किसी भी व्यक्ति की आत्मिक प्रगति कितनी हुई, इसका निर्धारण उसके कथन-पठन -श्रवण -भजन के बहिरंग क्रिया प्रतिक्रिया के आधार पर नहीं किया जा सकता। इन उपचारों को कोई भी विद्याव्यासनों या कौतुकी भी करता रह सकता है। व्यक्तित्व की गरिमा का मूल्यांकन करने के लिए दो प्रकार की जांच करनी पड़ती है। एक है व्यक्तिगत ललक लिप्साओं में महत्वाकाँक्षाओं की कटौती। इसी को संयम साधना या तपश्चर्या कहते हैं। दूसरे है न्यूनतम में निर्विवाद के उपरान्त बची हुई श्रम, क्षमता, बुद्धि, सम्पदा और साधन सामग्री को सत्प्रवृत्ति, संवर्धन के लिए नियोजित करने की ललक लगन व निष्ठा भरी तत्परता। अंतःकरण के स्तर को उदात्त बनाने के लिए इससे कम में काम नहीं चल सकता। इतना बन पड़े तो फिर अन्य उपचारों की आवश्यकता शोभा -सज्जा जितनी भर रह जाती है।
अध्यात्म ऐ उच्चस्तरीय पुरुषार्थ हैं, मात्र उपचार नहीं जिसमें क्रिया कृत्यों के आधार पर समय क्षेप करने पर कर्मकाण्ड आदि करने पर, कुछ उपलब्धियां हस्तगत होती बताई जाती है। ये कर्मकाण्ड तो एक प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबाव है जिसके कारण दृष्टि कोण बदलते हैं, आदतें सुधारने के आधार पर चेतना को अधिकाधिक परिष्कृत बनाने का अवसर मिलता है। जो लोग पूजा पत्री की लकीर भर पीटते हैं, वे निराशा एवं मन में नास्तिकता ही संजोये रहते है। कुछ कहने योग्य हाथ नहीं लगता एवं व्यक्तित्व के परिमापन के रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है। कि वस्तुतः अध्यात्म इनके जीवन में उतरा नहीं।
यह समझा जाना चाहिए कि वास्तविक अध्यात्म जब आँतरिक सफलताओं का पथ प्रशस्त करता है तो साधक को सम्पन्न सुसंस्कृत बनाता है। संपत्ति परक वैभव का भार घटता है। और उच्चस्तरीय पराक्रम उभरता है। इतिहास साक्षी हैं कि आत्म चेतना के विकास ने किसी को संपन्न नहीं बनाया वरन् समृद्धि को आदर्शों के लिए समर्पित करने एवं स्वयँ हल्का फुलका रहने के लिए बाधित करता है। महामानवों ने सदा से गरीबी का स्वेच्छा से वरण किया है और संचित वैभव का उदारतापूर्वक उस प्रायोजन के निर्मित समर्पण किया है। वास्तविक अध्यात्म यही है जो महत्वाकाँक्षाओं लिप्साओं की कटौती करना सिखाता है, जिससे लोक मंगल की भगवत् उपासना करने के लिए अपना सब कुछ नियोजित हो सकें। यह मर्म समझ में आ जाने पर यथार्थता की संपदा पा लेने पर आत्मिक प्रगति के पथ पर चल पड़ने में किसी को संशय नहीं करना चाहिए।
नयी साल की सुबह अपने साथ जिन उपहारों को लेकर आती है, उनमें सबसे बेशकीमती उपहार डायरी है। इसे नववर्ष के सौभाग्य चिन्ह के रूप में अपनाते स्वीकारते तो सभी है, पर सार्थक उपयोग बिरले ही कर पाते हैं। सामान्य क्रम में यह या तो यूँ ही उपेक्षित पड़ती रहती है। अथवा सब्जी दूध के हिसाब लिखने के काम आती है। हो सकता है डायरी लेखन से अनभिज्ञ मन में सवाल उठे आखिर यह है क्या और इसका उपयोग किस लिए ? इसके जवाब में जे.बैट्समैन को अपनी रचना ’थाट्रस इट्रस जर्मिनेशन ग्रोथ एण्ड डेवलपमेंट’ में समूचा एक अध्याय डायरी के मूल एवं महत्व पर लिखा है। उन्होंने कतिपय उप महापुरुषों के नामों का उल्लेख भी किया है, जिन्होंने अपने विचारों को डायरी लेखन के द्वारा सँवारा सुधारा और विकसित किया है। इनमें जार्ज बर्नार्डशा, बर्ट्रेंड रेसल और आइन्स्टाइन मुख्य है। रेसल के अनुसार इनकी बचपन से दैनन्दिनी लिखने की नियमित आदत थी। वह अपनी अंत+प्रवृत्तियों एवं वाह्य घटनाचक्रों पर उनकी प्रतिक्रियाओं का बारीकी से विश्लेषण करते, बाद में उन्हें शब्दों में पिरोते। कालांतर उनकी इसी आदत ने उन्हें विश्व का महान विचारक और दार्शनिक बनाया।
हिन्दुस्तान में भी ऐसे अनेक महनीय व्यक्तित्व हुए जिनका डायरी लेखन आज विचार जगत की अमूल्य धरोहर बन गया। श्री राम कृष्ण परमहंस क शिष्य महेन्द्र नाथ गुप्त ‘ मास्टर महाशय’ इसी तरह दैनन्दिनी लेखन करते थे। वह परम हंस देव की चर्चाओं को नियमित लिपिबद्ध करते थे जिन्हें बाद में श्री रामकृष्ण वचनामृत के रूप में प्रकाशित किया गया। इसके प्रकाशन के अवसर पर स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- मास्टर महाशय के वचनामृत के रूप में विश्व मानवता को ऐसी धरोहर सौंपी हैं, जिन्हें युगोँ तक याद किया जायेगा। उनके इस कार्य ने डायरी लेखन के मूल्य को अक्षुण्य बना दिया।
महात्मा गाँधी के शिष्य एवं सचिव महादेव भाई की डायरी जो अब अनेक खण्डों में प्रकाशित हैं, गाँधी के जीवन के मार्मिक क्षणों एवं तत्कालीन घटनाक्रमों का तथ्यात्मक मूल्याँकन है। गाँधी जी के इस कार्य के मुक्त प्रशंसक थे। बिनोवा भावे जो गाँधी के सहयोगी होने के साथ एक मौलिक विचारक भी थे, उन्होंने इस कार्य को चार चरणों में वर्गीकृत किया। उनके अनुसार ये चार चरण है आत्मनिरीक्षण, आत्म समीक्षा, आत्म सुधार एवं आत्म जागरण।
डायरी लेखन में नियमित रूप से इन चारों का समावेश होना चाहिए। प्रातःकाल से लेकर रात्रि सोने के समय तक स्वयँ का प्रवृत्तियों, भावनाओं, विचारों के उतार चढ़ाव, बाहरी घटना क्रमों पर स्वयँ होने वाली प्रतिभाओं का लेखा- जोखा आत्मनिरीक्षण है। इनके उचित अनुचित होने की विवेचना आत्मसमीक्षा है। उचित का उन्मूलन, उचित का संवर्धन आत्म सुधार है। और इसके प्रयास के फलस्वरूप स्वयँ की आत्म चेतना का जागरण अनिवार्य है। यही चौथा एवं अंतिम चरण है। इन चारों की गति स्थिति एवं विकास का ब्योरा नियमित लिपिबद्ध किया जाना चाहिए।
यह प्रक्रिया जहाँ समय एवं शक्ति का बेहतर उपयोग करने में सहायक सिद्ध होती है, वही हमारे विचारों एवं भावनाओं को असाधारण रूप से विकसित करने में सहायक सिद्ध होती है। प्रख्यात लेखक वालटेया ने, तो यहाँ तक लिखा हैं कि जिसे मौलिक लेखक, विचारक बनाना हो, उनको नियमित रूप से डायरी लेखन करना चाहिए। इससे न केवल विचारो का विकास होता है, बल्कि भाषा भी उत्तरोत्तर परिमार्जित एवं संतुलित होती जाती है। आइन्स्टाइन तो डायरी को अपना सबसे विश्वस्त मित्र एवं एकान्त क्षणों का सहयोगी मानते थे। उनके अनुसार हम अपनी वे बातें, वे भावनायें जिन्हें हम किसी से बत नहीं सकते, वे नितान्त गोपनीय है, अपनी डायरी में मुक्त मन से कह सकते हैं। इससे अधिक विश्वसनीय भला कौन होगा? मानव मन के विशेषज्ञ जेम्स डिलेट फ्रीमैन का कहना है कि यदि मन की गाँठों को खोला न जाये, तो परिणाम गंभीर मनोरोगों व शरीर रोगों के रूप में उभरता है। लेकिन इन गाँठों को खोले भी किसके सामने? इस सवाल के जवाब में उनका कहना हैं कि हमें अपनी सारी बातें अपनी डायरी से कह देना चाहिए। ऐसा करके हम स्वच्छ चिंतन एवं स्वस्थ जीवन का मार्ग अपनाते हैं।
साहित्य जगत की विभूतियाँ स्टीफेन ज्विंग जिनकी रचनाओं का अनुवाद दुनिया, करीब
तेईस भाषाओं में हो चुका है, नियमित दैनन्दिनी लेखनी के अभ्यासी थे उनके अनुसार डायरी हमारे विचारों के विकास का इतिहास है। जिस तरह हम शिशु का नियमित अंतराल में फोटो खींचें जाय एवं इस क्रम को वृद्धावस्था तक जारी रखा जाय तो उपलब्ध छाया चित्रों के सहारे शरीर के विकास क्रम को चेहरे के भावों को आसानी से समझा जा सकता है। उसी तरह से नियमित रूप से किया गया डायरी लेखन भी हमारे मानसिक, भावात्मक विकास के सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्वों को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।
इतनी मूल्यवान विधा से न जाने क्यों हमने स्वयँ को उपेक्षित कर रखा है। आइये इसे आज से अभी से इसी वर्ष से शुरू करें और नियमित रूप से जारी रखें। इससे होने वाले परिणाम हमें आश्चर्य चकित किये बिना न रहेंगे। सन् 1996 की प्रभात वेला में यह उपहार आप स्वयँ स्वीकारें और औरों को भी दें।
कोई आदमी यदि कमरे में भीतर हो ओर खिड़की दरवाजे सभी बन्द हो तो वह बाहरी दृश्यावलियों से एक प्रकार से वंचित रह जाता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि कुछ समय के लिए बाहरी दुनिया से वह अलग पड़ जायेगा और उसका सारा संसार कमरे तक ही सिमट कर रह जायेगा किन्तु जो कोठरी के वातायन खुले रखते हैं, वह चाहे जब भी बाहरी दृश्य के रसपान का आनन्द ले सकते हैं, यह पूर्णतः उनकी अपनी मर्जी पर निर्भर है।
यह पृथ्वी भी एक विशाल कमरे की तरह है। उसमें रहते हुए हम उसके चित्र विचित्र दृश्यों का अवलोकन करते रहते हैं। उसकी पर्वत शृंखलायें मनोहारी आनन्द की अनुभूति कराती है तो सरोवर और सागर अपनी उद्याम ऊर्मियों से तन मन को सराबोर कर देते हैं। कही वन्य प्रान्तों की छटा तो कही धान्यों की शस्य श्यामल भूमि, कही उजाड़ प्रदेश तो कही राजस्थानी इलाके का विस्तृत वीरान क्षेत्र। यह सभी अपने अपने ढंग से मानवी मन को लुभाते रहते हैं, पर जिन क्षेत्रों ने मनुष्यों को सर्वाधिक आकर्षित किया हैं, वक अजीबोगरीब अनुभूतियों से भरे पड़े है। सामान्य स्थानों एवं सामान्य घटनाओं की तरह उनकी सामान्य चर्चा नहीं हो सकती। वे असाधारण कोटि में गिने जाने योग्य भू भाग है पृथ्वी रूपी विशाल भवन के ‘कपाट’ उन्हें कहा जा सकता है। ‘कपाट’ इसलिए क्योंकि उन उन जगहों पर पहुँचकर व्यक्ति ऐसा आलौकिक अनुभव करने लगता है, मानों वह किसी अन्य लोक में आ गया हों।
उदाहरण के लिए उस घटना का उल्लेख किया जा सकता है जो 5 अगस्त 1980 को लैरी कुश्चे नामक ऐ अंग्रेज युवक के साथ घटित हुई।
कुश्चे डैसीबरी इंग्लैण्ड स्थिति अपने खेत में काम कर रहा था। चार घण्टे लगातार श्रम से वह कुछ थक सा गया। आंखें बन्द कर ली और थकान को मिटाने के लिए शरीर को शिथिल की लिया। दस मिनट तक वह उसी अवस्था में बैठा रहा। शिथिलीकरण से उसे राहत महसूस हुई तो उसने पुनः कार्य प्रारम्भ करने की नीयत से उसने आँखें खोली, पर यह क्या ? वहाँ एक दृश्य बदला हुआ था। वहाँ न कोई खेत, नकोई ट्रैक्टर। किसी मुहल्ले के निकट स्वयँ को बैठा हुआ पाया। वह हैरान तो इस बात से था कि दस मिनट तक तो वह अपने खेत पर बैठा रहा, फिर बैठे बैठे इस रिहाइशी और अज्ञात इलाके में कैसे पहुँच गया ? जो बात उसे सबसे अधिक आश्चर्य चकित कर रही थी, वह भी वहाँ के निवासियों का विचित्र व्यवहार। वे सभी तो आपस में बातें करते तो प्रतीत होते थे, पर कुश्चे को उनकी बात चीत बिल्कुल सुनाई नहीं पड़ रही थी। होठ हिलते तो दृश्यमान हो रहे थे, पर वाणी मानो अनिर्वचनीय बनी हुई थी। वह उनसे बोलना, बात चीत करना चाह रहा था, किन्तु उन्हें उसकी तनिक भी चिंता नहीं थी। लोग बगल से गुजर जाते थे किन्तु फिर भी उसकी तीव्र आवाज उनको कर्णगोचर नहीं हो रही थी, जैसे वे सब के सब बहरे हों। वह अवाक् था, तभी अचानक उसकी दृष्टि उनके लिवाज पर पड़ी। कुश्चे सोचने लगा कि वर्तमान इंग्लैंड में तो इस प्रकार के पोशाक प्रचलित है नहीं तो वह किसी दूसरी सभ्यता और संस्कृति के लोगों के मध्य आ पहुँचा है ? कदाचित ऐसा ही हो। शायद उसके प्रश्नों का उत्तर अभी तक किसी ने नहीं दिया। संभव हैं, वह उसकी समझ के परे हो, पर उसकी वार्तालाप क्यों नहीं सुनाई पड़ती ? कुश्चे की बुद्धि इस संबंध में तनिक भी काम नहीं कर रही थी। आँखों का धोखा तो नहीं ? अंतर्मन ने प्रश्न किया और उसने उनकी परीक्षा करनी चाही। आँखों को अनेक बार मला मुलमुलाया, पर दृश्य यथावत् था। वह परेशान हो उठा और उठकर चलने लगा। तभी चार डग ही आगे बढ़ा था कि सब कुछ आँखों से ओझल हो गया, जैसे स्वप्न देख रहा हो। वह हड़बड़ाया और रुका, क्योंकि सामने ट्रैक्टर था,। उससे टकराते टकराते बचा। चारों ओर नजर दौड़ाई तो स्वयँ अपने ही खेत में पाया। वह हतप्रभ होकर कुछ क्षण विचार करता रहा और पुनः अपने काम में जुट पड़ा, पर इस समय भी उसका मन ऊहापोह से बिल्कुल मुक्त नहीं था। शाम को घर आकर इस घटना की चर्चा उसने अपने पड़ोसियों से की तो सभी ने उसको सनकी समझने पर समीप के एक इतिहासवेत्ता को जो इसकी सूचना मिली तो विस्तृत वार्ता के लिए उस कृषक के पास पहुँचा। बातों बातों में किसान ने दृश्य में देखे गये लोगों की वेशभूषा का उल्लेया किया तो प्रोफेसर के नेत्र चमके। उसने समझ लिया कि दृष्टि भ्रम नहीं, वरन् विगत ‘गमन’ की घटना है। बाद में उसे इतिहास विद् ने बताया कि उक्त प्रकार के पहनावे आज से दो सौ वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में आम थे।
विशेषज्ञ बताते हैं कि इंग्लैण्ड के उत्तरी चेशायर का ‘हेल्सबाई’ नामक पहाड़ी क्षेत्र ऐसी घटना के लिए प्रख्यात है। उनके अनुसार यह पर्वतीय इलाका एक ऐसे भूखण्ड से घिरा है, जिसे रहस्यवादियों की दृष्टि में पृथ्वी का ‘झरोखा” अथवा सूक्ष्म जगत का ‘ द्वार’ कहना अत्युक्ति होगा। चमत्कृतियों से भरे इस भू भाग का सही सही अवस्थान वैरिंग्टन और रनकाँर्न नामक जगहों के दक्षिण में डैरेसबरी एवं प्रिस्टन ब्रूक के मध्य है। जानकारी के अनुसार यह खण्ड देखने में एकदम सामान्य और शान्त प्रतीत होता है, किन्तु सर्दियों में अपने चित्र विचित्र घटना प्रसंगों के कारण उल्लेखनीय बना हुआ है।
समीपवर्ती लोगों का कहना है कि इस प्रदेश में आकर विगत काल खण्डों में प्रवेश कर जाना कोई अनहोनी बात नहीं। ऐसी प्रतीतियाँ तो यदा कदा होती ही रहती हैं, पर यहाँ से संबंधित सर्वमान्य घटना ‘भटकाव’ की है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई आलौकिक शक्ति मनुष्य की सामान्य गतिविधियों से खिलवाड़ कर रही हैं और उसे पल भर में कहाँ से कहाँ पहुँचा देती है। ऐसे अनेकानेक प्रकरणों से यह द्रष्टव्य है।
एक रात मैरगोट ग्रे नामक एक मोटर साइकिल सवार उत्तर की ओर डैरसबरी की दिशा में बढ़ा चला आ रहा था। अकस्मात उसने अपने सिर के ऊपर एक मंण्डलाकर प्रकाश को मँडराते देखा और एक तीक्ष्ण मोड़ पर आकर गाड़ी रोक दी। स्थान कुछ अजीब सा प्रतीत हुआ तो उसने पूछताछ की। विदित हुआ कि कई मील दूर चेस्टर के निकट हैं, जबकि वह चला डैरेसबरी के लिए था, फिर वह भिन्न दिशा में चेस्टर के निकट कैसे पहुँच गया ? उसकी समझ से परे था।
एक अन्य प्रसंग में डा. सुसान ब्लैकमोर नामक एक मूर्धन्य अंग्रेज मनोविज्ञानी एक शाम अपनी कार से डैरसबरी मार्ग से होकर गुजर रहें थे। अभी उनने डैरसबरी पार ही किया था कि मार्ग भटकाव सा प्रतीत हुआ। , कार रोकी तो ज्ञात हुआ कि वह डैरसबरी से 34 मील उत्तर लंकाशायर में प्रिस्टन के पास है। वह निमिष मात्र से इतनी दूर कैसे पहुँच गये, इसका समाधान उनकी मनोवैज्ञानिक बुद्धि भी नहीं सुझा सकी।
ऐसे ही घटनाक्रम प्रिस्टन ब्रूक में भी देखे जाते रहें है। अभी पिछले ही दिनों वहाँ कुछ भीमकाय दैत्य के दृष्टिगोचर होने की चर्चा जोरों पर थी। उनके अतिरिक्त अंतर्ग्रही यात्रियों द्वारा दो उपकरणों का उल्लेख भी होता रहा है। रात्रिकाल में अनूठी तीक्ष्ण आवाजें सुनी जाती रही है।
ठसके अलावा तिमिराच्छन्न आकाश में विलक्षण प्रकाश दिखाई पड़ना, उड़न तश्तरियां मंडराना, खड़ी फसलों के मध्य सुन्दर वृत्ताकार आकृतियाँ बन जाना यह सब वहाँ की सामान्य घटनाएँ हैं, जो आये दिन घटती रहती है। डैरेसबरी और प्रिस्टन से संबंधित इन सभी विचित्रताओं का जिक्र पाटर हाँग एवं जेनी रैण्डल्स ने अपनी चर्चित कृत्रिम ‘मिस्ट्रिल ऑफ दि मर्सी वैली ‘ में विस्तार पूर्वक किया है।
जेनीरैण्डल्स ने ‘ दि पेनाइन यू. एफ. ओ. मिस्ट्रा’ नामक अपने एक ग्रंथ में ‘ पैनाइन पहाड़ी ‘ नामक ऐसे ही रहस्यमय क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण वृत्तांत का वर्णन किया है।
प्रसंग जनवरी 1978 का है। एक दिन चार मछुआरे वीवर नदी में मछली पकड़ रहे थे, तभी उनकी दृष्टि समीप के एक घण्टीनुमा आकृति पर पड़ी। संरचना न तो बहुत बड़ी थी और न ही बहुत छोटी ही। उस मध्यम आकार प्रकार वाली विचित्र आकृति को इससे पूर्व वहाँ उनने कभी नहीं देखा था, अतः वह क्या हैं ? इसे जानने के लिए उत्सुकतावश ध्यानपूर्वक देखने लगे। थोड़ी ही देर में उसके भीतर से कई प्राणी बाहर आते दिखाई पड़े। वे सामने पड़े एक निश्चेष्ट जन्तु को एक बड़े पिंजड़े में रखने का प्रयास कर रहे थे। कार्य सफल होने के उपरान्त सभी उसी घ्ण्टीनुमा आकृति में प्रवेश कर देखते देखते अदृश्य हो गये।
जिस स्थान पर यह प्रसंग है, वह भूभाग स्थानीय जनता में ‘ शैतान का बगीचा ‘ के नाम से प्रसिद्ध है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार के विचित्र अनुभूतियों और दृश्यावलियों क्षेत्र केवल स्थल भाग पर ही सीमित नहीं, वरन् जलीय प्रदेशों में भी कई ऐसे केन्द्र है, जिनके आस पास के जलीय क्षेत्र अथवा ऊपर के आकाशीय क्षेत्र में पहुँचकर व्यक्ति स्वयँ को एक दूसरी ही दुनिया में मौजूद अनुभव करने लगता है। यहाँ न तो आकाश दृष्टिगोचर होता है, न धरती, न जल। सब कुछ विलक्षण प्रतीत होता है और यान भटकाव जैसी स्थिति आ जाती है।
एक ऐसा ही अनोखा अनुभव ‘नासा ‘ के वायुयान इंजीनियर मार्टिन कैडिन को तब हुआ, जब वे फलोरिडा से यूरोप की हवाई यात्रा कर रहें थे। अपना संस्मरण लिखते हुए वे कहते हैं कि अचानक यान का कण्ट्रोल रूम से संपर्क टूट गया। यद्यपि उसमें अभी अभी ही करोड़ों की लागत से निर्मित एक अति संवेदनशील, उच्चस्तरीय एवं परिष्कृत सूचना संपर्क यंत्र स्थापित किया गया था। सभी सवार स्वयँ को एक ऐसे आकाशीय प्रवेश में पा रहें थे, जहाँ न स्वाभाविक नभमण्डल था, न क्षितिज। घंटों तक उनका हवाई जहाज एक भूरे से गगन में भटकाव की स्थिति में मँडरा रहा था। फिर अचानक यान स्वच्छ नीले आकाश में निकल पड़ा। इसी के साथ रेडियो संपर्क पुनः स्थापित हो गया। इस प्रकार की अद्भुतताओं का अध्ययन करने वाले शोधकर्मियों का कहना है कि ऐसे विलक्षण वृत, जल, थल, नभ तीनों ही क्षेत्रों में हो सकते हैं। और उन तीनों ही वातावरण में मनुष्य एक जैसी प्रतीति प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी अनुभूतियाँ उन स्थानों पर क्यों होती हैं ? इस संबंध में विज्ञानवेत्ताओं का कहना हैं कि वहाँ कुछ विशिष्ट कारणों से विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा संघनित होती है। जब कोई भी व्यक्ति उस ऊर्जा क्षेत्र से होकर गुजरता है तो वह सामान्य चेतना के ऊपर की एक विशेष भूमि में पहुँच जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ असाधारण घटित होती है। अनुसंधान कर्ताओं ने इस अवस्था का नाम ‘ओ जेड ‘ फैक्टर रखा है। ब्रिटिश वैज्ञानिक पॉल डेवेरोक्स ने अपने सहयोगी डेविड क्लार्क, एण्डी रावर्टस एवं विश्व विख्यात भूगर्भशास्त्री डॉ0 पाल मैककर्टनी के साथ मिलकर एक पुस्तक लिखी है। -’ अर्थलाइट रिवलेशन ‘ उक्त पुस्तक में विद्वान लेखकों ने ‘ ओ दृजेड दृकारक ‘ की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की है और लिखा है कि जिन जिन भूभागों में पृथ्वी की आँतरिक सक्रियता बढ़ी चढ़ी रहती है उन्हीं भूखण्डों में अधिकाधिक आलौकिकताएँ घटती देखी गयी है।
निश्चय ही स्थानों की सक्रियता निष्क्रियता की अनुभूतियों से गहरा संबंध है। अध्यात्म विज्ञान की भी ऐसी ही मान्यता है कि जो भूमि संस्कारवान और परिष्कृत चेतना संपन्न होगी, वहाँ की अनुभूतियाँ भी उच्चस्तरीय होती है। इसके विपरीत कुसंस्कारी स्थलों में दुश्चिंतनों और दुरितों का बाहुल्य देखा गया है। इतना ही नहीं उन उन स्थानों पर सक्रियता इतनी प्रबल होती हैं कि प्रत्यक्ष आचरण भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी निष्क्रिय और निश्चेत जमीन भी होती है जो आदमी पर किसी प्रकार का कोई प्रभाव छोड़ देने में असमर्थ होती है। विज्ञानियों के अनुसार ये वे स्थान हैं, जहाँ पर विशिष्ट स्तर की ऊर्जा का जमाव नहीं होता। अतएव सामान्य रूप से मानवी चेतना पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
इस प्रकार अध्यात्मविद्या के आचार्यों ने भूमि की प्रकृति के आधार के हिसाब से उनकी दो श्रेणियाँ निर्धारित की है। प्रथम में वे स्थान आते हैं, जहाँ सामान्य चेतना अनायास अथवा अल्प प्रयास से ही उच्च भूमिका में प्रतिष्ठित हो जाती है। हिमालय, देवालय, तपस्थलियाँ आदि ऐसे ही केन्द्र हैं जहाँ चेतना को ऊर्ध्वगामी बनने में सहायता मिलती है। यह केवल कहने सुनने भर की बात नहीं, वरन् इसकी सच्चाई उन केन्द्रों पर जाकर देखी परखी जा सकती है। कहा जाता है कि स्वाधीनता संग्राम के दिनों श्री अरविंद अलीपुर जेल की जिस काल कोठरी में बंद थे, वहाँ श्रीकृष्ण के निर्देश पर वे योगाभ्यास करने लगे और स्वल्पकाल में ही ध्यान के उच्च सोपान पर प्रतिष्ठित हो गये। वहाँ से उनके छूटने के बाद उस ‘सेल’ ( कोठरी ) में एक अन्य खूंखार कैदी को रखा गया, तो उसकी चेतना उस पूर्व के दिव्यता के प्रभाव से स्वयमेव ऊर्ध्वगामी बनने लगती। चूँकि वह इन अध्यात्मिक क्रियाओं से बिल्कुल अनभिज्ञ था, अतः भयभीत हो उठा और उसने प्रेत पिशाच का कोई उपद्रव मानकर अधिकारियों से किसी अन्य कमरे में स्थानान्तरित करने का आग्रह करने लगा। बाद में उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी। इसका उल्लेख स्वयँ श्री अरविंद ने अपनी एक पुस्तक ‘कारावास’ की कहानी में किया है।
अलकनन्दा का वर्तमान उद्गम जहाँ हैं, बताया जाता है कि वही क्षेत्र प्राचीन जमाने में अलकापुरी के नाम से प्रसिद्ध था। कुबेर की राजधानी यही थी। पुराणों में अलकापुरी की विशिष्टता का जो महात्म्य बतलाया गया हैं, वह इन दिनों भी यथावत देखा जा सकता है। उसकी पहचान की महिमा का बखान करते हुए पुराणकारों ने लिखा है कि यदि कोई व्यक्ति भूमिष्ठ होकर उसकी मिट्टी को जोर जोर से सूँघे, तो तत्काल ही व्यक्ति समाधि के गहरे स्तर में प्रवेश कर जाता है। कुछ वर्ष पूर्व एक संदेशवादी को इस पर शंका हुई, तो उसने इसकी परीक्षा करनी चाही। ऐसा करते ही वह गहरी सुषुप्ति की स्थिति में पहुँच गया और लगभग सात घंटे पश्चात ही पुनः सामान्य स्थिति में लौट सका।
दूसरे वर्ग में उन जगहों को सम्मिलित किया गया हैं, जहाँ कुकर्मों, कुकृत्यों के अतिरेक है। ऐसे केंद्र अधोगामी चेतना से प्रभावित रहते हैं और आगंतुकों को भी वैसा ही व्यवहार करने के लिए प्रेरित करते हैं। मरघट ऐसा ही स्थल है। उसके अपने प्रकार की एक विशिष्ट ऊर्जा होती है। अघोरी इसी ऊर्जा का उपयोग कर विभिन्न प्रकार के अभिचार, कृत्या, घात, मूँठ जैसी ताँत्रिक क्रियाओं को संपन्न करते हैं। चूँकि यहाँ की चेतना निम्न स्तरीय है, अस्तु इसमें दूसरों को सताने, डराने, धमकाने और मारने जैसे प्रायोजन सरलता से सिद्ध होते हैं।
इस प्रकार हर स्थल की अपनी प्रकृति के अनुरूप भली बुरी निजी शक्ति होती हैं। इसे अध्यात्म और विज्ञान दोनों रूप से स्वीकारते हैं। बुरी शक्ति का प्रयोग बुरे कामों में भी किया जा सकता है और उससे कुछ सीमा तक लोगों की भलाई भी की जा सकती है। जहर का प्रयोग किसी की जान लेने में भी होता है और उसी से साँपों के विष को निष्प्रभावी भी बनाया जा सकता है। आग भोजन भी पकाती हैं, पर उसकी चिंगारी अग्निकाण्ड रचकर सर्वनाश पल में प्रस्तुत कर देती है। यह तो व्यक्ति की निजी समझ पर निर्भर हैं कि वह उसका कैसा उपयोग करें। अध्यात्म ने इस संबंध में अपनी प्रमाणिकता सिद्ध कर दी। उसमें शक्ति के सृजनात्मक प्रयोग को ही स्वीकारा और अपनाया गया है। अब विज्ञान की बारी है कि धरती पर बिखरे विभिन्न ऊर्जा केंद्रों का सदुपयोग कैसे करें ? यदि वह ऐसा कर सका और मानवी चेतना को समुन्नत बनाने में इनकी मदद ले सका तो ही वास्तविक अर्थों में इन्हें दूसरे विश्व का ‘प्रवेश द्वार ‘ कहा जा सकेगा और समय समय पर तभी हम अपनी इच्छा और अभिरुचि के अनुसार इनसे किन्हीं अन्य लोक की दर्शन झाँकी कर सकें
अब क्या होगा ? इस सवाल ने किसी एक दो को नहीं, समूची अबीसीनियाँ को चौका दिया। विगत दो दिनों से लड़ाई बन्द थी। सभी सैनिक अपने अपने तंबुओं में मीठी नींद में सो रहें थे। अचानक उन्हें पता चला कि इटली कि सेना बढ़ती चली आ रही है। नगर के बाहर पहुँचकर मुकाबला करने का समय नहीं रह गया था और नगर के भीतर मुकाबला करने का मतलब था अपने ही देश की तबाही बरबादी। देखते ही देखते सारा नगर किसी विधवा की माँग की तरह सूना ओर वीरान हो गया।
लेकिन उसे भयभीत होकर भागना कायरता लगी। घर के सदस्यों, हितैषियों, पड़ोसियों ने पन्द्रह वर्ष की इस लड़की को बहुत समझाया, लेकिन उसे अपने साथ भाग चलने के लिए राजी न कर सके। अपने देश का झण्डा, अपने मकान पर लगाकर झण्डे की बल्ली के सहारे खड़ी हो गयी। थोड़ी ही देर में इटली की सेना नगर में प्रवेश कर गयी। पूरा नगर सैनिकों के बूटों की धमक एवं उनके नारों की गूँज से भर गया। अचानक सभी का ध्यान बरबस उस ओर जा पहुँचा, जिस पर अबीसीनियाँ का झण्डा अपनी पूरी शान से लहरा रहा था। सब के सब उसी ओर बढ़ते चले गये, जहाँ वह अपने विचारों में खोई चुपचाप खड़ी थी।
“तुम कौन हों ?” कप्तान के स्वर की मृदुता थी।
“ अबीसीनियाँ की एक नागरिक। “
“ नगर के सारे लोग कहाँ जा छिपे हैं बेटी “ कप्तान के स्वर में उसे फुसलाने का पुट था।
“ यह बात बताने की नहीं हैं कप्तान। “ पन्द्रह साल की इस छोटी सी लड़की की दृढ़ता ने उसे हैरत में डाल दिया। उसकी आँखों में क्रूरता चमक उठी। उसने डपटकर पूछा- “ यह तुम्हें बताना होगा शैतान लड़की।
कप्तान की इस सख्त और भेड़िया जैसी गुर्राहट ने दी जाने वाली शारीरिक यातनाओं की ओर संकेत कर दिया था, पर उसके होठों पर एक मासूम सी मुस्कुराहट फैल गयी, जो कप्तान के लिए एक चुनौती थी।
क्रोध से विफरा हुआ कप्तान कांप रहा था। उसकी आँखों में अंगारे धधक रहें थे, मुट्ठियाँ कस गयी थी। उसका भारी बूट बेरहमी से उसके घुटने पर जा पड़ा और वह हल्की सी कराह के साथ चुप हो गयी।
टब कप्तान के आग बबूला होने की बारी थी। अपने दोनों बूटों से उसके नन्हें नन्हें पैरों को लहूलुहान कर दिया लेकिन वह अपनी जगह पर शान्त और स्थिर होकर रह गयी थी।
अपनी हार पर कप्तान झुंझला उठा। उसने उसका सिर पूरी ताकत से झण्डे की बल्ली से टकरा दिया। खून की एक पतली सी धार उसके सिर से बह निकली। उसके पैर पहले ही खून से लथपथ हो चुके थे।
वह शत्रुओं के घेरे में खड़ी थी। चारों ओर से उसे तरह तरह की यातनायें दी जा रही थी। वह तड़फ रही थी और कठोर दिल सैनिक उसकी बेबसी पर अट्टहास कर रहें थे। एक ने आगे बढ़कर उसकी फ्राक को चीर दिया उसे पूरी तरह नग्न करके घुटनों तक धरती में गाड़ दिया। तलवार से उसके स्तनों को काट दिया गया। इंसानियत काँप कर रह गयी।
लेकिन वह दृढ़ स्वरों में कहने लगी-” तुम जैसे शैतानों की हवस का शिकार होने के बदले अपने शरीर को देश की आजादी में निछावर कर देने में तुमने मेरा हाथ बँटाया है, इसके लिए मैं तुम्हारी आभारी हूँ। ”
डस पर धीरे धीरे बेहोशी छाने लगी। शारीरिक यातनायें सहते सहते उसके दिल दिमाग जवाब देने लगे थे। कप्तान की अनुभवी निगाहों ने यह कमजोरी परख ली थी। उसने एक बार फिर अपनी आवाज को मुलायम करने की कोशिश करते हुए कहा- “ तुम दूसरों के लिए यह मुसीबत क्यों झेल रही हो लड़की ?बता दो न लोग कहाँ छिपे है। ”
अंतिम क्षणों में उसे अपने पिता के शब्द याद आ गये “ देश की मर्यादा तुम्हारे हाथ में है लायना, दुश्मन को यदि तुम्हारा पता चल गया तो देश सदा के लिए गुलामी की बेड़ियों में जकड़कर रह जायेगा।
एक नयी शक्ति का संचार उसके अन्दर हो। उसने बड़ी फुर्ती से अपने पास खड़े एक सैनिक की तलवार छीन ली जब तक इस मामले की तह तक पहुँचते उसने अपनी पूरी जीभ काट कर कप्तान के आगे फेंक दी। उसके मुँह से
खरून उबल रहा था, लेकिन वह हँसने की कोशिश कर रही थी उसकी हँसी में अब खिलखिलाहट की मिठास नहीं थी, बल्कि ओ आ ओ आ..............ओ आ की कंपा देने वाली भयावह आवाज थी।
बेरहम कप्तान भी एक बारगी थरथरा उठा। पत्थर दिल सिपाहियों के सीने भी दहशत से भर उठे। इस दहशत और कंपकंपी के बीच कही उन सब के भीतर लायना के देश प्रेम के प्रति सद्भावना अंकुरित होने लगी थी। बढ़ती हुई सेना के कदम वापसी की ओर मुड़ने लगे।
लयना का शरीर भले ही नष्ट हो गया हो, लेकिन उसका अमर कर्तृत्व आज भी अबीसीनियाँ के इस चौराहे पर प्रतिमा बनकर स्थापित हैं जो आज भी मूक स्वरों में राष्ट्रप्रेम एवं मानवीय भावनाओं का ज्ञान करता है।
आत्म कल्याण के लिए गायत्री की प्रज्ञा उपासना- साधना अनिवार्य मानी गयी है और कहा गया है कि प्रातःकाल दैनिक क्रिया कृत्यों से निवृत्त होकर एक बार महा यज्ञ की उपासना नित्य ही करनी चाहिए। संभव हो सके तो शाम को भी करनी चाहिए। शाम को एक माला आत्मकल्याण की करने से भी काम चल सकता है। आत्म शुद्धि पाँच संध्या विधान और सप्त विधि पूजा सायंकाल को ही करनी चाहिए। घर के अन्य लोगों को भी, स्त्री बच्चों को भी यह प्रेरणा देनी चाहिए कि वे पूजा स्थलों के समीप बैठकर कम से कम एक माला गायत्री मंत्र की सभी कर लिया करें। सप्त विधि पूजा एक बार कर ली गयी हो तो बार बार करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। घरों में पूजा स्थलों की स्थापना-उसके निकट बैठकर पूजा, उपासना का क्रम हर सद्गृहस्थ को अपने यहाँ चलाना चाहिए। स्वयं तो नियमित उपासना करनी चाहिए। प्रयत्न यह भी करना चाहिए कि बैठकर थोड़ी बहुत उपासना अवश्य कर लिया करें। घर में आस्तिकता का भक्ति भावना का वातावरण रहना परिवार की भावनात्मक समृद्धि और आत्मिक शुद्धि के लिए अति आवश्यक है।
आत्म कल्याण के लिए गायत्री महामंत्र की पहली एक माला जप करते समय अपने को एक वर्ष के छोटे बालक के रूप में अनुभव करना चाहिए और सर्वशक्ति मान गायत्री माता के गोद में खेलने, क्रीड़ा कलोल करने की भावना करनी चाहिए। उनका पयपान करते हुए अनुभूति जगानी चाहिए कि इस अमृत दूध के साथ मुझे आदर्शवादिता, उत्कृष्टता, ऋतम्भरा -प्रज्ञा, सज्जनता और सदाशयता जैसी दिव्य आध्यात्मिक उपलब्धियाँ उपलब्ध हो रही है। अतः इसके माध्यम से अपना अंतःकरण एवं व्यक्तित्व महान बनता चला जा रहा है।
ध्यान का स्वरूप नीचे दिया जा रहा है।
( 1) प्रलय के समय बची हुई अनन्त अनन्त जलराशि में कमल के पत्ते पर तैरते हुए बाल भगवान का चित्र बाजार में बिकता है। वह चित्र खरीद लेना चाहिए, और उसी के अनुरूप अपनी स्थिति अनुभव करनी चाहिए। इस संसार से ऊपर नीले आकाश और नीचे नीले जल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। जो कुछ भी दृश्य पदार्थ इस संसार में थे वे इस प्रलय काल में ब्रह्म के भीतर तिरोहित हो गये। अब केवल अनन्त शून्य बचा है। जिसमें नीचे जल और ऊपर आकाश के अतिरिक्त और कोई वस्तु शेष नहीं। यह उपासना भूमिका वातावरण का स्वरूप है। पहले इसी पर ध्यान एकाग्र किया जाये।
( 2) मैं कमल पत्र पर पड़े हुए एक वर्षीय बालक की स्थिति में निश्चिन्त भाव में पड़ा क्रीड़ा कलोल कर रहा हूँ। न किसी की बात की चिंता है, न आकाँक्षा और न आवश्यकता। पूर्णतया निश्चिन्त, निर्भय, निर्द्वन्द्व निष्काम जिस प्रकार छोटे बालक की मनोभूमि हुआ करती हैं, ठीक वैसी ही अपनी है। विचारणा का सीमित क्षेत्र एकाकीपन के उल्लास में ही सीमित है। चारों ओर उल्लास एवं आनन्द का वातावरण संव्याप्त है। मैं उसी की अनुभूति करता हूँ और परिपूर्ण तृप्ति एवं संतुष्टि का आनन्द ले रहा हूँ।
( 3) प्रातःकाल जिस प्रकार संसार में अरुणिमा युक्त स्वर्णिम आभा के साथ भगवान सविता अपने समस्त वरेण्य, दिव्य, भर्ग, ऐश्वर्य के साथ उदय होते हैं उसी प्रकार उस अनन्त आकाश की पूर्व दिशा में ब्रह्म की महान शक्ति गायत्री का उदय होता है। उसके बीच अनुपम सौंदर्य से प्रतिमा जगद्घातृ गायत्री माता प्रकट होती है। वे हँसती मुस्कुराती अपनी ओर बढ़ी आ रही है। हम बाल सुलभ किलकारियाँ लेते हुए उनकी ओर बढ़ते चले जाते हैं। दोनों माता पुत्र आनन्द युक्त मिलन से आबद्ध होते हैं और अपनी ओर से असीम वात्सल्य की गंगा यमुना प्रवाहित हो उठती हैं। दोनों का संगम परम पावन तीर्थराज बन जाता है।
माता और पुत्र के बीच क्रीड़ा कलोल भर स्नेह वात्सल्य का आदान प्रदान है। उसका पूरी तरह ध्यान ही नहीं, भावना भूमिका में भी उतरना चाहिए। बच्चा माँ के बाल, नाक आदि पकड़ने की चेष्टा करता है, मुंह, नाक में उँगली देता है, गोदी में ऊपर चढ़ने की चेष्टा करता है, हँसता, मुस्कुराता और अपने आनन्द की अनुभूति उछल उछलकर करता हैं- वैसी ही स्थिति अपनी ही अनुभव करनी चाहिए। माता अपने बालक को पुकारती हैं, उसके सिर, पीठ पर हाथ फिराती हैं, गोदी में उठाती, छाती से लगाती, दुलराती हैं, उछालती हैं, वैसी ही चेष्टायें माता की ओर से प्रेम उल्लास के साथ हँसी मुस्कान के साथ की जा रही है, ऐसा ध्यान करना चाहिए।
स्मरण रहें केवल उपयुक्त दृश्यों की कल्पना करने से ही काम न चलेगा वरन् प्रयत्न करना होगा कि वे भावनायें भी मन में उठें, जो ऐसे अवसर पर स्वाभाविक माता पुत्र के बीच उठती हरती है। दृश्य की कल्पना सरल हैं पर भाव की अनुभूति कठिन है। अपने स्तर को वयस्क व्यक्ति के रूप में अनुभव किया गया तो कठिनाई पड़ेगी, किंतु यदि सचमुच अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में अनुभव किया गया तो जिसको माता के स्नेह के अतिरिक्त और कोई भी प्रिय वस्तु होती ही नहीं, तो फिर विभिन्न दिशाओं में बिखरी हुई अपनी भावनायें एकत्रित होकर उस असीम उल्लास भरी अनुभूति के रूप में उदय होती हैं। प्रौढ़ता को भुलाकर शैशव का शरीर और भावना स्तर कर सकना यदि संभव हो सका तो समझना चाहिए कि साधक ने एक बहुत बड़ी मंजिल पार कर ली।
म्न प्रेम का गुलाम है। मन भागता है और उसके भागने की दिशा अप्रिय से प्रिय भी होती है। जहाँ प्रिय वस्तु मिल जाती हैं वहाँ वह ठहर जाता है। प्रेम ही सर्वोपरि प्रिय हैं जिससे भी उसका मन हो जाय वह भले ही कुरूप या विरूप भी हो लगता परम प्रिय है। मन का स्वभाव प्रिय वस्तु के आस पास मँडराते रहने का है। उपयुक्त ध्यान साधना गायत्री माता के प्रति प्रेम भावना का विकास करना पड़ता है फिर उसका सर्वांग सुन्दर स्वरूप भी प्रस्तुत हैं। सर्वांग सुन्दर -प्रेम की अधिष्ठात्री गायत्री माता के चिंतन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीडा कलोल करता है। अतएव मन को रोकने, वश में आवश्यकता करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक साधना भी इस साधन के माध्यम से पूरी हो सकती है।
इस ध्यान धारणा में गायत्री माता को केवल एक नारी मात्र नहीं माना जाता हैं वरन् सत् चित् -आनन्द स्वरूप-समस्त सद्गुणों सद्भावनाओं का प्रतीक, ज्ञान विज्ञान का प्रतिनिधि और शक्ति सामर्थ्य का स्रोत मानते हैं। प्रतिमा नारी की भले ही हो पर वस्तुतः वह ब्रह्म चेतना क्रम दिव्य ज्योति बनकर ही अनुभूति में उतरे।
जब माता के स्तन पान का ध्यान किया जाये तो यह भावना उठनी चाहिए कि “ दूध एक प्रकार का दिव्य प्राण है जो माता के वक्ष स्थल से निकल कर मेरे द्वारा उदर में जा रहा है। और वहाँ एक धवल विद्युत धारा बन कर शरीर के अंग प्रत्यंग रोम रोम में ही नहीं वरन् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, हृदय, अंतःकरण, चेतना एवं आत्मा में समाविष्ट हो रहा है॥। स्थूल, सूक्ष्म कारण शरीरों में अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञान मय कोश, आनन्दमय कोशों में समाये हुए अनेक रोग शोकों का कषाय, कल्मषों का निराकरण कर रहा है। यह पय पान का प्रभाव कायाकल्प कर सकने वाली संजीवनी रसायन जैसा हो रहा है। मैं नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, अणु से विभु, क्षुद्र से महान और अणु से परमात्मा के रूप में विकसित हो रहा है। ईश्वर के समस्त सद्गुण धीरे धीरे व्यक्तित्व का अंग बन रहें है। मैं द्रुतगति से उत्कृष्टता की ओर अग्रसर हो रहा हूँ। मेरा आत्म बल असाधारण रूप से प्रखर हो रहा हैं यह ध्यान एक ऐसी स्नायुक्त स्थान की उत्तेजना भरी प्रक्रिया उत्पन्न करता है जिससे अन्दर के शक्ति स्रोत खुलते जागृत होते एवं अनन्त आनन्द का निर्झर फूट पड़ता है। हम करके तो देखें फिर बहिरंग का आदि हमें निस्सार जान पड़ेगा।
फ्राँसीसी गायिका मेलिथाँन के पास एक बार एक फटे हाल व गरीब लड़का आ गया। मेलिथाँन उसे देखकर द्रवित हों गयी और बोली - “बेटे ! तुम्हारा क्या नाम और क्या काम हैं ?” जी मेरा नाम पियरे है और मैं एक निवेदन करने आया हूँ .......... मेरी माँ रुग्ण हैं, न तो उसका इलाज कराने के लिए मेरे पास पैसे है और न ही मैं दवा तथा पथ्य खरीद सकता हूँ। “ अच्छा तुम्हें आर्थिक सहायता चाहिए। बताओ कितने पैसे दे दूँ। ” मेलिथाँन ने पियरे की बात को बीच में ही काटकर कहा। “ “जी नहीं “ पियरे बोला- “ मैं मुफ्त में पैसे नहीं लिया करता। मैं तो यह निवेदन करने आया था कि मैंने एक कविता लिखी है। आप उसे संगीत सभा में गाने की कृपा करें। उसके बाद जो उचित समझें दें दे। ”
मेलिथाँन बड़ी प्रभावित हुई। अगले दिन जलसे में उसने यह कविता गायी। करुणा स्वरों में गायी गई वह कविता सुनकर श्रोताओं की आंखें भर आई॥। उस कविता पर कई लोगों ने अच्छा पुरस्कार दिया। मेलिथाँन सारी एकत्रित धनराशि लेकर पियरे की रुग्ण माँ के पास पहुँची उसका हकदार पियरे को ही बताते हुए सब की सब राशि पियरे को ही दे दी।
मैं नवीन सृष्टि करूंगा और उसका ब्रह्मर्षि ही नहीं ब्रह्म बनकर रहूँगा। उनके नेत्रों से चिंगारियाँ निकल रही थी। वह क्रोध के कारण काँप रहें थे। उन्होंने कठोर तप किया, बार बार ब्रह्म को संतुष्ट किया किन्तु वरिष्ठ के द्वारा वे अपने को ब्रह्मर्षि नहीं कहला सके। उस ब्रह्म तेज के सम्मुख सदा उन्हें पराजित होना पड़ा।
जगन्मयी आद्या उनका क्षत्रिय हृदय निराश जानता ही नहीं था। उन्होंने असंभव नहीं सीखा था। पराकाष्ठा की तितिक्षा एवं दृढ़ निश्चय था उनमें। ‘माँ ‘ तुम्हारी ही कृपा कटाक्ष से सृष्टा की सृजन शक्ति प्राप्त की है। आज यह शिशु भी उसी लिए मचलता है।
जाने कितनी वर्षा की झड़ियाँ, हिम की कंपा देने वाली शीत और आतप की लू उस तापस के ऊपर से गुजर गयी। अर्जुन वक्ष में कितनी बार पतझड़ हुआ और कितनी बार कपोलें आई पर कौन गिने ? जिस ममेर शिला पर वह तपस्वी बैठता है, उसमें गढ्ढे पड़ गये। आस पास तृण उगे, सड़े और अंततः वह पाषाण भूमि के बराबर हो गया। कुछ दिन तो उन्होंने त्रिकाल संध्या एवं पूजन किया और फिर सब छोड़कर जो बैठे तो उठने का नाम नहीं। जटाओं में पक्षियों ने घोंसले बना दिये पैरों पर मिट्टी चढ़ गयी। आस पास घूमने वाले हिरन अपनी देह खुजाकर कभी कभी उनकी देह पर जमीं मिट्टी छुड़ा देते थे।
अंततः एक दिन उनकी समाधि खुली। उन्होंने पलकें खोली। ऊपर की ओर देखकर ठहाका लगाया, और अपने शरीर की जमीं मिट्टी के खिलौने बनाने आरंभ किये। जैसे उन्हें उठने और भोजन पाने की आवश्यकता नहीं थी। अपनी धुन के सम्मुख वह कुछ नहीं देख पा रहें थे।
सृष्टा, देख ! तेरे जौ से मेरा गेहूँ कहा अधिक पौष्टिक और सुस्वादु है। तेरी गाय से मेरी भैंस अधिक दूध देती है। वह प्रत्येक पदार्थ एवं प्राणियों के प्रतिनिधि बनते जा रहें थे। सचल सजीव एवं वास्तविक।
तुम मानव से मानव उत्पन्न करते हो मेरे मानव वृक्ष फलेंगे। उन्होंने नारियल का फल बनाया।
“ अलम् वत्स ! “ वृद्ध हँसकर वाहन ब्रह्म जी आकाश में उपस्थित होकर उनको निवारण कर रहें थे।
आदरणीय का आदर न करना उद्दण्डता है। वह उठकर खड़े हुए। अर्घ्य निवेदित किया और दोनों हाथ जोड़कर नम्र सिर पितामह के सामने खड़े हो गये। हँस धीरे धीरे नीचे उतरा। उसी मर्म पाषाण पर उसी तपस्वी ने लोक सृष्टा की विधिवत अर्चना की।
“ मानव कृत सृष्टि स्थायी नहीं होती। “ ब्रह्म ने तपस्वी से कहा - “बड़वा एवं गर्दभ सुयोग से बना खच्चर संतति उत्पादन में असमर्थ है। उसके लिए सदा वही संयोग अभीष्ट है। ”
“ पितामह ! “ उन्होंने नम्रतापूर्वक कहा -” जिन महा शक्ति की कृपा से आप सृष्टि करते हैं, उन्होंने ही इस शिशु का हठ रखा हैं, मेरी सृष्टि मानव तो है नहीं। वह उन्हीं की कृपा से पालित है। ”
“ बिना प्रजापतियों एवं भगवान विष्णु के पालन के कोई सृष्टि नहीं रह सकती। “ पितामह ने दूसरा तर्क उपस्थित किया। ‘ निर्माता को सदा रक्षक की अपेक्षा है। रक्षण के बिना सृजन का कोई मूल्य नहीं। “
“ ये प्रजापति पालक किसकी शक्ति से अनुप्राणित हैं ? “ उनमें अटल विश्वास था - “ वस्तुतः तो जगज्जननी माँ गायत्री ही सबकी पालिका है। उन्हीं की पालक शक्ति से ये सब पालक बनें है। वे अपने बच्चों के निर्माण का रक्षण नहीं करेंगी ?मैंने उन्हीं कि शक्ति का सृजन किया है। उनके किस अनुजीवी में शक्ति हैं, जो मेरे सृजन की अपेक्षा कर सके ? “
“तब तो सृष्टि और भी भयंकर है। “ पितामह मुस्कुरा रहें थे। “ वह बराबर बढ़ती रहेगी। संपूर्ण स्थान घेर लेगी और नवीन स्थान की समस्या सदा बनाए रहेगी। ”
“ ऐसा क्यों ?” वह निश्चिन्त बोल रहे थे। “ ये रुद्र, ये काल, ये विनाशक महामारियाँ तथा दूसरी विश्लेषण शक्तियाँ क्या करेंगी ? उन्हीं महाशक्ति के प्रलय कारी रूप से विनाश की शक्ति प्राप्त ये शक्तियाँ नियमित रूप से मेरी सृष्टि में जो जीर्णता को हटाकर नूतन के लिए भूमि प्रशस्त करेंगी। “
“ मैं आज तुम्हारा अतिथि हूँ। मुझे कुछ दोगे नहीं ? अंततः तो तुम मेरे पुत्र ही हो। “ पितामह ने दूसरे ढंग से कार्य संपन्न करना ठीक समझा।
मेरा अहो भाग्य ! तपस्वी ने प्रसन्न मन से कहा - “मैं स्रष्टा के काम आ सकूँ तो यह शरीर भी त्याग सकता हूँ। “ उनके उपयुक्त ही उदारता थी यह।
“ शरीर नहीं सृष्टि। ” तपस्वी पुनः ब्रह्मर्षि बनने के लिए तप संलग्न हो गया। एक बार पुनः तप का प्रतिमान टूटने लगा। वर्षों की गहन समाधि त्रिशंकु के बाल हठ से भंग हुई उन्होंने उसे स्वर्ग भेज तो दिया किंतु देवताओं ने उसे पुनः नीचे धकेल दिया।
रक्षा करो प्रभु ! बड़ी तीव्र गति से वह नीचे मस्तक के बाल गिर रहे थे। वायु के वेग से अंग अंग उखड़ जाना चाहता था। आंखें बाहर निकली पड़ती थी। मूर्छित होने के पूर्व अंतिम स्वर से उसने कतार पुकार की।
“ अच्छा वही ठहरो !” प्रकृति का कोई नियम महर्षि की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता था। देवता और लोकपालों ने आश्चर्य से देखा कि त्रिशंकु अंतरिक्ष में ही स्थित हो गया।
“ तुम गुरु पुत्रों के शाप से चांडाल हो गये और फिर भी सशरीर स्वर्ग जाने की हठ न छोड़ सके। ” ऋषि ने कहा - “ तुम्हारे आग्रह के कारण मैंने तुम्हें भेज दिया। यह तो निश्चित था कि देवता तुम्हें वहाँ रहने नहीं देंगे। अब तुम जहाँ हो वही बनें रहो। “
“ आर्त क्षम्य होता है प्रभो !” ऊपर से करुण कण्ठ की ध्वनि आ रही थी। “ मुझे बड़ा क्लेश है। मेरा एक एक अंग फटा जा रहा है। मैं चक्कर खा रहा हूँ। मेरी रक्षा कीजिए। “
“ यह मेरे वश से बाहर की बात हैं नरेश। ” बड़े खिन्न स्वर में ऋषि ने कहा। “ अपनी तपस्या का अधिकाँश मैं वसिष्ठ के साथ द्वन्द्व में नष्ट कर चुका। उनके पुत्रों की मृत्यु का कारण बनने से बहुत तपस्या नष्ट हुई। तुम्हें स्वर्ग सशरीर भेजकर रिक्त प्रायः हो गया था और अब तुम्हें अंतरिक्ष में स्थित रखने के लिए मेरा अवशेष समस्त तप कर चुका है। किस शक्ति से अब तुम्हारा क्लेश निवारण करूं। “
“ मेरे लिए तो आपके श्री चरणों के अतिरिक्त और कोई गति ही नहीं प्रभु। ” गिड़गिड़ा कर रोते हुए उस पीड़ित नरेश ने कहा।
“ संपूर्ण देवता तुमसे रुष्ट है। “ महर्षि का स्वर कुछ शान्त हो चला था। “ गुरु पुत्रों ने तुम्हें शाप दिया हैं। तुम्हारे शुभ कर्म समाप्त हो चुके है। ऐसी स्थित में तुम कर्म लोक से भी दूर हो। कुछ कर भी नहीं सकते हो। तुम्हारे कष्ट का निराकरण बड़ा ही कठिन दिखाई पड़ता है। “
“ आपके लिए असंभव कुछ नहीं है। एक मात्र आश्रय की ओर पीड़ित दृष्टि न डाले तो क्या करें ?”
“ क्या उपाय है। “ त्रिशंकु के जी में जी आया। “ तुम आदि शक्ति माँ गायत्री का स्मरण करो। मैं स्वयं। भी तुम्हारे लिए उनके श्री चरणों का ध्यान करता हूँ। वे निखिल क्लेश निवारिणी ही तुम्हारे क्लेश को दूर करने में समर्थ है। “
महर्षि ने आचमन किया और दोनों हाथों में स्वेत पुष्पों की अंजलि लेकर भगवती गायत्री का ध्यान करने लगे। तन्मय हो जाना तो उनका स्वभाव हो गया था और एकान्त हृदय की प्रार्थना कभी निष्फल जाती नहीं, आंखें खुली देखा तो त्रिशंकु सामने बैठे है। “क्या है नरेश ? “उन्होंने शांत स्वर से पूछा।
“ओह गुरुदेव। “आप धन्य है। आपकी कृपा का प्रभाव महान है। “त्रिशंकु कह रहा था गदगद में वह महा ज्योति, वह आनन्द सौंदर्य की महिमामयी मूर्ति...........। आगे कण्ठ रुद्र हो गया।
“ धन्य तो तुम हो त्रिशंकु। ” आर्द्र स्वर में ऋषि बोले - “ भगवती ने तुम्हें दर्शन दिया। तुम्हारा जीवन सफल हुआ। इस अभागे पर तो उन्होंने ऐसी कृपा तो आज तक नहीं की। अब तुम्हारी क्या दशा है ?”
“ बड़ा सुख है, बड़ा आनन्द है। त्रिशंकु ने हर्ष से कहा - कोई असुविधा नहीं। मंद सुरभित वायु मेरा स्पर्श कर रही है और मुझे जो सुख प्राप्त हो गया, वह तो स्वर्ग में भी मैंने देखा नहीं। मेरे आस पास नवीन नक्षत्र बन गये हैं। उसमें परिचायक हैं तथा से भी दिव्य भोग है। “
“ महाशक्ति की कृपा से अब तुम आकल्पान्त इसी शरीर में इसी प्रकार से रह सकोगे। तुम पूर्ण काम हो गये, तुम्हारा मंगल हो। “ कहते कहते महर्षि के स्वर भक्ति में डूब गये। आज वह कृपा का मर्म अनुभव कर रहें थे। उन्हें इस तत्व का बोध हो चुका था, कि तप से भक्ति पूर्ण हृदय से की गयी प्रार्थना कही अधिक श्रेष्ठ है।
इस भक्ति रस का उनका अहं घुलता जा रहा था। कब उन्हें निर्विकल्प समाधि लगी कुछ पता नहीं, देश और काल जहाँ अपना आस्तित्व खो बैठते हैं वहाँ काल की गणना कौन करें? समाधि टूटी तो तब जब ब्रह्मर्षि वसिष्ठ स्वयं उनके मस्तक पर हाथ फेरते हुए कह रहें थे “ उठो महर्षि विश्वामित्र। ” उन्होंने वरिष्ठ के चरणों में मस्तिष्क रखते हुए कहा - “ सचमुच माँ गायत्री की कृपा से कुछ भी असंभव नहीं। “
इस भक्ति रस का उनका अहं घुलता जा रहा था। कब उन्हें निर्विकल्प समाधि लगी कुछ पता नहीं, देश और काल जहाँ अपना आस्तित्व खो बैठते हैं वहाँ काल की गणना कौन करें? समाधि टूटी तो तब जब ब्रह्मर्षि वसिष्ठ स्वयं उनके मस्तक पर हाथ फेरते हुए कह रहें थे “ उठो महर्षि विश्वामित्र। ” उन्होंने वरिष्ठ के चरणों में मस्तिष्क रखते हुए कहा - “ सचमुच माँ गायत्री की कृपा से कुछ भी असंभव नहीं। “
“ न जड़ क्वचित् सर्व चिन्मात्र मेव ही “
अर्थात् - “ संसार में जड़ कुछ हैं ही नहीं सब कुछ चेतना मात्र है। “
शास्त्रकार की बात सामान्य मनुष्य की समझ में नहीं आई। योग की सिद्धावस्था तक पहुँचे हुए, महा ऋषि रामकृष्ण जब भावावेश में आते थे, वे दक्षिणोत्तर की काली मूर्ति से माँ माँ कह कर लिपट जाते थे। मूढ़ और जड़ बुद्धि लोगों के लिए यह भावाभिव्यक्ति भ्राँतिपूर्ण लगी होगी, उन्हें अपनी बुद्धि शीलता का गर्व हुआ होगा, उमड़ती हुई भावनाओं में उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया होगा, पर आज का वैज्ञानिक कहता है, सचमुच संसार में जड़ता कुछ नहीं है। चेतना ही चेतना, भाव ही भाव सब कुछ। स्थूल आँखों से देखने में यह बात आधी सच लगती है। सूर्य, चन्द्रमा, तारे, रेल मोटर, बसें व चलने फिरने वाले पदवी, जीव जन्तु में तो कुछ चेतनता, कुछ हलचल दिखाई देती है पर पृथ्वी, मकान वृक्ष, लोटा -थाली - बर्तन, पुस्तकें, पौधे यह सब स्थिर लगते हैं। यह भी चंचल और गतिशील रहे होते तो हम रात्रि बम्बई की किसी अट्टालिका में सो रहे होते और उठते ही अपने आप को शाँतिकुँज हरिद्वार में पाते।
इससे शास्त्रकार की बात असत्य नहीं हो गयी ? हमारी समझ मात्र का अंतर है अन्यथा वस्तुतः संसार से जड़ता कुछ हैं ही नहीं, जड़ता हमारी मानसिक स्थित का कारण है, जितनी स्थूल बुद्धि होगी, उतनी ही स्थूलता सृष्टि में दिखाई देगी। यदि हम भावनाओं की गहराई से संसार को देखने और परखने लगें तो अपने दिखाई देने वाला शरीर, मकान, शहर, खेत, पेड़ -पौधे तक अपने साथ रहने के लिए तैयार नहीं। सब चेतन गतिशील अपने अपने उद्देश्यों की पूर्ति में संलग्न दिखाई देने लगे।
सृष्टि का प्रत्येक परमाणु चंचल है। अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सब अशाँत हैं, न जाने क्यों अपनी मूढ़ता तो मनुष्य के पल्ले आ पड़ी है कि वह समय और पदार्थों की स्थूलता के आगे की बात सोच ही नहीं पाता। अपने आप को वस्तु से बाँधे हुए, माया मोह के चक्कर में पड़ा हुआ, कामनाओं और वासनाओं से घिरा हुआ, कष्ट पूर्वक जीवन जीता रहता है।
एक वैज्ञानिक ने एक लोहे की शलाका ली, उसका एक सिरा आग में लगाया, दूसरा हाथ में पकड़े रहा थोड़ी देर में दूसरा सिरा भी गर्म हो गया। शलाका हाथ से फेंक देनी पड़ी। पूछा गया शलाका क्यों फेंक दी ? गर्म हो गयी इसलिए उन्होंने बताया। कैसे गर्म हो गयी ? अगला प्रश्न पूछा जिज्ञासु ने तो वैज्ञानिक ने बताया कि अग्नि चेतन हैं, उसके कण जब लोहे की शलाका के स्थूल कण से टकराते हैं तो उन कणों में विद्यमान चेतनता ने अपना नियमित मार्ग बदल दिया। इलेक्ट्रान जो अब तक परमाणु की सीमा से बँधे थे, आग की बर्मी लगते ही ऐसे भागे जैसे ज्ञान का उदय होने पर राग द्वेष और वासनाएँ भाग खड़ी होती है। अग्नि का ताप सारे परमाणु में यह हलचल उत्पन्न करता चला गया और दूसरा सिरा भी गर्म हो गया। वैसे बाहर से देखने में शलाका में अब भी कोई अंतर नहीं आया था। चेतना शक्ति हैं जब तक वह रहती हैं, मनुष्य या कोई भी वस्तु स्निग्ध प्राणवान गर्म और प्रकाशवान दीखती है पर जड़ता के आते ही यह गुण समाप्त हो जाता है, इसलिए निश्चय पूर्वक भाग्यशील व्यक्ति को अधिक शक्तिशाली कहा जा सकता है।
चेतना के सूक्ष्मतम स्वरूप का चिंतन न करने के कारण हमारी बुद्धि जड़तावादी हो गयी है। पृथ्वी हमें इसलिए जड़ दिखाई पड़ती है, क्योंकि हमने अपनी भावात्मक चेतना के द्वारा उसे देखने का प्रयत्न नहीं किया। अब आप यह मानिये कि आप बहुत छोटे बच्चे हैं। आपके हाथ में एक हथौड़ा हैं, दूसरे में पृथ्वी छोटे से गेंद के समान है। हथौड़े से पृथ्वी को पीस डालिये। देखिए पहाड़, नदियाँ, समुद्र, वृक्ष -वनस्पतियाँ सब रेत हो गये। इस रेत के किसी टुकड़े को एक चिमटी से पकड़कर एक प्रकाशीय सूक्ष्मदर्शी से देखिये शायद कुछ साफ न दिखाई दे तो न्यूक्लियर माइक्रोस्कोप से देखिये परमाणु के भी टुकड़े इलेक्ट्रान, न्यूट्रान, प्रोट्रान, प्रोजीट्रान, क्रोमोसोम, जीन्स आदि का अध्ययन इसी सूक्ष्मदर्शी से किया जाता है। आप देखेंगे कि उस टुकड़े में पृथ्वी का जो सबसे लघुतम टुकड़ा होगा, कैसी हलचल मची हुई है। आप उस छोटाई का अनुमान नहीं कर सकते तो एक से.मी. में उन परमाणुओं को बिखराकर देख ले, इतनी सी जगह में एक करोड़ परमाणु आराम से बैठे मिलेंगे। इतना छोटा कि जिसकी कल्पना भी न की जा सके।
अब इसका नाभिक देखते हैं तो लगता है कि, यह तो और भी छोटा है। एक सेमी. स्थान में 100000000000 नाभिक मजे में समा सकते हैं। इस छोटी सी छोटी स्थिति में में भी इतनी हलचल हैं यदि आप देख पाये तो आप यही कहें-
आकाशो भूजलं वायुरिग्नर्ब्रह्म हरिः शिवः। यत्किचिद्यत्र किचिच्च सर्व चिन्मात्र मेवहि॥ तेजविन्दूपनिषद् 1/28,
आकाश, पृथ्वी, जल, वायु, ब्रह्म, विष्णु, महेश जो कुछ है और नहीं हैं, वह सब चैतन्य ही है। ‘ न जड़ं क्वचित ‘ जड़ तो कुछ है ही नहीं।
योगवासिष्ठ के 3/14/20 से लेकर 3/14/21 तक इस गूढ़ रहस्य को स्पष्ट करते हुए महर्षि वशिष्ठ कहते है- जिस प्रकार जल की लहरों की चंचलता है, जलते हुए दीपक में प्रकाश किरणों की स्फुरणा, अग्नि में चिंगारियाँ, चन्द्रमा की किरणें, वृक्ष में फूल पत्तियों की शोभा है उसी प्रकार सृष्टि के अणु अणु में व्याप्त परम चेतना को जो देखते और अनुभव करते हैं, वही ईश्वर की सच्ची जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। ‘ यथैतत्प्रतिभा मात्रं जगत्सगविभासनम् ‘ अर्थात् जगत में भी पदार्थ हैं, वे सब इसी चेतना से उदय होते हैं।
अनुभव न आने वाली यह चेतना कितनी सूक्ष्म हैं उतनी ही विराट भी। पानी का एक अणु एक सेकेण्ड में 30 अरब टक्करें लेता है, उसके एक परिक्रमा की दूरी इंच के दस करोड़वें भाग जितनी होती है पर इतनी सशक्त कि यदि उसे छोड़ दिया जाय तो किसी परमाणु की चेतना सम्पूर्ण पृथ्वी को जलाकर खाक कर सकती है। बमों की रचना में इसी शक्ति वाले भाग को छेड़ा जाता है।
उसके वीभत्स परिणाम लोग नागासाकी के विध्वंस के रूप में देख सकते हैं। मनुष्य की भावात्मक चेतना में उसे भी कई गुना प्रचण्ड और चमत्कारिक शक्तियाँ होती है, जो कभी कभी ही प्रभाव में आती है।
कोल्हापुर में एक परमहंस संत हो गये हैं। वे जब भावनाओं के आवेश में आते थे तो कोई कुछ देता जाता था, खाते चलें जाते थे। एक बार कुछ बुरे व्यक्तियों को शरारत सूझी, उन्होंने दो भरी बोतलें शराब की दें दी, परमहंस उन्हें पी तो गये पर संभवतः उस प्रभाव से उसकी व्याकुलता बढ़ी होगी और उसकी प्रतिक्रिया यह हुई कि उन दुष्ट लोगों को तत्काल कुष्ठ रोग हो गया।
सामान्य अवस्था में यह शक्ति प्रसुप्त अवस्था में होती है इसलिए वह समझ में नहीं आती या उसका प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता, किन्तु यदि ( साधना तपश्चर्या द्वारा अपने ही भीतर की भावनात्मक चेतना को जागृत कर लिया जाये तो मनुष्य सूर्य चेतना की तरह सर्वसमर्थ और शक्तिशाली हो सकता है। ) सामान्य एवं सुप्त अवस्था की चेतना शक्ति सूर्य की चेतना के समान ही दृष्टिगोचर नहीं होती पर वह शक्ति है असंदिग्ध।
प्रकाश सूर्य से चलकर पृथ्वी तक पहुँचने में 8 मिनट समय लेता है। प्रकाश में परमाणु एक सेकिण्ड में 186000 मील की गति से चलते हैं। यह कण सूर्य की सतह से नहीं आते वरन् सूर्य में एक त्रिज्या की स्थिति विद्यमान है, उससे आते हैं। यह त्रिज्या 420000 मील की हैं, यही सूर्य की आत्मा हैं, इसी से शक्ति और ताप का स्फोट होता है। यदि सामान्य प्रकाश की गति काम करती तो वह गर्मी इस त्रिज्या को ढाई सेकिण्ड में पूरा कर लेती और फिर तुरन्त पृथ्वी और अन्य ग्रहों की ओर प्रवाहित होकर उन्हें कुछ ही क्षणों में जलाकर नष्ट कर देती। इसीलिए सामान्य अवस्था में इसे सुषुप्त और अनियमित रखा गया है।
अणुओं की चाल अनियमित होती है, इसीलिए त्रिज्या को पार करके सूर्य की सतह तक पहुँचने में ही उसे कई वर्ष लग जाते हैं। सूर्य के ताप के धन और ऋण अणु जब टकराते हैं तब उनमें केवल एक सेमी. की ही उछाल होती है, इसलिए वे अणु कितनी ही तेजी से उछलें सतह तक पहुँचने में समय लग ही जाता है, इस बीच वह कई प्रकार की किरणों में बँटकर चारों ओर प्रकीर्ण हो जाता है, इस तरह ताप शक्ति की थोड़ी सी मात्रा व प्रकाश पृथ्वी तक आ पाता है और उतने से ही पृथ्वी की गतिविधियाँ चलती रहती है। शक्ति वाला अंश धीरे धीरे प्रवाहित होता रहता है।
यह चेतना शक्ति ही समुद्र, वायु, वृक्ष -वनस्पतियाँ और मनुष्यों तक में काम करती रहती है। दरअसल पृथ्वी पर दिखाई देने वाली हलचल बिल्कुल स्तब्ध रही होती, यदि यह चेतना उतर कर न आई होती, यह चेतना ही अनन्त स्वरूपों में विभक्त होकर विलक्षण शक्ति उत्पन्न कर रही है। यही जब सिमटकर अलग हो जाती है तो मनुष्य का शरीर खाक होकर नष्ट हो जाता है।
हम जो भी बोलते -सुनते, खाते -पाते, भाव अहंकार, आकाँक्षाएँ इच्छायें रखते हैं यह सब चेतना के गुण है। शरीर नष्ट हो जाने पर भी चेतना में इसकी वासनायें और संस्कार बने रहते हैं, इसीलिए शास्त्रकार ने बार बार आत्म- चेतना को जानने और उसे शुद्ध करने के लिए सावधान किया है। चेतना कभी मरती नहीं उसका रूपांतरण भर होता है, इस लिए भावात्मक चेतना से ढके लोगों की अमरता का अविश्वास करने का कोई कारण नहीं रह जाता।
सविता अमृत तत्व का स्रोत हैं, और मकर संक्रान्ति इसके संदोहन का पुण्य पर्व। यूँ तो सविता उपासना के प्रभाव सर्वकालिक एवं सर्वभौम है। फिर भी अन्तर्ग्रही परिस्थिति के विशेष योग इस प्रभाव को अनेक गुना बढ़ा देते हैं। काल के प्रवाह में कतिपय सुयोग ऐसे भी आते हैं, जिनमें की जाने वाली एक घण्टे की साधना का परिणाम सामान्य समय में की गई वर्षों की साधना के बराबर होती है।
इस तथ्य को ध्यान में रखकर अन्तर्ग्रही प्रवाहों की गति देख परख कर ही प्राचीन ऋषि मनीषियों ने पर्वों का निर्धारण किया था। यह निर्धारण करते समय उन्होंने मुख्यतः चार बातों का ध्यान दिया, पहली उत्तरायण, दक्षिणायन की गोलार्द्ध स्थिति, दूसरी चन्द्रमा की घटती, बढ़ती कलाएँ, तीसरा नक्षत्रों की भूमि पर आने वाला प्रभाव, चौथा सूर्य की अंश किरणों का मार्ग इन सबका शरीर गत ऋतु, अग्नियों के साथ संबंध होने से क्या परिणाम होता है, मन की गति इसके अनुसार किस तरह परिवर्तित होती है ? इन सूक्ष्म तत्वों का पर्वों के निर्धारण से गहरा संबंध था। पर्वों के विधि विधान इस सत्य को ध्यान में रख कर ही बनायें गये थे।
इस क्रम में मकर संक्राँति को सविता के अमृत तत्व के अवगाहन एवं संदोहन पर्व की संज्ञा दी गयी। शास्त्रकारों के मत से इस पर्व की खोज छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित मधुविद्या के प्रवर्तक महर्षि प्रवाहण ने की थी। उन्होंने अपनी राहन साधना के अनन्तर इसी दिन पंचम अमृत को उपलब्ध करा दिया था। वेदवेत्ता मनीषियों के अनुसार शिशिर ऋतु में वातावरण में सविता के अमृत तत्व की प्रधानता रहती है। शाक, फल, वनस्पतियाँ इस अवधि के अमृत तत्व को अपने में सर्वाधिक आकर्षित करती और पुष्टिकर बनाती है।
साधना विज्ञान के मर्मज्ञों एवं दिव्य द्रष्टा ऋषियों के अनुसार शिशिर ऋतु में माद्यमास का महत्व सबसे अधिक है। इसी कारण वैदिक काल में इस महीने का उपयोग प्रायः सभी लोग आध्यात्मिक साधनाओं के लिए करते हैं। यह परम्परा रामायण काल एवं महाभारत काल तक अबाध रूप से प्रचलित रही। रामायण काल में तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भारद्वाज के आश्रम एवं साधना आरण्यक था। उनके सान्निध्य में माघ महीने में भारतवर्ष के आध्यात्मिक जिज्ञासु साधक एकत्र होते थे। तीर्थराज प्रयाग में इस मास का कल्पवास करते थे, चांद्रायण तप के साथ मधुविद्या की साधना करते थे।
गोस्वामी तुलसी दास ने इसका जिक्र करते हुए राम चरित्र मानस में लिखा हैं- “ माघ मकर गत रवि जब होई, तीरथ -पतिहिं आव सब कोई। ”आगे वह कहते है- “ अर्थात् माघ महीने में सभी साधक तपस्वी तीर्थराज प्रयाग में आकर अपनी साधनात्मक प्रतिक्रियाओं को पूरा करते थे और फिर यथाक्रम वापस लौटते थे। वैदिक काल से चलती आ रही इस परम्परा को किन्हीं अंशों में आज भी देखा जा सकता है। इस पुण्य परम्परा को यत्किंचित् व्यतिरेक खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी के समय आया था। उसने अपनी कट्टर धर्मान्धता और क्रूर स्वभाव के वशीभूत होकर साधकों तपस्वी, तीर्थ यात्रियों के साथ बर्बरता का व्यवहार करना शुरू किया। चारों ओर भय और दहशत का वातावरण फैल गया। सभी तरफ सहमे भयभीत लोग दिखाई पड़ते थे। एक बार तो लगा कि शताब्दियों और सहस्राब्दियों तक चलती रही यह परम्परा समाप्त हो जायेगी। ऐसे समय आविर्भाव हुआ महा योगी गोरख नाथ का। कठोर ब्रह्मचर्य प्रचण्ड तपस्या और हठयोग की गहन साधनाओं से प्रखर हुई उनकी आत्म चेतना की हुँकार सुनकर दलित और दमित व्यक्तियों ने अपने में एक नयी शक्ति का अनुभव किया। जाति पात वंश का भेद भुलाकर लोग उनके नेतृत्व में खिलजी के आतंक का सामना करने के लिए उठ खड़े हुए। इन्हीं तिरस्कृत समझे जाने वाले लोगों में से उन्होंने गहनीनाथ एवं चरपटनाथ जैसे महान व्यक्तित्व गढ़े।
उनके अलख निरंजन के नारे सुनकर चेतना में आलौकिक जागृति आई। ‘ न दैत्यं न पलायनं ‘ का उद्घोष होने लगा। आक्राँता खिलजी का बल भी कम न था। अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तत्पर नाथ योगियों के पास इतना भी समय न था कि वे ठीक से खाना भी खा सके। आक्रमण एवं आतंक के कुहासे हर हमेशा को मिटा देने के लिए तत्पर इन योगियों के सामने यह समस्या उठ खड़ी हुई कि वे खायें क्या ?
इस सवाल का हल भी महा ऋषि गोरखनाथ ने खोजा। दाल - चावल, सब्जी अलग अलग पकाने की जरूरत भी क्या ? क्यों न दाल चावल को एक साथ मिलाकर बना लिया जाय। इस नये व्यंजन को उन्होंने खिचड़ी नाम दिया। शायद कम ही लोग जानते होंगे कि सर्वप्रिय व्यंजन खिचड़ी का आविष्कार महायोगी गोरखनाथ न दिया। उनके इस आविष्कार ने खिचड़ी को ऐसी मान्यता दी कि यह साधक का एक सरल सुपाच्य एवं सात्विक आहार बन गया।
उनकी प्राण प्रण से लगायी गयी बाजी सफल हुई। जन चेतना ने खिलजी के आतंक से मुक्ति पायी। मकर संक्राँति गोरखनाथ का विजय पर्व बन गया और विजय प्रतीक खिचड़ी। माघ मास की साधना एवं मकर संक्राँति का पर्व फिर से जीवंत एवं जागृत हों उठा। चारों ओर उनके प्रति जन श्रद्धा उमड़ पड़ी। श्रद्धा के विभोर जन चेतना ने उन्हें आदि नाथ भगवान शिव के अवतार के रूप में स्वीकारा और इस पुण्य पर्व पर साधुओं को खिचड़ी का दान देने एवं खिचड़ी खाने की प्रथा जल पड़ी। जिसे आज भी मकर संक्राँति के पर्व पर देखा जा सकता है। इस दिन जन श्रद्धा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित महाऋषि गोरखनाथ के मंदिर में खिचड़ी के दान के रूप में साकार देखा जा सकता है। परम्परा के चिन्ह तो आज भी है। पर वे लुप्त हो चुके हैं, जो इनके माध्यम से प्रवाहित होते थे। ये तत्व और मधुविद्या की साधना सूर्य के अमृत तत्व का संदोहन। जिसके लिए उपयुक्त तो पूरा माघ मास ही हैं, परन्तु वे क्षण तो महत्वपूर्ण है जिन क्षणों में सूर्य मकर राशि पर संक्रमण करता है। दिव्य दर्शियों के अनुसार इन क्षणों में तन्मयता एवं तल्लीनता पूर्व की गई साधना मानवी चेतना के आलौकिक एवं चिर स्थाई परिवर्तन करती है।
यह साधना ही मधुविद्या का सार तत्व है। छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित इस विद्या में सविता के अमृत तत्व की सर्वांगीण विवेचना है। स्थान स्थान पर वर्णित उपासना की रहस्य रश्मियाँ एकत्रित होकर यहाँ प्रकाशित है। इस उपनिषद् के तृतीय अध्याय के प्रथम खण्ड में सविता की उस अमृत साधना को मनोरम ढंग से समझाया गया है। इसके अनुसार आदित्य देवताओं का मधु है-
ॐ असौ वा आदित्यो देव मधु तस्य द्यौरेव। थ्तरश्चीनवँशोन्तरिक्षमपूवों मरीचयः पुत्राः॥ -छा0 उ॰ 1-1
अर्थात् ॐ यह आदित्य निश्चय हो देवताओं का मधु हैं द्युलोक ही वह तिरछा बाँस है। जिस पर नया मधु लटका है अंतरिक्ष छत्ता है और किरणें मधुमक्खियों के बच्चे के समान है।
उपनिषद् की विवेचना इस मधु विद्या में सविता के अमृत प्रवाह का माध्यम पाँच अंतरिक्षीय छिद्रों को बताया गया है। छान्दोग्य उपनिषद् के तीसरे अध्याय के तीसरे खण्ड में उसका विस्तृत वर्णन है। उन्हें पाँच देव ऋषि कहा गया है। यही पाँच प्रकार की मधु नाड़ियाँ है। पंचकोशी साधना की दृष्टि में इस तत्व को यों समझना होगा कि अन्न आदि रस की उत्पत्ति का मतलब है अन्नमय कोश की पुष्टि- यह प्रथम प्रकार का मधुरस है। द्वितीय प्रकार के मधुरस अर्थात् अमृत से प्राण शक्ति बढ़ती है तथा प्राणमय कोश की इस प्रकार की सक्रियता से यश वृद्धि होती है, यह द्वितीय अमृत की उपलब्धि है। इन्द्रियों का अधिपति मन है। अतः उनकी उत्पत्ति का मतलब हैं, मनोमय कास की सिद्धि - यह तृतीय अमृत की उपलब्धि है। वार्य की पुष्टि विज्ञानमय कोश का आधार है जो इसे पा लेता है वह चतुर्थ अमृत को प्राप्त करता है। तेज की उत्पत्ति से अक्षय आनन्द उल्लास की उपलब्धि होती है। यह वह पंचम अमृत है। जिसे महर्षि प्रवाहण ने मकर संक्राँति को पाया था।
यह उपलब्धियाँ सविता की चतुर्थमुखी चतुर्वर्गी किरणों का परिणाम होती है। सविता की ऊर्ध्वमुखी किरणें उस अनुभूति का बोध कराती है’ ते या एते रसानाँ रसाः ‘ जिसे योग की भाषा में निर्वाण समाधि, धर्म मध समाधि, स्वरूप प्रतिष्ठा जीवनमुक्ति आदि का रूप कहा गया। सविता के इस मध्यवर्ती अमृत का पान इसी स्थिति में होता है।
मकर संक्राँति के पुण्य पर्व पर की गई एक घण्टे की गायत्री साधना इस अमृत का द्वार खोलती हैं। उदय कालीन स्वर्णिम सविता का ध्यान करते हुए महायज्ञ गायत्री का जप उसके दिव्य भावों का चिंतन सविता के अमृत का रसानुभूति कराने वाला सिद्ध होगा, इसे सुनिश्चित मानना चाहिए। इस अवसर पर सभी माननीय पुरुषों का श्रद्धार्चन भी किया जाय जिन्होंने इस पुण्य परम्परा को जागृत और जीवंत रखा। इस पुण्य पर्व को यदि यथा रीति मनाया जाय, तो हम सब भी उसी अमृत की उपलब्धि कर सकेंगे जिसे महर्षि प्रवाहण ने प्राप्त किया था।
मनुष्य जीवन का सर्वाधिक समय सोने में लगाता है। यद्यपि दिन के 24 घण्टे में से सामान्यतः 16 घण्टे जागते हुए बिताते हैं परन्तु इन 16 घण्टों में अनेक विधि क्रिया कलाप अपनाता जाता रहता है। यदि एक ही काम में समय लगने की दृष्टि से समय विभाजन और उसका मूल्याँकन किया जाय तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि निद्रा ही मनुष्य का सबसे ज्यादा समय लेती है। स्वस्थ मनुष्य के लिए प्रायः 8 घण्टे नींद लेना आवश्यक समझा गया है।
नींद के संबंध में एक तथ्य यह प्रकाश में आया कि उस समय शरीर तो सोया रहता है किन्तु मन जागता रहता है और वह तरह तरह की हलचलें किया करता है। जागृत अवस्था में मनुष्य में जो क्रिया कलाप व्यवहार, आचरण और कार्यों के रूप में होते अभिव्यक्ति जान पड़ते हैं सुप्तावस्था में वही हलचलें मन को स्वप्न के रूप में दिखाई पड़ती है। जागृत स्थिति में मन के उचंगों को सामाजिक दबाव, नैतिकता और सभ्यता के मानदंडों को दबाना पड़ता है उन्हें व्यक्त होने से रोकना पड़ता है। लेकिन स्वप्न एक ऐसी स्थिति है वहाँ किसी तरह के दबाव अथवा नैतिकता बाध्य नहीं रहती, इसलिए सपनों में मन स्वच्छन्द होकर विहार करता है। इसी आधार पर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्राइड ने यह सिद्धाँत प्रतिपादित किया कि प्रत्येक स्वप्न अतीत की अनुभूतियों एवं दैहिक संवेदनों, विकारों का संयुक्त परिणाम होता है। स्वप्न यह स्पष्ट करते हैं कि हमारा चेतन मन हमारी भावनाओं के हाथ में एक खिलौना मात्र है।
फ्राइड ने यह कहा कि मन की उचित वासनाएँ ही प्रायः स्वप्न के रूप में प्रकट होती है और तरह तरह के रंग बिरंगा चित्र दिखाकर अपने तृप्ति का उपाय सृजती रहती है। लेकिन अब यह धारणा पुरानी पड़ चुकी हैं और यह स्वप्नों का एक पक्ष सिद्ध हुई, न कि उन्हें समझाने या व्याख्यायित करने का संपूर्ण आधार।
फ्राइड के अनुसार व्यक्ति के अवचेतन को किन्हीं सामान्य और संकीर्ण सिद्धांत द्वारा स्वप्न के माध्यम से समझाने का दावा किया जाता था और उन्हें अतृप्त इच्छाओं की अभिव्यक्ति मात्र समझा जाता था। किन्तु अब स्वप्न को सामान्यतः तीन वर्गों में रखा जाता है, एक स्वप्न वह जो शारीरिक दबावों से प्रभावित होने के कारण दिखाई देते हैं, दूसरे प्रकार के स्वप्न मानसिक स्थिति की प्रक्रिया स्वरूप उत्पन्न होते हैं, तीसरी श्रेणी में उन स्वप्नों को रखा गया है जिन्हें आध्यात्मिक स्वप्न कहा जाता है।
शारीरिक दशाओं से प्रभावित स्वप्नों में अपच, उदार विकार, सर्दी गर्मी की अधिकता, भूख -प्यास, शरीर से किसी वस्तु से स्पर्श होने, सोते समय वातावरण में विशेष बदलाव आ जाने के कारण दिखाई पड़ने वाले दृश्य आते हैं। ऐसे स्वप्नों में अतिरंजना और विकृति की प्रधानता होती है। उदाहरण के लिए सोते समय यदि कोई सुई या कील वगैरह चुभ रही हो तो स्वप्न में जान पड़ता है कि किसी ने भाला या तलवार घुसेड़ दी। सर्दी की अधिकता में बर्फ की सिल्लियों पर लेटने या ठंडे पानी में डूबने तथा गर्मी में आग से झुलसने जैसे अनेक दृश्य दिखाई पड़ते हैं।
मैंने मस्तिष्क पर पड़ने वाले विभिन्न दबावों, इच्छाओं और वासनाओं के आघातों से उत्पन्न स्वप्न दृश्य दूसरी श्रेणी में स्वप्नों की कोटि में आते हैं। इस प्रकार के स्वप्नों के संबंध में प्रसिद्ध मनःशास्त्री कार्ल शेरनल का कथन हैं- “ शरीर या मन का प्रत्येक विक्षोभ एक विशिष्ट प्रकार के स्वप्न को उत्पन्न करता है। यह ठीक है कि स्वप्न तथ्यों पर आधारित होते हैं किंतु वे तथ्यों की सीमाओं से बँधे नहीं होते। उनमें कल्पनात्मक उड़ान भी भरपूर होती है।
तीसरी श्रेणी के स्वप्न वे हैं जिन्हें आध्यात्मिक कहा जाता है। इन्हें अतीन्द्रिय भी कहा जा सकता है। फ्राइड ने इस तरह के स्वप्नों को यौन कुण्ठाओं द्वारा प्रेरित ओर दमित इच्छाओं का प्रतीक कहा था, यही स्वप्न अब अतीन्द्रिय अनुभूतियों के आधार सिद्ध हो रहे है। विभिन्न अनुसंधानों प्रयोगों और परीक्षणों द्वारा यह भली भांति स्पष्ट हो चुका है कि स्वप्न मात्र दमित यौन आकाँक्षाओं अथवा कल्पित क्लिष्ट मनोविकृतियों के दायरे में नहीं सिमट सकते अपितु उनके विविध वर्ग एवं स्तर है। अतीन्द्रिय अथवा आध्यात्मिक स्वप्न भी उनमें से एक है।
अतीन्द्रिय अनुभूतियों से स्पष्ट प्रमाण देने वाले विभिन्न स्वप्नों की वैज्ञानिक छान बीन से यही संकेत मिल रहें हैं कि व्यक्ति का अवचेतन मनुष्य के सामूहिक अवचेतन का ही अंग है। इसका विस्तार विराट् एवं महत् है विश्व के अनेक आविष्कार इसी अवचेतन की कृपा से संभव हुए है।
हेनरी फार डेसफार्टिस, डन पाइनकेयर जैसे गणितज्ञों को स्वप्न से मार्गदर्शन होने की घटनाएँ सर्वविदित है। सिलाई की सुई से लेकर बंदूक के लिए शीशे के छर्रो और मनुष्य तक की सैकड़ों वैज्ञानिक आविष्कारों की सफलताओं का आधार स्वप्न प्रेरणायें रही है। विश्व विख्यात संगीतकार मीजार्ट को एक ललित संगीत धुन एक ही बग्घी में बैठकर कही जाते समय जरा सी झपकी लेने पर व्यक्त सूझी। वायलिन वादक तारालिनी को “ द डेविस सानेट “ नामक ध्वनि पूरी की पूरी स्वप्न में दिखाई पड़ी थी। ये धुनें काफी प्रसिद्ध और लोकप्रिय हुई, विश्व प्रसिद्ध गीतकार चैम्पीन भी अपने संगीत सृजन की प्रेरणायें स्वप्नों में पाते थे। प्रसिद्ध नृत्याँगना मेरी विगमैन ने “पास्तेरोल “ नामक एक नृत्य की प्रेरणा एक स्वप्न द्वारा ही प्राप्त की थी। हेनरी भूर पाठलों पिकासो, एडयू वेथ, वान गागासल्वाडोर डाली आदि प्रख्यात चित्रकारों की सृजन चेतना में स्वप्नों का बड़ा हाथ है।
साहित्यकारों का तो कहना ही क्या? पुश्किन, गेटे, शेक्सपियर, टॉलस्टाय आदि सैकड़ों लेखकों ने स्वप्न से प्राप्त हुए प्रेरणाओं निर्देशों और परामर्शों के आधार पर एक से एक अनूठी और ऐतिहासिक कृतियाँ रची। प्रख्यात यूनान लेखक होमर, अंग्रेजी साहित्यकार कार्लारेज, एडगर एलनोपो आदि ने अर्द्ध चेतन स्थिति में, स्वप्न लोक का विचरण करके उन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर अनेक रचनाओं का सृजन किया।
इसी प्रकार अनेक गणितज्ञों ने गणित की जटिल समस्याओं को स्वप्नों के माध्यम से अवचेतन की झांकियों के आधार पर सुलझाया। वैज्ञानिकों ने इस आधार पर अनेकों महत्वपूर्ण आविष्कार किये हैं, कवियों ने अमर काव्य कृतियाँ रची हैं, कथाकारों और नाटककारों ने स्वप्नों के माध्यम से रचनाओं के प्लाट प्राप्त किये हैं इन स्वप्नों का विश्लेषण अभी संभव नहीं हुआ हैं पर यह तथ्य है कि अनेक व्यक्तियों ने स्वप्नों के माध्यम से वर्तमान में प्रस्तुत जटिल गुत्थियों का समाधान प्राप्त किया और सुलझाया। अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों के मूल में स्वप्नों की प्रेरणा होने तथा साहित्यिक कृतियों के आधार मिलने की सैकड़ों घटनायें मिलती है। उनमें से कई तो विश्व विख्यात है। प्रश्न उठता है कि यदि स्वप्नों के कारण मन की दमित और कुण्ठित इच्छाएँ वासनाएँ ही हैं तो ये महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्वप्नों के पीछे कौन सी दमित आकाँक्षाएँ काम कर रही थी जिन्होंने सृजन और निर्माण की नई नई धाराओं को निःसृत किया।
इन सभी घटनाओं का विश्लेषण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि स्वप्न में मानवीय मस्तिष्क का अधिक विस्तृत और सशक्त भाग, जिसे अवचेतन कहा जाता है जागृत और क्रिया शील रहता है तथा व्यक्ति के मन की संरचना के अनुसार वह विश्व व्यापी गतिविधियों की गहराई के साथ संबद्ध होता है। अतीन्द्रिय स्वप्नों का यह एक प्रकार हैं और सर्वसामान्य भी यदा कदा इस प्रकार की अनुभूतियाँ प्राप्त करता है। जब कोई सुलझाये नहीं सुलझ रही हो, मन और बेचैन और व्यथित हो तो न जाने कहाँ से कई बार ऐसे समाधान सूझ पड़ते हैं कि चमत्कृत रह जाना पड़ता है। इसे सृष्टा की अनुकम्पा और करुणा ही कहा जाना चाहिए कि उसने अपने प्रिय संतान के लिए स्वयं उत्पन्न की गयी समस्याओं के लिए भी समाधान के ऐसे स्रोत प्रस्तुत किये हैं कि सही समस्यायें अनेक महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ सृजन का संदेश इस विचित्र माध्यम से प्राप्त होते हैं।
इसका यदि सुनियोजित सदुपयोग किया जा सके तो अनेकानेक उपलब्धियाँ हस्तगत की जा सकती है।
संगीतकार गार्ल्फड के पास उनकी एक शिष्या अपने मन की व्यथा कहने गई कि वह कुरूप होने के कारण संगीत मंच पर जाते ही यह सोचने लगती कि दूसरी आकर्षक लड़कियों की तुलना में उसे दर्शक नापसंद करेंगे और हँसी उड़ायेंगे। यह विचार आते ही वह सकपका जाती है और गाने की जो तैयारी घर से करके ले जाती हैं, वह सब गड़बड़ा जाती है। घर पर वह मधुर गाती है, इतना मधुर जिसकी हर कोई प्रशंसा करें, पर मंच पर जाते ही उसे न जाने क्या हो जाता है कि हक्का बक्का होकर अपनी सारी प्रतिभा गवाँ बैठती है। गाल्फर्ड ने उसे एक बड़े शीशे के सामने खड़े होकर अपनी छवि देखते हुए गाने की सलाह दी और कहा - “वस्तुतः यह कुरूप नहीं, जैसी कि उसकी मान्यता है। फिर स्वर की मधुरता और कुरूपता का कोई विशेष संबंध नहीं है। जब वह भाव विभोर होकर गाती हैं तब उसका आकर्षण बहुत बढ़ जाता है और उसमें कुरूपता की बात कोई सोच ही नहीं सकता। वह अपने मन में से हीनता की भावना निकालें। सुन्दरता के अभाव में ही न होती रहे, वरन् स्वर की मधुरता और भाव विभोर होने की मुद्रा से उत्पन्न आकर्षण पर विचार करें और अलग आत्म विश्वास जगायें। “
लड़की ने यही किया और आरंभिक दिनों जो सदा सकपकाई हुई रहती थी और कुछ आयोजन में जाने के बाद एक प्रकार से हताश ही हो गयी थी, नया साहस और उत्साह इकट्ठा करने पर उसने बहुत प्रगति की और फ्राँस की प्रख्यात गायिका ‘मेरी बुडनाल्ड’ के नाम से विख्यात हुई।
परशुराम उन दिनों शिवजी से शिक्षा प्राप्त कर रहें थे। अपने शिष्यों की मनोभूमि परखने के लिए शिवजी समय समय पर उनकी परीक्षा लिया करते थे। एक दिन गुरु ने कुछ अनैतिक करके छात्रों की प्रतिक्रिया जानी चाही॥ जब अन्य छात्र तो संकोच में दब गये परशुराम से न रहा गया। वे गुरु के विरुद्ध लड़ने को खड़े हो गये और साधारण समझाने बुझाने से काम न चला तो फरसे का प्रहार कर डाला।
चोट गहरी लगी। शिवजी का सिर फट गया। पर उन्होंने बुरा न माना वरन् संतोष व्यक्त करते हुए गुरुकुल के समस्त छात्रों को संबोधन करते हुए कहा-”अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना प्रत्येक धर्मशील व्यक्ति का मनोचित् कर्तव्य है। फिर अन्याय करने वाला कितनी ही ऊँची स्थिति का क्यों न हों। संसार से अधर्म इसी प्रकार मिट सकता है। यदि उसे सहन करते रहा जायेगा तो इससे अनीति बढ़ेगी और एक सुन्दर संसार में अशाँति उत्पन्न होगी। परशुराम ने जो धर्म रक्षा के लिए जो दर्प प्रस्तुत किया उससे मैं प्रसन्न हूँ।
शिवजी ने अपने इस शिष्य को उठाकर छाती से लगा लिया। उन्हें अव्यर्थ शस्त्र परशु उपहार में दिया और आशा प्रकट की कि उनके द्वारा संसार में फैले अधर्म का उन्मूलन करने की एक भारी लोक सेवा बन पड़ेगी। शिव ने अपने शिष्यों को और भी कहा-”बालकों! केवल दान, जप, तप उपवास ही धर्म के लक्षण नहीं हैं, अनीति से लड़ने का कठोर व्रत लेना भी धर्म साधना का एक अंग है। अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापक एक ही रथ के दो पहिये होते हैं। दोनों का क्रम चक्र ठीक चलने से सृष्टि संतुलन ठीक रहता है इसलिए धर्म की रक्षा के लिए उपाय पर निर्भर न रह कर दोनों ही अवलंबन करना चाहिए। परशुराम की धर्म संघर्ष वृति अनुचित तनिक भी नहीं। उसमें यदि अंत तक औचित्य ही भरा पड़ा हैं। परीक्षा के लिए मैंने अनुचित आचरण किया था और तुम सब पर उसकी प्रतिक्रिया देखनी चाही थी। परशुराम सफल हुआ इसका मुझे गर्व है। इस गर्व को प्रख्यात करने के लिए परशु प्रहार के चिन्ह को शिव ने सदा देखते रहने वाला ही बनाये रखा। उनके सहस्र नामों से एक नाम ‘खण्ड परशु’ अर्थात् फरसे से जिसका सिर फट गया हो-भी विख्यात है। विष्णु ने भी भृगु की लाल छाती पर खाई थी और औचित्य का अनुमोदन करने के रूप में उस चिन्ह को सदा छाती पर बनाये रखा।
उन दिनों हैहय वंशीय क्षेत्रीय राजपद से मदान्ध हो रहे थे। रावण, कंस हिरण्यकश्यप उन्होंने स्वेच्छाचारिता अपनी रखी थी। स्वार्थवश चाहे जिसके साथ जघन्य व्यवहार करने को उतारू हो जाते। भृगवंशी पुरोहितों ने ऐसा ने करने के लिए उन्हें समझाया तो कुपित होकर उल्टे आक्रमणकारी बन गये। घर खोद कर फेंक दिये, स्त्रियों के गर्भ फाड़ डाले और जिनने उन्हें समझाया था उनके सिर काट लिये। जो बच गये थे वह महिष्मती छोड़कर साबरमती तट पर जा बसे। इन्हीं स्थापित पुरोहितों में एक बालक था परशुराम ! वह शिवजी से शिक्षा तो प्राप्त करता, पर साथ ही अत्याचारी के विरुद्ध उसके मन में निरंतर आग जलती रहती। वह सोचता गुरु के द्वारा जो शक्ति उसे मिलेगी उसे अनाचार के विरुद्ध संघर्ष करने में प्रयुक्त करेगा। बालक की निष्ठा परखने के लिए शिवजी ने वैसा ही प्रसंग प्रस्तुत किया था। जब बालक ने गुरु का ही सिर फोड़ दिया तो उन्हें विश्वास हो गया कि बालक में लौह पुरुष के गुण मौजूद हैं और वह अधर्म के उन्मूलन की जन आकाँक्षा को पूरा करके रहेगा। शिवजी का आशीर्वाद पाकर उनकी शिक्षा और विभूतियों से सुसज्जित होकर परशुराम अनाचार विरोधी एक महान अभियान की तैयारी करने लगे।
परशुराम के इरादों का उस समय के शासक कार्तवीर्य सहस्रार्जुन को पता लगा तो वह आग बबूला हो गया और उन्हें पकड़ने आश्रम में सैन्य समेत जा पहुँचा। वे न मिले तो उनके पिता जमदग्नि का भाँति भाँति से अपमान किया और उनके आश्रम और पुस्तकालय को नष्ट भ्रष्ट कर डाला। परशुराम जब घर आयें तब आश्रम की दशा देखी तो उनके क्षोभ का ठिकाना न रहा। वे अपना दुर्दान्त परशु लेकर अकेले ही महिष्मती पहुँचे और सहस्रार्जुन को धर दबाया। उसकी भुजायें फरसे से काट डाली और सेना को धनुषबाण से प्रचलित कर दिया। प्रतिरोध की आग बढ़ी। सहस्रार्जुन के वंशजों ने अन्य अनेक राजाओं को लेकर चढ़ाई कर दी और परशु के पिता जमदग्नि को 21 स्थानों पर घायल करके मार डाला। कहने वालों ने कहा - “ एक साधु और ब्राह्मण के लिए इस प्रकार का हिंसात्मक कार्य करना उचित नहीं। “
उनने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया कि- “अनीति ही वस्तुतः हिंसा है। उनका प्रतिकार करने के लिए जब अहिंसा समर्थ न हो तो हिंसा भी अपनाई जा सकती है। शास्त्र ने वैदिक हिंसा को हिंसा नहीं माना है। क्रोध वह वर्जित है जो स्वार्थ या अहंकार की रक्षा के लिए किया जाय। अन्याय के विरुद्ध क्रुद्ध होना तो मानवता का चिन्ह है। मानवता की मूलभूत आस्था को खोकर क्रोध अक्रोध जैसे नीति नियमों में उलझे रहना व्यर्थ है। मेरा क्रोध धर्मयुक्त हैं और मेरी हिंसा भी अनीति के प्रतिकार में प्रयुक्त होने के कारण उचित है। धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए सदा यही क्रम अपनाया जाता रहा है। “ऐसे तर्क युक्त वचनों को सुनकर कहने सुनने वाले चुप हो जाते। वे संघर्ष की आग सुलगाये हुए देश देशान्तरों में भ्रमण करने लगे। जन सहयोग से उन्होंने आत्मचारियों के विनाश में आशाजनक सफलता पाई। व्यक्तियों के पास कितनी ही बड़ी शक्ति क्यों न हो, जनता के संगठित समर्थ से कम ही रहती है। परशुराम के नेतृत्व में भड़का हुआ विद्रोह एक नहीं 21 बार नृशंस लोगों के अनाचारों का उन्मूलन करने तक चलता रहा और जब अवांछनीय तत्व समाप्त हो गये तभी वह शान्त हुआ।
अनाचार को समाप्त करने की उदात्त भावनाओं से प्रेरित होकर परशुराम जी को हिंसात्मक नीति अपनानी पड़ी और उन्होंने इसे कभी अनुचित न समझा। शाँति की स्थापना के लिए प्रयुक्त हुई अशाँति सराहनीय है और अहिंसा की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए की गयी हिंसा को पाप नहीं माना जाता। स्वार्थ और अन्याय के लिए ही आक्रमण वर्जित हैं पर यदि आत्म रक्षा या अनाचार के लिए रोकथाम के लिए प्रतिरोधात्मक उपाय के समय में हिंसा अपनानी पड़े तो न अनुचित माना जाता है और न हेय। परशुराम जी शास्त्र और धर्म के गूढ़ तत्वों को भली भाँति समझते थे इसीलिए आवश्यकता पड़ने पर काँटे से काँटा निकालने, विष से विष मारने की नीति के अनुसार ऋषि होते हुए भी उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए सशस्त्र अभियान आरंभ करने में तनिक भी संकोच न किया।
जब प्रायोजन पूर्ण हो गया तो उन्होंने अनाचार रक्तचाप को एक क्षण के लिए जारी रखना उचित न समझा। फरसे को उन्होंने समुद्र में फेंक दिया-जो राज्य छीने थे वह सारी भूमि महर्षि कश्यप को दान कर दी ताकि वे प्रदेशों के स्वराज्य स्थापित करने की व्यवस्था कर सके।
पितरों से प्रसन्न होकर जब उनके इस धर्म संघर्ष के लिए प्रसन्नता प्रकट की तो उनने यही कहा - यदि आप लोग प्रसन्न हैं तो पहले की तरह मेरी तपस्या, स्वाध्याय, और धर्म रक्षा के मार्ग में प्रीति उत्पन्न हो जाय। जन कल्याण के लिए परशुराम जी ज्ञान और विग्रह दोनों को ही आवश्यक मानते थे। नम्रता और ज्ञान से सज्जनों को और प्रतिरोध तथा दण्ड से दुष्टों को जीता जा सकता है, ऐसी उनकी निश्चित मान्यता थी। इसीलिए वे अभय पक्षीय संतुलित नीति लेकर चलने से ही धर्म रक्षा की संभावना स्वीकार करते थे। उनकी मान्यता उनके शब्दों में ही इस प्रकार है-
अग्रतश्चतुरों वेदाःपृष्ठतः शसरंधनु। इर्दब्राह्म इदं क्षात्रंशास्त्रादपि शरादपि ॥
अर्थात् “मुख के चारों वेदों का प्रवचन करके और पीठ पर धनुष बाण लेकर चला जाय। ब्रह्म शक्ति और शस्त्र शक्ति दोनों ही आवश्यक है। शास्त्र से भी और शस्त्र से भी धर्म का प्रायोजन सिद्ध करना चाहिए।
वैशाख सुदी को परशुराम जी की जन्म जयन्ती मनाई जाती है। इन्हें भगवान का अवतार माना जाता है और वे शरीर समेत अमर हैं, ऐसा कहा जाता है। कोंकण और केरल में इनकी पूजा अधिक होती हैं। समुद्र तट पर कितने ही मंदिर बने हैं और वहाँ कितने ही मेले इस पर्व पर लगते हैं।
सज्जनता और दुष्टता की अति कहीं भी नहीं होनी चाहिए। दोनों का ही समुचित प्रयोग किया जाना चाहिए। दुष्टों के साथ सज्जनता और सज्जनों के साथ दुष्टता व्यर्थ ही नहीं अनुपयुक्त समझने की मान्यता परशुराम जी के जीवन और आदर्शों में कूट कूट कर भरी थी। अहिंसा के वे इसी रूप का प्रतिपादन करते रहे। हिंसा और अहिंसा का अद्भुत समन्वय करने वाले भगवान परशुराम अभी भी हमारे विचार क्षेत्र में एक आदर्श युग धर्म के मार्ग द्रष्टा के रूप में विद्यमान है।
बगदाद के खलीफा ने अपना दैनिक वेतन तीन रुपये रोज रखा था कोई त्योहार आया तो बेगम ने कहा-” वेतन नहीं बढ़ा सकते तो राज कोश से दस रुपये उधार ले लो। उसे धीरे धीरे चुकाते रहेंगे।
खलीफा ने कहा-”मौत का क्या ठिकाना? कल ही आ गई तो लिया हुआ कर्ज कौन चुकायेगा। अभी समाज में जी रहें हैं, कर्ज तो चढ़ा ही हैं, पहले उससे तो मुक्त हो। ” कर्ज लेने से उन्होंने स्पष्ट इन्कार कर दिया तो बेगम ने दैनिक वेतन में से ही कुछ बचा कर त्योहार मनाया।
मानव जीवन का जो वर्तमान स्वरूप दिखाई पड़ता है वस्तुतः वह इतने ही सीमित नहीं है। ईश्वर का अविनाशी अंश होने के कारण उसमें वह समस्त क्षमताएँ और विभूतियाँ विद्यमान है जो सृजेता में है। प्रत्येक व्यक्ति शक्तियों का भण्डागार है। उसका संबंध न केवल वर्तमान से वरन् भूत से एवं अनन्त भविष्यकाल से भी जुड़ा है। वर्तमान एवं अतीत की तरह वह अनागत भविष्य की संभाव्य घटनाओं को देख सकने में समर्थ होता है। ट्रयू एक्सपीरिएंस इन प्रोफेसी नामक अपनी विकृति में परामनोवैज्ञानिक मार्टिन ण्बाँन ने इस तरह की सैकड़ों घटनाओं का वर्णन किया है।
घटना 4 मई 1927 की है कैलीफोर्निया के मार्लबरो एवेन्यू वहाँ के पुलिस अधीक्षक श्री एडवर्ड्स पत्नी के पास बैठे चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। उनके सामने बैठी भविष्यवक्ता श्रीमती मिरिल हाँफमैन। चर्चा भविष्य कथन पर चल रही थी जिसे श्री एडवर्ड मात्र कोरा गल्फ एवं जालसाजी बता रहे थे। बात ही बात में श्रीमती मिरिल हाँफमैन ने श्री एडवर्ड को चुनौती देते हुए कहा कि यदि मैं चाय के इस प्याले में देखकर आने वाले दिनों की घटनाओं के बारे में कुछ प्रकाश डालूँ तो ? “ यह न भूलना कि मैं आप को गिरफ्तार कर सकता हूँ यदि बात कही संदेहास्पद हुई तो “ पुलिस अधिकारी ने कहा।
चाय का प्याला हाथ में लेकर उसमें झाँकते ही श्रीमती मिरिल एक दूसरे ही चेतनात्मक आयाम में पहुँच गयी। उन्होंने बताया कि अगले रविवार एक धनी मानी व्यापारी की हत्या कर दी जायेगी, साथ में एक अन्य व्यक्ति भी मारा जायेगा। उसका शरीर छलनी की तरह गोलियों से क्षत विक्षत होगा और तीसरा सरकारी गणवेशधारी व्यक्ति भी बुरी तरह से जख्मी हालत में मिलेगा। यह घटना घटित अवश्य होगी, लेकिन किस स्थान पर बता नहीं सकती। ” ऐसे में सिर पैर की कथनी को भला पुलिस अधिकारी कब मान्यता देने वाला था। लेकिन जिस ढंग से श्रीमती मिरिल हाँफमैन ने विश्वास भरे शब्दों से घटनाक्रम का वर्णन किया था, उसमें शंकाओं के लिए कोई गुँजाइश नहीं दिखती थी। अतः सतर्कता बरतने का क्या दोष हैं ? किसी तरह रविवार की रात व्यतीत हुई। सोमवार को साढ़े सात बजे जब वह पुलिस हेडक्वार्टर पहुँचता है तो जानकारी मिलती हैं कि कैलीफोर्निया के थियेटर मालिक जैमस एफ मोली की रात में हत्या कर दी गई हैं, हत्यारे भाग रहे थे, जिनका पीछा दो पुलिस काँस्टेबिलों ने किया। हत्यारे लम्बी भाग दौड़ के बाद एक कमरे में छिप गये थे॥ टोमरो मिन्टन नामक सिपाही ने बहादुरी के साथ उनमें से एक को मार गिराया। इस मुठभेड़ में वह स्वयं भी बुरी तरह जख्मी हो गया था। यह रात श्रीमती हाँफमैन के हत्यारे पहचान बताते हुए कहीं थी। इतने सटीक पूर्व कथन से वह हतप्रभ रह गया।
भारतीय मनीषियों ने पूर्व कथन को अतीन्द्रिय संवेदना माना है और कहा है कि सामान्य चेतना के लिए विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों की आवश्यकता होती हैं, किन्तु इन्द्रियातीत ज्ञान का आधार अंतःकरण है। पातंजलि योगसूत्र में भी कहा गया है-”परिमाणत्रय संयमात अतीता - अनागता ज्ञानप्। ” किन्तु कभी कभी जीवन में कुछ ऐसी भी घटनायें घट जाती हैं जिनके आधार पर मनुष्य को पूर्वाभास, भविष्य दर्शन करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है या यह भी कहा जा सकता है कि कितने ही व्यक्तियों को यह अनायास ही उभरती है तो कितने ही व्यक्ति उसे प्रयत्न पूर्वक विकसित कर लेते हैं तो कितने ही मनीषियों को अंतः स्फुरणा के आधार पर बड़े बड़े ग्रंथों की रचना कर डाली है और उनमें वर्णित घटनाक्रम आगे चलकर सही भी सिद्ध हुए है। ‘दी मैन आफ दी मून’ आरथर काँननडायेल की एक ऐसी ही कृति है जो चन्द्रमा पर मनुष्य के पदार्पण करने के कई वर्ष पूर्व लिखी गई थी। सन् 1898 में राबर्टसन ने ‘द रैंक ऑफ टाइरन’ नामक अपने बहुचर्चित उपन्यास में बताया था कि कभी न डूबने वाला टाइरन जहाज बर्फ की चट्टान से टकरा कर पानी में डूब जाता है और उसमें सवार हजारों यात्री जल समाधि ले लेते हैं। 1912 में 14 अप्रैल के दिन एस-एस टाइटैनिक नामक दुर्भेद्य जहाज अपनी प्रथम जल यात्रा में ही उत्तर अटलांटिक महासागर में बर्फ की चट्टानों से टकराकर डूब गया। उपन्यास में बताये गये जहाज की भार क्षमता 75000 टन, ऊँचाई 882 फीट थी और उसमें बैठे यात्रियों की संख्या भी उतनी ही थी। स्मरण करने योग्य तथ्य यह है कि इस जहाज में यात्रा करने वालों में से अधिकाँश व्यक्तियों को पूर्वाभास हुआ था, फलतः कइयों ने अपनी यात्रा रद्द कर दी थी।
विश्व विख्यात ‘गुलीवर्स ट्रैवल’ उपन्यास के लेखक जोनाथन स्विफट ने डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही लिया दिया था कि मंगल ग्रह के चारों ओर दो चंद्रमा परिक्रमा करते हैं और उनमें से एक की चाल दूसरे से दूनी है। डेढ़ सौ वर्ष बाद सन् 1877 में एक शक्ति शाली दूरबीन के सहारे खगोल विदों ने जब यह खोज निकाला कि मंगल ग्रह पर वास्तव में दो उपग्रह हैं जिसमें एक की चाल दूसरे के दमनी हैं तो लोग आश्चर्य चकित रह गये कि उस साधन हीन जमाने में इस तरह की कल्पना भी कैसे की जा सकी ? इसी तरह विज्ञान कथा लेखिका मेरी निबेन ने अपनी प्रसिद्ध कृति- ‘ए होल ऑफ द स्पेस’ में एक ऐसे तारे की कल्पना की थी जो आकार में सूर्य से दस गुना अधिक था, लेकिन अरबों वर्ष बाद सिकुड़कर साठ किलोमीटर अर्द्धव्यास का ही रह गया, किंतु इसका भार तब से सूर्य से दस गुना अधिक था। करीब एक शताब्दी के बाद जब 1972 में ‘साइगन्सस - एक्स-वन’ नामक ब्लैक होल का पता लगा तो पाया गया कि तारे का भार एवं अर्द्ध व्यास ठीक उपन्यास में बताये गये वर्णन के अनुसार ही है।
अब तो पैरासाइकोलॉजी, मेटाफिजिक्स आदि विज्ञान के जानकार भी यह स्वीकार करने लगे है कि मानवी अंतःचेतना न केवल बहुआयामी है, वरन् वह विरा विश्व मन का ही अंश है और सूक्ष्म जगत की हलचलों को देखने सुनने व समझने में सक्षम है। चतुर्थ आयाम की परिकल्पना करने वाले महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने भी जीवन के अंतिम दिनों में कहा था कि - “ मेरे जीवन का सबसे सुखद अनुभव यह हुआ कि कोई अदृश्य चेतना विश्व ब्रह्माण्ड की नियामक है। वही सम्पूर्ण सत्य, कला और विज्ञान का स्रोत है। मनुष्य उसी की अनुकृति है। “ सुप्रसिद्ध विज्ञान लेखिका वैरी स्टेनली एल्डर ने अपनी पुस्तक ‘दी फिफथ डायमेन्स ‘ में कहा है कि सामान्य लोगों के लिए चर्मचक्षुओं से भरे दृश्यमान सूक्ष्म जगत की जानकारी को चतुर्थ आयाम कहा जा सकता है। अणु विस्फोट, विकिरण, प्रकाश, रेडियो, टेलीविजन आदि की जानकारी और उसकी जन जीवन में उपयोग। ये सब चतुर्थ आयाम की उपलब्धियाँ तो हैं, किन्तु इन संयंत्रों को बना लेने वाली मानवी चेतना सत्ता में भी तो अद्भुत कही जाने वाली करामातों से कही अधिक शक्तिशाली क्षमता या उच्चस्तरीय आयाम सन्निहित है।
वास्तव में देखा जाये तो एक छोटी सी मानवी काया में समूचा विश्व ब्रह्माण्ड ही सूक्ष्म रूप से समाया हुआ है और उनमें सृष्टि के प्रत्येक जीवधारी में पायी जाने वाली विशेषतायें विद्यमान है। ‘ दि इनिसियन्स ऑफ द वर्ल्ड ‘ नामक पुस्तक में जिस तरह बताया गया है कि ठोस, तरल, गैस, ईथर आदि मिलकर पदार्थ की सात अवस्थायें, ठीक उसी तरह मानवी चेतना की एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय सात परतें हैं पूर्वाभास, दूर, श्रवण, दूरदर्शन, भविष्य दर्शन, परकाया प्रवेश आदि अतीन्द्रिय क्षमतायें सब उसी के छोटे मोटे उभार मात्र है। समाधि स्तर की सिद्धियों को उच्चस्तरीय माना जाता सकता है। आजकल पाश्चात्य देशों में मैस्मेरिज्म, हिप्नोटिज्म, पर्सनल, मैग्नेटिज्म, मेन्टल, थैरेपी आकल्ट साइन्स, टेलीपैथी, मेन्टल हीलिंग आदि के चमत्कारों की धूम है। प्राचीन काल में तंत्र क्रिया, मंत्र शक्ति प्राण विनिमय, साबरी विद्या, छाया पुरुष, पिशाच सिद्धि, शवसाधन, दृष्टिबन्ध, अभिचार घात, कृत्या, सर्पकीलन आदि चमत्कारी शक्तियों का बोलबाला था। परामनोवैज्ञानिक जिन्हें अद्भुत अतीन्द्रिय क्षमता और पैराकाइनेसिस नाम देता है, वे वस्तुतः मनश्चेतना के विभिन्न आयाम ही है। विज्ञानवेत्ता इसे ही ‘साई’ नाम से सम्बोधित करते हैं।
भविष्य का पूर्वानुमान किन आधारों पर संभव होता है, इस संबंध में चर्वा करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने बताया कि मनुष्य अर्थात् व्यष्टि घटक समष्टि का ही एक अंग अवयव है और उसमें समष्टि मन से महाप्राण चेतना से संबंध स्थापित करने तादात्म्य बिठाने की अभूतपूर्व सामर्थ्य है। यही सामर्थ्य भविष्य की झलक - झाँकी अपने मन मस्तिष्क में देख पाने का मूल भूत आधार है। इस संबंध में जर्मनी के फ्रीवर्ग यूनिवर्सिटी के श्री हान्स बेन्डर ने गहन अनुसंधान किया है। उनका निष्कर्ष है कि इस प्रकार के सर्वाधिक भविष्य कथन द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व हुए है। जो इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हैं कि समष्टि मन ऐसे प्रसंगों में विक्षुब्ध हो उठता है और भविष्य में समाहित होने वाले अंतःकरणों के पूर्वाभास के रूप में दिखने लगता है।
ठस तथ्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए श्रीमती वेरा ऐल्डर ने कहा कि आज विज्ञानवेत्ता जिस ‘ग्रेटयूनीफाइंग फोर्स’ की कल्पना करते हैं, अलग अलग नामों से जानी जाने वाली यह शक्तियाँ चाहे वह बिजली, चुंबकत्व, विकिरण या गुरुत्वाकर्षण आदि ही क्यों न हो, उन सबका एक ही सम्मिलित स्रोत है। यह एक सच्चाई है। समेकन मिला जाना, ऐक्य -परस्पर गुंथ जाना ही वैश्विक क्रम है। आइन्स्टीन ने जिस चेतना सत्ता का निर्देश किया है, वस्तुतः वही विश्व ब्रह्माण्ड की नियामक सत्ता है। उस नियामक सत्ता के जितने ही समीप हम जाते हैं, उतना ही अलगाव कम होता जाता है। विलगाव उससे दूरी की निशानी है। भौतिक जगत अलगाव का द्योतक है तो ऐक्य पराभौतिकता का द्योतक है। विश्लेषण, पृथक्करण ने हमें अनेकों भौतिक उपलब्धियाँ प्रदान की हैं, लेकिन चेतनात्मक आयामों की उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ जब सामने आयेंगी तब हमें हतप्रभ ही रह जाना पड़ेगा।
“भगवान भी दुर्बलों की पुकार नहीं सुनते। ” नेत्रों से झर झर आँसू गिर रहे थे। हिचकियाँ बंध गयी थी। वह साधु के चरणों पर मस्तक रखकर फूट फूटकर रो रहा था।
“ भगवान सुनते तो है लेकिन, हम उन्हें पुकारते कहाँ हैं ? “ साधु ने स्नेह भरे स्वर से कहा। विपत्ति में भी हम भगवान का स्मरण नहीं कर पाते, कितना पतन है हमार हृदय। ”
“ लेकिन प्रभु ! वे सर्वज्ञ शक्तिमान है, दयामय कहे जाते हैं। “ उनकी वाणी में अपार वेदना थी। मेरे घर के तो सभी नित्य प्रातः-सायं पूजा करते थे। “
“ लेकिन भाई ! किसी मूर्ति पर दो बूँद जल डाल देना, दो फूल चढ़ा देना, दो चार पद्य या श्लोक सुना देना ही तो पूजा नहीं है। पूजा तो तब होती हैं, जब हम भगवान को सचमुच मानें। , साधु महाराज के स्वर में कोमलता के साथ उलाहना था।
“ तो क्या मैं भगवान को मानता नहीं ? “ उसने मस्तक उठाया। “ भगवान सर्वव्यापक हैं, यह हम सब जानते मानते हैं। “साधु ने उसी शाँति से कहा “ “ लेकिन हम झूठ बोलते हैं, दूसरों को धोखा देते हैं और अनेक पाप करते हैं। संकट में घबरा जाते हैं, कि भगवान को पुकारने का स्मरण तक नहीं रहता। “
“संकट भी संकट जैसा हो तब न। “ अपने नेत्र पोंछने जैसी भी उसमें शक्ति नहीं थी। गला रुँधने से अटक अटक कर बोल पा रहा था- “ महाप्रलय एक साथ ही सिर पर टूट पड़े तो किसका चित्त ठिकाने रहें ?कोई उस समय क्या करता है, या क्या सोच समझ कर किया जा सकता है। “
“ कोई क्या मानता है, क्या जानता है इसका इसी महासंकट में तो पता लगता है। साधु ने स्थिर गम्भीर स्वर में कहा -” एक नन्हें बच्चे को जब वह माँ से दूर हो डराकर देखो। वह जानता है कि माँ दूर है, आ नहीं सकती, किन्तु वह भागेगा पीछे, कंकड़ पत्थर मारने की सुध उसे पीछे आयेगी, वह पहले पुकारेगा माँ ! माँ ! और हम तो जानते हैं कि सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान परमात्मा हमारे पास है। हमें वह आधे क्षण के करोड़वें भाग से बचा सकता है। यदि हम हृदय से परमात्मा को माने, हम आस्तिक हो तो उसे विपत्ति में पुकारना भूल जायँ, क्या यह बन सकता है ?”
उसने नतमस्तक झुका दिया। उसका शरीर जैसे ऐंठकर शिथिल हो गया हो। उसकी वाणी खिन्न हीन, निराश, अंतिम श्वास लेते प्राणों की वाणी जैसी थी- “ परमात्मा “
जब तुम्हारे पीछे तुम्हारे महाराज खड़े हो तो भले ही तुमने उन्हें देखा नहीं, पर जान गये हो की वे तुम्हारे पीछे दबे पाँव चले आ रहे हैं कोई तुम्हें एक हजार स्वर्ण मोहरें दे तो तुम उसके लोभ को पकड़कर उस समय कोई भेद बता सकोगे ? तुम कोई भी बुराई कर सकोगे उस समय ? कोई कर्तव्य तुम्हारे सामने हो तो उसमें तुमसे ढिलाई होगी ?तुम्हारा कोई शत्रु तलवार लेकर तुम्हारे सामने आ खड़ा हो तो तुम जानते हो कि तुम क्या करोगे उस समय ?” साधु ने गम्भीरता से प्रश्न किये।
“ मेरे उदार महाराज ! “ उसने एक बार मस्तक झुकाया। या तो शोक के वेग में साधु की पूरी बात सुनी या उसका उत्तर देना उसे उचित नहीं जान पड़ा। वह केवल अंतिम प्रश्न के उत्तर में बोला- “ मेरे महाराज मुझसे कुछ दूर भी हो इतनी दूर कि मैं उन्हें पुकार सकूँ ? मुझे किसका भय ?”
“ निखिल ब्रह्माण्ड नायक - परमात्मा तुम्हारे पास है, घबराहट होती है, इसका तो यही अर्थ है कि परमात्मा हैं, और सर्वत्र हैं, इस बात का हृदय में पूरा निश्चय नहीं, साधु कहते जा रहें थे -आस्तिक पाप नहीं कर सकता, कर्तव्य में प्रमाद नहीं कर सकता, और भयभीत नहीं हो सकता। आस्तिकता की कसौटी ही है निष्पाप, कर्तव्यनिष्ठ और निर्भय होना। आस्तिक की पूजा ही यथार्थ पूजा है। ”
“महाराज ! मैं आस्तिक नहीं हूँ। ” मुझमें ऐसा विश्वास कभी नहीं रहा है। “ वह बोल नहीं रहा था, उसके प्राण चीत्कार कर रहें थे “परमात्मा !”
वह राजपूत है। दूसरे राजपूतों के समान वह भी है। किंतु दूसरों के बहुत से दोष उसमें नहीं है। वह यहां के ठिकानेदार का अंगरक्षक है। उनका विश्वासी सेवक है। अपने ठिकानेदार को वह ‘ महाराज ‘ कहता है। उसके तो महाराज ही है।
राजस्थान के राजपूतों में कुछ दोष भी है। दोष किसमें नहीं है। वह भी अपने को निर्दोष कहाँ कहता है, किन्तु आप उससे शपथ ले सकते हैं कि उसने कभी माँस या मदिरा छुई हो। एक और भी दोष राजाओं, ठिकानेदारों में जहां तहाँ मिलता ही था और उसके पार्श्वचर लोगों का उसमें सम्मिलित हुए बिना निर्वाह नहीं था। उनके सामने भी बात आई थी और उसने बिना सोच -संकोच के तलवार खींच ली थी - दूसरी की बहिन बेटी तो मेरी बहिन बेटी है। उसका दिन का रौद्र रूप, किसको मारना था जो उससे फिर कोई ऐसी वैसी बात कहता।
कुल परम्परा से उसे ठिकानेदार की सेवा मिली है, शूरता मिली है और आस पास के राजपूतों से सर्वथा भिन्न आचार मिला है। उसके पिता जब मरण शैय्या पर थे, उन्होंने कहा था - “ बेटा ! भगवान नारायण हमारे कुल देवता है। माँस और शराब हमारे कुल में किसी ने छुई नहीं है। यह खड्ग यह तो माँ भवानी का साक्षात् रूप है। यह मेरे पिता - पितामह के हाथ में रहता आया है। इसकी लज्जा रखना। कुल को कलंक मत लगाना। ”
आज आप उसकी व्यथा उसकी दारुण पीड़ा समझ नहीं सकेंगे। राजपूत को जिस परम धर्म की रक्षा के लिए नारी के गौरव को उज्ज्वल रखने के लिए उसने एक दिन अपने उस स्वामी के सम्मुख भी तलवार खींच ली थी, जिसके लिए अपना मस्तक काट कर रख देने में भी संकोच नहीं। उसका यही परम धर्म आज नष्ट हो रहा था। आज उसके सामने उसका वह परम धर्म..............वह विचार करने में असमर्थ हो रहा था।
परमात्मा ! परमात्मा ! ! उसने कभी किसी नारी की ओर वासना भरी दृष्टि नहीं उठायी। किसी की वासना को ‘हूँ’ कहकर भी उसने समर्थन नहीं किया। आज उसके घर की नारी उसकी बहिन -ये नर पिशाच.......हे भगवान् ! वह जैसे उन्मत्त हो गया है। उसे न पृथ्वी दिखती है न आकाश। सारी दिशाएँ जैसे घूम रही है।
भारत का विभाजन पता नहीं कितने अनर्थ किये - इस विभाजन ने। उसकी गाँव सीमा का गाँव बना और सीमा के गाँव की जो दुर्दशा होती है, उसे भी क्या बताना पड़ेगा, दो राष्ट्रों में मैत्री हो, संधि हो, तब भी सीमा के गाँव पर रात दिन कोई न कोई संकट चढ़ा रहता है और जहाँ इतना उपद्रव इतनी कटुता ख् इतनी आपाधापी हो...........।
था वह घर पर ही। किसी का घर पर रहना क्या अर्थ रखता है ? बहुत छोटा गाँव है उसका। थोड़े से लोग रहते हैं। वे सावधान भी होते तो कुछ होना, जाना नहीं था और उस समय तो सब रात्रि में अपने अपने घरों में सोये पड़े थे। वह अपनी तलवार लेकर दौड़ पड़ा कुछ और राजपूत भी दौड़े होंगे। किंतु सीमा के दूसरी ओर से जो उपद्रवी चढ़ आये थे, उनकी संख्या बहुत बड़ी थी। राजपूत गिने चूने थे। कुछ भी हो जब मरना ही हैं, तो सम्मुख युद्ध में मरने से पीछे क्यों हटें ?वह जैसे आंखें बन्द करके टूट पड़ा था। उसे पता नहीं पीछे क्या हुआ ? वह दूसरे दिन चढ़े नेत्र खोल सका था। कोई उसे अपने घर उठा लाया था। उसके स्थान पर शरीर में घाव थे। स्थान स्थान पर शरीर में पट्टियाँ बँधी थी।
उपद्रवी केवल उपद्रवी थे। लूट पाट और हत्या ही उनका उद्देश्य था। वे शीघ्र ही भाग गये थे। कुछ लोग और कुछ गांव के लोग खेत रहे थे। कुछ पशु, संपत्ति लुटेरे ले गये थे और कुछ मनुष्य भी। कुछ झोपड़ियाँ और मकान भस्म हो गये थे।
“ अपना घर जल चुका है। बहुत थोड़ी सामग्री बची है। “ उसकी स्त्री उसके सिरहाने बैठी थी और भरे नेत्रों से उसकी ओर देख रही थी।
“संध्या कहाँ है ? “ पत्नी की बात का उत्तर दिये बिना उसने पूछा। “ संध्या उसकी छोटी बहिन उसे क्यों नहीं दिखती।
“ वह तो मिली नहीं। “ पत्नी ने सिर झुका लिया।
“ मिली नहीं ? कहाँ गयी वह ? “ वह झटके से उठ बैठा। एक क्षण में सब बातें उसकी समझ में आ गयी। पत्नी ने उसे रोकना चाहा, किंतु पता नहीं कहाँ की शक्ति उसमें आ गयी थी। स्त्री को एक ओर झटक कर वह बाहर आया॥ बिना किसी की सहायता के उसने सिडनी कसी और उठ चला। आज उसकी ऊँटनी को जैसे पंख लग गये थे। अच्छे पशु अपने सवार की उदारता भाप लेते हैं।
महाराज ! उसे और कहाँ जाना था। उसके परम आधार तो उसके महाराज थे।
“ तुम क्या चाहते हो ? “ ठिकानेदार जरी ने बड़े ही धैर्य से, बड़ी शाँति से उसकी बाते सुनी। लेकिन वे कर ही क्या सकते थे ? एक ठिकानेदार की शक्ति ही कितनी होती है और यह तो अब दूसरे देश की बात हो गयी थी।
“ मेरी बहिन। “ वह तो पागल हो रहा था।
“ मैं क्या करूं ? जहाँ इस समय अपने पूरे देश की शक्ति कुछ नहीं कर पा रही है, वहाँ मैं क्या कर सकता हूँ ? “ ठिकानेदार उसे बहुत मानते थे, बहुत स्नेह करते थे उससे, लेकिन विवश थे।
“ हे भगवान। “ आशा नष्ट हो जाने पर मनुष्य कदाचित ही जीवित रह पाता है। लेकिन मुख में भगवान का नाम आया और एक नवीन लहर आई हृदय में। एक आशा की दूसरी ज्योति दिखाई दी।
वह पढ़ा लिखा कम ही है। उसे तो तलवार की और राजपूत के आत्म गौरव की ही शिक्षा मिली है। वह शिक्षा इस समय काम आये ऐसा नहीं है। उसका कुल भगवान नारायण का उपासक रहा है। वह बचपन से साधु संतों पर श्रद्धा करता आया है। यहाँ से कुछ दूर एक टेकरी है। टेकरी पर कुटिया है। कुटिया में एक संत रहते है। संत सिद्ध है। सिद्ध संत अपनी इच्छा से ही सब कुछ कर सकते हैं। असंभव भी संभव कर सकते हैं। यही है उसकी आशा का आधार। उसकी ऊँटनी फिर पूरे वेग से दौड़ने लगी।
उसका दुःख उसकी पीड़ा, बात उसके शरीर से नीचे बँधी पट्टियों के घावों में नहीं है। पीड़ा का हाहाकार तो हो रहा है, उसके हृदय में। एक राजपूत और उसकी बहिन....वे क्रूर...पशु..........पिशाच.......।
साधु की बात वह सुनता रहा। साधु की बात सुन लेनी चाहिए, यह उसने सुना है। साधु को अप्रसन्न नहीं करना चाहिए, वह यह जानता है। पता नहीं क्यों इस टेकरी पर पैर रखते ही उसका उन्माद बहुत कुछ दूर होने लगा था। उसका हृदय अपने आप किसी अज्ञात शक्ति से आश्वस्त हो रहा था। साधु की बात सुन सके, इतना धैर्य उसमें आ चुका था।
“ परमात्मा। ” उसने साधु की बात सुनकर बड़ी कातरता से कहा। वह आस्तिक न सही, साधु महाराज भगवान के परम भक्त है। वह उन्हीं से तो दया की याचना करने तो यहाँ आया है।
भगवान दयामय है। वे किसी आर्त प्राणी की पुकार कभी अनसुनी नहीं करते। कोई संकट में उन्हें पुकारे और वे उसकी पुकार न सुने, यह हो नहीं सकता। साधु पर उसकी पुकार का प्रभाव पड़ा था। उसके स्वर में वज्र जैसी दृढ़ता और सम्पूर्ण निश्चय था। उसके नेत्र आकाश में कही स्थिर हो चुके थे।
“हे प्रभु! वह एक बार फिर मन-प्राण-अंतःकरण से पुकार उठा। साधु के आदेश का उसके हृदय पर सीधे प्रभाव पड़ा था।
“ भैया ” उसकी पुकार पूरी होती न होती दूसरी पुकार आई। टेकरी पर चढ़ता कोई नारी स्वर गूँज रहा था।
“संध्या। ”वह चौक पड़ा और दूसरी क्षण ही दौड़ा। दयामय प्रभु। साधु ने भूमि पर मस्तक रख दिया और फिर अपनी दोनों आंखें पोंछ ली, जिसमें भाव बिन्दु छलक उठे।
संध्या अकेली नहीं आई थी। उसके साथ एक और लड़की थी। आज उसका स्वरूप देखने योग्य था। उसके केश बिखर रहे थे। सारा शरीर रेत से भरा था। दाहिने हाथ में एक नंगी तलवार थी, जिसे अब भाई को देखते ही उसने झन से फेंक दिया था। उसके मुख पर, उसके नेत्रों में एक अद्भुत दीप्ति थी। उसने बाँये हाथ में उस लड़की का हाथ पकड़ रखा था और वह लड़की तो जैसे पुतली हो। संध्या के हाथ के संकेत पर चले चलने के अतिरिक्त जैसे वह और कुछ करना जानती ही नहीं हो।
“ तुम यहाँ कैसे आई बेटी! यह कौन हैं?” जब भाई बहन मिल चुके, उसका आवेग घटा, संध्या ने और दूसरी लड़की ने साधु के चरणों में सिर झुकाया और बैठ गयी तब साधु ने पूछा।
“ मेरे गाँव पर रात में लुटेरों ने आक्रमण किया था। ” संध्या ने मस्तक नीचे किये हुए कहा।
“ तुम्हारे भाई ने बहुत कुछ बता दिया है। “ साधु ने बीच में रोका तुम लुटेरों के हाथ से छूट कैसे आई ?”
“ मुझे किसने पकड़ा था ?मुझे कौन पकड़ सकता था ?” संध्या ने ऐसे दृढ़ स्वर में कहा, जिसे सुनकर उसके भाई को भी आश्चर्य लगा। वह भी अपनी बहिन का मुख देखने लगा।
“ तब तुम थी कहाँ ? “ साधु ने ही पूछा।
“बाबा ! लुटेरे बहुत बुरे होते हैं। वे किसी स्त्री के धर्म की रक्षा करना नहीं चाहते। “ संध्या के लिए यह बहुत बुरी और बहुत अद्भुत बात थी। भला कोई पुरुष स्त्री की मर्यादा का सम्मान कैसे नहीं करेगा। वे लुटेरे इस बेचारी को पकड़े लिए जा रहें थे। इसे बहुत गन्दी गन्दी गालियाँ दे रहे थे। यह रो रही थी, प्रार्थना कर रही थी, पर वे सुनते ही नहीं थे।
“तू इसे बचाने गयी थी?” साधु इस स्नेह से पूछ रहे थे, जैसे अपनी सगी पुत्री से पूछ रहे हों।
“मैं बचाने नहीं जाती बाबा ?यह मेरे गाँव की बहिन लगती है। कोई दुख में हो तो बचाना नहीं चाहिए बाबा ?” संध्या ने सहज भाव से कहा -”मैं दौड़ी मुझे एक कसया घोड़ा खाली मिल गया। एक कोई वहाँ मरा पड़ा था, मैंने उसकी तलवार ले ली। लेकिन बाबा लुटेरे कायर होते है। मैं उनके पीछे घोड़ा दौड़ाती गयी। उन्होंने पहले तोगारेलियाँ चलाई, लेकिन फिर पीछे डर गये। मैं इसे घोड़े पर बैठाकर घर आ रही थी, लेकिन रास्ता भूल गयी। पता नहीं कहाँ भटक गयी। वह घोड़ा भी अड़ियल था। बार बार पीछे ही मुड़कर भागता था। इससे मैंने उसे छोड़ दिया। बहुत भटकती भटकती यहाँ आई हूँ। बहुत थक गयी हूँ बाबा। ”
“उतने लुटेरे के पीछे तू अकेली दौड़ी गई। तुझे डर नहीं लगा? “वे तुझे पकड़ लेते तो क्या करती?” साधु के स्वर में उलाहना नहीं स्नेह था।
“क्या मैं मरना नहीं जानती? वे मुझे कैसे पकड़ लेते?” भगवान नहीं है क्या बाबा? भगवान मुझे बचाते न। मैं उन सबसे क्यों डरूं?” संध्या की वाणी में अविचल विश्वास था।
“इसका नाम हैं आस्तिकता। तुमने आस्तिक देखा?” साधु ने संध्या के बदले उसके भाई की ओर देखा। वह क्या कहें? वह संध्या का भाई है, यही क्या कम गौरव की बात है उसके लिए।
एक डबल सेट पम्प एक दिन 3250 गैलन पानी फेंकता है, किंतु उसे दिन भर बिना एक आध घण्टा विश्राम किये चलाये रखा जाय तो मशीन इतनी गर्म हो जायेगी कि उसके जल उठने या फट जाने का संकट उत्पन्न हो उठेगा। इसलिए मशीन वाले लोग उसे दिन में एक- दो घंटे विश्राम दे लेते हैं। तेल और ग्रीस की नियमित व्यवस्था के बाद भी विश्राम मशीन के लिए आवश्यक है, उसके बिना उसका थोड़े दिन भी अच्छा तरह चल लेना संभव नहीं।
उदाहरण यह बताता है कि विश्राम भी जीवन की आवश्यकता है, उससे एक नयी ताजगी मिलती है। किन्तु भगवान ने मनुष्य शरीर को क्षमताएँ दी है, वह बताती है कि यदि मनुष्य संपूर्ण जीवन अविराम काम करता रहे तो भी उसे शक्ति की कमी न रहेगी, विश्राम केवल स्थूल पदार्थों के लिए आवश्यक है अर्थात् शरीर यदि आराम करना चाहता है तो उसे कुछ विश्राम दिया भी जा सकता है। पर मानसिक और आत्मिक शक्तियों से तो मनुष्य निद्रा में भी काम कर सकता है।
हमारे शरीर में हृदय एक ऐसा ही स्रोत है जो जीवन भर एक पल भी बिना विश्राम किए काम करता रहता है। भगवान राम के सामने एक ही उद्देश्य था, आसुरी शक्तियों का दमन तो वे आजीवन उसी में लगे रहे। बुद्ध का निश्चय था, दलित समाज को हिंसा और भाग्य वाद के कुत्सित जाल से निकालना, उसके लिए वह एक क्षण विश्राम किये बिना काम करते रहे, तभी उन्हें एक आदर्श लोक सेवक होने का यश मिला। जगद्गुरु शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानन्द ने भारतीय धर्म और संस्कृति को नया जीवन देने का ही काम किया। पर आजीवन उसी में जुटे रहे तब उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त कर सकें। हृदय भी ऐसा एक उदाहरण है जो जीवन भर 6 लीटर रक्त सारे शरीर में दौड़ाता रहता है। अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए वह एक सेकेण्ड की नींद तक नहीं लेता। विश्राम तो उसके लिए मृत्यु ही है। अपनी इस सक्रियता के कारण ही वह शरीर, मस्तिष्क और मनुष्य रूप में आत्मा के विकास में सहायक होता है।
वाटर वर्क्स यूँ सारे शहर को पानी देता है पर किसे, कब, कितना पानी दिया जाय, उसमें इस तरह की विवेक बुद्धि नहीं, ऐसा भी प्रबंध नहीं कि अशुद्ध हुए जल को फिर से शुद्ध बनाकर जल संकट को बनायें रखने में समर्थ हो। हृदय दिन रात काम करता है। और सबकी आवश्यकताएँ पूरी करता है। यह चार भागों में विभक्त होता है, ऊपर के दो कोष्ठ ‘आरिकल्स ‘और नीचे के वेन्ट्रिकल्स ‘ कहे जाते हैं। दाहिने हाथ का एक आरिकल्स और एक वेन्ट्रिकल्स में अशुद्धि रक्त का विभाग है, जो बायीं ओर दोनों कोष्ठकों में शुद्ध रक्त का विभाग है। दोनों ही पिता माता की संतान की तरह अच्छे बुरे का ख्याल किये बिना काम करते रहते हैं। मनुष्यों की तरह सुवर्ण और अछूत का भेदभाव यहाँ नहीं रहता।
ऐसा भी नहीं किया कि पास असीमित रक्त हो, किसी की आवश्यकता ही पूर्ण न हो। हृदय एक धार्मिक साम्यवाद का प्रतीक है, जहाँ से वितरण असमान तो होता है पर वह आवश्यकता के अनुसार वितरण जिसका जैसा काम के अनुसार इनाम का प्रबंध रहता है। अपने वाल्व सिस्टम और दबाव नियंत्रण के द्वारा उचित मात्रा में सबको रक्त पहुँचाता है। यह दोनों यंत्र बताते रहते है कि कहाँ कितने रक्त की आवश्यकता है, फिर उतनी ही रक्त वहाँ पहुँचता
है।
आपातकालीन व्यवस्था भी रहती है, कभी कही कोई स्थान कट जाता है, या चोट लग जाती हैं तो हृदय अपनी कुछ विशेष धमनियों को चलाकर उस स्थान में पहले से ही अधिक मात्रा में तब तक रक्त पहुँचता रहेगा जब तक उतने रक्त की आवश्यकता बनी रहेगी। पूँजी एकत्रित करने का प्रयत्न करने वाला शरीर का प्रत्येक अंग दूषित हो जाता है इसलिए हृदय अधिकार से अधिक रक्त किसी को नहीं देता।
मस्तिष्क सारे जीवन का केन्द्र बिन्दु, प्राण और उसे, शुद्धतम रक्त की आवश्यकता होती है। हृदय उसे शुद्ध से शुद्ध रक्त देता है। हाथ दिन भर काम करते हैं उन्हें गर्म और ताजा रक्त, जिसे कम से कम जरूरत उसे कम और अनन्त में उसके गन्दे किये गये रक्त को स्वयं ले लेने की महानता। खराब रक्त को पुनः शुद्ध करके शरीर में लौटा देने की तपश्चर्या हृदय ही कर सकता है। इसीलिए भगवान ने उसे निरन्तर काम कर सकने और लम्बे आयुष्य के उपभोग की आयुष्य दी है।
हृदय प्रति मिनट में 72 बार धड़कता है। एक वर्ष के बच्चे में वह 120 बार धड़कता है। हम कभी कोई भयानक दुश्य देखते हैं तो हृदय अपनी धड़कन बढ़ाकर ऐसी व्यवस्था करता है कि भय
के कारण उत्पन्न स्थिति विस्फोटक न होने पाये।
यह एक विचित्र यंत्र हैं, जहाँ पर हजारों नस नाड़ियाँ शुद्ध रक्त शरीर के प्रत्येक भाग में ले जाती है। और अशुद्ध खून दिल में ले जाती है। यही रक्त शुद्ध फेफड़ों में भेजकर शुद्ध करा लेता है और फिर शरीर को बाँट देता है। साढ़े चार इंच लम्बे, साढ़े तीन इंच चौड़े और ढाई इंच मोटे इस रुधिर परिवाहक को कोरोनरी नामक बारीक धमनी रक्त देती है। कोरोनरी धमनी एवं वासा वासोरम को वहाँ से जीवन मिलता है, यह शरीर शास्त्रियों को ज्ञात नहीं। लोक सेवा का उत्तरदायित्व जो हृदय के समान निष्ठापूर्वक निभाते हैं। उन्हें भी ऐसी ही अदृश्य सहायता मिलती है।
विचारशील चेतन प्राणी स्थूल जगत की योजनाओं से भिन्न है, उन्हें तो हृदय की तरह अविराम काम ही करता रहना चाहिए ताकि समाज व्यवस्था बिगड़ने न पायें। जो लोग अपने आप की चिंता किये बिना ऐसी लोक सेवा में उत्सर्ग होता है, उन्हें शक्ति और साधनों का हृदय के समान कभी अभाव नहीं रहता।
न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे का विवाह एक अशिक्षित कन्या से किया जाने लगा। कोई और पढ़ा लिखा व्यक्ति होता तो शायद ऐसा नहीं होने देता, परन्तु उन्होंने अपूर्व आदर्श निष्ठा का परिचय दिया। उन्होंने अपनी पत्नी के प्रति प्रेम की कोई कमी नहीं आने दी। सच्चे प्यार की परख त्याग और बलिदान है। रानाडे ने संकल्प लिया था कि मैं स्वयं ही अपनी पत्नी को शिक्षित बनाऊँगा और वे अपने संकल्प को पूरा करने में जुट गये। सायंकाल अवकाश के समय नियमित रूप से वे अपनी पत्नी रमाबाई को पढ़ाने लगे। उधर परिवार की अंधविश्वासी महिलाओं को यह अच्छा नहीं लगा। रानाडे और रमाबाई दोनों को व्यंग बाण सहने पड़ते, परन्तु उनकी परवाह किये बिना दोनों अपने कार्य में जुटे रहे।
रानाडे के प्रयासों से रमाबाई को निष्ठा और श्रम के सत्परिणाम शीघ्र ही सामने आये और वे कुछ ही दिनों में अंग्रेजी और मराठी भाषा पर अधिकार पा गयी। घर का हिसाब किताब, रिश्तेदारों से पत्र व्यवहार, आगन्तुक अतिथियों का आदर सत्कार और शिष्ट व्यवहार आदि सभी कार्य सफलतापूर्वक करने लगी। रानाडे के उदार दृष्टिकोण और सूझबूझ की जब भी मित्रों ने प्रशंसा की तो वे मुस्कुरा कर कहते- “भाई, मैंने इसमें कौन सा महान कार्य किया है। अपनी पत्नी का विकास मेरे ही विकास का प्रश्न था। मैं सभी विद्याओं में कितना ही निष्णात क्यों न होऊँ, यदि मेरी पत्नी निरक्षर और अनपढ़ ही रहती तो सारा संसार का विकास अधूरा ही रह जाता। ”
आज स्थिति उसके विपरीत ही नहीं बहुत कुछ भिन्न भी है। पढ़ा लिखा और कुलीन युवक अच्छी शिक्षित और सभ्य पत्नी चाहता है। संयोगवश उच्च शिक्षित कन्या मिल भी जाती हैं तो लड़के की पढ़ाई लिखाई का खर्च, हर्जाना दहेज के रूप में लम्बी चौड़ी रकम लेकर वसूल करना चाहते हैं। इसीलिए अभिभावक अपनी पुत्री को ज्यादा पढ़ाने लिखाने से घबराते हैं और पढ़ लिखा देते हैं तो उनके योग्य वर का मूल्य नहीं पाते। नारी शिक्षा की दृष्टि से पिछड़ी है इसका यह बहुत बड़ा कारण है। शैक्षणिक स्त्र से ही नहीं सामाजिक और पारिवारिक जीवन में भी स्त्री बहुत पिछड़ी हुई है।
नारियाँ अपना उद्धार स्वयं करें। यह बात ठीक है, परन्तु उनकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी पुरुषों पर है। स्त्रियों का पिछड़ा रहना स्वयं पुरुष वर्ग के लिए कम घातक नहीं है। स्त्री पुरुष को गाड़ी के दो पहिये कहा गया है। एक पहिया छोटा या टूटा होगा तो दूसरा किसी हालत में आगे नहीं बढ़ सकता। समाज नारी पुरुष के युग्म से बनता है। यह कदापि संभव नहीं कि युग्म का एक पक्ष तो पिछड़ा रहें और दूसरा उन्नति करता जाये। नारी पुरुष का सामाजिक विकास के लिए समान महत्व है।
तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाय तो नारी की महत्ता पुरुष से बढ़कर है। सृष्टिक्रम सुचारु रूप से चलने में पुरुष को एक सामान्य हेतु है, शेष सारा उत्तरदायित्व और संभावनाएँ नारी की सामर्थ्य पर ही निर्भर है।
सम्मान धारण करने से लेकर उसे जन्म देने, उचित पालन पोषा करने, घर बसाने, व्यवस्था आदि चलाने का दायित्व नारी पर ही है। पुरुष तो अपने आप में एक उच्छृंखल इकाई है। कुंवारे, अविवाहित और विदुर लोगों की गृह व्यवस्था देखकर इस तथ्य की वास्तविकता से सहज ही परिचित हुआ जा सकता है एकाकी पुरुष का, स्त्री रहित परिवार सुव्यवस्था, शृंखला आदि अनेक दृष्टि से बिखरा हुआ पाया जायेगा। परिवार सुव्यवस्थित तभी होता है जब कोई स्त्री धर्म पत्नी बनकर घर में प्रवेश करती है।
समाज व्यवस्था कहने मात्र के लिए पुरुष प्रधान है। इसकी मूल इकाई परिवार का जीवन और आस्तित्व स्त्री, माता, पत्नी के कारण ही है। संसदीय जनतंत्र शासन व्यवस्था में जो स्थान राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का होता है, परिवार में वही स्थान पुरुष और स्त्री का होता है। शासन व्यवस्था का सूत्रधार प्रधान मंत्री हैं, राष्ट्रपति तो नाम मात्र का सर्वोसर्वा हैं,। यों भी गृह व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने का अधिकाँश उत्तरदायित्व नारी पर है। पुरुष तो कमाता भर है। किस काम में कितना खर्च होना है इसका नियोजन एवं निर्धारण गृहिणी ही कुशलता पूर्वक कर सकती है। कमाना जितना आसान हैं, समझदारी से खर्च करना उतना सरल नहीं है। इस प्रकार व्यवस्था की दृष्टि से भी नारी की महत्ता पुरुष की अपेक्षा कही अधिक है। किन्तु कितने खेद की बात है कि नारी को जितना सम्मान चाहिए था वह तो दूर उलटा उसे हेय, गिरी हुई और छोटी निगाह से देखा जाता है। जब जब जिस समाज और जिस जाति की नारी को समुचित स्थान और महत्व दिया गया, उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक विकास की व्यवस्था रखी गई है, तब तब उसे समाज और वे जातियाँ संसार में समुन्नत होकर आगे बढ़ी हैं तथा जब जब उसे उचित स्थान से पदच्युत कर उसकी अवमानना जिस जाति ने की वैसे वैसे उसका निश्चित रूप में पतन हुआ है।
भारत के गौरव शील अतीत के निर्माण में नारी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। नारी जननी हैं, माँ हैं इसलिए संतान के पालन -पोषण से लेकर उसके व्यक्तित्व के गठन तक का श्रेय उसी को है। संतान का अच्छा या बुरा होना प्राच्य संस्कृति की मान्यताओं के अनुसार माँ की मर्यादा के साथ जुड़ हुआ था। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, शिवाजी, प्रताप, अशोक, विक्रमादित्य, सुभाष गाँधी नेहरू जैसे महामानवों का उद्भव और पालन माँ की ही छत्रछाया में हुआ था। आज भी मनुष्य जीवन में माँ का स्थान वही है। पिता के प्यार और संरक्षण का प्रभाव संतान पर उतना नहीं पड़ता जितना की माँ की ममता और लाड़ -प्यार की कमी का। माँ के आँचल की छाया जिस पुरुष को नहीं मिली, उसने जीवन में आगे चलकर कोई बड़ा कार्य किया हो, ऐसी विभूतियाँ अपवाद स्वरूप ही मिलती है। लेकिन व्यक्तित्व के गठन से लेकर समाज, सभ्यता और संस्कृति के निर्माण का दायित्व नारी तभी निभा सकती हैं जबकि उसे स्वयं के विकास का अवसर मिला हो।
सुसंस्कृत माता ही विकास शील संतान को जन्म दे सकती है। जो माँ सभ्यता, जीवन और देश काल के अनुसार स्वयं ही पिछड़ी हो उससे उन्नत संतान की आशा कैसे की जा सकती है ? प्राचीन काल में भारतीय नारी को विकास के अवसर ही नहीं मिले थे, वरन् समाज में भी उनका बहुत ऊँचा स्थान था। शिक्षण व्यवस्था में साथ देने और सामाजिक गतिविधियों तथा आयोजनों में भाग लेने की सुविधाएँ उसे प्राप्त थी। जब तक समाज में नारी का स्थान ऊँचा और बराबर रहा भारतीय संस्कृति अपने विकास की चर्म सीमा को छूती रही। उस नारी ने नर - नारायणों को जन्म दिया, भारत भूमि 33 करोड़ देवताओं की पवित्र भूमि कहलायी। कायातंत्र में एक एक कर जैसे जैसे कई प्रतिबंध नारी जाति पर लगाये जाते रहे, हमारा पौरुष, साहस, वीरता धर्म और संस्कृति निरन्तर क्षीण होने लगे। यहाँ तक कि हम अपने जन्म सिद्ध अधिकार स्वतंत्रता को भी खो बैठे।
इस पराधीनता के खिलाफ भी सर्वप्रथम आवाज उठाने वाली नारी ही थी। पुरुषों ने तो आत्मसम्मान, स्वाभिमान लगभग खो सा दिया था। कुछ जागृत माताओं के लाड़लों ने स्वतंत्रता संग्राम की योजना बनाई।
सन् 1857 की 31 मई को एक साथ सभी स्थानों पर विद्रोह की आग भड़कने वाली थी, किन्तु उसके 21 दिन पूर्व ही मेरठ की छावनी के सैनिकों ने क्राँति का झंडा ऊँचा कर दिया।
दुर्भाग्य से इस छावनी में 85 लोगों ने ही भाग लिया। सामूहिक असहयोग के अभाव में सभी क्राँतिकारी सैनिक पकड़े गये। उन्हें सज हुई
जो अपने साथियों का सहयोग नहीं दे पाये थे वे जब मेरठ शहर आये तो उनका अद्भुत स्वागत किया उन्हीं की गृहणियों ने नारियों के एक जत्थे ने उन्हें चूड़ियाँ दिखाई और कहाँ-”तुम्हारे भाई इस तरह अपमानित हुए है और तुम चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे।
अब क्या मुँह लेकर आये हो हमारे सामने। धिक्कार है तुम्हारे पुरुषत्व पर। लो यह चूड़ियाँ पहनो और अपने हथियार हमें दे दो। हम अंग्रेजों से लड़ेंगे। इस तीव्र भर्त्सना से आहत सैनिक वापस लौट गये और रातों रात मेरठ एक ही दिन में स्वतंत्र हो गया। इस स्वतंत्रता संग्राम में नारी ने साहस और प्राण ही नहीं फूँके, स्वयं भी भाग लिया और वीरता तथा शौर्य का परिचय दिया। रानी लक्ष्मी बाई, बेगम जीनत महल, अजीजन आदि सैकड़ों महिलाओं ने लड़ाई में भाग लिया। योगीराज अरविन्द की तो मान्यता ही थी कि “ भारत मुक्ति आँदोलन मातृ शक्ति के कारण ही सफल हुआ। जब भी इतिहास की करवट बदली है, समाज और राष्ट्र में बड़े परिवर्तन आये हैं। उनकी पृष्ठ भूमि में महिलाओं का ही हाथ रहा है।
यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पुरुष जाति का आस्तित्व नारी के कारण ही सुरक्षित रहा है। पुरुष वर्ग नारी को प्रतिबंधित कर, अपने मिथ्या अहं को भले ही पोषित करें, पर उनमें उनकी ही अपार हानि है। पुरुष आततायी नहीं आत्मघाती सिद्ध हो रहा है। राष्ट्र की जननी, पुरुष की सहयोगिनी, सहचरी और अनुवर्ती को दासी और पशुओं से भी बदतर बनाकर उसका अपना क्या हित होगा ? जिसके सहारे ऊँचा उठा जा सकता था, उसे ही तोड़कर क्या पाया जा सकता है ? जिस डाली पर बैठे हो, उसे काटने की वज्र मूर्खता हम ही तो कर रहें है। मनुष्य जाति का विकास और उन्नति नारी के बलबूते ही संभव हुई है। उसे ही पतन के गर्त में ढकेलना वज्र मूर्खता का ही प्रमाण है।
नारी वर्ग के पिछड़ापन का मूल कारण है अशिक्षा। घर की चार दीवारों में कैद नारी असभ्य, अपंग और अयोग्य ही बनी रहेगी। उसकी जड़ हुई चेतना, समाज एवं राष्ट्र के लिए उसकी सारी उपादेयता को नष्ट करके ही छोड़ेगी। अज्ञान और पुरुष के प्रतिबंधों से उसे कायर और भीरु बना दिया। घर में अकेले रहते हुए भी वह कितनी दबी दबी है, मानो उस पर अभी भी कोई विपत्ति आने वाली है, जिससे वह आत्म रक्षा नहीं कर पायेगी और जब वास्तव में ही कोई आपत्ति आती है तो उसका सामना करने तथा प्रतिकार करने की अपेक्षा काँपने या रोने लगती है।
किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में आपदाओं और आपत्तियों का विरोध तथा संघर्ष करने का न तो उसका साहस रहता है, न बुद्धि। इस स्थिति के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है-पुरुष। वस्तु स्थिति को समझकर स्वयं के हित में ही सही अपनी संतानों का भला करने के लिए ही सही -पुरुषों को चाहिए कि नारी को इस दयनीय स्थिति से उबारें।
उन्हें सर्वप्रथम अशिक्षा एवं अज्ञान के अंधकार से निकालना होगा, शिक्षा दीक्षा के संबंध में उदार एवं सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा। नारी का उद्धार स्वयं। नारी ही कर सकती है - यह कहकर अपने उत्तरदायित्व कम नहीं किये जा सकते। इसके लिए तो स्वयं में भी बड़ा परिश्रम तथा प्रयास करना पड़ेगा अन्यथा पुरुष जाति का आस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा।
सरिता भाग रही थी-सागर से मिलने के लिए। मार्ग में रेगिस्तान का बीहड़ पड़ता था। मरुस्थल की रेत सरिता को सोख डाल रही थी। थोड़ी दूर जाकर वह मात्र गीली रेत हो गई। सपना टूटकर चकनाचूर हो गया। उद्गम स्रोत से वह जल लेकर पुनः तीव्र वेग से चल पड़ी। पर फिर उसकी वैसी ही दुर्गति हुई। ऐसा अनेकों बार हुआ झुँझला कर निराश होकर उसने रेत से पूछा-”क्या सागर से मिलने में मेरा सपना कभी पूरा होगा?” रेत ने कहा-”मरुस्थल को पार करके जाना तो संभव नहीं है। पर तू अपनी सम्पदा को बादलों को सौंप दे। वे तुझे सागर तक पहुँचा देंगे। “अपने आस्तित्व को मिटाकर अद्भुत समर्पण का उसमें साहस जुट नहीं पा रहा था। पर रेत का परामर्श उसे सारगर्भित जान पड़ा। श्रद्धा ने समर्पण की प्रेरणा दी। बादलों पर बूँदों के रूप में सवार होकर वह अपने प्रियतम सागर से जा मिली।
सच्चा समर्पण हो तो भक्त का भगवान से मिलन कठिन नहीं होता, नदी की तरह सुगम बन जाता है। पुरुष नारी दोनों यदि सच्चे दिल से एक दूसरे की प्रगति चाहते हो तो एक होकर चलना पड़ेगा। किसी एक के आगे बढ़ते रहने मात्र से तो यह संभव नहीं।
विधाता ने एक बार मनुष्यों की सहायता करने के लिए देवदूत भेजा और कहा-जिसकी जो कामना हो उसे पूरा कर दिया करें। देवदूत अपने काम में तत्परता पूर्वक लगे रहे। अनुदान असंख्यों ने पायें, रोना कलपना किसी का बन्द न हुआ। संकटों से किसी को मुक्ति न मिली। इस असफलता से मनुष्य, देवदूत ओर विधाता तीनों ही खिन्न थे। नारद को कारण का पता लगाने भेजा गया। पता चला कि मनुष्य दुर्गुण ग्रसित हैं। जो पाते हैं उन्हें अनाचार में लगा देते हैं, फलतः दरिद्रता मिटती नहीं-संकट कटता नहीं।
विधाता ने देवदूत को वापस बुला लिया और निर्देश में नया परिवर्तन किया कि मात्र सद्गुणी सदाचारियों की ही सेवा किया करें। अनाचारियों को वरदान न दिया करें। तब से अब तक वही क्रम चल रहा है। देवताओं की सहायता मात्र सज्जनों के रूप में नारियों को ही मिलती है। दुर्जन मनुष्यों की मनुहार अनसुनी होती और निरर्थक होती चली जाती हैं। मनुष्यों में सज्जनता का अंश नारी में सर्वाधिक है। इसलिए अनुदान उसे सहज ही मिले हुए हैं। यदि उनका लाभ सभी को मिलना है तो उसका सम्मान भी होना चाहिए, नारी को आगे बढ़ाने के प्रयास भी सतत् होने चाहिए।
ज्ञान और क्रिया के मध्य की स्थिति को इच्छा शक्ति के नाम से जाना जाता है। ज्ञान जब तक कार्य रूप में परिणीत नहीं होता तब तक वह अनुपयुक्त और अपूर्ण ही कहा जायेगा। उसे पूर्ण और उपयोगी बनाने के लिए इच्छा शक्ति की आवश्यकता अनुभव की जाती है। संसार में जितने भी महान कार्य हुए हैं, वे मनुष्य की इच्छा शक्ति का संयोग पाकर ही हुए। दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न व्यक्ति के महान कार्यों का संचालन करते हैं। वही नवसृजन व नवनिर्माण, करने में समर्थ होते हैं। अपने और दूसरों के कल्याण, विकास एवं उत्थान का मार्ग खोजते हैं। जीवन का सुख, स्वास्थ्य सौंदर्य, प्रसन्नता, शाँति उसके सदैव साथ रहते हैं। जीवन की विरोधी परिस्थितियाँ उसकी मनःस्थिति को नहीं डिगा पाती।
कभी पाश्चात्य मनोवेत्ताओं ने विचार, संवेग और मूल प्रवृत्ति को मन के लक्षण न मान कर शरीर की क्रिया प्रतिक्रिया भर कह कर संतुष्टि कर ली थी। लेकिन अब इच्छा शक्ति का रहस्य समझ लेने के उपरान्त उनकी यह मान्यता बदलती जा रही है। मन की प्रचण्ड शक्ति सामर्थ्य के आस्तित्व को अब सर्वत्र पृथक सत्ता के रूप में स्वीकारा गया है। नवीन विचारधारा के मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर के भीतर कोई स्वतंत्र सत्ता भी क्रियाशील है, जिसे मन कहा जाता है। शरीर की समस्त गतिविधियों का संचालन उसी के इशारे पर होता है। इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति का उद्गम स्रोत भी वही है। वैज्ञानिक स्तर के परीक्षणों से अब यह सिद्ध हो चुका हैं कि मस्तिष्क के अति संवेदनशील भाग पर बिजली का करेंट लगाया जाय तो व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र सत्ता का आभास होने लगता है और वह ऐसा अनुभव करता है कि अपने शरीर की गतिविधियों का संचालन स्वयं ही कर रहा है। भौतिक विज्ञानी भी अब इस तथ्य को पूर्णतः स्वीकार करने लगे हैं कि इस तरह की सत्प्रेरणाओं को उभार सकने में इच्छा शक्ति ही अग्रणी है।
वियना के विश्व प्रसिद्ध मनःचिकित्सक डॉ0 विक्टर फ्रैंचल ने लम्बे समय तक हिटलर के यहूदी बन्दी शिविरों में रहकर क्रूरता पूर्ण अत्याचारों को झेला हैं। उनके समूचे परिवार को उन्हीं के सक्षम गैस चैम्बरों में झोंककर मार डाला गया था। मृत्यु के बादल निरन्तर मँडराते हुए भी उनने अपने जीवन को उपेक्षणीय नहीं समझा। इच्छा शक्ति के बलबूते वे जीवन विरोधी परिस्थितियों में भी अध्ययनरत बने रहे। फलतः उनने साहित्य, वक्तृत्व, और विचार के क्षेत्र में विशिष्ट योग्यता अर्जित कर दिखाई। उनके कथनानुसार इच्छा शक्ति के दुर्बल होने पर व्यक्ति के जीवन में चारों ओर विफलता ही दृष्टिगोचर होने लगती है। ह्रास का यह क्रम निरन्तर चलता रहे तो तो व्यक्ति को न्यूरोसिस जैसी व्याधि आ घेरती है। फ्रैंक्ल का लोगों थैरेपी का सिद्धाँत-जो इच्छा शक्ति के अभिवृद्धि के उपाय सुझाता है, बड़ा ही प्रभावकारी होता है। उनके कथनानुसार जीवन की असफलता, सफलता, उत्कर्ष अपकर्ष, उन्नति अवनति, उत्थान- पतन सब मनुष्य की इच्छा शक्ति की सबलता और निर्बलता के परिणाम है। सशक्त दृढ़ इच्छा शक्ति संपन्न लोगों को कुविचार, कुकल्पनाएँ, भयानक परिस्थितियाँ और उलझने भी विकसित नहीं कर सकती। वे अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हैं। उनके विचार स्थिर और निश्चित होते हैं। प्रबल इच्छा शक्ति सं शारीरिक पीड़ा भी उन्हें नहीं डिगा सकती। ऐसे व्यक्ति हर परिस्थिति पर रास्ता निकाल कर आगे बढ़ते रहते हैं। अपने व्यक्तिगत हानि-लाभ से भी प्रभावित नहीं होते।
जनसमूह के समक्ष सत्यवादी और धर्म परायण होने का दिखावा करना एक बात है और उसे स्वेच्छा से जीवन व्यवहार में उतारना सर्वथा दूसरी है। यश की कामना से तो अधिकाँश जन समुदाय परमार्थ प्रवृत्तियों को अपनाने के निरत रह सकता है। लेकिन अंतः प्रेरणा के उभरने पर संभवतः कोई विरले ही ऐसा कर पाते हैं। मनुष्य की महानता इसी में हैं कि वह स्वेच्छा पूर्वक सम्प्रवृत्ति संवर्धन की बात को गले उतारे। उत्कृष्ट जीवन की रीति नीति भी यही हो सकती है। जब टिटहरी और गिलहरी जैसे नगण्य एवं तुच्छ प्राणी विशाल समुद्र को सुखा देने, पाट देने की योजना को सफल बनाने का प्रयत्न कर सकते हैं, तो मनुष्य जैसे सर्वश्रेष्ठ प्राणी को तो अपनी। इच्छा शक्ति का प्रमाण परिचय पूरी तरह देने में क्या संकोच होना चाहिए, मनुष्य जब भी दृढ़ निश्चय कर बैठता है कि मन वह विश्रृंखलित मन रूपी सागर को भी सुखाकर अपने वश में कर सकता है तो इच्छा शक्ति स्वयमेव उभर का आती है। बुद्धि भी उसकी साथी सहयोगी बन जाती है। जो अपनी प्रबल। इच्छा शक्ति को जगाते और अपनी क्षमताओं को सदुपयोग लोकहित में करने लगते हैं, ईश्वर भी उनकी सहायता हेतु सदैव तत्पर रहता है।
एलिवेटर या लिफ्ट एक ऐसी मशीन बनाई गई हैं, जिस पर बैठकर ऊँची से ऊँची इमारतों में क्षण भर में चढ़ा जा सकता है और सीढ़ियाँ में चढ़ने की थकान से बचा जा सकता है। तार के संदेश भेजने और उसे लिखित रूप से प्राप्त करने के लिए ‘ टेलीप्रिन्टर ‘ मशीन बनाई गई है। फैक सिमली नामक मशीनों पर आज कल तार से चित्र भेजना भी संभव हो गया है। अमेरिका में हो रहे अधिवेशन के चित्र दूसरे ही दिन भारतीय समाचार पत्रों में छप जाते हैं, यह सब इसी मशीन की कृपा का फल है।
इसी प्रकार कमरे, घड़ी , प्रेस, जाइरोस्कोप, जनरेटर, कन्सर्टिना बेसिमर कर्न्वटर, विलियर्ड, टैंक आदि सैकड़ों मशीनों और आयुध मनुष्य की बुद्धिमता की दाद देते हैं। ‘टेलस्टार’ नामक रैकेट को तो संसार का महानतम आश्चर्य कहना चाहिए। सारी पृथ्वी को एक संचार सूत्र में बांधने वाले 170 पौण्ड भार और कुल चौंतीस इंच व्यास के इस यंत्र में 3600 सौर बैटरियाँ लगी है। इसी की सहायता से हम संसार के किसी भी कोने में बैठे हुए व्यक्ति से ऐसे बात कर सकते हैं, मानों वह अपने सामने या बगल में बैठा हुआ है। इन सबके बनाने में मनुष्य को विलक्षण बौद्धिक क्षमता चमत्कार रूप में प्रकट हुई हैं, उस पर हम चाहे तो गर्व भी कर सकते हैं।
किन्तु मनुष्य शरीर जैसी मशीन बनाना मनुष्य के लिए संभव नहीं हुआ। ऐसी परिपूर्ण मशीन जो शरीर के रूप में परमात्मा ने बनाकर आत्मा की विश्व विहार के लिए दी हैं, आज तक कोई भी वैज्ञानिक नहीं बना सका। भविष्य ने बना सकने की भी कोई आशा मनुष्य से नहीं है। यह परमात्मा ही है, जो अपनी इच्छा से ऐसी प्राणयुक्त मशीन का निर्माण कर सका। संसार की विलक्षण से विलक्षण मशीन भी उसकी तुलना नहीं कर सकती।
भारतवर्ष में रक्त का ताप 100 डिग्री फारेनहाइट माना जाता है। त्वचा का ताप 18 डिग्री फारेनहाइट मौसम का तापमान इससे घटता बढ़ता रहता है। गर्मी के दिनों में तापमान इतना बढ़ जाता है कि बाहर धूप में नंगे बदन निकलना कठिन हो जाता है। उसी प्रकार सर्दी में कही कही तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है। और तब बड़ी बड़ी मशीनें भी ठप पड़ जाती है। उनका पेट्रोल, डीजल भी जम जाता है। यह तो मनुष्य शरीर ही है कि वह कठिन गर्मी व शीत को भी बर्दाश्त कर लेता है। त्वचा एक ऐसा ताप रेगुलेटर हैं, जो गर्मी में शरीर को ठण्डा और ठण्डक में शरीर को गर्म बनाये रखता है। इतना अच्छा ताप रेगुलेटर वैज्ञानिक भी नहीं बना पाये। थोड़ा सा गड्ढा पड़ जाये तो साइकिल में ऐसा धक्का लगता है कि सवार एक तरफ जा गिरता है और साइकिल एक तर!। कई बार, मोटरें, हवाई जहाज, गाड़ियाँ ऊँची नीची जमीन में उड़ते हुए वस्तु से टकरा जाते हैं। और टूट फूट कर नष्ट हो जाते हैं, किन्तु त्वचा ओर रीढ़ की हड्डियां शरीर में भगवान ने ऐसे ढंग से बनाई है यह मनुष्य को हर घड़ी चोट लगने की टूट फूट से बचाते रहते हैं, रीढ़ की हड्डी में बर्टेब्रलडिस्क लगी होती है जो हर दोनों रीढ़ की हड्डियों के बीच में ऐसी फिट रहती है कि मनुष्य कैसे भी छलाँग लगायें, उछले कूदे या चोट लगने का कोई भय नहीं रहता। यह सबसे अच्छे चोट वाचक का काम करता है। शाकआर्ब्जवर वस्तुतः रीढ़ की हड्डी ही की नकल है। मनुष्य तो दरअसल अपनी सूझ समझ से थोड़ी वस्तुएँ ही बना सका अधिकाँश शरीर की नकल या उनसे सीखी हुई बातों का विकास है। मनुष्य मशीनें बनाने में इतनी बुद्धिमता समय या सूझ बूझ का उपयोग करता है, तब क्या अपने शरीर जैसी कोई मशीन बनी होगी, तब बिना किसी ज्ञान या सूझ समझ के बन गई होगी।
हम इस पर थोड़ा-सा भी विचार करें तो यह मानना पड़ेगा कि संसार में कोई ऐसी नियामक सत्ता है अवश्य जो बुद्धिशील मनुष्य से भी अधिक दूरदर्शी और सूक्ष्म ग्रहणशीलता से संपन्न और सर्वसमर्थ है। वह ऐसे उपकरण बना सकती है, जो मनुष्य करोड़ों वर्ष का समय लगातार भी नहीं बना सकता। कैमरे एक से एक अच्छे बने है। सूर्य के प्रकाश से लेकर विद्युत प्रकाश के माध्यम से भी फोटो खींच सकते हैं पर ऐसा कैमरा अभी तक नहीं बना, जिसमें लेन्स के नाभ्यान्तर को बदला जा सकता हों। फोटो लेने के लिए अच्छे कैमरों के लेन्स भी पहले एक निश्चित नाभ्यांतर दूरी को कहते हैं, जो लेन्स से प्रारम्भ होती है और जहाँ जिस वस्तु की फोटो ले रहें है में जाकर समाप्त होती है। पर फिट कर लेते हैं। तभी सही फोटो ले सकते हैं। फिल्मों तक में मशीन पहले फिट करनी पड़ती है, किन्तु आँख के रूप में भगवान ने हमें ऐसा कैमरा दिया है जिससे पास से पास और दूर से दूर से वस्तु को भी हम आँखों को आगे पीछे किये बिना मजे से देख सकते हैं।
प्रिज़्म या त्रिविमीय कैमरा बड़े अच्छे माने जाते हैं पर आंखें उससे भी अच्छी किसी रंग को ज्यों के त्यों अंतर से दिखा देन वाली होती है। इसकी सुरक्षा, सफाई का स्वयं प्रबंध रहता है। कैमरे के द्वारा ली गयी फोटो पहले उल्टी आती है, फिर उसे दोबारा प्रिन्ट किया जाता है, जबकि आँख एक ही बार में दोनों आवश्यकताएँ पुरी कर देती है।
कान से अच्छा ध्वनि साफ करने वाला यंत्र नहीं। रेडियो बेतार के तार की आवाजें एक निश्चित ऊँचाई पर ही सुन सकते हैं। कई आवाजें एक साथ सुनने या कोलाहल के बीच अपने ही व्यक्ति की ही बात सुन लेने की क्षमता कान में ही है।
ध्वनि करने के लिए ‘रेक्टी फायर ‘ यंत्र का प्रयोग किया जाता है। कुछ यंत्रों में बैकुअम सिस्टम काम करता है और अच्छे यंत्रों में ‘गस सिस्टम ‘ से ध्वनि साफ करते हैं। उसमें धन प्लेट और ऋण प्लेट के साथ ग्रिड को भी जोड़ना पड़ता है, तब ध्वनि साफ होती है। यह सिद्धाँत बाहरी कान मध्य कान और अंतः श्रवण की नकल मात्र है। कान की तीन हड्डियाँ स्टैपिस, मेलियस, आकस इन्हीं की आकृति से ध्वनि संबंधी यंत्रों का विकास हुआ। आवाज सुनने केलि ए हमें सीधे कष्ट नहीं उठाना पड़ता वरन् एक प्रणाली काम करती है, वह आवश्यकतानुसार आवाज के शीघ्र या धीमे प्रभाव से भी हमें अवगत कराती रहती है और हम उसके फलितार्थ से तुरन्त परिचित हो जाते हैं। सांप फुसकारता है तो यह प्रणाली केवल एक फुंसकार का बोध ही नहीं कराती वरन् खतरे से सावधान करने के लिए शरीर के सारे रोंगटे खड़े कर देती है। ऐसी बढ़िया व्यवस्था संसार के किसी भी मशीन में नहीं हो पायी।
श्वाँस प्रश्वांस तथा सूंघने की तो कोई मशीन बन ही नहीं पायी। मस्तिष्क जैसी विचार क्षमता तो कम्प्यूटर में भी नहीं। यह सारी बाते ही वैज्ञानिक के महत्व को घटाती और बताती है। कि संसार से कोई अदृश्य किन्तु बुद्धि संपन्न शक्ति है। अवश्य उसकी कलाकारी की बराबरी मनुष्य नहीं कर सकता। यह तुलनाएँ तो बाहरी आघ्र स्थूल है। यदि मनुष्य अपनी चेतना को जान पायें जैसा कि योग विज्ञान बताता है। तो मनुष्य अपनी त्वचा के छिद्रों से सारे विश्व को आँखों से दूर से दूर की वस्तु को, कानों से विश्व व्यापी हलचल को देख सुन और समझ सकता है। चमत्कार जैसी दीखने वाली यह बातें योगियों के लिए ऐसे ही होती हैं, जैसी कि वैज्ञानिकों के लिए टैलीप्रिन्टर, टेलस्टार, , टेलीविजन, लेसर उपकरण एवं अन्याय आधुनिक अनुसंधान।
एक बूढ़ा घास खोदने में सवेरे से लगा हुआ था। दिन ढलने तक वह इतनी खोद सका था, जिसे सर पर लादकर घोड़े वालों की हाट में बेचने ले जा सके। एक सुशिक्षित देर सं उस बूढ़े के प्रयास को देख रहा था। सो उसने पूछा - “ क्यों जी दिन भर परिश्रम से जो कमा सकोगे उससे किस प्रकार तुम्हारा खर्च चलेगा ? घर में तुम अकेले ही हो क्या ?”
बढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा कि कई व्यक्ति से मेरा परिवार है। जितने की घास बिकती है, उतने से ही हम लोग व्यवस्था बनाते और काम चला लेते हैं।
युवक को आश्चर्यचकित देखकर बूढ़े ने पूछा- “ मालूम पड़ता है, कि तुमने अपनी कमाई से ज्यादा महत्वाकाँक्षाएँ संजोये रखी है। इसी से तुम्हें गरीबी में गुजारे से आश्चर्य होता है। “
युवक से तो और कुछ कहते न बन पड़ा पर अपनी झेप मिटाने के लिए कहने लगा- “ गुजारा ही तो सब कुछ नहीं है। दान पुण्य के लिए भी तो पैसा चाहिए। ”
बढ़ा हँस पड़ा। उसने कहा- “ मेरी घास में तो बच्चों का पेट ही भर पाता है, पर मैंने पड़ोसियों से माँग माँग कर एक कुँआ बनवा दिया है, जिससे सारा गाँव लाभ उठाता है। क्या दान पुण्य के लिए अपने पास कुछ न होने पर दूसरे समर्थों से सहयोग माँगकर कुछ भलाई का काम कर सकना बुरा है। “
युवक चला गया। रातभर सोचता रहा कि महत्वाकाँक्षाएँ सँजोने और उन्हीं की पूर्ति में जीवन लगा देना ही क्या एक मात्र तरीका जीवन जीने का है।
मनुष्य ने अनेक आविष्कार किये हैं। आज के इस वैज्ञानिक युग में वह सर्वत्र ने का दम भी भरने लगा हैं, लेकिन अभी तो सृष्टि के आँचल में कितनी ही ऐसी रहस्य मय घटनायें विद्यमान है, जिसका रहस्य वह नहीं जान पाया है। संसार में फैली यत्र तत्र यह रचनायें अभी भी हमारे लिए एक अनबूझ पहेली बनी हुई है। ‘ ग्रेट मिस्ट्रीज “ अनआक्सप्लेन्ड ‘ ‘मिस्टीरियस नॉलेज’ ‘मिस्ट्रीज ऑफ माइण्ड’ ‘ स्पेस एण्ड टाइम’ आदि पुस्तकों में इस तरह की सैकड़ों पुस्तकों का वर्णन है। जो पृथ्वी पर एवं उसके गर्भ में, समुद्र एवं आकाश में स्थित है, जिनके बारे में अभी तक कुछ भी नहीं जाना जा सका है।
समुद्र को ही ले लो 68 करोड़ वर्गमील जितनी जलराशि के ऊपरी सतह वाले प्रशाँत महासागर के मध्य दक्षिणी अमेरिका से कोई 2300 मील की दूरी पर पोलोनेशिया के सुदूर पूर्व में स्थित एक अति रहस्यमय द्वीप समूह है। यूरोपीय अन्वेषकों ने इसका नामकरण ‘ईस्टर आइलैण्ड‘ किया है। पुरातत्व विदों के लिए आज भी यह एक अबूझ पहेली बना हुआ है।
प्राचीन काल में इस स्थान को पृथ्वी की नाभि कहा जाता था। इस स्थान का स्थानीय नाम ‘ के-पिटो-आ-टे-हुनेआ ‘ है। प्रशाँत महासागर का यह द्वीप, ज्वालामुखी पहाड़ों के शृंग स्वरूपों में एक बिन्दु मात्र है। इसकी सर्वप्रथम खोज सन् 1772 में डच अन्वेषक जेकब रोगेवीन ने की थी। उन्होंने ही इसका नामकरण’ ईस्टर द्वीप ‘ रखा था, क्योंकि इसाइयों के पावन पर्व ईस्टर के दिन ही उसने यहाँ पर अपना पैर रखा था। इस द्वीप में अनेकों विशाल काय पाषाण भू तीर्थों को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहता। यहाँ के आदि निवासी भी इस बारे में कुछ नहीं जानते। अन्वेषणकर्ताओं का कहना हैं कि किसी समय यह स्थान उन्नत सभ्यता का केन्द्र था अन्यथा जिस तरह से ये विशालकाय शिलाखण्ड मूर्तियों के शक्ल में स्थापित हैं, यों ही बेतरतीब ढंग से पड़े होते हैं। उनके अनुसार ऐसी मूर्तियाँ 600 से अधिक संख्या में पायी गयी। जिसमें -रानारोराकु’ ज्वालामुखी के पास खड़ी हुई एक विशालकाय शिलाखण्ड से बनी एकात्मक, मूर्ति 33 फीट ऊँची है। इसका वजन लगभग 90 टन है। बताया जाता है कि 33 फीट ऊँचाई वाले इस प्रस्तर मूर्ति के सिर पर ग्रेनाइट पत्थर की 12 टन वजनी नलकाकार एक कलगी लगी हुई थी जो 6 फुट ऊँची और 8 फीट चौड़ी थी। इस प्रस्तर प्रतिमाओं के अतिरिक्त पक्की सड़कें, अनेकों मंदिर एवं सौर वेधशालाएँ आदि बनी हुई है। जो वहाँ के मूल निवासियों से भी पूर्व प्राचीन काल में सुविकसित सभ्यता का प्रमाण है। इतने पर भी यह एक रहस्य बना हुआ है। कि ग्रेनाइट जैसे पत्थर पर हथौड़ा मारने से चिंगारियाँ निकलती हैं, से बने इस तरह के अनेकों एकलव्य प्रतिमायें बनाना कैसे संभव हुआ होगा ? किन लोगों ने इन्हें बनाया होगा और किस लिए बनाया होगा ?इतनी भारी और ऊँची प्रतिमायें कहाँ से लाई और कैसे खड़ी की गयी होगी? इतना ही नहीं ईस्टर द्वीप में पाई गई चित्र लिपि को भी अभी तक वैज्ञानिक कुटानेवाद करने में सफल नहीं हो सके हैं हर प्रकार से विस्मित कर देने वाला यह द्वीप खोज कर्ताओं के लिए अन्वेषण का केन्द्र बना हुआ है।
‘अन-टू -दि अननोन ‘ नामक पुस्तक में बताया गया है कि ईस्टर द्वीप समूह जो प्रशांत महासागर में चिली राज्य के अधीनस्थ हैं, वहाँ 30 फीट से लेकर 70 फीट और 600 से अधिक मेगालिथक प्रतिमायें पाई जाती है। नार्वे के मूर्धन्य नृतत्ववेत्ता हेअरथल ने अपने एक पुरातत्वीय अभियान में बताया कि इस द्वीप समूह में जो मेगालिथ शिलाखण्ड जमीन पर गिर गये थे, उन्हें उठाने के लिए 180 आदमियों की आवश्यकता पड़ी थी। इन प्रतिमाओं के अकेले सिर का ही वजन 18 टन से कम नहीं है। इस प्रकार कोरसिका में साठ से अधिक मेगालिथक मूर्तियाँ पाई गई है। तुर्किस्तान में भीर नेमरुरुड डाग में पायी जाने वाली कई प्रस्तर प्रतिमाओं का अध्ययन हो रहा है।
मिश्र एवं ब्राजील में स्थित पिरामिडों के रहस्य पूर्णतया अभी तक उजागर नहीं हो पायें थे कि विश्व में अनेक क्षेत्रों में फैले विशालकाय मेगालिथक प्रतिमायें भी अपना उत्तर ढूंढ़ने के लिए वैज्ञानिकों को विवश कर रही है। कि इन्हें इतना परिश्रम करके क्यों बनाया गया था? वे किस उपयोग की रही होगी? यह सभी प्रश्न अभी भी अनुतरित है।
अनुसंधान कर्ता विज्ञानियों का कहना हैं कि दक्षिण डाकोटा अमेरिका में एक विशालकाय मेगालिथक शिलाखण्ड है, जिस पर सिओक्स के रेड इण्डियन्स अपने मेरुदण्ड को घिसते हैं और अपनी मनःशक्ति को ले जा करके साइकिक शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। इसी तरह इण्डीज पर्वत में एक ऐसा भारी भरकम प्रस्तर खण्ड हैं जिसमें फन फैलाये नाग के आकार का एक छिद्र है। युद्ध के समय सैनिक अपनी मुट्ठी उस स्थान पर रख देते हैं और असामान्य साहस और वीरता के भाव अपने भीतर प्रविष्ट कर जाने की अनुभूति करते हैं। जाँच कर्ता वैज्ञानिकों ने पाया कि उक्त स्थान पर यदि कम्पास रख दिया जाय तो उसकी सुई जोर जोर से घूमने लगती है, इंग्लैंड में भी कारेनिसले मार्ग के अंत में ‘ मेन एण्ड टाँल ‘ नामक एक शिलाखण्ड है। इसके मध्य एक बड़ा सा छिद्र है जिसमें सूखा रोग व गडमाला के रोगों को तीन बार निकालने से वह रोग मुक्त हो जाता है। , ऐसी मान्यता है। इंग्लैंड के अतिरिक्त फ्राँस एवं विश्व के अनेक अन्य स्थानों में इस तरह के रहस्यमयी मेगालिथक रचनायें पायी गयी है। जिनकी जाँच परख वैज्ञानिक उपकरणों को ध्यान से भी की गई है, पर उत्तर वही ढाक के तीन पात।
इंग्लैंड के सोमरसेट काउन्टी की ‘ब्रु’ नदी के समीप स्थित ग्लेसनबरी नगर यात्रियों के लिए मक्का -मदीना जैसा प्रसिद्ध स्थल है। कहा जाता है कि क्रूस पर चढ़ाते समय ईसामसीह के शरीर से बहने वाले रक्त को एक पात्र में एकत्रित कर लिया गया था। वह पवित्र पात्र ‘ दी होली ग्रेइल’ इसी गिरिजाघर में रखा हुआ है। इस स्थान को ड्रयूइड लोग पवित्र मान कर प्रतिवर्ष उसकी यात्रा करते है इस स्थान की एक अन्य विशेषता यह भी है कि यह ‘लेंज’ अर्थात् भीम ऊर्जा प्रवाह के मार्ग में पड़ता है। ‘लेंज ‘ अर्थात् रहस्यमयी सूक्ष्म ऊर्जा प्रवाह की खोज सर्वप्रथम अल्फ्रेड वोटकीन्स ने की थी। इससे पूर्व दन्त कथाओं में वर्णित कई चमत्कारी स्थानों का अन्वेषण सगुयिने डाउजर अर्थात् सगुनक दण्ड के माध्यम से तथा पृथ्वी की रहस्यमयी परतों के अनुसंधानकर्ता परम्परागत ढंग से करके यह प्रतिस्थापित कर चुके थे कि ग्लेस्नबरी, स्टोनहेज, एवबरी आदि प्राचीन स्थानों में पाये जाने वालेभीमकाय विशाल खण्डों मेगालिथक में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा पायी जाती है, पर उसे विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा नहीं कहा जा सकता। यह कोई विशिष्ट प्रकार की ऊर्जा है जिसे जाना नहीं जा सका है। वोटकीन्स ने कोई 470 स्थानों में इस प्रकार की ऊर्जा स्रोत ढूंढ़ निकाले थे। उनके अनुसार कई ऐसे ऊर्जा मार्ग भी हैं जो बीस मील से लेकर सैकड़ों मील तक फैलें हुए है। इस मार्ग में ही अधिकाँश मेगालिथक विशाल खण्ड खड़े हुए है जिनके बारे में रहस्यमय दन्त कथायें प्राचीन काल से जुड़ी हुई है कि वे अदृश्य जीवधारियों से संबंधित है तथा अभौतिक ऊर्जा से जुड़ी होने के कारण वे उड़ भी सकती है। इनको स्पर्श आदि करने से विभिन्न रंगों का शमन हो सकता है आदि।
विज्ञानवेत्ताओं ने इस संदर्भ में गहन छानबीन की है और पाया है कि उक्त बातें कुछ हद तक सही है। टोमस ग्रेइव्स ने अपनी पुस्तक ‘ नीडिल्स ऑफ स्टोन ‘ में बताया है कि आल्पस नगर में स्थित संत स्फिटन के गिरिजाघर की दीवार में लगे हुए एक तीन फीट ऊँचे पत्थर में इस प्रकार की ऊर्जा तरंगें निकलती हैं कि इसी तरह पृथ्वी के कुछ क्षेत्रों में स्पन्दनशील ऊर्जा निकलती है जिसमें ज्वार- भाटे की तरह ‘पॉजिटिव’ एवं ‘निगेटिव ‘ पोलैरिटी तो है पर उन्हें विद्युत चुम्बकीय नहीं माना जा सकता। इस ऊर्जा प्रवाह की प्रमुख विशेषता यह है कि उसकी मानवी मन की प्रक्रिया होती है और यह उसके क्रिया कलापों को प्रभावित करती है।
भावुक प्रकृति के लोगों के लिए तो प्रकृति के हर रहस्य तो भगवान की लीला है। उन्हें डाउजर आदि परम्परागत माध्यमों से मिली जानकारी से भी संतोष हो सकता है। लेकिन विज्ञान के इस युग में प्रत्यक्षवादियों को तो तभी संतोष हो सकता है जब उनकी पुष्टि वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से हो। इस संबंध में प्रकृति की अनबूझ पहेलियों समझाने के लिए इंग्लैण्ड में ‘ दो ड्रैगन प्र्रोजेक्ट ‘ के वैज्ञानिक ने कदम बढ़ायें। लेहर्न्टस पत्रिका के अनुसार मूर्धन्य प्राणिवेटा जीन बरनाट ने इस संबंध में गहन अनुसंधान किया है। पिछले दिनों अपने एक विद्यार्थी के साथ जब वे क्रीकोवेल मेगालिथ नामक शैलखड के पास बैठे चमगादड़ों की प्रतीक्षा कर रहें थे कि अचानक अल्ट्रा साउन्ड डीअक्टर की सुई हिलने लगी। इस घटना से पता चला कि सभी मेगालिथ इस प्रकार की श्रवणातीत ध्वनि तरंगें उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात वे रोल राइट्स स्टोन के क्षेत्र में गये जहाँ प्रोजेक्ट का प्रमुख कार्यालय था। उन्होंने पाया कि शिलाखण्ड से दिन की अपेक्षा सुबह ज्यादा ऊर्जा तरंगें निकलती है। इसके बाद उन्होंने जहाँ कहीं भी मेगालिथ शिलाखण्ड थे सभी जगह परीक्षण किये और उक्त धारणा की पुष्टि की। प्रोजेक्ट के प्रमुख डॉ0 जी. बी. रोबीन्स ने भी उक्त तथ्य की पुष्टि करने के लिए कोसलरीग, विरल शायर में एवबरी आदि स्थानों का भ्रमण किया और प्रातः कालीन सूर्योदय बेला में अनेकों परीक्षण किये। पीछे विशाल खण्डों से निकलने वाली श्रवणातीत ध्वनि तरंगों की प्रमाणिकता की जाँच अन्यान्य वैज्ञानिक ने भी की और सही पाया। उनका निष्कर्ष है कि इन ऊर्जा तरंगों के कारण ही व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक रोग युक्त होते हैं। इतने पर भी इस रहस्य पर अभी पर्दा ही पड़ा हुआ है, कि केवल उन्हीं पत्थरों से ही ऊर्जा क्यों निकलती है और वह भी सुबह। इस तरह के कितने ही रहस्य है, जिन्हें पृथ्वी अपने गर्भ में छिपाये बैठी है। उस पर विज्ञान यह कहता है कि हमने सब जान लिया है। है न यह हास्यास्पद कथन ॥ समझने के लिए यह सारा जीवन ही मिला है। हम अनुसंधान वृत्ति जारी रखें, चेतना की गहराइयों में प्रवेश करने के लिए आध्यात्मिक आश्रयों का सहारा ले, तो अनेकानेक रहस्योद्घाटन स्वतः होते चले जायेंगे।
कुम्हार घड़ा गढ़ते समय भीतर से सहारा देता और बाहर से चोट लगता है। सच्चे गुरु का व्यवहार भी श्रद्धावान शिष्य के लिए ऐसा ही होता है।
मनुष्य सामान्य रूप से जो कुछ देखता और जितना कुछ ग्रहण करता है, वह उसकी स्थूल संरचना की विशिष्टता की परिणीत है।
उसके सूक्ष्म बनावट और उसके सूक्ष्म क्रिया - कौशल इतने विलक्षण और विराट स्तर के है, जिन्हें शब्दों की अभिव्यक्ति करना संभव नहीं। जब हम आध्यात्मिक उपचारों द्वारा चेतना को परिष्कृत करना प्रारम्भ करते हैं तो सूक्ष्म चेतना केन्द्र विकसित और जागृत बनने लगता है।
यही यह अवस्था है जब, अमूर्त, मूर्तिमान और अगोचर गोचर बनने लगते हैं। दूसरे शब्दों में साधक को परोक्ष जगत में गति आरंभ हो जाती है और वह बहुत कुछ ऐसी देखने और जानने की क्षमता अर्जित कर लेता है, जो साधारण नहीं, असाधारण है। विगत ओर अनागत समय की जानकारियाँ प्राप्त कर लेना ऐसे लोगों के लिए संभव हो पाता है, किन्तु यदा कदा ऐसा अनायास और आकस्मिक रूप से ही हो पाता है और व्यक्ति भूत एवं भविष्य के संबंध में महत्वपूर्ण सूचनाएँ हस्तगत कर लेता है।
घटना जून 1974 की है। एक शनिवार को फिलक्सबोरी, हम्बरसाइड की लेस्ली कैसल्टन नामक एक महिला सुबह सुबह अपने टेलीविजन सेट पर फिल्म देख रही थी, तभी अचानक बीच में ही चलचित्र रुक गया और टेलीविजन के पर्दे पर दो शब्द उभरे -’विशेष समाचार’। इसी के साथ एक पुरुष शब्द उभरा और समाचार देने लगा कि फिलक्सबोरी के विशाल रसायन संयंत्र में एक भयानक विस्फोट के साथ आग लग गई है। इससे लगभग संपूर्ण संयंत्र विनष्ट हो गया है और करीब 21 लोग मारे गये हैं। आस पास के क्षेत्र को खाली करा दिया गया है क्योंकि उसमें खतरनाक जहरीली गैसें निकल रही है। समाचार वाचक ने घायलों की संभावित संख्या के साथ साथ उन रसायनों का उल्लेख किया जो इस भीषण दुर्घटना के लिए जिम्मेदार समझे जा रहें थे।
इस उद्घोषणा के साथ विशेष समाचार समाप्त हुआ और पर्दे पर फिल्म पुनः अपने लगी। कैसन्टन ने समझा कि दुर्घटना की जानकारी देने और उससे निकल रही विशेष गैस के प्रति लोगों को सतर्क करने के लिए ऐसा किया गया। दोपहर को उसके जब कुछ मित्र भोजन के लिए घर पर आई तो उनसे इस घटना की चर्चा की। इसके बाद बात आई गई हो गई। रात को जब लेस्ली और उसके पति ने टी.वी. पर समाचार देखा तो उसमें दुर्घटना का समय साढ़े चार बजे शाम कह कर उल्लेख किया गया। लेस्ली ने सोचा यह वाचक की भूल है किन्तु जब दूसरे दिन अर्थात् रविवार का समाचार पत्र आया तो तो उसमें भी घटना का वही समय पाकर उसने सम्पादक को फोन किया दुर्घटना का सही समय जानना चाहा, किंतु जवाब में वही समय बताया गया, जिसकी चर्चा समाचार पत्र में की गयी थी। उसने बार बार संपादक से एक ही प्रश्न किया कही आप भूल तो नहीं कर रहें है। उत्तर में हर उसके सही होने की दृढ़ता दोहराई गई। शंका निवारण जब यहाँ से नहीं हो सका तो लेस्ली कैसटन ने दूरदर्शन पर फोन कर यह सुनिश्चित करना चाहा कि प्रातः में वे विशेष समाचार और रात्रिकालीन समाचारों में दुर्घटना से संबंधित समय में जो विरोधाभास है, उसमें सही कौन सा है ? इस प्रश्न के उत्तर में केन्द्र से प्रति प्रश्न किया गया कि पूर्वाह्न में तो यहां से कोई विशेष समाचार तो प्रसारित ही नहीं किया गया, फिर आप किस समाचार और समय संबंधी किस अंतर्विरोध की चर्चा कर रही है ? यहाँ से दुर्घटना संबंधी वही समय हर बुलेटिन में गया है जो घटना का वास्तविक सम है अर्थात् साढ़े चार बजे शाम। यह सुनकर लेस्ली की हैरानी और बढ़ी। वह विचार करने लगी कि फिर जो कुछ उसने फिल्म के मध्य सुना वह क्या था ? इसे कानों का धोखा कहा जा सकता है। मन मानने को तैयार नहीं था, क्योंकि उसमें दुर्घटना का सुविस्तार वर्णन था, जिसका जिक्र उसने अपनी एक सहेली से दोपहर के वक्त किया था एवं मृतकों एवं घायलों की संख्या भी बताई थी, रसायनों के नाम भी बताये। यह सब कुछ समाचार पत्र से हू बहू मिल रहें थे। केवल समय के संबंध में ही विवाद की गुंजाइश थी। इतनी सटीक जानकारी को कानों की भ्राँति नहीं कहा जा सकता। तो फिर यह क्या थी? टी. वी पर यह संदेश 6 घंटे पूर्व प्रसारित करने वाला कौन था ? और प्रसारण भी ऐसा जो सिर्फ उसी के टेलीविजन पर आये। शो यंत्र उसे ग्रहण न कर सके। उसने बहुत माथापच्ची की, पर कुछ समझ नहीं आया। हार कर इस प्रसंग को अपने दिमाग से निकाल दिया।
उसी वर्ष मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता एण्ड्र टामस की एक पुस्तक प्रकाशित हुई नाम था “ वियोण्ड दा टाइम वैरिया “। इस ग्रंथ में उन्होंने इस प्रकार की संभावनाओं से इनकार नहीं किया है कि सुदूर भविष्य के गर्भ में पक रही कोई महत्वपूर्ण घटना विद्युत चुम्बकीय तस्वीर का रूप ग्रहण कर अकस्मात् किसी टी. वी. सेट पर मूर्तिमान हो पड़े। चूँकि उपरोक्त उपकरण के घट चुकने तक उसकी रचना प्रकाशित की जा चुकी थी, अतएव उसे पुस्तक में सम्मिलित नहीं किया जा सकता।
एक मिलते-जुलते वृत्तान्त का वर्णन लेखक ने अपनी कृति में यों किया है। प्रसंग सन् 1946 का है। अमेरिका के इलिवान्यज राज्य के बेलवुड शहर की एक महिला हेलन याँर्क एक दिन अपने रसोई घर में बर्तन साफ कर रही थी, तभी उसकी खिड़कियों में लगा काँच अचानक झिलमिला उठा। नजर उधर गयी तो सिनेमा के पर्दे की तरह उसमें चित्र दिखाई पड़ रहें थे। सर्वप्रथम उसने घर के बाहर सड़क किनारे चाडी अपनी कार देखी। इसके उपरान्त उत्तर की दिशा से आती हुई एक अन्य कार दिखाई पड़ी। ड्राइवर उसकी गति और दिशा नियंत्रित न कर सका और खड़ी कार से वह किनारे से आ टकराई। चालक तुरंत बाहर निकला। उसने सामने से दरवाजा खोला। उससे बाहर आता हेलन को एक व्यक्ति दिखाई पड़ा। वह लंगड़ा और लड़खड़ा रहा था। संभवतः दुर्घटना से चोट आई थी। उसने पहले तो दुर्घटनाग्रस्त मोटर पर नजर डाली और भागने लगा॥ शायद वह पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता था, इसीलिए भाग खड़ा हुआ, पर नियन्ता के अदृश्य कैमरे ने उसका पीछा किया और वह एक भवन के तहखाने में रखे कुछ बड़े संदूकों के पीछे छिपता दिखाई पड़ा। इसके पश्चात दृश्य परिवर्तित हुआ। हेलन अब पुलिस को उन दोनों का निरीक्षण करती देख रही थी। दृश्य का पुनः पटाक्षेप हुआ। अब सामने पुलिस स्टेशन दृष्टिगोचर हो रहा था। अधिकारीगण कार चालक के लिए अन्दर प्रवेश कर रहें थे। एक कमरे में ले जा कर उससे पूछताछ करनी आरम्भ कर दी। ड्राइवर भयभीत प्रतीत हो रहा था। चालक ने पूछताछ के मध्य अपने नशे में होने की बात स्वीकार की। इसके बाद पुलिस अधिकारियों ने इसे दुर्घटना का मामला मान लिया। खिड़की का काँच एक बार फिर चमका और सब कुछ सामान्य हो गया। इस विचित्र दृश्य को देख कर हेलन को कौतूहल तो हुआ, पर उसने कहा किसी और से नहीं। दोपहर बाद वह, उसका पति और एक मित्र स्मिटी एक राजनीतिक सभा में सम्मिलित होने गये। वे सभी मित्र की गाड़ी में सवार हो कर गये। जबकि उनकी अपनी कार घर के बाहर यथावत खड़ी रही। हेलेन ने अपने पति से उसे गैराज में बन्द कर देने के लिए बहुत आग्रह किया, पर पति ने हर बार यह कह कर टाल दिया कि कुछ नहीं होगा।
शाम को जब वे घर लौटे तो उन्होंने अपनी गाड़ी को क्षतिग्रस्त पाया। लोगों ने पुलिस को सूचित करने की सलाह दी, किन्तु हेलन ने यह कहते हुए सबको आश्चर्यचकित कर दिया वह सब कुछ जानती है। पीछे उसके बताये भवन से उस दूसरे व्यक्ति को पकड़ा गया, जो दुर्घटना के बाद उसके तहखाने में छिपा बैठा था। बाद में उसने अधिकारियों को दुर्घटना का विस्तृत ब्यौरा दिया तो पुलिस अफसर ने इससे सहमति प्रकट की। अधिकारियों के यह पूछने पर उसने इतनी जानकारी कहाँ और कैसे प्राप्त की? उसने खिड़की पर उभरी फिल्म का विस्तृत वृत्तान्त बताकर सभी को अचम्भे में डाल दिया।
यह महत्वपूर्ण घटना पहली बार हेलेन ने ‘फेट’ पत्रिका के संपादक को सन् 1988 में बतायी थी और उसी वर्ष के जनवरी अंक में यह सर्व प्रकाशित हुई।
‘भविष्य गमन’ क्या है? समय के इस काल खण्ड में व्यक्ति क्यों कर प्रवेश कर पाता हैं? प्रवेश करने के पश्चात वह अपने पूर्व दिक्−काल में कैसे लौट आता है, इन सब को सही वैज्ञानिक व्याख्या ‘क्वाँटम भौतिकी’ में निहित है। जे. वी दृ प्रिस्टले ने अपनी पुस्तक “मैन एण्ड टाइम” में इसकी विशद व्याख्या प्रस्तुत की और लिखा है कि जब हम त्रिआयामी विश्व के किसी उच्चतर आयाम की व्याख्या करते हैं तो उसका अर्थ मात्र समय के आयाम से होता है। उनने यह बात की संभावना प्रकट की है कि इस प्रकार के अनेकानेक ‘टाइम डायमेन्सन’ इस भौतिक जगत के समानान्तर उससे गुँथे हुए हो सकते हैं। यही कारण है कि व्यक्ति अपने स्थान पर मौजूद होते हुए ही किसी अन्य विश्व में पहुँच जाता है। उनने इस बात को अपने ग्रंथ में उल्लेख किया है कि क्वांटम भौतिकी के विकास द्वारा संभव है। आने वाले काल में समय के व्यवधान को दूर किया जा सके, ताकि मनुष्य एक आयाम से दूसरे आयाम में
अप्रतिहत प्रवेश कर सके। उनने संभाव्यता व्यक्त की है कि विज्ञान जब भी कभी इस प्रकार की क्षमता अर्जित करेगा और आदमी को स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत में प्रविष्ट कराने में सफल हो सकेगा, तो उसके लिए निश्चित रूप से किसी न किसी प्रकार के वाह्य कारक की आवश्यकता पड़ेगी, जो उसके मस्तिष्क में क्रिया कर उसे इस योग्य बना दें कि व्यक्ति अपने स्थान पर ही स्थित रहकर किसी अदृश्य लोक की अगोचर दृश्यावली का सिंहावलोकन कर सके। दूसरे शब्दों में उसे एक डायमेन्सन से किसी दूसरे आयाम में ले चलें। इस प्रकार के कारकों में आकस्मिक तीव्र प्रकाश, असामान्य स्त्र की विद्युत ऊर्जा आदि ऐसे उद्दीपन हो सकते हैं, जो उनके अनुसार मनुष्य को कृत्रिम रूप से अनागत और विगत काल खण्डों में प्रवेश करा सके।
‘दि मास्क ऑफ टाइम’ नामक अपनी कृति में लेखिका जोन फोरमैन स्वयं से संबंधित अनागत गमन की कई घटनाओं का वर्णन किया है। इसी प्रकार ‘ टाइम स्पिल ‘ नामक ग्रंथ में इवान सैर्ण्डसन ने इस बात की आशा प्रकट की है कि कृत्रिम ढंग से एक आयाम से दूसरे आयाम में प्रवेश कर सकना आने वाले समय में विज्ञान सफलता पूर्वक संपन्न कर सकेगा।
कृत्रिमता की तुलना में यदि हम वास्तविकता पर विचार करें तो विदित होगा कि वह कही अधिक सरल व सुनिश्चित, अधिक स्थायी तथा अधिक आनन्ददायक है। हम दुरूह पथ की अपेक्षा सरल और सुनिश्चित राजमार्ग चुनें, स्वयं को परिष्कृत करें, अंतराल को उदात्त बनाये। समय के व्याघात को समाप्त कर एक से दूसरे आयाम में पहुंचने और वहाँ की दिव्य अनुभूतियों से स्वयं ओत प्रोत करने का इससे कोई सुगम उपाय नहीं। अध्यात्म तत्व ज्ञान का एक शब्द में यही निचोड़ है।
मंजरियों के सुरभित भार से कोमल शाखाएँ बड़ी डालियों के साथ झुक गयी थी। ऐसा लगता था कि आम के पेड़ किसी अज्ञात के विलुप्त चरण चिन्हों पर अपना सौरभ संभार उत्सर्ग करने को आकुल हो पड़े हों। भँवरों की गुँजार के बीच कोयल की ‘कूहु’ और पपीहे की ‘पी’ कहाँ हृदय के रस को भिगोये दे रही थी।
बीच में एक पीपल था। अपने मूल में स्थित संन्यासी की भाँति वह भी अपने कोपलों के गेरुए रंग से रंग रहा था। एक भी पत्ता हरा न था। एक प्रशाखा भी पत्रहीन न थी। कोमल अरुण पत्र पूर्णतया ढके थे।
संन्यासी युवक था। उसके कपड़ों की तरह उसका शरीर भी अरुणाभ लग रहा था। इस आम के बगीचे में एक पीपल के नीचे संपूर्ण राग को घनीभूत किये भीविराग की मूर्ति बना बैठा था। शृंगार की गोद में अचंचल शाँत रस की भाँति वह बड़ा मोहक लग रहा था।
‘ ये विलोल किसलय ‘ संन्यासी के नेत्र ऊपर उठे। मलय पवन अरुण कोमल पत्तों से अठखेलियाँ कर रहा था। मेरा मन भी इसी प्रकार चंचल हो रहा है। यह अपने आप ही कह रहा था।
‘ वह सुन्दर सलोना हास्यपूर्ण मुख, बड़ी बड़ी आंखें सुकुमार किन्तु मोहक देह यष्टि। आँखों में से कुछ जल बिन्दु छलक उठे। बाहर का राग अंतर में प्रवेश कर गया था। संभवत अभी नया नया वेश धारण किया था। किसी की मधुर यादें प्रकृति का प्रोत्साहन पाकर अंतर्मन में उल्लसित हो उठी थी।
यह सब मोह है। बड़े जोर से उसने सिर झटक दिया। जैसे मस्तक पर रखे भार को दूर फेंक देना चाहता हो। आँखों पर हाथ फेरा। कमर सीधी की और आँखें बन्द कर ली। संभवतः ध्यान करने की कोशिश होने लगी।
मन तो एक नटखट बालक जैसा है। जिधर जाने को कहो उधर झाँकता नहीं चाहता, और जिधर से वर्जित करो, चौकड़ी भरने में उसे बहुत उत्साह रहता है। अवश्य ही बहानेबाजी उसे बहुत बढ़िया आती है।
कई बार आँखों को जबरदस्ती बन्द किया। प्राणों को रोकने का सतत् प्रयास कष्ट देन लगा। माथे पर पसीने की बूँदें झिलमिल करने लगी, किन्तु मन नहीं माना नहीं माना। विवश संन्यासी ने आंखें खोल दी। आसन ढीला हो गया।
यह सब मिथ्या है वे सब अपने आपस कहने लगे। मेरी बुद्धि में कोई भ्रम नहीं। यह सब नश्वर है। न जाने क्या क्या ऐसी बाते वे अपने आप में बड़बड़ाये जा रहे थे।
यह सौरभ समारोह, यह कोमल और पंचम स्वर, यह किसलय हल कमनीयता, उनके नेत्र अपने चारों ओर घूम रहे थे। क्या यह संपूर्ण सौष्ठव बेकार है ? क्या यह समस्त सुख संभार दुखदायी हैं ? आप कह सकते हैं कि उनके द्वारा उनका मन बोल रहा था।
‘ज्ञानानन्द तू भ्रान्त हो रहा है। ’ वे पुनः चौके ‘ यह सब मायिक प्रलोभन है। मस्तिष्क उन्हें चेतावनी दे रहा था। अंतरात्मा की दृढ़ पुकार उन्हें एक क्षण के लिए सजग कर रही थी। संन्यासी इस मन मस्तिष्क के द्वन्द्व से चंचल हो उठें। वह उठ खड़े हुए। अधोवस्त्र में लगी पीछे की धूल एवं तिनकों को हाथ से झाड़कर बड़ी तेजी से वहाँ से चल पड़ें।
‘मल में निवृत्ति तपस्या- यम नियमादि पालन, श्रवण मनन से होती है। विक्षेप दूर होता है उपासना निदिध्यासन या ध्यान से और आवरण समाधि भगवत्कृपा से स्वतः तिरोहित हो जाता है।
चन्द्रमा की चाँदनी ने उस सुविस्तृत अमर भूमि पर चाँदी की कालीन बिछा रखी थी। आस पास न कोई गांव था और न पेड़। धान की ऊँची नीची मेड़े चारों ओर बिखरी थी। खेतों में कटे धान की जड़े साफ दिख रही थी। धवल चांदनी में एक चौड़ी मेंड़ पर जो राहगीरों के निरन्तर आने जाने के बीच में उजली हो गयी थी, युवक संन्यासी चले आ रहे थे।
‘कोई भी तो नहीं है। ’ एक बार खड़े होकर उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। अपने दोनों ओर इधर उधर देखा। मैंने अभी किसकी शास्त्र चर्चा सुनी हैं ? ‘ वह कौन था ? कहीं कोई आड़ नहीं थी। कई फलाँग दूर का व्यक्ति भी दिख जाता। स्वर समीप से आया था।
‘हरि ॐ ‘ उच्च स्वर से साधु ने कहा। शरीर में रोमाँच हो आया था। अकारण ही मन में एके आतंक उठ रहा था। उसी को दूर करने के लिए उन्होंने ध्वनि लगायी थी। उसे वे दुहराते ही जा रहे थे। चरणों की गति के साथ प्राणों ने भी गति बढ़ा दी और हृदय ने भी। पता नहीं क्यों गर्मी लगने लगी थी और मस्तक पर कुछ पसीने की बूँदें भी इस रात की सर्दी में पकड़ होने लगी थी।
‘अभयं सत्यं संशुद्धि’ याद हो आया। ‘छिः’ मैंने अभी तक साधनावस्था की पहली सीढ़ी पर भी पाँव नहीं रखा है। यह शरीर का मोह है। संन्यासी वही खड़े हो गये।
‘ तब आप क्या करना चाहते हैं कि विश्वामित्र की तपस्या ने उनका मल नष्ट कर दिया था और इसी से वरिष्ठ पुत्रों की हिंसा में लगे थे एवं महातपस्वी दुर्वासा की भी यही दशा थी।
संन्यासी चारों ओर आंखें फाड़ फाड़कर देख रहे थे। शरीर में रोमाँच बार बार हो रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि यह शब्द कहाँ सके आ रहा है।
‘अरे नहीं’ मृदु हास्य की ध्वनि हुई। यह क्रोधादि विकार तो विक्षेप के फल थे और इसी से वे स्थायी न रह सके। फिर भी इतना स्मरण रखना चाहिए कि आवरण निवृत्ति से पूर्व साधन शिथिल होते ही निवृत्ति होते हुए भी मल विक्षेप पुनः जागृत हो जाते हैं, क्योंकि इसका मूल तब तक नष्ट नहीं हुआ रहता।
सहसा धक से एक लपट बगल के खेत की दूसरा मेंड़ से उठी। संन्यासी का हृदय भी एक बार धक से हो गया। नेत्र उधर ही स्थिर हो गये। सहसा उज्ज्वल चांदनी में धुँए की उठती हल्की रेखा उन्होंने देख ली। कुछ आश्वासन मिला। पाँव उधर ही खेत की ओर मुड़ गये।
ऊँचे नीचे खेतों में एक स्थान पर लकड़ी के दो कुन्दे धीरे धीरे जल रहें थे। आग के दोनों ओर एक साधारण सा मैला उत्तरीय बिछायें दो अलमस्त लेटे थे। उनकी कटि में कौपीने थी, पर गैरिक नहीं और कोई वस्त्र नहीं था। न भभूतिए, न जटाधारी। दोनों के समीप एक एक मिट्टी की हण्डी रखी थी। पता नहीं कैसे साधु थे वे।
ॐ नमो नरायणा “ संन्यासी ने देखते ही कहा। उनमें से जो कुछ वृद्ध थे बोले नारायण। आओ संत कोई उठकर अठा नहीं। संन्यासी ने भी उधर ध्यान नहीं दिया॥ वे अग्नि के समीप एक ओर बैठ गये।
इस अग्नि को तो आप देख ही रहे हो। वृद्ध साधु ने कहा “प्रज्वलित होने से पहले यह काष्ठ रूप में ही तो थी? यह भी समझते ही हैं कि अभी इस पर वृष्टि हो जाय तो तो यह अवशेष काष्ठ ही रहेगी। क्या आप ऐसा भी कोई उपाय गता सकते हैं जो वृष्टि से बचा सके। “
“ बहुत सीधी बात है “ संन्यासी ने कहा “ इस पर छाया कर दी जाये। “वर्षा तो होगी ही। बड़े बड़े की अग्नि इसमें बुझ जाती है और पुनः उसके लिए दौड़ते हैं। वृद्ध जैसे अपने आप में कुछ कह रहे थे। “ इस प्रकृति गगन में वर्षा भले कैसे रुकेगी। अग्नि तो रक्षा के लिए छाया चाहती है। “
“ मैं कुछ भी समझ नहीं सका भगवन्।
“संन्यासी ने बड़े विनम्र भाव से प्रार्थना की।
“अग्नि स्वतः अपनी छाया नहीं बनाती। ” वृद्ध ने प्रार्थना पर ध्यान दिया ही नहीं। वे वैसे ही कहते गये। “छाया तो उसे दूसरे से ही प्राप्त होती है। ”
“ किन्तु भगवन्.............। ” संन्यासी कुछ कहने जा रहे थे। उनकी भावभंगिमा कह रही थी कि अभी वे कुछ समझ नहीं सके है और अपनी प्रार्थना दुहराने जा रहे है।
“ नहीं नारायण “ वृद्ध ने उन्हें बीच में ही रोका “हम तो अनपढ़ है। आप श्रीवत्स लक्षित क्षीरशायी का ध्यान करें, वही आप को छाया देंगे। ”
हाँ सन्त ; उन्होंने अपने सहचर से पूछा हमारे अभ्यागत के आने का समय ही गया है ?
“प्रभु का अनुमान व्यर्थ नहीं होता। “ उस युवक साधु ने इस प्रकार नम्रता से उत्तर दिया जो बताता था वह वृद्ध का शिष्य है। ” पंडित गोपीनाथ आने ही वाले है। ”
संन्यासी ने इतना ही समझा कि ये दोनों महापुरुष किसी की प्रतीक्षा कर रहे है, पर क्यों ? यह भी क्या कोई प्रतीक्षा करने का स्थान हैं ? इस धान के खेतों में इस अर्द्ध रात्रि में कौन तीसरा व्यक्ति यहाँ आवेगा ? उससे मिलने को यही स्थान क्यों निश्चित किया गया ? अनेक प्रकार की शंकाएँ उठ रही थी। इनका कोई भी समाधान न था।
“ लीजिए पण्डित जी आ गये। ” युवक साधु ने कहा और थोड़ी दूर पर एक उज्ज्वल वस्त्र पहने कोई आता दिखाई पड़ा। चुनकर पहिनी धोती, कुर्ता, कन्धों पर दुपट्टा सभी दुग्धोज्ज्वल वस्त्र थे।
निकट आने पर एक गौरवर्ण तेजस्वी व्यक्ति के दर्शन हुए जिनका विशाल मस्तक त्रिपुण्ड की भस्म से विभूषित हो रहा था।
“नारायण “ सहसा वृद्ध बैठ गये। युवक साधु ने उठकर अग्नि के एक ओर चद्दर बिछा दिया। संन्यासी बड़े आश्चर्य में थे के प्रति महापुरुषों को इतना सम्मान प्रदर्शन क्यों ?
टाप इस सेवक को लज्जित न करें। पण्डित गोपीनाथ ने दोनों को हाथ पकड़कर मस्तक झुकाया।
“हे” संन्यासी चौंक पड़े। वे दोनों साधु उनका चद्दर व हड्डिया क्या हुई। यहाँ तो वही पण्डित एकाकी उसके सम्मुख खड़े है।
संन्यासी को चकित होता देख पण्डित गोपीनाथ बोल पड़े “ सिद्धों की गति के संबंध में आप को इतना आश्चर्य क्यों ? आप पर कृपा करके उन्होंने दर्शन दिये है। अब आप निकट ही पधार कर इस ब्राह्मण के घर को पवित्र करें। आप उन से परिचित जान पड़ते हैं। संन्यासी ने उत्सुकता पूर्वक पूछा “वे कौन थे ?यदि मैं जानने का अधिकारी होऊँ........................।
“ वे भगवान दत्तात्रेय के अंतरंग है। ” बीच में ही उन्होंने कहा। “ इस सेवक पर उनकी कृपा रहती है। आज अंतर में उन्हीं की प्रेरणा हुई और मैं रात्रि में उधर चल पड़ा। अब आप पधारे तो कृपा होगी। “
पंडित गोपीनाथ के आग्रह को संन्यासी टाल न सके। वे उनके साथ चल पड़े। “ विक्षेप की निवृत्ति उपासना ध्यान में होती है। “ गोपीनाथ जी जैसे स्वतः बाते करने के अभ्यस्त हो। प्रज्ज्वलित अग्नि भी वृष्टि से बुझ गयी। उसे छाया अभीष्ट है।
संन्यासी चौके कि ये ब्राह्मण देवता क्यों उन महात्माओं के वचनों की आवृत्ति कर रहे है। “ भगवान में इन गूढ़ वचनों को समझ नहीं पा रहा हूँ। उन्होंने बिना संकोच के कह दिया। ”
“महाप्रभुओं ने ठीक ही समझाया है। आप अपने मूल प्रश्नों को ही समझे। ” पण्डित जी ने उसी प्रकार बिना इधर उधर देखे, अनक्षेप भाव से कहा - “संयम दो प्रकार का होता है। एक अज्ञान जन्य और दूसरी मोह जन्य -अशक्ति जन्य। “
संन्यासी का सम्पूर्ण प्राण कानों में आ गया
था। वे न मार्ग देख रहे थे और न शरीर। पैर स्वतः बढ़े जा रहे थे। एकाध ठोकर भी लगी। इतने पर भी वह सुनने में दत्तचित्त थे।
“श्रवण मनन-निदिध्यासन से अज्ञान दूर हो जाता है। बुद्धि उसी परमतत्व की सत्यता को समझ लेती है। “ गोपीनाथ जी कहते जा रहे थे - “हृदय स्वीकार कर ले तो ठीक। अशक्ति पूर्ण हृदय अशक्ति का वेग प्रबल होने पर बुद्धि को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। वह पुनः भ्रान्त हो जाती है। ”
“ ज्ञान हो जाने पर भी अज्ञान की प्राप्ति होती है ?” संन्यासी के स्वर में आश्चर्य था।
“अपरोक्ष ज्ञान के पश्चात तो अज्ञान की प्राप्ति असंभव है। “ उन्होंने उसी धीर स्वर में कहा- “ किन्तु परोक्ष ज्ञान केवल अज्ञान के एक रूप को निवृत्त करता है। मोह के दो रूप है, अज्ञान जन्य एवं अशक्ति जन्य। पदार्थों में अज्ञान वश जो सुख समझ रहा है, वह असक्त ज्ञान से नष्ट हो जाती है।
प्र इतने भी आसक्ति मोह नहीं जाता। ”
संन्यासी ने उनकी ओर इस तरह देखा जैसे वे ठीक नहीं समझ पा रहे है।
“ जैसे शराबी मदिरा को लाभदायक समझकर पीना प्रारम्भ करता है। ” उन्होंने स्पष्ट किया “ समझाने पर वह उसे हानिकर तो समझ लेता है, किन्तु व्यसन होने से छोड़ नहीं पाता। इसी प्रकार भोगो में सुखरूपतसा का बोध तो ज्ञान दूर कर देता है, किन्तु जन्म जन्मान्तर के सेवन से उसमें व्यसन हो गया है, उपासना से, महापुरुषों की कृपा से। ”
“ और आप के श्री चरणों के प्रताप से। ” सहसा संन्यासी को उन दोनों महापुरुषों के गुरु वचनों का ज्ञान हुआ। वे बड़ी शीघ्रता से घुटनों के बल बैठ गये। पण्डित जी झिझके इससे पहले ही उनका मस्तक उनके चरणों में पहुँच गया, एक क्षण के पश्चात ही वे उठे ओर बिना कुछ कहे शीघ्रता से एक ओर चले गये। पता नहीं क्या सोचकर महामहोध्याय पं. गोपीनाथ कविराज ने भी उन्हें रोका नहीं।
इंग्लैण्ड के इतिहास में एल्फ्रेड का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। एल्फ्रेड ने प्रज्ञा की भलाई के लिए अनेक साहसिक कार्य किये, जिससे वे महान एल्फ्रेड के नाम से पुकारा जाता है। प्रारम्भ में एल्फ्रेड भी एक साधारण राजा की तरह थे, जो बाप दादों होता है। वह चाहे अच्छा हो या बुरा करने की अंधविश्वासी प्रवृत्ति के कारण सामान्य व्यक्तियों का सा खाओ पियो और वैभव विलास में डूबे रहो, का जीवन जीने लगा। एक दिन ऐसा भी आया, जब उसकी यह सुस्ती शत्रुओं के लिए वरदान साबित हुई। एल्फ्रेड का राज्य औरों ने हड़प लिया और उसे गद्दी से उतार कर मार भगाया। इधर उधर मारे मारे फिर रहे एल्फ्रेड को एक किसान के घर पर नौकरी करनी पड़ी। उसे बर्तन माँजने, पानी भरने, और चौके का काम सौंपा गया। उसके काम की देख रेख किसान की स्त्री करती थी। एल्फ्रेड छिपे वेश में जिन्दगी काटने लगा। एक दिन किसान की स्त्री को किसी काम से बाहर जाना पड़ा। बटलोई पर दाल चढ़ी थी, सो उसने एल्फ्रेड से कहा कि जब तक मैं वापस नहीं आ जाती तुम बटलोई की दाल का ध्यान रखना। यह कहकर स्त्री चली गयी। हा0161 से काम पूरा कर लौटी, तो स्त्री ने देखा कि एल्फ्रेड एक ओर बैठा सो रहा है और बटलोई की दाल जल चुकी है। स्त्री ने कहा मूर्ख नवयुवक। लगता है तुझ पर एल्फ्रेड की छाया पड़ गयी है, जो काम सौंपा जाता है, उसे एकाग्रचित्त होकर पूरा नहीं करता। तू भी उसकी तरह मारा मारा घूमेगा। “ स्त्री बेचारी को क्या पता था कि किससे बात कर रही है, वह एल्फ्रेड ही है, पर एल्फ्रेड को अपनी भूल का पता चल गया। उसने बात गांठ बाँध ली आज से जो भी काम करूंगा, एकाग्रचित्त से करूंगा। कल्पना के किले बनाते रहने से कोई लाभ नहीं। एल्फ्रेड एक बार फिर सहयोगियों से मिला। धन संग्रह किया, सेना एकत्रित की और दुश्मन पर चढ़ाई करके इंग्लैण्ड को फिर जीत लिया।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। एकाकी स्थिति में तो वह वन मानुष की तरह ही जीवित रह सकता है, प्रगति नहीं कर सकता। अन्य प्राणी तो जन्म से कुछ समय बाद ही अपने प्रयत्न से आहार लेने लगते हैं, पर मनुष्य के बालक को कई वर्षों तक अभिभावकों के अनुदान पर आश्रित रहना पड़ता है। शिक्षा के लिए अध्यापक का, दांपत्य जीवन के लिए ससुराल का, अरोग्य के लिए चिकित्सक का, आजीविका के लिए दफ्तर कारखानों का व्यापार के लिए उत्पादक एवं ग्राहक का सहारा लेना पड़ता है। यदि यह आधार न मिले तो मनुष्य को सोचने, बोलने, तथा सभ्य आचरण करने तक की विधि विदित न हो सके और भेड़ियों द्वारा पाले गये’ ‘रामू ‘ बालक की तरह सर्वथा पशु तुल्य स्थिति में रहना पड़े। आदान प्रदान की पद्धति अपनाकर ही मनुष्य प्रगति कर सका है। उसकी भावी प्रगति का आधार भी पारस्परिक सहयोग एवं अनुदान प्रतिदान पर निर्भर है।
आत्मिक क्षेत्र में यह नियम और भी लागू होता है। आत्मिक प्रगति के लिए उदारमना, तप, संपदा, के धनी, प्राणवान, मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ती है, जो न केवल शिष्य की आवश्यकता, कठिनाई, समस्या की गहराई में घुसकर समझें और उसका समाधान बतायें वरन् आवश्यकता पड़ने पर अपनी तप सम्पदा का एक अंश देकर उसे पार करें, उबारें। आत्मिक क्षेत्र में ऐसी सहायता की आवश्यकता पड़ती ही है।
धरती की उर्वरता कितनी ही क्यों न हो, हरियाली उगाने के लिए उसे पानी का आश्रय चाहिए। धातु कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो, उसे उपयोगी उपकरण या आभूषण के रूप में बदलने के लिए धातु विशेषज्ञों द्वारा शोधे जाने एवं ढालने की आवश्यकता पड़ती है। हीरा, खरादी के हाथ की कुशलता का लाभ लेकर ही चमकता और बहुमूल्य बनता है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए गुरु शिष्य परम्परा का महत्व माना गया है। भटकाव से बचने के लिए मार्गदर्शक चाहिए और प्रगति के अभीष्ट साधनों का अभाव पूरा कर सकने के लिए उपयुक्त सहयोगी। ऐसे सुयोग न बन सके तो यह कहना कठिन है कि एकाकी प्रयास से कौन, कितने समय कितनी प्रगति कर सकेगा ?
विवेकानन्द को रामकृष्ण परमहंस का, चन्द्रगुप्त को चाणक्य का, शिवा जी को समर्थ गुरु राम दास का, विनोबा को गाँधी का आश्रय मिला। इस छत्र छाया के बिना एकाकी पुरुषार्थ के बूते, कदाचित इतने ऊँचे उठ नहीं पाते, जितने कि उठ गये। संसार के महामानवों के पीछे ज्ञात या अज्ञात रूप से कोई न कोई अज्ञात सता उन्हें ऊँचा उठाने व आगे बढ़ाने में सहयोग करती रही है। दुर्बल रीढ़ वाली बेले भी पेड़ के सहारे ऊँची उठती और उतनी ही ऊँचाई तक जा पहुँचती है। उड़ाने वाले की कुशलता पतंग को आकाश में उड़ाती है। बाजीगर कठपुतली को जीवितों जैसी कला अभिनय दिखाने का श्रेय दिलाता है। बुद्ध के अनुग्रह से अंगुलिमाल, अम्बपाली जैसे पिछड़े हुए और आनन्द, कुमारजीव जैसे सामान्य स्तर के व्यक्ति, विश्व विख्यात बने थे। बड़ों की बात छोड़ दे तो भी सामान्य विकास क्रम में अपने से अधिक समर्थ का सहयोग चाहिए ही। माता बालक की सुरक्षा एवं सहायता में हर घड़ी लगी रहती है और पिता उसके लिए निर्वाह एवं प्रगति के साधन जुटाने में दत्त चित्त रहता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में यह दोनों ही कार्य एक ‘गुरु ‘ को करने पड़ते हैं। बिना उपयुक्त मार्गदर्शक के भी कुछ लोग एकलव्य की तरह मात्र अपनी निष्ठा के बल पर उच्चस्तरीय प्रगति कर लेते हैं, पर वह अपवाद है। सामान्य नियम तो वही है जो कृष्ण ने संदीपन का, राम ने विश्वामित्र का, और पाण्डवों को द्रोणाचार्य का आश्रय लेकर अपनाया।
प्रज्ञा युग निकट है और इसमें महाप्रज्ञा गायत्री, युगशक्ति के रूप में उभर रही है। उसका आश्रय लेने वाले सामयिक विपत्तियों से जूझने और उज्ज्वल भविष्य की भूमिका बनाने के अन्य सभी समुदायों की तुलना में अधिक समर्थ रहेंगे।
जागृत आत्माओं को इन दिनों आत्म कल्याण एवं लोकमंगल दोनों मोर्चे सँभालने पड़ेंगे। इसके लिए उनकी निजी शक्ति पर्याप्त नहीं।
उन्हें अतिरिक्त अनुदान चाहिए। शुद्ध मोर्चों पर अकेला सिपाही नहीं लड़ता। उसके लिए आवश्यक साधन जुटाने में समर्थ सरकार पीठ पर रहती है॥ ऐसे अनुदान अदृश्य दैवी अनुग्रह की तरह प्रत्यक्ष, गुरु दीक्षा के माध्यम से उपलब्ध किये जा सकते हैं। युग निर्माण के सूत्र संचालकों का उदाहरण इसी प्रकार का है। उनमें सत्प्रयोजनों के लिए उपयोग की शर्त पर अजस्र अनुदान मिलने का सनातन नियम पूरा होने की बात प्रत्यक्ष देखी और जानी परखी जा सकती है।
साधक की श्रद्धा के साथ गुरु के सामर्थ्य को जोड़ने की प्रक्रिया को गुरु दक्षिणा कहा जाता है। जब गुरु की सामर्थ्य के प्रति आस्थावान होकर शिष्य उसका लाभ लेने के श्रद्धा भरे संकल्प के साथ कटिबद्ध होता है, तब दीक्षा की पृष्ठ भूमि बनती है। दीक्षा कृत्य पौधों के लिए विकसित वृक्ष की कलम बाँधने जितना ही महत्व रखता है। यदि उस आरोपित टहनी में वह पौधा अपने रस का प्रवाह कर सके तो ही वह टहनी अपना कमाल दिखा सकती है। अन्यथा नहीं। पौष्टिक आहार से शरीर पुष्ट होता है, पर उसके लिए आहार का पेट में पहुँचना भर पर्याप्त नहीं। पेट अपने पाचक रस उसमें मिलायें, उसका रस खींचे, रक्त तक पहुँचाये, तब बात बनती है। यज्ञ की श्रेष्ठ सामग्री हवन करने से वातावरण का शोधन पोषण होता है। यह यज्ञ कुण्ड कीर अग्नि उस हव्य को अपनी ऊष्मा से वशीभूत करें तभी वह प्रक्रिया सधती है। इसी प्रकार गुरु का प्राणदान पाकर शिष्य जब उसके साथ अपनी श्रद्धा भरा समर्पण जोड़ता है, तभी वाँछित सफलता हाथ लगती है। दीक्षा की सार्थकता, सफलता एवं निरर्थकता निष्फलता का मर्म यही है।
दीक्षा की सार्थकता प्रदान करने वाली इस श्रद्धा प्रक्रिया को ‘दक्षिणा’ कहा जाता है। जिसे पौधे में कलम लगाई जाती है उस पौधे को अपने रस का एक अंश उस टहनी को संचारित करता होता है गुरु द्वारा आरोपित प्राण को विकसित करने के लिए अपने समय, साधन एवं पुरुषार्थ निश्चित अंश श्रद्धा पूर्वक नियमित रूप से गुरु के निर्देशानुसार खर्च करना पड़ता है। यही दक्षिणा है जो दीक्षा को सार्थक बनाती है। गुरु द्वारा दीक्षा और शिष्य दक्षिणा देने का क्रम इसीलिए परस्पर पूरक अनिवार्य प्रतिक्रियाओं के रूप में प्रतिपादित किया जाता है।
बीज को वृक्ष बनाना हो तो खाद पानी की आवश्यकता पड़ेगी ही। अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए ईंधन चाहिए। आहार को हजम करने में पेट का पाचक रस चाहिए। वर्षा का लाभ उर्वरा भूमि को ही मिलता है। औषधि उसी पर काम करती है, जिसमें जीवन शक्ति विद्यमान है। पारस मात्र लोहे को ही स्वर्ण बनाता है, हर धातु को नहीं। इसी प्रकार समर्थ गुरु की दीक्षा का प्रतिफल तो निश्चित रूप से उत्पन्न होता है, पर वह एकांगी होने पर संभव नहीं। इसमें गुरु की समर्थता और शिष्य की पात्रता समान रूप से आवश्यक है। एक हाथ से ताली कहाँ बजती हैं ? आंखें होने पर ही दृश्य दीखते हैं, कान काम करें तो शब्द सुनाई पड़ेंगे। मस्तिष्क ठीक हो तो प्रशिक्षण की उपयोगिता है। शिष्य के अनुदान और गुरु का अनुग्रह समान रूप से मिलने पर ही चमत्कारी प्रतिफल उपलब्ध होते हैं। इसलिए गुरु दीक्षा की पूरक गुरु दक्षिणा बताई गयी है। सच्ची आत्मिक प्रगति के लिए गाड़ी के यह दोनों पहिये समान रूप से गतिशील होने चाहिए। गुरु दक्षिणा के निम्न स्वरूप है-
1. मंत्र दीक्षा अर्थात् निर्धारण और अनुशासन 2-प्राण दीक्षा भूमि में बीज वपन, गर्भ धारण, पेड़ में कलम का नियोजन, दो प्राणों का आंशिक एकीकरण, 3- ब्रह्म दीक्षा समर्पण, विलय विसर्जन, शरणागति, एकात्म, अद्वैत। दो शरीर का एक प्राण प्रयोजन में परिणित। गायत्री महा विज्ञान के तृतीय खण्ड में इनकी विस्तृत चर्चा है।
गुरू दक्षिणा के तीन पक्ष है-
साधना की भाव भरी तत्परता, उत्कृष्ट जीवन एवं उदार व्यवहार में अनवरत प्रगति ( 3) सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त अनुकरणीय अंश दान। आज जिनकी जो स्थिति है उसकी तुलना में कुछ करने, कुछ बड़े एवं आदर्शवादी साहसिक कदम उठाने का निश्चय करना ही गुरु दक्षिणा का प्रारूप है। कौन क्या करेगा ? इसका निर्धारण उसे स्वयं ही करना चाहिए और जो सोचा हो उसे गुरु दक्षिणा के रूप में संकल्प पूर्वक घोषित करना चाहिए।
दीक्षा के ग्रहण कर्ताओं से महायज्ञ महादेव की अपेक्षा हैं, कि वे नव निर्माण अभियान को सफल बनाने के लिए अपना अंश दान अब की अपेक्षा उतना बढ़ा दें जितना कि अधिकतम संभव हो। आज मनुष्यता जीवन मरण के झूले में झूलती है।
विभीषिकाओं से जूझने और उज्ज्वल भविष्य का शिलान्यास करने का ठीक यही समय है। इस महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्रज्ञा पुत्रों का अधिकतम अंशदान चाहिए। वे अपने समय का, साधनों का जितना अंश दे सके, उनमें अधिकाधिक उदारता बरतें। कृपणता को आगे न आने दें।
पू0 गुरुदेव द्वारा युग सृजन में संलग्न रहने वाली शक्ति हिमालय के उच्च केंद्रों में आती है वे उसका निर्धारण निर्देश के अनुरूप वितरण करते रहते हैं। (1) असंख्यों की सेवा साधना के बदले कमाया हुआ कैलाश पर्वत जितना पुण्य (2) अंतरंग और बहिरंग की कठोर तितीक्षाओं द्वारा अर्जित मान सरोवर जैसी तपश्चर्या ( 3) अजस्र आत्मीयता से हृदयाकाश में लबालब भरी हुई भक्ति भावना करुणाई आत्मीयता। इन तीनों वैभव का अधिकाँश उपयोग वे दीक्षा प्राप्त आत्मीय जनों को सुखी समुन्नत बनाने के लिए करते हैं। इस अनुदान से असंख्यों का कायाकल्प जैसी परिवर्तित मनःस्थिति और परिस्थिति का सर्वोत्तम लाभ हुआ है। यह मेघ वर्षा भूतकाल में किस प्रकार बरसी और कितनों ने कितना लाभ उठाया यह सर्व विदित है। भविष्य में वे बादल और भी सघन होते जा रहें है और घनघोर घटाटोप वर्षा की तैयारी में संलग्न है। दीक्षा प्राप्त आत्मीय जनों को उन अनुदानों का विशिष्ट लाभ मिलने जा रहा है। किन्तु इस क्षण को एक पल के लिए भी विस्मृत न किया जाना चाहिए कि चट्टान पर मुसलाधार वर्षा होने पर भी नयी हरियाली का कोई चिन्ह प्रकट नहीं होता। जहाँ लोलुपता ही दीक्षा का कारण बनी है और श्रद्धा उमंगने का कोई चिन्ह प्रकट न हो तो सशक्त दीक्षा भी अपना सिर धुनती हुई, असफलता स्वीकार करती हुई वापस लौटेगी। निष्ठुरता और कृपणता की चट्टानें टस से मस न हो तो समझना चाहिए कि दीक्षा और दक्षिणा के उभयपक्षीय संयोग से चलने वाले सशक्त विद्युत प्रवाह का आधार ही समाप्त हो गया। ऐसी दीक्षाएँ विडम्बना मात्र बनकर रह जाती है। भले ही वह किसी सशक्त द्वारा दी गयी क्यों न हों।
अपने कुटुम्बियों में एक और सदस्य को सम्मिलित करें। वह है गुरुदेव का प्राण प्रिय प्रज्ञा अभियान गायत्री परिवार ‘युग निर्माण मिशन हर कुटुम्बी के लिए समय और साधन लगाने पड़ते हैं। इस नये कुटुम्बी का भी उसी अनुपात में भरण पोषण करें। अधिक न सही तो कम भी न मानें। उसकी प्रगति के लिए जो सोचते हैं, उससे कम प्रज्ञा अभियान की प्रगति के संबंध में भी न सोंचे। उनमें से प्रत्येक पर जो खर्च करते हैं, उससे कम पू0 गुरुदेव के प्राण चेतना का परिपोषण करने पर भी न करें। समय सृजनात्मक प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगायें। अपने क्षेत्र में नवजागरण का आलोक वितरण करने के लिए जन संपर्क स्थापित करें। महीने के एक दिन की आजीविका, न्यूनतम बीस पैसा अथवा जो संभव हो, नियमित रूप से शाँतिकुँज भेजे, ताकि नवसृजन में जुटे हुए युग शिल्पियों के निर्वाह, मार्ग व्यय आदि की आवश्यकताओं को उस अनुदान से पूरा किया जा सके।
मीरा ने पत्थर को जीवंत ‘ गिरधर गोपाल ‘ बनाया था। रामकृष्ण परमहंस की काली अपना प्रत्यक्ष परिचय देती थी। एकलव्य के द्रोणाचार्य ने चमत्कार दिखायें थे। प्राण दीक्षितों की शिक्षा अपने जीवंत होने का प्रमाण, भाव भरी गुरु दक्षिणा के माध्यम से देगी तो निश्चय ही तो वह अनुदान असंख्य गुने वरदान लेकर वापस लौटेगा। आध्यात्मिक प्रगति में अनुदारता की असफलता का प्रधान अनुरोध बनकर अड़ी रहती है। दीक्षितों को यह बाधा हटाने में समर्थ होना चाहिए।
ईश्वर चन्द्र विद्या सागर अभाव और निर्धनता के बीच पढ़ते पढ़ते 50 रुपये मासिक के नौकर हो गये। उनकी सफलता पर उनके अनेक संबंधी उन्हें आशीर्वाद देने पहुँचे, बोले - “ भगवान की दया से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो गये। आप आराम से रहो और चैन से जीवन बिताओ। ” ईश्वरचन्द्र जी के नेत्र भर आये, बोले - “ आप ने यह आशीर्वाद दिया या अभिशाप ? जिस अध्यवसाय के बल पर मैं उस भीषण परिस्थिति से निकल कर आया हूँ उसे ही त्यागकर मुझे अकर्मण्य बनने की सलाह दे रहें है। आपको कहना तो यह चाहिए था कि जिस गरीबी और अभाव का कष्ट तुमने स्वतः अनुभव किया हैं, परिस्थितियाँ बदलने पर उसे भुला मत देना। अपने श्रम और साहस से अभावग्रस्तों के अवरुद्ध मार्ग साफ करना। जिन्हें जीवन में कुछ आभास ही नहीं, वे उपेक्षा बरतें, ऐश में भूले रहें, तो भूले रहें, मैं कैसे यह अपराध कर सकता हूँ। “ तथ्य बतलाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में इस सिद्धाँत का पूर्ण तत्परता से निर्वाह किया। अगणित अभावग्रस्तों के लिए प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से देवदूत की तरह आगे आते रहे। सच्चे अर्थों में उन्होंने परमार्थी जीवन जिया।
वस्तुतः जीवन उतना ही सार्थक है जितना परहितार्थ नियोजित होता है। राजा शतायुघ प्रजा निरिक्षण के लिए निकलें। एक झोपड़ी में जराजीर्ण वयोवृद्ध दीखा। राजा रुक गये। कौतूहल वश पूछा - आपकी आयु कितनी है ? देखने में शतायु की परिधि तक पहुँचे दीखते थे। वृद्ध ने झुकी गर्दन उठायी और कहा- “ मात्र पाँच वर्ष “ राजा को विश्वास न हुआ तो फिर से पूछा, तो सही उत्तर मिला। वृद्ध ने कहा -” पिछला जीवन तो पशु प्रयोजनों में निरर्थक ही चला गया। पाँच वर्ष पूर्व ज्ञान उपजा और तभी से मैं परमार्थ प्रयोजन में लगा। सार्थक आयु तो तभी गिनता हूँ।
विगत छह अंकों से लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले हर इच्छुक परिजन लोक नेतृत्त्व के क्षेत्र में आगे आने वाले हर व्यक्ति के लिए परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखी गयी आचार संहिता के अंतर्गत लेखा मालाएँ प्रकाशित की जा रही है। प्रत्येक में कूट कूट कर वे सू.त्र भरे गये हैं, जिनसे एक आदर्श कार्यकर्त्ता के निमार्ण का कच्चा माल कैसे तैयार हो, यह मार्गदर्शन मिलता है। समाज सेवा का क्षेत्र हो अथवा धर्मतंत्र से जन मानस के परिष्कार का, प्रत्येक पर ये सूत्र लागू होते हैं। वसंत पर्व (24 जनवरी 96) के संदर्भ में यह सूत्र किसके लिए पठनीय है।
सेवा का महत्व और जीवन विकास के लिए उनकी अनिवार्य आवश्यकता समझ लेने के बाद सेवा धर्म की उमंग उठना स्वाभाविक है। अधिकाँश लोगों में इस तरह की उमंग उठती है। वे उस उमंग के अनुरूप सेवा मार्ग में प्रवृत्त भी होते हैं, किन्तु उस पथ पर अधिक समय तक नहीं चल पाते। इसका कारण यह है कि लोक सेवा के प्रति आवश्यक उत्साह और निष्ठा का जागरण नहीं हो पाया। कुछ लोग प्रवृत्त भी होते हैं, पर कठिनाइयाँ आती देखकर उसे झमेला समझ कर छोड़ बैठते हैं अथवा असफलता से डर कर चुप बैठ जाते हैं।
बहुत से कारण है जिनसे सेवा कार्य में संतोष जनक प्रगति नहीं हो पाती। लोग या तो गलत बातों को सही समझ कर विचलित हो जाते हैं अथवा असफलता का अहंकार उन्हें दिग्भ्रान्त कर देता है। इन सब बाधाओं और भटकाव की परिस्थितियों को पहले से जान समझ कर चला जाय, सेवा धर्म का निर्वाह पालन किया जा सकता है। होता यह भी है कि सेवा धर्म अपना लेने के बाद उसे अपना जीवन लक्ष्य बनाने और साधना स्तर पर करने में भूल हो जाती है। भूले स्वभावगत हों या परिस्थितियों के कारण, लोक सेवी को अपने साधना पथ से दूर हटाती है।
हमें यह तथ्य स्मरण रखना चाहिए कि मार्ग दर्शक बनना हो तो नेतृत्व का कौशल नहीं चरित्र चाहिए। प्राचीनकाल में लोकमानस के परिष्कार का महान कार्य जो लोग हाथ में लेते थे वे कार्य क्षेत्र में प्रवेश करने से पूर्व ब्राह्मणों जैसी संयमशीलता और साधु जैसी उदार आत्मियता का अभ्यास करते थे। इस परीक्षा में वे इतनी ऊँची कक्षा उत्तीर्ण करते थे, उसी अनुपात में उनकी सेवा साधना सफल होती थी। यदि सच्चे मन से उच्चस्तरीय दृष्टिकोण लेकर सेवा धर्म अपनाया जाय, तो उसका परिणाम लोकमंगल से अधिक आत्मोत्कर्ष के रूप में उपलब्ध हो ता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रज्ञा परिजनों को युगशिल्पी की भूमिका निभाने के लिए अग्रसर होते समय इस बात को गिरह बाँध कर रखना है कि उन्हें अपने स्तर के व्यक्तित्व की दृष्टि से सामान्य लोगों की तुलना में कहीं ऊँचा उठकर रहना है।
इसके लिए क्या करना होगा ?इस संबंध में प्रत्यक्ष कर्तव्य उतना नहीं है जितना कि दृष्टिकोण में परिवर्तन करने का प्रबल अभ्यास अपनाना। सर्वविदित है कि लोभ मोह के भव -बंधन आदर्शवादिता के आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने वाले के लिए हथकड़ी -बेड़ी जैसे अवरोध उत्पन्न करते हैं। लालची, संग्रही, विलासी व्यक्ति को लोभ लिप्सा इस कदर जकड़े रहती हैं कि उसे परमार्थ में कोई रस नहीं आता। अपनी तराजू अपने बाटों से तौलने पर उसे स्वार्थ वजनदार प्रतीत होता है और परमार्थ हल्का। इसलिए लालच की राई-रत्ती कमी पड़ते ही वह परमार्थ से हाथ खींच लेता है और कुछ आडंबर करता भी है तो उतना ही जिससे कम खर्च में लोकसेवी पुण्यात्मा की अधिक ख्याति खरीदी जा सके। इसमें भी वे तौलते रहते हैं कि कितना गंवाया और कितना कमाया।
दूसरा अवरोध हैं-व्यामोह। शरीर और परिवार के साथ अत्यधिक ममता जोड़ने वाले उन्हें प्रसन्न रखने के लिए उचित अनुचित कुछ भी करते रहते हैं। उन्हें यह छोटी परिधि लोक - परलोक सभी से बढ़कर प्रतीत होती है और उसी के निमित्त कोल्हू की तरह पिघलते रहते हैं। परिवार का उत्तरदायित्व निभाना, परिजनों के प्रति कर्तव्य पालन करना एक बात है और उन्हें सुविधा से लाद लादकर अनुचित दुलार से व्यक्तित्व की दृष्टि से हेय हीन बना देना सर्वथा दूसरी। मोहग्रस्त लोग दूसरे को अपनाते हैं और पहले की ओर से आंखें बन्द किये रहते हैं।
इसके लिए कभी रोका झिड़का जाय कि उन पर अशर्फियाँ लुटाते रहने की तुलना में कही अधिक हित इसमें हैं कि वे श्रेष्ठ चिंतन देने का प्रयास करें, मात्र लाड़ दुलार न दे तो कोई मुहान्ध सुनता नहीं। पर कहे कौन किससे ? ज्ञान वैराग्य में कथा कहते रहने वाले ही जब श्रोता भक्त जनों से भी अधिक गये गुजरे सिद्ध होते हो तो सत्य वचन महाराज की विडम्बना ही सिर हिलाती रहेगी।
परिवार पोषण किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए, क्योंकि नयी दृष्टि से देखने से इस परिवार के कितने ही सदस्य ऐसे होते हैं, जिनमें आर्थिक स्वावलंबन की ही नहीं दूसरों को सहारा देने की क्षमता भी है किन्तु उन्हें मोहवश अपनी नाक काटने के बहाने अपंग अपाहिज बनाकर रखा गया है। एक कमाऊ व्यक्ति ही मरता खपता रहता है। दूसरे समर्थ होते हुए भी, असमर्थों की बिरादरी में आलसी, प्रमादी बनें बैठे रहते हैं। इस प्रकार फिजूल खर्ची की आदतें जब अभ्यास में आ जाती है तो खर्च का ढोल इतना भारी हो जाता है कि उसे भी परिपोषण की संज्ञा मिलती है। वस्तुतः यह होता परिवार पोषण भर है। पोषण सरल है, पोषण अति कठिन है। पुत्रवधू की गोद से छीन छीनकर पोते -पोतियों को कंधे पर लादे फिरने वाले बुड्ढों की भी कमी नहीं। कमाऊ लड़कों के गुलछर्रे उड़ाने में कोई कमी न रहने पर भी बुड्ढा जब उन्हीं के हाथ में पेंशन थमाता जाता है तो उनकी दयालुता देखते ही बनती है। जीवन भर की कमाई का बँटवारा जब समर्थ बेटों की हिस्सेदारी के रूप में कर दिया जाता है तो प्रतीत होता है कि घिनौना व्यामोह जिस प्रकार औचित्य एवं प्रचलन का लबादा ओढ़कर अपने को निर्दोष सिद्ध करता है।
इस चक्रव्यूह में कुछ थोड़े से घेरे ही यहाँ उजागर किये हैं। ऐसे ऐसे और भी अनेकों है। जिनमें आये दिन बच्चे जनने, उस पर खुशी मनाने और सिर पर पर्वतों जैसा बोझ चढ़ाते चलने की भी एक बात सम्मिलित की जा सकती है। इस मोह ग्रस्तता को परमार्थ पथ पर अड़ा हुआ भारी चट्टान कह सकते हैं। लोभ को प्रथम नम्बर दिया जाता है, मोह को दूसरा, पर अभी यह तय किया जाना है कि इसमें से कौन द्वितीय है। वस्तुतः यह रावण, अहिरावण जैसे सगे भाई ही प्रतीत होते हैं।
आत्मकल्याण और लोककल्याण की साधना में ऐसा कुछ नहीं, जिसके लिए शरीर निर्वाह एवं पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने में कोई बाधा पड़ती हो। मात्र लोभ और मोह का मद्यपों जैसा अतिपाद ही एक मात्र अवरोध है जो वस्तुतः तिनके जैसा हल्का होते हुए भी पर्वत जैसा भारी बनकर दिग्भ्रांतों के मनः क्षेत्र पर भूत पिशाच की तरह चढ़ बैठता है और भली चंगी परिस्थिति होते हुए भी नारकीय उत्पीड़कों की तरह निरंतर संत्रस्त करता रहता है।
किन्तु बात इतनी ही छोटी नहीं। इस मार्ग पर एक और बड़ा अवरोध अर्हता का है। यह परोक्ष होती है। न अपनी पकड़ में आती है, न दूसरों को समझ में। इसलिए उसकी उखाड़ पछाड़ ही नहीं होती। फलतः मजे में अपने कोंतर में बैठी पोषण पाती है, जोंक की तरह मोटी होती रहती है। इनकी विनाश लीला इतनी बड़ी है कि जिसकी तुलना में लोभ मोह से होने वाली हानि का नगण्य जितना ठहराया जाता है। अर्हता बड़प्पन पाने की आकाँक्षा को कहते हैं। दूसरों की तुलना में अपने को अधिक महत्व, गौरव, श्रेय, पद, सम्मान मिलना चाहिए। यही है अर्हता की आकाँक्षा। इस जादूगरनी द्वारा लोगों को चित्र विचित्र विडम्बनाएँ रचते देखा जा सकती है। केश, वस्त्र, आभूषण सौंदर्य प्रसाधनों की इन दिनों धूम है। फैशन के नाम पर कितना धन और कितना समय नष्ट होता है। उसे शरीर सज्जा की रुचि रखने वाले सभी जानते हैं। उस महंगे जंजाल को इसलिए रचना पड़ता है कि अर्हता अपने को सुन्दर, युवा, आकर्षक, सभ्य, अमीर, सिद्ध करने के लिए लबादे को ओढ़कर वस्तु स्थिति से भिन्न प्रकार का प्रदर्शन करने को बाधित करती है। इसके लिए ठाठ -बाट का नम्बर आता है।
इसमें अमीरों का प्रदर्शन हैं। निवास, फर्नीचर, वाहन, नौकर तथा विलासिता के उपकरणों का सरंजाम जुटाने तथा रख रखाव में इतना धन तथा मनोयोग लगता है, जो वास्तविक आवश्यकता की तुलना में अनेक गुना महँगा होता है। बात बात पर फिजूल खर्ची उस समय की जाती है जब उसे लोग देखे और अनुमान लगाये कि वह व्यक्ति बड़ कुबेर है और अनावश्यक खर्चने से भी इसे कोई कमी नहीं पड़ती। बड़प्पन पाने की मृगतृष्णा के लोग कितने पाखण्ड रचने, धन को पानी की तरह बहाने के उपरान्त आवश्यक प्रयोजनों में किस प्रकार कटौती करते है-इसे देख कर कोई सूक्ष्मदर्शी आश्चर्य चकित ही रह सकता है। असलियत का अनुमान सहज ही लगा लिया जाता है फिर भी अर्हता का उन्माद विडम्बनाएँ रचने से बाज नहीं आता है।
यह तो सामान्य लोगों की बात हुई। अब प्रसंग उन विशिष्ट लोगों का आता है जो कि आदर्शवादी, त्यागी, अध्यात्मवादी, योगी, लोकसेवी आदि के रूप में प्रख्यात है। विश्लेषण करने पर इनके भीतर भी अर्हता चोर दरवाजे से घुसी और तानाशाह की तरह सिंहासनारूढ़ बनी बैठी दिखाई देती है। संतों के अखाड़े, धर्म, सम्प्रदाय, संस्था, संगठन आदि बड़ों की इसी प्रतिस्पर्धा में कलह के केन्द्र बने रहते हैं। उनके संचालकों में कौन बड़ा कहलायें ?एक ही संस्था के सदस्य एक ही लक्ष्य को दुहाई देने वाले इस कदर लड़ते क्यों है? इसका वास्तविक कारण सामान्य लोगों की समझ से बाहर होता है, उन्हें तो कुछ भी कह कर बहका दिया जाता है। वास्तविकता इतनी भीर होती है कि वे येन−केन प्रकारेण अपना बड़प्पन सिद्ध करना चाहते हैं। दूसरा जब आड़े आता है, तो मोहल्ले के कुत्तों की तरह अकारण एक दूसरे पर टूट पड़ते हैं। संगठनों के सर्वनाश में एक मात्र नहीं तो सर्वप्रधान कारण तो इस अर्हता सूर्पणखा को ही माना जायेगा। मनोमालिन्य और विग्रह के बहाने तो सिद्धाँत वाद की दुहाई देते हुए कुछ भी गढ़े जा सकते हैं। पर यदि भारी बाँध में दरार पड़ने के कारण ढूंढ़ने के लिए गहराई में उतरा जाय, तो प्रतीत होगा कि अर्हता कि नन्ही सी चुहिया ही दुम उठायें, मुँह मटकाती, पंजे दिखाती अपनी करतूत का करिश्मा दिखा रही है।
व्यवसाय अपने बच्चों को छोड़कर आने वालों से भी अर्हता नहीं छूटती। जिस प्रकार कोई लालची मनोभूमि का मनुष्य भिक्षा व्यवसाय करके पेट भरने पर भी लगातार कमाता जोड़ता रहता है और मरते समय चिथड़े और कुल्हाड़े में लाखों की दौलत छोड़ जाता है, उसी प्रकार लोकसेवी, अध्यात्मवादी का कलेवर बना लेने पर भी यदि अर्हता न छूटी तो पैर पुजाने के लिए अनेकानेक पाखण्ड रचाते, लोगों को ठगते उलझाते हुए उसे देखा जायेगा। आये दिन कुछ करतूतें, चमत्कारों की डींग हाँकते तथा और भी न जाने उसे क्या- क्या करते देखा जायेगा। सार्वजनिक जीवन में ऐसे लोगों का घुस पड़ना वस्तुतः संगठन के लिए एक प्रकार का अभिशाप सिद्ध होता है। वे जितना जनहित करते हैं, उसकी तुलना में हजार गुना अनहित करके रख देते हैं। इसलिए उत्कृष्टता के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों के लिए मनीषियों ने वित्तेषणा, पुत्रेषणा और लोकेषणा की विविध एषणाओं का परित्याग करने के उपरान्त ही श्रेय मार्ग पर पैर बढ़ाने की सलाह दी है। लोकसेवी में नम्रता निरहंकारिता उत्पन्न करने के लिए प्राचीनकाल में दरवाजे दरवाजे भिक्षा माँगने के लिए जाना पड़ता था। यों घर बैठे भी भोजन मिलने का प्रबंध कठिन नहीं हैं, पर अहंकार गलाने को तो कोई न कोई स्वरूप चाहिए ही, इसके बिना साधु कैसा? ब्राह्मण कैसा? लोकसेवी कैसा?
गाँधी जी के आश्रम में निवासियों की टट्टी साफ करने, झाड़ू लगाने जैसे छोटे समझे जाने वाले कार्य परिपूर्ण श्रद्धा और तत्परता के साथ करने पड़ते थे। प्रज्ञा मिशन की परम्परा भी यही थी। प्रत्येक आश्रम वादी को श्रमदान अनिवार्यतः करना पड़ता है और उसमें नाली साफ करने और झाड़ू लगाने, कूड़ा ढोने जैसे ही काम करने पड़ते हैं।
कई व्यक्ति सोचते हैं कि हम संध्या के निर्वाह लेकर काम क्यों करें?
अपना खानें के नाम पर निर्वाह लेने वालों से श्रेष्ठ क्यों न बनें? कुछ लोग इस कारण काम ही नहीं करते। इस असमंजस के पीछे कोई सिद्धाँत काम नहीं करता है मात्र अहंकार ही उछलता है। हजार रुपये मासिक का काम करके यदि कोई सौ रुपये लेता है, तो उसके नौ सौ रुपयों का अनुदान ही हुआ। शाँतिकुँज परम्परा में हर आश्रम वादी को अन्य सभी की तरह निर्वाह आश्रम से ही लेना पड़ता है।
उसकी निजी आमदनी या पेंशन है, तो वह उसे आश्रम में दान देते रहने के लिए कहा जाता है। लोकसेवी यदि जनता से ब्राह्मणोचित निर्वाह लेता है तो वह वेतन भोगी कर्मचारी नहीं रह जाता वरन् श्रद्धासिक्त निर्वाह दक्षिणा के रूप में प्राप्त करते हुए गौरवान्वित होता है। सच्चे सेवक के लिए ऐसी नम्रता आवश्यक है।
यहाँ एक और प्रकरण ध्यान देने योग्य है। वह है ऐसे व्यक्तियों से बचना, जो कालनेमि की तरह सतत् अपना षड्यन्त्र रचने व लोकसेवी की प्रगति के मार्ग में रोड़ा बनते हैं।
इस प्रकार अनेकों तरह के व्यक्ति है कोई सत्परामर्श देकर मनोबल ऊँचा उठाने व साधना क्षेत्र के सहयोगी बनते हैं, किन्तु आज बहुतूल्य ऐसे व्यक्तियों का है जो मायावी कालनेमी की भूमिका निभाते अच्छे भले आदमी का पथ भ्रष्ट कर देते हैं। हर समाज सेवी संस्था को ऐसे कालनेमी से बचना पड़ता है। रावण के भाई कालनेमी का अपने काले कारनामों के कारण पुराण कथनों में बहुत स्थानों पर वर्णन आया है। वह त्रेता में आया था, पर काल से बँधा नहीं था। दुर्बुद्धि देने का काम वह हर युग में करता आया है। उसी ने सूर्पणखा के नाक कान काटने राम के पास भेजा, रावण को सीता हरने की सलाह दी। मरीच, कुंभकरण, मंथरा कैकेयी की बुद्धि उलटने के मूल में उसकी ही भूमिका थी उस कालनेमी की कुटिलता अभी भी है। तपस्वी, योगी, महात्मा कोई भी वेश धारण कर उसकी विक्षुब्ध जीवंत सतत् भटकती व कमजोर मनःस्थिति वाले व्यक्तियों को ढूँढ़ती रहती है युगशिल्पियों, प्रज्ञापरिजनों को लोभ, मोह, अर्हता इन तीनों के अतिरिक्त कालनेमि परम्परा के व्यक्तियों से भी सावधान रहना चाहिए।
एक सम्पादित लेख पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है वसंत पर्व पर। इस लेख को मात्र एक पृष्ठ के कलेवर में खण्ड खण्ड में दिया गया है ताकि परिजन पूज्यवर की भाषाभिव्यक्ति का वास्तविक परिप्रेक्ष्य में समझकर उनकी अपने प्रति असीम प्यार की अनुभूति करा सके। यह लेख सम्पादकीय रूप में जनवरी 61 में ( आज से 26 वर्ष पूर्व ) तब लिखा गया था जब गुरुवर ने घोषणा कर दी थी कि अब वे मथुरा में न रहकर सबसे विदा लेकर जीवन के अध्याय में प्रवेश कर रहे है। आज भी हमें उनके जन्म दिवस पर उनकी अत्यधिक याद आ रही है, ये पंक्तियाँ हम सब को उस मंगल की स्मृति दिलाती है, जिसने यह विराट गायत्री परिवार बनाया है।
आयु की दृष्टि से हम लगभग 60 वर्ष पूरे करने जा रहे है। हमारे साँसारिक जीवन में एक बड़ा विराम यही लग जाता है। एक छोटे नायक का यही पर्दाक्षेप है। दो वर्ष में कुछ ही अधिक शेष है कि हमें अपनी ये सभी हलचलें बंद कर देनी पड़ेगी जिनकी सर्व साधारण को जानकारी बनी रहती है। इसके उपराँत क्या करना होगा इसकी सही रूपरेखा तो हमें भी मालूम नहीं है। पर इतना सुनिश्चित है कि यदि आगे ही जाना पड़े तो उससे सर्वसाधारण का कोई प्रत्यक्ष संबंध न होगा।
ऐसा विचित्र कष्टकर निर्णय हमें स्वेच्छा से ही करना पड़ा है वरन् इसके पीछे एक विवशता है। अब तक का सारा जीवन हमने ऐसी सता के इशारे पर गुजारा जो हर घड़ी हमारे साथ है। हमारी हर विचारणा और गतिविधि पर उसका नियंत्रण है। बाजीगर की अंगुलियों में बँधे हुए धागों के साथ जुड़ी हुई कठपुतली तरह तरह का अभिनय करती है। परन्तु असल में वह एक बेजान लकड़ी का एक तुच्छ सा उपकरण मात्र है। खेल तो बाजीगर की अंगुलियाँ कराती है। हमें पता नहीं कभी कोई इच्छा निज के मन में स्वतः से उठी है क्या ? कोई क्रिया अपने मन से की है क्या ? जहाँ तक स्मृति साथ देती है एक ही अपना क्रम एक ही ढर्रे पर लुढ़कता चला आ रहा है कि हमारी मार्गदर्शक शक्ति जिसे हम गुरुदेव के नाम से स्मरण करते हैं, जब भी निर्देश देती है ना अनुनय किये कठपुतली की तरह सोचने और करने की हलचलें करती रही है।
पिछले और अगले दिनों में कभी तुलना करने लगते हैं तो लगता है कि छाती फट जायेगी और एक हुक पसली को चीर कर बाहर निकल पड़ेगी। कोई अपनी चमड़ी उखाड़कर भीतर का अंतरंग परखने लगें तो उसे माँस हड्डियों का एक तत्व उभरता दृष्टिगोचर होगा- वह है असीम प्रेम। एक ही सम्पदा कमाई है प्रेम। एक ही रस हममें चला है वह है प्रेम का। यों सभी ने हमें अपनाया और आत्मभाव प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है पर उसके प्रति तो असीम ममता है जो एक लम्बी अवधि में भावनात्मक दृष्टि से हमारे समीप रहते रहे है।
ज्ञान और वैराग्य की पुस्तकें हमने बहुत पढ़ी है। माया, मोह की निरर्थकता पर बहुत प्रवचन सुने है। संसार मिथ्या हैं, कोई किसी का नहीं सब स्वार्थ के है आदि आदि ब्रह्मचर्य में भी सम्मिलित होने का अवसर मिला है। यदा कदा उन शब्दों को दूसरों के सामने दोहराया भी हैं,। पर अपनी दुर्बलता को प्रकट कर देना ही भला है। कि हमारी मनो भूमि में अभी तक भी वह तत्व ज्ञान प्रवेश नहीं करता न कोई पराया दिखे, न कोई माया का आभास होता है, जिससे विगल व्रत हुआ जाय। जब अपनी ही आत्मा दूसरों में जगमगाती रही हैं, तो किससे मुंह मोड़ा जाय? जो हमें नहीं भुला पा रहे उन्हें हम कैसे भूल जायेंगे ?जो साथ घुले और जुड़े है उनसे नाता कैसे तोड़ ले? कुछ भी सूझ नहीं पड़ता। पढ़ा हुआ ब्रह्मज्ञान रत्ती भर भी सहायता नहीं करता। इन दिनों बहुत करके रात में जब आंखें खुल जाती हैं तब यही प्रसंग मस्तिष्क में घूम जाता है। स्मृति पटल पर स्वजनों की हंसती बोलती मोह ममता से भरी एक कतार बढ़ती उमड़ती चली आती है। सभी एक से बढ़कर एक प्रेमी-सभी एक से बढ़कर एक आत्मीय सभी को एक से बढ़कर एक ममता। इस स्वर्ग में से घसीट कर। हमें कोई कहाँ लिए जा रहा है? क्यों लिए जा रहा है? इन्हें छोड़कर हम कहाँ रहेंगे? कैसे रहेंगे? कुछ भी तो सूझ नहीं पड़ता। आंखें बरसती रहती है और सिरहाने रखे वस्त्र गीले होते रहते हैं।
ठन दिनों हमारी आत्मिक स्थिति कुछ ऐसी है जिसका विश्लेषण कर सकना हमारे लिए कठिन है। हमारी व्यथा, वेदना के कष्ट से डरने की, परीक्षा में काँपने अथवा मोह ममता न छोड़ सकने वाले अज्ञानी जैसी लगती भर है वस्तुतः वैसी है नहीं। डर या कायरता की मंजिल पार हो चुकी है। सुख सुविधा की इच्छा के लिए अब मरने के दिनों में गुँजाइश ही कहाँ रही। शौक मौज की आयु ढल गयी। अब और कोई न सही अपना जराजीर्ण शरीर भी पग पग असुविधाएँ उत्पन्न करेगा। ऐसी दशा में सुविधाओं की कामना, असुविधाओं की अनिच्छा भी रोने कलपने का कारण नहीं है। कारण एक ही है हमारी भावुकता और छलछलाते प्यार से भरी मनोभूमि। जिनका रत्ती भर भी स्नेह हमने पाया है, उसका बदला पहाड़ जैसे प्रतिपादन देने के लिए मन मचलता रहता है।
जिनने हमारी कुछ सेवा सहायता की हैं, उनकी पाई पाई चुका देंगे। न हमें स्वर्ग जाना है और न हमें मुक्ति लेनी है। चौरासी लाख योनियों में एक बार भगवान से प्रार्थना करके इसलिए प्रवेश करेंगे कि इस जनम में जिस जिस ने जितनी जितनी हमारी सहायता की हैं उसे एक एक चौरासी चक्र में भुगतान कर दिया जाय। घास, फूल, पेड़, लकड़ी, बैल, गाय, भैंस आदि बनकर हम किसी न किसी के काम आते रह सकते हैं और इससे अपने उपकारियों के अनुदान का बदला पूरे अधूरे रूप में चुकाते रह सकते हैं। सद्भावना का भार ही क्या कम है जो किसी सहायता का भार और ओढ़ा जाय ?यह सुविधा भगवान से लड़-झगड़कर प्राप्त कर लेंगे पर जिनने समय समय पर ममता भरा प्यार हमें दिया, हमारी तुच्छता को भुलाकर जो आदर सम्मान, श्रद्धा, सद्भाव, स्नेह एवं अपनत्व प्रदान किया है, उसके लिए क्या कुछ किया जाय समझ में नहीं आता। इच्छा है कि हृदय कोई बादल जैसा बना दें कि जहाँ से एक बूँद स्नेह की मिली हों, वहाँ एक प्रहर की वर्षा कर सकने का अवसर मिल जाय। मालूम नहीं ऐसा संभव होगा कि नहीं। यदि संभव न हो सके तो हमारी अंत व्यंजना उन सभी तक पहुँचे, जिनकी सद्भावना किसी रूप में हमें प्राप्त हुई हों। वे उदार सज्जन अनुभव करें कि उनके प्यार को भुलाया नहीं गया वरन् उसे पूरी तरह स्मरण रखा गया।
हमारे मन में व्यथाएँ बहुत है। उनका समाधान क्या हो सकता है कौन जाने? पर आप इस आन्तरिक उद्वेग की घड़ियों में यह भी अच्छा ही है कि जो हम खोलकर अपनी बात कह लें और परिजनों को बता सकें कि हम क्या सोचते और चाहते है-कहते हुए विदा हों सके।
(वसंत पर्व 1981 पर शाँतिकुँज परिसर में दिया गया प्रवचन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों ! भाइयों !!कैसा शुभ अवतरण का दिन रहा होगा वह जिस दिन भगवती सरस्वती ने अवतरण लिया होगा इस धरती पर। भगवती सरस्वती हम देखें, प्रकृति के अंतर्गत वसंत के रूप में। पदार्थों में एक उल्लास आता है, उमंगे आती है, पत्तों झड़ते हैं और फूल खिलते हैं। बच्चों में हम देखते हैं कि वसंत किस तरीके से हँसता और मुस्कुराता है। कोयल को देखते हैं, भौंरों को देखते हैं, दूसरे प्राणियों में देखते हैं, थिरकन और पुलकन किस प्रकार दिखाई पड़ती है।
वसंत के दिनों में हर प्राणी में एक उल्लास और उमंग दिखाई पड़ती है। सृष्टि का सृजन क्रम इन दिनों ज्यादा होता है। मनुष्यों में भी वसंत क्रम इस प्रकार आता है कि उमंग और उत्फुल्लता पैदा होती है। इस रूप में भगवती सरस्वती ने इस धरती पर अपनी खुशी की, उत्साह की तरंगें पैदा की है।
आज से बहुत दिनों पहले कैसा शुभ दिन रहा होगा, जिसे हम भगवती सरस्वती के अवतरण के दिन ज्ञान के अवतरण का दिन कहते हैं। मनुष्य के अन्दर भगवती सरस्वती आयी होंगी ज्ञान के रूप में। मनुष्य कभी असभ्य रहा होगा, वनमानुषों की तरह रहा होगा, दूसरे प्राणियों से कहाँ कमजोर और दुर्बल रहा होगा।
वह कुत्ते की तरह से दौड़ नहीं सकता, हिरण की तरह कुलाचें नहीं भर सकता, बन्दर की तरह उछल कर छलाँग पेड़ पर नहीं लगा सकता, पक्षियों की तरह उड़ान नहीं भर सकता, मछली की तरह पानी में तैर नहीं सकता। इस तरह की सामर्थ्य उसमें नहीं है। आदमी बहुत कमजोर है। इतना कमजोर होते हुए भी वह विकसित होता चला बया। आज प्राणियों का ही नहीं, सृष्टि का स्वामी होने का दावा करता है। मनुष्य यह कैसे हो गया ? वह उसकी बुद्धि का चमत्कार, विचारों के चमत्कार का प्रतिफल है।
कैसा वह सौभाग्य का दिन रहा होगा, जब अन्य प्राणियों की तुलना में बुद्धि विकसित हुई होगी, जिसकी हम खुशी मनाते हैं। आनन्द मानते हैं कि हमें वन मानुष से मनुष्य बनाने का वसंत बड़ा ही महत्वपूर्ण है। भगवती सरस्वती की कृपा से हमें भगवान विचारणा प्राप्त हुई। इसे दूसरे नामों से पुकारते है-विद्या-शिक्षा भी कहते हैं। यह खुशी इसी दिन हर साल मनाते हैं। वहाँ सरस्वती की वंदना करते हैं। यह परम्परा बहुत दिनों से चली आ रही है। हम भी उसके अंतर्गत यह पर्व मनाते हैं ज्ञान प्रेमी के तरीके से, विद्या प्रेमी के तरीके से, लेकिन अपने वसंत पर्व की कुछ विशेषता है।
हमारे व्यक्तिगत जीवन में एक वसंत आया था, आज से लगभग 55 वर्ष पूर्व, जिसमें सामान्य पतझड़ जैसे, एक ठूँठ जैसे इंसान में नवीन पल्लव आ गये, नया उत्साह आ गया।
एक छोटे से देहात में रहने वाले लड़के के समक्ष वसंत पर्व के दिन एक दैवी शक्ति आई, उससे बातचीत हुई। उस दैवी शक्ति ने कहा- तुम से हमें कुछ विशेष काम कराने हैं, बड़े काम कराने है, तुम्हें सामर्थ्य बनाना है। हमने कहा आप बनाइये। मजबूत बनने के लिए ताकतवर बनने के लिए हम तैयार है। समर्थ बनने के लिए ताकतवर आदमी की आवश्यकता पड़ती है। आप हमें योग्य बनाइये।
उनके साथ बातचीत शुरू हो गयी। जिन्हें मैं बाँस, मार्गदर्शक गुरु कहता हूँ -ठीक व वसंत पर्व के दिन आये थे, एक छोटे से कमरे में। तब हमारी उम्र 15 वर्ष की ही रही होगी। हमने पूछा आप क्या सहायता करेंगे ?उन्होंने कहा हम एक ही सहायता करेंगे, तुम्हारी कामनाओं और भावनाओं को बदल देंगे। कामनाएँ किसे कहते हैं, कामनाएँ उसे कहते हैं, जिसके बारे में हम कह रहें थे। यह दो है पर एक पेट की भूख है, जो पेंडुलम की घड़ी के तरीके से खट खट, खट खट चलती रहती है। यह रोटी माँगती है। रोटी की भूख का परिष्कृत रूप वह है, जिसे जीभ कहते हैं। जीभ का इच्छुक प्राणी इकट्ठा करना चाहता है, बड़ा आदमी बनाना चाहता है, सेठ बनना चाहता है। अन्य प्राणी पेट भरना चाहते हैं।
दूसरी वृत्ति प्राणियों की यह होती है। कि वह जोड़े के साथ रहना चाहता है। इंसान में उसका रूप कुछ विकसित हो गया है। विकसित रूप यह है कि विवाह शादियों की बात करता है। दूसरे प्राणियों में यह बात नहीं बनती। वहाँ सिर्फ चयन होता है। चयन के बाद मिलन। दोनों के मिलने से बच्चे पैदा होने लगते हैं। दोनों की मोहब्बत बच्चों को मिलने लगती है, तत्पश्चात कोई भी उनसे अलग रहना पसन्द नहीं करता। इसे मोह कहते हैं।
मित्रों ! प्रत्येक प्राणी के भीतर लोभ- मोह विकसित होते चले जा रहे है। प्रकृति की दी हुई प्रत्येक प्राणी के भीतर दो ही चीजें है, जिसे हम लोभ और मोह कहते हैं। जानवरों के अन्दर उसे पेट और प्रजनन कह सकते हैं। , अतः पेट और प्रजनन का विकसित रूप लोभ एवं मोह है। इन्हें ही कामना कहते हैं। इन कामनाओं की लोग तरह तरह की गुत्थियाँ बनाते रहते हैं।
कामनाओं के स्थान पर दूसरी चीजों की जरूरत है, अगर आदमी अपने आप को विकसित बनाना चाहता है तब। बड़ा आदमी होना चाहता हो, सुसंस्कृत होना चाहता हो, मजबूर होना चाहता हो, देवता होना चाहता हो तो उसे पात्रता सिद्ध करनी होगी। उसे अपनी कामना को बदल करके भावना में विकसित करना होगा। कामना वह होती है जो शरीर से ताल्लुक रखती है।
मित्रो! मैं आप से लोभ-मोह यानि वासना तृष्णा का जिक्र कर रहा था। ये चीजें आदमी के शरीर से संबंध रखती है शरीर में आदमी जब विकसित होता है तो उसके अन्दर दूसरी तरह की भूख उत्पन्न हो जाती है। वह भूख जीवात्मा की होती है। जीवात्मा की जो भूख है उसे हम भावना कहते हैं। हमारे गुरु ने कहा है कि तुम्हें भावना के क्षेत्र में प्रवेश तथा विकसित होना चाहिए और कामनाओं को ऊँचा उठाना चाहिए।
कामनाओं को छोटा नहीं कहा जा सकता, उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि हमारे पास शरीर है। शरीर को जिन्दा रखने के लिए दूसरी चीजों की भी आवश्यकता पड़ती है। पेंट भरने के लिए रोटी कमाने की जरूरत पड़ती है, लेकिन हर चीज की एक मात्रा है। पेट भरने के लिए मुट्ठी भर अनाज चाहिए। मनुष्य कम खर्च में भी अपने कुटुम्ब को सुसंस्कृति बना सकता है। नहीं हम अपने बच्चों को सुसंस्कारी बनाने के लिए पब्लिक स्कूलों में भर्ती कराना चाहते हैं। कितने बच्चे है आपके ? तीन बच्चे है। आपको 2400 रुपये देना चाहिए। आपकी बात भी ठीक हो सकती है, अगर हमारे अन्दर सुसंस्कारिता हो तो हम कम पैसे में ही काम चला सकते हैं ? बिनोवा भावे की माँ की तरह से। बिनोवा भावे की माता का मन था कि उसके बच्चे सुयोग्य और सुसंस्कारी बने। बच्चों को आगे बढ़ाने तथा पढ़ाने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है। नहीं पैसों की नहीं, सुसंस्कारों की आवश्यकता पड़ती है, जिसका मन भावना है। अगर सुसंस्कारी हो तो कोई महिला बच्चों को ब्रह्मज्ञानी बना सकती है। बिनोवा भावे की माँ सुसंस्कारी थी अतः उसने तीन बच्चों को पैदा किया तथा तीनों को महान बना दिया। एक का नाम ‘ बिनोवा’, दूसरे का नाम ‘वाल्कोवा’, तीसरे का नाम बिठोवा। तीनों बच्चे ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मचारी संत बन गये तथा समाज के काम आ गये। क्यों साहब पैसे की जरूरत पड़ी, नहीं भाई साहब पैसों की जरूरत नहीं पड़ती।
शकुन्तला जब कण्व ऋषि के आश्रम में पाली पोषी गयी थी, तो कण्व ऋषि के पास कितना पैसा था ? नहीं भाई साहब कुछ नहीं था। शकुन्तला को सुसंस्कारों का वातावरण मिला था, जिसके द्वारा उसने अपने बच्चों को ‘भरत’ बना दिया।
सीता के जब लव-कुश पैदा हुए थे, तो सीता वाल्मीकि के आश्रम में थी। वहाँ क्या सुविधा व क्या व्यवस्था थी आप बता सकते हैं ?नहीं कोई सुविधा नहीं थी॥ इंसान को विकसित करने के लिए भावना की जरूरत है। शरीर को पोषण देने सुन्दर बनाने, सुखी बनाने के लिए कामनाओं की भी जरूरत हो सकती है, जिसको आप दौलत कह सकते हैं, सुविधा कह सकते हैं, लेकिन आत्मा को विकसित करने के लिए दौलत की कोई खास जरूरत नहीं है॥ हम ऋषियों के तरीके से सन्तों के तरीके से कुटुम्ब का पालन करते हुए बड़ी आसानी से जी सकते हैं एवं बड़ी आसानी से शाँति से गुजारा कर सकते हैं, लेकिन हम क्या करें ? एक हविश हमारे ऊपर ऐसी हावी हो गयी है, जिसको हम एक तरह से नशा कही सकते हैं, जिसकी न जरूरत है, न आवश्यकता। यह जब हमारे दिमाग पर हावी होती है, तो पूरी तरह से जकड़ लेती है, तो बुरी तरह से जकड़ लेती है, समझदारों को पकड़ लेती है, हाथ पाँव को पकड़ लेती है, चप्पे चप्पे को पकड़ लेती है।
आज वसंत के दिन जिसे मैं अपना सौभाग्य दिन मानता हूँ, हमारे गुरु ने कहा - तुम्हें अपने आप को कामनाओं की दिशा से मोड़कर दूसरी दिशा में बढ़ना चाहिए। तुम्हें अपने चिंतन की दिशा धारा को दूसरी दिशा में मोड़ देना चाहिए। उस दिन से उनकी जो इच्छा, वह हमारी इच्छा। उस दिन से हमारा सौभाग्य उदय हो गया। मैं तब से क्रमशः मजबूत होता चला गया।
उन्होंने कहा सिद्धाँतों का पालन करने के लिए आदमी को कठोर होना चाहिए, बलवान होना चाहिए, मजबूत होना चाहिए। मजबूती आयेगी, तो हम जो दूसरी चीज देना चाहते हैं, उसे पाने के हकदार हो जाओगे। तभी से हमने अपनी भावना को परिपक्व करने के लिए, मजबूत करने के लिए संकल्प किया। उन्होंने जो संकल्प दिया, उसे जीवन भर निबाहा। संकल्प छोटा सा था। उन्होंने कहा तुम्हें 24 साल तक जौ और छाछ की रोटी पर निर्भर रहना होगा। खानें के संदर्भ में, जीभ के संदर्भ में दो ही चीजें इस्तेमाल करनी होंगी, तीसरी नहीं। जीभ पर हुकूमत कर सकते हो ? हमने कहा -हाँ ! जीभ पर जो दिमाग हुकूमत करता है, उसे चलायमान करता है, उस पर हुकूमत कर सकते हो ?हमने कहा - हाँ, हम जीभ और दिमाग दोनों पर हुकूमत कर सकते हैं। हमने दिमाग पर नियंत्रण किया। जिन लोगों को खाते देखा, दिमाग ने कहा- हमें भी चाहिए। सब लोग बड़े मजे में खाते हैं, पसन्द करते हैं आपको भी खाना चाहिए। हमने दिमाग से कहा आप हमारे है या हम आपके हैं? दिमाग ने कहा हम तो आपके है। हमने कहा तब तो आपको हमारी बाते और हमारा कहना मानना चाहिए। उसे समझा दिया- जो स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक है, वही हमें करना चाहिए। जीभ की आज्ञा हमने नहीं मानी। कहा - हमारे गुरुदेव की आज्ञा है आदर्श सिद्धाँतों को उनकी आज्ञा बड़ी जबरदस्त है, उसे हमें माननी चाहिए। इस प्रकार क्रमशः हमारे संकल्प मजबूत होते चले गये और हम संकल्पवान बनते चले गये।
सिद्धांतों का पालन करने में अपनी कमजोरियाँ कैसे तंग करती है? अपने पड़ोसी कैसे तंग करते हैं? रिश्तेदार खानदान कैसे तंग करते हैं, 24 साल के इस अंतराल में हमने जाना। दुनिया अपने साथ न चलने वालो का कैसा मजाक उड़ाती है, कैसा बेवकूफ बनाती है, उपहास करती है, यह भी हमने देखा परन्तु मैं क्या कर सकता था? कुटुम्बियों से लोहा लिया, मोहल्ले वालों से लोहा लिया, मंच के साथ लोहा लिया, इन्द्रियों के साथ लोहा लिया, परिवार वालों के साथ लोहा लिया। हर एक से टक्कर लेते लेते आज हमारा सौभाग्य उन्होंने हमें लोहा का बना दिया यह क्या चीज थी? भावना थी। किसने दी? हमारे गुरुदेव ने दी। इसको मैं वसंत कहता हूँ। जब से होश सँभाला तब से अबतक 55 वसंत देखे। यह हमारा 56वाँ वसंत पर्व है। 70 साल का मैं हो गया हूँ। इसमें तो 14 वर्ष को मैं नहीं जानता, क्योंकि उस समय हमारा संबंध पारस से नहीं हुआ था। उस समय तक तो हम साधारण इंसान की तरह रहते थे। परन्तु जब हमने 15 वर्ष के बाद पारस को छूना प्रारम्भ किया, तो हमारी शक्ल बदल गयी। शक्ल का मतलब है हमारा ईमान, हमारा दृष्टिकोण, हमारा चिंतन। दूसरे आदमी जैसा विचार करते हैं वैसा मैं नहीं करता॥। दूसरे आदमी की जैसी आकाँक्षाएँ है वैसी मेरी नहीं है। वे जिस दृष्टिकोण के आधार पर फैसले करते हैं, मैं उस आधार पर फैसला नहीं करता। यह क्या हुआ पारस को छू जाना हुआ फ यह मेरा सौभाग्य है कि मैं पारस को छू गया। मैं कौन ? लोहा। वसंत मेरे जीवन में आ गया। पतझड़ पर सिद्धाँतों के, आदर्शों के, मर्यादाओं के, संकल्पों के जो वसंत के कोमल और पत्ते आये थे आज से 55 वर्ष पूर्व यह मेरा सौभाग्य था। आज तो इसमें फूल आ रहे है, और न जाने क्या क्या चीजें आ रही है, उन संकल्पों के कारण, कामना को भावना में बदल देने के कारण कि मैं क्या कहूँ। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। इसे मैं भगवती सरस्वती का वरदान मानता हूँ। कि मुझ ठूँठ जैसे व्यक्ति में पल्लव पैदा कर दिये। कौन सी चीज आ गयी ?बहुत सी चीज आ गई। कोयल आ गई बौर को देखकर। भौंरे आ गये गीत गाने, खिले हुए फूलों को देखकर। कितने आदमी आ गये फूलों को देखकर कि मैं क्या बताऊँ। बच्चों ने ललचाई आँखों से फूलों को देखा। हर एक ने इसे देखा और पसन्द किया। यह मैं अपने जीवन की बात बता रहा हूँ, अपने सौभाग्य की बात बता रहा हूँ, अपने वसंत की बात बता रहा हूँ। यह वसंत एक से एक बढ़ते चले आये मेरे जीवन में। आज 56 वें वसंत के दिन आप और हम मिलकर खुशी मना रहे है। इसका आयोजन संपन्न करने के लिए आप और हम बैठे हुए है। इसमें आप भी खुश हैं और हम भी खुश है, वसंत के पेड़ भी खुश है पत्ते भी खुश है-कोयले, भौंरे, इंसान सभी खुश है। इसमें एक तीसरी धारा और भी मुड़ जाती हैं तीसरी धारा प्रकृति का समस्त सृष्टि में अवतरण। दूसरी धारा हम जैसे नाचीज के जीवन में वसंत की उमंगे, वसंत की भावना। एक और भी वसंत आ गया। भगवान की इस सुन्दर सृष्टि को हम नष्ट नहीं होने देंगे। भगवान ने इसे बड़े परिश्रम से बनाया है। हमने भूगोल पढ़ा है, भूगोल विद्या पढ़ी है। हमने देखा है कि यह दुनिया जिसमें हम और आप है। सबसे सुन्दर, बढ़िया और खूबसूरत है और ऐसा मालूम पड़ता है, मानो भगवान ने बड़ी समझदारी के साथ इस सृष्टि को बनाया है। इसमें उनकी बड़ी बड़ी तमन्नाएँ और उम्मीदें हैं।
इस धरती पर जब कभी भी असंतुलन आता है, भगवान अपनी सृष्टि को संभालने के लिए अपने वासंती खिलौने इस धरती पर भेजते हैं। क्या भगवान व्यक्ति के रूप में आते है? उन्हें धारण करते हैं, क्या क्या चीजें आती है उमंगे आती है प्रकृति में और ढेरों ढेरों आदमी लग जाते हैं। नेतृत्व कौन करता है? मैं नहीं जानता। श्रेय किसे मिलता है? यह मैं नहीं जानता। क्या हवा आती है जो एक आदमी को अवतार बनने का श्रेय दे दें वास्तव में यह असंख्यों का अवतार बना देती है। भगवान राम को हम श्रेय देते हैं, परन्तु क्या अकेले राम की बात थी ? केवट, भील से लेकर गिलहरी तक, गीध से लेकर रीछ, वानरों तक सबके भीतर एक उमंग थी - हम सृष्टि का संतुलन बनाये रखने के लिए अनाचार के विरुद्ध लोहा लेंगे। गिलहरी जिसकी कोई हैसियत नहीं, एक ढेला मारने पर मर जाती है, वह कहती है कि हम लोहा लेंगे। यह कौन कहता था ? अवतार कहता था। अवतार शरीर धारी को व्यक्ति को नहीं कहते, एक तरंग को कहते हैं जो उठती है और मनुष्य के पर छा जाती है। अवतार बहुत बार आये। राम के जमाने में आये, कृष्ण के जमाने में आये। उस समय छोटे छोटे आदमी ग्वाल बाल गोवर्धन उठायेंगे ? क्यों जोखिम उठायेंगे? परन्तु अवतार कहता था कि आपको करना चाहिए। उन छोटे छोटे लोगों में उमंगे थी उन्होंने वैसा किया। इस प्रकार जब भी कोई अवतार आयें होंगे, ऐसे ही हजारों लाखों व्यक्ति के भीतर हूक आयी होगी। क्या भगवान बुद्ध ने दुनिया पलट दी थी ? आपने देखा नहीं ? उनके साथ ढेरों ढेरों आदमी जुड़े थे। उनके परिव्राजक नालन्दा ओर तक्षशिला विश्व विद्यालय में शिक्षण प्राप्त करने के पश्चात बिखर गये थे। रेगिस्तान को पार करते हुए मंचूरिया, मंगोलिया तथा चीन जा पहुँचे। कौन ? भगवान बुद्ध ?हाँ भगवान बुद्ध। एक लाख नर एवं एक लाख नारियाँ अपने घरों को छोड़कर भिक्षु बन गये थे। लोगों ने कहा वे पागल हो गये हैं। उसकी उन्होंने चिंता नहीं की। धर्म की स्थापना और अधर्म के उन्मूलन के लिए जो हूक उठती अवतार उसी को कहते हैं। गाँधी जी भी अवतार थे - यह मत कहिए। गाँधी जी स्वराज्य अकेले लेकर नहीं आ गये। उनके लाखों सत्याग्रहियों की हूक थी, जिसके कारण स्वराज्य प्राप्त हुआ। हूक को ही अवतार कहते हैं। मेरी बात समाप्त।
युग युग से ही आत्मा वसंत पतझर से पीड़ हरने को। ग्रुवर आये पतझर में ही वासंती वैभव भरने को ॥ 1॥
पहिले वसंत आ, पतझर को साँत्वना तनिक दे जाता था, फिर वे पतझर हो जाता था। आता वसंत, जब जाता था, फिर से पतझर हो जाता था॥
मुस्कान तनिक दिखती भर थी, कुछ क्षण पतझर के अधूरे पर। बौछार सरस पड़ती भर थी, भावों के भूखे भ्रमरों पर ॥
कोई वसंत आया न कभी, पतझर के मधु रस करने को। ग्रुवर आये पतझर में ही वासंती वैभव भरने को ॥ 2॥
थे घाव अभावों के गहरे, ऊपर से मरहम लगाते थे। गहरी ले घावों की पीड़ा, कोई भी जान न पाते थे॥
पतझर को ही जैसे तैसे, अपनी पीड़ा पीनी होती॥ आये वसंत के जाने पर उनकी दुनिया सूनी होती ॥
खोला न किसी ने पतझर ने, पतझर के अंतरस के झरने को। ग्रुवर आये पतझर में ही वासंती वैभव भरने को ॥ 3॥
गुरुवर वासंती वैभव के उपहार लिये आये भू पर। समता ममता मृदु करुणा की, रस धार लिये आये भू पर॥
पतझर के अन्यस के रस के वि( रस सब खोल दिये। पतझर के प्राणों आया हूँ तुममें ही सदा विचरने की॥
ग्रुवर आये पतझर में ही वासंती वैभव भरने को ॥ 1॥ ग्रुवर आये पतझर में ही वासंती वैभव भरने को ॥ 4॥
बस फिर क्या था, पतझर का ही हो गया प्राण परिवर्तन। वासंती वैभव फूट पड़ा, खिल गया महकता नदन वा॥
दुश्चिंतन के, दुर्भावों के, पतझर में परिवर्तन आया। सद् चिंतन का सद्भावों का, मानव मन में खुमार छाया ॥
सौरभ के सद् प्रवृत्तियों के, मानव मन लगा महकने को। ग्रुवर आये पतझर में ही वासंती वैभव भरने को ॥ 5॥
भण्डार वासंती वैभव के! भावों का सुमन समर्पित है। थ्जस में वासंती प्राण भरे, ऐसे मचले मन अर्पित है॥
हमको महकाया है तुमने, इस जगती को महका देंगे। संदेश तुम्हारा सुना सुना, हर कोकिला को चहका देंगे॥
उज्ज्वल भविष्य के उद्घोष का प्रस्तुत है प्राण चहकने को। ग्रुवर आये पतझर में ही वासंती वैभव भरने को ॥ 6॥
मंगल विजय
ओ वसंत के दूत तुम्हीं ने, मर्म रंग का पहचाना। तपे जगत हित किया हमें पहना दिया वही बाना॥
जो भी निकट तुम्हारे आया, रंगता गया इसी रंग में। केवल वस्त्र न पीले है-है वही ऊर्जा अंग अंग में॥ भला और का हो चाहे खुद को पड़ जाये चोट खाना॥
ओ वसंत के दूत तुम्हीं ने, मर्म रंग का पहचाना। तपे जगत हित किया हमें पहना दिया वही बाना॥
भले कूट दो पीली सरसों पिसकर, भी देती है स्नेह। ऐसे ही बन गये तुम्हारे शिष्यों के मन, प्रण व देह॥ अभी रंगे है स्वयं, शेष है सकल विश्व को रंगवाना॥
ओ वसंत के दूत तुम्हीं ने, मर्म रंग का पहचाना। तपे जगत हित किया हमें पहना दिया वही बाना॥
लायेंगे वह पर्व वासंती-ममता का आलम होगा। सभी बनेंगे सबके अपने- समता का परचम होगा ॥ सब चाहेंगे सुखद, शाँतिमय झंडे के नीचे अपना॥
ओ वसंत के दूत तुम्हीं ने, मर्म रंग का पहचाना। तपे जगत हित किया हमें पहना दिया वही बाना॥
हमें कसम आँवलखेड़ा की- गुरु का वचन निभायेंगे। जबतक दम में दम है-काम मिशन का करते जायेंगे॥ हों जग के सब खेत वासंती -हमें बीज बन गल जाना॥
ओ वसंत के दूत तुम्हीं ने, मर्म रंग का पहचाना। तपे जगत हित किया हमें पहना दिया वही बाना॥
मायावर्मा
(समापन किश्त)
आंवलखेड़ा पूर्णाहुति महोत्सव में पाँच मंच बनाए गए थे जहाँ से वार सम्प्रेषण, दैवी चेतना के प्रवाह के वितरण का क्रम चलता रहा। इनमें से देव मंच से सामगान से लेकर वैदिक ऋचाओं द्वारा 1251 कुण्डीय यज्ञशाला का संचालन ऋत्विक् गणों एवं ब्रह्मवादिनी बहिनों द्वारा सम्पन्न हुआ तथा संस्कार मंच जहाँ से बारह प्रमुख संस्कारों से सम्पन्न कराया गया, की चर्चा विगत अंक में की जा चुकी है। ज्ञान मंच 4, 5, 6, नवम्बर को संधिवेला में पूज्यवर की विचार चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य करता रहा। विचार युगऋषि के थे, पहुँचाने का कार्य उनकी कठपुतलियां नित्य अभ्यागत अतिथिगणों व विशेषज्ञों के द्वारा विभिन्न विषयों पर विचारों की अभिव्यक्ति व करने योग्य क्या-क्या कार्य हैं, यह क्रम 2 नवम्बर से 7 नवम्बर तक सतत् चलता रहा। पांचवां मंच कला मंच था, जहाँ से लोक कला के वैविध्य पूर्ण प्रस्तुतीकरण का कार्य देश भर के कोने-कोने से आए कलाकारों ने कर लोकरंजन से लोक मंगल के पूज्यवर द्वारा निर्धारित एक महत्वपूर्ण कार्य के अभिनव स्वरूप प्रदान किया।
ज्ञान मंच - बैकड्राप के रूप में जन्मस्थली की झलक व परमपूज्य गुरुदेव के विराट रूप को दर्शाता एक चित्र पृष्ठ भाग में था। गुरु सत्ता के प्रतीक के रूप में मध्य में एक भव्य सिंहासन पर गुरुदेव एवं माताजी की पादुकाएँ स्थापित थीं। प्रतिनिधि रूप में मध्य में एक भव्य सिंहासन पर गुरुदेव एवं माताजी की पादुकाएँ स्थापित थी। प्रतिनिधि रूप में श्रद्धेय पंडित लीलापति जी शर्मा (गायत्री, तपोभूमि, मथुरा) एवं डॉ0 प्रणव पण्ड्या (निदेशक, ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान) ने अपने विचार इस मंच से व्यक्त किए। 3 नवम्बर कलश यात्रा वाले दिन संध्या वेला में विशिष्ट अनुयाज पुनर्गठन प्रधान उद्बोधन में डॉ0 प्रणव ने कहा कि अब “करो या मरो” का समय आ गया है। जनता का विश्वास जीत लेने वाले गायत्री परिवार को जब सुगठित सुव्यवस्थित इकाइयों में पुनर्गठित हो जाना चाहिए। यही समय की माँग है। उनने पंच प्यारों का उदाहरण देकर संधिकाल की विशिष्ट वेला में कार्यकर्त्ताओं के लिए पूर्णाहुति का संदेश क्या है, विस्तार से समझाया। श्रीमती शैलबाला पण्ड्या ने नारी जागरण की प्रक्रिया को कैसे बलवती बनाया जाय इस सम्बन्ध में मार्गदर्शन दिया। संवेदना प्रधान शैली में उनने परमवंदनीय माताजी की अन्तः की पीर को अपनी भावाभिव्यक्ति दी। श्रद्धेय पण्डित जी का एक ही संदेश था कि गुरुवर के साहित्य को अब घर-घर पहुँचाना ही एक मात्र दायित्व हमारे परिजनों का है। जो जिस परिमाण में पूज्यवर के विचारों को जन-जन तक तक पहुँचाएगा, वह उतना ही पूज्यवर का निकटवर्ती व श्रेयाधिकारी बनेगा। ज्ञान मंच का संचालन श्री कालीचरण जी ने बड़े कौशल के साथ किया। दीपयज्ञ भव्य विराट रूप में 6 नवम्बर को ज्ञान मंच में ही आयोजित व संचालित था तथा इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसंघ कार्यवाह श्री कुप. सी. सुदर्शन, सुप्रसिद्ध अधिकारी (मुम्बई महानगर पालिका) एवं भ्रष्टाचार उन्मूलन मोर्चे के उपाध्यक्ष श्री खैरनार तथा ‘कालचक्र’ वीडियो पत्रिका के प्रधान सम्पादक श्री विनीत नारायण भी उपस्थित थे। श्री सुदर्शन जी ने संक्रान्तिकाल व अवतार के प्रकटीकरण की प्रक्रिया को वैज्ञानिक-दार्शनिक शैली में समझाते हुए गायत्री परिवार के इस प्रयास को श्लाषनीय बताया। दीपयज्ञ का संचालन श्री वीरेश्वर जी उपाध्याय एवं चन्द्र भूषण मिश्र ने किया। सवालक्ष दीपों के जलने पर जो आभा प्रकट हुई, वह देखते ही बनती थी।
विचार मंच - इसे केन्द्रीय कार्यालय के सामने आगरा रोड पर कर्ब्हड क्षेत्र में बनाया गया था। एक बार में उसमें पाँच हजार व्यक्ति बैठते थे। इतने ही बाहर खड़े होकर सुनते थे। पत्रकार नगर भी पास था, अतः सारे भारत में आए पत्रकार इसमें सतत् उपस्थित रहे। विचार मंच से विचार क्रान्ति का स्वर गुँजायमान करने वाले स्वर मुखरित होते रहे। मुख्य रूप से इसका स्वरूप एक विचार गोष्ठी का था। कोई एक नहीं, 5-6 वक्ता निर्धारित विषय पर अपने विचार व्यक्त करके गए। राष्ट्रीय जलागम विकास परियोजना (एन. डब्ल. डी. पी. आ. ए.) में युग निर्माण मिशन की भागीदारी, राष्ट्र निर्माण हेतु प्रतिभाओं का आह्वान, धर्मतंत्र और राजतंत्र का सहगमन, स्वास्थ्य संरक्षक योजना-चल ग्राम्य चिकित्सा सेवा, नवसृजन में युवाओं की भूमिका, विश्व के साँस्कृतिक विकास में प्रभारी भारतीयों की भागीदारी, जातिभेद का व्यावहारिक समाधान ग्रामीण स्तर पर आर्थिक स्वावलम्बन, बिखरे हुए धर्मतंत्र पुनर्जीवन, तथा दृष्टाओं की दृष्टि में भारत का भविष्य जैसे विचारोत्तेजक विषयों पर सतत् विचार मंथन चलता रहा एवं प्रवासी भारतीयों से लेकर राजनेताओं एवं मूर्धन्य प्रतिभाओं की इसमें भागीदारी होती रही। उपलब्ध निष्कर्षों के आधार पर ऐसी व्याख्यान मालाएँ दूसरे देश में आयोजित करने की अनुयाज वर्ष में योजना बनी है। युगद्रष्टा के विचार जन-जन तक फैलें एवं विचार मंच द्वारा एकमत होकर विभिन्न स्तर की प्रतिभाएँ सृजनात्मक दिशाधारा तय कर सकें, वही इसका मूल उद्देश्य था एवं इसमें पूरी सफलता मिली, यह सुनिश्चित रूप कहा जा सकता है।
कला मंच - यह न केवल क्षेत्री स्तर की
प्रतिभाओं के लिए अवसर के रूप में सामने आया। जन-जन के लिए एक स्वस्थ मनोरंजन का स्वरूप भी लेकर सामने आया अपितु पूज्यवर चाहते थे कि लोकरंजन कसे लोकमंगल के लिए लोक कला को पुनर्जीवित किया जाय एवं विविधता से भरे इस देश की कला क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न प्रतिभाओं को एक मंच पर लाया जाए। यह भूमिका कला मंच ने पूरी तरह निभायी। प्रतिभाओं के मनमोहन प्रदर्शन ने दर्शकों का दिल जीत लिया। बुन्देलखण्ड का आल्हा, रुहेलखण्ड के लोकगीत, पंजाबी-भाँगड़ा, उड़िया नृत्य व गायन, कूल्लू की दशहरा पूजा व नृत्य, उत्तराखण्ड का लोक गायन, पंडवानी गायकी से जुड़ी प्रतिभाओं का प्रदर्शन, राजस्थानी कौशल भरा नृत्य, असम के त्यौहार नृत्यों का प्रदर्शन, ब्रजभाषी मीठी शब्दावली के साथ भावनात्मक प्रस्तुति, एकाकी मिमीक्री शैली द्वारा अपनी कला का सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन अरुणाचल के कलाकारों द्वारा पूर्वांचल की शैली में नृत्य-गायन ये सभी विशेषताएँ कला मंच की थी। कलानगर में टेण्टों की नगरी में सारी असुविधाओं में रहकर भी कलाकारों ने दिव्यता के अनुदानों की वर्षा की अनुभूति की एवं इस कार्यक्रम से वे बहुत कुछ लेकर गए। अनेकों कलाकार दीक्षित होकर परिजन बनकर गए।
अब इस प्रयोग के बाद ऐसी संकल्पना की जा रही है कि अगले दिनों अनुयाज क्रम के बाद जब विराट् सम्मेलनों-यज्ञायोजनों की शृंखला चले तब इसी प्रकार विचार मंच एवं कला मंच स्तर के अनेकानेक प्रयोग क्षेत्रीय स्तर पर चलें एवं प्रतिभाओं का सदुपयोग किया जाय। अनुयाज पुनर्गठन वर्ष में भी शाँतिकुँज में ऐ मंच सक्रिय हो जायँ यह भी सोचा गया है।
विराट जीवन दर्शन प्रदर्शनी जिससे सबने मिशन को जाना
इस विराट आयोजन का सर्वाधिक आकर्षक केन्द्रबिन्दु थी एक विराट प्रदर्शनी जो कई भागों में बँटी थी किन्तु प्रत्येक अपने में परिपूर्ण एवं गुरुसत्ता के निर्धारणों जीवन दर्शन-आदर्शों का, राष्ट्र निर्माण के विविध कार्यक्रमों की झाँकी दिखाने वाली थी। इन्हीं के साथ परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय प्रातःस्मरणीय पूज्य श्री दादा गुरु, अर्धनारी-नटेश्वर के विराट कट आऊट स्थान-स्थान पर लगे थे, जिनकी झाँकी परिजन चित्रों में देख चुके हैं। समर्पित कलाकारों द्वारा बनायी गयी महाकाल की विराट प्रतिमा सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्रबिन्दु थी। पाप-पुरुष के ऊपर नृत्य की मुद्रा में खड़े महाकाल का स्वरूप सबने देखा जिसकी अभिव्यंजना व्याख्या परमपूज्य गुरुदेव की पुस्तक ‘महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ पुस्तक में की गई है।
शाँतिकुँज प्रदर्शनी चित्रकला प्रभाग के श्री गंगाधर चौधरी, सुधीर भारद्वाज एवं गगन तो अपने समर्पण भाव से एक माह पूर्व से ही तैयारी में लग गए थे किन्तु क्षेत्रीय स्तर की प्रतिभाओं जिनने विगत सभी अश्वमेधों में अपना योगदान दिया था, इस विराट महाकुम्भ में भी अपना पूरा समय दिया एवं भोपाल के आनन्द विजयवर्गीय से लेकर गुजरात की समग्र टीम इसके लिए आ पहुँची। सर्वाधिक पुरुषार्थ किसका रहा, यह किन शब्दों में व्यक्त किया जाय किन्तु चलती-फिरती मूर्तियों, मनमोहक-आकर्षण-कलाकारिता की पराकाष्ठा तक पहुँची मूर्तियों के माध्यम से गुरुसत्ता, गायत्री माता एवं संस्कार प्रक्रिया के एक-एक पद्धति को अभिव्यक्ति देने का कार्य श्रीराज जी (मुँगेर) के माध्यम से जिस प्रकार सम्पन्न हुआ, इसकी सभी ने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की। श्रीराजजी 3 माह पूर्व से ही शाँतिकुँज आ गए थे एवं अपनी समर्पण साधना के आधार पर उनने वह झाँकी भारत एवं विश्वभर के परिजनों को दिखायी जिसने संस्कारों से लेकर चौबीस गायत्री महाशक्तियों के तत्वज्ञान को उन्हें बड़ी सुगमता से समझा दिया। सरकण्डों से बना भव्य मन्दिर एवं विराजमान गुरुदेव-माताजी सभी के लिए एक आश्चर्य का विषय बने हुए थे। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के क्रियाकलापों- आँकड़ों-उपकरणों, विज्ञान अध्यात्म समन्वय सम्बन्धी प्रयोगों तथा एक सौ आठ दुर्लभ वनौषधियों का जीवन दर्शन आगन्तुक सभी विशिष्ट अभ्यागतों सहित परिजनों ने किया। यह प्रस्तुतीकरण पहली बार किया गया था व अपने आप में अनूठा था।
जीवनदर्शन प्रदर्शनी में परमपूज्य, गुरुदेव, परमवंदनीया माताजी एवं मिशन की जीवन यात्रा समग्र रूप में दर्शायी गयी थी। 1911 से प्रारम्भ इस यात्रा के एक-एक पक्ष को चित्रों आँकड़ों-विवरणों-पक्षों के माध्यम से शिकागो यज्ञ (जुलाई 1995) तक की स्थिति तक दर्शाया गया था। सभी ने इसे देखकर अपने सौभाग्य को सराहा। इसी प्रदर्शनी में परमपूज्य गुरुदेव के द्वारा लिखे गये विराट साहित्य पर आधारित वाङ्मय की एक झाँकी छपे चौबीस खण्डों के दर्शन के रूप में परिजनों ने की।
एक विलक्षण पक्ष इस प्रदर्शनी का आदर्श ग्राम की परिकल्पना एवं राष्ट्रीय जलागम विकास परियोजना में युग निर्माण मिशन की भागीदारी के मॉडल रूप में था। ऐ विराट लैण्डस्केप पर एक आदर्श ग्राम की परिकल्पना की गयी थी एवं किस प्रकार जल-भू-संरक्षण द्वारा पर्यावरण को सही रख कृषि उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, यह क्राँति कैसे जन-जन को प्रभावित कर गरीबी उन्मूलन की दिशा में एक महत्पुरुषार्थ सम्पन्न कर रही हैं, यह सभी ने देखा। श्री जे. सी. पंत जो अपने एक परिजन भी है व भारत सरकार के कृषि सचिव के नाते इस योजना के प्रणेता भी रहे हैं, ने इसे देखकर अपनी हर्षाभिव्यक्ति प्रकट की। गायत्री महाविद्या, यज्ञ विज्ञान, वैदिक विज्ञान एवं देवसंस्कृति के विभिन्न पक्षों पर एक विराट प्रदर्शनी गुजरात के सारसा शक्तिपीठ द्वारा लगायी गयी थी। यह अनेकानेक भागों में बँटी थी एवं इसमें चित्रों, ग्राफों आँकड़ों तथा वैज्ञानिक-शास्त्रोक्त प्रमाणों के माध्यम से उपरोक्त सभी विधाओं के एक-एक पक्ष को छुआ गया था। यही नहीं, प्रत्येक पैनल की विज्ञान सम्मत व्याख्या करने वाले प्रशिक्षित स्वयं-सेवकों जिनमें अधिकाधिक बालक थे, के प्रस्तुतीकरण द्वारा संकस्ति के इस पक्ष को जन-जन तक पहुँचाने का भी एक श्रेष्ठ स्तर का प्रयास किया गया था। श्री साधुराम भाई आचार्य गायत्री महाविद्या के दर्शन पक्ष को जन-जन तक पहुँचाने का भी एक श्रेष्ठ स्तर का प्रयास किया गया था। श्री साधुराम भाई आचार्य गायत्री महाविद्या के दर्शन पक्ष पर पी.एच.डी. कर चुके हैं एवं देवसंस्कृति के विज्ञान सम्मत स्वरूप को पूरे विश्वभर में पहुँचाने हेतु परिव्रज्या कर चुके हैं। गुजरात प्राँत की इस प्रदर्शनी के माध्यम से जन-जन ने परमपूज्य के माध्यम से जन-जन ने परमपूज्य गुरुदेव प्रणीत गायत्री से जन-जन ने परमपूज्य गुरुदेव प्रणीत गायत्री महाविद्या के गुह्य पक्ष को बड़े सरलतम ढंग से जाना एवं सराहा।
वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण- पूर्व में भी यज्ञ प्रक्रिया के विज्ञान पर शोध कार्य हेतु हमारे युवा वैज्ञानिकों का दल भोपाल-गोरखपुर, जबलपुर आदि अश्वमेध यज्ञों में कार्य कर आंकड़े एकत्र कर चुका है। इस बार भी उनने पूर्व मिट्टी, हवा, जल के नमूने एकत्र किया। शाला के अत्यन्त समीप, एक किलोमीटर, दूरी पर मोबाइलवाँन में उपकरण स्थापित किये गये थे व सभी जगह नमूने एकत्रित कर उनका विश्लेषण किया गया व अब उन पर विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। सी.एस.आई.आर. दिल्ली के वैज्ञानिकों एवं दिल्ली की मानी बाजपेई सहित मथुरा पिफाइनरी के वैज्ञानिकों का इसमें सक्रिय सहयोग रहा। आधार स्तर पर स्वयं सेवक की तरह दौड़−धूप कर श्रीमती संध्या पाण्डे एवं डॉ0 पदमाकर त्रिपाठी ने सारी व्यवस्थाएँ जुटाई एवं समस्त असुविधाओं प्रतिकूलताओं के बीच भी यज्ञ प्रक्रिया के वैज्ञानिक प्रभावों, जन स्वास्थ्य व पर्यावरण से लेकर सामाजिक पक्ष पर अपना अध्ययन किया। सभी आँकड़े कम्प्यूटर में डाल दिये गए हैं व विस्तृत विश्लेषण के बाद इस पत्रिका में प्रकाशित होंगे।
प्रवासी परिजनों की भागीदारी-लगभग बीस देशों के तीन सौ से अधिक प्रवासी भारतीयों ने इस महायज्ञ में भाग लिया। अपनी आराध्य सत्ता की जन्मभूमि पर हो रहे इस विराट यज्ञायोजन में सब आना चाह रहे थे किन्तु सुन्दर देशों में रहने वाले परिजनों की अपनी विशेषताएँ भी होती हैं। फिर भी अमेरिका, कनाडा, ग्रिनिडाड-टोबेगो, दक्षिण अफ्रीका, जिंबाब्वे, जाम्बिया, केन्या तंज़ानिया, यूगाण्डा इंग्लैण्ड, फ्राँस, पुर्तगाल, न्यूजीलैण्ड, थाईलैंड इत्यादि देशों से प्रवासी भारतीय व अन्य विदेशी भी इस आयोजन में आए एवं भारतीय संस्कृति भी इस आयोजन में आए एवं भारतीय संस्कृति का विश्व संस्कृति के रूप में बदलता स्वरूप देखकर गए। प्रत्येक से एक प्रश्नावली भराई गयी। सभी के जवाब समान रूप से इस अभिव्यक्ति के रूप में आए कि विचार मंच, कला मंच, ज्ञान मंच, देव मंच व संस्कार मन से जो विचार उनने सुने, वे सभी उनको संतानों भौतिक वादी जीवन में जी रहे लोगों के लिए अत्यंत महत्व पूर्ण है। शाँति का एक यही राजमार्ग अब बचा है। सभी आयोजन की भव्यता व सुव्यवस्था से गदगद होकर गये। लंदन लेस्टर व यूरोप का पूरा समूह तो एक चार्टर फ्लाइट से पूरे अस्सी लोगों के साथ आया था व सभी नव दिवसीय सत्र भी शाँतिकुँज में संपन्न करके गये।
वेदस्थापना वाङ्मय एवं साहित्य केन्द्र- इस बार विशेषता थी चारों वेदों के अभिनव संपादित संस्करणों की उपलब्धता जो कि जो आठ जिल्दों में थे, पूज्य गुरुदेव के समग्र साहित्य पर संपादित वाङ्मय के सत्तर में से चौबीस खण्ड तथा विराट परिणाम में लिखा छोटी बड़ी पुस्तिकाओं के रूप में विद्यमान ऋषियुग्म रचित संजीवनी विद्या प्रधान साहित्य। इसके लिए शाँति कुँज हरिद्वार एवं युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि मथुरा द्वारा स्थान स्थान पर स्टाल लगाये गये थे। वेदस्थापना की अभिनव पूजन प्रक्रिया से जोड़कर ऐ संस्कार का रूप दे दिया गया। प्रायः बीस हजार से अधिक व्यक्तियों ने यह संपन्न कराया। वाङ्मय के प्रत्येक खण्ड अलग अलग भी समग्र रूप से अग्रिम राशि देकर विशेष कार्टन में पैक्ड उपलब्ध थे। ढेरों व्यक्ति ले गए। अनेक शक्तिपीठों-प्रज्ञा परिजनों के समूह या प्रज्ञा मण्डलों ने इसे अपने यहाँ स्थापित करने का उत्साह दिखाया है। साहित्य लेकर जो भी गया, इसे यज्ञ का विशेष प्रसाद मानकर ले गया। सच भी है कि पूज्यवर की प्राणचेतना उनके द्वारा लिखे साहित्य में ही तो विद्यमान है।
भोजनालय, चिकित्सालय, विभिन्न कार्यालय- एक साथ ढाई लाख व्यक्ति भोजन कर सकें, इसके लिए 4 विशाल पाकशालाएँ एवं बीस भोजन शालाएँ (डाइनिंग हाल) बनाई थीं। सभी प्रान्तों के विविध कार्यकर्त्ताओं ने मिल-जुलकर यह व्यवस्था सँभाली। छत्तीसगढ़, गुजरात, रुहेलखण्ड-बागपत-मेरठ क्षेत्र एवं राजस्थान के परिजनों ने यह सारा दायित्व बखूबी निभाया। किसी को भी बिना अधिक प्रतीक्षा के समय पर भोजन मिलता रहा।
एक विराट परिधि में चिकित्सक नगर भी बसाया गया था, जहाँ सभी सुविधाएँ एम्बुलेंसों, एक्सरे उपकरण, सर्जरी आदि से लेकर सामान्य उपचार तक की उपलब्ध थी। शाँतिकुँज के डॉ0 रामप्रकाश पाण्डे जी की सुव्यवस्था के कारण क्षेत्रीय नगरों की डिस्पेंसरी व केन्द्रीय कार्यालय में सभी को सारी सुविधायें मिलती रहीं। मिशन के प्रायः दो सौ से अधिक चिकित्सकों व आगरा नगर के चिकित्सकों का योगदान सराहनीय रहा।
अन्त में-मीडिया, प्रशासन की भूमिका के बारे में जितना विस्तार से लिखा जाय कम है। सभी ने यथायोग्य अपनी शक्ति अनुसार इसमें योगदान दिया। जो भी कुछ कमियाँ इस आयोजन में रही होंगी वह आयोजकों की सूझबूझ की कमी की वजह से हो सकती है परन्तु दिव्यसत्ता ऋषि चेतना के सुरक्षा कवच में, उनके अनुदानों की वर्षा की दृष्टि से कोई कमी नहीं थी। इस आयोजन की सफलता का श्रेय उन ढेरों श्रमशील समयदानियों को तो है ही जो पूर्व से आकर रह रहे थे, उन सभी को जो केन्द्र के आग्रह पर बाद में काफी दिन तक रुककर सारे क्षेत्र की सुव्यवस्था बनाते रहे।
इस आयोजन की पूर्णता तो 2001 में हुई मानी जाएगी पर इतना अवश्य कहना चाहेंगे कि क्षेत्रीय स्तर पर हुई अनुयाज गोष्ठियों पुनर्गठन परक विचार विमर्श से 1996 में जो कार्य सम्पन्न होगा वही मिशन की नवसृजन प्रक्रिया की आधारशिला रखेगा। (समाप्ति)
ऋतुएँ बदलती हैं। उनके बदलने के साथ प्रकृति में भी परिवर्तन आते रहते हैं। कभी पतझड़ आता है तो कभी शिशिर, कभी वर्षा आती है तो कभी हेमन्त। वर्ष भर में छह परिवर्तन चक्रों से समय गुजरता है और हर चक्र में प्रकृति को अपना रंग दे जाता है। लेकिन इन सभी ऋतुओं में जितना महत्व वसंत को मिला है-मनुष्य ने वसन्त के जितने गीत गाए हैं, अन्य किसी ऋतु को उतना तो क्या, आधा-चौथाई महत्व भी नहीं मिला है। इसका कारण है ? वसन्त ने मनुष्य की भावचेतना को जितना स्पर्श व प्रभावित किया है उतना अन्य किसी ने नहीं किया।
वसन्त नवजीवन का चेतना के प्रवाह का प्रतीक है। सम्भवतः यही कारण है कि भगवान कृष्ण ने उसे “ऋतूनाँ कुसुमाकर” कहकर सर्वोपरि महत्व दिया है। वसन्त से पूर्व की ठिठुरन का ठण्ड का जिन्हें अहसास है, वे जानते हैं कि शीत के कारण पेड़-पौधों के पत्ते व बागों में फूल कुम्हला जाते हैं। पक्षी तक अपने घोंसलों में छिपे रहते हैं, धूप निकलने पर ही कहीं हलचल करते दिखाई देते हैं। वसन्त ज्यों ही आता है, पेड़ पौधों को नये पत्तों की कोपलें बाँटता है, कुम्हलाये फूलों को नयी मुस्कान देता है और पक्षियों से उनका अनमनापन छीन कर उन्हें सदाबहार मुसकान दे देता है। पेड़-पौधों और वन-उपवन की बहार, पक्षियों का कलरव, कोयल की कूक तथा सूरज की स्वर्णिम किरणें मिलकर ऐसा वातावरण उत्पन्न करते हैं कि चारों ओर आनन्द तथा उल्लास का वातावरण फैल जाता है। आनन्द और उल्लास-आनन्द और उल्लास ही वसन्त की वह भावचेतना है जिसकी एक झलक भी मनुष्य को जीवन्त बनाए रखती है। बसन्त नव जीवन का, नये उत्साह का, नयी चेतना का संचार करता हुआ आता है, एवं व्यष्टि से लेकर समष्टि तक एक प्रेरणा-उत्साह की लहर उठने उमगने लगती है।
ऐसे ही बसन्त पर्व को मिशन गायत्री परिवार अपने आराध्य इष्ट परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्मदिवस के रूप में, वार्षिकोत्सव के रूप में, नूतन प्रेरणा-संदेशों के उद्गम केन्द्र के रूप में तब से मनाता चला आया है। जब से इसका विधिवत् शुभारंभ हुआ। 1926 में परमपूज्य गुरुदेव की पन्द्रह वर्ष की आयु में यह वसन्त उनकी मार्गदर्शक सत्ता के दीपक की ज्वाला से प्रकटीकरण के रूप में सामने आया एवं तब से ही उनने उसे अपने जीवन का कायाकल्प, आध्यात्मिक जीवन का शुभारंभ वर्ष मनाना आरंभ कर दिया। आज जो गायत्री परिवार का विराट वट वृक्ष विनिर्मित है उसके मूल में जो-जो स्थापनाएँ हैं उन सभी की प्रेरणा पूज्यवर को वसन्त की वेला में ही मिलती रही हैं। सूक्ष्म जगत से आने वाला ऋषि चेतना का प्रभाव ही उन सभी निर्धारणों को करता रहा है। यह विराट मिशन जब एक लम्बी यात्रा पारकर एत्तर वर्ष पूरे कर अब 1996 में एक नये साल में पदार्पण कर रहा हैं। यह वर्ष कई माइनों में महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक है। सत्ताईस विराट आयोजन पूरे कर अनुयाज-पुनर्गठन की वेला में यह वसन्त तब आया है जब हमारी गुरुसत्ता को शाँतिकुँज का रजतजयंती वर्ष भी है। सन् 1971 में मथुरा से स्थायी रूप से विदाई लेकर परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीय माताजी विश्वामित्र ऋषि की इस तपस्थली में आ विराजे थे। तब यह स्थान छोटा था, आज का एक दसवाँ भाग भी नहीं। किन्तु अब यह अपने विराट रूप में गुरुसत्ता के चमत्कारी विराट रूप का बोध कराता हमें आने वाले पांच वर्षों के लिए कुछ विशेष सन्देश दे रहा है। यदि प्रस्तुत बसन्त पर हम उन निर्देशों का आत्मसात् कर सके तो निश्चित ही हम उन लक्ष्यों की पूर्ति की दिशा में अग्रसर हो सकेंगे जो हमारे लिए हमारी इष्ट सत्ता निर्धारित कर गयी है।
प्रस्तुत वसन्त पंचमी जो 24 जनवरी के दिन आ रही है, सभी के लिए जो जाग्रत आत्माओं की श्रेणी में आते हैं, एक ही उमंग-एक ही प्रेरणा लेकर आ रही है कि अब हम सभी को प्रमाद से बचते हुए अपने हर कार्य को साधना के रूप में ही हाथ में लेना है। एक विराट आयोजन सम्पन्न करने के बाद थकान आना स्वाभाविक है किन्तु वह शारीरिक ही होती है एवं सामयिक भी। यदि यह थकान शिथिलता के रूप में आने लगे तो समझ लेना चाहिए कि यह आसुरी उमंग है एवं लोक-मंगल के कार्य में लगे व्यक्ति के लिए अत्यन्त घातक है। वसन्त जागते रहने और कर्मशील बने रहने का संदेश लेकर आया है एवं हमें उसी रूप में उसे ग्रहण करना चाहिए।
पुनर्गठन की इस वेला में जब 21 वीं शताब्दी मात्र पाँच वर्षों की दूरी पर खड़ी हमसे प्रश्न पूछ रही है एवं उज्ज्वल भविष्य परक समाधान क्रिया रूप में हमसे चाहती है, हम सभी को कुछ विचार बिन्दुओं पर गंभीर चिन्तन कर लेना चाहिए।
(1) रजत जयन्ती के इस वर्ष को हम सभी परिजन पूरे भारत व विश्व में उल्लास के साथ मनायें, उत्साहपूर्वक मनायें। अपने-अपने अश्वमेध यज्ञ की वर्षगाँठ अलग-अलग आयोजित न कर वसन्त पर्व, गायत्री जयन्ती, गुरुपूर्णिमा इन तीन पर्वों को व्यापक स्तर पर साधनात्मक रूप में मनायें। इस वर्ष न्यूनतम एक कार्यकर्त्ता सम्मेलन जो विशुद्धतः संगठनात्मक आधार लिये हो सामूहिक आधार पर 8-10 जिलों या बीस लाख की आबादी के परिकर को लक्ष्य रखकर मनालें। इस सम्बन्ध में मात्र हीरक बनने योग्य डेढ़ सौ-दो सौ कार्यकर्त्ताओं को ही आमन्त्रित करें व आयोजन का स्वरूप सादगी प्रधान हो। सम्मेलन कब, कैसे आयोजित करें व आयोजन का स्वरूप सादगी प्रधान हो। सम्मेलन कब, कैसे आयोजित हों, इस सम्बन्ध में शाँतिकुँज संगठन प्रकोष्ठ से जानकारी ले लें एवं ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक पत्रिका का द्वितीय पृष्ठ नियमित रूप से पढ़ते रहें।
(2) स्थान-स्थान पर प्रभात फेरियाँ आयोजित की जायँ, वैयक्तिक साधनात्मक ऊर्जा संवर्धन हेतु पुरश्चरण का क्रम चले एवं सामूहिक साधना भी सम्पन्न की जाती रहे। सामूहिक साधना रविवार को एक घण्टा जप के रूप में एवं गुरुवार को शाम सात से साढ़े सात उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में सभी स्थानों पर घरों, शाखा कार्यालयों-प्रज्ञा मण्डलों-शक्तिपीठों स्वाध्याय मण्डलों में सम्पन्न हो सकती है।
(3) प्रतिकूलताओं से भरी परिस्थितियों में भी मिले जन-विश्वास को ऋषियों का दिव्य अनुदान मानते हुए अब स्वयं को बिखराव से समेटकर एक जिम्मेदार-प्रमाणिक लोकसेवी के रूप में विकसित करें। जिम्मेदार वह जो निभा सके। मात्र मुँह से ढेरों संकल्प तो तोते से भी दुहरवाये जा सकते हैं। किन्तु अब मिशन की इस परिपक्वावस्था में हमें एक भारी भरकम व्यक्तित्व के रूप में विकसित होना है जो जिम्मेदारी सँभालना सीख व सिखा सकें। जो भी कार्य हाथ में लिया है, तो फिर “प्राण जाँहि पर वचन न जाँहि” की तरह उसे पूरा करके ही दिखायें। ‘पंजप्यारों’ का उदाहरण सामने रखें जिसने गुरु के कहने पर संस्कृति के निमित्त सीस चढ़ा दिए। भले ही गुय गोबिन्दसिंह जी ने यह परीक्षा ही ली हो पर पाँच शूरवीरों दयाराम क्षत्रिय (लाहौर, ) धर्मदास जाट (दिल्ली), मुहकमचन्द्र धोबी (द्वारिका), हिम्मतराय पनिहार (जगन्नाथपुरी), एवं सहिब चन्द्र नाई (बीदर) ने वह मरजीवड़ों वाला साहस तो अन्दर से जुटाया कि गुरु के कारण के लिए अपने आपको समर्पित कर दिया। पंजप्यारे जीवित भी रहें व इतिहास में सदा के लिए अमर हो गए। हमें भी अब इसी स्तर का पुरुषार्थ दिखाने हेतु तत्पर होना है। उससे पूर्व इस बसन्त पर्व पर एक बार पुनः आत्म पर्यवेक्षण कर लें कि गुरुवर की कसौटी पर हम अभी भी खरे उतरते हैं कि नहीं, कहीं महत्वकाँक्षाओं की मूढ़ता उद्धत अहंकार लिप्सा हमें जकड़ तो नहीं रही। कड़ी परीक्षा का समय है यह गायत्री परिवार के लिए।
(4) समयदान की दृष्टि से अपील करते-करते हम अखण्ड ज्योति के कई पन्ने रंग चुके हैं। हमें सभी वर्ग के व्यक्तियों का सुनिश्चित निर्धारित समयदान चाहिए। शाँतिकुँज का संगठन प्रकोष्ठ अब समयदानियों का जो कम समय के लिए हैं (3 या 6 माह के लिए) यदि वे प्रशिक्षण ले चुके हैं तो स्थानीय स्तर पर उपयोग करना चाहता है। निकट के जिलों के लिये यदि समयदान नियोजित हो सके तो वह शाँतिकुँज प्रतिनिधि नाते हुआ सेवा कार्य ही माना जाएगा। शाँतिकुँज में स्थायी स्तर पर अब मात्र कुछ ही विधाओं के प्रशिक्षित निष्णात व्यक्तियों की आवश्यकता है जिनमें कम जिम्मेदारी वाले डाक्टर दम्पत्ति, अध्यापक जो प्रशिक्षित हों तथा अनुवादक स्तर के सौष्ठव पूर्ण शैली वाले व्यक्ति प्रधानतः चाहिए। शेष क्षेत्रों का कार्य अब हीरक मण्डलों के गठन से निकल कर अपने वाले पूर्ण समयदानियों के माध्यम से शाँतिकुँज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं के मार्गदर्शन में चलेगा।
(5) मूल धुरी क्षेत्रीय कार्यक्रम की वही है छह महा क्रांतियां किंतु उसका प्राण है आध्यात्मिक पुनर्जागरण व नारी जागरण। साधना प्रधान, संस्कार प्रधान, परिवार, संस्था की धुरी पर ही ये क्रांतियां सम्पन्न हो सकेंगी। इसके लिए जो भी सम्भव हो किया जाना चाहिए।
(6) जहाँ भी बड़ी-बड़ी शक्तिपीठें-प्रज्ञा संस्थान बने हैं किसी के पास लोकसेवी के नाते
गायत्री परिवार की क्रेडिट पर मिली जमीन या बिल्डिंग हैं, उन्हें अब अपनी कानूनी औपचारिकताएँ पूरी कर लेनी चाहिए। किसी भी प्रकार का जमीन जायदाद का झगड़ा न रख, ट्रस्टियों के विवाद सुलझा लिये जायँ-इसके लिए जनमत तैयार किया जाय तथा हर रजिस्टर्ड शक्तिपीठ पर परिव्राजक की नियुक्ति कर ली जाय। इस सम्बन्ध में ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक (1 जनवरी 96) अनिवार्य रूप से पढ़ लें।
(7) प्रज्ञा मण्डलों का भी पुनर्गठन का डालें। पत्रिकाओं के सदस्य, मिशन के कार्यों में रुचि लेने वालों को ही इनका सदस्य बनाये, एक संयुक्त कार्यकारिणी बनाकर सामूहिक दायित्व स्वीकार कर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करें। शाँतिकुँज से दो-दो परिजनों की टोलियाँ सघन प्रज्ञामण्डल क्षेत्रों को केन्द्र बनाकर भेजी जा रही हैं। वे मार्गदर्शन भी करेंगी। व वाँछित जानकारियाँ भी साथ ले आयेंगी।
(8) इस वर्ष कोई भी बड़ा खर्च प्रधान आयोजन न करें जिनमें चंदा भी माँगना पड़े व समय क्षेप भी हो। अपने मन से घोषणा कर केन्द्र के वरिष्ठ विशेष का नाम छापकर जो पर्चे बाँट देते हैं, फिर आग्रह करते हैं, उनसे विशेष रूप से कड़ाई से कहा जा रहा है। यह वर्ष छोटे-छोटे संगठनात्मक आयोजनों के निमित्त ही नियोजित हों, यही गुरुसत्ता की इच्छा है एवं हम सभी को इसका दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए।
बसंती उल्लास हम सभी के रोम−रोम में प्राण ऊर्जा भर गुरुसत्ता के प्रति समर्पण भाव को और अधिक बढ़ावा चले यही सबके प्रति मंगल कामना है।
नयी साल की सुबह अपने साथ जिन उपहारों को लेकर आती है, उनमें सबसे बेशकीमती उपहार डायरी है। इसे नववर्ष के सौभाग्य चिन्ह के रूप में अपनाते स्वीकारते तो सभी है, पर सार्थक उपयोग बिरले ही कर पाते हैं। सामान्य क्रम में यह या तो यूँ ही उपेक्षित पड़ती रहती है। अथवा सब्जी दूध के हिसाब लिखने के काम आती है। हो सकता है डायरी लेखन से अनभिज्ञ मन में सवाल उठे आखिर यह है क्या और इसका उपयोग किस लिए ? इसके जवाब में जे.बैट्समैन को अपनी रचना ’थाट्रस इट्रस जर्मिनेशन ग्रोथ एण्ड डेवलपमेंट’ में समूचा एक अध्याय डायरी के मूल एवं महत्व पर लिखा है। उन्होंने कतिपय उप महापुरुषों के नामों का उल्लेख भी किया है, जिन्होंने अपने विचारों को डायरी लेखन के द्वारा सँवारा सुधारा और विकसित किया है। इनमें जार्ज बर्नार्डशा, बट्रेण्ड रेसल और आइन्स्टाइन मुख्य है। रेसल के अनुसार इनकी बचपन से दैनन्दिनी लिखने की नियमित आदत थी। वह अपनी अंत+प्रवृत्तियों एवं वाह्य घटनाचक्रों पर उनकी प्रतिक्रियाओं का बारीकी से विश्लेषण करते, बाद में उन्हें शब्दों में पिरोते। कालांतर उनकी इसी आदत ने उन्हें विश्व का महान विचारक और दार्शनिक बनाया।
हिन्दुस्तान में भी ऐसे अनेक महनीय व्यक्तित्व हुए जिनका डायरी लेखन आज विचार जगत की अमूल्य धरोहर बन गया। श्री राम कृष्ण परमहंस क शिष्य महेन्द्र नाथ गुप्त ‘ मास्टर महाशय’ इसी तरह दैनन्दिनी लेखन करते थे। वह परम हंस देव की चर्चाओं को नियमित लिपिबद्ध करते थे जिन्हें बाद में श्री रामकृष्ण वचनामृत के रूप में प्रकाशित किया गया। इसके प्रकाशन के अवसर पर स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- मास्टर महाशय के वचनामृत के रूप में विश्व मानवता को ऐसी धरोहर सौंपी हैं, जिन्हें युगोँ तक याद किया जायेगा। उनके इस कार्य ने डायरी लेखन के मूल्य को अक्षुण्य बना दिया।
महात्मा गाँधी के शिष्य एवं सचिव महादेव भाई की डायरी जो अब अनेक खण्डों में प्रकाशित हैं, गाँधी के जीवन के मार्मिक क्षणों एवं तत्कालीन घटनाक्रमों का तथ्यात्मक मूल्याँकन है। गाँधी जी के इस कार्य के मुक्त प्रशंसक थे। बिनोवा भावे जो गाँधी के सहयोगी होने के साथ एक मौलिक विचारक भी थे, उन्होंने इस कार्य को चार चरणों में वर्गीकृत किया। उनके अनुसार ये चार चरण है आत्म निरिक्षण, आत्म समीक्षा, आत्म सुधार एवं आत्म जागरण।
डायरी लेखन में नियमित रूप से इन चारों का समावेश होना चाहिए। प्रातःकाल से लेकर रात्रि सोने के समय तक स्वयँ का प्रवृत्तियों, भावनाओं, विचारों के उतार चढ़ाव, बाहरी घटना क्रमों पर स्वयँ होने वाली प्रतिभाओं का लेखा- जोखा आत्मनिरीक्षण है। इनके उचित अनुचित होने की विवेचना आत्मसमीक्षा है। उचित का उन्मूलन, उचित का संवर्धन आत्म सुधार है। और इसके प्रयास के फलस्वरूप स्वयँ की आत्म चेतना का जागरण अनिवार्य है। यही चौथा एवं अंतिम चरण है। इन चारों की गति स्थिति एवं विकास का ब्योरा नियमित लिपिबद्ध किया जाना चाहिए।
यह प्रक्रिया जहाँ समय एवं शक्ति का बेहतर उपयोग करने में सहायक सिद्ध होती है, वही हमारे विचारों एवं भावनाओं को असाधारण रूप से विकसित करने में सहायक सिद्ध होती है। प्रख्यात लेखक वालटेया ने, तो यहाँ तक लिखा हैं कि जिसे मौलिक लेखक, विचारक बनाना हो, उनको नियमित रूप से डायरी लेखन करना चाहिए। इससे न केवल विचारो का विकास होता है, बल्कि भाषा भी उत्तरोत्तर परिमार्जित एवं संतुलित होती जाती है। आइन्स्टाइन तो डायरी को अपना सबसे विश्वस्त मित्र एवं एकांत क्षणों का सहयोगी मानते थे। उनके अनुसार हम अपनी वे बातें, वे भावनायें जिन्हें हम किसी से बत नहीं सकते, वे नितान्त गोपनीय है, अपनी डायरी में मुक्त मन से कह सकते हैं। इससे अधिक विश्वसनीय भला कौन होगा? मानव मन के विशेषज्ञ जेम्स डिलेट फ्रीमैन का कहना है कि यदि मन की गाँठों को खोला न जायं, तो परिणाम गंभीर मनोरोगों व शरीर रोगों के रूप में उभरता है। लेकिन इन गाँठों को खोले भी किसके सामने? इस सवाल के जवाब में उनका कहना हैं कि हमें अपनी सारी बातें अपनी डायरी से कह देना चाहिए। ऐसा करके हम स्वच्छ चिंतन एवं स्वस्थ जीवन का मार्ग अपनाते हैं।
साहित्य जगत की विभूतियाँ स्टीफेन ज्विंग जिनकी रचनाओं का अनुवाद दुनिया, करीब तेईस भाषाओं में हो चुका है, नियमित दैनन्दिनी लेखनी के अभ्यासी थे उनके अनुसार डायरी हमारे विचारों के विकास का इतिहास है। जिस तरह हम शिशु का नियमित अंतराल में फोटो खींचें जाय एवं इस क्रम को वृद्धावस्था तक जारी रखा जाय तो उपलब्ध छाया चित्रों के सहारे शरीर के विकास क्रम को चेहरे के भावों को आसानी से समझा जा सकता है। उसी तरह से नियमित रूप से किया गया डायरी लेखन भी हमारे मानसिक, भावात्मक विकास के सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्वों को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।
इतनी मूल्यवान विधा से न जाने क्यों हमने स्वयं को उपेक्षित कर रखा है। आइये इसे आज से अभी से इसी वर्ष से शुरू करें और नियमित रूप से जारी रखें। इससे होने वाले परिणाम हमें आश्चर्य चकित किये बिना न रहेंगे। सन् 1996 की प्रभात वेला में यह उपहार आप स्वयँ स्वीकारें और औरों को भी दें।
*समाप्त*