धारा को चीरकर चल पड़ने जैसा पराक्रम

प्राणी का धर्म है प्रगति । से यहाँ अर्थ है स्वभाव । इसके बिना न तो किसी को चैन मिलता है, न संतोष न सुख । कहा जाता है कि प्राणी सुख की खोज में फिरते रहते हैं। यह कथन तब ही सही हो सकता है जब उन प्रयासों के साथ सुविधा नहीं प्रगति भी जुड़ी हो। निम्न स्तरीय प्राणी सुविधा से संतुष्ट हो सकते हैं। किन्तु जिनका अंतराल जीवित है, गुजारा प्रगति की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाये बिना हो ही नहीं सकता । इस स्तर के लोगों सुविधा नहीं उस गौरव को अर्जित करने का प्रयास रहता है जो अपनी पीठ थपथपा सके। साहस और पराक्रम के क्षेत्र में अपनी स्थिति सामान्य जन समुदाय की तुलना में अधिक ऊँची, अधिक अच्छी सिद्ध कर सके। प्रगति इसी को कहते हैं। जिन्हें असामान्य कहा जाता है, उनका काम इससे कम नहीं चलाता। वे वर्चस्व प्रकट किये बिना नहीं रह सकते। सुविधाएँ उनका प्रगति पथ कभी अवरुद्ध नहीं करती, न ही वे सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं।

विशिष्टता सिद्ध करने की उत्कण्ठा यदि उथलेपन की स्थिति में हुई तो वह भोंडे प्रदर्शन एवं एक कदम आगे बढ़ने पर उद्दण्डता के रूप में प्रकट होने लगती है॥ अहमन्यता अपने उद्धत प्रदर्शन न कर पाये, इसके लिए तत्व वेत्ता - दूरदर्शियों ने मानवी मनो विज्ञान को समझते हुए इस प्रवृत्ति को उत्कृष्टता के साथ जोड़ने का प्रयास किया । आत्मोत्कर्ष के लिए उनने कुछ उपयोगी क्षेत्र निर्धारण कर सिद्ध किया कि उस राजमार्ग पर चलने में दूसरों को चकाचौंध करने वाला न सही अपनी अंतरात्मा को गौरवान्वित करने वाला, श्रेय संतोष परिपूर्ण मात्रा में मिल सकता है। वैभव तो चतुराई से कमाया जा सकता है किंतु व्यक्तित्व का निर्माण तो मनुष्य को अपनी कलाकारिता, सूझबूझ, एकाग्रता और ऐसे पराक्रम का प्रतिफल है। जो संसार के अन्यान्य उपार्जनों की तुलना में कही अधिक महत्व पूर्ण साध्य है। इसमें संकल्प शक्ति साहसिकता और दूरदर्शिता का परिचय देना पड़ता है। जन साधारण द्वारा अपनाई गयी रीति नीति से ठीक उल्टी दिशा में चलता उस मछली के पराक्रम जैसा है जो प्रचण्ड प्रवाह को चीर कर उसके विपरीत चलती है ऐसे नर पुँगवों को ही विश्व विजेता की उपमा दी गयी है जो महानता को अंगीकार कर प्रतिकूलताओं से टकराते हुए आगे सतत् आगे ही बढ़ते रहते हैं। इस मार्ग को अपनाना ही मनुष्य की सबसे बड़ी दूरदर्शिता है।


शाश्वत को तलाशो

वह इधर हो गयी होगी । कुछ भी तो नहीं रहने दिया उसने। सब अपने साथ समेट ले गयी, किसी ने अत्यंत उद्धेय भरे स्वर में चिंता प्रकट की।

हम तो पूरी तरह कंगाल हो गये दूसरा स्वर उभरा । साथ ही आश्वस्त भाव भी - ‘ पर वह इस वनखण्ड से भाग कर जायेगी कहा ? कितने अमूल्य थे, हमारे रत्न आभूषण । हम उसके लिए अरुवल का कोना ही छान मारेंगे।

वे लोग अपने साथ किसी रूप जीवा वेश्या को लेकर वन विहार को आये थे । अरुवल का यह वन प्रान्त बहुत सुरम्य और मोहक था। प्रकृति अपनी अपार रमणीयता यहाँ आ जुटी थी। नाना लीला विभ्रमों में अपनी देह को तोड़ती मरोड़ती शिलाओं और गुल्मों के बीच नाचती कूदती नदी अठखेलियाँ कर रही थी। किनारे खड़े कास के अंतराल में लहरें विछल रही है और किरणें नदी की माँग में सोना भर रही थी। कुछ दूर चलकर नदी के पुलिन में लवली लताओं के कुँज छाये थे। किसी तटवर्ती वृक्ष के सहारे दो चार विरल वल्लरियाँ नदी की लहरों को चूमती हुई झूल रही थी। उसमें बैठी कोई एकाकी चिड़ियाँ दुपहरी का अलस गान गाने में विभोर थी।

ये सब भी वही पास के कोमल दूब के प्राकृतिक बिछौनों का राग−रंग में आकष्ठ डूबे थे। मोहक और मादक परिस्थितियाँ कब किसे होशो हवास में रहने देती है। ये सब भी विलास राग रंग में खुद को ऐसा भूले कि वेश्या उनके सब आभूषण चुराकर कब भागी, उन्हें पता ही न चला। सुध आते ही वे लोग उसी का पता लगाने वन का पत्ता छानने के लिए निकल पड़े।

वन के उसी भाग में प्रवेश करते ही उन्होंने विशेष शाँति का अनुभव किया । जैसे जैसे वे आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे वैसे वैसे उनकी वासनाओं का उफान शान्त होता जा रहा था। आखिर क्या ऐसा है यहाँ उन सब ने आपस में एक दूसरे की ओर देखा । तभी उनकी नजर पास के एक सघन वृक्ष की छांव में बैठे एक दिव्य पुरुष पर गयी। वह उस वृक्ष की छाया में पद्मासन लगाये बैठा था। उसकी मुद्रा बालक सी निर्दोष और परम शाँत थी। उसके ओठों पर निरवाछिन्न आनन्द की मुस्कान दीक्षित थी। दृष्टि नासिका के अग्र भाग पर स्थिर हो गयी थी। मस्तक के पीछे उद्भासित प्रभामण्डल से वृक्ष में लिपटी लताएँ प्रकाशित हो रही थी। कुछ ऐसा लग रहा था कि सिद्धियों के ज्योतिपुंज रह रहकर उसके कोमल शरीर से तरंगों की तरह उठ रहें थे। यह दिव्य पुरुष कोई और नहीं महात्मा बुद्ध ही थे।

कुछ पल ये सब एकटक उनकी ओर देखते रहे । रत्नाभरण चले जाने के क्षोभ से पुरुष चीर कर्म करने वाली वेश्या को खोजते हुए यहाँ तक आ पहुँचे थे। भगवान बुद्ध के तपोदीप्ति दिव्य आभा पूरित परम शान्त मुख मण्डल को देखकर अनायास ही अभिभूत हो उठे और उन्होंने उस दिव्य मूर्ति की वरण धूल अपने माथे पर लगा दी। भगवान के कृश शरीर की स्वर्णिम प्रदीप्ति से वे विमुग्ध हो गये थे।

“ आपने उसको इधर से जाता देखा है “- भद्र वर्गीय पुरुषोँ ने महात्मा बुद्ध से निवेदन किया ।

“मुझे अपने सिवा दूसरा को दिख ही नहीं रहा है मित्रो ! इतना ही सत्य है,” यह कहकर भगवान मौन हो गये।

“भान्ते ! हमारा आशय एक स्त्री से है।” एक ने कहा। कैसी स्त्री ? भगवान बुद्ध की परम पवित्र दृष्टि भद्रगणों पर टिक गयी। उनके दृष्टि विक्षेप से ही भद्रगण आहत हो उठे। लगा, वे अनुचित कर्म के कारण पीड़ित है।यह कर्म और उनकी हानि महात्मा बुद्ध की दृष्टि से छिपी नहीं रह गयी। एक ने कहा वह वेश्या है भन्ते ! हम लोग अपनी अपनी पत्नियों के साथ वन विहार को आये थे । पत्नी के अभाव में एक मित्र के मनोरंजन के लिए एक वेश्या एक मित्र के साथ थी। विशेष राग रंग में लिप्त देखकर वह हमारे कीमती आभूषण लेकर इसी वनखण्ड में छिप गयी। हमें उसी की खोज है।

“ वन विहार, मनोरंजन, किसलिए भद्र ?” मन्दस्मित के साथ महात्मा बुद्ध ने कहा ।उस क्षीण सी किन्तु मोहक मुस्कान ने उन लोगों के मर्म भेद दिये। प्रतीत हुआ कि अपराध पकड़ा गया। सकुचाते हुए वे कुछ कह न सके । फिर भगवान ने प्रथम ही कहा- “ आनन्द के लिए ही न ?”

“ तो भद्र ।जगत के विषय भोग और सुख तो नश्वर और क्षणिक है। उससे नश्वर और क्षणिक आनन्द ही मिलेगा। उसके पीछे उन्मना भाव से दौड़ने पर इसी प्रकार पश्चाताप, हानि तथा क्षोभ के अलावा और कुछ नहीं मिलने का ।”शाश्वत आनन्द तो शाश्वत वस्तु से ही प्राप्त होगा वह शाश्वत वस्तु तो केवल आत्मा ही है। तुम उसे खोजने के लिए निकलते तो रत्नालंकार को खोने का संताप नहीं झेलना पड़ता। “ भगवान बुद्ध ने कहा।

भद्रवगियों के धर्म चक्षु खुले। रत्नालंकार की चिंता छोड़कर उन्होंने कहा -” ठीक है भन्त् ! हमें स्त्री की खोज नहीं, आत्मा की खोज करनी है “ और उन्होंने भगवान से प्रव्रज्या उपसम्पदा की याचना कर जीवन की राह बदलने का उसी क्षण निर्णय ले लिया।


अद्भुत और विलक्षण है यह सृष्टि

ईश्वर क्या है ?इसकी परिभाषा करते हुए सूत्रकार ने लिखा है - ‘ कर्तुमकुर्तमन्यथाकर्तुम शक्य ईश्वरः ‘ अर्थात् ईश्वर वह समर्थ सत्ता है, जो सब कुछ करने में अद्वितीय है। यदि ऐसा है तो फिर सर्वोपरि शक्ति के रूप में उसकी मान्यता उचित ही है। जिसके हाथों संसार की सम्पूर्ण शक्ति हो, जो सृष्टि का सृजेता हो, नियन्ता और पालन कर्त्ता हो, उसके लिए अघटित को घटित और असंभव को संभव बना देना क्यों कर अशक्य होना चाहिए ? निश्चय ही वह सत्ता ऐसा कर सकती है । गुह्य विज्ञान का सम्पूर्ण आधार अध्यात्म तत्वज्ञान की उसी धुरी पर टिका है। इस मूल धुरी को समझना ही अभीष्ट होना चाहिए। विश्व के इस सर्वोपरि गुह्य तत्व को जान लेने के उपरान्त फिर कुछ ऐसा निगूढ़ शेष नहीं रहता, जिसे समझ पाने में आत्म चेतना निरुपाय है। समय समय पर घटित होने वाले रहस्यमय प्रसंग इसी बात का आमंत्रण देते हैं कि हम उस परम तत्व को जाने, समझे और उस तक पहुंचने का उपाय करें।

घटना महात्मा रूप कला से संबंधित है । उनका पूर्व नाम भगवान प्रसाद था और वे शिक्षा विभाग में उपशिक्षा निरक्षक के पद पर कार्यरत थे।बात उन दिनों की है जब देश परतंत्र था। एक बार निरक्षण कार्य हेतु बेहटा (पटना) रेलवे स्टेशन से कई मील दूर दक्षिण पटना के एक देहात में गये थे । उन दिनों शिक्षा विभाग का डायरेक्टर जे0 क्राफट नामक एक अंग्रेज था । वह कलकत्ता से पटना आया हुआ था और उसी दिन कलकत्ता लौटने वाला था। इसी आशय का एक पत्र शिक्षा निरीक्षक आर. मार्टिन का उक्त ग्राम में भगवान प्रसाद को मिला, जिसमें उन्हें यह निर्देश दिया गया था कि तत्काल पटना पहुँचकर संबंधित विषय की चर्चा शिक्षा निर्देशक से कर ले । जब वे पटना जाने के लिए बेहटा स्टेशन पर पहुँचे, तो वहाँ जाने की अंतिम गाड़ी जा चुकी थी। उधर पटना निर्देशक की गाड़ी चलने से बहुत कम समय रह गया था। भगवान प्रसाद को बड़ी चिंता हुई । इतने कम समय में वहाँ कैसे पहुँचा जाय ? वे प्लेटफार्म की बेंच पर बैठकर इसी उधेड़ बुन में पड़े हुए थे कि उन्हें थोड़ी झपकी आ गयी । जब आंखें खुली तो स्वयँ को किसी अन्य स्टेशन के प्रतीक्षालय में पाकर सहसा चौक उठे,बाहर जाकर उन्होंने स्टेशन जानना चाहा, तो सामने ही पटना जंक्शन का बोर्ड देखकर आश्चर्य चकित रह गये। वे अनायास बेहटा से पटना कैसे पहुँच गये, उनकी समझ में कुछ नहीं आया । समय कम था अतः वे क्राफट को ढूँढ़ने लगे।वह सामने ही दिख गये। उनसे आवश्यक विचार विमर्श किया और बिहटा लौटने के लिए अगली ट्रेन का इन्तजार प्रतीक्षालय में जाकर करने लगे।उनके मन में अभी अभी घटी घटना के संबंध में ऊहापोह चल रही थी कि पुनः आंखें झपक गयी ।तो वह यह देख कर घोर अचंभे में पड़ गये कि अब वे बिहटा स्टेशन पर है। पलक झपकते ही पुनः बिहटा कैसे पहुँच गये ?यह उनकी समझ से परे था । उक्त घटना का उनके मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि तुरन्त अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और एकान्त साधना करने लगे। कालांतर में वही महात्मा रूपकला के नाम से प्रसिद्ध हुए।

इससे मिलती जुलती एक घटना उड़ीसा के रसिक सन्त रघुनाथ महापात्र से संबंधित है। रघुनाथ अपने पिता के इकलौते पुत्र थे । उनके पिता कृष्णानन्द एक बहुत बड़े जमींदार थे । वे जितने बड़े जमींदार थे, उतना ही विशाल उनका हृदय था। उनकी पत्नी भी वैसी ही उदारमना थी। एक बार उस क्षेत्र में भीषण दुर्भिक्ष पड़ा । कृष्णानन्द ने इस प्राकृतिक विपदा को देखते हुए कृषकों से लगान वसूलना बन्द कर दिया। लोगों को इससे राहत तो मिली, पर अन्न के बिना जिन्दा कैसे रहा जाय, वे सभी परमार्थ परायणता और पर दुख कातरता के सजीव प्रतिमूर्ति जमींदार के दरवाजे पर अपनी करुण गुहार के साथ इकट्ठे होने लगे। जमींदार ने भी मुक्तहस्त से अन्न बाँटना प्रारम्भ किया।पर ऐसा कब तक चल सकता था, आय का स्रोत बन्द हो चुका था और व्यय भार लगातार बढ़ता ही जा रहा था। इससे जल्द ही वह ऋण भार से लद गये । इस कर्ज से उऋण कैसे हुआ जाय, इसकी चिंता करते करते शीघ्र ही इस लोक से विदा हो गये। पत्नी भी उनके साथ सती हो गयी। रघुनाथ की शादी हो चुकी थी । पत्नी अन्नपूर्णा का वय कम होने के कारण वह अभी तक माँ के घर ही रह रही थी। रघुनाथ यहाँ अकेले थे और अब अनाथ हो चुके थे। शरीर त्यागने से पूर्व पिता निर्देश दे गये थे कि यथासंभव ऋण चुका देना और जीवन में सत्य निष्ठ बने रहना। रघुनाथ के पास अब एक ही विकल्प बचा था कि घर द्वार, जमीन जायदाद सभी बेच दिया जाय और उससे कर्ज चुकता किया जाय, क्योंकि संपत्ति पिता के रहते ही लगभग समाप्त हो चुकी थी।जो थी वह जमीन व मकान के रूप में ही शेष बची थी। रघुनाथ इन्हें बेचकर ऋण मुक्त हो गये । पर अब वह बेघर थे कि इस तरह द्वार द्वार भीख माँगने की तुलना में किसी पवित्र क्षेत्र में जाकर भगवद् भक्तिपूर्वक जीवन बिताना कही अच्छा है। यह सोचकर वे पुरी के लिए रवाना हो गये।

उक्त समाचार तब उनकी ससुराल पहुँचा, तो सभी सोचने लगे कि अब क्या किया जाय ? अन्नपूर्णा को छोड़कर सब इस बात पर सहमत थे कि उस कंगाल को बेटी देने की तुलना में उसका पुनर्विवाह कर दिया जाय। पैसे से असंभव क्या है ? निश्चय ही वह परिवार धन की दृष्टि से सम्पन्न था, पर उसने कठोरता और नृशंसता सहृदयता की अपेक्षा कही अधिक बढ़ी चढ़ी थी, सो अन्नपूर्णा के लाख मना करने पर सबने राजमंत्री के पुत्र से विवाह निश्चय कर दिया। तिथि भी तय हो गयी।

उधर अन्नपूर्णा का बुरा हाल था। वह दिन रात रो रोकर भगवान से प्रार्थना करती कि किसी प्रकार उसकी सूचना रघुनाथ को मिल जाय और वे यहाँ आ जाय। ठीक उसी समय कुछ पड़ोसी पुरी की यात्रा को निकल रहे थे ।अन्नपूर्णा ने उन्हें एक पत्र दिया, जिसमें पूरी परिस्थिति का विस्तृत विवरण देते हुए, उनके यहाँ उपस्थित होने की विनती की गयी थी, साथ ही अपने मत का उल्लेख करते हुए यह भी लिखा था कि दूसरी शादी किसी भी कीमत पर नहीं कर सकती है, आप आयें अथवा नहीं । विवश किये जाने पर प्राण त्याग देगी।

पत्र पाकर रघुनाथ व्याकुल हो उठे । उनकी बेचैनी का कारण था कि पुरी से उनके ससुराल का मार्ग एक महीने का था और विवाह होने में मात्र पन्द्रह दिन शेष थे। वे किस भाँति वहाँ पहुँचे ? कुछ भी समझ में न आने पर भगवान से प्रार्थना करने लगे और रात्रि भर करते ही रहे। प्रातःकाल थोड़ी नींद आ गई । आंखें खुली तो सामने भगवान जगन्नाथ का मंदिर न पाकर कुछ चौंके । चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो बिल्कुल अपरिचित जैसा स्थान जान पड़ा। मंदिर की जगह व अब एक हवेली के सामने थे ।राहगीरों से जब स्थान और मकान का परिचय पूछा तो पता चला कि अपनी ससुराल के सामने उपस्थित है।सोते सोते वे यहाँ कैसे पहुँच गये ?यह बात समझने में उन्हें तनिक भी कठिनाई नहीं हुई ।इसे वह भली भाँति जान चुके थे, कि ऐसा भगवान की असीम अनुकम्पा से ही संभव हुआ है। इसके बाद वे पत्नी अन्नपूर्णा को लेकर पुरी चले गये और आजीवन वहीं रहें।

बंगाल के प्रसिद्ध सन्त रामदास के जीवन में एक ऐसी ही अद्भुत घटना है। वे काली भक्त थे ।पर न जाने क्यों हिमालय दर्शन की तीव्र अभिलाषा उन्हें रह रहकर बेचैन कर देती। वे इतने निर्धन थे कि स्वयं के बूते वहाँ पहुँच नहीं सकते थे। आय का कोई साधन था नहीं। जो थोड़े पैसे मुन्शीगीरी से मिल जाते थे, वह नौकरी भी उनने भक्ति के आवेश में छोड़ दी थी। फिर हिमालय-दर्शन की साथ कैसे पूरी हो ? वह कुछ समझ नहीं पा रहे थे। इच्छा की उपेक्षा करते भी नहीं बन पड़ रहा था, कारण कि वह इतनी प्रबल और आवेगपूर्ण थी कि उन्हें आकुल-व्याकुल किये दे रही थी। हार कर जगत जननी काली से इसकी किसी प्रकार व्यवस्था कर देने को कहने लगे। कई दिनों के मनुहार का जब कोई असर नहीं हुआ, तो अन्न-जल त्याग दिया। एक दिन और एक रात निराहार रहते बीत गये। दूसरा दिन और दूसरी रात्रि भी ऐसे ही गुजर गये। उनकी विकलता बढ़ने बढ़ने लगी। वे कातर अन्तःकरण से काली को पुकारने लगे। नेत्र से निरन्तर अश्रु-धरा बह रही थी। आज का दिन भी बिना खाये ही गुजर गया। रात्रि आयी। उनकी बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। काली के चित्र के आगे माथा टेका और भाव-विह्वल अन्तराल के क्रन्दन करने लगे। स्थान अश्रुपात से पूर्णतया भीग गया। विह्वलता इतनी थी कि बेसुध हो गये। कुछ समय पश्चात ठण्ड लगने की अनुभूति हुई तो उठ बैठे। स्वयं को सक शिलाखण्ड पर पाकर हैरान हुए। सामने सघन वन था किसी जलधारा की कल-कल भी स्पष्ट कर्णगोचार हो रही थी। थोड़ी दूरी पर आग जलती दिखाई पड़ी, शायद किसी साधु की धूनी हो। सन्त रामप्रसाद ने इतना तो अनुमान लगा लिया कि यह उत्तराखण्ड का ही कोई क्षेत्र होना चाहिए, पर अनुमान को पक्का करने के लिए वे धूनी की ओर बढ़ गये। साधु के सम्मुख उपस्थित होकर उनने अपनी जिज्ञासा प्रकट की, तो उत्तर मिला कि यह ‘उत्तरकाशी’ है। सूर्योदय होने तक वे वहीं ठण्ड निवारण करते रहे। इसके उपरान्त दैनिक क्रिया से निवृत्त होकर हिमालय-दर्शन के लिए निकल पड़े उस क्षेत्र में दिन तक घूमने-फिरने के पश्चात् उनका मनोरथ पूरा हो गया। अब वे वहाँ कुछ कठिनाई भी अनुभव करने लगे थे। पुनः उसी शिलाखण्ड पर तीसरे दिन बैठे-बैठे काली की कृपा का स्मरण कर तन्मय होकर गा उठे-

एमन दिन के हबे तारा, ज्बे तारा-तारा बले तरा बये पड़बे धारा, दि पद्य उठबे फुटे, मने आँधार जाबे छुटे।

.....तन्मयता गीत समाप्ति के साथ ही भंग हो गई। आंखें खुली तो सामने काली का चित्र दीख रहा था। उसने अपने को स्वयँ को कोठरी में बैठे पाया। इस दृश्य से एक बार पुनः उनके नेत्र नम हो गये । भाव प्रवणता के कारण जलधारा फिर से चली।

ये गुह्य विज्ञान के प्रसंग हैं। सर्वसाधारण को यह आश्चर्यजनक इसलिए लगते हैं, क्योंकि सामान्य दृश्य और सामान्य घटना की तरह यह आम नहीं होते। यदि ऐसा हो जाय, तो जायेगी और मनुष्य को फिर ये विलक्षण प्रतीत नहीं होंगे। विलक्षणता की सारी नाप-तौल यहीं तक सीमित हैं। यदि इस परिधि से बाहर निकल कर सोच सकें, तो हम पायेंगे कि ईश्वर की इस सृष्टि में अद्भुतता के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। यह तो अपनी-अपनी दृष्टि है कि कौन किसे, किस रूप में ग्रहण करता, स्वीकारता और उसकी व्याख्या विवेचना करता है। देखने वाले अच्छाई में भी बुराई देख लेते और उत्कृष्टता में निकृष्टता ढूँढ़ निकलते हैं, पर सतोगुणी की दृष्टि यही होती है कि वह विष में भी अमृत की तलाश करें। यही वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा संसार के रचयिता तक सरलतापूर्वक चहुं ओर उसे भली-भाँति जाना-समझा जा सकता है। इस सर्वोपरि अचम्भे को समझ लेने के उपरान्त शेष को समझना कठिन नहीं रह जाता, ऐसा गुह्य विद्या विशारदों का सुनिश्चित मत है।


वे हमारी धरती का द्वार खटखटा रहे हैं।

सृष्टि का विस्तार असीम है। अपने सौर-मण्डल को ही लें तो उसके सम्बन्ध में जितनी जानकारियाँ अब तक मिल पायी हैं वे इतनी अल्प हैं कि उनके आधार पर सब कुछ जानने का दावा नहीं किया जा सकता। सीमित मानवी बुद्धि अपनी प्रतिभा, योग्यता एवं वर्चस्व का गुणगान भले ही करले, पर इतने मात्र से वह सर्वज्ञ नहीं हो सकती। इस विश्व-ब्रह्माण्ड में अकेला मनुष्य ही बुद्धिमान प्राणी नहीं है, वरन् वैज्ञानिक खोजों से जो प्रमाण उपलब्ध हुये हैं, उनसे पता लगता है कि अन्याय ग्रहों पर भी जीवन है। ब्रह्माण्ड में पृथ्वी से अधिक विकसित सभ्यताएं विद्यमान हैं। वे सशरीर अन्य ग्रहों पर भी जीवन है। ब्रह्माण्ड में पृथ्वी आदि की टोह लेने के लिए कभी-कभी पृथ्वी पर उतरते हैं। यह मात्र कल्पना लोक की बातें नहीं हैं, वरन् एक तथ्य है। समय’समय पर दिखाई पड़ने वाली उड़न तश्तरियों के प्रमाण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। उड़न तश्तरियों की बनावट, अचानक प्रकट होकर लुप्त हो जाना कुशल वैज्ञानिक मस्तिष्क एवं विकसित सभ्यता का प्रमाण देती है।

“स्ट्रेन्ज हैपनिंग्स” नामक अपनी कृति में मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता पॉल बेनिस्टर ने इस तरह की अनेकों घटनाओं का वर्णन किया है। उनका कहना है कि वैज्ञानिक खोजों ने आज यह सिद्ध कर दिया है। कि अन्य ग्रहों पर भी कही जीवन है अवश्य । यह भी सत्य है कि अन्य ग्रहों के जीवों का आकार प्रकार एवं जीवन यापन का तरीका पृथ्वी वासियों से भिन्न प्रकार का हो। आवश्यक नहीं कि वहाँ कि परिस्थितियाँ हम मनुष्यों के भी जीवित रहने लायक हो। पर आज यह एक वास्तविकता बन गयी है कि अन्य ग्रहों से उन्नत सभ्यता वाले आते जरूर है जिनका प्रमाण उड़न तश्तरियां प्रस्तुत करती है। सन् 1947 की एक घटना का वर्णन करते हुए उनने लिखा है कि अमेरिका के पश्चिमी तट राकोया के निकट मोटर वोट में बैठे दो तटरक्षक ए. एस. डहल एवं फ्रेडराल क्रेसवेल समुद्री तट की निगरानी कर रहे थे। अचानक दो हजार फीट की ऊँचाई पर आकाश में एक गोलाकार आकार की चमकीली मशीनों को घूमते देखा । वे क्रमशः नीचे उतरने लगी और समुद्रतट से लगभग 500 फिट की ऊँचाई पर आकर रुक गयी। उनकी तस्वीरें खींची जा रही थी। कि एकाएक उन मशीनों में जबरदस्त विस्फोट हो गया । नाव में बैठे दोनों तटरक्षक जान बचाने के लिए छलाँग लगाकर समीपस्थ गुफा में छिप गये।उनके साथ का कुत्ता वही मरा पड़ा था। कुछ देर बाद जब दोनों बाहर निकले तो आकाश में उड़ने वाली उन वस्तुओं का नामों निशान तक न था।

खोजबीन करने पर पाया गया कि विस्फोट का कारण उनके टुकड़े समुद्र के किनारे बिखरे पड़े थे । दुर्घटना की सूचना देने के लिए जब ट्राँसमीटर का प्रयोग करना चाहा तो पता चला कि वह भी बन्द हो गया है । और बाद में निरक्षण के लिए आया अनुसंधान दल वाशिंगटन के उक्त टापू से लगभग 20 टन धातु के टुकड़े एकत्र किये । परीक्षण करने पर मालूम हुआ कि धातु के टुकड़े में 16 तत्वों का सम्मिश्रण है तथा उनके ऊपर कैल्शियम की मोटी परत चढ़ी है।वैज्ञानिक को यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि 16 धातुओं में से एक भी धातु पृथ्वी पर नहीं पायी जाती।

इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध अनुसंधान कर्त्ता ऐरिक वॉन डेनिकन का कहना है कि निश्चय ही ग्रहों पर निवास करने वाले प्राणी हम से कहीं अधिक बुद्धिमान एवं प्रभावशाली हैं। उन्होंने कश्मीर घाटी में अन्य ग्रहों से आने वाले प्राणियों का पता लगाया है। अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र नासा के जाने माने वैज्ञानिक जोसेफ ब्लुमरिच का भी कहना है कि प्राचीन काल में अन्य ग्रहों के प्राणी समय समय पर धरती पर आते रहे है। इस संदर्भ में प्रमाण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि ईसा के समय में भी अंतर्ग्रही आदान प्रदान का प्रमाण मिलता है। श्रीनगर से बीस मील दूर दक्षिण पूर्व में मारतंड़ नामक गाँव में एक अति प्राचीन सूर्य मंदिर है जो किसी अन्य लोकों से आने वाले निवासियों की वेधशाला थी। ऐरिक वाँन डेनिकन ने भी इस क्षेत्र में यात्रा की थी। वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में परीक्षण करने पर पाया है कि 42 मीटर लम्बे और डेढ़ मीटर चौड़े इस क्षेत्र में सशक्त एक प्रकार का सतत् विकिरण निकलता रहता है जहाँ ग्रीगर काउन्टर जैसे उपकरण भी काम करना बन्द कर देते हैं। इस संदर्भ में एक अन्य वैज्ञानिक विशेषज्ञ डॉ0 ब्लुमरिच का कहना है कि इन पहाड़ियों को लोकोत्तर वासियों ने ऐसे विकिरण धर्मी पदार्थ कभी छोड़े थे जिनके माध्यम से अंतरिक्ष यानों को यात्रा के समय उक्त स्थानों को पहचानने और वहाँ उतरने में आसानी रहे। डॉ0 ब्लुमरिच के साथ उनके सहायक भारतीय वैज्ञानिक डॉ एफ. एम. हसन ने भी उक्त तथ्यों की पुष्टि की है । वे इस केन्द्र को प्राचीन काल के अंतरिक्ष वासियों के अंतरिक्षयान की मरम्मत करने की वर्कशाप मानते थे। उनने 30 हजार वर्ष तक लोकोत्तर वासियों की धरती पर अनेकों बार यात्रा करने की घटनाओं का संकलन किया है।

दक्षिण अमेरिका के पेरु राज्य के प्रख्यात नृवंशशास्त्री एवं इतिहासवेत्ता डॉ काबररी ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया कि 30 हजार वर्ष पूर्व पेरु के मूल निवासियों से अन्य ग्रहों के निवासियों से संपर्क कर रखा था। इसके प्रमाण स्वरूप उनने कोई 14 हजार से अधिक स्थापत्य के नमूने एकत्रित किये हैं। उनका कहना है कि ये स्थापत्य मात्र चित्र नहीं है।, वरन् उसकी विकसित सभ्यता के विकास चिन्ह है।केवल पेरु ही नहीं मैक्सिको की पहाड़ियों में भी कई ऐसी गुफायें पायी गयी है जिनमें बने भित्ति चित्र यह दर्शाते हैं कि लोकोत्तर वासियों के निवास केन्द्र रहे होंगे। एक गुफा में एक प्रसिद्ध चित्र है- “ लापिहान्डा” जिसमें एक उड़न तस्तरी को उड़ते हुए दिखाया गया है । अंतरिक्ष यात्रियों के अनेकों मित्र भी वहाँ है। इसी प्रकार के तेल चित्र सहारा के रेगिस्तान, आस्ट्रेलिया एवं विश्व के अन्य स्थानों पर पाये गये हैं। ख्यातिलब्ध जीवनशास्त्री एवं ‘मय’ सभ्यता के विशेषज्ञ डॉ0 जे. मेनसन वेलेन्टिन का इस संदर्भ में कहना है कि उपरोक्त सभी प्रमाण अंतरिक्ष से आये है और किन्हीं बुद्धिमान प्राणियों के है, जो यह बताते हैं कि पृथ्वी की तुलना में विकसित सभ्यताएँ ब्रह्मांड में और भी कहीं है। यहाँ के निवासी बुद्धिमता आध्र सभ्यतों हमसे कही आगे हैं।

उड़नतश्तरी जैसे अंतरिक्षयान अब मात्र किंवदंती नहीं, वरन् एक वास्तविकता बन गये हैं । पिछले दिनों 24 अक्टूबर सन् 1978 को मेलबोर्न को एक कुशल युवा विमान चालक श्री फ्रेडरिक वाकेटिच आस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया के मध्य अपने चार्ट उड़ान पर थे। अचानक विमान के इंजन में गड़बड़ी के कुछ संकेत मिलने लगे। । उसने अधिकारियों को बताया कि 137 मीटर की ऊपर किंग आइस लैण्ड के पास उड़ रहा है और विमान के ऊपर एक लम्बी चमकदार उड़नतश्तरी चक्कर काट रही है। उसके भीतर से हरे रंग का प्रकाश निकल रहा है। यान सहित लुप्त होने के पूर्व फ्रेडरिक के अंतिम शब्द थे कि मेरे विमान के इंजन में रुकावट आ रही है तथा यह विचित्र चमकीली वस्तु अब भी यान के ऊपर मँडरा रही है। इसके पश्चात रेडियो पर किसी धातु के टकराने जैसा शोर सुनाई पड़ा तथा विमान का नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूट गया । मेलबोर्न हवाई अड्डे से कई जहाजों ने खोज के लिए उड़ाने भरी, लेकिन दुर्घटना ग्रस्त विमान का कोई चिन्ह नहीं मिला।

अमेरिका के विख्यात खगोलवेत्ता डॉ0 जे एल एलेन टिकेन एवं डॉ0 जेकिस वेली ने उड़न तस्तरी जैसे विमानों के संदर्भ में खोजबीन की है ।उनका कहना है कि दुनिया के लगभग 50 लाख लोगों ने अब तक उड़न तश्तरियों को अंतरिक्ष में तैरते हुए देखा है। 2 नवम्बर 1957 कि एक घटना का वर्णन करते हुए लिखते हैं। कि टैक्सास क्षेत्र के लीपलोड स्थान में रात्रि के 11 बजे पुलिस केन्द्र को एक संदेश मिला कि ट्रक डिरावर व उसके साथी का टारपीडों नामक एक अति प्रकाशित यान ने उसका पीछा किया। वह अति तीव्र गति से ट्रक के ऊपर चढ़ रहा था जैसे ही वह अंतरिक्ष यान आगे निकल गया इंजन पूर्ववत चालू हो गया ।

इस घटना के एक घण्टे बाद पुनः पुलिस केन्द्र को एक संदेश मिला कि क्लीव लैण्ड के चार मील की दूरी पर वही अंतरिक्ष यान जमीन पर उतर आया है पुलिस वहाँ तक पहुँच पाती कि उससे पूर्व उनकी गाड़ी का इंजन बन्द हो गया और देखते ही देखते वह यान उड़ गया। प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार उस यान से नीला हरा प्रकाश निकल रहा था और ऐसा मालूम पड़ता था कि ऐल्यूमीनियम या किसी अन्य धातु विनिर्मित थी। क्षणार्थ में ही जमीन से सीधे अनुलम्ब दिशा में उठकर वह गायब हो गया था । उस रात्रि में इस तरह की घटनाओं की पन्द्रह से ज्यादा सूचनायें मिली।कुछ इन्हीं घटना क्रमों के आधार पर हालीवुड द्वारा एक काल्पनिक फिल्म आज से प्रायः 8 वर्ष पूर्व बनायी गयी थी। नाम था ईटी । यह फिल्म अपने फन्टासी भर्र दृश्यों के कारण काफी लोकप्रिय हुई थी। डॉ0 ऐनराइन ने अपनी पुस्तक- “दी यू0 एफ॰ ओ॰ एक्पीरियेन्स “ में उड़न तश्तरियों के विभिन्न अनुभवों का वर्णन किया है।वे अमेरिका की प्रसिद्ध शोध संस्था - “नासा” के अध्यक्ष रह चुके है उनके अनुसार सन 1973 में ट्युपोलो क्लीवलैण्ड के एक मजिस्ट्रेट एवं वन्य विभाग के चार रेजरों ने एक उड़न तस्तरी को आकाश में उड़ते हुए देखा था जिससे लाल, पीले व हरे रंग की रोशनी निकल रही थी। उसके ठीक दो सप्ताह बाद इसी नगर में एक सैनिक हैलिकाप्टर एक गुम्बदाकार धातु से बने एक अंतरिक्ष यान से टकराते टकराते बचा था। उस यान का चुम्बकीय आकर्षण इतना प्रचण्ड था कि उसके साथ हैलिकाप्टर 600 मीटर की अधिक ऊँचाई तक ऊपर उठ गया था। बड़ी मुश्किल से उस पर नियंत्रण हो सका था । कोरिया युद्ध के समय में भी दो सैनिकों ने एक विलक्षण अंतरिक्ष यान को पृथ्वी पर उतरते देखा था। जिसमें से चार फुट कद वाले तीन साँवले व्यक्ति बाहर निकल आये थे और उन सिपाहियों में से एक को पकड़कर अपने यान के भीतर ले गये थे । उस पर अनेक परीक्षण करने के पश्चात उसे जमीन पर बेहोशी की हालत में छोड़कर न जाने यान सहित कहां लुप्त हो गये थे । बाद में अनुसंधान कर्त्ताओं को उस स्थान पर रेडियोधर्मिता के स्पष्ट प्रमाण मिले ।

ऐसी भी अनेक घटनायें है जिनमें उड़न तश्तरियों की खोज करने वाले उनका आंखों देखा विवरण प्रकाशित करने वाले अधिकाँश व्यक्ति बेमौत मारे गये । उन्हें इसके लिए पहले से ही लोकोत्तर वासियों से चेतावनी मिल गयी थी कि वे इस कार्य में हाथ न डाले, अन्यथा खतरा उठायेंगे। यह खतरा उनकी जान लेने के रूप में सामने आया । इससे स्पष्ट है कि उड़न तश्तरियां मात्र किम्वदंतियां नहीं रह गयी हैं, वरन् अन्य लोकों से आने वालों के वाहन है जिसमें बैठ कर अंतरिक्ष वासी धरती वासियों से संपर्क साधने का प्रयत्न कर रहें है।


अध्यात्म दर्शन का मर्म

मानवी सत्ता शरीर और आत्मा का सम्मिश्रण है। शरीर प्रकृति पदार्थ है । उसका निर्वाह स्वास्थ्य सौंदर्य, अन्न- जल जैसे प्रकृति पदार्थों पर है। आत्मा चेतन है । चेतन का भण्डारण है परमात्मा । आत्मा ओर परमात्मा की जितनी निकटता, घनिष्ठता होगी उतनी ही अंतराल समर्थ होगा। शरीरगत प्रखरता और चेतना क्षेत्र की पवित्रता जिस अनुपात में बढ़ती है उतना ही आत्मा परमात्मा के बीच आदान प्रदान चल पड़ता है। महानता के अभिवर्धन का यही मार्ग है । शरीर को प्रकृति की समीपता अनुकूलता मिले । आत्मा को पवित्रता और प्रखरता से सुसम्पन्न होने का अवसर मिले । इसी निर्धारण पर सच्ची प्रगति एवं समृद्धि अवलम्बित है।

दो तालाबों के बीच नाली का संपर्क संबंध बना देने से ऊँचे तालाब का पानी नीचे तब तक आता रहता है जब तक की दोनों की सतह समान नहीं हो जाती। आत्मा और परमात्मा को आपस में जोड़ने वाली उपासना यदि सच्ची हो तो उनका प्रतिफल सुनिश्चित रूप से होना चाहिए कि जीव और ब्रह्म में गुण कर्म और स्वभाव की ममता दृष्टि गोचर होने लगे। उपासना निकटता को कहते हैं। निकटता अर्थात् एकता- घनिष्ठता। आग और ईंधन निकट आते हैं तो दोनों एक रूप के हो जाते हैं। इसके लिए साधक को साध्य के प्रति समर्पण करना होता है। उसके अनुशासन को जीवन नीति बनाना पड़ता है। तो इतना साहस और सद्भाव जुटा सके वह सच्चा भक्त। भक्त और भगवान की एकता प्रसिद्ध है। भक्त को अपनी आकाँक्षा, विचारणा, आदत एवं कार्य पद्धति में अधिकाधिक उत्कृष्टता का समावेश करना पड़ता है। आदर्शों का समुच्चय भगवान ही, भक्त का इष्ट एवं उपास्य है।

बेलें पेड़ों पर लिपट जाती है और जमीन पर रेंग सकने की स्वल्प सामर्थ्य से आगे बढ़कर पेड़ की चोटी तक उठती बढ़ती चली जाती है।अपना सिर उठाने वाले के हाथ सौंपने और उसके संकेतों का अनुसरण करने वाली पतंग पंख न होने पर भी आकाश में उड़ती है। नाला नदी से मिलकर हेय नहीं रहता, वरन् गंगा के समान पवित्र हो जाता है । लोहा पारस से घनिष्ठता स्थापित करके स्वर्ग बनता है । अमृत पीने पर मुर्दा नव जीवन पाता है। कल्प वृक्ष की छाया में बैठने वाला निहाल हो कर रहता है। यह उदाहरण आत्मा की घनिष्ठता परमात्मा के साथ सधने के है । चंदन के निकट उगे उगे हुए झुंड झंखाड़ भी सुगन्धित होते हैं स्वाति जल को आत्मसात करने वाली सीप रत्नगर्भा बनती हैं। पोले बाँस का टुकड़ा वादक के होठों से लगकर वंशी कहलाता और राग रागनियों को मनोरम उद्गम बनता है। बाजीगर के हाथों अपने धागे बँधा लेने पर लकड़ी की खपच्चियाँ

कठपुतली का नाच नाचती और प्रशंसा पाती हैं। बूँद समुद्र में मिलकर तुच्छ से महान बनती है । दूध में मिल जाने पर पानी भी उसी भाव बिकता है ।

यही भक्त और भगवान की एकता में होता और । उस एकता का रु आत्म समर्पण है। समर्पण अर्थात् अहंता और आकाँक्षा का समापन साथ ही ईश्वरेच्छा उसकी प्रेरणा आकांक्षा उत्कृष्टता एवं विशालता का अन्तः करण में अवधारण । पत्नी पति के प्रति ऐसा ही समर्पण करती है और बदले में उसकी प्रतिष्ठा, प्रतिभा एवं स्नेहसिक्त आत्मीयता का पूरा लाभ उठाती हैं।

ईश्वर भक्ति का यही स्वरूप है । न इससे कम में काम चलता है न अधिक करना पड़ता है । बिजली घर के साथ सम्बन्ध जुड़ा रहने पर ही बल्ब, पंखे हीटर, आदि गतिशील रहते हैं । सम्बन्ध कट पर वे बहुमूल्य उपकरण निष्क्रिय पड़े रहते हैं। ईश्वरीय घनिष्ठता से विमुख व्यक्ति नर पशुओं की तरह शिश्नोदर परायण रह सकते हैं पर आत्मिक प्रगति के अधिकारी नहीं बन सकते विश्वास की समर्पण भक्ति की महती आवश्यकता है ।

उपसाय परमेश्वर आदर्शों के संचय को समझा जाना चाहिए। भगवान की प्रतिमाओं के पीछे उच्चस्तरीय चिंतन चरित्र की भावना है । वह भावना न हो तो प्रतिमायें खिलौना भर रह जाती है । सदाशयता के प्रति प्रगाढ़ आस्था बनाने में जिसका अन्तराल जितना सफल हुआ वह उसी स्तर का भगवान भक्त हैं । भक्त का गुण कर्म, स्वभाव ईश्वर के सहचर पार्षदों जैसा होना चाहिए जिस ईश्वर भक्ति के प्रतिफलों का वर्णन स्वर्ग मुक्ति ऋद्धि सिद्धि आदि के रूप में किया गया है उसमें एकत्व अद्वैत, विलय विसर्जन की शर्त है साधक भगवान को आत्मसात करता है और उसके निर्धारण, अनुशासन को अपनाने को ही गर्व -गौरव और हर्ष, संतोष अनुभव करता है

अपनी निकृष्टता यथावत बनाये रहना । पात्रता और पुरुषार्थ का व्यतिरेक करके नियन्ता से चित्र - विचित्र मनोकामनाओं के लिए दबाव डालना दुराग्रह करना, भक्ति भावना के सर्वथा विपरीत है। शरब्उ जंजाल से फुसलाने, छुटपुट उपहार देकर बरगलाने और स्वार्थ सिद्ध करने के लिए बहेलिया, मछुआरे जैसे छद्म प्रदर्शनी की विडम्बना रचना न तो ईश्वर भक्ति है और न उसके बदले किसी बड़े सत्परिणाम की आशा की जानी चाहिए। ईश्वर न्यायकारी है। उसके दरबार में पात्रता ही अधिक अनुग्रह एवं अनुदान के कारण होती है । यह कार्य प्रार्थना, याचना के रूप में पूजा अर्चना मात्र करते रहने से शक्य नहीं है। ईश्वर भक्ति कर्मकांड प्रधान नहीं है। इसमें भावना, विचारणा और गतिविधियों की अधिकाधिक उत्कृष्टता बनाना होता है। उसकी उपेक्षा करके मनुहार तक सीमित व्यक्ति आत्मिक उपलब्धियों से वंचित ही रहते हैं। उनके पल्ले थकान, निराशा और खोज के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता ।

संसार के हर क्षेत्र में पात्रता के अनुरूप अनुदान मिलने का नियम है। यही प्रचलन अध्यात्म क्षेत्र में भी है। कोई अपनी बेटी किसी भी याचना करने वाले को दे, दें, ऐसा नहीं होता जमात की क्षमता उपयुक्त हर कसौटी पर परखी जाती है, जो जीतते हैं वे नियुक्त होते हैं। दंगल में वही पहलवान पुरस्कृत होते हैं, जो कुश्ती पछाड़ते हैं। छात्रवृत्ति उन्हीं को मिलती है जो अच्छे नम्बर लाते हैं । प्रार्थना करने भर से बैंक मैनेजर किसी को हुँड़ी नहीं भुनते हैं। भिखारियों में भी उन्हीं को कुछ मिलता है जो अपनी असमर्थता प्रमाणित करते हैं। हट्टे कट्टे याचक हर जगह दुत्कारे जाते हैं। ईश्वर के दरबार में अनुदान वरदान उन्हीं के लिए सुरक्षित है जो प्रस्तुत उपलब्धियों का श्रेष्ठतम उपयोग करके यह सिद्ध करते हैं कि उन्हें कुछ अधिक मिला तो वे उसे विलास, संचय, उद्धत प्रदर्शन, कुपात्रों पर बिखरने, दुर्व्यसन एवं अर्हता के परिपोषण के दुरुपयोग नहीं करेंगे।

स्मरण रहे ईश्वरीय अनुदान सत्पात्रों के हाथों उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सौंपें जाते हैं। किसी की लिप्सा, लालसा, तृष्णा, अहंता के मनोकामना पूरी करने में ईश्वर को तनिक भी रुचि नहीं है। इसके लिए उसे पूजा का प्रलोभन देकर भी न्याय निष्ठा एवं कर्म व्यवस्था छोड़ने के लिए सहमत नहीं किया जा सकता है। उसकी निष्पक्ष न्यायशीलता में किसी भी कारण प्रतिरेक उत्पन्न नहीं किया जा सकता।

बदल सर्वत्र बरसते हैं। पर चट्टानें सूखी रहती है और गहरे तालाबों में ढेरों पानी जमा होता है। दूसरों के अनुदान पाने के लिए अपनी पात्रता आवश्यक है । फूल खिलते हैं तो उन्हें भ्रमरों से प्रशंसा के गीत सुनाने और तितलियों को शृंगार सज्जा जुटाने का सहयोग मिलते दिखता है। कीचड़ सड़ने पर वह मक्खी, मच्छर, दुर्गंध तथा घिनौने कृमि- कीटकों के ही झुण्ड जुड़ते हैं। यह अपनी अपनी पात्रता है। वृक्षों के आकर्षण शक्ति बादलों को बरसाने के लिए विवश करती है। धातु खदानें दूर - दूर बिखरे स्वजातीय कणों को अपनी चुम्बक शक्ति से खींचती, घसीटती और भण्डार बढ़ाती रहती है। आँख की पुतली सही हो तो संसार के दृश्य दिखेंगे। कान की झिल्ली सही हो तो शब्द संगीत सुनने को मिलेंगे । पाचन तंत्र सही हो तो आहार से पोषण मिलेगा। अन्यथा “ अपना ही दाम खोटा हो तो परखने वालों का क्या खोट” “ईश्वर मात्र उनकी सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं ।” इन तथ्यों को समझने वालों की उपासना, याचना स्तर की नहीं होती । वे पात्रता और प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए आत्म-शोधन और आत्म- परिष्कार का द्विविध पुरुषार्थ करते हैं। यही है वह मूल्य जिसकी कीमत पर अध्यात्म क्षेत्र की विभूतियाँ हस्तगत होती है । उपासना का स्वरूप एवं उद्देश्य यही है । जो उसे क्रिया कृत्यों की जादूगरी समझते हैं, वे भूल करते हैं। अध्यात्म पराक्रम का केन्द्र बिन्दु है- आत्म परिष्कार । उपासनात्मक कर्मकाण्डों के सभी उपाय, उपचार साधक को पवित्रता और प्रखरता अपनाने के लिए उत्साहित और अग्रसर करते हैं। उनके द्वारा चित्र- विचित्र चमत्कार देखने और उपयुक्त अनुपयुक्त मनोरथ पूरा करने जैसी बिना पंखों की कल्पना उड़ाने नहीं उड़ी जानी चाहिए। ऐसे में सिर, पैर के रंगीन सपने किसी को भी नहीं देखने चाहिए। जादुई चमत्कारों के लिए किसी देवता या संत के दर्शन अनुग्रह से लम्बी - चौड़ी उपलब्धियाँ पाने की लालसा में उलझने की अपेक्षा यथार्थता इसमें है कि हम अंतर्मुखी हो । अंतर्जगत में छिपी दिव्य शक्तियों को खोजे और सुधारें । पेड़ के पत्ते, पल्लव और फल, फूल देखकर यह अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि यह ऊपर आसमान से टपके है वरन् जड़ों की उस मजबूती और गहराई को समझना चाहिए, जो पेड़ के लिए खुराक बटोरती और भेजती रहती हैं किन्तु प्रत्यक्ष आँखों से दृष्टिगोचर नहीं होती । मानवी सत्ता की गरिमा, सफलता भीतर से उबलती है। देवताओं या संतों की अनुकम्पा तो उसे खरादती, सजाती भर है।

जन्म- जन्मांतरों से संचित कुसंस्कारों को हट पूर्वक निरस्त करना पड़ता है। अपने आपे से, अभ्यस्त ढर्रे, संघर्ष करने का नाम ‘तपश्चर्या । इस उपाय से परिशोधन जन्म पवित्रता की उपलब्धि होती है। यह आत्मिक प्रगति का प्रथम चरण है। दूसरा है ‘ योगसाधना ‘ । इसका अर्थ है दैवी। विशिष्टताओं के साथ व्यक्तित्व को जोड़ देना । गुण, कर्म, स्वभाव में चिंतन और चरित्र उत्कृष्टता, आदर्शवादिता का समावेश करना । आत्मशोधन और आत्म परिष्कार की उस उभयपक्षीय प्रक्रिया को गलाई, ढलाई, धुलाई रंगाई भी करते हैं । इन्हीं को पवित्रता, प्रखरता का युग्म भी कहते हैं। सज्जनता औ साहसिकता का समन्वय ही आत्मिक प्रगति का सच्चा स्वरूप है। हर कोई को यह देखते रहना चाहिए कि उसकी आँतरिक समस्वरता बढ़ रही है या नहीं। इस प्रगति के साथ भौतिक क्षेत्र के जंजाल, प्रपंच स्वभावतः घटने लगते हैं और “ सादा जीवन, उच्च विचार “ अक्षरशः चरितार्थ होने लगते हैं।

अन्न, जल, वायु पर शरीर की स्थिरता एवं प्रगति निर्भर है। आत्मा की प्रगति के लिए उपासना, साधना एवं आराधना के तीन आधार चाहिए। उपासना अर्थात् ईश्वर की इच्छा को प्रमुखता, उसके अनुशासन के प्रति अटूट श्रद्धा, घनिष्ठता के लिए निर्धारित उपासना प्रक्रिया में भाव भरी नियमितता । साधना, अर्थात् जीवन साधना । संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों मान्यताओं का उन्मूलन । गुण, कर्म, स्वभाव, चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश। आराधना अर्थात् लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रम दान, अंशदान । यह तीनों ही साथ -साथ चलने चाहिए। इनमें से एक भी ऐसा नहीं जो अपने आप में पूर्ण हो। इसमें से एक भी ऐसा नहीं जिसे छोड़कर प्रगति पथ पर आगे बढ़ना संभव हो सके । हमारे जीवन की दिशाधारा में उपासना, साधना, आराधना का त्रिवेणी संगम अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहना चाहिए। औसत देश वासियों का निर्वाह स्तर अपनाये । परिवार को छोटा रखे उसे सुसंस्कारी, स्वावलंबी बनाये। बड़प्पन की लिप्सा छोड़े। महानता का लक्ष्य अपनाये। शरीर और आत्मा दोनों का हित साधे । निर्वाह के लिए न्यायोचित आजीविका उपार्जित करें । आत्मा का हित साधने के लिए चिंतन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का अधिकाधिक समावेश करते रहे। व्यक्तित्व के हर पक्ष को मानवी गरिमा के अनुरूप बनाये किन्तु अवाँछनीयता से लड़ने के लिए हर समय लड़ाकू, शूरवीर का बाना पहने रहे। जो उपलब्ध है उसका सदुपयोग करे। जो नहीं है उसके लिए प्रयत्न करे, किन्तु चिंतन, खिन्न, असन्तुष्ट कभी भी न रहें। हँसती -हँसाती, हलकी-फुलकी जिन्दगी ही किसी अध्यात्मवादी होने की निशानी हो सकती है।


पिशाच रूपी क्रोध (Kahani)

वन-विहार के लिए वासुदेव, बलदेव और सात्यकि अपने घोड़ों पर चढ़कर निकले । रास्ता भटक जाने से वे एक ऐसे सघन वन में जा फँसे, जिसमें न पीछे लौटना संभव था, न आगे बढ़ना। निदान रात्रि एक पेड़ के नीचे बिताने का निश्चय किया। घोड़े बाँध दिये गये। तीनों ने एक-एक पहर पहरा देने का निश्चय किया ताकि सुरक्षा होती रहे और दो-दो साथी सोते रह सकें।

पहली पारी सात्यकि की थी । वे जगे, दो सो गये । इतने में पेड़ पर से एक पिशाच उतरा और मल्लयुद्ध के लिए ललकारने लगा । सात्यकि ने उसके कटु वचनों का वैसा ही उत्तर दिया और घूंसे का जवाब लात से देते रहे । पूरे प्रहर मल्ल युद्ध होता रहा। सात्यकि को कई जगह चोट लगी पर उस समय साथियों से उस प्रसंग की चर्चा न कर, सो जाना ही उचित समझा।

अब बलदेव के जागने की बारी थी। पिशाच ने उन्हें भी चुनौती दी जवाब में वैसे ही गरमागरम उत्तर मिले। प्रेत का आकार और बल पहले की तरह बढ़ता रहा और बलदेव की बुरी तरह दुर्गति हुई । दूसरा प्रहार इसी तरह बीत गया ।

तीसरी पारी वासुदेव की आई उन्हें भी चुनौती मिली वे हँसते हुए लड़ते रहे और कहते रहे - बड़े मज़ेदार आदमी हो तुम, नींद और आलस से बचने के लिए मेरी जैसी मखौल कर रहे हो ।

पिशाच का बल घटता गया और आकार भी छोटा होने लगा। अंत में वह झींगुर जैसा छोटा रह गया। तब वासुदेव ने उसे रुपट्टे के एक छोर से बाँध लिया।

प्रातः नित्य कर्म से निपटकर, जब चलने की तैयारी होने लगी तो सात्यकि और बलदेव ने पिशाच से मल्ल युद्ध होने की घटना सुनाई और चोटों के निशान दिखाये । वासुदेव हँसे और पिशाच को रुपट्टे के छोर में से खोलकर हथेली पर रख लिया ।

आश्चर्यचकित साथियों को देखकर वासुदेव ने बताया कि वह पिशाच और कोई नहीं, कुसंस्कार रूपी क्रोध था, जो वैसा ही प्रतिउत्तर पाने पर बढ़ता और दूना होता है, पर जब अपेक्षा की जाती है तो, दुर्बल और छोटा हो जाता है।


आत्मा पथिक काया सराय

शूरसेन राज्य की सीमाएँ काफी क्षेत्रों में फैली हुई थी। उस राज्य के अधिपति थे सम्राट चित्रकेतु, सन्त साधु प्रकृति के साथ-साथ प्रतापी-पराक्रमी भी थे। उन्हें किसी बात की क्या होगा ? क्योंकि उनके कोई सन्तान न थी। एक दिन महर्षि अंगिरा चित्रकेतु के पास राजभवन में आए। राजा की चिन्ता व्यथा देखकर महर्षि का मन करुणार्द्र हरे उठा । उन्होंने महाराजा को पुत्रेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया । डुबते करे जैसे तिनके का सहारा नहीं, जहाज का सहारा मिल गया । पुत्रेष्टि यज्ञ की तैयारियां होने लगी । देश-देशान्तर से पुत्रेष्टि यज्ञ से कर्मकाण्ड विशेषज्ञ, आचार्य देव एवं तपोनिरत महाऋषियों का आमंत्रण देने प्रधान मात्य स्वयँ गये। समारोह के साथ यज्ञ सम्पन्न हुआ । महर्षि अंगिरा ने यज्ञ शेष हविष्यन्न राजमहर्षि कृतद्युति को दे दिया । जाते जाते महर्षि कहते गये - राजन् । आपको एक पुत्र तो होगा किन्तु वह आपके हर्ष तथा शोक दोनों का कारण बनेगा। महर्षि का कथन अनबूझ पहली जैसा था। महाराजा चित्रकेतु एवं कृतद्युति कुछ पलों तक सोचते रह गये, पर रहस्य न समझ सके। फिर यह सोचकर प्रसन्न हो गये, कि महर्षि ने पुत्र होने कास आश्वासन तो दे ही दिया ।

महारानी कृतद्युति गर्भवती हुई । समय पर उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया । माता-पिता दोनों ने पुत्र का मुख देखा - निमेष भर के लिए एक टक देखते ही रह गये, जिसे अपनी एक आँखों में बाँध पाने को वे बार बार तरस गये थे । आज वही सौन्दयी - वही सौंदर्य बँध आया है, आज उन्हीं के रक्त -माँस के बँधनों में । दोनों ने बारी बारी से शिशु को अपनी भुजाओं में भर की चूम लिया। उत्तराधिकारी की चिंता मिटी और इस उपलक्ष्य में पूरक राज्य भर में उत्सव हर्षोल्लास मनाया गया। वर्षों तक राज्य करते रहने और अब प्रवणता की ओर अग्रसर होते जा रहे है। चित्रकेतु के यहाँ संतान का जन्म हुआ था सो उनके हर्ष का पारावार न रहा । पुत्र के स्नेह वश वे प्रायः महारानी कृतद्युति के आवास में ही ज्यादातर समय व्यतीत करते थे। पुत्रवती बड़ी रानी पर उनका एकान्त अनुराग हो गया था फलतः दूसरी रानियाँ कुढ़ने लगी।

पति की अपेक्षा से उत्पन्न हुआ क्षोभ ने द्वेष का रूप धारण कर लिया। उन्होंने सोचा राजा कृतद्युति पर विशेष स्नेह इसलिए रखते हैं कि उसने संतान को जन्म दिया है। यह नवजात शिशु ही उनकी अपेक्षा का कारण है। अंत में सबने मिलकर उस अबोध शिशु को विष दे दिया - और वह बालक मृत्यु का ग्रास बन गया।

महारानी कृतद्युति और सम्राट चित्रकेतु के लिए तो यह अनभ्र वज्रपात था। वे बालक के शव के पास कटे वृक्ष की तरह गिर पड़े। पूरे राजभवन में करुण क्रंदन की चित्कारें गूंजने लगी। चित्रकेतु ने अपने पुत्र का अंतिम संस्कार भी नहीं कराया था। उसी समय महर्षि अंगिरा और महर्षि नारद आये। अंगिरा ने समझाया कि इस देह में अब क्या अशक्ति रखना, इसकी अंत्येष्टि कर दो । राजन् ! जो भाग्य में नहीं होता है उसे बचाया नहीं जा सकता है।

चित्रकेतु ने कहा - “ नहीं महात्मन् ! ऐसा मत कहिए आप जैसे तपस्वी के लिए सब कुछ संभव है भला ऐसा कौन सा काम है, जिसे तपोनिष्ठ महर्षि न कर सके। मैं अपने प्रिय पुत्र को प्राण देकर भी प्राप्त करना चाहता हूँ। आप इसे पुनर्जीवित कर दीजिए।”

महर्षि अंगिरा एवं देवर्षि नारद ने अनेकों तरह महाराजा चित्रकेतु एवं महारानी कृतद्युति को समझाया । लेकिन किसी तरह से भी वे दोनों न माने । ऐसी दशा में महर्षि अंगिरा में ध्यानस्थ होकर उस बालक की आत्मा को आमंत्रित किया । थोड़ी ही देर में बालक जी उठा लेकिन अब वह किलकारियाँ करने वाला शिशु नहीं था उसके मुख मण्डल पर एक स्वर्गीय आभा थी। वह आस पास के वातावरण से उपराम लग रहा था।

अपने पुत्र को जीवित देखकर राजा और रानी उसे अपनी बाँहों में उठाने के लिए आतुर हो उठे। मेरे लाल ! कहकर उन्होंने जैसे ही उसे उठाने की चेष्टा की, कि बालक बोल उठा-” कौन पुत्र ! देवर्षि ! ये लोग कौन थे ? “ बालक ने नारद से कहा “ यह तुम्हारे माता-पिता है।” नारद बोले !

तब बालक ने कहा- “ नहीं, मैं तो जीवात्मा हूँ । शरीर पुत्र हो सकता है। सारे संबंध शरीर के ही है, जहाँ शरीर से संबंध छूटा वही सारे संबंध छूट जाते हैं। वर्तमान जीवन तो जीवात्मा की विकास यात्रा का एक सुपाँत है। मैं अपनी अब विकास कदम की ओर बढ़ना चाहता हूँ मुझे रोकिये मत। यह कहकर शरीर फिर निष्प्राण हो गया। चित्रकेतु का जैसे सारा मोह आवरण नष्ट हो गया। वे पुत्र के शव का अंतिम संस्कार करके लौटे तो देवर्षि नारद ने कहा -” अनात्मा वस्तु में आशाक्य रखना ही शोक का कारण है, अतः किसी किसी के लिए आशाक्य न करते हुए अपने कर्मों को भली भाँति पूरा करते चलना ही संसार में सुखी रहने का सर्वोत्तम साधन है।”

राजा को जीवन दर्शन समझ में आया वह अनासक्त हो वे राज्य कार्य में पुनः निरत हो गये।


कुछ अनसुलझी गुत्थियाँ

मनुष्य अपने को ज्ञान का, श्रेष्ठता का, प्रकृति का सिरमौर मानता है। लेकिन विश्व - ब्रह्माण्ड के बारे में अभी तक जितना कुछ जाना जा सका है उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि अभी हम कुछ सीपियाँ ही बिन पायें है। मणिमुक्तक बहुमूल्य चीजें तो अभी भी प्रकृति के अंतराल में छिपी पड़ी है जिन्हें ढूँढ़ा नहीं जा सकता । प्रकृति की कितनी ही पहेलियाँ ऐसी है जिनका रहस्योद्घाटन करना मानवी बुद्धि के लिए एक चुनौती बनी हुई है। प्रकृति की इन पहेलियों को देखकर मनुष्य को अपनी क्षुद्रता का परित्याग करना ही चाहिए।

“ मारवेल्स एण्ड मिस्टरीज ऑफ द वर्ड एराउन्ड अस” नामक पुस्तक में इस तरह की कितनी ही प्रकृति की रहस्यमय रचनाओं एवं घटनाओं का वर्णन किया गया है उनमें से एक है- रहस्यमय गीत गाती पालवों की प्राकृतिक घटना ! विश्वविख्यात “ अरेबियन नाइट्स “ में एवं मध्य एशिया के गोबी के रेगिस्तानों में इस प्रकार के अनेकों रहस्यों का उल्लेख चीन के प्राचीन इतिहास में पाया जाता है। इतना ही नहीं ख्यातिनामा यात्री मार्कोपोलो ने भी अपनी यात्रा संस्करण में इन प्रदेशों में प्राकृतिक संगीत सुनने का उल्लेख किया गया है। पिछले दो दशक से ब्रिटेन की न्यूकेशन ऑन टाइम युनिवर्सिटी में गीत गाती बालुओं की प्राकृतिक घटना के संबंध में अनुसंधान चल रहा है। ताल एवं लय के साथ गाने के अतिरिक्त कानाफूसी करती, गर्जना करती तो कभी चूँ चूँ की आवाज निकालती, भिनभिनाती, तो कभी चीखती बालू संसार के विभिन्न भागों में पायी जाती है किंतु इनके ये रहस्य प्राचीन काल से अभी तक नहीं खोले जा सके है। इस संदर्भ में 19वीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध ब्रिटिश भूगर्भ शास्त्री एगमिलर ने अपनी पुस्तक - “ दी क्राइज ऑफ दी बिटसी” में अपना निजी अनुभव बताते हुए लिखा है कि स्कॉटलैंड के भीतरी हेबरीडीश के निकट ‘ईग’ नामक द्वीप पर जो रेत फैली थी उस पर पैर रखते ही सुरीली आवाज आने लगती थी। प्रत्येक कदम पर उसी ध्वनि का पुनरावर्तन होता था। वु.......वु ......वु जैसी सुरीली व ध्वनि तीस गज की दूरी तक सुनाई पड़ती थी। इसी प्रकार की सुरीली आवाज करने वाली बालु अमेरिकी महाद्वीप में “ लागे आइलैण्ड “ एवं मेस्च्यूसेंट की खाड़ी की बालु में भी होती है। इतना ही नहीं हवाई द्वीप में ब्रिटेन के वेइलस के पश्चिमी तट पर, नार्थम्बरलैण्ड के समुद्री तट पर, बोर्नहोम द्वीप में, डेनमार्क के कुछ स्थानों में, पोलैण्ड में, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, चिली, एशिया, अफ्रीका, मध्यपूर्व के रेगिस्तानों में भी इस प्रकार की बालु पायी जाती है, जहाँ भिन्न भिन्न प्रकार की ध्वनि हुआ करती है।

मूर्धन्य वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने भी अपनी कृति “ए नेच्यूरेलिस्ट वायेज राउन्ड द वर्ड “ में लिखा है कि ब्रजील के रि- यों -डी जानिरो के निकटवर्ती द्वीपों की तप्त बालुओं पर घोड़ों के चलने पर चूँ- चूँ की आवाज आने लगती है। इसी तरह चीलि में एक रेतीले टीले पर चढ़ते समय उससे गर्जने की आवाज आने लगती है। चढ़ते समय नीचे गिरने वाली रेत से भी वही ध्वनि निकलती थी। स्कॉटलैंड के विख्यात प्रकृतिविद् सर डैविन ब्रायुस्टर ने अपनी पुस्तक “ लेटर्स आन नेचुरल मैजिक “ में ‘ दि माउन्टेन ऑफ बेल’ नामक एक रेतीली पहाड़ का वर्णन किया। उस पहाड़ पर चढ़ने से रेत कणों में एक प्रकार का तीव्र कंपन होने लगता है और रेत नीचे धंसने लगती है जिससे मेघ गर्जन जैसी भयानक आवाज आने लगती है और आस पास का स्थान भी कम्पायमान होने लगता है। प्रशान्त महासागर के मध्य स्थित हवाई द्वीप समूह की रेत, लावा, शाख और प्रवाल के मिश्रण से बनी हुई है। उस पर चलते समय कुत्ते भौंकने जैसी आवाज आने लगती है।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी आर. ए. बेगनोल्ड ने इस प्रकार की विभिन्न रहस्यों वाली बालुओं पर गहन अनुसंधान किया है । अपने शोध निष्कर्ष में उन्होंने बताया है कि इजिप्ट से 300 मील दक्षिण- पश्चिम में जहाँ निकटतम आवास भी पाये जाते हैं, वहाँ रात्रि के शांत वातावरण में कभी कभी अचानक मेघ गर्जन की सी आवाज आने लगती है और आस पास की धरती काँपने लगती है।

यह आलौकिक वृंदगान कुछ मिनटों तक लगातार होता रहता है फिर एकाएक शान्त हो जाता है । उनके अनुसार बालुओं में ध्वनि होने के दो स्थान होते हैं (1) समुद्रतट पर (2) रेगिस्तानी रेतीले टीलों में! स्कॉटलैंड के ईदाद्वीप के रेत में से निकलने वाली ध्वनि ऐसे सुनाई पड़ती है जैसे कोई जोर से सीटी बजा रहा है। यह ध्वनि समुद्रतट की रेत से निकलती है, जबकि रेगिस्तानी रेत से ‘ गर्जना ‘ की आवाज आती है। तट प्रदेश की बालू से 700- 1200 साइकल्स के प्रति सेकेण्ड के आवर्तन से ध्वनि होती है इसे पियानो के उच्च “ सी” ध्वनि से तुलना की जा सकती है। जबकि रेगिस्तान की बालू से इससे बहुत कम -132 साइकल्स प्रति सेकेण्ड के आवर्तन की ध्वनि हो पाती है। लेकिन जब रेतीले टीलों पर से वह प्रपात की तरह नीचे आती है तब 260 साइकल्स के प्रति आवर्तन से ध्वनि करती ह जो पियानों के मध्य स्वर - “ सी”की तुलना के बराबर होती है। वैज्ञानिक अभी तक इतना ही जान पायें हैं कि गाते - बजाते, शोर मचाते प्रकृति के ये नन्हें कण किसी स्तर की और कितनी ध्वनि उत्पन्न करते हैं परन्तु इसका मूल कारण वे नहीं ढूंढ़ पाये हैं। यद्यपि इस संबंध में प्रयत्न भी तो किये गये हैं। पिछले दिनों प्रीटोरिया “साउथ अफ्रीका” की प्रयोग शाला में कलहारी रेगिस्तान की बालू का जब परीक्षण किया गया तो उसकी वह ध्वनि उत्पादक क्षमता नदारद थी जो रेगिस्तानी जलवायु में पायी जाती है। लेकिन जब उसी प्रयोग को दोबारा रेगिस्तानी वातावरण में सम्पन्न किया गया तो वह क्षमता यथावत पायी गयी। कि यदि उसी बालू को 200 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर रखा जाय तो वह क्षमता कुछ अंशों में फिर से वापस आ जाती है। विज्ञानवेत्ताओं का मानना है कि रेत कणों द्वारा ध्वनि उत्पन्न के लिए आवश्यक है कि सभी रेत कण एक समान आकार के है। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बालू के दो सतहों के बीच दबाव और घर्षण उत्पन्न हो।

प्रकृति अपने आँचल में कितने रहस्य छिपाये हुए हैं, अभी तक उन्हें जान सकना तो दूर, उनकी गणना तक कर पाना संभव नहीं हो सका है। नगण्य सी चीज समझे जाने वाले बालू के कण ही अपने भीतर कितने आश्चर्य चकित कर देने वाले रहस्य समेटे हुए हैं । कि उनकी सम्पूर्ण जानकारी मनुष्य को नहीं है।उपरोक्त पंक्तियों में रेत केवल गाने, शोर माने वाले गुणों का ही वर्णन किया गया है, किन्तु कही कही पर प्रकृति के ये कण आतंकित करने वाले मृत्यु पास भी बन जाते हैं। इन्हें “ चोर-रेत या बलुआ दलदल कहते हैं।”

घटना मार्च 1970 की है। अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में ओकीयोबी नामक झील प्रकृति छटा देखने हेतु जेक पिकेट एवं फ्रेड सोल नामक दो छात्र आवश्यक सामान लेकर घर से निकले थे रास्ते में एक सूखी बालूवी नदी को पार करने जा रहे थे। पिकेट आगे था। कुछ ही कदम वह बढ़ पाया होगा कि अचानक जमीन में धंसने लगा। ठोस धरातल पाने के लिए जैसे जैसे वह कदम बढ़ाता, प्रत्येक कदम के साथ और गहराई में धंसने लगा। वह चिल्ला उठा “ सोल तुम वही खड़े रहो, यह बलुआ दलदल है” । यह सुनते ही सोल को लगाकर कि आगे बढ़कर बचाने में दोनों को खतरा है अतः उसने पास ही पड़ी पेड़ की एक डाली उठाई और पिकेट की ओर बढ़ाया । तब तक पिकेट जाँघों तक बालू में धंस चुका था । उसके आस पास की बालू मानो कोई अवलेह कर हौज हो और उसे हिलाया जा रहा हो, कि तरह से थिरकने लगी थी वह उसके पास में बुरी तरह जकड़ चुका था अपना संतुलन खो कर वह गिर पड़ा जब तक पेड़ की शाखा उस तक पहुँची, वह गर्दन तक नीचे धंस गया था। हाथ बढ़ाने के भरसक प्रयत्न भी किये पर वह असफल ही रहा। तब सोल ने डाली को उसके शरीर के नीचे घुसा कर एक पत्थर को आधार बनाकर उस पर शरीर को उठाना चाहा, लेकिन सूखी डाल टूट गयी और पिकेट पूरी तरह बालू में लुप्त हो गया। मात्र सर्वत्र चारों ओर सूखी बालू दृष्टिगोचर हो रही थी ईद गिर्द दूर दूर तक और कोई व्यक्ति नहीं था। अकेले सोल ने अपने मित्र की जान बचाने की भरसक कोशिश की किन्तु असफलता ही हाथ लगी।शोकाकुल होकर वह वापस कॉलेज लौट गया । दुखद घटनाक्रम सुनने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था। इसी तरह कुछ वर्ष पूर्व उत्तरी अमेरिका के आरकाँसस प्रान्त में बेर्डेन स्थान के पास एक शिकारी दल अचानक नदी के तट के पास जा पहुँचा । घनी झाड़ियों को पार करते समय एकाएक दल की नजर सामने एक भयभीत कर देने वाले दृश्य पर पड़ी। सभी वही रुक गये । देखा कि सामने बालू की सतह पर किसी मनुष्य का मात्र सिर भर दिखाई दे रहा था जिसकी आंखें आसमान की ओर थी। तलाश करने पर पता चला कि वह बलुआ दलदल थी जिसमें वह व्यक्ति सिर तक धंस गया था और भूखों मर कर मृत्यु की गोद में चला गया था। एक अन्य घटना में दूसरे विश्व युद्ध के समय नाजी बमबारी से ग्रस्त होकर कप्तान रोजर जोन्स अपना ट्रक लेकर बालू वाले क्षेत्र से निकल भागने का प्रयत्न कर रहा था कि थोड़ी दूर आगे जाकर उसका ट्रक बालू के भीतर धंसने लगा। किसी तरह जान बचाकर वह वहाँ से भाग निकलने में सफल हो सका, पर गाड़ी वही लुप्त हो गयी।

इस घटना के बाद अमेरिकी सैन्य विभाग की ओर से इस दिशा में कई अनुसंधान कार्य हाथ में लिये गये हैं। ऐसा ही एक अनुसंधान इण्डिआना राज्य के वरिष्ठ विज्ञानवेत्ता डॉ0 आर्नेस्ट राइस स्मिथ ने किया इसके लिए उन्होंने एक किसान की बलुआ दलदल वाली जमीन को चुना जो एक नदी के निकट थी। लम्बे समय तक अध्ययन करने के पश्चात उन्होंने बताया है कि जब उक्त स्थल पर कोई बड़ा पत्थर फेंका जाता तो आस पास की बालू अप्रीतिकर ढंग से स्पंदित होने लगती और ऐसा दिखाई पड़ता मानो वह सही हो। सबसे बड़ा आश्चर्य जनक तथ्य उभर यह आया है कि वह दलदल ऋतु परिवर्तन के साथ अपना रंग और गुण धर्म भी बदलता रहता है। कभी तो उस स्थान की बालू दलदल जैसी होती है, तो कभी ठोस हो जाती है। अगस्त माह में वह इतनी ठोस हो जाती है कि उस पर कितनी ही उछल कूद ही क्यों न की जाय कोई हलचल नहीं होती। अगस्त माह में वह बिल्कुल सूखी होती है, फिर भी यह एक रहस्य ही बना हुआ है कि इसके बाद वह अपना गुण धर्म क्यों बदल देती है ? मानवी बुद्धि के लिए प्रकृति के ये रहस्य अभी भी अनसुलझे बनें हुए हैं और उसकी बहुज्ञाता के लिए चुनौती दे रहे है।


जिन प्रेम कियो तिनहिं प्रभु पायो

ईश्वरीय सत्ता को रसवत बताते हुए शास्त्रकारों ने उसकी प्राप्ति का एक सुगम मार्ग बताया है- प्रेम ! प्रेम यदि वास्तविक और उच्चस्तरीय हो तो भक्त को भगवान की सहायता मिलकर रहती है । कठिनाइयों, विपत्ति और बाधाओं वह हर प्रकार से भक्त का मार्ग दर्शन करते हैं। ईश्वरानिरागियों के जीवन में घटने वाली घटनायें इस बात की साक्षी है कि तादात्म्य यदि दिव्य हुआ, तो दैवी सत्ता का सहयोग भी अद्भुत ढंग से प्राप्त होता है। घटना रामकृष्ण परमहंस के एक ग्राही शिष्य दुर्गा चरण नाग से संबंधित है। बात जिन दिनों की है उन दिनों पूर्वी बंगाल में बारदी के ब्रह्मचारी विशेष ख्याति थी ब्रह्मचारी का ताराकान्त गंगोपाध्याय नाम का एक शिष्य था । उसका नाग महाशय के यहाँ बराबर आना जाना था। एक बार बहुत आग्रह से उसने नाग महाशय को ब्रह्मचारी के पास आने के लिए राजी कर लिया। नासग महाशय बड़े साध्य पुरुष थे। वे कही भी किसी से मिलने जाते, तो भेट के रूप में कुछ फल आदि अवश्य ले जाते ।बरदी जाते भी फल - मिष्ठान साथ ले गये।

उनकी वेश भूषा अत्यन्त दीन हीनों जैसी थी। रूखे बाल, खुश्क शरीर और दुर्बल काया में वे एकदम भिखारी जैसे प्रतीत होते थे । नग्न पाँव और देह में लिपटी जीर्ण - शीर्ण धोती इस अनुमान को और अधिक ठोस आधार प्रदान करते । इस हाल में जब वे ब्रह्मचारी के समक्ष उपस्थित हुए तो उसने उनकी दरिद्रता का उपहास उड़ाया और उपहार में लाई सारी वस्तुएँ एक गाय के सामने फेंक दी। नाग महाशय सर नीचा किये बैठे रहे उन्हें शान्त और अनुद्विग्न देख ब्रह्मचारी और भी उत्तेजित हो उठा एवं रामकृष्ण की निन्दा करने लगा। अब और अधिक वे बरदाश्त नहीं कर सके। क्रोध पराकाष्ठा पर पहुँच चुका था इतने पर ब्रह्मचारी चुप नहीं हुआ। भर्त्सना जारी रही । गुस्से के मारे उनका चेहरा एकदम लाल हो गया । शरीर में मानो चिंगारियाँ सी फूटने लगी। तभी उन्होंने अकस्मात् देखा कि एक विकराल भैवर मूर्ति उनके सम्मुख प्रकट हुई और ब्रह्मचारी को कुचल डालने की अनुमति माँगने लगी। नाग महाशय ने किसी प्रकार अपने क्रोध को नियंत्रित किया और उसी के साथ वह किराल विग्रह भी अदृश्य हो गया । इसके बाद में वह एक पल भी नहीं रुके और ‘ हा! देव !! हा ! रामकृष्ण !! ‘ का विलाप करते हुए तेजी से बाहर निकल आये।

इससे मिलती जुलती एक अन्य घटना गोरखनाथ से संबंध है। प्रसंग उन दिनों का है जब उनके गुरु मस्येन्द्र नाथ महारानी मंगला और कमला के साथ ब्रह्म ज्ञान भूल कर भोग विलास में डूबे हुए थे। इन्हीं दिनों एक बार गोरख नाथ यात्रा करते हुए कदलीवन से होकर गुजर रहे थे। गर्मी के दिन थे। चिलचिलाती धूप से थोड़ी राहत पाने और थकान मिटाने के निमित्त वे एक बकुल वृक्ष के नीचे सुस्ताने लगे। कुछ देर के विश्राम के बाद उन्हें ध्यान करने की इच्छा हुई सो वही ध्यान करने लगे। आंखें बन्द किये अभी कुछ ही क्षण बीते थे कि उन्हें कतिपय असुविधा उत्पन्न हुई । आंखें खोली तो चकित रह गये। सामने भगवान शंकर की एक वामन मूर्ति अधरों पर दिव्य मुस्कान बिखेरते विराजमान थी।

उसने गोरखनाथ को संबोधित करते हुए कहा-”तुम्हारा गुरु इसी वन में अपने पतन का सरंजाम जुटा रहा है। जाओ और उसकी रक्षा करो “ इतना कहकर प्रतिमा अंतर्ध्यान ।

इसी के उपरांत गोरखनाथ अपने गुरु को ढूंढ़ते हुए उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ वे आत्म विस्मृति की स्थिति में उपरोक्त दोनों रानियों के साथ ऐश्वर्य - भोग कर रहे थे। उन्होंने उनके मूर्छित अंतःकरण को अपने दिव्य उपदेशों द्वारा उद्भूत किया और उस पाप - प्रखर से बाहर निकाल उन्हें अपने साथ ले गया।

कहते है कि जिन दिनों राजा भर्तृहरि अपनी प्राण प्रिय रानी पिंगला के प्रति अत्यधिक आशक्त थे, उन्हीं दिनों उनके जीवन की एक अद्भुत घटना ने उन्हें वैराग्य की ओर मोड़ दिया।

जनश्रुति है कि एक बार एक योगी ने कठोर तपस्या हेतु ऐसा फल प्राप्त किया, जिसे खाने के पश्चात चिरयौवन बना रहे। योगी ने सोचा कि इसका वास्तविक अधिकारी राजा है। यदि उनका स्वास्थ्य उत्तम बना रहा, तो वे अधिक अच्छी तरह राज-काज चला सकेंगे। और सुरक्षा व्यवस्था भली प्रकार कर सकेंगे।राज्य में शाँति और सुरक्षा बनी रहने से प्रजा सुखी रहेगी। ऐसा सोचकर योगी ने उक्त फल नरेश को भेट कर दिया और साथ ही उसकी महिमा भी बता दी। भद्रहारी ने विचार किया कि इसे खा लेने पर उसका यौवन तो चिरस्थायी बना रहेगा, पर रानी का लावण्य तो चूकता चला जायेगा, फिर आकर्षण का आधार क्या रह जायेगा ? उसका अप्रतिम सौंदर्य ही मेरे जीवन की गतिशीलता है। सक्रियता और स्फूर्ति कदाचित उसके बिना संभव नहीं। अस्तु इसकी यथार्थ अधिकारिणी पिंगला ही हो सकती है उसे ही फल ग्रहण करना चाहिए। पिंगला किसी और पर आशक्त थी। उसने उसे अपने प्रेमी को दे दिया । इस प्रकार फल अंततः एक वराँगना के पास पहुँचा । शरीर से भले ही वह हेय कर्म में लिप्त भी पर मन की परोपकार प्रति अभी भी जिन्दा थी। उसने सोचा कि उसकी तुलना में सम्राट को इसकी कही अधिक आवश्यकता है। यदि स्वयँ उसे ग्रहण कर लिया तो वह अगणित लोगों को पाप कर्म के लिए ही प्रेरित करेगी जबकि राजा के द्वारा इससे प्रजा का उपकार होगा । यह निर्णय कर उसे भर्तृहरि को सौंप दिया।

सम्राट ने पहली ही दृष्टि में फल को पहचान लिया । उसने वस्तु स्थिति का पता लगाया कि पिंगला की चरित्र हीनता से उसे गहरा धक्का लगा। किंकर्तव्यविमूढ़ होकर वे गम्भीर सोच में पड़ गये।दिन भर की उधेड़ बुन के पश्चात भी किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सके। रात्रि आई उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। व्यग्रता की स्थिति में आंखों में नींद नहीं थी । वे राज्य प्रसाद के एक एकान्त कमरे में अशान्त मन से टहल रहे थे। कि अचानक तुमुल निनाद के साथ महल की छत को भेदते हुए एक सौम्य सुन्दर देव विग्रह प्रकट हुआ। वैराग्य उपदेश करते हुए वह जिस प्रकार अभिभूत हुआ था उसी प्रकार अचानक अदृश्य हो गया। ऐसी विदेत्रंती है कि इसी के बाद नरेश में वैराग्य का उदय हुआ और राज पाट त्यागकर वे वन में रहने लगे।

विवेकानन्द तब तरण ही थे ध्यान-साधना और अध्ययन में किसी प्रकार का व्यवधान उपस्थिति न हो इसलिए किराये के एक अलग मकान की उनके लिए व्यवस्था कर दी गयी। वे उसी में एकाँकी रहते थे। एक दिन अध्ययन कर रहे थे कि सामने की दीवार से एक चीवरधारी देव पुरुष मूर्तिमान होते दिखाई पड़े। पहले तो उन्होंने इसे नेत्रों का भ्रम समझा पर बार बार आँखों मलने पर वह धीर गम्भीर प्रतिमा उनके सम्मुख बनी ही रही, तो उन्हें कुछ भय हुआ और डर कर भागकर बाहर खड़े हुए । कुछ क्षण पश्चात जब उन्हें अपनी मूर्खता का भाव हुआ तो वह कमरे में प्रविष्ट हुए, किंतु तब तक वह मूर्ति तिरोहित हो चुकी थी। इस संबंध में विवेकानन्द कहा करते थे। कि संभव है कि वह देव विग्रह बुऋ देव की है और किसी विशिष्ट उपदेश के निमित्त उपस्थिति हुआ हो।

ऐसा ही एक प्रसंग मीरा बाई के जीवन का है।बात यह है कि बात उन दिनों की है, जब भोजराज का देहान्त हो चुका था । पति के निर्धन से उनका मन वैराग्य सागर में और भी निमज्जात हो गया। संसार के प्रति उनकी रुचि जो न्यूनाधिक थी, वह इस घटना से बिल्कुल ही समाप्त हो गयी । अब वह दिन भर रणछोड जी के मंदिर में ही पड़ी रहती है । वही पर एकान्त में वह अपने आराध्य से तरह तरह से बातें किया करती है कभी कभी यह उपक्रम देर रात तक चलता। दिन में साधु संतों का समागम कीर्तन भजन और रात्रि में विग्रह से एकान्त वार्ता यही उनका दैनिक क्रम था धीरे धीरे उनकी यह गतिविधियाँ बढ़ती ही गयी और उसी के साथ कृष्ण प्रेम का नशा भी गहराता चला गया । दूर दूर तक उनकी ख्याति पहुँच गयी और चारों ओर से योगी यति दर्शन करने आने लगे। प्रसिद्ध से दिल्ली के तत्कालीन बादशाह अकबर भी अपना लोभी संवरण न कर सके एवं वैष्णें वेश में तानसेन के संग चित्तौड़ आकर उनके दर्शन किये ।इन सब से वहाँ तत्कालीन राणा और भोजराज के छोटे भाई वँम सिंह क्रुद्ध हो गये पूरा परिवार मीरा की ख्याति से द्वेष करने लगा और तरह तरह से सताने लगा। ननद ऊदाबाई इन सब में आगे थी । आरम्भ में मीना इन यातनाओं को शाँतिपूर्वक सहती रही, पर जब प्रताड़नाएँ बढ़ने लगी तो रात में रण छोड़ जी की मूर्ति के समक्ष पदावलियों के माध्यम से वह इनका बयान करती और अपने प्रियतम से निवेदन करती कि दनुजता के इस कारागृह से वह जल्दी मुक्ति दिलाये। एक रात अपने इष्ट देव से इसी प्रकार आग्रह कर रही थी। नेत्र से प्रेमाक्षु बहे चलें आ रहे थे और वह उन्मत्त हुई अपनी व्यथा- कथा तथा स्वजनों का दुराचरण भक्ति के आवेग में गाती जा रही थी। सहसा रणछोड़ जी की मूर्ति दो भागों में विभक्त हो गयी।उससे एक अति सुन्दर बाल- गोपाल प्रादुर्भूत हुए। उस भुवन मोहिनी मूर्ति ने अपने बाल सुलभ चपलता से मीरा को आश्वस्त किया और कहा कि अब और आगे यातनायें सहनी नहीं पड़ेगी। वह तुरन्त उसकी लीला भूमि वृन्दावन के लिए प्रस्थान करें और वही रहें। आदेश मिलते ही उसी क्षण उनने राजमहल त्याग दिया और फिर कभी चित्तौड़ नहीं लौटी।

यह सारी घटनाएँ अनुराग की महिमा का बखान करती और बताती है कि यदि प्रेम को विकसित करते हुए परमेश्वर तक विस्तृत और विराट् किया जा सकें, तो दिव्य सत्ता का दिव्य संरक्षण हर कोई प्राप्त कर सकता है, पर इसका आरम्भिक अभ्यास घर-परिवार के छोटे दायरे में शुरू कर शनैः-शनैः व्यापक बनाते हुए विश्व स्तर तक पहुँचाना पड़ता है। इसमें सफलता मिलने के पश्चात ही परमसत्ता से अहैतुकी प्रेम कर सकना संभव हो सकता है। इस आलौकिक प्रेम के संपादन से आलौकिक सत्ता की आलौकिक अनुकम्पा भी भक्त पर बरसने लगती है, ऐसा भक्त रस के आचार्यों का कथन है।


मंत्र साधना : आधार और चमत्कार

मंत्र साधना की सफलता के लिए साधक का उपयुक्त व्यक्तित्व निर्माण करना एक ऐसा कार्य है जिस पर जितना अधिक ध्यान दिया जाय उतना ही उत्तम है। शरीर के क्रिया कलाप ऐसे हो, जिनसे इन्द्रिय शक्ति कलुषित एवं विकृत न होती हो । इस दृष्टि से इन्द्रिय निग्रह, संयम और सदाचार पर अत्यधिक जोर दिया जाना चाहिए। साथ ही भावनाओं की उत्कृष्टता मंत्र शक्ति में प्राण झोंक देती है इस बात का भी ध्यान रखा जाय। साधना के लक्ष्य एवं साधन विधान की यथार्थता एवं सफलता के बारे में मन सुनिश्चित और संयम सहित रहना चाहिए। इसके लिए सतत् प्रयत्न करते रहने और तत्काल फल प्राप्ति के लिए उतावली न करने का धैर्य भी आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत जीवन की रीति नीति एवं लोक व्यवहार में सौम्य उद्दात्त एवं निर्मल दृष्टिकोण रहना चाहिए। स्नेह सद्भावना सज्जनता, करुणा एवं उदारता का अंतःकरण में जितना अधिक समावेश होगा, उसी अनुपात में साधना की सफलता के लिए उपयुक्त मनो भूमि बनेगी। इस प्रकार का शारीरिक और मानसिक निर्माण आध्यात्मिक जगत की कुँजी समझी जानी चाहिए। साधक की सफलता का तीन चौथाई श्रेय इसी तथ्य पर निर्भर है कि विधि विधान का तो एक चौथाई ही को महत्व दिया जा सकता है। इन दिनों साधक पथ के पथिकों जो असफलता और जन्य निराशा ही हाथ लगती है। और उसका एक बहुत बड़ा कारण जीवन साधना की उपेक्षा और विधि विधान को सब कुछ मान बैठने की भूल है और यह भूल सुधार ली जाय और साधना के राज मार्ग पर चलने की सर्वांग पूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया कलापों की।

साधना के अन्य माध्यम भी है पर मंत्र साधना सर्वत्र अनिवार्य है। कारण कि इसमें संकल्प शक्ति जागृत एवं नियंत्रित होती है, साथ ही शब्द विज्ञान का ऐसा सुन्दर सुयोग भी जुड़ता है जो साधक की प्रसुप्त किन्तु अति अद्भुत शक्तियों को जागृत कर उसे आत्मबल सम्पन्न बनाता है और वाह्य जगत को प्रभावित करने की रहस्यमयी हलचलों का सृजन करता है।

मंत्र क्या है इसके बारे में आज की स्थिति, सर्वभौम और सर्वजनीन दृष्टि से कुछ कह सकना कठिन है कारण यह है कि इन दिनों साम्प्रदायिक पक्षपात और पूर्वाग्रहों का बोलबाला है। हर सम्प्रदाय अपनी परम्परा को प्रधानता देता है। अन्य मत वालों की बात उसके गले नहीं उतरती।किसी प्रकार समझा भी दिया जाय तो श्रद्धा नहीं जमती। ऐसी दशा में सामयिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यही कहना ठीक होगा कि साधक अपनी मान्यताओं के आधार पर कोई मंत्र अपनालें और उसी पर श्रद्धा केन्द्रित करें और उसी को साधना का माध्यम बनाये। ऐसी दशा में विधि विधान भी अपनी अपनी परम्पराओं के अनुसार अपनाना होगा। यों यह मार्ग भी देर सवेर में लक्ष्य तक पहुँचा ही देगा और अश्रद्धा, संदेश एवं आशंका के वातावरण में किये गये उपयुक्त मंत्र की अपेक्षा अधिक अच्छा रहेगा। पर यह काम चलाऊ समझौता है, तथ्य नहीं। यदि लेखक को हिन्दू धर्मानुयायी होने और एक मंत्र विशेष पर उसका पक्षपात होने के द्वेष से मुक्त किया जा सके, तो उसे यह कहने में कोई संकोच न होगा कि गायत्री मंत्र की शब्द संरचना अनुपम और अद्भुत है। आगम और निगम का समस्त भारतीय अध्यात्म इसी पृष्ठभूमि पर खड़ा है। मंत्र और तंत्र की अगणित शाखा प्रशाखाएँ इसी का विस्तृत परिवार है। अन्य धर्मावलंबियों के अन्य मंत्र हो सकते हैं पर जब कभी सर्वभौम और सर्वजनीन मंत्र की खोज पूर्वाग्रह को दूर रखकर निष्पक्ष भाव से उसकी निजी महत्ता के आधार पर की जायेगी तो उसका निष्कर्ष गायत्री मंत्र ही निकलेगा। पर इन दिनों इसी के लिए आग्रह करना साधना के क्षेत्र में गतिरोध उत्पन्न करना होगा। अभी तो सरल प्रतिपादन तो यही है कि श्रद्धानुरूप मंत्र और परम्परानुसार विधि विधान अपना लिया जाय। यह तरीका भी बुरा नहीं है। प्रगति धीमी भले ही रहे पर प्रगति लक्ष्य की ही ओर रहेगी।

श्रद्धा और एकाग्रता युक्त मनोभूमि में स्वच्छ शरीर मन, वस्त्र स्थान और उपकरणों का ध्यान रचाते हुए किया हुआ जप तुरन्त स्फूर्ति प्रदान करता है। और जिस प्रकार चाय आदि उत्तेजक पदार्थ पीने से तत्काल फुर्ती दिखाई पड़ती है वैसा ही अनुभव साधना काल एवं उसके उपरान्त होता है। लगता है कुछ आन्तरिक और महत्वपूर्ण शक्ति कहाँ से मिलती है और वह अपेक्षाकृत अधिक आत्मबल सम्पन्न बना है। हर्ष संतोष और प्रकाश के रूप में मंत्र की उपलब्धि को सहज ही परखा जा सकता है। कहना न होगा कि इसका मन अपने तक ही सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव वाह्य जगत पर भी पड़ता है। किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति को इस उपलब्धि से प्रभावित और परिवर्तित किया जा सकता है। सिद्धि इसी का नाम है।

स्वामी रामतीर्थ ने एक बार कहा था- ईश्वर बना जा सकता है।उसे देख या दिखाया नहीं जा सकता। सूक्ष्म तत्व के बारे में यही बात है। ईश्वर तत्व में शब्द प्रवाह के संचार को रेडियो यंत्र अनुभव करा सकता है पर ‘ईश्वर’ को उसके असली रूप में देखा जा सकना संभव नहीं। गर्मी, सर्दी, सुख, दुख की अनुभूति होती है उन्हें पदार्थ की तरह प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। मंत्र में उच्चस्तरीय शब्दावली मंत्र की मूल शक्ति नहीं वरन् उसको सजग करने का उपकरण है। किसी सोते को हाथ से झकझोर कर जगाया जा सकता है। पर यह हाथ ‘जागृति’ नहीं। अधिक से अधिक उसे जागृत निमित्त होने का श्रेय ही मिल सकता है। मंत्रोच्चार भी अंतरंग में और अंतरिक्ष में भरी पड़ी अगणित चेतन शक्तियों में से कुछ को जागृत करने का एक निमित्त कारण भर है।

किस मंत्र से किस शक्ति को, किस आधार पर जगाया जाय, उसका संकेत हर मंत्र के साथ जुड़े हुए विनियोग में बताया जाता है। आगम और निगम शास्त्रों में मंत्र विधान के साथ ही उसका उल्लेख रहता है। जप तो मूल मंत्र का ही किया जाता है पर उसे आरम्भ करते समय विनियोग को पढ़ ले ना तथा स्मरण कर लेना आवश्यक है। इससे मंत्र के स्वरूप और लक्ष्य के प्रति साधना काल में जागरुकता बनी रहती है और कदम सही दिशा में बढ़ता रहता है।

मंत्र विनियोग के पाँच अंक है- ऋषि, छन्द, देवता, बीज, तत्व । इन्हीं से मिलकर मंत्र शक्ति सर्वांगपूर्ण बनती है। पंच तत्वों के सम्मिश्रण से विभिन्न शरीर और पदार्थ बनते हैं। इसी प्रकार विनियोग के पाँच अंक उसके प्रत्यक्ष और सजीव बनाने वाले आधार माने जाते हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर की पाँच परतें है इन्हें आवरण या कोश कहते हैं। प्याज के भीतर जिस तरह परतें होती है हमारी अंतः चेतना में वैसी ही है उन्हें

(1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञान मय कोश और (5) आनन्दमय कोश कहते हैं। इन्हें पाँच शक्ति भण्डार भी कह सकते हैं। पृथ्वी पर जैसे पाँच महाद्वीप है उसी प्रकार चेतना सत्ता को स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति की काया में इन्हें देखा व समझा जा सकता है। मंत्र विनियोग के पाँचों अंक ऋषि, छंद, देवता बीज और तत्व इन पाँचों आधारों को प्रस्फुटित, प्रदीप्ति एवं प्रयुक्त कैसे किया जाय इसका पथ प्रदर्शन करते हैं। अस्तु किसी मंत्र की साधना करते हुए उसके विनियोग भाग को भी जानना समझना और अपनाना आवश्यक है।

‘ऋषि’ तत्व संकेत है -मार्गदर्शक गुरु। ऐसा व्यक्ति जिसमें उस मंत्र से पारंगतता प्राप्त की हो सर्जरी, संगीत जैसे क्रिया कलाप अनुभवी शिक्षक ही सिखा सकता है। पुस्तकीय ज्ञान से नौकानयन नी सीखा जा सकता है इसके लिए किसी मल्लाह का प्रत्यक्ष प्रदर्शन चाहिए। चिकित्सा ग्रंथ और औषधि भण्डार उपलब्ध रहने पर भी चिकित्सक की आवश्यकता पड़ती है । विभिन्न मनो भूमियों के कारण साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार चढ़ाव आते हैं, उस स्थिति में सही निर्देश और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में पारंगत हो। गुरु का यह कर्तव्य भी हो जाता है कि शिष्य ने केवल पथ प्रदर्शन करे वरन् उसे अपनी शक्ति का एक अंश अनुदान देकर प्रगति पथ को सरल भील बनाये। अस्तु ऋषि का आश्रय मंत्र साधना की प्रथम पीढ़ी बताई गयी है।

छंद का अर्थ है- लय । काव्य में प्रयुक्त होने वाली पिंगल प्रक्रिया के आधार पर ही छन्दों का वर्गीकरण होता है, यहाँ उसका कोई प्रयोजन नहीं मंत्र रचना से काव्य प्रक्रिया अनिवार्य नहीं। फिर यदि हो भी तो उसको जानने न जानने से कुछ बनता बिगड़ता नहीं। यहाँ लय को ही छंद समझा जाना चाहिए किस स्वर में, किस क्रम से, किस उतार चढ़ाव के साथ मंत्रोच्चारण किया जाय यह एक स्वतंत्र शास्त्र है, सितार में तार तो उतने ही होते हैं, अंगुलियां चलने का क्रम भी हर वादन में चलता है, पर बजाने वाले के कौशल तारों पर आघात करने के क्रम में करके विभिन्न राग रागनियों का ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करता है। मानसिक, वाचिक, उपार्शु, उदात्त, अनुदात्त स्वरित ही नहीं मंत्रोच्चार के और भी भेद प्रभेद है जिनके आधार पर उसी मंत्र द्वारा अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएं उत्पन्न की जा सकती है।

ध्वनि तरंगों के कंपन इस लय पर निर्भर है। साधना विज्ञान में इसे यति कहा जाता है।मंत्रों की एक यति सबके लिए उचित नहीं। व्यक्ति को स्थिति और अपनी आकाँक्षा को ध्यान में रखकर यति का-लय का -निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मंत्र साधना में प्रवृत्त होने के लिए उपयुक्त छंद की लय निर्धारण करले।

ध्वनि योग का तीसरा चरण है- देवता । देवता का अर्थ है चेतना सागर में से अपने अभीष्ट शक्ति प्रवाह का चयन। आकाश में एक ही समय में अनेक रेडियो स्टेशन बोलते रहते हैं पर हर किसी की फ्रीक्वेंसी अलग होती है। ऐसा न होता तो ब्रोडकास्ट किये गये सभी शब्द मिलकर एक हो जाते। शब्द धाराओं की पृथकता और उनसे संबंध स्थापित करने के पृथक माध्यमों का उपयोग करके ही किसी रेडियो सेट के लिए आज यह संभव है कि अपनी पसंद का रेडियो प्रोग्राम सुने और अन्यत्र में चल रहे प्रोग्रामों को चलने से रोक दें। निखिल ब्रह्माण्ड में ब्रह्म चेतना की अनेक धारायें समुद्री लहरों की तरह अपना पृथक आस्तित्व लेकर भी चलती है। भूमि एक ही होने पर उसमें परतें अलग अलग तरह की निकलती है।समुद्री अगाध जल में पानी की परतें तथा असीम आकाश में वायु से लेकर किरणों तक की अनेक परतें होती है।इस प्रकार ब्रह्म चेतना के अनेक प्रयोजनों के लिए उद्भूत अनेक तरंगें निखिल ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होती रहती है। उनके स्वरूप और प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए ही उन्हें देवता कहा जाता है। साकार उपासना पक्ष इनकी अलंकारिक प्रतिमा भी बना लेता है और निराकार पक्ष प्रकाश किरणों के रूप में उसको पड़ता है। सूर्य की सात रंग की किरणोँ में से हम जिसे चाहे उसे रंगीन शीशे के माध्यम से उपलब्ध कर सकते हैं। एक्सरे मशीन अल्ट्रावायलेट किरणें आकाश में से अपनी अभीष्ट किरणों को ही प्रयुक्त करते हैं। हंस दूध पीता है, पानी छोड़ देता है। इसी प्रकार किसी मंत्र के लिए ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाय इसके लिए विधान निर्धारित है।

स्थापन, पूजन, स्तवन, आदि क्रियायें इसी प्रयोजन के लिए होती है। निराकार साधक ध्यान द्वारा उस शक्ति को अपने अंग प्रत्यंगों में तथा समीपवर्ती वातावरण में ओत - प्रोत होने की भावना करते हैं। किस देव संपर्क का यह तरीका ठीक रहेगा यह निश्चय करके ही मंत्र साधक को प्रगति पथ पर अग्रसर होना होता है।बीज का अर्थ है उद्गम । मानवी काय कलेवर में विभिन्न शक्तियों के लिए विभिन्न स्थान निर्धारित है। षट् चक्रों 108 उपत्यिकाओं, सहस्र शक्ति नदियों का निर्धारण स्थान है। उन स्थानों को शक्ति संपर्क स्थान कहाँ है और उसे किसी विधि से प्रभावित किया जाय इसी जानकारी को बीज विज्ञान कहते हैं। ह्रीं, श्री, क्लीं, ऐं, हुँ, यं, वं, रं, लं, आदि बीज अक्षर भी है जिसे किसी मंत्र में अतिरिक्त शक्ति भरने का सूक्ष्म इन्जेक्शन कहते हैं। आवश्यकतानुसार मंत्रों के साथ इन अतिरिक्त बीजों को भी जोड़ दिया जाता है। गायत्री मंत्र और मृत्युंजय मंत्र में इसी आधार पर कई बीज उलट पलट कर लगायें जाते हैं। यद्यपि उन्हें लगाना अनिवार्य नहीं पर मंत्र के उद्गम स्थान को तो जानना ही चाहिए। टेलीफोन के डायल को घुमाकर अभीष्ट नंबर से बाते की जा सकती है। बीज स्थान और बीज शक्ति का प्रयोग करके मंत्र को समर्थ बनाने वाली ब्रह्म चेतना के साथ संबंध जोड़ा जा सकता है और उसका समुचित लाभ उठाया जा सकता है।

तत्व को मंत्र की कुँजी कह सकते है दूसरे शब्दों में इसे लक्ष्य भी कहा जा सकता है। अक्सर साधना करने से पूर्व संकल्प पढ़े जाते हैं उनमें यह प्रतिज्ञा रहती है कि साधना का उद्देश्य क्या है ?इसके माध्यम से हमें जाना कहाँ है- और प्राप्त करना क्या है ?स्थूल रूप से पंच तत्वों एवं तीन गुणों के रूप में मंत्रों की प्रवृत्ति मिलती रहती है और उस तत्व के अनुरूप पूजा उपकरण इकट्ठे करके तत्व साधना की जाती है।

आयुर्वेद शास्त्र में वस्तुओं के स्थूल, सूक्ष्म और कारण प्रवृत्तियों का वर्णन है। सामान्य तथ्य अन्न का स्थूल भाग रक्त माँस बनता है, सूक्ष्म भाग से बुद्धि और मनः चेतना विकसित होती है और कारण प्रभाव से अंतरात्मा को पोषण मिलता है।

योगशास्त्र में आहार का सात्विक राजस, तामस वर्गों का वर्गीकरण किया जाता है। मनुष्य के तीन शरीर होते हैं स्थूल, सूक्ष्म और कारण । इसी प्रकार हर वस्तु के अंतराल में उपरोक्त प्रकृतियों की न्यूनाधिकता भरी रहती है। पेड़ों में से केवल यज्ञ कार्य के लिए वही प्रयुक्त होती है जिनकी सूक्ष्म और कारण शक्ति सूक्ष्म प्रयोजनों में सहायक होती है। इसी आधार पर निर्माण निर्धारण किया जाता है किस मंत्र की, किस उद्देश्य के लिए, किस स्थिति का मनुष्य साधना करें तो उसे आहार, वस्त्र, रहन-सहन, माला, दीपक, धूप, नैवेद्य आदि में किस प्रकार का चयन करना चाहिए। तत्व निर्धारण में इसी बात का ध्यान रखा जाता है।

दबी हुई प्रसुप्त क्षमता को प्रखर करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यंत्रों को चलाने के लिए ईंधन चाहिए। हाथ या पैर से चलने वाले ईंधन के लिए न सही उन्हें चलाने वाले हाथ पैरों को काम करते रहने के लिए ऊर्जा की जरूरत रहती है यह तापमान जुटाने पर ही यंत्र काम करते हैं। मंत्रों की सफलता भी इसी ऊर्जा उत्पादन पर निर्भर है।

साधना विधान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है कि आयुर्वेद में भी नाड़ी शोधन के लिए वमन, विरेचन, स्नेहन, स्वेदन, नस्व यह पाँच कर्म शरीर शोधन के लिए हैं। मंत्र साधन में व्यक्तित्व के परिष्कार के अतिरिक्त पाँच आधार - ऋषि, छंद, देवता, बीज और तत्व है। जो इन सब साधनों को जुटाकर मंत्र साधना कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर रहती है।


श्रम की सुगन्ध

रंग बिरंगे फूलों की सुशोभित छटा एवं मोहक सौंदर्य सहज ही उस रास्ते पर आने वाले के मन को आकर्षित कर लेता था। फूलों की सुरभित गंध मन को मदमस्त बना देती थी। अपने पावन चरणों से अपनी परम भक्त शबरी की कुटिया को कृतार्थ करने भगवान आज स्वयं जा रहे थे। राह के दोनों ओर लगे ये रंग बिरंगे फूल झूम झूम का उनका अभिनन्दन कर रहे थे।

कुटिया अपने इष्टदेव प्रभू श्रीराम को देखकर शबरी भाव विह्वल हो उठी । उसकी आँखों से आनन्द और प्रसन्नता के अश्रु टपकने लगे। पदरज को माथे पर धारण करके उनके चरणों को पवित्र जल से धोया, उन्हें आसन पर बिठाकर कुछ खिलाने की तैयारी करने लगी।

शबरी की श्रद्धा से अभिभूत भगवान श्रीराम के मन में फूलों का सौंदर्य, उनका बिखरना सौरभ अभी भी महक रहा था। सहज जिज्ञासा वश उन्होंने शबरी से पूछ लिया कि मोहक फूलों को किसने लगाया है ?

उनके इस सवाल का वृद्धा शबरी के मन में अतीत की अनगिनत यादें कौंध गई। उन्हें शब्दों के सूत्र में पिरोते हुए वह कहने लगी भगवान्।

एक ऋषि कुछ दिनों पहले यहाँ रहा करते थे, जिनका नाम मातंग था। ऋषि जितने प्रचण्ड तपस्वी थे, उतनी ही प्रखर प्रज्ञा थी उनकी। लोक कल्याण की भावना तो जैसे उन में कूट कूटकर भरी थी। इस भावना को परितृप्त करने के लिए उन्होंने यहाँ आश्रम की व्यवस्था बनायी। महर्षि की चारों दिशाओं में फैली ख्याति से आकर्षित होकर विद्यार्थी विद्याध्ययन और जनसेवा का प्रशिक्षण लेने यहाँ आते थे। लोक कल्याण से निरत होने वाले ऋषियों मुनियों को ठहरने को भी यहाँ समुचित व्यवस्था रहती थी। विश्व वसुन्धरा को सुन्दर बनाने एवं प्राणी मात्र के कल्याण के लिए यहाँ शोध कार्य, प्रशिक्षण एवं तपश्चर्या के अनेकों क्रिया कलाप चलाये जाते थे।

एक बार आश्रम में भोजन आदि बनाने की लकड़ी का अभाव हो गया।वर्षा ऋतु भी आने ही वाली थी। आश्रम में रहने वाले विद्यार्थी इस तथ्य से अवगत थे कि बरसात आने वाली है और लकड़ी का अभाव है। वर्षा से पूर्व इतनी लकड़ी की व्यवस्था कर लेनी चाहिए कि जिससे चार मास बरसात में ईंधन का काम चल सके।यह जानते हुए विद्यार्थी उपेक्षा कर रहे थे तथा श्रम से बचना चाहते थे। विद्यार्थियों के छाये हुए अवसाद और व्यवस्था को देखकर मातंग ऋषि चिंतित हो उठे, श्रम देवता का अपमान वह भी ऋषि आश्रम में, भला यह कैसे हो सकता था ?

उन्होंने बिना किसी से कुछ कहें, स्वयँ जंगल में पहुँच कर लकड़ी काटना प्रारम्भ कर दिया। उन्हें प्रायः जंगल की ओर जाते देखकर सभी विद्यार्थियों और आचार्यों ने सोचा था कि महर्षि ध्यान उपासना के लिए वन की ओर गये होंगे। किन्तु जब सब ने उन्हें अपने सिर पर लकड़ियों का भारी गट्ठा उठाये आते हुए देखा तो वस्तु स्थिति से अवगत होते देर न लगी।

भारत के सुविख्यात आश्रम के कुल पति, राजा-महाराजाओं, ऋषि मनीषियों से पूजित महर्षि मातंग के इस कार्य ने सभी को झकझोरा कर रख दिया। सब अंतःकरण उद्वेलित हो उठे। आलस्य की चादर ओढ़कर सोये आश्रम के विद्यार्थियों पर तो घड़ों पानी पड़ गया । सब के सब उनके पीछे कुल्हाड़ी लेकर जंगल की आरे दौड़ पड़े।

सभी वन में पहुँचकर लकड़ी काटने लगे। तीसरे पहर विद्यार्थी गण अपने अपने सिर पर भारी लकड़ी के गट्ठर लादे आश्रम की ओर लौट पड़े। शरीर से पसीना निकल कर गिरता जा रहा था, तथा सभी प्रसन्न थे और एक आलौकिक अनुभूति का अनुभव कर रहे थे। उस दिन विद्यार्थियों की छुट्टी कर दी गयी। कठोर श्रम और मन प्रफुल्लित होने के कारण सब जल्दी सो गये।

प्रातःकाल ब्रह्म बेला में ऋषि उठे। विद्यार्थियों को साथ लेकर स्नानादि के लिए चल पड़ें। एकाएक ऊष्माकालीन वायु के झोंके के साथ मन को प्रसन्न करने वाली सुगंध आने लगी सभी विद्यार्थी आश्चर्य से युक्त स्वर में ऋषि से पूछने लगे- “पूज्यवर । यह सुगंध आज कहाँ से आ रही है ?”

मातंग ऋषि मुस्कुराते हुए बोले, आओ स्वयँ पता लगाओ। हिरन के समान कुलाचें भरते हुए बच्चे दौड़ पड़े । उन्होंने देखा जंगल से लकड़ी सिर पर लाते जिन जिन स्थानों पर आश्रम वासियों का पसीना गिरा था, उन उन स्थानों पर एक एक पुष्प सुन्दर डालियों में मुस्कुरा रहा था। यह प्रसंग सुनते ही अतीत की यादों से विभोर शबरी ने कहा - हे राम । वे मोहक पुष्प पसीने से उत्पन्न हुए हैं। इनसे उड़ने वाली सुगंध श्रम की सुगंध है।


ब्रह्माण्डीय चेतन प्रवाह के अंशधर हम सब

विश्वव्यापी चेतन प्रवाह एक यथार्थता है, इस तथ्य को आज विज्ञानवेत्ता भी स्वीकारते हैं कि उसी समष्टिगत प्राण चेतना के अंश होने से हम में से हर एक को उस प्रवाह से मुक्त रूप से जुड़ सकने की पूरी संभावना है। यह संभावना दो तरीकों से प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर सामने आती है- प्रथम योग साधना द्वारा, जो कि एक सुनिश्चित मार्ग है। दूसरा कई बार बिना किसी योगसाधना के भी कुछ व्यक्तियों में यह सामर्थ्य विकसित होती हुई देखी व पायी गयी है। इससे जहाँ उसके पुनर्जन्म के विकसित स्वरूप का पता चलता है वही साथ ही मनुष्य के भीतर सन्निहित दिव्य चेतना का भी प्रमाण मिलता है।

डॉ0 बर्नार्ड जॉनसन ने अपनी कृति “ बियोन्ड टेलीपैथी “ में ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख किया है कि कितने ही मनुष्य में इस तरह की अतींद्रिय क्षमताएँ विकसित होती है जिसमें वे दूरस्थ स्थानों पर व्यक्तियों की जानकारी बिना किसी संचार साधनों के अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। मार्टिन ऐबोन ने भी अपनी पुस्तक “ एक्सपेरियन्सेस इन प्रोफेसी “ में इस तरह की कई घटनाओं का वर्णन किया है। एक दिन सुबह से ही उनका मन बेचैन था। उसे बार बार एक ही आशंका व्यग्र किये जा रही थी कि वृद्धा माँ जो उससे 30 मील दूर अकेले रहती थी, संकट की स्थिति में है। उसका अंतर मन बार बार उसे आन्दोलित कर रहा था कि माँ के पास पहुँचना चाहिए।

डस दिन वह अन्यमनस्क भाव से छात्रों को पढ़ा रही थी कि एकाएक बिस्तर पर लेटी वेदनाग्रस्त माँ की छवि दिखाई देने लगी । इस दृश्य ने उसे क्लास छोड़ देने को विवश कर दिया । वह सीधे अपने दामाद के घर पहुँची आध्र उसको साथ लेकर गंतव्य दिशा की ओर बढ़ने लगी। रात गहरी हो चुकी थी, ऊपर से तूफान और वर्षा भी अपना विकराल स्वरूप प्रकट कर रही थी। सामने पहाड़ी भी पानी गिरने की वजह से जगह जगह पर अवरोध उत्पन्न कर रही थी। किसी तरह रास्ता साफ करते हुए दोनों उस वृद्ध माँ के पास पहुँचते हैं और पाते हैं कि वह दिल के दौरे से गुजर रही थी। बोब के बिना देरी लगाये तुरन्त चिकित्सक से संपर्क किया । चिकित्सक ने जाँच करने के पश्चात बताया कि कुछ ही मिनटों की यदि देरी हो जाती तो बूढ़ी माँ के प्राण निकल जाते । उक्त घटना का वर्णन अंग्रेजी की पत्रिका “ साइन्स ऑफ माइंड “ में करते हुए कहा गया है कि उस दिन उक्त शिक्षिका के अंतर्मन में उठी गहन संवेदना कोई अदम्य प्रेरणा स्वरूप थी जिसका स्रोत किसी दिव्य चेतना से जुड़ा था। अन्यथा इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी उसका और उसके दामाद का साहस कैसे बन पाता ? सुप्रसिद्ध भौतिक विद् मार्टिन गार्डनर का इस संदर्भ में कहना है कि इस संसार में हजारों व्यक्तियों के साथ ऐसी छोटी बड़ी घटनायें नित्य ही घटती रहती है। इनमें से कुछ को यदि संयोग मान लिया जाय तो यह मानना पड़ेगा कि विश्व ब्रह्माण्ड में कोई दिव्य चेतनात्मक प्रवाह अवश्य है जो समस्त प्राणियों को एक सूत्र में बाँधे हुए हैं। उस प्रचण्ड चेतनात्मक प्रवाह की दिव्य तरंगें हमें एक दूसरे से बेतार के तार की तरह जोड़ देती है और अनायास ही हमारे कार्य व्यापार उस ओर प्रवाहित होने लगते हैं। न चाहते हुए भी कभी कभी कदम उस ओर चल पड़ते हैं जहाँ उनकी आवश्यकता है।

‘बोस्टन सोसायटी फॉर साइकिक रिसर्च ‘ के वरिष्ठ अनुसंधान कर्त्ता डॉ0 एफ॰ एडिंगटन ने अपने निजी जीवन को अनेकों पूर्वाभास की घटनाओं का वर्णन करते हुए विश्वव्यापी चेतन प्रभाव की यथार्थता का सत्यापन किया है। अपने जीवन की एक घटना का वर्णन करते हुए बताया कि किसी तरह उनने अपनी चाची के सूक्ष्म शरीर से साक्षत्कार किया था। उनकी चाची उनके निवास स्थान कैम्ब्रीज से काफी दूर रोक्सबरी में रहती थी जिनका चार दिन पहले ही उनके अस्वस्थ होने कर पत्र उनको मिल चुका था । डॉ0 एर्डिगन रात्रि को सोने का उपक्रम कर रहे थे कि तंद्रावस्था में ही उनके सामने चाची कैथरीन एफ.बोविस दिखाई पड़ी उन्होंने उसे अपने घर का भ्रम समझा, पर जब बार बार वही एक दृश्य मानस पटल पर छाया रहा तो उनसे रहा नहीं गया । वे सुबह निकलने ही वाले थे कि रोक्सबरी से फोन आया कि रात्रि के करीब ग्यारह बजे कैथरीन एफत्र का ऐक्सीडेंट हो गया है। बर्फ से फिसल जाने से उनकी खोपड़ी फट गयी है और अब वह कोमा की स्थिति में है। “कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी।

इसी घटना को अगस्त 1941 की एक अन्य घटना का उल्लेख करते हुए उनने लिखा है कि रात्रि में वह सोने जा रहे थे । लाइट बन्द भी न कर पाये थे कि अचानक दो हलके धमाके सुनाई पड़े। चारों तरफ खोजबीन करने पर भी कोई चीज टूटी फूटी नजर नहीं आई।अंतर्मन किसी अप्रिय घटना की आशंका उठने लगी। अगले दिन दोपहर में पुलिस की एक गाड़ी आकर उनके निवास स्थान पर रुकी उन्हें बताया गया कि वाशिंगटन में उनके साले की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने के कारण हो गयी है। दफन क्रिया के लिए जब वे पहुँचे तो पता चला कि हृदयाघात से पूर्व वह व्यक्ति अपने टेबल के पास बैठा था कि अचानक दिल का दौरा पड़ने से उसका सिर टेबल से टकरा गया जिसके कारण मस्तिष्क में गहरी चोट आ गयी थी। मृत्यु का समय ऑफिस से आने के तुरन्त बाद का था।

तीसरा प्रसंग मार्च 24 सन् 1947 का है। वही सोने का समय, कि कही अचानक कहीं कोई सीसे का गिलास टूटने जैसी आवाज आती है। सभी कमरों में ढूँढ़ खोज की गयी, परन्तु सारे प्रयत्न विफल रहे, कही कोई काँच का एक टुकड़ा तक नहीं मिला। तब डॉ0 एर्डिगटन ने अपनी भतीजी से कहा हो न हो कही किसी प्रिय की मृत्यु न हो गयी हो ? दूसरे ही दिन एक पत्र मिला जिसमें एक अति घनिष्ठ वृद्धा की मृत्यु का समाचार था।

अनुसंधानकर्त्ताओं ने इन तीनों घटनाओं की समीक्षा करते हुए कहा कि मर्मांतक पीड़ा या बिछुड़ने की अप्रिय घटना की व्यथा मरने वाले व्यक्ति के अचेतन मन को तरंगित करती है। उसके विचार तरंग ब्रह्माण्ड के चारों तरफ फैल जाते हैं। और सभी व्यक्तियों तक पहुँचते हैं । लेकिन सामान्यतः इन लोगों के मन मस्तिष्क के अचेतन भाग में अपनी ही निजी आकाँक्षायें, राग- द्वेष विचार संस्कार भरे रहते हैं, अतः वे एक दूसरे के मानसिक तरंगों के पकड़ में सक्षम नहीं होते हैं। केवल कुछ ही लोग होते हैं कि उनकी मनश्चेतना उन विचार तरंगों को प्रकट कर लेती है कि पूर्वाभास, दूर संवेदन अति अतींद्रिय क्षमता प्रायः ऐसे ही लोगों में विकसित पायी जाती है।

“स्ट्रैच वर्ड “नामक पुस्तक में इस तरह की घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है जिनसे सिद्ध होता है कि हम सभी एक ही माला के मनकों की भाँति विश्व चेतना से जुड़े हुए हैं। घटना प्रसंग नार्थ कोरोलीना, अमेरिका के चारलोटी नगर के रेडियो उद्घोषक श्री हावर्ट ह्नीलर के जीवन की है। जून 1982 रविवार को देर रात वह अपने घर आया था। धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण बिस्तर पर जाने से पूर्व वह प्रार्थना कर रहा था कि अचानक उसे पूर्वाभास हुआ कि चौराहे पर कही कोई दुर्घटना हुई है। इस आभास की सूचना अपनी पत्नी को देकर वह अपनी गाड़ी लेकर घर से निकल पड़ा । पर सबसे बड़ा प्रश्न सामने यह था कि किस दिशा में गाड़ी दौड़ाई जाय ?अंतः प्रेरणा हुई कि पार्क रोड़ से ही जाना चाहिए। उसे ऐसा लगा मानो कोई विज्ञात सत्ता उसका मार्गदर्शन करती जा रही है और गन्तव्य दिशा की ओर मार्गदर्शन करती हुई उसे उसी ओर घसीटे लिए जा रही है। दुर्घटना स्थल पर पहुँचने पर उसने क्या देखा और क्या किया, इसका विस्तार पूर्वक वर्णन “शारलीट समाचार पत्र” उसने जो प्रकाशित कराया था वह इस प्रकार था।

मोन्टफोर्ड मार्ग पर 200 मी. की देरी पर एक मोड़ आता है, उस मोड़ पर ही गाड़ी चालक खंभे से टकराकर अपनी दुर्घटना ग्रस्त गाड़ी में फँसा पड़ा था। वही से एक क्षीण सी आवाज आ रही थी-”हप्पी मुझे बचाओ” ह्निलर का यह घरेलू नाम केवल उनके प्रियजन ही जानते थे, फिर वह कौन व्यक्ति उसे आवाज दे रहा है? हप्पी नाम से तो उसके निकट मित्रों के अलावा इस नगर में कोई परिचित नहीं था अतः उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। ह्निलर ने बारीकी से गाड़ी का निरक्षण किया तो देखा कि उनका पूर्व परिचित मित्र फ्रन्डर वर्क चालक सीट के नीचे खून से लथपथ दबा पड़ा था। किसी प्रकार उसे गाड़ी के मलबे से बाहर निकालने में ह्निलर सफल हुआ और उसे अपनी गाड़ी में डालकर अस्पताल पहुंचाया। । शल्य क्रिया द्वारा चिकित्सकों ने उसकी जान बचायी। डाक्टरों के अनुसार उसके शरीर से इतना अधिक खून बह गया था कि 5-20 मिनट की और देरी हो जाती तो फ्रन्डर वर्क को बचाना मुश्किल हो जाता।

अनुसंधान कर्त्ता भौतिक विज्ञानियों का कहना हैं कि यह एक ऐसा मूढ़ प्रश्न है कि ह्निलर ने अपने घर से आधा किमी. दूर से ही इस दुर्घटना का पता किस आधार पर लगा लिया ? उसने पार्क रोड़ पर ही गाड़ी लेने का निर्णय क्यों किया ? टीले के पास पहुँचने पर मोन्टफोडर्ड ड्राइवर की ओर मुड़ने पर वह क्यों मजबूर हुआ ?रात को थका हारा एक व्यक्ति प्रार्थना करके सोने की तैयारी कर रहा हो कि अचानक मन में उठी एक तरंग के कारण दुर्घटना स्थल की ओर रवाना हो जाय और अपने निकटतम मित्र की जान बचाने में सफल हो जाये । इसे केवल कोई संयोग या अकस्मात घटना नहीं कहा जा सकता। यह निश्चित ही इस तथ्य का प्रमाण है कि कोई ब्रह्माण्ड रूपी चेतना शक्ति अवश्य है जिसका संबंध सभी चेतना प्राणियों से है।

अध्यात्म विज्ञानियों की भाषा अब भौतिक विज्ञानी भी बोलने लगे है।वे अब मानने लगे है कि नगण्य सी दिखने वाली मानवी काया में समायी प्राण चेतना विपुल शक्ति का भण्डागार है इस पिटारों में अगणित रत्न दबे है श्रुति कहती है कि इस प्राण तत्व को समझने, उस पर नियंत्रण प्राप्त करने और सर्वव्यापी महाप्राण से जोड़ देने से प्रकृति के समस्त रहस्यों को जाना और अनुभव किया जा सकता है। प्रकृति की सारी शक्तियाँ प्राण सम्पन्न व्यक्ति की अनुगामिनी होती है।

इस तथ्य की पुष्टि करते हुए मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता डॉ0 ऐलस टेनस ने अपनी कृति “ वियोन्ड कोइन्सीडेट “ में कहा है कि विश्व की एक सर्वव्यापी प्राण ऊर्जा संव्याप्त है।जिसे अभी तक वैज्ञानिक उपकरणों से जाना नहीं जा सका है। जब तक उसे जानने के उपकरण उपलब्ध नहीं होते तब तक परिस्थितियाँ प्रमाणों या परिस्थितिकी प्रमाणों के आधार पर हमें ज्ञान एकत्र करते रहना चाहिए। उनके अनुसार जिस प्रकार रेडियो, टीवी और बिजली के कन्डेन्सरों में बिजली एकत्र होती रहती है, उसी तरह हम भी विश्व व्यापी प्राणऊर्जा को धारण कर सकते हैं। मनुष्यों में इनका प्रभाव उनके शील स्वभाव, गुण, कर्म, व्यक्तित्व, शिक्षा, रुचि, शारीरिक एवं मानसिक तथा वातावरण के अनुसार भिन्न होता है। इस ऊर्जा का नाम उन्होंने सी.पी. ई अर्थात् रचनात्मक बोधात्मक ऊर्जा रखा है।

स्वामी विवेकानन्द ने इसे “साइकिक फोर्स “ कहा है और उसका संबंध समष्टि सर्वव्यापी चेतना सत्ता के साथ जोड़ा है। इस शक्ति के प्रभाव से ही मनुष्य अपनी सुप्त अतीन्द्रिय क्षमताओं को जागृत कर सकने में सफल होता है और भूत, वर्तमान एवं भविष्य के संबंध स्थापित कर उन क्षेत्रों की गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर लेता है। कारण की हम सब विश्वव्यापी एक ही चेतना प्रवाह से “सूत्रे मणिगणा इव” की तरह पिरोये हुए जो हैं।


स्वेदना की टीस बदल रही है प्रचलन

अचानक माँसाहारियों के कदम शाकाहार की ओर क्यों मुड़ जाते हैं। अचरज पैदा करने वाले इस सवाल के जवाब में तीन तथ्यों को उभरते देखा जा सकता है। इनमें से पहला हैं- स्वास्थ्य समस्या को लेकर वैज्ञानिकों की चेतावनी । दूसरा है पशुधन से आये संकट से होने वाला पर्यावरण पर बुरा असर और तीसरा है माँसाहारियों में विकसित होने वाली समझ से पनपी संवेदना। ये तीनों तथ्य अपनी महत्ता में एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर है और इनमें हरेक में माँसाहार के औचित्य पर जबरदस्त सवालिया निशान लगा दिया है ?

अमेरिका सहित ज्यादातर उन्नत देशों में पिछले काफी समय से एक बड़े और वैज्ञानिक स्तर पर यह बहस जारी है कि स्वस्थ जीवन के लिए आहार कैसा हो ? बहस का मूल मुद्दा ‘शाकाहार बनाम माँसाहार ‘ है। चिकित्सा जगत में हाल ही के दिनों में हुई वैज्ञानिक खोजों और अध्ययनों से यह साबित होता जा रहा है कि शाकाहार मनुष्य की प्रकृति और स्वाभाविकता के ज्यादा निकट है। यह ज्यादा स्वास्थ्य वर्धक है, और अधिक वैज्ञानिक है। इससे शाकाहार की तरफ झुकाव निरन्तर बढ़ रहा है। गौर करने लायक तथ्य यह है कि अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में पिछले बीस सालों के दौरान कोई एक करोड़ लोगों ने माँसाहार छोड़कर शाकाहार अपनाया है। वह परिवर्तन उस बड़े जन आन्दोलन का एक हिस्सा है जिसमें नशाखोरी के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द की है। उसका एक मात्र मकसद वैज्ञानिक तत्वों के आधार पर स्वस्थ जीवन पद्धति चुनना है।

वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर यह पता चलता है कि माँस और अण्डों में हानिकारक कोलेस्टरोल और सैच्युरेटिस फैटी एसिड की मात्रा अधिक पाई जाती है। खाना पकाने के तेलों, सोयाबीन का तेल, सुरजमुखी का तेल, में वसा तो पायी जाती है।यह एक बहुत बड़ा अंतर है कि, जिसका व्यक्ति के शरीर की कुल कोलेस्टरोल की मात्रा, हानिकारक लोडेंसिटी प्रोटींस और स्वास्थ्य कारी हाई डेंसिटी लाइपो प्रोटींस की मात्रा पर गहरा असर पड़ता है।

माँसाहारी और शाकाहारी खानपान में दूसरा महत्वपूर्ण फर्क यह है कि शाकाहारी खानपान में रेशे दार पदार्थों की मात्रा ज्यादा होती है जबकि माँसाहारी भोजन इससे वंचित रहता है। क्लारी खाद्य पदार्थों का खजाना है। इस नजर से हम माँसाहार और शाकाहार तुलना में शाकाहार कही बेहतर साबित होता है। दोनों आहारों की संरचना का यह फर्क हमारे स्वास्थ्य पर कई तरह के प्रभाव दर्शाता है।

दिल की बीमारी में कोरोनरी धमनी रोग सबसे प्रमुख है। इससे ही ऐजाइमा की तकलीफ होती है और दिल का दौरा पड़ता है। उन्नत समाज में यह अकेला मौत का सबसे बड़ा कारण है। यह रोग दिल की खुराक देती कोरोनरी धमनियों के सँकरे पड़ने पर उपजता है। धमनियों का भीतरी आयतन चर्बी के जन जाने से सिकुड़ जाता है। इस वसा जमाव की प्रक्रिया एथिरोस्कृलरोसिस के नाम से जाना जाता है। पाया गया है कि खून में कोलेस्टरोल की मात्रा ज्यादा होने, डाइबिटीज होने की आदत से उस रोग का खतरा होता है। यानि एक मायने में उनसे ही रोग लगता है। इन तीनों का हमारे खान पान की आदतों से नजदीक संबंध है। माँसाहारियों में कोलेस्टरोल की कुल मात्रा व हानिकारक एल दृडी. एल दृमात्रा अधिक पाये जाने की संभावना प्रबल रहती है। जबकि स्वास्थ्य कारी एच डी. एल की मात्रा कम रहती है। यदि कोई व्यक्ति माँसाहार छोड़ देता है और वसा के लिए पाली अप्सैच्युरेटिड फैटी एसिड इस्तेमाल करने लगता है तो उसका एच.डी.एल. बढ़ जाता है। और हानिकारक कोलेस्टरोल घट जाता है। तब तब्दीली कुछ हफ्तों में देखी जाती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी व्यक्ति में दिल का दौरा पड़ने का सबसे बड़ा कारण संकरी हुई कोरोनरी धमनी में रक्त कणों का धक्का फँस जाना है। वैज्ञानिक निष्कर्षों से यह पता चलता है कि प्लेटलेट्स रक्त कणों के एक दूसरे में चिपकने से ही एक कण के थक्के बनते हैं।उनके बनने में रक्त रसायनों की भूमिका महत्व पूर्ण है।यदि खून की सैच्युरेटिड फैटी एसिड की मात्रा ज्यादा और रक्त गाढ़ा हो तो थक्के बनने की आशंका बढ़ जाती है। अतः माँसाहारियों में यह आशंका ज्यादा रहती है, लेकिन आहार में परिवर्तन लाकर सुधार लाया जा सकता है। इस आधार पर भी ठीक से चुना गया शाकाहार गुण कारी है।

कई अध्ययनों में इस विचार की पुष्टि हुई कि शाकाहार रक्तचाप के संतुलित बने रहने में सहायक है। एक प्रयोग के दौरान जब माँसाहारियों को 12 हफ्तों के लिए शाकाहार पर रखा तो उसके रक्त चाप में उल्लेखनीय गिरावट आई ।आहार का विश्लेषण करने पर मालूम हुआ कि उनके आहार में कोई पोषक तत्वों के स्तर में महत्वपूर्ण बदलाव आया, पाँली अन सैच्युरेटिड फैट्स में 16 फीसदी, खाद्य रेशे की मात्रा में 75 फीसदी विटामिन्स सी में 80 फीसदी विटामिन ई में 85 फीसदी कैल्शियम में 17 फीसदी की उल्लेखनीय वृद्धि माना जाता है। जबकि प्रोटीन में 27 फीसदी सैच्युरेटिडफैट्स में 16 फीसदी मोना सैच्युरेटिड फैट्स की कमी पायी जाती है। चिकित्सा वैज्ञानिकों का मानना है कि आहार में हुआ फेरबदल ही रक्तचाप पर असर करता है।

इसी तरह मधुमेह पर किये गये अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि आहार में रेशे वाले पदार्थों को बढ़ाने से रक्त सुगर की मात्रा नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। इससे खाद्य पदार्थों का ग्लाइकोलिसिस इन्डेक्स कम होता है। यानि की भोजन के पचने पर रक्त सुगर की मात्रा एकाएक तीव्र रूप से नहीं बढ़ती है। रेशेदार पदार्थ सुगर के खून में जा कर उसकी गति धीमी कर देते हैं। इस तरह रक्त सुगर पर बेहतर नियंत्रण रखा जाता है। डायबिटीज में बतारैर दवा दिये जाने वाले ग्वार की गोंद इसी सिद्धान्त पर काम करती है। शाक सब्जियों में मयानोजिटोल नामक पदार्थ भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसकी कमी ही मधुमेहियों के नसों को कमजोर करती है। अतः इस कारण भी मधुमेह के लिए शाकाहार करना उपयोगी बन सकता है।

हमारी पाचन प्रणाली के लिए शाकाहारी सर्वथा अनुकूल होने के कारण चिकित्सा विज्ञानियों ने पाया है कि शाकाहारी में माँसाहारियों की तुलना में ग्रास नली का कैंसर, हायटे, सहर्निया, अपेडिक्स की शोभा और बड़ी आँत के विकार कम होते हैं। यही है कारण है कि आधुनिक वैज्ञानिक अन्वेषण माँसाहार को सर्वथा वर्जित मानने लगे हैं।

इस वैज्ञानिक पाबन्दी के साथ पशु धन पर गहराया संकट कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसी के 1997 की गहराई में प्रथम पखवाड़े में पाकिस्तान की बेनजीर सरकार को वह निर्णय लेना पड़ा कि अनिवार्य रूप से दो दिन पाकिस्तान में एक भी जानवर नहीं मारा जायेगा। यदि किसी ने प्राइवेट रूप से ऐसा किया तो उसे बड़ा दण्ड दिया जायेगा। यही हाल अन्य उन देशों का होने जा रहा है जहाँ मांसाहार की बहुतायत है । एक समय था कि आस्ट्रेलिया में सबसे अधिक पशुधन माना जाता था, लेकिन वहाँ अब एक हजार व्यक्ति के पीछे एक आंकड़ा 1470 रह गया है। अर्जेन्टीना में एक हजार के पीछे 2081 है जो संभवतः विश्व में सबसे अधिक है। भारत में यह आंकड़ा केवल 271 है। कोलंबिया और ब्राजील में क्रमशः 111 और 116 रह गयी है। पाकिस्तान और बंगलादेश में यह गणना सिमट कर 204 और 116 रह गयी है। क्षेत्रफल के हिसाब से देखें तो भारत की स्थिति पाकिस्तान और बंगलादेश की तुलना में ही नहीं, बल्कि मलेशिया और श्रीलंका की तुलना में अत्यंत दयनीय है।

माँसाहार में जिन प्राणियों का उपयोग किया जाता है उसमें बकरा, सुअर, मुर्गी ही नहीं, वे असंख्य पक्षी भी है इको सिस्टम संतुलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पिछले दिनों इनकी संख्या में तेजी से आई गिरावट को देखते हुए विश्व के माने जाने वैज्ञानिकों ने विभिन्न देशों की सरकारों को चेतावनी दी है कि वे अपने माँसाहार पर प्रतिबंध लगाये।साथ ही मांसाहारियों से अपील की है कि यदि वे अपना और अपने साथी मनुष्यों का जीवन सुखद देखना चाहते हैं तो माँसाहार छोड़ दे । क्योंकि पर्यावरण में असंतुलन किसी एक के लिए नहीं वरन् समूचे मानवी जाति के लिए घातक होगा। इस चेतावनी ने भी माँसाहारियों के कदम तेजी से शाकाहार की तरफ मोड़े हैं।

इस सब के अलावा माँसाहारियों की यह समझ कि जिसमें वह संवेदना पनपी कि वे माँसाहार को मनुष्यता के लिए अपमान समझने लगे। एक अध्ययन के मुताबिक वृद्धों में माँसाहार की प्रवृत्ति कम हो जाती है।इसके पीछे बहुत कुछ धार्मिक भावनाओं का भी हाथ है।जो उन्हें इस हिंसात्मक प्रवृत्ति को छोड़ने के लिए बाध्य करती है । माँसाहार छोड़ चुके एक व्यक्ति का कथन है कि एशिया की धरती पर तो पैगम्बरों ने भी पशु पालन का काम किया है। मोहम्मद पैगम्बर को मिले इतिहास में अल्लाह ताला ने कहा था कि रक्त और माँस मुझे सहन नहीं होता, अतः इससे परहेज करो । ईसा मसीह का भेड़ों को चराना लोक प्रसिद्ध है। बाइबिल में उनका कहना है-” अगर तुम किसी का माँस नहीं खायेंगे तो मेरे पास रहोगे। भगवान कृष्ण का गायों के प्रति लगाव होने के कारण ही तो वे गोपाल कहे गये। अपने पैगम्बरों की भावनाओं का आदर भी माँसाहार छोड़ने का एक महत्वपूर्ण कारण है। उपयुक्त तीनों तथ्यों से यह संभव है कि कोई एक मान्यता दे, दूसरे व तीसरे को। लेकिन यह सर्वथा सच है कि माँसाहारियों की प्रवृत्ति क्रमिक किन्तु तेजी से शाकाहार की ओर मुड़ चलती है। उनका यह झुकाव मानव सभ्यता के लिए नयी सुबह की घोषणा है।


ओजस्, तेजस्, ब्रह्मवर्चस्

प्रकृति के अंतराल में छिपी शक्ति का परिचय शताब्दियों पूर्व लगा लिया गया है। और अब उसका उपयोग मनुष्य जीवन को घनिष्ठ सहकारी रूप में किया जा रहा है कभी अग्नि की - पशु शक्ति की क्षमता को हस्तगत करके मनुष्य को बड़ा संतोष हुआ था, सचमुच उसकी प्रगति में इन दोनों ने बड़ा योगदान दिया । इन शताब्दियों में बिजली की शक्ति ने संसार के भौतिक विकास में असाधारण सहायता की है। भाप, तेल, गैस की सहायता से शक्ति प्राप्त करने की बात अब पिछले जमाने की बात हो गयी है। अगले दिनों अणु शक्ति और लेसर किरणों के प्रयोग को प्रधानता मिलने वाली है।

इन समस्त शक्ति स्रोतों से भी अद्भुत एक और शक्ति भी है। जिसकी ओर न जाने हमारा ध्यान गया ही नहीं। वह है मानवी विद्युत। यह अधिक गहराई के साथ समझा जाना चाहिए कि प्राणियों के शरीर में पाई जाने वाली विद्युत शक्ति ही उसके शरीर संस्थान, मनः संस्थान को अधिक सामर्थ्य एवं सुविकसित बना सकती है। कहना न होगा कि सुविकसित व्यक्तित्व संसार की समस्त शक्ति सम्पदाओं से हमारे लिए बढ़ चढ़कर उपयोगी सिद्ध हो सकता है। भौतिक जगत में अग्नि, भाप, गैसें, तेल, बिजली, अणु विस्फोट आदि का जो महत्व है उससे कही अधिक उपयोगी सजीव प्राणियों के लिए यह बिजली की है, जो उनके शरीरों में पाई जाती है। मनुष्य में भी एक विद्युत शक्ति का अजस्र भण्डार पड़ा है।शक्ति की संचार प्रणाली का मूल आधार क्या है ? इसका सूक्ष्मातिसूक्ष्म कारण ढूंढ़ने पर वे शरीर विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पेशियों में काम करने वाली स्थिति तक ऊर्जा “पोटेन्शियल “ का तथा उसके साथ जुड़े रहने वाले आवेश “इन्टेन्सिटी “ का जीवन संचार में बहुत बड़ा हाथ है। ताप विद्युतीय संयोजन थर्मोलेरिक कपलिंग के शोधकर्त्ता अब इसी पर निष्कर्ष पहुँचे है कि मानव शरीर की सारी क्रिया कलाप इसी विद्युतीय संचार के माध्यम से गतिशील रहता है।

पृथ्वी के ईद गिर्द ऐ चुम्बकीय वातावरण फैला हुआ है। अकेला गुरुत्वाकर्षण कार्य ही नहीं उससे और भी कितने ही प्रायोजन पूरे होते हैं। यह चुम्बकत्व आखिर आता कहाँ से है ? यह पता लगाने वाले इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि यह कोई बाहरी अनुदान नहीं वरन् पृथ्वी के गहन अंतराल सं निकलने वाली शक्ति है।

लोहे की सुई यदि धागे में बाँध कर अधर लटकाई जाये तो उसका सिर उत्तर की ओर दूसरा सिरा दक्षिण की ओर होगा। दिशा निर्देशक यंत्र इसी आधार पर बनते हैं कितने ही जीव - जंतु अपने महत्वपूर्ण कार्य इसी चुम्बकीय प्रवाह के आधार पर करते रहते हैं। कितने ही पक्षी ऋतु परिवर्तन के लिए झुण्ड बनाकर सहस्रों मील लम्बी उड़ाने भरते हैं वे धरती के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा सकते हैं। इनकी उड़ाने प्रायः रात में होती है । उस समय प्रकाश जैसी कोई इस तरह की सुविधा भी उन्हें नहीं मिलती जिससे वे यात्रा लक्ष्य की दिशा जान सके । यह कार्य उसकी अंतः चेतना पृथ्वी के ईद- गिर्द फैले हुए चुम्बकीय घेरे में चल रही हलचलों के आधार पर ही पूरा करते हैं। इस धारा के सहारे वे इस तरह उड़ते हैं मानो किसी सुनिश्चित सड़क पर चल रहें हो।

जीवकोशों का सूत्र विभाजन कार्य उसके मध्य बिन्दु में चलता है उसमें यही दिशा ज्ञान कराता है। क्रोमोज़ोम की गति ‘सेल’ के मध्यवर्ती ध्रुव की दिशा की ओर रहती है । उसे दिशा ज्ञान कैसे रहता है ? इस प्रश्न का उत्तर भी यही रहता है कि पृथ्वी के चुम्बकीय प्रवाह को हमारे जीव कोश की आँतरिक सत्ता अनुभव करती है और उसी आधार पर अपनी गतिविधियों का निर्धारण कर सकती है।

चुम्बक और विद्युत यों प्रत्यक्षतः दो पृथक पृथक सत्ताएँ है पर वे परस्पर अविच्छिन्न रूप से संबद्ध है और समयानुसार एक ही धारा में परिवर्तन होता रहता है। यदि किसी सर्किट का चुम्बकीय क्षेत्र लगातार बदलते रहा जाय तो बिजली पैदा हो जायेगी। इसी प्रकार लोहे के टुकड़े से लपेटे हुए तार से विद्युत धारा प्रवाहित किया जाय तो चुम्बकीय शक्ति सम्पन्न बन सकती है।

मनुष्य शरीर में बिजली काम करती है यह सर्वविदित है। इलेक्ट्रो कार्डियोग्राफी तथा इलेक्ट्रो सेफैलो ग्राफी के द्वारा इस तथ्य को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हमारी रक्त नलिकाओं में लोह युक्त ‘होमोग्लोबिन ‘ भरा है। लोहा चूर्ण ओर चुम्बक जिस प्रकार परस्पर चिपके रहते है, उसी प्रकार हमारी जीव सत्ता सभी जीव कोशों को परस्पर संबद्ध किये रहती है और उसकी सम्मिश्रित चेतना में वे समस्त क्रिया कलाप चलते हैं जिन्हें हम जीवन संचार व्यवस्था कहते हैं।

शरीर की चमक, स्फूर्ति, श्रम, रुचि, ताजगी, उमंग, उत्साह, शौर्य, साहस जैसी जो प्रवृत्तियां पायी जाती है उनके पीछे मानवी शक्ति की अभीष्ट मात्रा का होना ही आँका जा सकता है। मनस्वी, तेजस्वी, ओजस्वी तपस्वी जैसे शब्दों से ऐसे ही लोगों को संबोधित किया जाता है।

ऐतिहासिक लोगों की पंक्ति में ऐसे ही व्यक्ति खड़े होते है। भौतिक उपलब्धियाँ उन्हीं के पल्ले पड़ती है । यहाँ तक की आतंकवादी खलनायक भी इसी शक्ति के सहारे अपने भयानक दुष्कर्मों में सफलता प्राप्त करते हैं। ऐतिहासिक महामानवों में से प्रत्येक को इसी अंतः शक्ति का सहारा मिलता है और उनके महान कार्य आगे बढ़ते चले जाते हैं।

मानवी शरीर के शोध इतिहास में ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख है जिनसे यह सिद्ध होता है कि किन्हीं किन्हीं शरीरों में इतनी अधिक बिजली होती है उसे दूसरे लोग भी आसानी से अनुभव कर ले ते हैं। यों हमारा नाड़ी संस्थान पूर्णतया विद्युत धारा से संचालित हो ता है। मस्तिष्क का जादुई बिजली घर कह सकते हैं। जहाँ से शरीर के अंग प्रत्यंगों की गतिविधियों का नियंत्रण और संचालन होता है। पर वह बिजली जीव विद्युत वर्ग में होती है और इस तरह से अनुभव में नहीं आती जैसा कि बत्ती जलाने व मशीन चलाने वाली। शरीर में काम करने वाली गर्मी से विभिन्न अवयवों से सक्रियता रहती है और वे अपना अपना काम करते हैं। यह कायिक ऊष्मा वस्तुतः एक विशेष प्रकार की बिजली ही है। इसे मानवी विद्युत कहते हैं। इतने पर भी यह आँतरिक बिजली से भिन्न ही मानी जाती है। यह अपना प्रभाव शरीर संचालन तक ही सीमित रहती है। इससे बाहर उसका प्रभाव अनुभव नहीं किया जा सकता है किंतु कुछ अपवाद ऐसे भी देखने को मिले है जिनमें शरीर गत ऊष्मा ने याँत्रिक बिजली की भूमिका निभाई है और उस व्यक्ति को चलता फिरता बिजली घर सिद्ध किया है।

मानवी शरीर की विलक्षणताओं की चर्चा करते हुए उन प्रमाणिक घटनाओं का उल्लेख अक्सर किया जाता है कि जिनकी यथार्थता सुविज्ञ लोगों ने पूरी जाँच पड़ताल के बाद घोषित की है। मनुष्य शरीर भी याँत्रिक बिजली की आश्चर्यजनक मात्रा होती है, इसके कितने ही उदाहरण सर्व विदित है। कोलोरोडी प्रांत के लेडीवली नगर में के0 डब्ल्यू ॰ पी. जोन्स नाम का एक ऐसा व्यक्ति था कि जिस भूमि पर वह चल रहा है कि उसके बीच किस धातु की कितनी बड़ी और कितनी गहरी खदान है उसे जमीन में दबी विभिन्न धातुओं का प्रभाव अपने शरीर पर विभिन्न प्रकार के स्पन्दनों से होता है। अपनी इसी विशेषता का उसने भरपूर लाभ उठाया। कइयों को खदानें बताकर उसने हिस्सा लिया और खदानें अपने पैसों से खोदी और चलाई। अमेरिका का यह बहुत धन सम्पन्न इसी अपनी विशेषता का कारण बना था।

आयरलैण्ड के प्रो0 वैरेन्ट इस बात के लिए विख्यात थे कि वे भूमिगत जल स्रोतों तथा धातु खदानों का पता अपनी अंतःचेतना से देखकर बता देते थे। इस विशिष्टता से अपने देशवासियों को बहुत लाभ पहुँचाया था।आस्ट्रेलिया का एक किसान भी पिछली शताब्दी में इस विद्या के लिए प्रसिद्ध पा चुका हैं, वह दो शंकु वाली टहनी हाथ में लेकर खेतों में घूमता फिरता था और जहाँ उस जल स्रोत दिखाई पड़ता था वही रुक जाता था । उस स्थान पर खोदे गये कुओं में प्रायः पानी निकल ही आता था। भारत के राजस्थान प्रांत में एक पानी वाले महाराज जिन्हें माधव नन्द जी कहते हैं अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर कितने ही सफल कुंए बनवा चुके हैं।

भूमिगत अदृश्य वस्तुओं को देख सकने की विद्या को रेब्डोमेसी कहते हैं। इस विज्ञान की परिधि में जमीन में दबे रसायन, जल, तेल आदि सभी वस्तुओं को जाना जा सकता है। किन्तु यदि केवल जल तलाश तक ही वह सीमित हो तो उसे वाटर डाउजिंग कहेंगे।

आयरलैण्ड के विकली पहाड़ी क्षेत्र में दूर दूर तक कही पानी का नामों निशान नहीं था। जमीन कड़ी-पथरीली थी। प्रो0 वैरेंट ने खदान विशेषज्ञों के सामने अपना प्रयोग किया । वे कई घण्टे उस क्षेत्र में घूमें अंततः वे एक स्थान पर रुके और कहा- केवल 14 फुट गहराई पर यहाँ एक अच्छा जल स्रोत है। खुदाई आरम्भ हुई और पूर्व कथन बिल्कुल सत्य निकला। 14 फुट जमीन खोदने पर पानी की एक जोर दार धारा वहाँ से उबल पड़ी। यह मानव विद्युत का ही चमत्कार है जो भिन्न भिन्न रूपों में दिखाई पड़ता है।

मानवी विद्युत को अध्यात्म विज्ञान में ओजस् तेजस् और ब्रह्मवर्चस् कहा गया है। इसे विकसित करने की प्रक्रिया योग साधना और तपश्चर्या के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्मविद्या में इसी ‘चित्त शक्ति’ के विकास पर जोर दिया गया है और कहा गया है कि मनुष्य के सन्निहित प्रकट और अप्रकट रहस्यमय शक्ति संसाधनों को जागृत करके मनुष्य देवस्तर की विशेषताओं से सम्पन्न हो सकता है। भौतिक जगत के विकास प्रयोजन में बिजली का जो उपयोग है उससे कही अधिक उपयोगिता व्यक्तित्व के समग्र विकास में मानवी विद्युत की है। उसका स्वरूप आधार और उपयोग जानने के लिए हमेँ विशेष उत्साह पूर्वक प्रयत्न करने चाहिए।


सर्वश्रेष्ठ औषधि

यह जावा द्वीप की बात है। उस समय एक ने मूसा का आविर्भाव हुआ था, और न ईसा का ही । यूरोप में विडालाक्ष जाति के लोग कमर में पशुओं की खाल लपेटे पर्वत कन्दराओं में निवास करते थे और भारत की सीमा मिश्र तक थी । बीच के समस्त पर्वतीय एवं मरु प्रांत उज्जयिनी द्वारा संचालित पोषित होते थे। भारतीय जल यान की अपार जल राशि को चीरकर श्वेत द्वीप तक जाने कर दुःसाहस कर सकते थे । आज भी पुरातत्व विभाग को सूर्य मंदिर इसी कारण वहाँ पर अस्तित्व में दृष्टिगोचर होते हैं।

भारत विश्व का सम्राट था, पर शोषक नहीं। केवल राजसूय एवं अश्वमेध यज्ञों में प्रत्येक देश से कुछ कर, धनराशि अथवा संस्कृति विस्तार के निमित्त पूर्ण समय दान के रूप में लिया जाता था। नहीं तो सबके सब अपनी संस्कृति शक्ति के पूर्ण उन्नति में सम्पूर्ण स्वाधीन थे। किसी को भी पराधीन करने की बात यहाँ का मस्तिष्क सोचता ही नहीं था।

भारत केवल सम्राट नहीं था, वह जगद्गुरु भी था। उसका यह पद पहले से ही महत्वपूर्ण था। यहाँ के जंगलों में फूस के कुटीरों के भीतर वल्कल पहनने वाले जो ऋषि मुनि निवास करते थे, संपूर्ण जगत उन्हीं की दिव्य वाणी से आलोक प्राप्त करता था। आज भी उनके उस आलोक से ही विश्व का समस्त दार्शनिक ज्ञान अवलोकित है।

बल, तेज, पौरुष, सजीव क्षात्र शरीरों में और त्याग तपस्या एवं ज्ञान साकार विप्रों के रूप में इस भवन आर्य भूमि को प्रकाशित करते हैं। भावना और भव्य मूर्तियाँ मात्र यहाँ प्राप्त हो सकती है। क्षुद्र शरीर एवं लौकिक भोग तो जैसे कोई वस्तु हीन थे। यम और इन्द्र वहाँ की धनुष टंकार से काँपते थे । मोक्ष प्राप्ति प्रधान लक्ष्य था अवश्य किंतु अलस्य जैसा कुछ नहीं था।

ईशान कोण के सभी समुद्री द्वीप उस समय भारतीय उपनिवेश थे। यहाँ से ही गये हुए वणिक विप्रादि यहां रहने लगे थे और वहाँ के आदि निवासियों के रूप में उनका भव्य स्वागत किया था। उसके शासक यहाँ सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे । सच्ची बात तो यह थी कि उन्हीं के वंशज आस पास के द्वीप राज्यों के सिंहासन के अधिष्ठित थे और वे अपने मूल वंश के नरेश को प्रसन्नता से अपना अधिपति मानते थे।

भारत से जाने वाले विद्वान महात्मा एवं राजपुरुष ही सीधे यवद्वीप ही पधारते तथा वहाँ से उनका संदेश द्वीप राज्यों में प्रसारित था। आवश्यकता होने पर यष्व द्वीप के अधिपति ही उनकी इतर द्वीप यात्रा की व्यवस्था करते थे।

एक दिन भारत सम्राट की वैजयन्ती ध्वजा फहराया हुआ एक पोत आकर यवद्वीप के पोत निवास में रुका । दूर से ही द्वीप के शासक वर्ग ने ध्वजा देख ली थी। भूमि पर स्वागत की समस्त प्रस्तुति थी। पोत के किनारे लगते ही तोपों का गगन भेदी तुमुल ध्वनि ने अभिवादन प्रारम्भ कर दिया था। पोत के तट पर होते ही तोपें मौन थी।शंख ध्वनियों के बीच विप्रों का सामगान गुंजित हो उठा। मार्ग में पावड़े पड़े थे।

दोनों ओर सजल घट लिए संविकाएँ खड़ी थी। स्थान स्थान पर बने तोरण द्वार तीव्र गति से सज्जित हो रहे थे।

सबका अनुमान था कि पोत कोई राज पुरुष पदार्पण करेंगे । हुआ इसके विपरीत ही उससे बल्कल कौपीन लगाए सम्पूर्ण शरीर में भस्म मले हुए एक तेजोमय गौरव पूर्ण तपस्वी निकलें। उसके पास एक बल्कल में बँधी पोटली थी। विप्रों ने जो अपनी अग्नियों के साथ पधारे थे साष्टांग प्रणाम किया।

महामात्य ने युवराज को आगे करके राजपुरुष के साथ उनके चरणों पर पुष्पांजलि समर्पित किये। पुष्प दूर्वा, लाजा, अक्षत, की वृष्टि प्रारम्भ की गयी।

“ महाराज क्यों नहीं पधारें ?” यवद्वीप के राजपुरुषों ने देखा कि महात्मा के पीछे एक वृद्ध महापुरुष पूछ रहे है। उन्हें सम्राट की ध्वजा का अभिवादन करना आवश्यक ज्ञात नहीं हुआ ? इन वृद्ध के स्वरों में आज्ञा थी तथा कुछ रोष भी।

यदि वे आ सकते तो हम यहाँ क्यों आते ? किसी के कुछ कहने से पूर्व उन तपस्वी ने ही कहा” अमात्य ! रुट होने का कोई कारण नहीं। तुम राज सम्मान प्राप्त करो और विश्राम लेकर यहाँ से प्रस्थित हो जाना ।” फिर उन्होंने आगत राज कुमार से कहा- “ आप लोग भारत के सम्राट के प्रधान अमात्य का स्वागत करें। मैं एकाकी जाऊँगा। श्री गुरु देव के लिए ऐसी ही आज्ञा है।

किसी को कुछ कहने का अवकाश दिये बिना वे सीढ़ी से उतरे। लोगों ने मार्ग दे दिया। एक और चल पड़े। किसमें साहस था कि उस आविर्भूत को रोके या उनसे कुछ प्रश्न करें। दूर से आदेश आया “मेरे संबंध में महाराज को कोई सूचना न दी जाय।”

तपस्वी की यह यात्रा विदेश उद्देश्य को लेकर हुई थी। उसे अभी भी उन क्षणों का स्मरण था जब गिरनार की एक अगम्य गुफा में भगवान दत्तात्रेय ने अपने सम्मुख कर बद्ध घुटनों के बल उससे पूछा था -” तुम प्रस्तुत हो न ?”

यंत्र की प्रस्तुति क्या है? जब प्रेरक जहाँ चाहे ....नियुक्त कर दे! युवक में अगाध श्रद्धा थी एवं अपार विश्वास।

अपनी मुक्ति कोई अथग् नहीं रखती । उन योगेश्वर की वाणी गूँजी। हम सब का त्याग पवित्रता, एवं तप विश्व के लिए हैं। विभु की प्रसन्नता प्राप्ति का एक मात्र मार्ग है उत्सर्ग। तुम्हारे समीप जो कुछ हैं, विश्व के लिए उत्सर्ग कर दो। हमारे साधन विभूतियाँ बेकार हो जायेंगी यदि अधिकार प्राप्ति के क्षण में ही किसी साधक की हम सहायता नहीं दें सकेंगे।

युवक का गला भर आया। आँखों के भाव बिन्दुओं को उन पावन पदों पर अर्पित करते हुए बड़े कष्ट से उसने कहा - इस क्षुद्र को किसी योग्य नहीं समझते हैं, यह उनका अहासे भाग्य।’

“मित तुम समर्थ हो।” चाहे वह भले ही कुछ भी न हो, किंतु जब ये योगीराज कह रहे हैं तो इसीलिए यह भार तुम्हारे ऊपर डाला जा रहा है।”

प्रभु ने गम्भीर ध्वनि से कहा !

निश्चय ! युवक ने प्रभु के चरणों की धूल को अपने मस्तक पर लगाते हुए कहा-”जब तक यह शक्ति मेरे समीप है, निश्चय ही मैं ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्तियों के सम्मुख समर्थ हूँ। उनकी वाणी में प्रेमाद्र विश्वास उमड़ पड़ता था।”

अच्छा ! प्रभु मुस्कुराये ऐसा ही सही। अब तुम यहाँ से बाहर जाओ, नगर द्वार पर राज प्रतिनिधि तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। तुम्हारे उज्जयिनी जाने का प्रबंध हो गया है। वहाँ तुम जैसा चाहोगे, प्रबंध हो जायेगा। उन सर्व सामर्थ्य के लिए यह कोई अनोखी बात नहीं थी। अभिवादन करते हुए युवक तपस्वी उठा । अपने गुप्त मार्ग से जो जो केवल सिद्ध योगियों के आने के योग्य था। वह बाहर आया । उसे नगर द्वार पर ही राज प्रतिनिधि मिल गया । स्वप्न में आदेश प्राप्त कर स्वयँ सम्राट ने उसे लेने के लिए प्रतिनिधि भेजा था।

उज्जयिनी पहुँचकर उसने केवल यव द्वीप की यात्रा का प्रबंध करने की माँग की थी। किसी भी आते जाते वणिक पोत से जाने की इच्छा प्रकट की गयी। लेकिन सम्राट सेवा का सौभाग्य छोड़ने वाले नहीं थे। सेवकों के साथ स्वयँ महाराज समुद्र तट पर पधारें । प्रधान अमात्य सम्राट के निजी पोत से उसे लेकर द्वीप के लिए विदा हो गये।

और इन क्षणों को वह इस ओर जा रहा था जहाँ यवद्वीप के महाराज पड़े बिलख रहे थे।उन चरणों में मैंने अपने आप को एक बार छोड़ दिया। यदि मेरे दुर्बल पैर लड़खड़ाये और आश्रय के अभाव में गिर पड़ा तो मेरा अपराध होगा? उनका कर्तव्य नहीं था कि वे मुझे बचा लेते। महाराज पता नहीं क्या क्या विलाप किया करते थे।राज वैद्य के आदेश को मानने की आवश्यकता उन्होंने समझी ही नहीं। परिचारक समझते थे यह प्रलाप रोग की प्रबलता के ही कारण है।

आज उन्हें अपनी युवावस्था के वे दिन स्मरण आते हैं, जब वे गम्भीर रहा करते थे । एकान्त को छोड़ना उनके लिए मुश्किल था। निरन्तर आत्म साधना की प्रबल प्रेरणा उन्हें अपनी ओर वेग पूर्वक आकर्षित किया करती थी। भगवान दत्तात्रेय के धवल कीर्ति दिशाओं में व्याप्त थी। मन ही मन वे उन योगी राज को अपना गुरु वरण कर चुके थे और उनकी एक मात्र इच्छा थी, एक बार चर्म चक्षुओं से उन श्रीचरण के दर्शन हो।

वह दिन भी स्मरण होता है जब पिता का शरीरान्त हुआ । अमात्यों ने बल पूर्वक उनको सिंहासन पर बिठाया । इच्छा न रहने पर भी ब्रह्मणो की आज्ञा के सम्मुख उन्हें मस्तक झुका कर श्वेत छात्र की छाया में बैठना पड़ा।

पता नहीं किस प्रारब्ध का उदय हुआ। युवावस्था राज सिंहासन और अतुल संपत्ति गर्व ने अधिकार जमाया। सुन्दरियों का जमघट जुटने लगा, अमात्यों की शिक्षा एवं सलाह ठुकरायी जाने लगी॥शासन व्यवस्था अस्त व्यस्त हो गयी।

आज छः महीने की शय्या से उठ नहीं सके थे । शरीर के भोगो ने रोग मंदिर बना दिया था। जलोदर है, ज्वर आता है, दया भी अपने वेग पर है और अब तो संभवतः यक्ष्मा का संदेह भी होने लगता है।वैद्य मुख पर कुछ कहते नहीं।

स्वाभाविक ही दीर्घ रोगी से लोग ऊब जाते हैं। वैसे भी कठोर स्वभाव एवं अपने ही भोग में लिप्त रहकर दूसरों की अपेक्षा रखते रहने के कारण कोई उन्हें हृदय से नहीं चाहता। राजकुमार भी दूर दूर खिंचे रहते हैं। सेवक और अमात्य भी कर्तव्य दिशा की प्रेरणा से ही सब कुछ करते हैं प्रेम से नहीं।

रोगी पड़े पड़े छिद्रान्वेषी हो जाय तो क्या आश्चर्य ? महाराज का स्वभाव अत्यंत चिड़चिड़ा हो गया। और उन्हें अकारण ही सबने अपने प्रति उपेक्षा की दृष्टि गत होती है। अत्यन्त तुच्छ भूल को भी वे बड़े महत्वपूर्ण ढंग से ग्रहण करते थे। उनके क्रोधी स्वभाव के कारण लो विशेषतः राजकुमार उनके सम्मुख कम ही जाते थे।

गुरुदेव ने तो अधम समझ का त्याग ही दिया। महाराज को सम्राट के पोत के आने की सूचना देकर ही अत्मादि तट पर गये थे। । जान पड़ता है कि मेरे दुर्गुणों की सूचना सम्राट तक पहुँच गयी। क्यों अपनी दुर्गति कराऊँ ? मरना तो अब है ही ?”

महाराज सोचने लगे।रोग ने उन्हें आत्म शक्ति हीन कर दिया था।

जब सम्राट के प्रतिनिधि प्रधान को लेकर युवराज लौटे तो उन्हें सेवकों ने सूचना दी कि महाराज का पता नहीं है। वस्तुतः वे सेवकों की दृष्टि बनाकर राजभवन से निकल गये। एक खलबली पड़ गयी। युवराज के प्रधान अमात्य का प्रबन्ध सेवकों पर छोड़ और स्वयँ पिता के अन्वेषण का प्रबंध करने लगे। किसी को कोई कष्ट नहीं हुआ। दोपहर बीतते द्वार पर से एक गम्भीर ध्वनि आई ! ॐ नमो नरायणा ‘ दौड़ कर राजकुमार द्वार पर पहुँचे भले चंगे महाराज के साथ वे युवा तपस्वी द्वार पर खड़े थे ।

उन्हें अब महाराज नहीं कहना चाहिए। पूरे शरीर में उन्होंने धूल लगा ली थी। उन्हीं के शब्दों में श्री गुरु चरण की वह रज उनके समस्त भौतिक शरीर एवं मानस रोगों की त्राण पा चुके थे और केवल इस लिए लौटे थे कि युवराज का अभिषेक करके प्रधान अमात्य के साथ ही भारत में श्री गुरु चरणों तक पहुँच सके।


गुरु गोविन्द सिंह और रघु (Kahani)

गुरुगोविन्द सिंह निविड़ वन में बैठे एकान्त चिंतन में लीन थे। उनके मन में देश, समाज, संस्कृति के उत्थान और कल्याण के लिए विचारो की लहरे उठ रही थी। उनका प्रवाह नीचे वेगवती यमुना के प्रवाह से तेज था।

तभी गुरु ने देखा यमुना को पार कर उनका शिष्य उनकी ओर आ रहा है। निकट आने पर उसे पहचाना - उस शिष्य का नाम था रघुनाथ। काफी सम्पन्न और ऐश्वर्यशाली । उसे अपनी धन सम्पदा का भी अभिमान था। वह निकट आकर गुरु के पास बैठ गया। गुरु ने कहा - आओ रघु कैसे आये हो ?

रघुनाथ ने गुरु के चरणों में विनम्र प्रणाम किया और बोला - सुना था आप हम भक्तों को छोड़कर एकान्त वन में जा रहे है। सोचा आप का कुशल क्षेम पूछ आऊँ।

मेरी कुशल क्या जानना है रे रघु - गुरु ने बड़ी आत्मीयता से संबोधित करते हुए कहा- ‘कुशल तो मेरे उन बन्दों को पूछ जाकर, जो अपना सारा समय और समर्थ ग्रंथ साहिब का संदेश सुनकर जन चेतना को जाग्रत करने लगे है। इस कार्य में उन्हें मेरे से अधिक कष्ट कठिनाइयाँ सहन करनी पड़ रही है।

रघु ने उन्हें देखा और तुरंत कहा- ओ गुरु जी आप इन सूखे टुकड़ों पर अपना जीवन निर्वाह कर रहे है।

सूखे टुकड़े नहीं यह प्रेम का पकवान है। गुरु जी बोले इन्हें एक भाई दे दिया गया।

तो मैं भी उनकी सेवा में एक तुच्छ भेट अर्पित करता हूँ- रघु ने कहा उनसे अपने दो हाथों के हीरे जड़े कड़े उतारे और गुरु के समस्त रख दिये। फिर इन्हें स्वीकार की जिए।

रघु यह कहकर गर्व से देखने लगा। गुरु ने उसके चेहरे पर आते जाते भावों को देखा और कड़ों को एक ओर उपेक्षित झाड़ी में फेंक दिया।

गुरु पुनः चिंतन में लीन हो गये रघु ने सोचा गुरु कम मिलने के कारण उदास है।उसने कहा अभी मेरे पास बहुत संपत्ति है। इसे मैं आपको इच्छानुसार दे सकता हूँ। गुरु बोले मुझे संपत्ति की नहीं बन्दों की जरूरत है। जो पूर्णतया समर्पित होकर समाज के उत्थान में जुट सके ।

लेकिन संपत्ति से अनेकों व्यक्ति प्राप्त किये जा सकते हैं रघु का स्वर उभरा । गुरु ने उसे असमंजस से उबारते हुए कहा, मुझे नौकर नहीं देश, समाज संस्कृति के प्रति पूर्णतया समर्पित व्यक्ति चाहिए जो समाज विपत्तियों, परेशानियों, कठिनाइयों के बीच से अविचलित रह कर अपने साथ हेतु जुट रह सके। संपत्ति तो चोर भी दे सकते हैं लेकिन मुझे भाव पूर्ण व्यक्ति चाहिए।

रघुनाथ को यथार्थता का बोध हुआ। वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा और बोला मुझे भ्रम से उबार लिया- आज से अपनी समूची जिन्दगी आपके चरणों में निवाहित करता हूँ। अतः इसका निःसंकोच उसी प्रकार उपयोग कर सकता है जैसे अपने हाथ के हथियारों का करते हैं।

गुरु गोविन्द सिंह ने उसे हृदय से लगाते हुए कहा अब तुमने समय की आवश्यकता को समझा हैं, सेवा का आधार, धन का मद नहीं, अपितु हृदय की उदात्त भावनाओं का पूर्णतया समर्पण एवं तद्नुरूप किया।


सूर्य किरणों में विलक्षण सामर्थ्य

सूर्य की रंगीन रश्मियों में जीवनदायी तत्व विद्यमान है। सूर्य विज्ञान के ज्ञाता इन किरणों के माध्यम से मृतकों को भी प्राण फूँक सकते हैं। “ए सर्च इन सीक्रेट इण्डिया “ नामक अपनी प्रसिद्ध कृति में लन्दन के प्रख्यात मनीषी डॉ0 पाल. ब्रण्टन ने इस संदर्भ में काशी के महान योगी स्वामी विशुद्धानन्द परमहंस का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि स्वामी जी सूर्य विज्ञान में पारंगत थे । प्रकाश किरणों के माध्यम से वे न केवल वस्तुओं का रूपांतरण कर देते थे, शुष्क वस्तुओं में इच्छित सुगन्ध पैदा कर देते थे, वरन् विशिष्ट किरणों के केन्द्रीकरण द्वारा मृतकों में भी प्राण का संचार करने में सक्षम थे।

पाल. ब्रण्टन के अनुसार सूर्य को विभिन्न वर्ण वाली किरणों को अलग करने और उसके द्वारा विभिन्न प्रयोग परीक्षणों को सम्पन्न करना विशुद्धानन्द का विशिष्ट अनुसंधान विषय बन गया था। उनने कई तरह के लेंस एकत्र कर रखें थे और आवश्यकतानुसार उनका प्रयोग करते थे । लेंस द्वारा किसी भी वस्तु से सूर्य किरणें एकत्र कर वह दुर्लभ सुगंध पैदा कर देते थे।इसी तरह कुछ प्रयोगों को पाल. ब्रण्टन ने काशी संस्कृति विश्वविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य महा महिम पं0 गोनत्रपी नाथ कविराज के साथ स्वयं देखा था।

एक प्रयोग में स्वामी जी ने एक रुमाल पर लेंस द्वारा सूर्य किरणें केन्द्रित की तो उसमें से श्वेत जैमाइन पुष्प की सुगंध आने लगी। एक दूसरे प्रयोग में गुलाब तथा तीसरे में वायलेट की खुशबू हो गयी ।इन तीनों प्रकार की सुगंध उनने ब्रन्टन के कहने पर उत्पन्न की थी। वे लिखते हैं कि चौथी बार स्वामी जी ने अपनी इच्छानुसार एक ऐसे दुर्लभ पुष्प की सुगंध पैदा कर दी जिसके पौधे मात्र तिब्बत में ही पाये जाते हैं। इस परिवर्तन का कारण पूछे जाने पर स्वामी जरी ने सूर्य किरणों की विशिष्टता के बारे में बताया।

सूर्य किरणों द्वारा मृतकों में प्राण चेतना डालने के विशुद्धानन्द के एक प्रयोग का वर्णन करते हुए ब्रन्टन ने अपनी उक्त पुस्तक में बताया है कि कैसे एक मृत पक्षी कबूतर को उन्होंने जीवित कर दिया। उनके अनुसार एक कबूतर का गला दबाकर उसे मार दिया गया था। तदुपरांत स्वामी जी ने उसकी एक आँख में एक लेंस की सहायता से सूर्य की किरणों को फोकस किया साथ ही कुछ मंत्र का उच्चारण करते हुए, कुछ देर बाद लोगों ने देखा कि कबूतर के शरीर में हलचल होने लगी और वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया। देखते देखते वह उड़ने लगा और आधे घण्टे इधर उधर उड़ता रहा।स्वामी जी ने इस रहस्य के बारे में पूछे जाने पर ब्रन्टन को उत्तर दिया कि सूर्य की रंगीन रश्मियों में जीवन तत्व भरपूर मात्रा में विद्यमान है। उन्हें अलग करने की कला ज्ञात हो तो उससे अद्भुत कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। किरणों के ईथर की प्राणशक्ति सन्निहित है कि मनुष्य उसका उपयोग कर अनन्त शक्तियों का स्वामी बन सकता है।

कविराज गोपीनाथ ने अपने गुरु स्वामी विशुद्धानन्द जी के संदर्भ में लिखा है कि उनके प्रयोग विज्ञान सम्मत होते थे। एक विशेषज्ञ रसायन शास्त्री जिस तरह किसी वस्तु का विश्लेषण उसमें सम्मत घटकों तत्वों को अलग अलग कर देता है उसी तरह वह सूर्य किरणों को विश्लेषित करके उनमें से किसी विशिष्ट किरण का चयन कर उसका उपयोग करने में समर्थ थे । एक वस्तु को प्रकाश रश्मियों के प्रभाव से दूसरे रंग रूप में परिणित कर देने में वे हस्तगत थे। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने लिखा है कि एक प्रयोग में उन्होंने एक गुलाब पुष्प को लेंस द्वारा सूर्य करण एकत्र करके उसे जवा कुसुम में परिवर्तित कर दिया था। जिसे कितने ही उपस्थित लोगों ने देखा था। कविराज के अनुसार सूर्य विज्ञान के संबंध में पूछे जाने पर स्वामी विशुद्धानन्द इन्हें बताते थे कि सूर्य रश्मियों या उनके वर्णक्रम को भली भाँति समझना और उनके वर्णों को शांत करना परस्पर मिश्रित करना एक विज्ञान है किरणों को पहचान कर उनकी योजना करना ही इस विज्ञान का प्रतिपाद्य विषय है। जिसने स्थूल एवं सूक्ष्म कार्यों को इसके द्वारा सम्पन्न हो सकता है।रश्मि देव और विभिन्न रश्मियों के मिश्रण भेद से सृष्टि के समस्त पदार्थों के उपयोग को मानते थे और कहा करते थे कि रश्मि समूहों का योजन और वियाचन की क्रिया पद्धति प्रणाली को जानने वाला व्यक्ति उसके द्वारा कुछ भी करने में समर्थ हो सकता है। वह निर्माण भी कर सकता है और संहार भी । आवश्यकता मात्र किरणों के वर्णभेद जानने, उसके समायोजन की विधि व्यवस्था जानने एवं स्वयँ की पात्रता के निवारने की है।


जीवन जीने की कला सिखाए, वह है अध्यात्म

इस संसार में मानव जीवन से अधिक श्रेष्ठ अन्य कोई उपलब्धि नहीं मानी गई है। एक मात्र मानव जीवन ही वक अवसर है जिसमें मनुष्य जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है। इसका सदुपयोग उसके कल्पवृक्ष की भांति फलीभूत हो रहा है।

जो मनुष्य इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को पाकर उसे सुचारु रूप से संचालित करने की कला नहीं जानता है अथवा उसे जानने का प्रमाद करता है, तो उसका बड़ा दुर्भाग्य ही होता है। मानव जीवन वह पवित्र क्षेत्र है, जिसमें परमात्मा ने सारी विभूतियां बीज रूप में रख दी है जिनका विकास नर को नारायण बना देता है। किंतु इन विभूतियों का विकास होता तभी है, जब जीवन का व्यवस्थित रूप से संचालन किया जाय। अन्यथा अव्यवस्थित के आधार पर दरिद्रता की वृद्धि कर देता है।

जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए एक वैज्ञानिक पद्धति है उसे अपना कर चलने पर इसमें वाँछित फलों की उपलब्धि की जा सकती है। अन्यथा इसकी भी वही गति होती हैं, जो अन्य पशु प्राणियों की होती है। जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए वैज्ञानिक पद्धति एक मात्र अध्यात्म है। जिसे जीवन जीने की कला भी कहा जाता है। इस सर्वश्रेष्ठ कला को जाने बिना जो मनुष्य अस्त व्यस्त ढंग से बिताता रहता है। उसे उनमें से कोई भी ऐश्वर्य उपलब्ध नहीं हो सकता, जो लोक से लेकर परलोक तक फैले है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जिनके अंतर्गत आदि से लेकर अंत तक सारी सफलताएँ सन्निहित है, इसी जीवन कला के आधार पर ही तो मिलते हैं। सामान्य लोगों के बीच प्रायः या भ्रम फैला हुआ है कि अध्यात्मवाद का लौकिक जीवन से कोई संबंध नहीं है। वह योगी तप स्थितियों का क्षेत्र है जो जीवन में दैवीय वरदान प्राप्त करना चाहतें है, जो सांसारिक जीवन यापन करना चाहते हैं, घर- वार बसाकर रहना चाहते हैं। उनसे अध्यात्म का संबंध नहीं है।इसी भ्रम के कारण बहुत से गृहस्थ भी जो दैवीय वरदान की लालसा के फेर में पड़ जाते हैं अध्यात्म मार्ग पर चलने का प्रयत्न करते हैं किंतु अध्यात्म का सही अर्थ न जानने के कारण थोड़ा सा पूजा पाठ कर लेने से ही अध्यात्म मान लेते हैं।

यह बात सही है कि अध्यात्म मार्ग पर चलने से उसकी साधना करने से देवीय वरदान भी मिलते हैं और ऋषि सिद्ध की भी प्राप्ति होती है किंतु वह उच्चस्तरीय सूक्ष्म साधना का फल है कुछ दिनों पूजा पाठ करने अथवा जीवन भर यों ही कार्यक्रम के अंतर्गत पूजा करते रहने पर भी ऋषियों वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं हो सकता। उस स्तर की साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती हैं वह सर्व समान लोगों के लिए संभव नहीं उन्हें ताप संध्या आत्म अध्ययन में न पड़कर अपने आवश्यक कर्तव्यों में ही आध्यात्मिक निष्ठा रखकर जीवन को आगे बढ़ाते रहना चाहिए। उनके साधारण पूजा पाठ का जो कि जीवन का एक अनिवार्य अंग होना ही चाहिए। अपनी तरह लाभ मिलता रहेगा। थोड़ी सी साधारण पूजा उपासना करके जो जीवन में अलौकिक ऋषि सिद्ध पाने की लालसा रखते हैं वे किसी जुआरी की तरह नगण्य सा धन लाकर बहुत अधिक लाभ उठाना जानते हैं। बिना श्रम के मालामाल होना जानते हैं। ऐसे लोभी उपासकों की यह अनिश्चित आशा कभी भी पूरी नहीं हो सकती और हो यह भी हो सकता है कि इस लोभ के कारण अपनी उस समान उपासना का भी कोई फल न मिले । देवताओं का वरदान वस्तुतः इतना सस्ता नहीं होता जितना कि लोगों ने समझ रखा है।वे मंदिर में जाकर हाथ जोड़े जान या अक्षत पुष्प जैसी तुच्छ वस्तुएं चढ़ा देन से प्रसन्न हो जायेगी और अपने वरदान लूटने लगेंगे । ऐसा सोच कर अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं । सामान्य पूजा पाठ का अपना जो पुरस्कार है मिलेगा। वही उससे अधिक कुछ नहीं वरदानी अथवा आलौकिक ऐश्वर्य का आधार आत्म सम्मान उपासना मात्र नहीं है। उसका क्षेत्र आत्मा के सूक्ष्म संस्थाओं की साधना, उन शक्तियों के प्रबोधन की प्रक्रिया है जो मनुष्य के अंतःकरण में बीच रूप में सन्निहित आत्मिक अध्ययन के उस क्षेत्र में एक से एक बढ़कर सिद्धियाँ एवं स्मृतियाँ भारी पड़ जाती है किंतु उनकी प्राप्ति तभी संभव है जब मन में वृद्धि, चित्त, अहंकार, से निर्मित अंतःकरण पाँचों कोशों 6 चक्रों मस्तिष्कीय ब्रह्म रन्ध्र में अव्यवस्थित, कमल हृदय स्थिति सूर्य चक्र नाभि की ब्रह्म ग्रंथि और मूलाधार वासनीय कुंडलिनी आदि के शक्ति संस्थान और कोश केन्द्रों के प्रबुद्ध प्रयुक्त ओर अनुकूलता पूर्वक निर्धारित दिशा में सक्रिय बनाया जा सकता है यह बड़ी गहन सूक्ष्म और साध्य तपस्या है।जन्म जन्म से तैयारी किये हुए किये हुए कोई बिरले ही वह साधना कर पाते हैं और आलौकिक शक्तियों को प्राप्त करते हैं यह साधना न सामान्य है और न कोई सर्वसाधारण के वश की। तथापि असंभव भी नहीं हैं एक समय था, जब भारत वर्ष में अध्यात्म की इस साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा।देश का ऋषि वर्ग उस वर्ग की देन है। जो पुरुषार्थी इस साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि यह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गयी है।अब भी यदा कदा यत्र तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सूने जाते हैं। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है । वैसे योग का स्वाँग दिखाकर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रंगे सियार तो बहुत देखे है। किन्तु उच्चस्तरीय अध्यात्म विद्या की पूर्वोक्त वैज्ञानिक पद्धति से सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने वाले सच्चे योगी के बराबर ही नहीं है। जिन्होंने साहसिक तपस्या के बल पर आत्मा की सूक्ष्म शक्तियों को जागृत कर प्रयोग योग्य बना लिया है, वे संसार के मोह जाल से दूर प्रायः अप्रत्यक्ष ही रहा करते हैं।शीघ्र किसी को प्राप्त नहीं होते और पुण्य अथवा सौभाग्य से जिसको मिल जाते हैं, उनकी जीवन उनके दर्शन मात्र से धन्य हो जाता है।

इतनी बड़ी तपस्या की छोटी मोटी साधना अथवा थोड़े से कर्म काण्ड द्वारा पूरी कर लेने की आशा करने वाले बाल बुद्धि के व्यक्ति ही माने जायेंगे। यह उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधना शीघ्र पूरी नहीं की जा सकती है। स्तर के अनुरूप ही पर्याप्त समय, धैर्य, पुरुषार्थ एवं शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति धीरे धीरे अपने वाह्य जीवन के परिष्कार से प्रारम्भ होती है।

आज के समाज में हम सब जिसे स्थिति में चल रहे है, उसमें जीवन निर्माण की सरल आध्यात्मिक साधना ही संभव है। इस सत्र से शुरू किये बिना काम भी नहीं चल सकता। वाह्य जीवन की यथा स्थिति में छोड़कर आत्मिक स्तर पर पहुँचा सकना भी तो संभव नहीं है। अस्तु हमें उस अध्यात्म को लेकर ही चलना होगा, जिसे जीवन जीने की कला कहा जाता है।

जीवन विषयक अध्यात्म हमारे गुण, कर्म, स्वभाव से संबंधित है। हमें चाहिए कि हम अपने गुणों की वृद्धि करते रहे। ब्रह्मचर्य, सच्चरित्रता, सदाचार, मर्यादा-पालन और अपनी सीमा में अनुशासित रहना आदि ऐसे गुण है, जो जीवन जीने की कला के नियम माने गये हैं। व्यसन, अव्यवस्था, अस्तव्यस्तता व आलस्य अथवा प्रमाद जीवन कला के विरोधी दुर्गुण है। इनका त्याग करने से जीवन कला को बल प्राप्त होता है। हमारे कर्म भी गुणों के अनुसार ही होने चाहिए। गुण और कर्मों में परस्पर विरोध रहने से जीवन में न शाँति का आगमन होता है और न प्रगतिशीलता का समावेश। हममें सत्यनिष्ठा का गुण तो हो पर उसे कर्मों में मूर्तिमान होने का साहस न हो तो कर्म तो जीवन कला में प्रतिकूल होते ही है, वह गुण भी मिथ्या हो जाता है। सत्कर्मों में हमारी आस्था तो हो पर पुण्य परमार्थ की सक्रियता से दूर ही रहे तो जीवन कला के क्षेत्र में यह एक आत्म प्रवंचना होगी। इस प्रकार हमारा स्वभाव भी इन दोनों के अनुरूप ही होना चाहिए। हममें दानशीलता का गुण भी हो और अवसरानुसार सक्रिय भी होता हो, किन्तु यदि उसके साथ अहंकार भी जुड़ा है तो यह गुण कर्म का स्वाभाविक विरोध ही होगा, जो जीवन कला के अनुरूप ही नहीं है। हम सदाशयी परमार्थी और सेवा भावी तो है और कर्मों में अपनी इन भावनाओं को मूर्तिमान भी करते हैं, किन्तु यदि स्वभाव से क्रोधी, कठोर अथवा निर्बल है तो इन सद्गुणों और सत्कर्मों का कोई मूल्य नहीं रह जाता है। किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते हैं और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते हैं तो एक प्रकार का पुण्य दूसरे आरे के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों के सामंजस्य एवं अनुरूपता ही विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

जीवन यापन की वह विधि ही जीवन जीने की कला है, जिसके द्वारा हम स्वयँ अधिकाधिक सुखी, शान्त और संतुष्ट रह सके, साथ ही दूसरों को भी उसी प्रकार रहने में सहयोगी बना सके और यही वह प्रारम्भिक अध्यात्म है, जिसके द्वारा जीवन निर्माण होता है और आत्मा की सूक्ष्म आत्म साधना पथ प्रशस्त होता है। हम सब को इसी सरल और साध्य अध्यात्म को को लेकर क्रम क्रम से आगे बढ़ना चाहिए। सहसा आदि से अंत पर कूद जाने का प्रयत्न करना एक ऐसी असफलता को आमंत्रित करता है, जिससे न तो ठीक से जीवन जिया जा सकता है और न उच्चस्तरीय साधना को सामान्य बनाया जा सकता है।

पुराकालीन ऋषि मुनियों ने भी उच्चस्तरीय आध्यात्म में सहसा ही छलाँग नहीं लगाई। उन्होंने ने भी अभ्यास द्वारा पहले अपने वाह्य जीवन को ही परिष्कृत किया और तब क्रम क्रम से आत्मिक जीवन में उच्च साधना के लिए पहुँचे । इस नियम का - कि पहले वाह्य जीवन में व्यवहारिक अध्यात्म का समावेश करके उसे सुख शाँतिमय बनाया जाय। इस प्रसंग में जो भी पुण्य परमार्थ अथवा पूजा उपासना उपेक्षित हो उसे करते रहा जाय । लौकिक जीवन में सुविकसित एवं सुसंस्कृति बना देने के बाद ही आत्मिक अथवा आलौकिक जीवन में प्रवेश किया जाय।

अध्यात्म मानव जीवन के चरमोत्कर्ष की आधार शिला है, मानवता का मेरुदण्ड है । इसके अभाव में असुख, अशाँति एवं असंतोष की ज्वालाएँ मनुष्य को घेरे रहती है। मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सफल जीवन जीने के लिए अध्यात्म से बढ़कर कोई उपाय नहीं है।


भजन, मनन और चिंतन की त्रिवेणी

उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के भाव पक्ष के तीन चरण है। भजन, मनन, और चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल, वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाये तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन, और चिंतन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अंतःकरण की स्वस्थता, प्रखरता, परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आहारों पर निर्भर है। गायत्री महामंत्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणा भी इसी त्रिवेणी को ही कहा जाता है।

उच्चस्तरीय ‘भजन’ के लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना पड़ता है। ताकि न शरीर की माँसपेशियों पर कोई तनाव रहें और न मस्तिष्क में कोई आकर्षण उत्तेजना पैदा करे । यह स्थिति कुछ ही दिन के अभ्यास से उपलब्ध हो जाती है। किसी आराम कुर्सी, कोमल बिस्तर या दीवार, पेड़ आदि का सहारा लेकर शरीर को निद्रित एवं मृतक स्थिति जैसा शिथिल कर देना चाहिए। इसमें शवासन या शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। शारीरिक दृष्टि से यह पूर्ण विश्राम है। मानसिक दृष्टि से इसे ध्यान भूमिका कहा जाता है।उत्तेजित तनी हुई नाड़ी या मांसपेशियां होने पर कभी किसी का ध्यान लग नहीं सकता। इस लिए पद्मासन, वद्धपद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसन और किसी प्रयोजन के लिए उपयोगी भले ही हो -ध्यान के लिए उल्टे बाधक होंगे।

यही बात मन के संबंध में भी है समस्त संसार में शून्यता संव्याप्त है। प्रलय काल की तरह नीचे अथाह नील जलराशि और ऊपर नील आकाश है। सर्वत्र परम शाँतिदायिनी नीलिमा और नीरवता संव्याप्त है। कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं। मन को आकर्षित करने वाली कही कोई स्थिति परिस्थिति शेष नहीं। उस परम शून्यता में बालक की तरह अपनी निर्मल चेतना कमल पत्र पर लेटी हुई तैर रही है। अपने पैर का अंगूठा अपने पैर में लगा हुआ है और आत्म स्वरस का पान कर रही है। प्रलय काल का ऐसा चित्र बाजार में बिकता भी है। मनः स्थिति को उसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया जाय तो शून्यता की मानसिक स्थिति बनती और बढ़ती चली जाती है। शारीरिक शिथिलता और मानसिक रिक्तता की उपरोक्त स्थिति भजन साधना की पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।

शिथिल शरीर एवं मनःस्थिति में ही भजन ठीक प्रकार हो सकता है। भावपरक ध्यान योग का यही पूर्वार्ध है । ऑपरेशन कराते, इन्जेक्शन लगाते समय हिलने जुलने पर प्रतिबन्ध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करते समय दोनों व्यक्ति अपने हाथों को हिलाते डुलाते नहीं है। भजन के समय मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शान्त रहना चाहिए।

भजन का उत्तरार्ध यह है कि शक्तिवान -सर्व वैभववान् धर्म उत्कृष्टता से सम्पन्न सर्वाधिक प्रेमी परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए घुलते हुए अनुभव किया जाय । ब्रह्माण्ड व्यापी दिव्य प्रकाश सागर में अपने आपको मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाय।

जिस प्रकार मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप “कीचड़” बनता है वैसी ही भावना की जानी चाहिए कि परम प्रकाश अपने रोम रोम में संव्याप्त हो रहा है। वह शरीर के अंग प्रत्यंग में वह संयम और बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरों में परमात्मा की परम ज्योति को ज्वलंत अनन्त की तरह समाविष्ट देखना आने को उस आलोक से आलौकिक अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।

इस संयोग की वेला में आनंदानुभूति उठानी चाहिए। माता-पुत्र का त्र प्रेमी प्रेयसी का मिलन जितना सुखद होता है उससे भी अधिक तृप्ति दायक यह आत्मा परमात्मा का मिलन है। इस मिलन की प्रक्रिया को भी अनुभूति में उतारना चाहिए। शरीर और मन परमेश्वर को समर्पित किया गया और उसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद यही होना चाहिए कि अपना काय कलेवर पूर्णतया परमेश्वर में इच्छानुसार गतिशील रहे॥ अपनी कोई इच्छा कामना परमेश्वर पर न थोपी जाय । परमेश्वर जिसमें प्रसन्न ही यही सोचना और वही करना सच्चे भजन परायण भक्त के लिए उचित है। बदला पाने के लिए किया गया भजन तो वेश्या वृति है। आज तो यही चारों ओर देखा जाता है।

कहा जा चुका है कि भावनात्मक साधनाओं के लिए किसी संध्या वदन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बंधन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासना के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात मनन साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त ओर स्थान एकान्त होना चाहिए । आंखें बंद करके आराम से कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -” शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकलकर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना पलटना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह खोलकर देखना चाहिए। इसी प्रकार मस्तिष्क को अपने छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, चित, अहंकार के चार आभूषण उपकरण औजार सुसज्जित रखे थे।”

इस ध्यान को जितनी गहराई से जितनी देर तक किया जा सकना संभव हो करना चाहिए और इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्राण हंस की आत्मा सत्ता सर्वथा स्वतंत्र है। शरीर की वस्त्र पेटी और मस्तिष्क की उपकरण पिटारी, जीवन रथ के दो अश्व वाहन की तरह थी। काय कलेवर लक्ष्य पूर्ति के लिए सहायक रूप से मिला था। उस की शोभा सुसज्जा के लिए आत्म कल्याण के लक्ष्य को तिलांजलि नहीं दी जानी चाहिए।

मृग मरीचिका को, कुछ भी साथ न जाने वाले वैभव को, अकाल मृत्यु को आयुष्य के क्षण भृगुरता को, विषयों की निरर्थकता को यदि मनुष्य गम्भीरता पूर्वक समझे तो उसकी आंखें खुले कि क्या करना चाहिए था और क्या किया जा रहा है ? किधर चलना चाहिए था और किधर चला जा रहा है। जीवन और मृत्यु दोनों एक दूसरे के साथ इस प्रकार से जुड़े है कि किसी के भी नीचे ऊपर होने में तनिक भी आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। यह वस्तुस्थिति समझ में आये तो हर व्यक्ति अपने बहुमूल्य क्षणों का ठीक प्रकार उपयोग करना सीखे, और उन निरर्थक बाल क्रीड़ाओं में न उलझें जिनमें आम तौर पर लोग अपने को घुलाये भुलाये रहते हैं।मृत्यु की विस्मृति ही वह कारण है जिसने नर जन्म के भ्रष्टतम सदुपयोग के प्रति उदासीनता उत्पन्न कर रखी है।

समय का दूसरा अर्थ है आत्म बोध। अपनी वास्तविक स्वरूप जीवन का उद्देश्य, शरीर ओर आत्मा का संबंध, श्रेय या प्रेय में से एक का चुनाव अपनी गतिविधियों या रीति नीतियों का सुनिश्चित निर्धारण जैसे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय इसी केन्द्र पर टिके है कि आत्मबोध हुआ या नहीं। यह चेतना जब तक जागेगी नहीं तब तक लोभ और मोह की लिप्सा प्रचण्ड ही बनी रहेगी, तृष्णा और वासना की की प्रबलता उभरी ही रहेगी, माया पाश के भव बंधनों से छुटकारा मिलेगा ही नहीं फलतः व्यथा वेदनाओं के झुलसते रहने की दुर्गति से छुटकारा भी नहीं मिलेगा। यदि आत्मबोध का लाभ भी न मिल सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन की उद्देश्य और आनन्द हाथ से चला गया।

भजन अर्थात् ईश्वरीय सत्ता का समीकरण परस्पर विलय समन्वय की अनुभूति है।मनन अर्थात् आत्मबोध। शरीर और आत्मा के स्वार्थों और संबंधों का पृथक्करण। जीवन लक्ष्य के प्राप्त आस्था और रीति नीति का साहस पूर्ण निर्धारण । दोनों की साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या दो पृथक पृथक सुविधा के समय और शान्त एकान्त स्थान में, सुसंतुलित चित्त में यह दोनों ध्यान, चिंतन किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनको लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य सम्पदाओं की करतलगत होती चली जायेगी।

भाव साधना का तीसरा चरण है -चिंतन। चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रात’काल उठते ही “ हर दिन नया जन्म और हर रात नयी मौत” का तथ्य सामने रखकर आज ही समय परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए।एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात की मृत्यु निद्रा की गोद में जाता है।इसी लिए ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए-जीवन लाभ लेने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए । किसी भी व्यवधान को इस निर्धारण में बाधक नहीं होने देना चाहिए।

प्रातःकाल से लेकर सोने के समय तक की दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। नित्य, कर्म, विश्राम उपार्जन से लेकर परमार्थ प्रायोजन तक के लिए उचित रीति से समय विभाजन किया जाय। उपार्जन और परिवार पोषण के उत्तरदायित्व अभी जिनके कंधों पर है उन्हें भी आठ घण्टा कमाने के लिए नैमित्तिक कर्मों के लिए लगाकर सांसारिक प्रायोजन के लिए अधिकतम 20 घण्टे ही खर्च करने चाहिए। शेष चार घन्टे जीवनोद्देश्य की की पूर्ति में लगाने चाहिए। हर क्रिया के साथ एक विचारणा अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती हैं यह कार्य किस लाभ या प्रयोजन के लिए किया जा रहा हैं, इसमें रुचि या उत्साह किस लिए हैं, इसका कुछ न कुछ कारण आकर्षण होना ही चाहिए। मनोगत आकाँक्षा ओर शरीर गत क्रिया दोनों के सम्मिश्रण से समग्र कर्म बनता है, उसी के आधार पर संस्कार बनते हैं,पाप पुण्य का निर्धारण होता है। हमें अपने हर क्रिया कलाप के साथ उच्च आदर्शों से भरी पूरी भावना नियोजित रखनी चाहिए। पत्नी को अपने संरक्षण में रखी गई ईश्वर की पुत्री समझा जाना चाहिए ओर पिता के घर से जिस स्थिति में आई थी उसकी अपेक्षा अधिक स्वस्थ, सुयोग्य, सुविकसित, प्रसन्न, प्रफुलित बनाने का प्रयास निरन्तर करते रहना चाहिए। यदि उसके प्रति कर्तव्य, स्नेह, सौजन्य, बरसाया जाता रहा तो यह पत्नी भौतिक सुविधा ओर आत्मिक प्रगति की दोनों ही दृष्टि से बड़ी सुखद श्रेयष्कर सिद्ध होगी।

बालकों को ईश्वर के उद्यान में उगे हुए सुरक्षित पुष्प माना जाना चाहिए और उन्हें माली की तरह सींचा, संभाला जाय । अपनी सम्पदा बुढ़ापे की लकड़ी वंश चलाने वाले उत्तराधिकारी, मात्र प्रियपात्र यदि उन्हें माना समझा जायेगा तो वे ही बालक बन्धन रूप सिद्ध होंगे और लोक परलोक में विचित्र विधि दुर्गति का कारण बनेंगे। दृष्टिकोण का अंतर रहने के कारण एक व्यक्ति के लिए शिशु पोषण, परिवार पालन अपार उद्वेग उत्पन्न करेगा जब कि परिष्कृत चिंतन शैली से की गई परिवार सेवा गृहस्थ योग साधना बन जायेगी। पिता-माता, भाई-बहन आदि का भरा पूरा कुटुम्ब किसी भावना शील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बन जाना एक छोटे से राज्य का आगे स्पष्ट छपा नहीं था ।

यदि चटोरेपन की लालसा से अनुपयुक्त आहार किया जा रहा है तो वही सामान्य दीखने वाला भोजन प्रक्रिया पाप परिणाम प्रस्तुत करेगा।

तात्पर्य यह है कि दिन भर के समस्त कार्य पद्धति के साथ उच्च कोटि की भावनाएँ नियोजित रखी जाय। हर दिन कागज पर पूरी दिनचर्या नोट कर ली जाय जिसमें दिन भर का समय विभाजन और हर कार्य के साथ जुड़ी रहने वाली भावनाओं का विवरण लिखा रहे।

यह कागज मेज पर या जेब में रखा रहें। निर्धारित कार्य पद्धति और विचार प्रक्रिया में कितनी सफलता मिल रही है इसका निर्णय हर घण्टे करते रहा जाय। इस तरह चलता हुआ क्रम यह बतायेगा कि सब मिलकर कुल कितने प्रतिशत सफलता कितनी असफलता। कभी कामुकता का विचार मन में उठे तो उन्हें निरस्त करने के लिए व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले असंख्य अनर्थों का, संयम ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होने वाले सत्परिणामों की सूची तैयार रखनी चाहिए और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठे कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार शृंखला पर गम्भीरता पूर्वक ऊहापोह आरम्भ कर देना चाहिए। जहाँ यह प्रक्रिया आरम्भ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।

उच्चस्तरीय भावनात्मक साधना के लिए भजन, मनन, चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्म काण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया जाता रहा है।


आइए, मिल जुलकर जीना प्रकृति से सीखें

वनों में कुछ ऐसे वृक्ष होते हैं, जो अपनी सीमा में छोटे छोटे पौधों को पनपने नहीं देते हैं, सारे जंगल में दो चार ऐसे हिंसक जन्तु भी होते हैं,

वे छोटे छोटे जीव जंतुओं को खा जाते हैं, अफ्रीका में कुछ पौधे ऐसे धोखेबाज होते हैं उनमें कोई चिड़ियाँ आश्रय के लिए आई और उन्होंने अपने नुकीले पत्ते से उसे पकड़ कर खून पी लिया । समुद्र में एक दो मछलियाँ, एक दो जन्तु जैसे मगर और घड़ियाल ऐसे भी होते हैं, जो किसी का पनपना देख नहीं सकते, अपने से कम शक्ति का जो भी दाव में आ गया, उसी को चटकर लिया।

विविध -विपुला प्रकृति के ऐसे दृष्ट प्रकृति के जीव जन्तु है तो पर उनकी संख्या उनका औसत थोड़ा है पर मनुष्य जाति के दृष्टि दोष को क्या कहा जाय, जिन ने इन दो चार उदाहरणों को लेकर उपयोगिता वाद जैसा मूर्खतापूर्ण सिद्धाँत ही तैयार कर दिया। ढूँढ़े तो अधिकाँश संसार ‘आओ ‘ हम सब मिलकर जिये के सिद्धाँत पर फूल फल रहा है। यदि छोटे को मारकर खा जाने वाली बात सत्य रही होती तो कुछ ही समय में विश्व की आबादी दो गुने से अधिक न हो गई होती।

प्रस्तुत प्रसंग यह बताता है कि संसार के बुद्धिमान न समझे जाने वाले जीव-जंतु भी परस्पर मिलकर रहना कल्याणकारी मानते है

जंगल की नदियों में रोडियश नामक एक मछली पाई जाती है, एक साथ सीप नामक जीव भी पाया जाता है । सीप के शरीर को एक कछुए जैसा मोटा और कड़ा आवरण घेरे रखता है, जिससे वह अपने अण्डों की सेवा नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में रोडियश मछली और सीप दोनों मिलते हैं और आओ हम सब मिलकर जियें के अनुसार समझौता कर लेते हैं।

रोडियश अपने अण्डे सीप के खोल में प्रविष्ट कर देती है, इसी समय सीप अण्डे देती है, वह रोडियश अपने शरीर से चिपकाये होती है। रोडियश घूम घूम कर अपने लिए भोजन इकट्ठा करती है। उसी के दाने चारे से सीप के बच्चे पल जाते हैं, जबकि उसके अपने बच्चों को सीप पाल देती है । विभिन्न जातियों में सहयोग और संगठन की आचार संहिता से लगता है, कि भारतीय समाज शास्त्रियों ने प्रकृति की इस मूक भाषा को पढ़कर ही तैयार किया था। आज भी उसका मूल्य और महत्व सामाजिक जीवन में उतना ही है। इस सिद्धाँत के आधार पर ही संसार सुखी रह सकता है। शोषण, छल, कपट, बेईमानी, अनीति और मिलावट पर नहीं, वह यदि दूसरों के साथ वह दुष्टता करेगा तो शोध वातावरण उसके लिए वैसा ही तैयार मिलेगा।

यह उदाहरण कोई अपवाद नहीं। ‘एल्गो ‘ जाति के ‘प्रोटोकोकस ‘ पौधे और फंगस जाति के “ एक्टिनो माइसिटीज” पौधे भी मिलकर आपस में एक दूसरे को बहुत सुन्दर ढंग से पोषण की वस्तुएँ प्रदान करते है॥ हमें शिक्षक ज्ञान देता है कि हम अपनी अनपढ़ धर्मपत्नी या अशिक्षित पड़ोसी के लिए एक घण्टा भी नहीं निकाल सकते, हमारे माता-पिता जब हम बच्चे थे, आधे पेट खाकर, गीले वस्त्रों में सोकर, हमारी परवरिश करते थे, पर आज जब वे वृद्ध हो गये हैं, तब हम क्या उनकी उतनी सेवा कर पाते हैं ?

दुकानदार, रेलवाला, बसवाला, सारा संसार यों कहिए अपनी सेवाएँ हमें देने को तत्पर है, तब यदि हम दूसरों को धोखा देने के बारे में सोचे तो ऐसे व्यक्ति से नीच और घृणित कौन होगा ?

पौधे का क्या आस्तित्व, पर वे मनुष्य जाति से अच्छे है। ऊपर के दोनों पौधे मिलकर एक चपटे आकार का ढांचा बना लेते हैं, उसे ‘जूलाँजी ‘ में लाइकन कहते हैं। इसमें से होकर एल्गी की जड़े फंगस के पास पहुँचती है। एल्गी के पास जिन तत्वों की कमी होती है, उसे फंगस पूरा कर देता है और फंगस की कमी को एल्गी, दोनों का आदान प्रदान से एक थैला भी विकसित होता रहता है । औरों के कल्याण में अपना कल्याण, सबकी भलाई में अपनी भलाई अनुभव करने वाले समाज इसी तरह विकास और वृद्धि करते हैं और अपने साथ उन छोटे छोटे दीन- हीन व्यक्तियों को भी पार कर ले जाते हैं, जो सहयोग के अभाव में दबे पड़े पिसते रहते हैं।

स्कारपियन नामक मछली अपने शरीर के ऊपर छोटे छोटे हाइड्रा जाति के जीवों को फलने फूलने देती है, वे छोटे छोटे जन्तु हजारों की संख्या में एक सिरे से दूसरे सिरे तक पूरी सतह पर फैले रहते हैं । देखने पर यह हरें रंग के होते हैं। मछली के शरीर के ऊपर इनका पूरी तरह पोषण होता रहता है।

जब हम अविकसित मछली दूसरे दीन दुर्बलों की सहायता में इतना योगदान दे सकती है तो हम समाज के दलित माने जाने वाले वर्गों, हरिजनों, आदिवासियों, दहेज के प्रभाव में पीड़ित बहनों, दवा के अभाव में पिसते रोगियों के लिए जो अपने ही समाज के अंग है, कल्याण की योजनायें क्यों नहीं बना सकते। जीव - जीव, पेड़ - पौधे तक में जब एक दूसरे के प्रति सहयोग और सेवा का भाव पनप रहा है तब मनुष्य जाति उससे पीछे क्यों हटें, यह उसका दुर्भाग्य ही कहना चाहिए।

परोपकारिता घाटे का सौदा नहीं, व्यक्ति का महान स्वार्थ है। जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, तब सही मानों में अपनी भी सेवा करते हैं। मछली इन हरे जीवों को पालते समय कोई मूल्य नहीं माँगती। वह पूर्ण निष्काम होती है। पर उसे क्या पता कि ये कीड़े अस्वादिष्ट होते हैं और अपने शरीर से एक ऐसी दुर्गंध निकालते हैं, जिनके कारण हिंसक मछलियाँ और जीव उनसे दूर भागते हैं, इससे वह मछली जो इन्हें पालती है, स्वयँ भी शिकार होने से बच जाती है।

हमारा मनुष्य भी निष्काम सेवा और परस्पर मिल जुलकर रहने के इस तत्व ज्ञान को समझ जाता तो वह इसी पृथ्वी पर स्वर्गीय सुखों की अनुभूति केर रहा होता इसमें राई -रत्ती भी संदेह नहीं है।


दिव्य औषधियों से होता है आध्यात्मिक कायाकल्प

अध्यात्म तत्व ज्ञान का सार यही है कि चेतन सत्ता का वाहक मानव शरीर है और उसे प्रकृति के अन्य घटकों की तरह निर्धारित नियम मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। शरीर की स्वाभाविक संरचना इतनी अद्भुत है कि यदि हम असामंजस्य, अस्तव्यस्तता न लादी जाय तो वह शतायु की न्यूनतम परिधि को पार कर सैकड़ों वर्ष जी सकता है।मरण तो प्रकृति धर्म है, पर किसी तरह मरते खपते, जीर्ण शीर्ण स्थिति में जाना मनुष्य का स्वयँ का उपार्जन है।

आरम्भ से सही मार्ग पकड़ लिया जाय तो कहना ही क्या ?अन्यथा मध्य काल में भी उचित दिशा मिलने पर रुख बदलना, स्वयँ में सुधार ला सकना संभव है। आध्यात्मिक कायाकल्प के रूप में सभी तप तितिक्षाएँ प्रायश्चित रूपी साधना उपक्रम उच्चस्तरीय विशिष्ट भाव योग की साधनाएँ एक प्रकार से आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक उपचार उद्देश्य लेकर ही निर्धारित की जा रही है।

आयुर्वेद कायाकल्प में आहार साधना द्वारा संयमशीलता का अभ्यास कराया जाता है। यह विग्रह प्रक्रिया है। निरोध के बाद सुनियोजन हेतु अनिवार्य है की पदार्थ की कारण शक्ति द्वारा आँतरिक उपाय अंग अवयवों की चिकित्सा का क्रम बिठाया जाय। उपवास युक्त तितिक्षा में एक आहार को ग्रहण की गई साधना जितनी फलदायी है, उतनी ही एक ही जड़ी बूटी से, दिव्य वनौषधि से अपने अंतरंग में नव जीवन देने वाली कल्प चिकित्सा भी महत्वपूर्ण है। इतनी अधिक महत्वपूर्ण व अद्भुत कि उसके बिना कल्प क्रिया का उद्देश्य ही पूरा नहीं होता । काय साधनों से आरोग्य लाभ मिलता है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है। परन्तु तपश्चर्या से ऊर्जा व संयम जन्य मनोबल के सामर्थ्य की दिव्य औषधि का सेवन क्रम का भी जब जीवनचर्या में समावेश हो जाता है तो योग साधनाओं के वे सभी लाभ मिलने लगते हैं जिनकी चर्चा गृह विज्ञान के पृष्ठों में की जाती है।

मेधा वर्धन उत्तेजना शमन, दुर्बलता निवारण तथा वात आदि प्रकोपों से पीड़ित काया के दोष शमन हेतु इससे श्रेष्ठ कोई औषधि नहीं। बुढ़ापे का नाश, शतायु प्राप्ति स्मरण शक्ति की वृद्धि, मनोविकारों का निवारण ऐसे आँतरिक लाभ है जो नित्य 30 से 40 ग्राम ब्राह्मी कल्प सेवन 30 दिन तक करने से सहज ही प्राप्त होते हैं। जप, उपवास, शोधन, आहार उपचार तथा योग साधनाओं के भव्य योग परक क्रिया प्रयोगों के साथ इसे सेवन किया जाता है तो आत्मिक उत्कर्ष में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है। ब्राह्मी को कुछ विशिष्ट औषधियों की भावना देकर कल्प बनाने से विशिष्ट लाभ मिलता है। एक माह तक ब्राह्मी का निरंतर सेवन आयु, बल तो बढ़ाता ही है, वर्ण को सुन्दर, वाणी को मधुर तथा वृद्धि को तीव्र करता है।काया कल्प के लिए मात्रा को बढ़ाकर वर्ष भर अनुपान सेवन का शास्त्रों में विधान है। काया कल्प प्रक्रिया में ब्राह्मी का कल्प अभिमंत्रित पुष्पों के रस की भावना के साथ साधकों के लिए कहा जाता है । सरस्वती पंचक की एक महत्वपूर्ण औषधि की आध्यात्मिक संदर्भ में सब भली भाँति परिचित है।

शंखपुष्पी भी एक मेध्य औषधि है। इसके भी पंचांग का कल्प बनाकर दूध में मिश्रित कर प्रातः पुष्प रसों के साथ इसे देते हैं। आयुष्य की वृद्धि, एकाग्रता और आसन सिद्धि, मेधा शक्ति की वृद्धि तथा जीवनी शक्ति में अप्रत्याशित परिवर्तन करके महत्वपूर्ण लाभ है। आत्मिक उपचारों में इसका नाम ब्राह्मी के साथ लिया जाता है। साधकों के लिए तो इसे नव जीवन देने वाली सोपानों पर चढ़ाने वाली दिव्य औषधि माना जाता है।

अश्वगंधा और शतावरी दोनों ही रसायन है, बल्य है। तप संयम द्वारा जब विकारों का शमन होता है तब इसका सेवन बल बढ़ाने वाला प्रतिरोधी सामर्थ्य को ऊँचा उठाने वाला माना जाता है। आध्यात्मिक प्रगति के लिए इच्छुक साधकों के लिए ये किसी भी प्रकार से बाधक नहीं है। इन्हें कामोत्तेजक अवश्य माना जाता है पर जहाँ निग्रह के साथ नियोजन है, वहाँ संचित सामर्थ्य से विशिष्ट ऊर्जा उत्पादन में ये जो योगदान देती है उसकी जितनी चर्चा की जाय कम है।भाव कल्प संबंधी इनके महात्म्य से ग्रंथों के पृष्ठ रंगे पड़े है।

आध्यात्मिक काया कल्प की साधना का उद्देश्य व्यक्ति को मात्र निरोग, दीर्घायु बनाना ही साधक के व्यक्तित्व को आमूलचूल बदल देता है। संयम अकेला काफी नहीं। कुसंस्कार घटने के साथ आँतरिक प्रखरता न बढ़े तो योगाभ्यास व साधनाएँ वे प्रायोजन पूरे नहीं कर पाते, जिनके लिए उनका विधान किया जाता रहा है। एकान्त सेवन, अंतर्मुखी चिंतन, आहार नियमन तथा दिव्य औषधि के साथ की गयी तप योग साधनाएँ किस प्रकार व्यक्ति का स्वरूप बदल देती है, उसे नया जीवन देती है, इसे देखकर कोई भी आश्चर्य चकित हो सकता है। कोई कारण नहीं है कि च्यवन, ययाति की तरह आज भी व्यक्ति समुदाय का कायाकल्प नहीं किया जा सका। यह पूर्णतः वैज्ञानिक परीक्षित एक अध्यात्म उपचार प्रक्रिया है, इसे साधक साधना विधि में अनुभव कर सकता है।

यदि यह उच्चस्तरीय स्वरूप न भी बन पड़े तो यह मानकर चलना चाहिए कि आहार चिकित्सा, दिव्य औषधि कल्प, तितीक्षा, उपवास तथा योगसाधना की प्रक्रियाओं के सम्पुट शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के रूप में, दीर्घायुष्य तथा संकल्प शक्ति के ऐसे अनुदान मिलते हैं जो आत्मिक प्रगति के लिए इच्छुक साधक को सामान्य से असामान्य स्थिति तक पहुँचा देते हैं।औषधि कल्प को शरीर स्वास्थ्य तक सीमित कर गौण नहीं बना देना चाहिए। पंचकर्म आदि के माध्यम से शोधन का शरीर चिकित्सा का शास्त्रोक्त विधान चिर पुरातन काल से निर्देशित चला आया है।

आँवला, पलाश, हरीतकी, पीपल, शिलाजीत, ब्राह्मी, गिलोय, त्रिफला, गोक्षुर, भल्लातक, सुवर्ण आदि की चर्चा कल्प चिकित्सा संबंधी शास्त्रों में होती है। इसमें अन्य प्रकार के आहार कल्पाँ दुग्ध अथवा मठा कल्प का भी प्रावधान रखा जाता है। एनीमा द्वारा नियमित सफाई तथा पर्पटी के सेवन को भी अनिवार्यता माना जाना चाहिए। परन्तु इन सभी को आज की परिस्थिति के अनुरूप एक सरल विधान नहीं माना जाना चाहिए। यदि उद्देश्य की पूर्ति करनी ही है तो क्यों न शरीर व मन पर प्रभाव डालने वाली औषधि के एकाकी प्रयोग को महत्व दिया जाय ? जब उपवास प्रक्रिया एवं तितीक्षा प्रक्रिया के उद्देश्य की पूर्ति एक ही अन्न से चिकित्सा कराने के रूप में किये जाने का विधान बना लिया गया तो क्यों न इस कार्य के लिए पाँच दिव्य औषधियों कार निर्धारण कर लिया जाय ताकि उन्हें ताजे स्वस्थ रूप में संस्कारित करके ग्रहण करने से कुसंस्कारों का निष्कासन एवं प्रगति की दिशा में अग्रगमन के विभिन्न प्रायोजन पूरे हो सके ? यही विचार शाँतिकुँज के सत्र संचालकों पूज्यवर एवं वंदनीय माता जीने इच्छुक साधकों के लिए पाँच ऐसी औषधि चुनी जिसे ऋषिगण मात्र साधना के उद्देश्य सो अपने आध्यात्मिक कायाकल्प के रूप में प्रयुक्त करते थे। आँवला, पलाश, हरीतकी, पीपल, शिलाजीत, ब्राह्मी, गिलोय, त्रिफला, गोक्षुर, भल्लातक, सुवर्ण के रूप में दिव्य वनौषधियों कमोध्यम से कल्प के युग ऋषि द्वारा निर्देशित विधान माना जाय एवं न्यूनाधिक रूप में हर साधक इनका सेवन करता रहे, यही उपेक्षा ऋषि युग्म की रही है।

आध्यात्मिक कायाकल्प का इच्छुक साधना, उपवास, जप, स्वाध्याय, सत्संग, कुटि प्रवेश, एकाँत और अंतर्मुखी साधना जैसे दैनिक कृत्यों की पूर्ति तो शास्त्र परम्परा के अनुसार करते ही है। पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह अवधि अंतर्जगत की गुत्थियों को सुलझाने के लिए किये जाने वाले संयम के लिए होता है। इस क्रिया रहित प्रक्रिया को आध्यात्मिक कल्प के मेरुदण्ड आधार केन्द्र कहा जा सकता है। चिंतन मनन के इन दो साधनों को तपश्चर्या अनुसंधान की पृष्ठ भूमि माना जा सकता है। प्रायश्चित के विभिन्न पक्ष भी इस पूर्वार्ध में सन्निहित है। उत्तरार्द्ध और भी अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाये जाते हैं। आत्म परिष्कार के बाद यदि मन व अंतर्जगत के क्रमबद्ध दिशा नहीं मिलेगी तो उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। औषधि सेवन को इसलिए महत्व दिया गया है एवं निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि शरीर की सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना इससे प्रभावित, उत्तेजित हो और प्रसुप्त जागरण में भाव योग की उच्चस्तरीय स्थितियों में पहुँचने का साधक को अवसर मिल सके ।

सीधे कारण शरीर को प्रभावित करने वाली इन औषधियों में तुलसी का स्थान सर्वोपरि है। यह एक प्रकार की संजीवनी बूटी है एवं सभी रोगों की स्वयँ में निराली औषधि है। तुलसी की सूक्ष्म सामर्थ्य, सात्विकता सर्व विदित है। जल में तुलसी के पत्र दल डालकर लिया गया चरणोदक साधक के लिए आत्म निग्रह का सर्वश्रेष्ठ साधन शास्त्रों में बताया गया है। सामान्यता कायाकल्प संबंधी शास्त्रों के कल्प तंत्रों में रसायनों का ही वर्णन अधिक मिलता है। परन्तु तुलसी जैसी औषधि जो रसायन कर्म से कही अधिक श्रेष्ठतम गुणवत्ता धारण करती है, का वर्णन चिर पुरातन आर्य ग्रंथों के अतिरिक्त कहीं मिलता नहीं। तुलसी के रामा, श्यामा, बेसिल, मरुवा वन तुलसी, कपूर तथा अजवाइन जैसी तुलसी नामक के कई भेद प्रचलित है। अध्यात्म, उपचार, प्रकरण में हमेशा रामा और श्यामा तुलसी का ही प्रयोग होता है। ये ही सर्वोपलब्ध सर्वप्रचलित भी है। ग्रंथ लिखते है:-

महा प्रसाद जननी, सर्वसौभाग्यवर्धिनी। आधिव्याधि हरेर्नित्यं तुलसित्वं नमोस्तुते॥

अर्थात् “हे तुलसी ! आप सम्पूर्ण सौभाग्यों को बढ़ाने वाली है। सदा आधि व्याधि को मिटाती हैं, आपको नमस्कार है।”

आधि व्याधि निवारण शब्द में कुसंस्कार, निष्कासन एवं स्वास्थ्य संवर्धन, सद्गुण प्रतिष्ठान के सिद्धाँत गुंथे हुए हैं। शास्त्रकार लिखते है-

त्रिकाल विनता पुत्र प्राशर्य तुलसी यदि। विशियष्ते कामशुद्धिश्चाद्रियाण शतं बिना॥

अर्थात् -” हे विनता पुत्र ! प्रातः मध्याह्न तथा शाम को, जो तीन संस्थाओं में तुलसी का सेवन करते हैं उसकी काया वैसी ही शुद्ध हो जाती है, जैसी कि सैकड़ों चांद्रायण व्रतों से होती है। वस्तुतः तुलसी एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कायाकल्प योग है। शरीर का वाह्य आँतरिक शोधन कर यह सामर्थ्य बढ़ाती है, चिंतन के सतोगुण प्रधान तथा चरित्र को निर्मल बनाती है। कल्प चिकित्सा विज्ञान में तुलसी पत्रदल चूर्ण को गंगा जल में संकरित किया जाता है और कल्क रूप में उसे नियमित रूप से 30 से 60 ग्राम की मात्रा का सेवन करने का विधान बनाया गया है।

ब्रह्म का कुटी प्रावेशक विधि से काया कल्प विधान का प्रसंग शास्त्रों में मिलता है।


संसार के कुशल समाचार (Kahani)

संसार के कुशल समाचार जानने के लिए एक दिन भगवान ने नारद को पृथ्वी पर भेजा। उन्हें सबसे पहले एक दीन दरिद्र पुरुष मिला, जो अन्न वस्त्र के लिए तरस रहा था। नारद जी को उसने पहचाना तो अपनी कष्ट कथा रो रोकर सुनाने लगा और कहा, जब आप भगवान से मिले तो, मेरे गुजारे का प्रबंध उन से करा दें । नारद उदास मन आगे बढ़े, तो एक धनी से उनकी भेंट हो गयी। उसने नारद को पहचाना तो खिन्न होकर कहा, मुझे भगवान ने किस जंजाल में फँसा दिया । थोड़ा मिलता तो मैं शाँति से रह पाता और थोड़ा भजन -पूजन कर पाता, पर इतनी दौलत सँभाले नहीं सँभलती।, ईश्वर से प्रार्थना करें कि मुझे इस जंजाल से घटा दें। यह विषमता देवर्षि को अखरी। वे आगे चले ही थे कि साधुओं के एक जमघट से भेट हो गयी। जमात वाले उन्हें चारों ओर से घेर कर खड़े हो गये और बोले स्वर्ग में तुम अकेले ही मौज करते रहते हो, हम सब के लिए वैसे ही राजसी ठाठ, जुटाओ, नहीं तो नारद बाबा चिमटे मार मार कर तुम्हारा भूसा बना देंगे। घबराए नारद ने उनकी माँगी वस्तुएँ मँगा दी और जान छुड़ाकर भगवान के पास वापस लौट गये। जो कुछ देखा वही उनके लिए बहुत था और देखने की उन्होंने इच्छा तक नहीं रही।

भगवान ने नारद से उस यात्रा का वृत्तांत पूछा, तो देवर्षि ने तीनों घटनायें कह सुनाई । नारायण हँसे और बोले देवर्षि, मैं कर्म के अनुसार ही किसी को कुछ दें सकने में विवश हूँ। जिसकी कर्मठता समाप्त हो चुकी है, उसे मैं कहाँ से दूँ। तुम अगली बार जाओ तो उस दीन हीन से कहना, दरिद्रता के विरुद्ध लड़े और सुविधा के साधन जुटाने का प्रयत्न करे, तभी उसे दैवीय सहायता मिल सकेगी। इसी प्रकार उस धनी से कहना कि दौलत उसे दूसरों की सहायता के लिए दी गई है। यदि वह संग्रही बना रहा,तो जंजाल ही नहीं आगे चलकर विपत्ति भी बन जायेगी। नारद जी ने पूछा- और उस साधु मण्डली को क्या कहूँ ? भगवान के नेत्र चढ़ गये और बोले - उन दुष्टों को कहना कि त्यागी और परमार्थी का वेध बनाकर आलस्य और स्वार्थपरता की प्रवंचना इतनी आह्म है कि उन्हें नरक के निकृष्टतम स्थान में अनंत काल तक सहना पड़ेगा।


कटु वचनों का घाव (Kahani)

वृद्धावस्था आने पर कई व्यक्ति स्वभाव में परिवर्तन ला नहीं पाते। दुश्चिंतन मिटे तो ही आगे की व्यवस्था बन सकती है। बुढ़ापे ने काया जीर्ण कर दी तो ब्राह्मण और किसी लायक न रहा । सूखी लकड़ियाँ पास के जंगल से बीनकर गाँव में बेंच आता और किसी प्रकार निर्वाह चलाता। एक दिन लकड़ी भी थोड़ी मिली और दुर्भाग्य से बाघ भी झाड़ी से निकलकर सामने आ खड़ा हुआ। ब्राह्मण प्राण जाने के भय से थर थर काँपने लगा। इतने में उसे एक सूझ सूझी। दोनों हाथ ऊपर की आशीर्वाद की मुद्रा में प्रसन्न होकर मंत्र पढ़ने लगा। बाघ की इस विचित्र व्यवहार को जानने की इच्छा हुई और वह झपटने से पूर्व बोला -तुम कौन हो और ऐसी विचित्र भाषा में क्या कह रहे हो। अब तक तुमसे भेट ही नहीं हो पायी थी।, सो प्रतीक्षा में था कि प्रसन्न होकर आशीर्वाद के मंत्र पढ़ने लगा। तुम्हारा कल्याण हो ! अपने पूर्वजों की भाँति जो दक्षिणा बने, सो देने का प्रयत्न करो।

बात इस विचित्र कथन पर सकपका गया और पुरोहित को प्रणाम करके बोला- देखते हैं न, मेरे हाथ सर्वथा खाली है। शरीर से कुछ काम कराना चाहें तो कर दूँ। ब्राह्मणा ने कहा -यजमान तुम्हारी श्रद्धा बहुत सराहनीय है। इतना भर कर दो कि मेरी लकड़ियाँ पीठ पर लादकर पास के गाँव में पहुँचा दीजिए। बाघ सहमत हो गया और ब्राह्मण द्वारा लादे बोझ को गाँव की सीमा तक पहुँचा दिया । बाघ ने कहा ऐसी सेवा तो मैं रोज दिया करूंगा। इसी समय तुम मेरी प्रतीक्षा किया करना। ब्राह्मण नित्य लकड़ी का लट्ठा जमा करता और बाघ उसे ढोकर गाँव तक पहुँचाता था। इसी तरह कितने ही दिन बीत गये और एक दिन बाघ विलंब से आया । तो ब्राह्मण ने उसे बहुत खरी खोटी सुनाई और शाप देने की धमकी दी। बाघ चुप रहा और गट्ठा पहुँचाने के बाद उसने ब्राह्मण से कहा- आज मेरा एक काम कर दो कल से मैं नहीं आऊँगा। ब्राह्मण के तेवर बदले देख कर उसने समझा कि कहना न माने तो खैर नहीं। सो उसने नम्र होकर आदेश पूछा । बाघ ने कहा - अपनी लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी से मेरे कंधे पर घाव कर दो। असमंजस के बाद उसने वैसा कर भी दिया। घाव छोटा था। बाघ चला गया और दूसरे दिन से फिर नहीं आया। एक दो महीने बीतने पर बाघ फिर प्रकट हुआ। उसने ब्राह्मण को अपनी घाव दिखाते हुए कहा यह अच्छा हो गया है न। पर अभी तक उस दिन के कटु वचनों का घाव अभी भी हरा है और तुम्हारे जैसे से कोई व्यवहार न रखने की नसीहत दे गया है।


कुमारिल भट्ट और उनका प्रायश्चित

बात उस समय की है, जब बौद्ध धर्म सारे भारतवर्ष में तथा अन्य देश देशांतरों में भी अपने पूरे वेग के साथ फैल चुका था और वैदिक मान्यताएँ पंगु हो चुकी थी। मृत प्रायः वैदिक धर्म के पुनरुद्धार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो गया था। बौद्ध धर्म में शून्यवाद की नास्तिक मान्यताएँ अधिकाँश जनता को नास्तिक बनाती चली जा रही थी।

ऐसी संघर्षमय परिस्थिति यों में श्री कुमारिल भट्ट का आविर्भाव हुआ। वे वैदिक धर्म के प्रकाण्ड पण्डित तथा पूर्णतया अनुयायी थे। उन्होंने वेद, शास्त्रों तथा उपनिषदों का गहन अध्ययन किया था। उनका विश्वास था कि वैदिक तथ्य ही मानव जीवन को ऊँचा उठाने में समर्थ हो सकता है। किंतु जनता के सामने अपनी बात कहने तथा उसे मनवाने से पूर्व यह आवश्यक था कि उस प्रभाव को मिटाया जाय तो बौद्ध धर्म के नास्तिक विचारधारा के रूप में जन मानस में छाया हुआ था। उन्होंने प्रतिज्ञा की, कि - चाहे जो कठिनाई मेरा मार्ग अवरुद्ध करे- मैं वैदिक मान्यताओं का प्रचार प्रसार करने में कुछ भी उठा न रखूँगा। “

मार्ग में सबसे बड़ी कठिनाई यही थी कि बौद्ध मतानुयायियों से शास्त्रार्थ करने से पूर्व बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन स्वयँ को होना भी आवश्यक था। इसके लिए वे तक्षशिला गये और पूरे पाँच वर्षों तक बौद्ध धर्म का क्रमबद्ध व विशद् अध्ययन किया। जब शिक्षा पूर्ण हो गई तो चलने का अवसर आया। इस समय की प्रथा के अनुसार बौद्ध विश्वविद्यालयों के स्नातकों की यह प्रतिज्ञा करनी होती थी कि -” कि मैं आजीवन बौद्ध धर्म का प्रचार व प्रसार करूंगा तथा धर्म के प्रति आस्था रहूँगा।

समस्या बड़ी ही गम्भीर तथा उलझनमय थी। करना तो था उन्हें वैदिक धर्म का प्रचार। बौद्ध धर्म का अध्ययन तो उनकी ही जड़े काटने के लिए किया था। झूठी प्रतिज्ञा का मतलब था कि गुरु के प्रति विश्वासघात तथा वचनभंग।

किंतु इस मानसिक संघर्ष के मध्य में उन्होंने अपना विवेक खोया नहीं, और क्या करना चाहिए यह निश्चय कर लिया। आपत्ति धर्म के रूप में उन्होंने प्रतिज्ञा ली और बौद्ध धर्म का अपार ज्ञान लेकर वहाँ से चल दिये। लौटकर उन्होंने वैदिक धर्म का धुँआधार प्रचार करना शुरू कर दिया। जन जन तक वेदों का दिव्य संदेश पहुँचाया। फिर जहाँ भी विरोध की परिस्थिति उत्पन्न हुई वहाँ पर उन्होंने बौद्ध मान्यताओं का खण्डन किया। अपने गहन अध्ययन के आधार पर चुन चुन कर एक एक भ्रान्त बौद्ध मान्यता और वैदिक तथ्यों द्वारा काटा। बौद्ध मतावलम्बियों को खुला आमंत्रण दिया। शास्त्रार्थ के लिए बड़े से बड़े विद्वानों को अपने अगाध ज्ञान और विशद अध्ययन के आधार पर धर्म संबंधी विश्लेषणों तथा वाद विवादों में धराशायी किया। दिग्भ्रान्त जनता को नया मार्ग, नया प्रकाश और नयी प्रेरणाएँ दी।समस्त विज्ञ और प्रज्ञ समाज में यह साबित कर दिया कि वैदिक धर्म के प्रचार में उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया।

और जब उन्हें यह विश्वास हो गया कि गिरती दीवार थम गई है, वैदिक मान्यताओं के लड़खड़ाते पैर जम गये है- तब उन्हें कुछ संतोष हुआ। अब वे यह अनुभव कर रहे थे कि जो बीज मैंने बोये थे, वे फलते फूलते रहेंगे।

अब उन्होंने अपनी ओर देखा । झूठी प्रतिज्ञा करने का क्षोभ, उनके हृदय को निरंतर कचोटता रहता था। महान व्यक्तियों की तो यही विशेषता होती है कि जरा सी अनौचित्य उन्हें सहन नहीं होता। निदान उन्होंने प्रायश्चित करने का निश्चय किया। शास्त्रीय विधान के अनुसार गुरु के प्रति विश्वासघात करने का प्रायश्चित था, जीवित अग्नि में जल जाना और वह अग्नि भी धान के छिलके की, जो लौ उठकर हाल नहीं जल जाती केवल सुलगती रहती है।

इस प्रायश्चित के हृदय स्पर्शी दृश्य को देखने देश के बड़े बड़े विद्वान आये थे । उनमें आदि शंकराचार्य भी थे। उन्होंने समझाया भी, कि आपको तो लोक हित के लिए वैसा करना पड़ा है। आपने स्वार्थ के लिए तो वैसा नहीं किया है । अतः इस प्रकार भयंकर प्रायश्चित मत कीजिए। “

इस प्रकार श्री कुमारिल भट्ट ने जो उत्तर मंद मुस्कान के साथ दिया वह उनकी महानता को और भी कई गुना बढ़ा देता है।उन्होंने कहा कि - “ अच्छा काम केवल रास्ते से ही किया जाना चाहिए तभी उसका प्रभाव लोगों पर अच्छा पड़ता है। माना कि मैंने आपत्ति धर्म के रूप में ऐसा किया, लेकिन इस प्रकार की परम्परा नहीं चलाना चाहता। कुमार्ग पर चलकर श्रेष्ठ धर्म की परम्परा गलत है। हो सकता है, इस समय की मेरे मन की स्थिति को न समझ कर कोई केवल ऊपरी बात ही अनुकरण करने लग जाय । यदि ऐसा हुआ तो धर्म और सदाचार नष्ट ही होगा और तब इससे प्राप्त लाभ का कोई मूल्य न रह जायेगा।अतः मेरा प्रायश्चित करना उचित है।”?

और उसके पश्चात उस दिव्य आत्मा के लिए दिव्य चिता जलाई गई । वे उसमें सहसा ही बैठ गये और आग लगा दी गई। धीरे धीरे सुलग सुलगकर पता नहीं कितनी पीड़ा के साथ, कितनी वेदनाओं के तर्प हटाकर निकलें होंगे प्राण।

देह जल कर भस्म हो गई और उस प्रायश्चित की भीषण अग्नि में । लेकिन उनका आदर्श सदा के लिए अमर हो गया।


तेज पुँज ज्योति अवतरण की साधना

पेज नं0 39-40 नहीं है


सामगान, सामवेद का ज्ञान क्यों है अनिवार्य ?

वेद का ज्ञान साम है गान। जब वेद के पद्यबद्ध मंत्रों को गान विद्या से अनुप्राणित किया गया हो तो -सामवेद’ बन गया। मानवी क्षमता के अंतर्गत ज्ञान और भावना सर्वोत्कृष्ट संयोग होने से इसे सर्वश्रेष्ठ प्रयोग कहना सब प्रकार सर्व संगत है। इन्हीं कारणों से ‘वेदानाँ समावेदोऽस्मि ‘ कहकर गीता उपदेशक ने सामवेद की गरिमा को प्रकट किया। साथ ही इस उक्ति के एक रहस्य की झलक पाने की ललक हर स्वाध्यायशील के मन में पैदा कर दी। यों तो वेद के सभी मंत्र अनुभूति जन्य ज्ञान के उद्घोषक होने के कारण लौकिक एवं अध्यात्मिक रहस्यों से लबालब भरे है किंतु सामवेद के परिष्कृत ज्ञान और उत्कृष्टतम भावना के संयोग से ईश्वरत्व की सहज अनुभूति जीवन काल में ही हो जाती है।

गान का सीधा साधा संबंध भाव संवेदना से है। अनुभूति की अभिव्यक्ति में शब्दों की सामर्थ्य छोटी पड़ जाती है। वेद अनुभूतिजन्य ज्ञान हैं, उसे व्यक्त करने के में भी शब्द शक्ति अपर्याप्त है। ऋषि के अनुभूतिजन्य ज्ञान के शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया, किंतु जब देखा कि पूरे प्रयास के बाद भी अभिव्यक्ति अनुभूति के स्तर की नहीं बन सकी तो, उसने ईमानदारी से कह दिया ‘नीति-नेति ।’यह बात पूरी नहीं हो सकी।

वेद के ज्ञान का मूल स्रोत ऋषियों ने ईश्वर को ही माना है। ज्ञान की सार्थकता पूर्णता तभी है, जब वह पुनः अपने उद्गम तक जा पहुँचे। ईश्वर तक पहुंचने के लिए उसे भावना को योग चाहिए। भाषा को भावपूर्ण बनाने के प्रयास में मंत्र बने। गद्य की अपेक्षा पद्य के भाव संयोग और आभार की क्षमता अधिक पाई गई। पद्य को भी जब गान विद्या में जोड़ा गया तो भावना का प्रवाह अधिक पूर्णता से खुला। अभिव्यक्ति के तीन माध्यमों - 1-गद्य, 2-पद्य, 3-गायन में गायन को भाव विद्या में सबसे अग्रणी देखकर उसे विशेष महत्व दिया गया। ज्ञान की अभिव्यक्ति की उक्त तीन विधाओं के कारण वेदों को तीन प्रवाह युक्त-”वेदत्रयी-- कहा गया। त्रयी हो या चतुष्ठयी, वेद मंत्रों की गणना में कोई अंतर नहीं।

वेदत्रयी के भाषा की रचना प्रमुख है। और वेद चतुष्ठयी में प्रतिपाद्य विषय की प्रधानता है। इसको इस ढंग से भी समझा सकते हैं। वेदत्रयी अर्थात् वेद-मंत्र-गद्य मंत्र एवं गान के मंत्र । वेद चतुष्ठयी अर्थात् गुण वर्णन के मंत्र, यज्ञ कर्म के मंत्र और ब्रह्मज्ञान के मंत्र ।

इन सबमें भाव तरंगों के रहस्यमय दिव्य प्रयोगों को सम्पन्न करने वाले गान के मंत्रों की अपेक्षाकृत कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। तभी इसके प्रयोग सभी शुभ कर्म के प्रारम्भ में करने का स्पष्ट निर्देश है। बात यह भी सही है कि पद्य, गद्य और गायन में से मन पर गायन का विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका अनुभव हम सबको सामान्य जीवन क्रम में भी होता रहता है। गायन से पीड़ित हृदय को शाँति और संतोष मिलता है। इससे मनुष्य की सृजन शक्ति का विकास और आत्मिक प्रफुल्लता बढ़ती है। सच कहें, गायन की अमूल्य निधि देकर परमात्मा ने मनुष्य की पीड़ा को कम किया है। मानवीय गुणों में प्रेम और प्रसन्नता की अभिवृद्धि इससे होती है।

शास्त्रकारों ने स्पष्ट स्वरों में घोषणा की है कि ‘स्वरेण संतलीयते योगी ‘ स्वर साधना के द्वारा योगी अपने को तल्लीन करते हैं। एकाग्र मनःस्थिति को विद्याध्ययन से लेकर जीवन के किसी क्षेत्र में लगाकर चमत्कारी सफलतायें अर्जित की जा सकती है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति पूर्ण न होगा कि इससे मनुष्य की क्रिया शक्ति बढ़ती है और आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है। वेद के प्रणेता ऋषि महाऋषियों ने इस तत्व की अनुभूति बहुत पहले ही कर ली थी, तभी तो उन्होंने शोध निष्कर्षों में कहा “अभिस्वरन्तिबहवो मनीषिणों राजा नमस्य भुवनस्यर्निसते । “ ऋ॰ 1.57.13 अर्थात् - “ अनेक मनीषी विश्व के महाराजाधिकार भगवान को इंगित कर संगीत मय स्वर लगाते हैं और उसी के द्वारा उन्हें प्राप्त करते हैं। “ एक अन्य मंत्र में बताया है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए भक्ति भावनाओं के विकास में गायन का योगदान असाधारण है- “स्वरन्ति त्वा सुते वसो निरेक उक्थिन...................। “

ऋ॰ 8....33.2 )

अर्थात् हे शिष्य ! तुम अपने आत्मिक उत्थान की इच्छा से पास आयें हो। मैं तुम्हें ईश्वर का उपदेश देता हूँ । तुम उसे प्राप्त करने के लिए संगीत के साथ उसे पुकारोगे, तो वह तुम्हारी हृदय गुहा में प्रकट होकर अपना प्यार प्रदान करेगा।

सामवेद में भगवान के संगीत शक्ति के ऐसे रहस्य एवं मर्म स्पर्शी सूत्र पिरोये हुए हैं, जिसका आवाहन कर मनुष्य अपनी आत्मिक शक्तियों तुच्छ से महान, सूक्ष्म से विराट बना सकता है। तभी तो संगीत के दृश्य अदृश्य प्रभावों के अनुसंधान में रत ऋषियों को ऐसी चमत्कारी शक्तियाँ सिद्धियाँ और अध्यात्म का इतना विराट ज्ञान उपलब्ध हुआ जिसे वर्णन करने के लिए एक पृथक वेद की रचना करनी पड़ी।

अब तो पाश्चात्य विद्वानों की मान्यताएँ भी उनके समर्थन में मुखर हो उठी है। उनके कथन से जो निष्कर्ष मिलते हैं, उनसे यही सिद्ध होता है कि मानवीय गुणों और आत्मिक आनन्द को जीवित रखना है तो मनुष्य स्वयँ को गायन से जोड़े रहे। उन्होंने संगीत की तुलना प्रेम से की है। दोनों ही समान उत्पादक शक्तियाँ है। इन दोनों की प्रकृति और जीवन दोनों पर चमत्कारी प्रभाव पड़ता है

“ संगीत आत्मा की उन्नति का सबसे अच्छा साधन है।, इसलिए हमेशा वाद्य यंत्र के साथ गाना चाहिए” यह पाइथागोरस की मान्यता थी । पर डॉ0 फैडन ने अकेले गायन को भी प्रभावोत्पादक और लाभकारी बताया है। इस संबंध को कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के शब्दों में कहे तो “ सौंदर्य कोई साकार रूप और सजीव प्रदर्शन है, तो उसे संगीत ही होना चाहिए।” अलग अलग प्रकार की सम्मतियां वस्तुतः अपनी अपनी तरह की विशेष अनुभूतियाँ है अन्यथा गायन में शरीर, मन व आत्मा तीनों को बलवान बनाने वाले तत्व परिपूर्ण मात्रा में विमान है। यही कारण था कि ऋषियों ने विशिष्ट यंत्रों का संकलन कर गायन की पद्धति विकसित की।

समस्त स्वर, ताल, लय, छंद, गीत, मंत्र, स्वर चिकित्सा, राग, नृत्य मुद्रा, भाव आदि सामवेद से ही निकाले गये हैं। नाद को 22 श्रुतियों में विभक्त किया गया है। ये श्रुतियां कान को अनुभव की जाने वाली विशिष्ट तरंगें है। इनका प्रभाव मानवीय काया और चेतना पर होता है। 22 श्रुति का संबंध गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों से होता है। प्रणव और व्याहृतियों को श्रुतियों और श्रेणियों में नहीं रखा गया है क्यों कि ये दोनों ईश्वर और ब्रह्मांड के परिचायक है। ईश्वरत्व की अनुभूति होने पर ही ये प्रभावी होते हैं।

षडज से संबंधित तीवा, कुमुद्धति, मन्दा छंदोवती, ऋषभ दयावती, रंजनी, रतिका, गाधार रौद्री, क्रोधा, माध्यम वज्रिका आदि इन श्रुतियों का लाभ इसके गायत्री मंत्र के प्रणव एवं व्याहृति कहा गया है, मात्र ईश्वरोन्मुख भावयुक्त गायन से संभव है।

औषधियाँ जिस प्रकार मूल द्रव्यों के रसायन सम्मिश्रण से उत्पन्न होने वाले आँतरिक प्रभाव के कारण विभिन्न रोगों पर अपना प्रभाव डालती है। उसी प्रकार उन 24 शक्तियों का उनके सम्मिश्रण एवं प्राणियों पर प्रभाव पड़ता है। इस सारी शोध का मूल स्रोत सामवेद ही है। इस संबंध में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में जो श्रुतियाँ इन रोगों सं संबंधित है उन रोगों का प्रयोग विशेष रोगियों को सुनाने एवं बाँसुरी सितार, वीणा और अन्य वाद्यों को बजाकर वा साधकों को उन्हें सुनाकर किया गया है। जो शोध निष्कर्ष निकला उसे हृदयरोग के लिए भैरवी, शिवरंजनी, अहैल्या, बिलावल मानसिक रोग के लिए ललित एवं केदार राग एवं दमा और खून की कमी वाली बीमारियों के लिए राज्यश्री केदार, कल्याण, पूरिया, प्रियदर्शिनी एवं सामवेद का गायन लाभदायी है। उच्च रक्तचाप के लिए राग हिण्डोल, पूरिया, कौसी, कानड़, कैंसर के लिए सामवेद गायन राग सिद्ध भैरवी, नर्वस ब्रेकडाउन के लिए अहिर भैरव राग, पूरिया चर्म रोग के लिए मेघ मल्हार, राग सुल्तनी, मधुवन्ती मधुमेह हेतु जौन पुरी जामवंती- उच्च ताप, बुखार में मालकोषबसन्त बहार जैसे राग बहुत उपयोगी है। इसी तरह कैंसर, खून बहना, आधा सिर का दर्द, उच्च अम्लता पैष्टिक अल्सर, इनसोमैनिया, ल्यूकोरिया जैसे रोग है, जिन पर संगीत का अचूक प्रभाव सफल रहा है। इस संबंध में जड़ी बूटी चिकित्सा खान-पान, आहर -व्यवहार का नियंत्रण सम्मिलित है। लेकिन चिकित्सा का एक प्रयोग संगीत का है जिससे चमत्कारी परिवर्तन देखने में आता है।

वैदिक काल में संगीत के इस रहस्यमय विज्ञान के ज्ञाता मंत्र गायन, भावमुद्राओं के रसानुभूतियों के आधार पर अपने अंतराल में दबी हुई शक्तियों को जगाते थे और संपर्क में आने वाले प्राणी मात्र की व्यथा वेदना को हरते थे। जड़ चेतन प्रकृति को प्रभावित करके वे अवांछनीय परिस्थितियों को बदलकर अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने में चमत्कारी सफलता प्राप्त करते थे। उसी आधार पर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान एवं शाँतिकुँज में नादयोग सामगान प्रेरणादायी संगीत साधना के माध्यम से सफलता प्राप्त की जा सकती है। एक शोधकर्त्ता के लिए यह विषय छोड़ा गया है कि वे इस संबंध में आगे प्रयोग शृंखला को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं ? एक अच्छा विचारक स्वर विज्ञान का ज्ञाता होना चाहिए, ऐसा हमारे आयुर्वेद के विद्वान लिख ये है सही भी है। जिस वेद का साम का भान का नाद न हो उसके अंतः में संवेदना के अंकुर कैसे फूटेंगे एवं यह अन्याय औषधि के साथ संगीत को न जोड़ पाया तो उसकी चिकित्सा अधूरी रहेगी। सर्वांग पूर्ण चिकित्सा हेतु सामगान सामवेद का ज्ञान हर चिकित्सक को दिया जाना चाहिए, यह युग ऋषि की मान्यता है एवं इस संबंध में जागृति फैलाने का काम हम सबका है।


मानव जीवन : एक प्रवास ही तो है।

जब पृथ्वी के यातायात के साधनों का उतना अधिक विकास नहीं हुआ था तब भी यात्राएँ मानव स्वभाव का एक आवश्यक अंग थी। न केवल आजीविका, रोजगार, अध्ययन अपितु प्राकृतिक सुषमा दर्शन सत्संग और ज्ञान प्राप्ति के लिए एकाकी और सामूहिक यात्राएँ आयोजित हुआ करती थी। साधना के विकास के साथ साथ इस प्रवृत्ति का विकास हुआ है। यात्राओं की सफलता के लिए प्रचुर भौगोलिक ज्ञान स्थान विषय के रीति रिवाज, रहन-सहन, योग्य विश्राम स्थलों की जानकारियाँ पूर्व में ही उपलब्ध हो जाने के कारण यह यात्राएँ अब सब तरह की आत्म देह हो गयी है।

दूसरी ओर पशु पक्षी है उनमें भी प्रवास की नैसर्गिक गुण आदिकाल से चला आया है। उनकी यात्राएँ पहले की अपेक्षा अब अधिक संकट पूर्ण हो गयी है। उन्हें कोई भी भौगोलिक ज्ञान भी नहीं मिला होता किंतु यह प्रकृति का एक चमत्कार ही है कि प्रतिवर्ष हजारों पक्षी, जंगली जीव न केवल पड़ोसी राज्यों की अपितु सुदूर देशों की भी यात्राएँ करते हैं। मनुष्य में भाषा वाद, जातिवाद, रहन-सहन की भिन्नता के कारण उनके हृदय परस्पर मिल नहीं पाते, पर इन जीवों का ऐसा कोई अंतर्द्वंद्व नहीं। विशेष अवसरों पर विशेष स्थानों पर अनेक देशों से आये भिन्न भिन्न जाति के पक्षी और जीव जन्तु परस्पर सहिष्णुता आदर भावना और भाईचारे की स्वस्थ परम्परा से जीवन निर्वाह कर नियत समय पर अपनी मातृभूमि लौट जाते हैं। मनुष्य जीवन भी एक सुनिश्चित और विराट प्रवाह का लघु संस्करण है। जीव जंतुओं के माध्यम से हम पता लगा सके कि इस नैसर्गिक क्षमता के कारण क्या है तो एक अनोखी जीवन दृष्टि का विकास नितान्त संभव है।

प्रवासी पक्षियों की व्हाइट स्टार्क, गोल्डन प्लावर, आर्कटिक टर्न, सेन् पाइपर, सारस मुख्य है। यह अधिकाँश समुद्र के ऊपर उड़ान भरते हैं। इसलिए उबाऊ दूरी लगातार उड़कर पार कर लेते हैं। गोल्डन प्लावर टुन्ड्रा के पम्पास तक की 1200 किमी. स्वेत स्टार्क को समूचा स्टार्क जिब्राइटल जल भ्रूमध्य आर्कटिक टर्न जब ये उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव लगभग 14 हजार किमी. दूरी तय कर यह एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं और कुछ समय विश्राम कर वे अपनी आगे की यात्रा प्रारम्भ करते हैं।

प्रवास मनुष्य जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। चाहे वह मनोरंजन के लिए हों या आजीविका, तीर्थयात्रा, प्रकृति दर्शन के लिए, उनमें मानव मन की जिज्ञासाओं को असीम परितृप्ति मिलती है। इससे अनेक सीमित दायरे के प्रति असंतोष और विराट के प्रति कौतूहल मिश्रित जिज्ञासा का पता चलता है। पशु - पक्षियों में भी यह गुण समान रूप से पाया जाता है, वे न केवल घाटियाँ, प्रदेश और प्रान्तर प्रवास में ही रुचि रखते हैं अपितु देशान्तर दूरियाँ पार कर ये भी दूसरे देशों को जाने का आनन्द लेते हैं। यह भी एक अपवाद है कि यह जीव जन्त् भारतवर्ष आना अधिक पसन्द करते हैं संभव है यहाँ की सम शीतोष्ण जलवायु उसका कारण है। प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में पक्षी भारत के विभिन्न प्रान्तों में आते और कई बार तो लगातार 2000 मील की लगातार उड़ान करके भी यहाँ आते हैं। योरोपीय देशों में सारस शरद ऋतु में अफ्रीका आ जाते हैं और वसन्त ऋतु में पुनः लौट जाते है एक बार पूर्ण प्रशा से अनभिज्ञ सारस के कुछ बच्चे ऐसेन नामक स्थान पर ले जाकर छोड़ दिये गये । उस समय तक वहाँ के अन्य प्रवासी सारस जा चुके थे । अत्यधिक चक्कर दार रास्ता होने पर भी किसी अंतः प्रेरणा से किसी निश्चित दिशा से प्रशा जा पहुँचे। इसी तरह कुछ कौवों को उत्तरी जर्मनी और वाल्टिक के पार उत्तर पूर्व की दिशा में ले जाकर छोड़ा गया, पर वे 400 मील करी वापसी यात्रा समान्तर मार्ग से सम्पन्न कर यथा पूर्व स्थान पर लौट आयें। आश्चर्य तो तब होता है जब इनके अण्डे भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँची दिये जाय तो उनसे निकलने वाले बच्चे भी अपने जन्म स्थान लौट आये। ऐसा पैतृक गुण सूत्रों की प्रेरणा से होता है। इससे संस्कारों की महत्ता प्रतिपादित होती है।

इंग्लैंड से अफ्रीका की दूरी 6000 मील है वहाँ की अवावीलों कष्ट उठाकर भी यह देशान्तर करती है। अमेरिका से दक्षिणी अफ्रीका जाने वाली स्वर्ण टिटहरी को 2000 मील यात्रा करनी पड़ती है । पेन्गुइन उड़ नहीं सकने पर वह समुद्र में तैर कर ही अंटार्टिका से दक्षिणी अफ्रीका की यात्रा करती है। वे जिस रास्ते जाती है उसी रास्ते आती है विशेष ध्वनि से गाते हुए चलने वाली इनकी टोलियाँ दर्शकों का मन उसी तरह मोहती है, जैसे मेले-ठेले जाने वाली स्त्रियों की गीत गाती टोलियाँ।

अपने जन्म स्थान की कुत्तों को भी विलक्षण पहचान होती है। वे गंध के सहारे सैकड़ों मील दूर से भी अपने घर वापस लौट आते हैं । न्यूयार्क का कुत्ता एल्वनी विश्व भ्रमण की ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसने अकेले रेल और समुद्री जहाजों से जापान, चीन, यूरोपी देशों की यात्रा की और अंततः सकुशल न्यूयार्क वापस लौट आया।

मनुष्य कहाँ से आया उसका यथार्थ क्या है, यह न तो समझने का प्रयास करता है और न लक्ष्य प्राप्ति का प्रयत्न, पर यह पक्षी है जो दूर दूर तक जाकर भी समय पर प्रयत्न पूर्वक खुशी खुशी लौट आता है। शरद ऋतु में उत्तरी पश्चिमी ध्रुव प्रदेशों के पक्षी भारत, दक्षिणी अफ्रीका, श्री लेका तक फैल जाते हैं, पर ग्रीष्म ऋतु आते ही अपनी जन्मभूमि लौट आते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जीव वैज्ञानिक जर्मनी के विम्रेन नगर में एक प्रयोग किया। उन्होंने सात अवाविलयाँ पकड़ी और उन्हें लाल रंग सं रंग दिया। फिर उन्हें विमान में बैठाकर लन्दन लाकर हवाई अड्डे के पास छोड़ दिया गया। पीछे पाया गया कि उनमें से पाँच सुरक्षित अपने घोसलों में पहुँच गयी।

हममें से अनेक मनुष्यों को परमात्मा कुछ विशेष बौद्धिक आत्मिक गुणों से सम्पन्न कर पृथ्वी पर भेजता है और आशा करता है कि सृष्टि को सुन्दर बनाने की, उसकी कल्पना को साकार बनायेंगे, पर वह ऐसा करना तो दूर उसकी बुद्धि कौशल को अपने ही स्वार्थ साधनों में उलझाकर यह कामना करता है कि उसे संसार से जाना नहीं पड़ेगा। अपनी हठ बुद्धि के कारण वह न केवल संसार को कुरूप बनाता है, अपितु पश्चाताप भरी जिन्दगी लेकर लौटने को विवश होता है।

नवीनता के प्रति आकर्षण जीवन की नैसर्गिक गुण है । यह गुण भी जीवन की पृथक पृथक इकाइयों में सामंजस्य प्रकट करता है। और मनुष्य को उसके चिंतन के लिए भावभरी विराट सामग्री प्रदान करता है। जीवों की भाँति मनुष्यों में भी यह गुण पाया जाता है। किन्तु सांसारिकता के भार इस तरह के आवाहन प्रदान करने वाले गुणों को भी नष्ट कर देते हैं। तब उनकी पाशविकता उभर कर सामने आ जाती है। अच्छे और नये के स्वागत की दृष्टि से भारतीय मनीषा को अनासक्त कर्म योग का दर्शन दिया है। इन परम्पराओँ को बनाये रखने में न केवल प्रसन्नता अपितु पवित्रता भी निहित है।

भावनाओं के अलौकिक जगत के सत्य से हमें कभी इन्कार नहीं करना चाहिए। यह सत्य दृष्टि में निरन्तर बना रहे तो अनायास ही दुष्कर्मों और छोटे कृत्यों से छुटकारा मिल जाता है, पर उसी के साथ ही व्यवहारिकता का आधार भी नष्ट हो तो संतुलन बना रह सकता है। नवीन के प्रति अन्येन जिज्ञासा और पलायनवाद नहीं होना चाहिए। अपनी इसी त्रुटि के कारण भारतीय जीवन में धक्का खाया और शिरोमणि जीवन में तत्वदर्शन की धरती पर धूल चाटनी पड़ी। आकाश की कल्पना करते समय धरती के यथार्थ का मोह न मोड़े, जन्म स्थान बार बार लौटने में जीव की प्रकृति यही संदेश संकेत हो सकता है।

प्रकाश चिरकाल से ही मानवीय प्रेरणा का स्रोत है । प्रकाश जितना दिव्य और स्निग्ध होता है उतना ही मोहक लगता है। चैत्र की नव रात्रियों के समय आकाश में आने वाले प्रकाश में कुछ ऐसी दिव्यता होती है कि उनका अनुभव कर आंखें चमकने लगती है। ब्याह शादियों के समय छूटने वाली फुलझड़ियाँ देखकर न केवल बच्चे अपितु प्रसन्न होते हैं । प्रकाश का मानवीय चेतना से सीधा संबंध है, तभी हम अन्धकार बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। परमात्मा से अंधकार से प्रकाश की और ले चलने की प्रार्थना करते हैं । प्रकाश ही जीवन और अंधकार अविद्या है- यह बात प्राण चेतना में समान रूप से लागू होती है चाहे वह मनुष्य या मनुष्येत्तर जीव।

पक्षियों के प्रकाश संबंधी वैज्ञानिक अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि पक्षियों का प्रयास जिन कारणों से प्रेरित होता है उनमें ऋतु परिवर्तन को अनुकूल बनाये रखना, भोजन प्राप्त करना गौण है। जिन देशों में चौबीसों घण्टे या अधिक से अधिक सूर्य का प्रकाश रहता है वहाँ पक्षी अधिक रहना पसन्द करते हैं । ध्रुवों के समीपवर्ती प्रदेश इसी तरह के है आर्कटिक टर्न और गोल्डन प्लोवर ऐसे ही पक्षी है जो ध्रुव की यात्रा गर्मियों में करते हैं। क्योंकि उन दिनों वहाँ सूर्य चौबीसों घण्टे दिखाई पड़ता है। केवल मौसम की ही बात होती तो उसमें आये दिन उतार चढ़ाव आते रहते किंतु वे ऐसा नहीं करते हैं । अमेरिका के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि वहाँ सैन जुआन से आने वाले स्वालों पक्षी प्रति वर्ष एक ही निर्धारित तिथि को पहुंचते हैं।

न्यूयार्क में एक पक्षी पाया जाता है ब्राँज कक्कू इनके बच्चे पैदा होते ही आत्म निर्भर जीवन बिताते हैं। माता- पिता इन्हें अपने साथ यात्राओं पर भी नहीं ले जाते हैं कि जब वे प्रति वर्ष सोलोद्वीप की यात्रा समूहों में करते हैं। तो न जाने कौन सी सूक्ष्म अंतः प्रेरणा है कि बच्चे अपने आप ही अपने पूर्वजों की तरह यात्राएँ करने और उस स्थान पर स्वतः पहुँच जाते हैं, जहाँ उनके पितामह आते जाते रहते थे । वैज्ञानिक अनुसंधान है कि प्रकाश किरणों की दिशा वुत चुम्बकीय क्षेत्र तथा पृथ्वी के घूमने की स्थिति का पक्षी भली भाँति अनुभव करते हैं। इसी कारण वे इतनी लम्बी यात्राएँ बिना किसी जान पहचान और यंत्र के सम्पन्न करते हैं। नक्षत्रों की स्थिति और सूर्य का परिभ्रमण के आधार पर भी वे अपनी यात्रायें सम्पन्न करते हैं किंतु जितना उनका यह सूक्ष्म बोध आश्चर्य जनक है उसी तरह यह तथ्य भी कि रात में बिना पूर्व ज्ञान और मार्ग दर्शन से उन्हें इन सभी परिस्थितियों की जानकारी किस स्रोत से उपलब्ध होती है ?


लोकसेवी का दृष्टिकोण और जीवन नीति

विगत सात माह से सतत् पूज्यवर की लेखनी से प्रदत्त वह मार्ग दर्शन दिया जा रहा है जो किसी भी लोक सेवा के क्षेत्र में उतरने वालों के लिए एक पाठ्य पुस्तक में दिये गये निष्कर्षों की तरह है । इस लेख का एक एक वाक्य गीता के श्लोकों की तरह से सबके लिए नित्य पढ़ने योग्य है। महाशिव रात्रि की वेला में महाकाल के वरद पुत्रों को पढ़ने योग्य ठोस सामग्री इन पंक्तियों में मिलेंगी। पढ़ें और इसे मनन करें।

लोकसेवा के लिए मन में उमंग और उत्साह उठाने के बाद तत्काल उस ओर प्रवृत्त नहीं हुआ जा सकता । इसके लिए अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ता है। मान्यताओं में आवश्यक परिवर्तन करना पड़ता है तब कही जाकर सेवा साधना संभव होती है। मनुष्य के पास थोड़ी सी शक्तियाँ है और छोटा सा जीवन, उसे अलौकिक प्रयोजन में लगा दया जाय तो यह निश्चय स्वयं ही करना पड़ेगा। अपने स्वार्थों के लिए हर कोई प्रयत्न करता है। लोकसेवी अपनी शक्तियों का नियोजन जन सेवा के लिए परमार्थ कार्यों के लिए करते हैं अतः उसे अपनी आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए दूसरों से भिन्न दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और अपना जीवन स्तर आवश्यकताओं और साधनों के उपयोग की रीति नीति भिन्न रखनी चाहिए।

प्रायः दृष्टिकोण न बदलने के कारण ही सेवा धर्म कठिन जान पड़ता है और उसका निर्वाह नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए आवश्यकताओं को ही ले ले। बहुत से व्यक्ति यह सोचते हैं कि सम्पन्नता और समृद्धि ही जीवन का लक्ष्य है और उसे प्राप्त करने में जो सफल हों गया वही धन्य है। लोकसेवी का दृष्टिकोण इससे भिन्न होना चाहिए। उसे साधनों की विलुप्तता नहीं व्यक्तित्व की श्रेष्ठता के बड़प्पन का आधार मानना चाहिए। यदि ऐसा न हो सका तो लोक सेवी उसे गोरख धन्धों में उलझ कर रह जायेगा जिसमें कि दूसरे लोग उलझ जाते हैं। सर्वसाधारण की दृष्टि से सुविधायें और विलासिता के साध नहीं जीवन की सार्थकता है। यद्यपि वे सभी उपलब्ध नहीं होते परंतु इसकी गतिविधियों का केन्द्रीय आधार वही रहता है। इच्छित स्तर की स्तर की साधन सम्पन्नता हर कोई अर्जित नहीं कर पाता लेकिन लक्ष्य सभी का वही रहता है। लोकसेवी को सर्व साधारण से भिन्न रीति अपनानी चाहिए।अपने निर्वाह के लिए लोकसेवी को कम से कम आवश्यकतायें रखने का दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए। समझा जाता है कि हम जितनी शान शौकत और मौज मजे से विलासिता पूर्ण साधनों का उपयोग करेंगे उतना ही बड़प्पन मिलेगा। वस्तुतः यह सोचना गलत है। इसके लिए अपने बड़प्पन की परिभाषा बदलनी चाहिए। बड़प्पन धन संपत्ति या शान शौकत से नहीं उत्कृष्ट और आदर्श व्यक्तित्व तथा महान बनने वाले सद्गुणों से मिलता है। प्राचीन काल में लोक सेवी परम्परा के अंतर्गत जितने ही संत, ऋषि, विचारक, मनीषी और महापुरुष हुए हैं उन्होंने यही दृष्टिकोण अपनाया है। ऋषियों के रहन- सहन की ताजगी इतनी संविख्यात है कि उस संबंध में कुछ भी कहना ठीक नहीं है। चाणक्य जिन्होंने भारत को एक राष्ट्र रूप में संगठित करने के लिए चन्द्रगुप्त का मार्गदर्शन किया, हमेशा एक कुटिया में रहे।

यदि वे चाहते तो उनके लिए प्रचुर साधन सुविधाएँ जुटा सकते थे लेकिन लोकसेवी को आदर्श परम्परा की रक्षा के लिए उन्होंने न्यूनतम आवश्यकता की मर्यादा का पालन किया।

इस युग में भी वे न्यूनतम आवश्यकताओं को रखते जीवन व्यतीत करने वाले महापुरुष हुए हैं और उन्हें भरपूर श्रद्धा मिली है। गोपाल कृष्ण गोखले, महर्षि अरविन्द, ईश्वरचन्द विद्या सागर आदि मनीषी महामानवों ने के जीवन के तीस चालीस वर्ष पूर्व की ही बात है। उन्होंने अच्छी सम्पन्न स्थिति में रहते हुए न्यूनतम साधनों का उपयोग अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया।

गोपाल कृष्ण गोखले अच्छी सम्पन्न स्थिति के थे और आमदनी भी उन्हें पर्याप्त होती थी । पर उन्होंने अपने लिए यह मर्यादा बना ली थी कि परिवार के तीस रुपये से अधिक खर्च नहीं करेंगे। उन्होंने आजीवन इसी मर्यादा का पालन किया।

महर्षि अरविन्द जब इंग्लैण्ड से शिक्षा प्राप्त कर लौटे तो उनकी नियुक्ति बड़ौदा के पास एक कॉलेज में 500 रुपये माहवार पर हुई। चाहते तो वे अच्छा ठाठ बाट का जीवन व्यतीत कर सकते थे। लेकिन उन्होंने निश्चय किया कि पचहत्तर रुपये में ही गुजारा चलायेंगे और वास्तव में उन्होंने अपने निश्चय के अनुसार ही जीवन रखा। ईश्वर चन्द्र विद्या सागर को 500 रुपये प्रतिमास मिलते थे लेकिन उन्होंने अपने लिए 50 रुपये की ही व्यय सीमा रखी और आजीवन उसी स्तर को कायम रखते हुए सेवा धर्म का पालन करते रहें।

महात्मा गाँधी का सस्ता सा कपड़ा-धोती पहनते थे और सादे से सादा भोजन करते थे। इसी में उन्हें संतोष और अनुभूति होती थी और जन साधारण से निकट की आत्मीयता की अनुभूति भी प्राप्त होती रहती थी। अपने बीच का अपनी स्थिति का व्यक्ति मान कर लोगों ने उन्हें जो सम्मान दिया वह बीसवीं शताब्दी में शायद ही किसी को मिला है।

यहाँ दो-चार महापुरुषों की ही चर्चाएं की गयी हैं। अन्यथा संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने आवश्यकताओं के संबंध में अनिवार्यता का दृष्टिकोण अपनाया। सुकरात के संबंध में कहते हैं जब भी वे कोई वस्तु खरीदते या नया साधन जुटाते तो उससे पहले वे अपने आप से एक प्रश्न करते क्या इस वस्तु के बिना मेरा काम नहीं चल सकता है ?यदि उत्तर हाँ में मिलता तो वे वह वस्तु खरीदते अन्यथा उस विचार को ही छोड़ देते थे। कम साधनों में निर्वाह गौरव और गरिमा की बात है यह दृष्टिकोण विकसित किया जा सके तो न अभावों की समस्या रह जाती है और न किसी बात की कमी रह जाने की शिकायत रह जाती है।

यह समझा जाता है कि यदि साधारण स्तर का जीवन व्यतीत किया जाये तो लोग हमें घटिया, दरिद्र और कंजूस समझेंगे। लोगों की मान्यताएँ कभी कभी बनती और बिगड़ती रहती है। अन्यथा न सादगी का कभी अपमान हुआ है और न उसके प्रति किसी में घृणा उत्पन्न हुई है । बल्कि सादगी कम आवश्यकताओं में ही अपना गुजारा चला लेने वाले व्यक्तियों को असाधारण सम्मान मिलता है। महात्मा गाँधी खद्दर की एक धोती भर पहनते थे और जन साधारण जिसे अनुपयोगी और निम्न स्तरीय साधन अपाकरण समझते हैं, उनका प्रयोग करते थे। लेकिन इससे उनके सम्मान में कोई कमी तक नहीं आयी। अपितु सर्वसाधारण भी उन्हीं साधनों को अपनाने में गौरव अनुभव करने लगे ।

सामान्य रूप से लोग फूहड़पन और गंदे रहन- सहन को जरूर घृणा की नजर से देखते हैं, किंतु सादगी को सम्मान देते हैं। छोटे तबके के लोगों को लोग गिरी हुई निगाह से इसलिए देखते हैं कि उनके पास पर्याप्त वस्त्र नहीं होते अथवा और दूसरे साधनों का अभाव रहता है उनके प्रति असम्मान की भावना तब उभरती है जब वे आलसी होने के कारण गन्दे और मूर्ख होने के कारण अव्यवस्थित रहते हैं। कम वस्त्र या कम साधन होने से कोई छोटा या गिरा हुआ नहीं हो जाता। गिरावट आती है अस्वच्छता और अव्यवस्था से। इस प्रकार लोकसेवी को बड़प्पन की मान्यता परिष्कृत करनी चाहिए।सादगी पूर्ण वेशभूषा और न्यूनतम आवश्यकतायें -यह सिद्धाँत अपने जीवन में समाविष्ट कर लेना चाहिए। सुरुचिपूर्ण सादगी को ही अपनी गौरव गरिमा समझने की दृष्टि विकसित की जानी चाहिए।

लोकसेवियों को अपने स्वरूप की गौरव गरिमा को ध्यान में रखने के लिए उज्ज्वल चरित्र और धवल व्यक्तित्व की आवश्यकता अनुभव करनी चाहिए। इस संबंध में यह मान्यता बनाई और अपनायी जाय कि हम जो कुछ भी कहना चाहते हैं, जो कुछ भी शिक्षा दें वह वाणी से कम और व्यक्तित्व से अधिक उद्भूत हों। कहने का अर्थ यह है कि लोकसेवी अपनी गरिमा को समझे और उसे अक्षुण्ण बनाये। अपने स्वरूप और वेश के गौरव को प्राचीन काल में साधु ब्राह्मण लोक सेवियों की परम्परा में ही मानते थे किन्तु आजकल वे शब्द रूढ़ हो गये है और वर्ग विशेष का अर्थ बोध कराते हैं, क्योंकि इस नाम से संबंधित व्यक्तियों ने भी वही रीति नीति अपनाना आरम्भ कर दिया जिसे सर्वसाधारण अपनाता रहा। बल्कि एक दृष्टि से तो उनकी रीति नीति और भी विकृत हो गयी । कारण यह वर्ग जन श्रद्धा का भी दोहन करने लगा। अन्यथा एक समय था कि जब साधु वेश का अर्थ ही निस्पृह, अपरिग्रही और सेवाभावी व्यक्ति समझा जाता था। उस बहरूपिये की कहानी प्रसिद्ध है जिसने एक राजा के कहने पर एक बड़ा कमाल दिखाने और बड़ा इनाम लेने की बात कही थी।उस कमाल के लिए बहरूपिया साधु बनकर बैठ गया था और राजा ने उस साधु के सामने सिक्के और अशर्फियों का ढेर लगा दिया पर साधु बने बहरूपिये ने उस ओर आँख उठा कर तक नहीं देखा। बाद में जब रहस्य खुला तो राजा ने पूछा - कि तुम्हारे सामने इतनी सम्पदा का ढेर लगा हुआ था, यदि तुम चाहते तो उसे ले सकते थे । अब तुम्हें इतना इनाम मिल सकता है ?इनाम की तुलना में तो वह भेट कई गुना ज्यादा थी। बहरूपिये ने तब यही उत्तर दिया था कि -” यदि मैं वह भेट स्वीकार कर लेता तो उससे साधु वेश की मर्यादा ही समाप्त हो जाती और लोगों के हृदय में साधु के प्रति जो श्रद्धा है वह कम हो जाती । कहने का अर्थ यह है कि साधु ब्राह्मण -लोक सेवा ही जिनका जीवन लक्ष्य था अपनी मर्यादा और नियमों के प्रति इतनी दृढ़ इच्छा रखते थे कि जन सामान्य उस वेश को देख कर ही श्रद्धावनत हो उठता था। लोकसेवी को भी अपना स्वभाव, अपना रहन-सहन अपना आचरण इस स्तर का रखना चाहिए कि उसे देखकर लगो में लोकसेवी के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो।

इसके लिए आत्म निर्माण की साधना करनी पड़ेगी। अपनी कमियों को खोजना और दूर करना, कमजोरियों को हटाना तथा सत्प्रवृत्तियों को अपने स्वभाव का अंग बनाना होगा। व्यक्तित्व की दृष्टि से लोकसेवी को अपना विकास इतना प्रखर और उच्च करना चाहिए कि उसकी वाणी से अधिक उसके कर्म प्रेरक बनें।

व्यक्तित्व रूप में अपने साफ करने और उसमें उज्ज्वलता धवलता का समावेश करने के साथ ही परिवार के संबंध में भी अपने दृष्टिकोण की रीति नीति को परिष्कृत कर लेना चाहिए। लोकसेवा का व्रत ग्रहण करने के नाते अपनी आवश्यकताओं को भी कम किया जा सकता है लेकिन बच्चों को तो सुविधाओं में तो कटौती नहीं की जानी चाहिए।

यदि यह दृष्टिकोण अपनाया गया तो सादगी नाम मात्र की चिन्ह पूजा बनकर रह जायेगी। सेवा साधना के लिए सादगी जिन कारणों से आवश्यक है वे कारण भी पूरे नहीं हो सकेंगे- जैसे सादगी के कारण जन साधारण में अपनत्व की भावना जागती है। कहना नहीं होगा कि लोग लोकसेवी के साथ साथ परिवार के संपर्क में भी आयेंगे, परिवार के संपर्क में आने के बाद ठाठ बाट और वैभव विलास ही दिखाई देगा तो लोकसेवी की निष्ठा पर लोगों को संदेह होने लगेगा और वे लोक सेवी के रहन सहन को नाटकीय समझने लगेंगे। यह भी हो सकता है कि वे सोचे अपने अपने परिवार के लिए तो इन्होंने सारे साधन जुटा लिये है और हमें सादगी से रहने का संदेश दे रहे है।

वैसा ही परिवार के लिए साधन सम्पत्ति इकट्ठी करना और पर्याप्त सुविधाएँ जुटाना आवश्यक है। न केवल अनावश्यक वरन् अनेक दृष्टि से घर के बच्चों और स्वजनों का संस्कार बिगाड़ने जैसा है। उदाहरण के लिए आज परिवार में इतनी सम्पत्ति है या इतना धन इकट्ठा कर लिया गया कि बच्चों को कभी पैदल चलने की जरूरत ही न पड़े। साइकिल, रिक्शा या स्कूटर जैसे साधन जुटा दिये गये, सभी सुविधायें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने से एक तो बच्चों को शारीरिक श्रम से जी चुराने की आदत पड़ेगी दूसरे कभी संघर्ष पूर्ण परिस्थितियाँ आई तो उन परिस्थितियों में निर्वाह बहुत मुश्किल हो जायेगा।

परिवार के लिए सुविधा साधन जुटाने और धन सम्पत्ति इकट्ठी करने के स्थान पर घर के सदस्यों में सद्गुणों का संवर्धन और उत्कृष्टता का अभिवर्धन किया जाय तो अधिक श्रेयष्कर है। धन संचय और सम्पत्ति संग्रह कर घरों के बच्चों को निकम्मा और और आलसी बना देने की अपेक्षा अच्छा है कि उन्हें परिश्रमी पुरुषार्थी जीवन वाला तथा सद्गुणी बनाया जाय । संतान यदि सुयोग्य हो तो -संतान यदि अयोग्य हो तो दोनों ही स्थिति में उनके लिए धन सम्पत्ति एकत्रित कर छोड़ देना व्यर्थ है। किसी संत ने इसी को लक्ष्य कर कहा है-

पूत सपूत तो क्यों धन संचै। पूत कपूत तो क्यों धन संचै॥

अर्थात् संतान यदि सुयोग्य है तो उसके लिए संपत्ति संग्रह की क्या आवश्यकता क्योंकि अपने निर्वाह लायक उपार्जन तो, वह अपनी योग्यता द्वारा ही कर लेगा, और यदि संतान अयोग्य है तो तो उसके लिए भी संपत्ति का संग्रह व्यर्थ है क्योंकि वह सारी संपत्ति अपनी अयोग्यता के कारण शौक मौजों में नष्ट कर देगी।

अपना आदर्श परिवार के लिए भी प्रेरक बनता है। प्रायः अभिभावक स्वयँ अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर बच्चों के लिए सुविधा साधन एकत्रित करते हैं। यदि बच्चे को अपने आदर्शों के अनुरूप ढालने की चेष्टा की जाय तो, उनके व्यक्तित्व को परिष्कृत और संस्कारित बनाने के प्रयास किये जाय तो उनके सुखद भविष्य की संभावना अधिक रहती है। धन संपत्ति से नहीं गुण और योग्यता से ही भविष्य का निर्माण होता है। इस दृष्टि से परिवार के सदस्यों को परिमार्जित करने में समय लग सकता है। इसके लिए मूर्तिकार सा धैर्य रखना चाहिए। एक साधारण से पत्थर को मूर्ति का रूप देने के लिए लम्बे समय तक परिश्रम करता और मनोकल्पित स्वरूप को साकार हुआ देखने के लिए धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करता है। लोक सेवी को चाहिए कि वह अपनी संतानों को, परिवार के सदस्यों को आदर्शों के साँचे में ढालने के लिए धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करते रहे, स्वयँ भी वैसा जीवन जिये और घर में भी वैसा वातावरण विनिर्मित करता रहे।


आगत का स्वागत


आगत का स्वागत (Kavita)

आगत का स्वागत साधे हम और विगत की करे विदाई। नव प्रभात की नव किरणों से, किलक उठे सूनी अंगनाई॥ 1॥

विगत नशा भूले विसरायें। दुर्भावों का भूत भगायें। कलुषित कृत्य नहीं दोहरायें। सत्कर्मों की राह बनाये॥

भेछ-भावना को विस्मृत कर, गुँजे समता की शहनाई। नव प्रभात की नव किरणों से, किलक उठे सूनी अंगनाई॥ 2॥

जीर्ण-शीर्ण में ममता तोड़े। नव प्राणों से रिश्ता जोड़े। नीरसता, निष्क्रियता छोड़े। पतन पराभव से मुँह मोड़ें ॥

नव जीवन में रहे न पतझर, फूटे वासंती तरुणाई। नव प्रभात की नव किरणों से, किलक उठे सूनी अंगनाई॥ 3॥

पुलक उठे ऐसे मानव मन। जैसे पुष्पित हो नन्दन वन। स्नेह और समता का चिंतन। पाये मानवता का मधुवन॥

‘श्रम’ ‘ आतिथ्य करे आगत का, गाये सुख सुविध बधाई। नव प्रभात की नव किरणों से, किलक उठे सूनी अंगनाई॥ 4॥

नूतन वर्ष विवेक जगाये। सदाचरण के चरण जमाये। मानव के देवत्व समाये। मनुज धरा को स्वर्ग बनाये॥

वसुधा हो कुटुंब, मानव हो आपस में सब भाई भाई। नव प्रभात की नव किरणों से, किलक उठे सूनी अंगनाई॥ 5॥

सृजनात्मक मानव चिंतन हो, जन हिताय ही जग जीवन हो। शोषण- उत्पीड़न, अभाव अज्ञान न दें फिर कही दिखाई॥

नव प्रभात की नव किरणों से, किलक उठे सूनी अंगनाई॥ 6॥


एक ही रास्ता


एक ही रास्ता (Kavita)

आज मन की तपन दूर कर पायेगी, धर्म अध्यात्म की दिव्य अमराइयाँ।

आदमी द्वेष की गोद में पल रहा, खुद जलाई हुई आग में जल रहा, लोभ-लिप्सा भीर फिसलने हैं बहुत, पाँव ठहरें न, अब वह मनोबल रहा, एक ही रास्ता अब बचा है यहाँ, अन्यथा बढ़ रही ध्वंस परछाइयाँ।

धर्म का स्नेह से फिर नाता रहा, धर्म मन में उजाला बढ़ाता रहा, जब कठिन जंगलों में उलझते कभी, धर्म सीधा सुपथ है दिखाता रहा, व्यर्थ हम खोदते जा रहे रात-दिन, धर्म के नाम पर खंदके-खाइयाँ।

जो हृदय को निकट ला सके,धर्म है, पा जिसे फिर न दुख पा सके, धर्म है, क्षुद्र संघर्षरत आदमी को यहाँ, प्यार का मर्म समझा सके, धर्म है, रह सके फिर न उथला किसी का हृदय, भावना को मिले मौन गहराइयाँ।

धर्म, जो विश्व की चेतना दे हमें, आत्म का मधुर स्वर सुना दे हमें, स्वार्थ के दायरे लाँघकर हम बढ़ें, इस तरह देवमानव बना दे हमें, धर्म ही संकटों का समाधान है, विश्व पा जायेगा श्रेष्ठ ऊँचाइयाँ।


वसंत की वेला में गुरुवर का वासंती संदेश

इस अंक में 15/2/78 को शाँतिकुँज परिसर में, जब यहाँ गायत्री नगर का निर्माण हो रहा था,परमपूज्य गुरुदेव के श्री मुख से निकली अमृतवाणी दो भागों में पाठक बन्धु पढ़ेंगे। पहला भाग इस अंक में अविकल जा रहा है जिसमें स्थापनाओं की, जिनने आज सारे विश्व में धूम मचा रखी है, भावी फलश्रुतियों का वर्णन है। पढ़े अमृतवाणी।

गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ -

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों। वसंत पर्व के समय पर हमारी यह शृंखला जिस उद्घाटन प्रायोजन के लिए चल रही है, उसमें सम्मिलित करने के लिए आपको दूर दूर से बुलाकर क्यों कष्ट दिया गया, आइये जरा इस पर विचार करे।इस समय इधर तीन काम चल रहें हैं, जिनमें सम्मिलित होने के लिए आप लोगों को बुलाया गया है। यह तीन कार्य है-

( 1) ब्रह्मवर्चस का उद्घाटन ( 2) प्रज्ञा मंदिर का उद्घाटन और ( 3) गायत्री नगर का उद्घाटन । आँख से देखने पर ये तीनों चीजें बहुत ही छोटी दिखाई पड़ती है, लेकिन अगर आप अपने विवेक की आँख से देखे तो, इसमें कायाकल्प करने वाले युग और व्यक्ति को बदल देने वाले सारे के सारे गुण मौजूद है, भले ही बाहर से देखने पर ये छोटी छोटी प्रतीत होती हो, इसमें से ब्रह्मवर्चस आश्रम का निर्माण है, जो वाह्य दृष्टि से एक मंदिर जैसी चीज है जिसे बिल्कुल एक सामान्य सा निर्माण कहा जा सकता है, पर भीतर की दृष्टि से यह बहुत बड़ा अनुभूति सी बात है। यह एक प्रतीक की उलट पलट करने वाली कोई बहुत बड़ी चीज आने वाली है। मनुष्यों को दिशा देने वाली कोई नयी चीज उत्पन्न होने वाली है, इसका यह प्रतीक है।

प्रतीक किसे कहते हैं ? प्रतीक बेटे उसे कहते हैं जिसे कि सम्राट जार्ज पंचम जब इंग्लैण्ड की गद्दी पर बैठे तब हमको बचपन की यह कहानी याद है कि उनके हाथ में एक चाँदी की छड़ी या डण्डा रहता था। लोगों ने जब उनसे पूछा कि यह डण्डा किस काम आता है तो उन्होंने कहा कि यह राज सत्ता का प्रतीक है । हम सम्पूर्ण राज्य मण्डल के बादशाह है। उसका यह प्रतीक है रोल। रोल के बिना वे गद्दी पर नहीं बैठ सकते थे । इसी तरह हिन्दुस्तान की राज सत्ता जब ट्राँसफर हुई तब अंग्रेज सरकार अपना शासन हिन्दुस्तान की सरकार को देकर गयी थी तो क्या चीज देकर गयी थी-फाइलें नहीं ?

तब लार्ड माउण्डबेटन ने राज गोपालचार्य को गवर्नर बनाया था और उनके हाथ में एक रोल थमा दिया था। यह रोल या डण्डा क्या है ? यह हिन्दुस्तान के शासन की बागडोर का प्रतीक है। यह सिमबल हमें सौंप दिया गया और किलों पर से यूनियन जैक उतार दिया गया एवं यहाँ तिरंगा झण्डा फहरा दिया गया। झण्डा भी एक प्रतीक तिरंगा हो या जैक । यूनियन जैक पर तिरछी नीली व लाल लकीरें बनी हुई थी और तिरंगा हिन्दुस्तान के शासन का प्रतीक है जिसमें तीन पट्टियाँ लगा दी गयी है। इसमें एक पट्टी शौर्य और साहस का प्रतीक हैं, दूसरी सादगी और तीसरी श्रम की, समृद्धि का प्रतीक है। तीनों प्रतीकों से तिरंगा झण्डा बना दिया गया है। प्रतीक सबमें माने जाते हैं और जब तक दुनिया है,तब तक प्रतीक पूजा भी कायम रहेगी। मुसलमान प्रतीक पूजा को नहीं मानते हैं, लेकिन संगे अवसद जो काबा शरीफ में एक काले रंग का पत्थर रखा हुआ है, प्रत्येक मुसलमान जब भी हज यात्रा के लिए जाता है तो उसे उस काले पत्थर का चुम्बन लेना पड़ता है जिस पर मोहम्मद साहब बैठा करते थे। जो उनको बोसा नहीं लेता है उस व्यक्ति की जियारत कबूल नहीं मानी जाती है! यह क्या है ?प्रतीक है ?

आइये अब हम आप प्रतीक की उस गहराई में प्रवेश करे जिसके लिए उक्त तीनों प्रतीक बनाये गये हैं। जीवन के अंतिम दिनों में भगवान ने, महाकाल ने, त्रिपदा गायत्री की तीन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ प्रतीक रूप में हमारे कंधों पर डाल दी है और हमने आपको बुलाया है कि इस सेतुबंध को बाँधने में हम और आप मिलकर काम करें, गोवर्धन पहाड़ को मिलकर उठायें। इसी के लिए आपको इस उद्घाटन सत्र में बुलाया गया है। बेटे यह उद्घाटन नहीं वरन् एक प्रकार की प्रकार की प्रतीक पूजा है। इस प्रतीक पूजा के पीछे जो उद्देश्य काम करते हैं और जिनके लिए हम व्याकुल है और सारा श्रम सारी अक्ल और सारे मनोयोग के आधार पर उनको पूरा करने में लगे हुए हैं, उसमें हम आपको भी दावत देते हैं, कि इनके पीछे जो विचारणायें काम करती है, आइये उनको पूरा करने में मदद कीजिए।

ब्रह्मवर्चस क्या चीज है ? बेटे ब्रह्मवर्चस की फैक्टरी है, एक कारखाना है, एक भट्टी है। इस भट्टी का क्या होगा ? गलाई और ढलाई । भट्टियां कई तरह की होती है। कहीं काँच की भट्टी है तो कही लोहे की भट्टी है, तो कही अमुक भट्टी है लेकिन हमने जो भट्टी बनाई है उसमें गलाई और ढलाई का काम हम करेंगे। एक तो ताकत और दूसरी बिजली के आधार पर नये युग का ढांचा खड़ा होगा। प्रत्येक मशीन या प्रत्येक क्रिया किसी न किसी ताकत से चलती है। कोई भी तंत्र किसी न किसी ताकत से घुमाया जाता है।ताकत न हो तो वह चलेगा ही नहीं। जिस ताकत के द्वारा नये युग के निर्माण का तंत्र चलने वाला है ‘क्रेन जिसके आधार पर उठाई जाने वाली है, ट्रिलिंग मशीन जिसके द्वारा मशीन में सुराख किया जाना है, वह आत्मिक ताकत है। आत्मिक ताकत के बिना हम नया युग नहीं ला सकेंगे। नया युग लाने के लिए हम ऐसी बात नहीं करते जिसके लिए हमें ऐसे की जरूरत हो । हम आत्मबल की जरूरत समझते हैं आत्मबल यदि हमारे पास होगा तो हम मनुष्यों की चेतना को बदल सकेंगे।

परिवर्तन में क्या बदलना है ? क्या खानें- पीने के तरीके बदलने है ? नहीं बेटे यही दाल रोटी सब खायेंगे चाहे नया युग आ गया हो या नहीं आया हो। तो फिर क्या बदलेंगे ? हम लोगों की विचारणायें बदल देंगे, आस्थायें बदल देंगे, दृष्टिकोण बदल देंगे, और आदमी को इंसान बना देंगे। ईमान को बदलने के लिए किस ताकत की जरूरत पड़ेगी । हमको रूहानी ताकत की जरूरत पड़ेगी, क्यों कि बदलना हमको चिंतन है - खाना -कपड़ा नहीं। आदमी का चिंतन बदलने के लिए लकड़ी की, पैसे की जरूरत नहीं है। जरूरत है रूहानी बल की -आत्मबल की जिससे विचारों को बदलना है। विचारों को कोई और दूसरी चीज नहीं बदल सकती। पैसा विचारों को नहीं बदल सकता। दुनिया की कोई भी चीज विचारों को नहीं बदल सकती। विचारों को बदलने के लिए जिस आत्मबल की जरूरत है। उसे हम पैदा करेंगे।

युगशक्ति केवल आत्मबल की शक्ति होगी । आत्मबल की शक्ति आप कैसे पैदा करेंगे ? इसके लिए हमें महाब्रह्मवर्चस की छोटी फैक्टरी लगाई है इसमें हम यह कोशिश करेंगे कि आत्मबल समस्त मनुष्यों का निर्माण करें।

गुरुजी ! आप कैसे मनुष्यों का निर्माण करेंगे ? उन्हें क्या सिखायेंगे ?क्या आप उन्हें इंजीनियरिंग सिखायेंगे ? नहीं इंजीनियरिंग नहीं सिखायेंगे। हम दो तरह के आदमी बनायेंगे एक का नाम होगा मनस्वी और दूसरे का नाम होगा तपस्वी। तो क्या आप मनस्वी और तपस्वी इसी जगह बनायेंगे और कही अन्यत्र भी ?नहीं बेटे ! यह तो हमारी नर्सरी है। इस नर्सरी में हम छोटे छोटे पौधे उगायेंगे और फिर उनको सारे संसार में भेज देंगे। यहाँ हम एक नमूने के मॉडल के अीज तैयार करेंगे और फिर सारे विश्व का ध्यान आकर्षित करने के लिए हर आदमी को विस्मार देने के लिए उन्हें भेज देंगे। नये युग के लिए इस मॉडल को हमने देवता कहा है। देवता की शर्त क्या होती है ?देवता के दो हिस्से है - एक मनस्वी और दूसरा तपस्वी। मनस्वी पूर्वार्द्ध है और तपस्वी उत्तरार्द्ध। मनस्वी मैट्रिक, स्कूल, हाईस्कूल है और तपस्वी कॉलेज कोर्स है।तपस्वी स्तर के मनुष्य जिसको हम देवत्व सम्पन्न कहते हैं, अगले दिनों तैयार करने पड़ेंगे। उन्हें तैयार करने के लिए हम शिक्षण करेंगे। क्या क्या शिक्षण करेंगे इस ब्रह्मवर्चस में जिसका उद्घाटन कराया है आपसे ? बेटे इसके लिए हमारे बड़े बड़े ख्वाब है यद्यपि कम्पनी जरा सी, कारखाना जरा सा, इमारत जरा सी, लेकिन हम जो काम करने वाले है वह इस इमारत भर के लायक नहीं, हिन्दुस्तान के लायक नहीं, इमारत के लायक नहीं, हिन्दुओं के लायक नहीं वरन् सारे विश्व के लिए हैं।सब जगह हमारे बैठने के लिए हैं। बैठने के लिए - खड़े होने के लिए कही न कही तो जगह चाहिए। यह हमारे खड़े होने की जगह है लेकिन हमें जो काम करना है उसे थोड़े से दायरे में नहीं करना है, वरन् सारे संसार में करना है।व्यापक रूप से विस्तृत रूप से करना है।

क्या काम करना है ? एक तो हमको मनस्वी तैयार करने है और दूसरे तपस्वी तैयार करने है। मनस्वी कैसे होते हैं जो मन के गुलाम नहीं होते वरन् मन के स्वामी होते हैं । मन के स्वामी का नाम है मनस्वी। पर आज तो सारा मानव समाज ही मन का गुलाम है। मन के गुलाम का मतलब है लोभ का गुलाम और मोह का गुलाम। सिद्धांतों से उन्हें कोई मतलब नहीं। सिद्धाँत उनके लिए केवल कहने और सुनने के लिए हैं। सिद्धाँत उनके जीवन से बहुत दूर है। वे नर वानरों, नर पशुओं और नर कीटकों की तरह से जिन्दा रहते हैं। सिद्धाँत उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। उनके लिए लोभ मायने रखता है लोभ माया मायने रखता है। इस पीढ़ी को हम बदल देना चाहते हैं और नयी पीढ़ी लाना चाहते हैं इस लिए हम गलाई और ढलाई करेंगे। गलाई और ढलाई क्या होती है ? बेटे गलाई वह है जिसमें छापेखाने पर टाइप जब घिस जाते हैं तो उनको गलाने और सड़ाने के लिए फैक्टरी भेज देते हैं। जैसे ही उसे भट्टियों में गला, उसे ढालकर टाइप बना देते हैं। इसी प्रकार टूटे पुराने बर्तनों को भट्टियों में गलने भेज दिया जाता है जहाँ उन्हें दुबारा ढालकर नया बर्तन बना दिया जाता है। हम भी नया युग लाने के लिए मनस्वी बनाना चाहते हैं।

मनस्वी कैसा होता है ?मनस्वी ऐसा होता है जो मन का मालिक हो और अपने इशारे से मन को चलाता हो और कहता हो कि भाई साहब हम आपके गुलाम नहीं है। हम को यह मन और शरीर सहित ग्यारह इंद्रियां काम करने को मिली है इन्द्रियों को हमारा इशारा मानना पड़ेगा आप का इशारा क्या होगा और आप क्या करेंगे ? हम भगवान के यहाँ से आते हैं। भगवान ने हमारे जिम्मे सिद्धाँत दिये हैं, आदर्श दिये हैं, उन आदर्शों और सिद्धाँतों के चलने पर हम मन को हुक्म देंगे और आपको हमारा आदेश मानना ही पड़ेगा। इस तरीके से जो आदमी अपने जीवन की बागडोर अपने हाथ में सँभाल लेते हैं उनका नाम होता है मनस्वी। अब हम मनस्वी बनेंगे। मनस्वी से क्या हो जायेगा ? बेटे, मनस्वी से ऐसा हो जायेगा जो हम इंसान के भीतर ख्वाब देखते है कि देवता का उदय होना चाहिए तो उसके भीतर देवत्व का उदय हो जायेगा। अपने मन का जो मालिक है वही देवता होता है। देवता कैसे होते हैं ? देवता ऐसा होता है कि उसके सामने उसकी महत्वाकाँक्षाएँ, इच्छाएँ, उसकी कामनायें, भावनायें, उमंगे जो उठती है, वे यह उठती है कि हमारा जीवन आदर्शों के लिए, सिद्धाँतों के लिए हैं । जहाँ से हम उसके लिए चलते हैं।

साथियों, भगवान ने मनुष्य को जो बहुमूल्य जीवन दिया है वह मौज उड़ाने के लिए मजा उड़ाने के लिए नहीं दिया है। यदि इतने भर के लिए भगवान ने मनुष्य को जन्म दिया होता तो, फिर भगवान को जितनी गालियाँ दी जा सके कम है। फिर भगवान को पक्षपाती कहा जाता, अन्यायी कहा जाता। चौरासी लाख योनियों में से जो चीजें किसी को नहीं मिली, लेकिन इंसान को मिली, तो वह निश्चय ही मौज उड़ाने के लिए या स्वार्थ करने के लिए, अय्याशी करने के लिए नहीं मिली है वरन् एक अमानत के रूप में आपको मिली है। जिस दिन आदमी को यह ख्याल आ जायेगा वह जो अमानत मिली है। इसका इस्तेमाल आपको ईमानदार आदमी के तरीके से करना चाहिए बेईमान या बदमाश आदमी के तरीके से नहीं, तो समझना चाहिए कि वह मनस्वी हो गया। बेईमान कौन होता है ? बेईमान उस मुनीम या खजांची का नाम है जिसके हाथ बहुत सारा पैसा दिया गया कि वह इसे सरकारी कामों में खर्च करेगा, ,लेकिन उसने इसे सरकारी कामों में खर्च ने करके अपने कामों में खर्च कर डाला। वह आदमी क्या हो सकता है आप समझ सकते हैं। वह आदमी एक क्रिमिनल है। जो अपनी अक्ल को दौलत को अपने प्रभाव को, विशेषताओं को अपनी, अय्याशी में, अपने लोभ और मोह में खर्च कर डालता है। ऐसा व्यक्ति कानून की दृष्टि में क्रिमिनल होता है। सरकारी कानून में इसके आधार पर मुकदमें चलते हैं वे जो चोरों और चालाकों और चोरों के लिए बना दिये गये है। हम सरकारी कानूनों की बाबत नहीं कहते कि ये बाते जुर्म है कि नहीं।, लेकिन बेटे, आध्यात्मिक दृष्टि से जो बाते जुर्म है उनकी बाबत हम आपका ध्यान आकर्षित करते हैं। आदमी की अक्ल भगवान की धरोहर है, आदमी की क्षमताएँ भगवान की धरोहर है और वे केवल इसी काम के लिए मिली है कि उस भगवान की सुन्दर दुनिया को खूबसूरत बनाने के लिए, संस्कार वान बनाने में खर्च करनी चाहिए। यह उसकी जिम्मेदारी है जो भगवान ने उसके जिम्मे सौंपी है। अगर आपका यह ख्याल हो कि मरने के बाद आपसे सवाल जवाब पूछा जायेगा कि आपने कोई भजन पूजन किया था नहीं तो, बेटे, भगवान के यहाँ ऐसा कोई एकाउण्ट नहीं है। भगवान के यहाँ तो केवल एक ही सवाल जवाब होता है आपने इन्सानी जिन्दगी किन किन कामों में खर्च की जवाब दीजिए। हमने आपको दुनिया सुन्दर समुन्नत बनाने के लिए ऊँचा उठाने के लिए, आदर्श वादी बनाने के लिए अपने सहायक असिस्टेण्ट के रूप में भेजा था। आपने ये काम किये कि नहीं। आपको हमने इतनी सुन्दर अक्ल दिमाग, इतने सुन्दर हाथ पाँव दिये थे कि जो धरती पर और किसी को नहीं मिले। आपको हमने पेट भरने और तन ढकने लायक इतनी चीजें दे दी थी कि घण्टे आध घण्टे की मेहनत से आप अपना गुजारा कर सकते थे और बाकी समय की क्षमता हमारे काम के खर्च में लगाइए। पर आपने ऐसा नहीं किया कर भी क्या सकते थे, जो कुछ भी हमारा मन है, यह ऐसा बेईमान बदमाश, दुष्ट, अन्यायी, अत्याचारी नौकर और साथी है जो बेकाबू है। मिला तो यह हमको इस लिए था कि इसकी मदद से हमको अपनी जिन्दगी की नाव पार लगानी है, पर हमने इसे ऐसे घसीट घसीट कर मारा है जैसे कई लड़के अपने बाप को जब वह बूढ़ा हो जाता है तो पैसा छीनने के लिए मारते पीटते और पैसा छीन लेते हैं। कोई कोई होता है ऐसा बदमाश।

गुरुजी । कौन कौन सा ऐसा बदमाश है उसका मन बताइये ? बेटे, उस बदमाश का नाम है -आपका मन, जिसने आपको अपने ईमान को, आपकी जीवात्मा को मारा पीटा है,लाते लगाई और गालियाँ दी है और जितना भी पीड़ित कर सकता था, उत्पीड़न दे सकता था, जितना भी गिरा सकता था वह सब गिरा दिया। यदि वह हमारा और आपका मन काबू में होता तो आज हमारी हैसियत कुछ दूसरी ही होती। अगर आपका मन काबू में होता तो आप में से अधिकाँश व्यक्ति विवेकानन्द होते, कबीर होते, रैदास होते, पर यह नहीं मानता कसाई हत्यारा- हमारे ऊपर दिन रात हाथी रहता है और भगवान के बारे में न जाने क्या ऊल - जलूल पट्टी पढ़ाता रहता है हमको। भगवान का भजन करने से मतलब केवल एक ही है कि हम अपने मन की सफाई करें और यह याद रखें कि भगवान के यहाँ से हम किस काम के लिए आये है और किस काम के लिए जाना पड़ेगा। लेकिन यह चालाक और बेईमान मन न जाने क्या पट्टी पढ़ा देता है। ये यों कह देता है कि भगवान को धूपबत्ती और चावल दीजिए, फूल माला सुधा दीजिए, भगवान को हनुमान चालीसा सुना दीजिए और भगवान को उल्लू बना दीजिए फिर चाहे भगवान से जो काम करा लीजिए। हमारा मन बड़ा चालाक बड़ा बेईमान, बड़ा दुष्ट और जालिम है जो हमको न जाने क्या क्या पढ़ाता और कराता रहता है ?

मित्रों, हम मनस्वियों की नयी पीढ़ी बनाने के इच्छुक है । ऐसे मनस्वी, ऐसे हिम्मत वाले अपने मन के स्वामी आदमी अगले दिनों ढालने के लिए हम सब बहुत इच्छुक है, जो सिद्धाँत के लिए आदर्शों के लिए जिये। सिद्धाँत और आदर्शों के लिए जीने वाले का स्वरूप क्या होना चाहिए ? बेटे एक स्वरूप बता सकता हूँ कि एक बात जिस आदमी के भीतर हो समझना चाहिए कि वह आदमी मनस्वी और भगवान के कार्य कर सकता है । ऐसे ही व्यक्ति की आध्यात्मिक शक्तियाँ बढ़ेगी और वह दुनिया के लिए महत्वपूर्ण कार्य करेगा और जीवन की नाव को खेकर पार लगा देगा, पर एक बात आ जाये तब ? बताइये उस मनस्वी की क्या पहचान है ? मनस्वी की पहचान एक है कि वह अपनी महत्वाकाँक्षाओं की धुरी बदल दें ? अभी तो 24 घण्टे यही राक्षस हमारे ऊपर हावी बना रहता है। कि हमारी महत्वाकाँक्षायें, हमारा अहंकार रावण के बराबर होना चाहिए, हमारी अमीरी हिरण्यकश्यप के बराबर होनी चाहिए, और हमारी ताकत भस्मासुर के बराबर होनी चाहिए। अगर हम इसे बदले सके तो मनस्वी बन सके तो हमारे चिंतन की दिशा अलग बदल जायेगी । फिर मैं समझ लूँगा कि अब आप कल्याण की दिशा में चल पड़े और आपके पास बहुत सारी चीज आ गयी । क्या क्या चीज बदल जाये ?बस एक ही चीज बदल जाये वह यह कि महत्वाकाँक्षाओं का प्वाइंट बदल जाय तब।

इन दिनों मनुष्य को भौतिक इच्छायें खायें जा रही है। उसने आपके शरीर को खा लिया है, आपकी अक्ल को खा लिया, आपके प्रभाव को खा लिया, आपकी प्रतिभा को खा लिया। तो क्या भौतिक महत्वाकाँक्षायें खराब है ? नहीं बेटे, ये खराब उस सीमा तक नहीं है जिसमें कि आदमी को शरीर गुजारने के लिए जितना धन चाहिए आवश्यक है अक्ल, समय, श्रम आवश्यक है, बस उतनी उसमें लाये और बची हुई चीजें भगवान के लिए लगाये।मनस्वी आदमी वे है जो अपने जीवन का निर्धारण और जीवन की दिशा धारा को सही कर सकते हैं । उनको मैं मनस्वी कहता हूँ जो अपने मन और अक्ल को सलाह देते हैं, परामर्श देते हैं कि आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। मनस्वी को पहचान कर ही उसके जीवन में ‘ सदा’ “सादा जीवन उच्च विचार “ के ऊँचे विचार आते हैं। ऊँचे विचार लाने के लिए सादा जीवन आवश्यक है । आध्यात्मिक महत्वाकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए साँसारिक महत्वाकाँक्षाओं को गिराया जाना आवश्यक है। साँसारिक महत्वाकाँक्षाओं को आप नहीं गिरायेंगे तो आपको दो शिकायतें हमेशा बनी रहेंगी कि अच्छी बातों में भजन- पूजन में हमारा मन नहीं लगता। फिर आप कहेंगे कि गुरु जी कोई विधा बता दीजिए जिससे मन लगने लगे। बेटे मन लगाने की विधा यह है कि जिन महत्वाकाँक्षाओं में तेरा मन लगा हुआ है, वहाँ से उस प्वाइंट से हटाकर दूसरे प्वाइंट पर लगा, फिर देखना कि तेरा मन लगता है या नहीं। एक जगह से मन हटाकर दूसरी जगह लगा, सफलता का यही रहस्य है।

अध्यात्म क्या है ? अध्यात्म कोई जादू नहीं, भजन, प्राणायाम जैसी कोई क्रिया नहीं है वरन् जीवन जीने की शैली और सोचने का तरीका है और जीवन यापन करने की पद्धति हैं पर आप तो इसे जादूगरी समझते हैं कि हाथ को यहाँ धर देंगे, नाक में से हवा निकाल देंगे, वे मुद्रा कर लेंगे, हाथ की हेरा फेरी करेंगे, चावल रोटी को यहाँ धरेंगे इसको यों जोड़ देंगे। हाथों की बाजीगरी और जीभ की नोक से रंग बिरंगे अक्षरों को कह करके हम भगवान को काबू में रखेंगे। बेटे यह अध्यात्म नहीं हो सकता । यह सिद्धाँत गलत है। सही बात है कि हमारे जीवन का स्वरूप, जीवनयापन का तरीका, स्तर और सोचने का तरीका अगर बदल जाता है तो फिर आपको भगवान की तलाश नहीं करनी पड़ती । भगवान हमको तलाश करता । हमारा जीवन इस बात का साक्षी है। हमने भगवान को नहीं तलाश किया, भगवान ने हमको तलाश किया। भौंरे को बुलाने के लिए फूल नहीं गया, भौंरा फूल के पास आया । तितलियों की खुशामद करने के लिए उसे बुलाने के लिए इश्तहार देने के लिए फूल नहीं गया था, तितलियाँ फूल के पास आई थी।

साथियों, मैं यह कह रहा हूँ कि मनस्वी व्यक्ति अपने जीवन के उस स्तर को बनाते हैं, जिसमें हम ख्वाब देखते हैं, कल्पना करते हैं, जिनका हम प्रयास करते हैं। नये युग में जिन देवताओं की जरूरत पड़ेगी, उन देवताओं की शुरुआत करने के लिए हमने ब्रह्मवर्चस की स्थापना की है जिसका की अभी उद्घाटन कराया है। उसके आधार पर हम विचार करते हैं कि नये युग में कौन सा आदमी होगा ?मनुष्य से देवता उदय होने में सिर्फ एक बात होगी कि आदमी की महत्वाकाँक्षाएँ बदल जायेगी । आदमी की खुशी कहाँ टिकी हुई है ?पैसे को पूरा करने के लाए हम हनुमान जी का इस्तेमाल करते हैं, संतोषी माता, साँई बाबा का इस्तेमाल करते हैं। जो भी आदमी आ जाता है उसका इस्तेमाल करते हैं। हम किसी से माँगते नहीं हर किसी को बहकाते हैं कि बहकावे में आकर वह मेरा उल्लू सीधा कर जाय। यह बात मैं भलीभाँति जानता हूँ कि मेरे मन में क्या है। घर में चाहता हूँ कि जिस अध्यात्म से मनस्वी पैदा होते हैं, जिसको हम देवता कहते हैं, आप वह करें। मनुष्य में से देवता उदय हों। मनुष्य में से जब देवता पैदा होगा तो अपने आप में दिव्य होगा और जो कोई भी उसके समीप आवेगा वह भी उसी तरह का बनता चला जायेगा।

नये युग में मनुष्य को बनाने के लिए हम मनस्वी पैदा करेंगे । मनस्वी पैदा करने का मतलब है कि वह मनुष्य अपने मन से कहेगा कि जिस देश में हम पैदा हुए हैं उसके औसत नागरिक के स्तर के जीवनयापन का मापदण्ड बनाना चाहिए। भारत का औसत नागरिक क्या खाता है वह खाइये। वह जिस स्तर पर जीवनयापन करता है आप भी उसी स्तर पर कीजिए। औसत नागरिक की आवश्यकताएँ क्या है ? आप तय कीजिए और अपना मानदण्ड बनाइये।मनस्वी व्यक्ति ऐसे ही होते हैं और ऐसे ही होने चाहिए। ईश्वरचन्द्र विद्या सागर का मैं मनस्वी में नाम लेता हूँ। वे 500 रुपये महीने कमाते थे लेकिन 50 रुपये में अपना जीवन और कुटुम्ब चलाते थे। शेष बचे 450 रुपये विद्यार्थियों और मुसीबत ग्रस्तों के लिए सुरक्षित रखते और उससे उनकी मदद करते थे। मनस्वी उसे नहीं कहते जो प्राणायाम करता है।और 11 माला जप करता है।मनस्वी वह होता है जो बहादुरी और ईमानदार तरीके से अपने जीवन के संबंध में अपने जीवन पद्धति के संबंध में महत्वपूर्ण फैसले कर लेता है। अगर आप यह फैसला कर ले तो आपके जीवन में कायाकल्प हो जायेगा। कैसे हो जायेगा ? अभी तो 24 घण्टे तो आपकी अक्ल एक ही बात के सपने देखती रहती है कि लोभ-मोह की पूर्ति कैसे हो ? सारी की सारी अक्ल, आकांक्षाएं उसी काम में लगी रहती है। क्या आप इसे खाली नहीं कर सकते ? अक्ल को खाली कीजिए। अक्ल को यदि खाली करेंगे तो आप मनस्वी कहलायेंगे। गुजारे से सब्र कीजिए, संतोष कीजिए, तब आपका बचा हुआ मन जो 24 घण्टे महत्वाकाँक्षाओं और लिप्साओं में और लालसाओं की पूर्ति में लगा रहता है, बदल जायेगा और फिर बदले हुए मन के सामने वे सिद्धाँत काम आयेंगे जिसको मैं अध्यात्म कहता हूँ, ईमान कहता हूँ, धर्म कहता हूँ। धर्म के लिए, ईमान के लिए, भगवान के लिए फिर आपकी अक्ल काम करेंगी, श्रम काम करेगा, आपकी क्षमता कुशलता काम करेगी।

इससे क्या हो जायेगा ? इससे आप महामानव हो जायेंगे, ऋषि हो जायेंगे। ऋषि उस व्यक्ति का नाम है जिसे नयी वस्तु ग्रहण करने की जरूरत नहीं है। उसके लिए न नया धन चाहिए न बल चाहिए। जो चीजें पास है वे इतनी ज्यादा है कि आप उनका इस्तेमाल करना सीखिए। अभी तो आप उनका गलत कामों में इस्तेमाल करते हैं, पर जिस दिन आप सही इस्तेमाल कर लगेंगे, पायेंगे कि आप के भीतर कितनी शाँति, कितना संतोष, कितनी क्षमता, कितनी प्रतिभा विकसित होती है। जिस दिन आपके भीतर यह क्षमता यह प्रतिभा विकसित होगी, उस दिन मैं वादा करता हूँ कि देवता आपकी सहायता करने के लिए आयेंगे। देवता आपकी आरती उतारने के लिए आयेंगे। रामायण में मैंने पढ़ा है कि श्रेष्ठ दिशा में जीवन यापन करने वालों पर देवता फूल बरसाने आये थे। रामचन्द्र जी का जन्म हुआ तो, देवता विमान से फूल बरसाने लगे।जब रामचन्द्र जी ने धनुष तोड़ा तो स्वर्गलोक से देवता फूल बरसाने लगे। इस बात पर मैं विचार करता रहा कि देवता क्या कोई माली है, या इनके पास फूलों की दुकान है जो फूल बरसाने का ही काम करते हैं पीछे मैंने सोचा कि फूल बरसाने से क्या मतलब है ?फूल बरसाने से मतलब होता है कि दैवीय शक्तियाँ, श्रेष्ठ मनुष्य एवं आदर्श मनुष्य की सहायता करती है। किनकी सहायता करती है ? उन व्यक्तियों करी जिसने अपने जीवन की धुरी बदल दी थी, चिंतन का स्वरूप बदल दिया आकाँक्षाओं को बदल दिया। जो व्यक्ति अपनी प्रियता को, चिंतन और दिशाधारा को बदल देता है, वही देवता हो सकता है।

हमने मनुष्य में देवत्व के उदय का सपना देखा था। आइये उस पर विचार करे कि हम अपने सपने को साकार कैसे कर सकते हैं ? इस संदर्भ में हमने ब्रह्मवर्चस के माध्यम से एक फिलॉसफी बनायी है क्रिया पद्धति बनायी है। ब्रह्मवर्चस क्या होगा ?इसमें प्रातःकाल ढाई बजे की साधना है। जिसे पंचकोशी साधना या कुंडलिनी कहते हैं। इसमें योगाभ्यास भी कराये और दोपहर को ब्रह्मज्ञान का प्रशिक्षण जिसे हम आत्मज्ञान कहते हैं। यह भी ढाई घण्टे प्रशिक्षण है। इसमें ब्रह्मविद्या के ईश्वर, जीवन प्रकृति से लेकर विज्ञान के बारे में ऋषियों ने जो कहा है उनकी बाते बतायेंगे। शाम को लोकमंगल के लिए लोक शिक्षण करेंगे कि आज की परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए ?उसकी गतिविधियाँ, स्वरूप या क्रिया शैली क्या हो ?ऋषि केवल भजन ही नहीं करते थे उसके साथ लोक मंगल की सेवा साधना भी करते थे। ब्रह्मवर्चस में भी सेवा, स्वाध्याय, साधना एवं तपश्चर्या वाले तीनों अंशों का समन्वित साधन चलेंगे।ऐसी तपश्चर्या कराना चाहते हैं। तपश्चर्या में सबसे पहले यह काम करना पड़ता है -महाभारत की लड़ाई लड़नी पड़ती है। अर्जुन को श्रीकृष्ण बार बार यही कहते थे कि “ततो युद्धाय युज्यस्व “ किंतु अर्जुन बार बार बहाने बनाता रहा और कहता रहा कि मैं नहीं लड़ूँगा। पीछे भगवान के बार बार समझाने पर उसने कहा-” करिष्ये वचनं तव” अर्थात् आपकी आज्ञा मानूँगा। तो उनने कहा तो उतर कुरुक्षेत्र में और लड़ाई कर । अर्जुन लड़ने लगा और विजय हुआ।

बेटे अध्यात्म क्षेत्र में भी लड़ना पड़ता है । किससे लेना पड़ता है ?अपने मन से। हमारा यह मन बड़ा कमीना है। इस लड़ाई में अगर हमारा विजय हो जाती है तो समझना चाहिए कि हमने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। कहा भी है- ‘ नमरा आपको जो खाक हो अवसीर बन जाता। अगर पारे को ए अवसीर गर मरा तो क्या मारा। न अंगों अशगवाहों शेर नर मरा तो क्या मारा। न मरा आपको जो खाक हो अवसीर बन जाता। अगर पारे को ए अवसीर गर मारा तो क्या मारा॥” तात्पर्य यह है कि अगर हम अपने आपको मार ले, अपने मन पर काबू कर ले, अपने मन को अपनी इच्छानुसार चला ले तो मजा आ जाये ।तो आप कौन हो जायेंगे, मनस्वी हो जायेंगे, संत हो जायेंगे और देवता का पुरुषार्थ पूरा कर लेंगे। अपने आप से लड़ाई लड़ने, अपने मन पर कन्ट्रोल कर इन्द्रियों पर काबू करने वालों और जन्म जन्मांतरों के हैवानी कुविचारों से पीछा छुड़ाने वालों को हम मनस्वी कहते हैं। मनस्वी हो अपने जीवन को बदल सकेंगे और समय को युग को बदल सकेंगे। यदि वे मनस्वी नहीं होगे तो वे न अपनी जिन्दगी को बदल सकेंगे और न दूसरों को बदल सकेंगे। इसी लिए मनस्वी पैदा करना हमारा काम है।

मनस्वी पैदा करने के लिए, ब्रह्मवर्चस संस्थान की स्थापना की गयी है। यहाँ पर हम लोगों को बुलायेंगे और बतायेंगे कि मनस्वी कैसा होना चाहिए ? मन से कैसे लड़ना चाहिए ?मन के विकृत होने पर जिन्दगी कैसे खराब हो जाती है और मन को काबू में लाने पर मन कैसे मुक्त हो जात है ? “ मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्ष्यये। “ यह मन ही है जो हमको बाँधता और हमको मुक्त कर देता है। यह मन ही है जो राक्षस बना देता है, देवता बना देता है। चाहे हम इसको विधाता कह लें या पिशाच कह लें वह एक ही है। इसे किस तरीके से निग्रहित कर सकते हैं, यह विधि यहाँ सिखायेंगे और यहाँ से सारे संसार में फैलायेंगे। इसलिए ब्रह्मवर्चस का पहला अध्याय, पहला उद्देश्य हमारा यह है कि मनुष्योँ को पहले मनस्वी बनाइये। मन से लड़ने वाला, मन को काबू करने वाला, मन को हीरा बना देने वाला बनाये।

आदमी का मन ही उसे आत्म हत्या के लिए प्रेरित करता है, नींद नहीं आने देता, शराबी, नशेबाज बनाता है।, डाकू बनाता है और यही ही पारस भी है, जो हमको ऋषि बना देता है और संत बना देता है, देवता बना देता है। इसलिए मन के साथ जद्दोजहद करना, मन को परिष्कृत करना यह एक कला है। फिलॉसफी है, एक साइंस है, एक विधि विज्ञान है, । इसको ब्रह्मवर्चस में सिखायेंगे। यह एक नमूना है, मंडल है, प्रयोगशाला है, फैक्टरी है, फार्महाउस व नर्सरी है । जहाँ प्रयोग करने के बाद विश्व भर में बतायेंगे कि मन को काबू करके मनस्वी कैसे बना जा सकता है ?हमारी यह प्रयोगशाला विश्व में अपने आप में एक अनोखी प्रयोगशाला है । यह आश्रम हमारी शुरुआत का एक केन्द्र है जहाँ हम शिक्षण करेंगे और नव युग की एक हवा पैदा करेंगे। मनस्वियों को ढालने की यह एक बहुत बड़ी फैक्टरी है जिसका प्रत्यक्ष परिणाम अगले ही दिनों आपके सामने आने वाला है।

( क्रमशः अगले अंक में )


विदाई की घड़ियाँ और गुरुदेव की व्यथा वेदना ?

विगत अंक में लिखे गये अनेक लेख जो पूर्व प्रकाशित लेख की पुनरावृत्ति था किंतु संक्षिप्त करके दिया गया था, को पढ़ने के बाद पाठकों ने इच्छा जाहिर की है कि इस क्रम को आगे भी जारी रखा जाय। भले संक्षिप्त ही सही, एक पृष्ठ के कलेवर में पर ये मार्मिक अंश प्रकाशित होते रहे ताकि पाठक उस युग ऋषि की अंतर्वेदना को समझ सके एवं तद्नुरूप बढ़ चढ़कर हमारी क्षमताएँ महाकाल के निमित्त नियोजित हो सके । पाठकों की इच्छा का भाव रखते हुए फरवरी 61 में तीन पन्नों से अपनी बात के कुछ अंश इस, पृष्ठ पर दिये जा रहे है। जितना हम पक्ष पर मनन चिंतन करेंगे, उतना ही गुरु सत्ता के मर्म को समझ पायेंगे। नीचे के पैराग्राफ में मार्मिक हृदय स्थल को स्पर्श करने वाले अंश इसी लेख में दिये जा रहे है।

विदाई के दिन समीप आते जा रहे है, हमारी भावनाओं में उतनी तेजी से उफान आता चला जा रहा है। बार बार जो हूक और इठन कलेजे में उठती है उसका कारण यदि कोई दुर्बलता हो सकती है तो एक ही हो सकती है, कि जिनको प्यार किया, उसको समीप पाने की अभिलाषा भी सदा बनी रही।

प्यार के धागों को इस तरह तोड़ना पड़ेगा, इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी। आने जाने की बहुत दिन से कही सुनी जा रही थी। उसकी जानकारी भी थी, पर यह पता न था कि प्रियजनों के बिछुड़ने की व्यथा कितना अधिक कचोटने वाली- ऐंठने मरोड़ने वाली होती है।

अपनों से छिपाया क्या जाय ? अब हम अपने अंतर के हर घुटन, व्यथा और अनुभूति को अपनों के आगे उगलेंगे तो हमारे अंतर का भाव हल्का हो जायेगा और परिजनों को भी वास्तविकता का पता चल जायेगा । आत्म कथा तो कैसे लिखी जा सकेगी यह अंतर्द्वंद्व घुमड़ते हैं, उन्हें तो बाहर लाया जा सकता है । इस सुनने से सुनने वालों को मानवी सत्ता के एक पहलू का समझने का अवसर मिलेगा।

किसी ने हमें विद्वान, किसी ने तपस्वी, किसी ने तत्वदर्शी, किसी ने याँत्रिक, किसी ने तपस्वी, किसी ने लोकसेवी, किसी ने प्रतिभा पुँज आदि कुछ भी समझा हो । हम अपनी आँखों और अपनी समझ में केवल मात्र एक अति सहृदय, अति भावुक और अतिशय स्नेही प्रकृति के एक नगण्य से मनुष्य मात्र रहे।

प्रेम के व्यापार में घाटा किसी को नहीं रहता, फिर भी हमें ही नुकसान क्यों उठाना पड़ता है ? नुकसान एक ही रहा कि यह सोचने में आया कि स्नेह का तन्तु जितना मधुर है, वियोग की घड़ियों में वह उतना ही तीखा बन जाता है।

स्नेह से दूरी बाधक होती है। आत्मीयता शरीर से नहीं आत्मा से होती है, आदि दर्शन तत्व हमने पढ़े तो बहुत है दूसरों को सुनाये भी है पर उसका प्रयोग सफलता पूर्वक कर सकना किसी भी ऊँची स्थिति पर पहुँचे व्यक्ति के लिए संभव है, यह कभी सोचा न था। लगता है अभी अपना आत्मिक प्रगति नगण्य है।

स्नेहियों से स्नेह और अनुग्रहियों से अनुग्रह का कितना ऋण भार लेकर विदा होना पड़ रहा है, यह सोच कर कभी कभी बहुत कष्ट होता है। अच्छा होता जन्म से ही एकान्त में चले गये होते।

सोचते तो बहुत रहे, स्वप्न तो बड़े बड़े देखते रहे, अमुक के लिए यह करेंगे, अमुक को यह देंगे। पर किया जा सका और दिया जा सका, वह इतना कम है कि आत्मग्लानि होती है और लज्जा से सिर नीचा हो जाता है।”

एक इच्छा अवश्य मन में थी कि असीम स्नेह बरसाने वाले स्वजनों के लिए प्रतिदान में जो कुछ अपने भीतर बाहर और कुछ शेष बच रहा है, उसे राई−रत्ती देकर जाते और सबके जिए की धूल सिर पर रखकर कहते- “ इस नगण्य प्राणी से अभी इतना बन पड़ा है। 84 लाख योनियों में यदि विचरण करना पड़े तो हर शरीर को लेकर आप लोगों की सेवा में उपलब्ध प्रेम और सहकार का कुछ न कुछ ऋण भार चुकाने के लिए अति श्रद्धा के साथ उपस्थित होते रहेंगे और जिस शरीर से जितनी सेवा सहायता बन पड़ेगी, उतनी कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त कर सकने की क्षमता रहेगी, उसका पूरा पूरा उपयोग आपके समक्ष करते रहेंगे।

“ हम अज्ञान ग्रस्त मोह बन्धन में बँधे प्राणी अपना दूरवर्ती हित नहीं समझते हैं और जिसमें हमारा हमारे परिवार, हमारे समाज धर्म एवं विश्व का कल्याण हो, उसी को करने जा रहें है।”

अपना मन कितना ही इधर उधर क्यों न होता हो यह निश्चित है की हमें ढाई वर्ष बाद निर्धारित तपश्चर्या के लिए जाना होगा। यों यह मृत्यु जैसी स्थिति है, पर संतोष इतना ही है कि वस्तुतः ऐसी बात होगी नहीं।

थ्वयोग की घड़ियों में भी संतोष केवल इस बात का है कि दूसरे लोग भले ही शरीर समेत हमसे मिल न सके पर जिन्हें अभीष्ट है, उनके साथ भावनात्मक संबंध यथावत बना रहेगा वरन् सच पूछा जाय तो और भी अधिक बन जायेगा। (आगे भी जारी )


रजत जयन्ती वर्ष में अनुयाज महाक्राँति का शंखनाद

ठण्डक के दिन । 20 दिसम्बर 1989 की दोपहरी में पूज्य परम गुरुदेव जी का जिस परिसर में आवास है, उसकी तीसरी मंजिल की छत पर धूप में बिठाकर शिष्यगणों को भविष्य के संबंध में निर्देश दिये जा रहे थे। अचानक पूज्यवर बोले- “ अब शाँतिकुँज का नाम क्राँतिकुँज होना चाहिए क्योंकि यह सारी धरती के परिवर्तन की धुरी बनने जा रहा है। भले ही तुम नाम न बदलो पर यह मानकर चलना कि यह महाकाल का घोंसला है। भगवान की प्रेरणा की 21वीं सदी के रूप में उज्ज्वल भविष्य सतयुग आये । उसका निश्चय है कि हम सब कि मदद से हजारों वर्षों के कलंक धोकर साफ कर दें। भगवान की इस इच्छा की सुसंस्कारिता सम्पन्न प्रज्ञा पुत्र पूरा करेंगे तथा सहायता के लिए महाकाल तैयार रहेगा। उसका घोंसला शाँतिकुँज में हैं पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर वह यही शाँतिकुँज में आकर बैठ जाता है।” यह सब महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि प्रायः यही चिंतन उनकी लेखनी में आगे भी प्रकट होता रहा एवं जून तब जब तक उनके हाथों लिखी” अपनों से अपनी बात “ परिजनों तक पहुँचती रही, वह अपनी भावी भूमिका, स्थूल शरीर के बन्धनों से मुक्त होकर सूक्ष्म रूप में शाँतिकुँज में ही विराट रूप में विराजे रहने की बात लिखते रहे।

वसंत पर्व पर महाकाल का संदेश ( 31 जनवरी 1990 ) तथा उसके बाद अप्रैल 1990 को ज्योति के विशेषाँक में लेखों तक सतत् यही बात लिखी जाती रही कि शाँतिकुँज की 21 वीं सदी की गंगोत्री के रूप में मान्यता दी जा रही है एवं सभी देवशक्तियां -ऋषि सत्ताएँ यही से हिमालय रूपी गोमुख से आने वाली ऊर्जा और आभा सारे विश्व में गतिशील बनायेंगी। उसी शाँतिकुँज का 1996 का रजत जयन्ती वर्ष है। 1971 के जून माह की बीस तारीख को परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीय माता गायत्री तपोभूमि मथुरा स्थायी रूप से छोड़कर शाँतिकुँज हरिद्वार आ गये थे । दोनों का पहला वसंत जो शाँतिकुँज हरिद्वार में सम्पन्न हुआ, वह 1972 का था, दोनों का इसलिए कि उन दिनों परम पूजनीय माता जी की विछोह वेदना से जन्य शारीरिक कष्ट चरम सीमा पर होने से पूज्यवर उन्हीं कुछ दिनों के लिए हिमालय साधना के मध्य से आ गये थे। बाद में वे गुरुसत्ता के आदेश पर ऋषियों की इस तपःस्थली में ऋषि परम्परा का बीज रोपण कर उसे पुष्पित पल्लवित करने का संकल्प लेकर जून 1972 में यही शाँतिकुँज अपने अंतिम चरण में आ गये थे एवं आगे की गतिविधियों का ताना बाना बुनना उनने आरम्भ कर दिया था। इस वसंत के बाद अब यह 25वाँ वसंत पूरा होने जा रहा है, अपनी रजत जयन्ती इस वर्ष मना रहा है, जिसमें प्रमुख लक्ष्य है देव परिवार का पुनर्गठन -आगामी छः वर्षों के लिए विराट व्यापक तैयारी एवं छावनी के रूप में इस केन्द्र भूमि को परिपक्व बनाना।


महाकाल के घोंसले का परिजनों को भावभरा संदेश

रजत जयन्ती जब आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में मनायी जाती है तो उसका स्वरूप ही दूसरा होता है। विशेष रूप से तब जब एक प्रचण्ड ऊर्जा केन्द्र के कार्यकर्त्ताओं को गढ़ने की, टकसाल की, महाकाल की कार्य स्थली की जयन्ती मनायी जा रही हो। स्वयं पूज्यवर ने अपने प्रवचनों में कहा है कि “शाँतिकुँज” धर्मशाला नहीं है। यह एक विश्व विद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारे सतयुगी सपनों का महल है। आप में से जिन्हें आदमी बनना हो, बनाना हो, इस विद्यालय में संजीवनी विद्या सीखने के लिए उसे आमंत्रण है, दावत है।”जिस स्थान को घनीभूत ऊर्जा का का केन्द्र बनाया हो उसे उनने अकारण ही “छावनी” अथवा कायाकल्प के लिए बनी अकादमी नाम नहीं दिया था। स्वयं जब वे बाद में शाँतिकुँज का विस्तार कर ब्रह्मवर्चस आरण्यक एवं गायत्री नगर की स्थापना कर रहे थे तब उनने मार्च 1978 की अखण्ड ज्योति में था-” उत्तराखण्ड की साधना के सर्वथा उपयुक्त संस्कारवान देव भूमि समझ लेने के उपरान्त ही इसे सृजन सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त समझा गया है और उसे एक छावनी के रूप में विकसित करने का निश्चय किया गया है। अन्यत्र स्थानों में व्यापक परिश्रम से भी जो सत्परिणाम उपलब्ध होने असंभव थे, वे यहाँ अल्प प्रयास में संभव होंगे क्योंकि यहाँ के वातावरण में चिरकाल के आच्छादित ऋषियों के विचारों के संकल्प का लाभ साधकों को मिलेगा। यह बात जग जाहिर है कि शाँतिकुँज आज यहाँ स्थित है उसके नीचे गंगा की सात धाराओं में से एक बहती थी पर अभी भी उसके चिन्ह थोड़ा खुदाई करके देखे जा सकते हैं। यही स्थान कभी ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि था, जहाँ उनने विश्वामित्र पद प्राप्त करने के बाद कठोर गायत्री साधना कर नूतन सृष्टि के निर्माण का कार्य सम्पन्न किया था। इन सब से उस शाँतिकुँज का महत्व जन जन को बताने का मन है, जिसकी रजत जयन्ती इस वर्ष के वसंत पर्व से 1997 के वसंत पर्व तक बड़े धूम धाम उल्लास व नये संकल्पों के साथ मनाने का एवं अधिकाधिक व्यक्तियों को इस गंगोत्री के साथ जोड़ने का संकल्प इस वर्ष लिया जा रहा है।

इस ऊर्जा केन्द्र की - टकसाल को किस भाव संवेदना के खाद पानी से विनिर्मित किया गया है।उसे परम पूज्य गुरुदेव के मार्च 1978 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में लिखी गयी इस पंक्तियों को पढ़कर समझा जा सकता है जिसमें उनने भावभरे हृदय से उन सबका आमंत्रण किया था जिन्हें वे अपने देव परिवार में सम्मिलित करना चाहते थे। उनने इसी अंक के पृष्ठ 62 पर लिखा था- “ जीवन के इस अंतिम अध्याय के मिशन के सूत्र संचालकों का मन है कि परिवार को जागृत आत्माओं के साथ रखने और रहने का अवसर मिल सके तो कितनी प्रसन्नता रहे। यह सान्निध्य मोहवश नहीं, वरन् उद्देश्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट है। साथ रहने और काम करने से प्राण ऊर्जा का आदान प्रदान होता है।” जिन्हें आगे बढ़ना हो वे समय की प्रतीक्षा न करे परिस्थितियों की आड़ न लें। आदर्शों को अपनाने का शुभ मुहूर्त आज ही होता है। ................ शाँतिकुँज का आवाहन और वातावरण उनके लिए भाव भरे हाथ और दुलार भरा आँचल पसारता जो नव युग की अवतरण बेला में जो अपनी गरिमा को जीवंत करने और प्रखरता का परिचय देने में समर्थ है। चरित्रवान भावनाशील और कर्मनिष्ठ परिजनों को वसंत पर्व पर अपने भीतर प्रखर आदर्शवादिता उगाने का युग आमंत्रण प्रस्तुत है। “ उनके द्वारा आवाहन के बाद ही देव परिवार बसने लगा एवं कार्यकर्त्ताओं जो विविध विशिष्टताओं से सम्पन्न थे, यह शाँतिकुँज वह रूप लेने लगा जिसको पुष्पित पल्लवित रूप में देखा जा सकता है।

क्या होगा अब इस रजत जयन्ती वर्ष में ? अनेकानेक प्रश्न इस वसंत की वेला में अनेकों के मन में उठ रहे होंगे। एक विराट भव्य प्रथम पूर्णाहुति आयोजन करने के बाद जब एक वर्ष का पुनर्गठन -अनुयाज वर्ष घोषित किया गया था, तब सभी को लगा कि यह क्या किस प्रकार के हतोत्साह का चिन्ह है जो एकदम बड़े कार्यक्रमों से मुँह मोड़ लिया गया। नहीं ! वस्तुतः यह बात नहीं है। जो भी ऊर्जा सत्ताईस बड़े अश्वमेधिक प्रयोगों से निस्तृत हुई यदि इसका नियोजन हीरक मण्डलों का गठन, सुनियोजित ग्रामीण विकास योजना से लेकर राष्ट्र एवं विश्वव्यापी आध्यात्मिक पुनर्जागरण में नहीं किया गया एवं इसके लिए कार्यकर्त्ताओं को एक सुनिश्चित क्रिया पद्धति देकर स्पष्ट पैकेज नहीं दिये गये, वह यह साधनारत दृष्टि से हर कार्यकर्त्ता को इतना सम्पन्न बना देना कि वे आने वाले 5 वर्षों में होने वाले अप्रत्याशित विश्वव्यापी परिवर्तनों के लिए स्वयं। को तैयार कर सके । इसके लिए महाकाल का घोंसला शाँतिकुँज जहाँ परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी की शक्ति घनीभूत रूप से विद्यमान है । साधनात्मक आधार सशक्त रहा तो प्रचारात्मक स्तर पर किये गये विगत पाँच वर्षों के सफल पुरुषार्थ को एक नयी गति मिलेगी एवं सुव्यवस्थित सुस्पष्ट आंकड़ों में सिमट जाने वाला यह युग निर्माण मिशन अपनी उन छह महाक्राँतियों को सम्पन्न कर सकेगा, जिनकी घोषणा आँवलखेड़ा कार्यक्रम में की गयी थी। आश्वमेधिक प्रयोगों ने सारे देश व विश्व में एक विलक्षण ऊर्जा भरा आभा मण्डल युक्त वातावरण विनिर्मित किया है। किंतु यह अपूर्ण है, यदि इस रजत जयन्ती वर्ष में अनुयाज का कार्य सक्रिय रूप से सम्पन्न न हुआ तो सही प्रामाणिक कार्यकर्त्ता एवं खोटे मात्र महत्वाकांक्षा प्रदर्शन की दृष्टि से जुड़े व्यक्तियों के परख हो कर छँटाई न हो पाई, प्रत्येक स्थान पर व्यक्ति व्यक्ति में मन मिलाकर एकता स्थापित न हो पाई एवं हमारी श्रद्धा समर्पण को एक रचनात्मक मोड़ न मिल पाया।

इतना समझ लेने पर मात्र संगठनात्मक एवं रचनात्मक पुरुषार्थ हेतु खाली रखे गये अनुयाज वर्ष के सभी निर्धारणों एवं आगामी 6 वर्षों की योजनाबद्ध क्रियापद्धति को समझा जा सकेगा। इस वर्ष जो किया जाना है, वह संक्षेप में यहाँ दिया जा रहा है। विस्तार से परिजन अगले अंक में पढ़ सकेंगे।

(अ ) रजत जयन्ती वर्ष में परम पूज्य गुरुदेव के जीवन के अंतिम अध्याय के रूप में सक्रिय कर्मभूमि शाँतिकुँज जिसे उनने 21 वीं सदी की गंगोत्री कहा था, से पूरे देश भर में जन जागरण का अभियान पूरी तीव्र गति से चलाया जायेगा। प्रायः दस लाख समय दानी कार्यकर्त्ताओं की शक्ति से सम्पन्न यह मिशन जिस सत्ता ने अपनी भावी संवेदना को खाद पानी देकर सींचा है, उसे सशक्त आधार देने के लिए मात्र कार्यकर्त्ताओं की दृष्टि से यह वर्ष भर आयोजित किया जायेगा। सभी से कहा जायेगा कि अपने अपने स्तर पर क्षेत्र में शाँतिकुँज का इतिहास उनकी रचनात्मक उपलब्धियों - सृजन की दिशा में उनके योगदानों को नये व्यक्तियों तक प्रचारित कर न्यूनतम दस व्यक्ति नये तो गंगोत्री के प्राण प्रवाह में जोड़े ही।

स्थान स्थान पर विगत 25 वर्षों की उपलब्धि व भावी योजनाओं पर भाव भरा आमंत्रण दिया जायेगा। इस संबंध में जन सामान्य के लिए गायत्री जयन्ती से गुरुपूर्णिमा तक शाँतिकुँज, जो कि अब एक विराट रूप ले चुका है, में इन्हीं वर्ग के अधिकारी, व्यापारी, शिक्षक, प्रवासी परिजन तथा नये व्यक्तियों के सुनियोजित शिविर सम्पन्न होते रहेंगे।

शाँतिकुँज की उपलब्धियाँ एवं भावी योजनाओं पर आकर्षक प्रदर्शनी बनाने का भी संकल्प है ताकि जन जन तक यह संदेश पहुँच सके।

(ब ) क्षेत्रीय स्तर पर परिजनों के मण्डलों में गठित करने हेतु विरल स्तर पर 5-6 जिलों के एवं सघन स्तर पर 1-2 जिलों के सम्मेलन गहन मंथन के बाद आयोजित होते रहेंगे। ये विशुद्ध उनके लिए होंगे जो कुछ विशेष समय युग देवता के निमित्त आगामी 6 वर्षों में निकालने हेतु कटिबद्ध होने जा रहे है। संधिकाल में इस वेला में खरे प्रमाणिक ही एक स्तर के कार्यकर्त्ताओं की तलाश हेतु उनसे चर्चा कर राष्ट्रव्यापी जागरण के निमित्त उनकी क्या भूमिका हो, इसी केन्द्र बिन्दु पर ये सम्मेलन होंगे। परम पूज्य गुरुदेव जी कहते रहे है कि हमारे संगठन के विकेन्द्रीय करण का प्रान्तों के विभाजन से कोई संबंध नहीं है। विभिन्न प्रांतों के समीपवर्ती जिले मिलकर कार्यकर्त्ता सम्मेलन आयोजन कर समय दान की सुनिश्चित प्रक्रिया का निर्धारण कर सकते हैं जिसकी परिधि वह क्षेत्र विशेष या उसका विस्तार हो सकता है। अभी पिछले दिनों ऐसे तीन प्रयोग क्षेत्रीय स्तर पर भीलवाड़ा, दक्षिण गुजरात के बलसाड़ तथा लखनऊ राजधानी परिसर के आस पास में आयोजित कार्यकर्त्ता सम्मेलन के रूप में हो चुके है।ये बड़े सफल रहें इनसे मिशन का संगठनात्मक आधार सशक्त बना है। इसी स्तर के कार्यक्रम पूरे देश के सभी परिजनों को कार्यकर्त्ताओं की सघनता के आधार पर बाँटते हुए शाँतिकुँज के समान्तर क्षेत्रीय सम्मेलन के रूप में होंगे। लक्ष्य एक ही होगा कि जवाबदार जिम्मेदार हीरे की चमक वाले कार्यकर्त्ता उसमें उभर कर आगे आये। व आगामी 6 वर्षों के लिए स्वयं को तैयार करें। इसके लिए प्रारम्भिक पर्यवेक्षण हेतु दो दो केन्द्रीय कार्य कर्त्ताओं के दल वसंत के तुरन्त बाद पूरे भारत में रवाना कर दिये गये है जो सर्वेक्षण करके केन्द्र को रिर्पोट देंगे व तदनुसार ही शिवरात्रि के बाद का आयोजन परक प्रारूप बनेगा।

(स ) आध्यात्मिक पुनर्जागरण के रूप में 6 महाक्राँतियों में से पहला कार्यक्रम इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि इस विषम वेला में, जब चारों ओर पीड़ा, पतन, और पराभव दृष्टिगोचर हो रहा है, नैतिक मूल्यों का हास तेजी से होता दीख पड़ रहा है, पारिवारिक मर्यादायें टूटती जा रही है, समाज संस्कार विहीन होता जा रहा है, इसके लिए अधिकाधिक व्यक्ति युग संधि महापुरश्चरण के इस द्वितीय चरण में भागीदार बने, इस संबंध में प्यास गतिशील होना चाहिए । क्योंकि अपनी परिधि सारा विश्व है, इस लिए सभी की भागीदारी जोड़ी जा सके उतना ही सूक्ष्म जगत का संशोधन होगा एवं उतना ही नव युग के अवतरण के योग्य वातावरण विनिर्मित होगा।

शब्द शक्ति से वातावरण संशोधन की बात चिरपुरातन है एवं इसी लक्ष्य को लेकर 2400 करोड़ के गायत्री जप रूपी युग संधि महापुरश्चरण रूपी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान पूज्यवर ने 12 वर्षों के लिए 1989 की वसंत में आरम्भ कराया था। जप इससे कही अधिक हुआ एवं उसी ऊर्जा को अनुप्राणित आँवल खेड़ा का प्रथम पूर्णाहुति समारोह सम्पन्न होता सबने देखा। अब लक्ष्य आगामी 6 वर्षों के लिए निर्धारित होना है । इसमें 24000 करोड़ गायत्री महा मंत्र भगवान्नाम का जप पूरे विश्व भर में होना सुनिश्चित करना है।यह कोई बड़ा लक्ष्य नहीं । यदि 15 -20 लाख व्यक्ति प्रतिदिन एक माला आत्मकल्याण के प्रति 6 वर्ष तक करें तो सभी बीच के अवकाश आदि के दिनों को निकालकर यह जप संभव है। जो गायत्री मंत्र जप नहीं कर सकते वे ॐ भूर्भुवः स्वः अथवा ॐ ॐ ॐ, अथवा राम राम राम अथवा नमः शिवाय अथवा संप्रदायगत निर्धारित मंत्र का जप प्रतिदिन 10 मिनट करे एवं समष्टिगत कल्याण की भावना मन में रखते हुए स्वाध्याय मनन के साथ इसका समापन करे। यदि यह क्रम नियमित चल गया तो 15 लाख नये व्यक्ति अन्यान्य सम्प्रदायों के या अल्पशिक्षित वर्ग के इस मिशन के साथ जुड़ेंगे ।

आध्यात्मिक पुनर्जागरण के इस क्रम में घर परिवार के सुसंस्कारों की स्थापना अखण्ड ज्योति के मिशन पत्रिकाओं को पढ़कर, गायत्री चालीसा पाठ, देवस्थापना करने वालो की संख्या में अभिवृद्धि, 24000 करोड़ गायत्री मंत्र लेखन या भगवान्नाम रूपी एक सुनियोजित कार्यक्रम पाठकगण आगामी माह की अखण्ड ज्योति एवं प्रज्ञा अभियान पाक्षिक युग निर्माण योजना मासिक में पढ़ सकेंगे। इस प्रक्रिया से देश का कोई भी कोना अछूता नहीं रहेगा और सूक्ष्म स्तर पर यह विराट धर्मानुष्ठान व सम्पन्न हो सकेगा जो भावी आयोजनों के आधारशिला रखेगा, नवयुग की पृष्ठभूमि बनायेगा।

6 महाक्रांतियां जो इस पुनर्गठन वर्ष में घोषित है- (1 ) आध्यात्मिक पुनर्जागरण (2) नारी शक्ति का जागरण (3 ) घर घर में वेद स्थापना(4 ) पर्यावरण संतुलन हेतु जनजाग्रति-हरीतिमा विस्तार शाकाहार, जीव दया आन्दोलन (5 ) चल ग्राम्य चिकित्सा सेवा एवं ग्रामीण पुनरुत्थान (6 ) लोक रंजन से लोक मंगल कला मंच के माध्यम से लोक मानस का परिष्कार अगले दिनों एक एक करके हाथ में ली जाती रहेगी व इनसे सारे देश व विश्व की एक एक व्यापक हलचल मचा दी जायेगी।

रजत जयन्ती वर्ष जो उल्लास के इस वासंती माहौल में आया है, हम सबके साधनात्मक पुनर्गठन व परिवार के पारस्परिक एकीकरण एवं शाँतिकुँज की चेतना के घर घर विस्तार के निमित्त नियोजन होना है। आइए, हम आप सभी इसे उत्साह, उमंग के साथ मनाये एवं महाकाल के श्रीचरणों में ऐसा कुछ अर्पित करने का संकल्प ले जिससे जो होने जा रहा है, वह भवितव्यता है, उसमें हमारा महत्वपूर्ण योगदान हो, हम श्रेयार्थी बन सके।