन्धित अनुलेप और मधुर भोज्य प्रस्तुत करते हुए वरुथिनी ने एक लुभावनी दृष्टि सौभरि पर डाली और बोली-महाभाग मैंने पूर्व जन्म में कोई श्रेष्ठ पुण्य किया है, तभी आप जैसे प्रतापी सिंह पुरुष को पाने का सौभाग्य मिला है।”

“ओह भद्रे!” बहुत देर बाद सौभरि का कण्ठ फूटा-मैं तुम्हारी क्या सेवा कर सकता हूँ? तुम्हें किसी ने बंदी बनाया हो तो शीघ्र बताओ, मैं अभी उसे परास्त कर तुम्हें मुक्त कर सकता हूँ। तुम पर किसी ने ओछी दृष्टि डाली हो तो बताओ। आर्ये, तुम निश्चित जानो, मैं उसका मान मर्दन करने में किंचित् भी डरुँगा नहीं।”

यह सब होता तो वरुथिनी कहती भी। वह तो उस योग माया की तरह आयी थी जो संसार को क्षणिक सुख आकर्षण में बाँधकर, पारलौकिक सुख, संयम, शक्ति और जीवन से विच्युत किया करता है। एक क्षीण किन्तु मर्माहत कामुक दृष्टि से निक्षेप करते हुए वरुथिनी ने कहा-देव पुरुष! आपको पाकर मुझे अब एक ही वस्तु प्राप्त करने की इच्छा रह गई है। आप जानते ही होंगे, स्त्री पत्नी बनने के बाद एक मात्र मातृत्व की इच्छा रखती है। सो मैं भी उसी लालसा से आपकी सेवा में प्रस्तुत हुई हूँ। महान् पुरुष किसी की इच्छा ठुकराते नहीं हैं।” यह कहती हुई वरुथिनी सौभरि के बिलकुल समीप तक जा पहुँची।

सौभरि हतप्रभ रह गए। एक ओर मोहक रूप जाल था− दूसरी तरफ अध्यात्म का प्रकाशमान राज मार्ग। एक की दिशा सर्वस्व नाश की ओर थी, दूसरा अनन्तता की प्राप्ति का आश्वासन देता था। वह सोचने लगे, वासना जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकती। अगले पल उनका मन दृढ़ हो गया। उनके आध्यात्मिक संस्कार बड़े बलवान थे, वरुथिनी का आकर्षण जाल उन्हें बाँध नहीं पाया। उन्होंने कहा-भद्रे “मैंने जिस क्षण तुम्हें देखा, उसी समय मुझे अपनी कनिष्ठ सहोदरा का ध्यान आया था। तुम मेरी बहिन के समान हो। मैं तुम्हारे साथ समागम कैसे कर सकता हूँ?”


तुच्छता को त्यागें, महानता का वरण करें

नीति-मर्यादा का परिपालन ही सदाचार है। जहाँ सदाचार होता है, वहाँ सुव्यवस्था कायम रहती है ओर उन्नति-प्रगति भी होती रहती है। इसका लोप ही अव्यवस्था का कारण बनता है और पतन का निमित्त भी।

सदाचार में ऋजुता, सरलता और साधुता का समावेश है। इन्हीं से ऐसे लोग प्रशंसा पाते एवं महान् बनते हैं, किन्तु कठोर और क्रूर प्रकृति के कारण कदाचारी सर्वत्र अपयश और अपमान के भागी बनते हैं। नीतिवानों का जीवन यज्ञमय होता है। यज्ञ परमार्थ का पर्याय है। इसीलिए यज्ञीय जीवन को दिव्य जीवन कहा गया है। जहाँ यज्ञीय भाव है, वहाँ प्रकारान्तर से सदाचरण की ही उपस्थिति समझना चाहिए। सदाचार युक्त नैतिक जीवन की पराकाष्ठा यज्ञ में हुई है। इसी से सत्कर्म पैदा होते, उसी में स्थिर रहते और उसी में उनकी पूर्णता है।

यज्ञीय जीवन सृजनात्मक होता है। संसार में जब-जब सर्वहित की भावना से, सर्वोन्नति की कामना से क्रान्तियाँ हुई हैं, तब-तब निर्माण कार्य भी विपुल हुए हैं। साहित्य, कला आदि सभी पर उनका प्रभाव सुस्पष्ट है। मनुष्यों के हृदयों में सर्वहित का संकल्प दृढ़ हो, इसके लिए विशिष्ट आचार की, ऐसे व्यवहार की नितान्त आवश्यकता रहती है, जिसमें सब प्रेमपाश में ओत-प्रोत हुए, सहयोग करते हुए आगे बढ़े। सदाचरण पर ही यज्ञ क्रिया निर्भर है और यज्ञ भावना से सदाचार उन्नत होता है। उदारता की स्थिरता के लिए सत्य आचरण अत्यन्त आवश्यक है। सत्याचरण से परस्पर विश्वास, स्नेह और सौहार्द के भाव उदय होकर दृढ़ होते हैं। यही दृढ़ता मनुष्यों में उद्देश्य पूर्ति के लिए तन, मन, धन लगाने की उत्कट भावना उमगाती है। यह उत्साह वहीं दिखाई पड़ता है, जहाँ सद्भावना होती है। दुर्भावना तो आपसी दूसरी बढ़ाती, कटुता पैदा करती और विनाश के कुचक्र रचती है, जबकि सद्भावना की शक्ति रचनात्मक होती है। यह शक्ति जब सत्संकल्प, सद्विचार के रूप में प्रकट होती है, तो दिव्य वातावरण का निर्माण करती, धरती पर स्वर्ग उतारती और मनुष्यों में देवताओं की झाँकी उत्पन्न करती है।

इसके विपरीत स्वार्थ में पारस्परिक वैर-विरोध ही बढ़ता है। जहाँ स्वार्थ होगा, वहाँ उसकी भगिनी ईर्ष्या भी साथ होती है। स्वार्थी व्यक्ति न दूसरों की उन्नति देख सकता है, न शान्ति। वह सदा इसी फिराक में रहता है कि कैसे उसकी शान्ति छीनी जाय और उन्नति का अपहरण किया। इस निमित्त वह अपना बहुमूल्य समय और श्रम खपाता और पैसा भी बहाता रहता है। यह सम्पदा यदि उसकी स्वयं की प्रगति के लिए लगी होती तो शायद वह अपने प्रतिपक्षी से भी कई मामलों में आगे बढ़ गया होता, पर मूढ़मति को यह शिक्षा कौन दे कि इसमें सामने वाले की कोई हानि नहीं, जबकि स्वयं का घाटा अपार है। जहाँ दुर्बुद्धि और दुर्भाव होंगे, वहाँ अभाव ही अभाव होगा। शान्ति का अभाव, संतोष का अभाव, धन, यश, कौशल और विवेक का अभाव-यह सब दुर्बुद्धि की परिणति है। दुर्भाव उसे और मजबूत आधार प्रदान करता है। स्वार्थ को यदि स्वतंत्र और निरंकुश छोड़ दिया जाय, तो यह व्यक्तियों नहीं, जातियों नहीं, राष्ट्रों तक में कलह-विग्रह बढ़ा कर महायुद्ध की भीषण दुरभिसंधि खड़ी करता है। इस दिनों जाति, धर्म, भाषा, लिंग, क्षेत्र के नाम पर होने वाले विवाद और दंगों के मूल में इसी की मुख्य भूमिका है। स्वार्थी अपना छोटा-सा स्वार्थ साधने के पीछे पूरे समाज और राष्ट्र को वैर, वैमनस्य एवं हिंसा के गर्त में धकेल देता है। यह तनिक भी नहीं सोचता कि इसका अन्तिम परिणाम क्या होगा? क्या वह स्वयं इस परिणाम से बचा रह सकेगा? शायद इसे उसकी स्वार्थ-बुद्धि सोचने नहीं देती। यही कारण है कि सर्वत्र उसकी निन्दा-भर्त्सना के साथ-साथ अपकर्ष भी होता चलता है। उत्कर्ष यदि कहीं दिखाई पड़ता है, तो वह “चार दिनों की चाँदनी फिर अँधेरी रात” वाली कहावत ही चरितार्थ करता और यह बताता है कि बालू की ढेर को चट्टानी टीला न समझा जाय, जो प्राकृतिक व्याघातों के बावजूद भी सदा अपने को अजर-अमर बनाये रखता है। परमार्थपरायणता की ही जड़ इतनी मजबूत हो सकती। स्वार्थपरता तो एक ठोकर खाकर ही छिन्न-भिन्न होने लगती है।

जहाँ विकार है, वहीं क्षुद्र इच्छाएँ पनपती हैं। यदि इस विकार को मिटाया जा सके, तो भावनाएँ शुभ और निरभ्र आकाश जैसी होंगी। फिर इस उद्गम से जो कामनाएँ पैदा होंगी, वह स्रोत जैसी ही शुभ और शिव संकल्पयुक्त होंगी। इसी स्थिति में मानवी ध्येय श्रेय हो पाता और व्यक्ति महानता की ओर अग्रसर होता है महान् व्यक्ति ही श्रेष्ठ युग और सभ्य समाज को जन्म देता है। इन दिनों का समाज सभ्य जैसा लगते हुए भी असभ्यता के चरम पर पहुँचा हुआ है। यदि इसका कारण ढूँढ़ना हो तो मानवी मन का अध्ययन करना पड़ेगा और यह देखना पड़ेगा कि प्रगति का इतना विराट् विस्तार कर लेने पर भी मनुष्य असभ्य स्तर का किस भाँति बना रहा? पर्यवेक्षण से यही ज्ञात होता है कि दोनों प्रकार के मानवों में एक मूलभूत अन्तर है। आदि मानव अपने अल्प विकसित बुद्धि और मन के कारण असभ्य बने हुए थे, तो वर्तमान मानव अपनी सुविकसित बुद्धि के कारण इस श्रेणी में आ पहुँचे। इस मध्य प्रगति यात्रा की इस विशाल अवधि में उसकी बुद्धि तो बढ़ी, पर मन पशुवत् बना रहा। बुद्धि के विकास के साथ-साथ मन का परिष्कार न हो सका, इसलिए आज वह बुद्धि की दृष्टि से सर्वोच्च स्थिति में रहने पर भी मन पर पशुताजन्य क्षुद्रता के लदे रहने के कारण जिस बुद्धि का उपयोग विकास के कामों में होना चाहिए था, सम्प्रति विनाश प्रयोजनों में लगी रहकर मनुष्य की असंस्कृति का पर्याय बनी हुई है। इसीलिए जहाँ बुद्धि का विकास वाँछनीय है, वहाँ मानसिक चेतना का परिष्कार भी अभीष्ट है, तभी बुद्धि का सदुपयोग हो सकेगा और व्यक्ति देवोत्तम बन सकेगा।

देवता अर्थात् सदाचारी, दानव अर्थात् दुराचारी। दोनों में आकाश-पाताल जैसा अन्तर है। सदाचारी में स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा होता है, जबकि दुराचारी में इसका स्थान उद्धत अहंकार लिये होता है। सदाचारी में आत्म सम्मान होता है, जबकि दुर्जनों में घमंड। उद्दण्डता दुराचारी का दुर्गुण है, तो साधुता सत्पुरुष का आभूषण। कुटिल प्रकृति के कपटी लोग ढीठ होते हैं, तो ईश्वर विश्वासी विनयशील जन सभ्य स्वभाव के। निर्लज्जता कुकर्मियों में प्रायः देखी जाती है, तो मर्यादा सभ्य जनों की विशेषता है।

मृदुलता सौम्य लोगों का स्वाभाविक लक्षण है, तो कठोरता असभ्यों की चिर-परिचित पहचान है। साधु लोगों का जीवन अकृत्रिम होता है, जबकि असाधु बनावटीपन में जीते हैं। सज्जनों की चापलूसी सिर्फ ईश्वर के दरबार में होती है, किन्तु दुर्जन प्रकृति के लोभी लोग जहाँ स्वार्थपूर्ति की संभावना दिखाई पड़ती है, वहीं चाटुकारिता प्रदर्शित करने लगते है। उत्तम पुरुष आत्मिक उन्नति करते हुए आत्म साक्षात्कार की दिशा में अग्रसर होते हैं, जबकि अधम पुरुष अपनी आत्मा का गला घोंटते हुए पतनोन्मुख बनते देखे जाते हैं। एक का लक्ष्य महान् है, दूसरे का आदर्श अतिशय क्षुद्र। एक मिल-बाँट कर खाने और सहयोग-साकार से जीने के दर्शन पर विश्वास करता है, तो दूसरे की नीति अनीति और अपहरण है। एक धर्म का अनुचर है, तो दूसरा अधर्म का अनुयायी। एक में सहिष्णुता की पराकाष्ठा है, तो दूसरा उतना ही असहिष्णु। एक का उद्देश्य समाज को सुखी बनाना है, जबकि दूसरे का लक्ष्य उसे दुःख के महागर्त में धकेल देना है।

इस प्रकार देखा जाये तो हम पायेंगे कि सद्गुणों की सम्पत्ति में ही व्यक्ति और समाज की वास्तविक उन्नति छिपी हुई है। जहाँ दुर्गुण होंगे, वहाँ उसके पीछे अवनति भी प्रच्छन्न रहती है। यहाँ यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ सकता है कि यदि पतन और अवगुण सगे भाई हैं, तो फिर-चोरों डकैतों, बेईमानों, ठगों, अपराधियों की उन्नति दिन दूनी रात चौगुनी होती क्यों दिखाई पड़ती है? जबकि सरल और ईश्वर परायण लोग जीवन भर जहाँ-के-तहाँ बने रहते हैं। इस संबंध में पहली बात तो यह है कि डकैतों और दुर्जनों की प्रगति उक्त कर्म में लिप्त रहने ............................................................. संभव है नीच कर्म से .......................... सम्पत्ति की चकाचौंध से कोई उन्हें उन्नत मान ले, पर उन्नति की इस प्रकार की परिभाषा करना बुद्धि के दिवालियेपन के अतिरिक्त और कुछ नहीं। यह ठीक है कि उन्नति भौतिक भी होती है, पर किसी की सम्पदा पर अवैध कब्जा जमा लेना और यह घोषित करना कि उसने धन कमा लिया, उत्कर्ष कर लिया-सरासर गलत है। प्रगति जहाँ भी होगी वहाँ श्रम-सीकर भी गिरेंगे। पुरुषार्थ का पसीना बहाये बिना यह संभव नहीं। फिर भी कुछ क्षण के लिए यदि इसे उन्नति मान भी ली गई, तो तत्काल दूसरा सवाल उठ खड़ा होगा कि क्या मनुष्य का लक्ष्य इसी प्रकार की प्रगति करना है? उत्तर “नहीं” में प्राप्त होगा।

वास्तव में जीवन का मूल उद्देश्य आत्मिक विकास करना है। आत्मिक विकास उन गुणों को विकसित करके ही संभव हो सकता है, जो आत्मा का स्वाभाविक गुण है। आत्मा का गुण उत्कृष्टता मूलक है। हम स्वयं को श्रेष्ठ-सदाचारी बनाकर ही इस स्तर को प्राप्त कर सकते हैं, जिसमें मनुष्य देवता कहलाने का अधिकारी बनता है। दानव तो यत्र-तत्र-सर्वत्र ही इन दिनों देखे जा सकते हैं। हमारी गरिमा और महिमा इसी में है कि हम तुच्छता को त्यागें और महानता का वरण करें। तभी अव्यवस्था का अन्त और सुव्यवस्था का शुभारंभ हो सकेगा और समाज दयनीय से दिव्य बन सकेगा।


नारी का सबसे बड़ा आभूषण (Kahani)

नारी का सहज रूप शील प्रधान है। वही उसका सबसे बड़ा आभूषण भी है।

अरस्तू की एक कन्या थी। नाम था पीथिया। अरस्तू के शिष्य सिकन्दर की रानियाँ एक दिन गुरु गृह गईं और आतिथ्य के उपरान्त उनने पीथिया से पूछा− “चेहरे को अधिकाधिक सुन्दर बनाने के लिए क्या उबटन लगायें?” पीथिया ने कहा-उनका सबसे बड़ा सौंदर्य है लज्जा, उसे वे बनाए रखें तो अधिक उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नहीं। सौंदर्यवान वही है, जो शीलवान् भी है।”


सारा जगत ही शब्दमय है

शब्द द्वैतवाद के अनुसार शब्द ही ब्रह्म है, उसकी ही सत्ता है। सम्पूर्ण जगत शब्दमय है। शब्द की ही प्रेरणा से समस्त संसार गतिशील है। महती स्फोट की प्रक्रिया से जगत की उत्पत्ति हुई तथा उसका विनाश भी शब्द के साथ होगा। इन्द्रियों में सबसे अधिक चंचल तथा वेगवान मन को माना गया है। मन के तीन प्रमुख कार्य हैं-स्मृति कल्पना तथा चिन्तन। इन तीनों से ही मन की चंचलता बनती है। लेकिन यदि मन को शब्द का माध्यम न मिले तो उसे चंचलता नहीं प्राप्त हो सकती। उसकी गति शब्द की बैसाखी पर निर्भर है। सारी स्मृतियाँ, कल्पनाएँ तथा चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।

दैनन्दिन जीवन में काम आने वाले शब्दों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-व्यक्त और अव्यक्त। जैन पंथी इन्हें अपनी भाषा में जल्प् और अन्तर्जल्प् कहते हैं। जो बोला जाता है, उसे जल्प् कहते हैं। जल्प् का अर्थ है-व्यक्त स्पष्ट मन्तव्य। जो स्पष्टतः बोला नहीं जाता, मन में सोचा अथवा जिसकी मात्र कल्पना की जाती है, वह है-अन्तर्जल्प् मुँह बन्द होने, होठ के स्थिर होने पर भी मन के द्वारा बोला जा सकता है, जो कुछ भी सोचा जाता है वह भी एक प्रकार से बोलने की प्रक्रिया है तथा उतनी ही प्रभावशाली होती है, जितनी की व्यक्त वाणी।

शब्द अपनी अभिव्यक्ति के पूर्व चिंतन के रूप में होता है। अपनी उत्पत्ति काल में वह सूक्ष्म होता है पर बाहर आते-आते वह स्थूल बन जाता है। जो सूक्ष्म है वह हमारे लिये अश्रव्य है। जो स्थूल है वही सुनाई पड़ता है। ध्वनि विज्ञान ने ध्वनियों को दो रूपों में विभक्त किया है-श्रव्य और अश्रव्य। अश्रव्य अर्थात्-अल्ट्रा साउण्ड-सुपर सोनिक। हमारे कान मात्र 20000 कम्पन आवृत्ति को ही पकड़ सकते हैं। वे न्यूनतम 20 कम्पन आवृत्ति प्रति सेकेंड तथा अधिकतम 20 हजार कम्पन आवृत्ति प्रति सेकेंड को पकड़ने में सक्षम हैं। पर उनसे कम तथा अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों का भी अस्तित्व है। श्रवणेन्द्रियों की मर्यादा अपनी सीमा रेखा को चीर नहीं पाती। फलस्वरूप वे ध्वनियाँ सुनाई नहीं पड़तीं। कान यदि सूक्ष्मातीत ध्वनि तरंगों को पकड़ने लगें तो मालूम होगा कि संसार में नीरवता कहीं और कभी भी नहीं है। कमरे में बन्द आदमी अपने को कोलाहल से दूर पाता है। पर सच्चाई यह है कि उसके चारों ओर कोलाहल का साम्राज्य है।

समूचा अन्तरिक्ष ध्वनि तरंगों से आलोड़ित है। उनमें से थोड़ी-सी ध्वनियाँ मात्र मनुष्य के कानों तक पहुँच पाती हैं। प्रकृति की अगणित घटनाएँ सूक्ष्म जगत में पकती रहती हैं। घटित होने के पूर्व भी उनकी सूक्ष्म ध्वनि तरंगें सूक्ष्म अन्तरिक्ष में दोलायमान रहती है। उन्हें पकड़ा और सुना जा सके तो कितनी ही प्रकृति की घटनाओं का पूर्वानुमान लगा सकना सम्भव है। मनुष्येत्तर कितने ही जीव ऐसे हैं जिन्हें प्रकृति की घटनाओं का, भूकम्प, तूफान आदि विभीषिकाओं का पूर्वाभास हो जाता है। सूचना मिलते ही उनका व्यवहार बदल जाता है। अपनी आदत के विरुद्ध वे अस्वाभाविक आचरण करने लगते हैं। कितने ही सुरक्षा के लिए सुरक्षित स्थानों की ओर दौड़ने लगते हैं। सूक्ष्म ध्वनि स्पन्दनों के आधार पर ही वे सम्भाव्य विभीषिकाओं का अनुमान लगा लेते हैं।

जो कुछ भी बोला अथवा सोचा जाता है वह तुरन्त समाप्त नहीं हो जाता, सूक्ष्म रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान रहता, तरंगित होता रहता है। हजारों-लाखों वर्षों तक ये कम्पन उसी रूप में रहते हैं। ऐसे प्रयोग भी वैज्ञानिक क्षेत्र में चल रहे हैं कि भूतकाल में जो कुछ भी कहा गया है, ईथर में विद्यमान हैं उसे यथावत् पकड़ा जा सके। सदियों पूर्व महामानवों ऋषिकल्प देवपुरुषों ने क्या कहा होगा, उसे प्रत्यक्ष सुना जा सके ऐसे अनुसन्धान प्रयोग विधि में है। अभी सफलता तो नहीं मिल पायी है पर वैज्ञानिक आश्वस्त हैं कि आज नहीं तो कल वह विद्या हाथ लग जायेगी। निस्सन्देह यह उपलब्धि मानव जाति के लिए महत्वपूर्ण तथा अद्वितीय होगी, अब तक की वैज्ञानिक उपलब्धियों में वह सर्वोपरि होगी। सम्भवतः इसी आधार पर कृष्ण द्वारा कही गयी गीता एवं राम-रावण संवादों को अपने ही कानों से सुनना सम्भव हो सकेगा।

रेडियो, टेलीविजन, राडार की भाँति प्राचीन काल के आविष्कारों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथा चमत्कारी खोज थी-मंत्र विद्या। मंत्र ध्वनि विज्ञान का सूक्ष्मतम विज्ञान था। इसके अनुसार जो कार्य आधुनिक यंत्रों के माध्यम से हो सकते हैं, वे मंत्र के प्रयोग से भी सम्भव हैं। पदार्थ की तरह अक्षरों तथा अक्षरों से युक्त शब्दों में अकूट शक्ति का भाण्डागार मौजूद है। मंत्र कुछ शब्दों के गुच्छक मात्र होते हैं। पर ध्वनि शास्त्र के आधार पर उनकी संरचना बताती है कि एक विशिष्ट ताल, क्रम एवं गति से उनके उच्चारण से विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है। प्राचीन काल में ऋषियों ने शब्दों की गहराई में जाकर उनकी कारण शक्ति की खोज-बीन के आधार मंत्रों एवं छंदों की रचना की थी। पिछले दिनों ध्वनि-विज्ञान पर अमेरिका, पं. जर्मनी में कितनी ही महत्वपूर्ण खोजें हुई हैं। साउण्डथेरेपी एक नयी उपचार पद्धति के रूप में विकसित हुई है। ध्वनि कम्पनियों के आधार पर मारक शास्त्र भी बनने लगे हैं। ब्रेन वाशिंग के अगणित प्रयोगों में ध्वनि विद्या का प्रयोग होने लगा है। अन्तरिक्ष की यात्रा करने वाले राकेटों, स्पेस शटलों के नियंत्रण संचालन में भी शब्द विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान है। पर वैज्ञानिक क्षेत्र में ध्वनि विद्या का अब तक जितना प्रयोग हुआ है, वह स्थूल है, सूक्ष्म और कारण स्वरूप अभी भी अविज्ञात, अप्रयुक्त है जो स्थूल की तुलना में कई गुना अधिक सामर्थ्यवान है। मंत्रों में शब्दों की स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म एवं कारण शक्ति का अधिक महत्व है। मानवी व्यक्तित्व की गहरी परतों-मन एवं अन्तःकरण को मन्त्र की सूक्ष्म एवं कारण शक्ति ही प्रभावित करती है। व्यक्तित्व का रूपान्तरण विचारों में परिवर्तन उसके प्रभाव से ही होता है।

यों तो वेदों के हर मंत्र एवं छंद का अपना महत्व है। दिखने में गायत्री महामंत्र भी अन्य मंत्रों की तरह सामान्य ही लगता है, जो नौ शब्दों तथा 24 अक्षरों से मिलकर बना है। पर जिन कारणों से उसकी विशिष्टता आँकी गयी है वे हैं-मंत्र के विशिष्ट क्रम में अक्षरों एवं शब्दों का गुँथन प्रवाह, उनका चक्र-उपत्यिकाओं पर प्रभाव तथा उसकी महान प्रेरणाएँ। हर अक्षर एक विशिष्ट क्रम में जुड़कर असीम शक्तिशाली बन जाता है। 24 रत्नों के रूप में अक्षरों के नवनीत का एक मणिमुक्तक बना तथा आदिकाल में प्रकट हुआ। ब्रह्म की स्फुरणा के रूप में गायत्री मंत्र का प्रादुर्भाव हुआ तथा आदि मंत्र कहलाया, सामर्थ्य की दृष्टि से इतना विलक्षण एवं चमत्कारी अन्य कोई भी मंत्र नहीं है। दिव्य प्रेरणाओं की उसे गंगोत्री कहा जा सकता है। संसार के किसी भी धर्म में इतना संक्षिप्त, पर इतना अधिक सजीव एवं ............................ कोई भी प्रेरक दर्शन नहीं है जो एक साथ उन सभी प्रेरणाओं को उभारे .................................................................... ओर बढ़ने तथा ...................... सम्पन्न बनने का पथ प्रशस्त होना है

ब्रह्म की अनुभूति शब्द ब्रह्म नाद ब्रह्म के रूप में भी होती है जिसकी सूक्ष्म स्फुरणा हर पल सूक्ष्म अन्तरिक्ष में हो रही है। गायत्री महामंत्र नाद ब्रह्म तक पहुँचने का एक सशक्त माध्यम है। प्राचीन काल की तरह सामान्य व्यक्ति को भी अतिमानव-महामानव बना देने की सामर्थ्य उसमें मौजूद है। आवश्यकता इतनी भर है कि गायत्री मंत्र की उपासना के विधि-विधानों तक ही सीमित न रहकर उसमें निहित दर्शन एवं प्रेरणाओं को भी हृदयंगम किया जाये और तद्नुरूप अपने व्यक्तित्व को ढाला जाय। पूरी श्रद्धा के साथ मंत्र का अवलम्बन किया जा सके तो आज भी वह पुरातन काल की ही तरह चमत्कारी सामर्थ्यशाली सिद्ध हो सकता है।


साहसी ग्रेट कनिंघम (Kahani)

सर्दी के दिनों में अँगीठी सुलगाने के प्रयास में दो छोटे बच्चों ने मिट्टी के तेल के स्थान पर पेट्रोल डाल दिया, आग भड़की। एक तो तत्काल मर गया। दूसरा महीनों अस्पताल में रहने के बाद कुरूप और अपंग हो गया। दोनों पैर लकड़ी की तरह सूख गये। पहियेदार कुर्सी के सहारे घर लौटा तो किसी को आशा न थी कि वह कभी चल-फिर भी सकेगा। पर लड़के ने हिम्मत नहीं छोड़ी। आज की तुलना में अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए वह प्रयत्न करता रहा। निराश या खिन्न होने के स्थान पर उसने प्रतिकूलता को चुनौती के रूप में लिया और उसे अनुकूलता में बदलने के लिए अपने कौशल और पौरुष को दाँव पर लगाता रहा। उसने बैसाखी के सहारे न केवल चलने में, वरन् दौड़ने में सफलता पाई और पुरस्कार जीते। इस विपन्नता के बीच भी उसने पढ़ाई जारी रखी, एम. ए., पी.एच.डी. उत्तीर्ण की और विश्वविद्यालय में निर्देशक के पद पर आसीन हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध में वह मोर्चे पर भी गया। जहाँ अड़ा वहीं सफल रहा। रिटायर होने पर उसने अपनी जमा पूँजी से अपंगों को स्वावलम्बन देने वाला एक आश्रम खोला, जिसमें इन दिनों आठ हजार अपंगों को पढ़ने, रहने और कमाने का प्रबन्ध है। अमेरिका में संकल्पवान् साहसी ग्रेट कनिंघम का नाम बड़ी श्रद्धापूर्वक लिया जाता है और कठिनाइयों से जूझने के लिये उसका जीवन वृत्तांत पढ़ने-सुनने का परामर्श दिया जाता है।


सिद्धियों का भाण्डागार है मानवी अन्तराल

कुमायुँ की पहाड़ियों पर कई दिन घूमते, वन श्री का अवलोकन करते हुए वह कुमायुँ के राजा साहब और रानी साहिबा के साथ नैनीताल के पास एक ऐसे स्थान पर जा पहुँचे जहाँ की फूलों की छटा देखते ही बनती थी। समय काफी हो चुका था, यह स्थान भी बहुत रमणीक था सो उस दिन पड़ाव के लिए उसे ही चुन लिया गया। आज्ञा होते ही खेमे गाड़ दिये गये। थोड़ी देर पहले जो स्थान निविड़ एकान्त था, अब उसी में सैकड़ों तंबू लग गये, सेवक-सेविकाओं की चहल-पहल और व्यस्तता दिखाई देने लगी।

रात के बारह बजे तक गपशप भोजन-पान चलता रहा और इसके बाद फिर सन्नाटा छाने लगा। सब लोग अपने-अपने बिस्तरों पर चले गये और दिन भर के थके होने के कारण थोड़ी ही देर में सो गये। नींद का पहला चरण ही पूरा हुआ था कि उन्होंने अनुभव किया कि उनकी चारपाई पर कोई है। नींद टूट गयी। उन्होंने स्पष्ट सुना-कोई उनका नाम लेकर कह रहा है-मिस्टर फैरेल-जिस स्थान पर आपका यह तंबू लगा है, इसकी हमें पहले से ही आवश्यकता है, तुम इस स्थान को खाली कर दो, मेरी बात तुम्हारी समझ में न आये तो सामने उत्तर-पश्चिम में जो पहाड़ी दिखाई दे रही है, वहाँ आओ मैं तुम्हें सब समझा दूँगा।”

“पर आप हैं कौन?” यह कहते हुए उन्होंने चारपाई से उठकर टार्च जलाई। सारा तंबू प्रकाश से भर गया, पर वहाँ कोई भी तो नहीं आया था। वह बाहर निकल कर आये, लेकिन वहाँ पर भी कोई नहीं था। किसी के पैरों के निशान भी तो नहीं थे जिससे पता चलता कि वहाँ कोई आया है। एक बार तो उन्हें कुछ भय सा लगा, किन्तु दूसरे ही क्षण वे चुपचाप तंबू में चले गये और पुनः सोने के लिए लेट गये। लेटते समय उन्होंने घड़ी देखी-रात के साढ़े तीन बजे थे।

बहुत प्रयत्न करने पर भी उन्हें नींद नहीं आ रही थी, किसी तरह आँखें मूँद लेते थे, तभी फिर किसी के आने की सी आहट हुई। लेटे ही लेटे उन्होंने आँखें खोली और देखा कोई छाया पुरुष सामने खड़ा है, इस बार भी उसने वही शब्द कहे। उनने पहचान के लिए जैसे ही टार्च जलाई कि वहाँ न तो कोई छाया थी, न आदमी-वही एकान्त। सारे शरीर से पसीना फूट पड़ा। आज तक उन्होंने कभी भी अपने अंदर साहस की कमी अनुभव न की। अनेकों बार युद्ध की भयंकरता झेली थी। अपने बढ़े-चढ़े साहस के कारण ही आज वह पश्चिमी कमाण्ड के सेनापति थे। लेकिन आज वह एक बार अतीन्द्रिय सत्ता की कल्पना मात्र से सहम उठे। देह काँपने लगी, मुँह से एक शब्द फूटना भी आफत थी। चुपचाप आँखें ही मूँदते बनी। फिर सुबह तक न उनने आँखें खोली और न कुछ देखा या सुना पर एक विलक्षण आकर्षण उठ रहा था कि क्यों न उस पहाड़ी पर चलकर देखें बात क्या है? जूते, कपड़े पहनकर बाहर निकले, देर से सोने के कारण बाकी लोग अभी तक सोये पड़े थे। श्री फैरेल बाहर निकले और चुपचाप उस पहाड़ी की ओर चल पड़े।

जिस स्थान पर पहुँचने के लिए उन्हें निर्देश दिया गया था, वहाँ तक पहुँचने का रास्ता बहुत ही दुर्गम, सँकरा और भयावह था। ऊपर चढ़ने की हिम्मत जबाब दे रही थी, लेकिन न जाने कौन सा अदम्य आकर्षण उन्हें ऊपर खींचे लिए जा रहा था। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई व्यक्ति साथ-साथ रास्ता दिखाता चल रहा हो। ऊपर चढ़ने की शक्ति भी कोई अदृश्य सत्ता ही जुटा रही थी। साढ़े तीन घण्टे के कड़े परिश्रम के बाद वह ऊपर जा पहुँचे। हाँफी और पसीने के कारण दम फूल रहा था, आगे चलना कठिन दिखाई दे रहा था, सो वहीं पड़े एक चौकोर पत्थर पर थोड़ा आराम करने की इच्छा से बैठ गये।

अभी दो क्षण भी नहीं बीते कि ठीक उसी आवाज ने चौंकाया-मिस्टर फैरेल! अब तुम अपने जूते वहीं उतार दो और धीरे-धीरे उतर कर यहाँ मेरे पास आओ।” इन शब्दों के साथ ही उनकी दृष्टि उठी, उन्होंने देखा एक अति जर्जर शरीर किन्तु मुखमण्डल से झर रही अपूर्व तेजराशि वाले साधु सामने खड़े हैं। वह सोचने लगे-मैं तो इनको जानता तक नहीं, जानना क्या इससे पहले कभी देखा भी नहीं, यह मेरा नाम कैसे जान गये? यह यहीं थे तब बिलकुल इन्हीं के शरीर जैसी छाया, रात मेरे तंबू तक कैसे पहुँची? न कोई बेतार का तार, न रेडियो माइक्रोफोन, फिर इनकी हु-ब-हू आवाज मेरे पास तक कैसे पहुँची? न जाने कितने सवाल एक साथ उनके मस्तिष्क में उठ खड़े हुए। उनके इन सवालों पर एक और सवालिया निशान लगाते हुए साधु ने कहा-तुम जो सोच रहे हो, वह एकाएक समझने वाली बातें नहीं है, समझ सकते भी नहीं, क्योंकि उसके लिए लम्बे समय तक साधना और योगाभ्यास करना पड़ता है। जीवन के सुख और इन्द्रियों के आकर्षण त्याग कर लम्बे समय तक तप करना पड़ता है। वह न आपके लिए सम्भव है, न आप जान सकते हैं, आपको तो जिस काम के लिए बुलाया है, उसी के लिए यहाँ आ जाइये।”

फैरेल आश्चर्य चकित रह गये कि यह व्यक्ति मनुष्य है या देवता, बातें मेरे मन में उठ रही हैं और जान यह रहे हैं मनुष्य भी क्या कोई पुस्तक है? जिसके सम्पूर्ण रहस्य को, अप्रकट को इस तरह पढ़ा जा सकता है? इस तरह के विचित्र प्रश्न और चिन्तन करते हुए वह नीचे उतरने लगे और थोड़ी ही देर में वहाँ पर जा पहुँचे, जहाँ साधु बैठे थे। वहाँ एक व्यक्ति के आराम करने भर की जगह और धूनी में जल रही आग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।

पास में पहुँचते ही, साधु ने अपना जर्जर हाथ उनकी पीठ पर फेरा। हाथ फेरते ही वह एक बारगी चौंक पड़े, अरे यह क्या, वृद्ध शरीर में यह क्या विद्युत शक्ति-उनका शरीर जो अभी-अभी थकान से टूट रहा था, फूल की तरह हल्का जान पड़ा। श्रद्धावश उन्होंने झुक कर साधु के चरण स्पर्श किये। अब तक वह सैकड़ों साधु देख चुके थे, लेकिन यहाँ तो कुछ विलक्षण ही था। उन्हें अनुभव हुआ कि ऐसे ही साधुओं ने भारतीय दर्शन का सम्मान बढ़ाया है। ये भीख माँगने-पेट भरने वाले बाबा जी नहीं हैं, तपस्वी हैं। जो शरीर से 80−90 पाउण्ड होकर भी शक्ति और सामर्थ्य में हजारों बमों की क्षमता से कहीं अधिक शक्तिशाली और ज्ञान-विज्ञान के भण्डार होते हैं।

वातावरण में संव्याप्त मौन को तोड़ते हुए साधु कह रहे थे-वह स्थान जहाँ आपका तंबू लगा है, वहाँ पहुँचने के लिए मैंने एक युवक को प्रेरित किया है। वह पूर्वजन्म में मेरा शिष्य था, साधना अधूरी रह गयी। अब मैं फिर उससे लोक मंगल के लिए साधना और तप कराना चाहता हूँ, पर उसकी पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ सो गयी हैं, इस जन्म के संस्कार और परिस्थितियाँ उसे खींचती हैं, इसलिए साधना में आरुढ नहीं हो पा रहा। मैंने उसे प्रेरणा देकर बुलाया है वह आया और निर्देशित स्थान न पा सका तो उसे भ्रम होगा और मैं जो चाहता हूँ, वह न हो पाएगा, इसलिए आप वह स्थान तुरन्त खाली कर दें।

कमाण्डर फैरेल कहने लगे-भगवन् आप मुझे भी अपने पूर्व जन्मों की कुछ बातें बतायें?” इस पर साधु बोले-बेटा यह सिद्धियाँ तमाशे के लिए नहीं होती, इनका एक प्रयोजन है, उसी में खर्च किया जाना उचित है, हाँ यदि तुम चाहो तो उस लड़के के पूर्व जन्म का विवरण दिखाते समय उपस्थित रह सकते हो। बस अब जाओ? खेमे में तुम्हारे लिए हलचल मच रही है, मुझे भी जल्दी है।”

वह जिस रास्ते आये थे, उसी रास्ते से वापस लौट गये। यहाँ सचमुच उनकी तीव्रता से खोज हो रही थी। उन्होंने सारी बातें राजा साहब को बतायी और वह स्थान छोड़कर खेमे की 200 गज दूर कर दिया।

सायंकाल होने तक एक युवक सचमुच इधर-उधर कुछ खोजता हुआ सा उस स्थान पर आ पहुँचा। सब ओर से आश्वस्त होकर वह युवक वहाँ बैठ गया, तक तक फैरेल भी वहाँ पहुँच गये, उनकी जिज्ञासा तीव्र हो रही थी, साधु भी थोड़ी देर में वहाँ आ पहुँचे। श्री फैरेल और युवक दोनों ने उन्हें प्रणाम किया और आदेश की प्रतीक्षा में खड़े हो गये।

वह स्थान पेड़ों की झुरमुट में था। उसकी सफाई की गयी। अग्नि जलाकर साधु ने कुछ पूजा की, मंत्र पढ़े और एक स्थान में उनको बैठा दिया। अब तक चारों ओर अंधेरा छा चुका था।

साधु ध्यानावस्थित होकर बैठ गये। उनके मस्तिष्क से प्रकाश की रेखा फूटी और एक वृक्ष के मोटे तने पर गोलाकार बिम्ब उभर उठा-फिर उसमें जो कुछ देखा, वह बिलकुल सिनेमा की तरह व्यवस्थित चलता फिरता, बोलता नाटक सा था। जिसमें उस युवक के पूर्व जीवन की अनेक घटनाएँ ठीक चलचित्र जैसी ही प्रत्यक्ष आँखों से दिख रही थी। बीच-बीच में वह युवक कुछ उत्तेजित सा हो उठता था, हाँ हाँ यह सब मैंने ही किया

है, ऐसा बोल पड़ता था। उसकी मृत्यु तक की सारी घटनाएँ फैरेल ने भी देखीं तो वे भारतीय दर्शन की इस महानतम उपलब्धि से इतने प्रभावित हुए कि अपना सारा जीवन अपने सारे संस्कार ही बदल कर उन्होंने अपने को पूरा भारतीय बना लिया।

युवक ने अन्त में साधु को प्रणाम कर कहा-भगवन् अब मेरा मोह टूट चुका है, मैं अपनी छोड़ी हुई साधना और कठिन तपश्चर्या के लिए पुनः तैयार हूँ, आप मुझे रास्ता दिखाइये, ताकि मैं उस छोड़े हुए अधूरे कार्य को पूरा कर सकूँ।”


Quotation

जीभ से निकले शब्द कानों से टकराकर बिखर जाते हैं पर हृदय की वाणी कलेजों में घुस बैठती है और फिर उखड़ने का नाम नहीं लेती।


जरा जगाकर तो देखिए मस्तिष्क की प्रसुप्त परतों को

कैसे बन सकते हैं हम प्रतिभाशाली? यह सवाल किसी एक का नहीं हममें से बहुतों का है। किसी वैज्ञानिक, मेधावी साहित्यकार, ख्याति प्राप्त आविष्कारक के दिमागी चमत्कारों को देखकर खुद के मन में वैसा ही बनने की ललक जग उठती है। आखिर क्या है ऐसा उनके दिमाग में। मस्तिष्क की संरचना तो प्रायः सबकी एक ही तरह की होती है। लेकिन न जाने क्यों कुछ बुद्धू होते हैं और कुछ बुद्धिमान।

इन दिनों वैज्ञानिकों ने इस पहेली का हल ढूँढ़ने की कोशिश की है। “ड्राइंग आन दि राइट साइड ऑफ ब्रेन” की लेखिका, विख्यात वैज्ञानिक बेट्टी एडवर्डस लिखती हैं कि प्रतिभाशाली व्यक्तियों के मस्तिष्क का दांया हिस्सा अधिक सक्रिय होता है। यों तो दांए-बांए हिस्से के ठीक-ठीक सामञ्जस्य से ही मस्तिष्क के क्रिय कलाप चलते हैं। लेकिन फिर भी जिनका दांया मस्तिष्क तुलनात्मक रूप से ज्यादा विकसित होता है, उनमें अन्वेषक बुद्धि, जिज्ञासु प्रवृत्ति, गहरी समझ, विश्लेषण क्षमता कुछ ज्यादा ही देखने को मिलती है।

कहने को शरीर की लम्बाई पाँच-छह फुट होती है। लेकिन उसे छोटे से मस्तिष्क के इशारों पर नाचना पड़ता है। फिर अकेला शरीर ही क्यों? मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ी-चढ़ी हुई तो संस्थाओं, समूह, समाज को उसके संकेतों के अनुसार घूमना पड़ता है। व्यक्ति में मस्तिष्क की हैसियत वही है जो किसी कारखाने में बिजली आपूर्ति करने वाले जनरेटर की होती है। जीवन-संचालन की प्रेरणाएँ ही नहीं, जरूरी सामर्थ्य भी उसे वही से मिलती है। तकरीबन दस अरब न्यूरान कोशों से बने, सवा-डेढ़ किलो वजन के भूरे लिबलिबे पदार्थ जैसे इस अंग की क्षमता किसी-सुपर कम्प्यूटर से भी हजारों लाखों गुनी हैं। आखिर सुपर कम्प्यूटर भी तो किसी न किसी के मस्तिष्क की देन है।

क्या कुछ होना है? इसकी सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट कुछ ही क्षणों में तय करके कुछ माइक्रो सेकेंड्स में व्यक्त भी कर देती है और क्रियान्वित भी। लगातार काम करते रहने वाले मस्तिष्क में बावन हजार मीटर प्रति सेकेण्ड की गति से विद्युत संवेग इधर से उधर दौड़ते रहते हैं और आने जाने वाले संकेतों-संदेशों क्रियान्वित होने वाले निर्णयों की आधारशिला रखते हैं। इस सारे कामों के लिए ऊर्जा पैदा करने का काम भी स्वयं यहीं सम्पन्न हो जाता है। न किसी पावन हाउस की जरूरत पड़ती है और न बाहरी जनरेटर की।

इस विलक्षण अंग का, भगवान के बनाये इस सुपर-कम्प्यूटर का सार्थक उपयोग कैसे करें? यह बात संसार में कम ही लोग समझ पाते हैं अन्यथा ज्यादातर लोगों की सोच-समझ चालाकी-चतुरता उदरपूर्ति और वंश वृद्धि में ही खपती मिटती रहती है। सुविख्यात वैज्ञानिक एवं शरीर शास्त्री डॉ. स्टेनले इंगलबर्ट अपनी रचना “आर यू थिंकिंग राइट” में लिखते हैं− कि परमात्मा ने सबको समान क्षमताएँ दे रखी हैं। बात उनके उपयोग में लाने अथवा निरुपयोगी बेकार पड़े रहने की है।

सामान्य क्रम में मस्तिष्क के बांए हिस्से को प्रतिभा क्रिया कौशल एवं विलक्षण स्मरण शक्ति का केन्द्र माना जाता है और दांया हिस्सा, संवेदनशीलता एवं कलाकारिता का उद्गम स्रोत कहलाता है। यह तथ्य सभी को मालूम है कि बांए हिस्से से शरीर के दाहिने अर्धांग का संचालन होता है और दांए हिस्से से शरीर का बांया अर्धांग संचालित होता है। लेकिन इंगलबर्ट के अनुसार बात ऐसी नहीं है। कोई व्यक्ति जिसे हमने कभी देखा था, कोई चीज जिसे हम ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हैं कि कहाँ रखा है, इस समय हम मस्तिष्क के दांए हिस्से को अधिक एवं बांए हिस्से को कम काम में लाते हैं। यह ‘शिफ्ट टू राइट’ की क्रिया जगने की दशा के सोलह घण्टों में कार्पस कैलोजम के माध्यम से किसी विचारशील व्यक्ति में प्रति घण्टे पचास बार से भी ज्यादा होती है।

कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डॉ. रोज़र स्पेदरी और उनके साथियों ने मिर्गी के कई रोगियों का सर्जरी से पहले और बाद में विश्लेषण करने पर पाया कि दिमाग के दोनों हिस्सों के क्रिया-कलापों का समन्वय अथवा विभान कर देने से विद्युत्विन्गारियों के क्रम में फर्क पड़ जाता है। जिन रोगियों के दोनों हिस्सों के मिलन बिन्दु को काट दिया जाता है, उनमें स्प्लिटब्रेन सिन्ड्रोम विकसित हो जाता है। ऐसे रोगियों में न सिर्फ दुहरा व्यक्तित्व विकसित हुआ, बल्कि महत्वपूर्ण विभूतियों का समायोजन हो पाने के अभाव में वे प्रतिभाशाली होते हुए भी उसका सदुपयोग कर सकने की स्थिति में नहीं रहे। इस तरह के अध्ययनों के कारण अब यूरो सर्जरी संबंधी चिन्तन में सिरे से फेर-बदल हुई है और शल्य क्रिया के रचनात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।

पश्चिमी देश हों अथवा अपना देश-हर कहीं समाज में बचपन से यही सिखाया जाता है कि दांए हाथ से ही काम करना चाहिए। काम कोई भी हो भले खाना खाना हो अथवा लिखना हो, या रोजमर्रा के क्रिया-कलापों का कोई सा पक्ष हो, दांए हाथ से ही करना चाहिए। जबकि बांए हाथ से भी काम करने को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। ऐसे में मस्तिष्क का दांया हिस्सा मुख्य एवं कार्यकारी अंग की भूमिका अदा करता है और जब कभी बच्चों को यह बाधित किया जाता है बांया नहीं सिर्फ दांया हाथ इस्तेमाल करें तो मस्तिष्क के दोनों हिस्सों में असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है।

न्यूरोफिजियोलॉजिस्ट ने इसे ‘शिफ्ट टू लेफ्ट’ बताया है। डॉ. जूडीहेम्स के अनुसार-ऐसे बालक अपनी प्रतिभा का समुचित विकास नहीं कर पाते हैं। दुहरी मानसिकता का शिकार होकर उन्हें कुण्ठाओं और ग्रन्थियों से कसा-बँधा जीवन जीना पड़ता है। डॉ. हेम्स के शब्दों में मस्तिष्क के दांए भाग की अपेक्षा करते-करते हमने उसे मेजर से माइनर बना डाला।

अपने दिमाग को क्रिया-कौशल में प्रवीण और पारंगत बनाना अपने हाथ की बात है। मस्तिष्क विज्ञानियों के अनुसार जो किया जाना है, उसकी त्रिआयामी आकृति भावी रूपरेखा सबसे पहले मस्तिष्क में बनाने की कोशिश करनी चाहिए। यह कौशल-इंसान को जनम से मिला हुआ है और यह प्रक्रिया दिमाग के दाहिने हिस्से में ही सम्पन्न होती है। यदि किसी काम की पूर्व योजना तथा उसके क्या? क्यों? और कैसे? के विभिन्न बिन्दुओं पर चिंतन करके विचारों का एक प्रतिरूप दिमाग में बना लिया जाय तो काम पूरा होकर ही रहता है। ‘माई लाइफ एण्ड फिलॉसफी में इस तथ्य का जिक्र करते हुए आइन्स्टीन का कहना है कि वह इसी प्रणाली के आधार पर स्वयं को प्रतिभाशाली बना सके थे।

यहाँ तक कि जो विचार मन को परेशान कर रहे हैं, जिनका आपस में कोई तारतम्य नहीं बैठ पा रहा है। उन्हें यदि थोड़ा समय देकर कुछ समय के लिए भुला दिया जाए, तो कुछ क्षणों बाद वे दांए गोलार्ध में जाते हैं और पुनः चिन्तन करने पर सुलझे हुए रूप में सामने आ जाते हैं। यह प्रक्रिया लेटे-लेटे घूमते हुए अथवा ध्यान की स्थिति में भी संपन्न की जा सकती है।

मस्तिष्क दांए हिस्से को कैसे विकसित करे? इस सवाल के जबाब में मनोवैज्ञानिक कई तरह की युक्तियाँ सिखाते हैं लेकिन आर्थर कोयस्लर के अनुसार इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त प्रक्रिया ध्यान है। क्योंकि इस अवस्था में के प्रथम चरण में ही कल्पनाओं और विचारों में समरसता आने लगती है। सामञ्जस्य स्थापित होने लगता है। शनैः शनैः जब आकृतियों का चिन्तन करके उन्हें आदर्शवादी चिन्तन के साथ जोड़ा है तो अगले क्रम में शान्त-प्रसन्न स्थिति प्राप्त होती है। शान्त और नीरवता की इस दशा में मस्तिष्क दांए हिस्से की क्षमताएँ आश्चर्यजनक रूप से जाग्रत होती है। बहुत सम्भव है मस्तिष्क की नीरव स्थिति के इसी आश्चर्य जनक प्रभाव को अनुभव कर अनन्त निर्विकल्प का सूत्र दिया है। आखिर वह स्वयं भी चमत्कारी प्रतिमा के स्वामी भी तो थे। क्यों न हम भी सही चिन्तन प्रणाली एवं ध्यान की पद्धति का अनुसरण कर दांए मस्तिष्क की सोई क्षमताओं को जगाएँ और प्रतिभाशाली बनें।


देवमानव-ऋषि के पद पर चलने से श्रेष्टता प्राप्त (Kahani)

एक धार्मिक मुमुक्षु ने अपनी सारी धन दौलत लोकोपयोगी कार्यों में लगाकर संयम का जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया। अब तो उनके सत्कार्यों की सर्वत्र चर्चा होने लगी। जनता के कुछ प्रतिनिधियों ने उस मुमुक्षु के पास उपस्थित होकर निवेदन किया-आपका त्याग प्रशंसनीय है। आपीन देवा से समाज ऋणी है, हम सब सार्वजनिक रूप से आपका अभिनन्दन कर दानवीर तथा मानव-रत्न के अलंकरणों से विभूषित करना चाहते हैं। कृपया हम सबकी इस प्रार्थना को स्वीकार कीजिये।” मुमुक्षु ने मुस्कराते हुए कहा-मैंने कोई त्याग नहीं किया है, वरन् लाभ लिया है। बैंक में रुपये जमा करना त्याग नहीं, वरन् ब्याज का लाभ है। ग्राहक की वस्तु देकर दुकानदार किसी प्रकार के त्याग का परिचय नहीं देता, वह तो बदले में उसकी कीमत लेकर लाभ कमाता है। समुद्र के किनारे खड़े हुए व्यक्ति को जब मोती दिखाई दे तो उन्हें समेट कर कौन झोली न भरना चाहेगा? उस समय यदि उसकी झोली में शंख और सीपियाँ होंगी तो उन्हें खाली कर मूल्यवान् वस्तुऐं भरना क्या त्याग की वृत्ति का परिचायक है? उसी प्रकार क्रोध, लोभ, मोह आदि को छोड़कर अपने स्वभाव में अहिंसा, परोपकार और क्षमा जैसे सद्गुणों को स्थान देना, त्याग नहीं वरन् एक प्रकार का लाभ है। मैंने तो कोई त्याग नहीं किया है, वासनाओं से छुटकारा पाकर त्याग का लाभ ही प्राप्त किया है।” इतना सुनकर जनता के प्रतिनिधियों को और कुछ कहने का साहस नहीं हुआ और नतमस्तक होकर चले गये।

यही वे लक्षण हैं, जो व्यक्ति को देवमानव-ऋषि पद से सुशोभित करते हैं। ऐसों के पदचिह्नों पर चलकर ही अन्य व्यक्ति श्रेष्ठता को प्राप्त होते हैं।


कारण शरीर की कर्णेन्द्रिय साधना

संसार का सबसे संवेदनशील राडार मनुष्य का कान है। ध्वनि कम्पनों की वह कितने अच्छे भेद प्रभेद के साथ पकड़ता है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि कोलाहल रहित स्थान में मक्खी की भिनभिनाहट जैसी बारीक आवाज छह फुट दूरी से सुनी जा सकती है।

न्यूजर्सी की टेलीफोन प्रयोगशाला में एक कमरा इस तरह का बनाया गया कि उसमें कोई बाहरी आवाज तनिक भी प्रवेश न कर सके। इसमें प्रवेश करने पर कुछ ही समय में मनुष्य को सीटी बजने, रेल चलने, झरने गिरने, आग जलने, पानी बरसने से समय होने वाली आवाजों जैसी ध्वनियाँ सुनाई पड़ती थीं। इस प्रयोग को कितने ही मनुष्यों ने अनुभव किया, बात यह थी कि शरीर के भीतर जो विविध क्रिया-कलाप होते रहते हैं, उनसे ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। वे इतनी हलकी होती हैं कि बाहर होते रहने वाले ध्वनि प्रवाह में एक प्रकार से खो जाती हैं। नक्क र खाने में तूती की आवाज की तरह यह भीतरी अवयवों की ध्वनियाँ कानों तक नहीं पहुँच पातीं, पहुँचती हैं तो वायु मण्डल में चल रहे शब्द कम्पनों की तुलना में अपनी लघुता के कारण उनका स्वल्प अस्तित्व अनुभव न होता हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पर जब बाहर की आवाज रोक दी गई और केवल भीतर की ध्वनियों को मुखरित होने का अवसर मिला तो वे इतनी स्पष्ट सुनाई देने लगीं मानो वे अंग अपनी गति विधियों की सूचना चिल्ला-चिल्ला कर दे रहे हों।

रक्त संचार, श्वाँस प्रश्वास, आकुंचन-प्रकुंचन ग्रहण-विसर्जन स्थगन-परिभ्रमण विश्राम-स्फुरणा शीत-ताप जैसे परस्पर विरोधी अथवा पूरक अगणित क्रिया कलाप शरीर के अंग अवयवों में निरन्तर होते रहते-हर हलचल ध्वनि तरंगें उत्पन्न करती हैं। ऐसी दशा में उनका शब्द प्रवाह उपयुक्त स्थिति में कानों तक पहुँच ही सकता है और संवेदनशील कर्णेन्द्रिय उन्हें भली प्रकार सुन भी सकती है।

कान जैसा कोई इलेक्ट्रॉनिक मनुष्य द्वारा बन सकना सम्भव नहीं। क्योंकि कान में ऐसी संवेदनशील झिल्ली लगाई गई है, जिसकी मोटाई एक इंच का 2500 बिलियन (एक बिलियन बराबर दस लाख) है। इतनी हलकी साथ ही इतनी संवेदनशील ध्वनि ग्राहक वस्तु बन सकना मानवीय कर्तृत्व से बाहर की बात है। सुनने के प्रयोजन में काम आने वाले मानव निर्मित यंत्रों की तुलना में कान की संवेदन शीलता दस हजार गुनी है। हमारे कान-लगभग 4 लाख प्रकार की आवाज पहचान सकते हैं और उनके भेद प्रभेद का परिचय पा सकते हैं। सौ वाद्य यंत्रों के समन्वय से बजने वाला आरकेस्ट्रा सुन कर उनसे निकलने वाली ध्वनियों का विश्लेषण प्रस्तुत करने वाले कान कितने ही संगीतज्ञों के देखे गये हैं। शतावधानी लोग सौ शब्द श्रृंखलाओं के क्रमबद्ध रूप से सुनने और उन्हें मस्तिष्क में धारण कर सकने में समर्थ होते हैं। कहते हैं कि पृथ्वीराज चौहान ने घण्टे पर पड़ी हुई चोट को सुनकर उसकी दूरी की सही स्थिति विदित कर ली थी।

कानों की झिल्ली आवाज की बिखरी लहरों को एक स्थान पर केन्द्रित करके भीतर की नली में भेजती है। वहाँ वे तरंगें विद्युत कणों में बदलती हैं। इसी केन्द्र में तीन छोटी किन्तु अति संवेदनशील हड्डियाँ जुड़ती हैं; वे परस्पर मिलकर एक पिस्टन का काम करती हैं। इसके आगे लसिका युक्त घोंघे की आकृति वाले गह्वर में पहुँचते पहुँचते आवाज का स्वरूप फिर स्पष्ट हो जाता है। इस तीसरे भाग की झिल्ली का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से है। कान के बाहरी पर्दे पर टकराने वाली आवाज को लगभग 3500 कणिकाओं द्वारा आगे धकेला जाता है और मस्तिष्क तक पहुँचने में से सेकेंड के हजारवें भाग से भी कम समय लगता है। मस्तिष्क उसे स्मरण शक्ति के कोष्ठकों में वितरित विभाजित करता है। वह स्मरण शक्ति पूर्व अनुभवों की आवाज पर भी यह निर्णय करती है कि यह आवाज तुरही की है या घड़ियाल की। सुनने की प्रक्रिया को अन्तिम रूप यहीं आकर एक बहुत बड़ी-किन्तु स्वल्प समय में पूरी होने वाली प्रक्रिया के उपरान्त मिलता है।

कितने ही जीवों में मनुष्य की अपेक्षा अधिक दूर की आवाजें सुनने की शक्ति हैं। घोड़े को ही लें, उसके कानों के बाहरी परदे में 17 पेशियाँ होती हैं जबकि मनुष्य में उनकी संख्या 9 है। इसी अनुपात से घोड़ा मनुष्य की अपेक्षा अधिक दूरी की और अधिक हलकी आवाजें सुन सकता है।

नेपोलियन बोना पार्ट की स्मरण शक्ति बहुत तीव्र थी। अपनी सेना के प्रायः हर सिपाही का नाम उसे याद रहता था और आवाज सुनने भर से बिना देखे वह यह बता देता था कि कौन बोल रहा है। इसी प्रकार सिकन्दर की श्रवण शक्ति विलक्षण थी। एक बार रात को उसने एक गाना सुना। निस्तब्ध नीरवता में वह गीत बहुत दूर से आ रहा था पर सिकन्दर ने उसे सुन ही नहीं, याद भी कर लिया। कई दिन वह संगीत प्रवाह उसी तरह उसी समय पर सुनाई पड़ता रहा। सिकन्दर ने अपने कर्मचारियों को उस गायक की दिशा और दूरी बताकर बुला लाने के लिए भेजा। पाँच मील दूरी पर नीरव जंगल में वही व्यक्ति गाया करता था जिसकी आवाज सिकन्दर ने सुनी।

मस्तिष्क के साथ नाक, कान, आँख, जीभ, इन्द्रियाँ जुड़ी हैं। उन सभी के कार्यों का संचालन सन्तुलन रखने में मस्तिष्क की शक्ति विभक्त रहती है और खर्च होती है। यदि इनमें से कोई एक इन्द्रिय कुण्ठित हो जाय तो उस पर होने वाली क्षमता अन्य इन्द्रियों पर या इन्द्रिय विशेष पर लग जाती है। इसी कारण अन्धों में विशिष्ट प्रतिभा विकसित देखी जाती है। अन्य इन्द्रियों के कुण्ठित होने का भी दूसरी इन्द्रियों की शक्ति बढ़ने का लाभ होता है। पर चूँकि नेत्रों में सबसे अधिक शक्ति नियोजित है इसलिए अन्धों में गायन, स्मरण आदि की विशेषताएँ अधिक मात्रा में विकसित देखी जाती हैं।

अभ्यास से दुर्बल व्यक्ति भी पहलवान बन जाते हैं। कालिदास मूर्ख थे पर विद्याध्ययन में निरंतर श्रम संलग्न रहने से वे उच्च कोटि के कवि और विद्वान बन गये। इन्द्रियों की शक्ति का यदि अभिवर्धन किया जाय तो उनकी क्षमता में असाधारण और आश्चर्य जनक वृद्धि हो सकती है। कर्णेन्द्रिय का विकास इतना अधिक हो सकता है कि वह सिकन्दर की तरह दूरगामी, हलकी आवाजें भी अच्छी तरह सुन ले। भीड़ के चहल-पहल के सम्मिश्रित शब्द घोष में से अपने परिचितों की आवाज छाँट और पकड़ ले। फुसफुस की-कानाफूसी की आवाजों को भी कर्णेन्द्रिय की प्रखरता को तीव्र बनाने पर सुना जा सकता है। ऐसी विशेषताएँ कइयों में जन्मजात होती हैं किन्हीं में प्रयत्न पूर्वक अभ्यास करने से विकसित होती हैं।

यह तो स्थूल कर्णेन्द्रिय में निकटवर्ती उच्चारणों को सुनने, समझने की बात हुई, इससे भी बढ़कर बात यह है कि सूक्ष्म और कारण शरीरों में सन्निहित श्रवण शक्ति को यदि विकसित किया जा सके तो अन्तरिक्ष में निरन्तर प्रवाहित होने वाली उन ध्वनियों को भी सुना जा सकता है, जो चमड़े से बने कानों की पकड़ से बाहर है।

सूक्ष्म जगत की हलचलों का आभास इन ध्वनियों के आधार पर हो सकता है। कराहने की आवाज सुनकर किसी के शोक ग्रस्त होने, दर्द से छटपटाने, सताये जाने आदि को स्थिति का, दूरी का, नर-नारी का, बाल-वृद्ध का अनुमान लगा लिया जाता है उसी प्रकार कर्णेन्द्रिय की पकड़ में बाहर की सूक्ष्म ध्वनियों को यदि सुना जा सके तो विश्व में विभिन्न स्थानों पर विभिन्न स्तर की घटित होने वाली घटनाओं का विवरण जाना जा सकता है, सम्भावनाओं का पता लगाया जा सकता है तथा लोक लोकान्तरों में हो रही हलचलों को समझा जा सकता है। सर्व साधारण के लिए अविज्ञात जानकारियाँ सूक्ष्म शरीर की कर्णेन्द्रिय के विकास द्वारा नितान्त सम्भव है।

तन्त्र विद्या में ‘कर्ण पिशाचिनी’ साधना का महत्वपूर्ण प्रकरण है। रेडियो, टेलीफोन तो निर्धारित स्थान से निर्धारित स्थान पर ही सन्देश पहुँचाते हैं उन्हें विशेष यंत्रों द्वारा ही प्रेषित किया जाता है और विशेष यंत्र ही सुनते हैं। कर्ण पिशाचिनी विद्या से कहीं पर भी हो रहे शब्द प्रवाह को सुना जा सकता है। स्थूल शब्दों के अतिरिक्त अन्य घटनाक्रमों की हलचलें विद्युत के रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान रहती हैं, उन किरणों को प्रकाश रूप में देखा जा सकता है और शब्द रूप में सुना जा सकता है। तांत्रिक साधना से इस सिद्धि को उपलब्ध करने वाले अपने ज्ञान भण्डार को असाधारण रूप से बढ़ा सकते हैं और उस स्थिति से विशेष लाभ उठा सकते हैं।

नाद योग सूक्ष्म शब्द प्रवाह को सुनने की क्षमता विकसित करने का साधना विधान है। कानों के बाहरी छेद बन्द कर देने पर उसमें स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब ईश्वर से चल रहे ध्वनि कम्पनों को उस नीरवता में सुन समझ सकना सरल हो जाता है। नाद योग के अभ्यासी आरम्भ में कई प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ कानों के छेद बन्द करके मानसिक एकाग्रता के आधार पर सुनते हैं। शंख, घड़ियाल, मृदंग,

बहुसंख्य व्यक्तियों को अंत तक बोध नहीं हो पाता कि क्यों वे इस धरती पर जन्मे हैं व क्या उन्हें करना है? मखौल में ही वे जिन्दगी ....................। एक साधु तीर्थ यात्रा पर निकले। मार्ग-व्यय के लिए किसी सेट से ................ तो उसने कुछ दिया तो नहीं, पर अपना एक काम भी सौंप दिया ......................... ............... हाथ में थमाते हुए कहा-प्रवास काल में जो सबसे बड़ा मूर्ख ........दे देना।” संत बिना रुष्ट हुए उसका काम कर देने का वचन ......................... में ले गये। बहुत दिन बाद वापिस लौटे, तो सेठ को बीमार पड़े पाया। ................ धन से वे न अपना इलाज करा पाये और न किसी सत्कर्म में लगा पाये। मरणासन्न स्थिति में संबंधी, कुटुम्बी उनका धन-माल उठा-उठा कर ले जा रहे थे। सेठ जी को मृत्यु और लूट का दुहरा कष्ट हो रहा था। साधु ने सारी स्थिति समझी और दर्पण उन्हीं को वापस लौटा दिया। कहा-आप ही इस ............. सबसे बड़े मूर्ख मिले, जिसने कमाया तो बहुत, पर सदुपयोग करने का विचार .................. उठा।” क्रमों के संकेत प्रकट करने वाली अधिक सूक्ष्म आवाजें भी पकड़ में आती हैं। अनुभव के आधार पर उनका वर्गीकरण करके यह जाना जा सकता है कि इन ध्वनि संकेतों के साथ कहाँ किस प्रकार का-किस काल का घटना क्रम सम्बद्ध है। आरम्भिक अभ्यासी भी अपने शरीरगत अवयवों की हलचल, रक्त प्रवाह, हृदय की धड़कन, पाचन संस्थान आदि की जानकारी उसी भाँति प्राप्त कर सकता है जिस तरह कि डॉक्टर लोग स्टेथिस्कोप आदि उपकरणों से हृदय की गति, रक्त चाप आदि का पता लगाते हैं अपने ही नहीं दूसरों के शरीर की स्थिति का विश्लेषण इस आधार पर हो सकता है और तदनुकूल सही निदान विदित होने पर सही उपचार का प्रबन्ध हो सकता है।

सूक्ष्म शरीर की कर्णेन्द्रिय को विकसित करके संसार में घटित होने वाले घटनाक्रम को जाना जा सकता है। कारण शरीर का सम्बन्ध चेतना जगत से है। लोगों की मनःस्थिति के कारण उत्पन्न होने वाली अदृश्य ध्वनियाँ जिसकी समझ में आने लगें वह मानव प्राणी की, पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं की मनःस्थिति का परिचय प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार बिना उच्चारण के एक मन से दूसरे मन का परिचय, आदान-प्रदान होता रह सकता है। विचार संचालन विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि मनःस्थिति के अनुसार भावनाओं के उतार-चढ़ाव में एक विचित्र प्रकार की ध्वनि निसृत करते हैं और उसे सुनने की सामर्थ्य होने पर मौन रह कर ही दूसरों की बात अन्तःकरण के पर्दे पर उतरती हुई अनुभव की जा सकती है और अपनी बात दूसरों तक पहुँचाई जा सकती हैं।

कारण शरीर की कर्णेन्द्रिय साधना, दैवी संकेतों के समझने, ईश्वर के साथ वार्तालाप और भावनात्मक आदान प्रदान करने में समर्थ हो सकती है। साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थान को विकसित करना-अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही तो योग साधना का − आत्म साधना का उद्देश्य है।


साँप की डंडे से खबर ली (Kahani)

इसके लिए सबसे बड़ी वैतरणी जो पार करनी पड़ती है, वह है-मोह-माया की। देवर्षि नारद को परिभ्रमण काल में एक वयोवृद्ध धनवान् मिला। पूजा बहुत करता था, भक्तजन लगता था। उसकी ढलती आयु को देखकर नारद बोले - "परिवार समर्थ हो गया, अब घर से निकल कर वानप्रस्थ लेना चाहिए और लोकसेवा में लगना चाहिए, बात धनवान् के गले न उतरी। उसने कहा-अभी तो परिवार को सम्पन्न बनाना है। फिर कभी समय होगा, तो चलेंगे।" बहुत वर्ष बाद नारद उधर से फिर निकले। धनी भक्त की याद आ गयी। उसके घर पहुँचे, तो मालूम हुआ, वे कुछ समय पूर्व मर गये। नारद ने दिव्य दृष्टि से देखा तो प्रतीत हुआ, वह मर कर बैल बन गया है और हल में चलता है। समीप जाकर नारद ने पूर्व जन्म की बात स्मरण दिलाई और कहा- "अभी भी समय है, हमारे साथ चलो"। बैल को पूर्व जन्म स्मरण हो आया। फिर भी उसने सिर हिलाया - "परिवार को कमाई करके खिलाता हूँ। मेरे चल पड़ने से इन लोगों को कठिनाई पड़ेगी।" नारद चले गये।

कई वर्ष बाद फिर आना हुआ। बैल का समाचार पूछने गये तो ज्ञात हुआ कि वह भी मर चुका। अब वह कुत्ता बना बैठा था उसी घर में। नारद बोले- "कुत्ते की स्थिति में पड़े रहने से क्या लाभ? चलो विश्व कल्याण का कुछ काम करें।" कुत्ता सहमत न हुआ। उसने कहा-विश्व कल्याण से क्या? परिवार कल्याण ही बहुत है। मैं चल पड़ूं तो चोरों की रखवाली कौन करेगा?" नारद चले गये फिर तीसरी बार उसी प्रकार लौटना हुआ और नारद जी ने इस बार भी पहले की तरह पूछताछ की। मालूम पड़ा कुत्ता भी मर गया। देखा तो वह साँप बना। वहीं एक बिल में सिर चमक रहा था। नारद उसके समीप पहुँचे बोले- "ऐसी दुर्गति से क्या लाभ। अब तो इन लोगों की कोई सहायता भी नहीं बन पड़ती होगी चलो न।" सर्प ने असहमति सूचक सिर हिलाया और कहा-घर में चूहे बहुत हैं। इन्हें निगलने और डराने का काम क्या कम है? परिवार का मोह कैसे छोड़ूं?" नारद इस बार भी चले गये। एक दिन साँप बिल से निकला ही था कि घर वालों ने उसकी डंडे से खबर ली और सिर कुचल दिया। ऐसी दुर्गति न हो, इसलिए आत्मीय जनों के प्रति अनावश्यक अतिशय मोह छोड़कर स्वयं को सत्प्रवृत्ति संवर्धन हेतु समाज रूपी रणक्षेत्र में उतर जाना चाहिए।


बुद्धि का अपच

महात्मा ‘निष्कम्प’ नगर के बाहर उपवन में रुके हैं। यह समाचार पाकर जिज्ञासु साधक उनके ज्ञान का लाभ लेने जा पहुँचे। विद्रूप ने भी सुना। वे परमार्थ तथा आत्म कल्याण की साधना में रत थे। अपनी साधना में गतिरोध सा उन्हें अनुभव होता था। अवसर से लाभान्वित होने वह भी पहुँचे।

सहज शिष्टाचार के बाद अवसर देख विद्रूप ने पूछा-महात्मन् साधना में भौतिक वैभव बाधक बनता है किन्तु उसको छोड़ा भी नहीं जा सकता और बिना छोड़े प्रगति भी नहीं। कृपया कोई मार्ग बतावें।”

महात्मा हँसे, बोले-वत्स तुम्हारी समझ को अपच हो गया है-हल्का आहार दो।”

विद्रूप न समझ पाने के कारण अवाक् खड़े रह गये। महात्मा ने उनकी स्थिति समझ ली और कहने लगे, “मस्तिष्क पर अधिक तनाव मत दो। अपने खेल में तल्लीन बच्चों की गतिविधि में रस लिया करो, वहीं तुम्हारे प्रश्न का व्यावहारिक उत्तर प्राप्त हो जाएगा।”

बच्चों के खेल में इस गम्भीर प्रश्न का उत्तर? विद्रूप मन ही मन संकल्प-विकल्प करने लगे-क्या कहें, कैसे पूछे? बोले-भगवन् स्वयं अपने श्रीमुख से शंका निवारण कर दें तो अति कृपा होगी।”

महात्मा मुस्करा उठे। प्रेम से विद्रूप की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहने लगे-वत्स शब्द से क्रिया का शिक्षण अधिक उपयोगी होता है। तुम्हें सम्भवतः यह शंका हो रही है कि बच्चों के खेल में क्या सीख मिलेगी? किन्तु ध्यान रखो, यह संसार उस परम प्रभु का क्रीड़ांगन ही है। इसके महत्वपूर्ण पक्ष क्रीड़ा सिद्धांतों से समझे जा सकते हैं। फिर भगवान दत्तात्रेय को प्रकृति व जीव-जन्तु शिक्षा दे सकते हैं, तो क्या तुम्हें बच्चे भी न दे सकेंगे? जाओ प्रयास मनोयोग से करना।”

विद्रूप प्रणाम करके लौट आये। आदेशानुसार उन्होंने क्रीड़ारत बालक-बालिकाओं को देखना प्रारम्भ किया। प्रारम्भ में ही उन्होंने अपने अन्तःकरण में हल्कापन अनुभव किया। उन्होंने पाया कि बच्चे खेल के समय कितने तन्मय हो जाते हैं। उनकी तन्मयता के साथ विद्रूप भी तन्मय होने लगे। प्रश्न का उत्तर न मिला तो भी सहज शान्ति मिलने लगी और एक दिन अचानक उनके गम्भीर प्रश्न का क्रियात्मक उत्तर भी मिल गया।

तीन बच्चे खेल रहे थे। दो बालक, एक बालिका। घुड़सवारी के खेल का प्रस्ताव हुआ। घोड़े खोजे गये। दो लाठियाँ मिलीं। उन्हें जाँघों के बीच दबाकर बच्चे घुड़सवार बन गये। चाबुक के स्थान पर ज्वार के डंठल ले लिए गये। किन्तु घोड़े दो ही थे तथा सवार तीन। निर्णय हुआ कि बारी-बारी से सवारी की जाये। दोनों बच्चे घोड़ों पर सवार होकर चल पड़े, चाबुक घुमाते। बच्ची एक क्षण खड़ी देखती रही, फिर अचानक झपटकर उसने दो डंठल उठाए। एक को जाँघों के बीच दबाकर घोड़ा बनाया तथा दूसरे से फटाफट चाबुक मारना प्रारम्भ किया। विद्रूप बालिका के भोलेपन पर हँसे-बेचारी को ठीक घोड़ा भी न मिल सका।

किन्तु उनकी हँसी रुक गयी उन्होंने देखा-बालिका का दुर्बल घोड़ा उन सबसे आगे पहुँच चुका था। दोनों बालकों के बढ़िया (भारी) घोड़े उनके पैरों की गति में बाधक बने थे और बालिका का मरियल (हल्का) घोड़ा उसके लिए वरदान सिद्ध हो रहा था। घोड़ा किसका अच्छा कहा जाये, लड़कों का या उस बेचारी लड़की का।

मस्तिष्क ने करवट ली। रसानुभूति के साथ विवेक कार्य करने लगा। दृश्य स्थूल से सूक्ष्म दृष्टि का विषय बन गया। विद्रूप को जैसे दिव्य दृष्टि मिल गयी थी। वे देख रहे थे विश्व क्रीड़ा को। अपने-आपको बुद्धिमान-ज्ञानी कहने वाले प्रौढ़ बच्चे जीवन का खेल, खेल रहे हैं। नाम-यश-वैभव कीर्ति आदि के सुगढ़-सुन्दर लकड़ी के घोड़े उन्हें आवश्यक लगते हैं। प्रगति पथ पर बढ़ना, दौड़ना तो अपने पैरों की शक्ति से पड़ता है। प्रतिभा, चरित्र, साहस, धैर्य आदि गुणों की शक्ति ही सहनशीलता लाती है किन्तु घुड़सवार ‘विकास’ के साधक कहलाने के लिए स्थूल प्रतीक भी उन्हें आवश्यक लगते हैं।

विद्रूप को ध्यान आया महात्मा का वचन-वत्स तुम्हें बुद्धि का अपच हो गया है।” ................

विद्रूप पुनः महात्मा निष्कम्प के पास पहुँचे। अपना

अनुभव सुनाया। सुनकर महात्मा ने साधुवाद दिया-वत्स सही दृष्टिकोण अपनाया तुमने। क्या अब भी अपनी साधना के लिए भौतिक वैभव आवश्यक लगता है।” विद्रूप ने अपनी भूल स्वीकार की। महात्मा ने आशीर्वाद दिया-तुम्हारी साधना आगे ......................... लिए भौतिक वैभव का .................................... उसका भार ही गतिरोध ..................................। लोक मर्यादा के लिए भी आवश्यक पड़े तो तुम उसका प्रत्यक्ष समाधान देख ही चुके हो।”

विद्रूप ने अपने आप को धन्य माना तथा महात्मा के निर्देशानुसार साधना में श्रेष्ठ गति प्राप्त की।


मंत्रों में निहित शक्ति एवं उसकी जाग्रति

ईथर तत्व में शब्द प्रवाह के संचरण को रेडियो यंत्र अनुभव करा सकता है, पर ‘ईथर’ को उसके असली रूप में देखा जा सकना सम्भव नहीं गर्मी, सर्दी, सुख, दुःख की अनुभूति होती है, उन्हें पदार्थ की तरह प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। मंत्र में उच्चरित शब्दावली मंत्र की मूल शक्ति नहीं वरन् उसको सजग करने का उपकरण है। किसी सोते को हाथ से झकझोर कर जगाया जा सकता है, पर यह हाथ जाग्रति नहीं। अधिक से अधिक उसे जाग्रति का निमित्त होने का श्रेय ही मिल सकता है। मंत्रोच्चार भी अन्तरंग में और अन्तरिक्ष में भरी पड़ी अगणित चेतन शक्तियों में से कुछ को जाग्रत करने का एक निमित्त कारण भर है।

किस मंत्र से किस शक्ति को किस आधार पर जगाया जाय, इसका संकेत हर मंत्र के साथ जुड़े हुए विनियोग में बताया जाता है। वैदिक और तान्त्रिक सभी मंत्रों का विनियोग होता है। आगम और निगम शास्त्रों में मंत्र विधान के साथ ही उसका उल्लेख रहता है। जप तो मूल मंत्र का ही किया जाता है पर उसे आरम्भ करते समय विनियोग को पढ़ लेना अथवा स्मरण कर लेना आवश्यक होता है। इससे मंत्र के स्वरूप और लक्ष्य के प्रति साधना काल में जागरूकता बनी रहती है और कदम सही दिशा में बढ़ता रहता है।

मंत्र विनियोग के पाँच अंग हैं-ऋषि 2−छन्द, 3−देवता, 4−बीज, 5−तत्व। इन्हीं से मिलकर मंत्र शक्ति सर्वांग पूर्ण बनती है। ‘ऋषि’ तत्व का संकेत है-मार्गदर्शक गुरु, ऐसा व्यक्ति जिसने उस मंत्र में पारंगतता प्राप्त की हो। सर्जरी, संगीत जैसे क्रिया कलाप अनुभवी शिक्षक ही सिखा सकता है। पुस्तकीय ज्ञान से नौकायन नहीं सीखा जा सकता, इसके लिए किसी मल्लाह का प्रत्यक्ष पथ प्रदर्शन चाहिए। चिकित्सा ग्रन्थ और औषधि भण्डार उपलब्ध रहने पर भी चिकित्सक की आवश्यकता रहती है। विभिन्न मनोभूमियों के कारण साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार-चढ़ाव आते हैं, उस स्थिति में सही निर्देशन और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में पारंगत हो।

छन्द का अर्थ है-लय वाक्य में प्रयुक्त होनेवाली पिंगल प्रक्रिया के आधार पर भी छन्दों का वर्गीकरण होता है, यहाँ उसका कोई प्रयोजन नहीं। मंत्र रचना में काव्य प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है। हो भी तो उसके जानने न जानने से कुछ बनता बिगड़ता नहीं। यहाँ लय को ही छन्द समझा जाना चाहिए, किस स्वर में किस क्रम से, किस उतार-चढ़ाव के साथ मंत्रोच्चारण किया जाय यह एक स्वतंत्र शास्त्र है। सितार में तार तो उतने ही होते हैं, उँगलियाँ चलाने का क्रम भी हर वादन में चलता है, पर बजाने वाले का कौशल तारों पर आघात करने के क्रम में हेर-फेर करके विभिन्न राग रागिनियों का ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करता है। मानसिक, वाचिक, उपाँशु, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित ही नहीं मंत्रोच्चार के और भी भेद-प्रभेद हैं, जिनके आधार पर उसी मंत्र द्वारा अनेक प्रकार की प्रतिक्रियायें उत्पन्न की जा सकती हैं।

ध्वनि तरंगों के कम्पन इस लय पर भी निर्भर हैं। साधना विज्ञान में इसे यति कहा जाता है। मंत्रों की एक यति सबके लिए उचित नहीं। व्यक्ति की स्थिति और उसकी आकांक्षा को ध्यान में रख कर यति का लय का-निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मंत्र साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिए उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।

विनियोग का तीसरा चरण है-देवता देवता का अर्थ है-चेतना सागर में से अपने अभीष्ट शक्ति प्रवाह का चयन। आकाश में एक ही समय में अनेकों रेडियो स्टेशन बोलते रहते हैं पर हर एक की फ्रीक्वेंसी अलग होती है। ऐसा न होता तो ब्रॉडकास्ट किये गये सभी शब्द मिलकर एक हो जाते। शब्द धाराओं की पृथकता और उनसे संबंध स्थापित करने के पृथक् माध्यमों का उपयोग करके ही किसी रेडियो सेट के लिए यह सम्भव होता है कि अपनी पसन्द का रेडियो प्रोग्राम सुने और अन्यत्र में चल रहे प्रोग्रामों को बोलने से रोक दे। निखिल ब्रह्माण्ड में ब्रह्म चेतना की अनेक धारायें समुद्री लहरों की तरह अपना पृथक् अस्तित्व भी लेकर चलती हैं। भूमि एक ही होने पर भी उसमें परतें अलग-अलग तरह की निकलती हैं। समुद्रीय अगाध जल में पानी की परतें तथा असीम आकाश में वायु से लेकर किरणों तक की अनेक परतें होती हैं। इसी प्रकार ब्रह्म चेतना के अनेक प्रयोजनों के लिए उद्भूत अनेक शक्ति तरंगें निखिल ब्रह्माण्ड में प्रवाहित रहती हैं। उनके स्वरूप और प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए ही उन्हें देवता कहा जाता है।

साकार उपासना पक्ष देवताओं की अलंकारिक प्रतिमा भी बना लेता है और निराकार पक्ष प्रकाश किरणों के रूप में उसको पकड़ता है। सूर्य की सात रंग की किरणों में से हम जिसे चाहें उसे रंगीन शीशे के माध्यम से उपलब्ध कर सकते हैं। एक्सरे मशीन अल्ट्रा वायलेट उपकरण आकाश में से अपनी अभीष्ट किरणों को ही प्रयुक्त करते हैं। हंस दूध पीता है पानी छोड़ देता है। इसी प्रकार किस मंत्र के लिए ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाये इसके लिए विधान निर्धारित है। स्थापन, पूजन, स्तवन आदि क्रियायें इसी प्रयोजन के लिए होती हैं। निराकारी साधक ध्यान द्वारा उस शक्ति को अपने अंग प्रत्यंगों में तथा समीपवर्ती वातावरण में ओत-प्रोत होने को भावना कहते हैं। किसके लिए देव सम्पर्क का क्या तरीका ठीक रहेगा, यह निश्चय करके ही मंत्र साधक को प्रगति पथ पर अग्रसर होना होता है। दबी हुई प्रसुप्त क्षमता को प्रखर करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यंत्र को चलाने के लिए ईंधन चाहिए। हाथ या पैर से चलने वाले यंत्रों के लिए न सही उन्हें चलाने वाले हाथ पैरों को काम करते रहने के लिए ऊर्जा की जरूरत रहती है। यह तापमान जुटाने पर ही यंत्र काम करते हैं। मंत्रों की सफलता भी इसी ऊर्जा उत्पादन पर निर्भर है। साधना विधान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है। आयुर्वेद में भी नाड़ी शोधन के लिए वमन, विरेचन, स्नेहन, संवेदन नस्य यह पंच कर्म शरीर शोधन के लिए हैं। मंत्र साधन में व्यक्तित्व के परिष्कार के अतिरिक्त पाँच आधार-ऋषि छन्द, देवता, बीज और तत्व हैं। जो इन सब साधनों को जुटा कर मंत्र साधन कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर ही रहती है।

मंत्र योग साधना का एक ऐसा शब्द और विज्ञान है कि उसका उच्चारण करते ही किसी चमत्कारिक शक्ति का बोध होता है। ऐसी धारणा है कि प्राचीन काल के योगी, ऋषि और तत्वदर्शी महापुरुषों ने मंत्रबल से पृथ्वी देव-लोक और ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पाई थी। मंत्र शक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तान्तरण, शक्ति को, पदार्थ को शक्ति में बदल देते थे। शाप और वरदान मंत्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग अच्छा कर देना एक पल में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना, एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार नाड़ियों के एक-एक जोड़ की ही अलौकिक शक्ति थी। इसलिए भारतीय तत्वदर्शन में मंत्र शक्ति पर जितनी शोधें हुई हैं, उतनी और किसी पर भी नहीं हुई। मंत्रों के आविष्कार होने के कारण ही ऋषि मन्त्र दृष्टा कहलाते थे। वेद और कुछ नहीं एक प्रकार के मंत्र विज्ञान हैं, जिनमें ...................................................................................................................................

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मंत्र का सीधा सम्बन्ध उच्चारण या ध्वनि से है। इसलिए इसे 'ध्वनि विज्ञान' भी कह सकते हैं। अब तक इस दिशा में जो वैज्ञानिक अनुसंधान हुए और निष्कर्ष निकले हैं, वह यह बताते हैं कि सामान्य भारतीय मंत्र शक्ति पर भले ही विश्वास न करें पर वैज्ञानिक अब उसी दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। वह समय समीप ही है जब ध्वनि विज्ञान की उन्नति ऋषियों जैसे ही कौतूहल वर्धक कार्य करने लगेगी। उदाहरण के लिए ‘ट्रान्स्डूयसर’ यंत्र से सूक्ष्म शब्द को व्यापक बनाया जा सकता है। वह शब्द की कर्णातीत शक्ति का ही फल है।

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कुण्ड समिध, पात्र पीठ, आज्य चरु, हवि, पीठ आदि को अभिमन्त्रित करके उनके सूक्ष्म प्राणों को प्रखर करने का विधान, मंत्रोच्चार, कर्मकाण्ड, न्यास, ऋत्विजों का मनोयोग ब्रह्मचर्य तप, आहार आदि विधि विधान से मंत्र की फल दायिनी शक्ति सजग होती है। सकाम कर्मों में मंत्र की यही शक्ति विभिन्न क्रिया-कृत्यों के सहारे सजग होती है और अभीष्ट प्रयोजन पूरे करती है।

तीसरी शक्ति है ‘बहुलीकरण’ अर्थात् थोड़े को बहुत बनाना। यज्ञ में होमा हुआ जरा-सा पदार्थ वायुभूत होकर समस्त विश्व में फैल जाता है। पानी के ऊपर जरा-सा तेल डाल देने से पानी की सारी सतह पर फैल जाता है। तनिक-सा विष सारे शरीर में फैल जाता है। उसी प्रकार साधक का शरीर, मंत्रोच्चार एवं साधन में काम आने वाले अंग जरा से होते हैं, पर उनके घर्षण से उत्पन्न शक्ति, दियासलाई से निकलने वाली चिनगारी की तरह नगण्य होते हुए भी दावानल बन जाने की सामर्थ्य से ओत-प्रोत रहती है। एक व्यक्ति की मंत्र साधना अनेक व्यक्तियों को तथा पदार्थों को परमाणु जीवाणुओं को प्रभावित करती है तो वह बहुलीकरण शक्ति ही काम कर रही होती है।

चौथी ‘आयातयामता शक्ति’ किसी विशेष क्षमता सम्पन्न व्युत्पन्नमति मेधावी सूक्ष्म व्यक्ति द्वारा विशेष स्थान पर, विशेष व्यक्ति की सहायता से विशेष उपकरणों के सहारे विशेष विधि-विधान के साथ मंत्रोपासना करने पर विशेष शक्ति उत्पन्न होती है। विश्वामित्र और परशुराम ने गायत्री मंत्र की साधना विशेष प्रयोजन के लिए विशेष विधि-विधानों के साथ की थी और उससे उन्होंने अभीष्ट परिणाम भी प्राप्त किये। दशरथ जी का ...................... यज्ञ वशिष्ठ जी पूरा न करा सके तब ............ ऋषि ने उसे सम्पन्न कराया, यह श्रृंगी ऋषि की आयातयामता शक्ति ही थी।

कौत्स मुनि ने मंत्रों को अनर्थक माना है। अनर्थक का अर्थ यह है कि उसके अर्थ को नहीं ध्वनि प्रवाह को, शब्द गुँथन को महत्व दिया जाना चाहिए। ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐं आदि बीज मंत्रों के अर्थ से नहीं, ध्वनि से ही प्रयोजन सिद्ध होता है। नैषध चरित्र के 13 वें सर्ग में उसके लेखक ने इस रहस्य का और भी स्पष्ट उद्घाटन किया है। संगीत का शारीरिक, मानसिक, स्वास्थ्य पर जो असाधारण प्रभाव पड़ता है, उससे समस्त विज्ञान जगत परिचित है।

शब्द शक्ति का स्फोट मंत्र शक्ति की रहस्यमय प्रक्रिया है। अणु विस्फोट से उत्पन्न होनेवाली भयावह शक्ति की जानकारी हम सभी को है। शब्द की एक शक्ति सत्ता है। उसके कम्पन भी चिरन्तन घटकों के सम्मिश्रण से बनते हैं। इन शब्द सम्पन्न घटकों का विस्फोट भी अणु विखण्डन की तरह ही हो सकता है। मंत्र योग साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही विधि व्यवस्था रहती है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन तत्वदर्शी मनीषी तथा दिव्यदृष्टि मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उसका उपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप साधनों एवं कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मंत्राराधन वस्तुतः शब्द शक्ति का विस्फोट ही है।

शब्द स्फोट से ऐसी ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं जिन्हें कानों की श्रवण शक्ति से बाहर की कहा जा सकता है। शब्द आकाश का विषय है। इसलिए तान्त्रिक का कार्यक्षेत्र आकाश तत्व रहता है। योगी वायु उपासक है। उसे प्राणशक्ति का संचय वायु के माध्यम से करना पड़ता है। इस दृष्टि से मान्त्रिक को योगी से भी वरिष्ठ कहा जा सकता है। सच्चा मांत्रिक योगी से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही शक्तिशाली हो सकता है।

मंत्राराधना में शब्द शक्ति का विस्फोट होता है, विस्फोट में गुणन शक्ति है। मंत्र में सर्वप्रथम देवस्थापना की सघन निष्ठा उत्पन्न की जाती है। यह भाव चुम्बकत्व है। श्रद्धा शक्ति के उद्भव का प्रथम चरण है। इस आरम्भिक उपार्जन का शक्ति गुणन करती चली जाती है और छोटा सा बीज विशाल वृक्ष बन जाता है। विचार का चुम्बकत्व सर्वविदित है। इष्टदेव के मंत्र अधिपति की शक्ति एवं विशेषताओं का स्तवन, पूजन के साथ स्मरण किया जाता है और अपने विश्वास से उसमें सर्वशक्ति विधान के द्वारा तथा तप साधना, कष्टसाध्य तितीक्षा के द्वारा मंत्र की गुह्य शक्ति के करतलगत हो जाने का भरोसा दीर्घकालीन साधना द्वारा साधक के मनःक्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण चुम्बकत्व से परिपूर्ण कर देती हैं।

मंत्र से दो वृत्त बनते हैं एक को भाववृत्त और दूसरे को ध्वनिवृत्त कह सकते हैं। लगातार की गति अन्ततः एक गोलाई में घूमने लगती है। ग्रह नक्षत्रों का अपने-अपने अयन वृत्त पर घूमने लगना इसी तथ्य से सम्भव हो सका है कि गति क्रमशः गोलाई में मुड़ती चली जाती है।

मंत्र जप में नियत शब्दों को निर्धारित क्रम से देर तक निरन्तर उच्चारण करना पड़ता है। जप यही तो है। इस गति प्रवाह के दो आधार हैं। एक भाव और दूसरा शब्द। मंत्र के अन्तराल में सन्निहित भावना का नियत निर्धारित प्रवाह एक भाववृत्त बना लेता है, वह इतना प्रचण्ड होता है कि साधक के व्यक्तित्व को ही पकड़ और जकड़ कर उसे अपनी ढलान में ढाल ले। उच्चारण से उत्पन्न ध्वनिवृत्त भी ऐसा ही प्रचण्ड होता है कि उसका स्फोट एक घेरा डालकर उच्चारणकर्ता को अपने घेरे में कस ले। भाववृत्त अन्तरंग वृत्तियों पर शब्दवृत्त बहिरंग प्रवृत्तियों पर इस प्रकार आच्छादित हो जाता है कि मनुष्य के अभीष्ट स्तर को तोड़ा-मरोड़ा या ढाला जा सके।


ज्ञानार्जन-स्वाध्याय पिछड़ जाते हैं वे पछताते हैं (Kahani)

महापुरुषों की यही विशेषता रही है कि वे स्वयं आजीवन स्वाध्यायशील रहे हैं। आचार्य अत्रे उन दिनों बीमार पड़े थे। फिर भी चारपाई पर सिरहाने, बगल में उनने ढेरों पुस्तकें जमा कर रखी थीं। उस कष्टकर मनःस्थिति में पढ़कर मन का हलका करते थे। एक मित्र मिलने आये और उन्होंने पूर्ण विश्राम की बात कहते हुए पढ़ने से बचने का परामर्श दिया। अत्रे जी ने मुस्कराते हुए कहा-मैं बीमारी की खुराक बना हुआ हूँ, पर मैं भूखा कैसे रहूँ? अपनी खुराक पुस्तकों से हासिल करता हूँ।”

इसी प्रकार सभी की अभिरुचि यदि ज्ञानार्जन-स्वाध्याय के प्रति जाग उठे तो उनका व्यक्तित्व भी अपूर्ण न रहे। जो इसमें पिछड़ जाते हैं, वे पछताते हैं।


विज्ञान नकारे तो भी सत्य तो सत्य ही है

ब्रह्माण्ड व्यापी चेतना को ब्रह्म के नाम से सम्बोधित कर भारतीय ऋषियों ने कहा है कि वह निराकार और निर्गुण होते हुए भी सब ओर से हाथ पैर वाला तथा सब ओर से नेत्र, सिर और मुख वाला है। वस्तुतः ब्रह्म का या चेतना का कोई स्थूल स्वरूप आँखों से नहीं देखा जा सकता फिर भी ऐसी कोई घटना नहीं होती, जिससे चेतना को अनभिज्ञ रखा जा सकें अथवा किसी घटनाक्रम में उसके अस्तित्व को, कारण को अस्वीकारा जा सके।

जो विभु में है, वही अणु में भी है, जो ब्रह्माण्ड में है, वह कण में भी है तथा जो ब्रह्म में है, वही चेतन में भी है-भारतीय दर्शन के अध्येताओं से यह सिद्धान्त अनावगत नहीं है। सामान्य जगत में भी यह देखा जा सकता है। एक बीज में वृक्ष की तमाम विशेषताएँ और सम्भावनायें सन्निहित होती हैं। समुचित खाद-पानी और पोषण प्राप्त कर बीज ही वृक्ष बनता है। माता-पिता के रज वीर्य में अपने ही समान एक नया प्राणी जन्म देने की क्षमता अन्तर्निहित होती है। आत्मा, जिसे शरीर तक सीमित रहने वाली चेतना का एक कण समझा जाता है विकसित होकर परमात्मा से समान विभूतियों और विशेषताओं की भण्डार बन जाती है।

विज्ञान पहले इन तथ्यों को नकारता आ रहा था, पर नकारने से तो कोई तथ्य असत्य नहीं हो जाता। जो घटनायें अनादि काल से घटती आ रही हैं, यदाकदा घटने के कारण वे विचित्र और चमत्कारी भी लगती हैं, परंतु उनके पीछे चेतना विज्ञान के सुनिश्चित नियम काम करते हैं, आज भी घटती है। पहले लम्बे समय तक उन्हें गप्प, भ्रम या मनगढ़न्त कहा जाता रहा, परन्तु विज्ञान उनकी ओर से और अधिक आँखें मूँदे नहीं रह सका।

अब इन घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन भी किये जाने लगे हैं, उनके निष्कर्षों को पुष्ट करने के लिए प्रयोगशालाओं में परीक्षण भी होते हैं तथा जो तथ्य विदित होते हैं उन्हें निर्विवाद रूप से प्रकाशित किया जाता है। उदाहरण के लिए बिना किसी बाहरी संसाधनों के मीलों दूर घटी घटनाओं का आभास ही लिया जाये। अध्यात्म की भाषा में इसे दूरबोध कहते हैं। आत्मा की यह सामर्थ्य लम्बी योग साधनाओं के अनवरत अभ्यास से प्राप्त होती है किन्तु, यदा कदा सामान्य स्थिति में भी इसकी अनुभूति हो जाती है।

घटना सन् 1918 की है। लन्दन में चार वर्ष का बालक टैड अपने हम उम्र अन्य बच्चों के साथ खेल रहा था। अचानक उसे खेलते-खेलते न जाने क्या हुआ कि चिल्लाता हुआ घर के भीतर दौड़ा आया-मेरे पिता का दम घुटा जा रहा है। उन्हें बचाओ। वे एक कोठरी में बन्द हो गये हैं और उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है। टैड इतना कहकर बेहोश हो गया और जब उसे होश आया तो उसके मुँह से जो पहले शब्द निकले यह थे-अब वे ठीक हो जायेंगे।

उस समय टैड के पिता दूसरे महायुद्ध में फ्राँस के मोर्चे पर लड़ रहे थे। युद्ध समाप्त होने पर जब वे घर वापस आये तो उन्होंने बताया कि 7 नवम्बर को वे एक गैस चैम्बर में फँस गये थे और वहाँ से किसी अदृश्य शक्ति के सहयोग से ही वे निकल पाये। घर के लोगों को तब यकायक याद आया कि जिस दिन टैड खेलते-खेलते बेहोश हो गया था उस दिन भी तो 7 नवम्बर थी।

इस प्रकार की एक नहीं असंख्य घटनायें हैं। कई व्यक्तियों को रहस्यमय अनुभव होते हैं और कभी पता चल ......... कि उन्होंने जो अनुभव किया है वह अमुक स्थान पर ठीक उसी प्रकार ........... है। वैज्ञानिकों ने जब इन रहस्यों .............. उद्घाटित करने का बीड़ा उठाया ..................... एक से एक चौंका देने वाले तथ्य सामने आये और सिद्ध हुआ कि साढ़े पाँच ............... ऊँची सी पौण्ड वजनी काया में ब्रह्माण्ड ................. व्यापी चेतना संयुक्त और ओत प्रोत है।

प्रसिद्ध जीवशास्त्री प्रो. .............. ब्राउन ने कई प्रयोगों के आधार पर ................ सिद्ध किया है कि सृष्टि में जो .................. प्राणी हैं वे ऐसे संग्राहक रिसीवर हैं .............. ब्रह्माण्ड के स्पन्दन तथा संवेदन ग्रह ............... करते रहते हैं। संग्राहक का काम ............ के बहुत सूक्ष्म परमाणु बताये जाते ............. जिनमें घनत्व, भार, चिरफुटन, चुम्बक ............ आदि कोई भौतिक लक्षण नहीं होते हैं।

अन्य वैज्ञानिकों ने भी इस ............... खोज की और पाया कि प्रो. ........... ब्राउन का मत एकदम सही है .................. संग्राहक का काम करने वाले इन .................. परमाणुओं को ‘न्यूगिनी’ नाम दिया .................. है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये .................. अरबों की संख्या में प्रकाश की गति .................. बहते रहते हैं। यहाँ तक कि ये .................. के भीतर से भी पार हो जाते हैं− .................. सूक्ष्म होते हैं। यदा कदा इनमें .................. विशेष क्रियाशीलता आती है। इसी .................. इन्हें देख पाना सम्भव होता है।

एण्ड्रिया ड्राब्स नामक वैज्ञानिक .................. ने न्यूट्रान के आधार पर ही साइत्रो.................. अणु का पता लगाया और कहा .................. साइक्रोन की मस्तिष्क के न्यूरॉन .................. से जुड़कर पराचेतना को जाग्रत .................. है। एक्सेल फरसाँफ नामक अन्तरि .................. वैज्ञानिक ने तो तथ्यों और प्रयोगों .................. आधार पर यह प्रमाणित कर दिखाया कि मनुष्य को कभी अनायास ही विचित्र अनुभूतियाँ होती हैं। उनमें से कुछ खास तरह की अनुभूतियाँ माइण्डोन नामक कणों के हलचल में आने से होती हैं। जब ये कण सक्रिय होते हैं तो हमारा अवचेतन मन (सबकाँशस) ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ जुड़ जाता है। यदि उन अनुभूतियों को पहचाना, जगाया अथवा समझा जा सके तो व्यक्ति बैठे ठाले ही किसी भी ग्रह नक्षत्र की बातें जान सकता है।

योग साधना भी एक विज्ञान है और उसके अपने सुनिश्चित सिद्धान्त हैं। विज्ञान का यह सिद्धान्त जिस प्रकार अपने आप में अकाट्य है कि हाइड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन का एक अणु मिलकर पानी बनता है उसी प्रकार योग विज्ञान के भी अकाट्य, अनुभूत और परीक्षित सिद्धान्त हैं, जिन्हें अपनाकर अभीष्ट दिशा में असाधारण सामर्थ्य अर्जित कर लेता है।

वैज्ञानिक परीक्षणों से जिस प्रकार यह सिद्ध हो गया है कि मनुष्य के भीतर कई केन्द्रों में ऐसी गुप्त सामर्थ्य छिपी पड़ी है जो अनुकूल परिस्थितियों में ही प्रकट होती है। योगाभ्यास द्वारा उन परिस्थितियों का निर्माण ही किया जाता है। रूस-जहाँ के स्कूलों में यह सिखाया जाता है कि धर्म अफीम और ईश्वर फ्राॅड है-में ही अब इस दिशा में बहुत कार्य होने लगा है। पिछले दिनों इन घटनाओं की वास्तविकता जाँचने के लिए कई परीक्षण किये गये।

29 अप्रैल 1976 को कार्ल निकोलायेव नामक युवा वैज्ञानिक को मास्को से साइबेरिया भेजा गया, उद्देश्य था-दूरानुभूति के कुछ सिद्धान्तों का प्रायोगिक परीक्षण। साइबेरिया के नियत स्थान पर गोल्डन वैली होटल में कुछ सोवियत वैज्ञानिकों के साथ बैठा हुआ था। उसी समय सैकड़ों मील दूर मास्को स्थित एक ‘इन्सुलेटेड’ कक्ष में वैज्ञानिक यूरी कामेस्की अपने कुछ साथियों के साथ बैठा था। यूरी को नहीं बताया गया था कि उसे किस प्रकार का सन्देश भेजना है। ठीक आठ बजे, एक वैज्ञानिक ने कामेस्की के हाथ में एक सील बन्द पैकेट पकड़ा दिया। उस पैकेट में धातु की बनी एक स्प्रिंग थी जिसमें सात क्वाइल लगे थे।

कामेस्की ने उस स्प्रिंग को उठा लिया और क्वाइलों पर अंगुलियाँ फेरने लगा। उस समय कामेस्की ने कार्ल निकोलायेव का ध्यान किया और पूरी एकाग्रता के साथ यह कल्पना की कि वह उसके सामने बैठा है तथा उस स्प्रिंग को देख रहा है-फिर वह कार्ल की आँखों से वह स्प्रिंग और क्वाइल देख रहा है।

उसी समय, मास्को से 1890 मील दूर अपने वैज्ञानिक साथियों के बीच बैठे कार्ल ने कुछ अजीब-सा अनुभव किया। जैसे उसे अपने हाथों में कोई वस्तु दिखाई दे रही हो। कुछ ही क्षणों बाद वह बोला गोल, चमकती हुई चीज, धातु से बनी हुई है-क्वाइल है।

इसके बाद कामेस्की ने मास्को से एक पेचकस का चित्र देखा तो कार्ल ने उसका विवरण भी शब्दशः बता दिया। कार्ल निकोलायेव ने टेलीपैथी को सिद्ध करने में बड़ी मेहनत की है। एक प्रेस सम्मेलन में कार्ल ने इन प्रयोगों के संदर्भ में कहा है-टेलीपैथी के क्षेत्र में मैंने जो सफलता प्राप्त की है वह हर कोई प्राप्त कर सकता है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में अन्तःशक्ति विद्यमान होती है। इसी लिए मैं अपनी योग्यता को विज्ञान की कसौटी पर कसा जाना महत्वपूर्ण मानता हूँ। यदि मैं ऐसी योग्यता प्राप्त कर सकता हूँ तो कोई कारण नहीं कि आप ऐसी योग्यता प्राप्त न कर सकें।

‘यह विद्या आपने कहाँ से सीखी?’ इस प्रश्न के उत्तर में कार्ल निकोलायेव ने बताया कि-बचपन में उन्हें योग पर किसी भारतीय महात्मा द्वारा लिखी हुई एक पुस्तक प्राप्त हो गयी थी। उसी से प्रेरणा प्राप्त कर मैं अपने मित्रों से कहने लगा कि वे मुझे कोई मानसिक आदेश दें। आगे चलकर मैंने योगदर्शन, राजयोग, प्राणायाम आदि साधनाओं का 11 वर्ष तक अभ्यास किया। इसका परिणाम वर्तमान सफलता के रूप में प्रस्तुत है। इस क्षेत्र का और अधिक गहरा अध्ययन करने के लिए रूस ने भारत सरकार से कुछ योगियों को जिन्होंने योग साधना के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलतायें अर्जित की थीं-रूस भेजने के लिए भी आग्रह किया था। न केवल रूस में वरन् अन्य पश्चिमी देशों में भी इस प्रकार के प्रयोग सफलतापूर्वक किये गये हैं तथा इस दिशा में बहुत आगे पहुँच गये व्यक्तियों से कई महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोग लिया गया है।

चैकोस्लोवाकिया के व्रतिस्लाव काफ्का ने पराशक्ति के संबंध में अनेकों अद्भुत प्रयोग किये हैं। उन्होंने एक प्रयोगशाला भी स्थापित कर रखी है। कहते हैं कि द्वितीय महायुद्ध में जब मित्र राष्ट्रों के अधिकारियों को युद्ध की स्थिति के बारे में कुछ पता नहीं चलता था तो वे बेतिस्लाव काफ्का की ही सहायता लेते थे। काफ्का अपनी प्रयोगशाला में कार्यरत दूसरे मनोवैज्ञानिक को समाधिस्थ कर देते तथा उससे वही प्रश्न करते। प्रायः यह जानकारी सही निकलती थी।

प्रश्न उठता है कि परमात्मा ने यह सामर्थ्य क्या केवल मनुष्य को ही प्रदान की है? उत्तर एक ही है-उसे अपनी सभी सन्तानें समान रूप से प्रिय हैं और उसने सभी प्राणियों में विभिन्न सम्भावनाओं के बीच बो रखे हैं क्योंकि शरीर भेद होने पर भी आत्मा तो सबमें समान रूप से विद्यमान है। अन्य प्राणियों को अलौकिक क्षमता का अध्ययन करने के लिए पिछले दिनों रूस में ही खरगोश पर एक प्रयोग किया गया।

सर्वविदित है कि पानी के भीतर पनडुब्बी से जमीन पर बैठे व्यक्ति का किसी भी प्रकार कोई संपर्क सम्भव नहीं है। यहाँ तक कि रेडियो और बेतार के तार भी काम नहीं कर सकते। पराशक्ति की अनुभूति का प्रयोग करने के लिए रूस के वैज्ञानिकों ने एक पनडुब्बी में खरगोश के बच्चों को बन्द कर दिया और उनकी माँ को बाहर जमीन पर एक प्रयोगशाला में रखा गया। खरगोश के बच्चों को पानी में उतारने से पूर्व उनके मस्तिष्क में ‘इलेक्ट्रोड्स’ लगा दिये गये थे। जब पनडुब्बी समुद्र में बहुत नीचे चली गयी तो उसमें मौजूद व्यक्तियों ने एक एक करके खरगोश के बच्चों की हत्या कर दी। मादा खरगोश को इस हत्या के विषय में कोई जानकारी नहीं थी, पर ठीक उसी समय जबकि समुद्र तल में उसके बच्चों की हत्या की जा रही थी, मादा खरगोश के मस्तिष्क में जैसे उसके सामने ही बच्चों को मारा गया हो।

यह चेतना हर प्राणी में विद्यमान देखी गयी है। कारण स्पष्ट है कि आत्मा केवल मनुष्य में ही नहीं है, जीव-जन्तुओं पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों में भी है। कई बार आत्मा की यह सामर्थ्य मनुष्यों की अपेक्षा दूसरे प्राणियों में ज्यादा देखी जाती है, जिन्हें अबोध बुद्धिहीन और मनुष्य की तुलना में सृष्टि का तुच्छ घटक समझा जाता है। इस संदर्भ में तत्वदर्शियों का कहना है कि मनुष्य ने अपने जीवन में कृत्रिमता, रागद्वेष, ईर्ष्या, डाह आदि विकारों के कारण उस शक्ति स्रोत को कमजोर बना लिया है अथवा उस पर पर्दा डाल दिया है।

महर्षि पातंजलि ने यम नियमों के दृढ़तापूर्वक पालन करने और व्यक्तित्व, चरित्र से उन सभी सिद्धियों के करतलगत होने की बात कही है जिन्हें लोग लम्बी तप साधनाओं से प्राप्त होने की बात करते हैं। मैले दर्पण को साफ कर लेने पर जिस प्रकार उसमें स्पष्ट छवि देखी जा सकती है उसी प्रकार अपनी अन्तरंग चेतना पर चढ़े मलीनता के आवरणों को हटाकर उसमें संसार की दृष्ट-अदृष्ट सभी वस्तुओं, घटनाओं को देखा जा सकता है, इसमें कोई दो राय नहीं है।


मन का समाधान (Kahani)

उपासना का अर्थ मात्र देवालय बना देना नहीं है। वैसा जीवन भी जीना होता है, तभी वह सफल है।

चित्रगुप्त अपनी पोथी के पृष्ठों को उलट रहे थे। यमदूतों द्वारा आज दो व्यक्तियों को उनके सम्मुख पेश किया गया था। यमदूतों ने प्रथम व्यक्ति का परिचय कराते हुए कहा, “यह नगर सेठ हैं। धन की कोई कमी इनके यहाँ नहीं। खूब पैसा कमाया है और समाज हित के लिये धर्मशाला, मन्दिर, कुआँ और विद्यालय जैसे अनेक निर्माण कार्यों में उसका व्यय किया है।” अब दूसरे व्यक्ति की बारी थी। उसे यमदूत ने आगे बढ़ाते हुए कहा, "यह व्यक्ति बहुत गरीब है। दो समय का भोजन जुटाना भी इसके लिए मुश्किल है। एक दिन जब ये भोजन कर रहे थे, एक भूखा कुत्ता इनके पास आया। इन्होंने स्वयं भोजन न कर सारी रोटियाँ कुत्ते को दे दीं। स्वयं भूखे रहकर दूसरे की क्षुधा शान्त की। अब आप ही बतलाइये कि इन दोनों के लिये क्या आज्ञा है?" चित्रगुप्त काफी देर तक पोथी के पृष्ठों पर आँखें गड़ाये रहे। उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ कहा-धनी व्यक्ति को नरक में और निर्धन व्यक्ति को स्वर्ग में भेजा जाये।"

चित्रगुप्त के इस निर्णय को सुनकर यमराज और दोनों आगन्तुक भी आश्चर्य में पड़ गये। चित्रगुप्त ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा-धनी व्यक्ति ने निर्धनों और असहायों का बुरी तरह शोषण किया है। उनकी विवशताओं का दुरुपयोग किया है और उस पैसे से ऐश और आराम का जीवन व्यतीत किया। यदि बचे हुये धन का एक अंश लोकेषणा की पूर्ति हेतु व्यय कर भी दिया, तो उसमें लोकहित का कौन सा कार्य हुआ? निर्माण कार्यों के पीछे यह भावना कार्य कर रही थी कि लोग मेरी प्रशंसा करें, मेरा यश गायें। गरीब ने पसीना बहाकर जो कमाई की, उस रोटी को भी समय आने पर भूखे कुत्ते के लिए छोड़ दी। यह साधन-सम्पन्न होता, तो न जाने अभावग्रस्त लोगों की कितनी सहायता करता? पाप और पुण्य का सम्बन्ध मानवीय भावनाओं से है, क्रियाओं से नहीं। अतः मेरे द्वारा पूर्व में दिया गया निर्णय ही अंतिम है।" सबके मन का समाधान हो चुका था।


अवतार की पहचान

तेजोदीप्त शरीर। लम्बे श्वेत केश। घुटनों तक प्रलम्ब बाहु। एक हाथ में कमण्डल, पैरों में खड़ाऊँ। ललाट पर प्रचण्ड तिलक। रोम-रोम सफेद हो चला है। आयु का हिसाब न तो इनके पास है और न तो देवों को ही ज्ञात है। भूत, भविष्य, वर्तमान, पृथ्वी, पाताल और अंतरिक्ष में कोई ऐसा काल और लोक नहीं जहाँ इस तपस्वी की गति न हो। विश्व के वृत्त पर शताब्दियों के सुमन झर कर गिर गये। लेकिन काल का कोई झंझावात इसे उड़ा न सका।

मौत इससे भयभीत थी। काल इसका क्रोध देख काँपता था जीवन इसकी शरण में सुरक्षित था। जिस तरह सहस्राब्दियाँ बीत आने पर वटराज के विशाल कलेवर पर नये जड़-मूल झूलते हैं, उसी प्रकार इस सिद्ध पुरुष के सिर पर मटमैली जटाएँ झूल रही थीं।

देवलोक में अभी वह मध्याह्न विश्राम कर ही रहे थे कि नूपुरों और मृदंग की ध्वनियों ने उनके विश्राम में विक्षेप पहुँचाया। महर्षि उठ खड़े हुए और एक देवता से पूछा-क्यों यह शोर कैसा हो रहा है?

अरे आपको मालूम नहीं महाराज, मृत्युलोक में कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन की महारानी माया देवी ने एक पुत्र प्रसव किया है।

तो इसमें हँसने-चिल्लाने की क्या बात है? प्रतिदिन धरती पर ऐसे प्राणी पैदा होते हैं।’

नहीं महाराज, यह बालक असाधारण हैं। भविष्य में वह बोधिवृक्ष की छाया में बुद्धत्व प्राप्त करेगा और संसार के समस्त प्राणियों को करुणा का संदेश देगा। वह प्रथम बार मनुष्य के स्वभाव को बदल कर उनमें प्रेम का संचार करेगा। उन्हें हिंसा से अहिंसा की ओर ले जाएगा। मनुष्य तब यह स्वीकार करेगा कि जीवन इसी का नाम नहीं कि आप अकेले जीवित रहें, बल्कि प्राणिमात्र के जीवन की रक्षा उसके प्रति करुणा, मैत्री एवं प्रेम के भाव भी रखना आवश्यक है। उसकी हर चरण चाप से भूलोक में क्रान्तियाँ जन्मेंगी। उसकी वाणी से परिवर्तन के भूचाल आयेंगे। उसकी दृष्टि से करुणामृत का वर्षण होगा और उसके प्रत्येक संकेत से शान्ति का स्रोत बहेगा। वह बहुजन के कल्याण और बहुजन की शान्ति के निमित्त विचरण करेगा। लोक जीवन, वैराग्य साधना और सिद्धि साफल्य के क्षेत्रों में वह विचार क्रान्ति करेगा।

संक्षेप में वह आसमुद्र वसुन्धरा पर धर्मचक्र प्रवर्तन करेगा। उसके द्वारा प्रवाहित विचार गंगा युग-युगान्तरों तक मानव मन के कल्मष का प्रक्षालन करती रहेगी। पाप के प्रपंचों एवं काल के वक्र चक्र के कारण भले यह धारा दुबली होकर ओझल प्रतीत हो परन्तु मिट न सकेगी। समय पाकर जिस प्रकार तरुवर फलते-फूलते हैं और शीर्ण जीर्ण पत्तों को त्यागकर नव पल्लव उपजाते हैं, उसी तरह देवों और मानवों के इस वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ, युगाचार्य का विचार प्रवाह, प्रतिपल नवजीवन और शक्ति पाता रहेगा।

ओह, तब तो आज मुझे इस दोपहरी में ही कपिलवस्तु जाना पड़ेगा। जल्दी-जल्दी ब्रह्मर्षि कालदेवल ने आना उत्तरीय संभाला। कमण्डल उठाया। मुँह पर पानी के दो छींटे दिए और मुँह और दाढ़ी के बालों में उलझे जल बिन्दु पोंछे बिना ही वेगपूर्वक वे हिमगिरि के आँगन में उतर पड़े। हिमालय के पहरुओं ने और उस अन्तहीन प्रदेश में तपस्या करने वाले साधुओं ने कालदेवल को यों बिखरे-बिखरे भागे-भागे जाते देख अनुमान लगाया कि हो न हो आज धरा पर कुछ अपूर्व घटा हो। हिमगिरि के श्रृंगों की बर्फीली चोटियाँ पिघल-पिघल कर जैसे किसी देव शिशु के चरण धोने को आकुल चल पड़ी है। कुछ ही समय के अन्तराल में महासिद्ध कालदेवल के खड़ाऊँ की खट-खट कपिलवस्तु में सुनायी पड़ने लगी। जिसे सुनते ही शुद्धोधन के दरबारी, सभासद, मंत्री, प्रहरी, रानियाँ और दास-परिचारक चौंके। सम्राट ने पैरों में साष्टांग प्रणाम करते हुए कहा-परमर्षि बड़े अच्छे अवसर पर आये। मैं बारम्बार आपका ही स्मरण कर रहा था।"

हर्ष विभोर राजन् को पुत्र जन्म का संवाद देने की सुध न रही। तब मायादेवी ने आगे बढ़कर कहा-महर्षि आज पट्टमहिषी मायादेवी ने युवराज को जन्म दिया है।"

मैंने सुना है, तभी तो मैं इस असमय आया, कालदेवल का साँस चढ़ रहा था-मैं शिशु को देखूँगा, जल्दी करो।"

मंत्रीगण दौड़े। अन्तःपुर में संवाद गया। रानियों ने आरती के थाल, पत्र, पुष्प, कन्द मूल सजाए। लेकिन जब ऋषि आये तो सबको परे हटाकर अपना पथ बनाते चले गये-अभी समय नहीं है।"

नवजात शिशु को स्वयं महाराज शुद्धोधन ने लाकर तपस्वी के चरणों में रख दिया। परन्तु बालक के पैर, अपनी ओर झुके हुए तपस्वी की दाढ़ी में लग गए। तुरन्त ही तपस्वी उठा और हाथ जोड़, गदगद कण्ठ से जय-जय और धन्य भाग्य पुकारता हुआ शिशु के चरणों को बार-बार सिर-माथे पर लगाने लगा।

ऋषि के बहते अश्रु, शिशु का पैर उठाना और तपस्वी वन्दना का यह दृश्य देखकर राजा और परिजन सब चकित हो गए।

“क्या बात है महाराज?” राजा ने हाथ जोड़कर पूछा-आप इतने विह्वल क्यों हो रहे हैं? और शिशु की यह वन्दना।”

“अरे शुद्धोधन, तू नहीं जानता तो चुप रह। मैं इसे प्रणाम न करूँ, तो क्या अपने सिर के सात टुकड़े करवाऊँ?”

इसके पश्चात् कालदेवल ध्यानमग्न हुए। उन्होंने पूर्व के चालीस और भावी चालीस ऐसे अस्सी जन्मान्तरों का वृत्त और इतिहास दिव्यदृष्टि से देखकर जान लिया, अवश्य यह छोकरा बुद्धत्व को प्राप्त करेगा। मुक्ति इसकी चरण-रज लेगी। निर्वाण हाथ बाँधे इसका अनुचर होगा। प्रकट में उन्होंने कहा- “कैसा सौम्य व्यक्तित्व है इसका।”

और कालदेवल अपने पोपले मुँह से मुस्कराए, जिसमें नए दन्ताकुद आ रहे थे।

उपस्थित जन शिशु और कालदेवल पर अपनी दृष्टि लगाए थे। कालदेवल की दृष्टि शिशु पर थी और शिशु की दृष्टि कालदेवल पर थी। कालदेवल ने सोचा- “यह शिशु बड़ा होकर बुद्धत्व प्राप्त करेगा। परन्तु तब तक क्या मैं भी जीवित रहूँगा? काल कब से मुझे खा लेने को आतुर है। कई बार छल-कौशल से उसने यत्न किया। कई बार प्रार्थना की उसने। शरीर का धर्म तो मुझे निभाना ही पड़ेगा। आज नहीं कल। परन्तु क्या एक लम्बी अवधि तक मैं जी सकूँगा। जबकि यह शिशु बुद्ध बनेगा?”

त्रिकालज्ञ तपस्वी ने ध्यान से जाना-अरे तब तक तू जीवित न रहेगा। यात्रा की समाप्ति निकट आ गयी है। पथ का अन्त समीप है। चलते-चलते आज मंजिल अशेष हो गयी है। सब रहेंगे अरे तू अकेला न रहेगा।”

सहस्राब्दियों की आयु व्यतीत करके भी उनके मन में ‘कुछ ही वर्ष’ और जीने की ललक, पिपासा बन गयी। हाय रे मनुष्य! जितना जीता है उतना मरने से मुकरता है। शताब्दियाँ देखी पर तेरे मन में दो-तीन दशाब्दियाँ देखने की प्यास अपूर्ण रह गयी।

बालक के बुद्ध बनने से पूर्व अपनी अवश्यंभावी मृत्यु का चलचित्र देखकर तृषा, ग्लानि, निराशा, पश्चाताप और प्रलोभन की पीर से महर्षि कालदेवल का हृदय समुद्र उद्वेलित हो उठा। उनकी आँखें मिचमिचाईं, होठों से स्फुरण हुआ, हाथ-हथेलियाँ काँपी, जटा, श्मश्रु के केशों में प्रकम्प आया और वे फफक कर रो उठे। महाराज शुद्धोधन घबराकर उनके चरणों में बैठ गए और धीरे-धीरे उनके पैर दबाने लगे। रानियाँ व्यग्र हो उठीं। प्रस्तुत जन समुदाय चित्र लिखित सा रह गया।

कालदेवल का यों फूट-फूट कर रोना असाधारण बात थी। देव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, असुर, जड़, चेतन नर-नारी किसी ने उन्हें आज तक बिसूरते नहीं देखा था। आज वही महामानव इस मंगल बेला में इस उल्लास में आयोजकों की भावना का ख्याल न कर, यों शकुन बिगाड़ने वाली कर्कशा की तरह बिलख रहा था। दुर्मना व्यक्ति मन ही मन कहते थे-अभी तो यह पोपले

मुँह से मुस्करा रहा था, अभी आँसू बहाने लगा।

“देवर्षि कुछ कहिए तो शिशु का कोई अशुभ होगा?”

“नहीं राजन् स्वयं काल भी इसका बाल-बाँका नहीं कर सकता। आप प्रसन्न हों आपका पुत्र विश्व के इतिहास को नयी दिशा देगा। सहस्रों वर्षों तक राजनीति को नया रुख देगा। मानव स्वभाव को नया रूप देगा। हे सम्राट, यह होनहार शिशु मानव संस्कृति की प्रगति को अभिनव गति देगा और समस्त संसार के प्राणियों को नया धर्म देगा। यह निश्चय ही सम्यक् सम्बुद्ध अर्हत होगा। मैं इसके प्रमाण में बत्तीस लक्षण प्रस्तुत करता हूँ।

इस कुमार की दिव्य देह देखो-इसके पद तल में सर्वाकार परिपूर्ण नाभि नेमि युक्त सहस्रारों वाला चक्र है। यह सुप्रतिष्ठित पाद है अर्थात् इसका पैर धरती पर समान पड़ेगा। यह आयात पार्ष्णि है। .......................................


सामूहिक प्रार्थना के चमत्कारी सत्परिणाम

एकांकी और सामूहिक प्रयत्नों की सफलता के स्तर में भारी अन्तर रहता है। अलग-अलग रहकर दस आदमी अलग प्रयत्नों से जितना काम कर सकते हैं, उनकी तुलना में उन दसों का संयुक्त प्रयत्न कहीं अधिक परिणाम उत्पन्न करेगा। अलग-अलग रहकर सींकें उतनी सफाई नहीं कर सकतीं जितनी कि उन्हें मिलाकर बनने वाली बुहारी द्वारा संभव होती हैं। ठीक इसी प्रकार अलग-अलग की जाने वाली उपासना व्यक्ति एवं वातावरण को परिष्कृत करने में जितनी उपयोगी सिद्ध होती हैं उसकी तुलना में एक संकल्प सूत्र में आबद्ध होकर एक तत्त्वावधान में ही गई साधना का प्रभाव कहीं अधिक होता है। सामूहिक प्रयास,सत्संग, कथा, कीर्तन, यज्ञानुष्ठान, परिक्रमा, तीर्थ यात्रा आदि की क्षमता सामान्य गणना में कहीं अधिक होती है।

शब्द शक्ति का संयुक्त समावेश कितना प्रभावी होता है, इसका एक प्रमाण तब मिलता है जब किसी भारी वजन को ऊपर उठाने या आगे धकेलने के लिए मजदूर लोग एक नारा लगाकर, एक साथ अपनी सामर्थ्य को केन्द्रित करते हैं। प्रातः सायं मंदिरों में होनेवाली आरती, विद्यार्थियों की सामूहिक प्रार्थना में भी यही विशेषता रहती है कि संयुक्त मन, संयुक्त भाव प्रवाह से यही विशेषता रहती है कि संयुक्त मन, संयुक्त भाव प्रवाह से उत्पन्न शब्द शक्ति उच्चारण कर्ताओं से लेकर अन्य असंख्यों के समग्र वातावरण को प्रभावित करने में विशेष रूप से फलप्रद होती है।

ध्वनि शक्ति के संदर्भ में जो शोध कार्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में चल रहा है, उससे सामूहिक उच्चारण की प्रतिक्रिया के संबंध में नये तथ्य सामने आये हैं। एक निष्कर्ष यह निकला है कि संसार के 50 प्रतिशत व्यक्ति भी यदि सक्रिय हों तो वे शब्दों तथा ध्वनियों द्वारा 3 घण्टे में 6 हजार खरब वॉट विद्युत शक्ति पैदा करते हैं, जो भारत में पैदा की जाने वाली कुल ऊर्जा से 8 गुना ज्यादा है। सम्पूर्ण विश्व में इस ऊर्जा से घण्टों प्रकाश किया जा सकता है।

साधारणतया वाणी का उपयोग बातचीत के एवं जानकारियों के आदान-प्रदान हेतु ही होता है। यह उसका अति स्थूल प्रयोग है। शब्द की सूक्ष्म शक्ति और उसके उपयोग की विधि जानी जा सके तो उससे जितने गुना लाभ आमतौर से उठाया जाता है, उससे असंख्य गुना उठाया जाना सम्भव हो सकता है।

शब्द से जुड़ा विद्युत प्रवाह कितना प्रचण्ड है, इसे पदार्थ विज्ञानवेत्ता जानते हैं और उसी ज्ञान के आधार पर रेडियो, टेलीविजन, राडार आदि यंत्रों का निर्माण करते हैं। आज इसी शब्द शक्ति के आधार पर शरीर की विभिन्न गहन पर्तों में छुपी व्याधियों का निदान भी सम्भव है। ............................... द्वारा प्रतिध्वनि प्राप्त कर मस्तिष्क की बीमारियों का पता लगाया जा सकता है तो उसी तरह इको कार्डियोग्राम द्वारा हृदय की व्याधियों का। आवाज मुँह से निकलने वाली हवा मात्र ही नहीं है। वह एक शक्तिशाली ऊर्जा (एनर्जी)की तरह है।

उच्चारित शब्द कान व त्वचा वर सीधा प्रभाव डालते हैं। कान एक प्रकार का माइक्रोफोन है जिसमें 02 से 20000 आवृत्तियों का प्रवेश होते ही एक धारा प्रवाहित होने लगती है। सीधे मस्तिष्क तक पहुँचकर यह शरीर के सभी भागों एवं ग्रंथियों को क्रियाशील बना देती है। मनुष्य शरीर, विचारणा एवं भाव स्थिति की त्रिविधि क्षमताओं का समन्वय करके जो विद्युत प्रवाह प्रस्तुत होता है, उसकी क्षमता को अध्यात्म .................. ने समझा है उसी आधार पर .................. का आविष्कार किया है।

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शब्दोच्चारण होता है उनका सीधा सम्बन्ध मानव शरीर के सूक्ष्म संस्थानों से है। षट्चक्र, उपात्मक एवं दिव्य नाड़ियों, ग्रन्थियों का सूक्ष्म संस्थान है, जिनसे हमारे मुख्य यंत्र के तार जुड़े हुए है। जब मंत्र गुंफनों का प्रभाव उक्त संस्थानों पर पड़ता है तब एक अतिरिक्त शक्ति तरंगों का प्रवाह चल पड़ता है। जो मंत्र विज्ञानी को लाभान्वित करता है, उसकी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाता है। जब वे कम्पन बाहर निकलते हैं तो वातावरण को प्रभावित करते हैं। ये कम्पन सूक्ष्म जगत में अभीष्ट परिस्थितियों का सृजन करते हैं और व्यक्ति विशेष को प्रभावित करना हो तो उस पर भी असर डालते हैं।

भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रन्थों में शब्दों की इन्हीं प्रक्रियाओं को ध्यान में रखकर विविध शब्द प्रक्रियाओं का विधान किया गया है। आज के वैज्ञानिक युग में यह सब मनोवैज्ञानिक युद्ध यानी “साइकोलॉजीकल वार” (या स्रावयिक युद्ध) के अंतर्गत आता है।

इसी शब्द शक्ति का उपयोग करके पिछले दिनों कनाडा के उत्तरी भाग में हजारों वर्ग मील के क्षेत्र में सोवियत रूस द्वारा रोगवर्धक तरंगें फैलाई गयी थीं। जिनसे वहाँ के निवासियों में चिड़चिड़ापन, मानसिक तनाव, डिप्रेशन, आत्महत्या की वृत्ति देखने में आयीं। विश्लेषण करने पर मालूम हुआ कि किसी स्थान विशेष से तरंगें छोड़ी जा रही हैं जो किन्हीं निश्चित आवृत्तियों में होने से मानसिक क्षमताओं पर ऐसा प्रभाव छोड़ रही है। इस तरह शब्द शक्ति का दुरुपयोग कर ‘साउण्ड वार’ भी आरम्भ हो गया है। दूसरी ओर चिकित्सकों ने ध्वनि विज्ञान का सहारा लेकर साउण्ड थेरेपी नामक एक नयी ही चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया है जिससे शरीर के विभिन्न भागों में दर्द आदि कष्टों का इलाज किया जाता है। ध्वनि के कम्पनों द्वारा परमाणु को सूक्ष्मतम भागों में विभाजित करना अब सम्भव है। इन सबके मूल में हमारे ऋषि मनीषियों द्वारा प्रतिपादित मंत्र शक्ति है जिसमें ध्वनि विज्ञान का आश्रय लेकर सूक्ष्म संस्थानों व वातावरण को प्रभावित किया जाता है।

पाश्चात्य देशों में शब्द-शक्ति के एक रूप को सम्मोहन (हिप्नोटिज्म) और आत्म परामर्श (आटो सजेशन) की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रसिद्ध रूसी मनोवैज्ञानिक आई. पी. पावलोव ने शब्दों को अत्यन्त शक्तिशाली अनुकूलित प्रतिवृत्त (उत्तेजक) कण्डीशण्ड रिपलेक्स की संज्ञा दी है। शब्द शक्ति पर पावलोव ने विशद कार्य किया है, जो विश्व प्रसिद्ध है। शब्द शक्ति का महत्व वैज्ञानिक जानते हैं व उसे उपयोग में भी अब लाने लगे हैं। यदि यह सब संभव है तो मंत्र विद्या की सामर्थ्य को समझकर हम उसका समुचित उपयोग कर भौतिक उन्नति से कम नहीं बल्कि कई गुनी अधिक लाभदायक आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं।

यह शब्द शक्ति तब और भी अधिक प्रखर हो उठती है जब उसका भावनात्मक तारतम्य एवं उच्चारण का प्रवाह सामूहिकता को अपना ले। वेद मंत्रों को सामगान के स्वर क्रम में गाने वाले उद्गाता अपने उपक्रम से चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करते हैं। यज्ञानुष्ठानों में भी यही शब्द सहकार एक महत्वपूर्ण तथ्य होता है और उसका प्रभाव भी असाधारण ही होता है।


अहंता और नम्रता के अन्तर पर विचार (Kahani)

अहंकार को मिटाने एवं विनम्रता की शिक्षा देने हेतु कोई भी घटनाक्रम लिया जा सकता है। शाल्मली का एक वृक्ष था बहुत ऊँचा भी और चौड़ा भी। पास में छोटे-छोटे झाड़-झंखाड़ भी उगे हुए थे। एक साधु उधर से निकले। दोनों के समाचार पूछे, वृक्ष से भी और झाड़-झंखाड़ से भी। दोनों के बीच परस्पर संबंध कैसे हो? इस बात को भी उनने लगे हाथों पूछ ही लिया। विशाल वृक्ष ने अपने बड़प्पन की विस्तारपूर्वक प्रशंसा की और सौभाग्य सराहा। साथ ही पड़ोसी झाड़ियों का उपहास उड़ाया। झाड़ियाँ क्या कहतीं। उन्होंने अपनी स्थिति पर सन्तोष किया और कहा, जिस स्थिति में भी वे हैं, प्रसन्न हैं। बड़े प्राणियों को न सही, छोटों को ही छाया और आश्रय प्रदान करती है।

बहुत दिन बाद साधु इसी रास्ते फिर वापिस लौटे। वृक्ष का पता न था और झाड़ियों का विस्तार हो चला था।

पूछा तो पता चला कि एक बार भयंकर तूफान आया था। उसकी चपेट में अनेकों वृक्ष आये और वह शाल्मली भी उस चक्रवात में धराशायी हो गया। साधु ने दुःख मनाया, साथ ही झाड़ियों से पूछा-आप लोग उस कुचक्र से कैसे बच गये?”

झाड़ियों ने कहा-देव हमें अपनी तुच्छता का भान था, सो तूफान आते ही सिर झुका लिया, तूफान ऊपर से उतर गया। वृक्ष अकड़ा रहा और अन्धड़ से टकरा कर धराशायी हो गया।

अहंता और नम्रता के अन्तर पर विचार करते हुए साधु अपने रास्ते आगे बढ़ गये।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम-

युग निर्माण योजना का प्रारम्भ इस उद्देश्य से हुआ कि मनुष्य की भावनात्मक स्थिति में परिवर्तन किया जाये और उसे ऊँचा उठाया जाय। संसार में जितनी भी समस्यायें हैं उन सारी समस्याओं का एक मात्र उपाय यह है कि मनुष्यों का भावनात्मक स्तर गिरता हुआ चला गया। यदि मनुष्यों का भावनात्मक स्तर ऊँचा हो तो जो समस्यायें आज हमको दिखाई पड़ती हैं उनमें से एक का भी अस्तित्व न रहे। जितनी भी कठिनाइयाँ मनुष्य के सामने हैं वे उसकी स्वयं की पैदा की हुई हैं, वास्तविक नहीं। सृष्टि में जितने भी जीव रहते हैं सारे के सारे अपने जीवन की सुविधाओं को आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। कीड़े-मकोड़ों से लेकर के जलचर, नभचर और थलचर के सामने कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसके कारण से वह दुःखी रहते हों। मनुष्यों के सम्पर्क में जो आ गये हैं उन प्राणियों के दुखी होने के कारण हैं। उनको मनुष्यों ने पाल रखा है, वे दुःखी भी हो सकते हैं, काटे भी जा सकते हैं, भूखे भी रखे जा सकते हैं, घायल भी हो सकते हैं लेकिन जो प्रकृति की गोद में रहते हैं उनके सामने कोई समस्या नहीं है जीवन यापन करने के सम्बन्ध में फिर मनुष्य के सामने इतनी समस्यायें क्यों? मनुष्य तो बुद्धिमान प्राणी हैं, सुशील प्राणी हैं, उन्नत प्राणी है उनके सामने तो सुख सुविधाओं के अम्बार होने चाहिये।

लेकिन हम देखते हैं कि दूसरे प्राणियों की तुलना में मनुष्य बहुत दुखी है। उसका एक मात्र कारण यह है कि उसकी विचारणाएँ, उसकी भावनायें, उसके दृष्टिकोण निम्न स्तर के होते चले गये। अगर यह स्तर उनका ऊँचा उठा रहा होता तो अभावग्रस्त स्थितियों में भी मनुष्य ने शान्ति का जीवन जिया होता। कहा जाता रहा है कि सम्पदायें मनुष्य के पास होंगी, सुख सुविधायें मनुष्य के पास होंगी तो वह समुन्नत होगा, सुखी रहेगा और आनन्द से रहेगा, लेकिन यह बात सही नहीं है। गरीब लोगों के पास जिनके पास साधन और सामान नहीं होते, सम्पत्ति नहीं होती, वह भी बड़ी सुख और सुविधा का जीवन जीते हैं और उनकी वृद्धि का कोई मार्ग रुका नहीं रहता। ऋषियों का जीवन इसी प्रकार का था। उनके समान ज्यादा अभावी दुनिया में कोई भी नहीं है। पहनने के नाम पर एक लंगोटी, इस्तेमाल करने के नाम पर एक कमण्डल, फूस की झोंपड़ी, जमीन पर सोना, फूस की बिछावन, घास–पात और कन्द-मूल खा करके गुजारा कर लेना। इतना सब होते हुए भी ऋषियों ने बताया कि अभावग्रस्तता में भी जीवन सुखी बन सकता है, सुख और शान्ति का स्रोत बन सकता है विद्या अध्ययन में कोई रुकावट पैदा नहीं हुई। मगर सही बात यह है कि जिन-जिन लोगों के पास विशेष सुविधायें थीं, उन लोगों की अपेक्षा उन लोगों ने ज्यादा सुखी और समुन्नत जीवन जिया। ये बात उन्होंने साबित करने के लिए की थी कि वक्त बेवक्त वे न हों, साधन मनुष्य के पास न हों तो भी वह आदमी सुखी जीवन जी सकता है, समुन्नत जीवन जी सकता है और दूसरों के लिये बड़ा उपयोगी सिद्ध हो सकता है। फर्क केवल एक है कि भावनात्मक स्तर ऊँचा उठा हुआ हो।

इसकी तुलना में दूसरी बात है जिनके पास अपार सम्पदायें थीं और रावण जैसों के पास सम्पदाओं की क्या कमी थी उसकी सोने की लंका बनी हुई थी, लेकिन वह स्वयं भी दुख में रहा, स्वयं भी क्लेश चक्र में पड़ा रहा, उसके सम्पर्क में जो लोग आये, जहाँ कहीं भी वह गया, वहाँ उसने दुख फैलाया और संकट फैलाया। सम्पत्ति से क्या लाभ रहा। विद्या से में चैन से रहा हूँ लेकिन उसके पास विद्या होने से भी क्या लाभ हुआ? उसके पास धन था, विद्या थी, बल था, सब कुछ तो था, लेकिन एक ही बात की कमी थी भावनात्मक स्तर का न होना। बस, एक ही समस्या का आधार है जिसे यों हम समझ लें तो फिर हम उपाय भी खोज लेंगे और विजय भी मिलेगी। उपाय हम अनेक ढूँढ़ते रहते हैं पर मैं समझता हूँ कि इतने पर समाधान नहीं हो पाते। खून अगर खराब हो तो खराब खून के रहते हुए फिर कोई दवा-दारु कुछ काम नहीं करेगी। फुन्सियाँ निकलती रहती हैं। एक फुंसी पर पट्टी बाँधी, दूसरी फुंसी फिर निकल पड़ेगी। एक घाव अच्छा हुआ, दूसरा घाव फिर पैदा हो जायेगा। बराबर कोई न कोई शिकायत पैदा होती रहेगी। खून खराब न हो, खून साफ हो जाय तब न कोई फुंसी उठने वाली है न कोई और चीज उठने वाली है। ठीक इसी प्रकार से अगर हमारा भावनात्मक स्तर ऊँचा हो तो न कोई समस्या पैदा होने वाली है और न कोई गुत्थी पड़ने वाली है। इसके विपरीत हमारी मनः स्थिति और हमारा दृष्टिकोण गिरा हुआ हो तो हम जहाँ कहीं भी रहेंगे अपने लिये समस्या पैदा करेंगे और दूसरों के लिये भी समस्या पैदा करेंगे। यही वस्तु स्थिति है और यही इसका आज की परिस्थितियों का दिग्दर्शन है।

भूतकाल में भारतवर्ष का इतिहास उच्च कोटि का रहा है, समुन्नत रहा, सुखी रहा है। इस पृथ्वी पर देवता निवास करते थे, स्वर्ग की परिस्थितियाँ थीं, इसका और कोई कारण नहीं था न आज के जैसे साधन उस जमाने में थे। आज जितनी नहरें हैं उतनी उस जमाने में थीं कहाँ। आज बिजली के जितने साधन-शक्ति प्राप्त हैं उस जमाने में कहाँ थे। आज जितने अच्छे पक्के मकान और दूसरे यातायात के साधन हैं उस जमाने में कहाँ थे। लेकिन इस पर भी यह देश सम्पदा का स्वामी था। इस देश के नागरिक देवताओं के शिविर में चले जाते थे। यह भूमि तब स्वर्गादपि गरीयसी मानी जाती थी। यद्यपि आज की तुलना में अभावग्रस्त थी, उस जमाने में इसका क्या कारण था। इसका कारण एक ही था कि उस जमाने के लोग उच्च कोटि का दृष्टिकोण अपनाये हुए थे। उनकी भावनाएँ उच्च स्तर की थी। उसका परिणाम यह था कि लोग परस्पर स्नेह पूर्वक रहते थे, सहयोग पूर्वक रहते थे, परस्पर विश्वास करते थे, एक दूसरे के प्रति वफादार होते थे, अपने होते थे, सदाचारी होते थे, सदा खुश रहना जानते थे, एक दूसरे के प्रति सेवा करने की वृत्तियाँ हर एक के मन में बसी हुई थी। अपने आप स्वयं कष्ट सदा लेना और दूसरे की सेवा करना हर आदमी के समाने लक्ष्य था। यही कारण था कि आदमी थोड़ी-सी वस्तुओं में साधारण वस्तुओं में ही सुखी रहते थे और दुनिया के जगद्गुरु कहलाते थे, वास्तविक शासक कहलाते थे बाहर के लोग वहाँ आकर बुलाते थे कि आप चलिये हमारी शासन व्यवस्था को सम्हालिए। वहाँ सुख सम्पदाओं के पेड़ से किफायतशारी मितव्ययिता के आधार पर जो कुछ भी सम्पदा थी, उसी के इस्तेमाल करने और कुछ बचत करने का था। यहाँ हर घर में सोना-चाँदी था, हर घर में लक्ष्मी का निवास था क्योंकि आदमियों में मितव्ययिता से उपयोग किया हुआ था। अपव्ययता का दौर जो आजकल चारों ओर फैला हुआ है उस जमाने में नहीं था। उस जमाने की परिस्थितियाँ और आज की परिस्थितियों में हम जब तुलनात्मक दृष्टियों से देखते हैं कि जो सम्पन्नता आज हमारे पास ज्यादा है, शिक्षा हमारे पास ज्यादा है विज्ञान के साधन हमारे पास ज्यादा हैं, चिकित्सा के माध्यम हमारे पास ज्यादा हैं, असंख्य माध्यम और साधन ज्यादा हैं फिर भी हम असन्तुष्ट होकर कहीं अधिक दुखी, कहीं अधिक दीन, कहीं अधिक उलझे हुए, कही अधिक व्याधियों में ग्रस्त हैं। इस प्रकार भावनात्मक स्तर का निकृष्ट हो जाना ही है।

युग निर्माण योजना का आविर्भाव केवल इसी समस्या का समाधान करने के लिये हुआ था। दूसरे शब्दों में इसको हम यों कह सकते हैं कि विश्व की जितनी भी समस्यायें, कठिनाइयाँ और गुत्थियाँ हैं उन सबका समाधान एक ही उपाय से करने के लिए, एक ही उपाय से दूर करने के लिये जो हल ढूँढ़ा गया था, वह नव निर्माण आन्दोलन था। नव निर्माण आन्दोलन का अर्थ भावनात्मक नव निर्माण है। मनुष्य की विचारणायें, भावनायें और दृष्टिकोण को बदल देना-यही हमारा उद्देश्य है, उसे बदल देने के पश्चात् सारी परिस्थितियाँ स्वयं ही बदल जाती हैं। एक-एक चीज को हम बदलना चाहें तो बहुत मुश्किल है। हजारों समस्यायें सामने हैं, उनको अलग-अलग तरीके से हल करना असम्भव है क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्यों की आमदनी बढ़ती चली जाएगी, उससे हर आदमी का खर्च बढ़ता चला जायेगा। आदमी का खर्च बढ़ता चला जाये और आमदनी की अपेक्षा खर्च ज्यादा किया तो दर्द कैसे दूर हो जायेगा। अपव्यय अगर मनुष्य के काबू से बाहर है तो चाहे कितनी ही आमदनी क्यों न बढ़े हमेशा कर्जदारी की समस्या बनी रहेगी। इसी प्रकार से अगर कोई आदमी क्रोधी है, कोई आदमी स्वार्थी है, कोई आदमी दुष्ट प्रकृति का है तो वह भी अपने समीपवर्ती लोगों के साथ जो व्यवहार करेगा उसकी प्रतिक्रिया होगी ही और दूसरे लोग भी उसके प्रति डाह रखेंगे, ईर्ष्या रखेंगे, दुर्व्यवहार रखेंगे, कुढ़ेंगे, जलन पैदा करेंगे, लड़ाई झगड़े होंगे और सब समस्यायें उत्पन्न हो जायेंगी। गुस्सा वहीं है, गुस्से का केन्द्र एक ही है, इसलिये उसको हल करने के लिये भावनात्मक निर्माण करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं हैं। चाहे वह उपाय आज इस्तेमाल किया जाय या एक हजार वर्ष बाद। स्वस्थ स्थिति तब हो सकती है जब सबका ध्यान उस ओर जायेगा कि जहाँ गुत्थियों का केन्द्र है। ऐसे केन्द्र को सुधारने और सम्भालने के लिये कदम उठाये जायें। युग निर्माण योजना ने यह कदम उठाया और उसकी ओर पाँव बढ़ाया। इसलिये हमारा प्रयास भावनात्मक निर्माण है। इसी का दूसरा नाम विचार क्रान्ति है, इसी का दूसरा नाम ज्ञान यज्ञ है। ज्ञान यज्ञ का विचार क्रान्ति के नाम पर युग निर्माण योजना ने बहुत दिन पूर्व कुछ क्रिया कलाप प्रारम्भ किये थे और उन क्रिया कलापों के लिये एक मंच, एक साधन, एक माध्यम बनाया गया था और वह धर्म मंच माध्यम बोला गया था, क्योंकि भारतवर्ष की प्रतिक्रिया विशेष रूप से इसी लायक थी। भारतवर्ष में अस्सी फीसदी लोग बिना पढ़े लिखे रहते हैं और ये अस्सी फीसदी लोग देहातों में रहते हैं। इनके मानसिक स्तर ऐसे हैं जिसमें कोई चीज समझी या समझायी जा सकती है, बोली जा सकती है और उसके भीतर गहराई तक उतारी जा सकती है, वह धार्मिक क्षेत्र ही है। यहाँ लोग रामायण की बात, कहानी को, सामाजिक कथा को जानते हैं, श्रीकृष्ण भगवान की कथा को जानते हैं, मोरध्वज की कथा को जानते हैं लेकिन उनसे राजनीति या दूसरी समस्याओं के बारे में पूछा जाये तो शायद ही वह कुछ बात बता पायेंगे। यहाँ का देहाती व्यक्ति भी लोक परलोक की बात, भगवान की बात, आत्मा की बात, तीर्थयात्रा, पुण्य परमार्थ की बात, परलोक की बात किसी हद तक बता सकता है और दूसरी बातों को नहीं। इसीलिये यह तय किया गया कि लोगों का मन बदल जाये, लोगों की दिशा जिधर है, व लोगों का ध्यान जिधर है, लोगों की जानकारियाँ जिस क्षेत्र में है, उसको हाथ में लेकर के भावनात्मक नव निर्माण का प्रयास प्रारम्भ किया जाये। धैर्य सत्ता और राजसत्ता दोनों समानान्तर है। अगर ये राजसत्ता चाहे तो लोगों के मानसिक स्तर को ऊँचा उठा सकती हैं और लोगों को दिशायें दे सकती हैं, लोगों को क्रोध से रोक सकती हैं और लोगों को शुद्ध और सदाचारी बना सकती हैं। इसी प्रकार से धर्म सत्ता में भी वह सामर्थ्य है कि वह लोगों की भावनाओं को पढ़ सकती है और लोगों को अच्छे मार्ग पर चलने के लिये प्रेरणा दे सकती है। अतः प्रयास यही किया गया कि हम धर्म तंत्र को सम्भालें और उसकी शक्ति का उपयोग करें और लोगों की भावनाओं को ऊँचा उठाने के लिये प्रयास करें। धर्म तंत्र अपने आप में बड़ा सामर्थ्यवान है। धर्म तन्त्र में 56 लाख व्यक्ति सन्त और महात्मा, बाबा और ब्राह्मण, महात्मा के रूप में भारतवर्ष में 7 लाख गाँवों में रहते है। भारतवर्ष में 7 लाख गाँव हैं और 56 लाख सन्त महात्मा हैं। हर गाँव के पीछे 8 आदमी आते हैं। अगर ये 8 आदमी चाहें कि हर गाँव को अपना कार्य क्षेत्र और सेवा क्षेत्र बना लें तो हर गाँव में से शिक्षा की समस्या को हल किया जा सकता है। सामाजिक गुत्थियों की समस्याओं को दूर किया जा सकता है। विषमतायें और दूसरी बुराइयाँ जो हमारे देहातों में व और जगहों में फैली हुई हैं उनको मिटाया जा सकता है। यह काम कोई कठिन नहीं हैं। सफाई की समस्या को सहज समझा जा सकता है। इसके अतिरिक्त सन्त महात्मा घर-घर भक्ति के नाम पर सहयोग की भावना पैदा करें, कल्याण की भावना पैदा करें, मिल जुल कर के काम करने की भावना पैदा करें। कल्याण की भावना पैदा करें, मिल जुल कर के काम करने की भावना पैदा करें। सरकार का यह व्यक्तिगत उत्तरदायित्व हो तो हमारा विश्वास बन सकता है और हमारा इतिहास अन्य किसी देश की तुलना में आगे बढ़ सकता हैं, पीछे रहने की कोई जरूरत नहीं। लेकिन ये धर्मतन्त्र ठीक तरीके से काम नहीं कर सका। प्रयास युग निर्माण योजना का यही था कि धर्म तन्त्र में जितने भी व्यक्ति काम करते हैं उन सबको यह प्रेरणा दी जाय, वह शिक्षा दी जाये कि वह भगवान का सूक्ष्म स्वरूप समझें, भगवान का सन्देश समझें और भगवान की सेवा पूजा का उद्देश्य समझें।

पिछले दिनों में ही समझाया जाता रहा है कि भगवान पूजा-पाठ का भूखा है। उसकी थोड़ी-सी प्रार्थना कर दी जाये, स्तुति कर दी जाये या भोग-प्रसाद जैसी छोटी मोटी रिश्वतें खिला दी जायें तो हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिये वह तैयार रहता है। ये कितनी गन्दी और घृणित भावना थी। युग निर्माण योजना ने यह प्रयास किया कि हर व्यक्ति को यह बताया जाये कि भगवान कोई व्यक्ति विशेष नहीं हैं, बल्कि एक समग्र सत्ता का नाम है। यह सारा विश्व ब्रह्माण्ड की पूजा करना और सेवा करना-यही भगवान की वास्तविक सेवा और पूजा है। इसका प्रभाव-परिणाम यह हुआ कि असंख्य व्यक्ति जो पूजा-भजन में ही सारा समय खर्च कर देने के लिये तैयार थे, उन्होंने सेवा को अपना धर्म मानना स्वीकार किया और पूजा भजन एक सीमित मात्रा में करने के पश्चात् बचे हुए समय में सेवा कार्यों को अपने हाथ में ले लिया। धर्म मंच को सेवा-शिक्षा में मोड़ने का प्रयास एक बहुत ही अच्छा और बड़ा उपयोगी प्रयास था। उसने इस देश के नागरिकों में भावनात्मक नव निर्माण करने की दिशा में बहुत सफलता पायी। धर्म क्षेत्र में जो सम्पत्ति लगी हुई है, जो पूँजी लगी हुई है, युग निर्माण योजना का यह प्रयास है कि इस पूँजी को केवल पंच-पुजारियों के कार्यों में खर्च न होने दिया जाये, बल्कि ऐसे उपयोगी कार्यों में लगाया जाये जिससे कि उसे जन कल्याण के प्रयोजनों में प्रयोग किया जा सके। अकेले केवल मथुरा-वृन्दावन में ही 2-3 मन्दिर ऐसे हैं जिनमें कि एक-एक लाख रुपया मासिक भोग-प्रसाद में खर्च कर दिया जाता है। वैसे मथुरा-वृन्दावन में 5000 मन्दिर हैं। 5000 मन्दिरों की आमदनी और खर्चे का क्या ब्यौरा दिया जाये। दो मन्दिर ऐसे ही हैं मथुरा का द्वारकाधीश मन्दिर और वृन्दावन का रंगजी का मन्दिर, दोनों मन्दिर ऐसे हैं जिनमें कि भगवान के भोग और प्रसाद पर एक-एक लाख रुपया खर्च होता है। एक लाख रुपये के हिसाब से साल भर का खर्च हुआ बारह-बारह लाख रुपया। बारह लाख रुपये में साल में एक बढ़िया विश्वविद्यालय चलाया जा सकता है और उस विश्वविद्यालय के द्वारा ऐसे प्रशिक्षित व्यक्ति तैयार किये जा सकते हैं, स्नातक बनाये जा सकते हैं जो विश्व की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करने के बाद सारे विश्व में भारत माता का सन्देश और भारतीय संस्कृति का सन्देश पहुँचाने में समर्थ हों। ऐसे कार्यकर्ताओं को तैयार करना इस विश्वविद्यालय के लिये क्या कठिन होगा।

इंजीनियर बनाने वाले विश्वविद्यालय अपना काम करते हैं, चिकित्सक-डॉक्टर बनाने वाले विश्वविद्यालय अपना काम करते हैं। धर्म प्रचारक और लोक सेवा करने वाले विश्वविद्यालय कहीं भी नहीं हैं। अगर एक मन्दिर चाहे तो अपनी आमदनी का बारह-लाख रुपया साल भर में खर्च कर सकता है और जाने क्या से क्या समाज की सेवा कर सकता है। गायत्री तपोभूमि का मासिक व्यय दो हजार रुपया मासिक है। इसका अर्थ हुआ चौबीस हजार रुपया साल। कहाँ बारह लाख रुपया साल भर के खर्चे का एक मन्दिर का, कहाँ चौबीस हजार रुपया। ऐसे एक मन्दिर की आमदनी से गायत्री तपोभूमि जैसी संस्थायें 48 बनाई जा सकती हैं। यही वह आधार है जो नव निर्माण का, युग निर्माण का संकल्प पूरा कर सकेंगे। आज की बात समाप्त।

ओम् शान्ति


पूज्यवर की लेखनी से विशेष लेख - जो मिला वह वस्तुतः खरीदा गया

आमतौर से समान आयु और योग्यता वालों के बीच आदान-प्रदान के आधार पर मित्रता होती है। प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे के सौंदर्य एवं सहयोग को ध्यान में रखते हुए मित्रता बनाते और एक दूसरे के लिए जोखिम उठाते हैं।

पर मैत्री का एक दूसरा आधार भी है जो अभिभावकों और बच्चों के बीच होता है। माता बच्चे को नौ महीने पेट में रखती है और अपने रक्त, माँस का अनुदान देकर एक बूँद बराबर कल को जीवित रह सकने योग्य स्थिति में परिपक्व करती है। असहनीय पीड़ा सहती है, अपने रक्त को दूध में परिणत करके उसका पेट भरती है, अपनी नींद और सुविधा में कटौती करके उसे संभालने में निरन्तर ध्यान रखती है। इसके बदले में बच्चा उसे क्या देता है?

पिता बच्चे के भरण-पोषण की व्यवस्था करता है, उसकी शिक्षा चिकित्सा का भार उठाता है, विवाह करता और आजीविका से लगाता है, मरता है तो अपनी सम्पदा का उत्तराधिकार उसे दे जाता है। इसके बदले बच्चा बाप को क्या देता है? कुछ न मिलने पर भी यह घनिष्ठता जीवन भर निभती है और एकांगी प्रदान आजीवन चलता है, उसमें आदान की कदाचित् ही कमी कोई अपवाद देखा गया हो। साँसारिक दृष्टि से आदान-प्रदान वाली मित्रता का कोई आधार न होने पर भी एक सूक्ष्म स्नेह तन्तु संतान और अभिभावकों के बीच बँधा रहता है। दोनों ही पक्ष समझते हैं यह मेरा है। माँ से थोड़ी देर के लिए अलग होने पर वह रोने लगता है और जैसे ही वह दौड़कर आती और गोदी में उठाती है वैसे ही हँसने, लिपटने लगता है। माँ के साथ रहकर फटे कपड़े और सूखे टुकड़े खाकर वह प्रसन्न रहता है और उसे छोड़कर किसी सुविधा सम्पन्न का होकर रहना नहीं चाहता। माता का पक्ष भी ऐसा ही होता है, वह बच्चे के साथ इसलिए कष्ट उठाती है कि यह मेरा अपना है। पिता भी ऐसा ही समझता है। यदि यह स्नेह सम्बन्ध न हो, तो दूसरों के बच्चों के लिए इतनी ममता क्यों बढ़े? क्यों कोई इतना त्याग करे?

हमारा शरीर और मस्तिष्क सामान्य स्तर का है। साँसारिक साधन या सहयोग भी कुछ कहने लायक स्तर के नहीं मिलें, फिर भी अपनी और दूसरों की आँखों से देखने पर प्रतीत होता है कि जो बन सके, जो कर सके वह अपनी योग्यता, प्रतिभा एवं सम्पदा की तुलना में हजारों गुना लाभ यह कैसे मिला। कोई जुआ लाटरी नहीं फली है और न कोई आकस्मिक भाग्योदय ही हुआ है, जो कुछ भी हुआ है, किया है, मिला है उसमें 99 प्रतिशत न सही, 90 प्रतिशत तो उसी देव सत्ता का अनुदान है, जिसे हम कभी गुरु, कभी मास्टर, कभी बॉस, कभी मार्गदर्शक और कभी दृश्यमान परमेश्वर कहते हैं।

उनने यह सब मुफ्त में दिया? यदि ऐसा होता तो दानी हमसे भी अधिक दीन-हीनों को पहले देता। हम तो दीन-हीन भी नहीं थे, पर उसने एक विशेषता देखी-पात्रता की। पात्रता ही पर्याप्त नहीं हुई, एक-एक सूत्र जुड़ा समर्पण का। यह समर्पण जीभ से नहीं अन्तरात्मा द्वारा हुआ। जब गठबंधन हुआ तो उसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष शर्त जुड़ी हुई थी कि जो दिया जायेगा, वह उच्च उद्देश्य के निमित्त रहेगा, अपने निज के लोभ, मोह और अहंता प्रदर्शन में इसमें से राई रत्ती भी नहीं लगेगी। जिस उच्च प्रयोजन के लिए संकेत किया जाएगा अनुदान उसी में लगेगा। यह शर्त पूरी तरह स्वीकार हुई और हम उनके सभी सन्तान बन गये। स्वार्थ सिद्धि के लिए तो गधे को भी बाप बनाया जाता है और गुरु कहने में भी कुछ गाँठ से नहीं जाता यदि किसी बड़ी कामना की पूर्ति का लालच हो, किसी सिद्धि चमत्कार द्वारा हमें निहाल कर दिया जाये। इन दिनों ऐसी ही गुरु शिष्य परम्परा चलती है, जिसमें कहा गया है कि-राम मिलाई जोड़ी, एक अन्धा एक कोढ़ी।" एक पक्ष वरदान माँगता है दूसरा पक्ष जेब काटता है। यदि हमारे सम्बन्ध भी ऐसे ही बने होते तो मखौल बनकर रह जाता। दोनों पक्ष एक दूसरे पर अपनी घात लगाते।

पर अपने मन में कभी कोई कामना, याचना उठी ही नहीं। यदि उठी तो सिर्फ एक, कि किसी प्रकार व्रत निभ जाये। समर्पण में कहीं कोई खोट न उपजे, जिसके लिए अपनी अन्तरात्मा धिक्कारे।

पात्रता जन्म जन्मान्तरों की, जिसमें साधु ब्राह्मण की हर कसौटी पर अपना प्रयत्न पूरी ईमानदारी, समझदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के साथ चले। सदा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते रहे तो छात्रवृत्ति पाने का हक बन गया। इस जन्म में यह इकरार नामा वज्रलेप-स्याही से लिखा गया है-जो कुछ भी अपना है आपका होकर ही रहेगा। आपकी कोई अमानत मिलेगी तो उसमें से कुछ हड़प लेने की बात न सोची जायेगी। आपने बनाया है तो सच्चे अर्थों में आपके अपने ही बनकर रहेंगे। आपके हर इशारे को अपना कर्तव्य, निज का स्वार्थ मानेंगे। बस इतना निश्चय हुआ तो हम उस सिद्ध पुरुष के दत्तक पुत्र नहीं, सगे निजी बन गये और उनके अनुदान बरसने लगे। जो दिया गया वह उसी काम में खर्च किया गया, जिसके लिए दाता ने दिया। न मन में चोर उठा और न किसी ऐसे परामर्श देने वाले का कहना माना गया। यथार्थता अनेक बार परखी गई। पर किसी प्रलोभन या दबाव के सामने अपने पैर डगमगाये नहीं।

सिद्धियाँ कूड़ा करकट नहीं है, जिन्हें कोई निरर्थक समझकर कूड़े-करकट की तरह बुहार कर किसी गली-कूचे में फेंक दे। वे बड़ी कठिनाई से कमाई जाती है। माँगने वालों की दुनिया में कमी कहाँ है? व्यक्तिगत लाभ उठाने के लिए उन्हें जरूरतमंद ही नहीं, बिना जरूरत वाले भी माँगते हैं। किन्तु देने वाले को विचार करना पड़ता है कि उन्हें किसके हाथों, किस निमित्त सौंपा जाय। मात्र दर्शन करने, पैर छूने और चापलूसी करने पर जब बैंक मैनेजर लाख, पचास हजार ही रकम बिना खाता देखे नहीं उठाने देता तो फिर जिनके पास वस्तुतः आध्यात्मिक सम्पदा है वे उसे बिना सोच-विचार किये, बिना पात्रता और उपयोग का स्वरूप समझे ऐसे ही चाहे किसी को दे दें, यह संभव नहीं।

सयानी सुयोग्य कन्या के लिए वर ढूँढ़ने के लिए जब पिता निकलता है, तो बारीकी से देखता है कि लड़की सुखी रहेगी या नहीं। कोई कुपात्र स्वयं ही माँगने आ पहुँचे और लड़की से कमाई कराने और मौज उड़ाने का मन करे तो कन्या का पिता उसे अस्वीकार ही करेगा? इससे कम विवेक सिद्ध पुरुषों में भी नहीं होता। लेने वाला तो कुछ भी माँग सकता है, पर देने वाले को हजार बार विचार करना पड़ता है कि देना चाहिए या नहीं? देना चाहिए तो कितना? रामकृष्ण परमहंस सिद्ध पुरुष थे। उनके पास नित्य सैकड़ों की संख्या में आते थे। उन सभी की अपनी-अपनी आवश्यकतायें, कठिनाइयाँ और समस्यायें होती थीं। सहायता चाहते थे। परमहंस जी ने सभी का अतिथि सत्कार किया। किसी को खाली हाथ नहीं जाने दिया। सभी की यथासंभव सहायता की और सभी को उस सहयोग से राहत मिली। यह क्रम चलता रहा। इस पर भी वे यह दृष्टि लगाये रहे कि अपना स्थान ग्रहण करने वाला, परम्परा चलाने वाला कोई मिले। यह ढूँढ़ने में उनका लम्बा समय बीत गया। आगन्तुकों में से एक भी ऐसा न मिला, जिसे वे अपना उत्तराधिकारी बनाते। बड़ी कठिनाई से विवेकानंद हाथ लगे। उन्हें प्रोत्साहित करने में कोई कमी न रखी। वे जब समीप आये तो उनकी मर्जी पूरी नहीं कि वरन् अपनी इच्छा पूरी करायी। विवेकानन्द नौकरी की तलाश में थे। इस काम को परमहंस जी चाहते तो चुटकियों में करा सकते थे, पर कराया नहीं, वरन् काली की प्रतिभा के पास भेजा और उनसे माँगने के लिए कहा। वहाँ उन्होंने माता का विराट रूप देखा तो अपने को बदल लिया और कहा माँ, मैं नौकरी माँगने नहीं आया। मुझे भक्ति, शक्ति और शान्ति चाहिए। वही उन्हें मिल भी गया। अपनी पूर्ववर्ती कामना पूरी करा लेते तो किसी दफ्तर में नौकरी करते हुए क्लर्क मात्र रह जाते। देश और विदेश में भारतीय संस्कृति के सन्देश वाहक जिस प्रकार बन गये, उस सौभाग्य से उन्हें वंचित ही रहना पड़ता।

परमहंस जी जब शरीर त्यागने लगे तो उन्होंने अपना पैर विवेकानन्द के सिर पर रखा, उनके शरीर में बिजली कौंध गयी। आँखें खोलकर परमहंस जी ने कहा-जो कुछ मेरे पास था, तुम्हारे सुपुर्द कर दिया। अब यह खोखला शरीर बेकार है, इसकी अन्त्येष्टि करने की तैयारी करो, इतना कह कर उन्होंने आँखें बन्द कर लीं।

विवेकानन्द का आत्मबल उसी स्तर तक पहुँचा, जितना परमहंस जी का था। वे जब बोलते थे, तब अनुभव करते थे कि उनकी जीभ पर परमहंस जी विराजमान् हैं। जिनसे भी सम्पर्क साधा उन्हें उतना ही प्रभावित किया, जितना परमहंस जी किया करते थे। इसी को कहते हैं सद्गुरु का सच्चा अनुदान। वह लूटा नहीं, खरीदा जाता है।

हमने भी खरीदा है। गुरु के उच्चस्तरीय आदेश में अपना निजी का जो कुछ था वह बूँद-बूँद निचोड़ दिया है। अपने लिए कुछ भी बचाया नहीं। दूध लेने के लिए गिलास में भरा पानी फेंकना पड़ता है। हमने अपना पानी फेंका है और दूध पाया है। इस प्रकार के साहस में कुछ गँवाया नहीं, कमाया ही है। अब तो इस तथ्य को वे लोग भी स्वीकार करते हैं, जो आरम्भिक दिनों में हमारी मूर्खता पर हँसा करते थे। अब वे मानते हैं कि वह मूर्खता नहीं, बुद्धिमत्ता थी।

अब तक हमारे शरीर में परिजनों के साँसारिक हित साधन के लिए लोकमंगल के परमार्थ के लिए जो बन पड़ा हो, उसे यही समझना चाहिए कि हमारी सामान्य-सी उपासना साधना का फल नहीं, वरन् उसके पीछे दिया अनुदान ही काम करता रहा। अब हमें भी यह चिन्ता लगने लगी है कि इस जीवन का अन्त करते हुए वे प्रतिभायें कहाँ से पायें, जो हमारी अपेक्षा हजारों गुना काम जो करने के लिए पड़ा है, उसे सम्पन्न कर सकें और हमारी ही तरह दैवी अनुग्रह का अनुदान पाकर अपने को धन्य कर सकें।

पुनःप्रकाशित विशेष लेखमाला-4


अपने अंग अवयवों से

(एक बार इसे नित्य पढ़ें)

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा समय-समय पर दिये गये महत्वपूर्ण निर्देश जो हर लोकसेवी कार्यकर्ता-समयदानी-समर्पित शिष्य पर लागू होते हैं, इस स्तम्भ में प्रकाशित होते रहे हैं। यह लेखमाला का चौथा पुष्प है, जिसमें उनने यह अनुरोध किया है कि कार्यकर्ता अपना चिन्तन, जीवन शैली कैसी रखें। पहले मात्र विज्ञप्ति रूप में प्रकाशित यह पंक्तियाँ सर्वसाधारण के लिए हम ‘अखण्ड ज्योति’ में दे रहे हैं ताकि एक आदर्श आचार संहिता के उस पक्ष को परिजन समझ सकें जो गुरुवर की अन्तर्वेदना थी। उनने जीवन भर व्यक्ति गढ़े। यदि कहीं कोई कमी रही है तो वह हमारी ही है उनकी नहीं। उनने अपनी ओर से अनुदान बाँटने, उँगली पकड़कर चलना सिखाने, एक समर्पित स्वयं सेवक कैसे बना जाय, यह शिक्षण देने में कोई कसर नहीं रखी। हम उसी को यदि प्रथम पूर्णाहुति का अपने लिए नितान्त अपने लिए व्यक्तिगत स्तर पर अंतर्जगत् का प्रयास मानते हुए जीवन में उतार लें तो वास्तविक अर्थों में पूज्यवर की जन्मभूमि में उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे रहें होंगे।

यह मनोभाव हमारी तीन उँगलियाँ मिलकर लिख रही हैं। पर किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि जो योजना बन रही है और कार्यान्वित हो रही है, उसे प्रस्तुत कलम कागज या उँगलियाँ ही पूरा करेंगी। करने की जिम्मेदारी आप लोगों की, हमारे नैष्ठिक कार्यकर्ताओं की है।

इस विशालकाय योजना में प्रेरणा ऊपर वाले ने दी है। कोई दिव्य सत्ता बता या लिखा रही है। मस्तिष्क और हृदय का हर कण-कण जर्रा-जर्रा उसे लिख रहा है। लिख ही नहीं रहा है वरन् उसे पूरा कराने का ताना-बाना भी बुन रहा है। योजना की पूर्ति में न जाने कितनों का- कितने प्रकार का मनोयोग और श्रम, समय, साधन आदि का कितना भाग होगा। मात्र लिखने वाली उँगलियाँ न रहें या कागज कलम चुक जायें तो भी कार्य रुकेगा नहीं। क्योंकि रक्त का प्रत्येक कण और मस्तिष्क का प्रत्येक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नहीं, वह दैवी सत्ता भी सतत् सक्रिय हैं जो आँखों से न तो देखी जा सकती है और न दिखाई जा सकती है।

योजना बड़ी है। उतनी ही बड़ी जितना कि बड़ा उसका नाम है-युग परिवर्तन’। इसके लिए अनेक वरिष्ठों का महान योगदान लगना है। उसका श्रेय संयोगवश किसी को भी क्यों न मिले।

प्रस्तुत योजना को कई बार पढ़ें। इस दृष्टि से कि उसमें सबसे बड़ा योगदान उन्हीं का होगा जो इन दिनों हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे हैं। आप सबकी समन्वित शक्ति का नाम ही वह व्यक्ति है जो इन पंक्तियों को लिख रहा है।

कार्य कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँगे? इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो सिर्फ एक बात सोचें कि अधिकाधिक श्रम व समर्पण करने में एक दूसरे में कौन अग्रणी रहा?

साधन, योग्यता, शिक्षा आदि की दृष्टि से हनुमान उस समुदाय में अकिंचन थे। उनका भूतकाल भगोड़े सुग्रीव की नौकरी करने में बीता था, पर जब महती शक्ति के साथ सच्चे मन और पूर्ण समर्पण के साथ लग गए तो लंका दहन, समुद्र छलाँगने और पर्वत उखाड़ने का, राम-लक्ष्मण को कंधे पर बिठाये फिरने का श्रेय उन्हें ही मिला। आप लोगों में से प्रत्येक से एक ही आशा और अपेक्षा है कि कोई भी परिजन हनुमान से कम स्तर का न हो। अपने कर्तव्य में कोई भी अभिन्न सहचर पीछे न रह।

काम क्या करना पड़ेगा? यह निर्देशन और परामर्श आप लोगों को समय-समय पर मिलता रहेगा। वह तो समय की बात है। काम बदलते भी रहेंगे और बनते-बिगड़ते भी रहेंगे। आप लोग तो सिर्फ एक बात स्मरण रखें कि जिस समर्पण भाव को लेकर घर से चले थे, पहले लेकर आए थे, उसमें दिनोंदिन बढ़ोत्तरी होती रहे। कहीं राई रत्ती भी कमी न पड़ने पाये।

कार्य की विशालता को समझें। लक्ष्य तक निशाना न पहुँचे तो भी वह उस स्थान तक अवश्य पहुँचेगा, जिसे अद्भुत, अनुपम, असाधारण और ऐतिहासिक कहा जा सके। इसके लिए बड़े साधन चाहिए, सो ठीक है। उसका भार दिव्य सत्ता पर छोड़ें। आप तो इतना ही करें कि आपके श्रम, समय, गुण-कर्म स्वभाव में कहीं भी कोई त्रुटि न रहे। विश्राम की बात न सोचें, अहर्निश एक ही बात मन में रहे कि हम इस प्रस्तुतीकरण में पूर्णरूपेण खपकर कितना योगदान दे सकते हैं? कितना आगे रह सकते हैं? कितना भार उठा सकते हैं? स्वयं को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करें। इसी में आपका बड़प्पन है।

अपनी थकान और सुविधा की बात न सोचें। जो कर गुजरें, उसका अहंकार न करें वरन् इतना ही सोचें कि हमारा चिंतन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक ऊँची भूमिका निभा सका? कितनी बड़ी छलाँग लगा सका? यही आपकी अग्नि परीक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्षमता घटने न दें। उसे दिन दूनी रात चौगुनी करते रहें।

स्मरण रखें कि मिशन का काम अगले दिनों बहुत बढ़ेगा। अब से कई गुना। इसके लिए आपकी तत्परता ऐसी होनी चाहिए, जिसे ऊँचे से ऊँचे दर्जे की कहा जा सके। आपका अन्तराल जिसका लेखा जोखा लेते हुए अपने को कृत-कृत्य अनुभव करें। हम फूले न समाएँ और प्रेरक सत्ता आपको इतना घनिष्ठ बनाए जितना की राम पंचायत में छठे हनुमान भी घुस पड़े थे।

कथन का साराँश इतना ही है आप नित्य अपनी अन्तरात्मा से पूछें कि जो हम कर सकते थे, उसमें कहीं राई रत्ती त्रुटि तो नहीं रही? आलस्य प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया? अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ? अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अहंता कहीं छद्म रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?

यह विराट योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है कि इस अग्निपरीक्षा की वेला में आपका शरीर, मन और व्यवहार कहीं गड़बड़ाया तो नहीं। ऊँचे काम सदा ऊँचे व्यक्तित्व करते हैं। कोई लम्बाई से ऊँचा नहीं होता, श्रम, मनोयोग, त्याग और निरहंकारिता ही किसी को ऊँचा बनाती है। अगला कार्यक्रम ऊँचा है। आपकी ऊँचाई उससे कम न पड़ने पाए, यह एक ही आशा, अपेक्षा और विश्वास आप लोगों पर रखकर कदम बढ़ रहे हैं। आप में से कोई इस विषम वेला में बिछुड़ने न पाए, जिसके लिए बाद में पश्चाताप करना पड़े - श्रीराम शर्मा आचार्य


गायत्री मंत्र और वाक् शक्ति

शब्द को ब्रह्म कहा गया है। शब्द-ब्रह्म, नाद-ब्रह्म आदि संबोधनों से शास्त्रों में इसकी महिमा और गरिमा गाई गई है। यह अलंकारिक वर्णन नहीं बल्कि यथार्थ है। लेकिन जिन शब्दों को ब्रह्म कहा गया है वे मात्र ध्वनि नहीं है। वाद्य यंत्र पर यदि उल्टी सीधी अंगुलि से आघात किये जाये तो केवल आवाज भर होगी जबकि क्रमबद्ध और लयबद्ध ध्वनि निकालनी हो तो उसके लिए प्रशिक्षित मस्तिष्क और सधे हुए हाथ होना जरूरी है। मंत्रों से भी अभीष्ट परिणाम प्राप्त करने के लिए उनका लयबद्ध, तालबद्ध और क्रमबद्ध विधान पूरा करना आवश्यक है।

जिह्वा से उच्चारित किये गये शब्द तो दूसरे व्यक्ति तक अपनी जानकारी और अनुभूति भर पहुँचा सकते है। इसके अतिरिक्त उनका कोई उपयोग नहीं होता। पर मंत्र चमत्कारी क्षमताओं से सम्पन्न होते हैं और वे अपना परिणाम तभी प्रस्तुत करते हैं जबकि उन्हें निर्धारित विधि से प्रयुक्त किया जाय। जिस प्रकार जैसे तैसे अंगुलि चलाने से दीपक राग या मल्हार राग उत्पन्न नहीं होता, उसी प्रकार जैसे तैसे मंत्रोच्चारण करने से उसके प्रभावोत्पादक परिणाम प्राप्त नहीं किये जा सकते। फिर गायत्री मंत्र में तो 24 अक्षरों का गुम्फन ही इस प्रकार किया गया है कि उसके लिए निर्धारित विधि और आवश्यक बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। साधारण बातचीत में ही कई लोग बातों को उस रूप में नहीं कह पाते जिस रूप में कि कहना चाहिए और न ही सभी सुनने वाले कहीं गई बात को उसी रूप में स्वीकार कर सकते हैं।

जब सामान्य व्यवहार तक में वाणी की यह दुर्गति हो जाती है और उच्चारण अविश्वस्त तथा अप्रामाणिक माने जा सकते हैं तो उससे व्यावहारिक आदान प्रदान की पूरी तरह आवश्यकता पूर्ति नहीं हो पाती तो फिर मंत्राराधन द्वारा आध्यात्मिक प्रयोजन की पूर्ति तो और ही बात है। इसी कठिनाई को ध्यान में रखते हुए मंत्राराधन में ‘वाणी’ मात्र से सम्भव हो सकने वाले क्रिया काँडों को महत्व नहीं दिया गया है।

जीभ से तो लोग आये दिन कथा, कीर्तन, भजन, पाठ, जप आदि के माध्यम से तरह-तरह के चित्र विचित्र वचन बोलते रहते हैं। यदि उतने भर से धर्मचर्या के उद्देश्य पूरे हो जाया करते तो फिर सरलता की अति ही कही जाती। छोटे-छोटे लाभ प्राप्त करने के लिए मनुष्य को कठोर श्रम करने, साधन जुटाने एवं मनोयोग लगाने की आवश्यकता पड़ती है तब कहीं आधी-अधूरी सफलता का योग बनता है। अध्यात्म क्षेत्र जितना उच्चस्तरीय है उतनी ही उसकी विभूतियाँ भी बहुमूल्य हैं। निश्चित रूप से उसके लिए प्रयास भी अपेक्षाकृत अधिक कष्ट साध्य ही होते हैं। यदि उतने बड़े लाभ मात्र जिह्वा से अमुक शब्दावली दुहरा देने भर से प्राप्त हो जाया करते तो उन्हें पाने से कोई भी वंचित न रहता पर इतना सस्तापन है कहाँ?

महत्व की दृष्टि से हर वस्तु का मूल्य निर्धारित है। अध्यात्म-उपलब्धियों में शब्द शक्ति की महत्ता बताई और महिमा गाई गई है। मन्त्राराधन के फलस्वरूप मिलने वाले लाभों का वर्णन विस्तारपूर्वक शास्त्रों में भरा पड़ा है, पर उसे शब्द चमत्कार भर नहीं मान लिया जाना चाहिए। यदि उच्चारण ही सब कुछ रहा होता तो साधना ग्रन्थ पढ़ने वाले प्रेस कर्मचारी और पुस्तक विक्रेता पहले ही लाभान्वित हो लेते। पाठक को उनका बचा खुचा ही शायद कुछ हाथ लगता। शब्दोच्चारण में जप के अति सरल कर्मकाण्ड के लिए थोड़ा-सा समय लगा देने में किसी को क्या कुछ असुविधा होगी? उतना तो कोई बालक-नासमझ या वृद्ध अशक्त भी कर सकता है, फिर समर्थ व्यक्ति तो उसे उत्साह पूर्वक करते और भरपूर लाभ उठाते। ऐसा कहाँ होता है? लाभों का माहात्म्य विस्तार पढ़ते हुए भी कुछ करने के लिए कहाँ किसी का उत्साह होता है।


ज्ञातव्य

मातृसत्ता श्रद्धांजलि पुस्तक माला के अन्तर्गत 108 पुस्तकों का एक सेट गायत्री तपोभूमि मथुरा द्वारा तैयार किया गया है। आदरणीय पं. लीलापतजी शर्मा के संरक्षण में परमपूज्य गुरुदेव के विशाल साहित्य सागर से चुनकर अनेकानेक विषयों पर तपोभूमि के उनके सहयोगियों ने छोटी-छोटी 108 पुस्तकें तैयार की हैं। सवा लाख घरों में गायत्री ज्ञान मंदिर स्थापित करने का लक्ष्य भी इसके साथ रखा गया है। 600 रुपये में उपलब्ध इस सैट को प्रथम पूर्णाहुति के समय स्थापना हेतु 450 रुपये में ही दिया जा रहा है। इस सम्बन्ध में परिजन गायत्री तपोभूमि मथुरा व आँवलखेड़ा में सम्बन्धित स्टाॅल्स से सम्पर्क साधें।

शब्दों में जो गहन रहस्य छिपा है वह यह है कि अध्यात्म प्रयोजनों में प्रयुक्त होने वाली शब्दावली को उच्चस्तरीय होना चाहिए। वह इतनी परिष्कृत हो कि उसकी पवित्रता, प्रामाणिकता एवं क्षमता को ईश्वर के समतुल्य ठहराया जा सके। इसके लिए कई लोग स्वर विन्यास की बात सोचते हैं और अनुमान लगाते हैं कि मन्त्रों में उच्चारण का जो स्वर क्रम बताया गया है, उसे जान लेने से काम बन जायेगा। यह मान्यता भी तथ्य की दिशा में एक छोटा कदम भर ही है। इस चिन्तन में इतनी-सी ही जानकारी है कि हमारे क्रिया-कृत्यों को अनगढ़ नहीं-सुव्यवस्थित होना चाहिए। भले ही वह उच्चारण ही क्यों न हो? वाणी को शिष्टाचार-सन्तुलन सभ्यता का अंग माना जाता है। जो ऐसे ही अण्ड-दण्ड बोलते रहते हैं वे असभ्य कहलाते और तिरस्कार के पात्र बनते हैं। ऐसी दशा में मंत्र प्रयोजन में यदि उनके साथ जुड़े हुए व्यवस्था नियमों का पालन किया जाये का निर्देश है तो उसका पालन होना ही चाहिए। इसमें सतर्कता एवं जागरूकता अपनाये जाने की बात दृष्टिगोचर होती है। यह दिशा उत्साहवर्धक है। इससे प्रमाद पर अंकुश लगने और व्यवस्था अपनाने में उत्साह उत्पन्न होने का बोध होता है, यह उचित भी है और आशाजनक भी।

मंत्रों का उच्चारण सही हो, शुद्धता और गति का ध्यान रहे यह आवश्यक है। स्वर, लय, क्रम, विराम आदि को जाना व माना जाये। मंत्रोच्चार की कक्षा में प्रवेश का यह आवश्यक कदम है। पूजा उपचार के अन्य कर्मकाण्डों में भी यह सतर्कता बरती जानी चाहिए। आलसी प्रमादियों की तरह आधी अधूरी चिन्ह पूजा करने की बेगार भुगत लेने से तो अश्रद्धा मात्र टपकती है। अन्यमनस्कता एवं उपेक्षापूर्वक किये गये नित्यकर्म तक बेतुके और बेढंगे होते हैं तो अध्यात्म की उपलब्धियाँ उस ढंग से किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है। इस स्वभाव से तो जीविका उपार्जन तक में असफलता मिलती है, फिर साधना क्षेत्र में उसका परिणाम अवरोध उत्पन्न करने के अलावा और क्या हो सकता है।

गायत्री मंत्र के अभीष्ट परिणाम प्राप्त करने के लिए उसके उच्चारण से लेकर विधि-विधान तक में सुव्यवस्था एवं सतर्कता बरती जानी चाहिए किन्तु इतने भर से ही यह नहीं मान लेना चाहिए कि हमारे उच्चारण ‘मन्त्र’ बन गये और उन्हें शब्द ब्रह्म या नाद की संज्ञा मिल गई। इसके लिए वाणी को ‘वाक्’ के रूप में परिष्कृत करना होगा। यह स्वर साधना नहीं, इसके लिए समूचे व्यक्तित्व को-मन वाणी, कर्म, स्वभाव को, चिन्तन एवं चरित्र को, उच्चस्तरीय बनाने के भागीरथी प्रयत्न में जुटना होता है। मन्त्रोच्चारण की विधि-व्यवस्था कुछ घंटों में सीखी जा सकती है- उसका परिपूर्ण अभ्यास कुछ दिनों में हो सकता है। किन्तु व्यक्तित्व की मूल सत्ता का स्तर ऊँचा उठाना काफी कठिन है। उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। दूसरों को सुधारने में जितनी कठिनाई पड़ती है अपने को सुधारना उससे भी अधिक कष्ट साध्य और श्रम साध्य है।

जिह्वा उच्चारण तंत्र है। अन्य वाद्य यंत्रों की तरह उसका सही होना तो प्राथमिक आवश्यकता है। मंत्र की शब्दावली शुद्ध हो। भाषा की अशुद्धियाँ न हो। प्रवाह एवं स्वर ठीक हो। इसके अतिरिक्त जिह्वा साधना की दृष्टि से सामान्य व्यवहार में उसके रसना प्रयोजन एवं वार्ताक्रम में साधकों जैसी रीति-नीति का समावेश किया जाये। अनीति की, हराम की कमाई न खाई जाये। परिश्रम और न्याय के सहारे जितना कुछ कमाया जा सके उतने में ही मितव्ययितापूर्वक गुजारा किया जाये। चटोरेपन की बुरी आदत से लड़ा जाये और सात्विक सुपाच्य पदार्थों को औषधि भाव से उतनी ही मात्रा में लिया जाये जितनी की पेट की आवश्यकता एवं क्षमता है। इस दृष्टिकोण को अपनाने वाले के लिए मद्य, माँस जैसे अभक्ष्यों को ग्रहण करने की तो बात ही क्या उत्तेजक मसाले और नशीले पदार्थों-मिष्ठान्न पकवानों तक से परहेज करने की जरूरत पड़ती है। अन्न का मन पर प्रभाव पड़ने की बात स्पष्ट है। सात्विक आहार में मनःक्षेत्र में सात्विकता बढ़ती है और उससे अनेक दोष-दुर्गुण जो अभक्ष्य खाते रहने पर छूट नहीं सकते थे, अनायास ही घटते-मिटते चले जाते हैं। अस्वाद व्रत पालन करने वाले के लिए अन्य इन्द्रियों पर काबू रख सकना सरल हो जाता है।

आहार की सात्विकता का वाणी की पवित्रता पर गहरा असर पड़ता है। अभक्ष्य आहार से जिह्वा की सूक्ष्म शक्ति नष्ट होती है और उसके द्वारा उच्चारित शब्द आध्यात्मिक प्रयोजन पूरे कर सकने की क्षमता से रहित ही बने रहते है। वाणी का दूसरा कार्य है वार्तालाप। हमारे दैनिक जीवन में वार्तालाप का स्तर उच्चस्तरीय एवं आदर्श परम्पराओं से युक्त होना चाहिए।

मंत्र को धीमे जपा जाता है। शब्दावली अस्पष्ट एवं धीमी रहती है। बहुत बार तो वाचिक से भी अधिक महत्व मानसिक और उपाँशु का होता है। उनमें तो वाणी नाम मात्र को ही होती है किन्तु इन मौन जपों में भी मध्यमा, परा, पश्यन्ति वाणियाँ काम करती रहती हैं। यह तीनों वाणियाँ मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र एवं आकांक्षा से संबंधित रहती हैं। यदि व्यक्ति ओछा, घटिया और दुष्ट है, उसकी आकांक्षाएँ निकृष्ट, दृष्टिकोण विकृत एवं चरित्र भ्रष्ट है तो तीनों सूक्ष्म वाणियाँ निम्नस्तरीय ही बनी रहेंगी और उनके समन्वय से बैखरी वाणी तक प्रभावहीन, संदिग्ध एवं अप्रामाणिक बनी रहेगी। उसका साँसारिक उपयोग भी कोई महत्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न न कर सकेगा। फिर उसके द्वारा की गई मंत्र साधना तो सफल हो ही कैसे सकती है।

मंत्र जप की विधि सरल है पर साधना कठिन है और साधना के बिना उपयुक्त परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता। मंत्र जप की साधना में जिह्वा समेत समस्त उपकरणों का परिशोधन करना पड़ता है। जो तथ्य को समझते हैं विधिविधान तक ही सीमित नहीं रहते अपितु जीवन प्रक्रिया को उच्चस्तरीय बनाने की सुविस्तृत रूप रेखा भी तैयार करते हैं। उस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसके जप तप उसी अनुपात में सफल होते देखे जा सकते हैं।

इसी आधार पर शब्द ब्रह्म का साक्षात्कार होता हैं समूची आत्मसत्ता को परिष्कृत बनाने से वाणी की परिणति वाक् शक्ति में होती है। इसका प्रभाव असीम है और उसकी सहायता से असम्भव को भी संभव किया जा सकता है। शतपथ ब्राह्मण में गायत्री का विवेचन करते हुए कहा गया है- परावाक् उसका मर्मस्थल है। परावाक् का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया है-वह हृदयस्पर्शी है प्रसुप्त को जगाता है, स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि का आधार वही है, देवताओं के अनुग्रह वरदान का केन्द्र उसी में है। इस विश्व में जो कुछ श्रेष्ठ है वह वाक् की प्रतिध्वनि एवं प्रतिक्रिया ही समझी जानी चाहिए।

बैखरी वाणी जब साधना सम्पन्न होकर वाक् बनती है तो उसका विस्तार श्रवण क्षेत्र तक सीमित न रहकर तीनों लोकों की परिधि तक व्यापक होता है। वाणी में ध्वनि है ध्वनि में अर्थ। किन्तु वाक् शक्ति रूपा है। उसकी क्षमता का उपयोग करने पर वह सब जीता जा सकता है जो जीतने योग्य है।

कौत्स मुनि ने मंत्र अक्षरों के अर्थ की उपेक्षा की है और कहा है कि उनकी क्षमता शब्द गुँथन के आधार पर समझी जानी चाहिए। उसमें वाक् तत्व ही प्रधान रूप से काम करता है। इस परावाक् का स्तवन करते हुए श्रुति कहती है।

देवी वाचमजनयन्त देवास्तां;विश्चरूपाः पशवो ददन्ति। सा नो मंद्रेष्षमूर्ग दुहाना,धेनुर्वागस्मानुफ्सुष्टुवैतु

परावाक् देवी है। विश्व रूपिणी है। देवताओं की जननी है। देवता मंत्रात्मक ही हैं। यही विज्ञान है, इस कामधेनु वाक् की शक्ति से हम जीवित हैं। उसी के कारण हम बोलते और जानते हैं।

इससे स्पष्ट है कि गायत्री मंत्र में वाक् तत्व इतना प्रधान है कि यदि उसे सिद्ध कर लिया जाये तो आयु-प्राण से लेकर कीर्ति और द्रव्य तक लौकिक उपलब्धियाँ तथा आत्मकल्याण, आत्मबल, आत्मज्ञान, ब्रह्मतेज, ब्रह्मवर्चस् जैसी आध्यात्मिक उपलब्धियाँ अर्जित की जा सकती है।


एक अति विशेष अनुरोध

परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने न केवल वेदों के अध्ययन, अनुशीलन का मार्ग प्रशस्त किया, इनके उच्चस्तरीय अनुसंधान हेतु ब्रह्मवर्चस शोध-संस्थान नाम की प्रयोगशाला भी स्थापित की। यह प्रयोगशाला प्रयोगों की दृष्टि से उपकरणों के अभाव में यद्यपि प्रारम्भिक स्थिति में हैं, फिर भी जो भी उपकरण इसमें अब तक उपलब्ध हो सके हैं, उनसे भारतीय योगविज्ञान, भारतीय संस्कृति की आधारभूत मान्यताएँ, अध्यात्म साधनाएँ तथा यज्ञों की वैज्ञानिकता असाधारण महत्वपूर्ण एवं विज्ञान सम्मत सिद्ध हो चुकी हैं। इस प्रयोगशाला में 24 से अधिक उच्च शिक्षित एम.डी., एम.एस., एम.बी.बी.एस., बी.ए.एम.एस., एम.एस.सी. स्तर के वैज्ञानिक कार्य कर रहे हैं। वेदों के “आकल्ट” विषयों का शोध अनुसंधान करने की भी व्यवस्था यहाँ की गई है। किन्तु यह शोध कार्य बड़े उपकरणों की अपेक्षा रखता है। इस तरह के उपकरण अम्बाला, चण्डीगढ़, बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली के अलावा विदेश से भी मँगाए जाने की व्यवस्था की जा रही है, किन्तु स्वर विज्ञान, मंत्र-विद्या संगीत चिकित्सा, समागान, आँरा विज्ञान, प्लाज्मा विज्ञान, ब्रह्माण्ड के विलक्षण विकिरणों के प्रभाव पर अध्ययन के लिए अति संवेदनशील बहुमूल्य उपकरणों की आवश्यकता है। अपने धर्म-संस्कृति प्रदर्शियों की धरोहर पर निष्ठा रखने वाले श्रीमंत जनों से इसमें विशेष सहायता करने का सादर अनुरोध है।


अपनों से अपनी बात - पुनर्गठन की वेला में अब आ पहुँचा प्रथम पूर्णाहुति पर्व

परमपूज्य गुरुदेव ने 1966 की ‘अखण्ड ज्योति’ की ‘अपनों से अपनी बात’ श्रृंखला क्रम में अगस्त माह की पत्रिका में ‘हमारा छँटनी कार्यक्रम और उसका प्रयोजन’ शीर्षक से अपनी भावनाओं को छूने वाली तूलिका से लिखा था कि इन दिनों विश्व में जो भावनात्मक दुर्भिक्ष फैला हुआ है, उसके निवारण हेतु एक बड़ी सृजनात्मक योजना इन दिनों बन रही है। पाँच वर्ष बाद (1971 के बाद) हमारी क्रियापद्धति सूक्ष्मजगत में आरम्भ होगी। वह हमारे जीवन का उत्तरार्द्ध है। सूक्ष्म जगत के वर्तमान स्वरूप को बदल देने के लिए ऐसे ही आयोजन सृष्टि के इतिहास में समय-समय पर होते आये हैं। इस बार भी ऐसी ही व्यवस्था सामर्थ्यवान् प्रकाशपुँजों द्वारा की गयी है। उसमें भाग लेने का अवसर हम जैसे अकिंचन व्यक्ति को भी मिल रहा है। हमारी भावी तपश्चर्या इसी निमित्त है। विश्व के नवनिर्माण में यह भूमिका अपना महत्वपूर्ण योगदान करेगी।

आगे इसी क्रम में उन्होंने लिखा है कि युगपरिवर्तन आन्दोलन का इन दिनों सूत्रपात हुआ है। इसे बीजारोपण ही कहना चाहिए। इस फसल को लहलहाने और पकने में अभी समय लगेगा। अभी जो बीज बोये जा रहे हैं वे सन् 2000 में आज से 34 वर्ष बाद पुष्पित एवं फलित होंगे। तब सब कुछ बदला हुआ होगा। ‘अखण्ड ज्योति’ के किशोर पाठक नोट करके रख लें कि 34 वर्ष के बाद की दुनिया आज की तुलना में लगभग हर दृष्टि से बदली हुई होगी। उस समय युगपरिवर्तन के दृश्य खुली आँखों से देखे जा सकेंगे, अभी तो सूक्ष्म जगत में इनका बीजारोपण मात्र हो रहा है।

मात्र दृष्टा स्तर की सत्ता ही यह सब लिख सकती है कि, आज के किशोर पाठक 34 वर्ष बाद एक बदली हुई दुनिया देखेंगे। यह भी उनने तब लिखा था जब युग निर्माण योजना को जन्म दिये मात्र तीन या चार वर्ष ही हुए थे। इसी अंक में उनने लिखा था कि “अगले 34 वर्ष काफी कष्ट भरे हैं। प्रसव पीड़ा की तरह सभी को बड़ी आपत्तियाँ उठानी पड़ेंगी। महंगाई, अनावृष्टि, बीमारियाँ, दुर्घटनाएँ, आन्तरिक कलह, पारिवारिक विग्रह आदि उपद्रव सामने आते रहेंगे और उनसे जनसाधारण को नित नई मुसीबतें सहन करनी पड़ेंगी।” यह सब हो भी रहा है, सभी इसे देख भी रहे हैं। संभवतः इन सबको पूर्व से ही अपनी दिव्यदृष्टि से देखकर उस युग पुरुष ने यह सब लिख डाला था। अपने छँटनी कार्यक्रम की बात कहते हुए समर्थ, तेजस्वी, आत्माओं को ही मिशन से जुड़े रहने का पूज्यवर ने आवाहन किया था। उनका मत था कि “इतने बड़े प्रयोजन की सिद्धि, युगपरिवर्तन का महान कार्य तेजस्वी, मनस्वी एवं तपस्वी आत्माओं द्वारा सम्भव होगा। जिनके पास आत्मबल नहीं, वह युगपरिवर्तन की भूमिका में कोई कहने लायक योगदान दे भी कहाँ सकेगा?” इसीलिए उनने मात्र सक्रियता की कसौटी पर खरे उतरने वाले परिजनों को जुड़े रहने को कहा था व शेष से कहा था कि वे इस कार्य से अब जुड़े रहना न चाहें तो हट जायें।

आज तीस वर्ष बाद प्रथम पूर्णाहुति की वेला में जब लाखों व्यक्तियों की भीड़ परमपूज्य गुरुदेव की जन्मभूमि में एकत्र होगी, तब पुनर्गठन की बात फिर सामने आएगी कि बचे हुए इन चार-पाँच वर्षों में ऐसे कौन-कौन प्राणवान् आत्मबल सम्पन्न शेष बचे हैं जो समय की कसौटी पर खरे उतर सकेंगे। आस्था संकट की इस विपन्न वेला में कहीं उन पर किसी प्रकार का व्यामोह तो उत्पन्न नहीं होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि बढ़ी-चढ़ी इस भीड़ में वे सभी खो जायें जिन्हें तलाशने के लिए यह पूर्णाहुति आयोजन रखा गया था। बड़े आयोजन प्रचार की दृष्टि से ठीक रहते है। राजनीतिज्ञों की यही शैली होती है कि जितनी अधिक बड़ी रैली जुट सके, जुटाई जाये। वे इसी बलबूते अपने को बढ़ा-चढ़ाकर प्रमाणित करने में सफल हो पाते हैं। उनकी सफलता-असफलता भीड़ की संख्या पर निर्भर करती है किन्तु अध्यात्म क्षेत्र भीड़ का मोहताज नहीं है। इसमें तो संस्कृति के उत्थान के लिए मर मिटने वाले मरजीवड़ों की संख्या देखी जाती है, उनका आत्मबल कूता जाता है व वे गिने चुने भी हों तो भी यह आशा बनी रहती है कि, इस निर्णायक युद्ध में उनकी भूमिका निश्चित ही महत्वपूर्ण इतिहास लिखेगी।

प्रस्तुत प्रथम पूर्णाहुति 26 विराट अश्वमेध महायज्ञों के बाद गुरु ग्राम आँवलखेड़ा (आगरा) में युगसन्धि महापुरश्चरण जो सन् 2001 तक चलने वाला है, के अर्द्ध विराम की तरह है। इसमें हमें विश्राम नहीं करना अपितु जो कुछ भी विगत छह वर्षों में सम्पन्न हुआ-आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न हुई, उसकी फलश्रुति स्वरूप कितने हीरक हम युग देवता के चरणों में समर्पित कर रहे हैं, यह मूल्याँकन करना है। सवा लक्ष न सही, कुछ सहस्र हीरकों की हमें आवश्यकता है जो संधिकाल के पूरा होने तक व उसके बाद भी पूज्यवर के आदर्शों पर चल सकें। वैभव की चकाचौंध में, बड़े-बड़े भवनों के निर्माण में, शक्तिपीठों पर पदों की प्रतिस्पर्धाओं में जो अपनी पट्टी से हटकर चल रहे हों, उनकी छँटनी का अब यह समय आ गया है। प्रस्तुत महापर्व जो कार्तिक पूर्णिमा तक होने जा रहा है, इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। अब हम बहुत बौरा लिए, बहुत अपनी ही पीठ अपने हाथों से ठोंक ली, बहुत नाम अखबारों में उस गुरुसत्ता के नाम पर छपवा लिए किन्तु अब समय आया है महाकाल के सहचर बन वस्तुतः वह सब करने का जो निर्माणात्मक है, जिसमें बहुत कुछ बलि देकर आत्मबल बनाए रखकर हमें युग निर्माण का प्रयोजन पूरा करना है।

किसी को बात कड़वी लग भी सकती है किन्तु अब तीस वर्ष बाद भी इसे उसकी पुनरावृत्ति कहा जाये जो छँटनी अभियान के रूप में सम्पन्न हुआ था, जिसका वर्णन ऊपर किया गया तथा जिसे अब पुनर्गठन नाम दिया गया है तो इसे मिशन के लिए एक स्वस्थ संकेत मानना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीय माताजी अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसी व्यक्ति को नहीं ‘लाल मशाल’ को, संघ शक्ति की प्रतीक एक टीम को नियुक्त कर गये थे। ऐसे में हम सबकी दृष्टि उन्हीं आदर्शों पर होना चाहिए जिन पर पूज्यवर व माताजी ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। आँवलखेड़ा पूर्णाहुति आयोजन अब अपनी अंतिम तैयारी पर आ पहुँचा है। नगरों का निर्माण पूर्णता पर है। प्रदर्शनी बनकर तैयार हो चुकी है। पूज्यवर की जन्मस्थली पर उनके जीवन वृत्त का परिचय देने वाले 14 विवरण पट लग चुके हैं व उस स्थान का जीर्णोद्धार कर उसे वैसा ही बना दिया गया है जैसा कि आज से 85 वर्ष पूर्व रहा होगा। जिस स्थल पर पूज्यवर ने जन्म लिया, वहाँ पर ग्रेनाइट का एक चबूतरा बना दिया गया है व उस पर जन्मतिथि, आत्मबोध-तिथि निर्वाण महाप्रयाण-तिथि अंकित कर दी गयी है। सारे देश के समर्पित दस हजार से अधिक स्वयं सेवक पहुँच चुके हैं व अपने-अपने श्रमप्रधान, कलाप्रधान, निर्माणप्रधान कार्यों में लगे हैं। जब तक परिजनों के हाथों में यह पत्रिका पहुँचेगी, सभी घर से निकलने की तैयारी में होंगे। एक विराट संकल्प मन में लिए कि आगामी एक वर्ष तक अनुयाज के रूप में देवसंस्कृति को सुदूर उत्तर पूर्व व दक्षिण भारत तथा पंजाब, जम्मू-कश्मीर से लेकर पूरे विश्व में पहुँचाने के लिए उन्हें क्या करना है। निश्चित ही यह आयोजन अनेकानेक रूपों में अनूठा होगा क्योंकि इसमें श्रद्धांजलि संकल्प-समारोह, शपथ समारोह एवं आश्वमेधिक प्रयोगों का एक अभिनव समन्वित रूप देखा जा सकेगा। पहली बार हमारी दोनों ही आराध्य सत्ताएँ हमारे बीच ऐसे विराट आयोजन में नहीं होगी किन्तु उनकी सूक्ष्म व कारण शक्ति का प्रभाव इस आयोजन व उसके बाद कई वर्षा तक देखा जा सकेगा।

इधर परमपूज्य गुरुदेव के समग्र जीवन पर बन रहा वांग्मय भी अपनी पूर्ण तैयारी पर है। इसमें सत्तर खण्ड होंगे जो प्रायः अखण्ड ज्योति आकार के पाँच सौ पृष्ठ के होंगे। इस प्रकार 35000 पृष्ठों में एक अमूल्य सामग्री जिसमें पूज्यवर की लेखनी रूपी संजीवनी वाणी रूपी अमृत तथा पत्रों-अनुभूतियों-काव्य का अद्भुत समन्वय परिजन पायेंगे। उनकी प्रथम पूर्णाहुति पर तो मात्र 45 खण्ड ही सबको दिये जा रहे हैं, इतने ही भरपूर परिश्रम के बाद तैयार हो पाये हैं, किन्तु सभी को शेष पच्चीस खण्ड इस वर्ष के अन्त तक मिल जायें, ऐसी व्यवस्था की जा रही है। सभी सत्तर खण्डों के नाम इसी पत्रिका में दिये जा रहे है।

परिजनों को पशोपेश हो सकता है कि पहले चालीस खण्ड प्रस्तावित थे, अब सत्तर खण्ड कैसे हो गये? सारी सामग्री पलटने पर देखा गया कि सभी कुछ बहुमूल्य है, किसी को छोड़ा नहीं जा सकता। यह कार्य बार-बार संभव भी नहीं हैं। इसीलिए खण्डों की संख्या बढ़ती चली गयी व अब सत्तर पर जाकर टिकी है।

एक ही स्थान पर परिजनों-पाठकों को वह सब देखने को मिलेगा जो जीवन भर की पूज्यवर की पूँजी हैं। जो भी कुछ उनने लिखा, जो भी कुछ कहा, जो भी कुछ अन्यों ने अनुभव किया-वह सब इसमें उनके दुर्लभ चित्रों के साथ है। प्रत्येक में प्रत्येक खण्ड की पृथक् एक भूमिका, मिशन के संस्थापक-संरक्षकों का जीवन-परिचय पाँच महत्वपूर्ण स्थापनाओं का इतिहास तथा समस्त खण्डों के नाम हैं। जिल्द में बंधा यह वांग्मय प्रोटेक्टिंग कवर से सज्जित होगा एवं एक संग्रहणीय संकलन बन जायेगा।

प्रथम पूर्णाहुति के इस उपक्रम को जो संधिकाल की वेला में आ रहा है, हम सबके लिए एक महत्वपूर्ण समय माना जाना चाहिए। मिशन के विराट विस्तार, अनुपयोगी की छँटाई एवं मात्र युग निर्माण की जिम्मेदारी कंधों पर लेकर चलने वाले हीरकों की ढूँढ़ खोज-उनका सुनियोजन- क्रिया–कलापों सम्बन्धी मार्गदर्शन एवं कार्य करने की शैली को सुव्यवस्थित बनाना-यही सब इन दिनों चलेगा। प्रत्येक को इसी तैयारी के साथ कुछ संकल्प लेकर कुछ कर गुजरने की उमंगों के साथ इसमें भागीदारी करने के लिए आना है, यह स्मरण रखें। पैंतालीस खण्डों को परिजन पूरी लागत देकर बंधे हुए कार्टून बॉक्सों में आसानी से ले जा सकें, इसके लिए हर नगर में एक स्टॉल वाङ्मय सम्बन्धी लगाया जा रहा है।


वेदों के उद्धार हेतु प्राणवान परिजन आगे आयें

संसार में जितने भी धर्म-सम्प्रदाय आज हैं, उनमें वैदिक धर्म सबसे पुराना है। यदि एक दृष्टि से देखें तो जितने भी सम्प्रदाय स्थापित हैं, उनका उद्गम उस धर्म के मूल ग्रंथ को ही माना गया है। इस्लाम धर्म की स्थापना कुरान शरीफ से, ईसाई धर्म न्यू टेस्टामेंट से, यहूदी धर्म ओल्ड टेस्टामेंट से, पारसी धर्म जिन्दावेस्ता से, बौद्ध धर्म त्रिपिटक से तथा सिक्ख धर्म गुरु ग्रंथ साहब की संरचना से स्थापित माना जाता है। इन सभी ग्रन्थों के प्रति इनके अनुयायी असीम श्रद्धा का भाव रखते हैं तथा उनको विधिवत् व्यवस्था के साथ पाठ के पश्चात् श्रद्धाभाव से इन्हें रखते हैं। समय-समय पर उत्सव आयोजन भी किये जाते हैं, झाँकियाँ निकाली जाती हैं व उन सम्प्रदायों के लोग उन्हें पूजते हैं। इन धर्म-सम्प्रदायों का निरन्तर विकास और अभिवृद्धि इसी आधार पर हो रही है।

वैदिक धर्म की-हिन्दू धर्म की उत्पत्ति वेदों से हुई है, जिन्हें अपौरुषेय कहा जाता है। यह एक दुर्भाग्य ही है, घोर विडम्बना ही है कि इसके मूलभूत धर्मग्रन्थ वेद जो ज्ञान और विज्ञान के रत्न केवल अगाध भाण्डागार समझे जाते है, प्रत्युत सारे संसार के प्राचीनतम ग्रंथ होने का गौरव भी इन्हें प्राप्त है, उन्हें प्रायः बहुसंख्य लोगों ने भुला दिया है, उनकी स्मृति पुरातत्वावशेष जितनी मात्र रह गयी है। जिस आदिकालीन संस्कृत भाषा में उन्हें लिखा गया, उसे अब विज्ञान ने भी कम्प्यूटर से भी श्रेष्ठतम, विज्ञान सम्मत मान्यता प्रदान कर दी है। वस्तुतः देवशक्तियों से सम्पर्क सीधे स्थापित करने का यदि कोई माध्यम हो सकता है तो वह वैदिक ऋचाएँ ही हैं। हमारे ऋषिगणों ने इन्हें रचा ही इसलिए था कि ये वैदिक स्तुतियाँ मानव व देवलोक में सम्पर्क स्थापित करने का माध्यम बनें। वैदिक सूत्रों में जो वैज्ञानिकता पायी जाती है, वह संसार के अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं देखी जाती। इन सबके बावजूद हमने इन्हें न केवल विस्तृत कर दिया अपितु, उपेक्षा के गर्त्त में डाल दिया है। आज यदि किसी हिन्दू से प्रश्न किया जाय कि, हिन्दुओं के आदि ग्रंथ क्या है तो उनका कोई सुनिश्चित उत्तर नहीं है-गीता भागवत्, रामायण में से किसी को भी आदि ग्रंथ बता देते हैं। ये भी सबके घर में होना जरूरी नहीं। किसी के पास माहात्म्य पाठ है तो किसी के पास चालीसा, दुर्गा सप्तशती, सहस्र नाम आदि अर्थात् वेदों की गरिमा का भान न होने से कोई भी हिन्दू अपने आदि ग्रंथ को वह सम्मान नहीं देता जो अन्यान्य धर्मानुयायी देते आये हैं व अभी भी देते है। जिन्हें यह मालूम है कि हमारे आदि ग्रंथ मूलतः वेद हैं, जरूरी नहीं कि उन्हें चारों वेदों का ही नाम पता हो, सही उच्चारण वे कर सकते हों। जो लाभ हमारे ऋषिगणों ने उनके अध्ययन-अनुशीलन से पाया था, उसकी बात तो कोसों दूर है।

कभी किसी राजकुमारी ने यह गुहार लगायी थी कि कोई है ऐसा वीर पुरुष जो इन वेदों का पुनरुद्धार करेगा? (को वेदान पुरनद्धसि?) तो एक व्यक्ति निकलकर आया था, जिसका नाम था कुमारिल भट्ट। भले ही गुरुद्रोह करके उसने वेदों को पुनर्जीवित किया हो ताकि यह परम्परा नष्ट न होने पाये, प्रायश्चित स्वरूप स्वयं को अग्नि में भी जला डाला एवं बलिदानियों की परम्परा में एक नया इतिहास लिख डाला। आज भी यही प्रश्न पुनः आ खड़ा हुआ है, जब मध्यकाल में हमारी संस्कृति पर हुए आक्रमण, अंधकार युग व पाश्चात्य सभ्यता के आज के युग में अंधानुकरण ने हमारी जड़ों पर कुठाराघात कर हमारी आर्य विरासत को लगभग बन्दीगृह में डाल दिया है। इस बन्दीगृह से निकालकर इसे जन-जन तक पहुँचाना हमारा आपका सबका कर्तव्य है। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने हर बालक को महामानव बनाने वाले, आत्मसूत्र का परमात्म सत्ता का ज्ञान कराने वाले इस वैदिक ज्ञान को आज से पैंतीस वर्ष पूर्व सर्वसुगम सुबोध भाष्य द्वारा सरल हिन्दी में प्रस्तुत किया था। तब से अब तक इसके कई संस्करण छप चुके। उन्हीं के निर्देशानुसार परम वन्दनीय माताजी ने उन्हें विज्ञान की अद्यतन उपलब्धियों के समायोजन के साथ उन्हें आठ जिल्दों में सरल हिन्दी व वैज्ञानिक टिप्पणियों के साथ विगत दो वर्षों में सम्पादित प्रकाशित किया। अब चारों वेद ऋग्वेद(चार जिल्दों में), अथर्ववेद (दो जिल्दों में) तथा यजुर्वेद व सामवेद (एक-एक जिल्द में) सबके लिए प्रथम पूर्णाहुति तक उपलब्ध है। इनका मूल्य छह सौ रुपये है। किन्तु श्रीमन्तों से प्रार्थना की गयी है कि हर हिन्दू के घर ये स्थापित हो सकें, इसके लिए उन्हें जो इतने समर्थ नहीं हैं आधी कीमत पर तीन सौ रुपये में स्थापित करायें। जो पूरा मूल्य दे सकने की स्थिति में हो, वे सम्पूर्ण मूल्य देकर अपने घरों में वेद स्थापना संस्कार करायें।

इन वेदों की स्थापना विधिवत् एक शास्त्रीय कर्मकाण्ड के साथ की जाये, इसके लिए शान्तिकुञ्ज द्वारा यह अभियान चलाया जा रहा है। सभी परिजन अपने घरों में तो यह स्थापना करायें ही, औरों, श्रीमन्तों, सम्पन्नों के घरों अथवा सामान्य आजीविका वालों के घरों में भी इसे करायें। इसके लिए शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार से सम्पर्क स्थापित कर नवम्बर के प्रथम सप्ताह में होने वाली प्रथम पूर्णाहुति में इन वेदों के सभी खण्डों की प्राप्ति की व्यवस्था बनायें। यहीं पर विराट रूप में वेद स्थापना संस्कार कराने का निश्चय किया गया है। इस ऋषियों द्वारा प्रणीत ब्रह्मकर्म में सभी सम्मिलित होंगे, इस प्रत्यक्ष ब्रह्मभोज में सभी भाग लेंगे, यह अभिलाषा महाकाल की सत्ता की है। आशा है इसे सभी पूरी करने की यथा शक्ति प्रयास करेंगे।

*समाप्त*