जीवन एक कलाकार की तरह जीना सीखें

प्रतिकूलताएं प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आती है। इस जीवन-समर में कोई भी व्यक्ति सदा अपने साथ अनुकूलताएँ बनी रहने का वरदान लेकर नहीं आया। बच्चा जब जन्म लेता है, माँ के गर्भ से बाहर आते ही उसे अनगिनत अवरोधों का सामना करना पड़ता है। जो सम्बन्ध गर्भ-रज्जु के माध्यम से विगत नौ माह से माँ के साथ बना हुआ था, वह एकाएक तोड़ दिया जाता है। गर्भ रज्जु के कटते ही बच्चे में अपने बलबूते जीवन जीने का, संघर्ष करने की स्थिति आ जाती है। वह छटपटाता है, चिल्लाता है वह इसी क्रिया में उसके फेफड़े खुल जाते हैं, रक्त परिवहन सारे शरीर में सुनियोजित ढंग से होने लगता है। प्रकृति का यह पाठ बच्चे के लिए है कि, उसे स्वतन्त्र होकर कैसे जीना चाहिए? यह न कोई दण्ड है, न कोई कर्म का भाग्य-विधान।

इस धरती पर आने वाले हर व्यक्ति को एक नहीं अनेकानेक अवरोधों से गुजरना पड़ता है। पर यहां की यह एक सुनियोजित व्यवस्था है और यह हर किसी के लिये हैं, कोई भी अपवाद नहीं। व्याधियां, मानसिक संताप, रोग, शोक, आर्थिक हानि, रिश्तेदारों का बिछोह, विभिन्न रूपों में असफलताएँ मनुष्य की परीक्षा लेने के लिए आने वाले अवरोध मात्र हैं। इन बाधाओं को हँसकर पार कर लेना, दुःखों-कष्टों को तप बना कर जीना ही मनुष्य के लिये उचित है। जो ऐसा करता है, वह जीवन समर को हँसते-हँसते पार कर जाता है। जो रोते कलपते, देवी, देवताओं को दोष देते, अपने भाग्य को दोष देते, किसी तरह घिसट-घिसट कर अपनी जीवन-यात्रा पूरी करता है, वह न केवल एक असफल व्यक्ति सिद्ध होता है, वरन् वह मनोरोगों-मनोविकारों से ग्रस्त होकर अल्पकाल में ही इस सुरदुर्लभ मानव तन को गँवा बैठता है। कई व्यक्ति तो निराश होकर आत्महत्या एक कर बैठते हैं। यह मानवीय काया रूपी देवालय की अवमानना है एवं उस स्रष्टा के अस्तित्व को नकारना भी।

अच्छा हो हम इस जीवन को एक कलाकार की तरह जियें। हँसती-हँसती, हल्की-फुल्की जिन्दगी जीते हुए औरों को अधिकाधिक सुख बांटते चलें। दुःखों, कष्टों को तप मानकर चलें और अपना एक सौभाग्य भी। यही जीवन जीने की सही रीति-नीति हैं।


काँटे वरदान है। प्रभु के

मुस्कराते गुलाब की पंखुड़ियों पर जल बिन्दु थे। ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी आन्तरिक पीड़ा उपलब्धियों की मुस्कान को पार कर छलक उठी है। वह सोच रहा था- भगवान् ने मुझे सुन्दरता और सुगन्ध से भरा-पूरा किया। चारों तरफ मेरी प्रसिद्धि है। मनुष्यों के ही नहीं देवताओं के माथे पर भी मुझे चढ़ाया जाता है। ईश्वर के लिए की जाने वाली आराधना मेरे सान्निध्य के बिना अधूरी रह जाती है।

एक और इतना सब कुछ देने वाले भगवान् ने न जाने क्यों मुझमें काँटे भर दिये। चारों ओर से मुझे काँटों से घेर दिया। इन्हीं काँटों के कारण लोग मेरे काँटों से हिचकते हैं। बच्चे मुझे कँटीला कहकर मुझसे कतराते हैं। काश! इन कांटों से से छुटकारा मिल पाता तो कितना अच्छा होता।

काफी समय तक गुलाब अपने इन्हीं विचारों में डुबा रहा। उसका दुःख विचारों में डूबा रहा। उसका दुःख पंखुड़ियों से जल-कण बनकर ढुलकता रहा उसे परमात्मा की यह करामात जरा भी अच्छी न लग रही थी। उसे अपने ऊपर की गई इस नाइंसाफ़ी का इतना गम हुआ कि उसने जमीन से भोजन तथा पानी लेना भी बन्द कर दिया। धीरे-धीरे उसका हँसता-खिलखिलाता अस्तित्व मुरझाने लगा।

उसकी यह दशा किसी से छिपी न रही। बगीचे के अन्य पौधे आश्चर्यचकित थे। आखिर ऐसा क्या हुआ, अभी दो दिन पहले यह कितना प्रसन्न था। तने से फुनगी तक अनगिनत कलियों से लदा था। चारों ओर इसकी सुगन्धि के चर्चे थे। आखिर क्या हो गया इसे? सबने मिलकर उसके दुःख का कारण पूछा।

गमगीन मन से गुलाब ने अपनी व्यथा पूछने वालों से कह सुनायी। उसकी बात सुनकर सभी पौधे सोच में पड़ गए। सभी को उससे सहानुभूति हो चली थी। अन्ततः सबने निश्चय किया कि गुलाब को भगवान् के दरबार में पहुँच कर अपने साथ की गयी नाइंसाफ़ी के बारे में पूछना चाहिए।

उसे भी अपने साथियों की बात अच्छी लगी। मार्ग की बाधाओं को पार करते हुए संकल्प, साहस और मनोयोग ने उसे भगवान के दरबार तक पहुँचा दिया। उसके पहुँचते ही वहाँ का वातावरण सुगन्धित हो उठा। भीनी-भीनी खुशबू सारे दरबार में फैल गयी। सारे दरबारी निहाल ही उठे।

वे सभी आश्चर्य से इधर-उधर ताक ही रहे थे, तभी गुलाब ने उन सबके बीच, प्रवेश किया। सबकी आँखें एकबारगी उस पर जा टिकीं। हरेक के हाथ उसे पाने के लिए मचल उठे। वे तो उसे झपट कर मसल ही देते, तभी गुलाब के काँटे उनकी हथेलियों में चुभ गए। आखिर सबको हाथ मलते पीछे हटना पड़ा। गुलाब की तो जैसे जान लौटी।

अब गुलाब की नजर भगवान् की ओर गयी। वह सुनहरी आभा बिखेरते सिंहासन पर बैठे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। गुलाब की उनकी यह मुस्कान कतई अच्छी न लगी। वह खिन्न मन अपनी समस्या पर विचार करने लें लीन था, तभी जैसे किसी संगीत लहरी ने उसके अस्तित्व को भिगो दिया, भगवान् पूछ रहे थे- “कहो वत्स, तुम्हारे यहाँ आने का कारण क्या है?”

भगवान् के इस प्रश्न पर गुलाब के अंतर्मन की पीड़ा शब्दों में छलक उठी। वह बोला- “हे सृष्टि के सिरजनहार। आपने मुझे रंग, रूप, सुगन्ध सब कुछ दिया। आपके इस अनुदान ने सारे संसार में मुझे प्रसिद्ध किया। लेकिन सब कुछ देकर मुझमें काँटे क्यों भर दिये? क्या यह मेरे साथ अन्याय नहीं है? इन्हीं काँटों के कारण मुझे पर्याप्त सम्मान नहीं मिल पा रहा है। लोग खुलकर मेरे पास नहीं आते । बच्चे मेरी शाखाओं को छूने में हिचकते हैं। मैं उनके स्पर्श के लिए तरस कर रह जाता हूँ”

भगवान् गुलाब की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। उनके होठों पर मुस्कान थिरक रही थी। सब कुछ सुनने के बाद वे गुलाब से बोले- “वत्स! तुम्हारा दुःख व्यर्थ है। ये काँटे तुम्हारे लिए अन्याय नहीं, प्रकृति देवी का वरदान है। इनके महत्व के बारे में यदि तुमने ठीक से विचार किया होता, तो तुम मेरे पास शिकायत लेकर न आते।”

गुलाब को भगवान् की बातें समझ में न आयी। वह उनकी बातों का मर्म जानने के लिए उतावला हो उठा। गुलाब की आतुरता का समाधान करते हुए परमेश्वर कहने लगे- “वत्स ! जिस क्षण तुमने दरबार में प्रवेश किया था, उसी समय तुम्हारी सुगन्ध से अकर्षित होकर सबके सब तुम्हारे ऊपर

झपट पड़े थे। उन्होंने तुम्हें पाना चाहा, परन्तु काँटों के कारण सबके सब हाथ मलकर रह गये। इससे साफ जाहिर है, वे तुम्हें सिर्फ मनोरंजन के लिए पाना चाहते थे। यदि उनके हृदय के पारखी हैं। जिन्हें तुमसे सच्चा अनुराग होगा, वे काँटे झेलकर भी तुम्हें पाने से सकुचायेंगे नहीं।”

“इस सृष्टि में जिसे विपत्ति कहकर कष्टकारक समझा जाता है, उसका भी अनोखा रहस्य है। जिसने रहस्य समझ लिया, वह अभिशाप को भी अनुदान बना लेता है। तुम्हारे जीवन के काँटों का भी यही रहस्य है।” इतना कहकर भगवान् चुप हो गए।

गुलाब का मन अपनी हीन भावना से मुक्त हो गया।


अब वैज्ञानिक सुधारेंगे मानवी नस्ल को

विकास साधना की उपयोगिता, आवश्यकता से कोई इन्कार नहीं करता, वे अपना काम करते हैं। और करना चाहिए। इतने पर भी यह असमंजस अपने स्थान पर यथावत् ही बना रहता है कि मनुष्य की अपनी निजी विशेषता एक सुनिश्चित तथ्य जैसी बनकर भारी चट्टान की तरह अड़ी बैठी रहती है और बहुत हिलाने-डुलाने, उठाने-हटाने का प्रयत्न करने पर भी उत्साहवर्धक बाधा ही बनी बैठी रहती है। देखा गया कि शारीरिक और मानसिक विकास में मनुष्य की निजी विशेषता का असाधारण महत्व है। सुधार प्रयत्नों से उस पर सीमित प्रभाव ही होता है। उदाहरण के लिए, मनुष्य के चेहरे, रंग एवं कार्यशक्ति पर दृष्टिपात किया जा सकता है। अफ्रीका के नीग्रो, अरब के तगड़े, काँगो, के बौने एकत्रित करके यह जाना जस सकता है। कि उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति में भी भारी अन्तर पाया जाता है। चेहरा, नाक, आँख, होंठ दाँत, बाल, नाखून जैसे अंगों को देखकर यह जाना जा सकता है कि यह भिन्नता उन समुदायों कही निजी विशेषता है। इसका परिस्थितियों या साधनों से कोई सम्बन्ध नहीं है। काले नीग्रो अमेरिका जैसे शीत प्रधान देश में गोरों के बीच बसते हुए भी अपने रंग और चेहरे को पीढ़ी-दर-पीढ़ी यथावत् बनाये रहते हैं। इसी प्रकार गोरे लोग दक्षिण अफ्रीका जैसे गर्म क्षेत्र में शताब्दियों से बसे होने पर भी काले नहीं हुए। उनकी सन्तानें गोरे रंग की तथा माँ-बाप जैसे चेहरों की ही होती है। जबकि पड़ौस में बसे मूल निवासी अपने काले रंग, घुँघराले छोटे बाल, चौड़ी नाक, मोटे होठ जैसी विशेषताएँ यथावत् बनाये रहते हैं। सन्तानें इसी प्रकार की उत्पन्न होती रहती है।

इससे प्रतीत होता है कि प्रान्त, क्षेत्र वातावरण आदि का प्रभाव मनुष्य वातावरण आदि का प्रभाव मनुष्य की शारीरिक स्थिति पर उतना नहीं पड़ता जितना कि वंश परम्परा का । पख्तूनिस्तान में बस जाने पर भी अपने वंशजों के काय-कलेवर में कोई विशेष परिवर्तन कर नहीं पाते।

यही बात बौद्धिक संरचना के सम्बन्ध में भी है। मारवाड़ी, बंगाली, द्रविण, केरली, ब्राह्मण, कास्थ, आदिवासी जैसे वंशजों के चिन्तन, स्वभाव, कौशल, स्वर, चातुर्य आदि पर एक विशेष आवरण चढ़ा पाया जाता है। यों सुधार प्रयत्नों का कुछ लाभ तो होता ही है, पर जन्मजात विशेषता में उतना परिवर्तन नहीं होता जितना कि होना चाहिए।

एक ही पेड़ पर रहने वाले, एक ही वातावरण में पलने वाले, एक जैसा आहार करने वाले पक्षियों की आकृति और प्रकृति का अन्तर स्पष्ट देखा जा सकता है। पशुओं, पक्षियों से लेकर कृमि-कीटकों तक के अगणित प्राणी, पास-पड़ौस में बसते और एक ही प्रकार के साधनों पर निर्भर रहते हुए भी अपनी मौलिक विशेषताएँ बनाए रहते हैं और उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलाते रहते हैं। इसे वंश परम्परा कहते हैं।

वंश परम्परा की चर्चा यहाँ इसलिए की जा रही है कि अगले दिनों मानवी विकास के लिए किए जाने वाले प्रबल प्रयत्नों में यही कठिनाई सबसे अधिक आड़े आयेगी कि परम्परागत आकृति एवं प्रकृति में हेर-फेर कैसे किया जाय? धीमी गति से यत्किंचित् सुधार होते चलने की प्रतीक्षा करते रहना अब इस प्रगति युग में सम्भव नहीं। न इतना धैर्य है। और न अवकाश, अवसर है कि वंश परम्परा के साथ जुड़ी हुई। विशेषताओं में क्रमिक परिवर्तन की आशा लगाये बैठा रहा जाय और सुधार प्रयत्नों पर सन्तोष किया जाय?

मानवी विकास के नये आधारों में वंशानुक्रम विज्ञान का आश्रम लेने की बात गम्भीरतापूर्वक सोची जा रही है। यह विज्ञान अभी नया है और सर्वसाधारण को उसकी उतनी जानकारी नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। अतएव आवश्यक समझा गया कि इस संदर्भ में प्राथमिक जानकारी और पीढ़ी विकास के साथ उसके समावेश का आधार संक्षेप में समझा दिया जाय। इन पृष्ठों पर उसी का प्रयत्न किया जा रहा है। मानवी नस्ल को सुधारने में दिलचस्पी रखने वाले प्रत्येक विज्ञजन को इस संदर्भ में कामचलाऊ जानकारी तो नोट करनी ही चाहिए।

समझा जाना चाहिए कि मनुष्य के अन्दर एक प्रकार से दो विशिष्ट आनुवंशिक व्यवस्थाएँ है एक तो वह जिसके माध्यम से जीन्स तथा गुणसूत्र द्वारा पिता से सन्तान को जैविक द्वारा पिता से सन्तान को जैविक सूचनाएँ स्थानान्तरित होती है। दूसरी व्यवस्था वह है। जिसके माध्यम से साँस्कृतिक आदान-प्रदान होता है। उदाहरणार्थ, बोलने वाले से सुनने वाले को, पाठक को अध्ययन से, दर्शक को दृश्यावलोकन से। यही दर्शक को दृश्यावलोकन से। यही हमारी संस्कृति धरोहर बनाता है।

‘यूजोनिक्स’ उस विज्ञान का नाम है जिसके द्वारा जीन्स की सुधारने एवं वशं परम्परा को परिष्कृत करने की बात सोची जाती है। फ्राँसिस गाल्टन ने इस शती के प्रारम्भ में इस शब्द से वैज्ञानिक समुदाय को परिचित कराया । वैसे तो इससे भी पहले ‘प्लूटो’ ने ‘द रिपब्लिक’ नामक अपनी रचना में इस प्रकार की सम्भावनाओं का वर्णन किया है, जिसमें (सलोक्टिव ब्रीडिंग) सही चयन से उत्तम नस्ल का निर्माण पक्ष उलटकर आया। रूप से समर्थ एवं मानसिक दृष्टि से बुद्धिमत्तायुक्त जोड़ों को ही विवाह की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि उनसे उत्पन्न सन्तान चाहिए ताकि उनसे उत्पन्न सन्तान उत्तम कोटि की हो। जो इस दृष्टि से हीन या निम्नकोटि के पाये जायें उन्हें राज्य द्वारा विवाह की अनुमति ही न मिलनी चाहिए या सन्तानों को पैदा होने से पूर्व ही नष्ट कर देना चाहिए ताकि समाज पर अनावश्यक बोझ न बढ़े। यह तो प्लूटो का अतिवादी चिन्तन था, जो उस समय साकार न हो सका। पर गाल्टन ने इस तथ्य को वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में रखकर बताया, कि डार्विन की ‘प्राकृतिक चयन’ (नेचुरल सलेक्शन) की तकनीक के बजाय समाज को बुद्धिमान प्राणी देने के लिए ‘सोशल सलेक्शन’ की विधि अपनाई जानी चाहिए।

गाल्टन एवं नीत्शे के प्रतिपादनों से समर्थन पाकर जर्मनों ने ‘यूजोनिक्स’ का हवाला देते हुए स्वयं को ‘मास्टर रेस’ घोषित कर दिया। एक जर्मन रेस’ घोषित कर दिया। एक जर्मन आर्यन एवं एक अनार्य के बीच विवाहों पर बन्धन लगा दिया गया। हिटलर के अनुसार लाखों व्यक्ति मात्र उसकी इस मान्यता के कारण मार दिया गया। हिटलर के अनुसार लाखों व्यक्ति मात्र उसकी इस मान्यता के कारण मार दिए गए कि वे अनार्य थे, हीन नस्ल के थे एवं उनके रहने से वंश-परम्परा के विकृत होने की सम्भावना था।

अमेरिका में उलटा देखा गया है। इस राष्ट्र में विभिन्न देशों की, विभिन्न वंश परम्पराओं में उत्पन्न व्यक्ति ही इसके नागरिक है। ये सभी बाहर से आकर गत चार शताब्दियों में यहाँ यह पाया गया है। कि बुद्धिमत्ता की दृष्टि से काले व गोरे एक से ही हैं बल्कि ऊँचे पदों पर अश्वेत नस्ल के व्यक्ति अधिक सक्षम पाये गये हैं।

विचारकों का कहना कि नस्ल के आधार पर विशेषताओं का निर्धारण विज्ञान सम्मत नहीं है। बुद्धि की कुशाग्रता व शरीर की बलिष्ठता किसी एक वंश की बपौती नहीं है। हाँ, यह बात जरूर है पौष्टिक आहार की उपलब्धि, संस्कृति विकास के अवसर एवं समाज की सन्तुलित व्यवस्था से ऊँचे उठने की सम्भावनाएँ किसी एक वंश को अधिक आसानी किसी एक वंश को अधिक आसानी से मिल जाने से वह अधिक श्रेष्ठ हो गयी हो।

आनुवांशिकता अपनी जगह है एवं पर्यावरण अपनी जगह। अलग-अलग जीन्स वाजं व्यक्ति उपयुक्त अनुकूल वातावरण पाकर बुद्धि की दृष्टि से सुनिश्चित विकास दर्शाते हैं। समाज और अधिक रचनात्मक व्यक्तित्व तैयार कर सकता है, यदि इसके प्रत्येक घटक को शैक्षणिक एवं आर्थिक साँस्कृतिक एवं नैतिक विकास का परिपूर्ण अवसर दिया जाय। ऐसे विकास के अभाव में कई ऐसे व्यक्ति उभर नहीं पाते जो सम्भवतः न्यूटन, वाल्टेयर, नेपोलियन, आइन्स्टीन की कोटि के जीन्स वाले थे। इस कारण दोनों ही परस्पर अन्योन्याश्रित है।

‘यूजोनिक्स’ शब्द अपने आप में पवित्र है, यदि इसमें से वंशवाद, नस्लवाद जैसे पूर्वाग्रह युक्त दुर्गुण निकाल दिये जायें। नेगेटिव यूजोनिक्स का अर्थ है, नुकसान पहुंचाने वाले जीन्स को हटाने का प्रयास कर जीन्स को हटाने का प्रयास कर सन्तरित को शुद्ध परिपूर्ण बनाना। पॉजिटिव यूजोनिक्स का अर्थ है लाभदायक (शरीरगत बलिष्ठता, मानसिक कुशाग्रता बढ़ाने वाले) जीन्स को सन्तति में पहुंचाने का प्रयास करना।

‘सलेक्टिव मेटिंग’ अर्थात् उचित नस्ल के चुनिन्दा समूहों में परस्पर संसर्ग के लिए जो एक सुझाव सामने आया था, वह था ‘वीर्य बैंक’ के रूप में जिसके प्रणेता थे- हेनरी मुलर। प्रतिभावान, प्रख्यात एवं हर दृष्टि से समग्र कुछ व्यक्तियों के वीर्य को ‘डीप फ्रीज’ में रखकर उसका समय आने पर विरोधी लिंग का उचित पात्र मिलने पर उपयोग हो उचित पात्र मिलने पर उपयोग हो ताकि इनके संपर्क से एक सर्वश्रेष्ठ सन्जति का जन्म हो, यही दृष्टि इसके पीछे थी। इसे वैज्ञानिकों ने नाम दिया ‘यूटेलेजनेसिस’। कृत्रिम गर्भाधान का इसे पर्यायवाची कह सकते हैं। ‘महामानव’ निर्माण हेतु जो नहीं परन्तु नपुंसक व्यक्तियों को पिता बनाने के लिए अवश्य अमेरिका में इसका प्रतिवर्ष 10 से 15 हजार बार प्रयोग होता है एवं करीब 40 प्रतिशत में सन्तति का जन्म इस विधि से सफलता पूर्वक हो जाता है।

एक और विधि जो सुझायी गयी है, वह है जीन्स के घटक डी0 एन0 ए0 के साथ सीधा हस्तक्षेप। इसी ‘जेनेब्कि सर्जरी’ नाम दिया गया। यूजोनिक्स की यह विधि लगती तो बड़ी अतिशयोक्तिपूर्ण है, पर जिस द्वतगाति से आनुवंशिकविदों के प्रयास इस दिशा में चल पड़े हैं, उससे लगता है डी0 एन0 ए0 की संरचना में वांछित रूपांतरण करने में वैज्ञानिकों को सफलता अवश्य मिलेगी। जैनेटिक सर्जरी को कई प्रकार से प्रयुक्त किया जा रहा है।

‘जीन्स की कलम’ के समर्थक वैज्ञानिकों की प्रतिपादित विधि में शारीरिक ऊतकों को प्रयोगशाला में भूणवत् (एम्ब्रियोनिक) बना लिया जाता है। ऐसे ‘क्लोन्स’ या कलम उन गुणों से भरे-पूरे होते हैं जो उस व्यक्ति के क्रोमोसोम्स में परिपूर्ण मात्रा में थे, सम्भवतः निषेचन से उनमें परिवर्तन आ जाता। ऐसी कलम का उचित वातावरण व पोषण देकर कई कार्बन कापी उस व्यक्ति की तैयार की जा सकती हैं जिसके कि ऊतकों से कलम को तैयार किया गया था।

इस क्षेत्र में आनुवंशिक रोगों को दूर करने में लगे वैज्ञानिकों को जिस सीमा तक सफलता मिली है, उससे कहा जा सकता है। कि वह दिन दूर नहीं, जब किसी भी भावी सन्तति के डी0 एन0 ए0 में पूर्व निर्धारित क्रमानुसार वाँछित परिवर्तन कर उसकी संरचना मोड़ दिया जा सकता है, संस्कारों में परिवर्तन लाया जा सकता है एवं सम्भवतया नर पशु को देवमानव बनाया जा सकता है।


कुण्डलिनी जागरण : एक विज्ञानसम्मत अध्यात्म उपचार

कुण्डलिनी का सचेतन विद्युत शक्ति कह सकते हैं। बिजली की दो धाराएँ एक वह, जो जड़ पदार्थों धाराएँ हैं। एक वह, जो जड़ पदार्थों में काम करती है। और दूसरी वह जो जीवित शरीर धारियों में काम करती है। इसलिए एक को भौतिक और दूसरी को आत्मिक कहा जा सकता है।

भौतिक बिजली वह है जो घरों में बल्ब, पंखे, हीटर, कूलर, रेफ्रिजरेटर, आदि, चलाती है और कल-कारखानों में मोटरों को गतिशील बनाकर उनके द्वारा भारी-भरकम काम कराती है। इसका प्रयोग सीखने के लिए तद्विषयक विद्यालयों में बढ़ना और व्यावहारिक प्रयोग सीखना पड़ता है। इस स्तर के प्रशिक्षितों को इंजीनियर कहते हैं।

चेतन विद्युत वह है जो शरीर में प्राण रूप में काम करती है। इसका बटन बन्द होते ही सारा कारखाना फेल हो जाता है। वह यथास्थान फेल हो जाता है। वह यथास्थान खड़ा तक नहीं रह सकता, सड़ता है। इसलिए उसे जल्दी ही नष्ट करना पड़ता है। जलाने, गाड़ने बहाने की जहाँ जैसी प्रथा है, अन्त्येष्टि की व्यवस्था करने में विलंब नहीं किया जाता।

इस जीवन्त प्राण विद्युत के सहारे शरीर की सभी मशीनें काम करती हैं। जहाँ कहीं उसकी पहुँच अवरुद्ध हो जाती है, वहाँ अशक्ति छा जाती है। पक्षाघात, मूढ़ता, नपुँसकता आदि ऐसे ही रोग है, जिनमें जैविक विद्युत की सप्लाई घट जाती है। कई बार तो कोढ़, गैंगरिन, नासूर जैसे रोगों में किन्हीं अंगों को काटना पड़ता है या वे स्वयं कट जाते हैं, आमाशय, आंतें, जिगर, गुर्दे आदि में जहाँ कहीं अशक्ति आती है, वही अवयव अपना काम धीमा कर देते हैं या छोड़ देते हैं। फलस्वरूप सम्बन्धित दूसरे अंग भी प्रभावित होते हैं। चित्र-विचित्र नाम-रूपों वाली बीमारियां आ दबोचती हैं। कष्ट सहना और उपचार दबोचती हैं। कष्ट सहना और उपचार करना पड़ता है। हृदय जैसे कुछ अंग तो ऐसे हैं, जिनकी शक्ति संचार में व्यवधान खड़ा होने पर कुछ ही क्षणों में मृत्यु हो जाती है।

मस्तिष्क का अपना निराला क्षेत्र है। उसमें अनेक विशेषताओं के लिए अपने-अपने केन्द्र और क्षेत्र निर्धारित है। समस्त शरीर का विद्युतीय संचार संचालन मस्तिष्क में ही होता है। इसलिए मस्तिष्क मर जाने पर ही किसी की पूर्ण मृत्यु मानी जाती है। हृदय की धड़कन रुक जाने पर तो उसे दुबारा भी चलाया जा सकता है।

मस्तिष्कीय क्षेत्र की बिजली की जिस केन्द्र में कम सप्लाई होती है, उसका प्रभाव मनुष्य की क्रिया-शक्ति और चिन्तन-शक्ति पर पड़ता है। मन्द मति, अर्थ विक्षिप्त, सनकी, बेसिर पैर की कल्पनाएँ करने वाले, निराश, भयभीत आदि स्तर के लोग ऐसे ही होते हैं, जिनके मस्तिष्क के किसी क्षेत्र विशेष में विद्युत प्रवाह कम पड़ता है। आलसी और प्रवाह कम क्षेत्र विशेष में विद्युत प्रवाह कम पड़ता है। आलसी और प्रमादी कम पड़ता है। आलसी और प्रमादी भी ऐसे ही होते हैं। उनका मन, श्रम करने को तथा आगा-पीछा सोचने को ही नहीं होता। यथास्थिति को सहन करते हुए वे किसी प्रकार दिन काटते रहते हैं।

इसके विपरीत बुद्धिमान, उत्साही, साहसी, पराक्रमी, तत्पर मस्तिष्क में प्राण विद्युत की पर्याप्त मात्रा होती है, उनकी निर्णायक बुद्धि सतेज होती है। लाभ-हानि के दोनों पक्षों पर विचार करने और किसी उपयुक्त निष्कर्ष पर पहुँचने में उन्हें देर नहीं लगती। अवसर का लाभ ऐसे ही लोग उठा लेते हैं।

यहाँ मृगी, उन्माद, सिर दर्द या मूढ़मति लोगों की चर्चा नहीं हो रही है। क्योंकि उनका सम्बन्ध शरीर के अन्यान्य अवयवों से भी होता है। उनका उपचार अस्पतालों में ही किया जाता है। इनमें से कई तो वंशानुक्रम से भी सम्बन्धित होते हैं। ऐसी दशा में उनका उपचार शरीर विज्ञान के आधार पर किया जाना चाहिए। योग विज्ञान तो विशुद्धतः कुण्डलिनी जागरण उसी क्षेत्र की एक शाखा है।

प्रत्येक शिल्पी को अपने-अपने विषय से सम्बन्धित उपकरण, औजार एकत्रित करने पड़ते हैं। चिकित्सा निदान के काम आने वाले, शल्य क्रिया से सम्बन्धित उपकरण एकत्रित करते हैं। बढ़ई अपने प्रयोजन के कितने ही औजारों से थैला भरे रहते हैं। स्वर्णकर के पास आभूषण ढालने, खरीदने, मोड़ने आदि के काम आने वाली वस्तुएँ होती है। कुम्हार के पास खिलौने बनाने के साँचे होते हैं। सैनिकों के पास ढाल, तलवार, गोला, बारूद, कवच, वाहन आदि का प्रबन्ध रहता है। कुण्डलिनी जागरण जैसे योग वैज्ञानिकों को मानसिक क्षेत्र के साधनों से लैस रहना पड़ता है।

अध्यात्म विज्ञानियों के पास संकल्प, साहस, प्राण संयम, धैर्य के अतिरिक्त तन्मयता और तत्परता की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से एक भी कम हो तो गाड़ी लड़खड़ा जाती है और लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाती।

महत्व क्रियाओं का नहीं, आन्तरिक दक्षता का हैं नट, बाजीगर अपने कौशल में प्रवीण होते हैं। यदि उन करतबों का रहस्य बता दिया जाय और विधि-विधान की व्याख्या-व्यवस्था समझा दी जाय, तो भी यह सम्भव नहीं कि कोई अजनबी उस कौशल को सबके अजनबी उस कौशल को सबके सम्मुख प्रस्तुत कर सके। आपरेशन के समय वार्ड बॉय और सफाई कर्मचारी भी रहते हैं। वे उस कृत्य को आये दिन आँखों-देखते रहते हैं तो भी उनसे यह अपेक्षा नहीं की भूमिका निभा सकेंगे। दंगल में कुश्ती का दृश्य देखने अगणित लोग पहुँचते हैं। दाव-पेंचों को भी आँखों से देखते रहते हैं। हार-जीत का कारण भी समझते हैं। फिर भी उन्हें अखाड़े में नहीं उतारा जा सकता। हथियार बनाने वाले तक उनका सही प्रयोग नहीं कर सकते। इसी प्रकार पुस्तकीय ज्ञान संजय कर लेने या उस विषय के विशेषज्ञों के व्याख्यान सुन लेने पर भी कोई योगी नहीं बन सकता। इसके लिए उसके लिए लम्बे समय तक श्रद्धा और निष्ठापूर्वक अनवरत अभ्यास न किया गया हो तो यह आशा नहीं की जा सकती कि उन विषयों में प्रवीणता या सफलता हस्तगत ही जायेगी।

फिर प्रत्येक साधक का अपना लक्ष्य होता है। एक से दूसरे के प्रयोजन में अन्तर रहता है। तद्नुरूप साधना। विधानों में अन्तर करना पड़ता है। हर रोगी को एक बीमारी में एक ही दवा नहीं दी जा सकती। यद्यपि कैमिस्टों से पूछ कर यह जरूर जाना जा सकता है कि किस नाम की दवा किस रोग में प्रयुक्त होती हैं किन्तु उस आधार पर बिना चिकित्सक से परामर्श किये सेवन करने लगना खतरनाक है। चिकित्सक देखता है कि किस रोग के साथ क्या लक्षण मिले हुए हैं? रोगी की बीमारी कितनी हल्की या भारी है? उसकी सहन शक्ति कैसी है? बालक की, गर्भिणी की दवाओं की मात्रा में अन्तर करना होता है फिर उसकी प्रतिक्रिया में अनुकूलता उत्पन्न हो रही है या प्रतिकूलता, यह भी ध्यान रखना पड़ता है। इन्हीं सब उतार-चढ़ावों पर विचार करने के लिए चिकित्सा की आवश्यकता पड़ती है। उसके यहाँ जाना या बुलाना पड़ता है। यदि ऐसी आवश्यकता न समझी जाती तो किताब में पढ़कर या केमिस्ट से पूछकर कोई भी अपना इलाज कर लिया करता।

ऐसी ही आवश्यकता योग साधनाओं में भी पड़ती है। अपनी स्थिति का भली प्रकार पर्यवेक्षण जिसने किया हो और उपचार कृत्य उस मार्गदर्शक का परामर्श योग साधनाओं में उपयुक्त हो सकता है, विशेषतया कुण्डलिनी जागरण में।

कुछ कार्य सरल होते हैं। कुछ कठिन। पानी को किसी पर फेंक देना या स्वयं नहाना, पीना उतना जोखिम का काम नहीं है। जितना कि आग से खेलना। उसका उपयोग करते समय अनेक बातें ध्यान में रखती समय अनेक बातें ध्यान में रखती पड़ती है। क्या पकाने के लिए कितनी धीमी या कितनी तेज तेज आँच चाहिए, उसे कितनी देर, जलने दिया, जाय, पकड़ते, उठाते, हटाते समय किन बातोँ का ध्यान रखा जाय? इन विशेषताओं और भिन्नताओं की जिसे जानकारी है, वह उसका उपयोग ठीक कर लेगा अन्यथा अपने कपड़े जला लोग या चासनी को कड़ी जला लेगा या चासनी को कड़ी करके पत्थर जैसी जमा देगा। यही बात बिजली के सम्बन्ध में भी हैं। उसके प्रयोग से अनेक लाभ है। अनेक सुविधाएं मिलती हैं, किन्तु प्रयोक्ता को अनेक सावधानियां भी बरतनी पड़ती है अन्यथा आग लगने से लेकर अपनी जान जाने और संपर्क में आने वालों तक के लिए खतरा है।

कुण्डलिनी योग बिजली का प्रयोग है। वह गेंद खेलने की तरह सरल नहीं है कि उल्टी-सीधी फेंक देन पर भी कोई भी खेल बन जाए। गुलाम, बेगम, बादशाह के ताश, काटने में मनोरंजन भर है, किन्तु किसी तख्ते पर झूलना पड़ता है। हलवाई को सतर्कता का हर घड़ी प्रयोग करना पड़ता है अन्यथा जो बनाने चला था वह पकवान-मिष्ठान तो बनेगा नहीं, कुछ के बदले कुछ बन जायगा, या अपना हाथ-पैर गरम घी से जलेगा। कुछ काम ऐसे हो होते हैं जिनमें समग्र सतर्कता का प्रयोग करना पड़ता है किसी व्यक्ति के हाथ में कागज, ब्रश और रंगों की प्लेट थमा देने भर से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह बढ़िया किस्म के चित्र बना देगा। न किसी को पत्थर, छैनी, हथौड़ा थमा कर यह आशा की जा सकती है कि बढ़िया स्तर की प्रतिमा बनकर तैयार हो ही जायगी। चित्रकार या मूर्तिकार को इस कला में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए जो अभ्यास करना और अनुभव संचय करना पड़ता है, उसी प्रवीणता के आधार पर श्रेय की उपलब्धि होती है। संगीतकार, नर्तक भी बहुत समय तक साधना करके अपने कौशल में पारंगत होती हैं।

कुण्डलिनी जागरण का विधि विधान उतना महत्वपूर्ण नहीं है, विधान उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि साधक का परिपक्व मनोबल। किसी भी योगाभ्यास की पुस्तकें बाजार में बिकती हैं, उन्हें मुट्ठी भर पैसों में खरीदा जा सकता है। जो प्रयोग होते हैं कि उन्हें एक दो बार दुबारा लेने पर ही तद्नुसार कृत्य किया जा सके। इतने भर से कोई उन कृत्यों में सफल नहीं हो सकता । विधान तो हर कार्य के सरल होते हैं, पर उन्हें कार्यान्वित कर दिखाने के लिए अपनी मनः स्थिति एवं परिस्थिति भी तद्नुरूप विनिर्मित करनी पड़ती हैं यह पूर्व तैयारी ही सफलता का या अपयश का पक्ष पूरा करती है। साधना वस्तुतः साधना है। उसके प्रयोग में अपना समूचा व्यक्तित्व साधना और अनुभवी मार्गदर्शक का सहारा लेना पड़ता है।


Quotation

परिवार एवं समाज में स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता सुयोग्य एवं सुसंस्कृत नारी के लिए ही संभव है।


दो धर्मात्मा

काफी बड़ी कोठी है। ऊँची चहारदीवारी से घिरी हुई इस कोठी के चारों ओर सुन्दर सी वाटिका है। इसे छोटा-सा राजभवन कहें तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं। इसी से सटकर चहारदीवारी के बाहर एक फूस की पुरानी झोंपड़ी है। फूस की टटियों से घिरी अनेक स्थानों से टूटी झोंपड़ी। कोठी जितनी स्वच्छ, जितनी विशाल, जितनी सजी हुई एवं वैभव संपन्न है, झोंपड़ी उतनी ही जीर्ण-शीर्ण, उतनी ही अपने में सिमटी-सिकुड़ी और उतनी ही कंगाल है। कोठी और झोंपड़ी-दोनों एक दूसरी से सटी। इनका क्या मेल? क्या सामंजस्य इनमें? लेकिन सामंजस्य जो संसार में है, यही है। दोनों में ही धर्मात्मा रहते हैं। कोठी है सेठजी की। सेठ जगतनारायण को कौन नहीं जनता, वे बड़े सज्जन हैं, बड़े धनी है, बड़े भक्त है, बड़े धनी हैं, बड़े व्यापारी हैं अर्थात् बड़े हैं! बड़े है!!!

झोंपड़ी है भोला की। जब लोग यदा-कदा उसे सम्मान से बुला लेते हैं, तो कहते भोलाराम! वह कंगाल है, श्रमजीवी है, दुबला है, ठिगना है, धीरे-धीर बोलता है, धीरे-धीरे चलता है। थोड़े में कहें तो छोटा है! छोटा !! छोटा है!!!! अन्ततः उसकी झोपड़ी भी तो छोटी है। उसके पास झोंपड़ी भी तो छोटी है। उसके पास क्या मोटर है कि, इधर से उधर सर्र-सर्र दौड़े उस पर चढ़कर। उसके पास तो एक बुढ़िया घोड़ी भी नहीं। सेठजी बोलते हैं तो कोठी गूँज उठती है; किन्तु किन्तु भोला का शब्द तो उसकी झोपड़ी में भी पूरा सुनायी नहीं देता।

सेठजी के बनवाये तीर्थों में अनेक मंदिर हैं, धर्मशालाएँ हैं। स्कूल-पाठशालाएँ कई उनके दिए खर्च पर चलती हैं और कई तीर्थों में अत्र क्षेत्र चलते हैं उनकी ओर से। गरमी के दिनों में कितनी प्याऊ सेठजी चलवाते हैं, यह संख्या सैकड़ों में है और जाड़ों में जिन-ब्राह्मण एवं कंगालों को वे वस्त्र तथा कम्बल दिलवाते हैं, उनकी संख्या तो हजारों में कहनी पड़ेगी। कोठी से थोड़ी पड़ेगी। कोठी से थोड़ी ही दूर पर सेठजी ने अपने आराध्य का मन्दिर बनवाया है। कई लाख की लागत लगी होगी। इतना सुन्दर, इतना आस-पास देखने में ही नहीं आता। दूर-दूर से यात्री मन्दिर में दर्शन करते हैं। स्वयं सेठजी रोज दो-तीन घण्टे पूजा-पाठ करते हैं। कई विद्वान ब्राह्मण उनकी ओर से जप या पाठ करते रहते हैं। नियमित रूप से सेठजी कथा सुनते हैं। उनका दातव्य औषधालय चलता है और पर्वों पर वे किसी न किसी तीर्थ की यात्रा कर आते हैं। तीर्थ में दान, दक्षिणा तथा पूजन में हजारों खर्च कर आते हैं, सेठजी, लोगों का कहना है, ऐसा धर्मात्मा इस युग में बहुत कम देखने में आता है।

भोला जब रोटी बना लेता है, प्रायः पड़ोसी की गाय हुम्मा-हुम्मा करती आ जाती है उसकी झोंपड़ी में। एक टुकड़ा रोटी भोला उसे दे देता है। गाय ने यह नियमित दक्षिण बाँध ली है। एक कुतिया ने कहीं पास ही बच्चे दिए हैं। दो-तीन पिल्लों के साथ वह भी पूँछ हिलाती आ जाती है। बेचारी हुड्डी हो गयी है, भूख के मारे और उस पर ये पिल्ले। भोला भोजन करने के पश्चात् मिल कुछ डाँट-डपट सुनने के पश्चात् मिल ही जाती है, किन्तु पानी का नल कहीं पास में है नहीं। भोला उसके घड़े में सबेरे और शाम का नियम से एक घड़ा पानी डाल आता है। वह जो पीपल के नीचे नाले के प्रवाह में पड़कर गोल-मटोल बना पत्थर रखा है, वही भोला के शंकरजी हैं। स्नान के बाद एक लोटा जल वह उनकी चढ़ा देता है, यही उसकी पूजा है। वह तीर्थ करने जाये तो पेट की फीस कहाँ मिले? यही क्या कम है कि शिवरात्रि को वर्ष में एक बार वह चला जाता है गंगा स्नान करने।

ये दो धर्मात्मा हैं । कोठों में रहते हैं सेठजी और झोंपड़ी में रहता है भोला। भोला में साहस नहीं कि कोठी में सेठजी के पास चला जाय और सेठजी के पास चला जाय और सेठजी को कहाँ इतना अवकाश की बाहर कोने में जो फूस की झोंपड़ी है, उस पर ध्यान दें और सोचें कि उसमें भी कोई दो पैर का जन्तु रहता है। ये दोनों पड़ोसी हैं पर हैं सर्वथा अपरिचित।

सेठजी दान-दक्षिणा का दम्भ तो बहुत करते है; किन्तु उनके व्यापार में धर्मादि की जो रकम निकलती है, वह भी रोकड़ बही में जमा ही रहती है। यह मन्दिर कैसे बना? ये क्षेत्र कैसे चलते है? इनका कहीं कुछ हिसाब ही नहीं है। सच्ची बात तो यह है कि ब्लैक की जो नित्य आमदनी है, उसका एक अंश इस धर्म कमाई में इसलिए लगाया जाता है कि वह आमदनी पच सके।

ये दूसरे श्री श्री 9008 श्री कहलाने वाले अपने को बड़ा विचारक एवं सन्त मानते हैं। इनका कहना है “सेठजी के मन्दिर को देखकर वही लोग प्रशंसा कर सकते हैं, जिन्होंने सेठजी की कोठी भीतर से नहीं देखी। सेठजी ने अपने लिए जैसा मकान बनवाया है, मन्दिर उसकी तुलना में कुछ भी नहीं है । भगवान के लिए जो वस्त्र आभूषण हैं, उससे अच्छे तो अपने लड़के के ब्याह में सेठजी ने नौकर-नौकरानिओं को उपहार में दिये थे। भगवान के भोग की बात छोड़ दो। ये रोटियाँ सेठजी के यहाँ झाड़ देने वाले भी नहीं छुएँगे। वैसे कुछ लोग महन्तश्री की इस नाराजगी का कारण सेठजी द्वारा उनकी एक बड़ी माँग को पूरा न करना मानते हैं।

नाराज तो नेताजी भी हैं। ये सेठजी के ही किसी कारखाने में किसी पद पर काम करते हैं। इनकी बात और भी विलक्षण है। ये मजदूरों की उपदेश दिया करते हैं कि कम से कम काम करना और पैसा ज्यादा से ज्यादा लेना ही बुद्धिमानी हैं इन सेठों से जितना जैसे भी वसूल हो जाए सब जायज है। सामने अफसर आ जाए तो काम करना और पैसा ज्यादा से ज्यादा लेना ही बुद्धिमानी है। इन सेठों से जितना जैसे भी वसूल हो जाए सब जायज है। सामने अफसर आ जाए तो काम करना नहीं तो आराम करना और कहने रोकने पर उसी का दोष, निकालकर लड़ने को तैयार हो जाना, उसे पूँजीपति या गरीबों का शत्रु बताकर चिल्लाने लगना ये ही तरीके है इन लोगों पर विजय प्राप्त करने के। ये व्याख्यानों में कहते हैं- सेठजी मजदूरों के पक्के शोषक है, दया का नाम भी इनमें नहीं है। इन नेताजी की नाराजगी के पीछे जो राज है उसकी खुस-फुस मजदूरों में चला करती है।

ये पण्डितजी भी सेठजी से सन्तुष्ट नहीं जान पड़ते। स्वयं चाहें अनुष्ठान के समय ऊँघते ही रहें पर अनुष्ठान भी पहले से बहुत थोड़ी दक्षिण तय करके कराते हैं। पाठशालाओं में अध्यापकों को बहुत कम वेतन दिया जाता है। मन्दिरों और अत्र क्षेत्रों में सदा काट-कसर करते रहते हैं। धर्म में भी मोल-भाव करते हैं।

संसार में दोष देखने वालों की, गुण में भी दोष की कल्पना करने वालों की कमी नहीं है। कोई सेठजी को कंजूस कहता है, काई अनुदार बतलाता है, कोई निष्ठुर कहता है, कोई अनुदार बतलाता है, कोई निष्ठुर कहता है, काई अश्रद्धालु । स्वयं रिश्वत लेने वाले सरकारी कर्मचारी उन्हें लेने वाले सरकारी कर्मचारी उन्हें चोर बाजारी आदि का दोष देते हैं तो दूसरे दलों के नेता उन्हें शोषक कहते हैं।

जहाँ दूसरों को सेठजी के बहुत से दोष दिखते हैं, वहीं सेठजी को भी दूसरों से सन्तोष नहीं है। सबसे अधिक तो वे इस झोंपड़ी से असन्तुष्ट हैं जो उनकी विशाल कोठी से सटी खड़ी हैं। इस कूड़े के ढेर ने उनकी कोठी की शोभा ही बिगाड़ रखी हैं उन्होंने अनेक बार अपने मुनीम मैनेजर से कहा, अनेक बार प्रयत्न कराए झोंपड़ी की भूमि खरीदने के लिए। उनके नौकरों ने बताया है कि इस झोंपड़ी में एक बहुत बुरा आदमी रहता है। बुराई उसमें सबसे बड़ी यही है कि वह किसी दाम पर अपनी झोंपड़ी बेचता ही नहीं सेठजी ने कभी नहीं देखा झोपड़ी में रहने वाले इस गन्दे जीव को। वे उसे देखना चाहते भी नहीं। वह घमण्डी है, उजड्ड-मूर्ख है और न जाने क्या-क्या है सेठजी के मन में। वे उससे घृणा करते हैं। वह भला आदमी कैसे हो सकता है जबकि एक औषधालय या पाठशाला बनाने के लिए अपनी अपनी सड़ी झोंपड़ी नहीं बेच रहा।

भोला की बात छोड़ दीजिए। वह तो पूरा भोला है। कुछ मजदूर नेताओं ने उसे भड़काने की कोशिश की, कुछ दूसरे लोगों ने भी कारण विशेष से उसके कान भरे, उसे अनेक लोगों ने सेठजी के विरुद्ध बहुत कुछ बताया, किन्तु ऐसे लोगों का यही अनुभव है कि भोला पल्ले सिरे का मूर्ख और एकदम कायर है। उसमें साहस ही नहीं सेठ के विरुद्ध मुँह खोलने का । कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उसे सेठ से अवश्य गुप-चुप अच्छी रकम मिलती है। भोला क्या कहता है इसे कोई सुनना नहीं चाहत। भोला कहता है-सेठजी बड़े धर्मात्मा हैं। वे तो मेरी झोंपड़ी अच्छे काम के लिए ही लेना चाहते हैं। लेकिन मैं क्या करूं? मेरे बाप-दादे की यही झोंपड़ी है। मैं इसे कैसे बेच दूँ?

यदा-कदा अटपटी बातें भी घटित हो जाती है। सेठजी बाते भी घटित हो जाती हैं। सेठजी और भोला के शहर में एक स्वामीजी आ गए। स्वामीजी अवस्था आ गए। स्वामीजी अवस्था में तरुण थे। अंग्रेजी, फारसी के पारंगत विद्वान, उन्हें बोलते देखकर लगता कि वेदान्त का अमृत चारों ओर झर रहा हो। उनके मुख से निकली ओंकार की ध्वनि श्रोताओं को अनिर्वचनीय आनन्द में डुबो देती। लोग उन्हें स्वामी रामतीर्थ कहते, पर वे अपने को रामबादशाह कहत थे। सचमुच उनकी बाल में बादशाहत था, चेहरे पर अलौकिक नूर, जीवन का फक्कड़ाना अन्दाजा। अपने प्रवचन के बाद उन्होंने सेठजी की कोठी के पास जो पीपल है, उसके नीचे आसन लगाया। पता लगने पर सेठजी दौड़े-दौड़े आए। वे एक महात्मा को इस प्रकार सर्दी सहते देखकर बहुत बढ़िया आए। वे एक महात्मा की इस प्रकार सर्दी सहते देखकर बहुत बढ़िया कम्बल लेकर आए थे। स्वामीजी ने कम्बल उठाकर आए थे। स्वामीजी ने कम्बल उठाकर एक ओर रख दया, बोले-”मैं किसी धर्मात्मा व्यक्ति की वस्तुओं का उपयोग करता हूँ। अब यह अटपटी बात नहीं तो क्या है? बेचारे सेठजी हाथ जोड़े खड़े रह गए। कोई दूसरा होता तो............लेकिन फक्कड़ का कोई क्या कर लेगा?

बात यहीं रह जाती तो भी कुछ आश्चर्य न होता। सबको आश्चर्य तो तब हुआ, जब वहाँ भोला लगभग दौड़ता हुआ आया। वह भी साधु-सन्तों का बड़ा भक्त है। दो मटमैले से कई दिन के तोड़े हुए नन्हें-नन्हें अमरूद स्वामीजी के पैरों के पास रखकर वह भूमि में पूरा ही लेट गया। स्वामीजी ने झटपट अमरूद उठा लिए और इस प्रकार उनका भोग लगाने लगे जैसे कई दिनों से कुछ खाया ही न हो।

“भगत! बड़े मीठे हैं तेरे अमरूद!” वे मस्त हो रहे थे और इस प्रकार भोला से बातें करने लगें थे जैसे वहाँ और कोई न हो- “तू बड़ा धर्मात्मा हैं आज मैं रात को बड़ा धर्मात्मा है। आज मैं रात को यहीं रहना चाहता हूँ, मेरे लिए थोड़ा-सा पुआल ला दे तू।”

“महाराज! मेरे पास ताजा पुआल...............!” भोला बहुत संकुचित हो गया था, उस बेचारे के पास संकुचित हो गया था, उस बेचारे के पास ताजा पुआल कहाँ से आवे। वह कोई किसान तो है नहीं । कहीं से कुछ पुआल ले भी आया होगा तो झोंपड़ी में बिछाकर उसी पर सोता होगा।

“सेठजी। आप कष्ट न करें।” महात्माजी ने सेठजी को रोक दिया, क्योंकि वे एक नौकर को कोठी में से पुआल ले आने का आदेश दे रहे थे।

सेठजी को मना करके वे भोला से बोल-

“तू जो पुआज बिछाता है, उसमें से ही दो मुट्ठी ले आ। देख, सबकी सब मत उठा लाना।”

“यह कौन है?” सेठजी ने अपने मुनीम से, जी पास खड़ा था पूछा।”इसी की झोपड़ी है वह ।” जैसे सेठजी आकाश से जमीन पर गिरे। यह धर्मात्मा है। वे मस्तक झुकाए बहुत देर तक सोचते रहे।

तुम क्या सोचते हो? सन्त ने अब कृपा की उन पर, जो धर्म का सच्चा जिज्ञासु है। वह भूले चाहें कितनी भी करे, अन्धकार कब तक अटकाए रख सकता है उसे? सन्त कह रहे थे- “वह धर्मात्मा है या नहीं उस बात को अभी छोड़ दो! तुम धर्मात्मा हो या नहीं-यही बात सोचो”

“मुझसे जो बन पड़ता है करने का प्रयत्न करता हूँ” सेठजी का उत्तर स्वच्छ था और वे वही कह रहे थे जो जो उनकी सच्ची धारणा थी।

“यदि भोला तुम्हारे दस हजार रुपये चुरा ले........।” सेठजी चौके और भोला की ओर देखने लगे। महात्माजी ने कहा- “डरो मत! तुम्हारे रुपये सड़क पर भी पड़े हों तो वह छुएगा नहीं। मैं तो समझने की बात कर रहा हूँ कि यदि वह तुम्हारे दस हजार रुपये चुरा ले और उनमें से सौ रुपये दान करे तो वह दानी हो जायगा या नहीं।”

“चोरी के धन को दान करने से दानी कैसे होगा? वह तो चोर ही होगा।” सेठजी ने भोला की ओर देखते हुए उत्तर दिया।

“वह सौ रुपये का दान क्या कुछ फल नहीं देगा? क्या पकड़े जाने पर सरकार उसे दान करने के कारण छोड़ेगी नहीं?” सन्त ने बहुत भोलेपन से पूछा।

“दान तो उसने किया ही कहाँ? दान तो मेरे रुपयों का हुआ सौ दान का कुछ पुण्य हो तो जिसका रुपया है, उसको होना चाहिए सरकार भला क्यों छोड़ने लगी उसे”?

“अब सोचो-तुम जो बन दान करते हो, वह सब तुम्हारी ईमानदारी की कमाई का है या झूठ, छल, कपट, धोखा देकर उसे प्राप्त किया गया है?”

“तो मेरा सब दान धर्म.................।” सेठजी सहसा नहीं बोल पाए। वे कई क्षण चुप रहे और जब बोले-रुकते-रुकते, वाक्य पूरा करते अटक गए। उनकी आँखों से टप-टप बूंदें गिरने लगीं।

ऐसी नहीं! स्वामी जी की वाणी में बड़ा स्नेह और आश्वासन था- चोर ने जो रुपए चुराए हैं उन पर अनुचित रीति से ही सही, पर उसका अधिकार तो हो ही गया था। वह उन रुपयों को बुरे कर्मों में भी लगा सकता था और दान भी कर सकता था। इसलिए जब वह उनमें से कुछ दान करता है, तब दान का पुण्य तो उसे होता ही है, किन्तु चोरी के पाप से दान करके वहाँ छूट नहीं जाता। चोरी का दण्ड तो उसे भोगना ही पड़ेगा। अवश्य वह दूसरे दान न करने वाले चोरों से श्रेष्ठ है। उसे दान का पुण्यफल भी अवश्य मिलेगा।”

“यह नन्ही सी सेवा .........।” सेठजी बहुत देर सिर झुकाए चुपचाप कुछ सोचते रहे। बड़ी नम्रता से हाथ जोड़कर अन्त में अपने कम्बल स्वीकार करने की पुनः प्रार्थना की।

“तुम्हारी वस्तु होती ता मैं अवश्य ले लेता।” महात्मा कुछ हँसते हुए से बोले-”तुम्हारा हृदय पवित्र है भैया भगवान बड़े दयालु हैं। वे शरणागत के अपराध देखना और उस समय तुम मुझे अपनी वस्तु दे सकोगे।”

स्वामीजी की बातों का सेठजी ने क्या अर्थ लगाया? पता नहीं, किन्तु उस कम्बल को लेकर वे उनके चरणों में प्रणाम करके कोठी में लौट गये। इस लौटने के साथ ही उनका जीवन भी उलट गया।

व्यापारी कहते हैं- यह सेठ पक्का धूर्त है। इसने हम लोगों का रुपया हड़प जाने के लिए दिवाला निकाला है-बहुत बड़ी रकम दबाली है इसने। भिखारी कहते हैं-वह महान कृपण है। इसने चलते हुए अन्न क्षेत्र. बन्द करा दिये। भिखारियों की रोटी बन्द करा दिये। भिखारियों को रोटी बन्द करके धन बटोरने में लगा है।

पण्डे-पुजारी कहते है- अब वह नास्तिक हो गया है। पर्वों पर भी न तो कोई भेंट चढ़ाता है और न कथा-वार्ता ही कराता है।

सब लोग निन्दा करते हैं, सब असंतुष्ट है। सेठजी की दिवाला निकल गया है। व अब एक छोटे से भाड़े के मकान में पत्नी के साथ रहते हैं। दलाली करके किसी तरह पेट भर लेते हैं। न मोटरें हैं, न कोठी है। न नौकर है, न स्तुति करने वाले है। मन्दिरों में जो धन पहले लगा दिया। उसी से वहाँ पूजा की व्यवस्था चलती है। सेठजी अब यदा-कदा ही अपने मन्दिरों में जाते हैं। वे तो आजकल घर पर ही पूजा कर लेते हैं।

यह सब तो हुआ तो सेठजी हैं बड़े ही प्रसन्न । इतना कष्ट-क्लेश, इतना अपमान, तिरस्कार, इतना उलट-फेर जैसे कुछ हुआ ही नहीं वे कहते हैं, अब मुझे पता लगा कि सुख क्या होता है और कहाँ मिलता है? अब तक तो मैं अशान्त और दुःखी ही था।

आज फिर से वे ही स्वामी जी आये हैं उसी पीपल के पेड़ के नीचे आसन और सेठजी एक साथ आये। कहना यह चाहिए कि सेठजी भोला को देखकर आये। एक बहुत साधारण का कम्बल सेठजी ने स्वामीजी के चरणों के पास धर दिया और भूमि पर मस्तक रखा।

“अब इस वर्ष जाड़े भर मैं कम्बल ओढूँगा।” महात्माजी ने चटपट कम्बल उठाकर ओढ़ लिया। ये कृपा न करते तो मुझ जैसे का उद्धार न होता। इनके पड़ोस के कारण ही मैं गिरकर सम्भल सका। सेठजी भोला के चरण छूने झुक रहे थे।

“आप क्या कर रहे है? धर्मात्मा है। आप तो।” हक्का-बक्का सा भोला पीछे हट गया।

स्वामी रामतीर्थ इन दोनों धर्मात्माओं पर अनुग्रह की वर्षा करते हुए मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।


यंत्रों के गुलाम तो न बनें हम

आधुनिक सभ्यता में रह रहे लोगों की जीवनचर्या, रहन-सहन स्वभाव, प्रकृति और मान्यताओं-दृष्टिकोण को देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचता पड़ता है कि मनुष्य दिनों दिन यान्त्रिक होता जा रहा है और उसका व्यक्तित्व यन्त्रों के समान ही संवेदना शून्य होता जा रहा है। इन दिनों जीवनयापन और दैनंदिन कार्यों दिनों जीवन यापन और दैनंदिन कार्यों के सम्पादन में यंत्रों युग कहने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मनुष्य जीवन प्रत्येक क्षेत्र में किसी न किसी रूप में मशीनों से प्रभावित है, यन्त्रों के संपर्क में है।

यान्त्रिक जीवन का भावना क्षेत्र पर गम्भीर प्रभाव पड़ा है। यान्त्रिक सभ्यता ने मनुष्य के जीवन और व्यक्तित्व को कितना और किस प्रकार प्रभावित किया है? इसकी चर्चा करते हुए प्रसिद्ध विचारक संत विनोबा भावे ने लिखा है- “आधुनिक यान्त्रिक सभ्यता जिस तेजी से प्रगति कर रही है उसी अनुपात से मनुष्य की संवेदना का ह्रास होता जा रहा है कि शीघ्र ही वह पूरी तरह खोखला और बुरी तरह दुःखी हो जायेगा। इस तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट करते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने लिखा है- “आज के युग में जीने वाले व्यक्ति की स्थिति विचित्र कम, शोचनीय अधिक है। समस्त मानवीय सम्बन्ध अब केवल वित्तीय स्तर पर ही बनते हैं और अन्य सभी माध्यमों को या तो नगण्य घोषित कर दिया गया है अथवा यान्त्रिकता से जकड़े हुए नये समाज में वे स्वतः अपना महत्व और मूल्य खोते चले जा रहे है।”

मनुष्य चूँकि समाज का ही एक अंग है और समाज में रहने के कारण अंग है और समाज में रहने के कारण उसे दूसरे लोगों के संपर्क में भी आना पड़ता है प्रत्येक व्यक्ति अपने पड़ोसियों के दुःख-सुख में काम आये, उसके साथ पारिवारिक सम्बन्ध विकसित करे। किन्तु बड़े शहरों की स्थिति तो यह है कि वहाँ रहने वाला व्यक्ति अपने पड़ोसी के दुःख -दर्द में साथ देने की बात तो दूर रही, उसे जानते तक नहीं। बड़े शहरों और कस्बों में रहने वाले लोगों को अपन काम-काज से ही फुरसत मिल पाती है। फुरसत मिलती भी है तो उनकी मानसिकता कुछ इस प्रकार की बन गई है कि वे अवकाश का समय अपने पड़ोसियों से मेल-जोल बढ़ाने के स्थान पर टी.वी देखने सिनेमाघरों में जाने, सैर-सपाटे करने में गुजारना अधिक अच्छा समझते हैं। इतना ही नहीं रिश्तेदारों और सम्बन्धियों तक से संपर्क रखने को समय की बर्बादी समझा जाता है उपेक्षा अपने परिवारजनों की भी की जाती है। बच्चे क्या पढ़ रहे हैं? सुधर रहे हैं या बिगड़ रहे है। उन्हें माता पिता का प्यार मिल रहा है या वे प्यार के लिए तरस रहे हैं? माता-पिता के स्नेह और ममत्व की प्यास अतृप्त रह जाने के कारण कहीं उनका कोमल हृदय अंकुरित तो नहीं गया? आदि प्रश्नों की ओर काई ध्यान देना आवश्यक ही नहीं समझाता।

यन्त्रों के संपर्क में रहते-रहते मनुष्य इतना हृदयहीन और भाव शून्य होता जा रहा है। कि वह अपने अतिरिक्त और किसी की चिन्ता करना व्यर्थ ही समझने लगा है। यन्त्रों की बाढ़ ने मनुष्य का श्रम हल्का किया है और उसकी सुविधाएँ बढ़ाई हैं। उपभोग की वस्तुओं से, सुविधा साधनों से बाजार भरे पड़े हैं। जो समर्थ हैं, वे उन्हें खरीद सकते हैं और जो असमर्थ हैं वे इसके लिए बुरी तरह लालायित हैं। साधन-संपन्न और सुविधा जीवियों की देखा-देखी दूसरे लोगों में भी इस तरह उपभोग करने की आकांशा जगती है तथा वे भी इस का जीवन यापन करने के लिए ललक उठते हैं। अन्तर बढ़ता जाता है तथा यह अन्तर बढ़ता जाता है तथा यह अन्तर ही संपन्नता को प्रतिष्ठा का केंद्र बना देता है। मशीनी वातावरण एवं यन्त्रों देता है। मशीनों वातावरण एवं यन्त्रों से उत्पन्न हुई समृद्धि-संपन्नता के कारण हमारा दृष्टिकोण बदला है, उसने आर्थिक स्थिति को ही सर्वप्रधान बना दिया है तथा उसे केवल उस भाग को ही सुदृढ़ बनाने के लिए मनुष्य को इतना बावला बना दिया है कि वह चारों ओर से एकाकीपन, संत्रास, आत्महीनता कुँठाओं और विक्षोभों का शिकार होने लगा है।

धन को जीवन का केन्द्र बिन्दु बनते जाने से सहयोग-सद्भाव की वृत्ति घटने लगी हैं। लोग एकाकी परिवार बसाकर अधकचरी स्थिति में जीते हुए अपनी महत्वाकाँक्षाओं को पूरी करते रहने की आशा में टकटकी लगाये रह रहे हैं। इस प्रकार और अधिक धन कमाने और अधिक धन संग्रह करने के लोभ में लोग इन दिनों एकाकी, अकेले तथा स्वार्थी बनते जा रहे हैं।

यन्त्र जिस प्रकार एक ही गति एक ही लय-ताल में चलता है, उसी प्रकार मनुष्य भी एक ही स्थिति को बार-बार भोगने के लिए अपने आपकी विवश अनुभव करता इन दिनों प्रतीत हो रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यन्त्रों को नष्ट कर समाज पीछे चला जाय-यह एक और बड़ी गलती होगी। अब व्यवस्था का संयोजन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि हम अपने मूल्यों को सुरक्षित रख सकें। इतना किया जा सके तो यान्त्रिक सभ्यता के खतरों से बचा जा सकता है।


कर्मयोग के मूल मर्म को समझें, आत्मसात करें

कर्म की धुरी पर ही सृष्टि का गतिचक्र अविराम चक्कर काट रहा है। अविराम चक्कर काट रहा है। संसार का दृश्य स्वरूप इस गति प्रक्रिया पर अवलम्बित है। जड़ परमाणु पर अवलम्बित है। जड़ परमाणु एक सुनिश्चित परिकर में गति करते और अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं और चेतन जीव दूसरे तरह की हलचल में अपने को नियोजित रखते हैं। कर्म किए बिना यहाँ की हलचल में अपने को नियोजित रखते हैं। कर्म किए बिना यहाँ कोई नहीं रह सकता। जीवित रहने के लिए कर्म आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। अविकसित मनुष्येत्तर जीवों में यह प्रकृति प्रेरणा से परिचालित है, शिश्नोदर जीवन तक सीमित है। उदर शिश्नोदर जीवन तक सीमित है। उदर पूर्ति और-तुष्टि जैसे दो सीमित प्रयोजनों तक उनके सुख और आनन्द की अनुभूतियाँ परिसीमित है। इसके इर्द-गिर्द ही उनका समूचा जीवन परिभ्रमण करता रहता है और एक दिन काल के गर्भ में समा जाता है। अस्तु उनके लिए सुख-दुःख की उच्चस्तरीय वैचारिक और बन्धन-मुक्ति की आत्मिक अनुभूतियाँ निरर्थक है।

मानसिक और बौद्धिक दृष्टि से सुविकसित होने के कारण मनुष्य इंद्रिय सुख की निम्न परिधि में नहीं रह सकता। उसे उच्चस्तरीय और शाश्वत आनन्द की खोज है, जिसके लिए वह साँसारिक मृग-मरीचिका में अज्ञानवश भटकता रहता है। ऋषियों ने इस भटकाव से बचने और जीवन-मुक्ति के शाश्वत आनन्द की प्राप्ति के लिए ज्ञानयोग, भक्ति के अथवा कर्मयोग का मार्ग अपनाने का निर्देश कर्मयोग का मार्ग अपनाने का निर्देश दिया है। कर्मयोग के पथ को राजकर्मयोग का मार्ग अपनाने का निर्देश दिया है। कर्मयोग के पथ को राजमार्ग इसलिए माना गया है कि यह हर तरह की मनःस्थिति के व्यक्तियों एवं आज की परिस्थितियों के अनुकूल है। भटकाव की गुँजाइश कम है। जबकि ज्ञानयोग अथवा कम हैं। जबकि ज्ञानयोग अथवा भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए एक निश्चित प्रकार की मनःस्थिति का होना अनिवार्य है। कर्मयोग सभी के लिए इसलिए अधिक उपयुक्त है क्योंकि मनुष्य जीवन-पर्यंत किसी न किसी रूप में कर्मों से जुड़ा रहता है-उनसे विरत रहना सम्भव नहीं है। अस्तु, यदि कर्मयोग युक्त जीवन शक्य हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और हो सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द लेना हर किसी के लिए सम्भव है।

‘कर्म’ आत्मा और परमात्मा को एकाकार कर देने वाला ‘योग’ तब जाता है जब वह निष्काम हो। निष्काम क्यों-कामना से युक्त क्यों नहीं? क्योंकि मन की कामना ही नहीं? क्योंकि मन की मना ही भव-बन्धनों का कारण है। गीतकार ने इसी सत्य का रहस्योद्घाटन इस ने इसी सत्य का रहस्योद्घाटन इस प्रकार किया है- “मनः एवं मनुष्याणाम् कारणं बन्धमोक्षयो” अर्थात् ‘मन ही मनुष्य के बन्धन या मुक्ति का कारण है।’ कामना युक्त कर्म जहाँ बन्धनों में बाँधता है, निष्काम कर्म ‘मुक्ति’ का साधन बन जाता है। एक क्षण के लिए भी कर्म से विरत रहना सम्भव नहीं है, साथ से विरत रहना सम्भव नहीं है, साथ ही कर्म भव-बन्धनों में भी जकड़ता है, फिर संसार में किस तरह रहा जाय? जीवन-मुक्ति का आनन्द कैसे उठाया जाय? जीवन-मुक्ति का आनन्द कैसे उठाया जाय? यजुर्वेद का ऋषि इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हुए कहता है- “तेन त्यक्तेन भुँजीथाः” अर्थात् ‘संसार को भोगो, परन्तु निर्लिप्त होकर, निस्संग होकर, निष्काम भाव से।’

निष्काम कर्मयोग के पथ पर चलने वाला साधक अपनी समस्त इच्छाओं, आकाँक्षाओं को परमात्मा को समर्पित कर देता है। कर्मफल के प्रति उसकी आसक्ति नहीं रहती। अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति उसकी आसक्ति नहीं रहती। अपने कर्त्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति वह तत्पर और सजग रहता है। उनके निर्वाह में सन्तोष की अनुभूति करता है। शरीर से कर्म और मन से चिन्तन करते हुए भी वह साँसारिक पदार्थों एवं व्यक्तियों के प्रति निरासक्त होता है।

अर्जुन को सम्बोधित कर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- “योगस्थः कुय कर्माणि, सड्र त्यक्त्वा धनंजय। सिद्वयासिद्वयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥”

अर्थात् ‘हे अर्जुन। आसक्ति छोड़कर सिद्धि और असिद्धि के विषय में समबुद्वि रखकर, योग में स्थिर होकर कर्म कर। समत्व को ही योग कहते हैं।’

‘समत्व’ का अर्थ हुआ समान भाव, संभव वृत्ति की एकरूपता, चित्तवृत्तियों की चंचलता पर निरोध। जिसे पतंजलि ने “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः “करके समझाया है, उसे भगवान ने यहाँ एक ही शब्द ‘समत्व’ में गूँथ दिया है। हर पल चित्त की चंचलता कर्मों को करने में बाधा चंचलता कर्मों को करने में बाधा डालती है। सुख-दुःख, जय-पराजय, हानि-लाभ के द्वन्द्व मानस पटल पर सतत् उभरते हैं। जय होने से घमण्ड होता है और पराजय से व्यक्ति हताश, होता है और पराजय से व्यक्ति हताश होता है और पराजय से व्यक्ति हताश हो जाता है। परिस्थितियों से जो हताश हो जाता है। परिस्थितियों से जो मनः हो जाता है। परिस्थितियों से जो मनः स्थिति को प्रभावित न होने दे, वह समत्व योग की ही उपासना करता है। बाह्य परिस्थिति जैसी भी बने, जिसकी वृत्ति में चंचलता नहीं है, वही कुछ कर्त्तव्य पालन कर सकते हैं।

चित्त की चंचलता के कई कारणों में, अनुकूल भोग पाने की इच्छा भी एक प्रमुख कारण है। मनोवृत्ति की यही चंचलता असंयम को जन्म देकर उसे पथ भ्रष्ट कर देती है। समत्व योग का उपासक वस्तुतः निष्काम कर्मयोगी के साथ चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण रखने वाला कठोर साधक भी है, जो पल-पल अपनी मनःस्थिति पर पैनी नजर रखता है। सिद्धि हो, चाले असिद्धि, हम जीवन क्षेत्र में सफल हों अथवा असफल, कभी भी अपनी समस्वरता पर उसका, कभी भी अपनी समस्वरता पर उसका प्रभाव न पड़ने देंगे-यही साधक का लक्ष्य होता है।

इसी श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है- “संगं त्यक्त्वा” अर्थात् फल की आसक्ति भी त्यागी जाय। वही मानव आमन्त्रित दुर्बुद्धिजन्य आपत्तियाँ हैं। संग से ही विषयासक्ति की कामना, कामना से क्रोध से मूढ़ता मूढ़ता से भ्रम, भ्रम से बुद्धि का नाश होता है। बुद्धि का नाश ही मनुष्य के नाश का कारण है। यह सर्वविदित तथ्य है।

ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म बहुत अनिवार्य है। साधारण मनुष्य जो कर्म करता है वह स्वार्थवश करता है। उस समय इस जीव को परमात्मा का उस समय इस जीव को परमात्मा का चार गौण होता है। काम कर्म करने वाला मनुष्य अपने अंश रूप आत्मा को प्रधान और सर्वव्यापी परमात्मा को गौण मानता है। किरण को प्रधान मानना और सूर्य का विचार तक न करना अज्ञान का ही द्योतक है। इसलिये इस अज्ञान के निवारण तथा ब्रह्मर्पण कराने वाले, इस ‘समत्वयोग’ को ‘निष्काम कर्मयोग ‘ के अलावा ‘बुद्धियोग’ भी कहा गया है।

कर्मफल के प्रति अनासक्ति का होना इसलिए भी आवश्यक मात्र कर्म करने पर है। फल पर उसका कोई अधिकार नहीं है। यह सच है कि कर्मों का फल अपने निश्चित समय पर मिलता है, पर यह भी उतना ही सत्य है कि यह प्रक्रिया किसी अदृश्य के हाथों संचालित है। कई बार कर्मफल प्रक्रिया में व्यतिरेक पड़ते भी दिखाई पड़ता है। एक निश्चित प्रकार के कर्म करते हुए भी उसका परिणाम उल्टा देखकर मन में कर्मफल व्यवस्था के प्रति आशंका उठती है। प्रायः ऐसा कर्मफल के सिद्धांत को सही रूप से न समझने के कारण ही होता है। प्रत्यक्ष जीवन और उससे जुड़ी भली बुरी उपलब्धियाँ मात्र इसी जीवन की ही नहीं, जन्म-जन्मान्तरों उचित कर्मों का परिणाम होती है। बार अच्छे कर्म करते हुए अनुकूल नहीं विष विघ्न जाती है। जिन्हें हटाने में मानवी पुरुषार्थ असमर्थ सिद्ध होता है। यह वस्तुतः उन अदृश्य कर्मों के फल होते हैं जो पिछले जन्मों में लिए गये होते हैं। जो कर्मफल के सुनिश्चित विधान के अनुसार कालान्तर में रोग-शोकों के रूप में प्रकट होते दिखायी देते हैं। अस्तु, कर्मफल का सिद्धांत अक्षरशः सत्य होते हुए भी उसमें आसक्ति का न होना ही श्रेयष्कर है। फलासक्ति होने और तद्नुरूप होती है।

भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्मयोग का उपदेश को निष्काम कर्मयोग का उपदेश देते हुए कहते हैं-”जो सुख दुःख, सर्दी-गर्मी, लाभ-हानि, जीत हार, यश-अपयश, जीवन-मरण, भूत-भविष्य की चिन्ता न करके मात्र अपने कर्त्तव्य-कर्म में निरत रहता है वही सच्चा निष्काम-कर्मयोगी है।” कर्मयोगी इस सत्य से भलीभाँति परिचित होता है कि साँसारिक द्वन्द्व तो एक के बाद एक आते हैं और आते रहेंगे। इनका प्रभाव क्षणिक और अस्थायी तथा मात्र नाशवान शरीर तक सीमित है। स्थायी, शाश्वत तो आत्मा है, उसका उत्थान और पतन ही मनुष्य का वास्तविक उत्थान और पतन है। अस्तु, जो भी कर्म किये जायँ आत्मोन्नति को ध्यान में रखकर।

सृष्टि का नियामक, संचालक होते हुए भी परमात्मा ने मनुष्य का अतिरिक्त रूप से विवेक बुद्धि देकर उसे कर्मों का अधिष्ठाता बनाया है। उसे कर्म का अधिष्ठाता बनाया है। उसे कर्म करने की पूरी-पूरी छूट दे रखी है। चाहे तो वह सत्कर्म का मार्ग करने की पूरी-पूरी छूट दे रखी है। चाहे तो वह सत्कर्म का मार्ग अपनाकर आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ सकता है अथवा दुष्कर्मों में प्रवृत्त होकर अपनी अवनति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। भले-बुरे कर्मों के लिए इस प्रकार पूर्णरूपेण उत्तरदायी। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाय कि कर्मों के लिए प्रेरणाएँ परमात्मा से मिलती है तो इस सत्य की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि “सत्यं शिवं सुन्दरम्” से युक्त परमात्मा कभी मनुष्य को दुष्कर्म करने की प्रेरणा देगा। ऐसी प्रेरणाएँ अपने ही मन की उपज-प्रतिनिधि आत्मा के रूप में अपने भीतर बैठा है, जो सदा उच्चस्तरीय प्रेरणाएं ही सम्प्रेरित करता है, पर मन द्वारा उनकी उपेक्षा-अवहेलना होने से वे व्यवहार में नहीं उतर पातीं। मन की अपेक्षा यदि सचमुच ही अपनी गतिविधियों को आत्मप्रेरणा के अनुरूप परिचालित किया जाय तो कभी दुष्कर्मों की ओर बढ़ने का अवसर ही न प्रस्तुत हो। अस्तु कर्माकर्म का दायित्व अपने ऊपर न मानकर परमात्मा पर मानना अनासक्त कर्मयोग का गलत अर्थ लगाना है।

अनासक्त कर्मयोग शब्द स्वयं भी अपने वास्तविक आशय को प्रकट करता है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है- अनासक्त और कर्मयोग। अनासक्ति का अर्थ यह है कि राग न रखना। कोई भी छोटा अथवा बड़ा काम क्यों न किया जाय, उसके प्रति कर्तृत्व का अहंकार न जोड़ा जाय। ‘पापमूल-अभिमान’- अहंकार को सभी पापों की जड़ माना गया है। अहंकार की उत्पत्ति आसक्ति से होती है। दूसरा शब्द है- कर्मयोग। गीता इसकी व्याख्या इस प्रकार करती है-

“योगः कर्मसु कौशलम्”-कर्म में कुशलता ही योग है। कार्य कुश लव ही हो सकता है जिसे उचित अनुचित कर्मों के बीच स्पष्ट अन्तर का बोध हो। कुशल शब्द के अंतर्गत सत्यं, शिवं, सुन्दरम् का भाव प्रवाहित है। इसलिए कार्य कुशलता में अशुभ कर्मों के लिए कोई गुँजाइश नहीं है। अनासक्त कर्मयोग का वास्तविक तात्पर्य यही है कि किसी भी काम को पूरी कुशलता के साथ कर्त्तापन का अभिमान छोड़कर किया जाय और उसके फल के प्रति निर्लिप्त-निस्पृह रहा जाय। निष्काम कर्मयोग के तत्व-दर्शन को हृदयंगम करने और इस राजमार्ग का अवलम्बन लेकर साधक संसार में रहते हुए भी स्वर्ग-मुक्ति का उच्चस्तरीय आनन्द प्राप्त कर सकता है।


अध्यात्म हर दृष्टि से वरिष्ठ एवं वरेण्य है।

इस विश्व-ब्रह्मांड के प्रत्येक घटक की संरचना में दो तयि अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए है। एक प्रत्यक्ष दूसरा परोक्ष। प्रत्यक्ष वह है जो इन्द्रियगम्य है। परोक्ष वह है जो इंद्रियातीत कहा जा सकता है। इन्द्रियातीत अर्थात् बुद्धिगम्य। प्रत्यक्ष को ज्ञान कहते हैं और परोक्ष की विज्ञान। इन्हीं दो पक्षों को अध्यात्म की भाषा में स्थूल एवं सूक्ष्म कहा जाता हैं

हर घटक की प्रत्यक्ष क्षमता एवं उपयोगिता स्वल्प है। उसका वर्चस्व परोक्ष में छिपा है। समग्र क्षमता एवं उपयोगिता समझने पर ही समुचित लाभ उठाया जाना सम्भव है अन्यथा इस दुनिया में सर्वत्र मिट्टी बिखरी पड़ी है। पानी के गड्ढे और पेड़-पौधे भर दृष्टिगोचर होते हैं। चाबीदार खिलौनों की तरह कुछ जीवधारी चित्र विचित्र हलचलें करते दिखाई पड़ते हैं। इतने भर से सन्तोष होता और काम चलता होता तो मनुष्य भी अन्य प्राणियों की भाँति अपने निर्वाह की आवश्यकता जुटाने भर तक सीमाबद्ध रहा होता । प्रस्तुत प्रगति की न आकाँक्षा उठती है और न आवश्यकता प्रतीत होती है।

जमीन पर बिखरी धूलि की कोई कीमत नहीं। पर उसके छोटे से परमाणु की परोक्ष शक्ति की जो जानकारी-रहस्य का पर्दा उठने पर मिलती है उसे देखकर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है। आकाश नीले शामियाने जैसा दीखता है, पर इस प्रत्यक्ष से आगे बढ़कर इन्द्रियातीत रहस्यों का पता चलता रहता है। कि उस पोल में उससे भी अधिक सम्पदा भरी पड़ी है, जितनी कि इस धरती पर इन्द्रियों के सहारे बिखरी हुई लगती है। यह रहस्य लोक ही है जिसे इन्द्रियातीत या बुद्धिगम्य कहते हैं। परोक्ष भी प्रत्यक्ष के साथ ही गुँथा हुआ है पर उसे जानने, पकड़ने और करतलगत करने के लिए इन्द्रियों की क्षमता से काम नहीं चलता, उसके लिए बुद्धि क्षेत्र की प्रखरता उभारकर उसके सहारे गहराई में प्रवेश करने और मोती ढूँढ़ निकालने का पुरुषार्थ करना पड़ता है। प्रत्यक्ष जानकारी को ज्ञान और परोक्ष के रहस्योद्घाटन को विज्ञान कहते हैं। ज्ञान सब प्राणियों को समान मिला है। विज्ञान मनुष्य की अपनी उपलब्धि है।

विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में इन दिनों तक इतनी सामर्थ्य प्रदान कर दी है कि उसे पौराणिक महादैत्यों के समतुल्य मानने में कोई अत्युक्ति नहीं। पाँचों देवता उसकी सेवा में नियुक्त हैं। अग्नि देव खाना पकाते हैं। वरुण देव नल में विराजमान आज्ञा की प्रतीक्षा करते हैं। पवन पंखा झलते हैं। धरती अपनी उदरदरी की छिपी हुई सम्पदा की तिजोरी सुनाते हैं। धरती अपनी उदरदरी की छिपी हुई सम्पदा की तिजोरी खोल-खोलकर उसका वैभव बढ़ाती चली जाती है। प्राचीनकाल के पौराणिक महादैत्यों ने भी इसी प्रकार देवताओं का वशवर्ती करके उनके माध्यम से विपुल वैभव और वर्चस्व उपलब्ध किया था।

अब जो मिल है वह आदि मानव को आश्चर्यचकित कर सकता है। भविष्य में जो मिलने वाला है उसे भी इतना ही महत्वपूर्ण और रहस्यमय समझा जा सकता है कि आज का मनुष्य हजार वर्ष बाद फिर लौटकर इस धरती पर आये तो देख कि वह सन् 16 के युग को करोड़ों मील पीछे छोड़ कर किसी देवमानवों के लोक में आ पहुँचा । यह पदार्थ विज्ञान की देन है। विज्ञान अर्थात् परोक्ष। परोक्ष अर्थात् इन्द्रिय शक्ति से परे बुद्धिगम्य। पदार्थ की प्रकृति सत्ता और मनुष्य की जिज्ञासा जन्य तत्परता के समन्वय का चमत्कार ही है, जिसके कारण हम इस समूचे ही है, जिसके कारण हम इस समूचे ब्रह्मांड के कदाचित् सर्वश्रेष्ठ लोक में निवास करने का गौरव पा रहे और आनन्द ले रहे है।

पदार्थ जगत के साथ विज्ञान की प्रखरता जुड़ जाने से जो सम्पदा हस्तगत हुई है, होने वाली है उस पर हम सभी प्रसन्न हैं, गौरवान्वित हैं और भविष्य में इस से भी अधिक पाने की अपेक्षा लगाये बैठे हैं। इस प्रकार विज्ञान को जितना सराहा जाय उतना ही कम है। उसे देवाधि देव न कहकर दैत्यादिदैत्व तो ही जा सकता है। दैत्य शक्ति को कहते हैं और देव सम्पदावानों को। इसलिए विज्ञान को देव न कहकर दैत्य ना देना ही ठीक है।

अब सृष्टि संरचना के दूसरे पक्ष का प्रसंग आता है वह है-चेतना। चेतना प्राणियों में पायी जाती है। इसलिए उसे प्राण भी कहते हैं। प्राण होने से प्राणी भी कहते हैं। प्राण होने से प्राणी कहे गये या प्राणियों की आधारभूत सत्ता होने के कारण उस चेतना को प्राण कहा गया। इस विवाद में न पड़कर इतना मान लेने से ही काम चल जायगा कि प्राणियों की काया देखने में जैसी भी लगती हो, करने को जो कुछ भी करती हो, पर यह उनका निर्वाह पक्ष भर है। उनकी रहस्यमय क्षमता इन्द्रियातीत है परोक्ष-बुद्धिगम्य। मनुष्य की हलचलें उसी सीमा तक सीमित हैं जिसके सहारे अव अपना निर्वाह करता है। निर्वाह क्षेत्र में ही आजीविका और परिवार क्षेत्र में ही आजीविका और परिवार को जोड़ा जा सकता है। अन्य प्राणियों के पेट-प्रजनन की सीमा छोटी है। मनुष्य जीवन में उन्हीं दो आवश्यकताओं ने थोड़ा विस्तार करके आजीविका एवं परिवार क्षेत्र तक विस्तार कर लिया है। व्यक्तिगत विशेषता देखनी हो तो उसकी वाणी, भाषा, सज्जा, शिल्प, कला आदि की गणना हो सकती है। इन्द्रिय लिप्सा की प्रबलता उसे और कुछ प्रपंच रचने, सरंजाम जुटाने को बाधित करती रहती है। इसके अतिरिक्त मूर्धन्य समझे जाने वाले मनुष्य का भी क्या विवेचन विश्लेषण किया जाय? औरों की तरह वह भी खाता, सोता और सांसें पूरी करके मौत के मुँह में चला जाता है। सामान्यता मनुष्य की व्याख्या और क्या की जाय? उसकी विशेषता और क्या बताई जाय? इंद्रियगम्य उसका प्रत्यक्ष रूप इतना ही तो है। अनय प्राणियों की तुलना में मनुष्य की प्रत्यक्ष विशेषता इतनी ही आँकी जा सकती है कि उसकी चतुरता एवं संपन्नता की दृष्टि से कुछ अधिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।

मनुष्य नहीं परोक्ष है। वह चतुरता और संपन्नता से बहुत आगे की वस्तु है। मानवी परोक्ष को अध्यात्म करते हैं। यह वह उद्गम स्त्रोत है जहाँ से उसे सर्वतोमुखी प्रगति के लिए आधारभूत सामर्थ्य उपलब्ध होती है। यह वह उद्गम स्त्रोत है जहाँ से उसे सर्वतोमुखी प्रगति के लिए आधारभूत सामर्थ्य उपलब्ध होती है। असली व्यक्तित्व, हाड़-माँस की टोकरी में नहीं है वरन् उस लचीली तिजोरी में भरा हुआ बहुमूल्य रत्न भंडार है। इतना बहुमूल्य जिसकी तुलना में इस वसुधा पर बिखरी हुई समूची सम्पदा वसुधा पर बिखरी हुई समूची सम्पदा भी कम पड़ती है। यदि मानवी बुद्धिमत्ता प्रकाश में न आई होती तो इस धरती वह यह स्वरूप ही न निखरता और उसकी रहस्यमयी क्षमता अविज्ञात के पर्दे में ही छिपी पड़ी रहती जैसे कि अन्य ग्रहों में उपेक्षित जैसे कि अन्य ग्रहों में उपेक्षित पड़ी हुई है। सृष्टि में क्या है-क्या नहीं, इस असीम, अनन्त और अचिन्त्य को कौन जाने? जो प्रकाश में, उपयोग में आया वही तो सब कुछ बना और गौरवान्वित हुआ। इस दृष्टि से न केवल प्रकृति वैभव का वरन् परब्रह्म तक का सृजेता न सही उद्घाटन कर्त्ता तो मनुष्य ही ठहरता है। कोयले के समतुल्य किसी खंदक में पड़े हीरे का अपना महत्व कुछ भी क्यों न हो, श्रेय तो उस जौहरी को ही मिलेगा, जिसने उसे ढूंढ़ निकालने से लेकर खरीदने और आभूषण का रूप देने की कला दिखाई। इस प्रकार सृष्टि का-स्रष्टा का उद्घाटन कर्त्ता होने का श्रेयाधिकारी यदि मनुष्य को ठहराता जाय तो इसे अतिरंजित नहीं कहा जाना चाहिए।

पदार्थ शक्ति की सम्भावनाओं का अनुमान लगाते-लगाते वैज्ञानिक पसीने-पसीने हो जाते हैं। दूसरे पक्ष चेतन की प्रत्येक तरंग का मूल्याँकन किया जा सके तो उसकी भूतकालीन उपलब्धियों और भावी सम्भावनाओं को देखते हुए चेतना क्षेत्र को सूक्ष्मदर्शियों को और भी अधिक आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है मनुष्य जो न्यूनाधिक मात्रा में अपने तथाकथित वानर पूर्वजों से कुछ ही बात में विशिष्ट प्रतीत होता है, जिन विभूतियों वानर पूर्वजों से कुछ ही बात में विशिष्ट प्रतीत होता है, जिन विभूतियों से भरा-पूरा है, वे उसके कार्य संरचना एवं मस्तिष्कीय विशेषता तक सीमित नहीं हैं, वरन् अन्तराल की गहन परतों में छिपी पड़ी हैं। व्यक्तित्व की परिभाषा शोभा, सज्जा, सम्पदा एवं चतुरता के रूप में नहीं हो सकती। इनके सहारे तो वह मात्र सुविधा-सामग्री एवं इंद्रियजन्य प्रसन्नता ही प्राप्त कर सकता है जिस आधार पर वह महान् बनता है वे तत्व तो उसके अंतःकरण की गहन गुफा में प्रसुप्त जैसी ही पड़ी होती हैं।

महर्षि व्यास का कथन है- “मैं एक अद्भुत रहस्य का उद्घाटन करता हूँ कि इस विश्व में मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं।” इस रहस्य को प्रकट करते हुए वे यह बनाता चाहते थे कि चेतना का उच्चस्तरीय प्रतिनिधित्व करने वाली क्षमता मनुष्य के अन्तराल में छिपी पड़ी है। उसे समझने, उभारने और प्रयोग में लाने की विद्या का नाम अध्यात्म है। प्रकृतिगत अणुसत्ता और तरंग सत्ता की खोज एवं उपलब्धि को विज्ञान कहते हैं और चेतना की भावनात्मक विभूतियों के रहस्योद्घाटन एवं उपार्जन उपयोग को अध्यात्म।

विज्ञान के स्वरूप एवं प्रयोग क्रमबद्ध होने से उसकी महत्ता सर्वसाधारण के सम्मुख है, किन्तु अध्यात्म की सुनियोजित न किये जाने के कारण वह अनपढ़, अस्त-व्यस्त स्थिति में पड़ा रहा। उपयोगी सिद्ध होने के स्थान पर विकृत स्थिति में पहुँच जाने के कारण अवास्तविक, उपहासास्पद एवं दयनीय भी बन गया। आज उसकी वही दुर्गति है इतने पर भी तथ्य अपने स्थान पर जहाँ के तहाँ ही रंगे जैसे कि बदली छा जाने से सूर्य और चन्द्रमा ढक जाते हैं फिर भी प्रखरता के कारण उनका अस्तित्व यथावत् बना रहता है और बदली हटते ही वे पूर्ववत् फिर चमकने लगते हैं। विज्ञान की तरह अध्यात्म भी एक तथ्य है। विज्ञान ने प्रकृतिगत सम्पदा और समर्थता को मनुष्य के हाथ में सौंपा। अध्यात्म में वह क्षमता विद्यमान है कि चेतना के परोक्ष स्वरूप को प्रकाश में लाये और उसके वर्चस्व से शोधकर्त्ता साधक को समर्थ बनाये। साथ ही उसकी विशिष्टता से समूचा लाभ भी उठाए।

मनुष्य समुदाय की शरीर संरचना में कोई बड़ा अन्तर नहीं। कुछ अपंग अपवादों को छोड़कर मनःसंस्थान भी एक जैसा है। साधनों में न्यूनाधिकता हो सकती है, पर परिस्थितियाँ सभी के लिए एक जैसी हैं। इतने पर भी किसी को पतित- पराजित, दीन-दुर्बल, दुखी-दरिद्र देखा जाता है, कोई चैन के दिन गुजारते हैं, किन्तु किन्हीं-किन्हीं की वरिष्ठता ऐसी होती है कि उसके सहारे वे न केवल प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचते हैं- न केवल असाधारण पर पहुँचते हैं- न केवल असाधारण सफलताएं पाते हैं- वरन् अपनी प्रतिभा-प्रखरता से असंख्यों का मार्गदर्शन करते हैं-अपने क्षेत्र एवं समय के वातावरण को प्रभावित परिवर्तित करने की भूमिका निभाते हैं। इन तीनों प्रकार के मनुष्यों में क्या अन्तर है, इसकी गहराई में उतर कर जाँच-पड़ताल करने पर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचता पड़ता है कि साधन, सहयोग, परिस्थिति इन भिन्नताओं में कारण या बाधक उतने नहीं रहे हैं जितने कि इन वर्गों की अपनी-अपनी मनःस्थिति। यही है वह उद्गम केन्द्र जो अन्तराल में सन्निहित रहने पर भी बाह्य जगत की परिस्थितियों को प्रभावित करता है ओर उपयुक्त सहयोगी तथा साधन अपने चुंबकत्व के सहारे खींच बुलाता है । यही है उत्थान-पतन का रहस्य।

वस्तु का स्वरूप देखने से ही काम चलाना, उसकी विशेषताओं को समझना, उभारना एवं प्रयोग में लाना भी आवश्यक होता है। चेतना वस्तु नहीं शक्ति है। इसलिए उसके रहस्यों को जानने तथा प्रयोग करने में और भी अधिक सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। ईंट-पत्थरों को इधर से उधर हटाया, पटका जा सकता है, किन्तु आग या बिजली की उलट-पलट करने में अधिक जानकारी तथा सतर्कता की आवश्यकता होती है। पदार्थ को अनुपयुक्त रीति में प्रयोग करने में जितनी हानि है, उससे कहीं अधिक बिजली जैसी शक्तियों के सम्बन्ध में अनजान या प्रमादग्रस्त रहने से होती है। मनुष्य के पास उसकी चेतना का अस्तित्व ही सर्वोपरि सम्पदा हैं। यह ईश्वर का प्रतिनिधित्व करती हुई काय- कलेवर में विद्यमान है। इस वैभव के सम्बन्ध में अभीष्ट जानकारी एवं प्रयोग-प्रक्रिया से मनुष्य को अवगत होना ही चाहिए। इसी को ब्रह्म विद्या-अध्यात्म विद्या आदि के रूप में तत्वदर्शियों ने विवेचन, निरूपण, निर्धारण किया है। इससे अनजान रहना या विकृत मान्यताएँ अपनाये रहना या विकृत मान्यताएँ अपनाये रहना प्रत्येक सचेतन के लिए उतना ही हानिकारक है जितना कि कपड़े में आग छिपाये फिरना या अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारना।

शस्त्र, पेट्रोल, बारूद, बिजली आदि शक्तिशाली पदार्थों का प्रयोग करने एवं सुरक्षा रखने में हर कोई समुचित ध्यान रखता है चेतना महा-शक्ति है। वह अपने अन्तराल में विद्यमान हैं। हर स्तर के शाप वरदान देने की सामर्थ्य उसमें विद्यमान है। देवता अपमानित, असंतुष्ट होने पर शाप देते, अनिष्ट करते हैं। प्रसन्न होने पर वरदान देते ऋद्धि-सिद्धियां बरसाते और निहाल कर देते हैं।

चेतना को ही आत्मदेव कहते हैं। जीवनचर्या के साथ यह उसी हैं। जीवनचर्या के साथ यह उसकी प्रकार गुँथी है जिस प्रकार कि जीवकोषों, अंग-अवयवों एवं श्रस् धातुओं के साथ रक्त-माँस की गतिविधियों में चेतना की शक्ति ही करती है। प्राण निकल जाने काया निश्चेष्ट हो जाती है और देखते-देखते सड़ने लगती है। ठीक इसी प्रकार जीवन की अंतरंग एवं बहिरंग की गतिविधियों पर चेतना का प्रभाव रहता है। चिन्तन एवं चरित्र के रूप में उसी का अनुशासन चलता है। कहना न होगा कि अन्तराल की गहन गुफा में विद्यमान यह सचेतन किन्तु अदृश्य व्यक्ति ही मनुष्य के भाग्य का निर्माण करता है। तिरस्कृत, विकृत, अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित किये जाने पर उसी के शाप उभरते हैं और मनुष्य को दुःखी दरिद्र, पतित, पराजित बनाकर दयनीय स्थिति में पटक देते हैं। उसी सत्ता को सम्मानित, सुसंस्कृत, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाने पर विभूतियाँ अन्तराल से उभरती है, उन्हीं के सम्बन्ध में यह समझा जाता है कि वे किसी अदृश्य लोक से, दैवी शक्ति द्वारा सौभाग्य या वरदान की तरह अनुग्रहपूर्वक दी गई हैं।

आत्म-साधना का नाम अध्यात्म है। चेतना को किस प्रकार मल आवरण, विक्षेपों से बचाया जाय? किस प्रकार उसे प्रगतिपथ पर अग्रसर होने का अवसर दिया जाय?

किस प्रकार उसे बलिष्ठ, प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय? इसी विद्या का नाम ‘अध्यात्म’ है। वह विज्ञान से कनिष्ठ नहीं वरिष्ठ है। विज्ञान ने मनुष्य को अगणित सुविधा-साधन दिये हैं। किन्तु यदि पदार्थों की ही तरह चेतना की भी शोध और साधना की जाय तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य जीवन में देवताओं जैसा अन्त प्राप्त न कर सके, कोई कारण नहीं कि वह सामान्य परिस्थितियों और सीमित साधनों के सहारे भी स्वर्गीय वातावरण में कोई रहने का आनन्द न ले सके।


मधुमक्खी और तितली (Kahani)

मधुमक्खी और तितली एक ही पेड़ पर रहती थीं। अक्सर वाटिका में फूलों के पास भी मिल जातीं। एक दूसरे की कुशल पूछतीं और अपने काम पर लग जातीं।

बरसाते आ गयी। लगातार झड़ी लगी थी। तितली उदास बैठी थी। मधुमक्खी ने पूछा, बहिन क्या बात है? ऐसे सुन्दर मौसम में उदासी कैसी?

तितली बोली मौसम की सुन्दरता से पेट की भूख अधिक प्रभावित कर रही है। कहीं भोजन लेने जा नहीं सकती, इसीलिए परेशान हूँ।

मधुमक्खी बोली-ऐसे समय के लिए कुछ बचत क्यों नहीं की? कल की बात न सोचने वाले यूँ ही परेशान होते हैं। ऐसा समझाकर मधुमक्खी ने अपने संचित कोश में से तितली की भी भूख शान्त की।


अराजकता मिटेगी आस्थाओं के परिष्कार से

फिर से आत्मचिन्तन करें कि हमारे पाँव किधर मुड़ चले हैं। लगता है हम राह भटक गए। लगता है हम यह भटक गए। शायद यही कारण है कि इन्सानी पुरुषार्थ अपराधों के चक्रव्यूह में जा फँसा है। डाँवाडोल आस्थाएँ, भ्रमित मान्यताएं उसे दिशा न दे सकीं। इसी वजह से उसे दिशा न दे सकीं। इसी वजह से साधन जुटाने के चक्कर में साध्य भुला दिया गया। इस भूलभुलैया ने ही निरंकुश भोगवाद को जन्म दिया। निरंकुश भोगवाद को जन्म दिया। फलतः “ऋणंकृत्वा घृतं पिवेत” की चार्वाकी प्रवृत्ति अब ऋण लेकर घी बरबाद करने में भरोसा रखने लगी है।

रोज-मर्रा से समाचार पत्रों का दो-तिहाई हिस्सा अपराधों की दास्तान से रँगा रहता है। मनोवैज्ञानिक परेशान हैं, समाजशास्त्री हताशा। विदेशी शासन की तकरीबन 80 वर्षीय अवधि में कानूनों की कुल संख्या 400 थी। अब प्रजातन्त्रीय शासन की 40 वर्षीय अवधि में इनकी संख्या बढ़कर 5000 हो गई है। 1959 से 1991 तक के 40 सालों में जनसंख्या 135ण्3 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि अपराधों में 158ण्3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। इसी तरह सन् 1986 से 1991 तक जनसंख्या वृद्धि 19.6 प्रतिशत हुई, जबकि अपराध 19.4 प्रतिशत बढ़े।

बढ़ते अपराधों के कारण दिल्ली भारत की राजधानी के साथ अपराधों की राजधानी बन गयी है। 1988 में यहाँ 350 हत्याएँ, 14 डकैतियाँ, 615 अपहरण, 162 बलात्कार, 615 अपहरण, 162 बलात्कार, 212 लूट, 1448 धोखाधड़ी एवं 364 गम्भीर अपराधों के मामले दर्ज हुए थे। वर्ष 1990 में आंकड़ों में और वृद्धि हुई, जिसमें 314 हत्याएँ, 21 डकैतियाँ, 657 अपहरण, 177 बलात्कार, 224 लूट, 1479 धोखाधड़ी व 501 गम्भीर हमलों के मामले दर्ज हुए। इसी तरह 1991 में हत्या के 496, डकैती के 33, अपहरण के 658, बलात्कार के 200, लूट के 274, धोखाधड़ी के 1479 तथा गम्भीर हमलों के 501 मामले दर्ज हुए। 1992 में हत्या के 524, डकैती के 48, अपहरण के 706, बलात्कार के 270, लूट के 348, धोखाधड़ी के 1507 तथा गम्भीर हमलों के 608 अपराध लिखित रूप में दर्ज किए गये। वास्तविक आँकड़े इनसे बहुत अधिक हैं, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की अपराध शाखा के अनुसार उपलब्ध आँकड़ों में 25, प्रतिशत और अधिक जोड़ देने पर ही शायद अपराधों की सही संख्या पायी जा सके।

पाश्चात्य चिन्तन शैली के अभ्यस्त कई समाजशास्त्रियों के अनुसार हत्याओं और अपराधों में यह बढ़ोत्तरी स्वाभाविक है, क्योंकि भारतीय समाज आज संक्रमण काल से गुजर रहा है और औद्योगिक क्रान्ति के दबाव से नए सामाजिक तनाव पैदा हो रहे हैं। आर्थिक दबाव यानि कि अपरिचय, इसके मुख्य कारण बताए जाते हैं। सामाजिक जागरुकता की वृद्धि गरीबों में धनिकों के प्रति क्षोभ उत्पन्न करती है तथा शहर में एक-दूसरे के कुल-शील, ठौर-ठिकाने का अता पता न होने से अपराध कर गुलाम हो जाना आसान हो जाता है। ऐसा इन समाजशास्त्रियों द्वारा विश्लेषित किया जाता है।

पर बात कुछ और ही है। यदि विपन्नता और संपन्नता की भीषण विषमता से उत्पन्न तनाव अपराधों का मुख्य कारण रहा होता ता संपन्न देशों में स्थिति कुछ और होती। जबकि एक सर्वेक्षण के अनुसार अर्जेन्टीना में प्रति एक लाख व्यक्ति पर 706, जापान में 1418, स्वीडन में 5116, ब्रिटेन में 5108 तथा संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 5128 अपराधों का औसत है। भारत का औसत बड़े तथा विकसित, विकासशील देशों की अपेक्षा बहुत कम है। भारत में प्रति एक लाख 3.2 हत्या, अर्जेन्टीना में 4.1 तथा अमेरिका में 10.2 का औसत है। बलात्कार के मामले में भारत में 2 तथा पाकिस्तान में 5.4 का औसत है। राहजनी में प्रति एक लाख व्यक्ति पर कनाडा में 10.2, अर्जेन्टीना में 1040 तथा भारत में 1 है। चोरी के मामले में भारत में 23, अर्जेन्टीना में 218, जापान में 199, स्वीडन में 6212, ब्रिटेन में 4151, तथा अमेरिका में 5265 का औसत है।

स्पष्ट है अपराधों की जड़ साधनों की प्रचुरता या अभाव अथवा अवसरों की उपलब्धि से सम्बन्धित नहीं है। यदि गुमनामी या अपरिचय की सुविधा वृत्ति का उभारने वाली हुआ करती, तो तीर्थयात्री भी अपरिचित स्थानों पर जाकर भीड़-भक्कड़ में अपराध किया करते। जबकि वे लोग अधिक ही उत्कृष्ट आचरण का प्रयास करते हैं। वस्तुतः मूल कारण मानवीय चिन्तन से सम्बन्धित है। सामाजिक परिवेश अपराधों के लिए उत्तरदायी तो है किन्तु सामाजिक परिवेश का अर्थ समाज का भौतिक ढाँचा या समाज में साधनों -उपकरणों का औसत नहीं है। बल्कि समाज में किन गुणों, मूल्यों और आदर्शों की प्रतिष्ठा है, इससे सामाजिक परिवेश बनाया है।

इसमें लगातार होती जा रही गिरावट ही वह कारण है। जिसकी वजह से भारत में सन् 1951 में एक लाख की जनसंख्या में अपराधों की कुल संख्या 179.9 थी, जा 1990 में बढ़कर 195.2 तक पहुँच गयी। 1976 से 1990 के बीच कुछ राज्यों में अपराधों की वृद्धि इस प्रकार रही- आन्ध्र प्रदेश में 5.8 से 6.4 प्रतिशत, बिहार में 7.5 से 7.8 प्रतिशत, गुजरात में 5.1 से 6.7 प्रतिशत, हरियाणा में 1.6 से 1.8 प्रतिशत, कर्नाटक में 5.8 से 6.2 प्रतिशत, केरल में 3.8 से 4.2 प्रतिशत, मध्य-प्रदेश में 12 से 13.1 प्रतिशत व राजस्थान में यह प्रतिशत 5.8 से 6.4 से 6.4 तक बढ़ा।

सन् 1976 से देश के विभिन्न जिलों, शहरों में भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत अपराधों में भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत अपराधों का असर भी बढ़ा है। सन् 1986 में केवल 51 जिलों-शहरों में 5,000 विचार करने योग्य अपराध घटे थे। सन् 1989 एवं 1990 में ऐसे जिले-शहरों की कुल संख्या बढ़कर 73 व 89 हो गयी। इसी प्रकार सन् 1986 में 10.,000 से अधिक अपराध होने वाले शहरों की कुल संख्या 1 थी, जो 1990 में बढ़कर 14 हो गयी। भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत अपराधों में गम्भीर अपराध भी बढ़े हैं। सन् 1953 में जहाँ इनकी संख्या 49,578 थी वहीं 1990 में बढ़कर यह 2,34,338 तक जा पहुँची। 1988 से 1990 के तीन वर्षों में केवल हत्याओं में 21.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी प्रकार रही-डकैती 29.2 प्रतिशत, लूट 17.7 प्रतिशत चोरी एवं धमका फूलता कर भागा ले जाना 17.9 प्रतिशत बलात्कार 10.6 प्रतिशत, उपद्रव 9 8.7 प्रतिशत और हत्या के प्रयासों में यह प्रतिशत में यह प्रतिशत 31 रहा।

ठीक भी है, जब तक सामाजिक परिवेश मानसिक उद्वेगों को बढ़ाने वाला रहेगा, समाज में उद्धत आचरण और अपराध कर्म बढ़ते रहेंगे। वातावरण में ही व्यक्तियों का अंतरंग-बहिरंग ढाँचा बदलने की क्षमता होती है। यदि वर्तमान ढाँचे अस्वस्थ, असुन्दर और अशिव रूपों का निर्माण, असुन्दर और अशिव रूपों का निर्माण करने वाले प्रतीत होते हैं, तो उनका स्वरूप परिवर्तित करने की ही आवश्यकता है। ऐसा न हो सकने की स्थिति में पुरुष ही नहीं महिलाएँ भी अपराध की शिकार होती रहेंगी। शायद यही कारण है कि अपराधों में बढ़ोत्तरी के सिलसिले में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में सन् 1977 से 1990 के बीच तीन वर्षों में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सन् 1988 में इन अपराधों की संख्या 53.933 थीं जो सन् 1990 में बढ़कर 58,933 थीं जो सन् 1990 में बढ़कर 48,164 तक जा पहुँची। सबसे अधिक बढ़ोत्तरी बलात्कार सम्बन्धी मामलों में हुई जो 10.6 प्रतिशत रही। सन् 1977 में इन अपराधों की संख्या 1099 थी। जो 1990 में-10,068 हो गयी । इसी तरह महिलाओं को सताने सम्बन्धी अपराधों में भी 13.2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। सन् 1988 में इन अपराधों की कुल संख्या 17,836 थी, जो भी सन् 1989 व 1990 में बढ़कर क्रमशः 12,497 और 20,194 हो गयी अर्थात् प्रति वर्ष 34.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी।

महिलाओं के विरुद्ध अत्यन्त आधुनिक अपराध दहेज के कारण काफी भारी संख्या में हत्याएँ हुई हैं। सन् 1980 और 1990 के बीच इनमें 197.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सन् 1980 औसतन प्रतिवर्ष 66 प्रतिशत । इन अपराधों के 68.3 प्रतिशत। इन अपराधों में भी केवल पाँच राज्यों में कुल अपराधों में भी कुछ अपराधों में भी केवल पाँच राज्यों में कुल अपराधों के 68.3 प्रतिशत घटे हैं। ये राज्य है -मध्य प्रदेश 19.9 प्रतिशत उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश 8.1 प्रतिशत, राजस्थान 7.6 प्रतिशत और दिल्ली 6.6 प्रतिशत, शेष बाकी राज्यों एवं केन्द्रीय शासित क्षेत्रों में केवल 31.7 प्रतिशत, अपराध हुए हैं।

अपराधों की यह भरमार, वह भी स्वयं को समझदार, सर्वज्ञ समझने वाले मनुष्य के द्वारा, देख-सुनकर आश्चर्य होता है, छोटी श्रेणी के पशु मात्र शरीर स्वार्थ की पूर्ति के लिए हत्याएँ करते हैं। किन्तु मनुष्य तो ऐसी भी हत्याएँ और अपराध करते देखे जाते हैं, जिनसे न तो उनके शरीर को कोई लाभ पहुँचता है न ही मन को। यह चिन्तन और भावनाओं की विकृति नहीं तो और क्या है?

अपराधी प्रवृत्ति भय, आशंका, अविश्वास, घृणा और लोभ की अधिकता से बढ़ती है। इन पर रोक लगाने का काम अन्तःकरण की वे आस्थाएँ ही कर सकती हैं, जिन्हें आस्तिकता, धार्मिकता, आध्यात्मिकता, सदाशयता, सद्भावनाशील, संस्कार संपन्नता के रूप में जाना जाता है। सरकारी रोकथाम से बात अधिक बनती नहीं।

सरकारी रोकथाम के आधार हैं कानून और औजार है पुलिस। विकृत वातावरण में ये दोनों ही उस पूर्ति में विफल , अक्षम सिद्ध हो जाते हैं। यह शिकायत आए दिन आती है कि पुलिस प्रशासन में ईमानदार, निष्ठावान लोगों की कमी है। परन्तु सोचने की बात यह है कि पुलिस के लोग और जनता एक ही ढाँचे की उत्पत्ति हैं। पुलिस मैन, अपराधी तथा पीड़ित तीनों ही साथ-साथ गाँव की धूल भरी पगडंडियों में, हरे-भरे खेत-खलिहानों के बीच बाढ़ और सूखे की मार सहते हुए बढ़ और सूखे की मार सहते हुए बढ़ते हैं या फिर कस्बों शहरों के मुहल्लों में साथ-साथ खेलते-कूदते बड़े होते हैं। यदि उस वातावरण में ही करुणा-संवेदना, तत्व पर्याप्त मात्रा में रहें, तो अपराध की प्रवृत्तियाँ कभी भी बढ़ नहीं सकती।

जहाँ तक कानूनों की बात है हर बुरे काम के खिलाफ कानून है। अपराधियों के लिए जेल-पुलिस, न्यायालय की पूरी गुप्तचरों का सरकारी तन्त्र है। परन्तु अपराध दिन दहाड़े जारी है। और बढ़ रहे है। पचास प्रतिशत अपराध तो अंकित ही नहीं होते। जो दर्ज कराए जाते हैं। उनमें भी दस प्रतिशत पकड़ में नहीं आते। जितने लोग पकड़े जाते हैं उनमें भी तीन-चौथाई तिकड़म, तरकीब, धन, आतंक, प्रभाव-दबाव से छूट जाते हैं। दण्ड-प्रक्रिया दुरूह है ही। एक साधनहीन को न्याय पाना कठिन हो जाता है। निःसन्देह पुलिस, न्यायालय, कारागार सभी की अत्यधिक आवश्यकता है। किन्तु अपराधों की रोकथाम इतने भर से नहीं हो सकती।

ये प्रतिबन्धात्मक कार्यवाहियाँ तो अनीति-अत्याचार की वृद्धि पर कुछ सीमा तक लगा सकती हैं। मुख्य आवश्यक उन दुष्प्रवृत्तियों की प्रेरणा। के आधारों को समाप्त करने की है, जो इन अपराधों तथा न्याय व्यवस्था में होने वाली चालाकियों के लिए उत्तरदायी है। जब तक अधिसंख्य जनता का मन दुष्प्रवृत्तियों को पकड़े रहेगा, तक अपराध की बाढ़ सामाजिक बन्धनों, मर्यादाओं को इसी तरह तोड़ती रहेगी।

जन सामान्य अपराधियों और पुलिस को कोसकर अपने को कर्त्तव्य मुक्त तथा सज्जन मान बैठते हैं। इस भयानक भ्रान्ति का कारण भी चिन्तन की विकृति ही है। मौन दर्शक बना रहकर वह उसमें सहभागी हो रहा है, बात उसे समझ में ही नहीं आती। आए दिन सड़क से युवतियों, महिलाओं का दिन-दहाड़े मार-पीट, खून-खराबा मचाया जाता है और हजारों की भीड़ सहमी-सिमटी सकपकाती रहती है। यह सब अन्तः क्षेत्र में घुसी कायरता के अतिरिक्त और क्या है?

कायरता और आक्रमण जुड़वा बहिनें है। भीतर से कायर व्यक्ति ही कमजोरों के प्रति आक्रमण होता है। इसी प्रकार स्वार्थान्धता और निष्ठुरता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। स्वार्थान्ध व्यक्ति करुणाहीन होता है। तथा जिसे नीति में निष्ठा नहीं है, वह अपराधी होगा ही।

वस्तुतः अपराधों का क्रम न्याय संहिता की परिधि की पहुँच से बहुत पहले प्रारंभ होता है। जिन कार्यों के लिए दण्ड संहिता में कोई व्यवस्थाएँ नहीं हैं, वे ही अपराधों के उद्गम केन्द्र है। आलस्य, प्रमाद, असंयम, अशिष्टता, उद्धत, आचरण, द्वेष, दुर्भाव, कुदृष्टि, कुभाव, कटुभाषण, अस्त-व्यस्तता, नशा-पानी अनुशासनहीनता जैसी अवाँछनीयताएँ सरकारी अंकुश से भले मुक्त है। पर वस्तुतः अपराधों की कारणभूत उत्तेजनाएँ इन्हीं से फैलती हैं।

यही अवाँछनीयताएँ आगे बढ़कर विध्वंसक अपराधों-विभीषिकाओं का रूप ले लेती है। नैतिक और नागरिक मर्यादाओं का निरन्तर उल्लंघन तथा मानवीय संवेदनशीलता का नितान्त अभाव ही अपराधों का वास्तविक आधार और प्रेरणा केन्द्र है। क्योंकि ये ही आदमी को धीरे-धीरे खोखला ही और संकीर्ण बनाती है जिसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति अपराध करने और सहने के रूप में सामने आती है। जिन्हें स्तरहीनता, परपीड़न और मर्यादाहीनता में कोई संकोच नहीं होता, वे अनास्थावादी लोग ही अपराधी बनते, गुण्डागर्दी अपनाते, आतंक बनते, गुण्डागर्दी अपनाते, आतंक उत्पन्न करते तथा चोरी-ठगी पर उतारू रहते हैं। यही अभ्यास उन्हें हत्या, बलात्कार जैसे नृशंस क्रूर कर्म करने में भी निर्लज्ज बनाए रहता है।

अतः अपराधों की बाढ़ से बचने के लिए अनैतिकता के आरंभिक विकास पर दृष्टि डालनी होगी और उसे रोकने की व्यवस्था करनी पड़ेगी। भोग की निरंकुश भूख और मन की मनमानी उछल-कूद को ही जिस समाज में स्वाभाविक मान लिया गया, वहाँ हिंसा, क्रूरता तथा अपराध अवश्यम्भावी है।

अतः आवश्यकता आस्थाओं के परिष्कार की, अन्तःकरण के उत्कर्ष की है। अन्तःकरण को सुसंस्कारित बनाने, अध्यात्म की प्राण-प्रतिष्ठा। समझाने की है। कहने वाले प्रायः कहते हैं। कि अध्यात्म से क्या होगा? उससे धन तो मिल नहीं जाएगा? उससे धन तो मिल नहीं जाएगा। उन्हें स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि अध्यात्म से धन नहीं, मासिक वर्चस, आत्मशान्ति, आत्मसन्तोष वास्तविक आनन्द मिलेगा, जो धन से भी अधिक महत्वपूर्ण तो है ही, साथ ही धन के संरक्षण-सदुपयोग के लिए भी आवश्यक है। अराजकता, असामाजिकता की चपेट से धन भी बचा नहीं रह पाता। सुख-शान्ति तो भला उस स्थिति में कभी मिलती ही नहीं।

मनुष्य मूलतः अपराधी अविश्वास असहयोगी और असंवेदनशील नहीं होता। इसके विपरीत मनुष्य स्वभाव में संवेदना-सहकारिता, स्थिति में अपराधों की वृद्धि का कारण विकृत चिन्तन और दूषित दृष्टिकोण के अतिरिक्त और दूषित दृष्टिकोण के अतिरिक्त और क्या है? स्पष्ट है कि मनुष्य को सुसंस्कृत बनाते की ओर यदि ध्यान नहीं दिया गया तो आज की दुःस्थिति बदलने की नहीं।

भोगवादी दृष्टिकोण वाले समाज नाच-गाने, कामोत्तेजना और सस्ते मनोरंजन तक सिमटकर रह गया है। शायद यही कारण है कि भारतीय अपराध घड़ी के अनुसार अकेले वर्ष 1990 में भारतीय समाज में भारतीय दण्ड संहिता एवं स्थानीय एवं विशेष अधिनियम के अंतर्गत प्रत्येक 6.35 सेकेंड में एक अपराध हुआ है। अन्य अपराधों की दर कुछ इस तरह रही है- सम्पत्ति सम्बन्धी अपराध- दो मिनट में एक, लूटमार पाँच मिनट में एक, डकैती 14 मिनट में एक और हत्या की दर 15 मिनट में एक रही है इसको रोकने के लिए हमें साँस्कृतिक गतिविधि वही है जो व्यक्ति को साँस्कृतिक चेतना से संपन्न सुसंस्कारित बनाए। उसमें सिद्धांतों विचारों की समझ पैदा करे जब तक व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया जायेगा, तब तक समाज में पशु प्रवृत्तियों का प्राधान्य भी बना ही रहेगा।

अच्छा यही है कि अपराधियों को दण्ड देने और अपराधों की धड़ पकड़ पर जितना ध्यान दिया और खर्च किया जाता है, साँस्कृतिक चेतना के प्रसार हेतु उससे कहीं अधिक श्रम एवं शक्ति खर्च की जाए। इसे ही आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण प्रसार कहा जाता है। जब तक मनुष्यता आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित नहीं होगी, आचरण की महत्ता व्यक्ति के अंतःकरण में अंकित नहीं होगी और अपराधों के चक्रव्यूह को तोड़ पाना सम्भव नहीं हो सकेगा।


रोइये अथवा हंसिये पर तनाव को निकाल फेंकिये

जीवन की सरसता इस बात पर अवलम्बित है कि सहजता ओर स्वाभाविकता को सदा अपनाये रहा जाय। विचारों एवं भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर यथासम्भव मिलता चले। उन्हें इस ढंग से पोषण मिलता रहे जिससे उनकी क्षमता सत्प्रयोजनों में नियोजित हो सके। मनःशास्त्री मानवी विकास प्रक्रिया में उपरोक्त सत्य को असाधारण महत्व देते हुए कहने लग हैं कि मनुष्य देते हुए कहने लगे हैं कि मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन की बढ़ती समस्याओं का एक सबसे प्रमुख कारण है- उसका ‘रिजर्व नेचर’। मानवी स्वभाव में यह विकृति तेजी से बढ़ रही है। यही कारण है कि संसार में मनोरोगियों का बाहुल्य होता जा रहा है तथा कितने ही प्रकार के नये रोग पनप रहे हैं।

नदियों के पानी को बाँधकर रोक दिया जाय तो वह महाविप्लव खड़ा करेगा। रास्ता न पाने से फूट-फूट कर निकलेगा तथा अपने समीपवर्ती क्षेत्र को ले डूबेगा। भावनाओं को दबा दिया जाय तो वे मानवी व्यक्तित्व में एक अदृश्य कुहराम खड़ा करेंगे, जो नेत्रों को दिखाई तो नहीं पड़ता पर मानसिक असन्तुलन के रूप में उसकी प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं। अपना आपा खण्डित होता प्रतीत होता है। दिशा दे देने पर नदियों के पानी से विभिन्न कार्य किए जाते हैं। बिजली उत्पादन से लेकर सिंचाई आदि का प्रयोजन पूरा होता है। भावों एवं विचारों को दिशा दी जा सके तो उनसे अनेकों प्रकार के रचनात्मक कार्य हो सकते हैं। कला, साहित्य, कविता, विज्ञान के आविष्कार इन्हीं के गर्भ में पकते तथा प्रकट होते हैं।

भावनाओं एवं विचारों में से कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी अभिव्यक्ति हानिकारक है। पर उन्हें दबाने से तनाव की स्थिति आती है। उससे बचाव का तरीका यह है कि भावनाओं को दूसरे रूप में अभिव्यक्त होने दिया जाय। मनोविज्ञान ने इस संदर्भ में नये निष्कर्ष निकाले हैं। न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में डॉ0 फ्रैंक ने यह उत्सर्जन प्रक्रिया है। श्वसन, मल निष्कासन, स्वेदन की भाँति इस एक्सोक्राइन प्रक्रिया में भी शरीर के कितने ही टॉक्सिक पदार्थ बाहर निकलते हैं। तनाव एवं दबाव जैसे मानसिक कारणों से शरीर में उत्पन्न होने वाले विषाक्त रासायनिक पदार्थों को रोने से बाहर निकलने का अवसर मिलता है।

डॉक्टर फ्रैंक लम्बे समय से साइकोजेनिक अश्रुपात के ऊपर शोध कार्य कर रहे हैं। वर्षों पूर्व उनके मन में विचार उठा कि मनुष्य आखिर रोता क्यों है? इससे प्रेरित होकर उन्होंने कई वर्षों तक खोजबीन की वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आँसू तनाव मुक्ति में सर्वाधिक सहायक है।

डॉ0 फ्रैंक लम्बे समय से साइकोजेनिक अश्रुपात के ऊपर शोध कार्य कर रहे हैं। वर्षों पूर्व उनके मन में विचार उठा कि मनुष्य आखिर रोता क्यों है? इससे प्रेरित होकर उन्होंने कई वर्षों तक खोजबीन की वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आँसू तनाव मुक्ति में सर्वाधिक सहायक है।

डॉ0 फ्रैंक एक बायोकोमिस्ट है। तथा मेनिसोटा स्थित सेंट पाल रिसर्च मेडिकल सेंटर के साइकियाट्री रिसर्च लैबोरेटरी के डाइरेक्टर है। उनका कहना है कि भावोद्वेग को अधिकाँश व्यक्ति दबा देते हैं। कुण्ठा, अवसाद, द्वन्द्व जैसे मानसिक व्यतिरेक इसी कारण पैदा होते हैं। आवेश की स्थिति में जो विषाक्त रसायन पैदा स्थिति में जो मानसिक व्यतिरेक इसी कारण पैदा होते हैं। आवेश की स्थिति में जो विषाक्त रसायन पैदा होते हैं, उनको यदि दिया जाय, तो किसी प्रकार के मानसिक असन्तुलन के उत्पन्न होने का खतरा नहीं रहता।

मक्विटे यूनिवर्सिटी कॉलेज आफ नर्सिंग के डॉक्टरों ने मानसिक तनाव से पीड़ित 100 व्यक्तियों का अध्ययन किया। उनमें से 50 पेष्टिक अल्सर के रोगी थे तथा पचास अल्सरेटिव कोलाइटिस के। तुलनात्मक अध्ययन के लिए उन्होंने पचास अन्य स्वस्थ व्यक्तियों को चूना, जो परिस्थितियों की दृष्टि से लगभग उन रोगियों की ही स्थिति में थे, अपने अध्ययन निष्कर्ष को उन्होंने अमरीकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के एक मीटिंग में प्रस्तुत करते हुए कहा- “रोगियों के पूर्व इतिहास से पता चला है कि उनकी बीमारियों के अधिकांश कारण मनोवैज्ञानिक है। अपनी बात किसी से व्यक्त करने तथा भीतर ही भीतर घुटते रहने के कारण ही उनकी अन्य शारीरिक क्रिया प्रणालियों में गड़बड़ी पैदा हुई, जिसने विभिन्न प्रकार के रोगों को जन्म दिया। स्वस्थ व्यक्तियों का पिछला जीवन वृत्तांत बताता है कि वे हर परिस्थितियों में तनावों एवं द्वंद्वों से मुक्त रहे। जब कभी भी प्रतिकूल अवसर आये, उसे सहज रूप से स्वीकार किया तथा उसके अनुरूप सामंजस्य स्थापित कर लिया।”

चिकित्सकों ने एक रोग की खोज की है-’फेसिलियल डिसटोनिया।’ यह एक बच्चे का वंशानुगत रोग है। जब बच्चे रोते का लक्षण यह है कि जब बच्चे रोते हैं तो उनके आँसू नहीं निकलते। यद्यपि इसके रोगी तो कम पाये जाते हैं पर है यह अत्यन्त खतरनाक रोग। शरीरशास्त्रियों तथा मनः शास्त्रियों का मत है कि जो बच्चे इस राग से ग्रसित होते हैं, उनका मानसिक विकास समुचित रूप से नहीं हो पाता। बड़े होने पर उनमें आक्रामक प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है। ऐसे बच्चों के अपराधी निकलने की सम्भावना अधिक रहती है। उनका भाव संस्थान अत्यन्त शुष्क पड़ जाता है। प्रायः यह धारण भी सर्वत्र प्रचलित है कि जन्मोपरान्त जो बच्चे रोते नहीं, उनके जीवित बचने की सम्भावना कम रहती है। जो बचने की सम्भावना कम रहती है। जो बचते भी हैं तो उनका भली-भाँति विकास नहीं होता।

एक नृतत्व विज्ञानी ने निष्कर्ष निकाला है कि नारियाँ उनके भावोद्वेग दबते नहीं, आँसुओं से बाहर निकल जाते हैं। यही कारण है कि वे पुरुषों से अधिक स्वस्थ तथा मानसिक दृष्टि से अधिक सन्तुलित होती हैं।

मिनिसोटा (अमेरिका) से प्रकाशित एक मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट में कहा गया है कि “महिलाएँ पुरुषों से पाँच गुनी अधिक रोती हैं, जिसके 40 प्रतिशत कारण निजी सम्बन्धी से उत्पन्न मन-मुटाव होते हैं, जबकि 27 प्रतिशत कारण सामाजिक होते हैं। भावातिरेक भी महिलाओं के रोने का एक प्रमुख मिलाकर प्रभाव अच्छा ही पड़ता है। “प्रायः देखा भी जाता है कि नारियाँ पुरुषों की अपेक्षा तनावग्रस्त कम रहती है। इसका कारण बताते हुए मनःशास्त्री कहते हैं कि वे अपनी भावनाओं को दबाने की अपेक्षा किसी न किसी रूप में की अपेक्षा किसी न किसी रूप में व्यक्त कर देती हैं।

विद्वान आर्डिस विटमैन लिखते हैं कि “सामान्य व्यक्ति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने से डरते हैं जबकि महान व्यक्ति कर देते हैं। जिन्दगी की तमाम विचित्रताओं और विषमताओं को वे इतने सहज ढंग से लेते हैं जैसे कुछ असामान्य बात ही न हुई हो। उनकी सरसता, प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता का यही रहस्य है।”

अभिव्यक्ति के अभाव में भावनाओं की संवेदनशीलता तथा लालित्य धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। आखिर इससे कैसे बचें तथा आये अवरोध की परख कैसे करें? चारक आर्डिस इस सम्बन्ध में कहते हैं कि अपना आपा स्वयं ही उसका परिचय दे देगा। जीवन की शुष्कता स्वयमेव प्रमाण है कि भावाभिव्यक्ति के मार्ग में कही चट्टान आ खड़ी हुई है, जो दिखाई तो नहीं पड़ती पर अवरोध रूप में अनुभव तो होती है। स्वयं के प्रति पूर्वाग्रह, अड़ियल स्वभाव तथा अहम् ही उस मार्ग से सबसे प्रमुख और सबसे बड़े अवरोध हैं। इन्हें हटाते ही अपने उद्गम स्त्रोत से भावनाओं के अमृत को निर्विरोध निस्सृत होने का अवसर मिल जाता है। गंगा में स्नान करने के बाद जैसी शीतलता एवं शान्ति मिलती है लगभग ऐसी ही मानसिक प्रफुल्लता भाव गंगा में अवगाहन करने से मन और अन्तः कारण को प्राप्त होती है।”

हैंबर्ग के मनोरोग विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि दूषित भावनाएँ हृदय रोग तथा कैंसर जैसे रागों का कारण बन सकती हैं। मनोरोग पर आयोजित एक सम्मेलन में 35 देशों के मनः चिकित्सा विशेषज्ञों ने भाग लिया तथा उपरोक्त तथ्य की पुष्टि की। प्रो0 एडोल अर्नेस्ट मेयर के अनुसार, “संसार में जितने व्यक्ति धूम्रपान तथा शराब के कारण हृदय रोग के रोगी बनते हैं, उससे भी अधिक दूषित भावनाओं के कारण होते हैं।”

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो0 क्लास वेन्सन का कहना है कि “कैंसर रोग को जन्म देने में भी मन की प्रमुख भूमिका हो सकती है। असन्तुलित, निरुत्साहित, कुँठित तथा जीवन से हारे हुए लोग दूसरे व्यक्तियों की तुलना में कैंसर की गिरफ्त में शीघ्र आ सकते हैं।”

बलात् शान्त रहने तथा मनोभावों को दबाये रखने की स्थिति मनोभावों को दबाये रखने की स्थिति में थकान आती है। यह थकान भी शारीरिक श्रम से आयी थकान भी शारीरिक श्रम से आयी थकान जैसी मालूम पड़ती है पर श्रम से आयी थकान की अपेक्षा स्वास्थ्य की दृष्टि से यह मानसिक थकान अधिक हानिकारक है। इस भावोद्वेग तथा मानसिक उत्तेजनाओं से बचने का सर्वोत्तम उपाय है-हँसना। यह एक ऐसा टॉनिक है जो मन की सभी गाँठें खोल देता है। खिलखिलाकर हँसने से सभी कुण्ठाएँ समाप्त हो जाती हैं।

ब्रिटिश चिकित्सा संस्थान के शोध विभाग की एक अध्ययन रिपोर्टानुसार “मनुष्य के स्वभाव तथा भावनाओं का सर्दी-जुकाम से गहरा सम्बन्ध है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मानसिक तनाव की स्थिति में शरीर में कार्टीसॉल नामक एक तत्व बनने लगता है, जो शरीर में मौजूद संक्रमण नामक तत्वों को कमजोर बनाता है। फलतः जीवनी शक्ति नष्ट बनाता है। फलतः जीवनी शक्ति नष्ट होने लगती है तथा बीमारियों की चढ़ दौड़ने का अवसर मिल जाता है।”

संस्थान के विशेषज्ञों का परामर्श है कि जो नजला, सर्दी जुकाम एवं दमे से बचना चाहते हैं वे तनाव से बचें। अपनी भावनाओं को दबाने का प्रयास न करें। अभिव्यक्ति के लिए या तो करें। अभिव्यक्ति के लिए या तो जी खोल कर रोयें। उनका मत है कि अंतर्मुखी स्वभाव के व्यक्ति सर्दी के रोगों से अधिक पीड़ित होते देखे गये हैं।

कुछ ऐसी प्रकृति के लोग भी होते हैं जो अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में सकुचाते हैं। किसी के सामने अपनी बात कही जाय, यह समस्या भी आड़े आती है। जीवन में कितनी गल्तियाँ होती है, जिसका पश्चात्ताप तो मनुष्य मन ही मन करता रहता पर किसी के समाने कह नहीं पाता।

भावावेश में किसी से कहना उचित नहीं। आदिकाल से ही परम्परा यह रही है कि समर्थ मार्गदर्शक के समक्ष मन की उन बातों को कह दिया जाय, जिन्हें दूसरों के समाने कहने में संकोच लगता है गल्तियों के परिशोधन, दुर्भावनाओं के परिष्कार तथा भावी निर्धारण के परिष्कार तथा भावी निर्धारण में समर्थ मार्गदर्शक के मार्गदर्शक का सम्बल मिल जाय तो व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास का मार्ग प्रशस्त होने लगता है। सर्वतोमुखी प्रगति के लिए वह अत्यावश्यक है कि भावाभिव्यक्ति जीवन जीने की रीति-नीति ही अपनानी चाहिए।


आत्मिक बलिष्ठता हेतु प्राणों को साधिए

आत्मपरिष्कार एवं आत्मविकास के लिए आत्म-बल अभिवर्द्धन की आवश्यकता पड़ती है। आत्मिक प्रगति इसी आधार पर सम्भव होती है। आत्मबल बढ़ाने के सम्भव होती है। आत्मबल बढ़ाने के लिए वैचारिक, भावनापरक और क्रियात्मक प्रखरता उत्पन्न करना आवश्यक है साथ ही इस प्रयोजन में असाधारण रूप से सहायता करने वाले प्राणायाम जैसे विशिष्ट क्रिया वाले प्राणायाम जैसे विशिष्ट क्रिया वाले प्राणायाम जैसे विशिष्ट क्रिया योगों की भी आवश्यकता रहती दुर्बलता निवारण के लिए आहर विहार की सुव्यवस्था तो होनी ही चाहिए, पर साथ ही चिकित्सा उपचार से साधन जुटाने से भी उस कार्य में सहायता मिलती है। प्राणायाम ऐसा ही विशेष उपचार है जिसके सहारे आत्मिक बलिष्ठता बढ़ने का पथ-प्रशस्त होता है। संध्या वन्दन के नित्यकर्म में उसका समावेश प्राणबल नित्यकर्म में उसका समावेश प्राणबल संवर्धन की आवश्यकता, उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए ही किया गया है।

प्राणायाम के दो उद्देश्य हैं, एक श्वास की गति का नियन्त्रण, दूसरा अखिल विश्व ब्रह्मांड में संव्याप्त प्राणचेतना को आकर्षित करके स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को उस अद्भुत शक्ति से ओत-प्रोत करना। प्राण प्रखरता बढ़ाने के साथ ही मनोनिग्रह में भी प्राणायाम से आशाजनक सहायता मिलती है। चंचल और उच्छृंखल मन निर्दिष्ट केन्द्र पर स्थिर होता दीखता इतना ही नहीं मनोविकारों के निराकरण का भी पथ प्रशस्त होता । साधना जगत में प्राणायाम की महत्ता एक स्वर से स्वीकार की गयी है। शारीरिक और मानसिक आरोग्य की दृष्टि से उसे अतीव उपयोगी बताया गया है।

श्वास की गति में तीव्रता रहने से जीवन का शक्तिकोष जल्दी चुक जाता है ओर दीर्घजीवन संभव नहीं जाता है और दीर्घजीवन संभव नहीं रहता। श्वास की चाल जितनी धीमी होगी शरीर उतने ही चाल जितनी धीमी होगी शरीर उतने ही अधिक दिनों तक जीवित रह सकेगा। विभिन्न प्राणियों की श्वास-प्रश्वास का तुलनात्मक अध्ययन करने से यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है जैसे कबूतर एक मिनट में 37 बार साँस लेता है और 9 वर्ष जीवित रहता है। खरगोश भी प्रति मिनट 39 बार श्वास लेता है और उसकी आयु 9 वर्ष मानी गयी है। कुत्ता एक मिनट में 29 बार श्वास लेता है और 13 वर्ष तक जिन्दा रहता है। बकरी 24 बर साँस लेती है घोड़ा 50 वर्ष तक जीता है। हाथी एक मिनट में 11 बार साँस लेता है। और 100 साल तक जिन्दा रहता है। कछुआ भी एक मिनट में 4 बार साँस लेकर 150 वर्ष का दीर्घजीवन जीता है। पहले मनुष्य प्रति मिनट 11-12 बार साँस लेकर शतायु 25- बार साँस लेकर शतायु होता था, पर अब यह दर बढ़कर 25-26 बार प्रति मिनट हो गयी है और इसी अनुपात से उसकी आयु भी घटकर औसतन 60-65 वर्ष हो गयी है। जबकि सामान्यतः 15-16 हो गयी प्रति मिनट हो गयी तो भी नीरोग जीवन जी सकना संभव है।

श्वास की गति बढ़ने से तापमान बढ़ता है और बढ़ा हुआ तापमान आयु क्षय करता है। जो जानवर कुत्ते की तरह हांफते हैं-जिनकी हांफने की गति जितनी तीव्र होती है, वे उतनी जल्दी ही मरते हैं। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि हांफना और तापमान की वृद्धि दोनों एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। तीव्र ज्वर आने पर आदमी भी हांफने लगता है। क्रोध, आवेश एवं उत्तेजना की स्थिति में भी श्वास दर बढ़ जाती है और व्यक्ति काँपने लगता है। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि जिसकी साँस तेज चलेगी उसके शरीर की गर्मी बढ़ जायेगी। यह गर्मी की बढ़ोत्तरी और साँस की चाल में तीव्रता दोनों ही जीवन का जल्दी अन्त करने वाले हैं। इस संदर्भ में दीर्घायुष्य का रहस्य बताते हुए वैज्ञानिक जेक्टलूबे लिखते हैं कि इन दिनों मनुष्यों का शारीरिक ताप 19.6 रहता है। इसे अगर आधा घटाया जा सके अर्थात् 41 बना दिया जाय तो मनुष्य मजे से 1000 वर्ष जी सकता है।

प्राणायाम में गहरी श्वास लेने का अभ्यास किया जाता है। साधना के समय उसके लिए विशेष प्रयास किया जाता है कि सामान्य समय में भी उथले साँस लेने की आदत को बदला जाय और उसके स्थान पर गहरे साँस लेने का अभ्यास सदा के लिए डाला जाय इससे स्वास्थ्य संवर्द्धन और दीर्घ जीवन की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं।

साधारणतया एक मिनट में 19 बार हमारे फेफड़े फूलते-सिकुड़ते हैं। 4 घण्टे में इस प्रक्रिया की 251200 बार पुनरावृत्ति होती है। प्रति श्वास में प्रायः 500 सी.सी. वायु का प्रयोग होता है। क्योंकि लोग उथला श्वास लेते हैं। सामान्यतया एक स्वस्थ शरीर की आवश्यकता पूर्ति के लिए हर साँस से 12000 सी.सी. वायु का उपयोग होना चाहिए। लोग आवश्यकता को देखते हुए आधे से भी पेट भोजन या आधी प्यास पानी की तरह ही शरीर को दुर्बल ही बनाते रहे हैं और कहते रहे है। कि उथली साँस, सीने में दर्द जैसे अनेक रोगों का खतरा बना रहेगा।

गहरी साँस लेने का लाभ यह है कि फेफड़ों को जल्दबाजी की भगदड़ से थोड़ी राहत मिलती है और वह उस अवकाश का उपयोग रक्त को अधिक शुद्ध करने में कर सकता है। इससे हृदय कम बोझा पड़ेगा और वह अधिक नीरोग रह सकेगा। इंग्लैण्ड का विख्यात फुटबाल खिलाड़ी भिडलोथियन अपने गर्वीले मन और फुर्तीलेपन का कारण गहरी साँस लेने का अभ्यास ही बताया करता। वह प्रायः 2000 सी.सी. वायु हर श्वास में लेता था जबकि औसत व्यक्ति 500 सी.सी. वायु लेकर ही छुट्टी पा लेते हैं।

मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता डॉ0 मेकडावल का कहना है कि गहरी श्वास लेने का मतलब फेफड़ों को ही नहीं पेट के पाचन यन्त्रों को भी परिपुष्ट बनाना है। रक्त शुद्धि की दृष्टि से गहरी साँस बहुमूल्य दवादारु लेने से भी बढ़कर लाभदायक है। मूर्धन्य चिकित्सक डॉ0 नोल्स ने भी लिखा है- गहरी श्वास लेने की आदत मनुष्य को अधिक कार्य कर सकने की क्षमता और स्फूर्ति प्रदान करती है। श्रमजीवियों की शक्ति साधारणतया अधिक ही खर्च होती है, इससे उन्हें जल्दी थकना चाहिए, पर देखा इससे उलटा जाता है। उसका प्रधान कारण कठोर श्रम करने के साथ-साथ फेफड़ों का अधिक काम करना और उस आधार काम करना और उस आधार पर रक्त शुद्धि का अधिक अवसर मिलना ही होता है। डॉ0 मेटनो इससे भी आगे बढ़कर गहरी श्वसन क्रिया का प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ना स्वीकार करते हैं। उन्होंने स्मरण शक्ति की वृद्धि से लेकर हर्षोल्लास-मगन रहने तक की विशेषता को इसी की लाभ परिधि में सम्मिलित किया है।

स्थूल शरीर में वायु संचार के लिए फेफड़े प्रधान रूप से काम करते हैं। सूक्ष्म शरीर में यह कार्य भी नाभि केन्द्र को ही करना पड़ता है। प्रत्यक्ष शरीर नासिका द्वारा वायु खींचता छोड़ता है, सूक्ष्म शरीर को प्राणवायु का संचार शरीर को प्राणवायु का संचार करना होता है। प्राण वस्तुतः एक विद्युत शक्ति है जो ऑक्सीजन की ही भाँति वायु में घुली रहती है। श्वास-प्रश्वास के साथ ही उसका आवागमन भी होता है। वैसे उसकी सत्ता वायु से सर्वथा भिन्न है। समुद्र के पानी नमक घुला रहता है। यह ठीक है पर वस्तुतः वे दोनों एक दूसरे से भिन्न स्तर के ही है।

सूक्ष्म शरीर की नाड़ियों में प्रवाहित होने वाले शक्ति प्रवाह को प्राण कह सकते हैं। जिस प्रकार रक्त ओर रक्तवाहिनी शिरा- इन दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध रहने पर भी उनकी सत्ता सर्वथा स्वतन्त्र है। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर की नाड़ियों और उनमें प्रवाहित होने वाले प्राणों को एक दूसरे से संबद्ध रहते हुए भी वह सत्ता की दृष्टि से पृथक् भी ठहराया जा सकता है।

यह एक तथ्य है कि प्राण सत्ता पर नियन्त्रण से ऐसी सिद्धियां उपलब्ध की जा सकती है। जहाँ तक पहुँचने में भौतिक विज्ञान को कई शताब्दियाँ लग सकती है। प्राणायाम, उसके द्वारा नियन्त्रण और नियन्त्रित प्राण का उपयोग विशुद्ध भौतिक विज्ञान हैं हठयोग में ऐसे प्राणायाम बहुत प्रचलित है और आये दिन इस तरह के चमत्कार देखे जाते हैं। कुछ वर्षों पूर्व एडमण्ड हिलेरी ने ‘समुद्र से आकाश’ अभियान संपन्न किया था। उस यात्रा के मध्य इलाहाबाद में एक रेशम का धागा बाँधकर एक हठयोगी वयोवृद्ध साधक ने उनके 10 अश्वशक्ति थी, किन्तु उस तरह के प्राणायाम की शक्ति थी, किन्तु उस तरह के प्राणायाम जितने शक्ति संवर्धन होते हैं, उतने ही भूल हो जाने पर अनिष्टकारक भी हो सकते हैं। परमाणु शक्ति का दुरुपयोग स्वतः के लिए उतना ही घातक होता है, जितना शत्रु के लिए। इसी तरह प्राण प्रक्रिया में आयी तकनीकी खराबी के कारण यही प्राण-विद्युत अनेकों के लिए प्राणघातक समस्या बन जाती है। इस समस्या से निदान पाने के लिए भारतीय योग तत्वेत्ताओं ने कुछ ऐसे प्राणायाम खोज निकाले जो काई भी, किसी भी शारीरिक, मानसिक स्थिति का व्यक्ति, कभी भी कर सकता है।

यों तो प्राणायामों के अनेकों भेद हैं। शीतली, शीतकारी, भ्रामरी, उज्जाई, लोम-विलोम सूर्यवेधन, प्राणाकर्षण तथा नाड़ी शोधन भारतीय अध्यात्म ग्रन्थों में भरी पड़ी हैं। पर जो सर्वसुलभ और सर्वथा हानि-रहित हैं, जिन्हें बालक, वृद्ध स्त्री व पुरुष कोई भी कर लें। ऐसे ही बहु उपयोगी प्राणाकर्षक प्राणायाम की विधि यहाँ दी जा रही है-

प्राणायाम के चार भाग हैं- (1) पूरक (2) अंतर कुम्भक (3) रेचक (4) बाह्य कुम्भक । साँस को खींचकर भीतर धारण करने को पूरक कहते हैं। यह क्रिया तेजी या झटके के साथ नहीं की जानी चाहिए। धीरे-धीरे फेफड़ों में जितना साँस भर सकें, इस क्रिया को पूरक कहते हैं। अंतर कुम्भक-वायु को भीतर रोके रहने को कहते हैं। जब तक सरलतापूर्वक रोके रख सकें। उतनी ही देर अंतर कुम्भक करें, जबर्दस्ती प्राण वायु को नहीं रोकना चाहिए, धीरे-धीरे समय बढ़ाने का अभ्यास किया जा सकता है। वायु को बहार निकालने को रेचक कहते हैं। पूरक के समान की यह क्रिया भी धीरे-धीरे करनी चाहिए।

साँस एकदम या झटके के साथ छोड़ना ठीक नहीं होता। इसके बाद बाहर भी साँस रोककर बाह्य कुम्भक करते हैं। अर्थात् कुछ देर बिना साँस के रहते हैं। पूरक और रेचक का समय बाह्य कुम्भक और अन्तर कुम्भक का समय समान होना चाहिए। यह एक प्राणायाम हुआ। आरम्भ में केवल पाँच बार ही इस पूर्ण प्रक्रिया को संपन्न करें। धीरे-धीरे आधा घण्टा तक समय बढ़ा सकते हैं। इसके लिए प्रातःकाल का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। अभ्यास के लिए स्वच्छंद पवित्र, शाँत व खुला स्थान होना चाहिए।

या प्राणायाम स्वास्थ्य कि साथ-साथ आतोत्रति का भी एक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी साधन है। इससे प्राण-साधना के साथ ही साथ चित्त की एकाग्रता, स्थिरता, दृढ़ता और मानसिक गुणों का विकास होता है।


हाय री बुद्धिमत्ता, हाय री प्रज्ञाशीलता!

बुद्धिमानी की कमी नहीं। उसका उपार्जन भी सरल है। स्कूलों के रूप में विभिन्न व्यवसाइयों के साथ रहकर अनुभव अर्जित करने के रूप में उसे आसानी से सरी दा जा सकता है। साँसारिक से खरीदा जा सकता है। सांसारिक जानकारियों के बले पैसा अधिक कमाया जा सकता है, लोग धाक मानते हैं और प्रशंसा भी करते हैं। मानते हैं और प्रशंसा भी करते हैं। वकील, इंजीनियर, प्रोफेसर, दलाल, कलाकार आदि बुद्धिजीवी कहलाते हैं। उनकी आजीविका बुद्धिगत परिश्रम पर ही निर्भर रहती है। सेल्समैनों की चतुराई मालिकों को भी निहाल कर देती है। और अपने को कमीशन के अनुसार से मालामाल बना देती है। विभिन्न विषयों के जानकार, बुद्धिजीवी या बुद्धिमान कहलाते हैं। पढ़ाई की फीस और निजी मेहनत खर्च करके कोई भी बुद्धिमान बन सकता है।

प्रज्ञावान का रास्ता दूसरा है, उसे पढ़ा-लिखा तो होना चाहिए। अनुभवी भी और साथ ही दूरदर्शी विवेकशीलता भी उसकी अन्तरात्मा में श्रद्धा बनकर जमी होनी चाहिए। उचित और अनुचित का अन्तर करना आना चाहिए और तात्कालिक लाभ के दूरगामी परिणामों का लाभ के दूरगामी परिणामों का अनुमान खरे कामों में ही हाथ डालना होता है। समर्थन भी उन्हीं का करना होता है। समर्थन भी उन्हीं का करना होता है। समर्थन भी उन्हीं का करना होता है। और किसी को परामर्श देना हो तो भी इसी कसौटी पर कसने के लिए बाद जो खरा और सही प्रतीत हो वही नहीं प्रज्ञा का अनुशासन सर्वप्रथम अपने ऊपर लागू होता है। कष्ट सहकर भी मात्र उसी मार्ग पर चलना होता है। जो मानवी गरिमा के उपयुक्त है। जिन्हें करने के लिए अन्तरात्मा की सहमति प्राप्त है।

बुद्धिमानी के लिए ऐसे कठोर बन्धन स्वीकार करना आवश्यक नहीं। तात्कालिक लाभ ही उसके लिए सब कुछ है। इस प्रयोजन के लिए वह भला-बुरा कुछ भी कर सकती है। अन्तरात्मा का दबाव नहीं होती। यदि वह वकील है तो सर्वथा झूठे मुकदमों को भी सफल बनाने के लिए जो जान एक कर सकता है, यदि वह अफसर है तो खुद का और अपने दोस्त का फायदा कराने के लिए कुछ भी तरकीब बता सकता है। यदि वह डॉक्टर है तो संपन्न है। यदि वह डॉक्टर है तो संपन्न मरीजों को अपने घर आने का और सौदा करने का इशारा कर सकता है। इंजीनियर के लिए निर्माण कार्य में सीमेण्ट की जगह रेत भर देने में चतुरता मानी जायेगी। बुद्धिमान के सामने एक ही कसौटी है-सफलता-फिर चाहे किन्हीं भी नैतिक मूल्यों का हनन होता हो।

आज सर्वत्र बुद्धिमानी की ही प्रशंसा है, उन्हीं की आवश्यकता भी। उन्हीं की माँग सर्वत्र है। बुद्धिमत्ता पहले भी थी पर अब वही सबसे बढ़कर हो गई है। उन्हीं का शासन में प्रवेश है। वे ही मिल-कारखाने चलाते हैं। पहले दिन कारखाना खड़ा करना, दूसरे दिन कारखाना खड़ा करना, दूसरे दिन दिवाला निकाल देना और तीसरे दिन नये नाम से नई फर्म खड़ी कर देना उनके बायें हाथ का खेल है। व हजार की कमाई पीछे एक रुपया निकाल कर संगमरमर का मन्दिर बनाते हैं। और गली-मुहल्लों में अपने धर्मात्मा होने का ढोल पिटवाते हैं। जय-जयकार इन्हीं की होती है। किसी सभा सोसाइटी में जाते हैं। तो उद्घाटनकर्ता चेयरमैन वे ही होते हैं और मालाओं से लद जाते हैं।

बुद्धिमान के लिए दसों दिशा खुली हुई हैं। उन पर कोई रोक-टोक खुली हुई है। उन पर कोई रोक-टोक नहीं। नियन्त्रण वे किसी का नहीं मानते। नीति-मर्यादा उन्हें बाधित नहीं करती। जिस पर कोई नियन्त्रण लागू होता हो, वह बुद्धिमान कैसा? वही जीवन मुक्त होता है, बुद्धितमा देवी की उपासना से उसे यह अभयदान मिल हुआ है। दूसरों को धर्मोपदेश देने में वह प्रवीण-पारंगत है। इतने भर से यह आवश्यकता पूरी हो जाती है। कि उन शिक्षाओं को अपने पास तक नहीं फटकने दे।

प्रज्ञावान बहुत करके घाटे के काम करते हैं। गान्धी, बुद्ध विवेकानन्द, सुभाष की तरह अपनी योग्यता के बल पर नहीं के बराबर कमा पाते हैं, पर उनकी उच्चस्तरीय सफलता अन्ततः उन्हें कृत-कृत्य बना देती है। शंकराचार्य और चाणक्य यदि अपनी विद्या के बल पर कहीं अच्छा कमा लेते । अरविन्द को अच्छा वेतन मिल जाता, पर वे भटकते ही रहे, किन्तु उनकी भटकन भी इतनी मूल्यवान नहीं जिस पर अशर्फियाँ निछावर की जा सकती है।

प्रज्ञा की आँखें न सफलता पर रुकती हैं न सम्पन्नता पर। लाभ के अवसर चुकाते रहने वर वे मूर्खता भी होती इतनी शानदार है कि उसकी तुलना में बुद्धिमत्ता तराजू के पासंग जितनी भी नहीं रहती। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने अपनी अपेक्षा तरक्की के अवसर दूसरों को दिला दिये। जो कमाते थे उसमें से चौथाई में परिवार का गुजारा चलाते थे, शेष जरूरतमंद विद्यार्थियों की शिक्षा रुकने न देने के लिए खर्च कर देते थे। देते थे। ऐसे होते हैं प्रज्ञावान।

यह विश्व-वसुधा प्रज्ञावानों से कृत-कृत्य हुई है। उन्हीं ने संकटग्रस्त मनुष्यता को दलदल में से खींचकर किनारे पर लगाया है। समय की उलझनों को सुलझा सकने का श्रेय प्राप्त किया है। आत्म सन्तोष निरन्तर अनुभव करते रहे हैं। लोक सम्मान और सहयोग उन पर लदा रहा है और दैवी अनुग्रह की आकाश पुष्य वर्षों होती रही है। इतना पाकर बुद्धिमानी की तुलना कम समृद्धिशाली रहना उन्हें अखरा नहीं है।

बुद्धिमानों की बस्ती ढूंढ़नी हो तो वे हर नगर में जेलखानों को जाकर देख सकते हैं। उसमें एक से एक से एक बढ़कर चतुर लोग बन्द पाये जायेंगे। ठगी, लूट, हत्या जैसे अपराध कर सकना हर किसी का काम नहीं है। साधारण व्यक्ति काम कैसे माना जा सकता है? डाकू ओर हत्यारे बुद्धिमानी की कसौटी पर ऊँचे नम्बर ही पा सकते। पकड़े तो उनमें से सौ पीछे कोई एक जाता है अन्यथा ,खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालो से लेकर नकली दवाओं पर असली का लेबल लगाकर बेचने वाले बुद्धिमानों की संख्या कम नहीं है। टैक्स चुराने वाले और काला धन पाखानों के झरोखों में बन्द करके रख लेने वालों की चतुरता इतनी अधिक है, जितने आकाश में तारे।

बुद्धितत्त्व और प्रज्ञा का अन्तर सभी जानते हैं। उनमें एक आरम्भ में सभी जानते हैं। उनमें एक आरम्भ में फलती है, दूसरी अन्त में। एक को हथेली पर जाने वाली जादूगरों की सरसों कहा जा सकता है और दूसरी को मीठे आमों की बगीची लगाने के लिए धैर्य, साहस और दूरदर्शिता भी चाहिए। उसकी आमदनी पीढ़ियों तक मीठे फलों का रसास्वादन कराती और गुजारे लायक आमदनी देती रहती है। किन्तु बाजीगर द्वारा हथेली पर जमाई गई सरसों का तेल कितनों ने शरीर पर मला और बालों में लगाया है, यह ठीक से नहीं कहा जा सकता।

कोई समय था जब इस देश में प्रज्ञावान देव मानव रहते थे और अपनी गतिविधियों से न केवल इस भारत भूमि को वरन् समूचे संसार को धन्य बनाते थे। तब प्रताप ओर शिवाजी जैसे बलिदानी, व्रतशीलों की कमी नहीं थी। भामाशाह, हर्षवर्धन, अंशों जैसे सत्प्रयोजनों के लिए अपनी जेबें पूरी तरह खाली कर देने वालों का वह समय चला गया आज तो हर जगह बुद्धिमानी का बोलबाला हैं वह अपने पास न हो तो कहीं से भी पैसा देकर खरीदी जा सकती है। प्रज्ञाशीलता। तुम्हारा समय कितना बदल गया? कब आएगा वह समय जब प्रज्ञा बुद्धि से अधिक श्रेष्ठ व वरेण्य मानी जायगी? सम्भवतः यह संक्रान्तिकाल है ही प्रज्ञावानों के जागरण है ही प्रज्ञावानों के जागरण हेतु। इसी आशा पर तो हम सबकी आस्थाएं जीवित हैं।


स्वर्ण-नरक का विवरण (Kahani)

शिष्यगण गुरुदेव से स्वर्ण-नरक का विवरण पूछते रहते। गुरुदेव ने बताया, वे दोनों इसी धरती पर है। कर्मों के अनुसार इसी जीवन में मिलते रहते हैं।

शिष्यों का दर्शन कराने, वे एक बहेलिये के धर गये, जो जीव हत्या करके पेट पालता, किन्तु था सर्वथा निर्धन। बच्चे सब के सब कुकर्मी, विग्रही और दुर्गुणी। घर में प्रत्यक्ष नरक था।

दूसरा घर वेश्या का था। युवावस्था में उसने कमाया भी खूब और गिराया भी बहुतों को ; पर इस वृद्धावस्था में वह अनेक रोगों से ग्रसित हो गयी थी। तिरस्कार सहती और भिक्षा से पेट भरती थी।

तीसरा घर एक सद्गृहस्थ का था। संयमी, परिश्रमी, उदार और सद्गुणी। पूरा परिवार सुखी-समृद्ध था। धर में स्नेह-सौजन्य बिखरा फिरता था।

चौथा प्रवेश एक सन्त की कुटी में हुआ। मस्ती देखते ही बनती थी। शिक्षा और प्रेरणा पाने सुखी-समृद्ध था। घर में स्नेह-सौजन्य बिखरा फिरता था।

चौथा प्रवेश एक सन्त की कुटी में हुआ । मस्ती देखते ही बनती थी। शिक्षा और प्रेरणा पाने के लिए अनेकों श्रेयार्थी श्रद्धापूर्वक उनके चरणों में बैठे थे।

गुरु ने दो नरक के और दो स्वर्ग दिखाये और शिष्यों से कहा-”कर्मफल के अनुरूप इन दोनों ही परिस्थितियों को कही चरणों में बैठे थे।

गुरु ने दो नरक के और दो स्वर्ग के रूप दिखाये और शिष्यों से कहा-”कर्मफल के अनुरूप इन दोनों ही परिस्थितियों को कही भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

गृहस्थ एक प्रत्यक्ष स्वर्ग है, इसी धरती पर है। घर में सत्प्रवृत्तियों की फसल बोकर उससे सब कुछ पाया जा सकता है, जिसकी कि स्वर्ग में होने की आलंकारिक गाथायें कही जाती हैं।


सप्तलोक, सप्त आयामों का ज्ञान एवं विज्ञान

शास्त्रों में सप्त लोक, सप्त घोड़ों का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। उपरोक्त सात समूह वस्तुतः चेतना की सात परतें, सात आयाम - जिनका अलंकारिक वर्णन इन रूपों में किया गया है। उनकी चमत्कारी सामर्थ्य की गाथाओं से सारा पुराण-इतिहास भरा पड़ा है। जो जितनी परतों को जान लेता, उन पर अधिकार कर लेता है, लेता, उन पर अधिकार कर लेता है, वह उसी अनुपात में शक्ति संपन्न इतिहास भरा पड़ा है। जो जितनी परतों को जान लेता, उन पर अधिकार कर लेता है, वह उसी अनुपात में शक्ति संपन्न बन जाता है। समस्त जड़-चेतन इन्हीं सात आयामों के भीतर गतिशील हैं। सात आयामों के भीतर गतिशील हैं। दृश्य-अदृश्य समस्त सत्ताओं का अस्तित्व इन सात आयामों के भीतर है। पदार्थ एवं चेतना का दृश्य एवं अदृश्य स्वरूप इन आयामों के ऊपर निर्भर रहता है।

ब्रह्म विद्या में सात आयामों की चर्चा अक्सर की जाती है। यही सात लोक गायत्री मन्त्र के साथ प्राणायाम उच्चारण किया जाता है। भू, भुव, स्वः, तप, जन, महः, सत्यम्। ये सात व्याहृतियाँ सात लोकों की परिचायक है। इनकी चर्चा इस संदर्भ में होती है कि प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए ही हमें अगले आयामों में पदार्पण करना चाहिए। तीन लोक भौतिक हैं-भूः, भुवः एवं स्वः। इन्हें धरती, पाताल और आकाश भी कहते हैं। भौतिकी इसी सीमा में अपनी हलचलें जारी रखती है। अगले चार लोक हलचलें जारी रखती है। अगले चार लोक सूक्ष्म हैं। चौथा भौतिकी और आत्मिक का मध्यवर्ती क्षेत्र है। पाँचवाँ, छठा, सातवाँ लोक विशुद्ध चेतनात्मक है। इन्हें पदार्थ सत्ता से ऊपर माना गया है। इसे और भी अच्छी प्रकार समझना हो तो भूः स्वः को सामान्य जगत, तपः को चमत्कारिक सूक्ष्म जगत एवं जनः, महः, सत्यम् का देवलोक तपः को चमत्कारिक सूक्ष्म जगत एवं नः, सत्यम् को देवलोक कह सकते हैं। मनुष्य सामान्य जगत में रहते हैं, सिद्ध पुरुषों का कार्यक्षेत्र सूक्ष्म जगत है। देवता उस देवलोक में रहते हैं। जिनकी संरचना जनः, महः, सत्यम् तत्वों के आधार पर हुई है।

समझा जाता है। कि सातों लोक ग्रह-नक्षत्रों की तरह वस्तु विशेष हैं और उनका स्थान कहीं सुनिश्चित है। वस्तुतः ऐसा है नहीं। ये लोक अपने ही जगत की गहरी परतें हैं। उनमें क्रमशः ऐसा है नहीं। ये लोक अपने ही जगत की गहरी परतें हैं। उनमें क्रमशः प्रवेश करते चलने का चक्र व्यूह को बेधन करते हुए परम लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव हो सकता है। इस प्रगति क्रम में सशक्तता बढ़ती चलती है और अन्तिम चरण पर पहुँचा हुआ मनुष्य सर्व समर्थ बन जाता है। इसी को आत्मा की परमात्मा में परिणति कह सकते हैं। यह सात लोक ही सात ऋषि हैं। इन्हीं में पहुँचे हुए देवात्मा एक से एक बढ़-चढ़कर उच्चस्तरीय सिद्धियां प्राप्त करते हैं।

सामान्यता तीन आयाम तक ही हमारा बोध क्षेत्र है। लम्बाई चौड़ाई, ऊँचाई तथा गहराई के अंतर्गत समस्त पदार्थ सत्ता का अस्तित्व है। इन्द्रियों की बनावट भी कुछ ऐसी है कि वह मात्र तीन आयामों का अनुभव कर पाती है- लम्बाई, चौड़ाई ऊँचाई (या गहराई)। जो भी पदार्थ स्थूल नेत्रों को दृष्टिगोचर होते हैं, उनके यही तनी परिणाम हैं। चतुर्थ आयाम की ऊहापोह वैज्ञानिक क्षेत्रों में चल रही है। काल, दिक् के रूप में पाश्चात्य दार्शनिकों एवं पूर्वार्त्त दर्शन के मनीषियों द्वारा वर्णित यह आयाम अनेक रहस्य अपने अन्दर छिपाये आइन्स्टीन से लेकर नार्लीकर व अब्दुस्सलाम तक कई वैज्ञानिकों को शोध हेतु आकर्षित करता रहा है। दार्शनिक मान्यताओं करता रहा है। दार्शनिक मान्यताओं के अनुसार, चतुर्थ आयाम में पहुँचने पर हमारी पूर्व स्थापित धारणाओं एवं जानकारियों में आमूलचूल परिवर्तन होने की पूरी-पूरी सम्भावना है। सम्भव है कि जो दूरी हमें दो-चार हजार मील की मालूम पड़ती है, रह जाय। चौथे आयाम में पहुँचकर प्राणी के कुछ पल में अमेरिका व ब्रिटेन पहुँचकर भारत वापस लौट आने की पूरी -पूरी सम्भावना है। ऐसे अनेकों प्रामाणिक प्रसंग समय-समय पर सामने आते रहे हैं। उनका अदृश्य हो जाना, कुछ पलों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाना सम्भवतः चतुर्थ आयाम में पहुँचकर ही सम्भव हो सका होगा। जिस चतुर्थ आयाम की कल्पना अभी वैज्ञानिक जगत में की जा रही है। उसकी जानकारी हमारे ऋषियों को पूर्वकाल से है।

चतुर्थ आयाम का बोध होते ही हमारे सामने ज्ञान का एक अनन्त क्षेत्र खुल सकता है। तब यह संसार भिन्न रूप में दिखायी पड़ने लगता है। उन मान्यताओं को जिन्हें हम सत्य यथार्थ मानते हैं, सम्भव है भ्रान्ति मात्र लगने लगें। आइन्स्टाइन की कल्पना के अनुसार काल को भूत, वर्तमान, भविष्य काल से नहीं बाँधा जा सकता। हाइजन की कल्पना के अनुसार काल को भूत, वर्तमान, भविष्य की सीमाओं से नहीं बाँधा जा सकता। हाइजन वर्ग जैसे वैज्ञानिक ने सिद्ध किया कि ‘काल’ भूत से वर्तमान एवं भविष्य से भूतकाल की ओर भी चलता है।

जब अतीत की ओर लौटना सम्भव हो जायेगा तो हमारी मान्यताएँ अस्त-व्यस्त हो जायेगी । तब रामकृष्ण, बुद्ध, विवेकानन्द, गान्धी को उसी प्रकार देखा जा सकेगा जैसे सामने जीवित खड़े हों। जीवन-मरण की मान्यताएँ तब उलट जायेंगी। पाँचवाँ, छठा एवं सातवाँ आयाम पदार्थ सत्ता से परे है। ये आयाम विशुद्धतः चेतना से सम्बन्धित हैं भौतिकी की पकड़ यहाँ तक नहीं है। भौतिक यन्त्रों एवं इन्द्रियों की सीमा से बाहर है।

पांचवां आयाम विचार जगत से संबंधित है। विचारों की महत्ता एवं उनकी चमत्कारी शक्ति से हर कोई परिचित हैं मनुष्य जैसा भी है विचारों की प्रतिक्रिया मात्र हैं शारीरिक हलचलें उनकी प्रेरणा से ही होती हैं विचारों में माध्यम से वस्तुओं के स्वरूप के माध्यम से वस्तुओं के स्वरूप की कल्पना की जाती हैं विचार जगत में उठने वाली तरंगें वातावरण एवं मनुष्यों को प्रभावित करती हैं तथा अपने अनुरूप लोगों को चलने के लिए बाध्य करती है। महामानव, ऋषि महर्षि अवतार आने सशक्त विचारों का संप्रेषण सूक्ष्म अन्तरिक्ष में करते रहते हैं। इस आधार पर वे असंचय मनुष्यों की मनःस्थिति एवं परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं जन प्रवाह उन विचारों के अनुकूल चलने के लिए विवश होता है प्रथम आयाम की रहस्यमय शक्ति को जानने एवं उसको करतलगत कर सदुपयोग करने से ही बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक क्रान्तियां सम्भव हो सकी है। कन्दरा में बैठें ऋषि एक स्थान पर बैठकर अपने विचारों को पंचम आयाम में प्रस्फुटित करते रहते हैं तथा अभीष्ट परिवर्तन कर सकने में समर्थ होते हैं छठा आयाम भावना जगत हैं कहते हैं कि इस लोक में मात्र देवता निवास करते हैं इस अलंकारिक वर्णन में एक तथ्य छिपा है कि भावों में ही देवता निवास करते हैं। अर्थात् भाव सम्पन्न व्यक्ति देव तुल्य हैं भावना की शक्ति असीम हैं इसके आधार पर पत्थर में भगवान पैदा हो जाते हैं व्यक्तित्व का समूचा कलेवर अंतरंग की आस्था से ही विनिर्मित होता है। विचारणा तथा क्रिया-कलाप तो आंतरिक मान्यताओं से ही अभिप्रेरित होते हैं। इसे ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ जीव चेतना को जोड़ने और उससे लाभ उठाने का सशक्त माध्यम कहा जा सकता है। आत्मा का परमात्मा से मिलन मिलन कितना आनन्ददायक होता है। इसका अनुमान भौतिक मनःस्थिति द्वारा लगा सकना सम्भव नहीं हैं तत्वज्ञानी उसी आनन्द की मस्ती में डूबी रहते हैं तथा जन-मानस को उसे प्राप्त करने की प्रेरणा देते रहते हैं। तुलसीदास जड़-चेतन सबमें। परमात्म सत्ता की अनुभव करते हुए लिखते हैं” सियाराम मय सब जग जाती”। “ईशावास्यमिर्द सर्वे यत्किंचित् जगत्याम जगत।” ईशासास्योपनिषद तथा रामायण के इस उद्धरण में अद्वैत स्थिति का वर्णन किया गया है। सप्तम आयाम की यही स्थित हैं इसमें पहुंचने पर जड़-चेतन में विभेद नहीं दीखता। सर्वत्र एक ही में विभेद नहीं दीखता। सर्वत्र एक ही सत्ता-ब्रह्मा की एकरूपता सातवें आयाम में दिखाई पड़ने लगती है। इसी को ब्राह्मी स्थिति कहते हैं इसे प्राप्त करने के बाद कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता। सातवें आयाम का ही वर्णन सप्तम लोक के रूप में किया गया है। सप्त लोक, सप्त आयाम, चेतना की सात परतें एक के भीतर एक छिपी हुई हैं। इनमें विभेद स्वरूप मात्र है। जिस प्रकार पोले स्थान में हवा भरी रहती हैं हवा में ऑक्सीजन तथा ऑक्सीजन में प्राण-सभी एक के भीतर एक परतें हैं उसी प्रकार चेतना की सात परतें एक के भीतर एक विद्यमान है। एक तीन आयामों से युक्त पदार्थ जगत की विशेषताओं से सभी परिचित हैं स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म पदार्थ में चेतना की शक्ति अनेक गुना अधिक है आइन्स्टीन के चतुर्थ आयाम की कल्पना मात्र से वैज्ञानिकों के हाथ में एक बहुत बड़ी शक्ति मिलने की आशा बन चली है लेजर किरणों से ‘होलोग्राफी ‘ के आधार पर त्रिमिजीय सिनेमाओं का निर्माण कई देशों में हो चुका हैं जहाँ पर्दे पर मनुष्य मोटर , गाड़ी शेर हाथी यथावत् चलते दिखाई देते हैं अनभ्यस्त व्यक्तियों को प्रायः यथावत् होने का भ्रम हो जाता है त्रिआयामीय चित्रों की यह विशेषता है इसके पश्चात् चतुर्थ , पंचम, पृष्ठ सप्तम आयाम कितना विलक्षण एवं शक्ति सम्पन्न हों सकता है इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। वस्तुतः सात लोगों का अस्तित्व अपने ईद-गिर्द एवं भीतर-बाहर भरा पड़ा है। उसमें से इंद्रियों एवं यन्त्र अनुभव किया जा सकता है चौथे लोक में यदि प्रवेश सम्भव हो सकें तो इन्हीं इन्द्रियों और इन्हीं यन्त्र अनुभव किया जा सकता है चौथे लोक में यदि प्रवेश सम्भव हो सके तो इन्हीं इन्द्रियों और इन्हीं यन्त्र उपकरणों से उसे कुछ देखा-समझा जा सकेगा । जिसे आज की तुलना में अद्भुत ही कहा जायगा। तब गीता के अनुसार “आश्चर्यवत् पश्यति विश्चदेन ....................” की स्थिति सामने होगी। भूः स्वः के बाद यह चौथा आयाम चेतना जगत और भौतिक जगत का घुला-मिला स्वरूप हैं इसे ‘तप’ लोक कहा गया हैं तपस्वी इसमें अभी प्रवेश पाते और अतीन्द्रिय क्षमताओं से सम्पन्न सिद्ध पुरुष कहलाते हैं इसे ऊपर के जनः+ महः और सत्य लोक विशुद्धतः चेतनात्मक हैं उनमें प्रवेश पाने वाला देवलोक में विचरण करता है दैवी शक्ति से सम्पन्न होता है और उस तरह की मनःस्थिति एवं परिस्थिति में होता है जिसे पूर्ण पुरुष जीवनमुक्त, परम हंस जनों द्वारा तो कहा सुना ही जा सकता है।


अग्रणी (Kahani)

साम्यवादी दल की ही एक सिरफिरी लड़की ने लेनिन पर पिस्तौल चला दी । गोली तो निकल गई, पर छर्रे गले और गरदन में फँसे रह गये। उसी बीच एक पुल टूट गया। आपात स्थिति घोषित करके उसे युद्ध स्तर को आया। तब पता चला कि लेनिन भी उसमें लगे थे। गले में गोली होते हुए भी मजदूरों के साथ भारी शहतीर उठवाने का काम नित्य बीस-बीस घंटे तक करते रहें। पूछने पर, उन्होंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, कहा - हम अग्रणी कहलाने वाले पीछे रहें, तो जन उत्साह में वह प्रखरता नहीं आ सकती जो आनी चाहिए।


ध्यान साधना से अन्तःशक्तियों का जागरण -प्रस्फुटन

पतंजलि के योगदर्शन का प्रथम सूत्र है- “योगःचित्तवृत्ति निरोधः।” अर्थात् चित्त वृत्तियों को निरोध ही योग है। दूसरे शब्दों में, मन की चंचलता है अवरोध को रोक कर उसकी स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाकर अभीष्ट प्रयोजन में निरत करने के अभ्यास को योगाभ्यास-ध्यान कहा जाता है। धार्मिक क्षेत्र में इसके लिए देव प्रतिमाओं को निमित्त बनाया और मनःशास्त्रियों ने प्रकाश , बिन्दु, काला गोला या अन्य कोई ध्यानाकर्षण में सहायक माध्यम एकाग्रता के लिए प्रयोग किया । सूर्य की किरणें आतिशी शीशे के माध्यम से एक केन्द्र पर केन्द्रित करने के फलस्वरूप आग जलने लगती हैं सुई की नोक ही बारीक छेद द्वारा पिस्टन तक पहुँचाने पर उसका दबाव बढ़ता है और रेल दौड़ने लगती है। फायर ब्रिगेड के पाइप का मुँह छोटा पर धारा दूर तक पहुँचाती है और उसमें तीव्रता भी रहती है। बन्दूक की नली में डाली गई एक दिशा विशेष में चलने के लिए बाधित की गई तनिक -सी बारूद किस तेजी से चलती और लक्ष्य बेधती है। इस आधार पर एकाग्रता -ध्यान का चमत्कार समझा जा सकता है मस्तिष्कीय क्षमताएँ अनेक प्रयोजन में उड़ती रहती हैं इन्हें यदि नियन्त्रित करने और दिशा विशेष में लगाने का कौशल हस्तगत हो सके तो सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी विलक्षणों से आगे निकल सकता है वैज्ञानिक , कलाकार , साहित्यकार, शिल्पी आदि को इसी आधार पर अपने - अपने कार्यों में प्रवीणता और सफलता मिलती है। इसे ही ध्यान कहते हैं । आत्म नियंत्रण का अर्थ है-अपने चिन्तन तंत्र पर अधिकार अपना नियन्त्रण स्थापित करना । यह कार्य विचारों की अनियन्त्रित उछल-कूद की इच्छित दिशा धारा में लगा सकने के रूप में सम्पन्न होता है इसका अभ्यास ध्यानयोग के द्वारा किया जाता है। कुसंस्कारी मन आलस्य, प्रमाद से लेकर दुर्व्यसनों, दुष्कर्मों, दुष्प्रवृत्तियों में रस लेने में अभ्यस्त रहा हैं उसे रोकने, सम्हालने, साधने और सुसंस्कृति बनाने के लिए ही ध्यानयोग का समूचा शास्त्र गढ़ा गया है। ध्यान के कई उद्देश्य हैं- अनगढ़ दिमागी उछल-कूद को नियन्त्रित करना नियन्त्रित विचार शक्ति को अभीष्ट प्रयोजनों में नियोजन करना, एकाग्रता द्वारा बौद्धिक प्रखरता उत्पन्न करना, संकल्प शक्ति को किसी भी चमत्कारी हलचलें उत्पन्न करना, चेतना की रहस्यमयी परतों को अपने की मनोबल से उभारना, उछालना, अवांछनीय कुसंस्कारों का उन्मूलन, प्रतिकूलताओं के बीच भी सन्तुलन बनाये रहना, हर स्थिति में आनन्द और उल्लास भरी मनोभूमि बनायें रहना, अपनी विचार-विद्युत से संपर्क क्षेत्र को प्रभावित करना और वातावरण में सुख शान्ति संवर्धक तत्वों को बढ़ाकर लोक मंगल का पथ प्रशस्त करना। यह ध्यान धारणा के लौकिक-बौद्धिक प्रयोग है। यह लाभ थोड़ी-सी सावधानी एवं तन्मयता के सहारे कोई भी नास्तिक समझा जाने वाला व्यक्ति भी उठा सकता है जो ध्यान प्रक्रिया के माध्यमिक स्तर का प्रयोग मात्र है इससे आगे ध्यान के उच्चस्तरीय लाभ है इसके लिए विशिष्ट श्रद्धा एवं भाव संवेदनाओं से सम्पन्न अन्तः करण की आवश्यकता पड़ती हैं इसके अंतर्गत साधक अपनी चेतना को महत् चेतना से जोड़ सकता है। गुरु एवं इष्ट की शक्तियों को आकर्षित करना, उन्हें धारण करना’इसी स्तर के ध्यान प्रयोग से सम्भव होता है आत्म तत्व को परमात्मा तत्व से एकाकार करना इसी के सहारे सम्भव होता है यह ठीक है कि मनुष्य में स्वतः ही विद्यमान है और वह उन्हें अपने प्रयत्न-पुरुषार्थ से जाग्रत कर सकता है प्राथमिक माध्यमिक स्तर का ध्यान प्रयोग इसलिए है

किंतु उच्चस्तरीय ध्यान प्रयोग में दिव्यात्माओं का प्रत्यक्ष संयोग पा सकना, मनुष्य की सीमित सत्ता से असीम सत्ता का योग-संयोग सम्भव हैं ईश्वर प्राप्ति, जीवन लक्ष्य प्राप्ति ध्यान-धारणा के उच्चस्तरीय उद्देश्य हैं जिस प्रकार शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक सुसम्पन्नता के संवर्द्धन में अपने-अपने संपर्क क्षेत्र की और सार्वजनिक हित साधन की संगठना बढ़ती है, उसी प्रकार मनःसंस्थान के परिष्कृत और प्रखर बनने से भी व्यक्ति और समाज के लिए कल्याणकारक परिस्थितियों उत्पन्न होती हैं स्थूल जगत से हम अनेकों प्रकार के लाभ अपने प्रत्यक्ष पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त करते रहते हैं सूक्ष्म जगत की विभूतियों और भी बढ़ी-चढ़ी है। उन्हें आकर्षित कर सकना । जिस प्रचण्ड मनोबल द्वारा सम्भव होता है। उसे उत्पन्न करने के लिए ध्यानयोग की प्रक्रिया अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होती हैं ध्यानयोग की आराधना को किसी चमत्कारी देवता की आराधना करने के समतुल्य ठहराया जा सकता है। ध्यान से भगवान प्राप्त होते हैं-आत्म साक्षात्कार का अवसर मिलता है नीरोगता और शक्तियों जाग्रत होती हैं, ऋद्धि-सिद्धियों से भरे वरदान प्राप्त होते हैं जैसे अनेकों लाभ साधना शास्त्र में गिनाये गये हैं यह कथन यथार्थ हैं चेतना की सामर्थ्य अनन्त है उससे लाभान्वित होने में एक ही बाधा है कि मनोनिग्रह की कला हस्तगत नहीं होती । जिसने इस कौशल में प्रवीणता प्राप्त कर ली, समझना चाहिए कि उसने अनेकों देव-दानव वशवर्ती कर लिए। पंचकोशों की ध्यान-धारणा से अपनी ही चेतना के पाँच प्राण, अपनी की काया के पंचतत्व इतने प्रखर परिष्कृत हो जाते हैं कि उन्हें दस दिक्पालों , दस दिग्गजों की उपमा दी जा सके। गायत्री माता की पंचमुखी प्रतिमाओं में अलंकारिक रूप से इन्हीं अंतर्जगत के पाँच देवों की शक्तियों सन्निहित होने के संकेत हैं कुण्डलिनी जागरण की ध्यान साधना में, काय-कलेवर में बीज रूप से समाहित असंख्य शक्तियों के उद्भव एवं उपयोग का द्वार खुलता है। कुण्डलिनी शरीरगत ऊर्जा है, जिसके सहारे भौतिक जगत की अनेक शक्तियों को आकर्षित करके समर्थ, शक्तिवान बना जा सकता है पंचकोश अनावरण में चेतना शक्ति हैं आत्म सत्ता को पंचकोशों के और काय सत्ता को कुण्डलिनी के माध्यम से प्रखर बनाया जा सकता है इस उभयपक्षीय प्रयोजन की सिद्धि में अन्य साधनाओं के अतिरिक्त ध्यान -धारणा का सर्वोपरि स्थान हैं हर मस्तिष्क की संरचना भाव चित्र उभारने ध्यान में अभीष्ट दृश्य देखने की नहीं होती। अस्तु, उनके लिए ध्यान को केन्द्रित करने के लिए दृश्य प्रतीकों का, बिन्दु योग का अभ्यास नहीं कराया जाता। मूल उद्देश्य विचार प्रवाह के बिखराव को रोक एक समिति प्रयोजन में केन्द्रित होने का अभ्यास कराया जाता है यह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से हो सकता है। कर्णेन्द्रिय के माध्यम से नादयोग, नासिका द्वारा गन्धयोग , जिह्वा द्वारा रसनायोग , त्वचा द्वारा स्पर्शयोग की अनेकों विधि-विधान हैं जिनमें सूक्ष्म नेत्रों द्वारा दृश्यों को देखा जाता है। आरम्भ के साधकों के लिए यह अधिक उपयुक्त है कि एक श्रेष्ठ विचारधारा के प्रवाह में बहने के लिए रास्ता बना दिया जाय। वैज्ञानिक , साहित्यकारों, दार्शनिकों की ध्यान-धारणा इसी प्रकार की होती हैं कि वे एक सीमित विचार पद्धति को अपनाकर, वे उसी दायरे में अपने चिन्तन क्रम में नियोजित किये रहते हैं और उसके आश्चर्य-जनक सत्परिणाम उपलब्ध करते हैं। पंचकोशों और कुण्डलिनी जागरण की ध्यान-धारणा में यही नीति अपनाई गई हैं

शांतिकुंज के पाँच दिवसीय एक मासीय एवं नौ दिवसीय साधना सत्रों में त्रिकाल ध्यान-धारण का क्रम सम्पन्न होता है। प्रातःकाल उगते सूर्य का ध्यान-प्रज्ञायोग, दोपहर कालीन दीपक की ज्योति पर ध्यान-ज्योति अवधारण ध्यान-साधना एवं संध्याकालीन को करनी पड़ती हैं ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में प्रत्येक साधकों का विभिन्न पर प्रयोग किया जाता है। ध्यान के पूर्व एवं बाद में कितना अन्तर आया, मानवी काया पर क्या प्रभाव पड़ा? इसके लिए मल्टीचैनेल पालीग्राफ (इलेक्ट्रो एनसेथ्फलोग्राम) , बायोफीडबैक (टेम्परेचर पल्स ई॰ ई॰ जी0 जी0 एस0 आर0) आदि मशीनों से साधकों को गुजरना पड़ता है। रक्त के श्वेत कणों एवं विविध हारमोन्स एन्जाइम जीवनी शक्ति बढ़ाने वाले द्रव्यों तथा फेफड़ों की रक्त शोधन प्रक्रिया पर आहार शुद्धि योगासन, ध्यान-धारणा का प्रभाव रेखांकित किया जाता है। ध्यान-साधना के अंतर्गत , मानवी सत्ता के अंतर्गत विशिष्ट शक्ति स्रोतों अद्भुत व्यक्तित्वों का विकास किया जाता है। अपने अन्दर बीज रूप में सन्निहित महाशक्ति को जाग्रत करके, इसके अधोगाती प्रवाह को रोककर बलपूर्वक ऊर्ध्वगति बनाया जाता है उच्चस्तरीय ये साधनाएँ आत्मसत्ता को परमात्मा सत्ता से जोड़ने उस स्तर तक पहुँचाने में समर्थ है।


दार्शनिक हिक्री (Kahani)

दार्शनिक हिक्री उन दिनों तंवा में रहते थे। कई लोग उनसे उलझी गुत्थियां सुलझाने सम्बन्धी परामर्श करने आते । एक दिन एक व्यक्ति अपनी पत्नी समेत उनके पास पहुँचा और उसकी आलस्य तथा कंजूसी की बुराई करने लगा। सचमुच यह दोनों बुराइयाँ उसमें थी भी। हिक्री ने उस औरत को स्नेहपूर्वक पास बुलाया। एक हाथ की मुट्ठी बाँधकर उसके सामने की- और पूछा-”यदि यह ऐसे ही सदा रहे, तो क्या परिणाम होगा, बताओ तो, लड़की?” औरत सिटपिटाई तो, पर हिम्मत समेटकर बोली-”यदि सदा यह मुट्ठी ऐसी ही बँधी रही, हाथ अकड़ कर निकम्मा हो जायेगा।” किक्री इस उत्तर को सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और दूसरे हाथ की हथेली बिलकुल खुली रखकर फिर पूछा-”यदि यह हाथ ऐसे ही खुला रहे, तो फिर इस हाथ का क्या हस्र होगा जरा बताओ तो? औरत ने कहा-”ऐसी हालत में यह भी अकड़ कर बेकार ही हो जायगा।” किक्री ने उस औरत की भरपूर प्रशंसा की और कहा -”यह तो बुद्धिमान भी है और दूरदर्शी भी। मुट्ठी रहने और हाथ सीधा रहने के नुकसान को यह अच्छी तरह जानती है। बेटी, इस विवेक का उपयोग अपने जीवन में भी करना, इससे तुम्हारे जीवन में सुख-सौभाग्य बढ़ेगा।” पति -पत्नी प्रणाम करके चल दिए। युवती ने सन्त की बात पर गौर किया। समझ में आया कि मैं एक ही स्थिति में रही और आलस्य बरतती रही, तो हाथ की तरह अकड़ जाऊंगी । उसने सक्रियता अपनायी। पति का साथ देकर आय बढ़ाई बचत की और सदुद्देश्य के निमित्त उदारतापूर्वक खर्च किया।


बड़े विलक्षण हैं कुदरत के खेल

रस्टीड -जर्मनी के सेन्ट भूलारिच चर्च में एक ऊंची मीनार बनी हैं इस पर एक 1599 और 17न्3 के बीच भयंकर आकाशीय बिजली चार बार गिरी। वह चार बार धराशाई हुई और नये सिरे से बनाई गयी। चारों बार बिजली गिरने की तारीख 1न् अप्रैल थी। स्पेन के वार्सिलोना नगर में एक ‘सिएट सेंटिएन्ब्रे ‘ नामक व्यक्ति हुआ हैं जिसका अर्थ स्पेनी भाषा में होता हैं -सात सितम्बर। यह नाम उसे माता-पिता से नहीं मिला। लोगों के द्वारा थोपा गया। वह 7 सितम्बर 1749 को पैदा हुआ और 7 सितम्बर 1न्01 को मर गया। उसके बेटे का भी यही नाम था। वह 7 सितम्बर 1774 को पैदा हुआ और 7 सितम्बर 1न्26 को मरा। इतना ही नहीं उसके पोते का भी यही नाम था और जमत-मरण का दिन भी पूर्वजों की भांति हैं पोता 7 सितम्बर 1न्14 को पैदा हुआ था। और 7 सितम्बर 1न्6न् को दिवंगत हुआ। तीन पीढ़ियों तक एक ही नाम और एक ही जन्म- मरण का दिन अभी तक उस देश में चर्चा का विषय हैं जापान पर भूकम्पों की विपत्तियों अनेक बार आई है। पर छह भयानक संयोग ऐसे है जो एक ही तारीख को घटित हुए और विनाश की दृष्टि से असाधारण रूप से भयानक माने गये। (1) 1 सितम्बर, न्ञ्7 (2) 9 सितम्बर, 859 द3ड्ट 1 सितम्बर, 860 (4) 1 सितम्बर 1185 (5) 1 सितम्बर, 1649 (6) 1 सितम्बर, 1923। इनमें से छठे ने सबसे अधिक विनाश किया उससे टोकियो और याकोहामा शहर बुरी तरह बर्बाद हुये और प्रायः 1 लाख 43 हजार क्योंकि दबकर मर गये। घायलों की संख्या तो इससे भी कही अधिक थी। विश्व’-विख्यात चित्रकार आल्माटाडमा के जीवन में ‘17’ की संख्या महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह बात वे स्वयं स्वीकार करते हुए कहा करते हैं। “जब में 14 वर्ष का था तब 17 तारीख को अपनी प्रिय पत्नी से मिला। मेरे पहले मकान का नम्बर 17 था, जब दूसरा मकान बनवाया था वह भी 17 अगस्त से प्रारम्भ हुआ और उस नूतन गृह में मेरा प्रवेश भी 17 नवंबर को ही हुआ। चित्रकारों के लिए सेन्ट लोन्स वुड में जो कमरा लिया वह भी 17 नम्बर का ही निकला एस0 बी0 फ्रेंच के जीवन की अधिकांश घटनायें ‘7’ की संख्या के साथ ही घटित हुई । उनका जन्म 7 वे महीने की 7 वीं तारीख को हुआ था। 7 वीं कक्षा तक वे कभी फेल नहीं हुये। उनका विवाह भी 7 वीं, लड़की के साथ हुआ और संयोग से उस लड़की के लिए भी फ्रेंच 7 वें ही लड़के थे । ऐलन वान ने अपनी पुस्तक ‘इनक्रेडिबल कोइन्सीडेन्स’ में अंक संयोग पर आधारित घटना का भी उल्लेख किया हैं आयरलैंड स्थिति डबलिन के निवासी एन्टनी क्लेंसी के जीवन में ‘सात ‘ संख्या का विशेष महत्व रहा। उसके जीवन के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर सात का संयोग अवश्य रहा। एन्टनी क्लैसी के शब्दों में,”सप्ताह के सातवें दिन, महीने की सातवीं तारीख को, वर्ष के सातवें दिन , इस सदी के सातवें वर्ष में मेरा जन्म हुआ था मैं अपने माता-पिता का सातवाँ बेटा हूँ यहाँ तक मेरे पिता भी अपने अभिभावक के सातवें पुत्र थे। अपनी सत्ता इसकी वर्षगाँठ पर सातवीं घुड़-दौड़ में मैंने सात तम्बर का घोड़ा चुना और उसका नाम था- ‘सातवाँ’ बहिश्त’। मैंने उस घोड़े पर सात शिलिंग लगाये। रेस में भी उसका सातवाँ नम्बर था। “उत्तरी वर्टन यार्क्रम के डॉ0 रुड के जीवन में 13 की संख्या दुर्भाग्य सूचक के रूप में रही। 13 वर्ष की अल्प-आयु में वे बीमार पड़े। 13 दिन तक घोर कष्ट सहते हुए 13 तारीख के हृदय की बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गयी। उनके परिवार में 13 सदस्य थे। मृत्यु के समय कुल अ शिलिंग ही उनके फण्ड में बचे थे। अन्तिम संस्कार के समय भी 13 सदस्य ही उपस्थित हुये। रुड का नाम फूवाह था, जो कि बाइबिल के 13 वे छन्द में आता है। उनकी मृत्यु समय मात्र 13 तार ही शोक संवेदना के रूप में आये। इसके विपरीत ‘डेनवरा कोलराडों’ के धनाढ्य उद्योगपति शेरमैन के लिए 13 की संख्या सौभाग्य सूचक थी। शेरमैन का जन्म 13 तारीख को हुआ । उनकी सगाई 13 तारीख को हुई और विवाह भी 13 जून 1916 को हुआ । पत्नी का जन्मदिन भी 13 तारीख को ही था। उनके विवाहोत्सव में कुल 13 सदस्य ही उपस्थित थे। 13 की संख्या उनके जीवन में सदैव लाभदायक रही। फ्रांस के सिंहासन के साथ 14 की संख्या का महत्व , संख्याओं के साथ जुड़ी विचित्रताओं को प्रकट करती हैं फ्राँस के प्रथम सम्राट हेनरी 14 मई , 1209 को सिंहासन पर बैठे जबकि वहां के आखिरी सम्राट का नाम भी हेनरी 14 वा था 14 संख्या का महत्व सदैव बना रही। हेनरी द्वितीय ने 14 मई 1610 को उनकी हत्या कर दी गयी थी। जिस तारीख को एक को सिंहासन मिला, उसी को दूसरी 14 मई को मृत्यु का उपहार। वहाँ के अन्य सभी राजाओं के लिए 14 मई को ही फ्रांस का राज्य विस्तार किया। हेनरी तृतीय को 14 मई के दिन युद्ध के मोर्चे पर जाना पड़ा । हेनरी चतुर्थ ने आपबरी का युद्ध 14 मार्च , 1590 को जीता । 14 दिसम्बर, 1599 को सवा के ड्यूक ने अपने आपको हेनरी को आत्म-समर्पण किया। 14 तारीख को ही लार्ड डफिन ने लुई 13 वे के रूप में बपतिस्मा ग्रहण किया। हेनरी चतुर्थ के पुत्र लुई 13 वे की मृत्यु 14 मई, 1643 को हुई । लुई 14 वे 1643 में (1 +6+4+6=14) सिंहासन पर बैठे और 77 वर्ष (7+7=14) की आयु में उनकी मृत्यु हुई। लुई 15 का महत्व सदैव बना रहा। जर्मनी के शासक चार्ल्स चौथे ने अपने जीवन में चार की संख्या को अत्यधिक महत्व दिया। वह चार रंग की पोशाक को दिन में चार बार पहनते थे। चार प्रकार का भोजन , चार मेजों पर दिन में चार बार करते थे। चार प्रकार की शराब पीते थे। बग्घी में चार पहिए और चार ही घोड़े जुतते थे। उनके चार महत्व थे, उनमें चार-चार की दरवाजे और प्रत्येक महल में चार-चार कमरे प्रत्येक कमरे में चार-चार ही खिड़कियां। मृत्यु के दिन उनके समीप चार ही डॉक्टर उपस्थित थे उन्होंने चार बार “गुडवाय” कहा और ठीक चार बज कर चार मिनट पर इस संसार से विदा हो गये संयोगवश संयुक्त राज्य अमेरिका के इतिहास में 160 वर्षों से एक विचित्र परम्परा ही दिखाई पड़ती है। प्रति 20 वर्ष पर राष्ट्रपति की मृत्यु अपने की कार्यकाल में हो जाया करती थी। 1न्40 में 6न् वर्षीय विलियम हैरीसन राष्ट्रपति बनें। मार्च 1न्41 में निमोनिया से मृत्यु हो गयी। 1न्60 में लिंकन राष्ट्रपति बने और इनकी हत्या 1न्65 में हो गयी। 1न्न्0 में प्रेसीडेण्ट गारफील्ड राष्ट्रपति बने और अगले वर्ष गोली लगने के कारण मर गये। 1920 में प्रेसीडेन्ट हार्डिग ने कार्य भार सम्भाला । ये स्वाभाविक मृत्यु से 1923 में मर गये। 1940 में फ्रेंकलिन रुजवेल्ट राष्ट्रपति बने और 1945 आते-आते मर गये। 1960 में प्रेसीडेन्ट कैनेडी ने अपनी 1960 की मृत्यु के पूर्व तक राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। 1न्60] 1900] 1940 में चुने सभी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में मरे तो थे ही , सब दूसरी बार राष्ट्रपति कार्यकाल में थे। अमरीका के जिम विशप अपने तुलनात्मक अध्ययन से यह सिद्ध कर दिया है। कि जान एफ, कैनेडी ही अब्राहम लिंकन थे। चालीस वर्ष की आयु के लिंकन को राष्ट्रपति बनने की इच्छा हुयी थी, कैनेडी को भी। दोनों विश्व शान्ति के प्रयासों में संलग्न रहे और नीग्रो स्वतंत्रता को भी उन्होंने समान रूप से चाहा। लिंकन के चार बच्चे थे दो मर गये, दो उनके साथ रहते थे। कैनेडी के भी चार पुत्र हुये दो मर गये दो जीवित रहे। लिंकन की पहली पत्नी फैशनेबल थी, कविता व पेंटिंग में उसकी रुचि थी। ठीक इसी स्वभाव की पत्नी कैनेडी की थी । दोनों की आस्था धार्मिकता की ओर थीं भोजन में स्पर्श दोनों को प्रिय था। लिंकन 1861 में राष्ट्रपति बने तो कैनेडी 1961 में । लिंकन के प्राइवेट सेक्रेटरी का नाम था कैनेडी और कैनेडी काकन । दोनों की मृत्यु शुक्रवार के दिन हुई। दोनों ही गोली के शिकार हुये और जान्सन नामक उपराष्ट्रपतियों ने ही दोनों का पद सम्भाला। साइप्रस के शासनाध्यक्ष मकरिआस के जीवन में 13 का अंक कुछ उसे की संयोग लाता रहा। 10 अगस्त, 1913 को उनका जन्म हुआ। 13 वर्ष की आयु में चर्च में भर्ती हुये। 13 नवम्बर , 1946 में उन्होंने प्रीस्ट दीक्षा ली। 13 जून, 1948 में विशप बने तथा राजगद्दी पर बैठे। 13 मार्च, 1951 में यूनान के राजा ने उनका अभिनंदन किया 13 दिसम्बर 1951 को वे राष्ट्रपति चुने गये। भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व लाल बहादुर शास्त्री के जीवन में मंगलवार का विशेष महत्व रहा। बचपन में एक बार वे गंगा में डूबते डूबते बचे वह दिन भी मंगलवार था। यू0 पी0 पार्लियामेन्टरी बोर्ड के मंत्री 1947 में पुलिस एवं यातायात मन्त्री 1951 में रेलमंत्री 1957 में परिवहन मन्त्री आदि पद उन्होंने मंगलवार के दिन ही प्राप्त किये। यहाँ तक कि वे प्रधानमंत्री भी मंगलवार को ही बने। मंगलवार को ही उन्हें स्व राधाकृष्णन ने भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया। ताशकन्द वार्ता भी उन्होंने गलवार को प्रारम्भ की और अन्त में उन्होंने अपना पार्थिव शरीर भी मंगलवार के दिन छोड़ा आयरलैण्ड के क्रुक हैवेन शहर में एक ही मकान में रहने वाले दो दम्पत्तियों के एक की दिन कुछ मिनटों के अन्तर से दो पुत्र पैदा हुए। नाम रखा गया एलेनर गेड़ी तथा पैट्रिक। दोनों बच्चे अलग-अलग खेलते किन्तु एक दिन दोनों रोते-रोते घर पहुंचे ते उनके माता-पिता ने देखा कि दोनों के पैर में एक ही स्थान पर चोट लगी थी। दोनों बच्चे पढ़ रहे थे तब कई बार ऐसा हुआ कि दोनों को परीक्षा में समान अंक मिले। दोनों का विवाह एक साथ तय हुआ। शादी के बाद पहला बच्चा भी दोनों के एक ही दिन हुआ। प्रेरिक और ऐलेनर 16 वर्ष की आयु में एक ही दिन बीमार पड़े और साथ ही मृत्यु भी दोनों की एक ही समय में हुयी ।इन घटनाओं से आयरलैण्ड के शिक्षित व्यक्ति भी इस बात को मानने लगे। कि कोई एक सार्वभौमिक सत्ता व नियम सृष्टि में अवश्य काम कर रहा है। उपरोक्त सारे प्रमाण बताते हैं कि कुदरत का खेल विचित्र और बड़ी पहेलियों से भरा -पूरा हैं ।


संघर्ष नहीं, सहयोग पर टिकी है यह सृष्टि

सृष्टि में संघर्ष का नहीं, सहयोग का अस्तित्व है। संघर्ष से तो अराजकता, अव्यवस्था फैलाती और विकसित जातियाँ भी पतन के गर्त में मिल जाती है। सतत् लड़ने -मरने पर उतारू जातियाँ आपस में ही भिड़कर समाप्त हो जाती है। इस तथ्य को प्राणी जगत के पिछले इतिहास के विकास एवं अवसान की घटनाओं के अध्ययन से भी भाँति समझा जा सकता है। मनुष्येत्तर जीवों की कितनी ही बलिष्ठ एवं समर्थ जातियाँ केवल इस कारण लुप्त हो गई कि उनमें मरने -मारने की हिंसात्मक प्रवृत्ति अधिक थी। उन्होंने आपस में ही लड़कर अपना अस्तित्व समाप्त कर लिया। पूर्वकाल में सशक्त एवं सामर्थ्य की दृष्टि से एक से बढ़कर एवं जीव थे पर उनके आपसी संघर्ष ने उन्हें जीवित नहीं रहने दिया, ‘डायनोसौर विशालकाय जीव था। ‘डिप्लोडोकस’ नब्बे फीट लम्बा था। ‘ब्रेकियो सेरस’ का वजन पचास टन था तथा ऊँचाई बीस फीट थी, जो लगभग मकान की दूसरी मंजिल तक ऊँचा दिखाई पड़ता था। डायनोसौर के शरीर की लम्बाई बीस फीट तथा दाँत की 6 फीट थी। ये सभी ‘सरीसृप समुह’ के नाम से विख्यात थे तथा सारे भूमण्डल पर छाये हुए थे। इनमें से कुछ पानी में कुछ पृथ्वी पर तथा कुछ आकाश में भी उड़ने वाले जीव थे। शक्ति की दृष्टि से ये महादानव थे, किन्तु आपसी संघर्ष के कारण लुप्त होते चले गये। कुछ तो परिस्थितियों की प्रतिकूलता नहीं, आपसी सहयोग का अभाव था। एक तो वातावरण की प्रतिकूलता-दूसरे संघर्ष की प्रकृति - दोनों में सम्मिलित प्रहार ने उनका अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। विकासवादी एकमात्र इसका कारण परिस्थितियों को बताते हैं पर इसे पूर्णतया सही नहीं माना जा सकता है। वैज्ञानिक शोध इस बात की प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जीवों में विषम से विषम स्थिति में सामंजस्य स्थापित करने की अद्भुत सामर्थ्य विद्यमान है। स्पष्ट है कि आपसी सहयोग रहा होता तो विषमताओं में भी अपना आस्तित्व सुरक्षित रखा जा सकता था, किन्तु ऐसा सम्भव न हो सका। जबकि शक्ति-सामर्थ्य की दृष्टि से नगण्य जीव आपसी सहयोग के कारण जीवित बने रहे। मनुष्य का स्वरूप भूत में जो भी रहा हो पर यह तो सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उसमें आपसी सहयोग सहकार की प्रवृत्ति थी, उसी कारण उसने अपना अस्तित्व बनाए। रखा। अपनी इस विशेषता के कारण वह न केवल समूह रूप में सुरक्षित रहा वरन् प्रगति के सोपानों पर क्रमशः चढ़ता गया। तर्कशील इस प्रगति को बुद्धि एवं विचारशीलता की परिणति कहकर सन्तोष कर सकते हैं। पर तथ्य यह है कि सहयोग एवं सहकार रूपी विचारशीलता ने ही उसे वर्तमान स्थिति तक पहुँचाया हैं। अन्य जीवों की तरह मनुष्य ने भी संघर्ष को ही महत्व दिया होता तो वह भी आपस में लड़-मरकर समाप्त हो गया होता। विकासवाद के जनक ‘डार्विन’ ने जीवन के लिए संघर्ष का जो सिद्धान्त दिया, उसका अर्थ संकुचित रूप में लिया गया। इस सिद्धांत की समग्रता भी तभी बनती है जब उसे स्थूल संघर्षों के अर्थ में नहीं जीवन संघर्ष एवं विकास के लिए सतत् प्रयास के रूप में लिया जाय। संघर्षों का व्यापक अर्थ यह है कि “विभिन्न प्राणी एवं मनुष्य मजबूत एवं समर्थ बनें। यह तथ्य स्थूल कम सूक्ष्म अधिक है। तात्पर्य व्यक्ति से नहीं परिस्थिति से है।” डार्विन ने स्वयं भी यह सिद्धान्त स्वीकार किया है कि “प्राणियों का अस्तित्व परस्पर एक-दूसरे के ऊपर निर्भर है। “व्याख्याकारों ने इसका अर्थ संघर्ष के रूप में लिया तथा कहा कि अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए शक्तिशाली जीव असमर्थों को समाप्त कर देते हैं। परिस्थितियों की महत्ता प्रतिपादित करने की दृष्टि से सम्भव है। ‘डार्विन’ ने भी इस सिद्धान्त को संकुचित अर्थों में प्रयुक्त किया हो, पर वह एकपक्षीय एवं एकाँगी है। उसे शाश्वत सिद्धान्त के रूप में तो तभी स्वीकारा जा सकता है। जबकि वह सर्वत्र शाश्वत सत्य के रूप में लागू होता है। जीवन संघर्ष का अर्थ आपसी टकराव से नहीं था। इसकी पुष्टि स्वयं डार्विन ने ‘मनुष्य’ का अवतरण ‘ नामक पुस्तक में की है। वे लिखते हैं कि “विकास के क्रम में असंख्य प्राणी समूहों में पृथक्-पृथक् प्राणियों का आपसी संघर्ष मिट जाता है- संघर्ष का स्थान सहयोग ले लेता है। और इसके फलस्वरूप उनका बौद्धिक एवं नैतिक विकास होता है। इस विकास से ही उन प्राणियों का अस्तित्व बने रहने के लिए अत्यन्त अनुकूल अवस्था पैदा होती है।’ ‘सरवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट’ की व्याख्या करने हुए डार्विन इस पुस्तक में स्वयं कहते हैं कि “ऐसे समुदायों में योग्यतम वे नहीं कहे जाते जो सबसे अधिक बलवान या चालाक है, वरन् समर्थ वे है, जो अपने समाज के हित के लिए-निर्बल एवं बलवान सभी कि शक्ति को इस तरह संगठित करना जानते हों कि वे एक - दूसरे के पोषक हों । जिन समुदायों में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखने वाले प्राणियों की अधिकता होगी , वे ही सबसे अधिक उन्नत होंगे और फूले-फलेंगे । “वर्तमान समाज के विशद् अध्ययन से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। कि उनके परस्पर स्नेह-सहयोग एवं सहकार की भावना ने ही उन्हें उस स्तर तक बढ़ाया है। “अविकसित, पिछड़ी, असभ्य जातियों का गहराई से अध्ययन करने पर एक ही तथ्य

हाथ लगता है कि पिछड़ेपन का एकमात्र कारण है- आपसी सहयोग, स्नेह एवं सहकार का अभाव। जो पशु अपना अस्तित्व बनाए हुए है, उनका कारण भी उनकी सहयोग भावना है रूसो का कहना है कि “प्रकृति में प्रेम, शान्ति और सहयोग कूट-कूटकर भरा है। पशुओं को इन प्रवृत्तियों से रहित समझने वाले व्यक्तियों को जंगलों का पर्यवेक्षण करना चाहिए। उनकी यह विचारधारा निर्मूल सिद्ध होगी कि पशुओं में सामाजिकता का अभाव है।”डार्विन के सिद्धान्त की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या रूसी प्रोफेसर ‘केसलर’ ने की है। उन्होंने माना है कि “ सहयोग प्रकृति का नियम और विकास का मूल अंग है। “ जनवरी 1770 में अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व रूसी प्रकृतिवादियों के समक्ष उन्होंने अपने ये विचार व्यक्त किए थे। जीवन संघर्ष के सिद्धान्त का दुरुपयोग होते देखकर ‘केसलर’ ने उसका वास्तविक स्वरूप जन - सामान्य के समक्ष रखना अपना कर्त्तव्य समझा । उनका कहना था कि “प्राणी शास्त्र और मनुष्य सम्बन्धी अन्य दूसरे शास्त्र सदा उस नियम पर जोर देते हैं, जिसे वे अपनी भाषा में जीवन संघर्ष का निष्ठुर नियम कहते हैं, ऐसे व्यक्ति एक-दूसरे नियम के अस्तित्व को भूल जाते है, जिसे हम पारम्परिक सहयोग का नियम कह सकते हैं। प्रो. केसलर ने बताया कि “ किस प्रकार वन्य प्राणी भी परस्पर सहकार की भावना से समूहों में रहते, बच्चे पैदा करते तथा उनके लिए व्यवस्था जुटाते हैं। एक साथ रहने पर वे अपने साथियों का सहयोग भी करते हैं। अपने भाषण के अन्त में प्रो. केसलर ने कहा कि “ मैं जीवन संघर्ष के अस्तित्व से इन्कार नहीं करता, किन्तु मेरा कहना यह है कि पारस्परिक संघर्ष द्वारा नहीं बल्कि सहयोग द्वारा प्राणी संसार एवं मानव जाति का विकास सम्भव हुआ है। प्राणियों की दो प्रमुख आवश्यकताएँ है। एक तो भोजन प्राप्त करना, दूसरा अपनी जाति की वृद्धि करना। इसमें पहली आवश्यकताएं संघर्ष को जन्म देती है जबकि दूसरी परस्पर सहयोग के लिए प्रेरित करती है। किन्तु मेरा विश्वास है कि विकास के लिए दूसरी कही अधिक महत्वपूर्ण एवं शाश्वत है। प्रो. ‘केसलर’ के विचारों का उल्लेख रूस के प्रसिद्ध विचारक ‘प्रिस क्रोपाअकिन’ के प्रसिद्ध पुस्तक ‘संघर्ष नहीं सहयोग में किया है जीवन संघर्ष की तथाकथित व्याख्या पर व्यंग्य करते हुए वे लिखते हैं कि “ में अपने मित्र प्राणि विशेषज्ञ ‘ पोलियोकोफ के साथ साइबेरिया के घने जंगलों में गया। डार्विन के सिद्धान्त का हम दोनों पर नया-नया असर था हम दोनों यह आशा लगाये बैठे थे कि हमें एक ही जाति के प्राणियों में तीव्र प्रतिस्पर्द्धा देखने को मिलेगी, किन्तु वहाँ इसका कोई नामोनिशान नहीं था। जीवन में संघर्ष की स्थिति आती है, इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता किन्तु वह सृष्टि के सिद्धान्त का रूप नहीं ले सकता। हिंसक जीवों से लेकर चोर, डाकुओं, आततायियों से सामना करने के लिए संघर्ष का रास्ता अपनाना पड़ता है यह उचित है और आवश्यक भी। पर यह अपवाद है। आपत्तिकालीन परिस्थितियों में ही इसका अवलम्बन लिया जाता है। संघर्ष जीवन का ‘दर्शन’ नहीं बन सकता। यदि होगा भी तो अन्तः दुष्प्रवृत्तियों के लिए। अपनी दुष्प्रवृत्तियों से भी तो मनुष्य को सतत् लड़ना होता है। परिस्थितियों के अनुकूलन के लिए भी अथक प्रयत्न करना होता है। चाहें तो इसी को जीवन संघर्ष की संज्ञा दी जा सकती है, किन्तु यही जब बाह्य जीवन में अपने सजातियों के प्रति प्रकट होने लगेगा तो भारी संकट उत्पन्न हो जायेगा। उस स्थिति की कल्पना करें कि संघर्ष को जीवन का सिद्धान्त मानकर हर व्यक्ति अपनाने लगे तो कैसी स्थिति होगी? निश्चित ही “जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली” उक्ति चरितार्थ होगी।’ मत्स्य न्याय’ की यह परम्परा मनुष्य को पाषाण युग के आदमखोर मनुष्य के तुल्य बना देगी और कुछ दिनों में सभ्यता लड़ - मरकर समाप्त हों जायेगी। पारिवारिक जीवन में यह परम्परा चल पड़े तो स्नेह, आत्मीयता के पावन सूत्रों में बंधे रिश्तों को टूटते देर न लगेगी जो शारीरिक दृष्टि से बलवान होगा, वह कमजोरों पर अपना स्वार्थ साधने के लिए अनेकों प्रकार के अत्याचार करेगा। ‘संघर्ष’ के जीवन दर्शन बन जाने पर कौन माँ निरीह बच्चों का, कौन पिता अनाथ सदस्यों का पालन-’पोषण करेंगे? बच्चे की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देने वाली माँ क्यों कर यह उदात्त त्याग करेंगी? समाज के प्रगति एवं सुव्यवस्था आपसी सहयोग एवं सहकार पर टिकी हुई है। संघर्ष यदि सफलता का आधार बन जाये तो सामाजिक व्यवस्था को विश्रृंखलित होते देन न लगेगी। अनीति, अत्याचार से शरीर बल से हर व्यक्ति अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न करेगा। नैतिक पुरुषार्थ की कोई महत्ता न होगी। फलतः प्रगतिशील मानव समाज की भी वही दुर्दशा होगी जो विलुप्त जीवों एवं आदिम जातियों की हुई स्पष्ट है कि अस्तित्व संघर्ष का नहीं सहयोग का है- सहकार का है। मनुष्य जाति को, सभ्यता एवं संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए जीवन-दर्शन के रूप में सहयोग एवं सहकार को स्वीकार करना होगा न कि संघर्ष को। जीवों के विकास एवं अवसान के तथ्यों के पर्यवेक्षण से भी यही तथ्य स्पष्ट होता है कि जिनमें यह प्रवृत्ति जितनी अधिक रही वह उतना ही आगे बढ़ते गये और प्रगति के उच्चतम सोपानों पर चढ़ते गये। सहयोग एवं सहकारिता रूपी उत्कृष्ट जीवनदर्शन की विचारशील मनुष्य जाति को अपनाना ही होगा। तभी वह अपना अस्तित्व अक्षुण्ण बनाये रख सकती है।


बिना परिश्रम का धन - शैतान का

आँख मलते हुए उसने पलकें झपकाई। उसके चेहरे पर अभी भी भय और आश्चर्य मिश्रित भाव थे वह हड़बड़ा कर उठा और लगभग दौड़ते हुए बुढ़िया की चारपाई तक पहुँचा। पास पहुँचकर वह सहम गया, बुढ़िया की बेजान आंखें उसे घूर रही थी। वह अब इस दुनिया में नहीं थी। बरसों का साथ एकाएक छूट जाने पर उसकी आँखें बरस पड़ी। रात समाप्त होने के थी। उसने चारों ओर देखा, उसके जहन पर अभी भी सपने का असर था। अपने का एक हिस्सा सच होने की वजह से वह सोचने के लिए विवश था, की दूसरा हिस्सा भी सच होगा। बुढ़िया की लाश दफनाने की फिक्र थी। इसलिए पादरी के पास गया। पादरी ने जब बूढ़े का दुःख सूना तो पहले चुप रहा। फिर बोला- “तुम्हारे पास रुपये है?” “मैं गरीब हूँ फादर।’ हाथ जोड़कर लगभग गिड़गिड़ाते हुए उसने वाक्य पूरा किया-”मेरे पास इस समय एक भी पैसा नहीं है।” “मुझे अभी फुर्सत नहीं हैं, तुम चले जाओ।” इतना कहकर पादरी ने दरवाजे बन्द कर लिए। बेचारे बूढ़े ने कब्रिस्तान का रास्ता पकड़ा और कुदाल से स्वयं कब्र खोदने में जुट गया। अचानक बूढ़े की कुदाल एक घड़े से टकराई बूढ़ा चक्कर में आ गया। उसे ऐसा लगा जैसे घड़े से उठने वाली टन्न की आवाज घड़े से न उठकर उसके मस्तिष्क से उठी हो। उसने मिट्टी हटाई। देखा तो सोने की अशर्फियों से भरा घड़ा रखा है। वह खुशी से फूला न समाया। उसने सोचा कि अब उसकी बुढ़िया बहुत अच्छे ढंग से दफना दी जाएगी । वह पादरी ओर रिश्तेदारी को दावत भी दे सकेगा। बस उसने झटपट उस घड़े को उठाया और घर लौट गया। जेब में दस अशर्फियाँ डाल जी, बाकी छिपाकर रख दी। उसके देखे गए स्वप्न को दूसरा अंश भी सही था। वह फिर से पादरी के पास गया। पादरी तो पहले उसे देख कर झल्लाया लेकिन उसके हाथ में अशर्फियों की चमक देखकर उसकी आवाज कोमल हो गयी। वह तुरन्त उस बूढ़े के साथ जाने के लिए तैयार हो गया। सोचा, इतना धन तो बड़े-बड़े धनवानों को दफनाने पर भी नहीं मिलता। बुढ़िया को दफनाए जाने के बाद बूढ़े ने सभी को दावत दी । भोजन करते समय पादरी सोच रहा था कि इस बूढ़े के पास इतना धन आया कहाँ से? इसलिए जैसे ही सब भोजन करके चले गए। उसने उस बूढ़े को अकेले में बुलाकर पूछा-”तुम्हारे पास अचानक इतना धन आया कहाँ से? यदि तुमने सारी बाते सच-सच नहीं बताया तो में तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूँगा।” इस धमकी से बूढ़ा घबरा गया। उसने अशर्फियों से भरा घड़ा मिलने की बात सच-सच बता दी। पादरी के मन में चैन न था। वह बूढ़े के मन में चैन न था। वह बूढ़े के स्वप्न के अन्तिम हिस्से का लाभ उठाने की फिराक में था। आखिर उसने एक तरकीब सोची और रात होने का इन्तजार करने लगा। पादरी के पास एक बूढ़ा बकरा था। रात होते ही उसने बकरे को मार डाला फिर उसकी खाल, सींग और दाढ़ी निकाली। खाल को ओढ़कर पत्नी से बोडडडडडडड कि उसे सुई’ डोरे से सिल दे। इसके बाद बकरे के सींग अपने सिर पर लगाए। उसकी दाढ़ी के बाल अपनी दाढ़ी में लगाए। अब वह भयानक शैतान की शक्ल का दिख रहा था। अपनी शक्ल की भयानकता से सन्तुष्ट होकर वह बूढ़े के घर जा पहुँचा। दरवाजा खटखटाते ही पादरी की तरकीब से अनजान बूढ़े ने किवाड़ खोल दिए। उसके होश-हवास गुम हो गए। उसने बड़ी हिम्मत करके पूछा-”तुम कौन हो?” “शैतान”- पादरी ने अपनी आवाज को खौफनाक बनाते हुए कहा-”तुम मेरा धन लेने आए हो। मैंने तुम्हारी गरीबी पर दया की थी। साया धन इसलिए दिखाया था कि आवश्यकतानुसार तुम ले सको पर तुम ठहरे लालची, तुमने सारा का सारा हड़प कर लिया। अब तुम्हारा काम हो गया मेरा धन वापस कर दो। “ बूढ़ा की आंखें के सामने अपना बीता हुआ समय नाच गया। जिसमें उसने एक देवदूत को देखा जो उसे बता रहा था कि “ तुम्हारी बुढ़िया का समय समाप्त हो गया, में उसे लेने आया हूँ। इसे जब तुम दफनाने जाओगे, तो तुम्हें सोने की अशर्फियों से भरा घड़ा मिलेगा पर तुम इसे मत लेना, क्योंकि जो धन बिना मेहनत किए मिलता है वह शैतान का होता है बूढ़े ने कांपते हाथों से सोने से भरा घड़ा उठाया और पादरी को थमा दिया। उसे देवदूत की चेतावनी सच्ची लगी। पादरी इतना धन पाकर बहुत खुश हुआ। वह घर आकर पत्नी से बोला कि उसकी खाल के टाँके काट दे। पत्नी ने जैसे ही चाकू चलाया तो पादरी चिल्ला पड़ा। क्योंकि अब तक खाल शरीर से चिपक चुकी भी। जिस जगह से काटा गया था वहाँ से खून बहने लगा था। दोनों बड़े हैरानी में पड़ गये। उन्होंने खाल निकालने की बहुत कोशिश की , पर सफल न हुए। मजबूरन पादरी को उसी शक्ल में रहना पड़ा गाँव में सभी को यह बात मालूम हो गयी। पादरी ने बूढ़े को धन वापस करना चाहा, परन्तु उसने शैतान का धन कहकर वापस लेने से इन्कार कर दिया। पादरी को भी अब यह बात समझ में आ गयी थी कि बिना मेहनत किए मिलने वाला धन शैतान का होता है। उसे अपनी करनी पर पछतावा हो रहा था, गाँव के लोग भी उसे बुरा - भला कर रहे थे।


जरा ईश्वर पर विश्वास करके तो देखे

ब्रिटेन निवासी बावन वर्षीय थायर नामक महिला की परमात्मा में गहरी आस्था थी। वह धर्म के कार्यों में पूरी श्रद्धा के साथ लगी रहती थी । अपने शारीरिक स्वास्थ्य के परीक्षण के लिए वह हर वर्ष डॉ0 विलियम ए॰ नोलेन के पास पहुंचती थी। नवम्बर माह के एक दिन वह अपने चिकित्सक के पास निदान के लिए पहुँची । डॉक्टर को धर्म में किसी प्रकार की श्रद्धा न होने पर भी वह एलेन के आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित था। डॉ0 नोलेन को अन्य शारीरिक परीक्षणों के उपरान्त मलाशय के परीक्षण में यह संदेह हुआ कि एलन को एक विशेष प्रकार का कैंसर हो सकता है। मलाशय में उस तरह के ट्यूमर का उभार भी मौजूद भा, उस उभार का एक छोटा-सा टुकड़ा काटकर उसे हिस्टोपैथालाफजिकल परीक्षण के लिए भेजा। रिपोर्ट के लिए तीन दिन बाद वापस आने के लिए चिकित्सक ने परामर्श दिया। तीन दिनों बाद पैथोलोजिस्ट की रिपोर्ट आयी, जिसका निष्कर्ष था कि उभार एक प्रकार के असाध्य कार्सीनाइड नामक ट्यूमर का है। जो प्रायः आमाशय छोटे आँत अथवा बड़ी आँत पैदा होता है। जबकि एलेन के केस में वह मलाशय में उत्पन्न हुआ था। डॉ0 विलियम ने बिना किसी संकोच के एलेन थाँयर को कैंसर एवं उसकी प्रकृति के विषय में विस्तृत रूप में बता दिया। साथ ही यह चेतावनी भी दे दी कि शीघ्र उपचार की व्यवस्था बनायी नहीं गयी तो यह ट्यूमर पूरे मलाशय में तुरन्त फैलकर अधिक गम्भीर संकट खड़ा कर सकता है। तथा जान तक ले सकता है। ऑपरेशन की निर्धारित तिथि को प्रातः डेढ़ बजे फोन द्वारा डॉ0 नोलेन को पता चला कि श्रीमती एलेन वहीँ भर्ती है। तथा छाती के तेज दर्द से परेशान है। दर्द एवं सोने की तेज दवा देने का भी कुछ परिणाम नहीं निकला है। तुरन्त आने को कह कर डाक्टर ने टेलीफोन का चोंगा रख दिया। हॉस्पिटल बेड पर पड़ी श्रीमती एलेन दर्द की पीड़ा से छटपटा रही थीं डाक्टर को देखते ही उनके होठों पर हल्की मुस्कान तैरने लगी। दर्द के विषय में पूछे जाने पर एलेन ने बताया कि इस तरह की पीड़ा जाने पर एलेन ने बताया कि इस तरह की पीड़ा पहले कभी नहीं हुई थी। यह प्रथम अवसर है। हृदय एवं फेफड़े की गति और लय को सुनने के बाद डॉ0 विलियम पाया कि फेफड़े की सतह पर द्रव्य एकत्रित होता जा रहा है। जो हाट्र फैल्योर को जन्म दे सकता है। हृदय की धड़कन 70 प्रति मिनट से बढ़कर 100 प्रति मिनट हो गयी थी, जबकि रक्तचाप सामान्य दर 130 । 74 से घटाकर 72। 57 हो गया था। ये सभी संकेत इस बात के प्रमाण थे कि स्थिति ठीक नहीं है। इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम मशीन द्वारा इ0 सी0 जी0 लेने पर भी इसकी पुष्टि हुई।

यह स्थिति देखकर डॉक्टर ने ऑपरेशन का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम बदल दिया तथा प्रस्तुत हुए नये संकट को दूर करने के लिए हृदय की गति सामान्य लाने के लिए दवाएं तथा श्वासावरोध के लिए ऑक्सीजन दी। उन्होंने पूरी तरह आराम करने का परामर्श एलेन को दिया। कुछ ही दिनों में एलेन की हालत सामान्य हो गयी। हृदय एवं फेफड़े सामान्य ढंग से कार्य करने लगे। दो सप्ताह बाद परीक्षण हेतु आने पर डॉ0 विलियम ने ऑपरेशन करने पर उसके पूरी शरीर में फैलने व मृत्यु तक होने की बात कही। इस पर श्रीमती एलेन बोली - “डॉक्टर । मुझे ऐसा लगता है कि अब ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी। परमात्मा की कृपा से मैं अब अच्छी हो जाऊँगी । “लगता है। भगवान ने बड़ी आपदा को छोटे में बदलकर नया जीवन दे दिया है।” डॉक्टर को यह मालूम था कि श्रीमती एलेन एक धर्मनिष्ठ महिला है। तथा उनकी ईश्वर के प्रति गहरी आस्था है। सम्भव है भावातिरेक में वे ऑपरेशन कराने से इन्कार कर रही हों यह सोचकर उन्होंने निर्णय दो दिन बाद के लिए छोड़ दिया। पर डॉक्टर विलियम को यह अच्छी तरह मालूम था कि बिना उपचार के यह कैंसर का ट्यूमर किसी भी तरह गल नहीं सकता। दो सप्ताह बाद श्रीमती एलेन डॉ0 विलियम के पास पुनः परीक्षण के लिए पहुँची । पहुँचते ही उन्होंने कहा-”डाक्टर । मैं अब पूरी तरह स्वस्थ और नीरोग अनुभव कर रही हूँ तथा मुझे लगता है मलाशय का वह ट्यूमर भी अब समाप्त हो गया है। “शुरू में तो डॉक्टर ने उनके इस कथन को वहम मात्र माना, पर उस समय आश्चर्य का ठिकाना न रही जब परीक्षण के उपरान्त ट्यूमर का कही कोई नामोनिशान न मिला। आश्चर्यचकित डॉक्टर से एलेन बोली” यह ईश्वर की कृपा का प्रतिफल है। हृदय रोग के रूप में मुझे किसी अपने अविज्ञात बुरे कर्म का दण्ड मिल गया। मुझे संकेत मिल गया था कि उसकी सहायता अवश्य मिलेगी। यह सब उसका ही चमत्कार है। डॉ0 विलियम ने अपने संस्मरणों में लिखा है- “किसी ईश्वरीय सत्ता में विश्वास न होते हुए भी मैंने उस धर्मनिष्ठ महिला की प्रार्थना की शक्ति को स्वीकार न करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया। उस महिला का हँसता-मुस्कुराता चेहरा जब कभी भी मैं देखता हूँ तो सोचता हूँ कि अपने वैज्ञानिक तथ्यों का मुझे एक बार नये सिरे से विश्लेषण करना चाहिए तथा उस विश्वास को पाने का प्रयत्न करना चाहिए। जिसके द्वारा उक्त महिला ने असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया। “


देखिए भविष्य की झाँकी स्वप्नों के माध्यम से

स्वप्न यों तो सभी को आते हैं, पर जन-सामान्य को दिखाई पड़ने वाले सपनों में से अधिकाँश में अचेतन मन का भटकाव ही रहता है। ऐसे सपनों के दृश्य बेसिर-पैर के, औंधे-सीधे होते हैं। जिनमें किसी प्रकार की क्रमबद्धता का सर्वथा अभाव होता है किन्तु यदि भावनाओं को थोड़ा भी परिष्कृत-परिमार्जित कर लिया जाय तो सार्थक और उच्चस्तरीय स्वप्नों को देखा व स्मरण रखा जाना सम्भव हैं जिनमें अनागत भविष्य की महत्वपूर्ण सूचनाएँ निहित हों ‘अण्डरस्टैडिंग ह्ममैन विहेवियर’ के ग्यारहवें खण्ड के ‘टुमारे टुडे’ शीर्षक के अंतर्गत देश-विदेश के अनेकों मूर्धन्य मनीषियों के ऐसे कितने की विवरण छपे है। जिनने अनागत भविष्य की संभाव्य घटनाओं को प्रत्यक्ष देखा था। जो यथार्थता की कसौटी पर बाद में सही उतरी। ऐसे व्यक्तियों में निष्णात् इंजीनियर व कुशल ब्रिटिश यान चालक जे0 डब्ल्यू0 डुने प्रख्यात है, जिन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एन एक्सपेरीमेंट विद टाइम’ में ऐसे अगणित घटनाक्रमों का उल्लेख किया है। एक स्थान पर इस पुस्तकें में उन्होंने लिखा हैं कि एक बार जब वे बोअर युद्ध के दौरा दक्षिण अफ्रीका में नियुक्त थे, तो रात को एक नाटकीय स्वप्न देखा। ऐसा लगा कि वे एक पहाड़ी ढलान पर खड़े -खड़े ऐसे ज्वालामुखी को देख रहे है, जो फटने ही वाला है। इस भीषण नरसंहार का अनुमान कर वे चिल्ला-चिल्ला कर लोगों को संचेत करने लगे और तुरन्त ही फ्रांसीसी अधिकारियों से उनकी सहायता की अपील की। उन्हें अन्यत्र ले जाने के लिए वायुयान भेजे जाने का आग्रह किया। इसी बीच उन्होंने देखा कि इस भयंकर प्राकृतिक आपदा से लगभग चाह हजार लोगों की जानें चली गई । अनेक लोग अपंग-अपाहिज बन गये । बच्चों के करुण-क्रंदन और बड़ों के आर्तनादयुक्त चीत्कार से इस मध्य उनकी आँखें खुल गई। इस प्रकार की अनेक घटनाओं को ‘डूने ड्रीम्स’ नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में उन्होंने संकलित किया है, जिसका प्रकाशन प्रथम बार सन् 1930 में हुआ। जब यह पुस्तक समकालीन ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक डॉ0 जे0 सी0 बार्कर के हाथ लगी, तो वे पढ़ने के बाद उनके तार्किक मन में इस प्रकार के विचार कुलबुलाने लगे कि जब भावी घटनाओं का पूर्वाभास समय रहते ही मिल जाता है, तो क्या मानवीय प्रयासों द्वारा इस माध्यम से जन-धन की हानि टाली जा सकना संभव नहीं? और यदि शक्य है तो ऐसे प्रयास क्यों न किये जाये? इस प्रकरण पर उन्होंने गंभीरतापूर्वक विचार किया। चूँकि डॉ0 बार्कर को भी डूने जैसे ही सपने आते थे और उनमें से अधिकाँशतः सही सिद्ध होते थे इसलिए भी डॉ0 बार्कर ने इस दिशा में विशेष रुचि दिखायी। घटना सन् 1933 की है। रात्रि में डॉ0 बार्कर ने एक लोक हर्षक विभीषिका का रोमाँचक दृश्य देखा। वेल्स क्षेत्र की गगनचुम्बी पर्वतमालाओं की उपत्यिका में बसा एक गाँव काई लगे बृहद् शैलखण्डों के यकायक स्खलन होकर लुढ़क पड़ने के चपेट में आ गया हैं खण्डहर हुए मकानों की छतों छप्परों के नीचे दबकर अगणित लोगों की जानें चली गई । तराई क्षेत्र में चल रहें विद्यालय के लगभग सभी छोटे-बड़े बच्चे इस प्राकृतिक आपदा में धराशायी हो गये। बच्चों की असहाय हृदयस्पर्शी करुण चीत्कार से यकायक वे जग पड़े। सींचने लगें आज इस स्वर्ण अवसर को हाथ से जाने न दूँगा। बचाव का जितना प्रयत्न संभव हो सकेगा, करूंगा। इससे जहाँ एक ओर जान-माल की क्षति को रोका जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर ऐसी महत्वपूर्ण सूचनाओं का लाभ व्यक्ति और समाज को मिलते रहने से वे स्वप्न की साक्षातता को समझ सकेंगे और भविष्य में उन्हें झुठलाने , इनकी उपेक्षा करने की बजाय समय रहते चेत कर इनका फायदा हस्तगत कर सकेंगे । “इसी उधेड़बुन में प्रातः हो चला। सूर्य निकालते ही लन्दन के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक पत्र ‘इंवनिंग स्टेंडर्ड’ के प्रातः संस्करण के मुख पृष्ठ पर सुर्खियों में ‘वार्निंग इम्पीडियेट क्लीयरिंग हाउस, उवर्टिग कैलोसिटी’ शीर्षक के अंतर्गत सनसनी खेज सूचना प्रकाशित करायी। पर होनी को टाला नहीं जा सका। दुर्भाग्य से समाचार पत्र उस दिन उक्त क्षेत्र में समय पर नहीं पहुँच सका। जब पहुँचा तब तक काफी देर हो चुकी थी। फिर भी सूचना मिलते ही लोग माल-असबाब के साथ सुरक्षित क्षेत्र की ओर भागने लगे। घटना ठीक अपने निश्चित समय में घटी, जिसमें काफी प्रयासों के बाद भी बहुतों की जान गई। ‘स्वप्न संकेत द्वारा बचाव’ - इस विद्या के प्रणेता डॉ0 बार्कर स्वयं भी इस घटना के दौरान ग्रामीणों की सुरक्षा -व्यवस्था करने में अपनी जान गँवा बैठे। इस प्रकार अनागत भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के नियन्त्रण और फेरबदल काने जैसे अति महत्वपूर्ण शोध कार्य को और आगे नहीं बढ़ाया जा सका। इसी विपदा ने इस शोध कार्य का पटाक्षेप कर दिया। इसी प्रकार क्लीवलैण्ड के जुलियस डिटमैन ने एक बार स्वप्न देखा कि निकटवर्ती बाँध अचानक टूट गया है और बड़ी संख्या में उस क्षेत्र में जान-माल की क्षति हुई है। वह स्वयं भी उसकी चपेट में आ गया है एवं डूबता - उतरता पानी में बहा जा रहा हैं हाथ पैर थक कर चूर हो गये और अब वह डूबने ही वाला हैं इस घबराहट की स्थिति में उसकी नींद खुल जाती हैं तब प्रातःकाल होने की वाला था। थोड़ी देर ओर रुककर बाँध अधिकारियों से डिटमैन ने अपने सपने की बात बतायी। चार अधिकारी अविलम्ब बाँध के निरीक्षण के लिए निकल पड़े। निरीक्षण के दौरान बाँध के एक जगह उन्हें एक बड़ा सुराख नजर आया, जिससे पानी बड़ी तेजी से बाहर निकल रहा था। तुरन्त स्थानीय लोगों को इसकी सूचना दे दी गई और किसी सुरक्षित स्थान में चले जाने को कहा गया। इधर सुराख को बन्द करने का प्रयास किया जाने लगा, पर सारी प्रयत्न निरर्थक साबित हुए। सुराख का आकार निरन्तर बढ़ता हो चला जा रहा था। जब जलप्रवाह को रोकना और सुराख बन्द करना हर प्रकार बेकाबू सिद्ध हुआ, तो काम करने वाले मजदूर व अधिकारी भी जल्दी ही वहाँ से अन्यत्र चले गये। एक घंटे बाद बाँध टूट गया, पर तब तक उस क्षेत्र की आबादी करीब-करीब खाली हो चुकी थी। हाँ , फसल और मकान अवश्य बर्बाद हो गये। एक स्वप्न ने व्यापक जन हानि को बचा लिया। यही नहीं, सपनों द्वारा यहां-कदा गढ़े धनों की सूचना भी मिल जाती है। बेट्टी फाक्स हैम्पाशयर इंग्लैंड के एक गरीब किसान की पत्नी थी। दोनों परिश्रमपूर्वक खेत में काम करते और उससे जो कुछ भी प्राप्त होता, उसी से अपना जीवन चला रहे थे। किसी की पत्नी अत्यन्त सात्विक विचारधारा की थी। एक दिन उसने स्वप्न में देखा कि योद्धा की वेशभूषा में कुछ लोग मिट्टी के नीचे कुछ दबाकर शीघ्रता से भाग रहे है। वेट्टी फाक्स ने इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया पर एक सप्ताह बाद फाक्स को पुनः वही स्वप्न दिखाई पड़ा तो उसकी उत्सुकता कुछ बढ़ी। फावड़ा लेकर स्वप्न में निर्दिष्ट स्थान को उसने खोदा, तो नीचे सोने-चांदी के सिक्कों से भरा एक घड़ा मिला। उसकी दरिद्रता मिटी और दंपत्ति धनवान बन गए। धन का उन्होंने दूसरों को लाभ पहुँचाने वाले कार्यों में ही सार्थक सुनियोजन किया।

एक बार श्री अरविन्द ने अपने एक ऐसे शिष्य को सपने में देखा, जिसका चेहरा काफी वीभत्स था । वास्तविक जीवन में उनके शिष्य का चेहरा ऐसा बिल्कुल नहीं था। छह वर्ष बाद उनका वह सपना सच निकला। उस शिष्य का चेहरा स्वप्न में देखे। दृश्य की भांति की कुरूप हो गया था। उपरोक्त घटनाओं में स्वप्न दृष्टा के जीवनक्रम शुद्ध, सात्विक थे। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ को वे अपना आदर्श मानते और व्यावहारिक जीवन में उनका अधिकाधिक पालन करते थे। विचारणाएं एवं भावनाएं उच्च स्तर की थी यदि हर व्यक्ति अपने जीवन को इस आदर्शवादी साँचे में ढाल सके, भाव संवेदनाओं को सात्विक बना सकें, तो उच्चस्तरीय व सार्थक स्वप्न एवं समष्टि का भली -भांति हित साधन कर सकते हैं। स्वप्न मात्र मृगमरीचिका नहीं है।, उनमें से कई सोद्देश्य होते हैं। मानवीय मस्तिष्क रूपी कल्पवृक्ष से जुड़ी इस विधा के महत्व को स्वीकारी व इस दिशा में प्रगति के प्रयास किए जाने चाहिए।


नीति और अनीतिपूर्वक कमाये हुए धन में अन्तर (Kahani)

एक संत प्रजा को धार्मिक उपदेश देते तथा टोपियाँ सीकर जीवन निर्वाह करते थे। नित्य उन्हें एक पैसे की बचत आती , उसे भी दान कर दिया करते। एक सेठ को उनके क्रिया-कलापों का पता चल गया। उसे उनसे प्रेरणा मिली तथा संत के पास जाकर बोला-मेरे पास धर्म खाते में पाँच सौ रुपये है, उनका क्या करूं? संत ने सहज स्वभाव से कहा-जिसे तुम दीन-हीन समझते हो, उसे दान कर दो। सेठजी ने देखा-एक दुबला, पतला अन्धा, भूखा मनुष्य जा रहा है। उन्होंने उसे सौ रुपये देकर कहा-सूरदासजी आप इन रुपयों से भोजन, वस्त्र तथा आवश्यक वस्तुएं ले लें। अन्धा आशीर्वाद देता हुआ चला गया। सेठजी को न जाने क्या सूझा, उसके पीछे चले, आगे चलकर उन्होंने देखा कि उस अन्धे ने उन पैसों से खूब माँस खाया, शराब पी तथा जुए के अड्डे पर जाकर वे रुपये दाव पर लगा दिये । वह सब रुपये हार गया। सेठजी को ग्लानि हुई। एक क्षण के लिए दान, धर्म से विश्वास हट गया। परन्तु वे साधु के पास गये। उन्होंने सारी घटना सुनाया। संतजी मन ही मन मुस्कराये तथा उसे अपना बचाया हुआ पैसा देते हुए कहा- आज इसे किसी आवश्यकता वाले को दे देना। सेठजी ने आगे जाकर एक दीन, दरिद्र भिखारी को वह पैसा दिया। छिपकर सेठ उसके पीछे हो लिया। कुछ आगे चलकर उसने अपनी झोली में से निकालकर मरी हुई एक चिड़िया फेंक दी, जिसे वह भूनकर खाता। एक पैसे के चने खरीद कर खाये। सेठजी ने यह घटना संतजी को सुनायी। संत बोले-वत्स तुम्हारा अनीतिपूर्वक कमाया बिना श्रम का धन था एवं मेरा परिश्रम से कमाया धन । नीति और अनीतिपूर्वक कमाये हुए धन में यही अन्तर होता है। अब आया न समझ में कमाई का अन्तर?


भली एवं उदार प्रेतात्माएँ भी होती है।

मरणोत्तर जीवन के सम्बन्ध में विभिन्न धर्मों की विभिन्न मान्यताएँ हैं भारतीय धर्मशास्त्रों ने भी मरने के बाद परलोक के सम्बन्ध में कितने ही प्रकार से प्रकाश डाला है। वे लोग, जो पुनर्जन्म के सम्बन्ध में विश्वास नहीं करते, यह मानते हैं कि मरने के बाद मनुष्य का अस्तित्व नष्ट नहीं हो जाता । उसका अस्तित्व किसी न किसी रूप में विद्यमान रहता है। पुनर्जन्म में आस्था रखने वाले मत-मतान्तर भी यह मानते हैं कि मरने के बाद किसी भी व्यक्ति या प्राणी का तुरन्त जन्म नहीं हो जाता। पुनर्जन्म के जो मामले प्रकाश में आए हैं जिन व्यक्तियों ने अपने पिछले जन्मों के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी दी है। उनके विवरणों से भी राह बात स्पष्ट होती है कि मरने और पुनः जन्म धारण करने के बीच की अवधि में कुछ अन्तर रहता है। प्रश्न यह उठता है कि मरने और पुनः जन्म लेने के बीच की अवधि में जीवात्मा क्या करता है? इव अवधि में वह कहाँ रहता है? इन प्रश्नों के उत्तर तरह-तरह से दिये जाते हैं परलोक के सम्बन्ध में जानकारी रखने और अन्वेषण करने वाले व्यक्तियों ने इस विषय में विभिन्न परीक्षण और प्रयोग कर यह जाना है। कि इस अवधि में प्राणी को अशरीरी अवस्था में अपना अस्तित्व बनाये रखना होता है भारतीय धर्मशास्त्रों ने इस स्थिति वाली अस्तित्वधारी जीवात्मा को ही प्रेतयोनि का नाम दिया हैं मरने के बाद पुनः जन्म धारण करने के बीच की अवधि में प्रत्येक जीवात्मा को यह योनि धारण करनी पड़ती हैं जीवन-मुक्त आत्माओं की बात दूसरी हैं वे किसी नाटक की तरह जीवन का खेल खेलती हैं और अभीष्ट उद्देश्य पूरा करने के बाद अपने लोक में वापस लौट जाती हैं उन्हें वस्तुओं घटनाओं , स्मृतियों और व्यक्तियों कान तो मोह होता हैं तथा न उनकी छाप उनके मन पर होती है, परन्तु सामान्य आत्माओं की बात भिन्न है। वे अपनी अतृप्त कामनाओं, सम्वेदनाओं , तृष्णाओं और राग-द्वेष मूलक वासनाओं की प्रतिक्रियाओं से उद्विग्न होती है। परिणामस्वरूप मरने के बाद भी उन पर जीवन के समय की स्मृतियाँ छाई रहती है और वे अपनी अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए ताना - बाना बुनती रहती हैं इस तरह की आत्माएँ दो स्तर की होती है,एक तो वे जो दूसरों को डराती-दबाती है तथा उनके माध्यम से अपनी अभिलाषाएँ पूरी करती है। दूसरे स्तर की आत्माएँ इनसे भिन्न होती हैं। वे मरण और जन्म के बीच की अवधि को प्रेत बनकर गुजारती तो है, किन्तु अपने उच्च स्वभाव तथा संस्कार के कारण दूसरों को यथासम्भव सहायता करती हैं उनका संबंध सूक्ष्म जगत से होता है वे उनकी कई प्रकार की सहायता करती हैं इस स्तर की प्रेतात्माओं से देव स्तर की सहायता प्राप्त की जा सकती है। इस तरह के कई उदाहरण है, जिनमें प्रसिद्ध व्यक्तियों ने इन देव स्तर की प्रेतात्माओं का सहयोग प्राप्त किया तथा उनसे लाभ उठाया। महायोगी श्री अरविन्द के सम्बन्ध में विख्यात है कि वे जब अलीपुर जेल में थे तब दो सप्ताह तक लगातार विवेकानन्द की आत्मा ने उनसे संपर्क किया था। सन् 1901 में श्री अरविंद प्रेतात्माओं से संपर्क का अभ्यास किया करते थे इस अभ्यास में एक बार रामकृष्ण परमहंस की आत्मा ने भी अरविन्द को कुछ महत्वपूर्ण साधनात्मक निर्देश दिए थे। श्री दिविनद जिन दिनों बड़ौदा में रह रहे थे उन दिनों का एक अनुभव बताते हुए उन्होंने लिखा है कि एक बार जब वे अपनी गाड़ी में कैप रोड से शहर की ओर जा रहे थे जब आमबाग के पास उन्हें लगा कि जैसे कोई दुर्घटना होने को हो। उस समय उन्होंने स्पष्ट देखा कि दुर्घटना को बचाने की बात मन में आते ही एक ज्योति पुरुष ऐसे प्रकट हुआ, मानो वह वहाँ पहले से विद्यमान हों और उसने एक क्षण में ही स्थिति को अपने हाथ में लेकर सम्हाल लिया। श्री माँ को बचपन से ही इस प्रकार दिव्य आत्माओं द्वारा सहयोग तथा मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता था। भारत सरकार के नेशनल बुक ट्रस्ट जीवन चरित के श्री माँ प्रकरण में इस प्रकार की घटनाओं का विवरण देते हुए लिखा गया है, “वे (श्री माँ) जब छोटी-सी बालिका थी, तब उन्हें बराबर भान होता रहता था कि उनके पीछे कोई अति मानवी शक्ति है, जो जब-तक उनके शरीर में प्रवेश कर जाती है और तब वे बड़े-बड़े अलौकिक कार्य किया करती है।” इस प्रकरण में उस दिव्य शक्ति द्वारा माँ के कई कम सम्पन्न करने की अनेक घटनाएँ वर्णित है। निश्चित ही इस स्तर का सहयोग मुक्त आत्माएँ करती हैं यद्यपि वे सहायता के लिए बाध्य नहीं है, फिर भी वे स्वेच्छा से करुणावश आध्यात्मिक मार्ग के पथिकों, सच्चे जिज्ञासुओं की सहायता के लिए सक्रिय होती है। थियोसोफिकल सोसायटी की जन्मदात्री मैडम ब्लेवटस्की को चार वर्ष की आयु में ही देव आत्माओं का सहयोग-सान्निध्य प्राप्त होने लगा था। वे अचानक आवेश में आकर ऐसी तथ्यपूर्ण बाते बता दिया करती थी, जिन्हें कर पाना किन्हीं विशेषज्ञों की लिए ही सम्भव था। परिवार के लोग तो उन्हें विक्षिप्त समझने लगे पर जब उनके साथ देवात्माओं के प्रत्यक्ष संपर्क के प्रमाण मिलने , देखे जाने लगे तो उन्हें यह तथ्य स्वीकार करना पड़ा । एक बार वे अपने संबंधियों से मिलने के लिए रूस गई । वहाँ उनके भाई के कानों तक भी यह चर्चा पहुंची कि उनकी बहिन का संपर्क किन्हीं दिव्य आत्माओं से है। जब इस विषय पर चर्चा चली तो उसने इतना ही कहा कि “मात्र मेरी बहिन होने के कारण मैं तुम्हारी बातों पर विश्वास नहीं कर सकता। कोई प्रमाण दो।”मेडम ने अपने भाई को एक हल्की-सी मेज उठाकर लाने के लिए कहा, वह ले आया, अब उन्होंने फिर कहा कि इसे जहाँ से उठाकर लाए हो, वहाँ वापस ले जाकर रख आओ। भाई ने मेज को उठाने की कोशिश की , पर जोर लगाने के बाद भी नहीं उठ सकी। घर के अन्य लोगों ने भी मिलकर मेज उठाने की कोशिश की परन्तु कोई सफलता नहीं मिली। जब सब लोग थक-हार गए तो मैडम ने अपने सहयोगी प्रेतों से कहा कि वे हट जाएँ। तत्क्षण मेज पूर्ववत् हल्की हो गई । मैडम ब्लैवहल्की के कथनानुसार उनके अदृश्य सहयोगियों की एक पूरी मण्डली थी, जिसमें सात प्रेत थे। ये प्रेत थे ये प्रेत समय-समय पर उन्हें उपयोगी परामर्श दिया करते थे और मुक्त हस्त से उनकी सहायता किया करते थे । ऐसे भी उदाहरण है जिनमें दयालु प्रेतात्माओं ने लोगों के लौकिक जीवन में सहायता पहुंचाई और उनके उत्कर्ष में योगदान दिया। एक दरिद्र व्यक्ति आर्थर एडवर्ड के संबंध में विख्यात है। उसने 40 डालर प्रति मास पर कुलीगीरी की छोटी-सी नौकरी अपना जीवन प्रारंभ किया था। पन्द्रह वर्ष की आयु में उस पर कुछ प्रेत मेहरबान हो गए और उन्होंने आर्थर को नौकरी छोड़कर अपने बताए अनुसार काम करने का परामर्श दिया, साथ ही यह भी कहा कि हम तुम्हें बड़ा आदमी बनाएंगे । आर्थर के पास न तो ज्ञान था, न अनुभव और न ही व्यावसायिक बुद्धि । फिर भी उसने प्रेतों के परामर्श से रेलमार्ग बनाए अपनी नहरें खोदी तथा एक बन्दरगाह के निर्माण का भी काम हाथ में लिया। ये योजनाएँ जो प्रेतों के परामर्श से बनाई गई थी। जादुई ढंग से सफल हुई और वह कुछ ही वर्षों में अरबपति बन गया। अदृश्य और उदार आत्माएँ स्थूल सहायता भी पहुँचाती है। द्वितीय महायुद्ध के समय मोन्स की लड़ाई में ब्रिटिश सेना जर्मनों क्षरा बुरी तरह पिट गई केवल 500 सैनिक बचें थे। जर्मनों की संख्या 10 हजार थी। वे इन पाँच सौ सैनिकों का भी काम तमाम कर देना चाहते थे। सभी ब्रिटिश सैनिक बुरी तरह घिर गए थे तभी एक ब्रिटिश सेनाधिकारी को स्वर्गीय सेनानायक सेंट जार्ज का स्मरण आया। उसने आपने साथियों को इस महान सेनानायक का स्मरण कराया और भावनापूर्वक उनका स्मरण करने के लिए कहा। सभी सैनिकों ने तन्मय भाव से स्मरण किया, उसी समय एक बिजली-सी कौंधी। पाँच सौ सैनिकों के पीछे हजारों श्वेत वस्त्रधारी सैनिकों को आभा दृष्टिगोचर हुई और कुछ ही क्षणों बाद रणभूमि में भी जर्मन सैनिक मृत पड़े थे। ना गोला-बारूद छूटा, न किसी अस्त्र शास्त्र को उपयोग किया गया। फिर भी आश्चर्य था कि जर्मन शत्रु कैसे मर गए? अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को तो प्रेतात्माओं पर इतना विश्वास था कि वे अवसर एक प्रेत विद्या विशारद कुमारी नैटिकोसबर्म को व्हाइट हाउस में बुलाया करते थे और उसके माध्यम से प्रेतात्माओं से संपर्क कर महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे। गृह युद्ध के दिनों में तो प्रेतात्माओं जैसी उनकी विश्वस्त सलाहकारी हो गई थी। उनकी मदद से लिंकन को उपद्रवियों के ऐसे-ऐसे रहस्यों को पता लगा जिन्हें जासूसों द्वारा प्राप्त करना सम्भव ही नहीं था। ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि प्रेत बुरे और दुष्ट ही होते हैं। उनमें भी भले-बुरे व्यक्तियों की तरह भले-बुरे स्वभाव-चरित्र वाले होते है। आखिर मनुष्य हो तो मरकर प्रेत बनते हैं मरने के बाद भी वे अपना स्वभाव कहाँ छोड़ पाते हैं।? उसी स्वभाव के वशीभूत होकर भली आत्माएँ सत्पात्रों को सहायता किया करती है। ‘शिवोऽहम्’,’तत्वमसि’, आदि सूत्रों में जिस सत्ता को परमतत्व परमात्मा माना है वह परिष्कृत अंतःकरण ही हैं उसी को विज्ञान की भाषा में ‘सुपर चेतन’ कहते हैं। अंतःकरण की इसी गहन परत को विकसित करने के लिए भक्तियोग का आश्रय लिया जाता है। कर्म योग से शरीर, ज्ञान योग से मस्तिष्क और भक्ति योग से अंतःकरण की साधना की जाती है। अंतःकरण को ब्रह्म मनः संस्थान को विष्णु और कायकलेवर को रुद्र की उपमा दी गयी है। यही तीनों व्यक्तिगत त्रिदेव है जिनके वरदान-अभिशाप पर उत्थान पतन की सारी संभावनायें अवलंबित हैं अध्यात्मवेत्ता अंतःकरण को कही अधिक महत्व देते हैं और उसे मनःसंस्थान से कही अधिक उच्चस्तरीय मानते हैं। कार्य कौशल से लोक व्यवहार बनता है। बुद्धि वैभव से उपयुक्त निर्णय होते हैं, किंतु अंतःकरण तो समूचे व्यक्तित्व का ही अधिष्ठाता है उसकी परिष्कृत स्थिति ही सामान्य स्थिति के मनुष्य को महामानव , अतिमानव, कृष्,ि देवात्मा, देवदूत स्तर तक पहुँचाने में समर्थ होती हैं अपने ही भीतर विद्यमान इस देवलोक का माहात्म्य ऋषि -मनीषी सदा से ही बताते और उसकी अनुकंपा उपलब्ध करके जीवन लाभ लेने वाले विभिन्न प्रतिपादनों द्वारा समझाते रहे हैं । सिद्धान्त और प्रयोग दोनों ही इन प्रयोजनों के लिए उनने गढ़े - परखें और प्रचलित किये हैं। वैज्ञानिक प्रगति के इस युग में अब भौतिकवादी, समाजशास्त्री, तत्वज्ञानी, नीतिशास्त्री, मनोविज्ञानी सभी इस मिले-जुले निष्कर्ष पर पहुँचे रहे है कि पतन पराभव से छूटने और वरिष्ठता उत्कृष्टता उपलब्ध करने के लिए सुपर चेतन की अर्थात् अंतःकरण की उच्चस्तरीय परतें खोदी कुरेदी जानी चाहिए। परामनोविज्ञान, मेटाफिजिक्स आदि माध्यमों से भी पिछले दिनों मनः संस्थान की अचेतन परतों की महत्ता बखानी जाती रही है और उसे जगाने उभारने के लिए तरह-तरह के प्रयोगों की चर्चा होती रही हैं दूरदर्शन, दूरश्रवण, विचार संचालन, प्राण−प्रत्यावर्तन, भविष्यज्ञान जैसी कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमतायें इस संदर्भ में खोजी और परखी गयी हैं इस दिशा में प्रयास चालू रखते हुए भी मूर्धन्य स्तर के मनीषी इस बात पर जोर दे रहे है कि अचेतन से भी असंख्य गुनी उच्चस्तरीय संभावनाओं में भरे-पूरे ‘सुपरचेतन’ को नये सिरे से समझा -खोजा और उसके अभ्युदय का अभिनव प्रयास किया जाय। वे मानने लगे है कि अंतःक्षेत्र की उपलब्धियाँ व्यक्ति और समाज में उच्चस्तरीय परंपराओं का समावेश और नये युग का नया सूत्रपात कर सकने में समर्थ हो सकती हैं ‘साइकोलॉजी आफ इंट्यूशन’ नामक अपनी कृति में प्रख्यात मनोवैज्ञानिक एमिली मारकाल्ट ने अंतःकरण की चर्चा करते हुए कहा हैं “यह शरीर एवं उच्चस्तरीय भाग हैं ज्ञानेन्द्रियों और तर्क बुद्धि से जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं उनसे भी कही अधिक महत्वपूर्ण समाधान उच्च चेतन मन की सहायता से मिल सकता है इस तंत्र को उजागर कर लेने का अर्थ है एक ऐसे देवता का साथ पा लेना जो उपयोगी सलाह ही नहीं देता, वरन् महत्वपूर्ण सहायता भी करता है यही वह क्षेत्र है जहाँ से आदर्शवादी प्रेरणा में एवं उमंगे उभारती और मानव को महामानव बनाने में सहायता करती है। सुप्रसिद्ध मनीषी मार्टिन ट्रिनबी ने लिखा है विचार बुद्धि की उपयोगिता कितनी ही क्यों न हो, पर वह रहेगी अपर्याप्त हो । चेतना की पूर्णता का केन्द्र मस्तिष्क नहीं, अंतःकरण हैं अब तक प्रकृति को खोजा पाया और उसका दोहन किया गया हैं परंतु अब परमात्मा की खोज और उसके पाने की बारी हैं ऐसा संपर्क साधने के लिए एक मात्र स्थान मानवी अंतःकरण है सहायता इसी के न्006म् मतें बसती हैं हेनरी गाल्डर ने अपने ग्रंथ “एवोल्युशन एण्ड मैन्स प्लेस इन नेचर “ में इसी केन्द्र की शीलता को और अधिक गहरा बनाने पर जोर दिया है। उनका कहना है कि वस्तुओं का लाभ जिसे उठाता है उसकी अंतःचेतना यदि निकृष्टता परायण रही तो संपदा का दुरुपयोग ही होगा। संपदा किसी ही क्यों न बढ़े पर यह ध्यान तो रहे कि उपभोक्ता की गरिमा ही साधनों का सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकती हैं जिस तरह परमाणु का ऊर्जा ‘नयुक्जियस’ को माना जाता है ठीक इसी प्रकार मनुष्य की स्थिति और संभावनाओं का केन्द्र बिंदु उसके अंतःकरण अंतराल को समझा जा सकता है यही से मनः संस्थान को निर्देश मिलता है और वह एक अच्छे सेवक की तरह मिलता है और वह एक अच्छे सेवक की तरह वैसा ही सोचना आरंभ कर देता है जिससे कि आकाँक्षा की पूर्ति संभव हो सके। मन की सोचने की दिशाधारा पूर्णतया अंतःकरण के संकेतों के ऊपर निर्भर है। वह तर्क तथ्य, प्रमाण , उदाहरण इसी स्तर के ढूंढ़ता और क्रमबद्ध करता है जिससे अपने अधिष्ठाता अंतःकरण की इच्छापूर्ण हो सके। इसके लिए वह चिंतन तंत्र को ही नियोजित नहीं करता है, वरन् शरीर वाहन को भी इसी प्रयोजन के लिए नियोजित करता । अंतःकरण का आदेश मन मानता है और मन के इशारे पर चलने वाला शरीर स्वामिभक्त सेवक की भूमिका निभाने लगता है। इसमें उसे भला-बुरा सोचने या किसी प्रकार का ननुत्व करने की भी इच्छा नहीं होती। संक्षेप में अंतराल को ही मनः संस्थान और काय-कलेवर का सूत्रधार कह सकते हैं। जो किया और सोचा जाता है उस सुचे क्रिया तंत्र का अधिष्ठाता अंतःकरण को ही कहा जाना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी मनोविज्ञान की भाषा में अंतःकरण को ही ‘सुपरचेतन’ कहा गया है। अध्यात्मशास्त्र में इसी अंतराल को जीवात्मा का निवास स्थान कहा गया हैं मनुष्य की व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाने और उस पर अनुग्रह बरसाने वाला-वरदान देने वाला जो ईश्वर है और जो हर व्यक्ति से साथ रहता है वह इसी अंतःकरण में बसता है उसी की अनुकूलता-अनुकंपा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना, मतं जप, अनुष्ठान से लेकर तप एवं योग साधनाओं का सूजन हुआ है। अंतःकरण ही मनुष्य का भाग्य विधाता है इस क्षेत्र को उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं आस्थाओं आकाँक्षाओं से अनुप्राणित करने पर ही व्यक्ति और समाज को वर्तमान से उबारा और उज्ज्वल भविष्य के निकट पहुँचाया जा सकता है।

शताब्दी को जनसंख्या विस्फोट की शताब्दी कहा जा सकता है इतनी तेज रफ्तार से आबादी कभी नहीं बढ़ी । शताब्दी के आरम्भ में विश्व की आबादी लगभग डेढ़ अरब थी और अब इस सदी के अंत तक 6 अरब तक हो जाने की सम्भावना हैं लेकिन जनसांख्यिकी क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि अगले कुछ ही वर्षों में एक विशेष डेमीग्रैफिक रिवोल्युशन होगा, जिससे जन्म और मृत्यु दर में अप्रत्याशित रूप से कमी आयेगी और सर्वत्र एक स्थिरता परिलक्षित होगी। रूस का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए विस्नेवस्की ने बताया है कि इसे देश की महिलाओं की चेतना जगी है। और वे अपने भविष्य को सब प्रकार से उज्ज्वल एवं स्वस्थ-सुन्दर बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं बीस वर्ष की आयु के पश्चात ही वे दांपत्य सूत्र में बँधना पसंद करती हैं साथ ही संतति निर्माण में किसी तरह की कमी नहीं रहने देती । जापान जैसे अन्यान्य धनी देशों में भी इसी स्तर की मान्यता को बल मिल रहा है। फ्रांस , जर्मनी , स्कैन्डीनेवियन तथा पाश्चात्य योरोपीय देशों की गणना भी इस ‘जनसाँख्यिकी क्रांति में की जा सकती हैं इस क्रांति के फलस्वरूप ही मनुष्य की औसत आयु में 30-35 से लेकर 70-75 वर्ष तक की वृद्धि हो पायी हैं आर्थिक दृष्टि से विकसित राष्ट्रों की स्थिति का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि वहाँ की महिलाएँ अपने जीवन-काल में दो बच्चों को ही जन्म देती है, उन्होंने भी शिशु को ही जन्म दर को कम करके दिखाया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सर्वेक्षणकर्ताओं के अनुसार पूर्वी एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे देशों में सन् 1970 के दशक में जहाँ 100 महिलाओं ने 460 बच्चों को जन्म दिया, वही यह अनुपात बीसवीं शताब्दी के अन्त तक 320 तक तथा सन् 2025 तक 240 तक हो जाने की सुनिश्चित सम्भावना हैं इक्कीसवीं शताब्दी में समूचे विश्व में जनसंख्या अपने स्थिरता के बिन्दू पर जा पहुँचेगी तब जनसंख्या विस्फोट जैसी भयावह समस्या का समाधान सहज ही हो जावेगा। जनसंख्या अभिवृद्धि के संबंध में अपने अभिमत प्रेट करते हुए युनाइटेड किंगडम से प्रख्यात पर्यावरण एवं ‘एटेला ऑफ प्लेनेट मैनेजमेंट’ ‘दि सिंकिंग आर्क ‘ एवं ‘द प्राइमरी सोर्स ‘ ट्रौपीकल फाफरेस्ट एण्ड अवर फ्यूचर जैसी पुस्तकों के लेखक नौर्मन मायर ने बताया है। कि जनसंख्या के अंतिम स्वरूप का अनुमान वर्तमान की वृद्धि दर को देखकर नहीं लगाया जा सकता, वरन् जनसाँख्यिकी ‘वेग के दृश्य को दृष्टिगत रखते हुए ही इस तथ्य से भलीभाति अवगत हुआ जा सकता है। उन्होंने इस तथ्य की पुष्टि ‘फेनोमिनन ऑफ डेमोग्राफिक मूमेंटम’ के सिद्धान्त के आधार पर की हैं इसके अनुसार आज जितने अधिक बच्चे जन्म ले चुके हैं, वे भविष्य में अधिक अच्छे एवं सुसभ्य, सुसंस्कृत माता-पिता के रूप में भी सुविकसित हो सकते हैं और अच्छे एवं सीमित परिवार की आधारशिला रख सकते हैं इस तरह परिवार को समुन्नत एवं सुखी-सम्पन्न बनाने वाली भावनाओं के विकास के कारण साम्य संतुलन की स्थिति स्वतः ही स्थापित होने लगती हैं कोई समय था जब चीन की जनसंख्या बड़ी तेज रफ्तार के साथ बढ़ी थी, पर आज वैसी स्थिति कहाँ दिखाई पड़ती है। लोगों में नागरिक भावना का विकास हुआ है। परिवार को सुखी, समृद्ध और सुसम्पन्न बनाने वाले उत्तरदायित्व समझ में आने लगे हैं यही कारण है कि चीन के सत्तर प्रतिशत माता-पिता ‘वन चाइल्ड फैमिली’ अर्थात् एक बच्चे वाले परिवार से ही संतुष्ट हैं नियोजित परिवार की गति प्रगति को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि सन् 2000 तक चीन की आबादी अपने स्थिरता के बिन्दु पर जा पहुँचेगी और इक्कीसवीं सदी उसके लिए सुख्यात सम्भावनाओं का सपना साकार करेगी। नौर्मन मायर का कहना है कि अब विश्व की महिलाओं की चेतना जगी है और वे सीमित परिवार के पक्ष में है। यही कारण है कि प्रति वर्ष 6.5 प्रतिशत की बुद्धि संतति नियमन के उपाय-उपचारों को अपने में हो रही हैं इसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि सन् 2025 तक संसार की जनसंख्या में स्थिरता आ जायेगी । उन निर्धन देशों में यह क्रांति विशेष रूप से परिलक्षित होगी जिन्होंने अपनी आर्थिक और सामाजिक प्रगति का मेरुदंड संतुलित आबादी को ही माना हैं इन देशों में जनसंख्या पर नियंत्रण पाकर अगली शताब्दी को उज्ज्वल भविष्य वाली सम्भावनाओं के रूप में दिखने की उत्कंठा जाग्रत होने लगी हैं इसका मूलभूत कारण शिक्षा के विकास-विस्तार को समझा जा सकता है इन देशों में महिलाओं का शैक्षणिक स्तर जैसे-जैसे ऊँचा उठता जा रहा है। वे पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों से भी अवगत होने लगी है। अब लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा पर भी ध्यान दिया जाने लगा है और संभावना व्यक्त की जा रही है कि इस शताब्दी के अंत तक अशिक्षा निवारण पर शत-प्रतिशत रूप से नियंत्रण पर लिया जायेगा। इक्कीसवीं शताब्दी में न केवल जनसंख्या विस्फोट पर रोक लगेगी, वरन् आवास, ऊर्जा एवं खाद्य जैसी विकट समस्याओं का भी समाधान ढूंढ़ लिया जायेगा। नये सेंचुरी’के नाम से लोग व्यक्तिगत स्वार्थ की अपेक्षा दूसरों के हित साधन पर अधिक विकास होगा। एक दूसरे के साथ मिलजुल कर काम करने के वृत्ति का विस्तार होगा। उन्होंने इसे ‘कलेक्टिव ऐफटूर्स’ के नाम से पुकारा जाता है। निश्चय ही इक्कीसवीं शताब्दी में स्वतंत्रता, समानता, स्नेह और सौहार्द्र का वातावरण बनेगा और बढ़ती हुई आबादी पर अंकुश लगेगा।


परमार्थ (Kahani)

एक संत मरने के बाद परलोक पहुँचे। चित्रगुप्त ने उनसे कर्मों का लेखा -जोखा पूछा। सन्त ने बताया, तीन-चौथाई जीवन तो घर-गृहस्थी के काम-धामों में बीता और एक-चौथाई एकान्त जीवन के भजन-पूजन में लगा। जितना समय परिश्रम और पुण्य-प्रयोजनों में लगा, उसी को परमार्थ माना गया और उस अनुपात से पुण्य मिला। भजन-पूजन वाले दिन तो अपने निज के लाभ भर के लिए माने गए और उतने दिन के श्रम परमार्थ से रहित होने के कारण सामान्य ही माने गये। सन्त की मान्यता से चित्रगुप्त का निष्कर्ष ठीक उल्टा निकला। जिस श्रम-साधना को, समय को ये प्रपंच मानते रहे, वही अनेकों को सुविधा पहुंचाने और ऋण चुकाने के कारण परमार्थ गिना गया।


सूर्य साधना का महात्म्य समझें और लाभ उठाये

सूर्य को समूचे सौर-मण्डल का ध्रुव केन्द्र समझा जाता है यही कारण है कि विभिन्न धर्म-सम्प्रदाय के लोग उसे दैवी शक्ति के स्वरूप में मानकर पूजा अर्चना का उपक्रम बिठाते रहे है। मिश्र की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिलियों पोलिस को सूर्य की राजधानी कहा गया हैं एपोलो, यूनान और रोम के निवासियों का आराध्य एवं इष्टदेव सूर्य है उनकी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य पुत्र फीथन ने जब आग्नेय रथ को आकाश मार्ग से हाँकने का प्रयास किया तो पृथ्वी की कक्षा के सन्निकट आ पहुँचा । तभी से वह अपने अस्तित्व का परिचय दे रहा है। ईसाइयों के धर्मग्रन्थ ‘ओल्ड टेस्टोमेंट’ अनुसार , जोशुआ को सूर्य प्रासाद में ही दफनाया गया। पादरी जाब ने अपने जीवनकाल में केवल एक ही उपदेश दिया कि सूर्योदय के समय ही मेरे पास विचार विमर्श हेतु आया करें अर्थात् प्रभातकालीन सूर्य की सुनहरी रश्मियों की उपस्थिति में सत्संग का पूर्ण लाभ उठाया जा सकता है। उन्होंने अपने निवास का नाम ही ‘वेथ रोमेश’ रखा, जिसका अर्थ ‘सूर्य भवन’ से लगाया जाता है। चिरपुरातन ‘इन्का’ संस्कृति पर दृष्टि दौड़ाई जाय तो पता चलता है कि राजधानी ‘कुन्को’ में एक विशाल सूर्य मेदिन बना हुआ है जिसे देखकर यही कहा जा सकता है। कि उनका आराध्य देव सूर्य हो रहा होगा। मैक्सिको के देवालय साके में आज भी विशाल सुनहरे रंग की स्वर्ण चकतियाद्द सूर्योपासना की प्रमाणिकता को सिद्ध करती हैं ब्राजील, न्यूजीलैण्ड के आदिवासी समुदाय में रहने वाले लोग सूर्य को एक विराट आत्मा के रूप में मानते हैं इतना ही नहीं उनका यह भी विश्वास है कि सूर्य अपनी आवश्यकतानुरूप मनुष्य शरीर धारण करता और मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए प्राणियों को ज्ञान ज्योति के सहारे भवसागर से पार करता है उत्तरी अमेरिका में निवासरत कई प्रकार की जाति-प्रजातियां ऐसी है जो सूर्य को ही अपना देवी-देवता मानते और पूजा-अर्चन का उपक्रम बिठाते हैं क्रो, प्यूबलों, नैचेज, ब्लैकफुट इरोकोइस और सिओवस के नाम प्रमुख रूप से लिए जाते हैं। ध्रुव प्रदेशों के एस्किमो जाति के लोग ‘सूर्यनृत्य’ में बहुत रुचि रखते हैं यहूदी और ईसाई धर्म के अनुयायी अपना धार्मिक दिन रविवार हो ही मानते हैं जिससे सूर्य की गरिमा और महत्ता एवं उपयोगिता का ही पता चलता है।

सूर्य अग्नि का एक प्रचण्ड गोला भी है तो प्राण शक्ति का प्रखर भांडागार भी । उसकी अन्तर्निहित शक्तियों से ध्वंसात्मक सरंजाम भी जुट सकता है तो सृजनात्मक प्रयोजन भी पूरा होता रह सकता है। मानवी बुद्धि के ऊपर ही निर्भर करता है कि वह इस दैवीय ऊर्जा शक्ति का कैसा और किस प्रकार का प्रयोग कर सकता है। ईसा से 447 वर्ष पूर्व एथेन्स के सुप्रसिद्ध हास्य कवि ऐरिस्टोफेनीज ने ‘मेघ’ नामक अपनी रचना में एक शीशे का वर्णन किया है, जिसके माध्यम से सूर्य की ऊर्जा शक्ति को अवशोषित किया जा सकता है उनके मतानुसार जिस प्रकार काँच का इस्तेमाल करके सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है, ठीक उसी तरह मानवी चेतना में प्राण ऊर्जा का संचार सूर्य के संपर्क सान्निध्य में आकर किया जा सकता है चूंकि चेतना की ज्योति का उद्गम स्त्रोत महासूर्य को ही माना जाता है इसलिए उसके अंश आत्मसत्ता में प्रखरता सम्पादित करने का सत्प्रयोजन भी पूरा होता रहता है। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्किमिडीज ने सौर ऊर्जा के प्रयोग के लिए एक दाहक शीशे का इस्तेमाल किया , जिसका दुरुपयोग लोगों ने किया और बुद्ध जैसी विनाशकारी विभीषिका उत्पन्न कर दी। रोम के एक जहाजी बेड़े ने सिराक्यूज पर आक्रमण करते समय आर्किमिडीज के दाहक शीशे का ही युद्ध आयुध के रूप में प्रयोग किया। यूनानी लोग सूर्य को अपोलो के नाम से भी पुकारते हैं दूसरा नाम हीलियोस हैं अंग्रेजी भाषा के हीलियम शब्द की व्युत्पत्ति इसी से हुई है उनकी दृष्टि में विभिन्न प्रकार के जीवनोपयोगी तत्वों का उद्गम केन्द्र सूर्य को ही माना जाता है। भारती शास्त्रों, ग्रंथों में भी इसी को स्पष्ट किया गया हैं कि सम्पूर्ण विश्व चर-अचर सबको जीवन देना वाला, प्राण देना वाला , ऊर्जा देना वाला सूर्य ही है। ऋग्वेद 10।37।4-5 में कहा गया है कि सूर्य ने न केवल सम्पूर्ण विश्व के प्रकाशक, प्रवर्तक, धारक एवं प्रेरक हैं वरन् उनकी किरणों में आरोग्यवर्धन-दोष निवारण की अभूतपूर्व क्षमता विद्यमान है। उसकी उपासना करने, सेवन करने से दुःख स्वप्न जनित अनिष्ट एवं नवग्रह जन्य पीड़ा का निवारण होता है राक्षसों से , दुष्प्रवृत्तियों से भी छुटकारा दिलाने-उनसे रक्षा करने वाली शक्ति सूर्य किरणों में है। ऋग्वेद 1।115।1-6 में कहा है कि “हे प्रकाश रश्मियों! टाज सूर्योदय के समय इधर-उधर बिखरकर तुम लोग हमें पापों से निकालकर बचा लो इस संसार में जो कुछ भी निन्दनीय है। दुःख दारिद्रय हैं गर्हणीय है उन सबसे हमारी रक्षा करो तात्पर्य यह है कि सूर्य किरणों में समस्त रोग-शोकों को विनष्ट करने की क्षमता विद्यमान है। सूर्य ही अपने प्रकाश से , तेज से सबको प्रकाशित करते हैं । यजुर्वेद में सूर्य को, सम्पूर्ण भुवन को प्रकाशित करने वाला बतलाया गया है। अथर्ववेद में प्रकाश रश्मियों द्वारा हृदय की दुर्बलता हृदय, रोग और कास रोग को दूर करने का प्रतिपादन किया है। सूर्य की किरणें धरती पर गीले पदार्थों को सुखा देती हैं तथा समुद्र से जल का वाष्पीकरण कर उन्हें पीन योग्य बनाती हैं सूर्य किरणों में कुष्ठ रोग निवारण को अपूर्व क्षमता है साम्बोपाख्यान में इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता हैं श्री कृष्ण द्वारा किया था। प्रकाश किरणों के सेवन से उनका रोग जाता रहा ‘सूर्य शतक’ नामक उत्कृष्ट कोटि के सूर्य स्रोत की रचना करने वाले सातवीं शताब्दी के महान कवि मयूर को कुष्ठ रोग हो गया था कुष्ठ जनित आत्मवेदना से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने सूर्य की उपासना की। प्रकाश किरणों के प्रभाव से वे रोग मुक्त हुए थे। मत्स्य पुराण में 67।79 में सूर्य को आरोग्य के अधिष्ठाता देवता बताया गया है। और कहा गया है- “आरोग्य भस्करादिच्छेत् “ अर्थात् आरोग्य की कामना भगवान भास्कर से करनी चाहिए। सूर्य किरणों में आँखों के सभी रोगों के निवारण की क्षमता है। रामचरित-मानस में भी कहा गया हैं- “नयन दिवाकर कच घन माला” ।15।3 योग विद्या के विशारदों का कहना है कि शरीर में स्थित सूक्ष्म चक्रों का सम्बन्ध तत्व विशेष से होता है। उन्हें प्रभावित करने एवं सक्रिय बनाने के लिए किसी विशेष रंग का ध्यान करना होता हैं उदाहरण के लिए, ‘सोलर प्लेक्सस’ अर्थात् मणिपुर चक्र जो अग्नि तत्व प्रधान है- उसे जाग्रत करने के लिए स्वर्धिम आभायुक्त पीले रंग या इस रंग के कमल का ध्यान किया जाता है। उनके अनुसार, सूर्य की सप्तवर्णी किरणों का इन चक्रों से विशेष सम्बन्ध है। ध्यान से इस क्षेत्र के तत्वों में सूक्ष्म प्रकम्पन पैदा हो जाते हैं परिणामस्वरूप शरीरस्थ व्यष्टि प्राण चेतना समष्टिगत प्राण चेतना की ओर प्रवाहित होने लगती है और दोनों में आदान - प्रदान का क्रम चल पड़ता हैं सुविख्यात भौतिक बानी प्रो0 ए॰ हेर्ण्डसान का कहना है कि ब्रह्माण्ड में सर्वोत्तम यदि कुछ है तो वह सूर्य और उसकी किरणें । यह किरणें 176000 मील प्रति सेकेंड की तीव्रगामी गति से चलकर पृथ्वी पक पहुँचती एवं जीवधारियों तथा वृक्ष-वनस्पतियों में नवजीवन फूँकती है। विश्व-ब्रह्मांड के जड़- चेतन की उत्पत्ति का मूल आधार इन किरणों की प्राण शक्ति हैं सूर्योपनिषद् में चराचर जगत की उत्पत्ति का एकमात्र कारण सूर्य को बतलाया गया है और उन्हीं को सम्पूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्मा बतलाया गया है। पतंजलि योग दर्शन में कहा गया है।-”भूवनज्ञानं सूर्य संयमात्” अर्थात् सूर्य में संयमन करने से सम्पूर्ण विश्व का स्पष्ट ज्ञान हो जाता हैं सूर्य की सात किरणें ग्रहों के सात , ईश्वर, कास्मिक, प्लैनेटरी लोगोई ‘ के रूप में मानी गई है। ’फर्स्ट बुक ऑफ थियोसॉफी” नामक पुस्तक में पी पावरी ने इसका विशद् विवेचना किया है। उनके अनुसार सूर्य मंडल का प्रत्येक ग्रह सात प्रकार के अणुओं से बना है। उनका सामूहिक स्वरूप सुर्य की सप्तवर्णी किरणों के रूप में परिलक्षित होता है। उसी पुस्तक में उन्होंने आगे बताया है कि पदार्थों की मात्र ठोस, द्रव एवं गैस नामक तीन प्रमुख अवस्थाएँ ही नहीं है वरन् यह सात अवस्थाओं में बँटा होता है पदार्थ की चौथी, पांचवीं छठी एवं सातवीं अवस्था ईथर है, जो अलग-अलग और सूक्ष्म अवस्था में होते हैं साथ ही उनके भी सात-सात उप अवस्थाएँ (सब स्टेट्स) होते है। यह सभी पदार्थ एक-दूसरे से मिले हुए होते हैं इन्हीं से ग्रह-नक्षत्रों का निर्माण हुआ हैं सात रंगों के प्रकम्पन इन्हीं पदार्थों के हैं, जिनका मुख्य स्त्रोत सूर्य हैं मानव जीवन पर इनका गहरा प्रभाव पड़ता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि काय संरचना में भी उन्हीं तत्वों की भरमार है, जो विश्व - ब्रह्माण्ड में फैले हुए हैं प्रकृति सात हैं साँख्कारिका सूत्र 3 में कहा गया है कि महत्व अहंकार और पंच तन्मात्राएं सात प्रकृति है। सुप्रसिद्ध थियोसाफिस्ट लेडवीटर ने अपनी पुस्तक ‘मैन विजिबल एण्ड अनविजिबल्स ‘ मैं बताया है कि संसार में सप्त लोक हैं उसी तरह मनुष्य के शरीर में सात तत्व कार्यरत है। ये हैं (1) फिजीकल (2) एस्ट्रल (3) मेण्टल (4) बौद्धिक (5) निर्वाणिक (6) परा निर्वाणिक (7) महापर निर्वाणिक । प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानी फ्रान्ज हार्टमैन ने अपनी कृति- ‘आकल्ड साइन्स इन मेडिसा’ में चिकित्सा विज्ञान के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डाला हैं उन्होंने उक्त पुस्तक में आधुनिक चिकित्सा के जन्मदाता थियोफ्रैस्ट्स पासैल्सस और उनकी पुस्तक ‘द फण्डामैण्टों सेपियेण्ठी’ का उल्लेख किया हैं उनके अनुसार पासैल्स अपने समय के प्रख्यात चिकित्साशास्त्री थे। शारीरिक-मानसिक रुग्णता दूर करने के आधुनिक तरीकों के बारे में उनका कहना था कि रोगों का प्रमुख कारण मात्र स्थूल अवर ही नहीं-ढूंढ़ा जाना चाहिए । इसका जड़ मनुष्य को प्राण चेतना में सन्निहित होती हैं जिसका अधिपति सूर्य हैं उस आश्रय लेकर मनुष्य न केवल स्थूल काया की बीमारियों से छुटकारा पर सकता है वरन् समष्टि चेतना का सम्बन्ध स्थापित करके उच्चता के सोपान पर आगे बढ़ सकता है। सूर्य का पृथ्वी के साथ अविच्छिन्न रूप में संबंध जुड़ा हुआ है। सूर्य की गतिविधियों से जितना समूचा भूमण्डल प्रभावित होता है उतना ही पृथ्वी की हलचलों के कारण क्षुब्ध अथवा प्रसन्न होकर सूर्य बढ़ा सुख मिल जाय , तो विक्षिप्तता टल जाती और एक अनिर्वचनीय आनंद मिलने लगता है पागलपन तो उस स्थिति में आता है, जब मनुष्य उपलब्ध में सुख को त्याग दे, किंतु सामने कोई दूसरा सुख नहीं हो। यदि कोई दूसरी बड़ा सुख मिल जाए तो निश्चय की वह पहले वाला छोटा और गौण हों जायेगा? एवं उसकी महत्ता नगण्य जितनी रह जायेगी, ठीक वैसे जैसे छोटी रेखा के आगे कोई बड़ी लकीर खिंच जाय, तो पहले वाली अप्रथान और दूसरी प्रमुख हो जाती हैं इसकी उपलब्धि के लिए ऋषियों ने एक सारगर्भित सूत्र दिया है। यदि उसे जीवन में उतारा गया, तो निस्संदेह उस बड़े आनंद की प्राप्ति की जा सकेगी, जिसके आगे काम-सुख तुच्छ हो जाता है यह सुख है-अंतर्यात्रा का? बहिर्यात्रा व्यक्ति को ‘काम’ में उलझाती है, जबकि अंतर्यात्रा उसे ‘राम’ तत्व का रसास्वादन कराती है। इस अंतर्यात्रा का सही ढंग से अभ्यास किया गया, तो भोग से भी अधिक रस इस अंतर्योग में आने लगेगा। यदि इसके पीछे की वैज्ञानिकता को समझ लिया जाय, तो बात और भी स्पष्ट हो जायेगी। यथार्थ में हम जिसे सुख मानते और बाहरी वस्तुओं में तलाश करते हैं, वह वास्तव में अंदर की मन की चीज है। बाहरी जगत से उसका रंचमात्र भी संबंध नहीं। यदि ऐसी बात नहीं रही होती , तो सी सामग्री के उपभोग के पश्चात् वह फीकी लगती प्रतीत नहीं होती और रस की खोज में मन फिर किसी अन्य की माँग नहीं करता, पर दैनिक जीवन में अनुभव इसके विपरीत होते जान पड़ते हैं इससे स्पष्ट है-मन ही सरसता और नीरसता के लिए जिम्मेदार हैं इस मन के सुख की जो व्याख्या आप्त वचनों में की गई है, उसके अनुसार जब मन का योग एक विशेष प्रकार की विद्युत धारा से होता है, तो सुख की अनुभूति होती है और जब दूसरी प्रकार के प्रवाह से होता है तब दुःख का कारण बनता है। अर्थात् दोनों स्थितियों के लिए आँतरिक तरंगें ही उत्तरदायी हैं ब्रह्मचर्य के दौरान इन्हीं में से एक तरंग की जगाना पड़ता है, पर यह जगे कैसे? इसकी भी प्रक्रिया बतायी गई है। विज्ञान के अनुसार यह तरंगें सिर के पीछे स्थित दो छोटी परस्पर सटी ग्रंथियों के कारण पैदा होती हैं। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि इनमें से यदि सुखोत्पादक ग्रंथि जाग जाय तो फिर चाहे कितना भी दारुण कष्ट उपस्थित हो जाय, भयंकर घटना घट जाय, व्यक्ति का कभी भी दुःख नहीं होगा। इसी तरह क्लेश पैदा करने वाली ग्लैण्ड के जाग्रत होने से आदमी कदापि सुखी नहीं रह पायेगा, भले ही उसे कुबेर जितनी संपत्ति मिल जाय, साधनों का अंबार लग जाय, अनुकूलता की अट्टालिका खड़ी हो जाय, पर इन सबके बावजूद वह पीड़ित बना रहेगा, कारण कि उक्त ग्रंथियों से संबंधित अंतस् की जो संवेदना थी, वह जाग गई यह जागरण व्यक्ति अथवा वस्तु के कारण भी हो सकता है, परन्तु यहाँ वे मात्र संवेदना को जगाने का निमित्त बनते हैं, सुख-दुख का नहीं सुख-दुख का निमित्त हो वह भीतरी स्पन्दन ही हैं जिसके कारण ्राँथ्यों सक्रिय बनती और तत्सम भाव को प्रतीति कराती हैं इसे संवेदना का विज्ञान कहा गया है। ब्रह्मचर्य के दौरा इसी का संयम करना पड़ता है। इसके मार्ग को जिसने समझ लिया, वही ठीक -ठीक उसका पालन कर सकता है अन्यथा इसके रहस्य को जाने बिना वह बाहरी पदार्थों में ही भटकता रहेगा संसार में पलायन करेगा, इस उम्मीद में कि शायद कंदरा में ब्रह्मचर्य सध जाय, पर वहाँ भभ् उसे दुख के अतिरिक्त कुछ भी हस्तगत नहीं होगा और जीवन यों ही बरबाद होता चला जायेगा। यहां तनिक उस शरीरशास्त्र की समझा लेना जरूरी है। जो काम वासना का निमित्त हैं ज्ञातव्य है कि शरीर की अधिकाँश क्रियाएं रस-स्रावों पर निर्भर हैं यह स्राव यदि ज्यादा हुआ, तो तत्संबंधी क्रिया भी असामान्य स्तर की हो जाती है और होने पर भी वह असामान्य बनी रहती है दोना के स्तर में अंतर होता है। अधिक बनने से क्रियाविधि काफी तीव्र हो जाती है। जबकि कम होने पर मंद जाती है। सामान्य भूमिका में वह तभी रह पाती है। जब हारमोन संतुलित मात्रा में निकले। यही सहजल स्थिति है। वासना की दशा में यौन हार्मोन के स्राव पर पहले पिट्यूटरी का कठोर नियंश होता है। यही कारण है कि बालकों को आरंभ के कुछ वर्षों तक काम-लिप्सा का ज्ञान आरंभ के कुछ वर्षों तक काम-लिया का ज्ञान तक नहीं हो पाता उसके सताने की बात तो दूर है किंतु जब वह 14-15 साल की अवस्था के हो जाते हैं, तो निसर्ग के नियमानुसार यौन हारमोन्स पर पिट्यूटरी ग्रंथि का नियमन ढीला पड़ने लगता है उसके ढीला पड़ते ही ‘काम’ संबंधी रसस्राव गोनैड (काम केन्द्र) को प्रभावित करने लगता है यही वह आरंभिक अवस्था है, जिसमें ‘काम’ संबंधी जानकारी का प्रथम उदय बालकों में होता है बाद में जिसमें जिस अनुपात में काम पैदा होता उसमें उसी अंश में उसके प्रति ललक देखी जाती है। कई व्यक्तियों में कई बार यौन के प्रति भयंकर अतृप्ति पायी जाती है जबकि कुछ सामान्य ढंग इसके प्रति एकदम अश्चि होती है। इस भिन्न-भिन्न मात्रा की ही भूमिका होती हैं । इस यौन प्रवृत्ति को नियंत्रित कैसे किया जाय? इसके दो तरीके है। एक-दूसरी का तरीका है, दूसरा उदात्तीकरण का है जैसा कि पहले कहा जा चुका हैं दमन से विक्षिप्तता आ सकती है व्यक्ति असामान्य बन सकता है किंतु उदात्तीकरण से आनन्द की उपलब्धि होती है। यह एक व्यापक आध्यात्मिक प्रयोग है, जिसमें काम वृत्ति को इतना परिष्कृत और विशाल बना दिया जाता है, कि सताने जैसी कोई बात शेष रह नहीं जाती । काम नियंत्रण के द्वारा जब प्राण शक्ति को संबंधित किया जाता है। तो वही प्रतिभा, प्रखरता, साहस, मनोबल, पुरुषार्थ , पराक्रम विवेक सहिष्णुता जैसी कितनी ही धातुओं के रूप में प्रकट और प्रस्फुटित होती हैं धूति , स्मृति, आत्मविश्वास, शारीरिक स्वस्थता, कायिक बलिष्ठता, ओज, तेज, - यह सब ब्रह्मचर्य के ही सत्परिणाम है। जो इसे जितने अंशों में धारण करेगा, उसी परिणाम में हाथों-हाथ यह विभूतियाँ मिलती चली जायेगी। भी अपनी प्रभावशीलता का परिचय देता है यू0 के0 ईस्ट ऐंब्लिया यूनिवर्सिटी के क्लाइमेटिक रिसर्च यूनिट के अनुसंधानी टी0 एम॰ एल॰ चिगले के अनुसार पृथ्वी की जलवायु अथवा मौसमीय परिवर्तनों की जानकारी 11 वर्षीय सोलर स्पाट साइकल और 22 वर्षीय मैगनेटिक साइकल के द्वारा आसानी से की जा सकती है। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में किसी भी प्रकार का विक्षेप उत्पन्न होने का अभिप्राय सूर्य को क्षुब्ध करने का ही होता है। उन दिनों कुछ ऐसा ही घटित हो रहा हैं वायुमण्डल में घुली हुई विषाक्त गैसों और रेडियोधर्मी विकिरण के फलस्वरूप पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को विशेष आघात पहुँचा हैं सौर विस्फोट और हैलियों मैग्नेटिक डिस्टरवेंसेज अर्थात् सूर्य के चुम्बकीय क्षेत्र में भी विक्षोभ उत्पन्न होने लगा है, जिससे धरती पर निवासरत प्राणियों को भिन्न-भिन्न तरह के प्राकृतिक प्रकोपों का शिकार बनना पड़ा रहा हैं नेशनल फिजीकल लैबोरेटरी दिल्ली के भौतिक विज्ञानी ए॰ पी0 मित्रा के अनुसार, सूर्य की इस विध्वंसकारी प्रतिक्रिया का कुप्रभाव समताप मण्डल (स्ट्रटोस्फीय ) के माध्यम से देखा-समझा जा सकता है इसमें विद्यमान वायु कण के कारण पृथ्वी के विद्युतीय क्षेत्र को विशेष प्रकार का खतरा उत्पन्न हो रहा है। यह सब मानवी कृत्यों की परिणति हैं अणु विस्फोट और जहरीली गैसों के उत्सर्जन से ही ऐसी विपन्न हुई हैं वायुमण्डल के परिशोधन के बिना उक्त समस्या ज्यों की त्यों ही बनी रहेगी और समूचा पृथ्वी मण्डल मौसम सम्बन्धी विषमताओं का शिकार बनता रहेगा। भौतिकविदों का कहना है कि फैले विकिरण में विकिरण में विशेष प्रकार का परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगा हैं विश्व के विकिरण में 0.1 प्रतिशत से कम का परिवर्तन भले ही दिखता रहे पर किसी स्थान विशेष के विकिरण की परिवर्तनशीलता को देखा जाय तो इसका औसत 10 प्रतिशत से भी अधिक होता है वायुमण्डल प्रदूषित होने के कारण ही इस तरह की अप्राकृतिक हलचलें देखने को मिल रही है। ज्योतिर्विज्ञान से चीन के ज्योतिषी 4000 वर्षों से भविष्यवाणियों करते आये है। और लोगों को पूर्व जानकारी देकर प्रकोपों से बचाते आए है। यूनान के बेलीज ने इससे सूर्य ग्रहण को जानकर मेडीज और लाइडियन्स के बीच भारी युद्ध बन्द करोगे । तो सूर्य देवता 27 मई, 575 को काला पड़ जायेगा और तुम्हें श्राप देगा। उस दिन से डरकर उन्होंने युद्ध बन्द कर दिया। भारत के ज्योतिषियों ने जान लिया है कि 6545 दिनों बाद ग्रहणों के गतिचक्र की पुनरावृत्ति होती है इससे वे हजारों वर्ष बाद पड़ने वाले ग्रहणों का दिन, समय आदि बतला देते हैं आस्ट्रिया के देवज्ञ थियोडोर ओपोल्जेर न भावी 7000 वर्ष के सूर्य ग्रहणों एवं 52 वर्षों के चन्द्र ग्रहणों की तिथि एवं निकाला हैं इसमें लोग सूर्य एवं चन्द्र ग्रहणों के दुष्प्रभावों को पूर्व से जानते हुए उनसे दीर्घकाल तक बचें रहेंगे। महर्षि वशिष्ठ ने सूर्यवंशीय वुहद्बल को अभिलक्ष कर सूर्य के वैभव का ही वर्णन किया है। उनके अनुसार सूर्य की किरणों में 4 किरणें जल बरसाती है, तीस किरणें हिम (शील) उत्पन्न करती है। इन्हीं सूर्य किरणों की औषधि शक्ति बढ़ती हैं अग्नि में दी गई आहुति सूर्य तक पहुँचकर अन्न उत्पन्न करती हैं यज्ञ से पर्जन्य और पर्जन्य से अन्न को होना शास्त्र सिद्ध और लोक प्रसिद्ध हैं जल का अनन्त चक्र सूर्य ही चलाता है गायत्री उपासना से जिन स्ळाल लाभों की चर्चा की जाती हैं वह सूर्य देव की प्रकाश शक्ति का ही चमत्कार हैं जिस तरह मन में जब काम वासना के विचार उठते हैं, उसकी शारीरिक इन्द्रियों पर उत्तेजना परिलक्षित होती हैं उसी प्रकार मन का ध्यान जब सूर्य लोक में करते हैं तो सूर्य की सबसे समीप वाला किरणों में मन का व्नान होता है और उसकी श्रेष्ठ शक्तियों के चमत्कारी परिणाम भी निश्चित रूप से शरीर में परिलक्षित होते हैं सूर्य भगवान का ध्यान करने से मानसिक शुद्धि ओर आत्मिक पवित्रता भी बढ़ती है, इसलिए ही सूर्य को लोक एवं परलोक दोनों प्रकार के सुखों का दाता कहा गया है। सूर्य सृष्टि का प्राण है। प्राणों की उपेक्षा कर मानवी जीवन के अस्तित्व की रक्षा नहीं की जा सकती , इसलिए स्वस्थ, बलिष्ठ रोग मुक्त और आत्मिक प्रगति के लिए हमें सूर्य किरणों सूर्य के प्राण तत्व की उपासना करनी ही चाहिए।


आँख और मान की विशेषता और गरिमा (Kahani)

आँख और मान की विशेषता और गरिमा बनाने के लिए किसी जिज्ञासु ने विचारक से पूछा। मनीषी ने उत्तर दिया। आँख केवल सामने का देखती है। जबकि कान विगत - आगत ओर वर्तमान को सुनने-समझने में सहायता करते हैं। सुन्दर दीखने वाला आँखों की तुलना में कुरूप कानों की महिमा अधिक हैं जो लोग सौंदर्य को , बहिरंग की सज्जा को ही महत्व देते हैं। उनके लिए यह जानना जरूरी है कि महत्ता कर्तव्य है। विवाद सम्बन्धों पर भी यह लागू होती हैं।


जिसने राष्ट्र को माँ माना

शीतकाल की शुरुआत काफी पहले ही चुकी थी समूचा पेरिस नगर बर्फ की चादर ओढ़े हुए था। लगातार पड़ रही कड़ाके की सर्दी के कारण सभी अपने-अपने घरों में गर्म लिहाफों में दुबके हुए अलाव सेंक रहे थे। ऐसे में उसका यह बर्ताव सभी के लिए आश्चर्यजनक था। वह इस जानलेवा ठंड में भी बरफ जैसी शीतल धरती में भी उघाड़े, शरीर , बिना कुछ भी बिछाए बैठा था। जेल विभाग के छोटे-बड़े हर एक अधिकारी और कर्मचारी ने उस बन्दी को अपने-अपने ढंग से लाख बार समझाने व मनाने का प्रयास किया। परन्तु वे लोग उसे सूती या गरम कोई सा भी वस्त्र पहनने या ओढ़ने या बिछाकर बैठने को राजी न कर सके। जबकि ठंड के मारे उसके दाँता बज रहे थे। मुँह की रंगत उड़ चुकी थी, रंगे नीली पड़ रही थी, कहने -सुनने की तानि भी परवाह नहीं की। जो स्वयं सर्दी की इस असहनीय पीड़ा को अपने मन से झेल रहा हो, उसे डाँटने मारने के प्रभाव की आशा करना बेकार था। बस, वह तो चुपचाप बैठा सर्दी से काँपता रहा- पत्ते की तरह रात के साथ-साथ सर्दी का प्रकोप भी बढ़ता गया। तभी सम्राट नैपोलियन प्रतिदिन की तरह बंदियों का निरीक्षण करते हुए उस ओर भी आ पहुँचे । जेलर ने आगे बढ़कर सम्राट से उस अजीब किस्म के हठीले कैदी के बारे में निवेदन किया, तो नैपोलियन भी एक पल के लिए सोच में पड़ गए। उन्होंने एक दो बार पहले भी इस युद्ध बन्दी के बारे में सुन रखा था। अभी पिछले दिनों हुई फ्रांस और जर्मनी की लड़ाई में जर्मनी हो हार के बाद उसे पकड़ा गया था। अन्तिम समय तक इस जर्मन युद्ध बन्दी ने अप्रतिम शौर्य और साहस का प्रदर्शन किया था। उसकी वीरता के चर्चे फ्राँस के सिपाहियों की जुबान पर थे। नैपोलियन स्वयं भी वीर था, बहादुरों के सम्मान करना उसका स्वभाव था। वह उसी पल उस जर्मन बन्दी के सामने जा खड़े हुए। एक सैनिक होने के नाते सम्राट का अभिवादन करना तो दूर उस बन्दी ने पलकें उठाकर उसकी ओर देखा तक नहीं। मानों वह किसी गम्भीर ध्यान में तल्लीन हो। हाँ उसकी देह में कंपकंपी जरूर छूट रही थी। जिससे उसके दाँत बज रहे थे। बन्दी से नैपोलियन ने कई काम की बाते जाननी चाहीं, पर उसकी जुबान से एक शब्द भी नहीं निकला। वहाँ उपस्थित लोगों ने एक बार फिर उसे समझाने की कोशिश की, पर वह चुप्पी साधे रहा। उसकी जिद देखकर अधिकारियों को बहुत ही क्रोध आ रहा था वे लोग उसे छोड़कर जाना चाहते हैं लेकिन उसकी बिगड़ती जा रही शारीरिक दशा ने जैसे उसके पाँवों को जकड़ दिया। वे जा नहीं सके। कैदी की हालत को चिन्ताजनक देख सम्राट का कठोर हृदय भी दया से पसीज उठा। उन्होंने फिर बड़ी आत्मीयता से पूछा। सैनिक, तुम बेधड़क होकर अपनी समस्या मुझे बताओ। तो सही, अभी इसी पल उसका समाधान हो जाएगा। इस स्नेह भरे वाक्य ने कैदी पर मानो जादू कर दिया, उसके होठ हिले। काँपते स्वर में कहने लगा, महोदय मेरे न बोलने और न कपड़े पहनने, ओढ़ने से आप सब दुःखी है पर मैं अपने मन से लाचार हूँ क्या करूं? मैंने स्वदेशी कपड़े ही पहनने, ओढ़ने का प्रण कर रखा है सो आप लोग मुझे क्षमा करें मैं आपके देश के इन कपड़ों की पहन, ओढ़कर प्रण बचाने की अपेक्षा अपने प्राण की रक्षा के लिए प्राण त्यागना बेहतर समझता हूं। स्वदेश प्रेम पर मर-मिटने के लिए तैयार उस युद्ध बन्दी की देश भक्ति के सामने सम्राट नैपोलियन नतमस्तक हो गए। उन्होंने आस-पास खड़े। अधिकारियों को तुरन्त आज्ञा दी कि जैसी भी हो सके इस देशभक्त बन्दी के लिए जर्मन वस्त्रों की शीघ्र ही व्यवस्था की जाए। आदेश देकर सम्राट नैपोलियन अन्य बन्दियों की ओर उनका हाल-चाल जानने के लिए चल दिए और अधिकारीगण भी आज्ञानुसार तुरन्त भाग-दौड़ करने लगे। किन्तु सवेरा होने तक उस अनूठे देशभक्त कैदी की आत्मा, दुश्मन की कैद और संसार के बन्धनों से अपने को मुक्त करके अनन्त की ओर प्रस्थान कर चुकी थी। प्रातःकाल इस समाचार को सुनकर नैपोलियन की आँखों से दो आँसू लुढ़क पड़े। अनचाहे उसने हैट उतार कर उस देशभक्त को सलाम करते हुए कहा’- “काश। हर देश में ऐसे देश-भक्त पैदा हों जो देश की जमीन को मिट्टी का टुकड़ा न समझ उसे अपनी माँ समझे। देश के स्वाभिमान के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान कर सके।” इतना कहते हुए वह एक ओर चला गया।


जल : एक जीवन मूरि

जल की व्यापता और सुलभता के कारण हमारी दृष्टि उसके गुणों की आरे नहीं जाती। वस्तुतः दुनिया में पानी से बढ़कर दूसरी कोई औषधि नहीं। जल को जीवन कहा गया है। यह नामकरण उसके गुण को देखकर ही किया गया था। शरीर का पाचन, रक्त परिभ्रमण रस-स्राव स्नायु संचालन एवं सभी जैविक कार्यों में जल का अमूल्य योगदान हैं यदि सही ढंग से जल का सेवन किया जाय तो बीमार पड़ने , एवं डाक्टरों के पास दौड़ने जैसा झंझट ही न पड़े। शरीर शास्त्रियों के अनुसार काया का दो तिहाई भाग जल से ही भरा हैं यह शरीर के 69 से अधिक प्रतिशत भाग को बनाता है रक्त का 73 प्रतिशत भाग पानी ही हैं जो आक्सीजन के अतिरिक्त रोगों से जूझने वाली कोशिकाओं की फौज को वहाँ पहुँचाता है जहाँ उसकी आवश्यकता होती हैं खून के जलीय अंश के कारण ही रोग प्रतिकारक कण एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचे पाते हैं। माँस पेशियों के द्रव्य में 75 प्रतिशत और हड्डियों की मज्जा में 22 प्रतिशत पानी हैं जिसके कारण जोड़ों में चिकनाहट प्रतीत होती है और भीतरी अंग अवयव आपस में चिपकते नहीं, चमड़ी सूखती नहीं। शरीर की सूक्ष्मतम कोशिकाओं के भीतर विद्युत संवहनशीलता के आधार इलेक्ट्रोलाइट्स सोडियम व पोटेशियम है जिनका उचित संतुलन पानी में घुले हुए लवणों के कारण ही स्थापित हो पाता है यह कथन कि मस्तिष्क निरंतर पानी पर तैर रहा है विलक्षण सा प्रतीत होता हैं किंतु मस्तिष्क ही सभी 15 बिलियन कोशिकायें पानी के कणों से ही विनिर्मित है और उनका कुल परिमाण खोपड़ी की क्षमता का 60 प्रतिशत तक होता है वसा ऊतकों में जल 20 प्रतिशत होता है। यहां तक कि सुखी दीखने वाली हड्डियों में 25 प्रतिशत और धारीदार पेशियों में 70 प्रतिशत जल ही होता है शरीर की सभी कोशिकाएं जल में डूबी रहती है ताकि व नम रह सकें जिससे रुधिर वाहिकाओं और कोशिकाओं के बीच पदार्थों को मार्ग में आने-जाने के लिए सुगम कर सके। इसके द्वारा ही उपयोगी अंश फेफड़ों में और अनुपयोगी अंश किडनी में चला जाता है इस प्रकार जल भोजन को पेट के अनुकूल बनाने से लेकर रक्त बनने की प्रक्रिया में सहायक है। मात्र संरचना में ही नहीं वरन् शरीर की आंतरिक क्रियाओं में भी जल का महत्वपूर्ण स्थान है यह शरीर में उत्पन्न दूषित पदार्थ ही साँद्रता कम कर रक्त को पतला करके उसमें ओजस्वी कणों की वृद्धि करता है। सड़े-गले पदार्थों को घुलाकर, त्वचा , मूत्र तथा श्वास के द्वारा बाहर निकाल फेंकता है शरीर के दूषित पदार्थ जब बाहर निकल जाते हैं तो रक्त परिशोधन को प्रक्रिया को बल मिलता है भोज्य पदार्थ को गुर्दा के फिल्टर वाले पहले भाग से छन-छन कर दूसरे भाग वाले नली तथा लघु नलिकाओं के लंबे मार्ग से गुजरना पड़ता है। उन्हीं मार्गों से उच्छिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में जल गुर्दों की मदद करता है। संधि तथा आँतरिक अंगों के लिए जल स्नेहक (लुव्रिकेटर) की भूमिका निबाहता है ताप नियंत्रक के रूप में शरीर से ऊष्मा हटाने में सहायक होता है ज्यों ही शरीर गर्म हुआ कि अधिक रक्त त्वचा की ऊपरी सतह पर आ जाता है उनके द्वारा प्रेषित स्वेद बूंदें रोम कूपों से वाष्पन क्रिया हेतु शरीर वातानुकूलित अर्थात् गर्मी में ठंडा एवं सर्दी में गरम रहता है। जल का उपयोग जितना अनिवार्य है उतना ही इसका कम प्रयोग अनेकानेक रोगों को जन्म देने वाला भी। चूंकि यह शरीर जल द्वारा ही संचालित है अतः इसके न्यूनतम सेवन से इसके अंदर अनेक गड़बड़ियां उत्पन्न हो जाती है शरीर में ऐंठन मल उत्सर्जन के रुकावट , पेट दर्द, आदि का कारण जल की न्यूनता ही है ऐसे व्यक्ति प्रायः परेशान से रहते हैं एवं चिकित्सा के लिए डाक्टर के पास रंग बिरंगी गोलियों, चूर्ण आदि का सेवन करते हैं और मूल कारणों को न जानने के कारण कई अनेक रोगों से ग्रसित हो जाते हैं पेट में भारीपन के कारण शरीर में सुस्ती छाई रहती है। शरीर कमजोर हो जाता है और चेहरा निस्तेज। ये कमी शरीर में उत्पन्न हो ही नहीं इसके लिए प्रकृति ने मनुष्य के अनुकूल खाद्य पदार्थों में जल के अंश को संतुलित बनाया है। जिसे यदि प्राकृतिक रूप में लिया जाय तो कमी पूरी हो सकती हैं “न्यूट्रिशन एण्ड डायट इन हेल्थ एण्ड डिजीज“ के अनुसार हमारे भोज्य पदार्थों में सत्तर प्रतिशत नमी होती है बिना जलीय अंश के हम भोज्य पदार्थों के ग्रास गले के नीचे उतार नहीं पाते हैं। ताजी सेम में 79 प्रतिशत और सलाद वर्ग के सब्जियों में 15 प्रतिशत और पानी होता है । शुद्ध दूध में भी पानी की मात्रा अस्सी प्रतिशत होती है। भोजन के अन्यान्य पदार्थों में जलीय अंश कुछ न कुछ होता ही हैं । यहाँ तक कि शरीर को प्राप्त , होने वाले कार्बोहाइड्रेट वसा और प्रोटीन के


अन्तरात्मा की मार से कब तक बचेंगे?

अपराध विज्ञान का एक सामान्य और सर्वमान्य सिद्धान्त है कि अपराधी कितना ही चतुर और कितना ही चालाक क्यों न हो, जब वह अपराध करता है तो अपराध स्थल पर कोई न कोई ऐसे चिह्न अवश्य छोड़ जाता है जिससे कि वह पकड़ में आ जाता हैं इस सिद्धान्त के मूल में अन्तरात्मा के विरुद्ध किये जाने वाले कार्य में, आत्मा की प्रताड़ना के कारण अंतः करण में होने वाली हड़बड़ाहट ही हैं अपराधी को उस समय दोहरे मानसिक द्वन्द्व से गुजरना पड़ता है एक तो अपराध करते हुए कोई देख न ले, कोई ऐसा सूत्र न छूट जाय जिससे उसकी पहचान हो सके। दूसरा संघर्ष अपनी आत्मा से ही करना पड़ता है जो उसे किये जा रहे अनुचित कार्य के लिए अनवरत लताड़ती-फटकारती ही रहती है। इन दोहरे द्वन्द्वों के कारण अपराध स्थल पर कोई चूक अवश्य कर जाता है। अब तो अपराधी की खोज के लिए अंगुलि मुद्रायें (फिंगर प्रिण्ट्स) भी काफी सहायक होते हैं यह मुद्रण अपराध स्थान पर अपराधी द्वारा कही न कही जरूर छूट जाती हैं। यद्यपि अपराधी अपनी ओर से पूरी सावधानी बरतते हैं कि उनका कोई चिह्न घटना स्थल पर छूटे नहीं परन्तु अंगुलियों की छाप कही न कही अवश्य छूट जाती है, जिससे वे पकड़ में आ जाते हैं। कई बार तो अंगुलि मुद्राएं प्रत्यक्षदर्शियों से भी अधिक प्रामाणिक सिद्ध होती है। अंगुलि मुद्राओं का वैदिक आधार यह है कि मनुष्य के शरीर के सभी अंग सारे चिह्न समयानुसार बदलते, बनते मिटते रहते हैं हथेली अथवा अंगुलियों पर पड़ी रहने वाली हस्त रेखाएं भी बदलती रहती हैं किन्तु उनके अतिरिक्त जो बारीक असंख्य रेखायें होता है वे कभी नहीं रेखायें होती हैं वे कभी नहीं बदलती इसके साथ ही किसी एक व्यक्ति की रेखाएं दूसरी व्यक्ति से मेल ही नहीं खाती यहां तक कि एक ही समय पर एक साथ जन्में दो हमशक्ल जुड़वा भाइयों की रेखाएं भी एक सी नहीं रहती। पिछले दिनों लन्दन में ही एक ऐसा काण्ड हुआ था जिसमें अपराधी का पता चल गया था। उसे देखने वाले प्रत्यक्षदर्शी भी थे परन्तु समस्या यह थी कि अपराधी का एक दूसरी भाई भी था जो स्वयं अपने भाई का अनुगमन करता था। वह निश्चित नहीं किया जा रहा था कि स्थिति में अंगुलि मुद्राएं सहायक सिद्ध हुई और वास्तविक अपराधी को दण्ड दिया जा सका। घटना स्थल पर अपराधी की अंगुलि-मुद्राएं कैसे अंकित हो जाती हैं इस संदर्भ में अपराध वानियों का कहना है कि मनुष्य के हाथ में से एक अदृश्य द्रव्य निरन्तर प्रवाहित रहता है साथ ही विद्युत प्रवाह भी जी0 एस0 आर0 के रूप में सतत् निकलता रहता है व्यक्ति जब अपराध करता है तो इस द्रव्य व विद्युत प्रतिरोध की मात्रा बढ़ जाती है मात्रा बढ़ जाने का कारण अपराधी में चलते रहने वाला मानसिक द्वन्द्व पकड़े जाने का डर तथा आत्मा की फटकार के कारण उत्पन्न हुई घबराहट ही बताया जाता है। इसलिए अपराधी की अंगुलि मुद्राएं उस स्राव के कारण अधिक स्पष्टता से अंकित हो जाती हैं इसी आधार पर सैकड़ों व्यक्तियों की अंगुलि मुद्राओं के बीच भी अपराधी की अंगुलि मुद्राएं पहचानी जा सकती है। किसी भी दुष्कर्म में प्रवृत्त होते समय पहले व्यक्ति की अन्तरात्मा धिक्कारती है परन्तु जब उस आवाज की कुचलकर बार-बार दुष्कर्म किये जाते हैं तो अन्तरात्मा की वह ध्वनि, चेतावनी क्षीण पड़ने लगती है उसी स्थिति में अपराधी को न घबराहट होती है और न भय माना जाय कि उस द्रव के निस्सरण का कारण घबराहट या भी ही है तो वैसी स्थिति में लेकिन ऐसा कोई द्वन्द्व नहीं चलता अंत’करण की आवाज मर सी जाती है , तो कोई द्रव नहीं बहना चाहिए, परन्तु इस दश में भी अंगुलि मुद्राएं के अंकन में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया है। बड़े से बड़े पुराने और कुशल अपराधियों की अंगुलियों उसी प्रकार अपनी छाप , छोड़ देती है, जैसे नये अपराधी की । वहां यह प्रक्रिया अंतरात्मा द्वारा अपनी बात न मानने , अनीति का पथ न छोड़ने के कारण समाज द्वारा दण्डित कराये जाने के लिए छुड़वायी घटनाओं में तो उन्हीं अपराधों को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किया गया हैं जिनमें हाथ के निशान अंकित होने की सम्भावना कही न कही रहती ही है लेकिन अपराधी जब दूर रहकर बार करता है जैसे गोली चलाता है या विष देकर किसी की हत्या करता है तो भी बच नहीं पाता। हालांकि इस तरीकों में अंगुलि मुद्राओं का कोई भय नहीं रहता, फिर भी अपराधी को पकड़ ही लिया जाता है 1950 में पंजाब की “रियासत के राजा रंजीतसिंह की हत्या उनकी रानी पलविंदर कौर ने ही कर दी थी। कोई प्रमाण नहीं था कि यह हत्या रानी ने ही की है। और न ही किसी को संदेह हो सकता” क्योंकि किसी ने कभी भी राजा-रानी में मनमुटाव या मतभेद जैसी कोई बात देखी ही नहीं थी।

घटना इस प्रकार है- रंजीतसिंह और पलविंदर कौर उस दिन शिकार पर गये थे, शाम को वापस कैंप पर केवल महारानी ही लौटीं। कैंप पर केवल महारानी ही लौटीं। उन्होंने अपने अपने अन्य साथियों को बताया कि मैं और महाराजा अपने शिकार के पीछे अलग-अलग रास्तों पर निकल गये थे। महाराजा भी बहुत चिंतित दिखाई दे रही थीं। देर रात तक उन लोगों के कैंप पर महाराज का इन्तजार किया। जब महाराजा का एक प्यादा यह सूचना लेकर आया कि महाराज एक कुएँ में गिर गये हैं सभी लोग दौड़े गये और रस्सी डाल कर महाराज को कुएँ में से निकाला गया परन्तु तब तक महाराजा की मृत्यु हो चुकी थी।

लेकिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट मृत्यु का दूसरा कारण ही बता रही थी। डॉक्टरों के अनुसार महाराजा की मृत्यु कुएँ में गिरने के कारण नहीं वरन् एक नुकीले तीर के कारण हुई थी। पुलिस का विचार कबीलों की महाराज से रंजिश चल रही थी और यह तीर आदिवासियों द्वारा ही इस्तेमाल किया जाता है। सूत्र दर सूत्र घटना की कड़ियाँ इस प्रकार मिलाई गयीं कि लगता था किसी आदिवासी ने महाराजा पर उस समय तीर चलाया, जब पानी पीने के लिए कुएँ में गिर गये और उनकी मृत्यु हो गयी।

डस तीर को, जिसका, अगला सिरा महाराज की पीठ में घुसा हुआ मिला था, अपराध विज्ञान की लैबोरेटरी में भेजा गया। अपराध विज्ञानी डॉ0 दत्त ने निरीक्षण किया तो पाया कि तीर का अगला हिस्सा अत्यन्त नुकीला, ठोस और ताँबे का बना हुआ था और यह एक पेंचदार खोखली ट्यूब से बना है। आग जाँच की गयी तो पता चला कि वह तीर नहीं बल्कि एक विशेष प्रकार की रायफल की गोली है जो तांबे से बनती है क्योंकि उस रायफल से निकली गोली की गति व मारक शक्ति इतनी तेज तथा गर्म होती है कि सीसे की गोली पिघल जाती है कि सीसे की गोली पिघल जाती है। इसीलिए रायफल में ताँबे की गोली प्रयुक्त की जाती है।

यह रायफल उक्त क्षेत्र में केवल रियासत के राजघराने में ही थी। केस ने नया मोड़ लिया तो उसके आधार पर महारानी को गिरफ्तार किया गया और उसे सात साल की सजा दी गई। यद्यपि यह केस आगे हाईकोर्ट में भी ले जाया गया। पता नहीं वहाँ क्या निर्णय हुआ परन्तु इन सभी घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि अपराधी अपराध करने के लिए कितनी भी योजनायें बनाये, कैसी भी सावधानी बरते परन्तु प्रायः वे कहीं न कहीं ऐसी चूक जरूर कर जाते हैं, जिससे कि उनका राज खुल जाता है।

कदाचित् कोई व्यक्ति इतनी सावधानी बरते कि वह पुलिस और कानून की निगाहों से बच निकले तो भी उसे अपराध का दण्ड तो मिलता ही है। समाज न भी दे, परन्तु जिनके प्रति अपराध किया गया है उनकी आत्मा, स्वयं अपनी आत्मा और ईश्वरीय नियम अपराधी को उसके किये का दण्ड देते हैं।

वर्षों पूर्व की एक घटना है। अर्जेन्टीना के एक ग्रामीण क्षेत्र में किसी व्यक्ति ने एक ग्रामीण को गोली मारकर हत्या कर दी। गोली इतनी नजदीकी से मारी गयी कि मृत व्यक्ति की खोपड़ी को छेदते हुए पीछे खड़े वृक्ष के तने में जा घुसी। हत्यारा पकड़ लिया गया। प्रत्यक्षदर्शी गवाह, साक्ष्य और प्रमाणों के बावजूद भी वकीलों ने कुछ ऐसे कानूनी पेंच निकाल लिये कि अपराधी को संदेह का लाभ मिल गया और वह बरी हो गया। इस घटना के तीन वर्ष बाद वही व्यक्ति अपने खेत पर खड़ा होकर मेंड़ पर लगा एक वृक्ष कटवा रहा था। यह वही वृक्ष कटवा रहा था। यह वही वृक्ष था जिसके नीचे उस मजदूर की गोली मार कर हत्या की गयी थी। जब वृक्ष कट कर कुछ इस प्रकार जमीन पर गिरा कि उसमें तीन वर्ष पूर्व फँसी गोली बंदूक से छूटी गोली की तरह उसी खेत मालिक की कनपटी पर लगी जिसने कि मजदूर की गोली मारकर हत्या की थी। पेड़ से छूटी हुई गोली के कारण वह व्यक्ति घटनास्थल पर ही मर गया। इस विचित्र घटना को जिस किसी ने भी सुना, सृष्टि नियंता की न्याय प्रक्रिया का यह अद्भुत ढंग देखकर दाँतों तले अंगुली दबाकर रह गया।

व्यक्ति के अपने अपकर्म ही भूत बन कर उसका पीछा करते रहते हैं और जब तक वह व्यक्ति उन दुष्कर्मों का फल नहीं भोग लेता तब तक उनसे पीछा नहीं छूटता। इस जन्म में कोई व्यक्ति पाप कर्मों के दण्ड से बच जाने में सफल भी हो जाता है तो भी उसका दण्ड अगले जन्म में सुनिश्चित रूप से मिलता है। आतवाक्य कि “पूर्वजन्म के पाप ही इस जन्म में असाध्य और कष्टकर रोगों के रूप में पीड़ित करते हैं।” अगले जन्म में यह दण्ड तो भोगने ही पड़ते हैं इसी जन्म में जो मानसिक बोझ, व्यथा, पश्चाताप की आग दहकती रहती है वही कम नहीं होती।

क्षणिक प्रलोभन या आवेश में आकर कोई अपराध कर बैठना सौ में से निन्यानवे बार समाज के सामने अपराधी की तरह खड़ा कर देता है। उससे बच भी गये तो अन्तरात्मा की मार, पीड़ित आत्मा के प्रतिशोध और सृष्टि संतुलन बनाये रखने वाले नियमों की पकड़ से बचकर कहाँ जा सकते हैं?


अनुयाज-पुनर्गठन-1 विशेष लेखमाला-5 - चिन्तन सार्थक बनाता है स्वाध्याय को

स्वाध्याय-मनन-चिन्तन की तीन पदों वाली विचार शैली में ‘चिन्तन’ अन्तिम पद है। एक पैर अथवा दो पैरों वाली तिपाई खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी नहीं होती। तीन पैरों वाली स्थिर खड़ी तिपाई ही उपयोग में लाई जा सकती है। उपयोग में लाई जा सकती है। इसलिए केवल स्वाध्याय अथवा मनन महत्वपूर्ण क्रियाएँ होते हुए भी फलहीन बनी रहती हैं और इच्छित परिणाम प्रस्तुत नहीं कर पाती। चिंतन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता। चिन्तन के साथ जुड़कर ही वे पूर्णता प्राप्त करती हैं। और सार्थकता सिद्ध करती है।

स्वाध्याय के द्वारा अपने दोष गुण जान लिये, स्वीकार अपने दोष गुण जान लिये, स्वीकार भी कर लिये। मनन द्वारा इन दोष-गुणों को विस्तार से ढूँढ़ भी लिया गया। जहाँ से वे पोषण पाते हैं, उन मनोवृत्तियों, संस्कारों को भी देख लिया गया। किन्तु इतना जान लिये व खोज गया। किन्तु इतना जान लेने व खोजे लेने से तो दोष घटेंगे-मिटेंगे नहीं । न तो गुण विकसित हो पायेंगे, न ही इच्छित परिणाम प्राप्त होगा, क्योंकि अभी एक सोच और बच रहा है-

“जाने गये अपने दोष, दूषित मनोवृत्ति एवं कुसंस्कार को हटाने के लिये हम कौन-से व्यावहारिक उपाय अपनायें? खोजे गये अपने श्रेष्ठ गुण, श्रेष्ठ वृत्ति व श्रेष्ठ संस्कार को अधिक विकसित करने के लिए और क्या करें? दोषों को दूर करने का, श्रेष्ठताओं को बढ़ाने का यह सोच ही ‘चिन्तन’ है।

युद्ध जीतने के लिए अनेक प्रकार की मोर्चाबन्दियाँ या व्यूह रचनाएँ की जाती हैं। इन व्यूह रचनाओं का उद्देश्य ही यह होता है। कि प्रत्येक परिस्थिति में शत्रु इनमें पहुंचकर घिर जाए और तब उसे नष्ट कर दिया जाए और तब उसे नष्ट कर दिया जाए। पुराणों में वर्णित देवासुर संग्राम के आख्यान ऐसी व्यूह रचनाओं से भरे पड़े है। दुर्गुणों को नष्ट करके श्रेष्ठताओं को स्थापित करना ही देवों का असुरों के विरुद्ध संग्राम है। इस संग्राम में ‘चिन्तन’ दुर्गुणों को नष्ट करने के लिये की गई व्यूह रचना है।

चिन्तन दो प्रकार की व्यूह रचना प्रमुख रूप से करता है। जिस प्रकार प्रकाश से अन्धकार को दूर किया जाता है, जल से अग्नि को बुझाया जाता है। वैसे ही सत्कर्म से दुष्कर्म को, सद्विचार से कुविचार को और सद्भाव से दुर्भाव को काटा जाता है। अतः चिन्तन-दुर्गुण का शमन, उन्मूलन करने के लिये विपरीत सद्गुण का विकास करने वाली उपयुक्त क्रियाओं का अभ्यास निर्मित करता है। उदाहरण स्वरूप, लोभ का शमन करने के लिये अपनी शुद्ध आये के एक निश्चित अंश का श्रेष्ठ कार्यों के लिए नित्य विनम्र अर्पण करना। जिस प्रकार वायु की सहायता पाकर अग्नि अधिक प्रज्ज्वलित होती है। जल की सहायता पाकर पृथ्वी अधिक उपजाऊ बन जाती है। वैसे ही सत्कर्म या सद्भाव के साथ सहयोगी सत्कर्म या सद्भाव को संबद्ध कर देने से उसकी प्रभावशीलता व गुणवत्ता बढ़ जाती है। अतः चिन्तन श्रेष्ठ गुण की अभिवृद्धि करने के लिये उपयुक्त सहायता करने की व्यावहारिक विधि को खोजता है। उदाहरण के लिये, केवल सेवा-भाव से किये जा रहे कार्य में सहानुभूति अथवा करुणा का समान रूप से योग करना।

किन्तु सबसे बड़ी व्यूह-रचना तो श्रद्धा, विश्वास और लगन करते हैं। यह तीन तत्व व्यक्ति में हों तो ही वह अपने जीवन के भौतिक, मानसिक और भावात्मक स्तरों को ऊपर उठाने के लगातार प्रयास करता रहता है। यह तीन भाव आध्यात्मिक जीवन के तो मानो प्राण ही हैं। यह न हों तो अपने वर्तमान जीवन में झाँकने और उसे सुधारने के चक्कर में भला कोई क्यों पड़ेगा। श्रद्धा, विश्वास व लगन से छलछलाती आध्यात्मिक वृत्ति ही व्यक्ति को श्रेष्ठ जीवन जीने श्रेष्ठ गुणों को विकसित करने के लिये उकसाती है, चेतना को झकझोरती है, आशा को जगाती है। “इस गई-गुजरी स्थिति में भी मेरे व्यक्तित्व में सुधार सम्भव है (श्रद्धा) यह सुधार मेरे जीवन में आएगा, अवश्य आएगा। (विश्वास) मुझे प्रयास करते रहना है, असफल होऊँ तो भी बार-बार प्रयास करते रहना है (लगन)।” ऐसे प्राणवान व्यक्ति की प्रगति को भला कौन सा दुर्गुण रोक सकता है? इन्हीं तीन सर्वोच्च भावों से युक्त होकर प्राणवान चिन्तन’ का भी आरम्भ होता है

दो पहलवानों के बीच दंगल हो तो कोई एक तो हारेगा ही। किन्तु हारने वाले पहलवान को निराश होते कभी नहीं देखा गया। हारने वाला तत्काल तीन बातों की खोज करता है। पहला, वह बारीकी से खोजता है। कि उसने कौन-कौन सी गलतियां कीं (स्वाध्याय)। दूसरा, इन गल्तियों और कमियों को दूर करने के लिये अब क्या करना चाहिए? शरीर बल में कमी हो तो कौन से व्यायाम बढ़ाए जायँ? कौशल में कमी हो तो कौन से दाँव-पेंच सीखें और क्या करें जिससे कि भविष्य में जब भी दंगल का अवसर आए तव विजय श्री मिले (चिन्तन)। सम्भव है कि इतनी तैयारियों के बाद भी अगला दंगल फिर हार जाये। किन्तु हार उसका मनोबल नहीं तोड़ पाती, क्योंकि उसने जीतने का संकल्प मन में ठाना है। अगले-और-अगले दंगल के लिये वह लगन के साथ दंगल के लिये वह लगन के साथ अपना बल और कौशल बढ़ाता रहता है। ‘अगला दंगल मुझे ही जीतना है’ इस आशा भरे विश्वास को वह उत्साहपूर्वक सँजोए रखता है। यही’ श्रेष्ठ चिंतन ‘ की शैली है। श्रेष्ठ चिन्तन कभी निषेधात्मक नहीं होता वह कभी निराश नहीं करता, क्योंकि वह कर्म और भविष्य में विश्वास करता है।

हमारी कमजोर मनः स्थिति के कारण तथा डगमगा देने वाली बाह्य जीवन की आकर्षक किन्तु हानिकारक परिस्थितियों के कारण हानिकारक परिस्थितियों के कारण हमारे दोष पनपते हैं और बार-बार हमारी श्रेष्ठताओं पर आक्रमण कर उनका स्तर घटाते रहते हैं। हमारे कुसंस्कार इतने प्रबल हो जाते हैं।कि अवसर पाते ही वे हमारे शरीर से बरबस ही दुष्कर्म करा लेते हैं और प्रतिरोध करना चाहकर भी हम कुछ नहीं कर पाते। वे कभी तृष्णा के मोर्चे से, कभी वासना के मोर्चे से आक्रमण करते हैं इस भयंकर संग्राम में एक कुशल सेनापति के समान ‘चिन्तन’ इन सभी मोर्चों से आक्रमणों को विफल करने की प्रभावी कार्य योजना बनाता है। साथ ही श्रेष्ठ संस्कारों के, सत्कर्मों के, संयम और संकल्प आदि के अपने भी ऐसे मोर्चे खड़े करता है। जहाँ से इन दोषों-दूषित मनोवृत्तियों पर प्रत्याक्रमण कर उन्हें उखाड़ा जा सके। अतः जब तक देवासुर संग्राम होता रहेगा, जब तक श्रेष्ठता और निम्नता के मध्य युद्ध जारी रहेगा, तब तक विजय के लिए ‘चिन्तन’ जैसे कुशल देव-सेनापति की अनिवार्य आवश्यकता बनी रहेगी।

चिन्तन बेतुकी और काल्पनिक कार्य योजना नहीं बनाता, न ही ऐसी दुरूह योजनाएँ बनाता है। जिन्हें कार्यान्वित करने में उच्च इच्छाशक्ति संपन्न भी कठिनाई अनुभव करें। वह तो स्वाध्याय व मनन के निष्कर्षों के अनुरूप सरल, साध्य अभ्यासों की बना करता है। इतना ही नहीं वह कार्य-योजना का विस्तार भी उतना ही करता है, जितना अपनी वर्तमान क्षमता व इच्छाशक्ति के द्वारा संपन्न होना सम्भव हैं इस कारण चिन्तन व्यावहारिक एवं उपयोगी होती है। कुल मिलाकर चिन्तन प्रक्रिया का उद्देश्य बहुत सीधा और स्पष्ट है “आज हमारी जैसी भी मनः स्थिति व परिस्थिति है, जैसी भी क्षमता व इच्छाशक्ति है, हमें तो उतने से ही अपने दोषों को हटाने और गुणों को बढ़ाने का प्रयास करना है। अतः हम निश्चित करें कि हम अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन-कौन से उपायों-अभ्यासों का सतत् प्रयोग कर पायेंगे, जिससे कि वर्तमान स्थिति से बेहतर मानसिक व आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ सकें।

अपनी कार्य-योजना बनाने के लिए ‘चिन्तन’ जिन उपायों को साधनों को, काम में लाता है उनमें से अधिकांश वैचारिक स्तर के होते हैं, कुछ स्थूल-साधन भी होते हैं।

उदाहरण के लिये, मन को डाँवाडोल करने वाली अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ होती हैं। प्रत्येक परिस्थिति का सामना करने के लिये अथवा उसका निराकरण करने के लिये उसके अनुरूप तथा प्रभावशाली प्रेरक वचन, श्लोक, चौपाई को कण्ठस्थ करना तथा समय आने पर उन्हें दुहराना एक प्रकार के साधन हैं। सेवा कार्य करते समय संवेदना, करुणा जैसे सहायक भावों को साथ रखना दूसरे प्रकार का साधन है। नित्य अर्थ-दान, ज्ञान-दान के अभ्यास द्वारा क्रमशः त्याग व सेवा भाव को विकसित करना जिसके द्वारा लोभ व स्वार्थ भावों का उन्मूलन किया जा सके, तीसरे प्रकार का साधन है। प्रीति भाव इनमें सबसे अधिक प्रभावी साधन है। इन्द्रदेव गुरुदेव अथवा किसी अत्यन्त प्रिय व्यक्ति के प्रति भाव से उनका करने के लिए तथा अनेक दोष-दुर्गुणों का शमन करने के लिए तथा अनेक श्रेष्ठ गुणों को बढ़ाने के लिए शक्तिशाली प्रोत्साहन देता है। यह प्रीति अथवा उत्कृष्ट जीवन के प्रति श्रद्धा चौथे प्रकार का साधन हैं यज्ञोपवीत का दर्शन, स्पर्श तथा नमन स्थूल साधनों का प्रकार है। इनके तथा अनेकों साधनों का उपयोग चिन्तन की कार्य योजना बनाते समय उपयुक्तता के आधार पर किया जा सकता है।

चिन्तन मनोमय कोश की उच्चस्तरीय साधना है। उत्कृष्ट जीवन जीने की आकांक्षा, अपनी थोड़ी या अधिक क्षमता पर विश्वास तथा धर्म जैसे गुणों के साथ नियमित अभ्यास करने से जीवन की अनेक प्रकार की समस्याओं का सफल समाधान खोजने में तथा व्यक्तित्व के विकास में यह साधना बहुत सहायक है। स्वाध्याय, मनन-चिन्तन को मन्त्र जप के समान महत्व देते हुए आश्वमेधिक अनुयाज में इसीलिए प्रथम स्थान दिया गया है।


निवेदिता (Kahani)

स्वामी विवेकानन्द जब इंग्लैण्ड प्रवास पर थे, तब उनने अपने एक प्रवचन में कहा-मुझे 100 समर्पित व्यक्तियों की आवश्यकता है। जिनके साँचे से मैं नई प्रतिभायें ढाल सकूँ।

19 वर्षीया मोबुल ने विवेकानन्द साहित्य पहले भी पढ़ा था, भारत की सेवा करने की कल्पनायें उनने बार की थीं। यह भाषण उन्हें ऐसा लगा, मानो सीधा उन्हीं के लिए कहा गया हो।

कु0 नोबुल ने कहा- ‘एक मैं अपने को समर्पित करती हूँ।19 और आप ढूंढ़ लें। वे भारत चली आयी। स्वामी जी ने उन्हें संन्यास दिया और निवेदिता नामकरण कर दिया। वे आजीवन स्वामी जी के मार्गदर्शन में भारत की सेवा करती रहीं।


आत्मशोधन, आत्म परिष्कार एवं कायाकल्प-परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(कल्प साधना सत्र के दौरान शान्तिकुँज परिसर में दिया गया उद्बोधन-मई 1972)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों। आपको यह बताया गया है। कि अपने पापों का प्रायश्चित करना पड़ेगा। प्रायश्चित कैसे होगा? इसके लिए आपकी घटनाएँ सुनाता हूँ। आम्रपाली ने प्रायश्चित किया आम्रपाली ने सैकड़ों आदमियों की जिन्दगियाँ खराब कीं, सुमार्ग पर चलाया, बहुत सारा धन कमाया और उस पाप से निदान पाने के लिए भगवान बुद्ध की शरण ली। भगवान बुद्ध ने शरण में तो ले ली, किन्तु साथ-साथ यह भी कहा कि पिछले जो गुनाह हैं, उनकी भरपाई तो करनी ही पड़ेगी, आध्यात्मिक उन्नति का केवल मंत्र लेने से या जप करने से रास्ता थोड़े ही सुलझेगा? आम्रपाली ने कहा- “ठीक है, मैंने जो कुछ भी गुनाह किए हैं, जो कुछ भी पैसा मैंने गुनाहों के द्वारा कमाया है, उस समस्त सम्पदा को मैं दुनिया में ज्ञान के संवर्धन में खर्च कर दूँगी। उसके पास करोड़ों रुपये की सम्पत्ति थी, उसे लाकर वह भगवान बुद्ध के चरणों में से मैंने अनेकों को गुमराह किया है, आप अनेकों को अच्छे मार्ग में लगा देने के लिए इस पैसे को खर्च कर डालिए। बस ऐसा ही हुआ। भगवान बुद्ध ने आम्रपाली की करोड़ों रुपये की सम्पत्ति से बुद्ध विहार बनवा दिए, धर्म प्रचारकों के शिक्षण, का प्रबन्ध कर दिया। इस तरीके से जो अनीति का धन था वह सब उसमें लग गया, प्रायश्चित हो गया।

यही तरीका एक और व्यक्ति ने अपनाया, उसका नाम था अंगुलिमाल। अंगुलिमाल ने अपने जीवन में बहुत हत्याएँ की थीं, न जाने कितने कत्ल किए थे और कत्ल करने के बाद बहुत सारा धन कमा लिया। बहुत धन था उसके पास। वह भगवान बुद्ध का शिष्य बनने के लिए आया, मंत्र माँगने के लिए आया। भगवान बुद्ध ने मजाक में ही कहा-’ लगता है आप मंत्र जानकर बैकुण्ठ जाना चाहते हैं।”वह बोला- “हाँ प्रभु! मैंने सुना है। जो कोई मंत्र जप कर लेता है, राम नाम लेता है, बैकुंठ को जाता है। भगवान बुद्ध बहुत हँसे, उन्होंने कहा-जिस आदमी ने आपको ऐसी सलाह दी है, वह बहुत बड़ा पागल आदमी मालूम पड़ता है और आपने विश्वास कर लिया, आप उससे भी ज्यादा मालूम पड़ता है। केवल राम-राम का जप करने से अथवा उसके शब्द का उच्चारण करने से या देवी-देवता के आगे नाक रगड़ने से अथवा किसी क्रिया-कृत्य को पूरा करने से आप आध्यात्मिकता का लक्ष्य प्राप्त करने में कभी समर्थ नहीं हो सकते। रास्ता एक ही है- आपने जो गल्तियाँ की हैं, उसको बराबर कीजिए, खाइयों को पाटिए। कैसे पाटें? जो धन आपने अनीति से कमाया है, उसे खर्च कर डालिए। बस उन्होंने ऐसा ही किया। अंगुलिमाल ने करोड़ों ऐसा ही किया। भगवान बुद्ध ने सारे संसार में, उन्हीं की भाषा में बौद्ध धर्म के ग्रन्थों को अनुवाद कराके और उन ग्रन्थों को दूसरे देशों में नाव में रखकर भेजने का प्रयत्न किया। अंगुलिमाल का सारा धन उसमें खर्च हो गया।

इन लोगों ने धन के अलावा भी तो अनेक गुनाह किये थे, लोगों का ईमान खराब किया था, चरित्र खराब किया था, दुःख और दारिद्रय की आग में उन्हें धकेल दिया था। इतने आदमियों का कत्ल करने के बाद में कितनी आत्माओं ने चीत्कार किया होगा, उसकी भरपाई केवल पैसे से कैसे हो सकती है? वह केवल पैसा ही तो चुका दिया और रूह का क्या हुआ? आम्रपाली ने अपने भावी जीवन को भूतकाल की खाई पाटने के लिए समर्पित कर दिया। वह सन्त हो गई और स्वामी विवेकानन्द की तरह सारे एशिया में और सारे हिन्दुस्तान में गाँव-गाँव घूमती फिरी, ज्ञान की शिक्षा देने के लिए, सत्कर्म की शिक्षा देने के लिए। इस तरह उन्होंने ने केवल अपने धन को उत्सर्ग कर दिया, बल्कि अपने समय को, उत्सर्ग कर दिया, बल्कि अपने समय को, अपने पसीने को भी उसी खर्च कर दिया। जो उत्साह उन्होंने बुरे कर्म करने में, गन्दी जिन्दगी जीने में लगायी था, वही उत्साह उन्होंने भावी जीवन को पुनीत और पवित्र करने में भी खर्च कर दिया जो श्रम और समय उन्होंने पाप कर्म कमाने में खर्च था, वही श्रम और समय उन्होंने पुण्य कमाने के लिए खर्च कर दिया। जब आम्रपाली सच्चे अर्थों में सन्त हो गई। अंगुलिमाल ने भी ऐसा ही किया। अंगुलिमाल के पास जो था, वह तो उन्होंने खर्च कर ही डाला, बौद्ध धर्म के ग्रन्थों को सारे विश्व की भाषाओं में अनुवाद कराने है। उन्होंने केवल धन थोड़े ही अपहरण किया था, कई आत्माओं को दुखाया भी तो था। न जाने कितनों को कुमार्ग के रास्ते पर धकेला भी तो था। उसका प्रायश्चित यही हो सकता था। कि अपने समय, श्रम एवं बचे हुए जीवन को उचित कामों में खर्च कर दिया जाय। वैसा ही हुआ। अंगुलिमाल एक संत हो गये। संत के रूप में सारे संसार में काम करते रहे और बराबर प्रायश्चित के लिए चलते रहे। इससे बढ़िया प्रायश्चित का कोई तरीका नहीं हो सकता, इसलिए आप अपना समय-दान दे दें। समय न दें, क्षतिपूर्ति न करें। फिर क्या हुआ। यह तो प्रायश्चित का मखौल हुआ, दिल्लगी बाजी हुई और विधि की व्यवस्था के साथ में उपहास हुआ। भगवान के यहाँ अंधेर नहीं है। पाप करने वाले हाथ-पाँव जोड़ेंगे, नाक रगड़ेंगे, पूजा करेंगे, फिर भगवान की दुनिया में नियम कहाँ रहा, व्यवस्था कहाँ रही। फिर ऐसे ही लोग कर लिया करेंगे। पा कर लिया करेंगे और बस प्रार्थना कर लिया करेंगे, पंच कर्म कर लिया करेंगे, डुबकी मार लिया करेंगे। फिर पापों का डर तो कुछ है ही नहीं। तब संसार की व्यवस्थाओं को कौन कायम रखेगा? आप ऐसा मत सोचिए। आपको केवल यह सोचना चाहिए। कि यह चित्त भ्रम का एक ढंग है और कुछ नहीं।

यहाँ जो , कल्पसाधना आपको कराई जा रही है, इसमें भी अत्र को, आहार को कम करना पड़ता है, भोजन पर नियन्त्रण रखना पड़ता है, वही आपको करनी पड़ी । दोनों में एक ही बात है, इसलिए आपको यह प्रायश्चित करने के साथ में तितिक्षा करने के साथ-साथ में अब एक नया काम शुरू कर देना चाहिए-पापों का प्रायश्चित समयदान देकर।

समयदान के लिए क्या करना चाहिए? इन विषय में एक पुरानी परम्परा है, तीर्थयात्रा करनी चाहिए। पापों के लिए तीर्थयात्रा-तीर्थयात्रा आप कहीं भी पता कर लीजिए प्रायश्चितों में तीर्थयात्रा कहते हैं धर्म प्रचार की पदयात्रा को तीर्थयात्रा का अर्थ है- गाँव-गाँव घूमना, जगह-जगह जाना, लोगों को अच्छे-अच्छे उपदेश करना। प्राचीन कला में जो गौ हत्याएँ हो जाती थीं, तो लोग गायों की पूँछ लाठी से बाँधकर गाँव-गाँव घूमते थे, मुँह ढक करके, फिर कहते थे हमसे गाय की हत्या हो गई है और हम कलंकी हैं। हमको कलंक लग गया है। इस प्रकार अपने पापों को गाँव-गाँव बताते थे, लेकिन इसके साथ-साथ लोगों को यह भी कहते थे कि हमने गलती की है, लेकिन आप में से कोई मत करना। हमने गलती में, गुस्से में आ करके गया पर हमला किया और उसे मार डाला, आप ऐसा तम करना- यह उपदेश भी करता था और अपनी गलती को बताता भी था।

आपको यही करना चाहिए। आपको हर जगह जा करके तीर्थयात्रा। के रूप में पदयात्रा करनी चाहिए। पदयात्रा के रूप में, गाँव-गाँव घूमना चाहिए, पदयात्रा का एक रूप तीर्थयात्रा का एक रूप अभी भी विद्यमान है। आपने कभी वैद्यनाथ धाम जाने के बारे में सुना है? अपने यहाँ उत्तर प्रदेश में भी ऐसा रिवाज है कि शिवरात्रि के समय लोग गंगाजी से गंगाजल चढ़ाने के लिए लाते हैं और अपने यहाँ किसी देवालय पर चढ़ाने के लिए लाते हैं। काँवर लेकर चलने वाले रास्ते भर अच्छे-अच्छे गीत सुनाते जाते हैं। राहगीरों को हर वक्त अच्छी शिक्षा देते जाते हैं। जहाँ भी राहगीर मिलते हैं, जिस किसी भी गाँव में भी गाँव में प्रवेश करते हैं।वहाँ अच्छे दोहे ज्ञान के दोहे, भक्ति के दोहे वैराग्य के दोहे और कर्त्तव्य पालन के दोहे सुनाते चलते हैं। यह उनका धर्मोपदेश भी साथ-साथ चलता रहता है, पदयात्रा भी चलती रहती है और जनसंपर्क का कार्य भी पदयात्रा, दो, धर्मप्रचार भी। इन तीन बातोँ को कमला दें, तो आपकी सच्चे अर्थों में पदयात्रा हो जाएगी। जो इस समय चल रहा है। यह तो केवल भगदड़ है, पर्यटन है। पर्यटन के घुमक्कड़ लोग, देश-विदेश में घूमने के लिए जाते हैं। इसको देखते हैं, उसको देखते हैं। वे केवल देखने के लिए जाते हैं, दर्शन करने की बुद्धि कहाँ है उनमें, केवल देखने के लिए जाते हैं कि बद्रीनाथ कहाँ है, केदारनाथ कहाँ है? मंदिरों में रखे हुए खिलौनों को देखने के लिए जाते हैं। देखने की दृष्टि उनमें है कहाँ? दर्शन के लिए दृष्टि चाहिए। श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को देखने की दृष्टि दी थी। अर्जुन ने कहा था हमको भगवान का रूप दिखा दीजिए तो उन्होंने कहा-पहले दृष्टि तो ला, देख काहे से लेगा। देखने को हम हैं तो सही। नहीं साहब, आप भगवान नहीं है। हम तो भगवान देखना चाहते हैं, तो फिर दृष्टि विकसित कर दृष्टि से दर्शन होता है। जिनके पास दृष्टि नहीं है उनको खुलकर कह सकते हैं-यह तो घुमक्कड़? यह तो केवल मनोरंजन है। यह मान लीजिए कि कलकत्ता, बम्बई नहीं गए, बद्रीनाथ हो आए। इसमें बिल्कुल भी फर्क नहीं। दोनों से घूमने की ही आवश्यकता पूरी होती है, फिर तीर्थयात्रा के पीछे तो उद्देश्य जुड़ा हुआ है, क्रियाएँ जुड़ी हुई हैं। क्रियाओं का अर्थ यह है कि आपको धर्म प्रचार की पदयात्राओं में संलग्न होना चाहिए। धर्म प्रचार की पद-यात्रा में अगर आप संलग्न है तो आपकी तीर्थयात्रा फलदायी मानी जायेगी।

प्राचीनकाल के ऋषि भी यही करते थे। घर-घर अलख जगाते थे। अलख क्या? अलख ऐसे करते थे, घर-घर दरवाजे पर खड़े हो करके गीत गाते थे। एक हो तो अकेले-अगर दो आदमी हों तो साथ-साथ, इसे अलख जगाना कहते हैं। इस आदमी जो घर के निवासी थे, घर से निकलकर बाहर आते थे, गाना सुनाते थे, उपदेश सुनते थे। इसे अलख जगाना कहते हैं। घर-घर जाकर संपर्क बनाना कहते हैं। वे आपके पास आयेंगे? नहीं, आपके पास नहीं आयेंगे। बादलों के पास खेत कैसे आ पायेंगे? बताइए। खेतों के पास इतनी सामर्थ्य होती, तो फिर क्यों किसी का इन्तजार करते। मित्रो, घर-घर आपको ही जाना पड़ेगा। वे आपके पास नहीं आयेंगे। दुर्घटना से घिरे हुए आदमी किस तरह आपके पास आ पायेंगे। टाँग टूट गई है, ऐक्सीडेंट हो गया है और अप कह रहे हैं आइए साहब। हमारे यहाँ आइये, प्रार्थनापत्र लिखिए पैसे दीजिए, तब हम आपकी सहायता करेंगे। इतनी ही हैसियत होती तो बेचारा टाँग टूटा हुआ क्यों आता? तो फिर घुड़सवार न होता। घुड़सवार नहीं है, टाँग टूटा हुआ आदमी है, इसलिए चल नहीं सकता। जाना आपको ही पड़ेगा। बाढ़ें आती हैं, दुर्घटनाएँ होती है और भी मुसीबतें फैल जाती है, उसमें अधिकारी लोग यह इंतजार नहीं करते कि जो इंतजार नहीं करते कि जो दुःखी है, हमारे पास आयें। अर्जी दें और हमसे प्रार्थना करें। नहीं, आपको ही भागकर जाना पड़ेगा। हवा हर आदमी के पास भागकर जा पहुंचती है, नाक में घुस जाने के लिए। सूरज की रोशनी हर आदमी के पास अपने आप चली जाती है और उसे गर्मी देकर आती है, रोशनी देकर के आती है। आपको सूरज की तरह, हवा की तरह और बादलों की तरह उन सभी जगहों पर जाना चाहिए, जहाँ ज्ञान की आवश्यकता है।

यह आवश्यकता पिछड़े हुए आदमियों को भी है और पढ़े-लिखों को तो उससे भी ज्यादा है। पिछड़े हुए आदमी दूसरे ढंग के बेहूदे और पढ़े हुए आदमी दूसरे ढंग के बेहूदे हैं। उनमें कोई खास फर्क नहीं है। चरित्र की दृष्टि से, चिन्तन की दृष्टि से, आदर्शों की दृष्टि से, सारा समाज लगभग एक ही स्तर पर जा पहुँचा है। इसमें धनी और निर्धन का भेद करना बड़ा मुश्किल है, पढ़े और बिना पढ़े का भेद करना बड़ा मुश्किल है। जहाँ तक गफलत का सम्बन्ध है, दुर्भावनाओं का सम्बन्ध है, दोनों ही क्षेत्र एक-दूसरे से बाजी मारने पर तुले हुए हैं। पढ़े-लिखे कम कमा पाते हैं, यह बात अलग है। पढ़े - लिखे आदमी ज्यादा चालाक होते हैं, बिना पढ़े-लिखे कम चालक होते हैं, यह बात और है। पढ़े-लिखे आदमियों के पास अच्छे महल, मकान और पैसे होते हैं, गाँव वालों के पास फटे-पुराने कपड़े होते हैं, टूटी-फूटी झोंपड़ियाँ होती हैं, लेकिन जहाँ तक चरित्र का सम्बन्ध है, वहाँ तक दोनों एक ही स्तर के हैं, इसलिए हम और आप में करना हो, उसे तीर्थयात्रा की तैयारी करनी चाहिए, घर-घर जाना चाहिए और जनसंपर्क करना चाहिए।

जनसंपर्क किसके लिये? धर्म धारण जाग्रत करने के लिये, विचार क्रान्ति के लिये, जनमानस का परिष्कार करने के लिये, लोक मानस में आदर्शवादिता की प्रतिष्ठापना करने के लिये। यही उद्देश्य होना चाहिए। घर-घर आप जायेंगे, किसके लिये जायेंगे? भीख माँगने के लिये? नहीं साहब। भीख तो नहीं, ऐसे ही जायेंगे। गाँव-गाँव एक उद्देश्य के लिये जाइए, गाँव-गाँव एक उद्देश्य के लिये जाइए, कि हमको जन-जागरण की हवा पैदा करनी है। तीर्थयात्रा का यही उद्देश्य है। इसमें पैदल चलना पड़ना है जिससे कि ज्यादा से ज्यादा लोग रास्ते में मिलें और उनसे संपर्क सधे।

आपको भी ऐसी ही तीर्थयात्रा की तैयारी करनी चाहिए। आप यहाँ से जायें, जब एक योजना बना करके जाइए कि किस तरीके से एक लम्बा सफर तय करेंगे और उसमें किस तरह अधिक से अधिक उपदेश देंगे? इसका एक ही तरीका है- आप साइकिल यात्रा करें। साइकिल चलाने को तो मैं पदयात्रा ही मानता हूँ। यह मानता हूँ कि इस यात्रा में आपको बिस्तर लेकर चलना पड़ेगा, कपड़े लेकर चलना पड़ेगा। उन्हें साइकिल पर लादकर चलिए, तो ज्यादा सुविधा रहेगी और आप यह कीजिए जगह-जगह शिक्षण देने के लिए, अलाव जगाने के लिये एक योजना बनाकर ले जाइए। दीवालों पर आदर्श वाक्य खड़िया, मिट्टी से लिखने की आप आदत डालिए। उससे आप असंख्यों आदमियों को, राहगीरों का प्रेरणा देने में समर्थ हो सकेंगे।

प्रायश्चित का यह भी एक तरीका है और क्या काम करें? यहाँ के शिविरों में ढपली बजाना सिखाया जाता है, सड़क पर खड़े होकर गाने वाले हस्टेजिसगरो की एक नई पीढ़ी और नई पौध हमने लगाई है। आप भी उसमें शामिल हों, तो एक दो आदमियों के साथ ढपली और खंजरी लेकर चले जायँ। किसी भी गाँव के लोगों को कहीं भी इकट्ठा कर लें, जहाँ प्याऊ है, ढपली बजाने लगें बस में सफर करना है तो आप बस में भी ऐसा कर सकते हैं। रास्ते में बैठे हुए हैं तो कोई अच्छा सा भजन गाना शुरू कर दीजिए। इससे लोगों के दिलों में एक नई जाग्रति पैदा होगी यह छोटी-छोटी बातें हैं। आप कहीं जाकर के प्रज्ञा पुराण की कथाएँ भी कह सकते हैं, रात को सत्संग कर सकते हैं इस तरह आप में से हर एक आदमी को, जहाँ भी, जिस भी क्षेत्र में ज्ञान, वहाँ ही जन-जागरण का काम आरम्भ कर दें। पढ़े और बिना पढ़े का फर्क मत कीजिए। इसलिए आपको शिक्षण करने में फर्क करने की जरूरत नहीं है। कि आप सभी से कहिए। हर आदमी इन मामलों में दरिद्र है। हर आदमी को आपके ज्ञान की आवश्यकता है। इसलिए आपको तीर्थयात्रा की योजना बना लेनी चाहिए। यह भी दो गायत्री के बड़े तीर्थ हैं। दर्शन करने के लिये तो तीर्थ बहुत सारे हैं, लेकिन ऐसे तीर्थ जिनमें प्रेरणा मिलती हो, कहीं नहीं है। तीर्थ बहुत सारे हैं, लेकिन ऐसे तीर्थ प्रेरणा मिलती हो, कहीं नहीं है। तीर्थों में जा करके तप करते हैं। लाखों आदमी अभी भी जाते हैं और प्रायश्चित की विधि पूरी करते हैं, मुँडन संस्कार कराते हैं, तीर्थ में नहाते हैं, वहाँ जा करके गऊदान करते हैं, ब्राह्मण भोजन कराते हैं- यह सब बातें यह बताती हैं कि तीर्थयात्रा का स्वरूप क्या होना चाहिए? तीर्थयात्रा से पाप कटते हैं अर्थात् पापों का खामियाजा पूरा होता है। कैसे? मैंने बताया न आपको कि जनसंपर्क साधना चाहिए और अलख जगाना चाहिए। इसके अलावा तीर्थयात्रा में और भी कई बातें बतायी गई हैं। आप उस समय एकाँत में रहकर अपने प्रायश्चित की साधनाएँ कीजिए, उपासनाएँ कीजिए, आत्म-परिष्कार के लिए पृष्ठ-भूमि बनाइए।

प्राचीनकाल में तीर्थों में दो तरह के लोगों के शिक्षण का प्रबंध था। एक बच्चों का शिक्षण जिनको गुरुकुल कहते थे। गुरुकुलों में जितने भी गुरुकुल थे। गुरुकुलों में जितने भी गुरुकुल थे, सब तीर्थ स्थानों में बने हुए थे। तीर्थ स्थानों की वजह से गुरुकुल बनाये गये अथवा गुरुकुलों की वजह से तीर्थ स्थान बन गए- यह समय इस तरह की बहस करने की नहीं है। दोनों एक ही बात हुई। प्राचीनकाल में जहाँ गुरुकुल थे, वहाँ स्कूल खुलवा दिये गये, वे तीर्थ बना दिए गये। राजस्थान का वनस्थली विद्यालय को हम तीर्थ कहते रहे हैं। बाबा साहब आमटे के अपंग चिकित्सालय को हम तीर्थ कहते रहे हैं। तीर्थ पहले थे? पहले तो नहीं थे, अब अच्छे व्यक्तियों से तैयार हो गए अथवा प्राचीनकाल में वे तीर्थ बने थे, तो किसी श्रेष्ठ कार्य से बने थे।

आप हरिद्वार की तैयारी कर सकते हैं, आप मथुरा की गायत्री तपोभूमि जाने की तैयारी कर सकते हैं। साइकिल से आप चलें, गाँव-गाँव जायें, घर-घर रुकें, दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखें, ढपली से गीत और संगीत सुनायें, रात को प्रवचन की व्यवस्था करें, यज्ञ आदि की बात सोचे, अच्छे साहित्य को लोगों तक पहुँचाने का प्रयत्न करें। अगर आप ऐसे कार्य करते हों, जिससे जन-जीवन में नव चेतना भरने का मौका मिलता हो और आपको सेवा करने का, श्रम करने का, त्याग करने का एवं रास्ता दिखाने का मौका मिलता हो तो समझना कि तीर्थयात्रा के पीछे का उद्देश्य सफल हुआ। मुँडन कराते थे तीर्थों में लोग। इसका यही मतलब था कि हमने पुराने विचारों को, बुरे विचारों को बदल दिया है। मस्तिष्क के ऊपर उग हुए बालों को पहले कुविचारों का प्रतीक मानते थे और प्रतीक मानकर ऐसा कहते थे, यही था जिसके लिए लोगों को अभी तक प्रोत्साहन मिलता है। शास्त्रों में तीर्थों का इतना ज्यादा माहात्म्य बताया गया है। कि शायद और किसी चीज और किसी पुण्य फल का न बताया हो। तीर्थ अवश्य जाना चाहिए। मुसलमान धर्म में भी ऐसी मान्यता है। मक्का एक जिन्दगी में वे अवश्य जाना पसंद करते हैं। हिन्दु धर्म में भी ऐसा ही मत है कि तीर्थयात्रा उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिए तभी उसका लाभ है, अन्यथा नहीं।

आप जिस तीर्थ में जायँ, वहाँ कुछ दिन निवास कीजिए, साधना कीजिए, तपस्या कीजिए, उपासना कीजिए और ऐसे वातावरण और सत्संग में रहिए, जिससे कि आप पिछले वाले घिनौने भूतकाल को छोड़ करके उज्ज्वल भविष्य में प्रवेश करने में समर्थ हो सकें। यह कार्य वातावरण से ताल्लुक रखता है, यह कार्य उसकी सामग्री से ताल्लुक रखता है, यहाँ यह कार्य प्राणदायक प्रक्रिया से ताल्लुक रखता है। यहाँ यह कार्य प्राणदायक प्रक्रिया से ताल्लुक रखता है। तीर्थों में पहले सारी बातों की सुविधाएँ होती थीं। इसलिए लोग तीर्थों में जाते थे और वहीं निवास करते थे अनुष्ठान तो अपने घर रहकर भी किया जा सकता है, पर अच्छे वातावरण में रह करके अनुष्ठान करना एक बात है और घिनौने वातावरण में रह करके अनुष्ठान करना एक बात है और घिनौने वातावरण में, घिसे-पिटे वातावरण में, कामवासना के वातावरण में, लोभ और मोह के वातावरण में, लोभ और मोह के वातावरण में रहकर कर लें तो वह एक चिह्न-पूजा जैसी प्रक्रिया होगी। वातावरण का भी बड़ा महत्व था, इसलिए प्राचीनकाल में तीर्थयात्रा के लिए वातावरण को भी देखा जाता था। ऋषियों का सान्निध्य, तपश्चर्या का उपक्रम, यह मानकर चल सकते हैं कि आप यहाँ जो कल्प-साधना शिविर में आये हैं, वह वास्तव में एक महीने के तीर्थसेवन सत्र जैसा है। इसे तीर्थसत्र भी कह सकते हैं। तीर्थों में ऐसी ही परम्परा होती थी। अभी भी ऐसा होता है। प्रयाग में माघ के महीने में इससे ही मिलते-जुलते शिविर होते हैं, सत्र होते हैं, जैसे कि आप यहाँ रहकर कर रहे हैं। एक महीने तक त्रिवेणी में, बालू में झोंपड़ी डालकर रहते हैं। न कहीं बाहर जाते हैं, न बाहर आते हैं- न किसी के घर-गृहस्थी की चिन्ता करते हैं, न अपनी चिंता में डूबे रहते हैं। सिर्फ आत्म-कल्याण की चिंता करते हैं। आत्म कल्याण,लोक कल्याण की चिंता में डूबे रहने के कारण, घर-गृहस्थी से जुड़े हुए सम्बन्धों के बारे में एक महीने के लिए बैरागी हो जाते हैं। घर वालों से कह देते हैं। कि घर-गृहस्थी के समाचारों की चिट्ठी-पत्री मत डालना, हमें किसी लेन-देन की खबर मत देना, कोई विकट परेशानी आती हो तो अपने ढंग से हल करना, हम तक मत आना और हमारे सपने में विघ्न मत डालना। घर वाले भी इस बातों का ध्यान रखते हैं। जरूरत पड़ने पर सिर्फ इतना ही पूछते हैं कि किसी सामान की आवश्यकता तो नहीं है, कोई चीज तो नहीं चाहिए? बस जिस सामान की जरूरत होती है, लाकर दे देते हैं। बाकी एक-एक क्षण तीर्थयात्रा या कल्प साधक त्रिवेणी तट पर गुजारा करते हैं।

आप भी इसी तरह मानकर चलिए कि आपको अपने गुनाहों को ठीक करना है। अपने भावी कुसंस्कारों को धो करके साफ करना है तथा भावी जीवन के लिए कोई ऐसी रूपरेखा निर्धारित करनी है, जिसको इष्ट पूर्ति कहा जा सके, क्षतिपूर्ति कहा जा सके। इस कल्प साधना में आत्म परिष्कार, आत्म परिशोधन की प्रक्रिया उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है जैसा कि आपको पूजा, उपासना, जप और योग करने के लिए बताया गया है। यह बहुत ही मूल्यवान है, इसलिए आप इस ओर भी ध्यान रखें और ऐसी जिन्दगी प्राप्त करें जिस पर संतोष ही नहीं गर्व और गौरव भी अनुभव किया जा सके। बस आज की आज समाप्त ।


अंतःकरण ही वास्तविक भाग्य विधाता

आधुनिक तकनीकी युग में व्यक्ति के मानसिक-बौद्धिक स्तर का विकास तो हुआ है, पर अंतःकरण के गई-गुजरी स्थिति में पड़े रहने के कारण व अनेकानेक प्रकार की समस्याओं में उलझा असहाय-अपंगों की तरह बेचैन दिखाई पड़ता है। जबकि मानवी अंतराल में शक्तियों का विपुल भाँडागार भर पड़ा है, पर मानसिक दुर्बलताओं के फलस्वरूप वह आत्मानुभव तथा अतिमानवी क्षमताओं का विकास नहीं कर पाता परिणाम स्वरूप तृप्ति, तुष्टि और शांति से वंचित रहता है। आत्मोत्कर्ष की उपलब्धि एवं वंचित रहता है। आत्मोत्कर्ष की उपलब्धि एवं आत्मिक क्षुधा की निवृत्ति के लिए ही ऋषि मनीषियों ने विविध विधि योग साधनाओं और तपश्चर्या का आविष्कार किया और परामर्श दिया है। कि अंतःकरण की भाव संवेदना को -उत्कृष्टता को जगाया-बढ़ाया जाय, कारण की गहराई में ही विद्यमान हैं। नगर से नारायण बनने का उद्गम स्थल यही है। ऋद्धि सिद्धियों के भंडार इसी की तिजोरी में बंद है। इसे ही विकसित करने का प्रयत्न किया जान चाहिए।

यों तो व्यक्तित्व के विकास में कई तथ्यों का समावेश रहता है। इनमें एक शरीर में जीवनी शक्ति का प्रकटीकरण भी है। जिससे वह हृष्ट-पुष्ट सुडौल-निरोग एवं सुन्दर आकर्षक बना रहे। आशा और उमंग मन में भरी रहे। उत्साह और साहस का स्वभाव में समावेश हो, हँसने-मुस्कराने की आदत हो तो व्यक्ति की आकृति-प्रकृति में उच्चस्तरीय आकर्षण का विकास होता है, भले ही उसकी बनावट में कुरूपता ही बाहुल्य क्यों न हों। भोले-भाले, सज्जन और चरित्रवान व्यक्ति की भाव भंगिमा, शिष्टता एवं कार्य-पद्धति को देखते ही यह ता लग सके कि वह कितने पानी में है।

अपने को प्रतिभावान बनाने के लिए शरीर और मन को इस प्रकार ढाला जाना चाहिए कि वह सौंदर्य, सज्जा, शिक्षा, कौशल, आदि के अभाव में भी अपनी विशिष्टता का परिचय दे सके। इसमें आदर्शवादी अवलंबनों को ग्रहण करना ही अधिक प्रतिभा को विकसित करने की भूमिका निभाता है।

शालीनता व्यक्तित्व को वजनदार बनाने की दूसरी शर्त है। इसी सत्प्रवृत्ति को सज्जनता शिष्टता, सभ्यता, सुसंस्कारिता आदि नामों से पुकारते हैं। यह गुण, कर्म, स्वभाव में रहती गहराई तक घुली रहती है कि किसी के पास कुछ समय बैठने उसे सुनने-समझने का अवसर मिलने, निकट से रहन-सहन का अवसर मिलने, निकट से रहन-सहन और स्वभाव व्यवहार पर थोड़ी सी दृष्टि डालने भर से पता चल जाता है कि बचकानापन किस मात्रा में घट गया और वजनदार व्यक्तियों में पायी जाने वाली विशेषताओं का कितना उद्भव-समावेश हो गया ।

व्यक्तित्व विकास की सबसे महत्वपूर्ण परत अपना अंतःकरण है। इसी महत्ता को पाश्चात्य मनीषियों जुँग ने अंतःकरण की ऊर्जा ‘लिविडो’ की महत्ता समझने-समझाने का भरपूर प्रयत्न-प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं “कि न जाने क्यों यह तथ्य बुद्धिमानों के गले नहीं उतरता कि वे मस्तिष्कीय चमत्कारों की तुलना में कही अधिक विभूतियाँ अंतःकरण चीज की कमी नहीं रहेगी और तब अपने पराये का भेद भी समाप्त हो जायगा।”

अंतःकरण के व्यापक विकास में किन−किन साधनों की आवश्यकता पड़ेगी क्या साधन जुटाने पड़ेंगे यह सोचते समय का ध्यान रखना होगा कि श्रमिक क्षेत्र की सबसे बड़ी प्यास उस घनिष्ठता आत्मीयता की होती है, जिसे व्यवहार में सद्भाव संपन्न मैत्री कहते हैं, पुरातन भाषा में इसी का अमृत कहते थे। अंतरंग प्रेम की ईश्वर भक्ति और बहिरंग प्रेम की उदार सेवा साधना कहा जाता रहा है। बहिरंग प्रेम पारिवारिक और सामाजिक जीवन में उगाया-बढ़ाया जाता है तो ईश्वर भक्ति अर्थात् अंतःकरण के विकास के लिए अध्यात्म परक साधना उपचारों का सहारा लिया जाता है।

महर्षि अरविंद कहते हैं। कि सामान्य मनुष्य का व्यक्ति अनेकों जाल-जंजालों से बना हुआ अच्छा खासा तमाशा होता है। उसमें कुसंस्कारों, निकृष्ट अभिलाषाओं और उफनते उद्वेगों की भरमार होती है। ऐसे लोगों के लिए न तो एकाग्र होते बन पड़ता है और उफनते उद्वेगों की भरमार होती है। ऐसे लोगों के लिए न तो एकाग्र होते बन पड़ता है और न अंतर्मुखी होने की स्थिति आती है। ऐसे लोग वस्तुओं की माँग, परिस्थितियों की शिकायत और साथियों पर आक्षेप करते करते ही दिन गुजारते हैं। उन्हें यह सूझता ही नहीं कि अंतराल में विकृति भर जाने से ही अनेकानेक विपन्नताएं उत्पन्न होती हैं। इस विषम स्थिति से छूटना कठिन नहीं है। मकड़ी विषम स्थिति से छूटना कठिन नहीं है। मकड़ी की तरह स्वयं अपने हाथों बुने जाले का समेटने का साहस किया जा सके तो मुक्ति का आनंद ले सकना हर स्थिति के व्यक्ति को भी सरल हो सकता है।

मनःशास्त्री भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे है। कि व्यक्तित्व की उत्कृष्टता-निकृष्टता का केंद्रबिंदु मनुष्य के अंतराल का स्तर ही है। मनः संस्थान के इस सबसे गहरी-अंतिम परत को ‘सुपरचेतन’ कहा गया है। ‘सुपर’ इसलिए कि उसकी मूल प्रवृत्ति मात्र उत्कृष्टता से ही भरपूर है। उसे यदि अपने वास्तविक स्वरूप में रहने दिया जाय, अवाँछनीयताओं के घेरे में जकड़ा न जाय, तो वहाँ ने अनायास ही ऊँचे उठने-आगे बढ़ने की ऐसी प्रेरणा मिलेगी जिन्हें आदर्श वादी उच्चस्तरीय ही देखा जा सके। प्रकाराँज येतन को ईश्वर के समतुल्य ही माना जा सकता है । वेदांत दर्शन में सगमाय


निर्भीक, सिद्धांतवादी होता है लोकसेवी

घटना स्वतन्त्रता पूर्व की है। जब भारत पराधीन था और अंग्रेज अधिकारी यहाँ अपनी विलासिता तथा वैभव का सब साज-सामान, जन-सुविधाओं की परवाह किए बिना ही जुटाया करते थे। ऐसे ही विलासी अधिकारी थे संयुक्त प्रबन्धक गवर्नर सर हारकोर्ट बटलकर। वे जहाँ भी जाते, उनकी इच्छित वस्तु हर दशा में उपस्थित करनी होती, वह चाहे उस समय, उस स्थान पर उपलब्ध हों या न हों। अपना शौक पूरा न होने पर उनका क्रोध भी फट पड़ता था और वे न जाने क्या कर बैठें इस अवस्था में इसलिए सम्बन्धित लोग उनसे भयभीत ही रहते थे। अपने विलास- वैभव और शौक-मौज के लिए बटलकर साहब -नवाब-साहब’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये थे।

बटलकर, पान्त की राजधानी लखनऊ से कभी-कभी तफरीह के लिए प्रयाग भी जाया करते थे। वहाँ उनके ठहरने की व्यवस्था राजभवन में होती थी। राजभवन में उनके जल-विहार के लिये एक बड़ा कुण्ड बनवाया गया था, जिसमें उनके प्रवास काल में पानी भरा जाता और बटलकर निश्चिन्त हो जल-क्रीड़ा का आनन्द लेते थे।

उन दिनों इलाहाबाद में भारी जल संकट चल रहा था। थोड़े ही समय के लिए नलों में पानी आता और लोग-बाग दौड़ पड़ते अपने बर्तन, टीन के कनस्तर लेकर ताकि शीघ्र टीन के कनस्तर लेकर ताकि शीघ्र अपना क्रम आने पर पर्याप्त पानी की व्यवस्था कर सके। उन्हीं दिनों बटलकर साहब का आगमन हुआ। अन्य अधिकारीगण जल बिहार की व्यवस्था करने के लिए जल कुण्ड में पानी भरने हेतु दौड़ पड़े। परन्तु तत्काल प्रबन्ध न हो सका। होता भी कैसे सर्व-साधारण के लिए पीने के पानी का भी अभाव हो तो जल कुण्ड में लाखों गैलन पानी कहाँ से इकट्ठा होता। अधिकारीगण और गवर्नर के सेवक नगर पालिकाध्यक्ष के निवास स्थान की और दौड़े।

नगर पालिकाध्यक्ष थे बाबू पुरुषोत्तमदास टण्डन जो अपनी कर्तव्यनिष्ठा और सादगी के कारण राजर्षि कहे जाते थे। राजर्षि टण्डन इस पद की जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए अहर्निश व्यस्त रहते थे। साथ ही अपनी आय में से भी मात्र उतना अंश स्वयं के लिए रखते जितना कि अत्यावश्यक होता । अति साधारण स्तर का जीवन व्यतीत कर प्रतिभा और धन लोक सेवा के लिए सर्वसाधारण की चिंता और सुव्यवस्था के लिए लगाते थे। सादा, सरल और मितव्ययी जीवन ही उनके निर्वाह का मूल सूत्र था। गवर्नर के कर्मचारी उनके पास पहुँचे और अपनी बात कही। राजर्षि ने कर्मचारियों की बात को गम्भीरता-पूर्वक सुना और समझाने के स्वर में कहा- “नागरिकों के लिये पीने के पानी की ही उचित व्यवस्था नहीं हो पा रही है। जल पूर्ति के साधनों में इतनी गड़बड़ी है कि सर्वसाधारण को बड़ी परेशानियाँ और कठिनाइयाँ सहनी पड़ रही हैं, तो गवर्नर साहब के जल-विहार की व्यवस्था किस प्रकार की जा सकती है?

टण्डनजी ने इस प्रकार से समझाया और अपनी विवशता बतायी तो गवर्नर के कर्मचारी क्रोधित हो उठे और किसी भी दशा में जल कुण्ड का प्रबन्ध करने के लिए दबाव डालने लगे।”कुछ भी हो”- सेवकों ने कहा- “गवर्नर साहब के लिए जल व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी। सामान्य जनता को थोड़ी कठिनाई और सही।” इस पर टण्डन जी भी उबल पड़े ओर बड़ी निर्भयतापूर्वक कहा- “ जाओ अपने गवर्नर से कह देना कि टण्डन जी जल कुण्ड में पानी की व्यवस्था नहीं कर रहे हैं। सामान्य जनों की तकलीफें बढ़ाकर विलासियों के लिए मैं साधन नहीं जुटाऊँगा।”

स्वतन्त्रता पूर्व के समय में इतनी निर्भीकता के साथ अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहकर साथ अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहकर काम करने वाले अधिकारी-नेता राजर्षि टण्डन ही थे।


कर्तव्य साधना (Kahani)

वैधव्य का भार सहते हुए भी माँ ने पुत्र का पालन कर उसे बड़ा किया; किन्तु पुत्र तो अपनी वृद्धा माता को निराश्रित छोड़ तांत्रिक साधना करके शक्ति पाने घर से निकल पड़ा। देव शर्मा नामक इस युवक ने अपनी ताँत्रिक सिद्धियों के बल से अपना चीवर लेकर उड़ते दो कौओं को भस्म होते देख वह अभिमान से भर उठा।

एक सद्गृहिणी के द्वार पर वह भिक्षा देने में देर होते देख वह क्रोध से भर उठा, तो गृहिणी बोली-”महात्माजी। आप शाप देना जानते है; पर मैं कोई कौआ नहीं हूँ, जो भस्म हो जाऊँ। जिस माँ ने तुम्हें जीवन भर पाला उसे त्याग कर मुक्ति के लिए भटकते आप मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।”

“यह सुन देव शर्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पूछा-”आप कौन-सी साधना करती हैं?” कर्तव्य साधना।” देव शर्मा भी ताँत्रिक साधना छोड़ अपनी माँ की सेवा करने चल पड़ा।


पुनर्प्रकाशित विशेष लेखमाला-12 - लोकसेवी की आचार संहिता (समापन किश्त)

लोगों की बात न सुनकर लोकसेवी अपनी बात कहने का ही उतावलापन करता है, तो सुनने की भाव-स्थिति नहीं आ पाती। क्योंकि चित्त में तो वे समस्यायें घुमड़ रही होती हैं, जो व्यक्ति को आकुल व्याकुल बनाये हुए हैं। उन्हें तात्कालिक आवश्यकता उन समस्याओं के समाधान की है।

भगवान बुद्ध के शिष्य एक बार किसी व्यक्ति को धर्मोपदेश दे रहे थे। वह व्यक्ति को धर्मोपदेश दे रहे थे। वह व्यक्ति को धर्मोपदेश दे रहे थे। वह व्यक्ति उन उपदेशों को सुन तो रहा था पर उसका ध्यान कहीं और बँटा हुआ था। शिष्यों ने बार-बार उस व्यक्ति को ध्यान देने के लिए कहा पर वह ध्यान दे ही नहीं पाता। शिष्यों को लगा कि हमारी शिक्षण पद्धति में कहीं त्रुटि है। इसलिए वे उस व्यक्ति को महात्मा बुद्ध के पास ले गये और सारा विवरण कह दिया। बुद्ध ने उस व्यक्ति ने पूछा कि आपके शिष्य मुझे आपके पास क्यों लाये हैं? तब बुद्ध ने उसे धर्मोपदेश दिया।

जहाँ लोगों को लोकमंगल की दिशा देनी हो, किसी पुण्य अभियान में संलग्न करना हो या उस अभियान में संलग्न व्यक्तियों को अगले चरण का दिशा-बोध कराना हो तो आवश्यक है कि उन लोगों को पहले अपनी स्थिति बता लेने दी जाय, समस्याओं को शाँत चित्त से सुन लिया जाय। जब उसे आत्मीयता का बोध होने लगें तब अपनी बात कही जाय।

इस सम्बन्ध में कोई सुझाव देने की व्यावहारिक पद्धति भी यही है। कोई सुझाव देने से पहले अपनत्व के सम्बन्ध स्थापित किये जा किये जायँ, आत्मीयता की अनुभूति करायी जाय। तब कहीं कही गई बात का प्रभाव होगा। अन्यथा जो कुछ कहा गया है वह अपरिचितों से किये गये वार्तालाप की तरह ही प्रभावहीन होगा। परिवार में अपनत्व की भावना होने के कारण ही घर के सदस्य एक-दूसरे की छोटी से छोटी बात और छोटा से छोटा सुझाव मानते हैं, जबकि बाहर अपनत्व का संस्पर्श न मिलने के कारण महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण बात तक अस्वीकार कर दी जाती है। लोकसेवी को भी अपनत्व पैदा कर अपनी बात कहने का अभ्यास करना चाहिए। यह दृष्टिकोण नहीं बनाया जाय कि, राजनैतिक प्रत्याशी तो अपने स्वार्थ के लिए चिकनी-चुपड़ी बातें बनाता है। हम तो उन लोगों के भले की बात ही करते हैं, वे सुने तो सुनें, समझे और मानें तो मानें, वे सुनें तो सुनें, समझे और मानें तो मानें, हमें क्या?

यह दृष्टिकोण अपनाया गया तो सेवा का साधना स्तर कहाँ रहा? फिर तो वह उन वेतनभोगी कर्मचारियों जैसा काम ही काम करते हैं और उस काम के सफल-असफल होने से अपना कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ते। सफलता-असफलता होने से अपना कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ते। सफलता-असफलता की चिन्ता तो लोकसेवी को भी नहीं करनी चाहिए लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि सेवा के साथ अपना मनोयोग भी न जोड़ा जाय। मनोयोग इसी का नाम है कि आप अपने कार्य में कितनी दिलचस्पी ले रहे हैं।

स्थानीय कार्यकर्त्ताओं से बातचीत करते समय, मार्गदर्शन देते समय उनकी रुचि और क्षमता का ध्यान रखा जाय तो उनका सफल का ध्यान रखा जाय तो उनका सफल उपयोग हो सकता है । जैसे श्रमदान के द्वारा कहीं सड़क का निर्माण हो रहा है या कहीं सड़क का निर्माण हो रहा है या गाँव में सफाई के लिए नालियाँ खोदी जा रही हैं तो अनेकों स्वयं-सेवक उसमें जुटेंगे। किसी की रुचि खुदाई करने में है, शरीर भी अच्छा हट्टा कट्टा और मजबूत है तो उसे किसी दूसरे काम में न लगाया जाय। यदि उसे दूसरे काम में लगा दिया गया जो जिस काम में यह लगता था उस काम में उसकी क्षमता लगेगी नहीं और दूसरे काम में वह वाँछित मनोयोग जुटा नहीं पायेगा। किसी समारोह की ही बात लें। एक समारोह का आयोजन करने में बहुत से पक्षों से व्यवस्था और तैयारी करनी पड़ती है। अतिथियों को आमंत्रित करने, प्रचार करने, पाण्डाल बनाने और लोगों को बिठाने जैसे ढेरों काम करने पड़ते हैं। लोकसेवी को कभी यदि ऐसे कार्यों का नेतृत्व या संचालन करना पड़े तो उसे इतनी सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए। कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी रुचि और क्षमता के अनुसार काम मिले। यदि ऐसा नहीं होना चाहिए कि जो व्यक्ति की क्षमता और प्रतिभा का सही-सही उपयोग नहीं हो पाता।

कई अवसरों पर ऐसा होता है कि एक ही विषय को लेकर कार्यकर्त्ताओं में मतभेद होते हैं। उन मतभेदों का सद्भावनापूर्ण समाधान होना चाहिए। न तो जबर्दस्ती एक रहने के लिए आग्रह किया जाय और न ही विलगाव को प्रोत्साहन दिया जाय जबर्दस्ती एकता होने के आग्रह से होता यह है कि उस स्थिति में वह तथ्य उपेक्षित कर दिया जाता है जिसके कारण कि मतभेद उत्पन्न हुआ है। ऐसे कई प्रसंग हो सकते हैं। जिनमें मतभेदों का दूरदर्शितापूर्ण समाधान किया जाना चाहिए। स्वयं से किसी का मतभेद हो तो लोकसेवी को चाहिए कि वह सहनशीलता अपनायें। जो प्रभाव सहनशीलता का पड़ता है वह वह प्रतिवाद या विवाद का नहीं हो सकता।


अपनों से अपनी बात - युग-नेतृत्व महान आत्माएँ ही कर सकेंगी

उज्ज्वल भविष्य के कदमों की आहट में तेजी के साथ ही महाकाल ने युग निर्माण मिशन के कन्धों पर एक और जिम्मेदारी का बोझ सौंपा है। नवयुग, का नेतृत्व कर सकने लायक वरिष्ठों एवं विशिष्टों की ढूँढ़-खोज, इन्हें तलाशने और तराशने का काम। यूँ कहने-सुनने का नेताओं की कमी नहीं, वेश-भूषा और लच्छेदार बातों से इन्हें कहीं भी पहचाना जा सकता है। पर अगले दिनों नेतृत्व के लिए यह पहचान काफी न होगी। भावी युग न केवल परिवर्तित, परिस्थितियों, बल्कि बदली परिवर्तित, परिस्थितियों, बल्कि बदली मान्यताओं, नग प्रतिमानों, नवीन मानदंडों का युग होगा। जिनके का कोई स्थान न होगा। जिनके व्यक्तित्व लोभ-मोह के चक्रवात में तिनकों की तरह उड़ा करते हैं, वे भला देश और समाज के नीड़ को क्या सुरक्षित रख पाएंगे।

मानवीय इतिहास की पोथी को उलट-पलट कर देखें तो यह तथ्य कहीं अधिक मुखर हो, अपना स्पष्टीकरण देता है। कबीलेख् यूथों के सामुदायिक निवास से राजतन्त्र, लोकतन्त्र, साम्यवाद, समाजवाद के उत्थान और अवसान की गहराइयों में यही स्वर गूंजते हैं, यथार्थ में कोई भी प्रणाली या विधि-व्यवस्था उतनी खराब नहीं होती, जितनी कि हम सब समझ बैठते हैं। यदि राजतन्त्र का नेतृत्व करने वाले विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त वाले विक्रमादित्य, और चन्द्रगुप्त सदृश व्यक्ति हों, जिन्होंने समूचे जीवन का उद्देश्य मात्र जन-कल्याण मान रखा हो, तो शायद राजतन्त्र अभी भी अपनी सामयिकता सिद्ध कर सके। इसी प्रकार लोकतन्त्र की बागडोर जनहित में आधी धोती पहनने वाले गाँधी के हाथ में हो तो राम-राज्य अभी भी अपनी अभिव्यक्ति लिए बिना न रुके। यही बात अन्य प्रणालियों के बारे में भी सच है। हो सकता है, यह सवाल किसी के मन को परेशान करने लगे कि यदि व्यक्ति की इतनी महत्ता है, कर्णधार इतने अधिक उपादेय हैं, कर्णधार इतने अधिक उपादेय हैं, तब फिर यह प्रणालियों में उलट-फेर क्यों? क्या इन प्रणालियों को जन्म देने वालों की अबल गड़बड़ थी।

इन सवालों के जवाब में यही कहा जा सकता है। कि व्यवस्था की अपनी उपयोगिता है। इनकी संरचना में फेर-बदल करने वाले असंदिग्ध रूप से बुद्धिमान थे। इतने पर भी नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों का महत्व कम नहीं हो जाता। बदलते समय के अनुरूप व्यवस्था की संरचना में फेर बदल सिर्फ इसलिए करना पड़ता है ताकि इसकी सहायता से मानव महासागर में खोए, उपेक्षित पड़े सुयोग्य प्रतिभाशाली तत्कालीन समाज चैन की साँस ले सके। कोई भी प्रणाली जब अपना यह दायित्व निभा सकने में अक्षम होने लगती है, नीतिज्ञ उसे बदल डालने के लिए नई स्थानापत्र विद्या की ढूंढ़-खोज में लग जाते हैं।

प्रकारान्तर से यह ढूँढ़-खोज नेतृत्व संभाल सकने योग्य व्यक्तियों की होती है। उसका स्वरूप और प्रक्रिया भले ही कुछ भी और कैसी भी हो। स्वाभाविक है इसे जीतने की लालसा बहुतों में जगे। हर कोई यह जानना चाहे कि वह कौन-सी योग्यता है जो मनुष्य को इस योग्य बनाती है। विशेषकर जिसे अपनाकर हममें से कोई भावी समाज की नौका का खेवनहार बन सकने योग्य बन सके।

सही भी है, संसार के सभी महत्वपूर्ण कार्यों के लिए एक विशेष योग्यता और शक्ति की आवश्यकता योग्यता और शक्ति की आवश्यकता होती है। अनेक व्यक्ति महत्वपूर्ण करने की आकाँक्षा तो करते हैं, पर उनको करने के लिए जिस क्षमता एवं शक्ति की जरूरत होती है, उसे सम्पादित नहीं करते फलस्वरूप उन्हें सफलता से वंचित ही रहना पड़ता है। जिन्होंने भी कोई बड़ा पुरुषार्थ किया है, बड़ी विजय प्राप्त की है। उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों से ही सब कुछ प्राप्त नहीं किया। बल्कि उनकी पूर्व तैयारी ही उस सफलता का कारण रही है।

इस तैयारी की उपेक्षा अब मानना करने वाले ही नर पशु कहलाते हैं। उन्हें तो सिर्फ इन्द्रिय विलास, शरीर सज्जा और अर्हता का परिपोषण करने वाली सुविधा-सम्पदा चाहिए। दिखने में तो उनकी संरचना भी मनुष्य जैसी लगती है पर वस्तुतः होते हैं वो जड़ कलेवर। चलते फिरते पेड़-पौधे इन्हीं को कहा जाता है। इन्हें सड़न-सीलन और घुटन चाहिए। जान-बूझकर या अनजाने वे इसी को चाहते और इसी को खरीदते हैं। विलास-संजय और अहंकर की खाई को पाटने में जीवन भर अथक श्रम करते हैं, किन्तु हाथ में छाले, कमर में दर्द और मन में असंतोष के अतिरिक्त इन्हें मिले भी क्या? अन्धी भेड़ों का अनुकरण करते हुए, वे एक पीछे एक चलते हुए, गहरे गर्त मेँ गिरते हुए जिस-तिस पर दोषारोपण करते हुए, खोजते-कलपते दिन बिताते हैं।

पीड़ा और पतन के गर्त में गिरी हुई या गिरने के लिए आतुर नर पामरों की यह मण्डली निश्चय ही दया की पात्र है। इन्हें सान्त्वना मिलती चाहिए और जहाँ तक सम्भव हो राहत के साधन भी जुटने चाहिए। मानवीय करुणा का तकाजा है कि दुखियारा भले ही अपने पतनोन्मुख दृष्टिकोण और गर्हित क्रिया-कलाप को अपनों से विपत्ति के जाल में जा घुसा हों। फिर भी भ्रमित तो भ्रमित है। उसे दृष्ट या भ्रष्ट कहना व्यर्थ है। ऐसों के लिए ‘भटका हुआ देवता’, क्योंकि इन्होंने अपनी भटकन के चलते अपना देवत्व गवाँ दिया। इसके अलावा इस सम्बोधन से चिन्तन में शालीनता झलकती है और पीड़ित के प्रति ममता। ये सेवा और सहायता के पात्र है, इन्हें वह मिलनी भी चाहिए। मिलती भी है। लेकिन इनसे नेतृत्व की आशा कना, मार्गदर्शन की जिम्मेदारी सौंपने की बात सोचना व्यर्थ है।

को अपनों से विपत्ति के जाल में जा घुसा हों। फिर भी भ्रमित तो भ्रमित है। उसे दृष्ट या भ्रष्ट कहना व्यर्थ है। ऐसों के लिए ‘भटका हुआ देवता’, क्योंकि इन्होंने अपनी भटकन के चलते अपना देवत्व गवाँ दिया। इसके अलावा इस सम्बोधन से चिन्तन में शालीनता झलकती है और पीड़ित के प्रति ममता। ये सेवा और सहायता के पात्र है, इन्हें वह मिलनी भी चाहिए। मिलती भी है। लेकिन इनसे नेतृत्व की आशा कना, मार्गदर्शन की जिम्मेदारी सौंपने की बात सोचना व्यर्थ है।

इसके अलावा मनुष्यों का दूसरा वर्ग वरिष्ठों एवं विशिष्टों का है। वरिष्ठ वे जो अपनी समस्या का आप समाधान कर सकें, साथ ही बचे हुए पराक्रम का उपयोग दूसरों को उबारने में कर सकें। महत्ता इन्हीं की उबारने में कर सकें। महत्ता इन्हीं की है। नदी की प्रचण्ड धारा को चुनौती देने वाले ये माझी न हों तो भयानक आपत्तिकाल सामने रहने पर भी लोग नदी किनारे खड़े असहाय, अपंगों की तरह रोते-कलपते रहेंगे। पुरुषार्थ उस माझी का है, जिसकी माँसपेशियाँ चप्पू को दोनों हाथों से पकड़ती है। और नाव पर लदे हुओं को पार उतारने का विश्वास भरा अभयदान देती है। पर उतरने के लिए व्याकुल भीड़ की तुलना में एक माझी वरिष्ठ है, फिर वह आयु और सुविधा सम्पदाओं की दृष्टि से औरों से कितना भी गया-गुजरा क्यों न हो?

रोगियों की कहीं कमी नहीं । आवश्यकता कुशल चिकित्सक की है। ज्योति गँवाकर दिन में रात्रि जैसा अंधेरा अनुभव करने वालों की कमी नहीं। अनुभव करने वाले की कमी नहीं। अनुभव करने वालों की कमी नहीं। सराहनीय वे हैं, जिन्हें निष्णात चिकित्सक कहा जाता है। वे अस्पताल में प्रातःकाल घुसते हैं। और सन्ध्याकाल तक आप्रेशन की मेज पर योगी की तरह समाधिस्थ होकर शल्यक्रम चलाते रहते हैं। शल्यगृह से वापिस निकलने पर खोई ज्योति फिर पा लेने वाले सराहना करें या उपेक्षा इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, तथ्य वरिष्ठता के सौभाग्य का है, जिसे वह मिला, वह सन्तोष के साथ जिएगा। और शान्तिपूर्वक मरेगा। भगवान किसी को धन कुबेर भले ही न बनायें, पर उनकी करुणा बरसती ही न बनायें, पर उनकी करुणा बरसाती ही हो तो उस चिकित्सक की पदवी मिल जिसने असंख्यों का अंधतमिस्रा से उबारा और आलोक की दुनिया में ला बिठाया।

इस भाव को व्यापक, अर्थ दे तो लोकमान्य, तिलक, गान्धी, गोखले, सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर, श्री अरविन्द, रमण महर्षि जैसे महामानव उपरोक्त श्रेणी में आते हैं। इनकी योग्यता और कार्यक्षेत्र भले अगल-अगल रहे हों पर कार्य का उद्देश्य एक ही रहा है, जन-साधारण की दशा सुधारना, दिशा देना, उनके भीतर ऊर्जा प्रवाहित करना। ऐसों के क्रिया-कलाप ही मृतकों में प्राण का संचार करते, अपंगों, अपाहिजों, को हाथ पकड़कर को तूफान में फँसे तिनके की तरह आसमान की बुलन्दियों पर जा बिठाते हैं।

जब-जब ऐसे व्यक्तियों का समाज में बाहुल्य होता हो जाती हैं। पूर्वकाल में लाखों वर्षों तक सतयुग को सुख-शान्ति भरी परिस्थितियाँ इस संसार में रही है। कि उस समय के लोक-नायक, मार्गदर्शक आत्मशक्ति से संपन्न रहे और केवल वाणी से नहीं बल्कि अपनी अपनी आन्तरिक महानता कि किरणें फेंककर लोक-मानस को प्रभावित करते रहे। मस्तिष्क की वाणी मस्तिष्क तक पहुँचती है। और आत्मा की आत्मा तक। कोई सुशिक्षित व्यक्ति अपनी ज्ञान शक्ति का लाभ सुनने वालों की जानकारी बढ़ाने के लिए दे सकता है। पर अन्तःकरण में जमी हुई आस्था में हेर-फेर करने का कार्य ज्ञान से नहीं तपशक्ति से संपन्न होना सम्भव हो सकता है। प्राचीनकाल के लोकनायक ऋषि मुनि इसी तथ्य को भली-भाँति जानते थे। इसीलिए वे दूसरों को उपदेश देने उनकी बाह्य सेवा करने में जितना समय खर्च करते थे। उतना हो प्रयत्न स्वयं के जीवन को सँवारने तप के साँचे में डालने के निमित्त करते थे। जिसकी प्रेरणा से किसी के मन पर जमे बुराइयों के आकर्षक कुसंस्कारों को हटाकर अच्छाइयों के कटनायक मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जा सके।

प्राचीन इतिहास की ही भाँति पिछले दो हजार वर्षों में आधार पर जनमानस का सुधा ओर परिष्कार सम्भव होता रहता है। भगवान बुद्ध के मन में अपने तथा संसार के दुःखों के निवारण की लालसा जगी। इसके लिए उन्होंने पच्चीस वर्ष की आयु से मोह बन्धनों को तोड़कर बीस वर्ष तक लगातार आत्म-निर्माण की साधना की। पैंतालीस वर्ष की आयु में उनका व्यक्तित्व लोकनायक के रूप में उभरा। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन-चौथाई भाग तप में और एक-चौथाई भाग जन-नेतृत्व में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेशों की बौछार उतनी नहीं की, जितने आज के सामान्य उपदेशक कर लेते हैं। तब भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक चौथाई से अधिक जनता उनके मार्गदर्शन पर आस्था रखती है।

समस्त विवादों से परे परिभाषा है “स्वयं के जीवन की समस्त खोटों को निकाल फेंकना। साथ ही अध्यात्म के उन प्रयोगों को रोजमर्रा के जीवनक्रम की अंतःशक्तियों को जगाते वर्षों की तपश्चर्या के बलबूते अपने समय के मार्गदर्शन का दायित्व संभाला। गुरु गोविन्द सिंह ने लोकपत नामक स्थान में जो तप प्राण बटोरा, उसी को बिखेरकर स्वयं को युग निर्माता के रूप में प्रतिष्ठित कर सके। छत्रपति शिवाजी का प्रतिष्ठित कर सके। छत्रपति शिवाजी का व्यक्तित्व गढ़ने वाले समर्थ रामदास ने तप कौशल गढ़ने वाले समर्थ रामदास ने तप कौशल से स्वयं को साँचा बना डाला था।

संभवतः 1724 के कुम्भ में स्वामी दयानन्द को हरिद्वार प्रवास के दौरान कोरी वाणी फीकी मालूम पड़ी। इस न्यूनता की पूर्णता के लिए उन्होंने कठोर तप को ही साधन बनाया।

श्री रामकृष्ण परमहंस ने पचास वर्ष की आयु में विशुद्ध तीस वर्ष तप साधना में लगाए। संसार के अन्य भूमिका की ओर बढ़ाया, निश्चित रूप से तपस्वी थे। पैगम्बर मुहम्मद ने पच्चीसवें वर्ष में साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे। महात्मा ईसा के जीवन के छत्तीस वर्ष तपश्चर्या में लगे। यहूदी जरथुस्त्र की दीर्घकालीन तप साधनाएँ प्रसिद्ध हैं। स्वयं परमपूज्य गुरुदेव के जीवन को तप का पर्याय कहना अतिशयोक्ति न होगी।

इसी सोच को आधार मानकर शान्तिकुँज के संचालन तन्त्र ने भावी युग के लोकनायकों के चयन एवं निर्माण के लिए व्यापक एवं प्रभावी योजना तैयार की है। पिछली अखण्ड ज्योति एवं प्रज्ञा अभियान पाक्षिक के पृष्ठों में परिजनों ने इस सम्बन्ध में पढ़ा भी होगा। शान्तिकुँज के दिव्य वातावरण में चलायी जाने वाली यह शिक्षण योजना अपनी बौद्धिक एवं भावनात्मक विशेषताओं के सँजोये रहने पर भी मूलतः तप प्रधान होगी। स्वयं के चरित्र-चिन्तन और व्यवहार को प्रामाणिकता की कसौटी पर खरा सोना साबित करने वाले ये लोग ही भविष्य में समाज एवं शासन की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां उठाने में समर्थ होंगे।

अपने परिजनों को इसे समय की चुनौती के रूप में स्वीकार करना चाहिए और क्षेत्रों में कार्यरत ऐसे करके यहाँ की शिक्षण योजना में भेजना चाहिए, बल्कि उनके क्रिया कलापों, गतिविधियों का संक्षिप्त हवाला देते हुए उनका नाम, पता आदि विवरण केंद्रों को भी प्रेषित करना चाहिए।

इन दिनों ऐसे ही उदारचेताओं की अत्यधिक आवश्यकता है। महाकाल का युग निमन्त्रण उन्हीं के लिए उतरा है। युग सन्धि के इस पुण्य पर्व पर उन्हें आगे आना चाहिए। अन्तः- प्रेरणा का अनुसरण करना चाहिए फैसला होने की इस निर्णायक बेला में युग पुरुषों जैसा रोल अदा करना चाहिए। इन महतीय व्यक्तियों की गलाई-ढलाई ही इस शिक्षण योजना का उद्देश्य है। इसमें शामिल होने वाले अन्धड़ की तरह उभरे बिना न रहेंगे। भविष्य में उनका वेग जिस दिशा में जिस तेजी के साथ बढ़ेगा, उसी अनुपात में लोक समूह तिनकों, उड़ते-लुढ़कते उनका अनुगमन करने के लिए विवश होगा। इसे किसी युग प्रत्यावर्तन करने वाले भगवान महाकाल का स्पष्ट आश्वासन माना जाना चाहिए।

जो कल था, वह आज नहीं है। जो आज है वह कल नहीं रहेगा। यह आज है वह कल नहीं रहेगा। यह आज और अभी की गतिविधियों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है। विगत चुनावों में जिन्होंने लोक सम्पदा की बेतहाशा बरबादी देखी है, उनमें से किसी को कभी ख्याल भी नहीं आया होगा। कि कभी चुनाव इतने शान्त भी हो सकते हैं, लाउडस्पीकरों की चीख-चिल्लाहट रंगी-पुती दीवारों को शोभा और सुषमा का सत्यानाश किए बिना भी चुनाव, संपन्न हो सकते हैं, इस आश्चर्यजनक किन्तु सत्य को वर्तमान चुनावों में स्पष्ट देखा और अनुभव किया गया है। इसी तरह राजनीतिज्ञों के चेहरे एक के बाद एक बड़ी तेजी से बेनकाब होते चले जाएंगे और उन्हें जेल के सीखचों के पीछे जाना पड़ेगा। कभी का यह असंभव भी आज सच है। अकेले राजनीतिज्ञ भी आज सच है। अकेले राजनीतिज्ञ ही क्यों, तन्त्र-मन्त्र की जादुई ताकतों का भय और लोभ दिखाकर देश के नेतृत्व को गुमराह करने वाले और स्वयं को सर्वथा अजेय समझने वाले भी आज जेल की सलाखों में बन्द देखे जा सकते हैं।

अभी तो यह शुरुआत है, जो यह समझने के लिए काफी है कि कूड़े का ढेर लिए काफी है कि कूड़े का ढेर पहाड़ जितना ही विशालकाय क्यों न हो, आने वाला तूफानी बवंडर उसके अस्तित्व को मिटाए बिना न रुकेगा। इस तूफान में मिटाए बिना ने रुकेगा। इस तूफान में तिनके ही नहीं मजबूत समझे जाने वाले वृक्ष भी उखड़ते-उड़ते देखे जा सकेंगे। हममें से किसी को यदि सतयुग के आगमन पर यदा-कदा अविश्वास होता है तो सिर्फ इस कारण क्योंकि हमें कूड़े के ढेर की वीभत्सता, उसकी दुर्गन्ध की वीभत्सता तो साफ दिखाई देती है, लेकिन नजदीक से नजदीक बढ़ते चले आ रहे प्रलयंकारी तूफान की ताकत का अन्दाजा नहीं। जो अपने एक ही झटके में इस विषाक्तता के ढेर का मटियामेट किए बिना न रहेगा। आने वाला समय ओछे, हल्के नेतृत्व जैसे महान कार्य के लिए इन जैसों के बारे में सोचना ही ठीक नहीं। यह महान कार्य महान आत्माएँ ही कर सकेंगी और महान आत्माओं के अनेक गुणों में प्रमुख एक तपश्चर्या भी है। इसलिए शान्तिकुँज में चलने वाले तप प्रधान शिक्षण की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। इसे युगान्तरकारी सत्ता द्वारा दिये जाने वाले अनुदानों के एक अलभ्य अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए।


विदुषी विश्ववारा (Kahani)

महर्षि अत्रि के वंश में उत्पन्न विदुषी विश्ववारा ने योगाभ्यास और विशाल अध्ययन के बल पर ब्रह्मवादिनी पद पाया । उनने ऋग्वेद के कितने ही अनुच्छेदों की गहन विवेचना की है और उन लोगों का मुँह बन्द किया है, जो स्त्रियों को वेद की अनधिकारिणी मानते हैं। उनने परिवार के विवाह परामर्श को भी स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया था।

*समाप्त*