भारतीय संस्कृति में अनेकानेक विशेषताएँ हैं, किन्तु एक सबसे बड़ी विशेषता है जो हम उसमें पाते हैं वह है- गुरु शिष्य परंपरा । गुरु माँ की तरह अपनी प्राण ऊर्जा से शिष्य के अन्तःकरण को ओतप्रोत कर उसमें नई शक्ति का संचार करता है, उसे नया जीवन देता है। शिष्य का समर्पण और गुरु द्वारा अपना सर्वस्व उसको अर्पण, इसकी मिसाल और कहीं भी देखने को नहीं मिलती। गुरु का सहयोग लिये बिना शिष्य की आत्मिक प्रगति संभव नहीं। अज्ञान के अंधकार में फँसे मानव को बाहर निकालने के लिए गुरु अपनी विशिष्ट ज्ञान की शलाका से उसकी आँखों में वो अंजन लगाता है कि उसे जीवन का वास्तविक उद्देश्य और अपनी भावी भूमिका स्पष्ट नजर आने लगती है। जिस किसी के जीवन में गुरु का पदार्पण हुआ है, उसे मानकर चलना चाहिए कि उसके उच्चस्तरीय आत्मोत्थान का पथ प्रशस्त हो गया।
आज के आधुनिक युग में जब आदमी को आदमी पर विश्वास नहीं है तब शिष्य कैसे विश्वास करे- कौन सा गुरु उसके लिए सच्चा है ? शास्त्रों का मार्गदर्शन है- धूर्तों के मायाजाल से बचने के लिए लोभ-लालच में फँसाकर अपना उल्लू साधने वाले तथाकथित बाबाजियों के चंगुल में आने से बचने के लिए शिष्य को अपने अंदर के नेत्र खुले रखने चाहिए। यह एक समयसाध्य प्रक्रिया है, परन्तु क्रमशः समझ में आने लगता है- कौन सही है? और कौन गलत ? आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधक आज के इस मायाजाल से घिरे संसार में निश्छल स्वभाव वाले, संवेदना से अभिपूरित, तार्किक नहीं बल्कि वास्तविक ज्ञान से भरे−पूरे गुरु को पहचानने में देर नहीं करते। गुरु की पहचान के पश्चात् अपनी आत्म सत्ता का परिपूर्ण समर्पण , अहंकार का विगलन और अपनी इच्छाओं का गुरु की इच्छाओं में विलय- बस इतना ही शेष रह जाता है। समर्पण यदि सर्वोच्च स्तर का हुआ तो बदले में उतना ही मिलता हुआ चला जाता है। वंशी स्वयं को पोला कर लेती है और मुँह से लगने के पश्चात् वही स्वर बजने देती है जो बजाने वाला चाहता है। शिष्य भी यदि स्वयं को खाली कर दे और अपनी इच्छायें गुरु को दे दे, तो गुरुदीक्षा सम्पूर्ण हो जाती है। गुरुसत्ता अपनी प्राण ऊर्जा की कलम शिष्य के व्यक्तित्व में आरोपित कर उसे विशिष्टता से सम्पन्न बना देती है। समर्थ गुरु का अवलम्बन के सौभाग्य है। जिसे यह मिल गया मानो उसकी मुक्ति का द्वार खुल गया।
जार्ज बिसेल ने सामने खड़े हुए नवयुवक की ओर ध्यान से देखा। उसकी उम्र लगभग अठारह वर्ष होगी। सादे कपड़े , गौर वर्ण और चेहरे आत्मविश्वास भरी मुसकान। उसकी आँखें तो जैसे सम्मोहन का झरना थीं, इसके जादू से बिसेल भी न बच सके। उन्होंने अपनी टेबल की फाइलों को एक ओर खिसकाते हुए उसे सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।
कुर्सी पर बैठते हुए युवक ने विनम्रतापूर्वक अभिवादन करते हुए अपना परिचय दिया- “मेरा नाम एडविन ड्रेक है। कुएँ खोदने में मुझे महारत हासिल है। सुना है आप आजकल तेल के कुएँ खुदवाने का काम करवा रहे हैं। इस काम में, मैं आपकी मदद कर सकता हूँ।”
बिसेल उसकी ओर देखता रह गया, युवक ड्रेक का एक- एक शब्द उसके आत्मविश्वास की गवाही दे रहा था। एक पल को वह हैरान भी हुए कि अठारह साल के नवयुवक में इतना मनोबल कहाँ से आया। फिर कुछ सोचते हुए वह एक हल्की-सी मुसकान के साथ बोले, लेकिन तुम्हें कैसे मालुम हुआ कि मैं तेल की तलाश में कुएँ खोदने की योजना बना रहा हूँ।
“बस यूँ ही”- एडविन हँसकर बोला। ऐसा करो, तुम कल प्रातः दस बजे आ जाना, आज मुझे रोडरिक से बात करनी है। उससे बातचीत करके ही कुछ निर्णय ले सकूँगा।
ठीक है सर, कहते हुए एडविन ने हलका-सा सिर झुकाया और दरवाजे से बाहर निकल गया, बिसेल पुनः अपने काम में खो गया।
एडविन एक बेरोजगार युवक था। वह न्यूयार्क शहर के उत्तर-पश्चिम स्थित मुहल्ले फ्लोरिडा में रहता था। उसकी माँ की मृत्यु उसके बचपन में ही हो गयी थी। अपनी माँ का वह इकलौता बेटा था। लेकिन माँ की मौत के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली। नई माँ उसे फूटी आँखों से भी नहीं देखना चाहती थी। बात-बात पर झिड़क देना, डाँटना और मार-पीट करना उसकी रोज की दिनचर्या का अनिवार्य अंग बन गया था। ईर्ष्यावश उसने एडविन का नाम स्कूल में भी नहीं लिखवाया, जिससे वह अनपढ़ ही रह गया।
उसके घर के पास ही राबिन नाम का एक ठेकेदार रहता था, जो कुओं की खुदाई करता था। घर की मारपीट और उपेक्षा से तंग आकर एडविन राबिन के साथ लग गया था। जिससे उसे कुएँ खोदने का अच्छा खासा अनुभव प्राप्त हो गया था।
उन दिनों अभी तक प्राकृतिक तेल नहीं खोजा जा सका था। जलाने के लिए लोग मधुमक्खी के छत्ते से मिली मोम, जानवरों की चर्बी और प्राकृतिक कोयले से प्राप्त तेल का प्रयोग करते थे। पर कोयले से तेल निकालने की विधि काफी महंगी थी।
उन्हीं दिनों जार्ज बिसेल जो पेशे से वकील था, की मुलाकात वैज्ञानिक रोडरिक से हुई। उसने बिसेल को धरती के अन्दर प्राकृतिक तेल सम्भावनाओं के बारे में बताते हुए कहा- “यह तेल काफी सस्ते दामों में उपलब्ध होगा। इसके व्यापार से तुम मालामाल हो जाओगे।”
लगभग पाँच बजे जब रोडरिक उसके आफिस पहुँचा, तो कमरे में घुसते ही बिसेल ने एडविन का जिक्र करते हुए सारी योजना पर विस्तार से चर्चा की।
अगले दिन बिसेल ने रोडरिक और एडविन के साथ जाकर जगह का मुआइना किया और कुएँ की खुदाई का काम शुरू हो गया। इस काम में बिसेल ने दस मजदूर लगाए थे। लगभग दस दिनों में 60 फुट गहरा कुआँ खोद लिया गया, लेकिन वहाँ तेल का नामोनिशान न था। इस असफलता ने बिसेल को बहुत दुःखी कर दिया था। इसमें उसके तकरीबन 500 डालर खर्च हो चुके थे।
उसने रोडरिक के लाख समझाने के बावजूद इस सम्बन्ध में आगे काम करने से मना कर दिया, पर एडविन लगनशील और आत्मविश्वासी था। अनपढ़ होने के बावजूद उसने रोडरिक से आवश्यक परामर्श किए और मन ही मन में एक निश्चय कर डाला।
लेकिन उसके पास रुपए न थे कि वह मजदूर इकट्ठे कर सकता। इसलिए उसने अकेले ही तेल ढूँढ़ने का निश्चय किया, जो काफी ऊँची थी। कुएँ की खुदाई में प्रयुक्त होने वाला सामान उसने बिसेल से उधार ले लिया था और अब वह अकेले ही कुआँ खोदने में जुट गया।
देखने वाले उसे सनकी कहकर मजाक उड़ाते। व्यंग्य की बौछारों, तानों की कड़वाहटों के बीच वह अपने काम में जुटा रहा। हर एक के लिए उसका एक ही जवाब था कि अगर व्यक्ति के पास लगन और मेहनत रूपी दो साथी हों, हृदय में ईश्वर-विश्वास की दीप शिखा प्रज्ज्वलित हो तो फिर दुनिया का कोई बड़ा से बड़ा तूफान उसकी राह नहीं रोक सकता।
सब कुछ भूल-भाल कर एडविन रात-दिन खुदाई में लगा रहता। उसके लिए जैसे दिन और रात का भेद ही समाप्त हो गया था। भूख-प्यास की भी सुधि उसे भूल चुकी थी। पास से गुजरने वाले उसे पागल, दीवाना और न जाने क्या-क्या कहते। लेकिन वह अपने काम में निमग्न था। उसके अन्दर ईश्वर विश्वास एवं आत्मविश्वास की उफनती नदी उसे पल प्रतिपल एक नयी ताजगी प्रदान करती है। इसी ताजगी की बदौलत वह अपनी सारी थकान भूल जाता और दुगुने उत्साह के साथ काम में लग जाता।
दिन-रात के श्रम से एडविन ने एक महीने में अकेले के बलबूते 60 फुट से भी गहरा कुआँ खोद डाला। वहाँ की जमीन कुछ ज्यादा तैलीय थी। उसे लगा कि यहाँ तेल जरूर मिलना चाहिए । उसने अपने कान जमीन पर लगा दिए और कुछ सुनने की कोशिश करने लगा। कुछ पलों में उसके चेहरे पर एक चमक उभर आयी। अब तो उसका मन बाँसों उछल रहा था। वह फिर चौगुने उत्साह के साथ अपने काम में जुट गया।
लगभग 69 फुट खोदे जाने के बाद एक जगह से फव्वारा और कुछ नहीं प्राकृतिक तेल ही था, जो अपनी प्राकृतिक अवस्था के कारण काला-काला लग रहा था।
उसे देखकर एडविन खुशी से चिल्ला उठा। उसका श्रम सार्थक हो चुका था। वह हाथ ऊपर करके प्रभु को श्रद्धाभाव से नमन कर रहा था। अपनी मेहनत और लगन के बलबूते एडविन ड्रेक ने 19वीं सदी की महानतम खोज कर डाली थी। एक ऐसी वस्तु की खोज, जिसने सारी दुनिया के स्वरूप को बदलकर रख दिया। हो भी क्यों न! लगन और मेहनत के दो हाथ असम्भव को सम्भव कर दिखाने में सर्वथा समर्थ हैं।
जीवात्मा का चरम लक्ष्य है - उस परमतत्व से तादात्म्य स्थापित करना, जिसका कि वह एक अंश है। उसकी संरचना, कार्य पद्धति एवं जीवनचर्या का निर्धारण ही कुछ इस प्रकार हुआ है मानों सृजेता ने विकास की चरमावस्था को प्राप्त करने के लिये ही इस धरती पर भेजा हो। उपनिषदों में जीवनमुक्ति एवं पूर्णता सम्बन्धी जितनी धारणाएँ व्यक्त की गयी है, उनसे आध्यात्मिक विकासवाद की एक प्रगतिशील झलक मिलती है। उपनिषद्कार का कथन है कि “मानव की जीवात्मा निरन्तर यह कामना करती रहती है कि वह स्वच्छन्द हो समग्र बने एवं पूर्णता को प्राप्त करें।” लघु से महान बनने, बीज रूप से विराट् में विकसित होने की यह परिकल्पना मिथ्या नहीं। इसे दैनन्दिन जीवन के क्रिया-कलापों में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
विकास के सम्बन्ध में विज्ञान मात्र स्थूल दृष्टि रखते हुए दो ही प्रकार की स्थितियाँ जानता है। एक शारीरिक एवं दूसरे मानसिक विकास की। नृतत्व विज्ञानी एवं अन्यान्य आधुनिक दर्शन के समर्थक इससे इतर कुछ सोचना भी नहीं चाहते। वे कहते हैं कि एक नवजात शिशु जन्म के समय लगभग सात पौण्ड भार लिये होता है। माता के दूध एवं वातावरणजन्य परिस्थितियों से उसका क्रमशः विकास होता है। धीरे-धीरे वह एक विकसित होता है। धीरे-धीरे वह एक विकसित किशोर अथवा युवा लड़की के रूप में विकसित हों एक स्पष्ट रूप ले लेता है। यह शारीरिक विकास है जो प्रत्यक्षतः सबको दिखाई देता है, जिस पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाता है एवं जिसके तनिक भी व्यतिक्रम से चिन्ता होने लगती है। मानवी विकास का दूसरा पक्ष मानसिक है-जो परोक्ष है, जिसे चर्म-चक्षुओं से देखा नहीं जा सकता, किसी यन्त्र द्धारा जिसकी मानीटरिंग नहीं की जा सकती। बहिरंग की शिक्षा एवं संस्कार रूपी विद्या के माध्यम से शिशु में क्रमशः स्वावलम्बन, आत्मविश्वास, सतर्कता, आत्मरक्षा, प्रतिभा, स्व-मूल्याँकन जैसी विशेषताएँ विकसित होने लगती हैं। इस क्षेत्र में विकास की सम्भावनाएँ अनन्त है, जबकि शारीरिक विकास एक सीमा में परिबद्ध है। असामान्य मेधा, जीवट, संकल्पबल, प्रखरता, अन्वेषण बुद्धि का विकास ही मानस क्षेत्र की उपलब्धियां हैं। इस कार्य में मनुष्य का स्वयं का पुरुषार्थ तो सहयोग करता ही है, वातावरण भी इनमें एक महती भूमिका निभाता है। अपवादस्वरूप ही कुछ प्रतिभासंपन्न ऐसे निकल आते हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितियों के होते हुए भी मानसिक दृष्टि से विकसित हुए होते हैं एवं पूर्व जन्म की संचित सम्पदा के उचित दिशा में मोड़ मिलते ही वे प्रगति के चरण शिखर पर जा पहुंचते हैं। अल्पायु में भी अतिमेधावान बालकों को ‘प्रोडिगी’ कहा जाता है व इनकी संख्या भी कम नहीं होती। यह क्यों व कैसे होता है? इस सम्बन्ध में वैज्ञानिक अभी मौन हैं एवं उन्हें विलक्षण मानकर संयोगों की शृंखला में बिठा भर देते हैं।
मानसिक विकास में बहिरंग जगत की परिस्थितियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शिक्षा, सुरुचिपूर्ण, संस्कारी वातावरण, स्वाध्याय, सत्संग-सान्निध्य के सहारे अनेकों व्यक्ति प्रतिभासंपन्न होते देखे जा सकते हैं। जहाँ ऐसा वातावरण नहीं उपलब्ध हो पाता, उलटे कुरुचि भड़काने वाली, परिस्थितियों का प्राधान्य होता है, वहाँ कमजोर मनोबल प्रखरता के अभाव में गिरते हैं। अविकसित नर-पामरों की श्रेणी में शामिल होते देखे जा सकते हैं
शारीरिक एवं मानसिक ये दो ही पक्ष ऐसे हैं जिनके विकास-पराभव की जानकारी विज्ञान जगत को हैं। उनकी परिभाषाएँ भी इसी परिधि में घूमती नजर आती हैं। डार्विन के विकासवाद के समर्थक, लैंडमार्क के पक्षधर एवं जाति-प्रजातियों का गम्भीर अध्ययन करने वाले एन्थ्रापॉलाजिस्ट शरीर एवं मन के विकास के इस सीमित परिकर में ही ऊहापोह करते दृष्टिगोचर होते हैं। अध्यात्म की विकासवाद की परिभाषा में एक और उच्च स्थान लिए हुए है। आत्मिकी के प्रतिपादक इसे आध्यात्मिक विकास कहते हैं। जो मनो आत्मिक विकास क्रम से आरम्भ होकर पूर्णता पर समाप्त होता है। यही जीवात्मा का चरम लक्ष्य भी हैं, इसी की खोज-प्राप्ति हेतु वह अवतरित भी हुई है। यह आयाम व्यक्ति के ‘स्व’ का सर्वव्यापी सर्वश्रेष्ठ, असीमित आयाम हैं जिसमें वेदान्त के प्रतिपादनों के अनुसार व्यक्ति को समष्टि के साथ एकाकार हुआ देखा जा सकता है । इसकी बहिरंग में अभिव्यक्ति, नैतिक एवं सामाजिक विकास के रूप में, सुसंस्कारिता, सहकारिता, पारिवारिकता की भावना के उत्कर्ष के रूप में देखी जा सकती हैं।
क्राइस्ट ने इसे परफेक्शन कहा है, जो पूर्णता का बोधक हैं। मेध्यू (बा0 48) के अनुसार, “तुम इसलिये पूर्ण बनो क्योंकि तुम्हें जन्म देने वाला स्वर्ग स्थित परम-पिता भी पूर्ण है।” बुद्ध ने इसी चरम उद्देश्य की प्राप्ति को आत्मबोध-ज्ञानोदय कहा है। अन्तः में निहित सत्य को जान लेना ही विकास की अन्तिम परिणति है, ऐसा बुद्ध का मत है।
वेदान्त के अनुसार ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होने पर मनुष्य जीवनमुक्त हो जाता है। ‘अविद्या लेश’ सिद्धांत का हवाला देते हुए वेदान्त समर्थक कहते हैं। कि ज्ञान से अविज्ञान का आवरण हटते ही मानव पूर्णता को प्राप्त होता है।
सभी धर्म, सम्प्रदाय, पंथ, मतावलम्बी इस पर एक मत हैं कि शारीरिक एवं मानसिक विकास तो उस पूर्णता की प्राप्ति के मध्य की अवस्थाएँ हैं। मानसिक अनुशासन धार्मिक कर्मकाण्ड मात्र मस्तिष्क रूपी ज्ञानेन्द्रियाँ पंच तन्मात्राओं के नियमन हेतु बनाई गयी विधि-व्यवस्थाएँ हैं, जो अनंतः पूर्णता की प्राप्ति में सहायता सिद्ध होती हैं। मनोसामाजिक, मनोआत्मिक एवं आत्मिक विकास वस्तुतः वे अवस्थाएँ हैं जो जीवात्मा को क्रमशः इस चरम लक्ष्य पर पहुँचाती हैं।
‘अहम्’ जिसने मनुष्य को प्रकृति पर आधिपत्य हेतु समर्थ बनाया, मनुष्य का यथार्थवादी रूप नहीं है। उसका सच्चा व्यक्तित्व नहीं हैं। वह तो चट्टान के हिमखण्ड के उस छोटे से अंश के सामान है जो कि गहन जलराशि के ऊपर दिखाई पड़ता है लेकिन अपना अधिकाधिक वृहद अंश पानी में अदृश्य रूप से छिपाये रखता है। भारतीय दर्शन के अनुसार, मनुष्य का यथार्थवादी रूप, सच्चा व्यक्तित्व उसकी ‘आत्मा’ है जो कि इन्द्रियातीत है। यही मानव की सच्ची सम्पदा है, जिसके परिपूर्ण विकास हेतु वह इस कार्य कलेवर में धरित्री पर आता है। सर जूलियट हक्सले ने अपने विचार लगभग उपनिषद्कार की भाषा में ही व्यक्त करते हुए कहा है कि- “अन्तर्मुखी चिन्तन द्वारा नितान्त एकान्त में अनेकों बार चिन्तन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ‘स्व’ के विकास के अभाव में जीवन निरुद्देश्य है। आत्मा निरन्तर अपने प्राकट्य का बोध हमें कराती रहती है लेकिन उसका अहसास हमें तभी हो पाता है। जब हम गहराई से अन्तः पर्यवेक्षण करें, अपने अहम् से मुक्ति पाएँ।”
मनीषियों का मत है कि आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया में अहम् रूपी क्षणिक लेकिन सुखदायी भ्रान्ति से मुक्ति दिलाकर उसे वास्तविक व्यक्तित्व की श्रेणी में पहुँचाने में नैतिक अनुबन्धों एवं आत्मिक अनुशासनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अहम् का जाला एक प्रकार से भव बन्धन ही है जिससे मुक्ति पाकर मनुष्य अपने यथार्थवादी रूप को पहचान लेता है। भक्ति उपासना, जीवन साधना अथवा समाज सेवा की आराधना में से कोई भी मार्ग ऐसा हो सकता है, जिसे अपनाता हुआ मनुष्य आत्मिक विकास के सोपानों पर क्रमशः आगे बढ़ता चला जाए। जो भी क्रिया-कृत्य अपनी अन्तःप्रेरणा को साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने पूर्णता की प्राप्ति के इस प्रसंग को गीता के ग्यारहवें अध्याय में वर्णित करते हुए कहा है-”हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्ति रहित है, सम्पूर्ण भूत प्राणियों से बैर से मुक्त है, वह मुझको ही (पूर्णता को ही )प्राप्त होता है।”
वस्तुतः जीवन रूपी कर्मशाला में मनुष्य को अपनी काया रूपी उच्चस्तरीय प्रयोगशाला को सुनियोजित रूप से संचालित करते के लिये पूर्ण अवसर प्राप्त है। शेष समस्त साधना अनुशासन तो मन के प्रशिक्षण, परिशोधन एवं अग्रगमन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन गतिशील यन्त्रों को कौन कितनी कुशलतापूर्वक संचालित कर पाता है, इसी पर उसका आध्यात्मिक विकास निर्भर है।
यह विकास की प्रक्रिया जैव समाज वैज्ञानिकों (सोसियोबायो-लॉजिस्ट) एवं विकासवादियों की मान्यता से कितनी भिन्न है, किस प्रकार मनुष्य को अन्याय जीवों से श्रेष्ठ, प्रारम्भ से ही विकसित प्राणी बताती है, इसका निरूपण श्रीमद्भागवत् में इस प्रकार हुआ है-” उस दिव्य पर परम सत्ता ने अपनी निहित शक्ति के द्वारा अनेक प्रकार के चेतन आकारों को जन्म दिया, जैसे कि पेड़-पौधे, पशु-पक्षी रेंगने वाले जीव, कीट, मछली आदि। किन्तु उसे अपने मन में इन आकारों से सन्तोष नहीं हुआ। तब उसने मानव को विनिर्मित कर उस ब्रह्म को अर्थात् सार्वभौम दिव्य-सत्ता को प्राप्त करने की पात्रता से विभूषित किया। अपनी इस कृति को बनाकर ही उसे प्रसन्नता प्राप्त हुई।”
ऋषिगणों, मनीषियों की प्रजा को मानव और प्रकृति के यथार्थवादी स्वरूप को मात्र अनुमान एवं अटकल से ही जानकर सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने अपने ज्ञान के उत्तरोत्तर विकास की शृंखला को सतत् जारी रखा। “वृहदारण्यकोपनिषद् (1-4-7) के अनुसार-” उन्होंने जब गहराई में प्रवेश किया तो समय की परिधि में आबद्ध ससीम सत्ता के पीछे उन्हें एक असीम शाश्वत वास्तविकता की उपलब्धि हुई। इस प्रकार उन्होंने विशुद्ध चेतना के स्वरूप एवं जीवात्मा के विकास की चरम परिणति को जाना।” वस्तुतः विकासवाद की यही अद्वितीय मान्यता भारतीय दर्शन को अन्याय प्रतिपादनों से ऊँचा सिद्ध करती हुई, आधुनिक मतों का खण्डन करती है। वह जीवात्मा की चेतना के विकास क्रम के रहस्यों का उद्घाटन करती है ताकि वह मायावी भ्रम जंजाल से बचकर मुक्ति पथ पर अग्रसर हो सके।
मन को साधारणतः इच्छा,ज्ञान और क्रिया में संलग्न रखने वाली चेतना के रूप में जाना जाता है। पर अब उसकी अतीन्द्रिय चेतना पर विश्वास किया जाने लगा है। ऐसे अगणित प्रमाण सामने आ रहे हैं जिनसे प्रतीत होते हैं कि हाड़-माँस का सोचने, बोलने वाला पिण्ड जो कर सकता है उससे कहीं अधिक परिधि मानवी चेतना का है। उसमें अतिमानवी असाधारण शक्तियाँ भी सन्निहित है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी अब यह सिद्ध हो चुका है कि कल्पना, विचार, भावनाएँ और संकल्प कोई हवाई उड़ानें या अवास्तविक बातें नहीं है, बल्कि वे भी स्थूल क्रियाओं की तरह प्रभावशाली होती हैं। इनकी सामर्थ्य स्थूल क्रियाओं से अधिक समर्थ होती है। प्राचीनकाल में ऋषि-महर्षियों ने इस शक्ति का महत्व समझकर उनका उपयोग सरलतापूर्वक करने की विधि खोज ली थी।
विचार संचालन के अंतर्गत बिना यन्त्रों, संकेतों या इन्द्रियों की सहायता के दूरस्थ व्यक्तियों द्वारा परस्पर विचार-विनिमय की प्रक्रिया इसी शक्ति के अंतर्गत आती है। अतीन्द्रिय दृष्टि में बिना आँखों की सहायता के दृश्यों को देखा जाना सम्मिलित है। पूर्व ज्ञान से बीती हुई घटनाओं को जानना और भविष्य ज्ञान में भावी सम्भावनाओं का परिचय प्राप्त करने की बात है। स्वप्नों में व्यक्ति की स्थिति अथवा अविज्ञात घटनाक्रमों के भूतकालीन अथवा भावी संकेत समझे जाते हैं। साइकोकानेसिस के अंतर्गत मस्तिष्क वस्तुओं पर पड़ने वाला प्रभाव आँका जाता है। मूर्धन्य वैज्ञानिक लूथर वरथेन्क ने पौधों, फूल, कीड़ों, पक्षी और पशुओं के द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव डालने में जो सफलता प्राप्त की है, उससे शोधकर्ताओं का उत्साह बहुत बढ़ा और वे न केवल प्राणियों पर, वरन् पदार्थों पर भी विचार शक्ति के आश्चर्यजनक प्रभावों को प्रमाणित कर सकने में सफल हुए।
मैस्मरेजम के आविष्कर्ता डॉ0 मैस्मर ने लिखा है- “मन को यदि संसार के पदार्थों और तुच्छ इन्द्रिय भोगों से उठाकर ऊर्ध्वगामी बनाया जा सके, तो वह ऐसी विलक्षण शक्ति और सामर्थ्यों से परिपूर्ण हो सकता है जो साधारण लोगों के लिए चमत्कार सी जान पड़े। मन आकाश -स्पेश में भ्रमण कर सकता है और उन घटनाओं को ग्रहण करने में समर्थ हो सकता है, जिन्हें हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ग्रहण न कर सकें और हमारा तर्क जिन्हें व्यक्त करने में असमर्थ हो।”
अमेरिका के प्रसिद्ध विद्वान डॉ0 जे0 बी0 राइन ने भी उक्त तथ्य की बाद में विस्तृत खोज की और पाया कि विचार, चिन्तन और किसी भी अभ्यास द्वारा यदि मन को विचारणाओं के सामान्य धरातल से ऊपर उठाकर आकाश में घुमाया जा सके तो वह भूत और भविष्य की अनेक घटनाओं को बेतार के तार के संदेश की तरह प्राप्त कर सकता है। ‘न्यू फ्रान्टियर्स ऑफ माइण्ड’ नामक पुस्तक में उन्होंने ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण भी दिया है, जो उक्त कथन की सत्यता प्रतिपादित करती हैं। यह एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है अंधविश्वास नहीं।
इस तथ्य को समझने से पूर्व की मनःशक्ति के बारे में जान लेना आवश्यक होगा। जिस प्रकार ध्वनि तरंगों को पकड़ने के लिए रेडियो में एक विशेष प्रकार का क्रिस्टल है और वह मन है। विज्ञान जानने वालों को पता है कि ईथर नामक तत्व सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। हम जो भी बोलते हैं उनका भी एक प्रवाह है, पर वह बहुत हल्का होता है, किन्तु जब अपने शब्दों को विद्युत् परमाणुओं में बदल देते हैं तो वह शब्द तरंगें भी विद्युत् शक्ति के अनुरूप ही प्रचण्ड रूप धारण कर लेती हैं और बड़े वेग से चारों तरफ फैलने लगती हैं। वह शब्द तरंगें सम्पूर्ण आकाश में भरी रहती हैं, रेडियो उन लहरों को पकड़ता है और विद्युत् परमाणुओं को रोककर केवल शब्द तरंगों को लाउडस्पीकर तक जाने देता है। जिससे दूर बैठे व्यक्ति की ध्वनि वहाँ सुनायी देने लगती है। शब्द को तरंग और तरंगों को फिर शब्द में बदलने का काम विद्युत करती है, उसी प्रकार आध्यात्मिक चिकित्सा और विचार प्रेषण टेलीपैथी का काम मन करता है।
यों मन शरीर में एक प्रथम सत्ता की भाँति दिखायी देता है, पर वैज्ञानिक जानते हैं कि शरीर के प्रत्येक कोश में एक पृथक मन होता है। कोशों के मनों का समुदाय ही अवयव स्थित मन का निर्माण करता है। प्रत्येक अवयव का क्रिया क्षेत्र अलग-अलग है, पर वह सब मन अवयव के अधीन हैं। मान लीजिए गुदा के समीपवर्ती जीवकोश (सेल्स) अपनी तरह के रासायनिक पदार्थ ढूँढ़ते और ग्रहण करते हैं। उनकी उत्तेजना काम-वासना को भड़काने का काम करती है, किन्तु अवयव मन नहीं चाहता कि इन गुदावस्थित जीवकोषों की इच्छा को पूरा किया जाये, तो वह काम वासना पर नियन्त्रण कर लेगा। इसी प्रकार शरीर के हर अंग के मन अपनी-अपनी इच्छायें प्रकट करते हैं, पर अवयव मन उन सबको काटता-छाँटता रहता है, जो इच्छा पूर्ण नहीं होने को होती , उसे दबाता रहता है और दूसरे को सहयोग देकर वैसा काम करने लगता है।
इस बात को और ठीक तरह से समझने के लिए शरीर रचना का थोड़ा ज्ञान होना आवश्यक है। यह भौतिक शरीर सूक्ष्म जीवकोशों से बना है। प्रत्येक जीवकोश प्रोटीन की एक अण्डाकार दीवार में घिरा रहता है, उस कोश के अन्दर सैकड़ों प्रकार के यौगिक और मिश्रण पाये जाते हैं। नाइट्रोजन और न्यूक्लिक अम्लों का सबसे बड़ा समूह इस कोशिका के अन्दर होता है। फास्फोरस, चर्बियाँ (बसायें) और शर्करायें भी उसमें मिलती हैं, साथ ही बीसियों अन्य कार्बनिक पदार्थ सूक्ष्म मात्राओं में पाये जाते हैं जैसे- विटामिन और हार्मोन। उसमें बहुत से अकार्बनिक लवण भी होते हैं। श्बसायें, शर्करायें और लवण, ये साँसारिक पदार्थ जिन्हें रसायन एक जीवित कोशिका में पाते हैं, निश्चय ही ऐसे पदार्थ नहीं हैं, जिनसे विचारों का निर्माण होता है, फिर भी ऐसे ही पदार्थों के ऊपर उस असंभव विचार का भवन निर्मित होता है, जिसे हम जीवन कहते हैं। अतः उस जीवन की विचित्रता और भी बढ़ जाती है, यह मान्यता आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं की है।
यह जीवकोशों के मन ही मिलकर अवयव मन का निर्माण करते हैं। इसलिए मन को एक वस्तु न मानकर अध्यात्म शास्त्र में उसे ‘मनोमय कोश’ कहा गया है। एक अवस्था ऐसी होती है जब शरीर के सब मन उसके आधीन काम करते हैं। जब यह अनुशासन स्थापित हो जाता है तो मन की क्षमता बड़ी प्रचण्ड हो जाती है और उसे जिस तरफ लगा दिया जाये, उसी ओर वह तूफान की सी तीव्र हलचल पैदा कर देता है।
इन सूक्ष्म जीवों के मन निःसन्देह प्रत्युत्पन्न मति पटल (संस्कारजन्य मन) के आधीन हैं और बुद्धि की आज्ञाओं को भी मानते हैं। इन जीवों के मन में अपने विशेष कार्य के लिए विचित्र योग्यता रहती है। रक्त से आवश्यक सार का शोषण, अनावश्यक का त्याग इनकी बुद्धि का प्रमाण है। यह क्रिया शरीर के हर अंग में होती है, जो जीवकोश संस्थान ज्यादा सक्रिय होता है, वह ज्यादा बलवान रहता है और अपने पास-पड़ौस वाले जीवकोशों की शक्ति को मंद कर देता है। वस्तुतः जीवकोशों का अनुशासित न होना ही शरीर की इन चोरियों का कारण बनता है। जो भी हो यह सत्य है कि पचे हुए खाद्य पदार्थ का अवशोषण, घावों का पूरना , आवश्यकतानुसार दूसरे स्थानों पर दौड़ जाना, अन्य बहुत से कार्य कोशगत जीवन के ही मानसिक कार्य हैं। उन्हें विश्रृंखलित रहने देने से उनका सम्राट मस्तिष्क में रहने वाला मन भी कमजोर और अस्त−व्यस्त हो जाता है, किन्तु जब सम्पूर्ण शरीर के मन उसके अनुशासन में आ जाते हैं, तो शक्ति बहुत अधिक बढ़ जाती है।
केवल कोमल स्नायु, पेशियाँ, झिल्लियाँ आदि ही नहीं हड्डियाँ, दाँत, नाखून आदि कठोर पदार्थ भी सूक्ष्म जीवों के योग से बने होते हैं। अपने कार्यों के अनुसार इनकी आकृतियाँ अलग-अलग होती हैं, पर इनमें भी स्वतंत्र और प्रत्युत्पन्न मन के आधीन काम करने की दोहरी क्षमता होती है। अर्थात् सब जीवकोश स्थानीय कार्य भी करते रहते हैं और संगठित कार्य भी।जिस प्रकार एक गाँव के सब लोग अपना अलग-अलग काम करते रहते हैं अपना खेत जोतना, अपना खेत काटना ,अपने लिए अलग खाना पकाना, अपने ही परिवार के साथ बसना,अपनी बनायी कुटिया में रहना आदि केवल अपने तक ही सीमित रहते हैं पर जब आवश्यकता आ जाती है तो सब लोग इकट्ठे होकर कोई सार्वजनिक कुआँ,तालाब आदि भी खोदते हैं । एक आदमी दूसरे की सहायता करता है। ठीक वैसे ही जीवकोशों के मन और प्रत्युत्पन्न मन के भी दो क्षेत्र है और अत्यन्त महत्वपूर्ण है । कुछ कोष ऐसे भी होते हैं जिन्हें शरीर में केवल सुरक्षा की दृष्टि से तैनात किया गया है। वे गंदगी को दूर करने, कचरा न जमा होने देने की चौकीदारी भी करते हैं और कोई रोग का कीटाणु बैक्टीरिया , वायरस आदि शरीर में आ जाय तो उससे युद्ध करने का काम भी वे कोश करते हैं। इस तरह शरीर में मन तो अपनी-अपनी व्यक्तिगत ड्यूटी पूरी करते हैं, दूसरे बाह्य जगत से संपर्क बनाते हैं।
शरीर के अन्दर इस तरह के जीव-कोशों का मेला लगा हुआ है। अनुमानतः केवल लाल रंग के कोशों की संख्या कम से कम 75000,000,000 है। इनका फेफड़ों से ऑक्सीजन चूसना, धमनियों और वाहिनियों के द्वारा सारे शरीर में बाँटना होता है। यह जीव-कोश अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह जगत् से भी शक्ति चूसने के वैज्ञानिक कार्य को पूरा करते हैं इसलिए मनुष्य शारीरिक शक्ति की कमी के बावजूद भी बहुत दिन तक जिन्दा रहता है, क्योंकि यह विश्वव्यापी प्राणसत्ता से शरीर का सम्बन्ध बनाये रहते हैं।
प्रत्युत्पन्न मन जब एकाग्र और संकल्पशील होता है तो सभी कोश स्थित मन जो विभिन्न गुणों और स्थानों की सुरक्षा वाले होते हैं, उसी के आधीन होकर काम करने में लग जाते हैं। फिर उस संग्रहित शक्ति से किसी भी दूसरे के शरीर में पहुंचाकर उस व्यक्ति की किसी रोग से रक्षा की जा सकती है, सुनने, समझने वाले मनों में हलचल पैदा करके उन्हें संदेश दिया जा सकता है, किसी को पीड़ित या परेशान भी किया जा सकता है।
मानवीय प्रगति में परिष्कृत मन का प्रमुख योगदान होता है। यदि इस क्षेत्र को परिष्कृत, परिमार्जित एवं जाग्रत किया जा सके तो उसमें प्रवेश करके बहुमूल्य रत्नराशि ढूँढ़ी जा सकती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं से लेकर ऋद्धि-सिद्धियों के भाण्डागार उपलब्ध किये जा सकते हैं।
शान्तिकुँज द्वारा परमपूज्य गुरुदेव द्वारा रचित समग्र आर्ष वाङ्मय (1959-60) को पुनः वैज्ञानिक प्रतिपादनों के साथ परम वंदनीया माताजी के प्रत्यक्ष व परोक्ष मार्गदर्शन में संपादित कर 1992-95 में सर्वप्रथम चार वेदों की आठ जिल्दों के रूप में जनसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। उपनिषदों का संपादन गीता विश्वकोश के साथ-साथ चल रहा है। इस लेख में प्रस्तुत है वेदवाणी एवं यज्ञ का माहात्म्य।
वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। भारतीय धर्म, संस्कृति एवं सभ्यता का भव्य प्रासाद जिस दृढ़ आधारशिला पर प्रतिष्ठित है, उसे वेद के नाम से जाना जाता है। भारतीय आचार-विचार, रहन-सहन तथा धर्म-कर्म का मूल तथा यथार्थ कर्तव्य की जिज्ञासा वाले लोगों के लिए ‘वेद’ सर्वश्रेष्ठ प्रमाण हैं।
‘वेदो डखिलो धर्ममूलम्’ ‘धर्मं जिज्ञासमानानाँ प्रमाणं परमं श्रुतिः’ (मनु0 2.6, 13) जैसे शास्त्रवचन इसी रहस्य का उद्घाटन करते हैं। वस्तुतः ‘वेद’ शाश्वत-यथार्थ ज्ञान राशि के समुच्चय हैं, जिसे साक्षात-कृतधर्मा ऋषियों ने अपने प्रातिभ चक्षु से देखा है- अनुभव किया है।
ऋषियों ने अपने मन या बुद्धि से कोई कल्पना न करके एक शाश्वत अपौरुषेय सत्य की, अपनी चेतना के उच्चतम स्तर पर अनुभूति की और उसे मंत्रों का रूप दिया । वे चेतना क्षेत्र की रहस्यमयी गुत्थियों को अपनी आत्मसत्ता रूपी प्रयोगशाला में सुलझाकर सत्य का अनुशीलन करके उसे शक्तिशाली काव्य के रूप में अभिव्यक्त करते रहे हैं। वेद स्वयं इनके बारे में कहता हैं- “सत्यश्रुतः कवयो” (ऋ॰ 5.57.8) अर्थात् “दिव्य शाश्वत सत्य का श्रवण करने वाले द्रष्टा महापुरुष।”
इसी आधार पर वेदों को ‘श्रुति’ कहकर पुकारा गया। यदि श्रुति का भावात्मक अर्थ लिया जाय, तो वह है स्वयं साक्षात्कार किये गये ज्ञान का भाण्डागार। इस तरह समस्त धर्मों के मूल के रूप में माना जाने वाले, देव संस्कृति के रत्न-वेद हमारे समक्ष ज्ञान के एक पवित्र कोष के रूप में आते हैं। ईश्वरीय प्रेरणा से अन्तःस्फुरणा (इलहाम) के रूप में ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना से सराबोर ऋषियों द्वारा उनका अवतरण सृष्टि के आदिकाल में हुआ।
वेदों की ऋचाओं में निहित ज्ञान अनन्त है तथा उनकी शिक्षाओं में मानव-मात्र ही नहीं, वरन् समस्त सृष्टि के जीवधारियों, घटकों के कल्याण एवं सुख की भावना निहित है। उसी का वे उपदेश करते हैं। इस प्रकार वे किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष को दृष्टिगत रख अपनी बात नहीं कहते। उनकी शिक्षा में छिपे मूल तत्व अपरिवर्तनीय हैं, हर काल-समय-परिस्थिति में वे लागू होते हैं तथा आज की परिस्थितियों में भी पूर्णतः व्यावहारिक एवं विशुद्ध विज्ञानसम्मत है।
भारतीय परम्परा ‘वेद’ के सर्व ज्ञानमय होने की घोषणा करती है- “भूतं भव्यं भविष्यश्च सर्व वेदात् प्रसिध्यति।” (मनु0 12.17) अर्थात् भूत, वर्तमान और भविष्यत् सम्बन्धी सम्पूर्ण ज्ञान का आधार वेद है।
वेद मंत्रों में पराचेतना के गूढ़ अनुशासनों का समावेश है। शब्दार्थ और व्याकरण आदि तो उसके कलेवर मात्र हैं। वे मंत्रों के भाव समझने में सहायक तो होते हैं, किन्तु केवल उन्हीं के सहारे गूढ़ तत्वों को समझा जाना संभव नहीं । स्वयं वेद में इस तथ्य को प्रकट किया गया है। जैसे- ऋग्वेद 1.164.39 में कहा गया है- “ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यास्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः।” अर्थात् ऋचाएँ परम व्योम में रहती हैं, जिसका देवत्व अपरिवर्तनीय है। आगे कहा गया है- “वस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति” जो उस अपरिवर्तनीय सत्य को नहीं समझता, उसके लिए मात्र ऋचा क्या करेगी ? यह कथन उसी तरह सत्य है, जिस प्रकार यह कथन कि ‘जो संगीत का ज्ञात नहीं, उसके लिए मात्र बाँसुरी क्या करेगी ?’ इसी प्रकार भाषा की सीमा बतलाते हुए ऋ॰ 10.71.1 में कहा गया है- बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः। यदेषाँ श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत
प्रेणा तदेषाँ निहितं गुहाविः॥ हे बृहस्पते! सर्वप्रथम पदार्थों के नाम आदि का भाषा ज्ञान प्राप्त होता है। यह वाणी का प्रथम सोपान है। ज्ञान का जो दोष रहित- श्रेष्ठ-शुद्ध स्वरूप है, वह गुफा में छिपा है, जो दिव्य प्रेरणा से प्रकट होता है।
भाषा ज्ञान वाणी का प्रथम सोपान है। उससे प्रेरित होकर पदार्थों को देखा-पहचाना जा सकता है, किन्तु विचारों और भावनाओं की गहराई (गुफा) तक पहुँचने के लिए तो विशेष अन्तःस्फुरणा आवश्यक होती है। यदि किसी प्रभावशाली राग की सरगम (स्वरलिपि) लिख दी जाय, तो उससे राग को समझने में सहायता तो मिलेगी, किन्तु संगीत- निपुण व्यक्ति के निर्देशन में साधना करके ही उसे पाया जा सकता है।
वेदवाणी के संदर्भ में भी ऋषियों का यही मत है- यज्ञेन वाचः पदवीयमायन् तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्। तामाभृत्या व्यदधुः पुरुत्रा ताँ सप्त रेभा अभि सं नवन्ते (ऋ॰ 10.71.3) ज्ञानी लोग श्रेष्ठ वाणी को यज्ञ से ही प्राप्त करते हैं। उन्होंने तत्वज्ञानी ऋषियों के अन्तःकरण में प्रविष्ट वाणी को प्राप्त करके उस ज्ञान को संपूर्ण विश्व में प्रसारित किया। इसी वाणी (दिव्य ज्ञान) को सात छन्दों में, स्तुति रूप में प्रस्तुत किया। “वेद वाणी को यज्ञ के माध्यम से पाया गया।” यह वाक्य गूढ़ार्थक है।
यज्ञ-यजन का अर्थ है- देव-पूजन, संगतिकरण, दान...........। विद्या के विशेषज्ञ, दाता, देवता का पूजन श्रद्धायुक्त अनुगमन पहली शर्त है। उसके निर्देशानुसार स्वयं साधना-अभ्यास रूप में संगतिकरण करके ही व्यक्ति विद्याविद् बनता है। इससे कम में किसी विशेषज्ञ के अन्तःकरण में संचित अनुभवजन्य विद्या को प्राप्त करना संभव नहीं है। इतना करके ही कोई व्यक्ति दान रूप में विद्या का विस्तार करके उसे सार्थक बना सकता है।
वेद एवं यज्ञ का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। यज्ञ का कर्मकाण्ड पक्ष ही लें, तो भी देव पूजन के क्रम में ऋग्वेद के मन्त्रों से स्तुतियाँ करने, यजुर्वेद के मंत्रों से यजन प्रयोग करने, सामगान द्वारा यज्ञीय उल्लास को संवर्धित और प्रसारित करने तथा अथर्ववेद से स्थूल-सूक्ष्म परिष्कार की वैज्ञानिक प्रक्रिया चलाने की मान्यता सर्वविदित है। यदि यज्ञ का विराट् यज्ञ द्वारा ही सृष्टि का निर्माण हुआ तथा उसी से उसके पोषण का चक्र चल रहा है। उसी विराट् यज्ञीय प्रक्रिया के अंतर्गत सृष्टि के संचालन एवं पोषण के लिए उत्कृष्ट ज्ञान-वेद का प्रकटीकरण हुआ। यथा- ततो विरालजायत विराजो अधिपूरुषः। सजातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथों पुरः (ऋ॰ 10.90.5) अर्थात्- उस विराट् पुरुष से यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ। उसी से समस्त जीव प्रकट हुए। देहधारियों के रूप में वही श्रेष्ठ पुरुष स्थित है। उसने पहले पृथ्वी और फिर प्राणियों को उत्पन्न किया। तस्मात् यज्ञात् सर्वहुतडऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दाँसि जज्ञिरे तसमाद्यजुस्तमादजायत (ऋ॰ 1.90.9) उस विराट् यज्ञ पुरुष से ऋग् एवं साम का प्रकटीकरण हुआ। उसी से छन्दों की और यजुः एवं अथर्व की उत्पत्ति हुई।
वेद यज्ञीय प्रक्रिया से प्रकट हुए हैं और यज्ञीय अनुशासन में जीवन को गतिशील बनाने के लिए हैं। वेद मंत्र परा-चेतन और प्रकृतिगत गूढ़ अनुशासनों, रहस्यों का बोध कराते हैं। उन्हें समझकर ही प्रकृतिगत चेतन प्रवाहों तथा स्थूल-पदार्थों का प्रगतिशील एवं कल्याणकारी प्रयोग किया जाना सम्भव है, जैसे अग्नि या विद्युत् के स्वाभाविक गुण-धर्मों को समझे बिना व्यक्ति उनका उपयोग भली प्रकार नहीं कर सकता। अग्नि को धारण करने के लिए प्रज्ज्वलन शील (नाँनइन्फ्लेमेबिल) पदार्थ ही चाहिए तथा उसे प्रज्ज्वलित रखने के लिए ज्वलनशील (इन्फ्लेमेबिल) पदार्थों की ही संगति बिठानी पड़ेगी। विद्युत् को इच्छित उपकरणों तक ले जाने के लिए विद्युत सुचालक (इलेक्ट्रिकल कंडर्क्टस) तथा फैलकर नष्ट हो जाने से बचाने के लिए विद्युत् कुचालक (इलेक्ट्रिकल इन्सुलेटर्स) का व्यवस्थित क्रम बिठाना अनिवार्य है। जो व्यक्ति विद्युत् एवं पदार्थों का गुणधर्म ही नहीं समझता, वह कैसे विद्युत् तंत्र (इलेक्ट्रिकल नेटवर्क) स्थापित कर सकता है ?
अस्तु, वेद ने प्रकृति के गूढ़ तत्वों को प्रकट करते हुए कहा है कि ये प्रवाह एवं पदार्थ यज्ञार्थ हैं, इन्हें यज्ञीय अनुशासनों में प्रयुक्त करने से सत्पुरुष, देवों के समान ही स्वर्गीय परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसी यज्ञीय आचरण प्रणाली को उन्होंने यज्ञीय आचरण प्रणाली को उन्होंने यज्ञ कहा- यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याःसन्ति देवाः। (ऋ॰ 10.90.16) “देवों ने यज्ञ (प्रक्रिया) से या (विराट् पुरुष जिनका धर्मकृत्यों में प्रथम स्थान है) का यजन किया। (जो सत्पुरुष) इस पूर्व प्रयुक्त प्रक्रिया का अनुसरण करते हैं, वे देवों के आवास स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं।” उक्त संदर्भों से स्पष्ट होता है कि वेदोक्ति ‘यज्ञ’ मात्र अग्निहोत्र परक कर्मकाण्ड ही नहीं है, वह स्रष्टा के अनुशासन में भावना, विचारणा, पदार्थ एवं क्रिया के संयोग से उत्पन्न होने वाला एक अद्भुत पुरुषार्थ है। वेद में इसके अनेक रूप परिलक्षित होते हैं-
पहला यज्ञ, पराचेतन (विराट् पुरुष या ब्रह्म) के संकल्प से सृष्टि के उद्भव के रूप में दिखाई देता है।
दूसरा स्वरूप यज्ञ का वह है, जिसके अंतर्गत उत्पन्न स्थूल एवं सूक्ष्म तत्व, अनुशासन विशेष का अनुपालन करते हुए सृष्टि चक्र को सतत् प्रवाहमान बनाये हुए हैं।
यज्ञ का तीसरा स्वरूप यह है कि जिस क्रम में प्राणिजगत प्रकृति के प्रवाहों को आत्मसात् करते हुए उत्पन्न ऊर्जा से स्वधर्मरत रहता है और प्रकृतिगत यज्ञीय प्रवाहों को अस्त-व्यस्त नहीं होने देता ।
मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले कर्मकाण्ड युक्त देवयज्ञ उस वैज्ञानिक प्रक्रिया के अंग हैं, जिसके अंतर्गत मनुष्य प्रकृति के पोषक प्रवाहों को पुष्टि प्रदान करने का प्रयास करता है। यह यज्ञ का चौथा स्वरूप है।
वेदों द्वारा निर्दिष्ट यज्ञीय जीवन शैली अपनाकर मनुष्य परमपिता के प्रतिनिधि के रूप में अपनी स्थूल एवं सूक्ष्म सामर्थ्यों के यज्ञीय सुनियोजन से भूमण्डल पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सका है। वेदवाणी के मर्म को यदि हम समझ सकें तो आत्मिकी के उस वैभव को करतलगत कर सकते हैं, जिसे शास्त्रों में मनुष्य का परम पुरुषार्थ कहा गया है। वेदों की अपौरुषेय वाणी यज्ञ माहात्म्य की चर्चा जिस वैज्ञानिकता से करती है उससे हमें हमारे साँस्कृतिक अतीत के गौरवमय स्वरूप की जानकारी मिलती है। काश आज के तथाकथित बुद्धिजीवी इसे समझ पाते।
पदार्थ और प्राण का-जड़ और चेतन का समन्वय ही काया का अस्तित्व बनाये हुए है। वे दोनों पृथक् होते हुए भी परस्पर इतने अधिक गुँथे हुए हैं कि एक के बिना दूसरे की गति नहीं। प्राण निकलते ही शरीर न केवल निश्चेष्ट हो जाता है वरन् स्वयमेव सड़ने लगता है और अपना अस्तित्व समाप्त कर लेने के लिए अन्त्येष्टि कर्म में अपनी रही बची विशेषता होम देता है। यह तो हुई प्राण के अभाव में शरीर की दुर्गति। दूसरा पक्ष भी ऐसा ही है। प्राण-सत्ता आकाश में वायुभूत होकर भले ही घुमड़ती रहे, पर दृश्य जगत में अपने अस्तित्व का परिचय देना या किसी प्रकार का अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर सकना सम्भव नहीं होता। प्राण के बिना शरीर का और शरीर के बिना प्राण का प्रत्यक्ष उपयोग नहीं रह जाता। इस तथ्य को देखते हुए दोनों के मध्यवर्ती सम्बन्ध सूत्र की समझा जा सकता है।
स्थूल और सूक्ष्म का, जड़ और चेतन का, यह समन्वय इसी ब्रह्माण्ड में व्यापक रूप से विद्यमान है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई तरंगें हैं। इन कम्पनों के अन्तराल में चेतना का अस्तित्व और अंकुश ढूँढ़ निकाला गया है। उसकी सूझ-बूझ भरी गतिविधियाँ ‘इकॉलाजी’ विज्ञान के आधार पर सृष्टि-सन्तुलन के रूप में पग-पग पर अपना कार्य करती हुई देखी जा सकती हैं। ऐसे और भी अगणित प्रमाण है। जिसमें पदार्थ जगत के साथ एक अत्यन्त शक्तिशाली, रहस्यमय एवं वरिष्ठ चेतना जगत गुँथा हुआ देखा जा सकता है। पदार्थ में जिस प्रकार ऊर्जा और गति का अस्तित्व है, उसी प्रकार प्राण में भावना एवं विचारणा का अनेक रूपों में अपने चित्र-विचित्र कृत्य करते हुए देखा जा सकता है।
पदार्थ का स्वरूप और व्यवहार समझने पर स्थूल जगत में मनुष्य अपने विभिन्न प्रयोजन पूरे करता रहता है, किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि जीवात्मा स्वयं सचेतन होते हुए भी, चेतना जगत में अपनी मूल सत्ता को अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए भी उस विधा से अपरिचित ही बना रहता है जो उसकी अपनी निजी सत्ता के उत्थान-पतन की जिम्मेदार है। शरीर पदार्थ है। अस्तु, उसकी सुविधा पदार्थ पर निर्भर समझी जा सकती है। अभीष्ट उपलब्धियों के लिए कार्य सत्ता की, भौतिकी विद्या की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना उसका काम नहीं चलता, निर्वाह कठिन हो जाता है। ऐसी दशा में भौतिकी का महत्व समझा जाना और उसका उपयोग करना उचित ही है, किन्तु समझा यह भी जाना चाहिए कि जीवन की समस्त आवश्यकताएँ भौतिकी द्वारा पदार्थ को उपलब्ध कर लेने से ही तो पूरी नहीं हो जाती। चेतना का अपना भी कुछ स्वरूप, उद्देश्य, कार्यक्रम, बल-वैभव है। उस सम्बन्ध में अनाड़ी बने रहने पर मात्र शरीर यात्रा ही चलती रहेगी। चेतना की अपनी निजी सामर्थ्य एक प्रकार से सोई ही पड़ी रहेगी, उसका निर्वाहरत पक्ष ही जाग्रत रहेगा। जिसे समग्र चेतना का कठिनाई से शताँश की कहा जा सकता है। शेष अंश प्रसुप्त, उपेक्षित या अनगढ़ स्थिति में पड़ा रहे तो उसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।
अध्यात्म शास्त्र में पग-पग पर एक उद्बोधन निर्देशन पूरा जोर देकर दिया जाता है, कि “अपने को जानो, उसे उठाओ।” “आत्मानं विद्धि”-”आत्मावा अरे ज्ञातव्य” सूत्र संकेतों का आत्म क्षेत्र में प्रवेशार्थी को ध्यानपूर्वक मनन-चिन्तन करना पड़ता है। राजकुमार सिद्धार्थ का जिस क्षण आत्म-बोध उभरा, उसी क्षण वे भगवान बुद्ध बन गये। जिस वटवृक्ष के नीचे यह सुयोग बना वह भी ‘बोधि वृक्ष’ के रूप में श्रद्धास्पद बना-प्रख्यात हुआ और कृत-कृत्य हो गया। आत्मज्ञान की महत्ता, प्रतिक्रिया एवं सिद्धि परिणति का इतना अधिक प्रतिपादन हुआ है कि उससे बढ़कर इस संसार में और कोई बड़ी उपलब्धि मानी ही नहीं गई। गीताकार ने “अपने को ही अपना मित्र और अपने को ही अपना शत्रु बताते हुए कहा है कि अपना उद्धार आप करो, अपने को गिराओ मत।”
सामान्यतया यह कथन कबीर की ‘उलटबांसी’ और बच्चों की ‘कौतुक पहेली’ जैसी लगती है। क्योंकि अपने को कौन नहीं जानता। हर कोई अपना नाम, पता, वंश, धर्म, आयु, व्यवसाय, वैभव, ज्ञान, पद, पराक्रम, कौशल आदि पूछते ही बता सकता है। फिर अपने को न जानने की क्या बात रह गई ? शरीर से आत्मा के पृथक् होने की, उसे अजर-अमर मानने जैसी कोई बात हो तो उस प्रसंग को भी स्वाध्याय सत्संग में हजारों बार पढ़ा-सुना गया होता है फिर ‘न जानने’ जैसी क्या बात रह गई जिसके लिए ‘आत्म-बोध’ की बात को इस तरह सिर पर उठाया जाय और उसमें सफल होने पर सामान्य से असामान्य बन जाने का माहात्म्य सुनाया जाता रहे ?
बात की गम्भीरता को समझा जाना चाहिए। हम अपने सम्बन्ध में मात्र उतना ही जानते हैं जितना शरीर निर्वाह, परिपोषण या समाज व्यवहार के लिए दैनिक जीवन में काम आता है। कुशलता पदार्थ सम्बन्ध तक सीमित है, यह कहा जा चुका है। यह चेतना पक्ष समग्र चेतना का कठिनाई से शताँश होगा। इसके अतिरिक्त जो आत्म-वैभव शेष रह जाता है। उसी से अनजान रहने की बात का बार-बार स्मरण कराया जाता है और कहा जाता है कि जिसके शताँश से जीवनचर्या का इतना बड़ा सरंजाम ढोया, ढकेला जाता है उसके शेषाँश को भी महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए उसे उपेक्षा के गर्त से निकाला जाना चाहिए और ऐसा अवसर देना चाहिए कि समान चेतना को अपने क्षेत्र की वे सभी प्रवीणता प्राप्त हो सकें, जिनके सहारे मनुष्य वस्तुतः नर-पशु जैसे भव बन्धनों से निकल कर ब्रह्मचेतना के स्वच्छन्द आकाश में विचरता है और वैसा दिव्य अनुभव करता है जिसे स्वर्ग लोक में निवास या जीवन-मुक्ति जैसा हाथों-हाथ रसास्वादन किया जा सके।
उथली साँस लेने वालों के फेफड़ों का एक छोटा भाग काम में आता है और शेष ऐसे ही निष्क्रिय पड़ा रहता है। इसी क्षेत्र में विषाणु पलते और प्राण संकट उत्पन्न करते हैं। चेतना का निष्क्रिय पक्ष यदि स्तरीय सक्रियता में संलग्न न होगा तो उस अँधेरी कोठरी में ऐसे तत्व पलेंगे जो पतन-पराभव के गर्त में व्यक्तित्व को गिराते रहें और सड़न उत्पन्न करके उस क्षेत्र को दुर्गन्ध से भरते रहें।
व्यक्ति चेतना का कार्यक्षेत्र उससे कहीं अधिक व्यापक है, जितना कि परिवार, समाज के छोटे दायरों में-बहिरंग जीवन में प्रयुक्त होता है। हाड़-माँस के स्थूल अपनी हस्ती और क्षमता है, किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण और अदृश्य शरीर-आत्मा की उपलब्धि है और वे यदि सजग सक्रिय हो सके तो ‘काय शरीर’ की तुलना में अत्यधिक महत्व के काम कर सकते हैं। स्थूल शरीर बोझिल होने के कारण धीमे चलता और जल्दी थकता है, पर सूक्ष्म शरीर का भार न होने से वह प्रकाश से भी अधिक गति के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच सकता है। दूरदर्शन दूरश्रवण जैसी अनेकों आश्चर्यजनक घटनाओं के उदाहरण सामने आते रहते हैं। भूत-प्रेतों के अस्तित्व सिद्ध करने वाले प्रमाण मिलते रहते हैं। जीवित रहते हुए तन्त्र योगी अपनी ही एक अदृश्य अनुकृति छाया पुरुष के रूप में गढ़ लेते हैं, और उससे बिना चेतन की देवमानव जैसे सहायक सेवक का काम लेते हैं। यह सूक्ष्म शरीर के ही चमत्कार हैं। कितने ही स्वप्न अक्षरशः सत्य निकलते हैं और कइयों में महत्वपूर्ण संकेत रहते हैं। जाग्रत अवस्था में भी कई बार ऐसे दिवा-स्वप्न देखे गये हैं जो किसी सामयिक घटनाक्रम की जानकारी देने वाले सिद्ध हुए।
अंतर्मुखी होकर अंतर्जगत का अवलोकन और उसे परिष्कृत करने के लिए योगाभ्यास में कई प्रकार की ध्यान-धारणाएँ कराई जाती हैं। षट्चक्र, पंचकोश, तीन ग्रन्थियाँ, इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना,उनकी सहायक नाड़ियाँ किस स्तर की हैं और उनकी प्रस्तुत स्थिति दूर हो जाने पर क्या कुछ उपलब्ध हो सकता है ? इसका सुविस्तृत वर्णन हठयोग-कुण्डलिनी जागरण आदि विद्याओं के अंतर्गत सुना-समझा जाता रहा है। यह कार्यक्षेत्र वैभव एवं अदृश्य विद्युत् भण्डार सूक्ष्म शरीर की परिधि में ही आता है। स्थूल शरीर के अवयव तो सर्वविदित हैं। उसकी संरचना में चक्र कोश आदि का कहीं कोई स्थान नहीं है। चक्रवेधन, कुण्डलिनी जागरण, शरीर सत्ता का अभीष्ट परिवर्तन, अचेतन मन की लगता हाथ में आने पर मानसिक चेतना का इच्छित उपयोग जैसे कितने ही ऐसे काम हैं, जिन्हें सूक्ष्म शरीर को समर्थ बनने के उपरान्त सहज ही सम्पन्न किया जा सकता है। इन्द्रिय शक्ति से कहीं अधिक प्रखरता सम्पन्न मनुष्य की अतीन्द्रिय सामर्थ्य है। इसे कैसे जगाया बढ़ाया जाय ? यह सारा प्रकरण सूक्ष्म शरीर सम्बन्धित है।
कारण शरीर इन सूक्ष्म से भी अधिक रहस्यमय है। जिस प्रकार स्थूल शरीर आधा प्रकृति का और आधा प्राणचेतना के समन्वय से बना है, उसी प्रकार कारण शरीर आधा मानवी चेतना और आधा देव चेतना के समन्वय से बना है। अन्तःकरण की सूक्ष्म परतें इसी क्षेत्र में है। यह जग पड़े तो भीतर से ही देव-शक्तियों का उदय हो सकता है। अध्यात्म शास्त्र में अन्नमय प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय पंचकोशों को प्रख्यात पंच देवों का प्रतीक-प्रतिनिधि बताया गया। इसी शरीर में समस्त लोक, देव ऋषि, तीर्थ सन्निहित माने गये हैं। बहुमूल्य रत्न भण्डारों का खजाना इसी में गढ़ा हुआ बताया गया है। अंतःकरण ही व्यक्तित्व का मूलभूत स्वरूप है। स्वरूप है। उसकी स्थिति जैसी भी भली-बुरी होती है। उसी के अनुरूप चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, वातावरण गढ़ी हुई दुनिया में मनुष्य अपने ढंग का निर्वाह करता है। अंतःकरण की प्रेरणा से मन, बुद्धि को काम करना पड़ता है। मन के निर्देशन पर काया काम करती है। संक्षेप में बाह्य जीवन का जैसा भी स्वरूप है, उसे अन्तः करण का प्रतीक-प्रतिबिम्ब ही समझा जाना चाहिए। यह अन्तराल ही कारण शरीर है। देव सान्निध्य इसी मिलन कक्ष में शक्य होता है। इष्टदेव का दर्शन-ईश्वर मिलन, स्वर्गानुभूति, मुक्ति आनन्द, विभूति, वैभव सिद्धि, चमत्कार आदि की जो उत्साह भरी चर्चा अध्यात्म प्रसंगों में होती रहती है। उसका कारण शरीर स्थिति के रूप में भी विवेचन किया जा सकता है।
स्थूल शरीर की क्षमता, प्रखरता के आधार पर मिलने वाली प्रसन्नता, सम्पदा, सफलता जिन्हें प्राप्त है उन्हें उतना और भी जानना चाहिए कि स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण शरीर की सामर्थ्य में उत्तरोत्तर वृद्धि ही होती चली जा रही है। नीरोग, परिपुष्ट स्फूर्तिवान, सुन्दर, सुडौल शरीर के सहारे जो कुछ हो सकता है, उनसे अत्यधिक अनुपात में समुन्नत सूक्ष्म शरीर और सुसंस्कृत कारण शरीर के माध्यम से उपलब्ध किया जा सकता है। कारण शरीर की भावना को, सूक्ष्म शरीर की विचारणा को और स्थूल शरीर की क्रियाशीलता को केन्द्र माना गया है। इन्हें परिष्कृत करने के लिए क्रमशः भक्ति योग की, ज्ञान योग की, कर्म योग की साधना की जाती है। उनकी प्रखरता मनुष्य को तेजस्वी, मनस्वी एवं ओजस्वी बनाती है। अध्यात्म क्षेत्र की साधनाएँ विभूतियों को करतलगत कराती हैं।
प्रत्येक वेद मन्त्र का देवता होता है, जिसकी शक्ति से ही वह मन्त्र सिद्ध एवं फलित होता है। गायत्री महामन्त्र का देवता ‘सविता’ है। ‘तत् सवितुः’ इस आरम्भिक वाक्य में उस सविता का उल्लेख करते हुये आगे उसी का ध्यान और धारणा करने का निर्देश दिया गया है। गायत्री की शक्ति इस सविता देवता पर ही अवलम्बित है।
सविता कहते हैं, ‘सूर्य’ को। गायत्री को एक प्रकार से सूर्य का मन्त्र भी कहा जाता है। “पनातु माँ तत्सवितुर्वरेण्यं” इस अन्तिम पद वाले स्तोत्र में सूर्य देवता का ही स्तवन किया गया है। इसलिए कितने ही उपासक सूर्य की देवता का ही स्तवन किया गया है। इसलिए कितने ही उपासक सूर्य की आराधना के लिए गायत्री को माता रूप में मानने वाले साधक भी उसका रूप ‘सूर्य मण्डल मध्यस्था’ सूर्य मण्डल के बीच में उपस्थित स्वरूप का मातृदेवी के रूप में ही ध्यान करते हैं। किसी भी रूप में गायत्री मन्त्र की उपासना की जाय ‘सूर्य’ का उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध अनिवार्य रूप से रखना होगा। गायत्री का देवता ही सूर्य है तो उसका स्वरूप भी साथ में होना स्वाभाविक ही है।
स्थूल विज्ञान की दृष्टि से सूर्य एक अग्नि पिण्ड है, जो आकाश में अवस्थित अनन्त आकाश गंगाओं में ‘स्पाइरल’ नामक एक आकाश गंगा के परिवार के लगभग डेढ़ अरब तारों में से एक छोटा सा तारा मात्र है। इसका व्यास करीब 9 लाख मील अर्थात् पृथ्वी की अपेक्षा 110 गुना बड़ा है। उसके परिवार में 9 ग्रह हैं। तथा प्रत्येक ग्रह के अनेक उपग्रह हैं। बुध, शुक्र, और पृथ्वी का एक-एक चन्द्रमा है। मंगल के दो, बृहस्पति के बारह, शनि के नौ, वरुण के पाँच, हरिग्रह के दौ और पीतग्रह (प्लूटो)। इनके अतिरिक्त हजारों छोटे ग्रह तथा ग्रहिकाएँ एवं अगणित धूमकेतु, पुच्छल तारे इस सौर परिवार में सम्मिलित हैं। वह सब सूर्य की प्रबल आकर्षण शक्ति में जकड़े हुए उसकी परिक्रमा करते रहते हैं। अपने सारे परिवार को लेकर सूर्य स्पाइरल ‘आकाश गंगा’ की परिक्रमा करता है। इस एक परिक्रमा में उसे 25 करोड़ वर्ष लग जाते हैं ज्योतिषियों का अनुमान हैं कि जबसे सूर्य पैदा हुआ है तब से अब तक यह सोलह ऐसी परिक्रमा कर चुका है।
स्थूल पदार्थ विज्ञान अभी तक सूर्य के सम्बन्ध में ऐसी जानकारियाँ एकत्रित कर सका है। तथा किरणों से सप्तरंग, विद्युत प्रवाह एवं आणविक विकिरण का कुछ हद तक पता लगा सका है। इस दिशा में और भी जानकारी एकत्रित की जा रही है। पर यह सब सूर्य के स्थूल रूप का ही परिचय है। जिसे मनुष्य की सत्ता का विश्लेषण करने के लिए उसके शरीर सम्बन्धी जानकारी प्राप्त कर लेन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उसकी विद्या, बुद्धि, गुण, कर्म, स्वभाव, प्रवृत्ति, भावना, चेतना एवं आत्मा का पता लगाना भी आवश्यक होता है। इसके बिना केवल शरीर विश्लेषण के आधार पर जो परिचय प्राप्त किया जायेगा, वह अधूरा ही रहेगा। इसी प्रकार सूर्य की आत्मा को जानना भी आवश्यक है। इसके बिना गायत्री मंत्र का साधक दस अग्निपिण्ड सूर्य के जान लेने मात्र से अपना प्रयोजन पूर्ण नहीं कर सकता।
एक अनन्त चैतन्य, जीवन एवं शक्ति का समुद्र इस विश्व में लहरा रहा है। जड़ प्रकृति का परमाणु संकुल, उस चेतन-सत्ता की तरंगों से ही तरंगित होकर गतिवान हो रहा है। जड़ पदार्थों में अपने निज की कोई शक्ति या चेतना नहीं है, जब प्रलय होती है, तो वह सब राख के ढेर समान गतिहीन हो जाता है। संसार में जो कुछ हलचल हो रही दीखती है, उसके मूल में यह चेतना का महाभाण्डागार ही काम कर रहा है। जैसे देह के निर्जीव कलेवर में आत्मा का ही संसार गतिशील रहता है, वैसे ही जड़ प्रकृति में जो चेतना होती दिखाई पड़ती है, उसका कारण वह चेतना सागर ही हैं। जिसके लिए गायत्री मंत्र में ‘सविता’ शब्द का प्रयोग हुआ है, यह प्रकाश पिण्ड उस सविता का एक बाह्य शरीर, स्कूल कलेवर मात्र हैं।
सूर्य की गर्मी और रोशनी हर किसी को दीखती है, यह उसकी स्थूल शक्ति हैं। इसके भीतर एक और भी सूक्ष्म - सता उसके अन्तर में मौजूद हैं, वह है - जीवनी शक्ति। प्राणियों को उत्पन्न करने, पोषण और अभिवर्द्धन करने का विश्वव्यापी कार्यक्रम उस सूर्य की आत्मा पर ही आधारित है। रोशनी और गर्मी मशीनों से भी पैदा की जा सकती है, पर उनसे जीवन नहीं मिल सकता। वैज्ञानिक जानते हैं कि यदि सूर्य न होगा तो पृथ्वी जीवन का चिन्ह शेष न रहेगा।
श्रुति में सूर्य को ‘संसार की आत्मा’ बताया गया है। आँखों में आकाश में दौड़ने वाले सूर्य के बाह्य कलेवर की गर्मी और रोशनी को पिण्ड कह सकते हैं, जबकि आत्मा जगत का जीवन है। इस जीवनी शक्ति का दूसरा नाम प्राण-शक्ति भी है। सूर्य की आत्मा को ही महाप्राण कहा गया है। उस महाप्राण की बूँदें विभिन्न प्राणियों में अल्प प्राण के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं।
गय कहते हैं - प्राण को, त्री कहते हैं - त्राण उद्धार करने वाली को। प्राण शक्ति का उत्थान करने वाली विद्या को गायत्री कहा जाता है। अपने देवता सविता से गायत्री महामंत्र में प्राण-शक्ति अभिप्रेत होती है और उसी का एक अंश अपने में धारण करके गायत्री उपासक अपने आपको धन्य बनाता है।
सूर्य के माध्यम से प्रस्फुटित होने वाला महाप्राण, परब्रह्म परमात्मा का वह अंश है, जिससे इस विश्व ब्रह्माण्ड का संचालन होता है। एक से अनेक बनने का ब्रह्म संकल्प ही महाप्राण बनकर फूट पड़ा है। यह निर्झर जिस दिन तक झर रहा है, उसी दिन तक सृष्टि है। जिस दिन परम प्रभु उस संकल्प को समेट लेंगे उसी दिन महाप्राण शान्त हो जायगा और फिर महाशून्य के अतिरिक्त और कुछ भी शेष न रहेगा। वह ब्रह्म संकल्प - महाप्राण-परब्रह्म की सत्ता से भिन्न बाहरी पदार्थ नहीं वरन् उसी का एक अविच्छिन्न का एक भाग जो सृष्टि के संचालन में, उसकी समस्त प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित रखने में लगा हुआ है। उस महाप्राण को ही सूर्य की आत्मा-सविता देवता समझना चाहिए। प्राणी का, जीवधारी का सीधा सम्बन्ध इसी से हैं।
जीवन की बाह्य और आन्तरिक सुव्यवस्था के लिए, प्रगति और शान्ति के लिए, परब्रह्म की महाप्राण सत्ता का अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करना प्राणी के लिए अभीष्ट होता है। इसी प्रयोजन की पूर्ति करना प्राणी के लिए गायत्री महामंत्र द्वारा सविता देवता की उपासना की जाती है।
यह भ्रम नहीं रहना चाहिए कि गायत्री महामन्त्र की शक्ति इस अग्नि पिण्ड सूर्य पर अवलम्बित है। यह तो रोशनी और गर्मी मात्र देता है। यह सब तो बिजली की मशीनों से भी प्राप्त किया जा सकता है। इतने मात्र के लिए किसी उपासना की क्या आवश्यकता ? गायत्री सूर्य की आत्मा सविता शक्ति के साथ उपासक को सम्बन्धित करती है। जिससे द्वारा वह परब्रह्म का महाप्राण अपने शरीर और अन्तःकरण में आवश्यक मात्रा में धारक करके लौकिक सुख एवं आत्मिक शक्ति को अनुभव करता हुआ जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
यह महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य, आयुष्य तेज, ओज, प्राण, उत्साह-स्फूर्ति-पुरुषार्थ, इन्द्रिय शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता है। जब वह मन क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो प्रफुल्लता, साहस एकाग्रता, स्थिरता, धैर्य, संयम आदि सद्गुणों के रूप में देखा जा सकता है। जब उसका अवतरण अध्यात्मिक क्षेत्र में होता है, तो त्याग, तप, श्रद्धा विश्वास, दया, उपकार, प्रेम विवेक आदि दिखाई देते हैं। तीनों ही क्षेत्र उस महाप्राण से जैसे-जैसे भरते जाते हैं वैसे ही मनुष्य अपूर्णता से पूर्णता की ओर, लघुता से विभुता की ओर, तुच्छता से महानता की ओर बढ़ने लगता है। आत्म कल्याण का, लक्ष्य प्राप्ति का यही मार्ग है।
सविता देवता यद्यपि सूर्य का ही दूसरा नाम है। पर यह भली प्रकार जान लेना चाहिए कि जो अन्तर शरीर और आत्मा का है वहीं सूर्य और सविता में है। गायत्री महामन्त्र का देवता सूर्य वहीं महाप्राण है। उसका स्पष्टीकरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर विस्तारपूर्वक किया गया है।
योऽसावादित्ये पुरुषःसोऽहम् - मैत्रेयी उपनिषद् 6/125
“जो सूर्य है सो ही मैं हूँ।”
प्राणों वै अर्कः॥ - शतपथ 10!4!7!23
“प्राण ही सूर्य है।”
स एष वैष्वानरो विश्वरुपः प्राणोऽग्नियदयते॥ -प्रश्नोपनिषद् 1। 7
“सूर्य के उदय होने पर सारे विश्व में प्राणाग्नि का संचार होने लगता है।”
सहस्त्ररश्मिः शतधा वर्तमानः। प्राणःप्रजानामुदयत्येष सूर्यः॥ - शत॰ 6।7।9।20
“प्राण ही सहस्र रश्मियों वाला, सैकड़ों प्रकार से वर्तमान, प्रजा को उत्पन्न करने वाला सूर्य है।”
योऽसो तपन्नुदेति ससर्वेषा भूतानाँ प्राणनाँ दायोदोति॥ - श्रुति
“इस सूर्य से ही सब प्राणियों को प्राण प्राप्त होता है।”
सूर्याह्णवन्ति भूतानि सूर्येंण पालितानि तु। सूर्य लंय प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च ॥ - सूर्योपनिषद्
“सूर्य से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उसी से उनका पालन होता है, उसी में लय हो जाते हैं, जो सूर्य है सो ही मैं हूँ।”
चारों वेदों में जो कुछ है, वह सविता शक्ति का विवेचन मात्र है। तप, श्रद्धा और साधना के द्वारा योगी-जन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं। नाम, रूप, सुविधा के अनुसार कोई भी माना जाय पर वस्तुतः वह सविता देवता ही सब का उपास्य है। उसी को प्राप्त करने के लिये प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है।
इस सविता की उपासना में संलग्न ऋषि-मुनि योग के द्वारा अपनी आत्मा को उस तेज पुँज महाप्राण परब्रह्म में प्रविष्ट करते हैं। शुकदेव जी अपनी साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुये उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है -
तस्माद्योगं, समास्थातत्य-क्त्वागृह कलेवरम्। वायुभूतः प्रवेक्ष्यामि तेजोराशिं दिवकरम्॥-महा0
शुकदेव जी ने कहा - “मैं योग से स्थित होकर इस देह को त्याग कर तेजो राशि सूर्य में वायुभूत होकर प्रवेश करता हूँ।”
यदि किसी जिज्ञासु को हृदय, रक्तवाही संस्थान की क्रिया पद्धति एवं उससे सम्बन्धित रोगों के कारण सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करनी हैं, इस विद्या में निष्णात होना है तो उसे यह विकल्प नहीं सौंपा जा सकता कि वह मात्र उस संस्थान सम्बन्धी एनाटॉमी पढ़कर, क्रिया प्रणाली के सिद्धान्त समझकर उसका विशेषज्ञ बनने का प्रयास करें। शरीर का हर अंग-अवयव एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। हरेक की कार्य पद्धति का परस्पर एक-दूसरे से तालमेल है तभी तो शरीर - व्यापार चल पाता है। किसी भी विद्या का शाखा में रुचि रखने वाले को उस समूचे विज्ञान के हर पहलू को भली-भाँति समझना होगा। तन्त्र शास्त्र पर भी यही बात लागू होती है। भ्रान्तिवश सामान्यजन इसे आत्मिकी से इतर एक अलग विद्या मान लेते हैं और जानकारी प्राप्ति के लिये तरह-तरह के उपाय अपनाते हैं। इस भटकाव भरी यात्रा में पल्ले कुछ पड़ता नहीं, उलटे अपना अहित और कर बैठते हैं।
तत्वज्ञानी ब्रह्मवेत्ताओं का अभिमत है कि सारी सृष्टि जड़ व चेतन का युग्म है। दोनों के सम्मिश्रण से ही इसकी संरचना हुई है। पदार्थ विज्ञान जड़ वस्तुओं की रचना, आकृति-प्रकृति एवं प्रयोग के विधि-विधानों से सम्बन्धित एक विधा है। चेतन जगत अपने आप में पूरा एक अलग ही संसार है, जिसमें गति है, जिसकी अपनी सत्ता है एवं जिसमें असीम संभावना निहित हैं। इसे हम अध्यात्म-विज्ञान नाम से जानते हैं। ये दोनोँ ही शाखाएँ अपनी भूमिका अलग-अलग रूपों में निभाती रहती हैं पर हैं परस्पर गुँथी हुई।
पदार्थ विज्ञान के प्रयोग अनुसंधान की अनेकों रूपों में आज प्रयोगशालाओं में क्रियाशील नजर आते हैं। एप्लाइड फिजिक्स, के मिस्ट्री, न्यूक्लियर साइंस जैसी अनेकानेक शाखाओं में बँटी भौतिकी यन्त्र-उपकरणों की मदद से इस सदी के प्रारम्भ से अब तक मानव समुदाय को अनेकों उपलब्धियों से लाभान्वित करा चुकी। इसके लिये उसकी जितनी सराहना की जाय कम है। अध्यात्म विज्ञान के प्रयोग अनुसन्धान एक ही यन्त्र के माध्यम से सम्पन्न होते हैं। यह यन्त्र है - जड़-चेतन के सम्मिश्रण से बनी मानवी काया। स्थूल शरीर जो दिखाई पड़ता है, वहीं सब कुछ नहीं है। गहराई से देखने पर इस काया की दो अदृश्य परतें और दृष्टिगोचर होती हैं, जिन्हें ‘सूक्ष्म शरीर’ एवं ‘कारण शरीर’ नाम से पुकारा जाता है। दृश्यमान काया का तो मात्र उदरपूर्ति, मल विसर्जन, प्रजनन आकाँक्षा एवं दैनिक जीवन व्यापार भर से नाता रहता है। लेकिन अन्य दो परतों का सम्बन्ध उस अदृश्य लोक है, जिससे सम्बन्ध स्थापित कर चेतना सत्ता समष्टि का एवं अंग बन जाती है एवं वे कार्य सम्पादित करने लगती है, जिन्हें अद्भुत-अलौकिक माना जाता है, जबकि होते वे भी सुगम एवं प्रकृति अनुशासन की मर्यादा में ही हैं।
यह अदृश्य जगत कैसा है, कहाँ है, इसकी खोजबीन भौतिकी के चश्मे से नहीं की जा सकती। इसके लिये योग एवं तन्त्र विज्ञान की धाराओं को-उनके रहस्यों को मनीषी स्तर के चिन्तन के माध्यम से समझना होगा। मानवी काया, जिसे इस अदृश्य लोक का यन्त्र उपकरण बताया गया है, का सूक्ष्म कलेवर इस दृष्टि से दो भागों में विभक्त माना जा सकता है। एक मस्तिष्क के ऊर्ध्व भाग में स्थित ब्रह्मरन्ध्र, सहस्रार रूपी विद्युत, स्फुल्लिंगों के निर्झर एवं आज्ञाचक्र का समुच्चय। दूसरा निचले छोर पर स्थित प्राणाग्नि का सघन पुँज जिसे मूलाधार,
कुण्डलिनी एवं प्राण संस्थान कहा गया है। काया के निचले छोर पर स्थित मूलाधार केन्द्र की अलंकारिक दृष्टि से तुलना अधःलोक- पाताल लोक से की गयी है।पृथ्वी को शेषनाग पर विराजमान माना गया है। वह कल्पना आत्मिकी की भाषा में काया पर मूलाधार या कुण्डलिनी के रूप में अवस्थित सर्पिणी के माध्यम से समझायी जाती है। यह काय-कलेवर में प्रकृति के सारे क्रिया-कलाप गति एवं शक्ति पर आधारित हैं। काया का दक्षिणी ध्रुव नहीं दोना प्रयोजनों को पूरा करता है।
इन दोनों केन्द्रों-चेतन सत्ता एवं जड़ प्रकृति को परस्पर मिलाने-दोनोँ के मध्य आदान-प्रदान का प्रयोजन जिस उपकरण से पूरा होता है, उसे मेरुदण्ड रूपी देवयान मार्ग के रूप में समझा जा सकता है। अधोलोक के माध्यम से निर्वाह प्रयोजन-उदरपूर्ण एवं प्रजनन जैसी गतिविधियाँ सधती हैं। काया की नीरोगता दीर्घायुष्य जीवनी शक्ति इसी पर निर्भर है। अध्यात्म विज्ञानियों ने इस स्थूल पक्षों को जनसमुदाय के लिये स्पष्ट कर, चेतना विज्ञान के उन अदृश्य क्षेत्रों पर और अधिक प्रकाश डालने का प्रयास किया है, जो इन केन्द्रों व इन्हें जोड़ने वाली सुषुम्ना नाड़ी प्रवाह से सम्बन्धित हैं।
अनन्त सामर्थ्य सम्पन्न विश्व ब्रह्माण्ड की दैवी चेतना से संपर्क जोड़ने के लिए जहाँ ब्रह्मरंध्र एवं सहस्रार का योग विज्ञान के माध्यम से प्रयोग होता है, वह प्रकृति वैभव रूपी दैत्य शक्तियों के प्रचण्ड प्रवाह से लाभ उठाने के लिये यन्त्र विज्ञान का आश्रय लेना होता है। ऊर्ध्वलोक का नेतृत्व जहाँ पर ब्रह्म - सदाशिव करते हैं, वहाँ अधोलोक की अधिष्ठात्री हैं - महाकाली कुण्डलिनी। मध्यव्यापी देवयान मार्ग दोनों के बीच सघन संपर्क बनाये रखने की महती भूमिका निभाता है।
स्वर्गलोक-ऊर्ध्वलोक मस्तिष्क में अवस्थित सहस्रार को जगाने हेतु योग साधना के विभिन्न उपक्रम हैं, जबकि पाताललोक-अधोलोक मूलाधार में अवस्थित कुण्डलिनी में स्पन्दन पैदा करने के लिए तन्त्र स्पन्दन पैदा करने के लिए तन्त्र साधना के अनेकों उपक्रम शास्त्रों में वर्णित हैं। ये दोनोँ मिलकर आत्मिकी की विधा को पूर्ण बनाते हैं। एक शिव हैं एवं दूसरी शक्ति दोनों मिल कर सम्पूर्ण बनते हैं।
योगी ब्रह्म पारायण होते हैं, दिव्यलोक में विचरण करते हैं, भाव साधना के माध्यम से दैवी संपर्क स्थापित कर कुण्डलिनी केन्द्र को जगाने व प्रकृति करते हैं इस प्रकार शरीर की दोनों ही सूक्ष्म परतें अदृश्य शरीर की दोनों ही सूक्ष्म परतें अदृश्य रूप में ब्रह्म एवं प्रकृति से घनिष्ठता स्थापित कर वाँछित अनुदान अपने लिये प्राप्त करने, अन्तः को बलिष्ठ बनाकर अन्यान्यों को लाभान्वित करते देखा जा सकता है। योग एवं तन्त्र के समूचे विज्ञान को इस रूप में भली-भाँति समझकर ही साधना उपक्रमों को आरम्भ किया जाना चाहिए। तंत्र के टोने-टोटके वाले स्वरूप से बचकर उसके मर्म को समझा जाना चाहिए। गलती यही होती रही है कि उसका प्रदर्शन- परक दुरुपयोग अधिक हुआ है।
तंत्र के विषय में अनेकानेक घटनाओं की चर्चा होती है। इस सम्बन्ध में एक घटना है। तब भारत परतंत्र था। सीतापुर क्षेत्र में हृदय नारायण नामक एक सेठ रहते थे। विशाल बँगला था तथा उसमें पत्नी व नौकर-चाकर समेत वे रहते थे। एक दिन सेठजी के बंगले पर एक तान्त्रिक का पदार्पण हुआ। उसने सेठ जी से वाँछित मादक पेय की तन्त्र प्रयोग हेतु माँग की सेठजी ने जब इसको प्रस्तुत करने से इनकार कर दिया तब उस तान्त्रिक ने उन्हें सबक सिखलाने की घोषणा की।
कुछ दिनों बाद ही घर में बिल्लियों का उपद्रव आरम्भ हुआ। घर-आँगन में हर तरफ बिल्लियों का शोर तथा चहलकदमी सुनने, देखने को मिलने लगी। बिल्लियों को पकड़कर कोसों दूर फेंक आया जाता, तब भी न जाने कहाँ से नई बिल्लियाँ आ जातीं तथा उपद्रव पूर्ववत् जारी रहता। उपचार रूप में झाड़-फूँक, पूजा-पाठ का कृत्य भी सम्पन्न किया गया, पर वह भी नाकामयाब रहा।
इसी बीच उस क्षेत्र में एक तलवारधारी साधु की ख्याति काफी फैली। उसने एक बार रेलगाड़ी को चलाने से रोक दिया था। तभी से लोग उसे अपने यहाँ कष्ट निवारणार्थ लिवा जाते। सेठ जी ने भी यही किया साधु ने उन्हें निर्दोष मानते हुए उनके घर आना स्वीकार कर लिया। वहाँ उन्होंने अपनी तलवार माँजना शुरू किया तथा यह कहते रहे। “देखता हूँ कौन अब बिल्लियों को भेजा है, कौन यहाँ तबाही मचाता है?” इसके बाद से वहाँ फिर कोई हलचल नहीं हुई। आज भी सेठजी के परिवार के अन्य लोग इस घटना के साक्षी हैं।
ये घटनाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि तन्त्र-विज्ञान एक अलौकिक सामर्थ्यों का समुच्चय है। तान्त्रिक के पास शाप-वरदान एवं अशुभ को टालने, अहित को मिटाने, साथ ही किसी का अहित करने की भी क्षमता होती है। बहुधा ऐसा कम ही होता है कि अहित करने वाले तन्त्रवेत्ता को बदले में पुरस्कार मिला हो अथवा उसे कुछ लाभ हुआ हो। नियामक सत्ता की विधि -व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें भी चलना होता है। जो इस विद्या का सदुपयोग करते हैं, वे अध्यात्म ऊर्जा सम्पन्न होते हैं, एवं दूसरोँ के अनिष्ट का निवारण भी करते हैं। तन्त्र-विज्ञान के इस पक्ष को जो उज्ज्वल है, प्रकाश में लाया जाना चाहिए ताकि इस विषय में संव्याप्त भ्रान्तियों का निवारण हो सके।
वस्तुतः तन्त्र विज्ञानी प्रकृति के परिकर में छिपी अनेकों ज्ञात-अविज्ञात में शक्तियों का अपने लिये उपभोग करते हैं। माध्यम उपकरण काय-कलेवर रूपी यऩ् ही बनाते हैं। ईश्वर द्वारा अनुदान रूप में मिली काया की इस प्रयोगशाला का लाभ बिना किसी लागत के उठाया जा सकता है, बशर्ते कि तप-तितीक्षा के अध्यात्म अनुशासनों को पूरी तरह निभाया गया हो एवं बदले में प्राप्त ऋद्धि-सिद्धि रूपी अनुदानों के दुरुपयोग न होने देने का समुचित आश्वासन उस दैवी सत्ता को दे दिया गया हो। आत्मशोधन की संयम साधना के बिना, कषाय-कल्मषों को हटाए बिना ये चमत्कारी विभूतियाँ हस्तगत होती नहीं। ये कुछ प्रारम्भिक शर्तें हैं, जिन्हें पूरी किए बिना न योग साधना सध पाती है, न तन्त्र साधना ही सम्भव हो पाती हैं। योगी अपने प्रचण्ड आत्मबल के सहारे इस दीवार को गिराकर देव अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते हैं इसी प्रकार तान्त्रिक भी अपनी कठोर तितीक्षा द्वारा उस श्रेय को प्राप्त करते हैं जो उन्हें अभीष्ट होता है।
दोनों ही क्षेत्रों की अपनी-अपनी मर्यादा है, लेकिन दोनों परस्पर अविच्छिन्न रूप से जुड़े भी हैं। योगी शिव का आदर्शवाद की समर्थक शक्तियों का उपासक होता है एवं तान्त्रिक भौतिक क्षेत्र की सामर्थ्यों का आराधक, जिनके माध्यम से प्रकृति सम्पदा के वैभव का लाभ वह साथ परिकर को दे सकने में समर्थ बनता है। दोनों ही समान महत्व के लेकिन तभी जब दोनों का मानव कल्याण हेतु उपयोग हो।
सेठ जमनालाल बजाज करोड़पति बच्छराम जी की गोद आये। उन्हें जो धन मिला उसका अधिकाँश भाग गाँधीजी की राष्ट्रीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लगा दिया। इसे कहते हैं - उत्तराधिकार का सुनियोजन।
धन बच्चों को देकर उपभोग की अपेक्षा यही श्रेष्ठ है कि उसे किसी अच्छे काम में लगा दिया जाय। यह एक प्रकार से देव ऋण चुकाना ही हैं।
आषाढ़ के घने बादलों से आसमान ढका था। पानी बरस जाने सब ओर धरती जलमय हो रही थी। साधुओं का एक समूह जंगल पार कर था, लेकिन चारों ओर पानी उफनते नाले, गर्जती नदियां, कीचड़ से भरे रास्ते आगे बढ़ने से रोक रहे थे। उन साधुओं के अग्रणी महर्षि शाल्विन वहीं एक पेड़ की नीचे रुक गए और विचार करने लगे-अब क्या जाय ? रास्ता सूझ नहीं रहा है। चातुर्मास लगन में सिर्फ चार दिन बाकी है। चौथे दिन अर्थात् आषाढ़ी पूर्णिमा को तो चातुर्मास स्थल तक पहुँच ही जाना है। फिर तो घूमना-फिरना नियम के विपरीत होगा। इस जंगल में रहकर चातुर्मास करना सम्भव नहीं और आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं। अन्य साधु भी इसी चिन्ता में खोए थे।
तभी पेड़ों के झुरमुट से एक मजबूत कद-काठी का मनुष्य आता दिखाई पड़ा। उसके चेहरे की आभा, सुदृढ़ मांसपेशियां, कंधे पर धनुष बाण सिंह, की सी निर्भीक चाल यह बता रही थी कि वह कोई वीर पुरुष है। उसने यकायक इन साधुओं के पास आकर प्रणाम करते हुए पूछा-महाराज ! आप इस भयंकर जंगल में यहाँ क्यों और कैसे आ गए ? इस प्रश्न के उत्तर में साधुओं ने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा - भाई! हम मार्ग भूल गए हैं। हम विदिशाँ जाने के लिए निकले थे ; लेकिन बरसात होने से कीचड़ घास जीव-जन्तु आदि पैदा हो गए। पगडण्डी बन्द हो गयी। हम तीन दिन इधर, उधर भटक रहे हैं। गन्तव्य तक पहुँचना असम्भव है। अतः यहीं आस-पास कोई बस्ती हो तो बताओ। साधुओं के लिए क्या जैसा नगर वैसा ही वन। तुम अनुमति दो तो जंगल में ही जप तप करके चातुर्मास बिता डालें।
आगन्तुक तनिक सोच-विचार में पड़ गया। धीरे-धीरे उसके रक्त में रमे हुए संस्कारों ने अँगड़ाई ली और उसने एक और अँगुली से इशारा करते हुए कहा - “इन टीलों की ओट में जो झोपड़ियाँ दिखाई दे रही हैं, वे भीलों की हैं। आप यहाँ चार महीने रहना चाहें तो हम आपको रहने का स्थान दे सकते हैं, परन्तु एक शर्त है, यदि आप उस शर्त को मानने की प्रतिज्ञा करें, तो आप यहाँ रह सकते हैं।
साधुवृन्द के नायक महर्षि शाल्विन तनिक मुस्कराए, बोले-”कौन सी शर्त है वह ?” उसने कहा - देखिए, हम डाकू हैं, आप हैं साधु। हम दोनों की दी राह हैं, जो अलग-अलग है। हमारा रास्ता मारने का है आपका तारने का। हमारा धर्म लूटना है और आपका लूट छोड़ने का उपदेश देना। आप हमारा साथ करेंगे तो बिगड़ने और हम आपका साथ करेंगे तो हमारी आजीविका समाप्त हो जाएगी। अतः आप हमारे मार्ग में हस्तक्षेप न करना। मेरे आधीन 700 लुटेरे हैं। हमारा धन्धा उक्ति का है। डकैती के साथ हत्या और मार-पीट स्वाभाविक रूप से जुड़ी हैं। मैं जानता हूँ कि आपका मार्ग सच्चा हैं परन्तु मेरे काम का नहीं। अहिंसा को अपना लें तो खून कैसे करेंगे। अपरिग्रह स्वीकार करें तो पेट कैसे भरें? इसलिए आप खुशी से रहिए पर हमारे किसी भी साथी को उपदेश न देने की शर्त ध्यान में रखिएगा, अन्यथा ............।” डाकुओं के सरदार की यह स्पष्ट समझदारी से भरी और बेबाक बात सुनकर महर्षि को प्रसन्नता हुई। उन्होंने भावी कल्याण की आशा से सभी साधु सन्तों से परामर्श करके भील पल्ली में उसकी शर्त के अनुसार ठहरने की स्वीकृति दे दी।
प्रकृति के इस सुरम्य, शान्त वातावरण में सभी तपस्वियों ने एक झोंपड़ी में चातुर्मास बिताने के लिए अपने बिताने के लिए अपने आसन लगाए। स्वाध्याय, ध्यान मौन, तप और आत्म साधना में चार महीने हवा के झोंके की तरह झट-पट व्यतीत हो गए। डकैत - डकैती का माल लेकर इन ऋषियों - मुनियों के निवास स्थान के आगे से होकर गुजरते जरूर थे, परन्तु तप का प्रकाश उनके हृदयों को स्पर्श करता, उससे पहले ही वे वायु वेग सरपट आगे निकल जाते हैं।
चार महीने बीत गए, चातुर्मास समाप्त हो गया। आज साधुवृन्द जाने की तैयारी में था। डाकुओं के सरदार ने आकर भावपूर्वक नमन किया। ग्रामपति और उसके कुछ आधीन लोग साधुओं को विदाई देने साथ-साथ चल रहे थे। उपदेश चाहे भले न दिया गया हो, लेकिन तप-त्याग, शान्ति, संयम का मूक असर सभी के हृदयों पर अंकित हो चुका था। पगडण्डी के मोड़ पर महर्षि रुके। उन्होंने सरदार और उसके साथियों को स्वस्ति वचन सुनाए। साथी लोग तो वापिस लौट गए, लेकिन ग्रामपति सरदार अभी भी साधुओं के साथ-साथ चल रहा था।
महर्षि शाल्विन ने उससे कहा-”एक सवाल पूछूँ ? क्योंकि चातुर्मास में तुम्हारी शर्त के मुताबिक हमने तुम सबसे कुछ भी पूछना उचित न समझा।”
सरदार ने विभोर होकर कहा-”निःसंकोच पूछिए भगवन्। आप जो कुछ पूछेंगे, मैं आपसे कुछ नहीं छुपाऊँगा।”
उससे इस कथन से आश्वस्त होकर महर्षि बोले - “तुम कहते हो कि तुम चोर हो - लुटेरे हो, पर तुम्हारे संस्कार तो तुम्हारे डाकू होने की गवाही नहीं देते। तुम किसी ऊँचे वंश-कुल के मालुम होते हो। तुम्हारे गुण मुझे तुम्हारा परिचय जानने के लिए मजबूर कर रहे हैं।”
महर्षि की सहज अपनत्व से सनी वाणी सुनकर सरदार का हृदय पिघलने लगा। उसे अपने भव्य भूतकाल की धुँधली यादें ताजी होने लगीं। वेदना के आँसू उमड़ने लगे। उसने आँसू पोछते हुए कहा - “प्रभो ! अब उन पुरानी बातें को छेड़कर मेरे घाव को मत कुरेदिए। मैं वर्तमान में कौन हूँ बस यही जानना पर्याप्त होगा।”
महर्षि ने अपनी मानव रत्न परीक्षक बुद्धि से जरा नजदीक आकर वात्सल्य का हाथ फेरते हुए कहा “सरदार ! स्मृति के अंगारों पर विस्मृति की राख अब क्यों ढक रहे हो, वह तुम्हें अन्दर ही अन्दर जलाया करेंगी। उस बाहर लाओ, ज्ञान तथा पश्चाताप के जल से उसे बुझा दो।” महर्षि के स्नेह भरे शब्द सरदार के हृदय में सीधे उतर गए। उसने कहा - “प्रभो मेरी वेदना की भट्टी आपके भाव भरे ज्ञान के छींटों से ठंडी नहीं होगी। फिर भी आपकी जिज्ञासा को देखकर अपनी व्यवस्था कथा आपको सुना देता हूँ।”
मेरा जन्म कौशल के राजा सुयश के यहाँ हुआ था। माता का नाम सौम्यदर्शना था। मेरा नाम अभय था। मेरी एक बहिन थी उमा। बहुत लाड़-प्यार से मेरा पालन-पोषण हो रहा था। यह लाड़-प्यार और माता-पिता का अपरिमित वात्सल्य मुझसे हजम न हुआ। धीरे-धीरे बुरी संगति के कारण मुझमें स्वच्छंदता और उन्मत्तता बढ़ती गयी। मेरे उपद्रव के कारण सभी त्रस्त हो चले थे। माता-पिता के कई बार समझाने को मैंने उनकी निर्बलता समझा दशहरे के दिन तो उसकी हद हो गयी।
थक-हारकर मेरे पिता ने आखिर मुझसे कहा-”जा पापी। चला जा यहाँ से, मेरी गरीब प्रजा त्रस्त हो गयी है, मुझे अपना काला मुँह न दिखाना। इन शब्दों ने मेरे स्वाभिमान को चुनौती दी और में उसी क्षण घर से निकल पड़ा। मेरी छोटी बहिन उमा बहुत कुछ समझाने के बावजूद भी मेरे प्रति अटूट स्नेह के कारण मेरे साथ चल पड़ी। भटकते हुए हम दोनों भाई-बहिन इस जंगल में आ पहुँचे। यहाँ मुझे एक भील मिला, मैंने उसे अपनी व्यथा कह सुनायी। उसने मुझे अपने गाँव में चलने का निमन्त्रण दिया और उसी गाँव में तब से अब तक हम हैं, जिसमें आपने चातुर्मास बिताया। उस बूढ़े भील के मरने के बाद सबने मुझे अपना सरदार मान लिया।
मेरे अधीन अब 700 भील हैं मेरे नाम से बड़े-बड़े काँपते हैं। लेकिन जब कभी अपने वात्सल्यमयी माता-पिता को याद करता हूँ तो हृदय विषाद से भर जाता है। वे बेचारे तो मेरे वियोग में रोक रोकर मर गए मैं अभागा उनके अन्तिम समय में भी न जा सका। भगवन् यही मेरी दुःख भरी कहानी है।
अभय की स्पष्टता और उसकी अन्तर्व्यथा ने महर्षि को द्रवित कर दिया। वे बोले-अभय ! इसी का नाम तो जीवन है। जो जीवन पथ पाप की अंधेरी घाटी में से गुजरता है, वहाँ प्रकाश की भी गुंजाइश है। उस घाटी में भी धर्म नियम की सीढ़ियों के द्वारा मनुष्य आत्मा के आलोक तक पहुँच सकता है। तुम्हें कुछ न कुछ जीवन पाथेय देने का मेरा मन करता है। मैं तुम्हें चातुर्मास की याद में चार नियम देता हूँ, जो कठिन नहीं हैं, लेकिन ये तुम्हारे जीवन विकास में सहायक सिद्ध होंगे। पहला नियम ऐसा करना तुम्हारे लिए सम्भव नहीं। इसलिए यही नियम दिलाता हूँ कि किसी पर वार करने से पहले सात कदम पीछे हटना और सात बार प्रभु का स्मरण करना।
“स्वीकार है भगवन्!” अभय के शब्द थे।
दूसरा नियम यह है - “मैं चाहता हूँ कि तुम सादे और सात्विक भोजन पर रहो, लेकिन अभी तुमसे इतना होना मुश्किल है। इसलिए जिस खाने की चीज की तुम्हें पहचान न हो, या तुम जिसका नाम न जानते हो उसे मत खाना।” अभय ने इस नियम को भी सहर्ष स्वीकार कर लिया। महर्षि ने तीसरा नियम बताते हुए कहा - “मैं चाहता हूँ कि तुम शीलवान बनो, पर शायद इतना करना तुम्हारे लिए कठिन होगा। इसलिए राजा की रानी के प्रति कुदृष्टि देखने और सहवास करने की भावना का त्याग करना, क्योंकि वह प्रजा की माता होती है।” सरदार अभय ने इसे भी श्रद्धापूर्वक स्वीकार कर लिया। अब चौथे नियम की बारी थी। इसे प्रकट करते हुए महर्षि ने कहा-”मैं चाहता हूँ कि तुम माँसाहार न करो, लेकिन अभी तुमसे यह भी संभव न होगा। इसलिए अभी तुम इतना ही करो कि कौए के माँस का त्याग करना। बोलो चारों नियमों का भलीभाँति पालन करोगे न? ध्यान रखना नियम लेना आसान होता है, पर उसे निभाना बड़ा कठिन है।”
सरदार अभय ने चारोँ नियमों के पालन का विश्वास दिलाते हुए महर्षि शाल्विन से कहा- “प्रभु ! मैंने ये नियम एक पूज्य ऋषि के समाने चातुर्मासिक पुण्य स्मृति में किए हैं। अब तो अभय सिंह इन पर पर्वत की तरह अडिग रहेगा, आप तनिक भी चिन्ता न करें।
महर्षि ने विदा लेते हुए कहा- “अभय !ये नियम और संस्कार ही तुम्हारे जीवन में प्रकाश करेंगे, जीवन को उन्नत बनायेंगे।” इतना कहकर ऋषि मण्डली आगे बढ़ गयी। अभय ने भावुक होकर गुरुचरणों की धूलि को माथे पर लगाकर नमन किया।
संतों को विदाकर घर वापस पहुँचने पर रात्रि हो गयी थी। ज्यों ही वह घर में घुसा देखा-आँगन में एक ही पलंग पर उसकी पत्नी के साथ कोई पुरुष लिपटकर सोया हुआ है। देखते ही अभय ने एकदम से आग बबूला होकर तलवार खींची - पापी। परन्तु तलवार मारने के लिए उठायी थी कि महर्षि शाल्विन के द्वारा दिया गया पहला नियम याद आया। वह तुरन्त सात कदम पीछे हटा, भगवान का नाम स्मरण करने लगा। संयोगवश तलवार पीछे की दीवार से जा टकराई।
उसी की आवाज से चौंककर एकदम से उमा की नींद उड़ गयी। पुरुष वेष में ही वह बोली-चिरंजीव हो मेरे भाई ! अभय के आश्चर्य का पार न रहा। उसने अपनी बहिन से पुरुष वेष पहनने का कारण पूछा और कहा - आज तो मुझसे महान अनर्थ हो जाता। मैं अपनी ही बहिन की हत्या कर बैठता। भला हो उन महान संत का जिन्होंने वार करने से पहले सात कदम पीछे हटने व प्रभु-स्मरण करने का नियम दिलाया। उमा ने मर्दाना वेष धारण कर भाभी से मजाक करने के अपने कौतुक के बारे में बताया और अभय की शंका का समाधान किया। इससे उसकी नियम-निष्ठा और भी दृढ़ हुई।
इसके कुछ ही दिनों के बाद अवन्तिका पर चढ़ाई करने की बारी आयी। प्रस्थान के समय कुछ अपशकुन हुए, पर उसने वीरता के दर्प में कतई परवाह न की। अवन्तिका में ज्यों ही लूट मचाने का प्रयत्न किया पहले ही सुसज्जित चौकीदारों और ग्रामीणजनों ने डटकर मुकाबला किया। ये सब भी डटकर लड़ें, इतने में राज्य की सेना भी आ गयी। इतने बड़े समूह से ये कहाँ तक लड़ते। अतः मौका देखकर ये सभी वहाँ से भागे, सैनिक पीछे लगे थे, लेकिन ये उन्हें धोखा देने में सफल हुए और घोर जंगल में पहुँचकर पूर्व निश्चित एक दर्रे में घुस गए। भूखे-प्यासे और थके हुए डकैतों ने सरदार के आदेश से जंगल में खड़े पेड़ों से सुन्दर और सुगन्धित फल तोड़े और अपने सरदार के आगे लाकर ढेर लगा दिया। कुछ लोग पानी लाए।
सरदार अभय ने एक फल उठाया और सूँघते हुए कहा-फल तो बड़े सुन्दर हैं क्या नाम है इनका। एक डकैत ने कहा-नाम का क्या करना है सरदार? भूख मिटानी है, खा लीजिए। परन्तु साथियों के बहुत आग्रह पर भी अभय ने उन अज्ञात फलों को नहीं खाया। भूखा ही रहा। दूसरे सब साथियों ने भरपेट फल खाए। सभी थककर चूर हो गये थे, इसलिए लेटते ही गरी नींद में सो गए, पर अभय को नींद नहीं आयी। उसने सबको जगाकर चलने का विचार किया; परन्तु यह क्या? सब सोये के सोये पड़े रहे। हिलाने और आवाज देने पर भी कोई न उठा। अभय को उनकी मृत्यु का कारण समझते देर न लगी एक ओर उसे अपने साथियों के मर जाने का खेद था तो दूसरी ओर संत के दिए हुए नियम के पालन से जान बच जाने का आनन्द था। नियमों पर श्रद्धा और बढ़ चली थी। वह भारी मन से गाँव पहुँचा।
अब तो उसके मन में महर्षि के वचनों पर अपार श्रद्धा हो आयी थी। उसके मन में आया, एक चोरी और कर लूँ, फिर सदा के लिए चोरी बन्द करके अच्छे आदमी का जीवन जीऊँगा। उसने अवन्तिका राजा की महारानी का नौलखा हार पूर्णिमा की चाँदनी रात को अकेले जाकर चुराने का संकल्प लिया। ठीक पूर्णिमा की रात वह अपने साधनों के सहित राजमहल में पहुँच गया। रानी अट्टालिका में पलंग पर सोयी हुई थी। चाँदनी उसके सुन्दर मुख मण्डल को और अधिक सुन्दर बना रही थी। अभय धीमे कदमों से रानी के पलंग के पास पहुँचा। नौखला हार उसके गले में पड़ा था। कदमों की आहट से रानी एकदम चौंक कर उठी और बोली कौन है तू? चाँदनी में अभय की साँचे में ढली सुगठित बलिष्ठ देह, उभरा हुआ वक्षस्थल एवं सुन्दर रूप को देख रानी चकित ओर मोहित हो गयी। वह पास आकर बोली-मैं जानती हूँ कि तू चोर है; लेकिन आज तो मैं तुझे खुद को चोरी के माल के रूप में सौंपती हूँ। मेरे चित चोर, मैं तो गहनों के साथ देह और दिल भी तुम्हें सौंपने के लिए तैयार हूँ। जरा नजदीक तो आओ। यों कहकर मुस्कराती हुई रानी, ज्यों ही अभय का हाथ पकड़ने के लिए बढ़ी अभय को अपना नियम याद आ गया। कितना कठिन काम था यह? एकान्त स्थान और समय उछलती जवानी और यौवन के मद में मदमाती नारी का आमंत्रण। चाहें शरीर के टुकड़े टुकड़े हो जाएँ मैं नियम को नहीं तोड़ सकता। ऐसा वह मन ही मन सोच रहा था। अभय ने हाथ छुड़ाते हुए कहा-माँ। यह क्या कर रही हो? अपने धर्म को मत भूलो। हम तो तुम्हारे बालक हैं। बालक पर माँ की विकारी दृष्टि कैसे हो सकती है? रानी ने छल,बल भय और प्रलोभन सीज्ञी तरह से उसे अपने काम जाल में फँसाने की कोशिश की, लेकिन अभय चट्टान की तरह अडिग रहा।
परिस्थितियां कभी एक-सी नहीं रहतीं, वे बदलती रहती हैं। आवश्यक नहीं कि वे सदैव अनुकूल ही रहें। विवेकशील वे हैं जो परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेते हैं, अपनी दिशा मोड़ लेते हैं। कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, जो परिस्थितियों से तालमेल नहीं बैठा पाते, प्रतिकूलताएँ कठिनाइयाँ ऐसे ही लोगों को परेशान और हैरान करती हैं। ऐसे ही अधीर और उतावले छोटी-छोटी कठिनाइयों में धैर्य और सन्तुलन गवाँ बैठते हैं, जीवन से हार मान बैठते हैं और जीवन को निरर्थक समझकर हताश, निराश होकर आत्मघात जैसे जघन्य कृत्य पर उतारू हो जाते हैं।
यों संसार भर के लोगों में निराशा, अपना जाल फैलाती और नासमझों, हताशों और कमजोरों को आत्मघात के लिए उकसाती रहती है, किन्तु पूर्व और पश्चिम के देशों में जीवन शैली के अनुरूप कुछ भिन्नता है। इसलिए एक जैसी परिस्थितियों में लोग आत्मघात नहीं करते। भारत में आत्महत्या के प्रमुख कारण पारिवारिक कलह, दांपत्य जीवन में संघर्ष, व्यापार में घाटा, असाध्य रोग, परीक्षा में असफल होना, विपन्नता और अब पिछले दो दशकों से दहेज के कारण अनेक अबलाएँ इस कृत्य पर मजबूर होकर जीवन से हाथ धो बैठती हैं। के0ई0एम0 मेडिकल कालेज बम्बई ने एक हजार घटनाओं का सर्वेक्षण इस सम्बन्ध में कराया और पाया-आत्मघात करने वालों में 47 प्रतिशत पुरुष और 41 प्रतिशत स्त्रियाँ थीं। जिनमें 20 प्रतिशत जीवन से निराशा के कारण, 7 प्रतिशत लोक लज्जा का भय, 11 प्रतिशत मादक द्रव्य सेवन कर आत्मघात कर बैठे।
इसी तरह मनःचिकित्सकों के एक दल ने परीक्षणोंपरांत निष्कर्ष निकाला है कि 90 प्रतिशत आत्महत्याओं में मनःस्थिति का असन्तुलन, 45 प्रतिशत में निषेधात्मक चिन्तन, 17 प्रतिशत में कुकृत्यों का पश्चाताप, 7 प्रतिशत में भ्रान्तियों का योगदान तथा 16 प्रतिशत में असाध्य रोग तथा 7 प्रतिशत मानसिक बीमारियों के कारण आत्मघात के लिए विवश हुए। इन चिकित्सकों का कहना है कि इस प्रवृत्ति को जन्म देने वाले कुछ प्रमुख कारणों में दुर्भावना, तिरस्कार, मनोबल क्षीण होना, सामाजिक एकाकीपन, सहानुभूति का अभाव, भविष्य के प्रति घोर निराशा है। यह सब होता है दुर्बल मनःस्थिति के कारण। आय लोग अशुभ का चिन्तन करते हैं और अशुभ और अन्धकारमय भविष्य की कल्पनाएँ करते रहते हैं। विपत्ति और सफलताओं की आशंकाओं से उनका मन काँपने लगता है और उन्हें ऐसे तर्क सूझते रहते हैं जो पुष्टि कर सकें कि वे जो सोच रहे है वह सही हैं।
मूर्धन्य मनोचिकित्सा विज्ञानी डॉ0 क्लाड हाटन का कहना है कि बीसवीं सदी में जैसे-जैसे भौतिक प्रगति होती जा रही है, लोगों में आत्महनन की प्रवृत्ति अधिक बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार संसार में प्रतिदिन डेढ़ हजार से भी अधिक व्यक्ति आत्महत्याएं कर लेते हैं। बर्लिन आत्महत्या निरोध केन्द्र के अध्यक्ष डॉक्टर कलौजा का कहना है कि सम्पन्न देशों में गरीब देशों की अपेक्षा आत्महनन का औसत अधिक हैं विलासिता उन पर इस हद तक हावी है कि वे स्वल्प - स्ी कष्ट - कठिनाई और अभाव को झेलने में समर्थ नहीं रह गये हैं, जबकि गरीब देशों के लोग जीवन भर अभावों से जूझते हैं, फिर भी जीवन से निराश नहीं है, क्योंकि उनकी सोच उनसे बेहतर हैं।
शास्त्रकारों ने आत्महनन को महापातक ही संज्ञा दी है और हत्या से भी बढ़कर अपराध माना है। इसमें मृत्युपरान्त जिन समस्याओं से उबरने की कल्पना की गई है वह भूल है। इनका कहना है कि ऐसे आत्मघाती की जीवात्मा भूत-प्रेत योनियों में भटकती और विक्षुब्ध और बेचैन बनी रहती है। इसे कार्पण्य दोष माना गया है। मरने वालों की प्रत्यक्ष निन्दा भी की जाती है। क्लीव, कायर और डरपोक कहा जाता है। यह निन्दा मरण से भी बुरी है। आत्मघात समस्या का हल नहीं। समस्याएँ फिर भी ज्यों की त्यों बनी रहती हैं। इसलिए बुद्धिमानों, विवेकशीलों का कथन है कि कठिनाइयों, समस्याओं, परेशानियों, से जूझने से वे हटतीं, दूर होतीं, हल्की होतीं और सुलझती हैं। संसार में ऐसी कोई समस्या नहीं जो मनुष्य द्वारा सुलझाई न जा सके।
मानवी बुद्धि को चुनौती देती ये विलक्षण घटनाएँ विज्ञान की अधुनातन प्रगति और चन्द्रमा तथा मंगल ग्रहों पर विजय जैसे अभियान यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान प्राणी है। परन्तु इसी कारण यह सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता, सामर्थ्य-वान इकाई कहाने का अधिकारी नहीं हो जाता। प्रकृति के थोड़े से रहस्यों का अनावरण कर लेने भर से उस पर दिनोंदिन यह दम्भ छाता जा रहा है कि उसकी बराबरी कोई दूसरा प्राणी तो क्या प्रकृति भी नहीं कर सकती, लेकिन जब प्रकृति उसके समाने ऐसे सवाल कर देती हैं।, जिन्हें वह सुलझा न सके, तब मनुष्य को क्षुद्रता और अल्प सामर्थ्य का आभास होता है।
प्रकृति के कुछ रहस्य तो ऐसे हैं, जिन्हें देखकर बड़े-बड़े मूर्धन्य वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित रह जाते हैं। संसार के विभिन्न भागों में पाई जाने वाली रहस्यात्मक ध्वनियाँ अभी भी मानवी वृद्धि को चुनौती दे रही हैं।
सन् 1961 से हडस्टन लाइब्रेरी में वायलिन का मधुर संगीत सुनाई पड़ता रहता है। वहाँ न तो कोई वाद्य यंत्र है और न की कोई टेपरिकार्डर या ट्राँजिस्टर, जिसे कोई बजाता हो। वायलिन क्यों बजता है? कौन बजाता है? उसका पता लगाने की हर संभव कोशिश की गयी, लेकिन अभी तक कुछ ज्ञात नहीं हो पाया। कुछ लोगों का कहना है कि बहुत पहले वहाँ एक अफसर रहता था, जो घण्टों वायलिन बजाया करता था। वह अब मर चुका है किन्तु संगीत अभी भी सुनाई देता है।
कभी-कभी ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं, जिनका समाधान ढूंढ़ते नहीं मिलता। एक घटना अक्टूबर 1962 की है। नैसाविले, टिनेसी में जान हाकिन्स नामक एक व्यक्ति के मकान में सामने के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। आवाज सुनकर हाकिन्स ने जब दरवाजा खोला तो वहाँ कोई नहीं था। अन्दर से दरवाजा बन्दर करके जैसे ही वह बैठा कि फिर से खट-पट की आवाज आई। इस प्रकार यह आवाज बार-बार आती रही। कुछ दिन बाद वह मकान अन्य दरवाजों और खिड़कियों पर भी सुनाई देने लगी। पुलिस की चौकसी बिठाई गई, वैज्ञानिकों ने भी जाँच-पड़ताल की, परन्तु कोई व्यक्ति नजर नहीं आया जो इस तरह की शरारतपूर्ण हरकतें करता हो। दो माह तक दिन-रात इस तरह की आवाज बराबर आते रहने के पश्चात् स्वयमेव बन्द हो गई। आश्चर्य तो इस बात का है कि बिना किसी की उपस्थिति के भी दस्तक की आवाज लगातार कैसे आती रही ? यह रहस्य अब तक अनसुलझा ही बना हुआ है।
प्रकृति के विभिन्न अंचलों एवं घटकों से निकलने वाली अद्भुत ध्वनियों को लैटिन में ‘ब्रोनटाइड’ कहा जाता है। इस तरह की आवाजों को विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में समय-समय पर वैज्ञानिकों, यात्रियों ने खोजा भी है। गाने वाली बालू संसार के विभिन्न रेगिस्तानों में पाई जाती है। होनोलूलू के निर्जन हवाई टापू से रोते हुए कुत्तों की आवाज आती है। रात्रि के अंधेरे में यह आवाज और अधिक तीव्र हो उठती है। गोवी मरुस्थल के ‘टकला माकान’ क्षेत्र में फैल रेत से एवं सहारा रेगिस्तान के टीलों से संगीतमय ध्वनि प्रवाह निकलता रहता है। जैसलमेर में बालू के कुछ टीलों से कराहने की आवाज आती है। ऐसे अनेकानेक प्राकृतिक रेडियो स्टेशन हैं जो चित्र-विचित्र स्तर की ध्वनियाँ प्रसारित करते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इन रहस्यों का पता लगाने के प्रयास, प्रयत्न भी किये हैं, पर अभी तक वे इतना ही ज्ञात कर पाये कि प्रकृति में बालू की तरह के कुछ ऐसे कण हैं जो परस्पर संघात से प्राकृतिक ध्वनियों का सृजन करते हैं।
चैकोस्लोवाकिया की एक नदी के समीप कुछ लोग पर्यटन कर रहे थे, तभी समाने से कुछ मधुर संगीत सुनाई देना लगा। लोगों ने दान मारा पर पता न चला कि कौन और कहाँ से गा रहा है, जबकि आवाज उनके पास ही हो रही थीं उस स्थान पर कुछ समय पूर्व कुछ सिपाही मारे गये थे, इसलिए यह मानकर उस बात को टाल दिया गया कि उन सिपाहियों की मृतात्माएँ गा रही होंगी।
एक बार कैलीफोर्निया की एक स्त्री भोजन पकाने जा रही थी, अभी वह उसकी तैयारी कर रही थी, चूल्हें से विचित्र प्रकार के गाने की ध्वनि निकलने लगी। गाना पूरा हो गया, उसके साथ ही ध्वनि आनी भी बन्द हो गयी। न्यूयार्क में एक बार बहुत से लोग रेडियो प्रोग्राम सुन रहे थे, एकाएक संगीत ध्वनि तो बन्द हो गयी और दो महिलाओं की ऊँची-ऊँची आवाजों में बातें आने लगीं। रेडियो स्टेशन से पूछा गया तो पता चला कि वहाँ से केवल नियमबद्ध संगीत ही प्रसारित हुआ है। बीच की आवाज कहाँ से आई? यह किसी को पता नहीं।
सेण्ट लुईस में एक बार रात्रि - भोज का आयोजन किया गया। जैसे ही संगीतकारों ने वाद्य-यन्त्र उठाये कि उनसे ताजा खबरें प्रसारित होने लगीं। इससे आयोजन के सारे कार्यक्रम ही फेल हो गये। नाहरियाल की एक स्त्री ने बताया कि उसके स्नान करने के टब से गाने की ध्वनियाँ आती हैं। एलवर्टा के एक किसान का कहना है कि जब वह अपने कुएँ के ऊपर पड़ी हुई लोहे की चादर को हटाता है, तो कुएँ के तल से संगीत सुनाई देने लगता है। पुलिस को सन्देह हुआ कि किसान ने कहीं रेडियो छुपाया होगा। इसलिए इंच-इंच जमीन की जांचकर ली। पड़ोसियों के रेडियो भी बरामद कर लिए, परन्तु जैसे ही उस लोहे की चादर को हटाया गया, आवाज बार-बार सुनाई दी और अन्ततः उस समस्या का कोई हल निकाला नहीं जा सका।
‘वण्डर बुक ऑफ दी स्ट्रेंज फैक्टस’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक ने नील नदी के किनारे स्थित कारनक के खण्डहरोँ में दो घूरती हुयी प्रतिमाओं का उल्लेख किया है। ये दोनों प्रतिमायें डेढ़ कि0 मी0 के फासले पर जमी हुई हैं तथा उनके पास जाने पर ऐसा लगता है जैसे कोई विशालकाय दैत्य घूर रहा हो। इनमें एक प्रतिमा पत्थर की सामान्य मूर्तियों की तरह चुप खड़ी रहती है, पर दूसरी से अक्सर कुछ बोलने की आवाज आती रहती है। पत्थर की मूर्ति क्यों और कैसे बोलती है ? इसका पता लगाने की हर सम्भव कोशिश की गयी, किन्तु अभी तक कुछ कारण खोजा नहीं जा सका। मूर्ति के कोई रेडियो भी नहीं जिससे यह अन्दाज लगाया जा सके कि वह अदृश्य शब्द प्रवाहों को पकड़कर ध्वनि में रूपांतरित कर देते हैं।
ब्रिटेन के नार्थ वेल्स प्रदेश के तट पर चलने से उसमें रेतीय सुमधुर संगीत ध्वनि सुनाई पड़ती है। जिससे वह लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनता चला गया। लन्दन विश्व-विद्यालय के सुप्रसिद्ध रसायन - शास्त्री डॉ0 केमेथ रिजवे तथ्य की पुष्टि के लिए इस संगीतमय रेत को बोरियों में भरवाकर अपनी प्रयोगशाला में ले गये। प्रयोगों के उपरान्त उन्होंने बताया कि पैर के दबाव के कारण बालू के कण आगे-पीछे सरकते हैं ये कण अधिकाँशतः समान आकार के होते हैं इसलिए उनमें से संगीतमय ध्वनि निकलती है। लेकिन हुआ यह कि रेत ने प्रयोगशाला में संगीत नहीं गाया।
अफगानिस्तान में काबुल के पास एक रेतीले मैदान में घोड़ों के दौड़ने और नगाड़ों के पीटने की आवाज आती है। जैसे कहीं से घुड़सवार अपने घोड़े दौड़ते हुये एक नगाड़े को पीटते आ रहे हों।
इज़राइल के सिनाई अंचल की तलहटी में स्थिति एक पर्वत से घण्टियाँ बजने की आवाज आती है। इसी कारण वह ‘बैल माउण्टेन’ कहकर भी पुकारा जाने लगा है। ईरान के मरुस्थल में कई स्थानों से ऐसा स्पष्ट संगीत सुनाई देता है जैसे वहाँ कोई बीन बजा रहा है।
प्रकृति के अद्भुत रहस्यों का पता लगाने में अपने जीवन का अधिकाँश भाग खर्च करने वाले अन्वेषी विलियम आर॰ कार्लिस ने सौ वर्षों से अधिक समय से प्रकाशित विशिष्ट पत्र - पत्रिकाओं जैसे-’साइकोलॉजिकल बुलेटिन” ‘लैक्सेट’ ‘अमेरिकन जर्नल आफ साइकिएट्री’ आदि के माध्यम से प्राकृतिक आश्चर्यों को एकत्र किया है। उन्होंने इन रहस्यमयी घटनाओं से सम्बन्धित 25 हजार से अधिक लेख लिखे हैं।
साथ ही ‘सोर्स बुक प्रोजेक्ट’ ‘इनक्रेडिबल लाइफ’ ‘द अनफैदम्ड माइन्ड’ तथा ‘इनसियन्ट मैन’ जैसी अपनी प्रसिद्ध कृतियों में लगभग दो हजार घटनाओं का वर्णन किया है। उनका कथन है कि अभी तक प्राकृतिक रहस्यों के मात्र कुछ ही अंशों को उद्घाटित करने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। उसका पच्चीस प्रतिशत भाग अभी भी अविज्ञात है। विश्व में जितनी भी जानकारी प्राप्त कर ली गई है, विभिन्न विषयों के एनसाइक्लोपीडिया में जितना ज्ञान संग्रह कर लिया गया है, उसकी तुलना में विपुल अज्ञात बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। उसे जान लेन पर ज्ञान विज्ञानों का भण्डार मनुष्य के हाथ लग सकता है।
विकासवाद के सिद्धान्त के प्रणेता प्रख्यात वैज्ञानिक डार्विन के पुत्र चार्ल्स फील्ड ने 1975 की ‘नेचर’ पत्रिका में रहस्यमय ध्वनियोँ का प्रकाशन कराया था। उनके अनुसार गंगा के डेल्टा स्थित वेरीसाल परगने से तोप दागने जैसी धाँय-धाँय की आवाज आती थी। कार्लिस ने इस लेख को पढ़ने के बाद अपनी खोज में पाया कि ऐसी रहस्यात्मक ध्वनियाँ अनेक स्थान पर भिन्न-भिन्न नामों से सुनी जाती है। उदाहरण के लिए, बेल्जियम में मिस्टोफर की, स्काटलैण्ड में मूडस की, प्रशान्त महासागर के हैटी द्वीप समूह में गोफरी ध्वनियाँ सुनी जाती है। इनकी पुष्टि समय-समय ऊपर अन्यान्य मूर्धन्य वैज्ञानिकों द्वारा की गई है। रेडियो फिजिक्स तथा अनुसंधान केन्द्र कार्नेल विश्वविद्यालय के निदेशक रामस गोल्ड ने कार्लिस के कार्यों को न केवल स्वीकृति प्रदान की वरन् ब्रोनटाइड को भी स्वीकारा है। अमेरिका के अत्यन्त धनी-मानी मूर्धन्य पत्रकार चार्ल्स फोर्ट ने भी अपना सारा जीवन प्राकृतिक आश्चर्यों को संग्रहित करने में ही व्यतीत कर दिया और अजूबों से भरी एक एनसाइक्लोपीडिया का निर्माण किया। कार्लिस ने लगभग चौबीस फील्ड गाइड’ द्वारा इन अज्ञात रहस्यों को समझने, समझाने को प्रयास किया है।
सुमात्रा-इण्डोनेशिया में एक ऐसा कुआँ है, जिसके अन्दर झाँकने से दर्श को एक के स्थान पर दो प्रतिबिम्ब दिखाई देते हैं। प्रकाश किरणों में ऐसी अद्भुत क्षमताएँ तो हैं कि वे किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब कहीं भी, कैसा भी उल्टा-सीधा, चित्र-विचित्र बना दें। किन्तु उसके लिये तरह-तरह के प्रिज़्म एवं लेन्सों का उपयोग आवश्यक होता है। इस कुएँ में कही कोई शीशा भी नहीं जड़ा है। आश्चर्य तो यह है कि जो दो प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ते हैं उनमें से एक तो स्वयं दर्शक का ही होता है पर दूसरा किसी अपरिचित का वैज्ञानिकों के पास इसका कोई उत्तर नहीं है कि ‘ऑप्टिक्स’ के सौर सिद्धान्तों से परे ऐसा क्यों कर होता है ?
जाने वह कौन-सी अभिशप्त घड़ी थी जब लैटले-फ्रांस में एक बार भयंकर तूफान आया, तेज बिजली कड़की और एक किसान के फार्म पर टूट पड़ी। इसमें हजारों की संख्या में काली और सफेद रंग की भेड़ें थीं। बिजली से केवल निर्जीव वस्तुएँ बच सकती हैं। पर गोरे-काले के भेदभाव से उसे क्या लेना देना किन्तु यहाँ उसने भेदभाव का बर्ताव किया। फार्म में जितनी काली भेड़ें थी। बिजली गिरने से सब की सब मारी गईं, पर सफेद भेड़ों में से एक का भी बाल-बाँका न हुआ। प्रकृति के भेद-भाव युक्त इस व्यवहार को आज तक कोई भी वैज्ञानिक या बुद्धिजीवी मेधावी हल नहीं कर सका।
अद्भुत स्रष्टा के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। इसका परिचय कभी-कभी इस प्रकार मिलता है। फ्राँस के मोमिन्स नगर में एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया, जिसने आनुवांशिकी के समस्त वैज्ञानिक नियमों को उठाकर एक ओर फेंक दिया। व्रासर्ड नामक यह बालक वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य एवं अनुसंधान का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। उसकी एक आँख भूरी तथा एक आँख नीली है। जीवविज्ञानी इस विचित्रता का कोई कारण नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं।
इसी तरह 1921 में लन्दन में चार्ल्सवर्थ नामक एक बच्चे ने जन्म लिया था और आनुवांशिकी के नियमों को चुनौती दी थी। चार वर्ष की आयु प्रायः ऐसी होती है जब बालक अच्छी तरह बोल भी नहीं पाता, किन्तु चार्ल्सवर्थ चार वर्ष में ही पूर्ण वयस्क हो गया। उसके मूँछ-दाढ़ी भी निकल आई उसके व्यवहार बात-चीत में भी पूरी तरह बुजुर्गपन टपकने लगा। सात वर्ष की आयु में उसके संपूर्ण बाल सफेद हो गये और इसी वर्ष उसकी मृत्यु हो गई। ऐसे मामले अब ‘प्रोजेरिया’-व्याधि समूह के अंतर्गत माने जाने लगे हैं। इसी प्रकार इटली में एक ऐसा व्यक्ति हुआ है। जिसका शरीर तो सामान्य था पर आँखें उल्लू जैसी थीं । वह दिन में नहीं देख पाता था, किन्तु रात्रि में घोर अँधेरे में भी किसी वस्तु को स्पष्ट रूप से देख सकता था। 41 वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई और वह रहस्य अब तक अनसुलझा ही बना रहा।
लन्दन में ‘एडवर्ड मार्डा’ नामक एक अंग्रेज अपनी शारीरिक विशेषताओं के कारण लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। उसके दो चेहरे अन्य व्यक्तियों से अलग सहज की उसका परिचय दे देते थे। सिर तो एक ही था, पर मुँह, आँख, नाक दोनों ओर थे। पीछे स्थित आँख से भी वह अच्छी तरह देख सकता था। पिछले मुँह से अस्पष्ट भाषा में बोलता था, जबकि सामने का सुख सामान्य था।
इसी तरह शरीर विज्ञान के नियमों का उल्लंघन करने वाली फ्राँस के टुरकुइंग नगर में एक बच्ची ने जन्म लिया। उसके अन्य अंग- अवयव तो सामान्य थे, किन्तु आँख एक ही थी और वह भी दोनों भौहों के मध्य, जहाँ आज्ञाचक्र की उपस्थित बतायी जाती है।
मनुष्य अपनी संकल्पशक्ति को जुटाकर अतिमानव बन सकता है, इसमें सन्देह नहीं। इतना होने पर भी उसे सर्वशक्तिमान नहीं कह सकते इसलिए कि उसकी इच्छा और माँग के विरुद्ध भौतिकी और पराभौतिकी क्षेत्र में ऐसी सैकड़ों घटनाएँ घटती रहती हैं, जिनका नियन्त्रण तो दूर वह उस रहस्य तक को नहीं जान पाता कि उनका कारण क्या है ? जबकि निसर्ग में उस तरह का स्वयं कोई सुनिश्चित सिद्धान्त नहीं होता, उदाहरण के लिए, पेरिस के एक प्रख्यात वकील जैकिव्सल हरवेट 4 वर्ष की आय के बाद से ही 72 वर्ष की उम्र तक एक क्षण भी नहीं सोये। इससे न तो उनके स्वास्थ्य पर कुछ बुरा प्रभाव पड़ा और न काम-काज पर ही मृत्युपर्यन्त वे पूर्णतः स्वस्थ रहें।
1947 में केन्टुकी बालगृह लिंडन ने एक ऐसी घटना प्रकाश में आई, जिसे देख सुनकर मूर्धन्य चिकित्साशास्त्री आश्चर्यचकित रह गये। इस बालगृह में एक छह वर्षीय बाकी नामक निर्धन बालक को भर्ती कराया गया। वह कुपोषणजन्य बीमारियों का शिकार था। उसकी चिकित्सा कर रहे डाक्टरों को यह देखकर बहुत अचम्भा हुआ कि अविकसित और अशिक्षित बाबी लैटिन, स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन, टर्किश भाषा सहित पाँच कठिन भाषाओं का पूर्ण ज्ञाता है। 12 वर्ष की आयु तक वह बीस भाषाएँ पढ़ने की क्षमता रखता था।
पिछले दिनों महाराष्ट्र से एक ऐसा मामला प्रकाश में आया है, जिसका रहस्य वैज्ञानिक जेनेटिक्स से लेकर आधुनिकतम चिकित्सा विज्ञान की किसी विधा में न पा सके। एक ट्रक ड्राइवर ने नासिक के समीप सड़क पर पड़ें अजगर के ऊपर से अपना ट्रक चढ़ाकर यात्रा तो पूरी कर ली, पर खौफ उसके मन में छाया रहा। कुछ ही दिन बाद उसकी पत्नी ने डेढ़ वर्ष के अन्तराल में दो बच्चों को जन्म दिये, जिनकी सारी त्वचा अजगर की तरह थी। सारे उपचार निरर्थक सिद्ध हुए। न इसे भय की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है, न ही सहजयोग, क्योंकि उसकी पत्नी पहले से ही गर्भवती थी। कोई इसे अभिशाप भी कह सकता है, पर आज के विज्ञान प्रधान युग में कोई तर्क-सम्मत जवाब किसी के पास नहीं है।
माउल्टिंग-केंचुल छोड़ने अर्थात् त्वक्मोचन के लिए साँप प्रसिद्ध है, किन्तु यदि यही प्रक्रिया मनुष्य की त्वचा के साथ घटित होने लगे तो उसे असामान्य की कहा जायगा। 1971 में शिकागो मेडिकल सोसाइटी ने एक ऐसे व्यक्ति का उपचार किया, जिसे 12 घण्टे के लिए तीव्र बुखार आता था। देह की सारी त्वचा लाल सुर्ख पड़ जाती है और इसके बाद बड़े-बड़े टुकड़ों में केंचुल की तरह छूटती जाती। जिस भाँति दस्ताने या मोजे उतारे जाते हैं उसी तरह चमड़ी की परतें उतरने लगती। तब तक इसका स्थान नई त्वचा ले चुकी होती।
प्रकृति के रहस्य अगम हैं और उससे भी रहस्यपूर्ण और विचित्र है-सूक्ष्म चेतन संसार। प्रकृति जब-तब मनुष्य के सामने इस प्रकार के चुनौती भरे प्रश्न खड़े करती रहती है, जिन्हें लाख प्रयत्न करने पर भी सुलझाया नहीं जा सकता। अभी तक तो यही ठीक से जान पाना सम्भव नहीं हुआ कि प्रकृति में क्या-क्या हैं? उसके सम्पूर्ण रहस्यों को समझ पाना तो दूर की बात रही। फिर चेतन तत्व कितना गूढ़ होगा? क्या उसके रहस्यों का अनुमान लगाया जा सकता है ?
टिकठी में जकड़े होने पर भी उसकी आँखों में वीरता की चमक थी, चेहरा आत्मबलिदान की आभा से प्रकाशित था। कोलोसियम के पैंतालीस हजार दर्शक उसे घेरे खड़े थे। सभी को मालुम था कि आज उसे मार दिया जायेगा। शायद इसी कारण चारों ओर मौत का सन्नाटा छाया हुआ था। दर्शकों के चेहरों पर भय और सहानुभूति के मिल-जुले भाव तैर रहे थे। तभी वातावरण के सन्नाटे की चीरती हुई सम्राट जेमलियोस की आवाज उभरी-”स्पार्टाकस अगर तुम हमसे माफी माँग लो, तो हम तुम्हें माफ कर देंगे। तुम्हें ऊँचा दर्जा दिया जायेगा।”
उसके चेहरे पर व्यंग्य भरी मुसकान उभरी और सम्राट की ओर देखते हुए कहने लगा -”मुझे अगर उच्च दज् कही लालसा होती तो में ये कदम कदापि नहीं उठाता। जेमलियासे ! मैंने कोई गलती नहीं की जो, माफी माँगू। हम लोगों को छोटे से अपराध के लिए भी अमानवीय दण्ड दिए जाते हैं। हम रात-दिन कठिन परिश्रम करते रहते हैं, फिर भी हमारा बहिष्कार !” लम्बी साँस भरकर तीखी आवाज में वह बोला-’मुझे अपने वतन के लोगों के साथ जीना पसन्द है। रोम ने हमारे वतन पर कब्जा कर लिया तो क्या हुआ, हम अपने वतन के लिए हैं। मैं और तू तो एक ही देश के ही है रे! तूने तो अपने वतन के लोगों को ही मरवा डाला। उन्हीं को अभी तक दास बनाए हुई। शर्म आती है मुझे कि तू मेरे ही देश का शासक है।
स्पार्टाकस के शब्दों ने जैसे आगे में घी का काम किया। सम्राट जेमिलियोस गुस्से में अपना चिनला होठ काटते हुए बोला-”कोलोसियम खेल की तैयारी की जाए।” कोलोसियम रंगशा ईशा की प्रथम शताब्दी में बनवायी गयी थी। यहाँ जंगली जानवरों की खूनी लड़ाइयाँ लड़ी जाती थी। जो अपनी बर्बरता और लोमहर्षक एवं रोमाँचकता के कारण विश्वभर में ख्याति प्राप्त हो चुकी थीं।
स्पार्टाकस को जैसे जेमिलियोस के आदेश की कोई परवाह नहीं थी। उसने मौत की परवाह किए बिना आस-पास घेरे खड़े दर्शकों से कहना शुरू किया-”हे मेरे देशवासियों ! मैंने जब दासों के दुख-दर्द को जाना और जब मैंने जेमिलियोस को ऐसा करने से मना किया तो उसने मुझे भी दासों के बीच टिकठी में जकड़ दिया। मगर मैंने अपने देशवासियों को स्वतन्त्र कराने के लिए बराबर लड़ाई जारी रखी। अरे मेरे देश के रहने वालों। क्या तुम्हारे अन्दर बैठा इंसान नहीं जागा? देश विपन्नता में है और तुम सब कोलोसियम में मनोरंजन कर रहे हो। मैं तो कुछ ही पलों का मेहमान हूँ। मगर तुमको कह जाता हूँ कि कभी भी किसी के साथ अमानवीय व्यवहार न करना और न ही सहना।
स्पार्टाकस के सम्बोधन को सुन-कर जेमिलियोस बिफर पड़ा-”सिपाहियों ! बहुत चिल्ला लिया ये! कोलोसियम में जंगली भैंसा छोड़ दो।
स्पार्टाकस यद्यपि टिकठी से जकड़ा था, तो भी जंगली भैंसे लड़ने के लिए तैयार हो गया। भैंसे ने अंदर आते ही जोर से फुँकारते हुए स्पार्टाकस को भयंकर टक्कर मारी। वह लड़खड़ा कर एक ओर गिर पड़ा। दूसरी बार भैंसा जैसे ही उसकी ओर झपटा तो उसने स्वयं को बचाते हुए टिकठी भैंसे के सींग में फँसा दी। कुछ दूर तो वह टिकठी के कारण भैंसे के पीछे लटकता चला गया। इस क्रम में उसका दम घुटने लगा। तभी हाथों के आगे-पीछे होने से टिकठी चरमराकर टूट गयी। अब वह स्वतन्त्र था उसने अपने मजबूत हाथों से भैंसे के दोनोँ सींग पकड़ लिए। काफी देर तक तो भैंसा और वह दोनों आगे पीछे होते रहे। अन्त में, उसने टिकठी की नुकीली लड़की उठाकर भैंसे के गर्दन के आर-पार कर दी। भैंसा छटपटा कर मर गया।
इस घटना को देखकर एक बार तो जेमिलियोस सहम गया। लेकिन दूसरे ही क्षण उसने सैनिकों को ललकारा-पकड़ा लो स्पार्टाकस को । आदेश से बंधे सिपाही, उसे पकड़ने के लिए बढ़ें। यद्यपि उसे पकड़ना इतना आसान न था, तो भी सिपाहियों के नुकीले भालोँ ने उसे विवश कर दिया। फिर से जेमिलियोस ने एकबार पुनः युद्ध प्रारम्भ करने का हुक्म जारी किया। अबकी बार मैदान में दो सिंहों को छोड़ दिया गया था।
अब वह दोनोँ सिंहों के बीच था। दोनों ने एक साथ उस पर आक्रमण किया। बड़ी फुर्ती से वह बीच में से हट गया। दोनों शेर एक-दूसरे से बुरी तरह टकरा गए। इतने में छलाँग लगाकर उसने एक शेर को धर दबोचा, फिर उसका जबड़ा चीरने लगा। पीछे से दूसरा शेर उसका कन्धा खा रहा था। मगर उसने पहले शेर का जबड़ा, चीर ही डाला।
लेकिन इस बीच उसका कन्धा बुरी तरह जख्मी हो चुका था। उसने दूसरे शेर को एक झटके में दूर फेंक दिया। मगर अब वह खड़ा रहने की स्थित में नहीं था, वह बहुत घायल हो चुका था। लेकिन जब दूसरा शेर उसकी छाती पर चढ़कर उसे खाने लगा, तो न जाने कहाँ से उसमें अद्वितीय शक्ति का संचार हुआ और उसने अद्भुत शक्ति से जो अभी तक जख्मी होने से बचा था, इतने जोर में मारा कि शेर का पेट फाड़ गया और वहीं ढेर हो गया।
स्पार्टाकस ने घुटनों के बल बैठकर दर्शकों से एकबार फिर लड़खड़ाती आवाज में कहना शुरू किया। क्यों करते हो यह बर्बरता अमानुषिकता ? क्यों सहते हो गुलामी। इंसान हो अपने पिता परमेश्वर से अपने रिश्ते को अनुभव करो। तोड़ फेंको गुलामी, उखाड़ फेंको जड़ से इन अमानुषिक परम्पराओं को .....। कहते-कहते उसकी आवाज काँपने लगी। उसने अपने दोनों हाथ सूर्य भगवान को नमन करने के लिए उठाए और फिर वहीं शहीद हो गया।
स्पार्टाकस की शहादत ने दर्शकों की सोयी मानवता को बुरी तरह झकझोर डाला। स्पार्टाकस की भावनाओं की चिनगारी दावानल बनकर भड़क उठी। जिसमें कोलो-सियम में होने वाली खूनी लड़ाइयों की परम्पराएँ और दासों पर होने वाले अमानुषिक अत्याचारों के रिवाज दोनों ही भस्म हो गए।
वन प्रदेश में भयंकर आँधी आने, पर वे वृक्ष उखड़ जाते हैं, जो एकाकी खड़े होते हैं। भले ही वे कितने ही विशाल क्यों न हों? इसके विपरीत घने लगे हुए पेड़ एक दूसरे के साथ सटकर रहने के कारण उस दबाव को सहज की सहन कर लेते हैं। अंधड़ उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाते।
यह उदाहरण देते हुए भगवान् बुद्ध ने अपने प्रवचन में कहा-”परस्पर स्नेह की सघनता मनुष्यों को इसी तरह नष्ट होने से बचाती और विकास का अवसर प्रदान करती हैं। संघारामों में सघन पारिवारिक स्नेह का अभ्यास इसीलिए कराया जाता है।”
बीज में वृक्ष बनने की पूरी-पूरी सम्भावना विद्यमान रहती है, पर कुशल माली अथवा किसान का सहयोग न मिले तो उसके अंकुरित होने तथा विकसित होकर फल-फूल देने योग्य बन चलने का सुअवसर नहीं मिल पाता। किसी प्रकार अपने पुरुषार्थ से, हवा आदि के झोंके के सहारे वह कहीं भूमि में पड़ भी जाय तो भी उसका वह समग्र विकास नहीं हो पाता, जो माली के सहयोग से हो सकता था। जो गरिमा, उपयोगिता एवं उपादेयता सजे-सँवरे उद्यान में विकसित हुए पौधों एवं खेतों में लहलहाते पौधों की होती है, वह झाड़-झंखाड़ों में किसी तरह प्रकृति के सहयोग से उग आये पुष्य एवं खाद्यान्न उत्पादन करने वाले पौधों की नहीं होती। विकसित होने की सभी विशेषताएँ अपने भीतर सन्निहित किये होने के बावजूद भी बीज को अभीष्ट सहयोग अपेक्षित होता है। वह मिलते ही बीज की तभी सम्भावनाएँ साकार होने लगती और पौधे के रूप में बदलते देरी नहीं लगती।
मनुष्य कितना भी समर्थ क्यों न हो, वह एकाकी कुछ भी नहीं कर सकता। जन्मने से लेकर मरने तक उसे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सहयोग किसी न किसी रूप में मिलता रहता है। जन्म के समय शरीर की सुरक्षा पोषण एवं विकास की जिम्मेदारी माता-पिता न सँभालें तो उसे अपना अस्तित्व बनाये रखना भी कठिन होगा। हजारोँ वर्षों का संचित ज्ञान, विज्ञान एवं अनुभव उसे कुछ की समय में मुफ्त में ही प्राप्त हो जाता है। लिपि बनाने, भाषा गढ़ने, विज्ञान का आविष्कार करने, अनेकानेक साधनों का निर्माण करने, साहित्य, कला इतिहास, भूगोल, कृषि जैसी अनेकानेक ज्ञान की विधाओं का नये सिरे से मनुष्य को अकेले अनुसंधान करना पड़े तो उसे एक जीवन तो क्या हजारों जीवन समूची उपलब्धियों को करतलगत करने के लिए खपाने होंगे। पर यह सौभाग्य ही कहना चाहिए कि पूर्वजों का संचित ज्ञान और उन ज्ञान की धाराओं की व्याख्या - विवेचना करने वाले मनीषियों का सहयोग उसे अनायास ही प्राप्त है। इस सहयोग को पाकर कितने ही व्यक्ति भौतिक क्षेत्र में योग्य, प्रतिभाशाली, विद्वान बनते देखे जाते हैं।
कहा तो जाता है कि मनुष्य सर्वसमर्थ है तथा अपने प्रचण्ड पुरुषार्थ के सहारे बहुत कुछ कर सकता है पर कब? जबकि उसे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सामाजिक सहकार मिलता रहे। मौलिक क्षमता, प्रतिभा का अपना महत्व तो है, पर वे उपयुक्त परिस्थितियां पाकर ही उभरती है।
एकाकी पुस्तकीय ज्ञान भी पर्याप्त नहीं होता, न ही वह मनुष्य के व्यावहारिक जीवन का मार्गदर्शन करने में समक्ष है। मात्र पुस्तकों के अध्ययन से कोई डॉक्टर, इंजीनियर वैज्ञानिक नहीं बन सकता । ऐसा सम्भव रहा होता तो हर व्यक्ति बाजार में उपलब्ध सम्बद्ध विषयों की पुस्तकों को खरीदकर, उनके अध्ययन द्वारा अभीष्ट विषय में दक्षता और प्रवीणता प्राप्त कर लेता। पुस्तकें सर्वसुलभ होते हुए मात्र उनके अध्ययन के बलबूते कोई विशेषज्ञ कहाँ बन पाता है ? आशय यह है कि पुस्तकों के साथ-साथ अध्यापक का मार्गदर्शन, शिक्षण आवश्यक ही नहीं अनिवार्य होता है। विशेष प्रकार का तकनीकी ज्ञान प्राप्त करने-कला, साहित्य, विज्ञान आदि क्षेत्रों में विशेषता हासिल करने के लिए अपने-अपने ढंग का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन अपेक्षित होता है।
साधना क्षेत्र में भी यहीं सिद्धान्त लागू होता है। भौतिक क्षेत्र की तुलना में आध्यात्मिक क्षेत्र कहीं अधिक अविज्ञात है और उतना ही रहस्यमय भी। भौतिक जगत एवं सम्बन्धित वस्तुएँ तो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती हैं, पर अध्यात्म का क्षेत्र तो पूर्णतया परोक्ष है। प्रत्यक्ष की तुलना परोक्ष में भटकाव की अधिक गुंजाइश रहती है। इस भटकाव की सम्भावना इसलिए भी अधिक रहती है कि साधना में आन्तरिक पुरुषार्थ करना पड़ता है। सर्वप्रथम स्वयं पर विजय प्राप्त करनी पड़ती है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का विश्लेषण कर लेना सबसे अधिक कठिन कार्य है। उनके परिमार्जन एवं विकास के लिए साधन-उपचार ढूँढ़ लेना तो और भी कठिन पड़ता है। उंगली पर गिने जाने वाले विरले ही होते हैं, जो एकाकी अपने बलबूते स्वयं का निरीक्षण, परीक्षण कर लेने एवं आवश्यक सुधार आदि के उपक्रम में सफल हो जाते हैं। वे अपवाद हैं जो साधना क्षेत्र में अपने एकाकी पुरुषार्थ के सहारे बढ़ चलने और मंजिल तक पहुँच जाने में सफल होते हैं। उनकी सफलताओं में भी जन्म-जन्मान्तरों की साधना के संचित संस्कार एवं अनुभव ही सूक्ष्म रूप से प्रेरणा देते एवं मार्गदर्शन की भूमिका निभाते हैं, पर अपवाद तो अपवाद ही हैं, वे जनसामान्य के अनुकरण के विषय नहीं हो सकते। इन अपवादों का अन्धानुकरण करने से तो असफलता ही हाथ लगती और साधना क्षेत्र में भटकाव ही पल्ले पड़ता है।
साधना क्षेत्र में प्रचण्ड पुरुषार्थी बुद्ध कभी-कभी प्रकट होते हैं, जो बिना किसी की सहायता के ही आत्मज्योति को जला लेने में सफल हो जाते हैं। लगन एवं भक्ति भावना के धनी रामकृष्ण परमहंस जैसे साधक का अवतरण कभी-कभी होता है, जिनका अन्तःप्रकाश स्वतः उनकी साधना का मार्गदर्शन करता है। आत्म-तत्व का, अपने एकाकी पुरुषार्थ द्वारा साक्षात्कार कर लेने वाले संकल्प के धनी रामतीर्थ, रामदास तो कभी-कभी ही प्रकट होते हैं, अन्यथा साधना के रहस्यमय एवं अविज्ञात क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले अधिकाँश साधकों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं संरक्षण अभीष्ट होता है।
यों तो साधना के विधि-विधानों, क्रियाओं एवं उनकी परिणतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन धर्मग्रन्थों, योग-शास्त्रों में मिलता है पर मात्र उन्हें पढ़कर साधना आरम्भ कर देना संकट से खाली नहीं है। शास्त्रों धर्मग्रन्थों की उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र को सम्बन्धित विषयों की पुस्तकों की पड़ती है। सर्वविदित है कि एकाकी पुस्तकें किसी भी क्षेत्र का मार्गदर्शन करने में सक्षम नहीं हो सकतीं, तो फिर साधना जैसे अवात क्षेत्र का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते हैं ? कहना न होगा मार्ग-दर्शन का गुरुवर दायित्व समर्थगुरु ही सँभाल सकता है।
गुरु की महिमा का गुणगान शास्त्रकारों, मनीषियों, धर्मग्रंथों सभी ने एक स्वर में किया है । गुरु की महत का प्रतिपादन करने वाले ऋषियों ने उसे बहता, विष्णु और महेश जैसे मूर्धन्य देवताओं से भी बढ़कर परब्रह्म के रूप में अभिनन्दित किया है। सद्गुरु की प्राप्ति के संदर्भ में एक सन्त का कहना है कि -
सह तनु विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। सीस दिखे जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
कबीरदास जो कहते हैं,
गुरु गोविन्द दोऊ खड़ें, काके लागूँ पायँ। खलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियों बताय।
सद्गुरु की महिमा गाते-गाते शास्त्रकार थकते नहीं। मनीषियोँ ने निरन्तर यही कहा है कि आत्मिक प्रगति के लिए गुरु की सहायता आवश्यक है। इसके बिना आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। जिस गुरु तत्व की वन्दना-अभ्यर्थना शास्त्रकारोँ ने की है वह गुरु वस्तुतः मानवी अन्तःकरण है। निरन्तर सद् शिक्षण और उर्ध्वगमन का प्रकाश दे सकना इसी केन्द्र के लिए सम्भव हैं। अपने अंतःकरण को निरन्तर कुचलते रहने, उसकी पुकार को अनसुनी करते रहने से आत्मा की आवाज मन्द पड़ जाती है। आत्मा का अवज्ञा करते रहने वालों को ही दुर्बुद्धिग्रस्त और दुष्कर्म लिप्त पाया जाता है, अन्यथा संजीव आत्मा की प्रेरणा सामान्य स्थिति में इतनी प्रखर होती है कि कुमार्ग का अनुसरण कर सकना मनुष्य के लिए सम्भव ही नहीं होता। यह आत्मिक प्रखरता ही वस्तुतः वह तात्विक गुह्य है जिसकी महिमा का गुणगान करते शास्त्र नहीं अघाते।
शास्त्रकारोँ ने सद्गुरु का वन्दन करते हुए उसे परमानन्ददायक परब्रह्म कहा है। यह अन्तःकरण रूपी सद्गुरु का ही निरूपण है। गुरु को गोविन्द से भी बढ़कर मानने की मान्यता अन्तरात्मा को परमात्मा का उपलब्धि आधार समझने के लिए ही प्रतिष्ठापित की गई है। निरन्तर परामर्श और अहर्निशि साथ दे सकना अन्ततः सद्गुरु द्वारा ही सम्भव है। उसी की प्रखरता, नियन्त्रण और अंकुश साधक को भटकावों से बचाता है। अवाँछनीयताओं का डटकर प्रतिरोध कर सकना प्रखर अन्तरात्मा द्वारा ही संभव है।
पर इस अन्तःकरण रूपी सद्गुरु की भूमिका बाद में आरम्भ होती है। सामान्यतः कषाय-कल्मषों, मल-विक्षोभों के आवरण से अन्तःकरण ढका रहता है। फलतः उसकी प्रेरणा एवं प्रकाश साधक को नहीं मिल पाता है।
शरीरधारी गुय का पवरण इसलिए आवश्यक हो जाता है। उसकी कृपा अनुकम्पा हो जाता है। उसकी कृपा अनुकंपा से ही अन्तः करण का प्रकाश आलोकित होता है तथा आन्तरिक सद्गुरु भी अपनी भूमिका सम्पादित कर सकने में समर्थ बनाता है। कहा जा चुका है कि विरले ही हुए हैं जो आरम्भ से ही अपने एकाकी बलबूते अन्तःप्रेरणाओं के आधार पर साधन का कंटकाकीर्ण मार्ग पार करने और मंजिल तक जा पहुँचने में समर्थ हुए हैं अन्यथा अधिकाँश प्रत्यक्ष समर्थ शरीरधारी गुरु को ही सहायता, कृपा से लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हो सके हैं।
वे बहुत सौभाग्यशाली हैं, जिन्हें समर्थ गुरु का संरक्षण एवं मार्गदर्शन प्राप्त है। ऐसा गुरु जो वरिष्ठ और विश्वमित्र की विशेषताओं में सम्पन्न हो, जिसने अपने प्रचण्ड तप द्वारा ईश्वरीय सत्ता का साक्षात्कार किया हो, जो बुद्ध की भाँति आत्मबल का धनी हो, रामकृष्ण की तरह जिसके अंतःकरण से भक्तिरस की धारा प्रस्फुटित होती हो, जो कृष्ण की भाँति रोग विभूतियों से सुसम्पन्न हो, सचमुच जिन्हें ऐसे समर्थ गुरु का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिल गया समझना चाहिए कि जीन लक्ष्य प्राप्ति के लिए की जाने वाली साधना की आधी मंजिल पूरी हो गयी तथा उत्तरोत्तर गति से आगे बढ़ने का एक सशक्त आधार-अवलम्बन मिल गया।
सूर्य ध्यान में निरत था। उन्होंने प्रवास काल में कईयो से कई प्रकार की निन्दा सुनी। एक बोला- “अभागे को कभी छुट्टी नहीं मिलती।” दूसरे ने कही-”बेचारा, रोज जनरुता और रोज भरता है।” तीसरे ने कहा-”निर्जीव होते हुए भी आग उगलता है।” चौथे ने कहा-”किसी बड़े अपराध का दण्ड भुगत रहा है।”
सूर्य को इस कुसध्नता पर क्रोध आया और दूसरे दिन उगने से इनकार कर दिया।
सविता की पत्नी ने रूठने का कारण जाना, तो हँस पड़ी। ढेले की चोट से घड़े फूटते हैं, किन्तु समुद्र में गिरकर गर्त में विलीन हो जाते हैं। आप घड़े नहीं, समुद्र हैं, फिर ढेले की आदत और परिणति क्योँ नहीं समझते ?
अपनी भूल स्वीकार करते हुए, सूर्यनारायण ने यथाक्रम अपना रथ आगे बढ़ा दिया। सत्पुरुष न अशिष्टता बरतते हैं और न अशिष्टों के व्यवहार को महत्व देते हैं। तभी लक्ष्य पर बढ़ पाते हैं।
आँखों के आँसू पोछते-पोछते वह मुस्करा उठे। यूँ अपमान, तिरस्कार उनके लिए कोई नई बात न थी। बचपन से इसे सहते-सहते अब वे इसके अभ्यस्त हो चुके थे। वह नीची जाति के माने जाते थे। उनका स्पर्श न हो जाए, इस भय से स्वयं को सवर्ण कहलाने वाले उनसे दूर-दूर रहते थे। इसका उन्होंने कभी पुरा नहीं माना। उनका हृदय तो जैसे पर्वत से उतरने झरने के नीम के समान निर्मल था।
लेकिन आज शाम को जब उन्हें भजन गाते देख एक कुलीन वंश के व्यक्ति ने उन पर व्यंग्य किया, तो वे दुःखी हो उठे थे। समाज और संसार भले उन्हें अछूत मानता रहे, पर प्रभु तो रतित-पावन है। भले संसार उन्हें उच्च पद और सम्मान न दे लेकिन भगवान की गोद के तो वे अधिकारी हैं। अपने वंश और कुल के दम्भ में उक्त व्यक्ति ने उनकी इसी मान्यता पर व्यंग्य किया था और वह बिलख पड़े थे। इकतारे पर गाये जाने वाले भजन में यही वेदना उमड़ पड़ी थी। उनका कण्ठ स्वर जब हृदय की करुण पुकार से एकात्म होता, तो ऐसे समाँ बँधता कि चट्टान रो पड़े। आज कुछ ऐसा की हुआ था।
वैसे भी वह देर रात्रि तक भगवान की आराधना करके ही विश्राम करते थे। भोर होते ही प्रभु नाम की प्रतिभायाँ गाकर फिर वह कामकाज में लग जाते । गर्मी हो अथवा बरसात या फिर चाहे ठिठुरती ठण्ड हो, वह पूरा साल अपने कृषि कार्य में निमग्न रहते और बीच में जब समय मिलता तो ‘गजी’ बुन लेते।
उनके खेत से थोड़ी ही दूर पर कागनोरा पर्वत की धार में एक बड़ी गुफा थी, जिसमें ‘रामनगर’ नाम एक सिद्धयोगी रहते थे। यही उनका स्थायी निवास था। उनके दर्शनों के लिए आस-पास के कई गाँवों के लोग आते रहते थे। योगिराज रामनगर के निर्वाह का साधन इन्हीं दर्शनार्थियों द्वारा लाए गए फल-फूल थे। वे तो दिन-रात आत्मचिन्तन, ध्यान, तप में संलग्न रहते थे। भोजन मिल जाए तो भी ठीक और न मिले तो भी ठीक, उन्हें तो जैसे देह का भान ही नहीं रह गया था। कई बार तो हफ्तों महीनों उन्हें निराहार भी रहना पड़ जाता। परन्तु वे अपना हाथ फैलाने के लिए अपनी गुफा छोड़कर कहीं भी नहीं तो थे।
वह भी नित्य इन योगिराज के दर्शन करके स्वयं को कृतार्थ मानता। उसकी इच्छा तो होती कि मैं भी महात्मा जी की सेवा करूं, लेकिन यह चाहत मन में उत्पन्न होकर, मन में ही विलीन हो जाती। उसे मालुम था कि वह जाति से अछूत है और योगिराज उच्च कुल के हैं। मेरी सेवा भला वे क्यों स्वीकार करेंगे ? अतः वह दूर से ही उन पवित्रात्मा के दर्शन करके स्वयं को धन्य मान लेता। इस बार वह दो-तीन दिन से उनके दर्शन नहीं कर पाया था। मन में दर्शनों के लिए बड़ी आकुलता थी। जब वह दोपहर के समय खेत में हल चला रहा था। तब अचानक वे योगी अपनी गुफा में से बहार आए और अभी वे मुश्किल से तीन-चार कदम ही चले होंगे कि उनके दाएँ पैर में काँटा चुभ गया। उनके मुख से एक हलकी सी कराह निकल पड़ी। उन्होंने नीचे झुककर वह काँटा निकाल लिया। और फिर आगे बढ़ गए।
वह यह दृश्य से दूर से देख रहा था। उसे ऐसे लगा जैसे काँटा महात्मा जी के पाँव में न लगकर उसके हृदय में बिंध गया हो। महात्मा जी ने वह काँटा अपने पैर में से निकाल कर एक ओर फेंक दिया था, लेकिन उसके हृदय से वह काँटा नहीं निकल रहा था। उसने तुरन्त गुफा के आस-पास की झाड़ियाँ साफ कर दीं। थोड़ी ही देर में गुफा के आस-पास की जमीन साफ हो गयी। उस दिन से गुफा से आस-पास की जमीन साफ करना, उसमें पानी छिड़कना उसका निज का काम हो गया।
इस तरह कांटों-झाड़ियों, कंकड़ों से घिरी हुई गुफा अब देवमन्दिर की तरह आकर्षित लगने लगी थी। योगिराज ने जब गुफा के आस-पास जब यह आश्चर्यचकित कर देने वाली स्वच्छता देखी तो वह भी हतप्रभ रह गए। लेकिन उन्हें अब तक यह नहीं मालुम हो सका था कि यह सफाई कौन करता है ? क्योंकि करने वाले के हाथ ये सारा काम रात्रि के तीसरे, चौथे प्रहर में ही कर डालते थे।
उसे सिर्फ करके ही सन्तोष न मिलता। उसका अंतःकरण उन महात्माजी के प्रति आकर्षित हो चला था। वह गुफा के दरवाजे पर धूनी के लिए समिधा भी जुटा देता। इस क्रम में सालों गुजर गए।
एक दिन भोर के धुँधलके में वह गुफा के दरवाजे के समीप झाडू लगाकर पानी का छिड़काव कर रहा था। उसी समय अचानक योगिराज रामनगर गुफा से बाहर निकल आए। उनके शरीर पर केवल एक लँगोटी बँधी हुई थी। समूची देह पर विभूति चमक रही थी। सिर पर जटाएँ मुकुट की तरह शोभायमान थी। आज उसने पहली बार उन्हें इतनी नजदीक से देखा था। उससे रहा नहीं गया। हाथ में पकड़े पानी के घड़े को एक ओर रखकर वह उनके चरणों में गिर गया।
योगिराज ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-भीकम भारत मैं तुम्हारी निष्काम सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो मेरे बच्चे, तुम्हें कुछ कहना हैं।
उसने हाथ जोड़कर आँसुओं से भरी आँखें, उनकी ओर उठाते हुए कहा - बापू मुझे शिष्य बना लीजिए।
भीकम भगत की भावना ने उन्हें विभोर कर दिया। परन्तु वे किसी को अपना शिष्य नहीं बनाते थे। एक पल विचार करके वह बोले-बच्चे मैं तो किसी को अपना शिष्य नहीं बनाता हूँ। परन्तु तू रापर में खीम साहब के पास जा। वे तुझे गुरुमन्त्र देकर तेरा कल्याण करेंगे।
लेकिन बापू मैं तो अछूत हूँ, ढेड़ हूँ। कहते-कहते उसके चेहरे पर उदासी घनी हो गयी।
तो चिन्ता क्यों करता है, योगिराज ने उसे अपने सीने से चिपटाते हुए कहा - तेरी आत्मा ढेड़ नहीं है। परमात्मा जाति, वंश को नहीं, निश्छल अंतःकरण को प्यार करता है। तू तो महान सन्त बनेगा। जा अभी चला जा, खीम साहब से कहना कि मैंने तुझे भेजा है।
महात्मा जी के शब्द सुनकर भीकम की खुशी का ठिकाना न रहा वह खेत का काम वहीं छोड़कर रापर की ओर दौड़ पड़ा। रापर पहुंचकर उसने देखा सन्त श्री खीम साहेब नित्यकर्म से निवृत्त होकर उस समय रापर के समुद्री स्थान पर अपने आसन पर बैठे हुए हैं।
उनका उपदेश सुनने के लिए सैकड़ों भक्तजनों की भीड़ लगी हुई थी। इस भीड़ की चीरता हुआ वह आगे तक चला गया और खीम साहेब के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसकी देह पसीने से तरबतर हो रही थी, वह काँपते हुए उनके पैरों पर गिर पड़ा। वहाँ एकत्रित जनों ने उसे पहचान लिया कि वह तो अछूत है। वे सब भी उत्तेजित हो उठे। एक ने चिल्लाकर कहा - इसकी हिम्मत कैसे हुई इस समुद्री स्थान को अपवित्र करने की ? एक ने तो अपने होशोहवास खोकर गाँव में से अपनी खड़ाऊँ उतारकर उनके माथे पर दे मारी। भीकम भगत के माथे से खून बह चला। समुद्री स्थान की जमीन एक अछूत के खून से भीगते देखकर भक्तजन भड़क उठे थे। खीम साहेब ने तुरन्त सबको रोका।
भीकम के सिर में लगी चोट ने खीम साहेब के कोमल अंतःकरण को वेदना से आकुल कर दिया। उनके नेत्र भर आये। सारा वातावरण करुणार्द्र हो उठा। खीम साहेब ने अपनी धोती फाड़कर भीकम के माथे पर पट्टी बाँधते हुए आने का कारण पूछा।
“बापू, मैं मन्त्र दीक्षा लेने के लिए आया हूँ। मुझे कागनोरा वाले योगिराज ने आपके पास भेजा हैं।” भीकम ने हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया।
ऐसा ही होगा, कहकर खीम साहेब ने अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रख दिए।
यह देखकर उपस्थित लोगों की आँखें फटी की फटी रह गयीं।
परन्तु, बापू, यह तो ढेड़ है, अछूत है। कई आवाजें एक साथ उठीं।
खीम साहेब हँस पड़ें, हाँ तुम्हारे समाज ने दम्भ में आकर इनसान को ऊँच-नीच, छूत-अछूत में बांटने का दम्भ जरूर किया है। लेकिन भगवान के यहाँ ऐसा कोई बँटवारा नहीं है। फिर इसकी आत्मा तो तुम सब लोगों की अपेक्षा अधिक पवित्र हैद्व अधिक निर्मल हैं।
अगले दिन खीम साहेब ने भीकम को दीक्षित करने की इच्छा माण साहेब के सामने व्यक्त की। माण साहेब संसारी रिश्ते से खीम साहेब के पिता थे। वे उच्चकोटि के अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न समर्थ महापुरुष थे। उन्होंने एक पल में भीकम की आन्तरिक स्थिति पहचान ली और उन्हें दीक्षा देने की अपनी सहमति दी दी।
विधिपूर्वक मन्त्र दीक्षा हो गयी। भीकम भगत अब भकीम साहेब हो गए। यह चर्चा सम्पूर्ण कच्छ-बागड़ में फैल गयी। कोई खुश हुआ, कोई नाराज। लेकिन माण साहेब एवं खीम साहेब के लिए गुजरात, काठियावाड़, तथा कच्छ की जनता के मन में बहुत आदर था। उनकी अवहेलना करने की कोई सोच भी नहीं सकता था। धीरे-धीरे विरोध शान्त हो गया। उनकी प्रसिद्धि एक सन्त के रूप में हो गयी।
एक दिन उन्होंने अपने दोनों गुरुओं के सामने हाथ जोड़कर चित्तौड़ धाम में अपना असान जमाने की स्वीकृति माँगी ताकि वे वहाँ की जनता में सद्ज्ञान एवं सद्भावनाओं का प्रसार कर सकें। गुरु उनकी सामर्थ्य से अवगत थे, सहज स्वीकृति मिल गयी।
भीकम साहेब ने चित्तौड़ में एक विशाल मढ़ी का निर्माण कराया और वहाँ वे सद्चिन्तन एवं सद्भावों की तरंगों को फैलाने लगे। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन-सत्प्रवृत्ति सम्वर्द्धन का क्रम चल पड़ा। इसी बीच माण साहेब और खीम साहेब मोक्षधाम सिधार गये। भीकम साहेब की देह भी जरा- जीर्ण हो चली थी। उन्होंने ने अपने अनुयायियों से कहाँ था कि मेरे मृत शरीर को समुद्र स्थान में माण साहेब एवं खीम साहेब की समाधियों के बीच दफना दिया जाए।
और एक दिन उनकी आत्मा भी देह छोड़कर प्रभु के पास पहुँच गयी। जब रापर गाँव के लोगों को यह खबर मिली कि भीकम भगत की देह समुद्र स्थान में गाड़ी जाएगी, वह भी माण साहेब एवं खीम साहेब की समाधियों के बीच , तो एक प्रतिगामी समुद्र उत्तेजित हो उठा।
इतने में झंझ और शंख की ध्वनि सुनायी दी। भजनों की गूँज के साथ भीकम साहेब की पालकी चली आ रही थी। पालकी में भीकम साहेब ऐसे लग रहे थे, जैसे वे माला फिरा रहे हों। पालकी गाँव में प्रवेश करते ही लोग पत्थरों और लाठियों का प्रहार करने लगे। लेकिन आश्चर्य ! उछाले गए पत्थर फूलों में परिवर्तित हो रहे थे। इस दैवी चमत्कार ने सभी को नतमस्तक कर दिया। उन्हें मानने के लिए विवश होना पड़ा कि भेद-भाव मनुष्य निर्मित है। प्रभु का अनुशासन तो ‘जाति-वंश सब एक समान’ को ही स्वीकार करता है और सभी ने आदर के साथ भीकम साहेब की देह को माण साहेब और खीम साहेब की समाधियों के पास समाधि दे दी और यह स्थान मनुष्यता के लिए भेद-भाव दूर करने वाला तीर्थ हो गया। आज भी कच्छ के रापर गाँव में चैत्र शुक्ल द्वितीया को इसी रूप में मनाया जाता है।
बहुत समय पहले शारीरिक रोगों का कारण बात, पित्त, कफ, अपच, मलावरोध, ऋतु प्रभाव, विषाणुओं का आक्रमण आदि माना जाता रहा है, किन्तु नवीनतम शोधें शरीर पर पूरी तरह मनः’सत्ता का अधिकार मानती हैं और बताती हैं कि बाह्य कारणों से उत्पन्न हुए रोग तो शरीर की जीवनीशक्ति स्वयं ही अच्छे कर लेती है अथवा मामूली से उपचार से वे अच्छे हो सकते हैं, किन्तु जटिल रोग आमतौर से मनोविकारों के ही परिणाम होते हैं। उनका निराकरण दवा-दारु से नहीं, मानसिक परिशोधन से ही संभव हो सकता है।
शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों का भी यह प्रधान कारण है। दुष्कर्म अथवा दुर्बुद्धिग्रस्त व्यक्ति शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों से भी ग्रसित रहते हैं। उन्माद विस्फोट की स्थिति न आये तो भी असंतुलन से ग्रस्त व्यक्ति अर्द्ध-विक्षिप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। अकारण दुःख पाते और अकारण दुःख देते हैं। इनकी मनःस्थिति कितनी दयनीय होती है यह देखने भर से बड़ा कष्ट होता है। शारीरिक व्यथाओं से पीड़ितों की अपेक्षा मनोरोगों से ग्रस्त लोगों की संख्या ही नहीं, पीड़ा भी अधिक पायी जाती है। इन व्यथाओं से छुटकारे का उपाय अस्पतालों में नहीं, मानसिक संशोधन की साधनाओं पर ही अवलंबित है। वे उपाय, उपचार अन्य प्रकार भी हो सकते हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उसे मनोमयकोश की साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
काय-विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए ज्ञान तन्तु सारे शरीर में फैले हैँ। उन्हीं के माध्यम से इस जटिल यन्त्र का संचालन होता है। इन्द्रियों की क्रिया शक्ति, अनुभूतियाँ, सरसताएँ मस्तिष्क में ही जाकर खुलती हैं। इन्द्रिय गोलक तो मात्र सूचनाएँ संग्रह करने और उन्हें मस्तिष्कीय केन्द्रों तक पहुँचाने भर का काम करते हैं। कोई मानसिक कष्ट होने पर सारा शरीर शिथिल हो जाता है और क्रिया शक्ति में स्पष्टतः अस्त-व्यस्तता दीखने लगती है। भय, चिन्ता, शोक, निराशा जैसे प्रसंगों पर किसी भी मनुष्य का चेहरा उदास और सारा शरीर शिथिल देखा जा सकता है। क्रोध, अपमान, द्वेष, प्रतिशोध की स्थिति में किस प्रकार अंग-प्रत्यंगों में उत्तेजना दीख जाती है, इसे किसी आवेशग्रस्त पर छाये पर भावोन्माद को देखकर सहज ही देखा - समझा जा सकता है। प्रसन्न और निश्चित रहने वाले स्वस्थ रहते और दीर्घजीवी बनते हैं। इसके विपरीत क्षुब्ध रहने वाले अकारण दुर्बल होते जाते हैं और अकाल मृत्यु से असमय मरते हैं। यह तथ्य स्पष्ट करते हैं कि शरीर संस्थान पर आहार−विहार का, जलवायु का जितना प्रभाव पड़ता है उससे कहीं अधिक भाव संस्थान का होता है।
शरीर में स्नायुमण्डल द्वारा तथा नलिकाविहीन अंत-स्रावी ग्रन्थियों द्वारा भावनाएँ क्रियाशील होती हैं।
हमारे सम्पूर्ण शरीर में स्नायुओं का जाल बिछा हुआ है। सामान्यतः स्नायु उज्ज्वल वर्णी होते हैं और तार की तरह ठोस होते हैं। हमारी सभी पेशियाँ स्नायुओं के ही आधार पर चलती हैं। प्रत्येक पेशी में पहुँचने वाला मुख्य स्नायु सुतली की तरह मोटा होता है। फिर उसकी शाखा-प्रशाखाएँ अधिकाधिक पतली होती चली जाती है। कई प्रशाखाएँ तो बारीक सूत जैसी पतली होती है।
तंत्रिका विज्ञानियों के अनुसार सम्पूर्ण स्नायुमण्डल के दो भाग हैं - (1) ऐच्छिक (2) अनैच्छिक चलने-फिरने, झुकने-मुड़ने, वस्तुएँ उठाने, रखने आदि की क्रियाओं में हम अपने हाथ-पैर आदि को इच्छानुसार हिलाते हैं। यह ऐच्छिक स्नायुओं के ही कारण है। अनैच्छिक स्नायुओं पर हमारा ऐसा अधिकार नहीं होता। वे शरीर की आन्तरिक क्रियाएँ संपादित करते हैं, जैसे हृदय की धड़कने, साँसों का आना-जाना आदि।
अनैच्छिक स्नायुमण्डल का केन्द्र मस्तिष्क का एक लघु अंश ‘हाइपौथैलेमस’ होता है। यही ‘हाइपोथैलेमस’ नारी व पौरुष ग्रन्थियों को भी नियन्त्रित करता है। साथ ही ‘मोनोएमीन आक्सीडेज’ नामक किण्वज (एन्जामइम) भी सम्पूर्ण शरीर में संव्याप्त होते हुए भी केन्द्रीय सनायिवक प्रणाली में विशेष रूप से जमा रहता है। “हाइपोथैलेमस’ द्वारा पिट्यूटरी ग्रन्थि भी उत्तेजित होती है और उससे विभिन्न हार्मोन्स निकलते हैं जो भावनाओं का कारण भी किसी नयी परिस्थिति के उपस्थित होने पर अंत-स्रावी नलिकाविहीन ग्रन्थियों पर दबाव पड़ता है और वे विभिन्न हारमोनों को स्रवित करती है। इन हारमोनों की शरीर की प्रतिक्रिया होती है और वह प्रतिक्रिया उसी के अनुरूप भावना समूहों को जन्म देती है। जैसे किसी रोग के जीवाणुओं के संक्रमण के दबाव से पिट्यूटरी ग्रन्थि ने कोई हार्मोन छोड़ा, इससे शरीर में तेज हलचल मच गयी, व्यक्ति को अस्वस्थता महसूस होने लगी और वह खाट पर पड़ गया। अब बीमारी की दशा में तरह-तरह की भावनाएँ जो अचेतन में दबी थीं, उभरने लगीं। उनके परिणामस्वरूप अनेक प्रकार ही शारीरिक प्रतिक्रियाएं भी पैदा होने लगती है।
वियना के सुप्रसिद्ध मनों चिकित्सक डॉ0 फ्रेंकल का मत है कि मानसिक धरातल ही शारीरिक स्वास्थ्य का आधार है। शारीरिक स्वास्थ्य का आधार है। मानसिक असन्तुलन का कारण जीवन की सार्थकता को न समझना है। इसीलिए उन्होंने “लौगोथेरेपी, या ‘अर्थबोध चिकित्सा’ नाम की चिकित्सा पद्धति विकसित की है। डॉ0 फ्रेंकल की मान्यता है कि जिस व्यक्ति को अपने जीवन और कार्य की सार्थकता का बोध नहीं हो वह स्वस्थ नहीं रह सकता। मनुष्य जीवन के आदर्शतम लक्ष्य और उनकी सिद्धि ही आनन्द का आधार है। डॉ0 फ्रेंकल की चिकित्सा पद्धति में रोगी से प्रिय अप्रिय सभी विषयों पर चर्चा कर उसे जीवन की सार्थकता की तलाश की प्रेरणा दी जाती है। व्यक्ति को जैसे ही जीवन में सार्थकता की अनुभूति हो उठती हैं, वह अपने भीतर निहित शक्तियों का स्मरण कर आत्म-विश्वास से भी उठता है और धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगता है। मनःक्षेत्र की स्वास्थ्यता उसके स्थूल शरीर को भी स्वस्थ बना देती हैं।
सूक्ष्म शरीर की हलचलों का स्थूल शरीर पर स्पष्ट एवं निश्चित परिणाम होता है। तन्त्रकीय रोगों का कारण दबे हुए गन्दे विचार ही होते हैं। शरीरशास्त्रियों का भी मत है कि मात्र मानसिक चित्रों के आधार पर ही अनेक शारीरिक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है। ‘इन्फ्लुएन्स ऑफ द माइण्ड अपाँन द बाँडी, नामक पुस्तक के लेखक डॉ0 टुके ने लिखा है - “विक्षिप्तता, मूढ़ता, अंगों का निकम्मा हो जाना, पित्त, पाण्डुरोग, के शपतन, रक्ताल्पता, घबराहट, मूत्राशय के रोग, गर्भाशय में पड़े बच्चे का अंग-भंग हो जाना चर्म रोग, फुन्सियाँ, फोड़े, एक्जिमा आदि अनेक स्वास्थ्यनाशक रोग कई बार मानसिक विक्षोभ तथा भावनात्मक उद्वेलन के परिणामस्वरूप होते पाये गये हैं।” मानसिक विक्षोभ, भावनात्मक उद्वेलन, निषेधात्मक चिन्तन, सूक्ष्म, शरीर की विकृतियाँ हैं, जिनका स्थूल शरीर पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण स्वस्थ-उदात्त चिन्तन, आदर्शवादी विचार-धारा सूक्ष्मशरीर को तेजस्वी और प्रखर बनाती हैं एवं उसका सही प्रखरतावर्धक प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
इस संदर्भ में विधेयात्मक विचारों की, ऊर्ध्वमुखी चिन्तन की आश्चर्यजनक महत्ता के प्रतिपादन में डॉ0 बेनेट ने स्वयं को ही प्रस्तुत किया है। 50 वर्ष की आयु तक वे निराशा और अवाँछनीय चिन्तन के कारण अपना स्वास्थ्य पूरी तरह गँवा बैठे। उन्हें जब ऊर्ध्वगामी चिंतन की इसी असीम उपादेयता का पता चला तो उन्होंने अपना जीवनक्रम ही बदल डाला। मन की जड़ता और विषय विचारों का जुआ उनने उतार फेंका, हृदय को श्रद्धा, आस्था से भरा, सदैव प्रसन्न-प्रफुल्ल रहने की आदत बना ली। 20 वर्षों के अपने इस जीवन को स्वार्गीय सुख से ओत-प्रोत बनाते हुए डॉ0 बैनेट से अपनी 50 वर्षीय फोटो तथा 60 वर्षीय फोटो भी इस पुस्तक में छापी है। पहली में उनका चेहरा झुर्रियों से, चिपके गाल, धंसी आँखों के कारण मनहूस दिखायी देता है। जबकि 70 वर्ष की आयु में वे स्वस्थ, सशक्त दिखायी देते हैं, झुर्रियाँ न जाने कहाँ चली गयीं, चेहरे में उद्दीप्ति हैं और युवकों जैसी सक्रियता।
अब तक किये गये, ऐसे ही विधि आधुनिक अनुसंधानों से प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया है कि मन का, मस्तिष्क का कष्ट प्रत्येक कोशिका को कष्ट में डाल देता है। घृणा, ईर्ष्या, क्रोध का अनिष्ट प्रभाव समस्त कोशाणुओं में तुरन्त दौड़ जाता है, झलक उठता है। मस्तिष्क में प्रसन्नता का भाव आते ही प्रत्येक कोशाणु प्रसन्न, पुलकित हो उठता है। ये सभी कोशाणु परस्पर गहन आत्मीयता और अभियन्ता का भाव रखते हैं।
प्रत्येक कोशाणु की दशा से सभी प्रभावित होते हैं - इनका सुख-दुःख मिला-जुला ही होता है। इनका पारस्परिक सौहार्द्र, सद्भावना अनूठा है। सच्ची मैत्री, प्रगाढ़, आत्मीयता, सहानुभूति के ये अनूठे उदाहरण हैं। कल्पना करें कि एक व्यक्ति को तेल भूख लगी है। सुस्वाद भोजन का थाल सामने है। उसी समय किसी प्रियजन की मृत्यु का तार मिलता है। उसे पढ़ते ही मस्तिष्क में उसकी संचित स्मृति सहसा जाग्रत हो उठती हैं। मन में आत्मीय संवेदना उमड़ पड़ती हैं। मस्तिष्क के कोषाणुओं में हलचल, उथल-पुथल मच जाती हैं। मस्तिष्क के कोशाणुओं की इस प्रतिक्रिया का तत्काल सम्पूर्ण शरीर के कोशाणुओं पर प्रभाव पड़ता है। जीभ सूखने लगती है। भूख बढ़ाने वाले कोशाणु जो उछल-कूद मचा रहे थे, भोजन माँग रहे थे, सहमकर शाँत, निष्क्रिय, दुबके से बैठ जाते हैं। हृदय और दूसरे अंग भी निष्प्राण से हो चलते हैं। दिल डूबने लगता है, आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है। शरीर निढाल हो जाता है। समस्त अंगों पर यह प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि मस्तिष्कीय कोशाणुओं की भावदशा का तत्काल प्रभाव सम्पूर्ण शरीरस्थ कोशाणु-समूहों पर बड़े व्यापक रूप में पड़ता है।
मनोमयकोश की, श्रेष्ठ विचारों के चिन्तन-मनन की साधना वस्तुतः मस्तिष्कीय क्षेत्र में घुसे मनोविकारों को, दुष्प्रवृत्तियों को निरस्त करने के लिए लड़ा जाने वाला महाभारत है। जो इसमें सफल होते हैं वे ही सच्चे अर्थों में जीवन का आनन्द उठाते हुए आत्मोत्कर्ष का परम लाभ प्राप्त करते हैं।
विवाह के पावन सूत्र दो आत्माओं को परस्पर एकाकार कर देते हैं। उनका यह मिलन सदैव सुखदायक बना रहे। प्रेम का यह पादप निरन्तर पल्लवित-पुष्पित होता रहे, दाम्पत्य सुख की सरिता अपना आकार विस्तृत करती रहे यह असम्भव नहीं है। विवेकशीलता से काम लिया जाय तो यह सुख-सौभाग्य सहज पाया जा सकता है। यह सौभाग्य जिसने पा लिया वह पारिवारिक तथा सामाजिक दायित्वों का भार सहज ही वहन कर सकता है।
पति-पत्नी का प्रेम बरसाती नाले के समान अल्पकालीन नहीं, सदा बहने वाली नदी की तरह स्थायी होता है। नदी जब पर्वतों से निकलती है तो क्षीणकाय तथा तीव्रगामिनी होती है। मार्ग की चट्टानों से टकराती हुई, शोर करती हुई आती है। उसमें जल कम और प्रवाह अधिक होता है। वाह के आरम्भिक दिनों में पति-पत्नी के प्रेम की यही स्थिति होता है। उसमें भावुकता का प्रवाह अधिक तथा विवेकशीलता का जल कम होता है। जो पति-पत्नी केवल भावुकता का प्रवाह भर होते हैं, वे बरसती नाले की तरह शीघ्र ही सूख जाते हैं। जहाँ विवेक का जल होता है वे निरन्तर आगे बढ़ते हुए अपने कलेवर को बढ़ाते चलते हैं।
रूप, यौवन का आकर्षण अधिक दिनों तक पति-पत्नी को बाँधकर नहीं रख सकता। रूप की अपनी कोई मर्यादा नहीं है। यह मनुष्य के मन की उपज मात्र है। एक अफ्रीकी हब्शी के लिए काला रंग, मोटे होठ तथा चपटी नाक सुन्दरता की निशानी ।एक अमेरिका निवासी गोरे व्यक्ति के लिये यह सब कुरूपता का मानदण्ड हो जाता है। चीन में छोटे पाँव अशुभ माने जाते हैं। हमारे देश में काले कमर तक लहराते बाल सुन्दर माने जाते तो इंग्लैण्ड में भूरे छोटे-छोटे गर्दन तक लम्बे।
रूप स्थायी भी तो नहीं होता आयु के साथ ढल जाता है। अस्वस्थ होने पर बिगड़ जाता है। जो रूप को देखते हैं वे उसके समाप्त होने पर कैसे अपने जीवन साथी को प्यार कर सकेंगे ?
रूप देखना ही हैं तो मानसिक सौंदर्य में देखना चाहिए। सच्चा परिचय तो मानसिक ही होना चाहिए। यही प्रेम का आधार होता है, इसे बढ़ाया जा सकता है - सद्विचारों से, सद्गुणों से तथा सत्कर्मों से मानसिक सौंदर्य को बढ़ाते रहने से व्यक्तित्व में निखार आता है। यह निखार परस्पर प्रीति बढ़ाने में पर्याप्त होता है।
यौनसक्ति भी दाम्पत्य प्रेम का आधार नहीं हो सकती। स्त्री-पुरुष का शारीरिक अन्तर मात्र आकर्षण का केन्द्र नहीं होता। शरीर के पीछे मन भी लगा होता है। पुरुष कठोर, परिश्रमी, बुद्धि प्रधान होता है। स्त्री कोमल, सहनशील तथा भावना प्रधान होतीं हैं। यही अन्तर स्थूल रूप से शरीर की आकृति में भी स्पष्ट होता है।
आजकल यह भ्रान्ति बुरी तरह फैल रही है कि पति-पत्नी के प्रेम को स्थायी रखने के लिये शारीरिक समानता का रूप-रंग-गठन आदि का समान होता आवश्यक है। यह नितान्त भ्रामक है। मिलन तो उनके गुणों का होना चाहिए। पति अपनी पत्नी से सहनशीलता तथा भावनाओं का अनुदान प्राप्त करता है। पत्नी अपने पति के शारीरिक श्रम तथा बुद्धिवादिता का लाभ उठाती है। परस्पर एक-दूसरे के पूरक बनकर पूर्णत्व की प्राप्ति करना ही इस विभिन्नता का परिणाम है।
शारीरिक संसर्ग की अपनी मर्यादाएँ हैं। इन मर्यादाओं को तोड़ने पर स्वास्थ्य हानि तथा मानसिक दुर्बलता का शिकार होना पड़ता है। प्रकृति ने स्त्री-पुरुष के संसर्ग में जो अनूठा स्पर्श सुख का सृजन किया है। उसके पीछे एक ही कारण है कि इससे आकर्षित होकर व्यक्ति सृष्टि क्रम को चालू रखे - संतानोत्पादन करे। इस सुख की अनुभूति भी मर्यादित रहने में ही होती है। इस रहस्य पर आवरण पड़ा करता है। तभी तक सुख है। शारीरिक संसर्ग से जितना बचा जाय तथा मानसिक अनुदान जितना अधिक ग्रहण किया जाय उतना ही पारस्परिक प्रेम बढ़ता है।
स्त्री - पुरुष का भेद प्रकृति ने जितना नहीं बनाया है। उतना मनुष्यों ने उसे बना दिया है। जिस प्रकार दो पुरुष परस्पर सहयोगी, भाई, मित्र, परिजन आदि होते हैं उनमें परस्पर प्रेम होता है। यह प्रेम उच्च कोटि का भी हो सकता है। भाई-भाई के लिये सब कुछ त्याग सकता है। मित्र अपने मित्र के लिये प्राण विसर्जन करने से भी नहीं हिचकिचाता। ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं। महिलाओं में भी अपने आपस में ऐसा ही प्रेम देखा जा सकता है।
लिंगभेद की यह धारणा मिटा दी जाय तथा पति-पत्नी एक-दूसरे को अपना, साथी, सहयोगी के रूप में स्वीकार करके आपस में वैसा ही प्रेम करें, तो यह प्रेम की बेल जीवन भर बढ़ता रह सकती है। शारीरिक भेद को भुलाकर किया गया यह प्रेम ही सच्चा दाम्पत्य प्रेम होता है।
सदियों से मन-मस्तिष्क में बैठी यह भावना नहीं मिट सके तो भी पत्नी को ‘रमणी’ स्वरूप में देखना हितकर नहीं होता। सम्बन्धों में जितना शारीरिक लगाव कम होता है प्रेम उतना ही प्रगाढ़ होता है। माता-पुत्र, पिता-पुत्री, भाई-बहिन आदि का प्रेम शारीरिक लगावों से रहित होने के कारण पवित्र कहलाता है यथा चिरस्थायी होता है।
पत्नी भी दिन भर माता, भगिनी की तरह ही सेवा करती है, प्रेम करती है। पति भी दिन भर पिता की तरह जी तोड़ कर श्रम करता है, अच्छी-अच्छी वस्तुएँ जुटाता है। यह पवित्रता जितनी अधिक बनी रहेगी उतना ही दाम्पत्य चिरस्थायी तथा आह्लादकारी बना रहेगा। ‘कामिनी’ के रूप में पत्नी महत्व देना पाशविक ही कहा जा सकता है। पाशविक प्रेम में स्थायित्व की आशा व्यर्थ होती है।
जीवनसाथी का चुनाव स्वयं ने किया हो अथवा अभिभावकों ने उससे कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ता। दाम्पत्य जीवन की सफलता तथा परस्पर प्रेम का विकास करने का दायित्व दोनों पर होता है।
विवाह के पश्चात् दोनों के सुख-दुःख एक हो जाते हैं हमारे देश में पुरुषों का काम उपार्जन तथा स्त्री का काम गृह-संचालन माना जाता है। यह कार्य विभाजन शारीरिक - मानसिक क्षमताओं को दृष्टिगत रख कर किया गया है। यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक दम्पत्ति इसका पालन करें। एक - दूसरे की सुख-सुविधा को ध्यान में रखते हुए इसमें परिवर्तन भी किया जा सकता है। इसमें एक दूसरे का सहयोग भी रहना चाहिएं। इस प्रकार का सहयोग प्रेम में वृद्धि करता है। पति - पत्नी के घर के कामों में हाथ बँटा दें तो उसे परम सुख मिलता है। इसी प्रकार पत्नी, पति के व्यापारादि कर्मों में सहयोग, परामर्श दे सकती है।
पति-पत्नी को एक-दूसरे का यथार्थ रूप लेकर चला आवश्यक है। मनुष्य में गुण - दोष होने स्वाभाविक हैं। गुणों में एकदम वृद्धि तथा दोषोँ में एकदम मिटाना सम्भव नहीं। जैसा भी यथार्थ स्वरूप एक-दूसरे का है उसी के अनुरूप एक-नारी की आदर्श प्रतिमा को अपने मन-मस्तिष्क में बिठाये रखे व अपनी पत्नी से वैसा ही व्यवहार चाहे। पत्नी भी पति के ऐसे ही आदर्श स्वरूप को लेकर चले और पति को उस कसौटी पर कसे तो दोनों के हाथ निराशा ही लगती है। प्रेम के स्थान पर कटुता का आरम्भ होने लगता है। यथार्थ स्वरूप को सामने रखकर चलने से वे एक-दूसरे की आशा से अधिक ही स्नेह-सहयोग देते हैं तथा परस्पर प्रेम बढ़ता है।
कोई पक्ष यह नहीं चाहता कि वह अनुपयोगी सिद्ध होगा। पति के हाव-भाव, क्रिया-कलाप तथा कथन द्वारा इस बात की पुष्टि होती रहे कि पत्नी उसके लिये बहुत उपयोगी सिद्ध हो रही है। उसकी आवश्यकता जैसी विवाह के समय थी वैसी ही आज भी है तो पत्नी की दृष्टि में उसका सम्मान बढ़ जाता है। यहीं पत्नी के व्यवहार से भी झलके कि उसे अपने पति वैसे ही लगते हैं जैसे विवाह के समय लगते थे तो दाम्पत्य स्नेह के सूत्र और भी दृढ़ हो जाते हैं।
इस उपयोगिता को जताने के लिये प्रशंसा करना, प्रेम दर्शन करना आवश्यक है। यह क्रिया जितनी बार दोहराई जायेगी परस्पर नवीनता तथा आकर्षण बना रहेगा। प्रशंसा करने में इस बात का ध्यान रहे कि प्रशंसा कार्यों की तथा गुणों की हो। शरीर तथा सौंदर्य की प्रशंसा शारीरिक आकर्षण को जन्म देती है। सत्कार्यों तथा गुणों की प्रशंसा एक-दूसरे का सम्मान को बढ़ाती ही है साथ-ही- साथ उनकी और वृद्धि करने का उत्साह भी जगाती है।
मनुष्य से भूल होना अस्वाभाविक नहीं है। भूल पति से भी होती है, तथा पत्नी से भी। भूलों को सुधारना भी आवश्यक होता है। भूल सुधार का क्रम भी प्रशंसा की तरह ही चलता रहना आवश्यक है, किन्तु सुधार का यह क्रम इस प्रकार का न हो कि एक-दूसरे के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचे। भूल, सुधारने, स्वीकारने के लिये वही पक्ष सामने आये, जिसने भूल की हो तो सराहनीय ही कहा जायगा। इस साहस की प्रशंसा करे तो उसके मन पर इसका अच्छा प्रभाव तो पड़ेगा ही साथ ही अपने जीवन साथी पर उसे गर्व भी हो आयेगा। भूल या गलती करने वाला उसे स्वतः स्वीकार न करे तो दूसरे को सहन कर लेना ही ठीक रहता है। यदि सह सकने योग्य न हो तो उसे अपनी भूल विनम्र शब्दों में बता दे जिससे कि उसे बुरा न लगे।
पति-पत्नी के स्वभाव तथा रुचि में भिन्नता हो सकती है। विवाहोपरान्त यह भिन्नता पूरी तरह मिटाना आवश्यक नहीं होता। एक-दूसरे को समझ लेना एक-दूसरे की रुचि तथा स्वभाव का ध्यान रखना ही पर्याप्त होता है। एक-दूसरे की रुचि तथा स्वभाव का सम्मान करने से उनके हृदय में परस्पर सम्मान बढ़ जाता है।
जो दंपत्ति एक-दूसरे की भावनाओं को समझने में असमर्थ होते हैं, उनका परस्पर स्नेह घटता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि वे एक-दूसरे को चाहते हुए भी प्रेम नहीं दे पाते। ये बातें साधारण-सी होतीं हैं किन्तु महत्वपूर्ण होती हैं। एक-दूसरे के लिए कोई उपहार लाने, सेवा करने आदि में जो समर्पण की भावना जुड़ी होती है उसको समझा न जाय, उसे प्रशंसा के जल से सींचा न जाय तो यह प्रेम-बेल सूखने लगती है।
पति-पत्नी का प्रेम एक सुन्दर, सुसज्जित होना चाहिए। प्रेम के इस पथ में खण्डहरों में निराशा, दुःख शोक, क्लेश, उत्पीड़न आदि कीड़े - मकोड़े, उल्लू व चमगादड़ निवास करते हैं। जीवन भर साथ निभाने तथा पुलकते, हँसते-खेलते अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों को निभाते रहने वालों का प्रेम ही सुरम्य प्रासाद कहा जा सकता है जिससे स्नेह, सौजन्य, आशा, उत्साह, दया, प्रसन्नता, श्री, मेधा आदि सत्पुरुष निवास करते हैं। ऐसे सुरम्य प्रासाद मिलकर ही समाज रूपी सुन्दर नगर का निर्माण करते हैं। यह तभी हो सकेगा जबकि पति-पत्नी ऐसा विवेक अपनायेंगे।
जिन्हें शारीरिक स्वास्थ्य की महत्ता एवं उपयोगिता के साथ-साथ उसकी सुरक्षा तथा अभिवृद्धि का रहस्य भी समझना है, उन्हें जानना चाहिए कि यह कार्य पौष्टिक आहार या टॉनिक रसायनों के बूते का नहीं है, जैसा कि पिछले दिनों समझा जाता रहा है। वह समय चला गया जिसमें उस्ताद, पहलवान या हकीम डाक्टर किसी को नीरोग या बलवान बना देने का दावा किया करते थे। आहार-विहार में सतर्कता को महत्व देते हुए भी अब नवीनतम तथ्य यह उभरकर आये हैं कि मानसिक स्तर ही किसी का स्वास्थ्य सुधारने या बिगाड़ने के लिए उत्तरदायी है। दुर्बलता या असमर्थता अंग-अवयवों में नहीं वरन् उन मस्तिष्कीय ज्ञान सम्वेदना से प्रभावित होते हैं। अब रक्त संचार केन्द्र को नहीं मस्तिष्कीय विद्युत् प्रवाह को प्रमुखता मिली है और समझा गया है कि जीवन के अनेक पक्षों में प्रगति, अवगति का ताना-बाना बुनने की तरह ही यह केन्द्र शारीरिक स्वस्थता, अस्वस्थता के लिए भी बहुत कुछ उत्तरदायी है।
लम्बे प्रयोग अनुसन्धानों में शरीरशास्त्री और मनोविज्ञानवेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मस्तिष्क पर अवाँछनीय दबाव पड़ने से तनाव बढ़ता है और वह तनाव ही शक्ति क्षय का प्रमुख कारण है। जीवनी-शक्ति का भण्डार घटने से ही दुर्बलता आती है और पाचन−तंत्र, रक्तसंचार, श्वास, प्रश्वास आदि में गतिरोध बढ़ने से भीतर उत्पन्न होती रहने वाली गन्दगी का निष्कासन नहीं हो पाता। पोषण की कमी और गन्दगी की अभिवृद्धि होने से दुर्बलता ही रुग्णता बन जाती है। इस स्थिति में निरोधक शक्ति घट जाने से विषाणुओं के बाहरी आक्रमण भी जड़ जमाकर बैठ जाते हैं। उन्हें खदेड़ने वाली सामर्थ्य कम पड़ी तो बाहरी हमलों की रोकथाम भी नहीं हो पाती और जमी हुई जड़ उखड़ भी नहीं पाती। रोग पलने और बढ़ने लगते हैं। संक्षेप में यही है वह शृंखला जिसके कारण मानसिक विकृतियाँ ही अनेकानेक शरीरगत रोगों की निमित्त कारण बनती हैं।
मनोविकारों से अस्वस्थता उत्पन्न होने की जानकारी थी तो पहले भी। पर अब उसे वैज्ञानिक मान्यता मिल गई है। विचारशील चिकित्सक अब रोगी का शारीरिक ही नहीं मानसिक पर्यवेक्षण भी करते हैं और उसकी उलझनों तथा आदतों पर पूरा-पूरा ध्यान देते हैं। औषधि उपचार से भी अधिक महत्व मनःक्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों को हटाने और उनके स्थान पर नई स्थापनाएँ करने पर जिन चिकित्सकों ने ध्यान दिया है, वे अपने रोगियों में अपेक्षाकृत अधिक जल्दी और अधिक स्थाई सफलता प्राप्त कर सके हैं। विश्वास किया जाता है कि अगले दिनों अंग परीक्षण की ही तरह मनोविश्लेषण और मानसिक परिष्कार चिकित्सा विज्ञान के प्रमुख अंग बनकर रहेंगे। इस स्थापना के लिए प्रयत्नशील मूर्धन्यों का विश्वास है कि रुग्णता के निराकरण में यह प्रक्रिया , यह पद्धति निश्चित रूप में सफल सिद्ध होगी।
मनोविकारों के दो स्तर हैं- एक, वे जिन्हें नैतिक क्षेत्र से सम्बन्धित कहा जा सकता है। छल, प्रपंच, द्वेष, अपहरण जैसे अचिन्त्य चिन्तन की व्यभिचार, अनाचार, चोरी, ठगी, आक्रमण, आघात आदि अपराधों के रूप में प्रकट होते हैं। दूसरा स्तर सनकों का है। चिन्ता, भय, आशंका, विश्वास, उद्वेग, कामुक कुदृष्टि, विक्षोभ, निराशा, खीज जैसी अनेकों कुकल्पनाएँ हैं जिन्हें लोग किसी न किसी बहाने उगाते, बढ़ाते और छाती से चिपकाये रहते हैं। वास्तविक कारण तो रंचमात्र होते हैं, पर सनक को स्थायी बनाकर उस पर ऐसा रंग चढ़ाते हैं कि उन्हें स्वयं वस्तुस्थिति जैसी प्रतीत होने लगती है, भले ही वह अन्यान्यों को निरर्थक एवं उपहासास्पद प्रतीत होती हो। इन्हीं मनोविकारों में एक उदासी भी है। अपने को एकाकी अनुभव करने वाले दूसरों के प्रति उपेक्षा बरतते हैं और साथ ही तिल को ताड़ बनाकर रंचमात्र कठिनाइयों को भारी संकट समझते और तनावग्रस्त रहने लगते हैं। इन दिनों दोनों ही स्तर के मनोरोग की भरमार है। जान-बूझकर या अनजाने लोग इस दलदल में फँसते जाते हैं । आरोग्य क्षेत्र का सबसे बड़ा निमित्त कारण यही है। तनावग्रस्तों में अधिकाँश को आये दिन चित्र-विचित्र रोग बने रहते हैं। औषधि उपचारों की मरहम-पट्टी होते रहने पर भी वे हटते या मिटते नहीं हैं। जड़ सींची जाती रहे तो पत्ते तोड़ने भर से उस विष वृक्ष के सूखने की आशा कैसे की जा सकेगी। चिकित्सा किसी भी पद्धति के अनुरूप क्यों न की गई हो, उसका प्रभाव अत्यन्त क्षणिक होता है। इतना ही नहीं यदि वे औषधियों मारक प्रकृति की है तो फिर उसके पश्चात् प्रतिक्रिया ऐसी होती है जो रोग घटाने में मिले हुए तनिक से लाभ की तुलना में कहीं अधिक महँगी या भारी पड़े। यही कारण है कि इन दिनों रोगी एक से दूसरे चिकित्सक के पास जाते और दवाएँ बदलते, जेब कटाते और खीजते-खिजाते जहाँ-तहाँ फिरते हैं।
स्वास्थ्य सुधार के निमित्त आहार-विहार को प्रकृति के अनुरूप सादा और सात्विक बनाने के अतिरिक्त दूसरी आवश्यकता यह है कि मानसिक दबाव एवं तनाव घटाये जायँ। इनमें से जो नैतिक स्तर के हैं उनका निवारण तो दृष्टिकोण और चरित्र में आदर्शों के समावेश से ही हो सकता है, पर जो सनक स्तर के हैं, उनके लिए मात्र स्वभाव में थोड़ा-सा हेर-फेर करने से भी काम चल सकता है।
हर रोगी को, हर स्वास्थ्य सुधार के इच्छुक को इतना समझना, समझाया जाना आवश्यक है कि उन्हें यदि बेमौत मरने की जल्दी नहीं है तो जीवनचर्या को सौम्य, शालीन चिन्तन और आचरण में जितना सुधार, परिष्कार हो सके, करें। सादगी और सात्विकता अपनायें। सज्जनता और शालीनता के साँचे में अपने को ढालें। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाने और वासना, तृष्णा, अहंता की आग में अपनी जीवन-सम्पदा को न जलायें। उच्चस्तरीय सफलताओं के लिए व्यक्तित्व की गरिमा को सम्पन्न बनाया जाना चाहिए। मनोबल इसी आधार पर बढ़ता है।
प्रसंग यहाँ समग्र स्वास्थ्य सुधार का चल रहा है। मानसिक विक्षोभों का निराकरण शालीनता अपनाने और मर्यादाएँ पालने से ही सम्भव है। नैतिकता ही समग्र आरोग्य और दीर्घ जीवन की गारन्टी है। अस्तु, इस दिशा में जो जितना अनुशासन अपना सके, उसमें कभी न रहने दे। जो अनुपयुक्त बन पड़ा है उसके परिमार्जन का उपाय प्रायश्चित ही हो सकता है। खोदी गई खाई को पाटा जाना चाहिए। दुष्कृत्यों से समाज को जो हानि पहुँचाई गई है उसकी पूर्ति के लिए परमार्थपरक सत्कर्मों का एक सुनिश्चित व्रत धारण करना चाहिए। पाप का प्रायश्चित पुण्य को दूसरे पलड़े पर रखने से ही बन पड़ता है। मात्र पंचामृत पीने और गंगा नहाने भर से वह भार उतरता नहीं, जो विश्व व्यवस्था में अनीति का विक्षोभ उत्पन्न करके सिर पर लादा गया है। धर्मशास्त्रों में रोग निवारण का एक उपचार पुण्य-परमार्थ भी बताया गया है। यह आडम्बर नहीं वरन् मनःचिकित्सा विज्ञान के सर्वथा अनुरूप है।
रुग्णता का दूसरा मनोवैज्ञानिक कारण सनकों का समुच्चय है। निराशा, आशंका, चिन्ता जैसी सनकें चाहे अकारण हो या सकारण, उनका प्रभाव मानसिक तनावों के रूप में निश्चित रूप से होता है। उतने भर से अनिद्रा, स्वल्प निद्रा जैसी अनेकों व्यथाएँ उठ खड़ी होती हैं। इतना ही नहीं अपच रहने लगता है, रक्तसंचार और श्वास-प्रश्वास में शिथिलता आने के कारण छुट-पुट रोग उपजते हैं और वे देर तक बने रहने पर जड़ जमा लेते हैं। सनकजन्य उद्वेगों का समाधान अपेक्षाकृत सरल है। चूँकि उनका कारण चरित्र की गहराई में छिपा नहीं होता। मात्र चिन्तन की अनगढ़ता के कारण स्वभाव की उथली परतों पर बिखरा होता है। उसे आसानी से कुरेदा और बुहारा जा सकता है। इतना बन पड़े तो भी समझना चाहिए कि रुग्णता पर आधी विजय मिल गई।
मन हल्का हो तो मुसकराहट आये यह बात सच है, पर यह भी झूठ नहीं है कि मुसकराते रहने की आदत डाल लेने पर मन हलका रहने लगता है और भ्रान्तजन्य विक्षोभों का भार बहुत हद तक उतर जाता है। कृत्रिम मुसकराहट का अभ्यास दर्पण के सामने खड़े होकर हर दिन एक नियमित साधना की तरह करते रहने पर भी हो सकता है।
मुस्कराते हुए मनुष्य का सौंदर्य तत्काल दूना हो जाता है। क्रुद्ध व्यक्ति भी यदि मुस्कराने लगे तो उसका चेहरा कमल जैसा खिला हुआ दीखेगा और पीले उखड़े दाँत भी मोतियों की माला जैसे सुन्दर लगेंगे। मुसकराहट कितनी ही बातों का परिचय देती है। उससे आत्मविश्वास एवं आन्तरिक सन्तोष, उल्लास झलकता है । होठों पर टँगी हुई यह तख्ती बताती है कि इस व्यक्ति को सन्तोष और उल्लास उपलब्ध हैं, यह सफल होता और प्रगति करता है। अभावग्रस्त और दुःखी-दरिद्र न होने की जानकारी भी दर्शकों को मुसकराता हुआ चेहरा देता । एक अर्थ में मुस्कराहट सफल और सुखी जीवन की घोषणा है। इस परिचय से किसी की भी प्रामाणिकता सिद्ध हो सकती है।
जब हम हँसते हैं तो साथ देने के लिए अनेकों साथ हो लेते हैं, पर जब रोते हैं या रोने जैसी सूरत बनाते हैं तो नयों का आकर्षित होना तो दूर पुराने भी घटने और हटते जाते हैं, रोने वाला अकेला ही रोता है। किसी के गम में लोग लोकाचार की तरह ही सम्मिलित होते हैं। देर तक साथ देकर कोई भी अपनी प्रसन्नता में कटौती नहीं करना चाहता ! इसके अतिरिक्त निराश असफल व्यक्ति से यह भी भय रहता है कि कहीं पैसे की अथवा दूसरे प्रकार की सहायता न माँगने लगे, प्रसन्नचित को सुखी, समृद्ध समझकर लोग उसके समर्थ सम्पन्न होने की बात सोचते हैं और यह समझकर साथ देते हैं कि उस प्रसन्नता में से समय पड़ने पर उन्हें भी कुछ हिस्सा मिल सकता है।
मुस्कराने वाला, हँसी-खुशी के वातावरण में अधिक काम कर लेता है, साथ ही उनसे भी अधिक काम करा लेता है जो साथ में काम करते हैं। मुसकराहट थकान मिटाने की अचूक दवा है। उसका सेवन करने वाला न केवल स्वयं तरोताजा रहता है वरन् समीपवर्तियों को भी ऐसी ताजगी प्रदान करता है जिसके सहारे वे भी थकान और तनाव से मुक्ति पा सकें।
बहुत-सी भली-बुरी आदतें आदमी अभ्यास करते-करते सीख लेता है। दर्पण के सहारे मानव मित्र मण्डली में हास्य कथाएँ चलाते हुए इस सद्गुण को कोई भी अपने स्वास्थ्य लाभ की बात तो निश्चित रूप से बनती है साथ ही ऐसी अनेक उपलब्धियाँ भी हस्तगत होती हैं जो बहुमुखी सफलताओं का पथ-प्रशस्त कर सकें ।
“वरं त्रूहि!” उस दिन उस नीरव रात्रि में पता नहीं क्यों उसकी निद्रा टूट गयी। वैसे वह इतनी प्रगाढ़ निद्रा में सोता है कि सिर पर ढोल बजे तो भी शायद उसकी नींद न टूटे। पूरा कमरा प्रकाशित है और एक देवता उसके समीप खड़े थे। देवता इसलिए कि प्रकाश उनके शरीर से ही निकल रहा था- जैसे किसी धुएँ के समान प्रकाशित पदार्थ द्वारा उनकी देह का निर्माण हो। साथ ही वे उसे वरदान माँगने को कह रहे थे- वरदान माँगने को या तो कोई देवता कहेगा या फिर ऋषि। वे ऋषि हो नहीं सकते, क्योंकि ऋषियों के जटा-जूट होते हैं और वे इतने रत्न-आभूषण क्यों धारण करने लगे ?
‘धन्यवाद’ वह भी अद्भुत अक्खड़ है- ऐसा कि आपको ऐसे अक्खड़ जीवन में कम ही मिले होंगे। बिस्तर पर उठकर बैठ गया था वह, किन्तु उसने उठकर खड़े होने , देवता की वन्दना - अभ्यर्थना करने का उपक्रम नहीं किया। भय भला क्या लगना था- जो वरदान माँगने को कह रहा था, उससे भय की तो कोई बात नहीं। वैसे भी उसे भय लगता होता तो सर्वथा एकाकी निर्जन स्थान पर अन्य ग्रहों से दूर यहाँ आवास स्वीकार नहीं करता।
मैंने तो आपको बुलाया नहीं था। आपसे कोई प्रार्थना कभी मैंने भूल से भी नहीं की होगी। देवता खड़े थे और अपने शयन के आसन पर बैठे-बैठे ही वह उनसे कहे जा रहा था। साथ ही ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर तक देवता को देख रहा था बार-बार। उसने जो पढ़ा-सुना, उसमें से कोई लक्षण मिल जाए तो देवता को पहचान ले। देवता के चरण-भूमि का स्पर्श नहीं कर रहे थे- इसके अतिरिक्त और कोई लक्षण उसे ऐसा नहीं मिला, जिससे वह उनका नाम जान सकता। अतः बोला “आपको स्वीकार हो तो आसन ग्रहण कर लें और मैं जल पिला सकता हूँ”।
परिचय उसने पूछा नहीं। नाभ-थाम-श्रम वह किसी से भी मिले, पूछना उसके स्वभाव में नहीं है। लोग उससे पूछते हैं तो उसे झल्लाहट होती है। किन्तु देवता-देवता का परिचय जानना भी उसे आवश्यक नहीं लगा। अपने तख्ते पर एक ओर थोड़ा खिसक गया, जैसे देवता को बैठना हो तो उसी के बराबर बैठ जाय। ऐसे कहीं देवता को आसन दिया जाता है ? देवता क्या प्यासा आया होगा उसके यहाँ पानी पीने ? किन्तु यह बात भी सच है कि उसके पास देवता को भेट करने के लिए उस समय कुछ नहीं था। रात्रि में पुष्प का तो प्रश्न ही नहीं उठता। कोई कह सकता है- “उसे उठकर खड़े हो जाना था। जल हाथ में लेकर निवेदन करना था।” यह सब उसने नहीं किया। उसे यह आवश्यक नहीं जान पड़ा।
“वरं ब्रूहि !” देवता ने भी जैसे दूसरा वाक्य सीखा ही न हो। उन्होंने आसन नहीं ग्रहण किया। जल की उन्हें आवश्यकता नहीं थी। वैसे देवता को सदा मनुष्य के दान की आवश्यकता होती है। मानव का श्रद्धा-दान हव्य, कव्य न मिले तो स्वर्ग और पितृलोक में दुर्भिक्ष पड़ जाय। इसलिए देवता को मनुष्य से अपेक्षा नहीं है। यह नहीं कहा जा सकता।
मनुष्य देवताओं को तृप्त करे हवन, पूजनादि से और देवता यथावत् वृष्टि , वायु, महामारी आदि का नियन्त्रण करके मनुष्य को सुखी, समृद्ध बनाते रहे- व्यवस्था यही है। केवल परमात्मा पूर्णकाम, नित्य, निरपेक्ष है। उसे मनुष्य जो कुछ देना चाहता है-देने का उद्योग करता है वह अनन्त गुणित होकर लौट आता है उसी के समीप, किन्तु देवता तो ऐसे नहीं है। अतः उसका भाव था- तुम वरदान देने आये, मुझे वरदान चाहिए कि नहीं यह भिन्न प्रश्न है, किन्तु मैं तुम्हें जल पिला सकता हूँ, यदि तुम पीना चाहो।
“वरं ब्रूद्धि।” देवता को पता नहीं क्यों वरदान देने की धुन चढ़ी थी और वह चाहता था कि वरदान लेना था, उसे कोई शीघ्रता या तत्परता उसमें नहीं जान पड़ती थी।
वह कौन है? आप अवश्य जानना चाहते होंगे, किन्तु नाम, धाम, पता, ठिकाना कोई पूछे तो उसे झल्लाहट होती है। कहता है व्यक्ति का क्या परिचय ? कल उत्पन्न हुआ, परसों मर जाएगा। मिट्टी के ढेले को एक आकार मिल गया- इस खिलौने का भी कोई परिचय हुआ करता है ?
‘तुमने साधु वेष क्यों ग्रहण नहीं किया ? एक महात्मा ने उससे एक बार पूछा था ? पूछना उचित था, क्योंकि जिसके कुल, परिवार में कोई नहीं, जिसकी कहीं कोई झोंपड़ी तक नहीं, वह क्यों अपने को गृहस्थ कहता है। वह धोती, कमीज में क्यों रहता है ? समाज की वर्तमान परिपाटी को देखते हुए उसे ऐसे ढंग से क्यों रहना चाहिए ?
‘मैं क्यों साधु वेष ग्रहण करता ? क्या प्रयोजन था इसका ? उसने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न कर दिया था। कहने लगा- सहज प्राप्य क्यों है ? यह प्रश्न अनुचित है।’ उसमें परिवर्तन क्यों किया जाय? यह प्रश्न ठीक है।
दूसरे साधु वेष किसी प्रयोजन से ग्रहण करते हैं? महात्मा ने पूछा।
दूसरों की बात मैं कैसे कह सकता हूँ। वह बोला वैसे साधु वेष ग्रहण करने के चार प्रयोजन मेरी समझ में आते हैं। उत्तम प्रयोजन-संसार से वैराग्य हो गया हो और कुटुम्ब परिवार का बन्धन अंतर्मुखी होने में बाधा दे रहा हो। मध्यम प्रयोजन-आसक्ति कहीं हो नहीं और साधन, भजन करने में पूरा समय लगाना हो। शरीर निर्वाह के लिए बिना माँगे भिक्षा मिल जाया करे। निकृष्ट प्रयोजन-सम्मान, संपत्ति, भोग, भरपूर चाहिए, किन्तु कुछ उद्योग करने की इच्छाशक्ति न हो।
जिसके कुटुम्ब-परिवार घर-द्वार कोई है ही नहीं, उसके लिए इस बन्धन से छुटकारे का प्रश्न ही नहीं उठता था। शरीर निर्वाह के लिए उसे जितना कम श्रम करना पड़ता है। जितनी स्वच्छन्दता उसके श्रम में है, उतना तो भिक्षाजीवी को भी करना ही पड़ता है। सम्मान उसे सहज प्राप्त है और संग्रह की सनक उसे है नहीं। यह कहता है- मैं प्रायः अस्थिर रहता हूँ। एक तौलिया भी अधिक रख लूँ तो उसे ढोते फिरना होगा। बात त्याग की नहीं, समझदारी की है। जितने से ठीक एक जीवन निर्वाह हो जाता है- सुख से, सुविधा से, सामाजिक शिष्टता को रखते हो जाता है, उतना रखता हूँ। अधिक को ढोते फिरने की मूर्खता नहीं कर सकता। फिर भाई मेरे! ज्ञान या भगवद् दर्शन मनुष्य को होता है, ऐसा न तो कोई शास्त्र कहता है और न किसी संत ने कभी कहा है।
‘भोगे रोग भयं’ - अधिक जिह्वा लोलुप बनोगे तो पेट खराब हो जाएगा और सामान्य रसास्वाद के सुख से भी वंचित कर दिए जाओगे। अधिक काम बढ़ेगा, तो वह शक्ति प्रकृति छीन लेगी। स्नायु दौर्बल्य, हृदय दौर्बल्य एवं पता नहीं कितने कष्ट-साध्य , असाध्य रोगों की भीड़ खड़ी है कि तुम इस ओर बढ़ो और वे बलात् तुम्हारी देह को अपना आवास बनालें।
‘भोग जीवन के लिए है, जीवन या देह भोग के लिए नहीं है। यह या ऐसी बातें हम आप सबने पढ़ी-सुनी हैं। इसको जीवन में किसने कितना अपनाया है, यह भिन्न बात है। किन्तु यह सत्य तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि जिसने जितना अधिक इन्हें अपनाया है उतना स्वस्थ एवं सुखी है वह। जिसने जितनी इनकी उपेक्षा की है, वह उतना रोगी, दुखी है।
इसका अपना ढंग है। कहता है अनावश्यक संग्रह करके उसकी चिन्ता करते रहना और उसे ढोते फिरना मूर्खता है। मैं अपने आपको एवयं मूर्ख नहीं बना सकता। इससे भी बड़ी मूर्खता है किसी इन्द्रिय के पीछे इतना पड़ना कि उसकी शक्ति, उसकी उपयोगिता ही नष्ट हो जाय। एक समय जीभ के बहकावे में जो आया- दूसरे समय के उपवास से ही उसका छुटकारा हो जाय तो बहुत कुशल हुई। अन्यथा पेट-दर्द, सिरदर्द आदि पता नहीं क्या-क्या उपहार सिर पड़ने वाले हों।
‘इन्द्रियों के बहकावे में जो आया- उसके लिए रोगों का नरक तैयार।’ यह उसका अपना विवेचन है। इन्द्रियों की तृप्ति तो कभी होने की नहीं, यह वे भी कहते हैं, जो इनका स्वभाव बिगाड़ देते हैं। अन्यथा इन्द्रियों का काम तो इनको अपने विषय को व्यक्त करना मात्र है। जीवन के लिए जितना उपयोगी है उतना रस पदार्थ भोग सेवन समझदारी है।
अब ऐसे व्यक्ति को वरदान देने देवता आ गए। क्यों आ गए हैं, यह बात तो वे ही जानते होंगे। देवताओं को भी सम्भव है, कि ऐसा कुछ व्यसन होता हो।
“आप क्या दे सकते हैं ?” उसने देवता की ओर ऐसे ढंग से देखा कि उस दृष्टि में जिज्ञासा का भाव तो सर्वथा नहीं था।
‘धन, रत्न, बल, यश, पद, प्रभुत्व, सिद्धियाँ।’ देवता के स्वर में गम्भीरता के स्थान पर उल्लास अधिक था। जैसे वरदान उसे न मिलकर स्वयं देवता को मिलने वाले हो-”एवं स्वर्ग से सम्बन्धित गन्धार्वादि लोकों में जो प्राप्य है वह भी।”
“अच्छा तो तुम मुझे मूर्ख बनाने आए हो? वह खुलकर हँसा। अच्छा हुआ, क्योंकि सम्भावना इसी की थी कि वह क्रुद्ध हो जाता और देवता को झिड़क देता, किन्तु देवता को आप के स्थान पर तुम तो वह कहने ही लगा था।
ऐसा तो नहीं है। देवता भी चौका। उस बेचारे देवता को भी ऐसा व्यक्ति अभी मिला नहीं होगा। उसने बड़े गम्भीर भाव से कहा- “प्रतिभा, कला, विद्या का वरदान भी चाहो तो माँग सकते हो।
अनावश्यक पदार्थ और पैसा जैसे भार है, वैसे ही विद्या, प्रतिभा भी भार ही है । उसने देवता की ओर ऐसे देखा जैसे किसी मित्र को समझा रहा हो। ‘तुम देख ही रहे हो जीवन के लिए जो पदार्थ, जो धन, जितनी विद्या, बुद्धि आवश्यक है मेरे पास वह है। मुझे इससे अधिक का लोभ नहीं है।
सिद्धियाँ.... देवता ने कहना चाहा।
बको मत! बेचारे देवता को डाँट दिया गया।’ मैं मनुष्य हूँ।’ पक्षी आकाश में उड़ते हैं और मछली जल में डूबी रहती है। चींटी नन्ही है और हाथी भारी। तुम्हारी ऐसी कौन-सी सिद्धि है, जो किसी पशु-पक्षी अथवा कृमि में सहज नहीं है? मनुष्य के मन में तुम प्रकारान्तर से पशु-पक्षी या कीट के गुण का लोभ उत्पन्न करना चाहते हो।
मनुष्य को भी पद-प्रतिष्ठा की स्पृहा होती है। देवता पता नहीं क्यों डाँट खाकर भी रुष्ट नहीं हुआ था। वह सम्भवतः असफल होकर जाने के लिए तैयार नहीं था। उसने कहा-”आपके समीप सामग्री थोड़ी है। शरीर सदा स्वस्थ रहे- इसका आश्वासन नहीं है। आपको इस ओर से मैं निश्चिन्त कर सकता हूँ।”
आश्चर्य की बात यह है कि डाँटे जाने के बाद देवता ने उसे तुम के स्थान पर आप कहना प्रारम्भ कर दिया था किन्तु इस ओर उसने ध्यान नहीं दिया। वह कह रहा था- “तुम देवता हो, मेरी शरीर की शक्ति, मेरी बुद्धि, मेरी विद्या कितनी अल्प है- यह तुमसे अज्ञात नहीं होना चाहिए। इतना होने पर भी मेरी निश्चिन्तता, मेरी सुव्यवस्था तुम देख सकते हो।
किन्तु यह सब तो इस समय है। देवता ने बड़े संकोच से कहा- भाग्य जब तक आप पर अनुकूल रहा है।
किसका भाग्य अनुकूल रहा है ? उसने व्यंगपूर्वक पूछा- “परिवार- परिच्छेद, पाथेय एवं अध्ययन का उच्छेद क्या अनुकूल भाग्य किया करता है ?”
देवता को भी नहीं सूझ रहा था कि वह इसका क्या उत्तर दे। वह मौन रह गया। दो क्षण रुककर उसने कहा- तुम देवता सही, तुम्हारी दिव्य दृष्टि की सीमा है। तुम उन आदि-शक्ति जगत्माता को नहीं देख पा रहे हो, यह तुम्हारा दोष नहीं है। तुम जानते हो जिन जगत्माता आदि शक्ति माँ गायत्री के कृपा-कटाक्ष से सृष्टि चक्र संचालित होता रहा है। उनके आश्रित बालक को तुम वरदान देने आए हो।
देव ! जैसे कोई बड़ी भूल हो गयी हो। देवता इस प्रकार केवल एक शब्द बोल सका और क्योंकि वह देवता था, उसे वहीं अदृश्य होने में कहीं क्षण लगना था।
उसके अदृश्य होते ही योगी अनिर्वाण मुस्करा पड़े। उन्हें अब नित्यकर्म से निवृत्त हो प्रातः उपासना में बैठना था। उनकी मुसकान कह रही थी- “समस्त भोग जीवन के लिए है”- मनुष्य को यह तथ्य समझ में आ जाए तो उसे न इन्द्रियाँ मूर्ख बना सकती हैं न देवता। मनुष्य जब इस सत्य को छोड़कर इन्द्रियों को व्यक्त करने के लोभ में पड़ता है, तो उसे मूर्ख ही नहीं, रोगी भी बनना पड़ता है और कष्टों की परम्परा में जकड़ा जाकर विवश होना पड़ता है। सिद्धियों की फिर ऐसे को आवश्यकता ही क्या हो सकती है।
पिछले दिनों अनेकानेक नये परिजन गायत्री परिवार के- अखण्ड ज्योति परिवार के अंग- अवयव बने हैं। प्रज्ञा अभियान- युग निर्माण योजना - गायत्री परिवार तीनों एक ही मिशन को प्रतिध्वनित करने वाले नाम हैं, जो समय-समय पर इस संस्थान के लिए प्रयुक्त होते रहे हैं। परमपूज्य गुरुदेव- परम वंदनीया माताजी एवं विशिष्ट उद्देश्यों को लेकर चला यह मिशन परस्पर गुँथे हुए हैं। प्रस्तुत परिचय इसी संदर्भ में है। यद्यपि इसे युग ऋषि के वाङ्मय के प्रत्येक खण्ड में दिया गया है तथापि जन-जन तक यह जानकारी विस्तार से पहुँच पाये, इस उद्देश्य के साथ इसे गुरुपूर्णिमा के परिप्रेक्ष्य में अपने श्रद्धासुमनों के साथ पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है-
इतिहास में कभी-कभी ऐसा होता है कि अवतारी सत्ता एक साथ बहुआयामी रूपों में प्रकट होती है एवं करोड़ों की नहीं, पूरी वसुधा के उद्धार- चेतनात्मक धरातल पर सबके मनों का नये सिरे से निर्माण करने आती है। परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य को एक ऐसी ही सत्ता के रूप में देखा जा सकता है, जो युगों-युगों में गुरु एवं अवतारी सत्ता दोनों ही रूपों में हम सबके बीच प्रकट हुई, अस्सी वर्ष का जीवन जीकर, एक विराट ज्योति प्रज्ज्वलित कर उस सूक्ष्म ऋषि चेतना के साथ एकाकार हो गयी, जो आज युग परिवर्तन को सन्निकट लाने को प्रतिबद्ध है। परम वंदनीया माताजी शक्ति का रूप थीं जो कभी महाकाली कभी माँ जानकी, कभी माँ शारदा एवं कभी माँ भगवती के रूप में शिव की कल्याणकारी सत्ता का साथ देने आती रही हैं। उनने भी सूक्ष्म में विलीन हो स्वयं को अपने आराध्य के साथ एकाकार कर ज्योति पुरुष का एक अंग स्वयं को बना लिया। आज दोनों सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु नूतन सृष्टि कैसे ढाली गयी, कैसे मानव को गढ़ने का साँचा बनाया गया ? इसे शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस, गायत्री तपोभूमि, अखण्ड ज्योति संस्थान एवं युगतीर्थ आँवलखेड़ा जैसी स्थापनाओं तथा संकल्पित सृजन सेनानी जनों के वीरभद्रों की करोड़ों से अधिक की संख्या के रूप में देखा जा सकता है।
परमपूज्य गुरुदेव का वास्तविक मूल्याँकन तो कुछ वर्षों बाद इतिहासविद् मिथक लिखने वाले करेंगे, किन्तु यदि उनको आज भी साक्षात् कोई देखना या उनसे साक्षात्कार करना चाहता हो तो उन्हें उनके द्वारा अपने हाथ से लिखे गए इस विराट् परिमाण में साहित्य के रूप में- युग संजीवनी के रूप में देख सकता है। जो वे अपने वजन से अधिक भार के बराबर लिख गए। इस साहित्य में संवेदना का स्पर्श इस बारीकी से हुआ है कि लगता है कि लेखनी को उसी की स्याही में डुबाकर लिखा गया हो। हर शब्द ऐसा जो हृदय को छूता , मन को, विचारों बदलता चला जाता है। लाखों-करोड़ों के मनों को, अंतस्तल को छूकर इसने उनका कायाकल्प कर दिया। रूसो की प्रजातंत्र की व कार्लमार्क्स की साम्यवाद की क्रान्ति भी इसके समक्ष बौनी पड़ जाती है। उनके मात्र इस युग व्यास वाले स्वरूप को लिखने तक में लगता है कि एक विश्वकोष तैयार हो सकता है, फिर उस बहुआयामी रूप को जिसमें वे संगठनकर्त्ता, साधक, करोड़ों के अभिभावक, गायत्री महा विज्ञान के उद्धारक, संस्कार परम्परा का पुनर्जीवन करने वाले, ममत्व लुटाने वाले एक पिता नारी जाति के प्रति अनन्य करुणा बिखेरकर उनके ही उद्धार के लिए धरातल पर चलने वाले नारी जागरण अभियान चलाते देखे जाते हैं। अपनी वाणी से , उद्बोधन से एक विराट गायत्री परिवार एकाकी अपने बलबूते खड़े करते दिखाई देते हैं तो समझ में नहीं आता क्या-क्या लिखा जाय, कैसे छन्दबद्ध, लिपिबद्ध किया जाय, उस महापुरुष के जीवन चरित्र को!
आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विक्रमी संवत् 1968, बीस सितम्बर 1911 को स्थूल शरीर से आँवलखेड़ा ग्राम में जनपद आगरा जो जलेसर मार्ग पर आगरा से पन्द्रह मील की दूरी पर स्थित है में जन्मे श्रीराम शर्मा जी का बाल्यकाल-कैशोर्यकाला ग्रामीण परिसर में ही बीता। वे जन्मे तो थे एक जमींदार घराने में, जहाँ उनके पिता श्री पं0 रूपकिशोर जी शर्मा आसपास की कोसों दूर के राजघरानों के राजपुरोहित , उद्भट विद्वान, भागवत कथाकार थे, किन्तु उनका अंतःकरण मानव मात्र की पीड़ा से सतत् विगलित रहता था। साधना के प्रति उनका सम्मान बचपन में ही दिखाई देने लगा, जब वे अपने सहपाठियों को, छोटे बच्चों को अमराइयों में बिठाकर स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुसंस्कारिता अपनाने वाली आत्मविद्या का शिक्षण दिया करते थे। छटपटाहट के कारण हिमालय की ओर भाग निकलने व पकड़े जाने पर उन्होंने संबंधियों को बताया कि हिमालय की उनका घर है एवं वहीं वे जा रहे थे। किसे मालुम था कि हिमालय की ऋषि चेतनाओं का समुच्चय बनकर आयी यह सत्ता वस्तुतः अगले दिनों अपना घर वहीं बनाएगी। जाति-पाँति का कोई भेद नहीं। जातिगत मूढ़ता भरी मान्यता से ग्रसित तत्कालीन भारत के ग्रामीण परिसर में एक अछूत वृद्ध महिला की, जिसे कुष्ठ रोग हो गया था, उसी के टोले में जाकर सेवा कर उन्होंने घरवालों का विरोध तो मोल ले लिया पर अपना व्रत नहीं छोड़ा। उस महिला ने स्वस्थ होने पर उन्हें ढेरों आशीर्वाद दिए। एक अछूत कहलाने वाली जाति का व्यक्ति जो उनके आलीशान घर में घोड़ों की मालिश करने आता था, एक बार कह उठा कि मेरे घर कथा कौन कराने आएगा ? मेरा ऐसा सौभाग्य कहाँ ? नवनीत जैसे हृदय वाले पूज्यवर उसके घर जा पहुँचे एवं कथा पूरे विधान से कर पूजा की, उसको स्वच्छता का पाठ सिखाया, जबकि सारा गाँव उनके विरोध में बोल रहा था।
किशोरावस्था में ही समाज सुधार की रचनात्मक प्रवृत्तियाँ उनने चलाना आरम्भ कर दी थीं। औपचारिक शिक्षा पाँचवीं तक ही पायी थी, किन्तु उन्हें उसके बाद आवश्यकता भी नहीं थी क्योंकि जो जन्मजात प्रतिभासम्पन्न हो वही स्कूली पाठ्यक्रम तक सीमित कैसे रह सकता है ? हाट-बाजारों में जाकर स्वास्थ्य शिक्षा प्रधान परिपत्र बाँटना पशुधन को कैसे सुरक्षित रखें तथा स्वावलम्बी बनें ? इसके छोटे- छोटे पैम्फलेट्स लिखने, हाथ की प्रेस से छपवाने के लिए उन्हें किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं थी। वे चाहते थे जनमानस आत्मावलम्बी बने- राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान उसका जागे, इसीलिए गाँव में जन्मे इस लाल ने नारी-शक्ति व बेरोजगार युवाओं के लिए गाँव में ही एक बुनताघर स्थापित किया व उसके द्वारा हाथ से कैसे कपड़ा बुना जाय, अपने पैरों पर कैसे खड़ा हुआ जाय ? वह सिखाया।
पंद्रह वर्ष की आयु में बसंत पंचमी की बेला में सन् 1926 में उनके घर को पूजास्थली में, जो उनकी नियमित उपासना का तब से आगार थी जबसे महामना मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें काशी में गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी, उनकी गुरुसत्ता का आगमन हुआ अदृश्य छायाधारी सूक्ष्म रूप में। उनने प्रज्ज्वलित दीपक की लौ में से स्वयं को प्रकट कर उन्हें उनके द्वारा विगत कई जन्मों में सम्पन्न क्रिया -कलापों का दिग्दर्शन कराया तथा उन्हें बताया कि वे दुर्गम हिमालय से आए हैं एवं उनसे अनेकानेक ऐसे क्रिया-कलाप कराना चाहते हैं जो अवतारी स्तर की ऋषि सत्ताएँ उनसे अपेक्षा रखती हैं। चार बार कुछ दिन से लेकर एक साल तक ही अवधि तक हिमालय आकर रहने, कठोर तप करने का भी उनने संदेश दिया एवं उन्हें तीन संदेश दिए- (1) गायत्री महाशक्ति के चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण जिन्हें आहार के कठोर तय के साथ पूरा करना था। (2) अखण्ड घृतदीप की स्थापना एवं जन-जन तक उसका प्रकाश फैलाने के लिए समय आने पर ज्ञान यज्ञ अभियान चलाना, जो बाद में अखण्ड ज्योति पत्रिका के 1938 के प्रथम प्रकाशन से लेकर विचार क्रान्ति अभियान के विश्वव्यापी होने के रूप में प्रकटा तथा (3) चौबीस महापुरश्चरण के दौरान युगधर्म का निर्वाह करते हुए राष्ट्र के निमित्त भी स्वयं को खपाना, हिमालय यात्रा भी करना तथा उनके संपर्क से आगे का मार्गदर्शन लेना।
यह कहा जा सकता है कि युग निर्माण मिशन, गायत्री परिवार, प्रज्ञा अभियान, पूज्य गुरुदेव जो सभी एक दूसरे के पर्याय है की जीवनयात्रा का यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने भावी रीति-नीति का निर्धारण कर दिया। पूज्य गुरुदेव अपनी पुस्तक ‘हमारी वसीयत और विरासत’ में लिखते हैं कि “प्रथम मिलन के दिन समर्पण सम्पन्न हुआ। दो बातें गुरु-सत्ता द्वारा विशेष रूप से कही गयी “संसारी लोग क्या करते हैं और क्या कहते हैं, उसकी ओर से मुँह मोड़कर निर्धारित लक्ष्य की ओर एकाकी साहस के बलबूते चलते रहना एवं दूसरा यह कि अपने को अधिक पवित्र और प्रखर बनाने की तपश्चर्या में जुट जाना- जौ की रोटी व छाछ पर निर्वाह कर आत्मानुशासन सीखना। इसी से वह सामर्थ्य विकसित होगी जो विशुद्धतः परमार्थ प्रयोजनों में नियोजित होगी । बसंत पर्व का यह दिन गुरु अनुशासन का अवधारण ही हमारे लिए नया जन्म बन गया। सद्गुरु की प्राप्ति हमारे जीवन का अनन्य एवं परम सौभाग्य रहा”।
राष्ट्र के परावलम्बी होने की पीड़ा भी उन्हें उतनी ही सताती थी जितनी कि गुरुसत्ता के आदेशानुसार तपकर सिद्धियों के उपार्जन की ललक उनके मन में थी। उनके इस असमंजस को गुरुसत्ता ने ताड़कर परावाणी से उनका मार्गदर्शन किया कि युग धर्म की महत्ता व समय की पुकार देख-सुन कर तुम्हें अन्य आवश्यक कार्यों को छोड़कर अग्निकाण्ड में पानी में लेकर दौड़ पहने की तरह आवश्यक कार्य भी करने पड़ सकते हैं। इसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते संघर्ष करने का भी संकेत था। 1927 से 1933 तक का समय उनका एक सक्रिय स्वयंसेवक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बीता, जिसमें घरवालों के विरोध के बावजूद पैदल लम्बा रास्ता पार कर वे आगरा के उस शिविर में पहुँचे, जहाँ शिक्षण दिया जा रहा था, अनेकानेक मित्रों, सखाओं, मार्ग- दर्शकों के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये। छह-छह माह की उन्हें कई बार जेल हुई। जेल में भी वे बच्चों को शिक्षण देकर व स्वयं अंग्रेजी सीखकर लौटे। आसनसोल जेल में वे श्री जवाहरलाल नेहरू की माता श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, श्री रफी अहमद किदवई, महामना मालवीय जी, देवीदासव गाँधी जैसी हस्तियों के साथ रहे व वहाँ से एक मूलमंत्र सीखा जो मालवीय जी ने दिया था कि जन-जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड मंत्र आगे चलकर एक घण्टा समयदान, बीस पैसा नित्य या एक दिन का वेतन एक माह में तथा एक मुट्ठी अन्न रोज डालने के माध्यम से धर्मघट की स्थापना का स्वरूप लेकर लाखों-करोड़ों की भागीदारी वाला गायत्री परिवार बनता चला गया। जिसका आधार था प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश।
स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान कुछ उग्र दौर भी आए, जिनमें शहीद भगतसिंह को फाँसी दिये जाने पर फैले जन-आक्रोश के समय श्री अरविन्द के किशोर काल की क्राँतिकारी स्थिति की तरह उनने भी वे कार्य किये, जिनसे आक्रान्ता शासकों के प्रति असहयोग जाहिर होता था । नमक आँदोलन के दौरान वे आततायी शासकों के समक्ष झुके नहीं, वे मारते रहे परन्तु समाधि-स्थिति को प्राप्त राष्ट्र देवता के पुजारी को बेहोश होना स्वीकृत था पर आँदोलन से पीठ दिखाकर भागना नहीं। बाद में फिरंगी सिपाहियों के जाने पर लोग उठाकर घर लेकर आए। जरारा आँदोलन के दौरान उन्होंने झंडा नहीं छोड़ा, जबकि फिरंगी उन्हें पीटते रहे, झण्डा छीनने के प्रयास करते रहे। उन्होंने मुँह से झण्डा पकड़ लिया, गिर पड़े, बेहोश हो गए, पर झण्डे का टुकड़ा चिकित्सकों द्वारा दाँतों में भींचे गए, टुकड़े के रूप में जब निकाला गया तब सब उनकी सहनशक्ति देखकर आश्चर्यचकित हो गए। उन्हें तबसे ही आजादी के मतवाले उन्मत्त ‘ श्रीराम मत ‘ नाम मिला। अभी भी आगरा में उनके साथ रहे या उनसे कुछ सीख लिये अगणित व्यक्ति उन्हें ‘मत जी’ नाम से ही जानते हैं। लगानबन्दी के आँकड़े एकत्र करने के लिए उन्होंने पूरे आगरा जिले का दौरा किया व उनके द्वार ! प्रस्तुत वे आँकड़े तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के मुख्यमंत्री श्री गोविन्द बल्लभ पंत द्वारा गाँधी जी के समक्ष पेश किये गए। बापू ने अपनी प्रशस्ति के साथ वे प्रामाणिक आँकड़े ब्रिटिश पार्लियामेंट भेजे , इसी आधार पर पूरे संयुक्त प्रान्त के लगान माफी के आदेश प्रसारित हुए। कभी जिनने अपनी इस लड़ाई के बदले कुछ न चाहा। उन्हें सरकार ने अपना प्रतिनिधि भेजकर पचास वर्ष बाद ताम्रपत्र देकर शाँतिकुँज में सम्मानित किया। उसी सम्मान व स्वाभिमान के साथ सारी सुविधाएँ व पेंशन उनने प्रधानमंत्री राहत फण्ड, हरिजन फण्ड के नाम समर्पित कर दीं। वैरागी जीवन का सच्चे राष्ट्र संत होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है ?
1935 के बाद उनके जीवन का नया दौर शुरू हुआ, जब गुरुसत्ता की प्रेरणा से वे श्री अरविन्द से मिलने पाण्डिचेरी, गुरुदेव ऋषिवर रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने शान्तिनिकेतन तथा बापू से मिलने साबरमती आश्रम अहमदाबाद गए। सांस्कृतिक- आध्यात्मिक मोर्चे पर राष्ट्र को कैसे परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त किया जाय , यह निर्देश लेकर अपना अनुष्ठान यथावत् चलाते हुए उनने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया। जब आगरा में ‘सैनिक’ समाचार-पत्र के कार्यवाहक संपादक के रूप में श्रीकृष्ण दत्त पालीवालजी ने उन्हें अपना सहायक बनाया। बाबू गुलाब राय व पालीवाल जी से सीख लेते हुए सतत् स्वाध्यायरत रहकर उनने अखण्ड ज्योति नामक पत्रिका का पहला अंक 1938 की बसंत पंचमी पर प्रकाशित किया। प्रयास पहला था, जानकारियाँ कम थी अतः पुनः सारी तैयारी के साथ विधिवत् 1940 की जनवरी से उनने परिजनों के नाम पाती के साथ अपने हाथ से बने काज पर, पैर से चलने वाली मशीन से छापकर ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका का शुभारंभ किया जो पहले तो दो सौ पच्चीस पत्रिका के रूप में निकली, किन्तु क्रमशः उनके अध्यवसाय घर-घर पहुँचाने, मित्रों तक पहुँचाने वाले उनके हृदयस्पर्शी पत्रों द्वारा बढ़ती-बढ़ती नवयुग के मत्स्यावतार की तरह आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में छपती व एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है।
पत्रिका के साथ-साथ ‘मैं क्या हूँ’? जैसी पुस्तकों का लेखन आरंभ हुआ, स्थान बदा, आगरा से मथुरा आ गए, दो तीन घर बदल कर घीयामंडी में जहाँ आज ‘अखण्ड-ज्योति संस्थान’ है आ बसे। पुस्तकों का प्रकाशन व कठोर तपश्चर्या, ममत्व विस्तार तथा पत्रों द्वारा जन-जन के अंतःस्थल को छूने की प्रक्रिया चालू रही। साथ देने आ गयीं परम वंदनीया माताजी भगवती देवी शर्मा, जिन्हें भविष्य में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका अपने आराध्य इष्ट गुरु के लिए निभानी थी। उनके मर्मस्पर्शी पत्रों ने, भाव भरे आद्विथ्य हर किसी को जो दुःखी था, पीड़ित था दिये गये ममत्व भरे परामर्श ने गायत्री परिवार का आधार खड़ा किया, इसमें कोई संदेह नहीं यदि विचार क्रान्ति में साहित्य ने मनोभूमि बनायी तो भावनात्मक क्रान्ति में ऋषि युगल के असीम स्नेह ने ब्राह्मणत्व भरे जीवन ने शेष बची भूमिका निभायी।
‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका लोगों के मनों को प्रभावित करती रही, इसमें प्रकाशित ‘गायत्री चर्चा’ स्तम्भ से लोगों को गायत्री व यज्ञमय जीवन जीने का संदेश मिलता रहा, साथ ही एक आना से लेकर छह आना सीरिज की अनेकानेक लोकोपयोगी पुस्तकें छपती चली गयीं। इस बीच हिमालय के बुलावे भी आए, अनुष्ठान भी चलता रहा जो पूरे विधिविधान के साथ 1953 में गायत्री तपोभूमि की स्थापना, 108 कुंडी यज्ञ व उनके द्वारा दी गयी प्रथम दीक्षा के साथ समाप्त हुआ। गायत्री तपोभूमि की स्थापना के निमित्त धन की आवश्यकता पड़ी तो परम वंदनीया माताजी ने जिन्होंने हर कदम पर अपने आराध्य का साथ निभाया, अपने सारे जेवर बेच दिए, पूज्यवर ने जमींदारी के बाँण्ड बेच दिए व जमीन लेकर अस्थायी स्थापना कर दी गयी। धीरे-धीरे उदारचेताओं के माध्यम से गायत्री तपोभूमि एक साधनापीठ बन गयी। 2400 तीर्थों के जल व रज की स्थापना वहाँ की गयी, 2400 करोड़ गायत्री मंत्र लेखन वहाँ स्थापित हुआ, अखण्ड अग्नि हिमालय के अति पवित्र स्थान से लाकर स्थापित की गयी जो अभी तक वहाँ यज्ञशाला में जल रही है। 1941 से 1971 तक समय परमपूज्य गुरुदेव का गायत्री तपोभूमि - अखण्ड ज्योति संस्थान में सक्रिय रहने का समय है। 1956 में नरमेध यज्ञ, 1958 में सहस्रकुंडी यज्ञ करके लाखों गायत्री साधकों को एकत्र कर उनने गायत्री परिवार का बीजारोपण कर दिया। कार्तिक पूर्णिमा 1958 में आयोजित इस कार्यक्रम में दस लाख व्यक्तियों ने भाग लिया, इन्हीं के माध्यम से देश भर में प्रगतिशील गायत्री परिवार की दस हजार से अधिक शाखाएँ स्थापित हो गयी। संगठन का अधिकाधिक कार्यभार पूज्यवर परम वंदनीया माताजी पर सौंपते चले गए एवं 1949 में पत्रिका का संपादन उन्हें देकर पौने दो वर्ष के लिए हिमालय चले गए, जहाँ उन्हें गुरुसत्ता से मार्गदर्शन लेना था, तपोवन, नंदनवन में ऋषियों से साक्षात्कार करना था तथा गंगोत्री में रहकर आर्ष ग्रन्थों का भाष्य करना था। तब तक वे गायत्री महाविद्या पर विश्वकोश स्तर की अपनी रचना गायत्री महाविज्ञान के तीन खण्ड लिख चुके थे, जिसके अब तक प्रायः पैंतीस संस्करण छप चुके हैं। हिमालय से लौटते ही उनने महत्वपूर्ण निधि के रूप में वेद, उपनिषद् स्मृति, आरण्यक, ब्राह्मण, योग वाशिष्ठ, मंत्र महाविज्ञान, तंत्र महाविज्ञान जैसे ग्रन्थों को प्रकाशित कर देव-संस्कृति की मूल थाती को पुनर्जीवन दिया। परम वंदनीया माताजी ने इन्हीं वेदों को पूज्यवर की इच्छानुसार 1991-92 में विज्ञान-सम्मत आधार देकर पुनर्मुद्रित कराया एवं आज वे घर-घर में स्थापित हैं।
युग निर्माण योजना व ‘युग निर्माण सत्संकल्प’ के रूप में मिशन का घोषणापत्र 1963 में प्रकाशित हुआ । तपोभूमि एक विश्वविद्यालय का रूप लेती चली गयी तथा अखण्ड ज्योति संस्थान एक तपःपूत की निवासस्थली बन गया। जहाँ रहकर उनने अपनी शेष तप साधना पूरी की थी, जहाँ से गायत्री परिवार का बीज डाला गया था। तपोभूमि में विभिन्न शिविरों का आयोजन किया जाता रहा, पूज्यवर स्वयं छोटे-बड़े सम्मेलनों युवा योजनाओं के द्वारा विचार-क्रान्ति की पृष्ठभूमि बनाते रहे पूरे देश में 1970-71 में पाँच 1008 कुण्डी यज्ञ आयोजित कर स्थायी रूप से विदाई लेते हुए एक विराट सम्मेलन (जून 1971) में परिजनों को विशेष कार्यभार सौंप परम वंदनीया माताजी को शांतिकुंज हरिद्वार में अखण्ड दीप के समक्ष तप हेतु छोड़कर स्वयं हिमालय चले गए। एक वर्ष बाद वे गुरुसत्ता का संदेश लेकर लौटे, परम्परा का बीजारोपण , प्राण प्रत्यावर्तन हेतु विशिष्ट सत्र, प्रवासी परिजनों के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन जैसे कार्य उनने शांतिकुंज में संपन्न किए।
सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थापना अपनी हिमालय की इस यात्रा से लौटने के बाद ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना थी जहाँ विज्ञान और अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों पर शोध कर एक नया धर्म वैज्ञानिक धर्म के मूलभूत आधार रखे जाने थे। इस संबंध में पूज्यवर ने विराट परिमाण में साहित्य लिखा- अदृश्य जगत के अनुसंधान से लेकर मानव की प्रसुप्त क्षमता के जागरण तक साधना से सिद्धि एवं दर्शन- विज्ञान के तर्क, तथ्य, प्रमाण के आधार पर प्रस्तुतीकरण तक। इसके लिए एक विराट् ग्रन्थागार बना व एक सुसज्जित प्रयोगशाला, वनौषधि उद्यान भी लगाया गया तथा जड़ी - बूटी , यज्ञ विज्ञान तथा मंत्रशक्ति पर प्रयोग हेतु साधकों पर परीक्षण प्रचुर परिमाण में किये गए। निष्कर्षों ने प्रमाणित किया कि ध्यान साधना, मंत्र, चिकित्सा व यज्ञोपैथी एक विज्ञान सम्मत विधा है। गायत्री नगर क्रमशः ण्क तीर्थ , संजीवनी विद्या के प्रशिक्षण की एकेडेमी का रूप लेता चला गया एवं यहाँ 9-9 दिन के साधना प्रधान, एक-एक माह के कार्यकर्त्ता निमार्ण हेतु युग शिल्पी सत्र सम्पन्न होने लगे।
कार्यक्षेत्र में विस्तार हुआ। स्थान-स्थान पर शक्तिपीठें विनिर्मित हुई जिनके निर्धारित क्रियाकलाप थे- सुसंस्कारिता, आस्तिकता संवर्धन एवं जन-जाग्रति के केन्द्र बनना। ऐसे केन्द्र जो 1980 में बनना आरंभ हुए थे, प्रज्ञासंस्थान , शक्तिपीठ, प्रज्ञामण्डल, स्वाध्यायमण्डल के रूप में पूरे देश व विश्व में फैलते चले गए। 76 देशों में गायत्री परिवार की शाखाएँ फैल गयीं, 4600 से अधिक भारत में निज के भवन वाले संस्थान विनिर्मित हो गए, वातावरण गायत्रीमय होता चला गया।
परमपूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण में प्रवेश कर 1985 में ही पाँच वर्ष के अन्दर अपने सारे क्रियाकलापों को समेटने की घोषणा कर दी। इस बीच कठोर तप साधना कर मिलना- जुलना कम कर दिया तथा क्रमशः क्रियाकलाप परम वंदनीया माता जी को सौंप दिए। राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों व विराट दीप यज्ञों के रूप में नूतन विधा को जन-जन को सौंपकर राष्ट्र देवता की कुण्डलिनी जगाने हेतु उनने अपने स्थूल शरीर छोड़ने व सूक्ष्म में समाने, की विराट से विराटतम होने की घोषणा कर गायत्री जयंती, 2 जून 1990 को महाप्रमाण किया। सारी शक्ति वे परम वंदनीया माताजी को दे गए व अपने व माताजी के बाद संघ शक्ति की प्रतीक लाल मशाल को ही इष्ट आराध्य मानने का आदेश देकर ब्रह्मबीज से विकसित ब्रह्मकमल की सुवास को, देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के रूप में आरंभ करने का माताजी की निर्देश दे गए।
एक विराट श्रद्धाँजलि समारोह व शपथ समारोह जो हरिद्वार में संपन्न हुए, में लाखों व्यक्तियों ने अपना समय समाज के नवनिर्माण मनुष्य में देवत्व के उद्भव, धरती पर स्वर्ग लाने का गुरुसत्ता का नारा साकार करने के निमित्त देने की घोषणा की। परम वंदनीया माताजी द्वारा भारतीय संस्कृति को विश्वव्यापी बनाने, गायत्री रूपी संजीवनी घर-घर पहुँचाने के लिए पूज्यवर द्वारा आरंभ किये गये, युग संधि महापुरश्चरण की प्रथम व द्वितीय पूर्णाहुति तक विराट अश्वमेध महायज्ञों की घोषणा की गयी। वातावरण के परिशोधन सूक्ष्म जगत के नवनिर्माण एवं साँस्कृतिक व वैचारिक क्रान्ति के निमित्त सौर ऊर्जा के दोहन द्वारा विशिष्ट प्रयोगों के माध्यम से विशिष्ट मंत्राहुतियों द्वारा संपन्न किये गये, इन अश्वमेधों ने सारी विश्ववसुधा को गायत्री व यज्ञमय, बासंती उल्लास से भर दिया, स्वयं परम वंदनीया माता जी ने अपनी पूर्व घोषणानुसार चार वर्ष तक परिजनों का मार्गदर्शन कर सोलह यज्ञों का संचालन स्थूल शरीर से किया व फिर भाद्रपद पूर्णिमा, 19 सितम्बर 1994 महालय श्राद्धारंभ वाली पुण्य बेला में अपने आराध्य के साथ एकाकार हो गयीं। उनके महाप्रयाण के बाद दोनों ही सत्ताओं के सूक्ष्म में एकाकार होने के बाद मिशन की गतिविधियाँ कई गुनी बढ़ती चल गयीं। जयपुर के प्रथम अश्वमेध यज्ञ (नवम्बर 1992) से लेकर सत्ताइसवें विराट आश्वमेधिक प्रथम महापूर्णाहुति समारोह आंवलखेड़ा (नवम्बर 1995) तक प्रज्ञावतार के लीला संदोह का स्पष्ट स्वरूप सबको दिखाई देना लगा है।
युग संधि महापुरश्चरण अपनी तीव्रतम गति से सारे विश्वभर में सम्पन्न होता चला जा रहा है एवं देव संस्कृति अगले दिनों विश्व संस्कृति बनने जा रही है, यह स्पष्टतः देखा जा सकता है। अनेकानेक व्यक्ति अपने जीवनक्रम को बदलते युग दृष्टि की बतायी राह पर चलते अब देखे जा सकते हैं। “ हम बदलेंगे-युग बदलेगा” का उद्घोष दिग्दिगन्त तक फैल रहा है एवं “इक्कीसवीं सदी- उज्ज्वल भविष्य” सतयुग की वापसी का स्वप्न साकार होता चला जा रहा है, यह स्पष्ट देखा जा सकता है। अगली महापूर्णाहुति (सन् 2001 तक सभी कमर कसकर साथ चल सकें, गुरुसत्ता के सच्चे उत्तराधिकारी संगठित हो साथ चल सकें इसी के निमित्त 1996 का वर्ष पुनर्गठन वर्ष घोषित किया गया, किसी को तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिए कि तमिस्रा का अंत अब होने जा रहा है, नवयुग का अरुणोदय सुनिश्चित है। एवं उसमें हम सबकी भागीदारी होनी ही है।
एक सद्गृहस्थ था। संयम से रहता था। परिवार को सुसंस्कारी बनाने में निरत रहता। नीतिपूर्वक आजीविका कमाता। बचा हुआ समय और धन परमार्थ में नियोजित किये रहता। वह तपोवन में बसा तो नहीं, पर घर में ही तपोवन बसा दिया।
देवता इस धर्मात्मा विरक्त गृहस्थ की योग साधना से बहुत प्रसन्न हुए। इन्द्र उसके सम्मुख प्रकट हुए और घर माँगने के लिए कहा।
क्या माँगता ! जब असन्तोष ही नहीं, तो अभाव किस बात का ? हाथ पसारने में हेठी भी तो होती है। स्वाभिमान गँवा कर ही किसी से कुछ पाया जा सकता है। सो उसने ऐसा उपाय खोजा, जिसमें ऋण भार भी न लदे और देवता बुरा भी न मानें।
डसने वर माँगा। उसकी छाया जहाँ भी पड़े , वहाँ कल्याण बरसने लगे। वरदान मिल गया, परन्तु अचंभित देवता ने पूछा- हाथ रखने पर कल्याण होने पर तो आनन्द भी आता, प्रशंसा भी होती और प्रत्युपकार की संभावना रहती। छाया से कल्याण होने पर इन लाभों से वंचित रहना पड़ेगा। फिर ऐसा विचित्र वर क्यों माँगा ?
सद्गृहस्थ ने कहा- देव ! सामने वाले का कल्याण होने पर तो अपना अहंकार पनपेगा और साधना में विघ्न डालेगा। छाया किस पर पड़ी, कौन कितना लाभान्वित हुआ, इसका पता न चलना ही मेरे जैसे विनसों के लिए श्रेयस्कर है।
साधना का यही स्वरूप वरेण्य है। यह क्रमिक प्रगति के पथ पर चलते-चलते व्यक्ति को महामानव बना देता है।
(परमपूज्य गुरुदेव द्वारा जुलाई, 1982 में शाँतिकुँज परिसर में दिया गया प्रवचन)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों ! भाइयों !! तीर्थ शब्द याद करके कितना आनंद आता है, कितनी प्रसन्नता होती है। प्राचीनकाल में तीर्थ जब अपने वास्तविक स्वरूप में रहे होंगे, तब कैसा मजा आता होगा। वहाँ जाने के बाद लोग अपने कषाय और कल्मष को धोकर के पुनीत और पवित्र होकर कैसे निकलते होंगे ? गंगा के बारे में तो मुझे ज्यादा मालूम नहीं है कि उसके पानी में नहाकर आप पुनीत और पवित्र हो जाते हैं कि नहीं, लेकिन एक और ज्ञान गंगा के बाबत मैं बतला सकता हूँ । उस ज्ञान गंगा में, वास्तविक तीर्थ में अगर आपको रहने का अवसर मिल जाय, तो यकीन रखिये आप अपने आपको तो धोकर जायेंगे ही भविष्य में आपका कपड़ा धुला हुआ रहेगा। क्यों ? इसलिए कि आपने वहाँ रहकर उपासना की है, साधना की है और उपासना-साधना करने के साथ-साथ में अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिये वहाँ के वातावरण का लाभ उठाया है, वहाँ जो ऋषि रहते हैं, उनके परामर्श से आप रास्ता भी तलाश करते हैं और उस तलाश में एक रास्ता यह भी है कि आपने अब तक जो गलतियाँ की है उनका प्रायश्चित कैसे हो ? भरपाई कैसे हो ? आप उसके लिये क्या करे ? मित्रों इसके लिये आप अपने गुण, कर्म और स्वभाव में शालीनता का समावेश करें, इस निमित्त ऐसी कौन-सी गतिविधियाँ अपनायेंगे, जो आपके संस्कारों के रूप में परिणित हो सकें ? जप नहीं नहीं, जप से संस्कार नहीं बनते, रामायण पाठ से भी संस्कार थोड़े ही बन जायेंगे। विचार के साथ-साथ आपको कुछ पुण्य कृत्य भी करने पड़ेंगे। विचार और कृत्य दोनों का समावेश करने के बाद ही यह संभव है कि समग्र प्रक्रिया पूर्ण हो जाये। वास्तव में अध्यात्म का मतलब संस्कार पैदा करना है और संस्कार ज्ञान और कर्म दोनों के समन्वय से ही होते हैं। ज्ञान में पूजा आती है, पाठ (रामायण पाठ) आता है, सत्संग आता है, स्वाध्याय आता है- यह ज्ञान एक्ष है और कर्म पक्ष ! उसे कहते हैं जिसमें सेवा का समावेश होता है, परोपकार का समावेश होता है, पुण्यकर्मों का समावेश होता है। इन दोनों बातों को अगर आप मिला देंगे, तो आपकी प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी। बिजली के दो तार मिल जाने से करेंट चालू हो जाता है। आप ज्ञान और कर्म का समावेश अगर कर पायें, तो आपकी पूर्ण उपासना हो जायेगी। आप उस अध्यात्म के चमत्कार को देख पायेंगे जिसकी चर्चा शास्त्रों में की गई है।
कल आपको तीर्थों का महत्व बताते हुये प्राचीनकाल के तरीके से यह बताया गया था कि अगर कहीं तीर्थ मिल जाये और आपको उस तीर्थ में रहने का सौभाग्य मिल जाय, तो आप वहाँ उसी प्रक्रिया को ग्रहण करना, जो करनी चाहिए। अगर आप शाँतिकुँज को गायत्री तीर्थ मानते हैं तो यहाँ रह करके अपना समय सुव्यवस्थित रूप से व्यय कीजिए। यहाँ सुव्यवस्थित रूप से व्यय करने का एक क्रम बैठा हुआ है। सुबह उठने से लेकर सायंकाल सोने तक का एक टाइम-टेबल इस बात पर निर्भर रहता है कि आपकी गतिविधियाँ क्या होनी चाहिए, आपको अनुशासित कैसे होना चाहिए ? आपको संयमी बसे रहना चाहिए ? आपको तपस्वी की तरह जीवन-यापन कैसे करना चाहिए ? यह जीवनयापन करने की पद्धति दिनचर्या का जो प्रावधान है इसको आप भंग कर लेते हैं , इसलिये जीवन में कुछ विशेष करने और पाने में सफल नहीं हो पाते हैं। यहाँ का एक वातावरण भी है, सेनिटोरियमों का एक वातावरण भी होता है। इलाज तो कहीं भी कराये जा सकते हैं, पर सेनिटोरियम जिसमें डॉक्टर भी रहते हैं, वातावरण भी अनुकूल है, क्लाइमेट भी उपयुक्त है , वहाँ रहने से आदमी जल्दी अच्छे हो जाते हैं। सेनिटोरियम में रह करके जो फायदा उठाया जा सकता है , वही प्राचीनकाल के बच्चे गुरुकुलों में रहकर उठाते थे। बड़ी उम्र के आदमी आरण्यकों में रहते थे। आरण्यक बड़े आदमियों के लिये सेवा-साधना के निमित्त बनाये गये थे। बुद्ध ने बहुत सारे संघाराम बनाये थे , विहार बनाये थे। उसमें लोकसेवा के लिये इच्छुक लोगों की शिक्षाओं का निवास करने का प्रबंध था। यह आरण्यक कहलाते थे। आरण्यक कहिये या बुद्ध-विहार कहिये, नाम और शब्दों से क्या फर्क पड़ता है। ऐसे स्थान जहाँ कहीं भी हाँ, वहाँ आदमी को अपनी आत्मसाधना करनी पड़ती है। तीर्थ वे थोड़े ही हैं कि जहाँ खिलौना देखा, पैसा फेंक दिया बस, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ धक्के खाते फिरे और जहाँ-तहाँ दान-पुण्य के बहाने जेब कटाते फिरे यह सब तो भाई साहब अज्ञानियों का जंजाल है। आप इस जंजाल से दूर रहकर के तीर्थयात्रा की गहराई जानने की कोशिश कीजिए। तीर्थयात्रा की गहराई यह है कि आप उतने समय, जितने समय तीर्थ सेवन करें, उतने समय के लिये अपने आपका परिशोधन करें। भूतकाल के गड्ढे भरने की कोशिश करें। भविष्य में हम क्या बनेंगे, इसके लिये वर्तमान में हमको तपश्चर्या करनी चाहिए। वर्तमान की तपश्चर्या का मतलब है- भावी जीवन के लिए नीति-निर्धारित करने का संकल्प। ऐसा करेंगे तो आपका तीर्थसेवन सशक्त हो जायेगा।
आप यहाँ आये हैं, तो यह मानकर चलिये कि यहाँ कल्प-साधना शिविर में बुड्ढे से जवान बनने के लिये नहीं , बल्कि अपने अन्तरंग परिष्कार के लिये आये हैं। इसलिए जितना भी समय है, आप इसको स्वाध्याय में लगाइये, आत्मचिंतन में लगाइये , पूजा में लगाइये , मनन में लगाइये, पूजा में लगाइये , उपासना में लगाइये, और अच्छे लोगों के संपर्क में लगाइये, अच्छी बातों के सोचने में लगाइये , गंगा के किनारे जा करके रहिये। पूरा का पूरा समय आपका ऐसा हो जिसमें कहीं अवाँछनीयता के लिये जगह न हो। आपका चिन्तन ऐसा हो, जिसमें अवाँछनीयता के लिये कोई गुँजाइश न हो। बस, यह एक तीर्थ हमने बनाया है। मान्धाता की सहायता से जगतगुरु शंकराचार्य ने चार धाम बनाये थे, चार तीर्थ बनाये थे। वह शानदार तीर्थ बनाने के इच्छुक थे , इसलिये उन्होंने शानदार ही बना डाले। भगवान बुद्ध ने बहुत सारे तीर्थ बनवाये थे। कहाँ बनवाये थे ? सारे भारतवर्ष में विनिर्मित किये थे। भगवान महावीर ने भी ऐसा ही किया था। समर्थ गुरु रामदास ने भी ऐसा ही किया था। समर्थ गुरु रामदास ने महाराष्ट्र के हर गाँव में दौरा किया था और वहाँ की उस समय की परिस्थिति के हिसाब से अनुमान जी के मंदिर बनवा दिये थे- महावीर मंदिर बनवा दिये थे। पैसे का प्रबंध कहाँ हो सकता था ? विचारशील बातों में कोई आदमी कहाँ पैसा खर्च करता है ? गरीबों को चाहें, तो आप बहका दीजिये, मालदार को बहकाने के तरीके अलग हैं। उन तरीकों को अख़्तियार कर लीजिये, मालदार भी खूब बहकते हैं , कम बहकते हैं क्या ? गरीबों की जेब कटती है तो उनकी भी जेब कटनी है और मालदार और भी ज्यादा उल्लू बनते हैं । इसीलिये मैं उसकी बात नहीं कहता। किसकी ? कि बड़े शानदार मंदिर बनाना जरूरी है या बना सकते हैं क्या ? समर्थ गुरु रामदास ने महावीर मंदिर बनवाये थे। कैसे बनवाये ? मिट्टी की दीवारों से फूँस के झोंपड़ों के बने हुए थे। हनुमान जी की मूर्तियाँ कैसे बनायी ? हनुमान जी की मूर्तियाँ उन्होंने गाँव में पड़े हुये पत्थरों के टुकड़ों से, स्थानीय कारीगरों के माध्यम से जैसे-तैसे बना लीं। उनके पास लिबास कहाँ से आये ? शृंगार कहाँ से आया ? उन्होंने सिंदूर से उनको लपेट दिया और सिंदूर से उन पत्थरों को लपेट देने के बाद में हनुमान जी की मूर्ति , बालाजी की मूर्ति बनकर तैयार हो गई। फिर क्या हुआ उनका ? वहाँ लोग पूजा करते थे ? हाँ, पूजा भी करते थे तथा और भी कार्यक्रम चलाते थे।
आजकल खराबी यह है कि हमारे मंदिरों में अब केवल पूजा ही होती है , होना यह चाहिए कि पूजा भी हो , बाकी समय में कुछ और भी हो। समर्थ गुरु रामदास ने जगह-जगह इस तरह का प्रबंध किया कि उन्होंने हर महावीर मंदिर के साथ व्यायामशाला अभिन्न रूप से जोड़े रखी। स्वास्थ्य संवर्धन और अनुशासन का परिपालन इसके लिये उन्होंने हर जगह व्यायामशालाएँ बनवायीं । व्यायामशाला एक तरह के विद्यालय थे जिसमें गाँव के बच्चे, बड़े आदमी , छोटे आदमी , औरतें , जिस किसी को भी विद्या का शौक था, वह जाये और वहाँ के पुजारी से विद्या प्राप्त करे। इसके अलावा रात्रि को कक्षाएँ होती थीं। कक्षाओं का अर्थ है- प्राचीनकाल के ऐतिहासिक घटनाक्रमों को सुना करके आज की समस्याओं का समाधान । कथा का मतलब यह नहीं है कि आप इधर की गपबाजी करें , उधर की गपबाजी करें , कि श्रीकृष्ण भगवान ने सोलह हजार एक सौ आठ रानियों से शादी की , एक-एक से आठ-आठ बच्चे पैदा हुए। यह सब बेकार की बातें , बेसिलसिले की बातें हैं। जिनका कि न कोई मायने है , न कोई मतलब है। न इन शिक्षाओं की आज कोई उपयोगिता है , न प्राचीनकाल में उपयोगिता थी। आप कथाएँ इन्हीं को कहते हैं कि शंकर जी ने गणेशजी का सिर काट दिया और हाथी का चिपका दिया ! इन बातों से क्या मतलब है ! न यह पुराण है, न सत्संग है। कथा के पीछे उद्देश्य और लक्ष्य होना चाहिए। प्राचीनकाल में समर्थ गुरु रामदास की लिखी ‘दासबोध’ की कथाएं हर महावीर मंदिर में होती थी। उन्हें एक नया ही शास्त्र बनाना पड़ा, नया ही वेद बनाना पड़ा । क्या करते बेचारे ! उस कूड़े-कचरे में से क्या चीज पल्ले पड़ती। आज आपको इस कूड़े-कचरे में से क्या चीज पल्ले पड़ने वाली है ? कुछ भी तो नहीं है , सिवाय आफत पैदा करने के और दिमाग खराब करने के , पुरानी गपबाजियाँ खड़ी करने के, अपना समय और दूसरों का समय बरबाद करने के अलावा क्या है, कथा ! इसलिए कथा भी उन्होंने बनाई और कथा की परंपरा को जिंदा रखा और ऐसे शानदार ढंग से जिन्दा रखा कि मजा आ गया। शिवाजी की सारी सेना को समर्थन वहीं से मिला , हथियार वहीं से मिले , अनाज वहीं से मिला और आजादी की लड़ाई उन महावीर मंदिर से भी लड़ी गई।
उसी तरीके की पुनरावृत्ति आज भी हुई है। हमने दो धाम पहले बनवाये थे। मथुरा का धाम बनवाया और यहाँ का बनवाया । एक संगठन के लिए बनाया , एक शिक्षण के लिये बनाया। फिर क्या किया ? जगतगुरु शंकराचार्य ने चार तीर्थ बनाये थे, महावीर भगवान के समर्थ गुरु रामदास ने सारे महाराष्ट्र में दो हजार के करीब मंदिर बनाये थे। आज हमारे भी मंदिरों की बहुत बड़ी संख्या है और बढ़ती ही चली जा रही है। गायत्री शक्तिपीठ के नाम से चौबीस सौ मंदिर बना दिये। अभी और भी बहुत से मंदिर बनने जा रहे हैं। इनके लिये कोशिश हमारी यही थी कि इनको गायत्री तीर्थ का रूप दिया जाये और तीर्थों में मंदिर नहीं, बल्कि वहाँ इनको शिक्षण संस्थान के रूप में विकसित किया जाये। वहाँ शिक्षण चले, ज्ञान वृद्धि के उपदेश चलें, रचनात्मक कार्यक्रमों का प्रयोग चल। ठीक उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमारा यह स्थानीय गायत्री तीर्थ है। आप ऐसे तीर्थों को मजबूत बनाने की कोशिश कीजिये। तीर्थयात्री करें यह तो बहुत अच्छी बात है। तीर्थयात्रा में आपको समय लगाना चाहिए, लेकिन मैं यह पूछता हूँ कि तीर्थ नहीं होंगे फिर आप कहाँ जायेंगे ? कहाँ हैं तीर्थ ? आपको कहीं दिखाई पड़ते हैं क्या ? तीर्थ कहीं दिखाई नहीं पड़ते। पुरानी ऐतिहासिक घटनाएँ जरूर उनसे जुड़ी हुई हैं। लेकिन वे जीवंत तो दिखाई ही नहीं पड़ते। लोगों को साधना कराने वाले, मार्गदर्शन करने वाले, परामर्श देने वाले ऋषि-तीर्थ और आरण्यक कहीं भी दिखाई नहीं पड़ते। इसलिये आपको एक काम और भी करना है, जहाँ तीर्थयात्रा करनी हो, वहाँ तीर्थों की स्थापना करने में भी योगदान देना चाहिए। तीर्थों की मरी हुई परम्परा को पुनर्जीवित भी करना चाहिए ? कोई आदमी आये और तलाश करे कि कैसे होते हैं तीर्थ तो आप दिखा तो सकें। आज तीर्थों के स्थान पर सब जगह बड़े-बड़े विशालकाय मंदिर बने हुये हैं और लोग उनके माध्यम से अपना पेट भरते रहते हैं, झगड़ा करते रहते हैं। तीर्थों के वातावरण , तीर्थों के गुण, तीर्थों के कर्म, तीर्थों के उद्देश्य और तीर्थों के लक्षण सब ऐसे ही गायब हो गये, डुबकी लगाइये, खिलौना देखिये, पैसा चढ़ाइये, मंदिर देखिये। इसके अलावा भी कुछ होता है तीर्थ ? नहीं भाई साहब ! यह तो बिल्कुल उलटा है। असली बात तो तीर्थ की अलग होती है। उसमें ज्ञान गंगा बहती है, जहाँ प्रेरणा मिलती है, दिशा मिलती है, जहाँ भावनाओं को उभारा जाता है, आदमी को समुन्नत स्तर का बनाया जाता है-ऐसे तीर्थों की स्थापना और पुनर्जीवन आवश्यक पड़ गया, इसीलिए हमने तीर्थों की स्थापना की है। आप भी इन तीर्थों की स्थापना में योगदान दीजिये ! जहाँ तीर्थ बन चुके हैं , उनको मजबूत बनाने की कोशिश कीजिए, जहाँ नहीं बने हैं वहाँ बनाने की कोशिश कीजिये।
यहाँ के सारे गायत्री तीर्थों में हमने शिक्षण का प्रबंध करने के लिये प्रावधान रखा है। यहाँ बच्चों की पाठशाला, बुड्ढों की पाठशाला, बड़ों की पाठशाला, महिलाओं की पाठशाला चलनी चाहिए। यहाँ आसनों और प्राणायामों के केन्द्र होने चाहिए। यहाँ जड़ी-बूटियों के सहारे चिकित्सालय चलने चाहिए। यहाँ रात्रि को कक्षाएँ होनी चाहिए तभी तो हम यह कह सकेंगे कि इन तीर्थों को गायत्री मंदिर कहिये या तीर्थ कहिये बात एक ही है। आप अपने ही केवल तीर्थयात्रा पर न निकलें, बल्कि नये आदमियों के लिए रास्ता भी बनायें, तीर्थयात्रा के लिए कोई आदमी जाने वाला हो, तो उसको यह मालूम हो कि तीर्थ कहाँ है ? किस जगह जायें ? किसके पास जायें ? क्या करेंगे वहाँ जा करके ? सैरगाहों में क्या करेंगे जा करके ? सैरगाहों में कितने आदमी आते हैं, आपने देखे होंगे ? विदेशों में भी घुमक्कड़ लोग जाते हैं। कोई नैनीताल जाता है, कोई कहीं जाता है, कोई दार्जलिंग जाता है, कोई आगरे का किला देखने जाता है, कोई दिल्ली की सैर करने जाता है, कोई बंबई जाता है। आप भी चले जाइये, धामों में चले जाइये, कोई फर्क नहीं है। इसलिए फर्क करने वाले तीर्थ तो बनाने ही पड़ेंगे। उनको नवजीवन देना पड़ेगा, उसमें नए प्राण-संसार करने पड़ेंगे। हमने इस दिशा में कदम बढ़ाया है। आप हमसे कंधा मिलाइये, हमारे कदम से कदम मिलाइये। थोड़ा-सा हमने प्रयत्न किया है, थोड़ा आप इसमें सहयोग कीजिए, कर सकते हैं ? जरूर कर सकते हैं। आप मान्धाता तो नहीं हैं, लेकिन उसके बनाने में कुछ तो कर ही सकते हैं। इसके निर्माण में किसी तरह का योगदान तो दे ही सकते हैं। अपने पास धन न हो, तो पड़ोसियों से माँग सकते हैं, मित्रों-रिश्तेदारों से लेकर भी इसमें लगा सकते हैं। आप दूसरे लोगों को तीर्थयात्रा करने के लिए ऐसे मौके दें, स्थान बनायें, वातावरण बनायें- यह आपको एक बहुत बड़ा काम करना है। आप मान्धाता की तरह तीर्थों की स्थापना करने के लिए कुछ कर सकें, तो जरूर करें। अहिल्याबाई की तरह तीर्थों का उद्धार करने के लिए फिर से कुछ कर सकते हों , तो अपने ढंग से अवश्य करें। अहिल्याबाई ने मंदिरों के जीर्णोद्धार कराये थे। अब उनके फिर से जीर्णोद्धार कराने हैं और जीर्णोद्धार ही क्या मैं तो कहता हूँ कि इन मरे हुओं को जिंदा करना है। उनके लिये कम से कम जीर्ण तो था, यहाँ तो जीर्ण भी नहीं है , खण्डहर पड़े हैं। खण्डहरों की तरह थोड़े से नाम-निशान पड़े हैं। जहाँ कभी तीर्थ रहे होंगे।
उनको जीवन्त करने के लिये मित्रों क्या करना चाहिए ? उनको अपने प्रायश्चित्त में सम्मिलित कर लीजिये। प्रायश्चित्त प्रक्रिया पूरी करने का एक तरीका और भी है। जहाँ अब तक शक्तिपीठें बन गई हैं, उनमें एक काम की बहुत कमी है कि वहाँ ऐसे प्राणवान परिव्राजक नहीं हैं, जो वहाँ रहें और वातावरण को हिला दें, वातावरण को जगा दें। बड़ी मुश्किल से कहीं पण्डा मिल गया, कहीं पुजारी मिल गया, कहीं आरती करने वाला मिल गया, कहाँ नौकर मिल गया, कहीं कर्मचारी मिल गया, कहीं झाडू लगाने वाला मिल गया। बस इसी तरह बेचारे जैसे वैसे काम चला रहे हैं। ऐसे प्राणवान् परिव्राजकों का घोर अभाव है जो वहाँ रहें और अपनी निष्ठा के, अपनी सेवा- भावना के आधार पर उस सारे क्षेत्र को जगा दें और सारे क्षेत्र का वातावरण ऐसा बना दें, जैसा कि तीर्थों का होना चाहिए। तीर्थों का एक विशेष वातावरण होता है। वहाँ जो कोई भी पहुँच जाता है, वह उस ढाँचे में ढलने लगता है। वातावरण बनाना नौकरों का काम नहीं हैं , कर्मचारियों का काम नहीं है, पुजारियों का काम नहीं है, प्राणवानों का काम है। आप प्राणवान मालूम पड़ते हैं। इस कायाकल्प चिकित्सा की कल्प-साधन में आये हुए हैं। प्राणवान न होते तब आप क्यों आ पाते, कष्ट कैसे उठा पाते ? हर आदमी तो माल मारने के लिये, भगवान जी के मंदिरों में फोकट का प्रसाद पाने के लिये घूमता रहता है त्याग कौन करता है ? भूखा कौन रहता है ? अपने घर का काम कौन छोड़ता है ? आपके अन्दर वह शराफत मालूम पड़ती है और जिन्दगी भर मालूम पड़ती है और जिन्दगी भर मालूम पड़ती रहेगी। आध्यात्मिकता का परिचय मालूम पड़ता है तथा और भी कई चीजें मालूम पड़ती हैं अगर यह बात सही है, तो आपको अगला वाला समयदान देने के लिये एक ही स्थान चुनना चाहिए, वह है शक्तिपीठ। परिव्राजक के अलावा, घूम-घूम कर प्रचार करने के अतिरिक्त एक तरीका यह भी है कि आप किसी समीपवर्ती शक्तिपीठ में चल जायँ, वहाँ कुछ समय तक निवास करें और निवास करने के बाद में अपने जीवन को न केवल परिष्कृत करें, बल्कि उस क्षेत्र को जगा देने की सेवा-साधना में भी संलग्न हो जायँ। यह भी आपका बढ़िया वाला प्रायश्चित है। यदि ऐसा आप करें, तब मैं बराबर यह कहूँगा कि आपने तीर्थयात्रा का मर्म समझ लिया और उसे करने के लिये कदम बढ़ा लिया, दो काम तो यह कीजिये।
और क्या करें ? और यह कीजिये कि इन तीर्थों की देश-विदेशों में स्थापना करने का हमारा बड़ा मन है। आप हमारा हाथ बंटाइए। हाथ बँटा देंगे, तो आपके सहयोग से हम इतना बड़ा काम कर सकेंगे कि तीर्थों का पुण्य, जैसा कि धर्म-ग्रन्थों में लिखा हुआ है वास्तव में सही हो जाये। आप उसमें सहयोग दोनों ही तरीके से कर सकते हैं। तीर्थों में दान-पुण्य की भी परम्परा है, क्षतिपूर्ति के लिये आर्थिक सहयोग की भी परम्परा है , ब्राह्मण भोजन की परम्परा है। पहले लोग जब तीर्थयात्रा जाते थे तो घर लौटने पर जप कराते थे, कथा कराते थे, भागवत कराते थे, दान भी कराते थे। तीर्थों में भी दान कर देते हैं, घर में भी दान कर सकते हैं। आखिर यह दान है क्या ? वास्तव में यह समयदान का ही दूसरा रूप है। समयदान जो आदमी नहीं कर सकता, वह अर्थदान कर सकते हैं, समयदान और अर्थदान दोनों सम्भव हो सकें तो और अच्छा , लेकिन नहीं हो सके, तो आप समय के बदले दूसरे आदमियों का समय खरीद कर भी ऐसा कर सकते हैं। आप नहीं करना चाहते, ऐसा तो मत कीजिए, आपके स्थान पर कोई और आदमी काम कर देगा। आप उसके गुजारे का प्रबन्ध कर दीजिये। गुजारे का प्रबंध कर देते हैं तो अपने काम करने के बराबर बात बन गई ! अपने यहाँ गायत्री परिवार में
सैकड़ों -हजारों ऐसे लाग हैं, जो सेवा करने के बड़े इच्छुक है।, पर क्या करें। घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ ऐसी हैं कि इनको कुछ दिये बिना, कपड़ा दिये बिना, निर्वाह व्यय दिये बिना इनका काम नहीं चलता। कपड़ा हम अपने घर से ले आये हैं, खाना अपने घर से ले आये हैं, बच्चों का प्रबंध अपने घर से कर आये हैं, ऐसे आदमी हो तो सकते हैं लेकिन बहुत कम हैं। अधिकाँश लोग ऐसे हैं जिनको खर्च चाहिए पेट भरने को अन्न चाहिए। इस तरह समाजसेवियों, लोकसेवियों की कितनी बड़ी संख्या रुकी पड़ी है, उनका हम गुजारे का प्रबंध नहीं कर सके, कपड़े पहनाने का साधन हमारे पास नहीं है और जिनकी बहुत जरूरत पड़ रही है उनके बच्चों के लिए नमक रोटी का इंतजाम करने में हम समर्थ नहीं हो सके इसलिए हजारों-लाखों कार्यकर्त्ता जो आज समाज के नये उत्थान, नये निर्माण करने के लिए आवश्यक थे, हमको नहीं मिल पा रहे हैं, क्योंकि उन ब्राह्मणों के लिए रोटी हमारे पास नहीं है। आप अपने खर्चे में कटौती करके दान भी दे सकते हैं , यह प्रायश्चित्त के तरीके हैं।
तीर्थयात्रा में डुबकी मारना ही जरूरी नहीं है, पंचामृत पीना, मंदिरों के दर्शन करना यह सब आवश्यक नहीं है। असली बात भी तो सोचिए, बिल्ली के गले में घंटी भी तो बाँधिये। आप कुछ त्याग भी तो कीजिए, सेवा की बात भी तो सोचिए, मन से उदार तो बनिये, कुछ कष्ट भी उठाइये , कुछ मेहनत भी कीजिए। कुछ करके भी तो दिखाइये। नहीं , साहब ! हम तो पंचामृत पियेंगे , बेकार की बात करेंगे, ऐसे कहीं प्रायश्चित्त होते हैं। खामियाजा चुकाने के लिए तीर्थ सबसे अच्छे माने गये हैं, इसीलिये तीर्थयात्रा के लिए मैंने आपसे निवेदन किया । बस आज की बात समाप्त। ओम् शान्तिः
विगत अप्रैल माह से अनुयाज - पुनर्गठन के अंतर्गत लिये गए चौदह कार्यक्रमों के अंतर्गत “स्वाध्याय-मनन-चिन्तन” के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रतिपादन को प्रस्तुत किया जा रहा है। मनोविज्ञान कहता है कि मन को नये ढाँचे में ढालने के लिए अभ्यस्त स्थिति से उबार कर नये सिरे से प्रशिक्षित करना पड़ता है। इसी तकनीक को विस्तृत विवेचन द्वारा विगत चार माह से समझाया जा रहा है। एक बार आत्मसात् कर लेने पर यह कितना सरल व चित्त को सुसंस्कारिता से ओत-प्रोत कर लेने वाला बन सकेगा, यह पाठक स्वयं देखेंगे।
हाड़-माँस का बना मनुष्य वस्तुतः विचारों एवं विश्वासों का बना होता है, शरीर तो सभी के प्रायः एक जैसे होते हैं , किन्तु व्यक्तियों में आकाश-पाताल का अन्तर होता है। यह अन्तर मानसिक एवं भावनात्मक स्थितियों की भिन्नता के कारण अर्थात् व दृष्टिकोण की, श्रद्धा व विश्वास की भिन्नता के कारण आता है। अतः श्रेष्ठ व्यक्तियों का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हमारी आस्था और मान्यता, हमारे मन का रुझान और आकाँक्षा परिष्कृत हो। इसके लिये हमें दो उपाय करने होंगे। (1) हीन श्रेणी के विचारों को हटाकर मनोभूमि को साफ करना होगा तथा (2) उन्नत श्रेणी के विचारों से तालमेल रखने वाली आकाँक्षा और रुचि को जगाकर मनोभूमि को उत्कृष्ट बनाना होगा। स्वाध्याय-मनन-चिन्तन इन कार्यों को भली प्रकार कर सकते हैं, इस दृष्टि से व अब हमारी जीवनचर्या का अनिवार्य अंश बन जाने चाहिए।
स्वाध्याय के अनेक प्रकारों की चर्चा पहले की जा चुकी है। इनमें से सत्साहित्य द्वारा स्वाध्याय अधिक सरल व सुलभ है। यह सदैव ध्यान देने योग्य बात है कि स्वाध्याय-त्रिवेणी के लिए उपयुक्त सत्साहित्य वही है। जो विज्ञानसम्मत ढंग से हमारी जिज्ञासाओं का समाधान कर सके तथा जीवन जीने की कला सिखा सके। ऐसे सत्साहित्य के माध्यम से स्वाध्याय-मनन-चिन्तन करने से ही श्रेष्ठ जीवन जीने की आकाँक्षा जागती है। आस्था और मान्यता में सुधार होता है, तो उस दिशा में में प्रयास भी होने लगते हैं। अतः इन तीन प्रक्रियाओं को एक बार फिर समझ लेना चाहिए।
स्वाध्याय
आदर्श स्थिति से अपने वर्तमान जीवन व्यवहारों की तुलना करना सिखाता है और अपनी श्रेष्ठताओं व दोषों को खोजने की विद्या में प्रवीण बनता है।
मनन
इन जीवन-व्यवहारों का कारण अन्तस् में बैठी मनोवृत्तियाँ और भावनाएँ। हैं, कामनाएँ और आकाँक्षाएँ हैं। मनन इन्हें खोजता है। अपने जीवन पर इनके कौन-कौन से अच्छे बुरे प्रभाव पड़ रहे हैं, इस पर व्यावहारिक रूप से विचार करता है।
चिन्तन
मनन ने जो श्रेष्ठताएं खोजी हैं, उन्हें कैसे बढ़ाया जा सकता है, जो विकारग्रस्त मनोवृत्तियाँ व कुसंस्कार खोजे हैं, उन्हें हटाने के लिए ऐसे कौन से उपाय करने चाहिए जो अपनी क्षमता में हैं- यह ‘चिन्तन’ है। कुल मिलाकर वर्तमान जीवन व्यवहारों को अधिक अच्छा बनाने के लिए चिन्तन लगातार व्यवहारिक योजनाएँ बनाता रहता है।
यद्यपि भली प्रकार समझने की दृष्टि से इन तीनों की अलग-अलग एवं विस्तारपूर्वक विवेचनाएँ पूर्व में की गई हैं, तथापि यह तीन प्रक्रियाएँ आपस में इतनी घुली-मिली है कि उनके बीच विभाजन की स्पष्ट रेखाएँ नहीं खींची जा सकतीं। इसकी आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि कोई भी एक प्रक्रिया अन्य दो के बिना अर्थहीन ही है। अतः स्वाध्याय-मनन-चिन्तन तीनों को एक साथ सम्पन्न किया जाना चाहिए। अपनी महत्ता के कारण स्वाध्याय-त्रिवेणी- भजन-उपासना के समकक्ष पुण्य फलदायक साधना मानी जाती है। यह विचारों के सामान्यतः निम्न प्रवाह को उत्कृष्टता की ओर मोड़ देती है। इस स्थिति में जप ध्यान भी श्रेष्ठ स्तर के बन पड़ते हैं। अतः आश्वमेधिक अनुयाज में इसे जप से पहले सम्पन्न करने की अनुशंसा की गई है। प्रतिदिन आधा से एक घण्टा इन श्रेष्ठ प्रक्रियाओं में लगाना चाहिए, किन्तु ज पके पूर्व दस मिनट का समय ही पर्याप्त है। दिन में कभी भी अपनी सुविधानुसार शेष स्वाध्याय-त्रिवेणी सम्पन्न की जा सकती है।
अगली पंक्तियों में स्वाध्याय- मनन- चिन्तन प्रक्रिया का एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है। मूल बिन्दुओं को ध्यान में रखकर अपनी रुचि तथा पूर्व अभ्यास के अनुसार इसमें साधारण हेर-फेर किया जा सकता है।
(1) सत्साहित्य के प्रति धर्म ग्रन्थ के समान आदरभाव रखते हुए उसे उत्तम स्थान पर तथा स्वच्छ सुरक्षित रखा जाय। “ श्रेष्ठ जीवन जीना ही मेरी आकाँक्षा है, एकमात्र इच्छा है”, इस श्रद्धा भावना के साथ सत्साहित्य का अध्ययन किया जाय।
(2) अध्ययन- धीमी गति से एवं समझ कर पढ़ा जाय । जो समझ में न आए उसे बार-बार पढ़ा जाय। केवल दो मिनट की पढ़ा जाय। कम पढ़कर सत्साहित्य यथास्थान रखने का क्रम अवश्य बनाना चाहिए।
(3) जितना पढ़ा है उसका सार संक्षेप मन ही मन दुहरा लेना अध्ययन को स्थायित्व देती है।
(4) विचार विस्तार- जो पढ़ा है वह आदर्श स्थिति है। अतः शांतचित्त से उसका विचार करना एवं अपनी बुद्धि से उसका विस्तार करना यह प्रक्रिया की विचार विस्तार है। ऐसा करने से उसका महत्व समझ में आएगा। उदाहरणार्थ , “शरीर को” भगवान का मंदिर समझ कर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे। “ सत्संकल्प के इस आदर्श पर विचार एवं विस्तार का एक प्रकार यह हो सकता है कि “मेरे इस शरीर में परमात्मा के अंश आत्मा का साक्षात् निवास है। सूर्य व चन्द्र आँखों की , अग्निदेव उदर की तथा मरुत व वरुण देव सम्पूर्ण शरीर की दिन रात सेवा कर रहे हैं। दमकते हुए शक्ति बीज अपने-अपने स्थानों पर कर्तव्यरत है। ऐसा गरिमावान मेरा शरीर सचमुच परमात्मा का चेतन मंदिर है। मंदिर है तो इसे स्वच्छ व सुदृढ़ बनाये रखना चाहिए। सुदृढ़ रखना हो तो संयम बरतना चाहिए, जीवनचर्या में नियमितता को सर्वोपरि स्थान देना चाहिए। .................. इत्यादि, इत्यादि।”
(5) स्वास्थ- स्वाध्याय के लिये, इस आदर्श स्थिति की तुलना में मैंने अपने बीते तथा वर्तमान जीवन व्यवहारों का निष्पक्ष अवलोकन किया। “मेरी जीवनचर्या में संयम की वृति एवं कार्यों में नियमितता है या नहीं ?” निष्कर्ष सामने आया है तो किन्तु कभी-कभी वे टूट भी जाते हैं। कभी ऐसा विचार उठा भी नहीं कि इन्हें टूटने नहीं देना चाहिए। फिर भी यह ईश्वरीय सत्ता की अनुकम्पा तथा गुरुसत्ता की प्रेरणा ही है कि भले ही वे थोड़ी मात्रा में हों, पर आज के इस उच्छृंखल वातावरण में भी यह श्रेष्ठ गुण मुझसे जुड़े हुए हैं। इनकी थोड़ी सी उपस्थिति से भी मेरा जीवन कितना संतोषजनक व सुव्यवस्थित बन गया है। इस अनुग्रह के लिए उनके प्रति मेरा कृतज्ञतापूर्वक नमन प्रस्तुत है।”
(6) मनन- स्वाध्याय ने संयम वृत्ति व नियमितता के कच्चेपन को भी स्पष्ट किया। मैंने अपनी यह दुर्बलता स्वीकार कर ली। इन्हें परिपक्व स्थिति में लाने के लिए मैंने मनन प्रारम्भ किया। मन को टटोला तो समझ में आया कि सुस्वादु भोजनों और आकर्षक किन्तु हेय मनोरंजनों का लोभ संयम वृत्ति को ढीला कर देता है, फलस्वरूप नियमितता का संकल्प भी टूट जाता है । अतः इस लोभ का शमन करना व संयम वृत्ति को स्थिर बनाना होगा। इसके लिए मैंने भाव क्षेत्र हृदय में झाँकने का प्रयास किया। संयम टूटने पर हृदय पर क्या प्रतिक्रिया होती है ? यह खोजने की चेष्टा की । मैंने पाया कि जब-जब संयम वृत्ति टूटती है तब हृदय अपनी प्रतिक्रिया को पश्चाताप और ग्लानि के रूप में अभिव्यक्त करता है। इसका अर्थ है कि हृदय में अभी भी श्रेष्ठ जीवन जीने की आकाँक्षा को तीव्र करना चाहिए। जैसे-जैसे यह आकाँक्षा प्रबल होती जाएगी, संयम वृत्ति भी उतनी ही बलवती होती जाएगी। फलस्वरूप जीवन में नियमितता भी स्वयमेव आने लगेगी। इस हृदयगत आकाँक्षा को तीव्र करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ?
(7) चिन्तन- मनन, ‘चिन्तन’ में बदल गया। नियमितता से संबंधित अन्य श्रेष्ठ कार्य क्या हो सकते हैं ? संयम वृत्ति से संबंधित अन्य श्रेष्ठ विचारणाएं क्या हो सकती है, जो इस आकाँक्षा को तीव्र करने में सहायक सिद्ध हो सके ? इन व्यावहारिक उपायों को ऐसे प्रस्तुत किया जा सकता है-
(7.1) अपने भीतर थोड़ी-बहुत जितनी भी संयम वृत्ति है उसके लिए अपने इष्टदेव व गुरुदेव को नित्य नमन करना चाहिए। इससे संयम वृति को और विकसित करने का उत्साह बढ़ेगा।
(7.2) ऐसे पद, छन्द, श्लोक, दोहा, सूक्तियाँ आदि कंठस्थ करने चाहिए जो काम , क्रोध , लोभ आदि विकारों पर संयम बरतने की प्रेरणा दें। इन्हें यदा-कदा गुनगुनाते रहना भी श्रेयस्कर है। ऐसा करने से अर्धचेतन मन पहरेदार का कार्य कर परोक्ष रूप से सहायता करता रहेगा।
(7.3) महापुरुषों के जीवन व्रत का गहराई से नित्य अध्ययन करना चाहिए। इससे उच्च आकाँक्षाओं को बल मिलेगा।
(7.4) भोजन, शयन आदि पारिवारिक नियमों व मर्यादाओं का कड़ाई से पालन करना होगा, इससे हमारे जीवन में अनुशासन का समावेश होगा जो संयम वृत्ति को मजबूत करता है।
(7.5) नियमित व्यायाम प्रारम्भ करना चाहिए। इससे ब्रह्मचर्य भावना का विकास होगा, फिर संयम वृत्ति को भी पर्याप्त पोषण मिलने लगेगा। नियमितता का अभ्यास भी होता जाएगा।
विचार क्रान्ति अभियान संबंधी सम्पूर्ण सत्साहित्य में ‘हमारा युग निर्माण सत्संकल्प’ श्रेष्ठतम है। जप के पूर्व इसका एक बार ध्यानपूर्वक पाठ करने के बाद एक सत्संकल्प पर विचार, विस्तार तथा स्वाध्याय -मनन-चिन्तन करना चाहिए। पहले षट्कर्म सम्पन्न करने के बाद संक्षिप्त स्वाध्याय आदि प्रक्रिया में दस मिनट समय लगाना उपयुक्त होगा। उसके बाद जप करने से विचारों की दिशा श्रेष्ठता की ओर मुड़ जाएगी तो जप-ध्यान आदि भी क्रमशः उच्च स्तर के होते जायेंगे।
चिन्तन प्रक्रिया में उपयोगी कुछ व्यावहारिक सुझाव इन बिन्दुओं से स्पष्ट होते हैं। इन्हें दुहरा लेना चाहिए।
(1) श्लोक-छन्द-चौपाई गीत आदि के ऐसे अंश कंठस्थ कर लेने चाहिए जो श्रेष्ठताओं की प्रेरणा देते हैं, स्वयं को भी अच्छे लगते हों।
(2) प्रभुसत्ता, गुरुसत्ता अथवा किसी अन्य व्यक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा प्रीति का स्मरण करना चाहिए और ‘उन्हीं प्रसन्नता’ के लिए मुझे यह करना (अथवा नहीं करना ) चाहिए’ इस भाव को जाग्रत करना श्रेयस्कर है।
(3) पवित्र वस्तुओं जैसे यज्ञोपवीत, गंगाजल, धर्मग्रन्थ आदि का श्रद्धापूर्वक स्पर्श व नमन करते हुए अपने संकल्पों का स्मरण करना चाहिए।
(4) लोभ-स्वार्थ-संकीर्णता आदि को निर्मूल करने के लिये विनम्र भाव से अन्नदान, अर्थदान ज्ञानदान करना कराने चाहिए। उस समय ‘प्रभु इच्छा का पालन कर रहे हैं।’ इस भाव को अपने भीतर उभारना चाहिए।
(5) कोई भी सेवा कार्य करते समय विनम्रता, सहयोग भावना , सहानुभूति व करुणा जैसे श्रेष्ठ, सहायक गुण अपने अन्तःकरण में जाग्रत कर लेना चाहिए।
यह सभी उपाय दोषों को दूर करने तथा श्रेष्ठताओं को बढ़ाने के दोनों उद्देश्यों में समान रूप से उपयोगी हैं। अपने विवेक से अन्य अनेक उपाय स्वयं भी निर्मित किये जा सकते हैं। किस परिस्थिति में, किस मनःस्थिति में कौन सा उपाय अपने को प्रभावित कर सकेगा ? इस पर पहले ही विचार कर लेना चाहिए। प्रयोग के बाद यदि यह अनुभव हो कि इस उपाय का अपने पर प्रभाव नहीं पड़ा अथवा कम पड़ा तो अगली बार के लिए दूसरा अधिक उपयुक्त उपाय चुनकर तैयार रखना चाहिए। पुनः असफल हो जाएँ तो भी निराशा को पास फटकने नहीं दें क्योंकि अच्छाई-बुराई के इस देवासुर संग्राम में आवश्यक नहीं कि एक-दो बार के प्रयासों से दोष-दुर्गुण का असुर नष्ट हो जाय या भाग जाय। फिर हमारे सत्संकल्प का आश्वासन भी तो हमारे साथ है कि “ईश्वर मनुष्य का मूल्याँकन उसकी असफलताओं के आधार पर नहीं, उसके सद्भावों और सत्प्रयासों के आधार पर करता है।” अतः प्रसन्नता और उत्साह बनाए रखकर अपने सत्प्रयास जारी रखना चाहिए।
प्रश्न तो हैं, अनुत्वरित। समस्याएँ हैं, पर समाधान का बोध नहीं । बोध के अभाव में पनपे अलगाव, आतंक अस्थिरता और अव्यवस्था से जर्जरित मानव सभ्यता न केवल त्रस्त है, बल्कि भयग्रस्त हो सहमी खड़ी है। उसे आशंका है कि पतन और विनाश कहीं उसे अपनी मृत्यु पाश में न बाँध ले। सामाजिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक , साँस्कृतिक सब ओर एक-सी स्थिति है, प्रश्न ही प्रश्न हैं, समाधान विहीन प्रश्न। जिनसे समाधान की आशा रखी गयी थी, वे विज्ञान और अन्तर्राष्ट्रीय विधान अपनी असमर्थता का अहसास कर विवश है।
इन व्यथापूर्ण क्षणों में व्याकुल मानवता के हृदय में फिर से विश्व- गुरु के लिए पुकार उठी है उन्हीं विश्वगुरु के लिए जिनकी वन्दना में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है- ‘वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रुपिणम्’ जो स्वयं बोध स्वरूप हैं, शाश्वत गुरु हैं, स्वयं सृष्टि के सूत्र संचालक महाकाल है। मानवीय असमर्थता, असहायता को उनके सिवा और दूर भी कौन कर सकता है ? उन्होंने ही तो ऐसे अवसर पर भटकी मनुष्यता को राह दिखाने के लिए ‘तदात्मानं सृजाम्यहम्’ का संकल्प लिया है।
पृथ्वी की सभ्यता का सदियों, सहस्राब्दियों, लाच्क्षाधिक वर्षों का इतिहास गवाह है, कि मानवी बुद्धि जब-जब भटकी है, भ्रमित हुई है, विश्वगुरु उसे चेताते रहे हैं। मानवी पुरुषार्थ जब-जब दिशाविहीन हुआ है, उसे मार्गदर्शन देते रहे हैं। उनके लिए जाति, धर्म, धरती के किसी भूखण्ड की सीमा अवरोध नहीं बनी, सृष्टि का कण-कण उनके प्रेमपूर्ण बोध से लाभान्वित होता रहा है। कृष्ण , ईसा , बुद्ध, जरथुस्त्र, मुहम्मद, महावीर, व्यास, बाल्मीकि के रूपों में वही शाश्वत गुरु भगवान महाकाल भटकी हुई मानवता को दिशाबोध कराते रहे हैं। इनके अनुदानों के प्रति सहज कृतज्ञ भारतीय जनमानस प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा को इनके प्रति अपनी भावाँज्जलि अर्पित करता है ।
अपने नाम-रूपों की भिन्नता के बावजूद देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप समाधान का बोध कराती हुई उन्हीं विश्वगुरु की एकमेव चेतना ही मुखरित होती रही। कौरवों के विनाशकारी आतंक से सिसकती, कराहती मनुष्यता को त्राण दिलाने वाले दिग्भ्रमित पाण्डवों को गीताज्ञान का उपदेश देने वाले श्रीकृष्ण ‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरु’ कहकर पूजित किए गए। दार्शनिक भ्रम जंजालों, तरह-तरह की मूढ़ मान्यताओं में उलझी-फंसी मनुष्यता को महर्षि व्यास ने समाधान के स्वर दिए। चार वेद-षड्दर्शन एवं अठारह पुराणों के विशालतम विचारकोष को पाकर मानवता ने उन्हें लोक गुरु के रूप में स्वीकारा। इतनी ही कृतज्ञता इस तरह मुखरित हुई कि गुरु पूर्णिमा व्यास पूर्णिमा का पर्याय बन गयी।
आज जब पुनः धर्म मूढ़ताओं से ग्रस्त है। चित्र-विचित्र मान्यताओं, कुरीतियों, कुप्रथाओं की मेघमालाओं ने इस सूर्य को आच्छादित कर लिया है। दर्शन जिसे आर्यावर्त के ऋषियों, सुकरात सदृश मनीषियों ने जीवन की राह के रूप में सृजा था, वह लुप्त प्रायः है। फिर से मनुष्यता में विश्वगुरु के सान्निध्य को पाने की छटपटाहट उठी और जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है वे स्पष्टतया देख सकते हैं, पुकार व्यर्थ नहीं गयी। ‘तदात्मानं सृजाम्यहं’ का आश्वासन ‘आचार्य श्रीराम शर्मा’ के रूप में पूरा हुआ।
प्रश्नों से आकुल संसार में उनका व्यक्तित्व समाधान का पर्याय बनकर अवतरित हुआ था। वह उन विरल प्रज्ञ पुरुषों में थे, जिनमें ऋषित्व व मनीषा एकाकार हुई थी। जिन्होंने धर्म का आच्छादन तोड़ने , दर्शन को बुद्धिवाद के चक्रव्यूह से निकालने की हिम्मत जुटाई। धर्म, दर्शन और विज्ञान के कटु, तिक, कषाय हो चुके सम्बन्धों को अपनी अन्तर्प्रज्ञा की निर्झरिणी से पुनः मधुरता प्रदान की । अवतारी प्रवाह भदा एक ही लक्ष्य सामने लेकर आते रहे हैं, समय की दार्शनिक भ्रष्टता को दूर कर उसे उच्चस्तरीय चिन्तन स्तर तक घसीट ले जाना। श्रेष्ठता का आधार सनातन है, निकृष्टता की दिशाएँ भी गिनी चुनी है। उतार-चढ़ाव उसी झूले पर झूलते रहते हैं, पर पुरानी सुधार प्रक्रिया हर बार नई बदलनी पड़ती है। क्योंकि मूल तथ्य यथास्थान रहने पर भी सामयिक परिस्थितियों के साथ जुड़ी हुई विकृतियों का स्वरूप पहले की अपेक्षा भिन्न होता है । भगवान बुद्ध के समय यज्ञीय हिंसा की वाममार्गी असुरता अट्टहास कर रही थी, तो स्वामी दयानन्द के समय पाखण्डी अनाचार गगनचुम्बी बना हुआ था। विवेकानन्द ने भारतीय संस्कृति की अनास्था के दुष्परिणाम देखे और गाँधी ने जनमानस में घुसी हुई पराधीनता प्रिय निराशा को जड़ जमाए पाया। वे मूलतः एक ही सुधार प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होते हुए भी वाह्य दृष्टि से सर्वथा भिन्न थे। उनमें न एकरूपता थी, न एक दिशा। कारण स्पष्ट है- समय -समय पर विकृतियाँ पृथक्-पृथक् परिधान ओढ़कर आती है।
अपने युग में अनाचार की गतिविधियाँ पूर्वकाल की अपेक्षा भिन्न है। इस समय दार्शनिक भ्रष्टता ने जिस दिशा में बहना आरम्भ किया है वह भूतकालीन दिशा से भिन्न है। इसलिए समाधान की प्रक्रिया भी नवीनतम होनी चाहिए, उसमें सामयिक विकृतियों की समीक्षा और निराकरण के सामयिक आधार रहने चाहिए।
समस्याओं के संसार में आचार्य जी का आविर्भाव इसी उद्देश्य को लेकर हुआ था। उन्होंने लोकजीवन की आर्त्तावस्था, विपन्न मानसिकता को अपने हृदय की धड़कनों में अनुभव किया और अपनी रचनात्मक प्रतिभा के बलबूते समाधान की शोध में तत्पर हुए। उनके दार्शनिक विचारों का उद्देश्य बौद्धिक महत्वाकाँक्षा से उपजे किसी मत या वाद की महत्ता का प्रतिपादन नहीं है, बल्कि जीवनभर किए गये महत्वपूर्ण प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों का वितरण है। इन दुष्कर एवं कष्टसाध्य प्रयोगों के लिए ऊर्जा देने वाली प्रेरणा का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है, “पीड़ित मानवता की, विश्वात्मा की, व्यक्ति और समाज की व्यथा-वेदना अपने भीतर उठने और बेचैन करने लगी। आँख दाढ़ और पेट दर्द से बेचैन मनुष्य व्याकुल फिरता है कि किस प्रकार किस उपाय से इस कष्ट से छुटकारा पाया जाय ? क्या किया जाय? कहीं जाया जाय ? आदि की हलचल मन में उठती है और जो सम्भव है उसे करने के लिए क्षण भर का विलम्ब न करने की आतुरता व्यग्र होती है , अपना मन भी ठीक ऐसा ही बना हैं। अन्तरात्मा की इसी बेचैनी ने उन्हें समाधान का अन्वेषण करने के लिए विवश किया।
यही करुणा उनकी तपश्चर्या का आधार बनी। तप और योग की गुह्य और गहन प्रक्रियाओं ने उनके व्यक्तित्व को भगवान महाकाल का आवास बनाया और नित्य गुरु के स्वरों ने उन्हें विश्वगुरु बना दिया। बोध की ऐसी आन्तरिक सम्पदा प्रदान की जो बौद्धिक सोच अथवा सूझ-बूझ की उपज नहीं है। वैदिक मन्त्रों की भाँति इसका अवतरण चेतना के उच्चतम स्तर से हुआ है। इस सत्य को उद्घाटित करते हुए स्वयं परमपूज्य गुरुदेव के शब्द है- ‘अखण्ड ज्योति का कलेवर छपे कागजों के छोटे पैकेट जैसा लग सकता है, पर वास्तविकता यह है कि उसके पृष्ठों पर किसी की प्राण चेतना लहराती है और पढ़ने वालों को अपने आँचल में समेटती है, कहीं से कहीं पहुँचाती है। बात लेखन तक सीमित नहीं हो जाती, उसका मार्गदर्शन और अनुग्रह, अवतरण किसी ऊपर की कक्षा से होता है। इसका अधिक विवरण जानना हो तो एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि हिमालय के देवात्मा क्षेत्र में निवास करने वाले ऋषि चेतना आ समन्वित अथवा उसकी किसी प्रतिनिधि सत्ता का सूत्र संचालन है। चेतना के उच्चतम स्तर से अवतरित हुए, अन्तःकरण की करुणा में धारण किए गए, बौद्धिक तीक्ष्णता से सँवारे गए इन विचारों में कितनी आभा है, कितनी रोशनी है, यह कहने की नहीं, अनुभव करने की बात है। जिनने इन्हें पढ़ा तड़पकर रह गया। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो इनका प्रभाव भी मानवी अन्तःकरण में बोध का बीज अंकुरित करता है
क्रोंच पक्षी के बघ से आहत होकर महर्षि बाल्मीकि ने रामायण की रचना की। लोकजीवन को मर्यादा, साहस , सूझ-बूझ एवं उज्ज्वल चरित्र वाले महानायक का आदर्श देने में सफल हुए। महाभारत के युद्धोपरान्त विकल, पीड़ित एवं दिशाधारा मनुष्यता को नवनिर्माण का साहस देने वाले विचार , महर्षि व्यास भावनाकुल अन्तर्चेतना से ही निसृत हुए थे। आचार्य जी के स्वर भी सम्बोधि से तरंगित हुए हैं। अपने स्वरों में सामाजिक, साँस्कृतिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक प्रत्येक क्षेत्र में पनपने वाली समस्याओं का सार्थक समाधान प्रस्तुत करने वाले आचार्यजी वेदों की ऋचाओं एवं उपनिषदों की श्रुतियों के द्रष्टा की भाँति क्रान्तिदर्शी ऋषि थे। साथ ही शंकर एवं मध्य की परम्परा में युगानुकूल भाष्यकार भी। अपनी गहन साधना के बल पर सत्य की गंगोत्री उनका आयाम बनी थी। उनका चिन्तन लयबद्ध संगीत है, जो उनके अपने अनुभव पर आधारित है। वे परम प्रज्ञा को उपलब्ध सन्त थे। उनके बोधमय स्वरों में प्राच्य एवं पाश्चात्य चिन्तन की गंगा एवं यमुना का पवित्र संगम है, जिसमें सरस्वती सी मौलिकता गुप्त होते हुए भी प्रकट है।
वे ईसा के स्वर्ग के राज्य को धरती पर अवतरित करने का आयोजन करने वाले विलक्षण देवमानव एवं खोखली हो रही संस्कृति व सभ्यता को, अपनी व्यथा के भार से लड़खड़ाती मानव जाति के बाण हेतु नवयुग के आगमन के सन्देशवाहक तथा उसके आयोजक एक प्रवर्तक लोकनायक हैं। अपनी अनुभूति पर आधारित होने पर भी उनके चिन्तन में पूर्व एवं पश्चिम अनायास समा गये हैं। सहस्राधिक पुस्तकों एवं अखण्ड ज्योति के लक्षाधिक पृष्ठों में लहराते उनके सम्बोधि सागर में कहीं निषेध का भाव नहीं है। आचार्य जी पहले महायोगी हैं फिर विचारक एवं लोक-नायक । उनके विचार योग के गहन आयामों में प्रत्यक्ष सत्य, सूक्ष्म से स्थूल में घटित होने वाले भविष्य की अनुभूति का बौद्धिक विश्लेषण हैं । उनका चिन्तन विचारों के इतिहास में क्रान्ति होते हुए भी किसी भी विचार का स्थान नहीं ग्रहण करता, बल्कि उसे आदर देकर पहले की अपेक्षा कहीं अधिक उपादेय बनाता है। एक अपूर्व सामंजस्य का प्रकाश स्तम्भ यहाँ है, जिससे लाखों लोग प्रकाश ले रहे हैं।
श्रीकृष्ण के जीवनकाल में उनके विचारों के प्रति सर्वथा समर्पित शिष्य वीरवर अर्जुन एवं मनीषी उद्धव थे। लेकिन विचारों की सार्वभौमिकता कुछ ऐसी थी कि समूची मानव जाति कृष्णं वन्दे जगद्गुरु कहकर नतमस्तक हुई। ईसा मसीह के भी उनके जीवनकाल में सिर्फ बारह शिष्य थे, लेकिन आज मसीह के विचार समूची दुनिया की आलोकित कर रहे हैं। आचार्य जी के विचारों को उनके सम्बोधि ज्ञान को भले शुरुआत में कुछ इने-गिने लोगों ने स्वीकारा हो, आज लाखों विश्वासी उन्हें परमपूज्य गुरुदेव कहकर श्रद्धा अर्पित करते हों, लेकिन भावी मानवता समूचा विश्व उन्हें वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रुपिणं कहकर वन्दित किए बिना न रहेगा।
इस समय याद आती हैं विक्टर ह्यगों कुछ पंक्तियाँ, जो उन्होंने अपने ‘सत्तरह सौ तिरानवे’ नामक उपन्यास में कहीं हैं- “क्रान्ति के बीज एक दो महान विचारकों के दिमाग में जमते हैं। वहाँ से फल-फूलकर बाहर आए कि छुतहे रोग की तरह अन्य दिमागों में उपज कर बढ़ते हैं। सिलसिला जारी रहता है। क्रान्ति की बाढ़ आती है। चिनगारी से आग और आग से दावानल बन जाता है। बुरे-भले सब तरह के लोग उनके प्रभाव में आते हैं। कीचड़ और दलदल में भी आग लग उठती है। “ ज्ञान क्रान्ति की लाल मशाल का भी यही भविष्य है। जो इसके आलोक को अपने हृदयों में अनुभव करते हैं।, उन्हें गुरु पूर्णिमा को शाश्वत गुरु के श्रद्धार्चन दिवस के रूप में हर्षोल्लासपूर्वक मनाना चाहिए। यही अर्चन उनके प्रश्नों का उत्तर देगा, समस्याएँ अपने समाधान का बोध पा सकेंगी।
समाज संगठन का सशक्त स्वरूप अब सरकार का ही माना जाना चाहिए। कोई समय था, जब अनुभवी, ईमानदार और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को पंच बना दिया जाता था और वे सद्व्यवहार की सत्परम्पराएँ चलाते रहने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते थे। ऐसे अवसर कम ही आते थे जिनमें सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया गया हो और अपराधियों को प्रताड़ना, भर्त्सना एवं क्षतिपूर्ति के लिए बाधित होना पड़ा हो। इस प्रक्रिया में निश्चयों को कार्यान्वित करने में विलम्ब भी नहीं लगता था। वदी-प्रतिवादियों के सिर पर न्याय-व्यवस्था का कोई खर्च भी नहीं पड़ता था। गवाहों की खानापूरी करने की अपेक्षा पंच लोग ही झंझटों की तह तक वस्तुस्थिति का पता लगा लेते थे। साक्षी मात्र प्रतिष्ठितों की, न्यायप्रिय लोगों की ही उपयुक्त मानी जाती थी। भाड़े के अप्रामाणिक व्यक्तियों की भीड़ लगाने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी। दूर न्यायालयों में जाने का खर्च भी नहीं पड़ता था और समय भी व्यर्थ नहीं जाता था। पंचायतें सत्प्रवृत्तियों के संचालन और दुष्प्रवृत्तियों के दमन का कार्य स्वयं ही कर लेती थीं। उनके पीछे लोकमत होता था। इसलिए निर्देशनों के उल्लंघन की हिम्मत भी किसी की नहीं पड़ती थी। केन्द्रीय सरकार को हस्तक्षेप तब करना पड़ता था, जब पंचायतों के निर्णय से अधिक का कोई झंझट सामने आता था। देशों की सीमा-सुरक्षा की जिम्मेदारी भी वे सरकारें ही उठाती थीं। उनके खर्च के लिए लोग अपने उपार्जन का छठा अंश राज्य-कोष में पहुँचा देते थे।
अब वह समय नहीं रहा। पंचायतें कालान्तर में दुर्बल होती चली गयीं। यद्यपि पिछले दिनों इस दिशा में कुछ प्रयास अवश्य हुए हैं। उनका कार्य सरकार को करना पड़ रहा है। शिक्षा, चिकित्सा, संचार, परिवहन आदि के लोकोपकारी कार्य भी उसी के जिम्मे हैं और अपराधियों से भी वही निपटती है। बाह्य आक्रमणों एवं आन्तरिक विग्रहों को दबाना भी उसी का काम है। अपने देश में प्रजातन्त्र है। प्रजा द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि ही सरकार के छोटे-बड़े संस्थानों को चलाते हैं। अफसर और कर्मचारी निर्धारित कार्यों की पूर्ति के लिए अपना पूरा समय लगाते हैं।
शासन का स्वरूप जनता द्वारा , जनता के लिए राज्य करना है। इसकी प्राथमिक और सर्वोपरि सत्ता मतदाता के हाथ में है। इसलिए सुशासन के लिए आवश्यक है कि मतदाता दूरदर्शी और विवेकवान हों। ऐसे व्यक्तियों को मत दें, जो सच्चरित्र और सुव्यवस्था की कसौटी पर खरे सिद्ध हो सकें। अपना परिचय और मन्तव्य संक्षेप में मतदाताओं को बता दें। यह प्रचार कार्य इतना महँगा नहीं होना चाहिए कि प्रत्याशी को अपने बर्तन बेचने पड़े। न मतदाता उनसे किसी प्रत्यक्ष, परोक्ष रिश्वत की आशा करें। अच्छा हो, प्रबुद्ध मतदाता ही चुनाव की प्रक्रिया अपने कंधों पर उठायें और प्रत्याशी को चापलूसी या धन-बर्बादी के लिए बाधित न होना पड़े। जिस प्रकार प्रतिनिधि चुनने का जनता को अधिकार है, उसी प्रकार उसे यह भी अधिकार रहे कि अयोग्य या अपराधी सिद्ध होने पर उसे उसी मतदान द्वारा वापिस बुला सके।
जनप्रतिनिधि कानून एवं संविधान बनाते या नीति निर्धारित करते हैं। निर्णयों को कार्यान्वित करने का दायित्व, अफसरों या कर्मचारियों का होता है। इसलिए उन्हें नियुक्त करते समय मात्र उनकी शिक्षा ही नहीं, पिछले जीवन की नीतिमत्ता एवं सेवा भावना भी परखी जानी चाहिए। इन दिनों यह नियुक्तियाँ 21 से 25 वर्ष तक ही आयु वालों की होती हैं। इसमें परिवर्तन होना चाहिए। अनुभव 30 वर्ष से कम आयु में किन्हीं बिरलों में देखा गया है। अनुभवहीनों को मात्र शिक्षा के आधार पर महत्वपूर्ण पद देना गलत है। जिनका सरकार पर प्रभाव है, राजनीति में दखल है, वे बड़ी आयु के अफसरों की नियुक्ति पर जोर दें। वे आलसी , प्रमादी न हों, रिश्वतखोरी न करें-इनकी जाँच-पड़ताल करते रहना, सरकार का अपना काम है। इन दिनों जनता में रिश्वत देने वाले और अफसरों में लेने वालों की संख्या बढ़ गई है। फलतः अनुचित कार्य होते रहते हैं और उचित मार्ग अपनाने वालों की हैरानी का सामना करना पड़ता है। यह प्रक्रिया रोकी न जा सकी, तो न्याय और नीति के पैर उखड़ जायेंगे और अनौचित्य की तूती बोलेगी।
न्यायपालिका एवं कार्य-पालिका की विधि ऐसी हो कि कम से कम समय में प्रतिवेदनों का निपटारा हो जाया करे। इन दिनों निर्णयों में बहुत समय लगता है और तारीखें बार-बार आगे बढ़ाई जाती रहती हैं। इसे ‘लालफीताशाही’ कहते हैं। इस कारण सरकार से जो आशा की जाती है, वह बहुत महँगी पड़ती है, फलतः संबद्ध व्यक्ति बुरी तरह खीजते हैं और विश्वास उठ जाने से कानून अपने हाथ में लेने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रक्रिया के कारण नये किस्म के नये उपद्रव खड़े होते हैं, मूल बात पीछे रह जाती है।
शासन तन्त्र बहुत महँगा हो गया है इसलिए हर क्षेत्र में टैक्सों की बढ़ोत्तरी निरन्तर होती जाती है। शासन इतना खर्चीला न हो। आवश्यकता से अधिक लोग न रखे जायँ, वेतन इतना हो जितने में देश का मध्यवर्ती समाज गुजारा करता है। इन दो बातों पर ध्यान दिया जाय और कर्मचारियों की चुस्ती-फुर्ती एवं ईमान की विश्वस्त जाँच-पड़ताल होती रहे, तो जनता और अफसरों के बीच जो खाई चौड़ी होती जाती है, वह न हो। इन दोनों के कारण सरकार की लोकप्रियता घटती है और जनसाधारण की देशभक्ति भावना में कमी आती है। लोग सरकारी निर्देशनों, सुझावों, योजनाओं पर ध्यान भी नहीं देते हैं। यह स्थिति सरकार और जनता दोनों के लिए ही अशोभनीय है।
अपराधियों को दण्ड मिलने की प्रक्रिया इतनी झंझट भरी तथा हलकी है कि उसका दबाव अपराधियों पर नगण्य जितना पड़ता है। उनमें से अधिकाँश कानूनी पेचीदगियों के कारण तथा गवाह न मिलने के कारण छूट जाते हैं, जमानत पर छूट आने से वे फिर आतंक पैदा करते हैं और गवाहों को धमकाते हैं। यदि सचमुच ही अपराधों में, अपराधियों में कमी करनी है तो दंड व्यवस्था कड़ी होनी चाहिए और पीड़ित पक्ष को गवाहियां जुटाने के दायित्व से मुक्त करना चाहिए। वस्तुस्थिति का पता लगाना, सरकार और पंचायत तन्त्र की किसी समन्वित समिति के हाथ सौंपा जाय, अन्यथा अपराधियों को दंड मिलना सम्भव न रहेगा।
कर चोरी और काले धन की वृद्धि में जहाँ व्यापारी दोषी है, वहाँ कर लगाने व वसूल करने की वर्तमान पद्धति भी कम दोषी नहीं है। उत्पादन कर एक जगह लगा दिया जाय और हर साल का लेखा-जोखा लेने में आमदनी बढ़े, उस पर टैक्स ले लिया जाय। ऐसे ही दूसरे तरीके भी हो सकते हैं, जिनके कारण कर चोरी और काले धन की अभिवृद्धि निरन्तर होती जाती है। यदि यह दबाया हुआ पैसा खोजा जा सके, तो उससे उद्योगों की वृद्धि हो सकती है और बेरोजगारी घट सकती है। देहाती उपयोग की वस्तुएँ कुटीर उद्योग के अंतर्गत गाँवों में ही बनें। बड़े मिलों को उनकी प्रतिद्वन्द्विता न करने दी जाय। सरकारी तन्त्र के अंतर्गत कच्चा माल देने, बना माल खरीदने की व्यवस्था रहे, तो-लाखों बेरोजगारों के कारण , जो अनेकों प्रकार के विग्रह पनप रहे हैं, उनमें रोकथाम हो सकती है।
शिक्षा का ऐसा क्रम बने कि जूनियर हाईस्कूल स्तर की शिक्षा को व्यापक बनाया जाय, उसको व्यक्तिगत आधार पर पनपने दिया जाय। जीवन में निरन्तर काम आने वाले शारीरिक , मानसिक, पारिवारिक , सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक विषयों का इससे अनिवार्य शिक्षा में समावेश हो। इतिहास, भूगोल, रेखागणित जैसे काम न आने वाले विषयों का परिचय मात्र एक पुस्तक में करा दिया जाय। इसी बीच गृह उद्योगों का व्यावहारिक शिक्षण भी चलता रहे। कालेज स्तर की शिक्षा को प्रोत्साहन न दिया जाय, जो विशेषज्ञ बनना चाहें, उन्हीं के लिए कॉलेजों के द्वार खुल रहें। नौकरी के लिए पढ़ाई का भ्रम विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में से निकाल दिया जाना चाहिए।
विविध विषयों की रात्रि पाठशालाओं की नई व्यवस्था चले, महिलाओं के लिए मध्याह्न पाठशालाओं की। इनमें साहित्यिक विषय कम और व्यावहारिक विषयों की बहुलता रहे।
वार्षिक परीक्षाओं की पद्धति दोषपूर्ण है, उसमें अयोग्य लड़कों को हथकंडों के आधार पर उत्तीर्ण होने की बहुत गुँजाइश है। मासिक या द्विमासिक परीक्षायें होने लगें। मात्र पुस्तकीय ज्ञान न आँका जाय, वरन् प्रतिभा, चरित्र एवं लोकसेवा जैसे विषयों में भाग लेने की जाँच-पड़ताल होती रहे! ठन मासिक परीक्षाओं के अंक जोड़कर ही वार्षिक परीक्षा मान ली जाय।
भारत में सामाजिक कुरीतियों की भरमार है। धर्म निरपेक्षता के नाम पर, इच्छा पर चलते रहने की छूट न मिलनी चाहिए। समाज सुधार के कुछ कानून हिन्दू सम्प्रदाय के लिए बने हैं, जबकि दूसरे सम्प्रदाय उनके मुक्त रखे गये हैं। बहुविवाह, पर्दाप्रथा-जैसी बुराइयाँ सभी वर्गों से हटनी चाहिए।
आरक्षण जाति विशेष को न दिया जाय, जिनकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति सचमुच गिरी हुई है, उन सभी को आरक्षण का लाभ मिले जबकि आजकल अनुसूचित जाति के नाम पर सुसम्पन्नों को भी वह लाभ मिलता है, जो वस्तुतः पिछड़ों को मिलना चाहिए। इन दिनों वनवासी, आदिवासी वर्ग सचमुच ही ऐसा है, जिनको जन-सामान्य के स्तर तक लाने की विशेष चेष्टा की जानी चाहिए।
प्रौढ़ शिक्षा की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। 70 प्रतिशत प्रौढ़ की शिक्षा उपेक्षणीय नहीं है। पुरुषों के लिए रात्रि पाठशालायें और महिलाओं के लिए अपराह्न शालाएँ स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से चलाई जायँ। इसके लिए ऐसी संस्थाओं के संगठन और संचालन के लिए शासक समुदाय अपने प्रभाव का उपयोग करके लोकसेवी संस्थाओं के निमित्त आवश्यक उत्साह पैदा करें।
बाल-विवाह, बहुविवाह और बहुप्रजनन, बड़े प्रीतिभोज भिक्षा-व्यवसाय के विरुद्ध कड़े कानून लागू किये जायँ। ढीले-पोले कानूनों का रहना न रहना समान है। यदि इन सामाजिक बुराइयों को सचमुच ही रोकना है, तो लोगों की नाराजी का वोट कटने का ध्यान रखे बिना, इन्हें कड़ाई से लागू करना चाहिए और अपराधियों को ऐसे दंड देने चाहिए, जिससे दूसरों के कान खुलें।
कन्या शिक्षा के पाठ्यक्रमों में उन विषयों को जोड़ा जाय, जो उनके पारिवारिक जीवन के हर पक्ष पर प्रकाश डालते हों, साथ ही आपत्ति के समय कुछ कमा सकने जैसे ग्रह उद्योग भी आवश्यक रूप से बढ़ाये जायँ। इन विषयों को पढ़ाने के लिए उनको कम किया जा सकता है, जो स्कूल छोड़ते ही विस्मृत हो जाते हैं और कभी किसी काम नहीं आते।
छात्र संस्थाओं की मार्फत विद्यालयों में सादा जीवन उच्च विचार की विद्या कार्यान्वित की जाय। इन दिनों वहाँ के वातावरण में उच्छृंखलता के तत्व प्रवेश करते जा रहे हैं। इसे निरस्त करने के लिए अध्यापक और विद्यार्थी मिल-जुलकर काम करें।
स्वयंसेवी संगठनों की मार्फत प्रौढ़ शिक्षा की ही तरह हर गाँव में व्यायामशाला की स्थापना कराई जाय, जिसमें हर स्तर के बाल-वृद्धों को उनकी स्थिति के अनुरूप व्यायाम करायें। इसके साथ ही स्वस्थ रहने से सम्बन्धित सभी विषयों का संक्षिप्त समावेश हो। फार्स्टएड, रोगी परिचर्या , धात्री कला, शिशु-पोषण जैसे विषय इन व्यायामशालाओं के साथ ही बौद्धिक शिक्षा के रूप में पढ़ाये जायँ।
प्रौढ़ शिक्षा और व्यायाम आन्दोलन के लिए ऐसी पाठ्य पुस्तकें रहें, जिनमें आज के व्यक्ति परिवार और समाज की सभी समस्याओं का स्वरूप और समाधान संक्षेप में किन्तु सारगर्भित रूप से मौजूद हो।
देहातों में ग्रामीणों के सामने उपस्थित सभी समस्याओं के कारण और निवारण बताने वाले सामूहिक वीडियो घर बनाये जायँ। उनके लिए सस्ते दामों पर दिखाने के लिए रचनात्मक एवं सुधारात्मक वीडियो फिल्में शांतिकुंज जैसी संस्था बनाती रहें और उसे व्यापक रूप से छोटे-छोटे गाँवों तक पहुँचाने का प्रबन्ध किया जाय। यह योजना सरकार हाथ में लेने के झंझट में न पड़ना चाहे, तो स्वयंसेवी संस्थाओं को यह काम सौंपा जा सकता है।
देश में डाक्टरों, प्रशिक्षित नर्सों एवं इंजीनियरों की अत्यधिक आवश्यकता है। इसके लिए पाँच वर्ष वाला कोर्स थोड़े से प्रतिभावान, एवं सम्पन्न लोग ही पूरा कर सकते हैं। सरकार इनके डिप्लोमा कोर्स दो-दो वर्ष के बनाये और उन्हें देहाती क्षेत्रों में काम करने के लिए भेज दे। ग्राम प्रधान देशों में से कइयों ने ऐसे डिप्लोमा कोर्स जारी किये हैं।
शहरों की बढ़ती आबादी और देहातों से भगदड़-यह दोनों ही हानिकारक हैं। इसका विकल्प कस्बों में उद्योग लगाये जायँ और आस-पास के गाँव के लिये सड़कें हों, माल लाने ले-जाने के लिए हलके पहियों वाली बैलगाड़ियां बनें, तो शहरों के विकेन्द्रीकरण का काम सरलतापूर्वक चल सकता है। आज की देहाती तथा शहरी कितनी ही समस्याओं का समाधान हो सकता है।
गाँवों का मल-मूत्र इर्द-गिर्द ही सड़ता रहता है, जिससे दुर्गन्ध तथा बीमारी तो फैलती है, साथ ही कीमती खाद का भारी नुकसान होता है। इसके लिए सस्ते, बिना साँकपिट वाले पाखाने, सामूहिक पाखाने, रोड़ी कंकड़ वाले पेशाबघर, जगह-जगह लगाये जाने चाहिए। कम लकड़ी से जलने वाला चूल्हा भी हर किसी को उपलब्ध हो सके, ऐसा प्रबन्ध किया जाना चाहिए। सम्भव हो, तो हैण्ड पम्प लगाने की योजना को भी सस्ता और सरकारी तन्त्र के साथ जुड़ा बनाया जाय। देहाती सस्ते मकानों के लिए खपरैल बनाने की व्यवस्था भी बड़े पैमाने पर जगह-जगह की जाय। सीमेन्ट के ढले हुए पाये भी बन सकें, तो बढ़ती आबादी के लिए घिच-पिच में सड़ने की अपेक्षा सस्ते मकानों की देशव्यापी योजना बन सकती है। इसमें लोहे के स्थान पर बाँस का उपयोग हो सकता है।
राष्ट्रीय एवं स्थानीय सरकारी तन्त्र के स्तर पर यह सभी सुझाव दिये जायं और जहाँ जो प्रबन्ध बन पड़ रहा हो, उसमें पूरा-पूरा सहयोग स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा सरकार को दिया जाय। शासन तन्त्र के पास साधन हैं, व्यक्ति हैं, मात्र सुनियोजन का अभाव है। प्रजातन्त्र में यह प्रयोग सफल न हो सका तो अन्य देशों में क्रान्ति लाने की बात फिजूल है। हम अपने संगठन से प्रेरणा देते हुए इन प्रयोगों का शुभारम्भ करें। परिणति सुखद ही होगी।
स्वर्गीय राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद एक बार कई राज्यों का दौरा करने के बाद राँची पहुँचे। वहाँ उनके पैर में दर्द होने लगा। पता चला कि उनके जूतों के तल्ले घिस गये तथा कीलें ऊपर उभर आयी हैं। राजेन्द्र बाबू अहिंसक जूतों का ही प्रयोग करते थे। उनके शिविर से 10 मील दूर ही अहिंसक चर्मालय केन्द्र था। वहाँ सचिव को भेजकर नया जोड़ा मँगवाया।
जूते पाँव में डालकर उन्होंने कीमत पूछी, तो उत्तर मिला- “उन्नीस रुपये।”
“गत वर्ष तो ऐसे जूते ग्यारह रुपये में लिये थे। “
सचिव ने उत्तर दिया। “ग्यारह रुपये वाले जूते इनसे कमजोर तथा कठोर हैं। “
राजेन्द्र बाबू को संतोष नहीं हुआ। उन्होंने कहा- “कि जब ग्यारह रुपये के जूते से काम चल सकता है, तब उन्नीस रुपये वाला जोड़ा मँगवाओ।”
राष्ट्रपति जी वहाँ तीन दिन ठहरे। उन्होंने किसी आने-जाने वाले से जूता बदलवाया। सचिव को मोटर द्वारा जूता बदलने नहीं भेजा। उन्होंने कहा- “जितने रुपये जूते में बचायेंगे, उतने पेट्रोल में लग जायेंगे।”
यद्यपि बात छोटी सी थी, परन्तु राष्ट्र की सम्पत्ति की एक-एक पाई का ध्यान रखनेवाले राजेन्द्र बाबू के लिये तो छोटी सी बात भी बहुत गंभीर थी। ये छोटी-छोटी बातें ही तो व्यक्ति को बड़ा बनाती हैं।
(शक्तिपीठों में त्रैमासिक प्रशिक्षण की अभिनव योजना)
नवयुग का दृश्यमान अवतरण, प्रभातकाल के अरुणोदय के समतुल्य माना जाय तो उसकी किरणें गायत्री शक्तिपीठों के रूप में व्यापक आलोक वितरण करती प्रतीत होंगी। सूक्ष्म कितना ही प्रचण्ड क्यों न हो, उसका दृश्य स्वरूप स्थूल कलेवर के रूप में ही देखा जा सकता है। मानवी सत्ता चेतन होने के कारण सूक्ष्म है। जीव का स्वरूप आँखों से नहीं देखा जा सकता, तो भी उसका परिचय काय-कलेवर के रूप में मिलता है। आमतौर से शरीर को ही व्यक्ति माना जाता है। व्यक्ति को ही जीव समझा जाता है। यों वस्तुतः दोनों पृथक् हैं। शरीर पंचभौतिक है और आत्मा अभौतिक। तो भी दोनों इस प्रकार गुँथे होते हैं कि सामान्य बुद्धि उनका अलगाव नहीं कर पाती। लोकमान्यता में जीव और शरीर का संयुक्त स्वरूप ही परिचय में आता और प्रभावी प्रतीत होता है। ठीक यह बात युगान्तरकारी चेतना के विषय में है, गायत्री शक्तिपीठें इसी का दृश्यमान कलेवर हैं, जिसकी प्रचण्ड क्षमता को इन्हीं दिनों परिवर्तन और सृजन की सामयिक आवश्यकताओं का पूरा होते देखा जाना है।
थ्वगलित का अभिनव के रूप में प्रत्यावर्तन ही युग परिवर्तन है। व्यष्टि में दुष्टता और समष्टि में भ्रष्टता के तत्व बढ़ गए हैं। औचित्य का स्थान औद्धत्य हथियाता चला जा रहा है। समूहगत सहकारिता कुण्ठित हो गयी है और संकीर्ण स्वार्थपरता का बोलबाला है प्रवृत्तियाँ सृजन का बहाना भर करती हैं, व्यवहार में ध्वंस ही उनकी दिशाधारा है। ऐसी दशा में बड़ा परिवर्तन और प्रत्यावर्तन से कम में काम नहीं चल सकता। प्रवाह को उलटना बड़ा काम है। विशेषतया निकृष्टता की सड़क पर जब आतुर घुड़दौड़ मच रही हो तो पवमनों की लगाम पकड़ना और उन्हें रुकने ही नहीं, उलटने को विवश करना एक बहुत बड़ा काम है। साथ ही अति कठिन भी, श्रम- साध्य और साधन−साध्य भी। क्रान्तियों की बात करना सरल है, योजनाएँ बनते देर नहीं लगतीं, किन्तु उन्हें कर दिखाना और सफल बनाना दुस्तर होता है। श्रेय हलचलों को नहीं, सफल प्रतिफल को मिलता है। इस दृष्टि से क्षेत्रीय और सामयिक क्रान्तियाँ भी आँशिक रूप से ही सफल हो पाती हैं। फिर छह सौ करोड़ मनुष्यों की मनःस्थिति और पच्चीस हजार मील परिधि के भूमण्डल की परिस्थिति को बदल देना कितना कठिन कार्य है, इसकी कल्पना करने भर से सामान्य बुद्धि हतप्रभ हो जाती है। लेकिन जिन्हें विशिष्ट प्रज्ञा का दैवी अनुदान प्राप्त है। जिनकी आँखें खगोलीय और भूगोलीय मन्थन की तीव्रता और व्यापकता को देख रही हैं, उन्हें यह अहसास हो चला है कि अब परिवर्तन हुए बिना न रहेगा। इसके सिवा दूसरा कोई विकल्प भी तो नहीं। यह जीवन और मरण का चौराहा है। जहाँ आज की दुनिया आ खड़ी हुई है। वहाँ से आगे बढ़ने के लिए दो ही मार्ग हैं एक सर्वनाश, दूसरा नवसृजन। चुनाव इन्हीं दोनों में से एक का होना है। नियति को इन्हीं दोनों में से एक का चयन करना है। प्रस्तुत परिस्थितियों में निर्णायक की भूमिका सृष्टि के सूत्र-संचालन को निभानी है और वह निभा भी रहा है, निश्चय ही उसे अपनी इस अनुपम कलाकृति का विनाश अमान्य है। छूट तो बच्चे को भी मिलती है और अभिभावक उसकी स्वतन्त्रता एवं सक्रियता को एक सीमा तक चलने भी देते हैं पर जब बचपन विनाश से खेलने को मचलता हो तो अभिभावकों का उत्तरदायित्व आगे आता है और सहमत या असहमत होने की परवाह किए बिना बालक को उद्धतता छोड़ने और औचित्य अपनाने के लिए विवश करता है। इन दिनों भी यही होने जा रहा है। स्रष्टा ने समय-समय पर असन्तुलन निभाई है। नियति के अन्यान्य निर्धारणों की तरह सन्तुलन में सूक्ष्म चेतना का यथासमय अवतरण होना भी एक सुनिश्चित विधान है। उसे ऐसे ही अवसरों पर सक्रिय होना पड़ता है, जैसे कि आज हैं। अधर्म के उन्मूलन और धर्म के संस्थापन की आवश्यकता जब भी अनिवार्य हुई है, तभी ‘तदात्मानं सृजाम्यहम’ का आश्वासन मूर्तिमान होते और आश्वासन की पूर्ति करते देखा गया है। अवतार की सुदीर्घ शृंखला का यही इतिहास है।
इसी में एक नया अध्याय, प्रज्ञावतरण का इन्हीं दिनों और जुड़ गया है। आस्था संकट की सघन तमिस्रा का निराकरण ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्रभात बेला ही कर सकती है। गायत्री यही है। जनमानस का परिष्कार एवं देवयुग का निर्धारण उसी तत्वज्ञान के आलोक से सम्भव होगा। यों इसे पिछले दिनों एक वर्ग विशेष की पूजा-पत्री तक सीमित समझा गया था, पर वह वस्तुतः इतनी स्वल्प और सीमित है नहीं। मानव जीवन के समग्र विकास का तत्व ज्ञान इसमें निहित होने के कारण इसे गुरुमन्त्र कहा गया है। गुरु तत्व द्वारा मिलने वाली श्रद्धा , प्रेरणा, भाव संवेदना एवं अनुशासन का प्रकाश इसमें निहित है। इसके अवलम्बन से देवयुग में स्वर्गीय परिस्थितियों का लाभ चिरकाल तक इस धरती के निवासी उठाते रहे हैं। नवनिर्माण की सन्धिबेला में गायत्री शक्तिपीठों के माध्यम से वही पुरातन-पुनर्जीवित होने को है। इन सृजन संस्थानों से देव युग की वापसी आश्चर्यजनक तो लग सकती है, पर उसमें ऊर्जा के हर प्रभात में बार-बार उदय होने के गति चक्र का परिभ्रमण मात्र ही तथ्य है।
सूक्ष्म को प्रेरणा-स्थल में हलचल बनकर प्रकट होती हैं। ऋतुओं के बदलते ही परिस्थितियाँ किस प्रकार उलट जाती हैं, इस चमत्कार से हर कोई परिचित है। शीत और ग्रीष्म की प्रतिक्रियाएँ और व्यवस्थाएँ एक-दूसरे से कितनी भिन्न होती हैं ? वर्षा के महीने और गर्मी के दिन एक-दूसरे से कितने भिन्न होते हैं। यह सर्वविदित है। यह सूक्ष्म परिवर्तन का स्थूल प्रभाव है। अदृश्य की दृश्य के रूप में परिणति है। मनुष्य की आस्था, आकाँक्षा बदलने पर उसकी गतिविधियों और सम्भावनाओं में कितनी बड़ी उलट-पुलट होती है, इसके प्रमाण आये दिन पग-पग पर देखे जाते हैं। बड़े और व्यापक परिवर्तन इसी प्रकार होते हैं। साधनों की सहायता से भी कई बार कुछ बड़े हेर-फेर देखे गए हैं। बुद्धि कौशल और व्यवस्था विधान से भी कई बार चमत्कार दिखाता है। किन्तु लोकप्रवाह बदलने जैसे व्यापक और जटिल प्रयोजन की पूर्ति चेतना जगत में उठने वाले प्रचण्ड प्रवाह ही सम्पन्न करते हैं।
देखने वाले देखते हैं और जानने वाले जानते हैं कि जब कभी सृजनात्मक परिवर्तन हुए हैं तो अंतर्जगत में आदर्शवादिता अपनाने वाली उमंगें आँधी-तूफान की तरह उमंगी हैं और उनके प्रचण्ड प्रवाह में पत्ते तिनके तक आकाश चूमने का असम्भाव्य सम्भव करके दिखाते रहे हैं। यही है युग परिवर्तन की सन्धिबेलाओं में अपनी प्रमुख भूमिका निभाने वाली समर्थता। जो उत्पन्न तो अंतर्जगत में होती है, पर उलटकर सारे वातावरण को रख देती है। अपने समय में युग परिवर्तन की यही पुण्यबेला है। इसके अन्तराल में महाकाल का प्रचण्ड प्रयास चल रहा है, उसी के फलस्वरूप अनेकानेक सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ मानवीय प्रयत्नों में सम्मिलित हो रही हैं। गायत्री शक्तिपीठों द्वारा इन्हें ही सुनियोजित एवं सुसंगठित किया जाना है। विवाद यह हो सकता है कि स्थूल प्रयत्नों से लोकचेतना उत्पन्न हुई या सूक्ष्म प्रवाह ने प्रयत्नों को उभारा ? इस प्रश्न के उत्तर में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि महाकाल की चेतना एवं गायत्री परिवार का स्थूल कलेवर दोनों अविच्छिन्न रूप से जीव और शरीर की तरह गुँथे और परिवर्तन एवं सृजन के उभयपक्षीय प्रयोजन में एकजुट होकर परिपूर्ण तत्परता के साथ तन्मय हो रहे हैं। सूक्ष्म जगत की प्रेरणाएँ और स्थूल जगत की प्रवृत्तियां संयुक्त रूप से नवसृजन का ढाँचा खड़ा कर रही हैं।
इस क्रम में इस वर्ष के गुरु पर्व पर क्रियान्वित करने के लिए चेतना की उच्चस्तरीय कक्षा से एक संदेश का अवतरण हुआ है। गुरु सत्ता की परावाणी ने यह उद्बोधन दिया है कि शक्तिपीठों में उन गतिविधियों को अविलम्ब शुरू किया जाय, जिसके लिये विनिर्मित हुई थीं। इस सन्देश में शक्तिपीठों की वर्तमान अवस्था एवं व्यवस्था पर छोभ था, एक गहरी टीस थी और साथ ही सुझाई गयी योजना के क्रियान्वयन के लिए भरपूर समर्थ संरक्षण एवं ऊर्जा अनुदान का स्पष्ट आश्वासन।
इन निर्देश के अनुरूप शान्तिकुँज ने शक्तिपीठों के लिए एक त्रैमासिक प्रशिक्षण कार्यक्रम की योजना तैयार की है। इसे शक्तिपीठों से जुड़े , मिशन की गतिविधियों के लिए समर्पित , अपने क्षेत्र की समस्याओं के जानकार कार्यकर्ताओं के सुझाव-परामर्श एवं वैचारिक आदान-प्रदान के आधार पर क्रियान्वित किया जाएगा। परिजन इन पंक्तियों को गम्भीरता से लें, इस कार्य में अपनी भागीदारी को गुरुसत्ता के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धाँजलि समझें।
इस कार्य में क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं के सुझाव बहुमूल्य हैं। क्योंकि इन्हीं के आधार पर क्षेत्र विशेष के लिए प्रशिक्षण के विशेष पाठ्यक्रम का निर्धारण किया जाएगा। क्षेत्र विशेष की समस्याओं को जाने, समझे, अनुभव किए बगैर हर कहीं एक जैसा पाठ्यक्रम थोप देने की प्रक्रिया विशेष की आदत से प्रशिक्षण की गुणवत्ता कम होगी, साथ ही स्थान विशेष की समस्याओं का निराकरण भी न पड़ेगा।
यही कारण है कि इस क्रम में क्षेत्र की समस्याओं और आवश्यकता को वरीयता दी गयी है। परिजन यह सुझाएँगे कि उनके क्षेत्र में सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के किन कार्यक्रमों को लागू किया जाना चाहिए। नशा उन्मूलन, पर्यावरण सम्वर्धन, प्रौढ़ शिक्षा, बाल संस्कारशाला आदि विभिन्न कार्यक्रमों में किनकी उपादेयता उनके क्षेत्र में सर्वाधिक है। इस तरह के अध्ययन एवं सर्वेक्षण के आधार पर शान्तिकुँज में प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा। प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले ये सभी प्रशिक्षक विशिष्ट एवं वरिष्ठ स्तर के होंगे। ताकि न केवल वे शक्तिपीठों को केन्द्र बनाकर वहाँ आस-पास के क्षेत्र में मिशन की गतिविधियों का प्रसार कर सकें बल्कि क्षेत्र विशेष की समस्याओं , संगठनात्मक गुत्थियों को सुलझाने में अपनी समर्थता सिद्ध कर सकें।
प्रशिक्षण कार्यक्रमों की अवधि त्रैमासिक रखे जाने के पीछे महत्वपूर्ण सोच यह रही है कि इस अवधि में केन्द्र के द्वारा भेजे जाने वाले प्रशिक्षक, प्रशिक्षण कार्यक्रम के संचालन के साथ ही इकाई को समर्थ एवं सशक्त बनाने में उचित सहयोग दे सकेंगे। तीन दिन या पाँच दिन की अवधि में सामान्य परिचय भर का कार्य सम्पन्न हो पाता है। इतनी स्वल्प अवधि में घर-घर जाकर मिशन का परिचय देना, नए कार्यकर्त्ताओं को प्रशिक्षण देना उत्साह खो चुके लोगों में नए उत्साह का संचार करना, आपस की उलझनों को मिल-बैठ कर सुलझाना जैसी बातों की सम्भावना नहीं रहती।
इस कार्यक्रम में पहले किन शक्तिपीठों को लिया जाय, यह भी निर्धारित कर लिया गया है। पहले चरण में इनकी संख्या प्रायः पच्चीस से पचास तक रहेगी और प्रत्येक शक्तिपीठ में इन तीन महीनों के लिए दो प्रशिक्षकों को भेजा जाएगा। जो अपनी सृजन गतिविधियों में नल-नील एवं तत्परता, कुशलता में अनुमान, अंगद का सा पराक्रम प्रदर्शित कर सकेंगे। इस योजना के परिणाम का आँकलन प्रचार-प्रसार की दृष्टि से कम एवं संगठन को मजबूत बनाने एवं नये समर्पित कार्यकर्ताओं को तैयार करने की दृष्टि से अधिक किया जाएगा। अपने प्रथम चरण की सफलता के साथ ही यह योजना अपने विस्तार में समस्त शक्तिपीठों को अपने आलिंगन में बाँध लेगी।
दिव्यलोक से उभरी हुई इस सक्रियता का उपयुक्त नाम ‘युगान्तरीय चेतना’ है। देव संस्कृति का उदय और स्वर्गीय परिस्थितियों का नवनिर्माण उसी का काम है, इसी ने जाग्रत आत्माओं को अनुप्राणित किया है। उदीयमान सूर्य की प्रथम किरणें भी तो सर्वप्रथम गिरिशिखरों पर ही चमकती हैं। द्वितीय चरण में दिनकर का आलोक समस्त भूमण्डल को ही आच्छादित कर लेता है। यों गुफाओं में अन्धेरा तो मध्याह्न काल तक बना रहता है। यह योजना भी दिव्यलोक के प्रवाह के प्रथम अवतरण के सदृश है जो सर्वप्रथम शक्तिपीठों में ही क्रियान्वित होनी है।
गायत्री शक्तिपीठें ही प्रज्ञावतार का दृश्यमान स्वरूप हैं और प्रज्ञावतार ही पौराणिक मान्यता के अनुरूप ‘निष्कलंक’ है। यह प्रमाण पत्र है जिसके लिए कलंकों का आरोपण और अग्नि परीक्षा से उनका निराकरण आवश्यक है। शक्तिपीठों के संचालन में अनेकानेक विग्रहों का खड़ा होना प्रायः वैसा ही है जैसा राम, कृष्ण, बुद्ध आदि को निरस्त करने के लिए आसुरी तत्वों ने विविध छद्म रूप से आक्रमणों का सिलसिला चलाया था। इसमें बिगड़ा कम बना अधिक । प्रज्ञावतार की युगान्तरीय चेतना को भी इसी प्रकार के अवरोधों से होकर गुजारना होगा। इतने पर भी सफलता की आत्मिक परिणति सुनिश्चित है। निष्कलंक प्रज्ञावतार द्वारा युग परिवर्तन की प्रक्रिया को सम्पन्न होने में आस्थावानों को तनिक भी सन्देह करने की आवश्यकता नहीं।
जिन्हें सूक्ष्म दर्शन का आभास देने वाली दिव्य-दृष्टि प्राप्त है, उन्हें यह अनुभव करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि युग परिवर्तन की सुखद सम्भावनाओं को मूर्तिमान करने के लिए गायत्री शक्ति पीठों का कितना महत्व है ? नवयुग के मत्स्यावतार के व्यापक होते जा रहे स्वरूप को देखते हुए मथुरा व हरिद्वार के दो आश्रम अब पर्याप्त नहीं रहे। प्रवृत्तियों की तीव्रता और व्यापकता ने तकाजा किया है कि आलोक वितरण के लिए विनिर्मित ये अनेकानेक केन्द्र अपने काम में ढिलाई न बरतें।
बिजली उत्पादन के लिए एक बड़ा केन्द्र हो सकता है। किन्तु हर नगर का, हर मुहल्ले का सबस्टेशन भी बनता है। ट्रान्सफार्मर अनेक लगाने पड़ते हैं। सत्ता भले ही दिल्ली में केन्द्रित रहे पर शासन तन्त्र चलाने के लिए क्षेत्रीय कार्यालयों की आवश्यकता रहेगी ही। समय आ गया है कि युग सृजन की चेतना के एकमात्र केन्द्र की सक्रियता भर से काम नहीं चलेगा। अब उसके लिए सब डिवीजन को भी सक्रिय होना पड़ेगा। गायत्री शक्तिपीठों में चलाए जाने वाले इस त्रैमासिक प्रशिक्षण कार्यक्रम को उपयोगिता, आवश्यकता के प्रतिपादन में जितना कुछ कहा जा सके कम है। इसे वर्तमान पीढ़ी के लिए गौरव गरिमा का और भावी पीढ़ी के लिए सुखद सम्भावनाओं केन्द्र बिन्दु माना जा सकता है।
यह प्रशिक्षण योजना मुरझाए हुए कल्पवृक्षों के लिए खाद-पानी का काम करेगी। इसके परिणामस्वरूप जब इन कल्पवृक्षों की फसल को फलित होने का अवसर आएगा तो एक स्वर से यही माना जाएगा कि इसकी आवश्यकता , उपयोगिता, प्रतिक्रिया एवं सम्भावना के सम्बन्ध में जो कुछ कहा गया था, वह स्वल्प, नम्र एवं संकोचयुक्त था। परिवर्तन प्रक्रिया जब सम्पन्न हो चुकेगी, आसुरी शक्तियाँ निष्प्राण होकर निर्जीव हो जायेंगी तथा दैवी शक्तियाँ और दैवी प्रवृत्तियाँ चारों ओर गतिमान दिखेंगी तब इन प्रयासों की उपलब्धियाँ आँकलित की जा सकेंगी। जिस प्रकार असुरता का प्रत्यक्ष आक्रमण नहीं दिखाई पड़ा, उसी प्रकार उसका उन्मूलन भी स्थूल दृष्टि से नहीं देखा जा सकेगा। लेकिन जो व्यक्ति नवयुग के अवतरण को पहचान रहे है उसके प्रसार, विस्तार में लगे हैं, वे अपने आप को कृतकृत्य और धन्य अनुभव करेंगे।
परमपूज्य गुरुदेव को कहाँ ढूँढ़ें ? कैसे पाएँ ? गुरुपर्व के अवसर पर श्रद्धा से आकुल परिजनों के अंतर्मन में इन सवालों का उठना स्वाभाविक है, जिन्होंने गुरुदेव को देखा है, उनका सान्निध्य पाया है, उनके वात्सल्य का स्वाद चखा है, उनके मनों में यह बात उठना स्वाभाविक है कि उनकी चैतन्य सत्ता की सघन अनुभूति कहाँ और कैसे की जा सकती है। लालसा उन्हें भी है जो उन्हें देख तो नहीं सके, मिल तो नहीं पाए, पर विचारों के संपर्क में आए हैं और अधिक प्रेरणा, स्पष्ट मार्गदर्शन पाने की ललक उन्हें भी आतुर-आकुल करती रहती है।
सूक्ष्म सत्ता कितनी ही सशक्त और सर्वव्यापी हो पर स्थूल की लालसा मिटती नहीं है। निराकार परमात्मा भक्तों की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए आकार ग्रहण करता है, अवतार लेता है। अवतार की स्नेह स्मृति का स्पर्श दिलाने वाले चित्रों, मंदिरों के निर्माण के पीछे यही भावना सक्रिय रहती है। महापुरुषों, ईश्वरीय विभूतियों की समाधियों का यही रहस्य है। यूँ तो इनकी चेतना परमात्मा से सर्वथा एकात्म और सर्वव्यापक होती है फिर भी अपने अनुयायियों, भक्तों पर कृपा करने के लिए इनके अस्तित्व की चैतन्य शिखा समाधियों में प्रज्ज्वलित रहती है। अरविन्द की समाधियों तथा बेलूर मठ में श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द के मन्दिरों में इसी आस्था का बोध होता है।
पूज्य गुरुदेव भी परिजनों की इस आतुरता भरी ललक से वाकिफ थे। उनके रहने पर बालकों को स्थूल सहारा, प्रेमपूर्ण सान्निध्य कहाँ मिलेगा, इसकी चिन्ता ऋषि-युग्म को थी। इसी के समाधान में उन्होंने सन् 1982 की बसन्त पंचमी के अवसर पर शान्तिकुँज में दो छतरियों का निर्माण कराया था और उन्होंने स्वयं इनका नामकरण किया था ‘प्रखर प्रज्ञा’ एवं ‘सजल श्रद्धा।’ ये दोनों ही नाम ऋषि-युग्म के व्यक्तित्व की विशेषताओं को अपने में परिलक्षित करते हैं। अपने हाथों से की गई इस स्थापना के अवसर पर उन्होंने हँसते हुए कहा था- “अब हम दोनों यहीं रहेंगे।”
एक अन्य अवसर पर उन्होंने इस स्थान विशेष का माहात्म्य बताते हुए कहा था- “शान्तिकुँज मेरा स्थूल कलेवर है, परन्तु ‘प्रखर प्रज्ञा’ एवं ‘सजल श्रद्धा’ आगे मेरे न रहने पर हमारे हृदय की भूमिका निभायेंगे। विशेष जोर देकर उनने कहा था कि महत्व संगमरमर से बने हुए इस निर्माण का नहीं, इस स्थान विशेष पर घनीभूत प्राण ऊर्जा का है। गायत्री नगर की स्थापना से लेकर 1983 की बसंत पंचमी तक धर्म ध्वजारोहण भी स्वयं पूज्यवर के हाथों वहीं हुआ था। एक अन्य अवसर पर उन्होंने बताया कि “गंगा की गोद और हिमालय की छाया में बना शान्तिकुँज इस युग का ऊर्जा-अनुदान केन्द्र है। हिमालय की दिव्य ऋषि सत्ताओं का हवाई अड्डा है, युगान्तरीय चेतना का हैड क्वार्टर है, महाकाल का घोंसला है और सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा इस इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री का गोमुख के रूप में प्रसिद्ध होगा। युग चेतना के अविरल प्रवाह का मूल स्त्रोत बनेगा। इस स्थान का विशेष महत्व उनने इस स्थली के नीचे गहराई में बहने वाली पुण्यतोया भागीरथी की विशेषा धारा के कारण हम सभी को समझाया था।”
निःसंदेह युगान्तरकारी चेतना का उत्तराधिकारी इस स्थान के अतिरिक्त हो भी कौन सकता था ? गायत्री जयंती सन् 1990 में पूज्यवर के लौकिक महाप्रयाग के पश्चात् उनके देहावशेष ‘प्रखर प्रज्ञा’ में स्वयं वन्दनीया माताजी ने स्थापित किये। 1992 में उत्तरकाशी में भूकम्प आने पर शान्तिकुँज में रहने वाले और बाहर के परिजनों का मन हुआ कि भूकम्प प्रधान बेल्ट में स्थित होने के कारण कमजोर नींव खिसकने से जो इसके ढाँचे में क्रैक्स आये हैं, उन्हें देखते हुए मजबूत आधार देकर उन्हें बाहर से नया रूप दे दिया जाय। वन्दनीया माताजी से निवेदन करने पर उन्होंने इतना कहा- “अभी नहीं।” समय सरकता गया। अश्वमेध यज्ञों के लिए जाते समय हर बार वंदनीया माताजी ‘प्रखर प्रज्ञा’ में अपने आराध्य के चरणों में प्रणाम करतीं और रवाना हो जातीं। बड़ौदा अश्वमेध यज्ञ हेतु रवाना होने से पूर्व एक कार्यकर्त्ता गोष्ठी में वे सहज ही बोल उठीं कि मेरे भगवान ‘प्रखर प्रज्ञा’ में भस्मावशेषों के रूप में स्थापित हैं, मुझे भी तुम ‘सजल श्रद्धा’ में स्थापित कर देना। हम दोनों सदा उस स्थान पर विद्यमान रहकर तुम्हें प्रेरणा देते रहेंगे। हाँ ! बाहर का संगमरमर से बना आवरण तुम अवश्य बदल सकते हो, किन्तु अभी नहीं कुछ समय बाद, जब तक मैं अपने आराध्य से एकाकार न हो जाऊँ। सभी वरिष्ठ कार्यकर्त्ता वहाँ मौजूद थे। सभी हतप्रभ रह गये क्योंकि परम वंदनीया माताजी प्रकारान्तर से अपने महाप्रयाग की भवितव्यता की सूचना भी दे रही थीं व स्वयं के स्मृति चिन्ह स्थापित हो जाने के बाद उसके जीर्णोद्धार की बात कह रही थीं, जिसके लिए स्वयं वे कहती भी रहती थीं किन्तु करने से रोक देती थीं। संयोग कि चित्रकूट अश्वमेध हेतु जाते समय उसी स्थान पर प्रणाम करने के बाद वे कुछ देर भाव विह्वल खड़ी रहीं एवं फिर पास खड़े वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं की तरफ मुड़कर बोलीं- “अब समय आ गया है कि तुम कुछ दिनों बाद इसे नये सिरे से बनवा दो। हाँ ! स्मृति चिन्ह वाले स्थान यथावत् रहें, छतरियों का ढाँचा जो जर्जर हो रहा है उसे बदल दें। जिस स्थान पर पूज्यवर के शरीर को भी यहीं पंचभूतों को समर्पित करने के बाद ही किसी प्रकार का पक्का चबूतरा बना देना।” इसकी रूपरेखा उनने वहीं खड़े-खड़े समझा दी। सबने सुन तो लिया पर सभी स्तब्ध थे।
सभी जानते हैं कि उनके इस कथन के पीछे नियति का एक अदृश्य संकेत था। इस यज्ञ के पश्चात् वे सूक्ष्मीकरण की स्थिति में चली गई। अगस्त 1994 की पत्रिका ‘अखण्ड ज्योति’ में उनने अपनी अंतर्वेदना व्यक्त कीं एवं 19 सितम्बर, 1994 (भाद्रपद पूर्णिमा-महालय श्राद्धारम्भ) की मध्याह्न बेला में महाप्रयाण के पश्चात् वे अपने आराध्य के बगल में जा विराजीं। श्रद्धेय पं0 लीलापति जी सहित शान्तिकुँज के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के द्वारा उनके देहावशेष ‘सजल श्रद्धा’ में स्थापित कर दिये गये। दोनों ही स्मृति चिन्ह अभी भी वहाँ उसी रूप में विद्यमान है।
जैसा कि परम वंदनीया माताजी का निर्देश था, नवनिर्माण हेतु विशद चर्चाएं होती रहीं, नक्शे बनाये गये, देश के सभी मूर्धन्य आर्किटेक्टों की सेवायें ली गई। मिशन के लिए अपनी सेवाओं को अपने पिताश्री के पश्चात् भी परम्परा निर्वाह करते चले आ रहे श्री शरद मोरोपन्त पारधी जी (नागपुर महाराष्ट्र) द्वारा यह सारा दायित्व अपने कन्धों पर लिया गया। तीन माह से इस कार्य ने गति पकड़ी है एवं व्यवस्था के द्वारा यह कार्य आरम्भ कर दिया गया है। जहाँ ऋषियुग्म के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था, उस स्थान पर एक भव्य चबूतरा विनिर्मित किया जा रहा है। इसकी नींव में कार सेवा के माध्यम से कूट-कूट कर उसी मिट्टी को भरा गया है, जिस पर ऋषियुग्म की स्थूल काया को अग्नि दी गई थी। एक ग्रेनाइट का स्मारक इसी माह बनकर तैयार हो गया है, जिसके दोनों ओर परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी के अंतिम संदेश भी ग्रेनाइट पत्थर पर उकारे गये हैं। गायत्री मंत्र जो गुरुसत्ता की हर साँस में समाहित था- राजघाट पर बापू की समाधि पर लिखे “हे राम” की तरह ग्रेनाइट के चबूतरे पर लगा परिजन देख सकेंगे।
इस स्थान के पीछे जहाँ हो छतरियाँ परिजनों ने पूर्व में देखी है, उनमें स्थित स्मृति अवशेष को सुरक्षित बनाये रख नींव को नीचे से सीमेंट , कंक्रीट के स्लैब सरिया आदि लगाकर मजबूती दी गई एवं समाधि की छतरियों के मार्बल बदल दिये गये हैं। ध्यान भव्यता एवं महंगे पत्थर पर नहीं मजबूती पर दिया जा रहा है ताकि आने वाले अनेकानेक वर्षों तक महाकाल का यह घोंसला अपनी स्थिति इसी प्रकार अक्षुण्ण बनाये रख सके। चारों तरफ का स्थान अब इतना अधिक बढ़ा दिया गया है कि चारों ओर परिजन, साधक, आगन्तुकगण बैठकर ध्यान कर सकें, ऋषियुग्म की प्राण चेतना को आत्मसात् कर सकें। प्रायः 200 से अधिक व्यक्ति अब वहाँ बैठकर ध्यान कर सकेंगे, ऐसे व्यवस्था की गई है। चारों ओर से हरियाली-पुष्पों-दिव्य वनस्पतियों से घिरा यह स्थान सुन्दरता-भव्यता एवं पवित्रता में अनेक गुना वृद्धि करेगा।
परिजनों को लग सकता है कि जो छतरियाँ ऋषियुग्म द्वारा अपनी देख-रेख में बनाई गई थीं, उन्हें क्यों हटाया गया, उन्हें उपरोक्त पृष्ठभूमि भली-भाँति समझनी चाहिए। जैसे कि पूज्यवर एवं शक्तिस्वरूपा माताजी कहा करते थे कि उनका निवास यों तो समूचे शान्तिकुँज में है क्योंकि यहीं से मिशन ने 1971 में एक क्रान्तिकारी मोड़ लिया, किन्तु घनीभूत प्राण ऊर्जा रूपी केन्द्रक के रूप में पवित्र स्मृति अवशेषों (रेलिक्स) के माध्यम से वे इस स्थान विशेष पर और भी स्पष्ट रूप में अनुभूत किये जा सकते हैं। यहाँ ध्यान करने वाले व्यक्ति यह अनुभूति और भी बढ़े-चढ़े परिणाम में कर सकेंगे, यह विश्वास रखें। शान्तिकुँज की रजत जयंती वर्ष की बेला में ही यह परम वंदनीया माताजी द्वारा निर्देशित नवीनीकरण सम्पन्न हुआ है, यह एक संयोग मात्र नहीं, निरयति की एक ऐसी भवितव्यता मानना चाहिए जिसे इतने शानदार ढंग से सम्पन्न होना ही था।
पुरानी छतरियों के हटाये गये, मार्बल स्लैब्स का क्या किया जाय ? यह सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की गोष्ठी में प्रश्न उठा। सर्वसम्मति से यह राय बनी कि अब सारे देश के शक्तिपीठों में परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी के प्रतीकों के रूप में ‘सजल श्रद्धा’ ‘प्रखर प्रज्ञा’ की स्थापना हो रही है या हो चुकी है परन्तु ‘गायत्री तपोभूमि’ मथुरा, जहाँ से पूज्यवर 1971 में विदाई लेकर हरिद्वार आये थे, में अभी तक इनकी स्थापना नहीं हुई। सभी परिजनों ने श्रद्धेय पंडित जी से विनम्र अनुरोध किया कि इस निर्माण में थोड़ा कुछ और जोड़कर जीर्णोद्धार कर वे इस पावन स्मृति को अपने यहाँ स्थापित कर लें। प्रसन्नता की बात है कि यह अनुरोध मान लिया गया एवं विगत गायत्री जयंती (28 मई 1996) की पावन बेला में सारे देश के कार्यकर्ताओं व शान्तिकुँज प्रतिनिधियों की उपस्थिति में भूमि पूजन कर यह शुरुआत कर दी गई । शान्तिकुँज के इंजीनियर्स व श्री पारधी जी के मार्गदर्शन में यह निर्माण वहाँ हो रहा है एवं इस प्रकार पवित्र स्मृति अवशेष शांतिकुंज में एवं चबूतरों के रूप में अभी तक विद्यमान छतरियाँ गायत्री तपोभूमि में सुरक्षित रहेंगी। ‘प्रखर प्रज्ञा’ -’सजल श्रद्धा’ तो महाकाल की अविनाशी सत्ता के जीवन्त आवास के रूप में यथावत् शांतिकुंज में उसी स्थान पर वैसे ही स्थापित हैं, जैसा परम वंदनीया माताजी व उनके बाद उनके वष्ठि पुत्रों द्वारा उन्हें रखा गया था। पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी की यह जीवन्त उपस्थिति इस गायत्री तीर्थ की चैतन्य ऊर्जा द्वारा अपने स्नेही बालकों को युगों-युगों तक अपना सान्निध्य-संरक्षण-अनुदान देती रहेगी।
सिक्खों के गुरुओं की स्मृतियों से जुड़ें स्थानों का महत्व है। पटना साहिब, हेमकुण्ड, पंजा साहिब उसी रूप में पूजित हैं। लेकिन अमृतसर एवं गुरुग्रन्थ साहिब का महत्व इनकी अपेक्षा असंख्य गुना अधिक है। इसी तरह पूज्य गुरुदेव की स्मृति से जुड़े सभी स्थान तीर्थ हैं। गोस्वामी जी ने भी लिखा है- “तीरथ राम चरण जहँ जाँहीं।” प्रभु श्रीराम जहाँ-जहाँ गये वही स्थान तीर्थ हो गया। परन्तु शान्तिकुँज उन परम प्रभु का आवास है जहाँ उनकी चैतन्य उपस्थिति प्रतिकरण में व्यास है। इस गायत्री जयंती को शांतिकुंज की स्थापना के पच्चीस वर्ष पूरे हुए हैं, इन पच्चीस वर्षों में शान्तिकुँज के स्वरूप, विस्तार, गुरुदेव माताजी की स्नेह स्मृतियों को स्पष्ट करने वाला एक विशेषाँक अगले माह ही प्रकाशित होगा। इसे पढ़कर परिजन शांतिकुंज के आध्यात्मिक मूल्य एवं महत्व को भली प्रकार समझ सकेंगे। अभी तो इतना ही कहना पर्याप्त है कि ‘प्रखर प्रज्ञा’ ‘सजल श्रद्धा’ के रूप में ऋषियुग्म अपने बालकों- परिजनों को हर हमेशा शान्तिकुँज के लिए स्नेह आमंत्रण देते रहते हैं, सदैव देते रहेंगे।
सद्गुणों में कृतज्ञता की गणना मूर्धन्य मानी गई है क्योंकि हर उपयोगी वस्तु से हम लाभ उठाते हैं और उसके अनुदान को स्मरण रखते हैं। इसके उपरान्त प्रतिदान देने की इच्छा स्वयं ही होती है और हमें उस व्यक्ति, वस्तु या वर्ग को बदले में सेवा-सहायता करने की इच्छा होती है।
अपनी ओर से सेवा करने में अहंकार होने की भी सम्भावना रहती है, पर यदि बदला चुकाने के लिए ऋण मुक्त होने के भाव से उसी कृत्य को किया जाय तो नम्रता और निरहंकारिता का भाव तो रहता ही है साथ ही किये हुए उपकारों का स्मरण करते रहने से यह ध्यान रहता है कि कितनों के कितने सहयोग से हम इस स्थिति में पहुँच सके एवं बचे हुए हैं। ऐसी दशा में ऋण मुक्ति की भावना से किया गया सेवा कार्य अथवा स्मरण रखा गया कृतज्ञता भाव, कहीं अधिक उच्चकोटि का होता है।
परमार्थ कृत्यों से उसके साथ जुड़ी हुई भावना का बहुत महत्व है। दान तिरस्कारपूर्वक, विवशता की स्थिति में, अहंकारपूर्वक, विज्ञापन के निमित्त, प्रतिफल के लिए छल के अनेक भावों का समन्वय हो सकता है। आत्मलाभ या पुण्यफल उसी भाव से होता है जिस भाव से कि कृत्य को किया गया है। देखने में तो चिड़ीमार, मछलीमार भी सर्वप्रथम दानी की भूमिका निभाते हैं पर उनका उद्देश्य दूसरा ही होता है। अतएव विश्लेषण करने वाले उद्देश्य को ही महत्व देते हैं। साथ ही आत्मा और परमात्मा के दरबार में भी उनकी गणना भाव स्तर के अनुकूल ही होती हैं । इसीलिए परमार्थ कृत्य करते समय अपनी कामना का उल्लेख नहीं किया जाता वरन् ईश्वर समर्पण की भावना से ही किया जाता है। इस भाव की अभिव्यक्ति एक दोहे से होती है-
मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर। तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर॥
कृतज्ञता की स्मृति में प्रत्यक्ष पितृ ऋण है, क्योंकि शरीर को उन्हीं ने पाला, पोसा, बड़ा किया और योग्य बनाया एवं आश्रय किया है। उन्हीं की प्रत्यक्ष सेवा से हम इस योग्य बन सके हैं जिसमें आज हैं। जो पितृगण दिवंगत हो चुके हैं उनके लिए तर्पण श्राद्ध का विधान है। श्रद्धाँजलि पूजा उपचार का सरलतम प्रयोग है। अन्य उपचारों में वस्तुओं की जरूरत पड़ती है। वे कभी उपलब्ध होती हैं, कभी नहीं, किन्तु जल ऐसी वस्तु है जिसे हम दैनिक जीवन में अनिवार्यतः प्रयोग करते हैं। वह सर्वत्र सुविधा पूर्वक मिल भी जाता है। इसलिए पुष्पाँजलि आदि श्रमसाध्य श्रद्धाँजलियों में जलाँजलि को सर्व-सुलभ माना गया है। उसके प्रयोग में आलस्य और अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं हो सकता । इसलिए सूर्यनारायण को अर्घ्य, तुलसी वृक्ष में जलदान, अतिथियों को अर्घ्य तथा पितरगणों को तर्पण का विधान है। प्रश्न यह नहीं कि इस पानी की उन्हें आवश्यकता है या नहीं। प्रश्न केवल अपनी अभिव्यक्ति भर का है। उसे निर्धारित मन्त्र बोलते हुए, गायत्री महामन्त्र से अथवा बिना मन्त्र के भी जलाँजलि दी जा सकती है। यही है उनकी प्रति पूजा-अर्चा के सुगमतम विधान। शास्त्रीय भाषा में इसे ‘तर्पण’ कहा जाता है। इसमें यह तर्क करने की गुंजाइश नहीं है कि यह पानी उन पूर्वजों तक या सूर्य तक पहुँचा या नहीं। इसके पीछे अपनी कृतज्ञता भरी भावनाओं को सींचते रहने की अभिव्यक्ति को ही प्रमुखता है। इसलिए उसे किसी पर अहसान करने के लिए नहीं, वरन् अपनी निज की श्रद्धा को सींचते रहने के लिए किया जाता रहना चाहिए।
पितृ ऋण को चुकाने के लिए दूसरा कृत्य आता है- ‘श्राद्ध’। श्राद्ध का प्रचलित रूप तो ब्राह्मण भोजन मात्र रह गया है पर बात ऐसी है नहीं। अपने साधनों का एक अंश पितृ प्रयोजनों के निमित्त ऐसे कार्यों में लगाया जाना चाहिए, जिससे लोक कल्याण का प्रयोजन भी सधता हो।
ऐसे श्राद्ध कृत्यों में समय की आवश्यकता को देखते हुए वृक्षारोपण ऐसा कार्य हो सकता है जिसे ब्रह्मभोज से भी कहीं अधिक महत्व का माना जा सके। श्राद्ध रूप में ऐसे वृक्ष लगाये जायँ जो किसी न किसी रूप में प्राणियों की आवश्यकता पूरी करते हों। अपने पास कृषि योग्य भूमि से थोड़ी भी जमीन बचती हो, कम उपयोगी हो तो उसमें आम, पीपल, आँवला, वट अशोक आदि के वृक्ष लगा देने चाहिए।
वृक्ष वायुशोधन करते हैं। छाया देते हैं। फल-फूल भी मिलते हैं। हरे पत्ते पशुओं का भोजन बन सकते हैं। सूखे पत्तों से जमीन को खाद मिलती है। लकड़ी के अनेकों उपयोग हैं। वृक्षों से बादल बरसते हैं। भूमि का कटाव रुकता है। पक्षी घोंसले बनाते हैं, उनकी छाया में मनुष्यों, पशुओं को विश्राम मिलता है। इस प्रकार वृक्षारोपण भी एक उपयोगी प्राणी के पोषण के समान है। वृक्षों की भाँति ही जलाशयों के निर्माण का भी उपयोग है। तालाबों में हर साल वर्षा के पानी के साथ मिट्टी भर जाती है और उनकी सतह ऊँची हो जाने से कम पानी समाता है जो जल्दी ही सूख जाता है। इन्हें यदि हर साल श्रमदान से गहरे करते रहा जाय तो पशुओं को पानी, सिंघाड़ा, कमल जैसी बेलें तथा तल में जमने वाली चिकनी मिट्टी से मकानों की मरम्मत हो सकती है।
इस प्रकार की समाज सेवा के कार्यों से जीवित या दिवंगत पितृगण निश्चय ही प्रसन्न होंगे। अपने कृतज्ञता भाव को जीवित रखने का पुण्य-परमार्थ तो प्रत्यक्ष ही मिलता रहेगा।
*समाप्त*