महानता के साथ संपर्क साधकर उस सहयोग का सुयोग पा लेना एक अप्रत्याशित सौभाग्य है जो कभी-कभी मनुष्य को मिलता है। ऐसे अवसर सदा-सर्वदा हर किसी को नहीं मिलते। पारस पत्थर को स्पर्श कर काले कुरूप और सस्ते मोल वाले लोहे का सोने जैसी गौरवास्पद बहुमूल्य धातु में बदल जाना संपर्क का परिणाम है। स्वाति की बूँदों से लाभान्वित होने पर सीप जैसी उपेक्षित इकाई को मूल्यवान मोती प्रसव करने का श्रेय मिलता है। पेड़ से लिपट कर चलने वाली बेल उसी के बराबर ऊँची जा पहुँचती और अपनी उस प्रगति पर गर्व करती है। अपने बलबूते वह मात्र जमीन पर थोड़ी दूर रेंग ही सकती थी किन्तु उसकी दुर्बल काया को देखकर इतने ऊँचे चढ़ जाने की बात साधारण बुद्धि की समझ में नहीं आती किन्तु पेड़ का सान्निध्य और लिपट पड़ने का पुरुषार्थ जब सोना-सुहागा बनाकर समन्वय बनाता है तो उससे महान पक्ष की कोई हानि नहीं होती, पर दुर्बल पक्ष को अनायास ही दैवी वरदान जैसा लाभ मिल जाता है। समर्पण के सामीप्य को महानता के साथ जुड़ने के ये कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि व्यक्ति के लिए वरेण्य क्या है।
दैवी प्रयोजनों में यदि क्षुद्र से जीव भी तनिक-सा सहयोग करें तो दैवी सहायता अपरिमित परिमाण में पाते है। बन्दरों की समुद्र पर पुल बनाने की उदार श्रमशीलता एवं गिलहरी की बालू से समुद्र को पाटने की निष्ठा ने उन्हें ऐतिहासिक बना दिया। सुग्रीव के सहयोगी-खोह कन्दरा में आश्रम हेतु भटकने वाले हनुमान जब श्रीराम के सहयोगी बन गये तो पर्वत उठाने, समुद्र लाँघने, लंका जलाने जैसा असंभव पराक्रम दिखाकर युद्ध में जीत का निमित्त बन राम पंचायतन का एक अंग बन गए। अर्जुन-भीम वे ही थे जिनने द्रौपदी को निर्वसन होते आँखों से देखा व वनवास के समय पेट भरने और जान बचाने के लिए जिन्हें बहुरूपिये बन कर दिन गुजारने पड़े थे। श्री कृष्ण रूपी महान सत्ता को अपनाने वाली उनकी बुद्धिमत्ता ने उन्हें महाभारत के-विराट भारत के निर्माण का श्रेयाधिकारी बना दिया।
यह सुनिश्चित तथ्य है कि जिस किसी पर भगवत्कृपा बरसती है वह महानता से अपना नाता जोड़ने की सूझबूझ-सत्प्रेरणा के रूप में ही बरसती है। आज की विषम परिस्थितियों में यदि यह तथ्य हम सब भी सीख-समझ कर महानता को अपना सकें तो निश्चित ही उस श्रेय को प्राप्त करेंगे जो प्रज्ञावतार की सत्ता उस संधिकाल की विषम वेला में अनायास ही हमें देना चाहती है।
भगवान भास्कर शीर्ष से दक्षिणावर्त हो चुके थे, तथापि उनकी प्रखरता अभी कम नहीं हुई। यही कारण था कि मगध निवासी अभी तक मध्याह्न विश्राम कर रहे थे। पक्षी अपने-अपने कोटरों से बाहर निकलने से सकुचा रहे थे। राजहंस अवश्य अपनी हंसिनी प्रेयसी के साथ जलक्रीड़ा में निमग्न था। उसकी क्रीड़ा से स्पन्दित तरंग राज सरोवर के किनारों को थपकियाँ देतीं और साथ ही कमलिनी नाच उठती। लग रहा था कि ग्रीष्म की प्रखरता का राजोद्यान पर कोई प्रभाव नहीं है। न तो उसकी सुषमा यत्किंचित् म्लान हुई और न सौरभ मुरझाया। उपवन में प्रातः काल जैसा मादक सौंदर्य अब भी बिखरा पड़ रहा था।
आम्र निकुँज के सघन एकान्त में राजकुमार कुणाल बैठे थे। उनकी मुख-मुद्रा बताती थी कि वे किसी विचार में खोये हैं। यह समाधि न जाने कब तक चलती कि सहसा लौध्र पुष्पों की सुन्दर सुवास नासा-रंध्रों को पार कर उनके मर्म स्थल को आलोड़ित करने लगी। नूपुर और पायलों की मन्द मोहक मधुर ध्वनि इस तरह सुनाई दी मानों स्वर्ग से कला साम्राज्ञी उर्वशी का पदार्पण हो रहा हो? कुणाल चौंके-कौन आ रहा है यह देखने के लिए जब तक नयन उठे तब तक सौंदर्य की प्रतिकृति महारानी तिष्यरक्षिता सम्मुख आ उपस्थित हुईं। उनका वेश विन्यास, नेत्रों की चपलता और मुखड़े की मादकता देखकर रति निष्प्रभ पड़ जातीं। तिष्यरक्षिता का यह सौंदर्य देखकर लताओं में भी काम भाव छा गया। मनुष्य निह्नल हो जाता तो यह कोई बड़ी बात न होती।
माता। आप? युवराज कुणाल अब तक खड़े हो चुके थे, और सस्मित पूछ रहे थे-आप स्वस्थ तो हैं न? आर्य श्रेष्ठ विश्राम कर रहे होंगे। आज्ञा करती वहीं आ जाता, यहाँ तक आने का कष्ट आपने क्यों किया?”
“दीपशिखा का रूप देखकर पतंग वर्तन क्यों करता है युवराज?” तिष्यरक्षिता कह रहीं थीं - “कलिका का केसर चूमने के लिए भौंरा क्यों उड़ कर आता है? कुणाल। पावस ऋतु आने पर पथिकगण सहसा अपने घरों की ओर क्यों मुड़ पड़ते हैं? यह भी कुछ बताने की बात है राजकुमार कि लतिका तरु का सघन सान्निध्य प्राप्त करने के लिए क्यों आतुर हो उठती है?”
यह सब सुनकर कुणाल मर्माहत हो उठे? “आप मेरी माँ के समान हैं भद्रे। आर्यश्रेष्ठ के लिए आप तीसरी धर्म पत्नी होंगी। मैंने तो आपको सदैव अपनी माँ के रूप में ही देखा है। फिर मेरे साथ यह प्रवंचना कैसी? नारी धर्म से विचलित मत हूजिए माँ?” कहते-कहते कुणाल के स्वर में कुछ तीक्ष्णता आ गई।
“कुणाल! सम्बन्ध बनाना बिगाड़ना मनुष्य के हाथ की बात है। महाराज अशोक से विवाह मेरे शरीर ने किया है, मन ने नहीं। मन से तो सदा मैंने तुम्हें अपना देवता माना है।”
“यह प्रताड़ना है देवि! आर्य सन्तानें नीति-धर्म का पालन करती है। हम धर्म के लिए जीवन का त्याग करते हैं। जीवन के क्षणिक सुखों के लिए धर्म का नहीं। मेरी सहचरी आप नहीं हो सकतीं। आप तो मेरी पूज्या हैं, माँ है। आपकी मनोकामना पूर्ण करना मेरे लिए सर्वथा असम्भव है।”
यह कहकर कुणाल एक ओर चल दिए। महारानी तिष्यरक्षिता ने इसे अपने सौंदर्य का अपमान समझा और कहा - “सोच लो कुणाल, तुम्हारी जिन आँखों पर मैं मुग्ध हुई उन्हें ही निकलवा न लूँ तो मैं भी मगध साम्राज्ञी नहीं। न तुम्हारा युवराज भुवन मोहन सौंदर्य। मेरे अपमान के लिए तुम्हें एक दिन पछताना पड़ेगा।”
कुणाल एक क्षण रुके, पीठ फेरे हुए बोले- “माँ का हर प्रसाद शिरोधार्य है पुत्र को।
वैसे युवराज पद हो अथवा हाड़-माँस के इस पुतले में भासित होने वाली सुन्दरता दोनों ही नश्वर है। धर्म शाश्वत है, चरित्र अविनाशी है। इसे अपनाकर मैं पूर्ण सन्तुष्ट हूँ” और चरित्र के धनी कुणाल वहाँ से क्षिप्र गति से दूर-बहुत दूर चले गए रुके नहीं। इतिहास साक्षी है कि उनकी आँखें निकलवा ली गईं, पर वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए। उन्होंने प्रमाणित कर दिया कि धर्म शाश्वत है और चरित्र अविनाशी।
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ब्रह्मविद्या या तत्त्वदर्शन से तात्पर्य उस परमात्मा सत्ता का स्मरण, उसकी विशेषताओं का चिन्तन-मनन है जिसे प्रभु, परमात्मा, ईश्वर या भगवान कहा जाता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय को ही भगवान कहते है। विराट्-परब्रह्म तो वह सूत्र-संचालन शक्ति है जिसे सारी सृष्टि की व्यवस्था चलानी होती है। नियम अनुशासन से अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना ही उसका काम है। उपासना में परब्रह्म को नहीं, भगवान को साकार या निराकार रूप में स्मरण किया जाता है। यह भगवान कोई व्यक्ति नहीं, सद्भावना-सद्विचारणा सत्प्रवृत्तियों का समुदाय है जिसकी समस्त विशेषताओं का स्मरण कर उन्हें आत्मसात् करने का प्रयास किया जाता है।
उपासना में अन्तः करण को- भावनाओं को उच्चस्तरीय उद्देश्यों के अनुरूप गतिशील बनाना पड़ता है। साधना व आराधना भी इसी के साथ स्मरण किये जाने वाले कृत्य हैं जिनमें क्रमशः विचारणा व गतिविधियों को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जाता है। उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिए इन्हीं त्रिविधि सोपानों को अपनाना पड़ता है।
उपासना, साधना व आराधना के इन तीन उपायों से ही ईश्वर जीवसत्ता में प्रवेश करता है तथा मनुष्य को देवोपम चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों, से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
मानव सहज ही अभ्यास क्रम में अनगढ़ है। कुसंस्कारिता से छुटकारा पाकर सुसंस्कारी शालीनता के ढाँचे में ढलने के लिए आत्मसत्ता को विवश करने हेतु योग-त्रयी के ये तीनों ही उपचार नित्य जीवन में अपनाने होते हैं। उपासना से ईश्वरीय गुणों को जीवन में उतारने का अभ्यास किया जाता है, साधना से मन को दुष्प्रवृत्तियों से जूझने योग्य सशक्त बनाया जाता है एवं आराधना द्वारा अपने क्रिया-कलापों को सोद्देश्य बनाकर ईश्वरी उद्यान को और भी सुन्दर-सुव्यवस्थित बनाने आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का विकास किया जाता है। सतत् हर क्षण इनका अभ्यास जीवन में अनिवार्य है।
इतनी-सी बात समझ में आने में किसी को भी कोई परेशानी न होगी कि परब्रह्म को किसी उपहार मनुहार से प्रसन्न नहीं किया जा सकता। भ्रान्तियाँ फिर भी मन पर छायी रहती और मनुष्य को दिग्भ्रान्त करती रहती है। परब्रह्म दृष्टि की अनुशासन व्यवस्था का नियन्ता है। उसे फुसलाया नहीं जा सकता। पूजा-उपचार कर्मकाण्ड तो उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने का प्रभावी व्यायाम पराक्रम भर है। इन माध्यमों को अपना कर जो अपनी चेतना को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालता चला जाता है वह ऋषि, देवदूत, महामानव, महात्मा जैसे स्तर को प्राप्त होता है।
उपासना अर्थात् आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। भाव संस्थान जो मान्यताओं, आकांक्षाओं से लिपटा होता है-वही अपनी आत्मा ही तो है। परमात्मा तत्व उत्कृष्ट आदर्शवादिता का ही दूसरा नाम है। अपने ढर्रे में चली आ रही, लोभ-मोह के बँधनों में जकड़ी आत्मा को परिष्कृत, शोधित कर उसे उत्कृष्टता की ओर मोड़ देना ही सच्ची उपासना है। उपासना से तात्पर्य है जिसके समीप बैठे हैं, तद्रूप हो जाना। यह समर्पण घनिष्ठता जितनी निश्छल सार्थक उच्चस्तरीय होगी, उतनी ही उपासना सार्थक होगी, यह तभी सम्भव है जब उपासक का स्वयं का स्तर ऊँचा हो और उपास्य के सम्बन्ध में वास्तविक बोध बना रहे, किसी प्रकार की भ्रान्ति न हो।
उपासना का तत्व दर्शन समझने के उपरान्त शेष इतना ही रह जाता है कि प्रारम्भिक प्रयासों में उसे भावनात्मक व्यायामों की तरह प्रयुक्त कर धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाय। कर्मकाण्ड यदि कायकलेवर है तो तादात्म्य वाला पक्ष उसका प्राण है। एक प्रत्यक्ष है, दूसरा परोक्ष। जप, ध्यान, प्राणायाम का क्रिया पक्ष महत्त्वहीन है, यदि भाव-पक्ष को प्रधानता नहीं दी गयी है। पौरुष हीन के हाथ में तलवार सौंप दी जाय तो पराक्रम के बिना वह मात्र लोहे का एक टुकड़ा भर सिद्ध होती है। पराक्रम ही जिताता है, तलवार नहीं। इसी प्रकार भाव-श्रद्धा ही उपासना को सार्थक बनाती है, कर्मकाण्ड के क्रिया−कलाप नहीं।
महाप्रभु चैतन्य के जीवनकाल की एक घटना है। वे जगन्नाथपुरी क्षेत्र में प्रचार यात्रा पर निकले थे। मण्डली में कई विद्वान भी थे। वट-वृक्ष के नीचे एक किसान को उन्होंने तन्मयतापूर्वक गीता पाठ करते देखा उसकी आँखों से आँसू टपक रहे थे। उसकी तन्मयता देखते बनती थी। हाव-भाव ऐसे थे, मानों वह स्वयं अपने अन्तर्चक्षु से गीता काल की घटनाओं को भगवान कृष्ण एवं अर्जुन को दृश्य रूप में सामने देख रहा हो। मण्डली रुक गयी। पाठ सुनने लगी। उच्चारण नितान्त अशुद्ध था। अल्प शिक्षित होने के कारण वह ने तो संस्कृत भाषा से अवगत था, न ही श्लोकों का अर्थ उसे समझ में आता था।
विद्वानों ने उसे टोका एवं अशुद्ध बोलने से रोका महाप्रभु एकटक-भाव विभोर हो उसे देख रहे थे। वह रुका नहीं, पढ़ता ही रहा। बोला-मेरे लिए इतना ही बहुत है कि भगवान जो कह रहे है उसे मेरी आत्मा अमृत की तरह पी रही है।” महाप्रभु के बोल फूटे-उन्होंने उस भक्त को नमन करते हुए कहा- “भक्तों! इस अशिक्षित की भावना स्तुत्य है। यही है वह तत्त्व जिसके सहारे भक्ति की जानी है, जो भक्त की उपासना को सार्थक बनाती है।” वस्तुतः का भाव नियोजित किए बिना सारे पूजा उपचार के क्रम अधूरे, खोखले हैं।
तादात्म्य का अर्थ है भक्त की भावना और इष्ट की उससे अपेक्षा का एकीकरण। दोनों की अन्तः स्थिति का समन्वय विसर्जन। दैवी अनुशासन के अनुरूप जो अपनी जीवनचर्या का निर्धारण कर लेता है, वही सच्चा उपासक है। इसमें अपने आप से कठोर संघर्ष तो करना पड़ता है, पर आत्मबल सम्पन्न उस परम तत्त्व पर पूरा भरोसा रख अपनी नाव खेते चले जाते है। साधक को अपना स्वरूप कठपुतली जैसा बनाना होता है और अपने अवयवों में बँधे धागों को बाजीगर को सौंप देना पड़ता है। इससे कम में वह स्थिति बनती नहीं जहाँ आत्मा-परमात्मा का मिलन संयोग क्रम बन सके।
बूँद चाहती तो बरसकर सूखी धरती को तृप्ति, प्यासों को तुष्टि दे सकती थी। सरोवर तट पर पड़ी सीप में गिरकर मोती भी बन सकती थी। यदि उसने अपनी अहंता-पृथकता को बनाये रखा और ओस बनकर सर्प द्वारा चाटी जाने पर विष में स्वयं को बदल दिया तो यह उसकी अपनी नियति है। जो न समुद्र बनने को तैयार है, न बादल; उनकी परिणति अधोगामी ही होती है। यह तो एक उदाहरण हुआ पर मनुष्य पर यह शत-प्रतिशत लागू होता है। समर्पण माँगता है-लोभ मोह से विरक्ति अहंता से मुक्ति। यदि समर्पण भाव न विकसे तो मानना चाहिए कि जीव ब्रह्म की एकता में विलग्नता उत्पन्न करने वाली बाधाएँ लोभ-मोह-अहंता के रूप में ही विद्यमान है। उपासना के कर्मकाण्ड इसी कारण बाह्योपचार मात्र बनकर रह गए हैं। समयक्षेप तो इसमें होना ही था, असन्तोष एवं ग्लानि और साथ लग जाती है। देवात्मा बनना तभी सम्भव है, जब परमात्मा के समकक्ष विशेषताएँ उत्पन्न करने योग्य पात्रता विकसित कर ली गयी हो। भावना विचारणा और क्रिया प्रक्रिया में जितना अधिक उत्कृष्टता आदर्शवादिता का समावेश हो सकेगा, उपासना उतनी ही सफल होगी। यही है श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का तत्त्वदर्शन।
विवाह का अर्थ है दो आत्माओं का मिलन, काया का नहीं। जो शरीर देखते हैं, ये पछताते व बहुमूल्य अवसर खोते है।
महर्षि अत्रि की एक पुत्री थी। नाम था उसका अपाला। कुछ बड़ी हुई, तो उसके सिर पर श्वेत कुष्ठ निकल आया। बहुत उपचार करने पर भी अच्छा न हुआ, वरन् बढ़ता गया।
पुत्री विवाह योग्य हुई। तो वर खोजा गया। उस विदुषी के ज्ञान की प्रशंसा सुन कर अनेक वर आये, पर श्वेत दागों को देखकर वापस लौट गये। ऋषि शिष्य वृताश्व ने बिना कुछ पूछताछ-देख-भाल किये ही भावावेश में पाणिग्रहण कर लिया।
घर पहुँचने पर वृताश्व ने जब चर्म दोष देखा तो वे उदास हो गये। कभी ऋषि को, कभी अपाला को कभी अपने को दोष देने लगे। किसी पर भार बनने की अपेक्षा अपाला अपने पिता के यहाँ वापस लौट गई। उसने अपना समस्त ध्यान-तप के लिये नियोजित कर दिया। उसकी प्रवीणता ने उसकी गणना ऋषियों में कराई। चर्म-दोष की तुलना में ज्ञान और चरित्र की गरिमा भारी बैठी।
शौर्य और धर्मनिष्ठा का जितना समन्वय उन दिनों सिन्धु-सौवीर राज्य के शासक सम्राट उद्रायण में मिलता था, किसी अन्य प्रजाजन तो क्या नरपालों में भी नहीं था। उद्रायण अधर्मी और अन्यायी शासकों को दण्ड देते समय जिसने कठोर हो सकते थे, किसी दीन दुःखी व्यथा-वेदना से पीड़ित को देख कर उतने दयार्द्र भी। कर्म और भावनाओं में धर्म की एक रस धारा का यह प्रवाह ही था, जिसने सम्राट उद्रायण को चक्रवर्ती बना दिया था।
अब वे तृतीय वय में प्रवेश पा चुके थे। एक दिन सायंकाल राज दरबार से लौटने पर उनकी धर्म परायणा पत्नी महारानी प्रभावती ने कहा-स्वामी! धार्मिक मर्यादा के अनुसार अब हमें राज्य शासन राजकुमार अभीचि को सौंप देना चाहिए। राजकुमार की शिक्षा-दीक्षा भी पूरी हो चुकी। अब वे इस योग्य हैं कि शासन-भार को वहन कर सकें। इन्हें शासन-सूत्र सौंप कर हम दोनों को परमार्थ एवं परलोक की तैयारी के लिए स्वयं को मुक्त कर लेना चाहिए। महारानी की यह सम्मति पाकर उद्रायण अतीव प्रसन्न हुए। युवराज अभीचि के राज्याभिषेक की तैयारियाँ होने लगी।
महाराज उद्रायण की एक बहन भी थी। उसका एक पुत्र केशीकुमार इस दिनों सिन्धु-सौवीर के संरक्षण में ही पल रहा था। केशीकुमार के पिता किसी अन्य राज्य के शासक थे, पर एक युद्ध में वह मारे गए थे। तब सम्राट उद्रायण की बहन सिन्धु-सौवीर ही चली वियोग में परलोक प्रयाण करने लगी थीं, तब उन्होंने केशीकुमार को अपने भाई को सौंपा था। महाराज ने वचन दिया था कि वह उसे अपने पुत्र राजकुमार अभीचि से अधिक ध्यान देकर रखेंगे। हुआ भी यही, उन्होंने अपने इस कर्तव्य का पालन अब तक अक्षरशः किया था। शिक्षा-दीक्षा आमोद-प्रमोद के जो साधन अभीचि को उपलब्ध होते थे, वह केशीकुमार के पास पहले पहुँचा दिए जाते थे। तब भी केशीकुमार के मन में फणिधर के विष की तरह अभीचि के प्रति अज्ञात दुर्भाव पनपता रहा। हर शंकालु व्यक्ति की तरह उसे अभीचि से सदैव भय बना रहता था।
राज्याभिषेक की तैयारियाँ अभी प्रारम्भ भी नहीं हुयीं थी कि केशीकुमार महाराज के पास जा पहुँचा। धूर्तों की सजगता ही तो होती है कि उन्हें कभी-कभी अनायास सफलता भी हाथ लग जाती है। उसने सम्राट को उनके दिए वचन की याद दिलाई और कहा- “अब तक प्राप्त प्राथमिक सुविधाओं के समान क्या सिन्धु-सौवीर के राज्य सिंहासन पर मेरा प्रथम अधिकार नहीं?”
प्रश्न बड़ा टेढ़ा आ पड़ा मंत्रीगण, सचिव और सेनापति सब इस पक्ष में थे कि राजकुमार अभीचि ही राज्य के उत्तराधिकारी और सुयोग्य प्रशासक हैं। किन्तु महाराज उद्रायण ने जब अपनी स्थिति देखी तो पाया कि वे वचनबद्ध हैं। यों वह केशीकुमार के दुष्ट स्वभाव को जानते थे। दुष्ट को दबाना पाप नहीं होता पर अपयश का भय धर्म के नाम पर एक प्रकार की दीनता ही कही जाएगी। जीवन भर एकछत्र क्षात्र धर्म का पालन करने वाले सम्राट उद्रायण से उतना भी साहस करते न बना। उन्होंने केशीकुमार का ही राज्याभिषेक कर दिया।
अब तो बन्दर के हाथ में तलवार वाली कहावत हो गयी। दुष्ट-स्वभाव के मनुष्य को शक्ति और साधन देना तो दुष्टता का अभिसिंचन और परिपोषण करना ही होता है। राज्य पाकर केशीकुमार का जीवन और अधिक उद्दण्ड हो गया। प्रजा के हित की चिन्ता न रही। मार्ग की एक मात्र बाधा अभीचि को भी उसने राज्य से निष्कासित कर अपने मुट्ठी भर समर्थकों के साथ भोग विलास का जीवन जीने लगा। अभीचि अपने मौसेरे भाई चंपा के राजकुमार कुणिक के पास चला गया।
उद्रायण ने महाश्रमण तीर्थंकर महावीर से धर्म दीक्षा ली और आत्मकल्याण की साधना में रत हो गए। साधना और लोक सेवा में तत्पर श्रमण उद्रायण बहुत समय तक देश का भ्रमण और तीर्थाटन कर अपनी आत्मिक क्षमताएँ बढ़ाने में लगे रहे। धर्म साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार के फैल गया। उनकी कठोर तपश्चर्या के उदन्त सारे लोक में गाए जाने लगे। उनके चमत्कारी व्यक्तित्व के सान्निध्य में जो कोई भी आता, स्वयं को धन्य अनुभव करने लगता।
कुटीचक साध्वी के रूप में तप कर रही महारानी प्रभावती का देहावसान जब हो गया, तब श्रमण उद्रायण अकेले ही लोकहित में प्रव्रज्या करने लगे। बहुत दिनों के बाद उनके मन में अपनी राजधानी सिन्धु-सौवीर की स्मृति ताजा हो उठी। वे वीतमय राजधानी की ओर प्रस्थान कर गए। और कुछ ही दिन में सिन्धु-सौवीर जा पहुँचे। अपने भूतपूर्व धर्मप्रिय शासक को पाकर प्रजाजनों ने अपना सारा प्यार उन पर उड़ेल दिया। यह अन्तर्स्नेह ही तो व्यक्ति को धर्म और सदाचरण की प्रेरणा देता है। अन्यथा आज संसार में दुष्ट-दुराचारियों का ही प्रभुत्व रहा होता।
सब अच्छे ही नहीं होते। इस संसार में बुरे भी कम नहीं है। एक ओर जहाँ प्रजा अपने भूतपूर्व शासक के स्वागत में तल्लीन थी। वहीं दूसरी ओर निहित स्वार्थ के चापलूस पदाधिकारी केशीकुमार को भड़का रहे थे कि महाराज प्रजा का समर्थन लेकर आपको राज्य-च्युत करने वाले हैं। उनका यहाँ आगमन आपको हटाकर अपने पुत्र राजकुमार अभीचि को राज सिंहासन दिलाने के लिए हुआ है।
कृतघ्नता-नीचता की पहली और अन्तिम कसौटी है। जो किसी के किए हुए उपकार के प्रति श्रद्धा नहीं रखता, उससे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं हो सकता। केशीकुमार ने दुष्ट व्यक्तियों के प्रभाव में आकर घोषणा करा दी कि सिन्धु-सौवीर का जो भी नागरिक श्रमण उद्रायण को आश्रय प्रदान करेगा, उसकी सम्पूर्ण सम्पत्ति छीन ली जाएगी और उसे मृत्यु दण्ड भी दिया जाएगा।
ज्येष्ठ की चिलचिलाती धूप में श्रमण उद्रायण भिक्षाटन के लिए निकले। लेकिन आज उन्हें भिक्षा देना तो दूर, जिसने भी उन्हें देखा अपने द्वार बन्द कर लिए अपना-अपना मुख छुपाकर लोग घरों में जा छुपे। इसी से तो भय को महापाप कहा गया है। भयभीत व्यक्ति अन्याय का प्रतिकार भी नहीं कर सकता है। जो प्रजा कल तक उद्रायण के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहती थी। आज वही भयवश उनका मुख तक देखने से कतरा रही थी।
ऐसे समय एक कुम्भकार ने आगे बढ़कर उद्रायण का स्वागत किया और यह दिखा दिया कि साहसी व्यक्ति सत्य के समर्थन में किसी भी भय से विचलित नहीं होते, चाहे मृत्यु दण्ड की आशंका ही क्यों न हो। उसने उद्रायण की समुचित सेवा की और विश्राम के लिए उचित व्यवस्था कर दी। उसके इस साहस ने श्रीमन्तों के सिर झुका दिए। अब तो और लोग भी उनके स्वागत को उद्यत हो गए।
केशीकुमार तक यह समाचार पहुँचा। पापी में साहस कितना। वह गरीब कुम्भकार के साहस का भी सामना न कर सका। उसने छल पूर्वक उद्रायण को मरवा देने का निश्चय किया। कुम्भकार के समीपवर्ती एक ग्वाले के हाथ विष मिला दुग्ध भिजवा कर उसने उन्हें मार डालने की योजना निश्चित कर दी।
सायंकाल का समय था श्रमण उद्रायण ने दुग्धपान कर लिया। विष का प्रभाव शरीर में फैलने लगा उद्रायण भयंकर पीड़ा से कराह उठे। सारे नगर में यह समाचार बिजली की तरह तेजी से फैल गया। नगरवासी विद्रोह कर उठे। महाराज उद्रायण की आज्ञा लेने और केशीकुमार की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए मतवाली भीड़ कुम्भकार के द्वार पर जा पहुँची।
श्रमण उद्रायण ने एक बार सिर ऊपर उठाया और बहुत धीमे स्वर में कहा- “आप लोग केशीकुमार का प्रतिकार न करना। वह क्षमा के पात्र हैं। शरीर तो आज नहीं कल नष्ट होना ही था।”
उद्रायण के प्राण-पखेरू उड़ गए पर उनके अन्तिम शब्द पास खड़े केशीकुमार के कानों में जा पड़े। उसका हृदय प्रायश्चित्त से जल उठा। जो कार्य मतवाली भीड़ न कर सकी, वह परिवर्तन “क्षमा” इन दो अक्षरों ने कर दिखाया। ग्लानि और पीड़ा से भरे केशीकुमार ने स्वतः राजसिंहासन का त्याग करके प्रव्रज्या स्वीकार कर ली उस धर्म मार्ग पर चलने का व्रत लिया जिस पर श्रमण उद्रायण चले थे।
आँवलखेड़ा कार्यक्रम की दृष्टि से कार्य बढ़ने के कारण Short – Hand (हिन्दी एक अंग्रेजी) में निष्णात 2 या 3 स्टेनोग्राफ़र की शान्तिकुञ्ज में समयदान की अनिवार्य आवश्यकता है। तुरन्त पत्र द्वारा अपनी सहमति भेजें।
रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे-एक हाथी है, उसे नहला-धुला कर छोड़ दो, तब फिर वह क्या करेगा? मिट्टी में खेलेगा और शरीर को फिर गन्दा कर लेगा। कोई उस पर बैठे, तो उसका शरीर भी गन्दा अवश्य होगा। लेकिन यदि हाथी को स्नान कराने के बाद बाड़े में बाँध दिया जाय? तब फिर हाथी अपना शरीर गन्दा नहीं कर सकेगा। मनुष्य का मन भी एक हाथी के समान है। एक बार ध्यान, साधना और भगवान के भजन से वह शुद्ध हो गया, तो उसे स्वतन्त्र नहीं कर देना चाहिए। इस संसार में पवित्रता भी है, गन्दगी भी है। मन का स्वभाव है, वह गन्दगी में जायेगा और मनुष्य देह को दूषित करने से नहीं चूकेगा। इसलिए उसे गन्दगी से बचाये रखने के लिए एक बाड़े की जरूरत होती है, जिसमें वह घिरा रहे। गन्दगी की सम्भावनाओं वाले स्थानों में न जा सके।
“ईश्वर भजन, उसका निरन्तर ध्यान एक बाड़ा है, जिसमें मन को बन्द रखा जाना चाहिए, तभी साँसारिक संसर्ग से उत्पन्न दोष और मलिनता से बचाव संभव है। भगवान् को बार-बार याद करते रहोगे तो मन अस्थायी सुखों के आकर्षण और पाप से बचा रहेगा और आपने जीवन के स्थायी लक्ष्य की याद बनी रहेगी। उस समय दूषित सुखों के आकर्षण और पाप से बचा रहेगा और अपने जीवन के स्थायी लक्ष्य की बनी रहेगी। उस समय दूषित वासनाओं में पड़ने से स्वतः भय उत्पन्न होगा और मनुष्य उस पाप कर्म से बच जायेगा, जिसके कारण वह बार-बार अपवित्रता और मलीनता उत्पन्न कर लिया करता है।”
आध्यात्म-विद्या में जिन्होंने थोड़ा बहुत भी प्रवेश किया है वे जानते हैं कि साधना से सिद्धियाँ प्राप्त होती है। अष्ट-सिद्धि और नव-निधियाँ प्रसिद्ध हैं। विभिन्न योगों द्वारा विभिन्न शक्तियों का मिलना प्रकट ही है। इन्द्रियों के आकर्षक भोगो को, सुख-सुविधा को, ऐश आराम को, छोड़कर कोई व्यक्ति कष्ट दायक, कठोर नीरस, श्रम-साध्य साधना में लिये यों ही उद्यत नहीं हो जाता। ज्यादा कीमती चीज के लिए कम कीमती चीज का त्याग किया जाता है। साधना का कष्ट इस लिये सहन करते हैं, कि जिन सुखों का त्याग किया गया है उससे अधिक मूल्यवान सुख प्राप्त हो। यदि ऐसा न होता तो कोई भी व्यक्ति साधना का कष्ट सहने को तैयार न होता।
अनेक अवसरों पर अनेक व्यक्तियों द्वारा ऐसे कार्य करते हुए किन्हीं व्यक्तियों को देखा जाता है, जैसे कि कार्य साधारण आदमी आम-तौर पर नहीं कर सकता। आम जनता के साधारण दायरे से बाहर की जो चीज होती है वह सिद्धि कहलाती है। जैसे हवा में उड़ने वाला मनुष्य सिद्ध कहा जायेगा, किन्तु पक्षी को कोई सिद्ध न कहेगा। पक्षी आम तौर से उड़ते हैं, इसलिए उनके उड़ने में कुछ अचम्भा नहीं है, क्योंकि आम तौर से मनुष्य प्राणी उड़ा नहीं करता। पानी में रहना हमारे लिए सिद्धि है, मछली के लिए नहीं। एक घण्टे में बीस मील की चाल से दौड़ना हमारे लिये सिद्धि है, पर घोड़े के लिए नहीं। हाथी को कोई मनुष्य पछाड़ दे तो उसे सिद्ध कहा जायेगा, किन्तु सिंह जो अक्सर हाथियों को पछाड़ता रहता है सिद्ध नहीं कहलाता। कहने का तात्पर्य यह है कि इस समय जो बातें सब किसी में दिखाई नहीं पड़ती, वह बातें किसी विशेष व्यक्ति में हो तो उसे आध्यात्मिक भाषा में ‘सिद्धि’ शब्द से पुकारा जाएगा। आश्चर्यजनक और असाधारण कार्यों का ही दूसरा नाम ‘सिद्धि’ है।
एक समय में जो बात साधारण होती है, वही बात समय और परिस्थिति के प्रभाव से असाधारण हो जाती है। सतयुग, त्रेता आदि प्राचीन युगों में अब की अपेक्षा मनुष्य अधिक ऊँचा, लम्बा, चौड़ा, अधिक खाने वाला और अधिक काम करने वाला होता था, किन्तु इस समय में तब की अपेक्षा आदमी की काया, खुराक और मजबूती बहुत घट गई है। सतयुग के लम्बे-तगड़े आदमी को अब लाकर दिखाया जाय या अब के आदमियों को तब सतयुग वालों को दिखाया जाता तो निस्संदेह आश्चर्य की सीमा न रहती। एक देश वाले दूसरे देश वालों के रीति-रिवाज खान-पान वेश-भूषा और भाषा को आश्चर्य जनक समझते हैं। लेकिन अपने देश की प्रथा-प्रणाली किसी को अचरज की मालूम नहीं देतीं। सिद्धियाँ हमें आश्चर्य में डालती है। क्यों? इसलिये कि वे आम लोगों में वर्तमान समय में नहीं देखी जाती। जो वस्तु सब किसी के पास नहीं है वह आश्चर्य है, चमत्कार है, वैभव है। पीतल के पर्वत हर किसी के घर में होते हैं, उन्हें देखकर कुछ कौतूहल नहीं होता। परन्तु सोने की थाली में किसी को भोजन करते हुए देखते हैं तो बार-बार उसकी ओर ध्यान आकर्षित होता है। यदि सोना इतनी अधिक मात्रा में निकलने लगे कि घर-घर में सोने के बर्तन हो जाये तो पीतल की भाँति ही वह सोना भी आकर्षण हीन हो जायेगा। यदि सभी धनी, बँगले वाले, मोटर वाले, अमीर हो जाएँ तो फिर उनकी ऐसी पूछ न रहेगी जैसी कि अब है। सिद्धियों को देखकर आश्चर्य का होना ऐसा ही है। अधिक लोगों के पास जो योग्यताएँ नहीं है उन्हें किसी खास व्यक्तियों में देखकर विचित्रता प्रतीत होती है। चमत्कारों को देखकर हम अचम्भा करते हैं तो भी वास्तव में स्वतः उनमें अचम्भे की कोई बात नहीं है।
मनुष्य अनन्त शक्तियों का महाभण्डार है, उसके अन्दर ऐसी महान सत्ताएँ सन्निहित हैं, जिनके एक-एक कण द्वारा एक-एक जड़ जगत का निर्माण हो सकता है। जितना बल उसके अन्दर मौजूद है, उसका लाखवाँ भाग भी अपने प्रयोग में प्रायः नहीं ला पाता है। इस छिपे हुए महाभण्डार में अगणित, अतुलित रत्न राशि छिपी पड़ी है, जो कोई जितना कुछ उसमें से निकाल लेता है वह उतना ही धनी बन जाता है। परमात्मा का अमर राजकुमार अपने पिता की सम्पूर्ण शक्तियों का सच्चा उत्तराधिकारी है। इच्छा और प्रयत्न करते ही सब कुछ उसे मिल सकता है। कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसे वह अपने पिता के खजाने से पा न सके। जितनी सिद्धियाँ अब तक सुनी या देखी गई हैं वे सब बहुत थोड़ी है। अभी इनसे भी अनेक गुनी, अनन्त गुनी तो वे छिपी ही पड़ी है। जब मनुष्य विकसित होते-होते परमात्मा को ही प्राप्त कर सकता है, स्वयं परमात्मा बन सकता है, तो उन सब महानताओं और शक्तियों को भी पा सकता है, जो परमात्मा के हाथ में हैं। परमात्मा की इच्छा से हर एक असम्भव बात सम्भव हो सकती है फिर परमात्मा की स्थिति में पहुँचा हुआ मनुष्य भी वैसा ही असम्भव को सम्भव करके दिखा देने वाला हो सकता है। सिद्धियाँ असम्भव हैं, ऐसा कहना भ्रम मूलक है। एक से एक आश्चर्य जनक चमत्कारी कार्य मनुष्यों द्वारा हुए हैं, हो रहे हैं और आगे होंगे। हमारी क्षमताओं की सम्भावना इतनी ऊँची है कि साधारण बुद्धि से उसकी कल्पना करना भी कठिन है। हर एक असम्भव बात मानव प्रयत्न के द्वारा सम्भव हुई है और हों सकती हैं।
जलते हुए अंगार के ऊपर जब राख जमा हो जाती है तो वह राख से ढका हुआ अंगार बाहर से छूने पर गरम नहीं मालूम पड़ता। किन्तु जैसे-जैसे उस राख को हटाया जाता है वैसे ही वैसे गर्मी बढ़ने लगती है जब वह पूर्ण रूप से हट जाती है तो अंगार इतना गरम निकल जाता है कि उसे छूना कठिन होता है। एक जलती हुई बिजली की बत्ती को कपड़े के अनेक पर्तों से ढक दिया जाय तो उसका प्रकाश कपड़ों से बाहर न आ सकेगा। किन्तु जैसे उन पर्तों को हटाते जाते हैं वैसे ही वैसे प्रकाश बढ़ता जाता है जब सारे पर्त अलग हो जाते हैं तो स्वच्छ बिजली की बत्ती निकल आती है और उसके प्रकाश से चारों ओर जगमग होने लगता है। जलाने वाला अंगार वही था उसके अन्दर दाहक शक्ति सदा से मौजूद थी परन्तु राख ने उसे ढक दिया था बिजली की बत्ती वैसी ही जल रही थी परन्तु कपड़े के पर्तों से ढके होने से प्रकाश बन्द था। यही बात मनुष्य की है वह अनेक शक्तियों का भण्डार है किन्तु दुर्वासना, दुर्भावना, कुविचार, भोग, लिप्सा, अनीति आदि आवरणों के पर्तों से वे ढक जाती है। यह पर्त इतनी अधिक मात्रा में जमा हो जाते हैं कि मनुष्य एक बहुता ही तुच्छ, निर्बल, असहाय बेबस, और दीन-हीन प्राणी मात्र रह जाता है पशु-पक्षियों और कीट पतंगों की अपेक्षा भी उसका बल साहस और सुख कम रह जाता है। तरह-तरह के कष्टों से रोता-कलपता रहता है, अपने छोटे-मोटे दुख दरिद्रों को भी वह हटा नहीं पाता। ऐसी पतित अवस्था में पड़ा हुआ जीव यदि आध्यात्मिक सिद्धि को देखकर हैरत में पड़ जाता है और उसके अस्तित्व पर अविश्वास करने लगता है तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।
जब हम अपनी कुवासना और दुर्भावनाओं को हटाकर सद्वृत्तियों और सद्भावनाओं को निखारते हैं तो आत्म तेज निर्मल होकर अपनी अनन्त महत्ताओं को प्रकट करने लगता है। यह प्राकट्य ही सिद्धि है। पतंजलि योग सूत्र जिन्होंने पढ़ा है वह जानते है कि यम-नियम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) यह सिद्धियों के मूल स्रोत हैं। अहिंसा पालन करने से, उसके समीप पहुँचने वाले आपस का वैर-भाव भूल जाते हैं गाय सिंह पास बैठी रहती हैं। सत्य का पालन करने से वाणी सत्य होती है जो .................. वरदान दिया जाय सफल होता है। अस्तेय का पालन करने से सब रत्नों की प्राप्ति होती है, लक्ष्मी की कमी नहीं रहती, अपरिग्रह से पूर्व जन्मों का हाल मालूम होता है। तप से शरीर हलका और दूर-दृष्टि मिलती है यदि। पतंजलि के इस कथन पर गम्भीरता पूर्वक विचार करने से प्रतीत होता है कि यह सिद्धियाँ बाहर से प्राप्त नहीं होती। कोई पुरस्कार की तरह इन्हें प्रदान नहीं करता वरन् यह सब अपनी आन्तरिक योग्यताओं का निखार मात्र है। हिंसा, असत्य, चोरी, व्यभिचार, लोभ, मलीनता, तृष्णा, आलस्य, अविद्या, नास्तिकता आदि दुर्गुणों के कारण भीतर की दिव्य शक्तियाँ निर्बल, कुंठित और नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं। जैसे-जैसे इन कमजोरियों को हटाकर हम अपनी स्वाभाविक, सात्विक अवस्था की ओर चलते हैं। वैसे-वैसे हम सफल विजयी, समृद्ध, सिद्ध और महान् बनते जाते है।
व्यक्ति धर्मोपदेशक हों अथवा विद्वान्-मनीषी वह अपने आपको कितना तपा सका, इस पर उसकी आन्तरिक वरिष्ठता निर्भर है।
सन्त राबिया जंगल में तप कर रही थीं। पशु-पक्षी उसके इर्द-गिर्द बैठे हँस-खेल रहे थे।
हसन उधर से निकले, उन्हें भी पहुँचा हुआ सन्त माना जाता था।
हसन जैसे ही राबिया के नजदीक पहुँचे, सारे पशु-पक्षी उन्हें देखते ही भाग खड़े हुए।
उन्हें अचम्भा हुआ और राबिया से पूछा-जानवर परिन्दे तुमसे लिपटे रहते है और मुझे देखकर भागते है, इसकी वजह?
राबिया ने पूछा-आप खाते क्या है?
हसन ने कहा-आमतौर से गोश्त ही खाने को मिलता है।
राबिया हँस पड़ी। लोग आपको जो भी समझे उनकी मर्जी। पर आपका दिल कैसा है, उसे यह नासमझ जानवर अच्छी तरह जानते है।
किसी स्कूल या पाठशाला में क्रमबद्ध और नियोजित रूप से जिन्हें कहीं शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला, परन्तु जिन्होंने अपनी प्रखर-शक्ति के माध्यम से समूचे फ्राँस को एक नयी जीवन दृष्टि दी और सम्पूर्ण राज्यशासन को उलटने के लिये विप्लवी भूमिका तैयार की-उन महान विचारक रूसो से किसी ने एक बार पूछा- “अपने किस स्कूल में शिक्षा प्राप्त की?”
स्कूल के तो कभी दर्शन नहीं किये थे, परन्तु शिक्षा तो अवश्य प्राप्त की थी, तभी तो अपने प्रखर विचारों द्वारा आज फ्राँसीसी शासन और ढर्रे-बन्द समाज व्यवस्था की जड़ें खोदने में एक सीमा तक वे सफल हुये और शिक्षा तो किसी पाठशालाओं में ही प्राप्त की जाती हैं किसी पाठशाला का नाम ले रूसो को यह सोचते देर न लगी और जितना संक्षिप्त प्रश्नकर्ता का प्रश्न था उतना ही संक्षिप्त उत्तर था उत्तर दाता का “विपत्ति को पाठशाला में।”
विपत्ति बहुत बड़ी पाठशाला है यदि वहाँ कोई सीखने के लिये जाय। परन्तु अधिकाँश व्यक्ति तो उस पाठशाला के नाम से ही डरते है। अन्य पाठशालाएँ तो ऐसी है कि वहाँ शिक्षा प्राप्त करने के लिये भर्ती होने जाना पड़ता है। आवेदन पत्र देने से लेकर कई एक प्रक्रियायें पूरी करनी पड़ती हैं तब कहीं जा कर प्रवेश प्राप्त होता है। महाविद्यालयों और उच्च कक्षाओं में प्रवेश प्राप्त कर सकना तो आजकल एक समस्या जैसा हो गया है। कई व्यक्तियों को इन कक्षाओं में प्रवेश की आकांक्षा से निराश होकर भी लौटना पड़ता है। कदाचित् जिस उत्साह से छात्र विद्यालयों और पाठशालाओं में भर्ती होने के लिये प्रयत्न करते हैं उसका एक अंश भी इस बिना बुलाई और नित्य खली रहने वाली पाठशाला में अनुग्रह पूर्वक वह समय व्यक्ति करें तो जीवन धन्य बन सकता है।
यहाँ कहा यह नहीं जा रहा है कि शिक्षण संस्थाएँ और विद्यालय, शालायें व्यर्थ है। वे उपयोगी है और उनका महत्व है तथा विद्यार्थी जीवन की अपनी एक गरिमा महिमा है। वहाँ बैठकर सरस्वती माँ का आराधना तो करनी ही चाहिए परन्तु अयाचित आने वाली विपत्तियों का भी उत्साह पूर्वक स्वागत करना चाहिए क्यों कि सीखने के लिए हमें वे बहुत कुछ देती है और सिखाने के लिए ऐसी महत्वपूर्ण शिक्षायें अपने साथ लेकर आती है कि कदाचित् उन्हें कोई सीख सके तो सुविधाओं और सम्पन्नता की परिस्थितियाँ न भी रहते हुए अपने व्यक्तित्व को सफल बना सकती हैं।
परन्तु प्रायः लोग विपत्तियों के आने पर या तो रोने घबड़ाने लगते हैं अथवा उनसे पलायन की बात सोचने लगते हैं। विपत्तियाँ न तो रोने के लिये हैं और न जीवन से पलायन कर जाने के लिये। जो लोग उनका उद्देश्य और प्रयोजन न समझ कर कलपने लगते हैं वे उस दब्बू छात्र की तरह हैं जो कक्षा में दिये गये पाठ को पूरा करने से घबराता हैं और सुनने से ऊब जाता हैं। ऐसे छात्र की न तो कोई प्रगति हो पाती हैं और न मानसिक विकास। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिये फिर या तो वह अनुचित साधन अपनायेगा अथवा असफल हो जायेगा। उसी प्रकार विपत्ति रूपी पाठशाला में विपदाओं के पाठ से जी चुराने वाला, घबड़ाने वाला व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से पिछड़ जाता है। जब वे पाठ बीत जाते हैं और आगे का जीवन क्रम चलाने की बात आती है तो चोरी, बेईमानी, झूठ, फरेब और रिश्वत, शोषण जैसे अनुचित कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है। दूसरी सम्भावना अनुत्तीर्ण होने की है। वह पाता है कि जीवनरूपी गाड़ी चलाने में अब असमर्थ हूँ जो जीवन से पलायन कर लिया जाय। आत्महत्या, गृहत्याग और स्वजन परिजनों से विश्वासघात आदि इसी सम्भावना के अंग है।
प्रतिभावान छात्र के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग और असफलता की सम्भावना दोनों ही बातें असम्भव हैं। परिश्रम, अध्यवसाय, लगन और संघर्ष की भावना से ज्ञान साधना में प्रवृत्त होकर वह अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो ही जाएगा अथवा उत्तीर्ण तो होगा ही। उसी प्रकार मनस्वी, श्रमशील और पुरुषार्थी व्यक्ति विपत्ति रूपी पाठशाला में पढ़ कर स्वयं को सफल और धन्य भी बना लेंगे तथा अन्य औरों के लिए भी ऐसा अनुकरणीय आदर्श उपस्थित कर जायेंगे जिसके प्रकाश में अन्य लोग भी चलते रहें।
कहा यह जाता है कि ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता अपने आप करते है। यदि ईश्वरीय कृपा का सहारा लेना है तो इस मन्त्र को जीवन में गाँठ बाँधकर रखना होगा। वह व्यक्ति जो अपने स्वयं के कार्य के लिये दूसरों का मुँह ताकता है एक सामाजिक अपराधी है। इससे बड़ा सामाजिक अपराध क्या होगा कि स्वयं तो निष्क्रिय बना ही बैठा है और दूसरों से अवलम्बन की आशा लगाकर उसके कर्तव्य वहन पर भी रोड़ा बन रहा है। अतएव पराधीनता के पाप से बचने के लिए हमें निज की क्षमता एवं निज के साधनों का उपयोग करना चाहिए।
बहुत से लोग परिस्थितियों का रोना लेकर बैठ जाते है और अपनी कार्य करने की असमर्थता जताने लगते है। यह अनुचित है। परिस्थितियाँ ही अनुकूल हो गयी और हमने अपनी कर्तव्य पूरे कर लिए तो इसमें किसी वाहवाही की बात नहीं है। परिस्थितियाँ तो सदैव प्रतिकूल ही रही हैं। मनुष्य ने मनः स्थिति को परिस्थितियों के अनुरूप ढाला है। तब परिस्थितियों का सामना किया है। हमारा इतिहास बताता है कि जितने भी महापुरुष हुए है सब ने अपने जमाने की तकलीफों पर पुरुषार्थ एवं पराक्रम से पार पाया है। और यशस्वी कीर्तिमान स्थापित किये है। यदि परिस्थितियाँ किसी को रोक पायी होती तो आज तक जितने श्रेष्ठकर होंगे कभी भी सम्भव नहीं हो पाते मनुष्य के जीवन में विपरीतता एवं विरोधाभास उसकी कर्तव्य निष्ठा एवं लगनशीलता की परीक्षा लेने आते है। उसको कर्तव्य पथ से च्युत करने के लिए नहीं यह तो वे ही निबल प्रकृति के लोग है जो इन्हें देखकर भयातुर हो जाते है और अपने पथ से डिग जाते हैं। इस संसार में तीन प्रकार के ही व्यक्ति है इसका चित्रण इस श्लोक में नीचे किया है-
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहिताः विरमन्तिमध्याः। विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः। प्रारभ्य चोत्तमजनः न परित्यजन्ति॥
तात्पर्य यह कि “मनुष्य की श्रेणी का निर्धारण उसकी कर्तव्य निष्ठा से होता है। यदि वह किसी कार्य को भयवश प्रारम्भ ही न करें तो उसे हम अधम नहीं तो क्या कहेंगे। उत्तम व्यक्ति तो वे होते है जो विघ्नों के पुनः आने पर भी प्रारम्भ किये हुए कार्य को अंत तक निभाते है।”
जो व्यक्ति कर्तव्य पर विश्वास रखता होगा वह आत्म निर्भर होगा तथा आत्मविश्वासी भी होगा। आत्मविश्वासी व्यक्ति को विपत्तियाँ कभी परास्त नहीं कर सकतीं। ऐसे व्यक्ति प्रायः ऊँची-ऊँची कल्पनाएँ नहीं करते है। प्रायः अपने साधनों के अनुरूप ही कार्य को हाथ में लेते है। क्योंकि वे जानते होते है कि कार्य को उन्हें स्वयं के साधन एवं शक्ति से पूरा करना हैं दूसरों से सहायता की बात तो वे सोचते भी नहीं है। दूसरे को इतनी फुरसत कहा है कि वह अपनी कार्य छोड़कर किसी की सहायता करने दौड़ेगा। यदि कुछ करेगा भी तो उससे सहायतार्थी की आवश्यकता का निराकरण बिलकुल ही नहीं हो पायेगा। सफलता तो मनुष्य अपने सहारे ही पा सकता है दूसरों की सहायता पर आधारित तानों–बानों से कहीं भी महल नहीं बने देखे गये।
इसके विपरीत पराधीन एवं परावलम्बी व्यक्ति हमेशा दूसरों के आश्वासनों पर एवं दूसरे की कृपा पर जीवन के बड़े-बड़े लक्ष्य निर्धारित करते हैं। इससे इस व्यक्ति के जीवन में एक सबसे बड़ी दुर्बलता घर कर लेती है कि उसे संसार में सारे व्यक्ति अधिक पुरुषार्थी एवं शक्तिवान नजर आने लगते हैं। ऐसे लोगों को वह अपना मित्र मान बैठता है पर वस्तुस्थिति कुछ और ही होती है। जिन्हें वह अपना सहायक या मित्र समझता है वे तो अपने कर्तव्य को पूरा करने में ही इतना व्यस्त रहते हैं कि उन्हें इसकी याद भी आती होगी इसमें पूर्ण संशय है।
यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि परावलम्बी व्यक्ति निज के पौरुष एवं शक्ति पर तो विश्वास करता नहीं और दूसरों के सहारे किसी कार्य की भूमिका बना लेता है। दूसरों के प्रति गहरी निष्ठा जमा लेता है कि वे लोग उसके कार्य में सहायक बनेंगे।
इस जगह यदि अन्य व्यक्ति सहयोग का अनुदान एक परावलम्बी व्यक्ति को नहीं देते तो उसे उचित ही ठहराया जाना चाहिये। वे स्वयं आत्म निर्भरता के श्रम से जुटकर अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर सकने में समर्थ होते है। यदि वे अपनी शक्ति एवं साधन ऐसे काहिल व्यक्तियों की सहायता में लगा देंगे तो उनके उद्देश्यों को कौन पूरा करेगा। यहाँ पर उनका स्वार्थ निन्दा की वस्तु नहीं ही कहा जाना चाहिये। संसार में सभी के कुछ न कुछ उत्तरदायित्वों को पूरा करेगा इसके बाद सेवा परोपकार की बात सोचेगा। जो व्यक्ति अपना ही कर्तव्य पालन नहीं कर पाया है वह दूसरों की सहायता कहाँ तक कर सकता है? यह बात विश्वसनीय नहीं है दूसरे का सहारा लेना भीख माँगने के बराबर है। अपने आत्म गौरव को भुलाकर जो व्यक्ति दूसरे के सामने दवा की भीख माँगता है वह वस्तुतः पुरुष कहलाने का अधिकारी नहीं है। ऐसे कायर व्यक्ति जीवन भर चाटुकारिता करते हैं और दरिद्रता तथा हीन भावना से ग्रसित रहते हैं। इन्हें वहीं मयस्सर हो पाता है जो लोगों की आवश्यकता पूर्ण होने के बाद जूठन के रूप में बचा होता है।
प्रायः देखने में आया कि समाज के कतिपय गणमान्य एवं धनी कहे जाने वाले व्यक्ति भी परावलम्बन के शिकार होते हैं। यह उनका प्रमाद ही कहा जायेगा कि स्वयं के घर के कार्यों को भी वे कर्मचारियों के भरोसे छोड़ देते हैं। इसके परिणाम तो कभी-कभी बहुत दुखदायी होते हैं। बड़े-बड़े सेठ अपने मुनीमों के वश में इसलिये रहते हैं क्योंकि उनमें कार्य कुशलता एवं वाक्पटुता का वह अपेक्षित ज्ञान नहीं होता है जिसकी कि आज व्यापार जगत में आवश्यकता है। इसी तरह शासन में कई उच्च अधिकारी स्वयं निर्णय लेने की असमर्थता के कारण अपने आधीन कर्मचारियों के आश्रित रहते हैं। इससे उनकी स्वतंत्र सत्ता हमेशा खतरे में पड़ी रहती है। पर निर्भरता तो एक कमजोरी है। इस कमजोरी को यदि अपने से नीचे वाला जान लेता है तो हमेशा अनुचित लाभ लेने की ताक में रहता है।
परावलम्बी व्यक्ति के पास न अपना विवेक होता है न अपनी बुद्धि। इसलिये किसी भी आपातकालीन स्थिति में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता उसमें नहीं होती है। जब आत्म निर्णय का गुण नष्ट हो जाता है तो पराधीन व्यक्ति दीन हीन की तरह दिखाई देता है। महारानी कैकेयी का उदाहरण हमारे सामने है। उसने एक महारानी होते हुए दासी मन्थरा की कुबुद्धि का सहारा लिया। विवेक एवं चातुर्य के अभाव के कारण ही महारानी कैकेयी को कितना दारुण दुख सहन पड़ा था। यह सामाजिक परावलम्बन नहीं तो और क्या था?
गोस्वामी जी ने ठीक ही कहा है-
“विपत्ति बीज वर्षा ऋतु केरी भुँई भई बुद्धि कैकेई चेरी”
दासी की बुद्धि के ऊपर की निर्भरता ने कितना विश्वास घाती परिणाम उत्पन्न किया? इसका सहज अन्दाज हम गोस्वामी जी के उपर्युक्त अंश से समझ सकते हैं।
अन्त में यह कहा जा सकता है कि जीवन को समृद्ध, निष्कलंक एवं पूर्ण बनाने के लिये हमें परावलम्बी नहीं होना चाहिए। पराश्रितता को त्यागकर देवीय जीवन जीने के लिये अग्रसर होना चाहिये। क्योंकि गोस्वामी तुलसीदासजी ने ठीक ही कहा है कि- “ पराधीन सपनेहु सुख नाहिं। “ "
बाक्स में- एक गिद्ध था। उसके माता-पिता अंधे थे। सारा परिवार पर्वत की एक कोटर में रहता था। गिद्ध रोज सूर्योदय पर निकल जाता, अपना पेट भरता और अपने अन्धे बूढ़े माता-पिता के लिए भी खोज-खोज कर माँस के टुकड़े लाता था। कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा। किन्तु ‘सब दिन नाहिं बराबर जात।’ एक दिन नदी के किनारे बहेलिये ने जाल डाला और गिद्ध आकर उसमें फँस गया। वह तड़फड़ाया, मगर उसकी सब कोशिशें बेकार रहीं। गिद्ध को अपने जाल में फँस जाने का सन्ताप इतना नहीं था, जितना उसे अपने माता-पिता के भूखों मर जाने का भय था। वह जोर-जोर से विलाप करने लगा। बहेलिये का ध्यान उधर गया। उसने गिद्ध के पास जाकर पूछा कि वह क्यों परेशान है? दूसरे गिद्ध तो रोते नहीं हैं वह अकेला ही क्यों जमीन-आसमान एक कर रहा है? गिद्ध ने अपनी व्यथा कही। बहेलिये ने ताना-मारा “ रे गिद्ध, तेरी बात मेरी समझ में नहीं आयी है। गिद्धों की दृष्टि तो इतनी तेज होती है कि वे सौ योजन ऊपर आसमान से भी मुर्दा चीजों को देख लेती है, लेकिन तू तो निकट बिछे जाल को ही नहीं देख पाया है, ऐसा गज़ब कैसे हो गया?” इस पर गिद्ध बोला- “ बहेलिये, बुद्धि की लगाम जब तक अपने हाथ में रहती है, तब तक मनुष्य प्रपंच में नहीं फँसता। किन्तु जब बुद्धि पर लोभ का अधिकार हो जाता है, तो थोड़ा रास्ता भूल जाता है और अपने साथ सवार को भी ले डूबता है। जीवन भर माँस पिण्ड के पीछे ही भागते-भागते मेरी नजर में माँस पिण्ड ही सर्वस्व बन गये हैं। उनके सिवाय मुझे और कुछ दिखलायी ही नहीं पड़ता है। दृष्टि जब इतनी सँकरी हो जाती है, तो सही रास्ता भी लुप्त हो जाता है। मेरे जाल को नहीं देख सकने का कारण यहीं है। लेकिन अब ज्ञान का उदय होने से क्या होगा? किये का फल भोगना ही पड़ेगा। “ बहेलिये को गिद्ध की बात भायी। उसने प्रसन्न होकर कहा- “ गिद्ध राज, जाओ! मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ। अपने अन्धे माता-पिता की सेवा करो। तुमने आज मेरी भी आँखें खोल दीं।
ठीक यही भूल मनुष्य अपने जीवन में करता है। जो पहले ही सँभल जाता है, वह जीते जी अपने दायित्वों से मुक्त हो जाता है।
यह भी कोई बात हुई कि अपने-अपने बारे में सोचना-देखना ही छोड़ ----- सोचिए यदि किसी का सहारा आपको अनुचित प्रतीत होता है तो यह मानने के पहले कि सारा --- उसी का है आप अपने बारे में ---- कर लें। इस तरह दूसरों ---- करने का आधा कारण ---- आप खत्म हो जाएगा। कई --- होता है कि किसी की ---- भूल या अस्त-व्यस्तता पर ----- पूर्वक कुछ उपहास कर देते ---- इससे तो सामने वाले व्यक्ति ----- पर चोट लगना ---- अपनी प्रशंसा सबको प्यारी लगती है। कोई नहीं चाहता कि --- लोग उसका उपहास करें, --- अब यदि आपके -----व्यवहार के कारण यदि औरों ----- कटुता या तिरस्कार --- तो उस अकेले का ही दोष ---- की भावना बनाने के ---- अपना भी दोष दर्शन कर ---- तो अकारण उत्पन्न होने --- झगड़े क्यों हों?
अगर किसी को अपनी बात समझानी ही है अथवा यह पूरी तरह से --- लिया गया है कि अमुक कार्य में इस व्यक्ति का हित है, तो भी अशिष्ट या --- व्यवहार का आश्रय लेना ठीक ---- वह व्यक्ति आपके तर्क या ----- नहीं मानता तो आप उसे --- मूर्ख या दुष्ट समझने लगते हैं --------- ही ऐसा कुछ कह या ----- जो उसे बुरा लगे। इससे ----को चोट लगती है --------- प्रतिक्रिया भी कटु होती है ------ की ही सम्भावना अधिक --------
इसी बात को स्नेह और --- पूर्वक कहें तो सम्बन्ध भी --- रहते हैं और बात भी मान -- है। ऐसे समय किन्हीं व्यक्तियों या घटनाओं के उदाहरण प्रस्तुत करें तो प्रभाव और भी परिपुष्ट होगा, लेकिन यह ध्यान बना रहे कि बात पूर्ण आत्मीयता से कहीं जा रही है। इतने पर भी शत-प्रतिशत यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि वह आपकी बात मान ही ले, क्योंकि उसकी अपनी धारणा भी तो किसी आधार पर टिकी होती है। उसके सिद्धान्त में बल है अथवा नहीं-यह अलग बात है। बात सिर्फ मान्यता की है। ऐसे समय उसे दुष्ट मानने की अपेक्षा यह देखना अधिक श्रेयस्कर है कि उसके ज्ञान या अनुभव में कमी है, या उसे प्रभावित करवाने की क्षमता का आप में अभाव है। इस प्रकार के विचार से आप उत्तेजित भी नहीं होते, क्रोध भी नहीं आता और प्रतिशोध या बदला लेने की भावना भी नहीं बनती। आपके सम्बन्ध भी ज्यों के त्यों बने रहते हैं। उनमें भी किसी प्रकार का तनाव पैदा नहीं होता।
मनुष्य को सम्मान उसकी योग्यता, गुरुता, कार्य क्षमता और उपयोगिता के आधार पर मिलता है। पात्रता के अभाव में किसी को सम्मान मिलने की आशा नहीं बाँधनी चाहिए। अहंकारवश कई व्यक्ति पात्रता न होते हुए भी दूसरों से भारी सम्मान की आशा करते हैं और जब वह नहीं मिलता है तो दूसरों को दोष देने लगते हैं। उन्हें अपना विरोधी, शत्रु या ईर्ष्यालु मानने लगते हैं। कई व्यक्ति इसी अहंकार वश अनावश्यक शेखी खोरी करते रहते हैं और जो उनसे सहमत नहीं होता उससे क्षुब्ध होते हैं। ऐसी झूठी शेखी जताने से आपका सम्मान गिर जाएगा और दूसरों से प्रतिष्ठा पाने की आपने जो आशा की थी, उससे भी वंचित बने रहेंगे।
यह भी देखिए कि ऐसी ही अपेक्षा दूसरे भी आपसे रखते हैं। जिस प्रकार आपको प्रशंसा प्रिय है, वैसे ही दूसरों को भी। आप दूसरों से सहयोग और सहानुभूति चाहते हैं वैसे ही आपके मित्र, बन्धु, पड़ोसी भी आपसे ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं। स्वयं औरों से सेवा लेकर दूसरों को अँगूठा दिखाने का संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने से आप औरों की नजर में गिर जाएँगे। यदि चाहते हैं कि आड़े वक्त आपकी कोई मदद करे तो औरों के दुःख में हाथ बँटाइए और सहानुभूति प्रकट कीजिए, औरों के साथ उदारता- पूर्वक व्यवहार करने से ही उनका हृदय जीत सकते हैं- सहयोग और सहानुभूति प्राप्त कर सकते हैं। इस संसार में सर्वत्र क्रिया की ही प्रतिक्रिया चलती है। “ दो तो मिलेगा” की ही नीति सच्ची और व्यावहारिक है।
मनीषी मैक्स जेमर अपने मनोवैज्ञानिक अध्ययन “ आबजर्ब योर ओन सेल्फ “ में बताते हैं कई बार ऐसा होता है कि कोई बात आप भूल जाते हैं। कोई बात आपकी स्मरण शक्ति से उतर जाती है। इसका दण्ड आप अपने घर वालों, बच्चों और प्रियजनों को देने लगते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप यह मान बैठते हैं कि मैंने बच्चे को अमुक वस्तु लाने के लिए कह दिया था, जबकि वस्तुतः आपने कहा ही नहीं था। यदा-कदा अस्पष्ट या अधूरे आदेशों को दूसरा ठीक प्रकार समझ नहीं पाता और आप यह समझ बैठते हैं कि हमारी अवज्ञा की गयी है। जिसे आदेश दिया था वह अपनी असमर्थता प्रकट करता है तो इसे उसकी गलती मानकर झिड़कते और भला-बुरा कहते हैं। भूल जाने की बात मानवीय है। आपकी ही तरह दूसरा भी मानसिक कमजोरी के कारण भूल कर सकता है। आप यही मान लें कि भूल हमसे या दूसरों से हो सकती है तो क्यों दुर्भाव पैदा करेंगे। मानसिक सन्तुलन बनाए रखने के लिए इस प्रकार करना ही अच्छा होता है।
मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो मोटिवेशन एण्ड पर्सनैल्टी” में कहते है कि गलतियाँ जल्दबाजी करने से भी होती हैं। इसलिए कोई समस्या आने से उस पर पूर्ण रूपी से विचार कर लेने के बाद ही कोई कदम उठाना अच्छा होता है। आप ढूँढ़े तो हर परेशानी का -------- कारण तो अपने में ही मिल ---- है। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि गलती हर बार आप ही करते हैं, सुचित रूप से किसी को अकारण -------- न मिले, इसलिए प्रत्येक अवस्था अपनी भूल ढूँढ़नी चाहिए। यह --- है कि दूसरा व्यक्ति भूल-भ्रम या ----- आपकी इच्छा पूरी न ----- सका हो। ऐसी दशा में उस पर ----- का आरोपण कर बैठना अन्याय -- कहा जाएगा। किसी के प्रति ---- पूर्ण धारणा बना लेने से बुरी --- उत्पन्न होती है। इसलिए --- पर दोषारोपण करने से पूर्व शान्त --- से यह देखना चाहिए कि आपकी ---या दूसरे की विवशता के कारण तो ऐसा अप्रिय प्रसंग नहीं बन पड़ा आपको क्षुब्ध बनाए हुए है।
जो लोग प्रत्येक कार्य में अपने ---- सर्वथा सही मानकर दूसरों को --- मानते हैं वे भूल करते हैं। इससे ---- दब जाती है और मनोमालिन्य झंझट बढ़ने लगते हैं। ---- ए. सी ब्लिस अपने ग्रन्थ- --- ऑफ बिहेवियर” में बताते हैं कि संसार के सभी व्यक्ति भिन्न-भिन्न व प्रकृति के होते हैं। दो सगे --- तक की आदतों में बड़ा अन्तर --- जा सकता है, फिर सभी आपकी --- मान्यता या अभिरुचि का --- करें ऐसा सम्भव नहीं। --- चावल पसन्द है, किसी को --प्रिय है। इतना अन्तर तो प्रायः ----- है। इस तथ्य को समझते हुए ---- दोषी ठहराने न ठहराने की ---- समाधान करने में अपने --- पिछली पंक्ति में खड़ा करना ---- समन्वय से काम चल जाय तो बात है, किन्तु कदाचित् ऐसा --- होता तो भी अपनी रुचि भिन्नता ---- में रखते हुए दूसरों की इच्छा सहन करनी चाहिए। दूसरों की इच्छा के लिए यदि आप अपनी अभिरुचि का दमन कर देते हैं तो सामने वाले पर आपकी इस सद्भावना का असर जरूर पड़ेगा। दूसरे क्षण वह आपकी इच्छाओं को प्राथमिकता देगा घरेलू वातावरण में सद्भावना का वातावरण बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि प्रत्येक वस्तु का चुनाव करते समय आप यह मान लीजिए कि इसके दोषी आप भी हो सकते हैं तो आए दिन होने वाले झगड़ों में से बहुत से तो स्वतः ही मिट जाएँगे।
प्रिय दर्शन मनुष्य का श्रेष्ठ गुण है। औरों में अच्छाइयाँ देखने से अपने सद्गुणों का विकास होता है। यह कहना कि दूसरे ही निरे दोषी हैं, अनुचित बात है। संसार में हर किसी में कोई न कोई सद्गुण जरूर होता है। किसी में सच्चाई अधिक है, कोई ईमानदार है, कोई अच्छा वक्ता है, कोई संगीतज्ञ है। आत्मीयता, उदारता, साहस, नैतिकता, श्रमशीलता जैसे सदाचारों में से कोई न कोई सम्पत्ति किसी के पास मिलेगी। इन्हें ढूँढ़ने का प्रयास करें, उनके सत्परिणामों पर ध्यान दें तो अपना भी जी करता है कि हम भी वैसा ही करे। आत्म विकास का क्रम यही है। स्वयं के व्यक्तित्व को श्रेष्ठतर, श्रेष्ठतम बनाने की पद्धति यही है कि छिद्रान्वेषण के स्वभाव को त्याग कर प्रत्येक व्यक्ति में जो अच्छाइयाँ दिखाई दें उनकी प्रशंसा करें और स्वयं भी वैसा ही बनने की कोशिश करें।
जिस तरह हम दूसरे व्यक्तियों के सद्गुणों से प्रेरणा लेते हैं, उसी प्रकार अपने दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ने और निकाल कर बाहर कर देने से आत्म शोधन की प्रक्रिया और भी तीव्र होती है। मनीषी बी. एफ. स्किनर अपने शोधग्रंथ “ बिहेवियरि पत्र” में कहते हैं कि हरेक की अपनी अलग-अलग कठिनाइयाँ होती हैं। हो सकता है कोई अधीर हो, कोई चिड़चिड़ा हो, कोई ईर्ष्यालु अथवा अर्थ-लोलुप हो। अब इन कठिनाइयों, विकारों की खोजबीन कर लें तो उन पर शान्तिपूर्वक नियन्त्रण का प्रयास ---- चाहिए। मान लीजिए ---------- चिड़चिड़ा पन अधिक है------- उत्तेजित हो जाता है -- समझता भी है पर यह ------- कि यह दोष उसके स्वभाव ------ है। यह उसके छूट------ ऐसी निराशा सर्वथा अनुपयुक्त----- मनुष्य चाहे तो अपने स्वभाव ------ प्रयत्न करके आसानी से ----- है। हमें अपना स्वभाव और ---- संघर्षमय न बनाकर ------ चाहिए। सड़क पर चलते हैं तो ----- चुभेंगे ही, लेकिन पैरों में जूते ------ से चलते रहने की क्रिया में ------ नहीं पड़ता और आत्म रक्षा ----- जाती है। इसी प्रकार चिड़चिड़ा ------- प्रतिद्वन्द्वी मनोभाव धैर्य और ------ को अपना लेने से भी ------ से रक्षा की जा सकती है।
दूसरों को उजड्ड ------- बताने की अपेक्षा यह अच्छा है----- आप स्वयं अपने आपको ही ------ बनाए। औरों में दोष देखने ------ करें। साथ ही अपनी ----- दूरदर्शिता, सहनशीलता जैसे ----- का विकास करते रहें। इस --- पूर्ण मार्ग पर चलने से ही यह ---कि दूसरे लोग आपका सम्मान करें----- आपकी बात मानें। ---- सहानुभूति का व्यवहार करे। ---- कोई व्यक्ति स्वेच्छा से बुरा नहीं ----- अतः मनुष्य को यह सोचने की ----- विचारों के अनुसार जो लोग ---- करते हैं वे हमें परेशान करने के ---- से ऐसा करते हैं। इस प्रकार --- कल्पनाओं से सावधान रहें ताकि ---- के साथ अन्याय न हो जाय। ---- कारण अपने स्वभाव की छोटी---- त्रुटियाँ भी हो सकती हैं। जिन्हें ---- नगण्य मानते रहे हैं। इसलिए दूसरों ------- सामञ्जस्य, सौहार्द, सौजन्यता, ---- आत्मीयता बनाए रखने के लिए ---- उचित है कि जब भी कोई ---- परिस्थिति उठती दिखाई -----7 दोषों को देख लिया करे,---- में सोच लिया करें।
पानी और नदियों में भी बहता है, फिर गंगाजल ही क्यों? आजकल के बौद्धिक एवं तर्क प्रवण जमाने में इस तरह के अनगिनत सवाल उठना कोई अचरज की बात नहीं है। इन दिनों जब कि अधकचरी बौद्धिकता सदियों पुरानी श्रद्धा एवं आस्था को निगलती जा रही है, ऐसे समय में विदेशी वैज्ञानिकों, डॉक्टरों ने अपने श्रम साध्य प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर बताना शुरू कर दिया है कि ऋषियों की बातें कोरी गल्प नहीं हैं। उसके पीछे उनके दीर्घकालीन अनुभव सँजोये हैं।
अमेरिका के विश्वविख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन ने अपनी पुस्तक भारत यात्रा वृत्तांत में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. हेनकेन के एक प्रयोग का ब्योरेवार जिक्र किया है जो उन्होंने “ गंगाजल” पर किया था। प्रयोग के लिए उन्होंने जो जल लिया वह स्नानघाट वाराणसी के उस स्थान का था, जहाँ बनारस की गन्दगी गंगाजी में गिरती है। परीक्षण से पता चला कि उस जल में हैजा के लाखों कीटाणु भरे पड़े हैं। 6 घण्टे तक जल रखा गया, उसके बाद दुबारा जाँच की गई तो पाया कि अब उसमें एक भी कीड़ा नहीं हैं। उसी समय जब इस जल का प्रयोग किया जा रहा था, वह शव भी बाहर निकाल लिया गया, जाँचने पर पता चला कि उसके बगल के जल में भी हजारों हैजे के कीटाणु हैं, 6 घण्टे तक रखा रहने के बाद वे कीटाणु भी मृत पाए गए। यही कीटाणु निकाल कर एक दूसरे कुएँ के जल में दूसरे बर्तन में डाल कर रखे गए तो उसमें हैजे के कीटाणु अबाधगति से बढ़ते रहे। अद्भुत-आश्चर्य-आखिर क्या विशेषता है उसमें? गंगा जल के पाचक, कीटाणुनाशक, प्राण एवं शक्ति वर्धक गुणों की प्रशंसा सुनते-सुनते हिन्दू विश्वविद्यालय के तत्कालीन प्रवक्ता डॉ. एन. एन. गोडबोले ने सोचा क्यों न गंगाजल की रासायनिक परीक्षा करके देख ली जाए? लगातार अपने प्रयोगों से उन्हें जो निष्कर्ष प्राप्त हुए, उससे उनका मस्तक गंगा की पवित्रता के समक्ष नत हो गया।
इन निष्कर्ष का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि मुझे फिनायल यौगिकों की जीवाणु निरोधिता के परीक्षण का काम दिया गया था। तभी मुझे गंगा जल पर कुछ चिकित्सा सम्बन्धी शोध पत्र देखने को मिले जिनमें यह बताया गया था कि ऋषिकेश से लिए गए गंगाजल में कुछ ‘प्रोटेक्टिव कोलाइड’ होते हैं। ये ही उसकी पवित्रता को हद दर्जे तक बढ़ाते हैं। कोलाइड एक ऐसा तत्व है, जो पूरी तरह घुलता और ठोस भी नहीं रहता। शरीर में लार, रक्त आदि देहगत कोलाइड हैं। ऐसे ही कोलाइड गंगाजी के जल में भी पाए जाते हैं। जब उनकी शक्ति का ‘ रिडैलवाकर’ नामक यन्त्र से पता लगाया तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि गंगाजल जीवाणु की वृद्धि को रोकता ही नहीं, उन्हें मारता भी है। जाँच के लिए प्रयुक्त ‘रिडैलवाकर’ उपकरण की खोज रिडैल और वाकर नामक दो वैज्ञानिकों ने मिलकर की थी। जिस तरह परमाणुओं के भार को हाइड्रोजन परमाणु के सापेक्षित मान निकालते हैं, उसी तरह फीनोल से सापेक्षित जीवाणु निरोधिता निकालते हैं।
फ्राँस के डॉक्टर डी. हेरल ने गंगाजल पर किए गए इन प्रयोगों की चर्चा और प्रशंसा सुनी तो वे भारत आए और गंगाजल का वैज्ञानिक परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि इस जल में संक्रामक रोगों के कीटाणुओं को मारने की जबर्दस्त शक्ति है। उनके अनुसार आश्चर्य जनक बात तो ये है कि एक गिलास में किसी नदी या कुएँ का पानी लें जिसमें कोई भी कीटाणुनाशक तत्व न हो, तो गंगा जल में कृमिनाशक कीटाणुओं की संख्या बढ़ जाती है। इससे सिद्ध होता है कि गंगा जी में कोई ऐसा विशेष तत्व है जो किसी भी मिश्रण वाले जल को भी अपने समान बना लेता है। यही कारण है, 1557 मील लम्बी गंगाजी में घाघरा, यमुना, सोन, गण्डक और हजारों छोटी-बड़ी नदियाँ मिलती चली गयीं, तब भी गंगा सागर पर उसकी यह कृमिनाशक क्षमता अक्षुण्ण बनी रही। इसे उन्होंने ईश्वरीय चमत्कार की संज्ञा दी।
अपने गम्भीर प्रयोगों के दौरान वैज्ञानिक डी. हेरल ने पाया कि गंगा जल में जीवाणुओं को समाप्त करने वाला एक विशिष्ट जीवाणु ‘बैक्टिरियो फेज पाया जाता है। इसमें टी.बी. अतिसार, संग्रहणी, व्रूण, हैजा के जीवाणुओं को समूल समाप्त कर देने की आश्चर्य जनक शक्ति विद्यमान है। इस विशिष्ट जीवाणु के अलावा गंगाजी के जल में ऐसा अद्भुत रासायनिक मिश्रण है जो असाध्य बीमारियों के लिए कारगर सिद्ध होता है। इस औषधीय गुणों के कारण की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि वस्तुतः हिमालय के क्षेत्र में अति दुर्लभ औषधियाँ पायी जाती हैं वहाँ से निकलने के कारण यदि गंगा इन गुणों को अपने में समाहित कर लायी है तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
इसी के आधार पर उन्होंने गंगावतरण के पौराणिक कथानक की व्याख्या करते हुए कहा कि भारतीय ऋषियों-मुनियों की पद्धति प्रत्येक घटना को कलात्मक रीति से वर्णन करने की रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन दिनों अकाल-महामारी जैसी स्थिति आयी होगी। तब प्रजा को पुत्र के समान माना जाता था। बहुत सम्भव है, सगर के साठ हजार नागरिक पीड़ित हुए हों और तब उन्हें एक नहर की आवश्यकता हुई हो। पौराणिक कथन है कि गंगा जी के लिए सगर की तीन पीढ़ियों ने तप किया था। डॉ. हेरल के अनुसार ऋषियों ने तप का अर्थ आग में तपना नहीं बल्कि असम्भावित परिस्थितियों से संघर्ष को माना है। हिमालय की चट्टानों को काटकर गंगाजी को लाना एक कठिन कार्य था। उसके लिए सचमुच बड़े परिश्रम की आवश्यकता थी। डॉ. हेरल के अलावा कई अन्य पश्चिमी विशेषज्ञों की भी ऐसी धारणा है कि गंगा नदी नहीं नहर है और उसे कुछ विशेष स्थानों से जानबूझ कर लाया गया है।
हिमालय बहुमूल्य रसायनों और खनिजों का रहस्यमय स्रोत है। सर्पगंधा, चन्द्रवटी ऐसी अनेक जड़ी-बूटियाँ जो अन्यत्र दुर्लभ हैं, हिमालय में आज भी हैं। जो फूल संसार में दूसरे स्थानों पर उगाने पर भी नहीं उगते, उनकी वहाँ मीलों लम्बी घाटियाँ हैं। वहाँ से गुजरने के कारण यदि ये औषधीय चमत्कार गंगा जी में समा गए तो आश्चर्य क्या?
भगीरथ की प्रजा अकाल ग्रस्त ही न थी, अभिशाप ग्रस्त भी थी, अर्थात् वे लोग अनेक रोगों से पीड़ित होंगे। इसलिए गंगा जल को उन-उन स्थानों से लाने के लिए एक विशेष शोध कार्य सगर की तीन पीढ़ियों को करना पड़ा, जिनमें स्वास्थ्य वर्धक, कीटाणु नाशक और तेजोवर्धक तत्वों का बाहुल्य था। गंगाजी का भूगोल भी इस तथ्य का शतशः प्रतिपादन करता है।
प्राचीन काल में जब भारतवर्ष का अरब, मिश्र एवं योरोपीय देशों के साथ व्यापार चलता था, तब भी और इस युग में भी सब देशों के नाविक गंगा की गरिमा स्वीकार करते रहे हैं। डॉ. नेल्सन ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है कि गंगा का जो जल कलकत्ता से जहाजों में ले जाते हैं, वह लन्दन पहुँचने तक खराब नहीं होता। परन्तु थेम्स नदी का जो पानी लन्दन से जहाजों में भरा जाता है, बम्बई पहुँचने के पहले ही खराब हो जाता है।
तब जब कि जल को रासायनिक सम्मिश्रणों से शुद्ध रखने की जानकारी नहीं थी, तब पीने के पानी की बड़ी दिक्कत होती थी। खारी होने के कारण लोग समुद्र का पानी नहीं पी सकते थे। अपने साथ जो जल लाते वह कुछ ही दिन ठहरता था, जब कि समुद्री यात्राएँ महीनों लम्बी होती थीं। जाते समय वे लोग गंगाजी का बहुत जल भर ले जाते थे, बहुत दिनों तक रखा रहने पर भी उसमें किसी प्रकार के कीड़े नहीं पड़ते थे।
योरोपीय देशों में चर्टेल गायोन, सेण्ट नेक्टेयर, बार्बूले और मोन्टेडोरे की कुण्डों को अति पवित्र माना जाता है। फ्राँस के डॉ. मोनोद ने इन जलकुण्डों की वैज्ञानिक जाँच करके बताया कि सचमुच इन जल कुण्डों में कुछ ऐसे उपयोगी रसायन घुले हुए हैं जो डिप्थीरिया, दमा आदि बीमारियों में लाभकारी होते हैं। अपने इण्टेरियन लेक्चर में उन्होंने इन निष्कर्षों का विवरण दिया तो लोगों को उन मान्यताओं की वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ी। डॉ. मोनोद के अनुसार इन जलकुण्डों से हजारों गुना बढ़कर गुणकारी गंगाजल को यदि भारतीयों ने इसे श्रद्धास्पद माना, तो उस पर आक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।
डॉ. स्टीवेन्सन ने अपने ग्रन्थ, “ इण्डिया ए लैण्ड ऑफ मिरैकल्स” में इस तथ्य की चर्चा करते हुए कहा है कि गंगाजल के जो रासायनिक परीक्षण किए गए हैं, उनके निष्कर्षों पर यकायक वैज्ञानिक भी विश्वास नहीं कर पाते हैं, जो संसार की किसी नदी में नहीं हैं। चाहे वह अमेजन नदी हो अथवा मिसीसिपी और मिसौरी नदियाँ। यहाँ तक कि यमुना में भी वे तत्व उपलब्ध नहीं हैं, जो गंगा जी में बहुतायत से विद्यमान है। कई पश्चिमी वैज्ञानिकों ने यह कोशिश की कि इन तत्वों को उनके अपने देश की नदियों में विकसित किया जा सके, परन्तु वह सफल नहीं हो सके। डॉ. स्टीवेन्सन के मतानुसार- “ गंगा नदी भारतीयों के लिए परमात्मा द्वारा दिया गया ऐसा अनुदान है जिस पर अन्य देश के निवासी सिर्फ ललचा सकते हैं। उसे पाने की कोई तरकीब उनके पास नहीं है।
ऐसे विशिष्ट अनुदान का मूल्याँकन भारतवासियों की वर्तमान पीढ़ी ने क्या किया है? इसका विश्लेषण करने पर सिर शर्म से झुक जाता है। जो गंगा हम भारतीयों के जीवन-मरण के साथ जुड़ी हुई है, उसे यो प्रदूषित करते रहना, उन लाखों-करोड़ों लोगों की श्रद्धा और भावनाओं का अपमान है, जो अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण के अवसरों पर हजारों मील दूर से चलकर पहुँचते और स्नान करते हैं। उनकी इस श्रद्धा का आधार वह विज्ञान है, जिसे भारतीय तत्त्ववेत्ता आदि काल से जानते रहे हैं और आज का विज्ञान जिसकी अक्षरशः पुष्टि करता है।
आज हुई विजय के उपलक्ष्य में उल्लास का पर्व-मनाया जा रहा था। अहंकार और सत्ता के मद में चूर सैनिक अधिकारी घूम रहे थे। इसी बीच सम्राट ने महासेनापति को बुलाया। कुछ ही क्षणों के बाद वह सम्राट के शिविर में थे।
“ सेनापति। युद्ध बन्दी कितने हैं? “
“ सिर्फ एक।”
एक! अशोक के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। अपनी भृकुटियों में बल डालते हुए उसने पूछा- बाकी कलिंग के किशोर और वृद्ध?
उन्होंने भी तलवार उठा ली थी सम्राट!
उन्होंने भी?
“ हाँ “
“ तब तो अब कलिंग में महिलाएँ भर रह गयी होंगी।”
वह भी नहीं रहीं।”
क्यों?”
अन्तिम लड़ाई हमें उन्हीं से लड़नी पड़ी। “
ओह! कहकर वह किसी चिन्तन में डूब गया।
“अच्छा, युद्ध बन्दी को हाजिर करो। “
“जो आज्ञा।”
थोड़ी देर बाद एक लंगड़ा झुर्रीदार चेहरे वाला बूढ़ा सामने था। उसकी ओर देखते हुए सम्राट ने कुछ तीखे स्वर में कहा- तो तुम हो।
हाँ मैं ही हूँ - आपकी विजय का उपहार। बूढ़े के स्वरों में रोष था। विजय का उपहार और तुम-कहकर सम्राट हंस पड़ा। यानि कि मेरी वीरता का सामना कलिंग निवासी नहीं कर सके। क्यों सेनापति? कहकर उसे पास खड़े सेनापति की ओर देखा। वह चुप था।
‘वीरता नहीं क्रूरता कहिए’- बूढ़ा बोला पड़ा।
क्रूरता!
हाँ लाशों के लोभी वीर नहीं हुआ करते। कुत्ते, गिद्ध, स्यारों के चेहरों पर भी लाशों को देखकर प्रसन्नता नाच उठती है, पर उन्हें वीर नहीं कहा जा सकता।”
“ चुप रहो” ........... सम्राट जैसे चीख पड़ा।
“ कौन चुप रहे? नृशंस-अथवा वह जिसका रोम-रोम पीड़ा से चीत्कार कर रहा है।” बूढ़े ने विषैली हँसी हँसते हुए कहा। “ “अपनी क्रूरता को जाकर युद्ध भूमि में देखना वहाँ तुम जैसे कुछ और मिलेंगे।”
“ इस बूढ़े को यहाँ से हटाओ”- कहते हुए सम्राट के स्वर में पर्याप्त झल्लाहट थी। लेकिन इसका कोई असर उस बूढ़े पर नहीं पड़ा। उसने जाते-जाते कहा- “सताए हुओं के कष्ट हरने, उत्पीड़ितों के उत्पीड़न का दूर करने का नाम वीरता है। वीरों के लिए कहा गया है क्षविया व्यक्त जीवितः जो दूसरों के लिए स्वयं के जीवन का मोह भी त्याग दे। जो हँसती-खेलती जिन्दगियाँ बरबाद करे, व क्रूर है, उन्मादी है।” शिविर से बाहर ले जा रहे बूढ़े के ये स्वर अशोक के कानों में हथौड़े की तरह बजने लगे।
रात बेचैनी में कटी। वीरता और क्रूरता की व्याख्या उसके अन्तर को कचोटती रही। तो क्या वीर नहीं है? फिर वीरता के लिए किया गया यह सब कुछ? प्रश्न शून्य में विलीन हो गया, कोई उत्तर नहीं था।
सुबह उठते ही उसने कहा- ‘ उस बूढ़े को बुलाओ।’ सैनिक दौड़ पड़े। थोड़ी देर बाद वे फिर हाजिर थे, पर खाली हाथ, सिर झुकाए।
“ क्या हुआ?”
“ वह मर गया, सम्राट। “
अरे!
थोड़ी देर बाद सेनापति हाजिर हुए, उन्होंने बताया, राजवैद्य ने परीक्षा करके घोषित किया है कि असह्य मानसिक पीड़ा का आघात उसे सहन नहीं हुआ और उसने दम तोड़ दिया।
वह भी गया-अशोक बुदबुदाया।
अपराह्न में सम्राट अपने मन्त्रियों, सैनिकों, अधिकारियों के साथ युद्ध भूमि में थे। वहाँ थी सिर्फ लाशें, हाथी, घोड़े, आदमी, औरतों के कटे-छितराए अंग, जिन्हें कुत्ते, स्यार, गिद्ध इधर-उधर घसीट रहे थे और खुश हो रहे थे।
उसे रह-रह कर बूढ़े की बातें याद आने लगीं। किले के अन्दर घुसने पर मिला राख का ढेर। यानि कि उसने विजय किया है श्मशान को। अब वह किन पर शासन करेगा-लाशों के ढेर पर? उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सम्राट के अन्तराल में सोयी आत्म चेतना अँगड़ाइयाँ ले रही थीं।
वह शिविर में लौट आया। अब उसके मन में आज से सात-साल पहले के दृश्य घूम रहे थे। भाइयों के साथ लड़े गए भीषण युद्ध-नर संहार। विनाश ध्वंस-हँसते को रुलाना, जिंदे को मारना, मरे को कुचलना-यही किया था, उसने अब तक। यही था अब तक का उसका कर्तृत्व, जिसके बलबूते वह वीर कहलाने की डींग हाँकता आया था। पर अब........?
शिविर उखड़ रहे थे। वह मगध की ओर जा रहा था। पर मन में था परिवर्तन का संकल्प, क्रूरता को वीरता में बदलने का। न उसे बूढ़ा भूल रहा था और न कलिंग के लाखों लोगों का सर्वनाश। वह रक्त की प्रबल धारा हताहतों का आर्तनाद। अन्दर की बेचैनी की प्रबलता बढ़ती जा रही थी।
मगध पहुँच कर उसने आचार्य उपगुप्त को बुलवाया। आचार्य आए। उसका पहला प्रश्न था- “ वीरता और क्रूरता क्या है?” “ त्रास से घिरे लोगों को बचाने, उनको सुख पहुँचाने हेतु अपने जीवन तक के मोह को तिलाञ्जलि देकर जुट पड़ने का नाम वीरता है और क्रूरता ...........। “ उन्होंने सम्राट के चेहरे की ओर देखा। कुछ रुक कर कहना शुरू किया, “ बसी हुई बस्तियों को उजाड़ देना, खड़ी फसल में आग लगा देना, शोषण उत्पीड़न के चक्र चलाना, इसी का नाम क्रूरता है।”
कैसा साम्य है- उस बूढ़े के और इस आचार्य के कथन में अशोक ने मन ही मन सोचा।
“आचार्य! मैं वीर बन सकता हूँ। “ सम्राट के स्वरों में पश्चाताप का पुट था।
“ हाँ क्यों नहीं? “आचार्य की वाणी में मृदुलता थी।” पर किस तरह?” अब वाणी में उल्लास था। “ अन्दर के दिव्य भावों को जगाकर। इन्हें जीवन के सक्रिय क्षेत्र अर्थात् आचरण व व्यवहार में उतार कर। “
“ उदार आत्मीयता-अपनत्व का विस्तार फिर कोई पराया नहीं रह जाता। दूसरों की तकलीफें स्वयं को निष्क्रिय निठल्ला बने नहीं रहने देती। पैर उस और स्वयं बढ़ते, हाथ सेवा में जुटे बिना नहीं रहते ..... एक और चिन्ह भी है।”
“ वह क्या?” अब स्वरों में उत्सुकता थी।
“ स्वयं के जीवन का स्तर समाज के सामान्य नागरिक जैसा हुआ या नहीं? यदि मन के किसी कोने में अभी वैभव को पाने का लालच, सुविधा संवर्धन की आतुरता है, बड़प्पन जताने, रौब गाँठने की ललक है, तो समझना चाहिए कि भावों का स्रोत अभी खुला नहीं है। “
“ भावों का स्रोत खुले और अविरल बहता रहे, क्या इसके लिए कोई उपाय नहीं है?”
“ हाँ क्यों नहीं। “
“ क्या? “
“ स्वाध्याय और सत्संग। युगावतार भगवान तथागत के चिन्तन को पियो। जिन्होंने उनके चिन्तन के अनुरूप जीना शुरू किया है, उनका सत्संग करो। रोज न सही तो साप्ताहिक ही सही। ऐसे परिव्राजकों की आज बड़ी संख्या तैयार की जा रही है, जो घूम-घूम कर जनमानस को युग की भावधारा से अनुप्राणित करें। उनके मर्म को स्पर्श कर सम्वेदनाओं को उभारें। “
बत समझ में आ गयी। उसके उत्साह का पारावार न था। चण्ड अशोक के कदम अब अशोक महान की ओर बढ़ने लगे। उसने भली-भाँति जान लिया था, कि करुणा की दिव्यता महत्त्वाकाँक्षाओं की मलीनता दोनों परस्पर विरोधी हैं। जहाँ एक रहेगी वहाँ दूसरे का ठहरना टिकना बिलकुल असम्भव है।
अशोक की जाग्रत आत्मचेतना ने महत्त्वाकाँक्षा को ठोकर मारकर स्वयं के व्यक्तित्व से बाहर निकाल फेंका था। क्रूरता को तोड़-मरोड़ कर कूड़े के ढेर में डाल दिया और जुट गया शान्ति और सद्भाव की भावधारा बहाने में। साम्राज्य का संचालन ही नहीं व्यक्तित्व जीवन भी अब अपने परिवर्तित रूप में था। सभी के कहने-सुनने-मना करने के बाद भी उसने अपनी आवश्यकताओं को कम कर लिया। साम्राज्य का सबसे गरीब अधिकतर जिस तरह जीता था सम्राट उसी तरह जीने लगा, ऐतिहासिक विवरण के अनुसार उसकी कुल सम्पत्ति थी, एक चीवर और एक सुई, केशों के लिए एक छुरा, जल छानने के लिए एक छलनी और एक तूंबा जो उसका अभिन्न संगी बना। उसने एक शिलालेख में लिखवाया-” मैं सभी जनों के मंगल के लिए कार्य करूँगा। सभी के हित में मेरा हित है इससे मैं कभी विमुख न रहूँगा। जीवन की सफलता के लिए यही सूत्र है।”
व्यक्ति धर्मोपदेशक हों अथवा विद्वान-मनीषी वह अपने आपको कितना तपा सका, इस पर उसकी आन्तरिक वरिष्ठता निर्भर है।
सन्त राबिया जंगल में तप कर रही थी। पशु-पक्षी उसके इर्द-गिर्द बैठे हँस-खेल रहे थे। हसन उधर से निकले, उन्हें भी पहुँचा हुआ सन्त माना जाता था। हसन जैसे ही राबिया के नजदीक पहुँचे, सारे पशु-पक्षी उन्हें देखते ही भाग खड़े हुए।
उन्हें अचम्भा हुआ और राबिया से पूछा-जानवर परिन्दे तुमसे लिपटे रहते हैं और मुझे देखकर भागते हैं, इसकी वजह?
राबिया ने पूछा-आप खाते क्या हैं?
हसन ने कहा-आमतौर से गोश्त ही खाने को मिलता है। राबिया हँस पड़ी। लोग आपको जो भी समझें उनकी मर्जी। पर आपका दिल कैसा है, उसे यह नासमझ जानवर अच्छी तरह जानते हैं। संस्कारों में इसीलिए संयम पर अत्यधिक, विशेषकर आहार पर ध्यान दिये जाने की अपेक्षा की जाती है।
लोकसेवियों को कैसा होना चाहिए, कैसा उनका आचरण होना चाहिए, ताकि वे आदर्श लोक-नायक बन सकें, यह परमपूज्य गुरुदेव अपनी लेखनी के माध्यम से अपने जीवन काल में ही बड़ा स्पष्ट कर गए। आज जब अन्याय तंत्रों में पदों की आपाधापी, टाँग खींचने की केकड़ा वृत्ति ही दिखाई देती है व चारों ओर से निराशा ही निराशा नजर आती है, प्रस्तुत मार्गदर्शन हमें अध्यात्म तंत्र का मूल मर्म-कैसे संघ चलता है- सम्वेदना की धुरी पर चलने वाला तंत्र कैसे प्रगति करता चलता है-हम सबको सच्ची राह दिखाता है। हम विधेयात्मक ही सोचें, वही चिन्तन जीवन में भी उतरे एवं राष्ट्र ही नहीं, युग के निर्माण के श्रेयाधिकारी बनें, ऐसा गुरुदेव चाहते थे। वह इस आचार संहिता के परिपालन से ही संभव हो सकेगा। अगले दिनों वही सम्मान का अधिकारी बनेगा जो अधिकाधिक विनम्र व आदर्शों के परिपालन में प्रतिस्पर्धा करता देखा जाएगा।
युग शिल्पियों की समर्थता, वरिष्ठता, उनकी विद्या, बुद्धि, आयु, वंश आदि के आधार पर नहीं वरन् व्यक्तित्व की विशिष्टता के साथ अविच्छिन्न रूप से संबद्ध है। यह किस नियम अनुशासन पर निर्धारित है, इसके लिए एक आचार संहिता “ युग शिल्पियों के सप्त महाव्रत” नाम से (विगत अंक में ) प्रस्तुत की जा चुकी है। जो उसे जितनी गंभीरता से समझने का, जितनी तत्परता से अपनाने का प्रयत्न करेंगे, वे उसी अनुपात में युग पुरुष बनने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे, मूर्धन्य महामानव कहलायेंगे और अपनी आत्मिक विभूतियों से असंख्यों को अनुप्राणित करेंगे, अपने ढाँचे में ढालेंगे।
बड़ा, उससे बड़ा, सबसे बड़ा बनने की ललक इतनी मदान्ध हो जाती है कि न न्याय सूझता है, न औचित्य और न परिणाम, न मर्यादाओं का ध्यान रहता है और न नम्रता सधती है। बैल बनने की प्रतिस्पर्धा में एक मेढ़क अपने पेट में हवा भरता चला गया और अन्त में उदर कलेवर फट जाने पर बेमौत मरा। वह कहानी मनुष्यों पर लागू होती है। जितनी जल्दी बन पड़े, जितना अधिक बटोरना संभव हो उतना बिना प्रतीक्षा किए, बिना मूल्य चुकाये, किसी भी छल, छद्म से अपने लिए उपलब्ध कर लिया जाय। यही है सेवा मार्ग पर चलने वालों की दुर्गति बनाने वाली ललक, भावनात्मक अवगति। आश्चर्य होता है कि जब ख्याति की, पदवी की इतनी अधिक लिप्सा थी तो उसके लिए दूसरे सस्ते उपाय हथकण्डे हो सकते थे। सेवा का जटिल मार्ग क्यों चुना जाय? यदि चुन ही लिया गया तो सेवा की अभिन्न सहचरी नम्रता को भी साथ लेकर चलना था। सेवा धर्म के साथ शालीनता का समन्वय रहना चाहिए। लोकसेवी को निस्पृह एवं विनम्र होना चाहिए। इसी में उसकी गरिमा और उज्ज्वल भविष्य की संभावना है। जो बड़प्पन लूटने, साथियों की तुलना में अधिक चमकने, उछलने का प्रयत्न करेंगे वे औंधे मुँह गिरेंगे और अपने दाँत तोड़ लेंगे। साथी क्यों किसी का दर्प सहें, किसी के बड़े बनने पर अपनी हेठी क्यों स्वीकार करें?
सुन्द, उपसुन्द की कथा प्रसिद्ध है। एक सुन्दरी पर आसक्त होकर दोनों आपस में लड़ पड़े और मरकर समाप्त हो गए। मुगलों ने कई पीढ़ियों तक बाप की, भाइयों की छाती पर चढ़कर गद्दी हथियाई। मध्यकालीन सामंतों ने ऐसे कितने ही कुकृत्य किये जिनमें उत्तराधिकारी बालकों की हत्या करके स्वयं मात्र दरबारी होते हुए भी सिंहासनारूढ़ को बैठे। संस्थाओं के विघटन में यह पद लोलुपता ही प्रधान कारण रही है। कल परसों जनता पार्टी का विघटन होकर चुका है। उसमें व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षा का, पदलिप्सा का नग्न नृत्य साथ ही दुष्परिणाम हर किसी ने देखा है। कौरव पाण्डव चक्रवर्ती युधिष्ठिर के अनुशासन में न रहकर अपना स्वतन्त्र वर्चस्व चमकाने के लिए व्याकुल कौरवों ने वह अनीति अपनाई जो अन्ततः महाभारत के रूप में महा विनाश का कारण बनी। कृष्ण का यादव वंश कोई भूखा नंगा नहीं था, लेकिन उसका हर सदस्य अपनी विशिष्टता सिद्ध करने और अन्यों को गिराने के लिए सामूहिक आत्मघात की स्थिति तक जा पहुँचे। यही सब देखकर व्यास जी ने अकाट्य सिद्धान्त के रूप में लिखा था -
बहवः यत्र नेतारः बहवः मानकाँक्षिणः। सर्वे महत्वमिच्छन्ति, सदल अवसीदति॥
जहाँ बहुत लोग नेता बनें जहाँ बहुतों की महत्त्वाकाँक्षा, यश लिप्सा हो वह दल अन्ततः नष्ट होकर रहेगा।
युग शिल्पियों को समय रहते इस खतरे से बचना चाहिए। हममें से एक भी लोकेषणा-ग्रस्त बड़प्पन का महत्त्वाकाँक्षी न बनने पाए। जो युग शिल्पी विश्व विनाश को रोकने चले है, यदि वे महत्त्वाकाँक्षा अपनाकर साथियों को पीछे धकेलेंगे, अपना चेहरा चमकाने के लिए प्रतिद्वंद्विता खड़ी करेंगे तो अपने पैरों कुल्हाड़ी मारेंगे और इस मिशन को बदनाम नष्ट, भ्रष्ट करके रहेंगे, जिसकी नाव पर वे चढ़े हैं।
भगवान कृष्ण ने महाभारत के उपरान्त हुए राजसूर्य यज्ञ में आग्रह पूर्वक आगन्तुकों के पैर धोने का काम अपने जिम्मे लिया था और सज्जनोचित विनम्रता का परिचय दिया था। गाँधीजी काँग्रेस के पदाधिकारी नहीं रहे किन्तु फिर भी सबसे अधिक सेवा करने और मान पाने में समर्थ हुए। राम-भरत में से दोनों ने राज तिलक की गेंद दूसरे की ओर लुढ़काने में कोर कसर न रहने दी। चाणक्य झोपड़ी में रहते थे ताकि राजमद उनके ऊपर न चढ़े और किसी साथी के मन में प्रधान मन्त्री का ठाट-बाट देखकर वैसी ही ललक न उठे। राजा-जनक हल जोतते थे। बादशाह नसिरुद्दीन टोपी सीकर गुजारा करते थे। यह वे उदाहरण हैं जिनसे साथियों को अधिक विनम्र और संयमी बनने की प्रेरणा मिलती है। नहुष ने ऋषियों को पालकी में जोता और सर्प बनने का शाप ओढ़ने को विवश हुए। पेशवाओं के प्रधान न्यायाधीश राम शास्त्री की पत्नी जब राजमहल से बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण के उपहार लेकर वापस लौटी तो उनने दरवाजा बंद कर लिया और कहा ब्राह्मणों की पत्नी को अपरिग्रही आदर्श का पालन करना होगा अन्यथा विनम्रता की सम्पदा हाथ से चली जाएगी और हम लोग द्रोणाचार्य की तरह नौकर बनेंगे और कुछ भी करने के लिए तैयार होते रहेंगे।
युग शिल्पियों को राजकाजी लोगों की तरह बड़प्पन, ठाट-बाट वैभव की न तो चाह करनी चाहिए और न उसके लिए अपने पुनीत क्षेत्र में हाथ पैर पीट कर ईर्ष्या द्वेष का विष बोना चाहिए। जो जितना बड़ा हो वह उतना ही नम्र होकर रहे। अनुशासन वाले और योग्यता के अनुरूप वर्चस्व पाने का प्रयास न करे। मिशन में योग्यता का नहीं उस सज्जनता का महत्व है जिसके साथ नम्रता, निरहंकारिता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। हम में से कोई अहंकार प्रदर्शित न करे। छोटा बनकर रहे और अनुशासन पालने में अपना गौरव समझे। इस रीति-नीति का परित्याग करने वाले मान के भूखे व्यक्ति सृजन शिल्पी न बनें।
सिख धर्म के छठवें गुरु अर्जुनदेव संगत में जूठे बर्तन माँजने का काम करते थे। गुरु गद्दी के इच्छुकों में से सभी को अयोग्य ठहरा कर गुरु रामदास ने अपना उत्तराधिकारी अर्जुनदेव को इस आधार पर घोषित किया कि वे नम्रता, निस्पृहता और अनुशासन पालन में अग्रणी पाये गए। अध्यात्म क्षेत्र में वरिष्ठता, योग्यता के आधार पर नहीं आत्मिक सद्गुणों की अग्नि परीक्षा में जाँची जाती है। इस गुण श्रृंखला में निरहंकारिता को, विनयशीलता को अति महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सरकारी क्षेत्रों में योग्यता के आधार पर पदोन्नति होती और नौकरी बढ़ती है। वहीं मापदण्ड यदि अध्यात्म क्षेत्र में भी अपनाया गया तो फिर भावनाओं का कहीं भी कोई महत्व न रहेगा। महत्त्वाकाँक्षी लोग ही इस क्षेत्र पर भी अपना आधिपत्य जमाने के लिए योग्यता की दुहाई देने लगेंगे तब सदाशयता की कोई पूछ ही नहीं रहेंगी। संन्यास लेते समय अपने अब तक के वंश, यश, पद, गौरव, इतिहास का विस्मरण करना होता है। गुरु आश्रम एवं सम्प्रदाय का एक विनम्र सदस्य बनकर रहना पड़ता है। सेवा धर्म भी एक प्रकार से हल्की संन्यास परम्परा है। उसमें भूतकाल में अर्जित योग्यताओं, वरिष्ठताओं को प्रायः पूरी तरह भुला कर मिशन की गरिमा के साथ जुड़े हुए एक स्वयं-सेवी के हाथों में जितनी प्रतिष्ठा लगती है उसी में सन्तोष करना होता है। स्मरण रहे अधिक वरिष्ठ व्यक्ति अधिक विनम्र होते हैं। फलों से डालियाँ लद जाने पर आम का वृक्ष धरती की ओर झुकने लगता है। अकड़ते तो पतझड़ के डंठल ही हैं।
गाँधी जी के साबरमती आश्रम में टट्टी साफ करने से लेकर छोटे-मोटे ऐसे सभी काम अपने हाथों करने पड़ते थे, जिन्हें करने में आमतौर से बड़े आदमी अपनी हेठी मानकर नौकरों से कराते हैं। विनोबा के पवनार आश्रम में सभी आश्रमवासी कुएँ से पानी खींचते और पहरेदारी का काम अपने हाथों करना पड़ता है। यहाँ कोई मेहतर नहीं। शौचालय, स्नानघर, नालियाँ सभी मिलजुल कर साफ करते हैं। नेतागिरी के लिए विग्रह खड़े करने वाले क्षेत्र दूसरे हो सकते हैं पर सेवा धर्म में इस प्रकार की लिप्सा का थोड़ा प्रदर्शन सहता नहीं है। स्काउटिंग की जिन्होंने शिक्षा पाई है वे जानते हैं कि वहाँ अनुशासन का पालन ही वरिष्ठता का चिन्ह माना जाता है। पदवी पाने के लिए विग्रह करने वालों के लिए स्वयंसेवी संगठनों में कोई स्थान नहीं होता।
गुरुद्वारों में श्रद्धालु सेवी हर आगन्तुकों के जूते पोंछते और यथा स्थान रखते देखे जाते हैं। महिलायें अपनी चुनरी से सीढ़ियाँ साफ करती हैं। इजराइल के प्रधान मंत्री गोल्डा मेयर सरकारी कर्मचारियों के दफ्तर में स्वयं पहुँचती और समाधान तथा मार्गदर्शन खड़े-खड़े चलते-फिरते ही करती चलती थीं। केरल में जब निम्बूदरी भाई मुख्यमंत्री थे तब वे घर से दफ्तर तक साइकिल पर आते-जाते थे। यह नम्रता ही है जिसे सज्जनता का दूसरा नाम कहा जा सकता है। युग शिल्पियों की सेवा साधना में इसी आचार संहिता का परिपालन किया जाता है। नेतागिरी गाँठने वाले यहाँ पाते कुछ नहीं अपनी प्रतिष्ठा का श्राद्ध तर्पण अपने हाथों ही करते चलते हैं।
साधु ब्राह्मण परम्परायें अपरिग्रह, सादगी, मितव्ययिता, नम्रता को वरिष्ठता का प्रतीक चिन्ह माना गया है। विलासी, अहंकारी, उद्धत, कटुभाषी इस क्षेत्र में हेय माने जाते हैं। भिक्षाटन के लिए जाने, घर-घर से रोटी माँगकर खाने के पीछे अहंकार गलाने की वह साधना करनी पड़ती है जिसके बिना आध्यात्मिक उत्कृष्टता पनपती ही नहीं। जोंक जहाँ अपने पंजे गड़ा लेती है वहाँ से भरपेट रक्त पीकर ही छूटती है। छुड़ाने का एक ही उपाय है कि उस पर पिसा नमक छिड़क दिया जाय तो देखते-देखते गलने लगती है और छूटकर तत्क्षण एक कोने पर गिर पड़ती है उससे पीछा छुड़ाने के लिए ऐसे छोटे काम अपने हाथों करने होते हैं जिन्हें आमतौर से छोटे लोगों द्वारा किए जाने योग्य समझा जाता है।
युग शिल्पी एक महान मिशन के अंग अवयव होने के कारण ही सम्मान पाते और उच्चस्तरीय व्यक्तित्व का श्रेय पाते हैं। उन्हें सार्वजनिक प्रयोजनों में “मैं” “मैं” शब्द का उपयोग न करके “ हम “ “ हम लोग “ कहना चाहिए। दोष दुर्गुणों की, मूल अपराधों की स्वीकृति में तो “ मैं ” शब्द का उपयोग हो सकता है किन्तु श्रेय तो सभी के सम्मिलित प्रयत्नों से बन पड़ा है इसलिए उसके किए जाने में सभी के मिले-जुले प्रयत्न का संकेत रहना चाहिए। साथियों को स्नेह, दुलार, सहयोग देने में हम अग्रणी रहें। सफलता की चर्चा में उनके श्रम सहयोग का उल्लेख करें। कर्तव्य पालन को सर्वोपरि मानें और अन्धकार के दावेदार न बनें। ऐसी निरहंकारिता का खाद-पानी पाकर ही वे सप्त महाव्रत कल्पवृक्ष की तरह फलते, फूलते और सिद्ध सफलताओं से लादते हैं जिन्हें सेवा क्षेत्र में काम करने वालों के उपलब्ध होने वाले दिव्य वरदान कहा गया है। "
नारद जी बोले “ सूत जी! आप ज्ञानी हैं। यदि किसी का कलेवर सजाया सँवारा जाय, परन्तु प्राण निकाल दिया जाय, तो वह रहेगा या नष्ट होगा?” सूत जी बोले- “ प्राण हीन कलेवर तो नष्ट होगा ही।”
नारद जी ने कहा- “ यदि बात दक्ष के यज्ञ पर लागू होती है। दक्ष अपनी क्रिया-कुशलता पर इतना गर्व करते थे कि यज्ञ के प्राण, यज्ञीय भाव पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। यज्ञ परमात्मा को “ सुहृद् सर्वभूतानां अर्थात् सारी जड़ चेतन सृष्टि का मित्र हितैषी कहा गया है। इसीलिये यज्ञ सर्वहित भाव से किया जाता है।
हे ऋषिवर! जहाँ द्वेष या सत्कर्म को प्रारम्भ करने के पूर्व घोषणा होती है “ सर्वेषाम् अविरोधन यज्ञकर्म समारभे” अर्थात् सबके प्रति अविरोध का भाव रखते हुये यज्ञ कर्म प्रारम्भ किया जाता है।
दक्ष के यज्ञ का सारा विवरण समझने के बाद देवर्षि बोले- हे ऋषि श्रेष्ठ! यज्ञीय उपचार, यज्ञीय भावना, यज्ञीय चेतना के उभार और सदुपयोग के लिये किये जाते हैं। यज्ञीय भाव न होने से केवल उपचार कभी यज्ञ नहीं बन सकते, यह मर्म जो समझता है, वही यज्ञ रूप प्रभु का लाभ उठा पाता है।
पदार्थ विज्ञान के विशेषज्ञों ने मनुष्य मात्र के लिए बहुमूल्य सम्पत्तियाँ और सुविधाएँ जुटा दी हैं। यदि इनका विवेकपूर्ण और सद्भावयुक्त उपयोग हो सके तो धरती पर सतयुग जैसी-स्वर्ग परिस्थितियाँ पैदा करना कठिन नहीं है। विवेक और सद्भाव जैसी दिव्य क्षमताएँ मनुष्य के अन्दर जगाने का उत्तरदायित्व अध्यात्म के चेतना विज्ञान के विशेषज्ञों पर आता है। इसके लिए पूज्य गुरुदेव ने सद्विवेक और सद्भाव जगाने का एक ऐसा प्रयोग हमें सौंपा है जो मनुष्य मात्र के लिए विश्व स्तर पर स्वीकार किये जाने योग्य है। गायत्री परिवार उस कार्य को देवसंस्कृति के प्रति आस्थावानों, उदार विचारशीलों के सहयोग से सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रहा है। युग संधि महापुरश्चरण उसी आध्यात्मिक प्रयोग का व्यवस्थित अनुष्ठान है। युग संधि महापुरश्चरण की अर्धपूर्णाहुति के इस वर्ष में सर्व हितकारी प्रयोग की गूँज जन-जन तक, हर मन मस्तिष्क तक पहुँचाने की आवश्यकता है।
क्या करें कैसे करें-
युग निर्माण योजना-गायत्री परिवार की प्रत्येक संगठित इकाई में सप्ताह में एक बार उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना सहित, अपने द्वारा किये जा रहे सेवा कार्यों पर समीक्षात्मक चर्चा होती है, जिसमें आस्थावान् सदस्य तथा क्षेत्र के सद्भाव सम्पन्न नर-नारी भाग लेते हैं। अब प्रति गुरुवार विभिन्न क्षेत्रों में यह प्रयोग एक ही समय, एक साथ, सारे भारत में की जाने वाली प्रार्थना के रूप में जोड़ दिया जाय।
-उपासना की दृष्टि से विभिन्न विश्वासों मतों, पथों व संप्रदायों के विचारशील व्यक्तियों तथा उस वर्ग के प्रमुखों से संपर्क करके सार्वजनिक स्थानों पर यह सामूहिक प्रार्थना एवं ध्यान प्रयोग अलग से भी सम्पन्न किये कराये जायें।
-जहाँ कहीं भी सज्जनों का कोई भी छोटा-बड़ा सम्मेलन हो, वहाँ 10 मिनट इस सामूहिक प्रार्थना प्रयोग को शामिल करने-कराने के लिए उन्हें सहमत किया जाए।
-प्रारम्भ से 5 मिनट में उन्हें मनुष्य मात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य की कामना सहित की जाने वाली इस प्रार्थना का महत्व समझाया जाए।
-उसके बाद निर्धारित प्रार्थना बोल कर उनसे खण्ड-खण्ड में दुहरवायी जाये। यह प्रार्थना इस प्रकार है-
हे सर्वज्ञ! हम सबको सद्बुद्धि प्रदान करें। हे सर्वव्यापी!
मनुष्य मात्र को उज्ज्वल भविष्य के लक्ष्य तक पहुँचाने वाले मार्ग हमें दिखायें।
हे सर्वशक्तिमान्! हमें उज्ज्वल भविष्य के उस मार्ग पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ायें।
हमारा स्वभाव ऐसा बनायें कि-हम आपसे दिव्य प्रेम पायें और दूसरों को बाँटे।
-हम आपसे दिव्य सम्पदाएँ पायें और सब तक पहुँचाएँ।
-इस श्रेष्ठ मार्ग पर हम स्वयं चलें और दूसरों को चलाएँ।
-हम आपके अनुदानों तथा अपनी मेहनत के संयोग से अपने अन्दर देवत्व जगाने और आस-पास स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ बनाने में समर्थ हो सकें।
प्रार्थना बोली जाने के बाद सब लोग 5 मिनट तक मौन प्रार्थना एवं ध्यान करें।
-उक्त प्रार्थना के भाव मन में दुहराते हुए भावना करें कि हम सब की भावशक्ति-संकल्पशक्ति ऊपर अंतरिक्ष में एकत्रित हो रही है। उसके साथ हमारे इष्ट का सर्वशक्तिमान् सत्ता का अनुदान-आशीर्वाद जुड़ रहा है।
-अन्तरिक्ष में एक दिव्य प्रवाह उमड़कर सभी मनुष्यों पर बरस रहा है जिससे उनमें सद्भाव-सद्विवेक एवं सत्कर्म की सामर्थ्य विकसित हो रही है।
इस मौन प्रार्थना एवं ध्यान का रूप सभी को प्रार्थना दुहरवाने से पहले ही समझा दिया जाय।
अन्त में सब लोग हाथ जोड़ कर फिर सस्वर प्रार्थना करें।
विश्वानिदेव सवितुर्दुरितानि परासुव। यद्भद्रं तन्न आसुव॥
“ हे संसार को उत्पन्न करने वाले, सबको हर बुराई से बचायें और हर अच्छाई से जोड़ते रहें।” इस प्रार्थना के पश्चात् युग निर्माण सत्संकल्प का पाठ कर शाँतिपाठ कराया जाय।
ठस सामूहिक प्रार्थना के अनेक प्रत्यक्ष एवं परोक्ष लाभ होंगे, जैसे-
-युगसंधि महापुरश्चरण साधना में सूक्ष्म जगत से आने वाले दैवी प्रवाह में अभिवृद्धि होगी।
-सभी वर्गों, यज्ञों, सम्प्रदायों के लोग इस प्रयोग के साथ जुड़ेंगे तो उनके जीवन में नया प्रकाश उभरेगा।
-राष्ट्रीय स्तर पर दुर्भावों को मिटाकर सद्भाव एवं सहयोग का वातावरण बनेगा जिसकी कि आज अत्याधिक आवश्यकता है। "
श्रावणी पर्व - दिनाँक 8/7/79 पर दिया गया उद्बोधन (शान्तिकुञ्ज परिसर)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-बोलिए ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो, भाइयो, आज श्रावणी का पुनीत पर्व है, जिसके मनाने के लिए हम और आप एकत्रित हुए हैं। आइये विचार करें कि यह पर्व हमारे लिए क्या संदेश लेकर आया है और क्या दिशा-धारा निर्धारित करने आया है। हमारी महान परम्परायें हैं जो प्रायः हमारे स्मृति पटल से बिखर जाती हैं, जिन्हें हम भूल जाते हैं। हम लोगों के साथ कुछ ऐसा ही है। आदमी का झुकाव, मनोवृत्तियों का झुकाव नीचे की दिशा में है। ऊपर की दिशा में चलने के लिए बड़े प्रयत्न करने पड़ते हैं। कुएँ में से पानी निकालने के लिए कई तरह की मेहनत करनी पड़ती है। जमीन से, सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने के लिए कई तरह के इंतजाम करने पड़ते हैं। छत पर से नीचे गिरना हो तो कुछ मेहनत करने की जरूरत नहीं है। किसी खड्डे में कोई चीज आपको धकेलनी हो तो मेहनत करने की जरूरत नहीं है। ऊपर चढ़ाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। इसीलिए ऋषियों के द्वारा भारतीय संस्कृति का स्वरूप इस तरीके से बनाया गया है कि जिससे आदमी को ऊँचा उठने का, आगे बढ़ने का मौका मिल सके। मनुष्य- गिरता तो है ही, गिरने में क्या दिक्कत है? मन की बनावट ही ऐसी है। इसके अन्दर जन्म-जन्मान्तरों के पशुवत् संस्कार चौरासी लाख योनियों में घूमने के बाद आ गये हैं। ये कुसंस्कार आदमी के लिए काफी हैं कि उसे नीचे गिराते रहें और नीचे की वृत्तियों की तरफ उसका ध्यान आकर्षित करते रहें। इसमें कुछ करना नहीं है।
संस्कृति किसलिए बनायी गयी? धार्मिक परम्परायें और अध्यात्म का ढाँचा किसलिए बनाया गया? अध्यात्म का ढाँचा और संस्कृति की परम्परायें सिर्फ एक काम के लिए बनायी गयीं कि मनुष्य को ऊँचा उठाया जाये, आदमी को आगे बढ़ाया जाये। इन दो उद्देश्यों को लेकर संस्कृति बनायी गयी है। भारतीय संस्कृति में त्योहारों और पर्वों का अपने आप में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। श्रावणी का तो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण स्थान है। ब्रह्मकर्म में श्रावणी का पहला नम्बर आता है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी श्रावणी पर्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है। अनेक पर्वों के अपने-अपने आधार हैं। हमारा आर्थिक संतुलन किस तरीके से स्थिर रहे और हमारी अर्थोपार्जन से लेकर के अर्थ के व्यय करने तक की नीति क्या होनी चाहिए-ये आधार है दीपावली का। विजयादशमी का त्यौहार है जो हमको विजय प्राप्त करने के लिए, विजयी और सफल जीवन जीने के लिए भौतिक सामर्थ्यों का किस तरीके से संकलन करना चाहिए, हथियारों से कैसे सुसज्जित रहना चाहिए, स्वास्थ्य संवर्द्धन कैसे करना चाहिए, दुर्गा के तरीके से हमारी शक्तियों का एकत्रीकरण कैसे होना चाहिए, वगैरह-वगैरह समर्थता की शिक्षा हमको विजयदशमी से मिल सकती है। बसन्त शिक्षा का त्यौहार-हमारे लिए शिक्षा की जरूरत है। हमको पढ़ना चाहिए। विद्या बिना आदमी किसी काम का नहीं होता। ये बसन्त पंचमी सरस्वती के जन्मदिन का त्यौहार है। होली का अपना महत्व है, गन्दगी के विरुद्ध लड़ने के लिए। गन्दगी को जलाने, फूँक देने और नष्ट करने के लिए हमारा होली का त्यौहार है। एक से एक बढ़िया त्यौहार हैं। इन सारे के सारे त्यौहारों में ज्यादा महत्वपूर्ण त्यौहार वह है जो कि आज आपके सामने उपस्थित है- श्रावणी पर्व।
श्रावणी क्या है? श्रावणी यज्ञोपवीत का त्यौहार है। इसमें यज्ञोपवीत का हम हर साल बदल देते हैं। ठीक उसी तरह जैसे हम बन्दूक का, मोटर का लाइसेंस हर साल बदलते हैं। बहीं खाता भी हर साल बदलते हैं। बहुत से काम ऐसे हैं जो हर साल बदलने पड़ते हैं। क्यों? ताकि हमको देखने का, निरीक्षण करने का, मौका मिलता रहे। यह रिन्यू कराने का त्यौहार है। यज्ञोपवीत बहुत महत्वपूर्ण चीज है। बेटे। यज्ञोपवीत एक तरह के संकल्प का प्रतीक है, जिसमें आदमी दूसरा जन्म लेने की प्रतिज्ञा करता है। दूसरा जन्म क्या है? दूसरा जन्म द्विज का। यज्ञोपवीत दूसरे जन्म का सर्टीफिकेट है। यह इस बात का संकेत है कि हमें इंसान की जिन्दगी जीनी चाहिए। इंसान का जन्म मिलना, ये भगवान की कृपा के ऊपर है और उसका ठीक तरीके से इस्तेमाल करना इंसान के ऊपर है कि वह अपनी जिन्दगी को उस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करे जिसके लिए भगवान ने जन्म दिया है। भगवान ने किस काम के लिए जन्म दिया है? भगवान ने किसी खास मकसद के लिए जन्म दिया है कि आदमी को हैवान नहीं रहना चाहिए, इंसान बनना चाहिए। इसके लिए इंसान का कलेवर और इंसान का लिफाफा, इंसान के हाथ-पाँव इंसान के कलपुर्जे और इंसान की मशीन-ये सारी की सारी चीजें हमारे सुपुर्द कर दी गयी हैं भगवान के द्वारा। एक बात की जिम्मेदारी अब हमारी है कि जिस काम के लिए यह मशीन हमको दी गयी है उस काम को पूरा करें। इंसान होकर के दिखाये। हैवान से एक दर्जा आगे बढ़ें, तरक्की करें। इस तरक्की के बाद में, एक दर्जा ऊँचा उठने के बाद में, इस बात का सबूत पेश करें कि इंसान से अगले वाले दर्जे प्राप्त करने का हमको हक है। इंसान से आगे के दर्जे। हाँ, इंसान से आगे और भी दर्जे है। कौन से हैं? जिसको हम देवत्व का दर्जा कहते हैं। इंसान अपनी ही जिन्दगी में एक और कदम बढ़ा सकता है, एक और कदम बढ़ा सकता है जिसको देवता कहते है। देवता कौन होते हैं? देवता इंसान होते हैं। कैसे इंसान होते है? जैसे हमारे बुजुर्ग थे। यहाँ देवता निवास करते थे। देवता का विचार, देवता का चिंतन अलग होता है। देवता और इंसान की शक्ल में तो फर्क नहीं होता, पर दृष्टिकोण में जमीन-आसमान का फर्क होता है। आप इस बात को लिए अगर सबूत पेश करें कि हमको देवता बनना चाहिए, तो देवताओं के अन्दर जो विशेषताएँ होती है, देवताओं को जो सम्मान मिलता है, देवताओं को जो सम्मान मिलता है, देवताओं में जो सामर्थ्य होती है-देवता अपने आप में हँसते-हँसाते रहते है। देवता अपनी सुगन्धि से वातावरण को न जाने क्या से क्या बना सकते हैं। वह दूसरा दर्जा आप पा सकते है इसी जिन्दगी में।
अपने तो न जाने क्या-क्या कल्पनायें कर रखी हैं कि मरेंगे तो स्वर्ग लोक में जायेंगे। कहाँ मरेंगे आप? शरीर बदल लेते है बारबार। कपड़ा पुराना होता है तो बदल लेते है। नहाना भी पड़ता हैं। बनियान में गंध आ जाती हैं तो रोज धोकर के दूसरी बदल लेते हैं। दूसरे दिन फिर दूसरी बदल लेते हैं। मरेंगे, मर कर फिर कहाँ जायेंगे? बैकुण्ठ लोक में जायेंगे। कहाँ हैं बैकुण्ठ? बैकुण्ठ इस जमीन में हैं। आपको मालूम नहीं हैं। स्वर्ग भी इसी जगह हैं और नर्क भी। देवता भी इसी जगह पर रहते हैं और राक्षस भी। इंसान भी इसी में रहते हैं और हैवान भी इसी में रहते हैं। तरक्की के लिए ‘मैट्रिक के बाद आप बी. ए. कर लें, बी. ए. के बाद आप एम. ए. कर लें और पोस्ट ग्रेजुएट हो जायें। इसी तरीके से सिपाही से आप दरोगा हो जायें, दरोगा से आप सुपरिन्टेन्डेन्ट हों जायें। इस तरीके से बहुत से चाँस हैं। आप चाहें तो एक और भी मौका हैं कि देवताओं के बाद आप भगवान भी हो सकते हैं। भगवान? हाँ भाई साहब मैं आप से कहता हूँ कि आप भगवान भी हो सकते हैं। इंसान परब्रह्म नहीं हो सकता, पर भगवान हो सकता है। परब्रह्म और भगवान में क्या फर्क है? परब्रह्म वह है जो सारे के सारे ब्रह्माण्ड के ऊपर नियन्त्रण रखे हुए है, काबू रखे हुए है, कब्जा रखे हुए है। सारी सृष्टि का संचालन जो व्यवस्थित रूप से चलाता है और बनाता है- उसका नाम है- परब्रह्म। भगवान उनको कहते हैं, जिन्हें हम देवदूत करते हैं जो विश्व की व्यवस्था को कायम रखने के लिए आते हैं और अपना काम करने के बाद चले जाते हैं। इन्हें अवतार भी कहते हैं-जैसे भगवान रामचन्द्र जी, भगवान कृष्ण चन्द्र जी, भगवान परशुराम और भगवान बुद्ध आये। आदमी का ऊँचे से ऊँच स्तर भगवान का है। आपके लिए चाँस है। इंसान का जन्म पाकर के ठीक तरीके से अपनी मंजिल के ऊपर चढ़ते चले जायें ताकि वह सब पा सकें। इसी का स्मरण दिलाने, जानकारी कराने के लिए संस्कार कराये जाते है।
हिन्दू का बच्चा जब थोड़ा बड़ा, समझदार होने लगता है तो हिन्दू परम्परा के मुताबिक़ उसका यज्ञोपवीत कराया जाता है। यज्ञोपवीत तीन लड़ का एक धागा है जिसे कंधे पर धारण किया जाता है। जब मल मूत्र विसर्जन के लिए जाते हैं तो उसे कान पर चढ़ा लेते है और हाथ साफ करके कान से उतार लेते हैं। उससे क्यों हो जाता है? ये हमारे प्रतीक है। प्रतीकों के पीछे न जाने क्या से क्या शिक्षण भरा हुआ पड़ा है। प्रतीक हमारी गीता की पुस्तक, हमारे मन्दिर में पत्थर की प्रतिमा। श्रद्धा आरोपित करके इन प्रतीकों को हमने शक्तिपुञ्ज, भगवान बना दिया है। मीरा के गिरधर, रामकृष्ण परमहंस की काली, एकलव्य के लिए गुरु प्रतिमा, ये भगवान थे। नहीं साहब ये तो खिलौने थे। हाँ भगवान के प्रतीक खिलौने भी हो सकते हैं, अगर उन्हें श्रद्धा से समन्वित कर दिया जाये तब! इसी मिट्टी का खिलौना जिसे एकलव्य ने बिना किसी संस्कार, बिना किसी मंत्र के अपने आप बना लिया था, उसने गज़ब करके दिखा दिया और मीरा ने-जिसका संस्कार भी नहीं हुआ, प्राण प्रतिष्ठा भी नहीं हुई, मंत्रोच्चार भी नहीं किये, उस पत्थर के टुकड़े में से भगवान बना दिया था। धागे को श्रद्धा से समन्वित करके हम जनेऊ में से भगवान को बना सकते है। कैसे बना सकते हैं? जनेऊ में अगर हमारी निष्ठाएँ और आस्थाएँ शामिल हो जायें तो क्या से क्या हो सकता है। उस श्रद्धा को जिस श्रद्धा के आधार पर हैवान को इंसान बनाने के लिए जनेऊ पहनाया जाता है। उसके साथ मौलिक फिलॉसफी, तत्त्वज्ञान जोड़ दिया जाता है कि दूसरे जन्म से मतलब ये है कि दूसरे जन्म से मतलब ये है कि आदमी जब पैदा होता है तो शरीर से तो इंसान होता है, लेकिन मानसिक स्तर की दृष्टि से, चिंतन और विचारों की दृष्टि से हैवान होता है, नरपशु होता है। नरपशु किसे कहते हैं? जिनका कि शरीर तो इंसान का होता है, पर दिल-दिमाग हैवान का होता है। उसका नाम नरपशु है। नरकीटक और नरपिशाच आप ने सुने होंगे। परिस्थितियाँ जब मजबूर करती हैं तो आदमी नरपिशाच भी हो सकता है और नरकीटक भी? लेकिन वे कम होते है। आमतौर से आदमी नरपशु पाये जाते हैं।
नरपशु कैसे पाये जाते हैं? पशु और इंसान की मनोवृत्तियों में क्या फर्क है? शरीरों में तो बहुत फर्क है। शरीर में मूल फर्क ये है कि आदमी बोल सकता है, जानवर बोल नहीं सकता। आदमी में समझ होती है, जानवर में समझ नहीं होती। आदमी दो पैरों से खड़ा नहीं हो सकता। रीढ़ की हड्डी की बनावट-आदमी की दूसरी तरह की है और जानवर को दूसरी तरह की है। इंसान को हँसना-रोना आता है और जानवर को हँसना-रोना नहीं आता। शरीर की दृष्टि से आदमी भिन्न है। आदमी को काम करने, पुरुषार्थ करने के लिए इतना शानदार हाथ दिया गया है कि मैं कहता हूँ कि यह गज़ब का है। इससे आदमी न जाने क्या कर सकता है। आदमी का दिमाग कमाल का है। ये क्या है? ये इंसान और जानवर की बनावट में साफ फर्क है, जो मैंने आपको बताया। लेकिन एक मामले में दोनों एक हैं। वह किस मामले में हैं? आदमी की नीयत और मनोवृत्ति जानवरों की मनोवृत्ति की धुरी दो है। पृथ्वी की धुरी दो है-एक उत्तरी ध्रुव, एक दक्षिणी ध्रुव। गाड़ी की धुरी दो हैं- एक दांया वाला पहिया, एक बांया पहिया। बैलेन्स इन्हीं पर टिका रहता है। एक को गिरा दे तो फिर गाड़ी गिर पड़ेगी। इसी तरीके से हैवान दो चीजों पर टिका रहता है। उसकी नीयत आप खोलिये, पोस्टमार्टम कीजिए, उसके दिमाग को तौल के देखिये तो हैवान के विचारों में दो चीज पाइयेगा, तीसरी कोई चीज नहीं पायी जायेगी। आदमी क्या सोचता है और क्या करना चाहता है? आदमी की इच्छाएँ, प्रेरणाएँ, विचारणाएँ क्रियायें क्या हैं? आदमी की अच्छाइयाँ पहले होती हैं, इच्छाओं पर विचार के लिए दिमाग मजबूर होता है और विचार करने के बाद में शरीर को उसका हुक्म मानना पड़ता है। शरीर दिमाग का कहना मानता है और दिमाग हमारी मान्यताओं, आस्थाओं आकांक्षाओं का हुक्म मानता है। दिमाग हमारा खराब है, हमारी आस्थाएँ और नीयत खराब है। इसीलिए हमारी नीयत, इच्छाएँ, रुचि लक्ष्य आदमी की नहीं हैवान की हो जाती है तब दिमागी दृष्टि से, विचारों की दृष्टि से इंसान और हैवान में कोई फर्क नहीं। दोनों हूबहू एक हो जाते है। इनकी नीयत में दो ही चीज दिखाई पड़ती हैं-पैसा और औलाद। आप क्या चाहते है? औलाद। तीसरी कोई चीज न हो तो आप शरीर दृष्टि से कौन है? हम नहीं जानते लेकिन आम की दृष्टि से, भावना की दृष्टि से, चिन्तन और आस्थाओं की दृष्टि से कौन हैं, विचारिये।
हैवान को इंसान बनने के लिए क्या करना चाहिए? वही जो यज्ञोपवीत में सिखाया गया है। यज्ञोपवीत में सारे का सारा पाठ्यक्रम, सारे का सारा कैरिकुलम, सारी की सारी स्कीम्स, जो स्कूलों में पढ़ाया जाता है, जो छोटे रूप में संक्षेप में इसके भीतर बना दिया गया है। क्या करना चाहिए आदमी को? आदमी को हैवान के बदले .....................कब करने चाहिए, एक तो हजारों जन्मों के साथ जो मलीनतायें आदमी के ऊपर हावी हो गयी हैं, इनसे लोहा लेना चाहिए, उन्हें दूर करना चाहिए। हमें लड़ाई लड़नी चाहिए उन निकृष्ट मनोवृत्तियों और कुसंस्कारों से जो न जाने किस-किस जन्म के, ज्यों के त्यों अभी भी हमारे भीतर मौजूद हैं। लड़ाई से तात्पर्य-तप संयम, कानून, मर्यादा और मनोबल से है। तपश्चर्या के अंतर्गत ये सब चीजें आती हैं जिन्हें यज्ञोपवीत संस्कार कराते समय सिखाया जाता है। आपको अपने कुसंस्कारों के विरुद्ध बगावत खड़ी करनी चाहिए और अपने भीतर इंसानी ताकत विकसित कर देवत्व धारण करना चाहिए।
एक काम तो यह है कि हमें अपने स्वार्थ को जानना चाहिए। स्वार्थ क्या है? स्वार्थ वह कि हम जीवन में तरक्की करें। तरक्की से हमको आत्मसंतोष, यश मिलेगा और इतिहास के पन्नों पर हम अपना नाम छोड़ करके जा सकेंगे। हमारा स्वार्थ और भी है कि इस दुनिया में जो खुशी हमको मयस्सर न हो सकी वो खुशी जिन्दगी में आनी चाहिए। खुशी किसे कहते हैं? खुशी का नाम है- स्वर्ग। स्वर्ग किसे कहते है? इंसान की जिन्दगी और दृष्टिकोण में खुशी प्रसन्नता के समावेश का नाम है स्वर्ग। स्वर्ग कोई गाँव, बस्ती, कोई लोक नहीं है। फिफ्थ डायमेंशन फोर्थ डायमेंशन ये विचारों और चिन्तन के डायमेंशन होते हैं। स्वर्ग भी एक डायमेंशन है- हमारे दृष्टिकोण का। इसमें हम देखना शुरू करते है तो इस दुनिया में बड़ी खुशी खूबसूरती, आनन्द और तरह-तरह के नजारे दिखायी पड़ते है। हमको बेहद शाँति दिखायी पड़ती है चारों ओर इसका नाम स्वर्ग। नर्क क्या है नर्क उसी का नाम कि जहाँ कहाँ भी हम निगाह फेंकते है अथवा ........ कहते है, हाथ डालते, सम्बन्ध बनाते हैं, वो सब बागी हो जाते है। कौन-कौन बागी हो जाते है- हमारी बीबी, हमारे बच्चे, हमारे पड़ोसी, हमारा समाज, यहाँ तक कि हमारा शरीर भी कहता है मारूंगा डण्डे से आपको। हमारा चिंतन, दृष्टिकोण जब विकृत हो जाता है तो हमारा शरीर, दिमाग बगावत कर देता है। हमारे कम्प्यूटर ने हमारे विरुद्ध झंडा खड़ा कर दिया कि आपको सोने नहीं देंगे, चैन से रहने नहीं देंगे। चिंताओं, निराशाओं से दिमाग हैरान हो जाता है। बेटे। हमारे जीवन में नर्क भी है और स्वर्ग भी, बन्धन भी हैं और मुक्ति भी। चारों ओर के बन्धनों ने हमको जकड़ रखा है-पैरों में, हाथों में, गले में सब जगह बन्धन। ये हमारी कमजोरियाँ हैं वरना आदमी के ऊपर क्या बन्धन हो सकता है? जानवर पर बन्धन हो सकते है, पैर में, गले में रस्सी बाँध सकता, लेकिन उन्नति के मार्ग पर जिन बन्धनों ने रोककर रखा है वो आपकी कमजोरियों और दृष्टिकोण से ताल्लुक रखते है। अगर इन्हें तोड़ा जा सके तब? आपकी मुक्ति हो सकती है। इसी को कबीर ने “जीवन मुक्ति” कहा था और ये नाम मुझे बहुत पसन्द आया। स्वर्ग वह जो आदमी की इसी जिन्दगी में-खुशी उमंग, उत्साह और आशाओं के रूप में है। ये चीजें अगर मिल जाती हैं तो आपका स्वार्थ पूर्ण हो जाता है। आप जीवन को नेक, समुन्नत सुसंस्कृत, सभ्य शालीन बनाये तो स्वार्थ पूर्ण है।
परमार्थ-एक और उद्देश्य है। इंसान की जिन्दगी का परमार्थ किसे कहते हैं? जिससे भगवान की इच्छाएँ पूरी हों। भगवान के प्रति आपका ख्याल है कि वह एक छोटी तबियत का है। आप जैसे छोटे हैं, बिलकुल वैसा ही छोटे मॉडल का भगवान अपने बना के रख लिया है, जो खुशामद, चापलूसी, चमचागिरी, प्रार्थना, पूजा, कराने के लिए मारा-मारा फिरता है। आहा! आप और आपका बनाया भगवान- “राम मिलायी जोड़ी और एक अंधा, एक कोढ़ी।” दोनों हूबहू एक जैसे ‘सगे माँ जाये भाई।’ एक चापलूसी पसन्द करता है और दूसरे को चापलूस बनाता है। नारियल खाइये, मनोकामना लाइये। बेटे, ये भगवान नहीं है। मैं तो दूसरे भगवान की कहता हूँ। कौन-सा? जो आपके हृदय में करुणा, सहृदयता, उदारता के रूप में विद्यमान रहता है। करुणा के रूप में भगवान? हाँ करुणा के रूप में भगवान। वाल्मीकि ने एक बहेलिये के तीर से क्रौंच पक्षी को घायल देखा। क्रौंच पक्षी तड़प रहा था। उसकी बीबी उसके पास बैठी रोती-बिलखती प्राण त्याग रही थी। उसकी करुणा को, उसके दुखों को, उसकी संवेदना को वाल्मीकि ने देखा। उनके पत्थर जैसे कठोर हृदय के भीतर वो करुणा की धारा आ गयी ओर जिस क्षर करुणा की धारा आयी, उसी क्षर से उनके अंदर से अध्यात्म फूट पड़ा। अध्यात्म माने भगवान, भगवान माने अध्यात्म। करुणा किसे कहते हैं? जिसको हम सेवा कहते हैं, उदारता, परमार्थ कहते हैं। भगवान ने ये अपेक्षा की इंसान से कि वह निष्ठुर, कृपण, स्वार्थी न बने। उसे उदार, परोपकारी, लोकसेवी बनना चाहिए और भगवान के कामों में हिस्सा बटाना चाहिए। भगवान ने इंसान को अपने सेक्रेटरी के रूप में, इंजीनियर के रूप में इसीलिए बनाया कि हमारे बगीचे को-हमारे उद्यान हाथ बटाये। बड़े बेटे से बाप हमेशा उम्मीद करता है कि हमारा बेटा जब बड़ा हो जायेगा तो हमारे कारोबार में हाथ बटायेगा। ठीक इसी तरह भगवान ने अपने बेटे इंसान से ये उम्मीद की है कि उसकी दुनिया को सभ्य, सुसंस्कृत, समुन्नत बनाने के लिए हमारा हाथ बटायेगा। ये ही पूजा है, ये ही भजन है, भाई साहब, आप सुनते क्यों नहीं? नहीं साहब भजन में तो हम ग्यारह माला का जप करते हैं। ग्यारह माला के पीछे ये ही मकसद है, आप समझते क्यों नहीं?
हमारा परमार्थ इस बात में है कि हम इंसान की जिन्दगी अपना कर सादा जीवन यापन करें, कम में गुजारा करें, कम खर्च में काम चलाएँ, और जो हमारे पास शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं अन्य प्रकार के साधन बच जाते हैं, उनको भगवान के काम में लगायें। भगवान की बैंक में जमा करें, ताकि हजारों गुना होकर के फिर हमारे पास आयें और भगवान हमारी ईमानदारी पर विश्वास करें। हमारा जो प्रमोशन है देवता का, अवतार का, ये सारे के सारे प्रमोशन हमको टाइम पर मिलते चले जायें। ये हमारा परमार्थ है-भगवान को प्रसन्न करना, जीवन में उदार होना। हम एकादशी उपवास करें तो? मर्जी है आपकी। पेट अच्छा हो गा, पर एकादशी व्रत भर से भगवान प्रसन्न नहीं होता, उदारता और परमार्थ परायणता के बिना। इसीलिए मित्रो। मैं ये कहता हूँ कि भगवान की प्रसन्नता के लिए फिर एक बार समझिये। भगवान का स्वरूप आदमी की सम्वेदना में, उदारता के रूप में, परमार्थ परायणता, लोकमंगल के रूप में होना चाहिए और इस विश्व को सुखद, समुन्नत बनाने के रूप में होना चाहिए। न भगवान का रूप इससे कम में है और न इससे ज्यादा होने की जरूरत है। आदमी का स्वार्थ इससे कम में नहीं हो सकता। साँसारिक स्वार्थ भी मैं इसी को कहता हूँ। संसार का स्वार्थ-जिन आदमियों ने अपने व्यक्तित्व को गौण और स्वभाव को श्रेष्ठ बनाया है, उनके ही स्वार्थ पूरे हुए हैं। सुखी, सम्पन्न यशस्वी, वो ही रहे हैं। पारिवारिक आनन्द, शारीरिक आनन्द उन्हीं ने उठाया है। संसार और परमार्थ दोनों एक में मिले हुए हैं। अध्यात्म और भौतिकवाद अलग नहीं है, दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए है। हमारा शरीर और आत्मा दोनों एक दूसरे से जुड़े है। अलग हैं? अलग नहीं हो सकते। अलग निकलेंगे तो शरीर बेकार हो जायेगा, और हम बेकार हो जायेंगे। भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों आपस में जुड़ी हुई है। स्वार्थ और परमार्थ दोनों जुड़े हुए हैं। इन दोनों की शिक्षा के लिए सारी की सारी फिलॉसफी और सारे का सारा दर्शन हमारे यज्ञोपवीत में जोड़ दिया गया है।
यज्ञोपवीत जो हमको ये सिखलाता है कि आदमी को हैवान का चोला छोड़ना और इंसान की जिन्दगी में प्रवेश करना चाहिए। आदमी को उदार और उदात्त बनना चाहिए। ये ही शिक्षण है। सारे के सारे शिक्षण को अपने देखा? हमने कर्मकाण्ड कराये, यज्ञोपवीत पहनाया और आपको याद दिलाया कि आपके जीवन का मकसद, आपके जीवन का लक्ष्य क्या है? इंसान के कलेवर में रहने वाले शैतान को ठोकर मार कर भगा दीजिए और जिस भगवान के निवास करने की पूरी-पूरी गुँजाइश है, उसे स्थापित कर लीजिए। यही है जीवन का लक्ष्य, इसी को दूसरा जन्म कहते है? जनेऊ पहनाते समय, यज्ञोपवीत करते समय यही शिक्षायें दी जाती हैं और यही दी जानी चाहिए। इसी के लिए आपको दो काम करने पड़े थे- एक तो दस स्नान करने पड़े और दूसरा हेमाद्रि संकल्प करना पड़ा। यज्ञोपवीत करते समय, श्रावणी पर्व मनाते समय विशेष उपासना की प्रक्रिया को पूरा करते समय में ये दो आधार बहुत आवश्यक हैं कौन-कौन से? आपको दस स्नान करने चाहिए। इसका क्या मतलब है? हमारे पास इन्द्रियाँ हैं-दस और प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने ढंग से मलीनतायें पैदा करती हैं। जिससे हमारा स्वरूप, हमारे जीवन की श्रेष्ठता और शालीनता मलीन होती चली जाती है। इसीलिए इनकी धुलाई, मुजाई, घिसाई, पिसाई और धुनाई करना जरूरी है। दस स्नान से धोइये आप इनको। शरीर को? हाँ, शरीर को तो आप साबुन से भी धो ले तो कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। दस स्नान की फिलॉसफी आप समझिये कि हमको अपनी दसों इन्द्रियों के मध्यम से होने वाले गुनाहों और गलतियों से बाज़ आना चाहिए।
हमारे प्राण है दस। पाँच प्राण और पाँच उपप्राण ये हमारी चेतना के दस हिस्से हैं। पाँच उपप्राण ये हमारी चेतना के दस हिस्से हैं। पाँच तत्वों के भी दे हिस्से हैं-पंच तन्मात्राएँ और पंचतत्व। पंचतन्मात्रायें-शब्द रस, रूप, गंध और स्पर्श हैं, और अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी ये पाँच तत्व हैं। आप शरीर की धुलाई कीजिए, जिससे ये बना हुआ है, और मन की धुलाई कीजिए जो कि प्राणों से बना हुआ है। आपको सबेरे दस स्नान कराये गये थे अपने दस स्नान का ये मकसद, ये प्रेरणा, ये इच्छाधारा, ये संकेत समझा होगा, तब तो ठीक है और अगर संकेत नहीं समझा होगा तो “साँप निकल गया लकीर पीटें” ये आपकी मर्जी की बात है। आजकल कर्मकाण्डों और पूजा के नाम लकीर पिटती है। आदमी ने लकीर पीटने के पीछे, कर्मकाण्डों के पीछे जो दिशाधाराएँ रहनी चाहिए थी और रहती थीं, उन्हें न जाने क्यों वंचित रह गये। चन्द पूजा से आदमी को न जाने कैसे संतोष हो जाता है। जैसे आचमनम् समर्पयामि, अर्घ्यम् समर्पयामि, स्नानम् समर्पयामि, एक चम्मच जल के पीछे छिपी प्रेरणा और दिशाधारा समझिये। वह ये कि आपके शरीर में से जो पसीना निकलता है अर्थात् जो श्रम आपकी मेहनत और मशक्कत है उसे आप भगवान के लिए लगाइये। वह लोकहित के लिए हो, उसी से आप स्नान करा सकते हैं। ये अक्षत, नैवेद्य कहाँ है दिखाना जरा? शक्कर की गोलियाँ नहीं, भगवान का नैवेद्य है-हमारे श्रमदान के साथ-साथ में हमारा अंशदान। हमारी कमाई का एक हिस्सा भी जुड़ा रहना चाहिए। गवर्नमेंट का एक टैक्स- इनकमटैक्स और आदमी के धर्म का टैक्स-हर आदमी की कमाई में भगवान का एक शेयर यही है “अक्षत समर्पयामि” की प्रेरणा, आप सुनते नहीं दिशा निर्देशों को समझते नहीं और लकीर पीटने पर उतारू हो गये हैं। पीछे से कहते हैं भगवान प्रसन्न नहीं हुआ, हमारा उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। इसीलिए मित्रो। आज श्रावणी के दिन आप ये कोशिश करें, अपने में मुँह डालें और जहाँ कहीं भी मलीनतायें दिखायी पड़ें उनसे बगावत करने के लिए अमादा हो जाइये। ये आपके दस स्नानों की शिक्षा है।
हेमाद्रि संकल्प किसे कहते हैं? चिन्तन और कृत्य जो हम शरीर से करते हैं। आदमी का चिंतन-बीज है और कृत्य उसका फल। विचार भी एक काम है, उसका परिणाम भी होता है। गंदे विचारों करते रहिये फिर देखिये आपका पतन कैसे होता है, दिमाग कैसे खराब होता है। हेमाद्रि संकल्प इस बात को बताता है कि हमारे जीवन में जो निषेधात्मक पक्ष है-उसको ठीक करें, धोये, लोहा ले, लड़ें, बराबर अपने आपसे। लड़ाई में कमजोरी को जाहिर शक्तियाँ हावी हो जायेंगी। इसीलिए हर समय आपको चौकीदारी करनी चाहिए। जिस दिन पहरा बन्द कर देंगे उसी दिन आपके घर का सफाया हो जायेगा, चोर माल उठा ले जायेंगे। इसके अतिरिक्त दो काम आपके और हैं-एक ऋषिपूजन और दूसरा देवपूजन। हमारे जीवन को ऊँचा उठाने के लिए सत्संग और स्वाध्याय अति आवश्यक है। चारों ओर के वातावरण का असर हम पर पड़ता है। उसे दूर करने के लिए हम ज्ञान का, विचारणाओं का लगातार शिक्षण करें। अगर हमें श्रेष्ठ जीवन जीना है तो गंदे विचार जो बिना प्रयत्न के हमारे ऊपर हावी होते रहते हैं, उनसे लोहा लेने, अच्छा जीवन जीने के लिए श्रेष्ठ विचारों के संपर्क में रहना पड़ेगा। हमारे मन में बड़ी मलीनता आती है। तो बेटे! उसको उखाड़ फेंक, उनसे लोहा ले, जद्दो-जहद कर। हाथी से हाथी की टक्कर होती है और भैंसे से भैंसे की। लाठी से लाठी की टक्कर होती है और बन्दूक से बन्दूक की। तेरे ऊपर जो कुविचार छाये रहते हैं उनसे मुकाबले के लिए अच्छे विचारों की सेना से लड़ा दे। मित्रो! ये क्या है? आपने उत्तम जीवन जीने के लिए जो देवपूजन, ज्ञान का पूजन और ऋषि पूजन किया।
ऋषि का अर्थ-वो व्यक्ति जो प्रभावशाली प्रतिभाओं के रूप में आपके ऊपर दबाव डाल सकते हो, आपको अनुशासन में रखने के लिए समर्थ हों। ऋषि वह जो आदमी को मजबूर कर सकते हैं, जो आदमी से धड़ल्ले से कह सकते है। आप ऋषि का अनुशासन पाये बिना आगे नहीं बढ़ सकते, कुसंस्कारों से छुटकारा नहीं पा सकते। ऋषि का पूजन हमने इसीलिए कराया कि आपके जीवन में अनुशासन आये। ऋषि हमारे जीवन की महती आवश्यकता हैं। ऋषि का सम्पर्क जिनसे हो गया, वो धन्य हो गये। नारद जी ऋषि थे। उनका सम्पर्क प्रहलाद और ध्रुव से हो गया वे धन्य हो गये हिमांचल के राजा की लड़की से नारद जी का सम्पर्क हो गया, वह धन्य हो गयी। वाल्मीकि से नारद जी का सम्पर्क हुआ, वह भी धन्य हो गये। कैसे हो गया? दबाव डालने वाले व्यक्ति जो आदमी की इच्छा के विरुद्ध भी बात कह सकते हों, उसे नाखुश भी कर सकते हों और इस पर झल्ला भी सकते हों-ऐसे आदमी कौन होते हैं? ऋषि जीवन को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने, के लिए आदमी को उन लोगों के साथ सम्पर्क बनाना चाहिए। ऐसे आधार खड़े करने चाहिए, जिनके बल पर हमारे लिए आगे बढ़ सकना संभव हो सके। श्रेष्ठ जीवन जीने भगवान के रास्ते पर चलने की, भगवान का प्रिय होने की, परमार्थ परायण होने की, अध्यात्म का जीवन में विकास होने की आवश्यकताएँ है।
स्वाध्याय और सत्संग क्या है? श्रेष्ठ पुरुषों का सान्निध्य और सद्ज्ञान के प्रति निष्ठावान् होना। अगर दो काम आपने नहीं किये है, तो आप ग्यारह माला जपें, चाहे ग्यारह हजार माला जपें, कुछ नहीं होने वाला। विकारों को आप काटते नहीं है। जीवन को ऊँचा उठाने के लिए जिस क्रेन की जरूरत है, उससे आपका सम्पर्क ही नहीं है। आप जान का तो निकाल देते है और लाश को लिए फिरते है। लाश को लेन से काम नहीं चलेगा, दिशाओं को लेने से काम चलेगा। मित्रो, आज हमने शिक्षण किया यज्ञोपवीत का, जिसे चौबीसों घण्टे कंधे पर धरण करते है। हम इसकी शिक्षाओं को, जीवन के लक्ष्य को ध्यान में रखेंगे, भुलायेंगे नहीं। हर साल इसको रिन्यु कराते है। टट्टी-पेशाब के समय आपको यज्ञोपवीत का ध्यान रखना चाहिए। जय पुराना हो जाता है, छः महीने हो जाते है, तब इसे आपको बदल देना चाहिए। क्यों? बार-बार हमें ध्यान रहे कि जनेऊ का भी हमारे जीवन में बच्चा हो, घर में गमी हो, चन्द्रग्रहण हो, सूर्यग्रहण हो। लाइये नया जनेऊ, बदलना पड़ेगा? हों बदलना पड़ेगा, ताकि आपको याद रहे। जनेऊ अर्थात् जीवन लक्ष्य आपको याद बना रहे और जीवन लक्ष्य के लिए जो काम आपको करने है, वे ध्यान में बने रहे। ये जीवन की महती आवश्यकता है। इन्हीं दोनों आवश्यकताओं को पूरा कर सके तो बात बन जाती है।
सुरक्षा के लिए क्या करना पड़ता है? कोई राष्ट्र, कोई समाज, कोई व्यक्ति, कोई कुटुम्ब सुरक्षित किस तरीके से रह सकता है? इसके लिए दो सूत्र है-एक लड़कियाँ अपने भाई के हाथ में राखी बाँधती है। बहिन राखी लेकर आयी और आपने उसे पाँच रुपये, एक धोती या टुपट्टा दे दिया और हो गया कार्य खतम! अरे भाई साहब, इसके लिए नहीं आती बहिन। भिखारिन नहीं है, जो आपसे कुछ माँगने आयेगी। किसलिए आयी थी? ये प्रतीकों का त्यौहार है। लड़कियाँ गा रही थी-” मेरी राखी”। मेरी से मतलब है नारी समाज, कोई व्यक्ति विशेष नहीं। कोई लड़की प्रतिनिधित्व करती है-सारे नारी समाज का। किसी का राष्ट्रीय, पारिवारिक और सामाजिक जीवन सुरक्षित बन सके, इसके लिए दो अपेक्षाएँ है। दो की रक्षा। काहे की रक्षा होनी चाहिए? एक रक्षा नारी के सम्मान की होनी चाहिए। नारी का सम्मान-शील भी उसी में आता है। नारी को दूसरे दर्जे का नागरिक, जैसा कि आज है, नहीं बनना चाहिए। उसको बलिष्ठ रहना चाहिए। नर के द्वारा प्रत्येक क्षेत्र में उसका रक्षा-सूत्र नारी की ओर से बाँधा जाता है। उसका सम्मान, उसकी इज्जत, उसका गौरव हर जगह होना चाहिए। नर-नारी दोनों इंसान हैं। दोनों को एक-दूसरे की इज्जत करनी चाहिए। विचारों का विनिमय, मतभेदों का जहाँ तक ताल्लुक है आप बातचीत कीजिए, समझौता कीजिए, लेकिन सम्मान पर किसी के आँच मत आने दीजिए। न मर्दों की ओर से नारी के
सम्मान पर आँच आनी चाहिये न नारी ओर से मर्द के सम्मान पर आँच आनी चाहिये। नारियाँ मर्द के सम्मान की ओर से नारी के सम्मान पर ठेस पहुँचायी जाती है। ये नहीं होना चाहिये। नारी के सम्मान की रक्षा सामाजिक सुरक्षा के लिये सूत्र है। जहाँ नारी सम्मान पायेगी, विकसित होगी। जहाँ आपने उसके विकसित होगा। जहाँ आपने उसके सम्मान में कमी करना शुरू किया वे नारी के लिये न जाने क्या से क्या हो जायेगा और उसकी अंतरात्मा उसका गौरव गिरता हुआ चला जायेगा। एक और कारण भी है कि आर्थिक दृष्टि से नारी का कमजोर होना उसके लिये कितना कमाई ओर आपकी बुद्धि का एक हिस्सा इस काम के लिये लगना चाहिये। नारी ने पुकार की है। कि हमारी आर्थिक कमजोरी का अनुचित लाभ न उठाने दिया जाये। सारे समाज का कर्तव्य है कि जब सारा समाज नारी से लाभ उठता है माता, पत्नी बेटी और बहिन के रूप में तो उसका टैक्स भी चुकाना चाहिये। नारी का आर्थिक स्वावलम्बन कमजोर पड़ता है तो उसकी मदद करे ये रक्षा-सूत्र की प्रेरणा और शिक्षा है।
एक और रक्षा-सूत्र है सामाजिक सुरक्षा का जो ब्राह्मण यजमान को बाँधता है ये क्या? ये श्रेष्ठ पुरुषों का अनुशासन है �
बीस वर्ष के गायत्री आलोक को व्यापक बनाते हुये युग निर्माण की पृष्ठभूमि बनाने के लिये हमें कहा गया था। यह कार्य हिमालय से लौटते ही समग्र तत्परता के साथ आरम्भ कर दिया। उसका शुभारम्भ तो पहले ही हो चुका था। गायत्री परिवार का ढाँचा खड़ा करना प्रेस लगाना जैसे कार्य तो इससे पूर्व ही हो चुके। अगले बीस वर्षों में क्या किया जाना है। यह जन समुदाय को पहले ही बताया जा चुका था। नवीन साधना सम्बन्धी कार्य पद्धति में कुछ नये तत्वों के समावेश की आवश्यकता पड़ी, जिन्हें एकान्त साधना करनी है, उनकी बात दूसरी है पर जिन्हें आपत्तिकालीन समय की माँग को देखते हुये जन आन्दोलन के क्रिया–कलापों में लगना है उन्हें अपनी साधना में ऐसे तत्वों का समन्वय करना चाहिये। जो व्यक्तित्व के इस प्रयोजन की सिद्धि में सहायक हो सके।
इस दृष्टि से प्रज्ञायुग की विधि व्यवस्था को मंत्राराधन करने के अतिरिक्त भी ऐसा कुछ करना था, ताकि अन्तःकरण और व्यक्तित्व का निरन्तर निखार होता रहे। इसके अतिरिक्त लोक साधना में संलग्न होने वालों की तीन धारा वाले उस उपक्रम को भी जीवनचर्या के हर पक्ष में सम्मिलित करना चाहिये जो साधक को त्रिवेणी संगम जैसी स्थिति में पहुँचा देता है।
बीज ही अंकुरित, पल्लवित होकर विशाल बनता है पर साथ ही यह भी गलत नहीं है कि पौधे को खाद, पानी निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की व्यवस्था भी आवश्यक होती है। अन्यथा बीज को सड़क पर बिखेर देने से वहाँ उद्यान खड़ा नहीं हो सकता। लोकसेवा में रुचि रखने वालों और सेवा क्षेत्र में उतरने वालों के लिये यह त्रिविध साधना नितान्त आवश्यक है। इसके सहारे व्यक्तित्व में वह विशिष्टता उपजती है, जो दूसरों को प्रभावित कर सके यह प्रयोजन आत्मसत्ता को प्रखर किये बिना सम्भव नहीं। यश-कामना के साथ साथ दूसरे स्वार्थ साधने के लिये तो कितने ही व्यक्ति लोकसेवी को चोगा पहनते है कुछ उछल कूद भी करते है, पर जब निष्कर्ष निकालने का अवसर आता है तो प्रतीत होता है कि कोई महत्वपूर्ण परिणति हाथ नहीं लगी। व्यर्थ ही लोकरंजन होता रहा। उसके साथ लोक मंगल का उद्देश्य पूरा न हो सका।
उपासना साधना और आराधना के समन्वय को तीर्थराज प्रयाग का त्रिवेणी-संगम कहा गया है। उपासना अर्थात् गंगा, साधना अर्थात् यमुना, सरस्वती अर्थात् आराधना। यही है वह समन्वय का महातीर्थ जिसका अवगाहन करने से आध्यात्मिक कायाकल्प होता है और कौआ, कोयल तथा बगुला हंस बन जाता है। रामायण के प्रतिपादनानुसार मात्र स्थान विशेष में जाकर पानी में डुबकी लगाने भर से वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।
हमें उपरोक्त निर्देशन को भी अपनी जीवनचर्या में सिरे से सम्मिलित करना पड़ा और जो भी उपासना प्रयोजन के लिये पूछताछ करने, मार्गदर्शन लेने आये उन सबको यह बताना पड़ा कि मात्र जप संख्या पूरी करने से बात नहीं बनेगी। ऐसे तो कर्मकाण्ड की पूर्ति असंख्यों करते रहते और उसका अभ्यास पड़ जाने से ढर्रा भी स्वभाव का अंग बन जाता है। और कृत्य यथाक्रम चलता रहता है पर वह लाभ हस्तगत नहीं होता जिसकी आशा की गई थी।
कहा जा चुका है कि मंत्राराधन के अतिरिक्त निष्ठावान् साधक को अपनी जीवनचर्या में उपासना, साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिये। स्मरण रहे, त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों में इन तीनों विशिष्टताओं को मनोभूमि में ओत प्रोत कर लेने की आवश्यकता है।
उपासना स्थूल शरीर से सम्बन्धित है। साधना चिन्तन से सूक्ष्म शरीर से और आराधना के कारण शरीर अन्तःकरण से सम्बन्धित है।
उपासना में आत्मा को परमात्मा के साथ एकाकार करने का अभ्यास करना होता है। भावना बनानी पड़ती है कि आत्मा को परमात्मा के प्रति समर्पित किया गया और उसी के आदेशानुसार चलन के लिये सच्चे मन से सहमत हुआ गया।
उप समीप आसन माने बैठना। यह समीप बैठना इतना वास्तविक, भावनात्मक और घनिष्ठ होना चाहिये कि दोनों के मध्य एकता की अनुभूति होने लगे और अपनी सत की आकांक्षा को मिटाकर इष्ट देव की सत्ता में विलीन होने का अनुभव होने लगे।
बूँद समुद्र में गिरती है तो अपनी सत्ता खो बैठती है और समुद्र की महानता में तिरोहित हो जाती है। पानी के पात्र में नामक या शक्कर डालने पर उनका अपना अस्तित्व तो समाप्त हो जाता है पर उनका खारापन या मिठास समूचे जलपात्र में घुल जाता है। आग में ईंधन डालने पर ईंधन का स्वतन्त्र अस्तित्व मिटता है किन्तु वह स्वयं अग्नि रूप हो जाता है। यह स्थिति ईश्वरार्पण होने वाले भक्त जन की होती है।
नाला नदी में मिलता है तो वह अपनी हस्ती गंवाने पर गंदा नहीं रहता, वरन् गंगाजल ही बन जाता है। बेल अपनी पृथक् सत्ता में थोड़ी दूरी तक जमीन पर फैल सकती है किन्तु पेड़ से लिपट जाने पर वह उतनी ही ऊँची उठती जाती है जितना कि पेड़ है। पतंग में अपनी निज की कोई क्षमता भले ही न हो, पर जब वह अपनी डोरी कुशल उड़ाने वाले के हाथों सौंप देती है, तो आकाश नापने लगती है। बंशी में अपना कोई स्वर नहीं पर जब निज के कूड़े-कबाड़े से विरत होकर बजाने वाले के होठों से लगती है तो वादक की समूची कला उस स्वल्प मूल्य के वाद्य यंत्र से प्रकट होती है और सुनने वाले मंत्र मुग्ध रह जाते हैं। यह समर्पण का ही प्रतिफल है।
पत्नी जब अपना तन मन धन पति को समर्पित करके विवाह बंधन में बंधती है तो तत्क्षण उसका पति की ख्याति और सम्पदा पर अधिकार बन जाता है। डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी पण्डित की पत्नी पण्डितानी सेठ की पत्नी सेठानी कहलाती है भले ही उसकी निज की विशेषता कुछ भी न हो। पति के वैभव पर उसका कानूनी हक उसी पति की सम्पदा पर तत्काल उत्तराधिकार मिलता है, भले ही विवाह को एक महीना ही क्यों न हुआ हो। इसी घनिष्ठता को समीपता या उपासना कहते है ओर उसके लाभ भी प्रत्यक्ष मिलते है।
यह लाभ उस वेश्या को नहीं मिल सकते, जो पैसे के लोभ में अपना शरीर बेचती और मनोरंजन करती रहती है। सकाम उपासनाएँ ऐसी ही घटिया वेश्यावृत्ति जैसी है जिसमें अपने स्वार्थों की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये छुट पुट कर्मकाण्ड किये जाते है। और उनमें व्यवधान पड़ने पर पूजा पाठ छोड़ बैठने से लेकर खीजने और गालियाँ देते तक का सिलसिला चल पड़ता हैं ऐसी कामनाओं से भरी हुयी पूजा-पत्री एक प्रकार से उपासना का उपहास है।
यह व्यावहारिक दृष्टि से भी असंभव है। एक देवता के दो भक्त परस्पर शत्रु हों और विजय के लिये दोनों मनौती मनाये तो दोनों की इच्छापूर्ति कैसे हो? जो हारेगा, वह गाली सुनायेगा। यदि इतनी सस्ती मनोकामना पूर्ति रही होती, तो किसी को भी योग्यता, पात्रता, तत्परता बढ़ाने की प्रतियोगिता में जीतने की आवश्यकता न पड़ती। थोड़ी-सी टंट घंट से ही सारे मनोरथ सिद्ध हो जाया करते और संसार का कोई व्यक्ति कठोर पराक्रम के लिये तैयार न होता, सभी पूजा पाठ का हेरा-फेरी करके मनचाही इच्छाएँ पूर्ण करा लिया करते। इसलिये उपासना के तत्त्वज्ञान में अपनी कामनाओं की भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं की तिलाञ्जलि देनी पड़ती है। और ईश्वर की इच्छाओं को ही अपनी इच्छा बनानी पड़ती है। भगवान मनुष्य से दो ही अपेक्षा करते है एक आत्मशोधन, दूसरा लोकमंगल। जो इन दो कामों को जितनी मात्रा में जितनी तन्मयता और तत्परता से करते है समझना चाहिये कि वे ईश्वर की इच्छा के अनुरूप अपने को ढाल रहे हैं। ऐसे भक्त जन ही भगवत् स्वरूप हो जाते हैं और वे नर में नारायण प्रकट कर सकने की समर्थता से सम्पन्न हो जाते हैं।
व्यावहारिक जीवन को भक्ति भावना से ओत प्रोत कर लेने को साधना कहते है। साधना अर्थात् अपने आपको साध लेना संभाल लेना सुधार लेना। अनगढ़ को सुसंस्कृत बना लेना। जन्म जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों के कारण मनुष्य के गुण कर्म स्वभाव में नर पशु स्तर की निकृष्टताओं भरी होती है वे अनायास ही उभरती रहती है मन भी पानी जैसी प्रकृति का है जो ढलान की ओर ही सहज गिरता है। इस गिरावट को रोकने और ऊँचा उठाने के लिये घोर प्रयत्न करना अविवेक और अनाचार से लड़ पड़ने का साहस सँजोना, यह वह प्रयास है जिसे साधना कहते हैं। गीता में जिस महाभारत का धर्मयुद्ध का वर्णन है। वस्तुतः वह आत्मशोधन की प्रक्रिया है जिसके लिये स्वभावगत दुष्प्रवृत्ति से जूझना पड़ता है।
अनगढ़ आने को जो जितना श्रेष्ठ समुन्नत बना सका समझना चाहिये उसकी साधना जीवन साधना उसी अनुपात से सफल हुई। माली अनगढ़ पेड़ पौधों को काटता छाँटता रहता है उसके साथ उगे हुये खर पतवार को उखाड़ फेंकता है तभी वह नये किस्म की कलमें लगाता है और उसका उद्यान शोभायमान बन पड़ता है।
साँप, रीछ, बानर जैसे अनगढ़ जानवरों को मदारी कुशलता से नाचने में सफल होता है और उन्हीं की कमाई पर अपने परिवार को भरण पोषण चलाता है। आत्मशोधन की जीवन साधना का स्वरूप भी प्रायः इसी प्रकार का है। किसान बैलों से महावत हाथियों से काम लेते है। सरकस वाली वैसी ही कुशलता जीवन शोधन में भी दिखाने पड़ती है। सरकस वाले शेर, घोड़े, हाथी, रीछ, कुत्ते आदि जैसे जानवरों को ऐसे कर तब दिखाने के लिये प्रशिक्षित कर लेते है। जिन्हें देखकर दर्शकों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहे। वे जानवर यशस्वी हों और मालिक को असाधारण रूप से धन कमाने का अवसर प्रदान करें। ऐसे ही प्रयास आत्मनिर्माण के सम्बन्ध में किये जाते है तो उन्हें साधना के नाम से पुकारते है। साधना का अर्थ है व्यक्तित्व को चरित्र को आदर्श बनाना। इस प्रकार के व्यक्ति ही दूसरों पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं उनके कथन का मूल्य समझा जाता है और प्रभाव भी पड़ता है। जो उपदेशों के अम्बार लगाते रहते है पर निज के जीवन में खोखले रहते है। उनका कला कोशल सराहा जाता है पर उनका अनुसरण करने के लिये कोई तैयार नहीं होता है।
रंगमंच पर राजा, ऋषि आदि की साज सज्ज बनाकर अभिनय करने वाले मनोरंजन तो कर देते है पर दर्शकों में से कोई उनके सम्बन्ध में ये धारणा नहीं बनाता कि वे सचमुच ही राजा या ऋषि है। लो नेतृत्व के लिये आत्म परिष्कार की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। उपदेशक का आसन तो ऊँचा रखा ही जाता है उसके चरित्र भी सर्वसाधारण की तुलना में अधिक उत्कृष्ट और आदर्श होना चाहिये। इससे कम में बात बनती नहीं। जिसे करने के लिये प्रवृत्त हुआ गया है। जनता की साधन श्रद्धा न होने के कारण कार्यान्वित हो ही नहीं पाता।
एक नशेबाज अनेकों को नशेबाजी सिखा लेता है। एक वेश्या अनेकों को व्यभिचारी बना लेती है। चोर और उचक्के अपने गिरोह बना लेते है। इसका कारण एक ही है कि उनका कथन और कृत्य एक होता है बुरी बातों के सम्बन्ध में जो नीति काम करती है, वही नियम भले कामों के सम्बन्ध में भी है। स्थायी, प्रभावी और उच्चस्तरीय प्रेरणा देने और अनुयायी बनाने के लिये मनुष्य का अपना चरित्र ऊँचा होना चाहिये। यही जीवन साधना है। इसके लिये हर समय अपने ऊपर तीखी नजर रखनी पड़ती है। और जहाँ भी लोभ या दबाव के क्रम पैर डगमगाने लगें, वहीं अपने को संभालना पड़ता है। त्रिपदा गायत्री को जीवनचर्या में सम्मिलित करने के लिये उपासना साधना के अतिरिक्त तीसरा चरण आराधना का कार्यान्वित करना होता है। आराधना का अर्थ है। लोकमंगल की पुण्य-परमार्थ की सेवा साधना। सेवा धर्म का परिपालन भी ईश्वर भक्ति का ही एक चरण है।
विश्वव्यापी नियम और व्यवस्था की शक्ति के रूप में ब्रह्माण्ड भर में समाये हुये निराकार भगवान का चर्म चक्षुओं से दर्शन नहीं हो सकता। देव प्रतिमाएँ तो अपनी अपनी मान्यता के साथ ध्यान प्रयोजन के लिये गढ़ी जाती है। वस्तुतः वैसी प्रतिमाओं वाले देवता कहीं होते नहीं। होते तो अनेक सम्प्रदायों की पृथक् कहीं होते नहीं। होते तो अनेक सम्प्रदायों की पृथक् पृथक् मान्यताओं के अनुरूप अलग अलग नाम रूप के भगवान क्यों दृष्टिगोचर होते। होते तो सूर्य चन्द्र की तरह संसार भर में एक ही रूप दिखाई क्यों न पड़ता। तब भिन्नता कैसे होती। देव प्रकरण बाल- बोध की तरह लोक शिक्षण के लिये है।
आराधना जिसकी की जा सकती है जो चर्म चक्षुओं से देखा जा सकता है। वह विराट् रूप के दर्शन कराये गये। यशोदा भी कृष्ण का बालक रूप नहीं, वास्तविक रूप देखना चाहती थी, उन्हें भी माटी न खाने की सफाई देते हुये भगवान ने अपना विराट् रूप ही दिखाया। रामावतार में कौशल्या को पालने में और काकभुसुण्डि को खेल के मैदान में अपना यही विराट् रूप दिखाया था।
आराधना इसी विराट् विश्व की, की जा सकती है। आराधना अर्थात् सेवा। सेवा निराकार ब्रह्म सत्ता की नहीं हो सकती। उसका तो अनुशासन ही पाला जा सकता है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के क्षेत्रों में मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहना, चरित्र भ्रष्ट न होना, आदर्शों का विधाओं का मर्यादापूर्वक पालन करना, कर्तव्यों का पालन ईश्वर को घट घट वासी मानकर करते रहना ही पर्याप्त है। उसे किसी के धूप दीपकों या मनुहार उपहार की आवश्यकता नहीं। वह निन्दा से या स्तुति से प्रभावित नहीं संवेदनाओं को उच्चस्तरीय बनाये रखने के लिये किया जाता है।
आराधना दृश्य संसार की, की जा सकती है। इसके लिये सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन करना पड़ता है। भगवान के अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म का उन्मूलन करने के लिये होते है। यह कार्य उसके अनुचरों को करने होते है। राम दल के रीछ, बानर, सेतु बाँधने, लंका उजाड़ने में ही नहीं, राम राज्य की स्थापना में अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में भी जुटे रहे। भगवान परशुराम ने अनीति से जूझने के लिये फरसा भी चलाया और इसके पश्चात् वे उद्यान आरोपण में जुट गये। यह दोनों ही पक्ष ईश्वराधना के धर्म सेवा के परमार्थ परायणता के है। इन्हीं में साधक को लगना पड़ता है।
किन्तु यह बन तभी पड़ता है जब लोभ ओर मोह के भवबन्धनों से अपने को निवृत्त कर लिया जाय, अन्यथा यह दो ऐसे महादैत्य है जो मनुष्य की सारी क्षमताओं को उदरस्थ कर जाते है और बदले में पापों का इतना भारी पोटला सिर पर लाद जाते हैं, जिनका प्रतिफल भुगतते भुगतते अनन्त काल तक नारकीय त्रास सहने पड़ते है।
मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएँ मुट्ठी भर है। कुटुम्ब को न बढ़ाया और जो आश्रित है उन्हें स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनने भर तक का भार वहन किया जाय तो उसे निबाहते हुये परमार्थ प्रयोजनों के लिये ढेरों समय निकाला जा सकता है। यह पूर्णतया शक्य है संसार के असंख्य मनुष्य गृहस्थ जीवन यापन करते है लोक मंगल के एक से एक बढ़कर काम किये है। उनकी विशेषता एक ही रही है कि महत्त्वाकाँक्षाओं और तृष्णा अहंताओं से अपने को बचाये रखा सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त अपनाया और इतना अधिक काम कर सके कि अगणितों ने उनसे प्रकाश प्रेरणा प्राप्त की अनेकों ने यश गाथा गाई ओर अभिनन्दन किया। इतिहास उनकी कृतियों उल्लेख करते हुये धन्य हुआ।
मथुरा रहकर हमने अपनी बहिरंग साधना का यही स्वरूप रखा। रात्रि में शयन के अतिरिक्त उपासना सम्पन्न कर ली। दिन में अपने प्रति कठोरता और दूसरों के प्रति उदारता का व्यवहार करते रहे। आत्मशोधन ओर लोकमंगल की साधना का यही सुनिश्चित स्वरूप चलता रहा।
जो लोग संपर्क में आये, उन सबको गायत्री विधान और तत्त्वज्ञान से अवगत कराते हुये यही कहते रहे कि गायत्री त्रिपदा है। उसके तीन चरणों की तीन प्रेरणाएँ है उपासना, साधना और आराधना। यदि विधान के साथ तत्त्वज्ञान का सम्मिश्रण रखा गया। तो उसका समुचित लाभ प्राप्त होगा। अपने अनुभव की साक्षी देकर जब यह प्रतिपादन समझाया तो सम्पर्क में आने वालों में अधिकाँश ने उस मार्ग पर चलना अंगीकार किया। यही कारण है जहाँ मात्र पूजा पाठ करने वाले सर्वथा खाली हाथ रहते और प्रपंच रचते देखे गये है वहाँ हमारे द्वारा प्रशिक्षित गायत्री साधकों में से अधिकाँश ने अपने व्यक्तित्व का कायाकल्प किया और लोकसेवा के क्षेत्र में बढ़ चढ़ कर भूमिका निबाही। एक लाख से अधिक लोकसेवी कार्य क्षेत्र में उतारने का एक बहुत बड़ा कार्य इसी प्रशिक्षण से आरम्भ किया।
कार्यकर्ता भी ऐसे जिनमें योग्यता थी ओर प्रतिभा भी। अनेकों ने अपनी निजी सम्पदा को बेच बेच कर बैंक में जमा किया और उसके ब्याज से अपना निर्वाह करते हुये पूर्णतया अवैतनिक रूप से काम करते रहे। बहुत ही ऐसे थे। जिनके पास निजी साधन कम या नहीं थे। उन्हीं को मिशन से ब्राह्मणोचित निर्वाह लेना पड़ा। आजीवन इस प्रकार का व्रत निबाहने वाले ओर अपने आदर्श से असंख्यों में प्राण फूँकने वाले कार्यकर्ता जिनके पास हों ऐसे संस्था संगठन इतने बड़े परिमाण में कदाचित् ही कहीं दृष्टिगोचर होते है। जहाँ है वहाँ रामकृष्ण मिशन की तरह सफलतापूर्वक महत्वपूर्ण क्रिया−कलाप भी चल रहे है।
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मशापहम्। श्रवणमगंलम् श्रीमदातं भुवि गृणन्ति ते भूरिदः जनाः।
परम पूज्य गुरुदेव की चर्चा करते करते वंदनीय माता जी श्रीमद्भागवत के इस श्लोक को भाव भरे स्वरों में अक्सर दुहराने लगती थी। पू. गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद उनका समूचा जीवन अपने आराध्य का कथामृत बन गया था। रोजमर्रा के जीवनक्रम में निजी जीवन के अनेकों घटना प्रसंगों के माध्यम से गुरुदेव के भाव विचारों उद्देश्यों को समझाया बताया करती। एक दिन शिष्यों बालकों को समझाती हुये कहने लगी बेटा! गीता की सही व्याख्या जानते हो कहाँ मिल सकती है? सुनने वाले कुतूहल और जिज्ञासा से उनकी ओर देख रहे थे। उनमें से कई ऐसे भी थे, जिन्होंने गीता की अनेकों टीकायें अनगिनत भाष्य समालोचनाएँ पढ़ी थी पर सही गलत का निर्णय नहीं हो सका। जब जिसको पढ़ा वही सही लगने लगा।
अद्भुत तर्क और अलौकिक व्याख्याएँ माता जी आज इनमें से सही व्याख्या बताने वाली है। सुनने वालों का ऊहापोह अधिक देर तक नहीं चला। उनके मुख से समाधान के स्वर निकले बोली गीता की सही व्याख्या सिर्फ कृष्ण के जीवन में मिल सकती है। जेल की काल कोठरी में पैदा होने वाली कृष्ण का जीवन हर पल आपदाओं विपदाओं से घिरा रहा। अधासुर बकासुर पूतना के ढेरों आघातों को सहते हुये भी उनकी प्रसन्नता यथावत रहीं किसी ने कभी उन्हें निराश हताश नहीं पाया। जिनके इशारे मात्र से युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट बन गये, वह स्वयं राजसूय यज्ञ में झूठी पत्तलें उठाने का अतिथियों के पैर धोने का काम प्रसन्नता पूर्वक करते रहें। कुबड़ी कुरूप स्त्री कुब्जा गँवार गोप गोपी उनके प्रेम से तृप्त हो गये। जहाँ कहीं पीड़ा देखी पतन देखा अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये उतावले हो उठे। सब कुछ करके भी सर्वथा निस्पृह पूरी तरह स्थित प्रज्ञ।
कहते कहते माताजी की बातों का रुख बदला कहने लगी। गुरुदेव के चिन्तन दर्शन का सही मर्म उनके जीवन में छिपा हुआ है उन्होंने जो कहा उसे पूरी तरह किया। बेटा! वह सिर्फ लेखक या कवि नहीं थे। वह ऋषि लेखक या कवि नहीं थे। वह ऋषि थे क्रान्तिदर्शी ऋषि। साहित्यकार और ऋषि में बड़ा फर्क होता है इसका स्मरण रखना। तुमने कभी देखा किसी की कविता पढ़कर मन डावाँडोल हो जाता है। डोल डोल उठता है। लेकिन उस कवि से मिलने जाओ तो बड़ी बेचैनी होती है। वह कोई साधारण आदमी से भी गया बीता आदमी मालूम होता है। तुम चकित होते हो, कैसे इस अभागे को ऐसी कविता का दान मिला। ऐसा अक्सर हो जाता है। क्योंकि कवि जो कहा रहा है उसकी झलकें भर आती है उसे कभी कभी छलाँग लगती है आकाश में फिर जमीन पर आ जाता है।
यही तो कवि और ऋषि का फर्क है। कवि छलाँग लगाता है, एक क्षण आकाश में उठ जाता है, फिर जमीन का गुरुत्वाकर्षण खींच लेता है फिर जमीन पर गिर जाता है। ज्यादा उचके कूदे खाई खड्ड में गिर जाते हैं समतल जमीन तक खो जाती है। तो निरा साहित्यकार अक्सर ऐसी दशा में होता है लंगड़ा लूला हाथ पाँव तोड़े अपंग। उसकी कविताओं में तो हो सकता है परमात्मा की बात हो और मुँह सूँघो तो शराब की बास आये। उसके गीत तो ऐसे हो सकते हैं कि उपनिषदों को माम करे। और उसका जीवन ऐसा फीका हो सकता है जहाँ कभी कोई फूल खिले इसका भरोसा ही न आये।
ऋषि और कवि में यही अन्तर है। ऋषि जो कहता है वही उसका जीवन है। सच तो यह है कवि का जो जीवन नहीं है उससे ज्यादा वह कह देता है। और ऋषि का जो जीवन है उससे वह हमेशा कम कह पाता है उतना नहीं कह पाता है क्योंकि शब्द में उतना अंटता नहीं है। उसके पास बहुत शब्द छोटे पड़ जाते है। कवि तो अक्सर अपने जीवन से ज्यादा कह देता है और ऋषि अपने जीवन से बहुत कम कह पाता है। उसका जीवन तो सागर है जो कह पाता वह बूँद ही रह जाती है।
गुरुजी ऋषि थे और में तो कहूँगी कि ऋषि से कुछ और अधिक थे। अपने छोटे से जीवन में उन्होंने बड़े बड़े से जीवन में उन्होंने बड़े बड़े प्रयोग किये। इनमें जो निष्कर्ष निकला उसे सरल सीधी भाषा में कह डाला। उनके जीवन के विविध घटना प्रसंगों का चिन्तन मनन करने से लोगों को पता चलेगा कि बाहर से सामान्य जीवन क्रम को स्वीकार करते हुये असामान्य असाधारण कैसे बना सकता है गीता कृष्ण इसीलिये तो दसवें अध्याय में कह गए हैं कि - तेशां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकं। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ यानि कि जो मेरे जीवन को बारीकी से जानते हैं, उन्हें मैं बुद्धि योग हूँ। अर्थात् उनकी बुद्धि निष्कल्मष हो जाती है। यही बात योगदर्शन लिखने वाले महर्षि पतंजलि ने कही है कि - वीतराग विषयं वा चित्तं।।9/37॥ अर्थात् ऐसे वीतराग भाषियों के जीवन का हृदय से चिन्तन करने पर व्यक्ति का अन्तःकरण प्रकाशित होता है।
उनके जीवन की चर्चा का मतलब व्यक्ति पूजा नहीं है। वह तो व्यक्ति और व्यक्तित्व के संकरे दायरे से अपने जीवन काल में ही बहुत ऊपर उठ गए थे। मैं तो जब उनके जीवन की चर्चा करती हूँ तो मेरा मतलब एक जीती-जागती प्रयोगशाला में किए गए छोटे-बड़े प्रयोगों से होता है-जिसे दुहरा कर कोई इंसान धन्य हो सकता है। मुझे उनके नजदीक रहने का अवसर मिला। उन्हें देखा-पाया-उनमें जी सकी-यह मेरा सौभाग्य। यह सौभाग्य पत्नी होने के कारण मिला, ऐसी बात नहीं। मैं। उनकी पत्नी के रूप में कम-शिष्या बनकर अधिक रही हूँ। तुम लोग भी उनके शिष्य हो, उनके बच्चे हो, चाहो तो वह सब कुछ सकते हो-पा सकते हो-जो मैंने पाया।
अब अध्यात्म के बारे में ही लो। कितनी भ्रामक मान्यताओं-भ्रम जंजालों में छिपी पड़ी थी यह विद्या। लोगों ने इसे विज्ञान कम इन्द्रजाल का खिलौना ज्यादा समझ रखा था। यह भी मान्यता जनमानस में घर कर गयी थी-कि आध्यात्मिक होने के लिए तो घर परिवार छोड़ना ही पड़ता है। यह स्थिति उन्हें सदा अखरी और उन्होंने अध्यात्म प्रेमियों को यही समझाया कि आज घर को ही तपोवन बनाने की आवश्यकता है। और यदि वह ठीक ढंग से किया जा सके तो आत्म कल्याण के सारे प्रयोजन घर में ही पूरे हो सकते है। अपने इस कथन को उन्होंने चरितार्थ करके भी दिखाया और एक ऐसे सद्गृहस्थ का स्वरूप प्रस्तुत किया जिस पर हजार गृह त्यागियों का निछावर किया जा सकता है। उन्होंने अपने महान जीवन की सुगन्धि से अपने छोटे परिवार को इस प्रकार सुगन्धित किया कि देखने वालों के मुख से यही निकलता रहा - धन्यो गृहस्थाश्रमः।” ऐसा गृहस्थ सचमुच ही धन्य है जिसमें महानता के समस्त आधार ओत-प्रोत हो रहे हैं। अपने जितने अपने उतने ही उन दूसरों के जिनके पास बालकों के समुचित विकास की व्यवस्था न थी। अपने और पराए का अन्तर मिटाने के लिए उन्होंने सदा बाहर के बच्चों को अपने परिवार में सम्मिलित किए रहने की आवश्यकता समझी और इस बत का पूरा-पूरा ध्यान रखा कि अपने और पराये के बीच स्नेह से लेकर लालन-पालन तक में किसी प्रकार का भेद-भाव तो उत्पन्न नहीं हो रहा है। व्यस्त कार्यक्रम से छँट कर जब भी वे अवसर पाते बालकों के साथ खेलने-खिलाने में, हँसने-हँसाने में ऐसे तन्मय हो जाते मानों वे मात्र बालक ही हों। बड़ी आयु में बचपन का आनन्द लेने के इन क्षणों को वे सर्वोत्तम मनोरंजन साधन होते हुए भी बालकों को छोड़ जाने कहाँ क्लबों, शराब घरों की गन्दी दुर्गन्ध सूँघने चले जाते हैं।
गृह व्यवस्था के छोटे-मोटे कार्यों को अक्सर वे स्वयं करने लगते और बालकों समेत हम सबको साथ लगा लेते और बताते कि छोटे दिखने वाले कार्यों को भी यदि मनोयोग कुशलता पूर्वक किया जाय तो वे कितने सुन्दर बन जाते है। तथा कर्ता की योग्यता का कैसा विकास होता है। झाड़ू लगाने से कपड़े धोने तक और भोजन बनाने से लेकर बर्तन माँजने, टूटी-फूटी चीजों की मरम्मत करने तक के कामों को सुन्दरता पूर्वक कैसे किया जा सकता है-बताने समझाने के लिए वे हम सब को साथ लेकर-जब भी सुविधा होती जुट जाते। मैं अक्सर झगड़ती और कहती-आप इन छोटी बातों के लिए अपना मूल्यवान समय क्यों बिगाड़ते हैं। मुझे शर्म लगती है कोई बाहर का देखेगा तो यही कहेगा कि इनकी गृहिणी आलसी या बेशऊर है अन्यथा घर गृहस्थी के काम ये स्वयं क्यों करते?
वे हँस पड़ते-इसमें हर्ज ही क्या है जो देखेगा सो सीखेगा कि मर्दों को गृहस्थी चलाना आना चाहिए। इससे मर्दों की पराधीनता दूर होगी और स्त्रियों को लगेगा कि वे ही छोटे-छोटे काम करने के लिए बाधित नहीं। इसी प्रकार हँसी-मजाक चलती रहती। और हम सब मिलकर घर का काम निपटाते, तो न केवल व्यवस्था सम्बन्धी अनेक जानकारियों का प्रशिक्षण मिलता वरन् आनन्द भी खूब आता सुन्दर, सुसज्जित और सुव्यवस्थित रहे तो छोटे से किराये के घर भी बढ़िया होटलों से भी अधिक सुव्यवस्थित रहे तो छोटे से किराये के घर भी बढ़िया होटलों से भी अधिक सुविधाजनक रह सकते है। इस शिक्षा को अपने परिवार के प्रत्येक व्यक्ति ने पाया है। घर की पाठशाला में जीवन व्यवस्था के अनेक गुण जिन बालकों ने सीखे हैं आशा की जानी चाहिए वे भी अपनी गृहस्थी ऐसे ही आनन्दमय बनाकर शान्ति से जिएँगे और साथियों को सन्तोषपूर्वक जीने देंगे।
परिवार का खर्च, व्यवस्था, सुझाव के बारे में घर के हर सदस्य का परामर्श लिया जाता और आवश्यकता तथा कठिनाइयों को हर एक से पूछा जाता। जितना निराकरण सम्भव था किया जाता जो बात आर्थिक सीमा मर्यादा के कारण सम्भव न थी उसे वस्तुस्थिति समझा दी जाती। यही कारण था स्वल्प साधनों में निर्वाह करने पर हममें से कभी किसी को असन्तोष नहीं हुआ,
सांख्य योग’ नामक गीता का द्वितीय अध्याय सर्वाधिक है, यह पूर्व में बताया जा चुका है। बहत्तर श्लोकों के इस अध्याय के प्रारंभिक प्रसंग “अर्जुन के अंदर से शिष्यत्व आ उभार एवं उसके द्वारा श्रीकृष्ण को सद्गुरु-भगवान के रूप में वरण किया जाना” की चर्चा की जा चुकी है। यह प्रसंग द्वितीय अध्याय के दसवें श्लोक गीता का उपदेश यहीं से आरंभ होता है। इसके पूर्व अर्जुन कह चुका है “मेरे लिए निश्चित कल्याणकारक साधन मुझे कहिए, क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ-आपके शरण हुए मुझ अकिंचन को शिक्षा दीजिए।” साथ ही वह यह भी कहता है कि मेरी इंद्रियों को सुखाने वाले शोक को दूर कर सके ऐसा ज्ञान मुझे दीजिए, क्योंकि भूमि में निष्कंटक, धन-धान्य संपन्न राज्य को-स्वामित्व को प्राप्त होकर (सातवाँ व आठवाँ श्लोक)। इसके बाद के दो श्लोक में संजय द्वारा दी गई जानकारी से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे। इस अंक में अर्जुन के अंदर से शिष्यत्व के जागरण के बाद के इसी प्रसंग का विवरण है, जो योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से तत्त्वज्ञान के रूप में निस्सृत हुआ है।
अर्जुन के अंदर एक अभीप्सा पैदा कर महाक्रान्ति की है श्रीकृष्ण ने, तभी वह युद्ध न करने की बात कहकर भी शिष्य भाव से उनकी शरणागति आया है एवं वह तत्त्वज्ञान जानना चाहता है, जो उसकी आत्मिक प्रगति भी कर सके एवं युगधर्म की स्पष्ट व्याख्या उसे समझा सके। गुरु ने भगवान ने जब भी शिष्य की ऐसी स्थिति देखी है, तो इसे उचित मनः स्थिति पाकर उसकी अच्छी-खासी धुलाई की है। चाहे वे विरजानन्द जी हों, रामकृष्ण परमहंस हों अथवा श्रीराम शर्मा आचार्य जी। गुरु की डाँट भी भले के लिए होती है। बिना धुलाई के रंगाई कैसे संभव होगी। शिष्य के प्रारब्धों को इसमें कम में काटा भी नहीं जा सकता। हम कभी-कभी असमंजस में आ जाते हैं कि हमने तो समर्पण किया हैं एवं गुरुजी हमें डाँट लगा रहे हैं-हमें झाड़ रहे हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हममें से न जाने कितने हैं, जिन्हें उस डाँट को सुनने का सौभाग्य मिला, वह न मिलती, तो संभवतः पूर्व का अहंभाव, पूर्वाग्रह सभी यथावत
रहते एवं वह प्रगति न हो पाती, जिसने आज यहाँ तक पहुँचाया है। यदि वह प्रगति हो नहीं पाई है, तो इसका कारण संभवतः यही हे कि गुरु की डाँट को हमने अंतस् में प्रविष्ट नहीं होने दिया, बुरा मान बैठे अथवा हमारे जड़ता भरे पूर्वाग्रह आड़े आ गए। अर्जुन श्रीकृष्ण की डाँट ‘कुतस्त्वा कश्मलमिंद विषमे सपुपस्थितम्’ के माध्यम से दूसरे अध्याय के दूसरे श्लोक में सुन चुके हैं एवं तत्त्वज्ञान को जानने की अभीप्सा प्रकट कर रहे हैं, भगवान उन्हें गीता का वह तत्त्वज्ञान सुनाते हैं, जो हम सब शिष्यों के लिए है। अनादिकाल से यह ज्ञान सबका मार्गदर्शन करता रहा है एवं आगे भी असमंजस में-ऊहापोह में फँसी मानवजाति का त्राण करता रहेगा। समय-समय पर छोटे-छोटे व्यवधानों-शरीरगत क्लेशों या तनाव के कारण-पारिवारिक क्लेशों या तनाव के कारण-पारिवारिक संकटों के कारण हम शोकग्रस्त हो जाते हैं। समझ में नहीं आत, क्या करे? तब हमें समग्र मार्गदर्शन प्रदान करती है।
श्री भगवान कहते हैं-
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। गतासूनगतासूंश्च नानूशोचन्ति पण्डिताः॥ (2/11)
अर्थात्- “हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पंडितों के से वचन कहता है- परंतु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं, उनके लिए भी पंडितजन शोक नहीं करते।”
भगवान कह रहे हैं कि तु तो पंडित है। इतनी बड़ी-बड़ी पंडितों जैसी-बुद्धिमानों जैसी बातें पूर्व में कह चुका है। बोलता है-ज्ञानियों की भाषा और है पूर्णतः अज्ञानी। जो सोचना नहीं चाहिए, वह सोचता है। बुद्धि का मान रखने वाले बुद्धिमान-तथाकथित पंडित तर्क तो कई दे लेते हैं, किंतु व्यावहारिक धरातल पर उस ज्ञान के लागू आने का मौका आता है तो फिसड्डी साबित होते हैं। तर्क-बुद्धि को प्रपंच ही तो समर्पण में आड़े आता है। इसीलिए पहली चोट-डाँट लगाकर-लताड़ मारकर श्रीकृष्ण उसके अहं को विगलित करने का प्रयास करते हैं। कहते हैं कि पंडितजनों को जो प्राण छोड़कर चले गए हैं या जीवित हैं, उनके लिए कभी भी शोक नहीं करना चाहिए। भगवान सद्गुरु भी हैं, पारदर्शी भी, ऋषि भी और अंतर्यामी भी। वे कह रहे हैं कि मन के अरमान तो तेरे बड़े ऊँचे हैं। बड़ी-कड़ी विद्वता की बातें कहता है वे कहता हैं कि तू भीख माँगकर गुजारा कर लेगा, किंतु युद्ध नहीं करेगा। भीख माँगना अर्जुन के लिए संभव नहीं है, क्योंकि वह वैरागी नहीं है। वह स्वभावतः एक योद्धा है।
भिक्षा माँगना एक योगी-वैरागी के लिए ही ठीक हैं, वह भी तब, जब वैराग्य पूर्णतः प्रज्वलित हो। गैरिक वस्त्र जो पहने जाते हैं, वे प्रज्वलित अग्नि ज्वालाओं के प्रतीक हैं विरजु होम किया जाता है तब संन्यास धर्म अपनाया जाता है। वैरागी-संन्यासी अपना ही श्राद्ध-दर्पण करती है व फिर अपने नाम-कुल को भूल जाता है। कभी इस तरह भिक्षा माँगना ज्ञान की बात मानी जाती थी। महात्मा बुद्ध ने भी इस परंपरा का निर्वाह किया। परंतु परमपूज्य गुरुदेव ने कहा-आज के युग का धर्म, आज का नवसंन्यास है- परिव्रज्या समयदान - अंशदान द्वारा समाज को पीड़ा-पतन-पराभव से मुक्त कराना। यह बात अर्जुन के कथन के परिप्रेक्ष्य में बड़ी अच्छी तरह समझी जा सकती है कि युगधर्म का निर्वाह एवं परिव्राजक बनकर समय की माँग का परिपालन पूज्यवर के अभियान में जुटकर किया जा सकता है।
हम अर्जुन के तर्कों व उसकी पांडित्यपूर्ण तर्कों पर योगेश्वर श्रीकृष्ण की लताड़ के परिप्रेक्ष्य में चर्चा कर रहे थे। भगवान कहते हैं-तुझे शोक नहीं करना चाहिए। न तो ऐसा है कि मैं किसी काल में नहीं था तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे। (जिनके लिए तू शोक कर रहा है) और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे। (बारहवाँ श्लोक)। इसके आगे वे कहते हैं कि जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। उस विषय में धीरपुरुष मोहित नहीं होते (शोक नहीं करते)। (तेरहवाँ श्लोक)
देह से परे जाकर समझने की बात कहकर भगवान अपने शिष्य को आसक्ति से मुक्त करना चाह रहे हैं। हर गुरु बचपन की याद दिलाकर, जो छूट गया से ठीक अब वर्तमान को देखने-जीवनयात्रा की निरंतरता के देखने की बात शिष्य को समझाता है। गुरु पूर्वकाल को भी जानता है, हमारे बचपन को भी-हमारे वर्तमान को भी एवं भविष्य में क्या होने वाला है यह भी। वह बार-बार यह बात कहता हैं, क्योंकि जब तक शिष्य के आसक्ति के बंधन नहीं छूटेंगे, तब तक अध्यात्म के मर्म को नहीं जाना जा सकता।
परमपूज्य गुरुदेव भी बार-बार हमारे आसक्ति के बंधनों पर चोट मारते थे। जो भी जीवनदान देकर शान्तिकुञ्ज आने की बात कहता था, उसे यही कहते कि एक झटके से मोह तोड़ सको पारिवारिक संबंधों से, तो ही आओ। नहीं तो रहोगे यहाँ, मन रहेगा परिवार संबंधियों में। न जाने हमारे काका जी, मौसी जी का क्या हो रहा होगा। जब भी कोई कार्यकर्ता किसी शादी-ब्याह में, किसी की बीमारी में जाता था, तो पूज्यवर यही कहते थे कि “तू अपनी नानी की बेटी की मौसी की, बच्ची के ब्याह में क्यों जा रहा है। अब तू बाबाजी बन गया है। तेरी जिम्मेदारी बड़ी है। भले ही तू अपने खर्चे से जा रहा है, तेरे समय की कीमत तुझे मालूम नहीं हैं। तू यहीं रह। शादी-ब्याह के बाद रिश्तेदारों को युगतीर्थ में आशीर्वाद के लिए बुला ले। सब निहाल हो जायेंगे, तेरा पैसा व मिशन का समय बच जाएगा। तू यहाँ के खर्चे से यदि शादी-ब्याह में जाएगा तो मान ले कि हमारे पेट में चाकू मारकर तो मान ले कि हमारे पेट में चाकू मारकर जा रहा हैं। किसी की बीमारी में जाना हो बेटे, प्रार्थना हम कर देंगे। तू कोई डॉक्टर है जो जाकर ठीक कर देगा। अब व्यवहार आदि की प्रक्रिया से परे होकर चलो तुम सब।” हमने यह सब यहाँ सभी को याद दिलाने को लिखा है कि देहातीत यात्रा-आसक्ति के बंधन तोड़कर यात्रा करने-आसक्ति के बंधन तोड़कर चलने की बात लोकसेवी के लिए एक दिशा-दर्शन की तरह है। यही समय-समय पर पूज्यवर ने सबको समझाई। यदि युगगीता के परिप्रेक्ष्य में आज भी यदि हम उनकी-गुरुसत्ता की वेदना को समझ सकें तो अपने आसक्ति के बंधन तोड़कर अपने को एक विराट परिवार का अंग मानकर उन सभी पर अपनी पारिवारिकता को लागू कर उनके कार्य को अंजाम दे सकते हैं। यदि श्रीकृष्ण-अर्जुन के इस संवाद के द्वारा यही तथ्य हमारे केंद्रीय-क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं की समझ में आ जाए, तो यह लेखन सार्थक माना जाएगा।
श्री भगवान अर्जुन के आसक्ति के बंधनों पर चोट करने के बाद चौदहवें श्लोक में उसके शोक संबंधी कथन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहते है कि “हे कुंती पुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुख को देने वाले इंद्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं। इसलिए तू उन्हें सहन कर।”
इसके पहले आठवें श्लोक में अर्जुन कह चुका है कि “मेरी इंद्रियों को सुखाने वाले शोक को दूर कर सकने वाला उपाय मुझे दिखाइये यहाँ भगवान कह रहे हैं कि एवं उसे सहन करने की आदत डालनी चाहिए। वे आगे कहते हैं ऐसा व्यक्ति जिसे से संयोग व्याकुल नहीं करते, वही मोक्ष के योग्य होता है। (पंद्रहवाँ श्लोक) आगे वे सत्रहवें-अठारहवें श्लोक में कहते हैं कि हे अर्जुन! नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह संपूर्ण जगत- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहीं हैं। इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गए हैं। इसलिए हे भरतवंशी! तू युद्ध कर।
कितने बड़े दर्शनपरक प्रसंग को अति-संक्षेप में कहकर योगेश्वर कृष्ण उसे पुनः उसी प्रवाह में आते हैं कि यह शरीर तो नाशवान् है, मात्र आत्मा ही है, जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता। जो दिखाई देता है, वह नाशवान् है-क्षणभंगुर हैं। जो अदृश्य है, वह अविनाशी है। देखते-देखते कितने लोग मृत्यु के गर्त में समा गए। उस अविनाशी तत्त्व को पहचान, जिसका नाम है आत्मा, जो देहातीत हैं। वे अगले श्लोकों में यही कह रहे हैं और उसे इस सांख्ययोग के प्रथम भाग ‘देहातीत आत्मा का भान’ के संबंध में समझाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि वह अपना कर्तव्य समझ सके एवं युद्ध में स्वयं को नियोजित कर सके।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थात्- जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है। यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है, क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
उपर्युक्त व्याख्या आत्मा के विभिन्न गुणों के विवेचन के साथ तीसवें श्लोक तक आई है। गीता का सार माने जाने वाले एवं किसी प्रियजन की मृत्यु पर शोकग्रस्त व्यक्ति के लिए मननीय-पठनीय अंश यही हैं, जो ग्यारहवें से तीसवें श्लोक तक फैले हुए है। बारबार अहसास करा रहे हैं भगवान कि इस देह के लिए परेशान मत हो। इन रिश्तेदारों के प्रति जो मरणधर्मा हैं, मोह मत कर। गुरु हर शिष्य को ही हम बुद्धिमानों की भाषा-पांडित्यपूर्ण वचन बोलते हैं- गुरु हमें आइना दिखा देता है। यह गुरूर किसलिए - यह मोह किसके लिए- समाप्त हो जाने वाली काया के लिए-नश्वर संबंधों के लिए। बारबार योगेश्वर कृष्ण अपने शिष्य अपने से कहते हैं कि वह शाश्वत संबंधों को पहचानो, अस्थायी संबंधों को भूले। शाश्वत है- आत्मा-परमात्मा का, जीव ब्रह्म का, शिष्य-गुरु का संबंध तथा अस्थायी व नाश को प्राप्त होते रहने वाला संबंध है-रिश्तेदारों वाला-भाई चाचा, मामा वाला। हम जिन्हें सगा मानते हैं-वे वस्तुतः मात्र गुरु-है युगों-युगों तक अनंतकाल तक चलते हैं गुरु-शिष्य के संबंध। जिस में सच्ची भावना है, उदात्त प्रगाढ़ पवित्र संबंध है- वह मात्र गुरु- शिष्य का संबंध है। जिस में सच्ची भावना है, उदात्त भावना है, प्रगाढ़ पवित्र संबंध है- वह मात्र गुरु- शिष्य को ढूँढ़ लेता है एवं सच्चे शिष्य को ढूँढ़ लेता है एवं सच्चा गुरु सदैव सच्चे शिष्य को ढूँढ़ लेता है एवं सच्चा शिष्य सदैव सच्चे गुरु को ढूँढ़ लेता है।
भगवान बारबार अर्जुन को मोह पर चोट करते हुए अगले श्लोकों में भी यही बात पुनः जोर देकर कहते हैं-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
अर्थात्-पुराने वस्त्रों का त्याग कर मनुष्य जैसे नए कपड़े धारण कर लेता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर नए शरीरों को प्राप्त करती है। इस आत्मा को शस्त्र काट सकते हैं न आग ही जला सकती है, न जल इसे गला सकता है और न वायु इसे सुख सकता है।
नित्य-सर्वव्यापी-अचल-स्थिर-सनातन आत्मा की विशेषताएँ समझा रहे योगेश्वर उसे अगले श्लोकों में विकाररहित बताते हुए कहते हैं कि इस प्रकार से आत्मा को समझ लेने वाले अर्जुन को किसी भी स्थिति में शोक नहीं करना चाहिए, न ही अवसादग्रस्त होकर युगधर्म से मुँह ही मोड़ना चाहिए। यह सारा प्रसंग देहातीत आत्मा के भान का है, जो वे बराबर करा रहे है, ताकि उनका शिष्य मोहग्रस्तता की स्थिति से उबर सके। वे कहते हैं कि आज जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है एवं मरे हुए का जन्म निश्चित है, इसलिए बिना कोई विकल्प या कारण वाले इस शोक को करना उसे शोभा नहीं देता। आगे (सत्ताईसवां श्लोक)। आगे यह कहते हुए कि यह आत्मा सबके शरीरों में अवश्य है (उसका वध नहीं किया जा सकता- वध तो मात्रा शरीर रूपी बाह्य आवरण का होता है) इसलिए किसी भी स्थिति में उसे शोक नहीं करना चाहिए। वे सीधे युगधर्म की व्याख्या कर देह से स्वधर्म आचरण की बात पर आ जाते हैं।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
अर्थात् अपने धर्म को देखकर भी तुझे भय नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।
इस श्लोक के माध्यम से साँख्य योग रूपी इस दूसरे अध्याय के शिष्यत्व के जागरण के बाद का देहातीत आत्मा के मन से संबंधित दूसरा प्रकरण समाप्त होकर तीसरा आरम्भ हो जाता है एवं यह है देह से स्वधर्म आचरण की मीमांसा-परक भगवान अर्जुन से कहते हैं कि तुझे यह देह इसलिए मिली है कि तू देह के माध्यम से स्वधर्म निर्वाह कैसे किया जाना चाहिए, यह समझ सके। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि हमें यह शरीर मिलता है कि इस माध्यम से ही आत्मा और ईश्वरीय प्रकाश की रश्मियाँ फैलती हैं। यह हमें मिला ही इसलिए है कि हमारे माध्यम से परमात्मा झर सके, परमात्मा का वैभव प्रकट हो सके। फव्वारा है हमार शरीर-हमारा मन-हमारी देह, हमारे प्राण हमारे कर्म एवं विचार। अद्भुत ईश्वरीय संरचना है मानवी देह। भगवत् चेतना में आरूढ़ होकर यदि हम इस देह से कर्म करेंगे, तो वह स्वधर्म आचरण-कर्तव्यपालन कहा जाएगा। अपने कर्तव्यपालन कहा जाएगा। अपने कर्तव्य के परिपालन से बड़ा कोई तप नहीं है।
इस परिप्रेक्ष्य में महाभारत की एक कथा बड़ी प्रासंगिक है। एक जाजल्य मुनि थे, जिनके तप की महिमा का गान गाया जाता था। उनने अपनी तपस्या से अद्भुत सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। धोती वे हवा में फेंक देते थे एवं वह सुख जाती थी। कोई तार या रस्सी बँधनों की जरूरत नहीं पड़ती थी। एक दिन उनने देखा कि किसी कौवे ने उस पर बीट कर दी। उनने क्रोध से उसे देखा एवं वह जलकर भस्म हो गया। उन्हें अपनी तपश्चर्या-जन्य उपलब्धियों पर बड़ा ही नाज था। इसी घटना के तुरंत बाद एक आकाशवाणी हुई कि हे जाजल्य! ज्ञान व तप जानना चाहता है, तो अहंकार मत कर, सुलभा से मिलना चाहते हैं। सुलभा ने कहा कि वह थोड़ी देर में आएँगी- अभी बच्चों को खिला रही हैं, थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। उन्हें गुस्सा आ गया। बोले- तू जानती है कौन आए है। रास्ते भर लोग हमें प्रणाम करते आए है। तू हमें पहचान की भी उपेक्षा कर रही है। अंदर से सुलभा बोल- न हम धोती हैं, जो आपके इशारे पर सूख जाएँ, न ही हम कौए है, जिसे जलाकर प्रणाम करते आए होंगे, पर हम जानते हैं कि आप क्या है? मुनिवर आश्चर्यपूर्वक सोचने लगे कि इसे अतींद्रिय ज्ञान कैसे मिला? यह कैसे हमारे बारे में इतना जानती है। सुलभा बोली-मुनिश्रेष्ठ आश्चर्य न करें, यह देह से स्वधर्म के आचरण का तप ही है, जिसने हमें यह सिद्धि दी है। यदि और जानना हो तो तुलाधार वैश्य के पास जाएँ।
तुलाधार वैश्य ग्राहकों को निपटा रहा था। मुनिवर बोल- हमें सुलभा ने भेजा है। हमारी बात पहले सुनो। तुलाधार बोले-पहले हम ग्राहकों को निपटायेंगे, फिर आपकी बात सुनेंगे। तुरंत उन्हें क्रोध आ गया। तुलाधार तुरंत बोले कि हम कौए हैं, न धोती है, क्रोध मत करिए धैर्य रखिए। आश्चर्यचकित जाजल्य मुनि सोचने लगे कि इन्हें यह सिद्धि कैसे मिली। वे बोले- हम मुनाफाखोर नहीं हैं, ईमानदारी से तौलते हैं- अपने धर्म पर सही-सही आचरण करते हैं। यही हमारा तप है। आगे जाजल्य मुनि को ऐसे कई अनुभव हुए, जिनने उन्हें यह समझाया कि अपने कर्तव्य का -धर्म का परिपालन ही सबसे बड़ा तप है। उन्हें अपने तप व उसकी सिद्धि पर इस तरह गर्व नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये क्षणिक होती हैं व क्रोध के आने के बाद समाप्त हो जाती हैं। जनक आदि ज्ञानी भी इसी देह के स्वधर्म आचरण से योगी-विदेह बन गए, यह तत्त्वज्ञान भी इसी माध्यम से जाजल्य मुनि को मिला।
यहाँ भगवान भी बार-बार यही तथ्य अपने शिष्य अर्जुन की समझा रहे हैं व कह रहे हैं कि यह युद्ध जिसे लड़ने तू खड़ा हुआ है, अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप में भाग्यवानों को ही मिल पाता है एवं यदि वह इस कर्तव्य का पालन- अपनी देह से स्वधर्म का आचरण नहीं करेगा-इस धर्मयुक्त युद्ध में नहीं लड़ेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा। सब लोग बहुत समय तक उसकी अपकीर्ति का कथन करेंगे और माननीय पुरुषों के लिए तो अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है। (32, 33 व 34 वाँ श्लोक)
परमपूज्य गुरुदेव भी युग-संधिकाल के लिए हमें तप बता गए। संधिकाल के लिए हमें तप बता गए। महापुरश्चरण में भागीदारी, लोकहित में ही अपना हित समाहित है, यह मानते हुए है? ज्ञानयज्ञ में लगे रहना, यही सबसे बड़ा तप पूज्यवर ने बताया। लोगों को सद्बुद्धि की शरण में लाना-उज्ज्वल भविष्य का मार्ग दिखना- यही सबसे बड़ा आज का कर्तव्य है, यह पूज्यवर ने बताकर गायत्री परिवार को दिशा दी। इस तप-साधना में सुख भी छोड़ने पड़ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी सहन करनी पड़ती है, परंतु सेवासाधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तप-साधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
हमारी गुरुसत्ता ने 1926 से सतत् 1994 तक स्थूल रूप में शिव और शक्ति के रूप में तथा बाद में अपने सूक्ष्म व कारण रूप में ऐसा दिव्य संरक्षण प्रदान किया है, जिसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं माता भगवती देवी एक-दूसरे के पूरक थे-अविभाज्य अंग थे। आश्विन कृष्ण संवत् 1982, 20 सितंबर 1926 को प्रातः 8 बजे साँवलिया बोहरे (आगरा) के श्री जसवन्तराय के घर जन्मी परम वंदनीय माताजी एक दैवीसत्ता- शक्ति के रूप में ही अवतरित हुई थीं। यह मात्र संयोग ही नहीं है कि पंद्रह वर्ष की आयु में उसी वर्ष की आयु में उसी वर्ष वसंत पर्व पर उनके भावी जीवनसाथी- उनके आराध्य एवं गुरु परमपूज्य पं. श्रीराम शर्मा जी ने भी अपने अखण्ड दीपक के प्रज्ज्वलन के माध्यम से अपनी सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता के लगभग 16 मील दूर स्थित आँवलखेड़ा ग्राम में दर्शन किए एवं अपने तीनों जन्मों की जानकारी प्राप्त की थी। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि उसी वर्ष श्री अरविंद ने भागवत् चेतना का सिद्धिवर्ष इसे घोषित किया था। इस ये सारे असाधारण स्तर के संयोग बताते हैं कि ऋषियुग्म के रूप में एक दैवी चैतन्यशक्ति हम सब का मार्गदर्शन करने आई। यह बात अलग है कि ‘देवदूत आया, हम पहचान न सके’ लिखने व पढ़ने वाले हम उनका अत्यधिक सामीप्य पाने वाले परिजन भी अंत तक उनके वास्तविक स्वरूप नहीं जान पाए।
परमपूज्य गुरुदेव के जीवन की सबसे बड़ी थाती रही है- वह पाती जो वे 1971 में मथुरा छोड़कर हरिद्वार आने तक परिजनों को भेजते रहे, जिसके माध्यम से ममत्व पर केंद्रित इस विराट तंत्र का निर्माण हुआ। ये मात्रा काले वाले पत्र ही नहीं थे, उस व्यक्ति के अंतरंग-बहिरंग को झकझोरने वाला सूक्ष्म मार्गदर्शन भी थे, अपने वास्तविक स्वरूप की एक झलक भी थी तथा एक परोक्ष आश्वासन भी कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे, शर्त यही है कि लोकसेवा के निमित्त उनकी विभूति का कुछ अंक नियोजित हो। ऐसा ही एक पत्रा जिसमें वे स्वयं अपनी लेखनी से अपने सूक्ष्मशरीर की उनके कार्य की सिद्ध हेतु उपस्थिति की बात करते हैं, यहाँ उद्धत है-
हमारे आत्मस्वरूप, 13-5-55
पत्र मिला। विवाह का विस्तृत समाचार जाना। वह सब समाचार पूर्ण रूप से हमें मालूम है। क्योंकि हमारा सूक्ष्मशरीर उस समय चौकीदार की तरह वहीं अड़ा रहा है और विघ्नों को टालने के लिए-शत्रुओं को नरम करने के लिए-आपत्तियों को हटाने के लिए जो कुछ बन पड़ता है, बराबर करते रहते हैं। फिर भी आपके पत्र से सब बातें भली प्रकार विदित हो गई। सब कार्य कुशलपूर्वक हो गया, यह आपके पुण्य, सद्भाव और बुद्धिचातुर्य का फल है माता की कृपा तो सर्वोपरि है ही।
यह पत्र जो मिशन के कर्णधार एवं कानूनी सलाहकार भी रहे श्री शिवशंकर जी के पिता श्री बशेशर नाथ जी को लिखा गया था। इस परिवार की चारों पीढ़ियाँ परमपूज्य गुरुदेव के लिए समर्पित रही हैं। कितना अद्भुत संरक्षण है व खुली स्वीकारोक्ति भी कि “हाँ हम मौजूद थे।” साथ ही यह भी कि यह कार्य आपके पुण्य व बुद्धिचातुर्य के कारण ही सफल हो पाया है। मात्रा गुरुकृपा को ही नहीं, मनुष्य को स्वयं को भी श्रेय मिल जाए, वह भी गुरु की लेखनी के माध्यम से, इससे बड़ा विनम्रता भरा कथन और क्या हो सकता है।
ऐसी ही एक अनुभूति का जिक्र यहाँ करना अप्रासंगिक न होगा। श्री राम बहादुरसिंह कार्यवाहक गायत्री ज्ञान मन्दिर प्रज्ञानगर पो. माध्वपुर छतौना (जि. सुल्तानपुर उ.प्र.) द्वारा लिखी यह घटना परमपूज्य गुरुदेव के इलाहाबाद दौरे से संबंधित हैं उन्हें श्री रामलाल जी श्रीवास्तव, जो गायत्री शक्तिपीठ इलाहाबाद के मुख्य ट्रस्टी भी हैं, वर्षों से जुड़े पुराने कार्यकर्ता भी तथा अंग्रेजी युगनिर्माण योजना पत्रिका जो 1971 के बाद के कुछ वर्ष प्रकाशित हुई थी, के संपादक भी रही हैं। उनने श्री राम बहादुर सिंह को एक घटना सुनाई कि पूज्य गुरुदेव मध्यप्रदेश के दौरे पर इलाहाबाद होते हुए जाने के लिए आए। रामलाल जी से कहा - भाई! ट्रेन तो देरी से है, इस बीच यूनिवर्सिटी पुस्तकालय हो लेते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहले भी 2-3 बार पुस्तकों के लिए पूज्यवर आ चुके थे। यही सोचकर कि यूनिवर्सिटी से यदि देरी होगी तो सीधे स्टेशन निकल जाएँगे, वे सामान आदि लेकर चलने लगे। गुरुदेव ने कहा-भई रामलाल! यहीं आकर जाएँगे। अभी आते हैं। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में पहुँचकर पूज्यवर ऐसे डूब गए कि उन्हें दीन-दुनिया का होश ही नहीं रहा। जैसे-जैसे ट्रेन जाने का समय समीप आ रहा था। रामलाल बाबू का जी घबड़ा रहा था। वे 2-3 बार बोले कि सामान भी लेना है। स्टेशन भी पहुँचना है। गुरुदेव बोले कि समय हो गया होगा। यह भी तो एक यज्ञ है। इसे बीच में छोड़कर नहीं चल सकते। गुरुदेव पुस्तकें पढ़ने में पूरी तरह मग्न थे। एक पुस्तक में लगभग दस मिनट लगता, वे एक तरफ रख देते। वे हिंदी अंग्रेजी, प्रकृत, पाली, संस्कृत सभी भाषाओं की किताबें इस बीच देख गए। ट्रेन का समय निकल गया।
इस बीच उनके घर मित्र भटनागर जी गुरुदेव को लेकर स्टेशन ही गए होंगे, वे सीधे वहीं पहुँच गए। थोड़ी देर ढूँढ़ा पर यह सोचकर कि कहीं बैठ गए होंगे, हम छूट जाएँगे। उनने टिकट लिए व चलती गाड़ी में बैठ गए। निर्धारित कार्यक्रम में पूरा भाग लिया। लौटे तो गदगद थे कि न जाने कैसे गुरुदेव ने ट्रेन में हमें ढूँढ़ लिया व अगले स्टेशन पर ही हमारे पास आकर बैठ गए। पर आप नहीं मिले। कार्यक्रम बढ़िया रहा। हम सीधे स्टेशन से ही आ रहे हैं, पर स्टेशन पर दिखते भी कैसे। वे तो लायब्रेरी से ट्रेन टाइम के निकल जाने के आधे घंटे बाद रामलाल जी के साथ घर लौटे व चादर ओढ़कर सो गए। रामलाल जी ने पूछा भी कि अब कार्यक्रम का क्या होगा। वे हंस कर लेट गए। उधर भटनागर जी सोच रहे थे कि रामलाल जी कैसे हैं, जो गुरुजी को अकेले भेजकर खुद घर पर रह गए। भटनागर जी का वार्तालाप अंदर लेटे गुरुदेव ने सुना-बुलाया व करि के क्या लड़कपन करते हो। दोनों की बात सच्ची है! मैं यहाँ भी था, वहाँ भी था। वहाँ रेल में भी भटनागर जी के साथ मैं ही था। यज्ञ में भी मैं ही था। तुम इस बात को गोपनीय ही रखा। यह मेरा स्वरूप मेरे महाप्रयाण के बाद ही लोगों को पता लगे, यह ध्यान रखना। समय आने पर ऐसी ढेरों बातें लोगों को पता लगेंगी, तब वे हमारे स्वरूप को पहचान पाएँगे।
धन्य हैं गुरुदेव-धन्य हैं आपकी लीला। अखण्ड ज्योति पत्रिका का वर्तमान संपादक जो तथाकथित बुद्धिजीवी भी रहा है। इन सब बातों की वैज्ञानिकता को नहीं समझता, किंतु वह स्वयं साक्षी रहा है अपने गुरु के दैवीस्वरूप का। वह क्या तो समीक्षा करे, वह क्या किसी को समझाए?
जबलपुर शक्तिपीठ की प्राण-प्रतिष्ठा हो रही थी। दूसरा दिन था। गुरुदेव आए-शक्तिपीठ में प्राण-संचार किया। बीसों हजार लोगों ने दीक्षा ली, चरणस्पर्श किए,किंतु रिलीवर के अभाव में श्री बी.एस.गौतम ‘श्रीनाथ की तलैया में दिया उनका ऐतिहासिक प्रवचन में न सुन पाए, न ही अपनी लगाई ड्यूटी से हट पाए। चरण स्पर्श न कर पाने का दुख उन्हें साल रहा था। पूज्यवर की विदाई का समय निकल चुका था। सभी विदा करके शक्तिपीठ लौटते दिखाई भी दे रहे थे। गौतम जी शक्तिपीठ पर जहाँ ड्यूटी लगी थी, खड़े थे। एकाएक उनने देखा कि पूज्यवर उनके सामने से निकल कर आए व मंदिर में माँ गायत्री के सामने जाकर खड़े थे। किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में गौतम जी समझ भी न पाए कि यह क्या हो गया। दो मिनट बाद वे निकले उनके सामने आकर खड़े हो गए। श्री कपिल जी को बोले कि पूजा कि थाली लाओ। थाली आई। पूज्यवर ने अपने प्रिय भक्त का-सच्चे स्वयं-सेवक का तिलक किया और कहा बेटा यह शक्तिपीठ संभालना। यह तुम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। हिलक–हिलक कर रोते हुए उनने पूज्यवर के चरण छुए। कपिल जी भी उसके बाद उन्हें हृदय से लगाते हुए बोल पड़े-भैया गौतम तुम बड़े भाग्यवान हो। थोड़ा आगे निकलकर पूज्यवर ने काफिला लौटाने की बात कही व मंदिर दर्शन को आ गए। जबकि कार्यक्रम ऐसा नहीं था। तुम्हारी भक्ति स्तुत्य है।
वे इतना वार्तालाप कर ही रहे थे। कि इतने में कुछ फोटोग्राफर आ गए। पूज्यवर फिर मंदिर में गए। गौतम जी को बुलाकर कहा-चरणस्पर्श कर व फोटोग्राफर्स से फोटो खींचने को कहा। वह फोटो उस घटना की सारे परिवार को आज भी याद दिला देता है। अपने भक्त की पुकार सुन जो गुरुवर चले आएँ, उन्हें भगवान न कहें तो क्या कहें।
ऐसा ही एक पत्र यहाँ उद्धृत करने का मन है। जिसमें 20’1-67 को परमपूज्य गुरुदेव ने अंजार-भुज-गुजरात की अपनी प्रिय शिष्यों को लिखा है-
तुमने स्वप्न में हमें देखा, सो वह स्वप्न नहीं था। जाग्रति थी। हमारा प्राण शरीर में से निकल कर निष्ठावान् साधकों के पास जाया करता है और उन्हें प्रकाश प्रदान करता है। जब हम उधर जाते हैं, तभी तुम उस प्रकार का अनुभव करती हो। कितनी स्पष्ट स्वीकारोक्ति है उस प्रक्रिया की, जो गुरुसत्ता की अनुभूति के रूप में भक्तों को हुआ करती थी। ऐसी ही विलक्षण अनुभूतियों का विस्तृत वर्णन तो अगले अंकों में परिजन पढ़ेंगे, यहाँ तो परमपूज्य गुरुदेव की लिखी कुछ पंक्तियाँ मातृसत्ता के चरणों में उनकी पाँचवीं पुण्यतिथि पर समर्पित हैं-वे भावमयी हैं। प्यार तो जैसे उनके राम-राम में बसता है। उन्हें हमारी तरह बातें बनाना तो नहीं आता, पर ममत्व लुटाने में वह हमसे कहीं बहुत आगे हैं। भले ही हमारी तरह वह बौद्धिक चातुर्य की धनी न हों, किंतु ममता की पूँजी उनके पास हमसे कई गुना अधिक है। इसी कारण हम उन्हें सजल श्रद्धा कहते हैं। मिशन के प्रत्येक परिजन ने उन्हें इसी रूप में अनुभव किया है।”
उसी सजल श्रद्धा की पूज्यवर ने प्रखर प्रज्ञा के समीप स्थापना करवाई एवं दोनों के महाप्रयाण के बाद उन्हें अग्नि वहीं पर दी गईं। वह समाधि स्थल जो शान्तिकुञ्ज के प्रवेशद्वार के समीप है, हर परिजन को ऋषि-युगल के सतत् सान्निध्य की अनुभूति कराता है- उनके दुखों-कष्टों का निवारण करता है।
दूध में घुले मक्खन को अलग निकालने के लिए उबालने-मथने जैसे कई कार्य संपन्न करते पड़ते हैं। जैसे ही मलाई तैरकर ऊपर आती है, एक चरण पूरा हो जाता है-शेष थोड़े से पुरुषार्थ से पूरा हो दुग्ध का सार नवनीत के रूप में मिल जाता है। प्राणवान प्रतिभाओं को भी समुद्र रूपी दुग्ध के नवनीत की संज्ञा दी गई। इनका अनुपात जिस समाज में जितना अधिक होता है, उतना ही उसके प्रगति के पथ पर बढ़ चलने की संभावनाएँ प्रबल होती चली जाती है। प्राणवान प्रतिभाओं की इस युगसंधि के उत्तरार्द्ध की समापन वेला में जितनी आवश्यकता है उतनी विश्व के इतिहास में पहले कभी नहीं रही। अनिष्ट के अनर्थ से मानवीय गरिमा को विनष्ट होने से वे ही बचा सकते हैं। इन दिनों उन्हीं की ढूँढ़-खोज का कार्य चल रहा है।
आज के असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए महाकाल की ही योजना के अंतर्गत एक युगसंधि महापुरश्चरण की योजना बनी। 1980 में घोषित अभियान साधना के उग्र तपश्चर्या-परक बारह वर्षीय उत्तरार्द्ध वाले एक विश्वव्यापी महाअनुष्ठान के रूप परिवर्धित हुए इस उपक्रम की घोषणा परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आश्विन नवरात्र 1988 को की गई थी। अब उस महापुरश्चरण की अंतिम समापन घड़ियाँ आ पहुँची हैं। यह सारी अवधि सारी मानवजाति के लिए प्रतिकूलताएँ झेलते हुए अग्नि परीक्षा की तरह बीती हैं। इस सदी का अंतिम गुरुपूर्णिमा पर्व भी इस महापुरश्चरण के साधना वर्ष व पूर्णाहुति वर्ष की मिलन वेला में आया है एवं हमें सोचने पर विवश करता है कि इस अग्निपरीक्षा में-तप−साधना प्रधान अनुष्ठान ने क्या वह उद्देश्य पूरा किया, जिस प्रयोजन के लिए इसे आरंभ किया गया था। अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने तब अक्टूबर 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखा था- यह एक लंबा संग्राम है। संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है। इस युगसंधि वेला में तो हम सबको उस स्तर की तप−साधना में संलग्न रहना है, जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा का अवतरण संभव कर दिखाया था। महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरंतर अनवरत गति से शरीर छूटे तक चलते ही जाते हैं। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरंतर रहने का संकल्प संजोये रहते हैं। इसी परंपरा का निर्वाह उन्हें भी करना है जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में अनुकरणीय-अभिनंदनीय उपलब्धियाँ कमानी हैं।
परमपूज्य गुरुदेव ने ‘प्रतिभा की महासिद्धि’ की साधना हेतु ही इस विषम वेला में एक सामूहिक उसकी समापन घड़ियाँ हमारे सामने हैं। सारा मार्गदर्शन जो 1988 से 1990 तक लिखे पूज्यवर के अमृत वचनों के माध्यम से मिलता है-वह एक ही धूरी पर घूमता है। “प्राणवान प्रतिभाओं का परिष्कार उनके माध्यम से युगपरिवर्तन रूपी दैवी प्रयोजन पूरा किया जाना।” इसके लिए उनने साधना की धुरी पर दो मोर्चे आरंभ किए जाने की बात कही थी-पहला-आदर्शवादी सहायकों में उमंगों को उभारना और एक परिकर, एक सूत्र में संबद्ध करना, साथ ही कुछ नियमित-सृजनात्मक गतिविधियों का आरंभ होना, जो सद्विचारों को सत्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका निभा सकें। दूसरा-अनीति विरोधी मोर्चा खड़ा किया जाना। उसे एक प्रयास से आरंभ कर विशाल-विकराल बनाया जाना।
परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद श्रद्धांजलि समारोह एवं शपथ समारोह से लेकर परम वंदनीय या माताजी के मार्गदर्शन में संपन्न देवसंस्कृति दिग्विजय के आश्वमेधिक पराक्रमों का लक्ष्य उपर्युक्त दो मोर्चों को सशक्त किया जाना था। 1994 की भाद्रपद पूर्णिमा को परम वंदनीय माताजी के गुरुसत्ता के साथ विलय हो जाने के बाद उनके सूक्ष्म संरक्षण में बाद के भारत व विश्व के विराट भव्य आयोजन संपन्न हुए, साथ ही संस्कार महोत्सवों, जिनकी संख्या प्रखर साधना वर्ष के शुभारंभ तक 400 को पार कर गई के द्वारा भारतीय संस्कृति के निर्धारण प्रायः चार करोड़ से अधिक सामान्यजनों तक जो गाँव-शहरों-महानगरों में रहते थे, पहुँचे। प्रखर साधना वर्ष वसंत पर्व 22 प्रायः सात माह पूरा होने को आ रहे हैं। अब महापूर्णाहुति वर्ष 10 फरवरी 2000(वसंत पंचमी) से आरंभ होने जा रहा हैं। इस गुरु पर्व पर हम एक के उत्तरार्द्ध एवं दूसरे की पूर्व तैयारी के संधि-स्थल पर खड़े हैं। एक ऐतिहासिक महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कैसे-क्या होने जा रही है, यह सबके लिए एक कुतूहल का विषय हो सकता है। इस संबंध में बड़ा ही स्पष्ट चिंतन एवं एक सुनिश्चित लक्ष्य पूज्यवर हमारे समक्ष रख गए हैं। गुरु सत्ता ने प्रज्वलित संवेदनशीलों, प्राणवान, प्रतिभावानों की लक्ष्य संख्या एक से दो करोड़ निर्धारित की है। निश्चित ही गुरुसत्ता का भविष्य-कथन मात्र पदार्थ यज्ञ नहीं, विभूति यज्ञ की ओर इंगित करता है। जिसका हवाला प्रारंभ में दिया गया था।
विभूतियों से तात्पर्य परिष्कृत प्रतिभाओं से है, जो नवसृजन के निमित्त नियोजित होंगे। वे ही सही अर्थों में युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार-प्रज्ञा अभियान रूपी इस विराट संगठन के सही अर्थों में उत्तराधिकारी-प्रतिनिधि एवं श्रेय के अधिकारी माने जाएँगे, जो इस प्रखर साधना वर्ष में स्वयं को परिपक्वता के शिखर तक पहुँचाएँगे एवं अपने को दस से अधिक व्यक्तियों के रूप में बहुगुणित कर महापूर्णाहुति के निमित्त दो करोड़ साधकों के एक विराट जाग्रत संगठन के रूप में प्रस्तुतीकरण कर सकेंगे। ऐसे बीस लाख परिजन भी यदि हम इस प्रखर साधना वर्ष में संकल्पित कर लेते हैं। जिनने 48 साधना केंद्रों के माध्यम से स्वयं को जोड़ा है या अगले दिनों जुड़ सकते हैं तो यह लक्ष्य हम पूरा कर सकेंगे। वस्तुतः यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
महापूर्णाहुति की एक मोटी रूपरेखा फिलहाल परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत की जा रही है। मूल ढाँचा तो यही रहेगा, किंतु क्रमशः इसके सूक्ष्मतम विस्तार का पूरा स्वरूप निश्चित ही इस वर्ष की (आश्विन नवरात्र 10-18 अक्टूबर 1999) की वेला तक सबके समक्ष प्रस्तुत हो सकेगा। महापूर्णाहुति को परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित सभी मार्गदर्शन परक टिप्पणियों तंत्र ने पाँच खण्डों में बाँटा है।
प्रथम चरण-पूर्वाभ्यास महापूर्णाहुति के पूर्व एक पारमार्थिक पूर्वाभ्यास तथा संघशक्ति के प्रतीक रूप सभी धर्म-संप्रदायों की उसमें साझेदारी के रूप में इस वर्ष दिसंबर माह की तीन तारीख को एक आयोजन एक साथ सारे भारत में एक ही समय संपन्न किया जाना है। यह प्रसंग भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान के राष्ट्रीय कार्यक्रम की पूर्व वेला में जन-चेतना के जागरण के रूप में आया है। इस सदी की अंतिम पोलियो खुराक 5 दिसंबर 99 के एक साथ सारे भारत में शिशुओं को पिलाई जाएगी। उसके पहले जन-चेतना जगाते हुए एक अभियान अपने विराट व्यापक तंत्र के द्वारा चलाया जाएगा, जिसमें सभी धर्म-संप्रदायों-समाजसेवी संगठनों की भागीदारी होगी। उन्हें सहमत किया जाएगा कि पोलियो उन्मूलन के इस महायज्ञ के साथ “सबको स्वास्थ्य, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य ‘की प्रार्थना के रूप में 3 दिसंबर की संध्या 5 से 6 सभी एक साथ दीपयज्ञ करें। जहाँ दीप प्रज्ज्वलन संभव नहीं-वहाँ मोमबत्ती जलाकर, लोबान जलाकर अथवा अपने देवालयों की प्रतिमा के समक्ष एक साथ बैठकर प्रार्थना की जा सकती है एवं जनसाधारण की इसमें भागीदारी कराई जा सकती है। इसके लिए विभिन्न धर्म संप्रदायों के प्रमुखों, उपासनागृहों -देवालयों, तीर्थों तथा रोटरी लायन्स क्लब भारत विकास परिषद जैसे समाजसेवी संगठनों से संपर्क, अपने परिजनों को अभी से आरंभ करना होगा। इसमें हमें जन-जन तक पहुँचने, सबसे सद्भाव स्थापित करने का मौका मिलेगा, साथ ही महापूर्णाहुति का एक पूर्वाभ्यास भी संपन्न हो जाएगा, जिसमें संभवतः इन सभी संगठनों की हम पुनः भागीदारी करा सकेंगे।
द्वितीय चरण-फरवरी 2000 पर- वसंत पर्व, जो पूज्यवर का आध्यात्मिक जन्मदिवस व मिशन का प्रमुख पर्व है, की पावन वेला में पुनः एक ही समय सभी जगह पूर्वाभ्यास के समान दीप-महायज्ञ किए जाएँगे। इक्कीसवीं सदी के आगमन की शुभ वेला एवं महापूर्णाहुति के शुभारंभ पर सभी शाखाओं-प्रज्ञापीठों-शक्तिपीठों-प्रज्ञा-मंडल केंद्रों एवं पूर्व में जुड़े अन्यान्य धर्मावलम्बियों के उपासनागृहों में एक साथ संपन्न इस दीपयज्ञ के माध्यम से महापूर्णाहुति वर्ष में किए जानेवाले संकल्पों की, राष्ट्रनिर्माण की प्रतिज्ञाओं की घोषणा की जाएगी। हर परिजन अपनी भूमिका-भागीदारी का स्वरूप एवं अपने प्रभाव क्षेत्र का तब तक अध्ययन कर चुका होगा। ये सभी घोषणाएँ इस वेला में होंगी।
तृतीय चरण-वसन्तपर्व (10 फरवरी 2000) से गायत्री जयंती (11 जून 2000) पूरे देश में क्रमशः ग्राम पंचायत, ब्लॉक, जिला, संभाग एवं प्राँत स्तर पर पाँच खंडों में महापूर्णाहुति के घोषित कार्यक्रम पूर्व निर्धारित अनुशासनों के साथ चलेंगे।
चतुर्थ चरण- महापूर्णाहुति का उत्तरार्द्ध होने के नाते सामूहिक स्तर पर इसे वर्ष के अंत तक संपन्न किया जाना है। इसका स्पष्ट स्वरूप समयानुसार परिजनों को पढ़ने को मिलेगा। वसंत से गायत्री जयंती तक राष्ट्र-भर में व विश्व के अस्सी से अधिक देशों में उभरी शक्ति और संकल्पित कार्यों का संयुक्त स्वरूप इसमें उभर कर आएगा। इसमें पूरा भारत के परिजनों सहित युगतीर्थ आँवलखेड़ा, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं शान्तिकुञ्ज हरिद्वार की सक्रिय भूमिका रहेगी। जिस क्षेत्र में जिस स्तर की क्षमता उभरकर आएगी, उसी आधार पर परिजनों को-प्राणवानों को इक्कीसवीं सदी के सृजन अभियान की कमान सौंपी जाएगी।
पंचम चरण-वसंत पर्व 2001(29 जनवरी) -पर एक साथ पुनः दीपयज्ञ संपन्न होने के रूप में पूरा होकर महापूर्णाहुति का समापन होगा। इसमें 2000 के अंत में क्षेत्र-वार परिजनों-संगठनों द्वारा स्वीकार की गई जिम्मेदारियों की स्वीकारोक्ति के साथ नई सहस्राब्दी का स्वागत दीपदान द्वारा किया जाएगा।
यह दीपदान एक साथ सारे भारत के विभिन्न केंद्रों-देवालयों एवं विश्व भर के शक्ति केंद्रों में संपन्न होकर एक ऐसी शक्ति को जन्म देगा, जिसके माध्यम से आगत के शुभ होने एवं विभीषिकाओं के निरस्त होने की संभावनाएँ प्रबल होंगी। भारतीय संस्कृति पुनः विश्व संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित हो, उज्ज्वल भविष्य के माध्यम से सतयुग की वापसी के संकल्प को साकार करेगी।
आज विश्व में दो ही शक्तियों का बोलबाला है। एक राजतंत्र और दूसरा धर्मतंत्र। दोनों यों तो स्वतंत्र विधाएँ हैं, किंतु नासमझी में हम दोनों में पारस्परिक मिलावट करते रहते हैं, इसी कारण इनका सुनियोजन नहीं हो पाता, न जनमानस इनके सही स्वरूप को समझ पाता हैं राजतंत्र वह है जो राज्य या राष्ट्र की सुरक्षा- आंतरिक कानून−व्यवस्था एवं राजस्व जुटाकर जनसामान्य की प्रति के सरंजाम जुटाने के हेतु संकल्पित एक तंत्र है। धर्मतंत्र व्यक्ति की सदाशयता को- सद्भावना को उसके आँतरिक उत्कर्ष के निमित्त नियोजित करने हेतु मार्गदर्शन करने वाला एक ऋषिकालीन तंत्र है, जिसके कारण हमारी शाश्वत-सनातन संस्कृति अभी तक अक्षुण्ण रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए है। न जाने कितनी सभ्यताएँ, संस्कृति आई, किंतु समय के प्रभाव से वे विलुप्त होती चली गईं। किंतु यह हमारी भारतीय संस्कृति ही है, जिसने अपना समरसता का, सहिष्णुता का स्वरूप बनाए रख सारे विश्व का मार्गदर्शन सतत् किया है और इसका श्रेय जागृत प्रगतिशील धर्मतंत्र को जाता है।
राजतंत्री शक्ति के प्रभाव के औचित्य-अनौचित्य पर विचार न कर येन-केन प्रकारेण किसी राष्ट्र के तंत्र का संचालन करता हैं कूटनीति एवं छल उसके रग–रग में समाए हुए हैं। यदि ये न हों तो संभवतः कोई शासक अपना अस्तित्व ही न बचा सके। राजतंत्र कभी राजा-महाराजाओं जमींदारों, सामंतशाही नवाबों के शासन के रूप में था, पर अब वह समाप्तप्राय है। इंग्लैंड की रानी, स्पेन, हालैंड जापान आदि देशों के राज-प्रमुखों का अभी भी अस्तित्व है, पर वे अब सक्रिय राजनीति के रूप में नहीं, एक मोहर मात्र लगाने हेतु प्रयुक्त होते हैं। कभी “इंग्लैंड के साम्राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं” यह अत्युक्ति कही जाती थी एवं औपनिवेशिक साम्राज्य के रूप में सारी धरती तो नहीं, पर तीन-चौथाई पर तो उनका शासन था ही। लोकशाही की हवा आई एवं उस प्रवाह में सारे तंत्र का स्वरूप बदल गया। राजतंत्र का एक और स्वरूप हमें मजदूरों के रहनुमा के रूप में उभरे साम्यवादी तानाशाहों के रूप में देखने को मिलता हैं कार्लमार्क्स व लेनिन के सिद्धांतों को भुलाकर एशिया, पूर्वी यूरोप, चीन आदि सभी देशों में जनता ने इसे भी ठुकरा दिया। एक उदारवाद की लहर आई एवं उसमें सारा तथाकथित साम्यवाद बर्लिन की दीवार ढहने के साथ चरमरा गया। आज इन सभी देशों में उलटे उपभोक्तावाद, भोगवाद, पूँजीवाद, सुख-सुविधावाद की होड़ लगी है। एक अति के बाद दूसरी अति। कहीं-न कहीं कोई त्रुटि रही होगी। तभी आज उस तंत्र का सिद्धांत-हीनता के कारण अस्तित्व समाप्तप्राय-सा है।
राजतंत्र की ही बात करें तो इसके दुरुपयोग के रूप में हिटलर-मुसोलिनी की तानाशाही व उसके परिणाम के रूप के रूप में हुआ एक भयावह नरसंहार, द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका तथा परमाणु बत का पहला विस्फोट याद आता है और अंदर से हिलाकर रख देता है। सभी अफ्रीकी देश प्रायः तानाशाहों, मिलिट्री शासकों की गिरफ्त में रहे हैं। सबने जी भरकर शोषण किया व अपनी देश की अर्थ-व्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है। चाहे वह केन्या हो, मलाबी, काँगो या जाँबिया अथवा बुरुंडी, अंगोला सभी देशों में आज भी लोकतंत्र पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है। लेटिन अमेरिका (दक्षिण अमेरिका) व मध्य अमेरिका का इतिहास तो रक्तरंजित कारनामों से भरा पड़ा है। देख-देखकर लगता है कि वाकई एक जन-जन को मार्गदर्शन देने वाली विधा का मानवता के विकास के लिए नहीं, विनाश के लिए प्रयोग हुआ है। जिस महाशक्ति के पास कहने को तो लोकतंत्र है व सारे विश्व की अगुआई करने का दावा करता है, वह स्वयं हथियारों के निर्माण व उनकी उपर्युक्त राष्ट्रों में बिक्री से अपना आर्थिक क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित किए हैं। जिस दिन वह यह सब बंद कर देगा, उसका पूँजीवाद एवं तथाकथित लोकशाही ध्वस्त हो जाएगी।
1947 में स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद एक विराट लोकतंत्र के रूप में भारत उभरकर आया हैं उसके चारों तरफ ही नहीं, विश्वभर में सरकारें लोकतंत्र के दायरे से बाहर निकलती चली गई, किंतु भारतवर्ष में अभी भी चुनाव के आधार पर जन-नेता चुने जाते हैं एवं वे राष्ट्र का मार्गदर्शन करते हैं। सारी उपलब्धियों के बावजूद-लोकतंत्र को अक्षुण्ण बनाए रखने पर प्रशस्ति के बावजूद विगत बीस-पच्चीस वर्षों से राजतंत्र को जो स्वरूप अपने देश में देखा जा रहा है, उससे लगता है कि यह तंत्र कहीं इतना विकृत तो नहीं हो गया कि इसके आमूलचूल परिष्कार हेतु प्रबुद्धों, प्रतिभाओं को, जनचेतना को जगाने हेतु आगे आना पड़े। इस अंक में इस विषय पर कई लेख विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र (1 अरब जनसंख्या, प्रायः 60 करोड़ से अधिक मतदाता) एवं इस माह हो रहे चुनाव पर लिखे गए हैं। क्या इस विषय में अध्यात्मतंत्र की- परिष्कृत धर्मतंत्र की कोई भूमिका हो सकती है, इसे प्रासंगिक मानते हुए यह संपादकीय लिखा मतदाता) एवं इस माह हो रहे चुनाव पु लिखे गए हैं। क्या इस विषय में अध्यात्मतंत्र की -परिष्कृत धर्मतंत्र की कोई भूमिका हो सकती है, इसे प्रासंगिक मानते हुए यह संपादकीय लिखा जा रहा है। विकृति तो राजतंत्र में थोड़ा बाद में परिलक्षित होने लगी, किंतु इसके बीज स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महात्मा गाँधी की अपनी संस्था काँग्रेस को लोकसेवी तंत्र के रूप में ‘डिजाल्व कर राजनीति से परे चलने की सलाह की अवज्ञा के साथ ही डल गए थे। शासनतंत्र में भ्रष्टाचार, भाई- भतीजावाद, कुर्सी से चिपके रहना, दल बदलना एवं अशोभनीय आचरण का क्रम थोड़ा बाद से चला गया एवं परिणति निकली- इस विराट तंत्र के विघटन एवं कुछ समय बाद राष्ट्र में पहली बार सैनिक शासन स्तर की ‘इमरजेंसी लागू होने के रूप में तब से अब तक के 24 वर्षों में कितनी सरकारें बनी हैं- कितने अधिक क्षेत्रीय दल बन गए हैं एवं कितनी अल्पावधि की सरकारें बनी है, यह आँकड़े देखकर दिमाग चकरा जाता है। जब राष्ट्र के नागरिकों की मूलभूत आवश्यकता न पूरी हो पा रही हों, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी नितांत जरूरी विधाओं के लिए बजट में प्रावधान एक -चौथाई से भी कम हो, तब चुनाव हेतु अरबों की राशि खर्च करना व वही निष्कर्ष बार-बार हाथ लगना क्या सिद्ध करता है? यही कि अब सबके मिल-बैठकर इस तंत्र की उपयोगिता-अनुपयोगिता पर चर्चा करने का समय आ गया। गायत्री परिवार सारे विश्व में छाया हुआ है। धर्मतंत्र में एक बहुत बड़े तंत्र के रूप में प्रखर व उज्ज्वल इसकी छवि है। कई लोग पूछते हैं कि युग-निर्माण को तत्पर यह विराट संगठन सारे रचनात्मक कार्य करने में लगा है, क्यों वह राजतंत्र को परिष्कृत करता? क्यों वह राजतंत्र में अपनी भागीदारी को संकल्पित नहीं होता। ऐसा समय- समय पर अपने कई ऐसे परिजन भी पूछते रहते हैं, इसी कारण जागने लगी है कि इस विराट तंत्र से जुड़े लोगों का वे प्रतिनिधित्व संसद में कर सकेंगे। हमें समय-समय पर ऐसी असमंजस भरी घड़ियों में परमपूज्य गुरुदेव का अक्टूबर 1970 में लिखे ‘ हम राजनीति में भाग क्यों नहीं लेते’ तथा फरवरी 1970 में लिखे ‘अध्यात्म विकृत नहीं परिष्कृत रूप में ही जी सकेगा’ ये दो संपादकीय पढ़कर सारा समाधान मिल जाता है। सभी परिजन भी राष्ट्र में सक्रिय विघटन-कारी शक्तियों के चलते माहौल में जब चुनाव संपन्न हो रहे हैं, इन्हें जान सकें, इसलिए यहाँ कुछ सटीक मार्गदर्शन, अपने आराध्य सत्ता की लेखनी के माध्यम से ही दिया जा रहा है। यह युगसंधि की प्रस्तुत वेला में प्रखर साधना वर्ष की समापन की समापन की अवधि व महापूर्णाहुति की तैयारी में संलग्न परिजनों का निश्चित ही समाधान करेगा, उनके मनोबल को ऊँचा उठायेगा। इससे पूर्व जुलाई 1961 में लिखे पूज्यवर के लिखे एक लेख प्रतिष्ठापना होनी ही है’, (पृष्ठ 60) के कुछ अंश उद्धत हैं।
पूज्यवर लिखते हैं- “अगला समय अनीति सहन नहीं करेगा, भले ही वह किसी वर्ग की क्यों न हो। राजतंत्र समाप्त हो गए, अब वर्ग तंत्र भी समाप्त होने जा रहा है। नए युग में किसी को इस आधार पर ऊँचा-नीचा न माना जाएगा कि उसका अमुक वंश में जन्म हुआ है। बड़प्पन के आधार केवल गुण-कर्म-स्वभाव रह जाएँगे। रंग, जाति, लिंग या वंश के आधार पर किसी को न तो अहंकार करने का अवसर ही रहेगा और न इस कारण किसी की हीनता-दीनता अनुभव करने पड़ेगी।” आज जो स्थिति जाति- भेदपरक राजनीति-वंशवाद पर टिकी राजनीति-वंशवाद पर टिकी राजनीति एवं लिंग-भेदपरक अव्यवस्थित सामाजिक ढाँचे के कारण पैदा हुई है, उसका समाधान परमपूज्य गुरुदेव के उपर्युक्त संकल्प में देखा जा सकता है। इसी लेख में वे आगे कहते हैं- अपनों से अपनी बात कहते हुए हमें इन पंक्तियों द्वारा यह स्पष्ट कर देना है कि नया युग तेजी से बढ़ता चला आ रहा है। उसे कोई रोक न सकेगा। महाकाल उसके लिए आवश्यक व्यवस्था बना रहे हैं और तदनुकूल व्यवस्था बना रहे हैं और तदनुकूल आधार उत्पन्न कर रहे हैं। युग का परिवर्तन अवश्यंभावी है।.... हमने अपना जीवन नवयुग की पूर्व सूचना देने- महाकाल के इस महान प्रयोजन में सम्मिलित होने के लिए प्रबुद्ध आत्माओं को निमंत्रण में लगा दिया। जिस काम लिए हम आए थे, वह पूरा होने को है। अगला काम महाकाल स्वयं करेंगे। अगले दिनों उनकी प्रेरणा से एक-से एक बढ़कर प्रतिभाशाली और प्रबुद्ध आत्माएँ सामने आएँगी। ये ऐसा एक व्यापक संघर्ष विश्वव्यापी परिमाण में प्रस्तुत कर सकेंगी, जो असमानता के सारे कारणों को तोड़ मरोड़ कर फेंक दे और समता की मंगलमयी परिस्थितियों का शुभारंभ करके इसी धरती पर स्वर्ग का वातावरण संभव कर दिखाए।
उपर्युक्त पंक्तियाँ जो आज से तीस वर्ष पूर्व लिखी गई थीं, इसीलिए उद्धत की गईं कि हम अपने स्वरूप एवं अपनी भूमिका को विकृत राजतंत्र की विनाशकारी भूमिका के परिप्रेक्ष्य में समझ सकें।
आगे 1970 की अक्टूबर पत्रिका में गुरुसत्ता हमें धर्म और राजनीति के पारस्परिक संबंधों के विषय में बताते हुए हमार मार्गदर्शन भी करती है कि क्या करना है- कैसे किया जाना है। वे लिखते हैं कि “ इतिहास ने हमें सिखाया है कि धर्म की स्थापना में राजनीति का सहयोग आवश्यक है और राजनीति के मदोन्मत्त हाथी पर धर्म का अंकुश रहना ही चाहिए। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक हैं।” यहाँ उनकी लेखनी बड़ा स्पष्ट करती है कि परिष्कृत धर्मतंत्र ही राजनीति की उन्मत्तता से भरी निरंकुश दौड़ पर अनुशासन का अंकुश लगा सकता है। पर उसका स्वरूप क्या हो? गुरुदेव लिखते हैं- “शासनतंत्र की असफलता से हम दुखी हैं बहुत खेद है कि विगत 22 वर्षों (1947 से 1961) में जितना बढ़ा जा सकता था, उतना में जितना बढ़ा जा सकता था, उतना बढ़ा जा सकता था, उतना नहीं बढ़ा गया। प्रगति कुछ भी न हुई हो से बढ़ा नहीं, पर दूसरे देशों की तुलना में हमारी चाल इतनी धीमी है कि इस क्रम से हजारों वर्ष में भी प्रगतिशील देशों की पंक्ति में भौतिक दृष्टि से हम खड़े न हो सकेंगे। गाँधी जी के धर्मराज्य, रामराज्य और विश्वमंगल की आध्यात्मिक प्रगति तो अभी लाखों मील आगे की बात है।” आगे वे लिखते हैं कि “आज जनता का स्तर ही ऐसा है कि वह वोट का मूल्य और उसके दूरगामी परिणामों को अभी समझ ही नहीं पाई झाँसेपट्टी और वास्तविकता का अंतर करना उसे आया ही नहीं। इसलिए चुनाव में वे लोग न जीव सके जो रामराज्य स्थापित करने में सचमुच समर्थ हो सकते थे। जनता ने अपने स्तर के विधायक व सांसद चुने। उनने अपने स्तर की सरकारें बनाई। उन सरकारों के संचालकों ने वही किया जो जनता कर रही है या कर सकती है। जड़ के आधार पर पत्ते बनते हैं। धतूरे के बीज से उगे पौधे पर शहतूत कहाँ से लगें।”
परमपूज्य गुरुदेव का सीधा जोर जनता के मानसिक स्तर को उठाने पर उपर्युक्त पंक्तियों में परिलक्षित होता है। जिस बौद्धिक, सामाजिक व नैतिक क्राँति की अपेक्षा थी, उस दिशा में बहुमुखी प्रयास न होने की असफलता को स्वयं स्वीकारते हुए पूज्यवर कहते है कि बिना अध्यात्मतंत्र द्वारा लोकशक्ति का भावात्मक परिष्कार किए सारे राजतंत्र के ढाँचे को बदलने की कल्पना करना भी हास्यास्पद है। इसी लेख में पृष्ठ 59 पर वे आगे लिखते हैं- “प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि शासन संचालन करने वाली मशीन कैसे उत्कृष्ट बने? तारे फिर बात लौटकर वहीं आ जाती है। सरकारी कर्मचारी आकाश से नहीं उतरते। वे जनता के ही बालक होते हैं। नौकरी पाते ही वे सारे संस्कार भुलाकर देवता बन जाएँ, यह आशा करना व्यर्थ है। इसी प्रकार पैसे लेकर वोट बेचने वाली, व्यक्तिगत या क्षेत्रीय लाभ के प्रयोजनों से आकर्षित होने वाली अदूरदर्शी जनता से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह उन्हें चुनेगी जो सुयोग्य एवं आदर्शवादी तो हैं, पर पैसा लुटाने या बहकाने वाले हथकंडे अपनाने में समर्थ नहीं। यह एक सच्चाई है कि प्रजातंत्र में जनता के स्तर की ही सरकार बनती है और उसी स्तर की सरकारी मशीनी चलती है।”
स्वतंत्रता संग्राम में 13 वर्ष ते अपनी साधना के साथ-साथ निरंतर मोर्चे पर लड़ते रहने वाले सैनिक के रूप में परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम ‘मत्त’ जी ने निष्कर्ष आजादी के 24 वर्ष बाद दिए, निश्चित ही उसके पीछे उनके जीवन के 45 महत्त्वपूर्ण वर्षों कि गहन चिंतन एवं द्रष्टा स्तर की शक्ति ही थी वे लिखते हैं कि “दूसरे सैनिकों ने अपनी वर्दियाँ उतार दीं और राजमुकुट पहन लिए, पर अपने लिए आजीवन उस चिंतन-लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। हमार विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति की त्रिवेणी बहाए बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किए बिना हमारे पाप ताप न कटेंगे। जन जागरण और लोकमानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग हैं हम इसी दूरगामी परिणाम वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
पूज्यवर सारे चिंतन का निचोड़ इन शब्दों में व्यक्त कर हमारा समाधान कर देते है। भौतिक सुधार करना राजतंत्र का क्षेत्र हैं भावनात्मक सुधार के लिए प्रजातंत्र के वातावरण में केवल धर्मतंत्र ही समर्थ हो सकता हैं धर्म और अध्यात्म को हमने मानवजाति की समग्र प्रगति के लिए नियोजित किया है। धर्ममंच अब तक प्रतिगामियों का दुर्ग समझा जाता रहा है, हमने उसे नई दिशा दी हैं अस्सी प्रतिशत देहातों में बसे एवं सत्तर फीसदी अशिक्षित देश में अपनी सुधारात्मक प्रक्रिया आँधी तूफान की तरह इसलिए सफल होती चली जा रही है कि हमने धर्म प्रथाओं एवं कलेवरों के बाह्य स्वरूप में हेर फेर किए बिना उनके मूल प्रयोजन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर दिया हैं हम स्वस्थ राजनीति के विकसित हो सकने की संभावना वाला भवन बनाने में नींव के पत्थर मात्र बनकर रहेंगे और जो भी हमारे प्रभाव संपर्क में आएगा उसे इसी दिशा में प्रेरित आकर्षित करते रहेंगे।
गायत्री परिवार की रणनीति को वर्तमान चुनाव महायज्ञ में जो अब ऊब भरी थकान जैसी स्थिति में प्रगति की ओर उन्मुख इस राष्ट्र पर जबर्दस्ती आ पड़ा है, इसी चिंतन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। परिष्कृत अध्यात्म-तंत्र का पुनर्जीवन एवं उससे राजतंत्र की मूल धुरी जनमानस का भावनात्मक परिष्कार विचारक्रांति एवं ज्ञानयज्ञ के द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ ही हम सबको संपन्न करना है। इस दिशा में जितनी जागरूकता हम जनमानस में पैदा कर सकेंगे उतना ही लोकतंत्र सशक्त व प्रभावी तक राष्ट्र प्रगति की दिशा में अग्रसर होगा। यह एक लंबा संग्राम है एवं संभवतया आगामी दो या तीन वर्श तक चलने वाला विशेषतः संक्रमण-काल की इस विशेष अवधि में यदि हम पूज्यवर की विचार-चेतना पर पक्का विश्वास शताब्दी के इस अंतिम चुनाव महोत्सव को जागरूकता समझदारी एवं देशभक्ति का पर्व मानते हुए सही प्रतिनिधि चुनने की आवश्यकता जन जन को समझाएँ तो निश्चित ही बदल-दल समझा जाने वाला यह सशक्त तंत्र भी परिष्कृत हो स्थायित्व देने की स्थित में आ सकेगा।
*समाप्त*