तुम उसे अवश्य पा लोगे

किसी पहाड़ी झील पर नजर डालों। तुषार की रुपहली चादर बिछी हुई है। हवा चलती है पाली बरसता है बादल गरजते हैं, बिजली चमकती है किन्तु झील की निश्चलता में कोई अन्तर नहीं आता। किनारों पर रंग-बिरंगे पक्षी कुँजते और किलोल करते हैं किन्तु उस झील में कोई विक्षेप उत्पन्न नहीं होता तट पर फैली वृक्षावली में एक से एक सुन्दर, सुगन्धित फूल खिलते शाखा में से टूटकर झील पर गिरते हैं किन्तु झील के स्थिर हृदय में उनका कोई प्रतिबिंब नहीं उठता वह अपने निर्विकल्प भाव में एक समान तन्मय रहती है। तुममें यदि उस झील की तरह स्थिरता तन्मयता और निर्विकलता का धैर्य है तो तुम उसे अवश्य पा लोगे।

वैद्य जंगल से तरह-तरह की घास-फूँस उखाड़ लाता है । उन्हें पानी से साफ करता है भली-प्रकार कूटता पीसता, मसलता है इन्हें आग में खौलाता है उबालता है इन घास-पत्तियों को दहकते अंगारों, धधकती लपटों में जलना, भूनना, रा, होना पता लेकिन ये घास-पत्तियों सारी यन्त्रणाएँ समर्पित भाव से सहन करती हैं उफ की ध्वनि, आहें की सिसकी, विरोध की प्रतिक्रिया उनमें कभी नहीं होती । यदि तुममें अपने गुरु के प्रति इन घास-पत्तियों की तरह का समर्पण भाव है तो तुम उसे अवश्य पा लोगे।

कुम्हार तालाब से मिट्टी खोद लाता है उसे कूट पीस कर महीन बनाता और छानकर साफ करके पानी डालकर उसे खूब रौंदता पीटता है। तैयार हो जानें पर चाक पर चढ़ाकर अपनी इच्छा के अनुसार वह उसे आदमी पशु या पक्षी का रूप देता है किन्तु इतना सब होने पर भी मृतिका कुछ नहीं बोलती । सब कुछ समभाव से सहन करती हुई कुम्भकार की इच्छा-वशवर्ती रहती है यदि तुममें उस मृतिका की भांति सहनशीलता और नम्रता है तो तुम उसे अवश्य पा लोगे।

मरुस्थल में भटके प्राणी की वाँछा में पानी की लालसा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। पानी के लिए उसकी व्याकुलता इतनी बढ़ जाती हैं कि उसे तपती रेत के कणों में पानी का आभास होने लगता है वह छटपटाता है, दौड़ता है विकलता है उसकी चाह होती हैं किसी पानी से लबालब भरे जलाशय की नहीं, सिर्फ एक बूँद जल की। वह बूँद में ही अपने सर्वस्व को खोजता है पनघट पर खड़े पथिक की प्यास में न तो इतनी व्याकुलता होती है और न एकांतिकता। वह पानी के अतिरिक्त वहां के दृश्य भी देखता और रस भी लेता है वहां पास में खड़े लोगों से गप-शप का आनन्द भी लूटने लगता है यदि तुम उसे पाना चाहते हो तो पनघट पर खड़े प्यार से पथिक की इच्छा नहीं भटके तृषित प्राणी की आकाँक्षा लेकर चलो , एक दिन तुम उसे अवश्य पा लोगे।


‘विश्ववारा’ भारतीय संस्कृति

संस्कृति का अर्थ है वह कृति-कार्य पद्धति जो संस्कार सम्पन्न हो। ऊबड़-खाबड़ पेड़-पौधों को जिस प्रकार काट छांट के उन्हें सुरम्य और सुशोभित बनाया जाता है, वही काम व्यक्ति की उच्छृंखल मनोवृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करके संस्कृति द्वारा सम्पन्न किया जाता है किसान जिस भूमि को खाद-पानी, जुताई -निराई आदि से उर्वर बनाता है और बीज बोने से लेकर फसल तैयार होने तक उन पौधों को सींचने, सँभालने, रखाने आदि की अनेक प्रक्रियाएँ सम्पन्न करता है वही कार्य संस्कृति द्वारा मानवीय मनोभूमि को उर्वर एवं फलित बनाने के लिए किया जाता है अंग्रेजी में संस्कृति के लिए ‘कल्चर ‘ शब्द आता है उसका शब्दार्थ भी उसी छवि को प्रकट करता है। अस्तव्यस्तता के निराकरण और व्यवस्था के निर्माण के लिए जो प्रयत्न किए जाए, उन्हें ‘कल्चर’ कहा जा सकता है संस्कृति का भी यही प्रयोजन हैं ।’संस्कृति ‘ के साथ ‘भारतीय ‘ शब्द जोड़कर उसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है इसका अर्थ यह नहीं कि वह मात्र भारतीयों के लिए ही उपयोगी है अन्वेषण का श्रेय देने के लिए कई वार नामकरण उनके कर्ताओं को दे दिया जाता है कई ग्रह-नक्षत्रों की अभी नई शोध हुई है उनके नाम उनके शोधकर्ताओं के नाम पर रख दिये गए हैं पहाड़ों की जिन ऊंची चोटियों पा जो यात्री पहले पहुँचे इनके नाम भी उस साहसियों के नाम पर रख दिए गए। धर्म -सम्प्रदायों के सम्बन्ध में भी ऐसा ही होता रहा है उनके आचार्यों संस्थापकों का नाम स्मरण बना रहे, इसलिए उनके नाम से वे सम्प्रदाय पुकारे जाते हैं इसका अर्थ उन पदार्थों या लेना नहीं है। जिनका कि नाम जोड़ दिया गया है। हिंदुस्तान में वर्जीनिया तम्बाकू पैदा होती हैं जिसका प्रारम्भिक उत्पादन वर्जीनिया में हुआ था, इसलिए नामकरण उसी आधार पर हो गया। यह प्रतिबन्ध लगाने की बात कोई सोच भी नहीं सकता कि उस तम्बाकू का उपयोग या उत्पादन मात्र भारतीय संस्कृति का प्रयोग पोषण एवं विस्तार भारत से हुआ, इसलिए उसे उस नाम से पुकारा जाता है, तो यह उचित हो हैं पर इसका अर्थ यह नहीं माना जाना चाहिए कि उसका प्रयोग इसी देश के निवासियों तक सीमित था अथवा रहना चाहिए।

‘सा प्रथमा विश्ववारा’ कहकर यजुर्वेद ने इसके भारत वर्ष में प्रथम आविष्कृत होने, तत्पश्चात् विश्वव्यापी बनने की बात स्वीकारी है। सृष्टि के आरम्भ से सम्भव है ऐसी छूट-छूट संस्कृतियों का भी उदय हुआ हो जो वर्ग विशेष काल विशेष अथवा क्षेत्र विशेष के लिए उपयोगी रही हों उन सबको पीछे छोड़कर यह भारतीय संस्कृति ही प्रथम बार इस रूप में प्रस्तुत हुई हक उसे विश्व संस्कृति कहा जा सके। हुआ भी यही जब उसका स्वरूप सर्वसाधारण को विदित हुआ जो उसकी सर्वश्रेष्ठता को सर्वत्र स्वीकार ही किया जाता रहा। फलस्वरूप वह विश्वव्यापी होती चली गयी। इतिहास भी इसे एक सर्वसामान्य तथ्य के रूप में स्वीकार करता है कि जा भी इसके संपर्क में आया, इसी का हो गया।

सुप्रसिद्ध पाश्चात्य मनीषी एवं भारतीय विद्याओं के ज्ञाता सर विलियम जोन्स ने भारत के साँस्कृतिक ग्रंथों के अध्ययन के पश्चात् कहा-” आने आपको ऐसे उदात्त वातावरण में पाकर मुझे अनिवर्चनीय आनन्द की अनुभूति हुई हैं यह महान देश जो दूर-दूर तक एशियाई देशों से घिरा है जिसको विज्ञान की धरती होने का सम्मान प्राप्त है जिसने गौरवपूर्ण कार्यों के दृश्य उपस्थित किए हैं। जो मानवीय प्रतिभा का उर्वर उत्पत्ति स्थान है । जो आश्चर्यजनक प्राकृतिक विचित्रताओं से भरा पड़ा है और जो धर्म-प्रशासन शास्त्रीय नियमों , शिष्टाचार , रीति- रिवाजों, विविध भाषाओं तथा मनुष्यों के विविध वर्गों का अटूट भण्डार है इसी देश की संस्कृति ने मनुष्य को उसके मनुष्यत्व की गरिमा की सीख दी हैं

विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय संस्कृति के विस्तार का कारण थी- यहां के ऋषियों की ‘वसुौव कुटुम्बकम्’ की भावना । वे सदैव किसी सीमित क्षेत्र के हित साधन के विषय में न सोचकर समस्त विश्व की एकता, प्रगति एवं समृद्धि का चिन्तन करते थे। तभी तो भारतीय मनीषी डाफ॰ राधाकृष्णन ने अपनी एक वक्तृता में कहा था -” भारतीय संस्कृति का अर्थ है मेल, सारी जातियों का मेल। इस प्रकार के महामेल को पैदा करने की इच्छा रखने वाली, सारी मानव जाति की उसके मंगल -कल्याण की ओर ले जाने की इच्छा रखने वाली यह ऋषि प्रणीत संस्कृति है। इसी विशाल दृष्टिकोण के कारण भारतवासी अपनी आध्यात्मिक एवं भौतिक सम्पदा को विश्व के कोने-कोने में बाँटने हेतु पहुँचे ।

प्राचीन भारत में न केवल ऋषि वरन् सामान्य स्तर के लोगे में भी त्याग और आदर्शों के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा रहती थी। देश का प्रत्येक नागरिक आदर्शवादिता की प्रतिमूर्ति था। संकीर्ण स्वार्थपरता से भरा जीवन भर्त्सनीय एवं घृणास्पद माना जाता था। सन् 1994 में रूस में भारतीय विद्या के संस्थापक इवान मिनायेव ने कहा था-” भारत के सुदूर अतीत का जितना अधिक पूर्ण और चहुंमुखी अध्ययन हो रहा है, उतना ही अधिक यह स्पष्ट होता जा रहा है कि प्राचीन विश्व के भाग्य निर्माण में इस दूरवर्ती पूर्वी देश ने कितनी बड़ी भूमिका अदा की । पुरातन मानव के लिए यह एक समृद्ध देश मात्र नहीं था जहां से वह सोना, हाथी दाँत दौर रत्न ले जाता था बल्कि विवेक का देश भी था। विवेक की उपासना की जाती थी। जेरार्ड येकार्टोर ने अपने ग्रन्थ ‘काँस्मोग्राफी” में उन्होंने भारत को ‘सौर नगर’ कहा है जहां के लोग नित्य-प्रति गायत्री महामंत्र की उपासना सूर्य उपासना के रूप में किया करते हैं। उनके अनुसार यह इस तथ्य का स्पष्ट संकेत है कि भारत ने मात्र अपनी सम्पन्नता के कारण ही नहीं अपनी आध्यात्मिक चेतना के कारण विरुव को प्रभावित किया है। भारतीय दर्शन , वेद-पुराण, उपनिषद् , सबका लक्ष्य एक है, ‘श्रेष्ठतम की प्राप्ति । यह मात्र बुद्धिवाद के आधार पर नहीं लिखे गए। इनमें प्रतिपादित प्रत्येक तथ्य प्राचीन ऋषिगणों की तम -साधना का निष्कर्ष है चूंकि यह सृष्टि असीम है विचार असीम है अतः किसी भी एक विचार को पूर्ण नहीं माना जा सकता । इसी मूल तत्व को ध्यान में रखकर भारतीय संस्कृति दृष्टिकोण को संकुचित न कर विभिन्न विचारों को प्रकट करने वाली हैं जो भी श्रेष्ठ है उसे आत्मसात् करने वाली है इसी कारणवश यहां की साँस्कृतिक सम्पदा ने प्रत्येक विचारशील को आकर्षित एवं प्रभावित किया है फिर चाहे वह किसी भी देश का क्यों न हो। फ्रेंच मनीषी एन्ववेति दू यू पेरो द्वारा अनुवादित उपनिषदों ने जर्मन दार्शनिक शेंलिग और शोपेनहाँवर का भी ध्यान आकृष्ट किया । जिसने इसकी प्रशंसा में कहा-”यह मानव की उच्चतम बुद्धि का प्राकट्य है और उसने इस औषनिषदिक वाक्य को ग्रहण किया-’ब्रह्मविद् बह्मोव भवति’- अर्थात् ब्रह्म को जान लेने वाला ब्रह्म की हो जाता है वर्ष 1789 में सर विलियम जोम्स ने कालिदास की अमरकृति , अभिज्ञान शाकुन्तलम् का अंग्रेजी अनुवाद किया जिसको इतनी लोकप्रियता मिला कि बीस वर्षों से कम अवधि में इसके पाँच अँग्रेजी संस्करण निकल गए। 1891 में विरुवयात्री एवं क्रान्तिकारी विचारक जार्ज फाँर्स्टर द्वारा इसका जर्मन रूपांतरण हुआ। जिससे हर्डर एवं गेटे जैसे व्यक्ति भी प्रभावित हुए । श्लेगल ने स्पष्ट घोषणा ही कर दी कि विश्व साहित्य का सही इतिहास भारतीय साहित्य के बिना नहीं लिखा जा सकता।

यूरोपीय विद्वान मैक्समूलर की भारत भक्ति तो प्रसिद्ध ही हैं उन्होंने अपने जीवन का अधिकाँश भाग भारतीय विद्याओं को पढ़ने ओर उसे प्रकाशित करने में लगाया उनके द्वारा संपादित ‘सैक्रेड बुक ऑफ द ईस्ट’ ग्रन्थ माला वेदों का भाष्य एवं इण्डिया व्हाट इट कैन दीच अस‘ जैसी पुस्तकें इसका प्रमाण है भारतीय संस्कृति के महान उद्गाता स्वामी विवेकानन्द जब उनसे इंग्लैण्ड में मिले तो उन्होंने स्वामीजी से कहा-भारत मेरे स्वप्नों का देश है। यहां के साँस्कृतिक अन्वेषण की राह दिखाई हैं

जर्मन विद्वान जोहान हर्डर ने अपनी कृति ‘आइडियाज आफन ए फिलॉसफी आफ द हिस्ट्री ऑफ मैनकाइण्ड’ में लिखा है कि मनुष्य जाति के उद्गम की खोज भारत में करनी चाहिए जहां सरलता शक्ति और विनय जैसे सद्गुणों के साथ बुद्धि ने सर्वप्रथम स्वरूप ग्रहण किया। यदि स्पष्ट कहा जाय तो उसकी समता करने को यूरोपीय जगत की जड़ तो उसकी समता करने को यूरोपीय जगत की जड़ दार्शनिकता में कोई भी वस्तु नहीं है।

रामायण में वर्णित पारिवारिक आदर्श एवं जीवन मूल्य भारतीय जनमानस के लिए सदा से अनुकरणीय रहे है पारिवारिक विघटन की आग में जल रहा पश्चिम अशान्ति एवं तनाव से संत्रस्त है। वे भारतीय साँस्कृतिक विरासत को गहराई से समझने के लिए प्यासे हैं मानवीय मन के आध्येता कार्ल गुस्ताव जुँग ने कहा है “इनको अभी तक यह ज्ञान नहीं है कि जहां हम अपनी तकनीकी क्षमता के सामने पूर्वी देशों के देय समझते हैं वही प्राच्य जगत अपनी मनोवैज्ञानिक उपलब्धियों में हमारी पहुँच से बहुत आगे हैं भौतिक दृष्टि से जहाँ हम प्राच्य जगत से बहुत आगे हैं वहां हमारे आत्मिक उत्थान का मार्ग भारत देश ही प्रशस्त करेगा।

श्लेगल का मत है -” यदि कोई सर्वमान्य भारतीय संस्कृति के मूल में निहित उत्कृष्ट दैवी भावना को समझ लेता है, तो जिसे हम यूरोप में धर्म की संज्ञा देते हैं वह इस नाम के उपयुक्त नहीं। जिस प्रकार कला का अध्ययन करने के लिए इटली जाना आवश्यक है, उसी प्रकार प्रत्येक धर्मान्वेषी को भारत जाना चाहिए। वहां कुछ ऐसे धर्म के अंश अवश्य मिलेंगे, जिनके लिए यूरोप में भटकना व्यर्थ है। “ भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि शास्त्र के रूप में गीता के बारे में उसे कहा’- “एक गम्भीरतम एवं उत्कृष्टतम वस्तु जिस पर संसार गर्व कर सकता है।”

भारत की सांस्कृतिक विरासत से अनुदान पाने वाले वालों में अरब पीछे नहीं रहा। यहाँ के निवासियों ने भारत से वेदान्त , ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, रसायन और प्रशासन का ज्ञान प्राप्त किया। टाइरस ने अपने ग्रन्थोँ में उल्लेख किया है - सूफी मत के विचारों और पवित्र रीतियों के धार्मिक स्वरूप में बौद्ध एवं वेदान्त दर्शन का पर्याप्त योगदान रहा। चौथे खलीफा का मत था-” भारत में ही सबसे पहले किताबें लिखी गयी। और बुद्धि एवं ज्ञान का प्रसार भी यहां से हुआ। अरब विजितों की संस्कृति अपने में मिलाने के अभ्यासी थे उनके भारत के प्रति सम्मानजनक उद्गारों को असाधारण ही कहा जाएगा। खलीफा उमर को बताया गया था कि भारत की नदिया मोती है उसके पहाड़ लाल और पेड़ सुगन्धित है। फिर भी उसने भारत पर आक्रमण करने से इन्कार कर दिया। क्योंकि वह भारत को ऐसा देश समझता था, जहां विचारों एवं धर्म की पूर्ण स्वतन्त्रता है । जहाँ हिन्दू एवं मुसलमान अपने -अपने धर्म का आजादी से पालन कर सकते हैं। तभी तो अब्दुल फजल ने आइना ए अकबरी में लिखा है- “भारत के मुसलमानों को अपने को भारतीय महसूस करने में फर्क होता है

संस्कृति ज्ञान का यूरोप में प्रचार करने वाले मनीषी सर विलियम जोन्स ने लिखा है -” मैं हिन्दू नहीं हूं पर हिन्दुओं के सिद्धान्तों की मोहकता ने मुझे उन्हें अपनाने के लिए विवश किया है उनके इस कथन को मैं पूर्णतया स्वीकार करता हूं। भविष्य में सबसे अच्छे एक अतुलनीय, विवेकपूर्ण पवित्र और मनुष्यों को पापमुक्त करने वाले युग का समारम्भ होगा, जो अवश्य अंतहीन दण्ड व्यवस्था की भयावह आशंकाओं से श्रेष्ठ है।

अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण भारतीय संस्कृति को विश्ववारा कहा गया हैं ‘विश्ववारा ‘ शब्द का अर्थ होता है- विश्वकृणोतीति- विश्ववारा अर्थात् जो समस्त संसार द्वारा वरण की जा सके- स्वीकार की जा सके वह विश्ववारा । दूसरे शब्दों में इसे सार्वभौम भी कह सकते हैं। संस्कृति के लिए दूसरा शब्द ब्राह्मण ग्रंथों में ‘सोम’ आना है योग क्या हैं ? अमुतम् वै सोमः (शतपथ ) अमृत ही सोम है अमृत क्या है? ज्ञान और तप से उत्पन्न हुआ आनन्द इस प्रकार भारतीय संस्कृति का तात्पर्य उस श्रद्धा से है जो ज्ञान और तप की विवेक युक्त सत्प्रयत्नों की ओर हमारी भावनाशीलता को अग्रसर करती है इस संस्कृति के जब जहां जितनी मात्रा में अपनाया है। यहां उतनी ही भौतिक समृद्धि और आत्मिक विभूति का अनुभव उम्वदन किया गया है।

ऐसा नहीं है कि भारतीयों के नैतिक आदर्श अन्य लोगों से बहुत भिन्न है। परंतु भारतीय संस्कृति की एक महान विशेषता रही है कि उसने मानवीय व्यवहार के भूतपूर्ण बनाए रखने के लिए जंग दिये भले ही इसके लिए कुछ भी क्यों न बलिदान करना पड़े इसी भाव से अनुप्रेरित महात्मा गांधी की दृष्टि से स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण अहिंसा थी वे कहते थे मनुष्य समाज और राष्ट्र की एक इकाई है आज मानवीय व्यक्तित्व खंडित हो रहा है राजनैतिक प्रयत्नों से एकता स्थापित होना सन्देहास्पद है जब तक स्वयं का सुधार कर व्यक्तित्व में समग्रता नहीं लायी जाएगी तब राष्ट्र के सुधार और प्रगति का स्वप्न साकार नहीं होगा । नेक बने बिना राष्ट्र एक कैसे बनेगा। अपना सुधार कर लेने पर राष्ट्र अपने आप सुधर जाएगा।

,भारत में राष्ट्रीयता राज्य में नहीं संस्कृति में है। इसीलिए अनेक जनपदी, राज्यों भाषाओं और जातियों के होते हुए भी भारत एक राष्ट्र है पश्चिम में राष्ट्र एवं राज्य का एक ही अर्थ है अतः यहां नेशनल स्टेट ( राष्ट्र राज्य ) कहा जाता है। भारत में राष्ट्रीयता संस्कृति पर आधारित होने के कारण राष्ट्र को राज्य से उच्च स्थान दिया गया हैं वही आधार भविष्य में समस्त विश्व को एक सूत्र में पिरो दे तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए । यथार्थ में संस्कृति पर आधारित राष्ट्रीयता ही देश को बलवान बनाती हैं इस समय यूरोप भाषा पर आधारित छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा हुआ हैं यूरोप के देश भी समान संस्कृति पर आधारित राजनैतिक इकाई का सपना सँजो रहे हैं अब अधिकाँश यूरोपियनों की इच्छा है, भारतीय संस्कृति के राष्ट्रवाद के आदर्शों पर आधारित राजनैतिक इकाई बने। यूरोपीय समुदाय की स्थापना इस दिशा में एक शुरुआत है

भारतीय संस्कृति की अपनी अनेकों अनोखी विशेषताएं है सच तो यह है कि ‘संस्कृति‘ शब्द के साथ जुड़ी हुई विशेषताओं को प9रा करने में समस्त कसौटियों पर कसे जाने पर खरी सिद्ध होने में एक भारतीय संस्कृति ही समर्थ है। अन्रु संस्कृतियों तो मात्र ‘सभ्यता’ है। सभ्यता किसी देश काल एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विनिर्मित की जाती और उसी सीमा उतने ही दायरे में सीमित रहती हैं हर परिस्थिति एवं देश -काल के लिए समान रूप से उसका उपयोग नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें सैद्धान्तिक क्रम व्यवहारिक तथ्य अधिक होते हैं व्यवहार तो ऋतुओं के परिवर्तन के साथ ही बदल जाता है आयु का हेर-फेर भी व्यवहार बदलने को विवश कर देता है ऐसी दशा में व्यवहार व्यवस्थाओं की सधमता के आधार पर बनी हुई सभ्यता सार्वदेशिक अथवा सर्वकालीन हो ही कैसे सकती है। अंग्रेजी अथवा अरब की सभ्यता भारत के उपयुक्त बैठ सकती हैं इसमें सन्देह है।

भारत की साँस्कृतिक सम्पदा महान ही नहीं बेजोड़ भी हैं उसके आचरण , व्यवहारों के विशुद्ध रूप को देखें-मध्यकालीन विकृतियों को घुसपैठ को उसमें से हटा दे तो निःसन्देह वह व्यवहार व्यवस्था भी उतनी उच्च कोटि की सिद्ध होगी कि वैयक्तिक व्यवहार और सामाजिक संगठन की परिष्कृतिक शैली सामने आ जाय और हम उन जंजालों से बच जाए जो व्यष्टि और समष्टि को उद्विग्न, उन्मत्त बनाकर विनाश की आरे धकेलती चली जा रही हैं साँस्कृतिक उत्कृष्टता का तो कहना ही क्या उसे मानवीय ही नहीं दैवी संस्कृति भी कह सकते हैं मानव को ईश्वरत्व की दिव्यता प्रदान कर सकने की सारी संभावना उस दार्शनिक ढाँचे में विद्यमान है जिन्हें किसी समय भारतीय संस्कृति के मान से पुकारा जाता था और अब यदि वह शब्द किसी को अरुचिकर लगे, तो उसका नाम, विश्व संस्कृति भी दिया जा सकता हैं

धर्म, अध्याय, ईश्वर, जीव, प्रकृति, परलोक, पुनर्जन्म, स्वर्ग , नरक कर्म-अकर्म, प्रारब्ध, पुरुषार्थ, नीति, सदाचरण प्रथा-परम्परा , शस्त्र , दर्शन आदि मान्यताओं के माध्यम से इस संस्कृति की मान्यताएँ मनुष्य को चरित्रवान , संयमी, कर्तव्यपरायण , सज्जन, विवेकवान, उदार, और न्यायशील बनने की प्रेरणा देती है। सबमें अपनी आत्मा समाया देखकर सब के साथ अपनी पसन्दगी जैसे सौम्य सज्जनता भरा व्यवहार करना सिखाती है। और बताती है कि भौतिक सफलताएँ तथा उपलब्धियाँ न मिलने पर भी विचार एवं कर्म की उत्कृष्टता के साथ जुड़ी हुई दिव्य अनुभूति मात्र का अवलम्बन करके अभाव ग्रस्त परिस्थितियों में भी आनन्दित रहा जा सकता है। अधिकार की अपेक्षा कर्तव्य की प्राथमिकता, आलस्य एवं अवसाद का अन्त और प्रचण्ड पुरुषार्थ में निष्ठा अपने लिए कम दूसरों के लिए ज्यादा, यही तो भारतीय संस्कृति के मूल आधार है , जिन्हें शस्त्र और पुराणों के विभिन्न कथोपकथनों द्वारा अनेक पृष्ठभूमियों में प्रतिपादित किया गया है। यह मनुष्य को पूर्ण बनाने का एक नृतत्वविज्ञान, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र और समाजविज्ञान की एक परिष्कृत एवं समन्वित चिन्तन प्रक्रिया है, जिसे इसके अन्वेषकों के नाम से भारतीय संस्कृति कहा गया है। इसकी इसी उत्कृष्टता एवं विशेषता को स्वीकार करते हुए भारत में पोलैंड के राजदूत मार्या वुस्को ने कहा था-” भारत और भारतीय संस्कृति ने मेरे लिए दर्पण का काम किया है जिस तरह दर्पण के सामने खड़े होकर आदमी अपने को देखता पहचानता और अपना मूल्यांकन करता है उसी तरह भारत आकर मैंने स्वयं को समझा और पहचाना है और स्वयं को समझा और पहचाना है। स्वयं सुधारने -संवारने को कोशिश की है। इसके इसी निर्दोष स्वरूप स्वीकारने , अपनाने का आह्वान करते हुए साने गुरुजी के शब्द है-” मैं उत्कृष्टतापूर्वक संस्कृति का पालन प्रकाश मिले। इसे धारण कर सभी तेजस्वी हो। यह संस्कृति ज्ञानमय है, संग्राहक है, कर्ममय है । यह संस्कृति सभी को अपने निकट लेगी नए नए प्रयोग करेगी, अविरत उद्योग करते रहेगी। भारतीय संस्कृति का अर्थ है। सर्वांगीण विकास, सबका विकास। भारतीय संस्कृति की आत्मा छुआछूत को मानती नहीं, हिन्दू मुसलमान को जानती नहीं। यह प्रेमपूर्वक और विश्वासपूर्वक सबका आलिंगन करके ज्ञानमय और भक्ति कर्म का अखण्ड आधार लेकर माँगल्य सागर की ओर सच्चे मोक्ष सिन्धु की ओर ले जाने वाली संस्कृति है॥”

भगवान की इच्छा एवं समय का आह्वान है कि हम सब उसकी इस सृष्टि को इस महान संस्कृति के सिद्धान्तों के अनुसार अधिक सुन्दर, अधिक सूखी, अधिक समृद्ध और अधिक समुचित बनाने में उस परम प्रभु का हाथ बटाए। अपनी बुद्धि क्षमता और विशेषता से अन्य पिछड़े हुए जीवों की सुविधा का सृजन करें और परस्पर इस तरह का सद्व्यवहार बरते जिससे इस संसार में स्वर्गीय वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे।

भारतीय संस्कृति के उपासकों को महान यात्रा अनादि काल से आरम्भ हुई हैं व्यास-वाल्मीकि, बुद्ध , महावीर शंकराचार्य, रामानुज, तुकाराम , नानक, कबीर एवं महात्मा गांधी, महर्षि अरविन्द जैसी महान विभूतियों ने इस यात्रा को आगे बढ़ाया है। आइए हम छोटे-बड़े सब इस पावन यात्रा में सम्मिलित हो। आइए सब कोई आइए। आज भारतीय संस्कृति के ये सारे सत्पुत्र आप सबको, समूची विश्व मानवता को पुकार रहे है। यह पुकार जिसके हृदय तक पहुँचेगी वह धन्य होगा।


जिस मरने से जग डरें, मेरे मन आनन्द

अनुभव से गुजरी एक महिला ने अपने अनुभव को शब्द देते हुए कहा -” दर्द चरम सीमा तक पहुंचते ही अचानक रुक गया। छत के नीचे हवा में लटकी मैं नीचे सब कुछ देख व सुन रही थी। पेट को हिला रही नर्सों को मैंने यह कहते हुए सुना है भगवान । यह तो मर गई हैं

मृत्यु अनुभव की तीसरी अवसक्ति में लोग एक अंधेरे मार्ग से गुजरते हैं गुर्दा रोग की पीड़ित मृत्यु के अनुभव से गुजरी एक महिला के बताया ऐसा लग रहा था कि मैं नींद से जाग रही हूं । लेकिन मैं स्वप्न में नहीं थी। मैं एक सुरंग से नीचं जा रही थी। जो आगे से चौड़ी होती जा रही थी। गुर्दा रोग के ही कारण मृत्यु के अनुभव से गुजरे एक पुरुष ने बताया कि वह एक अंधेरी गुफा में तीव्र गति से यात्रा कर रहा था एवं पूर्णतया भार शून्य था। इस तरह के अनुभवों से गुजरे हुए कुछ लोग सुरंग में यात्रा की बात कहते हैं तो कुछ बाह्य आकाश में यात्रा का उल्लेख करते हैं। एक महिला के अनुसार जैसे ही मेरी चेतना विलुप्त हो गयी, मुझे याद है कि मैं काले आकाश से होकर तीव्र वेग से जा रही थी हृदय के आपातकालीन ऑपरेशन से गुजरे व्यक्ति के अनुसार वह आकाश में तीव्र गति से दौड़ रहा था।

सँकरी सुरंग में जाने या काले आकाश में यात्रा करने का सीमित अनुभव कुछ ही लोगों का रहा। अधिकतर लोगों ने स्वयं को न केवल विशाल आकाश में रूप ले लिया, जिसने गति के बढ़ने के साथ उन्हें एक दूसरे छोर की ओर बढ़ाया। यह एक नए आयाम के अनुभव का शुभारम्भ था, जिसे मृत्यु अनुभव की चतुर्थ अवस्था कहा गया है।

मृत्यु संकट से गुजरे एक व्यक्ति के अनुसार-” वह एक बहुत ही आकर्षक प्रकाश की ओर बढ़ रहा था । यह सुरंग के दूसरे सिरे पर था। “प्रसव पीड़ा में मृत्यु अनुभव से गुजरी एक महिला ने बताया वह एक लम्बी, अंधेरी सुरंग में तेजी से नीचे जा रही थी ऐसा लग रहा था जैसे कि वह तैर रही थी। उसे मार्ग में कुछ चेहरे भी दिखें। जो आए व चले गए। वे उसकी ओर प्रेमपूर्ण दृष्टि से देख रहे थे। लेकिन कुछ बोले नहीं। सुरंग के अन्त में पहुंचने पर वह एक अद्भुत गर्म चमकीले प्रकाश से घिर गयी। एक अन्य व्यक्ति ने इस अवस्था में अनुभव का मार्मिक चित्रण इन शब्दों में किया” सुरंग के अन्त में एक सफेद प्रकाश दिखा। लेकिन यह इतना दूर था कि इसकी तुलना आकाश के किसी सुदूर तारे से की जा सकती है। जैसे-जैसे अत्यंत तीव्रगति से मैं इसके समीप पहुंचता गया , इसका आकार भी बढ़ता गया। सारी यात्रा के अन्त में सामने सुन्दर नीला-सफेद प्रकाश था। जिसकी चमक अन्धा करते वाले प्रकाश से भी तीव्र थी। लेकिन इसके बावजूद आंख को किसी तरह की क्षति नहीं पहुंची उल्टे सुखद अनुभव हुआ। मृत्युकालीन अनुभव की अन्तिम अवस्था में पहुंचे व्यक्तियों का कहना है कि वे उस जगत में पहुंचे जहां से प्रकाश का उद्गम होता है यह जगत अद्वितीय सौंदर्य से परिपूर्ण है। वहां के रंग इस जगत के रंगों से भिन्न हैं इस जगत में पहले मर चुके प्रियजनों को स्वागत करते हुए भी देखा गया। अद्भुत वृक्ष फूल, भवन एवं दृश्यों को देखा। मात्र एक तिहाई लोग ही इस लोक तक पहुंच पाए। अन्यों को रास्ते से वापस अपने शरीर में लौटना पड़ा इस लोक में पहुंचे हुए सभी लोगों ने अपने अनुभव में बताया है उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध शरीर में वापस आना पड़ा

हृदय संघात के कारण मृत्यु के इस अनुभव को पा चुकी एक महिला ने माप्रेट को उनकी शोध के दौरान बताया कि वह वहां एक सुन्दर गांव की गली में धीरे-धीरे टहल रही थी। ऐसा लग रहा था कि मैं यहां हमेशा से रह रही हूँ। वहाँ पक्षी बहुत सुंदर स्वर में गा रहे थे। आकाश का रंग चमकीला नीला वहां के सभी रंग चमकदार होते हुए सुखद कोमल थे। वृक्षों का रंग भी चमकीला था परन्तु वृक्ष नहीं था। वहां सूर्य तो नहीं दिख रहा था, लेकिन उसकी प्रकाश एवं गर्मी अनुभव हो रही थी। गली में दूर-दर तक मैं देख रही थी। समय की मुझे कोई प्रवाह नहीं थी। मुझे लगा कि गली के दूसरे सिरे पर कोई मेरा इन्तजार कर रहा है। लेकिन मुझे कोई जल्दी नहीं थी। क्योंकि संसार का सारा समय अब मेरे पास था। हृदय गति रुकने के कारण मृत्युकालीन अनुभव से गुजरी एक अन्य महिला ने बताया कि मैं एक सुन्दर जगह पर थी। वहां की घास पृथ्वी की किसी भी वस्तु से अधिक हरी थी। साथ ही इसमें एक विशेष चमक थी। रंग अवर्णनीय थे। प्रकाश कल्पना से बाहर चमकीला था इस सबका शब्दों में वर्णन नहीं हो सकता। यह स्वर्गीय प्रकाश था। यहां उन लोगों को भी देखा जो मर चुके थे। शब्दों में उनसे कोई बात नहीं हो रही थी। फिर भी मैं उनको समझ रही थी और वे मुझको समझ रहे थे। अपूर्व शान्ति का अनुभव हो रहा था। मैं प्रफुल्लित थी। मुझे वहां की सब चीजों से एकाकार होने का अनुभव हो रहा थे। मैंने वहां ईसा को देखा। उनसे आ रहा प्रकाश इतना तीव्र था कि सामान्यता अन्धा कर देता, लेकिन वह आश्चर्यजनक रूप से सुखप्रद महसूस हो रहा था मेरा वहां हमेशा के लिए रहने का मन था, लेकिन मेरे अभिभावक देवदूत ने कहा कि मुझे वास जाना होगा, अभी मेरा समय पूरा नहीं हुआ हैं तब मैंने विचित्र स्पन्दनों को अनुभव किया और मैं पुनः वापस शरीर में आ गयी।

मार्ब्रेट ग्रे की ही भांति रेमण्ड ए मूडी ने भी 150 ऐसे व्यक्तियों का अध्ययन किया जो बीमारी, दुर्घटना या किसी अन्य कारण से मृत घोषित हो चुके थे। ये सभी अपने मृत्युकालीन अनुभव के बाद आश्चर्यजनक रूप से पुनः जीवित हो गए थे। अपने उस शोधपूर्ण अध्ययन के निष्कर्ष का उन्होंने अपनी पुस्तक ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’ में विस्तार से वर्णन किया है

इस विवरण के अनुसार सभी का अनुभव आदि से अन्त तक एक नहीं रहा। शोध विज्ञानी रेमण्ड मूडी ने सभी के अनुभवों का सार अपनी पुस्तक के एक मॉडल के रूप में व्यक्त किया है मूडी की वह अभिव्यक्ति कँनेथ रिंग एवं मार्गेट ग्रे के प्रतिपादन से बहुत मिलती -जुलती हैं इस मॉडल के अनुसार मर रहे व्यक्ति की शारीरिक पीड़ा की चरम सीमा पर उसके मृत होने की घोषणा की जाती है वह एक तीव्र घण्टी या अन्य किसी तरह संगीतमय ध्वनि सुनता है उसी क्षण वह स्वयं को एक लम्बी अंधेरी गुफा में तीव्र गति से प्रवेश करते हुए पाता है। यहां का शरीर भौतिक शरीर से भिन्न तरह का होता है। शीघ्र की उसकी मृत सम्बन्धियों एवं मित्रों से मुलाकात होती है। अन्त में एक स्नेह प्रेम की गरमाहट से भरा प्रकाश पुँज सामने प्रकट होता है। जो पहल कभी नहीं देखा गया था वह बिना किसी शब्द के प्रश्न पूछता है व जीवन के सभी घटनाचक्रों की फिल्मांकित करते हुए उनका मूल्याँकन करता है मूडी के अनुसार शायद इसी का प्रतीकात्मक चित्रण हिन्दू धर्मशास्त्रों में चित्रगुप्त के रूप में किया गया है। उनके अनुसार इसी प्रसंग में कभी कभी मृतात्मा एक बाधा के रूप में एक संकेत द्वारा महसूस करती है कि उसे धरती पर वापस जाना चाहिए, लेकिन वह वापस नहीं जाना चाहती। क्योंकि वहां वह प्रेम, शान्ति एवं आनन्द की तीव्र अनुभूति से अभिभूत हो उठती हैं । इसके बावजूद वह किसी तरह शरीर में आ जाती है।

मृत्युकालीन अनुभवों की शोध परम्परा में’ इवेन्स वेन्टल’ का नाम भी उल्लेखनीय है। उन्होंने ‘द तिब्बेतन बुक ऑफ द डेड’ में तिब्बत के ऐतिहासिक ऋषियों द्वारा प्रतिपादित मृत्युकालीन अनुभवों का विवेचन किया है। इसके अनुसार सर्वप्रथम मृत व्यक्ति की जीवात्मा शरीर से अलग हो जाती है। इसके पश्चात् वह अब एक बेहोशी में प्रवेश यहां उसे तरह−तरह की ध्वनियाँ सुनायी देती है। ऐसी स्थिति में जीवात्मा एक धूसर कुहरेदार प्रकाश से घिरी रहती है।

शरीर से विलग होने के प्रारम्भिक क्षणों में जीवात्मा कुछ पलों के लिए हैरान होती है। वह अपने शरीर के अन्तिम संस्कार की तैयारी कर रहे भिन्न सम्बन्धियों को रोते−बिलखते देखती है। साथ ही वह स्वयं की भौतिक शरीर से भिन्न एक नवीन चमकीले शरीर में पर्वत -पहाड़ के आर पार बिना किसी बाधा के आ-जा सकती है। उसकी यात्रा सहज हो जाती हैं अपनी इच्छा भर से वह चाहे जहां पहुंच जाती है। नया शरीर, पुराने शरीर के अंधेपन, लंगड़ेपन बहरेपन, आदि दोषों से मुक्त होता है। उसकी इंद्रियां अधिक सूक्ष्म व सजग होती है। विचार अधिक तीक्ष्ण होते हैं। अब वह अपनी तरह के शरीरधारियों से मिल सकती है। इवेन्स वेन्टज ने अपनी पुस्तक में मृत्यु के समय एवं उसके बाद मिलने वाली घनीभूत शान्ति एवं सन्तोष की अनुभूति का भी वर्णन किया है। उन्होंने एक ऐसे शीशे का भी उल्लेख किया है। जिसमें समूचे जीवन के अच्छे-बुरे कर्म स्पष्ट रूप से प्रकाशित होते हैं। और उच्चतर प्रकाशित आत्मा उनको देखकर निर्णय देती है। इस संदर्भ में न कोई झूठ सम्भव होता है और न ही किसी तरह की चूक की गुँजाइश रहती है।

इस क्रम में उनका यही कहना है। कि मृत्युकालीन अनुभव मनुष्य की अन्तः स्थिति पर निर्भर हैं वह आजीवन जैसा सोचता रहा है, अन्तिम क्षणों में जीवन की समस्त अनुभूतियों का सारतत्व प्रकट हो जाता है इसी के अनुसार किसी को प्रकाश दिख पड़ता है, किन्हीं को मृदुल संगीत की ध्वनि सुनायी पड़ती है। कुछ को नशा चढ़ने जैसी स्थिति अनुभव होती

यह सुनकर युवक स्तब्ध रह गये। तभी निवेदिता बोली-” भाषण के दौरान प्रसन्नता प्रकट करना आवश्यक ही हो तो स्वभाषा में प्रकट करो। बोली सच्चिदानन्द परमात्मा की जय। सद्गुरु की जय।”

हैं जिनका चिन्तन एवं जीवन स्तर हेय स्तर का रहा हैं उनको दम घुटने एवं डूबने जैसी अकुलाई भी होती है। लेकिन जिन्होंने जीवन दर्शन को समझा है, उन्हें मरण सुखद की लगता है तभी तो प्राणिशास्त्री विलियम हण्टर ने मरने से पूर्व मन्द स्वर में कहा था,” यदि मुझ में लिखने की ताकत होती तो विस्तार से लिखता कि मृत्यु कितनी सरल और सुखद हैं ।”

यदि मनुष्य आरम्भ से ही मृत्यु को जीवन का अन्तिम अतिथि मानकर चले उसकी अनिवार्यता को समझे और अपनी गतिविधियां आध्यात्मिक स्तर की बनाए रखें तो उसे मृत्यु के समय जीवन के व्यर्थ चले जाने का पश्चाताप न होगा। मृत्यु भी उसके लिए सरल और सुखद ही साबित होगी। थकान मिटाने के लिए निद्रा की गोद में जाना जब अखरता नहीं तो कोई कारण नहीं प्रतीत होता कि कुछ अधिक लम्बी नींद प्रदान करने वाली शान्ति एवं नव उल्लास देने वाली मृत्यु से हम डरें अथवा घबराएँ ।

महात्मा कबीरदास के शब्दों में कहें तो जिसने जीवन जीने की आध्यात्मिक शैली विकसित कर ली मृत्यु उसके लिए पूर्ण परमानन्द ही प्रदान करती है। तभी तो उन्होंने कहा था।

शायद यही कारण है कि आध्यात्मिक जीवन दृष्टि रखने वाले सभी महापुरुषों को मृत्यु ने एक सा आनन्द दिया, फिर चाहें वे पश्चिम के हो अथवा पूर्व के। जार्ज वाशिंगटन मरने लगे तो उन्होंने कहा-” मौत आ गई, चलो अच्छा हुआ, विश्राम मिला। “हेनरी थोरी ने शान्त और गम्भीर मुद्रा में मृत्यु का स्वागत करते हुए कहा-” मुझे संसार छोड़ने में पश्चाताप की नहीं आनन्द की अनुभूति हो रही हैं ।” महाकवि विलियम वर्डससवर्थ ने और भी अधिक प्रसन्नता व्यक्त की तथा कहा-” लगता है मेरे बदन पर फूल ही फूल छा गए हैं। “ दार्शनिक इमानुएक काण्ट ने मृत्यु के समय अलंकारिक भाषा में कहा-”बत्तियां जला दो, मैं अन्धकार में नहीं जाऊँगा । “अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करते हुए कहा “ मरना कितना सुखद है। “स्वामी दयानन्द ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए मरण के क्षणों का स्वागत किया और कहा “ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हुई।” हन महापुरुषों की भांति अपने जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिकोण विकसित करने वाले हर किसी के लिए मृत्यु जीवन के अन्त की दुःखद सम्भावना बनकर नहीं विश्राम , शान्ति एवं उल्लास के महापर्व के रूप में आती है।


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जिस मरने से जग डरें, मेरे मन आनन्द। कब मरिहों कब पाहिहो , पूरन परमानन्द॥


भाषा पर गर्व (Kahani)

मिदनापुर में स्वामी विवेकानन्द की अंग्रेज शिष्या भगिनी निवेदिता का भाषण हो रहा था । मंत्रमुग्ध जनता उपदेशामृत पान करने में तल्लीन थी तभी भाषण से प्रसन्न हो कुछ युवकों ने हिप हिप’ का उद्घोष किया। भगिनी निवेदिता ने भाषण के बीच में ही उन्हें डाँटकर कहा -” चुप रहो, तुम्हें अपनी भाषा का जरा भी गर्व नहीं है।? काया तुम्हारे पिता अंग्रेज थे? क्या तुम्हारी माँ चमड़ी यूरोपियन थी? अंग्रेज की नकल करते लज्जा क्यों नहीं आती?”


अचेतन की ढलाई के चमत्कारी परिणाम

मनुष्य की भौतिक विभूति जितनी और जो कुछ दीखती है। उसे चेतन मस्तिष्क का चमत्कार कहना चाहिए। उसकी इस क्षमता से हर कोई परिचित है परन्तु उसको एक अचेतन और अविज्ञात पक्ष भी है जिसे ‘भानुमती का पिटारा’ कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा।

सर्वविदित है कि सम्पूर्ण अचेतन मस्तिष्क अभी अविज्ञात की स्थिति में पड़ा हुआ हैं उसमें इन दिनों तरह -तरह के शोध अनुसंधान हो रहे है’ पर अब तक उस बारे में जितना कुछ ज्ञात हुआ है, उसे बारे में जितना कुछ ज्ञात हुआ है उसे नगण्य ही कहा जा सकता है। शोधकर्मी वियों और चमत्कारों की संगति इससे बिठाते तो रहे है पर उस सम्बन्ध में कोई बुसिंगत व्याख्या करने में असफल रहे है। परामनोविज्ञानियों ने इस संसार का सर्वाधिक रहस्यमय , अद्भुत तथा शक्तिशाली यंत्र बताया और यह कहा -कि यदि इसके गूढ़तम अविज्ञात रहस्यों को प्रकट किया जा सके तो उस शक्ति के सहारे ही वह समस्त कार्य सम्भव हो सकेंगे जिसके लिए इन दिनों भौतिकी का अवलम्बन अनिवार्य अनुभव किया जाता है।

अचेतन मस्तिष्क का जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान है इसका अन्दाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब वह किसी शब्द अथवा संदेश को दृढ़तापूर्वक पकड़ लेता है तो या तो व्यक्ति को उत्कर्ष की ऊंचाइयों की आरे ले चलता है। अथवा रोग-शोक की दुःखदायी स्थिति में ला पटकता है। यह सब कुछ इस बात पर निर्भर है कि संदेश किस प्रकार का और कैसा है? उसमें किसी स्वस्थ विचार की अभिव्यक्ति हो रहा है। वह अवाँछनीय एवं अप्रिय स्तर का है। मस्तिष्क के इस भाग की भूमिका को समझने के लिए लिवरपुल युनिवर्सिटी के दो मनःशास्त्रियों जी ब्राउन एवं हैरिस ने एक विशेष प्रकार का प्रयोग किया । उन्होंने एक थियेटर में एक फिल्म के दौरान थोड़े-थोड़े अन्तराल में दर्शकों के समक्ष एक संदेश संप्रेषित किया, जिसमें कहा गया “सैण्डविच खाना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। एक सप्ताह के इस प्रयोग के दौरान देखा गया कि इस मध्य सैण्डविच की बिक्री में अप्रत्याशित ढंग से वृद्धि हो गई बाद में इसकी व्याख्या करते हुए शोधकर्मियों ने यह स्पष्ट किया कि चेतन मस्तिष्क के लिए यह किन्तु अचेतन मस्तिष्क ने इसे गम्भीरतापूर्वक लिया। इसी का परिणाम था कि इस मध्य सैण्डविच के प्रति लोगों का सामान्य रुझान बढ़ा-बढ़ा देखा गया।

कुछ इसी प्रकार के एक प्रयोग का वर्णन जी के मार्लेट एवं डी जे रोहसेनोव ने अपने एक निबन्ध ‘दि थिंक-ड्रिक एफेक्ट’ में किया है उन्होंने कुछ लोगों के दो ग्रुप बनाये । दोनों ग्रुपों को एक महीने तक सेबों का ताजा रस पिलाया गया। इसके बाद एक ग्रुप से बताया गया कि जिन सेबों का रस उन्हें पिलाया गया वे कुछ विषैले थे। इससे उन्हें हानि हो सकती है। दूसरे ग्रुप को ऐसा कुछ नहीं कहा गया। एक सप्ताह तक बराबर इस के दोहराने से वे लोग सचमुच बीमार हो गये। बाद में उपचार के नाम पर उन्हें ग्लूकोज दिया जाने लगा। बताया गया कि यह एक तीक्ष्ण दवा है । इससे वे जल्द स्वस्थ हो जाएंगे। आश्चर्यजनक रूप से वे धीरे-धीरे फिर ठीक हो गये। इसे अचेतन मस्तिष्क की ग्रहणशीलता का अन्दाजा लगता है।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के हैराल्ड मैग्नी ने अचेतन रूप से प्राप्त विभिन्न संदेशों का मस्तिष्कीय तरंगों पर क्या और कितना प्रभाव पड़ता है-इस सम्बन्ध में समय-समय पर अनेक प्रयोग एवं अध्ययन किये। निष्कर्ष में उनने पाया कि यदि सही ढंग से कई सप्ताह तक संदेश सम्प्रेषित किया जाय और व्यक्ति का अचेतन उसे ठीक-ठीक ग्रहण कर ले, तो मस्तिष्कीय तरंगों में तद्नुकूल परिवर्तन स्पष्ट परिलक्षित होना लगता है अर्थात् यदि संदेश विधेयात्मक हो तो तरंगों में अल्फा किस्म के कम्पनों की बहुलता दिखाई पड़ती हैं और निषेधात्मक होने पर उसका स्थान ‘बीटा ले लेती हैं

इसी से सम्बन्धित एक प्रयोग कीव विश्वद्यालय के मनोवैज्ञानिकों ने किया। उनका विचार था कि अचेतन मन को संदेश देकर मनुष्य को सुयोग्य और विज्ञ बनाया जा सकना सम्भव हैं प्रयोग के लिए उन्हें 15-25 वर्ष जितने आयु -वर्ग के लोगों के दो दल बनाये। दोनों को प्रतिदिन साथ-साथ अँग्रेजी सिखायी जाती किन्तु दूसरे ग्रुप के लोगों को नींद के दौरान भी लिंग्वाफोन की मदद से इलेक्ट्रोड के सहारे अचेतन मस्तिष्क में यह पाठ प्रेषित किया जाता। दो महीने के इस शिक्षण के उपरान्त देखा गया कि जिन लोगों को नींद के दौरान पाठ सुनायें गये थे वे उन लोगों की तुलना में अधिक दक्ष पाये गये, जिन्हें इससे वंचित रखा गया था सीखने की गति उनकी अधिक तीव्र कार्य करता है, बल्कि यह कहना अधिक समीचीन होगा कि अचेतन मन की ग्रहण और धारण क्षमता चेतन मन की अपेक्षा कही अधिक होती है।

वेल्स विश्वविद्यालय के मनः- शास्त्री डॉ पीटर कोवेनी ने ‘वी आर हेल्दी’ (हम स्वस्थ हैं) का संदेश अनेक रोगियों को नित्यप्रति दस मिनट तक सुनाया , इसके परिणामस्वरूप अनेक रोगियों की बुरी लतें छूटती देखी गयी। जो धूम्रपान और मद्यपान के एकदम आदी थे।

उनकी अभिरुचि इनके प्रति घटने लगी। इसके अतिरिक्त मानसिक रोगों से भी उन्हें मुक्ति मिली। कई मोटापे के शिकार व्यक्तियों पर यही प्रयोग दुहराया गया। यहां भी नतीजा उत्साहवर्द्धक देखा गया। तीन महीने बाद उनके वजन में गिरावट देखी गया।

वास्तव में मानसिक रोगियों में अचेतन मन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जब वह कोई गलत संदेश ग्रहण कर लेता है तो व्यक्ति के लिए अच्छी परिस्थितियों भी भय पैदा करने लगती है और इससे वह इतना परेशान हो उठता है कि जीवन नीरस, निरानन्द लगने लगता है मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि साइकोसिस एक ऐसी ही दुःखदायी अवस्था है जिसमें रोगी को यह ज्ञात नहीं हो पाता कि दुःख का कारण उसके अन्दर विद्यमान है । या बाहर । डोरोथी रो अपनी पुस्तक ‘बियोण्ड फियर’ में लिखती है कि ऐसा इस कारण होता है क्योंकि व्यक्ति अपने चेतन और अचेतना स्तर में वीोद नहीं कर पाता और सही- सही यह अनुभव नहीं कर पाता कि उसके अन्दर क्या है और बाह्य जगत में क्या है? वे लिखती है कि इस अनुभव की कमी के कारण ही बाद के जीवन में लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है अतः ऐसे लोगों को अप्रिय प्रसंगों को बार-बार याद नहीं करना चाहिए, अन्यथा वे अचेतन की गहराइयों में उतरकर दुःख को घटाने के बजाय बढ़ायेंगे ही ऐसा उनका मत है वे लिखती है कि चेतना के उक्त दोनों स्तरों में यदि संतुलन एवं सामंजस्य नहीं हुआ तो फिर जीवन नरक तुल्य साबित होता है बहिर्मुखी व्यक्ति अपने अंतर्जगत में चूंकि बिना यह मान्यता बना लेता है कि दुनिया बड़ी ही शोकपूर्ण, दुःखदायी और खतरों से भरी हैं वह इसे अपने अन्दर की उपज नहीं स्वीकार कर पाता । इसी तरह अन्तर्मुखी व्यक्ति अपने अंतस् में विभिन्न प्रकार की जटिलताएं अनुभव करता और सोचता है कि यह सब बाह्य जगत द्वारा उस पर आरोपित किये गये है, पर यथार्थता यह है कि वह सब उसी के अचेतन द्वारा उत्पादित होता है किन्तु इसे वह सरलता से अंगीकार नहीं कर पाता इस प्रकार हम देखते हैं कि अचेतन मस्तिष्क सचेतन की तुलना में कही अधिक सामर्थ्यवान है। चेतन मस्तिष्क यदि जाने,सीखने , अनुभव प्राप्त करने तक सीमित है तो अचेतन स्तर में जानने-सीखने के अतिरिक्त उन विधाओं को अपने में पूरी तरह आत्मसात् कर लेने की भी क्षमता है चेतन मस्तिष्क सीखे ज्ञान की, अभ्यास को कालान्तर में भूल सकता है किन्तु जो जानकारी अचिंतन स्तर में उतर गयी, वह मस्तिष्क को स्थायी निधि बन जाती है। उसे कभी भी जगाया और उभरा जा सकता है। सम्मोहन की कला में पारंगत व्यक्ति इसी स्तर की अपना आधार बनाकर कौशल का प्रदर्शन करते हैं व्यक्ति को सम्मोहन की स्थिति में लाकर वे चाहे तो उसकी अंतर्चेतना में विद्यमान विकृतियों से उसे छुटकारा दिला सकते हैं इसके विपरीत वह उसे अपार क्षति भी पहुँचा सकते हैं। निद्रित व्यक्ति की जानकारी से परे वह उसमें ऐसे दुर्गुण डाल सकते हैं।

जो उसे विनाश के कगार तक पहुँचा दे। यह इसका दुरुपयोग हुआ। किसी भी कलामर्मज्ञ को सदा उसके उस पक्ष का उपयोग करना चाहिए जिसमें लोगों का हित हो। अनहित वाले पहलू को गुप्त और असार्वजनिक ही रखना चाहिए। पर इन दिनों उलटा ही रहा हैं जो हानिकारक पहलू है उसका खुलकर प्रयोग हो रहा है यह वस्तुतः उसका अपमान हैं।

अचेतन स्तर की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी भी तथ्य को बड़ी आसानी से स्वीकार और सँजों लेता है । पी मोलोन ने एक पुस्तक लिखी है-” हिप्नोटिज्म-हेल और हेवन’ इस ग्रन्थ में उनने एक घटना का उल्लेख किया है और यह दर्शाने का प्रयास किया है कि अचेतन की सुविकसित और समुन्नत बनाने के उद्देश्य से यदि सम्मोहन का प्रयोग किया जाय तो जनसाधारण के लिए यह कितना लाभकारी सिद्ध होता है किन्तु यदि इसके पीछे विकृत मानसिकता हो तो वह समाज को कितनी अपार हानि पहुंचाती है।

घटना की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं कि मिशिगन कालेज के कुछ पुस्तक हाथ लग गई । उनने उसके आर पर कुछ प्रयोग करने का निश्चय किया । एक दिन छात्रावास में अपने एक मित्र को सम्मोहित कर दिया। अब उन्हें कुछ मसखरी सूझी तो सम्मोहित छात्र पर रबड़ के एक बर्तन ट्ष्ब के यहसो एयकर कनसई में बूँद -बूंद पानी टपकाना आरम्भ किया और छात्र को बताया कि उसकी नस काट दी गयी है। खून उसमें तेजी से निकल रहा है। अब कुछ ही देर में उसकी मृत्यु सुनिश्चित है कुछ देर तक इस तरह का संदेश देने के उपरान्त सचमुच उस छात्र की मृत्यु हो गई है। इस घटना के पश्चात सम्पूर्ण अमेरिका में सम्मोहन पर पाबन्दी लगा दी गई।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है। कि चेतन की तुलना में अचेतन को प्रशिक्षित-विकसित अधिक सुगमता-पूर्वक किया जा सकता है। साधना विज्ञान में इसके लिए अनेकानेक उपाय सुझाये गये इन उपायों को अपनाया जा सके, तो आज भी व्यक्ति अचेतन मस्तिष्क के उन रहस्यमय केन्द्रों को जगाने और उभारने में सफलता हस्तगत कर सकता है जिसके जाग्रत होने पर क्षुद्र से महान और नर से नारायण में बदल जानें की बात कही गई हैं।


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आलस्य और प्रमाद के चोर को पतन और पराभव गुप्तचर सहज ढूँढ़ निकालते हैं और उसे हेय अपराधियों की पंक्ति में ला खड़ा करते हैं।


जी तोड़ मेहनत का जादू (Kahani)

इटली के क्रेसन किसान की फसल अन्य किसानों की तुलना में कई गुनी पैदा होती थी। शत्रुता मानने वालों ने अदालत में मुकदमा चलाया कि या ता वह जादू जानता है या चोरी करता है क्रेसिन अदालत में अपना हल, बैल, लड़के , लड़की समेत पहुँचा और कहा-” मैं स्वयं भरपूर श्रम करता हूं इस ताने मेरे यह सहयोगी भी जी-तोड़ मेहनत करते हैं। यही एक जादू है जिसे फसल चमत्कारी ढंग से पैदा होती है।


गुणसूत्र दर्पण हैं बहिरंग में विकृति के

प्रकृति के नियम में जब और जहाँ भी कोई व्यतिरेक उत्पन्न होता है तो वह उसका प्रतिकार किसी -न - किसी प्रकार अवश्य करती है इन दिनों चूंकि इस नियम का उल्लंघन सर्वाधिक जुड़ा हैं अतः उसी अनुपात से उसकी प्रतिक्रिया भी बढ़-चढ़कर प्रस्तुत हुई हैं शरीर में यह प्रतिक्रिया कितने ही रोगों के रूप में सामने आती है पर वर्तमान में जिसको सबसे अधिक व्यापकता है वह है कैंसर। कैंसर के कितने ही प्रकार है किन्तु स्तन कैंसर जिस गति से संपत्ति बढ़ा है। उसे असाधारण ही कहना चाहिए।

महिलाओं में स्तन कैंसर की शिकायत आखिर क्यों होती है। पिछले दस वर्षों के अध्ययनों से इस सम्बन्ध में जो निष्कर्ष सामने आया है उसके अनुसार या कहा जा सकता है कि स्त्रियों में होने वाले मासिक स्राव इससे गहरा लगाव है। ‘भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद’ के अनुसार, अपने देश में प्रतिवर्ष 5 लाख महिलाएँ विभिन्न प्रकार के कैंसर की शिकार होती है। इनमें से लगभग 1 लाख महिलाएँ स्तन कैंसर से आक्रांत होती है। आँकड़े बताते हैं कि इनमें से करीब 50 हजार स्त्रियां इस संघातिक बीमारी से प्रतिवर्ष असमय ही मृत्यु के मुँह में समा जाती है।

यों तो रजोदर्शन की आयु देश, काल और जलवायु पर निर्भर हैं, फिर भी इसके आरम्भ होने की सामान्य उम्र प्रायः 12 से 13 वर्ष के मध्य ही होती है पूरे विश्व में मासिक स्राव इस उपरोक्त सीमा में ही कभी आरम्भ होता है ठंडे देशों एवं प्रदेशों में यह क्रिया गर्म क्षेत्रों की तुलना में थोड़ी देर से शुरू होती है स्तन कैंसर का इससे काफी कुछ सम्बन्ध है इसके अतिरिक्त प्रथम गर्भाधान के समय मां की आयु, पहला बच्चा जनने के समय उसकी उम्र तथा कुल संतानों की संख्या की भी इसमें उल्लेखनीय भूमिका है। चिकित्सा-शास्त्रियों का कहना है कि यही वह अवधि है जब स्त्रियों के शरीर में हारमोनों की सक्रियता काफी घट जाती है। यही अतिशय सक्रियता अव्यवस्थित होकर स्तनों को रुग्ण बना देती है।

शोधकर्मी वैज्ञानिकों का कहना है कि विवाह के उपरान्त प्रथम संतान जितनी जल्दी होगी, स्तन कैंसर की संभावना उतनी ही कम होती है विशेषज्ञ यह भी बताते हैं। कि प्रसव के बाद शिशु को स्तनपान न कराना भी इसका एक प्रमुख कारण है अक्सर स्त्रियों में यह धारणा होती है कि बच्चे के स्तनपान से स्तनों का आकार-प्रकार बेडोल हो जाता है। इसलिए वे प्रायः उन्हें बोतल का दूध पिलाती हैं यह सच है कि इससे स्तन का आकार बढ़ जाता है पर इसके स्वाभाविक आकार को सुरक्षित रखकर इतना बड़ा खतरा मोल लेना कि जीवन की संकट में पड़ जाये- इसे बुद्धिमानी नहीं कहा जा सकता । दूसरी इससे बालक के भावनात्मक विकास में भी बाधा पड़ती है। अतः जच्चे-बच्चे के लिए सुरक्षित तरीका यही है कि उसे स्तनपान कराया जाय।

विश्व स्वास्थ संगठन ‘ के एक अध्ययन में बताया गया है कि विश्वभर में लड़कियों के रजस्वला होने की आयु घटती जा रही है इस आशय के विगत 125 वर्ष के अध्ययनों से विदित हुआ है। कि इस दौरान इस वय में 3 से 4 वर्ष का अन्तर आया है पहले बालिकाएँ प्रायः 16 वर्ष के उपरान्त ही रजस्वला होती है किन्तु अब तो 10-11 वर्ष में भी होने लगी है विशेषकर अमेरिका जैसे देश में यह समस्या बड़ी तेजी से बढ़ी है। स्तन कैंसर का यह भी एक प्रमुख कारण अल्पवयस्क अवस्था में ही मातृत्व का दायित्व आ पड़ने से शरीर के अन्दर एक व्यावधान पैदा हो जाता है। प्रसव हो जाने के कारण शरीर की अंतःस्रावी ग्रंथियां उसे पूर्ण वयस्क मान बैठती हैं। और उसके अनुरूप रस स्राव करना प्रारम्भ करती हैं , जबकि वास्तविक आयु उनसे काफी कम होती है । पूर्ण वयस्क न होने के कारण प्रकृति उसे यौवन की ओर ले जाना चाहती हैं जबकि शरीर क्रिया उसे पूर्ण वयस्क बताकर भ्रम उत्पन्न करती है। इसी द्वन्द्व की स्थिति में कुछ ऐसे कारक शरीर के भीतर सक्रिय हो उठते हैं जो स्तन कैंसर के लिए जिम्मेदार होते हैं।

बालिकाओं में रजोदर्शन की आयु घटने के पीछे कितने ही कारण बताये जाते हैं। इनमें से कुछ तो प्राकृतिक है, जबकि कुछ ऐसे जो हमारी वर्तमान जीवन पद्धति के परिणाम हैं इनमें से कतिपय प्रमुख कारण निम्न है - मन-मस्तिष्क में अश्लीलता का कुप्रभाव, गंदी तस्वीर, फिल्में, टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले कामोत्तेजक कार्यक्रम , अत्यधिक मानसिक दबाव, प्रदूषित वातावरण, माता-पिता का नशा सेवन, पैवि स्मेकिंग, सहशिक्षा, अतिशय खेलकूद, मिलावटी भोजन, कृत्रिम रहन-सहन आदि लोगों को पैसा कमाने की अंधी दौड़ में शामिल हो जाने के कारण अब नैतिकता, अनैतिकता की चिन्ता नहीं रही। इससे कितने की खाद्य हानिकारक बन जाती हैं जो शरीर में पहुंचकर उसकी स्वाभाविक क्रिया और व्यवस्था में हस्तक्षेप करते हैं। यह न्योता बुलाते हैं। उदाहरण के लिए इन दिनों पशुओं से ज्यादा-से -ज्यादा परिमाण में दूध प्राप्त करने के लिए , लोग उनकी खुराक बढ़ने के तुलना में एक एकदम सीधा-सरल उपाय यह अपनाते हैं कि उन्हें ‘आक्सीटोसिन’ नामक हारमोन का इंजेक्शन लगा दिया जाय। इससे दूध तो बढ़ जाता है पर साथ-साथ वह हारमोन भी पीने वालों के शरीर में पहुंच जाता है। लड़कियां जब इस प्रकार का दूध -सेवन करती हैं तो शरीर का अंतःस्रावी रस- संतुलन गड़बड़ा जाता है फलस्वरूप कितनी ही प्रकार की जटिलताएं पैदा होने लगती है। इनमें से कम आयु में रजोदर्शन भी एक है जल्दी मासिक स्राव शुरू होता है। एक अध्ययन के अनुसार अब से 55 वर्ष पूर्व भारत में महिलाओं की ऊँचाई औसतन 5 फुट 3 इंच हुआ करती थी अब वह घटकर 5 फुट रह गई है। यों तो मासिक स्राव लड़कियों में 14-15 साल तक की अवस्था में प्रारंभ हो जाता है पर कानून उसे 18 साल से पूर्व विवाह की अनुमति नहीं देता। अर्थात् कोई भी युवती 18 वर्ष से पूर्व माँ नहीं बन सकती है। यहां इन दोनों प्रकार की व्यवस्थाओं में किसी भी प्रकार की विसंगति नहीं है। कहने वाले यह कह सकते हैं कि जब प्रकृति की ओर से 15 वर्ष की अवस्था तक में लड़कियों को प्रसव करने योग्य दशा में पहुँचा दिया जाता है तो फिर यह सामाजिक बन्धन क्यों? ऐसा सोचने वाले वास्तव में आम के टिकोलों को आम समझने जैसी भूल कर बैठते हैं । बोर और परिपक्व आम में जमीन-आसमान जितना अन्तर है बोर केवल कमजोर व अपरिपक्व होता उसमें न स्वाद होता है, न कठोरता , न नई पौध उत्पन्न करने की क्षमता । उसके परिपक्व होने में 3-4 माह लग जाते हैं। ऐसे ही रजोदर्शन का अर्थ प्रजनन की योग्यता नहीं समझ लेना चाहिए। यह उस अवस्था की शुरुआत मात्र है इसके परिपक्व दशा में पहुंचने में कम से कम 4.5 साल लग जाते हैं। यही विवाह की यथार्थ आयु है इससे कम उम्र में शादी कारण कि अपरिपक्व एवं कोमल स्तन में ऐसी स्थिति में दूध उत्पन्न करने का अतिरिक्त बोझ आ पड़ता है। जो उसे अस्वाभाविक बना देता है।

हावर्ड विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ता डाँव कार्ल बोड का कहना है कि स्तन कैंसर पर नियंत्रण पाने के लिए यह जरूरी है कि जीवनशैली में नैसर्गिकता का समावेश हो लड़कियों को आध्यात्मिक वातावरण और चिन्तन दिया जाय, अश्लील पत्र-पत्रिकाओं से दूर रखा जाय, भोजन में भी सात्विकता का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाय , तले-भुने पदार्थों एवं मिर्च-मसालों का कम से कम उपयोग किया जाय, कवायद अथवा पुरुष जैसे श्रमसाध्य व्यायामों से परहेज किया जाय। वे कहते हैं। कि इनके द्वारा बहुत हद तक रजोदर्शन की आयु की बढ़ाया जा सकता है यह उम्र को बढ़ाया जा सकता है। यह उम्र जितनी अधिक होगी, स्तन कैंसर की सम्भावना उतनी ही घट जाएगी ऐसा उनका मत है। कैंसर के मूल में जाकर विचार करें तो पता चलेगा कि इसका वास्तविक कारण क्रोमोसोम्स हैं यह गुण-सूत्र जो हमारी हर जीवन कोशिका में होते हैं। हमारी जीवन-पद्धति से प्रभावित होते हैं। और फिर अकस्मात् जानलेवा बन जाते हैं। अन्वेषणों से ज्ञात हुआ है। कि कैंसर जन्य प्रसुप्त जीन जब हमारी अस्वाभाविक गतिविधियों से सक्रिय बनते हैं। तो फिर जीवन के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं। ऐसी बात नहीं कि कैंसर जीन्स केवल कैंसर ही पैदा करते हो। वरन् सामान्य स्थिति में तो ये साधारण जीनों की तरह शरीर की आवश्यक क्रियाप्रणाली में योगदान करते हैं। किन्तु कृत्रिम रहन-सहन , अनुपयुक्त चिन्तन और प्रदूषित कोशिका वातावरण के कारण जब इनमें बदलाव आता है तो उससे प्रभावित कोशिका कैंसर सेल की भांति कार्य करने लगती है। कई बार तो जीन में पैदा होने वाली इस प्रकार की गड़बड़ी को हमारा शरीर तंत्र स्वतः ही सुधार लेता है पर जब इस प्रकार का आक्रमण लेता है पर जब इस प्रकार का आक्रमण बार-बार होने लगता है तो वह तंत्र भी कमजोर पड़ जाता है और आगे आक्रमण बर्दाश्त न कर पाने की स्थिति में रुग्ण बन जाता है। बचाव-कार्य में प्रायः ऐंजाइम ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं यह ऐंजाइम कैंसरजन्य तत्वों को निष्क्रिय बनाकर मूत्र के साथ शरीर के बाहर निकाल देते हैं। अध्ययनों से कैंसर की गाँठ बनते समय कोशिका के अन्दर होने वाले परिवर्तनों का भी पता चला है ज्ञात हुआ है कि जिन परिस्थितियों में कैंसर जीन निरंकुश होकर कैंसर पैदा करते हैं , उनमें कभी-कभी कैंसर जीनों की संख्या में अतिशय वृद्धि हो जाती है। अथवा वे अत्यधिक सक्रिय हो उठते हैं इसका कारण बताते हुए विज्ञानवेत्ता कहते हैं कि कई बार जिस गुणसूत्र पर यह जीन लगे होते हैं उसका कोई हिस्सा टूट जाता है तो कभी किसी अन्य गुणसूत्र का कोई खण्ड टूटकर उससे जुड़ जाता है।

यह सारी प्रक्रिया आहार-बिहार की गड़बड़ी के कारण हो होती हैं जब गुणसूत्र की यह जोड़-तोड़ प्रक्रिया कैंसर जीन वाले भाग के एकदम निकट होती हैं तो फिर यह क्रिया उक्त जीन को सोये सिंह की भांति अचानक जगा देती है। परिणाम कैंसर होता है चाहे वह स्तन कैंसर हो या किसी अन्य अंग की उसकी सम्पूर्ण प्रक्रिया ऐसी हो होती है।

हम सब प्रकृति का अनुसरण करें, नैसर्गिक भोजन और उसमें चिन्तन करें, तो कोई कारण नहीं कि ऐसी प्राणघातक बीमारियों से पिण्ड न छुड़ा सकें इस प्रकार के अधिकांश उदाहरणों में हमारा अस्वाभाविक आचरण ही इसके लिए जिम्मेदार होता है इसके प्रति सतर्क रहे, तो स्वस्थता सुनिश्चित हो नहीं, अवश्यम्भावी बन जाएगी।


आत्म परिशोधन (Kahani)

श्राबिया बसरी कई सन्तों के संग बैठी बाते कर रही थी तभी हसन बसरी वहां आ पहुंचे ओर बोले “चलिए , झील के पानी पर बैठकर हम दोनों अध्यात्म-चर्चा करें। “ इसन के बारे में प्रसिद्ध था कि उन्हें पानी पर चलने कि सिद्धि प्राप्त है।

राबिया ताड़ गई कि हसन उसी का प्रदर्शन करना चाहते हैं। बोली-” भैया यदि दोनों आसमान में उड़ते उड़ते बाते करें तो कैसा रहे? राबिया के बारे में भी प्रसिद्धि कि वे हवा में उड़ सकती हैं । फिर गंभीर होकर बोली-” भैया जो तुम कर सकते हो वह हर एक मछली करती है और जो मैं कर सकती हूं वह हर मक्खी करती है सत्य करिश्मेबाजी से बहुत ऊपर है उसे विलग होकर खोजना पड़ता है। अध्यात्मवादी को दर्प करके अपनी अपनी गुणवत्ता गंवानी नहीं चाहिए।” हसन ने अध्यात्म का मर्म समझा और राबिया को अपना गुरु मानकर आत्म परिशोधन में जुट गये।


नाम -यश का मोह, कितना झूठा-कितना सच्चा

मुझे कोई बताइए। कोई भी अनुष्ठान बता दीजिए। मैं कठिन से कठिन तप कर लूंगा। विनायक राय आज साँई बाबा के पाँव पकड़कर बैठ गया था। अकेले शिरडी गाँव में ही नहीं आस-पास के पूरे क्षेत्र में विख्यात था कि साँई बाबा सिद्ध सन्त हैं उनमें चमत्कारी शक्ति हैं वे जिसे जो बात कह देते हैं, वही हो जाती है किसी को वे सीधे आशीर्वाद देने की बजाय प्रायः कोई जड़ी-बूटी , धनी की विभूति अथवा कोई छोटा-मोटा व्रत आदि बता देते हैं लेकिन जिसे वे जो कुछ बता देते हैं वह ठीक-ठीक उनकी आज्ञा का पालन करें तो उसका काम हो जाता है।

संसार तो है ही दुःखी और अभाव का घर, किसी को कोई असाध्य रोग हैं, किसी को मुकदमा जीतना है, किसी के सन्तान या घर के लोग अच्छा व्यवहार नहीं करते एक न एक दुःख सबको लगा हैं सांई बाबा के पास भीड़ लगी रहते हैं। उनके पास हिन्दू आते हैं। और मुसलमान भी । अब दुःख पीड़ा को हिन्दू -मुसलमान का फर्क तो मालूम नहीं वह तो बिना जाति-पंथ और क्षेत्र का भेद किए कर्मों के अनुसार हरेक के पास पहुँच जाता है। और पीड़ित को अपने ममत्व का मरहम लगाना बाबा अपना प्रथम कर्तव्य समझते हैं। वैसे तो सभी उनके अपने है। लेकिन परेशान , दुःखी, पीड़ित को उनसे कुछ ज्यादा ही अपनत्व मिलता है। वैसे तो वे प्रायः कह देते हैं। भैया भगवान भला करेगा। अल्लाह भला करेगा। मंगलमय प्रभु जो करते हैं। जीव का उसी में मंगल हैं लेकिन कभी-कभी किसी को बहुत आर्त देखकर कोई व्रत -उपवास, पूजा -पाठ बता भी देते हैं।

विनायक राय बहुत बार आया है। उसके आने का एक ही उद्देश्य है किन्तु अपनी बात वह सबके सामने कहना नहीं चाहता । उसे एकान्त चाहिए और एकान्त उसे मिलता नहीं था। आज सौभाग्य से कोई दर्शनार्थी नहीं था। दो ढाई घण्टे की लम्बी प्रतीक्षा के बाद उसे एकान्त मिला है। वह बाबा के पाँव पकड़ कर बैठ गया। अब तो वह अपनी बात पूरी होने पर ही उठेगा।

विनायक अभी युवक है पूना के किसी बड़े कालेज में पढ़ता है कुछ कविता कर लेता है उसके कालेज में कई युवक अच्छी कविता लिखते हैं उसके एक सहपाठी की कविता कई पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होती है। अच्छे मोटे रंगीन विशेषाँकों में अपने सहपाठी की कविता देखकर उसके मन में क्या-क्या आता है, आप शायद ही समझ सकें।

कई महीने हो गए, पर विनायक को तो कल जैसी बात लगती है।, कालेज में कवि सम्मेलन हुआ था । अनेक विद्यार्थिओं ने अपनी-अपनी कविताएँ पढ़ी। कई के कविता पाठ पर लोगों ने तालियां भी बजाई । उसके सहपाठी की कविता लोगों ने आग्रह करके तीन बार सुनी। उसने भी कविता पढ़ने वालों में अपना नाम दे दिया था। उसका भी नाम पुकारा गया। उसमें भी अपनी कविता सुनाई। लोगों में इतनी समझ तो नहीं। वे सब तो केवल सुरीले स्वर पर रीझते हैं। उसका स्वर इतना अधिक सुरीला नहीं तो वह क्या करें, उसकी कविता का हम स्वर उसके सहपाठी समझते ही नहीं। मूर्ख है वे सब । उस दिन जो उसका उपहास हुआ, उसमें उसने अपने मन को इसी तरह सन्तोष दे लिया।

लेकिन वह कब तक अपने को धोखे में रख सकता है। उसके साथी अब तक अपने की धोखे में रख सकता है उसके साथी अब तक उसे ‘कविजी’ कहकर चिढ़ाते हैं। उसने सोचा था कि कविता किसी पत्र में छप जाय तो साथियों का चिढ़ाना बन्द हो जाय। इसलिए चुपचाप कई पत्रों के लिए उसने रचनाएं भेजी पत्रों के सम्पादक उसे मिल जाते तो वह उन्हें ने जाने कितनी खरी -खोटी सुना देता।उन पत्रों में जा रचनाएं निकलती है। व क्या सबकी सब उसकी रचना से श्रेष्ठ है। उसकी रचना यदि सुधर कर कोई छाप देता तो क्या बिगड़ जाता। उनका पक्षपात -उसे लगता है कि सब पक्षपात -उसे लगता है कि सब पक्षपात करते हैं सब पत्र -सम्पादक उसके खिलाफ कोई साँठ-गाँठ किए बैठे हैं उसी की रचनाएं क्यों सब कही से लौट आती हैं

ये रंगीन आवरण पृष्ठ के मोटे बड़े सुन्दर विशेषाँक। ये सजे सजाए मासिक और साप्ताहिक पत्र , इनमें उसकी दो पंक्ति कही छान नहीं सकती? हाँ इस बात के लिए उसकी कोई प्रशंसा भी कर सकता है। कि उसने कभी यह विचार नहीं किया कि दूसरे की रचना कुछ उलट-पलट कर या वैसे ही अपने नाम से दे दे।

कवि सम्मेलनों में तो वह अब जाता ही नहीं। उसे कवि सम्मेलनों के नाम से चिढ़ हो गयी हैं वहां कितने कविता समझने वाले आते है?

मैं दिखा दूंगा। ये पत्र मुझसे अनुनय−विनय करके कविता माँगने और उसे अपने मुखपृष्ठ पर छापेंगे। आप इस महत्वाकांक्षा का उपहास नहीं कर सकते। अन्ततः जिसकी रचनाएं मुखपृष्ठ पर छपती है। वे भी तो मनुष्य ही है। जो काम एक मनुष्य कर सकता है वही दूसरा क्यों नहीं कर सकेगा?

ये कवि सम्मेलनों के आयोजन मेरे पीछे जोड़ते घूमेंगे कि मैं उनके सम्मेलन की अध्यक्षता स्वीकार करके उन्हें गौरवान्वित करूं। विनायक राय अपनी धुन का पक्का है और धुन ही है। जिसने उसके हृदय में एक दिन के तनिक से उपहास को इतना भारी रूप दे रखा है।

महाकवि कालिदास मूर्ख थे। वज्रमूर्ख थे। विनायक को एक आश्वासन मिल गया है। वह भी उपासना करेगा। वह भी दैवी शक्ति प्राप्त करेगा।

बाबा! मैं यश चाहता हूं । मैं कविता करने की ऐसी शक्ति चाहता हूं कि सारा संसार मेरी रचनाओं की प्रशंसा करें । मेरी रचनाएँ पूरे विश्व में आदर पाएँ। भाव के आवेग में युवक विनायक शिरडी के इस फकीर के चरण पकड़े बोलता जा रहा था।

सांई बाबा सुन रहे थे। सुनते-सुनते यकायक वह एक ओर इशारा करके बोले-वहाँ एक कुंआ है। । देखा है तुमने उसे? बोलते-बोलते विनायक यह अटपटा सवाल सुनकर अचकचा-सा गया। उसे इस सवाल का अपनी बात-चीत से कोई तालमेल समझ में नहीं आया । लेकिन तनिक यह पुस्तक उठा लाओ । कुल तीन-चार ही पुस्तकें तो थी। द्वारिका माई मस्जिद में। बाबा स्वाध्यायी होते हुए भी संग्राही नहीं है। ये पुस्तकें भी किसी दर्शनार्थी की ही हैं। वह सबेरे इन्हें यहां लेकर आया था। पुस्तकें यही छोड़कर दोपहरी में पास के गांव में चला गया है। भोजन की कोई व्यवस्था यहाँ से ही आ जाता है। यदा-कदा वे स्वयं भी भिक्षा मांग लाते हैं। दर्शन करने जो लोग आते हैं वे गांव में जो एक हलवाई की दुकान है वही कुछ बनवाकर खा लेते हैं।

मर गया बेचारा । विनायक ने पुस्तक दी। बाबा ने उसे खोला और एक पन्ने पर दृष्टि गढ़ाकर इस प्रकार झुक गए, जैसे कोई बहुत बड़ी दुर्घटना देख रहे हों।

यह तो पुस्तकों को नष्ट करने वाले कोड़ा है। विनायक उत्सुकतावश समीप आ गया था। उसने झुककर पुस्तक का वह पृष्ठ देखा। वहाँ एक किताबी कीड़ा मरा चिपका था। ये वैसे तो ग्रन्थों को काट-काट कर नष्ट करते ही हैं मर कर भी ग्रन्थ को गन्दा करते हैं। विनायक को इन कीड़ों से बहुत चिढ़ है। इन्होंने उसकी कई उत्तम पुस्तकों के पन्ने जहाँ-जहाँ से खा लिए । उसका बस चले तो कवि बनने का यत्न पीछे करें, पहले इन कीड़ों के वंश को नष्ट कर डाले।

तुम उसे नहीं पहचानते। पहचान भी नहीं सकते। बाबा ने उसी खेद की मुद्रा से कहा-यह तो इस महाग्रन्थ का रचयिता है

इस ग्रन्थ का इस प्रख्यात महाकाव्य का रचयिता -महाकवि .................. । विनायक की आंखें फैल गयी।

बड़ा प्रतिभाशाली था। बड़ा विख्यात कवि था। उसकी कविताओं का कई भाषा में अनुवाद भी हुआ था। बड़ा सम्मान पाया इसने । इसका यह सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ बड़ी ममता थी इसकी इस ग्रन्थ से । बाबा ऐसे स्वर में कह रहे थे। जैसे मृत कीड़े के प्रति आन्तरिक सम्वेदना प्रकट कर रहे हों- बेचारा अपने ग्रन्थ में भी नहीं रह सका। यह तो कर्म का फल है। कर्म समाप्त हुए और शरीर समाप्त हुआ। कोई कब तक किससे ममता किए रहेगा।

महाकवि ....... और यह कीड़ा । में गूँज रहा है विनायक का मन अभी तक स्वस्थ नहीं हो सका था।

इसमें आश्चर्य की क्या बात है। अपने कर्म के अनुसार, अपनी आसक्ति के अनुसार हो तो प्राणी की पुनर्जन्म होता है। वैसे तो ज्ञान, नित्य और अनन्त हैं अभी जो बालक आया था, आसी पोथी के समान ही कुछ रेखाएं कुछ शब्द कुछ अक्षर जोड़-बटोर कर यह महाकवि हो गया। लोगों ने कहा इसने मान लिया कि मैं महाकवि हूं । अपने ग्रंथ से इसकी मोह हो गया। सन्त सम्वेदना के स्वर में ही कह रहे थे। अब तुम कहते ही कि यह ग्रन्थ कीट ग्रन्थ को नष्ट कर रहा था। कोई इस ग्रन्थ को इस ग्रन्थ के रचयिता को क्या कहता है कितनी प्रशंसा करता है। उनकी इस बात से इसको क्या लाभ? इसका पेट तो ग्रन्थ के थोड़े से बहुत थोड़े कागज से भर जाता था किसी ग्रन्थ के कागज से भी जाता लेकिन मर गया बेचारा । उसके अपने ग्रन्थ ने ही दबाकर मार दिया इसे।

यह कीड़ा था विश्वविख्यात महाकवि ...........। विनायक को कैसे झटपट सन्तोष हो जाय।

तुम पुनर्जन्म मानते हो फिर चौंकते क्यों हो? बाबा ने अब बड़ी स्थिति गम्भीर दृष्टि से विनायक को देख। तुम पिछले जन्मों में कालिदास, भवभूति गजाली अथवा 3मों या कोई दूसरे महान कवि, महान शूरवीर, चक्रवर्ता सम्राट नहीं रहे हो, यह कैसे जानते हो? उस समय के तुम्हारे कर्म विश्व में अब भी प्रख्यात हो तो तुम्हें उनसे क्या लाभ अगले जन्म में तुम क्या बनोगे, यह तो तुम्हारे इस जन्म के कर्मों पर निर्भर है । यह तुम्हें स्वयं निर्णय करना है ।

विनायक ने बाबा के चरणों में सिर रख दिया। उसे अब कोई अनुष्ठान नहीं चाहिए था।

शिरडी से अब वह अपने कालेज पहुंचा। कालेज में प्रवेश करते ही मित्रों ने उसे घेर लिया। आओ, मुंह मीठा करें। मित्रों का यह आग्रह उसे समझ में नहीं आ रहा था। अभी तो परीक्षाएं भी नहीं हुई थी फिर किस बात की मिठाई । तुम बहुत चालाक हो गए हो। हम लोगों से भी तुमने नहीं बताया कि तुम सचमुच अच्छे कवि हो गए हो। मित्रों के स्वर में उलाहना था। में और कवि? उसे कुछ समझ में नहीं आया। वह सोचने लगा कि आज पता नहीं ये सब उसे चिढ़ाने की कौन सी भूमिका बना रहे है।

बना मत। ये क्या है? एक सुविख्यात पत्रिका का विशेषांक खोलकर एक मित्र ने उसके आगे कर दिया। विनायक ने एक कविता काफी पहले इस पत्रिका को भेजी थी। कविता लेकर नहीं आयी थी। परन्तु सभी पत्रिकाएं अस्वीकृत रचनाएं लौआ हो तो नहीं देते। उसने सोचा था कि यह भी किसी अस्वीकृति के ढेर में पड़ी होगी। लेकिन वह तो छप गयी- इतनी विख्यात पत्रिका के विशेषाँक में और वह भी प्रथम पृष्ठ पर ।

इसे देखकर वह एक पल को मुस्कराया। उसकी इस मुस्कान के पीछे स्पन्दित हो रहा था उस बालक को टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों में और इन लकीरों में चाहे जितना अन्तर हों किन्तु अपनी लकीरों की प्रशंसा सुनकर फूल जाने में कौन सी विचारशीलता है। क्या हानि लाभ हैं इसमें किसी का कि कोई उसकी प्रशंसा करे या न करके उसके विचारों में स्पन्दित हो रहा था- संसार तो उस कुंए और तालाब बनाने वाली उदार स्त्रियों का नाम तक नहीं जानता। कोई नाम का पत्थर पढ़कर रट भी ले तो इससे उस बुढ़िया को क्या लाभ? कितना झूठा है नाम-यज्ञ का मोह। कितनी मूर्खता है इसमें और इसी मूर्खता के चक्कर में बेचारा महाकवि ग्रन्थ का कीड़ा बनकर उस में पिस गया।

मित्रों की समझ में विनायक की यह मुस्कान भरी चुप्पी समझ में नहीं आ रही थी। सबने मिलकर उसे कुरेदा तो वह खुलकर हंस पड़ा वह हंसते-हंसते कह रहा था कितना पागलपन हैं कितनी मूर्खता है इस नाम यश के मोह में। जिससे कोई लाभ नहीं उस नाम के मोह के पीछे लगभग सारा संसार पागल हो रहा हैं हंसते-हंसते वह एक बार फिर गंभीर हो गया- नहीं, में अपने को पागल नहीं होने दे सकता।

मित्र -परिचित समझने लगे है कि विना राव सनक गया है लेकिन सांई बाबा ने तो सारी बात सुनकर कहा- अब वह समझदार हो गया है। उसे जीवन के वास्तविक सत्य का बोध हो गया है। विनायक राव की संपत्ति ओर विचार का तो कोई महत्व हैं नहीं। लेकिन आप क्या समझते हैं?


ज्योतिर्विज्ञान को समझें , इस विधा का लाभ लें

सृष्टि का गतिचक्र एक सुनियोजित विधि व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। ब्रह्माण्ड अवस्थिति विभिन्न निहारिकाएं ग्रह दक्षत्रादि परस्पर सहकार - संतुलन के सहारे निरन्तर परिभ्रमण-विचरण करते रहते हैं। जिस ब्रह्माण्ड में हम रहते हैं उसकी अपनी परिधि एक लाख प्रकाश वर्ष है। और ऐसे-ऐसे हजारों अविज्ञात ब्रह्मांड विद्यमान हैं ।

आधुनिकतम अन्तरिक्ष यानों की अधिकतम गति (18 हजार मील प्रति घंटा ) से भी यदि ब्रह्मांड को पार करने की सोचा जाय तो मनुष्य को इस पुरुषार्थ में करोड़ों वर्ष लग जाएंगे ऐसी स्थिति में अन्यान्य ग्रहों की स्थिति , उनके परस्पर एक-दूसरे पर प्रभाव तथा सुन्दर स्थिति ग्रहों के पर्यावरण एवं जीव-जगत पर प्रभावों की कल्पना वैज्ञानिक दृष्टि से कठिन ही नहीं असम्भव जान पड़ती हैं यह की वह बिन्दु है जहां एस्ट्रानॉमी (खगोलशास्त्र) एवं एस्ट्रालॉजी (ज्योतिर्विज्ञान) का परस्पर टकराव होता देखा जाता है विज्ञानसम्मत प्रतिपादन फलित ज्योतिष की संभावनाओं को काटते नजर आते हैं तो ज्योतिष विज्ञान के ज्ञाता भौतिकी के नियमों को अपनी परिधि में न मानकर ग्रह-गणित आदि के आधार पर फलादेश की घोषणा करते दृष्टिगोचर होते हैं इनमें कौन सही है? कौन गलत? क्या कोई समन्वयात्मक स्वरूप बन सकना सम्भव हैं जिसमें ग्रह - नक्षत्रों की जानकारी से उनके प्रभावों से बचना, लाभान्वित हो सकना, अपने क्रिया -कलापों को तदनुसार बदलते रह सकना शक्य हो सके? इसका उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें खगोलशास्त्र की कुछ प्रारम्भिक जानकारी प्राप्त करनी होगी।

अपना भू-लोक सौरमंडल के वृहत परिवार का एक सदस्य है सारे परिजन एक सूत्र में आबद्ध है। वे अपनी-अपनी कक्षाओं में घूमते तथा सूर्य की परिक्रमा करते हैं सूर्य स्वयं अपने परिवार के ग्रह उपग्रह के साथ महासूर्य की परिक्रमा करता है। यह क्रम आगे बढ़ते-बढ़ते ब्रह्माण्ड के नाभि महाध्रुव तक जा पहुंचता है इतना सब कुछ जटिल क्रम होते हुए भी सौर ग्रह, नक्षत्र एक-दूसरे के साथ न केवल बंधे हुए हैं वरन् परस्पर अति महत्वपूर्ण आदान प्रदान भी करते हैं इन सबके संयुक्त प्रयास का ही परिणाम है कि ग्रह नक्षत्रों की स्थिति अक्षुण्ण बनी रहती हैं यदि ऐसा न होता, तो कही भी अव्यवस्था फैल सकने के अवसर उत्पन्न हो जाते । ग्रहों का पारस्परिक सहयोग एवं आदान-प्रदान इतना अधिक महत्वपूर्ण है। कि इसे ब्रह्माण्डीय प्राण - संचार कहा जा सकता है।

इतनी पृष्ठभूमि को समझने के बाद उस विद्या की चर्चा की जा सकती है, जिसे ‘ज्योतिर्विज्ञान’ कहा गया हैं । विज्ञान के क्षेत्र में इसे उच्चस्तरीय स्थान प्राप्त है। ऋतु-परिवर्तन, वर्षा , तूफान, चक्रवात, हिमपात, भूकम्प, महामारी जैसी प्रकृतिगत अनुकूलता-प्रतिकूलताओं की बहुत कुछ जानकारियां वैज्ञानिक लोग अंतर्ग्रही स्थिति के आधार पर प्राप्त करते हैं खगोल भौतिकीविदों का ऐसा अनुमान है कि मौसम की स्थिति पृथ्वी पर अन्तरा से आने वाले ऊर्जा प्रवाह के सन्तुलन-असन्तुलन पर निर्भर होती है। सामान्यतया पृथ्वी के ध्रुवों पर ही अन्तरिक्षीय ऊर्जा का संग्रहण होता है। उत्तरी ध्रुव होकर ही ब्रह्माण्डव्यापी अगणित सूक्ष्म शक्तियां संपदाएं पृथ्वी को प्राप्त होती हैं जो उपयुक्त है उन्हें तो पृथ्वी अवशोषित कर लेती है एवं अनुपयुक्त को दक्षिणी ध्रुवद्वार से अनन्त आकाश में खदेड़ देतीं है जिस प्रकार वर्षा का प्रभाव प्राणि जगत एवं वनस्पति समुदाय में पड़ता है। उसी प्रकार अन्तर्ग्रही सूक्ष्म प्रवाहों का जो अनुदान पृथ्वी को मिलता है उससे उसकी क्षेत्रीय एवं सामयिक स्थिति में भारी उलट-पुलट होती हैं यहां तक कि इस प्रभाव से प्राणि - जगत भी अछूता नहीं रहता । मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थिति भी इस प्रक्रिया से बहुत कुछ प्रभावित होती है। ज्योतिर्विद्या के जानकार बताते हैं कि वर्तमान की स्थिति और भविष्य की सम्भावना के सम्बन्ध में इस वान के आधार पर पूर्व जानकारी से समय रहते अनिष्ट से बच निकलने और श्रेष्ठ से अधिक लाभ उठाने की विद्या को यदि विकसित किया जा सके तो मानव का यह श्रेष्ठ पुरुषार्थ होगा। ऋषिगणों ने इसके लिए समुचित मार्ग भी सुझाया है। आवश्यकता पूर्वाग्रहों सम मुक्त होकर इस विज्ञानसम्मत प्रणाली के सभी पक्षों को समझने की है।

प्राचीनकाल में ज्योतिर्विज्ञान न की एक सर्वांगपूर्ण शाखा थी जिससे खगोल विज्ञान, ग्रह गणित, परोक्ष विज्ञान जैसे कितने ही विषयों का समावेश था। उस ज्ञान के आधार पर कितनी घटनाओं का पूर्वानुमान लगा लिया जाता था आज भी उस महान विद्या से सम्बन्धित ग्रन्थ तथा ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं जिससे उस काल की ज्योतिर्विज्ञान की विस्तृत जानकारी मिलती है उसे अगणित ग्रन्थों एवं ज्योतिर्विदों का परिचय इतिहास के पत्रों में मिलता है ।

आर्ष वाङ्मय में सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद है। अनुमान है कि इनकी रचना 4000 ईसा पूर्व में 2500 ईसा पूर्व वर्ष के बीच हुई है ऐसे अनेकों प्रसंग वेदों में है। जिनसे ज्ञान होता है। कि प्राचीन ऋषि -मनीषियों को ज्योतिर्विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान था उदाहरणार्थ ऋजुवेद में नक्षत्र दर्शन तथा ऋग्वेद में ग्रह का वर्णन मिलता है। अथर्ववेद के अनुसार ग्रन्थ ऋषि ने सर्वप्रथम अंतरिक्ष के विभिन्न में विभाजित करने का प्रयत्न किया था इसमें अतिरिक्त अट्टहास नक्षत्र समद्वि मण्डल, वृहल्लुब्धक आदि की भी पर्याप्त जानकारी वेदों में मिलती है। छह ऋतुओं का का नामकरण सर्वप्रथम खगोलशास्त्रियों ने किया था भौतिकविज्ञानियों को बहुत समय बाद यह जानकारी मिली कि सूर्य की किरणों में सात वर्ण होते हैं। पर सहित जैसे प्राचीन ग्रंथों में बहुत समृद्ध एवं ही सूर्य को सप्त रश्मि कहा गया हैं कुछ विद्वानों का अभिमत है कि भेतिकाशक्तियों को सूर्य रश्मियों को के आधार वह प्राचीन ग्रन्थ है।

वैदिक युग के बाद रामायण और महाभारत कहा गया है जो लगभग 2500 ईसा पूर्व से लेकर 3000 ईसा पूर्व तक माना जाता है कहा जाता है कि रामायण के रचयिता महर्षि बाल्मीकि न केवल तत्ववेत्ता थे वरन् महान ज्योतिर्विद् भी थे उन्होंने रामायण में भी तारे एवं ग्रहों को गति तथा उनकी स्थिति का वर्णन करते हुए उनका मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख किया है। रामायण का खलनायक रावण स्वयं महान ज्योतिर्विद् था ऐसा कहा जाता है कि उस काल में रावण जैसा प्रकाण्ड पण्डित तथा ज्योतिर्विद् कोई दूसरा न था। रावण संहिता’ उसकी ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी का प्रमाण है जो ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी का प्रमाण है जो ज्योतिष शास्त्र का असाधारण ग्रन्थ माना जाता है।

गुरु वशिष्ठ, विश्वमित्र, मनु, याज्ञवल्क्य जैसे ऋषि अपने समय के धुरन्धर तारों और तारा रश्मियों के विशद वर्णन है। जो इस संयम की खगोल विधा एवं ज्योतिर्विद् की जानकारी देता है। महाभारत में भी ऋतुओं एवं ग्रह - नक्षत्रों का वर्णन है एक स्थान पर उल्लेख है कि कौरव और पाण्डवों के बीच युद्ध छिड़ने के पूर्व चन्द्रग्रहण लगा था राहु एवं केतु प्रभावों का भी वर्णन मिलता है।

500 ईसा पूर्व से लेकर 500 ई॰ तक की अवधि में विदेशी आक्रमणकारी अत्यधिक सक्रिय रहे सिकन्दर ने इसी मध्य आक्रमण किया था। पुरातत्ववेत्ताओं का कहना है कि आतताइयों ने न केवल भारत में लूट-पाट मचायी वरन् यही की साँस्कृतिक धरोहरों विशेषकर ज्योतिर्विज्ञान की महत्वपूर्ण पाण्डु-लिपियों तथा वेधशालाओं को भी बुरी तरह नष्ट किया। ऐसा भी अनुमान है कि कितने ही बहुमूल्य अभिलेख वे अपने साथ बाध कर ले गये, जिनका जर्मन, रोमन, फ्रेंच आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ , वे वहां से संग्रहालयों में अभी भी उपलब्ध है।

ज्योतिर्विज्ञान को पुनर्जीवित करने का कार्य आगे चलकर पाटलिपुत्र में अथंभद प्रभम ने किया। सन् 0048 ए0 डी0 में उनका जन्म हुआ। पाटलिपुत्र की विश्वविख्यात विद्यापीठ में उन्होंने ज्योतिर्विद्या का विशद अध्ययन किया। उन्होंने ‘आर्यभट्टियम्’ तंत्र तथा इशगोतिका नामक तीन प्रख्यात ग्रन्थ लिखें। वे सर्वप्रथम खगोलविद् थे जिन्होंने यह सिद्धान्त खोजा कि पृथ्वी अपनी धुरी व कक्ष पर दैनिक गति करती है। इसी गति के कारण दिन और रात होते हैं।

आर्यभट्ट के बाद ज्योतिर्विद्या पर सबसे अधिक काम आचार्य वराहमिहिर ने किया। उनका जन्म उज्जैन के काल्पी नामक स्थान पर हुआ। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांशतः भाग उज्जैन में ही अध्ययन -अध्ययन में बिताया। उनके शोध कार्य का नवनीत ’वृहद् जातक’ ‘वृहत संहिता‘ जैसे महान ग्रंथों में भरा है। वृहत संहिता में प्राकृतिक विज्ञान का इतना विस्तृत वर्णन है कि कोई भी क्षेत्र ज्योतिर्विज्ञान का बचा नहीं हैं ग्रहण, उल्कापात, भूकम्प, दिग्दाह, वृष्टि प्रकृति , ग्रह, नक्षत्रों, पर विशद् वर्णन है। कुछ विशेषज्ञों का अभिमत है कि विज्ञान की नया शाखा-एस्ट्रोंफिजिक्स (खगोल भौतिकी) , जिसमें ग्रह-नक्षत्रों के विद्युत चुम्बकीय ऊष्मा यदि प्रभावों का अध्ययन किया जात है उसकी उत्पत्ति वराहमिहिर के ग्रन्थों की प्रेरणा से हुई है। उनकी ‘पंच सिद्धिन्तिका‘ कृति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उसमें वर्णित ‘सूर्य सिद्धान्त’ अद्वितीय है। विषुवअयन की क्रिया का वर्णन भी वराहमिहिर ने की किया है। उन्होंने अपने विशद अध्ययन से उसका मान 54 विकल्प (सेकेंड) प्रतिवर्ष प्राप्त किया, जिसका आधुनिक मान खगोलविदों ने 54,2728 सेकेण्ड खोजा हैं दोनों खोजों में कितना साम्य है यह देखकर अचरज होता है साथ ही इस बात का भी आश्चर्य होता है कि बिना आधुनिक यन्त्रों के उस काम में इतनी सूक्ष्म शुद्धि गणना करना किस प्रकार सम्भव हो सका।

न्यूटन ने बहुत समय बाद यह खोज की कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। उसके सैकड़ों वर्ष पूर्व ही महान भारतीय वैज्ञानिक एवं ज्योतिर्विद् भास्कराचार्य ने उपरोक्त तथ्य की खोज कर ली थी उनकी प्रख्यात कृति ‘सिद्धान्त शिरोमणि - में इस बात का प्रमाण भी मिलता है। उसमें कहा गया है कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है इससे वह अपने आस-पास की वस्तुओं को आकर्षित कर लेती हैं पृथ्वी के निकट आकर्षण शक्ति अधिक होती हैं जैसे-जैसे दूरी बढ़ती जाती है। वैसे-वैसे वह घटती जाती है यदि किसी स्थान से भारी तथा हल्की वस्तु छोड़ी जाए, तो दोनों एक ही समय पृथ्वी पर गिरेंगी, ऐसा न होगा कि भारी वस्तु पहले गिरे तथा हल्की बाद में। ग्रह और पृथ्वी आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ही परिभ्रमण करते हैं। स्पष्ट है, उस समय भी यह ज्ञात था कि वस्तुओं के ऊंचाई से गिरने में जो प्रत्यक्ष विरोधाभास दिखाई पड़ता है उसका कारण हवा का प्रतिरोध है। यदि इस अवरोध को हटा दिया जाय अर्थात् किसी प्रकार शून्य की स्थिति पैदा कर दी जाय तो हल्की भारी दोनों प्रकार की वस्तुएं साथ-साथ नीचे पहुंचेगी।

आज विज्ञान के पास अद्भुत जानकारियां , बेजोड़ राडार, टेलिस्कोप आदि यंत्र है। जिनके सहयोग से ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र में मूल्यवान खोजे की जा सकती है। आवश्यकता मात्र इतनी भर है। कि जड़ संसार की खोज में उलझा विज्ञान, अदृश्य जगत की ओर भी अपने कदम बढ़ाये। प्राचीन ज्योतिर्विज्ञान के अगणित सूत्र -संकेत उसे मार्गदर्शन करने में समर्थ है। इस महान विद्या का पुनरुद्धार किया जा सके तो अदृश्य जगत से संपर्क साधने, सहयोग पाने तथा परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का मार्ग प्रशस्त हों सकता है। यह एक ऐसी उपलब्धि होगी, जिस पर वैज्ञानिक गर्व कर सकते हैं। मारक आयुधों के निर्माण संलग्न प्रतिभाओं को वस्तुतः मनीषी की भूमिका निभाते हुए पुरातनकाल के ऋषिगणों की तरह ही ज्योतिर्विज्ञान की बौद्धिक प्रखरता का, सार्थकता का प्रमाण देना चाहिए।

शांतिकुंज गायत्री तीर्थ ने आर्यभट्ट परम्परा के अंतर्गत हुए इस कार्य को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। परमपूज्य गुरुदेव दृश्य गणित पर आधारित खगोल ज्योतिर्विज्ञान में न केवल निष्णात थे अपितु उनके मार्गदर्शन में गायत्री नगर में एक उच्चस्तरीय शोधकार्य करने वाली एक आँब्जर्वेटरी भी लायी गयी। साथ ही एक पंचाँग भी यहां से निकाला जाता रहा था। कालान्तर में स्थान की आवश्यकता बढ़ने पर वे यंत्र तीर्थ परिसर से हटाकर अन्य किसी उपयुक्त स्थान पर बनाने का उनने मार्गदर्शन दिया एवं यही कार्य परमवंदनीया माताजी से संरक्षण में अब नये परिसर में व्याप्त भवन के सामने के मैदान में पंडित कल्याणदत्तजी के प्रत्यक्ष जाता चाहिए कि मनीषी समुदाय की लुप्त होती जा रही इस विद्या की जाग्रत-जीवन संस्कृति की सबसे बड़ी सेवा है। ऐसी प्रतिभाओं का गायत्री तीर्थ-कुँज आह्वान करता है।


अतीत की वापसी

भारतीय धर्म, संस्कृति और सभ्यता का जिन्होंने अध्ययन, अनुभव एवं अवगाहन किया है। इसके मूल तक पहुंचे हैं उन्होंने इसकी सार्वभौमिकता, विशालता तथा पवित्रता से इनकार नहीं किया। भारतीय दर्शन सम्पूर्ण विश्व लिए प्रकाश है । उस प्रकाश का लाभ सभी जातियों ने पाया है। यहां के ऋषि मनीषियों ने अपने ज्ञान अपनी साधना और तपश्चर्या के लाभों को सारे संसार को बांटा है। उस अनुदान का लाभ समूचा विश्व उठा भी रहा है। किन्तु हम स्वयं उस प्राचीन गौरव को भुला बैठे। उच्च आदर्शों से च्युत होकर अपनी सारी भौतिक संपदाएं एवं आध्यात्मिक विभूतियां खोकर रख दी। युग संधि की संक्रमण वेला में आज समय उन्हें फिर से जाग्रत करने का संदेश दे रहा है।

महापरिवर्तन का वह युग आ गया है जय इस आवाहन को अनसुनी कर टाल नहीं सकते।

हीरे की परख जौहरी को होती है। हम जिस अतीत को आज भूल बैठे है। उसके महत्व को पाश्चात्य मनीषियों ने कला-पारखियों ने समझा और उसकी प्रशंसा की है। इतिहास में अनेकों वर्णन विश्लेषण एवं विज्ञप्तियां भरी पड़ी है। उनका अध्ययन करने से आंखें खुल जाती है। और अपने सही रूप का पता चल जाता है। प्रख्यात जर्मन दार्शनिक मैक्समूलर ने लिखा हैं-”यदि कोई मुझसे पूछे कि कौन -सा देश है जिसे प्रकृति ने सर्वसंपन्न , शक्तिशाली एवं सुन्दर बनाया है तो मेरा संकेत भारतवर्ष की ओर होगा। जिन्होंने प्लेटो और काण्ट के दर्शन का अध्ययन किया है उन्हें भी अपने मुख्तम गुणों का विकास करने वाली जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं पर गहराई से सोच-विचार करने वाली भारतीय संस्कृति के अध्ययन की जरूरत है अपने जीवन को अधिक पूर्ण अधिक विस्तृत और अधिक व्यापक बनाने के लिए भारतीय विचार पर्याप्त हैं न केवल इस जीवन के वरन् मनुष्य के अनन्त जीवन के पूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण की क्षमता केवल भारतीय संस्कृति में है। मैक्समूलर ने इन पंक्तियों में भारतीय आध्यात्मिक शोधों की ओर संकेत किया है। इन तथ्यों का विस्तृत विश्लेषण । जिसकी अभी तक कोई थाह नहीं पा सके। वह सब वेदों में सम्पादित है। वेद के पल आधार है इसमें मनुष्य का आध्यात्मिक तथा भौतिक आवश्यकताओं के सभी विषयों का समावेश है। यह ज्ञान अन्त में अनेकों धाराओं में प्रभावित होकर बहा जिससे न केवल यहां के आध्यात्मिक जीवन समृद्ध बना वरन् भौतिक सम्पन्नता भी अपने ही अनेक विश्लेषण लेकर प्रस्तुत हुई। ‘इंडिया रिव्यू’ में सुप्रसिद्ध अमेरिका विद्वान डेलभार ने लिखा है।

“पश्चिमी लोगों को जिन बातों पर अभिमान है। वे सब भारतवर्ष से आयी है। फल-फूल , पेड़ -पौधे तक जो इस समय यूरोप में पैदा होते हैं। वे भारतवर्ष से ही लाकर यहां लगाये गये हैं। घोड़े, मलमल, रेशम, टीन, लोहा तथा सीसे का प्रचार भी यूरोप में भारतवर्ष से ही हुआ हैं इतना ही नहीं ज्योतिष , वैद्यक, अंकगणित, चित्रकारी तथा कानून भी भारतवासियों ने ही यूरोपियनों का सिखलाया है।

भारतवर्ष केवल हिन्दू धर्म का ही घर नहीं है। उसमें संसार की सभ्यता का आदि भण्डार है यहां की जीवन सरल महत्वपूर्ण तथा अति प्राचीन है श्रद्धा और भक्ति, विश्वास और निश्चय से भरा हुआ यह अपना देश किसी समय ज्ञान-विज्ञान का सम्राट बना हुआ था। यहां मनुष्य को शाश्वत आशाएं और सांत्वनाएं घनीभूत थी। ऋषिओं की गम्भीरता को हृदयंगम कर पाना भी कठिन है, जिन्होंने सर्वप्रथम इस संसार में विचार और विवेक को जन्म दिया था। वास्तविक जीवन के सिद्धान्तों का अनुसंधान इसी पवित्र भूमि में हुआ हैं इसलिए सम्पूर्ण विश्व ने इसे शीश नवाया, इसकी अभ्यर्थना की है। पाश्चात्य मूर्धन्य मनीषी एम लुई जेकोलियट ने लिखा हैं -

“ऐ प्राचीन भारत वसुंधरा। मनुष्य जाति का पालन करने वाली, पोषणदायिनी तुझे प्रणाम है। शताब्दियों से चलने वाले आघात भी तेरी पवित्रता को नष्ट नहीं कर पाये। श्रद्धा प्रेम, कला और विज्ञान को जन्म देने वाली भारतभूमि को मेरा कोटिशः नमस्कार है।

भारतवर्ष का सम्मान और इसकी प्रतिष्ठा का मूल कारण यहां का धर्म है। इसे औरों ने सम्प्रदाय रहे रूप में भले ही देखा ही किन्तु वस्तुतः हिन्दू धर्म का मूल सिद्धान्त है मानवीय आत्मा के गौरव मूल सिद्धान्त है मानवीय आत्मा के गौरव को प्राप्त करना और फिर उसी के अनुसार आचरण करना । शास्त्रकार ने लिखा है।

श्रृयना धर्म सर्वस्त्र आत्मन पिक्तानी अर्थात् यह है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार मत करो जैसा तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे प्रति किया जाय। इसको सुनी ही नहीं आचरण भी करो।

धर्म का यही सुखद और सर्वहित में है। इसमें प्रविमान के जीवन रक्षा और सुखोपभोग की व्यावहारिक कल्पना है। अपने इसी म्प में हमारा अतीत उज्ज्वल सुखी और शांतिमय रहा है आज भी सारे विश्व को इसकी आवश्यकता है।

धर्म के जिस रूप की यहां व्याख्या की गयी है। वह आदर्श है किन्तु वह बिना किसी महान शक्ति के आश्रय में रहे हुए स्थिर नहीं रह सकता । मानवीय हितों की सुरक्षा की आज भी सारे संसार में व्यवस्था है किन्तु उसका परिपालन पूर्णतया कही भी नहीं है। इसी से सर्वत्र अस्त-व्यस्तता है। जो पंक्तियां इन कार्यों के लिए नियुक्त भी है। वे भी पूर्णतया विध्वंसक हैं भारतीय धर्म की पूर्ण शक्ति ही है। शक्ति का विकास पूरक गुण भी है। और उसका एक नितान्त वैज्ञानिक अंग भी है। ऐसी विशेषता केवल भारत में हो है।


Quotation

नारी केवल साँस पिण्ड का पर्याय नहीं है। अनादि कल से लेकर आज तक पुरुष को गढ़कर उसके विकास में सहायक-अनुगामी बनकर , उसके अभिशापों को स्वयं सहते हुए अपने वरदानों से जिसने उसके जीवन में अक्षय शक्ति का अभिसंचार किया है। वह नारी है।


देखें , सार्थक एवं सोद्देश्य सपने

सपनों की सार्थकता से इनकार नहीं किया जा सकता पर सामान्य जीवन में जो सपने दिखाई पड़ते हैं। उनमें से अधिकांश स्वप्नों में निरर्थक दृश्यों की ही भरमान होती है। इनसे कैसे बचा जाय और सार्थक एवं सोद्देश्य स्वप्न कैसे प्राप्त किये जाए ? इस दशा में विज्ञान कोई सुनिश्चित हल अभी तक नहीं दे शोधकार्य अवश्य हुए हैं। और शोधकर्त्ताओं ने अपने निष्कर्ष के आधार पर स्वप्न सिद्धान्त भी प्रतिपादित किये हैं मगर इनमें से अधिकाँश ऐसे है जिनमें स्वप्न सम्बन्धी क्रियाविधि की ही चर्चा की गई और मूल उद्देश्य को गौण रखा गया है।

किन्तु अमेरिका के येल विश्व-विद्यालय में इसी उद्देश्य को लेकर अनुसंधान किये जा रहे हैं वहां के वैज्ञानिक निरन्तर इस बात के लिए प्रयत्नशील है कि मानवी स्वप्नों को नियंत्रित कर उच्चस्तरीय स्वप्न कैसे प्राप्त किये जाए? इस दिशा में उन्हें कतिपय सफलता मिली भी है। यही कार्य भारत में विशाखापट्टनम की ‘ड्रीम रिसर्च लैबोरेटरी‘ में भी सम्पन्न हो रहा है। येल युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने सर्वप्रथम बिल्लियों पर प्रयोग कर यह जानने का प्रयास किया गया कि स्वप्नों के लिए मस्तिष्क का कौन-सा अवयव जिम्मेदार हैं इस क्रम में जब शोधकर्मियों ने जब बिल्ली का ब्रेन-स्टेम नष्ट किया, तो पाया कि उसे स्वप्न आने बन्द हो गये। इस आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि स्वप्न सम्बन्धी भाग बगेन स्टेम ही है इतना सुनिश्चित होने के पश्चात् अब वे मनुष्यों पर प्रयोग कर रहे है उनका कहना है कि यही वह हिस्सा है जिसका सीधा संपर्क समष्टिगत चेतना से होता है। और वही से भविष्य सम्बन्धी तरह-तरह की सूचनाएं आती है। शोधकर्ता वैज्ञानिक अब इस बात के लिए प्रयासरत है कि यदि सचमुच ही दिमाग का या भाग स्वप्न के लिए उत्तरदायी है। तो उसका सघन संपर्क वैश्व-चेतना से लगातार कायम कैसे रखा जा सकता है।ताकि सार्थक जानकारियां ग्रहण की जा सके। अनुसंधान कार्य अभी जारी है।

ब्रिटिश मनोविज्ञानी क्रिस्टों-फर इवान्स कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘लैण्डस्केप ऑफ दि नाइट’ में लिखते हैं कि स्वप्न चैतन्यावस्था में ही काम करना शुरू कर देते हैं। यह बात दूसरी है कि इसकी जानकारी हमें निद्रावस्था में मिल पाती है उनका कहना है कि व्यक्ति यदि चाहे तो कठिन समस्याओं का हल इसके माध्यम से प्राप्त कर सकता है। इसका उपाय बतलाते हुए इवान्स कहते हैं कि कुछ समस्याओं पर यदि लगातार गहन चिन्तन किया जाये और कुछ दिन पश्चात् इसका उत्तर निद्रावस्था में संकेत रूप से मिल जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसका समर्थन न्यूयार्क राकफेलर युनिवर्सिटी के तंत्रिकाविज्ञानी डॉ. जोनाथन विन्सन ने भी किया है वे अपनी ‘ब्रेन एण्ड दि साइक ‘ कृति में कहते हैं कि प्रसुप्त की क्षमता को यदि जगाया -उभारा जा सके, तो वह हमें ने केवल सपनों के माध्यम से अनागत की सूचना दे सकती है वरन् पूर्ण चेतना की अवस्था में भी हम उससे उसी स्तर का कार्य ले सकते हैं।

शोध के दौरान दोनों अनुसंधानकर्ता एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे है शोधर्थीद्वय का विचार है कि स्वप्न निद्रा का कोई आकस्मिक बाईप्रोडक्ट नहीं है, वरन् नींद की यह उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है दोनों ने जन्तुओं पर ही अपने अनुसंधान कार्य किये। इवान्स ने स्वप्न संबंधी तथ्य एक जलकौवे पर अध्ययन करके ढूँढ़ निकाले। एक बार उन्होंने देखा कि एक जलकौवा शोध का अच्छा अवसर देख वह दबे पाँव कौवे के निकट गये, उसे स्पर्श किया और धीमे स्वर में कहा -” क्या हो रहा है,” तत्क्षण पक्षी जग पड़ा उसे खतरे का एहसास हुआ एक पल तक दोनों की आँखें चार हुई , फिर वह पंख फड़फड़ाते उड़ पड़ा।

इवान्स का कहना है कि ऐसी खतरनाक स्थिति में कोई भी जन्तु अथवा पक्षी स्वयं को नहीं रखना चाहेगा। फिर ऐसा क्यों ? उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि स्वप्न फिजियोलॉजी और जीवन का इतना आवश्यक अंग है कि पशु - पक्षी (विशेषकर उष्णरक्तीय ) नींद की स्थिति में इसके (स्वप्न के) बदले ऐसे खतरे उठाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

आतव्य है स्वप्न सदा’ रेम स्लीप’ के दौरान ही आते हैं। पर आस्ट्रेलियाई पिपीलिका भक्षी एकमेव ऐसा ज्ञात स्तनपायी है। जिसमें ‘रेम स्लीप’ का सर्वथा अभाव होता है। इस जन्तुओं की तुलना में अपेक्षाकृत अन्य स्तनपायी जन्तुओं को तुलना में अपेक्षाकृत बड़ा होता है। विन्सन इसी विलक्षणता में स्वप्न रहस्य छिपा मानते हैं। उनका कहना है कि यद्यपि सभी जन्तु में ‘ रेम स्लीप नहीं होते किन्तु फिर भी वे इस क्षति की पूर्ति कर लेते हैं। क्योंकि ये जाग्रतावस्था में स्वप्न देखते हैं। फ्रण्टल लोब का प्रयोग जानकारियों के रूप से सक्रिय और क्रियाशील होता है। जबकि दूसरे उष्णरक्तीय जन्तुओं को इसके लिए ‘रेम स्लीग’ का इन्तजार करना पड़ता है।

किन्तु यदि किसी कारणवश किसी व्यक्ति की ‘रेम स्लीप’ में कोई व्यतिक्रम आ जाय, तो क्या होगा? मनोविज्ञानी इवान्स कहते हैं। कि इसके लिए ब्रेन को किसी नये सिरे की प्रोग्रामिंग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह उस पहले के ही प्रोग्राम में आवश्यक फेर -बदल कर अपना अभीष्ट पूरा कर लेता है। उदाहरण के लिए , मादक द्रव्यों के सेवन करने वालों को लिया जा सकता है। ये द्रव्य उन्हें उसी गहन निद्रा कि स्थिति में पहुंचा देते हैं कि वे भली-भांति स्वप्न नहीं देख पाते। जब यह स्थिति चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है (और ही नहीं पहुँच पाता)तो स्वप्न प्रक्रिया स्वतः चालू हो जाती है। जबकि मतिभ्रम होता है। जैसा कि डेलिरियम ट्रिमेन्स की स्थिति में शराबियों में देखा जाता है।

एक शरीरशास्त्री होने के नाते जीनाथन विन्सन ने अनेक वर्षों तक मस्तिष्क और उसकी संरचना व क्रिया का गहन अध्ययन किया है। इससे पूर्व तक शरीर में मन का स्थान अविज्ञात था, पर अपनी श्रमसाध्य शोध के दौरान विन्सन ने मन का सही -सही निवास ढूँढ़ निकालने का दावा किया है। उन्होंने मन का स्थान लिम्बिक सिस्टम के भीतर माना है। उनका कहना है कि यह तंत्र मन के प्रधान कार्यालय की तजरह है तो यह निर्णय करता है कि किन स्मृतियों , घटनाओं आँकड़ों बातों को सुरक्षित रखना है और किन्हें भुला देना हैं विन्सन का मानना है। कि यही स्वप्न प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ती है। वे कहते हैं। कि महत्व के आधार पर जानकारियों की छँटनी स्वप्नावस्था में ही सम्भव है इसके बिना नये-पुराने अनुभवों का मिलन-समागम सम्भव नहीं , न ही दैनन्दिन जीवन में आवश्यक अल्पावधि स्मृति ही सम्भव है। यह सारा कार्य मानी कियी कंप्यूटर की प्रोसेसिंग यूनिट की तरह यहां होता है। विन्सन का कहना है कि यदि हम अपने स्वप्नों को याद रखें। सकें, तो हम अपने आन्तरिक अभिप्राय को, अपनी आभ्यन्तरिक प्रवृत्ति को बहुत कुछ जानने में सफल हो सकते हैं क्योंकि इसमें यथार्थता की एक हल्की झाँकी विद्यमान होती है । विन्सन इसे ‘ स्वप्नद्रष्टा का अचेतन व्यक्तित्व कहते हैं।

क्या यह अचेतन व्यक्तित्व हमारे कुछ काम आ सकता है? इससे व्यावहारिक कठिनाइयों का हल प्राप्त किया जा सकता है? दोनों शोधकर्मी इसका सकारात्मक जवाब देते हैं उनके अनुसार सपने ग्रहण करते की यदि बहुत उच्चकोटि की क्षमता -योग्यता रही तो व्यक्ति उनसे लाभ उठा सकता है और जीवन का अपेक्षाकृत अधिक आनन्द ले सकता है।

समय -समय पर ऐसे व्यवहारिक सपनों द्वारा लोग जीवन की जटिलताओं का हल पाते रहे है कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित प्रसिद्ध उपन्यासकार ग्राहम ग्रीन की आत्मकथा ‘वेज ऑफ एस्केप’ में इस बात का उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार को एक अन्य पुस्तक ‘एक्पीरियेन्स एण्ड एक्सप्रेशन ‘ अभी-अभी प्रकाशित हुई है। इसमें मूर्धन्य लेखक एक आँगरैक ने बड़े विस्तार से इस बात की चर्चा की है कि किस प्रकार उसे अपनी व्यक्तिगत उलझनों का हल स्वप्नों के माध्यम से बराबर मिलता रहा। ,

विन्सन का कहना है कि हमारे मन के हृदय केन्द्र में ही अचेतन मन स्थित है। यह एक ऐसी सतत् क्रियाशील मानसिक संरचना है जो हमारें जीवन के अनुभवों से नोट लेती रहती हैं और इसकी प्रतिक्रिया व अभिव्यक्ति को अपनी योजनानुसार सांकेतिक भाषा में प्रकट करती रहती है। रात में स्वप्नों के माध्यम से यही प्रतिक्रिया अभिव्यक्त होती हैं इवान्स ने भी स्वप्नों को मानसिक जीवन का एक आवश्यक अंग माना है और कहा है कि अनागत भविष्य की जानकारियों का यह इतना विशाल भण्डार है कि यदि व्यक्ति चाहे तो इससे लाभान्वित हो सकता है।

एक स्थान पर विवेकानन्द ने कहा है कि हम उन्हीं वस्तुओं और ध्वनियों को देख - समझ सकने में समर्थ हैं जिनकी आवृत्ति हमारे प्रण के समतुल्य है। इससे कम और अधिक दोनों ही आवृत्तियों में से किसी को भी हमारी इंद्रियां ग्रहण करने में सक्षम नहीं है। वे कहते हैं कि हमारे चारों ओर कितनी ही सूक्ष्म सत्ताएं हो सकती है। किन्तु हम उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं देख पाते कारण कि हमारी प्राण चेतना के कम्पन उनकी आवृत्ति से मेल नहीं खाते। योगियों के देखते-देखते अदृश्य हो जाने के पीछे यही निमित्त कसाध्सश्रसूत है। अविज्ञात के गर्भ में पक रहे घटनाक्रम को एक सामान्य व्यक्ति नहीं ग्रहण कर पाता पर दिव्यदृष्टा महापुरुष उसे यही सरलता से पकड़ लेते हैं। इसके पीछे था प्राण - चेतना के स्पन्दन की ही मुख्य भविष्य है।

सामान्य निद्रा में प्राण स्पन्दन कुछ तीव्र हो जाता है फलतः हमें निरर्थक स्वप्नों दीख जाते हैं। जो भावी जीवन की क्रिया महत्वपूर्ण घटना की ओर संकेत करते हैं। ज्ञातव्य है कि घटनाएं घटित होने से बहुत समय पूर्व की प्रकृति की उदारजनों में आ जाती है। यदि प्राण -गति को नियुक्त करने की विधा हस्तगत की व्यक्ति जाग्रतावस्था में भी सार्थक सपने देख सकता है। योगी-यती इसी प्रकृति पक्षी प्राप्त करते और की महत्वपूर्ण घटनाओं बनाने में सफल होते हैं।


सफाई और व्यवस्था से मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास की क्षमता बढ़ती है (Kahani)

एडीसन महान् वैज्ञानिक हुए हैं गरीब माँ के बेटे थे। पर बचपन से ही वैज्ञानिक बनने की बात किया करते थे। माँ ने सोचा इसे किसी वैज्ञानिक के पास रख दूँ तो शायद इसका समाधान हो जाय । विज्ञान पढ़ाने की क्षमता तो उसमें थी नहीं।

एक वैज्ञानिक के पास वे एडीसन को ले गयी। वैज्ञानिक ने एडीसन को एक झाड़ू देकर अपनी प्रयोगशाला की सफाई करने को कहा। एडीसन ने काम घड़े करीने से किया।

वैज्ञानिक ने यह सब देखकर -” इस बालक में वैज्ञानिक बनने के हुआ है। आप इसे मेरे पास छोड़ दें। यह वैज्ञानिक जरूर बन जाएगा सफाई और व्यवस्था से मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास की क्षमता बढ़ती है। और उसी से उसके स्तर का पता भी लग जाता है।


सुपात्र बने तो दैवी अनुकम्पा बरसे

आत्मोन्नति में अहैतुकी कृपा का प्रावधान है अथवा नहीं? इसका उत्तर यदि एक शब्द में देना हो तो यही कहना पड़ेगा कि है। पर इसके लिए आध्यात्म पृष्ठभूमि का होना नितान्त आशा दुराशा साबित होगी। आये दिन मिलने वाली अभौतिक सहायताओं में सर्वप्रथम इसी बात को परखा जाता है कि हम उसके वास्तविक अधिकारी है कि नहीं पात्रता की परख होते ही अजस्र अनुदानों का क्रम आरम्भ हो जाता है। और सतत् चलता रहता है समय-समय पर ऐसे प्रसंग प्रकाश में आते ही रहते हैं। घटना ज्योति नामक महात्मा की है। उन दिनों इनकी उम्र 12-13 साल की रही होगी। तब वे श्रीहट्ट के मौलवों बाजार में अपने माता-पिता के पास रहते थे। वही के प्रवेशिका विद्यालय में इनकी शिक्षा-दीक्षा चल रही थी।

इन्हीं दिनों वहां के काली मन्दिर में एक आकर्षक युवा संन्यासी आकर निवास कर रहे थे प्रतिदिन शाम होते ही वे अपने सुमधुर कंठ से भजन गाना आरम्भ करते इसमें से ऐसे तल्लीन और भगमग्न हो जाते कि दीखने से ऐसा प्रतीत होता मानों गीत उनके अन्तस्तल से निकल रहे हो । भजन को मधुरता और भाव की तन्मयता से आकृष्ट होकर लोग वहां बड़ी संख्या में इकट्ठा हो जाते । बालक ज्योति भी किसी गीत में बैठकर उसका आनन्द लिया करना।

बालक के ये भजन बड़े मर्मस्पर्शी मालूम पड़ते । इसमें वह इस प्रकार बूध आता जैसे किसी ने सम्मोहन का प्रयोग कर दिया हो । कार्यक्रम जब तक चलता, वहां वही पर डटा रहता। यहां तक कि रात घर आती सभी श्ररता चले जाते फिर भी उसे वही से उठने की इच्छा नहीं होती तबकीमक था इस कारण विवन्त्रता वह उसे भलीभांति समझ नहीं पाता कि आखिर ऐसा क्यों है बस का चेहरा निहारता को आये अभी दे चार दिन ही हुए थे। फिर भी बालक को ऐसा लगता जैसे वे कितने अपने हैं उनसे परिचय न होने पर भी उसके अन्तराल के किसी कोने में यह धारणा उत्पन्न ही गयी थी कि उसके कोई अत्यन्त घनिष्ठ है।

प्रथम दिन भजन समाप्ति के उपरान्त आगन्तुक स्त्रोत अपने-अपने घर चले गये और मन्दिर-प्रेगण में मात्र संन्यासी और बालक रह गये बालक को अब भी बैठा देखकर साधुवेश धारी महापुरुष ने पूछा - “बेटा ! तुम कैसे बैठे हो? घर क्यों नहीं गये?

बालक इस बात का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दें सका, मात्र यही कहा कि जाता हूँ पर जाने की इच्छा नहीं होती।

इसके उत्तर में महापुरुष बोले-” आत्मविस्मृति सामान्य मनुष्य की साधारण घटना है इस स्थिति में वह कौन है? कहा से और क्यों आया है? यह भूल जाता है। तुम भी अभी इसी अवस्था में हो। मेरा सान्निध्य तुम्हें क्यों सुखकर प्रतीत होगा, इसे सम्प्रति समझ नहीं पा रहे हो पर आने वाले दिनों में समझ सकोगे। हम दोनों में परस्पर क्या सम्बन्ध है इसे तुम नहीं जानते किन्तु मैं जानता हूँ । भजन गाना लोगों को आकृष्ट करना और उपदेश देना यह सब बाह्य निमित्त भर है। आज घर जाओ कल पुनः आना।

इतना कह उसे उसे घर भेज दिया। दूसरे दिन होते ही वह पुनः आकर उपस्थित हुआ । संन्यासी का व्यक्तित्व निस्संदेह आकर्षक था और गायन भी इतना सामर्थ्यवान कि श्रोता को मंत्रमुग्ध करदे पर वह इन्हीं कारणों से वहां खिंचा चला आता अथवा कोई और बात थी। इसका ठीक-ठीक निश्चय नहीं कर पाता। अन्य जानों के आकर्षण का कारण तो संन्यासी की मधुर गायकी थी। पर बालक का आकर्षण उस प्रकार का नहीं था। खिंचाव का यथार्थ कारण क्या था उसे वह समझ नहीं पाता था।

संन्यासी के पास आने - जानें का बालक का नियमित क्रम बना रहा। कई दिनों बाद संन्यासी ने बालक से प्रश्न किया-” क्या तुम ईश्वर को मानते हो? ईश्वर के सम्बन्ध में तुम्हारी क्या धारणा है।?”

बालक ने उत्तर दिया-” ईश्वर है इस पर मेरा पूर्ण विश्वास है । काली, दुर्गा , सरस्वती, शिव, विष्णु, यह सब ईश्वर के ही रूप है। इन सभी को लोग देवता मानकर पूजा करते हैं इससे अधिक ईश्वर के सम्बन्ध में अन्य कोई धारणा नहीं है?”

एक बालक के लिए ईश्वर सम्बन्धी इससे गम्भीर बाते बता पाना संभव नहीं था। हिन्दू धार्मिक परिवार के वातावरण में ईश्वर और देवी-देवता में विश्वास सहज संस्कार रूप में रहता है बालक ज्योति में भी वह संस्कार मौजूद थे। उन्हीं संस्कारों के वशीभूत होने के कारण उन्होंने वैसा जवाब दिया था।

महापुरुष ने कहा-” तुम्हारे इस उत्तर से मैं संतुष्ट नहीं हूं। ईश्वर को प्रत्यक्ष किये बिना उसके सम्बन्ध में ठीक-ठीक धारणा सम्भव नहीं है। उसमें स्थिति तो दूर की बात हैं मैं तुम्हें एक गुप्त रहस्य का अनुभव कराऊंगा।

इतना कहने के उपरान्त वे मौन हो गये एवं एकटक अपलक भाव से उस बालक को देखने लगे। बालक भी निकट ही स्थिर भाव से बैठा रहा। अकस्मात् आसमान में एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई और इसके साथ ही बालक में प्रवेश कर गई । इस घटना के बाद बालक ज्योति में अद्भुत परिवर्तन दिखलाई पड़ने लगा। एक अवर्णनीय आनन्द और उल्लास से उसकी सम्पूर्ण सत्ता ओत-प्रोत हो गई। उसकी अपनी सत्त जिसका आश्रय लेकर वह हमेशा अपने को ‘मैं- का रूप में प्रयोग करता रहा। वह एक प्रकार से विलुप्त हो गया। इस ‘अहमत्व’ के लोप के साथ उसके हृदय में एक अद्भुत अनुभूति का आविर्भाव हुआ, जिसका वर्णन कर सकना। संभव नहीं उस समय उसकी दृष्टि जिधर और जिसमें पड़ती उधर यही आभास होता जैसे स्वयं ही वहां है पशु, पक्षी कीट, पतंग , वृक्ष लता, जिस किसी भी पदार्थ पर उसकी नजर पड़ती उसी को वह अपना स्वरूप समझता। ऐसा लगता जैसे एक ‘मैं’ ही अनन्त ’मैं’ के रूप में पशु, पक्षी, लता, वृक्षादि का आकार लेकर प्रकट हुए हैं।

ठीक इसी समय मन्दिर प्रांगण में एक बिल्ली आयी। वह मन्दिर में भाँग के लिए रखें दूध के लोभ से वहां आयी थी। बिल्ली के ऊपर नजर पड़ते ही ‘ वह बिल्ली’ है इस प्रकार की अनुभूति हुई। इससे एक पल के लिए वह यह सोचने लगा कि सम्भव है यह उसका मस्तिष्कीय विकार हो । उसी विचार आते ही बालक उस बिल्ली की ओर बढ़ा उसका स्पर्श करते ही वह फिर बिल्ली को देख नहीं सका इसके साथ ही उसने देखा कि यह स्वयं बिल्ली है उस समय उसका भावी संस्कार कुछ क्षण के लिए गायब हो गया था मानव देह से संबंधित सभी भाव तब थोड़े समय के लिए विलुप्त हो गये है। इसके साथ ही बिल्ली के संस्कार और प्रकृति , प्रवृत्ति उनके भीतर जाग उठे। केवल कल्पना और भावना से ही नहीं वरन् वास्तव में वह बिल्ली बन गया था।

यह अवस्था बहुत देर तक बनी रही। कुछ समय पश्चात जब इस भाव का उपशमन हुआ तो पूर्व भ्गव पुनः लौट आया। वह एक 12 वर्षीय बालक है और यहां मन्दिर में संन्यासी की मधुर - स्वर लहरियों से आकृष्ट होकर नित्य प्रति आता है यह सब स्मृतियां मन में तैरने लगी। इस अपूर्व दर्शन और उपरोक्त विवेचन से बालक को ईश्वर -दर्शन सम्बन्धी कुछ आभास मिला और विराट चैतन्य की न्यूनाधिक अपुष्ट धारणा हुई । महापुरुष जितने दिन वहां रहे, उतने दिन बालक ज्योति उनके पास जाता रहा। हर रोज उनकी अनुकम्पा से उसे कुछ न कुछ अलौकिक दर्श होते रहे।

एक दिन संध्या समय संगीत की समाप्ति के बाद और सभी आगत होगी के चले जाने के पश्चात् संन्यासी ने बालक के सूक्ष्म शरीर को आकर्षित करते हुए कहा -” चलो मेरे साथ । “ इतना कहना था कि बालक का अनुगमन करता हुआ चल पड़ा। उसका स्थूल शरीर मंदिर-परिसर में पड़ा रह गया। दोनों आकाश-मार्ग से चल पड़े लम्बी दूरी तय करने के उपरान्त दोनों पर्वतों के मध्य एक समण्पाीक स्थान पर पहुंचे। यह स्थान हिमालय को कोई गहन प्रदेश था।

यहां एक मनोहरी आश्रम एवं मन्दिर था। मन्दिर में एक काली को एक प्रतिमा थी। पास ही एक पहाड़ी नदी बह रही थी। आश्रम साधकों का कोई तपोवन मालूम पड़ता था वहां पहुंचकर वे रुक गये।

उस स्थान को देखकर बालक ज्योति की पूर्व स्मृति जाग उठी और अनायास उसके मन में विचार उठे लगे कि पिछले जन्म में वह यही था। वह वहां क्या करता था, कैसे रहता था, संन्यासी कौन है, उनका उससे क्या सम्बन्ध था, इस स्थान से वह क्यों च्युत हुआ? यह सभी बाते उसकी स्मृति-पटल पर शनैः- शनैः उभरने लगी। इसके उपरान्त वह इस बात को समझ सका कि संन्यासी के प्रति किसी अपरा के कारण ही उसे यह अवस्था प्राप्त हुई और भ्रष्ट होकर पुनर्जन्म लेना पड़ा संन्यासी उसके उद्धार के लिए ही साथ-साथ लोकालय में आविर्भूत हुए हैं। वह यह भी समझ सका कि जो संन्यासी उसे हिमालय स्थित इस आश्रम में लाये है और जिनकी कृपा से उनकी जन्मान्तर की स्मृति जगी है, वे ही उसे पूर्व जन्म के योगी गुरु है। वे उसके अत्यन्त अन्तरंग और घनिष्ठ है, संसार में उनके अवतरण का प्रधान उद्देश्य यही है कि मुझे बालक को ज्ञान प्रदान कर ऊँचा उठाया जाय इन सारी बातों को वे स्वतः हो समझ गये। महापुरुष को बताने की आवश्यकता न पड़ी

आश्रम-दर्शन के बाद जब दोनों मन्दिर में लौटे, तब बालक का सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर में प्रवेश कर गया। इसके पश्चात् वह सूक्ष्म शरीर द्वारा देखे गये सभी दृश्यों का स्मरण करते लगा।

उसने देखा संन्यासी मुस्कुरा रहे है। उनके बिना बताये ही एक प्रकार से अपना सम्पूर्ण परिचय दे दिया था । बालक ने कई बार उनके निवास स्थान के बारे में पूछा था, पर इस बारे में उनने कोई उत्तर नहीं दिया सिर्फ इतना ही कहा कि मैं जहां कही भी रहूं तुम्हें यह जानने की आवश्यकता नहीं किन्तु जब भी तुम्हें मेरी आवश्यकता होगी, मेरी सहायता पाओगे। इसके उपरांत बालक लोक-लोकांतरों की यात्रा करने में सफल हो गया। उस अल्पव्यय में ही उसने अनेक प्रकार के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

पात्रता यदि हो तो अनुकम्पा कही से भी प्राप्त हो जाती है क्षेत्र भौतिक हो या आध्यात्मिक, सर्वत्र योग्यता सब कुछ प्राप्त होता है। अयोग्यों और अपात्रों को तो हर रोज उपेक्षा ही होती है। हम पात्रता विकसित करें सहायता स्वयमेव खिंची चली आयेगी।


अहंकारी दुर्योधन (Kahani)

दुर्योधन को अहंकार दिखायें बिना चैन नहीं पड़ता था । पाण्डव वनवास में थे। दुर्योधन का महलों में संतोष न हुआ, अपने वैभव का प्रदर्शन करने जंगल के उसी क्षेत्र में गया। जहां पाण्डव रह रहे थे। वहां अपने को सर्वसमर्थ सिद्ध करने के लिए मनमाने ढंग से जश्न मनाने लगा। अहंकारी में शालीनता-सौजन्य नहीं रह जाता। अपने आगे किसी को कुछ समझता भी नहीं। उसी क्रम में कौरव गंधर्वों के सरोवर को गन्दा करने लगे, रोकने पर भी न मानें। कुद्ध होकर गंधर्वराज ने उन्हें बन्दी बना लिया। पता पड़ने पर युधिष्ठिर ने अर्जुन को भेज कर अपने मित्र गंधर्वराज से उन्हें मुक्त कराया। दुर्योधन को शर्म से सिर झुकाना पड़ा।


यो यच्छृद्धः स एव सः

सम्पूर्ण समय को तीन खण्डों में विभाजित किया जा सकता है। भूत वर्तमान और भविष्य। तीनों का अपना -अपना महत्व है। दोनों को मिला कर एक समग्र व्यक्तित्व की संरचना होती है।

आमतौर से बचपन अभिभावकों की सहायता से विनिर्मित होता है उन दिनों बालक चेष्टाएं तो स्वयं करता है। पर उनके मार्गदर्शन में योगदान परिजनों का ही प्रमुख रहता है। बालक पूरी तरह आत्मनिर्माण के अनुभव और सामर्थ्य के अभाव में स्वयं उठ नहीं पाता। इसलिए अभिभावकों और अध्यापकों की सहायता आवश्यक होती है। किशोरावस्था के साथ-साथ समझदारी बढ़ने से मनुष्य निजी अनुभव, रुझान और प्रयोग के बलबूते अपने कर्तव्य का परिचय देने लगता है इसी स्थिति में वर्तमान का निर्धारण चल पड़ता है दूसरों को इतना ही दीख पड़ता है। मनुष्य का वर्तमान ही सर्वसाधारण के परिचय में आता है भूत विस्मृत होता रहता है। उसको बहुत कुरेदने पर ही कुछ पता चलता है। भूतकाल की स्मृतियां घटनाओं और अनुभूतियों के आधार पर वर्तमान को विनिर्मित करने में सहायता करती है। इतनी भर ही उसकी उपयोगिता है। स्वभाव-निर्माण में ज्ञान-भण्डार भरने में भी भूतकाल की उपयोगिता रहती है।

वर्तमान अनुभूतियों और क्रियाओं का परिचय देता है। शरीरगत पीड़ा -सुविधा रसास्वादन जैसा कुछ वर्तमान में ही चलता है कौन क्या कर रहा है? इसकी जानकारी में वर्तमान का ही योगदान रहता है। इन सबसे इतना भर ज्ञानार्जन बन पड़ता है कि किसकी योग्यता क्या है और वह क्या कर रहा है।?

,किन्तु इतना सब पर्याप्त नही हैं जीवन की विगत एवं प्रस्तुत जानकारी ही भूत और वर्तमान मिलकर दे पाते हैं। भविष्य में जो बन पड़ता है सम्भव होना है उसका ऊहापोह मस्तिष्क की भावी-कल्पनाओं के साथ ही जुड़ता है। कौन क्या योजना बना रहा हैं उसे क्या रूप जा रहा है। इस आधार पर ही भविष्य का स्वरूप निर्माण होता है। मनः स्थिति ही परिस्थिति की जन्मदाता है मनः’ स्थिति और परिस्थिति का थोड़ा अंश ही भूत के स्मरण और वर्तमान में लगता है शेष अधिकाँश चिन्तन तो भविष्य की कल्पनाओं में ही निरत रहता है। कामनाएं और कुछ नहीं भविष्य की लालसा ही है। उन्हीं के अनुरूप यह निश्चित किया जाता है। कि अगले दिनों के लिए जो निर्धारण किया गया है। उसका नाना-बाना कैसे बुना जाय? सरंजाम कैसे जुटाया जाय? इसलिए तीनों काल खण्डों में भविष्य की अवधारणा ही अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि उसी के आधार पर अगले कार्यक्रमों का निर्धारण किया जाता है। और तद्नुरूप प्रतिफल उभर कर सामने आता है।

मूर्धन्य मनीषी एम॰ बुबर ने अपनी रचना पाथ्स इन यूटोपिया में इस काल खण्ड की वृहद व्याख्या की हैं वे लिखते हैं कि मनुष्य यदि योजनाओं और आकाँक्षाओं का सहारा लेना छोड़ दे, तो उसका भविष्य ही शून्य और समाप्त हो जाएगा। फिर तीन काल खण्डों में से मात्र वह दो को ही जी सकेगा। इसका प्रतिफल यह होगा कि व्यक्ति ने जिस आदिम स्थिति से अपनी जीवन यात्रा शुरू की थी, वर्षों बाद भी वह वही ज्यों-का-त्यों पड़ा रहेगा, उसकी प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी। मनुष्य आज अविकसित पाषाण युग से अतिविकसित विज्ञान युग में पदार्पण कर सका है, इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने सदा ही अपने वर्तमान को अपूर्ण अल्प और अविकसित माना है जिस दिन उसने यह सोच-ना आरम्भ कर दिया कि वह पूर्ण समग्र और विकसित है समझना चाहिए कि उसी दिन उसका भविष्य बन गया । सच्चाई तो यह है कि यह अवस्था भविष्य के तीसरे काल खण्ड में पैर फिर कभी रख ही नहीं पाती । कारण कि उसमें प्रवेश करते ही वह तो वर्तमान बन गया, भविष्य रहा कहा? भविष्य की जो सम्भावना थी, उसे तो अपनी पूर्णता स्वीकार कर समाप्त कर डाली गई। अब वहां भविष्य नहीं केवल भूत और वर्तमान है। अतः आगामी समय के संदर्भ में कार्यक्रम और योजना रहित लोगों के लिए यह कहना कि उसने भविष्य संजोया है। बेईमानी होगा।

परिप्रेक्ष्य में यदि इस काल खण्ड को परिभाषित करना हो तो ठीक -ठीक इसी प्रगति का सातत्य ही कहना पड़ेगा अर्थात् निरन्तर उन्नति की अभीप्सा और कोशिश बनी रहें यह कभी घटे-मिटे नहीं। यहां है मनुष्य जीवन के लिए ‘भविष्य ‘ का आस्तिक विवेचन ।

‘पेशन्स ऑफ दि व्यूमन स्पेल’ नामक ग्रन्थ में जार्ल्श फोरियर लिखते हैं। कि बहुधा लोग ऐसा कहते पाये जाते हैं परिस्थितियों ने अथवा अमुक लोगों ने उसके भविष्य संवारने में काफी मदद कि। यदि ऐसा नहीं होता तो शायद वह अपने स्वर्णिम भविष्य से हाथ धो बैठता। वे कहते हैं कि यदि इस अवधारणा के मूल में जाकर इस बात को तलाश की जाय कि क्या वास्तव में किसी व्यक्ति के भविष्य -निर्माण में दूसरों का हाथ होता है। तो यही पायेंगे कि ऐसा प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः ऐसा है नहीं। यदि व्यक्ति का स्वयं का प्रयास और पुरुषार्थ इस दिशा में नियोजित नहीं होता तो भला कोई और इस क्षेत्र में उसी सहायता क्योंकर और कैसे करता । अस्तु यह कहना कि उसके विकास में उसका निजी पुरुषार्थ नहीं वरन् अन्यों का प्रयास कारणभूत है समीचीन ही होगा।

अतएव यह कहना ठीक ही है कि ‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इस उक्ति के पीछे एक ही तथ्य जुड़ा हुआ है कि कौन क्या सोच रहा है। और उस सोच को क्रियान्वित करने के लिए क्या तैयारियां कर रहा है? इसलिए जहां तक चिन्तन का सम्बन्ध है वहां तक यही कहना पड़ेगा कि भावी निर्धारण का स्वरूप ही चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है यों प्रत्यक्षतः उसका कोई पर भी शक्ति उसी में सबसे अधिक होती हैं जो जैसा सोचता है वह वैसा ही बन जाता है इसी को कहते हैं -’भविष्य - निर्धारण ।’

इसकी दो दिशाधाराएं हैं एक यह है कि भविष्य को जैसा विनिर्मित हुआ बनना-देखना चाहते हैं उसके अनुरूप चिन्तन किया जाय योजना बनायी जाय क्रिया पद्धति अपनायी जाए प्रयास और साधन जुटाये जाए एवं इसके लिए जिनके सहयोग अभीष्ट हो उनसे सम्बन्ध जोड़ें जाए।

दूसरी दिशाधारा इससे अधिक सरल और सुनिश्चित है इसमें अपनी विवेक - बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए इस बात का अनुमान लगाना पड़ता है कि भविष्य में क्या कुछ होने की सम्भावना है। इस भवितव्यता के साथ तद्नुरूप प्रयासों को अपने चिन्तन और व्यवहार में सम्मिलित किया जाय। आमतौर पर इसी पद्धति को सर्वसामान्य अपनाते और विश्वासपूर्वक कदम उठाते हैं । इस प्रकार के भविष्य - ज्ञान का मोटा अनुभव दूरदर्शी समझदारी के सहारे प्राप्त किया जा सकता है। यों भविष्य सम्बन्धी शत-प्रतिशत सही जानकारी तो किसी के लिए भी संभव नहीं , फिर भी यदि चिन्तन में दूरदर्शिता सम्मिलित हो जाय तो अनागत का इतना अनुमान तो अर्जित किया ही जा सकता है जिसमें यदि तदनुकूल प्रयास और पुरुषार्थ शामिल हो जाए तो भवितव्यता के समीप पहुंचा जा सके।

इस उदाहरणों द्वारा भी समझा जा सकता है ऋतु परिवर्तन के साथ बदलती परिस्थितियों का अनुमान रहता है इसके आधार पर लोग तद्नुरूप तैयारी करने में जुट जाते हैं । वर्षा ऋतु आने से पूर्व छप्पर को दुरुस्त करने, छाता खरीदने, खेत जोतने , मेंड़ बनाने जैसी तैयारियों में लोग लग जाते हैं। यह भविष्य - ज्ञान के सहारे ही सम्भव होता है।

भवन निर्माता , आर्किटेक्ट, इंजीनियर अपने-अपने विषय के विशालकाय ढाँचे कागजों पर ही अंकित कर लेते हैं। उनकी कल्पना शक्ति इतनी प्रखर और पैना होता है कि जो करना है उस व्यावहारिकता से तालमेल बिठाते हुए प्रायः इस स्तर का बना लेते हैं। जिसमें भूल होने की गुंजाइश कम-से-कम रहे। यह भविष्य - ज्ञान का ही एक प्रकार है।

वैज्ञानिक आविष्कारों की प्रारम्भिक रूपरेखा मस्तिष्क ओर कल्पना-क्षेत्र में ही सम्पन्न हो जाता है प्रयोगशाला में तो सिर्फ इस बात की पड़ताल की जाती है कि जो कुछ सोचा गया था वह व्यवहारिकता के धरातल पर कितना खरा उतरा। साहित्यकार, कवि कलाकार, चित्रकार अपनी संरचनाओं का अधिकांश भाग कल्पना क्षेत्र में ही पूरा कर लेते हैं लेखनी , तुलिका , छेनी हथौड़ों तो इसके उपरान्त चलती है उपकरण तो योजना को मूर्त रूप देने में प्रत्यक्ष भूमिका भर निभाते हैं इन सब बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो सिद्ध होता है कि भविष्य का ढाँचा मनःक्षेत्र में खड़ा किया जा सकना सम्भव है।

इसी प्रकार मरणोपरान्त स्वर्ग और मुक्ति लाभ करने की व्यक्ति की आकाँक्षा भविष्य से ही सम्बन्धित हैं। दीर्घ-जीवन कायाकल्प, पुनरुत्थान , भाग्योदय जैसी सुखद सम्भावनाओं की खिचड़ी भविष्य के मभ्ज्ञ में ही पकती है अनिष्टों की आशंका भी भविष्य के साथ जुड़ी होती है। आक्रमण होने, विपत्ति टूटने , घटा पड़ने मृत होने जैसी डरावनी चिंताएं भी अगले दिनों की गड़बड़ी से ही सम्बन्ध रखती है नरक भविष्य की डरावना विभीषिका ही हैं प्रलय, प्रकृति प्रकोप जैसी संभावनाएं भी इसी प्रकार का उपक्रम है मस्तिष्क इसी प्रकार के शुभ-अथवा अशुभ के ताने बनता रहता है इन सबको संयुक्त रूप से एक नाम देना हो तो उसे भविष्य चिन्तन कह सकते हैं

यह सर्वथा निरर्थक भी नहीं। इन्हें चिन्तन के ज्वार - भाटे कहकर भी निश्चित नहीं हुआ जा सकता क्योंकि इस प्रवाह के साथ असाधारण शक्ति जुड़ी हुई पायी जाती है। मनुष्य का चिन्तन जैसा होता है। वह के अनुरूप ढलने लगता है विज्ञान में मन के गड़बड़ाने के स्वस्थ का लड़खड़ाना और शरीर का बीमार पड़ना प्रसिद्ध है। चिन्तन विकृति के अनुरूप यहां काया की प्रत्यक्ष हो उठती है । भृंग की आकृति और प्रकृति से तन्मय होकर कीट तद्रूप बन जाता है टिड्डे गर्मी के दिनों में सब और छाया देखकर अपना रंग भी पीला बना लेते हैं। वर्षा आने पर हरीतिमा बिखरे देखने पर पुनः अपना रंग बदलने और हर छा जाते हैं भयभीत रहने वाले अपना स्वास्थ्य गवा बैठते हैं। इसके विपरीत जिन्हें अगले दिनों बड़ी सफलता मिलने और सम्पदा प्राप्त करने का विश्वास जमा होता है वे अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ सुन्दर और समर्थ बनते चले जाते हैं यह भाव चिन्तन का भाव परिणति के प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इस आधार पर यह कहना गलत नहीं कि व्यक्तित्व निर्माण में भविष्य सम्बन्धी सकारात्मक चिन्तन की महती भूमिका है यो के क्रिया-कलापों और भूतकाल का अनुभवों का उल्लेखनीय योगदान है पर भावा समय का ताना-बाना यदि सूझ-बूझ और सतर्कतापूर्वक नहीं हुआ तो वर्तमान के प्रयास और विगत का अभ्यास भी एक प्रकार से निरर्थक ही साबित होते हैं।


कौरवो की आवभगत (Kahani)

महाभारत का युद्ध होने की तैयारियां शुरू हो चुकी थी। इस युद्ध के लिए दोनों पक्षों ने अपने राजाओं को निमन्त्रण भेजा। निमन्त्रण पाकर दूर-दूर से राजा महाराजा योद्धा अपने-अपने स्नेहियों के पक्ष में लड़ने के लिए चल पड़े। शल्य पाण्डवों के मामा था पाण्डवों ने सोचा वह तो हमारे पक्ष में आयेगी ही, उनकी अगवानी के लिए विशेष व्यवस्था करने की क्या आवश्यकता?

इस सहज उपेक्षा का दण्ड उनको मिला। दुर्योधन ने शल्य के मार्ग में जगह-जगह सुविधाएं जुटा दी। शल्य उन्हें पाण्डवों द्वारा प्रदत्त मानकर उपयोग करते रहे। बाद में जब यथार्थता का पता चला तो जिसके साधनों का शल्य उपयोग करते आ रहे थे। उसके ही पक्ष में खड़ा होना पड़ा यदि पाण्डव उपेक्षा न बरतते तो यह हानि न उठानी पड़ती।


यह दिवा-स्वप्न नहीं, ‘काल’ का लीला -सन्दोह है।

आइन्स्टाइन ने जब सापेक्षवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया और विश्व के रूप और उसकी क्रियाओं को गणित के आधार पर सत्य सिद्ध किया, तब से विज्ञान जगत में यह चर्चा उठ खड़ी हुई कि भूतकाल की घटनाओं को फिर से असली रूप में देखा जा सकना सम्भव है क्या? इससे पूर्व भूतकालीन घटनाओं के सम्बन्ध में मान्यता थी कि एक बार घट चुकने के बाद वे सदा के लिए समाप्त हो जाती है पर आइन्स्टाइन ने पहली बार इस संदर्भ में एक नवीन तथ्य प्रतिपादित किया कि घटनाक्रम भले ही समाप्त हो चुके हो पर उनकी तरंगें विश्व - ब्रह्माण्ड में फिर भी विद्यमान रहते हैं और यदि किसी अन्य लोक के निवासी के पास उपयुक्त साधन हो तो उनके ही सामने घटित हो रहे हों।

इस सिद्धान्त के आधार पर कुछ विज्ञानविदों ने रेडियो और टेलीविजन के सम्मिलित स्वरूप जैसे एक ऐसे यंत्र की कल्पना की थी, जिसकी सुई को यदि पीछे भूतकाल की ओर खिसका दिया जाय तो पर्दे पर सुदूरभूत के दृश्य उभरने लगें, किन्तु यह कल्पना साकार रूप में नहीं पा सकी। हां इतना अवश्य हुआ कि इसके बाद से इस बारे में विभिन्न प्रकार के सिद्धान्त प्रतिपादित किया जाने लगे और यह कहा जाने लगा कि काल अवरोध को लांघ सकना एकदम असम्भव नहीं है। मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता जोन फोरमैन अपनी पुस्तक ‘दि मास्क ऑफ टाइम’ में इस संसार में है नहीं । यह तो मन की विभिन्न अवस्थाएं हैं मन ही समय को तीन खण्डों में बाट लेता है। समय-बोध की यह उसकी अपनी शैली है। यदि पदार्थ जगत से किसी प्रकार चेतना जगत में प्रवेश पाया जा सके, तो यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकेगा कि वहां भौतिक जगत की तरह काल-विभाजन जैसा कुछ भी नहीं है। वहां समस्त घटनाएं इकट्ठी देखी जा सकती है । ऐसी स्थिति में उन्हें भूत, वर्तमान अथवा भविष्यत् जैसा नामकरण देने का कोई अर्थ और औचित्य रह नहीं जाता।

एस॰ ग्रीबिन अपनी रचना “टाइम वार्प्स’ में जे0 फोरमैन का समर्थन करते हुए कहते हैं कि समय के दूसरे आयाम में काल के तीनों खण्ड साथ-साथ रहते हैं। और उस भूमिका में पहुंच सकना सैद्धान्तिक रूप से सम्भव है उनका कहना है कि यहां उन आयामों द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है जो हमें ज्ञात है अर्थात् लम्बाई, ऊँचाई और गहराई। इन तक ऐ प्रारम्भिक बिन्दु द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है एक ऐसा बिन्दू , जिसमें स्थान तो होता है पर आयाम नहीं।

‘ आउटर टाइम‘ नामक अपने ग्रन्थ में एम बुल्फ लिखते हैं कि पदार्थ जगत में सरलता के लिए ‘समय’ को तीन खण्डों में बाँट दिया गया है। पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। यथार्थ में ‘समय’ एक अविच्छिन्न और अखण्ड प्रवाह है इसीलिए अंग्रेजी में इसे ‘टाइम कन्टिन्यूअम’ (ञ्जद्बद्वद्ग ष्टशठ्ठह्लद्बठ्ठह्वह्वद्व) कहा गया है बोलचाल की भाषा में जब इसके किसी खण्ड में प्रवेश की बात कही जाती है तो वस्तुतः वह सम्पूर्ण समय ही होता है जिसमें अनागत

विगत और वर्तमान तीनों ही साथ-साथ विद्यमान होते है? यह बात और है कि एक साथ सम्पूर्ण समय से सम्बन्धित दृश्यों और घटनाओं को हम नहीं देख पाते पर रहते सब साथ - साथ ही है वे कहते हैं भूत और भविष्यत् को नहीं देख पाने का एक ही कारण है कि वे अति सूक्ष्म अवस्था में अवस्थान करते हैं जो हमारी स्थूल आंखों की दृश्य सीमा से परे होता है ठीक उसी प्रकार जिस तरह कठपुतली के नृत्य में पुतलों से बंधे धागों के न दीख पड़ने से दर्शकों को यह भ्रम हो जाता है कि निर्जीव काठ के पुतले आप -ही - आप नाच रहे हो। पतंग का धागा पतंगबाज के हाथ में होता है। पर दूर से देखने वालोँ को पतंग निराधार उड़ती दिखाई पड़ती है यही बात विगत और अनागत काल खण्डों के सम्बन्ध में भी है। संक्षेप में कहना हो तो यह कहा जा सकता है कि जिस प्रकार स्थूल काया में सूक्ष्म और कारण सत्ताएँ साथ-साथ गुथी होती है वैसे ही वर्तमान के साथ भूत और भविष्यत् काल भी परस्पर लिपटे होते हैं। इन्हें देखने के लिए सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता पड़ती है दिव्यदृष्टा पुरुष चूंकि इस विभूति से सम्पन्न होते हैं अस्तु वे दृष्टि -निक्षेप मात्र से ही हर किसी का अनागत, विगत और वर्तमान जान लेते हैं। इसके लिए उन्हें कुछ विशेष करने और कही अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती , सिर्फ दृष्टि को सूक्ष्म और विकसित कर लेना पड़ता है। इतना करते ही उन्हें किसी व्यक्ति वस्तु और स्थान से सम्बन्धित सम्पूर्ण समय(भूत, वर्तमान और भविष्य) अनायास ही प्रतिभासित हो उठता है विज्ञान इसी को दूसरे ‘टाइम जोन’ समानान्तर संसार’ ,’ पृथक आयाम’ जैसी भूमिकाओं में प्रवेश की संज्ञा देता है।

मूर्धन्य फ्रांसीसी दार्शनिक हेनरी लूईस बर्गसाँ ने अपनी चर्चित कृति ‘टाइम एवड फ्री विल’ में उसे ही ‘टाइम-जोन’ में पहुंचकर भविष्य की झांकी करने सम्बन्ध एक घटना का उल्लेख किया है वर्णन के अनुसार पेरिस के निकटवर्ती गांव में विमबैक नामक एक किसान एक दिन अपने खेत में काम कर रहा था। बहुत अधिक थक जाने के कारण थोड़ा विश्राम करते लगा। अचानक उसने देखा उसके खेत में एक भव्य भवन है उसके सामने घास का एक सुन्दर मैदान है मैदान के बांयी ओर रंग -बिरंगे फूलों का आकर्षक उद्यान है उद्यान के एक किनारे अख़रोट एवं सेब के कई वृक्ष लगे है? यह सब कुछ चारों ओर से ऊँची दीवार से घिरा हुआ हैं सामने एक विशाल फाटक था उसके बाहर कई गाड़ियां खड़ी थी। कुछ लोग वहां खड़े आपस में बाते कर रहे थे। तभी वह विशाल गेट खुला और उसमें से व्यक्ति बाहर आया। देखने से वह वैभवशाली प्रतीत होता था। सभी ने उसका अभिवादन किया, फिर सब अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठकर उसके साथ चले गये। तत्पश्चात् सब कुछ सामान्य हो गया। अब वहां कोई इमारत थी, न पेड़-पौधे केवल उसका वह फार्म था, जिसमें काम कर रहा था। विमबैक को कुछ भी समझ में नहीं आया कि अभी-अभी जो कुछ उसने देखा, वह कोई स्वप्न था या आँखों का भ्रम।

लगभग एक वर्ष बाद उसको अपने इस दिव्य -दर्शन की बात याद आती है। अब उसकी समझ में आया कि वह कोई भ्रांति नहीं वरन् एक भविष्य दर्शन था। उक्त फार्म उससे पेरिस के एक उद्योगपति ने खरीद लिया था और उसमें हू-ब-हू वैसा ही महल बनवाया, जैसा उसने दिव्य-दर्शन में देखा था। वैसा ही बगीचा , फलों के वही सब पेड़ उसी कार का भव्य फाटक और यहां तक मालिक भी वही व्यक्ति था, जिसे उसने उक्त झांकी के दौरान देखा था।

इसी प्रकार की एक घटना की चर्चा डॉ0 गोपनीय कविराज ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति और साधना ‘ (द्वितीय खण्ड ) में की है प्रसंग एक उच्चस्तरीय साधक का है। जो साधना के दौरान एक भिन्न ‘टाइम-जोन- में विचरण करने लगता था। पर यह बात नहीं कि इस मध्य उसे अपना स्थूल अस्तित्व विस्मित हो जाता है उसे इसकी भिज्ञता बराबर बनी रहते और बीच-बीच में उसी परीक्षा भी करता रहता । वर्णन इस प्रकार है-

उक्त साधक मध्यरात्रि में साधना किया करता था। साधना के लिए जब वह आसन पर बैठता, तो थोड़ी ही देर में अत्यन्त स्निग्ध और उज्ज्वल प्रकाश पुँज से वह घिर जाता और इसके साथ ही उसे ऐसा प्रतीत होने लगता जैसे वह किसी अपरिचित स्थान में पहुंचकर एक नूतन एवं अज्ञात मार्ग में धवल चाँदनी में चल रही हों। ज्योत्सना खूब तीव्र और प्रखर थी। पर वह सूर्य किरणों की तरह ऊष्मा युक्त एवं कष्टकारक नहीं थी। उसमें चांदनी से भी अधिक शीतलता और उज्ज्वलता थी, इतनी कि सब कुछ दूर-दूर तक स्पष्ट रूप से देखा जा सके और पुस्तक भी आसानी से पढ़ी जा सके।

उस प्रकाशमय राज्य में एक शुभ्र अट्टालिका बनी थी। उधर आने के लिए मानों उसे कोई मौन प्रेरणा देता पर उस विशाल दूरी के आगे साधक कुछ असमंजस में पड़ गया किन्तु फिर भी वहां पहुंच गया। वह कैसे पहुंचा चलकर या बैठे-बैठे स्वतः? उसकी कुछ समझ में नहीं आया। वहां पहुंचने पर उसके मन में विचार उठा कि क्या वह सचमुच साधना के आसन से उठकर यहां इस अविज्ञात स्थान में आ गया है? यह प्रश्न उठते ही उसके आसन को टटोल कर देख, मालूम पड़ा कि वह थिवत् अपने स्थान और आसन पर विराजमान है। वह सम्पूर्ण रूप से चैतन्य है। यह समाधि अवस्था भी नहीं है उस दिन की यात्रा यही समाप्त हो गई।

दूसरी रात पुनः साधना के दौरान साधक उसी प्रकाश लोक में पहुंच गया। सामने शुभ्र स्फटिक निर्मित वह भव्य भवन था। भवन इतना आकर्षक था कि वह उसे लिपिबद्ध करना चाहता था। इस हेतु आज पहले से ही अपने पार्श्व में कागज, कलम लेकर बैठा था। भवन पर एक विहंगम दृष्टि डाली और उसका वर्णन कागज में संजोने के लिए कलम उठायी। यह उपक्रम करते ही धीरे-धीरे वह दिव्य प्रकाश और भवन तिरोहित हो गये। उसे ज्ञात हुआ कि उसने अनुचित किया।

अगली रात पुनः वह उस मन्दिर के निकट पहुंचा और उसकी सीढ़ियों में जा बैठा। मन्दिर के चारों ओर बड़े-बड़े स्तम्भ थे । उनके बीच-बीच में कमल फूल की पंखुड़ियां लगी थी। कुल मिलाकर दृश्य अत्यन्त अद्भुत था। मन्दिर के अन्दर की कोई भी वस्तु बाहर से दिखाई नहीं पड़ती थी बाहर से उसे विदित होता था जैसे दरवाजे पर कोई श्वेत पर्दा पड़ा हो कई दिनों के इन्तजार के उपरान्त पर्दा बीच से खुल गया और उसमें से एक अत्यंत लावण्यमयी षोडशी बाहर आयी। उसने साधक से भीतर आने के लिए कहा साधक यंत्रवत अन्दर प्रवेश कर गया। फिर दोनों के मध्य देर तक वार्तालाप हुआ। साधक अपने गुरु के दर्शन की तीव्र इच्छा रखता था वह बार-बार उस देवी से अपने आराध्य देव के दर्शन करा देना का आग्रह करता और और देवी पुनः-पुनः उसे आश्वस्त करती हुई कहती -अधीरता त्यागो और शान्त एवं स्थिर बनो दर्शन अवश्य होगे। पर साधक में इतना धैर्य नहीं था, कि वह इन्तजार कर से उसने मन्दिर का परित्याग कर दिया। बाहर निकला तो देखा कि पवित्र के दोनों और छोटी-छोटी वेदियों में कितने ही लोग ध्यानस्थ थे कदाचित् यह सभी अपने कोई-न-कोई मनोरथ की पूर्ति के निमित्त यहां समाधिस्थ थे।

मन्दिर एक पर्वत के निकट नदी किनारे बना था। नदी में जल प्रवाहित हो रहा पर उसमें कल-कल ध्वनि नहीं थी। वृक्षों पर कितने ही पक्षी थे, किन्तु सब मानो मौन थे। वायु बहती थी परन्तु उसके बहने से वृक्षों की टहनियों ओर पत्ते की आवाज नहीं होती थी। वहां बातचीत के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती दृष्टि निक्षेप से ही एक दूसरे का भाव ज्ञान हो जाना

इसी प्रकार के कितने ही विचित्र और विलक्षण अनुभव उक्त साधक को साधना के दौरान उस नये आयाम में हुए उसमें से सम्पूर्ण का वर्णन करना न तो यहां अभीष्ट है न आवश्यक । उद्देश्य मात्र यहां इतना बनाना है कि इस स्थूल जगत की तरह कितने ही सूक्ष्म लोक है जो सब भौतिक संसार से एकदम स्थूल शरीर से कहा जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।

अपने स्थान में रहते हुए ही उन लोकों में प्रवेश पाया जा सकता है। इन लोकों को कितनी ही श्रेणियां है। सब की अपनी-अपनी अद्भुतताएं और विचित्रताएं हैं इन्हीं में से एक वह है जिसमें व्यक्ति वस्तु एवं स्थान से सम्बन्धित भूत और भविष्य की जानकारी अर्जित की जा सकती है। जब कभी व्यक्ति अनायास अथवा प्रयासपूर्वक इस लोक में प्रविष्ट होता है तब वह कितनी ही प्रकार की अविज्ञात जानकारी अर्जित कर लेता है कारण कि घटनाएँ घटने के बाद सर्वथा समाप्त नहीं हो जानी वरन् एक ऐसे आयाम में प्रवेश कर जाती हैं जहाँ भूत भविष्य और वर्तमान जैसा कुछ होता नहीं अपितु वहां समय एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में रहता है।


Quotation

सच्चे धर्मोपदेशक की परिभाषा रामकृष्ण परमहंस ने धर्मोपदेशकों की एक मंडली को उद्बोधन करते हुए कहा जिसके पास अपनी पूंजी नहीं वही दूसरा को क्या बांटेगा? तुम लोग धर्म के अनुशासन में अपने को बांधो ताकि कथनी और करनी के समन्वय से ऐसे प्रवचन कर सको जिसे लोग सुनें ही नहीं अपनाये भी।


सविता की स्वर्णिम प्रकाश-साधना सरल भी और निरापद भी

वृक्ष -वनस्पतियों की तरह मनुष्य जीवन की एक प्रमुख आवश्यकता प्रकाश की है प्रकाश के साथ गर्मी भी जुड़ी होती है दोनों के समन्वय से ही विस्तार और हलचल का लाभ मिलता है इसके अभाव में जड़ता छाने लगेगी और विकास -विस्तार का क्रम अवरुद्ध हो जाएगा। सौरमंडल को ही ले तो उसके सदस्य अधिक दूरवर्ती नेपच्यून, प्लूटो, यूरेनस गह और उनके उपग्रह सूर्य प्रकाश का वैसा लाभ नहीं पाते जैसा कि समीपवर्ती पृथ्वी आदि को मिलता है। यही कारण है कि उन दूरवर्ती ग्रहों में ठण्डक की चरम सीमा है वहां न जीवन है न वनस्पति । गति भी उनकी धीमी है दिन में अर्थात् प्रकाश में प्राणियों और वनस्पतियों को गतिशील रहते तथा विकसित होते देखा जाता है जबकि रात्रि के अंधेरे में सर्वत्र सन्नाटा छाया रहता है और प्रगति के हर क्षेत्र में विराम जैसा लग जाता है।

सूर्य को जीवन कहा गया है। प्रकाश का प्रमुख स्त्रोत यही है। वैदिक प्रतिपादन में इसे ही इस जगत की आत्मा माना गया है पुराणों में आदित्य को पति और पृथ्वी को पत्नी के रूप में वर्णित किया गया है और प्राणियों की उत्पत्ति इन्हीं दोनों के सुयोग से सम्भव हुई बतायी गयी है। इस तथ्य की पुष्टि अब आधुनिक अनुसंधानकर्ता विज्ञानवेत्ताओं ने भी कर दी है। उनका कहना है कि धरती पर जीवन का अवतरण स्थानीय रासायनिक सम्पदा के साथ सूर्य ऊर्जा है यदि यह सुयोग न बना होता तो फिर नेपच्यून प्लूटो आदि ग्रहों की तरह धरती भी शून्य तापमान से नीचे की स्थिति में रहकर निर्जीव स्थिति में दिन गुजार रही होती। यह सूर्य की प्रकाश ऊर्जा ही है जो धरती को शस्य-श्यामला बनाये रखने के साथ ही उसे जीवधारियों से भी आबाद रखे हुए हैं।

प्रकाश और ताप सूर्य की दो प्रमुख विशेषताएं है इन दोनों को अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। प्रकाश देखने में सामान्यतया सफेद चमक के रूप में दिखाई देता है पर विश्लेषण करने पर भौतिकशास्त्रियों ने पाया है कि उसके अंतराल में कुछ विशिष्ट शक्तिधाराओं का समुच्चय सन्निहित है जिन्हें कलर या रंग कहते हैं।सूर्य किरणों का विश्लेषण करने पर उन्हें सात विशेषताओं से युक्त सात रंगों के रूप में देखा गया है क्योंकि सूर्य किरणों में सात रंग है इसलिए गायत्री के देवता सविता को सात अश्वों के रथ पर सवार होकर परिभ्रमण करते हुए शास्त्रों में निरूपित किया गया है। सूर्य की यह प्रकाश रश्मियां सात रंगों के रूप में जब धरती पर उतरती हैं तो वे सब अपनी-अपनी विशेषता से युक्त होती है उन सबके पृथक-पृथक प्रभाव मानव मन एवं शरीर पर पड़ते हैं। पदार्थ भी जिन किरणों को अधिक मात्रा में अवशोषित करते हैं वह उसी रंग के दृष्टिगोचर होने लगते हैं वस्तुतः यह मनुष्य की आंखों की सीमित क्षमता ही है जिसके कारण प्रकारु केवल सफेद ही दीखता है। अन्यथा उसमें कई वर्णों का सम्मिश्रण हैं जिनमें सात प्रमुख रूप से उभरकर सप्तवर्णी इन्द्रधनुष के रूप में क्षितिज पर कभी-कभी दिखाई दे जाते हैं प्रिज़्म द्वारा बने स्पैकट्रम -वर्णक्रम में भी यह रंग प्रतिबिम्बित होते हैं।

सूर्य किरणों के माध्यम से धरती पर आने वाले सात रंगों को सप्त अश्व कहा गया है और उस रथ पर सवार होकर उनके परिभ्रमण का वर्णन किया गया है। सूर्योपनिषद्, सूर्यपुराण आदि आर्ष ग्रन्थों में इसका विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया हैं कूर्म पुराण में सूर्य की अमृतमयी रश्मियों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए यह भी बताया गया है कि कौर से ग्रह किसी-किस रश्मि द्वारा तृप्त होते हैं। साम्बपुराण के अध्याय 8 में सूर्य रश्मियों का विस्तृत उल्लेख है। उसके अनुसार सूर्य के शुभ्र प्रकाश में हजारों रश्मियां हैं जिनमें से तीन सौ देवलोक पर प्रकाश फैलाती है तथा तीन सौ किरणें पृथ्वी पर एवं चार सौ किरणें चान्द्रमस नामक पितरलोक पर प्रकाश बिखेरती है इन्हीं में से चार सौ किरणें जल बरसाती है तीस किरणें शीत उत्पन्न करती है इन्हीं रश्मियों से औषधियां प्राणवान बनती हैं इसी में आगे कहा गया है कि यह प्रकाश किरणें सर्वव्यापक है इन्हीं के कारण दिन-रात, सर्दी-गर्मी, वर्षा आदि का वातावरण बनता है समस्त ग्रह तथा नक्षत्र मण्डल सूर्य किरणों से उत्पन्न होते और उसी में प्रतिष्ठित -अधिष्ठित रहते हैं।

सूर्य के सहस्रों रंगों वाली प्रकाश किरणों में सात रंग प्रमुख हैं सात वार सात रस, सप्त स्वर, सात रूप, सप्त धातु आदि सभी इन्हीं सप्तवर्णी किरणों के आधार पर प्रतिष्ठित है सूर्य चिकित्सा विज्ञानियों ने इन सप्तवर्णी किरणों का सम्बन्ध सात दिनों एवं उनसे सम्बन्धित ग्रह-मंडलों तथा उनके रंगों से बिठाया है इस प्रकार सूर्य का सम्बन्ध रविवार से है, जिसका रंग तप्त रक्त वर्ण का बताया गया है। सोमवार का चन्द्रमा से माना है, जिनकी प्रकाश किरणों का रंग शीतल-नारंगी है मंगलवार का’मास ‘ अर्थात् मंगल ग्रह से तथा उससे निस्मृत किरणों को पीले रंग की और बुधवार का ‘मर्करी’ अर्थात् बुध ग्रह से सम्बन्धित माना है जिससे निकलने वाली किरणों का रंग हरा होता है। गुरु या ‘ज्यूपिटर’ का सम्बन्ध बृहस्पतिवार से हैं जिससे आसमानी रंग की किरणें निकलती है ‘वेनस’ अर्थात् शुक्र ग्रह शुक्रवार से सम्बन्धित है और उससे निकले वाली किरणों का रंग नीला होता है शैटर्न अर्थात् शनिग्रह शनिवार से जुड़ा हुआ है और उससे निस्सृत होने वाली किरणें बैगनी रंग की होती है। राहु एवं केतु से क्रमशः गहरी बैगनी और इन्फ्रारेड किरणें निकलती है इन सबके अपने - अपने महत्व व प्रभाव है।

साम्बपुराण के अनुसार , सुर्य की हजारों रश्मियां है जिनमें सात प्रमुख है। यह सात प्रकाश रश्मियां ही समस्त ग्रह नक्षत्रों की संचालक एवं प्राणिमात्र का प्राण है इन प्रकाश किरणों के नाम क्रमशः (1) सुषुम्ना (2) सुरादना (3) उदन्वसु-संयद्वसु (4) विश्वकर्मा (5) उदावसु (6) विश्वव्यचा -अखराद् तथा (7) हरिकेश है। । इन्द्रधनुष में या त्रिपार्श्व काँच -’प्रिज़्म’ से वर्णक्रम नारंगी पीली हरी आसमानी नीली बैगनी रंग की दिखाई देती है इन्हें ही अंग्रेजी अक्षरों कढ्ढक्चत्रंघह्रक्र के रूप में अंकित किया जाता है उक्त प्रकाश किरणों के कार्य क्रमशः इस प्रकार बताये गये। है। ‘सुषुम्ना तथा सुरादना’ किरणें चन्द्रमा की कलाओं पर नियंत्रण करती है। कृष्णपक्ष में कलाओं को घटाने और शुक्लपक्ष में उनकी वृद्धि करने में इन्हीं किरणों की भूमिका होती है समुद्र में ज्वार -भाटे लाने एवं प्राणियों -विशेषकर मनुष्य को प्रभावित करने में यह किरणें अहम् भूमिका निभाती हैं चन्द्रमा कर अमृततुल्य शीतल किरणों का निर्माण इन्हीं दे प्रकार की सूर्य किरणों से होता है सूर्य की तीसरी रश्मि ‘उदन्वसु ‘ से लाल रंग के मंगल ग्रह का निर्माण हुआ है। यह किरणें मनुष्य सहित समस्त जीवधारियों के शरीर में रक्त संचालन की अधिष्ठात्री मानी गयी है। लाल रंग की सूर्य किरणें हमारे रक्त दोषों को दूर करती तथा आरोग्य एवं ओजस, तेजस प्रदान करती है।

‘विश्वकर्मा’ नामक चतुर्थ रश्मि सूह से बुध ग्रह का निर्माण हुआ हैं मनुष्य के लिए यह ग्रह शुभ कारक माना गया है। इस प्रकाश रश्मि का उपयोग करके मनुष्य मानसिक उद्विग्नता से छुटकारा पा सकता है इसी तरह उदावसु नामक किरणें बृहस्पति का निर्माण करती है। ज्योतिर्विदों के अनुसार यह गह प्राणिमात्र के लिए अभ्युदयकारक है। मनुष्य के उत्थान-पतन में इस ग्रह की अनुकूलता-प्रतिकूलता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘उदावसु’ किरणों का सेवन प्रतिकूलता का शमन करता और अनुकूल वातावरण का सृजन करता है। शुक्र एवं शनि-यह दोनों ही ग्रह सूर्य की ‘विश्वव्यचा ‘ नामक प्रकाश किरण से निर्मित हुए हैं शुक्र वीर्य के अधिष्ठाता गाने गये है। शनि को मृत्यु का देवता कहा जाता है इस प्रकार जीवन और मृत्यु का नियंत्रण ‘विश्वव्यचा’ किरणें द्वारा होता है इसका सेवन करने वाले व्यक्ति पूर्ण दीर्घायुष्य प्राप्त करते और स्वस्थ बने रहते हैं । ‘हरिकेश’ नामक सातवीं सूर्य किरण से समस्त नक्षत्रों की उत्पत्ति हुई है। मानव जीवन में आचरति शुभाशुभ कर्मों का प्रतिफल प्रदान करने में इसी किरण की प्रमुख भूमिका होती है।

सूर्योपनिषद् में समूचे जगत की उत्पत्ति एवं पालन में एकमात्र कारण सूर्य को ही बतलाया गया है। और उसे ही सम्पूर्ण जगत की आत्मा-’सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ कहा गया है। शाँकरभाष्य के अनुसार -” रश्मीना प्राणानाँ रसानाँ च स्वीकरणात् “ सूर्य - अर्थात् सूर्य रश्मि ही सम्पूर्ण प्राणियों की प्राण शक्ति है वह अपने दिव्य अमृत रस से जीवधारियों को जीवन प्रदान करती है। सातों ग्रहों - भूमि , चन्द्रमा, बुध आदि एवं भूः भुवः स्वः आदि सात भुवनों में प्रकाश पहुंचने और इन लोकों से रस आदि लेने वाली सूर्य किरणें ही हैं इन्हीं किरणों के तारतम्य से विश्व में सब परिवर्तन होते हैं। गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, अनुष्टुप्, वृहती, पंक्ति एवं अष्णिक ये सात व्याहृतियां सूर्य के सात किरणों से उत्पन्न हुई है। व्याहृतियां किरणों के अवयव हैं जिनके द्वारा ज्ञान चेतना उपलब्ध होती है। प्राचीनकाल के ऋषि -मनीषी इन्हीं सूर्य रश्मियों का पान करके सप्त व्याहृतियों तथा संपूर्ण वेदों का साक्षात्कार करते थे। महर्षि याज्ञवल्क्य ने इन्हीं सूर्य किरणों का अवगाहन कर व्याहमत एवं वेद को अपने अर्न्तमानस में आविर्भूत किया था। सप्तर्षियों के आराध्य भी यही गायी के देवता सविता देवता थे। त्रिकाल संध्या में इन्हीं भूवन भास्कर की प्रकाश किरणों को गायत्री महामंत्र द्वारा आकर्षित - अवधरित किया जाता है सविता की अधिष्ठात्री शक्ति का ही नाम गायत्री व सावित्री है।

आध्यात्मिक साधनाओं में विशेष -कर गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में स्वर्णित सविता अर्थात् प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य की प्रकाश रश्मियों की ध्यान धारणा का विशेष महत्व हैं ओजस्, तेजस् एवं वर्चस अर्जित करने के लिए गायत्री उपासकों में से जिन्होंने भी इस दिशा में निष्ठापूर्वक ईमानदारी से कदम बढ़ाया है उनने बौद्धिक एवं आध्यात्मिक दोनों की क्षेत्रों में आशातीत सफलताएं अर्जित की है प्रकाश-साधना हर वर्ग एवं हर आयु के नर-नारी सुगमतापूर्वक कर सकते हैं। और मनोवांछित उपलब्धि हस्तगत कर सकते हैं सविता की स्वर्णिम प्रकाश-साधना सरल भी और निरायद भी।


सन्त ज्ञानेश्वर (Kahani)

विट्ठल पंडित काशी जाकर संन्यास की दीक्षा लेकर वही रहने लगे। जब गुरु को पता लगा कि यह गृहस्थ के उत्तरदायित्वों को पूरा किए बिना ही संन्यासी हो गया है, तो उन्होंने संन्यास दीक्षा को रद्द कर दिया और गृहस्थ पालन की आज्ञा दी। उनसे कहा-” गृहस्थ को बन्धन मानकर उससे भागों मत । उसके साथ जुड़ी आत्म-परिष्कार की ब्राह्मणोचित साधना करो तथा युग की आवश्यकता के अनुरूप सन्तान समाज को देने का उत्तरदायित्व पूरा करो।

विट्ठल पंडित ने यही किया। जाति वालों ने पण्डितजी को जाति बहिष्कृत कर दिया और उनके बच्चों को भी किसी काम में शामिल न होने देते। होना यह चाहिए था कि रास्ता भूला व्यक्ति यदि फिर रास्ते पर आ जाय, तो उसका स्वागत किया जाय, पर प्रतिगामियों को विवेक बुद्धि से क्या सम्बन्ध।

परन्तु विट्ठल पण्डित गुरु द्वारा बतलाए गये गृहस्थाश्रम के आदेशों के अनुरूप चलते रहे और बच्चों को श्रेष्ठ संस्कार देते रहे।

सन्त ज्ञानेश्वर सहित उनके तीनों बेटी मुक्ताबाई चारों प्रचारक की तरह प्रतिभ्रमण करने लगे। एक बार काशी गए, तो पण्डितों से शास्त्रों ठन गया। समतावादी ज्ञानेश्वर जी ने श्रेष्ठ कार्यों में सबका अधिकारी साबित करने के लिए भैंसों के मुख से वेद मंत्र का उच्चारण कराया । प्रतिगामी पण्डितों का सिर नीचा हो गया। सन्त ज्ञानेश्वर के चमत्कारी रूढ़ि विरोधी प्रयासों से देव संस्कृति के विस्तार, धर्मधारणा के प्रयासों में सहायता मिली।


हारे को हरिनाम

जहाज समुन्दर की लहरों से बल खाता हुआ अपने गन्तव्य की और बड़ रहा था। लगभग पाँच सौ फौजी उस जहाज में सवार थे। साथ में खाने -पीने का समान भी था। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका चारों ओर फैल चुकी थी। अनेक उपनिवेशों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा था। एक तरफ विश्व युद्ध में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी, तो दूसरी ओर चारों ओर से उठ रहे विद्रोही स्वरों को शान्त करने का उसका व्यस्त अभियान जारी था।

ये सभी अंग्रेजी फौज के सिपाही थे। यूँ उनमें बहुसंख्यक हिंदुस्तानी थे, अंग्रेजी की संख्या तो उंगलियों में ही गिनने लायक थी। से सब कभी जावा-सुमात्रा के निर्जन स्थानों में पहुंच जाते तो कभी वर्मा के व्यस्ततम इलाकों में आ धमकते । घर परिवार सब कुछ उन्होंने काफी अरसे से छोड़ रखा था। बस ! एक ही लक्ष्य था-दुश्मन को धूल चटाना।

बीच समुद्र मैं तैरता जहाज, चारों ओर गरजती लहरे। लहरों के इस संगीत के साथ ही ये सब भी जहाज की छत पर बैठ गाना गाकर अपना दिल बहला रहे थे इतने में अचानक जहाज चिकोले खाने लगा भय और आश्चर्य से सभी के चेहरों का रंग फीका पड़ गया। उनकी आंखें एक - दूसरे को ताकने लगी। सभी की नजरों में एक ही प्रश्न-चिन्ह अंकित था। अब क्या होगा? तभी जहाज ने जोर-जोर से सायरन बजाना शुरू कर दिया। सायरन की इस गूँज के बीच उनके मेजर ने इशारा करते हुए कहा -’जम्प’ और एक-एक करके सभी जहाज के डेक से अपनी सुरक्षा नौकाओं पर कूद पड़े। पल भर पहले जिस जहाज में पाँच सौ सैनिक गीत गाते हुए झूम रहे थे, वही जहाज अब बिना चालक के एकदम सुनसान मार्ग पर बढ़ रहा था। धरती का एक कतरा भी कही नजर नहीं आता था।

साँझ ढल गयी। अँधेरा घिर आया। उसने अपने आप-पास तैरते साथियों के मुख पर छाई निराशा को देखा। नीला आकाश काले रंग में बदल गया। एक सुरक्षा नौका उसके पास से गुजरी । ‘शुभ रात्रि......... उसके साफ स्वर सुना, पर पहचान ही पाया कि यह आवाज उसके किस साथी की थी। अब कुछ नजर नहीं आ रहा था।

हाँ भयानक समुद्री चक्रवात गर्जना बढ़ती जा रही थी इस तूफानी चक्रवात के अंधड़ के बीच नौका को नियन्त्रण में रख पाना मुश्किल होता जा रहा था। चीख - चिल्लाहट बढ़ती जा रही थी और इन्हीं के साथ चक्रवात उग्र से उग्रतर होता जा रहा था। चक्रवात की इस बढ़ती गर्जना में ये चीखें खोती जा रही हैं उसे सूझ नहीं पड़ रहा था कि वह किसे पुकारे , ऐसे में कौन उसकी मदद कर सकता है? वह भारतीय भा। अपने मा बाप से उसने सुन रखा था, हारे को हरिनाम। ‘ सारे सहारे टूट जाने पर, सारे आधार नष्ट हो जाने पर भी परमात्मा का सहारा नष्ट नहीं होता। उसके होठ चुप थे, लेकिन हृदय उस निर्बल को बल प्रदान करने वाले को पुकार उठा- हे भगवान!’

इस प्रकार की तारतम्यता के बीच चक्रवात शान्त हो चुका था और सूर्योदय की लाली समुद्री जल को अपने रंग में रंग रही थी। उसने दूर-दूर तक नजर दौड़ाई , कोई नजर नहीं आ रहा था कहा गए सब? समुद्री तूफान में भटक गए । या उफनती लहरों समं समा गए, उसे नहीं मालूम था। भोर होते उसने अपने को कनहरा तो पता चला कि इस विशाल सर्वथा निराश्रय । अब न उसके पास भोजन था और न पीने को पानी। यदि कुछ बचा था तो प्रार्थना का सम्बल, अंतर्हृदय से उठने वाली आर्त पुकार ।

सूरज चढ़ने के साथ गर्मी महसूस होने लगी। शायद वह गर्म इलाका था या वहां सूर्य की किरणें सीधी पड़ती थी। यूं ही बैठे - बैठे मस्तिष्क में तरह- तरह के विचार आ रहे थे। पहली बार वह अपने बचपन की घटनाओं को कुरेद-कुरेद कर याद कर रहा था। गांव में हनुमानजी का मन्दिर, उसमें होने वाली रामकथा जिसमें वह अपने पिताजी के साथ जाया करता था कथा सुनाने वाले वैष्णव सन्त के शब्द उसकी स्मृति पटल पर प्रकाशित हो उठे-” मानव मानव को प्रायः निराश कर देता पर परमात्मा से उसे दिल की गहराइयों से पुकारा जाय। अभी वह इन्हीं यादों में खोया था कि एक जहाज दिखा पाल लगे थे। जो हवा की दिशा के अनुरूप गुब्बारे की शक्ल में फूल कर जहाज को उसकी ओर बढ़ा रहे थे। यह देखकर उसके मन को खुशी की एक सुखद लहर भिगो गयी। उस निर्जन समुंदर में मानव जीवन का कल्पना करना ही दुष्कर था ऐसे में नाविकों का जहाज देखकर लगा जैसे किसी ने उसे काल के जबड़े से छुड़ा लिया हो।

वह जहाज इतने में एकदम समीप आ पहुंचा कुछ जंगली से दिखने वाले लोगों ने उसे तीतर की तरह दबोच कर जहाज के डेक में डाल दिया। यहां के डेक का दृश्य बड़ा भयानक था एक मोटा तगड़ा काला वनमानुष - सा दिखने वाला ठहाके लगाता हुआ उसे खा जाने वाली नजरों से देख रहा था। उसका साथ देते हुए उसके साथी जो उसकी तुलना में कम डरावने लग रहे थे, भी ठहाके लगा रहे थे । उनकी खुशी का राज उसकी समझ में नहीं आता था वो आपस में कुछ बाते भी कर रहे थे। पर वह भाषा भी उसकी समझ के बाहर थी उसे लग रहा था, मानो आसमान से टपक कर खजूर पर अटक गया हों।

सांझ ढलने से पहले वे जहाज एक छोटे से द्वीप के छोर पर आ लगा। उस टापू पर चारों ओर जैसे मातम छाया था। सब कुछ सुनसान लग रहा था उसी बांहें पकड़कर वे लोग उसे एक रेतीले मार्ग पर ले जाते हैं। आगे-आगे उनका सरदार चल रहा था । अभी एक- आध मील ही चले होगे कि एक महलनुमा आकृति पहुंचे कि एक बार दिमाग चकरा गया। चारों इसका मसाले जल रही थी। अभी वह उस महल के वैभव को ठीक से देख पाता कि एक डाकू ने बड़ा भारी लौह द्वार खोलकर उसे अन्दर धकेल दिया। वह कैदखाना था। अनेक समुद्री यात्री वहां बन्दी बनाकर रखे गये थे। कुछ अभागे युवकों को न जाने किस भूल के लिए कोड़ों की मार पड़ रही थी। कुछ कैदियों के शरीर पिटकर सूज चुके थे। लगभग सभी कैदियों के वस्त्र फटकर चिथड़े में बदल गए थे। भय से उसका भी कंठ सूखने लगा था चार जल्लाद वहां पहरे पर नियुक्त थे।

उन बन्दियों से उनकी कहानी सुनकर उसका हृदय द्रवित हो उठा एक बारगी उसे अपने दुःख विस्मृत हो गए। उन बन्दियों में कुछ व्यापारी थे, कुछ सामान्य नागरिक जो समुद्री यात्रा कर थे। दुर्भाग्यवश ये लोग इन डाकुओं की गिरफ्त में आ गए थे। बच्चों और स्त्रियों की दशा तो अकथनीय थी। खिड़की की सलाखों के छेद से उसने उन मायूस बच्चों को डाकुओं के इशारों पर बर्तन मांजने से लेकर उनके पैर दबाने तक के कार्य करते हुए देखा।

इन सबका छुटकारा किस तरह हो? इस सोच -विचार में रात्रि बीत गयी। अगली सुबह वे डाकू अपने सरदार के नेतृत्व में दूसरे यात्री जहाज की टोह में निकल पड़े। बन्दीगृह ने नियुक्त जल्लादों की उनके सरदार ने जाते समय कुछ निर्देश दिये। डरे-सहमे वे सभी अपनी पेशियों को मसलते हुए कोड़े खाने की तैयारी करने लगे। इन विचित्र परिस्थितियों के बीच भी उसका हृदय इन सभी पर कृपा हेतु परमात्मा को पुकार रहा था।

हाथों में कोड़े लिए हुए ज्यों ही वे जल्लाद कैदखाने की ओर बढ़ने को हुए मनोरंजन कक्ष से वाद्य यंत्रों की ताज पर एक मधुर स्वर लहरी गूंज उठी। अचानक इतना सुरीला स्वर सुनकर वे जल्लाद ठिठक कर रुक गए। गीत की धुन पर जब घुंघरुओं की छम-छम शुरू हुई तो वो मुस्कराते हुए एक दूसरे को गौर से निहारने लगे। न जाने उन्होंने क्या सोचकर कैदखाने से मुख फेरकर मनोरंजन कक्ष का रुख ले लिया। बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी। उसे अपने मन में महसूस हुआ । कि इसके संगीत के पीछे परमेश्वर की ही कृपाशक्ति काम कर रही है।

अचानक कुछ क्षणों बाद स्वागत कक्ष से एक विदेशी युवती भागकर आयी। बन्दीगृह का लौह द्वार खोलकर उसने सभी को अपने साथ चलने का इशारा किया। किसी तरह साहस बांधकर जब ये सब मनोरंजन कक्ष में पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर दंग रह गए शराब के नशे में मदहोश होकर चारों जल्लाद निढाल जमीन पर लेटे हुए थे। स्त्रियों ने अपने सूजे हुए तलुवों पर मलहम लगा रखा था। यह देखकर सभी का हृदय रो उठा परन्तु वह समय भावनाओं में बहने का नहीं था इस समय तो विवेक एवं बुद्धि से काम लेने की जरूरत थी। स्त्रियों को साथ लेकर सभी बावर्ची खाने में पहुंचे । वहां छोटे-छोटे बच्चे अपनी कोमल हथेलियों से बर्तन साफ करने में व्यस्त थे। बचपन की इतनी दयनीय हालत पहले कभी किस ने नहीं देखी थी।

उस द्वीप में बन्धक बनाए गए सभी जनों ने एक साथ मिलकर चैन की सांस ली। अब उस महल में देर तक टिकना खतरे से खाली नहीं था जिस रेतीले मार्ग से उनको लाया गया था उसी मार्ग पर वापस चलते हुए सब के सब द्वीप के तट पर पहुंच गए। जहाज को तो डाकू ले गए थे परन्तु वहां पर एक बंधी पानी में स्थित खड़ी थी उफनते समुंदर में इतनी विशाल नौका को खेना असम्भव ही था, लेकिन उसके हृदय में साहस का संचार किया । सबने अपनी पूरी शक्ति उस नौका को आगे बढ़ाने में लगा दी क्फद कील का सफर तय करने के बाद समुंदर की लहरे उनके अनुरूप होने लगी। अब उनकी नाव तेजी से बढ़ रही थी पीछे मुड़कर देखा तो टापू आंखों से ओझल हो गया था।

इतनी लम्बी दूरी तक नाव को खेते हुए सब की बांहें दुखने लगी थी। लेकिन चारों ओर उफनते-गरजते सागर के अलावा और कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। सभी दिशा - भ्रम की स्थिति में थे। किधर चले, कहा जाए थक को सूझ नहीं रहा था शाम ढलती जा रही थी। नीला आकाश सितारों जड़ी काली चादर ओढ़ने की तैयारी में था सभी एकबारगी फिर से घबरा गए।

हे भगवान ! प्राण जाते समय प्राणी के कष्ट से जो आर्तनाद फूटता है बिना अनुभव के कोई उस स्वर को समझ नहीं सकता । कोई आशा कोई युक्ति कोई बल जब नहीं रह जाता और मृत्यु का कराल खुला जबड़ा सम्मुख दिखाई पड़ता है। अहो भाग्य उसका जो उस समय भी उस परम सहायता को पुकार सके। उस सर्व समर्थ को पुकार कर ले कोई कभी निराश नहीं हुआ है।

यही पुकार सभी के हृदयों और धर्म के अनुरूप प्रयुक्त किए हों । पर भाव एक ही है। भावों में कोई भेद नहीं था। अब की बार उसकी प्रार्थना वैयक्तिक नहीं सामूहिक थी। सभी के हृदयों से एक ही समन्वित पुकार उठ रही थी । अश्रु भर आंखों से सबके सब आसमान की ओर सिर उठाए उस परम प्रभु की याद कर रहे थे तभी उन्हें अचानक तेज हार्न सुनायी दिया। हार्न की तीव्र ध्वनि से सभी एकबारगी चौक गए बच्चे डर कर रोने लगे लेकिन एकमात्र वही फौजी होने के कारण समझ सका कि ये ध्वनि संकेत ‘मित्र राष्ट्र’ कि विजय का सूचक होता है। उसने देखा प्रकाश का एक पुंज उनकी ओर बढ़ा चला आ रहा है कुछ आशा बंधी तो वे अपनी नाव की दिशा बदलकर उस प्रकाश पुँज की ओर मुड़ चले।

निकट आकर उसने उस जहाज पर ‘मित्र राष्ट्रों’ का संयुक्त झण्डा लहराता देखा। वह भी फौजी था। उसने अपने तरीके से हाथ उठा-उठाकर अभिवादन किया। अभिवादन करने का तरीका देखकर उन सैनिकों ने इन सभी को अपने जहाज में बुला लिया। जहाज में चढ़कर इन सभी ने सन्तोष की गहरी सांस ली। ये अभी कुछ और सोच पाते कि इनके साथ की कुछ जापानी महिलाएं जोर-जोर से रोने लगी। दरअसल उनको किसी सैनिक ने बता दिया था कि जापान के भव्य शहर परमाणु बम की विभीषिका में जलकर राख हो गए हैं। मित्र राष्ट्र के जहाज में शत्रु राष्ट्रों के कुछ सैनिक क्रुद्ध होकर शत्रु देश के निवासियों पर टूट पड़े।

एक बार जहाज में फिर हलचल मच गई वह जिस किसी तरह भागकर मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारियों को बुला लाया। ताकि वे अपने सैनिकों को इन बात के लिए समझा सके कि इन निरीह औरतों, मासूम बच्चों का कत्ल करना उचित नहीं । उसकी बाते एक बुजुर्ग सेनाधिकारी की समझ में आयी। वे अपने सैनिकों को सम्बोधित करते हुए भावावेश में कहने लगे-” लड़ाई बन्द करो यहां हमारा कोई शत्रु नहीं हैं काल के मुंह से बचकर आने वाले इन निर्दोष लोगों को फिर से काल के मुंह में धकेलना कोई वीरता नहीं हैं हमारी शरण में आए लोगों को इनके देशों तक सुरक्षित पहुंचाना हमारा कर्तव्य हैं ।

अपने वरिष्ठ अधिकारी के शब्द सुनकर क्रुद्ध सैनिक एकदम शान्त हो गए। लेकिन यह शान्ति किसी श्मशान की शान्ति जैसी लग रही थी। परमाणु बम की सदी की भयावह खबरें जहाज के वायरलैस पर लगातार आ रही थी। सभी के हृदय इस हादसे की भयंकरता को सुनकर सहमे हुए थे। ऐसे में क्या किया जा सकता है? प्रार्थना उसके अंतःकरण में एक स्वर में गूंजी। उसने अपने हृदय की बात जहाज के सैन्य अधिकारियों को बताई । वे सभी सहमा हो गए । जहाज में आए हुए स्त्री, पुरुष , बच्चों के साथ सैनिक और उनके अधिकारी तथा जहाज के कर्मचारी सभी एक स्वर से प्रभु को पुकारने लगे।

बड़ी करुण और आर्द्र पुकार थी इस बार वे अपनी जीवन की रक्षा के लिए नहीं विश्व शान्ति के लिए पुकार रहे थे। प्रार्थना का यह स्वरूप पहले की वैयक्तिक प्रार्थना और सामूहिक प्रार्थना से भिन्न था।

लेकिन उसका भरोसा था कि उसके प्रभु अवश्य सुनेंगे। सभी के हृदय की यह समन्वित पुकार निकल नहीं जाएगी तभी जहाज बन्दरगाह पर पहुंचा। बन्दरगाह पर पहुंचते ही उन्हें खबर मिली , संयुक्त राष्ट्र संघ नामक एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन को गठित करने पर दुनियाभर के राष्ट्र सहमत हो गए हैं। यह संगठन विश्व में शान्ति कायम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और राष्ट्रों के बीच उपजे कटुता को मधुरता में परिवर्तित करने का प्रयास करेगा।

उसे यह खबर सुनाते हुए मित्र राष्ट्रों के एक वरिष्ठ सैनिक अधिकारी ने कहा-” कैप्टन मोहन सिंह , तुम्हारी प्रार्थना सफल हुई - अब किसी की नृशंस विजय को सराहा नहीं जाएगा। किसी शत्रु का खून नहीं बहेगा। यदि स्वागत होता तो शान्ति का और यदि तिरस्कार होगा तो घृणा का। अब एक शांतिमय विश्व पनपेगा। “ सैन्य अधिकारी के इस कथन को सुनकर वह गदगद था हृदय से निकले प्रार्थना के स्वरों का परिणाम आश्चर्यजनक और अद्भुत होता है उसने अपना शेष जीवन ‘प्रार्थना’ के लिए अर्पित करने का निश्चय किया। स्वामी सत्यप्रकाश के रूप में वह समाज में एक आध्यात्मिक विभूति के रूप में प्रख्यात हुए । प्रार्थना उनका जीवन-मंत्र बन गया।


तीन तस्वीरें (Kahani)

एक चित्रकार ने तीन तस्वीरें बनाई। एक सोच में पड़ा था। दूसरा हाथ मल रहा था। तीसरा सिर धुन रहा था। पूछने पर चित्रकार ने बताया कि यह तीनों एक ही आदमी की तीन स्थितियों के चित्र है विवाह से पूर्व यह कल्पना लोक में उड़ता है और कहा से वैसी सुन्दर पत्नी हाथ लगे, इस सोच में बैठा रहता है। दूसरा चित्र विवाहित का है गृहस्थ जीवन में जो जिम्मेदारियां आती है और जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उस जंजाल को देखकर हाथ मलता है कि इतना झंझट मोल ले लिया। तीसरा चित्र उस स्थिति का है , जिसमें सभी का वियोग और विरोध वास देता है तथा संतान दुःख देती है तब आदमी सिर पीटता है और सोचता है कि हमारे भाग्य ऐसे फूटे है कि अपने पैरों अपने हाथ लग सके तो गृहस्थ धर्म में रहते हुए हर दृष्टि से आदर्श जीवन जिया जा सकना सम्भव है । ऐसे उत्कृष्ट एवं अनुकरणीय बनो, जो स्वयं को तो श्रेय पथ पर ले जाने वाला हो ही , सारे सहयोगियों का हित साधन भी कर सकें।

गृहस्थ जीवन में अनेकों जिम्मेदारियाँ कंधे पर आती हैं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है पर इनसे घबराने से लाभ क्या? कभी-कभी जीवन -साथी से भी इसका समाधान मिल जाता है। सेठजी जब घर में आते तो तिल का तोड़ बनाते । घर के सभी लोगों को विशेषतया पत्नी को असमंजस में डाल देते। यह एक प्रकार से उनकी आदत बन गई थी।

पत्नी ने उनका चिंतन सुधारने लिए एक नाटक रचा। चारपाई पर रोनी सूरत बनाकर पड़ गई । घर का कोई काम न किया। दुकान पर से सेठजी आये, वे भी चिन्तित हुए और कारण पूछा। पत्नी ने कहा- “ आज एक पहुंचे हुए ज्योतिषी आये थे हाथ देखकर बता गये है कि तू साठ वर्ष तक जियेगी और आठ बच्चे होंगे। सोच रही हूं कि साठ साल में कितना अनाज खा जाऊंगी। बच्चों के प्रसव की कितनी पीड़ा निकल जाएगा।

सेठजी ने झिड़का और कहा-” इतना सब एक दिन में थोड़े ही होगा। समय के साथ आने और खर्च होने का काम चलता रहेगा। तू व्यर्थ चिन्ता करती है।

अब स्त्री की बन आई। उनके कहा-” तुम भी तो रोज भविष्य की चिन्ता ही मुझसे कहते हो । इतनी जिम्मेदारियां निभाने को पड़ी , उन्हें पूरा करना तो दूर तुम प्रयास नहीं करते । यह क्यों नहीं कहते कि समयानुसार समस्याओं के हल भी निकलते रहेंगे।


आनन्द की देवी

इन दिनों वह काफी असमंजस में था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने जीवन के लिए किस मार्ग का चुनाव करें उसके मित्र , सम्बन्धी , रिश्तेदार - कुटुंबी सभी अपनी चालाकों, चतुरता से भरपूर ऐश्वर्य-विलास का उपभोग कर रहे थे। सुखभोग में निमग्न इन सभी की सलाह थी कि वह भी उसी मार्ग का अनुसरण करें, जिस पर वे सभी चल रहे हैं। मित्रों ने सलाह दी-”तुम युवा हो, तुममें भरपूर साहस है शारीरिक सौंदर्य की दृष्टि से भी तुम देवकुमार लगते हों । यूनान की सुंदरियों में तुम्हारे बारे में अनेकों किम्वदंतियां प्रचलित है। वे सभी तुमको वरण करना चाहती है तुम्हारे पास पूर्वजों की अकृत धन-सम्पत्ति है यश -सम्मान और वैभव- विलास से भरे-पूरे इस जीवन का भरपूर उपभोग करो।

लेकिन न जानें क्यों उसे इन सबकी सलाह पसन्द नहीं आयी। उसका मन किसी अनजाने भय से कांप उठता । न जाने क्यों उसे लग रहा था कि इन सभी के द्वारा सुझाया गया मार्ग जीवन को नष्ट कर देने का मार्ग है। मानव जीवन सुख -भोग से ऊपर है, लेकिन क्या? उसे यह समझ में नहीं आ रहा था। एक अबूझ पहेली उसके सामने थी जिसका हल वह खोजना चाहता था। पर कोई हल नहीं निकल रहा था। उद्विग्नता परेशानी और गहरे असमंजस की इस मनोदशा में वह घर छोड़कर एकान्त में चला गया।

एकान्त के इन क्षणों में वह देव-सत्ताओं की आराधना में तल्लीन हो गया। बीतते दिनों के साथ तल्लीनता भी बढ़ती गयी। एक रात्रि उसके सामने दो ज्योति पुँज प्रकट हुए जो थोड़े ही समय में दो देवियों में बदल गए। दोनों देवियां एक -से -एक बढ़कर सुन्दर थीं ज्योतिर्मय थी। दोनों उसकी सम्बोधि के कहने लगी।

पहली देवी बोली -” तुम किस दुश्चिन्ता में पड़े हो । तुम मेरा अनुसरण करो। मैं तुम्हें संसार की सभी चिन्ताओं से मुक्त रखूंगी। मैं तुम्हें ऐशोआराम की दुनिया में ले चलूंगी । जहां किसी चीज की कमी नहीं होगी। खानें को एक से एक बढ़िया सुस्वाद व्यंजन होगे। पहनने असाधारण वस्त्रालंकार। रहने को भव्य महलों की कमी न होगी। सोने को मखमली गद्दे , रत्न जटिल पलंग होगे। महल के चारों ओर सुन्दर बाग-बगीचे होंगे, सारा वातावरण सुगन्धित और लुभावना होगा। तुम मेरा अनुसरण करो। मैं तुम्हें सांसारिक दुःख -दारिद्रय से मुक्त रखूंगी।”

देवी की सलाह पर वह हल्के से मुस्कराया । यह वही सलाह थी जो उसके मित्र-कुटुम्बी दिया करते थे। हां अबकी बार यह पहले से कही अधिक चमत्कारिक एवं आकर्षक रूप में प्रस्तुत की गयी थी। थोड़ी देर चुप रहने के पश्चात उसने देवनल से उसका नाम पूछा। इस जिज्ञासा पर देवी ने कहा -’ ऐश्वर्य के अभिलाषी तो मुझे ‘सुख की देवी‘ के नाम से जानते हैं, परन्तु कुछ सिरफिरे दार्शनिकों और कंगाल फकीरों ने मुझे’विलास की देवी’ कहा है।

इतने में दूसरी देवी भी आ गयी। उसके ज्योतिर्मय सौंदर्य में मातृत्व का प्रकाश झलक रहा था वात्सल्य और अपनत्व भरे स्वरों में उसने उसे सम्बोधित करते हुए कहा-” बेटे ! मैं जानती हूं कि तुम जीवन के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हो और अपने लिए रास्ता तलाश रहे हो। तुम मेरा अनुसरण करो। मैं तुम्हें जीवन के सच्चे और आत्मिक आनंद की दुनिया में लिए चलती हूँ।

इस पर पहली देवी ने कहा-” सावधान युवक । इसकी भोली बातों के बहकावे में कभी मत आना । इसका मार्ग अत्यन्त दुर्गम और लम्बा है कठिनाइयों ओर चुनौतियों से भरा हुआ है इसकी अपेक्षा मेरा मार्ग अत्यन्त ही सरल और छोटा है।

“बेटे हरक्यूलिस! “ अब की बार न जाने क्यों दूसरी देवी ने उसे उसके नाम से सम्बोधित किया। प्रेमपूर्ण स्वरों में वह कह रही थी।-”वास्तविक सुख के लिए संसार का कोई मार्ग लम्बा या छोटा नहीं होता, न सरल ही होता है। बिना पीड़ा और परिश्रम के आसानी से मिलने वाली वस्तु मूल्यवान नहीं होती। ईश्वर ने हर वास्तविक सूख और आनन्द की कीमत तय कर रखी है, जिसका भुगतान मनुष्य को परिश्रम और कष्ट- सहित

इस पर पहली देवी ने कहा-” सावधान युवक । इसकी भोली बातों के बहकावे में कभी मत आना । इसका मार्ग अत्यन्त दुर्गम और लम्बा है कठिनाइयों ओर चुनौतियों से भरा हुआ है इसकी अपेक्षा मेरा मार्ग अत्यन्त ही सरल और छोटा है।

“बेटे हरक्यूलिस! “ अब की बार न जाने क्यों दूसरी देवकी ने उसे उसके नाम से सम्बोधित किया। प्रेमपूर्ण स्वरों में वह कह रही थी।-”वास्तविक सुख के लिए संसार का कोई मार्ग लम्बा या छोटा नहीं होता, न सरल ही होता है। बिना पीड़ा और परिश्रम के आसानी से मिलने वाली वस्तु मूल्यवान नहीं होती। ईश्वर ने हर वास्तविक सूख और आनन्द की कीमत तय कर रखी है, जिसका भुगतान मनुष्य को परिश्रम और कष्ट- सहिष्णुता के रूप में चुकाना पड़ता है जिस किसी क्षेत्र में तुम प्रसिद्धि पाना चाहते हो, उसमें तुम्हें ईमानदारी और प्राणपण से जुटना पड़ेगा। तुम्हारे रास्ते में कठिनाइयां आएगी, रुकावटें आएगी पर तुम्हें साहस और धैर्य से सबका मुकाबला करना होगा। वास्तविक सुख मैं तुम्हें इन्हीं शर्तों पर उपलब्ध करवा सकती हूं।

अपनी बात जारी करते हुए उसने कहा-” हैियूलिस, तुम कौन - सा सुख पाना चाहते हो।

भूख के बिना भोजन, प्यास के बिना पानी थकान के बिना आराम, नींद के बिना सोना और बिना इच्छा के भोग इन से क्या सुख की अनुभूति कर सकोगे? तुम्हारी युवा पीढ़ी सुख के सपनों में अपनी आयु बैठे-ठाले बिता देती है वह बिना परिश्रम किए बिना कष्ट से सब कुछ पा जाना चाहती है लेकिन उन्हें मिलता क्या है विफलता, निराशा, हताशा, कुण्ठा, पीड़ा और यातना। मैं सज्जनों की परम मित्र सच्चे मित्रों की सहयोगी और श्रमशीलों की अधिष्ठात्री एवं संरक्षक हूं मेरे अनुयायों की दावतें खर्चीली नहीं होती परन्तु स्वादिष्ट होती क्योंकि भूख लगने पर ही वे खाते हैं और प्यास लगने पर ही व पीते हैं उन्हें पत्थरों पर भी गहरी नींद आ जाती है क्योंकि वे कठोर परिश्रम से अपना जीविकोपार्जन करते हैं जागने पर उनकी प्रफुल्लता ईर्ष्या की चीज होती है । आत्म -सन्तोष उनकी स्वाभाविक सम्पत्ति होती हैं क्योंकि अपनी क्षमताओं को वे लोक कल्याण में लगाते हैं।

इस देवी की बातों में इरक्यूलिस को अपना समाधान मिल रहा था। देवी मातृत्व एवं वात्सल्य भरे कथन की निर्मलता में उद्विग्नता, परेशानी और असमंजस गायब होते जा रहे थे। उसने दूसरी देवी से उसका नाम पूछा। देवी ने कहा लोग मुझे ‘आनन्द की देवी ‘ कहते हैं।

देवी के इस उत्तर के साथ ही हरक्यूलिस को उसका जीवन मार्ग मिल गया। उसने ‘आनन्द की देवी’ का अनुगमन किया और लोकहित में ऐसे-ऐसे असम्भव और कठिन कार्य किए, जिससे वह संसार में अमर हुआ। अभी भी यूनान में मान्यता है कि हरक्यूलिस पर देवताओं की बड़ी कृपा थी और असम्भव को सम्भव कर दिखाने की अपनी प्रवृत्ति के कारण आज भी कठोर या श्रमसाध्य कार्य को ‘हरक्यालिज्म टास्क’ कहा जाता है।


व्यवस्था बनाएगा, प्रकृति का अनुशासन

मनुष्य जब प्रकृति की अवहेलना करना आरम्भ करता है तो प्रकृति भी उससे निपटने का अपना उपचार प्रारम्भ कर देती है आये दिन घटने वाली प्राकृतिक आपदाओं में इसकी अनुभूति की जा सकती है क्रिया होगी तो प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक हैं अब यह प्रतिक्रिया मनुष्य के अन्दर उसके बन्ध्यत्व के रूप में घटित होने जा रही है।

सर्वविदित है कि विश्व जनसंख्या ‘-वृद्धि जितनी तीव्र गति से इन दिनों हुई है वैसा पहले कभी नहीं हुआ आंकड़ों पर दृष्टिपात करने से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है सन् 1800 में सम्पूर्ण विश्व की जनसंख्या -वृद्धि दर मात्र 0.47 प्रतिशत थी एक शताब्दी बाद इसमें विकसित और अविकसित एवं विकासशील जैसा एक विभाजन हो गया, परिणामस्वरूप उसमें दो प्रकार की वृद्धि आरम्भ हुई विकसित विश्व ने जहां 1.34 प्रतिशत वृद्धि 1101 में दिखलायी वहां अविकसित तथा विकासशील विश्व की वृद्धि -दर 4.75 प्रतिशत थी । सन् 1950 के आते-आते इसमें क्रमशः 1.50 और 3.02 प्रतिशत की और वृद्धि हो गई है। आज यह बढ़ोत्तरी दर इतनी है जिसे पूर्व की तुलना में विशाल ही कहना पड़ेगा।

आबादी को दृष्टि से विचार करे तो ‘विश्व जनसांख्यिकी रिपोर्ट ‘ के अनुसार दुनिया की कुल आबादी आज से 9 हजार साल पूर्व मात्र 75 लाख थी। सन् 1501 में बढ़कर यह 44 करोड़ हो गई 1630 में 52 करोड़ , 1855 में 18 करोड़, 1950 में 210 करोड़ 1975 में 400 करोड़ 1996 में 620 करोड़। इसी दर से यह बढ़ोत्तरी होती रही तो अनुमान है कि सन् 2025 तक विश्व की कुल जनसंख्या 870 करोड़ हो जाएगी।

जिस ग्रह पर हम रह रहे है उसके धरती ओर संसाधन सीमित है जबकि जनसंख्या-वृद्धि उपमित गति से ही रही है ऐसी स्थिति में प्रकृति और पर्यावरण पर दबाव पड़ना स्वाभाविक है आबादी बढ़ेगी , तो अन्न उत्पादन भी बढ़ना चाहिए और आवास के लिए भूमि भी। खाद्यान्न उत्पादन को तो कुछ सीमा तक वैज्ञानिक विधियों द्वारा बढ़ाया भी जा सकता है पर रहने के लिए भूमि की कमी की पूर्ति कैसे हो? जमीन का दो-तिहाई भाग जल से भरा है इसका एक तिहाई हिस्सा ही स्थल है इसमें भी रहने योग्य सपाट समतल भूमि से लेकर पर्वत , वन सभी सम्मिलित है यदि रहने योग्य वर्तमान खण्ड में ही बढ़ी हुई और बढ़ने वाली अतिरिक्त आबादी को किसी प्रकार रखा गया तो फिर यह तो एक छोटे बाड़े में अनेक पशु को रखने जैसा हो जाएगा। मनुष्य के लिए स्वस्थता भी जरूरी है उसे हवा और प्रकाश भी चाहिए ।उक्त घिच-पिच स्थिति में इन आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं। ऐसे में विकल्प एक ही रह जाता है वनों को काटा जाय और पहाड़ों को समतल बनाया जाय। यह प्रकृति से स्पष्ट छेड़छाड़ हुई। इससे प्रकृति और पर्यावरण दोनों प्रभावित होंगे। जंगल काटेंगे, तो वर्षा घटेगी । आबादी बढ़ेगी तो उद्योग बढ़ेंगे। उद्योगों के बढ़ने से प्रदूषण बढ़ेगा और पर्यावरण अस्वास्थ्यकर बनेगा। इन सभी विभीषिकाओं को एक शब्द में कहना हो तो इसे जनसंख्या वृद्धि ही कहना पड़ेगा। यही इनके मूल में समाहित है इसे यदि घटाया-मिटाया जा सके तो बहुत हद तक उपरोक्त समस्याओं से पिण्ड छुड़ाया जा सकता है पर न ऐसा होना था न हुआ। आगे भी इसकी कम ही सम्भावना दीखती हैं

ऐसे में प्रकृति को अपनी व्यवस्था आप संभालनी पड़ती है या समय-समय पर इन अदूरदर्शिताओं के परिणाम मनुष्य को बाढ़, भूकम्प, तूफान, चक्रवात, ज्वालामुखी विस्फोट और सूखे के रूप में भोगने पड़ते हैं। पर जब छोटे स्तर के दण्ड से अपराधी काबू में नहीं आते तो उनके लिए बड़े और विशिष्ट स्तर के दण्ड का प्रावधान करना पड़ता है।

मलेरिया में मच्छर आरम्भ में डी0 डी0 टी0 जैसे सामान्य कीटनाशक से मर जाते था पर बार-बार के प्रयोग से जब वे उसके अभ्यस्त बन गये, तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों को उनके उन्मूलन के लिए अधिक जहरीली और अधिक कारगर दवा की ढूँढ़ -खोज करनी पड़ी इसी का परिणाम है कि मलेरिया लगभग समाप्तप्रायः हो गया किंतु बढ़ती गंदगी एवं घटती जीवनी - शक्ति के कारण वह फिर उभर आया है यही प्रकृति का नियम है।

निसर्ग को मनुष्य के संदर्भ में ऐसी ही रीति-नीति अपनानी पड़ती है उसने जब यह अनुभव किया कि इस छोटी मोटी दण्ड-अवस्था से अब काम चलने वाला नहीं ओर न प्रयोजन पूरा होना वाला है तो अपने तरकश का सर्वाधिक समर्थ आयुध का प्रयोग करते हुए आबादी को नियंत्रित करने सम्बन्धी एक बिल्कुल ही अभिनव शुरुआत की और मानवकृत प्रयास आरम्भ किया।

अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि विश्वभर में मनुष्य के शुक्राणुओं की संख्या घटती जा रही है इस आशंका की प्रथम जानकारी पी0डी0 जेम्स नामक प्रसिद्ध अंग्रेज विज्ञान कथा लेखिका की रचना से मिली थी। सन् 1992 में उनने विज्ञान कथा पर आधारित एक उपन्यास लिखा , नाम था- ‘दि चिल्ड्रेन ऑफ मन’ यों तो यह ग्रन्थ एक वैज्ञानिक कल्पना था पर इसकी नींव अध्ययनों पर आधारित थी, अतएव उसे एकदम काल्पनिक कहना भी उचित नहीं एक वैज्ञानिक होने के ताने जेम्स ने अपने अध्ययन को ही पुस्तक का कथानक बना डाला और इस प्रकार एक नवीन तथ्य से संसार अवगत हुआ।

उसी वर्ष एक डैनिश अंतःस्रावी ग्रन्थि विशेषज्ञ नील्स है0 स्कैविक ने अपनी एक शोध-रिपोर्ट ‘ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ‘ प्रकाशित करवायी । आधारित थी। इसके अनुसार पिछले पचास वर्षों में स्वस्थ पुरुषों के शुक्राणुओं में 40 प्रतिशत की गिरावट आयी है। सन् 1940 में लग प्रािम बार स्वस्थ और प्रजनन क्षमता युक्त मनुष्यों के शुक्राणुओं का ‘अध्ययन ‘ किया गया , तो प्रति मिलीलीटर वीर्य में इसकी औसतन संख्या 1130 लाख थी। सन् 1992 में यह घटकर मात्र 660 लाख रह गई इनमें भी उसमें से अधिकाँश या तो गतिहीन थे या असामान्य। असामान्यों में ऐसे शुक्राणु बढ़ी संख्या में देखे गये, जिनके पूछे नहीं थी और सिर दो-दो थे। स्कैकबिक का कहना है कि शुक्राणुओं की संख्या में यह गिरावट अब भी जारी है और यह 0216म आगे यथावत् बना रहा तो जल्द ही मनुष्य प्रजनन के अयोग्य साबित होगे ऐसा उनका मानना है ।

प्रजनन में शुक्राणुओं की क्या भूमिका है - तनिक इस पर चर्चा कर लेना यहां अनुचित न होगा। शुक्राणु एक विशिष्ट आकार धारण किये होते हैं सिर का हिस्सा कुछ बड़ा और गोलाकार लिए होता है उसके एक पूछ जुड़ी होती है। अब इनकी विशाल जनसंख्या अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान करती है तो उनमें से मात्र एक लाख के करीब ही मन्तव्य तक पहुंच पाते हैं शेष की रास्ते में ही मृत्यु हो जाती है इस एक लाख में भी कोई एक दर्जन शुक्राणु डिम्बाणु से संयोग का प्रयास करते हैं इनमें भी किसी एक को ही सफलता मिल पाती है जो सफल होता है वही डिम्बाणु के बाह्य आवरण को भेदकर अन्दर प्रवेश करने में समर्थ हो पाता है विज्ञान की भाषा में इस पारस्परिक संयोग को ‘गर्भाधान‘ कहते हैं यही से भ्रूण का विकास आरम्भ होता है। बोलचाल की भाषा में यही गर्भधारण है।

,गर्भाधान की इस प्रक्रिया में शुक्राणुओं की विशाल संख्या अत्यन्त महत्वपूर्ण है? यह संख्या किसी भी प्रकार यदि इससे कम होती तो मनुष्य के लिए प्रजनन ओर गर्भधारण कितना कठिन होता इसका उपरोक्त विवेचन से सहज ही अन्दाज लगाया जा सकता है अतः इस विशाल परिमाण को न तो संयोग कहा जा सकता है न निरुद्देश्य । प्रकृति की यह सुनियोजित व्यवस्था है। इन दिनों यदि इसकी संख्या घटी है तो

यह अनायास नहीं है निश्चय ही इसके पीछे प्रकृति की प्रेरणा है ऐसा कई कारकों से प्रतीत होता है। । प्रथम तो यह कि यह इसी क्षेत्र विशेष अथवा समुदाय विशेष की स्थिति नहीं हैं विश्व के लगभग सभी हिस्सों और सभी समुदायों में न्यूनाधिक अन्तर के साथ एक ही निष्कर्ष सामने आया है कि सम्प्रति पूरी मनुष्य जाति की शुक्राणु संख्या में आश्चर्यजनक गिरावट आयी है ऐसी दशा में इसे परिस्थिति या पर्यावरण का परिणाम नहीं कहा जा सकता कारण कि तब इसे किसी क्षेत्र या वर्ग विशेष तक ही सीमित रहना चाहिए था पर ऐसा कहा है? यह तो विश्वव्यापी बना हुआ है दूसरे शरीर शास्त्रियों के अनुसार मद्यपान और एण्टीबायोटिक औषधियों के सेवन से भी शुक्राणु प्रभावित होते हैं और उनकी संख्या घटने लगती है किन्तु यह अस्थाई स्थिति है उनका प्रयोग बन्द होते हैं वह अपनी सामान्य और स्वाभाविक अवस्था प्राप्त कर लेते हैं इसके साथ ही उनकी तादाद पूर्ववत् हो जाती है पर अध्ययन बताते हैं कि उनकी औसत संख्या में लगातार घटोत्तरी हो रही है यह भी इस बात का प्रमाण है कि यह किसी भौतिक क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं वरन् अदृश्य की प्रेरणा है।

तेजी से जनसंख्या वृद्धि कर रहा भारत जैसा विशाल आबादी वाला देश भी उपरोक्त परिणाम की ही पुष्टि करता है मुम्बई के डॉ0 अनिरुद्व मालपानी और डॉ0 अंजली मामपानी ने अपनी रचना ‘गेटिंग प्रिगनेण्ट -ए गाइड फॉर दि इनफटइलि कपल’ में तत्सम्बन्धी तथ्यों की विस्तृत विवेचना की है उनका कहना है कि मुम्बई स्थिति उनके चिकित्सालय में बंध्यत्व के शिकार बड़ी संख्या में लोग इलाज करवाने आते हैं चूंकि महिलाओं की प्रजनन क्षमता संबंधी परीक्षण एक जटिल प्रक्रिया है अस्तु वहां सर्वप्रथम पुरुषों का शुक्राणु-परीक्षण किया जाता है इस जाख् में यही तथ्य उभरकर सामने आया है कि बंध्यापन का प्रमुख कारण कोई अन्य रोग नहीं वरन् अभीष्ट परिमाण से भी काफी कम तादाद में शुक्राणुओं की उपस्थिति है इसमें भी एक बड़ा हिस्सा ऐसे शुक्राणुओं की होता है जो विकृत स्तर के होते हैं और जिनमें गर्भाधान की क्षमता होती ही नहीं। ऐसी स्थिति में सारी भला गर्भधारण किस प्रकार कर सकेगी। वे कहते हैं कि कोलाबा स्थित उनके ‘स्पर्म बैंक’ में शुक्राणु दानदाताओं में से 70 से 90 प्रतिशत व्यक्ति ऐसे होते हैं जो स्वस्थ होने के बावजूद उनके वीर्य को कम शुक्राणु दिया जाता है दस में से मात्र एक व्यक्ति ही ऐसा होता है जिसका स्पर्म वांछित स्तर का होने के कारण स्वीकार किया जाता है।

मुम्बई के पैथोलोजिस्ट डॉ0 अविनाश फड़के का मानना है कि आज से चार दशक पूर्व दस सौ लाख या इससे अधिक शुक्राणु संख्या एकदम सामान्य बात थी पर अब यह एक विरल स्थिति है कारण स्पष्ट है चूंकि मनुष्य अपने प्रजनन को स्वयं नियमित नहीं कर सका अतः प्रकृति की ओर से ऐसी व्यवस्था की गई कि उसकी अवांछनीय वृद्धि पर अंकुश लगाया जा सके यदि ऐसा नहीं होता तो जल्द है और निरंकुश हो जाती जिसका कोई ठिकाना नहीं इसे रोकने के लिए अवास्तविक हस्तक्षेप आवश्यक था यही हुआ भी।

स्वीडन आफ मोर्य के बर्फीले भूभाग में लेमिग चूहे की एक विशेष प्रजाति पायी जाती है जब इनकी संख्या अप्रत्याशित से अधिक हो जाती और खाने तथा रहने की समस्या सताने लगती तो इन्हें एक अदृश्य प्रेरणा होती जिसमें सबके सब अटलांटिक महासागर में छलांग लगाकर सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं इस रोमांचकारी दृश्य को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग वहां मौजूद होते हैं हर पांच वर्ष में यह अद्भुत दृश्य उपस्थित होता है इसलिए इस वर्ष को ‘लोमिग ईयर’ कहते हैं ।

प्रकृति-व्यवस्था में जब और जहां भी व्यक्तिक्रम पैदा होगा वहां इसी प्रकार के दृश्य दिखलाई पड़ेंगे । मनुष्य इस संदर्भ में गम्भीर चिन्तन कर यह निर्णय करे कि उसे अपनी सत्ता इस धरती पर बनाये रखनी है अथवा बंध्यत्व का शिकार होकर वंशवृद्धि गंवानी है मर्जी उसकी है, निश्चय उसका है।


प्रकृति के साथ विवेकसम्मत व्यवहार करें

आज ही सब कुछ पा लेने के लोभ में आने वाले कल की दुर्दशा बना देने को नासमझी के सिवा और क्या कहेंगे ? यह नासमझी जितनी अधिक कृषि क्षेत्र में हुई है , उतनी शायद और कहीं नहीं । एक बारगी खेतों से सारा कुछ छिन लेने की सनक के कारण रासायनिक खादों एवं कीटनाशक दवाइयों का प्रचलन इधर बेतहाशा बढ़ा है । इस प्रचलन से तात्कालिक राहत तो जरूर मिली है , खेतों में उत्पादन भी बढ़ा है । लेकिन इन तात्कालिक लाभों के पीछे क्या छुपा है , यह जानने की शायद हममें से किसी ने कोई जरूरत नहीं समझी ।

हमारे आज के कारनामे , हमें कल क्या परिणाम देखें ? इस सत्य पर यदि हम विचार करें, तो उस लालची आदमी का किस्सा हमारी आंखों के सामने तैरने लगेगा , जिससे एक साथ सारे सोने के अण्डे पा लेने के लिए बेचारी मुर्गी की जान ले ली। रासायनिक खाद के उपयोग के सम्बन्ध में भी कुछ ऐसी ही बात है । इसके उपयोग से थोड़े समय के लिए उत्पादन तो जरूर बढ़ता है , किन्तु इसके साथ ही मिट्ठी विद्यमान जैविक पोषण तत्वों का नाश होता है। साथ ही मिट्ठी की प्राकृतिक संरचना भी विकृत हो जाति है । जिन खेतों में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है, उनमें पानी की माँग भी बढ़ जाती है । उत्पादन की मात्रा बरकरार रखने के लिए दूसरी तीसरी बार क्रमशः ज्यादा रसायनों का प्रयोग करना पड़ता है । जिससे खर्चा बढ़ने के साथ मिट्ठी की प्राकृतिक उर्वरता नष्ट होने की दर भी बढ़ जाती है ।

पंजाब के लुधियाना जिले के कंगनवार गाँव में देखा गया कि जिंक उर्वरक के कारण खेतों में लौह तत्व एवं मैंगनीज की कमी हो गयी । अन्य पाँच गाँवों में ताँबे की कमी पायी गयी । अध्ययन के दौरान यह भी देखने को मिला कि जिंक डालने से 80 से 90 प्रतिशत भूभाग ऐसे रूप में बदल जाता है , जो पौधों के काम नहीं आता । रासायनिक खादों की तरह कीट नाशक दवाइयों के दुष्परिणाम सामने आते हैं पिछले कुछ सालों में इनके उपयोग में भी कई गुना बढ़ोत्तरी हुई हैं विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत में प्रतिवर्ष 5 लाख टन से भी ज्यादा कीटनाशक रसायन उपयोग में लाये जाते हैं। बिना सोचे समझे किए गए इस उपयोग से समस्या का समाधान होने की बजाय परिस्थितियां और अधिक उलझती जा रही है देखने को यह मिला है कि कई बार कीटनाशकों के उपयोग से कीटों की संख्या ओर बढ़ी है इस बढ़ोत्तरी को वैज्ञानिक भाषा में ‘अपसेट्स’ कहते हैं, जो कल्पनातीत ढंग से होती हैं कई बार इसे मूल संख्या से 1200 गुना तक बढ़ते हुए देख गया है इस क्रम में यह भी पाया गया है कि कीटों की प्रजातियां अपनी प्रतिरोधी क्षमता को इस कदर बढ़ा लेती है कि उनपर कीटनाशकों का कोई प्रभाव ही नहीं होता है।हाँ भूमि के उपयोगी तत्व जरूर विकृत हो जाते हैं। इस कारण एक के बाद एक नए-नए तरीके के कीटनाशकों का अनुसंधान करना पड़ता है इस कार्य में होने वाले भारी-भरकम खर्चे के परिणाम में बरबादी के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता ।

इन फसलनाशी कीटों की प्रतिरोधी क्षमता ज्यामितीय अनुपात में बढ़ती देखी गयी है सन् 1940 में केवल 20 प्रतिशत कीट प्रजातियां ही कीटनाशकों के खिलाफ प्रतिरोध की क्षमता रखती थी। वर्तमान वर्ष तक यह क्रमिक वृद्धि लगभग 500 कीट प्रजातियों तक जा पहुंची हैं विशेषज्ञों ने अपने अध्ययन के दौरान इस दशा को खेतों में ही नहीं घरों में भी बरकरार अनुभव किया है। उनके अनुसार कई सालों डी0 डी0 टी0 की फुहार के बाद हिमालय क्षेत्र में क्षटमलों की संख्या हद से अधिक बढ़ गयी। यह बढ़ोत्तरी उनकी संख्या में ही नहीं कद में भी पायी गयी। ये पहले की कही अधिक बढ़े, अधिक रक्त चूसने वाले एवं अधिक चमकदार थे

कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग की वजह से इनके अंश भी खाद्य पदार्थों में पाये जाने लगे। है। अन्न , शाक-सब्जी ही नहीं मास मछली और जल भी इनके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। इनके खाने से होने वाले प्रभाव विविध रोगों के रूप में प्रकट होते देखे जा सकते हैं कीटनाशकों की वजह से होने वाली मौत की पहली घटना केरल में हुई थी। जहां पैरापियान कीटनाशक रसायन युक्त गेहूं के उपयोग से 100 लोग मरें थे। फसलों में इस तरह के रसायनों का उपयोग जब भी किया जाता है उनका 50 प्रतिशत से अधिक भाग जमीन पर ही पड़ता है। मिट्ठी में डाले गए डी0 डी0 टी0 गैमेक्सीन, एरिछ्रन कलोरोडेन के अवशेषों के जहरीले कगर को क्रमशः 7,10,11,12, सालों तक मौजूद पाया गया है। खरपतवारनाशी रसायनों के अवशेषी अंश भी 6 से 36 महीनों तक बने रहते हैं। इस तरह के प्रयोग में नासमझी रसायनों के अवशेषी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जहरीला एवं नुकसान देह घोषित कर दिया है अपने देश के किसान जानकारी के अभाव में उनका भी खुलकर प्रयोग कर रहे हैं ऐसे रसायनों में डी0 डी0 टी0, वी0 एच0 सी0 हैक्टोक्लोवर 2-4 डीफास्वेल, डेस्डिन, क्लोरोडेन प्रमुख है जिन्हें विकसित देशों में प्रतिबन्धित किया जा चुका है लेकिन न जाने क्यों अपने यहां इनके उपयोग में बढ़ोत्तरी होती जा रही हैं।

रासायनिक खादों के विकल्प में परम्परागत रूप में उपयोग की जाने वाली खादों को आज भी प्रभावी पाया गया है। सनई , ढाँचा आदि की बुवाई और इनके पौधे की बाद में जुताई करके मिट्टी में मिला देने से उर्वरता में असामान्य वृद्धि होती देखी गयी है। विभिन्न पशुओं के गोबर की खाद का भी कम मूल्य नहीं हैं पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के प्रयोगों से सिद्ध हुआ हैं कि मक्का गेहूं और चना के लिए जिंक की प्रति करने में मुर्गी की खाद एवं सुआरों की खाद उपयुक्त है। इसी तरह फली वाली फसलों व हरी खाद से मिट्टी के प्रायः सभी पोषक तत्व आ जाते हैं मिट्टी में लोहा व मैग्नीज की कमी पूरा करने में खेत को लम्बे समय तक पानी में डूबाए रखना भी एक अच्छा उपाय है रासायनिक उर्वरकों की जगह नीलहरित शैवाल और राइजोवियम जैसे उर्वरक भी विकल्प के रूप में सामने आते रहे हैं।

पश्चिमी बंगाल के सुन्दरवन दलदल क्षेत्र में नीलहरित शैवाल के प्रयोग से उत्साहवर्द्धक परिणाम आए हैं इसमें धान की पैदावार में 7 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी देखी गयी है भूमि खाद्यान्न एवं पर्यावरण एवं कीटनाशी रसायन एवं रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों को देखते हुए इनके विकल्प की खोज जरूरी है विकल्प के रूप में उन प्राकृतिक तौर तरीकों को अपनाया जा सकता है। जो आज भी बेहद प्रभावी है।

हालैण्ड में कृषि का मुख्य उत्पादन फूल है जिनमें गुलाब का फूल प्रमुख है गुलाब के फूल में कुछ गोल कृमि लगे पाए गए । लेकिन जहां आस-पास गेंदे के फूल थे वहां इन कृमियों का कोई प्रभाव नहीं था । इस तरह गेंदे के फूलों द्वारा गुलाब को इन कृमियों से सुरक्षित किया गया है।

कुछ कीट-पतंगे भी इस कार्य में सहायक सिद्ध होते देख गए हैं। अमेरिका के पूर्वी तट पर एक वनस्पति उग आयी , जो किसी भी तरह उपयोगी न थी साथ ही पशुओं के लिए हानिकारक भी थी। देखते - देखते यह 25 लाख हेक्टेयर भूमि मैं फैल गयी। यूरोप में इसका कोई प्रभाव नहीं था, क्योंकि वहां इसके दुश्मन दो भूँग थे। सन् 1948 में इनका आयात किया गया। इनके असर से सन् 1959 तक अमेरिका में मात्र 1 प्रतिशत ही यह वनस्पति रह गयी।

आस्ट्रेलिया ने 18 वीं शताब्दी में कैक्टस मंगवाया जो इतना बढ़ा कि इसने 6 करोड़ एकड़ भूमि को अपने कब्जे में कर लिया। लगने लगा कि वृद्धि दर यदि यही बनी रही तो अन्न उपजाने के लिए जमीन न मिलेगी। स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए तरह-तरह के रसायन छिड़के गए, किन्तु कुछ भी असर न हुआ वर्ष 1930 में अर्जेन्टीना से पतंगों की एक प्रजाति के तीन अरब अंडों का आयात किया गया । जिससे उत्पन्न होने वाले पतंगों के प्रभाव से 7 सालों में ही कैक्टस की समाप्ति हो गयी। इससे खर्च मात्र 10 पैसा प्रति एकड़ आया था जबकि रासायनिक छिड़काव का खर्च 150 रुपए प्रति एकड़ था। अनावश्यक का बढ़ाव रोकने के प्रकृति की यह प्रक्रिया इकॉलाजी के सिद्धान्त के अंतर्गत सहज कार्य करती देखी जा सकती हैं।

नीम जैसे कुछ पौधे भी कीटों पर नियन्त्रण बनाए रखने में अपनी क्षमता प्रदर्शित करते देखे गए हैं। परम्परागत बीज का उपयोग कीट एवं कई तरह के रोगों के विरुद्ध सक्षम है कुछ पक्षी भी इसमें अपनी भूमिका निभाते देखे गए हैं कुछ सालों पूर्व चीन ने फसलों को हानि पहुंचाने के कारण गौरैया पक्षी को नष्ट कर दिया था लेकिन इसका दुष्परिणाम यह रहा है कि वहां चावल का एक दाना भी नहीं पैदा हुआ। क्योंकि गौरैया धान के साथ एक कीड़ा भी खाती थी। गौरैया के नाश के बाद यही कीड़ा खूब पनपा। पूरी फसल नष्ट हो गयी। अंत में चीन ने 40,000 गौरैया का आयात किया। जिससे समाधान हो गया।

इस तरह प्राकृतिक नियन्त्रण की दिशा में नए-नए प्रयोग भी किए गए हैं विकिरण द्वारा हानिकारक कीटों को निर्वीजित करके वंश को हो समाप्त करने के प्रयोग हुए हैं दूसरा कृत्रिम प्रजनन द्वारा नए कीटों की संख्या बढ़ाई गई । जिससे वे आपस में ही समाप्त हो जाए। इन तरीकों के अलावा एक तरीका सूझ-बूझ की भी है। जिनको अपनाकर हम प्रकृति के जैव-चक्र को समझे , तद्नुरूप विवेकसम्मत व्यवहार करें। साथ ही उन तथ्यों में भी हम कुछ लाभदायक तत्वों को खोजे, जिन्हें अति आधुनिकतावादी बनने की सनक में हम छोड़ चुके है। प्रकृति का सहयोग पाने कि दिशा में इस अन्वेषण अनुसंधान में हमें बहुत कुछ ऐसा मिल सकेगा, जिसे अपनाकर न केवल हम कीटनाशी रसायनों के एवं रासायनिक खादों के आत्मघाती तरीके को छोड़ सकते हैं बल्कि ऐसा कुछ सार्थक कर सकते हैं। जिससे हमारी भावी पीढ़ियों की उर्वरक धरती में लहलहाती फसलों का आनन्द उठा सके।


मेरी और टॉमस का दाम्पत्य जीवन (Kahani)

जब पति व पत्नी आपस में घुल-मिलकर रहते हैं तो घर स्वर्ग नजर आता है चारों ओर आनन्द ही आनन्द संव्याप्त होता है परिस्थितियां चाहे कितनी ही विषम क्यों न हो।

मेरी और टॉमस का दाम्पत्य जीवन अनन्त प्रेम से भरा-पूरा था। हर वर्ष का विवाहोत्सव मनाते और छोटा-मोटा उपहार उस दिन एक दूसरे को भेट करते , गरीबी में जो दिन काटते थे।

उस वर्ष का विवाह दिन फिर आया। दोनों एक−दूसरे के लिए उपहार देना की योजना बनाने लगे पर जेबें बिल्कुल खाली थी।

टॉमस ने अपनी पत्नी के सुनहरे बालों के लिए एक सुनहरी क्लिप खरीदने की बात सोचीं मेरी सोचने लगी, पति की हाथ की घड़ी के लिए सुनहरी चेन खरीदी जाए दोनों के मनोरथ मन में थे। साधन जुट नहीं रहा था दिन निकट आ गया।

टॉमस पुरानी घड़ी खरीदने वाले की दुकान पर गया और घड़ी बेचकर बदले में सुनहरी क्लिप खरीद लाया। मन में बहुत प्रसन्नता थी।

मेरी क्या करती, वह सुनहरे बाल खरीदने वाले की दुकान पर गयी ओर अपने घुंघराले बाल कटाकर मिले पैसे से घड़ी चेन खरीद लायी। सिर पर टोपा लगा लिया।

दिन आया उपहार देने के लिए । एक दूसरे की ओर हाथ बढ़ाया । क्लिप हा लगे बाल नदारद । चेन कहा बंधे घड़ी गायब। पूछने पर तथ्य खुला शोभित न हो सकने पर भी इन उपहारों ने एक दूसरे का दिल सदा-सदा के लिए जीत लिया। दोनों की आंखों में प्रेम के आंसू भरे थे। इन तरह मना वह विवाह दिवसोत्सव।


उद्धव स्वार्थपरता की पराकाष्ठा है यह

बढ़ती स्वार्थपरता हमें कहा ले जाएगी एवं किस हद तक संवेदना-शून्य बनाएगी यह एक ज्वलंत प्रश्न है इस बारे में आज ही विचार करना चाहिए और निर्णय लेना चाहिए कि हम क्या करें सम्पूर्ण समाज को पतन के गहरे गर्त में धकेल दे या उत्थान के शिखर पर प्रतिष्ठित कर उसका गौरव बढ़ायें।

हमारी एक मौलिकता है हम अपनी आध्यात्मिकता के कारण सम्पूर्ण विश्व में पृथक पहचाने जाते हैं। आस्तिकता और आदर्शवादिता हमारी नस -नस में धुली हुई है। कर्तव्यों के प्रति हम पूर्ण निष्ठावान है ईमानदारी हमें विरासत में मिली है। धार्मिकता में हम गहरी आस्था रखते हैं सेवा हमारी आत्मा है और साधना उसकी अनिवार्यता, स्वयं गिरकर भी दूसरों को सहारा देना इस भूमि की विशिष्टता रही है। हम भले ही हानि सह ले पर दूसरों को लाभान्वित करना हमारा स्वभाव है। सामाजिकता के प्रति हम सजग है और उच्च नैतिक मूल्यों की स्थापना हम सबका लक्ष्य है?

इन सब विशिष्टताओं के रहते समाज की अवनति ओर अनैतिकता में वृद्धि एकदम अकल्पनीय है पर यदि ऐसा होने लगे, तो यही कहना पड़ेगा कि हम एवरेस्ट की ऊंचाइयों से उपत्यिका की खाई में आ गिरे और वह गौरव गवा बैठे तो उत्तराधिकार में मिला था। यदि ऐसा नहीं , तो फिर हमारी अन्तरात्मा इस कदर मूर्च्छित क्यों पड़ी है? क्यों हम नीति-अनीति का भेद नहीं कर पा रहे है अपने तुच्छ स्वार्थ और थोड़े से लाभ के लिए किस कारण ईमान बिकते देखे जाते हैं हमारी समझदारी कहा खो गई है पराक्रम कैसे सो गया है? परोपकारी की भावना को किस रत्नाकर ने लूटा है? अकर्मण्यता का धुन कैसे लग गया। करुणा क्यों नहीं चीत्कार कर पा रही है। ? उपासना निष्फल क्यों होने लगी? पत्थर को प्राणवान बनाने वाली श्रद्धा कहा गुम हो गई ? भागीरथी और शुनःशपुओं की यह धरती क्या अब बांझ हो जाएगी? कर्तवरुो की बलि चढ़ाकर अधिकार की मांग को उचित कैसे ठहराया जाय? व्यक्तिगत स्वार्थ को लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र के स्वास्थ्य के साथ समझौता कर पाना किस प्रकार सम्भव हो?

इन्हीं विसंगतियों के बीच जन्म लेती हैं अवांछनीयताएं एवं तरह-तरह की सामाजिक समस्याएं इन्हीं में से एक जो इन दिनों अत्यधिक चर्चा का विषय बनी हुई है। वह है।’-सिंथेटिक दूध-। आखिर यह है क्या? संक्षेप में हम तो इसे धनलोलुप लोगों के वैभव कमाने की उद्दाम लिप्सा का एक कुत्सित तरीका कह सकते हैं यह वास्तव में यूरिया खाद, खाद्य, तेल और डिटरजेंट पाउडर (वाशिंग पाउडर) का एक सम्मिश्रण है। विशेषज्ञों के अनुसार यों तो इन तीनों को एक विशेष अनुपात में मिलाकर दूध जैसे श्वेत रंग का मिश्रण प्राप्त करना तकनीकी रूप से सम्भव है पर उसमें आछित स्वाद का अभाव होता है। कदाचित् इसी कारण से इन धन्धे में लिप्त लोग एकदम कृत्रिम दुग्ध तैयार करने की बजाय ऐसे मिश्रण में थोड़ी मात्रा प्राकृतिक दूध की मिलाना ज्यादा पसंद करते हैं इसमें एक बड़ फायदा यह होता है कि उससे दूध की मात्रा बढ़ जाती है और साधारण तरीके से इस खतरनाक मिलावट का पता भी नहीं लग पाता ? यहां एक प्रश्न यह उठ सकता है कि यदि दूध का परिमाण ही बढ़ाया था तो इतने घातक रसायनों का उपयोग क्यों? वह तो परम्परागत तरीके से पानी मिलाकर भी बढ़ाया जा सकता है फिर जन स्वास्थ्य से यह खिलवाड़ किस कारण? उत्तर दूध के भाव ओर गुणवत्ता निर्धारण के वर्तमान मानदण्ड में निहित है।

सर्वविदित है कि बढ़िया दूध की पहचान का एक आसान और सर्वसामान्य उपाय यह माना जाता है कि उसमें मलाई अथवा क्रीम किस परिमाण में उपलब्ध है? उबालने के बाद यदि मोटी मलाई पड़े तो उसे अच्छा मान लिया जाता है यह सर्वसाधारण में प्रचलित गुणवत्ता जांच की विधि हुई डेयरी फार्मों में यह निर्धारण क्रीम की मात्रा पर आधारित होता है जिससे जितना अधिक मक्खन निकलें उसे उतना अच्छा स्वीकार लिया जाता है वर्तमान संकट का मूल कारण यहीं निहित है दूध उत्पादकों को जब यह महसूस हुआ कि पतली मलाई अथवा कम मक्खन के कारण उनका दूध अपेक्षाकृत सस्ते भाव में बिका है तो इसके समाधान के लिए उनने दिमाग मस्तिष्कों ने इसके कामचलाऊ उपाय ढूँढ़ निकालें कइयों ने उसमें ब्लाटिंग पेपर मिलाना आरम्भ किया जबकि अनेक ऐसे थे जिनने कुछ परिष्कृत तरीका अपनाते हुए अरारोट , सिंघाड़े का आटा जैसी वस्तुओं का सहारा लिया। कुछ ने इससे भी आगे बढ़कर सुअर की चर्बी मिलाना शुरू किया और उससे मिठाइयां बनने लगीं। किन्तु उन सब धन्धेबाजों ने यह अनुभव किया कि समस्या का यह कोई वास्तविक हल नहीं है उसी शृंखला में कुछ विकसित बुद्धि वालों ने यह ‘सिंथेटिक दूध’ बना डाला। इससे एक साथ उनकी दोनों कठिनाइयां सुलझ गई। दूध की मात्रा बढ़ गई और वसा एवं ठोस गैर वसा दोनों तत्वों की भी साथ−साथ बढ़ोत्तरी हो गई। बस , यही उत्पादन चल पड़ा सो चल पड़ा अब क्योंकर रुके। यों लोगों की बढ़ती जागरुकता के कारण सम्भव है इस निर्माण की कुछ कमी आये, पर फिर भी इसे पूरी तरह समाप्त कर पाना शायद सरकार और कानून के लिए भी शक्य नहीं होगा कारण कि इसका उत्पादन जिस विकेन्द्रित ढंग से हो रहा है। उस स्थिति में सरकार के लिए उस पर पूर्ण रूप से रोक लगा पाना अथवा नियंत्रित करना अत्यंत मुश्किल होगा। इस प्रज्ञापराध के कारण देश को काफी घाटा उठाना पड़ सकता है। और मिल्क पाउडर का निर्यात लगभग ठप्प हो गया है अनेक देशों ने इसके आयात पर पाबन्दी लगा दी है कारण स्पष्ट है।

इस प्रकार के अनैतिक धंधे में अक्सर बड़े उत्पादन की मुनाफा कमाने के लिए संलिप्त होते हैं उनका दूध प्रायः डेयरियों में जाता है जहां उनसे कई प्रकार के उत्पाद तैयार किया जाते हैं इनमें एक मिल्क पाउडर भी है जब सिंथेटिक दूध का यह प्रकरण प्रकाश में आया तो आयातक चौकन्ने हो गये। उनने उसकी शुद्धता ओर प्रामाणिकता को परखने के लिए उसका रासायनिक विश्लेषण किया तो उसमें यूरिया तथा डिटरजेंट दोनों ही रसायनों की उपस्थिति पायी गई । इसके बाद से भारत से उसके आयात पर रोक लगा दी गई है तब से लेकर अब तक देश के प्रमुख गोदामों में इसका विशाल अम्बार लग गया है जनसामान्य अब इस डिब्बे बन्द दूध को खरीदने ओर उपयोग करने से हिचकते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसके प्रयोग के प्रति सावधान किया है आरे कहा है कि इस नकली दूध के सेवन के कई तरह की शारीरिक जटिलताएं एवं व्याधियां पैदा हो सकती है शिशुओं, गर्भवती महिलाओं, वृद्धों, रोगग्रस्तों को इससे विशेष रूप से सतर्क रहने की सलाह दी गई है सामान्य स्वास्थ वाले भी इसके कुछ दिन के सेवन से गम्भीर रूप से बीमार हो सकते हैं ऐसा उनका मत है।

इस कृत्रिम दुग्ध प्रकरण से विदेशी दूध उत्पादकों को काफी लाभ पहुंचा है। अब वे खुलकर उन देशों को अपना उत्पाद निर्यात करने लगें है जहां पहले भारतीय माल की खपत होती थी। पश्चिमी देशों के यह उत्पाद पूर्णतः निरापद हैं ऐसा कहना उचित नहीं होगा पाश्चात्य राष्ट्र ज्यादा-से-ज्यादा उत्पादन लेने ओर अधिक - से अधिक धन कमाने के लिए नये-नये तरीकों का इस्तेमाल करते हैं अभी पिछले ही दिनों इंग्लैण्ड में ‘मैड काउ डिजिज’ का मामला प्रकाश में आया है वहां गायों के शरीर का मास बढ़ाने के लिए चारे के साथ उन्हें भेड़ों की आंतें खिलायी जाने लगी। इससे कम चारे में ही उनका शरीर मांसल तो बनने लगा पर वे एक घातक मस्तिष्कीय रोग का शिकार होने लगी। मवेशियों में पागलपन की यह घटना जब बड़ी संख्या में सामने आयी तो दूसरे यूरोपीय देशों ने वहां के गो-मास के आयात पर यह कहकर निषेध लगा दिया कि इससे उपभोक्ताओं को भी उक्त व्याधि हो सकती हैं अन्ततः इस रोग से ग्रस्त समस्त गायों को मारने को फैसला यहां की सरकार को लेना पड़ा यह कितना न्यायसंगत है यह विवाद का प्रसंग हो सकता है किन्तु मनुष्य की अपनी करनी ने उसके किस सीमा तक कसाई बन दिया यह स्पष्ट ही दीख पड़ता है।

दूध उत्पादन की संदर्भ में भी उनने ऐसी ही नवीन तकनीक का सहारा लिया। खुराक बढ़ाये बिना दूध की मात्रा को संवर्धित करने के लिए वहां हारमोनों का प्रयोग किया जाने लगा। इनका इंजेक्शन से उत्पादन 10-25 प्रतिशत तक बढ़ तो गया, पर इसे सर्वथा हानि रहित कहना ठीक नहीं होगा।

ऑक्सीटोसीन एवं सोमेटोट्रोफिन (बी0 एस॰ टी0 ) नामक जो दो सर्वाधिक चर्चित हारमोन इसके लिए प्रयुक्त होते हैं उनकी भी कुछ मात्रा इस प्रकार के दूध में वर्तमान होती है शरीरशास्त्रियों का विचार है कि इस हारमोन युक्त दूध के सेवन से तरह-तरह की अनियमितताएं आरम्भ हो सकती है। और व्यक्ति बीमार पड़ सकता है ऐसी दशा में सामान्य लोगों के लिए अब एक सरल विकल्प यही शेष रह जाता है कि सोयाबीन अथवा मूंगफली से दूध बनाकर इस स्थिति का सामना किया जाय। पौष्टिकता की दृष्टि से यह प्राकृतिक दूध से किसी भी प्रकार कम नहीं ऐसा आहारशास्त्रियों का मत है सवाल यहां विकल्पों की खोज का नहीं प्रश्न यह उठता है कि अच्छे बीज और अच्छी जमीन के बावजूद फसल उत्तम क्यों नहीं हो पाती । हमें उत्तराधिकार में सशक्त आध्यात्मिक पृष्ठभूमि मिली है। हमको उस संस्कृति के अनुगमन का सौभाग्य प्राप्त है जिसकी देव संस्कृति कहते हैं फिर क्या कारण है कि उदात्त तत्व हमारे अन्दर से पनप नहीं पाते? गम्भीर विचार मंथन से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि आवश्यक निराई-गुड़ाई और साफ - सफाई की सामयिक आवश्यकता की पूर्ति न न होने से ही भूमि झाड़ -झंखाड़ों से भर गई है और फसल आशा के अनुरूप न हो सकी। यह चिन्ता की विषय है जिस समय सर्वोपरि उत्कृष्टता की संसार की कहती आवश्यकता थी और जब सम्पूर्ण विश्व आस्था संकट के इस भयानक दलदल से उबरने के लिए दृष्टि हमारी ओर लगाये बैठा हो ऐसे वक्त मही उस भंवर में फंसकर अस्तित्व गवाने जैसी स्थित में आ जाए तो इसे दुर्भाग्य ही तो कहेंगे। इस सौभाग्य-सुख में बदलने ही पड़ेगा ओर ऐसा कुछ कायाकल्प अपने अन्दर घटित करना पड़ेगा , जिसमें देखने वालों को आकृति में भले ही कोई अन्तर न दीखें पर प्रकृति ऐसी प्रतीत हो जिसे दिव्य स्तर के अनुदान-वरदान की फल श्रुति कही जा सके।

हम इक्कीसवीं सदी के द्वार पर खड़े है उज्ज्वल भविष्य दस्तक दे रहा हैं निर्णय हमें करना है कि घोर पतन की इस महत्व मूर्च्छा में पड़े-पड़े अपने आपे को गवा दे या इससे उबर कर कुछ ऐसा उपक्रम करें, जो सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र के लिए गर्व और गौरव का विषय बनें।


पारिवारिक सहकार (Kahani)

महात्मा ईसा अपने शिष्यों सहित कही जा रहे थे रात्रि में एक जगह ठहरे। देखा गया तो पास में केवल पांच रोटियां थी, इतने से सबका पेट कैसे भरेगा, यह प्रश्न सामने था। यह समस्या ईसा ने सुनी तो कहा सारी रोटियां एक मात्र में टुकड़े-टुकड़े करके डाल दो । सभी लोग एक-एक टुकड़ा निकाल -निकाल कर खाते जाए। सबको समान रूप से भोजन मिल जाएगा।

सबने श्रद्धापूर्वक गुरु -आज्ञा मानी। सोचा जितना सबके पेट में समान रूप से अन्न पहुंचे वही ठीक है। भोजन शुरू हुआ तो सबका पेट भर गया टुकड़े हाथ में आते गया। शिष्य बोले यह गुरुदेव का चमत्कार है इस ईसा बोले यह तुम्हारे सद्भाव भरे सहकार का चमत्कार है तुम स्वार्थ भरी छीना-झपटी करते तो यह सम्भव न होता। जहां सद्भाव भग पारिवारिक सहकार होता है वहां प्रभु का आयातित सहयोग मिलता है।


एक प्रतिभावान अभीष्ट है या कई अनगढ़

परिवार के आकार के संदर्भ में क्या नीति अपनायी जाय? कई-कई संतानें उत्पन्न कर सबको सुयोग्य बनाया जाय अथवा एक पर संतोष किया जाय? इस दृष्टि से यह अध्ययन आवश्यक हो गया था कि इकलौती संतान मूर्ख होती है। अथवा मेधावी क्योंकि कुछ वैज्ञानिकों ने प्रथम संतान की प्रतिभा पर प्रश्न -चिन्ह लगा दिया था किन्तु बाद के शोध निष्कर्षों से जो परिणाम सामने आया , वह इसके सर्वथा विपरीत था।

इस संदर्भ में आस्ट्रिया के जीव- विज्ञानी फ्रेंकसलोवे ने विज्ञान-जगत में तब तहलका मचा दिया जब उन्होंने अपनी एक अध्ययन-रिपोर्ट अमेरिकन एसोसिएशन फॉर दि एडवांसमेंट ऑफ साईंस’ नामक प्रसिद्ध अमरीकी संस्थान के समक्ष प्रकाशनार्थ भेजी। अपने अध्ययन में उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि प्रथम संतान प्रतिभा की दृष्टि से गई गुजरी होती हे जबकि बाद की प्रतिभाशाली ।उल्लेखनीय है कि सलोवे के उपरान्त इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण अध्ययन पिछले अनेक वर्षों में विश्व के कई वैज्ञानिक संस्थानों ने किया किन्तु कुछ अपवादों को छोड़कर परिणाम सलोवे के विपरीत हो गया। अब से लगभग दस वर्ष पूर्व स्वीडन के दो मनोवैज्ञानिक सीसाइल आर्नेस्ट तथा जुलियस संगस्ट नेकई वर्षों के अध्ययन के उपरान्त एक पुस्तक लिखी- ‘बर्थ ऑर्डर’ अर्थात् जन्मक्रम ।इसमें उन्होंने इस बात का स्पष्ट खण्डन किया कि जन्म क्रम का प्रतिभा से कोई सम्बन्ध है परन्तु अपने अनुसंधान में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात अवश्य देखी कि यदि संतान इकलौती हो तो उसकी बुद्धि और प्रतिभा सामान्य से कुछ जरूर ऊपर होती है। लगभग ऐसा ही निष्कर्ष कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की मूर्धन्य समाजविज्ञानी ज्यूडिथ ब्लेक निकाला है ब्लेका सलोवे के -जन्म-क्रम’ सिद्धान्त का प्रबल विरोधी माना जाता है। पर ऐसी बात नहीं है कि वे इसके एकमात्र प्रतिपक्षी है वैज्ञानिकों एक बड़ा समुदाय भी उनके साथ है। ब्लेक अपने शोध-निष्कर्ष में लिखती है “जन्मक्रम सिद्धान्त बाह्य दृष्टि से भले ही लुभावना लगता है पर तथ्य की दृष्टि से यह सारहीन है इसमें उस सच्चाई का सर्वथा अभाव विस्तृत अध्ययन में प्रस्तुत किया है उनकी यह टिप्पणी गहन पर्यवेक्षण पर आधारित है। उन्होंने इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों की एक लाख से ऊपर प्रतिभाओं से संपर्क साधा। साक्षात्कार से जो तथ्य सामने सामने आया, वह साक्षात्कार से जो तथ्य सामने आया, वह चौंकाने वाला था सर्वेक्षण पर आधारित हैं उन्होंने इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों की एक लाख से ऊपर प्रतिभाओं से संपर्क साधा साक्षात्कार से जो तथ्य सामने आया, सर्वेक्षण के दौरान 70 प्रतिशत लोग ऐसे पाये गये, जो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे जबकि 30 प्रतिशत लोग ऐसे थे, भाई-बीन नहीं थे। इस अध्ययन से एक और महत्वपूर्ण बात सामने आयी, वह यह कि 70 प्रतिशत प्रतिभा संपन्नों में नारों का अनुपात पुरुषों से अधिक था। इस प्रकार ब्लेक के सर्वेक्षण से दो बाते उभरकर सामने आय- प्रथम यह कि लड़कियां लड़कों से प्रतिभा में किसी भी प्रकार कम नहीं होती और दूसरी इकलौती संतान चाहे लड़का हो या लड़की उसकी बुद्धिलब्धि (आई0 क्यू0) औसत दर्जे से अधिक होती है उन्होंने अपने शोध निष्कर्ष में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि व्यक्तित्व-विकास में परिवार के आर्थिक स्तर का प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है वे कहती है कि यदि परिवार निर्धन और बड़ा हुआ तो इससे सदस्यों की प्रतिभाएं प्रभावित हो सकती है। ओर स्वतंत्र विकास के स्थान पर वह कुण्ठित बनी रहती है। उनका कहना है कि सम्भवतः यही कारण रहा हो कि अध्ययन किये गये प्रतिभासम्पन्नों में आधे से अधिक इकलौती संतानें थी, कारण कि इस स्थिति में उनकी शिक्षा-दीक्षा ओर व्यक्तित्व विकास परिवार छोटा होने के कारण बिना किसी दबाव के स्वतंत्रतापूर्वक सम्पन्न हो सका। और वे विकास ही ऊंचाइयों को छू सकी।

इसी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए अब्राहम मैस्लो कहते हैं कि परिवार में अधिक संतान होने से उनके सर्वांगीण विकास में अड़चने आने लगती है। इसके साथ ही उनकी क्षमताओं के विकास में भी बाधा उत्पन्न होती है। ऐसे परिवार में प्रतिभाओं के उन्नयन को सम्भावना न्यून बनी रहती है। और व्यक्ति अपनी प्रतिभा को परिष्कृत कर वह स्थिति प्राप्त नहीं कर पाता जिसे उन्होंने ‘सेल्फ एक्चुअलाइजेशन’ कहा। प्रकारांतर से उनका ‘सेल्फ एक्चुअलाइजेशन ‘ प्रतिभा ‘ परिष्कार का ही दूसरा नाम है। लिवरपुल यूनिवर्सिटी के समाज वानी के फार्स्टर का कहना है कि छोटे परिवार में प्रतिभाओं के विकास की जितनी सम्भावना होती है बड़े परिवार के साथ वह उतनी ही न्यून बनती जाती है इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि वृहद परिवारों में माता-पिता के बाद चूंकि बड़ा सदस्य परिवार की सबसे बड़ी संतान होता है अतः माता-पिता के साथ अपने छोटे भाई-बहिनों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उसके कंधों पर भी आ पड़ती है। और दुर्भाग्यवश यदि बचपन में ही माना पिता काल-कवलित हो गये, तो फिर मुश्किलों का अन्त नहीं। ऐसी स्थिति में वे अपनी क्षमताओं का विकास तो क्या, बड़ी मुश्किल से जीवन की गाड़ी घसीट पाते हैं और ज्यों-त्यों करके जिन्दगी गुजारते हैं एकमात्र संतान होने के कारण अपनी क्षमताओं का उन्नयन - विकास बड़े परिवारों की तुलना में कही अच्छी प्रकार कर लेती है पर दूसरी ओर से यह भी कहते हैं। कि सभी इकलौती संतानें प्रतिभासम्पन्न होती है ऐसी भी बात नहीं है उनके सर्वेक्षण के 70 प्रतिशत मामलों में वे असाधारण पायी गयी, शेष 20 प्रतिशत सामान्य बुद्धि वाले बच्चों के सम्बन्ध में उनका विचार है कि माता-पिता के अतिशय लाड़-प्यार ने ही उन्हें बिगाड़ दिया अन्यथा वे भी किसी - न - किसी क्षेत्र में असाधारण बन सकते थे।

कोलोरेडो युनिवर्सिटी के शोध-कर्मियों ने जन्म-क्रम सिद्धांत को पूरी तरह अमान्य करते हुए अपने अध्ययन में कहा है कि इकलौती संतान सदा ओसत से ऊँचे दर्जे की होती है यदि उक्त प्रतिभा का सदुपयोग किया जा सके, तो वे अपने जीवन में असाधारण प्रगति कर सकते हैं पर वे कहते हैं कि कई बार इसका दुरुपयोग किया जा सके तो वे अपने जीवन में असाधारण प्रगति कर सकते हैं। पर वे कहते हैं कि कई बार इसका दुरुपयोग होने लगता है जिसके कारण उत्थान के स्थान पर वे पतन के गर्त में समा जाते हैं एकाकी संतान प्रतिभावान क्यों होती है इस सम्बन्ध में वे एक सर्वथा नवीन तर्क प्रस्तुत करते हैं उनका कहना है कि खेल में जब प्रथम बार कोई फसल उगाई जाती है। तो उपज बहुत अच्छी होती है और ददाने भी पुष्ट होते हैं किन्तु बाद की फसलों की उपज ओर गुणवत्ता क्रमशः घटती जाती है। ओर इसी के साथ जमीन की उर्वरता भी। वे कहते हैं। कि कुछ ऐसी ही सम्भावना प्रथम व एक संतति के संस्कार ओर क्षमताओं के सम्बन्ध में कही जा सकती है।

यहां यह प्रतिपादन अभ्यास विज्ञान से काफी कुछ मेल खाता है अध्यात्म भी इस बात को स्वीकारता है। कि प्राण -शक्ति के क्षरण के साथ-साथ शारीरिक-मानसिक क्षमताओं का ह्रास होता जाता है ओर यह सर्वविदित तथ्य है कि जननेन्द्रियों से प्राण-शक्ति का जितना अधिक अपव्यय होता है , उतना शायद ही और किसी मार्ग से । अस्तु प्रथम संतान की उत्पत्ति के साथ माता-पिता में जो शारीरिक-मानसिक क्षमता विद्यमान थी, उसे सिद्धांत सन्ति में जाना चाहिए और यदि यह सही है तो शोधकर्ताओं की इस बात में भी उतनी ही सच्चाई होनी चाहिए कि प्रथम संतान अधिक क्षमतावान होती है।

इतिहास के पृष्ठो को पलटने पर इस बात के अनेकानेक प्रमाण भी मिलते हैं जो हमें यह विश्वास करने पर विवश करते हैं कि इकलौती संतान असाधारण प्रतिभायुक्त होती है अष्टावक्र कहोड़ मुनि और सुजाता की एकमेव संतान थे, वे कितने मेधावी थे। इसका अनुमान उनके इस वाक्य से लगाया जा सकता है। जिसे वे गर्भ में रहकर ही पिता को इंगित हुए उस समय बोला करते थे, जब उनके पिता अधपान कार्य कर रहे होते -” सर्वो रात्रिमध्ययनम् करोषि?? नेदं पितः सम्यगिवोपवर्तते अति पिताजी! आप फिर भी उच्चारण सम्बन्धी यह त्रुटि क्यों? ऐसी घपलेबाजी न करें अर्जुन पुत्र अभिमन्यु उनके इकलौते पुत्र थे, इस कारण गर्भस्थ स्थिति में भी वे चक्रव्यूह भेदन की कला सीख सके। चाणक्य अपने माता-पिता के एकल पुत्र थे। किसी साधारण व्यक्ति को राजसिंहासन पर बैठा देना और किसी राजा का देखते -देखते पदच्युत कर देना उनके बांये हाथ का खेल था। आद्यशंकराचार्य अपने माँ-बाप के अकेले पुत्र थे।अध्यात्म की जिन ऊंचाइयों को वे छू सके यह किसी से छुपा नहीं है राजनीति के क्षेत्र में जवाहरलाल नेहरू इन्दिरा गाँधी रुजवेल्ट आदि भी अपने जन्मदाता की एकाकी संतति थे। साहित्यिक क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और इंग्लैंड के रस्किम प्रथम संतान थे एक को खड़ी बोली का जतन तो दूसरे का 19 वीं शताब्दी का महान साहित्यकार माना जाता है। विज्ञान के विकास के आइन्स्टाइन का सापेक्षवाद , न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त और पुनर्निर्माण काल में पारासेल्सस का कितना बड़ा योगदान रहा है यह सर्वविदित है सजे की बात यह कि यह सभी अपने जनक-जननी के अकेली संतान थे।

इस प्रकार के कितने ही उदाहरणों से विश्व-इतिहास भरा पड़ा है जो यह सिद्ध करता है कि चौथी संतान की क्षमता सामान्य स्तर से प्रायः ऊँची होती है इसे माता पिता की प्रतिभा का हस्तान्तरण कहे अथवा निजी क्षमताओं के अत्यधिक विकास की सुविधाजनक स्थिति कुछ भी कह लक पर अब यह लगभग निर्विवाद है हक इकलौती संतान प्रतिभा के क्षेत्र में औसत से ऊँचे स्तर की होती है।


Quotation

प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए सारी आयु खपानी पड़ती है। बदनामी तो एक दिन में भी हवा के साथ फैल सकती है।


मगध-सम्राट अजातशत्रु (Kahani)

मगध-सम्राट अजातशत्रु की गिद्ध-दृष्टि लिच्छवि-गणतन्त्र पर केन्द्रित थी। वज्जियों की वैशाली अजातशत्रु के विजय -रथ के लिए दुर्धर्ष शिला- खण्ड बनी गौरव से मस्तक ऊंचे किए हुए थी। भगवान बुद्ध अन्तिम बार राजगृह के बहिर्वती दुध्रकूट में पधारे तो अजात शत्रु ने मगध-महामात्मा वमस्कार को उनकी सेवा में भेजकर निवेदन किया, भगवन् हम वैशाली को पराभूत करना कहते हैं। कोई उपाय बताये।” भगवान् ने यह सुना तो निकट बैठे आनन्द से पूछा’-- भन्ते क्या वज्जियों के सन्निपात (संसद- अधिवेशन ) बार-बार होते हैं। हे भगवन्! क्यों आनन्द क्या वज्जि संघबद्ध हो उद्यम करते हैं। , स्वीकृत विधि संहिता का उल्लंघन तो नहीं करते , वज्जीधम्प (राष्ट्रीय विधान एवं संस्थाओं ) के अनुसार समवेत होकर चलते हैं । वज्जियों में वृद्धजनों का आदर करते हैं उनके मान्य वचनों को मानते हैं अपनी कुल वधुओं एवं कुमारियों का आदर करते हैं चैत्यों का सम्मान करते हैं। अर्हतों की सेवा ओर रक्षा कते हैं।?”

“ हाँ भगवन् , लिच्छवि इन सभी धर्मों कातरता से पालन करते हैं। “आनन्द ने उत्तर दिया। भगवान् की मुख -मुद्रा गम्भीर हो गयी। उन्हें समात्य वसस्काी की आरे देखते हुए शिष्य से कहा “तो आनंद ये धर्म गणतंत्र के प्राण-तत्व है जब तक लिच्छवि इनका पालन करते हैं वे अविजेय है यही स्वरूप एक आदर्श संस्था, समाज एवं संस्कृति का होना चाहिए। तुम तो भी उस आदर्श संस्कृति का अंग बनकर रहो, परस्त करते की न सोचो।”


आइए! इक्कीसवीं सदी का स्वागत हरीतिमा से करे।

व्न - सम्पदा की विविधता एवं प्रचुरता ही पर्यावरण सन्तुलन का आधार है वनों की अन्धाधुन्ध कटाई से इसका डगमगाना स्वाभाविक है इसी के परिणाम बढ़ते तापमान , अतिवृष्टि , अनावृष्टि , भूक्षरण, वायुमण्डलीय गैसीय चक्र में असन्तुलन के रूप में चारों ओर नजर आ रहे हैं प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोत्तरी भी दिन दूनी -रात चौगुनी देखने को मिल ही है प्रकृति का ताण्डव इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि परिस्थिति पर यदि समय रहते निमंत्रण न किया गया तो इंसान का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है।

पर्यावरण सन्तुलन की दृष्टि से धरती का 33 प्रतिशत भाग वनों से ढका होना चाहिए । सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में वनाच्छदित भूभाग सिर्फ 14 प्रतिशत रह गया हैं सेटेलाइट द्वारा किए गए सर्वेक्षण के निष्कर्ष इसे और कम करके बताते हैं। उनके अनुसार यह 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार , वनों की अंधाधुंध कटाई से अब तक विश्व का 25 प्रतिशत से भी अधिक इलाका रेगिस्तान की चपेट में कुल 8,6000,000 मील से भी ज्यादा इलाका सिमट चुका है। अकेले भारत में तकरीबन 3 लाख वर्ग किलोमीटर रेगिस्तानी इलाका है इसमें 65 प्रतिशत राजस्थान में , 22 प्रतिशत गुजरात में दृ 9 प्रतिशत पंजाब हरियाणा तथा शेष महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश में है संसार प्रतिमिनट 30 हेक्टेयर वन समाप्त हो रहे है यदि वनों के कटने की गति यही रही तो अगले 50 सालों में इस धरती की अगम्य क्षेत्रों के अलावा वन सम्पत्ति दिखाई देना दुर्लभ हों जाएगी।

वनों के इस तरह घटते जाने का सबसे घातक असर हमारे जीवन पर पड़ेगा, जिसकी सांसें इन्हीं का अनुदान हैं वृक्ष-वनस्पतियां वायुमण्डल से हर पल जहरीली कार्बन-डाई -आक्साइड का अवशोषण कर आक्सीजन के रूप में सतत् प्राण वायु द्वारा प्रतिवर्ष 76.3 अरब टन कार्बन -डाई-आक्साइड सोखी जाती है। और 55.5 अरब टन आक्सीजन वायुमण्डल में छोड़ी जाती है। पेड़ अपनी वृद्धि में एक किलों लकड़ी का उत्पादन करते समय लगभग 1.65 से 1.85 किलों कार्बन -डाई-आक्साइड सोखकर हमें 1.32 से 1.42 किलो प्राण वायु दे डालते हैं।

वनों की घटती दर के अनुक्रम में कार्बन-डाई-आक्साइड का अनुपात भी बढ़ता जा रहा है। सामान्य क्रम में वातावरण में कार्बन-डाई-ऑक्साइड का अनुपात भी बढ़ता जा रहा है सामान्य क्रम में वातावरण में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा सिर्फ 0.003 प्रतिशत होती हैं लेकिन यह वायुमण्डल के ताप सन्तुलन को प्रभावित भी बढ़ती है। पिछले 100 सालों में इसकी मात्रा में 25 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है व तापमान भी 0.5 डिग्री सेण्टीग्रेड बढ़ा है सन् 2000 तक यदि क्रम यही बना रहा तो कार्बन-डाई - आक्साइड में 10 प्रतिशत व तापमान में 1 डिग्री सेंटीग्रेड के बढ़ने की सम्भावना है। ओर यदि वनों के कटने व घटने का सिलसिला यही यही रहा तो 21 वीं सदी के मध्य तक तापमान की वृद्धि 5 डिग्री सेल्सियस जा पहुंचेगी। इससे हिम-खंडों के पिघलने से समूची धरती एक बार फिर से जल में निमग्न हो सकती है।

जंगलों और पेड़ों की बढ़ती संख्या ही हमें इस विनाशक स्थिति से उबार सकती है वृक्ष अपनी वाष्पोतसर्जन प्रक्रिया के कारण गर्मी को ठण्डक में बदलने में समर्थ है। देखा गया है कि 50 से 100 मीटर चौड़ी वृक्ष पट्टी द्वारा तापमान को 3.5 डिग्री सेण्टीग्रेड तक एयर कण्डीशनरों का काम करता है। जो 10 से 15 प्रतिशत बिजली का खर्चा बचाने के साथ ही हमें प्रदूषण मुक्त वातावरण दे सकता है।

आन्ध्र प्रदेश के रामागुण्डम स्थित नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन के पावर स्टेशन में वृक्षारोपण सम्बन्धी हुआ प्रयोग इस संदर्भ में बहुत ही उत्साहवर्द्धक रहा हैं प्रदूषण व अत्याधिक ईंधन जलने के कारण यहां का तापमान 47 डिग्री सेण्टीग्रेड तक बढ़ जाता था। गर्मी की इस बढ़ोत्तरी के कारण रामागुण्डम को अग्निकुण्डम तक कहा जाने लगा। इस समाधान के लिए वृक्षारोपण की एक योजना बनी, जिसके अंतर्गत एक दशक में छह लाख वृक्ष आरोपित किए गए। धीरे-धीरे वाष्पोत्सर्जन द्वारा पैदा होने वाली ठण्डक का चमत्कारी प्रभाव सामने आने लगा। एक सर्वेक्षण के अनुसार यही के तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की गिरावट पायी गयी है। वर्षा में 18 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई व भूमि का जल -स्तर भी बढ़ा हुआ पायी गया। प्राकृतिक सौंदर्य की छटा तो स्वयं में अनुपम भी है।

वृक्षों का समुदाय जहां तपती गर्मी में ठण्डक देता है ही कड़ाके की सर्दी में तापमान को ऊँचा रखने में सहायक है। ठंडे क्षेत्रों में इस पर प्रयोग किए गए हैं। इस क्रम में एक वृक्ष को 10 से 15 एयर कण्डीशनरों के बराबर सक्रिय पाया गया व विद्युत खर्च में 4 से 22 प्रतिशत की बचत देखी गई । साथ ही तमिलनाडु के नीलगिरी आदि क्षेत्रों में खुले मैदानों तक देखा गया जबकि वृक्षाच्छादित क्षेत्र का तापमान ॰ डिग्री से ऊपर पाया गया।

वनों के कटने का महत्वपूर्ण प्रभाव वर्षा पर भी पड़ा है वर्षा के होने न होने में वनों का महत्वपूर्ण योगदान है । सागरों के तल से उठने वाले वाष्पीकृत बादल जब पर्वत शृंखलाओं से टकराते हैं तो लौटकर मानसून के रूप में वनों के आकर्षण और शीलता के कारण बरस पड़ते है॥ यही कारण है कि समुद्री तटवर्तीय इलाकों में जहां वृक्षों -वनों का बाहुल्य है वहां वर्षा अधिक होती हैं सहारा, पेरु , थार, इजिप्ट, आदि के मरुस्थलों में जहां मीलों दूर-दूर तक वृक्ष नहीं पाए जाते वहां वर्षा नाम मात्र को भी नहीं होती है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले 25 वर्षों में वर्षा के दिनों में 30 प्रतिशत की कमी आयी है यह वनों के घटने के कारण हुआ है। हरे-भरे क्षेत्रों में हरियाली रहित क्षेत्रों की तुलना में अधिक बरसात होती है । ट्रेमिकल (वर्षा वन) क्षेत्रों में आधी बरसात वनों के धरातलीय वाष्पीकरण द्वारा होती है। कटाई कारण वनों का इलाका सिमटता जा रहा है। और सूखे की संभावनाएं बढ़ चली है।

वर्षा थोड़ी-बहुत हो भी जाय, तो भी बरसात के पानी को वही जमीन आने में ग्रहण कर पानी को वही जमीन अपने में ग्रहण कर पाती है। बरसात होने के पहले एक घण्टे में जल अवशोषण की क्षमता कृषि भूमि में 1 से0मी0 घासीय भूमि में 2 से0मी0 सालवन में 16.84 से0मी0 है। तथा मिश्रित वन में 16 से0मी0 पायी गयी है। अर्थात् वनभूमि जल का अधिकतम अवशोषण करती है एक अध्ययन के अनुसार वृक्षों से ढकी भूमि खुली भूमि की तुलना में हर साल 2.5 इंच अधिक जल ग्रहण करती है।

जंगलों के कटने से भू-जल स्तर भी गिरा है । पश्चिम एवं मध्य उत्तरप्रदेश में पिछले 10 वर्षों के सर्वेक्षण में पाया गया है कि जहां जंगल घने हैं वहां का भू जल स्तर मात्र 50 से0मी0 या कम गिरा है जहां वन नहीं है वहां यह गिरावट 8 इलाके में तो इसी कारण कुएँ सूखते चले जा रहे है।

वनों की कटाई के कारण हिमालय क्षेत्र में बरसात का 80 से 85 प्रतिशत पानी नदियों में बह जाता है। जो मैदानी इलाकों में बाढ़ का कारण बनता है वहां बरसात का सिर्फ 15 प्रतिशत पानी ही टिक पाता है इसी कारण एक सर्वेक्षण के अनुसार इन वर्षों में हरिद्वार में वर्षा एवं गर्मी के गंगा जल प्रवाह का अनुपात 80 और 1 का हो गया है। जबकि भूटान में जहां जंगल सुरक्षित है वहां की मक्खी नदी में वर्षों व गर्मी के जल प्रवाह का अनुपात 7 व 1 का है। हिमालय की वनस्पति आवरण के कमी के कारण जल स्रोतों में पिछले 5 सालों में 25 प्रतिशत की कमी आयी है।

कटते जंगलों की वजह से नंगी धरती भूक्षरण एवं भूस्खलन द्वारा असुरक्षित होती जा रही है। वर्षों के पानी के साथ खेतों की उपजाऊ मिट्ठी कट कट कर बह जाती है इस समय भारत के 43 प्रतिशत भूभाग भूक्षरण से प्रभावित है तथा 25 लाख हेक्टेयर भूक्षेत्र प्रतिवर्ष बाढ़ ग्रस्त हो जाता है। अनुमान है कि उर्वर भूमि से 700 करोड़ मूल्य के मृदा के खनिज तत्व प्रतिवर्ष बह जाते हैं जो रासायनिक उर्वरक की वार्षिक खपत से दोगुना है । 60 करोड़ टन से अधिक मिट्ठी प्रतिवर्ष बह जाती है जिसका अधिकाँश भाग समुद्र में पहुंच जाता है।

बाढ़-भूस्खलन मूलतः वन कटाव के कारण ही होते हैं। 1972 में अलकनंदा 1978 में उत्तरकाशी में आयी बाढ़ तथा 1979 में कोयना (चमोली) में हुए भूस्खलन एवं बाढ़ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। 1977.86.89 90 में गढ़वाल के कई क्षेत्रों में भयंकर भूस्खलन वन विनाश प्रतिक्रिया के ही परिणाम है वर्ष 1994 में हिमाचल प्राप्त में भूस्खलन एवं बाढ़ द्वारा भयंकर तबाही वन कटाव का ही प्रतिक्रिया है भूक्षरण एवं बाढ़ द्वारा नष्ट होने की सम्भावना है जिससे कई अन्न उपजाऊ क्षेत्र बंजर भूमि में बदल जाएंगे।

पेड़ों की हरियाली की कमी के कारण धूल की समस्या बढ़ती जा रही है। बड़े-बड़े शहरों में मृत्यु का प्रमुख कारण धूल से होने वाले टी0बी0 व साँस के अन्य रोग है एक आकलन के अनुसार वायु प्रदूषण की समस्या का 40 प्रतिशत धूल के कारण है उसके समाधान 30 मीटर चौड़ी धनी पट्टी लगभग पूर्णतया धूल मुक्त करे में सक्षम पायी गयी है रूस में प्रयोग द्वारा पाया गया है। कि लिलक, मेपल, लिन्डेन व पापलर सर्वोत्तम धूल फिल्टर का काम करते हैं पापलर की एक पत्ती अपने जीवनकाल में 1 किलों धूल छान लेती है पीपल, पाकड़, साल, , अर्जुन , आम बरगद, जरूरत आदि पेड़ भी प्रभावशाली फिल्टर का काम करते हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मत है कि वों की कटाई से वायुमण्डलीय गैसीय चक्र का भी सन्तुलन गड़बड़ाया है। भारतीय मौसम विज्ञान की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार कटते जंगलों के कारण आज तक वायुमण्डल में प्राणवायु आक्सीजन के स्तर में लगभग 0.005 प्रतिशत कार्बन-डाई- आक्साइड की मात्रा में बढ़ोत्तरी हुई वायुमण्डल में ऑक्सीजन के स्तर में कमी और जहरीली कार्बन-डाई-आक्साइड की मात्रा पर नियन्त्रण स्थापित नहीं किया गया, तो सन् 2000 तक इसकी मात्रा 5200 करोड़ टन से भी अधिक हो सकती है इस बढ़ी हुई मात्रा के कारण विश्व के तापक्रम में काफी वृद्धि होगी, सुगमता से पृथ्वी पर नहीं आएगा, ताप वृद्धि के कारण ध्रुवीय प्रदेशों की बर्फ पिघलेगी ।

इस प्रकृति असंतुलन से कही भीषण सूखा आकाल पड़े तो कही वायुमण्डल में संव्याप्त कार्बन-डाई-आक्साइड व सल्फर के कारण तेजाबी वर्षा का सामना करना पड़ेगा ‘वर्ल्ड वाच इन्स्टीट्यूट‘ की एक रिर्पोट के अनुसार, पश्चिमी जर्मनी में जेजाबी वर्या के कारण वर्ष में एक अरब डालर की वन सम्पदा का नुकसान हुआ। प्रकृति के शृंगार वनों को यदि इस प्रकार उससे छीना जाता रहा तो अगले दिनों कुपित प्रकृति की विनाशलीलाएं ही दिखाई देती रहेगी।

वन सिर्फ प्रकृति का शृंगार ही नहीं, इनमें जनसामान्य को ईंधन एवं पशुओं को चारा भी सहज मिलता है। स्थानीय लोगों के उपयोग की सामग्री व आजीविका बहुत कुछ इन्हीं पर चलती है। पशु -पक्षियों के एकमात्र शरण स्थल वन है असाध्य रोगों के उपचारार्थ दुर्लभ जड़ी-बूटियां भी वनों से ही उपलब्ध होती है प्रा0 टी0 एम0 दास के अनुसार एक वृक्ष अपने पचास वर्ष के जीवन में हमें 15.70 लाख रुपये की बहुमूल्य सेवाएं प्रदान करता है जबकि इसमें छाया, हरियाली फल और फूल का मूल्य शामिल नहीं है प्राकृतिक सौंदर्य में निरन्तर अभिवृद्धि करने वाले पेड़ ये मनुष्यों को सतत् अनगिनत लाभ देते हैं।

इनकी कटाई से उत्पन्न वर्तमान समस्या को देखते हुए यू0 उन0 ओ0 ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इस समस्या का निराकरण नहीं किया गा तो मानव विकास ओर जीवन के भविष्य पर प्रश्न - चिन्ह लग जाएगा । बाढ़, सूखा प्रकृति के प्रकोप से बचाव के साथ हमें योजनाबद्ध रूप से महत्व देना होगा। इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल भविष्य में बदल डालने के लिए प्राण-पण से मुड़े शान्तिकुँज ने वृक्षारोपण को एक जन अभियान का रूप दिया है।

इस क्रम में न केवल विचार क्रान्ति अभियान के सदस्यों द्वारा भारी संख्या में वृक्षारोपण किया जा रहा है बल्कि बच्चों, नवयुवकों, वृद्धों को इसकी उपयोगिता-महत्ता से अवगत कराने का भी सिलसिला जारी है इस सम्बन्ध में हमारे देश का जनमानस इजराइल जैसे रेगिस्तानी देश से सबक सीख सकता है जहां की जनता वृक्ष-पेड़ लगाकर विशाल क्षेत्र को हरा-भरा कर लिया और तपते रेगिस्तान पर हरियाली की शीतल चादर ओढ़ा दी? वहां आम रिवाज है कि लोग अपने खेतों, सड़कों, मैदानों में अपने बच्चों के जन्म पर और मरने वालों की यादगार में पेड़ लगाते हैं। ख्रन में भी अपने इस प्रयत्न से हरीतिमा की दीवार खड़ी की है। जो उसकी ऐतिहासिक चीन की दीवार से भी कही अधिक सजग प्रहरी की भांति पर्यावरण असन्तुलन से मोर्चा ले रही हैं

ऐसे में हम क्यों पीछे रहे? अपने देश की संस्कृति सभ्यता का तो जन्म ही वनों में हुआ है। प्राचीनकाल के गुरुकुल आरण्यक वनों की गोद में बसे होते थे। ऋषि -मुनि लोग इन्हीं ही छाया में तप-साधना में संलग्न रहते थे व जनमानस को दिशा देने वाले महत्वपूर्ण सूत्रों की खोज यही करते थे आज भी अपनी साँस्कृतिक धरोहर के रूप में भार के 70 प्रतिशत गाँवों में वृक्षों की पूजा होती है। इनमें पीपल,बरगद , तुलसी, विल्व, आँवला आम आदि प्रमुख है।

युग सन्धि के वर्तमान पल इन देव प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा के पल हैं वृक्षारोपण देव मन्दिर के निर्माण ही ही तरह बल्कि उससे कही ज्यादा पुण्यप्रद है। हमारे देश में 80,000 कि0 मी0 रेल पथ, 1,20,00,000 कि0 मी0 लम्बी सड़कों के साथ-साथ नदी , नहरों मरुभूमि में अरबों-खरबों के संख्या में वृक्षारोपण का पुण्य कार्य किया जा सकता है इस कार्य को इक्कीसवीं सदी के स्वागत महोत्सव के रूप में किया जाना चाहिए तभी हमारा हर कदम उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ेगा।


गांधी जी (Kahani)

गांधी जी छोटे थे बड़े भाई ने उन्हें मार दिया वे रोते हुए मा के पास शिकायत करते गये। मा ने कहा-” तू भी उसे मार।”,

गांधी मा पर बिगड़े और कहा-” जो गलती करता है, उसे तो रोकती नहीं। उल्टे मुझे भी वही गलती करना सिखाती है।

मा ने कहा-” बेटा ! मैं तो तेरी परीक्षा ले रही थी। यदि परिवार के सदस्यों के प्रति तेरी भावना का इसी तरह विकास होता रहा तो आगे चलकर तेरे मन में समग्र विश्व समुदाय के प्रति यही भावना पनपेगी। यह शिक्षण इसी पाठशाला में तो मिल सकता है।

गांधी जी इसी कारण महान् बने एवं विश्व के बापू कहलाए।

एक बूढ़ा तीर्थयात्रा पर तीन वर्ष के लिए निकला। चारों बेटों को बुलाकर अपनी जमा पूंजी उनके हाथों सौंप दी । कहा -लौटने पर ले लूंगा। न लौटूं तो तुम्हारी। चारों को सौ-सौ रुपये सौंपे गये।

एक ने उन्हें सुरक्षित रख दिया दूसरे ने उसे ब्याज पर उठा दिया। तीसरे ने रुपयों को शौक-मौज में उड़ाया । चौथे ने उनसे व्यवसाय करना आरम्भ कर दिया। तीन साल बाद बूढ़ा लौटा और धरोहर वापिस मांगी। एक ने ज्यों की त्यों लौटा दी। दूसरे ने थोड़ी सी ब्याज भी सम्मिलित कर दी। तीसरे ने खर्च कर देने की कथा सुनाई और मजबूरी बताई । चौथे ने व्यवसाय किया, मूलधन चौगुना करके लौटाया। बाप ने चौथे की सबसे अधिक प्रशंसा की और उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया। इसके बाद उसकी बुद्धिमानी सराही गई , जिसने कम-से-कम ब्याज तो कमाया।

वृद्ध ने सबको समझाते हुए कहा-” परन्तु उसके लिए प्रयास-पुरुषार्थ वही करता है जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर पारिवारिक उत्तरदायित्वों का पालन सीखता है परिवार में रहकर भी यह भाव विकसित न कर सकने से बुद्धि के उपयोग की उमंग भी नहीं उभरती । तुम्हारी यह परीक्षा लेने के लिए मेरी तीर्थयात्रा नियोजित थी।


बुद्धिवान बने कि प्राज्ञवान

शास्त्रकारों ने एक बड़े रहस्य का उद्घाटन निम्न शब्दों के माध्यम से किया है।

बुद्धेबुद्धिमताँ लौके नास्त्यगम्य कि किंचन। बुद्ध्या यता हता नन्दाश्चाणक्यनासिपाणया!!

अर्थात् -” बुद्धिमानों की बुद्धि के समक्ष संसार में कुछ भी असाध्य नहीं है। बुद्धि से ही शस्त्रहीन चाणक्य ने सशक्त नन्दवंश का नाश कर डाला।

मनुष्य के हाथ पैरों की अर्थात् मानवीय शरीर की स्थूल शक्ति अन्य पशुओं के मुकाबले में ज्ञी गयी-बीती है। यदि मनुष्य उनसे कुश्ती लड़ने लगे, तो निश्चय ही वह शारीरिक ताकत में हार मानेगा। शारीरिक शक्ति प्रत्यक्ष में एक सीमा तक ही फायदेमन्द सिद्ध हो सकती है लेकिन मानवीय उर्वरा बुद्धि की ताकत अति व्यापक है वह दूर तक भी प्रभाव डाल सकती है। शास्त्रकार कहते हैं “ दीर्घ गुस्तितों बाहू याभ्या दूरहिनस्ति सः। “अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति की भुजा बड़ी लंबी होती है जिनकी ताकत से वह दूर तक वार कर सकता है महर्षि व्यास ने कहा है “ बुद्धि श्रेष्ठानि कर्माणि।” अर्थात् मनुष्य की बुद्धि से विचारपूर्वक किये गये कार्य ही श्रेष्ठ होते हैं।

बुद्धि मनुष्य के लिए दैवी विभूतियों में उच्चकोटि का वरदान है इसके सहारे मनुष्य अपने जीवन को अधिक उन्नत , समृद्ध और प्रभावशाली बना सकता है समाज ओर इस समुन्नत संसार में जो कुछ मनुष्य द्वारा किया हुआ अद्भुत काम मिलता है वह उसकी बुद्धि की ही देन है कहावत है-” बुद्धिमान का एक दिन मूर्ख के जीवनभर के बराबर होता है। “ इसका तात्पर्य यह है कि समझदार आदमी अक्ल के ठीक उपयोग से वह काम कर डाला है। जो साधारण आदमी जिन्दगी भर नहीं कर पाते।

स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि हमें आज से, अभी से जी अपनी बुद्धि का विकास करना शुरू कर देना चाहिए बुद्धि को विकसित , संस्कारी ओर समर्थ बनाने व मनुष्य को अधिकाधिक आगे बढ़ने ओर बड़ी-बड़ी उन्नति करने की इच्छा पैदा होती है। जैसे-जैसे बुद्धि बढ़ती है अच्छाई बुराई , अपने हानि -लाभ और उन्नति अवनति का भेद आता जाता है। बुद्धि को अधिकाधिक प्रौढ़ व्यापक ओर परिपक्व बनाने के लिए ज्ञान की साधना और विचारों के अर्चना साधना के क्षेत्र में हम जितना ही नये विचारों को मन में रखना ओर फिर अपने ढंग से सोचना शुरू करेंगे उतना ही हमारी बुद्धि का विकास होगा।

बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए सबसे बड़ी जरूरत यह है कि हमारे अपने मन में नये ज्ञान को ग्रहण करने की बात सोचने और अपनी बुद्धि को बढ़ाने की तीव्र और उत्कट लगन होनी चाहिए। सीखने के लिए मानव जाति का संचित अब तक का ज्ञान कुछ कम नहीं है नाना क्षेत्रों में मानवी बुद्धि अर्जित ज्ञान का अथाह भण्डार भरा पड़ा है। एक-एक विषय पर असंख्य पुस्तक मौजूद हैं ढेरों पत्र-पत्रिकाएं प्रतिदिन छप रही है इसके अतिरिक्त संसार की खुली पुस्तक- इस समाज से हर समय कुछ न कुछ सीखने को मिलता ही रहता है दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाने की लालसा होनी चाहिए।

दूसरी बात है दूसरों को सिखाने की । स्वयं अर्जित यह स्वाध्याय से एकत्रित ज्ञान को दूसरे को सिखाने से हमारी बुद्धि का विकास होता है वस्तुतः दूसरों के माध्यम से ही जो कुछ सीखा हुआ है वह परिष्कृत होता है ।

ज्ञान कहीं से किसी से किस मूल्य पर मिले लेना ही अच्छा है सीखने के क्षेत्र में दूसरों के विचारों से या दृष्टिकोण से परहेज नहीं करना चाहिए। जिससे हम सीख वही गुरु है ऐसे अनेक गुरु है ऐसे अनेक गुरु हो सकते हैं। अपने उदार रहे है हमारी परंपरा के अनुसार ज्ञान ही प्राप्ति में हमने किसी से परहेज नहीं किया है संसार भर के विचारों का हमने प्रयोग किया और जो उपयुक्त लगा , उसे स्वीकार करने में आनाकानी नहीं की बुद्धि की साधना करने वाले की लिए अपनी ग्रहण शक्ति को एकांगी नहीं बनाना चाहिए। अपने आपको किसी एक ही विचारधारा में कैद नहीं कर लेना चाहिए । जो ऐसी भूल कर बैठते हैं उनकी बुद्धि भी एकाँगी बन जाती है। वह नाना दिशाओं में विकसित नहीं हो पाती इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध विचारक बेकने ने ठीक ही कहा है-” ईश्वर ने बुद्धि की कोई सीमा निश्चित नहीं की है ।

सचमुच बुद्धि के साधक के लिए सद्ज्ञान , विवेक ओर सरस्वती की उपासना करने वाले को किसी भी स्थिति में पहुंचकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि अब पढ़ाई -लिखाई समाप्त हो चुकी है और अब सीखने जैसी कोई बात नहीं रही है ज्ञान की सीमा नहीं , वरन् वह समुद्र की भांति अत्यन्त और अगाध है उसकी कोई सीमा नहीं है। ज्ञान नित-नूतन विकासक्रम की गोद में पलता है इसलिए बुद्धि विकास और उन्नति की कोई सीमा नहीं हो सकती प्रत्येक पढ़े -लिखे आदमी के लिए नया सीखने को बहुत कुछ शेष रहता है क्योंकि मानव ज्ञान भी बड़ी तेज रफ्तार में बढ़ता ही जाता है जितना मनुष्य इस दिशा में प्रयास करेगा। प्रज्ञा वाक् बनता चला जाएगा।

ज्ञानवर्द्धक की अनेक शाखाएं प्रशाखाएं हैं नये-नये क्षेत्र है बुद्धि को बढ़ाने के लिए सब प्रणालियों में घुसकर देखे। किसी एक संस्था विचार प्रणाली या सम्प्रदाय विशेष से संकुचित निया या क्षेत्र में बंधकर न देखे, जहां-जहां भी सद्ज्ञान के नये स्त्रोत प्रकाश में आये, वहां-वहां ही अपनी बुद्धि को उसमें प्रवेश करना चाहिए। अध्यात्म, संस्कृति आदि अनेक क्षेत्रों में अपनी गति बढ़ाये तो हमारी योग्यता किसी क्षेत्र में कम नहीं रह सकती । हमारा ज्ञानार्जन का क्षेत्र जितना व्यापक होगा उतनी ही हमारी बुद्धि भी विशाल और व्यापक बनेगी। फिर बुद्धि प्रज्ञा का रूप ले लेगी।


असामान्य समय हेतु असामान्य तैयारी - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(अक्टूबर 1989 में शान्तिकुँज में दिया गया उद्बोधन)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्

देवियों , भाइयों ! कभी साधनाएं समयानुकूल ओर पात्रता के अनुकूल हुआ करती थी। एक -सी साधनाएं कभी नहीं रही । बहुत पुराने जमाने की साधनाओं को जब हम देखते हैं तो एक मुख्य तपस्विनी पार्वतीजी तप करती रहती है। कितने ही वर्ष वे हवा पर रही, पत्ते खाकर रही, पानी पीकर रही। कभी तपस्वियों की ऐसी साधनाएं होती थी कभी ज्ञान की साधनाएं होती रही। सूत ओर शौनक से ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्रों में जाकर कथा-प्रसंग करते थे वहां अनेकानेक भक्तजन आते थे और कथा श्रवण करते थे, सत्संग की बाते करते थे। कभी शिक्षण का सिलसिला तो ब्राह्मणो के आरण्यक स्थापित हुए और उनके जाकर के लोग ज्ञानर्जित करने लगें साधनाएं उस समय की अजीबिी। हजारों तरह की साधनाएं प्रचलित थी जिनमें ताँत्रिक साधनाओं से लेकर सकाम साधनाएं तक होती थी लेकिन शागिर्द के हिसाब से साधना का चयन करना गुरुजनों और ऋषियोँ का काम था । ऋषि समय की जानकारी प्राप्त करने वाले द्रष्टा होते थे वे जो साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।

आज का समय सामान्य समय नहीं हैं यदि संधि का समय है इस संधि के समय को आप आपातकालीन समय भी कह सकते हैं कभी-कभी आपत्तिकाल भी आते हैं जैसे-भूकम्प आ जाय तो लोग भाग खड़े होंगे कुछ जमीन के नीचे दब जाएंगे , हाहाकार मच जाएगा, बिजली चली जाएगी जल पानी देना बन्द कर देंगे, ऐसे समय को आपातकाल कहेंगे जल खाना नहीं मिलता, अनाज पैदा होना बन्द को जाता है कुंए का पानी सूख जाता है, तो आदमी जान बचाने के लिए या तो भाग खड़े होते हैं। या वही प्राण त्याग देते हैं उसे ही कही अग्निकाण्ड हो जाय और किसी का छप्पर जलने लगे, उस आपत्तिकाल में आप अपना व्यक्तिगत काम बन्द कर दीजिए, अग्नि बुझाने के लिए दौड़िए । नहाना, कपड़े धोना, खाना खाना बन्द कीजिए, पहले पड़ौस में लगी आग बुझाने जाइए। आप दुकान जाने को थे आरे किसी बस का ऐक्सीडेंट हो गया, कितने आदमियों की टांग टूटी कितने की घायल हो गये कितने ही मर गये। आज आप दुकान मत जाइये क्योंकि पहले इन घायलों को पानी पिलाइये, उन्हें मरहमपट्टी के लिए अस्पताल पहुंचने में मदद कीजिए इस आपात स्थिति में आप इनकी सहायता कीजिए। क्योंकि असामान्य कार्यों में प्रवृत्त होना पड़ता है महामारियां फैल जाती है बाढ़ आ जाती है कोई बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती है। तो भावनाशील व्यक्ति अपना सामान्य क्रम बदल देते हैं और दूसरों की सहायता करने के लिए दौड़ पड़ते हैं इसकी आपत्तिजन्य स्थित कहेंगे।

आज के इस समय में हम सबको आपत्ति धर्म निबाहने के लिए तैयार रहना चाहिए इस संधि के समय में एक आरे कौरवों की सेना खड़ी है ओर एक ओर पाण्डवों की एक ओर असुरता एवं विनाश मुहबाये खड़े हैं सर्वनाश की चुनौतियां एक पार्टी में खड़ी हुई है तो दूसरी पार्टी में नवनिर्माण करने के लिए युगशिल्पी पूरी तैयारी के साथ कमर बांधकर खड़े हुए हैं ये कौरवों -पाण्डवों की लड़ाई -महाभारत का समय है इस आपत्तिकाल में आपको विशेष धर्म की ओर ध्यान करने का पेशा थोड़े ही करते थे। गीता में लिखा है कि जब भगवान ने अर्जुन से लड़ने कोकहा तजो वे आना-कानी करते रहें। बेकार में लड़ने से क्या फायदा? लेकिन वह तो आपत्तिकाल था अगर वहां लड़ाई नहीं लड़ी गयी होती तब तब कर्ण दुर्योधन, दुशासन ओर शिशुपाल मिलकर के न जाने केस हाहाकार मचा देते अपनी ललक-लिप्सा से न जाने कितनों को तहस-नहस कर देते और सारे जिसमें आदमियों का जिन्दा रहना मुश्किल ळज्ञै ज्ज्ञत्ज्ञ टस्भ्थ्ल्ए भगवान ने महाभारत की तैयारी की और अर्जुन से कहा की इस समय सामान्य बाते को छोड़ दो

अर्जुन बोले -” श्रेयों भोक्तू भेक्ष्यमपीह लोके। मैं तो भिक्षा मांग करके भी खा सकता हूं कुछ और काम करके भी पेट भर सकता हूं फिर मैं क्यों लड़ूंगा भगवान ने कहा यह आपत्तिकाल है इसके धर्म विशेष होते हैं।” उन्होंने आपत्ति धर्म निबाहने के लिए अर्जुन को तैयार किया और वह भगवान का कहना मानकर अपनी मर्जी भी कि नहीं थी, बात अलग है लेकिन अर्जुन ने भगवान की मर्जी मिला दी। मर्जी मिलाने के बाद वे लड़ाई के मैदान में गये और गाण्डीव द्वारा तीर चलाने लगे और सारे के सारे विरोधियों को मार गिराया। वे अपने साम्राज्य के स्वामी हुए ओर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति के भी अधिकारी बने। ये आपत्ति धर्म बना रहा हूं। पूजा , उपासना की थी अर्जुन ने, आप ही बताइये। कोई अनुष्ठान , जप, तप, ध्यान, धारणा , समाधि, दैनिक पूजा भी नहीं की थी बस भगवान की आज्ञा मानी थी उन्होंने कहा की इस समय सबसे बड़ी साधना महाभारत की है और अर्जुन उसी में लग गये ।तब भगवान की बनायी साधना मनुष्यों द्वारा की गयी साधना की अपेक्षा लाखों गुनी श्रेयस्कर सिद्ध हुई ऐसी ही दूसरों की बात है ।

अच्छा बताइये , हनुमानजी ने कौन सी साधना की? कोई अनुष्ठान , जप, तप , किये होंगे या ध्यान-धारणा की थी। कुछ भी नहीं किया था, सुग्रीव के साथ एक गुफा में छिपे बैठे थे। जब भगवान राम से मुलाकात हो गयी, मिलता-जुलना हुआ तो कहने लगे-मैं आपकी शरण में आ गया हूँ, मुझे आज्ञा बताइये आज्ञा बता दी कि सीताजी को खोज कर लाइये कोई अनुष्ठान, जन, तप अथवा रामायण, गीता, नारायण मंत्र का पाठ नहीं बताया। भगवान राम ने कहा- इस समय आपके साथी आपत्ति में है, सीताजी आपत्ति में है, अधर्म के बादल छाये है, उन्हें दूर करना पड़ेगा। आज की यही साधना है। हनुमानजी ने स्वीकार कर लिया कोई आग्रह नहीं किया कि कोई जप, तप, ध्यान बताइये। यह आग्रह तो उन लोगों का रहता है जो कुछ पुरुषार्थ नहीं कर सकते, जिन्हें मेहनत से काई लगाव नहीं है,

सेवा के प्रति जिनके अन्तःकरण में कोर्ठ उत्साह, कोर्ठ उमंग नहीं होती। ऐसे आदमी खाली बैठे रहें तो कुछ बकता नहीं पड़ेगा- कि लकड़ी की माला ही घुमाते रहे। अरे बाबा, खाली पड़े रहने की अपेक्षा माला घुमाना और राम का नाम लेना क्या बुरा है लेकिन उपासना का मतलब राम नाम लेना, माला घुमाना ही नहीं होता। हर जगह माला काम नहीं आती है, ऐसी बात नहीं।

उपासना की दृष्टि से सामयिक कर्तव्यों, सामयिक जिम्मेदारियों का परिपालन करना बहुत जरूरी है। हनुमान जी ने ही किया और जिस दिन से भगवान की शरण में आये, उनकी अनुसार जीवनभर साधना करते रहे। अपनी मर्जी की साधना की? नहीं, अपनी मर्जी की साधना नहीं की । भगवान ने हुकुम दिया-सीता को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूँढ़ लाये, अंगूठी दे आये और माँ की निशानी लाकर दी ओर कहा देखिये हम पता लगा लाये। बस काम नम्बर एक पूरा हो गया। दूसरा अध्याय साधना का शुरू-अब चलें राक्षसों से लड़ने के लिए, युद्ध की तैयारी करें-साधन जुटाएँ हनुमानजी अपने मोहल्ले में गये और सारे रीछ-बन्दरों से बोल चलिए, हम तो भगवान के काम के लिए जा ही रहे है, आप सब भी चलिए। हनुमान जी ने ऐसा उत्साह भरा कि सब के बस उनके साथ चल दिये, उनमें नल-नील जैसे अच्छे-खासे इंजीनियर भी थे, जो बड़ी इमारत भी बना सकते थे। ये सब अपने आप आये थे? कोई अपने लगा, हनुमानजी लाये थे सबको। हनुमान जी ने लड़ाई के सारे साधन जुटाये और राक्षसों को तबाह करने के लिए पेड़ तक उखाड़े जब लक्ष्मणजी मूर्छित हो गये और सुषेण वैद्य ने बूटी बतायी तो पूरा पहाड़ ही उखाड़ ले आये। जप-जप-जप, एक ही बात सीखी है आपने, दूसरी बात नहीं सीखी। सबसे सुगम वाला काम बैठे-बैठे लकड़ी हिलाने, का। इतनी सस्ती उपासना समझा ली है। आपने? उपासना इतनी सस्ती होती है कहीं? जिसमें कष्ट न उठाना पड़ता हो, पुरुषार्थ न करना पड़ता हो, इतनी सस्ती साधना भी कहीं होती है। क्या ? इतनी कीमती चीजें आप इतनी सस्ती कीमत पर खरीदने की कोशिश करेंगे? ऐसा मत कीजिए। वास्तविकता के नजदीक आइये।

भगवान को प्राप्त करना चाहते हो तो भगवान का कहना भी मानिये! शरणागति इसी का नाम है, समर्पण इसी का नाम है। समर्पण और शरणागति यह कि हम भगवान का कहना मानें, न कि भगवान आप हमारी मनोकामना पूरी कीजिए। आप अपनी मर्जी पर भगवान को चलायेंगे? आपकी मर्जी पर चलेंगे वे? आप है कौन जो आपको यह जुर्रत, यह हिम्मत हो गयी कि आप भगवान के ऊपर यह हुकुम चलायें कि हमारी मनोकामना अभी पूरी कीजिए। आप अपनी मर्जी पर चलेंगे वे? आप कौन है? अपना नाम तो बताइये? आप हैं कौन जो आपको यह जुर्रत, यह हिम्मत होती है कि आप भगवान के ऊपर यह हुकुम चलायें कि हमारी मनोकामना अभी पूरी कर दीजिए? शरीर और मन आपको मिल गया, कुटुम्ब आपको मिल गया, कला आपको मिल गयी, साधन आपको मिल गये, फिर भी आपकी यह जुर्रत और यह हिम्मत कि आप भगवान से कहे कि हमारी दैनिक जरूरतें पूरी कीजिए। इन चीजों की पूर्ति आप स्वयं आसानी से कर सकते हैं, अन्यथा एक दिन आप कहेंगे भगवानजी हमारी गन्दगी साफ कीजिए, हमारे कपड़े धोइये। मनोकामना में ये बात भी शामिल है। आप क्यों पुरुषार्थ करने लगे? क्यों योग्यता सम्पादन करने लगे? आप तो अपने सब काम भगवान के करा लीजिए। खाना चबाने के लिए भी भगवान जी से कहिए कि आप खाना चबाकर हमारे मुँह में डाल दिया कीजिए। मित्रों, आपको ये बाते शोभा नहीं देती आपको अपना पुरुषार्थ जाग्रत करना पड़ेगा और भगवान का कहना मानना पड़ेगा।

ग्वाल-बालो की बात सुनी है न आपने? ग्वाल-बाल भगवान के परमप्रिय मित्र थे, लेकिन ग्वाल-बाले को उन्होंने रामायण पाठ कराने की बजाय, अखण्ड आओ दोस्तों! गोवर्धन पहाड़ को उठायेंगे। ग्वाल-बालो ने उनका ही कहना उठायेंगे। ग्वाल-वालो ने उनका ही कहना माना किसी ने भी यह नहीं, कहा कि साहब रामायण का अखण्ड पाठ कराइये हमको तो सत्संग कराइये, हमको भण्डारा कराइये। भगवान तो भगवान हैं, यदि उनके प्रति समर्पण है तो उनकी आज्ञा-उनकी आज्ञा है। हुकुम दिया की पहाड़ उठाना है तो उन्होंने पहाड़ को टेका लगाना और पत्थरों को जमा करना ऐसा की कृत्य समझा-मानो कोई बड़ा भारी पुण्य कर रहे हो, दान कर रहे हों।

पहले हम इस बात का फैसला कर सकें कि हमको क्या क्या करना चाहिए? कुछ करने के लिए किसी महती शक्ति के साथ में अपना सम्बन्ध जोड़िए और कठपुतली के तरीके से उसका कहना मानकर उसके पीछे-पीछे चलिए? यही सही और मुनासिब तरीका है, लाभदायक भी यही है इसलिए इस संधि के समय में हम सबको बड़ा महत्वपूर्ण काम करना है। आज जन-जन के मन को परिष्कृत करने की आवश्यकता है। आदमी का मन, आदमी का चिन्तन ऐसा भ्रष्ट हो गया है।

कि अपने आवरण को दुष्ट बनाने में उसे कोई हया-शर्म नहीं आती। चार आदमी के है ही नहीं विचार सब अस्त-व्यस्त हो गये हैं। आज की सबके बड़ी आवश्यकता विचार-क्रान्ति की है , जन-मानस के परिष्कार की है, लोकमंगल के लिए जन-जागरण की है। आप यदि इस काम को करते हैं तो सही माने में युग संधि की साधना करते हैं।

आप जिस परिवार के मेम्बर हैं, यह परिवार बड़ी मुसीबत से, बड़ी मुश्किल से और बड़ी देखभाल से बनाया गया है। इसमें हमने ढूँढ़-ढूँढ़ करके ऋषि-महर्षियों को, कितनी डुबकी लगाकर के एक-एक मोती कहाँ-कहाँ से इकट्ठा किया है आपको किसने इकट्ठा किया ओर किसलिए साधना में लगाया है? इसलिए, ताकि आप भगवान के ऊपर अहसान करने में सर्ता हो सकें कि आपका अहसान भगवान कभी नहीं भूलें। भगवान अहसान लेते नहीं, हनुमान को उन्होंने अपने राज कुटुम्ब का सदस्य बना लिया। आपने राम पंचायतन के चित्र देखे हैं न ? उसमें पांच तो वे चार भार्ठ ओर सीताजी हैं, पाँच तो वे चार भार्ठ ओर सीताजी हैं, पाँच नाम से पंचायतन हो जाता है, लेकिन आपने हर चित्र में हनुमानजी को शामिल देखा होगा। छठवें हनुमानजी क्यों थे, क्या वजह थी? सिर्फ एक ही वजह थी कि ‘राम काज कीन्हें बिना मोहि कहाँ विश्राम। ‘ उन्होंने ये नी सोचा कि अपनी इच्छा से, अपने मन से बैकुण्ठ को जाएँगे। अपनी मुक्ति कराएँगे, अपना फायदा कराएँगे, अपना चमत्कार-अपनी सिद्धि देखेंगे। क्योंकि जब अपना पतन मिटा दिया तो अपनी मर्जी कहाँ रही? भगवान की जो कुछ मर्जी थी, वही उन्होंने पुरी की ओर रामचन्द्रजी के वही उन्होंने पूरी की ओर ओर रामचन्द्रजी के कुटुम्बियों में शामिल हो गये। आप भी अपनी मर्जी छोड़कर ऐसा ही कीजिए।

कभी इस बाबाजी के पास, कभी उस पंडाजी के पास, कभी गुरुजी के पास कही झक मत मारिये। आपके भीतर बैठा हुआ, अन्तःकरण में बैठा हुआ भगवान मार्गदर्शन कर सकता है ओर वह ऐसा विलक्षण मार्गदर्शन होगा जैसा कि अर्जुन के घोड़ों को चलाने के लिए कृष्णा भगवान ने किया था। गाण्डीव चला रहे थे, अर्जुन, ने किया था। गाण्डीव चला रहे थे अर्जुन, लेकिन घोड़ों को चलाने का, सही रास्ता बताने का, मोर्चे की जानकारी कराने का काम भगवान कृष्ण का था। अप भी ऐसा ही कर सकते हैं। ज्यादा बहस में पड़ने की बजाय कि हमको ये करना है, यह स्कीम, वह स्कीम। ये नौ सौ निन्यानवे की स्कीम मत बनाइये। आप एक ही स्कीम बनाइये, क्योंकि किसी महती सत्ता की छाया में बैठेंगे तभी तो कहना मानेंगे। बच्चे बड़ों का कहना माने, इसी में लाभ है। बन्दर का एक बच्चा उछल-कूद कर रहा था। बन्दर मना कर रहा था कि ये बड़ी-बड़ी चीजें हैं, इनसे दूर रह, पर वह मानता ही नहीं। एक दिन दो लकड़ियों को चीरने के लिए मशीन के बीच में खाँचा लगा हुआ था। बन्दर का बच्चा उससे दब गया और चीं-चीं करता रहा उसके घरवालों ने बड़ी मेहनत से हाथ निकला। यदि बन्दर की बात मानी होती तो तो शायद हाथ घायल न होता।

आप भी इसी तरीके अपनी मर्जी कहाँ तक करेंगे कि हमको ये साधना बताइये, हमको बीजमंत्र बताइये। तत पूछिये, हमने तो ऐसा नहीं पूछा है। अपने जीवन की साधनाओं के बारे में हमने हमें ये बता54 दीजिए,ख् इसका मंत्र बताइये, उसका तंत्र बताइये। हमने अपनी मर्जी खतम कर दी ओर उनसे कहा-हुकुम कीजिए। उन्होंने जो कुछ भी कहा हम बिना सोचे-समझे, आँखें मूँदकर उस रास्ते पर चलते रहे। हमें विश्वास था कि हमको रास्ता दिखाने वाली सत्ता हमसे सही और समर्थ है। आज हम कहाँ से आपके लिए भी यही रास्ता है। आपके सामने समय की माँग इस तरीके की है, जिसे आपको पूरा करना चाहिए।

रामचन्द्रजी ने जब जन्म लिया था तो उनके साथ में देवतागण भी आये थे। देवताओं ने भगवान से कहा कि मनुष्य तो बड़े चालाक होते हैं। उनमें त्याग परोपकार और सेवा का भाव कहाँ? मनुष्य तो केवल अपने स्वार्थ की बात सोचते रहते हैं आप जो काम करने जा रहे हैं उसके लिए स्वार्थियों से थोड़े ही काम चलेगा, परमार्थियों के दल चाहिए। परमार्थियों के दल चाहिए। परमार्थियों के दल कहाँ से आएँगे? आजकल संसार में तो हैं, भी नहीं, चलिए हम आपके साथ चलते हैं। बस, शंकरजी हनुमानजी के रूप में और अन्य देवताओं ने अपनी भूमिका निभायी। आप को भी प्रज्ञा अवतार के साथ में उन्हीं देवताओं के तरीके से भगवान के काम में हाथ बँटाना, हिस्सा बँटाना है। ऐसा करने के लिए जरूरी है कि बँटाना है। ऐसा करने के लिए जरूरी है कि आप उसकी कीमत चुकायें और भगवान की मर्जी पर इस समय चलना स्वीकार कर लें।

समाज के नये निर्माण के लिए समाज को नये ढाँचे में ढाला जाना है। पुराना ढाँचा इतना जीर्ण-शीर्ण हो गया है। कि अब उसे गलाने और नया ढालने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। इस गलाई-ढलाई में आप हिस्सा बंटाइए। आप अपने समय, अपनी शक्ति, अपने मन, अपनी भावना, अपने विचारों को लेकर आइये और इस काम में जुट जाइये। आज के इस युग का भगवान जिनको हम प्रज्ञावतार कहते हैं।उस प्रज्ञावतार की मर्जी क्या है ये आँख खोलकर देखिये और कान खोलकर सुनिये कुछ ऐसी जानकारियाँ आपको प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत बार-बार बतायी जा रही हैं जो भगवान की प्रेरणा, भगवान की दिशाधारा है। देवताओं ने भगवान ने सोचा कि धरती पर उनका सहयोग कौन करेगा, अगले कैसे क्या कर पायेंगे? देवताओं ने कहा-प्रभु, हमें भी चलने की आज्ञा दीजिए, हम भी आपके साथ-साथ चलेंगे और आपके काम में हाथ बंटाएंगे। भगवान ने जन्म लेकर उनका सहयोग किया।

पाण्डव कौन थे, आपको मालूम है, कथा पढ़ी है? शायद नहीं पढ़ी है। पाण्डव पाँच देवताओं के बेटे थे। कर्ण भी देवता का बेटा था। कुन्ती के गर्भ से देवता सिर्फ इसलिए पैदा हुए थे कि भगवान श्रीकृष्ण के काम आयें। धर्मराज ने क्या किया? अर्जुन ने कौन-सा बड़ा काम किया? भीम ने किसका क्या किया? नकुल-सहदेव किस काम में लगे रहे? इन सबने मिल-जुलकर सिर्फ एक काम किया कि भगवान की आज्ञा मानी, भगवान के काम आये। ये कैसे सम्भव हुआ? क्योंकि वे देवता थे। देवताओं की भावनाएँ को पाप इज्जत मिलनी चाहिएं। उनकी औलाद साधन संपन्न होनी चाहिए। बस, भावनाएँ बड़ी होती है। वे समझते हैं कि हमको परोपकार करना चाहिए। भगवान की आवश्यकताओं को समझकर योगदान करना चाहिए। भगवान की आवश्यकताओं का समझकर योगदान करना चाहिए। पांडवों ने सारी जिन्दगी यही किया। आप भी ठीक उसी तरह के है। आप अपने आप को देवता माने तो कोई हर्ज नहीं है।

आज प्रज्ञावतार का युग है। भगवान की नयी शक्तियों ने जन्म लिया है। ज्ञान की गंगा भी बहा दी है। इस समय जिन शक्तियों का जन्म हुआ है वे बराबर ये कोशिश कर रही है। कि लोग अपने खयालात बदल दे ओर नय विचारों की स्थापना हों। प्रज्ञा अभियान की है ओर भगवान वास्तव में इसका संचालनकर्त्ता है। तो फिर अवतार से इसका क्या मतलब है? हवाई जहाज पेट्रोल से उड़ता है ठीक है पायलट उड़ाता थोड़े ही है, वह तो मशीन घुमा देता है ठीक इसी तरह हम हैं और दूसरे लोग है। ये तो अपनी मशीन घुमा देते हैं पर ताकत कहाँ से आती है? वह ताकत कहाँ से आती है? वह ताकत भगवान की है, महाकाल की है। हवाई जहाज तो करोड़ों रुपये का आता है, लेकिन करोड़ों रुपये के इस हवाई जहाज को पैदा करने की शक्ति पैदा करने की शक्ति पैदा कीजिए। आप इस समय अपनी सारी इच्छाओं और आकाँक्षाओं को सिर्फ इस काम में लगा दीजिए कि हमें समय की माँग पूरी करनी है, युगस्रष्टा की भूमिका निभानी है। युगस्रष्टा की भूमिका निभाने के लिए आप आगे आगे बढ़ेंगे तो आपको पूरा-पूरा सहयोग मिलेगा। आप जाग्रत देवदूतों की रीति नीति अपनाएँ और आगे बढ़ें।

देवदूतों ने इन्तजार नहीं किया ओर न ही यह देखा कि दूसरे करेंगे तो हम करेंगे। हिमालय के ऊँचे शिखर पर सबसे पहले होती है। उसका दर्शन करके लोग अपने को धन्य समझते हैं। आप भी अपनी धूप चमकाइये, सबसे पहले। झंडा आगे आगे चलता है तो दूर से से दिखायी पड़ता है आप आगे-आगे चलिए और दूसरों को रास्ता बताइये। लड़ाई में बैण्ड-बाजे, बिगुल बाजे आगे-आगे चलिए और दूसरों को रास्ता बताइये। लड़ाई में बैण्ड-बाजे, बिगुल बाजे आगे-आगे चलते हैं। आप भी ताकि सारी सेना में हिम्मत पैदा हो सके। आप जिस युग प्रहरी की भूमिका निभाने वालों की पीढ़ियाँ सदैव याद रखेंगी और श्रद्धावनत हो उन्हें नमन करेगी। आप सब देवात्मा है।, युग प्रहरी है। ओर आप की इच्छा क्या है? अरे बाबा, हम कहते हैं कि युग कि जरूरतें क्या है। ओर आप की इच्छा क्या है।? अरे बाबा, हम कहते हैं। कि अपनी इच्छा को एक कोने में रखिए। भगवान की इच्छा को एक कोने में रखिए। भगवान की इच्छा क्या है। समय की माँग क्या है। ? प्रज्ञावतार की माँग क्या है। आप कान खोलकर सुनिये उसे और सुनने के बाद पूरी हिम्मत के साथ, पूरी वफादारी और जिम्मेदारी के साथ उसे निभाने में जुट जाइये। जिस तरह भगवान राम और भगवान कृष्ण की आवाज सुनने और उनके रामराज्य तथा महाभारत की स्थापना के उद्देश्य को पूरा करने में सहयोग देने वाले रीछ-वानर एवं ग्वाल-बाल धन्य हो गये। उसी तरह बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन में सहयोगी चीवरधारी भिक्षु एवं गाँधी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने वालों की लोग अपनी श्रेणी में गणना करते और उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। महाकाल के युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया में भारत लेने वालों को हमारा यह आश्वासन है कि वे भी मनुष्य में देवत्व के उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लक्ष्य को पूरा करने में सफल होंगे और धन्य बनेंगे। आने वाली पीढ़ियाँ उनसे इस कृत्य की न केवल सराहना करेगी, वरन् उनसे प्रेरणा प्राप्त कर अपने जीवन का सही लक्ष्य निर्धारित करेगी। आज की बात समाप्त ॐ शांति ।।


किसी की उपेक्षा न करें(Kahani)

एक सूफी कथा है किसी प्रेमी ने अपनी प्रेयसी के द्वार को खटखटाया। भीतर से पूछा गया कौन है ? प्रेमी ने उत्तर दिया मैं हूँ तुम्हारा प्रेमी प्रत्युत्तर मिला इस धर में दो का स्थान नहीं है। कुछ दिनों बाद प्रेमी पुनः उसी द्वार पर लौटा। इस बार “कौन है” के उत्तर में उसका जवाब था-”तू ही है।” और वे बन्द द्वारा उसके लिये खुल गये। ईश्वर और जीव के सम्बन्ध ऐसे ही होते हैं।

दक्षिण भारत की यात्रा करते समय एक बार गाँधीजी, महादेव भाई और काका कालेलकर जी को एक साथ काम करने का अवसर पड़ा। एक दिन सभाओं और विचार-गोष्ठियों का कुछ ऐसा ताँता बँधा कि उन्हें दिनभर एक क्षण का भी विश्राम करने का अवसर नहीं मिला। लौटे भी काफी रात गये। थकावट के तारने उनके शरीर बुरी तरह शिथिल हो चुके थे। वहां शिथिल हो चुके थे। वहाँ से आते ही तीनों चारपाईयों पर पड़ गये ओर पड़ते ही सौ गये।

चार बजे नींद टूटी। गाँधीजी का नियम था कि वह सायंकाल सोने के पूर्व और प्रातःकाल जगते ही प्रार्थना किया करते थे। उनके सभी साथी और अनुयायी भी इस नियम का पालन किया करते थे। प्रातःकालीन प्रार्थना के लिये एकत्रित हुए, काका कलोलकर से गाँधीजी ने बड़े दुःख भरे स्वर में पूछा-”शाम की प्रार्थना का क्या हुआ? काका जी ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया-”बापू जी!मैं तो थकावट के मारे आते ही सो गया, प्रार्थना करना बिलकुल भूल गया।” महादेव भाई ने भी डरते-डरते कहा-”बापू जी! थकावट के मारे आते ही सो गया, प्रार्थना करना बिलकुल भूल गया।” महादेव भाई ने भी डरते-डरते कहा-”बापू जी! थकावट के कारण मैं भी सो गया। मेरी बीच में नींद टूटी, तब मैंने चारपाई में बैठकर मन-ही-मन प्रार्थना कर ली, भगवान् से क्षमा माँगकर फिर सो गया।”

गाँधीजी का दुःख बहुत गहरा था। उन्होंने कहा-”मेरा मन तो आज बहुत ही अस्वस्थ है। मैं कल की प्रार्थना क्यों नहीं कर सका? क्या सोना इतना आवश्यक था कि भगवान् का स्मरण तक न किया जाता? इसके बाद प्रातःकालीन समझाते हुए-” बापूजी, आप ही तो कहते हैं कि भगवान् के नाम से उनका काम बड़ा है। आप उनका काम करते हुए गया, इसमें बुरा क्या हो गया? “ “ माँ की इस सिखावन को कि भगवान् का नाम लेना कभी न भूलना, मैं कैसे भूल गया? दैव दूर रहने मकल शिक्षा दी थी, में डूबकर मैं भगवान् का नाम और काम कही दोनों न भूल जाऊँ।”

उस दिन सभी उपस्थित लोगों ने एक शिक्षा ग्रहण की। संस्कारों की जीवन-साधना में महत्ता की व छोटी-सी बात समझकर कभी किसी की भी उपेक्षा न करने की।


महर्षि ने जानी नारी की पार

सन्ध्या का समय था। सूर्य अस्ताचल को ओढ़कर अपना मुख ढाँकने की चेष्टा कर रहा था। मन्द-मन्द हवा बह रही थी और उसी के साथ भगवती भागीरथी का जल कल-कल की ध्वनि के साथ प्रवाहित हो रहा। तट पर, एक शिला पर बैठे स्वामी दयानन्द आत्म चिंतन में निरत थे-परमात्मा की यह सृष्टि कितनी सुन्दर है, इसमें सर्वेश्वर की संव्याप्त चेतना कितनी आनन्दप्रद है। महर्षि भावों में डूबे हुए देख रहे थे कि पक्षी दिनभर के श्रम से थककर आये अपने घोसलों में विश्राम के पूर्व चहक रहे थे। लगता था कि वे अपने बच्चों रहे थे। लगता था कि वे अपने बच्चों के साथ बैठकर साध्य गीत गा रहे हों।

हे अनन्त के स्रष्टा और आनन्द के दाता! तुझे कोटिशः प्रणाम-महर्षि प्रणत भाव से बुदबुदा उठे। प्रकृति भी सन्ध्यता की मन्द, शीतल पवन के हिलोरों से मुदित होकर शयन की तैयारी कर रही थी। चारों ओर एकान्त था। ध्वनियाँ थी। तो केवल पक्षियों की चोंच से निकले आनन्द की संगीत बज रहा हो और ऋषि के हृदय में भी आनन्द की वीणा बज रही थी। वे प्राणायाम करते, दीर्घश्वासों उच्छ्वास छोड़ते, पुनः प्राण भरते और समाधिस्थ हो जाते ।

ध्यान टूटा तो पास ही कहीं से आती हुई सिसकियों से । लगता था कोई किसी से सदा के लिए बिछुड़ रहा हो, और सिसकने वाला जाने वाले को भगवती जाह्नवी को सौंपकर अन्तिम विदा दे रहा हो।

ऋषि ने उस ओर देखा, जिस ओर से सिसकी आ रही थी। न अधिक दूर और न अधिक समीप। एक दीन-हीन जीर्ण वस्त्र पहने नारी देह अपने शिशु का शव जल समाधि देने के लिए झुकी ।

शिशिर की शीत, समीर के मन्द झोंके और जाह्नवी के शीतल जल की ठण्डक ने जैसे माँ को कँपकँपा कर रख दिया। अब तक आकाश में सितारों के समूह के बीच उदय हो चुके निशानाथ की धवल चाँदनी में महर्षि ने उस नारी कँपकँपी को स्पष्ट महसूस किया। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि यह कँपकँपाहट वातावरण में संव्याप्त शीतलता की है अथवा उस पीड़ा की, जिसके बिछोह से उसका अंतर्मन व्याकुल हो रहा होगा।

अभी थोड़े ही क्षणों पूर्व वह अबला इन्हीं शीतल झोंकों के कारण पानी में लुढ़कते-लुढ़कते बची थी। उसकी एकमात्र ओढ़नी जिसका उपयोग उसने कफ़न के लिए भी किया था, भीग चुकी थी। अब वह पुत्र के तैरते हुए शव को किनारे पर बैठी फटी-फटी आँखों से निहार रही थी। शब जब आँखों से ओझल हो गया तो दुःख, विलाप ओर विवशता की त्रिवेणी में डूबती हुई वह लौटने लगी।

लौटते हुए वह ऋषि के समीप से होकर गुजरी । व्यथा के दूसरा भार के कारण उसके पाँवों में लड़खड़ाहट स्पष्ट थी। चन्द्रमा के मध्यम उजाले में उसके चेहरे पर पीड़ा व विवशता की झलक साफ नजर आ रही थी।

समीप आने पर ऋषि ने सांत्वना के स्वरों में पूछा-”देवी! क्या इस शिशु का पिता साथ नहीं आया।”

फूट पड़ी वह । बड़ी कठिनता से बोली-”वृद्ध पति अभी दो माह पूर्व ही मुझे अकेली छोड़कर चले गए हैं ओर अब यह पुत्र भी।”

आयु तो वह अभी युवती ही दिखाई दे रही थी। उसकी उम्र मुश्किल से अट्ठारह-बीस वर्ष की रही होगी। गैर-वर्ण, निर्दोष मुखमण्डल, इकहरा शरीर, उसका परिचय किसी विवाहिता के रूप में न देकर विवाह योग्य कन्या के रूप में दे रहे थे। लेकिन उसने अपने पति के साथ वृद्ध का सम्बोधन लगाकर अनायास ही ऋषि के हृदय को झकझोर दिया था। भयभीत हिरणी से नेत्रों में पीड़ा का अगाध और अनन्त समुद्र समेटे वह कहे जा रही थी- “अब मेरा कोई नहीं है महाराज। पुत्र था जो भी गया। समझ में नहीं आता वैधव्य किसके सहारे, कैसे गुजारूं? माता-पिता ने तो मुझे पहले ही बोझ मानकर कूड़े की तरह फेंक दिया था वृद्ध पति भी गए और अब यह पुत्र भी । पतवार विहीन नौका की भाँति इस संसार सागर में मैं अकेली हूँ, सर्वथा अकेली।”

हे सर्वेश्वर! महर्षि दयानन्द तड़प उठे। हे प्रभु! अब तू मुझे मेरी माताओं का इस रूप में दर्शन करा रहा है, ऋषि के ओष्ठ फड़फड़ाए। वे विचारमग्न हो रहे थे सृष्टि को अपनी कोख, से जन्म देने वाली माता की दीन-हीन, उपेक्षित, अपमानित सहने के लिए? आखिर उसकी सन्तान इतनी कृतघ्न क्यों है? क्यों समझा जाता है, उसे परिवार-समाज का भार ? उसमें बुद्धिमत्ता है, भावना हैं, कार्यक्षमता है। वेद भाष्यकार स्वामी जी अपनी विचार मग्नता में सोचे जा रहे थे, क्या यही है अपने ज्ञान से याज्ञवल्क्य को परास्त करने वाली गार्गी के देश की नारी। क्यों अवरुद्ध है उसके जीवन का पथ? महर्षि की विचारमग्नता का देखकर वह स्त्री जा चुकी थी। पर ऋषि को एक नयी दृष्टि देकर।

अब वे चैन से नहीं बैठ सके। उन्होंने संकल्प लिया कि माताओं की यह दुर्दशा करने वाली परिस्थितियों को बदल कर रहूँगा। अकेला अपना कल्याण कर लिया तो मुझ-सा स्वार्थी और कौन होगा? जिस माँ का दूध पिया, उसके आँचल की स्नेह छाया में रहा, उसे ही भूला देना, यह मात्र स्वार्थ ही नहीं कृतघ्नता भी है।

और अतीत बताता है। पहली बार अब से शताधिक वर्ष पूर्व वेदज्ञ महर्षि दयानन्द ने बाल-विवाह-नारी तिरस्कार अनमेल-विवाह जैसी नारी शक्ति से जुड़ी कुरीतियों को चुनौती दी तथा उन्हें हटाने के लिए आजीवन संघर्षरत रहे एक हम है जो आये दिन अपनी आँखों से नारी की लज्जा और स्वाभिमान को तार-तार होते हुए देखते हैं पर कायर और कृतघ्न की तरह उनसे जूझने से कतराते ही रहते हैं।


लोकनायक ही नवसृजन कर पायेंगे

हर युग की अपनी माँग होती है। समय अपनी मलिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समाज से गुहार करता है। इसे सुनना, समझना और इन जरूरतों को पूरा करने के लिए उद्यत होना उन्हें बन पड़ता है, जिनके दृष्टिकोण विशाल है। और हृदय भावनाओं से भरे है। शायद है और हृदय भावनाओं से भरे है। शायद इसी का अभाव ही है। कि लोग सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश तो करना चाहते हैं, लेकिन वे राजनीति को ही सब कुछ समझ लेते हैं। पिछली लोकसभा और अभी हाल में हुए विधानसभा चुनावों में जितने स्थान थे उन पर जितने प्रत्याशी खड़े हुए, उसे देखते हुए उस वर्ग की अभिरुचि का सहज ही पता चल जाता है दूसरे देशों में प्रायः दो तीन से अधिक उम्मीदवार कहीं नहीं होते हैं और वे भी संगठित संस्थाओं के मंच पर ही चुनाव लड़ते हैं। उनके पीछे कुछ आदर्श होता है, कुछ कार्यक्रम, पर अपने देश में सस्ती वाहवाही लूटने, जिस किसी तरह प्रचारित होने और बन सके तो सस्ती वाहवाही लूटने, जिस किसी तरह प्रचारित होने और बन सके तो सत्ता सिंहासन पर जा चिपकने के लिए कोई भी उम्मीदवार खड़ा हो जाता है और मतदाताओं में प्रतिभ्रम पैदा करके उपयुक्त प्रत्याशियों का भी मार्ग अवरुद्ध करता है।

अभी पिछले दिनों हुए चुनावों दृष्टिपात करे और उसका लेखा-जोखा ले तो प्रतीत होगा कि असफल हजारों प्रत्याशी ऐसे थे, जो राजनीति के वर्चस्व के क्षेत्र में प्रवेश करने की लालसा से एड़ी-चोटी का पसीना एक कर रहे थे। उनका चोटी का पसीना एक कर रहे थे। उनका करोड़ों रुपया भी इस प्रयास में खर्च हुआ। इतनी लालसा, दौड़-धूप और खर्चीली राह क्यों अपनायी गयी? इस संदर्भ में किसी व्यक्ति विशेष की शान में कुछ कहना उचित न होगा। हो सकता है उनमें के कुछ सचमुच देश-सेवा के लिए राजनेता बनने के लिए उत्सुक हो। लेकिन बहुसंख्यक ऐसे होते थे जो यश, प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए , सस्ते में प्रचारित होने के लिए खड़े हुए थे। ऐसों की संख्या भी कम न थी। जिन्होंने यह सट्टा इसलिए खेला था कि सफल होने पर ऐसे दांव−घात लगाएँगे जिनसे एक के बदले सौ कमाने का अवसर मिल जाय। कुछ के मन में तो बड़ी लालसा रही होगी, पर परिस्थिति वश मन मारकर बैठना पड़ा होगा।

जो हो, इतना तो स्पष्ट है कि सार्वजनिक क्षेत्र में आने के लिए लोक अथवा सेवा-साधन को कोई भी प्रयोजन अपनाने के लिए, यश-सम्मान पाने अथवा सेवा-साधन को कोई भी प्रयोजन अपनाने के लिए हैं। इन सबका मिला जुला रूप भी ऐसा हो सकता है, जो इस जुला रूप भी ऐसा हो सकता है, जो इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए लालच उत्पन्न करे। यह उभरता हुआ तयि हम उन लोगों के बची भी देख सकते हैं, जो संस्ि ओि के भीतर परदो की प्राप्ति के लिए धक्का-मुक्की करते हुए अवाँछनीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यह संख्या कम नहीं हैं लोकसेवा का आवरण ओढ़े हुए अधिकांश लोग इसी बीमारी से ग्रसित है। अधिकाँश लोग इसी बीमारी से ग्रसित हैं फलतः सार्वजनिक जीवन की पवित्रता आज इस कदर नष्ट हो गयी है कि इस क्षेत्र में काम करने वाला प्रायः हर व्यक्ति सन्देह की नजरों से देखा जाने लगा है और इस क्षेत्र में धक्का-मुक्की करने वाले लोग भी हर दृष्टि से असफल रहे है। न उन्हें यश मिल रहा हैं न श्रेय । लोकसेवा तो उस ओछी मनःस्थिति में बन ही कैसे पड़ेगी?

होना तो यह चाहिए कि जो जनसेवा के लिए इच्छुक और उत्सुक है, वे राजनीति की अपेक्षा सामाजिक क्षेत्र में उतरते और उन कार्यों को हाथ में लेते जा राजनीति की अपेक्षा अधिक ठोस और अधिक स्थायी है। यश और सम्मान की दृष्टि से भी राजनीति का क्षेत्र बड़ा अस्थिर और कुटिल है जब तक एम.एल.ए., एम.पी. या मिनिस्टर है तब तक लोग बन्दगी करते हैं और जैसे ही वह टोपी उतरी कि सड़क चलते मुसाफिरों से कुछ तो इस काजल नहीं रह जाती। यदा-कदा तो इस काजल इज्जत नहीं रह जाती । यदा-कदा तो इस काज की कोठरी से निकलने के बाद चेहरे में लग चुकी काज की कालिख के कारणों जेल की कोठरी तक नौबत आ पहुँचती है और यह नेक काम उन्हीं हाथों से होता है, जो कल तक बन्दगी के लिए जुड़े रहते थे इसी वजह से उस स्वल्प-कालीन सम्मान या पद को प्राप्त करने के लिए आगे बनाए रहने के लिए किन्हीं-किन्हीं को ऐसे प्रपंच भी करने पड़ते हैं, जिनसे उनकी आत्मा दिन पर दिन ऐसी कलुषित होती चली जाय कि ईश्वर के दरबार में वह तथाकथित लोक सेवा लोकद्रोह से भी अधिक बुरी ठहरायी जाय।

राजनीति में वर्चस्व प्राप्त करने के लिए लोगों की भीड़ और धक्का-मुक्की अत्यधिक है। घुसने वालों को भीतर बैठे हुए लोग रोकते हैं। शायद यही कारण है। कि आज इस क्षेत्र में ज्यादातर वही लोग घुस पाते हैं, जो अपने पिछले जीवन में गुण्डा-बदमाश अथवा अपराधी रहे हो। भीड़ वाली और खतरे से भरी इस गाड़ी में पायदान पर लटकते हुए चलने का जोखिम उठाने की अपेक्षा यह अच्छा है कि भीड़ वाला, सुरक्षित वाहन पकड़ा जय। ीरत का सामाजिक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें लोकमंगल के लिए बहुत कुछ करने की बहुत गुँजाइश है । उस क्षेत्र में बिना प्रतिस्पर्धा के सच्ची लोकसेवा की जा सकती है और उस मार्ग पर चलते हुए सच्ची और चिरस्थायी यश कामना भी पूर्ण हो सकती है।

सच तो यह है कि अपने देश का पिछड़ापन दूर करने में राजसत्ता उतनी सफल नहीं हो सकती, जितनी कि सामाजिक क्षेत्र में की गयी सेवा-साधना हजार वर्ष की गुलामी से अपना सब कुछ खो बैठने वाले समाज में संव्याप्त नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर किया जाना सबसे बड़ा काम है और उसे राजनीति द्वारा नहीं, सामाजिक सत्प्रवृत्तियों द्वारा ही पूरा किया जा सकता है जिन गाँधी जी को दुहाई देकर राजनीतिज्ञ लोग अपने क्षूद्र स्वार्थों को पूरा करने में संलिप्त हैं उन्हीं राष्ट्रपिता की भावनाएँ थी कि राष्ट्रीय स्वाधीनता के पश्चात् राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्ता और सर्वाधिक प्राचीन राजनीतिक संस्था समाज सेवा के क्षेत्र में उतरे।

गाँधीजी के समय में लोकसेवा के लिए राजनीतिक गतिविधियां युग की माँग थी। उन दिनों समय की पुकार यही थी कि राष्ट्र को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाया जाय इस अपरिहार्यता के बावजूद उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र को उपेक्षित नहीं छोड़ा । नशा निवारण, छुआ-छूत उन्मूलन, मलिन बस्तियों की सफाई जैसे अनगिनत कार्यक्रमों में काँसे के स्वयं सेवकों को दीक्षित किया। शायद यही कारण था कि समाज क्षेत्र की भट्टी में तपे-निखरे से स्वयं-सेवक सत्ता ओर शासन में पहुँचने के बावजूद अपनी ईमानदारी एवं चरित्रनिष्ठा बरकरार रख सके। उस पीढ़ी के समाप्त होते ही जैसे ईमानदारी एवं चरित्रनिष्ठा बरकरार रख सके। उस पीढ़ी के समाप्त होते ही जैसे ईमानदारी एवं चरित्रनिष्ठा का भी लोप हो गया। क्योंकि ये सभी समाज सेवा की उस भट्टी से अछूते रहे, जहाँ उनके व्यक्तित्व की गलाई-ढलाई होनी थी।

बापू के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी के रूप में विनोबाजी ने अपने अन्तिम क्षणों तक समाज तथा सेवा को अपनाकर अपने मार्गदर्शक की भावनाओं को जीवित रखा। उन्होंने राजनीति की अपेक्षा समाज सेवा को अधिक श्रेयस्कर माना। राष्ट्रीय स्वाधीनता के दिराँ में सिकी विदेशी विद्वान ने लोकमान्य तिलक से पूछा, भारतवर्ष की स्वाधीनता के पश्चात् आप स्वतन्त्र भारत के ष्ज्ञासन का कौन-सा पद सँभालता चाहेंगे? पर और शासन का नाम सुनकर लिने मुस्कराते हुए कहा स्वतंत्र भारत में मैं राजनीतिज्ञ की अपेक्षा शिक्षक बनना पसन्द करूंगा और अपनी सारी शक्ति को राष्ट्र की निरक्षरता को समाप्त करने लें लगाऊँगा।

स्वतन्त्रता की पचासवीं सालगिरह मना लेने के बावजूद लिक की बातों का औचित्य यथावत् है। देश अभी भी निरक्षरता की कालिमा से संत्रस्त है। सरकारी स्कूलों में नगण्य-सौ बाल संख्या शिक्षण पा ही है। प्रौढ़ और महिलाओं को मरने तक ऐसे ही निरक्षर रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार शिक्षा के वर्तमान स्वरूप को चलाने में ही चरपरा रही है। सभी को शिक्षित करने में सरकारी खर्चीली योजनाएँ इतने टैक्स लगा देंगी कि उसे वहन करने से तो देशवासी निरक्षर रहना ही पसन्द करेंगे। यह कार्य शिक्षितों में सेवा-भावना उत्पन्न करके गली−गली, मुहल्ले-मुहल्ले प्रौढ़ पाठशालाएँ चलाकर ही पूरा किया जा सकता है। काम-धन्धे में लगे हुए लोग अवकाश के समय अपनी शिक्षा वृद्धि कर सकें, इसके लिए रात्रिकालीन तथा भाव कालीन स्कूलों हर जगह भारी आवश्यकता है।

समाज-सेवा के क्षेत्र और भी है। खर्चीली शादियां समाज की आर्थिक तथा नैतिक दुर्दशा का बहुत बड़ा कारण है। औसतन हर शादी में बीस हजार भी खर्च करने पड़े और हर परिवार को एक पीढ़ी में पाँच शादियाँ भी करनी पड़े तो उस मद में एक लाख खर्च होगा। ऐसे परिवारों की संख्या इस देश में लाखों में होगी। इनकी शादियों पर आने वाला खर्चा भी अरबों-खरबों से भी अधिक होगा। यह धन औसत भारतीय को या तो बेईमानी से जुटाना पड़ता है या रोटी, कपड़े, दवा शिक्षा जैसे जरूरी कामों में कमी करे। जी कर्ज लेते हैं। वे और अधिक दुर्दशा ग्रस्त होते हैं। हजारों लड़कियां अविवाहित रह जाती हैं या फिर आत्महत्या कर लेती है। खर्चीली शादियों की कुरीति मिटाने से जो पैसा बचेगा उसे यदि कृषि, उद्योग आदि में लगाया जा सके तो अपने देश की सम्पन्नता अमेरिका से भी अधिक बढ़ी-चढ़ी हो सकती है।

नशों को ही लीजिए। केवल तंबाकू 10 करोड़ रुपये प्रतिदिन का पिया जाता है शराब, भाँग, अफ़ीम आदि को मिलाकर तो वह 50 करोड़ प्रतिदिन अर्थात् वर्ष के 365 दिनों में तो व्यय भारी अट्ठारह हजार तीन सौ पचास करोड़ पहुंचता है। यदि यह बचाया जा सके तो उतने धन से स्वास्थ्य, शिक्षा आदि की न जाने कितनी समस्याएँ, हल हो सकती है। और स्वास्थ्य गिरना, पैसे की तंगी रहना, गृहकलह, अपराधी प्रवृत्ति जैसी उसके साथ जुड़ा हुई बुराइयों से बचा जा सकता है।

महिलाओं की स्थिति अशिक्षा एवं सामाजिक कुप्रथाओं के कारण अपंग ओर अपाहिज-सी बनकर रह गयी है। समाज की आधी जनसंख्या को याद इस स्थिति से उबारा जा सके। तो दूनी श्रमशक्ति, बुद्धि शक्ति तथा दूनी प्रतिभा राष्ट्रीय प्रगति में योगदान दे सकती है। उपार्जन बढ़ सकता है और समुन्नत वातावरण बन सकता है।

छुआछूत ने जनसमाज के एक बड़े भाग को मानवी अधिकारों से वंचित करके उन्हें पिछड़ी स्थिति में पड़े रहने के लिए विवश कर रख है। उनका असन्तोष और पिछड़ापन दोनों ही राष्ट्रीय प्रगति में बाधक है। अपने समाज पर लगे हुए इस कलंक को धोया जाना आवश्यक है। जाति-पाँति के नाम पर हजारों टुकड़ों में बँटे-बिखरे अपने जर्जर समाज को फिर एकता और समता के सूत्र में बाँधने की आवश्यकता है। सरकारी कानून तो हर बुरे काम के विरुद्ध बने पड़े हैं पर उनके रहते हुए भी सब कुछ हाता रहता है। कानून और आरक्षण के स्थान पर उन्हें अपनत्व देने की आवश्यकता है। इसके लिए आवश्यक वातावरण बनाने के लिए बहुत काम करना पड़ेगा।

गृह उद्योगों के अभाव में महिलाएँ। तथा वृद्ध लोग सर्वथा अनुत्पादक बनकर जीते हैं। उन्हें कुछ काम मिले तो आर्थिक स्थिति सुधरे और बच्चों की शिक्षा तथा पौष्टिक आहार के साधन जुटे। इस दिशा में आवश्यक नहीं कि सरकार ही सब कुछ करे, सामाजिक क्षेत्र में भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है।

गौरक्षा यदि सचमुच करनी हो तो गौ दुग्ध की वरिष्ठता तथा उपयोगिता सर्वसाधारण को परिचित कराना होगी जो लोग गोरस लेना चाहते हैं, उनके लिए इसे उपलब्ध कराने का एक विशाल तन्त्र खड़ा करना पड़ेगा। उन्हें गोदुग्ध, गोबर, बछड़ा, बैलों की उपयोगिता का व्यावहारिक दिग्दर्शन करा देने पर एक ठोस आर्थिक कारण बना जाएगा। और गौरक्षा सम्भव हो जाएगी।

साहित्य क्षेत्र में आज कूड़ा-करकट ही लिखा, छपा और बेचा जा रहा हैं इसे निरस्त करने के लिए उसके स्थान पर ऐसा साहित्य सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध कराना होगा, जो प्रगतिवादी दृष्टिकोण विकसित कर सके। चित्री, जो प्रगतिवादी दृष्टिकोण विकसित कर सके। चित्रों एवं पुस्तकों में भरी अश्लीलता पर कुठाराघात किया जाना नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए नितान्त आवश्यक हैं इस दिशा में सृजनात्मक वस्तुएँ उपलब्ध करने की वास्तविक प्रगति को ध्यान में रखने की वास्तविक प्रगति को ध्यान में रखने की अत्यधिक आवश्यकता है॥ बाल साहित्य नारी साहित्य तो अभी लिखा ही नहीं गया है, जो नई पीढ़ी को, महिलाओं की आवश्यक प्रकाश दे वाले प्रभावशाली पत्रों, का भी एक प्रकार से अभाव ही है।

राजनीति का ढोल पीटने वाले अखबारों की भरमार है। जबकि इस देश में सामाजिक आन्दोलनों को प्रोत्साहित करने की राजनीति से भी हजार गुनी अधिक आवश्यकता है समय की पुकार है कि इस आवश्यकता को पूरा किया जाय।

सिनेमा आज की सर्वप्रिय मनोरंजन हैं देश के हजारों सिनेमाघरों में हर रोज लाखों आदमी देखने आते हैं। टी.वी में प्रदर्शित फिल्मों, सीरियलों को देखने वालों की संख्या तो करोड़ोँ में है। इनमें से अधिकांश फिल्में दर्शकों पर अवांछनीय प्रभाव छोड़ती है। इससे नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का बेतरह ह्रास होता है इसे कोसने कसे काम नहीं चलेगा। सुसंगठित रूप से यदि सृजनात्मक फिल्में बनाई जाने लगें तो उस माध्यम से भावनात्मक नवनिर्माण में बहुत सहायता मिल सकती हैं और नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति का पथ प्रशस्त हो सकता हैं

व्यायामशालाएँ गाँव-गाँव खोले जाने की आवश्यकता है। अपराधी तत्वों से निपटने के लिए सुरक्षा दल गठित किया जाना चाहिए और नागरिकों को अपनी रक्षा स्वयं करना आना चाहिएं खेलकूद की शिक्षा एवं प्रतियोगिता बालिकाओं को जूड़ो-कराटे का अभ्यास न केवल बल्कि नयी पीढ़ी में नया आत्मबल भी जगाएगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण के लिए व्यायाम आन्दोलन व्यापक बनाए जाने की नितान्त आवश्यकता है।

अन्न की कमी-पौष्टिक आहार की न्यूनता को देखते हुए शाक एवं फलों का उत्पादन आज की एक महती आवश्यकता है। सप्ताह में एक दिन शाकाहार की परम्परा चल पड़े तो उससे स्वास्थ्य लाभ के अतिरिक्त अत्र की बचत हो सकती है। बड़ी दावतें एवं अनापशनाप जूठन छोड़ने के विरुद्ध आन्दोलन करके भी अत्र की बरबादी का एक बड़ा भाग बचाया जा सकता है धर-आँगन में फूल एवं शाक उगाने की प्रथा चल पड़ें तो उसे जहाँ सृजनात्मक प्रवृत्ति बढ़ेगी वहाँ घरों की शोभा तथा शाक खरीदने की भी बचत होगी। गाँव के मल-मूत्र तथा गोबर-कूड़े का सदुपयोग सिखाया जा सके तो स्वच्छता की वृद्धि तथा उपलब्ध खाद से अत्र का उत्पादन बढ़ सकता है।

ऐसे छोटे किन्तु महत्वपूर्ण कार्य राष्ट्रीय प्रगति में भारी सहायक हो सकते हैं।

पुस्तकालय शिक्षित वर्ग की ज्ञान वृद्धि के लिए अति उपयोगी माध्यम है। हर व्यक्ति सभी जीवनोपयोगी पुस्तकें खरीदने की व्यवस्था नहीं जुटा सकता । पुस्तकालयों से इस अभाव की पूर्ति होती हैं विचारोत्तेजक साहित्य वाले पुस्तकालय तथा चलपुस्तकालय लोकचिन्तन में प्रखरता लाने की आवश्यकता पूरी करेंगे।

करोड़ की संख्या से भी अधिक होते जा रहे व्यक्ति चित्र-विचित्र वेष बनाकर अथवा थोड़ी-सी शारीरिक कमी का बहाना बनाकर भिक्षा व्यवसाय से जुड़ गए हैं। उन्हें काम करने के लिए विवश किया जाना चाहिए। लोकसेवी अपराधों में गिना जाना चाहिए। लोकसेवी तथा असमर्थ व्यक्ति दान पर जीवनयापन करे तो बात समझ में आती है, पर समर्थ लोगों का वेष बदलकर अकारण हाथ पसार की भीख माँगते घूमना या फिर प्रपंच करे रोटी कमाना, राष्ट्रीय चरित्र पर भारी आघात और मानवीय स्वाभिमान का पतन हैं अपंग, असमर्थों के निर्वाह की व्यवस्था करना समाज का कर्तव्य है, पर भिक्षा व्यवसाय की छूट नहीं होनी चाहिए।

निरर्थक आभूषणों से विलासिता और फैशन में अपव्यय रोकने और उस बचत को उपयोगी कामों में लगाने के लिए वातावरण तैयार किया जाना बाकी हैं बाल विवाह, वृद्ध विवाह, कन्या विक्रय, वर विक्रय, पशुओं के साथ बरती जाने वाली निर्दयता आदि अनेक सामाजिक बुराइयाँ ऐसी है, जिन्हें रोकने के लिए सामाजिक स्तर पर बहुत कुछ किया जा सकता है।

ऊपर की पंक्तियों में उन थोड़ी-सी आवश्यकताओं की बात कही गयी है, जिन्हें आज का समय पूरा करने के लिए आह्वान कर रहा हैं ऐसे अनेकों कार्य और भी हैं, जो युग की माँग का बोध कराते हैं। इन्हें हाथ में लेकर व्यक्ति और समाज की सर्वांगीण उन्नति में बहुत बड़ा योगदान दिया जा सकता है ऐसे आन्दोलनों, को रचनात्मक कार्यक्रमों को हाथ में लेने के लिए यदि संगठित को हाथ में लेने के लिए संगठित प्रयास किए जाएँ तो निःसन्देह सच्ची लोकसेवा हो सकती है।

वैसे भी राजनीति पनप चुकी हैं कि राष्ट्र का सामान्य नागरिक राजनेताओं, राजनैतिक पार्टियों पर विश्वास करने से कतरा रहा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि किसे चुने, किसे कम भ्रष्टाचारी माने। पिछले लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत न देकर जैसे समाज ने राजनेताओं एवं राजनीति को साफ तौर पर नकार दिया है। आवश्यकता शासन और सत्ता के इस वर्ग को भी स्वच्छ करने की है, पर इसे कार्य को वे ही सम्पन्न कर सकते हैं। जिन्होंने अपने को समाज सेवा की भट्टी में पकाया और निखारा हो। भ्रष्ट राजनेताओं से भी उसका वास्तविक समाधान मतदाता के जन समाज के हाथ में ही है सो उसी को जाग्रत किया जाना चाहिए।

जन-जागरण का प्रयोजन वे ही कर सकते हैं। जो अपने उज्ज्वल चरित्र एवं निःस्वार्थ सेवा-साधना से लोकमानस में गहरा सम्मान और स्थान बना लें जो इसके लिए साहस कर सकते हैं, लोक श्रद्धा एवं यशास्विता उन्हीं के गले पड़ती है और वे ही सच्चे लोकनायक कहलाने के अधिकारी बनते हैं।

इन्हीं रचनात्मक कार्यक्रमों को युगऋषि की तपःस्थली में शांतिकुंज के तत्वावधान में युग निर्माण योजना चल रही है। इक्कीसवीं सदी की यह गंगोत्री इस समस्त आयोजन का केन्द्र हैं सच्ची सेवा-साधना के इच्छुक व्यक्ति को उनका विशाल कार्यक्षेत्र यहाँ तैयार कर दिया गया हैं उसका आधार भारतीय धर्म एवं संस्कृति के अनुरूप तथा युग की पुकार से ओत-प्रोत रहने के कारण जनता ने उसे सहारा ही नहीं स्वीकार भी किया है राजनैतिक वर्चस्व प्राप्त करने के लिए लालायित लोग भी यदि लोक-मंगल की सेवासाधना सामाजिक स्तर पर करने लगें तो देश का कितना बड़ा उपकार हो और उन उमंगों का भी सदुपयोग हो जो राजनीति में इधर-उधर धक्के खाती हुई भ्रमित, कलुषित एवं अस्त-व्यस्त होती रहती हैं यदि लोकसेवी रहकर जनता की सच्ची श्रद्धा अर्जित कर ली जाय तो राजनेता बनने में भी कुछ कठिनाई नहीं रहती । यों ही उछल-कूद अथवा आपराधिक प्रवृत्ति के आधार पर यादि और स्थिरता के बदले अपयश ही गले पड़ता है विवेक एवं सद्बुद्धि का तकाजा यह है कि अपने समय की माँग को समझ स्वीकार करे ओर “धियो यो नः प्रचोदयात्”


पाठकों का स्तम्भ- - जिज्ञासाएँ आपकी - समाधान हमारे

अनेक पाठ-परिजन ऐसे है जो विगत कुछ वर्षों में या अभी-अभी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से जुड़े हैं। सभी की अपनी-अपनी जिज्ञासाएँ होती है। वे पत्रों के माध्यम से यदा-कदा उनका समाधान पाते रहते हैं।कई शंकाएँ-जिज्ञासाएँ जो पत्रों में उठाई जाती रहती है, सम्भव है वे एक नहीं कइयों की हों,। उनका समाधान यदि पत्रिका में हर माह दिया जाता रहे तो इससे अगणित व्यक्तियों को लाभ पहुँच सकता है ये जिज्ञासाएँ पत्रिका में प्रकाशित विचारों से लेकर गायत्री परिवार, युग निर्माण योजना, मिशन के व्यापक विराट् रूप से प्रकाशित विचारों से लेकर गायत्री परिवार, युग निर्माण योजना, मिशन के व्यापक विराट् रूप से सम्बन्धित होती है। भावी संभावनाओं से भी जुड़ी होती हैं इस माह से यह स्तम्भ यही बात मन में रखकर आरम्भ किया गया है कि बिना किसी का नाम लिए पाठकों के प्रश्नों व अपने उत्तर को प्रकाशित कर एक कमी, एक दूरी मिटा दी जाय। सम्भव है इससे आपके-हमारे समीप अनेक पथ-प्रशस्त हो। आपके सुझावों से हम इस पत्रिका को और भी प्रामाणिक, प्राणवान मार्गदर्शक पत्रिका बना सकेंगे। इस स्तम्भ में इस क्रम में प्रश्नों को जा समय-समय पर उठते रहे है, उनके उत्तरों के साथ दिया जा रहा है। यही औपनिवेशिक प्रणाली भी नहीं है उसी का निर्वाह करते हुए यह धारावाहिक स्तम्भ अब पाठकों के लिए खुले मंच के रूप में प्रस्तुत है।

प्रश्न:- ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका में जो लेख लिए जाते हैं, उनके बारे में कहा जाता है कि वे परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से निस्सृत प्राण−प्रवाह का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या परमपूज्य गए हैं ? फिर इनमें सामयिक संदर्भ स्थान-स्थान पर देखे जाते हैं, वे कैसे पूर्व से लिखकर रख दिए गए?

उत्तर:- निश्चित ही ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका पूज्य गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी (1911-1990) तथा परमवंदनीय माताजी (1926-1994) की विचार चेतना के प्रवाह के मार्गदर्शन में ही लिखी जाती हैं ‘अखण्ड दीपक’ जो शांतिकुंज हरिद्वार में मथुरा से 1971 में आने के बाद से ही प्रज्वलित है, इसकी एवं मिशन की सभी योजनाओं का प्रेरणा स्त्रोत हैं परमपूज्य गुरुदेव ने 1926 में जो अखण्ड दीपक प्रज्वलित किया था वही 1940 से प्रकाशित पत्रिका के ऊर्जा प्रवाह का प्रधान स्त्रोत है एवं आगामी बीस वर्षों में जो भी कुछ लिखा जाना है, उसकी मोटी रूपरेखा पूज्यवर ने महाप्रयाण से पूर्व जनवरी 1990 में बड़े स्पष्ट रूप में लिखकर दे दी थी। उँगलियाँ कोई भी लिखती हो, संपादन कोई भी करता हो, धुरी वही है मानव में देवत्व लाने के लिए-धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने के लिए श्रेष्ठ विचारों का ऐसा कल्पतरु विनिर्मित हो, जो चारों ओर ऐसा वातावरण बनाने की प्रक्रिया संपादित करें विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से लेकर सामान्य व गूढ़तम साधना पद्धतियों के मूल में भी पूज्यवर द्वारा 50 वर्ष की अवधि में लिखा गया वह चिन्तन प्रवाह है, जो समय-समय पर परिजनों तक पहुँचता रहा है वह सदैव सामयिक रहा है, रहेगा। संपादन मण्डल द्वारा जी सामयिक संदर्भ दिये जाते हैं वे भी उनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के अंतर्गत ही लिखे जाते हैं, एक मिलीमीटर भी इधर-उधर नहीं हटकर विगत की व सबकी पत्रिका के प्रवाह में देखकर यह अन्तर नहीं बता सकता कि यह गुरुसत्ता की लेखनी से लिखे गए हैं या नहीं।

प्रश्न:- ऐसा अक्सर कहा जाता है कि वाङ्मय में वह सब आ गया है, जो पूज्यवर द्वारा लिखा गया है या कहा गया है क्या आगामी बीस वर्षों का लेखन भी इसमें आ गया है। जो आगे प्रकाशित होने जा रहा है?

उत्तर:- पूज्यवर ने अपने जीवनकाल में स्वयं द्वारा व अपने मार्गदर्शन में औरों से जो कुछ भी लेखन कार्य कराया था, वह 2700 किताबों (छोटी-बड़ी सभी आकार की) के रूप में बिखरा पड़ा था। उसे संग्रहित करे एक स्थान पर वाङ्मय के रूप में अभी 70 खंडों में व बाद में 38 और शीघ्र प्रकाशित किया गया है अब तब के खंडों में बहुसंख्य भाग वह नहीं जो वह आगे के लिए मार्गदर्शन, लिखी हुई थी पढ़ी हुई सामग्री के रूप में दे गए है। यह संभावित है छोटी-बड़ी 500 पुस्तकों के रूप में हो इन्हें पहले ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका में एवं फिर छोटी पुस्तकों तथा बाद में वाङ्मय में दिया जाएगा॥ प्रथम वरीयता। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को ही मिलेगी, क्योंकि यह वस्तुतः गुरुसत्ता की प्राणचेतना का वास्तविक प्रतिनिधित्व करती है। एवं जन-जन के लिए सुलभ है।

प्रश्न:- गायत्री परिवार, युग निर्माण मिशन, प्रज्ञ अभियान,प्रज्ञापरिजन, अखण्ड ज्योति परवा नाम से बार-बार जो सम्बोधन दिए जाते हैं, वे अलग-’अलग हैं या एक ही समूह का प्रतिनिधित्व करने वाले नाम है।

उत्तर:- जो भी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का नियमित स्वाध्याय करता है,

वह गायत्री परिवार नामक विराट संगठन का सदस्य है। सदस्यता की और कोई औपचारिक शर्त नहीं है, मात्र नहीं यही है। उद्देश्य एक ही है। श्रेष्ठ विचारों से जुड़े रहने वालों का, अपने में छिपे देवत्व को उभारने को प्रयत्नशील परिजनों का परस्पर संगठित होना। शेष सभी नाम इस के पर्यायवाची है, अगल-अलग नहीं। हरिद्वार स्थित शांतिकुंज रूपी मुख्य चेतना केन्द्र से संचालित सारी गतिविधियों का विस्तार मथुरा स्थित गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान द्वारा विगत 50 वर्षों से भी अधिक समय से संपन्न होता रहा है व आगे भी प्रकाशन विस्तार क्षरा यह प्रक्रिया जारी रहेगी । समग्र समुच्चय मालाकर एक लाल मशाल से परमपूज्य गुरुदेव व परमवंदनीय माताजी के बाद उनका प्रतिनिधित्व करती है, के रूप में ज्ञान की जाज्वल्यमान ज्योति को प्रतीक मानकर उसके अधीन काम कर रहा हैं मार्गदर्शन उसी गुरुसत्ता का है प्रसाति उसे पांचों केन्द्र-शांतिकुंज एवं ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान हरिद्वार से , युगतीर्थ जन्मभूमि आंवलखेड़ा (आगरा)- से तथा गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से करते हैं अखण्ड ज्योति, हिंदी एवं अन्यान्य भाषाओं में इसे वैचारिक प्रवाह के प्रतिनिधि के रूप में ‘युग निर्माण योजना’ मासिक लोकशिक्षण व समाज-निर्माण की वाणी के यप् में तथा ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक हिन्दी व गुजराती में इसे कार्यकर्त्ताओं के प्रबन्ध मार्गदर्शन के रूप में जन-जन तक पहुँचाने की प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न:- कुछ व्यक्ति अखण्ड ज्योति को 1926 से एवं आरम्भ हुआ बताते हैं, कुछ 1937 से एवं कुछ 1940 से । इसमें -कौन सा सच है एवं प्रामाणिक है?

उत्तर:- 1926 से ‘अखण्ड ज्योति’ के रूप में अखण्ड ज्योति’ के रूप में अखण्ड दीपक परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रज्वलित किया गया था, जिसके माध्यम से वसंत पर्व रूपी उनके आध्यात्मिक जन्मदिवस की बेला में उन्हें उनकी परोक्ष मार्गदर्शन सत्ता ने हिमालय से आकर दर्शन दिए थे एवं साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन दिया था। यह सारा विवरण 1984 की जून-जुलाई तथा 1985 की अप्रैल माह की पत्रिका तथा बाद में हमारी वसीयत ओर विरासत’ में प्रकाशित है। तब से अब तक यही अखण्ड दीपक जल रहा है 1926 से 1941-42 तक यह आंवलखेड़ा व आगरा रहा तथा बाद में 1971 तक ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा में । मथुरा में यह कक्ष वैसा ही बनाए रखा गया है एवं घीयामंडी में सभी उसके दर्शन कर सकते हैं। 1971 की 20 जून से यह अखण्ड दीपक परमवंदनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में प्रत्यक्ष रूप से उनकी उपस्थिति में व बाद में उनके परीक्षा संरक्षण में सतत् शांतिकुंज सप्तसरोवर हरिद्वार में जल रहा है, जहां नित्य नियमित रूप से इसको दर्शन प्रणाम करने हेतु हजारों व्यक्ति आते हैं। जिस दिन से यह मथुरा से हरिद्वार लाया गया है, उसी कक्ष में सतत् प्रज्वलित है। इसी के प्रकाश-मार्गदर्शन में सभी निर्णय इस दैवी मिशन के लिए जाते हैं। यह हुई ‘अखण्ड दीपक’ की बात ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका इसी तप-साधना के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में प्रथम बार 1937 की वसंत पंचमी से हस्तनिर्मित कागज पर हाथ से चलने वाली मशीनों से निकलने के प्यास द्वारा आरम्भ की गयी थी। 1 अंक निकलने के बाद से अनौपचारिक रूपों से पत्रों द्वारा 200 पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास आगरा से चलता रहा है बाद में फ्रीगंज आगरा से नियमित प्रकाशन वसंतपर्व 1940 के प्रथम अंक से हुआ तो 20 जनवरी को प्रकाशित हुआ । यही प्रामाणिक रूप में उपलब्ध प्रथम अंक है। तक से सतत् प्रकाशित है तो रहा हैं 200 पत्रिका प्रतिमाह से छोटे कलेवर में आरंभ हुआ यह ज्योति-पुज आज बड़ा रूप लेकर बड़े आकर्षक फॉरमेट में भारत व विश्व के कोने-कोने में पहुँचता है तीनों वर्ष स्वयं में ऐतिहासिक व प्रामाणिक हैं पर वास्तविक प्रकाशन कब से है इसे परिजन उपरोक्त मार्गदर्शन से समझ सकते हैं।

प्रश्न:- अपनों से अपनी बात’ स्तम्भ जो संपादकीय के रूप में प्रकाशित होता है, कौन लिखता है व इसे एक नये पाठक क्षरा किस रूप में अंगीकार करना चाहिए?

उत्तर:- परमपूज्य गुरुदेव ने प्रारम्भ में ‘गायत्री -चर्चा’ नाम से एक स्तम्भ अखण्ड ज्योति में अपनी बात पाठकों से संपादकीय के रूप में कहने के लिए आरम्भ किया था, जिसे बाद में उनने ‘अपनों से अपनी बात- कॉलम से प्रकाशित करना आरम्भ किया। चालीस वर्ष तक सतत् प्रकाशित यह स्तम्भ या तो पूज्यवर या शक्तिस्वरूपा माताजी की लेखनी से लिखा जाता रहा। बाद में यह लेखनी जिसे सौंपी जाती रही । बाद में यह लेखनी जिसे सौंपी गयी, यह कार्य उन्हीं के मार्गदर्शन में कर रही हैं इसमें प्रत्यक्ष व्यावहारिक मार्गदर्शन परक शिक्षण व भविष्य की गतिविधियों परक शिक्षण व भविष्य को गतिविधियों की जानकारी होते हैं। विगत के उत्साहवर्द्धक विवरण से आगत में क्या कुछ घब्ति होने जा रहा है, इसका विवरण गुरुसत्ता के परोक्ष मार्गदर्शन में लिखा जाता है। लेखनी किसी की भी हो, यह प्रकाश उसी महाकाल के दैवी प्रवाह से उपजना है जो इस विराट मिशन का संचालन कर रहा हैं इसे उसी रूप में अंगीकार किया जाना चाहिए।

प्रश्न:- एक बात बार-बार मन में आती है कि ‘अखण्ड ज्योति’ यदि जन जन की वाणी है तो इसकी भाषा इतनी क्लिष्ट क्यों है? क्या इसे सरल नहीं किया जा सकता?

उत्तर:- जिस दैवी प्रवाह के परोक्ष मार्गदर्शन में यह लिखी जाती है, उसमें यह सहज की विकृष्ट हो जाती हैं पाठकों की इस कठिनाई को समझा जा सकता है। प्रयास यह किया जा रहा है कि क्रमशः इसे और भी सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाय संस्कृत निष्ठ शब्द जो लेखों में बहुधा दिखाई पड़ते हैं, अब कुछ सरल रूप में पाठकगण पढ़ सकेंगे। कई बार ढूँढ़ने पर भी उनका कोई उचित पर्यायवाची नहीं मिलता । प्रयास यह किया जा राह है कि वाक्य छोटे हों, सरल शब्द हों भाव गड़बड़ाने न पाएँ व प्रवाह यथावत् बनी रहे, शैली पूर्ववत् ही हो एवं कही आवश्यकता हो तो सरल कथन बना रहे शैली पूर्ववत् ही हो एवं कही आवश्यकता चाहे तो सरल हिंदुस्तानी भाषा में एक गरिष्ठ सरल हिन्दुस्तानी भाषा में एक गरिष्ठ शब्द या कथन को ‘ग्लाँसरी’ या फुटनोट द्वारा स्पष्ट कर दिया जाय। इससे सम्भवतः’ सबको समझने में सुगमता रहेगी एवं भाषा प्रवाह भी नहीं गड़बड़ाएगा।

(और भी प्रश्न व उनके उत्तर अगले अंक में।)


मेरा आत्मावलोकन

मैं अपने आप को देखकर फूला न समाया। सृष्टि के विभिन्न प्राणियों, वृक्ष वनस्पतियों के बची स्वयं को गौरव शालिनी बुद्धि से संपन्न पाकर मैं बौद्धिक विशेषता ने ही मुझे विशिष्ट बौद्धिक विशेषता ने ही मुझे विशिष्ट बनाया है। इसी की वजह से ही सृष्टि के प्राणी हीन नहीं, समूची प्रकृति मेरा सचमुच ही मैं भगवान का राजकुमार परमात्मा का बेटा-कितना भाग्यवान। मुझे मनुष्य जीवन मिला । ऐसा जीवन जिसे असीम शक्ति व विकास की अनंत संभावनाएं निहित हैं देवता भी ईर्ष्यालु हो गए हैं मेरे सौभाग्य पर, कि मुझे विचारशील पुरुषार्थ का कैसा सुनहरा सौभाग्य मिला, परन्तु दुर्भाग्य

मेरे इस सौभाग्यशाली मनुष्य जीवन में एक नहीं नो ऐसे अवसर आए जब मैंने अपनी महानता का गलित होते और अपने आपको क्षुद्र जीवन देखा।

जब मैं संसार में अपनी सफलता, यश, कीर्ति एवं प्रतिष्ठा बढ़ाने के उद्देश्य से बौद्धिक विचारशीलता को कुटिलता पूर्ण विचारशीलता को कुटिलता पूर्ण विचारहीनता में बदलने के लिए उतारू हो गया मैंने छल-प्रपंच पूर्ण ऐसे ऐसे कार्य लिए, जिनसे मेरी महानता क्षुद्रता में बदल गयी । यही नहीं, इन्हीं सब क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने के लिए परमात्मा की बजाय मनुष्य से प्रार्थना करने लगे हर किसी के सामने दीन हीन बनकर गिड़गिड़ाया और यह समझकर उनसे याचना करने लगा, जैसे यही सब मेरे भाग्य विधाता हो। शूद्रता का यह प्रथम अवसर मेरे जीवन में इस रूप में आया।

क्षुद्रता की दूसरी अनुभूति उस अवसर पर हुई जब मैंने अनुभव किया कि मैं अपने से अधिक शक्तिसंपन्न व्यक्तियों के सामने तो दीन-हीन बनता हूँ परन्तु अपने से कमजोर एवं अपने से आश्रित लोगों से अहंकार और घमंड भरी बाते करता हूँ, मानो मेरी यह शक्ति मेरे विकास के लिए नहीं अपितु दुर्बलों निर्बलों पर रौब जमाने का ही एक साधन है। अपने कर्तव्य निर्वाह हेतु कंटकाकीर्ण मार्ग पर चलते हुए काष्ट सहकर भी कर्तव्य पूर्ति करते रहना अथवा सरल सुगम मार्ग अपनाकर अस्थायी सुख प्राप्त करने के दो मार्गों में से की गए मार्ग की बुनने का अवसर आने पर जब मैंने सस्ते सुख का मार्ग चुना व कर्तव्य परायणता को परी तरह भुला दिया, तब मुझे तीसरी बार अपनी क्षुद्रता का आभास हुआ।

चौथा अवसर क्षुद्रता का मेरे जीवन में जब आया, जब मेरे द्वारा कठोर अनैतिक अव अनुचित काम एवं अपराध होने जाने पर मैंने उसका पश्चाताप व परिमार्जन न करके आम्मा की आवाज को यह कहकर दबा दिया कि परिस्थिति में एक आम शिष्टाचार बन गया है, इसमें दुःख क्या करना इस झूठ भरी प्रतिष्ठा एवं छटा अहं भावना से आत्मा की ज्योति शनैः शनैः जीवन की सत पर मन्द पड़ने लगी। लोकोत्तर प्रकाश के राज्य में पहुँचने के स्थान पर जीवन पतन के पहुँचने के स्थान पर जीवन पतन के अँधेरों में लुढ़कने लगा।

मेरे जीवन की क्षुद्रता का वह पाँचवाँ क्षण था, जब मैंने अपने मन की बातों सहन कर क्षमा कर दिया। मन को बुद्धि पर हावी हो जाने दिया। इतना ही नहीं मन की कल्पनाओं, तरंगों और मन की सतह पर उभरने वाले युक्तिहीन दृश्यों को ध्यान के क्षणों में उभरने वाली आत्मा की आवाज मान लिया। वाली आत्मा की आवाज मान लिया। मैं अपनी इस क्षुद्रता के कारण आत्मसत्ता की दिव्यता की अवहेलना कर बैठा।

छठी क्षुद्रता मुझसे उस समय हुई जब मैंने कुरूप को घृणा की दृष्टि से देखा। यही नहीं इन्हीं क्षणों में मैंने असहायों, अपाहिजों की को भी मैंने अवहेलना और उपेक्षा की नजर से देखने की कोशिश की। मैंने यह नहीं जाना कि घृणा का ही परदा कुरूपता है सर्वथा भुला बैठा कि सौंदर्य के सारे मधुर भाव प्रेम में उपजते हैं।

किसी के द्वारा प्रशंसित हो जाने पर सचमुच ही अपने आपको जब मैंने बड़ा सचमुच ही अपने आपको जब मैंने बड़ा मान लिया व दूसरों की प्रशंसा को ही मैंने अपनी अच्छाई की कसौटी मान ली तो वह मेरी क्षुद्रता की सातवीं घड़ी थी। इन क्षणों में मेरी विवेक की आँखें मुँद गयी। मैंने अपने जीवन की डोर उन अनजाने हाथों में सौंपा दी, जो स्वयंतनद गुमराह थे। मैं भी राह भटक कर उनके पीछे चलने की तैयारी करने लगा।

आठवीं क्षुद्रता उस समय मेरे जीवन में प्रविष्ट हुई,जब मैंने अपने ‘स्व’ की तो ध्यान कम रखा व दूसरों को ही देखता -परखता रहा । दूसरों के दोष-दुर्गुणों को जाँचने, परखने और छिद्रान्वेषण के प्रयास में मैं स्वधर्म से विमुख चला गया।

क्षुद्रता की नवी घड़ी तब आयी जब मैंने विपत्ति में आत्मविश्वास खोकर ‘याचना’ का मार्ग अपनाया। मैं पूरी तरह विस्मृत को अपने इंगित से नचाने वाले परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ। तनद इस विस्मृति के कारण ही मैं उनसे विमुख हो चला।

इस तरह नौ अवसरों पर मैंने अपने आपको क्षुद्र बनते देखा। यह सब मेरी विचारहीनता के कारण ही हुआ। जब से सद्बुद्धि एवं विवेक की महिमा समझी है, सोचता हूँ। तनद कि अब परमपिता परमेश्वर के दिए इस जीवन में अब परमपिता परमेश्वर के दिए इस जीवन में अब तो ऐसा कोई काम न हो, जो मुझे और अधिक क्षुद्र क्षुद्रताओं से उबरने और परमात्मा के गौरवशाली पुत्र के अनुरूप जीवन जीने की कोशिशों में जुटा हूँ। तनद क्या इन कोशिश में आप भी मेरे साथ अपने कदम बढ़ाएंगे?


नेपोलियन (Kahani)

नेपोलियन अपने साथियों समेत एक राह जा रहा था वे लोग परी रास्ता घेर कर चल रहे थे, सामने से लाबोढा लिए एक मजूर आ राह था। नेपोलियन ने साथियों का हाथ पकड़ कर खींचा और कहा- “श्रम का सम्मान करो और मजदूर के लिए रास्ता दो।” बाद में उसने साथियों को समझाया कि जिन सत्प्रवृत्तियों को राज्य में बढ़ावा देना है, उनका सम्मान हम स्वयं करेंगे, तो ही उनकी प्रति जन उत्साह उभरेगा।


अपनों से अपनी बात - अब आशा की एक ही किरण बाकी रह गयी है।

आस्था-संकट की इस बेला में, आसन्न विभीषिकाओं से छाए घटाटोप में उजियारे की किरण एक ही दिखाई पड़ती हैं भारतीय संस्कृति, देव संस्कृति का तर्क सम्मत, विज्ञान सम्मत स्वरूप आज जब पाश्चात्य सभ्यता हमारी मूलभूत आस्थाओं पर तेजी से कुठाराघात करती देखी जा रही है, साँस्कृतिक प्रदूषण कैबल नेटवर्क के माध्यम से , इन्फार्मेशन टेक्नालॉजी के माध्यम से घर-धर में, हर परिवार के ड्राईंग रूम- बेड रूम में प्रविष्ट होता जा रहा है, मूल्यों की गिरावट, मार्गदर्शक कहे जाने वाले, नेतृत्व करने वालों के चिंतन-चरित्र, व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर एक ही तथ्य का द्योतक है कि अब आशा कही से शेष है तो वही से जहाँ से भावनात्मक परिष्कार के साँस्कृतिक नवोन्मेष के बीजाँकुर प्रस्फुटित हो सकने की सम्भावना साकार हो सकती हैं एवं वह हैं प्रगतिशील संवेदना मूलक धर्मतंत्र। तनद

इसी मूल धुरी पर परमपूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का समग्र जीवन, मिशन एवं सर्वांगीण दर्शन टिका हुआ है। गायत्री परिवार के समस्त वर्तमान के क्रियाकलापों,भावी निर्धारणों को इसी धुरी के चारों ओर घूमता देखा जा सकता है जब तब प्रसुप्त संस्कार जगाए नहीं जाएँगे-देवत्व के उभरने हेतु साँस्कृतिक क्रान्ति द्वारा एक वातावरण विनिर्मित नहीं होगा, सतत् असुरता ही हावी रहेगी। समय की इस आवश्यकता को समझते हुए ही गायत्री रूप सद्ज्ञान एवं यज्ञ रूपी सत्कर्म के दो आधार स्तम्भों पर टिकी देव संस्कृति को विश्वव्यापी बनाने हेतु ‘देव संस्कृति दिग्विजय’ अभियान का शुभारम्भ किया गया शांतिकुंज स्थित उज्ज्वल भविष्य की गंगोत्री-इक्कीसवीं सदी का गोमुख कही जाने वाली महाकाल की दैवी चेतना का इन दिनों एक ही उद्घोष है’ “संस्कारों का अभिनव परम्परा का पुनर्जागरण”।तनद

संस्कार महोत्सवों के द्वारा आश्वमेधिक दिग्विजय अभियान को आगे बढ़ाते हुए यह कार्य सम्प्रति नवम्बर, 16 से आगामी एक वर्ष तक भारत के उन सुदूर अंचलों में संपादित करने का निर्णय लिया गया, जहाँ अभी गायत्री परिवार ही नहीं, अन्यान्य संस्थाओं का प्रभाव भी स्थापित नहीं हो पाया हैं श्रेष्ठ लक्ष्य के लिए साथ जुड़ी ऐसी संस्थाओं यशा-रामकृष्णा मिशन, विवेकानन्द केन्द्र, भारत सेवा प्रकल्प, वनवासी कल्याण परिषद, श्री अरविंद आश्रम को साथ लेकर गायत्री परिवार वनवासी कल्याण परिषद, श्री अरविंद आश्रम को साथ लेकर गायत्री परिवार अब नेपाल सहित उत्तरी, दक्षिण में संस्कार महोत्सवों का आयोजन करने को सन्निद्ध हो आगे बढ़ रहा हैं इस क्रम में अभी-अभी अल्मोड़ा (कूर्माचल) में एक भव्य संस्कार महोत्सव 108 कुण्डी यज्ञ के साथ संपन्न हो चुका है (23 से 26 अक्टूबर) तथा ऐसे ही आयोजन भद्रकाली (हुगली प. बंगाल), तिनसुकिया/ दुलियाजन एवं दुर्गपुर (पं. बंगाल) बुहत्तर मुम्बई नवी मुम्बई (महाराष्ट्र), जोरथाग, गंगटोक, सिक्किम जनकपुर, विराट नगर, गंगटोक, सिक्किम जनकपुर, विराट नगर, वीरगंज, नेपालगंज, नवलपरासी (नेपाल) ईटानगर (अरुणाचल), शिरपुरकागज-खम्मम, एलेन्दू, चिराला, हैदराबाद, विशाखापट्टनम (आँध्रप्रदेश), बैंगलोर (तमिलाडु) में सम्पन्न करने की योजना है।

इन सभी स्थानों पर कार्यकर्त्ताओं को विराट परिमाण मैं तैयार करने के साथ साँस्कृतिक गौरव के प्रति जागरुकता लाने का कार्य तेजी से हाथ में लिया जा रहा हैं बाद में वातावरण विनिर्मित होने पर कन्याकुमारी, तिरुअंनंतपुरम, कोचीन, कोयम्बटूर, शोलापुर, कोल्हापुर, जम्मू अमृतसर, काँगड़ा, कोल्हापुर, जन्मु अमृतसर, काँगड़ा, चम्बा, पिथौरागढ़ आदि स्थानों पर भी ऐसे ही कार्यक्रम सम्पन्न किये जपजसम मज जाते रहेंगे। समानांतर स्तर पर एक और किया जा रहा है जो अभी महानगरों एवं विश्वस्तर पर बड़े स्थानों पर इस वर्ष सम्पन्न होगा। इनमें प्रधानता ‘ज्ञानयज्ञ’ प्रधान कार्यक्रम को दी गयी है, वीडियो, लेकर प्रोजेक्शन के द्वारा भारतीय संस्कृति का विज्ञानसम्मत प्रदर्शन प्रमुख होगा। इस माध्यम से हम युवा पीढ़ी को पढ़े -लिखे कहे जाने वाले समुदाय को आध्यात्म के विज्ञानसम्मत स्वरूप के प्रस्तुतीकरण से पुनः अपनी जड़ों से जोड़ा जा सकेगा। वीडियो द्वारा हिमालय रूपी दैवीचेतना की, ऋषि सत्ताओं की कार्य स्थली की,ऋषि सत्ताओं की कार्य स्थली का प्रस्तुतीकरण भी इसमें किया जाएगा। देवात्मा हिमालय की प्रतिभा भी इनमें विनिर्मित की जाएगी तथा इसके पूरे सौंदर्य को, उसकी पवित्रता व पर्यावरण

बनाए रखने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया जाएगा। ऋषि परंपरा से लेकर प्रतीकवाद बहुदेववाद एवं देव संस्कृति द्वारा आज की समस्त समस्याओं का समाधान इन विराट ज्ञानयज्ञों का मुख्य लक्ष्य होगा। इनमें सवा लक्ष वेदी दीपयज्ञ भी संस्कारों के साथ सम्पन्न होंगे। प्रथम कार्यक्रम इसी कड़ी का वृहत्त मुम्बई में चर्चगेट क्षेत्र में सुन्दर बाई हाल व गिरगाँव चौपाटी पर आयोजित हैं। यह 22 से 26 जनवरी 1997 की तारीखों में हो रहा है बाद भी होंगे विदेश में न्यूजर्सी अमेरिका के रैरीटन सेण्टर एडीसन में 11 से 14 जुलाई एवं एलेक्जेण्ड्र पैलेस लन्दन यू. के. में 31 जुलाई से 3 अगस्त की तारीखों में इसी स्तर के कार्यक्रम प्रस्तावित हैं आशा की जानी चाहिए कि इन माहैतसपो से उज्ज्वल भविष्य का पथ प्रशस्त करना निश्चित ही सम्भव हो सकेगा।


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उज्ज्वल भविष्य के सृजन में सत्साहित्य का असाधारण योगदान होता है नई पुस्तकें खरीदते रहो, भले ही पुराने कोट से काम चलाना पड़े।


‘अखण्ड ज्योति’ का आलोक जन-जन तक पहुँचे

(पाठकों की संख्या बढ़ाकर परिजन पुण्य के भागी बनें)

आज के वैचारिक प्रदूषण के युग में भी बहुसंख्य व्यक्तियों में श्रेष्ठता को अंगीकार करने की चाह है, सत्प्रवृत्तियों के बारे में पढ़ने व जीवन में उतारने की उमंग है, यह परिजनों की अखंड ज्योति पत्रिका में अभी व्यक्त विचारों से बढ़ती अभिरुचि से प्रकट होता है । कोई यह सोचता का नवनिर्माण कैसे होगा? तो उसके लिए 1926 से सतत् प्रकाशित चहुँओर अपनी ऊर्जा बिखेरती 60 वर्ष पुरानी यह पत्रिका विधेयात्मक चिन्तन का स्वरूप लेकर आती है। प्रतिमाह परिजनों के घरों में ज्ञान का आलोक लेकर पहुँचने वाली यह आध्यात्मिक पत्रिका मात्र एक अखबार या लेखों का पुलिंदा नहीं अपितु प्रचाण् प्राण ऊर्जा के मान है, जो परमपूज्य की लेखनी मातृसत्ता के ममत्व भरे मार्गदर्शन का निर्वाह यथावत् करती आ रही है। जैसे प्रतिया के लिए अपनी अनिवार्यता को स्पष्ट करता जा रहा है।

महाकाल ही युग परिवर्तन के देवता हैं एवं उन्हीं की प्रेरणा से निस्सृत यह विचार प्रवाह आज कितना जरूरी हैं, होना चाहिए। तनद दैनंदिन जीवन की समस्याओं का समाधान पर मार्गदर्शन लेपन जीवन जीने की कला का शिक्षण एवं एवं विशिष्ट सभी प्रकार की पद्धतियों के वैज्ञानिक विवेचन से व्यक्ति, परिवार

अखण्ड ज्योति की पाठ्य सामग्री की मूलभूत पृष्ठभूमि है गायत्री एवं यज्ञ के रूप में भारतीय संस्कृति के दो की धुरी पर पूरा भारतीय अध्यात्म देवसंस्कृति का लोक शिक्षण परक मार्गदर्शन टिका से लेकर कथा साहित्य द्वारा सद्गुणों की अवधारण का शिक्षण एवं सामयिक सभी समस्याओं का गहराई से विवेचन ‘अखण्ड ज्योति पख्का से तत दिया जाता रहता है विगत वर्षों में इस साहित्य ने जीवन संजीवनी के रूप में जो भूमिका निभाई है उससे की अधिक आज की मूर्च्छित मानव जाति के लिए यह अगले दिनों निभाने जा रही है।

अखण्ड ज्योति पत्रिका के मार्गदर्शन के रूप में वे अपने उत्तराधिकारियों को उपलब्ध करा गए इस पत्रिका से सतत् सान्निध्य इसमें दिये गए विचारों का नियमित स्वाध्याय परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी से साक्षात्कार करने के समान है यह हर किसी के लिए हर पल सहज ही उपलब्ध हैं इस पत्रिका को स्वयं पढ़ना व औरों को प्रेरित करना ऋषियुग्म की सत्ता के मानस पुत्रों में वृद्धि में वृद्धि करने के समान हैं इस संधिवेला में सभी का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि इन मानस पुत्रों में और वृद्धि हो एक पाठक न्यूनतम पाँच नये जपजसम मज पाठक तैयार करे पच्चीस सहयोगी पाठक तैयार करे।

इस वर्ष अपने उसी रूप में ओर भी आकर्षक स्तम्भों के साथ नवीनतम शोधपरक सामग्री से सजी यह पत्रिका पाठकों तक पहुंचती रहेगी अपना प्रयास यही है कि यह सब तक सही समय पर पहुँचती रहे । पूर्व वर्ष की भाँति इसका चन्दा आठ रुपये वार्षिक होगा। परिजनों पर किसी प्रकार का आर्थिक भार न आए इसलिए इसी राषी में बढ़जपजसम मज पृष्ठों व चित्र युक्त सामग्री के साथ पत्रिका को प्रकाशित करते रहने का निश्चय किया गया हैं विज्ञापन न देने की पूज्यवर की नीति पर हमेशा से टिके रहा गया है। आगे अपने पाठकों की सहृदयता व श्रेष्ठता के प्रति विश्वास तथा गुरुसत्ता के आदर्श के प्रति अटूट निष्ठा के साथ।

अगले वर्ष पूर्वोत्तर पश्चिमोत्तर भारत एवं सुदूर दक्षिण में स्थान-स्थान पर संस्कार महोत्सव सम्पन्न हो रहे हैं इनका शुभारंभ अल्मोड़ा (कुमायुं) एवं भद्रकाली (पं. बंगाल) के कार्यक्रमों से हो गया हैं इन संस्कार महोत्सवों की ऊर्जा राष्ट्र की परिधि को पार कर विदेश की धरती पर सम्पन्न होने वाले लन्दन व न्यूजर्सी के विशिष्ट संस्कार ज्ञानयज्ञों के रूपों में चहुंओर विस्तरित होती नजर आएगी। इस सम्बन्ध में जानकारी एवं रूप में विराट रूप लेने का विवरण पाठकगण देव संस्कृति के विश्व संस्कृति के रूप लेने का विवरण पाठकगण देव संस्कृति के विस्तृत विवेचन के साथ पढ़ सकेंगे।

भावनाशील परिजनों से अनुरोध है कि ‘अखण्ड ज्योति‘ के आलोक प्राणऊर्जा के दिव्य प्रवाह को घर-घर पहुँचाने के अपने में अद्भुत इस आध्यात्मिक पंख्का का वार्षिक चंदा 60 रुपये,विदेशों में 500 रुपये जपजसम मज वार्षिक है अपनी व स्वजनों की आगामी वर्ष की राशि तुरन्त भेज दी जाय, ताकि प्रवाह अवरुद्ध न हो आराध्य की जुलाई ज्योति ज्वालमाल बन घर-घर फैले, यही हमारी मंगल कामना है।


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दरिद्री का त्यागी नहीं कह सकते । अकर्मण्य ‘दरिद्री ‘ होते हैं और क्षमताओं को परमार्थ में नियोजित किये रहने वाले को त्यागी कहा जाता हैं

*समाप्त*