सच्चे शिष्य की पहचान

जिस व्यक्ति की आत्मा से सतत् शक्ति प्रवाहित होती रहती है, उसे सद्गुरु कहते हैं और जिसकी आत्मा इस शक्ति को अपने में धारण करने योग्य है वह शिष्य कहलाता है। बीज भी उम्दा और सजीव हो और जमीन भी अच्छी तरह जोती हुई हो। जहाँ ये दोनों बातें मिल जाये तो वहाँ प्रकृत धर्म का अलौकिक विकास होता है। सद्गुरु और शिष्य जब दोनों ही अद्भुत और असाधारण होते हैं तभी अपूर्व आध्यात्मिक जागृति होती है, अन्यथा नहीं। जहाँ यह सुयोग न हो उन लोगों के लिए तो आध्यात्मिकता बस एक खिलवाड़ भर है। हो सकता है उनमें थोड़ा बहुत बौद्धिक कौतूहल जगा हो अथवा थोड़ी सी बौद्धिक स्पृहा पैदा हो गयी हो। पर अभी वे धर्म साम्राज्य की बाहरी सीमा पर ही खड़े हैं जब तक उनका कौतूहल सच्ची धर्म पिपासा में परिवर्तित न हो जाय इसका कुछ खास महत्व नहीं। हाँ प्रकृति का एक बड़ा अद्भुत नियम है कि ज्यों ही भूमि की तैयारी पूरी हो जाती है, त्यों ही बीज बोने वाला आना चाहिए और वह आता भी है। ज्यों ही आत्मा की धर्म पिपासा प्रबल होती है, त्यों ही अपनी आत्मा से धर्म शक्ति का संचार करने वाले पुरुष को उस आत्मा की सहायता के लिए आना चाहिए और वे आते भी हैं।

हम चाहें तो खुद के जीवन में इसका परीक्षण कर लें। अपनी जिन्दगी में कई बार ऐसा होता है कि हमारे किसी प्रियजन की मौत हो जाती है। उससे हमें भारी सदमा पहुँचता है। उस समय हमें ऐसा लगता है कि हम जिसे पकड़ने चले थे वही हमारे हाथों से निकला जा रहा है। यकायक पैरों तले से जमीन खिसकती हुई मालूम पड़ती है, आँखों के सामने अँधेरा छाने लगता है। हमें किसी मजबूत और ऊँचे सहारे की जरूरत महसूस होती है। इस समय हमें लगता है कि अब हमें धार्मिक हो जाना चाहिए। थोड़े ही दिनों में वह भाव-तरंग नष्ट हो जाती है और हम जहाँ के तहाँ रह जाते हैं।

हममें से प्रायः ज्यादातर ऐसी ही भाव-तरंगों को धर्म पिपासा समझ लेते हैं। लेकिन जब तक हम इन क्षणिक आवेशों के धोखे में रहेंगे तब तक धर्म के लिए सच्ची और स्थायी आकुलता नहीं पैदा होगी और इसके बिना हमारी आत्मा सद्गुरु की शक्ति को अपने में धारण करने के लिए तैयार नहीं होगी। अतएव जब कभी हममें यह भावना पैदा हो कि सद्गुरु मिले, फिर भी कुछ न हुआ हो उस समय ऐसी शिकायत करने के बदले हमारा पहला कर्तव्य यह होगा कि हम अपने आप से ही पूछें, अपने हृदय को टटोलें और देखें कि हमारी धर्म पिपासा यथार्थ है अथवा नहीं हम अभी तक शिष्य बन सके अथवा नहीं।


सच्चा पुण्य

सम्राट वीरभद्र के दान की कहानियाँ लोक विख्यात हो चुकी थीं। उनके सम्बन्ध में यह कहा जाता था कि द्वार पर आने वाला कोई भी याचक उनके यहाँ से खाली हाथ नहीं जाता था। प्रातः होते ही राजमहल के द्वार पर याचकों की भीड़ लग जाती और वीरभद्र अपने अन्तःपुर से निकल कर याचकों को पर्याप्त दान दिया करते थे।

प्रतिष्ठा और सम्मान की चाहत में डूबे सम्राट दान देने में पात्र-कुपात्र का विचार नहीं करते थे। इस ओर सोचने की उन्हें फुरसत भी नहीं थी। इस तरह दान देने के कारण राज्यकोष खाली होता चला गया। इस भारी भरकम दान के अलावा राज्य परिवार की सुख-सुविधाओं के लिए भी पर्याप्त धन राशि खर्च होती थी। इस प्रकार खाली होते राजकोष को भरने के लिए जनता पर नए-नए कर लगाने पड़ते। एक ओर जहाँ लोग सम्राट की दानशीलता का गुणगान करते थे, वहीं कर भार और अन्यान्य अव्यवस्थाओं के प्रति असन्तोष भी व्यक्त कर चुके थे।

इस अस्तव्यस्तता का लाभ उठा कर राज्य को अपने राज्य में शामिल करने के लिए पड़ोसी राजा ने वीरभद्र के राज्य पर आक्रमण कर दिया। दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया गया और राज वीरभद्र को रानी सहित बन्दी बना लिया गया। शारीरिक यातना एवं मानसिक प्रताड़ना से त्रस्त होकर एक दिन वे दोनों ही बन्दीगृह से भाग निकले।

बन्दीगृह से भाग निकलने बाद उनके पास कोई साधन तो थे नहीं, जिससे उन दोनों का गुजारा चलता। इसलिए दोनों वन-वन भटकने लगे। एक दिन परेशान होकर रानी ने कहा- ‘सुना है सेमरगढ़ नगर का एक सेठ पुण्य खरीदा करता है। आप तो जीवन भर दान देते रहे हैं। यदि हम लोग सेमरगढ़ जाकर अपने दान पुण्य का एक अंश बेच दे तो उससे कम से कम उदर पूर्ति की व्यवस्था तो जुट ही सकती है।

वीरभद्र भी रानी के इस विचार से सहमत हो गया, और दोनों सेमरगढ़ को चल पड़े। जिस स्थान पर वे लोग भटक रहे थे वहाँ से गन्तव्य स्थान काफी दूर पड़ता था। अतः मार्ग में निर्वाह की व्यवस्था दोनों पति-पत्नी मजदूरी करके जुटाते, साथ ही अपने दुर्दिनों और भाग्य को भी कोसते थे। एक स्थान पर मजदूरी बड़ी मुश्किल से मिल पायी। उस दिन केवल इतना ही कुछ कमाया जा सका कि जैसे-तैसे चार रोटियाँ बनायी जा सकें। इतना आटा लेकर ही वे आगे रास्ता तय करने के लिए पड़े। चलते-चलते शाम हो गयी तो वे एक गाँव में ठहर गए। आस-पास के वृक्षों से लकड़ियाँ तोड़कर आग जलायी और चार मोटी-मोटी रोटियाँ सेक ली।

रोटियाँ तैयार करने के बाद वे ग्रास तोड़ने ही वाले थे कि एक भिखारी रोटी माँगता हुआ वहाँ आया और बुरी तरह गिड़गिड़ाने लगा। वीरभद्र के स्वभाव में दया और उदारता तो थी ही। उसने अपने पास की दोनों रोटियाँ भूख से व्याकुल भिक्षुक को दे दीं। शेष दोनों रोटियों में पति-पत्नी दोनों ने एक-एक रोटी खाली।

इसी तरह किसी प्रकार चलते-चलते राजा-रानी सेमरगढ़ पहुँचे। सेठ के सामने पहुँचने पर उन्होंने अपने आने का उद्देश्य बता दिया। सेठ ने कहा आप अपने जिन पुण्यों को बेचना चाहते हैं।, उन्हें एक कागज पर लिखकर इस तराजू के पलड़े में रख दीजिए।

राजा ने वैसा ही किया, पर तराजू ज्यों की त्यों रही। सेठ ने वस्तु स्थिति समझाते हुए कहा-’ऐसा प्रतीत होता है, कि अपने अनीति और अधर्म की कमायी का दान दिया है।

यह सब सुनकर राजा और रानी आगे कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। राजा वीरभद्र लज्जा से गर्दन नीची करके जमीन की ओर देखने लगे। उनकी यह स्थिति देखकर सेठ ने कहा-मुझे आपकी दुःखदायी और भावपूर्ण स्थिति से पूरी सहानुभूति है। आप किसी ऐसे पुण्य का स्मरण करें, जो ईमानदारी से अर्जित कमायी द्वारा संचित किया गया हो।

वीरभद्र काफी देर सोचने रहे। फिर उन्हें पिछले दिन वाली घटना याद आयी, जब उन्होंने अपने हाथ से भिखारी को अपने सामने की रोटी खाने के लिए दे दी थी॥ भिखारी को रोटी दान में देने की बात एक कागज पर लिखकर उन्होंने उसे तराजू के पलड़े में रख दिया। दूसरे ही क्षण राजा ने देखा कि पलड़ा नीचे झुक गया है। सेठ ने अनेक स्वर्ण मुद्राएँ उसमें रखी, फिर भी काँटा बराबर न हो रहा था। उसे आश्चर्य हुआ कि इस छोटे से पुण्य के लिए सेठ को पाँच हजार स्वर्ण मुद्रा रखनी पड़ीं तब जाकर कहीं काँटा बीचों-बीच आया।

यह देखकर राजा वीरभद्र को समझा में आ रहा था कि दान वही सार्थक होता है, जो नैतिक साधनों द्वारा अर्जित धन से किया जाय। अनीति पूर्वक अर्जित की गयी समस्त सम्पदा का परमार्थिक मूल्य नीति पूर्वक कमायी गयी एक रोटी के बराबर भी नहीं होता है।


मानवी उत्कर्ष का एकमेव आधारः धर्म

अति पुरातन काल में धर्म ही मानवी उत्कर्ष और अनुशासन का एकमात्र आधार था। समयानुसार वह राजतन्त्र और धर्मतन्त्र में बँटा। तो भी अपनी उत्कृष्टता के कारण मानव अन्तराल पर उसका प्रभाव अक्षुण्ण ही बना रहा। शासन का क्षेत्र पदार्थ एवं व्यवहार है। धर्म का चरित्र एवं चिन्तन। धर्म व्यक्तित्व का गठन करता है। शासन साधनों के उत्पादन वितरण से लेकर सुरक्षा व्यवस्था जैसे भौतिक प्रयोजनों की पूर्ति करता है। यों साधनों की कमी या अव्यवस्था से भी कम कष्ट नहीं होता, इसलिए उसकी साज-संभाल रखने की जिम्मेदारी उठाने वाले शासन का भी महत्व एवं वर्चस्व है। अर्थ और दण्ड की शक्ति उसके हाथ में रहने से आकर्षण एवं भय के आधार पर उसका लोहा भी माना जाता है। इतने पर भी धर्म की गरिमा, उपयोगिता एवं स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। मानवी अन्तःकरण में उच्चस्तरीय आस्था जमाने-विचारणा में सदाशयता जोड़ रखने तथा क्रिया-प्रक्रिया को नीति-निष्ठा बनाने की शक्ति ‘धर्म’ की ही है। भावना और विचारणा का महत्व सर्वोच्च है। वहीं व्यक्ति की मौलिक सम्पदा एवं क्षमता है। उत्थान-पतन की दूरगामी भूमिका का सूत्र-संचालन यहीं से होता है। मनुष्यों का समूह ही समाज है। लोगों का स्तर जैसा होता है, उसी के अनुरूप समाज की गतिविधियाँ होती हैं, वैसी ही परिस्थितियां बनती हैं। शासन तो परिस्थितियों का नियन्त्रण भर करता है। उनका उत्पादन तो अन्तःकरण एवं बुद्धि-संस्थान से ही होता है। अस्तु, भावना क्षेत्र की दिशा देने वाले ‘धर्म’ की गरिमा सदा ऊँची रहेगी। उसे शासन से भी अधिक महत्व मिलेगा। दर्शन की गरिमा वैभव से किसी भी प्रकार कम नहीं है।

शासन का महत्व सभी समझाते हैं। कोई अराजकता नहीं चाहता। यहाँ तक कि दुष्ट-दुराचारी भी नहीं, क्योंकि अभी तो उन्हें न्याय-व्यवस्था के अंतर्गत अपनी जान बचाने और अनीति को छद्म रूप से चलाने का जो अवसर मिला हुआ है, वह भी अराजकता की स्थिति में न रहेगा। दो जवाब बीस। बीस कमजोर मिलकर भी दो बलिष्ठों की धज्जियाँ उड़ा सकते हैं। जिस प्रकार अराजकता सहन नहीं की जा सकती, अधार्मिकता सभी उतनी ही भयावह सिद्ध होती है। नीति-मर्यादा का परित्याग कर देने के बाद मनुष्य हिंसक पशुओं से भी अधिक आततायी हो जाता है। हिंसक जन्तु पेट भर जाने पर आक्रमण नहीं करते, पर मनुष्य तो दर्प के लिए असंख्यों को मटियामेट करता रहता है। मध्यकालीन सामन्तवाद का प्रत्येक रक्त-रंजित पृष्ठ इसी की साक्षी देता है। आज भी आस्थाहीन व्यक्तियों-हिटलर, चंगेजखाँ, नादिरशाह, रावण दुर्योधन, जरासन्ध ने न जाने कितने कहर ढाये हैं। आततायी और आतंकवादी प्रायः आस्थाहीन ही होते हैं। अराजकता और अधार्मिकता में से कौन अधिक भयावह है, यह कहना कठिन है।

शासन के पास साधन कितने ही अधिक हों, उसकी सफलता भी वफादार ईमानदार कर्मचारियों एवं नीतिनिष्ठा प्रजाजनों पर टिकी हुई है। यदि कर्मचारी भ्रष्ट हों तो असीम साधनों के रहते हुए भी पतन-पराभव का मुँह देखना पड़ेगा। इसी प्रकार प्रजाजन यदि दुष्टता पर उतारू हो चलें तो फिर उन्हें नियन्त्रित करने में पुलिस कचहरी की शक्ति क्या काम करेगी? फिर वे लोग भी तो भ्रष्ट जनता से ही निकल कर आये होंगे। उनका अन्तरंग नीति-भ्रष्टता के साथ साझेदारी कर ले तो फिर न्याय-नियन्त्रण की, विकास-उत्थान की योजनायें एक कोने में रखी रह जायेंगी। शासन को श्रेय देने वाली सफलताएँ शस्त्रों पर, वैभव-विस्तार पर टिकी हुई नहीं हैं। वरन् नीतिनिष्ठ कर्तव्यपरायण प्रजाजनों पर निर्भर है। कहना न होगा कि यह समूचा भावना क्षेत्र धर्म धारण के अंतर्गत आता है। शासन लोभ या भय के आधार पर किसी को भी उत्कृष्ट व्यक्तित्व से सम्पन्न नहीं बना सकता। उसकी पहुँच वैभव क्षेत्र से आगे बढ़ मात्र बौद्धिक क्षेत्र तक समाप्त हो जाती है। सरकारी प्रचार-प्रोपेगैंडा के आधार पर प्रस्तुत समाचारों तक पर जब विश्वास नहीं किया जाता, तो उनके द्वारा चिन्तन को उत्कृष्टता और व्यवहार की आदर्शवादिता को लोकमानस में इतनी गहराई तक उतार देना किस प्रकार सम्भव होगा, जहाँ किसी भी भय-प्रलोभन से मानवी आदर्शवादिता को न गँवाने की व्रतशीलता अडिग चट्टान की तरह खड़ी रहे।

धर्म-धारणा जहाँ भी बलवती होगी, वहाँ नैष्ठिक नागरिकता, अनुशासित सामाजिकता, चारित्रिक संयमशीलता, व्यवहारिक सज्जनता के वे सभी चिन्ह प्रकट होंगे, जिन्हें मानवी गरिमा के रूप में सुना समझा जाता रहा है। श्रेष्ठताओं का समुच्चय ही ‘धर्म’ है। इसी उपयोगिता जब जन-जन ने देखी-परखी थी तब उसे सर्वोच्च सम्मान किया गया था। हर किसी का इस आप्त वचन पर दृढ़ विश्वास था कि धर्म की रक्षा करने से ही अपनी रक्षा होती है और मारने वाले को वह उलट कर मार ही डालता है’ इसी तथ्य और सत्य पर अटूट विश्वास होने के कारण इस देश के नागरिक देवोपम कहे जाते थे।

सद्भाव, सम्वेदन, संस्कारवान, चिन्तन, व्यक्तित्व उन्नयन, समग्र प्रगति, सामाजिक सुव्यवस्था, अर्थ सन्तुलन जैसे व्यक्ति और समाज से सम्बन्धित अनेकानेक क्षेत्रों पर धर्म धारणा का असाधारण प्रभाव देखा जा सकता है। उसके कारण इन सभी क्षेत्रों के समुन्नत बनने की सम्भावना सुनिश्चित बनती है। अधर्म का अनौचित्य अपनाने का परिणाम मात्र असन्तोष विग्रह और विनाश का ही वातावरण बनता है। धर्मतत्व का एकमात्र स्वरूप सद्भावना, सज्जनता, सहकारिता, संयमशीलता, उदारता जैसे शालीनता समर्थक सरंजाम जुटाता है।

धर्म की इस गरिमा से मनुष्य जाति चिरकाल से परिचित, अभ्यस्त, आश्वस्त रही है। फलतः इस गये गुजरे जमाने में जबकि धर्म मात्र विडम्बनाओं का अजायब घर बनकर रह गया है, उस प्राचीन गरिमा के प्रति अभी अजस्र श्रद्धा जमी हुई है। लोग उसके लिए बहुत कुछ अनुदान प्रस्तुत करते रहते हैं। महामानवों की समाधियों पर मेले जुड़ते और फूल बरसते हैं। धर्म की मूल धारणा अस्त-व्यस्त हो जाने के उपरान्त भी उसके मजार पर जितनी श्रद्धा बरसती है उसे देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि जब वह जीवन्त रहा होगा तो कितनी बड़ी गौरव-गरिमा का केन्द्र रहा होगा।

भारत को ही लें। यहाँ देवालयों का तीर्थयात्रा का कर्मकाण्डों का-सोमवती अमावस्या से लेकर कुँभ जैसे छोटे-बड़े पर्वों का खर्चा जोड़ा जाय तो वह सरकार द्वारा वसूल किये जाने वाले राजस्व से कहीं अधिक बैठता है। जिनका धर्म ही आजीविका व्यवसाय है ऐसे साधु बाबाओं की संख्या तकरीबन 60 लाख है। जो इस उद्योग पर पूर्णतया निर्भर नहीं है-आँशिक समय गँवाते और उपार्जन करते हैं उन पण्डा-पुरोहितों की संख्या भी 40 लाख तो माननी ही पड़ेगी। इन एक करोड़ धर्म जीवियों का ठाट-बाट और आडम्बरों से भरा-पूरा व्यय-भार भावुक धर्म प्रेमियों को ही उठाना पड़ता है। यह राशि इतनी बनती है जितनी कि शिक्षा और चिकित्सा के लिए निर्धारित कुल बजट की। दैनिक जीवन में धर्म कृत्यों के लिए लोग ढेरों समय लगाते हैं और हाथ खोलकर पैसा खर्च करते हैं। मनोयोग, श्रम, समय एवं धन के रूप में जितनी मानवी शक्ति धर्म के निमित्त लगती है उसे उपार्जन, निर्वाह के बाद तीसरे नम्बर की सम्पदा कह सकते हैं।

इतनी बढ़ती मानवी शक्ति यदि सृजनात्मक प्रयोजनों में लग सके तो उतने भर से व्यक्ति और समाज का कायाकल्प हो सकता है। जो क्षेत्र शासन की पकड़ से बाहर हैं जिन्हें संभालना निश्चित रूप से धर्म तन्त्र के कंधों पर है, उस चिन्तन और चरित्र के उभारने वाले प्रयोजनों में यह शक्ति लग सके तो उसकी परिणति उससे भी अधिक श्रेयस्कर हो सकती है जितनी कि शासन द्वारा विभिन्न प्रकार के कल्याणकारी काम हाथ में लेने से सम्भव होती है। बलिष्ठता, सम्पदा और बुद्धिमत्ता को मानवी शक्ति माना जाता है किन्तु यदि थोड़ी गहराई में उतरकर देखा जाय तो प्रतीत होगा कि अन्तराल की गहन परतों में विद्यमान आस्थाएँ ही उसकी वास्तविक सामर्थ्य हैं। उत्थान और पतन के लिए पूरी तरह वही जिम्मेदार है। व्यक्ति की महानता और राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता उसी के आधार पर विकसित होती है। यहाँ एक तथ्य और भी समझा लेना चाहिए कि इस शक्ति स्रोत को उभारने और दिशा देने का कार्य मात्र धर्म ही करता रहा है। भविष्य में भी वही करेगा। यहाँ धर्म तत्व से तात्पर्य आस्थाओं को उत्कृष्टता के साथ जोड़े रहने वाली उच्चस्तरीय अन्तःप्रेरणा से है। आज के सम्प्रदायवाद को तो उसकी छाया या विकृति ही कह सकते हैं।

शासन की विकृतियों को सुधारने के लिए जनआन्दोलन उभरते रहते हैं। अर्थ संतुलन के लिए भी वैयक्तिक और सामूहिक पुरुषार्थ तत्पर देखा जाता है। निर्वाह, विनोद सुविधा साधन, शिक्षा-चिकित्सा जैसे प्रसंगों में उत्साह और प्रयत्न संलग्न देखा जाता है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि धर्म तत्व जैसे मानवी गरिमा के मेरुदण्ड को इस बुरी तरह अपेक्षित एवं विकृत स्थिति में रहने दिया जा रहा है जिसमें वह जन साधारण भ्रान्तियाँ उत्पन्न करने और निहित स्वार्थों का निमित्त भर रहने के अतिरिक्त और कुछ कर ही न सके।

आवश्यकता इस बात की है कि भ्रान्तियों का कुहासा हटाया जाय और धर्म के मूल स्वरूप की उपयोगिता और उसके नाम पर चल रही प्रतिगामिता जन्म विभीषिका से सर्वसाधारण को अवगत कराया जाय। धर्म और संप्रदाय के बीच क्या सम्बन्ध और क्या अन्तर है इसे समझने का अवसर मिलना ही चाहिए। आज तो गुड़-गोबर एक हो रहा है। असली के स्थान पर नकली की पूजा प्रतिष्ठा है।

सम्प्रदायों के नाम पर लोग झगड़ते हैं, परम्पराओं के समर्थन में औचित्य और न्याय दोनों को पददलित किया जाता है। स्थिति इतनी गम्भीर है कि कुरीतियों और मूढ़-मान्यताओं का विरोध करने वाले तक उन्हीं अन्ध-परम्पराओं से चिपके देखे जाते हैं। विवेक कितना दुर्बल और प्रचलन कितना समर्थ है- इस दुर्भाग्य भरी स्थिति को देखकर हतप्रभ रह जाना पड़ता है।

समय की माँग है कि नीर-क्षीर विवेक का सरंजाम जुटाया जाय। यथार्थता और विडम्बना के अन्तर को समझने का अवसर सर्वसाधारण को दिया जाय।


हमारी रक्त सम्पदा कितनी विलक्षण, कितनी बहुमूल्य

संसार की शोभा, सुषमा, सरसता में पानी का योगदान है। पानी न रहे तो वनस्पतियाँ सूख जायँ और प्यासे प्राणी जीवित न रह सके। ठीक यही बात शरीर संसार की है, उसकी सारी गतिविधियाँ उस जीवनरस पर निर्भर हैं, जिसे हम रक्त के नाम से जानते हैं। मोटेतौर पर यह लाल रंग का पानी है जो नस-नाड़ियों में ऐसे ही मन मौजी घुमक्कड़ की तरह घूमता फिरता रहता है। इस संस्थान की गतिविधियाँ देख कर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

सारी शरीर में रक्त की एक परिक्रमा प्रायः डेढ़ मिनट में पूरी हो जाती हृदय और फेफड़े के बीच की दूरी पार करने में उसे मात्र 6 सेकेंड लगते हैं, जबकि उसे मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने में 7 सेकेंड लग जाते हैं। रक्त प्रवाह रुक जाने पर हृदय भी 5 मिनट जी लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही बुझ जाता है। हृदय फेल होने की मृत्युओं में प्रधान कारण धमनियों से रक्त की सप्लाई रुक जाना ही होता है। औसत दर्जे के मनुष्य शरीर में पाँच से छह लीटर तक खून रहता है। इसमें से 5 लीटर तो निरन्तर गतिशील रहता है और एक लीटर आपत्ति कालीन आवश्यकता के लिए सुरक्षित रहता है। 24 घण्टे में हृदय को 13 हजार लीटर खून का आयात-निर्यात करना पड़ता है। 10 वर्ष में इतना खून फेंका समेटा जाता है जिसे यदि एक बारगी इकट्ठा कर लिया जाय तो उसे 400 फुट घेरे की 70 मंजिली टंकी में ही भरा जा सकेगा। इतना श्रम यदि एक बार ही करना पड़े तो उसमें इतनी शक्ति लगानी पड़ेगी जितनी कि दस टन बोझ जमीन से 50 हजार फुट तक उठा ले जाने में लगानी पड़ेगी। शरीर में जो तापमान रहता है, उसका कारण रक्त प्रवाह के कारण उत्पन्न होने वाली ऊष्मा ही है।

अपने चार वर्ण और चार आश्रमों की तरह रक्त के भी चार वर्ण हैं। भगवान मनु ने मनुष्य जीवन की क्रम व्यवस्था इन चार भागों में की थी। लेण्ड स्टीनर ने रक्त की चार श्रेणियों का रहस्योद्घाटन किया था सब मनुष्यों का रक्त एक जैसा नहीं होता, इनके बीच कुछ रासायनिक भिन्नता रहती है। इसी को ध्यान में रखते हुए उसे (1) ए. (2) बी.(3) एबी. (4)ओ. इन चार नामों से वर्गीकरण किया है। किसी की नसों में किसी का रक्त चढ़ाने से पहले यह विधि वर्ग मिला लिया जाता है अन्यथा भिन्न चढ़ा देने से रोगी भयंकर विपत्ति में फँस जायगा और मृत्यु संकट सामने आ खड़ा होगा।

हमारा रक्त लाल रंग का एक गाढ़ा तरल पदार्थ है जो हवा लगने पर जम जाता है उसे दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। (1)तरल पदार्थ-प्लाज्मा (2)ठोस कण-सारतत्व। प्लाज्मा रक्त में 55 प्रतिशत होता है, इसे भूरे, पीले रंग के पानी जैसी शक्ल में देखा जा सकता है। उसमें नमक, ग्लूकोस, प्रोटीन आदि घुले रहते हैं। कुछ ठोस पदार्थ उसमें घुल नहीं पाते और तैरते रहते हैं। इन ठोस कणों को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं (1) एरिथ्रोसाइट खून के लाल गण (2) ल्यूकोसाइट-खून के सफेद कण (3) प्लेटलेट-खून की पपड़ियाँ।

लाल कण शरीर के प्रत्येक अंश-तंतु और कोष को आहार एवं ऑक्सीजन पहुँचाते हैं। मल रूप निकलती कार्बनडाइ आक्साइड गैस को ढोकर फेफड़ों तक ले जाते हैं, ताकि वहाँ से साँस द्वारा उसे बाहर निकाला जा सके।

सफेद कण वस्तुतः कोषाणु हैं। उनकी संख्या कम ही होती है। 650 लाल कणों के पीछे एक। इन्हें शत्रु रोगाणुओं से लड़ने वाले सैनिक कहा जा सकता है। शरीर के किसी भाग में यदि रोगकीट हमला कर दे तो यह श्वेत कण उनसे लड़ने को तत्काल जा पहुँचाते हैं। आवश्यकता के समय अपनी जाति वृद्धि कर लेने की इनमें अद्भुत क्षमता है।

रोगों के कीटाणु हवा, पानी, आहार छूत या चोट आदि के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। वे इतने भयंकर होते हैं कि देखते-देखते सारे शरीर का कब्जा कर सकते हैं और किसी को भी रोगग्रस्त करके मौत के मुँह में धकेल सकते हैं। ईश्वर को लाख धन्यवाद है कि इस रोग कीटाणुओं से भरे शत्रुओं के चक्रव्यूह में आत्मरक्षा करने के लिए हमें श्वेत कणों की सुदृढ़ सेना दी है। यदि यह न मिली होती तो पग-पग पर मृत्यु संकट सामने खड़ा रहता।

श्वेत कोषाणु रोग कीटाणुओं से अधिक प्रबल होते हैं और वे शत्रुओं को मार-काट कर धराशायी करने में प्रायः सफल ही रहते हैं। इस युद्ध में उनमें से भी बहुतों को शहीद होना पड़ता है। मृत श्वेत कणों के ढेर को सफेद पीव के रूप में देखा जा सकता है, वह चमड़ी तोड़कर बाहर निकलता है। अपनी विशेषताओं के आधार पर उन श्वेत कणों की भी कई जातियाँ हैं यथा-न्यूट्रोफिल, ईओसिनोफिल, वेसोफिल, लिम्फोसाइट मोनोसाइट आदि। इनका आवश्यकता से अधिक बढ़ जाना या घट जाना भी चिन्ता का विषय है। इनकी असाधारण वृद्धि ल्यूकोसाइटोसिस और कमी ल्यूकोपेनिया कहलाती है।

साधारणतया प्रति घन मिली मीटर रक्त में 5 से 10 हजार तक श्वेत कण होते हैं। पर कभी-कभी यह संख्या बढ़ कर ढाई लाख तक जा पहुँचती है तब यह वृद्धि आत्मघाती सिद्ध होती है। कैंसर की सम्भावना बढ़ जाती है।

रक्त रस-प्लाज्मा में 90 प्रतिशत जल और 10 प्रतिशत चर्बी, हारमोन, नाइट्रोजन, आक्सीजन, कार्बनडाइ आक्साइड आदि पदार्थ मिले होते हैं। इस हलके पीले रंग के तरल पदार्थ में लाल और श्वेत रक्त कणिकाएँ तथा विम्बाणु तैरा करते हैं। लाला रक्त गण इतने छोटे होते हैं कि वे 3000 की संख्या में सीधे एक लाइन में रख दिये जायँ तो एक इंच से भी कम लम्बाई होगी। युवा मनुष्य के शरीर में 25,000,000,000,000 लाला रक्त गण होते हैं वे चार महीने जीवित रहकर मर जाते हैं। और उनका स्थान लेने के लिए नये पैदा हो जाते हैं।

रक्त की चाल धमनियों में प्रति घण्टा 65 कि0मी0 की है। रक्त कणिकाएं लौह और ऑक्सीजन से मिलकर बने पदार्थ होमोग्लोबिन अपने साथ प्रोटीन, प्राण वायु आदि अपने पोषक पदार्थ अपने ऊपर लाद कर चलता है और उस खुराक को शरीर के कण-कण तक पहुँचाता है। उसे दुहरा काम करना पड़ता है। इधर से उपयोगी पदार्थों का पहुँचाना, उधर से कार्बन डाइऑक्साइड तथा दूसरी हानिकार गन्दगियों को समेट कर फेफड़े द्वारा बाहर निकाल दिये जाने के लिए उन तक पहुँचाना यह दुहरी ढुलाई उसे करनी पड़ती है।

लाल रक्त कणिकाएं प्रायः 4 महीने में लगभग 1500 चक्कर सारे शरीर के लगा देने के बाद बूढ़ी होकर मर जाती हैं। तिल्ली के जिम्मे उनका अन्त्येष्टि संस्कार करना और लाश को तोड़-फोड़ कर मलद्वारों से बाहर निकालने की व्यवस्था उसी को जुटानी पड़ती है। हमारा छोटा सा शरीर वस्तुतः बहुत बड़ा है। एक पूरी पृथ्वी के बराबर जीवधारी उसमें रहते हैं। इसलिए उसके व्यवस्था कर्मचारियों की संख्या भी लगभग उसी अनुपात से रहती है। इन 2500 करोड़ लाल रक्त कणों को यदि एक सीधी पंक्ति में सटाकर बिठा दिया जाय तो इतना छोटा आकार रहते हुए भी वे इतनी बड़ी लाइन में होंगे जो समस्त पृथ्वी की चार बार परिक्रमा कर सकें।

ऊपर कहा जा चुका है कि रक्त में तीन जाति के कण रहते हैं। लाल रक्त कणों की चर्चा हो चुकी है। अब शेष कर्मचारियों में 1 करोड़ 20 लाख श्वेत रक्ताणु और 50 लाख लाल रक्त विम्बाणु और रहते हैं। एक बूँद खून में प्रायः 11 हजार श्वेत कण होते हैं। इन का मुख्य कार्य शरीर में बाहर से प्रवेश करने वाले अथवा भीतर से ही पैदा होने वाले रोग कीटाणुओं से लड़कर उन्हें परास्त करना है उनके मृत शरीरों को देह से बाहर निकल देना होता है। बीमारियाँ तभी प्रकट होती हैं जब ये श्वेत कण रोगाणुओं से हारते हैं। अन्यथा हमें पता भी नहीं चलता है और रोग निवारण का अधिकाँश कार्य इन श्वेत कणों द्वारा भीतर ही भीतर निपटा दिया जाता है।

तीसरे किस्म के रक्त के कण कभी चोट आदि लगने पर बाहर बहते हुए रक्त को जमाने की भूमिका सम्पादित करते हैं। यह न हों तो आघात लगने पर रक्त बाहर बहता ही रहे और उसके न रुकने पर मृत्यु हो जाय। एक बूँद खून में इनकी संख्या 3 लाख के करीब होती है और प्रायः 10 घण्टे ही जीवित रहते हैं।

यदि रक्त में लाल कण कम पड़ जाय या होमोग्लोबिन की मात्रा घट जाय तो एनीमिया रोग हो जाता है, शरीर थका-थका सा रहता है और सिर चकराता है।

रक्त के अभाव में हृदय तो पाँच मिनट सभी अपना काम चला लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही निर्जीव हो जाता है।

बाई पसलियों में 9 वीं 10 वीं और 11 वीं के नीचे आमाशय के पीछे तिल्ली का स्थान है यह लाल बैंगनी रंग की है। इसमें रक्त एकत्रित रहता है। उसकी 12 सेन्टीमीटर लम्बाई तथा 7 सेन्टीमीटर 150 से 200 ग्राम तक। इसमें रक्त को एकत्रित करने और निकालने की विशिष्ट क्षमता है।

पुराने जर्जर लाल रक्त कण अक्सर इसी में समाधिस्थ होते रहते हैं। गर्भावस्था में उसे रक्त बनाने के एक विशेष कारखाने का काम करना पड़ता है। किसी दुर्घटना के समय रक्त अधिक निकल जाय अथवा मज्जा में कोई दोष उत्पन्न हो जाय तो तिल्ली को उस आपत्ति काल में विशेष कार्य करना पड़ता है और उस क्षति की पूर्ति वहीं से हो जाती है।

रक्त संचार की दुनिया कितनी महत्वपूर्ण और कितनी सुव्यवस्थित है, फिर भी हम उसे देख समझ नहीं पाते और न रक्त शुद्धि के उपयुक्त रीति-नीति अपना कर परिपुष्ट सुविकसित दीर्घजीवन जी पाते हैं। अकेली रक्त सम्पदा के संबंध में ही क्या जीवन वैभव के साथ जुड़ी हुई अगणित विकृतियों के सम्बन्ध में हमारी अज्ञानता और उपेक्षा अत्यधिक गहरी है-इसी आत्मविस्मृति ने तो हमें हर क्षेत्र में दीन दयनीय बना कर रखा है।


संधिकाल में आया यह धूमकेतु कुछ गुल खिलाएगा

उथल-पुथल और हलचलें यही वर्तमान समय की परिभाषा बन गयी है। पर्यावरण-वातावरण हो या फिर जीवन और समाज कुछ भी इनसे अछूता नहीं। हर कहीं फेर-बदल और परिवर्तन का दौर चल रहा है। इस व्यापक उथल-पुथल के कारणों की खोज में जुटे वैज्ञानिक इसका कारण इन दिनों सूर्य में हो रहे परिवर्तनों को मानते हैं। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य ब्रह्मांड का नाभिक है और नाभिक में होने वाली हलचलें अपने इर्द−गिर्द चक्कर लगा रहे इलेक्ट्रानों की गति और स्थिति को प्रभावित किए बिना नहीं रहती।

सूर्य की रश्मियाँ ही ब्रह्मांड में जीवन का संचार करती हैं। पशु पक्षी हो या-पेड़ पौधे सभी किसी न किसी तरह इसी की प्राण ऊर्जा पर निर्भर हैं। मनुष्य के साथ तो इसका सम्बन्ध और भी गहरा है। इस गहराई को नापने के लिए हमें विज्ञान की भौतिक उपलब्धियों को ही देखकर सन्तुष्ट नहीं रह जाना होगा बल्कि उनके आधार पर भारतीय अध्यात्म की संगति पर भी विचार करना जरूरी होगा। पश्चिमी देशों में उसे जलवायु वनस्पति और दृश्य जगत में परिवर्तनों के लिए प्रमुख उत्तरदायी माना जाता है। किन्तु भारतीय आचार्यों का मत है कि मनुष्य की भावनाओं का भी सूर्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस तादात्म्य की उपेक्षा करके इनसान सुखी नहीं रह सकता। बहुत पहले गैलीलियो ने इसी सूक्ष्म विज्ञान पर प्रकाश डालने की कोशिश की थी। उस समय तो उसकी बातों की उपेक्षा की गयी, लेकिन इन दिनों जो वैज्ञानिक खोजें हो रही हैं, उनसे यह बात निश्चित रूप से साबित हो चुकी है कि मनुष्य पूरी तरह सूर्य पर ही आश्रित है। उससे मानसिक सम्बन्ध स्थापित करके अनेक प्राकृतिक रहस्य और शक्तियाँ प्राप्त करने एवं आत्म विकास में प्रकाश प्राप्त करने की विस्तृत खोज इस देश में गायत्री विद्या के नाम से हुई थी।

आधुनिक वैज्ञानिक भी इन दिनों इसी दिशा में प्रयत्नशील हैं। इन वैज्ञानिकों में जे0 विलकिन्स का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्होंने प्रकृति एवं मानव समाज में होने वाले क्रान्तिकारी परिवर्तनों का सूर्य की गतिविधियों का सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध साम्य स्थापित करने की चेष्टा की है। अपनी पुस्तक “सोलन एक्टीविटी : इट्स इफेक्ट्स ऑन नेचर एण्ड सोसाइटी” में इनका मानना है कि मानव जीवन पृथ्वी और सूर्य के तत्वों की मिली-जुली उपलब्धि है। इसलिए शारीरिक और मानसिक दृष्टि से मनुष्य पृथ्वी से ही प्रभावित नहीं होते वरन् उन पर सूर्य का भी प्रचण्ड हस्तक्षेप रहता है। इस हस्तक्षेप से भौतिक ही नहीं भावनात्मक एवं वैचारिक परिस्थितियाँ भी बनती-बिगड़ती हैं।

इन दिनों होने वाले प्राकृतिक और सामाजिक परिस्थितियों की उलट फेर का यही रहस्य है। ज्योतिषवेत्ताओं ने ही नहीं खगोल विज्ञानियों ने भी इस पर अपनी सहमति व्यक्त की है कि 24 अक्टूबर 1995 को हुए पूर्ण सूर्यग्रहण के प्रभाव अगले दिनों अनेकों तरह की भावनात्मक विक्षुब्धता और वैचारिक संघर्ष के रूप में देखे जा सकेंगे। इन प्रभावों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों ने इन दिनों सूर्य में काले धब्बों में चुम्बकत्व का गुण अधिक होता है, जबकि दृश्यमान सतह पर विद्युतीय गुण होता है।

इन काले धब्बों का चुम्बकीय गुण ही धरती निवासियों की भावनाओं और विचारों को विशेष रूप से उत्तेजित और आन्दोलित करता है। अब तक का इतिहास साक्षी है कि जिन वर्षों में सूर्य में काले धब्बों में बढ़ोत्तरी दिखाई दी, वे वर्ष धरती के लिए क्रान्तियों और परिवर्तनों के साल साबित हुए हैं। सामान्य क्रम में इन सौर कलंकों में घट-बढ़ का समय 11 वर्षों के अन्तराल में आता रहा है। पर इस समय यह क्रम विपर्यस्त हो चुका है। ग्यारह वर्षों की मर्यादा को अस्वीकार करके सूर्य में काले धब्बे इन दिनों तेजी से बढ़ रहे हैं।

इनके प्रभाव का मापन करने के लिए अमेरिकी संस्था नासा के सोलर मैक्सिमम मिशन ने एक अत्याधुनिक उपकरण तैयार किया है। इस उपकरण को उन्होंने एक्टिव कैविटी रेडियोमीटर इरेडिन्यस मोनीटर यानि कि.ए.सी.आर.इ.एम. नाम दिया है। यह सौर प्रभावों के अन्वेषण युग एक ऐसा प्रयास है जो सौर ऊर्जा फ्लक्स के एक प्रतिशत के हजारवें भाग के सूक्ष्म परिवर्तन का भी मापन कर लेता है। इस नए अन्वेषण से यह पता चला है कि सूर्य में उत्पन्न हो रहे काले धब्बों की वजह से सौर ऊर्जा की तीव्रता में एक प्रतिशत के दसवें भाग की कमी हैं, क्योंकि काले धब्बे सौर विकिरण को कम कर देते हैं।

इस परिवर्तन से जहाँ कतिपय वैज्ञानिक इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि सूर्य की तीव्रता कम होने से कहीं इक्कीसवीं सदी में हिमयुग का आगमन न हो जाए। वहीं विलकिन्स जैसे अन्य विशिष्ट और वरिष्ठ विज्ञानविदों ने इस शंका और चिन्ता को बेबुनियाद बताया है। इनमें से एक वैज्ञानिक एच.ग्रासमैन का तो यह मानना है कि सूर्य ऊर्जा की तीव्रता में कमी सूर्य द्वारा प्रकृति को फिर से सन्तुलित और पुनर्गठित करने का प्रयास है। सूर्य की तीव्रता में कमी आने से जहाँ ओजोन छतरी में छेद होने के कारण जहाँ बढ़ती जा रही उष्णता नियन्त्रित हो सकेगी, वहीं बढ़ती कार्बन-डाई-आक्साइड के कारण भयावह गर्मी के प्रभाव भी न्यून हो सकेंगे। इस तरह इक्कीसवीं सर्दी में प्रकृति और पर्यावरण सुनिश्चित रूप में अपना उज्ज्वल स्वरूप प्रस्तुत करेंगे?

हाँ, सूर्य में काले धब्बों को अकस्मात् होने वाली बढ़ोत्तरी के आधार पर प्रकृति और मानव समाज के परिवर्तनों की व्याख्या करने वाले जे.विलकिन्स का कहना है कि भावी वर्ष प्रकृति और मनुष्य के लिए अनेकानेक परिवर्तनों के होंगे। इस अवधि में एक के बाद एक अनेकों क्रान्तियाँ घटित होंगी, जो मानव समाज के वर्तमान को आमूल-चूल बदल डालेंगी। यों इन वर्षों में अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सूखा, अकाल, भूकम्प आदि ही नहीं युद्ध और महामारियों के प्रकोप भी होंगे। किन्तु इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करते-करते इस विनाश और विध्वंस लीला को चीरती उज्ज्वल भविष्य की किरणें भी दिखायी देने लगेंगी, जिनका प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता जायगा।

इन काले धब्बों के अलावा सूर्य की कक्षा में एक अन्य दृश्य देखने को मिला है। यह दृश्य है हयाकुता के नाम के धूमकेतु का सूर्य की ओर से बढ़ना जिसे बहुतों ने टेलिस्कोप के जरिए 15 मार्च से 18 मार्च के बीच देखा। खगोलशास्त्रियों के अनुसार 18 मार्च के बाद से इसे आधी रात और सूर्योदय के बीच नंगी आँखों से देखा जा सकेगा। दस साल में यह पहला मौका होगा, जब कोई धूमकेतु नंगी आँखों से देखा जा सकेगा। इससे पहले मार्च 1986 में हेली धूमकेतु को इसी तरह देखा गया था।

दिल्ली स्थित नेहरू तारा मण्डल की निर्देशिका डा0 निरुपमा राघवन के अनुसार इस धूमकेतु को देश के दक्षिणी राज्यों की तुलना में उत्तरी राज्यों में अधिक देखा जा सकेगा। इस धूमकेतु को इस वर्ष जनवरी में पहली बार एक जापानी शौकिया खगोलविद् ने देखा था। वैज्ञानिकों के अनुसार 23 से 25 मार्च के बीच यह पृथ्वी से करीब डेढ़ करोड़ किलोमीटर दूरी पर स्थित था।

डॉ0 राघवन के अनुसार अमेरिकी वेधशाला में इस पर 259 परीक्षण किए गए हैं। इन परीक्षणों से यह पता चला है कि सौर मण्डल में यह धूमकेतु पहली बार आया है। इसकी सतह पर काफी धूल और गैस होने की सम्भावना है। वैज्ञानिक परीक्षणों में पाया गया है कि इस पर जो धूल और गैस है, वे उसी अवस्था में है जिस अवस्था में साढ़े चार अरब वर्ष पहले इसके अस्तित्व में आने के समय में थे।

अमेरिकी खगोलविदों के अनुसार उन्हें पाँच मार्च को पता चला कि यह धूमकेतु 19 मार्च तक तुला राशि में रहेगा और उसके बाद वक्र होकर चलने की अपनी चिरकालिक प्रक्रिया के अनुरूप कन्या राशि में प्रवेश कर जाएगा। यह धूमकेतु सौर मण्डल में बलयिक दीर्घ वृत्ताकार कक्ष में धूम रहा हैं। इस कारण यह पृथ्वी की ओर न बढ़कर धीरे-धीरे सूर्य की ओर बढ़ेगा। जैसे-जैसे यह सूर्य की ओर बढ़ेगा इसकी चमक भी बढ़ती जाएगी। सूर्य के पास जाने पर इस पर जमी बर्फ व धूल गर्मी के कारण गैस में बदल जाएंगे। सूर्य के जोरदार गुरुत्व बल के कारण यह गैस पूछ का रूप धारण कर लेगी। होना यह चाहिए कि इसकी नंगी आँखों से देखी जाने वाली अवधि संधिकाल की चैत्र की नवरात्रि ही थी।

धूमकेतु पर अब तक के अध्ययनों के अनुसार हयाकुता के अगले साल पृथ्वी से दिखाई पड़ने वाले हेल बोप्प नामक एक अन्य धूमकेतु की तुलना में कम चमकदार है। पृथ्वी की ओर बढ़ रहे हेल बोप्प को गत वर्ष 26 जुलाई को दो अमेरिकी खगोलविदों ने पहली बार न्यूमेक्सिको में देखा था। चूँकि धूमकेतुओं के आकार का आंकलन चमक के आधार पर ही किया जाता है। इसलिए हयाकुता के धूमकेतु का आकार हेली धूमकेतु से 150 से 200 गुना अधिक किन्तु हेल बोप्प से कम होने का अनुमान है। इसके अलावा हयाकुता के सूर्य के करीब पहुँचने पर जो पूँछ बनेगी, वह हेल बोप्पा की बनने वाली पूँछ से काफी छोटी होगी। पूँछ हेल बोप्प अभी सूर्य से काफी देर है, लेकिन इसकी पूँछ बन गयी है। हेल बोप्प जैसे-जैसे सूर्य के निकट होता जाएगा, इसकी पूँछ बड़ी होती जाएगी।

ये धूमकेतु पृथ्वी या किसी अन्य ग्रह से टकराएंगे ऐसी सम्भावना तो नहीं है। किन्तु इतना सुनिश्चित है कि इनके कारण प्रकृति पर्यावरण और मानवीय परिस्थितियाँ व्यापक हलचलों एवं गम्भीर उथल-पुथल से भरी रहेंगी। इन परिस्थितियों में सूर्य से मानसिक सम्बन्ध बनाए रखने वाले न केवल स्वयं को विध्वंस और विनाश से बनाए रखेंगे, बल्कि अपने अन्तःकरण में ऐसी अलौकिक प्रेरणाओं को उतरता हुआ अनुभव करेंगे, जिसे अपनाकर वे नव सृजन के देवदूत कहला सके।

सूर्य को ऋषियों ने त्रयी विद्या कहा है। अर्थात् उसमें स्थूल तत्व (जिनसे शरीर बनते हैं), प्राण (जिनसे चेतना आती है) और मन (जो चेष्टाएं प्रदान करता है) तीनों तत्व विद्यमान है। हम दृश्य रूप से सूर्य के परिवर्तनों से प्रभावित होकर दुःखी होते हैं, किन्तु गायत्री मंत्र के माध्यम से जब हम सूर्य के साथ अपने मनोमय जगत को जोड़ते हैं तादात्म्य करते हैं, तो हमें उसके आध्यात्मिक लाभ-स्वास्थ्य, तेजस्विता और मनस्विता के रूप में मिलता है। यद्यपि इस विद्या से अभी सुप्रचलित विज्ञान परिचित नहीं है। लेकिन जिस दिन पृथ्वी के लोग इस विद्या को ठीक-ठीक जान लेंगे उस दिन सुख-शान्ति और समृद्धि का कोई अभाव नहीं रहेगा। पर युग परिवर्तन की इस सन्धि और सक्लान्ति अवस्था में उन लोगों को अधिक श्रेय सम्मान मिलेगा, जो इस तत्व ज्ञान के अवगाहन और इसे सारे विश्व में फैलाने का प्रयत्न करेंगे।


देवों और दैत्यों का भी अस्तित्व रहा है मानवीय इतिहास में

भारतीय मिथकों में मनुष्य की ही तरह देवताओं और दैत्यों का भी वर्णन मिलता है। मनुष्य भूलोक में, देव स्वर्गलोक में और दैत्य पाताल में रहते थे। इन तीनों की आकृति, प्रकृति एवं स्थान के सम्बन्ध में जो विवरण उपलब्ध हैं, उनमें कितनी कल्पना का मिश्रण और कितना यथार्थता का समावेश है, कहना कठिन है। फिर भी सामान्यतया यह सोचा जा सकता है कि मनुष्य प्राचीन काल में भी ऐसे ही रूपाकार के रहे होंगे जैसे आज हैं। साधन-सुविधाओं के अभाव में वन्य क्षेत्र में रहना और कष्टसाध्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ता होगा, तो भी वे निर्वाह की स्वाभाविक आवश्यकताएं पूरी कर लेते थे और प्रकृति से संघर्षरत रहने के कारण बलिष्ठ भी रहते थे।

सुविधाएं बढ़ने पर छीन-झपट चल पड़ती है, किन्तु असुविधाग्रस्तों में परस्त अधिक सहयोग-सद्भाव रहता है। इस आधार पर प्राचीनकाल के मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक पुरुषार्थी, संतोषी और सहयोगी प्रकृति के रहे होंगे यह कहा जा सकता है। देवताओं की बुद्धि संगत व्याख्या और स्वरूप यही हो सकता है। तनिक गंभीरतापूर्वक सोचने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि अपनी देने की प्रवृत्ति के कारण एवं सुयोग्य, समर्थ होने के कारण ही सम्भवतः वे ‘देव’ कहे जाते रहे होंगे। हो सकता है कि प्रकृति की विशिष्ट शक्तियों को और भावना क्षेत्र की सज्जनता को देवत्व का प्रतीक प्रतिनिधि माना गया होगा। उनके साथ जुड़ी हुई विशेषताओं विभूतियों को अलंकारिक रूप में चित्रित किया गया होगा। देवताओं के वाहन, आयुध ऐसे ही रहस्यों को अपने में छिपाये गए हैं। उनकी अनेक भुजाओं, मुखों, नेत्रों, सिरों का अंकन भी कदाचित् इसी आधार पर हुआ हो। सहायता के लिए सदा प्रस्तुत रहने वालों को ‘देव’ कहा जाना स्वाभाविक है, उन्हें देव रूप में प्रतिष्ठा और मान्यता देना युक्तिसंगत भी है।

दैत्य का भावार्थ है-विशाल, समर्थ एवं उद्धत। दैत्य, दानव, असुर आम बोल-चाल में एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, पर वे सब हैं वस्तुतः अलग-अलग। सुर समुदाय के अतिरिक्त अन्यान्यों को ‘असुर’ कहा गया है। मध्य एशिया में बसने वाली एक जाति भी थी-’अहुर’ जिसे ‘असुर’ शब्द का अपभ्रंश कह सकते हैं। उन क्षेत्रों में जीवनोपयोगी सामग्री का अभाव रहने से वे दूर-दूर तक आक्रमण धावे बोलते थे। शायद इसी क्रूरता के कारण उन्हें यह नाम दिया गया होगा अथवा परम्परागत यही नाम उनके हिस्से में आया होगा। ‘दानव’ शब्द भी इसी प्रकार नृशंसता का बोधक है।

‘दैत्य’ शब्द आकार एवं वैभव का परिचायक है। अंग्रेजी में इसे ‘जाइण्ट’ कहा गया है। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, सहस्रबाहु आदि के शरीर सामान्यों की अपेक्षा अधिक बड़े माने जाते हैं। उनकी बलिष्ठता भी उसी अनुपात में बढ़ी-चढ़ी होनी चाहिए।

प्रागैतिहासिक काल में महागज, महागरुड़, महासरीसृप जैसे विशालकाय प्राणियों का इस धरती पर आधिपत्य था। इन्हीं दिनों मनुष्य स्तर के प्राणियों की उत्पत्ति हुई होगी, तो वे नर-वानर भी भीमकाय ही रहे होंगे। अब भी साधारण वनमानुषों की तुलना में गोरिल्ला, चिम्पाँजी अपेक्षाकृत बड़े और बलिष्ठ होते हैं। सामान्य वनमानुषों से कई गुना विशाल हिम मानवों के देखे जाने, पाये जाने की चर्चा अभी भी होती रहती है। उनके पैरों के निशान से भी उनकी विशालता का अन्दाज लगता है।

ऐतिहासिक खोजों से सभी विशालकाय मनुष्यों के अस्तित्व का पता चला है। फ्राँसीसी पुरातत्ववेत्ता लुई बरबलिटा ने अपने अन्वेषणों में किसी समय के भीमकाय मनुष्यों के अवशेष प्राप्त किये हैं। उनकी अस्थियों के आधार पर डयौढे से लेकर दूने तक आकार का उन्हें बताया गया है। सीरिया के सासनी क्षेत्र की खुदाई में चुम्बक पत्थर के बने आठ पौण्ड भारी हथियार मिले हैं। उत्तरी मोरक्को में भी प्रायः इतने ही वजनी और बड़े आकार के शस्त्र मिले हैं। वे ऐसे हैं, जिन्हें 12 फुट से कम ऊँचाई वाले मनुष्य प्रयुक्त नहीं कर सकते।

लेबनाना में एक दो लाख पौण्ड भारी विशेष पत्थर मिला है, जिस पर कई ओर से बढ़िया नक्काशी की गई है। यह कार्य दैत्याकार मानवों का ही हो सकता है। इस ऐतिहासिक पत्थर का नाम ‘हज्रएल गुल्ले’ रखा गया है। उसे देखने संसार भर के लोग पहुँचते हैं।

इटली और आस्ट्रेलिया के कई दुर्गम शिखरों पर ऐसी ही कलाकृतियाँ पायी गई हैं। इतनी ऊँचाई पर पहुँच कर उतने कठिन काम कर सकना दैत्याकार मानवों के लिए ही सम्भव हो सकता है। मिश्र के पिरामिडों में लगे पत्थर इतने वजनी हैं और इतनी ऊँचाई पर अवस्थित हैं कि उन्हें इस प्रकार जोड़ना वर्तमान आकृति के मनुष्यों के लिए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। दक्षिण अमेरिका में पाये गये पिरामिड खण्डहर इनसे भी अधिक आश्चर्यजनक हैं।

प्राणि विज्ञान के शोधकर्त्ताओं का एक वर्ग ऐसा भी है, जो कहता है कि प्राणि विकास की एक मंजिल ऐसी भी रही है, जिसमें मनुष्यों और पशुओं के बीच की विभाजन-रेखा पूरी तरह नहीं बन पायी थी और उनके मध्य यौनाचार चलता था। उस संयोग से संकार प्राणि भी उत्पन्न होते थे और उनमें दोनों के गुण समन्वित रहते थे। मनुष्य की बुद्धिमता और पशुओं की बलिष्ठता के संयोग से उत्पन्न प्राणी दैत्याकार थे। अब तो इस संकर प्रक्रिया द्वारा जीव विज्ञानी और वनस्पतिशास्त्री तरह-तरह की नयी किस्में और प्रजातियाँ विकसित करने में लगे हैं। इसमें प्रधानतया गुणावलियों में सुधार और आकार-प्रकार में विस्तार ही मुख्य होता है। इसी प्रक्रिया द्वारा उन्होंने घोड़े और गधे के बीच की एक नई प्रजाति खच्चर विकसित की है, जिसमें दोनों जातियों के गुण सम्मिलित हैं। उसमें यदि घोड़े का आकार और गठन है, तो भार-वहन-क्षमता गधे की पायी है। इस प्रकार मनुष्य के विकास काल में यदि ऐसे अप्राकृतिक संयोग और सृजन हुए हों, तो इसे आज संकर-प्रजाति-निर्माण की आदिम शुरुआत ही कहना पड़ेगा।

प्लेटो ने अपने ग्रन्थ ‘मैन एण्ड सिविलाइजेशन’ में मनुष्य और मनुष्येत्तर पशुओं के संयोग से दैत्याकार प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन किया है। ‘टैटीक्स एनेल्स’ नाम फ्राँसीसी ग्रन्थ में भी ऐसे ही विवरणों का उल्लेख है, जिसमें मनुष्यों और मानवेत्तर प्राणियों के बीच चलने वाले यौनाचार का विवरण मिलता है। इतिहासकार हैरोयोतस ने अपने विवरणों में ऐसे ही प्रचलनों की चर्चा की है और लिखा है कि अति आरम्भ काल में मनुष्य और मनुष्य एवं पशु की मध्यवर्ती प्रजाति के बीच खुल कर यौन सम्बन्ध होते थे। इसी के फलस्वरूप उस काल में यह नयी किस्म आकार एवं शक्ति के अनूठे प्रतिमान के रूप में उभरी। बगदाद एवं लन्दन के संग्रहालयों में ऐसी कई पाषाण प्रतिमाएं हैं, जिनसे उन दिनों ऐसा प्रचलन रहने की साक्षी मिलती है।

सुमेर सभ्यता के पुराण कथनों में निपुर क्षेत्र के निवासी ऐनेलिल नामक देव समुदाय में निनलिल नाम मानवेत्तर मादाओं के साथ संयोग करके अर्ध पशु और अर्ध मनुष्य स्तर की प्रजा उत्पन्न करने का वर्णन है। भारतीय पुराण मिथक इससे भी एक कदम आगे है। उनमें हनुमान पुत्र मकरध्वज, मत्स्यगन्धा आदि का वर्णन है। भीम पुत्र घटोत्कच ऐसी ही संकर संतान स्था। दो भिन्न प्रजातियों के संपर्क से उत्पन्न होने के कारण ही उसका बल और पराक्रम अद्वितीय था। नृसिंह ह्यग्रीव जैसे अवतारों की आकृति अर्धपशु-अर्ध मनुष्य जैसी दर्शायी गई है। गणेश को भी ऐसा ही चित्रित किया गया है।

इतिहासकार पाताललोक अमेरिका को बताते हैं और वहाँ कभी ‘मय’ सभ्यता का चरमोत्कर्ष मानते हैं। महाभार में ‘मय’ दानव परिकर बताया गया है, जो सूर्योपासक था। ज्योतिर्विज्ञान का उसे आविष्कर्ता एवं मूर्धन्य भी माना गया है। अहिरावण पातालपुरी का ही एक शासक था। भौतिक विज्ञान और बलिष्ठता-सम्पन्नता की दृष्टि से बढ़-चढ़े होने के रण यह लोग ‘दैत्य’ कहे जाते थे।

पुरातत्व विशेषज्ञ हैविट्ट, मैकेज्जी, थेड आदि का कथन है कि मय सभ्यता के दिनों भारतीय सभ्यता के अनुरूप ही मान्यताएं प्रचलित थीं। वहाँ ‘नाग’ जाति के लोग रहते थे, अतएव उस क्षेत्र को ‘नागलोक’ भी कहा जाता था। नागलोक पाताल लोक का ही दूसरा नाम है। मय शासकों को दैत्य कहा जाता था। वे भूलोक में भी आते थे। मायावी कहलाते थे। जल से थल और थल से जल का भ्रम उत्पन्न करने वाला स्थान उन्होंने द्रौपदी के मनोरंजन हेतु बनाया था। उसी से भ्रमित होकर दुर्योधन को उपहासास्पद बनना पड़ा। लंकापुरी उन्हीं के द्वारा विनिर्मित हुई थी।

‘राक्षस’ भी इसी कोटि का प्राणी कोटि का प्राणी था। अपनी बलिष्ठता और मजबूती के कारण ही वह राक्षस कहलाया। सूत्रकार ने इसको परिभाषा करते हुए लिखा है कि क्षति से जो दूसरों को सुरक्षा प्रदान कर सके, वह राक्षस है। इस परिभाषा से भी उनके आकार-प्रकार का सहज अनुमान लगता है। जो असाधारण शरीर गठन वाला बलवान और सामर्थ्यवान हो, दूसरों की सुरक्षा की गारण्टी वही ले सकता है। इससे भी उनकी असामान्य शक्ति और विभूति का ही पता चलता है दूसरा कुछ नहीं, जिससे कि मानवाकृति से उन्हें भिन्न कहा जा सके। बाल कथाओं में जिन सींगों और लंबे दाँतों की चर्चा होती है, वह इसलिए कि अपरिपक्व बल-बुद्धि उसे सरलतापूर्वक सामान्य मनुष्य से भिन्न पहचान सके।

महाभारत में एक ऐसी कथा का वर्णन है, जिसमें अज्ञातवास के दौरान भीम की भिड़न्त एक दैत्यराज से हो गई थी। उसके आहार की मात्रा असाधारण थी। प्रतिदिन वह उस क्षेत्र के एक मनुष्य को अपना आहार बना लेता था। इसके अतिरिक्त भी ढेर सारा भोजन करता था। द्रौपदी के कहने पर उस दैत्य का वध करके भीम ने ही वहाँ की जनता को उससे त्राण पहुँचाया था।

इसके अतिरिक्त पुराणों में गंधर्व एवं यक्ष जैसी जातियों का सभी वर्णन मिलता है। मनुष्यों के साथ इनका संपर्क रहता था और परस्पर विवाह-सम्बन्ध भी होता था। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे कोई सूक्ष्म लोक के सूक्ष्म प्राणी नहीं, वरन् स्थूल मानवाकृति वाले ही कोई भिन्न जाति रहे होंगे।

इस प्रकार देवता और दैत्य उपाख्यानों में मनुष्य से भिन्न प्रकार के प्राणी मालूम पड़ते हैं, पर वास्तविकता यह है कि तीनों ही वर्ग प्रकृति से भिन्न अवश्य होते हैं, पर उनकी आकृति एक जैसी ही होती है।


विचारों एवं वस्तुओं की शक्ति से प्रभावित होता है हमारा वातावरण

मनुष्य एक चलता-फिरता विद्युतघर है- यह कोई नया तथ्य नहीं। उसकी नस-नस में एक विशेष प्रकार की विद्युत शक्ति संव्याप्त होती है। यह शक्ति सिर्फ शरीरधारी चैतन्य प्राणियों पर ही असर नहीं डालती, वरन् निर्जीव और जड़ कहे जाने वाले पदार्थों को भी समान रूप से प्रभावित करती है।

मकानों पर मनुष्य के रहने का प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। एक मकान में कोई मनुष्य न रहे और वह खाली पड़ा रहे, तो बहुत जल्द उसकी दशा खराब हो जायेगी और कम समय में ही वह बर्बाद हो जायेगा, किन्तु देखा जाता है कि वैसे मकान जिसमें मनुष्य रहते हैं, इतनी जल्दी खराब नहीं होते हैं। मोटे तौर से देखने में वह मकान खराब होना चाहिए, जिसमें लोग रहते हैं, क्योंकि प्रयोग करने से हर वस्तु जल्दी टूटती है और जो चीज काम में नहीं आती, वह ज्यादा दिन चलती है, परन्तु यहाँ उलटा ही उदाहरण दृष्टिगोचर होता है। इसका कारण एक ही है-शरीर विद्युत का चमत्कार। विशेषज्ञों का कहना है कि मनुष्य शरीर की बिजली जड़ पदार्थों में सभी बल का संचार करती है। मकानों में दीर्घ जीवन के साथ-साथ उसके मालिकों के विचारों का वातावरण भी गूंजता है। जिस घर में जैसी प्रकृति के लोग रहते हैं, उनके विचारों की शृंखला से वैसे ही प्राण ऊर्जा विद्युतीय आभा के रूप में उस स्थान पर संव्याप्त हो जाती है।

ये लोग चले जाय, तो भी बहुत काल तक उनके गुण, स्वभाव वहाँ डेरा डाले रहते हैं। अध्यात्म विद्या के आचार्यों का कहना है कि जिसे अध्यात्म तत्व की तनिक सी जानकारी होगी, वह किसी भी मकान में प्रवेश करते ही बता सकता है कि यहाँ पर कैसे स्वभाव के लोगों का रहना होता है या हुआ था। भले विचारों से परिपूर्ण मकान में प्रवेश करते ही एक शान्ति-शीतलता का अनुभव होगा। जिन स्थानों में बुरे विचार के लोग रहते हैं, वहाँ अपने मन में भी उस प्रकार के तरंगों का प्रादुर्भाव होने लगता है। जिस स्थान पर कोई वीभत्स या भयंकर कार्य हुए हैं, उन जगहों का वातावरण मुद्दतों तक नहीं बदलता। जिन मकानों में अग्निकांड, भ्रूण हत्या, कत्ल या ऐसे ही अन्य जन्य कार्य हुए हैं, उन घरों की ईंटें रोती हैं और उन स्थानों पर सताये गये प्राणी की करुणा कभी-कभी आग्रत होकर बड़े डरावने दृश्य या स्वप्न उपस्थित करती है। इन्हीं घरों का अभागा या भुतहा होना प्रसिद्ध होता है। उनमें जो कोई रहता है, उन्हें कष्ट होता है, डर लगता है या अन्य उपद्रव होते हैं ऐसे स्थानों के सम्बन्ध में उनका कुछ आगे का इतिहास ढूंढ़ा जाय, तो जरूर कोई खटकने वाली घटना उस घर में हुई होगी- ऐसा विदित होगा। या तो कोई मनुष्य अत्यन्त ही शारीरिक अथवा मानसिक कष्टों से कराहता हुआ उसमें पड़ा रहा होगा या उस स्थान पर किसी की ‘हाय’ पड़ी रही होगी। उदाहरण के लिए यातनाग्रहों, बन्दीग्रहों एवं बूचड़खानों को लिया जा सकता है। उग्र मानसिक अनुभूतियाँ जिन स्थानों में मंडराती रहती हैं, उनमें रहने वाले सुख से नहीं रह सकते। प्रबल मनस्वियों को छोड़कर साधारण कोटि के लोगों का कलेजा उनमें काँपता रहता है।

डॉ. गोपीनाथ कविराज अपने ग्रन्थ ‘तान्त्रिक साधना और सिद्धान्त’ में लिखते हैं कि मनुष्य शरीर के एक-एक कण में इतनी शक्ति भरी हुई है कि उससे एक स्वतन्त्र सृष्टि का सृजन हो जाय। यदि इस प्रक्रिया में कोई बाधा उपस्थित न हो, तो वे कण अवसर पाकर अपने पूर्व रूप की भूमिका में एक स्वतन्त्र अव्यक्ति व्यक्ति की रचना करने लगते हैं। एक कण का एक अव्यक्ति स्वरूप बन सकता है। वे कहते हैं कि कोई मृत व्यक्ति, चाहे वह अन्यत्र जन्म ले चुका हो, फिर भी उसके पिछले कण यदि जाग्रत होने की स्थिति में आ जाय, तो वे प्रकट और प्रत्यक्ष हो सकते हैं। प्रेत, पिशाच, बेताल अक्सर किसी भूतपूर्व व्यक्ति के थोड़े से विद्युत परमाणुओं की एक स्वतन्त्र सृष्टि होती है। बहुत-सी बातें उनमें अपने पूर्व सत्ता से मिलती-जुलती हैं और बहुत-सी बिल्कुल स्वतन्त्र होती हैं। इस प्रकार से बने हुए भूत-प्रेतों के लिए यह आवश्यक नहीं कि उनके सारे स्वभाव और सारा ज्ञान पूर्व शरीर की ही भाँति हो। चूँकि मरघट इस प्रकार के स्वतन्त्र विद्युत कणों का एक प्रकार से भण्डार होता है, अतः मौका पाकर जब ये कण अपनी सम्पूर्ण सत्ता की भूमिका में आते हैं, तो वहीं भूत-प्रेत की तरह व्यवहार करने लगते हैं। कई बार सुनने में आता है कि अमुक व्यक्ति का प्रेत हजार साल जितनी लम्बी अवधि के बीत जाने पर भी अपनी सत्ता बनाये हुए है। ऐसी घटनाओं में व्यक्ति की मूल सत्ता यह नहीं होती। वह तो अनेक बार पुनर्जन्म लेकर जन्म-मरण के कई चक्र से होकर कई अवधि में गुजर चुकी होती हैं। फिर उस जैसी लगने वाली यह सत्ता कौन है? यह वस्तुतः वही स्वतन्त्र कण हैं, जो माक् पाकर अपनी पूर्व सत्ता की भूमिका में प्रकट हो जाते और मूल सत्ता की तरह व्यवहार करने लगते हैं।

सर्वत्र स्त्रियाँ जेवर पहनना पसन्द करती हैं और उससे सौंदर्य में वृद्धि भी होती है, इसमें दो मत नहीं। विज्ञान वेत्ताओं का कहना है कि वायु के साथ आकाशीय विद्युत की एक धारा भी बहती रहती है, जिसमें मनुष्य शरीर को पोषण करने का बड़ा गुण है। धातुओं में विद्युत को खींचने की क्षमता होती है। स्थूल और सूक्ष्म का भेद इस आकाशीय विद्युत में भी हैं। लोहे, पीतल या ऐसी ही सस्ती धातुओं का सस्तापन उनके रंग-रूप के कारण नहीं वरन् सूक्ष्म और उपयोगी विद्युत-प्रवाह को ग्रहण करने की दृष्टि से है। यदि यह बात होती, तो चाँदी की अपेक्षा लोहा महंगा होता, क्योंकि उसकी भौतिक उपयोगिता चाँदी से अधिक है। इसी प्रकार सोने से प्लेटिनम धातु, महँगी होती है, क्योंकि उसकी चमक सोने से भी अच्छी होती है। चाँदी और सोना आकाश की सूक्ष्म बिजलियों को आकर्षित करते हैं। चाँदी द्वारा शीतलता, गंभीरता और मन्दता उत्पन्न होती है। काम शक्ति को घटाने के लिए चाँदी के आभूषण काफी उपयोगी सिद्ध होते हैं। सोना उत्साह, तेज और चमक प्रदान करता है। चेहरे पर तेज या चमक होना स्त्रियाँ विशेष रूप से पसन्द करती हैं। सोने के जेवरों की उपयोगिता इसी दृष्टि से निर्धारित की गई है। कान के निचले भागों में ही सोना पहनना हितकारी है। इससे कनपटी और गालों से सम्बन्ध रखने वाली माँसपेशियों से उसका स्पर्श होता रहता है। कान के ऊपरी भाग में सोना पहनने से उसका संपर्क मस्तिष्क की ऊपरी पेशियों से होता है, जिससे चित्त में चंचलता उत्पन्न होती है। धातुएं अपने आकर्षण से आकाश की उपयोगी बिजली खींच कर पहने हुए शरीर में देती हैं। इससे न केवल सौंदर्य की, वरन् स्वास्थ्य की भी वृद्धि होती है। ताँबा भी सोने जैसा ही गुणकारी है, परन्तु न जाने उसके जेवर क्यों नहीं पहने जाते। शायद सस्तेपन के कारण ही उसकी उपेक्षा की गई है। सोने के पोले जेवर जिनके अन्दर लाख आदि भरवायी जाती है, यदि ताँबा भरवा दिया जाय, तो गुणों में वह सोने के समान ही देखा गया है। सोने में थोड़ा ताँबा मिलाकर ‘गिन्नी गोल्ड’ जैसी मिश्रित धातु के आभूषण और भी उत्तम पाये गये हैं। छाती, हृदय कंठ के आस-पास कोई जेवर पहनना हृदय को बल देता है। पुरुष जो स्वयं जेवर पहनना पसंद नहीं करते यदि सोने चाँदी या ताँबे की अंगूठियां भर पहने रहें, तो यह उनके स्वास्थ्य के लिए लाभकारी पाया गया है, किन्तु ध्यान रहें, ऐसे आभूषण आवश्यकता से अधिक शरीर में नहीं लाद लेना चाहिए, अन्यथा लाभ के स्थान पर उलटी हानि ही होगी। आकाशीय विद्युत उतनी ही मात्रा में शरीर के लिए उपयोगी है, जितनी को काया आसानी से पचा सके। उसकी अधिक मात्रा कई प्रकार के उपद्रव खड़े कर सकती है। इन दिनों अमीरी और बड़प्पन का प्रदर्शन करने के लिए सोने के आवश्यकता से अधिक गहने पहनने का प्रचलन चल पड़ा है। इस दिशा में स्त्री-पुरुष दोनों को समान रूप से सावधान रहना चाहिए। अष्ट धातुओं के आभूषण पहनने में तो विशेष रूप से सतर्कता बरतनी चाहिए, क्योंकि उसमें बहुत ही ऊँची आकर्षण धारा होती है। यदि इसका कोई बड़ा गहना, बड़ी अंगूठी पहन ली गई, तो अनिद्रा, रक्त पित्त, उन्माद जैसी शिकायत उत्पन्न हो सकती है। ताँबे और चाँदी के तारों से गुथी हुई अंगूठी में सात्विक विचारधारा को आकर्षित करने की अद्भुत सामर्थ्य होती है, अतः पुरुषों के लिए इस प्रकार की अंगूठियाँ कहीं अधिक लाभकारी और उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।

पुराने लोग जेवर गिरवी रखने का व्यवसाय बुरा बताते हैं-यह अन्धमान्यता भर नहीं है। इसके पीछे सुनिश्चित वैज्ञानिक कारण है। ऐसे असंख्य उदाहरण पाये जाते हैं कि जेवर गिरवी रखने का व्यवसाय करने वाले फलते-फूलते नहीं और सदा किसी-न-किसी कष्ट से दुःखी रहते हैं। कारण यह है कि अधिकाँश गहने स्त्रियों के पहनने के होते हैं और वे उन्हें अत्यधिक प्यार करती हैं। जब वह गिरवी के लिए माँगे जाते हैं, तो वे बहुत दुःखी होकर देती हैं और भविष्य में भी जब तक वे उन्हें वापिस न मिलें, दुःखी बनी रहती हैं। यह दुःख भरी इच्छाएं अपनी इष्ट वस्तु पास पहुँचती हैं और उस पर लगातार लदती रहती हैं। धातुओं में विद्युत शक्ति को अधिक मात्रा में ग्रहण करने का गुण होने के कारण वे इन इच्छाओं को पूरी तरह अपनाये रहती हैं। इस प्रकार वे दुःख भरे विचार जिस व्यक्ति की अधीनता में रहेंगे, वे उसे अपने प्रीव से प्रीवित किये बिना कदापि न छोड़ेंगे। इसी कारण आभूषण या थाली-बर्तन आदि घर-गृहस्थी के काम आने वाली चीजें जो लोग गिरवी रखते हैं, देखा गया है कि वे दुःखी रहते और किसी-न-किसी प्रकार की विपत्ति में फंसे रहते हैं।

कपड़े शरीर के सबसे अधिक निकट संपर्क में रहते हैं इसलिए जड़ होते हुए सभी वे पूरी तरह प्रभावित हो जाते हैं। किसी का पहना हुआ कपड़ा पहनना ऐसा ही है, जैसा उसका जूठा भोजन खाना। एक पौराणिक कथा है कि देवगुरु बृहस्पति की कन्या देवयानी ने एक दूसरी लड़की शर्मिष्ठा के कपड़े पहन लिये थे, इसलिए उसे जीवन भर उसका गुलाम बन कर रहना पड़ा था। पुरानी चीजें बेचने वालों की दुकान से उतरे हुए बढ़िया कपड़े सस्ते दामों में खरीद कर लोग पहनते हैं और अपनी बुद्धिमानी पर प्रसन्न होते हैं। उन्हें जानना चाहिए कि वह कार्य उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही बुरा है। जिस आदमी के व्यक्तित्व के संबंध में जानकारी न हो, उसके विचार और स्वभावों से लदे हुए कपड़े पहनना आत्मविज्ञानी निरापद नहीं मानते। किसी के मन के ऊपर यदि किसी के बुरे विचार की छाप पड़ी, तो यह उसके शारीरिक रूप से बीमार पड़ जाने से भी अधिक बुरा होगा, क्योंकि शरीर की बीमारी तो थोड़े दिनों में ठीक हो जाती है, किन्तु मन के ऊपर पड़े अनिष्टकर प्रभाव जन्म भर दुःख देते हैं और आगामी जन्मों के लिए भी विरासत में मिलते चले जाते हैं। साधना मार्ग के पथिकों को विशेषकर इस दिशा में जागरुकता बरतने की आवश्यकता है। यह तर्क भी ठीक नहीं कि अच्छे स्वभाव के लोगों के कपड़े पहनने में हर्ज नहीं। किसी को भी किसी की आन्तरिक भाव-भूमि ज्ञात नहीं। क्या पता, जो व्यक्ति बाह्य आचरण से श्रेष्ठ प्रतीत होता हो, उसके मन में बुरे भाव नहीं हों अथवा कोई गुप्त रोग नहीं हो। इसलिए दूसरों के कपड़े पहनना भी एक प्रकार से अनजाने और अनचाहे ही उसके विचारों से प्रभावित होना ही कहा जायेगा।

रेशमी और ऊनी कपड़े बहुत कम प्रभाव ग्रहण करते हैं, इसलिए उन्हें पूजा आदि पवित्र कार्यों में, किन्हीं कारणों से बदलने या धोने की सुविधा न होने पर उसी रूप में यथावत् प्रयुक्त करने की छूट दे दी गई है। कपड़ों को धूप में खूब तपाने और गर्म पानी में उबालने से वे मैल और स्पर्श संबंधी उन दोषों से मुक्त हो जाते हैं, जो प्रतिदिन तरह-तरह के विचार और स्वभाव वाले लोगों के संपर्क में आकर वे ग्रहण-धारण कर लेते हैं। इसीलिए नित्य स्वच्छ-धुले कपड़े पहनने पर साधना विज्ञान में बल दिया गया है।

इतना जान-समझ लेने के उपरान्त अब इस सम्बन्ध में कोई ऊहापोह शेष रह नहीं जाती कि व्यक्ति और वस्तु का परस्पर कोई प्रच्छन्न प्रभाव नहीं पड़ता। साधना विज्ञान के आचार्यों ने इसी कारण से साधना में प्रगति के इच्छुक लोगों को आध्यात्मिक पुरुषों के अधिकाधिक संपर्क में रहने का निर्देश किया है। यदि इस विज्ञान को समझा जा सके, तो दैनिक जीवन में भी लोग कितने ही दुःख कष्टों से बच कर सुख-सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।


अहं गले तो गुरु मिले

काका! यह क्या ठोका-पीटी कर रहे हैं? अपनी बाल सुलभ हंसी बिखेरते हुए मुक्ताबाई ने उनसे यह सवाल पूछा। आज सुबह से ही वह अपने तीनों भाइयों निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर और सोपानदेव के साथ यहाँ आ गयी थी। इन चारों के साथ नामदेव भी थे। उम्र में ये सभी बालक होते हुए भी अपने ज्ञान एवं भक्ति के कारण सभी से सम्मानित थे। इनकी बालक्रीड़ाओं में ईश्वर बोध का सौंदर्य झलकता था।

इन पाँचों के आते ही सभी ने उठकर स्वागत किया। सबकी दृष्टि अब गोरा कुम्हार की ओर थी, उन सबके मन में यही तरंगित हो रहा था कि देखें गोरा काका मुक्ताबाई के सवाल का क्या जवाब देते हैं। गोरा कुम्हार ने सभी की मनोदशा भांपते हुए एक हल्की सी स्मित बिखेरी और कहने लगे-बेटी कच्चे और पक्के घड़ों की पहचान कर रहा हूँ।

मुक्ताबाई ने उसी बाल सुलभ चापल्यवश वह बर्तन गढ़ने की थापी उठा ली और कहने लगी, काका, हम सब भी तो मिट्टी के घड़े हैं। जरा देखो तो, हमारे इन घड़ों में किसका घड़ा कच्चा हैं।

गोरा जी ने थापी उठायी और लगे सभी की पीठ और सिर को उससे ठोक कर थपथपाने। इस क्रम में एक-एक करके सभी की बारी आती गयी। जिसकी भी बारी आती, वह सिर झुकाकर मौन धारे थापी की चोटें सहता, लेकिन मुख से उफ तक नहीं करता।

इस प्रक्रिया के दौरान, जब नामदेव के सिर पर थापी की पहली चोट पड़ी, तो उनके मन में छुपा अभिमान जाग पड़ा। वे सोचने लगे, ‘यह काका, तो कर्म से ही नहीं मन से भी कुम्हार हैं, गंवार है। ये इतना भी नहीं जानते कि इन संत जनों पर कहीं ऐसी चोटें मारी जाती हैं।

नामदेव जी विट्ठल भगवान के अनन्य प्रेमी थे। उनका उनसे सहज सान्निध्य था। भगवान का अर्श-पर्श तथा वार्तालाप उनको सहज सुलभ था। इस कारण भक्त मण्डली में उनको विशेष सम्मान प्राप्त था।

जब वह पाँच साल के थे, तब एक दिन उनके पिता दामासेठ को अपने व्यापार के सिलसिले में बाहर जाना पड़ा। उन्होंने अपने पाँच वर्षीय पुत्र को भोग लगाने व पूजा करने का कार्य सौंप दा। अपनी बाल-बुद्धि के अनुसार नामदेव ने यह समझा कि मूर्ति रोज पिता के द्वारा चढ़ाया हुआ दूध पी लेती होगी। जब उन्होंने दूध पी लेती होगी। जब उन्होंने दूध का भोग लगाया और मूर्ति ने छुआ तक नहीं, तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्होंने सोचा कि उनमें कुछ त्रुटि रह गयी है जिसके कारण विट्ठल की मूर्ति ने उस दूध के भोग को स्वीकार नहीं किया। वे बहुत रोये और यह हठ ठान ली कि जब तक विट्ठल दूध नहीं पियेंगे वे वहाँ से नहीं हटेंगे। भक्त के हठ के कारण, भगवान को प्रकट होकर दूध पीना पड़ा।

नामदेव की इस ख्याति से सभी परिचित थे। पर गोरा जी इसे जानते हुए भी उनपर कस-कस कर थापी की चोट लगाए जा रहे थे। नामदेव झुँझलाते रहे, पर काका की थापी चलती रही। सब थापी की चोटें पड़ चुकी थी। जाँच-परख का निर्णय जानने को मुक्ताबाई उत्सुक थी।

‘काका बताओ न, किसका क्या परिणाम रहा।’ मुक्ताबाई ने सहज भाव से पूछा।

काका की संयत वाणी गूँजी- ‘इतनों में इस नामदेव का घड़ा कच्चा है।’ काका का हाथ संकेत कर रहा था।

नामदेव के सिर पर तो मानों घड़ों पानी पड़ गया। सभी अवाक् रह गए। नामदेव जी इस अपमान की पीड़ा से कराह उठे। उनके दर्प का सर्प फुफकारने लगा।

प्रभु की लीला विचित्र है। वह खेल-खेल में जीवन की धारा पलट देता है। यह भी भगवान विट्ठल की ही माया थी।

‘काका, बताओ न, यह घड़ा कब और कैसे पकेगा?’ अब की बार मुक्ताबाई के सवाल में नामदेव के प्रति गहरी संवेदना का पुट था।

गोरा जी पुनः बोले- ‘नामदेव निगुरा है। जब बिसोबा जी के समक्ष शिष्यवत् उपस्थित होकर उनके पाद पद्मों में मान-सम्मान, अहंकार और सर्वस्व समर्पित करेगा, तब ही इसमें पावट आएगी। अन्यथा यह हमेशा कच्चा ही रहेगा, चाहे कुछ भी क्यों न करे!’

भक्त मण्डली में सन्नाटा छा गया। पर हरि सुनार, सावंता जी माली, सोपानदेव, निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, सबके सब चुप थे। मुक्ताबाई इन सबके चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी। गोरा जी कभी कटु नहीं बोलते थे। वे तो बोलते ही बहुत कम थे, तिस पर आज एक महान सन्त के प्रति ‘निगरा’ शब्द आश्चर्यजनक था। गोरा जी का एक-एक शब्द तीर की तरह नामदेव जी को बेध गया। उनका अहं फुँकार उठा। मन ही मन वे सोचने लगे-’विसोबा! वह दीन-हीन बूढ़ा, जिसकी संत मण्डली में मात्र सेवक के रूप में ही गिनती है उसे अपना गुरु बनाऊँ, उसके पाद पद्य?’ उन्होंने घृणा मुँह बिचकाया- हूँ उसके समक्ष आत्म-समर्पण-कदापि नहीं।’

अपने रोष में वह भूल गए कि साधना का सार तत्व अहंकार का समूल नाश है और आज वह उसी को बचाने की चेष्टा कर रहे हैं। सन्तों के मध्य उन दिनों गोरखवाणी का बहुत प्रचलन था। गोराजी अपनी धुन में गा उठे-

हबकि न बोलिबा, ठबकि न चलिबा, धीरे धखियावा पाँव। गरव न करिबा, सहजै रहिबा, भगत गोरख राव॥

गीत की इन पंक्तियों ने जैसे नामदेव की क्रोध की ज्वाला में घी का काम किया। वह आवेश में आकर भक्त मण्डली से उठकर चल दिए। लेकिन अभी उनके कानों में उन पंक्तियों की गूँज थी- जो गोरा जी गा रहे थे-

गुरु को जो गाहिला, निगुरा न राहिला, गुरु बिन ज्ञान न, पाईला रे भाईला॥

ये पंक्तियाँ उनके हृदय को बेधती चली गयीं। हठात् उनके कदम पढ़रपुर की ओर मुड़ चले। अपने आराध्य देव के सामने पहुँच कर उन्होंने रो-रोकर अपनी मनोव्यथा निवेदित की। वे आर्तवाणी में बोले-प्रभो! आपकी मुझ पर इतनी करुणा, कि आप प्रत्यक्ष प्रकट होकर मुझे प्यार करते हैं, पुचकारते हैं, गोद में बिठाकर सहलाते हैं, साथ खेलते हैं, बोलते-चालते हैं, फिर भी सन्त-मण्डली में मेरा ऐसा घोर अपमान - तिरस्कार! आप कहते थे-नामदेव! तुम सा प्यारा मेरा कोई अन्य भक्त नहीं? क्या यह सब झूठ था? क्यों, प्रभो, क्यों? बताओ न, तु चुप क्यों हो, बोलो न प्रभु! इस प्रकार वे रुदन करने लगे।

भगवान विट्ठल प्रकट हुए और बोले-’नामदेव, जो कुछ मैंने कहा था वह भी सत्य है तुम मुझे इतने ही प्रिय हो। परन्तु जो कुछ गोरा जी ने कहा, वह सभी उतना ही सच है। बिना गुरु की शरणागति के अन्य कोई उपाय नहीं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी बिना गुरु के आत्म ज्ञान प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं। तुम्हें विसोबा जी के पास जाना ही चाहिए। इसे तुम ‘मानो या ना मानो, यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है।’

उनके पास अब कोई चारा नहीं था। वे बिना मन से विसोबा जी के गाँव पहुँचे। वे घर पर नहीं मिले। उन्हें ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह एक शिवालय में पहुँचे। वहाँ जाकर क्या देखते हैं कि विसोबाजी एक मैली कुचैली फंटी सी चादर ओढ़े सो रहे हैं। उनके दोनों पाँव शिव लिंग पर टिके हैं। यह देखकर उन्हें उनकी ना समझी और कुबुद्धि पर घृणा हुई तथा बुद्धि पर तरस आया। वे सोचने लगे, गोराजी और भगवान विठ्ठल ने एक अज्ञानी व्यक्ति को गुरु बनाने का आदेश कैसे दे डाला। इधर नामदेव के मन में कुविचार पनप रहे थे और उधर विसोबाजी ने पुकारा-’अरे ओ नाम्या! तू आ गया?’

इसे सुनकर वह हतप्रभ रह गए। उनके मन में भयंकर क्रोध उत्पन्न हुआ। उनके कोई नाम्या कहकर पुकारे, यह वह सोच नहीं सकते थे। उनको न केवल आम जनता बल्कि इससे पूर्व विसोबा जी स्वयं उन्हें- ‘भगवान नामदेव’ के नाम से सम्बोधित करते थे। आज नाम्या कह रहे हैं। कहीं सन्निपात ग्रस्त तो नहीं हैं? उनके अहं को चोट करते हुए विसोबा जी ने पुनः कहा ’अरे ओ नाम्या! मैं रोगग्रस्त व शक्तिहीन वृद्ध हूँ अतः मुझे ध्यान नहीं रहा कि पाँव कहाँ रखने चाहिए। तू ऐसा कर कि पावों को पिण्डी से हटाकर ऐसी जगह रख दे जहाँ शिव की पिण्डी न हों।’

नामदेव ने सोचा-’बुड्ढा अब ठीक कहता है। उन्होंने दोनों हाथों से पाँवों को पकड़ कर ऐसे स्थान पर रख दिया जहाँ शिवलिंग नहीं था और तभी विस्मय से देखने लगे कि जहाँ विसोबा जी के पाँव रखे थे, उस भूमि में से प्रकट होकर शिवलिंग ने पुनः विसोबा जी के चरणों को अपने ऊपर धारण कर लिया है। तीन बार यह प्रक्रिया दुहराई गयी, पर स्थिति वही रही। वे आश्चर्य चकित हो गए।

अन्त में श्री गुरुचरणों को हाथों से उठाने के प्रभाव से उनके हृदय कपाट खुल गए। उनका अहंकार चूर-चूर हो गया। उनके मुख से स्वतः ही शब्द निकल पड़े-’शिव विट्ठल, तुम्हीं ही गुरुदेव। परब्रह्म परमेश्वर आप ही स्वयं हो। धन्य है आपके पाद पद्मों का प्रताप कि जिन्हें शरीर पर धारण करने हेतु स्वयीं स्वयं आतुर हैं। वास्तव में, मैं अज्ञानी हूँ। आप में संशय वृत्ति रखी। मुझे शरणागति दो प्रभो। मैं जैसा भी हूँ, तेरा हूँ।’

उन्हें लगा कि विसोबा जी व भगवान विट्ठलनाथ एकाकार है। उस स्थिति में उन्हें निज स्वरूप की अनुभूति हुई, और वह गा उठे।

सफल जनम मो कउ गुर कीना। दुख बिसारि सुख अंतरि लीना॥ गिआनु अंजनु मो कउ गुर दीना। राम नाम बिनु जीवनु मन हीना। नामदेइ सिमरनु करि जानाँ जगजीवनसिउ जीउ समाना॥


आत्म सत्ता रूपी दर्पण में अपनी छवि स्वयं देखें

ज्ञान का अस्तित्व ज्ञाता की सत्ता के भीतर ही होता है। हम इस संसार में जितना और जो कुछ अनुभव करते हैं, वस्तुतः वह आत्म चेतना का ही विधि विस्तार है। आत्मेत्तर की कल्पना या अनुभव शक्य नहीं। अतः संपूर्ण अनुभव आत्म तत्व की ही बहुरंगी झाँकियाँ हैं। अपने आपे का जैसा स्तर एवं स्वरूप होगा, उसके अनुरूप ही दृश्य, श्रव्य, स्पृश्य जगत का अनुभव प्राप्त होता है।

इसका यह अर्थ नहीं कि जगत की स्वयं में कोई सत्ता नहीं। वह निश्चित ही है। जो लोग यह कहते या मानते हैं कि जगत मिथ्या या माया है, उसकी स्वयं की कोई सत्ता नहीं, उन्हें फिर आत्मसत्ता को भी अस्वीकार करना होगा। यदि ऐसा हुआ, तो फिर संपूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाले प्रकाश के अस्तित्व को स्वीकार करने और उनके उद्गम स्रोत सूर्य को इनकार करने जैसा ही उपहासास्पद इसे कहना पड़ेगा। वास्तव में यह दृश्य जगत हमारे अपने ही अन्तस् की अभिव्यक्ति है। उसकी संरचना जिन तत्वों से जैसी हुई होती है, बाहर हमें वैसा ही भासता है। हर व्यक्ति रात्रि को स्वप्न देखता है। इसे देखने के बाद वह यह निराधार है, तो यह उसकी भूल होगी; क्योंकि बिना आधार और बिना सत्ता के अनुभूति संभव ही नहीं। स्वप्न विज्ञान पर शोध करने वाले मनोवेत्ताओं का कहना है कि नेत्रहीनों को स्वप्न में दृश्य नहीं दिखाई पड़ते, सिर्फ ध्वनियाँ ही सुनाई पड़ती हैं। उनका यह निष्कर्ष भी उपरोक्त बात की ही पुष्टि करता है कि आधार और अस्तित्व के बिना अनुभूति असंभव है। चूँकि चक्षुहीन लोग संसार को मात्र शब्द के रूप में ही समझ पाते हैं, दृश्य रूप में जान पाने की उनमें सामर्थ्य नहीं, इसलिए स्वप्न में संसार की प्रतीति उन्हें केवल ध्वनियों के रूप में ही हो पाती हैं; किन्तु यह ध्वनियाँ निरर्थक हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अन्धों के लिए यह काफी महत्वपूर्ण होती हैं और उनके अध्ययन-विश्लेषण से उनकी आन्तरिक स्थिति का बहुत कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। इस कारण मनोवैज्ञानिक स्वप्नों को भी यथार्थ का ही अंग मानते हैं। हाँ, उनका यथार्थ जाग्रत दशा के यथार्थ से भिन्न होता है, यह वे अवश्य स्वीकारते हैं। इस अन्तर को समझते हुए वे स्वप्न की अनुभूतियों का इस प्रकार लाभ उठा लेते हैं कि वह जाग्रत काल के यथार्थ को सजाने, संवारने और संतुलित बनाने में सहायक हो जाती है। स्वप्न-प्रतीकों, स्वप्न-संकेतों के भाव एवं भाषा समझ कर वे उस आधार पर अपने आचरण में अवश्य फेर-बदल कर लेते हैं। इसी प्रकार जागृति-काल की दिनचर्या में वाँछित संशोधन करने पर स्वप्नों के स्वरूप में भी परिवर्तन आ सकता है, इसे भी वे भली-भाँति जानते और करते हैं। एक गंभीर मनोवैज्ञानिक के लिए ज्राति एवं सुषुप्ति-दोनों की ही प्रतीतियाँ अपने-अपने ढंग से यथार्थ ही हैं।

आत्मविज्ञानी, तत्वज्ञ एवं दार्शनिक इस जगत को भी स्वप्नवत ही मानते हैं; कारण कि वे जानते हैं कि यथार्थ जगत की जो अनुभूति व्यष्टि चेतना को सामान्य स्थिति में होती है, वह द्रष्टा की चेतना के स्वरूप पर ही आधारित है, उससे भिन्न नहीं। इसके गंभीर पर्यवेक्षण द्वारा द्रष्टा की मनःस्थिति का काफी हद तक अनुमान आँकलन किया जा सकता है। यह संसार के सापेक्ष स्वरूप की चर्चा हुई। जीव-जग इसी रूप में उसे ग्रहण-प्रतिपादन करता है। किन्तु निरपेक्ष रूप में, चेतना जगत में यह विश्व मात्र ‘सत्’ का विराट सत्ता का एक अंग है; पर इसकी अनुभूति जीवसत्ता के लिए संभव नहीं। उसका ज्ञान सदा सापेक्ष होता है। यह सापेक्ष ज्ञान स्वप्न तुल्य यथार्थ ही है।

आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान भी इसी निष्कर्ष तक आ पहुँचे हैं। उनका यह सर्वमान्य निष्कर्ष है कि आकर्षक रंगों, सम्मोहक, सौंदर्य की, चित्ताकर्षक ध्वनियों की, परिव्याप्त प्रकाश की, तापमयी ऊर्जा की, सुहावने संगीत की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं; वे तरंगों और गतियों के भिन्न-भिन्न समुच्चय मात्र हैं। ऊष्मा क्या है? वातावरण के तरंगों का संघात। प्रकाश एवं वर्ण की व्याख्या भौतिकीविद् ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम’ के तरंग दैर्ध्य (वेवलेंग्थ) एवं आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) के रूप में करते हैं। प्रत्येक रंग प्रकाश खण्ड की एक निश्चित तरंग-लम्बाई और आवृत्ति का परिणाम है। इन दोनों के परिवर्तित होते ही प्रकाश-रंग भी बदल जायेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि तरंग यथार्थ तत्व है; पर जो रंग हम देखते हैं, वह हमारे मस्तिष्क की अपनी उपज है। यदि ऐसी बात नहीं होती, तो ‘कलर ब्लाइन्डनेस’ से आक्रान्त व्यक्ति हर प्रकार के रंगों को पहचानने में समर्थ होता; पर ऐसा देखा-सुना कहाँ जाता? वह कुछ खास-खास वर्णों को ही पहिचानने में सफल हो पाता है, शेष की पहिचान उसके बूते के बाहर की बात होती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि दिमाग का संबद्ध भाग किसी कारण से या तो निष्क्रिय हो गया होता है, या कोई क्षेत्र विशेष, क्षतिग्रस्त। इस प्रकार जग का यथार्थ अस्तित्व निरपेक्ष रूप में मात्र ‘अस्ति’ (है) है; किंतु वस्तु-सत्य के रूप में हम जो भी अनुभव करते हैं, वह हमारा ही आत्मपरक सृजन है। हमारी जो प्रतीति-क्षमताएं है, उनके अपने ढाँचे और स्तर के ही अनुसार हमें वस्तु-सत्य का अनुभव होता है।

तनिक हम कल्पना करें कि यदि विश्व का कोई भी चेतन प्राणी पाँच ज्ञानेन्द्रियों में से एक की भी शक्ति से समर्थ नहीं होता, अर्थात् किसी में भी देखने, सुनने, सूँघने, स्पर्शानुभव करने और स्वाद ले सकने की ऐन्द्रिक क्षमताएं नहीं होतीं, तब यह शेष संसार रहता तो यथावत् ही; किन्तु इसकी विविध रूपाकृतियों, विविध गंधों का, नाना स्वादों का, ध्वनियों तथा संगीत का क्या अनुभव होता और क्या प्रमाण होता? वस्तु सत्ता तो तब भी होती; किन्तु अनुभूतियों का वर्तमान स्वरूप तब कदापि कहीं होता ही नहीं।हम वस्तु-सत्य को जब भी देखते या उसका अनुभव करते हैं, उसमें हमारे अपने संस्कार, अपने पूर्व संचित संवेदन और उनकी क्षमता विशेष, झुकाव विशेष का भी प्रभाव घुला-मिला रहता है; क्योंकि हम जड़ नहीं, चेतन दर्शक और चेतन भोक्ता है।

कैमरे की देखने की क्रिया और चेतना प्राणी के देखने की क्रिया में भेद चेतना की उपस्थिति से ही होता है। नेत्र से भी किसी प्रकाशित वस्तु को उस वस्तु से विकीर्ण प्रकाश की किरणों के द्वारा ही देखा जाता है। वे ही किरणें पुतलियों में प्रविष्ट होती हैं और चक्षु के भीतर विद्यमान लैन्स के कारण उसका उल्टा प्रतिबिम्ब नेत्र-पटल पर बनता है; किंतु इसके आगे की क्रिया कैमरे की क्रिया से बिल्कुल भिन्न है। नेत्र-पटल पर उभरे बिम्बों का प्रतिबिंब संवेदन नाड़ियाँ मस्तिष्क तक ले जाती हैं; वहाँ संचित बोध-अनुभवों के आधार पर वस्तु के स्वरूप के अनुभव के साथ ही उसके प्रति संवेदनात्मक प्रतिक्रिया भी उत्पन्न होती है। सुन्दर प्रीतिकर दृश्यों से प्रसन्नता एवं उल्लास की, अरुचिकर दृश्यों से जुगुप्सा-अप्रसन्नता तथा कष्ट की, सामान्य अनुभव से सर्वथा भिन्न दृश्यों से विस्मय की और आत्मसत्ता द्वारा अपने लिए अनुकूल मानी गई परिस्थितियों को क्षति पहुँचा सकने का संकेत देने वाले या उनकी स्मृति उभारने वाले दृश्यों से भय की अनुभूतियाँ होती हैं। इन अनुभूतियों के समय मस्तिष्क की कोशिकाओं में या मज्जागत पदार्थ में किसी प्रकार के कंपन होते हैं-इसका यदि भौतिकी या रसायनशास्त्र की दृष्टि से अध्ययन-विश्लेषण कर भी लिया जाय, तो भी उस विश्लेषणात्मक अध्ययन की तुलना उस समय की वास्तविक मानसिक अनुभूति से पूरी तरह नहीं की जा सकती। भौतिक रासायनिक परिवर्तनों के अध्ययन से मानसिक अनुभूतियों का संकेत मात्र ही हो सकता है। अव अवलोकन वास्तविक प्रतीति के समतुल्य कभी भी नहीं हो सकता। इस प्रकार स्पष्ट है कि वस्तु की जो अनुभूति है, वह मूलतः व्यक्ति चेतना की स्वतः की क्रिया विशेष है। वस्तु सत्ता की निरपेक्ष अनुभूति चेतन व्यक्ति को नहीं हो पाती।

आज इस तथ्य को वैज्ञानिक भी स्वीकार कर रहे हैं। पदार्थ की सत्ता की खोज में आगे बढ़ते-बढ़ते वैज्ञानिक सृष्टि के मूल कणों से भी आगे बढ़कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वे प्राथमिक कण भी विद्युत तरंगों के संघात मात्र हैं और आगे बढ़ने पर नतीजा यह निकला कि ये विद्युत तरंगें भी अज्ञात, अवर्ण्य, अविवेच्य, तरंग समूहों का अंश मात्र हैं और उनका मूल रूप जानना भौतिक उपकरणों से संभव नहीं; क्योंकि उन उपकरणों एवं उनके संचालक नियमों की हम जो भी गणना एवं विधि-व्यवस्था बनाते हैं, वह अन्ततः हमारी ही मानसिक संरचना का परिणाम है जिसे हम प्रकृति की कार्यविधि समझते हैं, वह प्रकृति की कार्यविधि समझते हैं, वह प्रकृति के क्रिया-कलापों की हमारी अपनी मानसिक संकल्पनाओं के आधार पर व्याख्या भर है। हमारा सम्पूर्ण अवलोकन, विश्लेषण और परीक्षण हमारी निज अवधारणाओं पर आधारित रहता है; उसे स्वप्नवत् ही सत्य माना जा सकता है।

वैज्ञानिक प्रक्रियाएं भी हमारे अपने अनुभव संघातों के सहारे ही निर्धारित की जाती हैं। वैज्ञानिक विश्लेषण और प्रयोग की पद्धतियाँ एवं नियम-सूत्र वैज्ञानिकों के चेतन-अचेतन मस्तिष्क के अनुभवों द्वारा ही निर्धारित होते हैं। इसीलिए वे परिवर्तित भी होते रहते हैं। आज जो वैज्ञानिक निष्पत्ति निर्भ्रान्त सिद्ध होती है, कल वही भ्रान्त साबित हो जाती है।

ज्ञान चाहे भौतिक वस्तु का हो, चाहे देह का, चाहे मन का, वह सदैव ज्ञाता की चेतना के स्वरूप एवं स्तर नर निर्भर करता है। ज्ञाता की सत्ता से बाहर ज्ञान का अस्तित्व नहीं होता। वस्तु सत्ता भले ही ज्ञाता की सत्ता से बाहर; किन्तु उसका जो ज्ञान होगा, वह ज्ञाता की सत्ता के ही भीतर उत्पन्न प्रतिक्रिया होगा।

देह के तथ्यों संबंधी जाँच वैज्ञानिक अपने ढंग से करते हैं। इस संबंध में प्रयोगशाला का सत्य जितना वास्तविक है, शरीर-सौंदर्य पर मुग्ध होने वाले व्यक्ति के लिए उसका मुग्धता-भाव भी उतना ही वास्तविक हैं। मूर्ति-पूजा से विरक्त व्यक्ति के लिए प्रतिमा वस्तुतः निष्प्राण पाषाण खण्ड मात्र है, तो किसी सच्च भक्त के लिए वही विग्रह दिव्य प्रेरणाओं और गहन अनुभूतियों का जीवन स्रोत है। इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्ति चेतना के स्तर एवं स्वरूप के अनुसार ही इस दृश्य जगत (जो स्पृश्य जगत एवं श्रव्य जगत भी है) के अनुभव होते हैं। आत्मसत्ता ही अनुभूति का आधारभूत तत्व है।

इस तथ्य को समझ लेने पर श्रेष्ठ जीवन-दर्शन की,उत्कृष्ट दृष्टिकोण की महत्ता स्पष्ट हो जाती है। निकृष्ट दृष्टिकोण अपनाने पर, अंतःकरण में घटियापन भर लेने पर चारों ओर घटिया स्वरूप ही दृष्टिगत होगा। वस्तुतः यह संसार आत्मसत्ता का ही प्रतिबिम्ब है। आत्मसत्ता का स्तर ही चहुँ ओर प्रतिबिम्बित होता है। वस्तु जगत में हर व्यक्ति आत्मसत्ता को आरोपित करता रहता है। घटिया दृष्टिकोण वाला इसी आरोपण के कारण हर ओर घटियापन का ही अनुभव करता है। संत कबीर ने इसीलिए इस संसार को दर्पणों की गुफा कहा है, अर्थात् ऐसी गुफा, जिसमें चारों ओर दर्पण-ही-दर्पण हों और उसमें हर व्यक्ति को सभी तरफ अपना ही प्रतिबिम्ब दिखाई पड़े। इसी तथ्य को प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा है-

दर्पण केरा गुफा में, श्वनहा पइठा धाय। देखि के प्रतिमा आपनी, भूँकि-भूँकि मरि जाय॥

अर्थात् मनुष्य उस कुत्ते के समान है, जो दर्पण-गुफा में सहसा दौड़कर घुस जाय और चतुर्दिक् अपनी ही प्रतिमाएं देख-देख कर भौंक-भौंक कर दम तोड़ दें।

यह मनुष्य की यथार्थ स्थिति है। अपनी ही आत्मसत्ता के प्रतिबिम्ब को देख-देख कर मनुष्य विचलित, विक्षुब्ध, व्यग्र होता रहता है और जीवन में क्षण भर को भी सच्ची शान्ति, संतोष, एवं तृप्ति का अनुभव नहीं कर पाता। अध्यात्म-दर्शन का प्रयोजन इस तथ्य को सामने लाकर प्रत्येक मनुष्य को अपना स्वयं का स्तर उत्कृष्ट बनाने की, अपना दृष्टिकोण उन्नत एवं श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देना है। उसी के द्वारा मनुष्य को उत्कृष्टता, पवित्रता और प्रकाश के अनुभव एवं दर्शन हो सकते हैं तथा आनन्द-उल्लास की स्थायी अनुभूति हो सकती है।


रिश्ता इनसानियत का

आखिर कौन सा रिश्ता है-इनका आपसे, जिसके कारण आप समूचे रणभम्भौर को जोखिम में डाल रहे हैं? महामन्त्री के इस सहज प्रश्न के साथ ही सारे राजदरबार की आंखें महाराणा हम्मीर पर जा टिकीं। उन्होंने एक बार अपनी नजर सरदारों-सामन्तों-सभासदों पर डाली। फिर उस माहमशाह की ओर देखा जिसकी आँखों में कातरता झलक रही थी, चेहरे पर पीलापन छाया हुआ था और पाँव एक अनजाने भय से काँप रहे थे।

अभी कल ही की तो बात है जब वह इस ओर भागकर आ रहा था। अरावली की पहाड़ियाँ उसके अरबी घोड़े की टापों से गूँज उठीं थीं। उन टापों की लय बद्धता ने पत्थरों के सोने में भी स्पन्दन पैदा कर दिया था। घोड़े की अपरिमित गति अपने सवार की व्याकुलता को रह-रह कर व्यक्त कर जाती। अति तीव्र गति होने पर भी अश्व को व्यर्थ की एड़ लगाना सवार की किसी खास परेशानी का द्योतक था।

अश्व के साथ-साथ होड़ लगाती अपनी परछाई का निरन्तर छोटा होता जाना भी उसकी चिन्ता का कारण बन जाता, मानों वह समय की चाल को भी बाँध लेना चाहता हो, या फिर उसे अपने गन्तव्य पर अंधेरा होने से पहले ही पहुँचने की जल्दी थी।

हवा से बातें करते अश्व पर जब सन्ध्या ने अपना आँचल लहराया तो उस घुड़सवार ने ढलते सूरज की लालिमा को कुछ इस तरह देखा जैसे उसे वहीं अपनी आँखों में कैद कर लेगा और समय का चक्र एक बारगी थम जाएगा। पर वह ऐसा कुछ भी कर न सका और सन्ध्या के फैलते धुँधलके ने रात्रि के आगमन की सूचना देनी प्रारम्भ कर दी। उसने पुनः घोड़े को एड़ लगायी। रात्रि की काली चादर फैलने में अभी किंचित वक्त बाकी स्था, जब वह रणभम्भौर की सीमा में पहुँचा।

चेहरे पर चिन्ता और मन में भय संजोये, वह नगर के मुख्य द्वार पहुँचकर रुक गया। द्वार पर तैनात नगर रक्षकों ने जब उससे परिचय पत्र माँगा तो वह हाथ जोड़कर बोला, ‘मुझे रणभम्भौर के राणा हम्मीर से अभी मिलना है।’

द्वारपाल ने नजरों से ही ऊपर से नीचे तक उसका वहीं खड़े-खड़े परीक्षण कर डाला। वेशभूषा से वह कोई मुसलमान सिपाही जान पड़ता था। जिरह-बख्तर में कसा उसका लंबा-चौड़ा जिस्म उसकी बहादुरी का बखान कर रहा था। द्वारपाल का नम किसी अनजानी शंका से भर उठा। फिर भी आगन्तुक के प्रति अपनी मर्यादा भंग न करते हुए द्वार रक्षक ने अति सम्मान जनक शब्दों में उसका नाम एवं काम जानने की इच्छा प्रकट की। उसने भी नम्र निवेदन किया, ‘मैं केवल महाराणा को ही अपने आने का कारण बता सकता हूँ।’

द्वारपाल ने अपनी निगाहों से आसमान में जगमगा रहे सितारों की ओर नजर उठाकर कहा,’महानुभाव, इस वक्त तो दरबार कब का समाप्त हो चुका होगा और राणाजी अपने विश्राम कक्ष में पधार चुके होंगे। निश्चय ही आपको सुबह की प्रतीक्षा करनी होगी।’

आगन्तुक के चेहरे पर चिन्ता के भाव और भी बढ़ गए, व्याकुलता आँखों से झाँकने लगी। वह जिस परेशानी में घिरा था उससे उसे केवल राणा ही निकाल सकते थे, नहीं तो उसे उसी नगरी में मजबूरन वापस लौटना पड़ेगा, जहाँ मौत बेसब्री से उसकी राह देख रही थी। उसने विनम्र होकर कहा, ‘क्या कोई दूसरा उपाय नहीं कि अभी राणा से भेंट हो जाये?’ उसे अपने पहचान लिए जाने का भी डर सता रहा था।

‘यदि इतना ही आवश्यक है, तो मैं महामन्त्री को सूचित कर देता हूँ, वह जो भी आज्ञा दें।’

द्वारपाल ने अपना बिगुल बजाया तो विशाल द्वार के भीतर से कुछ अन्य सैनिकों की पदचाप उभरी। फिर छोटा द्वार खोल कर एक मुखाकृति ने बाहर झाँका। उसे कुछ सन्देशा देकर तुरन्त रवाना कर दिया गया। इधर उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

सन्देशवाहक तेज गति से घोड़ा दौड़ाता हुआ महामन्त्री के निवास पर जा पहुँचा और उन्हें पूरा समाचार दिया-सुनकर महामन्त्री के माथे पर कई लकीरें उभर आयीं, उनका हृदय शंकित हो उठा। क्या दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन की यह कोई नई चाल है, उनके मन में एक के बाद एक शंकाएं जन्म लेने लगीं, या तो कोई हमारे भेद लेने आया है, या सुल्तान किसी नयी सन्धि के लिए राणा को मजबूर करना चाहता होगा।’

उन्होंने अपना उत्तरीय कन्धे पर डाला और चल पड़े राणा के महल की ओर।

महामन्त्री की बात सुनकर राणा भी सोच में डूब गए। अलाउद्दीन और राजपूतों में खुला वैमनस्य है। उसका ज्यादा देर तक नगर द्वार पर ठहरना ठीक नहीं। सुबह की प्रतीक्षा करने से अच्छा है कि अभी भेंट कर ली जाय। हम्मीर ने महामंत्री से पूछा।

महामंत्री ने न चाहते हुए भी इसे स्वीकार कर लिया। कुछ देर के बाद ही उसे राणा के समा प्रस्तुत किया गया। वह राजसी सेना का बहादुर सिपाही लग रहा था। वह उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा। उसका सर झुका हुआ था।

‘तुम्हारे आने का कारण?’ राणा का स्वर गम्भीर था।

‘मेरे प्राण संकट में हैं और इस वक्त आपके संरक्षण का अभिलाषी हूँ, मुझे अपनी शरण में ले लें।’ उसका स्वर भीग चला था।

‘कौन हो तुम?’

‘मैं सुल्तान अलाउद्दीन की सेना का सिपहसालार माहमशाह हूँ। मुझे सुल्तान ने मौत का हुक्म दिया हैं’

‘तुम्हारा अपराध?’

‘मैंने उनके हरम के लिए अपनी बीबी को भेजना नामंजूर कर दिया। इस पर उन्होंने मुझे मौत की सजा दे डाली। अपनी बीबी को दूर के एक रिश्तेदार के यहाँ छोड़कर, मैं सीधा आपके पास भागता हुआ आया हूँ।

‘ओह!’ राणा हम्मीर किसी गहरे सोच में डूब गए। कुछ देर चुप रहकर उन्होंने कहा, ‘अच्छा अभी तो तुम विश्राम करो, ‘अच्छा अभी तो तुम विश्राम करो, कल दरबार में तुम्हारा फैसला होगा।’ और इन क्षणों में वह रणथम्भौर के राजदरबार में था। उसकी आँखों में याचना के भाव थे।

राणा ने एक बार फिर से उसकी ओर देखा। उनके चेहरे पर दृढ़ता थी। उन्होंने पास बैठे महामन्त्री को सम्बोधित करते हुए कहा, ‘हममें इनसानियत का रिश्ता है, महामन्त्री जी! ‘ पर यह तो मुसलमान है!’ एक सरदार के मुँह से अनजाने में निकल पड़ा।

तो क्या मुसलमान इनसान नहीं होते। फिर शरणागत की रक्षा राजपूतों का पहला धर्म हमने तलवारें इसीलिए थामी हैं कि किसी उत्पीड़ित की मदद कर सकें और उत्पीड़ित न हिन्दू होता है, न मुसलमान, वह सिर्फ इनसान होता है।

सरदारों के मन में राणा की बहादुरी के प्रति पहले से ही सम्मान था। अब वे उसकी इनसानी ीवचनाओं के भी कायल हो गए। माहमशाह राणा का शुक्रिया अदा कर एक ओर हट गए। परन्तु उनके मन पर एक बोझा तो आ ही पड़ा कि अब युद्ध सुनिश्चित है। जल्द ही यह खबर अलाउद्दीन के कानों तक भी जा पहुँची। सुनते ही वह आपे से बाहर हो गया, ‘उस राजपूत की इतनी हिम्मत, कि मेरे मुजरिम को पनाह दे। क्या वह मेरी तलवार की धीरे से वाकिफ नहीं है। उसने राणा को एक धमकी भरा सन्देश भेजा।

तलवार की धार से भी ज्यादा धारदार सन्देश जब मखमल के कपड़े में लपेट कर राणा को भेजा गया, तो पढ़कर मुस्कराए। तुरन्त उत्तर लिखा भेजा।

‘सुल्तान, अपनी समझ से मैंने कोई गलती नहीं की । हम इनसान हैं कि मुसीबत जदा इनसान की मदद करना मेरा फर्ज है। वही मैंने किया है।’

दिल्ली दरबार में हम्मीर का जवाब क्या पहुँचा मानों बारूद के ढेर को पलीता लगा दिया है। अलाउद्दीन अब एक मिनट ठहर न सका। अपनी ताकत दिखाने तुरन्त अपनी फौजों के साथ रणथम्भौर जा पहुँचा और किले का घेरा डाल दिया।

दूसरी ओर से भी जवाब में रणभेरी गूँज उठी। युद्ध का सबब क्या था? एक ओर कामुक और रक्तपिपासु अहंकारी सुल्तान अपनी उन्मादी गर्जना कर रहा था। दूसरी ओर इनसानियत के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तत्पर हठी हम्मीर थे। इनसानियत के लिए मर मिटना ही हम्मीर के लिए इस युद्ध का सबब था।

रणचण्डी अपनी विनाश लीला चारों ओर फैलाने लगी। माहमशाह भी हम्मीर के कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रहे थे। हम्मीर को चिन्ता थी तो बस किले में रह रहे, बच्चों, महिलाओं और वृद्धों की थी। रसद के मामले में भी दिन पर दिन उनका हाथ तंग होता चला जा रहा था। माहमशाह भी इस समस्या से अनजान न था। काफी सोच विचार कर उन्होंने हम्मीर से कहा कि वह उन्हें सुल्तान को सौंप कर समझौता कर लें।

हम्मीर ने एक नजर माहमशाह के चेहरे पर डाली और कहने लगे, ‘दोस्त! हम बहुत दूर निकल आए हैं। अब यह केवल तुम्हारा या मेरा युद्ध नहीं। यह पूरे राजपूताने की आन-बान-शान का सवाल है। मेरी और मेरे भाइयों की उन भावनाओं का है, जिनके अनुसार इनसानियत के लिए मर मिटना ही अपनी जिन्दगी का मकसद है। मैं मरते दम तक इसे निभाऊंगा।’

‘अब न मैं हिन्दू हूँ न आप मुसलमान, हम केवल इनसान हैं। हार-जीत की आप फिक्र न करें।’ माहमशाह राणा के इस कथन का का कोई उत्तर न दे सके। वह सोच रहे थे कि कल की लड़ाई के बाद तो किले में मुट्ठी भर सैनिक ही रह जाएंगे। खाना-पानी भी लगभग खत्म ही है। बाहर से मदद के लिए न तो कोई रास्ता है और न ही इसके आसरा या..........परवरदिगार ... वह एक लम्बी साँस खींच कर रह गए। वे अपने मददगार को इस अंजाम तक पहुँचा देंगे, इसका उन्हें अनुमान भी नहीं। अपनी गलती का जब एहसास हुआ, तो देर हो चुकी थी।

वह अपने हृदय की विकलता को कम करने के लिए किले की खुली छत पर आ गए। उनकी आत्मा उन्हें कचोट रही थी। अपने प्राणदाता के लिए वे कैसी मुसीबत बन गए। उसके लिए मुसीबत, जिसके दिल में यह रत्ती भर भी ख्याल न आया कि गैर जाति के आक्रान्ता को शरण देकर क्यों अपनी मुसीबत बुलाऊँ? केवल एक आदमी के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। दिल्ली सुल्तान से भिड़ना कोई हंसी खेल न था। इस बात से भी वे अनभिज्ञ तो नहीं थे कि कल तक मेरी तलवार भी हिन्दुओं के खून की प्यासी हुआ करती थीं। यह विचार भी उनके हृदय में न आया। मुसीबतों का मारा जब मैं उनके सामने आकर खड़ा हुआ, तो उन्होंने, मुझे ऐसे गले लगा लिया, जैसे मैं उनका कोई बिछड़ा हुआ दोस्त हूँ। यही है इनसानियत का तकाजा। काश इसे हर कोई समझ पाता।’

अपने इन्हीं ख्यालों में डूबते-उतराते वह किले की छल के दूसरी ओर निकल गए। एक प्राचीर से ठिठक कर खड़े ही थे कि किसी की धीमी बातचीत का स्वर उनके कानों में पड़ा। उन्होंने तनिक ओर से छिप कर देखा तो हैरत में डूब गए। हम्मीर व उनकी नवोढ़ा रानी किसी वार्तालाप में निमग्न थे। रानी की पीठ उनकी ओर थी। हम्मीर कह रहे थे, ‘अब अन्त समीप है, मुट्ठीभर सिपाहियों से सुल्तान की विशाल शाही फौजों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। हमने तो सिरों पर कफ़न बाँध लिए हैं, लेकिन तुम स्त्रियों ने क्या सोचा है? किले में अभी असंख्य ऐसी बालाएं हैं जो यौवन की देहरी लाँघ रही हैं। कल जब किले पर शत्रु का कब्जा हो जायगा तो किसी की भी लाज नहीं बचेगी।’

‘इसकी चिन्ता आप तनिक भी न करें, हम सभी जौहर करेंगी।’ महारानी का यह कथन सुनकर हम्मीर के चेहरे पर निश्चिन्तता के भाव उठे। पर माहमशाह को ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके सीने में खंजर घोंप दिया है। राणा हम्मीर का स्वर उभरा, ‘मुझे राजपूत वीराँगनाओं से यही उम्मीद थी।’ फिर बात बदलने के लिए उन्होंने उगते चन्द्रमा की ओर इशारा किया, जिसे देखने वह वीर नारी पलटी तो माहमशाह की नजरों के सामने हजारों तारे झिलमिला उठे। रूप लावण्य से प्रदीप्त वह मुखमण्डल एक और चन्द्रमा के उदय होने का भ्रम उत्पन्न कर रहा था। माहमशाह की आँखें उसे देखकर श्रद्धा से झुक गयी। वह धीरे से एक ओर हट गए।

दूसरे दिन उन्होंने फिर से महाराणा के पाँव पकड़ लिए। बोले, ‘राणा यह युद्ध नहीं आत्माहुति होगी। स्वयं को मृत्यु के हवाले करना कहाँ की बुद्धिमानी है। मुझे सुल्तान के हवाले कर सुलह कर लीजिए। मैं अब और ज्यादा दोस्ती का बोझ नहीं ढो सकता, मासूम बच्चों एवं महिलाओं की हत्या का पाप अपने सिर नहीं ले सकता, अभी भी वक्त है, मेरी बात मान लो।’

राणा ने उन्हें छाती से चिपटा लिया। भाव भरे स्वर में बोले, मुझे कायर न बनाओ दोस्त, जीवन किसी के काम आ जाए तो बड़ा पुण्य होता है। जानता हूँ कल का दिन युद्ध का नहीं, आत्माहुति का है। परन्तु मानवीय भावनाओं के लिए अपने सर्वस्व का बलिदान करना ही तो जीवन की परिभाषा है। कुछ पल रुक वह गम्भीर स्वरों में कहने लगे।’ युद्ध की पहल मैंने तो नहीं की थी। माहम, तवारीख गवाह है कि आज तक एक भी हिन्दुस्तानी किसी दूसरे देश पर आक्रमण करने नहीं गया। न हमें जमीनों की चाह है और न ही खूनी होली खेलने का शौक। इसके बावजूद भी विदेशी घुसपैठिये दा हमारी सीमाओं में घुसकर आतंक फैलाते रहे और हमारी शान्ति को भंग करते रहे। आज तक ये क्रम जारी है। हम शान्ति और भाईचारे के कायल हैं पर कायर नहीं, हमारी तलवारों पर जंग नहीं लगा है। जब भी कोई हमारी भूमि रोंदेगा या हमें अपमानित करेगा, मुँह की खाएगा। जाति-धर्म का भेद हमारे दिलों में नहीं उपजता, सत्य और न्याय हमारी दुधारी तलवार की धारें हैं।’ हम्मीर के स्वरों में उनकी आत्मा का ओज झलक रहा था। माहमशाह उनकी भावनाओं से अभिभूत हो गए। उनकी आँखों से ये भावनाएँ बह निकलीं।

अगले दिन किले का मुख्य द्वार खुलने से पहले सभी स्त्रियों ने अपने-अपने पतियों के माथे पर तिलक किया, उनकी आरती उतारी। सभी आँखें सजल थीं।

द्वार खोल दिया गया। सबसे आगे घोड़े पर राणा हम्मीर स्वयं थे। उनके साथ थे माहमशाह। पीछे अन्य सिपाही थे। माहमशाह ने सबसे पहले हर-हर महादेव का जयघोष किया फिर राजपूत सैनिकों ने उनके स्वर मिलाया और कूद पड़े युद्ध भूमि में। माहमशाह की तलवार युद्ध में अपना करतब दिखाती रही। वह महाराणा की ढाल बने आततायियों का संहार करते रहे। अन्ततः वह घायल हो गए। हम्मीर ने दूसरे हाथ से लपक कर उन्हें थाम लिया। अलविदा मेरे रहनुमा...। ‘और वह उनकी बाहों में हमेशा के लिए सो गये। उनके बाद महाराणा और फिर सारी सेना ही युद्ध भूमि में खेत रही। इधर जैसे ही ध्वज झुका, उधर किले में अग्नि ज्वालाएँ आसमान छूने लगी।

सुल्तान अलाउद्दीन अपनी जीत का जश्न मनाता हुआ किले में घुसा। पर प्राँगण में राख का ढेर देखकर वह सहम गया। यह इनसानियत के दीवानों की राख थी, जिसे देखकर उसकी हैवानियत काँप उठी। उसे आगे बढ़ कर ढेर में से एक मुट्ठी राख उठायी, और खड़ा होकर सोचता रहा-इनसानियत के रिश्ते के बारें में, कितनी अनोखी है इसकी गरिमा। मुट्ठी से सरक कर उड़ती राख को देखकर वह सोचने लगा-किलों, महलों, राज्यों पर विजय पाने के बदले-काश मैं इनसानी दिलों को जीत सकता। इनसान से इनसानियत के रिश्ते कायम कर पाता। अब उसे अपने बौनेपन का अहसास हो चुका था। परन्तु इतिहास साक्षी है कि उसका यह अहसास क्षणिक मात्र था। इसके बाद भी रक्तपात हुए, आराध्य गृह तोड़े गये एवं जबरन धर्मान्तरण की प्रक्रिया चलती रही। काश कोई इनसानियत के मूल आधार सम्प्रदाय भेद से परे इस मर्म को समझ पाता तो शायद आज जाति वर्ग धर्म के नाम पर खून की होलियाँ न बह रही होतीं। इनसानियत का यह रिश्ता हम सबके लिए एक सबक भी है और एक मील का पत्थर भी जो हमें आगे की यात्रा का मार्ग सुझाता है।


हस्तरेखा विज्ञान के विषय में नये सिरे से सोचें

यों मनुष्यों के चेहरे भी एक-दूसरे से नहीं मिलते। पर उनकी हस्तरेखाओं में तो असाधारण अन्तर होता है। इसकी प्रकार अँगूठे की छाप लेने की प्रथा सरकारी कागजों में प्रचलित है। चेहरे की आकृति प्लास्टिक सर्जरी कराकर इतनी भिन्न आकृति की बनायी जा सकती है, जिसको पहचानना मुश्किल पड़े। वस्त्रों तथा शृंगार प्रसाधनों की की सहायता से सभी आकृति बदली जा सकती है। किन्तु हस्तरेखाओं में यदा-कदा यत्किंचित् ही परिवर्तन होते देखा जाता है।

हस्तरेखा विज्ञानी अक्सर रेखाओं के आधार पर भविष्य कथन करते देखे जाते हैं, किन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य का निर्माता स्वयं है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का स्तर वह स्वेच्छापूर्वक गिरा या उठा सकता है, इसी आधार पर उसके भविष्य का तारतम्य बनता है। यदि पहले से ही किसी का भाग्य निश्चित है, तो पुरुषार्थ की क्या उपयोगिता रही? फिर भाग-छोड़ सोच-विचार करना व्यर्थ है। जब भवितव्यता निश्चित ही है तो फिर उसकी प्रतीक्षा करने भर से काम चल सकता है। फिर व्यक्तित्व निर्माण और परिस्थितियों के अनुकूलन की क्या आवश्यकता रही?

भविष्य किसी का निश्चित नहीं। उसे इच्छानुसार विनिर्मित किया जाता है। ऐसी दशा में हस्तरेखा देखने या जन्मकुण्डलियों की देखभाल करने की क्या तुक रही? भाग्यवाद और पुरुषार्थ प्रयास इन दोनों में से एक को ही चुनना पड़ेगा। दोनों सिद्धान्तों की मान्यता एक साथ नहीं टिक सकती। ऐसी दशा में भाग्यवाद और भविष्य कथन की संगति तभी बैठ सकती है, जब कोई दिव्यदर्शी मनुष्य के पूर्व जन्मों से संचित कर्मों और वर्तमान प्रयासों की संगति बिठाते हुए यह निश्चय करे कि अदृश्य में क्या पक रहा है और उसका परिणाम निकट भविष्य में किस रूप में आने वाला है? इनमें भी यह गुंजाइश है कि मनुष्य सामयिक रुख बदल कर भवितव्यता को कुछ से कुछ बना लें। दो सेनाओं में युद्ध हो रहा है, तो अनेकों के मरने की बात स्पष्ट है, किन्तु एक सेनापति हथियार डाल दे, हार मान ले और समर्पण कर दे तो फिर वह रक्तपात जो निश्चित प्रतीत होता था, उलट कर सुलह शान्ति की दूसरी दिशा में बदल सकता है। भविष्य परिस्थितियों के कारण भी बदल सकता है और मनःस्थिति में अन्तर आने से भी। ऐसी दशा में उसका पहले से ही निश्चित होना शक्य नहीं। जो शक्य नहीं उसे सिद्धान्त रूप से मानना और भवितव्यता की आशा लगाये रहना व्यर्थ है।

जन्म कुण्डलियों की भाँति हस्तरेखाओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। उस आधार पर भविष्य कथन तो नहीं करना चाहिए। पर यह पाया गया है कि भूतकालीन स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। इस जानकारी से दो लाभ मिलते हैं-एक तो कुसंस्कारों के पूर्व संचय किस स्तर के हैं, उनमें अभीष्ट परिवर्तन करने के लिए तद्नुरूप विशेष परिष्कार प्रयास किया जाय। इसी प्रकार यदि पुरातन काल के सुसंस्कार संग्रहित हैं तो उन्हें उपयुक्त समय पर अच्छी रीति से फलित करने वाले अभिनव प्रयास किया जाय।

देखा गया है कि कुछ बालक जन्मजात रूप से ही किसी दिशा में असाधारण रूप से प्रवीण होते हैं। यह प्रवीणता यदि पोषित की जा सके उसे सहारा मिल सके तो उसके सुविधापूर्वक बड़ी मात्रा में फलित होने की सम्भावना रहेगी अन्यथा अपरिचित मार्ग पर चलने से उतना ही समय उसकी सफलता में लगेगा जितना कि नौसिखियों को लगना चाहिए।

भूत काल के संचित संस्कारों को हस्तरेखा के माध्यम से जाना जा सकता है और यह अनुमान लग सकता है कि यदि उत्तम संस्कारों की पूँजी संग्रहित है तो उसे उसी दिशा में चलने का परामर्श एवं सहयोग दिया जाय। जिसने जिस मार्ग की आधी मंजिल पार कर ली है उसे शेष आधी को पूरा करने के प्रयासों में लगकर स्वल्प काल में ही बड़ी सफलता का तारतम्य बिठाया जा सकता है।

दूसरी बात जो हस्तरेखाओं से जानी जा सकती है वह है वर्तमान शारीरिक और मानसिक स्थिति का प्रतिबिम्ब। एक्सरे,’स्टेथस्कोप’ आदि उपकरणों के माध्यम से कई प्रकार के परीक्षण करने के उपरान्त ही निदान मिलने तथा उपचार की बात बनती है। इस वर्तमान परीक्षण प्रक्रिया से हस्तरेखाओं को उपयोगिता की मान्यता मिल सकती है। एक्सरे के फोटोग्राफ ई.ई.जी. के आधार पर उससे किसी व्यक्ति न केवल शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को जाना जा सकता है, वरन् रोग फूट पड़ने से पूर्व उसकी सम्भावना आँकते हुए बचने के प्रयास आरम्भ कर दिये जाय तो उससे समय की बचत होकर व्याधि टल सकती है। बुद्धिमान चिकित्सक ऐसा ही करते हैं। लक्षण उभरते ही उपचार आरम्भ कर देते हैं। मनुष्य की यथा समय वस्तुस्थिति को जान लिया जाय तो उसके भावी जीवन से सम्बन्धित सम्भावनाओं को निरस्त करने अथवा परिपोषण करने का प्रयास समय रहते हो सकेगा।

हस्तरेखाओं के आधार पर सीमित भविष्य दर्शन हो सकता है। पूर्व जीवन की उपयोगी उपलब्धियों को इसी जीवन में कार्यान्वित करते हुए अधिक लाभ उपार्जन का सुयोग बन सकता है। साथ ही जो परिमार्जन परिशोधन आवश्यक है, उसे निरस्त करने में जुटा जा सकता है। यह लाभ भी कम महत्व का नहीं है। अतएव जो सूत्र अदृश्य जीवन से सम्बन्धित भले या बुरे हैं, उन्हें आगे बढ़ाने या पीछे हटाने के सम्बन्ध में आवश्यक परिवर्तन करने की प्रेरणा इस आधार पर दी जा सकती है। यही इस विज्ञान की सीमा मर्यादा है।

जो विज्ञान जिस प्रयोजन के लिए काम आ सकता है, उसे उसी में प्रयुक्त करने में लाभ की सम्भावना बढ़ती है और हानि की घटती है, हमें यही करना चाहिए। हस्त रेखा विज्ञान पर इस नये दृष्टिकोण से विचार करने की और उसका एक समग्र शास्त्र बनाने की आवश्यकता है। भविष्य कथन की अपेक्षा वर्तमान को सुखद और भविष्य को समुन्नत बनाने वाले परामर्श से ही हस्तरेखा विज्ञान की सार्थकता मानी जा सकती है।


स्व संकेतों द्वारा व्यक्तित्व सम्पन्न बनें

अथर्ववेद के मेधावर्धन मुक्त 6/108/1 में उल्लेख है-’र्स्व नो मेधे प्रथमा’ अर्थात् सद्विचार ही संसार में सर्वश्रेष्ठ है। विचार ही वह आधार भूत तत्व है जिसके ऊपर जीवन का वटवृक्ष खड़ा होता है। मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ, संस्कार, स्वभाव, आदतें भावनाएं, प्रसुप्त आकाँक्षायें, आदि जिस आधार शिला पर अवस्थित हैं, मनोविज्ञान वेत्ता उसे विचार कहते हैं। व्यक्तित्व की उत्कृष्टता, निकृष्टता का निर्माण इसी बीज के सहारे होता है। बीज के अनुसार ही वृक्ष की उत्पत्ति होती है। जैसा बीज बोया जायेगा वैसा ही पौधा उत्पन्न होगा, वैसा ही जीवन निर्माण होगा। जीवन की यथार्थता हमारे विचारों पर निर्भर है। आज हम जैसे सभी हैं, अपने जीवन को जिस उत्कृष्ट या निकृष्ट स्थिति में रखे हुए हैं, हमारा अंतःकरण, इच्छाएं बाह्य स्वरूप, वातावरण, मानसिक संतुलन आदि सभी तत्व हमारे अपने विचारों के परिणाम हैं। यह एक तथ्य है कि जैसे विचार होंगे वैसा ही हमारा व्यक्तित्व बनेगा। जैसा हम विचार करेंगे वैसी ही हमारी आदतें बनेंगी। जैसी हमारी आदतें विकसित होंगी, वैसा ही मारा चरित्र विकसित होंगी, वैसा ही मारा चरित्र विकसित होगा। जिस श्रेणी के विचार मनः संस्थान में उत्पन्न होंगे, वैसे ही स्वभाव का निर्माण होता चला जायेगा। जीवन में जो भी प्रकाश या अन्धकार, प्रतिकूलता या अनुकूलता हमें दृष्टिगोचर होती है, वह सब विचारों के ही प्रतिफल हैं। मनुष्य की सर्वांगीण महत्ता, जीवन के सर्वोत्तम कर्तव्य, श्रेष्ठ व्यक्तित्व उसके प्रबल स्थायी विचारों पर निर्भर हैं।

अध्यात्मवेत्ता एवं मूर्धन्य मनःशास्त्रियों का मानना है कर्म हमारे विचारों के ही रूप हैं। सर्वप्रथम विचार हमारे मन में प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं और जब वे मन में प्रबलता के साथ अंकित हो जाते हैं-गरी नींव पकड़ लेते हैं, तद्नुरूप ही बाह्य-अंग-प्रत्यंग क्रियाएं करते हैं। जैसे ही विचार मन में उत्पन्न होते हैं, मस्तिष्क के संयुक्त गतिवाहक सूक्ष्म तंतुओं पर उसका प्रभाव पड़ता है। अन्त में प्रबल विचार के अनुरूप ही कार्य करने की बलवत्तर प्रेरणा की उत्पत्ति होती है। पहले विचार तत्पश्चात् क्रिया और व्यवहार रूप में परिणति-यही नियम हैं।

यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जिन विचारों पर हम दृढ़तापूर्वक विश्वास करते हैं, जिनके पीछे प्रचण्ड प्रेरणा प्रस्तुत रहती है, जो विचार बारम्बार मनःमस्तिष्क में उठता रहता है तथा जिसका पुनरावर्तन चलता रहता है, उसी के अनुसार हमारा जीवन ढल जाता है। तात्पर्य यह है कि अपने आपको हम जैसा कुछ मानने लगते हैं अपने बारे में जो दृढ़ मान्यता बना लेते हैं, दृढ़ चिन्तन कर लेते हैं, निरन्तर जिन विचारों और भावों में संलग्न रहते हैं, क्रमशः वैसे ही ढलते जाते हैं। जैसे हमारे आदर्श होते हैं, ठीक उन्हीं का प्रतिबिम्ब हमारे मुखमण्डल पर द्युतिमान हो उठता है और कुछ काल पश्चात् हम वैसे ही हो जाते हैं। वैसे ही मारा आभामण्डल बनता चला जाता है।

अनुसंधान कर्ता मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मनुष्य अपने आपको स्वस्थ, निरोग, सामर्थ्यशील एवं प्रतिभावान होने की- मानो निरन्तर इसी भावना का स्व संकेत अपनी आत्मा को करता रहे-ऑटोसजैशन देता रहे, इन्हीं सशक्त विचारों में पूर्ण निश्चय एवं विश्वास भर कर अपने आपको सूचित करता रहे तो निश्चय ही उसका व्यक्तित्व प्रतिभावान एवं शक्तिशाली बन जायेगा। आवश्यकता केवल निरन्तर स्वसंकेत-ऑटोसजैशन देते रहते की है। जितने उत्कृष्ट एवं परिपुष्ट संकेत होंगे, उतना ही महान परिवर्तन एवं उत्कृष्ट तत्वों की सिद्धि होगी।

संकेत और स्वसंकेत-’सजेशन और ऑटोसजैशन’ का यहाँ अन्तर समझ लेना आवश्यक है। पुष्ट एवं दृढ़ विचार, स्पर्श, ध्वनि, शब्द, दृष्टि तथा विभिन्न वस्त्रों, मुद्राओं एवं क्रियाओं द्वारा किसी के मन पर प्रभाव डालने तथा अपनी इच्छा द्वारा कार्य सम्पन्न कराने का नाम संकेत करना है। यह एक तरह की सम्मोहन प्रक्रिया है। स्वसंकेत को स्व-सम्मोहन भी कहा जा सकता है जिसमें प्रयोगकर्ता व्यक्ति स्वयं ही अपने ऊपर प्रयोग करता है। अपने संकेतों से स्वयं प्रभावित होना ही स्व-संकेत है। इस प्रक्रिया में अपना ही शरीर, मन एवं विचार उपकरण या ‘सबजेक्ट’ होता है। इसमें ऐसे सशक्त विचारों से व्यक्ति अपने आपको संकेत देता है जिनमें अपूर्व दृढ़ता, गहन श्रद्धा एवं शब्द-शब्द में प्रचंड शक्ति भरी होती है। इसमें कुछ शब्दों, वाक्यों या सूत्रों को बार-बार अपने मस्तिष्क में उठाना और उन पर विचार क्रिया को दृढ़ करना होता है। ऐसा बार-बार करने से कुछ काल पश्चात् विचार स्थायी स्वभाव में परिणत हो जाते हैं। मन को जिस प्रकार का प्रबोध बार-बार दिया जाता है, कालान्तर में वही उसकी स्थायी सम्पदा बन जाती है। मन ही हमारे सम्पूर्ण कार्यों का संचालक व नियंत्रण कर्ता है। यह प्रचण्ड शक्तिशाली यंत्र है। विचारों की उत्पत्ति, परिवर्धन एवं परिष्कार का कार्य भी इसी के द्वारा संचालित होता है, अतः स्व-संकेत का प्रभाव हमारे मन-मस्तिष्क पर भी पड़ता है। जितनी शीघ्रता से हमारा मन उत्कृष्ट विचारों के संकेतों को स्वीकार कर उनसे तादात्म्य स्थापित कर लेता है, उतनी ही जल्दी हमारे क्रिया-कलापों में परिवर्तन आने लगता है और व्यक्तित्व परिष्कार की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है।

जब उच्चस्तरीय संकेत हमारे व्यक्तित्व का एक हिस्सा बन जाते हैं और मानसिक क्षेत्र में दृढ़ता पूर्वक जम जाते हैं, तब ये अपनी प्रतिक्रियाएं प्रदर्शित करना आरंभ कर देते हैं। ये संकेत शक्ति-सामर्थ्य के जीवन निर्माण के स्रोत हैं। अंतःकरण में आग्रहपूर्वक ये संकेत नवीन संस्कार उत्पन्न करते हैं। पुराने कुसंस्कारों, बुरी आदतों को, जो स्वभाव का अंग बन चुकी हैं, इन्हीं संकेतों के द्वारा नष्ट किया जा सकता है। जिस प्रकार कोई विरेचक पदार्थ खा लेने पर वह पेट में हलचल उत्पन्न कर देता है और विजातीय तत्व को निकालकर बाहर कर देता है, उसी प्रकार मनःक्षेत्र में प्रवेश कर संकेत बड़ी भारी उथल-पुथल मचा देते हैं-मन-मस्तिष्क को मथ डालते हैं। पूर्व संचित संस्कारों तथा इन नवीन संकेतों में एक संघर्ष उत्पन्न होता है। निश्चय ही सुदृढ़ता एवं भावना की प्रबलता के अनुसार इस देवासुर संग्राम में सफलता मिलती हैं। यदि हमारी पूर्व भावना बलवती हुई तो ये संकेत निष्प्रयोजन सिद्ध होते हैं, किन्तु यदि इनके पीछे दृढ़ निश्चय की विश्वास की प्रचण्ड प्रेरणा विद्यमान रही तो इन संकेतों के अनुसार निश्चय ही मनःसंस्थान का एवं तद्नुरूप व्यक्तित्व का निर्माण आरंभ हो जाता है।

वस्तुतः स्व-संकेतों में ही मानसिक कायाकल्प का मर्म छिपा पड़ा है। श्रुति की मान्यता है कि- श्रयो मयो अयम् पुरुशः यो यच्छ्रद्धः स एव सः। अर्थात् जो जैसा सोचता और अपने सम्बन्ध में भावना करता है वह वैसा ही बन जाता है। उत्कृष्ट एवं विधेयात्मक चिन्तन, महापुरुषों के गुणों को अपने अन्दर समावेश होने की भावना से सजातीय विचार अपने भीतर खिंचते चले आते हैं और वाँछित सद्गुणों को-विद्युत प्रवाहों को जन्म देने लगते हैं।

मनोवैज्ञानिक इसी आधार पर व्यक्तित्व में, विचार प्रवाह में परिवर्तन लाने की बात कहते हैं। उनका मत है कि जैसा कि पृथ्वी के चारों ओर ‘आयनोस्फियर’ है इसी प्रकार मानवी मस्तिष्क के चारों ओर भी एक ‘आइडियोस्फियर’ होता है। यह वैसा ही होता है जैसा मनुष्य का चिन्तन क्रम होता है। क्षण मात्र में यह बदल भी सकता है व पुनः वैसा ही सोचने पर पूर्ववत् भी हो सकता है। इसी चिन्तन प्रवाह के आदर्शोन्मुख, श्रेष्ठता की ओर गतिशीलता होने पर व्यक्ति का मुखमंडल चमकने लगता है। दूसरों को आकर्षित करता है एवं ऐसे व्यक्ति के कथन प्रभावोत्पादक होते हैं, इसी सीमा तक कि अन्य अनेकों में भी परिवर्तन ला सकें। एक प्रकार से स्व संकेतों द्वारा अपने आभा मंडल को-व्यक्तित्व को एक सशक्त चुम्बक में परिणत किया जाता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं-’थिंक एण्ड ग्रो रिच’ अथवा ‘एडाँप्ट पॉजिटिव प्रिंसिपल टूडे’। आशय यह कि सोचिये-विचारिये- पर विधेयात्मक सोचिये एवं अभी इसी क्षण सोचिये ताकि आप स्वयं को श्रेष्ठ एवं समुन्नत बना सकें। सारे महामानव स्वसंकेतों से ही महान बने हैं। गाँधी जी ने हरिश्चन्द्र के नाटक को देखकर इस स्वयं संकेत से अपने मन-मस्तिष्क को भर लिया कि सत्य के प्रयोगों को अपने जीवन में उतारो व उसके परिणाम देखो। उनके शिखर पर चढ़ने के मूल में इस चिंतन चेतना की कितनी महान भूमिका थी, यह सभी जानते हैं।

संकेत हमारे वातावरण में-आइडियोस्फियर में चारों ओर फैले हैं। जिस प्रकार हम हवा में साँस लेते हैं, उसी प्रकार अपने वातावरण में से संकेत खींचा करते हैं। प्रातः काल से सायंकाल तक-उठने से लेकर सोने तक हम अपने अव्यक्त को, अपनी आत्मा को, अपनी शक्तियों को कुछ न कुछ आज्ञा-आदेश देते रहते हैं। ये सब हमारे खुद के लिए है, अतः इन्हें स्वसंकेत कहना चाहिए।

उच्चस्तरीय स्वसंकेत की प्रक्रिया इस प्रकार है-शान्त वातावरण में स्थिर शरीर और एकाग्र मन से बैठा जाय। भावना की जाय कि एक प्रखर आत्म ज्योति हमारे हृदय में सूर्य की भाँति प्रकाशित है। इसके दिव्य प्रकाश में हमें अपना कर्तव्य भली-भाँति दृष्टिगोचर हो रहा है। मेरा अंतर्जगत सब ओर से प्रकाशित है। उस प्रकाश में सारी भ्रान्तियाँ विलीन हो गयी हैं। वासना, लोभ एवं तृष्णा के पंजे से छुटकारा मिल चुका है। समस्त चिन्तायें, भय, शंका और क्षोभ तिरोहित हो गये हैं। अन्तराल की सृजनशक्ति, आकर्षक शक्ति ईश्वरीय सत्ता को प्राप्त करने से जाग्रत हो उठी है और प्राण चेतना से अपना मन-मस्तिष्क लबालब भर उठा है। उससे निस्सृत प्राण विद्युत का समुच्चय शरीर के अंग-अवयवों में रोम-राम में अधिकाधिक मात्रा में प्रवाहित हो रहा है। शिथिलता का स्थान समर्थ सक्रियता ग्रहण कर रही है। उस आधार पर प्रत्येक अवयव पुष्ट हो रहे हैं। इन्द्रियों की क्षमता का अभिवर्धन हो रहा है। चेहरे पर चमक बढ़ रही है। बौद्धिक स्तर में उभार आ रहा है, प्रतिभा में अभिवृद्धि हो रही है जिसकी फलश्रुति परिष्कृति एवं आकर्षक व्यक्तित्व के परिवर्धन के रूप में अपने को और दूसरों को हो रहा है।

स्व-संकेतों का आधार हमारी श्रद्धा है। जितना ही हमें अपने में विश्वास होगा, उतनी ही तीव्रता से संकेत कार्य करेंगे। श्रद्धा हमारे अणु-अणु को नव जीवन प्रदान करती है। विश्वास ही दृढ़ संकल्प शक्ति को उत्पन्न करने वाला तत्व है। एक बार आत्मविश्वास उद्दीप्त हो जाने से उसका प्रभाव जीवन पर्यन्त बना रहता है। श्रद्धा व पूर्ण विश्वास के विचारों से भरे संकेतों में यौवन, बल और सफलता का महान रहस्य छिपा हुआ है। अतः स्व संकेत करते समय अपने अभ्यन्तर प्रदेश में विश्वास करने वाली वास्तविक महत्ता पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए।

स्व-संकेत के प्रयोग प्रातः कालीन शाँत वातावरण में करना अत्यन्त फलदायी सिद्ध होता है, किन्तु जिन्हें ऐसा अवसर न मिलता हो, वे रात्रि शयन से पूर्व इस अभ्यास को सरलतापूर्वक कर सकते हैं और अपने भाग्य, भविष्य, दृष्टिकोण एवं वातावरण को परिवर्तित कर सकते हैं। (व्यक्तित्व परिष्कार की इससे सरल एवं प्रभावी प्रक्रिया और कोई हो नहीं सकती।)


पितर हमारी मदद भी करते हैं और सावधान भी

सूक्ष्म जगत में परोपकारी देवात्माओं का भी अस्तित्व हैं। परोपकारी देवात्माएं अनेक बार मनुष्यों को सत्परामर्श, मार्गदर्शन देती एवं संकटों के प्रति उन्हें सावधान भी करती हैं। उनके बताये मार्ग का अनुसरण और परामर्श का पालन कर कितने ही लोग आये दिन विपत्तियों से बचते और सुयोग का लाभ उठाते देखे जाते हैं। ऐसे घटनाक्रमों में से कुछ प्रामाणिक प्रसंग बहुचर्चित भी रहे हैं एवं कौतूहलवर्धक भी।

घटना सन् 1947 की है। ब्रैसिया (इटली) से पाँच किलोमीटर दक्षिण में मौण्टीकियारी नगर में पैरिनागिली नामक एक परिचारिका रहती थी। एक दिन जब वह घर से बाहर कुछ कार्य कर रही थी, जो कुछ विचित्र प्रकार की चिड़ियों का एक झुण्ड कुछ विचित्र प्रकार के कलरव करते हुए ऊपर से गुजरा। उत्सुकतावश उसकी दृष्टि आकाश की ओर उठ गई। वह उन आकर्षक पक्षियों को देखकर आह्लादित हुई; किन्तु तभी उसकी नजर गगन में एक ऐसे दृश्य पर पड़ी, जिससे वह भयभीत भी हुई और चकित भी। उसने देखा कि ऊपर शून्य में एक महिला तैर रही है। उसके सीने में तीन तलवारें चुभी हुई थीं। वह सब शरीर के आर-पार थीं।; किन्तु रक्त की एक भी बूँद उनसे नीचे नहीं गिर रही थी। महिला के मुखमण्डल पर इसके बावजूद दिव्य शान्ति विराजमान थी। अनेक लोग इस अद्भुत दृश्य को देख कर इकट्ठे हो गये, किन्तु दूसरे ही क्षण उस दृश्य की वीभत्सता से भयभीत होकर भाग खड़े हुए। पैरिना कुछ साहसी प्रकृति की थी। वह इससे घबराई नहीं। उसने उस दिव्य नारी मूर्ति से उसके वक्षस्थल में चुभे आयुध का रहस्य जानना चाहा। प्रत्युत्तर में उस दैवी सत्ता ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में अन्तराल को स्पर्श करने वाला एक संक्षिप्त-सा उद्बोधन दिया, जिसका भाव इतना ही स्था कि आज मनुष्य तप-त्यागो भूल चुका है। सेवा-सहायता की भावना उसमें रही नहीं। इससे सारा संसार क्लेशपूर्ण बना हुआ है। मैं इसी की संदेशवाहिका बन कर आयी हूँ। सेवा में, सहायता में, त्याग में शरीर को जितना कष्ट मिलता है, उससे कई गुना अधिक सुख और संतोष मन को प्राप्त होता है। मुझे देखो, प्रत्यक्षतः मैं शस्त्रोविधी हुई हूँ। मेरा शरीर निश्चित रूप से इससे पीड़ा अनुभव कर रहा है; किन्तु मन और मुख में इसका एक कण भी अभिव्यक्ति नहीं पा सका है। मैं चाहती हूँ कि परमार्थ-परायणता हर एक के जीवन का अविच्छिन्न अंग बने। यही संदेश मेरे इस प्रकटीकरण के पीछे प्रच्छन्न रूप से निहित है। अब जाती हूँ। इतना कहकर वह दिव्यात्मा तिरोहित हो गई।

इसके ठीक एक माह पश्चात 13 जुलाई 1947 को वह देवात्मा एक बार पुनः पैरिना के समक्ष प्रकट हुई। इस बार तलवार के स्थान पर उसके पास श्वेत, लाल पीले रंग के तीन पुष्प थे। इनका रहस्य समझाते हुए उस आकृति ने कहा- यह तीन पुष्प तीन प्रकार के संदेश देते हैं। सफेद इस बात का परिचायक है कि हमें त्यागवृत्ति को जीवन में अभिन्न रूप से धारण करना चाहिए। रक्त-वर्ण परिश्रमशीलता की निशानी है। हम परिश्रमी बनें और पसीने की कमाई पर निर्वाह करें-इसके पीछे यही भाव है। पीत वर्ण उदार आत्मीयता का उपदेश देता है। दैनिक जीवन में यदि इसका समावेश न हो तो घर और समाज वैसा ही कलहपूर्ण बन जाता है, जैसा इन दिनों सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहा है।

तत्पश्चात् कुछ क्षण रुक कर उसने पुनः कहना प्रारम्भ किया-यों प्रत्यक्षतः लोग मुझे ‘ईसा’ की माँ मदर मेरी के रूप में जानते हैं, पर मैं समस्त पृथ्वीवासी को ईसा की ही तरह स्नेह करती हूँ, इसलिए मेरी उनसे एक प्रकार का पुत्रवत् सम्बन्ध है। पुत्र जब पीड़ा में हो, तो माँ की ममता उभरे बिना चैन कैसे ले सकती है? यह कसक ही मेरे अन्तःकरण को बराबर कचोटती और कुरेदती रहती है। इसी कारण मुझे पुनः-पुनः आविर्भूत होना पड़ता है, ताकि उनकी पीड़ा कुछ कम कर सकूँ और उनमें कतिपय धर्म भावना का संचार कर सकूँ। इतना कह कर वह आत्मा अन्तर्धान हो गई। इसी की पुण्य स्मृति में हर वर्ष इस दिन को (13 जुलाई) उस स्थान पर ईसाई समाज में ‘रोजा मिस्टिका’ के रूप में मनाया जाता है।

स्पेन में आइबोरा नामक एक स्थान है। यहाँ पर स्मृति-अवशेष के रूप में रखा गया एक रक्त रंजित वस्त्र आज भी लोगों की श्रद्धा का प्रतीक बना हुआ है। हर वर्ष 16 अगस्त को यहाँ सामूहिक प्रार्थना की जाती है। धर्मानुष्ठान का यह क्रम सन् 1010 से अनवरत रूप से जारी है। प्रचलित मान्यता के अनुसार उक्त वस्त्र किसी संत शहीद का है, जिसने अपनी धर्म रक्षा हेतु जीवन होम देना अधिक उचित समझा। बताते हैं कि सामूहिक उपासना के दिन हर वर्ष उस संत की आत्मा वहाँ उपस्थित होती है और लोगों की प्रार्थना स्वीकारती हुई उन्हें मौन आशीर्वाद देती है। आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण लोगों को तब प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगा है, जब काँच के बक्से में बन्द उस पवित्र परिधान में अचानक हलचल आरंभ हो जाती है और तब तक बनी रहती है, जब तक प्रार्थना का क्रम बन्द नहीं हो जाता। अनेक श्रद्धालुओं को इस अवसर पर तरह-तरह की अनुभूतियाँ भी होती हैं। इन्हीं सब कारणों से तत्कालीन पोप चतुर्थ ने इसे एक सामूहिक साधना केन्द्र के रूप में परिवर्तित कर दिया। तब से लेकर अब तक यह केन्द्र सर्वसाधारण का श्रद्धा-बिन्दु बना हुआ है।

इसी प्रकार का एक सामूहिक उपासना स्थल मिलान के दक्षिण में स्थित सैन डैमियानों नामक स्थान में अवस्थित है। प्रत्येक गुरुवार को वहाँ ‘मामो रोजा’ की सामूहिक उपासना की जाती है। मामा रोजा सूर्य की अधिष्ठात्री है। लोगों का विश्वास है कि उस दिन देवी सूक्ष्म रूप से उपस्थित हो सभी को आशीर्वाद देती हैं। इस आशीर्वाद से बीमार स्वस्थ होते देखे गये हैं और स्वस्थ अनेक प्रकार की शुभ प्रेरणाओं से लाभ उठाते सुने गये हैं। बताया जाता है कि 17 नवम्बर, 1870 के दिन वहाँ एक अद्भुत चमत्कार हुआ था जिसमें मामा रोजा की उपस्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव सभी ने प्राप्त किया। इस घटना का विस्तृत उल्लेख ‘औब्जरवेटरे रोमानो’ नामक ग्रन्थ में मौजूद हैं।

जिन पुण्यात्माओं ने अपने धर्म-संस्कृति की रक्षा के निमित्त स्वयं का बलिदान कर दिया उनकी आत्माएं आज सभी लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई हैं। 23 फरवरी 1239 को कुछ मुस्लिम सैनिकों ने स्पेन की कोडोल पहाड़ी पर निवास करने वाले पुरोहितों की हत्या कर दी और उन्हें कपड़ों में बाँध कर समीपवर्ती नदी में बहा दिया। कहा जाता है कि उक्त पहाड़ी पर यदि कोई दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति अब भी पहुँचता है, तो उन्हें पुरोहितों के अभिशाप का भाजन बनना पड़ता है। वे देखते-देखते अपंग अपाहिजों जैसी स्थिति में आ जाते हैं। कई एक बेहोश भी हो जाते हैं। प्रायश्चित विधान अपनाने, क्षमा माँग लेने एवं दुरित त्यागने का व्रत लेने के उपरान्त उनकी अपंगता जाती रहती है। डैरोका धर्मस्थल पर प्रतिष्ठित इन पुरोहितों की रक्त वेदियाँ आज भी पूरे स्पेन वासियों के लिए श्रद्धा का विषय बनी हुई हैं।

अपर ऐल्सेक (फ्राँस) में ट्रोइस एपिस का पन्द्रहवीं सदी का इतिहास बड़ा रक्त रंजित रहा है। वहाँ आये दिन मार-काट, लूट-पाट मची ही रहती थी। इसमें निर्बल-निर्दोष और निरपराध ही सबसे अधिक कष्ट पाते और प्रताड़ित किये जाते थे। एक बार इसका शिकार वहाँ का एक धार्मिक किसान हो गया। निर्मम प्रकृति के कुछ लोगों ने उसकी अकारण हत्या कर दी। इस हत्या के एक सप्ताह बाद उस स्थल से होकर हैटरस्कोर नाम एक धर्मभीरु व्यक्ति गुजर रहा था। उसने देखा कि उसके सामने एक शुभ्रवसना नारी मूर्ति खड़ी है। उसका शरीर जमीन से कुछ ऊपर अधर में लटक रहा था। उसके एक हाथ में श्वेत हिम वर्तिका तथा दूसरे में अनाज की कुछ बालियाँ थीं। उस देवी ने डैटर से कहा कि यदि यहाँ अपराधों की गति ऐसी ही बनी रही, तो लोगों को असह्य कष्ट भोगना पड़ेगा, प्रकृति प्रकोपों का शिकार बनना पड़ेगा। अब भी समय है, उन्हें सावधान और सचेत कर देना, अन्यथा दंड अवश्यम्भावी है। इसी के कुछ समय उपराँत वहाँ भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा एवं तरह-तरह की बीमारियाँ फैलीं, जिसमें आधे से अधिक लोगे काल-कवलित हो गए। इतिहासकारों का कहना है कि ट्रौइस एपिस में उस प्रकार का अकाल और महामारी वहाँ के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना है। दोबारा आज तक वहाँ ऐसी विपदा पुनः नहीं उपस्थित हुई। इस घटना के बाद से एल्सेक की प्रतिष्ठा एक धर्मस्थल के रूप में प्रसिद्ध हो गई। तभी से प्रत्येक वर्ष उक्त अवसर पर वहाँ धार्मिक आयोजन होते आ रहे है।

फ्राँस में बैंसंकन नाम एक नगर है। 3 दिसम्बर 1712 को वहाँ के मैगाफोलिस नाम प्रार्थनालय में एक घटना घटी। उस पुजारी के अतिरिक्त भी बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। उपस्थित लोगों ने देखा कि एक दैत्याकार आकृति हवा में तैर रही है। थोड़ी देर इधर-उधर तैरने के पश्चात् जनसमुदाय ने सुना कि वह छायाकृति उन्हें सी असन्न संकट से सावधान कर रही है। इसके उपरान्त वह देवदूत विलुप्त हो गया। इतिहास साक्षी है- इसके पश्चात्, वहाँ ऐसा भूकम्प और ऐसी वर्षा शुरू हुई, जिसने वहाँ का दृश्य मरघट जैसा बना दिया। इस प्राकृतिक आपदा में वह सम्पूर्ण नगर नष्ट हो गया, केवल इक्के-दुक्के मकान की सुरक्षित बचे रहे। इतिहास वेत्ताओं का कहना है कि इस विपदा से पूर्व वहाँ बड़ी अराजकता छायी हुई थी। किसके साथ कब क्या घटित हो जाय, इसका अनुमान, आँकलन लगा पाना कठिन था। मूर्धन्य इतिहासविद् जान ट्रैवर ने इस घटना के संबंध में अपनी निजी टिप्पणी जोड़ते हुए लिखा है कि कदाचित् यह दुर्दमनीय उच्छृंखलता के प्रति ईश्वरीय प्रतिकार हो।

ये कतिपय उदाहरण दैवी सत्ता के अस्तित्व के प्रमाण प्रस्तुत करते और यह साबित करते हैं कि वह परम सत्ता इनके माध्यम से जन-जन को उनके आचरण के प्रति सावधान करती है। यदि समय रहते चिन्तन और आचरण को नहीं बदला गया, तो ईश्वर की न्याय-व्यवस्था से बच पाना मुश्किल है।


स्वास्थ्य-रक्षा के कुछ सरल किन्तु अनिवार्य नियम

मनुष्य धनवान, विद्वान, प्रतिभावान, अफसर, चैम्पियन और न जाने क्या-क्या बनना चाहता है, पर यह भूल जाता है कि स्वास्थ्य को सही रखे बिना प्रगति की दिशा में एक सीढ़ी चढ़ सकना भी सम्भव नहीं। जो स्वयं रुग्णता से कराहता रहता है, जिसमें अपने शरीर की गाड़ी धकेलने की सामर्थ्य नहीं है, जो पग-पग पर इसके लिए दूसरों की सहायता चाहता है उसके लिए कोई कहने लायक पुरुषार्थ कर सकना संभव नहीं। जो चिकित्सा के लिए घर की पूँजी समाप्त करता है, जिसे परिचर्या के लिए दूसरों का सहारा चाहिए, वह किस प्रकार क्या कुछ पराक्रम कर सकेगा और किये बिना अनायास ही कैसे समृद्धि सफलताएं अर्जित कर सकेगा।

प्रगतिशील बनना न बन पड़े तो भी मनुष्य को स्वावलम्बी तो होना ही चाहिए। दूसरों की सेवा-सहायता न बन पड़े तो कम से कम आत्म-निर्भर तो होना ही चाहिए। स्वस्थ रहना भी एक प्राथमिक आवश्यकता है। इसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।

परमार्थ न सही, स्वास्थ्य-साधना को ध्यान में रखते हुए भी स्वास्थ्य-रक्षा के सम्बन्ध में समुचित सतर्कता बरती जानी चाहिए और इसके लिए जो अकाट्य नियम हैं उनका महत्व समझना और दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए।

इस संदर्भ में पहला नियम है-भूख से कम खाना। पेट को हलका रखना। बहुमूल्य और स्वादिष्ट व्यंजनों की अपेक्षा फल और शाक की भोजन में बहुलता रखनी चाहिए। अन्न लेना हो तो उसे अंकुरित कर लिया जाय। पकाने में बहुत अधिक अग्नि संपर्क न किया जाय। जिनका उबालना आवश्यक है, उन्हें उबाल लिया जाय। खाद्य पदार्थों को छिलके समेत लिया जाय, उन्हें तला-भुना न जाये। कुकर की भाप में पकाना ठीक है। खुली कढ़ाई या पतीली में उसके जीवन-तत्व भाप में उड़ जाते हैं।

मनुष्य प्रकृतितः शाकाहारी है। माँसाहार उनके लिए हर दृष्टि से हानिकर होता है। प्रोटीन के नाम पर उस की सिफारिश की जाती है पर यह भूल जाना चाहिए कि वह सुपाच्य ही होना चाहिए। माँस दुष्पाच्य है। पशुओं के शरीर की बीमारियाँ मनुष्य के शरीर में पहुँचती हैं और मस्तिष्क में भी वैसी ही दुष्प्रवृत्तियाँ बैठती हैं। मार-काट करने-कराने वाले वैसी ही प्रवृत्ति अपना लेते हैं और मनुष्यों के साथ भी वैसी ही निष्ठुरता बरतते हैं।

भोजन की तरह पानी भी मनुष्य का आहार है। पाचन और स्वच्छता की दृष्टि से यह आवश्यक है। दिन−रात में 15 गिलास पानी पेट में पहुँचना चाहिए। उसमें पोषक तत्वों का सभी समावेश है।

शारीरिक श्रम की उपेक्षा न की जाये। इन दिनों मानसिक श्रम को अधिक सम्मान का और उपार्जन का माध्यम माना जाता है और शारीरिक श्रम में गंवारपन समझा जाता है और उसे हलकी दृष्टि से देखा जाता है यह बुरी बात है। इससे पाचन में अड़चन पड़ती है और शरीर की पेशियाँ तथा नाड़ियाँ जकड़ जाती हैं। इससे चुस्ती तथा फुर्ती एक प्रकार से विदा ही हो जाती है। मनुष्य अजगर की तरह बैठा रह तो उसे रक्तचाप मधुमेह, हृदय रोग, गठिया आदि का शिकार बनना पड़ेगा।

विचारशील वर्ग के लोग चाहे कितने ही व्यस्त हों, कितने ही महत्वपूर्ण पदों पर हों पर व्यायाम में चूक नहीं करते हैं। गाँधी जी प्रातः नियमित रूप से तेजी के साथ टहलने जाते थे। विनोबा पदयात्रा में दस मील नित्य चलते थे। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का सबेरे दौड़ने का नियम था। इसी प्रकार अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष केनेडी, आइजन हाँवर, जॉनसन आदि ने नित्य दौड़ने का नियम अपनाकर अपना शरीर स्वस्थ रखा था। मिलिटरी में दैनिक परेड होती है और उन्हें पसीना निकालने वाला श्रम कराया जाता है यदि वे न करें तो कुछ ही दिन में दुकान के लालाजी बन जायेंगे और लड़ना उनके बलबूते का न रहेगा।

पेट, हृदय ओर मस्तिष्क की ही तरह एक आवश्यक अंग है-मेरुदण्ड। मस्तिष्क से निकल कर सारे शरीर के लिए ज्ञान तन्तु इसी मार्ग से जाते हैं। यदि रीड का व्यायाम न हो तो उसके अस्थि खण्ड आपस में जुड़ने सिकुड़ने लगते हैं फलतः शरीर को असाधारण क्षति होती है। व्यायाम से टहलते समय इस बात का ध्यान रहे कि उससे मेरुदण्ड को सिकुड़ने फैलने की क्रिया होती रहे। जो व्यायाम में सर्वथा अशक्त हैं उन्हें माँसपेशियों को सिकोड़ने फैलाने वाली मालिश कराते रहना चाहिए।

साँस सदा गहरी लें। झुककर न बैठें। गरी साँस लेने से फेफड़ों में पूरी वायु पहुँचती है और उसके माध्यम से आक्सीजन की आवश्यकता पूरी होने में बाधा नहीं पड़ती। झुककर बैठे रहने पर या उथली साँस लेने पर फेफड़ों का एक छोटा भाग ही काम करता है, शेष निष्क्रिय पड़ा रहता है। इस भाग में क्षय आदि के कीटाणु जम जाते हैं और अपना घोंसला बना लेते हैं। कुकर, खाँसी, दमा आदि इसी कारण होता है। व्यायाम में पूरी साँस लेने की व्यवस्था हो गई, इतने से ही काम नहीं चल जाता। हर साँस गहरी ली जाती रहे इसका अभ्यास करके उस आदत को स्थाई बना लेना चाहिए।

रात्रि को जल्दी सोना और प्रातः जल्दी उठना बहुत अच्छी आदत है। इससे शारीरिक ही नहीं मानसिक लाभ भी हैं जो लोग रात को देर से सोते हैं और सबेरे दिन चढ़े उठते हैं उनके चेहरे पीले पड़ जाते हैं प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त का समय हर काम को करने में सर्वश्रेष्ठ है। इस समय को सोने में गुजार दिया जाय तो इससे कई प्रकार की हानियाँ होती हैं।

स्वास्थ्य-रक्षा के ये थोड़े से नियम ऐसे हैं जिन्हें पालन करते रहने पर न बीमार पड़ना पड़ेगा और न दुर्बलता का शिकार होने का कुयोग पीछे पड़ेगा।


छत्रपति की चरित्र निष्ठा

उनकी आँखों में रह-रह कर बेचैनी की लहर उठती और विलीन हो जाती। माथे पर उभरती और विलीन होती सिकुड़न चेहरे की गम्भीरता इस बात गवाही दे रहे थे कि वह किसी गहरे सोच में डूबे हैं। साथ ही उन्हें किसी की प्रतीक्षा है और बात थी भी यही। यह सेनापति भामलेकर की प्रतीक्षा कर रहे थे। जो शत्रु-सेना का मुकाबला करने और उसे राज्य की सीमा से दूर तक खदेड़ देने के लिए युद्ध अभियान पर गए थे। उन्हें चिन्ता थी कि कहीं आशा के विपरीत भामलेकर शत्रु सेना के बन्दी न हो गए हों।

प्रतीक्षा करते हुए काफी देर हो गयी थी। वह महल की अट्टालिका पर ही बैठे थे। तभी उन्होंने तेजी से घोड़ा दौड़ाते चले आ रहे एक घुड़ सवार को देखा। नजदीक आने पर स्पष्ट हुआ कि यह भामलेकर ही थे। उनकी चाल देखकर ही अनुमान लगा लिया कि वह विजयश्री का वरण करके लौटे हैं, पर उनके पीछे दो सैनिक जो डोली लेकर आ रहे थे, उसके बारे में उनको कुछ समझ में नहीं आया।

दौड़कर वह नीचे आए और भामलेकर को गले लगा लिया। भामलेकर ने कहा-छत्रपति! आज मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गयी। बेचारा बहलोल जान बचाकर भाग गया। अब हिम्मत नहीं कि मुगल सेना इधर की तरफ मुँह भी कर सके।

वह तो मैं तुम्हें देखकर ही समझ गया था भामले, छत्रपति ने कहा-और डोले की ओर इशारा करते हुए कहा, यह क्या है?

अट्टहास करते हुए भामले ने कहा-इसमें मुसलिम रमणियों में सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध बहलोल खाँ की बेगम है महाराज! मुगल सरदार ने हजारों लाखों हिन्दू नारियों सतीत्व लूटा है। उसी का प्रतिशोध लेने के लिए मेरी ओर से आपको यह भेंट हैं।

भामलेकर के इस कथन को सुनकर एक पल के लिए शिवाजी अवाक् रह गए। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके कानों में ढेर सारा पिघला हुआ शीशा उड़ेल दिया हो। वह तड़प उठे। उन्हें अपने किसी सरदार और सामन्त से ऐसी किसी मूर्खता की आ नहीं थी। कुछ देर ठहरने के पश्चात् वे डोले के पास गए, पर्दा हटाया और बहलोल की बेगम को बाहर आने के लिए कहा। छुई-मुई सी अपने आप में समिटती सिकुड़ती वह बाहर आयी। शिवाजी ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा-सचमुच तू बड़ी सुन्दर है। अफसोस है कि मैं तेरे पेट से पैदा नहीं हुआ नहीं ता मैं भी तेरे जैसा सुन्दर होता।

फिर उन्होंने एक अन्य अधिकारी को निर्देश देते हुए कहा कि वह बेगम को बहलोल खाँ के पास ले जाकर सौंप आए। इसके बाद वह सामलेकर की ओर मुड़े और बोले तुम मेरे साथ इतने दिनों तक रहे, पर मुझे पहचान नहीं पाए। वीर उसे नहीं कहते जो अबलाओं पर प्रहार करे, उनका सतीत्व लूटे और धर्मग्रन्थों की होली जलाए। कोई और पतन के गर्त में गिरता हो, तो उसके प्रतिकार का यह अर्थ नहीं कि हम भी उसी की तरह नीचता पर उतर आएं।

हमें अपनी साँस्कृतिक गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। अपने अभियान का उद्देश्य किसी राज्य का विस्तार नहीं, संस्कृति का विस्तार है। उन भावनाओं, मान्यताओं विचारों का विस्तार करना है, जिससे इनसान उत्पीड़क का उन्मूलन और उत्पीड़ित को संरक्षण दे सके। छत्रपति के इस कथन को सुनकर सभी उपस्थिति सरदारों सामन्तों के नेत्र सजल हो उठे। भामलेकर को अपनी भूल पर पश्चाताप हो रहा था।

इधर बेगाम को ससम्मान लौटाया हुआ देखकर बहलोल खाँ विस्मित हुए बिना नहीं रहा। वह तो सोच रहा था कि अब उसकी सबसे प्रिय बेगम शिवाजी के हरम की शोभा बन चुकी होगी। पर बेगम ने अपने पति को छत्रपति के बारे में जो कुछ बताया वह जानकर तथा अधिकारी के हाथों भेजा गया पत्र पढ़कर बहलोल खाँ जैसा क्रूर सेनापति पिघल उठा। पत्र में शिवाजी ने अपने सेनानायक की गलती के लिये क्षमा माँगी थी। इस पत्र को देखकर स्वयं को बहुत महान, वीर और पराक्रमी सामने वाला बहलोल खाँ अपनी ही नजर में शिवाजी के सामने बहुत छोटा दिखायी देने लगा। उसने निश्चय किया कि इस फरिश्ते को देखकर ही दिल्ली लौटूँगा।

इसके लिए आग्रह भेजा गया। बहलोल खाँ और शिवाजी के मिलने का स्थान निश्चित हुआ। नियत तिथि समय व स्थान पर शिवाजी बहलोल खाँ के पहले ही पहुँच गये। बहलोल खाँ जब वहाँ पहुँचा तो पश्चाताप आत्मग्लानि के साथ-साथ शिवाजी के व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धाभाव से इतना अभिभूत था कि देखते ही उनके पैरों में झुक गया- “माफ कर दो मुझे मेरे फरिश्ते। बेगुनाहों का खून मेरे सर चढ़कर बोलेगा और मैं उनकी आह से जला करूंगा। उस समय तेरी सूरत की याद मुझे थोड़ी सी ठंडक पहुँचाएगी।

‘जो हुआ सो हुआ’ अब आगे का होश करो एक पराजित और श्रद्धावनत सेनापति को गले लगाते हुए छत्रपति शिवाजी ने कहा।


दैवी स्फुरणा ने ही जन्म दिया है विभिन्न आविष्कारों को

कई बार हम बनाना कुछ चाहते हैं और बन कुछ जाता हैं। करना कुछ चाहते हैं, पर संयोगवश हो कुछ जाता है। ऐसे संयोग ने जीवविज्ञान को कई महत्वपूर्ण आविष्कार दिये है। ऐसी कई खोजें तो इतनी महत्वपूर्ण साबित हुई हैं कि यदि ये मनुष्य को उपलब्ध नहीं होतीं, तो अनेक ऐसे सुविधा-साधनों और आवश्यकताओं का आनन्द लाभ हम उठा ही नहीं पाते, जो अब उठा रहे हैं।

घटना सन् 1903 की है। मूर्धन्य फ्राँसीसी रसायनवेत्ता ए॰ बैनेडिक्ट्स अपनी प्रयोगशाला में काम कर रहे थे। सामने की शेफ में विभिन्न प्रकार के रसायनों से भरी अनेक शीशिया रखीं। उन्हीं के बीच सेल्युलाइड से भरी बोतल भी रखी थी। उन्होंने कुछ परीक्षण के लिए सेल्युलाइड से भरी बोतल उठानी चाही, पर अचानक वह हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ी। बोतल तो टूट गई पर उसके टुकड़े बिखरने की बजाय परस्पर जुड़े रहे। बैनेडिक्ट्स ने जब यह देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ। वे यह जानने के लिए कि आखिर इसका कारण क्या है? बोतल को उठा कर उसका निरीक्षण करने लगे। इससे ज्ञात हुआ कि बोतल की भीतरी सतह पर सेल्युलाइड की एक पतली पर्त चढ़ गई थी। इसी के कारण काँच के टुकड़े बिखरे नहीं।

उस घटना को देखकर उनके मन में एक विचार कौंधा कि काँच के निर्माण के समय बीच में नाइट्रो सेल्यूलोज की एक पर्त चढ़ दी जाय, तो एक विशेष प्रकार के मजबूत काँच का निर्माण हो सकता है। इसी के उपरान्त ऐसे शीशे बनने लगे, जिनका उपयोग आज मोटर गाड़ियों में किया जाता है।

कई संयोगवश कुछ ऐसा हो जाता है, जो अंततः वरदान सिद्ध होता है। ऐसा ही एक बार प्रसिद्ध वैज्ञानिक लुई पाश्चर के साथ हुआ। सन 1880 में वे मुर्गियों में पाये जाने वाले हैजे के रोग पर अनुसंधान कर रहे थे। उन दिनों यह बीमारी मुर्गियों में बड़ी तेजी से पनप रही थी। प्रतिदिन अगणित चूजे मर जाया करते थे। इसलिए इस व्याधि का अध्ययन कर वे कोई उपयुक्त उपचार ढूँढ़ना चाहते थे? अध्ययन से यह तो पता चल गया कि यह बीमारी एक विशेष प्रकार के रोगाणु के कारण होती है, पर इसे समाप्त कैसे किया जाय? यह गुत्थी नहीं सुलझ पा रही थी। प्रतिदिन वे मुर्गियों के चूजों पर नये-नये परीक्षण कर रहे थे, पर फल कुछ नहीं निकल पा रहा था। एक दिन इसी क्रम में उनसे एक चूक हो गई। कई दिनों तक मुर्गियों की हड्डियों का सत्व एक बर्तन में रखा रह गया। जब उन्हें इसका पता चला, तो एक नया परीक्षण करने को सोचा वे बीमार मुर्गियों में सत्व का इंजेक्शन लगा कर उसका परिणाम जानने को उत्सुक हुए। उनका विश्वास था कि इससे मुर्गियाँ तुरन्त ही दम तोड़ देंगी, पर हुआ इसके विपरीत। रोगग्रस्त जीव धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। यह देख कर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ और जब उस रस का परीक्षण किया,तो पता चला कि उसमें हैजे के रोगाणुओं को मारने का ओषीधीय गुण है और इस प्रकार मुर्गियों के हैजे रोग के लिए टीके का संयोगवश आविष्कार हो गया।

कागज को दबाने के लिए पेपर क्लिप की हर पढ़ने-लिखने वाले को आवश्यकता पड़ती है, पर इसकी खोज कैसे हुई? इसे कम ही लोग जानते होंगे? हुआ यों कि एक बार युवक वाशिंगटन (अमेरिका) की सड़कों पर निकटवर्ती शहर जाने के लिए किसी वाहन की तलाश में था। बस के आने में देरी होते देख वह युवक वहीं चहलकदमी करने लगा। इसी क्रम में सड़क पर उसे एक तार का टुकड़ा मिल गया। उसे उसने उठा लिया और निरुद्देश्य मोड़ने-मरोड़ने लगा। वह बार-बार उसे टेढ़ा एवं सीधा करता। इसी बीच उसके मस्तिष्क में विचार आया कि इस तरह तार के टुकड़े को मोड़ कर पेपर क्लिप (यू पिन) बनाया जा सकता है। इस प्रकार यू-पिन उस युवक के मस्तिष्क की खोज साबित हुई, जो अकस्मात् ही हो गई।

चिकित्सा विज्ञान जब शैशवावस्था में था, उन्हीं दिनों की घटना है। 1922 से पूर्व रक्ताल्पता रोग की कोई दवा नहीं थी। सामान्य रोगियों को लौह तत्व खिला कर किसी प्रकार ठीक कर लिया जाता था, पर जो घातक रक्ताल्पता (परनीशियस एनीमिया) के शिकार होते थे, उन्हें निश्चित ही मौत के मुँह में जाना पड़ता था। इसकी औषधि की खोज की भी एक विलक्षण कथा है। इस आविष्कार का श्रेय संयुक्त रूप से तीन लोगों को जाता है।

घटना इस प्रकार है। अमेरिका में न्यूयार्क के डॉ0 मेनाट ने एक निजी अस्पताल खोल रखा था, जिसमें कई प्रकार के रोगों की चिकित्सा होती थी। सन्! 1922 में उन्होंने वहीं के डॉ0 मर्फी को अपना सहयोगी बनाया, जो स्वयं भी एक कुशल चिकित्सक थे। डॉ0 मर्फी को अध्ययन का बड़ा शौक था। वे पत्र-पत्रिकाओं के पठन-पाठन में बहुत रस लेते थे। इसी क्रम में एक पत्रिका में उन्हें डॉ0 विपेल का एक चिकित्सा संबंधी लेख पढ़ने को मिला, जिसमें बताया गया था कि पशुओं पर किये जाने वाले प्रयोगों में कुत्तों से बारम्बार खून लिया जाता है। रक्त की अतिशय कमी के कारण वे एनीमिया रोग के शिकार हो जाते हैं, तो वे धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाते हैं। इस लेख को पढ़कर डॉ0 मर्फी के मन में विचार उठा कि क्यों ने रक्ताल्पता के मरीजों पर यह प्रयोग किया जाय। उस समय उनके चिकित्सालय में घातक एनीमिया के कई मरी थे। डॉ0 मेनाट ने डॉ0 मर्फी को उन रोगियों पर प्रयोग करने की अनुमति दे दी। यकृत का सत्व (एक्स्ट्रैक्ट) तैयार कर उन्हें दवा के रूप में रोगियों को पिलाया गया। एक सप्ताह बाद उनके रक्त-परीक्षण से व्याधि में सुधार दिखाई पड़ने लगा और फिर बड़ी तेजी से वे स्वास्थ्य लाभ करने लगे। डॉ0 मर्फी को इससे आश्चर्य हुआ और उनने सत्व का विश्लेषण करने का निश्चय किया। जब इसका परीक्षण किया गया, तो उसमें लौह तत्व के अतिरिक्त विटामिन बी-12 भी उपस्थित पाया गया। जाँच के रूप में जब विटामिन बी-12 ऐसे रोगियों को दिया गया, तो परिणाम पहले जैसा प्राप्त हुआ। इस प्रकार जब यह निश्चय हो गया कि उक्त बीमारी में विटामिन बी-12 ही अपना औषधीय चमत्कार दिखाता है,तो बाद में इसे संश्लेषण के द्वारा दवा के रूप में विकसित किया गया। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए सन् 1926 में डॉ0 मेनाट मर्फी और विपेल को संयुक्त रूप से चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इस सम्पूर्ण घटना का वर्णन अमेरिका के डॉ0 लेबिस थामस ने अपनी ‘दि यंगेस्ट साइंस’ में विस्तारपूर्वक किया है।

एल्युमिनियम के पतले पाइपों का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों में किया जाता है। यह घर में विद्युत तारों की वायरिंग में भी प्रयुक्त होता है और दूसरे कार्यों में भी काम आता है, पर इसका निर्माण भी अनायास ही हो गया। हुआ यों कि न्यूयार्क (अमेरिका) का जार्जली नामक एक व्यक्ति कमीज में प्रयुक्त होने वाले बटन बनाने का बड़ा इच्छुक था। इससे पूर्व बटन प्रायः प्लास्टिक के बनते थे, पर वह धात्विक बटन बनाना चाहता था, अस्तु बाजार से बटन बनाने वाली एक मशीन और एल्युमिनियम की चादरें खरीद लाया तथा बटन बनाना शुरू किया। उसने मशीन में चादरें डालनी शुरू की और बटनों के निकलने का इन्तजार करने लगा, पर जार्जली के आश्चर्य की सीमा न रही, जब उसमें बटन की जगह धात्विक नलियाँ बनकर निकलने लगीं। वस्तुतः मशीन की डाई में कुछ त्रुटि रह गई थी॥ इसी कारण चपटे बटनों के स्थान पर नलियाँ बनने लगी थी और इस प्रकार अचानक ही एक नया आविष्कार हो गया। इसी के आविष्कार से धात्विक नलियों का निर्माण व्यापारिक स्तर पर आरम्भ हुआ।

रंगों की दुनिया भी बड़ी विलक्षण है। कई बार सुन्दर आकर्षक रंग ही हमें तरंगित-उत्तेजित करते हैं और कई बार मन इसके कारण गहन वितृष्णा से भर उठता है। पर्व-त्यौहारों एवं खुशी के मौकों पर हम नये रंगीन कपड़े पहन कर मौज-मस्ती और प्रसन्नता जाहिर करते हैं, पर इतना निश्चित है कि रंग न होता, तो रंगीन दुनिया नहीं होती और मन निराश-उदास बना रहता। इन कृत्रिम रंगों की खोज की कहानी भी कोई कम मनोरंजक नहीं है।

एक बार हेनरी पारकिन नाम का एक अंग्रेज बालक क्रिसमस की छुट्टियाँ मनाने घर आया। वह अपने घर से दूर एक अन्य शहर में रहकर पढ़ता था और बड़ी खोजी वृत्ति का था। रसायनशास्त्र के प्रति उसकी विशेष अभिरुचि थी। इसी कारण से अपने घर पर भी एक छोटी प्रयोगशाला उसने बना रखी थी, जिसमें विभिन्न प्रकार के रसायनों की ढेर सारी बोतलें थी। उसकी इच्छा थी कि वह सिन्थेटिक क्वीनाइन अथवा उस जैसी कोई नयी चीज बनाये। इसीलिए एक दिन उसने कुछ रसायनों के परस्पर मिलाकर उनका मिश्रण तैयार किया एवं कुछ समय के लिए उसे यों ही छोड़ दिया। थोड़े समय उपरान्त तरल रसायनों के मिश्रण वाले फ्लास्क की दीवार में एक काली पर्त चढ़ गई। उसने जब उसे अल्कोहल से साफ करना चाहा, तो उसके संपर्क में आते ही काला रंग बदल कर बैंगनी कहो गया। यह मात्र एक संयोग ही था, जिसके कारण बैंगनी रंग बन कर तैयार हुआ। यही रंग विश्व का पहला अप्राकृतिक और कृत्रिम रंग साबित हुआ। इस आविष्कार के बाद हेनरी पारकिन की गणना वैज्ञानिकों में होने लगी और इसके उपरान्त उसने विभिन्न प्रकार के छूटने वाले कृत्रिम रासायनिक रंग तैयार किये। आज इन्हीं रंगों के सहारे टक्सटाइल मिलों में अनेकानेक प्रकार के रंगीन एवं आकर्षक कपड़े तैयार किये जाते हैं। रंगों की चित्र-विचित्र दुनिया का यही शुभारम्भ था।

इस प्रकार संयोगवश अथवा भूलवश घटी घटनाओं की उपेक्षा न कर यदि स मिल रही उस अन्तः प्रेरणा पर ध्यान दिया जाय, उसका अध्ययन कर कारणों का पता लगाया जाय, तो कई बार नये तथ्यों व सत्यों की जानकारी मिलती है, जो आगे चलकर काफी महत्वपूर्ण साबित होती है। ऐसी बात नहीं कि ऐसे संयोग सिर्फ किन्हीं-किन्हीं के साथ घटित होते हैं। होते तो यह प्रायः प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में हैं, पर हर व्यक्ति उस पर ध्यान नहीं दे पाता और उसकी उपेक्षा कर देता है, फलतः जो महत्वपूर्ण उपलब्धि उसे मिल सकती थी, जो यश और गौरव वह प्राप्त कर सकता था, इससे वंचित रह जाता है। ऐसे अवसरों पर जो जिज्ञासा दिखाते एवं खोजबीन की प्रवृत्ति प्रदर्शित करते हैं, वही श्रेय के भागी बनते हैं। विज्ञान की आज की प्रगति का श्रेय मानवी जिज्ञासा एवं अन्तः से उपजी प्रेरणा को, अन्तर्प्रज्ञा को दिया जाय, तो कोई अत्युक्ति न होंगी।


कर्म की गति न्यारी

सुदीप और चित्रदीप की पारस्परिक मित्रता पर जन-मन आश्चर्यचकित था और अभिभूत भी। उनके वैचारिक विरोधाभास से सभी परिचित थे। सुदीप को जहाँ शास्त्रचर्चा-सत्संग से प्रीति थी, चित्रदीप वहीं राग-रंग का रसिक था। फिर भी कुछ ऐसा था जो उन्हें बाँधे था। दोनों बाल मित्र थे। उनके पिता श्रेष्ठी सोमवयश और सुशोम की ख्याति अवन्तिका में ही नहीं विदेशों में भी व्याप्त थी।

अवन्तिका में जैसे मालव देश की श्री समृद्धि पुंजीभूत हो गयी थी। महाराज विक्रमादित्य के शौर्य पराक्रम एवं बेताल भट्ट की नीति कुशलता के कारण मालव अपने जीवन के उत्कर्ष के शिखर को छू रहे थे। सुदीप और चित्रदीप का जीवन भी श्री संपन्नता का आगार बना हुआ था।

दोनों मित्र एक दिन सन्ध्या के समय शिप्रा की ओर जा रहे थे। मार्ग में एक स्थान पर मल्ल युद्ध का आयोजन हो रहा था। तरह-तरह की पैंतरे बाजी-दाँव-पेज की कुशलता से जन समुदाय मोहित था। सुविख्यात मल्ल अपने शरीरी सौष्ठव का प्रदर्शन करके स्वयं की और अपने स्थान की कीर्ति द्विगुणित कर रहे थे। ये दोनों मित्र भी उधर से गुजरे। सुदीप का मन एक क्षण के लिए रुकने को किया लेकिन चित्रदीप के रसिक मन को मल्ल युद्ध में कोई दिलचस्पी न थी। उसने सुदीप का हाथ पकड़ कर एक ओर खींचा ओर आगे बढ़ चला।

कुछ दूर आगे बढ़कर वह एक गली में प्रविष्ट हो गया। वहाँ वेश्याओं के घर थे। जहां से भीनी-भीनी सुगन्ध और वीणा मृदंग के मधुर स्तर के साथ नृत्याँगनाओं के छमछमाहट के जैसी उत्तेजक गीत नाद सुनायी दे रहे थे। चित्रदीप का मन उस विलासमयी वीथिका में मनोरंजनार्थ रुकने के लिए मचल उठा। उसके कदम आगे न बढ़ सके। उसके मन के उद्वेलित तार उस मादक वातावरण के प्रभाव से झंकृत हो चुके थे।

उसने सुदीप से कहा-एक बार ही सही हम दोनों को वेश्या के यहाँ चलना चाहिए। मित्र की बात सुनकर सुदीप स्तब्ध रह गया। उसने आश्चर्य से कहा-आज तुम यह बहकी-बहकी बातें कैसे कर रहे हो? इस जघन्य कार्य के अतिरिक्त तुम जैसा कहो वह कर सकता हूँ पर इस दुर्गति के द्वार में प्रविष्ट होना मुझे सर्वदा नापसन्द है। विलासिता और कामुक उच्छृंखलताओं को भड़काने वाली वेश्या के घर जाने पर श्लेष्मा में फँसी मक्खी की तरह मुक्त वह स्वच्छ रह पाना अति कठिन होता है। चित्रदीप ने कहा-मेरे से यदि प्रेम है, तो एक बार अवश्य ही वेश्या के यहाँ चलना होगा। अन्यथा आज से ही अपना सम्बन्ध विच्छेद। सुदीप ने विवश होकर आज तो नहीं कल चलेंगे कहकर मित्र को एक बार टाल दिया।

बुराई को देख - सुनकर भी उससे बचे रहना बड़ी बात है। सामान्यतया आदमी उसमें फंस ही जाता है। व्यक्ति के लिए इसी हेतु सत्संग का महत्व बताया गया है। सत्संग से भी ज्यादा जरूरी होता है कुसंग से बचे रहना।

दूसरे दिन दोनों मित्र पान-फूल मिष्ठान आदि उपहार लेकर साथ-साथ निकल पड़े। मार्ग में माता हर-सिद्धि का मन्दिर आया। भक्त-जनों ने एकाग्रचित्त से माता को सजाया था। रंग मण्डप झाड़-फानूस के प्रकाश से जगमगा रहा था, मानों दीप मालिका का महापर्व ही आ गया हो। वीणा वेणु, मृदंगों पर ताल व ठेका दिया जा रहा था। भक्त जन आ-आकर अपने स्थान पर जम रहे थे। वहाँ आज देवी भागवत की कथा का समारोह जो था। सुदीप का सत्संग प्रिय मानस मन्दिर के सात्विक वातावरण की ओर सहज आकर्षित हो गया। उसने कहा-आज तो मन्दिर में बैठें, वेश्या के यहाँ कल चलेंगे चित्रदीप ने कहा-मुझे तो आज ही वेश्या के यहाँ जाना है।

सुदीप ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा- तुम्हें जाना हो तो जाओ। मैं तो मन्दिर जाता हूँ। उसने फल-मिष्ठान आदि मन्दिर में चढ़ा दिए और भक्ति भावना में बैठ गया। वहाँ घण्टों देवी कथा चलती रही। वह उसी में तल्लीन हो गया। कुछ समय बाद यद्यपि गर्भगृह तो बन्द हो गया, पर नाट्य मण्डप में रात्रि जागरण का आयोजन किया गया था। जब थोड़ी सी रात्रि बाकी रही तो वह उठकर वन्दना के बाद घर जाने के लिए मन्दिर से बाहर निकला। सीढ़ियों से उतरते ही उसके पैर में जोर से एक कील चुभ गयी जिसकी असह्य पीड़ा से वह गिर पड़ा। उपस्थित बन्धुओं ने उसे तत्काल उठाकर घर पहुँचाया। कुशल वैद्यराज को बुलाकर कील निकाली गयी। वह बिस्तर पर पड़ा वेदना भोगने लगा।

इधर चित्रदीप जैसे ही सर्वमंगला के कोठे पर पहुँचा। उसे देखकर अपनी सुध-बुध खो गया। नर्तकी सर्वमंगला का मुख अंगराग से मण्डित था, शरीर सुगन्ध में सराबोर। उसके अधर बिम्बारफल थे, भृकुटियाँ शिव पर विजय के संकल्प से धनुष सी तनी थी। उनमें कोमल अमर्ष था, आकर्ण, आम्र के फाँके सी आँखों में भंवर पड़ रहे थे। चीनाशुँक जैसे शुभ्र मृसण कपोलों में कूप बनते और हंसने पर चन्द्रिका सी बौछार होती। सर्वमंगला के शरीर पर गुलाबी साड़ी और गुलाबी कंचुक था साड़ी दो काँच वाली थी, जिसकी किनारी सुनहली थी, कर्धनी में जड़े हुए रत्न दीपकों, मशालों और चाँदनी में चमकते तो चकाचौंध होती। वह साज छिड़ने पर पैरों.....बाँधे... घुंघरू से छम-छम करती हुई त्रिभंगी मुद्रा में खड़ी थी।

चित्रदीप को देखते ही शतदल सरसिज की तरह सर्वमंगला की बरौनियाँ उठी और कौतुक, हास, अपनत्व, विस्मय और व्यंग ध्वनि के एक-साथ मिश्रण से मंजी हुई दृष्टि उस पर पड़ी। उसको लगा, उसकी शिराएं उसका साथ छोड़ रही हैं, और यदि वह खड़ा रहा तो रूप का भार उसे गिरा देगा। वह झुक कर एक ओर बैठ गया। सर्वमंगला हर्षित मुस्कुरायी और नृत्य शुरू हो गया और उसने एक के बाद एक कटोरा नृत्य, शण्टा नृत्य, छटा विद्युत नृत्य, बादल नृत्य, मयूर नृत्य किए। चित्रदीप के शरीर में मृदंग की गूँज, थाप, ताल, आलाप, और घुंघरुओं की गमक से लहर पर लहर उठती और उतर जाती, पुनः वही आरोह चल पड़ता। इसी सब में रात्रि बीत गयी।

नृत्य गान, हास विलास, मौज-शौक करता हुआ रात्रि के पिछले प्रहर में घर आने लगा तो उसे सर्वमंगला के गृह से बाहर निकले ही स्वर्ण मुद्राओं की एक पोटली मिली। वह उसे सहर्ष उठाकर अपने घर ले गाया। उसने जब प्रातःकाल सुना कि सुदीप के पैर में कील चुभ गयी है और वह शैया पर तो वह उसे देखने के लिए आया। स्वास्थ्य के हाल-चाल पूछने के उपरान्त उसने कहा-भाई तुमने मन्दिर में जाकर यह फल पाया ओर मैंने वेश्यागृह से लौटते समय भावमुद्राओं की एक पोटली प्राप्त की।

चित्रदीप का ऐसा प्रश्न था, जो आज भी अनेकों मनों को उद्वेलित करता रहता है। इस प्रकार के अनेकानेक उदाहरण संसार में रोज घटते रहते हैं जब साधु-सदाचारी व्यक्ति कष्ट भोगता है, और चोर लुटेरा मौज उड़ाता ।

सुदीप ने कहा-भाई मैं क्या कहूँ? इस बात की संशय निवृत्ति तो महायोगी गोरखनाथ ही कर सकते हैं। इन दिनों वह भर्तृहरि गुफा में ही ठहरे हुए हैं। कुछ दिनों के बाद हम लोग उन्हीं के पास चलेंगे।

थोड़े ही दिनों के पश्चात वे दोनों मित्र भर्तृहरि गुफा पहुँचे। वहाँ एक शाला पर महायोगी विराजमान थे। उनके शीश पर केशों पर जटा-जूट था, जिसके दोनों कुण्डलीकृत कानों के नीचे कंधों तक धहरा रहे थे। वे हवा में उड़ते तो वे नाग से लहराते। निकट से देखने पर योगी का मुख किसी अन्य लोक के दिव्य प्राणीसाथा सुवर्ण जैसे तपे गौर वर्ण में उनका कण्ठ शंखाकार था और भव्य मुख पर बड़े-बड़े कटोरे जैसे नेत्रों में करुणा का जल भरा था। योगी नासिका शुक सी थी और अधरों का कटाव कलात्मक था। उनके मस्तक का शिव तिलक उन्हें शिवावतार की तर मण्डित कर रहा था। इन क्षणों में वह चिन्तन की मुद्रा में थे।

सुदीप और चित्रदीप को देखकर वह मुस्कराए। उनकी मुसकान में प्रेम था, वात्सल्य था और गहरा प्रेम सने शब्द गूँजे-कहो क्या कहना चाहते हो तुम दोनों?

सकुचाते-हिचकिचाते चित्रदीप ने अपनी और सुदीप की कथा कह सुनायी। भला ऐसा क्यों हुआ प्रभु, मन्दिर में कथा श्रवण का फल पैर में कील का गड़ना और सर्वमंगला के यहाँ रास-रंग का परिणाम-सुवर्ण मुद्राओं की पोटली।

महायोगी दोनों पर ही अपनी कोमल दृष्टि डालते हुए कहने लगे-आत्मा की शाश्वतता में जीवन और मृत्यु दिवस की शाश्वतता में जीवन और मृत्यु दिवस और रात्रि की तरह है। जिस तरह कुछ कर्म ऐसे होते हैं, जिन्हें आज करने पर भी परिणाम कल मिलता है। उसी विगत जन्मों के कर्म भी वर्तमान जीवन में फलित होते हैं। हाँ वर्तमान जीवन के कर्मों का स्वरूप इनके प्रभाव को घटा बढ़ा जरूर देता है।

अपनी पारदर्शी दृष्टि से सब कुछ स्पष्ट देखते हुए बोल वत्स-सुदीप। तुम्हारे शूलीकर्म का उदय था, परन्तु तुमने माता हरसिद्धि के मन्दिर में बैठे-बैठे भक्ति भाव से उस निविड़ कर्मबन्ध को शिथिल कर दिया। यदि तुम दो-एक घड़ी और वहां तल्लीनता पूर्वक माँ के चरणों में बैठे रहते तो तुम्हारे कील भी नहीं चुभती। तुमने भक्ति-भावना के बल से शूलीकर्म का बन्ध टाल दिया।

शूल चुभने का समाधान करके महायोगी दो पल रुके। उन्होंने देखा कि वे दोनों तत्व को समझने का प्रयास कर रहे हैं तो फिर उनने वेश्यागृह से निकलने पर स्वर्ग मुद्राओं के प्राप्त होने का रहस्य भी बताया। उन्होंने बताया चित्रदीप के राज्यलाभ का योग आ रहा था। इस महापुण्य को इसने वेश्या के यहाँ रास-रंग में समाप्त कर केवल स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त कीं। यदि दो एक घड़ी यह वहाँ और ठहरता तो वह भी न मिलतीं।

चित्रदीप को आज कर्मफल का रहस्य बोध हो रहा था। उसने महायोगी के चरणों की शपथ खायी कि वह अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों में परिमार्जन करेगा और अपने मित्र की तरह सत्कर्म में निरत रहेगा कर्मों की गति बड़ी गहन है। गहन कर्मणो गतिः कहकर योगीराज श्री कृष्ण ने कर्म-अकर्म और विकर्म का महत्व गीता में समझाया है। यदि दैनन्दिन जीवन में काम करने वाला व्यक्ति भी इस महत्व को समझ सके तो वह न केवल इस जीवन को बल्कि आत्मा की अनन्त यात्रा को बिना किसी बाधा के पार कर सकता है।


उज्ज्वल भविष्य की साक्षी देते कुछ दिव्य कथन

बीसवीं सदी का अंत और इक्कीसवीं सदी का आगमन सन्निकट हैं। न केवल अपने देश के सामने वरन् समूचे विश्व के सामने इन दिनों समस्याओं के अम्बार लगे हुए है। युग संधि की इस विषम वेला में सारी मानव जाति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ दुरभिसंधियों के कुचक्र में उसके पिस जाने और अपना अस्तित्व गंवा बैठने का खतरा स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। उज्ज्वल भविष्य की कल्पना तो केवल विचारशील विवेकवान ही कर पाते हैं और सुखद परिणाम सामने आने का अनुमान लगाते हैं। ऐसी स्थिति में जन सामान्य को दिलासा कौन दे? मार्गदर्शन कौन करे? इस तथ्य से उन्हें कौन अवगत कराये कि आने वाला भविष्य कैसा होगा? कारण हर व्यक्ति यह जानना चाहता है कि आने वाला समय कैसा होगा ताकि वह उपलब्धियों की सम्भावना को सार्थक करने में अधिक उत्साहपूर्वक कर्मरत हो सके। अशुभ को टालने के लिए जो कुछ बन पड़ सके, वह उपाय कर सके।

वस्तुतः भविष्य जानने को उत्कण्ठा एक ऐसा कौतुक है जो मनुष्य को अपना ही नहीं अपने मित्र एवं शत्रुओं का भी भविष्य जानने के लिए उकसाती रहती है। उत्कण्ठा की प्रबलता ने ही ज्योतिष विद्या को जन्म दिया है। राशि, लग्न, ग्रहदशा, जन्मकुण्डली, फलित, मुहूर्त आदि विशालकाय ताना-बाना इसी एक आकाँक्षा पर आधारित है कि किसका भविष्य क्या होना है। पर यह विद्या कितना तथ्य-सम्मत है, इस पर प्रश्न चिन्ह लगा है। वैज्ञानिक इस प्रपंच में न पड़कर इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए भूगर्भ का-वायुमण्डल का, प्रकृति प्रवाह का स्वरूप और परिणाम जानने में ले रहते हैं। खगोल पर्यवेक्षण के अनेकानेक उपकरण और आधार विनिर्मित हुए हैं। एक से बढ़कर एक नई डिजाइन के कम्प्यूटर इसी प्रयोजन के लिए बन और प्रयुक्त हो रहे हैं कि भावी परिणामों का अनुमान वर्तमान परिस्थितियों के साथ आकलन करते हुए लगाया जाना सम्भव हो सके। भविष्य को विज्ञान के आधार पर जानने, वर्तमान के अनुसार तथ्यों, प्रमाणों एवं आँकड़ों के आधार पर पूर्वकथन करने की यह विद्या ‘फ्यूचरालॉजी’ कहलाती है। इसमें नृतत्ववेत्ता से लेकर समाज विज्ञानी, पर्यावरण विशेषज्ञ चिकित्सक एवं भौतिकीविद् सभी आ जाते हैं।

विरले ही होते हैं जिन्हें प्रकृति प्रदत्त यह महारत हासिल होती है कि भविष्य के गर्भ में झाँक सकें कि पर्दे के पीछे सूक्ष्म जगत में क्या खिचड़ी पक रही है। प्रस्तुत विभीषिकाओं का समापन एवं उज्ज्वल भविष्य का आगम या सतयुग की वापसी की सम्भावनाओं की स्पष्ट झलक-झलकियां जिन महामानवों, दिव्यदर्शी, भविष्यवक्ताओं ने प्रस्तुत की है उनमें से कुछ प्रमुख हैं-आज से चार सौ वर्ष पूर्व जन्मे फ्रेंच चिकित्सक नोसट्राडेमस, अमेरिका की सुविख्यात महिला जीन डिक्सन फ्राँस के नार्मन परिवार में जन्मे काउण्ट लुई हेमन-जिन्हें ‘कारो’ के नाम से भी जाना जाता है। जर्मनी के प्रख्यात दार्शनिक शाँपेनहावर, इंग्लैण्ड के यार्कशायर में सोलहवीं शताब्दी में जन्मी मदर शिप्टन, भारतीय चिन्तक मनीषी योगिराज अरविन्द एवं स्वामी विवेकानंद, इस्लाम धर्म के विद्वान मनीषी सैद कुत्ब, सुप्रसिद्ध अमेरिकी गुह्यविद् एडगरकेसी, भविष्य विज्ञान विद्या में निष्णात एवं कई ग्रंथों की रचयिता रुथ माँण्टगोमरी ‘फ्यूचर शाक’ जैसी किताबों के रचयिता एल्विनटाफलर, फ्रिटजाँफ काप्रा आदि कुछ ऐसे नाम है जिनने अपने दिव्यदृष्टि अंतःस्फुरणा, अंतःप्रेरणा, गणितीय, गणना, ज्योतिर्विज्ञान एवं अपने विषद अध्ययन-अनुसंधान के आधार पर बीसवीं सदी के अन्तिम चरण एवं इक्कीसवीं सदी के आगमन के विषय में जो कुछ कहा है वह ध्यान देने एवं चिन्तन-मनन के योग्य है। यह इसलिए भी जरूरी है कि ये सभी मनीषीगण इक्कीसवीं सदी का भविष्य उज्ज्वल बताते हुए मानव मात्र को आश्वासन देते हैं कि वर्तमान में जो कुछ भी अवाँछनीय दिखाई पड़ रहा है, वह बदलेगा, ध्वंस का स्थान सृजन लेगा और सर्वत्र सुख-शान्ति एवं स्थिरता का वातावरण बनेगा।

इन मनीषियों के अतिरिक्त एक दूसरा आधार है धर्मग्रंथों में वर्णित कुछ सूत्र संकेत, जिनमें प्रस्तुत विभीषिकाओं के समापन एवं सतयुग की वापसी की संभावनाओं की चर्चा की गयी है। बाइबल, कुरान, पुराण महाभारत आदि ग्रंथों में वर्णित भविष्यवाणियाँ ऐसी हैं जो दिव्य दर्शी महामानवों द्वारा कही व लिखी गयी हैं और अब तक सही निकली इन धर्म ग्रन्थों विभिन्न अंशों का हवाला उपरोक्त मनीषियों ने भी स्थान-स्थान पर दिया है। गूढ़ विवेचन समय-समय पर अन्यान्य व्यक्तियों ने करके जो निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं वे भी यही प्रमाणित करते हैं कि युगपरिवर्तन अवश्यंभावी है और वह यही समय जो एक विश्वव्यापी विचारक्रान्ति के माध्यम से सम्पन्न होगा। यह अवधि इन ग्रंथों के अनुसार बीसवीं शताब्दी के समापन एवं इक्कीसवीं सदी के आगमन की संधिकाल ही है।

चार सौ वर्ष पूर्व 24 दिसम्बर 1503 में सेंट मेरी नामक स्थान में जन्मे फ्रेंच यहूदी नोस्ट्राडेमस अपने समय के असाधारण भविष्यवक्ता थे। इन विशेषताओं को प्राप्त करने के लिए उनने कोई साधना नहीं की थी, पर यह अनुमान उन्हें दैवी अनुग्रह की तरह जन्मजात रूप में मिले थे। वे किसी के पूछने पर कभी-कभी ही उत्तर देते थे, परन्तु जब अपनी मस्ती में आ जाते थे तो कथन के प्रवाह के को रोक नहीं पाते थे और इस प्रकार कहते चले जाते थे कि तात्पर्य समझने पर उनका मित्र परिकर ही उन्हें पागल समझने और कहने लगता था।

नोसट्राडेमेस ने अपने जीवन काल में 2500 भविष्यवाणियाँ की हैं जिनमें से अब तक 800 से ऊपर अक्षरशः सही सिद्ध हो चुकी हैं। उनकी अन्य भविष्यवाणियां सन् 3797 तक की अवधि तक अर्थात् उड़तीसवीं सदी के अंत तक की है। इस भविष्यवक्ता की उन समस्त अनूठी भविष्यवाणियों को ‘सेन्चुरी’ नाम पुस्तक में संकलित किया गया है तथा इन्हें पौराणिक प्रतीकों का रूप दिया गया है। ये भविष्यवाणियाँ ‘रिम्ड क्वाड्रेन’ समूह के साथ 100 भागों में बंटी हुई हैं। प्रत्येक एक सौ के समूह को उनने ‘सेन्चुरी’ की संज्ञा दी। अब तक इस पुस्तक के इतने अधिक अनुवाद हो चुके हैं कि अब यह विश्वभर में लोकप्रियता एवं विश्वसनीयता हासिल कर चुकी है। यह पुस्तक काव्य रूप में चौपदी (चतुष्पदी) की तरह लिखी गयी हैं। उनकी इस हस्तलिखित पुस्तक का आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एरिका नाम की एक शोध छात्रा ने एक पुराने पुस्तकालय से ढूंढ़ निकाला है और पाया है कि उसमें भावी घटनाओं के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है।सन् 1546 तक नोस्ट्राडेमस एक सामान्य चिकित्सक के रूप में ही जाने जाते रहे, पर जब सन् 1547 से उनने व्यापक स्तर पर भविष्यवाणियाँ करना आरम्भ कर दिया और वे अक्षरशः सत्य सिद्ध होने लगीं तो पीछे उनकी ओर लोगों का ध्यान गया। देखा गया कि उनने जो भी कुछ कहा था वह समय आने पर सही होकर रहा। 1 जुलाई 1556 को उनका शिष्य शेविरनी मिलने आया। वार्तालाप के बाद दूसरे दिन फिर से मिलने की आज्ञा माँगी। इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि - “कल सवेरा होते-होते तो मैं इस दुनिया को ही छोड़ कर चला जाऊंगा।” कथन नितान्त आश्चर्य-जनक लगता था, क्योंकि उस समय उनका स्वास्थ्य बिलकुल ठीक था। इतनी जल्दी मरने जैसी कोई बात नहीं मालूम पड़ती थी, पर भवितव्यता होकर रही। लोगों ने देखा कि दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व ही वे अपना पार्थिव शरीर त्याग चुके थे।

नोस्ट्रोडेमस ने अपनी उक्त पुस्तक में लिखा है कि आने वाली सदी अर्थात् इक्कीसवीं सदी के आरम्भ होते ही एक विश्वव्यापी नरसंहार के एक समूचे कुचक्र का ही अंत हो जायेगा और मनुष्य में दिव्यता एवं धरती पर स्वर्गोपम वातावरण बनाने वाला समय आयेगा। वस्तुतः उनकी भविष्यवाणियों में विनाश एवं विकास दोनों ही पक्षों को उजागर किया गया है, किन्तु उनके एक नये व्याख्याकार जॉन होम का कहना है कि इस अनूठे भविष्य दृष्टा ने विध्वंस कयामत से बचने एवं सृजन का युग आरंभ होने की दिशा में ही अनेकानेक भविष्यवाणियां की है। उनके अनुसार इस संकट और चुनौती भरे कालखण्ड में एक नई आध्यात्मिक चेतना का उदय होगा जो सदी के अंत तक अपने पूरे चढ़ाव पर आ जायेगी। इस नयी चेतना को यदि विश्वचेतना में रूपांतरित होने दिया गया तो उसके फलस्वरूप हमारे इस सुन्दर ग्रह पर हजारों साल तक शान्ति का राज्य रहेगा। इसमें लोग उषाकाल के अरुणोदय जैसा नवीन उल्लास अनुभव करेंगे। नोस्ट्रोडेमस ने इसे ‘एज आफ ट्रुथ’- अर्थात् ‘सतयुग’ नाम दिया है जिसमें विज्ञान और अध्यात्म एक उच्चस्तरीय समन्वय की स्थिति में होंगे।

भविष्य में घटित होने वाली प्रमुख घटनाओं और विशेषकर भारत के सम्बन्ध में भविष्य कथन करते हुए उनने भारतवासियों के उत्कर्ष और उनके द्वारा विश्व भर में निभाई जाने वाली भूमिका को स्पष्ट किन्तु साँकेतिक भाषा में यों लिखा है-’जिस देश में तीन समुद्रों की सीमाएं मिलती है और जिसका नाम सागर शब्द (हिन्द महासागर) से मिलकर हुआ है, जहाँ गुरुवार को परम पवित्र दिन माना जाता है (शुक्रवार मुसलमानों का, शनिवार मिश्र वासियों का और रविवार ईसाइयों का पवित्र दिन है) वहाँ के लोग विश्वशान्ति की दिशा में असाधारण पुरुषार्थ करेंगे और समस्त विश्व को विनाश के रास्ते से मोड़कर विकास का पथ प्रशस्त करेंगे। विश्व के अनेक जटिल समस्याओं के समाधान में इस देश की महती भूमिका रहेगी। इस देश की संस्कृति को विश्व मान्यता मिलेगी जिसमें रूस प्रथम होगा जो इस संस्कृति के सिद्धान्तों को तथ्य के रूप में अनुरूप बनायेगा और अपनायेगा। साथ ही भारतीय विद्वान भी ऐसा प्रयत्न करेंगे जिससे उनका दर्शन भी साम्यवादी दर्शन को आत्मसात् कर सके।

नोस्ट्राडेमस के अनुसार सन् 1999 के सातवें महीने में भारत एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा। उसी समय एक भारतीय नेता-जिसको उनने “ग्रेट चायरेन” के नाम से सम्बोधित किया है, समस्त विश्व पर अपने सत्य, प्रेम, त्याग, करुणा एवं न्यायप्रियता के बल पर विजय प्राप्त करेगा। इक्कीसवीं शताब्दी में भारत ही एक मात्र महाशक्ति होगा और सारे विश्व का मार्गदर्शन करेगा। भविष्यवाणी में उल्लिखित ‘ग्रेट चायरेन’ की व्याख्या करते हुए विद्वानों ने प्रखर प्रज्ञा सम्पन्न उस महान व्यक्तित्व की ओर संकेत किया है जो अगले ही दिनों अपने तीक्ष्ण वैचारिक एवं आध्यात्मिक प्रवाह से समस्त विश्व में एक नयी महाक्रान्ति खड़ी करेगा।

श्रीमती जीन डिक्सन अमेरिका की सबसे अधिक जानी मानी भविष्यवक्ता है। उनने अपनी कृति- “माइ लाइफ एण्ड प्रोफेसीज” में कहा है कि इक्कीसवीं सदी में एक महान व्यक्तित्व उभरेगा और समस्त विश्व में शान्ति की स्थापना करेगा।लोग उसे शान्ति दूत-’पीस मेकर’ कहेंगे। आधुनिक समय में फैले युद्ध की मनःस्थिति को वह भाई चारे में बदल देगा। समूचे राष्ट्र उस पर विश्वास करेंगे और इस तरह वह शान्ति के विस्तार के माध्यम से विश्वविजेता बनेगा। भविष्यवक्ता की ने अपनी पुस्तक “वर्ल्ड प्रीडिक्शन्स” में भारतवर्ष को ही धार्मिक नैतिक एवं साँस्कृतिक चेतना के अभ्युदय का केन्द्र बिन्दु माना है। निश्चय ही ईसा से पूर्व जिस स्वर्णिम युग की कल्पना की गयी थी, वह अब अगली शताब्दी में साकार होने जा रही है।


शब्दनाद में निहित शक्ति सामर्थ्य

माण्डूक्योपनिषद् में परमात्मा के समग्र रूप के तत्व समझाने के लिये उनके चार पादों की कल्पना की गई है। नाम और नामी की एकता प्रतिपादन करने के लिये भी और नाद शक्ति के परिचय रूप में अ, उ और म इन तीन मात्राओं के साथ और मात्रा रहित उसके अव्यक्त रूप के साथ परब्रह्म परमात्मा के एक-एक पाद की समता दिखलाई गई है और ओंकार को ही परमात्मा का अभिन्न स्वरूप मान कर बताया गया है-

‘ओम’ अक्षर ही पूर्ण अविनाशी परमात्मा है। यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला जड़-चेतन का समुदाय रूप जगत् उन्हीं का उपाख्यान अर्थात् उन्हीं की निकटतम महिमा का निदर्शक है, जो स्थूल और सूक्ष्म जगत पहले उत्पन्न होकर उसमें विलीन हो चुका है, जो वर्तमान है, जो भविष्य में उत्पन्न होगा, वह सब का सब ओंकार (ब्रह्म का नाद-स्वरूप) ही है।तीनों कालों से अतीत इससे भिन्न है, वह भी ओंकार ही है। अर्थात् स्थूल सूक्ष्म और कारण जो कुछ भी दृश्य, अदृश्य है, उसका संचालन ‘ओंकार’ की स्फुरणा से ही हो रहा है। यह जो उनका अभिव्यक्त अंश और उससे अतीत भी जो कुछ है, वह सब मिलकर ही परब्रह्म परमात्मा का समग्र रूप है। पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति के लिये अतएव उनकी नाद-शक्ति का परिचय प्राप्त करना आवश्यक है।

परमात्मा के नाद रूप के साक्षात्कार के लिये किये गये ध्यान के सम्बन्ध में नाद-बिंदूपनिषद् के 33 से 41 वें मंत्रों में बड़ी सूक्ष्म अनुभूतियों का भी विवरण मिलता है। इन मंत्रों में बताया गया है, जब पहले पहल अभ्यास किया जाता है। तो ‘नाद कई तरह का और बड़े जोर-जोर से सुनाई देता है। आरम्भ में इस नाद की ध्वनि नागरी, झरना, भेरी, मेघ और समुद्र की हरहराहट की तरह होती है, बाद में भ्रमर, वीणा, बंसी और किंकिणी की तरह गुँजन पूर्ण और बड़ी मधुर होती है। ध्यान को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है और उससे मानसिक ताप का शमन होना भी बताया गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् के तृतीय अनुवाद में ऋषि ने लिखा है- ‘वाणी में शारीरिक और आत्म-विषयक दोनों तरह की उन्नति करने की सामर्थ्य भरी हुई है, जो इस रहस्य को जानता है, वह वाक्-शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करने में समर्थ होता है।’

ओंकार ध्वनि से प्रस्फुटित होने वाला ब्रह्म इतना सशक्त और सर्वशक्तिमान है कि वह सृष्टि के किसी भी कण को स्थिर नहीं होने देता है। समुद्रों को मथ डालने से लेकर भयंकर आँधी-तूफान और ज्वालामुखी पैदा करने तक-परस्पर विचार विनिमय की व्यवस्था से लेकर ग्रह-नक्षत्रों के सूक्ष्म कम्पनों को पकड़ने तक एक सुविस्तृत विज्ञान किसी समय भारतवर्ष में प्रचलित था। नाद-ब्रह्म की उपासना के फलस्वरूप यहाँ के साधक इन्द्रियातीत असीम सुख का रसास्वादन करते थे, यही नहीं उस शक्ति को पाकर वे जहाँ चाहते थे, वहीं मनोवाँछित वस्तुयें पैदा करते थे।

अपने आशीर्वाद से किसी रोगी को अच्छा कर देना, किसी निर्धन को धनवान, अपंग को शारीरिक क्षमता प्रदान कर देना इसी विज्ञान का अंग था। इन सबमें निश्चित विचार प्रणाली द्वारा निखिल ब्रह्मांड की वैसी शक्तियों के सूक्ष्माणू आकर्षित कर उपेक्षित स्थान पर प्रतिरोपित करने से चमत्कार दिखाई देने वाले कार्य सम्भव हो जाते थे। अब विज्ञान ही इन मान्यताओं को प्रमाणित करने में लगा है तो कोई उस विज्ञान को कैसे इनकार कर सकता है।

बहुत कम लोग जानते होंगे कि ऐसी ध्वनि-तरंगें (साउण्ड-वैव्स) जिनको हम सुन नहीं सकते, आज वैज्ञानिक शोध कार्यों एवं व्यवसायिक जगत में क्राँति मचाये दे रही हैं। कर्णातीत ध्वनि इन्फ्रा एवं सुपरसोनिक साउण्ड पर नियंत्रण करके अब चिकित्सा, शल्य, कीट और कीटाणुओं का संहार, धुआँ और कोहरा दूर करना, कपड़े, कम्बल और बहुमूल्य गलीचों को धोकर साफ करना, घड़ी आदि के पुर्जे चमकाना, साफ करना जैसे छोटे-मोटे काम ही नहीं धातुओं को क्षण भर में काट डालना, गला देना, एक दूसरे में जोड़ देना आदि ऐसे काम होने लगे हैं, जिनको बड़ी-बड़ी मशीनें भी काफी समय में कर सकती है।

ध्वनि की इस करामात पर आज सारा संसार आश्चर्य चकित है, लोग समझ नहीं पा रहे कि इतनी सूक्ष्म गतिविधि से इतने भारी कार्य कैसे सम्पन्न हो जाते हैं। विद्युत से भी अधिक तीक्ष्ण और सर्वव्यापी कर्णातीत नाद-शक्ति की वैज्ञानिक बड़ी तत्परतापूर्वक से शोध कर रहे हैं।

कर्णातीत ध्वनि जो साधारणतया कानों से सुनाई नहीं देती है- वह क्या है, थोड़ा इस पर विचार करना आवश्यक है। शब्द या ध्वनि तरंग वस्तुओं के कंपन (वाइब्रेशन्स) से पैदा होती है। यह तरंगें क्रम से और विचारों की चुम्बकीय शक्ति रूप के रूप में गमन करती है। उदाहरणार्थ सितार के तार छेड़ने पर उनमें कंपन पैदा होता है, वह कम्पन लहरों के रूप में हवा में पैदा होते और आगे बढ़ते हैं, जहाँ तक ध्वनि तरंगें प्रखर होती हैं, वहाँ तक वह कानों से सुन ली जाती हैं पर कम्पन की शक्ति जितनी घटती जाती है, उतना ही सुनाई नहीं पड़ती और कई बार तो वह दूसरे शक्तिशाली कम्पनों में खो भी जाती हैं। कम्पित वस्तु से ध्वनि-तरंगें सब दिशाओं में चलती और फैलती हैं, यही कारण है कि जो भी बोला जाता है, उसे उत्तर पूर्व, दक्षिण या पश्चिम किसी भी कोने में बैठा हुआ आदमी सुन लेता है। सुनने की क्रिया कान की झिल्ली से ध्वनि-तरंगें टकराने के कारण होती है। जो वस्तुएं नियत समय में जितना अधिक कम्पन करती हैं, उनकी ध्वनि उतनी ही पैनी-पतली और सीटी की आवाज की तरह होती है।

विद्युत तरंगों में उभारा जाय तो हर ध्वनि की फोटो अलग बनेगी, आज इस आधार पर पुलिस को अपराधियों को पकड़ने में 97 प्रतिशत सफलता मिली है, न्यूयार्क के वैज्ञानिक लारेन्स केर्स्टा ने यह खोज की थी और यह पाया कि मनुष्य चाहे कितना ही बदल कर, छुपकर या आवाज को हल्का और भारी करके बोले ध्वनि तरंगें हर बार एक सी होंगी। वैसे हर व्यक्ति की तरंगों के फोटो अलग-अलग होगे। वैज्ञानिक इन ध्वनि-तरंगों के आधार पर व्यक्ति के गुणों का भी पता लगाने के प्रयास में हैं, यह सफल हो गया तो किसी की आवाज द्वारा ही उसके अच्छे-बुरे चरित्र का पता लगा लिया जाया करेगा।

कानों की ग्रहण शक्ति बहुत स्थूल और थोड़ी हैं। जो ध्वनियाँ एक सेकिण्ड में कुल 20 कम्पन से अधिक और 20 हजार कम्पनों से कम में पैदा होता है, हमारे कान केवल उन्हें ही सुन सकते हैं, यदि कम्पन गति (वैलोसिटी आफ वाइब्रेशन) 20 हजार प्रति सेकिण्ड से अधिक होगी तो हम उसे नहीं सुन सकेंगे। ऐसी ध्वनियाँ ही कर्णातीत कहलाती है। कुत्ते और चमगादड़ इतने से भी अधिक कम्पनों वाली ध्वनियाँ सुन लेते हैं। कुत्ते कई बार कान उठाकर चौकन्ने से होकर कुछ जानने का प्रयास करते दीखते हैं, वह इन सूक्ष्म कम्पनों को पकड़ने का ही प्रयास होता है। वह इससे भी अधिक सूक्ष्म ध्वनि तरंगों को सुन सकता है। चमगादड़ 40,000 प्रति सेकिण्ड कम्पन वाली ध्वनियाँ भी आसानी से सुन लेता है। जो जितनी अधिक सूक्ष्म ध्वनियाँ सुन सकता है, वह दूसरों के मन की बातें भविष्य ज्ञान उतनी ही शीघ्र और स्पष्टता से पकड़ लेता है।

आज के विज्ञान की दृष्टि में भी स्थूल ध्वनि कोई महत्व नहीं रखती, क्योंकि सुन ली जाने वाली ध्वनि (औडिवल साउण्ड) की शक्ति बहु थोड़ी होती है। यदि डेढ़ सौ वर्ष तक निरन्तर ऐसी ध्वनि उत्पन्न की जाय तो उससे केवल एक कप चाय गरम करा लेने जितनी ही शक्ति पैदा होगी। किन्तु श्वास या विचार तरंगों के रूप में शब्द का जो मानसिक स्फोट होता है, वह बड़ा शक्तिशाली होता है, यद्यपि वह ध्वनि सुनाई नहीं देती पर वह इतनी प्रखर होती है कि अपनी एक ही तन्मात्रा से वह परमाणुओं का विखण्डन कर सकती है और उससे उतनी ऊर्जा पैदा कर सकती है, जिससे विश्व के किसी भी भूभाग यहाँ तक कि चन्द्रमा और सूर्य तक में भी क्राँति पैदा कर दी जा सकती है। इस शक्ति को मन्त्र-विज्ञान से जाना जाता है और उसकी ब्रह्म शक्ति या कुण्डलिनी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा की गई है।

एक बार कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के भूगर्भ तत्ववेत्ता डॉ0 गैरी लेन को लाखों वर्ष पूर्व की एक ऐसी हड्डी मिली, जो बहुत खस्ता हालत में थी, उस पर मिट्टी जमी थी। विस्तृत अध्ययन के लिये मिट्टी साफ करना जरूरी था, किन्तु ऐसा करने के लिये यदि कोई चाकू से सहायता ली जाती तो हड्डी टूट-फूट जाती। ऐसी स्थिति में उनका ध्यान ‘कर्णातीत ध्वनि शक्ति की ओर गया। तब से इस दिशा’ में अब तक आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ हुई हैं।

कर्णातीत ध्वनि का उत्पादन षट्कोणीय (हैक्सागनल) स्फटिक कणों द्वारा किया जाता है। रुपये की आकार के स्फटिक के टुकड़े को काटकर यंत्रों की सहायता से विद्युत आवेश देकर कम्पन की स्थिति उत्पन्न की जाती है। उससे 10 लाख से लेकर एक हजार करोड़ कम्पन प्रति सेकिण्ड की कर्णातीत ध्वनि तक तैयार कर ली गई है और उससे दूर-दूर तक सन्देश भेजने धातुओं को काटने-छीलने आदि का महत्वपूर्ण कार्य लिया जाता है। फोटो के अत्यन्त सूक्ष्मकारी फिल्मों के ‘इमल्शन विभिन्न प्रकार के रंग बनाने की’ रासायनिक औषधियों का निर्माण और सर्जरी तक का काम इस ध्वनि शक्ति से लिया जाता है।

अभी इस विज्ञान को विकसित हुए कुल 30,40 वर्ष हुये हैं तो भी अनेक अद्भुत सफलताएं मिली हैं।वैज्ञानिक विचार कर रहे हैं कि प्रकृति में जो कुछ हलचल दिखाई दे रही है, क्या वह भी किसी कर्णातीत ध्वनि का ही चमत्कार है, यदि हाँ तो ऐसा ध्वनि प्रसारण एक नियत व्यवस्था के साथ ब्रह्मांड के किसी कौने से हो रहा होगा। वैज्ञानिक उसे जानने और समझने के प्रयत्न में हैं, सम्भव है एक दिन हम जिस नाद-ब्रह्म को ओंकार या ॐ या सोऽहम् के नाम से जानते और ध्यान करते हैं, उसकी अनुभूति के लिये किसी यंत्र का निर्माण हो जाये और सृष्टि के अनेक गूढ़ रहस्यों का पता मनुष्य को चले। ऐसा युग वही होगा जहाँ से भारतीय धर्म और तत्व दर्शन की उत्पत्ति हुई है।


काल से बँधे हम सब

सारा राजदरबार स्तब्ध था, राज कर्मचारी हैरान। किसी को कल्पना भी न थी कि मुज्जन इतना नीचे गिर जायेंगे। सभी को पता था कि उन्हें महाराज सिन्धु ने किस कदर उठाया उबारा था। गरीबी की दयनीयता, पारिवारिक परेशानियों के कुचक्र से घिरे मुज्ज को उन्होंने न केवल सुविधाएं सुलभ करायीं, बल्कि सैनिक प्रशिक्षण दिलाया और अपना विश्वस्त सहयोगी बनाया। महाराज सिन्धु को जब अकाल मृत्यु पाश में आबद्ध होना पड़ा तो उन्होंने मुज्ज को ही अपने पाँच वर्षीय युवराज का संरक्षक नियुक्त किया। युवराज की बाँह मुज्ज के हाथों में थमाते हुए उन्होंने कहा था-तुम भोज के संरक्षक को मुज्ज, भोज के बड़े होने तक तुम्हीं राज्य व्यवस्था का संचालन करना तथा युवराज को राजनीति की दीक्षा देना।

काफी समय तक तो मुज्ज अपने कर्तव्य मार्ग पर चलते रहे। पर धीरे-धीरे सत्ता की लोलुपता और अधिकार लोभ के छिद्रों ने उनकी सारी निष्ठा, कर्तव्य, राजभक्ति बहा दी। लोभ लोलुपता की आसुरी वृत्ति ने छल−छद्म का सहारा लिया ओर युवराज भोज को मिथ्या आरोपों में निष्कासन दण्ड भोगना पड़ा। राज्य सीमा से निर्वासित अज्ञात प्रदेश में रहने की राजकीय आज्ञा हुई और भोज चल पड़े अवश निरुपाय होकर।

इतने पर भी मुज्ज के मन का काँटा नहीं निकला। युवराज होने के कारण भोज जनश्रद्धा के सहज अधिकारी थे। उसका लाभ उठाकर कहीं वह जन संगठन न करने लगे। संगठित जनशक्ति के आधार पर वह कभी भी मुझे राजसिंहासन से नीचे उतार सकते हैं। इस आशंका से भयभीत मुज्ज ने गौड़ेश्वर वत्सराज को आदेश दिया कि भोज का सिर काट कर उसका कटा हुआ मस्तक लाए ताकि अपने प्रतिद्वंद्वी को मृत देखकर निष्कंटक राज्य सुख भोगा जा सके।

हवाओं की तरंगों में बहकर यह आदेश मंत्री, सभासदों, सामन्तों एवं राजकर्मियों तक जा पहुँचा। सभी हतप्रभ थे और निरुपाय भी। उन्हें नहीं मालुम था कि युवराज इस समय कहाँ है। शिष्ट, शालीन, सद्गुण सम्पन्न, सहज स्नेही स्वभाव के युवराज पर लगाए गए आरोपों पर किसी को विश्वास न था। सभी इसे मुज्ज की राजनीतिक चतुराई मान रहे थे। पर सभी विवश थे। हर एक का मन अंतर्द्वंद्व में उलझा हुआ था।

उलझनों के चक्रव्यूह में तो घिरे थे वत्सराज भी। जो इस समय अपने तीव्रगामी रथ पर सवार होकर उस ओर जा रहे थे, जिधर भोज ने प्रस्थान किया था। लम्बी यात्रा पूरी करने के बाद भुवनेश्वरी वन के मध्य में भोज को पकड़ा जा सका। भोज के निष्कपट चेहरे को देखकर वत्सराज का मन राजा मुज्ज के आदेश पालन एवं मानवीय सम्वेदनाओं के झूले में झूलने लगा। इसी असमंजस की स्थिति में वत्सराज ने भोज को राज्यादेश कह सुनाया कि मुज्ज राजसिंहासन का पूरा अधिकार निःशंक निश्चिन्त होकर भोगना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने आपके वध की आज्ञा दी है।

तो विलम्ब क्यों करते हो गोड़ेश्वर। भोज ने कहा। तुम्हें जिस कार्य के लिए नियुक्त किया गया है उसे पूरा करो।

वन की नीरवता में कृष्ण पक्ष की अंधियारी रात काली चादर ओढ़े मृत्यु के समान लगती थी। वत्सराज के हाथों में चमकती तलवार उस समय ऐसी लग रही थी। जैसे मृत्यु भी निरपराध का वध करने में सहम रही हो। फिर न जाने क्या हुआ कि वत्सराज के हाथों से तलवार छूट गयी और वह कुमार से लिपटकर कहने लगा-’मैं भी मनुष्य हूँ कुमार! ममता, वात्सल्य से पूरित हृदय वाला मनुष्य और उन्होंने कुमार को अंक में भर लिया।

प्रातः होते ही वह वहाँ से चल दिए। अब की बार उनके हाथ में तलवार के साथ एक वटपत्र भी था। जिस पर भोज ने अपने हाथों कुछ लिखा था। दरबार में पहुँचते ही मुज्ज ने उनसे पहला सवाल किया-दिए गए दायित्व को पूरा करने में सफल हुए? वत्सराज ने हिचकिचाहट के साथ धीरे से स्वीकार भावों में सिर हिला दिया और साथ ही एक लिखित एक वटपत्र मुज्ज के हाथों थमा दिया। मुज्ज ने पत्र पर लिखी हुई पंक्तियाँ पढ़ीं, लिखी भोज ने ही थी लिखा था

मान्धाता च महीपति; कृतयुगालंकार भूतोगतः। सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौदशास्यन्तकः ॥

अन्ये चापि युधिष्ठिर प्रभृतयो याता दिपं भूपते। नैकेक चापि समं गता वसुमति मुज्ज! त्वया यास्यति॥

अर्थात्-सतयुग के अलंकार मांधाता, समुद्र में सेतु बनाने वाले भगवान राम और युधिष्ठिर आदि

अनेकों महाप्रतापी राजा हुए। यह धरती उनमें से किसी के साथ नहीं गयी। पर अब ऐसा लगता है मुज्ज। यह तुम्हारे साथ जाएगी।

श्लोक पढ़ कर मुज्ज का न जाने कौन सा मर्मस्थल दग्ध हो उठा। अपनी गलती का भान होते ही वह जोरों से विलाप करने लगा- ‘मैंने क्या कर डाला। इतना बड़ा पाप, महाराज सिन्धु की दिवंगत आत्मा को क्या उत्तर दूँगा? अन्तरात्मा की प्रताड़ना और पश्चाताप की अग्नि ने मुज्ज को विदग्ध कर डाला। उन्हें इस बात का अनुभव हो रहा था कि सब कुछ काल के आधीन है। यह धरती मेरे साथ भी नहीं जाएगी।

इसके बाद जैसे-तैसे वस्तुस्थिति से आवरण हटाया गया। कुमार भोज को सुरक्षित पाकर मुज्ज की व्यथा कुछ कम हुई। सब काल के आधीन है, तो लोभ किसलिए, अनीति क्यों? दुराचरण किस हेतु। मुज्ज ने विधिवत् भोज को राज्यशासन सौंपा और स्वयं तप के लिए प्रस्थान कर दिया।


एक सच्चा इनसान

हम इसी समय उसे अपने सामने देखना चाहते हैं। अब्दाली के स्वरों में पर्याप्त कठोरता थी। उसकी आँखों में एक शैतानी चमक तैर रही थी। पानीपत की लड़ाई में मराठे हार चुके थे। मराठों का सरदार इब्राहिम गार्दी अन्त तक लड़ता रहा और घायल हो जाने के कारण पकड़ लिया गया था। इस समय वह शुजाउद्दौला की छावनी में बन्दी था, जो अहमदशाह की छावनी के आधीन ही थी। शुजा घायल का वध नहीं करना चाहता था, लेकिन अब्दाली को इब्राहिम के नाम से घृणा थी। उसे उसके पकड़े जाने का समाचार मिल गया। इसीलिए उसने इब्राहिम को अपने सामने पेश किए जाने के लिए एक सिपहसालार को शुजा के पास भेजा।

शुजाउद्दास्ला ने इब्राहिम की घायल स्थिति बयान की और अनुरोध किया कि अच्छा हो जाने पर उसे पेश कर दिया जाएगा। पर सिपहसालार ने जब अपने शाह का हठ प्रकट किया तो शुजा का प्रतिवाद क्षीण पड़ गया। हारकर उसे इब्राहिम गार्दी को सौंपना पड़ा।

थोड़ी ही देर में इब्राहीमगार्दी अहमदशाह के सामने था। अहमदशाह ने भेड़िए जैसे खूँखार अन्दाज में सवाल किया ‘तुम मराठों के दस हजार सिपाहियों के सलार थे।’ उसने उत्तर दिया ‘जरूर था।’

‘पहले तुम फ्राँसीसियों के यहाँ नौकर थे?’

‘ठीक सुना है।’

‘फिर निजाम हैदराबाद के यहाँ नौकरी की?’

‘सही है।’

‘उसे नौकरी को छोड़ा किसलिए?’

‘क्योंकि निजाम के रवैये मेरे उसूल के खिलाफ थे।’ तुम्हारे उसूल, अहमदशाह गुर्राया और फिर तीखी नजरों से गार्दी की ओर देखता हुआ बोला मुसलमान होकर फिरंगी जुबान पढ़ी, फिर मराठों की नौकरी की। खैर, अब तक तुमने जो कुछ भी किया, उस पर तुमको तोबा करनी चाहिए। हम तुम्हारी खताओं को माफ कर सकते हैं।

घाव की परवाह न करते हुए इब्राहीम बोला, तोबा, किसके लिए अफगान शाह। आपके देश में अपने मुल्क से मुहब्बत करने के लिए, और उस पर जान कुरबान करने के लिए क्या तोबा करनी पड़ती है?

किससे बातें कर रहे हो, इसका कुछ अन्दाज है? अहमदशाह फिर गरजा।

जानता हूँ और यकीन से जानता हूँ, आप लुटेरे हैं, यकीनन खुदा के फरिश्ते नहीं।

मैं इतनी बड़ी फतह हासिल करके गुस्सा नहीं करना चाहता। तुम पर ताज्जुब होता कि मुसलमान होकर तुमने जिन्दगी को इस तरह बरबाद किया।

तब शायद आपको मालूम नहीं कि मुसलमान किसको कहते हैं। जो अपने मुल्क के साथ घात करे, बेगुनाहों का खून बहाने वालों का साथ दे, वह मुसलमान नहीं।

मुझको मालुम है कि तुम फिरंगियों के शागिर्द हो। उन्हीं से तुमने यह सब सीखा है। क्यों, कभी तुम नमाज पढ़ते हो?

क्यों नहीं, पाँचों वक्त।

अब्दाली के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान आयी और आँखों में वही शैतानी क्रूरता। बाबेला, फिरंगी या हिन्दुस्तानी जुबान में पढ़ते हो, खुदा को राम कहते होंगे।

अपने घावों की असहनीय पीड़ा को दबाते हुए गार्दी बोला, खुदा उर्दू फारसी, अरबी जुबान ही समझता है? उसे अंग्रेजी, फ्राँसीसी या मराठी नहीं आती? क्या खुदा राम नहीं और क्या राम खुदा नहीं है?

अब्दाली की नाक में नासूर था। उसमें से फुफकार निकल पड़ी। वह बौखलाया हुआ बोल पड़ा क्या कुफ्र बकता है। तोबा करो, नहीं तो तुम्हारे जिस्म के हजारों टुकड़े कर दिए जाएंगे।

‘जिस्म के टुकड़े होने पर भी तुम मेरी आत्मा को

छू भी न सकोगे।’ इब्राहिम ने मजबूती से कहा।

घायल इब्राहिम के ठण्डे स्वर से एक क्षण के लिए अहमदशाह कुछ नरम पड़ा और कहने लगा, ‘अच्छा हम तुमको तोबा करने के लिए वक्त देते हैं। तुम तोबा कर लो हम तुमको छोड़ देंगे। अपनी फौज में तुम्हें अच्छा ओहदा देंगे।’

कराह में दबाये हुए इब्राहिम के ओठों पर एक रीनी-झीनी हंसी आ गयी। वह अहमदशाह के इस नाटक को खत्म करना चाहता था।

उसने कहा, ‘अगर छूट जाऊँ तो फिर से पलटनें तैयार करूं। और तुम जैसे हैवानों को अपने मुल्क से खदेड़ कर बाहर कर दूँ।’

बद जुबान! अहमदशाह तड़प कर बोला अभी भी तोबा कर ले। जहाँ के तहाँ पड़े हुए इब्राहिम ने कहा, इनसानियत के लिए शहीद होने वाले कहीं तोबा करते हैं। तोबा करें वे लोग जो निहत्थों, घायलों मासूम बच्चों महिलाओं का कत्ल करते हैं। अब्दाली से रहा नहीं गया। उसने इब्राहिम के टुकड़े-टुकड़े करके वध करने की आज्ञा दी।

एक अंग कटने पर ‘इब्राहीमगार्दी की चीख में से निकला, इनसानियत के लिए मेरी पहली नियाज।’ दूसरे पर क्षीण स्वर में बोला, ए खुदा, हिन्दुस्तान की मिट्टी में ऐसे शूरमा पैदा करना, जो हैवानों व जालिमों को मिटा देने के लिए अपने को कुर्बान कर दें, फिर आखिर में मराठों के ब्रिगेडियर जनरल इब्राहीमगार्दी के मुख से एक जव्ज निकला ‘अल्लाह’ जिसको सुनकर आसमानी फरिश्तों और धरती के इतिहासकारों ने एक साथ कह। ‘वह सच्चा इनसान था।’


इस संधिकाल की विशिष्ट शक्ति संचार साधना

सृष्टि में जो कुछ भी प्रत्यक्ष या परोक्ष हलचल है, समग्र रूप से वह शक्ति द्वारा संचालित है। शक्ति ही सब कुछ है। शक्ति के बिना शिव भी शव है, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या? शक्ति के बिना हम न सोच सकते हैं, न बोल सकते हैं, न हिल-डुल सकते हैं, न देख सकते हैं, न सोच समझ सकते हैं। शक्ति के बिना न तो हम खड़े हो सकते हैं और न चल फिर सकते हैं वृक्ष-वनस्पति, अन्न, फल, शाक-भाजी, दाल, शक्कर आदि सब शक्ति से ही उत्पन्न होते हैं। इन्द्रिय और प्राण भी शक्ति के ही परिणाम है। गुरुत्वाकर्षण शक्ति, विद्युत शक्ति, चुम्बकत्व, तापशक्ति, आकर्षण शक्ति, तथा चिन्तन शक्ति आदि सभी शक्ति के व्यक्त रूप हैं। साधना की सफलता भी साधक की प्राणशक्ति पर ही निर्भर करती है।

‘शक्ति’ है क्या? इस प्रश्न की गहराई में उतरें तो उत्तर एक ही मिलेगा कि ब्रह्म की सक्रिय अवस्था का नाम ही शक्ति है। जिस प्रकार उष्णता अग्नि से अभिन्न है, उसी प्रकार शक्ति भी ब्रह्म से अभिन्न है। माया, महामाया, मूल प्रकृति, अविद्या, विद्या, महेश्वरी, आद्यशक्ति, सावित्री, गायत्री आदि माया, पराशक्ति, परमेश्वरी इत्यादि शक्ति के ही पर्यायवाची हैं। नवदुर्गा, काली, अष्टलक्ष्मी, नवशक्ति देवी आदि एक ‘पराशक्ति’ की ही अभिव्यक्तियाँ है। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती शक्ति के तीन व्यक्त स्वरूप हैं।

शक्ति की दो अवस्थाएं होती हैं-शुद्ध साम्यावस्था और वैषम्यावस्था। पहली अवस्था वह है जिसमें तीनों गुण-सत्व, रज और तुम साम्यावस्था में स्थित रहते हैं। यह अवस्था प्रलयकाल में होती है। उस समय असंख्य जीवन अपने संस्कारों तथा अधिष्ठाता के साथ अव्यक्त अवस्था में रहते हैं। अधिष्ठाता का अर्थ है कर्म की अदृश्य शक्ति अथवा फलदायिनी शक्ति, जो कर्म के भीतर छिपी रहती हैं।

प्रलय की अवधि समाप्त होने पर साम्यावस्थित शक्ति में स्फुरणा या स्पन्दन होते हैं और वह इसलिए कि तिरोहित जीवों को अपने−अपने कर्मों का फल भोगने की इच्छा होती है। यही वैषम्यावस्था है। अब ब्रह्म सृष्टि को उत्पन्न करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। उनके संकल्प मात्र से सृष्टि उत्पन्न हो जाती है। साम्यावस्था में रजोगुण शुद्ध और शान्त रहता है, विकास या सृष्टि निर्माण के समय वह अशुद्ध एवं क्षुब्ध हो जाता है। सृष्टि संरचना के समय जब आदि शक्ति के अन्दर क्षोभ होता है तो तीनों गुण-सत् रज, तक व्यक्त हो जाते हैं। सत्वगुण प्रधान चैतन्य का नाम विष्णु है जो ब्रह्म की संरक्षिका शक्ति है। रजोगुण प्रधान चैतन्य शिव है, जो ब्रह्म की पुनर्निर्माण करने वाली अथवा संहारिका शक्ति है।

उपरोक्त पंक्तियों में शक्ति के स्वरूप को समझाया गाया है। इस स्वरूप को समझ कर जो व्यक्ति शक्ति की साधना करता है उसे ईश्वरीय अनुदानों की प्राप्ति होती है। वस्तुतः शक्ति का ही खेल है यह सारा। साधना और अभ्यास पर्यायवाची शब्द हैं। साधना का अर्थ है अपने आपको साधना, अपने गुण, कर्म स्वभाव को चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को परिष्कृत कर उच्चस्तरीय बनाना। सिद्धि का अर्थ है-शक्ति अथवा पूर्णता की प्राप्ति। साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिए जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभीप्सा, ज्ञान तथा विकास के भेद से साधना में भेद होता है। अधिकारी साधक की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है। इस प्रकार साधना के चार भेद बताये गये हैं। सर्वोपरि भाव-ब्रह्मभाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है। इसे अद्वैत भाव कहते हैं। इसके उपरान्त ऊँची श्रेणी के योगियों और भक्तों का ध्यान भाव आता है, जिसमें भक्त अथवा योगी अपने सूक्ष्म एवं कारण शरीर के विभिन्न चक्रों, पंचकोश आदि में अपने इष्टदेव का ध्यान करता है और प्रसुप्त पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति को जाग्रत करता है। इससे नीचे का भाव वह है जिसमें केवल जप, प्रार्थना और स्तुति आदि से सम्बन्ध रहता है। चौथी अथवा सबसे निम्न श्रेणी का भाव वह है जिसमें केवल बाह्य पूजा से ही सम्बन्ध है।

उच्च श्रेणी का श्रेष्ठ साधक अपने प्रत्येक मनुष्योचित कर्म को यज्ञ और पूजा का एक पवित्र कार्य बना देता है। खाते-पीते, उठते, बैठते अथवा अन्य किसी भी शारीरिक मानसिक क्रिया को करते समय वह कहता नहीं, वरन् यह मानता और दृढ़ विश्वास करता है कि उसके द्वारा और उसके अन्दर ‘शक्ति’ ही सब कुछ करा रही है। वह अपने जीवन और उसकी प्रत्येक क्रिया को इस रूप में देखता है मानो प्रकृति में जो ईश्वर की इष्ट की क्रिया हो रही है, उसी का यह भी एक अंग है। शक्ति ही मनुष्य के रूप में व्यक्ति होकर यहाँ अपना कार्य कर रही है। इस प्रकार की भावना से प्रेरित होकर कर्म करने से अकर्म की ओर दुष्प्रवृत्तियों की ओर प्रवृत्ति नहीं होती ओर यदि पहले से कोई बुरी आदत या बुरा अभ्यास होता है तो प्रयासपूर्वक धीरे-धीरे दूर हो जाता है। जो इस प्रकार शक्ति साधना करते हुए इन्द्रियों को वश में करते हैं, उनपर आद्यशक्ति गायत्री की अवश्य कृपा होती है।

शक्ति का स्रोत गायत्री को माना गया है। गायत्री महाशक्ति की उच्चस्तरीय उपासना साधना करने वाले साधकों के लिए एक विशिष्ट आशीर्वाद का प्रेरणा प्रवाह हम लोगों को उपलब्ध है जिसे ‘शक्ति अनुदान की संचार साधना’ कहते हैं। इस साधना उपक्रम में निखिल आकाश में संव्याप्त गायत्री महाशक्ति के महाप्राण को भावना तथा श्वास क्रिया के सम्मिश्रित प्रयोग द्वारा खींचना और अपने अन्दर धारण करना होता है। यह प्रक्रिया जितनी सरल है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी। इस विधा का गहन अवगाहन करके मनुष्य देवतुल्य सामर्थ्यवान बन सकता है। शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में यह साधना बहुत ही सहायक सिद्ध हो सकती है। साधारण गृहस्थों से लेकर कार्यव्यस्त व्यक्ति तक इस साधना से असाधारण लाभ उठा सकते हैं। साधकों के लिए तो अपनी प्राण चेतना को विकसित करने में इससे और भी अधिक सुविधा होती है और लक्ष्य की प्राप्ति अधिक सफल एवं सुनिश्चित बन जाती है। ‘शक्ति साधना की संचार प्रक्रिया द्वारा प्राण चेतना से स्वं को अभिपूरित करने के लिए निम्न प्रक्रिया अपनानी पड़ती है-

1- ‘प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख पालथी मारकर सुखासन में बैठिये। दोनों हाथ घुटनों पर रखिये, मेरुदण्ड-कमर सीधी रखिये। नेत्र बन्द कर लीजिए। यह ध्यान मुद्रा कहलाती है ध्यान मुद्रा में अवस्थित होने के पश्चात् अब ध्यान करना चाहिए कि निखिल आकाश तेज और शक्ति से ओतप्रोत सविता की महाशक्ति गायत्री का सावित्री का महाप्राण व्याप्त हो रहा है। सूर्य देवता के पापनाशक तीव्र प्रकाश में चमकते हुए बादलों जैसी शकल के प्राणशक्ति का उफान हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है और उस प्राण उफान के बीच हम निश्चिन्त, निश्छल, शांतचित्त एवं प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए।’

2- ‘उक्त भावना से अपने को ओतप्रोत करने के पश्चात् नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे साँस खींचना आरम्भ कीजिए और सीवना कीजिए कि प्राणतत्व के उफनते हुए बादलों को हम अपनी साँस द्वारा भीतर खींच रहे हैं। जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसले में, साँप अपने बिल में प्रवेश करता है, उसी प्रकार वह अपने चारों ओर बिखरा हुआ प्राण-प्रवाह हमारी नासिका द्वारा श्वास के साथ शरीर के भीतर प्रवेश करता है और मस्तिष्क,, छाती, हृदय, पेट, आंतों से लेकर समस्त अंग-अवयवों में प्रवेश कर जाता है।’

3-’जब श्वास पूरी खींच ली जाय तो उसे कुछ देर तक भीतर रोककर रखना चाहिए और भावना की जानी चाहिए कि जो प्राण तत्व खींचा गया है उसे हमारे भीतरी अंग-प्रत्यंग अवशोषित कर रहे हैं। जिस प्रकार मिट्टी पर पानी डाला जाय तो वह उसे सोख जाती है, उसी प्रकार अपने अंग-प्रत्यंग सूखी मिट्टी के समान हैं और जल रूपी इस खींचे हुए उस प्राण को सोख कर अपने अन्दर सदा के लिए अवधारण कर रहे है। साथ ही प्राण तत्व में सम्मिश्रित चैतन्य, शक्ति, तेज, बल, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम सरीखे अनेक तत्व हमारे अंग-प्रत्यंग में स्थिर हो रहे हैं।’

4- ‘जितनी देर श्वास आसानी से रोकी जा सके उतनी देर तक रोके रखना चाहिए। तदुपरान्त उसे धीरे-धीरे बाहर निकाल देना चाहिए, साथ ही साथ गहरी भावना करनी चाहिए कि प्राणशक्ति का सारतत्व हमारे अंग-प्रत्यंगों द्वारा खींच लिए जाने के पश्चात् अब वैसा ही मलिन वायु बाहर निकल रहा है जैसा कि मक्खन निकाल लेने के पश्चात् निस्सार दूध हटा दिया जाता है। शरीर और मन में जो विकार थे वे सब इस निकलती हुई श्वास के साथ घुल गये हैं। और काले धुंए के समान अनेक दूषणों, बुराइयों, कुसंस्कारों को लेकर बाहर निकल रहे है।’

5- ‘पूरी साँस बाहर निकल जाने के पश्चात् कुछ देर तक यथा शक्ति साँस को रोक रखना चाहिए अर्थात् बिना साँस के रहना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि अन्दर के जो दोष-दुर्गुण कुसंस्कार एवं कलुष बाहर निकल गये थे,उनको वापस न लौटने देने की दृष्टि से दरवाजे बन्द कर दिये गये हैं और वे बहिष्कृत होकर हमसे बहुत दूर जा रहे हैं।

इस प्रकार पाँच अंगों में विभाजित शक्ति साधना की संचार प्रक्रिया को नित्य प्रातः सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पूर्व से लेकर आधे घण्टे बाद तक के समय में करना चाहिए। आरम्भ पाँच-प्राणायामों से किया जाय अर्थात् उपरोक्त क्रिया पाँच बार दोहराई जाय। इसके बाद हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक वर्ष में आधा घण्टा तक पहुँचा देनी चाहिए।

उपरोक्त विधान के अनुसार जो भी व्यक्ति साधना करेंगे, वे आशातीत सत्परिणाम प्राप्त करेंगे। निरुत्साही और निराश व्यक्ति भी, जिनकी नस-नाड़ियाँ शिथिल हो गयी हैं, आँखें जरा सा काम करने पर थक जाती है, थोड़ी सी कठिनाई में जिनका दिल धड़कने या बैठने लगता है, चिन्ता और आशंका से जिनका चित्त आतंकित रहता है, जो स्वं को आत्म बल से रहित मानते हों, वे भी इस शक्ति साधना से अपने अन्दर जादू चमत्कार जैसा परिवर्तन अनुभव करने लगेंगे। उन्हें अनुभव होगा कि कोई अतिरिक्त शक्ति उनके शरीर में प्रवेश कर गयी है और उसकी सहायता से आत्मा विश्वास एवं आत्म बल दूना हो गया है। काम में मन लगने और आशावादी रहने का एक विशेष परिवर्तन अनुभव होने लगेगा। साधकों को शक्ति संचार के साथ ही अपने में अनेकों उच्च कोटि की अध्यात्म भावनाएं प्रविष्ट एवं प्रतिष्ठित होती दिखाई देंगी और वे उस मार्ग पर चल पड़ेंगे जिसके लिये महाकाल ने पुकार लगाई।


विशेष लेखमाला-10 - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

इसी माह महावरी एवं हनुमान जयंती दोनों हैं। उसी उपलक्ष्य में परमपूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से निकली अमृतवाणी जो 6 अप्रैल 1974 की पावन वेला में शाँतिकुँज में गुँजायमान हुई थी, प्रस्तुत हैं। पढ़े और प्रेरणा पायें।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ -

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नाः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों! आज भगवान महावरी और रामभक्त अनुमान का जन्म दिन है। जैन धर्म के प्रथम संस्थापक भगवान महावीर का यह जन्म दिवस है और आज ही हनुमान जी का भी है। भगवान भक्त हनुमान भी आज ही जन्मे थे। वे हमारे प्रेरणा के स्रोत हैं। आज का दिन कितना शुभ है। भगवान महावीर राजकुमार थे। उनने सोचा कि राजकुमार होने की अपेक्षा संत होना अच्छा है, अतः हमें संत बन कर जीना चाहिए, क्योंकि राजकुमार की-राजा की शक्ति की अपेक्षा संत की शक्ति बड़ी हैं। संत समाज की जो सेवा कर सकता है वह राजा नहीं कर सकता। यह विचार करने के बाद उन्होंने बुद्ध भगवान की तरह अपना राजपाट छोड़ दिया और तपश्चर्या में निमग्न हो गये। यद्यपि वे चाहते तो राजसत्ता के माध्यम से समाज कीक सेवा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि राजसत्ता का दायरा बहुत सीमित है- बड़ा क्षुद्र है। धर्म तंत्र की शक्ति राजतंत्र की तुलना में असंख्य गुनी अधिक है। राजसत्ता केवल भौतिक जीवन पर प्रभाव डाल सकती है, लेकिन हमारे अन्तः जीवन में प्रवेश नहीं कर सकती।

साथियों, हृदय-हृदय पर शासन किसका होता है? हृदय-हृदय पर शासन धर्मतंत्र का था, है और रहेगा। भौतिक वस्तुओं पर शासन सरकार का रहेगा और सरकार का था। बहुत दिन पहले की बात है जब हमने राजनीति त्याग करके धर्मतंत्र में प्रवेश किया था। इसके पहले कांग्रेस आन्दोलन में जब तक रहा, तब बार-बार जेल जाता रहा। इसके पश्चात् जब इसको छोड़ा और धर्मतंत्र की ओर बढ़ा तब लोगों ने बार-बार यही कहा कि राजसत्ता में जो आदमी होता है वह मिनिस्टर बन जाता है और उसके पास मोटरें होती हैं और दुनिया उसका कहना मानती है। दुनिया में उसकी इज्जत होती है। तब मैंने कहा था -कि मैं यह तो नहीं कहता कि राजसत्ता में कोई बुराई है और वह समाज की कोई सेवा नहीं कर सकती, लेकिन मैं यह अवश्य कहता हूँ कि राजसत्ता सीमित है सीमाबद्ध है। इसमें व्यक्ति किसी प्राप्त का मिनिस्टर हो सकता है और उसी प्रान्त के लोगों को प्रभावित कर सकता है। दक्षिण भारत का मुख्यमंत्री कौन है जरा बताइये?अगर वह मंत्री आये और आपके ऊपर प्रभाव डाले तो क्या कोई प्रभाव पड़ सकता है? नहीं, कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। लेकिन दक्षिण भारत के रहने वाले केरल निवासी जगतगुरु शंकराचार्य केरल को छोड़ कर जब बाहर निकल गये और सारे हिन्दुस्तान में काम करते चले गये, तो सारा देश उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। यह धर्म की शक्ति का द्योतक है। अभी भी लोग हमसे बार-बार पूछते हैं कि आप राज सत्ता से दूर क्यों हैं? बेटे राजसत्ता से राजतंत्र से उसके घपलों से हमारा कोई ताल्लुक नहीं है। हम उन लोगों में से हैं जो यह जानते हैं कि मनुष्य के जीवन में राजनीति का क्या स्थान हैं।

राजनीति और आदमी अब जुड़ गया है। तिब्बत के दलाई लामा को राजनीति के कारण तिब्बत छोड़कर भाग जाना पड़ा। भगवान बुद्ध का जन्म स्थान था तिब्बत जहाँ से पैदा होने के बाद बुद्धावतार न जाने कहाँ से कहाँ चला गया। चीन में न जाने क्या से क्या हो गया। कभी चीन में बौद्ध धर्म इतना फैला हुआ था कि हिन्दुस्तान से भी अधिक बौद्ध लोग चाइना में रहते थे। वहाँ अभी भी बौद्ध विहारों के खण्डहर बहुत ज्यादा हैं। चीन की लाइब्रेरियों में बौद्ध धर्म की इतनी अधिक पुस्तकें हैं कि दुनिया में और कहीं भी नहीं है। लेकिन क्या हो गया? चाइना से बौद्ध धर्म का सफाया हो गया। वहाँ अब कोई धर्म नहीं है-न हिन्दू धर्म है, न मुसलमान धर्म है, न ईसाई धर्म है सब धर्म साफ हो गये। ऐसा इसलिए हो गया क्योंकि धर्मतंत्र अपनी गरिमा को क्षमता को भूल गया। राजसत्ता की शक्ति कितनी बड़ी है और वह क्या कर सकती है, इसे देखना हो तो जर्मनी में पिछले दिनों हिटलर की शासन सत्ता को देख सकते हैं। उसने सारी सारी शिक्षा प्रणाली को बदल कर रख दिया था और थोड़े ही दिनों में सारे देश को नाजी बना दिया था। राजसत्ता की शक्ति बड़ी जबर्दस्त है, इससे मैं इनकार नहीं करता हूँ, पर मैं यह कहता हूँ कि राजसत्ता को अच्छा बनाने के लिए ऊपर से काम करना ही काफी नहीं है। राजसत्ता की जड़ें जमीन में होनी चाहिये। आप ऊपर से देख भाल करेंगे, डालियों को झाड़ेंगे, पत्तों को साफ करेंगे, लेकिन जड़ों की ओर ध्यान नहीं देंगे तो पेड़ के चरमराकर गिर जाने का अंदेशा बना ही रहेगा। फिर बाग किस तरीके से बनेगा? यह काम केवल धर्मतंत्र कर सकता है। असली शक्तामता धर्मतंत्र के हाथों में है। राजतंत्र केवल कानून बना सकता है, लोगों को रोक सकता है, लोगों को गिरफ्तार कर सकता है, लेकिन सारे देश में विद्यमान मुख्य समस्याओं को हल नहीं कर सकता।

कल मैं आपसे निवेदन कर रहा था कि कोई भी काम केवल कानून बना देने से पूरा नहीं हो सकता। कोई भी बुरा काम ऐसा नहीं है दुनिया में जिसके खिलाफ गवर्नमेंट ने कानून ने बनाये हों और जेलखाने न बनायें हों, पुलिस न बनाये हों। पर बताइये कौन से कानून से कौन सा पा रुक गया? भ्रष्टाचार रुक गया? रिश्वतखोरी रुक गयी? मिलावट रुक गया? बताइये एक भी पा रुक गया हो तो जब कि सारे के सारे कानून बने हुए हैं कानून इनसान के ऊपर हुकूमत नहीं कर सकता और इनसान की इच्छाएं नहीं बदल सकता। इनसान की इच्छायें बदलने की शक्ति धर्मतंत्र में है। राजतंत्र की अपेक्षा धर्म तंत्र बड़ा है। धर्मतंत्र की शक्ति का ठिकाना नहीं। उसकी ताकत बड़ी है, प्रभाव बड़ा है, अतः समस्याओं के समाधान में भी वही सफल हो सकता है। धर्मतंत्र के बिना मनुष्य के ऊपर और कोई अंकुश नहीं रख सकता। समाज के ऊपर जब कभी अंकुश रखा जाएगा तो धर्म के द्वारा-भगवान के द्वारा रखा जायेगा। धर्म के अलावा और कोई अंकुश ऐसा नहीं है जिससे मनुष्य को काबू में रखा जा सके ओर सही राह पर चलाया जा सके। समाजशास्त्र के कायदे कानून चाहे जितने बनाइये, लेकिन कायदे और कानून बनाने के बाद में भी ऊंचे से ऊंचे आदमी सभी गलत काम करते पाये और देखे गये हैं। कितने ही उच्चपदस्थ लोगों ने अपने-अपने देशों की मिट्टी पलीद कर दी है, किसी से छिपा नहीं है। कानूनों के नाम पर चाहे जो कुछ करते रहिये, कोई रोक-टोक नहीं है। अतः इससे कोई गारंटी नहीं कि कानून से अच्छे मनुष्य बन सकते हैं। अच्छे और शिष्ट मनुष्य जब कभी भी बनेंगे तो धर्मसत्ता के माध्यम से बनेंगे।राजसत्ता जनता के हृदय पर शासन नहीं कर सकती। जनता के हृदय के ऊपर शासन करने की क्षमता केवल धर्मतंत्र में है वही करेगा।

तो क्या करना पड़ेगा मित्री राजनीति को परिपुष्ट बनाने के लिए और राजनीति को सही बनाने के लिए हमको एक काम करना पड़ेगा जो गाँधी जी ने हमको सलाह दी थी। गाँधी जी ने कहा था कि हमको-कांग्रेस संस्था को लोक-संस्था के रूप में बदल जाना चाहिए और राजनीति के काम और किसी के सुपुर्द कर देना चाहिए, ताकि उनपर अंकुश रखा जाय। हमको लोकशक्ति के रूप में जिसमें कांग्रेस का उदय हुआ था, उसी रूप में माना और जाना चाहिए। असली राजनीति की जड़ जमीन में है, जनता के पास में है। जनता को प्रभावशाली बना नहीं सके, जनता में उत्साह भर नहीं नहीं सके, जनता को नागरिकता की बात समझा नहीं सके, जनता को यह समझा नहीं सके कि क्रियाशीलता क्या होती है, इसका परिणाम यह हुआ कि जैसी हमारी जनता वैसी ही हमारी सरकार बनती चली आयी। दूध जैसा होगा मक्खन भी तो वैसा ही बनेगा, मलाई भी तो वैसी ही आयेगी। जनता का स्तर, जनता के विचार करने का क्रम, जनता का चरित्र जैसा जो कुछ भी होगा, गवर्नमेंट सभी वैसी ही बनती चली जायेगी। गवर्नमेंट को आप बदलना चाहें तो पहले जनता को बदलना पड़ता है। जनता जब बदल जाती है तो गवर्नमेंट बदल जाती है। उसकी इच्छा बदल जाती है, स्वरूप बदल जाता है।

गवर्नमेंट बनाने की जिम्मेदारी किसी है? आपकी और हमारी पाँच वर्ष बाद हमको यह अधिकार मिलता है कि हम किस तरीके से हुकूमत बदल सकते हैं और कैसे शासन बदल सकते हैं। अगर हमारे पास ईमानदारी न हो और हम कर्तव्यों को समझते न हों, हमको अपने हित का ध्यान न हो, ज्ञान न हो, नागरिक कर्तव्यों-अधिकारों का अनुभव न हो, तो क्या होगा कि जब कभी भी वोट देने का वक्त आयेगा तो इस बात की जिम्मेदारी का अनुभव हम नहीं करेंगे कि कहाँ और किसको वोट देना चाहिए और किसे नहीं देना चाहिए। तब हम क्या करेंगे? तब हम सिर्फ यही करेंगे कि जहाँ हमारा स्वार्थ प्रेरित करेगा, जो कोई आदमी जीप में बैठा कर ले जायेगा, जो कोई भी हमको मिठाई खिला देगा, शराब पिलायेगा, उसी आदमी को हम वोट देते चले जायेंगे। वोट देने का यदि हमारा यही क्रम रहा तो मैं यह पूछता हूँ कि फिर हमको अच्छी गवर्नमेंट सरकार कैसे मिल सकती है? अच्छी सरकार कभी नहीं मिल सकती। अगर यही क्रम बना रहा और जनता अपने नागरिक कर्तव्यों को नहीं समझती, नागरिक जिम्मेदारियों को नहीं समझती तो फिर यही होगा कि जो कोई व्यक्ति या पार्टी अमुक लोभ दिखायेगा, कोई पैसा दिखायेगा, कोई भय दिखायेगा, कोई जाति-बिरादरी की बातें कहेगा, कोई क्या कहेगा-कोई क्या कहेगा, उसी को समर्थन मिलता जायेगा। इस तरीके से क्या होता जायेगा कि जिस आदमी के अन्दर देश-भक्ति और नागरिक कर्तव्यों का उदय नहीं हुआ और उसे इस बात की जिम्मेदारी एवं जानकी भी नहीं है कि वोट के नाम पर राष्ट्र की हुकूमत हमारे हाथ में सौंप दी गयी है, वह अपनी जिम्मेदारियों को कैसे निभा सकता है? अच्छी राजनीति चलाने और अच्छी गवर्नमेंट बनाने के लिए शासनसत्ता में अच्छे व्यक्ति पहुंचने चाहिए। अच्छा व्यक्ति शासन में भेजने के लिए वोटों के इस्तेमाल का स्तर भी ऊँचा उठना चाहिए। क्रियापद्धति सभी यही है। अच्छा देश और अच्छी राजनीति बनाने के लिए अगर हम जनता का चरित्र अच्छा नहीं बना सकते तो फिर यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि देश को अच्छी गवर्नमेण्ट मिल सकती है। अगर आप रिश्वत लेकर वोट दे सकते हैं तो फिर आपको क्यों उम्मीद करनी चाहिए कि अच्छी सरकार मिल जायेगी। फिर तो यही समझना चाहिए कि जो बीज आपने बोये हैं वही काटना पड़ेगा।

लोग हमसे बार-बार यही पूछते हैं कि आप राजनीति में क्यों नहीं जाते? मित्रो, हम राजनीति से अलग नहीं है,किन्तु हमारी राजनीति वह राजनीति नहीं है जो सत्ता हथियाने वाली होती है। सत्ता हथियाने के बाद कोई सभी आदमी बड़ा काम नहीं कर सकता, अगर जनता उसका साथ देने को तैयार न हो तब। जनता का साथ देने वाला पक्ष बहुत बड़ा पक्ष है और इस बड़े पक्ष की ओर आज तक किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। हर आदमी का ध्यान केवल इस ओर गया कि अमुक आदमी को मिनिस्टर, अमुक आदमी की गवर्नमेंट बनायेंगे। आप किसी सभी पार्टी की गवर्नमेण्ट बना दीजिये, किसी को मिनिस्टर बना दीजिए, उससे किसी का कुछ बनने वाला नहीं है। आपका काम तो जनता से बनेगा। बनना तो जनता को है, उठना तो जनता को है। जनता को अपने कर्तव्यों और अधिकारों का अगर हम बोध नहीं करा सके तो फिर कोई भी पार्टी चुन लीजिये किसी का कुछ भला नहीं होने वाला है। कोई पार्टी ईमानदार तभी हो सकती है जब जनता ईमानदार होगी। तब गलत काम करने वाला कोई सभी मिनिस्टर या अधिकारी क्यों न हो, जनता उसे गलत काम करने से रोक देगी और यह कहेगी कि आपको गलत काम नहीं करना चाहिए। अगर जनता कमजोर हैं और अपने अधिकारों, नागरिक कर्तव्यों का ज्ञान उसे नहीं है तो फिर जो कोई भी पार्टी आएगी, जो कुछ करेगी, जनता मूकदर्शक बनी देखती और उसके दुष्परिणामों को भुगतती रहेगी। जनता को कैसे बहकाया जा सकता है, कैसे पैसा लिया जा सकता है और किस तरीके से उलटी पट्टी पढ़ाई जा सकती है, वह सब कुछ होता रहेगा। यदि जनता समझदार और जागरुक है तो फिर इन चालाकियों की बारीकी को वह समझ जाएगी और नेताओं के मनसूबों पर पानी फेर देगी।

मित्रों, वास्तविक शक्ति जनता के हाथ में है। जनता से बड़ा दैत्य, जनता से बड़ा राक्षस, जनता से बड़ा जालिम, जनता से बड़ा शक्तिशाली और कोई नहीं है। जनता के पास जो शक्ति है वह और किसी के पास नहीं है। वह चाहे जिसे शासन के शीर्ष पर बिठा दे ओर चाहे तो धूल में मिला दे। जनता के साहस से हमने गवर्नमेंट बनाया और कांग्रेस पार्टी को शासन पर बिठा दिया। शक्ति किसी रही? गाँधी जी की? नहीं, गाँधी जी की नहीं, जनता की रही। हुकूमत की शक्ति जब-जब होगी जनता की होगी। किंतु हमारे कर्तव्य क्या हैं, अधिकार क्या हैं और जनता को कैसा होना चाहिए, जब तक यह समझ विकसित नहीं होती, तब तक प्रयास सफल नहीं हो सकते। अभी तक लोगों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। ध्यान गया है तो केवल इतना कि गवर्नमेंट इस तरीके से बना देना चाहिए, पार्टी इस तरीके से बना देना चाहिए, हुकूमत इस तरीके से चलाना चाहिए, संविधान इस तरह से बना देने चाहिए और कानून ऐसे बना देने चाहिए। इस बात की ओर ध्यान देना चाहिए, उस बात पर ध्यान देना चाहिए। मित्रो, असली बात यह नहीं है, असली बात यह है जो जनता से तालुक रखती है। जनता जहाँ जिस तरीके की होगी, वहाँ उसी तरीके की चीजें बनती चली जाएंगी। जहाँ जनता की मनोदशा अच्छी नहीं है जहाँ जनता को अपने नागरिक कर्तव्यों और नागरिक जिम्मेदारियों का ज्ञान नहीं है, वहाँ अच्छी गवर्नमेंट नहीं हो सकती।

नागरिक कर्तव्यों, जिम्मेदारियों को समझाना, प्रत्येक नागरिक को उसके अधिकारों का बोध कराना, दूसरों के कष्ट-कठिनाइयों में भागीदार बनाना और उन्हें राष्ट्रीय दायित्वों को समझाने की जिम्मेदारी किसकी है? साथियों, यह धर्म की जिम्मेदारी है, यह मारी जिम्मेदारी है और आपकी जिम्मेदारी है कि हम हर आदमी को वह काम करना सिखाएं जिससे एक अच्छे राष्ट्र का विकास हो सकता है। कानून इस काम को नहीं कर सकता, जनता इस काम को करेगी। जनता का ईमान जब जाग्रत होगा तब लोगों को यह भय हो और दुख भी होगा कि हम मसाले में मिलावट करेंगे तो जो खरीद कर उसे खाएगा, पेट में पथरी हो जाएगी। जो आदमी बीमार पड़ा हुआ है और अगर वह मिलावट वाला दूध पियेगा तो उसके जीवन-मरण का प्रश्न पैदा हो जाएगा। जब ये बातें हमारे दिमाग में आएगी, अंतः करण में आएंगी, विचारों में आएंगी दूध में पानी और मिर्च-मसालों में मिट्टी व अनाज में कंकड़ मिलाना बंद कर देंगे। क्या इसे सरकार बंद कर सकी है? नहीं, सरकार नए-नए कायदे-कानून और नीतियाँ बनाती चली जायेगी और लोग अपने बचाव के लिए नए-नए तरीके ईजाद करते चले जाएंगे। अच्छा राष्ट्र बनाने के लिए जनता को अच्छा बनाया जाना नितान्त आवश्यक है। अच्छी जनता वह नहीं है जो सम्पन्न होती है मालदार होती है, वरन् अच्छी जनता वह है जो अपने फर्ज को समझती अपने कर्तव्यों को समझी है और अपनी जिम्मेदारी को समझती है। फर्ज, कर्तव्य और जिम्मेदारियों को समझना-यही, मित्रो! धर्म का उद्देश्य है यही अध्यात्म का उद्देश्य है।

धर्म और अध्यात्म का उद्देश्य बहुत लोगों ने समझा और समझाया है, पर खाली उद्देश्य के बारे में मेरी कोई गम्भीर निष्ठा नहीं है। जब लोगों को खाली उद्देश्य समझाये जाते हैं कि मरने के बाद हम कौन से लोक में चले जाते हैं और वह लोक किस तरह के हैं? स्वर्ग कहाँ है? स्वर्ग की लम्बाई, चौड़ाई कितनी है? हमको नहीं मालूम। हमको तो जिन्दगी की जानकारी है, जमीन की जानकारी है। हमको जमीन की जिम्मेदारी जाननी चाहिए, अपने कर्तव्यों को जानना चाहिए। भगवान महावीर जिनका कि आज जन्म दिन है, उन्होंने यही समझा और लोगों को समझाया। उन्होंने यह जान लिया था कि राजसत्ता की अपेक्षा धर्म सत्ता की शक्ति अपार है और इसे ही उन्होंने अंगीकार किया। धर्मसत्ता लोगों के दिलों पर हुकूमत करती है और राजसत्ता जमीनों पर हुकूमत करती है, पैसे पर हुकूमत करती है, किलों पर हुकूमत करती है, व्यापार पर हुकूमत करती है और चीजों पर हुकूमत करती है, परन्तु दिलों पर हुकूमत नहीं कर सकती। दिलों पर हुकूमत करने की क्षमता केवल धर्म में है। इसलिए भगवान महावीर ने यही किया और राजसत्ता को त्याग दिया। राजसत्ता त्यागने के पश्चात् उन्होंने धर्मसत्ता को सम्भाला और जग-जग घूम करके धर्म की बात अध्यात्मिक की बात, ईमानदारी की बात, नेकी की बात, शराफत की बात, कर्तव्य की बात लोगों को समझाते चले गये। लोगों में धर्म को जानने की इच्छा पैदा कर दी। यह सबसे बड़ी सेवा थी जो भगवान महावीर ने की।

हनुमान जी जिनका कि आज जन्मदिन है, क्या वे मिनिस्टर नहीं बन सकते थे? हाँ, वे भगवान राम की हुकूमत में मिनिस्टर बन सकते थे, उनके मंत्री बन सकते थे, लेकिन वे मिनिस्टर नहीं बने। उन्होंने कहा-इस काम के लिए तो ढेरों आदमी विद्यमान है, लेकिन जो मुश्किल का काम है, कठिनाई का काम है, कष्ट का काम है त्याग का काम है, बलिदान का काम है, वह कौन करेगा? अनुमान जी ने सेवा को सबसे बड़ा काम समझा सत्ता को नहीं, और शुरू से अंत तक उसी में निमग्न रहे। सत्ता की अपेक्षा सेवा को जब लोग अच्छा समझने लगेंगे तब मजा आ जायेगा और हमारा राष्ट्र राजनीति की दृष्टि से ही नहीं, आर्थिक दृष्टि से, सामाजिक दृष्टि से नेकी की दृष्टि से उन्नति के शिखर पर जा पहुँचेगा और तब समस्त समस्याओं का समाधान होता हुआ चला जायेगा। हर समस्या का समाधान मित्रो, व्यक्ति के दृष्टिकोण के साथ जुड़ा हुआ है।गवर्नमेंट हमारे रिश्तों को अच्छा कर देगी? नहीं कर सकती। हमारे सेहत को गवर्नमेण्ट अच्छा नहीं कर सकती। हमारा खान-पान ठीक नहीं हैं, ब्रह्मचर्य के ऊपर मारा संयम नहीं है, आहार-विहार के ऊपर हमारा संयम नहीं है, सफाई-स्वच्छता का ज्ञान हमें नहीं है, तो क्या आप समझते हैं कि किसी भी देश की जनता के स्वास्थ्य की रक्षा करने की जिम्मेदारी कोई गवर्नमेण्ट उठा सकती है। नहीं उठा सकती है। यह तो स्वयं ही समझना होगा कि हमें क्या करना चाहिए, क्या खाना चाहिए और कैसे रहना चाहिए। अगर यह बातें समझ में आ जायेंगी तब हमारे स्वास्थ्य की समस्या का समाधान हो जायेगा। जनता के मन में यदि एक जागृति का स्वभाव आ जाये कि हमें अपने प्रति, राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को निभाना है तो फिर क्या कुछ नहीं हो सकता। हर बात के लिए गवर्नमेंट से शिकायत करना या और किसी का मुख देखना मुनासिब नहीं है। कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें हमें स्वयं करना चाहिए।

जनता की शक्ति अपने आप में सबसे बड़ी शक्ति है। जनता की इस शक्ति को हम जाग्रत करेंगे और लोगों को यह बात बतायेंगे कि अपनी समस्याओं का समाधान आप स्वयं कर सकते हैं और आपको करना ही चाहिए। स्वामी केशवानन्द जी के तरीके से हम हर एक आदमी से कहेंगे कि आप अपनी शिक्षा की व्यवस्था अपने तरीके से चलाये तो वह अच्छे तरीके से चल सकती है। स्वामी कैशवानन्द बाइस वर्ष की उम्र में संत हो गये थे, और जनता की शक्ति को संगठित करने में जुट गये थे। वे गाँव-गाँव घूमकर लोगों को शिक्षित करने लगे। जगह-जगह प्राथमिक पाठशालाएं खुलवायी, अध्यापक नियुक्त किये। घर-घर से बच्चों को लाते और उन्हें स्कूल में दाखिल कराते। अध्यापकों की तनख्वाह की पूर्ति घर-घर से एकत्र मुट्ठी- मुट्ठी भर अनाज से की जाती। इस तरह उनके प्रयास से साढ़े तीन सौ गाँवों में स्कूल चालू हो गये और सात कालेज। यह किसी राजनेता का नहीं, एक संत का प्रयास था जिसने जनता को जगाकर रख दिया था।

मित्रो, क्या करना पड़ेगा? करना हमको वह पड़ेगा और वही महत्वपूर्ण काम है जो स्वामी केशवानन्द करने में समर्थ हुए थे। अगर स्वामी केशवानन्द कलेक्टर होते तो क्या वे इतने महत्वपूर्ण कार्य करने में समर्थ हो सकते थे? उन्होंने साढ़े तीन सौ गांवों में स्कूल बना दिये, सात कॉलेज बना दिये और जनता को स्वावलम्बी बना दिया। स्कूल बनाना, कॉलेज बनाना उतनी बड़ी बात नहीं है, जितनी कि जनता की स्वावलम्बी वृत्ति को जगाना। यह सबसे बड़ी बात है। जो भी राष्ट्र कभी उठे हैं स्वावलम्बी होकर उठे हैं, अपने बलबूते पर उठे हैं, अपनी ताकत के आधार पर उठे हैं। दुनिया में जहाँ कहीं भी तरक्की हुई है, जनता ने अपने बाजुओं के बल से की है। परायी सहायता से न तो आज तक कोई उठा है और न कभी उठेगा। इसमें गवर्नमेण्ट भी शामिल है। गवर्नमेंट कहाँ तक सहायता कर सकती है। हम हर गाँव में जायेंगे, हर घरों में जायेंगे और लोगों से यह कहेंगे कि समाज को ऊँचा उठाने के लिए आप सरकार का मुँह मत ताकते रहिए। आप हर रोज अपना एक घण्टा समाज के लिए दीजिए। हमारे पास 24 घण्टे होते हैं। 23 घण्टे हम अपने विभिन्न काम में लगायें, पर एक घण्टे का पसीना-एक घण्टे की मेहनत क्या हम समाज के लिए खर्च नहीं कर सकते? हाँ, हम एक घण्टा रोज अपने समाज, देश धर्म जाति और संस्कृति के लिए खर्च कर सकते हैं एक घण्टा कोई बड़ी चीज नहीं होती। इससे क्या हो सकता है? जिस गाँव में चार सौ घर हैं तो क्या उस गाँव के प्रत्येक घर से एक-एक व्यक्ति एक-एक घण्टा समय समाज, देश और संस्कृति के लिए नहीं निकाल सकते? चार सौ घण्टे का मतलब साठ आदमियों की पूरी मेहनत। साठ आदमी एक साथ मिलकर बाग लगाने के लिए, सफाई के लिए स्कूल चलाने के लिए खड़े जो जाय तो फिर आप देखिये कि साल भर में क्या हो सकता है। जनता की इस शक्ति को हमें जगाना पड़ेगा। जनता के पास कर्तव्यों का उद्बोधन करने के लिए हमको जाना पड़ेगा। जनता के पास कर्तव्यों का उद्बोधन करने के लिए हमको जाना पड़ेगा। घर-घर जाकर लोगों को सफाई की स्वच्छता की बात बतानी होगी। रहन-सहन की, खान-पान की बातें बतानी होंगी। गन्दगी की-बदबू की, अशिक्षा की कलंक-कालिमा जो देश पर छायी हुई है, उसे यदि दूर कर दे तो इससे बड़ा और कोई काम नहीं हो सकता।

तो गुरुजी क्या यही अध्यात्म है? हाँ बेटे, यही अध्यात्म है और यही धर्म है। यही भगवान की भक्ति है। हमको और आपको भगवान की यही भक्ति लोगों को सिखानी पड़ेगी। नागरिक कर्तव्यों का ज्ञान और समाज के प्रति जिम्मेदारी का आभास प्रत्येक व्यक्ति को कराना होगा। आध्यात्मिक ख्वाब दिखाने से काम नहीं बनेगा। इस बारे में मत पूछिये क्योंकि हिन्दू अलग तरीके से सोचता है और मुसलमान अलग तरीके से। एक कहता है कि मरने के बाद हम मृत्युलोक में जायेंगे तो दूसरा कहता है कि कयामत तक हम यहीं खड़े रहेंगे जब तक एक फरिश्ता नहीं आता। एक कहता है कि जब तक पिण्डदान नहीं दिया जायेगा तब तक मृतात्मा चक्कर मारता फिरता है और पिण्डदान खा करके स्वर्ग चला जाता है। हमसे मत पूछिये इन बेकार की बातों को। हमसे तो यह पूछिये कि असली धर्म क्या है? बेटे, असली धर्म उस चीज का नाम है जो मनुष्य की जिम्मेदारी को प्रभावित करता है, और कर्तव्य का ज्ञान कराता है। इस धर्म को, इस अध्यात्म को, भगवान की इस भक्ति को हम भूल गये, परिणाम स्वरूप हम गरीब हो गये, दीन-दुर्बल हो गये, असंगठित हो गये, अशिक्षित हो गये। ये अभिशाप हैं भगवान की उस भक्ति को त्याग देने के, धर्म को त्याग देने के। धर्म अगर हमारे पास होता, भक्ति हमारे पास होती तो अविद्या और अशिक्षा क्यों आती? आपके लिए नहीं कहता, मैं अपने लिए कहता हूँ। आज हमारी संख्या-हम पंडितों की, संतों की बाबाजियों की संख्या छप्पन लाख है और गाँव कितने हैं-सात लाख। हर गाँव पीछे आठ संत आते हैं। यदि हम उस धर्म के मूल स्वरूप को लेकर हर गाँव में चले जायं तो क्या हम लोग देश देश की समस्या को हल नहीं कर सकते? जब अकेले एक स्वामी केशवानन्द साढ़े तीन सौ गाँवों की अशिक्षा की समस्या को हल कर सकते थे तो हमारी संख्या तो उससे कई गुना अधिक है। इस समस्या को हमें ही दूर करना होगा और हम करेंगे। सरकार इसे दूर नहीं कर सकती। उसके लिए प्राइमरी स्कूल चलाना ही मुश्किल पड़ रहा है।हमारा देश इसलिए पिछड़ा हुआ है कि यहाँ अशिक्षा की भरमार है। इसे दूर करने के लिए हमें जनता को जाग्रत करना पड़ेगा। उसके कर्तव्यों का उद्बोधन करना पड़ेगा और उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना पड़ेगा। यही हमारा कुरान है, यही हमारी गीता है, और यही हमारी भागवत है। इसके लिए हमको बहुत कुछ करना है मित्रो, आज भगवान महावीर का जन्म दिन हमको यह सिखाने के लिए आया था कि धर्म सत्ता को राजनीति में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस माध्यम से जो काम हम जनता में जाकर कर सकते हैं, जनता को ऊँचा उठा सकते हैं, जनता की भावना को कर्तव्य को ऊँचा उठा सकते हैं, वह हजार गवर्नमेण्ट मिलकर भी नहीं कर सकती। यही भगवान महावीर का संदेश था ओर इसी क्रियाकलाप को उनने अपने जीवन में धारण किया और सारी जिन्दगी को इस काम में लगा दिया।

आज ही हनुमान जी का जन्म दिन है। जिस दिन से उनने सेवावृत धारण किया, उस दिन से जहाँ भी जरूरत पड़ी, वे चले गये। सीता, खोज के लिए पुल बनाने की जरूरत पड़ी तो पुल बनाने के लिए चले गये। जब रावण के साथ लड़ने की जरूरत पड़ी तो उससे लड़ने चले गये। जहाँ पहाड़ उठाने की जरूरत पड़ी, वहाँ पहाड़ उठाने के लिए चले गये। जहाँ वैद्य को लाने की आवश्यकता पड़ गयी, वहाँ उसे घर सहित उठा लाये। हनुमान जी ने सारी जिन्दगी भर सेवावृत को धारण करके रखा? उन्होंने कहा-हमारा काम सेवा करना है, और मुसीबत उठाना है। राजसत्ता का सुख, वैभव, मजा और लोभ-प्रलोभन क्या है, इससे उनने अपने आपको सदैव दूर ही रखा। तो क्या राजनीति की कोई सेवा नहीं की हनुमान जी ने? भला हनुमान जी से बढ़कर राजनीति की सेवा और कौन कर सकता था। रावण को उखाड़ करके विभीषण की स्थापना करने की भूमिका किसने निभाई? हनुमान ने, नल-नील अंगद और जामवन्त ने निभाई। यदि वे इस बात का झगड़ा करते कि हमको मिनिस्टर बना दीजिये तब तो चकल्लस खड़ी हो जाती। उन्होंने कहा नहीं, राज तो विभीषण को करना चाहिए, हम तो सेवा करेंगे, व्यवस्था जमाएंगे। व्यवस्था जमाना और सेवा करना-मित्रो यह बहुत बड़ा काम है। बार-बार जो लोग हमसे पूछते हैं कि आप राजनीति में क्यों नहीं जाते? उनसे हमारा यही कहना है कि किसी जमाने में हम राजनीति में थे। उस जमाने में राजनीति में बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी जब तक हिन्दुस्तान को स्वराज नहीं मिला था। राजनीति हमको बहुत प्यारी थी। कब? जब सेवा की राजनीति थी, कष्ट उठाने की राजनीति थी, फर्ज की राजनीति थी। आजादी के लिए जेल पर जाने पिटाई खाने और फाँसी के फन्दे झूलने की राजनीति थी तब हमको राजनीति बहुत प्यारी लगती थी।

मित्रो, अब राजनीति में वह चीज आ गयी है जिसे हुकूमत की भूख कहते हैं, सत्ता की हवस कहते हैं, जिस में वोट माँगेंगे, दूसरों का हक मारेंगे तब हमने राजनीति छोड़ दिया। हमने देखा इसको लेने के लिए तो ढेरों लोग तैयार हैं। उस एक ही डिब्बे में सारी की सारी भीड़ घुसी जा रही है। उसमें बैठने के लिए कोई कोहनी मारता है तो कोई कुछ करता है। ऐसी स्थिति में में हमको वहाँ क्यों जाना चाहिए? हमको वहाँ क्यों नहीं जाना चाहिए जहाँ पूरा का पूरा डिब्बा खाली पड़ा है। धर्म का क्षेत्र खाली पड़ा हुआ है। लोक सेवा का क्षेत्र खाली पड़ा हुआ है। जनता का क्षेत्र खाली पड़ा हुआ है। कर्तव्यों को जगाने वाला क्षेत्र खाली पड़ा हुआ है। मित्रो! हम वहीं चलना चाहिए। आज की राजनीति में जिसमें सत्ता की भूख है, उससे आपको दूर ही रहना चाहिए और वहाँ चलना चाहिए जहाँ राष्ट्र को ऊँचा उठाने वाला क्षेत्र मौजूद है। हमको जनता के पास जाना चाहिए और उन्हें प्रेरित करना चाहिए। इससे बड़ी राजनीति और राष्ट्र सेवा कोई और हो नहीं सकती जो कि आप करने के लिए चले हैं। मित्रो, वानप्रस्थी बन करके आप समाज में जाना, लोगों के पास जाना और उन्हें उनके कर्तव्यों को सिखाना, फर्जों को सिखाना लोगों को उनका नागरिक अधिकार समझाना और यह बताना कि भला आदमी शरीफ आदमी कैसा होना चाहिए। प्रत्येक आदमी को अपने राष्ट्रीय जिम्मेदारियों के प्रति कैसे रहना चाहिए। अच्छा समाज बनाने के लिए गुण्डागर्दी तथा अन्य दूसरी बुराइयों के विरुद्ध कैसे खड़े होना चाहिए, यह शिक्षण करना हमारा और आपका काम है।

गुण्डागर्दी पुलिस से नहीं रुक सकती। इसे जब कभी रोकेंगे जो हम और आप ही रोकेंगे। कैसे और कब? जैसे जटायु ने सीता जी को रावण के चंगुल से छुड़ा कर उदाहरण प्रस्तुत किया था। उसने देखा कि कोई बदमाश एक सती सी स्त्री को चुरा कर ले जा रहा है। वह किसी और की नहीं हमारी बेटी है, हमारे ही साथ गुण्डागर्दी की जा रही है, अतः हमको चलना चाहिए और आततायी से लड़ना चाहिए। हमारे पास तलवार नहीं है और रावण के पास हैं, पर इससे क्या हुआ हमारे पास आत्मबल तो है। आत्मबल बड़ा होता है, तलवार नहीं। वह रावण से लड़ने लगा। रावण ने उसके पंख काट दिये। जटायु घायल जमीन पर गिरा हुआ था। रामचन्द्र जी आये और उसे उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और कहा हम तुम्हें स्वर्ग भेज देते हैं। उसने कहा-स्वर्ग तो आप भेजिये मत, हमने तो केवल लोगों के सामने अपने फर्ज का-कर्तव्य का उदाहरण पेश किया है कि जहाँ कहीं भी गुण्डागर्दी या अत्याचार किया जा रहा है, उसका मुकाबला करने के लिए हर आदमी को उसके विरुद्ध उठ खड़ा होना चाहिए। अभी क्या होता है मित्रो कि इतनी सारी बुराइयाँ होती रहती हैं, गुण्डे-बदमाश छुट्टल घूमते रहते हैं, यदि सारे के सारे लोग निश्चय कर ले कि हम सब मिलकर उनका मुकाबला करेंगे तो जनता भी साथ देगी और तब समाज में एक भी गुण्डा दिखाई नहीं देगा।

जनता के सहयोग के बिना राष्ट्र की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। जनता का सहयोग कौन जगायेगा? जनता का सहयोग सरकार जगा नहीं सकती, इसे हम जगायेंगे। जिस तरह पक्षी के दो पंख होते हैं उसी तरह एक पंख राजसत्ता है तो दूसरी धर्मसत्ता जिसको हम जनसत्ता लोकसत्ता कहते हैं। लोकसत्ता का उतनी ही अच्छा होना आवश्यक है जितना कि सरकार का अच्छा होना। एक ही पंख से पक्षी उड़ नहीं सकता। फिर राजसत्ता में काम करने के लिए ढेरों व्यक्ति हैं अतः दूसरे पंख का अर्थात् धर्मसत्ता का क्षेत्र हमें ही सम्भालना पड़ेगा। जनता को धर्म का, कर्तव्यों का, ईमानदारी का, जिम्मेदारी का, बहादुरी का ज्ञान हमको ही कराना चाहिए और हम वहीं करेंगे भी। आप लोग वानप्रस्थ का शिक्षण लेकर जाना और लोगों को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाना जो कि हम आपको अभी तक समझाते रहे हैं और आगे भी समझाते रहेंगे। धर्म का मतलब ईमानदारी, धर्म का मतलब कर्तव्यनिष्ठा, धर्म का मतलब सेवा, धर्म का मतलब उत्तरदायित्व की सम्भावना को जगाना। इस तरह का धर्म हम हर आदमी को सिखायेंगे और समझाएंगे ताकि हमारा हर व्यक्ति अच्छा बन सके, ताकि हमारा परिवार अच्छा बन सके ताकि हमारा समाज और राष्ट्र अच्छा बन सके। यही प्रेरणा है भगवान महावीर की जिन्होंने राजसत्ता को तिलाँजलि देकर धर्म सत्ता को ग्रहण किया और समाज में अलख जगाते हुए लोगों को धर्मसत्ता के कर्तव्यों का ज्ञान कराया।

भगवान बुद्ध भी राजसत्ता को छोड़ करके राजसत्ता को ठोकर मारकर चले गये। उन्होंने गाँव-गाँव में अलख जगाया था


लोकसेवी की आदर्श आचार संहिता

संपर्क में आते ही मनुष्य के जिस कृत्य का सर्वप्रथम प्रभाव पड़ता है वह व्यवहार ही है। किसी व्यक्ति की वेशभूषा, आकृति और उसके बोलने का ढंग ही प्रथम संपर्क में सामने आता है। खान-पान की आदतें रहन-सहन, प्रकृति, स्वभाव और आचार-विचार तो बाद में मालूम पड़ते हैं मनुष्य के व्यक्तित्व का पहला परिचय व्यवहार से ही मिलता है। इसीलिए कहा गया हैं कि व्यवहार मनुष्य की आन्तरिक स्थिति का विज्ञापन है दीखने में कोई बड़े सौम्य दिखाई देते हैं, आकृति बड़ी शान्त और सरल होती है लेकिन जैसे ही कोई उनसे संपर्क करता है तो उनकी वाणी से वे सभी बातें व्यक्त हो जाती है तो उनके स्वभाव में दुर्गुणों के रूप में शामिल हैं।

असंस्कृत मन अशिष्ट, भद्दे और फूहड़ व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। कुसंस्कारी चित्त उसी प्रकार व्यवहार के माध्यम से अपना परिचय दे देता है और पहले संपर्क की प्रतिक्रिया अन्त तक अपना प्रभाव कायम रखती है, यहाँ तक कि वह बाद के सभी अच्छे प्रभावों को भी धूमिल कर देता है। इसलिए लोकसेवी को अपने व्यक्तित्व का गठन करते समय आचरण, रहन-सहन और स्वभाव का आदर्श रूप में प्रस्तुत करने के साथ-साथ व्यवहार के द्वारा भी अपनी आदर्शवादिता का प्रभाव छोड़ना चाहिए।

शिष्टता और शालीनता सद्व्यवहार के प्राण है। व्यवहार में इन गुणों का समावेश होने पर ही पता चलता है कि व्यक्ति कितना सुसंस्कारी है। प्रायः लोग आत्मीयता जताने या अपने को दूसरों से बड़ा सिद्ध करने के लिए अन्य व्यक्तियों से आदेशात्मक शैली तू-तेरे का सम्बोधन करते देखे जाते हैं इसका यह अर्थ होता है कि व्यक्ति में सेवाभावना होते हुए भी अच्छे संस्कारों की कमी है अथवा वह केवल अपने अहंकार का पोषण करने के लिए इस क्षेत्र में आया है। हर किसी से आप या तुम का सम्बोधन तथा बात-चीत करने में निर्देशात्मक शैली के स्थान पर सुझाव शैली का उपयोग सिद्ध करता है कि लोकसेवी कोई सन्देश लेकर पहुँच रहा है, न कि अपने बड़प्पन या विद्वता की छाप छोड़ने के लिए। शिष्टता का अर्थ है। प्रत्येक के साथ सम्मान पूर्ण व्यवहार और शालीनता अर्थात् प्रत्येक के प्रति स्नेह और आत्मीयता की स्तरीय अभिव्यक्ति।

स्नेह और आत्मीयता तो सर्वत्र व्यक्त की जाती है। असंस्कृत वर्ग के दो मित्र मिलते हैं तो वे भी स्नेह प्रदर्शन और प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं। लेकिन उनकी भाषा में जो फूहड़पन होता है वह अभिव्यक्ति के स्तर में गिरावट ला देता है। लोकसेवी को तो अपने आचरण और व्यवहार द्वारा भी लोकशिक्षण करना है, साथ ही अपने व्यक्तित्व का स्तर भी ऊँचा उठाना है। अतः यह आवश्यक है कि व्यवहार में स्नेह, प्रेम का समावेश करने के साथ-साथ शिष्टता और शालीनता भी समाविष्ट की जाय।

शिष्टता के साथ शान्तिपूर्वक बोलने और आवेशग्रस्त न होने की आदत भी लोकसेवी के स्वभाव का अंग होनी चाहिए। वैसे बहुत से लोग स्वाभाविक रूप से ही कठोर और कटुभाषी होते हैं। जोर से बोलना या कटूक्तियाँ कहना उनके स्वभाव में ही रहता है, लेकिन यह भी सम्भव है कि वे अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रहने की दृष्टि से कठोर व्यवहार कर रहे हों। स्वभावगत कटुता तो लोकसेवी के स्वभाव में होनी ही नहीं चाहिए। सिद्धान्तों के प्रश्न पर भी लोकसेवी का व्यवहार कटु-कर्कश न हो। दृढ़ता बात अलग है और कटुता बात अलग है।

दृढ़ता का अर्थ है अपने सिद्धान्तों और मर्यादाओं पर अडिग रहने की निष्ठा। कई अवसर ऐसे आते हैं जब सिद्धान्तों से विचलित होने का भय उपस्थित हो जाता है। लोग अपने स्नेह और श्रद्धावश उस तरह का आग्रह भी करते हैं। लोगों की श्रद्धा व्यक्ति के प्रति केन्द्रीभूत होकर उसे सम्मानित करने, अभिनन्दित करने के लिए सभी उमड़ सकती है और व्यक्तिपूजा का क्रम चल पड़ता है। ऐसी स्थिति में अपने आदर्शों पर दृढ़ रहने-मर्यादाओं का पालन करने के लिए दृढ़ रहना तो आवश्यक है, पर कटु होने की कही भी आवश्यकता नहीं हैं।

अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ होते हुए भी लोगों के आग्रह को-जिनसे कि मर्यादा टूटने का डर रहता है, विनम्रता पूर्वक बचा जा सकता है। महात्मा गाँधी के जीवन में ऐसे कई प्रसंग आये जबकि उन्हें अपने सिद्धान्तों की रक्षा के लिए दृढ़ता बरतने की आवश्यकता हुई। परन्तु गाँधी जी बिना किसी प्रकार की कटुता व्यक्त किये अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ बने रहे। उनके विदेशी मित्रों ने एक बार प्रीतिभोज का आयोजन किया। उस समय गाँधीजी विदेश में पढ़ रहे थे। प्रीतिभोज का आयोजन करने वाले मित्र उनके सहपाठी ही थे, भोज में माँस भी पकाया गया और परोसा जाने लगा तो उन्होंने मना करते हुए कहा कि-मैं इसका इस्तेमाल नहीं करता।

मित्रों ने समझाया कि-इसमें क्या नुकसान है। डॉक्टर लोग ता इसे स्वास्थ्यवर्धक बताते हैं।

गाँधी जी ने कहा-’परन्तु यह मेरा व्रत है कि मैं कभी माँसाहार न करूंगा।’ मित्र वाद-विवाद पर उत्तर आये और तर्क देने लगे। बहुत सम्भव था कि गाँधीजी भी वाद-विवाद करने लगते। मित्रों ने यह कहकर तर्कयुद्ध छेड़ने का प्रयास किया कि- ‘उस व्रत की क्या उपयोगिता जिससे लाभदायक कार्यों को न किया जा सके।’ तो गाँधीजी ने यह कह कर विवाद को एक ही वाक्य में समाप्त किया इस समय मैं व्रत की आवश्यकता, उपयोगिता का सभी ख्याल नहीं कर रहा हूँ। बल्कि मेरे लिए तो अपनी माँ को दिया गया वह वचन ही काफी है जिसमें कि मैंने माँस न खाने और खराब न छूने का संकल्प लिया था।’

गाँधीजी के मित्र वहीं चुप रह गये। वहाँ सिद्धान्त रक्षा भी हो गई और कटुता भी उत्पन्न न हुई। लोकसेवी को अपनी बात नम्रता और शालीनता पूर्वक कहनी चाहिए। यह नम्रता और शालीनता अन्तःस्थल से व्यक्त होनी चाहिए। अन्यथा व्यवहार में बनावटीपन भी हो सकता है। आन्तरिक क्षेत्र में द्वेष दुर्भाव रहते हुए भी लोग मीठा बोलने और अपने को हितैषी जाहिर करने का अच्छा अभ्यास कर लेते हैं। ठग और जालसाज अपने मन में दूसरे व्यक्ति को ठगने, उसका धन छीनने की भावना रखते हुए भी बाहर से ऐसा व्यक्त करते हैं कि चतुर से चतुर व्यक्ति भी उनसे धोखा खा जाते हैं। लेकिन इस बनावटीपन का प्रभाव कुछ देर तक ही रहता है। उस क्षणिक प्रभाव में ही ठग, जालसाज अपना मतलब हल कर चलते बनते हैं।

लोकसेवी का उद्देश्य तो स्थायी प्रभाव छोड़ना और व्यक्ति की जीवन क्रिया मोड़ना है। इसलिए उसका व्यवहार आन्तरिक भावनाओं से संयुक्त होना चाहिए। सोचा जा सकता है कि हमारे अंतःकरण में जब सद्भावनाएं विनय भाव, स्नेह और प्रेम सौजन्य उत्पन्न होगा तब लोगों से अच्छा व्यवहार करेंगे। यह भी एक आत्म प्रवंचना है। लोकसेवी को अपने व्यवहार में आन्तरिक गहराई तो लानी चाहिए, पर उसके लिए अन्तःकरण में सद्भावनाओं के उदय तक अपने व्यवहार का स्तर गिरा ही नहीं रहने देना चाहिए। क्योंकि व्यवहार का उद्देश्य प्रभाव उत्पन्न करने के साथ-साथ शिक्षण करना भी तो है। व्यवहार कुशलता प्राप्त करने के साथ-साथ आन्तरिक निष्ठा के समावेश की साधना भी नियमित रूप से चलती रहे।

यदि आन्तरिक एकात्मता उत्पन्न करने के प्रयास न किये गये तो व्यवहार में बनावटीपन बना ही रहेगा और एक न एक दिन वास्तविकता सामने आने से न रुकेगी। बनावटीपन के लिए, मिथ्याचरण के लिए कितना ही अभ्यास किया जाय, पर व्यक्ति का अपने मस्तिष्क पर से जैसे ही नियंत्रण थोड़ा कम होता है वैसे ही वास्तविकता प्रकट हो जाती है। एक छोटी सी घटना-है-उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनेता जो पर्वतीय क्षेत्रों में पैदा हुए थे एक बार गम्भीर रूप से बीमार पड़े। उन्होंने आरम्भ से ही हिन्दी और अंग्रेजी बोलने का अभ्यास कर रखा था। प्रायः वे अपने मित्रों और मिलने आने वालों से हिन्दी तथा अंग्रेजी में बातें किया करते थे। विशेषतः पढ़े लिखे व्यक्तियों से तो अंग्रेजी में ही बात करते थे। बीमार पड़ने पर काफी समय तक तो वे डॉक्टरों से अंग्रेजी में बातें करते रहे, लेकिन थोड़ी देर में हिन्दी बोलने लगे। स्वास्थ्य जैसे-जैसे बिगड़ता गया वैसे-वैसे मस्तिष्क पर से उनका नियन्त्रण कम होने लगा और एक स्थिति तो ऐसी आ गयी कि वे अपने क्षेत्र की प्रचलित भाषा-पर्वतीय भाषा में बोलने लगे। सुनने वाले लोग मुँह से वह भाषा सुनकर आश्चर्य चकित हुए क्योंकि उन लोगों ने जो काफी समय से उनके साथ काम करते रहते थे कभी वह भाषा उनके मुँह से नहीं सुनी थी।

कहने का अर्थ यह कि बाहरी अभ्यास मस्तिष्क पर नियन्त्रण रहने तक ही साथ देते हैं। मस्तिष्क पर से जैसे ही नियन्त्रण हटा या कम हुआ व्यक्ति के आन्तरिक भाव दुर्गुण उभर कर सामने आ जाते हैं। यह जो मनोविज्ञान का पक्ष है, इसे भलीभाँति समझते हुए हर समाज सेवा के क्षेत्र में उतरने वाले व्यक्ति को अपने जीवन की व्यावहारिक पृष्ठभूमि पहले चिन्तन क्षेत्र में आरोपित करने का अभ्यास कर लेना चाहिए जैसे-जैसे आन्तरिक अभ्यास परिपक्व होने लगता है मनःसंस्थान उन्हीं संस्कारों में ढल जाता है जैसा कि बहिरंग के व्यवहार में उन्हें झलकना चाहिए। स्वे-स्वे आचरेण शिक्षयेत का सिद्धान्त हमारे ऋषिगण हमें पढ़ा गए हैं। उसे हमें अच्छी तरह आत्मसात् कर अपनी जीवन शैली ढालने का प्रयास करते रहना चाहिए। (क्रमशः)


VigyapanSuchana

शान्तिकुँज में कम्प्यूटर नेटवर्क पर ‘ई’ मेल आरम्भ हो गया है, इसका एक्सेस कोड नं. इस प्रकार है:-

श्व-रुड्डद्बद्य ड्डस्रस्रह्द्गह्यह्य द्धशह् ड्डष्ष्द्गह्यह्य द्धह्शठ्ठ द्बठ्ठह्लद्गह्ठ्ठद्गह्ल :

स्द्धड्डठ्ठह्लद्बद्मह्वठ्ठद्भ. द्धड्डह्स्रख्ड्डह्ञ्चह्यद्व1.ह्यश्चह्द्बठ्ठह्लह्श्चद्द.ह्यश्चह्द्बठ्ठह्ल.ष्शद्व

श्व-रुड्डद्बद्य ड्डस्रस्रह्द्गह्यह्य द्धह्शद्व फ्-400

फ्- 400ष्ट: ढ्ढहृ. ्नंकस्हृरु, क्क:स्क्कक्रढ्ढहृञ्जक्रक्कत्र, ह्र: ह्यद्व 1,

स्नहृ: स्॥्नहृञ्जह्ररुढ्ढरुय़, स्रु: ॥्नक्रष्ठंख्नक्र

स्श्चह्द्बठ्ठह्ल रुड्डद्बद्य ह्वह्यद्गह् : स्द्धड्डठ्ठह्लद्बद्मह्वठ्ठद्भ. द्धड्डह्स्रख्ड्डह्/ह्यद्व1

इससे भारत व सारे विश्व में कोई भी सूचना पहुँचाई व मंगाई जा सकती है। ग्लोबलाइजेशन की दिशा में यह एक शान्तिकुँज के रजत जयंती वर्ष में बहुत बड़ा क्रान्तिकारी कदम है।


विदाई की घड़ियाँ और गुरुदेव की व्यथा वेदना-4

(समापन किश्त)

परमपूज्य गुरुदेव ने सदा के लिए गायत्री तपोभूमि मथुरा छोड़ने का निर्णय अपनी गुरुसत्ता के निर्देश पर काफी पहले ले लिया था। भावी बीस वर्ष की जीवन की रीति-नीति क्या हो, यह वे समय-समय पर लिखते रहते थे। सदा के लिए परिजनों से जिन्हें प्यार दे-दे कर उनने परस्पर बाँधा था,बिछुड़ने की विरह वेदना क्या होती है, सही अर्थों में आध्यात्मिक पिता कैसा होता है, यह इन पंक्तियों के माध्यम से परिजन विगत 3 माह से पढ़ रहे हैं। जनवरी, फरवरी 1969 में प्रकाशित अखण्ड-ज्योति पत्रिका के पृष्ठों से उद्धृत उनके मार्मिक उद्गार इस समापन किश्त में।

हर किसी को विश्वास रखना चाहिए कि और कुछ हमारे पास हो चाहे न हो असीम प्यार भरी ममता से हमारा अन्तःकरण भरा पूरा अवश्य है। जिसने हमें तिल भर प्यार किया है उसके लिए अपने मन से ताड़ बराबर ममता उमड़ी है। लम्बी अवधि से जिनके साथ हंसते, खेलते और प्यार करते चले आ रहे हैं उनसे विलग होने की बात सोच कर हमारा मन भी गाय-बछड़े के वियोग की तरह कातर हो उठता है। कई बार लगता है कोई छाती में कुछ हूल रहा है। यह वियोग कैसे सहा जायगा। जिसकी कल्पना मात्र से दिल बैठ जाता है, उस असह्य को सहन करने में कितना बोझ पड़ेगा? और कहीं उस बोझ से यह टूटा खचड़ा चरमरा कर बैठ तो नहीं जायेगा ऐसी आशंका होती है।

प्रिय जनों के विछोह की कल्पना न जाने क्यों कलेजा को मरोड़ डालती है। ब्रह्मज्ञान की दृष्टि से यदि इसे मानवीय दुर्बलता कहा जाय तो हमें अपनी यह त्रुटि स्वीकार है। आखिर एक नगण्य से तुच्छ मानव ही तो हम हैं। कब हमने दावा किया है योगी-यती होने का।

प्यार करना सीखने और सिखाने में सारी जिन्दगी चली गई। यदि कोई धन्धा किया है तो एक महंगी कीमत देकर प्यार खरीदना और सस्ते दाम पर उसे बेचना। इस व्यापार से लाभ हुआ या घाटा उसका हिसाब कौन लगाये?

यों मरना अभी देर में है, पर जब परस्पर मिलने जुलने और हंसने-खेलने, सुनने और समझने की सुविधा न रही,एक दूसरे से दूर समीप के आनन्द से वंचित रहकर जीवित भी रहे तो यह आनंद उल्लास जिसे पाने का आदी यह मन बना चुका है, कहाँ मिल सकेगा?

जिनके असीम स्नेह जलाशय में स्वच्छन्द मछली की तरह क्रीड़ा कल्लोल करते हुए लम्बा जीवन बीत चुका अब उस जलाशय से विलग होने की घड़ी भारी तड़पन उत्पन्न करती है।

शरीर साधन और श्रम के द्वारा विभिन्न कार्यों में सहायता करने वाले भी कम नहीं रहे हैं पर उनकी संख्या और भी अधिक है जो भावभरी आत्मीयता के साथ अपनी श्रद्धा, ममता और सद्भावना हमारे ऊपर उड़ेलते रहे हैं। सच पूछा जाय तो यही वह शक्ति स्रोत रहा है, जिसे पीकर हम इतना कठिन जीवन जी सके है।

जिसने कोई प्रत्यक्ष अनुदान नहीं दिया उन पाषाण प्रतिभाओं के चरणों में आजीवन मस्तक झुकाते रहे हैं तो क्या उन देवियों और देवताओं की प्रतिमायें हमारी आराध्य नहीं रह सकतीं, जिनकी ममता हमारे ऊपर समय-समय पर बरसीं और प्राणों में सजीवता उत्पन्न करती रहीं।

सहेलियों से बिछुड़ते हुए और पति के घर जाते हुए जिस तरह किसी नव-वधु की द्विधा मनःस्थिति होती है, लगभग वैसी ही अपनी है और रुँधा कण्ठ एवं भावनाओं के उफान से उफनता अन्तःकरण लगभग उसी स्तर का है।

रात को बिना कहे चुपचाप पत्थर की तरह चल खड़े होने का साहस अपने में नहीं, इस स्तर का वैराग्य अपने को मिला नहीं। इसे सौभाग्य दुर्भाग्य जो भी कहा जाय कहना चाहिए।

अपनी सभी सहेलियों से एक बार छाती से छाती जुड़ाकर मिल लेने और अपने अब तक के साथ-साथ हँस खेलकर बड़े होने की स्मृतियों को ताजा कर फफक-फफक कर रो लेने में लोक उपहास भले ही होता हो पर अपना चित्त हल्का हो जायेगा सो ही हमसे बन पड़ रहा है-.....................सन्त, ज्ञानी, वैरागी, ब्रह्मवेत्ता के लिए इस प्रकार की वेदना, अशोभनीय हो सकती है, पर हम उस स्तर के हैं कहाँ?

लोग प्यार करना सीखें। हमें, अपने आप में अपनी आत्मा और जीवन में, परिवार में, समाज में और ईश्वर में देशों दिशाओं में प्रेम बखेरना और उसकी लौटती प्रतिध्वनि का भाव भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता है।

हमारी अन्तःस्थिति कुछ ऐसी है कि जिनका रत्तीभर भर स्नेह हमें मिला है, उनके प्रति पर्वत जितनी ममता सहज ही उमड़ती है........... जो श्रद्धा, सद्भावना, आत्मीयता, एवं ममता की दृष्टि से देखते हैं, देखेंगे, प्यार करते हैं, प्यार करेंगे, उनसे विमुख नहीं हो सकते। उनके साथ भी संपर्क किसी न किसी रूप में बनाये रहना है (समापन किश्त)


अपनों से अपनी बात-1 - नवयुग की आधारशिला रखेगी शांतिकुंज की आदर्श ग्राम योजना

भविष्य की दुनिया की आहटें जिन्होंने भी सुनी हैं, उन सबने प्रायः वहीं कहा हैं कि कल की दुनिया शहरों की नहीं गाँवों की होगी। क्योंकि जीवन के शहरीकरण ने ही पर्यावरण संकट की शुरुआत की है और आज यह विश्व संकट बनकर समूची दुनिया के सिर पर मौत की तरह मंडरा रहा है। स्थिति को भाँपते हुए इन्सानी दिमागों ने अपनी भूल स्वीकार कर ली है। संसार भर के वैज्ञानिक विचारशील अपनी मानसिक संकीर्णता पर पछतावा व्यक्त कर रहे हैं। उन्हें यह अहसास होने लगा है कि विश्व केवल मानव विश्व नहीं है। इसमें मानव के साथ मानवेत्तर प्राणी, पशु-पक्षी और वृक्ष-वनस्पति तथा पृथ्वी, वायु, प्रकाश, आकाश सबों का समायोजन है।

दूसरे शब्दों में जड़, जीव चेतन ओर आत्मचेतन के चतुर्व्यूह से निर्मित ही विश्व बनता है। इन चारों के बीच परिस्थिति सन्तुलन जरूरी है। विश्व के संरक्षण एवं विकास में मानव, पशु, पक्षी, वनस्पति और भौतिक पदार्थों को हम अलग-अलग करके सोच ही नहीं सकते। प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रतिपादित तत्वज्ञान सर्वखल्विदं ब्रह्म ईशावस्यमिदं सर्वम् इसी सर्व व्यापकता का प्रशिक्षण देते हैं।

मानव स्वार्थ पर आधारित भोगवाद की संस्कृति ने शहर तो बढ़ाए, पर इकॉलाजिकल बैलेन्स को इस कदर बिगाड़ दिया कि पर्यावरण का दुःसह संकट सबसे भयंकर संकट है जिसके सामने परमाणु युद्ध का संकट अत्यन्त क्षुद्र एवं छोटा है। अपनी सुख-सुविधा का बढ़ाने-चढ़ाने में गाँव तो उजाड़ दिए लेकिन परिस्थिति की संतुलन को ही नष्ट कर दिया। हम भूल गए कि प्रकृति तो समग्रता में है। इसलिए हमने विकृत संकीर्ण और स्वार्थ युक्त बुद्धि से जिस विश्व का निर्माण किया उसमें मानव के अस्तित्व की ही नहीं प्राणि मात्र तथा उद्भिज जग आदि से सम्पूर्ण विनाश की चेतावनी है।

इसका दूसरा कोई विकल्प नहीं कि यदि हम जीना चाहते हैं तो गाँवों की ओर लौटें। प्रकृति हमारी माता है, उसी की गोद में हम ठीक से पल सकते हैं। माता को अपंग और विखण्डित बनाकर जीवन की कामना सम्भव नहीं। यही कारण था कि जब मनुष्यता भौतिकवादी और पाश्चात्य औद्योगिक सभ्यता के उत्कर्ष से चकाचौंध हो रही थी, उसी समय सुविख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने चेतावनी दी थी, वैज्ञानिक विकास ठीक तो है, पर इसे प्रकृति विरोधी नहीं होना चाहिए।

एक वैज्ञानिक के द्वारा विज्ञान के विकास के सम्बन्ध में दी जाने वाली चेतावनी को उस समय किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया। लगातार प्राकृतिक जीवन के सुरक्षाकवच को तहस-नहस करने के प्रयास जारी रहे और आज स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि ग्रामीण जीवन को पुनर्जीवित करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है। सादगी एवं संयम की ग्रामीण संस्कृति ही मानव को उसके वर्तमान अंधेरों से निकाल कर उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन दे सकती है।

इसी सोच समझ को बिंडेल विल्की, राहुल साँस्कृत्यायन आदि मनीषियों ने अपने-अपने भविष्य दृष्टि देने वाले ग्रन्थों में प्रतिपादित किया है। समय की नस को पहचानते हुए शान्तिकुँज ने भी इसे आन्दोलन का रूप देने का निश्चय किया है। क्योंकि ग्रामीण जीवन की ओर वापसी तभी सम्भव है, जब गाँव आदर्श ग्राम का रूप ले लें, बदबूदार नालियों, स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पारस्परिक वैमनस्य से ग्रसित आज के गाँव स्वयं अपना समाधान नहीं खोज पा रहे है। ऐसी हालत में इनसे देश और समाज के लिए समाधान प्रस्तुत करने की आशा रखना निरी मूर्खता होगी।

ऐसी हाल में गांवों को सबसे पहले उनका खोया अतीत लौटाना होगा। वही अतीत जिसकी चर्चा करते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने देश भर के 7 लाख तीर्थों में बदल डालने की बात कही थी। तीर्थों से उनका आशय था कि ग्रामीण अंचल उतने ही सुरम्य, पवित्र और प्राकृतिक वन सम्पदा से भरे पूरे हों जितने कि वैदिक काल में हुआ करते थे। वहाँ का वातावरण पारस्परिक स्नेह और सौहार्द में सना हो। जातीय कटुता और ऊँच-नीच के विद्वेष की दुर्गन्ध जहाँ के वातावरण को कलुषित न करे।

वैदिक भारत में ग्रामीण जीवन का स्वरूप कुछ ऐसा ही था। सुविधाओं की दृष्टि से भले आज के शहरी जीवन की अपेक्षा कुछ न्यून रहे हों। लेकिन यहाँ की सोच समझ और मानसिक उर्वरता आज के वैज्ञानिकों को जन्म देने वाले स्थानों से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी थी। विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में अनेकों स्थानों पर (3/33/11, 10/27/19, 10/127/5 आदि) न केवल ‘ग्राम’ शब्द का उल्लेख है बल्कि ग्रामीण जीवन की महनीयतौर महत्ता के अनेकों प्रमाण मिलते हैं। वेदों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि अधिकाँश वैदिक ऋषि कृषि कर्म करते थे।खेतों में खड़ी लहलहाती फसलों के बीच और छनी अमराई की छाँव के नीचे ही वैदिक ऋचाएं गूँजी थी। उपनिषद् के स्वर मुखरित हुए थे।

वैदिक जीवन पद्धति का अन्वेषण करने वाले अधिकाँश अन्वेषकों ने उपरोक्त कथन की पुष्टि में अनेकानेक प्रमाण दिए हैं। इस सम्बन्ध मं, आर.मुकर्जी की ‘द डायनिमिक्स आफ रुरल सोसाइटी ओ॰ लेविस की विपेज लाइफ इन नार्दर्न इण्डिया, तथा जिंकिन की इण्डियाज चेंजेस वी0 सिंह की नेक्स्ट स्टेप इन विलेज इण्डिया, अमिता रे की विलेजेज, टाउन्स एण्ड सेक्यूलर विल्डिंग्स इन एन्शियेन्ट इण्डिया और आर॰ श्रीनिवास की इण्डियन विपेज विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

इन पुस्तकों के अध्ययन से न केवल वैदिक संस्कृति को जन्म देने वाले प्राचीन ग्रामों का स्रुप स्पष्ट होता है बल्कि इसके भी सूत्र मिलते हैं हम फिर से कैसे अपनी प्राचीन संस्कृति को वापस ला सकते हैं। शान्तिकुँज द्वारा चलाए जा रहे ‘आदर्श ग्राम योजना आन्दोलन’ के पीछे सोच-समझ की यही गहराई काम कर रही है।

आदर्श ग्राम की सीमा रेखा, सुविधा सहूलियतों से भरे-पूरे गाँव तक सीमित नहीं हैं। इसमें व्यक्ति निर्माण परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के सभी सम्भव सूत्रों का समावेश का गया है। यह ठीक है कि गाँव-राष्ट्र की इकाई है। परन्तु इस इकाई को स्वतः समर्थ होना चाहिए। शरीर विज्ञान से परिचित जानते हैं कि कोशिका शरीर की इकाई भले हो इसमें ऊर्जा उत्पादन, नवनिर्माण आदि की सारी प्रक्रियाएं अहिर्निश गतिमान रहती है। संक्षेप में इसे शरीर का छोटा प्रतिरूप कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। ठीक इसी तरह से आदर्श ग्राम को विश्व की समर्थ इकाई बनने के साथ-साथ समग्र विश्व का छोटा प्रति रूप बनने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

इस तरह के आदर्श ग्राम निर्माण का पहला सूत्र है सफाई स्वच्छता। स्वच्छता की कमी में ग्रामवासियों की श्रमशीलता का अभाव न होकर प्रायः सूझ-बूझ और सोच की कमी हो रही है। इसी कमी की पूर्ति अपने परिजन करेंगे। पूज्य गुरुदेव के विचारों और भावनाओं को लोक जीवन के लिए ग्राह्य शैली में बताकर उन्हें इसका महत्व बताया जा सकता है। साथ ही स्थान विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी योजनाएं बनायी जा सकती हैं, जिनसे पानी के निकास आदि में सहूलियत हो सके। कूड़े, कचरे, बच्चों के मल-मूत्र, पशुओं के गोबर आदि को गाँव के बाहर गड्ढों में दफन किया जा सकता है। इससे जहाँ एक ओर घर और रास्ते दोनों साफ रहेंगे, वहीं दूसरी ओर दफन की गयी गंदगी कम्पोस्स्ट खाद में परिवर्तित होकर खेतों के काम आ सकेगी। अच्छा हो इन प्रयासों के लिए सामूहिक श्रमदान के लिए प्रेरित किया जाय। इससे श्रमदान की प्रवृत्ति के साथ सामूहिक भावना और सहकारिता की वृत्ति का विकास होगा।

बाहरी सफाई का बहुत महत्व है, शारीरिक स्वास्थ्य के लिए यह अतिशय जरूरी भी है। लेकिन शारीरिक बीमारियों से कहीं अधिक खतरनाक मानसिक दुष्प्रवृत्तियाँ और दुर्व्यसन हैं जो ग्रामीण अंचल के जीवन में जड़ जमा कर बैठे हैं। इन दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन के लिए गायत्री यज्ञों के माध्यम से देव दक्षिणा के लिए उन्हें संकल्पित कराया जा सकता है। लेकिन यह तस्वीर का एक पहलू हैं कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर होता है। जिस घर में कोई न रहता हो वहाँ भूत बसने लगते हैं।

ठीक इसी तरह दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन तभी सम्भव है जब सत्यवृत्ति सम्वर्धन के आयोजन साथ-साथ चलाए जाएं। शराब, तम्बाकू, हुक्का, बीड़ी, अफीम आदि दुर्व्यसनों की हानियाँ समझाने एवं इनके प्रति हेय वृत्ति जगायी जानी चाहिए। इस क्रम में यह भी बताया जाय कि जिस तरह से ये दुर्व्यसन हमारे शरीर को खोखला करते हैं, उसी प्रकार दहेज प्रथा, मृतकभोज आदि कुरीतियाँ हमारे सामाजिक जीवन को पंगु बनाती है। अतएव इनसे छुटकारा पाने में ही कल्याण है।

ग्रामीण जन कुरीतियों की ही तरह अन्धविश्वास और मूढ़ताओं के चक्रव्यूह में भी बुरी तरह घिरे हैं। भूत-प्रेतों के नाम ओझा, बाजीगर उन्हें तरह-तरह से ठगा करते हैं। इसकी निवृत्ति का समर्थ उपाय गायत्री उपासना है। आदि शक्ति की महिमा और गरिमा से परिचित होने पर चित की वह हीनता की ग्रन्थि सहज खुल जाती है, जिसके कारण वे अब तक तरह-तरह से ठगे जाते रहे। जो धन और भावनाएं अभी तक इस कुचक्र में खपती रहीं, उन्हें यदि लोक मंगल में लगाया जा सके तो न सिर्फ पुण्य लाभ होगा, बल्कि परमात्मा की सहज कृपा मिलने से जीवन की अगणित समस्याएं अपने आप सुलझ जाएंगी।

गाँवों में जुलाई-अगस्त के दो महीनों में धान आदि की रोपाई में व्यस्तता रहती है। इसी तरह अक्टूबर नवम्बर के दो महीनों में गेहूँ की बुवाई की व्यस्तता हो जाती है। बीच की व्यस्तता खाद-पानी और निराई-गुड़ाई की होती है, जो महीनों की नहीं दिनों की है। इस तरह ग्रामीण जीवन में खाली समय की बहुतायत रहती है और यह खाली समय या तो नाच-नौटंकी में जाता है अथवा दुर्व्यसनों के चंगुल में छटपटाता रहता है। ग्रामीणजनों को इस बात का बोध कराना होगा कि वे खाली समय का उपयोग अपनी प्रतिभा के विकास में कर सकते हैं। साथ ही अपनी उद्यमिता को विकसित करके उन कुटीर उद्योगों-गृह उद्योगों को अपना सकते हैं, जो उनके गाँव की परिस्थितियों के अनुकूल हैं।

इस क्रम में न केवल खाली समय का सृजनात्मक उपयोग तो होगा ही, बल्कि उन्हें पढ़ने लिखने-नया सीखने के अवसर सुलभ होंगे। साक्षरता के इस विकास से ग्रामीण अंचल के लोग भी विश्व-ब्रह्मांड की नयी-नयी जानकारियों से परिचित हो सकेंगे। सत्साहित्य के अध्ययन की प्रवृत्ति उनके जीवन की दिशा और दशा में बहुमूल्य सुधार लाएगी। इसी तरह कुटीर उद्योगों और गृह उद्योगों का विकास उन्हें आर्थिक उपार्जन के नए अवसर प्रदान करेगा।

इसमें महिलाओं की भागीदारी होना अनिवार्य है। यों कतिपय तथा कथित बड़प्पन के नशे में डूबे घरों को छोड़कर आम तौर पर ग्रामीण महिलाएं स्वभावतः श्रमशील होती है। कृषि आदि कार्यों में उनकी पुरुषों के साथ बराबर की भागीदारी होती है। इतने पर भी उन्हें अनगिनत सामाजिक प्रतिबंधों में जीना पड़ता है। ग्रामीण जनों को इस बात का बोध कराए जाने की सख्त आवश्यकता है महिलाएं कोई वस्तु नहीं व्यक्ति हैं। उनका एक समर्थ व्यक्तित्व है जिसे विकसित होने के भरपूर अवसर मिलने चाहिए। आखिर मुगल शासन को अपने शौर्य से चुनौती देने वाली रानी दुर्गावती भी तो ग्रामीण अंचल की साधारण कन्या थी।

उद्यमिता के इस विकास में पशुपालन को सर्वोपरि स्थान देने की बात सोची जानी चाहिए। इस मशीनी युग में पशुओं की उपेक्षा बढ़ी है। ट्रैक्टरों की भरमार से अब बैल रखना शान के खिलाफ समा जाने लगा है। बड़ी जोत के किसान ट्रैक्टर रखो यह ठीक बात है। लेकिन छोटी जोत वाले लोग भी बैल न रखें और फसल बोने और जोतने के समय इन धनी मानी लोगों के मुँह ताकते रहें-यह कहाँ तक उचित है। अच्छा तो यह हो कि सभी बैल रखे, गाय भैंस पालें। इससे सहूलियत तो होगी ही गाँवों में फिर से दूध दही की नदियाँ बहने लगेंगी। इससे भी बड़ा फायदा होगा कि खेतों में गोबर की खाद बढ़ने से हर साल बढ़ने जा रही बंजर भूमि का सिलसिला रुकेगा।

उद्यमिता विकसित हो सकी, सामूहिकता पनप सकी, तो उन प्रवृत्तियों पर सहज अंकुश लग जाएगा जो ग्रामीण जीवन में जहर घोल रही हैं। गुटबाजी और ओछी राजनीति का सिलसिला अपने आप थम जाएगा और वह आत्मीय सम्वेदना अपने आप विकसित हो सकेगी, जिसके लिए गाँव ख्याति प्राप्त रहे हैं। समूचे गाँव को एक कुटुम्ब मानकर चलना गाँववालों की ऐसी अद्भुत विशेषता है, जिसका अन्यत्र उदाहरण ढूँढ़े नहीं मिलता। एक की बेटी गाँव भर की बेटी होती हैं एक का मेहमान सारे गाँव का मेहमान माना जाता है। ग्रामीण जीवन आज के दौर में धीरे-धीरे खोती जा रही इन विशेषताओं को फिर से पा लेगा।

आदर्श ग्राम की योजना में ग्राम तीर्थ की स्थापना को महत्वपूर्ण माना गया है। यूँ मन्दिर तो हर गाँव में हैं। पर वे अपना उद्देश्य भूल चुके हैं। अच्छा तो यह हो कि इन्हीं मन्दिरों को ग्राम तीर्थ का रूप दिया जाए। ये मन्दिर देवालय के साथ पुस्तकालय का भी रूप लें। यहाँ सत्संग के साथ स्वाध्याय की सभी सुविधा उपलब्ध हो। मन्दिर के परिसर में उपयोगी जड़ी-बूटियों का एक छोटा उद्यान लगाया जाय। जिसमें रोज-मर्रा में काम आने वाली औषधियों के पौधे लगे हों। ग्रामीण अंचलों में अभी भी जड़ी-बूटियों के इतने अच्छे जानकार मिल जाते हैं, जितना ज्ञान कभी-कभी प्रशिक्षित आयुर्वेदाचार्य को भी नहीं होता। परन्तु उनमें इस ज्ञान को गोपनीय रखने की घातक प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को दूर कर औषधियों की वैज्ञानिक जाँच-परख का सिलसिला शुरू होना चाहिए।

ग्राम तीर्थ की भाँति गाँव के लिए पाठशाला और चिकित्सालय भी आवश्यक हैं, ताकि शिशुओं को शीघ्र ही पढ़ने-लिखने के अवसर सुलभ हो जाएं। चिकित्सालय के संदर्भ में गायत्री परिवार ने ग्राम्य चिकित्सा सेवा का कार्य करना शुरू किया है। स्थानीय परिजनों को सभी प्रशिक्षित चिकित्सकों के माध्यम से इस कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए, ताकि ग्रामीण जनों विशेषतः बच्चों और स्त्रियों के स्वास्थ्य-सुधार में तेजी आ सके।

आदर्श ग्राम योजना का कार्य तब तक पूरा नहीं माना जाएगा जब तक वहाँ के लोगों में कोर्ट कचहरी का दुर्व्यसन समाप्त नहीं हो जाता। छोटी-छोटी बात को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लेना, फिर इसके लिए अदालत में अपनी सारी धन सम्पत्ति गँवा बैठना एक ऐसा रोग है, जिससे आम ग्रामीण जनता बहुत व्यथित है। इस व्यथा को कतिपय शकुनि और माहिल बढ़ाने में जुटे रहते हैं। ऐसे लोगों का सामूहिक बहिष्कार करके समझदार-सुलझे हुए लोगों की पंचायत गठित होनी चाहिए, जो दोनों पक्षों के हितों का ध्यान रखते हुए सुलह करा सके।

आदर्श ग्राम योजना का क्रियान्वयन प्राचीन वैदिक संस्कृति का पुनर्जीवन है। सादगी और संयम की संस्कृति का जागरण है। पाश्चात्य जगत में भी स्वैच्छिक दरिद्रता या आवश्यकताओं के परिसीमन का आन्दोलन शुरू हो गया है। जो अपने ऋषियों की उस विचारधारा का अनुसरण है जिसे हम स्वयं भुला बैठे है। राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है-रेल, मोटर, यान चाहे जो चढ़ो सोच लो, पहले तुम्हें जाना कहाँ हैं? ग्रामीण संस्कृति का विज्ञान केवल भौतिकवादी उपभोक्ता संस्कृति का ही निरोधक नहीं, वह आध्यात्मिक उन्नयन का भी पासपोर्ट है। पातंजलि ने भी अष्टाँगिक योग में यम-नियम तथा महावीर और बुद्ध ने पंच महावत एवं पंचशील की व्यवस्था दी है। जो ग्रामीण संस्कृति के मेरुदण्ड सादगी और संयम का ही विस्तार है। इतिहास को कुरेदने पर पता चलता है कि जो संस्कृतियाँ भोगवादी और अनैतिक रही हैं, उनका नामोनिशान मिट गया। कहाँ है, सोअम एवं गमोरा की संस्कृतियाँ। भारतीय संस्कृति चिरंजीवी इसीलिए है क्योंकि यह ग्रामीण संस्कृति है, सादगी एवं संयम की संस्कृति है। अच्छा हो, हम सब अपनी चिरंजीवी संस्कृति को नव जीवन दें। आदर्श ग्राम योजना को उत्साह पूर्व नवयुग के स्वागत समाहरो का रूप दे डालें।


अपनों से अपनी बात-2 : अनुयाज-पुनर्गठन - आश्वमेधिक अनुयाज का शुभारंभ

इस अंक से आश्वमेधिक ‘अनुयाज’ पर विशेष लेखमाला आरम्भ की जा रही है। आँवलखेड़ा में सम्पन्न हुए प्रथम पूर्णाहुति समारोह के समय घोषित की गई 6 महाक्रान्तियों का क्रियापरक रूप ही यह अनुयाज है। इस लेखमाला की प्रस्तुति के पीछे दो महती आकाँक्षाएं है॥ पहली-समस्त परिजन भाई बहनें इसे ध्यानपूर्वक पढ़ें-समझें- क्रियान्वित करें। दूसरी-अपने परिचय व प्रभाव क्षेत्रों में इसे पढ़ाने-समझाने व कार्यान्वित कराने में भगवान महाकाल के दूत की सक्रिय भूमिका निभाएं। विश्वास है कि इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य की इन 6 महाक्रान्तियों, अनुयाज कार्यक्रमों द्वारा अगवानी करने के लिए सभी आगे आएंगे।

इस मिशन के प्रति सद्भाव तथा कार्यों के प्रति विश्वास रखने वाले अन्य सभी भाई-बहनों को, तथा परोपकार समन्वित आत्मोन्नति में रुचि रखने वाले सभी पाठकों को भी भाव भरा आमन्त्रण है कि विश्वकल्याण के संकल्प से प्रेरित इन छः महाक्रान्तियों-अनुयाज कार्यक्रमों में वे भी सक्रिय भागीदार बनने का अनुग्रह करें।

विदेशों व भारतवर्ष में आयोजित छब्बीस, अविस्मरणीय अश्वमेध समारोहों की गरिमामयी प्रथम पूर्णाहुति सत्ताइसवें अश्वमेध के साथ परमपूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली आंवलखेड़ा में नवम्बर 1995 में सम्पन्न हुई। उस समय दो महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई थी। (1) कुछ समय के लिए अश्वमेध आयोजनों का स्थगन, तथा (2) छः सूत्रीय आश्वमेधिक ‘अनुयाज’ का प्रारम्भ। अश्वमेधों की स्थगन घोषणा से अनेक परिजनों में भ्रम की स्थिति निर्मित हो गई, ‘अश्वमेध क्यों बन्द कर दिये’? ‘लोगों के उत्साह को रोकर अच्छा नहीं किया, ‘ इत्यादि। यह मिशन परिजनों का ही है। उनका उत्साह ही मिशन का प्राण है। अतः उसे रोकने की कभी कल्पना भी नहीं होती। स्थगन के कारण कुछ और हैं। उस समय स्थगन घोषणा के साथ-साथ कारणों को भी स्पष्ट किया गया था। किन्तु भ्रम कदाचित अभी भी है, अतः उसका निवारण करने के लिए कारणों को पुनः स्पष्ट किया जा रहा है।

अश्वमेध शृंखला को तीन प्रमुख कारणों से रोकना आवश्यक था :

(1) अश्वमेधों के ‘प्रयाज’ तथा ‘याज’ कार्यक्रमों में जाने अनजाने में जो जो भूलें हुई, उनको तथा उनके कारणों को ढूंढ़ना व समीक्षा करना जिससे कि भविष्य में उनकी पहले से ही रोकथाम की जा सके और व्यापक हानियों से बचा जा सके।

(2) जो जो प्रगतियाँ-उपलब्धियाँ हुई उनको स्थायी बनाए रखने के लिये उन्हें और सभी बढ़ाने के लिए, ‘अनुयाज’ जैसा आवश्यक उपाय निर्धारित करना, विकसित करना तथा, क्रियान्वयन की व्यवस्था बनाना।

(3) समस्त भूलों-उपलब्धियों का मूल्याँकन करना तथा निष्कर्षों के आधार पर अगले कदमों को निर्धारित करना।

पहले और तीसरे कारणों पर व्यापक समीक्षा की जा रही है। समीक्षा के निष्कर्षों से परिजनों को समय-समय पर निश्चय ही अवगत कराया जाता रहेगा। अतः अब इसके कारण ‘अनुयाज’ पर विचार करें।

अपने-अपने क्षेत्र के अश्वमेध प्रारम्भ होने के महीनों पहले से परिजनों ने रात-दिन कठोर परिश्रम किया गाँव- गाँव की माटी इकट्ठी करने व दीवाल लेखन आदि से प्रारम्भ कर अश्वमेध क्षेत्र की समूची जनसंख्या से निकट संपर्क स्थापित किया। शिक्षित या अशिक्षित, शहरी या ग्रामीण, नर नारी-बच्चे, किसी को नहीं छोड़ा। मिशन उसकी नीति-रीति से गायत्री व यज्ञ के महत्व से, भारतीय संस्कृति से और भारतीय होने के गौरव से उन्हें उनकी समझ के अनुसार अवगत कराया, प्रभावपूर्ण प्रेरणाएं दी, और इन सबके मूर्तरूप को अपनी आँखों देखने के लिए अश्वमेध में पधारने का भाव भरा आमंत्रण दिया। यह ‘प्रयाज’ था, अश्वमेध की पूर्व सुगन्ध थी, जिसने लाखों नहीं करोड़ों मानों को छू लिया, नवीन चेतना व उमंग से भर दिया।

समर्पित भाव से की गई परिजनों की इस कठोर श्रम-साधना के विस्मयकारी परिणाम अश्वमेध सम्पन्न होने की अवधि के पाँच दिनों में दिखाई पड़े। इन सत्ताईस अश्वमेधों में छः करोड़ से अधिक नर-नारी-बच्चे अपना धन, श्रम व समय लगाकर, अपना काम छोड़ कर आए। भीड़ में होने वाली कष्ट कठिनाइयों को बिना खीजे सहते रहे। अपने लिए प्रतिबन्धित की गई गायत्री को और यज्ञ को मुक्त रूप में देखा तो भाव विभोर हो उठे। परिजनों और मिशन के प्रति कृतज्ञता से भर गए। प्रत्यक्ष देखा और समझा कि यह मिशन क्या है। उसकी वैचारिक व भावनात्मक क्रान्ति के तत्व समझे, प्रभावित हुए और उनके बीज अपने चिन्तन में साथ ले गए। यह ‘याज’ था, अश्वमेध की सद्य-सुगन्ध थी, जो उन छः करोड़ से अधिक नर-नारी बच्चों के मानस में फैल गई और मिशन के प्रति श्रद्धा व अपनेपन की सुवास भर गई।

अब यह आवश्यकता अनुभव की जा रही है कि ऐसी प्रभावी व्यवस्था बनाई जाय जिससे परिजनों ने जो कठोर श्रमसाधना की है उसके परिणाम यही तक सीमित न रह जायं। जो उपलब्धियां परिजनों ने भारत में तथा विदेशों में हस्तगत की हैं और मिशन को सौंपी हैं वे समय की गर्द में दब कर लुप्त न हो जाएँ। वे विकसित हों तथा स्थायी स्वरूप धारण करें। इस विकास व स्थायित्व से निश्चय ही मिशन का भी आकार बढ़ेगा, स्तर ऊँचा उठेगा, अगली छलाँग के लिए अच्छी स्थिति बनेगी।यही आज की अनिवार्य आवश्यकता है प्राथमिक आवश्यकता है। अश्वमेधों के द्वारा युग निमार्ण मिशन के प्रति,प्रयाज व याज कार्यक्रमों में से झाँकती वैचारिक क्रान्ति के प्रति तथा स्वयं परिजनों के सेवाभावी व्यक्तित्व के प्रति विशाल जन समुदाय की जो आस्था व आत्मीयता जुड़ गई है, उसे स्थायी करना चाहिए। विशाल जन समुदाय को मिशन की हितकारी बाँहों में समेटना चाहिए, क्रियात्मक रूप से अपना बनाना चाहिए।

यही ‘अनुयाज’ है, अश्वमेध के बाद की सुवास है, अश्वमेध की उत्तर सुगन्ध है, जिसे उन करोड़ों श्रद्धावानों तक उनके ग्रामों-कस्बों में पहुँचाना है। प्रयाज और याज से उत्पन्न हुई आस्था आत्मीयता की भावना को अनुयाज ही क्रियात्मकता में बदल सकता है। अनुयाज ही परिजनों की श्रमसाधना से उत्पन्न सत्परिणामों को स्थायी बना सकता है। इसीलिए अनुयाज अब हम सबकी प्रथम आवश्यकता है।

अश्वमेधों से लौटकर यह छः करोड़ जनसंख्या अपने-अपने गाँव-कस्बों में चुपचाप बैठी है, प्रज्ञा परिजनों की प्रतीक्षा कर रही है। तैयार की गई भूमि अभी भी तरोताजा है। अतः जाकर अब अनुयाज के बीज बोना है, और बीजों के विकास की व्यवस्था करना है। इन दो प्रयासों से, श्रम-बिन्दुओं से, यदि कँटीले पौधे छटेंगे और शानदार फसल लहलहाएंगे तो हम सबसे अधिक भला और किसकी छाती फूलेगी। प्रत्येक मेहनती किसान निश्चय ही प्रभु-प्रदत्त यह आनन्द पाता है।

प्रथम पूर्णाहुति समारोह के अवसर पर जिन 6 महाक्रान्तियों को प्रारम्भ किये जाने की घोषणा की गई थी, वे आश्वमेधिक अनुयाज ही हैं। जीवन का प्रत्येक पक्ष इनकी लपेट में आ जाता है। मानव के सर्वांगीण विकास की कल्पा को वे साकार कर सकती हैं, यथा :—

(1) आध्यात्मिक पुनर्जागरण (2) वेद स्थापना (3) पर्यावरण सन्तुलन (4) नारी जागरण (5) ग्राम्य स्वास्थ्य सेवा (6) लोक-रंजन से लोक-मंगल।

इन महाक्रान्तियों की सीमाएं विस्तृत है। अतः क्रियान्वयन की सुविधा के लिए तथा क्रियापरक स्वरूप देने के लिए उन्हें 14 संकल्पों में फैला दिया गया है। वे ही आश्वमेधिक समुद्र मंथन से निकले 14 रत्न हैं जो निम्न हैं :—

(1) स्वाध्याय -मनन-चिन्तन (2) विश्व कल्याण के लिए समर्पित गायत्री मन्त्र जप अथवा भगवन्नाम जप, अथवा अपने-अपने धर्म सम्प्रदाय का मंत्र जप। (3) गायत्री मन्त्र अथवा भगवन्नाम लेखन। (4) ज्ञान-यज्ञ, दीप यज्ञ आदि द्वारा आस्था जागरण, मिशन का विस्तार। (5) तुलसी का व्यापक रोपण-रक्षण-सिंचन। (6) पंच महावृक्षों तथा जैनोसिया अशोक का व्यापक रोपण रक्षण-सिंचन।

(7) जीव दया। माँसाहार का त्याग। (8) नारी प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना। नारी शक्ति जागरण का व्यापक अभियान। (9) नारियों का कुटीर-उद्योग प्रशिक्षण। जीवनोपयोगी व्यवहारिक ज्ञान। (10) आर्थिक विपन्नताग्रस्त कन्याओं की शिक्षा व्यवस्था। (11) बालक-बालिकाओं में संस्कार संवर्धन। (12) स्वास्थ्य संरक्षण। शाकाहार प्रचार। (13) योग प्रशिक्षण। योग का प्रचार-प्रसार (14) लोकरंजन से लोकमंगल।

उपरोक्त 14 अनुयाज संकल्पों की एक-एक करके विस्तृत विवेचना तथा क्रियान्वयन पद्धति अखण्ड ज्योति में प्रकाशित की जाती रहेगी, साथ ही इस पर एक समग्र पुस्तिका प्रारम्भ में एवं अलग-अलग प्रत्येक पर सभी प्रकाशित की जा रही हैं, ताकि सभी उसे क्रिया रूप दे सकें। परिजनों से अनुरोध है कि वे इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ें, समझें तथा कार्यान्वित करें। परिवार-जनों से, सम्बन्धियों से तथा मित्रों से व्यक्तिगत चर्चाओं में इन्हें सभी सम्मिलित किया करें। मण्डलों तथा शक्तिपीठों की विचार गोष्ठियों में तथा कार्य निर्धारण करते समय इन पर विशेष चर्चा किया करें। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रचार एवं क्रियान्वयन का रूपरेखा निर्धारित किया करें।

निश्चय ही ये महाक्रान्तियाँ हैं, बड़े संकल्प हैं, किन्तु परिजनों के साहस व उत्साह उनसे कहीं अधिक बड़े हैं मनोबल व निष्ठा की परीक्षा है। सत्ताईस अश्वमेध पार कर चुके है। इन सबसे बड़ा महाकाल का संरक्षण व आशीष हमारे साथ है। अतः क्रान्तियों-संकल्पों के बड़े होने की चिन्ता न करें। ‘रहमत तेरी मेहनत मेरी’ इस प्रेरणा को मन में बिठाकर अपने धर्म कर्तव्य पर लग जाय।

पिछले दिनों एक विलक्षण खगोलीय घटना अंतरिक्ष जगत् में देखी गई। जब ‘हयाकुताके’ नाम धूमकेतु पृथ्वी के निकट आ पहुँचा, यह संयोग मात्र है कि यह धूमकेतु जिन दिनों नंगी आँखों से देखे जाने लायक चमकीला स्था, उस समय पूरे भारत में नवरात्रि का संधि पर्व मनाया जा रहा था। रामनवमी के दिन से यह सूर्य के अत्यधिक समीप आने के कारण यह अदृश्य हो गया। अब तक की किंवदंतियों के अनुसार जब-जब भी धूमकेतु प्रगट हुए हैं तब-तब भारी उथल-पुथल पूरे धरती एवं विश्व पटल पर हुई। इन्हीं दिनों अमेरिका और चीन के बीच अत्यधिक तनाव देखा गया। क्योंकि चीन स्वतन्त्र देश तैवान में चुनाव होते नहीं देखना चाहता था। चीन का युद्धाभ्यास इन्हीं दिनों चालू हुआ और जब अमेरिकन युद्ध-पोत भी तैवान की खाड़ी के नजदीक पहुँच गया तो एक युद्ध की पूर्व भूमिका तैयार हो चुकी थी। संयोग से यह सभी अब टल गया। इसी धूमकेतु के आने की पूर्व वेला में भारत के राजनीतिज्ञों को हिचकोले देने वाला ‘हवाला-काण्ड’ हुआ और इन्हीं दिनों चुनाव की घोषणा भी की गई।

अगले वर्ष अप्रैल में एक और बड़े धूमकेतु ‘हेल-बाब’ के आने की संभावना है, जो कि इससे भी काफी बड़ा होगा। यह परिवर्तन का समय है एवं ऐसी अन्तर्ग्रही घटनाओं को विगत की हलचलों के परिप्रेक्ष्य में देखते हुए महाकाल के लिए सृजन की तैयारी एवं मानव जाति के क्रिया-कलापों, चिन्तन-व्यवहार में परिवर्तन पर गहन विचार-विमर्श होना चाहिए। सूक्ष्म जगत के परिशोधनार्थ किये जा रहे युगसंधि महापुरश्चरण की इस समय बड़ी स्पष्ट भूमिका है।


अपनों से अपनी बात-3 : अनुयाज-पुनर्गठन - स्वाध्याय-मनन-चिन्तन आज की सर्वोपरि आवश्यकता

टूटता विश्व आज की सर्वोपरि समस्या

इसे ईश्वर की लीला कह लें अथवा काल चक्र का निर्धारण कि यह विश्व सत् व तम् के मध्य कभी न समाप्त हो वाले संग्राम का युद्ध क्षेत्र बना ही रहता है। कभी सत् पर होने वाले प्रबल तामसी आक्रमण उसे पंगु सा बना देता है, कभी तम का शमन कर सत् विश्व में व्याप्त हो जाता है। पुराणों में वर्णित देवासुर संग्राम के कथानक इसी तथ्य के रोचक रूप हैं।

कालखण्ड के जिस खण्ड में हम-आप जी रहे हैं वह सभी ऐसी ही एक विषम स्थिति है। इस समय तमस् अपनी पूरी उफान पर है। आकाश तक ऊँची उठ रही उसकी ज्वालाएं सत् को सम्पूर्णतः भस्मीभूत कर देने का प्रयास कर रही है। मानव मन झुलस कर काला हो रहा है। यह सब तब हो रहा है जब भौतिक उपलब्धियाँ सभी अपने सर्वोच्च स्तर पर है। जितनी सुख-सुविधाएं आज सहज ही उपलब्ध हैं उतनी पहले कभी किसी काल में नहीं रहीं किन्तु इनके परिणाम उलटे ही दिखाई पड़ रहे है। व्यक्ति की छवि में से तृप्ति तुष्टि व सहज मुसकान लुप्त हो गई है। परिवार में से सौहार्द्र भाव कपूर की भाँति उड़ गया है। समाज में समान उद्देश्य व आपसी सहयोग कभी, उसका आभास सभी अब नहीं होता। राष्ट्रों का मैत्री भाव दिखावा बनकर रह गया है। स्वार्थ-शोषण ही परम इष्ट बन सा गया है। दसों दिशाओं में चीत्कार-हाहाकार की गूँज है। कहीं चैन नहीं है। सुविधाओं में सिर तक डूबा हुआ विश्व आज सिर से पैर तक तनावग्रस्त है। मनुष्य टूट रहा है, परिवार टूट रहा है, समाज टूट रहा है, पूरा विश्व टूट कर बिखर रहा है। कालचक्र का तमस खण्ड अपने चरम उत्कर्ष पर है।

विश्वव्यापी प्रयास निष्प्रभावी सिद्ध हुए-

किन्तु सत् बिल्कुल निष्प्राण हो गया हो, ऐसा भी नहीं है, ऐसा कभी होता भी नहीं है। श्रेष्ठ पुरुषों तथा संस्कारवान परिवारों में सेवा भावी कतिपय स्वैच्छिक संगठनों तथा विश्व संस्था राष्ट्र संघ में धीमी-धीमी साँसें लेता हुआ वह अभी भी दृष्टिगोचर होता है। मानव हित का चिन्तन करने वाले इन सभी के प्रयास निश्चय ही सहनीय है।, किन्तु विशाल मानव समुदाय को प्रभावित करने में, मानव मन को मर्यादा की सीमा में रखने में, तमस् से मोड़कर सत् की दिशा में प्रेरित करने में उनकी सार्थकता अभी तक सिद्ध नहीं हो पाई है। इस असफलता का एक तर्कसंगत कारण यह समझ पड़ता है कि वे दुष्कृत्यों को रोकने में ही अपनी पूरी शक्ति व्यय कर रहे हैं, दुष्कृत्य जहाँ जन्म लेते हैं और पनपते हैं उस भूमि को सुधारने-संवारने का प्रयत्न नहीं रहे। सूख रहे वृक्ष के पत्तों पर तो दवा का छिड़काव करते हैं, किन्तु जड़ में समाए रोग को दूर करे की चिन्ता नहीं करते। फलस्वरूप इन बलवान प्रयासों को भी असफलता का मुँह देखना पड़ रहा है। व्यक्तिवाद, अलगाववाद, आतंकवाद, विकसित राष्ट्रों की विकासशील राष्ट्रों पर दादागिरी जैसे भीषण विस्फोटक बढ़ते ही जा रहे हैं। मानवी सभ्यता व संस्कृति को इन विस्फोटकों के ढेर पर बिठाकर अपनी ज्वालाओं को लपलपाता हुआ तमस उसके चारों और उन्मत्त नृत्य कर रहा है, और बेचारे सत्प्रयास असहाय से होकर यह सब होता हुआ देख रहे है।

युग निर्माण मिशन की मान्यता-

विश्व को इस विस्फोटक स्थिति से सकुशल उबार लेने का कारगर उपाय यही हो सकता है कि असफल हो गए पिछले प्रयासों में जहाँ चूक हुई है वहीं पर भूल का सुधार कर पुनः प्रयास किया जाय। पत्तों की नहीं, जड़ों की सम्भाल की जाय।

मनोविज्ञान के मान्य नियमों पर आधारित व्यवहार विज्ञान से भी इस उपाय की पुष्टि होती हैं। व्यवहार विज्ञान के अनुसार मनुष्य का व्यवहार शरीर के अवयवों द्वारा अभिव्यक्ति तो होता है, परन्तु उत्पन्न वह विचार क्षेत्र व भाव क्षेत्र में होता है। पत्ते अपने आप नहीं सूखने लगते, जड़ें रस एकत्रित नहीं कर पाती अथवा जड़ों में दीमक लग जाती है इसलिए सूखते हैं। गन्दे आचरण व्यवहार भी अपने आप नहीं होने लगते, मन मैला हो तभी होते हैं। इसलिए रोग का नहीं, रोग की जड़ का इलाज करना ही सही इलाज है। सफलता का इतना ही रहस्य है।

हमारा विचार क्रान्ति अभियान इसी आधारभूत नियम का अनुसरण कर सफलता के नवीन कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। इस अभियान की मान्यता है कि व्यक्ति से लेर विश्व तक में फैला हुआ तनाव, टूटन व बिखराव अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति के कारण नहीं वरन् विज्ञान को अध्यात्म के, विवेक के अनुशासन से मुक्त रखने के कारण आया है। अनगिनत सुख-सुविधाओं के कारण नहीं वरन् असीमित अनियन्त्रित तृष्णा के कारण आया है। मनः क्षेत्र तथा भाव क्षेत्र में व्यापक प्रदूषण के कारण आया है।अतः वर्तमान विस्फोटक स्थिति से उबरने का एक मात्र कारगर उपाय है, ‘मानवी अन्तः करण का विश्वव्यापी शुद्धिकरण’। विचार क्रान्ति अभियान वस्तुतः व विशुद्धतः वैचारिक तथा भावनात्मक शुद्धिकरण का अभियान ही है।

वैचारिक क्रान्ति ही एक मात्र प्रभावी उपाय

इस मान्यता को मूर्त रूप देते हुए मिशन के संस्थापक-मार्गदर्शक ने शून्य साधन किन्तु अखंड विश्वास व अदम्य उत्साह के साथ विचार क्रान्ति अभियान को सन् 1926 में बीज रूप में प्रारम्भ कर विशाल वट वृक्ष की वर्तमान स्थिति तक पहुँचा दिया। एक ही दिव्य भाव आजीवन उन पर छाया रहा, ‘व्यक्ति के भीतर सोए देवता को जगाएं। परिवार में स्वर्ग जैसा वातावरण बनाए। विश्व का पतन पीड़ा से मुक्त कर उत्कर्ष उल्लास से गूँजाए’।

परमपूज्य गुरुदेव के चरण चिन्हों का अनुसरण करते यह मिशन इसी दिव्य भाव को छाती से लगाए इन लक्ष्यों की ओर निरन्तर गतिमान है। विश्व की छः सौ करोड़ जनसंख्या में सं छः करोड़ तक तो वह पहुँच चुका है अर्थात् विश्व के प्रत्येक सास् व्यक्तियों में एक इस मिशन से तथा उसके उद्देश्य व कार्य पद्धति से परिचित व प्रभावित है। छः करोड़ व्यक्तियों के मन को तमस की ओर पीठ करने व सत् की दिशा में मुड़ने की प्रेरणा पहुँचाने में सफल हो पाना अपने आप में एक उपलब्धि है। निर्विवाद प्रमाण भी है कि तनाव, टूटन व बिखराव को रोकने के विश्वव्यापी प्रयासों की तुलना में इस मिशन की नीति-रीति कहीं अधिक प्रामाणिक, प्रभावी तथा व्यापक रही है।

कालचक्र के तमस खण्ड को चरम उत्कर्ष पर पहुँचा देख कर स्पष्ट अनुभव होता है कि अब वह समय आ गया है जब विश्व मानव के अन्तःकरण में गहराई तक फैली विकृतियों के साथ एक जुट होकर निर्णयात्मक युद्ध लड़ लिया जाय। शून्य साधनों से प्रारम्भ हुए विचार क्रान्ति अभियान ने दिव्य सत्ताओं के संरक्षण-मार्गदर्शन तथा परिजनों की सोत्साह सहभागिता से छः करोड़ व्यक्ति एक माला में पिरो दिये। अब तो लाखों लाख सृजन सैनिक साधन के रूप में उपलब्ध हैं। इनकी सहभागिता तथा अपराजेय निष्ठा के बल पर सम्पूर्ण विश्व में वैचारिक एवं भावनात्मक शुद्धिकरण का महाअभियान प्रसारित करना कठिन कार्य नहीं रहा है। तराजू के पलड़े विपरीत दिशा में झुकेंगे, परिजन ही इन्हें झुकाएंगे, इस परम विश्वास के साथ एक निर्णयात्मक युद्ध का शंखनाद मिशन के प्रथम पूर्णाहुति से किया है।

स्वाध्याय-मनन-चिन्तन की सर्वोत्कृष्टता

विचार क्रान्ति अभियान के इस विश्वव्यापी प्रसारण के लिए उपकरणों-शस्त्रों का पैना होना भी आवश्यक है। झोला पुस्तकालय, स्वाध्याय मण्डल, विचार गोष्ठियाँ, धार्मिक कर्मकाण्डों के भावात्मक आधारों का निरूपण तथा ऐसी अन्य प्रक्रियाएं इस अभियान के प्रमुख उपकरण माध्यम रहे हैं। शक्तिपीठों, प्रजा मण्डलों, महिला मण्डलों द्वारा जो व्यापक रूप से व्यवहार में लाए जा रहे हैं, अत्यन्त प्रभावी भी सिद्ध हुए हैं। अब इन्हें अधिकतम प्रखर व पैना बनाना आवश्यक है, युद्ध की दृष्टि से अनिवार्य भी। इस आवश्यकता की पूर्ति की सर्वाधिक प्रभावी विधि है-स्वाध्याय-मनन-चिन्तन प्रक्रिया। समय की कसौटी पर यह त्रिपदा प्रक्रिया सदा ही खरी उतरी है। यह सम्पूर्ण मन्थन भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस निर्णयात्मक वैचारिक युद्ध को लड़ने व विजयी होने के लिए स्वाध्याय-मनन-चिन्तन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है।

अतः इस प्रभावी प्रक्रिया को और भी स्पष्ट एवं व्यवहारिक रूप में पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है। देव संस्कृति दिग्विजय के अंतर्गत छह वर्षीय अनुयाज में स्वाध्याय-मनन-चिन्तन सर्वप्रथम क्रियापरक कार्यक्रम है। प्राणवान परिजनों से शुभाकाँक्षियों से तथा आत्मोन्नति के इच्छुक पाठकों से अपेक्षा और आग्रह भी कि वे इस स्वाध्याय त्रिवेणी को गहराई से जानें-समझे और मानव में प्रसुप्त पड़ी वैचारिक व भावात्मक चेतना को जाग्रत करने का नैष्ठिक प्रयास करें। इसका क्रियापक्ष, अगले अंक के चार लेखों में परिजन पढ़ सकेंगे। विश्वास रखें इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य दिवा स्वप्न नहीं है, महाकाल द्वारा निर्धारित भवितव्यता है। इसे चरितार्थ करने के लिए अब आवश्यकता विश्वास और उमंग भरे मन वालों का है।


VigyapanSuchana

शाँतिकुँज में अगले माह 20 से 26 मई 1996 की तारीखों में एक विशेष वर्कशाप आयोजित की गयी है, जिसमें प्रस्तुत अंक में प्रकाशित 14 अनुयाज संकल्पों, आदर्श ग्राम योजना एवं सद् पंच प्रशिक्षण अभियान के संबंध में विशेष ज्ञान रखने वाले प्रतिभाशालियों को आमंत्रित किया जा रहा है। इससे शाँतिकुँज का ‘ब्रेन सेल’ (चिन्तन प्रकोष्ठ) विनिर्मित होकर एक आकार लेगा ताकि सभी प्रतिभाशालियों की भागीदारी उसमें हो सके एवं सभी के सुझावों के आधार पर यह विराट महासंकल्प निभ सके। परिजन परिजन अपने क्षेत्र के किसी सभी विषय के विशेषज्ञों को जो इस परिधि में आते हों, संपर्क कर इन तिथियों में शांतिकुंज आने की प्रेरणा दें एवं पूर्व से सूचित कर दें कि कहाँ से कितने बंधु या बहिनें इसमें सम्मिलित हो रही हैं। इसमें शिक्षण विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, समाजशास्त्र, इंजीनियरिंग, प्लानिंग, समाज विज्ञान से लेकर सभी विषय के व्यक्ति भाग ले सकते हैं।


अपनों से अपनी बात-4 - पूज्यवर के स्वप्नों का पंचायती राज, इस प्रकार आएगा

भारत व्यापी सद्पंच प्रशिक्षण योजना अब शांतिकुंज द्वारा संचालित होगी

देश में स्वशासन और सुशासन के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने पंचायती राज का स्वप्न देखा था। उन्होंने कहा था कि जड़ों में दीमक लगी हो तो पत्तों के सींचने भर से पेड़ फल-फूल नहीं सकते। जिस शरीर की कोशिकाएं बीमार हों, उसे पौष्टिक भोजन देकर भी स्वस्थ नहीं किया जा सकता। यही बात अपने देश के बारे में भी है, जब तक इसकी ग्राम पंचायतें रुग्ण और जरा-जीर्ण रहेंगी उसमें स्वच्छ प्रशासन और स्वस्थ व्यवस्था की बातें दिवा स्वप्न बनी रहेंगी।

इस सम्बन्ध में उन्होंने जब सन् 1909 में अपना बीज ग्रन्थ ‘हिन्द स्वराज्य’ में लिखा था तो वह वस्तुतः पंचायती राज का ही घोषणा पत्र था। गाँधी जी अच्छी तरह समझते थे कि भारत गाँवों का देश है। भारत माता ग्रामवासिनी है। जब तक गाँव संगठित और स्वावलम्बी थे, भारत का पौरुष, इसकी अस्मिता और इसकी संस्कृति अक्षुण्ण रही। शक, शीथियन, गुर्जर, प्रतिहार, यवन, पठान मुगल आए और विलीन हो गए लेकिन भारत की आन्तरिक शक्ति अविजित रही। राजसत्ता राजधानियों में अठखेलियाँ करती रही, गाँवों का अन्तस्तल प्रदूषित नहीं हो सका।

इसका मूल कारण था कि गाँव प्रायः स्वावलम्बी थे। गाँव की कृषि और ग्रामोद्योग इसकी मृत्युँजयी अर्थ व्यवस्था का आधार था। गाँव की पंचायत इसकी विधि-व्यवस्था और न्याय का मेरुदण्ड था। गाँव की पाठशाला में ही शिक्षा मिलती थीं और गाँव के मन्दिर से ही नैतिकता एवं अध्यात्म का पाठ मिलता। संक्षेप में गाँव की पंचायती व्यवस्था में ही समग्र स्वशासन और सुशासन का भाव निहित था। स्थानीय योजना, स्थानीय पुरुषार्थ और स्थानीय अभिक्रम यही था पंचायती राज का आधार। इसलिए राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर न तो अमला तन्त्र का बोझ था न विदेशी पूँजी अभिनिवेश की समस्या। विदेशी मुद्रा के लिए हाहाकार तो खैर, कभी कुछ हुआ ही नहीं। प्राणवान ग्रामोद्योग के कारण बेरोजगारी एवं अर्ध बेरोजगारी का भूत कभी सताता ही न था।

स्वाधीनता से अब तक इसकी उपेक्षा का परिणाम ही हैं कि लोकतन्त्र पुलिस की गालियों एवं असामाजिक तत्वों के उग्रवाद के बीच छटपटा रहा है। बन्दूक और फौज के बल पर शासन करना लोकतंत्र का मजाक तो है ही, साथ ही यह एक खतरनाक खेल भी है। इसी कारण बापू ने अपनी आखिरी वसीयत में न केवल गाँवों के संगठन और पंचायती राज गठित करे पर बल दिया था, बल्कि यह भी चेतावनी दी थी कि भारत स्वतन्त्र होने के बाद नागरिक शक्ति एवं पुलिस फौज की शक्ति के बीच टक्कर अनिवार्य है। यदि लोकतन्त्र के नाम पर सारे कामकाज भी संगीनों की छाया में करेंगे तो वह लोकतन्त्र का श्राद्ध ही कहलाएगा। देश की सरहद की सुरक्षा कौन करे, यह ठीक है। लेकिन हर कहीं सैनिक अर्ध-सैनिक बलों का इस्तेमाल होने लगे तो फिर नागरिक शक्ति को समाप्त ही समझना चाहिए।

यह सौभाग्य की बात है कि इस तथ्य को भारत के वर्तमान कर्णधारों ने बड़ी गम्भीरता से लिया है। इस क्रम में वर्तमान सरकार ने नागरिक शक्ति को जाग्रत करने और उसे आगे लाने की भरपूर कोशिश की है। अपने परिजन प्रधानमंत्री महोदय द्वारा आँवलखेड़ा में दिए गए उस वक्तव्य को भूले न होंगे जिसमें उन्होंने कहा था मैं चाहता हूँ कि स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आएं और राष्ट्र निर्माण में शासन के साथ अपनी सहभागिता निभाएं। इस क्रम में उन्होंने गायत्री परिवार को आमन्त्रण भी दिया था।

आह्वान और आमन्त्रण के इस क्रम में शान्तिकुँज के संचालकों की प्रधानमंत्री से भेद वार्ता हुई। राष्ट्र निर्माण के विभिन्न कार्यक्रमों में गायत्री परिवार की सम्भावित सहभागिता की चर्चा के दौरान यह तय किया गया कि इसकी पहल पंचायती राज की प्रतिष्ठापना के लिए की जाय और इस क्रम में अपने परिजन बढ़-चढ़ कर सक्रिय भूमिका का निर्वाह करें।

परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि हमारी प्राचीन संस्कृति पंचायत राज्य पर आधारित थी। हमारे संविधान के निर्देशक तत्व में भी पंचायत व्यवस्था को राज्यशक्ति एवं संगठन का आधार बनाने का स्पष्ट प्रावधान है। प्राचीन भात में लिच्छवियों के अनेक छोटे-छोटे गणतन्त्र थे। यूनान में भी नगर राज्य थे। पंचायती राज इसी की परिष्कृत भावना है। जिस आधार पर सत्ता का विकेन्द्रीकरण एवं आर्थिक स्वावलम्बन है। यजुर्वेद के 16 वें अध्याय की 48 वीं ऋचा में कहा गया हैं- ‘विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन् अनातुरम्’ अर्थात् इस गाँव में आतुरता रहित स्वतः समर्थ विश्व का निर्माण यही सच्चा स्वराज्य है यतेमहि स्वराज्यम्।

इस सच्चे स्वराज्य को पंचायती राज को क्रियान्वित संचालित तभी किया जा सकता है जबकि पंचायत स्तर पर प्रामाणिक एवं समर्थ नेतृत्व उभरे। यह बात नहीं है कि देश में इस प्रयोजन के अनुकूल व्यक्तित्वों का अभाव है। किन्तु उन्हें उभारना तराशना बहुत जरूरी है। क्योंकि शिक्षा का काफी प्रसार हो जाने के बावजूद भी भी देश में शिक्षा की कमी है। लम्बे समय तक गुलामी की अथवा भोगने के कारण अपने निर्माण के लिए स्वयं पहल करने की वृत्ति मुरझा सी गयी है। दलगत राजनीति के कारण जन मानसिकता पर इतना विपरीत असर पड़ा है कि पारस्परिक सहमति के स्वर मुखर नहीं हो पाते। इसके अलावा प्रशासन और जन प्रतिनिधियों के बीच आपसी समझ और तालमेल का अभी भी बहुत अभाव हैं।

इन सब कमियों के उपचार के लिए शांतिकुंज ने एक विशेष प्रशिक्षण योजना बनायी है। जिसके अंतर्गत प्रशिक्षण लेकर ग्रामीण नेतृत्व लोकनायक की कुशलता और समर्थता अर्जित कर सकेगा। इस प्रशिक्षण में संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत उद्यमी, लक्ष्य के प्रति समर्पित कार्यकुशल एवं संयोजन दक्षता सम्पन्न व्यक्तित्व विकास के लिए 1 संवैधानिक प्रावधान 2. प्राथमिकताओं का विवेचनात्मक निर्धारण 3. सद्पंचों में उद्यमिता का विकास तथा 4. कार्यों के मूल्याँकन का शिक्षण किया जाएगा।

संवैधानिक प्रावधान के शिक्षण में लोकनायकों को उनके उन उत्तरदायित्वों का बोध कराया जाएगा, जो कि संविधान तथा राज्यों के अधिनियमों के अंतर्गत पंचायतों के लिए निर्धारित हैं। साथ ही कार्य योजना के सूत्र भी आत्मसात् कराए जाएंगे जिनका उल्लेख 243 जी में है। तथा जिन्हें सम्बन्धित राज्यों एवं इस संस्थान के प्रतिनिधियों ने अपने संयुक्त निर्धारण में स्वीकृत किया है। इस सबके साथ इनके क्रियान्वयन की कुशलता भी बतायी जाएगी।

सद्पच्चों की क्रिया कुशलता तब तक संदिग्ध रहती है, जब तक उनमें अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं के आधार पर प्राथमिकताओं का निर्धारण करने का कौशल न हो। ये प्राथमिकताएं सुविधाओं को जुटाने सम्बन्धी ही नहीं होती। इनका आधार नैतिक और सामाजिक भी होता है। इस तथ्य पर प्रशिक्षण की योजना में बहुत बारीकी से विचार किया गया और इस क्रम में क्षेत्र के अनुरूप नैतिक प्राथमिकताओं का चुनाव और प्रशिक्षण किया जाएगा। इसी के साथ क्षेत्रगत दुष्प्रवृत्तियों से कैसे निबटा जाय, गाँव के प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप किन कुटीर उद्योगों की स्थापना करें आदि सामाजिक ओर आर्थिक प्राथमिकताओं का निर्धारण करना सिखाया जाएगा। साथ ही नागरिक सुविधाओं की स्थापना, विकास और उनके रख-रखाव की तकनीकी बातें बताई जाएंगी।

प्राथमिकताओं का निर्धारण करने की समुचित योग्यता के साथ सद्पच्चों में उद्यमशीलता का विकसित होता जरूरी है। आलसी-प्रमादी व्यक्ति लोक नेतृत्व का गौरव पूर्ण दायित्व नहीं निभा सकते। इस उद्यमिता के विकास के लिए सबसे पहले ऐसी मानसिकता विकसित करनी होगी जो दलगत राजनीति से ऊपर, सृजनशील, न्यायनिष्ठ और सकारात्मक दृष्टिकोण से भरी पूरी हो। क्योंकि ऐसी व्यक्ति ही अपने उत्तरदायित्वों के मार्ग में आने वाली अड़चनों के बीच अविचल भाव से पुरुषार्थरत रहते हैं।

इन्हीं प्रभावकारी तथ्यों की शुद्ध अवधारणा बन पड़ती है। ये ही समझ सकते हैं कि मनुष्य का धर्म मनुष्यता है और विभिन्न धर्म सम्प्रदाओं के बीच उपयोगी और सामंजस्य स्थापना करने वाले सूत्रों को उभारा जाना चाहिए। इन्हें उभारने पर ही मानवीय सम्वेदना से उस भावना का विकास होता है जिसे अध्यात्म कहते हैं। जिसके बल पर इनसान अपनी विभूतियों को आत्मा के अनुशासन में चलाने की कुशलता प्राप्त करता है और ऐसे ही व्यक्ति सामाजिक वर्ग भेद से ऊपर उठकर ऐसे सामाजिक ढाँचे का निर्माण कर पाते हैं। जिसके अंतर्गत व्यक्ति के गणों का सामाजिक हितों में नियोजित करने की सामूहिक व्यवस्था हो सके। इस सामूहिक व्यवस्था में नारी बराबर की हिस्सेदार है। उसकी क्षमताएं उतनी ही हैं जितनी पुरुष की। बल्कि व्यवस्था और आत्मीय सम्वेदना के मामले में कुछ अधिक ही है। फिर कोई कारण नहीं कि उसकी पंचायत राज व्यवस्था में उसकी भागीदारी न हो। स्त्री हो या पुरुष प्रत्येक लोक नायक में जीवनोद्देश्यों के प्रति जागरुकता होना जरूरी है। जिससे कि वे समझ सके कि सद् पंच होने का दायित्व उन्हें इसलिए सौंपा गया है, ताकि अपने समाज ऋण को अधिक कुशलता पूर्वक चुका सके।

सद्पच्चों में इस उद्यमिता का विकसित होना क्रिया कुशलता के लिए जितनी आवश्यक है, उससे कहीं अधिक अनिवार्य है उनके व्यक्तित्व का नेतृत्व सक्षम होना। इसी कारण शांतिकुंज द्वारा चलायी जाने वाली प्रशिक्षण सत्र शृंखला में उसका विशेष रूप से ध्यान रखा गया है। लोकनायक के व्यक्तित्व को पारदर्शी होना आवश्यक है ताकि उसकी प्रामाणिकता और खुली मानसिकता स्पष्ट का सतत् परिष्कार करने की प्रवृत्ति तथा उत्तरदायी प्रवृत्ति का होना नितान्त जरूरी है। दूसरों के परामर्शों से लगाव, गौरव बोध, राष्ट्रभक्ति औरों को संरक्षण देने की सामर्थ्य और पारस्परिक सहयोग की वृत्ति ऐसे गुण हैं, जो किसी व्यक्ति की अन्तर्चेतना में एक ऐसे व्यक्तित्व को जन्म देते हैं, जो नेतृत्व के सर्वथा योग्य होता है। जन्मजात ये सारी की सारी प्रवृत्तियाँ एक साथ शायद ही किसी में होती है। प्रायः हर एक को अपने अन्तः करण में इन्हें धीरे-धीरे विकसित करना पड़ता है। शांतिकुंज के प्रशिक्षण सत्रों में इसी तकनीक का अभ्यास कराया जाएगा।

जिनकी मानसिकता परिष्कृत है, भावनाएं उत्तम है वे ही अथक पुरुषार्थ करने में समर्थ होते हैं। उनमें ही अविरल प्रयास सतत् जागरुकता और अटूट साहस के सुयोग समन्वित हो पाते हैं। इन सुयोगों की सफलता तभी है जबकि उनका समुचित सुनियोजन हो सके। सुनियोजन क्षमता का विकास व्यक्तित्व की महनीय सद्गुण है। क्योंकि इसी के आधार पर सुसंगठित प्रयास बन पड़ते हैं।

इसी के प्रभाव से महत्तर उद्देश्यों के लिए जन उत्साह का जागरण सम्भव हो पाता है। यही गुण अपने पराक्रम से मतभेदों की खाई को आपसी तालमेल में बदल देता है। यही गुण ग्राहकता काय के अनुरूप व्यक्तियों का चयन करने में समर्थ सिद्ध होती है। सुनियोजन क्षमता के आधार पर लक्ष्योन्मुखता का वह सामूहिक पराक्रम सफल हो जाता है, जिसके बलबूते प्रारम्भ किए गए कार्य को लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सभी सम्भव संसाधनों का नियोजन तथा पूर्णता तक पहुँचाने की तत्परता दिखाई जा सके। इसी सतत् अध्यवसाय से उद्देश्य के लिए सक्रिय समूह के लक्ष्य तक पहुँचे बिना न रुकने की ऊर्जा का संचार करने की कुशलता बन पड़ती है और सुरक्षित संसाधनों की व्यवस्था किस प्रकार करें, यह सूझ पड़ता है, ताकि अनपेक्षित रूप से आ पड़ने वाली आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त मात्रा में जनशक्ति तथा सुरक्षित कोष बनाया रखा जा सके।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के तीन विषयों संवैधानिक प्रावधान प्राथमिकताओं का विवेचनात्मक निर्धारण एवं सद्पंचों में उद्यमिता का विकास के अतिरिक्त चौथा विषय है मूल्याँकन जिसके अंतर्गत कार्यक्रम संयोजन के सभी घटकों की समीक्षा का क्रम सुझाया जाएगा। ताकि आवश्यक संशोधनों की दृष्टि से कार्य का पुनरावलोकन हो सके। साथ ही सम्प्रेषण कुशलता और भावी प्राथमिकताओं का पुनरावलोकन किया जा सके और प्रशासन तन्त्र से ऐसा समन्वय स्थापित हो सके, जिससे शासन से प्राप्त योजनाएं और सुविधाएं गाँव की छोटी से छोटी इकाई तक पहुँचायी जा सके।

शाँतिकुँज द्वारा चलायी जाने वाली इस सात दिवसीय प्रशिक्षण योजना में ग्रामीण योजनाओं से जुड़े शासकीय अधिकारी कर्मचारी पंच-सरपंच, किसान, जन प्रतिनिधि पंचायत अध्यक्ष और गायत्री परिवार के कार्यकर्ता भागीदार होंगे प्रशिक्षण प्राप्त इन भागीदारों के द्वारा निर्धारित पंचायत क्षेत्र में अभियान स्तर पर सेवा कार्य चलाए जाएंगे। इसमें प्रारम्भ में श्रमदान से सम्पन्न हो सकने वाले कार्यों का लिया जाएगा। बाद में सामर्थ्यवान विभूतिवान लोगों का स्वैच्छिक सहयोग सामूहिक कार्यों में लगाया जाएगा और अन्तिम क्रम में सरकारी अनुदानों का उपयोग जनोपयोगी कार्यों में किया जाएगा। देखा यह गया है कि कसी भी योजना के लिए उपलब्ध कराए गए संसाधनों की उपयोगिता सीमित ही रह जाती है। इस प्रशिक्षण में यह प्रयास किया जाएगा कि राष्ट्र द्वारा उपलब्ध कराए गए संसाधनों की अधिकतम उपयोगिता सिद्ध की जा सके।

योजना के प्रथम चरण में उद्देश्य के अनुरूप पंचायत राज के तंत्र से सम्बन्धित व्यक्तियों की मानसिकता का विकास किया जाएगा। एक ऐसी मानसिकता का विकास जो इस योजना के प्रत्येक उद्देश्य और कार्य योजना के प्रत्येक चरण के साथ एकात्मता का अनुभव करते हुए उसकी अनिवार्यता समझते हुए स्वयं को उसके लिए ढालते हुए, उसमें प्राण-प्रण से जुट जाने के लिए आकुल हो सके। दूसरे चरण में प्रशिक्षण के साथ-साथ ग्राम नेताओं एवं उनकी टीम और विभिन्न जिलों या ब्लॉक स्तरों पर प्रशासनिक प्रतिनिधियों तथा गायत्री परिवार के सहयोगियों के बीच अधिक अच्छा ताल-मेल उत्पन्न करने के प्रयास किए जाएंगे।

इस प्रकार के प्रशिक्षण से विकसित नेतृत्व क्षमता संपन्न व्यक्ति नयी योजनाओं का केवल समर्थन करके ही अपने दायित्व को पूरा नहीं मान लेंगे। वे स्वयं बारीकी से बात समझकर अपने आस-पास के परिकर को भी उस सम्बन्ध में विश्वास में लेंगे। स्वयं नमूना खड़ा करके जन उत्साह को बढ़ाने तथा योजना को सफल बना सकेंगे।

पंचायत राज की इस व्यवस्था के लागू होने से विरोध के स्थान पर सहमति की शुरुआत होगी। आज की राजनीति विरोध के तत्वदर्शन पर आधारित है। इसी विरोध का जहर ग्राम पंचायतों में भी घुल चुका है। नतीजा यह हुआ कि हर गाँव टूटा हुआ है। पंचायत का अर्थ ही पारस्परिक कलंक हो गया है। जबकि हमारी साँस्कृतिक विरासत के अनुसार पंचायत विरोध की नहीं सहमति की राजनीति पर आधारित थी। “पंच बोले परमेश्वर” कहा जाता था, जिसका अर्थ है सर्वानुमति या सर्व सम्मति से निर्णय होते थे। कहा जाता था जो पाँचहि मत लागे नीका। यानि जो आम राय होती थी। उसी को निर्णय माना जाता था। इससे गाँव टूटता नहीं था, उसकी ताकत बढ़ती थी। इन दिनों पंचायतें लगभग निष्प्राण पड़ी हैं। जिनमें थोड़ी बहुत जान बाकी भी है उन्हें गुटबाजी की दीमक खा रही है। पंचायती राज के स्व बलवंत राय मेहता और स्वर्गीय अशोक मेहता कमेटियों की रिपोर्टें बहुत दिनों तक ठण्डे बस्ते में पड़ी रहीं।

अब समय आ गया है कि उलटे को उलटकर सीधा करें ऊर्ध्वमूलं अधः शाखा। अर्थात् जो जड़ है उसे शीर्ष स्थान दें। इससे प्रशासन का बोझ कम होगा कुशलता बढ़ेगी। उधर गाँव के स्तर पर अधिकाधिक लोगों का सहयोग मिलेगा। भारत की प्राचीन संस्कृति फिर से अपनी खोई हुई मुसकान पा सकेगी।

*समाप्त*