अवतार केवल उन्हीं को नहीं कहते जिनके बारे में जन प्रचलित मान्यताएं है मिथक या शास्त्र जिनका वर्णन करते आए हैं परब्रह्म की अवांतर चेतना मानवी सत्ता से भी यह कार्य करा लेती है विशेषतः उनसे जिनमें दैवी तत्वों का चिरसंचित बाहुल्य पाया जाता है ऐसे अवांतर तीन रूपों में दृष्टिगोचर होते हैं संत सुधारक और शहीद ये तीन अवांतर चेतना के ऐसे स्वरूप है जिन्हें देखकर उनकी सृजन प्रयोजनों में नियोजित तत्परता के माध्यम से मानवी काया में परमात्मा की चेतना का दिग्दर्शन किया जा सकता है।
‘सन्त’ उन्हें कहते हैं जो अपने उपदेशों से नहीं अपने चरित्र एवं व्यक्तित्व के आधार सुसंस्कृत जीवन का शिक्षण देते हैं। जो अपनी निज की वासना पर नियंत्रण कर अपने आपे को सुधार कर मानव जीवन के एक-एक पल सदुपयोग करने का शिक्षण दे वह संत की परिभाषा में आता है। संत मनः स्थिति को नियंत्रित रखने विचारों की अनगढ़ता को ठीक कर आदर्श वादी उत्कृष्टता को जीवन में उतारे जाने की प्रयोगशाला स्वयं को बना कर अपना उदाहरण सबके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। वे जन- मानस को यह साहस प्रदान करते हैं कि मनः ऊँची रहने पर विषम परिस्थितियों में भी मानवी गरिमा अक्षुण्ण रखी जा सकती है।
अवांतर का दूसरा स्तर ‘सुधारक’का है जो न केवल वासना पर अपितु तृष्णा पर भी नियंत्रण कर आत्म निर्माण के साथ दूसरों को बदलने योग्य पराक्रम करने की सामर्थ्य रखते हैं। आत्म-सुधार अपने हाथ की बात है इसलिए संत का कार्य-क्षेत्र सीमित और सरल है। किन्तु सुधारक को अन्यों को भी बदलना पड़ता है। संत का ‘ब्राह्मण’ होना पर्याप्त है किन्तु सुधारक को ‘साधु’ भी बनना होता है जो एक हाथ में शास्त्र और दूसरों शस्त्र रखता है। अधिक प्राणशक्ति के लिए तृष्णा-लिप्सा और अधिक पाने की महत्वाकांक्षा पर नियंत्रण आवश्यक है। चरित्र अधिक ऊंचा साहस अधिक प्रखर और पुरुषार्थ अधिक प्रबल हो तभी दूसरों को अभ्यस्त अनाचार से विरत रहने और सदाशयता अपनाने के लिए सहमत एवं विवश करना सम्भव है। सुधारक दो मोर्चों को सम्भाल कर व्यापक परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाने वाली अवतारी सत्ता के अंतर्गत आते हैं।
अवतार का तीसरा स्तर ‘शहीद’ का है। शहीद का अर्थ है जो वासना तृष्णा से मुक्त है ही अहंता से भी मुक्ति पा चुका है। ‘स्व’का “पर” के लिए समग्र समर्पण-समर्पण शरणागति परमसत्ता के विराट उद्यान को सुन्दर बनाने के लिए अपने आपको विसर्जित कर देना-यह सच्ची शहादत है। संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त करके परमार्थ को ही अपनी महत्वाकाँक्षाओं का केन्द्र बना लेना उसी में रस लेना उसी चिन्तन में सतत् तन्मय रहना ही शहीद की वास्तविक परिभाषा है। जिसने अहं को अपनी क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं को गला दिया. वही सच्चा शहीद जिन्हें अवतार के प्रत्यक्ष दर्शन करने हों वे ऊपर बताए तीन वर्गों का विस्तार एवं स्तर उभरता देखकर युगपरिवर्तन की प्रक्रिया का अनुमान लगा सकते हैं।
रोज-रोज के सिर दर्द ने उन्हें परेशान कर रखा था। जिन्दगी की सारी सुविधाओं से घिरे रहने के बावजूद गहरी अशांति और बेचैनी ने उन्हें घेर रखा था। इसी कारण वह अपना साधारण काम-काज तक भी ठीक से नहीं कर पाते थे। देश-विदेश के अनगिनत हकीमों के भी इलाज बेकार गए, किसी से कुछ भी फायदा न हुआ। सिर दर्द के कारण उन्हें अपना सारा दिन बिस्तर पर छटपटाते हुए बिताना पड़ता था। कोई दवा कारगर साबित नहीं हो रही थी। कभी -कदर कोई दवा अपना थोड़ा बहुत असर दिखाती, कुछ समय के लिए सिर दर्द कम भी होता, परन्तु रोग जहाँ का तहाँ।
दवा बेअसर साबित होने पर दुआ की तलाश की जाने लगी। वजीर सिपाही गुमाश्ते फकीरों दरवेशों की ढूँढ़ खोज में जुट गए। सभी को अपने खलीजा हारुन-उल रशीद की बेहद फिक्र लगी थी। बगदाद के कोने-कोने में उनकी बीमारी चर्चा का विषय बन गयी थी। किसी ने उन्हें अरब के प्रख्यात फकीर अल्लामा इषा के बारे में बताया कि वे कठिन से कठिन रोगों का इलाज बड़ी आसानी से कर देते हैं और आज तक जिन रोगियों का भी उन्होंने इलाज किया, उनमें से कोई भी दुबारा फिर कभी उस रोग से आक्रान्त नहीं हुआ। खलीफा ने अपने कुछ सरदारों को बढ़िया सवारी देकर फकीर के पास भेजा कि वे उन्हें पूरे सम्मान के साथ यहीं लिवा लाएँ। साथ ही यह भी कहला दिया कि आपकी दवा से यदि खलीफा स्वस्थ हो गए तो आपको भारी इनाम दिया जाएगा। यही नहीं, प्रारम्भिक भेंट के रूप में थोड़ा धन अग्रिम भी भेज दिया।
बताये गए पते सरदार अपने सिपाहियों के साथ गए । वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा की एक फकीर ऊँट चरा रहा है। सहसा उन्हें अपनी नजरों पर भरोसा न हुआ। सोचा कोई और होगा । उन्होंने उससे संत अल्लामा का पता पूछा तो उसने कहा मैं ही अल्लामा हूं। इतना बड़ा दरवेश और हकीम ऊँट चराता होगा यह बात उनकी समझ में न आयी । उन्होंने और लोगों से पूछा तो उनका संशय दूर हुआ कि यही दरवेश अल्लामा हैं। अल्लामा से उन्होंने अपने खलीफा का पैगाम और उनके मर्ज का हाल कह सुनाया तो उन्होंने कहा मैं। किसी मरीज के घर नहीं जाता। उन्हें ही यहाँ लाना पड़ता है और जहाँ तक तुम्हारे खलीफा का सवाल है उनसे कहना कि वह पैदल ही चलकर यहाँ आये।
सरदार अपने सिपाहियों के साथ निराश होकर लौट गए। डरते-झिझकते उन्होंने फकीर की पूरी बात अपने खलीफा को कह सुनायी। पहले तो खलीफा काफी हताश हुए, पर कोई चारा न देखकर उन्होंने पैदल चलकर फकीर के पास पहुँचने का निश्चय किया। काफी हफ्तों तक चलते रहकर खलीफा ने इतनी दूर की मंजिल तय की और अल्लामा के पास पहुँच गया।
अल्लामा ने मरीज को भली प्रकार देखा-परखा और उसे कुछ पुड़ियाएँ देते हुए कहा कि इसकी सौ खुराक दवा हैं इनका प्रयोग करने से मर्ज अच्छा हो जाएगा। दवा के प्रयोग की विधि यह बतायी गयी कि जब माथे पर पसीना आवे, तब एक पुड़िया खोल कर सिर पर मल लिया जाय और हाँ आप जिस प्रकार पैदल चलकर आये हैं, उसी प्रकार पैदल चलते हुए ही वापस लौटें। निर्देश के अनुसार खलीफा को पैदल ही वापस लौटना पड़ा। सिर पर पसीना निकले इसका एक ही उपाय था कि तेज चाल से यात्रा की जाय। उसने वही किया और करीब तीन सप्ताह में वापस बगदाद पहुँच गया। वह तब तक तेज कदमों से चलता ही रहता, जब तक कि सिर पर पसीना निकल न आए और जब पसीना निकल आता तो वह दवा की पुड़िया खोल कर उसे अपने माथे पर मल लेता।
घर लौटने तक खलीफा का सिर दर्द पूरी तरह अच्छा हो गया। बची हुई दवा का क्या किया जाय? इस सवाल का जवाब पाने के लिए उसने अपने सिपाहियों-गुमाश्तों को वह दवा लेकर अल्लामा के पास वापस भेजा। गुमाश्ते अल्लामा के पास पहुँच कर बोले- हमारे खलीफा अब पूरी तरह ठीक हो गए हैं। आपने कहा था कि इस दवा का प्रयोग रास्ते में तभी करना है, जब सिर पर पसीना आए। खलीफा वापस अपनी राजधानी पहुँच गए हैं और मर्ज भी ठीक हो गया है अब इस दवा का क्या किया जाय?
अल्लामा ने हँसते हुए कहा-यह दवा तो मामूली मिट्टी भर थी इसे भले ही फेंक दो। असली इलाज तो निरन्तर चलते रह परिश्रम का अभ्यास करवाना था। फिर कुछ देर रुकने के बाद दरवेश अल्लामा ने कहा” पैदल चलने की आदत छोड़ देने से ही लोग मरीज बनते और बीमार पड़ते हैं। यदि अपने शरीर और मन को निरोग रखना है तो मेरी ही तरह पैदल चलने की आदत डालनी चाहिए। मुझे देखो में पैदल घूमता हुआ मजहब और ईमान का प्रचार भी करता हूं और तन्दुरुस्त भी रहता हूँ। यही मेरी सिद्धी का रहस्य है।”
आम मान्यता यह है कि धर्म या अध्यात्म और विज्ञान परस्पर विरोधी हैं और उन्हें आपस में मिलाया नहीं जा सकता । किन्तु यहाँ यह तथ्य भुला ही दिया जाता है कि विज्ञान अर्थात् जड़ पदार्थ और मनुष्य की प्राण चेतना मिलजुल कर ही वह स्थिति उत्पन्न करते हैं जिससे मानवी ज्ञान और प्रकृतिगत साधनों का सदुपयोग हो सकता है दोनों का समन्वय ही है जिसने दुनिया को इतनी सुन्दरता और सुव्यवस्था प्रदान की हैं एक दूसरे के सहारे ही अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का अवसर हमला है। इसलिए ज्ञान और विज्ञान अध्यात्मिक और भौतिकी के बीच घनिष्ठ सहयोग सहकार को स्वीकारना नितान्त आवश्यक ही नहीं उपयुक्त भी है।
समग्र ज्ञान को दो भागों में बाँटा जा सकता है एक को अंतर्बोध पर आधारित अध्यात्मिक अथवा धर्म और दूसरे तर्क, परीक्षण , अनुभव तथा बताये गये तथ्यों के आधार पर भौतिक जगत सम्बन्धी निष्कर्ष को विज्ञान कहते हैं मूर्धन्य विज्ञान वेत्ता भी इस वास्तविकता को अब समझने और स्वीकारने लगे हैं कि इन दोनों का स्वरूप तथा कार्य पृथक-पृथक न होकर एक दूसरे के पूरक हैं । समग्र प्रगति दोनों के समन्वय से ही सम्भव है।
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात तत्वविद् ब्रेन्ड रसेल ने अपनी कृति” रिलीजन एण्ड साइन्स” में विज्ञान और परम्परावादी धर्म के मध्य विगत चार शताब्दी से चल रहे विवाद की समीक्षा की है ओर वर्तमान काल के प्रगतिशील विज्ञान तथा आज के प्रचलित धर्म में आये परिवर्तन को उजागर करने का प्रयत्न किया है। इस संदर्भ में अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए उनने कहा है कि धर्म और विज्ञान के मध्य सदियों से चला आ रहा द्वन्द्व अब व्यावहारिक रूप से तो खत्म हो गया है।, यह अन्त नहीं हुआ है।
मध्यकालीन समय में जब विज्ञान का शैशव काल चल रहा था और धर्म सत्ता अपने कार्यक्षेत्र में उसके अनाधिकार हस्तक्षेप को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थी, उसे यह प्रतीत हो रहा था कि जिस परम सत्ता के कथन को व सदियों से अकाट्य बताता आया था, उसे विज्ञान चुनौती दे रहा है। जिन दिनों योरोप में ईसाई धर्म सर्वोपरि था और पोप-धर्म गुरुओं की सत्ता राजा से भी बढ़-चढ़ कर थी उन्हीं दिनों स्वर्ग में निवास करने वाले ईश्वर-’गॉड’ के निवास स्थान ग्रह-नक्षत्रों के बारे में खगोल विज्ञान ने चुनौती दे डाली और यह रहस्योद्घाटन किया कि सभी नक्षत्र पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। इसका प्रारंभ कोपरनिकस के इस कथन से हुआ कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और वह ब्रह्माण्ड का केन्द्र नहीं, वरन् एक सृष्टि का एक सूक्ष्म पिण्ड मात्र है उनकी पुस्तक “ ऑन दि रिवोल्यूशन्स ऑफ दि हेवन बॉडीज ‘ का प्रकाशन उनकी मृत्यु से भी कुछ समय पूर्व ही हुआ था, इसलिए वे धर्म गुरुओं के कोप-भाजन से बच निकले, लेकिन उनके समर्थक एवं अन्वेषक ब्रूनों को जिन्दा जला दिया गया। इसी तरह गैलीनियो को तो प्रथम क्षमा माँगने के लिए बाध्य किया गया और दुबारा कैद में यंत्रणा देकर अंधा बना दिया गया और वहीं कालकोठरी में उनकी मृत्यु हो गयी ।तब विज्ञान ने धर्म को प्रतिगामी बना कर खूब कोसा था और धर्म ने विज्ञान को छिछोरा कर गालियाँ दी थीं। वही कारण था कि दोनों एक दूसरे से दूर हटते गये। दुखद बात यह रही कि धर्म का अर्थ साम्प्रदायिक परम्पराओं का निर्वाह भर ही माना गया। यदि कर्तव्यपालन का निर्वाह भी माना गया होता तो जीवन को सार्थक बनाने वाली सर्वोपरि उपलब्धि का विकास आबद्ध न होता।
बट्र्रेण्ड रसेल के अनुसार चार सौ वर्षों तक यही क्रम चलता रहा। परन्तु यहाँ इसके विस्तार में न जाकर इतना ही जान लेना पर्याप्त है कि इस क्षेत्र में दूसरा वज्राघात डार्विन ने किया था और धर्म को विज्ञान का विरोधी बताया था। किन्तु वास्तविकता को देर तक पर्दे के पीछे छिपाकर नहीं रखा जा सकता। हुआ भी यही सन् 1893 में शिकागो धर्म सभा में स्वामी विवेकानन्द के विज्ञान सम्मत अध्यात्मिक प्रतिपादन के बाद काफी प्रयास चले। सन् 1930 में लन्दन में “ साइन्स एण्ड रिलीजन” पर एक सिम्पोजियम अर्थात् विज्ञान एवं धर्म पर एक परिसंवाद आयोजित किया गया जिसमें प्रो0 जूनियन हक्सले के नेतृत्व में अपने क्षेत्र के जाने माने प्रतिभाशाली मनीषियों ने भाग लिया। सभी मूर्धन्यों का एक ही निष्कर्ष था कि विज्ञान या धर्म अपने आप में अकेले पूर्ण नहीं है। दोनों का समन्वय ही पूर्णता प्रदान कर सकता है इस परिसंवाद को सुनने वालों ने तब कहा था कि लगता है अब विज्ञान और धर्म के बीच के विवाद का अन्त हो गया है। दोनों के मध्य की खाई पट गयी है।
गम्भीरता पूर्वक पर्यवेक्षण करने पर तथ्य की पुष्टि हो जाती है कि विज्ञान ने नैतिक मूल्यों के बारे में कभी हस्तक्षेप नहीं किया है। वह केवल यही बताता है कि मनुष्य की इच्छाओं की पूर्ति कैसे और किन साधनों से हो सकती है।, जबकि धर्म का विषय है- नैतिक मूल्य। यह अपने आप में बहुत बड़ा विषय है। आज विज्ञान ने पिछली शताब्दी की मान्यताओं में उसके गुण-दोष देखते हुए नये सिरे से विचार किया है और जो पिछले दिनों कहा जाता था, उसमें आमूल चूल परिवर्तन किया हैं विज्ञान के “इकॉलाजी” सिद्धान्त को ही लें तो उसका पर्यवेक्षण करने पर सृष्टि की व्यवस्था कितनी व्यवस्था पूर्ण है, यह सहज ही समझा जा सकता है इस तथ्य को दीखते हुए हर किसी की सहज मान्यता बनती है कि संसार का कोई बुद्धिमान स्रष्टा अवश्य होना चाहिए जो राह बताने और भूल सुधारने की योग्यता से सुसम्पन्न हैं विज्ञान ने अब तो मरणोत्तर जीवन के भी इतने अधिक प्रमाण ढूँढ़ निकाले हैं जिनसे इन तथ्यों की पुष्टि होती है कि आत्मा की अपनी स्वतंत्र सत्ता है और वह काया के न रहने पर भी किसी न किसी रूप में अपना अस्तित्व बनाये रखती हैं यह अधकचरी भूतकालीन मान्यताओं का खण्डन है।
इसी तरह पिछली पीढ़ियों पर जो साम्प्रदायिकता का प्रभाव था, धीरे-धीरे वह अब लुप्त हो रहा हैं इतने पर भी धर्म को अपनी खोई हुई पुरानी एवं वास्तविक शक्ति तभी प्राप्त हो सकती है जबकि विज्ञान की भाँति वह भी परिवर्तनों का सामना करने और तर्क तथ्य एवं प्रमाणों की कसौटी पर कसे जाने को तैयार हो। तब धर्म का लाभ परलोक में मिलेगा, इसकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। धर्म-धारण जहाँ भी होगी विज्ञान के नकद लाभों की तरह उसके फलितार्थ भी आत्म संतोष, आत्मोल्लास की ऐसी शक्ति के रूप में विद्यमान रहेंगे जिसके सामने भौतिक दृष्टि से अभावग्रस्त समझा जाने वाला जीवन भी शांति और धैर्य पूर्वक सरल एवं सौम्य बनाया जा सकेगा।
लन्दन विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञान प्रो0 हर्बर्ट डिग्ले का कहना है कि विज्ञान की एक सीमित परिधि है। पदार्थ के स्वरूप एवं प्रयोग का विश्लेषण करना उसका काम है। पदार्थ किसने बनाया, किस प्रकार बनाया, आदि बातों का उत्तर दे सकना बहुत ऊँची कक्षा में प्रवेश करने पर ही सम्भव होगा। यह कक्षा लगभग उसी स्तर की होगी जैसी की अध्यात्मिक के तत्वांश को समझा जाता है इस संदर्भ में दार्शनिक रेनाल्ड की मान्यता है कि धर्मक्षेत्र को भी अपनी भावनात्मक मर्यादाओं में रहना चाहिए और व्यक्तिगत सदाचार एवं समाजगत सुव्यवस्था के लिए आचार व्यवहार की प्रक्रिया को परिष्कृत बनाये रखने में जुटे रहना चाहिये। यदि धर्मवेत्ता अपनी कल्पना के आधार पर भौतिक पदार्थों की रीति-नीति का निर्धारण करेंगे तो वे सत्य की सही अर्थों में कुसेवा ही करेंगे और ज्ञान के स्वरूप एवं विकास में बाधक बनेंगे। धर्म विज्ञान का वास्तविक मिलन दार्शनिक स्तर पर ही हो सकता है।
“हरमन डेस्टिनी” नामक अपनी पुस्तक में प्रख्यात वैज्ञानिक लेकोन्टे डुन्वे ने कहा है कि विज्ञान अभी अपने शैशवकाल में है और पालने में ही पल रहा है। वह वस्तुओं के गुण-धर्म पर बहुत प्रकाश डाल रहा है। पर यह नहीं बताता कि दूरदर्शी बुद्धिमत्ता की घटोत्तरी को कैसे पूरा किया जाय। धर्म या अध्यात्मिक में वे तत्व मौजूद हैं जिनके आधार पर चिंतन-चेतना में विवेकशीलता का अधिकाधिक समावेश हो सकता है दुर्भाग्य यहाँ भी जड़ जमा बैठा है कि उसमें दुराग्रहों की भरमार ने विवेकशील चिन्तन के द्वारा अवरुद्ध कर दिये है। विज्ञान की कुछ प्रगति अवश्य इसलिए हुई है कि उसने नये ज्ञान के प्रकाश के लिए अपने द्वारा खुले रखे हैं और अपनी भूलों को समझने तथा सुधारने के लिए निरन्तर प्रयत्न जारी रखा है। इस भिन्नता के कारण ही विज्ञान आगे निकल गया और धर्म पिछड़ गया दीखता है यदि शोध और सुधार का द्वार धर्म ने भी खुला रखने का शुभारंभ किया तो निःसंदेह धर्म को भी वैसी ही मान्यता मिलती जैसी की आज विज्ञान को मिली है।
वस्तुतः वैज्ञानिक और अध्यात्मवादी दोनों ही अन्तर्ज्ञान से प्रकाश की किरणें प्राप्त करते हैं। आइन्स्टीन वहाइजेनबर्ग से लेकर अनेकानेक महान वैज्ञानिकों आविष्कारों के उदाहरण इस तथ्य के प्रमाण हैं कि उन्हें अकारण ही ऐसी सूझ उठी जिसके सहारे वे अपनी खोज का आधार खड़ा कर सके। अंतःकरण से उठने वाला अनायास अन्तर्बोध यही सिद्ध करता है कि मानवी चेतना के पीछे कोई अलौकिक दिव्य चेतन प्रवाह काम करता रहा था जिसे अप्रकट को प्रकट करने की प्रधान धाराओं के आविष्कर्ता इस तथ्य से सहमत हैं। अभी भी अदृश्य चेतना की वह उमंग उठकर ठप्प नहीं हुई है वरन् उसमें एक के बाद एक कदम आगे बढ़ाने का सहारा देने का क्रम अनवरत रूप से चल रहा है और सूझबूझ की शृंखला की कड़ियाँ जुड़ती हुई चली जाती हैं।
ख्याति प्राप्त दार्शनिक रैक्वे का कथन है कि मनुष्य ने विज्ञान द्वारा प्रकृति के अन्तराल को समझा है और धर्म के द्वारा अपनी महानता का आभास पाया है। उनके अनुसार धर्म का लक्ष्य है अन्तराल में सन्निहित सत्प्रवृत्तियों को मनोविज्ञान सम्मत पद्धतियों से इतना समुन्नत बनाना कि वे व्यावहारिक जीवन में वैज्ञानिक उपलब्धियों की भाँति ओत-प्रोत हो सकें। विज्ञान का लक्ष्य है कि प्रकृतिगत शक्तियों तथा पदार्थों के स्वरूप तथा क्रियाकलाप की इतनी जानकारी देना कि उनका समुचित लाभ मानवी सुख-सुविधाओं की अभिवृद्धि के लिए किया जा सके। दोनों का कार्यक्षेत्र प्रत्यक्षतः अलग है, फिर भी वे एक दूसरे के पूरक है। क्योंकि जीवन आत्मिक एवं भौतिक चेतन और जड़-दोनों प्रकार के तत्वों से मिलकर बना हैं जड़-चेतन के समन्वय से ही जीवन का प्रत्यक्ष स्वरूप सामने आता है। इतने पर भी यह अन्तर रखना ही पड़ेगा कि हृदय और मस्तिष्क की तरह दोनों का कार्यक्षेत्र विभक्त हो। एक का कार्य दूसरे पर थोपने की गति न की जाय। भौतिक तथ्यों की जानकारी में पदार्थ विज्ञान को प्रामाणिक माना जाय और आत्मिक आन्तरिक चिन्तन एवं भावनात्मक प्रसंग में श्रद्धा की आत्मानुभूति को मान्यता दी जाय। अतः आवश्यकता इस बात की है कि जिस प्रकार योजनाबद्ध तरीके से वैज्ञानिक प्रगति के लिए कार्य व अनुसंधान हो रहा है उसी प्रकार धर्म और अध्यात्मिक क्षेत्र में भी चिन्तन चेतना को परिष्कृत करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से शोध को प्रमुखता दी जाय। , तभी मानव-जाति की समग्र प्रगति व उत्थान हो सकता है विज्ञान वेत्ताओं की तुलना में दार्शनिकों एवं अध्यात्मवेत्ताओं का कार्यक्षेत्र एवं उत्तरदायित्व अधिक विस्तृत है।
‘मनुष्य तो मनुष्य ही है। उसमें कोई गलती न हो, प्रमाद न हो, ऐसा सम्भव नहीं है। ‘, उस ब्राह्मण कुमार ने कहा।
‘ मनुष्य-मनुष्य अवश्य है, किन्तु मनुष्य के लिए। शिष्य के लिए वह मनुष्य नहीं और देवता भी नहीं । उसके लिए वह नित्य निरन्तर जागरुक ज्ञान है। ‘ ऋषि ने समझाया।
हाथ में बिल्व पत्र एवं अर्क पुष्पों का दोनों तथा जल से भरा कमण्डलु लिए वह भगवान शंकर की आराधना के लिए जा रहा था। रास्ते में उसे ये एक ऋषि मिल गए थे। वे भी मन्दिर ही जा रहे थे, अतः दोनों साथ हो लिए
‘मैंने कोई भी अपराध किया नहीं था। मेरे प्रमादवश ग्रन्थ नष्ट भी नहीं हुआ। वह तो गुरु पत्नी के हाथों से दीपक गिर जाने के कारण तेल से भीग गया था। फिर भी गुरुदेव मुझ पर अकारण ही कुपित हो उठे।’ ब्राह्मण कुमार ने कहा।
मैं कह चुका कि तुम्हें गुरु की आलोचना का पाप नहीं करना चाहिए। ‘ ऋषि ने समझाया- ‘ शिष्य को केवल इतना ही देखना चाहिए कि गुरु उसे किसी पाप कर्म में प्रेरित तो नहीं करते। यदि ऐसा हो तो वह कोई दम्भी होगा। उसका त्याग कर दें। ऐसा नहीं है तो वह सचमुच गुरु है-शिष्य के लिए नित्य जागरुक ज्ञान। उनमें दोष न देखें।
‘क्रोध तो अज्ञान से होता है। ब्राह्मण कुमार ने शंका की-’ अकारण क्रोध जागरुक ज्ञान में कैसे सम्भव है।?
‘ माता का रोष पुत्र के लिए अज्ञान जन्य नहीं होता।’ ऋषि ने कहा-’ आश्रम की वस्तुओं, विशेषतः ग्रन्थों की रक्षा का भार छात्रों पर ही रहता है। तुम्हारा ही प्रमाद था कि ग्रन्थ ऐसे स्थान पर पड़ा रहा, जहाँ तेल गिरने की आशंका थी।
‘यह तो मैंने स्वीकार किया। ‘ विप्र कुमार ने कहा- किन्तु गुरु मानव नहीं है, उनमें साधारण मानवोचित दुर्बलताएँ नहीं हो सकतीं- यह बात हृदय में नहीं बैठती।’
‘ठीक ही है स्वानुभव के बिना ऐसी बात हृदयंगम हो नहीं सकती।’ ऋषि ने गम्भीरता से कहा जड़-पाषाण प्रतीक में तो हम चिद्धन देवता की भावना कर सकते हैं, किन्तु चेतन प्रत्यक्ष ज्ञान देने वाले प्रतीक में वही भाव स्थिर नहीं होता।
विप्रकुमार को यह युक्ति कुछ ठीक अवश्य प्रतीत हुई, पर वह उसे आत्मसात् नहीं कर सका। मन्दिर आ गया था। ऋषि मूर्ति को मस्तक झुका कर एक कोने में बगल से मृगचर्म निकालकर पद्मासन में बैठकर ध्यान करने लगे और विप्रकुमार ने मूर्ति का अर्चन किया।
जल, विल्व पत्र, अ-पुष्पादि चढ़ाकर स्तुति के पश्चात! अर्ध परिक्रमा करके उसने साष्टाँग दण्डवत् किया और वह भी एक ओर जब मालिका लेकर गोमुखी में हाथ डालकर बैठ गया। धीरे-धीरे मन अस्तित्व की गहराइयों में डूबने लगा।
“ कल्याण हो।” एक अन्तर्ध्वनि की गूँज के कारण उसने चौंक कर नेत्र खोल दिए वह ध्यानस्थ हो गया था और उसे भगवान शंकर के हृदय देश में दर्शन हुए थे। उन्हीं को प्रमाण करने के लिए उसने मस्तक झुकाया था। शब्द ने उसे चौंका दिया।
सामने चौड़ी किनारे की रेशमी धोती पहने सुन्दर उत्तरी धारण किए , ऊर्ध्वपुण्ड लगाए गुरुदेव को देखकर वह उठ खड़ा हुआ। गुरु के अपमान का कुफल वह पा चुका था उसे अपने पूर्व जन्म का स्मरण था और उस घटना की स्मृति उसे रोमांचित कर देती थी। उठकर उसने पुनः अभिवादन किया।
सम्भवतः गुरुदेव पूजन कर चुके थे। उनके हाथ के पात्र में एकाध छिन्न बिल्वपत्र तथा दो-तीन फूलों की पंखुड़ियाँ चिपकी रह गयी थी। उन्होंने शिष्य को बैठकर जप करने का आदेश दिया और स्वयं भी एक ओर आसन पर जा विराजे।
‘मैंने भगवान शंकर के लिए किया था।’ ब्राह्मण कुमार सोच रहा था, पता नहीं, कब गुरुदेव सम्मुख उपस्थित हो गए। भगवान के निमित्त किया हुआ नमस्कार उन्होंने अपने लिए स्वीकार कर लिया। यह देवापराध हुआ। मुझे क्या करना चाहिए? चिन्तामग्न हो रहा था वह।
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च। ॐ नमः शिवाय च श्वितराय च ॥
गम्भीर ध्वनि ने विप्रकुमार की चिन्तन शृंखला को भंग कर दिया। वह इधर-उधर उस ध्वनि का उद्गम ढूँढ़ने लगा। उसने दो कि महर्षि एकत का मुखमण्डल ज्योतिपूर्ण हो गया है और अवरुद्ध ध्वनि उनके समीप जाने पर बड़े प्रखर वेग से मस्तिष्क में गूँजने लगती हैं सम्भवतः महर्षि अपने प्राणों से परावाणी में इन मन्त्रों का उच्चारण कर रहे है।
तेज का आकर्षण अद्भुत था। वहाँ से लौट जाना उसके लिए सम्भव नहीं रह गया। वहीं घुटनों के बल बैठकर उसने उन मन्त्रों की सस्वर आवृत्ति प्रारम्भ की, क्योंकि वह ध्वनि ऐसा करने के लिए उसे विवश कर श्क में जो गुँजार वह अनुभव कर रहा था उसे मुख से प्रकट किए बिना सह लेना सम्भव नहीं था।
‘ब्रह्मचारी उठो! क्रमशः तेज कम हुआ और ध्वनि शान्त पड़ी। सम्भवतः ब्राह्मण बालक की वाह्य ध्वनि इस उफान में कारण हुई। धीरे-धीरे नेत्रों को खोलते हुए ऋषि ने कहा’ आओ नित्य ज्ञान धन के दर्शन करो।’
‘नित्य बोध स्वरूप तो भगवान शिव हैं।’ विप्रकुमार गदगद हो उठा। जीवन में ऐसा सौभाग्य प्राप्त होगा, इसकी उसे कभी आशा नहीं थी। ऋषि की कृपा से असम्भव क्या रहता है। वह उठकर खड़ा हो गया।
‘ गर्भगृह के भीतर ऋषि एक ओर खड़े हो गए। एक प्रकार की अद्भुत शांति तो वहाँ थी। किन्तु और कुछ भी विशेषता नहीं थी। मध्य में पुष्पदल पूजित भगवान शंकर की मूर्ति और एक ओर आसन लगाए ध्यानस्थ गुरुदेव। ब्राह्मण कुमार ने ऋषि के मुख की ओर देखा।
‘अभी भी तुम्हारी प्रकृति पूर्णतः परिवर्तित नहीं हुई है।’ ऋषि ने कहा-’अपने पूर्वकृत गुरु के अनादर का फल तुम भोग चुके हो। भगवान शंकर ने तुम्हें श्री राम भक्ति प्राप्त करने का वरदान दिया है और वे स्वयं ही तुम्हारे अन्तः कालुष्य को मिटाकर अधिकारी बनाने का अनुग्रह भी कर रहे हैं।’
‘तब क्या मेरे इस गुरु रूप में स्वयं......।’ वह अपनी कल्पना से स्वयं चौंक उठा।
‘ चौंकने का कोई कारण नहीं। ‘ ऋषि ने कहा-’शिष्य के लिए गुरु नित्य बोध स्वरूप भगवान शंकर का स्वरूप, उनसे भिन्न चल प्रतीक होता है।’
डसने देखा-गुरुदेव के मुख पर स्निग्ध मुस्कराहट झलक रही है। उनका उत्तरीय गज चर्म का है कमर में व्याघ्राम्बर है। गले का यज्ञोपवीत काले सर्प में बदल गया है और भाल पर ऊर्ध्वपुण्ड नहीं, वह तो तृतीय नेत्र है।
वह दौड़ा और उसने चाहा कि उनके उन ज्योतिर्मय चरणों पर मस्तक रख दें, पर उसे निराशा ने आकुल कर दिया। उसका मस्तक मन्दिर की उज्ज्वल पाषाण भूमि पर पड़ा। उसके गुरुदेव वहाँ नहीं थे।
‘दुःखी मत हो वत्स।’ पीछे से ऋषि ने कहा-’ अब तुम्हारा आश्रम लौटना भी कोई अर्थ नहीं रखता। समय आ गया है, जब तुम श्री रामचंद्र के पावन चरणों की भक्ति प्राप्त करो। अतः तुमको महर्षि लोमश के आश्रम को प्रस्थान करना चाहिए।
ऋषि मुड़े और चले गए। उसने भी लोमश ऋषि के आश्रम की ओर प्रस्थान किया। महर्षि से उसे शाप और अनुग्रह दोनों प्राप्त हुए। कभी की गई गुरु अवज्ञा के दण्ड में उसे कौए का शरीर मिला और लगातार की गयी साधना का पुरस्कार उसे तत्वज्ञान और प्री भक्ति के रूप में प्राप्त हुआ।
‘अब अपनी निर्मल मति में गुरु का शिव स्वरूप उसे स्पष्ट हो चुका। पक्षियों में काकभुशुंडि के रूप में जाने-जाने वाले उन पक्षी श्रेष्ठ के पास धीरे-धीरे सभी पक्षी आने लगे। एक दिन जब पक्षियों के अग्रणी राजहंस ने उन सभी को काकभुशुंडि को प्रणाम करने का आदेश दिया तो जैसे सभी चौंक पड़े।
‘उस म्लेच्छ जातीय कौए में आपने ऐसी क्या विशेषता देखी जो हम सबको उसे प्रणाम करना चाहिए।’ एक तरुण हंस ने रोषपूर्ण स्वर में कहा।
‘आप लोग एक ब्राह्मण कुमार का अपमान कर रहे हैं।’ राजहंस ने चेतावनी दी। ‘ महर्षि लोमश के शाप से उनका शरीर परिवर्तन हो गया हैं वैसे उन्हें स्वेच्छया शरीर धारण करने की शक्ति भी महर्षि ने दे दी है। किन्तु पक्षी जाति पर उनका यह अनुग्रह है कि उन्होंने हमारे सबसे तुच्छ शरीर को स्वीकार करके हमें गौरवान्वित किया है।’
काकभुशुंडि को प्रणाम करने के कारण पक्षियों में जो रोष जाग्रत हो गया था, वह शांत हो गया। अपने नायक की दूरदर्शिता के सम्मुख उन्होंने मस्तक झुकाया।
वट वृक्ष के नीचे एक विस्तृत वेदिका पर बीच में काकभुशुंडि बैठे थे। मानसरोवर से वृद्ध हंसों का समुदाय पहले ही आ गया था। कुछ और पक्षी भी
आ विराजे थे। इस नव जात समुदाय के लिए पर्याप्त स्थान था। ये सभी पीछे की ओर बैठ गए। वृक्ष पर किसी का भी बैठना अनुचित था, क्योंकि स्वयं वक्ता वेदिका पर नीचे बैठे थे।
सहसा पक्षियों में खलबली मच गयी। भुशुंडी जी भी उठ खड़े हुए। सबने देखा कि पक्षिराज गरुड़ पधार रहे हैं। आते ही उन्होंने भुशुंडी जी के चरणों में अभिवादन किया। यद्यपि इससे उनको बड़ा संकोच हुआ। वे पक्षिराज का सत्कार करने लगे।
‘श्री हरि के साक्षात् वाहन श्री गरुड़ जी भी इन्हें अभिवादन करते हैं? अवसर देखकर एक हंस ने कहा।
यों तो श्री राम भक्त सभी के पूजनीय हैं। फिर श्रद्धा भक्तिपूर्वक जो भी गुरु को नित्य ज्ञान स्वरूप तथा साक्षात् शिव समझकर उनकी शरण लेता है, वह भी जगत्पूज्य हो जाता है ये तो साक्षात् भगवान शंकर के शिष्य हैं, जिनके ललाट पर पहुँचने के कारण टेड़ चन्द्रमा भी विश्ववंद्य को गया हैं इनकी जाति की ओर ध्यान देने का अब किसी में न तो साहस है और न किसी को अधिकार ही है।’ वृद्ध राजहंस ने सबको धीरे-धीरे समझाया। उन हंसों को क्या पता था कि प्रश्नकर्ता बने हंस के वेष में स्वयं भगवान शिव रामकथा सुनने पधारे हैं और गुरु महिमा की चर्चा चला रहे हैं।
अंतरिक्ष में सौर मण्डल-आकाश गंगाएं अनेकानेक हैं। हमारे अपने सूर्य की परिक्रमा कर रहे ग्रहपिण्ड हमारी जीवन यात्रा में एक बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनसे आने वाले अनुदानों के माध्यम से ही हम सब ही नहीं, सारे प्रकृति जगत का संतुलित क्रिया व्यापार चल रहा है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पृथ्वी के उभयपक्षीय संतुलन केन्द्र बिन्दु हैं। अंतरिक्ष से बरसने वाला असीम विकिरण पृथ्वी के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है। उसका एक सीमित अंश ही भूतल को स्पर्श कर पाता है। धरती पर छाया आयनोस्फियर का कवच उस विकिरण के घातक प्रभाव से हम सबकी रक्षा करता रहता है। किन्तु अंतर्ग्रही ऊर्जा जो शक्ति धाराओं की तरह इन विकिरणों के साथ आती है, पृथ्वी पर हमें एक सुनियोजित विधिविधान के माध्यम से सतत् प्राप्त होती रहती है। यही हमारी जीवन शक्ति का एवं व्यक्ति समष्टि सम्बन्धों का मूलभूत आधार है। भौतिकी के नियमों के अंतर्गत यह आदान-प्रदान जिस प्रकार चलता है, उसे देखते हुए आश्चर्य चकित होकर रह जाना पड़ता है।
अन्तर्ग्रहीय ऊर्जाएं पृथ्वी पर उत्तरी ध्रुव क्षेत्र में होकर छनी हुई उपयुक्त एवं आवश्यक मात्रा में ही प्रवेश करती हैं और पृथ्वी को अभीष्ट परिपोषण देने के उपरान्त दक्षिणी ध्रुव में होती हुई बहिर्गमन कर जाती हैं। एक सिरे से प्रवेश करके चूहा जिस प्रकार बिल के दूसरे सिरे से निकल भागता है उसी प्रकार अंतर्ग्रहीय विकिरण धरती के एक सिरे से प्रवेश करता और दूसरे से बाहर निकलता रहता है उत्तरी ध्रुव क्षेत्र एक ऐसी चुम्बकीय छलनी है जो केवल उसी प्रवाह को भीतर प्रवेश करने देती है जो उपयोगी है। छलनी में बारीक आटा ही छनता है और भूसी ऊपर रह जाती है। ठीक इसी प्रकार प्रज्ञ ध्रुवीय छलनी में भी पृथ्वी के लिए उपयोगी विकरण आते हैं और शेष को पीछे ढकेल दिया जाता है।
उत्तरी ध्रुव पर यह छानने की क्रिया टकराव के रूप में देखी जा सकती है। इस टकराव से एक विलक्षण प्रकार के ऊर्जा कम्पन उत्पन्न होते हैं जिनकी प्रत्यक्ष चमक उस क्षेत्र में प्रायः देखने को मिलती रहती है उसे ध्रुवप्रभा या मेरु प्रकाश कहते हैं इसका दृश्यमान प्रत्यक्ष रूप से जितना अद्भुत है उससे अधिक रहस्यमय उसका अदृश्य रूप है । इसमें ध्रुवप्रभा का प्रभाव स्थानीय ही नहीं होता वरन् समस्त भूतल को यह प्रभावित करता है। भूगर्भ में, समुद्र तल में , वायु मण्डल में, ईथर के महासागर में जो विभिन्न प्रकार की हलचलें होती रहती हैं- चढ़ाव उतार आते हैं उनका बहुत कुछ सम्बन्ध इस ध्रुवप्रभा एवं मेरुप्रकाश से होता है। इतना ही नहीं उसकी हलचलें प्राणधारियों की शारीरिक एवं मनःस्थिति को भी प्रभावित करती है। मनुष्यों पर तो उसका प्रभाव विशिष्ट रूप से होता है। सुविज्ञ लोग उस प्रभाव प्रवाह में से अपने लिये उपयोगी तत्व खींच लेने, धारण कर लेने में भी सफल होते हैं और उससे असाधारण लाभ प्राप्त करते हैं।
ध्रुव प्रकाश सर्चलाइट के समान होता है यह उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में ज्यादा तेज होता है उत्तरी ध्रुव पर कभी-कभी गर्मी भी हो जाती है दक्षिणी पर नहीं। उत्तरी ध्रुव पर एस्किमो रहते हैं दक्षिणी ध्रुव में पेन्गुइन पक्षी के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता। यह पक्षी आगन्तुकों से बहुत प्रेममय व्यवहार करते हैं उत्तरी ध्रुव पर धरती भीतर को धँसी हैं 14000 फुट गहरा समुद्र बन गया है जबकि दक्षिणी ध्रुव 19000 फीट उभरा हुआ है। उत्तर में बर्फ बहती है दक्षिण में स्थिर रहती है, दक्षिण ध्रुव में रात धीरे-धीरे आती है सूर्य दक्षिणी क्षितिज के लिए बहुत थोड़ी देर के लिए आता है सूर्यास्त का दृश्य घण्टों रहता है अस्त हो जाने पर महीनों अन्धकार छाया रहता है केवल मात्र उत्तर की ओर कुछ प्रकाश दिखाई देता है एक बार ध्रुव यात्री बायर्ड ने यहाँ सूर्य को बिलकुल हरे रंग का देखा। ऐसा दृश्य इससे पहले किसी ने नहीं देखा था। किरणों की वक्रता के कारण ऐसे विलक्षण दृश्य वहाँ प्रायः देखने को मिलते रहते हैं।
ध्रुवों पर सूर्य की किरणों की विचित्रता के फलस्वरूप अनेक विचित्रताएँ दृष्टिगोचर होती हैं दूर की वस्तुयें हवा में लटकती हुई जान पड़ती है। टीले जितने होते हैं उससे कई गुना बड़े लगते हैं। कई बार सूर्य एक के स्थान पर कई- कई दिखाई देते हैं और इसी प्रकार चन्द्रमा भी। बर्फ में, हवा में भी कई बार सूर्य दिखाई दे जाते हैं यह सभी कृत्रिम सूर्य वास्तविक जैसे ही लगते हैं।
पृथ्वी का चुंबकत्व जो कि पृथ्वी के कण-कण को, पृथ्वी में पाये जाने वाले जीवन तत्व को प्रभावित करता है। वस्तुतः ब्रह्मांड से आने वाले एक प्रकार के शक्ति या तत्व प्रवाह के कारण हैं यह प्रवाह उत्तर की ओर से आता है इसलिए उत्तरी ध्रुव क्षेत्र और दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र दोनों दो ध्रुव होने पर भी गुण धर्म से अलग-अलग हैं सामान्यतः दोनों चुम्बकीय ध्रुवों की विशेषतायें एक समान किन्तु एक दूसरे से भिन्न दिशा में होनी चाहिए किन्तु कई बातों में समानता होने पर भी दोनों की विशेषताओं में बड़ा अन्तर है।
उत्तरी ध्रुव एक गढ़ा है दक्षिणी ध्रुव गुमड़ा। उत्तरी ध्रुव की बर्फ दक्षिणी ध्रुव से अधिक गर्म होती है जल्दी गलने और जल्दी जमने वाली भी होती हैं दक्षिणी ध्रुव उजाड़ क्षेत्र हैं यहाँ कुछ पक्षी जलचरों के अतिरिक्त एक पंखहीन मच्छर भी पाया जाता है वह क्या खाकर जीता है और कैसे इतनी भयंकर शीत में जीवन धारण किये रहता है वैज्ञानिक इस प्रश्न का आज तक समाधान नहीं कर सके।
उत्तरी ध्रुव में जीवन का बाहुल्य है। पौधों तथा जन्तुओं की संख्या करोड़ों तक पहुँचती है। यहाँ दिन और रात समान नहीं होते 6-6 माह के भी नहीं होते- कई बार रात 80 दिन के बराबर होती है यह सबसे लम्बी रात होती है। क्षितिज के बीच सूर्य वर्ष में 16 दिन रहता है। यहाँ चन्द्रमा इतनी तेजी से चमकता है कि उसके प्रकाश में, दिन में सूर्य की रोशनी के समान ही काम किया जा सकता है।
कुछ मेरुप्रकाश विस्तृत और आकृति हीन होते हैं कुछ सजीव और हलचल करते हुए । कभी वे किरणों की लम्बाई के रूप में जान पड़ते हैं कभी प्रभा और ज्वाला के रूप में कभी वह दृश्य बदलता हुआ कभी चाप, पड़ी और कोरोना के रूप में होता है तो कभी प्रकाश गुच्छे सर्चलाइट के समान। यह रात भर तरह-तरह के दृश्य बदलते हैं, हर दृश्य और परिवर्तन सूर्य की अपनी आन्तरिक हलचल का प्रतीक होता है इसका सबसे बड़ा प्रमाण अंतर्राष्ट्रीय भू-भौतिक वर्ष अनुसन्धान के दौरान आया और उसके विलक्षण आकार- प्रकार देखने में आये। इस अवधि में सूर्य की आन्तरिक हलचल बहुत बढ़ जाती है, यह प्रकाश मुख्यतः चुम्बकीय तूफान होता है जो की सारी याँत्रिक क्रिया में क्रांति उत्पन्न करके रख देता है।
अनुसन्धान के दौरान यह पाया गया है कि सूर्य में जब तेज दमक दिखती है उसके एक दो दिन बाद ही मेरु प्रकाश भी तीव्र हो उठता है यह बढ़ी हुई सक्रियता सूर्य- विकरण तथा कणों की बौछार का ही प्रतीक होती हैं शान्त अवस्था में भी यह सम्बन्ध बना रहता है पर प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होता। यह कण अति सूक्ष्म इलेक्ट्रान (ऋण आवेश कण) प्रोट्रान (धन आवेश कण) जो 200 से लेकर 1000 मील तक प्रति घण्टे की गति से दौड़ते हुए पृथ्वी तक पहुँचने में कुल 8 मिनट ही लेता है प्रकाश की गति 1800000 मील प्रति सेकेण्ड है इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी सूर्य की विद्युतीय शक्ति से सम्बद्ध है पृथ्वी स्वयं एक चुम्बक की तरह हैं चुम्बकत्व पार्थिव कणों में विद्युत प्रवाह के कारण पैदा होता है इससे स्पष्ट है कि पृथ्वी चुम्बकीय क्षमता सूर्य के ही कारण हैं यह कण पृथ्वी से हजारों मील ऊपर ही पृथ्वी के क्षेत्र के द्वारा पृथ्वी के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों की ओर मोड़ और प्रवाहित कर दिये जाते हैं।
मार्च तथा सितम्बर में (चैत्र तथा क्वार) में जबकि पृथ्वी का अक्ष सूर्य के साथ उचित कोण पर होता है मेरुप्रकाश अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पड़ता है जबकि अन्य समय गलत दिशा के कारण प्रकाश लौटकर ब्रह्मांड में चला जाता है यही वह अवधि होती है जब पृथ्वी में फूल -फलों की वृद्धि और ऋतु परिवर्तन होता है उस समय सूर्य की यह विद्युत धाराएँ स्पष्ट और अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पड़ती हैं प्रयोगों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि उत्तरी- दक्षिणी ध्रुवों में विद्युत धारा की चादरें जैसी ढकी रहती ही।
ध्रुव प्रभा एवं मेरुप्रकाश का धरती पर होने वाली विभिन्न हलचलों एवं परिवर्तनों से क्या संबंध है उसका अन्वेषण करने में विज्ञानवेत्ता संलग्न हैं। वे क्रमशः इस निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहे हैं कि मनुष्य के निजी पुरुषार्थ का महत्व एक बहुत छोटी सीमा तक ही सीमित हैं बहुत करके तो अन्तरिक्ष और भूलोक के बीच चल रहे आदान-प्रदान पर ही निर्भर रहता है। धातुएँ, वनस्पति, ऋतु परिवर्तन, जलवायु जैसे महत्वपूर्ण तत्वों पर इन्हीं अदृश्य अभिवर्षणों का प्रभाव रहता है। इतना ही नहीं वे प्राणियों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती हैं। उस दृष्टि से स्वतन्त्र समझा जाने वाला प्राणि जगत् प्रकृति की सूक्ष्म हलचलों की कठपुतली मात्र बनकर एक प्रकार से नियति नियंत्रित ही बन जाता है।, ऐसा कहा जा सकता है एक बारगी यह स्थिति बड़ी दयनीय प्रतीत होती है कि प्राणियों को नियति की कठपुतली मात्र बनकर रहना पड़े। अंतर्ग्रहीय प्रवाह उसके सामने जो भी परिस्थितियां उत्पन्न करे उसके सामने नतमस्तक होना पड़े।
नेतृत्व विज्ञान पर अधिक गहराई से चार करने पर स्पष्ट होता है कि ध्रुवीय छलनी की तरह ही मानवी चेतना में भी एक अद्भुत विशेषता यह है कि वह प्रकृतिगत प्रवाहों में से जिसे चाहे ग्रहण करे एवं जिन्हें चाहे अपने मनोबल की टक्कर मारकर इधर-उधर छिपा दें। प्रकृति की इन प्रेरणाओं को हृदयंगम करने पर जीवन यात्रा सुख-शांति पूर्वक सम्पन्न की जा सकती है। प्रकृति की इन प्रेरणाओं की, नियम-मर्यादाओं की अवहेलना करने पर उसका दण्ड दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है परस्पर सहयोग एक ऐसा तत्व है जिसमें न केवल प्राणी क्रमिक विकास की दिशा में अग्रसर होते हैं, वरन् निर्जीव समझे जाने वाले तत्वों में भी सुव्यवस्था रहती है।
रंगों की दुनिया बड़ी ही निराली हैं कभी इसकी रंग-बिरंगी छटा मन को ऐसा विमोहित कर लेती है कि व्यक्ति सुध-बुध ही खो बैठता है और कभी इतनी वितृष्णा और विषाद का कारण बन जाती है कि जीवन के अन्त का अंदेशा होने लगता है यह जीवनदायी भी है ओर क्लेशदायी भी।
निरभ्र गगन की नीलिमा को जब हम निहारते हैं, तो आँखें उसे देखते थकती नहीं, मन उसे देख कर अघाता नहीं, पर वही आकाश जब मेघ मालाओं से परिव्याप्त हो जाता है तो उस श्वेत’- श्यामक बदरंग मिलन से चित्त अनायास विकर्षित होने लगता है कदाचित् मोर और चकोर को ही यह विचित्र वर्ण आकर्षित करने में सफल हो पाता हो, अन्यथा मानवी हृदय में तो एक प्रकार का जुगुप्सा ही पैदा करता है
शुक्ल पक्ष की शुभ्र ज्योत्स्ना अन्तःकरण को कितना विभोर कर देती है, उसे तमसाच्छन्न ग्राम्य अंचलों में जाकर ही भलीभाँति अनुभव किया जा सकता है पर अमानिषा की कालिमा कैसी भयकारक होती है, इसकी प्रतीति सुनसान-वीरान स्थान में सहज ही होने लगती है।
बत सागर के नीलाभ जली की करें या सावन की रंगहीन रिमझिम फुहार की, दोनों मन को समान रूप से तरंगित करते हैं वनों की हरीतिमा हो अथवा उद्यानों का लुभावनापन, बर्फीले प्रदेश की सफेदी हो या शैलश्रृंगों का चित्ताकर्षण सभी न्यूनाधिक हृदय को गुदगुदाते हैं, पर बसंत के बाद जब पतझड़ का आगमन होता है, तो सूखे पीले ठूँठों पर दृष्टि जाते ही अन्तराल निरानन्द बनने लगता है किन्तु कुछ ही समयान्तराल के पश्चात् नये किसलय और कोंपल फूटते हैं, तो हरियाली का सुहावनापन एक बार पुनः मानस को उत्फुल्ल कर देता है।
यह प्रकारान्तर से वर्णों का ही प्रभाव है।, जो कभी अन्तः प्रदेश को उदासी, तो कभी प्रफुल्लता से ओत-प्रोत करता रहता है। इसे रंगों की विशिष्टता ही कहनी चाहिए जो अपने- अपने ढंग से वातावरण और अंतःकरण को उद्दीप्त करती हैं जिस तरह के रंग जैसे प्रभाव छोड़ते हैं, उसी के अनुरूप उनके गुणों का निर्धारण हमारे प्राचीन आचार्यों ने किया है उदाहरण के लिए श्वेत रंग को ज्ञान, वैराग्य, एकता, समता का प्रतीक माना गया हैं इसका अर्थ यह नहीं कि चाहे जिस वर्ण का चाहे जिस गुण से संगति बिठा दरी गई हो। वास्तव में यह एक पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है और रंग के साथ-साथ तद्नुरूप प्रतीक (गुण) के संगतिकरण में उसके सान्निध्य में उठने वाले भाव का पूरा- पूरा ध्यान रखा गया है। इसीलिए ज्ञान की देवी भगवती सरस्वती का परिधान श्वेत है। इतना ही नहीं, उनका वाहन भी धवल हंस है, जो नीर-क्षीर-विवेक में पूर्णतः निपुण माना गया है यही कारण है कि इस वर्ण को ज्ञान-वैराग्य का चिन्ह घोषित किया गया है इसी निमित्त इस मार्ग के पथिक सफेद वस्त्र धारण करते हैं। ईसाई गिरिजा घरों के पादरियों को देखें या वहाँ की ननो को अथवा मध्यपूर्व के सूफी सन्तों को, सभी की पोशाकें श्वेत ही होती हैं ‘ सूफी परम्परा तो उनके ‘ सूफ ‘ या श्वेत वस्त्र धारण करने के कारण ही चल पड़ी है।
इसके विपरीत श्याम रंग से मन में एक अजीब वितृष्णा-सी पैदा होती है और उसके संपर्क में वह विषण्ण बनने लगता है इसी कारण से मूर्धन्य आचार्यों ने इसे शोक विषाद, मृत्यु का सूचक बताया हैं सरकारी कर्मचारियों अथवा मजदूरों को जब किसी बात का विरोध करना होता है, तो प्रबन्ध समिति अथवा संगठन प्रमुख को वे काले झण्डे दिखाते या काले बिल्ले लगाकर इस बात का प्रदर्शन करते हैं कि वे उनकी वर्तमान रीति-नीति से प्रसन्न नहीं हैं जापानी कर्मचारियों को जब हड़ताल करनी होती है, तो वे भारतीयों की तरह काम करना बन्द नहीं कर देते वरन् काले बिल्ले लगाकर काम के घण्टे को बढ़ा देते और उत्पादन की गति को अचानक तीव्र कर देते हैं इससे खपत कम और उत्पादन अधिक बढ़ जाने से मालिक दिवालियापन के समीप पहुँच जाता है। इसलिए वह ऐसे अवसरों से सदा सावधान रहते हैं।
मुस्लिम देशों की महिलाएँ प्रायः काले बुर्के ही पहनती हैं यह इस बात का द्योतक है कि उन पर बुरी नजर डालना हदीस के नियमों के विरुद्ध है और पाप है। पाप सदा दुःखदायी होता है इसलिए इस विशेष रंग द्वारा मनचलों को एक प्रकार से चेतावनी दी जाती है कि दुराचरण अथवा छेड़खानी उनके लिए मृत्यु तुल्य साबित हो सकते हैं।
महाकाल और महाकाली की प्रतिमाएँ सदैव काले रंगों में रंगी होती है। काल शब्द मृत्यु का संदेशवाहक है। अतः उन्हें देख कर सदा यह स्मरण बना रहता है कि ईश्वरीय नियमों में किसी प्रकार का उल्लंघन खतरे से खाली नहीं है।
काले रंग की यह विशेषता है कि वह अन्य वर्णों की उदात्तता को ग्रहण नहीं करता, अपितु उसका यही प्रयास रहता कि वह दूसरे वर्णों को भी स्वयं में मिला ले और उन्हें भी अपने रूप गुण के अनुरूप बना लें। कलियुग का स्वरूप इसीलिए काला बताया गया है, कारण कि इस युग में काले कारनामे वाले लोगों की ही अधिकता और प्रमुखता है। श्वेत-सात्विक बुद्धि वालों को तो इनके कारण सर्वत्र प्रताड़ित और लाँछित ही होना पड़ता है। इसे काले स्वभाव वाले ‘कलि’ की प्रबलता ही कहनी पड़ेगी।
मूर्धन्य मनोविज्ञानी फ्रैंज हरमन ने एक पुस्तक लिखी है, नाम है-’कलर साइकोलॉजी’। अपने उक्त ग्रन्थ में विद्वान लेखक ने इस बात का जोरदार शब्दों में समर्थन किया है कि रंगों के प्रति भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की भिन्न-भिन्न रुचियाँ भी प्रकारान्तर से उनके व्यक्तित्व को प्रकट करती है। उदाहरण के लिए वे लिखते हैं कि यदि किसी श्याम वर्ण प्रिय हैं, तो इससे काफी हद तक यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्ति कपटपूर्ण, झूठा और धोखेबाज है। हलका नील वर्ण अथवा आसमानी से शांतिप्रियता प्रकट होती है। सफेद रंग से जिनका ज्यादा लगाव है, वे प्रायः सादगी पसन्द होते हैं। वासंती वर्ण को चाहने वाले सात्विक प्रकृति के होते देखे गये हैं। हरे के प्रति रुझान प्रसन्नचित्तता प्रकट करता है। पीला वीरता की निशानी है, जबकि लाल रंग प्रिय लगने वालों के बारे में यह अन्दाज लगाना कठिन नहीं कि वे स्वभाव से रूखे, क्रोधी, उद्दंड और दुस्साहसी हैं।
ज्योतिर्विज्ञान ने भी रंगों के शरीर और मन पर पड़ने वाले प्रभावों को स्वीकारा है और इस बात पर जोर दिया है कि यदि सप्ताह के हर एक दिन, उस दिन के अधिष्ठाता देव तथा ग्रह विशेष से संगति बिठाते हुए रंग का चयन और तद्नुरूप वस्त्र का धारण किया जाय, तो व्यक्ति को उस देवता का स्वतः संरक्षण प्राप्त हो जाता है, किन्तु यह निर्धारण सामान्य बुद्धि वाले साधारण जन नहीं कर सकते । इसे तो कोई प्रज्ञावान पुरुष ही करने सक्षम है। किसे, किस दिन, किस वर्ण का वस्त्र और कैसा आहार (जिसमें आहार का रंग भी सम्मिलित है) ग्रहण करना है, यह राज योगियों के लिए विशेष ज्ञातव्य है। इससे साधना मार्ग में आने वाले विघ्न-बाधाओं से उनकी रक्षा हो जाती है। इसमें दिवस विशेष के अधिपति देव उनकी सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए सोमवार के स्वामी शंकर बताये गये हैं। परिधान का रंग इसमें मटमैला होना चाहिए। मंगलवार के दिन लाल? बुध, हरा, गुरुवार पीला, शुक्रवार श्वेत, शनिवार काला, रविवार सफेद वसन अभीष्ट है।
योग विज्ञान में भी चक्रों के पृथक-पृथक रंग अकारण नहीं है। उन-उन चक्रों और रंगों की अपनी विशिष्टताएं हैं। विशिष्ट रंग वाले किसी विशेष चक्र के जागरण व्यक्ति में उस चक्र और वर्ण की विशेषता वाली विभूतियाँ स्वयमेव पैदा हो जाती है, ऐसा योगविज्ञानियों का मतभेद है। उदाहरण के लिए मूलाधार चक्र का वर्ण लाल है। इसके जागरण से पराक्रम पैदा होता है। इसी प्रकार सिंदूरी रंग के स्वाधिष्ठान चक्र के उद्बुद्ध होने पर प्रतिभा उत्पन्न होती है। नील वर्ण युक्त मणि पूरित चक्र परकाया प्रवेश, धूम्र वर्णी विशुद्धाख्य चक्र त्रिकालदर्शित्व, श्वेत वर्ण आज्ञा चक्र विवक एवं बहुरंगी सहस्रार या शून्य चक्र के उन्मेष से उपरोक्त समस्त विभूतियाँ साधक का करतलगत हो जाती है।
ऐसे ही किसी विशेष कामना सिद्धि हेतु विशेष रंग के वस्त्राभूषण से सुसज्जित देवी-देवताओं का जप, ध्यान और पूजन का तंत्र शास्त्रों में विधान है। रंगों के चयन में तंत्र शास्त्रों में विधान है। रंगों के चयन में तंत्रविद्या विशारदों ने इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा है कि साधक किस मनोरथ के निमित्त तंत्र कृत्य करना चाहता है। उदाहरण के लिए यदि दरिद्रता निवारण उसका प्रयोजन है, तो पीताम्बरधारी भगवती के पूजन और ध्यान का विधान है। उल्लेखनीय है कि पीतवर्ण का सम्बन्ध ‘लक्ष्मी’ तत्व से है। लक्ष्मी वैभव की अधिष्ठात्री है। इसीलिए पीतवर्णा भगवती का ध्यान और वैसे ही रंग के आहार का निर्देश उस तत्व को आकर्षित करने के लिए तंत्रविदों ने दिया है। ऐसे ही दूसरे काम्य प्रयोजनों के लिए तद्नुरूप रंगों का निर्धारण है।
इसी प्रकार ऋतुओं के परिवर्तन के साथ-साथ पहनावे के रंग में बदलाव को आवश्यक बतलाते हुए आयुर्वेद में इस बात पर बल दिया गया है कि मौसम के साथ-साथ पोशाक के रंग-परिवर्तन से शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है। खाद्यों का भी उसी के अनुरूप निर्धारण है। आश्विन और चैत्र मास-यह दोनों ऋतु की दृष्टि से संक्रमण काल हैं। इनमें पाचक रस न्यून पड़ जाते हैं और प्राण का अवस्थान सुषुम्ना में हो जाता है। संवत्सर के महीनों में आरोग्य संवर्धन और आत्मकल्याण के लिए जप, तप, व्रत-उपवास की व्यवस्था आवश्यक बतायी गई है। इन निर्धारणों के समय संवत्सर के ‘करण’ ‘जाति’ ‘बालव’ आदि तत्वों पर भी समान रूप से विचार किया जाता है, यथा-’बालव’ संवत्सर के लिए निष्णातों ने मुख्य वस्त्र पीला, उवपसत्र गहरा लाला, भक्ष्य पायस, तिलक कुमकुम निर्धारित किये हैं। फाल्गुन माह में ‘फाग’ के अवसर पर टेसू के फूलों से निर्मित वासंती रंग, वसन्त पंचमी के दिन पीत वसन एवं अमृताषन-यह सब कुछ सप्रयोजन थे, पर समय के साथ-साथ बुद्धिवाद जैसे-जैसे बढ़ा, हम इन निर्धारणों को रूढ़िवाद की उपज मान कर त्यागते चले गये, फलतः हमारा शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य भी तद्नुरूप दिन-दिन लड़खड़ाता गया। इसे समय की विडम्बना और सभ्यता का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जब हमें स्वस्थता और आरोग्यता की अधिक उम्मीद और आवश्यकता थी, तब हम शनैः-शनैः और दुर्बल बनते गये।
विज्ञान की इस संदर्भ में सराहना ही करनी पड़ेगी कि उसने हमारी भूलों को उजागर कर यह सोचने पर विवश किया कि जिन तथ्यों को अब तक अवैज्ञानिक और आधारहीन कह कर तिरस्कृत और उपेक्षित किया जाता रहा है, वह कितने वैज्ञानिक और कितने प्रमाणिक हैं। उसके प्रयोगों से अब यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गया है कि रंग मानवी मनोभावों के अतिरिक्त पौधों को भी समान रूप से प्रभावित करते हैं। रंग के प्रभावों का अध्ययन करते हैं। रंग के प्रभावों का अध्ययन करने वाले वनस्पति शास्त्रियों में ‘यू. एस. डिपार्टमेन्ट ऑफ एग्रीकल्चर’ के एच. के. बोर्थविक, न्यू हेम्पषायर यूनिवर्सिटी के स्टुअर्ट डन, एवं फिलिप्स रिसर्च लेबोरेटरिज के आर. वान डरविन तथा जी. मिजर प्रमुख हैं। बोर्थविक ने अपने प्रयोगों के दौरान देखा कि लाल रंग का दृश्य प्रकाश और अदृश्य अवरक्त किरणों परस्पर विरोधी आचरण प्रदर्शित करते हैं। लाल रंग के प्रकाश में लेटुस के बीज तेजी से अंकुरित होते दिखाई पड़े, किन्तु जब उन्हें अवरक्त किरणों के मध्य रखा गया, तो अंकुरण अवरुद्ध हो गया। इसी प्रकार लाल रंग की लाल रंग की किरणें अल्पजीवी पौधों के विकास को रोकती पायी गयीं, किन्तु दीर्घजीवी पौधों का विकास इसके संपर्क में आकर तीव्र हो गया। प्रयोग के दौरान नीले रंग के प्रकाश का भी वाँछित असर देखा गया, किन्तु हरी और पीली प्रकाश-किरणों किसी प्रकार की क्रिया करने में अक्षम पायी गईं, जबकि पराबैगनी प्रकाश का अवांछनीय प्रभाव तत्काल दृष्टिगोचर होने लगा। बान डरविन और मिजर ने अपने प्रयोगों में जो महत्वपूर्ण बात देखी, वह थी लाल और नीली रोशनी के प्रति पौधों की अति सक्रियता, जबकि पीली और पीली-हरी किरणों के प्रति वे निष्क्रिय बने रहते हैं।
मूर्धन्य वनस्पति शास्त्री स्टुअर्ट डन ने अपने परीक्षण टमाटर के पौधों पर किये। उन्होंने देखा कि श्वेत लैम्प प्रकाश में टमाटर की उपज अपेक्षाकृत अन्य प्रकाश की तुलना में सर्वाधिक होती है। इसके उपरान्त नीले और गुलाबी प्रकाश लैम्पों का नम्बर आता है। हरे और लाल प्रकाश किरणों के संपर्क में उपज सबसे न्यून देखी गयी। लेकिन जब पौधों को तीक्ष्ण रक्त वर्ण प्रकाश के समक्ष रखा गया, तो उपज सबसे अधिक प्राप्त हुई।
इन परीक्षणों से जो महत्वपूर्ण जानकारी हस्तगत हुई है, वह है भिन्न-भिन्न प्रकाश-किरणों के प्रति पौधों के भिन्न-भिन्न अवयवों की सक्रियता और निष्क्रियता। उदाहरण के लिए यदि पीतवर्णी प्रकाश तने की तीव्र वृद्धि के लिए जिम्मेदार है, तो रक्त वर्ण वाली किरणें फल को अधिक रसदार और गूदेदार बनाती हैं, जबकि नीली रोशनी उनके रस और गुदे को घटाती है। इसी प्रकार कृत्रिम प्रकाश किरणों के अंतर्गत फूलों को उगाने से उनके स्वाभाविक रंगों में भी परिवर्तन आ जाता है। यदि नैसर्गिक नीले वर्ण वाले पुष्पों को किन्हीं अप्राकृतिक प्रकाश में रखा गया और उनका वर्ण
लालिमा लिए हुए नीला हो जाय, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। इसी प्रकार पीले कुसुम यदि चित्तिदार हो जायं अथवा उनमें कई प्रकार की आभाओं का सम्मिश्रण हो जाय, तो इसे कृत्रिम प्रकाश का चमत्कार ही कहना चाहिए। आजकल अमेरिकियों में यह अभिरुचि बड़ी तेजी से पनपती और फैलती चली जा रही है। इसके माध्यम से वे प्राकृतिक वर्णों को बदल कर फूलों को रंग-बिरंगी छटा प्रदान कर सर्वसाधारण को चमत्कृत और चकित कर रहे हैं।
अभी हाल की शोधों से ज्ञात हुआ है कि यदि नवजात शिशु नीले रंग के प्रकाश के संपर्क में आ जाय, तो उसके पीलियाग्रस्त होने की शत-प्रतिशत सम्भावना रहती है। शोधकर्मी वैज्ञानिकों ल्यूक थोरिंगटन एवं एल. कनिंघम के अनुसार ऐसा इसलिए होता है कारण कि रक्त में बिलिरुबिन नामक रसायन की मात्रा अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है।
रंगों के इन्हीं प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अब आस्ट्रेलिया और अरब देशों में भेड़ों को गहरे रंगों में रंगने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है, क्योंकि सामान्य तौर पर देखने में आता है कि इनके प्राकृतिक रंगों वाली भेड़ें प्रकाश के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, इसलिए उनमें अक्सर तरह−तरह की असमानताएं पैदा हो जाती हैं। जब उन्हें गहरे कृत्रिम रंगों में रंग दिया जाता है, तो इस तरह की असामान्यताओं से वे मुक्त हो जाती हैं।
इस प्रकार यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गया है कि रंगों की दुनिया यदि मनमोहक, मनभावन और लाभकारी है तो इसकी हानियों के प्रति भी हमें सचेत रहना चाहिए और बिना जाने समझे किसी ऐसे वर्ण के संपर्क में अधिक समय नहीं रहना चाहिए, जो अपने अवाँछनीय प्रभाव से बाद में हमें बीमार बना दे।
जीवन प्रत्यक्ष देवता है। वह निरन्तर साथ रहने वाला ईश्वर का सर्व-समर्थ प्रतिनिधि है। स्रष्टा का इसे सर्वोत्तम उपहार समझना चाहिए। इससे बढ़कर और कोई वस्तु उसके पास ऐसी नहीं है जो जीवात्मा को दी जा सके। इसके सदुपयोग करने पर मनुष्य वह सभी विभूतियाँ अर्जित कर सकता है जो उसके लिए आवश्यक हैं। जीवन का महत्व समझा जाना चाहिए। भगवान के इस धरोहर का उन्हीं प्रयोजनों में उपयोग करना चाहिए जिसके लिए वह मिली है। जीवात्मा की दूरदर्शिता एवं प्रामाणिकता इस आधार पर परखी गई है कि वह इस अनुदान का कितनी जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ उपयोग कर सका। परीक्षा में उत्तीर्ण होने वालों की पदोन्नति होती है। जीवन सम्पदा के सदुपयोग की कसौटी पर खरे उतरने वालों को महामानव, सिद्ध पुरुष, ऋषि, जीवन मुक्त देवदूत जैसे उच्च बनने का श्रेय सौभाग्य मिलता है।
जीवन अनगढ़ रूप में सौंपा गया है। उसे परिष्कृत, सुसंस्कृत बनाने का उत्तरदायित्व मनुष्य का है। उसी के निर्वाह को जीवन साधना कहते हैं। धातुएँ जमीन में मिट्टी मिली हुई निकलती है। उन्हें आग में गलाकर शोधा जाता है तभी वे काम में आने योग्य बनती हैं। खदान से हीरा अनगढ़ निकलता है। उसे तराशा खरादा घिसा जाता है, इसके बाद ही उसका मूल्य निखरता है। वन्य पशु प्रयत्नपूर्वक सधाये जाते हैं तब कहीं सरकस के कलाकार बनते हैं। जीवन भी अनगढ़ मिला है। उसके साथ जन्म जन्माँतरों के सुसंस्कार चिपके हैं, इन्हें छुड़ाया जाना आवश्यक है। उठने बैठने के लिए बहुत कुछ सीखना पड़ता है। सामान्य योग्यता से शरीर यात्रा भर निभती है। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार की दो प्रक्रियाएँ अपनाने का नाम जीवन साधना है। आकर्षक आभूषण और महत्वपूर्ण उपकरण बनाने वाली भट्टियों में अनगढ़ को गलाने और उपयोगी ढालने का क्रम चलता है। ऐसा ही आँतरिक कायाकल्प करने का प्रचण्ड पुरुषार्थ मनुष्य को भी करना पड़ता है। इसी को जीवन साधना कहते हैं। ईश्वर उपासना व जीवन साधना परस्पर अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध हैं। दोनों के समन्वय से ही परम लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव होती है। रंगाई के पूर्व कपड़ों को धोना आवश्यक है। अकेला बाण ही लक्ष्य नहीं बेधता उसके पीछे तनी हुई कमान का बल भी रहना चाहिए। उगता तो बीज ही है पर उसके लिये उपयुक्त भूमि भी तो चाहिए। बादल तो बरसते तो सर्वत्र हैं पर पानी जमा वहीं होता है जहाँ गहराई है। यह उदाहरण बताते हैं कि दैवी अनुदान प्राप्त करने के लिए पात्रता प्रामाणिकता, पवित्रता एवं प्रखरता अनिवार्य रूप से आवश्यक है। नेत्र न हो तो इस प्रासाद, वैभव को देखा कैसे जाय ? कान बहरे हों तो मधुर संगीत एवं परामर्श कैसे सुने जायँ ? खिड़कियां बन्द हों तो घर में सूर्य की रोशनी और हवा की ताजगी को प्रवेश कैसे मिले ? उच्चस्तरीय प्रगति के लिए चिन्तन और चरित्र की, गुण कर्म स्वभाव की, विशिष्टता चाहिये ही यह विभूतियाँ अनायास ही किसी को नहीं मिलतीं इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। जीवन साधना का यही स्वरूप है। देवों की उपासना का प्रतिफल संदिग्ध हो सकता है किन्तु जीवन देवता की साधना का पुण्यफल तो हाथों-हाथ मिलता है। व्यक्तित्व का निर्माण इतनी बड़ी सम्पदा है कि उसके बदले इस संसार के बाजार में से कुछ भी खरीदा जा सकता है। जीवन को कल्पवृक्ष, पारस अमृत कहा गया है जो उसकी साधना कर सका वह सुनिश्चित रूप से कृत-कृत्य होकर रहा है।
मनुष्य नंगा उत्पन्न होता है। उसे वस्त्रों से ढकना पड़ता है। बोलना, सोचना, पढ़ना, कमाना उसे सिखाना पड़ता है। केश विन्यास से लेकर भोजन पकाने तक की सामान्य जीवनचर्या भी सीखी जाती है। जीवन सम्पदा बहुमूल्य मोटर की तरह मिली तो मुफ्त में ही है पर उसे चलाना तो सीखना ही होगा अन्यथा अनाड़ी चालक तो दुर्घटना ही खड़ी करेगा। आमतौर से लोग प्रायः जीवन भर पग-पग पर ठोकरें खाते और क्षण-क्षण में नये-नये संकट खड़े करते रहते हैं। आरम्भिक प्रगति के मार्ग पर चलने वालों का जीवन साधना का परम पुरुषार्थ करना होता है। चिन्तन एवं स्वभाव में उत्कृष्टता भर लेने को सुसंस्कारिता कहते हैं और व्यवहार में, आदतों में शालीनता के समावेश का सभ्यता कहा जाता है। सभ्यता और सुसंस्कारिता का समन्वय ही व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाता है। व्यक्तित्व संपन्न ही देव मानव कहे जाते हैं। वे स्वर्गीय वातावरण में रहते और दूसरों के लिये स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।
जीवन साधना के दो प्रमुख सूत्र हैं। समय और साधनों का मात्र सदुद्देश्य के लिये उपयोग करना। जीवन की अवधि ईश्वर प्रदत्त है और साधन सम्पदा मनुष्य अर्जित। उच्चस्तरीय दूरदर्शिता की एक ही कसौटी है कि कौन इन दिनों का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सका। कमाना संयोगवश भी हो जाता है पर खर्च में तो बुद्धिमत्ता की अग्नि परीक्षा से गुजरना ही पड़ता है।
कौन कितने दिन जिया, उसका एक ही उत्तर है किसने कितने समय का सदुपयोग किया। आद्यशंकराचार्य 32 वर्ष और विवेकानन्द 36 वर्ष जिए पर उन्हें सहस्रों वर्ष जीने का श्रेय मिला। इसके विपरीत धरती का भार बढ़ाते हुए बहुत दिन जीना निरर्थक है। सम्पदा का मूल्याँकन करते समय एक ही जाँच पड़ताल की जानी चाहिए कि कमाई किन कामों में लगाई गई। अपव्ययी और निर्धन में कोई अन्तर नहीं क्योंकि दोनों ही जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ कर सकने के सौभाग्य से वंचित रहते हैं। “चोर की कमाई उचक्के ने खाई” “अन्धी पीसे कुत्ता खाये” की उक्ति ही अधिकांश लोग चरितार्थ करते हैं उनका समय और वैभव ऐसे ही निरर्थक कामों में समाप्त हो जाता है, निरर्थक कामों में समाप्त हो जाता है, निरर्थक लोगों के हाथों चला जाता है।
जीवन साधना में दिनचर्या बनाकर चलना और बजट बनाकर खर्च करना यह दोनों शर्तें निताँत आवश्यक हैं। उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जीवन क्रम के साथ जुड़े हुए कर्त्तव्य, उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए ढेरों समय लगाना पड़ता है और साधन जुटाने में पैसा खर्च होता है। समय और वैभव के अपव्ययी सुरसा के मुँह जैसी लिप्साओं की पूर्ति तक में असफल रहते हैं। दिनचर्या और बजट बनाये बिना सदुद्देश्य के लिए कुछ बचता ही नहीं। हर प्रगति समय और साधन माँगती है। आत्मिक प्रगति भी इस सन्तुलन को बिठाने के लिए दिनचर्या और बजट के निर्वाह एवं परिवार के अतिरिक्त एक तीसरी आवश्यकता और जोड़नी पड़ती है परमार्थ प्रयोजन। दो के स्थान पर तीन की साझेदारी मानी जाय तो ही कुछ महत्वपूर्ण प्रयोजन सधेगा। इस तथ्य को भली प्रकार ध्यान में रखा जाय और उसका संतुलन कठोरता एवं दृढ़ता के साथ बिठाया जाय तभी कहने लायक आत्मिक प्रगति की सम्भावना बनेगी। हर दिन प्रातः दिनचर्या एवं बजट का निर्धारण करना चाहिए। साथ ही उसका कठोरतापूर्वक परिपालन भी। जीवन साधना का यह आरंभिक चरण है।
जीवन साधना के लिए उपासना की तरह ही आत्म चिन्तन के लिए न्यूनतम पन्द्रह मिनट का समय निश्चित रहना चाहिए। आत्मनिरीक्षण, आत्म सुधार आत्म निर्माण और आत्म-परिष्कार के सम्बन्ध में अपनी जाँच पड़ताल कड़ाई के साथ करनी चाहिए। मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन निर्वाह में कहाँ त्रुटि रही रही है। अशोभनीय, व्यर्थ, निरर्थक और अनर्थमूलक चिंतन और व्यवहार कब किस प्रकार बन पड़ता है और उन आदतों को कैसे सुधारा जाना चाहिए। इस ऊहापोह में आत्म-समीक्षा और आत्म-सुधार की प्रक्रिया बन पड़ती है। देव मानवों की पंक्ति में बैठने के लिए उनकी किन क्षमताओं को विकसित एवं आदतों को परिष्कृत किया जाना है उसका ताना-बाना बुनना आत्म निर्माण है। अन्ततः यह सोचा ही जाना चाहिए। संकीर्ण सीमा बन्धन तोड़े ही जाने चाहिए। लोभ मोह के बन्धन टूटने ही चाहिए। आत्मा का विस्तार वसुधैव कुटुंबकम् के रूप में होना चाहिए और आत्मवत् सर्वभूतेषु की कल्पना दिन-दिन सुदृढ़ बननी चाहिए। दूसरों का दुःख बाँट लेने और अपना सुख दूसरों को बाँट देने की उमंगें उठने लगें तो समझना चाहिए कि आत्म-विकास के लक्षण प्रकट होने लगे। आत्म-चिन्तन के लिए निर्धारित समय में इन्हीं प्रसंगों का ऊहापोह होते रहना चाहिए। जिन प्रसंगों पर ध्यान किया जाता है।
एक बड़े बौद्ध संघाराम के लिए कुलपति की नियुक्ति की जानी थी। उपयुक्त विद्या और विवेक वाले आचार्य की छाँट का ऊहापोह चल रहा था। तीन सत्पात्र सामने थे, उनमें से किसे प्रमुखता दी जाय यह प्रश्न सामने था। चुनाव का काम महाप्राज्ञ मौद्गल्यायन को सौंपा गया।
तीनों को प्रवास पर जाने का निर्देश हुआ। कुछ दूर पर उस मार्ग पर काँटे बिछा दिए गए थे।
संध्या होने तक तीनों उस क्षेत्र में पहुँचे। काँटे देखकर रुके। क्या किया जाय, इस प्रश्न के समाधान में एक ने रास्ता बदल लिया। दूसरे ने छलाँगे लगाकर पार पाई। तीसरा रुक कर बैठ गया और काँटे बुहार कर रास्ता साफ करने लगा, ताकि पीछे आने वालों के लिए वह मार्ग निष्कंटक रहे। भले ही अपने को दे लगे।
परीक्षक मौद्गल्यायन समीप की झाड़ी में छिपे बैठे थे। उनने तीनों के कृत्य देखे और परीक्षाफल घोषित कर दिया। दूसरे के लिए रास्ता साफ करने की विद्या सार्थक मानी गई और अधिष्ठाता की जिम्मेदारी उसी के कंधे पर गई। मौद्गल्यायन ने कहा-संघाराम में सत्प्रवृत्तियों की परम्परा वही डाल सकेगा, जो स्वयं सबका ध्यान रखे और अपने आचरण से प्रेरणा उभारने की क्षमता रखता हो।
उनकी गुत्थियाँ और मार्ग भी मिलता है। द्वार उनका अवरुद्ध रहता है जिन पर गम्भीरता पूर्वक विचार ही नहीं किया जाता।
चिन्तन का प्रभाव चरित्र पर पड़ता है। इसलिए उसे परिष्कृत करने के लिए साधना परायण को स्वाध्याय, संयम और सेवा की आवश्यकता अनुभव की जानी चाहिए और उसकी व्यवस्था भी आहार, वस्त्र, विश्राम की तरह ही बननी चाहिये। अब ऐसा सत्संग सम्भव नहीं इसलिये अब वह कार्य प्रेस की वर्तमान सुविधा और श्रेष्ठजनों की दुर्लभता में सत्साहित्य से ही चलाना होता है, संयम को तपश्चर्या कहते हैं। आत्म-अनुशासन भी वही है। इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम, के चार अनुशासन अपने ऊपर स्थापित किये जायँ तो अपव्यय और अस्तव्यस्तता में नष्ट होने वाली शक्तियां बचायी जा सकती हैं। इन चार छेदों के बन्द कर देने पर ईश्वर प्रदत्त विभूतियों की असाधारण बचत हो सकती है और उस बचत को सत्प्रयोजनों में नियोजित करने वाला कोई भी व्यक्ति, किसी भी दिशा में आश्चर्यजनक प्रगति करने में समर्थ हो सकता है। महानता की उपलब्धि का यही मार्ग है।
समाज के ऋण चुकाने के लिये विश्व उद्यान को सुव्यवस्थित करने में सहायता देने की ईश्वरीय इच्छा पूरी करने के लिये अपनी सत्प्रवृत्तियाँ परिपुष्ट करने के लिए-उपलब्धियों को सार्थक बनाने के लिये दूरदर्शी को जीवनचर्या में सेवा साधना को अधिकाधिक स्थान देना पड़ता है। इसके बिना मनुष्य संकीर्ण, स्वार्थपरता की, कृपणता निष्ठुर की परिधि में ही जकड़ा रहता है और अवरुद्ध कीचड़ की तरह सड़ता रहता है। कमाने के लिये पूँजी लगानी पड़ती है। उगने के लिए गलना पड़ता है सेवा धर्म अपना कर अर्जित किये गये पुण्य परमार्थ द्वारा ही महानता उपलब्ध होती है। आत्म संतोष? लोक सम्मान और ईश्वरीय अनुकम्पा के त्रिविध लाभ प्राप्त करने के लिये परमार्थ को आत्मा की भूख समझ कर उसकी पूर्ति के लिये कटिबद्ध होना पड़ता है।
सर्वसुलभ एवं सर्वोपरि महत्व की सेवा साधना वर्तमान परिस्थितियों में एक ही है, जन-जन के मन-मन तक महाप्रज्ञा का आलोक पहुँचाने में संलग्न रहना। व्यक्ति और समाज की सामयिक समस्याओं का समाधान एवं सर्वतोमुखी प्रगति से भरे-पूरे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण इसी आधार पर सम्भव है। हर जाग्रत आत्मा को विचार करना होगा कि वह युग की पुकार का समय की चुनौती का किस प्रकार उत्तर दें और समय दान की बढ़ी-चढ़ी श्रद्धाँजलि किस प्रकार युग देवता की झोली में रखें। साधना, स्वाध्याय संयम के आधार पर जो श्रेष्ठता अर्जित की जाय उसे प्रज्ञायुग के अवतरण में लगाने के लिये भगीरथ जैसा साहस उभरना चाहिये। अपने समय में प्रज्ञायोग ही सबसे बड़ा योग जप एवं तप, साधना माना जायेगा।
ज्ञान की सार्थकता कर्म में है। जीवन साधना के निमित्त जो सोचा या सुना, समझा जाय उसे व्यक्तित्व की पवित्रता, प्रखरता बढ़ाने के रूप में कार्यान्वित किया जाना चाहिये ।इन निमित्त जन मानस के परिष्कार की प्रज्ञा विस्तार साधना का महत्व सर्वोपरि है। उसमें भावना पूर्वक संलग्न रहकर जीवन साधना की जा सकती है। इस साधना के निमित्त जो सोचा या सुना, समझा जाय उसे व्यक्तित्व की पवित्रता, प्रखरता बढ़ाने के रूप में कार्यान्वित किया जाना चाहिये। इन निमित्त जन मानस के परिष्कार की प्रज्ञा विस्तार साधना का महत्व सर्वोपरि है। उसमें भावना पूर्वक संलग्न रहकर जीवन साधना की जा सकती है। इस साधना के फलस्वरूप मिलने वाली सिद्धियाँ हाथों-हाथ मिलती हैं उसके लिये तनिक भी ठहरना नहीं पड़ता।
सन्तान लाभ की कामना हेतु आतुर व्यक्ति विवेक खो बैठता है। अन्ततः वह अपने पैरों में कुल्हाड़ी ही मारता है।
ब्रह्म संध्या कर आचार्य त्रिपाद उठे ही थे आत्मदेव ने उनके चरण पकड़ लिये। वह दीन शब्दों में बोला-आचार्य प्रवन-एक सन्तान की इच्छा से आपके पास आया हूँ।
आचार्य ने कहा-आत्मदेव सन्तान से सुख की आशा करना व्यर्थ है। मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुःख पाता है। पूर्व जन्म की कृपणता का पाप ही तुम्हारे लिये सौभाग्य विमुख बना है। आत्मदेव की समझ में नहीं आया, उसने कहा-महात्मन्! या तो आज आपसे पुत्र लेकर लौटूँगा या आत्मदाह करूंगा।
ज्योति पाद ने हँस कर कहा-तुम्हारे लिए किसी और का पुण्य छीनना पड़ेगा। पुत्र तो तुम्हारे भाग्य में है नहीं। परन्तु तुम्हारी इच्छा परमात्मा पूर्ण करें, लो यह फल अपनी भार्या को खिला देना। वह एक वर्ष तक नितान्त पवित्र रहकर नित्य कुछ दान करे।
आत्मदेव, महर्षि के रहस्यमय वचन सुनकर कुछ समझ न सका तथा वह फल अपनी पत्नी धुँधली को देकर सारी बातें समझा दीं। धुँधली ने सोचा-पवित्रता मुझसे बन न पड़ेगी अपनी सम्पत्ति और को क्यों दान करूं ? उसने वह फल गाय को खिला दिया और समय पर अपनी बहन का पुत्र रत्न हुआ है। पुत्र का नाम धुँधकारी रखा गया। कालान्तर में वह बहुत दुराचारी निकला। धुँधकारी ने अपने पिता की सारी सम्पत्ति, माँस, मदिरा, जुआ और वेश्यावृत्ति में नष्ट कर दी। माता-पिता कुढ़ कर मर गए। धुँधकारी भी असमय ही काल-कवलित हो गया।
इससे तो अच्छा है कि समस्त विश्व को अपना परिवार मानकर उसके समग्र विकास में स्वयं को नियोजित कर दिया जाय।
निद्रा एक यज्ञ है एवं स्वप्न उसकी ऊर्जा रश्मियां आप तो सोए हैं, तो फिर भला सपने कौन देख रहा है ? नींद में जाते ही शरीर तो सो जाता है, इन्द्रियाँ भी निष्क्रिय हो रहती हैं। गहरी नींद में सोते ही व्यक्ति को अपने आस-आस क्या हो रहा है। एक तरह से वह सोते हुए भी किसी दूसरी दुनिया में चला जाता है। फिर सवाल उठता है कि शरीर का कौन सा बाहरी या भीतरी अंग होता है जो सपने देखता है ? प्रश्नोपनिषद् में गार्ग्य मुनि पिप्पलाद ऋषि से यही सवाल करते हैं-
“कान्यस्मिंज्जागृति कतर एवं देव स्वप्नान्पष्यन्ति (4/1)” अर्थात्-कौन-कौन जागते रहते हैं और स्वप्न अवस्था में कौन-कौन स्वप्न की घटनाओं को देखते रहते हैं।
चतुर्थ प्रश्न में गार्ग्य मुनि पिप्पलाद ऋषि से निद्रा के समय मनुष्य शरीर की स्थिति के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं। जिसके उत्तर में पिप्पलाद ऋषि कहते हैं कि निद्रा एक यज्ञ है। इस शरीर रूप नगर में पच प्राण रूप अग्नियाँ जागती रहती है। शरीर प्रश्वास दोनों इस यज्ञ में दी जाने वाली आहुतियाँ हैं। इनको जो समभाव से पहुँचाता है वही होता है। यह मन ही यजमान है और उससे मिलने वाला अभीष्ट फल ही उदान है। यह उदान ही मन रूप यजमान को प्रतिदिन (निद्रा के समय) ब्रह्मलोक में भेजता है अर्थात् हृदय गुहा में ले जाता है (प्रश्नो. - 4/3-4)
ऋषि के अनुसार निद्रा एक यज्ञ है और उसमें शरीर में जाने-वाले श्वास-प्रश्वास आहुतियाँ है। इस अलंकारिक उत्तर में ऋषि ने यह बताया है कि स्वप्न के माध्यम से मन जीवात्मा के पास पहुँचने का प्रयास करता है। यद्यपि नींद में पड़ने वाले विक्षेपों के कारण भी कई स्वप्न आते हैं। उस समय की कष्टकारक अनुभूतियाँ और मानसिक परेशानियां भी अपने-अपने स्तर के पीड़ादायक डरावने स्वप्न खड़े कर देती है। सोते-सोते यौन उत्तेजना में काम क्रीड़ा के दृश्य दिखाई देते हैं। अतृप्त आकाँक्षाएँ भी अपना रंग महल बनाने-बिगाड़ने का खेल खेलती हैं और कई प्रकार के स्वप्नों की सृष्टि होती है। इस तरह के स्वप्न प्रायः महत्वहीन होते हैं। यों उनका विश्लेषण किया जाय तो उनके सहारे मनःस्थिति का परीक्षण निदान उसी प्रकार किया जाता है, जिस प्रकार मल-मूत्र रक्त आदि की जाँच द्वारा शारीरिक रोगों का निदान किया जाता है। लेकिन महर्षि पिप्पलाद का प्रतिपादन निद्रा यज्ञ से सम्बन्धित है।
यों अग्नियाँ और भी है जिनमें कूड़ा-करकट के जलाने से लेकर खाना-पकाने और मकान जलने जैसी प्रिय-अप्रिय घटनाएँ घटती हैं। परन्तु यज्ञाग्नि उन अग्नियों से अलग है। इसी प्रकार निद्रा को भी एक अग्नि की संज्ञा देते हुए उसके यज्ञ स्तर के स्वरूप वाली निद्रा मन को ऐसे उच्च स्तर के स्वरूप वाली निद्रा मन को ऐसे उच्च लोकों की यात्रा करा देती है, जिन्हें वरदान और अलौकिक अनुभूतियाँ कहा जा सकता है। ऋषि ने इसी स्तर के स्वप्नों को ब्रह्मलोक की यात्रा-हृदय गुहा में स्थित आत्मचेतना के सामीप्य की प्राप्ति और उसके माध्यम से विराट चेतना के साथ सम्बद्ध होने का द्वार कहा है।
अब तक तो विज्ञान भी स्वप्नों को अतृप्त आकाँक्षाओं और दबी हुई कामनाओं का ही प्रतीक मानता था। परन्तु हाल में हुई शोधों के अनुसार स्वप्नों के बारे में मनःशास्त्री भी कहने लगे हैं, कि कुछ स्वप्न ऐसे होते हैं, जिनकी आधुनिक मनोविज्ञान के आधार पर व्याख्या नहीं की जा सकती है। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय तथा शिकागो विश्वविद्यालय ने इस तरह के अव्याख्येय स्वप्नों के रहस्य सुलझाने के लिए ‘स्वप्न परीक्षण विभाग’ खोले हैं। जहाँ लोगों को बुला या जाता है, उन्हें पैसे देकर सुलाया जाता है। वे गाढ़ी नींद लेकर सो सकें इसके लिए आवश्यक प्रबन्ध भी किए जाते हैं और सोते समय उनके मस्तिष्क में चलने वाली विद्युत तरंगों को रिकार्ड करने के साथ-साथ जागने के बाद उन्हें याद रहे स्वप्नों का विश्लेषण भी किया जाता है।
इन विश्वविद्यालयों द्वारा की गई शोधों से प्राप्त निष्कर्षों से फ्रायड के एकाँगी स्वप्न सिद्धान्त की यह मान्यता लगभग ध्वस्त हो चुकी है। दैनिक जीवन की अतृप्त आकाँक्षाएँ, इच्छाएँ और सम्वेदनाएँ ही निद्रा के समय स्वप्न के रूप में परिलक्षित होती है। मनोविज्ञान के विश्व-विख्यात आचार्य कार्ल युँग ने अपनी पुस्तक -मेमोरिज ड्रीम्स, रिफ्लैक्षन्स’ में लिखा है कि चेतन मस्तिष्क को ज्ञान प्राप्ति के जितने साधन प्राप्त हैं, उससे कहीं अधिक और समर्थ ठोस साधन उपचेतन (सबकाँशस) मन को उपलब्ध हैं। चेतन मस्तिष्क दृश्य श्रव्य तथा अन्य इन्द्रियानुभूतियों द्वारा ज्ञान अर्जित करता है, परन्तु अचेतन के पास तो ज्ञान प्राप्ति के असीम साधन हैं। वह अन्तरिक्ष में प्रवाहित होते रहने वाले संकेत कम्पनों को भी पकड़ लेता है, जिनमें असीम जानकारियाँ होती हैं और वह भी विभिन्न स्तरों की।
यह उपचेतन तभी सक्रिय होता है, जब चेतन मन सो जाता है। सामान्यतया हमारा शरीर ही सोता है, चेतन मन नहीं, जिसे मस्तिष्क भी कह सकते हैं। सोते समय मन में चलते रहने वाले विचारों और कल्पनाओं की दृश्यावली साधारण स्वप्नों के रूप में उभर कर आती है। लेकिन जब मस्तिष्क भी थका होता है, चेतन मन भी सो जाता है, तो गाढ़ी नींद की स्थिति होती है। कार्ल युँग के अनुसार उस गाढ़ी नींद के समय उपचेतन मन सक्रिय होता है।
फ्लोरेन्स (इटली) के मनःशास्त्री गेस्टन डगदियानी का कहना है कि सक्रिय मस्तिष्क में चले जाने के बाद दिखाई पड़ने वाले स्वप्नों में कई ऐसे संकेत ढूँढ़े जा सकते हैं, जो महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। इस स्थिति में बहुतों को ऐसे आधार हाथ लगते हैं, जिन्हें बहुत माथापच्ची करने के बाद भी नहीं समझा जा सका है। अपने स्वयं के स्वप्न का विश्लेषण करते हुए उन्होंने यह बात कही थी।
घटना उस समय की है, जब गेस्टन सात वर्ष की आयु के बालक थे। तब वे प्रायः सपना देखा करते थे कि वे किसी बहुत बड़े मन्दिर में पुजारी का काम करते हैं। सपना इतना स्पष्ट था कि इमारत का नक्शा उनके मस्तिष्क में जमा रहा और उस स्वप्न की गहरी छाप भी उनके मस्तिष्क में जमी रही। एक बार जब वे भारत आये तो उन्होंने फिर वैसा स्वप्न देखा। भारत मन्दिरों का देश है यह तो उन्हें मालूम ही था, अतः वे अपनी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए सभी प्रख्यात मन्दों में गए। खोजते-खोजते वे महाबलीपुरम के एक मन्दिर में गए, तो उसे देखकर वे सन्न रह गए। यह मन्दिर हू ब हू स्वप्न में देखे गए मन्दिर के समान था। इस स्वप्न का विश्लेषण उन्होंने पूर्व जन्म की स्मृति बताते हुए किया है।
स्वप्नों के साथ जुड़ी हुई दूरदर्शन, अविज्ञात का ज्ञान और भविष्य के पूर्वाभास की घटनाएँ भी यही सिद्ध करती हैं कि मनुष्य की चेतना स्वप्नों के माध्यम से सूक्ष्म जगत की हलचलों के साथ संपर्क स्थापित कर लेती हैं। मस्तिष्क या चेतन मन के शिथिल होते ही मनुष्य की सूक्ष्म चेतना पर छाया रहने वाला उनका आवरण हट जाता है और उसका संपर्क दिव्य चेतना से जुड़ जाता है। ध्यान- धारणा, समाधि और योग निद्रा के समय भी चेतन मन तथा बुद्धि की दौड़-धूप कम हो जाती है और उस समय भी अन्तःचेतना के साथ संपर्क कर लेती है। विराट चेतनापूर्ण समाधि अथवा अर्ध समाधि की स्थिति में साधकों को जो दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं, उन्हें जाग्रत एवं अधिक यथार्थ स्वप्न कहा जाय तो उसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी।
प्रसिद्ध मनोविज्ञानी हैफनर मारस का तो कहना है कि अपनी अंतश्चेतना को इस प्रकार प्रशिक्षित भी किया जा सकता है कि वह स्वप्नों का संकेत समझ सकें। सिडनी के टामफीचर नामक व्यक्ति ने तो यह कर भी दिखाया है। इतना ही नहीं उन्होंने ऐसी क्षमता भी अर्जित कर ली है कि जाग्रत स्थिति में न सुलझायी जा सकने वाली समस्याओं और गुत्थियों को वे स्वप्नों के माध्यम से सुलझा सकें। इस क्षमता को प्राप्त करने के लिए उन्होंने वर्षों तक अभ्यास किए थे। टामफीचर की स्वप्न सिद्धि के कई प्रमाण सिडनी के समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहे हैं।
एक प्रमाण तो सिडनी के नगर के पुलिस दफ्तर में भी दर्ज है। इसमें फीचर ने एक चुराए गए बालक को अपहरण कर्त्ताओं के चंगुल से मुक्त कराने में पुलिस की सहायता की थी। बालक इस समय कहाँ है, उसे किन व्यक्तियों ने चुराया है और उनका क्या पता ठिकाना है, वे बालक का क्या-क्या यातनाएँ दे रहे हैं आदि बातों का विवरण टामफीचर ने स्वप्न में देखकर बताया था और इसके लिए डिनी पुलिस ने उन्हें दो हजार डालर पुरस्कार स्वरूप भी दिए थे।
योग साधना, ध्यान, अभ्यास और आत्मिक साधनाओं द्वारा हो अथवा पूर्व जन्मों के संस्कारों के परिणाम स्वरूप, जब व्यक्ति का आत्मिक स्तर उठ जाता है कि उसका मन आत्मा की सनिनधि में पहुँच जाय, तो वह इस स्तर की अनुभूतियाँ स्वप्नों के माध्यम से प्राप्त करता है। उपचेतन मन ऐसे स्वप्न संकेत ही पकड़ता है जिनसे किसी का भला होता हो अथवा अपना पवित्र साध्य भी पवित्र साधनों से सधता हो। स्वप्नों के माध्यम से आज तक न तो किसी को अनीति अपनाने अथवा अवाँछनीय लाभ उठाने के संकेत मिले हैं अथवा न किसी को पहुँ की ही प्रेरणा मिली है। ऐसे उदाहरण अवश्य मिलते हैं जिनमें व्यक्ति के अपने सौभाग्य उदय में आ रहे अवरोधों को हटाने की प्रेरणा मिली हो।
स्वप्नों के माध्यम से विराट चेतना व्यक्ति को दिशा बोध भी प्रदान करती है, जैसे-सुदूर चौकियों पर लड़ रहे सैनिकों को उनके अफसर वायरलैस अथवा ट्राँसमीटर संकेत देता है कि अमुक दिशा में बढ़ो। अमुक मोर्चे पर आक्रमण करो। उसी प्रकार विराट चेतना भी व्यक्ति चेतना का मार्गदर्शन करती है। अमेरिका के चार्ल्स फिल्मोर को प्राप्त प्रमाणित करता है।
चार्ल्स फिल्मोर एक सात्विक प्रकृति के व्यक्ति थे। वे स्वयं ध्यान साधना का अभ्यास करते और लोगों से भी कराते थे। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि एक अपरिचित व्यक्ति उन्हें अपने पीछे-पीछे आने का संकेत कर रहा है। वे उसके पीछे-पीछे चल पड़े और कंसासनगर में पहुँच गए। फिर वह व्यक्ति उन्हें ऐसे स्थान पर ले गया जो उनके लिए अपरिचित था। वहाँ उसने चार्ल्स के हाथ में एक समाचार पत्र दिया, जिसका पहला अक्षर ‘सू’ ही वे पढ़ पाए थे कि एक के बाद एक अनेक समाचार पत्र उनके हाथों में आते गए। साथ ही उन्होंने देखा कि सामने बैठे बहुत से व्यक्ति ध्यान कर रहे हैं।
स्पष्ट ही इस स्वप्न का अर्थ उन्होंने लगाया कि वे ध्यान साधना का प्रचार करे। संयोग की बात, एक दिन कुछ लोगों ने उनके पास आकर इस कार्य को संगठन बद्ध प्रचार करने का प्रस्ताव रखा इसके बाद चार्ल्स फिल्मोर कंसास शहर चले गए। वहाँ के लोगों ने जिस स्थान पर संस्था का कार्यालय खोलने की बात कही, वह स्थान यूँ तो चार्ल्स के लिए अपरिचित था, परन्तु उन्होंने पाया कि स्वप्न में जिस स्थान को उन्होंने देखा था, यह वही स्थान है। उसी स्थान पर सोसाइटी ऑफ सायलेन्ट यूनिटी नामक संस्था की स्थापना की। संस्था की ओर से जो समाचार पत्र निकाला गया, उसका प्रथम अक्षर ‘यू’ ही था और अखबार का नाम ‘यूनिटी’ रखा गया। बाद में और भी पत्र-पत्रिकाएँ वहाँ से छपीं और स्वप्न का तथ्य सत्य हो गया।
कई बार स्वप्न इतने प्रेरक होते हैं कि उनका कारण मनुष्य की जीवन दिशा ही बदल जाती है। सभी जानते हैं कि भगवान बुद्ध राजकुमार थे। उनके वीतराग संन्यासी हो जाने की भविष्यवाणी ज्योतिषियों से सुनकर शुद्धोधन ने इस बात का हर सम्भव प्रयास किया था कि उनके सामने कोई दुःखद प्रसंग न आने पाए। फिर भी उन्होंने एक वृद्ध एक रोगी और एक शव यात्रा का देखकर जीवन प्रवाह के मोड़ देखे। इन घटनाओं ने उनके चित्त को विचलित किया। एक दिन उन्होंने स्वप्न देखा कि कोई श्वेत वस्त्रधारी एक वयोवृद्ध दिव्य पुरुष आया और उनका हाथ पकड़ कर श्मशान ले गया। उँगली का इशारा करते हुए उस दिव्य पुरुष ने बताया देख ! यह तेरी लाश है। इसे देख और प्राप्त हुए जीवन का सदुपयोग कर। आँख खुलते ही राजकुमार सिद्धार्थ ने निश्चय कर डाला कि इस बहुमूल्य सौभाग्य का उन्हें किस तरह का सदुपयोग करना है, जीवन का क्या प्रयोजन है और वे उसी क्षण रात में ही अपने राज-पाट को छोड़ कर श्रेय की खोज में निकल पड़े तथा उसे प्राप्त कर ही लिया।
फ्राँस की राज्यक्रान्ति की सफल संचालिका ‘जोन ऑफ आर्क’ एक मामूली से किसान के घर में जन्मी थी। अपने पिता के घर ही उसने स्वप्न देखा कि आसमान से कोई फरिश्ता उतर कर आया है तथा उससे कह रहा है कि अपने को पहचान। समय की पुकार सुन और स्वतंत्रता की मशाल जला। उस फरिश्ते ने जोन के हाथों में एक जलती हुई मशाल भी दी। नींद खुलने पर जोन ने इन बातों को गाँठ में बाँध लिया और उसी समय से फ्राँस को स्वतन्त्र कराने के लिए उत्साह के साथ काम करने लगी। इतिहास साक्षी है कि जोन ने कितनी वीरता के साथ स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा और अपने कर्तृत्व से स्वयं को अमर कर गयी।
इस तरह के दिव्य आभास और दिव्य प्रेरणाएँ देने वाले स्वप्न उन्हीं व्यक्तियों को आते हैं, जिनकी मनोभूमि अधिक विकसित होती है। पूर्व संचित संस्कारों के करण भी किन्हीं-किन्हीं में ऐसी विशेषता पायी जाती है। कई लोग साधना-उपासना द्वारा अपनी मलीनताओं तथा विकृतियों का
शोधन करके भी इस प्रकार की आत्मिक प्रखरता उत्पन्न करते हैं और स्वप्नों के माध्यम से ऐसे संकेत प्राप्त करते हैं जो आत्म तत्व की खोज में सहायक होते हैं अथवा आत्मसत्ता के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। ऋषि पिप्पलाद ने निद्रा को इसलिए यज्ञ कहा है, कि इस अवस्था में वैयक्तिक चेतना, परम चेतना के साथ आसानी से एकाकार हो जाती है। माण्डूक्योपनिषद् में बताया गया है-
स्वप्न स्थानोऽन्तः प्रज्ञः सप्ताँग एकोनविंषतिमुखः प्रविविक्त भुक् तेजसो द्वितीयः पादः ॥4॥
अर्थात्-स्वप्न अवस्था में जब मन सो जाता है, तब उसकी प्रज्ञा बुद्धि अन्दर ही काम करने लगती है। इस समय उसके सातों अंग (पाँच तन्मात्राएँ, अहंकार और महत् तत्व) उन्नीस मुख (दस इन्द्रियाँ, पाँच प्राण, और चार अन्तःकरण) भी उसी में लीन हो जाते हैं, जिनसे आत्मा शरीर के समान ही संसार का भोग करता है। यह आत्मा का तेजस द्वितीय पाद है। अर्थात् यह जागृति और सुषुप्ति के बीच की अवस्था आत्मतत्व की खोज में सहायक हो सकती है।
स्वप्न मन को आत्मा से जोड़ने वाली अवस्था के रूप में भी बदले जा सकते हैं। शास्त्रकारों के अनुसार इसके लिए साधना उपासना द्वारा अपनी चेतना का परिष्कार मलीनताओं का निवारण तथा आत्म शोधन के द्वारा अपने व्यक्तित्व का परिपाक करना पड़ता है। जिस समय चेतना पूर्णतया निर्मल शुद्ध हो जाती है, उस आत्म सत्ता में
परमात्म सत्ता का उसी प्रकार अनुभव किया जा सकता है, जिस प्रकार कि सामने बैठे हुए व्यक्ति या रखी हुई वस्तु का।
साधना क्षेत्र में आत्मिक प्रगति की कितनी मंजिल पार कर ली गयी है, इसका पता भी स्वप्नों से लगाया जा सकता है। पुराणों और आर्ष ग्रन्थों में इस प्रकार के कई स्वप्नों का उल्लेख आता है, जिनसे यह पता चलता है कि साधना क्षेत्र में हमारी प्रगति किस गति से हो रही है। स्वप्नों के संकेत यदि समझना सम्भव हो सके, तो न केवल आत्मिक स्थिति का स्तर मालूम किया जा सकता है, वरन् उसके माध्यम से सूक्ष्म को समझ पाना तथा उसके साथ ताल-मेल बिठाना भी सम्भव हो सकता है। प्रश्नोपनिषद् में महर्षि ने निद्रा को इसीलिए यज्ञ कहा है कि उस अवस्था में चेतना के अन्तर्मुख होने की सम्भावना अधिक रहती है और शरीर के सोते रहने पर भी मन न केवल सूक्ष्म जगत का ज्ञान प्राप्त कर सकता है बल्कि आत्मा को अलौकिक सान्निध्य भी पा सकता है। अन्यथा निद्रा आलस्य प्रमाद की तामसिक वृत्ति भी हो सकती है।
ज्वालामुखी फटने से पहले धरती के अन्दर ढेरों रासायनिक प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं। सालों लम्बी चलने वाली इन प्रक्रियाओं को जन साधारण भले न समझ पाए, लेकिन भूगर्भवेत्ता इन्हीं के आधार पर ज्वालामुखी फटने की सटीक भविष्यवाणी कर देते हैं। जो समय आपने पर खरी उतरती है। इक्कीसवीं सदी-नारी सदी के उद्घोष के पीछे भी यही तथ्य निहित है। अगले ही कुछ वर्षों बाद नयी सदी में होने वाला ‘नारी शक्ति’ का विस्फोटक उनके लिए जरूर अविश्वसनीय और आश्चर्यजनक लगेगा, जो वर्तमान सदी की हलचलों से आँख मूँदे हैं। अन्यथा इसे नियन्ता की प्रेरणा से सतत् क्रियाशील प्रक्रिया का सुनियोजित परिणाम ही समझना चाहिए।
विपन्नताओं और विषमताओं से घिरी मध्ययुगीन नारी ने भले ही अपना सब कुछ खो दिया हो, पर संघर्ष की शक्ति और धैर्य नहीं खोया। समाज के कतिपय चतुर लोगों ने उसे व्यक्ति नहीं वस्तु का दर्जा दे डाला। बौद्धिक विकास, शिक्षण-सामाजिक अधिकार सभी से उसे वंचित कर दिया। बस वह उपभोग की वस्तु बन कर रह गयी, जिसका मनचाहा उपभोग करने के बाद फेंक देने में ही भलाई समझी जाने लगी। जीने के अधिकार तक से वंचित नारी ने अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर पहला कदम उस समय रखा, जब एक लम्बे संघर्ष के बाद सन् 1894 में न्यूजीलैण्ड ने विश्व के प्रथम राष्ट्र के रूप में महिलाओं को वोट का अधिकार दिया।
यह अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में विस्मयकारी घटना थी जिसे समर्थन कम विरोध अधिक मिला। क्योंकि समाज पर अपना वर्चस्व बनाए रखने वाले संवेदनहीन लोगों को यह आशंका व्याप गयी थी कि देर से सही, पर अब महिलाओं के विकास को रोका न जा सकेगा और यही हुआ भी। बीसवीं सदी की शुरुआत में ही सन् 1901 में आस्ट्रेलिया में भी महिलाओं में ने अपने वोट का अधिकार प्राप्त कर लिया। देखते-देखते सन् 1911 में जो कि युग चेतना के अवतरण का वर्ष था, विश्व भर की जाग्रत महिलाओं ने मिल-जुलकर 8 दिवस के रूप में सम्पन्न किया गया यह अन्तर्राष्ट्रीय समारोह इस बात की स्पष्ट घोषणा थी कि अब नारी शक्ति युगशक्ति बनने जा रही है। उसकी इस नियति को रोक पाना, किसी व्यक्ति, संस्था, वर्ग अथवा समाज के बूते की बात नहीं।
सन् 1917 तो जैसे विश्व में क्रान्ति का संदेश लेकर ही उतरा था। बोल्शेविको द्वारा उठाए गए समता के स्वरों ने समाज में असमानता की जड़ें हिला दीं। साम्यवादियों ने यहाँ तक कहा कि औरत का भाग्य और समाजवाद की स्थापना अनिवार्यतः परस्पर सम्बद्ध है। अब वे जमाने गए जबकि औरत को रोमन कानून में बेवकूफ और असन्तुलित कहा जाता था। अरास्ताइन जैसे लोग बिना सोचे समझे कहते थे कि औरत वह जीनह जो न स्थिर है और न कृतसंकल्प। इन सबके विरोध में बेबल ने लिखा-’कि औरत और सर्पहारा दोनों ही दलित हैं और दोनों सामाजिक जागरण की सम्भावना साम्यवादी व्यवस्था में अधिक है। पूँजीवादी अवरोधों की समाप्ति के साथ ही स्त्री और पुरुष समानाधिकार प्राप्त कर लेंगे।
इस बीच भारत में भी राजा राममोहन राय, केशव चन्द्र सेन, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर एवं स्वामी विवेकानन्द के प्रयासों से नारी अपनी संघर्ष क्षमता पा चुकी थी। उसे इस बात का विश्वास होने लगा था कि वह बेजान वस्तु नहीं सप्राण व्यक्ति है। उसका व्यक्तित्व आधा-अधूरा नहीं सर्वांगीण है। जो नारी संघर्ष के इन बढ़ते कदमों के साम्यवादी क्रान्ति के वर्ष सन् 1917 में कनाडा में महिलाओं ने पहली बार वोट का अधिकार प्राप्त कर लिया।
महिलाओं के संघर्ष का यह दौर अनेकों अंतर्राष्ट्रीय तूफानों से घिरा रहा। हिंस्र और बर्बर राजनीतिज्ञों ने जन-जीवन को एक के बाद एक दो विश्व युद्ध से उबरने के बाद नारी चेतना ने एक नयी अंगड़ाई ली और सन् 1945 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा की पहली बैठक में महिला जागरुकता के लिए एक उप आयोग की स्थापना हुई। इन उप आयोग की पहली और अन्तिम बैठक में एक पूर्ण आयोग की आवश्यकता महसूस की गई और इसी के परिणाम स्वरूप सन् 1946 में मानवाधिकार आयोग की पहली बैठक में एक महीने बाद फरवरी में महिला आयोग की पहली बैठक सम्पन्न हुई।
इसी समय 15 अगस्त 1947 को भारत की महिलाओं ने पुरुषों के साथ मिलकर लड़ी गई विदेशी ताकतों के खिलाफ लड़ाई में जीत हासिल की। महिलाओं को बराबरी के अधिकार प्राप्त हुए। सन् 1949 में संयुक्त राष्ट्र स्तर पर घोषणा की गई, जिसमें नारी के शोषण को अपराध माना गया। सन् 1949 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिलाओं के यौन शोषण तथा वेश्यावृत्ति के खिलाफ सम्मेलन को विश्व स्तर पर मान्यता प्रदान की। इसके दो ही सालों के बाद सन् 1951 में अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने स्पष्ट घोषित किया कि बिना स्त्री पुरुष का भेद समान कार्य के लिए समान वेतन देय होगा। यह इस तथ्य का स्पष्टीकरण था कि महिलाएँ श्रमशीलता में पुरुषों से किसी तरह कम नहीं है।
वर्ष 1952 में संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं के राष्ट्रीय अधिकारों को मान्यता दी। यह मान्यता प्रदान करते समय संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने कहा कि अब वह समय आ गया है जबकि नारी घर की दीवारों में कैद नहीं रह सकती। उसके घर के आँगन की सीमाएँ विस्तृत होकर विश्व परिसर में फैल गयी हैं। 1957 में संयुक्त राष्ट्र ने इस बात पर अपनी सहमति व्यक्त की कि किसी महिला की शादी के बाद उसकी मर्जी से उसे पति की राष्ट्रीयता प्रदान की जाएगी। वर्ष 1961 में पैराग्वे तथा सम्पूर्ण लैटिन अमेरिका की महिलाओं ने एक लम्बे संघर्ष के बाद अपने मत का अधिकार पा लिया।
विधवा विवाह समस्या के समाधान की अधूरी खोज थी। इसे तब तक पूरा नहीं किया जा सकता जब तक बाल विवाह पर रोक न लगायी जाय। सन् 1962 में इस बात को विश्व स्तर पर माना गया कि विवाह के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की सहमति जरूरी है और विवाह की न्यूनतम आयु के निर्धारण के साथ विवाह के पंजीकरण को जरूरी माना गया। 1964 में रोजगार नीति में महिलाओं के साथ किए जाने वाले भेद-भाव को समाप्त किया गया।
भारत में इसी समय शासन की बागडोर श्रीमती इन्दिरा गाँधी के हाथों में आयी। उनकी सूझ-बूझ एवं नीति कुशलता में भारत में राष्ट्रीय स्तर पर नारी विकास के नये आयाम जुड़े। वर्ष 1967 में ईरान जैसे मुस्लिम और पर्दानशीन देश को भी अपने परिवार सुरक्षा कानून के तहत बिना पति की अनुमति के महिलाओं को काम करने की स्वतन्त्रता प्रदान करनी पड़ी। सन् 1968 में मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन तेहरान को प्रचार के लिए मान्यता मिली। इस सम्मेलन में विश्वभर के विचारशील महिलाओं के प्रति किए जाने वाले भेद-भाव को समाप्त करने के लिए संकल्प लिया। 1970 के पूर्वार्द्ध में ‘टेक बैक द नाइट’ के प्रचार का प्रारम्भ हुआ जिसके माध्यम से समूचा विश्व महिलाओं के सुरक्षा साधनों पर सोचने के लिए आपात काल एवं शस्त्र संघर्ष की स्थिति में भी महिलाओं सुरक्षा की जाएगी।
प्रबुद्ध नारी चेतना अपना विकास एवं विस्तार करते वर्ष के रूप में मनाने का संकल्प लिया। इस साल महिलाओं के विकास, शांति एवं समता के लिए मैक्सिको घोषणा पत्र को मान्यता मिली। साथ ही संसार के बहुसंख्यक देशों ने अनेकों महिला संगठनों एवं कार्य योजनाओं का विकास किया। 1976 में चार से आठ मार्च तक बेल्जियम में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर न्यायाधिकरण की घोषणा की गई। इस अवसर पर लगभग 40 देशों की 2000 महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसी वर्ष यानि कि सन् 1976 में ही संयुक्त राष्ट्र दशक के रूप में घोषित किया।
महाकाल की चेतना और उसकी सक्रियता निराली है। मानव समाज में किए जाने वाले बड़े काम हों अथवा सृष्टि की व्यापक फेर बदल, उसकी सामर्थ्य असम्भव को सम्भव बनाती चलती है। सड़ी-गली मान्यताओं, समाज के खण्डहर हो गए भवन को मटियामेट कर उसके स्थान पर नया सृजन करने वाली महाशक्ति का उद्गम स्त्रोत यही है। जो मनुष्यों संस्थाओं और आन्दोलनों को यन्त्र बना कर अपने शाश्वत प्रयोजन के लिए इस्तेमाल करता है। यह तो अन्तः स्थित वह विश्वात्मा है, जिसकी शक्ति सर्वत्र संचरित है और विश्व की प्रगति एवं मानव की नियति का निर्माण करती है। उसी का आवेग खुद को काल में चरितार्थ करता है और जब उससे गति और प्रेरणा मिल जाती है तो काल और शक्ति उसका भार ग्रहण करते हैं। उसे तैयार करने, पकाने और पूरी तरह सफल बनाने में जुट जाते हैं। काल के इस अधीश्वर के अपने हाथों में बागडोर थामते ही संसार की समस्त शक्तियां एक जुट होकर उसके संकल्प की पूर्ति हेतु संलग्न हो जाती है। चाहे मनुष्य सहायता दे अथवा प्रतिरोध करे, किन्तु उसका काम रुकता नहीं, जब तक संकल्प पूर्ति न हो जाए।
इक्कीसवीं सदी-नारी सदी का संकल्प उसी नियन्ता का है, सृष्टि जिसकी रचना है। सृजन की देवी को उसका गौरव वापस दिलाने के लिए वर्ष 1979 में महिलाओं के विरुद्ध हर प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें महिलाओं के पूर्ण विकास और आधुनिकीकरण तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समान अधिकारों के दिवाने के लिए विश्व के प्रमुख जन जन प्रतिबद्ध हुए। अगले ही वर्ष 1980 में 14 से 19 जुलाई को कोपेन हेगन में महिलाओं के लिए मध्य दशकीय एक और विश्व स्तरीय सम्मेलन हुआ जिसमें कार्य योजना हेतु दस्तावेजी कारण किया गया। इसके तीसरे साल 1983 में नीदरलैण्ड में महिलाओं के यौन शोषण के विरुद्ध एक वृहत कार्यशाला आयोजित की गई जिसमें संसार के सुविख्यात विचारशीलों ने समस्या सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों पर विचार किया और उन त्रुटियों और तकनीकों का विश्लेषण किया, जिसके आधार पर समस्या का समाधान सम्भव है। सन् 1985 में महिलाओं पर होने वाले क्रूरता पूर्ण अमानवीय अथवा मानहानि कारक व्यवहार एवं उत्पीड़न या दण्ड के विरोध में एक अंतर्राष्ट्रीय सन्धि हुई इसी साल नैरोबी में 15 से 26 जुलाई में महिला वर्ष के दशक की समाप्ति पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। जिसमें महिलाओं की उन्नति की रणनीति बनाने की सम्भावनाओं की ओर अग्रगामी नीति का निर्धारण हुआ। ताकि अगली सदी में नारी समाज के कर्णधार की भूमिका का सफलता पूर्वक निर्वाह कर सके।
वर्ष 1990 में 25 नवम्बर से 10 दिसम्बर तक महिलाओं पर हिंसा के सक्रिय विरोध में पहली बार 16 दिनों तक लगातार विश्व स्तर पर प्रदर्शन किया गया। स्थान-स्थान पर एक साथ किए गए इस प्रदर्शन में विश्व के लगभग हर देश की महिलाओं ने सक्रिय भागीदारी निभाई। इस प्रदर्शन ने समाज के अन्धे-बहरे प्रतिगामी तत्वों को यह देखने-सुनने और सोचने के लिए मजबूर किया कि नारी वस्तु नहीं व्यक्ति है। जीवन के हर पहलू में समान भागीदारी उसका नैसर्गिक अधिकार है।
1993 महिलाओं जाग्रति एवं प्रगति का विशिष्ट वर्ष रहा। इस साल न्यूजीलैण्ड में महिलाओं के मताधिकार का सौवां वर्ष मनाया गया। वियना में इसी साल 15 से 20 तक मानवाधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। 16 जून को महिलाओं के मानवाधिकारों के हनन के विरोध में न्यायाधिकरण की बैठक हुई, जिसमें महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरोध में 5 लाख हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन संयुक्त राष्ट्र को दिया। साथ ही गैर सरकारी संगठनों ने भी महिलाओं के हित में मानवाधिकार न्यायाधिकरण स्थापित किया। इसी साल 6 अक्टूबर को महिलाओं के विरुद्ध किए जाने वाले भेदभाव के उन्मूलन पर अभिसमय में वहाँ समाज भी शामिल हुआ। वर्ष के अन्त अर्थात् दिसम्बर में सबसे घनी आबादी वाले नौ देशों के शासनाध्यक्षों का ‘सबके लिए शिक्षा’ का प्रथम शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ जिसमें महिलाओं को शिक्षित करने के लिए विशेष रूप से विचार किया गया।
दिसम्बर में ही 20 तारीख को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए एक आयुक्त की नियुक्ति का निर्णय लिया। महासभा ने आयोग से दस वर्षों के लिए मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए एक कार्य योजना तैयार करने को कहा। इस योजना में इस बात पर विशेष रूप से बल दिया गया कि महिलाओं पर किए जाने वाले अपराधों में कमी आए और वे अपना स्वतन्त्र विकास कर सकें।
अगले वर्ष यानि के 1994 में फरवरी-मार्च के महीनों में दक्षिण अफ्रीका में पहली बार रंगभेद रहित सभी महिलाओं का समान रूप से वोट का अधिकार मिला। इसी साल जून महीने में एशिया और प्रशांत क्षेत्र में महिलाओं के विकास के लिए जकार्ता घोषणा पत्र जारी किया गया। सितम्बर की 5 से 13 तारीखों में मिश्र की राजधानी काहिरा में ‘जन संख्या नियन्त्रण तथा विकास’ पर एक विशेष अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमें यह निर्णय लिया गया कि गर्भ निरोधक साधनों में महिलाओं को निर्णय लेने की पहल का अधिकार है।
1995 के वर्ष में 11-12 मार्च की तारीखों में सामाजिक विकास के लिए विश्व शिखर सम्मेलन कोपेन हेगन में सम्पन्न हुआ। इसमें गरीबी निवारण, व्यवसाय के अवसर और सामाजिक एकीकरण में महिलाओं की सार्थक एवं सक्रिय भूमिका पर व्यापक विचार किया गया। इसी वर्ष 4 से 15 सितम्बर की तिथियों में चीन की राजधानी बीजिंग में संयुक्त राष्ट्र द्वारा चौथा अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें समता, विकास और शांति के संदर्भ में महिलाओं की भूमिका की चर्चा के साथ-साथ सन् 1996 से 2001 तक के लिए पंचवर्षीय कार्य योजना तैयार की गई।
इसी साल नवम्बर महीने अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा अपने संस्थापक की जन्मस्थली आँवलखेड़ा में आयोजित किए गये प्रथम पूर्णाहुति महा समारोह का संचालन ब्रह्मवादिनी महिलाओं
द्वारा किया गया। इस कार्य से प्रतिगामी तत्वों का भले ही निराशा हुई हो, पर यह सत्य गजागर हो गया कि नारी समाज में अपनी समान भागीदारी की ही हकदार नहीं, बल्कि उसके संचालक होने का दायित्व भी निभा सकती है। विराट अश्वमेध महायज्ञ के ब्रह्मवादिनी नारियों द्वारा किए गए सफल संचालन ने यह भी सिद्ध कर दिया कि भारत में अभी भी गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, विश्ववारा की वह पीढ़ी मौजूद है, जो मानव समाज को आर्थिक राजनैतिक ही नहीं वैचारिक एवं आध्यात्मिक नेतृत्व भी प्रदान कर सकती है।
हो भी क्यों न ? इक्कीसवीं सदी को नारी सदी का रूप देने का संकल्प स्वयं महाकाल का है। उसने हम सबसे इसके लिए साहस भरा कदम उठाने का आवाहन किया है। परवाह नहीं यदि हम शक्ति से पूरित होते हैं। यह वही सामर्थ्य है जो धरती से लाखों गुना भारी भरकम नक्षत्रों को उनकी कक्षाओं में ऐसी आसानी से घुमाती है, जैसे कोई बालक छोटी सी गेंद घुमाता है। उसके लिए असम्भव क्या ? वह असम्भव को सम्भव बनाने में सिद्ध हस्त है। हम क्या हैं ? कैसे हैं ? भूलकर जैसे भी हैं, संकल्प पूर्ति के इस महत्वपूर्ण चरण में अपनी भूमिका निभाने के लिए तत्पर हों। आने वाली सदी में आज की यह हलचलें नारी शक्ति को युग शक्ति बनाए बिना न रहेंगी। नारी शक्ति के इस विस्फोट से उपजे संवेदना प्रवाह से अपना वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन गौरवान्वित हुए बिना न रहेगा।
लोगों का कहना है कि वे पागल हैं। उन्होंने शहरों की सड़कों पर नंग-धड़ंग घूमने वाले पागल देखे हैं। बड़बड़ाते चले जाने वाले और फिर चाहे जिधर लौट पड़ने वाले पागल देखे हैं, ढेरों चिथड़े तथा कूड़ा-करकट समेटते चलने वाले पागल देखे हैं, गालियाँ देने वाले और लोगों पर पत्थर फेंकने वाले पागल एवं गुमसुम रहने वाले पागल भी देखे हैं। किन्तु, यदि देश के पागल चिकित्सालयों के इंचार्ज ने भी न देखा होगा।
पागल चाहे जैसा हो, उसकी आँखें अद्भुत कुछ गोलाई से लिए कुछ विभ्रान्त सी कुछ घूमी हुई सी रहेंगी। उसके चेहरे पर एक रूखेपन का भाव रहेगा। जबकि उनके विशाल सुन्दर नेत्रों में बालक की सरलता और माता का स्नेह साकार हो गया है। उनकी आंखों से जैसे स्नेह और शांति की हर पल बरसात होती रहती है। उनका सुन्दर चेहरा नित्य प्रसन्न, कुछ गम्भीर सा एकरस बना रहता है और वे एक जैसे अपनी मस्त गति से जैसे किसी दूसरे ही आनन्द लोक में हों। कभी वह किसी रोते बच्चे को पुचकारने लगेंगे और बच्चे भी उनको देखते ही हँस न पड़े, यह तो कभी नहीं हुआ।
कभी वह किसी लंगड़ाते कुत्ते के पिल्ले के पैर की चोट की देखभाल करने लगेंगे। कभी किसी निराश्रित पर अपना प्यार लुटाते दिखेंगे। दुखियों -पीड़ितों , अनाश्रितों के लिए सौहार्द सदा उमड़ा पड़ता है। फिर चाहे वे मनुष्य हो या मनुष्येत्तर प्राणी। इसी से लोगों ने उन्हें पागल समझ लिया है।
उन्हें किसी ने कुछ माँगते नहीं देखा। कोई कुछ पूछे तो तनिक मुस्कुराकर आगे चल देंगे। उनके होठ हिलते रहते हैं, पता नहीं क्या कहते रहते हैं वे ,शायद उनका अनवरत जप चलता रहता है। लेकिन उनको बात चीत करते देख लेना कठिन ही रहा है अब तक ।
उनको नगर की अपेक्षा एकान्त खेतों की ओर ही अधिक देखा जा सकता है नगर में तो बच्चे के प्रेक्षागृह तो कभी कभार आ जाते हैं। उन्हें कुछ भी न दें ,भोजन तो वे बहुत थोड़ा ही लेते हैं। संभवतः पेट भर जाने पर वे लेना बन्द कर देते हैं।
उस दिन उन्हें भी लगा कि शायद वे पागल ही हैं। एक बिल्ली खेत में मूर्छित पड़ थी। उसे सम्भवतः सांप ने काट लिया था। वे कुछ उसकी नाक से बार-बार सहसा चेतना में आती थी, अर्धचेतना में बौखलायी सी पंजे मारती और फिर मूर्छित हो जाती। उसने अपने नाखूनों से उनके हाथ, पैरा खरोंच डाले थे, लेकिन वह लगे थे उसे वह जड़ सुँघाने में। उन्होंने कई बार उनको मना किया पर जैसे उन्हें सुनायी ही नहीं दिया। अन्त में बिल्ली उठी सम्हली और भाग गयी। वे उसे देखते रहे। उनके मुख पर वही मुसकराहट आयी और वे एक ओर चल पड़े। उनके हाथों-पैरों की खरोंचों से निकलते रक्त ने उन्हें भिगो दिया है, इसका जैसे उनको ध्यान ही नहीं था।
इन दिनों एक हलवाई की उन पर बड़ी श्रद्धा उमड़ पड़ी थी। उसका कहना था कि वे महात्मा हैं। हलवाई बात झूठी है, यह कहने का साहस तो किसी को नहीं है। हलवाई उन्हें इधर-उधर से यदा-कदा ले आता है। उसने उनके लिए एक कमरे में सुकोमल गद्दा तख्त पर डाल रखा था। उन्हें साफ कपड़े पहना कर चंदन, पुष्प माला आदि से उनकी पूजा करने लगता, जैसे वह कोई मन्दिर का देवता हो। बस इतना ही। इस पूजा और भोग में उन्हें कुछ रस हो, ऐसा उनके चेहरे एवं व्यवहार को देखकर कहना कठिन ही है।
एक दिन पास से एक शराबी की आवाज सुनाई
पड़ी। वह चिल्ला रहा था, ‘तू यहाँ से भाग जा’ नहीं हड्डियाँ तोड़ डालूँगा, यह गालियां बक रहा था। हाथ के डण्डे से धड़ा-धड़ किसी को पीटे जा रहा था। वहाँ एक छोटे बच्चे के रोने का शब्द भी था। सारे मुहल्ले को मालूम है कि वह शराबी है। जब पीकर आता है, अपनी सीधी पत्नी को अकारण क्रूरता पूर्वक पीटता है। लेकिन उसकी पत्नी इस प्रकार शांत तो नहीं रहती। वह तो रोती है, चिल्लाती है तब क्या मूर्छित हो गयी वह ? यह दुष्ट कहीं बच्चे को ही न मारे डालता हो। यह सोचकर भागे-भागे वहाँ पहुँचे। पहुँचने पर पता चला कि वह शराबी व्यक्ति जिसे पीटे जा रहा था, वह और कोई नहीं हलवाई के महात्मा जी ही थे, जिन्हें कुछ लोग पागल भी कहते थे। पता नहीं ये कब और कैसे यहाँ पहुँच गए। मदान्ध शराबी डण्डे से पीटता जा रहा था, इस प्रकार जैसे किसी पत्थर या लकड़ी को पीट रहा हो। भुजाओं पर पीठ पर मोटी-मोटी काली धारियाँ उमड़ आयी थीं, लेकिन जैसे उन्हें इसका ध्यान ही नहीं था। वह तो बस उसी मारने वाले के बच्चे को गोद में लिए छिपाए उसे सम्हाल रहे थे। लड़के की नाक से खून बहता नजर आ रहा था। लगता है कि पिता के मारने या गिर पड़ने से उसकी नाक फूट गयी है और इन्हें उसकी नाक का रक्त बन्द करने के ध्यान में अपने शरीर पर पड़ती चोट का ध्यान नहीं है।
यह दृश्य देखकर उनसे रहा न गया। उन्होंने उस शराबी के हाथ से डण्डा छीनकर उसी के दो-चार जमाने को हुए, कि उन्होंने थोड़ा उलाहने की नजर से उनकी ओर देखते हुए कहा-ऐसा नहीं करते गंगाधर, यह तो शराबी है, लेकिन तुम तो समझदार हो। पहली बार उनके मुख से नाम सुनकर एक आत्मीयता की अनुभूति हुई। उन्होंने डण्डे को दूर फेंक दिया। बच्चे की माँ कहीं बाहर गयी थी। माता को आते देख बच्चा दौड़ गया।
इतने में हलवाई उन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ पहुँचा। पास में खड़े एक सज्जन ने अपनी समझदारी दिखाते हुए उससे कहा-रामदीन! तुम्हें भी क्या सनक है, उस पागल के पीछे पड़े हो। तुम्हें क्या लाभ हुआ उसकी सेवा से। इससे तो अच्छा होता।’
पता नहीं क्या-क्या कहना था उन्हें, किन्तु रामदीन हलवाई को वह सब सुनने का अवकाश नहीं था और न इतना धैर्य था उसमें। बड़ी नम्रता से उसने कहा-’वे पागल हों या महात्मा, उन्होंने मेरे लड़के को मरने से बचाया है। मैं उनकी सेवा किसी लाभ के लोभ में नहीं करता। मेरे भाग्य में जो होगा, उतना ही मुझे मिलेगा।
यह सभी को पता है कि रामदीन के एक ही पुत्र है। अकेली सन्तान पर माता-पिता का ममत्व एकत्र हो उठता है। बाजार में एक दिन दो लड़ते साँडों की चपेट में वह लड़का आ गया था। पता नहीं कहीं से वह आ निकले, और दौड़ कर लड़के को उठा लिया। उन्हें थोड़ी बहुत चोट जरूर लगी लेकिन बच्चे की जान बच गयी। रामदीन के मन में उनके प्रति असीम कृतज्ञता थी।
‘महराज! टाप मुझ पर कृपा करें।’ एकान्त में एक दिन गंगाधर उस पागल से लगने वाले सन्त के समीप गए। उनको आज यह निश्चय कर ही लेना था कि वे पागल हैं या साधु। उन्होंने केवल उनकी ओर नजर उठाकर देखा। उस नजर में कितना स्नेह था, यह कहना कठिन है। सम्भवतः वह कम बोलते हैं। उनके जप में बाधा न पड़े, इसलिए शायद उन्होंने बोलना कम कर दिया होगा। उनकी दृष्टि-रही थी-तुम क्या चाहते हो ?
मैं कुछ चाहता नहीं, केवल जानना चाहता हूँ। युवा गंगाधर ने नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर मस्तक झुकाया। उनके अधरों पर जो मन्द स्मित आया, वही शायद अपनी बात कहने की अनुमति थी। ‘आपने उस नोचने बिल्ली को जीवन दिया, उस पीटने वाले शराबी के बच्चे को स्नेह दिया और इस सेवा करने वाले रामदीन के पुत्र की प्राण रक्षा की, यह तो कोई विशेषता की बात न हुई। यह शराबी भी क्या रामदीन के समान ही आपकी कृपा का अधिकारी है ?’
वे खुलकर हँस पड़े। बालकों की भाँति इस प्रकार उनका यह उन्मुक्त हास्य आज पहली बार देखने को मिला और पहली बार ही उन्होंने कदाचित किसी को इस योग्य माना कि अपने पागलपन का नाटक न करके कोई संकेत करें। उन्होंने गंगाधर को वहीं रहने का संकेत किया और एक ओर चले गए।
पता नहीं क्या चमत्कार देखने को मिलेगा। स्वभाव से आस्तिक गंगाधर को यह पता था कि ऐसे सन्त कोई भी चमत्कार दिखा सकते हैं। वह उस सम्भावित चमत्कार के लिए पूरी तरह उत्सुक थे।
‘वे आवेंगे या नहीं ?’ पर्याप्त विलम्ब होने पर मन में हलकी सी घबराहट हो आयी। इस प्रकार काम-धाम छोड़कर एक खेत की मेंड़ पर बैठे रहना भला किसे प्रिय लगेगा। कब तक कोई इस तरह प्रतीक्षा करता रहता। उन्हें अपने पर कुछ-कुछ झल्लाहट होने लगी। तभी वह दूर से आते दिखाई पड़े। वह वैसे ही अलमस्त चाल से चले आ रहे थे। लेकिन उनके हाथों की अंजलि बनी हुई थी। दूर से ही जानने की उत्सुकता जगी-’क्या है उसमें ?’ उन्हें देर होनी ही चाहिए थी। लवंगलता के नन्हे-नन्हे पुष्प एक अंजलि
भरकर चुन लेना दस-पांच मिनट का काम तो है नहीं। वे आए और सुरभित फूलों को उन्होंने उनके सिर पर उड़ेल दिया। अब अपना दाहिना हाथ इस प्रकार उनके मुख के पास रख दिया कि वह उसे सूँघ सकें। वह मधुर मोहक सुरभि नासिका से मस्तिष्क तक भर सी गयी। इसी प्रकार उन्होंने बायाँ हाथ उनकी नासिका के समीप कर दिया था। फिर वे खुलकर हंस पड़े।
गंगाधर कुछ पल खड़े सोचते रहे। उनकी दृष्टि जमीन में बिखरे उन छोटे-छोटे फूलों पर गयी। अब भी वे वायु को अपनी सुहावनी गन्ध से भर रहे थे। तभी वह बोल पड़े इनका काम विश्व को सुगन्ध का दान करना है। दक्षिण या बाम (अनुकूल या प्रतिकूल) का भेद ये नहीं करते। जो इनके संपर्क में आता है, उसी को उनसे सुरभि प्राप्त होती है।
फूलों की सी इस समता को अपने व्यवहार में उतार लाना ही योग है। भगवान श्री कृष्ण ने तभी तो गीता में कहा है-’समत्वं योग उच्यते।’ उनके इस के साथ ही गंगाधर के मानस में गीता रहस्य प्रकट हो गया। कालान्तर में जब वह गंगाधर के मानस से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक हो गए उन्होंने इस रहस्य को जनमानस के लिए ‘गीता रहस्य’ के रूप में विस्तार से लिपिबद्ध किया।
होली के रंगों की फुहार बरसी और हम सब उसमें भीगे, फिर भी बदरंग रह गए। जिन्दगी के अनगिनत कोनों में उदासी छुपी रह गयी। फाग के गीतों के साथ, गूँजती ढोलक के थापों की गमक उसे पूरी तरह मिटा न सकी। यूँ तो पर्वों का मतलब ही होता है, कुछ विशेष खुशी, उल्लास और उत्साह का कुछ खास अन्दाज। फिर होली की तो रंगों का इन्द्रधनुषी समाँ साल दर साल इसमें नए रंग जोड़ता रहा है। इसका इतिहास, इतिहास से भी पहले का है। अर्थात् उस समय से यह पर्व हमारी इनसानी जिन्दगियों से जुड़ा रहा है, जबकि इतिहास लेखन की शुरुआत भी न हुई थी।
और जब से इनसान ने लिखना शुरू किया, उसने सबसे पहले उन घटनाओं-किम्वदन्तियों को सहेजना शुरू किया, जो कहने-सुनने में भले बच्चों की कहानियाँ लगें, लेकिन उनके अन्दर जिन्दगी की दशा और दिशा को समझने वाले मर्म सँजोये हैं। होली के संदर्भ में हिरण्यकशिपु और प्रहलाद की प्रचलित लोक कथा से सभी परिचित हैं। भावनाओं और सम्वेदनाओं के अस्तित्व को अपने क्रूर प्रहारों और कुटिल चालों से समूल नष्ट करने में जुटे हिरण्यकशिपु पौरुष’ नृसिंह’ सक्रिय हुआ।
अपने अस्तित्व के लिए छटपटाती भावनाओं की प्रहलादी चीत्कारें आज भी हैं, लेकिन इन्हें सुने कौन ? सुबह के अखबार का पन्ना, रेडियो सेट से उभरती समाचार की ध्वनि, टेलीविजन के दृश्य, कहीं न कहीं किसी न किसी जगह बमों के धमाकों की खबर देते हैं। यह खबर आहट होती है, किसी सुहागन के विधवा होने की या किसी माँ की गोद सूनी होने की। अथवा इस बात से हमें चौंका देती है कि किसी का हंसता-खिलखिलाता घर आँसुओं में डूब गया। फुहार तो उड़ी पर वह खून की थी। हमें भीगने का अहसास तो हुआ, लेकिन टेसू के रंग से नहीं, मानव रक्त से। इस अहसास की सिहरन हमें दहशत में डुबाए बिना नहीं रहती।
धधकती ज्वालाओं की लपटें अब वर्ष की फाल्गुन पूर्णिमा का इन्तजार नहीं करती। इन्हें अब गाँव के आँगन के आँगन-चौबारे से लेकर देश और दुनिया के विशालकाय परिसर में कहीं भी देखा जा सकता है। हाँ, इन लपटों में मनोमालिन्य पार पारस्परिक वैर-विरोध हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियां न जलकर सम्वेदनाओं की सम्पत्ति स्वाहा होती है। प्राचीन शास्त्रकारों ने तो “होलास्ति समता पवस्तद्दिनेऽयोन्यस्य वै असमताऽसुरत्वस्यदाहः कार्यो होलिकावत्” अर्थात् उस दिन निश्चय ही आपस की असमता रूप असुरता का होली की तरह दाह करना चाहिए की बातें कहीं हैं। लेकिन कहीं में किसी नवविवाहिता को जला डाला। अथवा सनसनीखेज समाचार इस बात का होता है कि तन्दूर की भट्टी में कोई सुकोमल काया बेरहमी से जला दी गयी। यही नहीं, राष्ट्र भक्ति के जिन गीतों की तोता रटन्त करते हम नहीं थकते, उसी देश को धर्म जाति, सम्प्रदाय के नाम पर बड़ी बेदर्दी से जलाए चले जा रहे हैं।
ये सर्वनाशी ज्वालाएँ अपने पीछे जो छोड़तीं हैं, वह यज्ञ भस्म नहीं चिता भस्म होती हैं, वह यज्ञ भस्म नहीं सद्भावनाओं की दुर्गन्ध उड़ती है। जिसकी छुअन मन को एक अनजाने खौफ से-अनचीन्हीं दहशत से भर देती है। ऐसे में होली का गुलाल भी हमारे मन के मलाल को न धो सका हो तो आश्चर्य क्या ? हमारे कर्म हमको रह-रह कर चौंकाते रहते हैं ? मन में उमड़ते विचार एक के बाद एक-ढेरों सवालों की झड़ी लगा देते हैं। आखिर केसर की क्यारियों में बन्दूकों की फसलें क्यों उगने लगी ? मस्तानों की भूमि पंजाब-आतंक के गाँव में कैसे बदल गयी ? त्यागी-तपस्वी ऋषि-मुनियों का देश आखिर घोटालों का देश कैसे बन गया ? अपने देश ने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे हैं। धरती के इस टुकड़े को जितना तपना और सहकर भी इसकी उमंग नहीं मिटी, होली के रंग इतने बदरंग कभी नहीं हुए।
यहाँ अरब आए, यूनानी, ईरानी आए। मुस्लिम-पारसी न जाने कितनी जातियाँ संस्कृतियाँ आयीं और होली के रंगों में सराबोर होती चली गयीं। कवि गुरु श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इन्हीं भावों को अपनी एक कविता में बड़े मार्मिक शब्दों में गुंथा है-
हे भोर चित्तपुण्य तीर्थों जागों रे धीरे, एई भारतेर महामानवेर सागर तीरे। केह नाहि जाने, कार आहृने कत मानुषेर धारा, दुर्घर स्त्रोते एलो कोपा हाते, समुद्रे हलो हारा। हे थाय आर्य, हे था आनार्य-हे थाय द्राविण चौन, षक-हूण दल, पठान मोगल एक देहो हलो लीन। रणधारा वाहि, भेदि भरु पथ, गिरि पर्वत यारा एसेछिलो सब। तारा मोर माजे सवाई विराणे केहो नहे-नहे दूर, आभार षोणिते स्येछे ध्वनित तारि विचित्र सुर॥
आशय इसका यह है कि भारत देश महा मानवता का पारावार है। ओ मेरे हृदय! इस पवित्र तीर्थ में श्रद्धा से अपनी आँखें खोलो। किसी को भी ज्ञात नहीं है कि किसके आह्वान पर मनुष्यता की कितनी धाराएँ दुर्वार वेग से बहती हुई कहाँ-कहाँ से आयीं और इस महासमुद्र में मिलकर खो गईं। यहाँ आर्य है, यहाँ अनार्य है, यहाँ द्रविड़ और चीनी वंश के भी लोग हैं। शक-हूण, यवन और मुगल न जाने कितनी जातियों के लोग इस देश में आए और सबके सब एक ही शरीर में समाकर एक हो गए। समय-समय पर जो लोग रण की धारा बहाते हुए एवं उन्माद और उत्साह में विजय के गीत गाते हुए रेगिस्तान को पार कर एवं पर्वतों को लाँघ कर इस देश में आए थे, उनमें से किसी का भी अब अलग अस्तित्व नहीं है। वे सबके सब मेरे भीतर विराजमान है। मुझ से कोई भी दूर नहीं हैं। मेरे रक्त में सबका सुर ध्वनित हो रहा है।
यह भारत में मनायी जाने वाली होली के रंगों में सराबोर होने की अनुभूति से उपजी कविता है जिसमें भारतीय एकता की अद्भुत अनुभूति है। जिस देश की संस्कृति ने विभिन्न संस्कृतियों, जातियों को अपनी होली के रंग में रंग लिया आज उसी देश में यह कैसी विडम्बना उठ खड़ी हुई है कि अपने ही परायों का सलूक करने लगे हैं। घर को रोशन करने वाले चिराग आज अपने ही घर को जलाने के लिए आतुर-आकुल हैं।
कहीं न कहीं कोई बुनियादी भूल जरूर हुई है और यह भूल राजनैतिक नहीं सामाजिक और साँस्कृतिक है। यह साँस्कृतिक भूल ही है जिसके कारण आज का आम आदमी अपनी रोटी दूसरों के साथ बाँट कर नहीं खाना चाहता। उसे पूरी रोटी केवल अपने लिए चाहिए, बल्कि बस चले तो वह दूसरों की भी रोटियाँ छीनकर बेच डालेगा और जो पैसे मिलेंगे उनसे और नहीं तो घूँट भर शराब ही पी लेगा। यही क्यों, जिसे रोटी बाँटने में परहेज है, वह जमीन को, हवा को, पानी को काटने-बाँटने की कोशिश में जुटा है।
इस असंस्कृति को दूर करने के लिए ही हमारी संस्कृति में जहाँ तीर्थ यात्रा व तीर्थ यात्रा व तीर्थ सेवन को एक बड़े राष्ट्र की साक्षात्कार प्रक्रिया माना गया वहीं पर्वों के माध्यम से व्यक्ति और समाज को संस्कारित करने का विधान भी रचा गया था। पर्वों का यूँ सामान्य मतलब है ऋतु परिवर्तन के महत्व को समझना। ऋतुचक्र और मनुष्य के जीवन चक्र में समानता देखना और काल को प्रवाह के रूप में, एक खण्ड के रूप में नहीं, सतत् चलायमान समय की धारा के रूप में अनुभव करना।
पर्व की शाब्दिक व्याख्या की जाय तो इसका अर्थ है गाँ सन्धिकाल तो इसका अर्थ गाँठ सन्धिकाल। जैसे बाँस का एक कल्ला फूटता है तो एक वोर छूटता चला जाता है। पर्व इस तरह की वृद्धि के सूचक हैं तथा दो समय विशेष प्रक्रिया विशेष की मिलन की अवधि में आ रहे हैं। इन क्षणों में जहाँ नव सृजन की सम्भावनाएँ हैं वहीं विकृतियाँ भी पनप सकती हैं। इन विकृतियों की समाप्ति एवं नव सृजन का कौशल कर दिखाना पर्वोत्सवों का प्रयोजन रहा है। होली इस क्रम में भावनाओं के उभार और उफान का समय है। इन्हें सुनियोजित और सुसंस्कृत करना सदियों से इसका प्रयोजन रहा है। पर्वोत्सवों से समाज का स्तर ऊँचा उठाने की हमारी साँस्कृतिक परम्परा रही है। जन-जन की भावनाओं की परिष्कार के हेतु, बहुरंगी व्यक्तित्व के बहुआयामी बहुविध पक्षों के प्रकटीकरण हेतु देव सुसंस्कृति में इनका विधान किया गया था।
ऋषिगण जानते थे कि मनुष्य असामाजिक व विक्षिप्त भावनाओं के दमन व विकृत होने से ही होता है। यदि भावनाओं को परिष्कृत उल्लास में बदल कर समूह की शक्ति का उसमें समावेश किया जा सके व उसे आध्यात्मिक उत्सव का रूप दिया जा सके तो इससे समाज स्वरूप बना रहेगा। आज के ख्यातिनामा सामाजिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ प्रो. आर. डी. लेंग का भी यही मानना है। उन्होंने “इण्डिया : ए लैण्ड ऑफ फेस्टिवल” में भारतीय परम्पराओं के मनोवैज्ञानिक महत्व को सिद्ध किया है। इस क्रम में उन्होंने होली को कुण्ठा-हीनता, एवं अन्यान्य मनोग्रन्थियों से छुटकारा देने वाले पर्व के रूप में चित्रित किया है। स्वस्थ एवं स्वच्छ मनोवृत्ति को विकसित करना ही इसका मकसद रहा है।
पर्व की जो परम्परा जनश्रद्धा को उल्लासपूर्ण तरीके से विवेक सम्मत मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए थी। उसमें आज विसंगतियाँ ही विसंगतियाँ भर गयी हैं। यही कारण है कि रंगों का त्योहार बदरंग हो गया। मस्ती पर बदमस्ती हावी हो गयी। शील का मिलन अश्लील घात कर बैठता है। शराफत के रंगों को वासना की कालिख मैली कर रही है। नशों को सिरों पर ताज की तरह सजा लिया गया है। हमारे जीवन में इतनी विसंगतियाँ क्यों ? हमारी खुशियों की हत्या क्यों ? हमारी इनसानियत शर्मिंदा क्यों ? पर्वों का वह दस आनन्द बेमजा और बदरंग क्यों ? जीने की रफ्तार कामनाओं की चाह-चाहे जितनी भी तेज क्यों न-हो ये समस्या हमें हल करनी ही होंगी। पर्वों के मर्म को भूल जाने का ही दुष्परिणाम है कि विकृतियों विसंगतियों का हिरण्यकशिपु भावनाओं के प्रहलाद को मिटा देने के लिए सचेष्ट है। उसकी इस कुत्सित चेष्टा को मिटा पाना तभी सम्भव है, जब ‘नृसिंह’ का प्रचण्ड पराक्रम सक्रिय हो। इस महापुरुषार्थ के जागते ही वह हुँकार उठेगी, जो स्वयं से और औरों से कह सकेगी, समाप्त कर दो इस अश्लीलता के नंगे नाच को जिससे हमारी मातृ शक्ति कलंकित होती है। मत खेलो खून की होली जो हमारे राष्ट्र को टुकड़ों में बाँटती है। मत उछालो एक दूसरे पर गंदगी, कीचड़ जो हमारे राष्ट्र के मानचित्र को गंदा करती है। सारे द्वेष-दुर्भावों सारी संकीर्णताओं के बन्धनों को को तड़ातड़ तोड़ दो और निश्छल प्रेम की रसधार बहा दो। ऐसी होली खेलो, सारा राष्ट्र तरंगित हो उठे। ऐसा हो सका तभी होली का गुलाल हमारे मन के मलाल को मिटा सकेगा।
जहाँ आज की तुलना में पूर्वकाल में साधनों का इतना बाहुल्य नहीं था वहाँ तब इस संसार में इतने दुःखों, दोषों, द्वन्द्वों तथा द्वेषों के साथ रोग-शोक तथा सन्तापों का भी बाहुल्य नहीं था। आज जैसे अभाव असन्तोष, अल्पता, असहनीयता, अहंकार, अबोधता, असत्य अथवा शोषण, छल-कपट, छीना-झपटी, स्वार्थ एवं संकीर्णता का बोल-बाला पूर्वकाल में रहा है-इसके भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होते। जीवन-साधनों की प्रचुरता के बीच भी मनुष्य का जीवन आज जितना अशांत एवं अभाव-ग्रस्त है, उतना पहले कभी नहीं रहा। साधनों की न्यूनता एवं अल्पता में भी लोग आज की अपेक्षा कहीं अधिक प्रसन्न, पुष्ट तथा सुखी थे।
इस विपर्य अथवा विरोधाभास का क्या कारण हो सकता है ? इसका कारण हो सकता है ? इसका कारण यही है कि मनुष्य ज्यों-ज्यों भौतिकता को प्रमुखता देकर बाह्य साधनों की दासता स्वीकार करता गया है, त्यों-त्यों उसका मानसिक पतन होता चला गया है, वह सहज मानवीय गुणों से रिक्त होकर मशीन बनता चला गया है। वह प्रेम, सौहार्द तथा मानसिक पुनीतताओं के प्रति निरपेक्ष होकर संकीर्ण एवं स्वार्थी, लोभी तथा लोलुप बन गया है। इस प्रकार की दूषित मनःस्थिति में सुख, सन्तोष तथा हँसी-खुशी की सम्भावना हो भी किस प्रकार सकती है ? आज जहाँ एक ओर राजनीतिक, सामाजिक शैक्षणिक, सामयिक तथा औद्योगिक प्रगति की ओर शक्तियों तथा साधनों को केन्द्रित किया जा रहा है, वहाँ मानसिक क्षेत्र की सर्वथा उपेक्षा की जा रही है। मानसिक विकास, मनोन्नति अथवा हार्दिक पवित्रता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आधिभौतिक तथा औद्योगिक अथवा आर्थिक योजनाओं को जितना महत्व दिया जा रहा है, यदि उसका कुछ अंश मनोविकास की ओर, मनोभूमि को शुद्ध तथा समतल बनाने की ओर दिया जाने लगे तो कोई कारण नहीं कि रोग-भोग और शोक संतापों की समस्या दूर तक हल न हो जाये।
जीवन की वास्तविकता प्रसन्नता तथा हंसी-खुशी के के लिए जाने वाले बाह्य उद्योगों के साथ-साथ यदि मानसिक विकास की योजना का गठबन्धन कर दिया जाये तो आज के सारे साधन मनुष्य की प्रसन्नता बढ़ाने में चार-चाँद की भूमिका प्रस्तुत करने लगें। अन्यथा यह बढ़े हुये भौतिक साधन लोभ, लालच, तृष्णा और आवश्यकताओं की वृद्धि करने के अतिरिक्त मनुष्य जिस प्रकार आज, उसी प्रकार आगे भी इनकी चमक-दमक में प्रसन्नता पाने के लिये इनके पीछे उसी प्रकार पागल होकर भागता रहेगा जिस प्रकार कस्तूरी मृग-नाभि में ही तत्व होने पर भी वन के वृक्ष, लता, द्रुम तथा तृणों को सूँघता फिरता है और अपने इसी भ्रम में व्यस्त रहकर जीवन को यातना के रूप में बदल लेता है। भौतिक विकास के साथ-साथ जब तक मानसिक विकास की योजना नियोजित नहीं की जायेगी, मनुष्य के लिये वास्तविक प्रसन्नता पा सकना सम्भव नहीं। साधनों की एकाँगी बढ़ोत्तरी मनुष्य को अधिकाधिक आलसी, प्रमादी, अकर्मण्य, ईर्ष्यालु तथा स्वार्थी बनाने के साथ-साथ अतृप्त एवं तृष्णाकुल बना देगी। साधनों के साथ-साथ मनुष्य की कामनाएँ तथा मनुष्य की कामनाएँ तथा आवश्यकताएं बढ़ेंगी, जिनकी पूर्ति सम्भव नहीं और तब ऐसी दशा में उसका क्षुब्ध एवं असंतुष्ट रहना स्वाभाविक ही है। मानसिक अरोग्य नष्ट हो जाने पर भूमि से लेकर स्वर्ग तक के साधन मनुष्य को हंसी, खुशी देने में कृतकृत्य न हो सकेंगे। साधनों से आवश्यकताओं की संतुष्टि नहीं, वृद्धि होती है, तभी मनुष्य को वह प्रसन्नता वह हँसी-खुशी नसीब हो सकती है, जिसकी उसे खोज है और जिसे पाने के लिये उसने इतने साधन इकट्ठे कर रखे हैं।
जिसने अपने अभ्यास एवं प्रयास से मानसिक स्वास्थ्य एवं विकास की ओर प्रगति कर ली है, उसकी स्थिति में साधनों का होना न होना कोई भी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत नहीं कर सकते। मानो स्वास्थ्य सम्पन्न व्यक्ति के लिये साधनों अथवा सहारों की अपेक्षा नहीं होती। उसकी मनोजन्य हंसी-खुशी उसके जीवन में चाँदनी की तरह प्रकाश एवं शीतलता बिछाये ही रहती है। जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएं और रहन-सहन के कतिपय साध नहीं उसको स्वर्गीय सुख देने के लिये पर्याप्त होते हैं। बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें, ऊँची-ऊँची कोठियाँ, मोटर, जहाज और हवाई जहाज और हवाई जहाज उसके लिये कोई महत्व नहीं रखते। वह बैंक की ओर तृष्णा भरी आँखों से नहीं देखता, उस आत्म तुष्ट योगी और मानसिक महारथी को न तो अभाव सताता है और न साधन ललचाते हैं। उसका अपेक्षित वैभव उसके स्वस्थ मानस में प्रसन्नता बनकर यों ही बिना किसी हेतु के जगमगाते रहते हैं। जो वस्तु, जो सम्पदा और जो वैभव हमारी एक मनोवृत्ति पर निर्भर है, जिसका निवास हमारे भीतर है और जिसको हम बिना साधनों के अनायास ही पा सकते हैं, उसके लिये आकाश-पाताल के कुलावे मिलाते रहना, साधनों और सुविधाओं के लिए मिमियाते रहना अथवा उनके लिये जीवन का दाँव हार बैठना बुद्धिमानी की बात नहीं कही जा सकती। अपनी समस्याओं का समाधान साधनों में नहीं, अपने अन्दर खोजिये, अपने मानसिक स्वास्थ्य में अन्वेषण कीजिये। वह वहीं है और आप अवश्य प्राप्त कर लेंगे।
अनेक ऐसे लोग भी होते हैं जो वास्तविक प्रसन्नता का निवास सांसारिक साधनों में तो नहीं मानते किन्तु यह अवश्य मानते हैं कि इस संसार से अलग कोई एक ऐसा स्थान अवश्य है, जहाँ पर मनुष्य जीवन की सफलता एवं प्रसन्नता के भण्डार भरे पड़े हैं- और वह स्थान है ‘स्वर्ग’। किसी प्रकार यदि स्वर्ग को प्राप्त कर लिया जावे तो वास्तविक प्रसन्नता, सुख एवं सौख्य अनायास ही सदा सर्वदा को मिल जायेगा। तब न तो कुछ करना होगा और न संघर्ष की आवश्यकता पड़ेगी, नितान्त निष्क्रिय रूप से वे यों ही बैठे-बैठे सब प्रकार के आनन्दों का भोग करते रहेंगे। अपनी इस धारणा के आधार पर वे संसार से ही रूठ बैठते हैं और अँधेरे में तीर चलाने की तरह एक अनदेखे तथा अनजाने स्वर्ग का अन्वेषण किया करते हैं। मनुष्य की यह धारणा भी बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कही जा सकती। उनका सारा जीवन और सारी शक्तियां यों ही किसी काल्पनिक स्वर्ग की खोज में नष्ट हो जाती हैं, किन्तु हाथ कुछ भी नहीं लगता। तब अन्त में उन्हें पश्चाताप के साथ अपनी भूल पर खेद करते हुये महाप्रयाण करना पड़ता है।
अच्छा हो यदि मनुष्य अपने मस्तिष्क से इस धारणा का निर्वासित कर दे कि संसार के बाहर स्वर्ग नाम का कोई ऐसा स्थान, लोक अथवा क्षेत्र है, जिसको प्राप्त कर लेने पर उसकी स्थायी प्रसन्नता की समस्या सदा-सर्वदा के लिये हल हो जायेगी। स्वर्ग इस संसार से बाहर अन्यत्र कहीं नहीं है, वह यहीं इसी संसार में आप के मनोमन्दिर में विराजमान् है। उसे कभी भी अपने वाँछित प्रयत्नों से बाहर प्रतिबिम्बित किया जा सकता है। जहाँ प्रेम, पवित्रता, सदाशयता, सहयोग, त्याग एवं उदारता का वातावरण मौजूद है, वहाँ स्वर्ग नहीं तो और क्या है ? जिसका हृदय में असन्तोष, ईर्ष्या-द्वेष, पाप एवं पश्चाताप की चिताएं जल रही हैं, वासनाओं तथा वितृष्णाओं का धुंआधार हो रहा है, आँखों पर भौतिकता की चमक चढ़ी हुई, साधनों लोभ भरा हुआ है तो हम उस सार्वत्रिक स्वर्ग को कैसे तो अनुभव कर सकते हैं और किस प्रकार देख सकते हैं। अपने मानसिक मलों को दूर करिये, दृष्टि पथ से लोभ एवं स्वार्थ के अवरोधों को दूर करिये, अपने मस्तिष्क में दैवी भावनाओं की कृषि कीजिये, अपने चारित्रिक विकास से देवों की स्थिति प्राप्त करिये, अपने मस्तिष्क में दैवी भावनाओं की कृषि कीजिये, अपने चारित्रिक विकास से देवों की स्थिति प्राप्त करिये और तब देखिये कि स्वर्ग आप में और आप स्वर्ग में ही निवास कर रहे हैं। यहीं इसी संसार में आपकी समस्या का समाधान आपको हस्तगत हो गया है। न कहीं दूर जाने की आवश्यकता पड़ेगी और न संसार से रूठ कर विमुख होकर अपने को लजाने-सताने की आवश्यकता। निश्चय मानिये कि आप स्वर्ग में ही निवास कर रहे हैं। किन्तु आपके मनोविकारों, स्वार्थों और संकीर्णता ने उसके सुख सौंदर्य को उसी प्रकार निष्प्रभाव कर दिया है जिस प्रकार किसी भी सर्व सुन्दर कमरे को जूते की लगी हुई थोड़ी-सी गन्दगी अपावन एवं नारकीय बना देती है। शुद्धि एवं सात्विकता का विकास कीजिये और यथास्थान एवं स्थिति में स्वर्गीय सुख-शांति का प्रसाद पाइये।
यह भूल जाइये कि वास्तविक सुख-शांति का निवास भौतिक साधनों की प्रचुरता में है, किन्तु यह याद रखिये कि उसका निवास मानसिक उत्कर्ष में ही है कि अपनी मनोभूमि को अतिशयताओं के घास-फँस व कुश कंटक से आवृत्त न होने दीजिये। जो कुछ आपको प्राप्त है, उसमें संतुष्ट रहिये और अधिक पाने की चेष्टा करते रहिये, अतिकामनाओं अथवा अतिशयता के अभिशाप से अपनी रक्षा कीजिये, जीवन के प्रति रुचि संतोष और आस्था की भावना रखिये और अभाव के भाव को अपने निकट मत फटकने दीजिये। सभी के साथ प्रेम एवं सहानुभूति का व्यवहार कीजिये और श्रद्धापूर्वक अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुये जीवन यापन करिये और देखिये कि आपकी प्रसन्नता आपके पास विराजमान है।
वाङ्मय गुजराती-अंग्रेजी में वाङ्मय जो परम पूज्य गुरुदेव के जीवन का निचोड़ है, सत्तर खण्डों में प्रकाशित हो रहा है। हिन्दी में प्रकाशित इस वाङ्मय ने वर्ल्ड बुक फेयर से लेकर सारे भारतवर्ष में धूम मचा दी है। अब इसे तुरंत अंग्रेजी व गुजराती में अनूदित करना है। 40 खण्ड छपकर तैयार हैं। परिजनों में से या प्रोफेशनल अनुवादकों में से जो पाठकगणों के परिचित ऐसे सज्जन हैं जो भावानुवाद कर सकें तुरंत उनके नाम-पते टेलीफोन या फैक्स नंबर शांतिकुंज हरिद्वार के पते पर भेज दें। यह प्रकाशन एक वर्ष के अंदर ही अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा द्वारा किया जाएगा।
विश्व प्रसिद्ध भारतीय डा. भाभा ने अपने परिश्रम, पुरुषार्थ तथा अध्यवसाय के बल पर संसार को यह चेतावनी देकर सावधान कर दिया कि भारतीय मस्तिष्क भी अणुबम बनाने में समर्थ है, इसलिये कोई देश अपनी अणु शक्ति के आधार पर भारत को धमकाने, दबाने अथवा भयभीत करने की कोशिश न करे।
जिनेवा में “एटम फार पीस” (अणु शक्ति शांति के लिये) नामक द्वितीय गोष्ठी के अवसर पर महान् वैज्ञानिक प्रोफेसर फ्राँसिस पैरा ने बड़े गर्व से कहा--”संसार के अल्प विकसित तथा गरीब देश परमाणु शक्ति के आधुनिक विकास के लाभों का तब तक उपयोग करने से वंचित रहेंगे जब तक वे औद्योगिक विकास की दिशा में पूरी तरह सम्पन्न नहीं हो जाते।
निश्चय ही एक सम्पन्न देश के वैज्ञानिक की एक गर्वोक्ति तथा भारत जैसे निर्धन देशों पर एक तीखा व्यंग था जिसके पीछे कथनकार का यह संकेत छिपा था कि असम्पन्न देश आणविक प्रगति नहीं कर सकते, यह बहुत ही व्यय साध्य काम है, इसलिये उन्हें अणु-विकसित देशों की वरिष्ठता तथा श्रेष्ठता मानते ही रहना चाहिए। डाक्टर भाभा ने, उक्त वैज्ञानिक का व्यंग तथा संकेत समझ लिया और उसका वैज्ञानिक आधार पर खण्डन करते हुये कहा कि आप शीघ्र देखेंगे कि अल्प विकसित देश भी अणु प्रगति कर सकते हैं और अणु बम बना सकते हैं।
डा. भाभा भारत आकर अपने कथन को चरितार्थ करने में लग गये। उन्होंने दिन-रात अनुसंधान कार्य करने का कार्यक्रम बनाया और अनेक वर्षों के अविराम परिश्रम से अणु-शक्ति का रहस्य खोज निकाला। इस महान् सफलता के बाद उन्होंने आणविक शक्ति के विकास के लिये ट्राम्बे में आधुनिकतम आणविक संस्थान की स्थापना कराई और ‘अप्सरा’ आणविक भट्टी का प्रारम्भ किया। डा. भाभा की इस सफलता तथा निर्माण ने आणविक शक्ति सम्पन्न देशों के बीच भारत का स्थान बनाकर उद्धत देशों के बीच भारत का स्थान बनाकर उद्धत राजनेताओं को गर्वोक्ति करने से विरत कर दिया। उन्होंने अपने महान् अध्यवसाय के बल पर सिद्ध कर दिखाया कि संसार के अल्प विकसित देश भी लगन तथा परिश्रम के द्वारा परमाणु शक्ति के विकास का लाभ उठा सकते हैं।
किन्तु भारतीय वैज्ञानिक डा. भाभा एक शांति प्रिय वैज्ञानिक थे। उन उद्धत वैज्ञानिकों में नहीं थे जो अणु शक्ति को युद्ध का साधन बनाकर अपने देश को दूसरे निर्बल देशों पर दबाव डालने की क्षमता प्रदान करने में ही अपना वैज्ञानिक गौरव समझते हैं। सक्षम एवं समर्थ होने पर भी उन्होंने ध्वंसकारी अणु बम बनाने की कभी नहीं सोची। वैज्ञानिक उपलब्धियों के विषय में उनका दृष्टिकोण सदैव शांति निर्माण तथा विश्व-कल्याण की दिशा में ही रहता था। वैज्ञानिक उपलब्धियों के उपभोग के विषय में उनसे जब-जब पूछा गया तब-तब उन्होंने यही उत्तर दिया-”मेरा सारा प्रयास और सारी प्रगति इसलिये है कि ऐसे साधन संचय किये जा सकें जिनके आधार पर भारत के करोड़ों भूखे, नंगे लोगों के लिये रोटी-रोजी की व्यवस्था की जा सके। हमारे देश की सारी वैज्ञानिक प्रगति का लक्ष्य राष्ट्र का सर्वांगीण विकास और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में यथासम्भव मात्र कल्याण का सम्पादन करना है। भारत कोई राजनीतिक उद्देश्य लेकर विज्ञान के क्षेत्र में नहीं बढ़ रहा है।”
अमित्र देश चीन की देश चीन की आणविक प्रगति तथा बम विस्फोटों के समाचारों पर जब विदेश के जिज्ञासुओं ने यह प्रश्न किया-सम्भवतः अब तो भारत भी अणुबम बनायेगा, तब डा. भाभा ने जो उत्तर दिया वह उनके अनुरूप ही है और निःसंदेह संसार के वैज्ञानिकों के लिये माननीय एवं अनुकरणीय है। डा. भाभा ने कहा-
“विज्ञान संसार के विनाश के के लिये नहीं बल्कि दुःखी एवं संतप्त मानवता के कल्याण और उसकी सेवा करने के लिये है। परमाणु शक्ति का सही उपयोग विनाशकारी बम बनाने में नहीं उसका सही उपयोग अणु शक्ति संचालित बिजली घर बनाने में है, जिससे लोगों को कम से कम मूल्य पर बिजली मिल सके, उनकी सुख-सुविधा के साधन बढ़ें, उद्योगों तथा कारखानों में उस शक्ति का उपयोग कर सस्ता और अच्छा माल बनाया जा सके। नये उद्योग धन्धे खड़े किये जा सकें जिससे गरीब लोगों को पर्याप्त रोटी-रोजी मिल सके। अणु शक्ति का सही उपयोग तब है जब उससे कृषि के उत्तम-उत्तम साधन खोजे जा सकें जिससे देश का धन धान्य बढ़े, उसकी गरीबी और भुखमरी दूर हो सके। रेतीले तथा अनुपजाऊ क्षेत्रों को उर्वर बनाने में उपयोग की गई अणु-शक्ति सदुपयुक्त मानी जायेगी। अणु शक्ति का उचित उपयोग तभी है जब उसके द्वारा विभिन्न प्रकार की बीमारियों का उपचार किया जा सके और मानव विकास को हर दिशा में गतिमान बनाया जा सके। मेरा तो विचार यह है कि एक अणु शक्ति ही नहीं ज्ञान-विज्ञान की कोई भी शक्ति विनाश में न लगा कर निर्माण में ही लगाई जानी चाहिये। न केवल विद्याबल ही बल्कि धन-बल तथा जन-बल का उपयोग भी मान-कल्याण की दिशा में ही किया जाना चाहिये।”
भारत के इस साधु वैज्ञानिक डॉ. भाभा का पूरा नाम डॉ. होमी जहाँगीर भाभा है। इनका जन्म 30 अक्टूबर 1909 में बम्बई में हुआ। एक सम्पन्न घर के पुत्र रत्न होते हुये भी इन्होंने सुख-सुविधा की सामान्य आकाँक्षा से ऊपर उठकर अपना सारा जीवन एक तपस्वी की भाँति विद्याध्ययन तथा देश की सेवा में लगा दिया। अपने प्रारम्भिक जीवन में ही इस देशभक्त को भारत की वैज्ञानिक मंदता खटकने लगी थी और विद्यार्थी जीवन में अनेक के बहुत-बहुत कठिन बताए जाने पर भी विज्ञान का विषय ग्रहण किया और सदैव ही अपना यह विश्वास व्यक्त व्यक्त किया कि परिश्रमशीलता के आगे संसार का कोई भी विषय कठिन नहीं और पुरुषार्थ तथा लगन के सम्मुख कोई भी उपलब्धि असम्भव नहीं ! मुझे विज्ञान का अध्ययन कर एक वैज्ञानिक बनना ही है फिर चाहे इसके लिये मुझे अपना सारा जीवन, सारी सुख-सुविधा और सारा हास-विलास ही क्यों न बलिदान करना पड़े। मुझे हर मूल्य और हर प्रयत्न पर भारत में वैज्ञानिकता की कमी दूर करनी ही है और आगे चल कर इस लगनशील तथा उत्साही बालक ने अपना विश्वास को चरितार्थ भी कर दिखाया।
डाक्टर भाभा ने बम्बई के कैभेंकल जान कैनन विद्यालय से हाई स्कूल पास करके एल्फिन्सटन कालिज और रायल इन्स्टीट्यूट आफ साइन्स से विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त की। अनन्तर लन्दन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से विज्ञान में पी. एच. डी. प्राप्त कर अनुसन्धान कार्य में लग गये। सबसे पहले उन्होंने ब्रह्माण्ड विवरण के क्षेत्र में ऐसी खोजें दुनिया के सामने रखीं कि वे जल्दी ही संसार के ऊँचे वैज्ञानिकों में गिने जाने लगे। जिसका मूल्याँकन विश्वविद्यालयों ने इन्हें “डॉ. ऑफ साइन्स” की उपाधि देकर किया। संसार की महान वैज्ञानिक संस्थाओं से राइज बेल ट्रेवलिंग की कैम्ब्रिज आइजक न्यूटन की स्टूडेन्टषिप पाने वाला वैज्ञानिक डा. भाभा यदि चाहता ता संसार के किसी भी विश्वविद्यालय में हजारों रुपये की प्रोफेसरी लेकर सम्मान एवं आराम की जिंदगी बिता सकता था। किन्तु नि मनुष्यों के हृदय में मानवता के दुःख का दर्द होता है, समाज की पीड़ा और राष्ट्र के गौरव वृद्धि की कामना होती है वे जनोपयोगी कामों के लिए अपने व्यक्तिगत जीवन का मूल्य कम कर दिया करते हैं।
टनेक आणविक भट्टियों की स्थापना के अतिरिक्त डा. भाभा ने औद्योगिक प्रगति के लिये “टाटा वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान” की स्थापना की और वर्षों उसका संचालन भी किया। बम्बई का टाटा भन्डा मेन्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट तथा ट्राम्बे के अन्य अनेक आणविक संस्थान डॉ. भाभा के ही प्रयत्नों के फल हैं। इन स्थापनाओं के अतिरिक्त डॉ. भाभा ने जो सबसे उपयोगी, महान, तथा दूरगामी काम किया वह यह कि उन्होंने अपने प्रयत्नों, परामर्शों तथा निर्दोषों से भारत में न जाने कितनी वैज्ञानिक प्रतिभाएँ उत्पन्न कर दी है। डा. भाभा अपने इस विचार के लिये सदा श्रद्धा के पात्र बने रहेंगे कि हर ज्ञानी-विज्ञानी, कलाकार तथा शिल्पी को अपनी विद्या नई पीढ़ी को दे जाना चाहिए, जिससे संसार में उसका अस्तित्व बना रहे, उसकी परम्परा तथा विकास का क्रम बना रहे। किसी भी विशेषताओं को अपने तक ही सीमित रखने की संकीर्णताओं नहीं रखनी चाहिये। इस प्रकार कोई भी विद्या विद्वान के साथ ही संसार से चली जाती है जिससे मानवता की बड़ी क्षति होती है।
अपने इन्हीं उदार विचारों से प्रेरित होकर डा. भाभा ने बम्बई में अखिल भारतीय वैज्ञानिक परीक्षाओं की परम्परा चलाई। इन परीक्षाओं द्वारा वे देश की विकासशील वैज्ञानिक प्रतिभाओं को खोज निकालते थे और उन तथ्यों को अपने निर्देशन में रखकर विज्ञान तथा अनुसंधानों की शिक्षा दिया करते थे। इस प्रकार वे देश में वैज्ञानिकों की एक ऐसी नई पीढ़ी पैदा कर गये कि जो आज उनके न रहने पर भी अणु क्षेत्र में उनके उद्देश्यों तथा अनुसंधानों को आगे बढ़ा रही है और आगे बढ़ाती रहेगी।
इस भारतीय वैज्ञानिक डा. भाभा में दो ऐसी विशेषताएं रही हैं जो संसार के किसी वैज्ञानिक में कदाचित् ही पाई जायँ। एक तो डॉ. भाभा बहुत ही गहरे कला प्रेमी थे। उन्होंने आधुनिक कला-कृतियों से अपनी वैज्ञानिकशालाओं तक को सजा रखा था। संगीत तो उन्हें इतना प्रिय था कि जब वे अपने अनुसन्धान कार्यों में थकते तो संगीत द्वारा ही अपनी क्लाँति दूर करते थे। कर्नाटकीय संगीत तो उन्हें इतना पसन्द था कि व्यस्तता के बावजूद भी वे उसका कोई भी कार्यक्रम बिना देखे सुने नहीं रहते थे।
डॉ. भाभा का एक धर्म प्राण व्यक्ति होना उनकी दूसरी विशेषता थी। अपने वैज्ञानिक अध्ययन के उपरान्त उन्हें जो भी समय मिलता था उसमें वे शास्त्रों तथा धर्म पुस्तकों का ही अध्ययन किया करते थे। उनके पुस्तकालय में जहाँ एक ओर विद्याज्ञान की पुस्तकों का ही अध्ययन किया करते थे। उनके पुस्तकालय में जहाँ एक ओर विद्याज्ञान की पुस्तकें लगी रहती थीं। डा. भाभा उन वैज्ञानिकों में से थे जिसका विश्वास भौतिक तथा आध्यात्मिक, दोनों विज्ञानों पर समान रूप से था और जो दोनों से लाभ उठाने की कला से पूरी तरह परिचित थे।
इन धर्म प्राण वैज्ञानिक डा. भाभा को जब स्वर्गीय प्रधान मन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपने शासन काल में मन्त्री पद देने का प्रस्ताव किया तो उसको विनम्रता पूर्वक अस्वीकार करते हुए डा. भाभा ने जो शब्द कहे थे वे उनकी त्याग तथा कर्त्तव्य-निष्ठा के जीते-जागते प्रमाण हैं। उन्होंने कहा--”मेरा कार्य क्षेत्र में उपयोग करने के लिये विविध प्रकार के प्रयोग तथा अनुसन्धान मेरी अविरल सेवा की माँग करते रहते हैं।
खेद है कि भारत का ऐसा विश्व हितैषी वैज्ञानिक और महामानव केवल पचपन वर्ष की अवस्था में ही कुछ समय पूर्व एक विमान दुर्घटना से स्वर्ग चला गया किन्तु भारत को वैज्ञानिकों की एक नई पीढ़ी देकर उसने जो राष्ट्र की सेवा की है वह उसे इतिहास के पृष्ठों पर सदा अमर रखेगी।
मनुष्य ने भौतिक क्षेत्र में अब इतनी प्रगति कर ली है कि सौर मंडल के समीप एवं दूरवर्ती ग्रहों तक उसके मानव रहित यान पहुँच चुके है। मनुष्य का किन्हीं अदृश्य लोकों तक पहुँच चुके हैं। मनुष्य का किन्हीं अदृश्य लोकों तक पहुँचना और लोक- लोकान्तरों के बुद्धिमान प्राणियों का मानव सभ्यता के साथ संपर्क बनाने के लिए दौड़ लगाना आश्चर्यजनक तो लगता है, पर सर्वथा अविश्वस्त भी नहीं है। समझा जा रहा है कि आगामी कुछ ही वर्षों में संभवतः इक्कीसवीं सदी के आरंभ में संभवतः इक्कीसवीं सदी के आरंभ में ही अपने सौरमंडल के अतिरिक्त अन्य ग्रह-गोलकों की सभ्यता का सरलतापूर्वक पता लगाया जा सकेगा। इस संदर्भ में पिछले दिनों फ्राँस के टोलोज शहर में अन्तरिक्ष विज्ञानियों का एक सम्मेलन भी हुआ था जिसमें विश्व भर के लगभग साढ़े तेरह हजार मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने भाग लिया था। उद्देश्य था-”एस. ई. टी. आई.”- ‘सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरिस्ट्रियल इन्टेलिजेन्ट लाइफ’। उनका निष्कर्ष है कि कहीं न कहीं अंतर्ग्रही सभ्यता सभ्यता विद्यमान एवं तकनीकी जानकारी धरती के निवासियों से भी काफी पीछे है।
जीव विकास के नवीनतम सिद्धान्तों के प्रतिपादन कर्ताओं के मतानुसार मानवी सत्ता किसी अन्य लोक से आई है। अन्य लोकवासी भी अपनी उत्सुकता को मनुष्यों की तरह रोक नहीं पा रहे हैं और यहाँ की अधिक खोज-खबर लेकर तद्नुरूप अधिक सघन संपर्क बनाने की कोई योजना तैयार कर रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण संसार भर में उड़न तश्तरियों के अस्तित्व सम्बन्धी जहाँ-तहाँ मिलने वाली घटनायें हैं। सुप्रसिद्ध विज्ञान वेत्ता एरिकवान डेनिकन ने अपने जीवन का अधिकतर भाग इसी खोज में बिताया है। प्रागैतिहासिक काल में धरती पर किसी अन्य लोक से आयी सभ्यता के अवशेषों को वे संग्रहित करते रहे हैं। अपनी प्रसिद्ध कृति-”चैरियट आफ गाड्स” में उनने एक चित्र प्रकाशित किया है जिसमें एक उड़नतश्तरी के निचले भाग से ज्वालायें निकलती हुई दिखा गया है। वस्तुतः ये चित्र किसी फोटोग्राफर के लिए हुए नहीं है, वरन् हजारों वर्ष पूर्व अफ्रीका में सोलेदाद की गुफाओं में वे चित्रित पाये गये हैं। अनेकानेक खोज कर्ताओं ने भी इस बात की पुष्टि की है।
इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध जीवशास्त्री जे. मेसन वेलेन्टाइन ने गहन खोजबीन की है। उनका कहना है कि इस प्रकार के चित्रों में काफी समानता है। इतना ही नहीं फ्राँस, उत्तरी अफ्रीका, आस्ट्रेलिया के सहारा एवं बाजा की गुफाओं में तो इन देवों के विमानों से उतरने वाले अन्तरिक्ष यात्रियों के चित्र भी पाये गये हैं। इन चित्रों में अन्तरिक्ष यात्री अपने सिर पर ऐसे टोप पहन हुए हैं जिनमें ऐन्टिना के आकार के चित्र पाये जाते हैं। इतना ही नहीं इन तैल चित्रों के पास साँकेतिक भाषा में कुछ शब्द भी खुदे हुए हैं जो अति प्राचीन काल की भाषा बताई जाती है। इन्हीं गुफाओं में एक एक गुफा की छत पर करीब 25-30 फीट की ऊँचाई पर एक तैल चित्र बना हुआ है जिसका आधा भाग काले रंग का और आधा भाग लाल रंग का है। उनके उठाते हुए हाथ मानो किसी का अभिवादन कर रहे हैं। ऐन्टिनायुक्त टोपियाँ अन्तरिक्ष यान से संदेश ग्रहण करने की ओर इशारा करती है। अन्य स्थानों में पायी जाने वाली प्राचीन गुफायें-जैसे कि दक्षिण आस्ट्रेलिया के केपयोर्क में भी ऐसे भित्ति चित्र पाये गये हैं। वैज्ञानिकों की धारणा है कि इस तरह के तैल चित्रों में ऐन्टिनायुक्त हेडड्रेस का चित्रण यह इंगित करता है कि मानवी सभ्यता किसी अन्य लोक से आई हुई है। इस तथ्य की पुष्टि जीव विज्ञानी भी करने लगे हैं।
इस सम्बन्ध में अमेरिका के ख्यातिलब्ध आरचियोलॉजिस्ट श्री करटीज शाफमान का कहना है कि आस्ट्रेलिया, अफ्रीका एवं दक्षिण अमेरिका की गुफाओं में जिनने भी ये भित्ति-चित्र बनाये होंगे, निश्चय ही उनका अदृश्य लोकोत्तर वासियों से सम्बन्ध स्थापित करना रहा होगा। उनके अनुसार सबसे बड़ी आश्चर्य की बात तो यह है कि सभी गुफाओं के चित्र हूबहू एक जैसे हैं जो यह बताते हैं कि इन जगहों में निवास करने या ठहरने वाले प्राणी किसी एक खास सभ्यता से सम्बन्धित रहे होंगे या फिर उनमें दूर संवेदन जैसी अतीन्द्रिय क्षमतायें विकसित रही होंगी। इस रहस्यात्मक तथ्य पर गहरी छान-बीन करने पर जो निष्कर्ष सामने आये हैं उसके अनुसार आस्ट्रेलिया के ताँत्रिक आज भी एक निश्चित समय पर जिसे “ड्रीमटाइम” कहते हैं, उस समय न केवल वे ीत एवं वर्तमान काल में कहीं पर भी घटित घटनाओं की झाँकी भी देख सकते हैं। अमेरिका के ही नृतत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि दक्षिण अमेरिका के कुछ आदि निवासी इसी प्रकार ‘ड्रीम टाइम’ के माध्यम से भविष्य कथन करते हैं जो एक दम सही पाया जाता है।
‘स्ट्रेन्ज हैपनिंग्स” नामक अपनी कृति में पाँल बैमिस्टर ने इस तरह की अनेक आश्चर्यजनक घटनाओं एवं रचनाओं का वर्णन किया है जो यह बताती है कि धरती पर सभ्यता का अवतरण किसी अन्य ग्रह या देव लोक से हुआ है। दक्षिण अमेरिका के ‘जेसुआईट’ नामक आदि निवासियों ने अपने रिकार्डों में इस तथ्य का उल्लेख किया है कि प्राचीन समय के निवासियों में एक जाति जिन्हें “पान्जिनास” कहते थे, वे एक ऐसे धर्म का पालन करते थे जो आसमान से आये देवताओं की पूजा करते थे। इस प्रकार की धारणा के अतिरिक्त एक अन्य मान्यता भी इस प्रकार की है कि प्रागैतिहासिक काल में पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई थी। इसमें भारत को “जम्बू द्वीप” नाम दिया गया था। जर्मन के प्रख्यात मौसम विज्ञजन आलफ्रेड वेगनर ने भी सन् 1914 में सप्त महाद्वीपों की धारणा की पुष्टि की थी और एक नक्शा भी बनाया था जिसमें सर्वप्रथम दो बड़े खण्डों में पृथ्वी दिखाई गयी जिसे लोरेशिया एवं गोन्डवाना लैण्ड नाम दिया गया था। लोरेशिया के पश्चिम में उत्तरी अमेरिका एवं पूर्व में योरोप और एशिया को दर्शाया गया है, जबकि गोन्डवाना लैण्ड के पाँच भाग इस तरह बताये गये हैं (1) पश्चिम में दक्षिण अमेरिका (2) अफ्रीका (3) अंटार्टिका (4) दक्षिण भारत और (5) आस्ट्रेलिया। सन् 1960 तक यह धारणा हास्यास्पद मानी जाती रही, लेकिन आधुनिक टोपोग्राफी एवं भी रचना के आधार पर वेगनेर की धारणा को आधारभूत माना जाने लगा है। इस आधार पर दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका का भू-भौगोलिक आकार आज भी ऐसा है जो यदि सिमट कर नजदीक आ जाय तो एक इकाई से अलग हुए दो टुकड़े आपस में स्पष्ट रूप से ऐक्य प्रदर्शित करेंगे। इसी तरह अंटार्टिका, दक्षिण भारत का तिकोना प्रदेश और आस्ट्रेलिया की भी एकरूपता स्पष्ट दिखाई देगी।
रामायण में रावण की पत्नी मंदोदरी को मयासुर की पुत्री बताया गया है। मयासुर काल में अति विकसित सभ्यता का नाम ही मय संस्कृति या मय सभ्यता पड़ गया था। दक्षिण अमेरिका में आज भी इस सभ्यता के भग्नावशेष बहुत अधिक संख्या में विद्यमान हैं। इसी तरह मध्य अमेरिका में “इन्का” संस्कृति के अनेकों स्थापत्य एवं सैकड़ों मील लम्बी सुरंगें खोज निकाली गयी हैं। एरिकवान डेनीकन ने अपनी पुस्तक ‘गोल्ड आफ गाड्स’ में कुछ ऐसी ही सुरंगों का उल्लेख किया है जो दक्षिण अमेरिका में स्थित हैं और हजारों मील लम्बी हैं। ये सुरंगें कहाँ से कहाँ तक गयी हैं इसका कोई पता नहीं लगाया जा सका है। कारण देखने में ये जितनी सुँदर हैं अन्दर जाने पर उतनी ही भयावनी लगती हैं। पेरु स्थित इन सुरंगों में कितनी ही बार खोजी दल अंदर जा चुके हैं, पर इनके अन्त का पता नहीं लगा पाये और न ही यह जान पाये कि इनके बनाने का ध्येय क्या था ? इन सुरंगों का निर्माण किन उद्देश्यों को लेकर किया गया, यह तो नहीं जाना जा सका, पर उसकी विचित्रता का अवलोकन करने का अवसर अवश्य इन खोजी दलों का मिला। देखा गया है कि हजारों मील लम्बी इन सुरंगों के नीचे 250 से लेकर 500 फीट नीचे भी दोहरी-तिहरी अंतरंग सुरंगें विद्यमान है। ऊपरी सुरंगों के बीच-बीच में भी कई बाहरी द्वार देखे गये हैं।
खोजकर्ताओं के अनुसार इन इन सुरंगों की दीवारों पर विभिन्न रंगों में अलग-अलग चित्र बने हुए हैं। पत्थरों पर खोदे गये अथवा धातुओं की प्लेटों से विनिर्मित इन चित्रों का निर्माण किन्हीं उद्देश्यपूर्ण प्रयोजनों के लिए किया गया है। डेनिकन का कहना है कि धातु प्लेटों पर इतने संकेत लिखे हुए हैं कि सुरंग की अभी जितनी यात्रा की जा सकी है, उस भाग के संकेतों को ही यदि संकलित किया जाय तो एक विशाल लाइब्रेरी बन सकती है। उनके अनुसार उन सुरंगों में प्रवेश करने वालों का सबसे बड़ा आश्चर्यजनक अनुभव यह रहा कि सिर पर हेलमेट में लगी प्रकाश बैटरियाँ सुरंग में घुसते ही बुझ जाती थीं। किसी एक-दो व्यक्तियों की ही नहीं, वरन् सभी खोजकर्ताओं की बैटरियाँ खराब हो गयी थीं। फोटोग्राफी के लिए ले जाये गये कैमरे जैसे उपकरण भी उस जगह अपना काम बंद कर देते थे। इसका कारण उन सुरंगों के भीतर सतत् होते रहने वाली विकिरण प्रक्रिया को माना गया है जिसकी वजह से न तो वहाँ कोई वैद्युतीय यंत्र-उपकरण।
इन विचित्र सुरंगों को किन्हीं सामान्य मनुष्यों ने बनाया होगा, यह नहीं कहा जा सकता। कारण ये सुरंग नहीं, वरन् एक तरह के राजप्रासाद या अनुसंधानशाला से लगते हैं। सुरंगों के बगल में कहीं-कहीं कमरे नुमा गैलरियाँ बनी हुई हैं तो कहीं-कहीं बहुत बड़े कमरे एवं हॉल भी हैं। ऐसे ही एक हॉल की लम्बाई 183 गज एवं चौड़ाई 164 गज है। इन कमरों का क्या उपयोग होता होगा, यह अभी तक नहीं जाना जा सका है। इन बड़े हॉलों में 12-13 हजार व्यक्ति आसानी से बैठ सकते हैं। ऐसे ही एक हॉल में विद्वान लेखक एरिकवान डेनिकन ने अपनी यात्रा के समय एक नर-कंकाल पड़ा देखा था। उस कमरे में प्रकाश की कोई व्यवस्था न होने पर भी कमरे में अंधकार नहीं था। नर-कंकाल इस ढंग से रखा हुआ था जैसे किसी मेडिकल कालेज की प्रयोगशाला में छात्रों के अध्ययन के लिए रखा जाता है। कुछ कमरों में पत्थरों से बनी मेज कुर्सियाँ भी देखी गयीं। देखने पर तो वह सनमाइका की तरह चिकनी और चमकदार लगती थी, पर उठाने पर पत्थर या पत्थर जैसी किसी धातु की बनी प्रतीत होती थी। कुर्सियों के पीछे दीवारों पर कई तरह के प्राणियों के चित्र बन हुए थे जो देखने पर सुन्दर और सजीव मालूम पड़ते थे। एक हॉल में तो सोने, चाँदी, पीतल आदि धातुओं के करीब ढाई से तीन हजार तक पत्तरें देखी गयीं जिनकी मोटाई लगभग एक मिली मीटर थी। ये पत्तरें 32 इंच लम्बे एवं 19 इंच चौड़े थे। एक ही साइज में बने, कटे इन पत्तरों पर प्राचीन भाषा में कुछ लिखा हुआ था। इस प्रकार की लिपि अभी तक संसार में खोजी नहीं जा सकी हैं।
किन्हीं-किन्हीं पत्तरों पर गोलाकार पृथ्वी पर खड़ी मानव आकृतियाँ भी चित्रित की गयीं थीं। अभी तक जो भी इतिहास उपलब्ध है, लगता है उनका निर्माण इससे पहले हुआ हो और इसके बाद की कड़ी लुप्त हो गयी हो जिससे इन सुरंगों का उपयोग और उद्देश्य अभी तक नहीं ज्ञात हो सका।
संसार में एक बढ़कर एक आश्चर्य भरे पड़े हैं और उसका निर्माण उस युग में हो चुका है जिसे हम समझते हैं कि तब लोग गुफाओं में रहते थे और पशुओं का सा जीवन जीते थे। पिछड़े और अविकसित लोग हर युग में हर समाज में रहते हैं, पर उनके आधार पर तत्कालीन समाज व सभ्यता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। अब जब कि अति प्राचीन काल में विनिर्मित विभिन्न स्थापत्य एवं सुरंगों के ऐसे विस्मयकारी अवशेष प्राप्त होते रहे हैं, तो हमें सृष्टि का सर्वाधिक विकसित, उन्नत और बुद्धिमान मनुष्य होने की घोषणा करना तथा स्वयं ही उसकी प्रसन्नता मना लेना अपने आपको धोखा देने अथवा मिथ्या आडम्बर ओढ़ने के सिवा और कुछ नहीं है।
विज्ञान चाहे माने या न माने पर दार्शनिकों-तत्वविद् आध्यात्मवेत्ताओं ने इसे करीब-करीब स्वीकार ही कर लिया है कि अब बुद्धि का चरमोत्कर्ष जा पहुँचा है। उनका कहना है कि अब यदि आगे भी मनुष्य बुद्धिवाद पर ही आश्रित रहा तो दुनिया का सर्वनाश सुनिश्चित है। इसलिए अनेक दार्शनिकों ने बुद्धि की बढ़ी कटु आलोचना की है। आरंभ में इस क्षेत्र में आलफ्रेड नार्थ हृइटहेड और महर्षि अरविन्द जैसे मनीषी थे। वे दोनों ही समकालीन थे। एक ने पाश्चात्य विचारधारा और दूसरे ने पूर्व की विचारधारा के माध्यम से बुद्धि के स्थान पर अंतः प्रज्ञा द्वारा रचनात्मक दर्शन का विकास किया। बाद में अन्य मनीषियों में मूर्धन्य दार्शनिक पास्कल और क्रिके गार्ड भी इस पंक्ति में आ खड़े हुए। इनने भी एक स्वर से यही कहा कि आज के बुद्धिवाद का एक मात्र विकल्प यही है कि व्यक्ति ईश्वर के उस स्वरूप पर विश्वास करे जिसकी शिक्षा वर्षों से आर्ष ग्रंथ देते रहे।
बुद्धिवाद ने - अकल ने आज जिस मोड़ पर लाकर मानव समाज को छोड़ा है, उसके चारों ओर गहरी खाई है और उसमें समूची सभ्यता के भरभराकर गिर पड़ने और अपने अस्तित्व को खो बैठने का खतरा है। इस स्थिति को देखते हुए दूरदर्शी विचारकों का चिन्तित होना स्वाभाविक है। इन एकाँगी प्रगति को देखते हुए दूरदर्शी विचारकों का चिन्तित होना स्वाभाविक है। इस एकाँगी प्रगति को देखते हुए फ्राँस के सुविख्यात दार्शनिक हैनरी वर्सो ने बुद्धि को अपंग बताया है। उनका मानना है कि अंतः प्रज्ञा स्तर की चेतना का विकास किये बिना मनुष्य की गति नहीं। इसे अधिक स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि मनुष्य जीवन धारा के साथ बहते हुए ईश्वर में समाहित हो जाय, यही उसकी अन्तिम नियति है। इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं। इसी प्रकार अध्यात्मवेत्ता मार्टिन हैडेगर भी तर्कबुद्धि को पर्याप्त नहीं मानते। उनका मत है कि मात्र विचारणा कल्पना भर से हम सत्य की प्राप्ति नहीं कर सकते। सत्य को जान कर अपने जीवन में-गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में उतारना पड़ेगा, उसकी अनुभूति करनी पड़ेगी, तभी वह सत्य सही अर्थों में सत्य कहलायेगा। समग्र मानव जाति के त्राण के लिए महर्षि अरविन्द के “नास्टिक बीइंग” अर्थात् अध्यात्मजीवी मनुष्य के साथ साथ अब “ओथोन्टिक बीइंग” अर्थात् प्रमाणिक मनुष्य के अवतरण की भी आवश्यकता है और यह कार्य दार्शनिक प्रज्ञा के जागरण से ही संभव है, कोरे बुद्धिवाद से नहीं।
मानव जाति के बौद्धिक इतिहास के प्रारंभ से ही सिद्धान्त रचना दार्शनिकों तथा वैज्ञानिकों का मुख्य लक्ष्य रहा है। भारतीय दार्शनिक वैदिक काल से ही दार्शनिक चिन्तन में चरम शिखर पर थे। वैदिक ऋषि मंत्रद्रष्टा थे। बुद्धि के स्थान पर उनने प्रज्ञा को प्रमुखता दी थी। बुद्धि तो अन्वेषण करके कई प्रकार की सामग्री--”डाटा” का ढेर लगा देती है, पर उसके सदुपयोग का सुयोग उससे बहुत कम ही बैठ पाता है। उच्च स्तरीय वैज्ञानिक भी अन्तः प्रज्ञा के बल पर इन डाटाओं में से सिद्धान्तों की रचना करते हैं, केवल बुद्धि के बल पर नहीं। अध्यात्म क्षेत्र में प्राचीन काल में ऐसे अन्वेषणों की दो श्रेणियाँ थीं-ऋषि और मुनि। जहाँ मुनि प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्र क्षमता रखते थे, वहाँ ऋषि के लिए यह अनिवार्य नहीं था। वे अपने आत्मबल से सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आन्दोलित करते और उसे सुसंस्कारित बनाये रखने सक्षम थे। वैज्ञानिक और ऋषि-मुनियों के बीच की एक और श्रेणी है जिन्हें मनीषी शब्द का अर्थ प्रायः उस महाप्राज्ञ से लिया जाता है, जिसका मन उसके मन हो। जो मन से नहीं संचालित होता, वरन् अपने विचारों द्वारा मन का संचालित करता है, उसे मनीषी कहते हैं। इस संसार में बुद्धिमान तो अनेकों हैं और एक से बढ़कर एक हैं, किन्तु वे पवित्र हो, यह अनिवार्य नहीं। आज अन्वेषक, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक एवं दार्शनिक तो अनेकानेक हैं और देश-देशांतरों में फैले पड़े हैं, लेकिन मनीषी कहीं चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलते। पिछली दिनों ऐसे दार्शनिक स्वामी विवेकानन्द, योगिराज अरविन्द, महर्षि रमण आदि हुए थे जिन्होंने तप शक्ति द्वारा अन्तः शोधन करके पवित्रता भी अर्जित की थी और प्रज्ञा भी।
आज की विषम परिस्थितियों में बुद्धि, वैभव और विनाश के झूले में झूल रही मानव जाति को उबारने के लिए आस्थाओं के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा। मानवी गरिमा को उभारने और दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाने वाला प्रचण्ड पुरुषार्थ करना होगा। इसके लिए प्रज्ञावान ऋषि-मनीषियों, दार्शनिकों एवं वैज्ञानिकों की नयी पीढ़ी का सृजन अनिवार्य है जो उक्त आवश्यकता की पूर्ति कर सके। मन का परिष्कृत पक्ष है बुद्धि। तत्वदर्शी बुद्धि से भी एक परत को समझते हैं और उसे प्रज्ञा नाम देते हैं। यह अंतःकरण चतुष्टय अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से ऊँची और अंतःकरण दिव्य चेतना के समीप है। विश्व की उलझी हुई समस्याओं-अड़चनों को सुलझाने-समाधान प्रस्तुत करने में तत्वदर्शी प्रज्ञा की शक्ति का प्रयोग आवश्यक मानते हैं। उनका कथन है कि मानव में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण इसी आधार पर संभव है कि प्रज्ञा को उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों में अवतरित किया और उसे प्रखर-प्रचंड किया जाय। मानवी चेतना को मन, बुद्धि तक सीमित न रहने देकर प्रज्ञा के स्तर तक विकसित किया जाय उसे प्रज्ञावानों के साथ जोड़ दिया जो तो भी काम चल जायेगा।
योगीराज श्री अरविन्द ने उच्च मन, प्रकाशित मन एवं संबुद्ध मन की कल्पना इस रूप में की है कि मन शरीर की अपेक्षा आत्मा के अधिक निकट है। साधना के उच्च सोपान पर आरुढ़ होने पर वे यह जान गये थे कि अब आगे के आदमी का विकास मन और बुद्धि के बस की बात नहीं है, वरन् यह विकास इन धरातलों से ऊपर उठकर ही संभव है। अतः उनने अतिमानस का अनुसंधान किया। आज विज्ञान वेत्ता भी यह मानने लगे हैं कि मात्र बुद्धि के बल पर इस विश्व ब्रह्माण्ड का रहस्य जाना समझा नहीं जा सकता और न ही इससे मानवी गुत्थियों का समाधान ही निकाला जा सकता है।
मूर्धन्य दार्शनिक काल्डरवुड ने भी कुछ इसी प्रकार का मन्तव्य अपनी पुस्तक “इवोल्यूशन एण्ड मेन्स प्लेस इन नेचर” में प्रकट किया है। वे लिखते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि परिवेश की अपनी सीमाएं हैं और विकास की पूर्णता तभी संभव है जब इसके लिए आभ्यंतरिक प्रयास हो। तात्पर्य यह कि विकास का कार्यक्षेत्र अब शरीर एवं जड़ पदार्थ नहीं, वरन् चेतना है। मनुष्य को अब प्रकृति पर आश्रित न रहकर परिवेश की सीमाओं से बाहर निकलने के लिए अन्दर से जोर लगाना पड़ेगा। ईश्वर की साझेदारी को जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देना होगा। ए. एन. ह्नाइटहेड एवं चार्ल्स हार्ट शोन जैसे विज्ञान वेत्ताओं ने इसे प्रक्रमम दर्शन नाम से सम्बोधित किया है। “दी प्रिन्सीपल आफ रिलेटिविटी” एवं “प्रिंसीपिया मैथमेटिका” नामक अपनी कृतियों में ह्नाइटहेड ने इस बात की खोज की है। इसमें बताया गया है कि भौतिकीय पदार्थ पड़ तत्व नहीं है, वरन् वह सतत् क्रियाशील घटनाओं से बना हुआ है। इन घटनाओं को परम तत्व की इकाइयाँ कहा जा सकता है। जिस समय वास्तविक सत्ताओं की सृष्टि ईश्वर से होती है, उस समय उसका दिक् और काल में संपर्क होता है, किन्तु जिस समय इन वास्तविक सत्ताओं का पुनरावशोषण ईश्वर में होता है उस समय वे दिक् और काल के संपर्कों से परे होती है। वे ईश्वर की अति वास्तविक सत्ता को स्वीकार करते हैं। ह्नाइटहेड की गणना विख्यात दार्शनिकों में की जाती है। उनने बुद्धि की अपेक्षा प्रज्ञा के विकास पर जोर दिया है। वे बुद्धि की चकाचौंध से ऊपर उठने के लिए गणितीय और वैज्ञानिक प्रत्यय के आधार पर जन मानस से अनुरोध करते हैं।
मनीषियों का कहना है कि आने वाली क्रान्ति परमाणु बमों एवं लौह आयुधों से नहीं, वरन् विचारों की काट विचारों से होगी। अभी तक जितनी मलीनता समाज में प्रविष्ट हुई है वह बुद्धिमानों माध्यम से हुई है। द्वेष, दुर्भाव, कलह, नस्लवाद, जातिवाद, प्राँतवाद, सम्प्रदायवाद, व्यापक नर संहार जैसे कार्यों में बुद्धिमानों ने ही अग्रणी भूमिका निभाई है। यदि वे सन्मार्गगामी होते, उनके अन्तःकरण पवित्र होते तो उन्होंने विधेयात्मक चिन्तन प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता और ऐसे आन्दोलन चलाये होते जो जन मानस को उच्चस्तरीय बनाकर रख देते। आज के दुर्बल बुद्धिवाद को प्रज्ञा स्तर की उर्वरक की आवश्यकता है। अध्यात्म वेत्ता समय-समय पर इस जिम्मेदारी को अपने ऊपर लेते रहे हैं और लोकमानस में संव्याप्त-भ्राँतियों से मानवता को उबारते रहे हैं। आध्यात्मिक शक्ति विज्ञान से भी बड़ी है। दर्शन या अध्यात्म ही व्यक्ति के अन्तराल में प्रविष्ट कर विकृतियों से लड़ सकने, उन्हें निरस्त कर सकने में सक्षम तत्वों की प्रतिस्थापना कर पाता है। प्राज्ञ पुरुष व्यक्तित्वों में पवित्रता व प्रखरता का समावेश करने के लिए मनीषा को अपना माध्यम बनाकर उज्ज्वल भविष्य के सपने देखते हैं। वातावरण को बदलने के लिए बुद्ध, गाँधी, योगिराज अरविन्द, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण की तरह भूमिका निभाने वाले मुनि एवं ऋषि के युग्म की आवश्यकता है जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों द्वारा विचार क्राँति का प्रयोजन पूरा कर सकें।
यह उक्त महामानवों की ही देन है कि उनने लोक सेवा के माध्यम से ईष्रानुीति को प्राप्त करना मनुष्य का चरम लक्ष्य बताया। उनने आध्यात्मिकता को उन्नति के शिखर पर लाने का अनवरत प्रयत्न किया। स्वामी विवेकानन्द जीवन भर भारतीय तत्वदर्शन और चिंतन की विविध धाराओं को समन्वित करने के लिए प्रयत्नशील रहे। वे समस्त संसार को अपने भारतीय ज्ञान परिधि में लेना चाहते थे। उनका कहना था कि हम किसी को अस्वीकार नहीं करते चाहे वह ईश्वरवादी हो या नास्तिक। हमारे धर्म में दीक्षित होने के लिए एक ही शर्त है- और वह है चारित्रिक गठन। वे तत्व चिंतन की अपेक्षा मानव कल्याण की संभावनाओं को खोजने पर बल देते थे और कहते थे कि दुख और पीड़ा-पतन से भरे इस संसार में बुद्धि की तरह उतर उन्हें दूर करने के लिए संघर्ष करो। ऐसा पुरुषार्थ अन्तः क्षेत्र की प्रचंड तप साधना से ही संभव हो सकता है। इसके बल पर दिव्य चेतना प्रकट हुआ करती है जो बुद्धि से परे की स्थिति है। यही प्रज्ञा है।
कहा जा चुका है कि विभिन्न वैज्ञानिक और दार्शनिक अब यह मानने लगे हैं कि मनुष्य की वर्तमान समस्याओं का समाधान बुद्धि से नहीं प्रज्ञा से ही संभव है। वे अब यह भी स्वीकारने लगे हैं कि मानवी सत्ता का उद्भव कोशिकाओं से नहीं दिव्य चेतना से हुआ है। योगिराज अरविन्द के अनुसार चेतना पदार्थ में पहले से ही सक्रिय अथवा निष्क्रिय अवस्था में विद्यमान थी, पर हो सकता है वह प्रच्छन्न रही हो। इसी प्रकार जीवन मन और यहाँ तक की इससे आगे की शक्तियां-जिनका अभी उद्घाटन होना बाकी है, सब उसी तत्व में छिपी पड़ी है। यदि आदिम द्रव्य जड़ होता तो उससे चेतन उत्पन्न होने का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता। श्री अरविन्द का विकासवाद इसी उद्भावना पर आधारित है। प्रज्ञा को अपेक्षाकृत सरलतापूर्वक समझा और प्रयत्नपूर्वक जाग्रत एवं प्रयुक्त किया जा सकता है। प्रस्तुत दलदल में से निकाल कर समूची मनुष्य जाति को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने में प्रज्ञा ही समर्थ हैं। हमें इसी का आश्रय लेना चाहिए।
शब्द के बारे में सर्वजनीन जानकारी बहुत ही कम है। सामान्यतया इतना ही समझा जाता है कि परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करने में वार्त्तालाप के माध्यम से शब्द का उपयोग होता है। या फिर प्रकृति की-प्राणियों की-यन्त्र वाहनों की हलचलों से शोर कोलाहल होता रहता है। यह सब सामान्य प्रतीत होता है, पर है निश्चित रूप से असाधारण।
सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ इस सम्बन्ध में तत्वज्ञान का प्रतिपादन है कि सर्वप्रथम प्रकृति और पुरुष के मिलन में घड़ियाल पर हथौड़ी की चोट पड़ने पर उत्पन्न होने वाली झनझनाहट सहित ऊँकार जैसा ध्वनि प्रवाह उत्पन्न हुआ। उससे प्रकृति में हलचल उत्पन्न हुई। गतिशीलता ने छोटे-बड़े पिण्ड गोलक बनाये और फिर उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन का चक्र चल पड़ा। इस प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति शब्द से ठहरी।
वैज्ञानिक पदार्थ की गहरी खोजबीन करते हुए अब बहुत आगे बढ़ गये हैं। कभी पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु थी। फिर बढ़ गये हैं। कभी पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु थी। फिर परिवार परिकर का मध्यवर्ती “नाभिक” को वह श्रेय मिला। बाद में शक्ति तरंगें प्रमुख मानी गई और कहा गया कि इन तरंगों का समुच्चय ही परमाणु है। अस्तु तरंगें प्रमुख हैं। तरंगों में शब्द, प्रकाश और तप को तीन विभागों में विभाजित किया। अन्ततः अब उन तीनों में प्रमुख शब्द होने की मान्यता अग्रणी है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा रहा है कि यह प्रकृति विस्तार फलतः शब्द तत्व की परिणति है।
योगाभ्यास में नाद ब्रह्म, शब्द ब्रह्म, सुरति योग, स्वरयोग, मन्त्रयोग लय होगा, आदि के माध्यम से शब्द साधना की प्रमुखता दी गई। मन्त्र विज्ञान का समूचा आधार ही ध्वनि शक्ति के विभिन्न उपयोगों, उपचारों, निर्धारणों पर ही ठहरा हुआ है। मंत्रों की संरचना में भाषा विज्ञान और व्याकरण अनुबन्धों का उतना ध्यान नहीं रखा गया है जितना कि अक्षरों के पारस्परिक गुँथन क्रम के आधार पर उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रकार के स्तर एवं प्रभाव का। गायत्री मन्त्र की प्रमुखता न उसके अर्थ पर निर्भर है और न व्याकरण शास्त्र की दृष्टि से उसकी परख की गई है। उसके उच्चारण क्रम में में ही वह विशेषता है जिसके आधार पर अन्तराल के प्रसुप्त चक्रों उपत्यिकाओं में जगाने का उद्देश्य पूरा होता है। अदृश्य जगत की हलचलों पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। ऐसे-ऐसे रहस्यमय कारण ही मन्त्र विज्ञान की आधारशिला है।
शब्द शक्ति का उपयोग अब विज्ञान के क्षेत्र में भी बढ़-चढ़ कर होने लगा है। यन्त्र मानव (रोबोट) शब्द को समझता है उसका उत्तर देता है तथा आदेशानुसार हलचल करने लगता है। कम्प्यूटर्स अब शब्दों के द्वारा संचालित किए जा सकते हैं। अन्तरिक्ष को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली रेडियो तरंगों, तथा लेसर किरणों के मूल तत्व को अब शल्य परक माना गया है। उनकी प्रत्यक्ष क्षमता,शब्द मूलक मानी गई है। भले ही वे अपना प्रभाव ऊर्जा के रूप में प्रकट करती हो।
प्राचीन काल में मंत्रशक्ति का शब्द शक्ति का प्रयोग विभिन्न प्रकार की ऊर्जाएँ उत्पन्न करने तथा प्रकृति प्रयोजनों के लिए उपयुक्त माध्यम माना गया था। यह उत्पादन में सरल सस्ती होने के कारण प्रभाव क्षेत्र में भी अद्भुत अद्वितीय है। अन्य प्रकार की ऊर्जाएँ उत्पन्न करने के लिए महँगे उपकरण चाहिए साथ ही बहूमूल्य ईंधन चुक सकता है। उपकरण घिसते-बिगड़ते रहते हैं। जबकि शब्द मानव शरीर की प्रयोगशाला में ही अभीष्ट स्तर एवं क्षमता के उत्पन्न किये जा सकते हैं। समझा जाना चाहिए कि मनुष्य शरीर ऐसा अद्भुत यन्त्र उपकरण है जिसमें प्रकृति जगत और चेतना जगत को प्रभावित करने-संपर्क साधने और आदान-प्रदान के लिए आवश्यक क्षमता अभीष्ट परिमाण में विद्यमान है। यही कारण है कि योग और तप द्वारा शरीर यन्त्र और मनःतन्त्र का इस प्रकार परिशोधन परिष्कार किया जाता है कि उससे उपयुक्त ध्वनि प्रवाह उत्पन्न किये जा सके और मन्त्र विद्या से प्रतिपादित लाभ उठाये जा सकें।
शब्द विद्या का सामान्य उपयोग भी कम नहीं है। उसमें पदार्थों और प्राणियों को प्रभावित करने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। गद्य का उपयोग प्रवचन परामर्श, वार्त्तालाप आदि में होता ही रहता है। पद्य की क्षमता उससे भी बढ़कर है।
संगीत में ताल और लय का उपयोग होता है। इन दोनों के समुच्चय को ही स्वर विज्ञान कहते हैं। थपकी ताल कहलाती है और अलाप को स्वर कहते हैं। यों दोनों के मिलन से समान संगीत बनता है, पर उनका प्रथक-प्रथक उपयोग भी है। यह बात सामान्य गायन वादन के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष है। संगीत के द्वारा रोग निवारण, भावनात्मक अभ्युदय, उत्साही सम्वर्धन, प्राणि विकास, वनस्पति उन्नयन, जैसे काम लिये जाने लगे हैं। अब संगीत मात्र मनोविनोद की सीमा तक ही सीमित नहीं है। उसके माध्यम से मनःक्षेत्र में आनन्द उल्लेख उत्पन्न किया और सम्वेदनाओं को भाव-तरंगों के साथ जोड़ते हुए मनुष्य को आनन्द विभोर किया जा सकता है। अन्य प्राणियों पर तथा प्रवृत्ति असाधारण प्रभाव छोड़ता है।
संगीत शास्त्र में ध्वनि प्रवाह के अनेकानेक प्रभावों का उल्लेख है। बुझे हुए दीपकों को जला देने वाला दीपकों को जला देने वाला दीपक राग-बादलों को बरसने के लिए विवश करने वाला मेघ मल्हार-हिरन स्तब्ध कर देने वाली गजगति, साँपों को लहरा देने वाला मोहन राग- मदोन्मत्त हाथियों को वश में करने वाला राग शंकर-सूखे पेड़ों को हरा करने वाला श्रीराग-किस प्रकार अपना प्रभाव उत्पन्न करता है इसका वर्णन मिलता है। लोक व्यवहार में मधुर वचनों की अनुकूल और कटुवचनों की प्रतिकूल प्रतिक्रिया का प्रत्यक्ष प्रमाण, हर किसी को अपने इर्द-गिर्द ही मिल सकता है। अब विज्ञान ने इस ओर ध्यान देना आरम्भ किया है तो यह सम्भावना अधिकाधिक स्पष्ट होती जा रही है कि संगीत की शब्दशक्ति का महत्व प्रकृति की अन्यान्य सामर्थ्यों से किसी भी प्रकार कम नहीं है।
ध्वनि विज्ञानियों का कहना है कि यदि किसी नर्तकी की पायल ध्वनि लय ताल से बंधकर एक प्रवाह में बहने लगे तो इतने भर से वह नृत्य का बड़ा हाल नीचे ढह सकता है।
नैपोलियन के समय में एक ऐसी ही दुर्घटना हुई। उसकी सेना एक पुल पर होकर कदम से कदम मिलाये चल रही थी कि पदचाप के क्रमबद्ध हो जाने से पुल हिला और नीचे ढह गया। पूरी टुकड़ी नदी में बह गई। कारण तलाश करने पर यह क्रमबद्ध पदचाप का प्रभाव निकला। तब से पुल पर चलना हो तो सेना को तितर-बितर चलने का नियम बना जिसका अभी भी पालन किया जाता है।
भूकम्पों में जो विनाश शक्ति देखी जाती है उसका कारण मात्र विस्फोट नहीं, वरन् पृथ्वी के भीतर से उठने वाले क्रमबद्ध कम्पन हैं। यदि उतना विस्फोट मानवी प्रयासों से किया जाय तो बहुत कम विनाश होगा। किन्तु ऐसे अवसरों पर धरती के भीतर जो क्रमबद्ध ध्वनि प्रवाह उठते हैं उन कम्पनों से प्रभावित क्षेत्रों को भारी हानि उठानी पड़ती है।
वाशिंगटन क्षेत्र के टेकोमा नदी पर प्रायः एक किलोमीटर लम्बा और 12 मीटर चौड़ा पुल बँधा था। वह 44 सेन्टीमीटर मोटे लोहे के रस्सों पर टंगा था। नियमानुसार उस पर 180 किलोमीटर प्रति घन्टे की चाल से चलने वाले तूफान का भी कोई असर नहीं होना चाहिए किन्तु 7 नवम्बर 1940 को हवा कुछ तेज तो जरूर थी पर ऐसा कुछ नहीं था, जिसे तूफान कहा जा सके। अचानक पुल ने काँपना आरम्भ किया। वे तेज हिलोरें लेने लगा। ऊपर उचका और धड़ाम से नदी में जा गिरा।
ठीक ऐसी ही घटनाएँ अन्यत्र भी हो चुकी हैं। फ्राँस का लाहोक र्नार्ड पुल सन् 1852 में ठीक इसी प्रकार गिरा था। उसे फिर से बनाया गया तो दुबारा भी ठीक वही घटना घटी और 1871 में फिर वैसा ही धराशायी हुआ।
अमेरिका की ओहियो नदी का पुल भी इसी प्रकार सन् 1854 में बैठा था। नियाग्रा जल प्रपात का झूला मजबूत पुल भी इसी प्रकार दो बार धराशायी हुआ। एक बार सन् 1864 में दूसरी बार 1889 में। कारण तलाश करने पर न निर्माण सामग्री में कोई खराबी पाई गई और न बनाने वालों की विधि व्यवस्था में। फिर इन दुर्घटनाओं का क्या कारण हो सकता है इसकी गहरी खोज-बीन करने पर यह निष्कर्ष निकला कि धरती के भीतर उत्पन्न हुए भूकम्प की नगण्य सी हलचल ने तालबद्ध ध्वनि तरंगें उत्पन्न कीं और उसके प्रभाव से वह अनर्थ होते रहे।
बारूद विस्फोट का इन दिनों बहुत उपयोग होता है। पहाड़ों को गिराने या पोला करने में आमतौर से यह प्रक्रिया काम में लाई जाती है। विस्फोटों की आवाजें भी बहुत होती हैं। पर उससे समीपवर्ती क्षेत्र में मकान गिरने जैसी कोई दुर्घटना नहीं होती। देखा गया है कि 50 टन बारूद का विस्फोट मात्र 200 मीटर की दूरी पर बने हुए मकानों को कोई क्षति नहीं पहुँचाता। 130 किलो बारूद यदि फट पड़े तो उससे 350 मीटर दूर के मकानों की किवाड़ें भर खड़-खड़ा सकती हैं। साधारण भूकम्पों में उन्हीं मकानों को क्षति पहुँचती है। जो सामग्री या बनावट के नियमों की दृष्टि से दोषपूर्ण होते हैं।
उपरोक्त दुर्घटनाओं के लिए धरती के भीतर ध्वनि कंपन उत्तरदायी ठहराये गये हैं। यह प्रचण्ड शक्ति तब उत्पन्न होती है जब उनमें एक निश्चित गति से उत्पादन हो और वह एकीभूत होकर एक दिशा में प्रवाहित हो। यह प्रवाह सामान्य घटनाओं से, यहाँ तक कि घड़ी के पेण्डुलम को खट-खट को तालबद्ध कर देने तक से उत्पन्न हो सकते हैं और कोई भयानक दुर्घटना उत्पन्न कर सकते हैं।
स्नायविक रोगों तथा मानसिक विक्षेपों में संगति के विशेष ध्वनि प्रवाहों के माध्यम से चिकित्सा का एक नया प्रचलन इन्हीं दिनों चला है और बहुत सफल हुआ है। शोक, क्रोध, उद्वेग, तनाव, रक्तचाप आदि को शांत करने में भी उससे बड़ी सहायता मिलती देखी गई है। सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि अन्यान्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह अगले दिनों संगीत उपचार भी उभर कर आवेगा और जन स्वास्थ्य के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करेगा।
इसके अतिरिक्त उसका प्रभाव पशु पक्षियों को उल्लिखित एवं वृक्ष वनस्पतियों को अधिक विकसित करने की दृष्टि से भी बहुत लाभदायक पाया गया है। दुधारू पशु अधिक दूध देने लगे। बैल घोड़े बिना थके अधिक परिश्रम करने में समर्थ रहे। मुर्गियों और मछलियों ने अधिक अण्डे बच्चे दिये। डरते रहने और असहयोग करने वाले अन्य प्राणी इस आधार पर नरम पड़े और मनुष्य के अधिक निकट आये। इस आधार पर हिंस्र पशुओं को भी किसी हद तक सौम्य बनाने में सफलता मिली है। सरकस वाले अब पशुओं को भी किसी हद तक सौम्य बनाने में सफलता मिली है। सरकस वाले अब पशुओं को कलाकार बनाने के लिए साधने में मात्र हंटर या लालच का ही उपयोग नहीं करते वरन् संगीत का सम्मोहन चलाकर भी चक्रवर्ती बनाने का एक नया उपाय अपनाने लगे हैं। यह प्रयोग वृक्ष वनस्पतियों पर भी बहुत प्रभावकारी सिद्ध हुआ है।
वेस्ट विल अमेरिका की कृषि प्रयोगशाला में ऐसे परीक्षण हुए हैं जिनमें संगीत के प्रभाव से खेती की फसलों को अधिक फैलने तथा फूलने फलने वाली बनाने में सफलता प्राप्त की गई है। इस सम्बन्ध में विस्कोन्सिन के आर्थर लाके के प्रयोगों की उस देश के वनस्पति विशेषज्ञों में बहुत चर्चा है। उसने फूलों को जल्दी तथा भारी बनाने में इसी आधार पर सफलता पाई। जिन खेतों को संगीत सुनाये गये वे अधिक समुन्नत हुए और जिन्हें इससे वंचित रखा गया वे खाद पानी की दृष्टि से समान लाभ प्राप्त करने पर भी पिछड़े रह गये।
संगीत मनुष्यों की तरह पेड़-पौधों को भी पसन्द है। सुनियोजित संगीत तरंगों से वे प्रसन्न पुलकित होते हैं और उत्साही भरे वातावरण में अधिक जल्दी अच्छा विकास करने लगते हैं। उन्होंने सिद्ध किया है कि संगीत में पौधों को भी उल्लसित करने की क्षमता है। न्यूयार्क के डाक्टर डारोवो रेटालक ने रुग्ण वृक्षों में चिकित्सा से संगीत की ध्वनि लहरों का उपयोग किया है कि जिनका भविष्य संदिग्ध चिकित्सा के माध्यम से रोगमुक्त किया और नया जीवन दिया गया।
वनस्पतियों के संगीत पर प्रभाव के सम्बन्ध में महा कौशल महाविद्यालय के रसायनशास्त्री प्रो. गोरे ने लम्बे समय तक परीक्षण करने के बाद अपना मत यही बनाया है कि जिस प्रकार मनुष्यों को संगीत प्रिय है उसी प्रकार उसके द्वारा वनस्पति को भी उल्लसित ही नहीं विकसित भी किया जा सकता है।
लन्दन विश्वविद्यालय जेम्स स्मिथ ने पौधों के साथ किये गये दुर्व्यवहार और सद्व्यवहार की प्रतिक्रियाओं को जानने के लिए लम्बी अवधि तक अनेक क्षेत्र उद्यानों में विभिन्न प्रकार के पर्यवेक्षण किये हैं। उनने पाया है कि वनस्पतियाँ प्रताड़ना तथा प्रतिकूलता उत्पन्न करने से खिन्न होती हैं। उनके यह मनोभाव कुम्हलाने मुरझाने के रूप में देखा गया। इसी प्रकार खाद पानी ऋतु प्रभाव की तरह वे सज्जनोचित व्यवहार से भी पोषण प्राप्त करती, बढ़ती और सुखी रहती पाई गई हैं। हँसी-खुशी का वातावरण जिस प्रकार मनुष्यों को पसन्द है वैसा ही अनुभव पेड़-पौधे भी करते हैं। शोक सन्ताप जहाँ छाया रहता है वहाँ पौधे भी दुखी निराश एवं कुरूप कठोर स्थिति में रहते हैं। श्मशानों, कसाई घरों के नये और तेजी से बढ़ने वाले पौधों की विकास गति अपेक्षाकृत अधिक मन्द और असन्तोषजनक पाई गई है।
वनस्पति विज्ञानियों का यह मत बनता जाता है कि संगीत की प्रतिक्रिया पौधों पर श्रेह सद्भाव जैसी होती है। वे गायन वादन से प्रसन्न होते, उत्साहित रहते और जल्दी बढ़ते तथा फूलते-फलते हैं।
शब्द तत्व असाधारण क्षमताओं एवं सम्भावनाओं से भरा-पूरा है, उसका रहस्य समझा जा सके और उपयोग सीखा जा सके तो मनुष्य के हाथ सामर्थ्य का विशिष्ट श्रोत्र हाथ लग सकता है। प्राचीन काल की तरह इस सामर्थ्य की शोध में संलग्न होकर उज्ज्वल भविष्य की एक नई सम्भावना को हस्तगत किया जा सकता है।
शब्द शक्ति के अनेकों प्रयोग हैं। जिह्वा से उच्चारण से लेकर वक्तृता तक, संगीत से लेकर नागयोग तक ऐसे अनेकों ऐसे पक्ष इसके हैं जिनका सुनियोजित उपयोग कर स्वयं को, वातावरण को एवं अन्यान्य प्राणियों को लाभान्वित किया जा सकता है। यही नहीं, शब्द शक्ति में जिस सूक्ष्मीकृत वाक् ऊर्जा का प्रयोग होता है, वह तथा यज्ञाग्नि में प्रयुक्त ऊर्जा दोनों मिलकर एक और समर्थशक्ति को जन्म देते हैं। इस सारे ज्ञान-विज्ञान का ऊहापोह इस छोटे से लेख में संभव नहीं है।
बूढ़े भूतकाल की गाथाएँ सुनाते हैं। बच्चे भविष्य की कल्पनाओं में निरत रहते हैं। किन्तु जो जवान हैं वे सिर्फ आज की बात सोचते और आज के शक्य कार्य करते हैं।
उपवास करने की परम्परा भारतीय संस्कृति में अति प्राचीन काल से ही चली आ रही है। विभिन्न मानसिकता वाले लोगों के लिए भिन्न-भिन्न दिनों किसी न किसी देवी-देवता के बहाने उपवास करने का विधान शास्त्रों में जोड़ा गया है। गुरुवार एवं रविवार के उपवास करना ही चाहिए। लगभग सभी भारतीय धर्मों में उपवास की महत्ता को स्वीकार किया गया है। मुसलमानों में रोजा इसी का परिचायक है। भारतीय साधना पद्धति में चान्द्रायण साधना को इसीलिए महत्व दिया गया है। शारीरिक-मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए, गन्दगी की सफाई के लिए उपवास का अपना अलग महत्व है।
अधिकांश लोगों का उपवास करने का कारण धार्मिक होता है। कुछ लोग चिकित्सकीय सलाह या अन्य कारणों से भी उपवास करते हैं। भोजन प्राणिमात्र के अस्तित्व के लिए आवश्यक है इसलिये उपवास प्रकृति के विपरीत होते हैं, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं हैं। मानव−शरीर पर उपवास का प्रभाव सकारात्मक होता है या नकारात्मक यह जानने का प्रयास वैज्ञानिक समय-समय पर करते रहते हैं।
उपवास का शाब्दिक अर्थ भोजन का पूर्ण या आंशिक रूप से त्याग है। समाज में उपवास का भिन्न-भिन्न अर्थ लगाया जाता है। कुछ लोग उपवास में जल भी ग्रहण नहीं करते (जैसे निर्जला एकादशी के दिन), तो कुछ लोग परम्परागत अनाज को छोड़कर फलादि खाते हैं। कुछ लोग एक समय भोजन करने को ही उपवास मानते हैं। किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से जल के अतिरिक्त कुछ भी ग्रहण नहीं करना उपवास की श्रेणी में आता है। पातंजलि के योग सिद्धान्तों में भी उपवास की महत्ता को स्वीकारा गया है। बापू जी का लम्बा व्रत सुप्रसिद्ध है। विनोबा भावे भी उपवास किया करते थे। नव-रात्रि के दिनों में ऋतु परिवर्तन के कारण उपवास एवं अनुष्ठान को हर मनुष्य के लिए अनिवार्य बताया गया है।
जो भोजन मुँह द्वारा अन्दर लेते हैं वह सीधे हमारे शरीर का भाग नहीं बन जाता। शरीर में मुँह से लेकर मलद्वार तक एक लम्बी नली पाई जाती है। मुँह से भोजन इस नली में जाता है।जब भोजन आहार नाल में धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, तो इसमें पाचक दस ऐंजाइम मिलते हैं। पाचक रसों के प्रभाव से भोजन के प्रमुख अंश विलय अवस्था में आ जाते हैं। जब भोजन आहार नाल के छोटी आँत वाले भाग में पहुँचता है तो भोजन के विलय अंश अवशोषित कर रक्त में मिला दिये जाते हैं। शेष भाग, मलाशय में मल के रूप में एकत्रित हो जाता है। रक्त में आए अंशों का शरीर के विभिन्न भागों में वितरण कर दिया जाता है।
छोटी आँत की भीतरी भित्ति पर पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए विशिष्ट प्रकार की रचनाएँ पाई जाती हैं जिन्हें सूक्ष्माँकुर कहते हैं। सूक्ष्माँकुर के कारण आँतों की भीतरी सतह का क्षेत्रफल बहुत बढ़ जाता है। भोजन के पचे हुए भाग को अवशोषित कर, उसे रुधिर में मिलाने की जिम्मेदारी मूलतः ये सूक्ष्माँकुर करते हैं, जब सूक्ष्माँकुर बनाने वाली कोशिकाएं वृद्ध हो जाती हैं, तो इनकी कार्य क्षमता भी क्षीण हो जाती हैं। अन्ततः ये कोशिकाएं मर जाती है तथा उनके स्थान पर नई कोशिकाएं बन जाती हैं। प्रतिस्थापन की इस प्रक्रिया में शरीर को बहुत अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। उपवास के समय पुरानी कोशिकाओं को ही पुनः प्रभावकारी बना दिया जाता है। तथा कम खर्च करने में ही आहार नाल की अवशोषण प्रक्रिया सही बनी रहती है।
उपवास हमारे शरीर की ऐंजाइम प्रणाली को सक्रिय बनाये रखने में सहायक होते हैं। पाचन क्रिया के फलस्वरूप भोजन की अतिरिक्त मात्रा को ग्लाइकोजीन व वसा में बदलकर शरीर में एकत्रित कर लिया जाता है। जब शरीर को भोजन नहीं मिलता तब जिगर में संग्रहित ग्लाइकोजीन व वसा को ग्लूकोज में बदल शरीर की ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखा जाता है। ग्लाइकोजीन व वसा को ग्लूकोज में बदलने की क्रिया एक विशिष्ट है यह ऐंजाइम तंत्र भी तभी सक्रिय होता है, जब शरीर भूखा होगा। उपवास करते रहने से इस ऐंजाइम तंत्र को सक्रिय बने रहने में मदद मिलती है। इसके विपरीत उपवास न करने की स्थिति में इस ऐंजाइम तंत्र के धीरे-धीरे निष्क्रिय होते चले जाने का खतरा रहता है।
उपवास का लाभ कैंसर रोकने में भी होता है। अमेरिका के स्वास्थ्य विज्ञानी डा. ग्रासीकराउप ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि शरीर में भोजन रूपी कैलोरी आपूर्ति कम होने पर जन्तुओं और मानव में कैंसर होने की आशंका कम हो जाती है। उपवास के बाद प्रीनि ओप्लास्टक कोशिकाओं के ही कैंसर कोशिकाओं में बदलने की आशंका रहती है।
इन प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट कहा जा सकता है उपवास शरीर के लिए नितान्त उपयोगी ही नहीं परम आवश्यक भी है। उपवास (इम्यूनिटी) भी बढ़ जाती है। मन भी पवित्र होता चला जाता है। इसीलिए उपवास को अनिवार्य बताया जाता है।
मनुष्य अपनी स्थिति और क्षमताओं को देखते हुए जितना परिपूर्ण दिखाई देता है, सृष्टि का अन्य कोई जीव भी कम परिपूर्ण नहीं है। यह बात अलग है कि मनुष्य को उपहार के रूप में कई विभूतियाँ प्राप्त हुई हैं जो अन्य प्राणियों के पास नहीं है, जो अन्य प्राणियों के पास नहीं है, लेकिन उन विभूतियों के साथ उत्तरदायित्वों की शर्त भी जुड़ी हुई है। यह नहीं सोचना चाहिए कि परमात्मा ने उसे किसी पक्षपात के कारण विभूतियाँ प्रदान की हैं और न यही यह मानकर इतराते फिरना चाहिए कि उसके जैसा बुद्धिमान और क्षमता वाला प्राणी अन्य कोई नहीं है। वरन् वास्तविकता यह है कि विश्व के अगणित जीवन-जन्तुओं में विविध प्रकार की क्षमताएँ पायी जाती हैं जिनसे मनुष्य बहुत पिछड़ा हुआ सिद्ध होता है।
उदाहरण स्वरूप प्रवासी पक्षियों को ही लिया जाय तो वे प्रति वर्ष लाखों की संख्या में हजारों मील की यात्रा करते हैं। इनमें सर्वाधिक दूरी की यात्रा “टर्न-अर्थात्-कुररी नामक समुद्री पक्षी करते हैं। ये पक्षी अधिकांशतः ध्रुव प्रदेशों के अतिशीत वाले स्थानों जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर उड़ान भरते हैं जहाँ उस समय ग्रीष्म ऋतु हुआ करती है। वे दक्षिणी ध्रुव में 74 डिग्री अक्षांश तक जा पहुँचते हैं। हवाई मार्ग से यह अन्तर 17600 किलोमीटर का है, किन्तु असहाय समझे जाने वाले ये प्राणी अपने लिए दाना पानी और आवास की सुविधा जुटाने तथा ऋतु काल में संतति वृद्धि आदि के लिए 64000 किलोमीटर तक दूरी प्रतिवर्ष अपने छोटे-छोटे डैनों के सहारे पूरी करते हैं। एक शताब्दी पूर्व तक हवाई यात्रा मानव के लिए एक कल्पना मात्र थी, पर आज इतनी वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद से पौन लाख किलोमीटर की दूरी पार करने के लिए मनुष्य को क्या-क्या और कितने साधन जुटाने पड़ेंगे और वह भी इतनी बड़ी संचा के लिए ? जबकि पक्षियों में यह प्रक्रिया सहज भाव से अनादि काल से होती आ रही है। न ईंधन की समस्या, न आवास की और न प्रदूषण की समस्या, पर आज तो मानवकृत समस्याओं का अम्बार लगा हुआ। कुररी, हंस फ्लेमिंगों आदि बड़े पक्षियों के प्रवास की तुलना में मात्र एक इंच से भी छोटी दो पंखों के बीच के अन्तर वाली अति स्वल्प पीली तितलियाँ प्रति वर्ष अफ्रीका से लेकर ब्रिटिश द्वीप समूहों तक 600 मील या एक हजार किलोमीटर की उड़ान भरती हैं। इन्हें रास्ते खाने पीने की भी कोई विशेष सुविधा नहीं रहती। मात्र फूलों के पराग के अतिरिक्त कुछ और आहार न लेने के कारण वे शारीरिक दृष्टि से पक्षियों जितनी समर्थ भी नहीं होतीं जहाँ कहीं फूल नहीं होते वहाँ वे अपने शरीर में एकत्रित वसा का उपयोग करते हुए आगे बढ़ती है। प्राणिशास्त्रियों का कहना है कि उन दिनों उड़ान के समय इनमें सर्वाधिक शक्ति की मात्रा खपत होती है। लेकिन प्रकृति ने पता नहीं उन्हें कौन सी अजीब क्षमता प्रदान की है कि इन उड़ानों में ये तितलियाँ अपने शरीर के वजन के केवल एक प्रतिशत वजन की वसा का ही प्रतिघंटा उपयोग करती हैं, जबकि मक्खियों को स्टार्च वाले पदार्थों का 35 प्रतिशत भाग प्रति घंटा उपयोग करना पड़ता है। प्रकृति प्रदत्त इस अद्भुत क्षमता के आगे वैज्ञानिक भी नतमस्तक हैं।
प्रवासी पक्षी प्रति वर्ष उन्हीं स्थानों की ओर उड़ान भरते हैं जहाँ उनके लिए आहर-विहार की सुविधा है। नर पक्षी मादाओं से पूर्व किसी एकाँत सुविधापूर्ण स्थान की तलाश करते हैं और वहाँ अपना अधिकार जमाते हैं। अन्य पक्षी भी मर्यादाओं का पालन करने में सहयोग देते हैं। केवल मनुष्य ही है जो अमर्यादित व्यवहार करने पर उतारू होता है और खोखला होकर मर्यादाहीनता को तो एक शान समझा जाने लगा है। वह डार्विन की मान्यता समर्थन करते देखे जाते हैं जिसे देखकर सारस, हंस, कौआ जैसे आजीवन एक पति और पत्नीव्रतधारी पक्षी भी लजा जाते हैं फलतः स्वच्छंद और अमर्यादित यौनाचार के कारण यौन रोगों से शिकार होने वाले मनुष्यों की संख्या असाधारण रूप से बढ़ रही है।
परिवार केवल मनुष्य ही नहीं बसाते, पशु-पक्षियों में भी पारिवारिकता पायी जाती है। प्रणय, नृत्य शृंगार सज्जा, उनके नृत्य आदि देखते ही बनते हैं। प्राणिशास्त्रियों के अनुसार प्रकृति ने पक्षियों को उनके आकार-प्रकार के अनुरूप न्यूनतम 450 से लेकर अधिकतम 25216 तक पंख दिये हैं। आकार में सर्वाधिक छोटा पक्षी मधुमक्खी की तरह गुजारा करने वाला “हमिंग बर्ड” होता है जो चोंच से लेकर पूँछ तक मात्र साढ़े पाँच सेन्टीमीटर का ही होता है। जो ओस्ट्रिच अर्थात् शुतुरमुर्ग की तुलना में एक बटा एक लाखवें भाग के बराबर हुआ करता है और इसका आकार उसकी आँख जितना होता है पेन्गुइन जैसे उड़ान न भरने वाले पक्षियों को छोड़कर वजन में सबसे भारी गूँगा-”म्युटस्वान” होता है जिसका वजन 23 किलो ग्राम से भी अधिक होता है। प्रवासी पक्षियों की तरह “ईल” मछलियों जैसे कितने ही जलचर जीव भी इसी प्रकार लम्बे प्रवास प्रति वर्ष करते हैं। छोटे-छोटे जीव-जन्तु भी ऐसे प्रवास करते देखे गये हैं। इनमें से रंग-बिरंगी तितलियों के बड़े-बड़े झुँड का प्रवास देखना अति मनोहारी दृश्य होता है। कहा जा चुका है कि ये प्राणी आकार में छोटे होते हैं फिर भी बड़े-बड़े पक्षियों को अपनी क्षमता में पीछे छोड़ देते हैं। छोटी तितलियाँ “तीड़ो” के बारे में वैज्ञानिकों ने उल्लेख किया है कि सन् 1958 के अक्टूबर माह में इन छोटे-छोटे रंग बिरंगे जीवों से इथियोपिया में एक हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भर गया था। इसी प्रकार नाइजीरिया में उनसे सूरज तक ढक गया था। इसी प्रजाति की तितलियाँ अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, दक्षिण चीन, फिलीपीन्स, श्रीलंका आदि देशों में पायी जाती हैं। इन तितलियों को भारत में सर्व प्रथम देखे जाने की घटना सन् 1902 की है। सुप्रसिद्ध कीट विज्ञानी सी.बी. विलियम्स ने इनके दक्षिण किया है। ये जीवनधारी एक देश से दूसरे देश को प्रवास तो करते ही हैं, एक ही देश के प्रान्तों में भी बड़ी संख्या में इन्हें प्रवास करते देखा जाता है। “फौना ऑफ ब्रिटिश इण्डिया” नामक ग्रंथ में जी. तालबोट ने लिखा है कि कुछ तितलियों को भीगी ऋतु अधिक प्रिय होती है, तो कुछ सितम्बर-अक्टूबर जैसे उतार-चढ़ाव वाले मौसम से घबराती और उत्तर भारत से दक्षिण भारत में जलवायु की ओर दीर्घकाल प्रवास पर निकल जाती हैं। जब दखिण भारत में स्थिति अधिक अनुकूल होती है उस समय इनके झुँड के झुँड वहाँ जा बसते हैं और अपनी वंश वृद्धि करते हैं।
हंस और कौआ के सम्बन्ध में कितनी ही लोक गाथाएँ प्रचलित हैं। इनके वार्तालाप को केवल मनोरंजन और गप्प माना जाता है, लेकिन जीवनशास्त्रियों के गहन अध्ययन से अब यह सिद्ध हो गया है कि यह ‘विहेविअरल साइन्स’ को अलंकारिक भाषा समझ सकते हैं। एक अन्य कथानक में पक्षियों को बहुत चालाक बताया गया है। उसके अनुसार ‘कपिल’ नामक एक हंस अपने साथियों के साथ सुदूर देशों के प्रवास के लिए चला था। रास्ते में “उपद्रवी” नामक कौवे से भेंट हो गयी। वह अकारण ही कहने लगा कि तुम लोग यदि लम्बे प्रवास की श्रेष्ठता का अभिमान करते हो तो चला हमारी तुम्हारी प्रतिद्वन्द्विता हो जाय। हंसों के कुछ उत्तर न देने पर भी उपद्रवी बगल में उड़ने लगा। अभी कुछ ही दूर उड़ा होगा कि कौवे के पंख ढीले पड़ गये। अपने ही कृत्य पर उसकी आँखें डबडबा आयीं। हंसों में से एक ने से अपनी पीठ पर बिठा लिया और उसको गंतव्य स्थान तक पहुँचा दिया। इस घटना से प्राचीन लोगों की यह मान्यता ही सत्यापित होती है कि हंस सरल और निष्कपट होता है, जबकि कौआ चालाक और कपटी हुआ करता है। इतने पर भी वह अपनी बिरादरी का बहुत हितैषी होता है। पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि आहार देखकर कौआ कभी अकेला उसे नहीं खायेगा। वरन् सभी साथियों को पहले बुलाएगा और तब खायेगा। जब किसी कौए की मृत्यु हो जाती है तो सारी बिरादरी एकत्रित हुए बिना नहीं रहती। मृतक के प्रति इतना गहरा शोक प्रदर्शित करने में मनुष्य भी पीछे छूट जाता है।
अपने मस्तिष्कीय क्षमता और हस्तकौशल से विभिन्न प्रकार के यंत्र उपकरण या औजार बना लेने पर यदि मनुष्य अपने को बुद्धिमान तथा सृष्टि के इतर प्राणियों को बुद्धिहीन माने तो यह उसकी वज्र मूर्खता ही कही जायगी। इतनी प्रगति कर लेने पर भी वह वह एक छोटी सी चिड़िया “बया” की कुशलता तक को प्राप्त नहीं कर सका है। बया पक्षी अपने घोंसले के लिए प्रसिद्ध है। इसी तरह ओवन पक्षी-जिसे कुम्हार पक्षी भी कहा जाता है, अपनी चोंच से घड़े जैसा मिट्टी का गोल घोंसला बना लेता है। बुद्धिमत्ता से मिश्र में पाया जाने वाला गिद्ध जाति का पक्षी सबसे आगे है। यह पक्षी शुतुरमुर्ग के अंडों का बहुत शौकीन है। लेकिन इसके अण्डे का कवच इतना कठोर होता है कि उसकी चोंच तो टूट जाती है, पर कवच नहीं टूटता। अतः वह अपनी चोंच में एक पत्थर लेकर उसे इस प्रकार से अण्डे पर दे मारता है कि अण्डा फूट जाता है। कठफोड़वा पक्षी तो अपनी चोंच से घड़े जैसा मिट्टी का गोल घोंसला बना लेता है। बुद्धिमत्ता में मिश्र में पाया जाने वाला गिद्ध जाति का पक्षी सबसे आगे है। यह पक्षी शुतुरमुर्ग के अण्डों का बहुत शौकीन है, लेकिन इस अण्डे का कवच इतना कठोर होता है कि उसकी चोंच तो टूट जाती है, पर कवच नहीं टूटता। अतः वह अपनी चोंच तो टूट जाती है, पर कवच नहीं टूटता। अतः वह अपनी चोंच में एक पत्थर लेकर उसे इस प्रकार से अण्डे पर दे मारता है कि अण्डा फूट जाता है। कठफोड़वा पक्षी तो अपनी चोंच से कुशल बढ़ई का काम कर लेता है। विकासवादी वैज्ञानिक डार्विन ने भी गलपगा द्वीप में “फ्लिन्थ” नाम एक बुद्धिमान प्राणी का वर्णन किया है जो दरारों में छिपे हुए कीड़ों को निकलने के लिए लकड़ी की टहनियों का उपयोग करता था। अमेरिका में कुछ गिलहरियां ऐसी भी पायी जाती हैं जो पेड़ों पर तो चढ़ ही लेती हैं अवसर आने पर आकाश में भी उड़ लेती हैं मलाया आदि देशों में छिपकलियों एवं साँपों की कुछ प्रजातियाँ हवा में उड़ने के लिए विश्व विख्यात हैं। इसी तरह पेलमीक मछलियाँ भी आकाश में उड़ने के लिए प्रसिद्ध है। इतना ही नहीं, उड़ते समय वे स्थान विशेष पर ठहरना चाहें तो अपने पंखों को हवा में लहराते हुए ठहर भी जाती हैं। इतनी उन्नत किस्म की उड़ान भरने वाले विमान तो अभी मनुष्य ने भी नहीं बनाये हैं।
जन्तु जगत में सांप को सर्वाधिक जहरीला प्राणी माना जाता है तो पदार्थों में पोटेशियम साइनाइड को, किन्तु जापान में पाई जाने वाली “फ्युग” मछली का विष पोटेशियम सायनाइड से भी 245 गुना अधिक तेज होता है। पिछले दस वर्षों में अकेले जापान में इसे खाने से 200 से अधिक लोग मर चुके हैं। इसकी विशेषता यह है कि जब भी इसे खतरे का आभास होता है वह अपनी फोम जैसी पारदर्शी त्वचा में हवा और पानी भरकर एकदम बड़ी गेंद या फुटबाल जैसी आकृति बना लेती है। खतरा टलने का आभास मिल मिलते ही हवा और पानी को बाहर निकाल देती और फिर से सामान्य आकार ग्रहण कर लेती है। गेंदनुमा आकार वाली इस मछली का स्पर्श कष्टप्रद मौत को आमंत्रण देता है। स्पर्श करने वाले के हाथ पैर सुन्न हो जाते हैं। उसके सोचने की क्षमता तो पूर्ववत् रहती है पर वह व्यक्ति बोल नहीं पाता। जापान का शिमोनेस्की नगर तो फ्युग नगर के नाम से ही जाना जाता है जहाँ इन मछलियों की खरीद फरोख्त होती है। यहाँ के बहुत से सार्वजनिक उद्यानों फ्युग मछलियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। इसी तरह मिश्र में ईसा से 2700 वर्ष पूर्व के राजाओं के मकबरे पर भी इन मछलियों के चित्र मिलते हैं। मनुष्येत्तर प्राणियों की यह विशेषताएं बताती हैं कि स्रष्टा ने छोटे-छोटे इन प्राणियों को जो विशेषताएं दी हैं, उनकी तुलना में मनुष्य अभी भी पिछड़ा हुआ है। यह पक्षपात का नहीं, वरन् ईश्वर की न्यायप्रियता का द्योतक है।
अपनी अंगुलियों से नापने पर 96 अंगुल लम्बे इस मनुष्य−शरीर में जो कुछ है, वह एक बढ़कर एक आश्चर्यजनक एवं रहस्यमय है। हमारी शरीर यात्रा जिस रथ पर सवार होकर चल रही है उसके प्रत्येक अंग-अवयव या कलपुर्जे कितनी विशिष्टतायें अपने अन्दर धारण किये हुए है, इस पर हमने कभी विचार ही नहीं किया। यद्यपि हम बाहर की छोटी-मोटी चीजों को देखकर चकित हो जाते हैं और उनका बढ़ा-चढ़ा मूल्याँकन करते हैं, पर अपनी ओर, अपने छोटे-छोटे कलपुर्जों की महत्ता की ओर कभी ध्यान तक नहीं देते। यदि उस ओर भी कभी दृष्टिपात किया होता तो पता चलता कि अपने छोटे से छोटे अंग अवयव कितनी जादू जैसी विशेषता और क्रियाशीलता अपने में धारण किये हुए हैं। उन्हीं के सहयोग से हम अपना सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन जी रहे हैं। विशिष्टता हमारी काया के रोम-रोम में संव्याप्त है। आत्मिक गरिमा तथा शरीर की सूक्ष्म एवं कारण सत्ता को जिसमें पंचकोश, पाँच प्राण, कुण्डलिनी महाशक्ति, षट्चक्र, उपत्यिकाएँ आदि सम्मिलित हैं, की गरिमा पर विचार करना पीछे के लिए छोड़कर मात्र स्थूलकाय संरचना और उसकी क्षमता पर विचार करें तो इस क्षेत्र में भी सब कुछ अद्भुत दीखता है। वनस्पति तो क्या-मनुष्येत्तर प्राणि शरीरों में भी वे विशेषताएं नहीं मिलतीं जो मनुष्य के छोटे और बड़े अवयवों में सन्निहित हैं। कलाकार ने अपनी सारी कला को इसके निर्माण में झोंक दिया है।
शरीर रचना से लेकर मनःसंस्थान और अन्तःकरण की संवेदनाओं तक सर्वत्र असाधारण ही असाधारण दृष्टिगोचर होता है। यदि हम कल्पना करें और वैज्ञानिक दृष्टि से आँखें उघाड़ कर देखें तो पता चलेगा कि मनुष्य−शरीर के निर्माण में स्रष्टा ने जो बुद्धि, कौशल खर्च किया तथा परिश्रम जुटाया, वह अन्य किया तथा परिश्रम जुटाया, वह अन्य किसी भी शरीर के लिए नहीं किया। मनुष्य सृष्टि का सबसे विलक्षण उत्पादन है। ऐसा आश्चर्य और कोई दूसरा नहीं है। यह सर्व क्षमता संपन्न जीवात्मा का अभेद्य दुर्ग, यंत्र एवं वाहन है। यह जिन कोषों से बनता है, उसमें चेतन परमाणु ही नहीं होते, वरन् दृश्य जगत में दिखाई देने वाली प्रकृति का भी उसमें योगदान है। इससे मनुष्य−शरीर की क्षमता और मूल्य और भी बढ़ जाता है। ठोस द्रव और गैस जल, आक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन सिल्वर, सोना, लोहा, फास्फोरस आदि जो कुछ भी तत्व पृथ्वी में हैं और जो कुछ पृथ्वी में नहीं हैं, अन्य ग्रह नक्षत्रों में हैं, वह सब भी स्थूल और सूक्ष्म रूप में शरीर में है। जिस तरह वृक्ष में कहीं तने, कहीं पत्ते, कहीं फल एक व्यापक विस्तार में होते हैं,शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में उसी प्रकार विभिन्न लोक और लोकों की शक्तियां विद्यमान देखकर ही शास्त्रकार ने कहा था-’यत्ब्रह्माण्डेतत्पिंडे’ ब्रह्माण्ड की संपूर्ण शक्तियां मनुष्य−शरीर में विद्यमान हैं। सूर्य चन्द्रमा, बुद्ध, बृहस्पति, उत्तरायण, दक्षिणायन मार्ग, पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु, विद्युत, चुम्बकत्व, गुरुत्वाकर्षण आदि सब शरीर में हैं। यह समूचा विराट् जगत अपनी इसी काया के भीतर समाया हुआ है।
आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि जो विशेषताएं और सामर्थ्य प्रकृति ने मनुष्य को प्रदान की हैं, वह सृष्टि के किसी भी प्राणी-शरीर को उपलब्ध नहीं। गर्भोपनिषद् के अनुसार मानवी काया में 180 संधियाँ, 107 मर्मस्थान, 109 स्नायु, और 700 शिरायें हैं। 500 मज्जायें, 306 हड्डियाँ, साढ़े चार करोड़ रोक, 8 पल हृदय, 12 पल जिह्वा, एक प्रस्थ पित्त, एक आढ़क कफ, एक कुड़वशुक्र, दो प्रस्थ मेद हैं। इसके अतिरिक्त आहार ग्रहण करने व मल मूत्र निष्कासन के जो अच्छे से अच्छे यंत्र इस शरीर में लगे हैं, वह अन्य किसी भी शरीर में नहीं है।
स्थूलशरीर पर दृष्टि डालने से सबसे पहले त्वचा नजर आती है। शरीरशास्त्रियों के अनुसार प्रत्येक वयस्क व्यक्ति के त्वचा का भार लगभग 9 पौण्ड होता है जो कि प्रायः मस्तिष्क से तीन गुना अधिक है। यह त्वचा 18 वर्ग फुट से भी अधिक जगह घेरे रहती है। मोटे तौर से देखने पर वह ऐसी लगती है मानों शरीर पर कोई मोमी कागज चिपका जो, परन्तु बारीकी से देखने पर पता चलता है कि उसमें भी एक पूरा सुविस्तृत कारखाना चल रहा है। शरीर पर इसका क्षेत्रफल लगभग 250 फुट होता है। सबसे पतली वह पलकों पर होती है- .5 मिलीमीटर। पैर के तलुवों में सबसे मोटी है- 6 मिलीमीटर। साधारणतया उसकी मोटाई 0.3 से लेकर 300 मिलीमीटर तक होती है। एक वर्ग इंच त्वचा में प्रायः 72 फुट लम्बी तंत्रिकाओं का जाल बिछा रहता है। इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई नापी जाय तो वे भी 12 फुट लम्बी तंत्रिकाओं का जाल बिछा होता है। इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई नापी जाय तो वे भी 12 फुट से कम न बैठेगी। यह रक्तवाहनियां सर्दी में सिकुड़ती और गर्मियों में फैलती रहती है ताकि शारीरिक तापमान का संतुलन ठीक बना रहे। चमड़ी की सतह पर प्रायः 3 लाख स्वेद ग्रंथियाँ और अगणित छोटे-छोटे बारीक छिद्र होते हैं। इन रोमकूपों से लगभग एक पौण्ड पसीना प्रति दिन बाहर निकलता रहता है। त्वचा के भीतर बिखरे ज्ञान तन्तुओं को यदि एक लाइन में रख दिया जाय तो वे 45 मील लम्बे होंगे। त्वचा से ‘सीवम’ नामक एक विशेष प्रकार का तेल निकलता रहता है। यह सुरक्षा और सौंदर्य वृद्धि के दोनों ही कार्य करता है। उसकी रंजक कोशिकायें ‘मिलेनिन’ नामक रसायन उत्पन्न करती है। यही चमड़ी को गोरे, काले भूरे आदि रंगों से रंगता रहता है। त्वचा देखने में एक प्रतीत होती है, पर उसके तीन मोटे विभाग किये जा सकते हैं- ऊपरी त्वचा, भीतरी त्वचा तथा सब क्युटेनियम टिष्यू। नीचे वाली परत में रक्त वाहिनियाँ, तंत्रिकाएँ एवं वसा के कण होते हैं। इन्हीं के द्वारा चमड़ी हड्डियों से चिपकी रहती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ जब यह वसा कण सूखने लगते हैं तो त्वचा पर झुर्रियाँ लटकने लगती हैं। भीतरी त्वचा पर में तंत्रिकाएँ, रक्तवाहनियां रोमकूप, स्वेद ग्रंथियाँ तथा तेल ग्रंथियाँ होती हैं। इन तंत्रिकाओं को एक प्रकार से संवेदना वाहक टेलीफोन के तार कह सकते हैं। वे त्वचा स्पर्श की अनुभूतियों को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं और वहाँ के निर्देश- संदेशों को अवयवों तक पहुँचाते हैं। त्वचा कभी भी झूठ नहीं बोलती। झूठ पकड़ने की मशीन-’लाय डिटेक्टर या पोली ग्राफ मशीन’ इस सिद्धान्त पर कार्य करती है कि दुराव-छिपाव से उत्पन्न हार्मोनिक परिवर्तनों के फलस्वरूप त्वचा के वैद्युतीय स्पंदन एवं रग में जो परिवर्तन या तनाव उत्पन्न होता है, वह सारे रहस्यों को उजागर कर देता है।
साँप की केंचुली सबने देखी है। जिस प्रकार सांप अपनी केंचुली बदलता है, उसी प्रकार हम भी अपनी त्वचा हर-चौथे पाँचवें दिन बदल देते हैं। होता यह है कि हमारी शारीरिक कोशिकायें करोड़ों की संख्या में प्रति मिनट के हिसाब से मरती रहती हैं और नयी कोशिकायें पैदा होती रहती हैं और इस प्रकार केंचुली बदलने का क्रम चलता रहता है। यह क्रम बहुत हलका और धीमा होने से हमें दिखाई नहीं पड़ता। इस तरह जिन्दगी भर में हमें हजारों बार अपनी चमड़ी की केंचुली बदलनी पड़ती है। यही हाल आँतरिक अवयवों का भी है। किसी अवयव का कायाकल्प जल्दी-जल्दी होता है तो किसी का देर में धीमे-धीमे। यह परिवर्तन अपनी पूर्वज कोशिकाओं के अनुरूप ही होता है, अतः अंतर न पड़ने से यह प्रतीत नहीं होता कि पुरानी के चले जाने और नयी स्थानापन्न होने जैसा कुछ परिवर्तन हुआ है।
त्वचा के भीतर प्रवेश करें तो मांसपेशियों का सुदृढ़ ढांचा खड़ा मिलता है। उन्हीं के आधार पर शरीर का हिलना डुलना, मुड़ना, चलना, फिरना संभव हो रहा है।शरीर की सुन्दरता, सुदृढ़ता और सुडौलता बहुत करके मांसपेशियों की संतुलित स्थिति पर ही निर्भर रहती है। मांसपेशियों की बनावट एवं वजन के हिसाब से ही मोटे और पतले आदमियों की पहचान होती है। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में 600 से अधिक मांसपेशियां होती हैं और उनमें से प्रत्येक के अपने विशिष्ट कार्य होते हैं। इनमें से कितनी ही अविराम गति से जीवन पर्यंत तक अपने कार्य में जुटी रहती हैं, यहाँ तक कि सोते समय भी, जैसे कि हृदय का धड़कना, फेफड़ों का सिकुड़ना-फैलना, रक्त संचार, आहार का पचना आदि की क्रियायें अनवरत रूप से चलती रहती हैं। 30 माँस पेशियां ऐसी होती हैं जो खोपड़ी की हड्डियों से जुड़ी होती है और चेहरे भाव परिवर्तन में सहायता करती हैं। शैशव अवस्था में प्रथम तीन वर्ष तक मांसपेशियों का विकास हड्डियों से भी अधिक दो गुनी तीव्र गति से होता है इसके बाद विकास की गति कुछ धीमी पड़ जाती है जब शरीर में अचानक परिवर्तन उभरते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। संरचना में प्रत्येक मांसपेशी अनेकों तन्तुओं से मिलकर बनी होती है। वे बाल से भी पतले होते हैं, पर मजबूत इतने कि अपने वजन की तुलना में एक लाख अधिक भारी वजन उठा सके।
इन अवयवों में से जिस पर भी तनिक गहराई से विचार करें तो उसी में विशेषताओं का भण्डार भरा दीखता है। यहाँ तक कि बाल जैसी निर्जीव और बार-बार खर-पतवार की तरह उखाड़-काट कर फेंक दी जाने वाली वस्तु भी अपने आप में अद्भुत हैं।
प्रत्येक मनुष्य का शरीर असंख्य बालों से (लगभग साढ़े चार करोड़) ढका होता है, यद्यपि वे सिर के बालों की अपेक्षा बहुत छोटे होते हैं। सिर में औसतन 120000 बाल होते हैं। प्रत्येक बाल त्वचा से एक नन्हें गढ्ढे से निकला है जिसे रोमकूप कहते हैं। यहीं से बालों को पोषण होता है। बालों की वृद्धि प्रतिमास तीन चौथाई इंच होती है, इसके बाद वह घटती जाती है। जब बाल दो वर्ष के हो जाते हैं तो उनकी गति प्रायः रुक जाती है। किसी के बाल तेजी से और किसी के धीमी गति से बढ़ते हैं। प्रत्येक सामान्य बाल की जीवन-अवधि लगभग 3 वर्ष होती है, जब कि आँख की बरोनियों की प्रायः 150 दिन ही होती है। आयु पूरी करके बाल अपनी जड़ से टूट जाते हैं और उसके स्थान पर नया बाल उगता है।
शरीर के आन्तरिक अवयवों की रचना तो और भी विलक्षण होती है। उसकी सबसे बड़ी एक विशेषता तो यही है कि वे दिन-रात अनवरत रूप से क्रियाशील रहते हैं-गति करते रहते हैं। उनकी क्रियायें एक क्षण के लिए भी रुक जायँ तो जीवन संकट तक उपस्थित हो जाता है। उदाहरण के लिए रक्त परिवहन संस्थान को ही लें। हृदय की धड़कन के फलस्वरूप रक्त संचार होता है और जीवन के समस्त क्रिया-कलाप चलते हैं। यह रक्त प्रवाह नदी-नाले की तरह नहीं चलता वरन् पंपिंग स्टेशन जैसी विशेषता उसमें रहती है। हृदय के आकुँचन-प्रकुँचन प्रक्रिया के स्वरूप ही ऊपर-नीचे-समस्त अंग अवयवों में रक्तप्रवाह होता रहता है। सारे शरीर में रक्त की एक परिक्रमा प्रायः 90 सेकेंड में पूरी हो जाती है। हृदय और फेफड़े की दूरी पार करने उसे मात्र 6 सेकेंड में पूरी हो जाती है। हृदय और फेफड़े की दूरी पार करने में उसे मात्र 6 सेकेंड लगते हैं, जबकि मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने में 8 सेकेंड लग जाते हैं। रक्त प्रवाह रुक जाने पर भी हृदय 5 मिनट और और अधिक जी लेता है, पर मस्तिष्क 3 मिनट में ही बुझ जाता है। हार्ट अटैक हृदयाघात की मृत्युओं में प्रधान कारण धमनियों से रक्त की सप्लाई रुक जाना होता है। रक्त प्रवाह संस्थान का निर्माण करने वाली रक्तवाही नलिकाओं की कुल लम्बाई 60 हजार मील है जो कि पृथ्वी के धरातल की दूरी है। औसत दर्जे के मानवी काया में प्रायः 5 से 6 लीटर तक रक्त रहता है। इसमें से 5 लीटर तो निरंतर गतिशील रहता है और एक लीटर आपत्ति-कालीन आवश्यकता के लिए सुरक्षित रहता है। 24 घंटे में हृदय को 13 हजार लीटर रक्त का आयात-निर्यात करना पड़ता है। 10 वर्ष में इतना खून फेंका-समेटा जाता है जिसे एक बारगी यदि इकट्ठा कर लिया है जिसे एक बारगी यदि इकट्ठा कर लिया जाय तो उसे 400 फुट घेरे की 80 मंजिली टंकी में ही भरा जा सकेगा। इतना श्रम यदि एक बार ही करना पड़े तो उसमें इतनी शक्ति लगानी पड़ेगी जितनी 10 टन बोझ जमीन से 50 हजार फुट तक ऊपर उठा ले जाने में लगानी पड़ेगी।शरीर में जो तापमान रहता है, उसका कारण रक्त प्रवाह से उत्पन्न होने वाली ऊष्मा ही है। रक्त संचार की दुनिया इतनी सुव्यवस्थित और महत्वपूर्ण है कि यदि उसे ठीक तरह से समझा जा सके और उसके उपयुक्त रीति-नीति अपनायी जा सके तो सुदृढ़ और सुविकसित दीर्घ जीवन प्राप्त किया जा सकता है।
त्वचा, मांसपेशियां रक्त परिसंचरण प्रणाली ही नहीं शरीर संस्थान का एक-एक घटक अद्भुत और विलक्षण है। 5 फीट 6 इंच की इस मानवी काया में परमात्मा ने इतने अधिक आश्चर्य भर दिये हैं कि उसे देव मंदिर कहने और मानने में कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
इक्कीसवीं सदी महान परिवर्तनों की धुरी है। इस महान परिवर्तन का सबसे बड़ा पक्ष यह है कि एक ओर जहाँ सृजनात्मक शक्तियां जोर-जोर से उज्ज्वल भविष्य के सरंजाम खड़ी कर रही होंगी, वहीं दूसरी ओर ध्वंसात्मक शक्तियां मरते-मरते भी इतना कुछ कर गुजरेंगी जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ सैकड़ों वर्षों तक याद रखेंगी। यह एक तथ्य भी है और वास्तविकता भी, जिसे एक चेतावनी के रूप में लिया और तद्नुरूप अपने चिन्तन, चेतन एवं क्रिया-कलापों में परिवर्तन करके उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित संभावना को साकार करने में सहायक भी बना जा सकता है।
अगला समय संकटों से भरापूरा है; इस बात को विभिन्न मूर्धन्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न प्रकार से जोरदार शब्दों में कहा है। पाश्चात्य देशों में जिन भविष्य वक्ताओं की भविष्य-वाणियाँ निन्यानवे प्रतिशत सही निकलती रही है, उनमें जीन डिक्सन, रुथमौअगोमरी आदि साथ डा. एलेक्स टेनस का नाम भी जोड़ा जा सकता है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बियोन्ड कोइन्सिडेन्स’ में उन्होंने लिखा है कि पूर्वानुमान और भविष्य वाणी एक ही की है। भविष्यवाणी की विशेषता बताते हुए वे लिखते हैं कि पूर्वकथन व्यक्ति विशेष या समूह विशेष या कुछ सौ व्यक्तियों के बारे में हुआ करता है, जबकि भविष्यवाणी का सम्बन्ध समूचे राष्ट्रों से, महाद्वीपों से, समस्त मानव जाति या समग्र धरती से होता है। मेरी यह भविष्यवाणी समूचे मानव जीवन से संबंधित है।
सन् 1967 के अक्टूबर माह में जब वे वाशिंगटन के कैथोलिक विश्वविद्यालय में थे, तब एक दिन आराम कुर्सी पर बैठे अपने साथियों से बातचीत कर रहे थे। अचानक उनकी आँखें किसी दूरवर्ती दृश्य को देखते हुए स्थिर हो गयी और बरबस यह शब्द मुँह से निकल पड़े-- “मानव जाति, आज आज जो पथभ्रष्ट हो गयी है, उसे चेतावनी देने के लिए अगले दिनों एक ऐसी घटना जिसे समूचा विश्व देखेगा।” इस घटना ने डा. टेनस को अन्दर से झकझोर कर रख दिया। वे यह सोचने लगे कि क्या यह संकेत वास्तविक है या केवल मन की कल्पना मात्र। सन् 1972 में वे जब पेरिस के चेपल आफ एपिरियन्स चर्च में गये तब उन्हें उक्त भविष्यवाणी का समाधान मिल गया। उन्हें अन्तर्बोध हुआ कि सन् 2000 से पूर्व के कुछ वर्ष समूची मानव जाति के लिए जीवन मरण के दिन हैं। इन दिनों मनुष्य जाति को सर्वनाशी विभीषिकाओं का सामना करना पड़ेगा, इतने पर भी भौतिक घटनाओं की अपेक्षा विश्व की मानव जाति और धर्मतंत्र के लिए यह एक भव्य मोड़ का समय होगा। विश्व के विभिन्न धर्मों-संस्कृतियों के मिलन की दिशा में यह एक अनूठा कदम होगा। इसके लिए जो कुछ करना आवश्यक है, वह मार्ग भी सुझाई देगा और विचारशील लोगों द्वारा पराक्रम पूर्वक किया भी जायेगा। यह समय अब निकट है। जाति, लिंग, वर्ण, धन, भाषायें, धार्मिक मान्यताओं आदि के प्रकरण बरती जाने वाली विषमता का अन्त समय अब निकट आ गया। शस्त्र बल और धन बल की अपेक्षा इस नये युग में बुद्धि बल एवं संगठन का प्रभाव प्रत्यक्ष होगा।
अमेरिका की हरवर्ड यूनिवर्सिटी के सुप्रसिद्ध खगोल विज्ञानी ऐरिक जो. चैसन ने इस नये युग को “ए होल न्यू ऐरा” के नाम से सम्बोधित किया है। अपनी पुस्तक “कॉस्मिक डॉन” में उनने लिखा है कि ब्रह्माण्डीय योजना के अंतर्गत बीसवीं शताब्दी के अंत तक विशिष्ट प्रकार के अन्तरिक्षीय परिवर्तन होंगे। सूक्ष्म खगोल भौतिकी एवं जैव रासायनिक प्रक्रिया को देखकर यही कहा जा सकता है कि विश्व-ब्रह्माण्ड में एक नये प्रकार का परिवर्तन होगा जिसके अनुरूप मनुष्य को अपनी गतिविधियों का निर्धारण करना होगा। पदार्थ सत्ता के स्थान पर चेतन सत्ता की महत्ता को सर्वोपरि मानना होगा। चैसन ने इस नयी सभ्यता के शुभारंभ को “टेक्नोलॉजी सभ्यता के शुभारंभ को “टेक्नोलॉजीकली इन्टेलीजेन्ट लाइफ” नाम दिया है। उनके अनुसार इस नयी सभ्यता का आरंभ अपनी इसी पृथ्वी पर होगा जो अन्य ग्रह गोलकों की अपेक्षा कहीं अधिक व्यवस्थित एवं सुन्दर है। इस युग को उनने “लाइफ ऐरा” कहा है, जबकि आज के युग को “मैटर ऐरा” की संज्ञा दी है। ब्रह्माण्डीय परिवर्तन का वह चक्र बिलकुल समीप आ चुका है जिसमें पदार्थ की अपेक्षा चेतन तत्व को ही जीवन का मूल भूत आधार मानकर मनुष्य अपनी जीवनचर्या का निर्धारण करेगा। ब्रह्माण्ड की इस विशिष्ट परिवर्तन प्रक्रिया को उनने “कोस्मिकरिइनकार्नेषन” के नाम संबोधित किया है। इक्कीसवीं सदी का शुभारंभ यहीं से होने वाला है। ऐसी स्थिति में लोगों में नयी सूझबूझ और जागृति आयेगी और वे परस्पर स्नेह सहयोग और सद्भाव के साथ जीवन जी सकेंगे। ‘दि वन्डरफल वर्ल्ड टुमारो’ नामक अपनी कृति में हरबर्ट डब्ल्यू ओर्म्स स्ट्राँग ने भी इसी तरह बाइबिल के ईसाम ( 2:10-12-17) का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि “तब लोगों में घृणा, ईर्ष्या, और विद्वेष की वृत्तियाँ समाप्त होकर स्नेह-सद्भाव जगेगा। इक्कीसवीं शताब्दी में धरती पर जिस स्वर्ग की कल्पना की गयी है, वह मनुष्य में दैवीय गुणों के विकास से ही संभव हो सकेगी।”
अमेरिका की श्रीमती जीन डिक्सन की गणना विश्व के ख्यातिलब्ध भविष्य वेत्ताओं में प्रमुख रूप से की जाती है। उनके द्वारा महत्वपूर्ण घटनाओं के भविष्य कथन की सार्थकता को देखते हुए सन् 1970 में अमेरिका तथा विश्व के 300 से अधिक दैनिक समाचार पत्रों ने उनकी भविष्यवाणियों को प्रकाशित किया था। अमेरिका की ही सुप्रसिद्ध भविष्यवाणियों उल्लेख किया है जो सच्चाई की कसौटी पर खरी सिद्ध हुई है। चीन में साम्यवाद की स्थापना, अफ्रीकी समस्या, भारत का विभाजन और गाँधी जी की हत्या के सम्बन्ध में उनने जो पूर्व कथन किये थे, समयानुसार लोगों को ठीक वैसा ही देखने को मिला। अपनी एक अन्य कृति ”द काँल टू ग्लोरी” में उनने बताया है कि निकट भविष्य में एक ऐसा समय भी आयेगा जिसमें संसार का हर प्राणी अपने को मुक्त मानेगा। संसार के इस स्वरूप को उनने “यूनीफाइट वर्ल्ड” के नाम से पुकारा है और कहा है कि शीघ्र ही धार्मिक एकता-यूनिटी आफ रिलीजन का युग निश्चित ही आयेगा। रुथ मौंटगोमेरी को अतीन्द्रिय क्षमता’सम्पन्न महिला माना जाता है। उनका कहना है कि भविष्य के अंदर झाँकने और उसके स्वरूप को समझ सकने की क्षमता उन्हें अशरीरी दिव्य आत्माओं से प्राप्त होती है। इस अलौकिक चेतना को उनने “वाक-इन्स” के नाम से संबोधित किया है। प्रागैतिहासिक दिव्य आत्माएँ भी उक्त प्रयोजन की आपूर्ति में सहयोगी होती हैं। सन् 1981 में मिश्र के राष्ट्राध्यक्ष अनवर सादात की हत्या, अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के शासनकाल में “वाटरगेट काण्ड” ईरान के बादशाह के अपदस्थ होने की उनकी भविष्यवाणियाँ अक्षरशः सत्य निकली थीं। मौंटगोमेरी ने दिव्य जीवन एवं इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य के सम्बन्ध में कई पुस्तकें लिखी हैं। जिनमें से प्रमुख है (1) ‘हियर एण्ड हियर आफ्टर’ (2) ‘ए सर्च फार द ट्रूथ’ ‘ (3) ‘स्ट्रेर्न्जस एमाँग अस’ (4) ‘द वर्ल्ड बिफोर’ एमाँग अस’ (5) ‘ए वर्ल्ड बियोन्ड’ (6) ‘थ्रेस होल्ड टू टूमारो’ आदि।
अपनी कृति “थ्रैस होल्ड टू टूमारो” के अन्तिम अध्याय में विस्तारपूर्वक उज्ज्वल भविष्य के सम्बन्ध में उनने प्रकाश डाला है। इस नये युग को उनने “ऐक्वेरियन एज” के नाम से संबोधित किया है। उनके अनुसार बीसवीं सदी के अन्तिम कुछ वर्ष में में एक ओर जहाँ विध्वंसकारी गतिविधियाँ भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर ने केवल उन पर काबू पा लेंगी, वरन् नयी सृष्टि की रचना में भी समर्थ होंगी। इन्हीं दिनों भौतिकवाद की प्रधानता वाली मान्यता भी अपनी अन्तिम साँसें गिन रहीं होंगी और इक्कीसवीं सदी आते-आते लोग आदर्शवादी एवं आध्यात्मवादी विचारधारा के अनुरूप अपने क्रियाकलापों का निर्धारण करने लगेंगे। यद्यपि बीसवीं सदी के अंतिम दिनों तक एक और बर्बर विश्व युद्ध के छिड़ने की संभावना है, पर संसार कुछ प्राणवान लोगों के प्रयत्न और पुरुषार्थ के फलस्वरूप उसे विफल कर दिया जायेगा। इस सत्प्रयत्न को उनने “हरक्यूलियन ऐफर्ट्स” की संज्ञा दी है। नये युग का सूत्रपात जो इसी सदी में आरंभ हो चुका है, अब पल्लवित पुष्पित होता नजर आयेगा। ऐसी स्थिति को “काँड्स किंगडम” यानी “धरती पर स्वर्ग” कहा जायेगा।
इक्कीसवीं शताब्दी में ब्रह्माण्ड में “क्रियेटिव फोर्स” अर्थात् सृजनात्मक शक्तियों की सक्रियता बढ़ जायेगी जिससे समस्त मानव जाति के हित साधन का प्रयोजन पूरा होता हुआ दृष्टिगोचर होगा। उनके अनुसार इस तरह की अलौकिक -शक्ति-सामर्थ्य का स्त्रोत सामूहिक रूप से अपनाई जा रही ध्यान-साधना ही होगी। हार व्यक्ति वैचारिक दृष्टि से अपने को स्वतंत्र अनुभव करेगा। लोगों की आक्रामक एवं अपराधी प्रवृत्तियों को देखते हुए तृतीय विश्व युद्ध तो इस सदी के अंतिम वर्षों में हो जाना चाहिए, पर दूसरी ओर परमार्थ परायण शक्तियों की सक्रियता होने लगेंगी, साथ ही लोगों की अभिरुचियों में विशिष्ट प्रकार का परिवर्तन भी आयेगा। वे शहरों के आकर्षक एवं अप्राकृतिक जीवन की ओर भागने की अपेक्षा गाँव के सादगी भरे जीवन को ही अधिक पसंद करेंगे, फलस्वरूप जगगी। यू. एस. नेवल औब्जरवेटरी के विशेषज्ञ डा. गैर्नोट विंकलर का भी कहना है कि इन दिनों पृथ्वी की परिभ्रमण गति के समय में बड़ा भारी अंतर आया है, जिसे देखकर यह कहा जा सकता है कि इस सदी के अंत तक कुछ विशिष्ट प्रकार का परिवर्तन होना सुनिश्चित है। भविष्य-वेत्ता रुथ मौंटगोमरी ने अपनी एक अन्य पुस्तक “द वर्ल्ड बिफोर” में बताया है कि बीसवीं शताब्दी में जो समस्यायें अभी दिख रही हैं, उनका समापन होना सुनिश्चित है, क्योंकि मानव−शरीर में किसी दिव्य आत्मा ने जन्म ले लिया है और वह अपनी प्रचंड तप एवं आध्यात्मिक शक्ति से उन्हें उलट कर रख देगा। नये युग अर्थात् इक्कीसवीं शताब्दी को उज्ज्वल एवं प्रकाशपूर्ण बनाने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। उनने उस दिव्यात्मा को “ल्म्यूरियन्स” के नाम से पुकारा है। उसकी प्रेरणा फलस्वरूप अच्छे लोगों का इस धरती पर बाहुल्य होगा। लोग बुद्धि के साथ-साथ हृदय की भाव-संवेदनाओं को भी महत्व देंगे जिससे दोनों का समन्वय होकर निरंकुश बुद्धिवाद की समाप्ति और आदर्शवादी भावनाशील वृत्तियों का विकास-विस्तार होगा। आध्यात्मिक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलेगा और प्राकृतिक नियम व्यवस्था के अनुरूप लोग अपनी जीवनचर्या का निर्धारण करेंगे। स्वजाति भक्षण के स्थान पर लोगों में परस्पर स्नेह-सहयोग की प्रवृत्तियां जगेंगी और वैर-वैमनस्य का समापन होगा। उनने इस युग को “वर्न्डस ऐरा” नाम दिया है और कहा है कि इस स्वर्णिम युग में किसी व्यक्ति विशेष का हस्तक्षेप न होकर प्रकृति की स्वसंचालित प्रक्रिया के अनुरूप ही प्राणियों की जीवनचर्या संचालित होगी। अपनी पुस्तक “स्ट्रेर्न्जस ऐमोंग अस” में तो उनने यहाँ तक कहा है कि इक्कीसवीं शताब्दी में ईसा जैसी महान आत्मा दूसरी बार इस पृथ्वी पर अवतरित हुई हैं। वह अपनी कार्यप्रणाली से समूची मानव जाति को प्रभावित-प्रेरित करेगी और उनके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगी। गिरों को उठाना, प्रसुप्तों को जाग्रत करना तथा जाग्रत आत्माओं को प्राणवान बनाकर उन्हें लोक सेवा में नियोजित करना ही उसका मूलभूत उद्देश्य है। इन दिनों यही हो भी रहा है। इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शांतिकुंज से जो प्रेरणा प्रवाह चल रहा है उसकी परिणति अगले ही दिनों मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की चिर-प्रतीक्षित आवश्यकता की पूर्ति के रूप में दृष्टिगोचर होने लगेगी। यह सुनिश्चित संभावना ही नहीं, वरन् एक तथ्य भी है।
(विगत अंक में दी गयी अमृतवाणी का उत्तरार्ध)
15 फरवरी 1978 के पावन दिन पूज्यवर द्वारा दिया गया उद्बोधन विगत अंक में पूर्वार्ध के रूप में परिजनों ने पढ़ा इस ऐतिहासिक प्रवचन का उत्तरार्ध इस अंक में प्रस्तुत है। इस समग्र प्रवचन में पूज्यवर के इस विराट अभियान जिसे युग-निर्माण, प्रज्ञा-अभियान नाम से जाना जा सकता है का मर्म समा गया है। ब्रह्मवर्चस के शुभारंभ की वेला में दिया गया यह उद्बोधन भावी मनुष्य के नवनिर्माण का संविधान भी एक प्रकार से बन गया है। पढ़ें, अमृतवाणी।
साथियों, ब्रह्मवर्चस प्रशिक्षण के उत्तरार्ध में एक और तरह का आदमी ढालना चाहते हैं तपस्वी किसे कहते हैं? “तपस्वी”। बेटे, तपस्वी उसे कहते हैं जो अपने व्यक्तिगत जीवन को ठीक कर लेता है उसका दूसरा नाम है -ब्राह्मण, ब्राह्मण किसे कहते हैं ? ब्राह्मण कोई कोई कौम नहीं होती, जाति नहीं होती। जाति ता न जाने किसने बना दी। ब्राह्मण एक वर्ग होता है, एक तबका होता है। ब्राह्मण उस तबके को कहते हैं जो अपने मन को काबू में रख करके अपने जीवन की विधि और प्रक्रिया को ऐसे व्यतीत करता है जिसको सिद्धांतवादी जीवन कहना चाहिए। कहते हैं कि ब्राह्मण अपने आप तक सीमित रहता है, अपने को ठीक करने में लगा रहता है। अपने आपको सही करता है, अपने आपको ही संस्कारवान बनाता है। तो क्या यह काफी नहीं है, नहीं, बेटे इतना ही काफी नहीं है। यह तो पहला अध्याय है, अपने आप को सही बनाना, लेकिन जब मैट्रिक हो जाय तो फिर ग्रेजुएट भी होना चाहिए।
ग्रेजुएट कौन होता है ? ग्रेजुएट तपस्वी होता है। तपस्वी किसे कहते हैं ? संत को तपस्वी कहते हैं। संत किसे कहते हैं ? जैसे मक्खन के ऊपर जब धूप पड़ती है तब वह पिघल जाता है, ठीक उसी तरह जो व्यक्ति अपने युग की-अपने समय की, मनुष्य जाति की, समस्त प्राणियों की पीड़ाओं को देखकर के पिघल जाता है, उसे संत कहते हैं। संत रोता नहीं है, वरन् उसके भीतर एक हूक उठती है, टीस उठती है, संकल्प जाग्रत होता है और पीड़ा एवं पतन के रोने के जो कारण थे, उनको दूर करने के लिए वह कष्ट उठाता है। वह उनसे मोर्चा लेने के लिए सीना तानकर खड़ा हो जाता है। रामचन्द्र जी तपस्वी का जीवन जी रहे थे। एक बार उन्होंने ऋषियों की हड्डियों का एक समूह देखा ता उनकी आँखों में आंसू आ गए तपस्वियों के आँसू कैसे होते हैं? उनके आँसू में से टपकती है आग-ऐसी आग कि जिसके ऊपर मुसीबत है उसे दूर करने में हमको मदद के लिए तन कर खड़ा हो जाता है। रामचन्द्र जी ने ऋषियों की हड्डियों के समूह को देखकर भुजा उठाकर प्रण किया कि अब इस पृथ्वी पर राक्षसों को नहीं रहने दूँगा। या तो मैं मरूंगा या उनको मार कर छोड़ूंगा-”डू और डाई” या तो हम करेंगे या मरेंगे। मित्रों! इतना साहस जिसके अन्दर होता है वह आदमी तप करने, कष्ट उठाने के लिए तैयार हो जाता है। उसे हम तपस्वी कहते हैं।
तपस्वी कैसे होते हैं ? तपस्वी उस प्रकाश स्तंभ की तरह होते हैं जो एकाकी समुद्र के बीच में खड़ा रहता है और उसके ऊपर एक बत्ती सदैव जलती रहती है चाहे रात हो, या ठण्डक हो या बरसात हो। यह बत्ती बताती रहती है कि जहाजों को नावों को इधर से आना चाहिए, उधर से नहीं विजधर चट्टान है वहाँ जोखिम है, आप वहाँ डूब जायेंगे, टक्कर खा जायेंगे आप दूसरे रास्ते से आइये। प्रकाश स्तंभ यही बताते रहते हैं। तपस्वी भी एक प्रकार के प्रकाश स्तंभ हैं। वे स्वयं मुसीबत उठाते रहते हैं और अकेले खड़े रहते हैं। उन्हें न सिनेमा देखने का मौका है, न खाने-पीने का शौक है, न कोई यार-दोस्त है, न चौपड़ है न शतरंज। वे अकेले खड़े रहते हैं और रास्ता बताते रहते हैं। इन्हें हम तपस्वी कहते हैं। इनके भीतर एक हूक उठती है, दर्द उठता है कि हमको दूसरों के दुख दर्द को दूर करने के लिए, भगवान की इच्छा पूरी करने के लिए क्या करना चाहिए। फिर उनकी गति-विधियों में फर्क पड़ जाता है? जब वे ऊपर आसमान की ओर देखते हैं तो कहते हैं कि भगवान की बनायी हुई मूल्यवान चीजें किस तरीके से जीवन यापन करती हैं, हमको भी इसी तरीके से जीवन यापन करना चाहिए। वे इसका अभ्यास करते हैं कि भगवान के दूत किस तरीके से काम करते हैं और हमें किस तरह से करना चाहिए। समुद्र में से पानी का गट्ठर लादकर के बादल रवाना होते हैं और दौड़ते हुए कहाँ-कहाँ तक चले जाते हैं जहाँ खेत सूखे पड़े हुए है। बादल अपनी हस्ती को, अपने परिश्रम के मेहनत को बिना कीमत के सूखे खेतों में गलाते हुए चले जाते हैं। ये कौन हैं ? ये संत हैं और तपस्वी है। तपस्वी जिनका काम ही है कि हम अपने आपका नुकसान उठायेंगे, पर समाज को, दुखियारों को, पिछड़े हुओं को, पतितों को सुखी बनाने के लिए अपने आपको हम खतम कर देंगे, खपा देंगे। वे ऊपर को देखते हैं तो उनकी हिम्मत बड़ी हो जाती है और उसी तरह के वे काम करने लगते हैं।
देवता बराबर काम करते रहते हैं। यह जमीन, यह आसमान यह संसार देवताओं से रहित नहीं है, तपस्वियों से रहित नहीं है। जमीन की ओर निगाह डालकर देखते हैं तो मालुम पड़ता है कि यहाँ तपस्वियों की कमी नहीं है। यह जमीन वजन उठाती है, टट्टी पेशाब उठाती है, लात खाती है फिर भी अपने भीतर से अनाज उगाती है, घास उगाती है, फूल पैदा करती है। यह अपने भीतर से लोहा पैदा करती है, सोना, चाँदी, रसायन आदि हर चीज देती चली जाती है। ये कौन है ? तपस्वी है। संत को चारों ओर तपस्वियों की परंपरा दिखाई पड़ती है। तपस्वियों की वजह से ही दुनिया जिन्दा है। जो दुनिया में खूबसूरती है, खुशहाली है, आनन्द है,शराफत है, अच्छाई है, केवल तपस्वियों की वजह से जिन्दा है। कौन-कौन तपस्वी है ? तपस्वी मनुष्य भी हो सकते हैं, लेकिन दुनिया में तपस्वियों की बहुत सारी सत्तायें हैं जो दुनिया में शांति कायम रखती हैं। दुनिया में जो खुशहाली आती है वह तपस्वियों के बलबूते पर आती है। पेड़ों की ओर जरा निगाह डाल कर देखिये-वह हमेशा फल पैदा करता है। पत्ता जानवरों को खिला देता है, अपनी छाया में पक्षियों को विश्राम देता है। अपने फलों को जमीन पर गिराता है। कौन हैं ये ? तपस्वी हैं।
तपस्वियों की बिरादरी अभी दुनिया में से खतम नहीं हुई है। तपस्वी जब निगाह उठा कर देखता है तो नदियाँ लहलहाती हुई दिखती हैं और प्यासों की प्यास बुझाने, पक्षियों को पानी पिलाने, खेतों की सिंचाई करने का काम करती हैं। तपस्वी जब घर आता है तो एक और बात देखता है- अपनी माँ को और अपनी धर्म पत्नी को। माँ कौन है ? तपस्विनी है जिसने अपने रक्त को-माँस को, हड्डियों को गलाकर के अपने बच्चे के लिए सौंप दिया और अपनी छाती का लाल रक्त सफेद रंग के दूध में बदल कर अपने बच्चे को पिला दिया। ये कौन है ? कोई दाम नहीं लिया, वरन् अपने प्यार की वजह से अपने को न्यौछावर कर दिया। माँ तपस्या की मूर्ति होती है और कौन होती हैं तपस्या की मूर्ति- निगाह उठाकर देखते हैं तो धर्मपत्नी-दूसरी तपमूर्ति नजर आती है। चौबीसों घंटे काम करने वाली , प्रेम देने वाली, श्रम करने वाली सेवा करने वाली, अपने शरीर का रस निचोड़ कर देने वाली, सारी जीवन और अपनी महत्वकाँक्षाओं को अर्पित कर देने वाली और बदले में गालियाँ खाने वाली-ये कौन है ? ये तपस्विनी है। यदि यह तपस्वी न होती तो दुनिया राक्षस हो जाती, आदमी पिशाच हो जाता और उसका कहीं ठिकाना न रहता। इसलिए तपस्विनी है-मेरी माँ, तपस्विनी है धर्म पत्नी, तपस्विनी है धरती। तपस्वी हैं पेड़ बादल, घास सब जगह तपस्वियों की बिरादरी है। सच्चा तपस्वी अपनी सारी जिंदगी को लोकहित के लिए-देश के लिए, श्रेष्ठ कार्यों को पूरा करने के लिए खर्च कर डालता है। तपस्वी वे नहीं हैं जो नंगे बैठे रहते हैं और धूनी रमाते हैं। वे और कुछ हो सकते हैं, पर तपस्वी नहीं।
तपस्वी अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी कष्ट उठाते हैं, लेकिन किसलिए उठाते हैं, यह आप लोगों को मालूम होना चाहिए। हमारी माँ एकादशी के दिन उपवास रखती थीं। उस दिन कुछ भी नहीं लेती थीं। दूसरे दिन द्वादशी को हम बच्चों को बुलाती थीं और जो सामग्री खाने के काम आती थीं-जैसे आटा, दाल, चावल, गुड़, घी आदि थाली में रखकर कहती थीं, जाओ बेटा, उसे मंदिर में देकर आओ। हम दे आते थे तब माँ पानी पीती थीं। क्या मतलब है इसका ? इसका मतलब यह है कि हम तपस्वी हैं और कष्ट उठायेंगे। कष्ट उठाने की वजह से जो आपने बचत की है, उसे अच्छे कामों में लगायेंगे। तू जानता है उपवास किस लिए करते हैं ? उपवास इसलिए करते हैं-पेट पर पट्टी बाँधते हैं कि अमुक दिन हम नहीं खायेंगे और उससे जो बचत होगी उसे अच्छे कामों में खर्च कर देंगे इसका नाम है - तप। हम अगले दिनों ऐसी ही पीढ़ी पैदा करना चाहते हैं जो तपस्वियों को पीढ़ी हो। तपस्वियों में क्या बात होती है ? बेटे-तपस्वी साक्षात् देवता होते हैं। वे स्वयं तो मुसीबत उठा लेते हैं, लेकिन अपने पुण्य की वजह से, तप की वजह से, अपनी शक्ति की वजह से असंख्यों का बेड़ा पार कर देते हैं अगले दिनों हम असंख्यों का बेड़ा पार करने वाले तपस्वियों की नयी पीढ़ी बनायेंगे। कैसे बनायेंगे ? क्या इसी में बना देंगे ? नहीं बेटे, इसी में तो नहीं बनाते, पर हाँ हम एक ऐसी विचारधारा, एक ऐसी कार्य पद्धति, विचार करने का ढंग और एक ऐसी फिजा पैदा करेंगे जो सारे के सारे समाज में छाती हुई चली जायेगी और लोगों की लिप्साओं को लोभ और मेह के दृष्टिकोण को बदलती हुई चली जायगी। यह आदमी को झकझोर कर रख देगी और कहेगी कि हे इंसान! तू इंसान की तरीके से जी। वनमानुषों, नर पशुओं और नर-कीटकों की तरीके से मत जी। एक ऐसी पैनी हवा उठेगी जो हर आदमी के कान पकड़ेगी और झकझोरेगी और यह कहेगी कि आपको नये युग के अनुरूप जीना चाहिए, सिद्धान्तों, आदर्शों, लोकहित एवं संसार की शांति के लिए जीना चाहिए।
ऐसे व्यक्ति पैदा करने के लिए हमने ब्रह्मवर्चस बनाया है। इसमें मन की मलीनता को धोने के लिए उपासनायें भी करायेंगे। हमारे भीतर का भगवान सो गया है-देवता सो गया है हमारे भीतर की शक्तियाँ सो गयी हैं, सिद्धियाँ सो गयी हैं, चमत्कार सो गये हैं। हमारे भीतर का आनन्द सो गया है, हमारे भीतर का शिव सो गया है। सौंदर्य सो गया है-देवता सो गया है हमारे भीतर की शक्तियां सो गयी हैं, सिद्धियाँ सो गयी हैं, चमत्कार सो गये हैं। हमारे भीतर का आनन्द सो गया है, हमारे भीतर का शिव सो गया है सौंदर्य सो गया है, भीतर की कला सो गयी है। सब कुछ सो गया है। अभी तो इस ढाँचे में कोई पिशाच, कोई भूत-मसान लाल-पीले कपड़े पहने हुए घरों में घूम जाया करता है। इस पिशाच के भीतर से ही हम देवता को जगायेंगे। इन सारे के सारे क्रियाकलापों को करने के लिए हमने ब्रह्मवर्चस बनाया है। यहाँ से हम एक विचार, एक कार्य पद्धति, प्रोसीजर पैदा करेंगे और न जाने क्या से क्या पैदा करेंगे। नये युग का आह्वान करने के लिए एक ऐसे फैक्टरी की जरूरत थी जिससे युगशक्ति का उदय किया जा सके। ब्रह्मवर्चस की स्थापना इसी के लिए की गयी है।
हमने बहुत पहले तीन घोषणाएं की थीं कि हम
व्यक्ति निर्माण के लिए और समाज निर्माण के लिए काम करेंगे। यह हमारे मिशन का स्वरूप है। व्यक्ति निर्माण के लिए हम ब्रह्मवर्चस और उसकी कार्य पद्धति बनाते हैं। मानव उत्कर्ष की सारी की सारी प्रक्रिया हम यहाँ से पैदा करेंगे इंसान को मनस्वी अर्थात् मनुष्य में देवत्व उदय होने की प्रक्रिया अर्थात् व्यक्ति निर्माण। व्यक्ति कैसे बनाया जा सकता है, यह प्रक्रिया हमारे छोटे से आश्रम ब्रह्मवर्चस से आरंभ होगी। आप इसके भविष्य को देखिये, इसके पीछे महानता को देखिये, झण्डे के इस प्रतीक को देखिये। यह है तो एक प्रतीक, पर इसके पीछे न जाने क्या से क्या सत्ता भरी पड़ी है। एक बड़ी चीज की जिम्मेदारी भगवान ने हमारे ऊपर सौंपी है और इसके लिए हमने एक बड़ा प्लान बनाया है। इस बड़े काम में सहायता देने के लिए ही आपको बुलाया गया है कि हम समाज में एक ख्वाब पैदा करेंगे, नया युग लाने के लिए मनुष्यों को पैदा करेंगे। युगशक्ति पैदा करेंगे। आध्यात्मिक शक्ति पैदा करेंगे। लोगों में मनस्वी तत्व पैदा करेंगे जो मन से लोहा ले सकने में समर्थ हो सकें। हम मनुष्यों में तपश्चर्या का माद्दा-अर्थात् श्रद्धा और उदारता पैदा करेंगे, करुणा पैदा करेंगे, सेवा की वृत्ति पैदा करेंगे। अभी आदमी के भीतर तो निष्ठुर पिशाच बैठा हुआ है और कहता रहता है कि ला हमारे लिए धन, ला हमारे लिए मोह। यह पिशाच न तो सिद्धान्तों को भीतर आने देता है, न आदर्शों को आने देता है, न करुणा को आने देता है, न सेवा को अपने देता है। चाहे भजन करने जायँ, चाहे मन्दिर में जायँ, हर जगह से यह अपना उल्लू सीधा करता है।
मित्रों ! हम मनुष्यों को बदलना चाहते हैं। इसके लिए क्या करना पड़ेगा ? इसके लिए आप अपने जीवनक्रम में थोड़ा सा हेर-फेर कर दें और भगवान को अपने जीवन में हिस्सेदार बना लें। हमने कई बार अपील की है कि आप लोग अपने जीवन में ईश्वर को साझीदार बना लें। बैंक को आप हिस्सेदार बना लेंगे तो आपका काम अच्छा चलेगा। बड़ी-बड़ी मिलें ऐसे ही चल रही हैं। उनमें पचास प्रतिशत पैसा बैंक का लगा हुआ है। बैंक उनको पैसा देती है, उसकी बिल्टियों पर एडवाँस देती है, तब सारे काम चल रहे हैं। आप भी भगवान की बिल्टी लें, भगवान को हिस्सेदार बनायें और मालदार बने। यदि कोई यह कहता है कि नहीं महाराज जी, भगवान की हमें कोई जरूरत नहीं है और हम तो ऐसे ही थोड़ा बहुत चालाकी से- बेईमानी से काम चला लेंगे, तो बेटा इससे काम चलेगा नहीं। सम्पन्न बनना हो, मालदार बनना हो तो भगवान को हिस्सेदार बनाना ही होगा। मैंने बार-बार लोगों से कहा है कि आप अपने जीवन में से थोड़ा सा हिस्सा भगवान के लिए खर्च करें और थोड़ा सा अपने लिए। भगवान के लिए जो हिस्सा खर्च करेंगे, उसके बदले में आप पायेंगे। भगवान के लिए जो हिस्सा खर्च करेंगे, उसके बदले में आप पायेंगे। भगवान को बहकायेंगे तो नहीं पायेंगे, वह जब भगवान को बहकाना है जो आप अब तक करते रहे हैं, ध्यान रखिये। भगवान को जिन्दगी में हिस्सेदार बनाने का मतलब यह है कि आप अपने समय का एक हिस्सा, अपनी अकल का एक हिस्सा, अपनी क्षमता का-प्रतिभा एक एक हिस्सा, अपने प्रभाव का एक हिस्सा और अपने पैसों का एक हिस्सा भगवान के कामों में लगाइये। नहीं, महाराज जी, हम इस चक्कर में नहीं फंस सकते। चक्कर में नहीं फंस सकते तो आप तालाब की तरीके से सड़ेंगे और कोई बड़ी चीज नहीं पा सकेंगे।
साथियों, मनुष्यों को श्रेष्ठ बनाने के लिए, सूखी और समुन्नत बनाने के लिए, नवयुग के अनुरूप शांति से रहने और रहने देने में सहायता करने वालों के लिए ब्रह्मवर्चस का यह प्रशिक्षण आरंभ किया गया है। ब्रह्मवर्चस के पीछे जो एक छोटी इमारत के रूप में बनाया गया है, हमारा एक ही उद्देश्य है- युगशक्ति का उदय, आध्यात्मिक शक्ति का उदय, व्यक्ति को मनस्वी और तपस्वी बनाना और मनुष्य के भीतर उन शक्तियों को उदय करना जिससे वह अपने जीवन की नाव पार कर सके और असंख्यों की नाव पार करा सके।
दूसरे नम्बर पर है-प्रज्ञा मंदिर, जिसका कि उद्घाटन करने के लिए हमने आपको बुलाया है। कौन सा प्रज्ञा मंदिर-गायत्री ज्ञान मंदिर। गुरु जी, गायत्री की मूर्ति तो हमारे यहाँ पहले से ही रखी हुई है, फिर दुबारा क्यों ? बेटे, ये मूर्ति नहीं है, यह प्रज्ञा मंदिर है। प्रज्ञा को हम सर्वोपरि मानते हैं। प्रज्ञा से बढ़कर और कोई चीज नहीं है - “नहि ज्ञानेन सदृशपवित्रमिह विद्यते।” इसलिए हम भगवान को प्रज्ञा के रूप में पूजा करते हैं। “प्रज्ञा” विवेकशीलता को कहते हैं-दूरदर्शिता को कहते हैं। अकल तो हमारे पास है, पर प्रज्ञा हमारे पास नहीं है-विवेक हमारे भीतर नहीं है। अकल किसे कहते हैं-और प्रज्ञा किसे कहते हैं ? अकल बेटे, वही होती है जो बी. ए., एम. ए. पास करने के बाद में खरीदी जा सकती है। कैसी होती है अकल ? अकल ऐसी होती है जो हमारे लिए तुरन्त फायदा कराती है और नहीं देखती कि कल जो नुकसान होगा वह होता रहे। प्रज्ञावान कौन होता है ? किसान होता है। वह अभी नुकसान उठाता है और छह महीने बाद फायदा उठाता है। प्रज्ञावान विद्यार्थी होता है तुरन्त नुकसान उठाता है, दस-पन्द्रह साल तक पढ़ता है और फिर वह गजटेड अफसर बन जाता है। प्रज्ञावान दुकानदार होता है जो अपना घर खाली कर देता है, फिर उसके बाद कमाता है। जो दूर की बात सोचता है, उस दूरदर्शी को हम प्रज्ञावान कहते हैं सिद्धान्तवादी को हम प्रज्ञावान कहते हैं और जो अपने छोटे-छोटे सामयिक स्वार्थों के लिए अपने भविष्य को अंधकारमय बना लेते हैं, उनको मैं अकलमंद कह सकता हूँ। विनाश की जड़ अकल ही है।
अकलमंद कैसे होते हैं ? बहुत अकलमंद हैं, आपकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है। आपकी अकल का मुकाबला कोई और कर सकता है क्या ? नहीं और कोई नहीं कर सकता सिवाय कौआ के ? कौआ बड़ा अकलमंद होता है, बहुत चालाक होता है। मनुष्य की सारी की सारी अकल ऐसे ताने-बाने बुनती रहती है कि क्या कहा जाय। बेटे, ताने-बाने बुनने वाली इस अकल के स्थान पर हम एक नयी सत्ता को स्थापित करना चाहते हैं, उसका नाम है - प्रज्ञा। प्रज्ञा के सामने हम मस्तक झुकाते हैं, प्रज्ञा की देवी को हम नमस्कार करते हैं। प्रज्ञा की देवी कौन है - गायत्री माता। गायत्री माता कौन है - प्रज्ञा। प्रज्ञा किसे कहते हैं, - ऋतम्भरा प्रज्ञा को-दूरदृष्टि को विवेकशीलता को, न्यायदृष्टि को विवेकशीलता को, न्यायदृष्टि को। इसी गायत्री माता की हम साधना करते हैं। तो महाराज जी, गायत्री माता वह है जो थैली में रुपये वाली नहीं है। मित्रों, आपको यह जानना चाहिए कि वस्तुतः गायत्री किसका नाम है ? गायत्री है श्रद्धा का नाम-प्रज्ञा का नाम। हम इसी प्रज्ञा की स्थापना करेंगे और जन-जन से कहेंगे कि आप प्रज्ञा के सामने मस्तक झुकाइये, विवेकशीलता के सामने मस्तक झुकाइये।
हमने जो भी स्थापनाएं की है, उसका नाम है - श्रद्धा। हम श्रद्धा की स्थापना करते हैं। श्रद्धा क्या ? श्रेष्ठता के प्रति असीम प्यार-इसका नाम है श्रद्धा। श्रद्धा मनुष्यों के भीतर से चली गयी। श्रेष्ठता के लिए हम जवान से भले ही प्रशंसा कर दें, लेकिन असीम प्यार करने वाली वह श्रद्धा चली गयी जिसके लिए आदमी त्याग कर सकें, कष्ट उठा सके। यह देवी कौन है जिसकी हमने स्थापना की है। इसका नाम श्रद्धा। ये कौन है ? बेटे ये नारी की गरिमा की स्थापना है। नारी की गरिमा कैसी होती है ? नारी की गौरव-गरिमा सत्य, शिव और सुन्दर की तीनों विशेषताओं से सम्पन्न, एक प्रतीक है। नारी का एक प्रतीक है-एक सम्बल है जो हमारी बेटी के रूप में विद्यमान है। श्रद्धा नारी के प्रति श्रेष्ठता के भाव-गरिमा के भाव जाग्रत करती है। नारी के प्रति श्रद्धा, नारी के प्रति नमन, नारी के प्रति सम्मान, आस्था उत्पन्न करने के लिए हमने गायत्री माता को नारी के रूप में भी बना सकते थे ? हाँ, हम नर रूप में भी बना सकते थे, क्योंकि ब्राह्मीशक्ति, ब्रह्म और गायत्री एक ही शक्ति है। सरस्वती, लक्ष्मी और विष्णु एक ही बात है। पार्वती और शंकर एक ही बात है। इस माध्यम से हम नारी की गरिमा बढ़ाते हैं और यह कहते हैं कि नारी के प्रति अर्थात् पवित्रता के प्रति, करुणा के प्रति कला के प्रति, सौंदर्य के प्रति, तपश्चर्या के प्रति नमन करें। हमने यही स्थापना की है।
देश भर में हमने प्रज्ञा मंदिरों की स्थापना की है। प्रज्ञा मंदिरों की स्थापना की है। प्रज्ञा मंदिरों से आप क्या करेंगे ? प्रज्ञा मंदिरों से बेटे हम वह काम करेंगे जो बहुत दिनों पहले मिशन के लिए यह घोषणा की थी कि हम नया समाज बनायेंगे। तो नये समाज का आधार क्या होगा- बताइये ? हर एक के मेनीफिस्टो होते हैं। नया समाज बनाने का आधार हमारा यह है कि हम आदमी का चिन्तन बदल देंगे। हम हर आदमी का मन बदल देंगे। मन बदलने से क्या होगा ? मन बदलने से व्यक्ति की समस्याएँ और समाज की असंख्य समस्याएँ-इन सबका एक ही कारण है-आदमी का मन। आदमी का मन अगर सड़ेगा तो उसमें से कीड़े, मच्छर, मक्खी आदि बीसों चीजें पैदा होंगी, बदबू पैदा होगी। कीचड़ को आप साफ कर दीजिए, फिर मच्छर भगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हमारे चिन्तन की मलीनताओं सारे के सारे समाज में असंख्य परिस्थितियाँ पैदा करती हैं-- राष्ट्रीय सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में। इसलिए हम समाज निर्माण के लिए इस बात का शिक्षण करते हैं कि शालीनता, सज्जनता, भलमनसाहत, ईमानदारी, और शराफत आदि तत्वों को आगे बढ़ाना चाहिए। समाज का अभिनव निर्माण इन्हीं आधारों पर खड़ा होगा।
मित्रों, गायत्री माता क्या है ? यह ईमानदारी और नेकनीयती, सज्जनता और शराफत की देवी है। इसके माध्यम से हम सबको समझाएंगे। राजहंस इसका वाहन है। इसे यह पसंद करती है, दुलार करती है और चौबीसों घंटे साथ लिए फिरती है। यह राजहंस ऐसा है जो नीर-क्षीर का विवेक करता है, जो मोती खाता है-कीड़े खाते हैं। हाँ बेटे, हंस कीड़े खाते हैं, पर गायत्री माता का राजहंस अलग है गायत्री माता की स्थापना करके हम राजहंस पैदा करना चाहते हैं। हम गायत्री का ही नाम सावित्री है और सावित्री का वरण करने के लिए-माला पहनने के लिए सत्यवान की जरूरत पड़ती है। गुरु जी! आप तो सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर रहे है, देवी-देवताओं की बात नहीं कहते ? हाँ बेटे, देवी-देवता फायदा कराते ? हाँ बेटे, देवी-देवता फायदा कराते हैं, लेकिन देवी-देवता सिद्धान्त होते हैं, आदर्श होते हैं। मनुष्य की महानता-मनुष्य के गुण होते हैं, श्रेष्ठतायें होती हैं। देवी वह नहीं होती जो पहाड़ पर मंदिर में बैठी रहती है और बकरे खाती है। देवी ऐसी नहीं हो सकती- वह तो कोई डाकिन होगी, भूतनी होगी। आपकी देवी और हमारी देवी में फर्क है। हमारी देवी देवत्व की निष्ठायें हैं, देवत्व के प्रति आस्थायें ही देवत्व के संकल्प, देवत्व के संकल्प, देवत्व की मान्यताएँ, भावनाएँ हैं। इन्हीं का हम विस्तार करना चाहता है। प्रज्ञा मंदिर हमने इसी लिए बनाया है। तो आप इसी मंदिर में से गायत्री उपासना सबको सिखा देंगे ? नहीं बेटे, हमने तो ये प्रतीक बनाया है यह एक सिमबल है। हम चाहते हैं कि इसका विस्तार हो।
प्रज्ञा-विस्तार के लिए क्या-क्या काम करने होंगे ? इसके लिए हमें बहुत काम करने होंगे। हमने आप लोगों को इसीलिए बुलाया है। कि लोगों की अकल को बदलने के लिए कई कार्यक्रम हाथ में लेने चाहिए। आदमी को विवेक की विचारधारा, अकल की नहीं- विवेक की विचारधारा, अकल की नहीं-विवेक की न्याय की, सिद्धान्तों की, आदर्शों की विचारधारा, अकल की नहीं- विवेक की न्याय की, सिद्धान्तों की, आदर्शों की विचारधारा को बताने के लिए-हृदयंगम कराने के लिए हमको और आपको दो काम करने चाहिए। एक तो लोगों को अपने पास बुलाना चाहिए और दूसरा लोगों के घरों परा जाना चाहिए। यह प्रज्ञा की देवी गायत्री माता की सबसे बड़ी सेवा है। तो क्या भजन करें , हाँ भजन तो करना ही पड़ेगा। भजन तो हम भी करते हैं, लेकिन उतने से ही काम पूरा नहीं होगा। भजन के साथ-साथ में उसको चरितार्थ करना भी बेहद जरूरी है। इस वास्ते हमने एक आन्दोलन आपको दिया है कि आप ज्ञानरथ चलायें-गायत्री माता का ज्ञान रथ। ज्ञानरथ कैसा होता है ? ज्ञान रथ ऐसा होता है जैसा कि जगन्नाथ जी का रथ निकलता है और रथ यात्रा होती है। वृंदावन में रंग जी का एक मंदिर है। उस मंदिर से जब रथ यात्रा निकलती है तो वह घर-घर जाती है। बूढ़े और बच्चे जो मन्दिर नहीं पहुँच पाते, उनके लिए भगवान को रथ पर बिठाकर घर-घर ले जाते हैं और कहते हैं कि देखिये साहब, आप तो रंग जी के मंदिर नहीं पहुँच पाये थे, अब हमने भगवान को आपको घर में लाकर रख दिया है, आप दर्शन कीजिए। युग के अनुरूप विचार क्रान्ति के लिए-ज्ञानयज्ञ के लिए हम भी अलख निरंजन कहते हुए बादलों की तरीके से, तीर्थ यात्रा की तरीके से घर-घर जायेंगे अपने साहित्य को लेकर। जो लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं, समझ भी नहीं सकते, उनके लिए लेखनी के अलावा एक और चीज रह जाती है। उसका नाम है वाणी। वाणी को हम घर-घर लेकर जायेंगे और अलख जगायेंगे। तीर्थ यात्रा प्राचीन काल में इसीलिए होती थी।
पदयात्रा का कोई उद्देश्य नहीं था। यह मात्र धर्म प्रचार के लिए अर्थात् ज्ञान-प्रचार के लिए होती थी। चाहे वह ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा हो या नर्मदा की परिक्रमा । धर्म क्या होता हैं-अच्छे ज्ञान और अच्छे विचार। अच्छे विचारों को फैलाने के लिए घर-घर जाना पड़ता है। ये क्या है ? ये बेटे वही है जिसे हम प्रज्ञा का प्रसार करने के लिए सम्मेलनों की बात कहते हैं घर-घर जाना जब मुश्किल पड़ता है तब लोगों को एक जगह जमा कर लेते हैं और अपनी बात उनसे कम समय में कह देते हैं। आप क्या बोलते हैं ? बेटे हम गायत्री मंत्र बोलते हैं-चौबीसों घंटे। नहीं गुरु जी, आप तो व्याख्यान करते हैं। नहीं बेटे हम व्याख्यान नहीं करते-गायत्री मंत्र बोलते हैं- केवल गायत्री मंत्र। हमारी वाणी से और कोई दूसरा शब्द नहीं निकलता। हमारा सारा जीवन गायत्री माता को समर्पित है। इसलिए हम गायत्री के अलावा दूसरा शब्द बोल ही नहीं सकते। एक स्वामी जी केवल एक शब्द बोलते थे- ‘श्रीकृष्णःषरणंमम।’ इसी तरह एक और स्वामी जी थे जो यह बोलते थे- ‘हरे राम-हरे कृष्ण’ इसके अलावा और कोई दूसरा शब्द नहीं बोलते थे, मात्र इशारा कर देते थे। हम भी गायत्री में का अर्थ है - अवांछनीयता के विरुद्ध संघर्ष। गायत्री मंत्र के “भर्गो” शब्द के माने हैं-जो अवाँछनीय तत्व है उसको भून डालना, उसके विरुद्ध लोहा लेना, संघर्ष करना। यही विचार क्रान्ति है। और ज्ञान यज्ञ क्या है ? ज्ञान यज्ञ वह है जिसमें से सद्भावना का उदय होता है, श्रेष्ठता, का उदय होता है। यही काम हमको और आपको करना है। बहुत से कार्यक्रमों के लिए हम आपको बुलाते रहते हैं। ये सब क्या है ? बेटे, यह गायत्री मंत्र की उपासना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। आपको तो इसलिए मालूम नहीं पड़ता कि आप माला घुमाने को ही गायत्री मंत्र कहते हैं और और अच्छे वारों के विस्तार के लिए जो प्रयास किये जाते हैं उसको आप गायत्री मंत्र नहीं मानते। वस्तुतः अच्छे विचारों का-अच्छी भावनाओं का संवर्धन करना विशुद्ध गायत्री मंत्र की उपासना करना है। मैं चौबीसों घंटे इसी महामंत्र की उपासना करता हूँ-जप करता हूँ। सोलह घंटे काम करता हूँ नहाने-धोने, खाने-पीने, सोने सबमें गायत्री मंत्र की उपासना करता हूँ। अच्छे विचारों को फैलाना, जन-जागरण करना, लोगों की भावनाओं को परिवर्तित करना उसके लिए परामर्श देना-ये सारे के सारे कार्य हैं जो आपको करना चाहिए।
ब्रह्मवर्चस में प्रज्ञा मंदिर की स्थापना करने के लिए जो आप आये हैं, इसमें हम आपको गायत्री मंत्र की उपासना, गायत्री मंत्र की विशेषता और गायत्री मंत्र को जीवन में समावेश कर लेना-इसकी विधियाँ सिखायेंगे। सारे विश्व में हम गायत्री मंत्र की एक हवा पैदा करेंगे। चारों ओर गायत्री मंत्र की हवायें पैदा करेंगे जिसे सभी मानेंगे। गायत्री मन्त्र की जो दिशा है, जो कल्पना है, वह हर एक को हृदयंगम करायेंगे और उनसे यह कहेंगे कि यह सार्वभौम मंत्र है-सर्वजनीन मंत्र है और इसमें व्यक्ति विशेष के लिए कोई अंतर नहीं पड़ता। ज्ञानरथ चलाने से लेकर सम्मेलन करने तक सी हमारे कार्यक्रम गायत्री माता को घर पहुँचाने के लिए हैं। हमारे सम्मेलन राजनैतिक सम्मेलन नहीं हैं। हमारे सम्मेलनों में केवल मनुष्यों के भीतर से सद्भावना जगाना-सत्प्रेरणा जगाना, सत्प्रवृत्तियाँ जगाना-बस यही एक उद्देश्य है। इसी के लिए हम आपको कार्यक्रम देते हैं, क्षेत्रीय सम्मेलन बुलाने के लिए कहते हैं। क्षेत्रीय सम्मेलनों में गायत्री माता के सद् विचारों का प्रसार करेंगे। इसके लिए जो भी व्यक्ति भेजे जायँ, हम चाहते हैं कि वे हमारे शब्दों में बोलें, हमारी वाणी में बोलें और हमारे जैसे बोलें। अगले दिनों समाज का नया निर्माण करने के लिए- विचारों को विस्तार देने के लिए प्रज्ञा मंदिरों का विस्तार होगा। आज तो एक शुरुआत है जिसका कि अभी-अभी उद्घाटन हुआ है।
साथियों, गायत्री एक परिवार है। परिवार निर्माण करने की प्रणाली है। परिवारों का निर्माण कैसे करना चाहिए-इस संबंध में हमने एक बार “लार्जर फेमिली’ नाम से एक लेख छापा था। उसमें घर-परिवार कैसे बनने चाहिए, कुटुम्ब-समाज कैसे बनने चाहिए, यह बताया गया था। गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार, अखण्ड ज्योति परिवार जैसे शब्द हमें बहुत प्यारे लगते हैं। बेटे, यह हमारा परिवार है जिसमें स्वर्ग का अवतरण होने वाला है। स्वर्ग का अवतरण सबसे पहले कहाँ होगा ? परिवार में होगा, फिर वहाँ से व्यक्तियों में फैलेगा और समाज में फैलेगा। स्वर्गीय वातावरण वाले पारिवारिक खदानों से ही नर-रत्न पैदा होते हैं। कॉलेज में से-गुरुकुल में से नर-रत्न पैदा नहीं होते। हाँ गुरुकुल यदि कोई परिवार होगा तो वहाँ से पैदा हो जायेंगे। परिवार नहीं होगा तो वहाँ भी पैदा नहीं होंगे। परिवार कैसे बनने चाहिए ? परिवार ऐसे बनने चाहिए जैसे कि एक महिला ने परिवार की पाठशाला में- प्रयोगशाला में तीन ब्रह्मज्ञानी बना दिये थे, जिनका नाम था-बिठोवा, बिनोवा और बालकोवा। परिवार को कौन चला सकता है ? परिवार को चलाने का स्वामी-अधिकारी एक ही है और उसका नाम है-नारी । नारी के पास वो शक्ति है जो मनुष्य के अकल को तो नहीं, पर हृदय को ठीक कर सकती है। नारी के पास अकल तो कम है, पर हृदय तत्व बहुत विशाल है।शरीर से ताकत से भी वह कमजोर पड़ती है, लेकिन श्रद्धा में बढ़ी-चढ़ी ही होती है। मनुष्य के भीतर की मनुष्यता को शालीनता का विकसित करने के लिए एक ही तत्व काम करता है और उसका नाम है - श्रद्धा। श्रद्धा-भावना से भरी हुई नारी को हम जगाना चाहते हैं। परिवार संस्था को जीवित करना चाहते हैं।
आज परिवार संस्था खतम हो गयी है और रह गये हैं बस स्त्री-पुरुष। स्त्री-पुरुष कौन होते हैं-वासना के शिकार। ब्याह किसके लिए होता है वासना के लिए - प्रेम के लिए नहीं। प्रेम किसे कहते हैं ? बेटा, प्रेम चला गया, प्रेम तो दुनिया में रहा ही नहीं, श्रद्धा तो है ही नहीं, सहयोग तो रहा ही नहीं। परिवार संस्था खतम हो गयी। परिवार कैसे होने चाहिए ? इस संस्था को जीवित रखने के लिए हम नया प्रयोग करते हैं और अपने कुटुम्बियों कार्यकर्त्ताओं को बुलाकर कहते हैं कि आप कुटुम्ब हमारे हवाले कीजिए, हम उनका शिक्षण करेंगे। गुरु जी, आप तो संत हैं इसलिए हम कुटुम्बों का शिक्षण कर सकते हैं इसलिए हम कुटुम्बों का शिक्षण कर सकते हैं। भगवान राम के बीबी-बच्चों का शिक्षण महर्षि वाल्मीकि ने जैसे अच्छी तरह से किया था, वैसा कोई और दूसरा नहीं कर सकता था। लव, कुश और सीता जिस सुख और शांति से उनने रखा, वैसा और कोई नहीं रख सकता था। यह काम केवल संत ही कर सकते हैं। परिवारों का निर्माण कैसे करना चाहिए इसके लिए हमने एक प्रयोगशाला बनायी है- एक कालोनी बसाई है-नाम है उसका गायत्री नगर। इसमें हम शिक्षण देंगे कि नारी को कैसे विकसित करना चाहिए ? नारी-शिक्षण कैसे होने चाहिए ? लार्जर फेमि�
चैत्र प्रतिपदा से नवीन संवत्सर आरम्भ होता है एवं हमारा नया विक्रमी वर्ष भी। साथ ही नवरात्रि का पावन पर्व भी इस दिन से आरम्भ होकर रामनवमी के दिन समाप्त होता है। हमारे ऋषिगण की विद्वता का सुदृढ़ साँस्कृतिक दैनन्दिनी संरचना का प्रमाण है यह कि बसंत पर्व से जब शिशिर की ठिठुरन समाप्त होने लगती है, एक विलक्षण प्रकृतिगत परिवर्तन का क्रम नवरात्रि समापन तक चलता है। सूक्ष्म जगत को अपना कार्य क्षेत्र बनाने वाली ऋषि चेतना ने अपनी मनीषा के माध्यम से वर्ष के एक दिन-एक-एक दिन को उल्लास बना दिया है एवं प्रत्येक प्रकृतिगत परिवर्तन को गणितीय माध्यम से ऐसा सुव्यवस्थित बनाया है कि उसके सुनियोजित एवं व्यष्टि चेतना पर प्रभावोत्पादकता को देखकर आश्चर्य चकित होकर हर जाना पड़ता है। बसन्त से ठीक चौबीस दिन बाद महाशिवरात्रि आती है एवं इसके सोलह दिन बाद होली का पावन पर्व आता है। चालीस दिन का यह समय प्रकृति में सूक्ष्म स्तर पर तीव्रगति से हो रहे परिवर्तनों का समय है। इस अवधि में वातावरण में क्रमशः गर्मी की तपन बढ़ने लगती है एवं शरीर गर्मी की तपन बढ़ने लगती है एवं शरीर पर उसका प्रभाव पर्व आरम्भ हो जाता है जो कि शक्ति उपासना का पर्व है। जो कार्य सामान्य साधना के माध्यम से साधारणतया काफी दिनों में सिद्ध कर पाते हैं, वह इन 9 दिनों की अवधि में बड़ी आसानी से सध जाता है, इसी कारण चैत्र-आश्विन इन दोनों ही नवरात्रियों को विशेष महत्व दिया जाता रहा है।शक्ति की मातृभाव से उपासना दुर्गा शक्ति की पूजा आराधना तथा विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना द्वारा आत्मबल का संचय इन नौ दिनों में बड़ी सरलता से हो सकता है। ऋग्वेद के अदिति सूक्त में शक्ति का मातृभाव वाला स्वरूप देखा जाता है, जबकि ऊषा सूक्त में कुमारी भाव, सूर्यादेवी सूक्त में कुमारी भाव, देवी सूक्त एवं वाक्सूक्त में शुद्ध शक्तिभाव के चिन्ह मिलते हैं। ऋग्वेद में भी पृथ्वी की स्तुति गायी गयी है एवं उन्हें पिता द्यौ के साथ वर्णित किया गया है। “समुद्र वसने देवि पर्व स्तन मण्डले। विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्वमे” अर्थात् समुद्र ही जिनके वस्त्र हों, पर्वत जिनके स्तन हों, ऐसी विष्णु पत्नी पृथ्वी देवी को पैर से स्पर्श करने की त्रुटि हेतु मैं क्षमा चाहता हूँ।” हमारे ऋषियों की यह मान्यता “शक्ति” स्वरूपा पृथ्वी में गति है। पृथ्वी-प्रकृति-मातृसत्ता सी हमारे यहाँ शक्ति के पर्याय हैं। इनकी उपासना हेतु नवरात्रि साधना को इसलिए महत्व दिया जाता रहा है।
नवरात्रि दो ऋतुओं का मिल काल है। विशेष रूप से आज की युगसंधि की वेला में यह संधि मिलन वेला विशेष महत्व रखती है। यह मिलन वेला सर्दी और गर्मी की ऋतु के मिलन की भी है एवं पुराने वर्ष की विदाई एवं नये वर्ष के आगमन वाली हर्षोत्सव के पर्व वाली भी। जब 24 घण्टे के चक्र में रात्रि और दिन के मिलन को इतना अधिक महत्व “संध्या” के रूप में प्राप्त है तो दो ऋतुओं के मिलन को तो अध्यात्मवेत्ता और भी अधिक महत्वपूर्ण मानकर इन दिनों विशिष्ट आध्यात्मिक पुरुषार्थ करने की बात कहते आए हैं। इस ऋतु परिवर्तन की वेला में सूक्ष्म जगत में अनेकानेक प्रकार की हलचलें होती हैं।शरीर से लेकर समष्टिगत चेतना जगत में ज्वार-भाटे जैसी हलचलें उत्पन्न होती देखी जाती हैं। जीवनीशक्ति प्रयासपूर्वक देह में जमी हुई विकृतियों को निकाल बाहर करने का प्रयास करती है एवं सूक्ष्म अंतरिक्षीय प्रवाह शरीर-मन-अंतःकरण का कायाकल्प करने को तत्पर रहते हैं। कायचक्र के सूक्ष्म ज्ञाताओं ने प्रकृति के अन्तराल में चल रहे विशिष्ट उभारों को ध्यान में रखते हुए यह सोचा कि इन दिनों की गयी आध्यात्मिक साधनाएँ विशेष रूप से सफल होती हैं। तदनुसार ही चैत्र और आश्विन के शुक्लपक्ष आरम्भ होते ही नौ-नौ दिन के नवरात्रि पर्व मनाए जाते हैं।
यों सारा समय भगवान का है और सभी दिन पवित्र हैं। शुभ कर्म करने की हर घड़ी शुभ मुहूर्त्त है और अशुभ कर्म हेतु काल-राहु दिशाशूल, योगिनी और विपरीत चन्द्रमा जैसे अनेकानेक बन्धन प्रतिरोध हैं, किन्तु वस्तुतः ऐसा है नहीं। सामान्य या विशेष उपासना करने पर कोई प्रतिबन्ध हमारे ऋषियों ने कभी लगाया नहीं। शुभ कर्म के लिए कभी कोई मुहूर्त्त देखने की आवश्यकता नहीं। फिर भी कालचक्र की प्रतिक्रिया से लाभ उठाने में बुद्धिमत्ता ही है। नवरात्रि पर्व में विभिन्न उपासनाएँ चलती हैं। रामभक्त उन दिनों रामायण का परायण और कृष्ण भक्त गीता या श्रीमद्भागवत का पारायण करते हैं। देवी उपासकों में दुर्गापाठ के विभिन्न उपचार चलते हैं। तपस्वी इन दिनों व्रत उपवास करते हैं। तंत्र विधान में शव साधना, कुमारी पूजन, कुण्डलिनी जागरण चक्रवेधन आदि की साधनाएँ विशेष रूप से इन्हीं दिनों सम्पन्न की जाती हैं। मध्यकाल में तंत्र प्रयोजनों की बहुत मान्यता थी इसलिए दैवी आराधना के विभिन्न उपचारों के लिए इन्हीं दिनों वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप से विशेष क्रिया-कृत्य किये जाते थे। अब वह समय नहीं रहा, न ही सौम्य स्तर की तंत्र साधना करने वाले साधक। अपेक्षित उच्चस्तरीय मार्गदर्शन के अभाव में आत्मघाती प्रयोग करने की अपेक्षा बल सम्वर्धन की-आस्था सम्वर्धन की एवं स्वयं के आध्यात्मिक कायाकल्प की अति सौम्य चौबीस हजार मंत्र जप वाली नौ दिन की अनुष्ठान साधना कर लेना ही ठीक है।
वैदिक साहित्य में नवरात्रियों का सुविस्तृत वर्णन है। ऋषियों ने इसकी व्याख्या विवेचन करते हुए कहा है कि इसका शाब्दिक अर्थ तो नौ रातें ही है पर इनका गूढ़ार्थ कुछ और है। नवरात्रि का तात्पर्य यह है कि मानवी कायारूपी अयोध्या में नौद्वार अर्थात् नौ इन्द्रियाँ हैं। अज्ञानतावश दुरुपयोग के कारण उनमें जो अन्धकार छा गया है, से अनुष्ठान करते हुए एक-एक रात्रि में एक-एक इन्द्रिय के ऊपर विचारना, उन पर संयम स्थापित करना तथा सन्निहित क्षमताओं को उभारना ही वस्तुतः नवरात्रि की साधना कहलाती है। रात्रि का अर्थ ही है-घोर निबिड़ अन्धकार। जो मनुष्य इन नौ द्वारों से-नौ इन्द्रियों के विषयों से जागरुक रहता है, उनमें लिप्त नहीं होता और ओजस् तेजस् और वर्चस् को गँवाता है, वस्तुतः उसे बढ़ाता ही है।
“अनुष्ठान” शब्द की परिभाषा” यदि दी जाय तो वह इस प्रकार होगी-” अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिए संकल्पपूर्वक नियत संयम-प्रतिबन्धों एवं तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।” इन नवरात्रियों में सर्वसाधारण से लेकर योगी, यती, तपस्वी, भी अपने-अपने स्तर की संयम साधना एवं संकल्पित अनुष्ठान करते हैं। इस अवधि की प्रत्येक अहोरात्रि बड़ी महत्वपूर्ण मानी जाती है और उन प्रत्येक क्षणों को साधक अपनी चेतना को परिष्कृत-परिशोधित करने-उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ाने में लगाता है।
नवरात्रि साधना एक संकल्पित साधना है। इसमें ऋषियों ने उपासना क्रम का निर्धारण कुछ ऐसा किया है कि जिसका पालन कर सकना सभी के लिए सुलभ है। इस अवधि में सत्ताईस माला प्रतिदिन करते हुए चौबीस हजार गायत्री महामंत्र का लघु गायत्री अनुष्ठान भी सम्पन्न हो जाता है। श्रेयपथ के पथिकों के लिए ऋषिगणों ने चौबीस सहस्र जप की संकल्पित साधना ही नवरात्रि हेतु सर्वश्रेष्ठ बतायी है। गायत्री परम सतोगुणी,शरीर के लिए भी व आत्मा के लिए भी दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। यही आत्म कल्याण का मार्ग है। गायत्री साधकों को यही साधना इन नौ दिनों में करनी चाहिए। असमंजस मन में हो सकता है कि नवरात्रि को दुर्गा उपासना से जोड़ कर रखा गया है, फिर गायत्री अनुष्ठान वस्तुतः दुर्गा महाकाली भी गायत्री महाशक्ति का एक रूप है। दुर्गा कहते हैं-दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को नष्ट करने वाली महाशक्ति को। नौ रूपों में माँ दुर्गा की उपासना इसलिए की जाती है कि वह हमारी इन्द्रिय चेतना में समाहित दुर्गुणों को नष्ट कर दे। मनुष्य की पापमयी वृत्तियाँ ही महिषासुर हैं। नवरात्रियों में उन्हीं प्रवृत्तियों पर मानसिक संकल्प द्वारा अंकुश लगाया और संयम द्वारा दमन किया जाता है। संयमशील आत्मा को ही दुर्गा, महाकाली, गायत्री की शक्ति से सम्पन्न कहा गया है। प्राण चेतना के परिष्कृत होने पर यही शक्ति महिषासुर-मर्दिनी बन जाती है।
नवरात्रि अनुष्ठान में मन को एकाग्र तन्मय बनाने के साथ ज पके साथ ध्यान की प्रक्रिया को सशक्त बनाया जाता है। मातृभाव में ध्यान तुरंत लग जाता है व जप स्वतः होठों से चलता रहता है। ध्यान तब माला की गिनती की ओर नहीं जाता। उँगलियों से माला के मन के बढ़ते जाते हैं, ध्यान मातृसत्ता का अनन्त स्नेह व ऊर्जा देने वाले पयपान की ओर लगा रहता है। इस अवधि में आत्मचिन्तन विशेष रूप से करना चाहिए। मन को चिन्ताओं से जितना खाली रखा जा सके-अस्तव्यस्तता से जितना मुक्त हुआ जा सकें, उसके लिए प्रयासरत रहना चाहिएं आत्मचिन्तन में अब तक के जीवन की समीक्षा करके उसकी भूलों को समझने और प्रायश्चित के द्वारा परिशोधन की रूपरेखा बनानी चाहिए। वर्तमान की गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण करना चाहिए। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्त्तव्य अपने क्रियाकलापों में अधिकतम मात्रा में कैसे जुड़ा रह सकता है, उसका ढांचा स्वयं ही खड़ा करना चाहिए और उसे दृढ़तापूर्वक निबाहने का संकल्प करना चाहिए। भावी जीवन की रूपरेखा ऐसी निर्धारित की जाय जिसमें शरीर और परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए आत्मकल्याण के लिए कुछ करते रहने की गुंजाइश बनी रहे। साधना-स्वाध्याय-संयम-सेवा, यही है आत्मोत्कर्ष के चार चरण। इनमें एक भी ऐसा नहीं है, जिसे छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा किया जा सके। अस्तु मनन और चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए। यदि इससे भावी जीवन की कोई परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानना चाहिए कि श्रेष्ठता भरी गतिविधियाँ अपनाते हुए ही भगवान की शरण में पहुँच सकना और उनका अनुग्रह प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।
गायत्री परम सतोगुणी-शरीर और आत्मा में दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। वर्ष की दो नवरात्रियों को गायत्री माता के दो आयातित वरदान मानकर हर व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए। इस अवधि में उनका कोमल प्राण धरती पर प्रवाहित होता है, वृक्ष वनस्पति नवलल्लव धारण करते हैं, जीवन-जन्तुओं में नई चेतना इन्हीं दिनों आती है। विधिपूर्वक सम्पन्न नवरात्रि साधना से स्वास्थ्य की नींव तक हिल जाती हैं एवं असाध्य बीमारियाँ तक इस नवरात्रि अनुष्ठान से दूर होती देखी गयी हैं।
इन नौ दिनों में दिनचर्या एवं मनःस्थिति ऐसी रखी जाय मानो यह अवधि ऋषि जीवन जीने के लिए नियत हो। अपने स्वभाव में घुसी हुई बुरी आदतों में से जितनी जिस मात्रा में छोटी या घटाई जा सके उसके लिए भरसक प्रयास किया जाना चाहिए। इसी प्रकार सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की आवश्यकता अनुभव होती है उनकी कार्यान्वित करने के लिए इन दिनों तो प्रयत्न करना ही चाहिए। अनुष्ठान काल में अनेक प्रकार के विधि निषेधों का नियम पालन की की परम्परा है। इसमें अपनी ओर से कुछ बातें छोड़ने और कुछ अपनाने का संकल्प करना चाहिए। घर को तपोवन बनाने और दिनचर्या में संत जीवन का समावेश करने का प्रयोग इन दिनों जितनी अच्छी तरह जितनी सफलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है, उतना अन्य किसी अवसर पर नहीं। नवरात्रि पर्व के नौ दिनों में हर साधक को अपने लिए स्वयं अनुशासन स्थापित करने और उनको निबाहने के लिए अपनी अंतःप्रेरणा से स्वयं ही संकल्प करना चाहिए। इस प्रयोग से प्रस्तुत अनुष्ठान का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
प्रस्तुत नवरात्रियों का महत्व इसलिए भी अधिक है कि ये युगसंधि काल की नवरात्रियाँ है। इस समय एक सहस्राब्दी बदल रही है एवं हम इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर रहे हैं युगसंधि की नवरात्रियों में अदृश्य लोकों से देवतत्व की अतिरिक्त वर्षा होती है जो विशेष रूप से देवमानवों में प्रखरता का अनुपात बढ़ाने के लिए होती है। नवयुग सुजन की प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने तथा उस दिशा में कदम बढ़ाने का यही शुभ मुहूर्त्त है। प्रज्ञा युग की प्रेरणा को अपनाने और विधि व्यवस्था को चरितार्थ करने के लिए यों हर घड़ी पवित्र और महत्वपूर्ण है। किन्तु इस प्रयोजन के लिए नवरात्रि पर्व की अत्यधिक गरिमा मानी गयी है। प्रत्येक वर्ष जो 2001 से 2005 तक की अवधि तक का माना जा सकता है, नवरात्रि की एक-एक दिवस की अवधि के समान है। इसके एक-एक पल का उपयोग मात्र महाकाल के निमित्त हो, यही इन दिनों का युगधर्म है। यों युगसंधि की इस परिवर्तन वेला में अनिष्ट के परिमार्जन तथा सृजन के सम्वर्धन को लक्ष्य में रखकर जो बारह वर्षीय योजना गुरुसत्ता द्वारा 1989 में बनायी गयी एवं जिसकी प्रथम पूर्णाहुति अभी-अभी नवम्बर 95 में गुरुग्राम आँवलखेड़ा में मनायी गयी, उसे युगसंधि महापुरश्चरण नाम दिया गया है। 240 करोड़ गायत्री का लक्ष्य 6 वर्ष में ही पारकर के 2400 करोड़ तक पहुंच गया, एवं अब आगे के छह वर्षों में 24000 करोड़ गायत्री जप, भगवान्नाम जप एवं मंत्र लेखन का लक्ष्य पूरा करने का संकल्प लिया गया है। कल्पना की जाती है कि अधिकाधिक साधक इस नैष्ठिक अभियान में जुड़ेंगे एवं अपनी श्रद्धाँजलि अन्ततः 2001 में युग देवता के चरणों में द्वितीय पूर्णाहुति में अर्पित करेंगे। प्रस्तुत नवरात्रि पर्व बड़ी ही विषम वेला में संधिकाल की अवधि में इस वर्ष चैत्र नवरात्रि के रूप में 20 मार्च से 28 मार्च की समयावधि में आया है। गायत्री परिवार की जहाँ भी शाखाएं प्रज्ञामण्डल, स्वाध्याय मण्डल, प्रज्ञा संस्थान छोटे व बड़े रूप में मनायें। सामूहिकता में बड़ी शक्ति होती है। एक साथ संकल्पित साधक जब इस अनुष्ठान प्रक्रिया में जुड़ेंगे तो निश्चित ही सूक्ष्मजगत के संशोधन एवं जीवन-मरण के संघर्ष के लिए जूझ रही असुरता से मोर्चा लेने में मदद मिलेगी। युग देवता ने इस पुनर्गठन वर्ष विशिष्ट संस्कार सम्पन्न दैवी अंशधारी आत्माओं से साधना द्वारा आत्मबल उपार्जन हेतु न्यूनतम पाँच चौबीस चौबीस हजार के अथवा दो या तीन सवा लक्ष के गायत्री अनुष्ठान करने की प्रेरणा दी है। उसका शुभारम्भ यदि अभी तक न हुआ हो तो इस नवरात्रि से आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। यह नवरात्रि सभी के लिए उज्ज्वल सम्भावनाएँ लेकर आए, यही शांतिकुंज परिवार की मंगल कामनाएँ हैं।
विदाई की घड़ियाँ और गुरुदेव की व्यथा वेदना-3
गुरुसत्ता के अंतःस्थल की पीड़ा को समझना हो तो प्रस्तुत लेख, जिसके कुछ महत्वपूर्ण अंश मात्र यहाँ दिए जा रहे हैं, को पढ़कर समझा जा सकता है। जनवरी 1969 में छपे लेखों से आरम्भ किया यह क्रम विगत दो माह से जारी है। अब मार्च महा में भी फरवरी 69 की अखण्ड ज्योति के इसी शीर्षक के भाव से लिखे गए लेख के अंश पुनः प्रस्तुत हैं।
(हमारा अपना आंतरिक ढाँचा एक विचित्र का बन चुका है और उसे आग्रहपूर्वक वैसा ही बनाए रहेंगे। सहृदयता, ममता, स्नेह, आत्मीयता की प्रवृत्ति हमारे रोम-रोम में कूट-कूट कर भरी है। यह इतनी सरस व सुखद है किसी भी मूल्य पर इसे छोड़ने की बात तो दूर, घटना भी सम्भव न हो सकेगा।
तृष्णा और वासना से छुटकारा पाने का नाम हम मुक्ति मानते रहे हैं। सो उसे प्राप्त कर चुके। उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन पद्धति बनाए रहने, दूसरों में केवल अच्छाई देखने और सबमें अपनी ही आत्मा देखकर असीम प्रेम करने की तीन धाराओं का संयुक्त स्वरूप हम स्वर्ग मानते रहे हैं। सो उसका रसास्वादन चिरकाल से हो रहा है। अब न स्वर्ग जाने की इच्छा है, न मुक्ति पाने की।
ऐसा वैराग्य जिसमें स्नेह सौजन्य से-अनन्त आत्मीयता से वंचित होना पड़े, हमें तनिक भी अभीष्ट नहीं। हमारी ईश्वर भक्ति पूजा-उपासना से आरम्भ होती है और प्राणी मात्र को अपनी ही आत्मा के समान अनुभव करने और अपने ही शरीर के अंग अवयवों की तरह अपनेपन की भावना रखते हुए अनन्य श्रद्धा चरितार्थ करने तक व्यापक होती चली जाती है।
जिनका स्नेह-सद्भाव, सहयोग, अनुग्रह अपने ऊपर रहा है, उनकी ओर से तनिक भी मुख मोड़ा जाय, उनके प्रति उदासीनता और उपेक्षा अपनाई जाय, कोई कृतघ्न ही ऐसा सोच सकता है।
रोटी ने नहीं-भावभरी आत्मीयता के अनुदान जहाँ-तहाँ से हमें मिल सके हैं, उन्हीं ने हमारी नस−नाड़ियों में जीवन भरा है और उसी के सहारे हम इस विशाल संघर्ष से भरे जीवन में जीवित रह सकने और कुछ कर सकने लायक कार्य कर सकने में समर्थ रहे हैं।
लोगों की आँखों से हम दूर हो सकते हैं पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आँखों में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनाएं हैं, उन सबकी तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जायेंगे और उन देव प्रतिभाओं पर निरन्तर आओ का अर्घ्य चढ़ाया करेंगे ।...लोग हमें भूल सकते हैं, पर हम अपने किसी स्नेही को नहीं भूलेंगे।
कोई माता विवशता में यहीं चली जाती है, तो चलते समय अपने बच्चों को बार-बार, लौट-लौट कर देखती और ममता से भरी गीली आंखें आँचल से पोछती आगे बढ़ती है। ऐसा ही कुछ उपक्रम अपना भी बन रहा है। सोचते हैं, जिन्हें अधूरा प्यार किया अब उन्हें भरपूर प्यार कर लें। जिन्हें छाती से नहीं लगाया, जिन्हें गोदी में नहीं खिलाया, जिन्हें पुचकारा दुलारा नहीं, उस कमी को अब पूरा कर लें। किसी को कुछ अनुदान, आशीर्वाद देना अपने हाथ में न हो तो दुलार देना तो अपने हाथ में है।
अब आने वाली विषम घड़ियाँ यों एक बारगी कलेजे को कपड़ा निचोड़ने की तरह ऐंठती है और अनायास की रुलाई से कण्ठ भर देती हैं, फिर भी इसके पीछे कोई विवशता नहीं है। महान उद्देश्य के लिए-लोकमंगल के लिए, नव-निर्माण के लिए, तिल-तिल करके अपने को गला देने में हमें असीम सन्तोष, अपार आनन्द और उच्चकोटि का गर्व है।
कोई चमड़ी उधेड़ कर देख सके तो भीतर माता का हृदय लगा मिलेगा, जो करुणा, ममता स्नेह और आत्मीयता से हिमालय की तरह निरन्तर गलते रहकर गंगा-यमुना बहाता रहता है।
प्यार, प्यार, प्यार यही हमारा मंत्र है। आत्मीयता ममता, स्नेह, और श्रद्धा यही हमारी उपासना है। सो बाकी दिनों अब अपनों से अपनी बातें ही नहीं कहेंगे-अपनी सारी ममता भी उन पर उढेलते रहेंगे। शायद इससे परिजनों को भी यत्किंचित् सुखद अनुभूति मिले।
प्रतिफल और प्रदान की आशा किए बिना हमारा भावना प्रवाह तो अविरल जारी ही रहेगा। परिजनों से परिपूर्ण स्नेह-यही इन पिछले दिनों का हमारा उपहार है, जिसे कोई भुला सके तो भुला दे ।हम तो जब तक मस्तिष्क में स्मृति और हृदय में भावना स्पन्दन विद्यमान है, आजीवन उसे याद ही रखेंगे।
लोकसेवा इन दिनों एक व्यवसाय बन गया है। पतन निवारण के निमित्त जो भी लोक सेवा के क्षेत्र में उतरता है, उसके लिए कुछ मानदण्ड ऋषिजनों द्वारा निर्धारित किए गये हैं। परमपूज्य गुरुदेव समय-समय पर युग-शिल्पियों-संस्था में स्वेच्छा से समर्पित भाव से कार्य कर रहे लोकसेवियों के लिए निर्धारित आचार संहिता के सूत्र देते रहे हैं। इन्हीं सूत्रों पर चलने का परिणाम है कि आज युग निर्माण मिशन-गायत्री परिवार गुरुसत्ता के बताए लक्ष्य पर निर्बाध गति से चल रहा है कहीं कोई गड़बड़ाने न पाए, इसी निमित्त यह लेख 18 वर्ष बाद पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है। सेवा के प्रति हमारा भाव क्या रहे, आत्मिक प्रगति का पथ साथ-साथ कैसे प्रशस्त होता चले, इस पर क्रमबद्ध मार्गदर्शन विगत आठ अंकों से दिया जा रहा है। उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए यह लेख प्रस्तुत है।
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण और जीवन की दिशा निर्धारित करने का काम क्षण भर में नहीं हो जाता। स्वयं अपना निर्माण भी अनवरत प्रयासों से कई फिसलनों और भटकावों के बाद हुआ है तो अपने निकटवर्तियों से शीघ्रता की आशा कैसे की जा सकती है। खास तौर से उस स्थिति में जबकि लोकसेवी का अपना रुझान आदर्शों की ओर था, टीस भी थी और लगन भी पैदा करना है। इसके लिए क्रमबद्ध शिक्षण और धैर्यपूर्ण प्रयास आवश्यक हैं।
आदर्शों पर दृढ़ रहने की निष्ठा परिवार वालों में भी आदर्शों के वरण की लक जगाती है। लोकसेवी अपने आदर्शों की कीमत पर परिवार का स्नेह प्राप्त न करे तो उन्हें प्रेरणा प्रदान करने का कार्य प्रभावशाली ढंग से सम्पन्न नहीं होता है। जैसे लोक सेवी पिता ने यह व्रत ले रखा है कि हम सूती या खादी के वस्त्र ही पहनेंगे। स्वयं तो वह नहीं खरीदेगा। लेकिन स्वावलम्बी और कमाऊ लड़के स्नेह श्रद्धावश उस के लिए टेरिकाट या पोलिस्टर के कपड़े ले आये तो असमंजस की सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। परन्तु ऐसा तभी होता है जब अपना दृष्टिकोण परिवार वालों के सामने साफ न रहा हो। यदि स्वजन सम्बन्धियों को सादगी शान समझने और व्यक्तित्व की उज्ज्वलता को गौरवास्पद अनुभव करने की प्रेरणा दी जाय, स्वयं अपना व्यक्तित्व भी उसी स्तर का रखा जा सके तो ऐसी असमंजस पूर्ण स्थिति आ ही नहीं सकती। क्योंकि तब घर के लोग भी लोकसेवी की मान्यताओं और दृष्टिकोण के महत्व को समझने-स्वीकारने लगेंगे तथा वे भी उन्हीं आदर्शों को अपनाने-उस व्रत पर दृढ़ रहने की निष्ठा विकसित कर सकेंगे।
अपने व्रत पर दृढ़ रहने की निष्ठा को प्रखर अभिव्यक्ति देने से लोग भले ही वैसा व्रत न अपनायें पर वे व्रत के महत्व को तो समझेंगे। परिवार के लोगों को शिक्षित करने के लिए परिस्थिति के अनुसार इस प्रकार कितने ही तरीके खोजे जा सकते हैं।
परिवार के सदस्यों में उत्कृष्टता और सद्गुणों की अभिवृद्धि के साथ-साथ लोक सेवी को चाहिए कि वे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को और ज्यादा न बढ़ायें। प्राचीन काल में जिन्हें लोक सेवा का व्रत लेना होता था वे तो ब्रह्मचर्याश्रम से सीधे ही लोक सेवा के क्षेत्र में उतर पड़ते थे और गृहस्थ व्यक्ति यदि लोक सेवा करना चाहते तो पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाते थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि घर परिवार छोड़कर संन्यासी हो जाते थे। लोक सेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए वे अपनी जिम्मेदारियों को इस प्रकार पूरा कर देते या ऐसी व्यवस्था कर देते थे जिससे कि वे परिवार के प्रति कम से कम उत्तरदायी हों। उदाहरण के लिए बच्चे बड़े हो गये तो घर परिवार की व्यवस्था उनके हाथ में सौंप कर माता-पिता ने वानप्रस्थ ले लिया और निकल पड़े समाज सेवा के लिए। अथवा परिवार के उत्तरदायित्वों को इतना कम रखा कि उसके लिए अपना अधिकांश समय और श्रम न देना पड़े।
आज की स्थिति में युवा लोकसेवियों को चाहिए कि वे सन्तान की संख्या न बढ़ायें। अच्छा तो यही है कि लोक सेवा के क्षेत्र में रहते हुए संतानोत्पादन से बचा जाय। सन्तान आखिर ममता और वात्सल्य भावना की अभिव्यक्ति के लिए ही तो आवश्यक समझी जाती है। ममता और वात्सल्य लुटाने के लिए समाज में बहुत से बच्चे हैं। यह कोई आवश्यक नहीं है कि बच्चा अपनी ही संतान हो। जो विवाह की आवश्यकता अनुभव न करते हों वे अविवाहित ही रह लें और जो विवाह करना चाहें तथा लोक सेवी का जीवन भर जीना चाहें उन्हें तो सन्तान की आवश्यकता ही नहीं समझनी चाहिए या जिनके बच्चे हैं वे वहीं तक सीमित रखें पारिवारिक उत्तरदायित्वों को रखने से लोक सेवा के लिए अधिक समय बच सकेगा और अपनी प्रतिभा तथा योग्यता का अधिकाधिक लाभ समाज को दे सकेंगे। जापान के गाँधी कागवा की तरह वे भी विवाहित किन्तु सन्तान उत्पन्न न कर सारे समाज का उत्तरदायित्व सम्भाल सकेंगे। सेवा के अनेक क्षेत्र हैं और उनके व्यापक स्वरूप को पूरी तरह स्पर्श कर सकना सम्भव नहीं है। यह सोचकर लोग अन्तःकरण में सेवा की उमंग उठते हुए तथा सेवा धर्म के लिए हर दृष्टि से योग्य होते हुए भी पीछे हट जाते हैं। वे सोचते हैं संसार में इतनी विकृतियाँ हैं, समस्या इतनी विकराल हैं या हजारों लोग बाढ़ की चपेट में आ गये हैं हम क्या कर सकते हैं ? सेवा कार्य तो अभी हुआ नहीं कि उसके परिणाम पर दृष्टि पहले गयी। यदि अन्य लोग जो सार्वजनिक समस्याओं के समाधान के लिए निकलते हैं-वे सोच लें तो संसार में सेवापरक गतिविधियाँ चलेंगी ही नहीं ? परिणाम क्या होगा, यह सोचे बिना अपनी सामर्थ्य और स्थिति के अनुसार प्रयास प्रारम्भ कर देना सेवा भाव की पहली शर्त है। गिलहरी जानती थी कि रीछ वानरों को समुद्र पर पुल बनाने में कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं दे सकती। फिर भी उसने सागर में डुबकी लगाना और रेत पर लोटने के बाद फिर सागर में डुबकी लगाना जारी रखा। उसका योगदान परिणाम की दृष्टि से भले ही न्यून रहा हो पर भगवान का कार्य करने वालों में उस गिलहरी को अग्रणी स्थान मिला।
व्यावहारिक दृष्टि से भी एकाकी योगदान निष्फल नहीं जाते। रीछ वानर जाते थे कि हमारी शक्ति कितनी है फिर भी उन्होंने लंका विजय की योजना बनाई और उस पर काम किया। साधनहीन और शक्तिहीन रीछ वानरों ने समर्थ शक्तिशाली प्रतिपक्ष को किस प्रकार परास्त किया, उदाहरण सामने है। इन्द्र के क्रोधित होने पर जब ब्रज का डूबना लगभग निश्चित लगने लगा तो कृष्ण ने गोप-बालों के सामने गोवर्धन पहाड़ उठाने की योजन रखी। कहाँ गोप-बाल और कहाँ गोवर्धन पर्वत का उठाना। कार्य की गुरुता के आगे सभी अपने को असमर्थ मान रहे थे फिर भी पीछे नहीं हटे और गोवर्धन पर्वत उठाकर ही रहे। लोकसेवी की उमंग अनुभव करने और उस मार्ग पर कदम बढ़ाने वाले को चाहिए कि वह बूँद-बूँद से घट भरने की बात सोचे।
प्रत्यक्ष देखने पर सेवा कार्य में घाटा जान पड़ता है जबकि वस्तुतः ऐसा नहीं है। कृषि विज्ञान से एकदम अनभिज्ञ व्यक्ति यदि किसी किसान को खेत में बीज डालते देखकर यह सोचने लगे कि किसान बीजों को यों ही गँवा रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं पर उसके परिणाम हमेशा सुखद लगते हैं। सेवा साधना के परिणाम भी सामाजिक सुव्यवस्थित और व्यक्तिगत आत्म सन्तोष एवं आनन्द के रूप में प्राप्त होते हैं। वह अनुभूति आन्तरिक है- लेकिन जिनकी दृष्टि बाहरी परिणामों पर ही टिकी रहती है वे सेवा को घाटे का सौदा समझते हैं।
समाज में यह स्थिति सदैव बनी रहने वाली है। जन साधारण स्थूल दृष्टि से ही हर वस्तु का मूल्याँकन करते हैं इसीलिए सेवा साधना के असाधारण लाभों को समझ नहीं पाते और उसके लिए आगे आने में, सहयोग देने में झिझकते हैं। जब कोई साहसी लोकसेवी उस क्षेत्र में पहल करता है, प्रसन्नतापूर्वक अकेला ही आगे बढ़ता जाता है तो लोगों का भ्रम दूर होता है। सेवा-साधना के लाभ सबको दिखने लगते हैं और लोकसेवी को सम्मान से लेकर सहयोग समर्थन तक दिया जाने लगता है।
परन्तु यदि लोकसेवी का दृष्टिकोण शुद्ध तथा प्रखर नहीं है तो वह बीच में मिलने वाली उपेक्षा और कठिनाइयों से विचलित हो जाता है उसे लगता है कि सेवा का लाभ सारे समाज को मिला है, फिर भी समाज उसके लिए सहयोग नहीं देता, तो हम ही क्यों मरें खपें ? और यह भाव आते ही लोक सेवी की प्रखरता घटने लगती है।
यह चिन्तन उभरने का अर्थ है- “लोकसेवी की दृष्टि खो जाना।” ऐसा चिन्तन उस मस्तिष्क में ही उभरेगा जो सेवा कार्य को कर्तव्य नहीं किसी पर किया गया अहसान मानता है। सेवा भाव से
सन्तोष बढ़ता है और अहसान के भाव से अहंकार पनपता है। उसके बढ़ने पर पतन निश्चित है। अस्तु सेवाभावी का दृष्टिकोण सेवा के प्रति शुद्ध रहना ही चाहिए। वे सेवा कार्य को कर्तव्य पूर्ति का, सामाजिक ऋण से मुक्त होने का, भगवान का प्रेम पाने का एक अलभ्य अवसर मानता है। उसे खोना नहीं चाहता।उसे सौभाग्य मानकर अपनाने के लिए दौड़ पड़ता है। कोई साथ आ रहा है या नहीं यह देखने की उसकी इच्छा ही नहीं होती। यदि कोई आ गया तो प्रसन्नतापूर्वक उसके सहयोग से कार्य को और भी प्रखर कर देता है। सहयोगी के अभाव में उसका मनोबल नहीं घटता है-और सहयोगी के आने पर उसे यह भी नहीं लगता कि कोई उसके श्रेय में हिस्सा बटाने क्यों आ गया। उसकी दृष्टि तो सेवा कार्य को अधिक से अधिक कुशलता से करने पर रहती है। इसलिए उसकी प्रखरता एवं उसे मिलने वाले सन्तोष में जरा भी कमी नहीं आने पाती।
अस्तु सेवा क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले हर व्यक्ति को अपना दृष्टिकोण शुद्ध एवं प्रखर बनाकर रखना चाहिए, तभी वह सही अर्थों में अपनी शक्ति उस कार्य में लगा सकेगा। आत्मोत्कर्ष एवं समाजोत्कर्ष का संयुक्त लाभ इसी आधार पर प्राप्त हो सकेगा।
सभी इस तथ्य की भली-भाँति जानते हैं कि प्रस्तुत समय जिससे हम सभी गुजर रहे हैं, अति विशिष्ट है। संधिकाल की विषम वेला के अंतिम छह वर्ष हैं यह । इन दिनों प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों ही स्तर पर बड़ी तेजी से परिवर्तनों का क्रम चल रहा है। महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के इस दौर में बहुत कुछ बदलने जा रहा है। असुरता भी अपनी ओर से अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है एवं देवत्व संगठित होकर उसका मुकाबला करने हेतु तत्पर दृष्टिगोचर हो रहा है। किन्हीं को नंगी आँखों से यह दिखाई न देता हो तो उनका कोई कसूर नहीं, किन्तु यह विश्वास किया जाना ही चाहिए कि युग परिवर्तन की प्रक्रिया ने प्रस्तुत संधिकाल में प्रथम पूर्णाहुति के बाद से एक नया मोड़ ले लिया है। एक सुनिश्चित यात्रा करने के लिए थोड़ा सफर करने के बाद जिस तरह गाड़ी का ड्राइवर क्लच दबाकर उसे नये गियर में डालकर गति देता है, कुछ ऐसा ही इन दिनों चल रहा है।
चूँकि मनुष्य अभी भी अनीति का मार्ग न छोड़ने के अपने दुराग्रह पर अड़ा दिखाई देता है इसलिए प्रत्यक्ष दीखता है कि हमें अगले दिनों महाकाल के भयंकर कोप-भयावह विपत्तियों से गुजरना पड़े। असम्भव को भी सम्भव कर देने वाले पराक्रम होते हमें दिखाई पड़ें व ऐसा लगने लगे कि उथल-पुथल की रक्त-रंजित प्रक्रिया महारुद्र द्वारा अब अपनायी जा रही है। यह महाकाल के खण्ड नर्तन का, कालरात्रि की महा निशा का पर्व है एवं ऐसे विषम समय में जब प्रत्यावर्तन प्रक्रिया सम्पन्न होने जा रही है, प्रत्येक को अपने को नये सिरे से ढालने के लिए अपनी साधनात्मक ऊर्जा भण्डार को नयी शक्ति से ओत-प्रोत कर लेने के लिए तैयार कर लेना चाहिए। समय रहते तो आगत को पहचान लें, उन्हें समझदार कहते हैं। ऐसे ही समझदारों में प्रज्ञा परिजनों की गिनती होती है। अखण्ड-ज्योति पाठकों से इसी स्तर की समझदारी अपनायी जाने की अपेक्षा रखी जाती है।
पूर्वजन्मों की अनुपम आत्मिक सम्पदा जिनके पास संग्रहित है, ऐसी कितनी ही आत्माएँ इस समय गायत्री परिवार युगनिर्माण मिशन में मौजूद है। पिछले कुछ समय से साधनात्मक स्तर पर कुछ विशेष न कर पाने के कारण इन फौलादी तलवारों पर जंग लग गयी है, ऐसा प्रतीत होता है। नव निर्माण का कार्य जिन्हें करना है, वे ही यदि प्रमाद की स्थिति में होंगे अथवा प्रचारात्मक विराट स्तर के भीड़ भरे आयोजनों के बाद उस ऊर्जा का उपयुक्त नियोजन न कर प्रसुप्त स्थिति में जाते दिखाई पड़ेंगे तो इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है। इसी महत्ता को समझते हुए सभी परिजनों से यही अपेक्षा की जा रही है कि इस रजत जयंती वर्ष की सौभाग्य भरी वेला में जब शांतिकुंज अपने पच्चीस वर्ष पूरे करने जा रहा है, जहाँ गुरुसत्ता की विशिष्ट तप ऊर्जा संग्रहित है, आकर विशिष्ट ऊर्जा अनुदान सत्रों में भाग लेकर अपनी बैटरी चार्ज कराके जायेंगे ताकि आगामी पाँच-छह वर्षों की प्रतिकूलताओं से जूझने हेतु पर्याप्त आत्मबल का संग्रह वे कर सकें।
मानवी व्यक्तित्व में देवत्व का अधिकाधिक समावेश करने के लिए जिस साधना पद्धति का अवलम्बन लेना पड़ता है वह दो वर्गों के लिए अलग-अलग है। पहली विशिष्ट लोगों की, विशिष्ट प्रयोजन के लिए विनिर्मित विशिष्ट प्रक्रिया। दूसरी सर्व साधारण के लिए सहज सुगम सौम्य पद्धति। विशिष्ट प्रक्रिया योगी, यति, एकान्तवासी, साँसारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त असाधारण मनोबल सम्पन्न, कठोर तपश्चर्या के लिए समुद्यत लोगों के लिए है। षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण, तंत्र योग, प्राणयोग आदि साधनाएँ इसी प्रकार की होती हैं। इनसे चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं जो किन्हीं अवसर विशेषों के लिए प्रयुक्त की जा सकती है। सर्वसाधारण के लिए जो राजमार्ग युगऋषि ने बताया है उसमें आत्मकल्याण, ईश्वर प्राप्ति और लोकमंगल की सभी सम्भावनाएँ विद्यमान है। आजीविका उपार्जन तथा सामान्य गृहस्थ जीवन यापन करते हुए इस साधना क्रम को अपनाया जा सकता है और श्रेय पथ पर गतिशील रहा जा सकता है। संधिकाल में सूक्ष्म जगत में चल रहे प्राण प्रवाह को विशेष रूप से आकर्षित कर अपने अन्दर के आत्मबल को विशिष्ट उछाल दे देने हेतु पूज्य गुरुदेव ने इन साधना विधानों में वह सारी विशेषताएं भर दी हैं जो कि आज की परिस्थितियों के अनुसार अभीष्ट हैं।
परिजनों को प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों का स्मरण होगा जो कि परमपूज्य गुरुदेव के हिमालय प्रवास से लौटने के बाद शांतिकुंज में सम्पन्न हुए थे। वास्तविक प्राण-प्रत्यावर्तन कैसे होता है, कैसे विशिष्ट आत्मशक्ति का उद्भव अपने अन्दर से हो सकता है, इसे सभी भाग लेने वाले परिजनों ने अनुभव किया। विशिष्ट उपलब्धियाँ लेकर वे गए एवं यही उनके प्राणवान सृजन सेनानी बनने का मूलस्रोत बना। इसके बाद कायाकल्प कर देने वाले कल्प साधना सत्र चले। इस में भाग लेने वाले परिजन आज भी उस ऊर्जा प्रवाह से अनुप्राणित हैं एवं अनुभव करते हैं कि आध्यात्मिक कायाकल्प जैसा कुछ विशिष्ट प्रयोग इन दिनों भी चले ताकि इस विशिष्ट वर्ष में कुछ विशेष कर दिखाने का साहस सँजोकर वे अगली कक्षा में बढ़ सकें।
शांतिकुंज तंत्र ने यह निश्चय किया है कि इस वर्ष नौ दिवसीय साधना सत्र, जो चैत्र नवरात्रि के रूप में 20 से 28 मार्च तक चलेगा, के बाद एक अप्रैल से नौ दिवसीय शक्ति अनुदान सत्रों की एक शृंखला चले, जिसमें भाग लेने से कोई भी अपने को वंचित न रखें ये विशिष्ट सत्र-नौ-नौ दिन के होंगे, एवं एक अप्रैल से 19 मई तक (कुल 18 सत्र) तक इस प्रकार इस वर्ष का चैत्र नवरात्रि सत्र मिलाकर ये कुल चौबीस सत्र हो जाते हैं। यदि प्रत्येक में एक हजार साधक भी भाग लेते हैं तो नैष्ठिक स्तर के प्राणवान चौबीस हजार साधक जो विशिष्ट आत्मबल सम्पन्न होंगे इस अवधि में नवयुग के अवतरण हेतु तैयार हो सकेंगे। मध्य में पड़ने वाली 20 मई से 30 जून की अवधि पाँच दिवसीय संस्कार-परामर्श सत्र हेतु रखी गयी है। यह सुविधा उन सामान्य लोगों के लिए बनायी गयी है जो अभी तक युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित हो नहीं पाए अथवा अवकाश अधिक न होने से मात्र थोड़ा ही समय निकाल पाते हैं। इस अवधि में परामर्श मात्र ही दिया जा सकेगा किन्तु कुछ विशिष्ट तप−साधना नहीं सम्पन्न हो सकेगी।
एक अप्रैल से आरम्भ होने वाले सत्र जिनके निमित्त किये जा रहे हैं, उन्हें इनकी विशिष्टता का अनुमान लगाना चाहिए। तीनों शरीरों के परिमार्जन परिष्कार हेतु इन नौ दिनों में उन्हें माँ के गर्भ में नौ माह रहने की अवधि की तरह विशिष्ट प्राणऊर्जा से पूज्यवर व मातृसत्ता के गर्भ इस शांतिकुंज की तपशक्ति से अनुप्राणित किया जाएगा। आहार में मात्र हविष्यान्न की रोटी, जड़ी-बूटी कल्क, विशिष्ट साधनाओं के अनुदान का क्रम ऊर्जा संचार के रूप में यहाँ से जाने के बाद भी इस विधि-विधान को करते रहने से चलता रहेगा। इस क्रम में कभी कोई व्यवधान नहीं आएगा। अन्दर के क्रिस्टल को निखारने-अपने सोये देवता को जगाने के लिए बैटरी चार्ज करने के लिए ही आहार-विहार में आमूलचूल परिवर्तन के लिये यह विधान रखा गया है।
प्रातःकाल साढ़े तीन बजे उठकर साधक प्रार्थना, आरती क्रम के बाद विशिष्ट ध्यान योग प्रक्रिया से गुजरेंगे जिसमें ज्योति अवतरण साधना के माध्यम से सविता देवता के प्रकाश के पापनाशक तेज के व्यक्ति सत्ता में समाहित होने का भाव होगा। परमपूज्य गुरुदेव के निर्देश वे सुनते रहेंगे एवं इस आधे घण्टे की अवधि में विशिष्ट प्राण संचार का क्रम चलेगा। तत्पश्चात् दिव्य औषधि कल्क सेवन अखण्ड दीपक व गुरुसत्ता की पादुकाओं को नमन का क्रम चलेगा। प्रयोग विशिष्ट प्राणायाम-मुद्राएँ बन्ध व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप सम्पन्न होने के बाद सभी चौबीस कुण्डी यज्ञशाला में हवन करेंगे। तत्पश्चात् ज्ञानयोग प्रक्रिया के अंतर्गत विशेष संदेश वरिष्ठ प्रतिनिधियों के माध्यम से श्रवण करेंगे। भोजन में उन्हें हविष्यान्न की बनी रोटी दी जाएगी। दिन में भेंट परामर्श का-त्रिकाल संध्या के अंतर्गत दोपहर की साधना का अपने कमरों में आत्मदेव की साधना, चिन्तन, मनन का क्रम चलेगा। इसी अवधि में नौ दिनों में से कुछ दिन वे ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान भी परीक्षण हेतु जायेंगे। शाम को आरती के पश्चात् नादयोग साधना के बाद परमपूज्य गुरुदेव का विशेष वीडियो संदेश प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर वे श्रवण कर रात्रि की संध्या-शमन से पूर्व शिथिलीकरण योग निद्रा में प्रवेश कर रात्रि भर होने वाले विशिष्ट प्राण संचार हेतु स्वयं को तैयार करेंगे।
मात्र सुपात्र ही इस साधना का सम्पन्न कर पायेंगे, अतः अभी से इसकी तैयारी कर लें, रोगी, वयोवृद्ध, जीर्ण−शीर्ण स्थिति वाले व्यक्ति इन सत्रों में भाग नहीं ले पायेंगे। आयेंगे तो पहले ही दिन वापस लौटना होगा। विशिष्टों को विशिष्ट उपहार युगदेवता का मिले ताकि वे कुछ विशेष कर दिखाने हेतु शिविरों की व्यवस्था बनायी गयी है। इस सम्बन्ध में अभी से शांतिकुंज हरिद्वार पत्र व्यवहार कर लें।
किसी भी संगठन का स्थायित्व उसकी जड़ों की मजबूती पर टिका है। प्रस्तुत एक वर्ष जिसे पुनर्गठन वर्ष नाम दिया गया है, कुछ विशिष्ट तैयारियों का वर्ष है, जिसमें गायत्री परिवार को अपने आप को सभी मोर्चों पर तैयार कर लेना है। जब भी कोई महत्वपूर्ण कार्य सामने होता है चाहे वह लड़ाई का मैदान हो अथवा प्रतियोगिता के द्वारा किसी महत्वपूर्ण पद का चयन, विशेष तैयारी करनी होती है। इन दिनों यही तैयारी चल रही है एवं विशिष्टों की, प्रमाणिक संगठनकर्त्ताओं की खोज चल रही है ताकि आगे आने वाले दिनों में उनके कंधों पर महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे जा सकें। अभी इस वर्ष का प्रयास कुछ इसी स्तर का माना जाना चाहिए।
पुनर्गठन सम्मेलन
रचनात्मक कार्यों में मिशन का नियोजन कैसे हो, छह क्रान्तियों को जिनकी घोषणा प्रथम पूर्णाहुति समारोह में की गयी, कैसे क्रियान्वित हों, यही उद्देश्य ध्यान में रखते हुए पुनर्गठन शृंखला के अंतर्गत पूरे देश में संगठन के सम्मेलन जिलों की शृंखला बनाकर आयोजित किए गए हैं। चार टोलियाँ चार दिशाओं में 26 मार्च के आस-पास रवाना हो जायेंगी। डेढ़ से दो दिन के सम्मेलन दो या तीन जिलों या कहीं परिस्थिति विशेषानुसार अधिक जिलों के कार्यकर्त्ताओं को एकत्र कर शांतिकुंज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की उपस्थिति में संपन्न होंगे। ये कार्यक्रम चूँकि ढाई-तीन सौ कार्यकर्त्ताओं के ही होंगे-आयोजकों को हॉल में ही प्रबन्ध कर लेने को कहा जा रहा है। यह व्यवस्था परिजन मिलजुल कर संभाल सकते हैं। सभी सहयोगी सदस्यों, समयदानियों-ट्रस्टियों, संरक्षकों, महत्वपूर्ण बुद्धिजीवी समुदाय के व्यक्तियों के नाम, पते व जिला स्तर पर क्रियाकलापों की अन्याय सरकारी, गैर सरकारी योजनाओं की जानकारी सभी परिजन लेकर आएँ ताकि सम्मेलन में कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकें। यहाँ से आयोजकों एवं सम्मिलित होने वाले सभी परिजनों को जो कार्यकर्त्ता स्तर के हैं, पत्र डाले जा रहे हैं। ये सम्मेलन मई अंत व जून अंत तक परिस्थिति विशेषानुसार सम्पन्न होते रहेंगे। इस अविधि में विराट स्तर के आयोजन इन क्षेत्रों में नहीं होंगे जहाँ पुनर्गठन सम्मेलन प्रस्तावित हैं। उन्हें मात्र पाँच महानगरों, दक्षिण व उत्तर पूर्व भारत के लिए छोड़ दिया गया है, जहाँ अभी मिशन का प्रकाश नहीं पहुँचा है। इन सम्मेलनों के बारे में सभी 1 मार्च का प्रज्ञान अभियान “पाक्षिक” पढ़ लें।
संगठन कर्त्ताओं का चयन-
पुनर्गठन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है संगठक स्तर के लोकनायकों का चयन। यह यजन केन्द्र क्षेत्र से मिली रिपोर्ट के अनुसार करेगा। “योग्यता के अनुरूप दायित्व-आवश्यकता के अनुरूप उपयोग इस सिद्धान्त के आधार पर अब प्रामाणिक संगठन व्यवस्था कायम करने के लिए योग्य निष्ठावान परिजनों को जो समय भी दे सकें आगे लाने की आवश्यकता है। भारत सरकार की जलागम विकास परियोजना, पल्स पोलियो अभियान के बाद अब स्वास्थ्य संरक्षक योजना एवं देश के प्राइमरी में पढ़ रहे ग्यारह करोड़ बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण व शिक्षण हेतु गायत्री परिवार को अपनी छह क्रान्तियों के पर्यावरण संरक्षण एवं चलग्राम्य चिकित्सा सेवा के अंतर्गत जुटना है। यह एक महती दायित्व भरा कार्य है। इसके लिए चयन हेतु एक सुझाव यह है कि सभी पाठक-परिजन जो रचनात्मक अभियान में रुचि रखते हों, अपने-अपने नगर एवं जनपद के पाँच-पांच ऐसे परिजनों के नाम केंद्र को भेजें जिनमें निम्नलिखित गुण उनकी राय में सबसे अधिक विद्यमान हों।
1-साधना का उच्चस्तर जो नम्रता, ईमानदारी, परिश्रमशीलता, जिज्ञासा एवं शारीरिक मानसिक स्फूर्ति के रूप में दिखाई देता हो।
2-सबका परामर्श लेकर कार्य करने की वृत्ति
3-संगठनात्मक-रचनात्मक कार्यों के लिए नियमित समयदान देने की क्षमता
4-सबकी सहायता बिना किसी भेद-भाव के करने की मनोवृत्ति ता
5-नेतृत्त्व कर सकने की क्षमता।
प्रत्येक नगर-ब्लाक-ताल्लुका से इस प्रकार प्राप्त होने वाली सूचियों में से जिन परिजनों का नाम सबसे अधिक सूचियों में पाया जायेगा, वे सर्वमान्य संगठनकर्त्ता के रूप में इंगित किए जा सकेंगे। यह प्रक्रिया प्रजाताँत्रिक प्रणाली के अनुरूप भी हैं, पक्षपात रहता भी तथा इसमें प्रत्येक जनपद-नगर के प्रत्येक परिजन की राय भी सम्मिलित है। ये नाम व पते सम्भव हो तो 31 मार्च 96 तक शांतिकुंज हरिद्वार आ जायें। निम्नलिखित प्रारूप के अनुसार अपनी राय यथा शीघ्र भेजें ताकि संगठन का ढाँचा खड़ा किया जा सके। साथ में यदि मिशनरी व शैक्षणिक योग्यता का भी उल्लेख कर सकें तो ठीक रहेगा। हमारे नगर/ब्लॉक/ताल्लुका-हमारे जनपद (किसी एक पर निशान लगायें) के निम्नलिखित पाँच व्यक्ति उपरोक्त गुणों व संगठन क्षमता के अनुसार निम्न प्रकार से हैं।
(1)
(2)
(3)
(4)
(5)
इसे भरकर नीचे प्रेषक परिजन का नाम पता गाँव/ब्लॉक/ताल्लुका नगर जनपद लिखकर भेज दें। उसी आधार पर केन्द्र को चयन करने में सुविधा रहेगी। पुनर्गठन वर्ष को हम आप सबके सहयोग से सफल बनाना चाहते हैं। आशा है सभी मदद करेंगे।
*समाप्त*