कल्पवृक्ष का अस्तित्व स्वर्गलोक में माना जाता है और कहा जाता है कि उसकी अमुक विधि से पूजा- प्रार्थना करने पर अभीष्ट मनोकामनाओं की पूर्ति होती है । इस अदृश्य एवं रहस्यमय प्रतिपादन में संदेह करने की गुंजाइश है।
किन्तु भूलोक के इस कल्पवृक्ष का अनुभव हर कोई कर सकता है, जिसे शान्तिकुँज कहते हैं। परम पू. गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी ने इसे रोपा, अपनी सम्मिलित तपशक्ति से खाद -पानी देकर इसे बड़ा किया । 25 वर्षों में अब यह इतना बड़ा हो गया है कि समस्त विश्व को इसके शीतल समीर का अहसास होने लगा है। यह अद्भुत है, अनुपम और असाधारण । यह दिव्य भी है और महान भी । इसके अन्तराल में सम्भावनाओं और सिद्धियों के भण्डार भरे पड़े हैं । जरूरत इसकी छाया में बसने और उन्हें उठाने की है।
पू. गुरुदेव के शब्दों में इसी कल्पवृक्ष पर भगवान महाकाल का घोंसला है । यहीं युगांतरीय चेतना का हेडक्वार्टर है । विश्व के नवनिर्माण में लगी समस्त सूक्ष्म-शक्तियों के अभियान के केन्द्रीय कार्यालय यहीं है। हिमालय के दिव्यक्षेत्र में बसने वाली ऋषिसत्ताएँ सूक्ष्म-रूप से यहाँ विचरण करती है। यहाँ आने वाले लोगों के हृदयों में उज्ज्वल प्रेरणाओं का संचार करती है। दिव्य देहधारी देवसत्ताएँ यहाँ आने वाले आर्त्त, कष्टपीड़ित जनों की पीड़ा निवारण कर उनकी मनोकामनाओं को पूरा करती है।
यह देवभूमि सबसे प्रत्यक्ष, सबसे निकट और सबसे वरदायी देवता है । यहाँ के कण-कण में समाया ऋषियुग्म का तप प्राण काले, कुरूप और अनगढ़ लोहे जैसे व्यक्तित्व को खरे सोने में बदल देता है । जीवन की दशा और दिशा आमूल -चूल बदल जाती है। उनके आशीर्वाद का अमुक सिंचन जीवन में नवप्राण भरता है । नयी ऊर्जा का संचार करता है।
कहा जाता है कि कल्पवृक्ष से भी कुछ प्राप्त करने का एक निश्चित विधि -विधान है। शान्तिकुँज भी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है। इससे वह सब कुछ उपलब्ध हो सकता है, जो कल्पवृक्ष से अभीप्सित है। शर्त एक ही है कि अभीष्ट की प्राप्ति के लिए यहाँ रहकर साधनात्मक दिनचर्या अपनाई जाय । इसकी छाया में रहकर साधना परायण जीवन जीने वालों की झोली मनचाहे अनुदानों -वरदानों से भरपूर हुए बिना नहीं रहती ।
लिखते समय अनेकानेक घटनाक्रम आँखों के सामने हैं,क्योंकि जिनसे मिले, ढेरों, अनुदान पाए, उनके लीला-प्रसंगों के अनगिनत रूप स्मृतियों में तरंगित हो उठते हैं। किन्तु जब किसी ऐसे विशेष स्थान के बारे में लिखने की बात आती हैं, जो छोटे शुभारम्भ के विराट में परिणत हुआ हो तो मन असमंजस में पड़ जाता है । जो स्थान दो अवतारी चेतना के गलने और उनके माध्यम से लाखों लोगों के जुड़ते चले जाने के साथ-साथ विस्तार पाता गया हो, उसका वर्णन शब्दों में कैसे सम्भव है? यह चर्चा विशेष रूप से प. पूज्य गुरुदेव एवं वन्द, माताजी के तप से अनुप्राणित शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ के बीज से वटवृक्ष बनने के इतिहास के संबंध में की जा रही है ।
अनेकानेक भव्य भवन तो आध्यात्मिक स्तर पर ऊँचे पहुँचे महापुरुषों के द्वारा बनाकर छोड़ दिए जाते हैं। वैभव भी देखने में कुछ कम नहीं होता, अपितु विस्तार लिए हुए होता है, परन्तु जिन भवनों में प्राण -प्रतिष्ठा की गई हो और जिनकी एक-एक ईंट में ऋषि सत्ता की तप -ऊर्जा समाहित हो, उन भवनों की ईंट मिट्टी से बने या संगमरमर, ग्रेनाइट से लदे आलीशान निर्माणों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता । बैलूर मठ के सौ वर्ष पूर्ण होने को है, किन्तु आज भी कलकत्ता जाने पर जब इस स्थान के दर्शन का सौभाग्य मिलता है, तो मस्तिष्क में उस महापुरुष की स्मृति जाग्रत हो उठती है, जिसकी साधना और तप ने एक विवेकानंद और समकक्ष तेरह से अधिक गुरुभाई तैयार कर आध्यात्मिक ऊर्जा की दृष्टि से एक विशिष्ट निर्माण कर दिखाया । इसी तरह पाण्डिचेरी स्थित अरविंद आश्रम तथा सम्प्रति बन रहे ओरोविल देखने पर वहाँ एक जाग्रत चेतना का आभास मिलता है । महापुरुषों की तप साधना से अनुप्राणित इन निर्माणों के माध्यम से एक प्रेरणा स्थली, एक तीर्थ चेतना का परिचय मिलता है ।
शाँतिकुँज का जो रूप आज हमारे परिजन देखते हैं, उसका शुभारम्भ 1968-69 में जिस छोटे रूप में हुआ था, उसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इसका बीजारोपण शक्तिस्वरूपा वन्द,माताजी के संरक्षण में चौबीस घण्टे जप में निरत देव कन्याओं की तप ऊर्जा के माध्यम से हुआ । सत्ताईस विराट विश्वव्यापी आश्वमेधिक आयोजन एवं एक अत्यंत भव्य श्रद्धाँजलि समारोह सम्पन्न करके आज का शाँतिकुँज ...1968-69 वर्ष पूर्व कैसा था, किस तरह छोटी -सी शुरुआत से विस्तृत होते-होते वर्तमान विराट रूप को पा सका है, यह जानने की जिज्ञासा हर उस परिजन को होगी,जो इस तंत्र से बाद में जुड़ा या जो पीढ़ी अब आने वाले दिनों में जुड़ेगी ।
यहाँ से उठने वाले प्रेरणा प्रवाहों के माध्यम से 21 वीं सदी में सतयुगी समाज का निर्माण होने जा रहा है । शाँतिकुँज तप-ऊर्जा से ओत-प्रोत एक जाग्रत चेतना केन्द्र है। इसमें ऋषि युग्म के अतिरिक्त लाखों व्यक्तियों की साधना ही नहीं जुड़ी, अपितु परोक्ष रूप से हिमालय वासी ऋषि सत्ताओं द्वारा निरंतर किए जाने वाले तप की ऊर्जा का भी समावेश है।
हो सकता है यह आश्रम किसी को देखने में वैभवपूर्ण अट्टालिकाओं की तुलना में साधन विहीन प्रतीत हो, परंतु जीवनभर ब्राह्मणोचित जीवन जीने वाले सद्गुरु ने अपने प्रचण्ड तप से इस स्थान को घनीभूत ऊर्जा पुँज बनाया है, इसे कोई भी संवेदनशील व्यक्ति अंदर प्रवेश करके ही महसूस कर सकता है।
यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि हम जो कुछ भी लिख रहे है, वही बिना किसी लाग -लपेट के शक्ति केन्द्र का अभूतपूर्व इतिहास है । शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस,, गायत्री नगर के गर्भ में पक रही एक ऐसे तीर्थ चेतना से परिचित हो, जो चर्म चक्षु से दिखाई नहीं पड़ती । इस शाँतिकुँज के रजत जयंती वर्ष विशेषांक में परिजन पं. पूज्य गुरुदेव एवं वन्द, माताजी की उस विलक्षण जीवन यात्रा का विवरण पढ़ सकेंगे, जिसने छोटे से निर्माण को उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं का ब्ल्यू प्रिंट बना दिया । पढ़ें और पाएँ उस इतिहास को, जो विगत 25.वर्षों का है एवं बहुत कुछ इसमें से अभी तक परिजनों के समक्ष नहीं आ पाया था ।
जिसका कोई घर-बार नहीं, उसी की सारी दुनिया घर है । जिसने जीवन के बन्धनों को काट डाला है, उसी के हाथ सच्चा जीवन आया है ।
अखण्ड ज्योति मार्च 1969..के सम्पादकीय में ‘हमारे पाँच पिछले एवं पाँच अगले कदम’ शीर्षक से परम पू. गुरुदेव ने लिखा “ अब हम मथुरा स्थायी रूप से छोड़कर जा रहे हैं । माताजी हमारी धर्मपत्नी भगवती देवी शर्मा, हिमालय और गंगातट पर एक ऐसे स्थान पर रहेंगी, जहाँ लोग उनसे संपर्क रख सकें और हमारा संपर्क भी बना रहें । हरिद्वार ऋषिकेश के बीच गंगा तट पर, जहाँ सात ऋषि तप करते थे, जहाँ गंगा की सात धाराएँ है, उस एकाँत भू-भाग में डेढ़ एकड़ माप की छोटी -सी जमीन प्राप्त की गयी, माताजी वहीं रहेंगी । उसमें फूलों को उसी वर्ष लगा दिया है, खाने को फल -शाक, पहनने को दो कैरी कपास जिसका सूत कातकर तन ढक ले । एक गाय जिसका घी अखण्ड दीपक के लिए मिल जाए व छाछ आहार में प्रमुख हो । एक कर्मचारी पेड़-पौधों, गाय को संभालने हेतु और रहने को चार कुटीर । ये सारी व्यवस्थाएँ धीरे-धीरे ढाई वर्ष में पूरी हो जायेंगी । “
कौन जानता था प. पूज्य गुरुदेव जिस शाँतिकुँज के बारे में इतने छोटे से स्वरूप के माध्यम से परिचय दे रहे थे, आने वाले दिनों में इतना विराट रूप ले लेगा जैसा कि एक वटवृक्ष । पं. पूज्य गुरुदेव ने मथुरा से ही अपने हिमालय से लौटने के बाद के एक वर्ष में सन् 1962-63.में नौ वर्ष बाद के शाँतिकुँज, स्वयं की 1990.तक की भूमिका के विषय में काफी कुछ लिख दिया । महापुरुष अपनी दृष्टि से भविष्य के गर्भ में पक रहे हर घटनाक्रम के विकास पर नजर रखते हुए, उसकी व्यवस्थाएँ जुटाने का ताना-बाना ऋषि सत्ताओं की मदद से बुनते रहते हैं। गुरुदेव ने कहा कि मैं हमेशा के लिए गायत्री तपोभूमि मथुरा छोड़कर चला जाऊँगा एवं अन्य कार्यक्षेत्र हिमालय को बनाऊँगा । ढाई वर्ष पूर्व से, पूर्व भूमिका बनानी शुरू कर दी थी । तब कोई भी नहीं जानता था कि हूबहू ऐसा होकर रहेगा । जैसा उन्होंने लिखा है, बार-बार याद आती हैं, क्षेत्रीय दौरों के व्यस्तता के बीच दो तीन दिन के लिये ही सही हरिद्वार आना, सप्तऋषि कुटी प्रज्ञा भवन में ठहरना एवं भावी व्यवस्था का सारा सरंजाम यहीं बैठकर बनाना । विश्वामित्र की तपस्थली के रूप में कभी प्राण चेतना से अनुप्राणित रही जिस भूमि का चयन पूज्यवर ने हिमालय की शिवालिक एवं गढ़वाल श्रृंखलाओं के मध्य हरिद्वार से छह किमी. दूर किया था, घुटनों तक पानी, कीचड़ से भरा यह स्थान बहुत छोटा -सा था, जहाँ पूज्यवर ने स्वयं ईंटों को ढो-ढोकर रहने योग्य स्थान बनाया । जमीन की बिक्री करने वाले दलाल ने कई बार कहा इससे भी अच्छा ऊँचा स्थान है, जहाँ नींव खोदते समय मिट्टी की भराई की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, सस्ते में उपलब्ध है, उसे भी देख लें, किंतु गुरुदेव का दृढ़ विश्वास था कि ऋषि परम्पराओं का बीजारोपण तथा उसे क्रियारूप देने का कार्य यदि कही होना है तो इससे श्रेष्ठ स्थान कहीं नहीं होगा, क्योंकि इस भूमि में परिष्कृत चेतना विद्यमान है । यहाँ थोड़े से जप में भी असीम फलश्रुति मिलती है। प्रायः दो शताब्दियों से तीर्थयात्रियों की उत्तराखण्ड यात्रा का जो पैदल मार्ग था, उसके एवं सप्तर्षि आश्रम के मध्य स्थित इस भूमि खण्ड को जो आज प्रारम्भिक स्थिति से प्रायः दस गुना बड़ा एवं भविष्य में भी जिसके बढ़ते रहने की सम्भावना है, पूज्यवर द्वारा भावी कार्यक्षेत्र के रूप में चुन लिया गया । प. पूज्य गुरुदेव ने मार्च .69.के अपने अखण्ड ज्योति के सम्पादकीय में लिख है - “ यहाँ से जाने के बाद शरीर जीवित रहने तक तीन महत्वपूर्ण कार्य करने है । पहला अग्र तपश्चर्या, दूसरा गुप्तप्रायः अध्यात्म की शाँध साधना, तीसरा परिजनों की विशिष्ट सहृदयता, आत्मीयता, ममता का विस्तार ॥ इसी में उन्होंने आगे लिखा - “ रामकृष्ण परमहंस, योगिराज अरविंद, महर्षि रमण की अनुपम साधनाओं ने भारत का भाग्य परिवर्तन करके रख दिया । अगले दिनों भारत को जिसे अभी भाग्य परिवर्तन का निर्माण का अधिकार मात्र मिला है, हर क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करना है । इसके लिए सूक्ष्म वातावरण को गरम कर सकने वाले महामानवों की आवश्यकता पड़ेगी । यह कार्य स्वतंत्रता संग्राम से भी अधिक भारी होगा । पूज्यवर ने लिखा कि हमें उपरोक्त तीन तपस्वियों की बुझी पड़ी परम्परा को फिर से जीवित करना है ताकि सूक्ष्म जगत गरम हो सके, उत्कृष्ट स्तर के महामानव पुनः अवतरित हो सकें । शाँतिकुँज का निर्माण सम्भवतः इस तपः पूत वातावरण में साधना के बीजाँकुरों का प्रस्फुटन और एक सजीव पौध-शाला निर्माण के लिए प्रयुक्त था । जहाँ शेष दो काम भी साथ चल सके । हमारे प्राचीन अध्यात्म की ज्ञान-विज्ञान परम्परा का पुनर्जीवन, अध्यात्म विज्ञान की शोध साधना जैसा भगीरथ कर गये, सम्भवतः ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के माध्यम से शाँतिकुँज में विराजमान ऋषि सत्ता के मार्गदर्शन में होना था । आत्मा की अनंत शक्ति का प्रयोग करके प्राचीनकाल में लोग अपने आँतरिक और भौतिक प्रगति का पथ जिस प्रकार प्रशस्त करते थे और रीति-नीति में आध्यात्मिक आदर्शों का समावेश रहने से सर्वत्र सुख-शांति का साम्राज्य था, उस विलुप्त अध्यात्म को पुनर्जीवित करने का कार्य जीवन के इस अंतिम अध्याय में ब्रह्मवर्चस द्वारा सम्पन्न होना था । इसीलिए शाँतिकुँज की स्थापना अभीष्ट समझी गयी । ‘मानव में देवत्व और धरती पर स्वर्ग का अवतरण ‘ यही दो सतयुगी समाज का मूलभूत आधार बनेंगी । प. पू. गुरुदेव का यह चिंतन शाँतिकुँज से ही क्रियान्वित होना था । पं.पू. गुरुदेव ने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए मार्च 69..की अखण्ड ज्योति में लेखनी से अभिव्यक्ति दी है कि आज धर्म, नीति, सदाचरण आदि की शिक्षा देने वाले ग्रंथ एवं प्रवक्ता तो मौजूद है, पर उस विज्ञान की उपलब्धियाँ हाथ से चली गई, जो इसी शरीर में विद्यमान अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय शक्ति कोषों की क्षमता का उपयोग करके व्यक्ति की, समाज की कठिनाइयों को हल कर सके । पातंजलि योग दर्शन, मंत्र महार्णव, कुलार्णव तंत्र आदि शक्ति विज्ञान के ग्रंथ तो कई है लेकिन उसमें वर्णित सिद्धियों को जो प्रत्यक्ष कर दिखा सके ऐसी मिश्रित साधना नहीं के बराबर दिखायी देती है । यदि इन लुप्त विद्याओं को खोज निकाला जाय तो भौतिक विज्ञान को परास्त कर पुनः अध्यात्म विज्ञान की महत्ता प्रतिस्थापित की जा सकेगी और लोकमानस के प्रवाह को उस स्थिति की ओर मोड़ा जा सकेगा जिसकी हम अपेक्षा करते हैं । ब्रह्मवर्चस की स्थापना का मूलभूत आधार प. पूज्य गुरुदेव के मानस में आठ वर्ष पूर्व ही बन चुका था । गंगा की गोद,हिमालय की छाया एकान्त में स्थित स्थान जो उच्च आध्यात्मिक शोधों के लिए सही सिद्ध हो, वह शाँतिकुँज के अंग के रूप में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान 1969 में जन्म ले चुका था ।
मात्र अध्यात्म विज्ञान की शोध ही नहीं अपितु समस्त लुप्त प्रायः ऋषि परम्परा का बीजारोपण एवं क्रियान्वयन किस तरह शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस के समन्वित प्रयास से होगा, यह भी इस भविष्यदर्शी युग ऋषि अवतारी सत्ता द्वारा अपने दिव्य चक्षुओं से देख लिया गया था । आज का शाँतिकुँज एवं ब्रह्मवर्चस उनकी उसी परिकल्पना की फलश्रुतियाँ हैं । स्थूल रूप में चाहे कोई भी कार्यकर्त्ता दिखाई पड़े, किन्तु वह ऋषि चेतना ही इन सारे क्रिया -कलापों के मूल में है जो यहाँ गतिशील होते हैं एवं क्षेत्रों में क्रियारूप लेते देखे जाते हैं । ब्रह्मवर्चस, जिसकी स्थापना 18 वर्ष होने को आते हैं, भले ही वैज्ञानिकों की भाषा में अध्यात्म विद्या का ऐसा प्रस्तुतिकरण न कर पाया हो जैसे वे अपेक्षा रखते हैं, परंतु संजीवनी साधना करने वाले साधकों पर निरंतर प्रयोग करने के बाद उन्हें श्रेष्ठ समर्पित साधक के रूप में, जिन्हें वास्तव में ज्ञान अनुभूतियाँ हुई, हजारों की संख्या में तैयार कर कार्यक्षेत्र में भेजने एवं जन-जन के लिए सुलभ बनाने का कार्य कर दिखाया । शोध वही सफल होती है जो धरातल तक कार्य करने वाले व्यक्ति -व्यक्ति तक पहुँचे । व्यक्ति का भावनात्मक कायाकल्प करके दिखा दे, परिवार में संस्कारों को इस तरह गूँथ दे कि वे उनके दैनंदिन जीवन का अंग बन जाएं। यही हुआ और 80 हजार से अधिक प्रयोग -परीक्षण के उपराँत इन ऊर्जा अनुदानों को पाने के लिए शाँतिकुँज आते हैं एवं परीक्षण कराते हैं, अनुदान पाते हैं,लाभान्वित होकर जाते हैं । यही युग ऋषि चाहते थे । वैज्ञानिकों की संतुष्टि के लिए उन्हीं की भाषा में बुलेटिन इसी वर्ष विनिर्मित किए जा रहे है जो निश्चित ही बुद्धिजीवियों में क्राँति का तूफान खड़ा कर देगा । देरी भले ही हुई हो परंतु कार्य कहीं नहीं रुका है।
तीसरा कार्य जो गुरु सत्ता ने शाँतिकुँज से अनवरत संचालित करने का निर्देश दिया था -वह था ममत्व का अनंत सीमा तक विस्तार । ज्ञातव्य है कि इसके पूर्व आखिरी दिनों की वे ‘विदाई ‘ की घड़ी और हमारी व्यथा वेदना ‘ शीर्षक से अपने अंदर की हूक परिजनों के समक्ष अभिव्यक्त कर चुके थे । इस तीसरे कार्य के अंतर्गत पूज्यवर ने जो विशेष दायित्व कंधों पर लिया, वह था परम व माताजी के ऊपर एक अभूतपूर्व स्तर का शक्तिपात, ताकि वे हरिद्वार में रहकर वह कार्य संपन्न कर सकें जो पूज्यवर गुरुदेव और वं. माताजी मथुरा में रहकर सम्पन्न किया करते थे । माताजी को उन्होंने अपने परिजनों के बीच जोड़ने वाली एक संपर्क कड़ी बताया और यह कहा कि सहारा ताकने वाले कमजोर और छोटे बालक जो गुरुसत्ता के मथुरा से जाने के बाद अपेक्षा रखेंगे वह उन्हें वं. माताजी के माध्यम से सतत् मिलता रहेगा । अपने विराट गायत्री परिवार युग निर्माण के प्रति कितना सघन स्तर का लगाव था कि उनने पूर्व जन्म से जुड़ी हुई आत्माओं के, जिन्होंने थोड़ा भी गुरुसत्ता से संबंध स्थापित किया अपने ममत्व की गंगोत्री के सतत् प्रवाहित होते रहने की सुनिश्चित गारंटी मार्च 69 में दे दी थी । 1971 के बाद शाँतिकुँज में वं. माताजी की मुख्य भूमिका आरम्भ होनी थी । गुरुदेव पृष्ठभूमि में रहकर सारा कार्य करते रहने वालों में थे । ये सारी घोषणाएँ विदाई के पूर्व वर्ष में ही कर दी । शांतिकुंज को समझने से पहले इस समग्र पृष्ठभूमि को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि स्नेह और अपनत्व की आधारशिला पर स्थापित मिशन का यह दृश्यमान कलेवर दोनों ही सत्ताओं के महाप्रयाण के बाद, उन्हीं प्रक्रियाओं को जारी रखने के लिये संकल्पित है, जिनका शुभारम्भ पूज्यवर ने किया । समाज सुधार के रचनात्मक आँदोलन एवं राष्ट्र के साँस्कृतिक उत्थान के लिए अनेकानेक संस्थाएँ बनती है, भवन खड़े होते हैं, किन्तु इनसे शाँतिकुँज की गुरुसत्ता ने इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री बनाया है एवं इक्कीसवीं सदी की भाव सम्वेदना बताया है । जिस संस्था का आधार सम्वेदना विस्तार, प्यार ही प्यार पर टिका हो, वह एकता, समता, ममता, शुचिता सभी चार स्तम्भों पर टिके उस सतयुगी समाज निर्माण के लिए प्रतीक है, जिसके लिये दैवी चेतना ने उसे चुकाया । इतना मूलभूत आधार समझ में आने के बाद शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ, ब्रह्मवर्चस भवनों का समुच्चय नहीं रह जाते वरन् ऋषि युग्म की तपश्चर्या से अनुप्राणित, भाव सम्वेदनाओं से सिक्त एक ऐसी आश्रयस्थली के रूप में परिलक्षित होकर हमारे सामने आते हैं, जिसके आगोश में पीड़ा, पतन, पराभव से ग्रसित मानवता को प्यार का मलहम लगाया जा सकेगा, दिशाधाराएं दी जा सकेंगी एवं समग्र ढाँचा विनिर्मित किया जा सकेगा, जो देव संस्कृति के, विश्व संस्कृति के, विश्व संस्कृति के रूप में परिणत होने का मूल नियंत्रण बने ।
धन लक्ष्मी वहीं विराजती हैं, जहाँ दुरुपयोग न होता हो, जहाँ सदैव पुरुषार्थ में निरत रहने वाले व्यक्ति बसते हो । बलि अपने समय के धर्मात्मा राजा था । उनके राज्य में सतयुग विराजता था । सौभाग्य लक्ष्मी बहुत समय तो उस क्षेत्र में रही, पर पीछे अनमनी होकर किसी अन्य लोक को चली गई । इन्द्र को असमंजस हुआ और इस स्थान-परिवर्तन का कारण पूछ ही बैठे । सौभाग्य लक्ष्मी ने कहा-मैं उद्योगलक्ष्मी से भिन्न हूँ । मात्र पराक्रमियों के यहाँ ही उसकी तरह नहीं रहती । मेरे निवास में चार आधार अपेक्षित होते हैं (1) परिश्रम में रस (2) दूरदर्शी निर्धारण (3) धैर्य और साहस(4) उदार सहकार । बलि के राज्य में जब तक यहाँ रहने में मुझे प्रसन्नता थी । पर अब, जब सुसम्पन्नों द्वारा उन गुणों की उपेक्षा होने लगी, तो मेरे लिये अन्यत्र चले जाने के अतिरिक्त और कोई चारा न था ।
वांग्मय अब गाँव-गाँव में
रायपुर शाखा ने ‘ऋषि-चिंतन’ के नाम से युग-साहित्य केन्द्र स्थापित किया है । केन्द्र के परिजनों ने जितना साक्षरता समिति से संपर्क किया व उन्हें वांग्मय के उपयोगी खण्ड दिखाए । जिला साक्षरता समिति के पास उपयोगी साहित्य खरीदने के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध रहता है । उन्होंने पूज्यवर के वांग्मय से प्रभावित होकर चिकित्सा उपचार के विविध आयाम ग्रन्थ की 1100 प्रतियों का एक मुश्त आर्डर दिया । इसके लिए रायपुर के परिजन साधुवाद के पात्र है । अन्य परिजन भी जिला साक्षरता समितियों से संपर्क करके उन्हें पू. गुरुदेव का वांग्मय दिखाकर उसे गाँव- गाँव तक पहुँचाने के लिए महत्वपूर्ण सहयोग कर सकते हैं।
करुण क्रन्दन और पैशाचिक अट्टहास दोनों की सम्मिलित गूँज ने उन्हें चौका दिया । वे अपने कर्त्तव्य कर्म से निवृत्त होकर आयु के अन्तिम चरण में शान्तिपूर्वक भगवद् भजन करते हुए आत्म-साधना में तल्लीन थे । उनकी यह आत्मतल्लीनता यह सिद्ध कर रही थी कि मोक्ष का प्रयत्न अधम योनि में भी निषिद्ध नहीं है । यदि कोई सच्चे मन से निम्न योनि में भी धर्म-कर्त्तव्यों का पालन करता है तो वह उस योनि को भी धन्य बनाकर स्वयं भी धन्य बन जाता है और यदि मनुष्य जैसी श्रेष्ठ योनि पाकर भी अधम कार्य करता है तो न केवल मनुष्यता को कलंकित करता है, बल्कि स्वयं भी अधम बन जाता है । लेकिन वह तो अधम योनि में रहते हुए भी आन्तरिक देवत्व से भरे−पूरे थे और इसी कारण उनके मर्मस्थल को इस करुण क्रन्दन ने बाँध दिया ।
एकबारगी उन्होंने अपनी गर्दन ऊपर उठाई । आंखें आकाश की ओर निहारने लगी । त्रैलोक्य विजेता कहलाने वाला रावण एक स्त्री को अपहरण किए लिए जा रहा था । दशमुख रावण, जगद्विजयी रावण, देव-दानवों, मानवों को अपने आतंक से पीड़ित करने वाला रावण । अनगिनत कहानियाँ प्रचलित थी रावण की उस क्रूरता के विषय में, जिसे वह अपनी शूरता समझ बैठा था । अपनी दुर्बुद्धि के बावजूद वह अतुलित बल का स्वामी था । अपरिमित सस्नास्नों का भण्डार था उसे पास । सृष्टि का संचालन करने वाली अनेक नियामक शक्तियों को उसने वशीभूत कर रखा था । सभी उससे भयभीत थे । उसका नाम ही किसी बड़े से बड़े पराक्रमी योद्धा को कंपा देने के लिए पर्याप्त था ।
आज वही रावण स्वयं ““““एक बार उन्होंने वृद्धावस्था से जर्जर अपने शरीर की ओर देखा, तत्क्षण उन्हें सीता का करुण क्रन्दन फिर से सुनायी पड़ा । अगले ही पल ज्यादा कुछ सोच-विचार किए बगैर वह उड़ चले । आत्म बलिदान का निश्चय उनके पंखों में गरुड़ का सा वेग भर रहा था ।
उन्हें अपनी ओर आते देख सीता की करुण ध्वनि एक बार फिर सुनायी पड़ी “ आर्य ! यह दुष्ट मेरा अपहरण कर रहा है । आप अत्यन्त वृद्ध है । असमर्थ है इस राक्षस को रोकने में । अपने को संकट में न डाले, किन्तु आर्य पुत्र से, लक्ष्मण से कह दें.........।”
“पुत्री सीता । बात पूरी होने के पहले ही जटायु का स्वर गूँजा -भय मत कर । मैं इस राक्षस को नष्ट कर दूँगा । “
सीता को आश्वासन देने के साथ ही उन्होंने रावण को ललकारा -ठहर, अत्याचारी ठहर । अनीति का जन्मजात शत्रु जटायु आ गया । साथ ही वातार्णव में डैनों के डाँड इतनी जोर से मारे कि समीप का पूरा वन हिल गया । अनेक शाखाएँ टूट गिरी । मानो भयानक अन्धड़ आ गया हो । मुहूर्त मात्र में पुष्पक विमान के आगे आकर प्रतिरोध में टक्कर मारी । रावण के साथ ही पुष्पक भी काँपकर गतिभंग हो गया । रावण ने चौंक कर देखा - क्या यान किसी पर्वत शिखर से टकरा गया ? और खंग खींचता हुआ बोला- “ अच्छा जटायु तू है । “
एक और धर्मात्मा जटायु और दूसरी और दिव्यास्त्रों से सज्जित दशानन । निःशस्त्र जटायु ने रावण के छक्के छुड़ा दिए । रावण ने अपने दसों हाथों में पाँच धनुष चढ़ाए और बाणों की झड़ी लगा दी, किन्तु जटायु का वेग प्रचण्ड था । अपने पंखों के झटके से उन्होंने बाणों को व्यर्थ कर दिया । पंजे के प्रथम आघात में ही रावण का सारथी समाप्त हो गया । उसके यान को चोंच के प्रहार से रावण का शरीर लथपथ हो गया । निःशस्त्र जटायु ने रावण के छक्के छुड़ा दिए, कई बार परास्त किया, किन्तु निर्लज्ज पापी जूझता ही रहा और अनीतिपूर्वक घात-प्रतिघात करता रहा ।
श्रावण ने धोखे से उनका एक पंख काट डाला । एक पंख कटते ही असन्तुलित होकर वे लड़खड़ाए । तब तक रावण ने उनके दोनों पैर काट दिए और गिरने से पहले ही दूसरा पंख भी काट लिया । जटायु भूमि पर गिरे । इतने में रावण आतुरतापूर्वक भाग निकला । अपनी मूर्छा के बावजूद जटायु की सांसें अभी गतिशील थी ।
पल, घड़ियाँ गुजरती रही । साथ ही राम के कदमों को आहट भी नजदीक आती गयी । “राम” । जटायु के मुख से एक क्षीण ध्वनि निकली । राम की गोद में उनका सिर था । वह सीताहरण और दशानन के संघर्ष की कथा अटकते-अटकते, धीमे स्वरों में सुना रहे थे, किन्तु मैं वृद्ध उस दुर्दम से जीत न सका । उसने तलवार से मेरे पंख और पैर काट दिए । मैं तुम्हारे अवतार कार्य में समुचित सहयोग न कर सका ।
“ नहीं तात । आप अवतार चेतना के शाश्वत सहचर है । आपका साहस, त्याग, बलिदान भविष्य के लिए लोकादर्श होगा । राम भी आपके सम्मुख कंगाल है । आपको कुछ देने में राम भी समर्थ नहीं, मर्यादा पुरुषोत्तम भरे गले से बोले -” परार्थ में प्राणोत्सर्ग करने वाले प्राणियों को परम पद तो स्वतः मिल जाता है । राम आपको क्या देगा, वह तो सर्वदा के लिए आपका ऋणी है।”
राम के इस कथन के साथ ही जटायु ने देह छोड़ दी । लक्ष्मण ने आस-पास से सूखी लकड़ियाँ एकत्र करके गोदावरी के तट पर चिता का निर्माण किया । दोनों भाइयों ने जटायु का शरीर उठाया । गोदावरी में स्नान कराके उसे चिंता पर स्थापित किया । श्रीराम के आदेश से लक्ष्मण पर्णशाला से अग्नि ले आए । सबका शरीर दक्षिणाग्नि की आहुति बनता है, किन्तु चिता की परिक्रमा करके श्रीराम ने अपने हाथों से उसमें अपने द्वारा स्थापित पूजित अग्नि अर्पित की । पशु -पक्षियों के लिए यों अन्त्येष्टि संस्कार का विधान नहीं है । किन्तु जिन श्री राम के हाथों की अग्नि महाराज दशरथ को नहीं मिल सकी, जटायु को प्राप्त हुई ।,
चिताग्नि शान्त हो जाने पर श्री राम ने भाई के साथ गोदावरी स्नान करके, अंजलि के जल से भस्म को गोदावरी में प्रवाहित किया । तर्पण किया जटायु का और उनके उपयुक्त पिण्डदान किया। देर तक दोनों भाई बैठे रहे यहाँ । भगवान श्री राम को उस समय जैसे सीता भूल ही गयी । उनके मुख पर केवल जटायु के स्नेह, शौर्य सद्गुण की प्रशंसा थी । आखिर वह उनके शाश्वत सहचर जो थे ।
अंतिम बार हम सब एक बार और मिल लें ‘ शीर्षक से मार्च 1971 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित सम्पादकीय में प. पूज्य गुरुदेव ने लिखा- “हमारे जाने के दिन अति निकट आ गये है। अति महत्वपूर्ण कार्य पूरा करने के लिए हमें जाना पड़ रहा है ।’ परम पूज्य गुरुदेव जैसी सत्ता, जिसके लिये मथुरा रहकर भी वह सब कुछ कर पाना सम्भव था जो उनने हरिद्वार में किया, तथापि यदि यह सत्य है कि आत्मविद्या की शून्यता और दिग्भ्रान्तिओं के उपचार निवारण हेतु एवं ब्रह्मवर्चस सम्पन्न व्यक्तियों को उभारने के लिए उन्हें जीवन के अंतिम चरण में तप,पूत वातावरण की आवश्यकता पड़ेगी और इसी कारणवश वे स्थान परिवर्तन करने जा रहे थे, तो शाँतिकुँज की स्थापना का मूल मर्म समझ में आ जाता है । गुरुदेव ने लिखा -” हम पर विश्वास किया जाना चाहिए कि हम दूसरे बाबाजियों की तरह अकर्मण्यता से दिन नहीं काटेंगे ओर विष्वष् मान के प्रति अपने कर्त्तव्य को उपेक्षा में नहीं बदलेंगे । जब तक हमारी अंतिम साँस चलेगी विश्व मानवता की सेवा से मुँह नहीं मोड़ेंगे । हम प्रचण्ड आत्मशक्ति की ऐसी गंगा को लेने जा रहे हैं, जिससे अभिषत सागर सुतों की तरह आग में जलते, नरक में बिलखते जन-जन को आशा एवं उल्लास का लाभ दे सकें । लोकमान को बदलने के लिए ही हमारी भावी तपश्चर्या नियोजित होगी । हमारे प्यार -अनुदार में राई-रत्ती भर भी कमी नहीं आने वाली । माताजी हरिद्वार रहेंगी । वे हमारे प्रतिनिधियों के साथ हमारे कार्य को भली प्रकार करती रहेगी ।”
भाव भरी अंतरंग मनः स्थिति जो विदाई के क्षणों में गुरुदेव की थी, उससे आगे का स्वरूप स्वल्प दिखाई पड़ने लगा था । 1971 के जून माह की 17 से 20 ता. को एक विराट विदाई सम्मेलन मथुरा में सम्पन्न हुआ एवं 20 ता. को सबने विदा लेकर पूज्य गुरुदेव एवं वं. माताजी हमेशा के लिए मथुरा छोड़कर अपनी आगामी प्रगति यात्रा की ओर चल पड़े । रोते-बिलखते लाखों व्यक्तियों को जो विदाई सम्मेलन में उपस्थित थे, इन पंक्तियों के लेखक ने अपनी आँखों से देखा है । यह भी देखा है कि स्नेह -सूत्र में जन्म -जन्माँतरों से एक सूत्र में पिरोयी हुई आत्माएँ अपने आराध्य के बिछोह से कितनी आकुल -व्याकुल है, परंतु उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन देकर परम पू.गुरुदेव शाँतिकुँज होकर हिमालय के लिए और वं. माताजी शाँतिकुँज में रहकर उसे छावनी के रूप में विनिर्मित करने के लिए अपनी तीस वर्ष तक रही एक सक्रिय कर्मभूमि को छोड़कर चल पड़े ।
यहाँ से मिशन का अगला अध्याय आरम्भ होता है । जिन्होंने गुरुदेव एवं वं. माताजी के दर्शन को समझा है उन्हें तो किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी किंतु जो इस मिशन से धीरे-धीरे संपर्क में आये अथवा जिनने केवल स्कूल शाँतिकुँज मात्र दूर से देखा है उन्हें विगत का इतना विवरण बताना अनिवार्य था ताकि वे 1971 से आरम्भ हुई वं. माताजी की विशिष्ट भूमिका को समझ सकें, जो एक दायित्व के रूप में पं. पूज्य गुरुदेव के द्वारा उन्हें सौंपी गयी थी ।
वैसे तो वं. माताजी की पं. पूज्य गुरुदेव के साथ नवनिर्माण के इस अभिनव आँदोलन में भागीदारी तब से ही आरम्भ हो गई थी, जब वे अखण्ड ज्योति संस्थान के पुराने भवन में पं. पूज्य गुरुदेव के साथ परिणय के बाद एक सूत्र में बंधकर कटिबद्ध हो गयी थी । आये हुए हर परिजन को भोजन कराने से लेकर घर की आर्थिक व्यवस्था तथा पत्रिका एवं पुस्तकों के प्रकाशन तथा आये हुए हर पत्र का जवाब देने में उनका सक्रिय योगदान प्रारम्भ से ही रहा । 1926 में जन्मी वंदनीया माताजी के कंधों पर बहुत ही कम उम्र में, एक बहुत ही बड़ी जिम्मेदारी आ गयी थी । पं. पूज्य गुरुदेव के लिए अपने सगे -संबंधी रिश्तेदारों के बच्चे एवं गायत्री परिवार के परिजनों एवं उनके बालक-बालिकाओं में कोई अंतर नहीं था । दो मंजिल के भुतहे मकान में 40-50 से अधिक व्यक्ति एक बार में रह लेते थे, चिकित्सा भी करा लेते थे, पढ़ भी लेते थे, अनुदान पाकर, आशीर्वाद लेकर चले जाते और फिर कोई नया समूह आ जाता । यह सब कैसे होता था आज भी समझ में नहीं आता । ऐसी जिम्मेदारियों के बोझ से लदी वं. माताजी 1943-44 से लेकर 1971 तक जो कार्य सम्पन्न करती रही उसमें एक अत्यंत जटिल स्तर का कार्य उनके कंधों पर आ गया । जहाँ अखंड ज्योति संस्थान भीड़-भाड़ के बीच में बाजार के बीच अवस्थित था वहाँ शाँतिकुँज बिलकुल अलग-अलग दुनिया के शोर -शराबे से दूर एकाँत में स्थित था । जहाँ उनके आराध्य भी सशरीर उनके पास नहीं थे । प्रारम्भ में उनके साथ शाँतिकुँज में मात्र तीन कार्यकर्त्ता, दो देख−रेख करने वाली महिलाएँ (शारदा देवी एवं रुकमणी देवी ) कुल चार कन्याएँ एवं एक समर्पित स्वयं सेवक के रूप में श्री रामचंद्रसिंह भी थे जो आज भी उन दिनों की साक्षी देते हैं। इन छोटी-छोटी बालिकाओं के द्वारा वं. माताजी ने न केवल अखण्ड दीपक के समक्ष 24 लक्ष के 24 अनुष्ठान कराये थे बल्कि उन्हें माँ का प्यार देते हुए उन्हें नारी जाग्रति अभियान का सूत्रधार भी बनाया था । बड़ा ही कठिन रहा होगा उस विराट हृदय वाली माँ के लिए वह क्षण, जब उनके समक्ष नन्ही-नन्ही 12 से 14 वर्ष की बालिकाएँ समस्त प्रतिकूलता के मध्य रहती हुई निरंतर तप में संलग्न रहती थी । वे स्वयं अपने भरे-पूरे परिवार को अपने पीछे छोड़कर गई थी । जिनमें मात्र 20 दिन पूर्व विवाह होकर गयीं, उनकी बेटी शैलबाला तथा उनके आराध्य परम पू. गुरुदेव 30 जून को उनसे विदा होकर हिमालय जाने वाले थे । शाँतिकुँज के आस पास का क्षेत्र उन दिनों निर्जन था । हरिद्वार ऋषिकेश के बीच यातायात भी उतना नहीं था और सप्तर्षि आश्रम स्थित शाँतिकुँज का मुख्य द्वारा पूर्वाभिमुख होने से चार धामों को जाने वाले मुख्य मार्ग से बिल्कुल ही अलग था । यहाँ से एक बस सबेरे व एक शाम को आती और सप्तर्षि थोड़ी देर रुक कर चली जाती थी । मात्र इतना ही संपर्क हरिद्वार से था । चारों ओर बड़े घने-घने पेड़, रात्रि में पशु -पक्षियों की नीरव निस्तब्धता को चीरती हुई आवाजें, एकाँत में सोने के अनभ्यस्त व्यक्ति को तुरंत जगा देती थी । सप्तर्षि आश्रम से लेकर शाँतिकुँज से हरिद्वार, ऋषिकेश के मुख्य मार्ग के बीच की सड़क तो विगत छह-सात वर्षों में पक्की बनी है एवं प्रकाश व्यवस्था भी अब उपलब्ध है। उन दिनों जबकि शाँतिकुँज बहुत छोटा था और अपने शैशवकाल में से प्रथम वर्ष में से गुजर रहा था, गंगा का किनारा होने, वृक्षों की बहुलता होने के कारण यहाँ ठण्डक भी बहुत थी । स्थापना के प्रायः 12 वर्ष बाद तक भी यहाँ पंखा चलाने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई । बदलाव तो बाद में आया है जब यहाँ गंगा पर बाँध बँध गए नहर निकालीं गईं एवं वृक्ष कटने का सिलसिला चल पड़ा । निश्चित ही नैसर्गिक सौंदर्य से भरे पड़े वातावरण के रूप में शाँतिकुँज का वह मुख्य भवन जिसमें अखण्ड दीपक स्थापित है तथा पीछे का छोटा बगीचा शामिल था । शेष विस्तार जिसे आज लोग गायत्री नगर एवं गायत्री तीर्थ के रूप में जानते हैं तो बहुत बाद में 1977-78 में जाकर बना ।
हम पाठकों को 25 वर्ष पूर्व के काल प्रवाह में 1971 -72 के प्रारम्भिक दिनों में ले जाना चाहते हैं जब यहाँ आने वाले व्यक्तियों की, जिज्ञासु साधकों की भीड़ नहीं के बराबर थी । वं. माताजी न केवल उनके साथ आयी 12-13 वर्ष की बालिकाओं की अभिभाविका, संरक्षिका थी वरन् नीचे कार्यालय में बैठकर आने वाले हर पत्र का उत्तर देने वाली एक व्यवस्थापिका भी थी । समय-समय पर जमीन, बैंक संबंधी कार्यों के लिए उन्हें सिटी बस में शहर भी जाना पड़ता था । निजी वाहन यहाँ बाद में आए जब नारी जागरण सम्मेलन हेतु दो एम्बेसेडर गाड़ियाँ ली गई । उनके सहायक हमारे वर्तमान व्यवस्थापक श्री बलराम जी होते थे जो व्यवस्था में उनके साथ थे । यह सारा कार्य जो आज हम लोग सम्पन्न कर रहे है परम पूज्य गुरुदेव द्वारा वं. माताजी को सिखाया गया और उनके द्वारा उन बालकों को जो आज इतने बड़े विराट् संगठन की स्थापित नीतियों का क्रियान्वयन सुव्यवस्थित सामूहिक दायित्व का निर्वाह करते हुए कर रहे है। लगभग 45 वर्ष की आयु, कार्य का अत्यधिक भार, स्थूलता लिए हुए काया एवं सबसे बड़ी प्रतिकूलता अपने आराध्य का प्रत्यक्षतः न होना, इन सबके बावजूद वं. माताजी ने सारा बोझ अपने कंधों पर लेकर शाँतिकुँज रूपी षिष् को चलने-फिरने योग्य बनाया ।
छोटी -छोटी बच्चियाँ जो जून माह में चार की संख्या में थी एवं मई 1972 में जिनकी संख्या जाकर 24 हो गई थी, उन्हें यहां 24 घंटे अखण्ड जप सम्पन्न करना था । गायत्री महाशक्ति की प्रतिमा के समक्ष जल रहे अखण्ड दीपक,जो कि परम पूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 में प्रज्ज्वलित किया गया था, के समक्ष दिनभर एवं रात्रि को तीन पातियों में समय विभाजन कर निरंतर जप की व्यवस्था बनाई गयी थी । शुरुआत के कुछ दिनों बाद से वर्ष में यह कार्य कुमारी पुष्पा, आदर्श, कमला, बसंती, निर्मला, रेणुका, सरोज, सुधा एवं उर्मिला, नामक नो बालिकाओं, जो भरत भर के अपने वर्षों से जुड़े कार्यकर्त्ताओं की पुत्रियाँ थी, के माध्यम से प्रारम्भ हुआ था । प्रातः काल एवं सायंकाल की आरती बन्द, माताजी सहित नौ बालिकाएँ एवं दो उनकी देख-रेख करनी वाली बहनों द्वारा सम्पन्न होती थी । अखण्ड गायत्री ज पके अतिरिक्त शेष जो समय बचता उसमें बन्द माताजी, 12 से 14 वर्ष की औसत आयु वाली उन देव कन्याओं को भोजन बनाना, संगीत संकीर्तन के साथ सम्भाषण, योग -व्यायाम आदि की कक्षाओं में विभाजित करके दिनचर्या पूरी कराती थी । माताजी की व्यक्तिगत साधना इसके अतिरिक्त थी जो प्रातःकाल तीन बजे से आरंभ हो जाती थी । प्रातः उठकर वे अखण्ड दीपक के सामने भजन कर रही बालिका को देखकर आती, अपना दैनंदिन कार्य समाप्त कर स्वयं भी जप में बैठ जाती थी । आरती होने तक सब बच्चों को नहला-धुलाकर तैयार करके वे उन्हें धीरे-धीरे स्वावलम्बी बनने का प्रशिक्षण दे रही थी । बीच-बीच में मनोरंजन हेतु कुछ ऐसी मनोरंजक अंताक्षरियों, खेल-चर्चाओं अथवा बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों का समावेश उनका मन बहलाने के लिए करती । इस बीच गायत्री मंदिर, जो शाँतिकुँज का सबसे पहला मंदिर है जहाँ पर अखण्ड दीपक स्थित है, में जन निरंतर चलता रहता था । कभी व्यवधान न आने पावें, इसकी व्यवस्था वन्द, माताजी के तरफ से की गई थी । कभी-कभी अतिरिक्त जप कर वन्द, माताजी अखण्ड दीपक का दायित्व किसी एक बालिका या शारदा देवी के जिम्मे छोड़ बालिकाओं को हरिद्वार घुमाने अथवा संत सरोवर के गंगा तट पर ले जाने का क्रम भी बनाए रखती थी । यह सारा विवरण इसलिये लिखा जा रहा है ताकि आज के दो हजार के स्थायी एवं तीन हजार प्रतिदिन के आगंतुक शिविरार्थी, दर्शनार्थी लोगों से भरे भीड़ वाले शाँतिकुँज के प्रारम्भिक स्वरूप को लोग समझ सकें । जप की आधारशिला पर रखी गयी शाँतिकुँज की नींव इतनी मजबूत और प्राण -ऊर्जा से ओतप्रोत है कि इसकी स्थापना को कोई भी डगमगा नहीं सकता ।
क्रमशः देव कन्याओं की संख्या बढ़ते-बढ़ते ठण्डक के बाद चौबीस तक पहुंच गई थी । जब अप्रैल -मई 1972 में यहाँ अतिरिक्त निर्माण की आवश्यकता आ पड़ी । ठण्डक के दिन बड़े ही कष्टकर थे । दोनों ओर पहाड़ की शृंखलाएं, बची में गंगा, उसके किनारे बसा शाँतिकुँज उस पर भी आराध्य का बिछोह माताजी के लिए अत्यधिक दबाव का कारण बन गया । जनवरी 1972 के बाद जब माताजी की छाती में कभी दर्द हो उठता था तब वे हर लड़की या आगंतुक से आकुलता-व्याकुलता यही पूछ बैठती देखना कहीं तुम्हारे पिताजी तो नहीं आये । उनका आशय गुरुदेव की ओर था जो उन दिनों हिमालय में कष्टसाध्य तपश्चर्या हेतु स्वयं को नियोजित किये हुए थे । उन्हें दिनों बंगला देश की मुक्ति का युद्ध पाकिस्तान से आरम्भ हो चुका था एवं वन्द, माताजी और पूज्यवर की समग्र उग्र तपश्चर्या उस प्रतिकूलता से जूझने में लगी थी । इसी अवधि में एक दिन वन्दनीय माताजी को दिल का दौरा पड़ा जो वे सह तो गई परंतु उस दौरे ने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया । अगले ही दिन बिना किसी पूर्व सूचना, के बेतार-तार से सूचना की तरह सम्वेदना की कड़ी से जूड़े । गुरुदेव शाँतिकुँज आ पहुँचे । वन्द. माताजी के साथ बैठकर एकाँत में विचार-विमर्श किये, सतत् उनके पास संरक्षण हेतु बने होने की बात कही एवं भावी गतिविधियों का जो जून 1972 के बाद आरम्भ होना थी, एक नक्शा खींचकर पाँच दिन बाद चले गये ।
“गुरुदेव क्यों गये, क्यों चले गये’ शीर्षक से अप्रैल 1972 की अपनों से अपनी बात में वन्द माताजी ने पूर्णतः स्वस्थ स्थिति में संपादकीय लिखा । इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि गुरुदेव का आकस्मिक आगमन क्यों हुआ ? अपने निज के स्वास्थ्य के संबंध में माताजी ने इसी सम्पादकीय में लिखा “ इस समय उनके आने का कारण मेरा स्वास्थ्य था ।” आगे लिखा -” इन दिनों हृदय के कई अत्यंत घातक दौरे आये, वे असामान्य थे । जहाँ तक सारा जीवन तितीक्षा का अभ्यास बन गया । गुरुदेव के संपर्क में यही बढ़ती रही कि क्रंदन को मुस्कान में कैसे परिवर्तित किया जाय? इस बार जो कष्ट हुआ उसे चिकित्सकों ने एक स्वर से प्राणघातक ठहराया एवं उनसे बच निकलने पर आश्चर्य प्रकट किया । बसंत तक कड़ी तपश्चर्या में लगे रहने का एवं शाँतिकुँज न आने का पू. गुरुदेव का प्रतिबंध था सो पूर्ण हो चुका था । यह कष्ट बसंत के बाद एकाएक आया और पूज्यवर के आने के निमित्त का कारण बन गया ।” महापुरुषों की लीला बड़ी निराली होती है । वन्द, माताजी लिखती है -जैसे ही पुकार उन तक पहुँची वह अविलम्ब शाँतिकुँज पहुँच आये । विराट परिवार के विविध प्रकार का भार मेरे ऊपर आ पड़ा । शक्ति कम और बोझ अधिक पड़ने से अपना ढाँचा चरमराने लगा तो उसमें कोई आश्चर्य करने की बात नहीं थी । यही है अपने रोग के प्रकोप का कारण ।”
संयोगवश अपनी कलम से विगत की स्मृतियों को ताजा कराता, यह सम्पादक भी उन पाँच दिनों की अवधि में यही उपस्थित था ।जो कुछ भी उसकी 21-22 वर्ष की बाल वृद्धि ने समझा एवं जो कुछ भी चिकित्सकों से परामर्श के बाद समझ में आया उसमें एक ही निष्कर्ष निकला कि गुरुदेव का आना एवं वन्द, माताजी की व्याधि ही एक निमित्त मात्र थी । शाँतिकुँज का भविष्य क्या है ? कैसे भावी निर्माण किये जाएँ ? आने वाले बाद आने पर समष्टि के कल्याण हेतु व्यक्तिगत उपासना-साधना एवं विशिष्ट लेखनी के साथ ऊपर एक छोटी खुली छत के साथ बना दिया गया एवं जब तक गुरुदेव आये तब तक ऊपर रहने, उस स्थान को तप -ऊर्जा से अनुप्राणित करने हेतु देवी का स्वरूप समझे जाने वाली 24 बालिकाओं को रहने की व्यवस्था यहीं पर बना दी गई । यहीं पर रहकर प. पूज्य गुरुदेव को न केवल देव कन्याओं का वरन् प्राप्त ऊर्जा सम्पन्न कार्यकर्त्ताओं का प्राण प्रत्यावर्तन एवं महत्वपूर्ण शिक्षण सम्पन्न करना था ।
मई 1972 का पूरा अंक, भावी क्रिया -कलाप जो उनके बताये एवं परिजनों से गुरुदेव की क्या आशाएं और अपेक्षाएँ थी, इसी पर केन्द्रित था । वन्द. माताजी ने इस अंक में शाँतिकुँज को गुरुदेव का डाक बंगला बताया और कहा एवं लिखा कि गुरुदेव अगले दिनों स्थूल व सूक्ष्म शरीर से जब चाहेंगे ऋषि सत्ताओं से मिलने -मार्गदर्शन के लिए यहाँ से चले जाया करेंगे । अनुभूति और उपलब्धि जो परिजन जानना चाहते थे, उन्हें समय से पूर्व प्रकाशित न करने का आदेश देकर चले गये । उन्होंने यह भी बताया कि शाँतिकुँज अंततः एक शक्ति केन्द्र के रूप में परिणित होगा तथा युग निर्माण के प्रत्येक सदस्य महामानवों की प्रत्यक्ष भूमिका अदा करेगा । इस कार्य के लिए जिस युग साधना की आवश्यकता है उसकी का मार्गदर्शन प्राप्त कर वे जून 72 में लौटेंगे एवं प्रत्यावर्तन का क्रम आरम्भ करेंगे । गुरुदेव द्वारा मिले संकेतों से प्रतीत होता है कि वे आत्मबल संग्रह करने और आत्म -कल्याण के साथ लोकमंगल के इच्छुक व्यक्तियों की संख्या गिनती के अनुपात में नहीं, गुणों के अनुपात में बढ़ाना चाहते थे । इसी कार्य के लिए समस्त ऋषि परम्पराओं का बीजारोपण शाँतिकुँज में करके नवनिर्माण की पृष्ठभूमि विनिर्मित करना चाहते थे । ऋषि परम्परा, जो कभी सतयुग की मूल आधार थी, का क्रियान्वयन कैसे हो, इसके लिये वे शाँतिकुँज को एक प्रखर ऊर्जा सम्पन्न गायत्री तीर्थ का रूप देना चाहते थे यह सारी रूपरेखा व वन्द. माताजी एवं उनके सहायकों के साथ फरवरी 72 के प्रथम सप्ताह में संक्षिप्त प्रवास के दौरान बन गई । प. पूज्य गुरुदेव घोषणा कर गये कि शाँतिकुँज अंततः शक्ति केन्द्र के रूप में परिणित होगा । नारी जागरण का महान अभियान यहीं से चलेगा और इक्कीसवीं सदी को नारी सदी बनाने तक तूफान का रूप लेगा । शाँतिकुँज अन्यान्य आश्रमों की तरह एक भवनों के समुच्चय के रूप में नहीं बल्कि आज आत्म बल सम्पन्न महामानव बनाने की टकसाल के रूप में विनिर्मित होना था । इस सारे कार्य की पृष्ठभूमि 1971-72 की इस अवधि में बन गई । इसी अंक (मई 72 ) के माध्यम से गुरुदेव ने विदाई सम्मेलन के बाद पहली बार अपने समस्त परिजनों के लिए जो कि लाखों की संख्या में थे, अपना हार्दिक भाव वन्द, माताजी के माध्यम से पहुँचाया । यह कथा गाथा आज 25 वर्ष के बाद के शाँतिकुँज में जब हम देखते हैं तो दिव्य दृष्टि सम्पन्न अवतारी सत्ता के द्वारा किये गये एक नर्सरी निर्माण के रूप में समझ में आती है, जिसे भविष्य में इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री कहे जाने का श्रेय अर्जित करना था ।
शाँतिकुँज में वन्दनीया माताजी की तप -साधना चल रही थी । विश्वामित्र की तपस्थली में फिर से एक बार नए प्राणों का संचार हो रहा था । उसमें नई ऊर्जा भरी जा रही थी । इसी बीच गुरुदेव हिमालय से वापस आ गए । इस बार भी वह देवात्मा हिमालय से तप-प्राण बटोर कर लौटे थे । अनेक नई जिम्मेदारियाँ भी उन्हें सौंपी गई थी । उनके वापस आने से शाँतिकुँज परिसर में उल्लास और उत्साह का उफान आ गया । माताजी अपने आराध्य को अपने समीप पाकर प्रसन्न थी । ऋषि युग्म के तपःपूत व्यक्तियों के स्पर्श से समूचा परिसर महाप्राण का आगार बन गया । यहाँ का कण-कण उनकी तप -ऊर्जा से प्राणवान हो उठा ।
पूज्यवर अपनी नई जिम्मेदारियों को अपने सहचरों में बाँटना चाहते थे । आखिर उन्हें नवयुग के आगमन के लिए नए सरंजाम जो जुटाने थे । पर उन्हें परिजनों की दुर्बलता का भी पता था । उन्हें इस बात का अहसास था कि उन्हें प्राणवान बनाए बिना यह कार्य सम्भव नहीं । सौ नई जिम्मेदारियों को सौंपने से पहले प्राण प्रत्यावर्तन की बात सोची गई । प्राणों का नवीनीकरण करने के लिए बसन्त 1973 से प्राण प्रत्यावर्तन सत्र शृंखला का आयोजन हुआ ।
इस सत्र शृंखला का नाम विशेष ही अपनी गरिमा प्रकाशित करने के लिए पर्याप्त है। प्राण प्रत्यावर्तन अर्थात् प्राण चेतना का आदान-प्रदान । यह आदान प्रदान किसके साथ ? इसका उत्तर यही हो सकता है -लघु का महान के साथ, आत्मा का परमात्मा के साथ, प्राण का महाप्राण के साथ-युग निर्माण मिशन के परिवार का उसके सूत्र संचालक के साथ ।
प्राण अर्थात् व्यष्टि-व्यक्ति की परिधि में अवरुद्ध चेतना । महाप्राण अर्थात् समष्टि की अनन्त सीमा में सुविस्तृत ब्रह्म सत्ता । दोनों का एक दूसरे में आदान -प्रदान हो आत्मा अपने को परमात्मा में समर्पित करें । शिष्य स्वयं को चेतना को गुरु में उड़ेलें ओर परमात्मा गुरु अपने आनन्द, अनुग्रह को, भावभरी आत्मीयता के साथ साधक पर, जीवात्मा पर बरसा दे । शिष्य अपनी क्षुद्रता का, स्वार्थ भरी संकीर्णता का गुरु में विसर्जन करे और गुरु उसे अपनाकर अपनी विभूतियों से उसके व्यक्तित्व को सजा दें ।
व्यक्तिगत क्षुद्रता की बूँद को जिन्होंने समष्टि के विशाल सागर में घुलाया है वे ही तो महामानव, देवदूत और ऋषिकल्प कहलाने के अधिकारी हुए है, अभावग्रस्त दुःख दैन्य की तुच्छता का अनन्त और असीम के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेना और विराट के ब्रह्मलोक से टपकने वाले अमृत का रसास्वादन करना यही है । आध्यात्मिकता का सार, ब्रह्मविद्या का उद्देश्य इसी प्राण प्रत्यावर्तन में निहित है।
प्राण का महाप्राण के साथ आदान-प्रदान सम्भव हो सके, आत्मा और परमात्मा के परस्पर मिलन की अनुभूति होने लगे, यही है प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, जिसकी व्यवस्था इन दिनों शाँतिकुँज में की गई थी । इन प्रत्यावर्तन सत्रों में उपयुक्त साधकों को क्रमशः थोड़ी -थोड़ी संख्या में बुलाया गया। एक सत्र में अधिकतम चौबीस, पच्चीस साधकों की ही व्यवस्था थी । इन सत्रों की अवधि चार दिन की थी । एक दिन आने का, एक दिन जाने का जोड़ ले तो छह दिन कहा जा सकता था । पर साधना काल 4 दिन अथवा 96 घण्टे का ही रखा गया था ।
इस अवधि में साधकों को अपनी एकान्त कोठरी में एकाकी रहना पड़ता । चार दिनों में प्रतिदिन छह घण्टे साधना के लिए अनिवार्य थे । एक घण्टा मध्याह्न बौद्धिक प्रवचन द्वारा आत्मबोध की शिक्षा दी जाती और सायंकाल एक घण्टा भाव गीतों द्वारा अन्तःकरण में उच्चस्तरीय उत्कृष्टता को उमगाया जाता था । छह घण्टे साधना, 2 घण्टे प्रशिक्षण इस प्रकार आठ घण्टे का नियमित और अनुशासित कार्यक्रम इन सत्रों में रहता । दिनचर्या इतनी सुगठित कि फौजी अनुशासन का पालन करने वाले ही उसमें फिट बैठे । अस्तव्यस्तता के आदी लोग इसमें रुक नहीं सकते थे । साधना वाले चार दिनों में प्रत्येक साधक को शाँतिकुँज की समी-मर्यादा में रहना पड़ता । इस परिसर से बाहर निकलने की कतई छूट नहीं थी । सीताजी की सुरक्षा के लिए जिस प्रकार लक्ष्मण रेखा खींची गई थी, लगभग वैसी ही शाँतिकुँज की सीमाएँ प्रतिबन्ध रेखा बन जाती ।
प्रत्यावर्तन सत्रों में आहार की भी विशेष मर्यादा रखी गयी थी । प्रातः काल जलपान में सर्वप्रथम आहार के रूप में पंचगव्य ही साधकों को दिया जाता । मध्याह्न को जौ, चावल और तिल की रोटी जी जाती । यों साथ में चावल, दाल, दलिया जैसे सात्विक आहार की मात्रा रहती पर प्रथम आहार हविष्यान्न चरु का ही करना पड़ता । मध्याह्नकालीन और सायं कालीन भोजन में गंगाजल ही प्रयुक्त होता ओर आहर के साथ गंगाजल ही पीने को दिया जाता ।
साधकों को आहार बनाने और परोसने के लिए साधना परायण हाथों का ही उपयोग होता । इस क्रम को वंदनीया माताजी के साथ पुरश्चरण में संलग्न कन्याएँ ही सम्पन्न करती । ब्रह्मचर्य से रहने वाले शरीर ही इस आहार का स्पर्श करते । इससे पूर्व उसे और भी सुसंस्कारी बनाने के लिए आध्यात्मिक उपचारों से सम्पन्न किया जाता । उस पर निरीक्षण दृष्टिपात उन आंखों का रहता, जिन्होंने प्रत्यावर्तन सत्र शृंखला का आधार खड़ा किया था । हविष्यान्न से बनी रोटी के साथ एक विशेष तरह की औषधि गुणों से युक्त चटनी भी दी जाती । इस चटनी में ब्राह्मी, आँवला का विशेष योग रहता । लेकिन इसके साथ ही शतावरी, शंखपुष्पी, गोरखमुण्डी और बच का भी उपयुक्त मिश्रण रहता । इस प्रकार इसे एक मस्तिष्कीय बलवर्द्धक रसादन भी कहा जा सकता है । रोटी के साथ दी जाने वाली यह चटनी स्वास्थ्य की दृष्टि से तो एक महत्वपूर्ण आहार थी । पर उसका मुख्य लाभ अन्तःकरण चतुष्टय से सम्बन्धित मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का स्तर तमोगुण, रजोगुण को भूमिका से ऊँचा उठाकर सतोगुणी स्तर तक पहुँचाने का था । जिसे इसका उपयोग करने वाले साधक अपने अंतर्मन में अनुभव करते ।
साधना उपक्रम में उत्कृष्ट भावनाओं का सघन समावेश प्रत्यावर्तन साधना की अपनी खासियत थी । यही कारण है कि इन दिनों हर साधक को प्रायः मौन रहना पड़ता । उसे गुरुदेव के अतिरिक्त किसी अन्य से बातचीत करने की मनाही थी । साधकों को घर-गृहस्थी और काम -धन्धों की चिन्ता करने से मन को मुक्त रखने तथा अनावश्यक चर्चाएँ तथा हलचलें न करने के लिए कहा जाता । ताकि आत्मचिंतन आत्म -सुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्म-विकास की दृष्टि से बनाया गया कार्यक्रम सुचारु रूप से चल सकें । उपासना को केवल लकीर पीटने की तरह मात्र कर्मकाण्ड स्तर तक पूरा नहीं किया जाता, वरन् उसके साथ जिस भावोत्कर्ष का सम्बन्ध है उसे अधिकाधिक प्रखर बनाने पर जोर दिया जाता । यही कारण है कि इन दिनों साधकों की मनःस्थिति उच्चस्तरीय भावभूमिका में अवस्थित रहती और वे किसी शान्ति लोक में निवास करने का अद्भुत आनन्द जीवन में पहली बार मिला अनुभव करते ।
उपासना पद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदु योग, आत्माराधना, तत्वबोध, नाद योग के दस साधना क्रमों का समावेश था । इसके अतिरिक्त आत्मशोधन की प्रक्रिया ही अमूल्य थी, जिसे साधक गुरुदेव के सान्निध्य में पूरा करते । यह प्रक्रिया विगत जीवन के पापों का स्मरण करने और बताने प्रायश्चित करने ओर भविष्य में पुनः उन भूलों को न दुहराने का निश्चय करने के रूप में सम्पन्न होते । यह प्रत्यावर्तन का प्रथम और आवश्यक चरण था । पहले दिन जब साधक पू.गुरुदेव से मिलने जाते, तो वह उनसे अकेले में अपनी सभी ग्रन्थियों को खोलने की बात कहते । उनके वात्सल्य का स्पर्श पाकर सभी अपनी-अपनी गलतियों को कह सुनाते । साथ ही व्यक्तिगत समस्याओं पर भी उसी दिन आदान-प्रदान, परामर्श कर लिया जाता । ये दोनों कार्य प्रथम दिन ही पूरे हो जाते । ताकि चार दिन बिना इस स्तर का परामर्श किए हुए आवश्यक साधनाक्रम पर मन एकाग्र रखा जा सकें ।
साधनाक्रम को सामान्य शौच,स्नान, भोजन, विराम के अतिरिक्त छह घण्टे रखा गया था । शारीरिक श्रम आठ घण्टा, मानसिक श्रम सात घण्टा और आध्यात्मिक श्रम छह घण्टे की सन्तुलित मर्यादा निर्धारित है, उसकी के अनुरूप इस अवधि का निर्धारण किया गया था यों मध्याह्नकालीन एक घण्टे का प्रवचन और सायंकाल एक घण्टे का संगीत भी जोड़ लिया जाय तो यह अवधि आठ घण्टे भी गिनी जा सकती है । हर साधक को प्रतिदिन पन्द्रह मिनट व्यक्तिगत परामर्श के लिए एकान्त अवसर मिलता सौ उसे सवा आठ घण्टे भी गिना जा सकता है । शेष समय स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के लिए था ।
सामान्यक्रम में इस दिनचर्या को इस तरह विभाजित किया गया । (1) प्रातः 4 बजे उठना (2) 4 से 5 शौच -स्नान (3) 5 से 6.30 तक साधना का प्रथम सोपान (4) 6.30 से 7 बजे जलपान (5) 7 से 7.30 तक वस्त्र धोना, सफाई, व्यायाम ( 6 ) 7.30 से 10 साधना का द्वितीय सोपान (7) 10 से 10.30 भोजन (8) 10.30 से 1.30 विश्राम, स्वाध्याय, मनन, चिन्तन (9) 1.30 से 2.30 प्रवचन (10) 2.30 से 3 जलपान (11) 3 से 5 साधना का तृतीय सोपान (12) 5 से 5.30 शौच आदि (13 ) 5.30 से 6 में भोजन (14 ) 6 से 7 टहलना (15) 7 से 8 भाव संगीत (15) 8 से 4 तक शयन ।
मध्याह्न 10.30 से 1.30 और साँय 5 से 7 की अवधि में हर दिन व्यक्तिगत परामर्श के लिए प्रत्येक साधक को एकान्त समय मिलता । साधना के लिए जो तीन सोपान निर्धारित किए गए थे, उनमें 10 सूत्री क्रियाकलापों का समावेश था जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -
(1) प्रातः 5 से 5.15 शिथिलीकरण मुद्रा, शवासन-शरीर को बिना तनाव का बनाना, अधिकाधिक शिथिल करना, मृतक जैसी स्थिति में शरीर में ढीलापन लाना ताकि मांसपेशियों का तनाव समाप्त हो सके और ध्यान-धारणा में कोई विघ्न न आए ।
(2) 5-15 से 5.30 उन्मनी मुद्रा व मन को विचार रहित खाली कर देना । प्रलय काल जैसी, नीचे नील जल, ऊपर नील आकाश के बीच अपने को एकाकी बालक की तरह कमल पत्र पर पड़े हुए बहते जाने की भावना करना । संसार में वस्तुओं और व्यक्तियों का सर्वथा अभाव अनुभव करना । सर्वथा नीरवता का ज्ञान करना । इस ध्यान से मन खाली हो जाता है और ध्यान पर चित्त को एकाग्र करना सरल हो जाता है।
(3) 5.30 से 6.30 खेचरी मुद्रा जिव्हा को तालू पर उलटकर ब्रह्मा रन्ध्र से टपकने वाले आनन्द और उल्लास को उभय स्तर की अमृत बिन्दुओं का रसास्वादन करना । आनन्द अर्थात् सन्तोष, हर्ष, उल्लास अर्थात् ऊर्ध्वगमन के लिए उमंग उत्साह ।
ये तीन साधनाएँ डेढ़ घण्टे में करने के उपरान्त एक घण्टे के अवकाश के बाद प्रभातकालीन मध्याह्न के पूर्व भाग में की जाने वाली साधनाओं का क्रम आता था । जिनका स्वरूप कुछ इस प्रकार था -
(4) 7.3. से 8 तक आधा घण्टा गायत्री मंत्र की पाँच मालाओं का जप । जप काल में आधे समय मल -मूत्र सनी मलीनता के कारण माता का अपनी गोद न लेना स्नान कराया जाना और पोंछा जाना तदुपरान्त माता की गोद में प्रश्रय और प्यार-दुलार मिलना । जप के अन्त में मूर्याघं देते हुए अपनी उपलब्धियों को जल रूप मानकर ब्रह्मवर्चस के प्रतीक भगवान आदित्य के चरणों में समर्पित, विसर्जित करना ।
(5) 8 से 8-54 पौन घण्टा सोऽहम् साधना-आरम्भ के पन्द्रह मिनटों में श्वास के साथ ‘सो’ की तथा श्वास बाहर निकालते समय ‘हम’ के ध्यान की भावना करना । उसके उपरान्त श्वास के रूप में महाप्राण का शरीर के रोम-रोम प्रवेश और ‘हम’ के रूप में निकृष्ट स्तर की अहंता का बहिष्कार ।
(6) 8-54 से 9.30 पौन घण्टा बिन्दुयोग त्राटक । प्रकाश बत्ती पर दृष्टि जमाना । आँखें बन्द करना और भूमध्य भाग आज्ञाचक्र में प्रकाश ज्योति का ध्यान जमाना । उस प्रकाश का शरीर के प्रत्येक अवयव एवं मन के प्रत्येक स्तर में प्रवेश अनुभव करना और अपनी सत्ता के कण -कण में दैवी प्रकाश की ज्योति जगमगाती अनुभव करना ।
(7) 9.30 से 10 आधा घण्टा नादयोग का पूर्वार्द्ध । भगवान की बंसी जैसी पुकार प्रेरणा में अपने लिए आह्वान का आमंत्रण मानना और रास नृत्य की तरह ईश्वरीय संकेतों पर थिरकने लगने की भावविभोर स्थिति में पहुँचना ।
साधना के इस द्वितीय सोपान के पूरा होने के बाद अगले तृतीय सोपान की बारी आती है।
(8) 3 से 3-45 पौन घण्टा आत्मबोध । दर्पण में अपनी छबि देखते हुए अब तक के अवरोधों के लिए अपने को उत्तरदायी मानते हुए भर्त्सना करना और भविष्य में सत्पथ गमन के लिए अनुरोध, अनुग्रह करना । इसी कलेवर में शैतान और भगवान की परस्पर विरोधी सत्ताएँ अवस्थित देखना । दोनों में से एक को चुनना । आत्मसत्ता के भीतर समाए हुए इष्ट देव का अभिवन्दन और प्रत्यक्ष करना । भविष्य में उसे देवस्तर का बनाने का विश्वास करना । उसी उज्ज्वल स्वरूप को ईश्वर प्राप्ति का प्रत्यक्ष कारण मानना और उस स्तर के लिए अभी से श्रद्धाँजलि समर्पित करना ।
(9) 3 -45 से 4.30 पौन घण्टा तत्वबोध । शरीर और आत्मा का पृथक्करण । अपने शरीर की मृतक स्थिति -कुत्तों, कौओं, कीड़ों, द्वारा खाया जाना, जलाया, गाड़ा जाना । अपने को किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर यह सब दृश्य देखने की स्थिति में रहना । शरीर और मन को आत्मा का उपकरण, वाहन मात्र समझना । उनके स्वार्थ और अपने स्वार्थ में अन्तर करना । उपलब्ध क्षमता में से कितना अंश इन वाहनों के लिए रखना और कितना आत्म-कल्याण के लिए रखा जाना चाहिए । इसका निर्णय करना ।
(10) 4.30 से 5 आधा घण्टा नादयोग का उत्तरार्द्ध । इस बार उच्च दृष्टिकोण अपनाकर संसार में मनुष्यों में बिखरे हुए उत्कृष्टता के तत्व का अनुभव करना और विधेयात्मक दृष्टिकोण के अनासक्त मनः स्थिति के फलस्वरूप मिलने वाले स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति में संगीत ध्वनि के साथ-साथ हर्षोल्लास भरे भाव नृत्य में संलग्न होने की अनुभूति करना ।
प्रत्यावर्तन के इस दस सूत्री साधनाक्रम में पाँच योगों का अद्भुत रीति से समायोजन किया गया था ।(1) लययोग (2) बिन्दुयोग (3) प्राणयोग (4) ऋजुयोग (5) नादयोग । इस एक ही साधनाक्रम में पाँच योग साधनाएँ जुड़ी गुँथी है। इन्हें पाँच कोषों के अनावरण का प्रयोजन पूरा करने वाली पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना भी कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम् साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती हैं आज्ञाचक्र में ज्योति अवतरण बिन्दुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्म सम्बन्ध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं। तीसरे सोपान में आत्मबोध और तत्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष है। लययोग से आनन्दमय कोश -बिन्दुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमय कोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमय कोश की जागृति होती है।
इनमें से प्रत्येक योग की अपनी सिद्धियाँ है, खेचरी मुद्रा से अमरत्व की, देवत्व प्राप्ति, देव सत्ताओं के साथ आदान-प्रदान । बिन्दुयोग से अदृश्य दर्शन, व्यक्तित्व में विद्युतीय प्रवाह का अभिवर्द्धन । प्राणयोग से स्थिरता, सुदृढ़ता, साहसिकता एवं तेजस्विता की वृद्धि, अभय एवं पराक्रम में कौशल । नादयोग से दिव्य श्रवण, वायरलैस जैसा चेतन स्तर उपयोग सूत्र का उठना । ऋजुयोग से आत्मसाक्षात्कार स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति सिद्धियों के संकेत भर है। वस्तुतः उनका सीमाबन्धन नहीं किया जा सकता कि वे कितने प्रकार और कितने स्तर की हो सकती हैं यह साधक की मनः स्थिति पर निर्भर है । दर्पण पर साधना करने के छोटे-से विधान को ही ले लें उसमें छाया पुरुष सिद्धि की समस्त सम्भावनाएँ विद्यमान है । अपने ही स्तर का एक नया सूक्ष्म व्यक्तित्व उत्पन्न कर लेना छाया पुरुष कहलाता है। पाँच कोशों में पाँच छाया पुरुष तक सिद्ध कर लेने की गुँजाइश हैं वे विश्वस्त सेवक का कार्य करने में निरन्तर जुटे रह सकते हैं । प्राणयोग के सहारे प्राण चिकित्सा से कठिन रोगों को सरलतापूर्वक दूर करने में सफलता मिल सकती है । ये सभी पाँच योग जिस सूत्र में गूंथे गए थे वह मंत्रयोग हैं गायत्री महामंत्र की साधना सभी सिद्धियों का आधार है ।
इस साधनाक्रम में, इन साधना सत्रों जिनने भी भागीदारी ली वे आज भी उन चार दिनों की स्मृतियों, अलौकिक अनुभूतियों को अभी तक भूले नहीं हैं । प्रायः सभी का सर्वमान्य अनुभव यही है कि इन दिनों चौबीसों घण्टे पूरे शरीर में विद्युत प्रवाह-सा दौड़ता रहता था । ऐसा लगता था -मानो गुरुदेव अस्तित्व में नए प्राण का संचार कर रहे है। प्राणों के इस प्रवाह को जिसने भी धारण किया वे अविच्छिन्न रूप से सदा सर्वदा के लिए उनके अपने हो गए । यही नहीं अपने में ऐसे साहस, मनोबल, प्राण, बल अनुभव करने लगे कि युग निर्माण मिशन की बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी को आसानी से उठाते चले गए । इन सत्रों की उपलब्धियों, अनुभूतियों को यदि संक्षेप में कहा जाय तो यही कहना होगा कि यह प्राण प्रत्यावर्तन साधना युग परिवर्तन की गतिविधियों का आधार बनी । प्रत्यावर्तित जीवन सांसारिक आसक्ति से छूटकर लोकसेवी वानप्रस्थ में बदलता चला गया ।
प्राण प्रत्यावर्तन साधना में जो बीज गया, वानप्रस्थ सत्रों में उसी का अंकुरण होने लगा । यह चिर प्राचीन परम्परा का नवोन्मेष था । इसी के बलबूते भारत किसी समय उन्नति के शिखर पर था । यह पुण्यभूमि स्वर्गादपि गरीयसी मानी जाती थी । समस्त विश्व पर उसका चक्रवर्ती साँस्कृतिक शासन था । स्वर्ण सम्पदाओं का अधिपति उसे कहा जाता था । समस्त विश्व को उसने जो भौतिक और आध्यात्मिक अनुदान दिए, उनसे सुविकसित, सुसंस्कृत बने लोगों ने कृतज्ञतापूर्वक उसे जगद्गुरु कहकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की । इस देश के तैंतीस करोड़ नागरिक किसी समय संसार भर में तैंतीस करोड़ देवताओं के, नाम प्रसिद्ध थे । भारत की गरिमा, ज्ञान और विज्ञान के दर्शन और वैभव के क्षेत्र में गगनचुम्बी बनी हुई थी । उसने अपने प्रकाश से सम्पूर्ण भूमण्डल को आलोकित किया था । यहाँ का व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन सामाजिक दशा इतनी उच्चस्तरीय और सुख -शांति पूर्ण थी कि सतयुग का वर्णन उस पर पूरी तरह लागू होता था ।
आज की स्थिति सर्वथा बदल गई। अन्न से लेकर शास्त्रों तक के लिए हम परमुखापेक्षी हैं। हमारी शिक्षा आवश्यकता विदेशी पूरी करते हैं। चिकित्सा तक में आत्मनिर्भर नहीं । यह तो भौतिक सम्पत्ति की बात रही। आत्मिक क्षेत्र की दशा और भी अधिक दयनीय है। अनुशासन, वचन पालन, समय की नियमितता, नागरिक कर्त्तव्य, सामाजिक उत्तरदायित्व, देशभक्ति, शिष्ट व्यवहार जैसी मानवोचित विशेषताओं की कसौटी पर हमारा जनजीवन खरा नहीं खोटा ही सिद्ध होता है । स्वच्छता जैसी प्राथमिक मानवी आवश्यकता तक से हम अभी परिचित नहीं हो पाए है।
सामाजिक कुरीतियों, मूढ़मान्यताएँ एक प्रकार से देश की जड़े खोखली कर चुकी है। नर-नारी की असमानता, वंश, जाति के आधार पर बरती जाने वाली ऊँच-नीच को मान्यता, लगभग एक करोड़ लोगों द्वारा अपनाया गया भिक्षा व्यवसाय विवाहों की प्राणघातक खर्चीली धूम-धाम जैसे कुष्ठ व्रण राष्ट्र की काया को किस प्रकार अपंग, कुरूप ओर कलंकित किए हुए है। यह देखकर दर्द उठता है । जिस में अभी भी शिक्षा का प्रतिशत न्यून हो, वहाँ विविध भ्रष्टाचारों का पनपना स्वाभाविक है। धर्म से लेकर राजनीति तक में धूर्त विडम्बनाएँ अपनी जड़े दिन-दिन अधिक गहरी घुसाती चली जा रही है। इन परिस्थितियों में हम अंतर्द्वंद्वों में ग्रह युद्ध जैसे स्थिति में रहते हुए प्रगति से वंचित ही रह सकते थे । रह रहे है।
प्राचीनकाल की महान प्रगति और आज की अवगति की तुलना पर्वत शिखर और गहरे गर्त से की जा सकती है। भौतिक दृष्टि से जो खोया सो दुःखद है, उसकी क्षतिपूर्ति आसानी से हो सकती है। पर मर्म भेदी दुःख उस आत्मिक स्थिती के पतन का है । जिसके कारण इस देश का प्रत्येक घर नररत्नों की खान बना हुआ था, जिसके कारण समस्त विश्व अपने उत्कर्ष के लिए आशा भरे सहयोग की अपेक्षा करता था ।
यह अत्यधिक विचारणीय प्रश्न है कि धर्म और अध्यात्म का कलेवर भूतकाल की अपेक्षा इन दिनों घटा नहीं बढ़ा है। धर्म संगठनों की, धर्मध्वजी महन्त, मठाधीशों की, साधु-ब्राह्मणों की ही वृद्धि नहीं हुई है, कथा-कीर्तनों की, देवाराधन कर्मकाण्डों की भी धूम है मंदिर तो इस तेजी के साथ बनते चले आ रहे है मानो उन्हीं की संख्या वृद्धि पर धर्म की आधारशिला रखी हुई हो । इतना सब होते हुए भी धर्म की आत्मा क्यों मर गयी? उसकी सड़ी लाश ही हमारे हाथ क्यों रह गई ?
इन प्रश्नों का समाधान ढूंढ़ने के लिए गहराई में
उतरने और विस्तृत विवेचन करने पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि हमारे आश्रम धर्म की रीढ़ टूट गयी और प्राचीन भारत की गौरव -गरिमा की स्थिति अपंग जैसी हो गयी । भारतीय धर्म को दूसरे शब्दों में वर्णाश्रम धर्म कर सकते हैं । चार आश्रमों की सुदृढ़ आधारशिला पर अपनी संस्कृति का भवन खड़ा किया गया था । जब तक वे स्तम्भ बने रहे, तब तक गौरव-गरिमा भी गगनचुम्बी बनी रही । जब उसमें विग्रह, संकट उत्पन्न हुआ तो सारा ढाँचा ही लड़खड़ा गया और धर्म विडम्बनाओं की अवांछनीय विकृतियाँ ही हमारे हाथ रह गयी ।
अब एक ही वर्ण शेष है-वैश्य और एक ही आश्रम जीवित है गृहस्थ । शेष तीन वर्ण भर गए । तीन आश्रमों का भी अन्त हो गया। हर व्यक्ति का जीवन लक्ष्य धन है । त्यागी, वैरागी भी प्रकारांतर से उसी कुचक्र के इर्द-गिर्द घूमते देखे जा सकते हैं । आकांक्षाओं का केन्द्र अब सम्मति ही बनकर रह गया है । वासनाओं और तृष्णाओं की पूर्ति उसी से तो होती है । इसके अतिरिक्त अन्य कुछ लक्ष्य किसी का नहीं दीखता । ऐसी दशा में यह कहना अत्युक्ति न होगा कि वर्ण धर्म सिमटकर वैश्य वर्ण में सीमित हो गया है ।
ठीक इसी प्रकार आश्रम धर्म की पर्याप्त दुर्गति हुई है। स्कूल में आते-जाते अबोध बालक काम कुचेष्टाएँ सीख जाते हैं । पास -पड़ौस में उन्हें अश्लील गालियाँ सीखने को मिल जाती हैं। घर-बाहर कामुकता की विविध प्रवृत्तियां बचपन में ही गृहस्थ की दीक्षा दे देती है और उसमें क्रमशः वृद्धि ही होती रहती है। किशोरावस्था परिपक्व होने से पहले ही बच्चे अपना बहुत हद तक आत्मघात कर चुके होते हैं । स्मरण शक्ति की कमी, चेहरे की निस्तेजता, काया की दुर्बलता और मानसिक उद्वेगों का बाहुल्य देखते हुए यह सहज ही समझा जा सकता है कि उन पर क्या बीती है।
समय से पूर्व गृहस्थ की किसी भौंड़ी और फूहड़ प्रवृत्ति का जो दुष्परिणाम होना चाहिए उसे अपने हर बालक पर काली घटाओं के रूप में छाया देखते हैं । बाल विवाह तो और भी कोढ़ में खाज का काम करता है । जिन्दगी के अन्त तक कामुकता, प्रजनन, अर्थोपार्जन कुटुम्बचर्या के अतिरिक्त कभी कोई बात सूझती ही नहीं । समस्त प्रवृत्तियाँ इसी केन्द्र पर केन्द्रीभूत रहती है । होश सँभालने के दिन से लेकर होश बन्द होने की घड़ी तक गृहस्थ स्तर की आकाँक्षाएँ ही मनः क्षेत्र को आक्रान्त किए रहती है । ऐसी दशा में यही कहा जा सकता है कि चार आश्रमों में से तीन समाप्त हो गए, ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास की परम्पराएँ नष्ट हो गयी । केवल एक ही आश्रम बचा है गृहस्थ । साधु -सन्तों की मनोदशा और गतिविधियों को देखते हुए उन्हें भी भगवा वस्त्रधारी गृहस्थ ही कह सकते हैं । तीन पाये टूट जाने पर एक के ऊपर खड़ी की गई चारपाई की जो डाँवाडोल स्थिति होनी थी वही है आज भारतीय समाज की । इन परिस्थितियों में भौतिक, आर्थिक स्थिति की स्थिरता की भी कुछ बात तो सम्भव भी है पर आत्मबल पर टिकी हुई उन महानताओं की आशा नहीं की जा सकती जिन पर प्राचीन भारत का महान गौरव आधारित रहा है
यही नहीं, यह स्थिति भारतीय संस्कृति के उस मूल आधार की कपाल क्रिया है जिस पर कि विश्व मानव को देव स्तर तक पहुँचाने की सफल चेष्टा की गयी थी । परम पूज्य गुरुदेव ने समाज को इस दयनीय और दुर्दशाग्रस्त स्थिति से उबारने के लिए वर्ष 1974 को शाँतिकुँज में वानप्रस्थ विद्यालय का शुभारम्भ किया । इसके माध्यम से आत्मकल्याण एवं लोककल्याण के उस मध्यम मार्ग की शुरुआत हुई, जिस पर सर्वसामान्य भी चलने का साहस जुटा सके और अति विशिष्ट बनने का गौरव हासिल कर सके ।
वानप्रस्थ का चरम लक्ष्य उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य को दैनिक जीवन में उतारते हुए जहाँ जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए साहसपूर्ण कदम बढ़ाना है, वहाँ सर्वसाधारण को यह विश्वास दिलाना भी है कि उच्च आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में उतारना न केवल सरल है वरन् सुखद और शान्तिदायक भी है । लोकशिक्षा का यही प्रभावशाली तरीका है । समग्र पुनरुत्थान और अभिनव निर्माण के लिए ‘जनसाधारण को कुछ कष्ट उठाना, त्याग करना और अनुदान प्रस्तुत करना ही पड़ेगा । इसी पूँजी से ही प्रगति का भवन बनेगा । लोगों को आदर्शों की बाते यों सुहाती है पर उस दिशा में बढ़ने के लिए जो अनुदान प्रस्तुत करना पड़ता है उसके लिए कोई साहस नहीं करता । फलतः लम्बी-चौड़ी योजनाओं को दीमक चाटती रहती है । जनता को सृजन,प्रयोजन के लिए अपना योगदान देने के लिए रजामन्द करना हर किसी का काम नहीं, उसे प्रभावशाली ढंग से वहीं कर सकता है, जिसने स्वयं वैसा कदम उठाकर दिखाया है । युग नेतृत्व की महती आवश्यकता वानप्रस्थ ही पूरी करता रहा है उसे ही करने का अधिकार भी हैं ।
तप−साधना और लोकसेवा इन दोहरे उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चलाए गए इन सत्रों की अवधि एक मास थी । आज जहाँ गायत्री मंदिर है, उसके ठीक सामने उन दिनों टिनशेड हुआ करता था । इसी टिन शेड में वर्ष 1974 की बसन्त पंचमी के अवसर पर वानप्रस्थ कक्षाओं का शुभारम्भ करते हुए पू. गुरुदेव ने कहा था -” प्राचीनकाल के संन्यास को भी अब वानप्रस्थ में ही विलीन होना पड़ेगा । उस वेष में अवाँछनीय व्यक्ति इतने अधिक घुस पड़े है कि संचित प्रतिष्ठा को समाप्त प्राय करके रख दिया । फिर इन दिनों संन्यास के साथ अकर्मण्यता, मुफ्तखोरी, से सेवा धर्म से विमुखता और आडम्बर अंधविश्वासों की विस्तार विडम्बना ने स्थिति सर्वथा बदल दी है । भिक्षा व्यवसाय अब जनआक्रोश का केन्द्र बनने जा रहा है । वस्त्र रंगने मात्र से राजसी निर्वाह प्राप्त करने के लिए अधिकार में अगले दिनों कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा और धर्म परम्परा की दुहाई देने से भी चमड़ी को बचाया न जा सकेगा । अस्तु, संन्यास को वानप्रस्थ में विलीन करके एक सहज, सुलभ परमार्थ परायण जीवन प्रक्रिया को अपनाने से ही काम चलेगा । वही इस युग के अनुकूल है और उपयुक्त भी ।
इन एक महीने के सत्रों में जिनकी भी भागीदारी रही वे आज भी उन बीते दिनों की स्मृतियों को जीवन की बहुमूल्य धरोहर की तरह सँजोये है । इनकी हलकी-सी स्फुरणा उन्हें अनगिनत भावों के मधुर मोहक रस से भिगो देती है। इन सत्रों में जहाँ एक ओर तप प्रधान दिनचर्या थी । वही एक अलौकिक आकर्षण था । तपोनिष्ठ परम पू. गुरुदेव का नित्यप्रति प्रवचन । जिसमें वे वानप्रस्थ की परम्परा, उसकी मर्यादा का दार्शनिक विवेचन किया करते थे । आज के समय में इसकी सामयिक आवश्यकता को बताते -बताते उनकी भावुकता कभी रोष बनकर वाणी से प्रकट होती, कभी आँसू बनकर नेत्रों से छलक उठती ।
इन सत्रों में भाग लेने वाले परिजन प्रायः पूज्यवर के अमृत वचनों को अपनी डायरी के शब्दों में पिरोने का प्रयास किया करते थे । ऐसी ही एक डायरी के पृष्ठों को पढ़ने पर उनके वानप्रस्थ दर्शन का स्वरूप कुछ इस प्रकार झलकता है । वह कहते हैं कि वानप्रस्थ के परमार्थ पथ प्रवेश को तीन स्तरों में विभक्त किया जा सकता है । उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ । सर्वोत्तम, अधिक श्रेष्ठ एवं श्रेष्ठ के उतार-चढ़ाव इस महान प्रक्रिया में भी हो सकते हैं।
सर्वोत्तम वह स्थिति है जिसमें पारिवारिक उत्तरदायित्वों को अन्य विश्वस्त एवं निष्ठावान परिजनों पर छोड़कर स्वयं पूरा समय परमार्थ प्रयोजन में लगाने के लिए तत्पर हो जाएँ। कुछ समय इस अभिनव जीवन प्रणाली की विधि-व्यवस्था का तात्विक अध्ययन और व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करें और फिर विश्व मानव की सेवा-साधना में जुट जायँ। दिनचर्या का ऐसा निर्धारण होना चाहिए जिसमें स्वाध्याय और योग साधन तपश्चर्या के लिए भी समुचित स्थान रहे और शेष समय सेवाकार्यों में लगा रहे। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युग की महानतम आवश्यकता और विश्व मानव की सेवा-साधना एक ही है जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की विचार क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इस चरण को पूरा करने के बाद ही रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्य हो सकता है। उद्योग, शिल्प,चिकित्सालय, मन्दिर, धर्मशाला, प्याऊ सदावर्त आदि कितने ही लोकोपयोगी कार्य हो सकते हैं पर वानप्रस्थ को एक ही लक्ष्य सामने रखना चाहिए विचारक्रान्ति, बौद्धिक परिष्कार, भावनात्मक नवनिर्माण इसी से संबद्ध सेवा कार्य हाथ में लिए जाएँ। यह कार्य प्रत्यक्ष में नहीं देखा जाता और उसका परिणाम इमारतों की तरह आँखों के सामने नहीं आता, इसलिए उथली तबियत के लोग उस दिशा में उदासीन देखे जाते हैं और ऐसे कार्य पकड़ते हैं जिन्हें आंखों से देखा जाना जा सके। इस संकटकाल में आपत्ति धर्म की तरह हमें केवल ज्ञान यज्ञ की महान प्रक्रिया को ही सामने रखना चाहिए। वानप्रस्थ की सेवा-साधना का प्रत्येक कदम इसी दिशा में उठना चाहिए। सर्वोत्तम स्तर के वानप्रस्थी-परिव्राजक स्तर की जीवनचर्या अपनाते हैं। वे आश्रम बनाकर नहीं बैठते वरन् जहाँ भी सत्प्रवृत्तियों के अंकुर उगे हुए हैं उन्हें सींचने के लिए यंत्र-तत्र भ्रमण करते हैं। मध्यम स्तर के वानप्रस्थी वे हैं जिनके लिए अपने घर-परिवार के बीच रहते हुए अपने समीपवर्ती क्षेत्र में काम करना अधिक सुविधाजनक पड़ता है। इसमें वे परिवार को मार्गदर्शन, परामर्श, नियन्त्रण और सहयोग का लाभ भी यथासम्भव देते रहते हैं। सुविधाजनक जीवनयापन का सुयोग भी मिलता रहता है और समीपवर्ती परिचित क्षेत्र में अपना काम भी करते रहते हैं। मुख्य काम वे परमार्थ प्रयोजन को ही मानते हैं और उसी में अपना मनोयोग भी लगाते हैं। परिवार की देखभाल एक सरल स्वभाव चलते रहने वाला गौण कार्य होता है। कोई विशेष अड़चन आ जाय तो बात दूसरी हैं अन्यथा अपनी रुचि का विषय परमार्थ ही होता है। अपने समय. श्रम और मनोयोग को उसी में लगाते हैं। घर रहते हुए भी जल में कमल जैसी स्थिति ही बनाए रहते हैं। एकान्त निवास के लिए घर में या किसी निकटवर्ती देवालय आदि में अपना निवास रखते हैं, जिससे अपने विरक्त स्तर का भान निरन्तर होता रहे।
कनिष्ठ स्तर का वानप्रस्थ वह है जिसमें पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वाह भी जुड़ा हुआ है। बच्चे छोटे हैं, पत्नी शारीरिक अथवा मानसिक दृष्टि से रुग्ण है। अनय विवशताएं ऐसी हैं जिनसे धर छोड़ कर अन्यत्र जा सकना सम्भव नहीं । परिवार के लिए आजीविका उपार्जन करने से भी छुटकारा नहीं, ऐसी स्थिति में कनिष्ठ वानप्रस्थ लिया जा सकता है, किंतु उसमें भी दो शर्तें तो पालनी ही पड़ती हैं। एक यह कि सन्तानोत्पादन उत्तम और माध्यम वानप्रस्थी की तरह ही बन्द कर दिया जाय और कम से कम चार घण्टे प्रतिदिन अपने समीपवर्ती क्षेत्र में ज्ञान यज्ञ सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में लगायें जायँ साधारणतया 7 घण्टे सोने के लिए, पाँच घण्टे आजीविका उपार्जन के लिए नियत रखे जायँ तो इन बीस घण्टों में शारीरिक एवं पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भली प्रकार निबाही जा सकती हैं और चार घण्टे का समय परमार्थ प्रयोजन के लिए बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है। छुट्टी के दिनों परिव्रज्या के लिए अधिक दूर तक जा सकते हैं किंतु साधारण समय में समीपवर्ती संपर्क क्षेत्र ही उनकी प्रव्रज्या की परिधि बना रह सकता है।
पू. गुरुदेव के इन नियमित रूप से चलने वाले सारगर्भित प्रवचनों के साथ वानप्रस्थ सत्रों की दिनचर्या गतिमान रहती और इन सबके बीच एक दिन वह भी आता जब सत्र में भागीदार साधकों का वानप्रस्थ संस्कार सम्पन्न होता। यज्ञ, देवपूजन,व्रतधारण, पीत परिधान, जल कलशों का अभिषेक मंगल, ऋचाओं का उच्चारण इस सबके साथ अन्तिम में परम पू. गुरुदेव स्वयं अपने हाथों से नवदीक्षित वानप्रस्थियों को ब्रह्मदण्ड प्रदान करते। बड़े अद्भुत, विलक्षण होते थे ये क्षण, कुछ ऐसा लगता मानो देव गुरु बृहस्पति देवताओं को वज्र जिसके प्रहार से वह अपनी मनोभूमि पर होने वाले आसुरी आक्रमणों को निरस्त कर सकें।
इन वानप्रस्थ सत्रों में जो भी आए सदा के लिए उनके अपने हो गए। इनमें भागीदार होने वालों में से अधिकांश तो आज शाँतिकुँज में ही स्थायी कार्यकर्ताओं के रूप में सक्रिय हैं। जो किसी कारणवश शाँतिकुँज में स्थायी कार्यकर्ता के रूप में नहीं आ सके, वे सबके सब अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता एवं वरिष्ठता प्रमाणित कर रहे हैं। उन्हें जो ऊर्जा इन सत्रों में मिली थी वह सदा−सर्वदा के लिए उनकी आत्मा में अक्षुण्ण हो चुकी है। नवनिर्माण की लो लहर अगले दिनों प्रखर बनायी जानी है, इसके लिए कितनी ही रचनात्मक प्रवृत्तियों को अपगामी बनाना पड़ेगा। ऐसे में इन्हीं विशिष्टों एवं वरिष्ठों को अपने कन्धों पर सेनापति होने का गुरुतर दायित्व सम्हालना है और वर्षों से सहेजी गई उस धरोहर को नयी पीढ़ी को देना है जो उन्हें गुरु सत्ता से मिली थी। उनका यही पुरुषार्थ आने वाले समय में उज्ज्वल भविष्य बनकर प्रकट होगा।
वर्ष 1975 शाँतिकुँज में महाकाल का एक नया संदेश लेकर उतरा- “ नारी शक्ति का युग शक्ति के रूप में उदय।” यूँ शाँतिकुँज ने अपनी स्थापना के प्रथम दिवस से ही वन्द. माताजी को अपनी अधिष्ठातृ शक्ति के रूप में अपना करके नारी के गौरव का उद्घोष कर दिया था। माताजी के सान्निध्य में देव कन्याओं द्वारा सम्पन्न की गई गायत्री पुरश्चरणों की शृंखला ने इस सम्बन्ध में सशक्त पृष्ठभूमि का निर्माण किया। फिर भी इस सबके बावजूद 1975 में नारी अभ्युदय के संदर्भ में किए गए प्रयासों का अधिक सशक्त और सुनियोजित स्वरूप प्रकट हुआ।
इस वर्ष में उत्पन्न हुई अन्तरिक्षीय हलचलों की व्यापकता इस बात से भी समझी जा सकती है कि संयुक्त-राष्ट्र-संघ ने भी इस वर्ष को अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में मानने का निर्णय लिया। यद्यपि इस निर्णय के काफी पूर्व पू. गुरुदेव महिला जागरण अभियान सम्बन्धी अपना कार्यक्रम निश्चित कर चुके थे। उनके द्वारा किया गया यह निश्चय कुछ ऐसा था, मानो भगवान महाकाल शाँतिकुँज को अपने संकल्पों को केन्द्र बनाकर उनका विश्वव्यापी विस्तार कर रहे हों।इस वर्ष राष्ट्रसंघ ने सभी देशों की सरकारों से तथा समाजसेवी संस्थाओं से अनुरोध किया कि वे महिला जागरण के सम्बन्ध में कुछ अधिक सोचें और कुछ अधिक करें। इसका प्रभाव इतना तो हुआ ही कि युग ऋषि के संकल्प के स्पन्दन विभिन्न हलचलों के रूप में यत्र-तंत्र दिखाई पड़े और जनमानस यह समझने के लिए मजबूर हुआ, कि अचानक हवा का रुख किस ओर मुड़ चला है। संसार भर के देशों की सरकारें इस वर्ष नारी समस्या पर अधिक ध्यान देने की ओर प्रवृत्त हुई । महिलाओं के मार्ग की अड़चने हटाने और सुविधाएँ बढ़ाने के लिए कुछ न कुछ सोचा गया। सामाजिक संस्थाओं ने भी इस वर्ष पहले की अपेक्षा अधिक उत्सुकता और सक्रियता प्रदर्शित की। पत्र-पत्रिकाओं में नारी उत्कर्ष पर अपेक्षाकृत अधिक लेख प्रकाशित हुए। सभा-सम्मेलनों प्रस्तावों, प्रदर्शनों की भी धूम मची। ये सभी ठोस हों या पोले प्रयास, इन्हें अच्छे चिह्न के रूप में तो स्वीकार करना ही होगा। जहाँ नारी संगठनों का अस्तित्व था, वहाँ भी मूर्छना टूटी और कागजी खोखला न खड़ा रखकर, कुछ रचनात्मक कदम बढ़ाने का उत्साह जागा। विचारशील स्त्रियों की एक बड़ी संख्या यह सोचने लगी कि उनके समाज का पिछड़ापन दूर करने के लिए अब कुछ अधिक बड़े प्रयास होने चाहिए और स्थिति में तेजी से सुधार होना चाहिए। पुरुषों में से अनेक दूरदर्शी लोग यह सोचने के लिए विवश हुए कि नारी का पिछड़ापन मानव समाज को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी समस्या है। उसे ऐसे ही उपेक्षित, अनसुलझी स्थिति में नहीं पड़ी रहने देना चाहिए। इसके पहले नारी समस्या पर चर्चाएँ तो होती थी। पर उसे घरेलू स्तर की मानकर ऐसे ही हल्की बात माना जाता था। पर इस वर्ष लोकचिन्तन ने ऐसी नयी करवट ली कि उसे उपेक्षित समस्या का प्राथमिकता देने के लिए विश्वव्यापी स्फुरणा उत्पन्न हुई। इस सबका-समन्वय सन् 75 के उस महान संकल्प में देखा जा सकता है। जिसने पर्दे के पीछे रहते हुए कितनी ही अभिनव हलचलों का सृजन किया । इसके प्रभाव और परिणाम भी उसी अनुरूप हुए । यों समय-समय पर कई आन्दोलन खड़े होते हैं और अपने संयोजकों के प्रभाव तथा उत्साह के अनुरूप उठते, बढ़ते तथा समाप्त हो जाते हैं। पर नारी अभियान उनमें से एक नहीं रहा। क्योंकि यह राष्ट्र संघ की, सरकारों की या संस्थाओं की सामयिक उमंग नहीं थी, जो बरसाती बादल की तरह कुछ घड़ी गर्जन-तर्जन करके ठण्डी पड़ जाती। यदि यह कुछ व्यक्तियों, का संगठनों का प्रयास भर होता तो वैसी आशंका की जा सकती थी पर यथार्थता तो कुछ और ही रही। यह तो युगान्तरीय चेतना का संकल्प था। जिसने कालचक्र की गति को बदलने के लिए विवश किया और उसने युग बदल देने जैसी करवट ली। सूक्ष्म जगत में वे सम्भावनाएँ बन चलीं जो अपने प्रचण्ड गवाह से आगे कितने ही महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तुत करेंगी। नारी का पुनरुत्थान उन्हीं में से एक सुनिश्चित तथ्य है।
इस वर्ष नारी उत्थान सम्बन्धी विश्वव्यापी हलचलें कहाँ कितनी हुई, इसका पर्यवेक्षण यदि क्या-क्या छपी, क्या-क्या कहा, सुना गया इस आधार पर निकालना हो तो कुछ सन्तोष की सांसें ली जा सकती हैं। पर यदि युग परिवर्तन, नवनिर्माण के केन्द्र शाँतिकुँज में इन्हीं दिनों क्रियाशील समय को पलट देने और प्रवाह को बदल डालने वाली शक्ति को समझा जा सके तो फिर निराश नहीं होना पड़ेगा। इस समर्थ शक्ति के क्रिया-कलापों का ही एक रूप कन्या प्रशिक्षण सत्रों के रूप में उभरा। यद्यपि कुछ कन्याएँ शाँतिकुँज की स्थापना के साथ ही वन्दनीया माताजी के सान्निध्य में रहने लगी थी। प्रारम्भ में इनकी संख्या चार थी जो आगे बढ़कर चौबीस तक जा पहुंची। लेकिन इनकी दिनचर्या मूलतः तप प्रधान थी। गायत्री पुरश्चरणों की शृंखला के लिए निर्धारित जप पुरा करने के बाद माताजी स्वयं ही इनका शिक्षण कार्य सम्पन्न करतीं। शिक्षण के इस क्रम में औपचारिक शिक्षा के साथ संगीत, कर्मकाण्ड, पौरोहित्य के साथ वक्तृत्व कला का भी समुचित स्थान रहता ।
उन दिनों शाँतिकुँज का कलेवर इतना बड़ा न था। सिर्फ दो तीन कमरों का छोटा-सा परिसर था। आस-पास वन प्रान्त, निकट में बहती गंगा की जलधारा इस सबकी सुरम्यता अनुभव ही करने योग्य थी। शब्दों में भला वह सामर्थ्य कहाँ कि इसका वर्णन कर सके। जैसे-जैसे लड़कियों की संख्या बढ़ती गयी नए भवन भी विनिर्मित होते गए। 1975 में विधिवत् देवकन्या प्रशिक्षण विद्यालय कर आरम्भ हुआ। जिसकी मुख्य अधिष्ठात्री माता जी स्वयं थी। इस प्रशिक्षण की शुरुआत के समय तक शाँतिकुँज का परिसर सप्तऋषियों की मूर्तियों तक सीमित था। यद्यपि उन दिनों ये मूर्तियाँ न थी। गायत्री मन्दिर के ठीक सामने आज जहाँ विश्वामित्र की मूर्ति है, उन दिनों यज्ञशाला हुआ करती थी। वशिष्ठ एवं विश्वामित्र ब्लाक वर्तमान समय की ऊँचाई न पाने के बावजूद अस्तित्व में आ चुके थे। गायत्री मन्दिर के पास वाले हाल के ऊपर एक और हाल बन चुका था। इसे नाम दिया गया-कन्या हाल। यही कन्या प्रशिक्षण का मुख्य कक्ष थी।
एक वर्षीय प्रशिक्षण में भागीदारी पाने वाली लड़कियाँ वशिष्ठ ब्लाक में रहा करती थी। यहीं उनका बोर्डिग हाउस था। भोजन के लिए इन्हें ऊपर माताजी के चौके में जाना होता और इनकी कक्षाएँ प्रातः छह से दोपहर 12 तक कन्या हाल में सम्पन्न होतीं। कक्षाओं के निर्धारित विषय कर्मकाण्ड, रामायण, स्वावलम्बन उद्योग, लाठी, स्काउट गाइड, संगीत गायन-वादन आदि होता। उन्हें स्क्रीन प्रिंटिंग और फोटोग्राफी आदि सिखाने की भी व्यवस्था जुटाई गयी थी।
इस सबके साथ जुड़ा रहता पू. गुरुदेव का भावभरा उद्बोधन जो प्रशिक्षण प्राप्त कर रही लड़कियों में नारी गरिमा का जागरण करता। वह उन्हें समझाते-” नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, शक्ति है, पवित्रता है, कला है और वह सब कुछ है जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धि है, रिद्धि है और वह सब कुछ है जो मानव प्राणी के समस्त अभावों, कष्टों एवं संकटों को निवारण करने में समर्थ है। यदि उस श्रद्धासिक्त सद्भावना के साथ सींचा जाय तो यह सोमलता विश्व के कण-कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओतप्रोत कर सकती है।
पू. गुरुदेव एवं वन्दनीय माता जी का सहज वात्सल्य बालिकाओं को इसी रूप में प्राप्त होता । हर लड़की यही अनुभव करती कि उसे उसके अपने शाश्वत माता-पिता मिल गए है। शाँतिकुँज से विछोह की कल्पना ही उन्हें रुला देती । जहाँ एक ओर वह सम्वेदना से सींची जा रही थी, वहीं दूसरी ओर उनमें आत्मविश्वास उड़ेला जा रहा था। शाँतिकुँज के इस प्रशिक्षण ने उन्हें कितनी योग्यता, प्रतिभा और मनोबल का वरदान दिया, इसे तो तब जाना जा सका, जब इन देवकन्याओं की टोलियाँ क्षेत्रों में युग निर्माण मिशन के कार्यक्रमों को सम्पन्न करने के लिए सक्रिय हुई।
ऐसा ही एक कार्यक्रम लखनऊ में आयोजित हुआ। उसमें उन दिनों के तत्कालीन गवर्नर डॉ. एम. चन्ना रेड्डी आए हुए थे। उन्होंने इस देवकन्याओं द्वारा प्रस्तुत किया गया भावपूर्ण संगीत सारगर्भित प्रवचन को सुना। सुनने के, पश्चात उनके अचरज का ठिकाना न रहा भला इतने कम उम्र की सोलह, सत्तरह साल की कन्याएँ देश की समाज की विभिन्न समस्याओं को इतना सटीक विश्लेषण कैसे कर पाती हैं। कौन है इनका प्रशिक्षक कहाँ पाया इन्होंने इतना सशक्त, शिक्षण। उत्तर में उन्होंने पू. गुरुदेव, वन्द, माताजी एवं शाँतिकुँज आए बिना न रह सके। यहाँ आने पर उनका मन प्रसन्नता, आह्लाद और नवीन आशाओं से छलक उठा। इन दिनों शाँतिकुँज में जहाँ एक ओर कन्या प्रशिक्षण सत्र, महिला शिविर चल रहे थे। वहीं क्षेत्रों में महिला सम्मेलनों की धूम मची थी। वर्ष 1975 के अक्टूबर माह में गुरुदेव ने घोषित किया कि देवकन्याओं के एक वर्षीय सत्र समापन की ओर है। इसकी समाप्ति के साथ ही सभी संगठित शाखाओं को अपने वार्षिकोत्सव महिला सम्मेलन के रूप में करना चाहिए। सम्मेलनों में, शाँतिकुँज में संगीत, प्रवचन एवं मार्गदर्शन के लिए प्रशिक्षित प्रचारिकाओं का एक जत्था मिशन का प्रतिनिधित्व करने के लिए पहुँच सके, इसके लिए व्यवस्था बनायी जा रही है। जत्थे में चार प्रचारिकाएँ एवं एक प्रबुद्ध संरक्षक इस प्रकार पाँच व्यक्ति रहेंगे।
इन कार्यक्रमों की अवधि पाँच दिन की रखी गई और उसका कार्यक्रम इस प्रकार बनाया गया। प्रथम दिन-प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व प्रभातफेरी। तीसरे प्रहर लाल मशाल के प्रतीक चित्र की सजधज एवं गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा; दूसरे-तीसरे और चौथे दिन-सूर्योदय से पूर्व प्रभातफेरी । प्रातःकाल पाँच कुण्डीय यज्ञ जिसमें कन्याएँ, आहुतियाँ देंगी और महिलाएँ, पूर्णाहुति समेत अन्य कार्यक्रमों में भाग लेंगी। सारा कार्यक्रम महिलाओं द्वारा ही सम्पादित हुआ करेगा। बच्चों के नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन विद्यारम्भ संस्कार भी साथ-साथ होते रहेंगे। तीसरे प्रहर 2 से 5 तक महिला गोष्ठी मात्र महिलाओं के लिए। रात्रि 7 से 10 खुला महिला सम्मेलन । जिसमें सभी भाग ले सकते हैं। पाँचवें दिन यज्ञ की पूर्णाहुति के समय देव दक्षिणा में कम से कम अपनी आदत में सम्मिलित एक दुर्गुण का त्याग एवं एक सद्गुण अपनाने का संकल्प। प्रसाद स्वरूप महिला जागरण सम्बन्धी सस्ते प्रचार साहित्य का वितरण।
पू. गुरुदेव ने इन्हीं दिनों स्पष्ट किया कि शाँतिकुँज की स्थापना का मूल प्रयोजन महिला जागरण अभियान का आरम्भ करके उसे नारी के समग्र उत्कर्ष की अनेकानेक गतिविधियों को विश्वव्यापी बनाना है। अभियान के क्रियाकलाप चार भागों में विभक्त किए गये 1 साहित्य प्रकाशन 2 नारी शिक्षण सत्र 3- संगठन द्वारा संघ शक्ति का उदय 4- रचनात्मक कार्यक्रमों का व्यापक विस्तार। साहित्य प्रकाशन के सिलसिले में न केवल शत-सहस्र पुस्तकें प्रकाशित हुई बल्कि महिला जागृति अभियान पत्रिका न भी प्रवाह पकड़ा।
भले ही इस वर्ष शाँतिकुँज में नारी अभ्युदय की एक हलकी-सी किरण का ही उदय हुआ हो, पर इसके क्षीण आलोक में उज्ज्वल भविष्य की झाँकी विश्वासपूर्वक की जा सकती है। जिनको सूक्ष्म जगत और उसकी सत्ता पर विश्वास है, वे जानते हैं कि क्रिया की प्रतिक्रिया का अकाट्य प्रकृति नियम अवाँछनीयताओं को उलट देने का सरंजाम अनादि काल से जुटाता रहा है। विश्व का सन्तुलन बनाए रखने के लिए ऐसे अंधड़, तूफान खड़े होते रहे हैं, जिनने निराशा और आतंक की मेघमाला को छिन्न-विच्छिन्न करके समय-समय पर घुटन को दुर किया है। मनुष्य को समष्टि अन्तरात्मा, जिसे विश्वात्मा या परमात्मा कह सकते हैं, विकृतियों के निराकरण के लिए समर्थ प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती रही हैं। शरीर में विषाणुओं का विजातीय द्रव्य जब अवाँछनीय जमघट एकत्रित हो जाता है तो प्रकृति कोई तीव्र रोग संवेग खड़ा करती है ज्वर, पीड़ाएँ सूजन आदि के रूप में कष्ट तो होता है पर बीमारी को उखाड़ने की दृष्टि से यह आवश्यक होता है।
शरीर स्वास्थ्य के सन्तुलन की तरह समाज स्वास्थ्य में विकृत विषाणुओं की भ्रष्ट मान्यताओं और गतिविधियों की भरमार हो जाती है तो अनिवार्य रूप से उसकी सुधार प्रक्रिया सामने आती है। इस परिवर्तन प्रकरण को मोटे तौर पर भगवान का अवतरण कहा जाता है। अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापन करने के लिए भगवान प्रतिज्ञा बद्ध हैं। साधुता का परित्राण और दुष्कृतों का विनाश करना, सृष्टि के असन्तुलन को सहन न करना उनका स्वभाव है। ठीक है मनुष्य कर्म करने को स्वतन्त्र है। पर यह स्वतन्त्रता औचित्य के साथ जुड़ी रहनी चाहिए। अनौचित्य सर्वत्र असह्य माना गया है और सदा-सर्वदा उसकी प्रतिक्रिया हुई है। यदि ऐसा न होता तो समय-समय पर प्रकट होने वाले दुर्दान्त असुरों ने अब तक कब का इस संसार को अपने पेट में निगल लिया होता।
महिला जागृति के सम्बन्ध में भी यह तथ्य है। स्थिति यह है कि आधी जनसंख्या को शिक्षा एवं स्वावलम्बन के अभाव ने पर्दाप्रथा, अनुभवहीनता एवं सामाजिक कुरीतियों ने बेतरह जकड़ रखा हैं। उसने सदियों से अनौचित्य के प्रहार सहे हैं। असन्तुलन अब असहनीय हो चुका है और संसार के इतिहास पर आरम्भ से लेकर अद्यावधि परिस्थितियों का विहंगावलोकन करें तो पाएँगे कि सन्तुलन बनाने में दिव्य शक्तियों ने देर तो की हैं और ढील भी बरती है, पर उसकी पुरी तरह उपेक्षा नहीं की है। लोग अपना काम अपने हाथों कर लें, उपजते और स्थिति को सुधारने में लगे रहते हैं पर जब सामान्यक्रम गड़बड़ा जाता है और देवत्व को निरस्त करके असुरता सत्ता सम्पन्न होती है तो फिर प्रकृति प्रतिक्रिया का, भगवान के भावावतरण का कोई न कोई रूप सामने आ ही जाता है।
वर्ष 1975 में शाँतिकुँज में नारी अभ्युदय के प्रयासों में यही झाँकी देखी जा सकती है। यह एक ऐसी शुरुआत थी जिससे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में समूचा विश्व आन्दोलित हुए बिना न रह सका। नारी की अन्तःचेतना ने मूर्छना की स्थिति को अस्वीकार कर दिया। वह मनुष्य से कम स्तर का जीवनयापन करने के लिए तैयार नहीं। समय का समर्थन उसके साथ है ऐसी दशा में न तो अस्वीकृति से काम चलेगा और न दमन को सफलता मिलेगी। न्याय की पुकार जब प्रबल हुई है, तब’-तब उसे मान्यता मिलकर ही रही है। इस वर्ष की यह शुरुआत अपने समय की समस्या का हल माँगने के लिए जोर पकड़ती जा रही है।
वस्तुतः महाकाल का यह प्रथम आश्वासन है जिसके पीछे पिछड़ों को ऊंचे उठाकर समता का धरातल बनाने के लिए वचनबद्ध दैवी शक्तियों ने आश्वासन दिलाया हैं। लोक मानस भी समय की प्रचण्ड धारा के विपरीत बने रहने का देर तक प्रयास नहीं करता रह सकता। तूफान मजबूत पेड़ों को भी उखाड़ फेंकता है। घटाटोप वर्षा में छप्परों से लेकर झोंपड़ों तक को बहते देखा जाता है। पानी का दबाव बड़े-बड़े बाँधो में भी दरार डालने और उन्हें बहा ले जाने का दृश्य प्रस्तुत करता है। यह महाकाल की हुँकार ही है- जो शाँतिकुँज में देवकन्या प्रशिक्षण के रूप में गूँजी थी। जिसने नारी को पिछड़े क्षेत्र से हाथ पकड़कर आगे बढ़ने के लिए धकेला और घसीटा है। अब न सिर्फ नारी के भाग्य में स्वतः की बेड़ियों से मुक्ति लिख दी गयी है वरन् विधाता ने उसे मुक्तिदूत बनने का गरिमापूर्ण दायित्व भी सौंपा हैं। जिन्हें सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त हैं वे अनुभव कर सकते हैं कि यह अपने युग का सुनिश्चित निर्धारण है जो इन्हीं दिनों पुरा होने वाला है। मनुष्य द्वारा मनुष्य के उत्पीड़न का एक और बड़ा दुर्ग अब बिस्मार होने वाला है।
,षं नो मित्रः। शं वरुणः। शं नो भवर्त्वयमा। शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः। शंनो विष्णुरुरुक्रम। नमो ब्रह्यणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्यासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्यवादिषम्। ऋतंभवादिषम्। सत्यम वादिषम्। तनमाभावीत्। तद्वक्तारमारवीत्। आवीन्माम्। अवीद्वक्तारम्। ॐ शान्ति। शान्ति!! शान्ति!!!
एक धीर, गम्भीर स्वर तथा उसका अनुकरण करते हुए बालकों का लयबद्ध समवेत स्वर, प्रभातकालीन सूर्य की सुनहरी धूप समूचे आश्रम पर बिखर गयी थी। पहले कुछ किरणें गोशाला के ऊपर धीमे से आयीं थीं, बड़ी सुहावनी थी। अतः प्रार्थना करते-करते सारा आँगन उस आह्लादक स्वर्णिमा से भर गया था तथा प्रार्थना करते हुए बटुकों के मुग्ध, स्निग्ध चेहरे चमकने लगे। वायु के एक झोंके ने आश्रमवासियों में सिहरन पैदा कर दो। जैसे उसने धूप की चुनौती को स्वीकार किया हो तथा अपने अस्तित्व का बोध कराया हो । किन्तु बालक निर्विकार भाव से गुरुदेव ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के साथ प्रार्थना के स्वरों में तन्मय थे।
ब्रह्मर्षि वशिष्ठ का यह आश्रम आर्यावर्त के ज्ञान- विज्ञान का केन्द्र बिन्दु था। महर्षि ने इसे मुख्य रूप से चार भागों में विभक्त कर रखा था। एक भाग था गार्हस्थ कर्म का, जिसकी देखभाल स्वयं भगवती अरुन्धती करती थीं। एक भाग था तपश्चरण का, जिसका प्रभार बालखिल्य ऋषियों के पास था। अध्ययन, अध्यापन, योग के प्रभाग का कार्य महर्षि वशिष्ठ स्वयं देखते थे तथा कृषि गोपालन हेतु उन्होंने अपने वरिष्ठ शिष्य सुतपा को नियुक्त कर रखा था। यह आश्रम अत्यन्त मनोरम ब्रह्मलोक जैसा जान पड़ता था। अनेक प्रकार की पुष्पलताएँ तथा वृक्ष लगे हुए थे। अनेक प्रकार के मृगगणों से भरा हुआ था। सिद्ध, चारण, देव, गंधर्व, किन्नर, ब्रह्मर्षि तथा देवर्षि गणों से परिपूर्ण था जो आश्रम की शोभा बढ़ाते थे। अग्निकल्प महात्माओं की तपस्याओं से संकुप था। जिनमें कुछ केवल पानी पीकर रहते थे। कुछ केवल हवा का भक्षण करके तपस्या कर रहे थे, कुछ सूखे पत्तों का भोजन करके ही जीवन धारण किए हुए थे। कुछ फल, मूलों पर आधारित थे। सभी इन्द्रियजयी तथा दान्त थे तथा जप-होम-परायण थे। इसके अतिरिक्त वैखानसों से भी यह आश्रम चारों ओर से सुशोभित था। उल्लास ही उल्लास, पूरा आश्रम स्फूर्ति और उनके शिष्यों के चेहरे इन्हीं भावों को प्रसारित कर रहे थे।
प्रार्थना की समाप्ति के बाद महर्षि अपना व्याख्यान प्रारम्भ भी नहीं कर पाए थे कि श्रोताओं से प्रश्न आना प्रारम्भ हो गया। वशिष्ठाश्रम की यह विशेषता थी कि प्रश्नों का बड़ा सम्मान था। पूरे-पूरे सत्र में उपाध्याय अपनी बात नहीं कह पाते थे केवल अन्तेवासियों के प्रश्नों का उत्तर देते थे। ऋषि कहते थे कि प्रश्नोत्तरी खाए हुए ज्ञान के रोमन्थ के समान है जिससे वह पचता है तथा सच्चे विवेक में परिणत होता है। अतः जितना अधीत किया हुआ है या श्रवण के माध्यम से जितना ज्ञान मस्तिष्क में गया है, उसका पहले पचना, हृदयंगम होना आवश्यक है। प्रश्नोत्तर तथा उन पर तर्कपूर्ण विचार इस हेतु आवश्यक है। प्रश्नों को ही दिशा देकर महर्षि अपने प्रतिपाघ विषय को भी गहराई से समझा देते हैं।
प्रश्न उठे इसलिए कि प्रार्थना ही आज को ऐसी थी। अभी तक प्रार्थनाएँ मूलतः गुरु-शिष्यों तथा उनके कल्याण आशंसन तक सीमित थीं। आज अनेक प्रणम्य तत्व उनमें आ गए। अतः व्युत्पन्न विद्यार्थियों की जिज्ञासाएँ फूट पड़ी।
गुरुदेव! मित्र वरुण अर्यमा किस प्रकार से हमार प्रणम्य हुए। ये कौन हैं? सबसे पहला प्रश्न अप्रत्याशित रूप से लक्ष्मण का था। हाँ गुरुदेव! और इन्द्र बृहस्पति तथा वायु ये भी प्रणम्य क्यों हैं? शत्रुघ्न भी कहाँ पीछे रहने वाले थे। विष्णु के विषय में कुमार ने सम्भवतः इसलिए नहीं पूछा क्योंकि उनके कुल देवता श्री रंगजी उनके अनुसार सम्भवतः विष्णु ही थे। ब्रह्म को भी वे विष्णु से अभिन्न मानते थे। और गुरुदेव। हम उनसे रक्षा की याचना क्यों करते हैं सूर्यदेव की शक्ति को हम देख सकते हैं किन्तु वायु, वरुण यदि हमारी रक्षा कैसे करेंगे। गुह को भी प्रश्न करने का साहस हो गया।
ऋषिवर! हम इनकी प्रार्थना करें तथा इनसे शान्ति एवं कल्याण की याचना करें तो अन्य देव जैसे अग्नि, यम आदि अप्रसन्न नहीं होंगे। इस प्रार्थना में उनके नाम नहीं हैं। काशी के राजकुमार प्रतर्दन का प्रश्न था।
महर्षि प्रश्नों को सुनकर गदगद हो गए तथा उनके प्रवासी पुत्र मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए। इस आश्रम में बालक कितने व्युत्पन्न हो जाते हैं। उन्होंने अन्य आश्रम तथा गुरुकुल भी देखे थे। यहाँ का अपना ही वैशिष्ट्य था।
साधु वत्स ! साधु ! महर्षि ने दोनों हाथ उठाते हुए प्रसन्न स्निग्ध चितवन से अन्तुवासियों को देखा तथा उनके प्रश्नों का समाधान करने का उपक्रम प्रारम्भ किया। “ वत्सगण ! तुम्हारा सभी का मूल प्रश्न यह है कि ये देवता कौन है? ये कितने हैं तथा ये हमारे प्रणम्य क्यों हैं ? इनमें ऐसी कौन−सी शक्ति है कि ये हमारी रक्षा कर सकते हैं ! यही न ?”
हाँ गुरुदेव ! अनेक आवाजें आयीं।
“ हाँ वत्स ! इसी की व्याख्या हम करेंगे तथा इसी के उत्तर में वैदिक साहित्य का परिश्रम निहित हैं। बच्चों ! तुम्हें स्मरण होगा कि हमने कल के सत्र में चौदहों विद्याओं का परिचय दिया था- चार वेद, छह वेदाँग, पुराण, न्याय मीमाँसा तथा धर्मशास्त्र और यह भी बताया था कि अगले दिन इन इनमें प्रवेश करके उनका सारभूत तत्व बताएँगे। तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर के माध्यम से हम सबसे पहले अपने आदि वाङ्मय वेदों में प्रवेश करते हैं। “
साधु ! साध! वेदिका पर से ही कुछ ऋषिगणों की आवाज आयी।
“ बच्चों ! वेद के दो विभाग हैं-मंत्र और ब्राह्मण। ‘ मंत्र ब्राह्मणात्मको वेदः ‘ किसी देवता, विशेष की स्तुति में प्रयुक्त होने वाले वाक्य की मंत्र कहते हैं तथा यज्ञानुष्ठान का विस्तारपूर्वक वर्णन करने वाले ग्रन्थ को ब्रह्माण कहते हैं। मंत्रों के समुदाय की संहिता कहते हैं। ये चार हैं ऋक्, यजुः, साम, अथर्व।”
गुरुदेव ! संहिताएँ या वेद चार हैं, किन्तु अनेक बार हमने आपको तथा सुतपा एवं अन्य गुरुवरों को वेदत्रयी या केवल त्रयी शब्द का प्रयोग करते सुना है। वेद विद्या या वेदों के अर्थ में यह विसंगति कैसी ? प्रतर्दन ने ही प्रश्न किया।
“ वत्स मुझे पता था तुम यह प्रश्न करोगे और इसीलिए आगे बढ़ने से पहले मैं कुछ रुक गया ताकि यह प्रश्न उठे। तुमने ठीक कहा। वेदों की त्रयी भी कहते हैं। किन्तु यह व्याख्या वेदों की संख्या की प्रतिपादक नहीं है अपितु उनमें आए हुए मंत्रों के स्वरूप की बोधक है। ये मंत्र तीन प्रकार के हैं पाद से युक्त छन्दोबद्ध मंत्र जो ऋक् कहे जाते हैं। संगीतबद्ध मंत्र जो साम कहे जाते हैं। तथा इन दोनों से पृथक, गद्यात्मक वाघ के स्वरूप के मंत्र जिन्हें यजुः कहते हैं। अतः मंत्र त्रिविध होने से इन्हें त्रयी कहते हैं चारों वेदों में इन्हीं तीनों प्रकारों के मंत्र हैं। वेदों के इस स्वरूप को समझने के बाद हम प्रधान प्रतिपाद्य देवताओं पर आते हैं। ये कौन हैं ? कितने हैं? इनका स्वरूप क्या है ? आदि। “
“ वत्सगण! सावधानी से सुनो अत्यन्त गूढ़ विषय है - देव-देवता देवी सभी एक ही अर्थ में प्रयुक्त हैं इन सबमें दिव्य धातु दिखती है। जिसका अर्थ होता है द्युति अर्थात् चमकना। अतः देवत्व की अवधारणा में चमक प्रकाश प्रधान है। इसलिए इनका सम्बन्ध दिन से है जिसे दिवा कहते हैं। मनुष्य से तुलना करने पर उनसे भिन्नता बनाने के लिए ये सूक्ष्म है जबकि प्राणी स्थूल है। असुरों से भिन्नता बताने के लिए ये प्रकाशवान है जबकि दैत्य या असुर अन्धकारमय है।”
“ गुरुदेव! इसका अर्थ हुआ कि वह तत्व जो प्रकाशमान, सूक्ष्म तथा आद्य है वही देव है।” राम ने व्याख्या का उपसंहरण-सी करते हुए कहा
“ बिल्कुल ठीक रघुवर !”
किन्तु इससे समस्या नहीं सुलझती गुरुवर ! इन
धर्मों से युक्त तत्व आदि देवें है तो उसमें बहुत्व कहाँ से आ गया । उनके अलग-अलग नाम कैसे हो गए ? इस बार भरत की बारी थी। वे देवों के एकत्व के हामी थे।
अभी समझाता हूँ, पहले देव शब्द की व्याख्या पूरी हो जाय। अभी जो व्याख्या हमने की वह कही हमारी बुद्धि का विलास तो नहीं, स्वयं वेद इस विषय में क्या कहते हैं। यह जानना आवश्यक है। चार गुण-धर्म हमने देवताओं के बताए-प्रकाशकत्व, सूक्ष्मत्व उद्गावर्तित (ऊपर उठाना) तथा पूर्ववर्तित्व (पहले पैदा होना)।
साधु गुरुदेव ! साधु! हम कृतज्ञ हुए। कई स्वतर एक साथ बोल उठे।
“ अब मैं तुम्हारे इस प्रश्न पर आता हूँ कि इनमें बहुत्व कहाँ से आ गया ? ऋषियों तथा साधारण आर्यजनों को दृष्ट तथा अनुभूत ये तत्व विभिन्न गुणधर्मों के साथ प्रत्यक्ष हुए। उन गुणधर्मों के आधार पर उनकी संज्ञाएँ हो गयी वे संज्ञाएँ उन गुणधर्मों के सतत् साहचर्य के कारण उन-उन गुण-धर्मोवाचक हो गयी। उन्हें हम इन्द्र, पूषा, वरुण आदि नामों से पुकारने लगे। ‘
“उदाहरण के लिए, दिन-रात को हमने घड़ियों तथा प्रहरों में बाँट रखा है और कहते हैं अभी तीसरा प्रहर है, दो घड़ी बीत चुकी आदि। यह विभाजन कल्पित तथा अखण्ड समय पर आरोपित खण्डता है। किन्तु व्यवहार के लिए उपयोगी है। जब हम कहते हैं कि चौथा प्रहर हो गया तो सन्ध्या का अर्थ आने लगेगा और सन्ध्या समय के विभाग का चौथा प्रहर हमेशा माना जाने लगेगा। दिन रात में 60 घड़ी तथा 8 प्रहर 24 होरा, 21600 कलाएँ कितने विभाजन हो गए एक अखण्ड काल के, दिवा-रात्रि या मास-संवत्सर का विभाजननादि इसी प्रकार कल्पित तथा आरोपित है। किन्तु व्यवहार में वह प्रतीत तो होता है। तत्वज्ञ को भिन्नता का व्यवहार करते हुए भी इसकी अखण्डता का सदा बोध रहना चाहिए।
और स्पष्ट करे गुरुदेव! कई समवेत स्वर-उभरे।
“ अखण्ड महाकाल की तरह परम चेतन, परम
सूक्ष्म, परम प्रकाशमान, परम लघु, परम महत परम आद्यतत्व को हमने अनुभव के आधार पर अर्थात् जैसे हमें या पूर्वज ऋषियों का दिखाया, अनुभूत हुआ उसके आधार पर विभाजन कर लिए गए। अनुभव के, गुण-धर्म के आधार पर उनके अलग-अलग नाम दे दिए जो उन-उन गुण-धर्मों के प्रतीक हो गए। ‘
महर्षि के कथन की समाप्ति के साथ राम का स्वर उभरा । वे पूछ रहे थे- क्या किसी ने महाकाल को, परम चेतन तत्व की समग्र अनुभूति की है।
इस प्रश्न को सुनते ही महर्षि मुस्करा पड़े, उनके मुखमंडल पर अतीत की अनेक यादें एक साथ चमक उठीं। वे बोले हाँ वत्स ! ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने। अपनी अनुभूति को उन्होंने गायत्री छंद में गाया भी है। परमात्मा का यह स्तुतिमान सभी वेदों का सार है। यह गायत्री मंत्र एक साथ सभी देव शक्ति की उपासना करने का मंत्र है। अब हम तुम्हें इसी का अर्थ बोध कराएँगे।
ओ..... ओ म् म्.........
महर्षि के मुख से निकली इस प्रणव ध्वनि को सभी बालकों ने दुहराया। आश्रम प्रणव की सुन्दर तरंगित ध्वनि से भर गया।
ॐ भूर्भुवः स्वः
“ प्रणव का उच्चारण करके हम परम चेतन का स्मरण करते हैं। अनन्तर दृश्यमान जगत का पृथ्वी, अंतरिक्ष कैसे हुआ ? राम ने प्रश्न किया। तुम ठीक कहते हो राम! भुवः भू का बहुवचन है किन्तु पृथ्वी
हाँ प्रभो ‘ भुवः तो भू का बहुवचन है। इससे अन्तरिक्ष का अर्थ कैसे ज्ञात होता है। छोटे गुरुदेव सुतपा को भी अपनी बहुत दिन की शंका दूर करने का मौका मिल गया।
तुम ठीक कहते हो राम ! भुवः भू का बहुवचन है किन्तु पृथ्वी तथा आकाश के बीच तो अनेक भौतिक पिण्ड हैं, वे क्या हैं। प्रत्येक पिण्ड एक ‘भू’ होता है। अतः वे सब मिलकर भुवः कहलाए तथा समग्र रूप से उनकी आख्या अन्तरिक्ष हो होगी, क्योंकि समस्त भवन तथा उसका आधार सभी
सन् 1926 की बसन्त पंचमी को साधना की जो दीपशिखा प्रज्ज्वलित हुई थी, उसने 1976 में अपने पचास वर्ष पूरे कर लिए। इन पचास वर्षों में पूज्यवर का जीवन अनेक अलौकिक अनुभूतियों से गुजरा था। अखण्ड दीपक के आलोक में अनगिनत प्रेरणाएँ उनके अर्न्तगगन में उतरी थीं। इन पचास सालों में न सिर्फ दीपशिखा अखण्डित रही, बल्कि साधना का क्रम भी अखण्डित रहा। आँवलखेड़ा की छोटी-सी कोठरी में प्रज्वलित किया गया दीपक, अपने मथुरा निवास की अवधि पुरी करके अब तक शाँतिकुँज में प्रतिष्ठित हो चुका था। इस बीच वन्दनीया माता जी के भी 24 महापुरश्चरण इसी के आलोक के समक्ष सम्पन्न हो चुके थे।
अपनी साधना के इस पचासवें वर्ष में पूज्य गुरुदेव के शिष्य वत्सल अन्तःकरण में एक नया संकल्प उभरा-अब तक की अर्जित तप सम्पदा का सामूहिक वितरण। यूँ उनका जीवनक्रम अर्जन एवं वितरण का सतत् प्रवाह रहा है। पर अभी तक वितरण की प्रणाली प्रायः वैयक्तिक ही रही थी। अनेक लोग समय-समय पर उनके सान्निध्य में आकर अपनी कष्ट-कठिनाइयों, पीड़ा-परेशानियों से मुक्ति पाते रहे थे। कइयों ने उनसे आध्यात्मिक उपलब्धियों के अनुदान, वरदान भी पाए थे, पर यह था प्रायः वैयक्तिक ही । यदा-कदा यदि इसका सामूहिक स्वरूप उभरा भी तो कुछ सत्रों और शिविरों के माध्यम से। जो गायत्री परिवार की व्यापकता को अपने में एक साथ समेटने में असमर्थ रहा।
इसी कमी को पूरा करने के लिए शिष्य वत्सल गुरुदेव ने सन् 1976 की स्वर्ण जयन्ती साधना वर्ष घोषित करते हुए कहा- ‘स्वर्ण जयन्ती वर्ष, साधना वर्ष होगा। इसमें एक लाख निष्ठावानों को साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग देने का निश्चय किया है। यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है। कुछ अन्य लोग भी ऐसे हो सकते हैं जो पत्रिका के नियमित सदस्य नहीं हैं। इन सब इच्छुकों में से काँट-छाँट करके ही एक लाख की संख्या सीमित करनी पड़ेगी। संख्या का सीमा बन्धन इसलिए है कि उस मण्डल में सम्मिलित लोगों का न केवल मार्गदर्शन करना वरन् सहयोग भी देना है।
“और यह साधनाक्रम इस वर्ष के बसन्त पर्व यानि 5 फरवरी सन् 76 गुरुवर से शुरू किया गया। इसकी अवधि प्रतिदिन 45 मिनट की निर्धारित की गई। ये 45 मिनट सूर्योदय के पूर्व के 45 मिनट थे। समय की नियमितता अनिवार्य थी। उसके लिए सभी से अनुरोध किया गया था कि सूर्योदय का समय प्रायः हर महीने बदलता रहता है। इसलिए घड़ी के हिसाब से हर महीन पंचाँग देखकर अपनी साधना के क्रम को सुचारु रूप से चलाया जाय।
एक समय में एक जैसी मानसिक क्रिया की सूक्ष्म विज्ञान के अनुसार अन्तरिक्ष में जो विशेष प्रतिक्रिया होती है, वह बिखराव की स्थिति में सम्भव नहीं। एक लाख साधक प्रस्तुत विशिष्ट उपासना के समय, क्रिया और भावना की दृष्टि से एकता, एकात्मता को आधार मानकर जब अपना क्रम पूरा। स्वर्ण जयन्ती साधना वर्ष घोषित करते हुए कहा- “ स्वर्ण जयन्ती वर्ष, साधना वर्ष होगा। इसमें एक लाख निष्ठावानों को साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग देने का निश्चय किया है। यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है। कुछ अन्य लोग भी ऐसे हो सकते हैं। जो पत्रिका के नियमित सदस्य नहीं हैं इन सब इच्छुकों में से काँट-छाँट करके ही एक लाख की संख्या सीमित करनी पड़ेगी। संख्या संख्या सीमित करनी पड़ेगी। संख्या का सीमा बन्धन इसलिए है कि उस पंडाल में सम्मिलित लोगों का न केवल मार्गदर्शन करना है वरन् सहयोग भी देना है।
“और यह साधनाक्रम इस वर्ष के बसन्त पर्व या दिन 5 फरवरी सन् 76 गुरुवार से शुरू किया गया। इसकी अवधि प्रतिदिन 45 मिनट की निर्धारित की गई। ये 45 मिनट की सूर्योदय के पूर्व के 45 मिनट थे। समय की नियमितता अनिवार्य थी। उसके लिए सभी से अनुरोध किया था कि सूर्योदय का समय प्रायः हर महीने बदलता रहता है। इसलिए घड़ी के हिसाब से हर महीने पंचाँग देखकर अपनी साधना के क्रम को सुचारु रूप से चलाया जाय।
एक समय में एक जैसी मानसिक क्रिया की सूक्ष्म विज्ञान के अनुसार अन्तरिक्ष में जो विशेष प्रतिक्रिया होती है, वह बिखराव की स्थिति में सम्भव नहीं एक लाख साधक प्रस्तुत विशिष्ट उपासना के समय, क्रिया और भावना की दृष्टि से एकता, एकात्मता को आधार मानकर जब अपना क्रम पूरा करते होंगे तो उसमें निश्चित रूप से असामान्य शक्ति उत्पन्न होती होगी। इस उपासनाक्रम में गायत्री मंत्र का अनिवार्य होना इसकी विशिष्टता को और अधिक बढ़ देता है।
इस साधनाक्रम में जो सबसे विशेष बात थी। उसका उल्लेख करते हुए उनके शब्द हैं- “ हमारा स्वयं का अनुभव इसी साधनाक्रम का है। उसके सभी उतार-चढ़ावों का हमें ज्ञान है। अस्तु, उसी को सन् 76 के साधना वर्ष के लिए निर्धारित किया है। हम प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में मार्गदर्शन और सहयोग करेंगे,साथ ही हमारी बागडोर सँभालने वाली शक्ति के द्वारा इस मण्डली पर विशेष प्रकाश-प्रेरणा मिलने का लाभ मिलता रहेगा। यह सब सूक्ष्म व्यवस्था बन जाने पर ही इस संघ साधना का उपक्रम किया गया है।
“पैंतालीस मिनट के इस साधनाक्रम में 15 मिनट अन्य साधनाओं के लिए और 30 मिनट गायत्री जप के लिए निर्धारित किए गए थे। औसतन इस अवधि में 600 मंत्र जपे जाने से कुल संख्या 6 करोड़ होती है। वर्ष में यह संख्या 6 करोड़ होती है। वर्ष में यह संख्या 360फ्6=2160 करोड़ हो जाती है। इन्हीं साधकों में से जिन्हें सुविधा हो उनसे चैत्र और आश्विन नवरात्रिय जप 240 करोड़ हो जाता है। इस प्रकार कुल मिलाकर 2400 करोड़ जप की यह एक वर्ष की संयुक्त जप संख्या हुई। यह अपनी तरह का एक अभूतपूर्व अनुष्ठान था। इतनी बड़ी संख्या में सुनियोजित साधनाक्रम की संघशक्ति से जुड़ी हुई साधना अब तक कभी कदाचित् ही हुई हो। एक दिन में 6 करोड़ गायत्री जप होने का अर्थ है 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों का प्रतिदिन सम्पन्न होना।
पू. गुरुदेव ने इसके द्वारा उत्पन्न विशेष चेतना का प्रयोग युग सन्धिकाल की उलझी परिस्थितियों को सुलझाने में किया। सम्मिलित होने वालों को इसमें अपनी तरह का लाभ मिला। अलग-अलग, छोटे-छोटे दीपक जलाने की अपेक्षा उन बिखरे साधनों को इकट्ठा करके एक बड़ी मशाल के रूप में जलाया जाय तो उससे अधिक गर्मी का लाभ एकत्रित होने वालों में से प्रत्येक को मिलता है। सहकारिता और संघ शक्ति का लाभ जड़ और चेतन दोनों ही क्षेत्रों में अति स्पष्ट है। अल्प बचत के अनुसार थोड़ा-थोड़ा पैसा जमा करके एक केन्द्र के हाथों सौंप दिया जाय तो उससे अधिक ब्याज भी मिलता है और देश के उद्योगों में भी उस धन से विशेष सहायता मिलती है। अलग-अलग कुछ करते रहने वाले डेढ़ ईंट की अलग मस्जिद बनाते रहने के कारण घाटे में ही रहते हैं। इस साधना मण्डल में सम्मिलित होने वाले हर साधक ने अपना लाभ भी अनेक गुना बढ़ा लिया और छाये हुए अन्धकार का निवारण कर सकने वाला प्रकाश उत्पन्न करने में अपनी विशिष्ट भूमिका भी निभा सके।
स्वर्ण जयन्ती वर्ष की साधना पद्धति का क्रम कुछ इस प्रकार था-
1- सूर्योदय का ठीक समय मालुम कर उससे 45 मिनट पूर्व साधना में बैठना अनिवार्य था। बैठने से पूर्व स्नान और धुले वस्त्रों को पहनने जैसी बातों पर भी ध्यान देना आवश्यक था।
2- पूजा की चौकी छोटी हो । उस पर पीले रंग का वस्त्र बिछा रहे। मध्य में गायत्री माता का चित्र, बाई ओर छोटी लुटिया में पानी भरकर जल कलश, दाहिनी और अगरबत्ती स्टेण्ड। मध्य में एक छोटी तश्तरी पूजा-उपकरण चढ़ाने के लिए स्थापित की जाय।
3- आसन के लिए कुष या चटाई ही पर्याप्त मानी गयी। पालथी मानकर सुखासन से सीधी कमर रखकर बैठ जाना था।
4- समस्त पूजा-उपचार में एक गायत्री मंत्र का ही प्रयोग किया जाना था।
5- गायत्री मंत्र में कई लोग कई-कई ॐ लगाते हैं। इस स्वर्ण जयन्ती साधनाक्रम में एक ही ॐ का प्रयोग करना था। अर्थात् ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। यही जाप का सर्वमान्य मंत्र था।
6- उपासना क्रम को छह भागों में इस प्रकार विभक्त किया गया था-(अ) आत्मशोधन के लिए षट्कर्म (आ) प्रतीक पूजा- उपचार (इ) सोऽहम् प्राणयोग (ई) गायत्री जप और ध्यान (उ) खेचरी मुद्रा (ऊ) सूर्य अर्घ्यदान।
(अ) आत्मशोधन में पवित्रीकरण, आचमन, शिखाबन्धन, प्राणायाम, न्यास एवं पृथ्वी पूजन यही षट्कर्म अनिवार्य थे।
(आ) देव पूजन-गायत्री माता के चित्र के समक्ष भावभरे मन से मन ही मन गायत्री मंत्र बोलते हुए जल, अक्षत, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प समर्पित करना ही देव पूजन के लिए पर्याप्त था।
आत्मशोधन एवं देवपूजन के इन दोनों कृत्यों से गायत्री परिवार के सभी सदस्य परिचित हैं। इस क्रम की विशिष्ट साधनाएँ थी सोऽहम् प्राण योग, विशेष ध्यान के साथ गायत्री जप एवं खेचरी मुद्रा।
सोऽहं प्राणयोग के लिए बायाँ हाथ नीचे दांया हाथ ऊपर गोदी में नेत्र अधखुले। साँस धीरे-धीरे दोनों नासिका छिद्रों से खींची जाय। नथुने बन्द करने या खोलने की इसमें आवश्यकता नहीं होती । धीरे-धीरे साँस खींचते हुए फेफड़े वायु से भरने के साथ ही यह ध्यान करे कि अखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राण तत्व साँस के साथ खिंचकर अपने शरीर में प्रवेश कर रहा है। प्रवेश के समय ‘सो’ को सीटी जैसी ध्वनि होती है। पूरी साँस भर जाने पर उसे रोके नहीं वरन् धारे-धीरे बाहर निकालना आरम्भ कर दें। इस विसर्जन के साथ हम् की फुंसकार जैसी भावना करे।
यह तीन अनुदान सविता देव सूक्ष्म शरीर को प्रदान करते हैं।
कारण शरीर का केन्द्र दोनों पसलियों के जोड़ पर आमाशय स्थान पर अवस्थित हृदय केन्द्र में है। यह आध्यात्मिक हृदय शरीर में धड़कने वाले रक्त के थैले से भिन्न हैं इसे विष्णुग्रन्थि अथवा सूर्यचक्र कहते हैं। यहाँ होकर प्रज्ञा पुँज सविता देवा कारण शरीर में प्रवेश करते हैं। और उच्चस्तरीय आदर्शवादी आस्था आत्मज्ञान से प्रभावित देव उमंगें आत्मीयता, करुणा, उदारता, अनुदान रूप में प्रदान करते हैं।
अपनी सारी सत्ता सूर्य पिण्ड जैसी ज्योतिर्मय हो रही है। अज्ञानान्धकार मिट रहा है। उसके साथ रहने वाली अनेक कुत्साएँ, कुँठाएँ पलायन कर रही हैं। भीतर सद्भावनाओं की और बाहर सत्प्रवृत्तियों की हिलोरें उठ रही हैं। ज्योतिर्मय आत्मसत्ता अपने आलोक से सारे वातावरण को प्रकाशवान बना रही है।
जप के साथ उपरोक्त ध्यान जप की प्रक्रिया को पूर्ण बनाता है। ध्यान के समय आंखें लगभग बन्द ही रखी जायँ। अधखुले नेत्र में भी पुतली ऊपर ही रखनी पड़ती है। ताकि बाहर के दृश्य ध्यान में बाधा न डालें।
ध्यान मिश्रित जप का आधा घण्टा पूरा हो जाने
पर अन्त में खेचरी मुद्रा का सम्पुट इस साधना का अनिवार्य अंग था। इसके लिए पाँच मिनट पर्याप्त माने गए थे। इस प्रक्रिया के लिए जीभ का उलट कर तालू से लगाएँ। ध्यान करें ब्रह्मलोक में, मस्तिष्क में भरा पड़ा है। जीवसत्ता की प्रतीक जिह्वा को ब्रह्मसत्ता के प्रतिनिधि तालू से स्पर्श कराया जा रहा है। इस दिव्य समागम में आनन्द एवं उल्लास की अनुभूति होती है। बछड़ा जिस प्रकार अपनी माता का दूध पीता है। अनुभव करना चाहिए कि ब्रह्मचेतना की कामधेनु का सोमरस, पयपान, जैसी जीवात्मा द्वारा किया जा रहा है और उससे नवजीवन की उपलब्धि हो रही है।
ध्यान मिश्रित जप इस साधनाक्रम की मध्यवर्ती मुख्य प्रक्रिया थी उसके आदि में सोऽहं प्राणयोग का बीज और अन्त में खेचरी मुद्रा का सम्पुट लगा हुआ था। इन चारों के मिलने से यह एक पूर्ण साधना पद्धति बन गयी थी। इस साधना यज्ञ की पूर्णाहुति सूर्यार्घ के रूप में इस भाव के साथ सम्पन्न करने का निर्देश था, जैसे अग्निहोत्र की पूर्णाहुति घृत की धार वसोधारा चढ़ाते हुए की जाती है।
सूर्योदय के समय 45 मिनट तक किये जाने वाले इस दैनिक उपासनाक्रम के साथ प्रातः आँख खुलते ही 15 मिनट का आत्मबोध चिन्तन-जिसमें यह मान्यता चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमानी होती है कि आज का एक दिन पूरे जीवन की तरह है इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाया जाना चाहिए। सोचा जाना चाहिए कि ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं वरन् विशुद्ध अमानत हैं जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने, स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पुरा होता है जब प्राप्त क्षणों का योजनाबद्ध रूप से सदुपयोग किया जाय।
तत्वबोध के रूप में सोते समय ईश्वर की अमानतें ईश्वर को सौंपने और स्वयं खाली हाथ प्रसन्नचित विदा होने की निद्रा देवी की गोद में जाने की बात सोचनी होती है। रात्रि को सोते समय मृत्यु का चिन्तन, आत्म-निरीक्षण, पश्चाताप और कल के लिए सतर्कता-वैरागी एवं संन्यासी जैसी हल्की-फुलकी मनः- स्थिति लेकर शयन करने से दुर्भावनाएँ एवं दुर्वासनाएँ अपने आप पीछा छोड़ देती हैं।
स्वर्ण जयन्ती वर्ष की यह साधना पद्धति समग्र जीवन साधना के रूप में एक लाख साधकों द्वारा निष्ठापूर्वक अपनायी गई। नैष्ठिक साधकों में से प्रायः सभी ने वैयक्तिक एवं सामाजिक स्तर पर अनेक सफलताएँ अर्जित कीं, अनगिनत दोषों से छुटकारा पाया। सबसे भारी लाभ तो आत्मिक उत्कर्ष का रहा, जो उन्हें अपनी मार्गदर्शक सत्ता एवं हिमालय से आती शक्तिधाराओं से जुड़ने, एकात्म होने से मिला। गूँगे के गुड़ की भाँति इस स्वाद को आज भी अनेक रसासिक्त होकर अनुभव करते हैं।
साधकों के वैयक्तिक उत्कर्ष के अलावा इस साधनात्मक पुरुषार्थ के देशव्यापी परिणाम भी अनुभव किए गए। उन दिनों समूचा राष्ट्र इमरजेन्सी की कैद में जकड़ा हुआ था शासकों की, स्वार्थपरता की रीति-नीति ने सारे देश को कारागार में बदल दिया था। उन्हीं दिनों क्षेत्र से आए एक परेशान कार्यकर्त्ता ने अपनी विपत्ति गुरुदेव को सुनायी तो उनका जवाब था-” तुम्हें जो बताया गया है उसे करते रहो- स्थिति परिवर्तित होगी, वर्तमान शासकों को सबक मिलेगा। तुम लोगों की साधना का लाभ सारे देश को मिलेगा। “ हुआ भी कुछ ऐसा ही-1977 में सारे देश ने राहत की साँस ली। हवाएँ मुक्त हुई फिजाएँ बदली हालाँकि जिन्हें अवसर दिया गया था वे अपनी कुप्रवृत्तियों के कारण उसे बरकरार न रख सके। परन्तु इस बीच जिन्हें सबक सिखाया गया था वे अपनी भूल सुधार चुके थे। साधना के इस सामूहिक पराक्रम ने उस विशेष सामूहिक साधना की भी पृष्ठभूमि तैयार की, जिसे युग सन्धि महापुरश्चरण नाम दिया गया। जो अपनी परिणति उज्ज्वल भविष्य के रूप में करने जा रही है।
गायत्री जयन्ती 3 जून, 1979 को गंगा के तट पर ज्ञान की एक नवीन धारा का अवतरण हो रहा था। युग के भगीरथ की बरसों की तप-साधना अपना साकार रूप ले रही थी । गायत्री और गंगा के इस अवतरण दिवस पर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का उद्घाटन हो रहा था। इस अवसर पर गायत्री परिवार के सदस्यों के अलावा देश के अनन्त विख्यात मनीषी भी आए हुए थे। आगन्तुकों में उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री जी.डी. तपासे भी थे। शोध संस्थान के कार्य की रूपरेखा ने उन्हें मोह लिया था। वह कह रहे थे-
“शांतिकुंज ने आज अपने एक नए आयाम का उद्घाटित किया है। विश्व ने अभी तक वैज्ञानिक भौतिकवाद को देखा है। विज्ञान अभी तक पदार्थ विज्ञान बना हुआ है । अन्वेषण तो बहुत हुए पर जड़ पदार्थों के। शायद इसी कारण हमने सुविधाएँ बटोरीं और उनके विनाश के सरंजाम जुटाए, चेतना का अनुसन्धान, अन्वेषण अभी बाकी है। मानव प्रकृति के रहस्यों की खोज-बीन अभी तक नहीं की गई। सम्भवतः इसलिए क्योंकि यह कार्य वैज्ञानिक भौतिकवाद की सीमा से बाहर है। पदार्थ विज्ञान इसका अन्वेषण करने में सक्षम नहीं है। इसके लिए विज्ञान को आध्यात्मिकता अपनानी होगी और अध्यात्म को वैज्ञानिक होना पड़ेगा। आज आचार्य जी के प्रयासों से यह असम्भव कार्य सम्भव हो रहा है। ज्ञान की सर्वथा नवीन धारा यहाँ वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के रूप में अवतरित हो रही है। चेतना का विज्ञान अपना रूप धारण कर रहा है।
यह अवतरण गंगा के अवतरण से किसी भाँति कम नहीं। युगों पूर्व भगीरथ अपनी दुष्कर तपस्या, कठोर श्रम से आज के दिन ही गंगा को धरती पर लाए थे। छटपटाते मानव जीवन को शीतलता प्रदान की थी। छटपटाहट आज भी है और शायद पहले से भी अधिक। पर यह मानसिक और बौद्धिक है। इसका समाधान जलधारा का अवतरण नहीं, ज्ञान की धारा का अवतरण है। अपने युग के ऋषि, आचार्य जी ने विश्वामित्र और भगीरथ की तरह वही किया है”
श्री तपासे ने अपने भाषण में जिस छटपटाहट का जिक्र किया उसे आज भी हम सब अपने चारों ओर देख सकते हैं। ऐसा नहीं है कि इसके समाधान के लिए प्रयत्न नहीं समस्याओं और विपत्तियों के निवारण में मूर्धन्य प्रतिभाएँ जुटी हैं। अनेकानेक उपाय-उपचार भी हो रहे हैं। पर जितना जोड़ते हैं उससे अधिक टूटने का दुर्भाग्य ही पल्ले पड़ता है। शान्ति के समाधान आज निकलें या हजार साल बाद, उनका स्वरूप एक ही होगा कि जनमानस पर छाए हुए आस्था संकट का निराकरण किया जाए। इस निराकरण के दो ही उपाय हैं- चिन्तन में अध्यात्म, तत्वज्ञान का और व्यवहार में धर्म-धारणा का समावेश। इस प्रयास की उपेक्षा जब तक होती रहेगी तब तक उज्ज्वल भविष्य की आशा, मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।
धर्म और अध्यात्म की पुनः प्राण प्रतिष्ठापना के मार्ग में दो बाधाएँ ही इन प्रतिष्ठापना के मार्ग में दो बाधाएँ ही इन दिनों प्रमुख हैं। इस महान प्रत्यक्षवाद द्वारा उत्कृष्टतावादी दर्शन की अवमानना। इन दो मोर्चों पर जूझा जा सके तो ही आगे बढ़ने का रास्ता प्रशस्त होगा अन्यथा अवरोधों की चट्टानें रास्ता रोक कर ही खड़ी रहेंगी। इन्हें कैसे हटाया जाय? इस प्रश्न का उत्तर एक ही है कि दोनों ही क्षेत्रों की भ्रान्तियों का निराकरण करने के लिए समर्थ तंत्र खड़ा किया जाय। दर्शन का उत्तर दर्शन से, तर्क का उत्तर तर्क से और विज्ञान का उत्तर विज्ञान से दिया जाय। आज की परिस्थितियों में शास्त्र प्रमाण एवं आप्तवचन पर्याप्त नहीं रहे। उनके पीछे समर्थ प्रतिपादन चाहिए। ऐसे समर्थ, जिनके तर्क, तथ्य एवं विज्ञान की साक्षी एवं पुष्टि उपलब्ध हो।
अपने समय का यही सबसे बड़ा काम है। इसके लिए आवश्यकता ऐसे शोध संस्थान की थी। जो धर्म और दर्शन के शाश्वत स्वरूप को प्रस्तुत कर सके और उसकी उपयोगिता एवं प्रामाणिकता से बुद्धिवाद को पुनर्विचार के लिए विवश कर सके। अध्यात्म विज्ञान के तीन अंग हैं-(1) परोक्ष सत्ता का अस्तित्व, (2) आस्थावादी तत्वदर्शन (3)साधना विज्ञान क्षेत्र में पिछले दिनों मान्यता नहीं दी है। फलतः नास्तिकवाद का पक्ष सबल हुआ है और अनास्थावादी आचरणों ने जोर पकड़ा है। नया अनुसंधान तंत्र ऐसा खड़ा होना चाहिए जो प्रत्यक्षवाद के प्रत्येक अनास्थावादी प्रतिपादन को चुनौती दे सके और उस क्षेत्र में छाई हुई भ्रान्तियों को परास्त कर सके। आज इन प्रतिद्वन्द्वी प्रयत्नों की इतनी आवश्यकता है जिसे मानवी भविष्य को बनाने, बिगाड़ने की दृष्टि से सर्वोपरि महत्व की मानी जा सकती है।
यद्यपि परम पू. गुरुदेव अखण्ड ज्योति के माध्यम से इस तरह के प्रयास प्रारम्भ से ही कर रहे थे। सन् 1965 में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर विशेष लेखमालाएँ भी प्रकाशित हुई। पर 1971 हिमालय यात्रा के समय तक उनके चिन्तन में यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि एकाकी लेख प्रकाशन इसके लिए पर्याप्त नहीं। इसके लिए अनुसंधान का दृश्यमान रूप खड़ा करना पड़ेगा। शोध का समर्थ तंत्र विकसित करना होगा। शोध-संस्थान का स्वरूप कैसा हो ? शोध अन्वेषण के सूत्र क्यों हों? इन प्रश्नों के उत्तर उन्होंने अपनी तप साधना के समय खोजे। उन्हीं के शब्दों में-
“ हमारी भावी तपश्चर्या का दूसरा प्रयोजन आध्यात्मिकता के विज्ञान पक्ष को मृत, लुप्त तथा विस्मृत, दुःखद परिस्थितियों में से निकालकर इस स्थिति में लाना है कि उसके प्रभाव और उपयोग का लाभ जनसाधारण को मिल सकना सम्भव हो सके। भौतिक विज्ञान का लाभ जनसाधारण को मिल सका और उसने अपनी महत्ता जनमानस पर स्थापित कर दी। आज विज्ञान सम्मत बातों को ही सच माना जाता है, जो उस कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं उन्हें मिथ्या घोषित कर दिया जाता है। आस्तिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता की मान्यताओं को हमें विज्ञान के आधार पर सही सिद्ध करने का प्रयत्न करना पड़ा रहा है। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की एक नई दिशा का निर्माण करना पड़ रहा है।
“हिमालय यात्रा से लौटने के बाद उन्होंने विदेश यात्रा सम्पन्न की। शाँतिकुँज में प्राण प्रत्यावर्तन सत्र, वानप्रस्थ सत्र चले। कन्या प्रशिक्षण का कार्यक्रम संचालित होता रहा। इसके साथ ही ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की रूपरेखा भी बनती रही और एक दिन पूज्यवर ने यह घोषणा कर डाली कि वह ब्रह्मवर्चस का निर्माण करेंगे। अपने प्रारम्भिक दौर में ब्रह्मवर्चस का स्वरूप ब्रह्मवर्चस साधना आरण्यक के रूप में प्रस्तुत हुआ था। योजना यह बनी थी-कि ब्रह्मवर्चस में साधकगण रहेंगे। पू. गुरुदेव के द्वारा बतायी गई एक सुनिश्चित साधना पद्धति का निष्ठापूर्वक अनुसरण करेंगे। साधना के लिए इन साधकों को नाव से गंगा की जलधारा पार करके दिनभर टापुओं में रहने और शाम को पुनः वापस ब्रह्मवर्चस लाने की विधि-व्यवस्था भी सोची गयी थी।
परन्तु बाद में उन्होंने इसमें थोड़ा हेर-फेर कर दिया। यह हेर-फेर ब्रह्मवर्चस के मूल प्रयोजन में नहीं- बल्कि उसके स्वरूप में था। वह साधकों को अपनी ही ऊष्मा में पकाने के पक्ष में थे और यह भट्टी उन्हें ब्रह्मवर्चस से अधिक उपयुक्त और कोई नहीं लगी। शायद इसी कारण गंगा के पार जाने की योजना समाप्त कर दी गई साधना सत्र शाँतिकुँज में संचालित होते रहे और ब्रह्मवर्चस साधना आरण्यक ने प्रयोगशाला का रूप ले लिया। यद्यपि इसकी शोध का स्वरूप प्रचलित अनुसंधान-अन्वेषण की पद्धतियों से अलग था। इस प्रयोगशाला में किए जाने वाले प्रयोग अपनी तरह के अनूठे हैं।
इस विलक्षणता का जिक्र करते हुए पू. गुरुदेव अपने एक प्रवचन में स्पष्ट करते हैं- ब्रह्मवर्चस एक फैक्टरी है, एक कारखाना है, एक भट्टी है। इस भट्टी में क्या होगा ? गलाई और ढलाई। भट्टियाँ कई तरह की होती हैं। कही काँच की भट्टी है तो कहीं लोहे की भट्टी है तो कही अमुक भट्टी है। लेकिन हमने जो भट्टी बनाई है उसमें गलाई का काम और ढलाई का काम हम करेंगे। इस कारखाने में हम दो चीज तैयार करेंगे- एक तो ताकत और दूसरी बिजली, जिसके आधार पर नए युग का ढाँचा खड़ा होगा। प्रत्येक मशीन, प्रत्येक क्रिया-कलाप किसी न किसी ताकत से चलता है। कोई भी तंत्र किसी न किसी ताकत से घुमाया जाता है। ताकत न हो तो वह चलेगा ही नहीं। जिस ताकत के द्वारा नए युग के निर्माण का तंत्र चलने वाला है, क्रेन जिसके आधार पर उठा दी जाने वाली है, ड्रिलिंग मशीन जिसके द्वारा जमीन में सुराख किया जाने वाला है, यह किस ताकत से चलेगी ? बेटे, यह जिस ताकत से चलेगी वह एटामिक ताकत नहीं है वरन् वह आत्मिक ताकत है।
हम यहाँ दो तरह के आदमी बनाएँगे। एक का नाम होगा-’मनस्वी’ और दूसरे का नाम होगा ‘तपस्वी’ तो क्या आप मनस्वी और तपस्वी केवल इसी जगह बनाएँगे या और कहीं अन्यत्र भी ? नहीं बेटे, यह तो हमारी नर्सरी है। इस नर्सरी में हम छोटे-छोटे पौधे उगाएँगे और फिर उनको सारे संसार भर में भेज देंगे। हमारी यह प्रयोगशाला विश्व में अपने आप में एक अनोखी प्रयोगशाला है। यह आश्रम हमारी शुरुआती का एक केन्द्र है, जहाँ हम शिक्षण करेंगे ओर नवयुग की एक हवा पैदा करेंगे। और नवयुग की एक हवा पैदा करेंगे यह एक बहुत बड़ी फैक्टरी है जिसका प्रत्यक्ष परिणाम अगले ही दिनों आने वाला है।
पू. गुरुदेव के प्रवचन के उपरोक्त अंश में न केवल-ब्रह्मवर्चस की विशेषताएं झलकती हैं, बल्कि उसके शोध कार्य की मौलिकता की भी झलक मिलती है। यहाँ की शोध कागज, कलम, पुस्तकों, मशीनों, उपकरणों तक सीमित नहीं है। यद्यपि ये सहायक तत्व जरूर हैं ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान तो मानव प्रकृति के अध्ययन-अनुसंधान का संस्थान है। विश्व प्रकृति-परमात्म तत्व से उसके सम्बन्धों को समझने, स्वीकार करने की प्रयोगशाला है। मनुष्य में सन्निहित दिव्य क्षमताओं के जागरण का वैज्ञानिक केन्द्र है।
प्राचीनकाल की ऋषि परम्परा में शोधन, सृजन और शिक्षण की त्रिवेणी का संगम था। एकान्तवास, विशुद्ध शोध प्रयोजनों के लिए होता था। ताकि बिना बाह्य विक्षोभ के एकाग्र मनःस्थिति में अनुसंधानों का क्रियाकलाप ठीक तरह सधता रहे। भौतिक विज्ञान में भी अन्वेषण-कर्ताओं को ऐसे ही सुविधा दी जाती है। “सृजन में लोकोपयोगी सभी सत्प्रवृत्तियों का स्वरूप निर्धारण आता है। साहित्य सृजन से लेकर चिकित्सा उपचार, कला शिल्प, उपकरण, रसायन आदि के अनेक प्रयोजन विनिर्मित करना ऋषि परम्परा का दूसरा आधार रहा है। तीसरा कार्य था शिक्षण। इसमें बालकों के लिए गुरुकुल और प्रौढ़ों के लिए आरण्यक सर्वसाधारण के लिए तीर्थाटन जैसे उपाय का में लाए जाते थे।
युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में जिस अनुसंधान को सम्पन्न किया जा रहा है, उसके भी तीन पक्ष हैं। शोध प्रक्रिया में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि इन दिनों दुनिया बहुत छोटी हो गयी है। मीलों के फासले आज की संचार और वाहन व्यवस्था ने समाप्त कर दिए हैं ऐसी दशा में समर्थ प्रतिपादन वही हो सकता है जो किसी देश धर्म के लोगों की परम्पराओं को तुच्छ करने तक सीमित न हो वरन् उस प्रखरता से सम्पन्न हो जो सार्वभौम एवं सार्वजनीन बनने का दावा कर सकें। जिसे परख-परीक्षण की हर कसौटी स्वीकार हो । नवीन या प्राचीन का आग्रह न करके यहाँ सत्यान्वेषण एवं तथ्यान्वेषण पर बल दिया जाता है। ताकि भौतिक विज्ञान के सिद्धान्तों की तरह इसे सर्वत्र एक स्वर से स्वीकारा जा सके।
ब्रह्मवर्चस के प्रारम्भिक दिनों से अपनी सूक्ष्मीकरण साधना में जाने से कुछ पहले तक परम पू. गुरुदेव शाँतिकुँज से पैदल चलकर यहाँ स्वयं आते थे। यह सिलसिला प्रायः प्रतिदिन का था। यहाँ का भवन निर्माण, 14 मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा, पुस्तकालय की स्थापना एवं प्रयोगशाला के स्वरूप का निर्धारण सब कुछ उन्हीं की देख-रेख में हुआ। शोध संस्थान के स्वरूप का विकास हो जाने के बाद, यहाँ आकर शोधकर्मियों का मार्गदर्शन भी स्वयं ही करते थे। आज जहाँ लाइब्रेरी है वहीं ये शोध गोष्ठियाँ हुआ करती थी।
इन गोष्ठियों में वे बताते कि भारतीय साधना विज्ञान के अंतर्गत कितनी ही शाखा-प्रशाखाएं हैं। संसार के अन्यान्य साधना-सम्प्रदायों में अपने-अपने ढंग की साधना प्रचलित हैं। अपने शोध प्रयास किसी देश या सम्प्रदाय की सीमा बन्धन में बँधे हुए नहीं हैं। इसलिए अपनी शोध का क्षेत्र विश्वव्यापी साधनाओं की क्रिया-प्रतिक्रिया का परीक्षण ही होगा। भारतीय योग साधनाओं की 84 शाखाएँ है॥ 84 योगासन ही नहीं 84 योग भी हैं। इनके जो महात्म्य बताए गए हैं उनमें से कितनी अंश अभी भी सही सिद्ध होता है यह देखना है। प्रयत्नों के असफल होने का कारण क्या है? क्या उन विधानों में परिस्थितियों के अनुरूप यत्किंचित् हेर-फेर हो सकता है ? साधक की शारीरिक, मानसिक स्थिति के अनुरूप क्या शास्त्रीय विधानों में कुछ न्यूनाधिकता हो सकती है ? इनसे यदि कुछ लाभ होता है तो उसका कारण प्रमाण क्या है ? श्रम के निरर्थक जाने पर कई बार उलटी हानि हो जाने की प्रतिक्रिया क्यों होती है? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर ब्रह्मवर्चस की प्रयोगशाला में खोजना है।
पू. गुरुदेव का कहना था- कि दक्षिणमार्गी साधनाओं का सम्मान है किन्तु वाममार्गी साधनाओं को हेय वर्ग की ठहरा दिया गया है। जबकि वह भी विशिष्ट शक्तियों को उपलब्ध करने का सुनिश्चित विज्ञान है। अनैतिक आचरण वालों के उस क्षेत्र में घुस पड़ने से बदनामी छाई है अन्यथा उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिए नीति-मर्यादाओं का उल्लंघन करना पड़े। तन्त्र को नए सिरे से खोज करने का आवश्यकता है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म जैसे प्रयोग भारतीय तंत्रशास्त्र के प्रारम्भिक अध्याय हैं। कुण्डलिनी योग और चक्र बेधन तंत्र की ही एक विशेष शास्त्र है। इन प्रयोगों को रहस्यमय नहीं रहने दिया जा सकता । जब अणु शक्ति का ज्ञान और उपयोग सर्वविदित हो सकता है तो तन्त्र विज्ञान की क्षमता का परिचय प्राप्त करने से जन साधारण को वंचित क्यों रहना पड़े।
इसी प्रयोग शृंखला में यज्ञ विज्ञान का विशिष्ट स्थान है यज्ञ विज्ञान के कितने ही पक्ष हैं- यथा (1) मन्त्रोच्चार में सन्निहित शब्द शक्ति, (2) साधकों का पवित्र एवं परिष्कृत व्यक्तित्व, (3) हव्य पदार्थों में दिवरु विशेषताओं का समावेश (4) अग्नि ऊर्जा का अभीष्ट प्रयोजन में सन्तुलित उपयोग आदि। इन प्रयोजनों का शास्त्रों में उल्लेख तो है पर उनके विधानों, अनुपातों और सतर्कताओं का वैसा उल्लेख नहीं मिलता जिसके आधार पर समान उपचार बन पड़ने की निश्चिंतता रह सके। सही प्रक्रिया से अवगत न हो पाने पर सही परिणाम भी कैसे निकले। यज्ञ विद्या को साँगोपाँग बनाने के लिए शास्त्रों के साँकेतिक विधानों को हमें सर्वांगपूर्ण बनाने की आवश्यकता है। इसे भी ब्रह्मवर्चस द्वारा ही पूरा किया जाना है।
इस तरह अपनी चर्चाओं के दौरान गुरुदेव ब्रह्मवर्चस की शोध के स्वरूप को स्पष्ट करते रहते थे। सूक्ष्मीकरण की साधना के बाद उनका यहाँ आना तो नहीं हुआ पर वहीं अपने निवास पर गोष्ठी, चर्चा परामर्श द्वारा क्रिया -कलापों को संचालित करते रहते थे।उनके महाप्रयाण के बाद यह दायित्व अखण्ड ज्योति के सम्पादक के कन्धों पर आ पड़ा है। जिसे उनके सान्निध्य में ब्रह्मवर्चस की स्थापना के समय से ही रहने, प्रशिक्षण पाने का सुयोग प्राप्त हुआ है। आज इस स्थापना को 17 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन सत्रह वर्षों में लगातार प्रयोग-परीक्षणों का क्रम अबाध गति से चलता रहा है। समय- समय पर इसके निष्कर्षों को अखण्ड ज्योति में प्रकाशित भी किया जाता रहा है। अब जिज्ञासुओं, मनीषियों, परिजनों, विज्ञानविदों के आग्रह को ध्यान में रखते हुए शोध पत्रों, रिसर्च बुलेटिन प्रकाशित करने का सिलसिला भी शुरू किया जाने वाला है। अभी इन पंक्तियों में विगत वर्षों के परिणामों को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि ब्रह्मवर्चस का शोध अनुसंधान अगले दिनों समस्त मानव समाज को वर्तमान बुद्धिवाद के कुचक्र से निकालने में सहायक ही नहीं समर्थ भी सिद्ध होगा।
लौह शिरस्त्राण, कवच तथा अस्त्र-शस्त्र धारण किए संजय अपने रथ पर बैठे उत्कण्ठा से प्रतीक्षा कर रहे थे। अन्त के आदि की प्रतीक्षा। लग रहा था जैसे अन्त के आरम्भ की प्रतीक्षा अनन्त हुई जा रही है। तभी उनका ध्यान पाण्डव पक्ष की ओर से बढ़े चले आ रहे एक रथ की ओर खिंच गया। रथ पर फहराते हुए कपिध्वज तथा श्वेत अश्वों को देखकर वे पहचान गए कि वह महावीर अर्जुन का रथ है। रथ पाण्डव सेना से काफी आगे आकर मध्य की खाली भूमि पर रुक गया था। उत्सुकता से संजय ने भी अपना रथ बढ़ते ही श्रीकृष्ण को पार्थ सारथी के रूप से देखकर संजय को रोमांच हो आया। पार्थ सारथी के एक हाथ में वल्गाएँ थामकर रथ का संचालन करेगा। श्रीकृष्ण के हाथों में सौंप दी हैं ? श्रीकृष्ण के अधरों पर सदा की भाँति आज भी एक रहस्यमयी मुस्कान है।
अर्जुन का तन महावीर योद्धा की भाँति सुस्थिर व तना हुआ। मुख पर प्रतिशोध का कठोर भाव और नेत्रों में शत्रुनाश का दृढ़ संकल्प साफ-साफ झलक रहा था। वे गर्दन उठाकर शत्रुसेना के एक-एक योद्धा को पहचानने का प्रयास कर रहे थे।
क्या विलम्ब है? युद्ध प्रारम्भ नहीं हो रहा। संजय रथ से उतर पड़े और धीरे-धीरे अर्जुन के रथ की ओर बढ़ने लगे।
अर्जुन देख रहे थे शत्रु सेनाओं को । रजत रथ पर बैठे, श्वेत केशों को श्वेत केशों को श्वेत उष्णीष में बाँधे पितामह भीष्म। लौह कवच पर लहरा रही थी उनकी श्वेत दाढ़ी। वृद्धावस्था के बावजूद उनके मुख पर ब्रह्मचर्य का तेज और दृढ़ता की प्रदीप्ति थी। अर्जुन ने देखा आचार्य द्रोण को जिन्होंने सर्वप्रथम उन्हें अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान दिया था और उन्होंने देखा- कृपाचार्य ! मामा शल्य! तात भूरिश्रृवा! भगिनी पति जयद्रथ! दुर्योधन, दुशासन विकर्ण और......ओर........पितामह।
दृष्टि लौट-लौटकर आती और टिकी रह जाती कुल के परम स्नेही महावृद्ध पर। पितामह्गले में कुछ अटक-सा गया। मन हुआ दौड़ लिपट जाए पितामह के चरणों से कि ले लो अपने आश्रय में पहले की भाँति और द्रोणाचार्य ! कृपाचार्य ! अर्जुन का पूरा शरीर थरथरा गया। हृदय विश्वासघात कर गया। नजर धुंधली पड़ती जा रही थी। अँधेरा! चारों ओर घना अंधकार छाता जा रहा था।
अर्जुन विक्षिप्त से चारों ओर देख रहे थे। कौन पुकार रहा है उन्हें ? कहीं से पुकारें आ रही थी। कोई गरज रहा है उन पर। कोई गरज-गरज कर कह रहा है- कृतघ्न ! फेंक दे अस्त्र-शस्त्र और लिपट जा पितामह के चरणों में! कौन पुकार रहा है? कहाँ से गर्जना आ रही हैं ?
पुकार आ रही थी उन्हीं के अन्तस्तल से । वीर अर्जुन के अन्तर में एक और अर्जुन के अन्तर में एक और अर्जुन का अस्तित्व था, भीरु और दीन। मोहाकुल और कातर ! भीतर बैठा हुआ वह मोहग्रस्त अर्जुन, योद्धा अर्जुन को धिक्कार-धिक्कार कर कहा रहा था कि छोड़ दे युद्ध की लालसा।
अन्तर से पुकार आ रही थी अर्जुन! किस प्रलोभन में दूल्हे की तरह सजा हुआ खड़ा है। किसकी प्रतीक्षा है तुझे ? पितामह के क्षत-विक्षत तन का गिद्ध, कौओं द्वारा महाभोज होते हुए देखने की प्रतीक्षा ? नहीं-नहीं! अपराजेय योद्धा सिहर उठा। तो ऐसी विराट सैन्य वाहिनी का अग्रणी बना किसकी प्रतीक्षा कर रहा है? द्रोणाचार्य के लहूलुहान शव की ? आचार्य के कटे हुए शीश को देखने की ? मामा शल्य के निर्जीव तन को सियारों द्वारा चीथ-चीथ कर खाए जाने की?
अर्जुन सिहर उठे। अन्तर की पुकारें बढ़ती जा रही थी। भावुक मानस की व्याकुल तरंगें उनके योद्धा मन को झकझोरे डाल रही थी।
अरे रक्त पिपासु वीर सव्यसाची। अरे महापराक्रमी योद्धा धनंजय! तू अपने ही इन सम्बन्धियों पर वीरता दिखाने चला है। राज्य लोभी ! विजयश्री चाहिए तुझे ? तो काटता क्यों नहीं दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का शीश। फिर देखना उसकी बाल विधवा कैसे हाहाकार करती लोट जाएगी पति के प्राणहीन तन पर। एक ठण्डी कंपकंपी पूरे तन को पुनः सिहरा गयी। अपने प्रचण्ड सेनानायक! दिखा अपना पराक्रम और सुला दे अपने वृद्ध अंधे पितृव्य के सौ पुत्रों को चिर निद्रा में। उठा गाण्डीव। शर-संधान कर। नष्ट कर दे कुलवंश। बुझा दे समस्त वंशीदीप। अर्जुन का कंठ शुष्क हो गया। अरे अपराजेय वीर! रुका क्यों हैं ? कर डाल आज सर्वनाश अपने पिता के वंश का। क्या सुन रहा है ? पुत्र शोक से व्याकुल गाँधारी वक्ष पीट-पीट कर जो क्रन्दन कर रही है ? हाँ ठीक सुन रहा है। यह तेरे ही पितृव्य धृतराष्ट्र का दारुण विलाप है। तेरे अन्धे और असहाय पितृव्य फूट–फूट कर रो रहे हैं। क्यों रो रहे हैं। कौन है उनका अपराधी। क्रूर आत्मा तू! तू! नृशंस सव्यसाची! तू अपराधी है। पापी हैं। तू दुःख पहुँचा रहा है अपने समस्त सम्बन्धियों को। तू उन्हें असहाय कर रहा है। तूने उनके वंशीदीपों को बुझा दिया हैं तूने उनके अवलम्ब छीन लिए हैं। तू उनके पुत्रों-पौत्रों का बधिक है। तू सबके दुःखों का मूल है। तू सबके कष्टों का मूल है। तू ही युद्ध का मूल हैं तू! तू! तू। लोभी ! निष्ठुर! पापी! कुलघाती !
अर्जुन स्वेद से आचुड़ नहा गए। सूखे अधरों पर बार-बार चिह्न फेरते असक्त हाथों से कभी गाण्डीव पकड़ते, कभी छोड़ते। रोकते-रोकते भी एक कंपकंपाती-सी दीर्घ निःश्वास कंठ से निकली ही गयी।
चौंक कर पार्थ सारथी ने पलटकर देखा।
भेंग मेरुदण्ड। ध्वस्त मनोबल। अपराजेय पौरुष के स्वामी और ऐसे निढाल स्कन्ध। शिथिल-भुजाएँ पाण्डव पक्ष की आशा की प्रदीप धुँआ छोड़ता हुआ। बुझा सा। सात अक्षौहिणी सेनाओं का महाबली केवट विकलता के क्षण में पतवार फेंक नौका को मझधार में छोड़कर पलायन करने को तत्पर। कातर अर्जुन श्रीकृष्ण की मर्मभेदी दृष्टि को अपने ऊपर अनुभव करते हुए अवरुद्ध कंठ से गुहार उठे-
“ अच्युत! मुझे यह राज्य नहीं चाहिए मुझे विजय नहीं चाहिए। मुझे सुख नहीं चाहिए। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं बन्धुहंता नहीं। मैं गुरुघाती नहीं, मैं कुलनाशी नहीं । गोविन्द। मैं युद्ध नहीं कर सकता। मैं युद्ध नहीं करूंगा।.......... “ विकल मन अर्जुन काँपते हाथों से गाण्डीव रथ में एक ओर रख हाथों से मुख छिपाकर बैठ गए।
संजय स्तब्ध रह गए। कितने माहों से निरन्तर होता आ रहा युद्धाभ्यास। सुदूर जनपदों से आए नरेशों की ये विराट् सेनाएँ और अर्जुन स्वयं ही टूट गए। अब क्या होगा ?
पार्थ सारथी ने सुना। विस्मय से भरकर वे अर्जुन को फटाकर उठे-
कुतस्तवा कष्मलमिदं विषमे समुपस्थिम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वष्युपपद्याते। क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्वक्वोत्तिष्ठ परंतप॥
असमय ऐसी क्लीवता। ऐसा तो कोई श्रेष्ठ वीर नहीं करता। ऐसे आचरण से तू स्वर्ग पाना चाहता है ? हृदय की यह कैसी अनुचित दुर्बलता। छोड़ दे, छोड़ दे, पार्थ मन की इस तुच्छ दुर्बलता को छोड़ दे और हुँकार कर उठा खड़ा हो वीरों की भाँति युद्ध करने।
व्याकुल अर्जुन ने धीर-धीरे मुख पर से अपने हाथ हटाए और वेदनापूरित स्वर में बोले-किन्तु मधुसूदन! पितामह और गुरुवर! इन पर बाण कैसे छोड़ूंगा ? अरिसूदन ये तो दोनों ही मेरे पूज्य हैं। नहीं माधव! नहीं। असम्भव ! मैं भिक्षा माँगकर ही जीवन चला लूँगा परन्तु राज्य पाने के लिए अपने गुरुजनों को नहीं मार सकता।
संजय उत्कण्ठा से और निकट आ गए थे।
श्रीकृष्ण सखा के भावुक मन का अन्तर्द्वन्द्व भलीभाँति समझ रहे थे किन्तु वे अधीर मन को साधना भी जानते थे।
“ पार्थ ! भयभीत न हो। मृत्यु से भयभीत न हो। तू बड़ी भ्रान्ति में पड़ा हुआ है। मृत्यु से कैसा भय। मृत्यु है क्या ? जिस प्रकार शरीर को बचपन, यौवन और वृद्धावस्था के परिवर्तन एक के बाद एक भोगने पड़ते हैं उसी प्रकार आत्मा भी पुराने शरीर रूपी वस्त्र उतारकर नए शरीर के वस्त्र धारण कर लेती है। मृत्यु कोई चिन्तनीय विषय नहीं है, पार्थ यह तो आत्मा का चोला बदलना मात्र है। एक शरीर को छोड़कर जब आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है तब उसे हम मृत्यु कहते हैं। मृत्यु को देहान्त भी कहते हैं क्योंकि मृत्यु को देहान्त भी कहते हैं। क्योंकि मृत्यु केवल देह अथवा ऊपरी आवरण अथवा चोला का ही अन्त करती है, आत्मा की नहीं।...................।
नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्तापों न शोषयति मारुतः॥
कुन्तीपुत्र ! इसे न शास्त्र भेद सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न ही इसे वायु सुखा सकती है, न ही इस दुःख, सुख क्लेश आदि प्रभावित कर सकते हैं। अतः तु भलीभाँति समझ ले कि आत्मा अमर और अवध्य है।
तू सोचता है कि अपने पितामह, आचार्य, तथा बान्धवों का वध यदि तु करेगा, तो ही वे मृत्यु को प्राप्त होंगे और यदि तू उनका वध न करेगा तो ये चिरायु हो जाएँगे? कितनी बड़ी भ्रान्ति है तेरी। कितना बड़ भ्रम! भारत! यह स्पष्ट समझ ले, हर मनुष्य अपने कर्मफल के अनुसार मृत्यु वरण करता है। तू किसी की मृत्यु का कारण नहीं । अर्जुन मात्र निमित्त है।.............
अँधेरे मन के भीतर यह कौन-सा अनजाना गवाक्ष सहसा खुल गया है कि भीतर प्रकाश ही प्रकाश भरा जा रहा है। संजय चकित थे। यह कैसी विवेचना जीवन मृत्यु के रहस्य की ! तो जन्म, मृत्यु भाग्य और मनुष्यों के परस्पर सम्बन्धों को कर्म संचालित करता है। दूर-दूर से जुड़ जाते हैं, वह भी कर्म के कारण।
सम्मोहित से संजय और आगे बढ़ आए। बहुत पहले कभी एक बार वृक्ष की शाखा पर बैठे चातक को मेघ की ओर एकटक निहारते देखकर वे कौतुक में पड़ गए थे। स्वाति के बूंद के लिए इतनी पिपासा। चातक चोंच खोले स्वाति की प्रतीक्षा कर रहा था। आज अर्जुन की उसी दशा में संजय देख रहे हैं। अर्जुन कौतूहल से मुख उठाए एकटक श्रीकृष्ण को देख रहे हैं। उनका मुख खुला हुआ था, नेत्र खुले हुए थे। उनका मुख, नेत्र कान, पुरा शरीर और रोम-रोम चातक-सा अमृत पान कर रहा था। गीतामृत की बूँद-बूंद तृषित कंठ में उतार रहा था, आत्मसात कर रहा था।
अर्जुन के हृदय के भीतर जैसे एक और नए हृदय का उदय हो रहा है। उस मोह के राहू से ग्रस्त हृदय के स्थान पर जैसे एक नया उज्ज्वल हृदय शनैः-शनैः जन्म ले रहा है। अंतःस्तल के अन्धकार के पंक में सुप्त पड़े पद्म को पहली बार सूर्य की किरणों ने स्पर्श कर जैसे जगा दिया था। एक पंखुड़ी हौले-हौले खुलने लगी थी।
अर्जुन नहा रहे थे। वर्षा की धारा थी। मन की कलुषता धुली जा रही थी। बही जा रही थी। मन पर जमा हुई घनी काई को ब्रह्म विद्या की धारा छील-छील कर निकाल रही थी। मन परिमार्जित होता जा रहा था। स्फटिक-सा निर्मल निकलता आ रहा था, उज्ज्वल होता जा रहा था। अर्जुन का रोम-रोम भीग रहा था। मन का ताप शीतल हो रहा था। पीड़ा, दुःख, उद्वेलन शीतल पड़ चुके थे। दूर नीले आकाश पार से जैसे विश्व गुरु की गम्भीर वाणी तैरती-सी आ रही थी-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफल हेतुर्भूमा ते संगोस्त्व कर्मणि॥
भारत! कर्म कर किन्तु परिणाम में आसक्ति मत रख। जय-पराजय जैसे कर्मफल से मुक्त होकर अपना कर्तव्य पालन कर। करना है इसलिए कर। कर्म के लिए कर्म कर फल के लिए कर्म नहीं। निर्विकार और निरपेक्ष भाव से कर्म कर। यह मत सोच कि कर्म का कर्ता तू है। स्वयं को कर्म में लिप्त न कर क्योंकि तू करने वाला नहीं है। तू सोचना है कि तू अपनी इच्छा से जो चाहे कर लेगा, तो यह तेरा भ्रम है। जो तू चाहेगा, वह न होगा और जो न चाहेगा, वह हो जाएगा क्योंकि नियामक तू नहीं, तू पूरी शक्ति से चाहकर भी किसी को मार नहीं सकता और न चाहकर भी तू मारेगा। इसलिए अपने मन से अहंकार को निकाल दे कि तू कर्ता है मैं यह करूंगा, मैं वह करूंगा यह सब अहंकार मात्र है, जो भ्रम से उत्पन्न हुआ है। अतः अनासक्त भाव से अपना कर्तव्य पुरा कर परिणाम पर मत जा। फल पर मत जा।
पार्थ! यदि तू ईश्वर की उपासना करना चाहता है तो अपने कर्मों के द्वारा ही उपासना कर। कर्म ही तेरे लिए पत्र-पुष्प हैं, कर्म ही फल व दूग्ध हैं अतः समर्पित कर दे अपने समस्त कर्म ईश्वर को जल में रहकर भी जैसे कमल पत्र जल से ऊपर रहता है, उसी प्रकार कर्म करते हुए भी तू कमल पत्र की भाँति कर्म से ऊपर उठा रह।........
अर्जुन को लग रहा था पृथ्वी, पर्वतों और सरोवरों से वे ऊपर उठे जा रहे हैं, उनका मानस जैसे किसी हंस पर बैठे मोह के मेघों को चीरता, मानवीय सम्बन्धों को भेदता हुआ ऊपर उड़ा जा रहा था। नचिकेता ने जो रहस्य यम से पूछा था, अर्जुन के मानस के समक्ष वे रहस्य स्वयं खुले जा रहे थे जन्म, कर्म, भ्रम, मर्म, धर्म सबको छिन्न-भिन्न करते हुए सबके मध्य वे किसी अद्भुत आलोक लोक में विचर रहे थे।
संजय बाबले से कभी पार्थ के शिष्यवत् जुड़े हाथ देखते, तो कभी अपने छलछलाते नेत्रों को पोछते। हृदय स्पन्दन बढ़ता जा रहा था।
उधर अर्जुन की स्वाभाविक एकाग्रता आज अपने चरमबिन्दु पर पहुँच चुकी थी। उन्हें कुछ नहीं दिख रहा था। न गुरुजन, न कुरुजन, न युद्ध, न योद्धा। न मित्र, न शत्रु। न महारथी, न अतिरथी। न कुरुक्षेत्र, न धर्मक्षेत्र।
उन्हें दिख रहा था केवल अपनी नील सारथी। जिसने हृदय और मन की बागडोर सम्हाल ली थी। विष्णु आकाश-सा विराट सारथी। सर्वव्यापी विराट पुरुष जिसमें उन्हें दिख रही थी समूची सृष्टि, पृथ्वी, नक्षत्र मण्डल असंख्य प्राणी।
अर्जुन को कुछ सुनायी नहीं दे रहा था। न चिंघाड़ें, न हुँकारें, न टंकारें। उनके कानों में था केवल अनहद-नाद-सा एक स्वर हिरण्यगर्भ की अतल गहराई से उठकर गूँजता हुआ एक घोर गम्भीर स्वर।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्य वृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह, प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वाँ न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यषो लभस्व जित्वा शत्रून्भुडक्ष्व राज्यं समृद्धम्।
भयैवैते निहिताः पूर्वमेव निमित्त मात्रं भवसव्यसाचिन्॥
मैं ही महाकाल हूँ अर्जुन? आज मैं असुरता, अनीति, दुष्प्रवृत्तियों के लोकों को नष्ट करने के लिए उठ खड़ा हुआ हूँ। जो आज दिखाई देता है, वह कल न रहेगा। इसलिए तू उठ खड़ा हो । समय को पहचान और यशस्वी बन।
अर्जुन अमृत वर्षा से आचूड़ भीगे हुए थे। धुँध छट रहा था। ज्ञान के प्रखर ताप से मन की मलीनता पिघल-पिघलकर गल-गल कर बही जा रही थी। परिताप बहा जा रहा था। फफूँद नष्ट हो गयी थी। मन शुद्ध सोने-सा निखर पड़ा था।
महाकाल के स्वर कुरुक्षेत्र में गूँज रहे थे-
भारत! मोह, ममता, संकोच सब त्याग दे। यदि त्याग न सके तो अपनी ये दोष-दुर्बलताएँ मुझे सौंप दे। अपने समस्त कर्मों को मुझे समर्पित करके तू निश्चिंत हो जा। तेरे कर्म का दायित्व मैं अपने ऊपर लेता हूँ। सब कुछ मुझ पर छोड़ कर तू मेरी शरण में आ जा। मेरे कहे के अनुसार कर्म कर क्योंकि तेरे मोक्ष का एकमात्र मार्ग वही है।
भारत! युगधर्म के रूप में आज तेरे उज्ज्वल भविष्य का द्वार खुला हुआ है। भाग्यवान मनुष्य ही ऐसा स्वर्ण अवसर पाते हैं और तू स्वर्ग द्वार पर पहुँचकर भी पलायन करके नरक भागना चाहता है, सौभाग्यशाली वीर! उठ खड़ा हो, क्योंकि आज आत्मिक उन्नति भी तेरी मुट्ठी में है, और भौतिक प्रगति भी तरी मुट्ठी में है, कीर्ति भी तेरी मुट्ठी में है। उठा ले लाभ इस पवित्र अवसर का। उठ जा। खड़ा हो जा। गाँडीव धारण कर। युद्ध कर।
संजय के नेत्र फिर छलछला आये थे। दृष्टि धुँधला गई थी। कुछ देख पाना कठिन हो गया था। बार-बार नेत्र पोछते, बार बार अश्रु उमड़ आते। बड़ी कठिनाई से नेत्र पोंछकर उन्होंने देखने का प्रयास किया।
पर जो कुछ देखा उससे तो व चकित रह गए अर्जुन कर्मपथ पर दृढ़ चरणों से शिला के समान खड़े हो चुके थे। नेत्रों में ज्वाला थी । हाथों में गाण्डीव और गाण्डीव में टंकार। उनके अधरों से एक दृढ़ स्वर निकाला “करिष्ये वचनं तव” साथ ही देवदत्त शंख का ऋषभ स्वर-जिसे सुनकर असुरता व अनीति की सेना में कंपकंपी की लहर दौड़ गई।
शक्ति मन्दिरों की घण्टियों की आवाज मेरे कानों में सुनायी पड़ रही है। यहाँ से उफनता शक्ति प्रवाह मनुष्य की दिशा और दशा को बदलकर रख देगा। भारत को केन्द्र बनाकर यह शक्ति प्रवाह समूचे विश्व का कायाकल्प करेगा। स्वामी विवेकानन्द का यह भविष्य कथन, उस समय साकार होने लगा, जब परम पू. गुरुदेव ने सन् 1979 के बसन्त पर्व पर शाँतिकुँज में 24 शक्तिपीठों के निर्माण की घोषणा की । सुनने वाले हतप्रभ थे, क्योंकि इससे पहले न तो उन्होंने ऐसी कोई चर्चा की थी और न ही कोई संकेत दिया था। यही नहीं कुछ वर्षों पहले जब एक कार्यकर्त्ता ने टाटानगर में गायत्री मन्दिर बनाने की चर्चा चलाई थी, तो उसे डाँटकर चुप कर दिया गया था।
सभी की हैरानी, उत्सुकता, जिज्ञासा का जवाब उन्होंने इन शब्दों में दिया- “यह संकल्प महाकाल का है। यह एक दैवी योजना है जिसे पूरा करने का दायित्व इसी बसंत पर्व पर शाँतिकुँज को सौंपा गया है। बसन्त पर्व पर युग सृजन की महाशक्ति के हर वर्ष नए निर्देश उतरते हैं। युग निर्माण मिशन की गतिविधियों की अद्यावधि सूत्र-संचालन इसी क्रम से होता चला आया है। इस बसन्त पर्व पर गायत्री शक्तिपीठों की प्रेरणा उभरी हैं। महाकाल के संकल्प कभी अधूरे नहीं रहे। इस संदेश के अपूर्ण रहने की कोई आशंका नहीं । मनुष्य तुच्छ है, उसके साधन भी सीमित है। इसलिए उसके निजी प्रयासों में परिस्थिति के अनुरूप कुछ सफल, कुछ असफल होते रहते हैं। किन्तु दैवी संकल्प के बारे में ऐसी कोई बात नहीं। सर्वसमर्थ सत्ता अपने प्रयोजन पूरे तो उसी मनुष्य शरीर से कराती है, पर वस्तुतः उसको सँभालने, साधन जुटाने और सफल बनाने का उत्तरदायित्व वह स्वयं ही सम्भालती है। श्रेय उन सौभाग्यशालियों को अनायास ही मिल जाता है। जो ऐसे महान प्रसंगों में प्रभु कृपा के निमित्त बन जाते हैं। प्रज्ञावतार का आलोक विश्वव्यापी बनाने के लिए गायत्री तीर्थों की स्थापना का अभियान भी ऐसा ही है, जिसे पूरा तो कुछ मनुष्य ही करेंगे, पर उनकी सफलता में अदृश्य शक्ति द्वारा सूत्र-संचालन होने तथा साधन-व्यवस्था का एकत्रीकरण किए जाते रहने के प्रत्यक्ष अनुभव होते रहेंगे।
इस क्रम में गायत्री शक्तिपीठ का प्रथम शिलान्यास ब्रह्मवर्चस के रूप में हुआ है। चौबीस अक्षरों की चौबीस प्रतिमाओं का परिचायक यह धर्म संस्थान अन्तर्राष्ट्रीय गायत्री तीर्थ माना जाएगा। इसी का विस्तार दूसरे चरण में 24 गायत्री तीर्थों की स्थापना के रूप में किए जाने का निर्धारण है। यह 24 स्थापनाएँ भी एक क्रम व्यवस्था मात्र है। इसे विराम, निर्धारण समझा जाय। वस्तुतः उसका विस्तार होगा और वह प्रगति 108 की संख्या को पार करती हुई 240 और 2400 तक जा पहुँचेगी।”
पूज्यवर के उपरोक्त कथन ने स्थिति स्पष्ट कर दी। जिज्ञासा को समाधान मिला। उत्सुकता यह सोचकर शाँत हुई कि ग्वाल-बालों की कमजोर कलाइयों और पोले बाँस की लाठियाँ गोवर्धन उठा सकती हैं, इस पर कौन, किस आधार पर विश्वास करे? इतने पर भी अनहोनी होकर रही, गोवर्धन उठ ही गया। गायत्री शक्तिपीठों की प्रतिष्ठापना का संकल्प महाकाल का है। उसी के प्राण इस अभियान में संलग्न हैं। जब मनुष्यों के प्राणवान संकल्प पूरे हो सकते हैं, तो सृष्टि सन्तुलन का उत्तरदायित्व सम्हालने वाली शक्ति की इच्छा क्यों पूरी न होगी?
गुरुदेव के महत्संकल्प का प्रभाव कुछ ऐसा रहा कि उसी दिन से प्राणवान परिजनों के हृदय में संकल्पों का उफान उठने लगा। देखते-देखते 24 शक्तिपीठों के निर्माण के लिए संकल्प ले लिए गए। निर्माण के लिए संकल्प ले लिए गए। निर्माण के इस प्रथम चरण में संकल्प गुरुदेव, माताजी के सामने ही लिए जाते। वह स्वयं अपने हाथ से संकल्पित परिजन के हाथ में कलावा बाँधते और निर्माण के लिए आशीर्वाद स्वरूप कुछ धन राशि भी प्रदान करते। यह धन राशि छोटी होने पर भी चमत्कारिक रूप से आर्थिक स्त्रोत का काम करती और दुगुना, दस गुना, सौगुना होते-होते अपना इतना विस्तार कर लेती कि इस धन से शक्तिपीठ का भवन निर्माण हो सके।
इस क्रम में जहाँ एक ओर परिजनों के मन में शक्तिपीठों के निर्माण के संकल्प उत्पन्न हो रहे थे, वहीं दूसरी ओर अनुदान देने वाले भावनाशीलों की बाढ़ आ रही थी। आर्थिक रूप से सम्पन्न एवं आर्थिक रूप से विपन्न दोनों के मन में टीस बराबर थी। हर किसी को लगन थी कि वह महाकाल की योजना में क्या और कितना कर सकता है? इतिहास एक बार फिर से बुद्ध और शंकराचार्य के संघारामों और चार धामों के निर्माण की नवीन एवं व्यापक पुनरावृत्ति कर रहा था। बिम्बसार और मान्धाता जैसे श्रीमन्तों के साथ आँवले का दान करने वाली वृद्धा ब्राह्मणी एक-एक करके आगे आने लगे।
अनुदान देने के इस सिलसिले में अनेक बार ऐसे दृश्य देखने को मिलते कि आँखें भर आतीं। ऐसी ही एक घटना गरीब सब्जी बेचने वाली महिला देवकी बाई की है। वह उन्हीं दिनों शिविर में शाँतिकुँज आयी हुई थी। शक्तिपीठों के निर्माण के बारे में जोर-शोर से जो तैयारियाँ हो रही थीं, उसने भी सुन रखी थी। एक दिन दोपहर को वह ऊपर गुरुजी से मिलने आयी। पास खड़े मिलाने वाले कार्यकर्त्ता ने सोचा कि वह अपनी किसी समस्या के बारे में कहने आयी होगी। किन्तु आशा के विपरीत उसने कहना शुरू किया-”गुरुजी। हमें पता चला है कि आप शक्तिपीठ बना रहे हैं। वहाँ गायत्री माता की पूजा होगी, लोगों का जीवन सुधरेगा। मैं बहुत गरीब हूँ, इस नेक काम के लिए मैं ज्यादा कुछ तो नहीं दे सकती। मेरे पास है भी क्या जो दे सकूँ? रोज सब्जी बेचती हूँ, तब घर चलता है। लेकिन मेरे पास चाँदी के कड़े हैं।” कहते हुए उसने अपने हाथों से दोनों कड़े उतार दिए और गुरुदेव के चरणों के पास रखते हुए बोली-बस सम्पत्ति के नाम पर यही मेरे पास है इसे स्वीकार कर लीजिए।
उसका यह कथन सुनकर गुरुदेव की आँखें डबडबा आयीं। देवकी बाई का भी गला रुँधा हुआ था। उसकी भावनाएँ आँखों में छलक उठी थीं। एक पल के लिए पास खड़े लोग भौंचक्के थे। कहाँ तो वे सोच रहे थे कि यह कुछ माँगने आयी होगी पर यह तो देने आयी है। ठीक ही तो है, भगवान के प्रेमी भगवान से माँगते कहाँ हैं? वे तो देते हैं। राजा बलि ने भगवान को दिया शबरी भगवान को देने के लिए बावली थी। जिसके पास जो था वही सौंपा और धन्य हो गए। देवकी बाई भी अपने हृदय की भावनाएँ सौंपने आयी थी। उसके दान को, उन चाँदी के कड़ों को गुरुदेव ने अपने हाथ से उठाकर मस्तक पर लगाया और बोले- यह सबसे बड़ा दान है। हमने सब कुछ पा लिया । बाद में उन चाँदी के कड़ों की फोटो भी उतारी गई। लेकिन इसके पहले ही उनकी अमर स्मृति भक्त और भगवान दोनों के हृदयों में सुरक्षित हो चुकी थी।
भावभरे इन अनुदानों से शक्तिपीठ बनाने का सिलसिला चल निकला। इस अभियान में जुटे संकल्पित परिजनों को उनकी भावनाओं के अनुपात में अदृश्य शक्ति का सहयोग मिलता रहा। इस क्रम में कई ऐसे घटनाक्रम घटे जिससे यह प्रमाणित होता है कि युगांतरीय चेतना का वरदान प्राप्त हो तो फिर साधनहीनता आड़े नहीं आती। गुजरात-जूनागढ़ के गुणवन्त भाई पंड्या जिन्हें ‘पथिक’ उपनाम से भी जाना जाता है, इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
भावुक हृदय के गुणवन्त भाई ने शक्तिपीठ बनाने का संकल्प तो ले लिया, पर निभाएँ कैसे? उन दिनों वह स्कूल में शिक्षक थे। यहाँ से उनको 300-400 रुपये की मासिक आय होती थी। इतनी छोटी-सी रकम में घर का खर्च मुश्किल से चल पाता है, फिर भवन निर्माण की बात भला कैसे सम्भव हो? लेकिन सब कुछ सम्भव है। गुरुदेव की कृपा, उनकी सामर्थ्य पर उन्हें भरपूर भरोसा था। इसी विश्वास के बलबूते वह गिरनार पर्वत पर अम्बाजी के मन्दिर से थोड़ी दूर एक गुफा में उन्होंने अनुष्ठान करते हैं- माँ कोई न कोई मार्ग सुझाएँगी। दिन बीतने लगे-अनुष्ठान का क्रम जारी था- साथ ही अन्तः हृदय में एक अविराम प्रार्थना उठ रही थी। एक दिन उनके पास एक साधु वेषधारी तपस्वी आए। उनके चेहरे की आभा, देह की कान्ति, नेत्रों की ज्योत्सना यह बता रही थी कि वह कोई पहुँचे हुए योगी हैं। बात भी कुछ ऐसी ही थी- उन्होंने अपना परिचय भी इसी रूप में दिया कि वह हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में तपस्या करते हैं। अपने इस परिचय के साथ उन्होंने पथिक जी को आश्वासन दिया कि तुम्हारे गुरु का काम भगवान का काम है। हिमालय की सभी ऋषि सत्ताएँ इसमें सहयोग कर रही हैं। चिन्ता न करो-तुम्हारी शक्तिपीठ बनेगी और भव्य बनेगी।
इस घटना से उन्हें आश्वासन तो मिला। पर अभी तक न तो जमीन थी और न धन। अनुष्ठान पूरा होते-होते उस क्षेत्र में एक फारेस्ट अधिकारी आए, उनके सहयोग से जमीन की व्यवस्था हो गयी। अब धन का प्रबन्ध कैसे हो? अपने घर की सम्पत्ति, श्रद्धालुओं का दान सब कुछ लगाने पर एक छोटा-सा मन्दिर बन गया। लेकिन इस छोटे से भवन के निर्माण में भी उनके ऊपर काफी कर्ज चढ़ गया था। शक्तिपीठ के उद्घाटन के सिलसिले में पू. गुरुदेव स्वयं पधारे। उन्हें गुणवन्त भाई पंड्या की अन्तर्व्यथा पूर्णतया ज्ञात थी। उद्घाटन, प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रणाम का क्रम चला। पूज्यवर लगातार 8 घण्टे बिना वहाँ से हिले-डुले प्रणाम में बैठे रहे। लोग आते, उनके प्रणाम में बैठे रहे। लोग आते, उनके चरणों पर भेंट अपनी श्रद्धानुसार चढ़ा जाते। आठ घण्टे के बाद जब प्रणाम का क्रम रुका, तब गुरुदेव उठे और उन्होंने पथिक जी से कहा-देखो तुम इस धन को ले लो, इतने से तुम्हारा कर्जा उतर जाएगा। चढ़ाई गई रकम अभी तक गिनी नहीं गयी थी। गिनने पर मालुम हुआ, कुल धन दो लाख इक्यावन हजार रुपया है, जबकि उन पर ढाई लाख-यानि दो लाख पचास हजार का कर्जा था। कर्जा चुकने पर भी एक हजार रुपये बच रहे।
उस समय तो यह शक्तिपीठ काफी छोटा था लेकिन भगवान महाकाल की कृपा से सहयोग मिलता रहा, अनुदान आते गए, शक्तिपीठ का कलेवर विस्तार पाता गया। तत्कालीन फारेस्ट मिनिस्टर उनके पास स्वयं आयी और भूमि देने के साथ अन्य उचित सहयोग देने का आश्वासन दिया। आज लगभग 4 एकड़ जमीन में फैले इस शक्तिपीठ की इमारत अत्यन्त भव्य है। भारतवर्ष के सर्वश्रेष्ठ शक्तिपीठ के रूप में इसे जाना जाता है। भवन एवं विस्तार की दृष्टि से ही नहीं क्रिया- कलापों की दृष्टि से भी इसे अनुपमेय कहा जाएगा।
बात जूनागढ़ के ही शक्तिपीठ की नहीं, भारतवर्ष के जिस क्षेत्र में जहाँ भी शक्तिपीठें बनायी गयीं, वहाँ अदृश्य सत्ता का समर्थ संरक्षण एवं सहयोग मिलता रहा। इस सहयोग की कहानियाँ इतनी और ऐसी हैं, जिनका स्मरण युग निर्माण मिशन के कार्यकर्त्ताओं को पुलकित करता रहता है। अतीत के पुनरागमन, वर्तमान के निर्धारण और भविष्य के संयोजन के त्रिविध उद्देश्य पूरे कर सकने में सर्वथा समर्थ गायत्री शक्तिपीठ योजना अपने समय का अनुपम प्रयास है। इसे भागीरथी तप-साधना के साथ जुड़ा हुआ गंगावतरण कह सकते हैं। अभी वह कल्पना के गर्भ में है। इन दिनों उसके द्वारा उत्पन्न होने वाली सम्भावना और प्रतिक्रिया का सुखद अनुमान ही लगाया जा सकता है पर भविष्य में जब व मूर्तरूप में सामने होगी तो प्रतीत होगा कि मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के संदर्भ में जो कहा और किया जा रहा है वह अनर्गल नहीं है।
प्राणवान संकल्प-साधनहीन परिस्थितियों में भी किस प्रकार उगते, बढ़ते और फलते-फूलते हैं? इसके अनेक उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हैं। उस शृंखला में नवयुग के अवतरण को लक्ष्य रख कर किए गए इस प्रयास को अपने समय का दुस्साहस की कहा जाएगा। इसकी उपमा खोजनी हो तो समुद्र पाटने के लिए प्राणपण से सन्नद्ध टिटहरी से अथवा सागर को पाटने में प्रवृत्त गिलहरी से ही दी जा सकती है। सेतुबन्ध बँध जाने जैसे सहज बुद्धि द्वारा असंभव घोषित किए जाने वाले कार्य को सम्भव बनाने के लिए प्राणों की बाजी लगाई थी। साधनहीन क्या कर सकते हैं? इसके लिए उनके लिए इतना ही सम्भव था कि लकड़ी पत्थर जमा करने में श्रम लगाएँ। इतिहास साक्षी है कि काम उतने भर से ही चल गया था। पहाड़ मनुष्यों का भार वहन करते हैं, यह एक तथ्य है पर मनुष्य पहाड़ का भार वहन कर सकते हैं यह विश्वसनीय नहीं हैं। इतने पर भी गुरुवर श्रद्धा-परमात्मा में विश्वास की सामर्थ्य जिन्हें विदित है वे जानते हैं राम काज में लगे रामदूतों के लिए पहाड़ उठना हँसी-खेल हो गया था। शक्तिपीठों के निर्माण में भी इसी कौशल और वर्चस को श्रेय दिया जा सकता है।
इनके निर्माण की शृंखला पूरी होते-होते यह निर्धारित किया गया कि इनमें प्राण-प्रतिष्ठा स्वयं पूज्य गुरुदेव करेंगे। इस निर्धारण में परिजनों में अपूर्ण उल्लास एवं उत्साह का संचार किया। लगभग एक डेढ़ वर्ष इस तरह कार्यक्रमों की शृंखला चलती रही। युगशक्ति की पावनधारा का पुण्य प्रवाह पूज्यवर स्वयं लेकर गए। स्थान-स्थान पर अपने प्रवचनों में इनके मूल्य और महत्व को समझाया। एक जगह उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा-” भगीरथ अपने साथ गंगा की धारा को जहाँ-जहाँ से ले गए, वे सभी स्थान तीर्थ हो गए। हम आप लोगों के लिए युग शक्ति गायत्री का प्रवाह लेकर आए हैं।
“ये स्थान भी तीर्थ हैं। तीर्थ तो श्रद्धा के प्रतीक होते हैं। श्रद्धा वस्तुओं से नहीं उत्कृष्ट व्यक्तित्वों द्वारा संचालित आस्थाओं का संवर्द्धन करने वाले किए गए क्रिया-कलापों द्वारा ही उत्पन्न होती है। महत्व डिब्बी का नहीं उसमें रखी हुई अँगूठी का होता है। बिकता छिलका नहीं धान चावल है। धान तो उसके ऊपर लिपटाभर होता है। मूल्याँकन मनुष्य का किया जाता है। पोशाक तो उसकी शोभा-सज्जा के लिए होती है। सच तो यह है कि पोशाक के बिना भी महानता अपने गौरव को अक्षुण्ण रख सकती है। अच्छा व्यक्तित्व, अच्छा स्वास्थ्य अच्छा आच्छादन का सुयोग मिल सके तब तो कहना ही क्या है। इतने पर भी यह तथ्य अपने स्थान पर अडिग है कि गरिमा उत्कृष्टता सम्पन्न व्यक्तित्व की है। उसी की शोभा-क्षमता बढ़ाने में आवरण का उपयोग होता है।
अच्छा होता तीर्थ कलेवर वर्तमान साधनों का ही उपयोग धर्म-धारणा की पुनर्जीवन प्रक्रिया के लिए हो सका होता। पर उसमें असफलता मिलने की सम्भावना दीखने पर अब यही कदम उठाया गया है कि युग तीर्थों का नवनिर्माण किया जाय, जिससे जनसाधारण को तीर्थों की गरिमा स्वीकार करने और उनसे लाभान्वित होने का पूरा-पूरा अवसर मिल सके। गायत्री तीर्थ निर्माण योजना, गायत्री शक्तिपीठों की स्थापना के पीछे एकमात्र उद्देश्य यही है कि तीर्थ तत्व अपने असली रूप में पुनः जनसाधारण के सामने उपस्थित हो सके और प्राचीनकाल की उस पुण्य परम्परा को क्रियान्वित कर सके, जिससे भारतभूमि को उसके महान पुत्रों की गरिमा को गगनचुम्बी बनाया था। पूज्य गुरुदेव के इस कथन के अनुरूप युगतीर्थों की यह शृंखला अपने अगले चरण में उन क्रिया-कलापों का ऐसा स्वरूप प्रस्तुत करने वाली है, जिसके बलबूते भारतीय संस्कृति अपनी गरिमा समूचे विश्व में प्रतिष्ठित कर सकेगी। यहाँ से उफनता, साँस्कृतिक प्रवाह राह भटकी मानवता को जीवन बोध करा सकेगा।
प्रभो! लगभग पन्द्रह साल हो गए मुझे आपके इस पवित्र वृन्दावन धाम में निवास करते; किन्तु तीर्थ की प्राप्ति मुझे नहीं हुई! मैं तीर्थवासी नहीं बन सका! कोई दूसरा सुनता उनकी इस बात को, तो उनका उपहास किए बिना नहीं रहता। लेकिन फुरसत किसे थी उनकी बात सुनने की। यात्री आते थे-सैकड़ों की तादाद में आते थे और बाँके बिहारी के दर्शन करके वापस लौट जाते। किसे पड़ी थी यह देखने की कि एक सफेद दाढ़ी वाला, गोरा रंग, झुर्रियों भरे चेहरे वाला बूढ़ा पता नहीं कब से बाँके बिहारी के द्वार के एक ओर ऐसे बैठा है, जैसे गिर पड़ा हो और फिर उठने में असमर्थ हो गया हो। उसकी आँखों से झरती बूँदें नीचे के चिकने फर्श को धो रही थीं और उसके हिलते अधरों से जो अस्फुट शब्द निकलते थे, उन्हें या तो वह स्वयं सुनता था या सुनते थे एक साथ उसके हृदय में और उससे पर्याप्त दूर आराध्यपीठ पर विराजमान श्री बाँके बिहारी जी।
आप संसार के स्वामी हैं और मैं आपके ही संसार का एक प्राणी हूँ। आपका हूँ और आपके द्वार पर आ पड़ा हूँ। बार-बार वह रुकता था, हिचकियाँ लेता और फिर-फिर मस्तक उठाकर बड़े कातर नेत्रों से आगे आराध्य पीठ पर स्थिति प्रभु की मूर्ति की ओर देखता था। आप मुझे मुक्त कर देंगे, यह जानता हूँ-मुक्त कहाँ होना चाहता हूँ मैं, मुक्त तो वह भी हो जाता है जिस पर वृन्दावन की पावन रज उड़कर पड़ जाती है। मैं आपके धाम में आया था तीर्थवास करने और वह आपके श्री चरणों में आकर भी मुझे प्राप्त नहीं हुआ।
तुम तीर्थ में ही हो भद्र! महाप्रभु बल्लभाचार्य पधारे थे श्री बाँके बिहारी का दर्शन करने। बल्लभाचार्य का ईश्वर सहचर्य, शास्त्रों का पारदर्शी ज्ञान, उत्कट तपश्चर्या लोकविख्यात थी। उनमें जो विवेक, वैराग्य, आत्मनिष्ठा तथा अनुभव सिद्ध ज्ञान का अद्भुत तेज था, वृद्ध ने अवकाश नहीं पाया उठने का। उसने घूमकर महाप्रभु के चरणों पर मस्तक रख दिया और उसके नेत्र जल से आचार्य के श्रीचरण प्रक्षालित हो गए।
देव! इस वृन्दावन धाम की भुवन पावनता में मुझे कोई सन्देह नहीं है। कुछ क्षण में वृद्ध ने आश्वस्त होकर दोनों हाथ जोड़ लिए। किन्तु मैं इतना अधम हूँ कि पन्द्रह सालों से यहाँ रहने पर भी श्री जगदीश्वर की कृपा का अनुभव नहीं कर सका। तीर्थवास मुझे अब भी प्राप्त नहीं हुआ।
यह तीर्थ में है, वृन्दावन धाम की पावनता में विश्वास रखता है, फिर ? महाप्रभु के पीछे जो अनुमत वर्ग, किन्तु उनमें से कइयों के मन में यह प्रश्न उठा।
“ भावुकता के आधिक्य ने मस्तिष्क को कुछ अव्यवस्थित कर दिया हैं।” एक युवक ने जिनके शरीर पर वैष्णवों के वस्त्र थे और सम्भवतः अभी अध्ययन करते होंगे अपने साथ के अन्तेवासी से धीरे से कहा।
भद्र! मैं श्री बाँके बिहारी के दर्शन करके शीघ्र लौट रहा हूँ। महाप्रभु ने किसी की ओर ध्यान नहीं दिया। लगता था कि आज वे इस वृद्ध पर कृपा करने ही मन्दिर पधारे हैं। वृद्ध के कन्धे पर उनका करुण कर कमल रखा था। “तुम मेरे साथ आज बैठक चलोगे।”
आचार्य चरण उत्तर की अपेक्षा किए बिना आगे बढ़ गये। वृद्ध स्थिर नेत्रों से उनके आगे बढ़ते चरणों की ओर देखता खड़ा रहा।
खड़े-खड़े न जाने कब उसका मन अतीत के स्मरण में भीगने लगा। “मैं पिता का कर्तव्य पूरा कर चुका, अब तुम लोगों को पुत्र का कर्तव्य पूरा करना चाहिए।” ठाकुर जोरावरसिंह आदर्श पिता रहे हैं, आदर्श जागीरदार हैं और आदर्श क्षत्रिय हैं। पुत्रों को उन्होंने शिक्षा दी, केवल पुस्तकों की ही नहीं, व्यवहार का भी विद्वान बनाया और अपनी नैतिक दृढ़ता उनमें लाने में सफल हुए। पुत्र अब युवक हो गए हैं। दोनों पुत्रों का विवाह हो चुका है और जागीरदारी उन्होंने सम्हाल ली है। प्रजा के लिए यदि जोरावरसिंह सदा स्नेहमय पिता रहे हैं तो उनके पुत्र सगे भाई हैं। परन्तु अब जोरावरसिंह वृन्दावन जाकर तीर्थवास करना चाहते हैं। उन्होंने निश्चय कर लिया और उनका निश्चय जीवन में कभी परिवर्तित हुआ हो तब तो आज हो। पुत्रों, पुत्र वधुओं और प्रजा के सैकड़ों, हजारों लोगों को जो व्यथा आज हो रही है- उनका यह देवता जैसा पिता क्या सचमुच इतना निष्ठुर है कि उनको छोड़कर चला ही जाएगा?
“पिता को पुत्रों का तब तक रक्षण, शिक्षण और पालन करना चाहिए जब तक पुत्र स्वयं समर्थ न हो जाएँ और पुत्रों को समर्थ हो जाने पर पिता को अवकाश दे देना चाहिए कि वह भगवान की सेवा में लगे।” जोरावरसिंह स्थित स्वर में कहे जा रहे थे- “मैं अपना कर्तव्य कर चुका, जो तुम्हारे प्रति। अब मुझे परम पिता के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करने दो।”
“आप यहाँ रहकर भजन करें तो...............” पुत्र अपने पिता को जानते थे, वे साहस नहीं कर सकते थे यह बात कहने का ।एक प्रजाजन ने एक युवक ने किया था यह प्रस्ताव। यद्यपि सभी के हृदय यही प्रस्ताव करना चाहते थे, किन्तु वाणी अवरुद्ध हो रही थी।
“तुम बच्चे हो, जोरावरसिंह उस युवक की ओर देखकर हँस पड़े वृन्दावनधाम-लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के पावन धाम की महिमा समझ नहीं पाते हो तुम और यह भी नहीं समझ पाते कि यहाँ रहने के लिए जितनी शक्ति चाहिए, हृदय में, वहाँ इस क्षुद्र प्राणी में नहीं है। मैं बृजधाम के अधीश्वर के श्रीचरणों में गिर जाना चाहता हूँ।”
बात बहुत बढ़ाने जैसा है नहीं। प्रजाजनों को, परिजनों को, पुत्रों को दुःख तो होना था ही; किन्तु जोरावरसिंह अपने निश्चय पर दृढ़ रहे। वे घर छोड़कर वृन्दावन आ गए। अवश्य ही उन्होंने पुत्रों का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया था। कि शरीर निर्वाह व्यय वे पुत्रों से ले लिया करेंगे और वृन्दावन में उनके निवास के लिए यमुना जी की ओर बस्ती से दूर एक छोटी कुटिया भी उनके पुत्रों ने ही बनवा दी थी। बहुत अनुरोध करने पर भी कोई सेवक साथ में उन्होंने नहीं लिया।
प्रातः यमुना स्नान करके जोरावरसिंह श्री बाँके बिहारी के मन्दिर चले जाते थे और रात्रि में प्रभु के शयन होने तक वहीं रहते थे। लौटते समय निश्चित पुजारी उन्हें महाप्रसाद दे देता था और इसके लिए उसे जोरावरसिंह के पुत्र मासिक दक्षिणा दे दिया करते थे। कुटिया पर लौटकर भगवत्प्रसाद लेते थे जोरावरसिंह।
भगवद् धाम में निवास, भगवन्नाम का जप, केवल एक बार भगवत्प्रसाद ग्रहण-किसी दूसरे से कुछ बोलने का कदाचित् ही अवकाश मिलता था जोरावरसिंह को। परन्तु वे बोलते पर्याप्त थे, जप के सिवा वे बोलते ही तो रहते थे, यही कहना ठीक होगा। बोलते थे, प्रायः बोलते रहते थे- मन्दिर के द्वार के पास बैठे-बैठे। रोते थे और बोलते थे-प्रार्थना करते थे, उलाहना देते थे, अनुरोध करते थे.. परन्तु उनका यह सब केवल श्री बाँके बिहारी के प्रति था।
“तुम कृपण हो गए हो! मुझ एक प्राणी को तीर्थवास देने में तुम्हारा क्या बिगड़ा जाता है? मेरे लिए ही तुम इतने कठोर क्यों हो गए?” पता नहीं क्या-क्या कहते रहते थे जोरावरसिंह। लेकिन उनका विषय एक ही था- तीर्थवास चाहिए उन्हें।
जो दूसरों को अपने सान्निध्य मात्र से पावन कर दे वह तीर्थ। जोरावरसिंह की यह परिभाषा उनकी अपनी नहीं है। तीर्थ की यह परिभाषा तो सभी शास्त्र करते है; किन्तु जोरावरसिंह की मान्यता है कि जब तक हृदय में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार आदि का लेश भी हैं, तीर्थ में रहकर भी तीर्थ की प्राप्ति नहीं हुई। यह जोरावरसिंह की परिभाषा है आप इसे मान ही ले ऐसा मेरा आग्रह नहीं । किन्तु वह गलत भी तो नहीं कहता। देवता हुए बिना देवता नहीं मिलता। तीर्थस्वरूप बने बिना तीर्थ की प्राप्ति नहीं होती। केवल शरीर तीर्थ में चला गया या रहा, यह तीर्थवास नहीं है। तीर्थस्वरूप श्री बाँके बिहारी के श्रीचरण हृदय में प्रकट हो जाएँ तो तीर्थवास प्राप्त हुआ।
एक अड़ियल भक्त ने एक भारी- भरकम परिभाषा बना ली और वह उस पर अड़ा है। श्री बाँके बिहारी जी तो है ही ऐसे कि उनके साथ उलटी-सीधी सबकी सभी हठ निभ जाती है। किन्तु महाप्रभु श्री बल्लभाचार्य इस बूढ़े क्षत्रिय को अपनी चौकी के पास इतने आदर से बैठाकर उसकी बातें इतनी एकाग्रता से सुन रहे हैं। यह क्या कम आश्चर्य की बात है।
“ठाकुर, तुमसे काम, क्रोध मोह आदि कोई दोष है कहाँ है?” एक बार समस्त विद्वत्वर्ग चौका। उनके सम्मुख जो यह पागल-सा बूढ़ा बैठा है, वह वासनाशून्य, क्षीण कल्मष है? महाप्रभु तो कह रहे थे- “तुम तीर्थ में हो कब से तीर्थवासी हो?”
“मुझे भूला नहीं कि मैं क्षत्रिय हूँ, मैं जागीरदार हूँ। कोई अपमान करे तो कदाचित् मैं सहन नहीं कर सकूँगा और मेरे हृदय में श्री बाँके बिहारी जी के दिव्य चरण.........।”
“नित्य विराजमान हैं वे दिव्यचरण तुम्हारी हृदय में। यह दूसरी बात है कि उनकी उपलब्धि पिपासा को बढ़ाती रहती है।” आचार्य श्री वात्सल्यपूर्ण स्वर में कह रहे थे- जोरावरसिंह संयम, सदाचार, तितीक्षा, इन्द्रिय एवं मन का दमन तथा सतत् भगवत्स्मरण जिसमें है, उसी ने तीर्थ पाया है। उसी का तीर्थवास सच्चा तीर्थवास है। महाप्रभु के मुख से निकली वाणी को सभी उपस्थित जन ध्यान से सुन रहे थे-युगावतार की लीलाभूमि, देवताओं की तपस्थली में रहने मात्र से मन, प्राण, चेतना आलोकमय लोक में जा पहुँचते हैं। तुम धन्य हो कि तुमने यहाँ रहने का संकल्प लिया। लेकिन रहते तो सभी हैं पर शरीर से। तुम विचारों और भावनाओं से, समूचे अन्तःकरण से तीर्थ चेतना में डूबने का प्रयास कर रहे हो, इसीलिए तुम तीर्थवास कर रहे हो। तुम तीर्थ में हो और तीर्थ तुममें है। तुम्हारा दर्शन दूसरों को पवित्र करता है।
देव ! प्रभो! वृद्ध जैसे हाहाकार कर उठा! असह्य हो गया उसके लिए अपनी प्रशंसा को सुनना।
श्री बाँके बिहारी जी तुम्हारे हैं न? महाप्रभु ने प्रसंग मोड़ लिया। नहीं क्यों होंगे। जोरावरसिंह के स्वर में क्षत्रिय का ओज आया। वे संसार के स्वामी हैं और मैं उनके ही संसार का का हूँ वे तो मेरे हैं ही।
वे तुम्हारे हैं- इसीलिए तुम्हें तीर्थ नित्य प्राप्त है। महाप्रभु की व्याख्या जोरावरसिंह से भी अद्भुत थी-”भगवद् विश्वास है तो तीर्थ नित्य प्राप्त है और भावनाएँ तीर्थ चेतना में नहा न सकें, मन वहाँ के अधिष्ठातृ देव के स्मरण में भीग न सके तो प्राप्त तीर्थ भी अप्राप्य ही है।”
युग सन्धि के क्षण बड़े रोमाँचकारी होते हैं। पुरातन के ध्वंस में तेजी आने के साथ ही नवीन का अंकुरण होता है। वर्ष 1980 से ऐसी ही युग परिवर्तन बेला शुरू हुई। पू. गुरुदेव ने 1980 से 2000 इस बीस वर्षों को युग-सन्धि काल घोषित किया। बीस सालों के इस काल खण्ड को चार भागों में बाँटते हुए उन्होंने कहा- “ये पाँच-पाँच साल की पंचवर्षीय योजनाएँ महाकाल ने बनायी हैं। सरकारें अपनी स्थिति के अनुरूप किसी छोटे से भू-भाग के लिए पाँच साल के कार्यक्रम बनाती हैं। भगवान ने किसी देश विशेष के लिए नहीं सारी धरती के लिए ये पंचवर्षीय योजनाएँ बनायी हैं। एक के बाद दूसरी योजना में उथल-पुथल का जोर बढ़ता जाएगा। अन्तिम में तो जैसे क्रान्तियों की बाढ़ आ जाएगी।”
उनकी इन योजनाओं की शुरुआत के साथ ही शाँतिकुँज के एक अध्याय का पटाक्षेप हो गया। सन् 1979 में शक्तिपीठों के निर्माण के साथ ही शाँतिकुँज का परिसर विस्तार पा चुका था। गायत्री नगर का निर्माण कार्य पूरा होते-होते विचार क्रान्ति के युगान्तरकारी महायज्ञ में आत्माहुति करने वाले जीवनदानी सैकड़ों की संख्या में यहाँ आ पहुँचे। यह उस आह्वान का उत्तर था जो युग देवता ने वर्ष 1982 के एक लेख ‘भलाई को तैर कर ऊपर आने का आमंत्रण’ में किया था। अब तक शक्तिपीठों के उद्घाटन कार्यक्रम प्रायः समाप्त हो चुके थे। शाँतिकुँज में चान्द्रायण कल्प साधना सत्रों की शृंखला चल रही थी।
इन वर्षों में समूचा विश्व-”विश्वयुद्ध के भय से आक्रान्त हो रहा था। सुप्रसिद्ध ज्योतिषी, भविष्यवक्ता, विख्यात मनीषी विनाशकारी विश्वयुद्ध की अटकलें लगा रहे थे। भयावह अटकलों एवं इनके परिणामों को बताने में वैज्ञानिक समुदाय भी पीछे न था। परमाणु-क्षमता-सम्पन्न देश रोज नए विनाशकारी कार्यक्रमों की घोषणा करते। जिन्हें सुनकर मानवी-सभ्यता काँप-काँप उठती। सूक्ष्म जगत में आसुरी उन्माद की हलचलें उग्र और प्रचण्ड हो चली थीं। परम पू. गुरुदेव इन्हें निरस्त करने के लिए अपने स्वाभाविक तप में संलग्न थे।
तभी एक दिन जनवरी 1984 को आसुरी उन्माद से ग्रस्त एक युवक ने उन पर प्राणघातक हमला किया। यह हमला किसी एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर नहीं, बल्कि किसी प्रचण्ड आसुरी शक्ति का देवसेना के महानायक पर आक्रमण था। जो इस बात को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त था कि असुरता ने सीधे नवनिर्माण के किले पर धावा बोल दिया हैं। गुरुदेव को तथ्य समझने में देर न लगी। उन्हें अब स्पष्ट हो गया कि स्वाभाविक तप से काम चलने वाला नहीं हैं। इस समय विश्वामित्र, अगस्त्य की प्रचण्ड शक्ति, दधीचि के वज्र के बिना काम चलने वाला नहीं है।
और मार्च 1984 को राम-नवमी के दिन से उन्होंने सूक्ष्मीकरण साधना की घोषणा कर दी। इसके पीछे निहित उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा-” सूक्ष्मीकरण का अपना नया कदम लोकमंगल और उच्च उद्देश्य की पूर्ति के लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण है। समय की विपन्नता दिन-दिन बढ़ती जा रही हैं, इसमें सन्देह नहीं। दृश्यमान और अदृश्य क्षेत्रों में सर्वनाशी विभीषिकाएँ जिस क्रम से गहरा रही हैं, उसे देखते हुए कभी भी ऐसा अनिष्ट हो सकता है जिसके कारण पृथ्वी को ऐसे चूरे में बदलना पड़े जैसा कि मंगल और बृहस्पति के बीच निरन्तर एक अन्धड़ की तरह घूमता रहता है। अणु-आयुधों की, रासायनिक शस्त्रों की, घातक किरणों की संख्या एवं विचित्रता इतनी बढ़ गयी है कि उनके द्वारा बिना आमने-सामने का युद्ध छिड़े भी ऐसा हो सकता है कि रात को अच्छे-खासे सोये हुए आदमी मृतक या अर्द्धमृतक जैसी स्थिति में मिलें। महायुद्ध के अलावा वायुप्रदूषण, विकिरण, जनसंख्या विस्फोट, खनिज सम्पदा का समापन, पृथ्वी की उर्वरता का घटना, वृक्ष कटना, पशुओं का मिटना जैसे अनेक ऐसे कारण विद्यमान जो शीतयुद्ध बनकर वही काम कर रहे हैं जो शहतीर में लगने वाला घुन धीरे-धीरे किन्तु निश्चित रूप से करता है।
इस अंधकार भरी निविड़ निशा में प्रभात की आशा की किरण यदि जीवित है तो एक ही है कि अदृश्य जगत से कोई सृजन प्रवाह उमगे और वर्षा के बादलों की तरह तपते धरातल को शीतलता और हरीतिमा से भर दे। ऐसे अवसरों पर दैवी चमत्कार ही काम करते हैं। हेमन्त में जब शीत की अधिकता से जंगलों के जंगल पत्ते रहित होकर ठूँठ बन जाते हैं। पाले के दबाव से जब पौधे मुरझाये और मृतक जैसे दिखते हैं, तब बसन्त का मौसम ही उत्साहवर्द्धक परिवर्तन का माहौल बनाता है। यह कार्य कोई संस्था या संगठन करना चाहे तो कठिन है। पतझड़ ग्रस्त पेड़-पौधों को पुष्प-पल्लवों से लादने में इनसानी कोशिशें कहाँ तक सफल हो सकती हैं। सूखी जमीन को हरा-भरा बनाने में सिंचाई के प्रयत्न कितने क्षेत्र में सफल हो सकते हैं, इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। वर्षा और बसन्त ही हैं जो हरीतिमा उगाने और उसे फलने-फूलने की स्थिति तक पहुँचाने की जिम्मेदारी उठा सकते हैं। “वर्तमान में सम्पन्न की जा रही सूक्ष्मीकरण साधना के परिणाम अगले समय में वर्षा एवं बसन्त जैसे ही देखे जा सकेंगे।”
इस प्रचण्ड साधना के दिनों में पूज्य गुरुदेव ने मिलने-जुलने का क्रम एकदम बन्द कर दिया। बाहर से आने-जाने वाले ही नहीं शाँतिकुँज में रहने वाले कार्यकर्त्ता भी उनसे इन दिनों नहीं मिल सकते थे। उनके साधनामय जीवन की एक-मात्र सहयोगिनी वन्दनीया माताजी उनके पास रहती थीं। लेखन सम्बन्धी कार्यों में सहयोग के लिए दिन में कुछ समय इस पत्रिका के वर्तमान सम्पादक का भी उनके पास रहना होता था। उन दिनों उनकी दिनचर्या हर-हमेशा की अपेक्षा कुछ अधिक ही अनुशासित हो गयी थी। दिन की स्थूल गतिविधियों में लेख नहीं दिखाई देता था। भोजन का क्रम प्रायः न के बराबर ही था। माताजी के आग्रह पर यदा-कदा वे बहुत थोड़ा-सा खा लेते थे। एक बार उनके कई दिन न खाने से चिन्तित इस सम्पादक ने उनसे खाने के लिए निवेदन किया तो उन्होंने सूर्य की ओर इशारा करते हुए कहा-”मेरा भोजन वहाँ से आ जाता है। तुम चिन्ता न करो।”
अपनी दिनचर्या में वे इन दिनों वाणी का उपयोग प्रायः न के बराबर ही करते। दिनचर्या की इस विशेषता के साथ उनका साधना कक्ष भी इन दिनों विशेष बन गया था। इसे स्पष्ट करते हुए उनके शब्द हैं-”जिस आवास-स्थली में, कोठरी में रहा जा रहा है, जहाँ तक एक दो का ही प्रवेश वाँछित समझा गया है, उसे अभिमंत्रित-कीलित किया गया है। इसमें जो प्रयोग चल रहे हैं वे अद्भुत हैं। कुछ ऐसे हैं, जो रात्रि को करने पड़ते हैं। कुछ दिन में करने के हैं। कुछ मंत्र ऐसे हैं जिनमें तनिक भी एक शब्द की भी भूल हो जाने पर उच्चारण तन्त्र ही उलट-पलट सकता है। इसलिए प्रयोग चलाते समय क्षण-क्षण में यह देखभाल करनी पड़ती है कि शरीर और मस्तिष्क का सन्तुलन ठीक रह रहा है या नहीं। बिगड़ता है तो उसे हाथों-हाथ सुधारना पड़ता है।”
लगातार तीन वर्षों तक चलने वाला यह विलक्षण प्रयोग असाधारण रूप से सफल रहा। असाधारण प्रक्रिया की ही भाँति उसके परिणाम भी असाधारण रहे । इस तपश्चर्या की पहली उपलब्धि थी-पाँच वीरभद्रों का उत्पादन । ये पाँच वीरभद्र क्या करेंगे, उसके बारे में उनके शब्द हैं-”सूक्ष्मीकरण के महाप्रयोग से उत्पन्न एक वीरभद्र विचार संशोधन में लगेगा। सूक्ष्मीकरण से उत्पन्न दूसरे वीरभद्र के लिए यही काम सौंपा गया है कि नवनिर्माण के लिए जितने प्रचुर साधनों की आवश्यकता है, उन्हें कहीं से भी, किसी भी कीमत पर जुटाया जाना चाहिए। इतने साधन जो जुटा सके, सो कितना समर्थ होगा यह अनुमान लगाने में किसी को चूक नहीं करनी चाहिए। तीसरा वीरभद्र दुरात्माओं के लिए भय का वातावरण उत्पन्न करेगा। सूक्ष्मीकरण से उत्पन्न चौथे वीरभद्र को प्रस्तुत एवं भावी प्रज्ञा-परिजनों को अधिक समर्थ बनाने के लिए सुरक्षित छोड़ दिया गया है। सूक्ष्मीकरण से उत्पन्न चार वीरभद्रों को असाधारण काम सौंपे गए हैं, उनके लिए खुराक कहाँ से आए? इसके लिए निर्मित एक पाँचवाँ वीरभद्र विशुद्ध तपश्चर्या में ही निरत रहेगा।
इस महान साधना के दिनों में एक और महान प्रयोग सम्पन्न हुआ- विश्व कुण्डलिनी का जागरण- यह जागरण पुरातन काल में विश्वामित्र के द्वारा सम्पन्न हुआ था, उस बार भी विश्व-वसुधा का कायाकल्प हुआ था इस बार भी वैसा ही होने जा रहा है। इसके प्रभाव और परिणामों को बताते हुए उन्होंने जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में लिखा-महाप्रज्ञा की जो इन तीन वर्षों में कुण्डलिनी जाग्रत हुई है, उसकी ऊर्जा का उदय प्रथम इस देश में होगा। पीछे क्रमशः वह समस्त विश्व में फैलता जाएगा। उसके प्रभाव से होता हुआ परिवर्तन विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न रूपों में दृष्टिगोचर होगा। यह सम्भावना नहीं, सुनिश्चितता है।
इस तीन वर्षीय साधना का एक और आश्चर्यकारी परिणाम हुआ-ब्रह्मांड के आनंदमय कोष का जागरण। ब्रह्मांड के प्रथम कोष अन्नमय कोष के रूप में वनस्पतियों में चेतना होते हुए भी हलचल नहीं होती। प्राणियों में चेतना है, हलचल भी। प्राणविद्युत का स्थूल नियोजन भर पाने वाले इन जीवों को ब्रह्मांड का प्राणमय कोष माना गया। मानसिक क्षमता सम्पन्न मनुष्य ब्रह्मांड का मनोमय कोष है। महर्षि अरविन्द ने अपनी तप-साधना से ब्रह्मांड के विज्ञानमय कोष को जाग्रत किया। जिसके जागरण से बौद्धिक क्षमताओं से सम्पन्न मानव देव मानव बनने लायक हो सकेगा। गुरुदेव ने महर्षि के अधूरे कार्य को पूरा करते हुए इन्हीं दिनों ब्रह्मांड के आनन्दमय कोष का जागरण मनुष्य में दैवी भावनाओं-सम्वेदनाओं की सृष्टि करने वाला होगा।
तीन वर्षीय सूक्ष्मीकरण साधना की इन विलक्षण परिणतियों के आधार पर ही उन्होंने घोषित किया-सघन तमिस्रा चिरस्थाई लगती हो, वे अपने ढंग से सोचे, पर हमारा दिव्य दर्शन उज्ज्वल भविष्य की झाँकी करता है। इस पुण्य-प्रयास में सृजन की पक्षधर देवशक्तियां प्राण-पण से जुट गयी हैं। इसी सृजन प्रयास के अकिंचन घटक के रूप में हमें भी कुछ कारगर अनुदान प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है। इस सुयोग, सौभाग्य पर हमें अतीव सन्तोश है और असाधारण आनन्द।”
पू. गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना के समय शांतिकुंज में एक-मासीय और नौ दिवसीय साधना सत्रों का क्रम अनवरत चलता रहा। सूक्ष्मीकरण साधना की पूर्णाहुति देशव्यापी 108 कुण्डीय-महायज्ञों राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों के रूप में की जाने लगी। इन महायज्ञों की घोषणा पूज्यवर ने अपनी विशेष साधना में विराम के अवसर पर की।
बसन्त 1986 को वे अपने एकान्त कक्ष के बाहर आए। यहाँ रहने वाले कार्यकर्ता, क्षेत्रों में क्रियाशील परिजन सभी अपने मार्गदर्शक, संरक्षक को स्थूल रूप में देखकर प्रसन्न थे। इसी अवसर पर उन्होंने प्रवचन मंच में अपनी तप साधना, भावी कार्यक्रम, परिजनों की उसमें भागीदारी के बारे में बताया। सूक्ष्मीकरण साधना के बाद यह पूज्यवर का प्रथम प्रवचन था। द्वितीय एवं अन्तिम प्रवचन इसी वर्श गुरु पूर्णिमा को हुआ। अपने इस प्रवचन में उन्होंने कहा-”युग निर्माण हमने करके रख दिया है। तुम लोगों को सिर्फ श्रेय लेना है। इस कथन के साथ ही उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का सार बताते हुए कहा- करिष्ये वचनं तव, जब वीरवर अर्जुन ने भगवान कृष्ण से वाक्य कहा तो पार्थ सारथी के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। उन्हें लगा कि उनके उपदेशों को कुन्ती पुत्र ने आत्मसात् कर लिया है। मैं तुमसे भी यही सुनने की आशा करता हूँ। तुमसे “करिष्ये वचनं तव’ सुनकर मुझे भी सन्तोश मिलेगा। लगेगा तुमने मेरी बात समझ ली।”
इस प्रवचन के बाद परम पू. गुरुदेव ने फिर कभी प्रवचन मंच पर आकर प्रवचन नहीं दिए। बाद के दिनों में अपने कक्ष में बैठकर ही परिजनों का मार्गदर्शन करते रहे। यह मार्गदर्शन ही शांतिकुंज के क्रियाकलापों की ऊर्जा का स्त्रोत रहा।
फरवरी 1987 में प्रकाशित अखण्ड ज्योति के ‘इक्कीसवीं सदी विशेषांक’ में पहली बार परम पू. गुरुदेव ने ‘इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य’ का उद्घोष किया। इसी अंक में उनने लिखा कि- “इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए हमने स्थूल शरीर से काम लेना प्रायः बन्द कर दिया है। उसके साथ एक हलका तन्तु ही जुड़ा रखा है। जब उसकी भी आवश्यकता न रहेगी तो एक झटके से इसे भी तोड़कर अलग कर देंगे।”
बसन्त पर्व 1988 के अखण्ड ज्योति विशेषांक में ‘ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं’ शीर्षक से एक लेख में उनने लिखा-”सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते हैं। इस महाप्रयाण का समय अब दूर नहीं है। हाथ के नीचे वाले अनिवार्य कामों को जल्दी -जल्दी निपटाने की बात बनते ही चार्ज दूसरों के हाथों चला जाएगा। सन्देह हो सकता है कि उस दशा में वर्तमान प्रगति रुक सकती है और व्यवस्था बिगड़ सकती है ऐसे लोग व्यवस्था में आने वाले उतार-चढावों के आधार पर अनुमान लगाते हैं। वस्तुतः यह मिशन तन्त्र बाजीगर द्वारा संचालित है। वही जहाँ कोई गड़बड़ी होते देखेगा उसे तत्परतापूर्वक सुधारेगा। आखिर लाभ हानि भी तो उसी की है। मिशन के भविष्य के सम्बन्ध में भी हर किसी को इसी प्रकार सोचना चाहिए और निराशा जैसे अशुभ चिन्तन को पास नहीं फटकने देना चाहिए।
“ऊपर की पंक्तियों से स्पष्ट है कि वे अपने दृश्य कार्यों को एक पूर्व निर्धारित, अवधि में समेट रहे थे, ताकि अपने भावी उत्तरदायित्व को सूक्ष्म शरीर के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्मचक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे एवं यह आश्वासन हम देते हैं कि यह ज्योति कभी बुझेगी नहीं” जैसे शब्दों से उन्होंने भावुक परिजनों को आश्वासन भी दे दिया था कि वे स्वयं को सँभाले व भावी सुनिश्चितता तो समझते हुए सौंपे दायित्वों को पूरा भर करते चलें।
बसन्त पर्व 1988 में प्रकाशित इन पंक्तियों को पढ़कर सभी को लगा कि पू. गुरुदेव पुनः दर्शन देना सम्भवतः बन्द कर देंगे। शरीर त्याग की बात तो किसी के मन में भी नहीं थी और न कोई इन शब्दों का भावार्थ ही समझ पाया था। लगभग दस हजार निकटवर्ती परिजनों का समूह पुनः शाँतिकुँज आ गया । शिवरात्रि पर एकत्रित इस वर्ग के एक विशेष सत्र को मिनी बसन्त पर्व की उपमा दी गई व आश्वासन पूरा निभाएँगे, किन्तु उन्हें समीप से, गहराई से जानने वाले भलीभाँति समझ रहे थे कि प्रत्यक्षतः स्वास्थ्य बहुत अच्छा दिखते हुए भी अब वे जिन्दगी का अन्तिम महत्वपूर्ण अध्याय सम्पन्न कर रहे हैं। यही कारण है कि सन् 1990 की बसन्त पंचमी पर जब उनने अंतिम दर्शन व अन्तिम बसन्त पंचमी की बात कही तो सूक्ष्म दृष्टि वालों ने उसका अर्थ तुरन्त समझ लिया। सतयुग की वापसी, नवयुग का मत्स्यावतार एवं नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी जैसी पुस्तकों में वे पहले ही संकेत दे चुके थे कि वे अब सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर से सक्रिय होने जा रहे हैं। ये सभी पुस्तकें 1988 के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित हो चुकीं थीं। जिनने उन्हें गहराई से पढ़ा, वे युग परिवर्तन का मर्म, गुरुसत्ता के वास्तविक स्वरूप व उनकी उस निमित्त भावी तैयारी हेतु तत्परता समझ रहे थे।
‘नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी’ पुस्तक में उन्होंने लिखा-”अब जीवन का दूसरा अध्याय आरम्भ होता है। अब इसमें जो होना है उसे और भी अधिक महत्वपूर्ण, मूल्यवान माना जा सकता है। स्थूल के अतिरिक्त सूक्ष्म व कारण शरीरों का अस्तित्व अध्यात्म विज्ञानी बताते रहे हैं। उन्हें स्थूल शरीर की तुलना में असंख्य गुना अधिक शक्तिशाली कहा गया है। उन्हीं का प्रयोग अब एक शताब्दी तक किया जाना है। यह कार्य सन् 1990 के बसन्त पर्व से आरम्भ किया जा रहा है। यहाँ से लेकर सन् 2000 तक दस वर्ष युग सन्धि का समय है। परिजन देखेंगे कि इस अवधि में जो गतिविधियाँ चलेंगी, उसका केन्द्र शाँतिकुँज हरिद्वार होगा।”
यहीं प्रसंग ‘बसन्त पर्व पर महाकाल का संदेश’ नाम से प्रकाशित हुआ। जिसमें परिजनों को उनने उसी ब्रह्मकमल खिलने व अपने जीवन का प्रथम अध्याय समाप्त होने की बात कही। यही प्रसंग मार्च 1990 अखण्ड ज्योति के सम्पादकीय एवं अप्रैल 1990 की पत्रिका में हमें क्या करना होगा।’ के अंतर्गत दिए गए। ‘हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े हैं’ शीर्षक लेख में उनकी लेखनी से प्रकट हुआ-”दृश्य शरीर रूपी गोबर की मषक चर्म चक्षुओं से दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्त किया गया प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरुकता के साथ अपनी जिम्मेदारी वहन करता रहेगा” आगे के शब्द हैं- “शांतिकुंज परिसर में संचालक अपना सूक्ष्म शरीर, अदृश्य अस्तित्व बनाए रखेंगे। आने वाले रहने वाले, अनुभव करेंगे कि उनसे अदृश्य, किन्तु समर्थ प्राण प्रत्यावर्तन और मिलन, आदान-प्रदान भी हो रहा है। इस प्रक्रिया का लाभ अनवरत रूप से जारी रहेगा।
कहने-सुनने, करने-कराने की प्रक्रिया चलती रहने के सम्बन्ध में इस बसन्त पर्व पर उपस्थित परिजनों से जब ऊपर से उतरे आदेश के अनुसार यह कहा था कि हममें से कोई किसी से अगले दिनों बिछुड़ न सके । जो प्रसाद और उपेक्षा बरतेगा, उसे शाँतिकुँज की संचालक शक्ति झकझोरती, उनके कान उमेठती और बाधित करती रहेगी। हर व्यक्ति सक्रिय रहकर ही चैन से बैठ सकेगा। कहा भले ही अलंकारिक भाषा में गया हो, पर इसे एक सच्चाई मानकर चलना चाहिए कि एक ऐसे सशक्त सूत्र मजबूती के साथ परस्पर बँधे है, जो बिछुड़ने देने की स्थिति आने नहीं देंगे। भले ही हम लोगों में से किसी का दृश्यमान शरीर रहे या न रहे।”
उपरोक्त आश्वासन में एक चेतावनी भी थी व दिलासा भी। इतना सब स्पष्ट होते हुए भी सहज मोहवश किसी को भी यह कल्पना न थी कि वे स्थूल शरीर का चोला यों उतार फेकेंगे। बसन्त पर्व पर प्रत्यक्ष मिलन क्रम बन्द होने के बावजूद 30 अप्रैल, 90 को उन्होंने निकटवर्ती कार्यकर्त्ताओं की एक विशेष गोष्ठी बुलाई। इसमें ब्रह्मबीज के ब्रह्मकमल में विकसित होने एवं उसकी सुवास कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए 7,8 जून को जेष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर भोपाल, कोरबा, मुजफ्फरपुर, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर इन छह महानगरों में 6 विशाल ब्रह्मदीप यज्ञ के आयोजन की बात कही, तो सम्भवतः औरों को उनके इस अन्तिम अध्याय पर शीघ्र पर्दा गिरने की बात मन में भी नहीं आयी होगी, किन्तु वन्दनीया माताजी एवं उनके समीपवर्ती सहयोगियों को भली-भाँति समझ में आ रहा था कि वे लक्ष्य निर्धारित कर चुके हैं। उनको बसन्त पर्व पर ही बता दिया गया था कि गायत्री जयन्ती तक ही उनका दृश्य अस्तित्व है। उसके बाद वे सूक्ष्म व कारण शरीर को और सक्रिय बनाने के लिए परोक्ष जगत में विचरण कर जाएँगे। गायत्री जयन्ती तक वे क्रमशः अपनी चेतना को समस्त अंगों से सिकोड़ना चालू रखेंगे ताकि इच्छानुसार जब चाहें शरीर छोड़ दें।
इतना होने पर भी मन में यह आश्वासन था कि जून की पूर्णिमा के ब्रह्मयज्ञों का निर्धारण उन्हीं का है। तब तक तो उन्हें सशरीर रहना ही है। सम्भवतः हम सबको पक्का करने के लिए यह बात कही गयी है, किन्तु 8 मई को उनने यह कहकर कि प्रस्तुत पूर्णिमा के कार्यक्रम श्रद्धाँजलि कार्यक्रम होंगे। वे अपना शरीर माँ गायत्री के अवतरण के पुण्य दिन, गायत्री जयन्ती पर उन्हीं की गोद में सिर रखते हुए महाप्रयाण कर जाएँगे, सब कुछ स्पष्ट कर दिया।
महापुरुषों की लीला अपरम्पार होती है। स्थूल दृष्टि उन्हें भले ही समझ न पाए किन्तु जो उन्हें समीप से देख चुके हैं, अपने सान्निध्य में जिनको उनने विगत छह-सात सालों को पूरी अवधि में रखा उनको यह लीला समझ में आ रही थी। इस बीच उनने मिशन की भावी रीति-नीति सम्बन्धी स्पष्टीकरण, कार्यकर्ताओं के दायित्व तथा सूत्र-संचालन सता संबंधी महत्वपूर्ण निर्देश देते रहने का क्रम बनाए रखा। उनने बार-बार यही कहा कि-”यह काम भगवान का है, अवतार चेतना का है। अतः कभी रुक नहीं सकता। सूक्ष्म व कारण शरीर से वे क्रमशः भारत एवं विश्वभर में सक्रिय होते हुए मूर्धन्यों को झकझोरेंगे एवं युगचेतना के आलोक को आगामी दस वर्षों में ही पूरे भारत एवं विश्वभर में संव्याप्त कर देंगे । ब्रह्मकमल जब परिपक्व स्थिति में पहुँचकर विभाजित होता है तो अनेक ब्रह्मबीज अपने पीछे छोड़ जाता है। हमारे संपर्क में प्रत्यक्ष रूप से आए पच्चीस लाख कार्यकर्त्ता एवं इनसे भी सौ गुना अधिक थे जो अगले दिनों जुड़ेंगे हमारा मार्गदर्शन सतत् प्राप्त करते रहेंगे, क्योंकि अब हम उनके और अधिक निकट आ गए हैं। प्रत्यक्षतः वन्दनीया माताजी आने वाले चार वर्षों के लिए सारे क्रिया-कलापों का संचालन कर शाँतिकुँज को एक विश्वविद्यालय का रूप देंगी, जहाँ हमेशा-हमेशा नियमित रूप से साधना अनुदान के वितरण ममत्व भरे मार्गदर्शन एवं कौशल प्रशिक्षण का क्रम चलता रहेगा।
उनके इन अन्तिम दिनों में समीप रहने वाले इस पत्रिका के सम्पादक को ये निर्देश नोट कराए जाते रहें। 25 मई से गुरुदेव ने भोजन व जल दोनों ही लेना बन्द कर दिया। कृत्रिम माध्यम से देने का प्रयास करने पर उनने समझाया कि वे स्वेच्छा से यह सब कर रहे हैं। उनके निर्देशानुसार कोई अतिरिक्त प्रयास फिर नहीं किया गया। 2 जून-गायत्री जयन्ती की प्रातःकाल का समय था। ब्रह्ममुहूर्त था वन्दनीया माताजी को, परिजनों का क्या कहना है एवं आगे कैसे कार्य करना है, यह निर्देश उनने दिये एवं फिर दोनों से अन्तिम विदाई ली। दोनों को दृश्य शरीर से पृथक होने की अनुभूति हो रही थी, किन्तु स्वयं पर वज्र रख वन्दनीया माताजी अपने आराध्य का संदेश सुनाने नीचे चली आयीं। जैसे ही युग संगीत की प्रथम पंक्ति पूज्यवर के कक्ष में पहुँची-”माँ तेरे चरणों में हम शीश झुकाते हैं”- उनके हाथ नमन की मुद्रा में ऊपर उठे एवं हृदय की धड़कन बन्द हो गयी। 2 जून, 1990 की प्रातः 8 बजकर 5 मिनट पर इस स्थूल काया से प्राण विसर्जित हो महाप्राण में विलीन हो गए। उस दिन भी शाँतिकुँज के सारे कार्यक्रम उनके निर्देश के अनुसार यथावत् चल रहे थे। प्रणाम समापन के बाद वन्दनीया माताजी स्वयं दर्शनार्थ ऊपर आयीं। अपने आराध्य का स्थूल शरीर ही उनके समक्ष था। प्राणों का विसर्जन जब हुआ, तब उन्हें सूक्ष्म रूप से संदेश भी प्राप्त हो गया था। उनके निर्देशन में पूज्यवर की पार्थिव काया को नीचे के हाल में लाकर रखा गया।
अन्तिम दर्शन का दृश्य सभी के अन्तःकरण को विदीर्ण करने वाला था। सभी ने अपनी पुष्पाँजलि अर्पित की । उस वातावरण में भी सबको एक विचित्र अनुभूति होती रही कि वे आश्वासन दे गए हैं तो ज्योति बुझ कैसे सकती है? हम सभी अपने कर्तव्य द्वारा ज्योति को सतत् जलाए रखेंगे। शाम का पार्थिव शरीर जो फूलों से सजा था, शाँतिकुँज आश्रम में स्थित प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के समझ ले जाया गया उनके दोनों पुत्रों एवं दौहित्र द्वारा अग्नि को समर्पित कर दिया गया। वन्दनीया माताजी जो सजल श्रद्धा की साकार मूर्ति हैं, पूरे समय वहीं बैठी सबका मनोबल बढ़ाती रहीं। जीवन भर जिसने ममत्व की धार बहाई थी। अपना सब कुछ मिटाकर स्नेह करुणा की जलधारा बहाकर उस सरिता में अगणितों को स्नान करा जिसने उन्हें पवित्र बना दिया था, वह युगऋषि, युगद्रष्टा, अब वहाँ भस्म एवं वह ताप जिसमें वह लाखों व्यक्तियों को तपाकर कुन्दन बनने की प्रेरणा दे गया।
पूज्यवर के महाप्रयाण का समाचार 2 जून को टी.वी., समाचार पत्रों, आकाशवाणी से लोगों तक पहुँचा। दिनाँक 3 जून को लोग स्तब्ध, किंकर्तव्यविमूढ़ रहे। 4 तारीख को लगा कि जैसे सभी के मस्तिष्कों को महाप्रज्ञा ने अपने नियंत्रण में ले लिया और विछोह की वेदना एकबारगी प्रिय की प्रसन्नता के लिए प्रचंड पुरुषार्थ के रूप में सक्रिय हो उठी। वेदना के आँसू आँखों में डबडबाए तो रहे, लेकिन बहे वे पसीना बनकर। उनके प्रति उमड़ा स्नेह ब्रह्मदीप यज्ञ के कोटि-कोटि दीपकों में ज्योतित हो उठा। ऐसा लगा पूज्यवर की चेतना अनन्त रूपों में प्रकाशित हो उठी है। पूज्य गुरुदेव के जाने के बाद क्या होगा? यह प्रश्न लोगों के मुँह का मुँह में ही रहा गया। आशंका के स्वर प्रशंसा में बदल गए। इतिहास जब कभी इस सबका मूल्याँकन करेगा, तो सम्भवतः पूज्यवर के महाप्रयाण की इस योजना को अलौकिक एवं अद्वितीय ही कहेगा।
गायत्री जयन्ती-जून, 1985
यह संदेश परम पूज्य गुरुदेव ने वीडियो टेप के माध्यम से अपनी हीरक जयन्ती के अवसर पर गायत्री जयन्ती-जून, 1985 में दिया था।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों! भाइयों! यह समय इस तरह का है जिसको सामान्य नहीं, असामान्य कहना चाहिए। यह युग संधि का समय है तो आप जानते हैं कि कुछ-न-कुछ हेर’-फेर अवश्य होता है। जब बच्चा पैदा होता है और पेट में से निकलकर बाहर आता है, तो कितनी पीड़ा होती है। पुराना युग जा रहा है और नया युग चला आ रहा है। ऐसे समय में दो काम होते हैं-एक बनाव होता है। परिवर्तन की इस संधिवेला में बिगाड़ क्या होने वाले हैं? बिगाड़ क्या होने वाले है? बिगाड़ वे होने वाले हैं जिनके बारे में बाइबिल में कहा गया है- “सेवन टाइम आयेगा और दुनिया तबाह हो जायेगी।” जिसके बारे में इस्लाम धर्म के कुरान शरीफ में कहा गया है- “चौदहवीं सदी आयेगी और दुनिया तबाह हो जायेगी।” भविष्य पुराण में यह लिखा हुआ है- “दुनिया उस मोड़ पर आयेगी जहाँ पूर्णतया तबाह हो जायेगी।” यह तबाही का भी समय है और बनाने का भी समय है। यह युग परिवर्तन का समय है। संधिकाल का समय है।
संधिकाल में निर्माण और ध्वंस के कार्य साथ-साथ चलते हैं। इन दिनों भी एक ओर निर्माण हो रहा है तो दूसरी ओर निर्माण हो रहा है तो दूसरी ओर बिगाड़ हो रहा है। मकान बनाना होता है तो नींव खोदने वाले नींव खोदते जाते हैं। और चिनाई करने वाले चिनाई करते जाते हैं। एक तरफ खोदने का काम शुरू होता है और दूसरी ओर उसको बनाने का भी काम शुरू हो जाता है। इन दिनों भी बनाने और बिगाड़ने के दो काम एक-साथ शुरू हो रहे हैं और इन शुरू हो रहे कामों के समय पर कोई एक बड़ी जरूरत पड़ती हैं। बच्चा जब पैदा होता है तो दाई की जरूरत पड़ती है- डाक्टर की नर्स की जरूरत पड़ती है। देखभाल करने के लिए और लोगों की जरूरत पड़ती है। इसी तरह बदलते हुए समय में बहुत -सी देखभाल करने की आवश्यकता है। बड़े बिगाड़ जो होने वाले हैं। आपको मालूम नहीं है कि ‘नेचर’ नाराज हो गई है। ‘नेचर’ के नाराज होने की वजह से कहीं बाढ़ आती है, कहीं अतिवृष्टि होने लगती है, तो कहीं सूखा पड़ने लगता है। कहीं तूफान आ जाते हैं क्या होता है तो कहीं क्या? हर तरह से नेचर हममें नाराज हो गयी है कि जो नई पीढ़ियाँ पैदा होती हैं, नये बच्चे पैदा होते हैं, ऐसे कुसंस्कार जन्म से ही लेकर आते हैं कि न तो माँ का कहना मानते हैं, न बाप का कहना मानते हैं, न मास्टर का कहना मानते हैं। जरा-जरा-सी उमर से ही जाने क्या-क्या खुराफातें करना शुरू कर देते हैं। यह सब खराब वातावरण का प्रभाव है।
इससे बचने के लिए वातावरण को परिशोधित करने के लिए हमने कुछ काम करना शुरू कर दिया है। कुछ तो का हमने अपने जिम्मे लिए हैं और कुछ काम आपके जिम्मे किए हैं। हमने अपने जिम्मे क्या लिया है? हम एक उस तरह की तपश्चर्या कर रहे हैं, जिस तरह की भगीरथ ने की थी। भगीरथ ने तपस्या की तो क्या हुआ? गंगा स्वर्ग लोक में रहती थी। उनकी तपश्चर्या से जमीन पर आयीं। गंगा जब जमीन पर बहीं तो तमाम जगह हरियाली हो गयी, पेड़ पैदा हो गये, बगीचे पैदा हो गये गेहूँ पैदा हो गया। इस तरह भगीरथ ने जिस तरीके से तप किया था, ठीक उसी तरीके से एक तप हम भी कर रहे हैं। एक और समय ऐसा था, जब दैत्यों ने देवताओं को मारकर भगा दिया था और देवता बेचारे मारे-मारे फिर रहे थे। दैत्यों ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया था। देवता ब्रह्माजी के पास पहुँचे । उन्होंने कहा-
अपने प्रारम्भिक दिनों से शाँतिकुँज जनसामान्य एवं विशिष्ट जनों के आकर्षण का केन्द्र रहा है। हरिद्वार आने वाले तीर्थयात्री यहाँ आए बगैर नहीं रहते। बद्री, केदार, गंगोत्री, यमुनोत्री इन चारों धाम की यात्रा करने वालों के लिए तो यह युग तीर्थ पाँचवें धाम की तरह है। जहाँ आए, घूमे, देखे, प्रसाद ग्रहण किए बगैर उन्हें अपनी तीर्थयात्रा पुरी होने की अनुभूति नहीं होती।
सहज श्रद्धालु तीर्थयात्रियों की ही तरह बुद्धिजीवी, साहित्यकारों, राजनेताओं, समाजसेवियों, मनीषियों, कलाकारों, वैज्ञानिकों के मन में भी यहाँ के प्रति कम आकर्षण नहीं है। यहाँ से संचालित राष्ट्र-निर्माण, समाज-निर्माण, व्यक्ति-निर्माण की गतिविधियाँ वैज्ञानिक अध्यात्म का शोध-अनुसंधान उनके मन को सहज मोह लेता है। आज के युग में धर्म का ऐसा उत्कृष्ट स्वरूप भी सम्भव है, यह उन्हें यहीं आकर पता चलता है।
पू. गुरुदेव ने शाँतिकुँज का जो वृक्ष रोपा, उसमें लगे बहुविधि गतिविधियों के पुष्प इतने सुरभित हैं कि उनकी सुवास दूर-दूर तक अपने-आप फैल चुकी है। इस मोहक सुगन्ध से आकर्षित होने वाले विशिष्टजनों के आने का यहाँ ताँता लगा रहता है। यहाँ आकर वे इतने भाव-विभोर होते हैं कि उनके हृदयोद्गार अपने आप झरने लगते हैं। ऐसे ही कुछ उद्गारों को इस लेख में पिरोया गया है।
शाँतिकुँज सचमुच स्वर्ग है। यहाँ का सान्निध्य अनगढ़ और भटके हुए मानव के अंदर देवत्व का उदय करता है। भगवान से मेरी प्रार्थना है कि उत्कट तपस्वी आचार्य जी की भावधारा से समूचा देश और दुनिया परिचित और प्रभावित हो।
डॉ.एम.चन्ना रेड्डी भूतपूर्व राज्यपाल उत्तरप्रदेश
मानव निर्माण के इस कारखाने शाँतिकुँज को देखकर विश्वास ऐसा दृढ़ हो जाता है कि यह काल्पनिक नहीं है वस्तुतः इसे ठोस धरातल पर उतारा जा सकता है। परम पूज्य गुरुदेव एवं वं. माताजी के सूक्ष्म घनीभूत विचारों का मूर्त रूप है शाँतिकुँज और उनके प्रशिक्षण स्वयंसेवी कार्यकर्त्ता।
श्रीमती मोहसीना किदवई पूर्व मंत्री उत्तरप्रदेश
शाँतिकुँज हिंदुत्व, भारतीयता एवं मानव समाज के उत्थान के लिए कर रहे कार्य का अभूतपूर्व उदाहरण है।
आर.सी.लाल पूर्व सीनीयर कामर्शियल ऑफिसर, पश्चिम रेलवे, मुम्बई
शाँतिकुँज तीर्थ चेतना में गोते लगाने वालों को मेरा ही नहीं समस्त ऋषि चेतना का आशीर्वाद सहज ही मिलता है, मिलता रहेगा। पवित्र हिमाच्छादित कैलास यहीं आ बसा है। यह साक्षात शिव पार्वती की तपस्थली है। मैं भी दिव्य अनुदानों से लाभान्वित होने के लिए यहाँ आता हूँ।
महात्मा आनंद स्वामी महान संत, प्रख्यात समाजसेवी, आर्य समाज
इधर काफी अरसे से महसूस हो रहा था कि जैसा जीवन मुझसे बिछड़ गया है। सब कुछ खोया-खोया, सूना-सूना लग रहा था। आज शाँतिकुँज आकर मेरा खोया जीवन वापस मिल गया। यहाँ के सान्निध्य में मेरे जीवन को नया आधार देने वाला अलौकिक तत्व चिन्तन मिला।
जस्टिस वी. रामास्वामी तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पंजाब
शाँतिकुँज में मानव जाति के कल्याण के लिए जैसी शिक्षा एवं विद्या दी जा रही है, वह भारत तथा विदेशों के हर नागरिकों के लिए संजीवनी बूटी के समान है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अगले दिनों इस विद्या को समस्त विश्व अपनायेगा।
भ.र.देवरस, सर संघ संचालक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
शाँतिकुँज का पुनीत कार्य कर्त्तव्य और धर्म के साथ मनुष्य को अपनी ऊँचाइयों में श्रेष्ठता तथा शाँति देने का अभिनव स्रोत है। शाँतिकुँज आचार्य श्री एवं व.माताजी का ज्योतिपुँज है और उनके कार्यकर्ता यहाँ से निकाली हुई प्रकाश किरणें।
श्रीपति मिश्र पूर्व मुख्यमंत्री उत्तरप्रदेश
शाँतिकुँज वैज्ञानिकों, समाज आँदोलनकारियों, करुण हृदय साहित्यकारों, दार्शनिकों एवं पत्रकारों के लिए प्रखर प्रेरणा का केन्द्र है। मैं स्वयं यहाँ से आवश्यक आत्मबल लेकर जा रहा हूँ। मेरी इच्छा है कि इन विविध विधाओं के मर्मज्ञ यहाँ आएँ और सीखें कि अपनी-प्रतिभा एवं विशिष्ट क्षमता को नवनिर्माण के लिए सुनियोजित करने की सही तकनीक क्या है?
सुन्दरलाल बहुगुणा प्रख्यात पर्यावरणविद्, प्रणेता ‘चिपको आँदोलन’
दूर बैठे, बिना देखे शाँतिकुँज की यथार्थ कल्पना करना दुष्कर एवं कठिन है। जो भी यहाँ आया, देखा और रहा वह यहीं का होकर रह गया। शाँतिकुँज विज्ञान, आत्मज्ञान और व्यवहार बुद्धि का अद्भुत संगम है। पुरातन भारतीय संस्कृति और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकी का जो समन्वय ब्रह्मवर्चस में देखने को मिला वह अलभ्य है। वाणी और आचरण के विलक्षण सामंजस्य का नाम है शाँतिकुँज।
सुषमा स्वराज महामंत्री भारतीय जनता पार्टी
शाँतिकुँज पुण्य तीर्थ है। इस केन्द्र से समस्त मानव जाति को भारतीय संस्कृति का, शान्ति का संदेश मिल रहा है, अध्यात्म एवं विज्ञान का संगम स्थापित हो रहा है। यहाँ का वातावरण ही आत्मा में शुद्धता प्रदान कर देता है।
हरिमोहन सिंह, आई.ए.एस प्रादेशिक सचिव, भारत स्काउट उत्तरप्रदेश
विश्व मानवता का केन्द्र है शांतिकुंज। यह आध्यात्मिक चेतना का स्रोत है। मानवोत्थान एवं समाज सेवा का यह अभियान अपने देश में ही नहीं अपितु सारे विश्व में सतयुगी वातावरण विनिर्मित करेगा।
सत्येन्द्र नारायण सिंह पूर्व मुख्यामंत्री, बिहार
शाँतिकुँज दिव्य एवं पवित्र तीर्थस्थली है। भारत को इस समय राष्ट्रीय चरित्र निर्माण एवं स्वावलम्बन की आवश्यकता है। जो मात्र यहाँ से प्राप्त हो सकता है।
हरिषचन्द्र मक्कड़ पूर्व असिस्टेंट हाउसिंग, कमिश्नर, दिल्ली प्रशासन
प्राचीन भारतीय संस्कृति का आधुनिक विचारधारा एवं आदर्शवाद में वैज्ञानिक रूप से कहीं बदला जा रहा है तो वह है शांतिकुंज।
संजय माकिन, संचालन दूरदर्शन केन्द्र, लखनऊ
आज कोई संस्था चरित्र निर्माण एवं समाज सेवा में लगी है और जो भारत में ही नहीं विश्व में भी मानवता का प्रसार कर रही है, उस तीर्थ का नाम है शाँतिकुँज। आध्यात्मिक, सामाजिक कार्य के साथ देश की अखण्डता, एकता के लिए पूर्व ऋषि तुल्य चिंतन, मनन एवं कार्य प्रणाली मेरी राय में सिर्फ यहीं से परिचालित हो रही है। राजनीतिज्ञों एवं देश के कर्णधारों को यहाँ से मार्गदर्शन लेना चाहिए। में मानव सेवा में अपना योगदान देने का संकल्प लेता हूँ।
दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री म.प्र.
इंसानियत, अमन, भाईचारा का पैगाम देने वाले
शाँतिकुँज आश्रम को देखते की अभिलाषा पूर्ण हुई। समस्त धर्मों के मूल में इंसानियत है और जो रोशनी यहाँ से इंसान को मिलती है वह बेमिसाल है।
इब्राहिम कुरैशी, एडवोकेट मंत्री म.प्र.
गंगा की गोद में एवं हिमालय की छाया में स्थित अद्भुत शाँतिकुँज लोक कल्याण में लगा है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि शाँतिकुँज का शाँतिदायिनी संदेश अगले दिनों सारे विश्व को आलोकित अवश्य करेगा।
गदाधर नारायण सिंह आई.जी..लखनऊ
शाँतिकुँज भारतीय संस्कृति की प्रेरणा स्थली के रूप में विकसित होकर देश में देवभूमि का स्वरूप ग्रहण कर रहा है। यह उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए उच्च साँस्कृतिक प्रेरणा एवं जनकल्याण का केन्द्र बनेगा तथा भारतीय संस्कृति के उत्कृष्ट संस्कारों को देश विदेश में प्रसारित करेगा।
डॉ. हरस्वरूप सिंह, कुलपति कृषि विश्वविद्यालय हिसार, हरियाणा
शाँतिकुँज कोई एक संस्था नहीं, यह बहुत बड़ा अभियान है। यह संस्थान आत्मकल्याण के लिए तो प्रयत्नशील है ही, साथ ही आत्मकल्याण के द्वारा लोकमंगल भी उसे अभीष्ट है। इसकी बड़ी विशेषता है अनमोल मानव सम्पदा। सादगी, सरलता एवं सात्विकता की त्रिवेणी यहाँ से प्रवाहित है।
हो.वे.शेषाद्रि सुविख्यात समाजसेवी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
हिन्दू संस्कारों की पुनः प्रतिष्ठा का जो महत् कार्य शाँतिकुँज द्वारा किया जा रहा है, उसका सदैव यह देश ऋणी होगा। इस संस्था के पीछे भगवत् शक्ति का स्पष्ट अनुदान, वरदान सन्निहित है।
अशोक सिंघल, महामंत्री हिन्दु परिषद
शाँतिकुँज कर्तव्य और सेवा का प्रणेता है। यहाँ आध्यात्मिक शक्ति सतत् प्रवाहित होती है। मनुष्य में मानवीय गुणों को शक्ति देने के लिए यह संस्थान महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। ऐसा कार्य जिसमें मानवता एवं राष्ट्रीयता हर भारतीय में रोपित होती है। पूज्य बापू के “क्षमता भर करो और आवश्यकता भर लो।” जीवन सिद्धान्त को हर जन में प्रशिक्षित करने का यह संस्था कार्य कर रही है।
रामलाल राही पूर्व केन्द्रीय उप गृहमंत्री भारत सरकार
आध्यात्मिक नवजागरण के इस केन्द्र से स्फूर्ति, प्रेरणा एवं बल लेकर जा रहा हूँ। यहाँ आकर चेतना को नई शक्ति मिली । यह कार्य बढे., केन्द्र अधिकाधिक सामर्थ्यवान बने, यही प्रभु से प्रार्थना है।
मुरली मनोहर जोशी वरिष्ठ राजनेता, भारतीय जनता पार्टी
शाँतिकुँज आकर मुझे पहली बार स्वर्गीय वातावरण की अनुभूति हुई। मेरे सुप्त हृदय के तार झंकृत हो गये और अंतर में मानव सेवार्थ संकल्प उमगने लगा। यहाँ का दिव्य आकर्षण का उच्च शिक्षित एवं प्रतिभासम्पन्न लोगों को भौतिकता का माह छोड़कर शाँतिकुँज आने एवं लोककल्याण करने के लिए प्रेरित करता है।
यशपाल जैन प्रख्यात साहित्यकार एवं मंत्री, सस्ता साहित्य मण्डल
भारत की प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता की महिमा यदि काई जानना चाहे तो उसे शाँतिकुँज में देखकर आना चाहिए। वैज्ञानिक, विद्वान एवं कलाकार की समाज को नवीन दिशा देते हैं। शाँतिकुँज में ये समस्त प्रतिभा विद्यमान हैं।
देवेन्द्र वर्मा फिल्म अभिनेता, मुम्बई
भारतीय संस्कृति की चिरंतनी धारा के अनेक स्रोत अबाध गति से प्रवाहित होते रहे हैं। यह एक ऐसा कुँज है जहाँ समस्त मानव जाति को प्रेरणा मिलती है, शक्ति मिलती है, दिव्य दृष्टि मिलती है, इसका यह स्थान एक प्रतीक है।
चंद्रशेखर भूतपूर्व प्रधानमंत्री भारत, सरकार
शाँतिकुँज आकर मेरी असली खोज पूर्ण हुई । पूज्य आचार्य जी के तप एवं विचार से तथा वं. माताजी के ज्ञान और क्रिया से विनिर्मित शाँतिकुँज मानव जाति के उत्थान की उद्गम स्थली है। विश्व के लिये यह वरदान सिद्ध होगा।
रामानंद सागर निदेशक, निर्माता, रामायण एवं श्रीकृष्णा सीरियल
जहाँ आत्मिक शाँति व साधना के विषय में निरंतर ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा है, उसका ही नाम शाँतिकुँज है। यहाँ आकर मैं बार-बार स्फूर्ति एवं चेतना से ओत-प्रोत हो जाता हूँ। यहाँ मुझे व्यक्ति और उसके कर्तव्य का बोध हाता है। मानवीय हितों पर किया जा रहा यहाँ का श्रेष्ठ कार्य विश्व इतिहास में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा। मैं जीवन को कृतार्थ समझूँगा यदि पूज्यवर के मार्गदर्शन के अनुसार कुछ कर सकूँगा।
भैरोंसिंह शेखावत मुख्यमंत्री राजस्थान
सप्तऋषियों के क्रिया-कलापों को जिन्हें देखना हो उन्हें शाँतिकुँज दर्शन करना चाहिए। हिन्दू धर्म एवं भारतीय संस्कृति का जो कार्य यहाँ हो रहा है, वह अपने आप में अद्भुत एवं विलक्षण है।
श्री जगद्गुरु, श्री चिदानंद भारती पीठाधिपति कोर्तलम, तमिलनाडु
शाँतिकुँज में पूर्ण आध्यात्मिक वातावरण है और यहाँ आध्यात्मिकता को वैज्ञानिक स्तर पर लाने की कोशिश की गई है। ब्रह्मवर्चस इसकी अभूतपूर्व मिसाल है।
प्रो.उनवान चिष्ती अध्यक्ष जमायते सूफियाये हिंद
इतिहास साक्षी है कि अतीत में भारतवर्ष विश्व का जगद्गुरु था। मानव सभ्यता का उद्गम यहीं से हुआ था। शाँतिकुँज उसी लक्ष्य को लेकर समाज में आध्यात्मिक जाग्रति का प्रयास कर रहा है। यह प्रयास राष्ट्र एवं विश्व निर्माण का वेगपूर्ण प्रवाह है।
कैलास जोशी पूर्व मुख्यमंत्री, म.प्र.
मानवीय हित ही जहाँ सर्वोपरि है, जहाँ मनुष्य एवं समाज की सेवा को धर्म माना जाता है, वह है शाँतिकुँज। यहाँ पर मानवीय प्रेम का अगाध समुद्र लहराता है।
किरण बेदी पूर्व आई.जी.तिहाड़ जेल
मानवीय संवेदना अगर घनीभूत हो जाए तो कैसी होगी? यह माताजी को देखकर शाँतिकुँज के बारे में जान पाया। शाँतिकुँज से चलाया गया अश्वमेध राष्ट्र निर्माण का सूक्ष्म एवं विशिष्ट प्रयोग है।
अटल बिहारी बाजपेई वरिष्ठ राजनेता भारतीय जनता पार्टी
परम वंदनीया माताजी एवं इनके द्वारा संचालित भव्य अश्वमेध का देखकर जान पायी कि संसार में मात्र शाँतिकुँज ही एक ऐसी दिव्यस्थली है, जहाँ पर स्नेह, ममत्व, करुणा, साहस, सेवा सदाशयता के सभी गुण मौजूद होंगे।
मिस कैम्पबेल उप प्रधानमंत्री कनाडा
भावभरी यादों की इस शृंखला का विस्तार बहुत बड़ा है, यह अंतहीन उद्गार के रूप में स्मृति एवं अनुभूति भरा पुलकन देता रहेगा । हम भी कल्पवृक्ष रूपी शांतिकुंज छाया में आएँ, अनुकरण, अनुगमन का प्रयास करें, जिससे हमारा जीवन दिव्य प्रेरणाओं एवं सुखद अनुभूतियों से भर जाए।
ब्रह्मदीप यज्ञ समाप्त होते ही वन्दनीया माताजी ने संकल्प श्रद्धाँजलि की घोषणा कर दी। पूज्य गुरुदेव कहते थे-”श्रद्धा सक्रियता में बदलनी चाहिए।” इसी आधार पर माताजी ने उनके मिशन को आगे बढ़ाने के संकल्प विकसित एवं समर्पित करने के लिए संकल्प श्रद्धाँजलि का निर्धारण किया । जैसा शानदार जीवन इस मिशन के संस्थापक, संचालन ने जिया, उतने ही शानदार ढंग से उनके व्यक्तित्व को एक विराट् समुदाय द्वारा श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाने थे। इसका मूल्य और महत्व इसलिए भी था क्योंकि इसके साथ वे पुनीत संकल्प जुड़े थे, जिनके माध्यम से शिष्य समुदाय परोक्ष में सूक्ष्मीकृत अपनी गुरु सत्ता की विद्या -विस्तार के पुण्य- प्रयोजन के कार्यों को आगे बढ़ाते रहने का सुनिश्चित विश्वास अर्पित करने वाला था।
तैयारियाँ बहुत चुनौती भरी थीं। जून के 15 दिन, जुलाई, अगस्त एवं सितम्बर ही थे। अधिकांश समय वर्षाकाल का था। उतनी ही अवधि में कुम्भ जैसे आयोजन की तैयारी पूरी करनी थी। कुम्भ के लिए प्रशासन अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ एक वर्ष तैयारी करता है। लेकिन यहाँ बिना किसी सरकारी सहायता के सिर्फ अपने बलबूते समूची तैयारी अपनी गुरु सत्ता को समर्पित समुदाय किस प्रकार कर सकता है, इसका एक अनूठा उदाहरण पूरे उत्तर भारत की जनता को वर्ष 1990 में देखने को मिला। शिक्षकों से लेकर कृषक, न्यायाधीश, चिकित्सक, इंजीनियर, आई.ए.एस. अधिकारी तक इस मिशन से जुड़े हैं। इनमें से बीस हजार के अधिक स्वयं सेवक के रूप में 15 सितम्बर से ही आ गये थे। आते ही ये सभी बिना किसी पद या शिक्षा, जाति या वर्ण के पूर्वाग्रह के सभी एकजुट होकर कार्यक्रम की तैयारी में लग गए।
इ.पी.टेण्ट, शामियाने, जल, बिजली आदि की व्यवस्था, ऊबड-खाबड़ स्थानों की सफाई, विशाल भोजन भट्टियों का निर्माण आदि सभी काम स्वयंसेवी स्तर पर किए गए। पारस्परिक तालमेल बिठाकर सारे काम इस तरह पूरे होते चले गए कि उन अधिकारियों को भी हतप्रभ रह जाना पड़ा, जो विशाल भूखण्ड की सफाई को न्यूनतम छह माह का काम मानते थे। प्रकृति ने भी जमकर परीक्षा ली । सामान्यतया मानसून की वर्षा 1-12 सितम्बर के बाद इस ओर नहीं होती, किन्तु विरोधी शक्तियाँ संकल्पशक्ति को कसौटी पर कसने को जो बैठी थी। 29 सितम्बर तक रुक-रुक कर पानी बरसता रहा किन्तु एक भी व्यक्ति अपने संकल्प से डिगा नहीं।
एक और परीक्षा सभी परिजनों की मार्ग में ली जा रही थी। सभी कार्यक्रम में पहुँचने को आतुर थे किन्तु उसी बीच अयोध्या प्रकरण तथा मण्डल आयोग की प्रतिक्रिया स्वरूप देशव्यापी आन्दोलन भड़क उठा। बसें, ट्रेनें और फायर ब्रिगेड की गाड़ियां तक जलाई जाने लगीं। सड़कों और प्लेटफार्मों पर सूनापन छा गया। ऐसे में भी दिव्य-चेतना तथा जनश्रद्धा ने अपना कमाल दिखाया। श्रद्धाँजलि समारोह में जितने व्यक्ति पहुँचने थे पहुँचे।मार्ग में न कोई उपद्रव आड़े आया और न कोई जन-धन हानि हुई । हरिद्वार नगर में मात्र इस कार्यक्रम के लिए पाँच लाख परिजन पंजीकृत किए जा चुके थे। स्थानीय लोगों के लिए इतनी विशाल अनुशासित भीड़ का जुटना एक सुखद आश्चर्य था, क्योंकि सभी कुछ सामान्य चल रहा था। कहीं स्थानीय यातायात में बाधा नहीं, कहीं कोई कानून व्यवस्था में गड़बड़ी नहीं। एक लाख परिजनों की रोलिंग भीड़ नित्य आती व जाती रही। सारा हरिद्वार पीले वस्त्र पहने, पीत दुपट्टाधारी स्त्री-पुरुषों से पटा हुआ था।
सुव्यवस्थित ढंग से ठहराने का प्रबन्ध किया गया था। पूरे हरिद्वार नगर की पंद्रह मील लम्बाई व आठ मील की चौड़ाई में कनखल से मोतीचूर तक पंद्रह हजार से अधिक छोलदारियाँ, इ.पी. टेण्ट, शामियाने लगाकर चौबीस नगर बसाए गए थे। अतिरिक्त व्यवस्था हेतु अनुरोध किया गया तो सभा आश्रमों ने युग पुरुष का श्रद्धाँजलि देने हेतु अपने द्वार खोल दिए। इन आश्रमों के अतिरिक्त टेण्टों में बहुसंख्यक जन बिना किसी साधन-सुविधा की अपेक्षा किए ठहरे हुए थे।
‘कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रातः ब्रह्मवेला में पू. गुरुदेव के जीवन-वृत पर बनी एक विशाल प्रदर्शनी का वन्दनीया माताजी द्वारा उद्घाटन से हुआ। इसके पश्चात् वे ब्रह्मर्षि नगर के विशाल मंच पर पहुँची। झण्डारोहण किया गया तथा एक विशाल मशाल प्रज्ज्वलित की गई । कलश पूजन के पश्चात् 1008 कलशधारी महिलाओं के नेतृत्व में एक विशाल शोभायात्रा, प्रवचन सभागार से निकली। चौदह किलोमीटर लम्बा यह जुलूस प्रातः 7 बजे रवाना हुआ व मध्याह्न साढ़े बारह बजे याज्ञवल्क्यनगर पहुँचा, जो सप्तर्षि आश्रम के समीप याज्ञवल्क्य की तप-स्थली में विनिर्मित किया गया था। यहाँ 1008 कुण्डों की भव्य यज्ञशाला बनाई गई थी। कलशों को यहाँ विधि-विधान से स्थापित कर प्रातःकाल के कार्यक्रम को विराम दिया गया। संध्याकाल में युग गायन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हरिद्वार, ऋषिकेश मार्ग पर अवस्थित प्रवचन सभागार में हुई। शाँतिकुँज के प्रतिनिधियों के प्रारम्भिक उद्बोधन के बाद वन्दनीया माताजी का प्रेरक, ओजस्वी प्रवचन हुआ। इसी के साथ इस दिन के कार्यक्रम की समाप्ति हुई।
पुरी नगरी में बसाए गए विभिन्न नगरों में जिस प्रकार प्रकाश की व्यवस्था थी, उससे रात्रि में भी शहर से छह मील दूर कभी नीरव लगने वाले क्षेत्र में भी जंगल में मंगल जैसी स्थिति नजर आ रही थी। संकल्पित साधकों ने अगले दिन प्रातः 3-30 बजे से दिनचर्या आरम्भ की। प्रातः ध्यान-साधना के बाद 1008 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ आरम्भ हुआ, जो 11-30 तक चलता रहा। साथ-साथ आज जहाँ देवात्मा हिमालय बन रहा है उसी भूमि में अखण्ड गायत्री जप एवं संस्कारों का क्रम नियमित चलता रहा। इसी के साथ प्रवचन सभागार में वन्दनीया माताजी द्वारा दीक्षा दी गई इस कार्यक्रम में प्रतिदिन 50 हजार से अधिक परिजन उपस्थित रहते थे।
मध्याह्न में कार्यकर्ता गोष्ठियाँ जगह-जगह विभिन्न नगरों में आयोजित की गई। इनका उद्देश्य था- पू.गुरुदेव का उज्ज्वल भविष्य के लिए महाकाल की साझेदारी का आमंत्रण ‘जन-जन तक पहुँचाया जाय। युगसन्धि साधना में भागीदारी चिंतन, मनन, स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना यह त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था, जो तीन दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वन्दनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। उन्होंने पू. गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के प्रसार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया है। इसके पश्चात् वन्दनीया माताजी का सारगर्भित प्रवचन हुआ। जिसमें उन्होंने उपासना, साधना, आराधना के मर्म को पूज्यवर के जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझाया।
तीसरा दिन अति विशिष्ट था। इस दिन सामूहिक गायत्री महायज्ञ के साथ-साथ 301 जोड़ों के आदर्श विवाह भी थे। एक साधनहीन कृषक से लेकर एक पूँजीपति का लड़का आज आदर्श विवाह पद्धति द्वारा दाम्पत्य जीवन में प्रवेश कर रहा था। दहेज विरोधी आन्दोलन इस मिशन का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम रहा है। नगर व प्रान्त के पत्रकार गण, दूरदर्शन व आकाशवाणी के प्रतिनिधि इस कार्यक्रम को देखने आए थे। मध्याह्न 12-30 पर उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री सत्यनारायण रेड्डी ने पधार कर अपनी शुभकामनाएँ उपस्थित समुदाय को दीं। इसी के साथ प्रातःकालीन सभा समाप्त हुई।
भोजन व दोपहर की गोष्ठियों के बाद शाम की सभा आरम्भ हुई। वन्द. माताजी के प्रारम्भिक उद्बोधन के बाद महामहिम राज्यपाल महोदय श्री रेड्डी ने उपस्थित समुदाय को दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त लगे रहने हेतु भूरि-भूरि बधाई दी। साथ ही गुरुदेव के समाज निर्माण के कार्यक्रम को युगान्तरकारी अभियान बताया। उनके उद्बोधन के पश्चात् भी जनसमुदाय के आने का क्रम चालू था। विराट सवालक्ष दीपों का महायज्ञ आरम्भ हुआ। “यन्मण्डलं दीपित्करं विषालम्” की धुन के बीच सभागार के चारों ओर सजाए गए दीपक जला दिए गए । मंच के चारों ओर विशाल स्टैण्ड पर दीपों के थाल सजा दिए गए थे। दृश्य देखते ही बनता था। शरदपूर्णिमा की रात थी, परन्तु पूर्णिमा का चाँद भी छोटे-छोटे दीपों की समन्वित आभा-ऊर्जा के समक्ष मद्धिम लग रहा था। दीपयज्ञ के पश्चात् गायत्री माता की आरती जब अहमदाबाद शाखा के एक परिजन ने अपने मस्तक पर 151 दीप सजाकर नृत्य करते हुए गायी तो सबकी तालियाँ पूरी आरती तक एक साथ बजती रहीं।
1 अक्टूबर से प्रारम्भ हुआ कार्यक्रम 4 अक्टूबर तक आ पहुँचा। इस दिन विदाई होनी थी। सभी का लग रहा था। कि देखते-देखते चार दिन कैसे बीत गए। नित्य अगणित व्यक्ति तीन विशाल भोजनालयों में भोजन करते रहे, कोई बिना भोजन के नहीं रहा, कोई बीमार नहीं पड़ा एवं कहीं किसी प्रकार की कोई की अव्यवस्था नहीं देखी गई। जाने की वेदना सभी को थी। वन्दनीया माताजी द्वारा 1008 कुण्डीय यज्ञशाला में स्वयं आकर उपस्थित याज्ञिकों को दीक्षा देने के उपरान्त विदाई गीत हुआ एवं वन्दनीया माताजी द्वारा भावभरे शब्दों में कार्यक्रम का समापन घोषित कर दिया गया। वन्दनीया माताजी ने स्वयं एक गीत गाकर परिजनों को विदाई दी। चारों ओर आँसू ही आँसू थे। सभी सोच रहे थे कि ममत्व की साकार प्रतिमा माताजी से कैसे दूर रहेंगे। पर सभी ने अपने को सँभाला व लोटने की तैयारी आरम्भ की। सबसे मनमोहक दृश्य था वह जब माताजी प्रवचन सभागार से वापस शाँतिकुँज लौटीं एवं उनके पीछे विशाल जनसमूह उन्हें नमन करता हुआ पूरे रास्ते चलता रहा यहीं श्रद्धा तो मूलभूत पूँजी है इस मिशन की, जिसने लाखों मणि-मुक्तकों को गूँथकर एक हार कि रूप में पिरो दिया है। इसी श्रद्धांजलि पर्व में संकल्पित परिजनों ने पूरे देश में प्रेरक आयोजनों की धूम मचा दी। देखने वाले समझ नहीं पाए कि कैसे यह छोटी-छोटी हैसियत वाले लोग इतने बड़े कार्य, इतने आत्मविश्वास के साथ कर रहे हैं, किन्तु करने वाले अनुभव करते थे कि सजल श्रद्धा का भाव प्रवाह बरबस उनके हाथों-पैरों व मन-मस्तिष्क को सक्रिय किए हुए है।
इस सक्रियता का वर्ष 1992 का 8-9-10 जून को पुनः आह्वान हुआ । अबकी बार संकल्पवान परिजनों को शपथ ग्रहण के लिए बुलाया गया था। शपथ समारोह की शोभायात्रा में भागीदारी के लिए मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र व दक्षिण भारत से सैकड़ों की संख्या में जीप, बसें, मेटाडोर आदि वाहन 5 जून की शाम आँवलखेड़ा पहुँचे। वहाँ 6 जून को परम पूज्य गुरुदेव की जन्मभूमि के रजकलश लेकर यह काफिला अलीगढ़, बुलंदशहर, रुड़की होते हुए 8 जून की शाम को शाँतिकुँज आ पहुँचा। इसी शाम शोभा यात्री की अगवानी शाँतिकुँज के ठीक सामने बने प्रवचन सभागार में की गई। वन्दनीया माताजी ने स्वयं इन रजकलशों का पूजन सम्पन्न किया।
प्रवचन सभागार के समीप बनी 108 कुण्डीय यज्ञशाला में प्रातः ध्यान-साधना के बाद अगले दिन आए हुए परिजनों ने यज्ञ सम्पन्न किया।
यज्ञ के साथ ही आए हुए परिजनों ने दीक्षा प्राप्त की। इस बीच संस्कार शाला में देव संस्कृति की रश्मियां 12 संस्कारों के रूप में बिखरती रहीं और 10 जून गायत्री जयन्ती की प्रातः परम पू. गुरुदेव की द्वितीय पुण्य तिथि पर शपथ समारोह सम्पन्न हुआ। इस दिन परम पु. गुरुदेव की जन्मभूमि की रज व सप्त सरोवर का गंगाजल हाथ में लेकर सवा लाख परिजनों ने देव संस्कृति के उद्धार व विस्तार की शपथ ली। साथ ही इस शपथ समारोह में भागीदारी लेने वालों में निम्न व्रतों को निष्ठापूर्वक अपनाने का बीड़ा उठाया गया।
1. प्रतिवर्ष न्यूनाधिक तीन माह का समय शाँतिकुँज के लिए देना। नियोजन केन्द्र द्वारा जो हो उसे स्वीकार किया जाना।
2. या एक लोकसेवी परिव्राजक की तीन माह की अवधि के लिए ब्रह्मवृत्ति जीवन निर्वाह का प्रबन्ध करना।
3. शक्ति संचार साधना के वे भागीदार जो
नियमित उपासना, एक घण्टा एवं बीस पैसा प्रतिदिन अथवा एक दिन की आजीविका माह में एक बार शाँतिकुँज को देव संस्कृति विस्तार के निमित्त देने का अनुबन्ध।
4. भविष्य में होने वाले कार्यक्रमों का अपने क्षेत्र में आयोजित करने, भाग लेने का संकल्प।
5. शाँतिकुँज में सम्पन्न होने वाले सत्रों में अपने क्षेत्र के दस प्रतिभावान लोगों को भेजने का संकल्प।
कहना न होगा, शपथ ग्रहण करने वाले परिजनों ने देव संस्कृति के उद्धार व विस्तार का बीड़ा उठाया। संकल्प श्रद्धाँजलि समारोह में परिजनों की अन्तर्चेतना में जो संकल्प बल पैदा हुआ था, वह शपथ समारोह में विकसित रूप में अनुभव किया गया। इसी ऊर्जा से देव संस्कृति दिग्विजय अभियान की प्रचण्ड धारा बह निकली।
पूज्यवर के महाप्रयाण के बाद ‘सामान्य गृहिणी’ के बाने में अपने को छिपाए बैठी ‘भगवती’ अपने विराट वैभव के साथ अनायास ही प्रकट हो गयीं। उनकी शक्ति के विस्फोट से आश्वमेधिक प्रवाह अचानक उमड़ पड़ा। अब तक लोगों ने अश्वमेध का नाम भर सुना थी। वेदों-पुराणों की कहानियों में चर्चा सुनी थी । प्राचीन ऐतिहासिक कथाओं में उसका जिक्र सुनाई पड़ा था। वहीं अश्वमेध महायज्ञ अपने वैदिक कर्मकाण्ड विधि-विधान के साथ वर्तमान समय में भी सम्भव हो सकते हैं, यह जनसामान्य की कल्पना से भी परे था। लेकिन माताजी ने जब अपनी ‘गंगोत्री’ सम्पन्न करने का अपना निश्चय शाँतिकुँज के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के सामने प्रकट किया तब सब -के-सब आश्चर्य में पड़ गए। पर इस आश्चर्य को शीघ्र ही समाधान मिला। उनके निर्देशन में आश्वमेधिक कर्मकाण्ड की शोध हुई। साथ ही अश्वमेध के इतिहास और स्वरूप को बताने वाला अश्वमेध विशेषांक भी नम्बर 1992 में प्रकाशित हो गया।
बात इतने तक सीमित न रही। उन्होंने नवम्बर माह में ही प्रथम अश्वमेध जयपुर में किए जाने की घोषणा भी कर दी। इस अवसर पर उन्होंने कहा-”अपनी शुरुआत के दिनों से ही अश्वमेध ब्रह्मशक्ति और क्षात्र शक्ति के सम्मिलित प्रयोगों के रूप में आयोजित होते रहे हैं। ब्राह्मीशक्ति भावना, आदर्शवादिता की प्रतीक है तो क्षात्रशक्ति शौर्य, पराक्रम की विचारणा, भावना क्रिया के बिना पंगु है, शौर्य के अभाव में वह भावुकता बनकर यह जाती है। इसे शौर्य का अभाव ही कहेंगे कि देवमानव गढ़ने, धरती को स्वर्गभूमि में बदलने वाले धर्म विज्ञान को पलायनवाद का पर्याय समझा जाने लगा। इस शब्द की विशालता, व्यापकता भावुकतापूर्ण कर्मकाण्डों के घेरे में सिमट गई। जबकि भगवान की अवतार प्रतिज्ञा में धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का उभयपक्षीय आश्वासन है। अवतारों, उनके लीला सहचरों ने इसीलिए धर्मोपदेश कम दिए, अनीति से जूझने में अधिक समय लगाना है। अश्वमेध अनीति कि विरुद्ध मन्यु के जागरण की इसी प्रक्रिया का नाम है, जो प्रज्ञावतार के माध्यम से सम्पन्न होने जा रही है।”
माताजी की प्रेरक वाणी ने उपस्थित कार्यकर्त्ताओं की अन्तर्भावनाओं में भूचाल ला दिया । उस समय शाँतिकुँज में शक्तिपीठ के कार्यकर्ताओं के सत्र चल रहे थे। देखते-ही-देखते दस अश्वमेध यज्ञों के संकल्प हो गए। इन संकल्पों के साथ उन्होंने यह कहकर सभी को अचम्भे में डाल दिया कि वे स्वयं इन महायज्ञों के संचालन हेतु जाएँगी। उनके इस कथन ने देश-विदेश के कार्यकर्ताओं में उत्साह का ज्वार ला दिया। सभी हर्षविभोर हो उठे। प्रत्येक की इच्छा थी, जन-मन की हार्दिक अभिलाषा थी कि माताजी उसके क्षेत्र में अवश्य आएँ। इच्छाएँ संकल्पों में बदलने लगीं और इन संकल्पों की धूम मच गई। देश में ही नहीं विदेशों में भी संकल्प होने लगे। तभी इन तरंगित भावनाओं के बीच प्रथम अश्वमेध की पुण्य घड़ी आ पहुँची।
यपुर (राज.) 7 से 10 नवम्बर, 1992।
देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के शुभारम्भ का यह प्रथम शंखनाद था। समारोह की प्रभात बेला में 6 नवम्बर, 1992 को ग्यारह सौ से भी अधिक मंगल-कलश-धारिणी देवियों द्वारा गंगामाता मन्दिर के निकट तीर्थ परिक्रमा यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। तत्कालीन केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण उपमंत्री सुश्री गिरजा व्यास ने पूजन, अर्चन कर शोभायात्रा को आगे बढ़ाया। मध्याह्न साढ़े ग्यारह बजे राजस्थान प्रशासन के राजकीय विमान द्वारा वन्द. माताजी हरिद्वार से जयपुर पहुँची। जहाँ उनका स्वागत राजस्थान शासन के प्रतिनिधि गृहमंत्री श्री दिग्विजयसिंह और स्वायत्त शासन मंत्री श्री भँवरलाल शर्मा ने किया।
भिलाई (म.प्र.) 17 से 20 फरवरी, 1993।
इस आयोजन के साथ शिवरात्रि पर्व भी जुड़ा था। 18 फरवरी को प्रातः से ही आश्वमेधिक आवाहन-पूजन की प्रक्रिया का प्रारम्भ सोत्साह प्रारम्भ हो गया। इसी बीच माताजी का शुभागमन हुआ। तत्कालीन केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुनसिंह ने आकर माताजी को प्रणाम करके यज्ञ के प्रति अपनी सद्भावना अर्पित की।
गुना (म.प्र.) 3 से 6 अप्रैल, 1993।
तीन अप्रैल को वन्दनीया माताजी का हवाई अड्डे पर प्रमुख कार्यकर्ताओं एवं अधिकारियों के साथ ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिन्धिया ने भव्य स्वागत किया। राजमाता के अतिरिक्त, श्री दिग्विजय सिंह, म.प्र. विधान सभा के अध्यक्ष श्री बृजमोहन मिश्रा, श्री माधव राव सिन्धिया आदि महानुभावों ने इस यज्ञानुष्ठान में अपनी भावभरी आहुतियाँ अर्पित की।
भुवनेश्वर (उड़ीसा) 3 से 6 मई, 1993।
भुवनेश्वर अश्वमेध में मातृशक्ति ने प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी रहकर अपनी गरिमामय भूमिका का परिचय दिया। एक विशिष्ट देवानुग्रह यह भी रहा कि तेज हवाओं से उछलते हुए पाण्डाल में यज्ञ कुण्डों की अग्नि पर वायु का प्रतिकूल प्रभाव नहीं था। अविचल भाव से आहुतियाँ पड़ती रहीं।
लेस्टर (यु.के.) 8 से 11 जुलाई 1993
देव संस्कृति दिग्विजय अभियान ने अपना एक पग और आगे बढ़ाया। इस कदम में प्रथम श्रेयाधिकारी इंग्लैण्ड बना। समारोह के विशिष्ट अभ्यागतों श्री कीथवाज, लाई मेयर, श्री जान मूडी आदि ने वन्द. माताजी को नमन कर पाँच-पाँच मिनट अपनी भावाभिव्यक्ति दी। इंग्लैण्ड में भारत के उच्चायुक्त श्री लक्ष्मीमल सिंधवी सपत्नीक इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।
टोरण्टो (कनाडा) 23 से 25 जुलाई, 1993
कनाडा की प्रधानमंत्री श्री कैम्पबेल सहित अनेक मन्त्रियों के सहयोग के कारण यहाँ की व्यवस्था दर्शनीय रही । टोरण्टो हवाई अड्डे पर वहाँ के मुख्य संगठनों के प्रमुख तथा गायत्री परिवार के मुख्य परिजनों ने वन्दनीया माताजी का स्वागत किया। माताजी के पधारते ही भीषण वर्षा थम गई और खुशगवार मौसम में अश्वमेध सम्पन्न हुआ।
लॉस एंजेल्स (यु.एस.ए.) 19 से 22 अगस्त, 1993
1008 कुण्डों में यज्ञाग्नि प्रज्ज्वलित होने पर सम्पूर्ण वातावरण में दिव्यता छा गई। यज्ञ-स्थल में लगभग 30 हजार की उपस्थिति में वन्दनीया माताजी ने संक्षिप्त दीक्षा उद्बोधन के साथ सभी को दीक्षा दी।
लखनऊ (उ.प्र.) 27 से 30 अक्टूबर, 1993
महायज्ञ का शुभारम्भ 27 अक्टूबर को भव्य मंगल कलश यात्रा से हुआ। 30 को पूर्णाहुति के दिन सोलह पालियों में लगभग 2 लाख श्रद्धालु याजकों ने श्रद्धापूर्वक यजन किया। प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री मोतीलाल वोरा एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर कार्यवाहक प्रो. राजेन्द्रसिंह एक साथ मंत्र पर उपस्थित थे। दिनाँक 29 को दीप यज्ञ के पूर्व माननीय शेषाद्रि जी तथा दीप यज्ञ के मध्य श्री अटल बिहारी बाजपेई ने मंच पर उपस्थित होकर अपने उद्गार किए।
बड़ौदा (गुजरात) 26 से 29 नवम्बर, 1993
अपराह्न यज्ञाश्व पूजन के समय वन्द, माताजी ने गुजराती भाषा में यज्ञारम्भ की घोषणा की। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री चिमनभाई पटेल दिनाँक 27 को यज्ञ में पहुँचे। उन्होंने राज्य की ओर से ताजी का स्वागत किया। यज्ञ में गायकवाड़ राजपरिवार की भागीदारी प्रषंसनीय थी।
भोपाल (म.प्र.)11 से 14 दिसम्बर, 1993
10 दिसम्बर को कलशयात्रा का शुभारम्भ महामहिम राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा की माताजी के द्वारा पूजन-अर्जन के साथ हुआ। मध्याह्न 12.30 पर राजकीय अतिथि के रूप में वन्दनीया माताजी बैरागढ़ हवाई अड्डे पहुंचीं। मुख्यमंत्री श्री दिग्विजयसिंह ने 13 दिसम्बर को जनसभा में वन्द. माताजी से आशीर्वाद लिया और श्रोताओं को सम्बोधित किया। मध्यप्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री मो. शफी कुरैशी 12 ता. को जनसभा में पूरे समय रहे। उन्होंने अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा-”यहाँ मैं कुछ दे नहीं सका, कुछ लेकर जा रहा हूँ।”
नागपुर (महाराष्ट्र) 6 से 9 जनवरी, 1994
लोकमान्य तिलक, शिवाजी महाराज, रामदास, तुकाराम आदि महापुरुषों की जन्मभूमि में हुआ यह महायज्ञ अनेक रूपों में अद्भुत था। डा. श्री कान्त (काँग्रेस साँसद) एवं श्री बनवारी लाल पुरोहित (पूर्व भाजपा साँसद) ने यज्ञ कार्य में संयोजन का दायित्व लिया। सर्वेक्षकों ने इसे नवयुग का महाकुम्भ कहा।
ब्रह्मपुर (उड़ीसा) 26 से 29 जनवरी, 1994
दिनाँक 26 जनवरी को प्रातः देवपूजन अत्यन्त भावपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। सायंकालीन पारी में माताजी की उपस्थिति के बाद उत्साह एवं उमंग की सीमा न रही। दिनाँक 27 से ही अनपेक्षित भीड़ उमड़ पड़ी। उड़ीसा के अंतरंग भागों एवं आंध्रप्रदेश से पहुंचे भोले- भाले ग्रामीणों से लेकर सुशिक्षितों में यज्ञ के प्रति असाधारण उत्साह था।
कोरबा (मध्यप्रदेश) 6 से 9 फरवरी, 1994
छत्तीसगढ़ क्षेत्र में एक वर्ष पुरा होते-होते यह दूसरा अश्वमेध यज्ञ था। वन्दनीया माताजी दिनाँक 7 फरवरी की मध्याह्न 2.30 बजे कोरबा पहुँचीं। यज्ञीय कार्यक्रमों के संचालन के साथ उन्होंने नित्यप्रति सारे स्टेडियम के अन्दर गोल पथ पर खुली गाड़ी में घूमकर परिजनों के अभिवादन स्वीकार करते हुए मंगलाशीश दिए।
पटना (बिहार) 23 से 26 फरवरी, 1994
पटना अश्वमेध यज्ञ कुछ नए अनोखे कीर्तिमान दिखाएगा, यह बात प्रारम्भ से ही झलकने लगी थी। यज्ञ प्रारम्भ से ही झलकने लगी थी। यज्ञ प्रारम्भ होने के पूर्व ही समारोहों में राज्य के राज्यपाल महोदय एवं मुख्यमंत्री महोदय के पहुँचने तथा उत्साह भरे सहयोग की घोषणा ने क्षेत्रीय कार्यकर्त्ताओं के मन में अपूर्व उत्साह का संचार किया। धर्म मंच पर लोगों ने मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव को पहली बार भावुक होते देखा। व्यक्तिगत वार्ता में उनने आते ही कहा- “ मेरी माँ मुझे मिल गई।” इस प्रकार बुद्धावतार के क्षेत्र में प्रज्ञावतार का प्रखर प्रवाह उभरा।
कुरुक्षेत्र (हरियाणा) 31 मार्च से 3 अप्रैल, 1994
श्रीमद्भगवद्गीता की भूमि कुरुक्षेत्र में आयोजन के प्रथम दिन हरियाणा के राज्यपाल श्री धनिक लाल मण्डल ने आकर पू. गुरुदेव के जीवन दर्शन की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। शिक्षामंत्री श्री फूलचन्द्र मुलाना ने वन्दनीया माताजी की अगवानी की। 1 अप्रैल को तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भजन लालजी भी यज्ञ करने आए। वहाँ से वन्दनीया माताजी से भेंट करने, उनके ठहरने के स्थान पर भी गए। वहाँ उनके साथ केन्द्रीय मंत्री श्री विद्याचरण शुक्ल एवं बिहार के मुख्यमंत्री श्री जगन्नाथ मिश्र भी थे।
चित्रकुट 16 से 20 अप्रैल, 1994
किसी को भी पता नहीं था कि चित्रकुट कार्यक्रम वन्दनीया माताजी का अन्तिम प्रवास होगा। किन्तु उनकी उस यात्रा में इस पत्रिका के सम्पादक को तो संकेत मिले, उनका मर्म बाद में उद्घाटित हुआ। वन्द.माताजी बार-बार पूछतीं थीं- “ प्रणव। रामनवमी को हम कहाँ होंगे? उन्हें जवाब दिया जाता कि हम लोग चित्रकुट में होंगे। यकायक विमान के जालीग्राण्ट हवाई अड्डे से रवाना होते समय वे बोलीं-”अब मैं शायद विमान यात्रा न कर पाऊँ, विमान की अब जरूरत भी क्या पड़ेगी।”
सतना हवाई अड्डे में उतरने पर वहाँ से कारों का काफिला पिण्डरा शक्तिपीठ पहुँचा। इस शक्तिपीठ प्राण-प्रतिष्ठा करते समय वह यकायक बोल उठीं- “प्रणव! शायद यह अंतिम प्राण प्रतिष्ठा है। मैंने जयपुर में पहली प्राण प्रतिष्ठा की थी। उसके बाद के क्रम में यह अब अन्तिम ही है। मैं शायद इसके बाद आगे कहीं और यह उपक्रम न कर सकूँ।
“16 से 20 अप्रैल की उनकी यात्रा उनकी ही नहीं, मिशन की जीवन यात्रा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस अवधि में अश्वमेध महायज्ञ के कार्य को सम्पन्न करने के साथ, वे अपनी शारीरिक अशक्तता के बावजूद उन स्थानों पर गयीं, जहाँ कभी भगवान श्रीराम अपने लीला-सहचरों, सीता माता तथा भाई लक्ष्मण के साथ गए थे। चित्रकुट यात्रा में उनके साथ रही, उनकी अनन्य भक्त सेवाभावी मानस पुत्री, दुर्गा दीदी ने बाद के दिनों में बताया कि-”चित्रकूट में मैं अक्सर देखती कि माताजी जैसे अपनी पुरानी यादों में खोयी हुई हैं। अचरज तब होता जब स्फटिक शिला, कामदगिरि, गुप्त गोदावरी जैसे स्थानों पर पहुँचने पर वह कुछ इस तरह देखने लगतीं मानो यही-कहीं अपने श्रीराम को ढूँढ़ रही हों।” उनकी इसी यात्रा के साथ अश्वमेध अभियान का एक अध्याय पूर्ण हो गया। अश्वमेध यज्ञ तो बाद में भी हुए पर उनमें उनकी स्थूल उपस्थिति नहीं रही। तब तक वे स्थूल से सूक्ष्म हो चुकी थीं।
अश्वमेध महायज्ञों की अभूतपूर्व सफलता के साथ ही वन्दनीया माताजी को विश्वास हो गया कि उनके बच्चे अब अपनी जिम्मेदारी सँभालने योग्य हो गए हैं। उन्हें अपने उस दायित्व बोध के पुरा होने की अनुभूति हुई, जिसकी साँकेतिक चर्चा वे यदा- कदा करती रहती थीं। उन्हें लगने लगा कि बाकी कार्य अब सूक्ष्म संकेतों से भी चल जाएगा। इसके लिए अब स्थूल शरीर की कोई विशेष आवश्यकता नहीं। उनका यह भाव चित्रकूट अश्वमेध यज्ञ से वापस लौटने पर और भी गहरा हो गया। परम पू. गुरुदेव से एकाकार होने की उनकी आतुरता और अधिक घनीभूत हो उठी।
पु. गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद अक्सर वे भावुक हो जाया करती थीं। गुरुदेव के प्रसंग आते ही उनकी अन्तः पीड़ा बरबस नेत्रों से छलक उठती। श्रद्धाँजलि समारोह के समापन के बाद उन्होंने अपने कक्ष से सटे हुए बड़े हाल में सभी स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं की गोष्ठी ली थी। उसमें उन्होंने कहा था- “मेरी तो अब चलाचली की बेला है। बच्चों! मिशन को तो तुम्हें ही चलाना होगा। पूर्णाहुति के दिन से ही मेरा मन अब जाने को हो रहा है। मुझसे अपने आराध्य का वियोग सहा नहीं जाता। तुम बुज़दिल मत बनना। वो तो बाजी मार ले गए। अस्सी साल में आठ सौ साल का काम करके चले गए। मुझे तुम्हारी देख−रेख को छोड़ गए तो बेटो! तीन-चार साल जबतक शरीर साथ देगा व देखूँगी कि तुम मजबूत हो गए तो मैं भी चल दूँगी। मैं भला अपने आराध्य से दूर क्यों रहूँ। मेरा चिन्तन अब ऐसा ही बन रहा है, किन्तु तुम निराश मत होना, चार साल बहुत होते हैं ।”
बात के क्रम का आगे बढ़ाते हुए वह बोलीं- तुम सबको देखना है कि आगे क्या होता है, सन् 1995 से 2000 में जो काम होंगे वे माताजी नहीं बेटेजी करेंगे । यह और भी शानदार होंगे। अब हम मिशनरी भावना की तरह फैलते चले जाएँगे। देखते-देखते कई गुना हो जाएँगे। तुममें से विवेकानन्द निकलेंगे, दयानन्द निकलेंगे, निवेदिताएँ निकलेंगी और देखते जाओ, तुमसे वह करा लेंगे जो तुमने कभी सोचा भी नहीं था। अशक्तता की वजह से मेरे हाथ-पैर भले ही न चलते हों पर मेरी शक्ति पूरी तुम्हारे साथ है। जब मैंने गुरुजी के साथ रहकर यहाँ तक विकास कर लिया तो तुम मेरा आशीर्वाद लेकर चलो, देखो तो सही तुम्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा दूँगी।
जिस शारीरिक अशक्तता का जिक्र उन्होंने अपनी गोष्ठी में किया था। चित्रकूट अश्वमेध के बाद से वह और ज्यादा हो गयी। वैसे भी शरीर का संचालक मन है। जब तक मन शरीरगत रहता है, देह की सार-सँभाल होती रहती है। सामान्यजन तो देह परायण होते हैं। उनका मन चौबीसों घण्टे देह के बारे में ही सोचता रहता है। लेकिन यह सोच देह के रखरखाव की नहीं, देह को माध्यम बनाकर अत्यधिक भागों की चाह ही बाद में उनकी दुर्गति का कारण बनती है। परन्तु योगीजनों को न तो भोगों की परवाह होती है और न चाह। उनका मन तो पूरी तरह परमात्मा में तल्लीन होता है। यह तल्लीनता जब बढ़ती जाती है तो मन के सूत्र शरीर से टूटने लगते हैं और देह से उनकी आत्मा का बिछोह हो जाता है।
यह कारण है कि योगीजन मन के सूत्रों को देह से जोड़े रखने के लिए किसी न किसी गतिविधि अथवा प्रवृत्ति को अपनाते रहते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस प्रायः भावसमाधि में रहा करते थे। भावसमाधि को तोड़ने के लिए वे मन को खाने-पीने की चीजों में लगाते रहते थे, ताकि देहबोध बना रहे। गुरुनानक, तुकाराम, समर्थ रामदास प्रभृति सन्तों, भक्तों ने लोकसेवा को अपनी देह रक्षा का साधन चुना था। वन्द. माताजी ने मिशन की गतिविधियों में अपने का संलग्न कर रखा था। यह संलग्नता उनकी अपने आराध्य की सेवा भी थी और इसी के माध्यम से मन देह और संसार से जुड़ा रहता था। पर बाद के दिनों में उनका मन सभी ओर से सिमटकर पू.गुरुदेव में तल्लीन होने लगा। इस बढ़ती तल्लीनता के कारण देह के सूत्र टूटने लगे।
मन और देह के सूत्रों का टूटना, उनका अस्त-व्यस्त होना ही उनकी बीमारी का कारण बना। वैसे इस बीमारी का एक और कारण था, जिसका जिक्र करते हुए गुरुदेव ने एक स्थान पर लिखा है-”शरीर छोड़ते समय हम लोगों को भी कष्ट आ सकता है। माताजी भी बीमार पड़ सकती है। पर यह बीमारी उनके किसी कर्म विपाक के कारण नहीं होगी। परिजनों, अपने बच्चों के कष्ट जो अत्यधिक मात्रा में उन्होंने लिए हैं उसे वे देह की बीमारी के माध्यम से निबटाकर जाएँगी, ताकि किसी तरह का कर्म बन्धन न रहे और जीवन मुक्ति की स्थिति में किसी तरह का व्यवधान न पड़े।”
बस यही कारण था वन्द. माताजी की बीमारी का, जो उन्होंने मई से सितम्बर तक अपने ऊपर ली। अतिशय दैहिक कष्ट के बावजूद समीपस्थ जनों ने उन्हें हमेशा हँसते-मुसकराते हुए ही देखा। चरम पीड़ा और असह्य वेदना कभी उनके मन को स्पर्श नहीं कर सकी। बीमारी के दिनों में उन्हें देखने वाला स्वल्पबोध क्षमता सम्पन्न बालक देह और नित्य मुक्त आत्मा के अन्तर का गम्भीर दार्शनिक तत्व बड़ी आसानी से समझ सकता था। इन दिनों भी वह आने-जाने वालों के भोजन का आश्चर्यजनक रूप से ध्यान रखती थीं। बाहर से आया हुआ एक कार्यकर्ता जब उनसे मिलने गया, उस समय वे गहरे कष्ट में थीं। पर उसे देखते ही वे बड़े वात्सल्यपूर्ण स्वर में बोलीं-”बेटा! इसे अभी खाना खिलाओ।” उनके इन शब्दों को सुनकर सुनने वाले की आँखें भर आयीं।
तभी तो पू. गुरुदेव उनके बारे में कहा करते थे-” माताजी आदि से अन्त तक माताजी ही हैं। मई 1971 की अखण्ड ज्योति में उन्होंने लिखा- “यों वे रिश्ते में हमारी धर्मपत्नी लगती हैं, पर वस्तुतः वे अन्य सभी की तरह हमें भी माता की भाँति दुलारती रही हैं। उनमें मातृत्व की इतनी उदारता गरिमा भरी पड़ी है कि अपने वर्तमान परिवार को भरपूर स्नेह दे सकें” और सचमुच यह स्नेह उन्होंने अपनी अन्तिम साँस तक दिया भी। बीमारी के दिनों में तो यह शायद पहले से भी कहीं अधिक बढ़ गया था। जिनसे वे मिलीं, जो उनके पास गए, वे भावपूरित हो गए और जो नहीं जा पाए वे भी अपनी अन्तरात्मा में उनके प्यार की छुअन प्रतिपल महसूस करते रहे।
बीमारी के दिनों में ही भिण्ड में 17 वाँ अश्वमेध यज्ञ 3 से 5 मई, 1994 को आयोजित हुआ। इस अश्वमेध में जैन मत के प्रतिष्ठित विद्वान दिगम्बर सन्त श्री योगेन्द्र सागर जी पधारे। आयोजन, जनसमूह, विशिष्ट अभ्यागत सभी को माताजी का अदृश्य स्पर्श महसूस होता रहा। इस अश्वमेध के थोड़े ही दिन बाद शिमला (हि.प्र.) में 18 वें अश्वमेध महायज्ञ का आयोजन हुआ। इस आयोजन में समूचे पर्वतीय क्षेत्र के कर्मनिष्ठ भावनिष्ठ, जनश्रद्धा से ओत-प्रात होते देखे गए। कइयों ने अपनी मान्यताओं, भावनाओं के अनुसार यह कहा कि यह देवों का यज्ञ हैं। सारे देवता यहाँ अपने दिव्य शरीर से पधारे हैं। जब आदिशक्ति स्वयं अपने दिव्य शरीर से गयीं थीं, तो उनकी अनुगत देवशक्तियों का वहाँ आना अचरज जैसी कोई बात नहीं।
इन अश्वमेध महायज्ञों के पश्चात् भाद्रपद मास की पूर्णिमा आ पहुँची। माताजी ने इसी दिन को अपने आराध्य से शाश्वत मिलन के लिए चूना था। इस दिन प्रातः से ही शाँतिकुँज में अजब रोमाँचक स्थिति थी। सभी कार्यकर्त्ता सहमे-सकुचे-से थे। कइयों को उनके अंतर्मन में घटना के पूर्व संकेत भी मिल रहे थे। प्रायः सभी के मन तथ्य से अवगत हो चले थे। पर एक-दूसरे से कहने-सुनने में हर कोई संकोच अनुभव कर रहा था। आज का मौसम भी समशीतोष्ण हो चला था। वर्षा के उमस भरे दिनों में भी शीतल समीर का अहसास हो रहा था। कुछ ऐसा लग रहा था जैसे देवगण वन्दनीया माताजी की अगवानी के लिए तैयार हो चुके हों।
और वे पल आ ही गए। 11 बजकर 40 मिनट से ही हर पल एक संकेत देने लगा था। जीवात्मा देह से अपने संपर्क तन्तुओं को समेटते जा रही थी। दस मिनट बाद ही परम वन्दनीया माताजी अपने आराध्य से एकाकार हो गयीं। परम पू. गुरुदेव ने इस स्थिति की चर्चा करते हुए जनवरी 1988 की अखण्ड ज्योति में-’जोति फिर भी बुझेगी नहीं’ शीर्षक के अंतर्गत लिखा है-”प्रकृति के नियम बदले नहीं जा सकते। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्द्धन और परिवर्तन होते रहना एक शाश्वत क्रम है। इस नियति चक्र से हम लोगों के शरीर भी नहीं बच सकते। बदन बदलने के समय में अब बहुत देर नहीं है। पर वस्तुतः यह कोई बड़ी घटना नहीं है। अविनाशी चेतना के रूप में आत्ता सदा अजर-अमर है। परिजन हम लोगों का संयुक्त जीवन अखण्ड दीपक का प्रतीक मानकर उसे आत्मसत्ता की साकार प्रतिमा मानते रहें। वह हम लोगों के लिए मत्स्यवेध जैसा लक्ष्यवेध करने वाले शब्दबेधी बाण की तरह आराध्य बनकर रही है। साथ ही साधना का सम्बल भी।”
शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा, पर क्षणभर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक का ज्वलन्त ज्योति में समा जाएँगे जिसके आधार पर अखण्ड ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म-चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे व इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत स्थिति में रहे हैं। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जाएँगी और उसे तेल बाती की प्रथक सत्ताओं की एक लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा, यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा। इस महामिलन को प्रज्ञा और श्रद्धा का एकीकरण भी समझा जा सकेगा।
प्रज्ञा और श्रद्धा के इस एकीकरण ने सूक्ष्म होते हुए भी स्थूल में प्राणों का नवसंचार किया । यह प्राण-ऊर्जा बाद के अश्वमेध यज्ञों में महसूस की जाती रही। इस अश्वमेध यज्ञों का क्रम इस प्रकार रहा-
19. बुलंदशहर (उ.प्र.) 17 से 20 नवम्बर, 94
श्रद्धेया शैलदीदी ने इस कार्यक्रम का संचालन किया। इस कार्यक्रम में पधारे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं चिपको आन्दोलन के नेता श्री सुन्दरलाल बहुगुणा ने कहा- “ मैं आप सबको आपके सौभाग्य के लिए बधाई देने आया सब जो कुछ लाख लोग जमा हैं, दुनिया का नई राह दिखाना चाहते हैं।”
20. हल्दीघाटी (राज.) 29 नवंबर से 2 दिसम्बर, 94
राणा प्रताप की शौर्यभूमि हल्दीघाटी से सम्पन्न हुआ यह महायज्ञ अनेक तरह से अद्वितीय रहा। यज्ञीय प्रक्रिया में सभी वर्गों के विशिष्ट अभ्यागतों ने भाग लिया। तृतीय पीठेष्वर पुष्टिमार्ग, निम्बर्काचार्य के साथ अनेक राजनेतागण भी पधारे। यज्ञ के क्रम में राजसमन्द की विशाल झील के किनारे हजारों व्यक्तियों द्वारा हल्दीघाटी के शूरवीरों का श्रद्धासिक्त तर्पण किया गया।
21. राजकोट (गुजरात) 14 से 17 दिसम्बर, 94
श्रद्धेया शैलदीदी ने लाल मशाल जलाकर यज्ञ का शुभारम्भ किया। यज्ञ के कार्यक्रम में गुजरात शासन के वित्तमंत्री श्री मनोहर सिंह जाडेजा, राज्यमंडी डॉ. चन्द्रिकाबेन चूड़ा सामा के साथ सौराष्ट्र नारी जगत की अग्रणी सुश्री सहनाज बाबी भी पधारी। सुश्री बाबी ने इस के सम्बन्ध में कहा-”यह हिन्दुओं का ही नहीं, मानव मात्र का कल्याण करने वाला विराट आयोजन है।”
22. जबलपुर (म.प्र.) 28 से 31 जनवरी, 95
मध्यप्रदेश की संस्कारधानी कहे जाने वाले इस शहर में सम्पन्न हुए महायज्ञ में राज्य महामहिम राज्यपाल मो. शफी कुरैशी ने कहा-गायत्री परिवार एकता और समता की राष्ट्रीय भावनाएँ फैला रहा है। उसे हर जगह सुना जा सकता है और सूना जाएगा। अश्वमेध के अन्यान्य कार्यक्रमों में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल, संत सुधारक हृदय-रामजी आदि ने भी भाग लिया, प्रोत्साहन दिया।
23. कोटा (राज.) 12 से 15 फरवरी, 1995
इस आयोजन की भव्यता एवं विशालता को देखते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने 10 हजार से अधिक स्वयं सेवक भेजे। प्रधानमंत्री कार्यालय से सम्बद्ध तत्कालीन राज्यमंत्री श्री भुवनेश चतुर्वेदी ने यज्ञशाला में उपस्थित होकर सभी याज्ञिकों, ऋत्विजों को अभिनन्द किया।
24. गोरखपुर (उ.प्र.) 25 से 28 फरवरी, 1995। यज्ञीय कार्यक्रमों की भव्यता के अतिरिक्त इस कार्यक्रम की सबसे बड़ा उपलब्धि इस यज्ञ का वैज्ञानिक प्रयोग-परीक्षण है। यहाँ की एक सामाजिक संस्था एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय के दो शोध छात्रों तथा डॉ. राकेश शर्मा ने अलग-अलग मिट्टी, पानी, हवा के यज्ञ के समय और बाद के नमूने लिए। परीक्षण के उपरान्त जो परिणाम उपलब्ध हुए हैं उन्हें क्रान्ति से भरा एक उद्घोष कहा जा सकता है।
25. इन्दौर (म.प्र.) 5 से 8 अप्रैल 1995
श्रद्धामय भव्यता से भरे इस आयोजन में पधारे म.प्र. क मुख्यमंत्री श्री दिग्विजयसिह ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा- “मैं यहाँ मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, गायत्री परिवार के स्वयं सेवक के रूप में आया हूं। यही मेरा वास्तविक पद है।”
26. शिकागो (अमेरिका) 27 से 30 जुलाई, 1995
यहाँ सम्पन्न हुए अश्वमेध महायज्ञ का प्रभाव इतना व्यापक रहा कि इसके तुरन्त बाद प्रथम विश्वधर्म संसद, जहाँ स्वामी विवेकानन्द ने अपना ऐतिहासिक भाषण दिया था, वहाँ पर एक ताम्र पट्टिका का अमेरिकन सरकार द्वारा लगायी गयी एवं आर्ट इन्स्टीट्यूट को सभी भारतीयों के लिए खोल दिया गया।
अश्वमेध महायज्ञों की इस कड़ी में 27 वाँ अश्वमेध 26 से 29 जुलाई, 1996 की तिथियों में अपने भव्य आकर्षण के साथ इस पंक्तियों के लिखे जाने के समय ही सम्पन्न हो रहा है। इन सभी की आश्चर्यजनक सफलता, उमड़ती जप श्रद्धा को देखकर यही कहा जा सकता है कि वन्दनीया माताजी ने अपने जीवनकाल में जिस अभियान को आरम्भ किया था, उसमें उन्होंने सूक्ष्म होकर नए प्राणों का संचार किया।
भव्य आयोजन यों ढेरों संस्थाएँ प्रतिवर्ष करती रहती हैं। करोड़ों की संख्या में धन भी लगाया जाता है। किन्तु एक ऐसा आयोजन, जिसमें छोटे-बड़े, हर जाति, वर्ग, सम्प्रदाय के व्यक्ति की न्यूनाधिक शक्ति नियोजित हुई हो, विशुद्धतः आध्यात्मिक ऊर्जा से अनुप्राणित हो वह आँवलखेड़ा का पूर्णाहुति आयोजन ही कहा जाएगा। इसकी शुरुआत 1 नवम्बर, 1994 को वन्दनीया माताजी के शक्ति कलश की स्थापना से हुई। यह शक्ति कलश शाँतिकुँज हरिद्वार से चलकर दिल्ली होता हुआ आँवलखेड़ा लाया गया था। भारत की राजधानी दिल्ली में तालकटोरा स्टेडियम में 30 अक्टूबर के दिन लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष श्री शिवराज पाटिल, प्रतिपक्ष नेता श्री अटल बिहारी बाजपेई, श्री नरेन्द्र मोहन (संस्थापक दैनिक जागरण कानपुर) एवं श्री मणिशंकर अय्यर (सुप्रसिद्ध पत्रकार एवं साँसद) के द्वारा चढ़ाए गए श्रद्धा सुमनों एवं पन्द्रह हजार परिजनों की भावांज्जलि के पश्चात् यह यात्रा संपन्न हुई थी।
कलश यात्रा के दिन से ही एक वर्ष का अखण्ड जप अनुष्ठान गायत्री शक्तिपीठ परिसर में प्रारम्भ हो गया। सूक्ष्म जगत के परिशोधन एवं महाप्रज्ञा के अभेद सुरक्षा कवच निर्माण के निमित्त यह अनुष्ठान वर्षभर चलता रहा। इस पूरे एक वर्ष में अनेकानेक प्रकार की अनुभूतियाँ परिजनों को होती रहीं । वह जन्मभूमि जहाँ आज से 85 वर्ष पूर्व हमारी आराध्य गुरुसत्ता प्रकट हुई थी, एक तीर्थ का रूप लेने लगी। इस चार हजार आबादी वाले छोटे से गाँव में जब इतने वृहद आयोजन की बात उठती तो सभी हैरत में पड़ जाते । आखिर कैसे और किस तरह हो सकेगा यह सब?
इस प्रश्न का सार्थक समाधान प्रस्तुत करने का
श्रेय अपने मिशन के समर्पित इंजीनियर कार्यकर्त्ताओं को है । जिनके सही विज्ञानसम्मत विधि से किए गए सर्वेक्षण एवं निर्माण कार्य ने जन्मभूमि स्मारक से लेकर चौबीस नगरों, भोजनालयों, कलामंच, ज्ञान- मंच, देवमंच, संस्कारमंच तथा विचारमंच से लेकर प्रदर्शनी को मूर्त रूप दे दिया। इस समूचे निर्माण को देखकर विश्वकर्मा द्वारा आनन-फानन किए निर्माण कार्य की पौराणिक कथाएँ संजीव हो उठती थीं । देखने वालों को लगने लगता कुछ इसी तरह उन्होंने इन्द्र की सुधर्मा सभा द्वारिकापुरी का निर्माण किया होगा।
इस कार्य में सबसे बड़ी समस्या थी निर्माण स्थल पर खड़े बाजरे के खेत । कैसे तो वह फसल कटे व कैसे वह स्थान इस योग्य बने कि वहाँ निर्माण आरम्भ हो सके। इसके लिए आए हुए अभियन्तागणों से लेकर प्रायः पाँच हजार से अधिक समयदानियों ने पन्द्रह दिन से भी कम की अवधि में सारी फसल काटकर किसानों के पास पहुँचाने तथा उन स्थानों पर रोलर्स चलाकर किसानों के पास पहुँचाने तथा उन स्थानों पर रोलर्स चलाकर उन्हें समतल बनाने का पुरुषार्थ सम्पन्न किया। ये पंक्तियाँ पढ़ने में जितनी आसान लगती हैं, कार्य फावड़ा, गैती, कुदाली तो क्या छोटा-मोटा बागवानी का काम भी नहीं किया था, उनने अगस्त, सितम्बर एवं अक्टूबर के पूर्वार्द्ध की कड़ी धूप में खड़ी फसल को काटकर अभियन्ताओं के कार्य को सुगम बनाया। अस्थाई टीन शेड बनते चले गए, स्वयंसेवक नगर बना, उनका भोजनालय चलने लगा। इस सबसे साथ ही पूरे क्षेत्र के आस-पास के गाँवों की प्रव्रज्या, दीवाल लेखन, गाँव की सफाई आदि कार्य भी चलते रहे। भावनासिक्त इस श्रमदान की काई कीमत नहीं लगाई जा सकती गुरुनिष्ठा से उपजा यह श्रमदान हमेशा- हमेशा मिशन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में चमकता रहेगा। श्रमदान जितना भावभरा थी, उतना ही श्रद्धा से ओत-प्रोत था आंवलखेड़ा की पुण्य भूमि के किसानों का सहयोग । इस ग्राम व आस-पास के सभी गाँवों के किसानों ने भावभरे स्वर में कहा-” हम अपनी नियमित फसल की बुवाई नहीं करेंगे, पुरा ढाई हजार एकड़ का क्षेत्र आपके लिए है, आप जैसा चाहे उपयोग करें ।” छोटी खेती वाले किसानों से लेकर बड़े किसानों ने एक स्वर से कहा-”कार्यक्रम यहीं होना चाहिए। हम आलू आदि की फसल जो बोई गयी थी जब निर्माण वालों को स्थान की आवश्यकता पड़ी, कच्ची-अधपकी फसल भी वे लोग स्वेच्छा से काटते रहे। भावना का प्रवाह कुछ ऐसा था कि उस्मानपुर ग्राम ने तो सर्वसम्मति से अपना नाम श्री रामपुर कर लिया।
यह कथा निर्माण काल की है। इस बीच अखण्ड जप अनवरत चलता रह। जिस पावन स्थली में आश्विन कृष्ण त्रयोदशी वि. संवत् 196(20 सितम्बर, 1911) के पावन दिन परम पू. गुरुदेव का अवतरण हुआ था, उसी परिसर में इस अवसर पर एक भव्य कीर्ति स्तम्भ की स्थापना हुई। कीर्ति स्तम्भ के शीर्ष पर ज्ञान यज्ञ की लाल मशाल जो संघ शक्ति की प्रतीक है, स्थापित की गई है। इसी पिछले हिस्से में बने एक भव्य कक्ष में पूज्यवर के जीवनरूपी विशाल सागर मंथन के निकले चौदह रत्नों के रूप में उनकी जीवन यात्रा के चरणों को चौदह शीर्षकों में बाँटकर काले ग्रेनाइट पत्थर पर सुनहरे अक्षरों में उकेरा गया है। पूज्यवर एवं माताजी के बड़े आकार के चित्र भी यहाँ लगाए गए हैं।
इस कीर्तिस्तम्भ को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पी. वी. नरसिंह राव ने 2 नवम्बर की अपराह्न वेला में राष्ट्र में समर्पित किया। वे विशेष रूप से उसके लिए वायुसेना के विमान से आगरा आए और आगरा से हैलिकॉप्टर से आँवलखेड़ा में तब आए थे जब स्वयं उन्हें अगले दिन एक लम्बी विदेशयात्रा पर रवाना होना था। उनके साथ पूर्व रक्षा राज्य मंत्री श्री सुरेश पचौरी, पूर्व जल संसाधन एवं संसदीय कार्य मंत्री श्री विद्याचरण शुक्ल, श्री रामलाल राही, श्री भुवनेश्वर चतुर्वेदी, श्री अरविन्द नेताम, उ.प्र. के तत्कालीन राज्यपाल श्री मोतीलाल वोरा एवं अखिल भारतीय काँग्रेस समिति के महासचिव श्री माधव सिंह सोलंकी एवं जनार्दन पुजारी भी थे। इतना बड़ा काफिला एवं उसके साथ जुड़ी सुरक्षा व्यवस्था आने से परिजनों को कुछ असुविधा भी हुई, किन्तु वह थोड़ी देर को थी इसलिए यह ली गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री जी का यह काफिला पूज्यवर की विराट जीवन प्रदर्शनी, आदर्श ग्राम का मॉडल देखकर जन्मभूमि की ओर बढ़ा वहाँ से प्रवचन मंच पर आया। वहाँ श्री राव ने स्मारिका का विमोचन करने के पश्चात् दिए गए अपने उद्बोधन में इस यात्रा को एक आध्यात्मिक यात्रा बताया और राष्ट्र निर्माण में गायत्री परिवार के योगदान की सराहना की।
पूर्णाहुति महायज्ञ के देव पूजन के क्रम में वयोवृद्ध स्वामी कल्याणदेव ने आकर सभी को विभोर कर दिया। शक्रताल (मुजफ्फर नगर) गंगातटवासी संत श्री कल्याणदेव जी लगभग 108 वर्ष से अधिक आयु के हैं। पू. गुरुदेव सही अर्थों में ब्राह्मण की परिभाषा करते हुए सबसे प्रथम उन्हीं का उदाहरण देते रहे है। जीवेम् शरदः शतम् की उक्ति को चरितार्थ करते स्वामी जी सभी के प्रेरणा के स्रोत हैं। पूज्यवर एवं माताजी के चित्रों पर पुष्पाँजलि अर्पित कर देवमंच से उन्होंने भावभरे शब्दों में कहा- मैं तो मात्र आचार्य जी एवं उनके क्रियाकलापों के यज्ञीय जीवन के दर्शन हेतु मथुरा जाता था। मेरा उनका सम्बन्ध तो कृष्ण सुदामा के समान था। उनके निर्देशानुसार मैंने भी अपने क्षेत्र में सौ से भी अधिक यज्ञ कराए। संत श्रेष्ठ स्वामी जी ही देवमंच से बोले। बाकी जो भी अतिथि अभ्यागत आए, उन्हें आयोजन तंत्र ने विचार मंच से बोलने की व्यवस्था रखी थी। एक नवंबर को पूर्व प्रधानमंत्री व उनके साथ आए मंत्रीगणों के अतिरिक्त तीन नवम्बर को काँग्रेस (तिवारी) के कार्यकारी अध्यक्ष श्री अर्जुन सिंह चार नवम्बर को इसी के अध्यक्ष एवं वर्तमान साँसद श्री नारायण दत्त तिवारी, भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव श्री जगदीशचंद्र पन्त, छह नवम्बर को म.प्र. मुख्यमंत्री श्री दिग्विजयसिंह एवं राज्यपाल श्री मो. शफी कुरैशी पधारे। छह नवम्बर को ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहकार्य वाहक श्री कुप.सी. सुदर्शन भी विशेष रूप से अपने व्यस्त कार्यक्रमों के बीच आए। सात नवम्बर के दिन जो पूर्णाहुति का दिन था, अन्तिम दिन था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक श्री प्रो. राजेन्द्र सिंह ने आकर यज्ञशाला में हवन किया, संयोजन मण्डल से मिले तथा प्रदर्शनी देखकर प्रसन्न मन से अपने अगले कार्यक्रम की ओर चले गए।
प्रथम पूर्णाहुति के इस कार्यक्रम में सम्पूर्ण यज्ञ नगर में पाँच मंच स्थापित थे। जिसमें देवमंच, संस्कारमंच एवं ज्ञानमंच। इन तीनों से विशुद्धतः आध्यात्मिक उद्बोधनों निर्दोषों एवं प्रेरणा को देने का क्रम चला। विचारमंच एवं कलामंच अलग उद्देश्यों के लिए बनाए गए थे। पूरे सात दिन प्रायः बीस से पच्चीस लाख व्यक्ति इस यज्ञ नगर में आते रहे व इन मंचों से प्रवाहित ज्ञान गंगा में स्नान कर लाभ लेते रहे।
देवमंच 1251 कुण्डीय यज्ञशाला के शीर्ष पर स्थित था। जहाँ से कलश यात्रा के बाद हुई कलश-स्थापना (3 नवम्बर से लेकर पूर्णाहुति 7 नवम्बर) के दिन तक समग्र संचालन गणाध्यक्ष, ब्रह्मणाच्छाँसी, ब्रह्मा, अध्वर्यु होता, उद्गाता भाई-बहिनों के द्वारा होता रहा। विगत सहस्र वर्ष के इतिहास में सम्भवतः पहली बार नारी शक्ति द्वार इतने बड़े महायज्ञ का संचालन किया गया।
संस्कारमंच इस बार विशिष्ट बनाया गया था। पर्णाच्छादित दो चौबीस कुण्डीय यज्ञशालाएं भी साथ में विनिर्मित थीं। गुरु ग्राम में दीक्षा लेने का विशेष महत्व समझते हुए पाँच व छह नवम्बर को तीस-तीस हजार नए परिजनों के अतिरिक्त हजारों पुराने परिजनों ने पुनः दीक्षा ली। विशिष्ट संस्कारों के क्रम में वेद स्थापना (वेद पूजन) का क्रम भी तीसों दिन सम्पन्न हुआ। सस्वर मंत्र पाठ व भावपूर्ण संगीत के साथ ब्रह्मवादिनी बहिनों एवं भाइयों द्वारा पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ आदि संस्कार भी सम्पन्न होते रहे। इसके अतिरिक्त 108 आदर्श विवाह, 1200 वानप्रस्थ संस्कार भी सम्पन्न हुए।
ज्ञानमंच-बैकड्राप के रूप में जन्मस्थली की झल व परम पू. गुरुदेव के विराट् रूप को दर्शाता एक चित्र पृष्ठभाग में था। गुरुसत्ता के प्रतीक के रूप में बीच में एक भव्य सिंहासन पर गुरुदेव एवं माताजी की पादुकाएँ थी। प्रतिनिधि रूप में श्रद्धेय पंडित लीलापति जी शर्मा, डॉ. प्रणव पण्ड्या ने अपने विचार इस मंच से व्यक्त किए। इसी मंच से भव्य विराट् दीप यज्ञ का संचालन भी किया गया।
विचारमंच- इसे केन्द्रीय कार्यालय के सामने आगरा रोड पर बनाया गया था। पत्रकार नगर भी पास में ही था । अतः सारे भारत से आए पत्रकार इसमें सतत् उपस्थिति रहे। विचार मंच से विचार क्रान्ति का स्वर गुँजायमान करने वाले स्वर मुखरित होते रहे। मुख्य रूप से इसका स्वरूप एक विचार गोष्ठी का था। कोई एक नहीं 5-6 वक्ता निर्धारित विषय पर अपने विचार व्यक्त करते गए।
कलामंच- यह न केवल क्षेत्रीय स्तर की प्रतिभाओं के लिए एक ऐतिहासिक अवसर था, बल्कि जन-जन के लिए एक स्वस्थ मनोरंजन का स्वरूप लेकर सामने आया। पूज्यवर चाहते थे कि लोकरंजन से लोकमंगल के लिए लोक कला को पुनर्जीवित किया जाए। यह भूमिका कलामंच ने पूरी तरह निभाई। शाँतिकुँज के समर्पित युवा कार्यकर्त्ता श्री उमाकान्त सिंह के सूत्र-संचालन में प्रतिभाओं के सम्मोहन प्रदर्शन ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
इस विराट् आयोजन का सर्वाधिक आकर्षक केन्द्र-बिन्दु थी एक व्यापक प्रदर्शनी। यह कई भागों में बँटी थी किन्तु प्रत्येक अपने में परिपूर्ण । गुरुदेव-माताजी के निर्धारणों, जीवन दर्शन, आदर्शों का राष्ट्र निर्माण के विविध कार्यक्रमों की मनोरम झाँकी यहाँ प्रदर्शित की गई थी। समर्पित कलाकारों द्वारा बनायी गई महाकाल की विराट प्रतिमा सर्वाधिक आकर्षक का केन्द्रबिन्दु थी। इस प्रदर्शनी को देखने वाले अनायास ही पूज्यवर के विचारों एवं जीवनक्रम को अपने अन्तः- करण की गहराइयों में धारण करते देखे गए।
पूर्णाहुति महायज्ञ के इस कार्यक्रम में मीडिया प्रशासन की भूमिका के बारे में जितना कहा जाय कम ही होगा। सभी ने यथायोग्य अपनी शक्ति अनुसार इसमें योगदान दिया। इस आयोजन की पूर्णता तो सन् 2001 में हुई मानी जाएगी। पर इतना अवश्य कहना होगा, इस आयोजन के रूप में शांतिकुंज की चौबीस वर्षा की सतत् साधना पूर्ण हुई। शाँतिकुँज के लिए इन पिछले चौबीस वर्षों का प्रत्येक वर्ष उसके संस्थापक के चौबीस पुरश्चरणों वाले, चौबीस वर्षों का अन्तिम अध्याय था, इसी के साथ तरुण तपस्वी शाँतिकुँज ने अपने पच्चीसवें वर्ष रजत जयन्ती वर्ष में प्रवेश किया।
अपने पच्चीस वर्षों में शाँतिकुँज ने न सिर्फ स्थूल कलेवर और दृश्यमान गतिविधियों का विस्तार किया है, बल्कि सूक्ष्म क्षमता भी व्यापक बनाई है। इतने दिनों में इसकी अदृश्य क्षमता और दिव्य शक्तियों का आश्चर्यजनक विस्तार हुआ हैं। यहाँ अपरिमित आध्यात्मिक ऊर्जा संग्रहित हुई है। अपनी स्थापना के प्रथम दिन से ही यहाँ जो आध्यात्मिक प्रयोग सम्पन्न हुए हैं, उनकी झलक पिछले पृष्ठों में दी जा चुकी है। वन्दनीया माताजी के संरक्षण में 24 देवकन्याओं द्वारा सम्पन्न किए गए 24-24 लाख के 24 गायत्री महापुरश्चरण, प्राण प्रत्यावर्तन सत्र, कल्पसाधना सत्र, कल्पसाधना सत्र, चांद्रायण शिविर, संजीवनी, साधना, जीवन साधना सत्र जैसे अनगिन सत्रों से अब तक यहाँ साधक लाभान्वित होते रहे हैं।
अभी तक यहाँ जा साधनाएँ होती रहीं उसमें शाँतिकुँज की भूमिका एक तपः स्थली की थी। यह सिर्फ संस्कारित दिव्य साधना स्थली भर थी पर, अब जबकि पूज्यवर एवं माताजी सूक्ष्म शरीरधारी हो गए- यह शाँतिकुँज उनका स्थूल शरीर बन चुका है। इसके द्वारा वहीं भूमिका सम्पादित होनी है जो कभी गुरुदेव-माताजी का यह निर्माण अब स्वयं निर्माता बन गया है। इस तथ्य को बनाने हुए पूज्यवर के शब्द हैं- “ अभी हम लोगों के शरीर शाँतिकुँज में रहते हैं। पीछे भी हम इस परिसर के कण-कण में समाए हुए रहेंगे इसकी अनुभूति निवासियों और आम...... का समान रूप से होती रहेगी। आगे कि दिनों में शाँतिकुँज ही हमारा स्थूल शरीर होगा। यहाँ से वे गतिविधियाँ, प्रवृत्तियां चलती रहेंगी, जिन्हें हम स्थूल शरीर के माध्यम से चलाते रहते हैं। यहाँ आने वालों को अनुदान, वरदान मिलने एवं मार्गदर्शन प्राप्त करने का सिलसिला भी जारी रहेगा। इसीलिए शरीर परिवर्तन की बात सोचने पर न हमें कुछ खिन्नता होती है और न शाँतिकुँज का वास्तविक स्वरूप समझने वाले अन्य किसी स्वजन परिजन को होनी चाहिए।”
आज के शाँतिकुँज के स्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए उन्होंने तीस नवम्बर 1989 की एक गोष्ठी में कहा था-”आगे आने वाले दिनों में यहाँ आने वालों को बहुत कठिन साधनाओं के चक्कर में नहीं पड़ना पड़ना पड़ेगा। उन्हें तुम लोग इतना बताना- अब शाँतिकुँज ही गुरुजी का स्थूल शरीर है, यहाँ की प्रत्येक गतिविधि एवं क्रियाकलाप में उन्हीं का स्पर्श है। शरीर के रक्त प्रवाह एवं प्राण प्रवाह की तरह गुरुजी -माताजी का तप प्राण यहाँ बिखरा हुआ हैं। इसे अपनी हर साँस में धारण करो। हरपल-हरक्षण इसी भाव में रहो कि यहाँ की तप-ऊर्जा रोम-रोम से, साँस-साँस से अन्दर प्रवेश कर रही है।”
यहाँ के संचालन तंत्र ने ऊर्जा अनुदान के इन विशेष साधना सत्रों को वर्तमान रजत जयन्ती वर्ष में आयोजित करने का क्रम चलाया है। अपने प्रयोजन एवं प्रक्रिया के अनुरूप इनका नाम भी ऊर्जा अनुदान सत्र रखा गया है। युग सन्धि के इन क्षणों में असुरता अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। उसे भी महाकाल की सुनिश्चित विधान का पता है पर जिसका अस्तित्व ही समूल नष्ट होने वाला हो, वह भला अपना अन्तिम जार लगाने में क्यों कोर-कसर उठा रखेगा। आसुरी शक्तियों के भी यही हाल है। उनने अन्तिम साँसों में देवत्व के मार्ग पर वज्र प्रहार करने की कसम खा ली है। यही कारण है कि सज्जनता, भलमनसाहत इन दिनों कुछ विशेष ही पीड़ित हैं। नवनिर्माण के अभियान में जुटे युग सेनानियों को भी असंख्य घात-प्रतिघात झेलने पड़ रहे हैं। आज इन सबको पूज्यवर की ऊर्जा अनुदान की जितनी सख्त जरूरत है, उतनी शायद पहले कभी नहीं रही।
पू. गुरुदेव की सूक्ष्म सत्ता का निर्देश पिछली बसंत को इसी रूप में उतरा था और उसे क्रियान्वित भी किया गया। ऊर्जा अनुदान सत्रों की शृंखला अपने अपेक्षित रूप में ही चल रही है। इन सत्रों में साधना एवं प्रशिक्षण दोनों का समावेश है। ध्यान-साधना के प्रभावी प्रयोग के साथ इसमें गायत्री महामंत्र के विलक्षण प्रयोग बताए जाते हैं। जिन दिनों राम-रावण युद्ध अपनी चरम सीमा पर था। रावण अपनी विनाशकारी शक्तियों के प्रयोग में जी-जान से लगा हुआ था। उन्हीं दिनों महर्षि अगस्त्य एवं महर्षि विश्वामित्र के आश्रम की गतिविधियाँ भी पूरे जोर-शोर पर थी। ये दोनों ऋषि अपनी विलक्षण तपशक्ति से रीछ-वानरों का प्रतिपल ऊर्जा अनुदान बाँट रहे थे। इस क्रम में एक बार तो महर्षि अगस्त्य को सूर्यशक्ति का एक विलक्षण प्रयोग बताने के लिए स्वयं रणभूमि में आना पड़ा।
आज भी मानवता को संकटापन्न दशा से उबारने में जुटे युग सेनानियों को ऊर्जा अनुदान की जरूरत है। जिसकी व्यवस्था शाँतिकुँज में की गई है। अब पहले की तरह वर्ष में एक बार आने से काम नहीं चलेगा। उन्हें साल में कम से कम दो बार जरूर आना चाहिए। स्वयं आने के साथ अपने साथ जुड़ने वाले नए परिजनों को भी लाएँ। गुरु सत्ता का स्पर्श, समर्थ प्राणों से महामिलन जितनी बार और जितने अधिक समय तक हो उतना ही अच्छा।
साधना का सुयोग, समर्थ सत्ता का भावपूर्ण स्पर्श, युग-सन्धि की वर्तमान क्षणों के लिए प्रभावी कार्य-नीति का प्रशिक्षण एक साथ प्राप्त हो सकेंगे। ऊर्जा अनुदान के इन सत्रों में आने के इच्छुक व्यक्तियों को पूर्व सूचना भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। असमय और अस्त-व्यस्त मनः स्थिति लेकर आने पर प्रभावी प्रशिक्षण एवं साधनात्मक मनोवृत्ति का निर्माण दोनों ही नहीं बन पड़ते हैं। इसलिए हम अस्त-व्यस्तता का जितना दूर किया जाये उतना ही अच्छा। परिजन इन सत्रों को रजत जयन्ती वर्ष का विशिष्ट अनुदान मानें । इनका स्वरूप भले उतना कठोर व बनाया गया हो, पर इनसे होने वाले लाभों को चमत्कारी और आश्चर्यचकित करने वाला ही कहा जाएगा। समर्थ शक्ति उद्गम से ऊर्जा का अनुदान पाने वाले आत्मकल्याण और लोककल्याण के लिए कुछ ऐसा कर सकेंगे जो युगों तक भुलाया न जा सके।
*समाप्त*