हिंसा क्यों होती है ? इसका मूल कारण क्या है ? अहिंसक समाज की स्थापना के लिए किस तत्व की सर्वोपरि आवश्यकता है, आदि प्रश्नों पर समय-समय पर विचार होते रहे हैं। दार्शनिकों और समाजशास्त्रियों ने अपने-अपने ढंग से इसके कारण और निवारण सुझाये हैं, पर वास्तविक निमित्त फिर भी अछूता ही बना रहा है।
मार्कट्वेन अपनी पुस्तक ‘इनसेनिटी’ में लिखे हैं कि प्रगति की उद्दाम लिप्सा ही हिंसा का निमित्त कारण है। उनके अनुसार प्रगति यदि होगी, तो हिंसा भी अवश्यम्भावी है। संभव है। वर्तमान समाज और उसके साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी मार-काट के आधार पर ही मार्कटवेन इस निष्कर्ष पर पहुँच हों। पर यदि हिंसा की भारतीय अवधारणा पर विचार करें, तो ज्ञात होगा कि यहाँ वह कहीं अधिक गहन और सूक्ष्म है। पश्चिम की हिंसा सिर्फ शरीर-आघात तक ही सीमित हैं ; पर भारतीय चिन्तन में वह सारे कार्य इसके अंतर्गत आते हैं, जिसमें किसी को मनसा - वाचा-कर्मणा चोट पहुँचायी गई हो। शारीरिक क्षति तो इसकी पराकाष्ठा मानी गई हैं। स्पष्ट है - पूर्व और पश्चिम की सोच में भारी अन्तर हैं, पर महत्वपूर्ण यहाँ वह व्यतिरेक नहीं। महत्व की बात तो यह है कि हम जिसे भी हिंसा मानते हैं, उसके औचित्य - अनौचित्य को किस सीमा तक स्वीकारते हैं। उदाहरण के लिए मार्क्स के साम्यवाद, हिटलर के नाजीवाद, मुसोलिनी के फासीवाद और आज के आतंकवाद को लिया जा सकता है। मजे की बात तो यह है कि इनमें से प्रत्येक की दृष्टि में अपने प्रयोजन की प्राप्ति के लिए बरती गई बर्बरता हिंसा नहीं है, भले ही उसमें निर्दोषों के रक्त की नदियाँ ही क्यों न बह गई हों ? सब उचित और जायज हैं। नाजीवाद का मानना था कि संसार में वही जाति रहने योग्य है, जो सर्वश्रेष्ठ हो। सके अतिरिक्त उसके समाज में और किसी को जीने का अधिकार नहीं। इस हेतु उसने जो कत्लेआम मचाया, वह उसकी दृष्टि में अनुचित नहीं था। मुसोलिनी के फासीवाद के अनुसार हिंसा प्रकृति का नैसर्गिक नियम है। यहाँ भी स्वार्थवश की गई, क्रूरता, अहिंसक मानी गई है। मार्क्स की साम्यवादी व्यवस्था में जिस आदर्श समाजवाद की कल्पना की गई है, वह भी बिना हिंसा के साकार कहाँ हो पायी है ? उसका तो यह सिद्धान्त ही है कि अपराधी को मार दो, अपराध समाप्त हो जायेंगे। वह अपराधियों के सुधार की तुलना में उनकी समाप्ति को अधिक कारगर मानता है। इस प्रकार ‘स्ट्रगल फार एक्जिस्टेंस’ एवं ‘सवाईअवल ऑफ दि फीटेस्ट’ के अस्तित्व के पश्चिमी सिद्धान्त हिंसा के संबंध में उनकी सोच को स्पष्ट करते हैं।
हिंसा को संबंध में भारतीय दृष्टिकोण कितना विराट् और व्यापक है, इसका अन्दाज श्रुति के उस वाक्य से लगता है, जिसमें कहा गया है - ‘न पापे प्रति पापः’ अर्थात् पाप का प्रतिकार पाप से नहीं लिया जा सकता। हिंसा पाप है, अतः हिंसा के बदले हिंसा को निषिद्ध घोषित किया गया है, किन्तु साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि लोकहित, समाजहित एवं राष्ट्रहित के निमित्त बरती गई हिंसा इस श्रेणी में नहीं आती। यदि ऐसा बात होती तो शत्रुओं से राष्ट्र की सुरक्षा ओर समाज की रक्षा खतरे में पड़ जाती और सर्वत्र चोर-उचक्कों, दुर्दान्त दस्युओं की ही तूती बोलती इसलिए नीतिकारों ने इस निर्धारण के समय उस बात का भी पूरा-पूरा ध्यान रखा है, जिससे समाज सुव्यवस्थित बना रहे। छांदोग्यकार ने तप, दान एवं सत्य के साथ अहिंसा की महिला-बखान करते हुए कहा है - “अथ यत्तपों दानजामर्जवहिंसा सत्य वचनमिति या अस्य दक्षिणः।’ अष्टाँग योग का पहला अंग यम है और पाँच यमों में प्रथम ‘अहिंसा’ माना गया है। इस अहिंसा के प्रारम्भिक सोपान से चल कर ही व्यक्ति समाधि के सच्चिदानन्द की दर्शन-झाँकी कराती है। समाधि अहिंसा को महिमाँडित बनाती है, जबकि अहिंसा समाधि का प्रथम चरण - पहला कदम है। किस प्रकार यह कदम अवरुद्ध हो जाय, तो समाधि-सुख कल्पना लोक की उड़ान से बढ़कर और कुछ नहीं रह जाता। इसलिए योग विज्ञान में समाधि की कल्पना अहिंसा के बिना संभव नहीं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि चरम लक्ष्य की प्राप्ति अहिंसक हुए बिना संभव नहीं अध्यात्म विद्या के आचार्यों का मत है कि हर मनुष्य शनैः शनैः अपने चरम लक्ष्य ही ओर बढ़ रहा है, जबकि समाज और सभ्यता पर हम दृष्टिपात करें, तो पाते हैं कि उनकी उन्नति के साथ-साथ अराजकता और अव्यवस्था घटने के बजाय और बढ़ी ही हैं। ऐसा क्यों ? यहाँ यह कहना अनुचित न होगा कि जो लोग हिंसा को सभ्यता के विकास के साथ जोड़ते हैं, वह गलती करते हैं। यह सत्य है कि बुद्धिवाद के विकास के साथ-साथ तोड़-फोड़ जैसी गतिविधियां बढ़ी है, पर मूल कारण बौद्धिक प्रखरता नहीं, वरन् आत्मिक प्रखरता का अभाव ही है। प्राचीन काल के लोग बुद्धिहीन थे इसलिए हिंसा नहीं होती थी, यह कहना ठीक नहीं होगा। सत्य तो यह है कि उन दिनों बुद्धि के वास के साथ चेतना का परिष्कार भी उसी अनुपात में सम्पन्न हुआ था और बुद्धि पर विवेक का प्रज्ञा का सदा अंकुश लगा रहता था। इसलिए तक के समाज में आज जैसी अराजकता नहीं दिखाई पड़ती थी।
‘दिन सेन सोसायटी’ नामक ग्रन्थ में मूर्धन्य मनीषी एरिक फ्राँक ने भी इसी आशय का मंतव्य प्रकट करते हुए लिखा है कि सभ्य (सिविलाइज्ड) समाज स्वस्थ हो, यह जरूरी नहीं पर स्वस्थ समाज के लिए सभ्य अर्थात् सुसंस्कृत हुए बिना समाज स्वस्थ हो नहीं सकता। ज्ञातव्य है - जहाँ उन्होंने ‘सभ्य’ शब्द संस्कृति के अर्थ में प्रयुक्त किया है। संस्कृति अर्थात् चिन्तन शैली। भारत की विचार-पद्धति आत्मा और चेतनापरक है। यहाँ पहला स्थान आत्मा का है, उसके बाद पदार्थ का नम्बर आता है। आत्मा की प्रधानता को अभिव्यक्त करते हुए यहाँ के दार्शनिक कहते हैं - ‘देयर इज ए सोल विदिन दि बॉडी’ अर्थात् हर शरीर में एक आत्मा निवास करती हैं, जबकि इस संबंध में पाश्चात्य मान्यता पदार्थपरक है। वे कहते हैं - देयर इज ए बॉडी सराउण्डिंग ए सोल’ अर्थात् प्रत्येक शरीर अपने अन्दर के कारण ही दोनों संस्कृतियों में भारी अन्तर है, फलतः समाज - व्यवस्था में भी स्फुट अन्तर झलकता है। यह बात और है कि इन दिनों भारत जैसा पैर्वात्य देश भी पाश्चात्य साँचे में ढलता जा रहा है, इस कारण यहाँ के समाज में भी वैसे ही अवगुण, अराजकता पनपने लगी है, जो वहाँ के सामाजिक जीवन में दिखाई पड़ती है, किन्तु संतोष इस बात का है कि विरासत में जो आध्यात्मिकता उसे मिली है, उसके कारण यहाँ का समाज तुलनात्मक दृष्टि से अभी भी पाश्चात्य समाज से श्रेष्ठ कहा जा सकता है। पश्चिमी देशों में जिस प्रकार के जैसे और जितने अपराध इन दिनों हो रहे हैं, उसकी तुलना में भारत की स्थिति पर कुछ अधिक संतोष किया जा सकता है। इस दृष्टि से एरिक फ्रास का यह कथन सत्य ही है कि स्वस्थ समाज का सभ्य (कर्ल्चड) होना नितान्त आवश्यक है।
जहाँ तक दरिद्रता और हिंसा का संबंध है, तो इस बोर में यह तर्क अमान्य हो जाता है कि गरीबी बढ़ने से हिंसा बढ़ती है। अध्यात्म में तो भीतर की अमीरी का तुलना में बाहरी को गौण माना गया है कि आन्तरिक विभूति के आगे बाह्य वैभव नगण्य और तुच्छ है। यही कारण है कि आध्यात्मिक पुरुष सम्पदाहीन स्थिति में भी अद्भुत सुख और संतोष अनुभव करते हैं, बल्कि यह कहना अधिक समीचीन होगा कि वे सुख-सुविधा को आत्मिक प्रगति की दिशा में भारी अवरोध और बन्धन का कारण मानते और स्वेच्छा से उसका परित्याग करते हैं।
विवेकानन्द जिन दिनों धर्म महासभा में भाग लेने अमेरिका गये हुए थे, उन दिनों वहाँ वे एक विशेष प्रकार के लिबास में रहते थे ।एक दिन कुछ अमेरिकी उनकी पोशाक को देखकर हँसने और उनका उपहास करने लगे। इस पर विवेकानन्द ने जवाब दिया कि आप अमेरिकनों को सभ्य बनाने वाला दर्जी होता है। आप लिबास के आधार पर किसी को सभ्य-असभ्य कहते हैं ; जबकि हम हिन्दुस्तानी अपनी आन्तरिक अमीरी के कारण सभ्य कहलाते हैं।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारा अंतःकरण यदि परिष्कृत विकसित हुआ, तो वह बाह्य दरिद्रता को मिटाने के लिए हिंसा का नहीं, अध्यवसाय का सहारा लेगा और जितना कुछ ईमानदारीपूर्वक उपार्जन हो सकेगा, उसी में वह स्वर्ग - सुख की अनुभूति करेगा। अपराध अपरिष्कृत अन्तराल का परिणाम है, जबकि शान्ति-सुव्यवस्था परिष्कृत चेतना को इंगित करती है। व्यष्टि चेतना जैसे-जैसे परिमार्जित होती जायेगी, वैसे ही वैसे समष्टि चेतना और उसके फलस्वरूप समाज अहिंसक और आध्यात्मिक समाज अहिंसक और आध्यात्मिक बनता चलेगा, ऐसा तत्व वेत्ताओं का मत हैं।
“मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है।” यह उक्ति एक ही तथ्य को इंगित करती है कि मनुष्य चाहे तो कोई भी असंभव से असंभव कार्य इस दुनिया में किसी के भी द्वारा किया जा सकता है। वह उसके जीवट के बलबूते संभव है। प्रारब्ध, संचित, क्रियमाण के सिद्धान्त अपनी जगह सही होते हुए भी एक तथ्य अपनी जगह सुनिश्चित एवं अटल है कि मनुष्य अपनी संकल्प-शक्ति के सहारे अपने भाग्य को बदल पाने में समर्थ है। ऐसा बहुतों ने किया है, वर्तमान में भी अनेकानेक उसी दिशा में संलग्न है और भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा।
मनुष्य को ईश्वर का श्रेष्ठतम एवं वरिष्ठ पुत्र युवराज कहकर संबोधित किया गया है। उससे यह भी अपेक्षा रखी गई है कि वह अपने कर्मों के सहारे इस सृष्टि रूपी बगिया को सुरम्य, सुरुचिपूर्ण और अनुशासित बनाये रखे। यह मनुष्य का सौभाग्य है कि वह इस सुरम्य, सुरुचिपूर्ण और अनुशासित बनाये रखे। यह मनुष्य का सौभाग्य है कि वह इस सुरदुर्लभ मानव तन को पाकर इस धरती पर आया है। उसे एक अवसर दिया गया है कि वह वह श्रेष्ठ कर्म करता हुआ भव-बन्धनों से मुक्त होता चले। जो अवसर किसी को भी प्राप्त नहीं है वह देवताओं को व अन्यान्य योनियों में रहने वाले प्राणियों को उस परम पिता परमात्मा ने मनुष्य को अपना युवराज होने के नाते प्रदान किया है। अब यह उस पर निर्भर है कि वह दिये गये दायित्व का निर्वाह कर रहा है अथवा अपने दुष्कर्मों द्वारा इस विश्व-वसुधा रूपी अपने कार्य-क्षेत्र में अव्यवस्था पैदा कर रहा है।
स्वर्ग-नरक जो कुछ भी है सब इसी धरती पर मौजूद हैं। परिष्कृत उदात्त मनःस्थिति का नाम ही स्वर्ग है। यही ऐसा वातावरण विनिर्मित करती है कि चारों ओर स्वर्गोपम परिस्थितियाँ स्वतः बनने लगती है। मनुष्य यदि चाहे तो निषेधात्मक चिंतन, ईर्ष्या-द्वेष भाव रखते हुए अथवा नरपशु, नर-पिशाच का जीवन जीते हुए नारकीय मनःस्थिति में भी रह सकता है। इस धरती को स्वर्ग जैसा सुन्दर ऐश्वर्ययुक्त बनाये रखना ही ईश्वर को मनुष्य से अभीष्ट है। इसीलिए उसे पूरी छूट दी गई है कि वह अपने मानव शरीर वाली इस योनि में जितना भी कुछ श्रेष्ठतम संभव हो सकता है वह दी हुई अवधि में कर दिखाये। इसी को कहते हैं।- “अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करना ।”
मानवी अस्तित्व विचित्रताओं-विलक्षणताओं का भण्डार है। दिखने में सामान्य सी पाँच-छः फीट की काया और उसमें समाए मन को यदि साध लिया जाय तो कुछ ऐसे बन पड़ता है जिसे जादुई कहा जा सके। हैरी हुडिनी ने अपने जीवन में यही कर दिखाया।
अपने कारनामों से संसार भर की चमत्कृत करने वाले हुडिनी का वास्तविक नाम एरिक वेस था। उनका जन्म हंगरी के बुडापेस्ट शहर में 24 मार्च, 1874 को हुआ था। पिता की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण अपने सभी भाई बहिनों के साथ वे अमरीका में जाकर बस गए।
लगभग पन्द्रह वर्ष की आयु में वह विभिन्न समारोहों तथा मेलों में अपने करतबों का प्रदर्शन करने लगे। इस काम में उन्होंने कई सहायक भी रख लिये। इन्हीं में से बैस नामक युवती के साथ उनकी शादी भी हो गयी।
इसी दौरान उन्हें महान फ्रेंच जादूगर हैरी हुडिनी की आत्मकथा पढ़ने का अवसर मिला। उनके कला कौशल तथा व्यक्तित्व से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना नाम ही हैरी हुडिनी रख लिया। साथ ही उन्होंने इस बात का दावा किया कि वह हर किस्म के बन्धनों से स्वतन्त्र होने की सामर्थ्य रखते हैं।
न्यूयार्क में प्रदर्शन करने के बाद वह लंदन पहुँचे। वहाँ के एलाम्ब्रा थियेटर के मौनेजर को अपनी कला के बारे में बताया । मैनेजर ने उन्हें स्काटलैण्ड यार्ड की हथकड़ियों से आजाद होकर दिखाने के लिए कहा । हुडिनी निःसंकोच स्काटलैण्ड यार्ड के दफ्तर जा पहुँचे। वहाँ के पुलिस अधिकारी को अपना परिचय देते हुए हथकड़ियाँ बाँधने का आग्रह किया ताकि वह मुक्त होकर दिखा सके।
उस अधिकारी ने एक खम्भे के साथ उन्हें बेड़ियों में बाँध दिया। बाँधने के बाद ज्यों ही वह आगे बढ़ा पीछे से हुडिनी भी मुक्त होकर उसके पास आ पहुँचा। अब तो उसके करतबों की शोहरत चारों ओर फैलने लगी। लन्दन के ‘डेली मिरर’ नामक एक अखबार के एक पत्रकार ने उनको चुनौती दी कि वह एक लुहार की पाँच सालों की मेहनत से बनायी गयी हथकड़ियों को खोल कर दिखाए।
हुडिनी ने उसकी चुनौती स्वीकारते हुए चार हजार दर्शकों के विशाल जनसमूह में उन हथकड़ियों को बिना किसी चाभी के पाँच मिनट में खोलकर दिखा दिया। जर्मनी में उनको एक पैकिंग वाले डिब्बे में बन्द करके ऊपर से सील लगा दी गयी। आस-पास खड़े लोग सोच रहे थे कि अब शायद ही वह जिन्दा निकल पाए। पर थोड़ी ही देर बाद वे सबके सब तब हैरत में पड़ गए जब वह कुछ पलों बाद बाहर निकल कर आ गए।
उनकी इस करामात को देखकर आश्चर्यचकित होते हुए एक पत्रकार ने कहा कि हुडिनी में ऐसी अलौकिक ताकत है जिसके जरिये वह अपने जिस्म को तत्वहीन करके किसी भी दीवार से बाहर निकल आता है।
बोस्टन के एक खिलाड़ी की चुनौती स्वीकार करने पर उन्हें एक बार मछली पकड़ने वाले मजबूत जाल में बुरी तरह लपेट दिया गया। लेकिन सवा घण्टे के ही अन्तराल में उसने उस जाल से भी मुक्त होकर दिखा दिया। यही नहीं शर्त हार जाने के कारण उस खिलाड़ी को 6000 डालर की रकम भी उन्हें भेंट करनी पड़ी।
वाशिंगटन की एक जेल में उसे पूरी तरह निर्वस्त्र करने के बाद उसकी तलाशी लेकर एक काल कोठरी में डाल दिया गया। अब जेल अधिकारी निश्चिन्त थे कि किसी तरह का औजार पास में न होने के कारण हुडिनी बाहर न निकल सकेगा। लेकिन आश्चर्य कि न केवल वह स्वयं दो ही मिनट के अन्तराल में उस काल कोठरी से बाहर हो गया, बल्कि खेल ही खेल में उसने 27 मिनट के थोड़े से समय में 18 अन्य कैदियों को उनकी अपनी कोठरियों से निकाल कर दूसरी कोठरियों में डाल दिया।
रूस में उसको स्टील की चादर वाले चौकोर बक्से में बन्द कर दिया गया । इस बक्से की यह खासियत थी कि इसे मास्को में एक चाभी से बन्द करने के बाद, साइबेरिया के गवर्नर के पास मौजूद दूसरी चाभी से ही खोला जा सकता था। साइबेरिया की दूरी मास्को से 3000 किलोमीटर थी। हुडिनी के सारे कपड़े उतरवा कर बारीकी से जाँच पड़ताल करने के बाद बक्से में बन्द कर साइबेरिया की ओर रवाना कर दिया गया। लेकिन केवल 28 मिनट के बाद ही वह बक्से के बाहर हो गया।
उसका प्रत्येक कारनामा जान-जोखिम में डालने वाला होता था। एक बार उसे शराब की तेल गन्ध को सहन न कर पाने के कारण वह अचेत हो गया। लेकिन अचेत होने के पहले वह ड्रम का ढक्कन खोल कर निकल पाने में सफल हो गया था।
एक बार वह इसी तरह जमी हुई बर्फ में छेद करवाकर हथकड़ियाँ बाँधे नीचे उतर गया, ताकि बर्फ के नीचे बन्धन मुक्त होकर दिखा सके। यह कठिन तो जरूर था, पर उसके लिए असम्भव नहीं। हालाँकि वह बर्फ के नीचे पानी में बहते-बहते उस छेद से पर्याप्त दूर चला गया था, पर आठ मिनट के ही बाद वह फिर से उसी छेद के पास आ पहुँचा और हथकड़ियाँ उसके शरीर से गायब थीं।
अपने जीवन में उनके करामाती शो तथा कई फिल्मों में अपने काम का प्रदर्शन करने वाले हुडिनी ने एक बार पत्रकारों को बताया था कि उसके चमत्कारों का रहस्य श्रवास की सिद्धि एवं मन की एकाग्रता में है। इसी को भारतीय योगी प्राणायाम एवं ध्यान कहते हैं। श्रवास की सिद्धि से शरीर को पर्याप्त रूप से फैसला -सिकोड़ा जा सकता है। यही नहीं मजबूत से मजबूत चीजें तोड़ी जा सकती हैं। मन की एकाग्रता के भी कम चमत्कारी परिणाम नहीं होते । इन दोनों की साधना मानवीय जीवन को चमत्कारों की चलती-फिरती पिटारी बना डालती है। असम्भव दिखने वाले काम सहज सम्भव हो जाते हैं।
इक्कीसवीं सदी विकास की अनोखी और अनूठी सम्भावनाओं की दी है। इन सम्भावनाओं का जिक्र करते हुए एक प्रख्यात अन्तरिक्ष विज्ञानी का कहना है कि बीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण प्रगति मनुष्य की अन्तर्ग्रही यात्रायें रही है। इसी सदी के मध्य के आस-पास धरती के निवासियों ने चन्द्रमा पर कदम रखे। अन्तरिक्ष यात्राओं के बढ़ते सिलसिले का दौर मंगल और शुक्र आदि अन्य ग्रहों पर जा पहुँचने के प्रयासों में परिणत हुआ। यहां तक कि अन्तरिक्ष में कालोनियाँ और नगर बनाए जाने की बात भी सोची जाने लगी। बहुत सम्भव है कि इक्कीसवीं सदी का इनसान अन्तर्ग्रही यात्राओं तक सीमित न रहकर अन्तर्ब्रह्माण्डीय यात्राओं पर निकल पड़े।
बहुत समय से यह सिद्धान्त विज्ञान क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करता रहा है कि प्रकाश की गति एक सेकिण्ड में 186000 मील है। इससे तीव्र और कोई गति नहीं। यदि ब्रह्माण्ड की यात्रा पर निकला जाय तो कहाँ कितने समय में पहुँचा जा सकेगा, इसका अनुमान इस आधार पर लगाया जाना चाहिए कि इस गति से चलने वाला कोई वाहन मिल जाएगा। लेकिन वर्तमान वैज्ञानिक विकास अभी इतना नहीं है कि प्रकाश की गति से अधिक चलने वाले किसी वाहन के निर्माण की कल्पना की जा सके।
दूसरा तथ्य इस संदर्भ में विचारणीय है कि ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उसे अपने दायरे से कितना किस प्रकार बढ़ने देगी। गुरुत्वाकर्षण ग्रह के भार और विस्तार से सम्बन्धित है। पृथ्वी की पकड़ के दायरे का कोई वस्तु तभी उल्लंघन कर सकती है, जबकि उसका वेग 11.2 किलोमीटर प्रति सेकेंड से अधिक हो। इसके अलावा अन्तरिक्ष में गतिशील ग्रह-गोलकों की स्थिति एवं उनके गुरुत्वाकर्षण के सम्बन्ध में समानता नहीं है। सूर्य का गुरुत्वाकर्षण प्रति सेकेंड 317 है कारण की पृथ्वी का व्यास मात्र 12700 किलोमीटर है, जबकि सूर्य का व्यास 14 लाख किलोमीटर है, कितने ही ग्रह इतने भारी एवं विस्तृत हैं कि उनकी गुरुत्वाकर्षण सीमा लाँघने के लिए प्रकाश के वेग से भी कहीं अधिक तीव्रगामी यान होना चाहिए।
ऐसे ग्रह-नक्षत्रों का अस्तित्व इस ब्रह्माण्ड में है जिनका गुरुत्वाकर्षण, प्रकाश की गति से भी अधिक है। ऐसी दशा में उनकी रोशनी उसे ग्रह की पकड़ में ला सकती है और उसे परिधि से बाहर कहीं दीख भी न पड़ेगी। चमकदार होते हुए भी वह पिण्ड अन्धकारमय दिखाई देगा। फिर भी उसकी शक्ति और सत्ता तो बनी ही रहेगी। एक और सिद्धान्त ‘ग्रेविटेशन रिएक्शन’ का है। इस परिधि में आने वाला पिण्ड ‘सिगनल एक्स’ बन जाता है। यही बहुचर्चित ‘ब्लैक होल’ है। इसका आकर्षण और विस्तार इतना अधिक होता है कि उसकी पकड़ में आ जाने पर पृथ्वी जैसे विशाल पिण्ड भी खिंचते चले जा सकते हैं और इतनी तेजी से इतनी दूर पहुँच सकते हैं कि उसका कुछ अता-पता ही न चले।
अन्तरिक्ष विज्ञान में हुई नवीन शोधों के अनुसार ग्रह वृद्धता को प्राप्त होने पर अपने अंग-प्रत्यंग सिकुड़ना शुरू करते हैं। सिकुड़न बढ़ने किन्तु भार कम न होने की स्थिति में एक और विचित्रता उत्पन्न हो जाती है जिससे वह जीवित होते हुए भी मृतक की श्रेणी में जा पहुँचता है। ऐसी दशा में भी ऊर्जा उसके पास बनी रहती है। वह इतनी अधिक होती है कि संसार भर की समस्त मोटर गाड़ियाँ 100 मील प्रति घण्टे की चाल से 100 अरब वर्षों तक दौड़ती रहें। सभी ऊर्जाएँ शक्ति की प्रतीक तो होती हैं पर यह जरूरी नहीं कि वह अपने संपर्क में आने वाली वस्तु को चला ही दें। वह खींचते रहने के काम भी आ सकती हैं।
ऐसे में यदि किसी को ब्रह्माण्ड का दौरा करना हो तो उसे प्रकाश से अधिक गति वाले वाहन बनाकर हजारों सालों में दूरवर्ती ग्रह-गोलकों की यात्रा करने की आवश्यकता नहीं। वह इन ब्लैक होलों की आकर्षण शक्ति का सहारा लेकर थोड़े ही समय में अभीष्ट स्थान तक पहुँच सकता है।
बड़े रहस्यमय ढंग से एक ब्रह्माण्ड से दूसरे ब्रह्माण्ड की सैर कराने वाले इन ब्लैक होल के बारे में सुविख्यात वैज्ञानिक -’स्टीफेन हाकिंग’ ने अपनी पुस्तक ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम’ में विस्तार से लिखा है। उनके अनुसार सूर्य से भी अनेकों गुने बड़े तारे जब प्रकृति की मार से सुपरनोवा विस्फोट के माध्यम से टूट कर बिखर जाते हैं, तो उनका चूरा फिर से एकत्रित-संगठित होकर प्रत्याक्रमण के भाव से पहले से भी कहीं मजबूत ‘ह्नाइट ड्वार्फ’ का निर्माण करता है। आकार में तो यह पहले से छोटा व सघन होता है मगर इसकी शक्ति बढ़ जाती है। इस शक्ति का अन्दाज इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी एक माचिस की डिबिया जितनी मिट्टी का भार 10 हजार किलोग्राम या एक डबल डेकर बस जितना होता है। इतने पर भी इसका सिकुड़ना रुकता नहीं, जारी रहता है, और अन्त में सूर्य से भी भारी भरकम तारा 10 मील त्रिज्या जितना रह जाता है। इस स्थिति में यह ‘न्यूट्रान स्टार’ कहलाता है। इसकी शक्ति ‘ह्नाइट ड्वार्फ’ से भी बढ़ी-चढ़ी होती है। इसका एक माचिस की डिबिया जितना पदार्थ 2फ्1013 किलोग्राम अर्थात् 20 अरब किलोग्राम के बराबर होता है। इस वक्त तक इसकी आन्तरिक-शक्ति (गुरुत्वाकर्षण-बल) इतनी बढ़-चढ़ जाती है कि वह स्वयं भी अपना बल बर्दाश्त नहीं कर पाता और निरन्तर घटते हुये छोटा होकर अदृश्य लेकिन अति समर्थ हो जाता है। इसका आकार जितना छोटा होता है - इसकी समर्थता उतनी ही बढ़ी-चढ़ी होती हैं।
‘ब्रह्माण्ड प्रतिबन्धित परिकल्पना’ के रूप में ‘ब्लैक होल’ को रोजर पेनरोज और स्टीफेन हाकिंग न व्याख्या की। इनके अनुसार ‘ब्लैक होल’ के सिंगुलेरिटी में प्रकाश या कोई संकेत तक प्रवेश नहीं कर समता है। ‘ब्लैक होल’ की बाहरी परत जिसे ‘इवेन्ट होराइजन’ कहते हैं, यह बाहरी पदार्थों को अन्दर प्रवेश तो करने देती है लेकिन अन्दर का पदार्थ किस तरह से बाहर निकलता है यह नहीं मालुम।
ब्रिटिश भौतिक विज्ञान एवं विख्यात गणितज्ञ प्रो0 जान टेलर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ब्लैक होल’ दि एण्ड आफ दि यूनीवर्स’ में ऐसे किसी स्पेसशिप के भाग्य के बारे में कई सम्भावनाओं का उल्लेख किया है- जो उसके गर्भ में समा चुका है। इनमें से एक सम्भावना के अनुसार ‘ब्लैक होल’ की लम्बी पतली गर्दन होती है, जो किसी अन्य ब्रह्माण्ड से जुड़ी होती है। यदि कोई अन्तरिक्ष यान इसके गले में समा जाय, तो वह किसी बिल्कुल ही नए ब्रह्माण्ड में जाकर निकलेगा। वे कहते हैं कि इस वक्त तक यदि यान यात्री किसी प्रकार जीवित भी बचे रहें, तो भी वे अपनी इस विलक्षण अनुभूति से हमें अवगत नहीं करा सकेंगे, क्योंकि पृथ्वी वासियों से संपर्क सूत्र स्थापित करने में वे सदा विफल रहेंगे। ऐसी स्थिति में उनका प्रयास पुनः अपने यान को ब्लैक होल के भीतर प्रवेश कराने का होगा। इस आशा में कि शायद वे इस प्रक्रिया के दौरान पुनः अपने ब्रह्माण्ड में निकल सकें, पर वास्तविकता यह होगी कि इस तरह के प्रत्येक प्रयास के बाद वे हमेशा किसी नूतन ब्रह्माण्ड में पहुँच जाएंगे और अपने मूल ब्रह्माण्ड में वापस लौटने का इनका स्वप्न कभी नहीं पूरा हो सकेगा।
प्रो0 टेलर अपनी उक्त पुस्तक में आगे लिखते हैं कि यद्यपि हमारी आकाश गंगा में ऐसा एक ही ब्लैक होल है, पर वह एक ही हम सबके लिए सर्वनाश उपस्थित कर सकता है। वे निराशा से अपना मन्तव्य व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि निश्चय ही हम सब उसके द्वारा एक न एक दिन निगल लिए जायेंगे। प्रो0 टेलर की यह सम्भावना कल्पनाओं और सिद्धान्तों पर आधारित है। यथार्थता तो सह है कि उसके भीतर किस प्रकार की प्रक्रिया चलती है और निगले गए पिण्ड का भाग्य क्या होता है ? इसे अब तक जाना नहीं जा सका है।
कनाडा के अन्तरिक्ष विज्ञानी वर्सर ने ‘ब्लैक होल’ की गतिविधियों का गहराई से अध्ययन किया है। उनके अनुसार इसका पता ‘क्वासार’ से लगाया जा सकता है। 1967 में कैंब्रिज के जोसलीन बेल ने एल॰ जी0 एम0- 14 के रूप में आकाश गंगा में ब्लैक होल का पता लगाया। उनके अनुसार ब्लैक होल की ओर गिरने वाली प्रकाश की किरणें समानान्तर नहीं चलतीं। ये किरणें बाहरी परत द्वारा सोख ली जाती हैं। दो ब्लैक होल के टकराने से इसका क्षेत्रफल बढ़ जाता है। सामान्य क्रम में ऐसी स्थिति में ऊष्मा का विकिरण भी होना चाहिए। परन्तु ऐसा हाता नहीं है।
इस उलझन को वैज्ञानिकों ने क्वाँटम सिद्धान्त के अनुसार सुलझाने की कोशिश की है। उनके अनुसार वास्तविक कण में सदैव धनात्मक ऊर्जा एवं एण्टी कणों में ऋणात्मक ऊर्जा होती है। प्रभाव से प्रत्येक कणों में ऋणात्मक ऊर्जा बन जाती है। इन ऋणात्मक कणों का प्रतिकण उतनी ही तीव्रता से बाहर निकलता है और यही वह कण है जो ब्लैक होल से बाहर निकलता है। अतएव यह कहना सरासर गलत है कि ब्लैक होल से कुछ बाहर नहीं निकलता है।
आइन्स्टाइन के प्रसिद्ध सूत्र श्व=द्वष्2 के अनुसार ज्यों-ज्यों ब्लैक होल का द्रव्यमान कम होगा, तापमान एवं उत्सर्जित ऊर्जा की दर भी बढ़ने लगेगी। द्रव्यमान के क्रमशः कम होते होते ऊर्जा लाखों ‘हाइड्रोजन बमों से भी अधिक शक्तिशाली हो जायगी। सबसे प्राचीन ब्लैक होल ब्रह्माण्ड के साथ रहा है। इसकी अगर कोई उम्र है तो ब्रह्माण्ड की उम्र की गणना की जा सकती है। इस ब्लैक होल से एक्सरे किरणों-गामा किरणों के रूप में ऊर्जा सतत् प्रवाहित होती रहती है। यों यह प्रकाश तरंग के समान होती है, लेकिन इनका वेवलेन्थ छोटा होता है, इनसे 10 हजार मेगावाट की दर से ऊर्जा निकलती है।
आकाश गंगा में ब्लैक होल की संख्या उसके द्वारा उत्सर्जित गामा किरणों से पता चलती है। इस हिसाब से एक धन प्रकाश वर्ष में 300 से अधिक प्राचीन ब्लैक होल नहीं हो सकते। अब तक खोजे गए सबसे बड़े ब्लैक होल का विवरण टाइम पत्रिका के जून, 94 के अंक में प्रकाशित हुआ था। एम0-87 नामक यह ब्लैक होल नासा के अत्याधुनिक हब्बल दूरबीन द्वारा खोजा गया। पृथ्वी से 50 लाख प्रकाश वर्ष दूर यह दैत्याकार ब्लैक होल दो करोड़ सूर्य जैसे तारों के आकार का है। इसके चारों ओर गैस 1.9 लाख कि0मी0 प्रति घण्टा की रफ्तार से चक्कर काटती है। यह पहला सुपरमैवि ब्लैक होल है।
अभी तक की गयी शोधों के अनुसार ब्लैक होल बड़े हैं और छोटे भी, दूर हैं और पास भी। भाँति-भाँति से किए गए अध्ययनों में प्रायः ज्यादातर वैज्ञानिकों ने इनके बारे में भयप्रद और निराशाजनक निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं। लेकिन विंसटन ह्यूरोज जैसे वैज्ञानिक इन कथनों से सहमत नहीं है। उनके अनुसार आज भूल भुलैया जैसे लगने वाले ये प्रकृति की रहस्यमयी रचनाएँ कल के मनुष्य के लिए न केवल अपरिमित ऊर्जा की स्त्रोत हो सकती हैं- बल्कि उसे ब्रह्माण्डों की सैर करा सकती है।
पृथ्वी पर भी फ्लोरिडा बरमूडा और कोस्टारीका के बीच एटलाण्टिक महासागर में बरमूडा त्रिकोण के रूप में ऐसा ही एक ब्लैक होल है, जो अपने अस्तित्व में आने के समय से लेकर अब तक अनगिनत जलयानों, वायुयानों को निगल चुका है। अब से कोई 14 साल पहले की घटना है, हालीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता पीटर सेलर्स एक बार अपना विमान उड़ाते - उड़ाते भटक गए और अमेरिका के पूर्वी तट पर स्थित इस रहस्यमय त्रिकोण में आ फंसे। उनका संपर्क यकायक कंट्रोल टावर से टूट गया। सारे यंत्र उपकरणों ने काम करना बन्द कर दिया। वायुयान नियन्त्रण से बाहर जाने लगा। उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा मानों जहाज किसी अदृश्य शक्ति के चंगुल में फंसकर खिंचा चला जा रहा हो। यान बड़ी तेजी से समुद्र की ओर नीचे खिंचने लगा। वह घबरा उठे तभी उन्हें भारत भ्रमण के दौरान एक भारतीय योगी द्वारा सिखाए गए गायत्री का स्मरण हो आया। वे मन ही मन उसका उच्चारण करते रहे और विमान पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करने लगे। देखते-देखते उनका विमान उस जानलेवा त्रिभुज से सुरक्षित बाहर निकल आया एवं वे उसका ग्रास बनते-बनते बचे। इसका विवरण अमेरिका के तत्कालीन प्रमुख समाचार पत्रों में विस्तारपूर्वक छपा था।
महाभारत के वन पर्व के अंतर्गत तीर्थयात्रा पर्व के एक सौ बत्तीसवें अध्याय में कहोड़ को जल समाधि दे दी गयी थी। बाद में मुनि पुत्र अष्टावक्र ने अपने पिता के अपराधी पण्डित वन्दी को पराजित कर उसे भी समुद्र में डुबोने की सजा दी, तो वरुण पुत्र वन्दी ने क्षमा याचना सहित कहा कि पण्डितों की जान से मारने का मेरा तनिक भी इरादा नहीं है। वस्तुतः मेरे पिता के राज्य में विशाल यज्ञ हो रहा है। यहाँ से विद्वान पण्डितों को चुन चुन कर मैं वहीं भेज रहा था। शास्त्रार्थ में हराकर जल में डुबाना तो एक निमित्त मात्र था। अब यज्ञ समाप्ति पर है और सभी ब्राह्मण लौटने वाले हैं। कुछ समय पश्चात् समस्त ऋषिगण सामने से आते दिखाई पड़े। इनमें कहोड़ भी थे।
सम्भव है उन्हें किसी समुद्री ब्लैक होल के माध्यम से वरुण के लोक भेजा गया हो और ज्ञान-विज्ञान के चरमोत्कर्ष के उस युग में वे कोई ऐसी रहस्य मय विद्या जानते हों, जिसके कारण उसके चंगुल से उनका सकुशल पृथ्वी लोक में पुनः वापस लौट सकना सम्भव हो सका। अन्यथा वे भी उसके गर्भ में समाकर अपनी जान गवाँ चुके होते।
इतना तो आधुनिक वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि ब्लैक होल के माध्यम से जाने पर समय लघुतम हो सकता है। यही नहीं इनका मार्ग एक ऐसी सड़क की तरह है, जिसमें स्थान-स्थान पर चौराहे फटते हैं। उनमें मुड़कर सीधे जाने की अपेक्षा तिरछा या दांया-बाँया भी जाया जा सकता है। इन ब्लैक होलों में छोटी - बड़ी पगडण्डियाँ भी हैं। वे राजमार्ग की तरह सीधी तो नहीं हैं, पर उनका सहारा पकड़कर यात्री अपनी दिशा बदल सकता है और चाल में धीमापन या तीव्रता ला सकता है। इस प्रकार लोक-लोकान्तरों की यात्रा सम्भव हो सकती है। ब्लैक होल पर सवार होकर ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का बन्धन भी झंझट नहीं रहता ।
प्राचीन काल में अन्य लोकों के निवासी पृथ्वी पर आते रहे हैं और पृथ्वी निवासियों को भी अन्तर्ग्रही ही नहीं अन्तर निहारिकीय यात्रा की भी सुविधा मिली है। मार्ग की दूरी, उसे पूरी करने में लगने वाली लम्बी अवधि के कारण जीवन का अधिकाँश भाग यात्रा में ही व्यतीत हो जाने का खतरा भी नहीं रहता। अपना अभीष्ट काम पूरा करने में जितना समय लगाने की आवश्यकता है उसे लगाकर उतनी ही तेजी से वापस भी लौटा जा सकता है। इस प्रकार की यात्रा में आवश्यक साधन सामग्री साथ ले जाने या वहाँ की कोई वस्तु साथ लाने में भी कठिनाई नहीं पड़ती। मात्र उसे किसी मामूली धागे से शरीर के साथ बाँधे रहना पड़ता है ताकि वह साथ चलती रहे और अलग न होने पाए।
विज्ञान ने अभी पदार्थ की शक्ति का ही पता लगाया है। उसने सम्मिश्रण-विकर्षण की जो प्रतिक्रिया होती है उसे भी एक सीमा तक समझ लिया है। ग्रह-उपग्रह भी जो भेजे गए हैं वे सौरमण्डल के ग्रहों और चन्द्रमाओं के इर्द-गिर्द की पहुँच पाए हैं। इस परिधि का उल्लंघन करने के उपरान्त वे पृथ्वी के साथ किसी सम्बन्ध सूत्र से बंधे नहीं रहते और यह आशा नहीं की जा सकती कि वे फिर वापस लौट सकेंगे।
ब्लैक होलों के बारे में भी आज का विज्ञान कुछ इसी तरह भूला भटका हुआ है। क्योंकि विश्व-ब्रह्माण्ड में फैले हुए ब्लैक होलों के जाल और उनसे सम्बन्धित मार्गों एवं पगडण्डियों का कुछ पता नहीं लग सका है। इतना जान भी लिया जाय तो ज्ञातव्य लोक के बारे में यह समझना बाकी रह जाता है कि मनुष्य के जीवन यापन की सुविधा वहाँ है या नहीं। विचारों का आदान-प्रदान हो सकता है या नहीं। इसके साथ ही जन संपर्क का परिणाम भी समझना है कि इतनी जोखिम उठाकर आने या जाने वाले प्राणी एक-दूसरे का कुछ हित साधन कर सकते हैं या नहीं।
जो आज सम्भव नहीं हो सका- उसे कल पूरा करने का दायित्व भौतिक-शक्तियों का भी है और आध्यात्मिक शक्तियों का भी ऋषि प्रणीत विधाओं के चमत्कार एवं भौतिक विज्ञान की सफलताएँ भविष्य की स्वर्णिम ऊषा में अन्तरिक्ष विज्ञान में एक नया अध्याय जोड़ दें तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए जिस दिन ऐसा हो सका, उस दिन धरती के इनसान को विश्व ब्रह्माण्ड की अनन्त विभूतियों के साथ जुड़ने का अवसर भी मिलेगा।
बादशाह के माथे पर चिन्ता की लकीरें उभरीं, गहरी हुई और थोड़ी देर में एक हलकी सी मुसकान में बदल गयीं। ऐसा लगा कि सोचते-सोचते उसने किसी गहरी समस्या का समाधान खोज लिया। उसकी ख्याति अपने फारस देश में ही नहीं देश-देशान्तरों में भी थी। उसके नाम को न्यायप्रियता के पर्याय के रूप में जाना जाता था। प्रजा के लोग उसकी आज्ञा का पालन करते थे। प्रकृति भी उस देश पर दयावान थी।
उसके तीनों बेटे भी योग्य और आज्ञाकारी थे। वृद्धावस्था आने पर उसने बड़े बेटे को राज-काज सौंप दिया । लेकिन कुछ सोचकर एक बहुत ही बेशकीमती मोती अपने पास रख लिया। इस मोती की कीमत इतनी ज्यादा थी कि इसके बदले राज्य खरीदे जा सकते थे। मन ही मन उसने निश्चय कर लिया था कि यह मोती अपने उस बेटे को देंगे जो सबसे अधिक नेक दिल हो। जिसके विचार सबसे अच्छे और महान हों।
समय - समय पर वह अपने लड़कों की परीक्षा लेते रहते, किन्तु अभी तक वह पूरी तरह से सन्तुष्ट न हो सके थे। बड़ा शहजादा राज-काज में पूरी तरह निपुण था। दोनों भाई पूरे मन से उसकी मदद करते थे। प्रजा पहले से भी अधिक सुखी थी। किसी भी व्यक्ति के साथ अन्यान्य न हो इसका वह स्वयं भी ध्यान रखते थे लेकिन अब उनकी चाहत थी कि जब सब कुछ ठीक चल रहा है तो वे ज्यादा से ज्यादा समय खुदा की इबादत में लगाएँ, पर मोती की चिन्ता इसमें सबसे बड़ी बाधा थी। इस समय भी वे लेटे-लेटे यही सोच रहे थे। अचानक उनके चेहरे पर बिखर आयी मुस्कान से लगता था कि उन्होंने समाधान का कोई सूत्र पा लिया है।
कुछ सोचते हुए उन्होंने अपने बड़े बेटे से सवाल किया, ‘बर्खुरदार, हम जानना चाहते हैं कि पिछले तीन महीनों में तुमने सबसे अच्छा कौन सा काम किया है ? थोड़ी देर सोचने के बाद उसने बताया’ ..... पिछले महीने जब मैं दूसरे शहर जा रहा था तो एक जान पहचान वाले ने हीरों की थैली देकर कहा कि इसे उसके छोटे भाई को दे देना। सच मानिए मेरे मन में जरा भी लालच नहीं हुआ और मैंने वह थैली उसके छोटे भाई को सौंप दी। मैं समझता हूँ इससे सभी को खुशी हुई होगी। उस दिन मुझे भी खुशी हुई थी। मैं सोचता हूँ लालच में न पड़ना इंसानियत की बड़ाई है और मैंने यह काम ईमानदारी से किया। “ बेटे के उत्तर से सुल्तान इब्राहिम के चेहरे पर प्रसन्नता तैर गयी।
दूसरे पुत्र की ओर मुखतिब हो उन्होंने पूछा- “बेटे ! तुमने कौन सा बड़ा काम किया है पिछले तीन महीने में ?” कुछ याद करने की चेष्टा करते हुए उसने बताना शुरू किया- “बात पिछले हफ्ते की है। सुबह-सुबह मैं सैर के लिए नदी किनारे जा रहा था। अभी वहाँ पहुँचा की था कि एक औरत के रोने की आवाज मेरे कानों में पड़ी। पास जाकर पता चला कि उसका बेटा नदी में डूब रहा है और वहाँ बचाने वाला कोई नहीं है। मैं फौरन नदी में कूद गया और उसे बालों से पकड़ कर बाहर ले आया। थोड़ी देर के इलाज के बाद उसके बेटे को होश आ गया। इस औरत ने मुझे लाखों दुआएँ दीं। अपने इस काम से मुझे भी बहुत खुशी हुई।”
“इनसानी जिन्दगी बचाव में तुमने यकीनन बहुत बड़ा काम किया है।” बादशाह ने अपने बेटे की पीठ ठोकते हुए शाबाशी दी।
अब तीसरे शहजादे की बारी थी। वही सवाल बादशाह ने उससे भी किया। कम उम्र के शहजादे ने बड़ी धीरे-धीरे बताना शुरू किया। “ अब्बा हुजूर, एक दिन मैं जंगल में से गुजर रहा था, देखा कि एक आदमी चट्टानों के किनारे गहरी नींद में सोया हुआ है। करवट बदलते ही उसके पहाड़ से गिर जाने का डर था। गिरने पर मौत लाजमी थी। मैं धीरे से पास गया तो देखा कि वह मेरा पुराना दुश्मन जावेद था फिर भी मैंने उसे जगाकर होशियारी करने का इरादा कर लिया। वह घबरा कर उठा, यह जानकर कि मैं उसकी जान बचाने के लिए यहाँ तक आया हूँ, उसने प्यार से मेरे गले में बांहें डाल दी और पुराना दुश्मनी भुलाकर हम दोस्त बन गए। बस, मैंने तो यही छोटा सा काम किया है, जो मुझे आज भी याद है।”
छोटे बेटे की विनम्रता और उसके काम से खुश होते हुए बादशाह ने कहा, “शाबाश बेटे इनसान का बड़प्पन उसकी भावनाओं में है और भावनाओं की पराकाष्ठा दुश्मन की भी मदद करने और उन्हें दोस्त बनाने में है। दुश्मन की जान बचाना वास्तव में बहुत बड़ा काम है। यह कहते हुए उनके चेहरे पर सन्तुष्टि की चमक फैल गयी। वह जिस महानता और नेकदिली को ढूँढ़ रहे थे- वह इसी छोटे बेटे में दिखाई दी।
उन्होंने अपना कीमती मोती इस छोटे बेटे को सौंपने का निश्चय किया। दोनों भाइयों ने भी उसकी बहुत प्रशंसा की। सुल्तान इब्राहिम पाक परवरदिगार का इबादत में लग गए।
शरीर के साथ चेतना का उद्भव और मृत्यु के साथ उसका अंत नहीं होता है, वरन् काय-कलेवर के न रहने पर भी जीवात्मा का अस्तित्व बना रहता है और वह पुनर्जन्म धारण करती है। अध्यात्म, तत्वज्ञान की आधार-शिला समझी जाने वाली इस मान्यता के सम्बन्ध में विश्व के विभिन्न धर्मों में अलग-अलग विचारधारायें प्रचलित है किन्तु चेतना-प्रवाह की अविच्छिन्नता और काया की नश्वरता को सभी ने समान रूप से स्वीकार किया है। अब इस मान्यता को वैज्ञानिक अनुसंधान का विषय स्वीकार कर लिया गया है। इस संदर्भ में जो प्रत्यक्ष प्रमाण जुटाये गये हैं, उनसे पुरातन असमंजस की स्थिति अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। इसकी मान्यता जीवनक्रम में आस्तिकता की भावना, नीतिमत्ता एवं उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशा बनाये रहने की दृष्टि से नितान्त आवश्यक भी है।
मृत्यु के बाद भी जीवन बना रहता है इस संबंध में पाश्चात्य देशों में पिछले दिनों संदेहास्पद माना जाता था, किन्तु वैज्ञानिकों में मूर्धन्य सर विलियम क्रुक्स तथा सर ओलिवर लाज आदि की मरणोत्तर जीवन संबंधी खोजों को अब संसार भर में प्रमाणिक माना जा रहा है। भारत में पहले से ही जीवन की अमरता और पुनर्जन्म के प्रति गहरी आस्था रही है। वैदिक संस्कृति में विगतात्माओं के अनेक विधि-प्रकारों, उनकी गतियों, विभिन्न लोकों में गमनागमन एवं विश्राम आदि का विस्तार पूर्वक वर्णन है। छान्दोग्य उपनिषद् के पंचम प्रपाठक से आठवें प्रपाठक तक पितृमार्ग एवं पितृलोक की विषद जानकारी दी गयी है। उसके अनुसार मृतात्मायें अपने-अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न मार्गों से सूक्ष्म-शरीर द्वारा प्रयाण करती है। सत्कर्म करने वाले परोपकारी, तपस्वी, योगी आदि के लिए स्वयं प्रकाशवान, ‘अर्चिमार्ग’ निर्दिष्ट हैं। इसी में आगे प्रेतात्मा प्रज्ञानात्मा, विज्ञानात्मा और महानात्मा आदि का उल्लेख किया गया है। श्रीमद्भागवत् गीता के आठवें अध्याय में भी कहा गया है - यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजन्ते कलेवरम् तं तमेवैति कौन्तय।” अर्थात् मृतात्मा के अंतिम भावों के अनुसार उन्हें शुक्ल या कृष्ण-ऊर्ध्व या अधोगति मिलती है। कामनाग्रस्तों को कृष्ण तथा कामना रहित परोपकारी महान आत्माओं को शुक्ल गति मिलना बताया गया है, यह सब कुछ कर्मफल के सुनिश्चित तथ्य पर निर्भर करता है।
पाश्चात्य देशों में पुनर्जन्म एक विवादास्पद विषय बना हुआ है, फिर भी मृत्यु के किनारे को स्पर्श करके लौटने वाले अनेकों व्यक्तियों की घटनाओं पर वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान-परीक्षण करके जो निष्कर्ष निकाले हैं उसके अनुसार प्रकृति की संरचना में शरीररूपी पदार्थ तो कलेवर मात्र है। कलेवर बदल जाने पर भी प्राणचेतना ऊर्जा रूप में या किसी अन्य रूप में अवश्य बनी रहती है।
इस तथ्य की पुष्टि अध्यात्मवेत्ता एडगर केसी ने अपनी कृति ‘देअर इज ए रिवर आप लाइफ’ में की है। स्व सम्मोहित-अवस्था में केसी की पहुँच अन्तरात्मा ‘यूनिवर्सल माइन्ड’ तक हो जाती इसी आधार पर उन्होंने पुनर्जन्म की वास्तविकता को कसौटी पर कसने हेतु आर्थर लेमर्स नामक एक व्यक्ति को चुना जिसकी पुनर्जन्म में गहन आस्था थी और उसने पूर्वात्य ग्रंथों का गहराई से अध्ययन भी किया था साथ ही वह इसकी पुष्टि भी चाहता था। स्वसम्मोहित अवस्था में उसने एडगर से अपनी जन्मकुण्डली के फलादेश के बारे में प्रश्न किया। उत्तर में उसे बताया गया कि ज्योतिष के सम्बन्ध में उसकी जो धारणा है, और वह है। पुनर्जन्म के संबंध में शंका। केसी ने उसे बताया कि वास्तव में पूर्वजन्म में तुम एक बौद्ध भिक्षु थे। इसके बाद यह तुम्हारा तीसरा जन्म है। पूर्व जन्मों में अर्जित ज्ञान संपदा एवं संचित सुसंस्कारों के कारण ही तुम्हें इस जीवन में भी तत्वज्ञान, अतिभौतिकी, अध्यात्म ज्योतिष एसोटेरिक एस्ट्रालॉजी अतीन्द्रिय क्षमता आदि में गहन रुचि है। एडगर केसी के साथ एक विडम्बना यह जुड़ी हुई थी कि सम्मोहित अवस्था-अचेतनावस्था में वह जो कुछ बोलता था, बाद में उसे उसका कोई स्मरण नहीं रहता था। अतः सचेत होने पर उसने जो कुछ कहा था- उसकी नोट कर लिया जाता था। इस बार भी पुनर्जन्म सम्बन्धी अपनी व्याख्या पर आश्चर्यचकित हुए बिना वह नहीं रहा।
विद्वान लेमर्स ने उक्त घटना को पढ़ते हुए पुनर्जन्म के रहस्य की व्याख्या करते हुए बताया कि कर्म के सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु के समय उस के सचेतन मन का साराँश अचेतन मन के साथ मिल जाता है। दोनों के बीच जीवनकाल में जो पर्दा रहता है, उठा लिया जाता है। अतः अचेतन या अवचेतन मन में अनेकों जन्म के संस्कार संग्रहित होते रहते हैं। इसे ही व्यष्टि-चेतना कहा जाता है। पूर्व या गत जन्मों के संस्कारों की प्रबलता के अनुसार ही हम इस जन्म में आने वाली परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठाने में सक्षम होते हैं। यह सचेतन मन ही है जो जीवन भर अच्छे या बुरे संस्कार एकत्रित करता रहता है। मृत्यु के समय अच्छे संस्कार अवचेतन से मिलकर जीवात्मा का अवरोध कम कर देते हैं जबकि दुष्कर्मों के संस्कार अवचेतन के साथ मिलकर जीवात्मा के लिए अवरोध खड़ा करते हैं जिसे ही अनुक्रम में सद्गति या दुर्गति कहा जाता है। स्रष्टा ने मनुष्य जीवन में अच्छे या बुरे कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी है, किन्तु साथ में उसे लेखा-जोखा रखने वाला एक जीवंत यंत्र भी जोड़ रखा है जो चित्रगुप्त का काम करता है और कर्मानुसार सद्गति या अधोगति प्रदान करता है।
‘ए सांइटिफिक इनवेस्टीगेशन आफ नियर डैथ एक्पीरियेन्स’ नामक पुस्तक में वैज्ञानिक मनीषी केनेथरींग ने लिखा है कि हमारे जैसे विज्ञानवेत्ता भी अब यह स्वीकार करने लगे हैं कि शारीरिक मृत्यु के बाद भी मानवी चेतना का अस्तित्व बना रहता है। मनोवैज्ञानिक अध्ययन-अनुसंधानों एवं निजी अनुभवों के आधार पर भी अब यह सिद्ध हो गया है कि मृत्यु के निकट जाने से हम उच्चतर अस्तित्व से परिचित होते हैं। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, उसके बाद हम इस उच्चतर अस्तित्व का यथेष्ट उपयोग कर सकते हैं। इन तथ्यों का अध्ययन करने के लिए अमेरिका में ‘नियर डेथ एक्पीरियेन्स नामक एक संस्था बनी हुई है जिसमें 250 वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक, परामनोविज्ञानी मनः चिकित्सक एवं विशेषज्ञ सम्मिलित हैं। ये प्रतिवर्ष उन 100 से अधिक लोगों पर अध्ययन करते हैं जो मृत्यु के मुँह से वापस लौट आते हैं। उन्होंने जो निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं उसके अनुसार ऐसे अवसरों पर व्यक्ति अपने आपको शरीर से पृथक अनुभव करता है। दृष्टा की तरह अपने शरीर को देखता है। नया शरीर, दीवार, खिड़की आदि बाधक नहीं रहते ; अतः वह अपने को और अधिक शक्तिशाली महसूस करता है। दिवंगत मित्र, सम्बन्धियों की आत्मायें भी मिलती हैं और सहायता करती हैं।
मरणोपरान्त चेतना के अस्तित्व संबंधी जो तर्क एवं तथ्य संगत कानूनी प्रमाण उपलब्ध हैं, वे भी चेतना की निरन्तरता और अमरता की पुष्टि करते हैं। ‘मिस्टरीज आफ आफ्टर लाइफ’ नामक अपनी पुस्तक में सुप्रसिद्ध परामनोविज्ञानी फ्रेंक स्मिथ ने इस तरह के कितने ही प्रसंगों का वर्णन किया है जिनमें से दो प्रमुख हैं। पहली में 1738 में लन्दन के एक कोर्ट में घटित हुई घटना का उल्लेख किया है। उसके अनुसार एक हत्या के मामले में ज्यूरी के सामने पर्याप्त प्रमाण नहीं थे कि अभियुक्त ने जार्ज कीथ नामक व्यक्ति की हत्या की है। हत्या तो हुई थी, पर किस अस्त्र से की गयी थी, उसे पुलिस बरामद नहीं कर पायी थी। ऐसी कोई गवाह भी नहीं था जिसने हत्या होते देखी हो। हत्या से पूर्व आरोपी और मृतक के बीच काफी समय से संपत्ति सम्बन्धी वाद-विवाद और अनबन चल रही थी। उसी आधार पर अभियोग लगाया गया था। प्रमाण न मिलने पर पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में न्यायविद् अभियुक्त जिसे जेल से कोर्ट में लाया गया था अचानक डर के मारे काँपने लगा और किसी को सम्बोधित करते हुए चीखने लगा- “हाँ मैं स्वीकार करता हूँ कि कुल्हाड़ी से मैंने तेरी हत्या की थी। हाँ उस कुल्हाड़ी को टेम्स नदी के पूर्व में ओक वृक्ष के नीचे मैंने छिपा दिया था और उस कुल्हाड़ी में तुम्हारे कमीज का कालर फँसा हुआ है। “ जज ने जब उस अपराधी से पूछा कि तुम यह सब किसे बता रहे हो ? तो उसने कहा “क्या आप नहीं देख रहे हैं कि जार्ज कीथ की प्रेतात्मा मेरा गला दबोच रही है। अतः लाजवाब होकर मुझे सच-सच बताना पड़ रहा है कि मैंने उसकी हत्या कैसे और किससे की है। जब पुलिस ने उसे उस स्थान को दिखाने को कहा तो उसे दिखाने के लिए वह राजी हो गया। उक्त स्थान से मृतक के कमीज के कालर में फँसी रक्त से सनी कुल्हाड़ी पायी गयी जिसके हत्थे पर अभियुक्त के हाथ और अंगुलियों के स्पष्ट निशान थे। इस प्रमाण के आधार पर अभियुक्त द्वारा हत्या स्वीकार करने को मान्यता प्रदान कर सजा दी गयी थी।
एक अन्य घटना 1937 की भारत में ब्रिटिश शासन काल की है जिसे अंग्रेज डिप्टी कलेक्टर मि0 किंग ने भारत में रहते समय अपने एक संस्मरण में प्रकाशित किया था। शिमला में एक डाक बंगला भुतहा बंगला के नाम से विख्यात था। दो-तीन सरकारी अफसरों की शिकायत पर एक पुलिस इन्सपेक्टर को इसकी जाँच करने के लिए भेजा गया था। रात्रि को ठीक बारह बजे उसे सफेद परिधान पहने एक महिला दिखी भयभीत इन्सपेक्टर ने रिवाल्वर से लगातार पाँच छः गोलियाँ दाग दीं, किन्तु ठहाका मारकर हँसने की आवाज सुनते ही उसके होश उड़ गये और वह भाग खड़ा हुआ। अतः दिल्ली से एक अनुभवी एवं साहसी आगा नामक पुलिस अफसर के साथ एक पुलिस दस्ता भेजा गया। विस्तार भय से संक्षेप में सभी सतर्कता बरतने पर भी आगा के सामने भी वह प्रेत प्रकट हुआ और कहने लगा कि यदि आप वास्तव में साहसी हैं तो मुझ अबला की सहायता कीजिए। आपका रिवाल्वर यहाँ कोई काम नहीं आयेगा। सहायता का आश्वासन मिलने पर प्रेतात्मा ने बताया कि यह बंगला पादरी आइजक का है जिसका नाम म्युनिस्पल रिकार्ड में अब भी दर्ज है। मैं यहाँ ‘मेयो स्कूल फॉर गर्ल्स’ में सीनियर कैंब्रिज में पढ़ती थी। पादरी से मेरी घनिष्ठता बढ़ती गयी और एक दिन हम दोनों ने सिविल मैरिज कर लिया। जब मैं गर्भवती हो गयी तो एक दिन अचानक से लन्दन से आया हुआ एक तार दिखाया और बोला वहाँ जाना मेरे लिए अनिवार्य है अन्यथा संपत्ति से हाथ धो बैठूँगा। दो माह बाद वह शिमला लौटा और प्रेम प्रदर्शित करने के बहाने गले में रुमाल फँसाकर मेरी हत्या कर दी।
आगा ने जब उससे प्रमाण माँगा तो छाया ने कहा- मेरी लाश पीछे वाले कमरे के बीचों बीच पलस्तर के एक पत्थर के नीचे दबी है जिसके साथ वह रुमाल तथा पादरी आइजक के कुछ और सामान दफन है। आगा ने पूछा , तुम क्या चाहती हो ? उत्तर मिला आइजक पर मुकदमा चलाकर आप उसे प्राणदण्ड दिलायें। इसके लिए मैं सब प्रकार के प्रमाण दूँगी। आगा ने अपने अधिकारियों से बात करके एक मजिस्ट्रेट के समक्ष उक्त स्थान की खुदाई करवायी तो एक युवा महिला के शव के कुछ अवशेष के साथ एक रुमाल तथा पादरी का कुछ अन्य सामान भी मिला जिसमें उसके कुछ अन्य पते भी थे। इतना प्रमाण मिलने पर आइजक के विरुद्ध हत्या का मुकदमा दायर किया गया। इसके बाद आगा ने जब उस लड़की के बारे में तथा पादरी के बारे में सारी विस्तृत जानकारी प्रेतात्मा से माँगी तो उन्हें बताया गया कि बंगले के हाल की एक अलमारी में ये सब प्रमाण सुरक्षित हैं। आगा को सभी प्रमाण यथास्थान मिल गये। इन कागजातों के आधार पर पता लगा कि पादरी के पिता की मृत्यु तो इस घटना से एक वर्ष पूर्व ही हो गयी थी, अतः वह तार टेलीग्राम फर्जी था। आगा ने वह सभी प्रमाण कोर्ट में प्रस्तुत किये जिसके आधार पर पादरी को यह स्वीकार करना पड़ा कि आवेरी नामक उस लड़की की, जिससे उसने सिविल मैरिज की थी, हत्या की थी। वह शव उसी का था। इस स्वीकारोक्ति के बाद पादरी आइजक को प्राणदण्ड की सजा सुनाई गयी। इससे खुश होकर आवेरी की प्रेतात्मा ने अपने गढ़े हुए जेवरात बताकर आगा को भेंट किये थे जिसे उन्होंने सरकारी खजाने में जमा कर दिया था। डि0 कलेक्टर मि0 किंग अपने संस्मरणों में लिखते हैं कि यदि यह मुकदमा मेरे समक्ष न चला होता तो मैं इस घटना पर और न ही मरने के बाद चेतना के अस्तित्व बने रहने का विश्वास करता।
यह एक तथ्य है कि रोगों का कारण शरीर नहीं, वरन् अपना मन है। रोग की जड़ें सर्वप्रथम मन में पनपती हैं पीछे शरीर पर उसके लक्षण उभरते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। चिकित्सा-विज्ञानियों की आधुनिकतम खोजों ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि शरीर में उपजने वाले रोगों का जनक अपना यह मन-मस्तिष्क ही है जिसे स्वच्छ-निर्मल बनाये बिना शरीर को स्वस्थ नहीं रखा जा सकता। अतः उत्तम स्वास्थ के लिए विचार परिशोधन एवं विधेयात्मक चिन्तन की प्रतिष्ठान ही एक मात्र वह सार्वभौम उपाय-उपचार है जिसके आधार पर मानव समुदाय को स्वस्थ तथा समुन्नत जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। शरीर चिकित्सा-विज्ञानियों का भी मनः चिकित्सकों की भाँति ध्यान अब इस ओर आकृष्ट हुआ है और वे रोगों के निर्धारण करने से पूर्व, मात्र शारीरिक स्थिति को ही नहीं निरखते-परखते, वरन् मानसिक स्थितियों व मस्तिष्कीय स्तर का भी अध्ययन करते हैं। इस तथ्य से भली भाँति परिचित चिकित्सक ही बहुधा सफल होते हैं।
इस संदर्भ में कुछ समय पूर्व न्यूयार्क में रोगों के मूल कारणों को जानने एवं निदान-उपचार के लिए अमेरिकन मनोचिकित्सक संघ एवं एसोसिएशन आफ मेडिकल कॉलेज के मूर्धन्य वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस विचार मंथन, में जो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले गये उसके अनुसार वर्तमान चिकित्सा-शास्त्री रोगों के संबंध में तो गहरी जानकारी रखते हैं, किन्तु लोगों की मनःस्थिति एवं भावना-विक्षोभों से सर्वथा अनभिज्ञ रहते हैं और यही तत्व रोगी को और भी अधिक रोगग्रस्त बनाता जाता है। यही कारण है कि डाक्टर रोगियों की भावनात्मक आवश्यकता को पूर्ण करने में असफल रहते हैं। होना यह चाहिए कि अभी वे रोगियों को जिस हिसाब से व्यवहार व उपचार करते हैं उसके स्थान पर उन्हें सर्वप्रथम मनुष्य माना जाना चाहिए और उनके भावनात्मक स्तर को टटोलना चाहिए। इसी रिपोर्ट में आगे यह कहा गया है कि विश्व भर में भौतिकवादी दृष्टिकोण छा जाने के कारण लोगों के रहन-सहन एवं चिन्तन-चेतना में तेजी से परिवर्तन आया है। आपा-धापी एवं मारा-मारी भरे इस युग में अधिकाँश नर-नारी भावनात्मक उथल-पुथल के कारण तनावग्रस्त बनते और अपने स्वास्थ्य को गँवाते चले जाते हैं। अतः समग्र निदान के लिए चिकित्सकों को चाहिए कि वे लोगों का अध्ययन करें कि वे किस तरह रहते हैं, किस तरह सोचते हैं तनाव एवं अप्रसन्नता का मूल कारण क्या है ? यही वे आधार हैं जिनमें समग्र चिकित्सा के सूत्र सन्निहित हैं।
‘नो योर ओन माइण्ड’ नामक अपनी कृति में हैराल्ड शेरमन ने लिखा है कि मैं कोई डाक्टर नहीं हूँ ; किन्तु मैंने जीवन भर लोगों का अध्ययन किया है कि वे किस तरह रहते हैं, किस तरह सोचते और अनुभव करते हैं। उनके प्रत्येक दिन के क्रियाकलाप एवं व्यवहार में क्या-क्या उतार-चढ़ाव आते हैं ? अतः हम अपने अध्ययन के लिए किसी चिकित्सक की प्रतीक्षा क्यों करें ? क्यों न हम स्वयं ही अपना विश्लेषण करना आरंभ कर दें और खोजें कि कौन सा गलत चिन्तन या बुरा विचार अथवा भावनात्मक प्रतिक्रिया रोगों के रूप में प्रस्फुटित हुई है। इन क्रिया-कलापों को कैसे ठीक किया जाय ? इस तरह की आत्म विश्लेषण क्रिया को अपनाकर हम खुद अपने रोगों के मूल कारणों को जान कर उन्हें रोक सकते हैं। जिस बुरी आदत, संकीर्ण चिन्तन एवं दूषित भावना की प्रतिक्रियाओं ने हमें रोगग्रस्त बनाया है तथा कष्टमय जीवन जीने को मजबूर किया है, उससे हम सहज ही छुटकारा पा सकते हैं।
विचार विज्ञान का एक नियम है- ‘लाइक अट्रैक्ट्स लाइक’ अर्थात् हम जैसा सोचते हैं, जैसा करते हैं और जैसा सोचते हैं, जैसा करते हैं और जैसा स्वयं होते हैं वैसे ही समान धर्मी विचारों एवं परिस्थितियों को आकर्षित करते हैं। यही कारण है कि हम अपने जीवन में उन्हीं तस्वीरों एवं घटनाओं को गढ़ते चले जाते हैं जैसाकि हमारी विचारणाओं का स्तर होता है। जो भी हम गहराई से सोचते, अनुभव करते एवं इच्छा करते हैं, वही हमारे सामने घटित होता चला जाता है।
इस संदर्भ में न्यूयार्क मेडिकल सोसायटी के वरिष्ठ सदस्य डॉ0 लौरेन टी0 गे ने गहन अध्ययन एवं अनुसंधान किया है। उनका कहना है कि रोग और कुछ नहीं, मात्र हमारी वैचारिक एवं भावनात्मक विकृति का ही परिणाम है। अंधे व्यक्तियों जिनमें से कुछ आँशिक तथा कुछ पूर्ण अंधता से ग्रस्त थे, पर किये गये परीक्षणों से उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि चिन्ता जैसी चिन्तन-चेतना की विकृति एवं मानसिक तनाव की इस तरह के रोगों का प्रमुख कारण है। यदि रोगी स्वयं ही अपनी समस्याओं का विश्लेषण करे तो चिन्ता एवं इस तरह की शारीरिक अपंगता से बच सकता है और यही हृदय , मस्तिष्क एवं प्रभावित अंग- प्रत्यंगों का सार्वभौमिक उपचार है। यह मात्र कोरी कल्पना नहीं है, वरन् ऐसी घटनायें लोगों के जीवन में घट चुकी हैं तथा लोगों ने स्वयं ही अपने प्रयासों से अपने को रोगमुक्त किया है।
अपनी उक्त पुस्तक में उन्होंने न्यूयार्क की एक महिला का उदाहरण देते हुए लिखा है कि गठिया रोग के कारण वह चल फिर नहीं सकती थी। चलने के लिए उसे अपने हाथ एवं पैरों का सहारा लेना पड़ता था। पहिए वाली कुर्सी ही एक मात्र उसका सहारा थी। जब उसे बताया गया कि समस्त रोगों का मूल अचिन्त्य-चिन्तन अथवा प्रभावित किये कोई भावनात्मक व्यवधान है जो शरीर के रासायनिक तत्वों में परिवर्तन कर देते हैं तो उसने स्वीकार किया कि अपने शरीर की यह हालत मैंने ही बनायी है। उसने बताया कि अपने जिस बेटे को वह सर्वाधिक चाहती और स्नेह करती थी, उसने उसे अपमानित किया। उसका व्यवहार ऐसा हो गया था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। बेटे ने माता-पिता की समूची आशाओं पर पानी फेर दिया था। माँ जहाँ अपने बेटे को एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में देखना चाहती थी, वहीं वह उतना दुष्ट एवं क्रूर निकला जिसे चाह कर भी वह क्षमा नहीं कर सकी। उसने स्वीकार किया कि उसकी रोगग्रस्तता का प्रमुख कारण यही भावनात्मक क्षोभ है।
समस्या के निदान के लिए जब उसे विधेयात्मक चिन्तन करने एवं ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास रखने की विधा बतायी गयी तो वह उससे पूर्णतः सहमत ही नहीं हुई, वरन् उसे अपनी जीवनचर्या का अंग भी बना लिया । धीरे-धीरे उसका मानसिक स्तर परिवर्तित होने लगा और घृणा के स्थान पर प्रेम के भाव पुनः प्रस्फुटित होने लगे। फलतः सुधार प्रक्रिया भी स्वयमेव आरम्भ हो गयी और कुछ ही महीनों में वह गठिया रोग से पूर्णतः मुक्त हो गयी। आज वह दूसरों को रोगों का मानसिक उपचार सिखाती हैं।
प्रश्न उठता है कि क्या हमारे मन में भी किसी व्यक्ति विशेष के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, घृणा अथवा क्रोध के भाव हैं ? क्या कोई व्यक्ति, वस्तु या क्रियाकलाप हमारे मन में विक्षुब्धता उत्पन्न कर देता है। यदि हाँ, तो निश्चित ही उसकी परिणति शरीर में दिखाई पड़ेगी और वह आज नहीं तो कल उन भावों को रोगों के रूप में व्यक्त करेगा जिनका निदान तब किसी औषधि उपचार से न होगा। यह केवल एक तथ्य ही नहीं वरन् सत्य घटना है। इस संबंध में हैराल्ड शेरमन उदाहरण देते हुए एक सच्ची घटना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि मेरे साथ पढ़ने वाले एक विद्यार्थी को अंधेपन ने घेर लिया उसके पास मात्र तीस प्रतिशत दृष्टि बची। इस अंधत्व के कारणों को ढूँढ़ने-ढूँढ़ते डाक्टर परेशान थे। उसका कोई स्थूल कारण उनकी समझ में नहीं आ रहा था। इस संबंध में जब मुझसे पूछा गया तो मैंने बताया कि उन नर-नारियों को इस तरह का अंधापन एवं बहरापन होता है जो किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से सामना नहीं करना चाहते। ऐसे लोग, व्यक्ति-विशेष अथवा वस्तु-विशेष को देखना या उनके शब्दों को श्रवण करना नहीं चाहते।
गहराई से जाँच पड़ताल करने पर पाया गया कि उक्त व्यक्ति को सुबह सोकर उठने के बाद प्रायः पाँच-दस मिनट तक स्पष्ट दिखाई देता था, पर पीछे आँखों के आगे अंधेरा छाने लगता और न के बराबर दिखाई देता था। जब उससे मानसिक एवं भावनात्मक परेशानियों के बारे में पूछा गया और कहा गया कि आप वस्तुतः अंधे नहीं हैं, किन्तु आपका अचेतन मन विशेष परिस्थितियों में अंधा बना रहता है। यदि इन बातों का खुलासा हो जाय तो न केवल आप देख सकेंगे, वरन् आपकी चेतना भी लौट आयेगी। अन्यथा यह दृष्टि तब तक मस्तिष्क में बैठे उस भावनात्मक धब्बे को-क्षुब्धता को धो नहीं दिया जाता। इस भारी पत्थर के हटते ही आपको दृष्टि सहज रूप में मिल जायेगी।
काफी कुरेदने पर उस व्यक्ति ने अपनी माँ के निरंकुश शासन की हृदय विदारक घटना
सुनाई कि किस तरह उसके क्रिया-कलाप ने उसके हँसते-खेलते, खाते-पीते खुशहाल परिवार को न केवल बर्बाद ही किया वरन् सभी बच्चों के मन में जहर घोल कर उनके कोमल मस्तिष्क में काले धब्बे छोड़ दिये। वे यह नहीं जानते थे कि माँ के इस क्रूरतापूर्ण व्यवहार के लिए किसे उत्तरदायी ठहरायें और उसका उत्तर कैसे दें। वे चाहते थे कि न तो माँ को देखें और न ही उसके शब्दों को सुनें। इसीलिए वे अंधेपन के शिकार हुए।
जब उन्हें फिर से मातृवत् स्नेह एवं ममत्व का आश्वासन दिया गया ओर इस ओर वे पूर्णतः आश्वस्त हो गये तो उनकी दृष्टि उन्हें वापस मिल गयी। इस बीच जब भी उनके मन में पुराना विद्वेष उभरता था तो उसका सीधा प्रभाव आँखों पर पड़ता था। पीछे वह प्रभाव आँखों पर पड़ता था। पीछे वह प्रभाव समाप्त हो गया और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गये।
अपनी स्वास्थ्य समस्या का निदान स्वयं हमारे पास है और इसमें हम समर्थ भी है। स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि ईश्वर की चेतना हमारे मन-मस्तिष्क एवं अंतःकरण के माध्यम से कार्य कर रही है। यदि मानसिक एवं भावनात्मक क्षेत्र की पवित्रता के प्रति विशेष जागरुक रहा जाय और उसे भय, क्रोध , आवेश, ईर्ष्या, द्वेष जैसे विकारों से बचाये रखा जाय तो ऐसा कोई कारण नहीं कि रुग्णता का शिकार होना पड़े और असमय ही काल का ग्रास बनना पड़े ।
योगीराज महर्षि अरविन्द ने कहा है कि ग्रह नक्षत्रों की संरचना से लेकर विज्ञान के अनेकानेक रहस्यों का उद्घाटन करके निस्सन्देह मनुष्य ने बहुत बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है किन्तु यदि हमारे पास मनुष्य की आत्मा को समझ सकने वाला यन्त्र रहा होता तो प्रतीत होता कि उस महत्व के सामने पदार्थ -विज्ञान की समस्त उपलब्धियाँ अत्यन्त ही नगण्य हैं।
मनुष्य की प्रकट और अप्रकट शक्तियों में से एक अति महत्वपूर्ण शक्ति है उसकी वाणी। वाणी के सहारे वह ज्ञानार्जन करता है, एक की विविध साँसारिक क्रिया - कलाप चलते हैं। वाणी रहित मानव -समाज की कैसी गई -गुजरी स्थिति होती इसकी कल्पना मात्र से सिहरन उत्पन्न होती है। वाणी का भौतिक महत्व असंदिग्ध है। दूसरों को मित्र और शत्रु बनाने का उल्लास और रोष उत्पन्न करने का जितना काम वाणी करती है उतना कर सकने वाला संसार में भी आधार नहीं है।
वाणी का आध्यात्मिक आधार और भी अधिक महत्वपूर्ण है। मंत्राराधना इसी प्रकार की रहस्यमयी प्रक्रिया है जिसके आधार पर मनुष्य की सर्वतोमुखी प्रगति और दूसरों की सहायता की पृष्ठभूमि बनती है। मन्त्रशक्ति के लाभ और प्रभाव से हम सभी परिचित हैं। यदि यह साधना ठीक प्रकार से की जा सके तो उस रहस्यमयी शक्ति का प्रचुर परिणाम में उत्पादन किया जा सकता है जो मनुष्य के भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों को आश्चर्यजनक सफलताओं से भर सकती हैं। मन्त्र-शक्ति में चमत्कारों का प्रधान आधार है-शब्द। शब्द-शक्ति का स्फोट । इसके साथ ही साधक की शारीरिक , मानसिक और भावनात्मक स्थिति की पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। इन सब के समन्वय से ही वह प्रभाव उत्पन्न होता है जिसे
मन्त्र -शक्ति का चमत्कार कहा जा सके।
शब्दोच्चारण में जिह्वा, ओष्ठ , दाँत तालु और कण्ठ आदि मुख से सम्बन्धित कई अवयवों का संचालन होता है तब कहीं पूर्ण ध्वनि निकलती है। केवल जिह्वा का ही अवलम्बन हो तो मनुष्य भी पशु-पक्षियों की तरह थोड़ी सी ही ध्वनियों का उच्चारण कर सके। मन्त्रों का गठन शब्द विद्या के गूढ़ रहस्यों को ध्यान में रखकर किया गया है। उनके शब्दोच्चारण से मुख अवयव ही गति नहीं करते वरन् उनकी हलचल सूक्ष्म शरीर के रहस्यमय केन्द्रों को भी प्रभावित करती हैं। षट्-चक्र, तीन ग्रन्थियों, तीन नाड़ियों, दश-प्राण, चौवन उपत्यिकाओं आदि को सूक्ष्म-शरीर का अति महत्वपूर्ण संस्थान कहना चाहिए। उनको सक्रिय एवं जाग्रत बनाने में मन्त्र के अक्षरों का प्रवाह महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करता है।
टाइप राइटर की कुंजियों पर उँगली दबाते ही दूर रखे कागज पर तीलियाँ गिरनी आरम्भ हो जाती हैं और अक्षर छपने लगते हैं। हारमोनियम की कुंजियों पर उँगली रखते ही रीड़ खुलती हैं और स्वर गूँजने लगते हैं। ठीक यही प्रक्रिया मन्त्रोच्चार में होती है। मुख में होने वाली हरकत सूक्ष्म-शरीर के विभिन्न शक्ति-संस्थानों पर प्रहार करके उनमें विशिष्ट हलचल उत्पन्न करती है तदनुसार साधक की अन्तःसत्ता में जागरण एवं स्फुरण के ऐसे दौर आते हैं जिनके सहारे चमत्कारी दिव्य शक्तियाँ जाग्रत हो सकें और साधक ऐसी विभूतियों से भर सकें जैसी कि सर्वसाधारण में नहीं पाई जातीं।
मोटे तौर पर शब्द का प्रयोजन कर्णेन्द्रिय के माध्यम से कतिपय जानकारियाँ मस्तिष्क तक पहुँचाना भर समझा जाता है पर बात इतनी छोटी नहीं है। शब्द की शक्ति पर जितना गहरा चिन्तन किया जाय उतनी ही उसकी गरिमा और विलक्षणता स्पष्ट होती चली जाती है। बादलों की गरज से ऊँची इमारतें फट जाती हैं। आज की याँत्रिक सभ्यता जितना शोर उत्पन्न कर रही है उसके दुष्परिणामों से मानव जाति को अपूर्णनीय क्षति उठानी पड़ेगी। इस तथ्य से समस्त संसार चिन्तित है। अतिस्वन और जेट-विमान आकाश में जितनी आवाज करते हैं उससे उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया को सर्वत्र समझा जा रहा है और इन विशालकाय द्रुतगामी यानों को कोलाहल रहित बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। यंत्र भी ऐसी कर्णातीत ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं जो आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित परिणाम उत्पन्न कर सकें।
संगीत अब मनोरंजन मात्र नहीं रहा वरन् उसे एक महत्वपूर्ण शक्ति स्वीकार कर लिया गया है। संगीत की अमुक ध्वनि, लहरें मानसिक और शारीरिक रोगों के निवारण में चमत्कारी लाभ प्रस्तुत कर रहे हैं। संसार के सुविकसित अस्पतालों में संगीत ध्वनि-प्रवाह का पूरा-पूरा लाभ रोगियों को दिया जा रहा है। पशुओं का दूध बढ़ाने में-पौधों को अधिक विकसित करने में संगीत का प्रयोग उत्साहपूर्वक किया जा रहा है। जापान में बच्चों में सहृदयता और अनुशासनप्रियता बढ़ाने के लिए आरम्भिक स्कूलों से ही संगीत का प्रशिक्षण किया जा रहा है। रणभेरी बजने का-सामूहिक लोक-नृत्यों, का कैसा उत्साहवर्धक प्रभाव उत्पन्न होता है यह सर्वविदित है। संगीत वस्तुतः ध्वनि-प्रवाह का एक विशेष क्रम मात्र है। मन्त्र को भी इसी आधार पर विनिर्मित समझना चाहिये। उनके अक्षरों के चयन का क्रम तथा उच्चारण का अनुशासन दोनों को मिलाकर एक प्रकार से विशिष्ट संगीत का ही प्रादुर्भाव होता है उसके द्वारा साधक को अतिरिक्त विशेषताओं से सम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। इसका आत्मबल प्रचण्ड बनता है और अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति का पथ प्रशस्त होता है।
मन्त्रों की विशेषता शब्दों के एक विशेष क्रम से चयन गुँथन में है। वे ध्वनि विज्ञान के एक विशेष नियम क्रम के अनुरूप गढ़े होते हैं जिनका एक ही प्रवाह से देर तक उच्चारण करने से एक विशेष स्तर की ऊर्जा उत्पन्न होती है। शब्दों के एक ही क्रम-प्रवाह को लगातार जारी रखना अपने आप में एक अद्भुत प्रयोग है। हाथों को एक ही गति से रगड़ने पर वे बात की बात में गरम हो जाते हैं। कुछ एक शब्दों को एक ही क्रम में-एक ही गति से-एक ही स्वर से उच्चरित किया जाय तो उसकी प्रतिक्रिया से न केवल उस व्यक्ति का शरीर और मन वरन् समीपवर्ती वातावरण भी उत्तेजित हो जायगा। व्यक्ति में मंत्र की प्रतिक्रिया की समुचित मात्रा उत्पन्न होना आवेश कहा जाता है। इनकी अनुभूति शरीर या मन में किसी विशेष स्फूर्ति, उत्साह एवं विश्वास के रूप में होती है। किसी-किसी को मन्त्र देवता का साक्षात्कार होता है और सफलता का आशीर्वाद सुनाई पड़ता है। यह स्थूल कानों से स्थूल आँखों से नहीं होता वरन् पूर्णतया सूक्ष्म होता है। सूक्ष्म इन्द्रियाँ ही उसकी अनुभूति करती हैं फिर भी कई बार उसमें इतनी प्रखरता होती है कि उस क्षण स्थूल जैसा ही दर्शन या श्रवण का आभास होता है। आवश्यक नहीं कि हर मन्त्र सिद्धि से हर किसी को श्रवण या दर्शन मिले, पर विश्वास और निष्ठा को परिपक्वता , उत्साह एवं मनोबल का अनुभव अवश्य होता है। सफलता व्यक्त करने वाली प्रसन्नता, चेहरे पर और विजय उपलब्धि की चमक साधक की आँखों में स्पष्ट देखी जा सकती है। इन सफलता सूचक अनुभूतियों को स्फोट कहा गया है।
मन्त्र की भाव-भूमिका चुम्बकत्व उत्पन्न करती है और स्फोट उसे असंख्य गुना विस्तृत एवं सशक्त बनाता है। अणु का आरम्भिक विस्फोट सामान्य होता है उसके चारों ओर घिरा वातावरण ही गुणन-शक्ति उत्पन्न करके उसे अति भयंकर बनाता है। यही प्रक्रिया मन्त्र में भी होती है। मंत्र में सन्निहित भावना, कर्मकाण्ड के साथ जुड़ी श्रद्धा तप साधना से उत्पन्न शब्द-शक्ति का प्रचण्ड प्रवाह जैसी अनेकों रहस्यमयी मंत्राराधन की विशेषताएँ मन्त्र को जाग्रत करती हैं और निष्ठावान साधकों को सिद्ध-माँत्रिक के स्तर पर पहुँचा देती हैं।
यहाँ एक बात और ध्यान रखने योग्य है कि मंत्राराधना में प्रयुक्त होने वाले हर उपकरण में - पदार्थ में अवयव में-दिव्य-सत्ता का आह्वान करना पड़ता है और उसे सामान्य पदार्थ न रहने देकर देव आयुध के रूप में प्रतिष्ठापित करना पड़ता है। स्नान के जल में तीर्थों का, आत्म का अवतरण कराने वाले मन्त्रों का, उच्चारण जल में वरुण देव सहित अन्य देवों का आह्वान है। इस प्रकार श्रद्धासिक्त जल से स्नान करने पर साधक की निष्ठा में गहरा पुट लगता है। आसन, माला, पंचपात्र, दीपक, चन्दन पुष्प आदि उपकरणों के प्रयोग में मन्त्रोच्चारण एवं अमुक क्रम विधान अपनाने की जो परम्परा है उसे निरर्थक नहीं माना जाना चाहिए। यथाक्रम करने से वे सामान्य लगने वाली वस्तुयें उस विशेष चेतन-स्तर की बनती हैं जिसकी कि मन्त्र प्रयोग में आवश्यकता है। इष्टदेव की प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा-षोडशोपचार पूजन जैसी व्यवस्थायें उसी दृष्टि से हैं कि गहन श्रद्धा का आरोपण उस पार्थिव प्रतीक को समर्थ-सत्ता का प्रतिनिधि बनाकर प्रचण्ड प्रेरणा देने का प्रयोजन पूरा कर सके।
साधक को अपने अंग-प्रत्यंग में न्यास-मन्त्रों द्वारा विविध देव -शक्तियों की प्रतिष्ठापना करनी पड़ती है। पवित्रीकरण, आचमन, प्राणायाम, न्यास का प्रयोजन सूक्ष्म-स्थूल और कारण-शरीरों को परिशुद्ध बनाता है। साधना-विज्ञान का अभिमत है कि देव बनकर ही देवाराधना करना चाहिए। शरीर और मन का परिमार्जन करने के लिए मन्त्र जप आरम्भ करने से पूर्व कई तरह के कर्मकाण्ड-विधि-विधान करने होते हैं इनमें से बहुत से अपने में देव-भाव की स्थापना के लिये होते हैं । यह प्रयोग साधना में प्रयुक्त होने पर उपकरणों को सफलता में सहायक रहने योग्य बनाते हैं।
मन्त्र से भावनायें और विचारणायें जुड़ी रहती हैं और एक ही विचारधारा को लगातार मस्तिष्क में स्थान देते रहने से वह चिन्तन विचार-प्रक्रिया पर सवार हो जाता है और एक चिरंतन प्रवाह का रूप धारण करता है। यह मार्ग मस्तिष्कीय प्रशिक्षण एवं परिवर्तन की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है। इससे मन को किसी विशेष भूमिका में रमण करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। विकृतियों को सुधारा जा सकता है और अभिरुचि तथा प्रकृति में परिवर्तन लाया जा सकता है। यह अर्थ चिन्तन को स्थान देते हुए मन्त्रानुष्ठान का सामान्य लाभ हुआ।
शब्द - शक्ति का स्फोट मन्त्र-शक्ति की रहस्यमय प्रक्रिया है। अणु विस्फोट से उत्पन्न होने वाली भयावह शक्ति की जानकारी हम सभी को है। शब्द की एक शक्ति-सत्ता है। उसके कंपन भी चिरन्तन घटकों के सम्मिश्रण से बनते हैं। इन शब्द-कंपन घटकों का विस्फोट भी अणु विखण्डन की तरह ही हो सकता है। मन्त्र योग साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही, विधि-व्यवस्था रहती है। मन्त्रों की शब्द चरना का गठन तत्वदर्शी मनीषी तथा दिव्यदृष्टा मनीषियोँ ने इस प्रकार किया है कि उनका जपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप-साधनों एवं कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है। लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मन्त्राराधन वस्तुतः शब्द-शक्ति का विस्फोट ही है।
शब्द-स्फोट से ऐसी ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं जिन्हें कानों की श्रवण-शक्ति से बाहर की कहा जा सकता है। शब्द आकाश का विषय है। इसलिये मान्त्रिक का कार्यक्षेत्र आकाश-तत्व रहता है। योगी वायु उपासक है। उसे प्राणशक्ति का संचय वायु के माध्यम से करना पड़ता है। इस दृष्टि से मान्त्रिक को योगी से भी वरिष्ठ कहा जा सकता है। सच्चा मान्त्रिक योगी से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही शक्तिशाली हो सकता है।
मन्त्राराधना में जहाँ शब्द-शक्ति का विस्फोट होता है। विस्फोट में गुणन-शक्ति है। मन्त्र द्वारा सर्वप्रथम देवस्थापन की सघन निष्ठा उत्पन्न की जाती है। यह भाव चुम्बकत्व है। श्रद्धा - शक्ति के उद्भव का प्रथम चरण है। इस आरम्भिक उपार्जन का शक्ति गुणन करतीं चली जाती है और छोटा सा बीज विशाल वृक्ष बन जाता है। विचार का चुंबकत्व सर्वविदित है। इष्ट देव की-मन्त्र अधिपति की शक्ति एवं विशेषताओं का स्तवन, पूजन के साथ स्मरण किया जाता है और अपने विश्वास में उसमें सर्वशक्ति-सत्ता एवं अनुग्रह पर विश्वास जमाया जाता है। निर्धारित कर्मकाण्ड विधि -विधान के द्वारा तथा तप साधना कष्ट साध्य तितीक्षा के द्वारा मन्त्र की गुहा शक्ति के करतल गत हो जाने का भरोसा दीर्घकालीन साधना द्वारा साधक के मनः क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मन्त्र की भाव प्रक्रिया को चुंबकत्व से परिपूर्ण कर देती हैं।
मन्त्र से दो वृत्त बनते हैं एक को भाव-वृत और दूसरे को ध्वनि-वृत्त कह सकते हैं। लगातार की गति अन्ततः एक गोलाई में घूमने लगती है। गह-नक्षत्रों का अपने-अपने अयन वृत्त पर घूमने लगना इसी तथ्य से सम्भव हो सका है कि गति क्रमशः गोलाई में मुड़ती चली जाती है। कोई मनुष्य नाक की सीध चला ही चला जाय तो वह अन्ततः उसी स्थान पर आ जायगा जहाँ से कि चला था। ऐसी पृथ्वी की गोलाई के कारण होता है। पिण्ड-ब्रह्माण्डों की गति तथा आकृति गोल है उसका कारण गतिशीलता है। पहाड़ों से टूटे शिला खण्ड नहीं-प्रवाह में बहते-बहते गोलाकार बनते जाते हैं। और छोटे बनने वाले बालू के कणों के रूप में परिणित हो जाते हैं।
मन्त्र जप में नियत शब्दों को निर्धारित क्रम से देर तक निरन्तर उच्चारण करना पड़ता है। जप यही तो है। इस गति-प्रवाह के दो आधार है एक भाव और दूसरा शब्द। मन्त्र के अन्तराल में सन्निहित भावना का नियम निर्धारित प्रवाह एक भाववृत्ति बना लेता है वह इतना प्रचण्ड होता है कि साधक के व्यक्तित्व को ही पकड़ और जकड़ कर उसे अपनी ढलान में ढाल लें। उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि-वृत भी ऐसा ही प्रचण्ड होता है कि उसका स्फोट एक घेरा डाल कर उच्चारण कर्ता को अपने घेरे में कस ले। भाव-वृत अन्तरंग वृत्तियों को शब्द-वृत्त बहिरंग प्रवृत्तियों पर इस प्रकार आच्छादित हो जाता है कि मनुष्य की उभयपक्षी चेतना को अभीष्ट स्तर का तोड़ा-मरोड़ा या ढाला जा सके। मंत्र-विद्या को व्यक्तित्व का स्तर बदलने के लिये सफलता पूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। कितने ही दोष दुर्गुण हटाये और मिटाये जा सकते हैं। सद्गुण सत्कर्म और सद्स्वभाव के अभिवर्धन का लाभ मिल सकता है। शारीरिक और मानसिक रुग्णताओं से मुक्ति दिलाने में मंत्र-विद्या का आशातीत उपयोग हो सकता है।
ज्ञानवृत्त और शब्दवृत्त दोनोँ ही अपने-अपने ढंग की शक्तियाँ संजोये हुये हैं। वे ऐसी भी हैं कि अन्यान्य व्यक्तियों को तथा परिस्थितियों के प्रवाह को उलट-पुलट सकें। विष्णु के हाथ में लगा हुआ चक्र-सुदर्शन आत्मबल की प्रचण्ड क्षमता की ओर ही इंगित करता है। मन्त्र की वृत्त परिधियाँ दूसरों के मनः स्तर को बदलने में और परिस्थितियों के कारण बने हुये वातावरण को पलटने में भी चमत्कारी सफलता उत्पन्न कर सकती है।
चेतना का अनन्त सागर वृत्तियों, आवृत्तियों और पुनरावृत्तियों की लहरों में गतिमान है। इन्हीं के चक्रव्यूह में इच्छा, क्रिया और कर्मफल बनकर हमें कहीं से कहीं लिये फिरती हैं। इसी चक्र जाल को बेधन करके हम जीवन मुक्त बनते हैं। इसी भाव उन्मुक्त स्थिति का नाम आत्म-साक्षात्कार, आत्मानुभूति, आत्मज्ञान हैं। यही जीवन का परम लक्ष्य है।
रेजीडेण्ट ठहाका मार कर हँसा - “आप हमें बेवकूफ नहीं बना सकते महाराजा साहब। बिना सेना के कभी शासन नहीं चला सकते। आपको हमें अपनी सेना देनी ही पड़ेगी।”
उन दिनों प्रथम विश्व - युद्ध चल रहा था। भारत में अँग्रेजों को लड़ाने के लिए लाखों सैनिकों की जरूरत थी। उन्होंने भारतीय राजाओं से सेना लेने का निश्चय किया। इसी सिलसिले में उनका प्रतिनिधि जिसे रेजीडेण्ट कहा जाता था, जैसलमेर राज्य में आया हुआ था। वह वहाँ के तत्कालीन महाराज जवाहरसिंह जी के नाम वायसराय का पत्र भी लाया था। जिसमें जैसलमेर की सेना को ब्रिटिश सेना में शामिल किये जाने का अनुरोध था। ऐसे पत्र बिनतीनुमा आदेश हुआ करते थे।
जैसलमेर में रेजीडेण्ट का भव्य स्वागत किया गया। इसके ठहरने का प्रबन्ध विशेष रूप से बने मेहमान-खाने में हुआ। रेजीडेण्ट ने जब वायसराय का पत्र महाराज को दिखाया और अपने आने का कारण बताया, तो वह चिन्तित हो उठे। उन्होंने उसको बताया कि जैसलमेर राज्य में कोई नियमित सेना नहीं है। ऐसी स्थिति में वह किसी तरह की सैनिक सहायता भेजने में असमर्थ हैं।
लेकिन रेजीडेण्ट को उनकी बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उसने पूछा - “बिना सेना के भला देश की रक्षा कैसे हो सकती है। आप पर कोई हमला कर देगा तो क्या करेंगे, कैसे मुकाबला करेंगे ?”
हमारी सेना हमारी जनता है। उसी के आत्मबल के भरोसे हम हर तरह के खतरे का मुकाबला कर सकते हैं। हम पाँच छः घण्टे में ही अपनी सारी जन-सेना संगठित कर लेते हैं।
पर अँग्रेज प्रतिनिधि जरा भी आश्वस्त नहीं हुआ। उसने फिर से सवाल किया - “राज्य में होने वाले चोरों - डाकुओं के उपद्रवों से कैसे निबटा जाता है।”
बाहरी चोर - डाकुओं से गाँव के लोग स्वतः निबट लेते हैं। और आपस में चोरियाँ होती नहीं। राज-काज चलाने के लिए थोड़े से सिपाही जरूर हैं पर जब जनता में अमन चैन है, तो क्यों हम बड़ी सेना रखकर अपनी जनता पर बेकार का आर्थिक बोझ लादें। राजा ने उसे समझाते हुए कहा।
लेकिन रेजीडेण्ट को ये बातें समझ में न आयीं, उसने कहा ये सब कोरी बातें हैं। मैं सेना लिए बिना वापस नहीं जा सकता। आप मुझे अपनी सेना दें, चाहे वह आपकी नियमित सेना हो अथवा नहीं। उसे आपके खजाने से वेतन मिलती मिलता है या नहीं, हमें इससे कोई मतलब नहीं है। मुझे अपने साथ यहाँ की आबादी के अनुपात से कम से कम पाँच हजार सैनिक तो चाहिए ही।
महाराज जवाहर सिंह को लगा कि अब बातों से काम नहीं चलेगा इसे सच्चाई समझानी ही पड़ेगी। उन्होंने कहा, “ठीक है। कल सुबह आप मेरी सेना देख लीजिएगा। तभी आप मेरी बात समझ सकेंगे।”
उसी दिन उन्होंने अपने ऊँट सवार, घुड़सवार, राज्य के हर गाँव भेज दिए। पन्द्रह से पचास साल तक के सारे आदमी सूरज उगने से पहले-पहले जैसलमेर पहुँच जाय। राज्य को आज सबकी जरूरत पड़ गयी हैं। आदेश हवा की तरंगों के साथ हर घर, हर गाँव में फैल गया। राज्य को हमारी जरूरत है सुनते ही खेत में, खलिहान में, चरागाह में, पत्थर ढोता, घास काटता, गड्ढे खोदता जो जहाँ था, वही रण का बाना पहन कर जैसलमेर की ओर बढ़ चला। ऊँट, घोड़े, बैल-गाड़ियों के रेले के रेले राजधानी में इकट्ठे होने लगें।
अँग्रेज रेजीडेण्ट अपने शयन कक्ष में अभी तक सोया हुआ था। उसे अपने कानों में ऊँट, घोड़े और बैलों की आवाजें, घंटियों की रुनझुन सुनायी पड़ी। उसे लगा जैसे वह कोई स्वप्न देख रहा है। लेकिन धीरे-धीरे ये आवाजें तेज होती गयीं। शोर बहुत बढ़ जाने से उसकी नींद खुल गयी। वह उठकर छत पर आ गया।
छत पर महाराजा पहले से ही बैठे हुए थे। उन्होंने उसकी ओर देखते हुए कहा - आइए रेजीडेण्ट साहब। रेजीडेण्ट आँखें फाड़-फाड़ कर देखे जा रहा था। दूर-दूर तक चारों दिशाओं में ऊँट, घोड़े, बैलगाड़ियों के हुजूम खड़े दिखाई दे रहे थे। धूल की परतें आसमान में छाई हुई थी। हजारों लोग पाँचों हथियार बाँधें सैनिक अभ्यास के लिए बढ़े चले आ रहे थे।
केसरिया वस्त्रों की अद्भुत छटा को दिखाते हुए महाराजा बोले, देखिए ये है मेरी सेना। ये सभी एक ही रात में यहाँ आ पहुँचे हैं। हम सबको अपनी मिट्टी से बेहद प्यार है। हमारी स्वतन्त्रता पर जब भी आँच आती है, सारी जनता बलिदान के लिए तुरन्त तैयार हो जाती है। जहाँ जनता उत्सर्ग के लिए तैयार हो तो कौन सा खतरा टिक सकता है। राजा ने सगर्व कहा।
रेजीडेण्ट आश्चर्यचकित हो देखता रहा। अपने देश के लिए बलिदान होने वाले ऐसे वीरों को देखकर वह बोला - “राजा साहब, जिस दिन जैसलमेर जैसे बहादुरों की भावनाएँ सारे हिन्दुस्तान में तरंगित होने लगेंगी, हम अंग्रेजों को बरबस हिन्दुस्तान छोड़ना पड़ेगा। आज मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, अभी नहीं तो थोड़े दिनों बाद ही सही, हिन्दुस्तान का भविष्य सुनिश्चित रूप से उज्ज्वल है।” वह सेना ले जाने के अपने विचार को त्याग कर वापस चला गया।
मनुष्य यों देखने में एक दुर्बल-सा प्राणी मालूम पड़ता है, पर वह प्राण-विद्युत की दृष्टि से सृष्टा की अद्भुत एवं अनुपम संरचना है। विशेषतया उसका मस्तिष्क इतनी विलक्षणताओं को केन्द्र है जिसके आगे अद्यावधि आविष्कृत हुए समस्त मानवकृत यन्त्रों का एकत्रीकरण भी हलका पड़ेगा। उसमें अगणित चुम्बकीय केन्द्र है जो विविध-विधि रिसीवरों, ट्रान्सफार्मरों का कार्य सम्पादित करते हैं। ब्रह्माण्ड में असंख्य प्रकार के एक से एक रहस्यमय प्रवाह स्पन्दन गतिशील रहते हैं इनमें से मनुष्य को मात्र कुछेक की ही लंगड़ी-लूली जानकारी है। यह जानकारी क्षेत्र जितना विस्तृत होता जाता है उससे असीम शक्ति की असंख्य धाराओं की हल्की-फुलकी झाँकी मिलती है। कदाचित् अबकी अपेक्षा मनुष्य के हाथ दूना-चौगुना भी और लग गया तो वह सृष्टा से प्रतिद्वंद्विता करने लगेगा। इतना होते हुए भी जो कुछ जानना और पाना शेष रह जायगा जिसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। ब्रह्मांड की भौतिक क्षमताएँ चेतनात्मक सम्भावनाएँ इतनी अधिक हैं कि उन्हें अचिन्त्य, असीम, अनन्त अनिर्वचनीय आदि कहकर ही सन्तोष किया जा सकता है।
सर्वविदित है कि पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र एवं सौरमण्डल के अन्य ग्रहों से बहुत कुछ अनुदान प्राप्त करती है और उस आधार की पूँजी से अपनी दुकान चलाती है। सौरमण्डल से बाहर के ग्रह-नक्षत्र भी उसे बहुत कुछ देते हैं। वह हलका होने के कारण विनिर्मित यन्त्रों की पकड़ में नहीं आता तो भी वह स्वल्प या नगण्य नहीं है। कोई वस्तु हलकी होने के कारण उपहासास्पद नहीं बन पाती वरन् सच तो यह है कि सूक्ष्मता के अनुपात में शक्ति की गरिमा बढ़ती जाती है। होम्योपैथी ने इस संदर्भ में अच्छे गहरे और प्रामाणिक प्रयोग प्रस्तुत किये हैं। ब्रह्माण्ड में बिखरे पड़े कोटि-कोटि ग्रह-नक्षत्र अपनी-अपनी उपलब्धियाँ मिल बाँट कर खाते हैं। तभी तो वे सब एक सूत्र में ‘मणिगण इव’ पिरोये हुए हैं। यदि उनमें से प्रत्येक ने अपनी उपलब्धियों को अपने ही सीमित क्षेत्र में समेट सिकोड़ कर रखा होता तो ब्रह्माण्ड का सारा सीराजा बिखर जाता और यहाँ केवल धूलि के बादल इधर-उधर मारे-मारे फिरते दिखाई पड़ते हैं। पृथ्वी को अगणित शक्ति केन्द्रों के छोटे बड़े उपहार मिलते रहते और वह उन खिलौनों से खेलती हुई अपना विनोद-प्रमोद स्थिर रखे रहती।
जिस प्रकार पृथ्वी अन्य ग्रहों से लेती है उसी प्रकार वह अपना उपार्जन ब्रह्माण्ड - परिवार को बाँटती भी हैं। दो और लो’ का विनियम क्रम ही इस सृष्टि की धुरी बन्द कर काम कर रहा है। पृथ्वी और ब्रह्माण्ड के बीच जो आदान-प्रदान क्रम चल रहा है वह चेतना के घटाकाश-मनुष्य और महादाश-विश्व मानव के बीच भी चल रहा है। पिण्ड शब्द का प्रयोग ग्रह-नक्षत्रों की तरह मानव शरीर के लिए भी होता है। मनुष्य एक पिण्ड है उसका ब्रह्माण्ड व्यापी असंख्य चेतना-पिण्डों के साथ वैसा ही सम्बन्ध है जैसा पृथ्वी का सौरमण्डल से - देवयानी निहारिका से अथवा ब्रह्माण्ड केन्द्र महा ध्रुव अनन्त शेष से। मनुष्य की चेतना अपनी उपलब्धियाँ विश्व-चेतना को प्रदान करती है और वहाँ से अपने लिए उपयोगी अनुदान प्राप्त करती हैं।
यों चेतना शरीर के अंश-अंश में बिखरी पड़ी है पर उसका उद्गम निर्झर मस्तिष्क से ही फूटता है। ध्रुवीय चुम्बक - शक्ति की तरह मस्तिष्क में भी आकर्षण और विकर्षण केन्द्र हैं। वे ब्रह्माण्ड से बहुत कुछ ग्रहण करते और देते हैं। इन्हीं क्रिया - केन्द्रों की रिसीवरों एवं ट्रान्समीटरों के रूप में व्याख्या की जाती है।
मनुष्य की स्वास्थ्य, चरित्र, संस्कार, शिक्षा आदि विशेषताएँ मिलकर समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। और उसी के आधार पर उसकी प्रतिभा निखरती है। प्रतिभा ने केवल समाने आने वाले कामों की सफलता के लिए वरन् दूसरों पर प्रभाव डालने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होती हैं। व्यक्तिगत जीवन में यह प्रतिभा धैर्य, साहस, सन्तुलन, विवेक, दूरदर्शिता एवं शालीनता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। सामाजिक जीवन में वह संबंधित लोगों को प्रभावित करती है। उन पर छाप डालती है - एवं सहयोग - सद्भाव, सम्मान प्रदान करने के लिए आकर्षित करती है। प्रतिभा प्रयत्नपूर्वक बढ़ाई जा सकती है। इन प्रयत्नों में लौकिक - गतिविधियाँ भी शामिल हैं और आध्यात्मिक - साधनाएँ भी। साधनारत मनुष्य अपनी संकल्प - शक्ति और उपासनात्मक तपश्चर्याओं द्वारा अतीन्द्रिय - शक्ति का उद्भव करते हैं। अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगाया जाना ओर इस विशाल ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए शक्तिशाली चेतन-तत्वों को खींचकर अपने में धारण करना यह दोनों ही प्रयत्न अध्यात्म-साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएँ बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
जिस प्रकार हृदय-स्पंदन की गतिविधियों की जानकारी इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम से होती है, उसी प्रकार मस्तिष्कीय व़ुत के आधार पर चलने वाली विचार-तरंगों का अंकन इलेक्ट्रो ऐसफैलोग्राम से होती है। मनः क्षेत्र से चिन्तन - स्तर के अनुरूप कितनी ही प्रकार की अल्फा वीटा, डेल्टा आदि किरणें निकलती हैं। उनके आयाम और दैर्ध्य - चिन्तन का - स्थिति का विवरण प्रस्तुत करते हैं।
किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों की शारीरिक बनावट सामान्य होती हैं, देखने में उनका व्यक्तित्व सीधा-सरल सा लगता है, पर उनमें विशिष्ट विद्युत-शक्ति इतनी भरी होती है कि जो भी काम हाथ में लेते हैं उसे संभालते में आते हैं उन्हें प्रभावित किये बिना नहीं रहते।
किस व्यक्ति में कितनी अतिमानवी विद्युत-शक्ति है उसका परिचय उसके चेहरे के इर्द-गिर्द और शरीर के चारों ओर बिखरे हुए तेजोवलय को देखकर जाना जा सकता है। यह तेजोवलय खुली आँखों से दिखाई नहीं पड़ता, पर उसे सूक्ष्मदर्शी दृष्टि से अनुभव किया जा सकता है। अब ऐसे यन्त्र भी बन गये हैं जो मानव - शरीर में पायी जाने वाली विद्युत शक्ति और उसके एक सीमा तक निकलने वाले विकरण का विवरण प्रस्तुत कर सकते हैं। देवी-देवताओं के चेहरे पर एक प्रभा-मण्डल चित्रित किया जाता है। इसका सम्बन्ध भौतिक प्रतिभा और आध्यात्मिक शक्ति धाराओं के साथ जुड़ा रहता है।
डॉ0 चार्ल्स फारे ने अपने ग्रन्थ ‘एनल्स डिस साइन्सेज साइकिक्स’ नामक ग्रन्थ के अपने कुछ रोगियों के शिरों भाग पर छाये प्रभा-मण्डल का विवरण दिया है और बताया है कि रोगों के कारण इस तेजोवलय में क्यों और क्या अन्तर उत्पन्न होते रहते हैं।
इटली में पिरानों अस्पताल में अन्नामोनारी नामक महिला के शरीर में डाक्टरों ने खुली आँख से झिलमिलाता नीलवर्ण प्रभा-मण्डल देखा था। जब वह दीप्ति अधिक तीव्र होती थी जब वह महिला पसीने से लथपथ हो जाती थी, साँस तेजी से चलती और दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। उस महिला इस विद्युत स्थिति को देखने के लिए विश्व भर के जीव-विज्ञानी, भौतिक - शास्त्री और पत्रकार पहुँचे थे।
‘फिजीकल फेनामेना आफ मिस्टिसिज्म’ ग्रन्थ के लेखक हर्बर्ट थर्स्टन ने अपनी खोजों में ऐसे ईसाई सन्तों का विवरण छापा है जिनके चेहरे पर लम्बे उपवास के उपरान्त दीप्तिमान, तेजोवलय देखे गये। उन्होंने अन्नामोनारों का विवरण विशेष रूप में लिखा जिनके शरीर में उपवास के उपरान्त सल्फाइडों की असाधारण वृद्धि हो गई थी। अल्ट्रावायलेट तरंगें अधिक बहने लगी थीं जिनका आभास दीप्तिमान चक्र के रूप में होता था। विद्वान थर्स्टन ने भी अपने विवरणों में ऐसे ही कई दीप्तिमान सन्तों की चर्चा की है और उनकी विद्युतीय स्थिति में असामान्यता होने का उल्लेख किया है।
अमेरिकी वैज्ञानिक मनुष्य शरीर के चारों ओर बिखरे रहने वाले - विशेषतया चेहरे के इर्द-गिर्द अधिक प्रखर पाये जाने वाले तेजोवलय के सम्बन्ध में अपनी शोधें बहुत पहले प्रकाशित कर चुके हैं। अब रूसी वैज्ञानिकों ने भी उस प्रभा-मण्डल के छाया-चित्र उतारने में सफलता प्राप्त कर ली हैं। यह प्रभा-मण्डल सदा एक रस नहीं रहता उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जिनसे विदित होता है कि व्यक्ति के भीतर क्या-क्या विद्युतीय हलचलें हो रही हैं। यदि इस प्रभामण्डल के बारे में अधिक जाना जा सके तो न केवल शारीरिक स्थिति के बारे में वरन् मस्तिष्कीय हलचलों के बारे में भी किसी व्यक्ति का पूरा गहरा और विस्तृत परिचय प्राप्त हो सकता है।
शरीरबल, बुद्धिबल, धनबल, शस्त्रबल, सत्ताबल आदि कितनी ही सामर्थ्यों के लाभ सर्वविदित हैं। यदि आत्मबल की क्षमता एवं उपयोगिता का भी लोगों को पता रहा होता तो वे जानते कि यह उपलब्धि भी इन सबसे कम नहीं, वरन् कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। आत्म शक्ति न केवल व्यक्तित्व को तेजस्वी बनाती है वरन् बाह्य जगत में लोगों को प्रभावित करने-उनका सहयोग सम्पादन करने में भी समर्थ रहती है। कठिन कामों को सरलतापूर्वक सम्पन्न करने की विशेषता जिनमें देखी जाती है उनकी प्रमुख विशेषता यही आन्तरिक-प्रतिभा होती है जिसे सर्वतोमुखी सफलताओं का आधार कह सकते हैं। हमारे प्रयत्न यदि उस क्षमता को प्राप्त करने की दिशा में चले पड़े तो सचमुच हम सच्चे अर्थों में सामर्थ्यवान कहे जो सकने योग्य बन सकते हैं।
सन्त वायजीद कहीं नहाने जा रहे थे ; उन्होंने कुत्ते को पास आते देखकर, अपना पायजामा घुटनों से ऊपर कर लिया, ताकि उसके छू जाने से अपवित्र न हों। कुत्ते ने कहा - “संत मेरे छू जाने से तुम कपड़े को पानी से धो सकते थे पर जो नफरत तुम्हारे मन में उपजी है वह तो सात नदियों में नहाने पर भी न धुल सकेगी। वायजीद पछताये कि “मैं इस कुत्ते तक से मोहब्बत न कर सका, तो अल्लाह की इनायत किस तरह पा सकूँगा।”
मनुष्य के अन्दर इतना कुछ असाधारण छिपा-दबा पड़ा है कि उसे ढूँढ़ने - उभारने में संलग्न होने वाला ऐसी असाधारण विभूतियाँ करतलगत कर लेता है जैसी कि बाहरी उपार्जन से किसी भी प्रकार संभव नहीं हो सकता।
सिद्धियों की चर्चा जहाँ-तहाँ होती रहती है और ऐसे विवरण सामने आते रहते हैं, जिनसे प्रकट होता है कि बाहरी दौड़-धूप तक सीमित रहने की अपेक्षा अधिक सुखी समुन्नत बनने के लिए अपने अंतरंग में छिपी शक्तियों को ढूँढ़ना - जगाना कम लाभदायक नहीं है।
बौद्ध धर्म की योग-साधनाओं में एक ‘जेन’ साधना थी, जिसके प्रमाण जापान आदि देशों में भी पिछले दिनों तक पाये जाते रहे हैं।
एक बार ‘मास’ नामक एक कोरियाई नाटा पहलवान अमेरिका गया और उसने वहाँ के नामी-गिरामी पहलवानों को चुनौतियाँ देना प्रारम्भ कर दिया। अन्ततः एक दंगल का आयोजन किया गया जिसमें अमेरिका के तत्कालीन चैम्पियन पहलवान डिकरियल से भिड़न्त की व्यवस्था की गई। दोनों जब विशाल जन-समूह के बीच अखाड़े में उतरे, तो जनता खिलखिला कर हँस पड़ी। हँसी का मुख्य कारण ‘मास’ का कद था। अपने छोटे कद और साधारण शरीर गठन से उसने डिकरियल को जिस प्रकार की चुनौती दी थी, उससे बरबस ही दर्शकों की हँसी फूट पड़ी। ‘मास’ देखने में डिकरियल से दो फुट छोटा ही न था वरन् आकार में भी उसके आगे वह बच्चे जैसा लगता था। वहाँ 6 फुट 7 इंच का डिकरियल और कहाँ 4 फुट 1 इंच का बौना मास। दर्शकों का उत्साह ठंडा हो गया और वे इस बेजोड़-बेतुकी कुश्ती का सहज परिणाम समझ कर समय से पहले ही उठ कर जाने लगे किन्तु तब चमत्कार ही हो गया, जब कुछ ही दाँव-पेंचों के बाद ‘मास’ ने डिकरियल को चित्त कर दिया और एक हजार डालर का इनाम जीत लिया।
अमेरिकी जनता इस पराजय को अपना राष्ट्रीय अपमान समझने लगी और ‘मास’ पर धोखाधड़ी की लड़ाई-लड़ने का आरोप लगाया गया। अखबारों में इस संबंध में कटु आलोचनाएँ छपीं। खिन्न ‘मास’ ने इन आरोपों का उत्तर एक नई चुनौती के रूप में दिया। उसने विज्ञापन छपवाया कि कोई भी अमेरिकी यदि उसे हरा दे, तो वह मिली हुई उपहार की रकम एक हजार डालर उसी को खुशी-खुशी वापिस लौटा देगा। निदान दूसरे दंगल का आयोजन हुआ। इसमें एक पुलिस अफसर से कुश्ती निर्धारित की गई। यह अफसर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का पहलवान था। वह बहुत ही आवेश में लड़ने आया था, किन्तु हुआ इस बार भी अचरज कि मास ने उसे ऐसी पटक दी कि बेचारे की दो हड्डियाँ ही टूट गईं। इस पर अमेरिकी और भी खीजे और मारने पर उतारू हो गये। किसी प्रकार भाग कर वह अपने होटल पहुँचा और जान बचायी।
यह तो अमेरिका की बात हुई। इससे पूर्व “मास” ने जापान में भी अपने पराक्रम की धूम मचा दी थी। यों वह जन्म से कोरियाई था, पर वहाँ से बचपन में ही अपने बाप के साथ जापान आ गया था और वहाँ का नागरिक बन गया था। उसने एक विशेष प्रकार की योग-साधना ‘जेन’ सीखी और उसी के बल पर वह चमत्कारी योद्धा बन गया।
अक्सर चुनौती - प्रदर्शन में उसके सामने अत्यन्त मजबूत पत्थर जैसी कठोर पकी हुई दो ईंटें दी जातीं। ईंटों की मजबूती को विशेषज्ञ परखते। इसके बाद दोनों हथेलियों के बीच वह इन ईंटों को रखता और उंगलियों के खाँचे भिड़ाकर इस तरह दबाता कि ईंटों का चूरा हो जाता दर्शक अवाक् रह जाते।
एक बार जापान में उसे विचित्र प्रकार की कुश्ती का सामना करना पड़ा। हारे हुए पहलवानों ने मिल-जुलकर उसे चुनौती दी कि वह साँड़ से कुश्ती लड़ने को तैयार हो। पहले तो वह आनाकानी करता रहा, पर पीछे जब चिढ़ाया जाने लगा, तो वह तैयार हो गया। इसके लिए एक अत्यन्त क्रोधी और तेरह मन भारी साँड़ विशेष रूप से तैयार किया गया। और नशा पिलाकर प्राणघातक आक्रमण करने में प्रवीण बनाया गया। इस दंगल को देखने के लिए जापान के कोने-कोने से लोग आये। डॉक्टरों और पुलिस वालों का एक विशेष कैम्प लगाया गया कि यदि ‘मास’ साँड़ की चपेट में आ जाय तो कम से कम उसकी मरणासन्न स्थिति में कुछ तो उपचार किया जा सके और लाश को यथास्थान पहुँचाया जा सके, तब कुद्ध साँड़ को काबू करने का भी सवाल था। यह काम पुलिस ही सँभाल सकती थी सो सभी आवश्यक प्रबन्ध पहले से ही नियोजित कर लिये गये।
‘मास’ पूरी तरह निहत्था था। मुट्ठियाँ ही उसकी एक मात्र ढाल तलवार थीं। लड़ाई आरंभ हुई आक्रमण करने के लिए पहला अवसर साँड़ को दिया गया। ‘मास’ अपनी जगह चट्टान की तरह खड़ा रहा। टक्कर खाकर वह उखड़ा नहीं, वरन् घूँसे से प्रत्याक्रमण किया। घूँसा ऐसा करारा बैठा कि वह एक में ही चक्कर खाकर गिर पड़ा और वहीं ढेर हो गया। 13 मन भारी उस महादैत्य साँड़ को एक ठिगना सा दो मन से भी कम वजन का मनुष्य इस तरह गिर सकता है, यह दृश्य लोगों के लिए आश्चर्यचकित करने वाला था। कई तो इसे भूत-प्रेत की सिद्धि एवं जादू मंत्र का चमत्कार तक कहने लगें।
साँड़ - युद्ध से मास की प्रसिद्धि सम्पूर्ण जापान में फैल गई। यत्र-तत्र उसकी ही चर्चा होती सुनी जाती। ढेर सारे प्रशंसा पत्र उसके पास आने लगे। कितने ही लोग व्यक्तिगत रूप से भी उससे मिलने आते। घर पर ऐसे प्रशंसकों को ताँता लगा रहता। इन सबसे चिढ़कर पराजित पहलवानों ने उसके विरुद्ध कुचक्र रचना आरम्भ किया। वे सभी कोई ऐसा उपाय सोचने ले, जिससे मास को नीचा दिखाया और उसके मास को नीचा दिखाया और उसके गर्व को चूर-चूर किया जा सके। अचानक उन्हें एक युक्ति सूझी। कुछ ही दिन पूर्व ‘कुँग फू’ क्षेत्र से एक नरभक्षी शेर पकड़ा गया था। शेर बड़ा ही खूँखार और आकार-प्रकार में बड़ा था। उन्होंने मास के समक्ष इससे भिड़ने का प्रस्ताव रखा। मास पहले तो हिचका ; पर प्रस्ताव बाद में स्वीकार कर लिया। तिथि निश्चित कर दी गई। मुकाबले की तैयारी होने लगी। आयोजनकर्त्ताओं ने इसके लिए एक विशाल पिंजरा बनवाया। नियत तिथि को एक मैदान में शेर को लाया गया और इस पिंजरे में बन्द कर दिया गया। भीड़ बुरी तरह इस अद्भुत भिड़न्त को देखने के लिए उमड़ पड़ी थी। सभी के मन में कौतूहल और उत्सुकता थी। मास भी वहाँ पहुँच चुका था। शर्तों के अनुसार मास को शेर के गले में एक जंजीर बाँधनी जी। जब सम्पूर्ण तैयारी हो गई, तो मास दरवाजा खोल कर पिंजरे के अन्दर गया और पुनः उसे बन्द कर लिया। मनुष्य को अपने समीप देखते ही शेर गुर्राया और आक्रमण कर दिया। मास इसके लिए अभी पूरी तरह तैयार नहीं था। शेर उसके बायें कंधे का दो इंच माँस नोंच ले गया। अब मास सतर्क हो चुका था। नरभक्षी दोबारा उसकी और झपटा। इस बार उसने अपने को फुर्ती से एक तरफ हटा लिया और बार को निष्फल कर दिया। दूसरे ही पल उसने चीते की सी फुर्ती दिखायी और जब तक शेर सम्भल पाता, इसके पूर्व ही एक भरपूर घूंसा उसके नथुनों में जड़ दिया और बगल हट गया। शेर के नथुनों से खून की धारा फुट पड़ी। पीड़ा से वह बिलबिला उठा। जोर की दहाड़ लगायी और मास के ऊपर टूट पड़ा। इस बार उसने पुनः अपने को चतुराई पूर्वक बचा लिया और अगले आक्रमण से पूर्व ही उसके ताबड़तोड़ घूँसे बरसने लगे। इस बार प्रहार करारा था और सिर के ऊपर पड़ा था। शेर वहीं निढाल - सा पड़ गया। अब उसने जंजीर उठायी। और आसानी से शेर के गले में बाँध कर बाहर आ गया। सभी ने उसकी हिम्मत और बहादुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की और करतल ध्वनि से उसका स्वागत किया। इस बार षड्यंत्रकारी पहलवानों को भी उसकी शक्ति स्वीकारनी पड़ी।
अपनी शक्ति का रहस्य बतलाते हुए मास सदा अपनी योग-साधना का वर्णन विस्तारपूर्वक किया करता था।
जापान में ‘जेन’ साधना भूतकाल में भी बहुत प्रख्यात और सम्मानित रही है। बौद्ध धर्मानुयायी सन्त इसे अपने शिष्यों को बताते सिखाते रहे थे। इस आधार पर मनुष्य केवल आध्यात्मिक ही नहीं, वरन् भौतिक - शक्तियाँ भी प्राप्त कर सकता है। जेन-साधना को नट-विद्या नहीं, वरन् विशुद्ध योगाभ्यास ही समझा जाना चाहिए। जापान की ‘जुजुत्सु’ विद्या संसार भर में प्रसिद्ध थी। इसके आधार पर कोई मनुष्य अपने से कहीं अधिक बलवान प्रतिद्वंद्वी को बात-की-बात में धराशायी कर सकता था। इसकी पुष्टि करने वाली न केवल दन्त कथाएं ही वहाँ प्रसिद्ध थीं, वरन् जापानी उसमें निष्णात भी होते थे।
मास को बचपन से ही योग विद्या का शौक था। उसने जेन-साधना में कुशल महाभिक्षु फना कोशी से दीक्षा ली और उन्हीं के पास रह कर यह विद्या सीखने लगा। उस प्रयोजन के लिए उसने पर्वतों की निर्जन गुफाओं में डेरा डाला और बर्फ से ढकी कन्दराओं में वनस्पतियाँ खाकर साधना जारी रखी। कई वर्ष बाद वापस लौटा, तो उसकी जटाएँ और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। लोगों ने उसे पागल समझा, पर इससे क्या वह धुन का धनी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता ही रहा और आखिर उसने अपने को जेन साधना का सिद्ध पुरुष ही बना लिया।
जापान आदि देशों में जेन साधना का बहुत सम्मान है। वह भारत की योगविद्या का ही एक अंग है। ईसा की पांचवीं शताब्दी में भारतीय बौद्ध-भिक्षु चीन गये। उनके नेता का नाम था - धरुम। यह नाम धर्म शब्द का अपभ्रंश ही हो सकता है। उन योगियों ने जहाँ धर्म, सदाचार, अध्यात्म आदि की शिक्षाएँ दीं, वहाँ एक विशेष प्रकार की योग साधना, जो तब से लेकर अब तक किसी न किसी रूप में उस क्षेत्र में जीवित ही बनी हुई हैं।
जेन-साधना का मूल आधार मनःशक्ति, संकल्प-बल, एकाग्रता और निर्धारित प्रयोजन से संबंधित श्रद्धा के साथ तत्परता बरतना है। शारीरिक योग के लिए अपनी माँसपेशियों और नस-नाड़ियों पर एकाग्रतापूर्वक अधिकार करना पड़ता है। इससे वे फौलाद जैसी कठोर हो जाती हैं और आक्रमण सहने तथा करने में अपराजेय सिद्ध होती हैं। इसी आभार पर मनःशक्ति को केन्द्रित एवं समर्थ बना कर इस योग्य भी बनाया जाता है कि उससे दूसरे के मनः संस्थान को करारी टक्कर दी जा सके। यह टक्कर भले या बुरे किस प्रयोजन के लिए दी गई और उससे दूसरे का क्या हित - अनहित हुआ-यह प्रयोक्ता के उद्देश्य पर निर्भर है ; किन्तु इतना हर हाल में निश्चित ही रहता है कि योग-साधना के बल पर शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र में शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र में चमत्कारिक क्षमता उत्पन्न की जा सकती है।
वह दीर्घ नेत्रों वाली तरुणी, जिसके सोने के रंग के शरीर पर यौवन अरुणोदय का उल्लास लगता था। जिसको चलते देखकर लगता था। कि संध्या अपने आलक्तक लगे चरण धरती हुई सुवर्ण - मेघ की दीप्ति से मनोरम होकर रंग - बिरंगे वस्त्र पहनकर चली आ रही हो। जिसके नेत्र फिरते थे, तो रूप में तोरणों की सृष्टि होती थी। वह राजकुमारी थी, अपार रूप-सम्पदा की स्वामिनी। लेकिन उसका रूप दर्प-मण्डित था अहंकार की स्वाभाविक आभा उसके हाव-भाव एवं व्यवहार में सहज परिलक्षित होती थी।
उन दिनों राजाओं की सत्ता अबाधित थी। समूची शक्ति और सत्ता उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती थी। उनकी मर्जी को कानून ही नहीं ईश्वर की इच्छा भी समझा जाता था। भोली-भाली निरीह जनता उनके हर आदेश को सिर-माथे चढ़ाती थी। आदेश सही हो या गलत, उसकी कहीं कोई फरियाद नहीं थी। ऐसी अबाधित सत्ता भोगने वाली राजकुमारी अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझती थी।
लेकिन इतने पर भी खैर न थी उसे दुःखी-गरीब लोगों को हंसी उड़ाकर एक अपूर्व सुख मिलता था। किसी का भी मजाक उड़ाना - उन्हें अपने व्यंग - बाणों से आहत करना उसका प्रिय व्यसन था।
राजमहल नहीं के किनारे पर था। राजकुमारी के कमरे का वातायन नदी की ओर खुलता था। वह अपने वातायन पर बैठकर अपनी सहेलियों के साथ आने-जाने वालों पर अपने व्यंग - प्रहार करती हरती व्यंग से मुरझाए शरमाए हीनता से सकुचे चेहरे देखकर उसका दर्प और बढ़ जाता। राजमहल से होकर गुजरा जन सामान्य की मजबूरी थी, क्योंकि नदी की ओर जाने का यही एक रास्ता था। बेचारे चुप-चाप सुनते और आहत होकर चले जाते। राजसत्ता के समक्ष कर भी क्या सकते थे।
सहेलियों के साथ एक दिन राजकुमारी नदी पर स्नान करने गयी। वहाँ से लौटते वक्त उसने आते-जाते ढेरों लोगों पर तरह-तरह के व्यंग बाण छोड़ने आरम्भ किये-देख तो उस आदमी के कान कैसे हैं - जैसे हाथी के कान हों और उसकी नाक जैसे सुअर की नाक चिपका दी गयी हों। दाँत तो देख उसके जैसे भेड़िये के हों। चाटुकार सहेलियाँ उसकी हाँ में हाँ मिलाती हुई हँस देती। उनकी हँसी की गूँज से न जाने कितने हृदय पीड़ा से भीग जाते।
से सब इससे बेखबर थी। नदी के किनारे खड़े एक वृद्ध संन्यासी उनके इस व्यवहार को बारीकी से देख रहे थे। संन्यासी की पारदर्शी दृष्टि रूपवान शरीर में छुपे कुरूप व्यक्तित्व को परख रही थी। उन्हें इस बेमेल संयोग पर आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ। वे सोचने लगे - काश ! इस राजकुमारी की देह जितनी सुन्दर है उकसा मन भी उतना ही सुन्दर होता। कुछ सोचते हुए उन्होंने राजकुमारी को सत्परामर्श देने के उद्देश्य से कहा-
“बेटी ! तुम इस देश की राजकुमारी हो। भगवान ने तुम्हें सुखी और सम्पन्न जीवन इसलिए दिया है कि तु औरों पर कृपा कर सको। ये लोग तो तुम्हारी प्रजा हैं, तुम्हें उन्हें सहारा देना चाहिए। तुम्हें इनके दुःख दर्द दूर करने चाहिए। लेकिन ऐसा करना तो दूर-उलटे तुम इनकी खिल्ली उड़ा रही हो। इन्हें अपनी कटूक्तियों से आहत कर रही हो। इनको पीड़ा पहुँचा रही हो। भला ऐसा करना तुम्हें शोभा देता है ?”
संन्यासी की बात सुनकर राजकुमारी के अहं का पारा और चढ़ गया। उसने संन्यासी की ओर क्रोधित दृष्टि से देखते हुए कहा-बूढ़े। तुझे खबर है तू किससे बात कर रहा है। मैं यहाँ की राजकुमारी हूँ फिर मैं गलत क्या कह रही हूँ कुरूप को कुरूप न कहा जाय तो और क्या कहा करें। खबरदार आइन्दा जो कुछ टोका-टाकी की। संन्यासी को धमकाती हुई राजकुमारी आगे बढ़ गयी।
कुछ दिनों के बाद फिर से घटनाक्रम ने अपने को दुहरा दिया। राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ नदी पर स्नान करने गयी। जब स्नान करके निकली तब उसने देखा एक ब्राह्मण नदी किनारे बैठा जप-ध्यान कर रहा था। उसकी नाक कुछ बड़ी थी, चेहरे पर दाढ़ी भी थी। राजकुमारी का तो स्वभाव ही ठहरा-व्यंग करके दूसरों को चोट पहुँचाना उसका छिद्रान्वेषी स्वभाव तो दूसरों की हँसी उड़ाने का मौका तलाशता रहता था। ब्राह्मण को देखकर उसे फिर से अपने कटु वचनों से मर्माहत करने का मौका मिल गया।
उस ब्राह्मण को देखकर उसने अपनी सहेली के चिकोटी काटी-अरी चित्रना देख न, यह रीछ कैसा बगुला भगत बना बैठा है। इतनी लम्बी नाक और चेहरे पर बाल पूरा रीछ लगता है। कैसे-कैसे कुरूप लोग हैं, दुनिया में ? बेचारे ब्राह्मण के कानों में भी ये शब्द पड़ें, लेकिन वह कर भी क्या सकता था। चुपचाप अपमान का घूँट पीकर रह गया। हाँ उसकी पीड़ा आँखों में जरूर छलक आयी।
संयोग से उस दिन भी वही संन्यासी थोड़ी दूर पर खड़े सारा नजारा देख रहे थे। उन्होंने ब्राह्मण के चेहरे पर उभर आयी पीड़ा। की लकीरों को साफ-साफ देख लिया, साथ ही उन्होंने राजकुमारी के चेहरे पर आयी दर्प की सन्तुष्टि को पढ़ लिया। इस उद्धत अहं को वे सहन न कर सकें। उन्हें अचानक शास्त्र का वह वाक्य याद आया कि जब राज सत्ता निरंकुश हो उठे - तो योगी को अपने योग-बल और तप शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
उन्होंने एक राजकुमारी को फिर से समझाने का प्रयास किया, सौंदर्य शरीर सौष्ठव का पर्याय नहीं, इसका मापन और मूल्याँकन तो आन्तरिक सद्गुणों के आधार पर ही हो सकता है। इस प्रकार से असहाय लोगों की हँसी उड़ाना अच्छा नहीं है। कभी अपनी कुरूपता की ओर भी देखिए आत्म-सौंदर्य को जाग्रत करने का मौका मिलेगा।
संन्यासी की सिखावन का धृष्ट राजकुमारी पर कोई असर नहीं हुआ। उलटे उसने नदी किनारे की एक मुट्ठी धूल उठाकर संन्यासी के चेहरे पर डाल दी। उसके इस व्यवहार पर तपस्वी की ऊर्जा चरम सीमा पर पहुँच गयी। वह कुपित होते हुए बोले-घमण्डी लड़की। तूने ब्राह्मण के मुख की तुलना जिस जानवर से की है तेरा चेहरा उसी जानवर सा हो जाएगा।
उसी दिन शाम को जब वह राजोद्यान में टहल रही थी, उसकी दृष्टि सुन्दर पुष्पों पर पड़ी। उसने हाथ बढ़ाकर पुष्पों को तोड़ लिया और मधुर और मादक सुरभि का आनन्द लेने लगी। किन्तु तभी एक आश्चर्य हुआ, जैसे-जैसे राजकुमारी फूलों को सूँघती, वैसे-वैसे उसकी नाक बड़ी होती जाती। देखते-देखते नाक इतनी बड़ी हो गयी, कि उसे सम्भालना कठिन हो गया। यहीं नहीं उसके चेहरे पर घने बाल भी उग आये। अब वह देखने में रीछ की तरह बदशक्ल लग रही थी।
पास खड़ी दासी ने जब यह देखा तो उसने इस घटना की सूचना महलों में राजा को दी। राजा और महारानी भागे-भागे राजोद्यान की ओर दौड़े। महारानी तो अपनी पुत्री की शक्ल देखकर रो पड़ी। फौरन राजवैद्य को बुलाया गया। फौरन उपचार आरम्भ किया गया, परन्तु कोई लाभ न हुआ। थक-हार कर राजवैध ने कह दिया “राजन ! यह कोई शारीरिक व्याधि नहीं, दैवकोप है। इसे औषधि से ठीक नहीं किया जा सकता।”
दिन बीतते गए, परन्तु स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इस बीच राजकुमारी ने अपने माता-पिता से संन्यासी का शाप कह सुनाया था। अपने को सौंदर्य की देवी समझने वाली राजकुमारी इन दिनों किसी को अपना मुख नहीं दिखा सकती थी। यहीं नहीं दिखा सकती थी। यही नहीं वह स्वयं भी शीशे में अपना चेहरा नहीं देख पाती थी। आज उसे अहसास हो रहा था कि असंख्य लोगों पर उसकी कटूक्तियों का क्या असर हुआ होगा। उसकी बातों से कितने मन आहत हुए होंगे।
इधर राजा उस संन्यासी को ढूंढ़ने के लिए भरपूर कोशिश कर रहे थे। एक दिन राजकर्मचारियोँ ने पास के वन में एक तेजस्वी संन्यासी के होने की सूचना दी। राजा अपने साथ पालकी में राजकुमारी को लेकर संन्यासी के पास उपस्थित हुए। संन्यासी ने बड़े आत्मीय भाव से पूछा - “राजन्। आप चिन्तित दिखायी देते हैं, कारण ?”
राजा ने लगभग बिलखते हुए अपनी चिन्ता का कारण बताते हुए कहा - “किन्तु महाराज, आपकी रहस्यमयी मुस्कान से तो लगता है कि आप मेरी परेशानी का कारण पहले से ही जानते हैं।”
संन्यासी बोले - ‘ठीक कहते हैं राजन्। न केवल चिन्ता को बल्कि चिन्ता निवारण के उपाय को भी जानता हूँ।”
संन्यासी का वाक्य सुनकर राजा को कैसे अपने खोए हुए प्राण वापस मिले। उसने उनके पाँवों पर अपना सिर रखते हुए कहा - “शीघ्र बताइए, महाराज ! हम बहुत दुःखी हैं।
“लेकिन आप से भी अधिक दुःखी आपके राज्य में हैं। वह भी एक दो नहीं, सैकड़ों - हजारों की संख्या में । लेकिन आपकी घमण्डी लड़की उनकी सेवा - सहायता तो दूर उलटे मजाक उड़ाती रही।”
“मैं अपने किए पर शर्मिन्दा हूँ।” राजकुमारी के स्वर में प्रायश्चित का पुट था।
“तो फिर सुनो!” संन्यासी ने गम्भीरता पूर्वक कहना प्रारम्भ किया-”मैं एक औषधि देता हूँ। पन्द्रह दिनों तक राजकुमारी उसके लेप को अपने चेहरे पर लगाए। लेकिन एक शर्त हैं।”
“कौन सी शर्त ?” राजकुमारी ने आतुरतापूर्वक कहा।
“आप बताइए, पूरी करूंगी।”
“औषधि का लेप, जिस जल से तैयार होगा वह नदी किनारे बैठने वाले अन्धे, लूले, अपाहिज लोगों के पाँवों का धोवन होना चाहिए और उनके पाँव राजकुमारी स्वयं धोएगी। इससे उन्हें इस बात का अनुभव हो सकेगा कि किसी धरती का हर प्राणी किसी न किसी रूप में ईश्वरीय सौंदर्य को व्यक्त करता है।”
अगले दिन से ही राजकुमारी संन्यासी की बतायी रीति के अनुसार औषधि उपचार में जुट गयी। पन्द्रह दिन पूरे होते-होते उसका शरीर पर्वत हो गया। हाँ अब की बार उन्हें यह ज्ञात हो गया था कि कुरूपता बाह्य नहीं आन्तरिक होती है और सच्चा - सौंदर्य शारीरिक - सौष्ठव नहीं आन्तरिक - सद्गुण सम्पत्ति हैं।
इस विश्व-ब्रह्माण्ड में दो शक्ति धारायें कार्यरत है- एक जड़ दूसरी चेतन की। इनमें से जड़ पदार्थ की क्षमताओं का स्वरूप और उपयोग समझने की विद्या को विज्ञान कहते हैं और चेतना को प्रगति एवं प्रसन्नता प्रदान करने वाली विद्या को अध्यात्म कहते हैं। मानवी - सत्ता को दोनोँ क्षेत्रों के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है। प्राण-चेतना का सुसंतुलन अध्यात्म तथ्यों पर अवलम्बित हैं। काया पदार्थ विनिर्मित होने से उसका काम जड़ वस्तुओं के सहारे चलता है। जीवन को सुखी समुन्नत रखने में दोनों की समान रूप से आवश्यकता पड़ती है। अतः अध्यात्म और विज्ञान का परस्पर सहयोग-समन्वय रहने पर ही व्यक्ति तथा समाज की सुविधा तथा प्रसन्नता को बनाये रहना तथा बढ़ाते चलना संभव हो सकता है।
इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि पिछले दिनों से ही उपरोक्त दोनों महाशक्तियों में परस्पर सहयोग-समन्वय होने के स्थान पर अनबन चलती रही हैं। एक ने दूसरे पर आक्षेप करने और हेय ठहराने की प्रतिस्पर्धा खड़ी की हैं। विज्ञान ने ईश्वर को आत्मा, और कर्मफल के तत्वदर्शन को असामान्य ठहराया है। प्रत्यक्षवाद ने मत्स्यन्याय का पक्ष लिया है। और जिसकी लाठी उसकी भैंस का उपयोगितावाद सही ठहराया है। इन भौतिकवादी प्रतिपादनों ने मानवी चिन्तन को दिग्भ्रान्त करने में बहुत सफलता पायी है। स्वार्थपरता, उच्छृंखलता और आक्रामकता को बल मिला है। व्यक्तिगत चरित्र और भौतिक प्रगति में विज्ञान ने बहुत सहायता दी है, किन्तु उसके द्वारा चेतना क्षेत्र में जो विकृति उसके द्वारा चेतना क्षेत्र में जो विकृति उत्पन्न हुई है, उसकी हानि भी कम नहीं है। पतन-पराभव का घटाटोप अनेकानेक विभीषिकायें उत्पन्न कर रहा है। लगता है महाविनाश के दिन तेजी से निकट आते जा रहे हैं।
अध्यात्म ने भी विज्ञान के आक्षेपों का प्रामाणिक स्तर पर उत्तर नहीं दिया। खीज कर उसे गाली गलौज देना आरम्भ कर दिया और अपनी स्वप्निल दुनिया अलग बसाली। वह वाग्जंजाल और पूजा-पत्री के टंटघंट तक ही सिमटकर रह गया। इससे बुद्धिजीवी वर्ग पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा और उसे पराजित की खीज, मूढ़मान्यता का समर्थन तथा निहित स्वार्थों का कुचक्र ठहराकर भर्त्सना का भाजन बनाया। इस प्रकार अध्यात्म की व्यक्ति को उत्कृष्ट और समाज को समृद्ध बनाने की भौतिक क्षमता को भारी ठेस लगी। अध्यात्म और विज्ञान के विग्रह-असहयोग से समूची मानवता को भारी क्षति पहुँची है। व्यक्ति का पतन हुआ और समाज का संतुलन बिगड़ा। अध्यात्म, दर्शन क्षेत्र की इस विसंगति का जनजीवन पर लोक व्यवस्था पर जो घातक प्रभाव पड़ा है उसे सूक्ष्मदर्शी जानते हैं। उनकी चिन्ता और बेचैनी स्वाभाविक है।
समय की माँग है कि विज्ञान और अध्यात्म का पर्दा और चेतना का ऐसा तालमेल बैठे जिसके सहारे व्यक्ति की गरिमा और समाज की व्यवस्था को उच्चस्तरीय बनाया जा सकना संभव हो सके। यह एक सुखद संकेत है कि भौतिक विज्ञानियों का ध्यान अब इस ओर आकृष्ट हुआ है। इस सर्म्दभ में ‘मिस्टीरियस यूनीवर्स’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के रचयिता मूर्धन्य विज्ञानी सर जेम्स जीन्स ने लिखा है कि “विज्ञान जगत अब पदार्थ-सत्ता का नियंत्रण करने वाली चेतन-सत्ता की ओर उन्मुख हो रहा है और यह सोचने में लगा है कि हर पदार्थ के गुण, धर्म की रीति-नीति से नियंत्रित रखने वाली व्यापक चेतना का स्वरूप क्या है ?” पदार्थ को स्वसंचालित व अचेतन सत्ता समझने की प्रचलित मान्यता अब इतनी अपूर्ण है कि उस आधार पर प्राणियों की चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। अब वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन-सत्ता को समझने का प्रयास गंभीरतापूर्वक कर रहे हैं।
वस्तुतः विज्ञान की जानकारियां बहुत सीमित हैं। वह आँशिक सत्य है। उसकी एक सीमा निर्धारित है। उसके आगे विज्ञान की नहीं ; विश्वास और श्रद्धा की आवश्यकता हो जाती है, जिसे अध्यात्म का प्राण कहा गया है। पदार्थ परमाणुओं से बने हैं और परमाणु इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन, न्यूट्रान, मेसान, पाजिट्रान और न्यूक्लियस से बने हैं - विज्ञान की इतनी ही जानकारी है। उसने यह भी पता लगा लिया है कि परमाणु में अकूत शक्ति भण्डार छिपा है। वह एक पूरा सौरमण्डल है। पर ऐसा क्यों हैं ? शक्ति कहाँ से आई ? परमाणु में गति क्यों है ? आदि बातें बताने में विज्ञान असमर्थ है। वह यह भी बता पाने में समर्थ नहीं हुआ है कि मानव जीवन का उद्देश्य क्या है ? आनन्द का वास्तविक स्रोत कहाँ है ? तभी तो सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ0 जे0 डब्ल्यू0 एन0 सुलीवान ने अपनी कृति ‘लिमिटेशन आफ साइन्स’ में लिखा है कि “मानव जीवन की उत्पत्ति के बारे में प्रचलित डार्विन का विकासवाद - जिसके अनुसार मनुष्य अमीबा, अमीबा से दूसरे सर्पणशील जीवों से विकसित होता हुआ बन्दर बना और फिर बन्दर से विकसित होकर मनुष्य बन गया और रैन्डम के सिद्धान्तानुसार मनुष्य उसी प्रकार परिपूर्ण जन्मा जिस प्रकार अन्य जीव, में से कौन सत्य है, कौन असत्य है। इस संबंध में विज्ञान कुछ भी स्पष्ट करने में असमर्थ है।” इसी तरह ‘इन्ट्रोडक्शन टू साइन्स’ नामक पुस्तक में विज्ञानवेत्ता जे0 ए0 थामसन ने कहा है - “विश्व में जीवन कब और कैसे उत्पन्न हुआ, उसका विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं है। यहाँ बड़े से बड़े वैज्ञानिक को भी भ्रम हो जाता है कि वस्तुतः कोई ऐसी महान चेतन-सत्ता इस संसार में अवश्य काम कर रही हो सकती है जिसकी इच्छा से शक्तिमान और कोई शक्ति संसार में न हों।
विज्ञान पक्ष की मान्यता है कि जो प्रत्यक्ष है, उतना ही सत्य है। इसमें जो तुरन्त लाभ दीख सके, अपनी सत्ता का परिचय दे सके, वहीं मान्य है। चूँकि ईश्वर, धर्म और तत्वदर्शन के प्रतिपादन प्रत्यक्ष नहीं है, इसलिए उन्हें मान्यता क्यों दो जाय? पर यहाँ इस वास्तविकता को भुला दिया जाता है कि प्रत्यक्ष की क्षमता एवं उपयोगिता स्वल्प है। उसका वर्चस्व तो परोक्ष में छिपा हैं। उसे ही चेतना कहते हैं। उदाहरण के लिए जमीन पर बिखरी धूल की कोई कीमत नहीं, पर उसके छोटे से परमाणु की - परोक्ष शक्ति की जो जानकारी रहस्य का पर्दा उठने पर मिलती हैं। उसे देखकर आश्चर्य-चकित रह जाना पड़ता है। आकाश नीले शामियाने जैसा दीखता है, पर इस प्रत्यक्ष से आगे बढ़कर इन्द्रियातीत रहस्यों का पता चलता रहता है कि उस पोल में उससे भी अधिक सम्पदा भरी पड़ी है जितनी कि इस धरती पर बिखरी हुई दीखती है, यह रहस्यलोक ही है जिसे इन्द्रियातीत बुद्धिगम्य कहते हैं। परोक्ष भी प्रत्यक्ष के साथ ही गुंथा हुआ है, पर उसे जानने, पकड़ने और करतलगत करने के लिए इन्द्रियों की क्षमता से काम नहीं चलता। इसके लिए बुद्धि क्षेत्र की - अंतःकरण की प्रखरता उभार कर उसके सहारे गहराई में प्रवेश करने और मोती ढूँढ़ निकालने का पुरुषार्थ करना पड़ता है। महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में इस तथ्य को जान लिया था। उन्होंने परमाणु प्रक्रिया का विशद विवेचन करने के उपरान्त अपने निष्कर्ष घोषित करते हुए कहा है - “मुझे विश्वास को गया है कि जड़-प्रकृति के भीतर एक ज्ञानवान परोक्ष-चेतना भी काम कर रही है।”
भौतिक विज्ञानी सर ए0एस0 एडिंगटन का भी यही निष्कर्ष है कि भौतिक पदार्थों के भीतर एक सूक्ष्म चेतन-शक्ति काम कर रही है। जिसे अणु-प्रक्रिया का प्राण कहा जा सकता है। हम उसका सही स्वरूप और क्रियाकलाप अभी नहीं जानते, पर यह अनुभव करते हैं कि संसार में जो कुछ हो रहा है - वह अनायास, आकस्मिक या अविचार पूर्ण नहीं है। ‘इवोल्यूशन’ नामक अपनी पुस्तक में पी0 गेईडर्स ने भी कहा है कि सृष्टि का आरंभ जड़-परमाणुओं से हुआ और ज्ञान पीछे उपजा, यह मान्यता सही नहीं है। लगता है कि सृष्टि से भी पूर्व कोई चेतना मौजूद थी और उसी ने क्रमबद्ध एवं सोद्देश्य रीति-नीति के साथ इस विश्व ब्रह्माण्ड का सृजन किया।
विख्यात मनीषी हर्बर्ट स्पेन्सर ने अपनी कृति ‘फर्स्ट प्रिंसिपल’ में कहा है कि एक ऐसे विश्वव्यापी चेतन तत्व से इनकार नहीं किया जा सकता जो साधारणतया सभी प्राणियों में विशेषकर मानवजाति में जीवन की एक सुरम्य प्रक्रिया का निर्धारण करती है। प्राचीनकाल के धर्माचार्य या दार्शनिक जिस प्रकार उसका विवेचन करते रहे हैं, भले ही वह संदिग्ध हो पर उसका अस्तित्व असंदिग्ध रूप से है और वह ऐसा है जिसका गम्भीर रूप से अन्वेषण होना चाहिए। इसी तरह की मान्यता डॉ0 गार्ल की है वे कहते हैं कि संसार की मुख्य सत्ता जड़ पदार्थ, नहीं वरन् वह चेतन-सत्ता है जो समझती, अनुभव करती, सोचती, याद रखती और प्रेम करती है। मृत्यु के उपरान्त जीवन की पुनरावृत्ति का सनातन क्रम उसी के द्वारा गतिशील रहता चला आ रहा है।
संसार के चौदह मूर्धन्य विज्ञानवेत्ताओं के सम्मिलित निष्कर्ष व्यक्त करने वाले ग्रन्थ ‘दी ग्रेट डिजाइन’ में प्रतिपादन किया गया है कि यह संसार निर्जीव यंत्र मात्र नहीं है। यह सब अनायास अकस्मात् ही नहीं बन गया है। चेतन और अचेतन हर पदार्थ में एक ज्ञान-शक्ति काम कर रही है, उसका नाम भले ही कुछ भी दिया जाय यह चेतन - शक्ति की विश्व - ब्रह्माण्ड से समस्त क्रिया - कलापों का संचालन व नियमन कर रही है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्फ्रेड रसेल ने भी कहा है कि “मुझे विश्वास है कि चेतना ही जड़-पदार्थों को गति प्रदान करती हैं।”
वस्तुतः अब विज्ञान का जड़ पदार्थों से लगाव समाप्त हो गया है। चेतना, मन और आत्मा का अस्तित्व माना जाने लगा है। विज्ञान वेत्ता अब यह स्वीकारने लगे हैं, कि चेतन-सत्ता की जड़-जगत की उत्पत्ति का मूल कारण है ; अतः उसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है। हम सम्बन्ध में ख्यातिप्राप्त ब्रिटिश वैज्ञानिक सर जेम्स जीन्स ने अपनी कृति ‘दि न्यू बैकग्राउण्ड आफ साइन्स’ में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि उन्नीसवीं शताब्दी में विज्ञान का मूल विषय भौतिक-जगत या जड़ पदार्थ था, लकिन अब प्रतीत हो रहा है कि विज्ञान जड़ पदार्थों से दूर होता जा रहा है और अनुसंधान का केन्द्र चेतन सत्ता बनती जा रही है। ‘द मिस्टीरियस यूनीवर्स’ में उन्होंने लिखा है कि वैज्ञानिक विषय के सम्बन्ध में हमने जो पूर्व मान्यता बना ली है, अब उसकी पुनः परीक्षण की आवश्यकता है। जड़ - जगत को जो प्रधानता दे बैठे थे - अब प्रतीत हो रहा है कि वह गौण है। जड़-जगत के पीछे एक नियामक - सत्ता काम कर रही है, खोज उसी की जानी चाहिए।
कहा जा चुका है कि अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही इस विश्व की महान शक्तियां हैं। दोनोँ के समर्थन-सहयोग से सत्य के अधिक समीप पहुँचने का अवसर मिलेगा, साथ ही दोनोँ के समर्थन से जो प्रतिपादन प्रस्तुत होगा, वह जनमानस में अपना स्थान भी सरलतापूर्वक बना सकेगा। अध्यात्म-विज्ञान से कनिष्ठ नहीं, वरिष्ठ है। आवश्यकता इस बात की है कि पदार्थ की तरह ही चेतना की भी शोध और साधना की जाय तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य इसी जीवन में देवताओं जैसा अन्तराल प्राप्त न कर सके और सामान्य परिस्थितियों एवं सीमित साधनों के सहारे ही देव-सुलभ वातावरण में रहने का आनन्द न ले सकें।
सृष्टा की नियति व्यवस्था जितनी दुरूह है उतनी ही अदृश्य भी। उसने न केवल जीवन का सृजन किया है वरन् उसका निर्वाह ठीक प्रकार से होता रहे इस निमित्त अन्न, जल, वायु, ताप, वृक्ष-वनस्पति आदि का भी प्रचुर मात्रा में प्राणियों को उपलब्ध कराया है। जिन साधनों के आधार पर हम जीवित हैं और अपनी अनेकानेक गतिविधियों को संचालन करते हैं, वे अपने पुरुषार्थ से नहीं उगाये गये, वरन् दैवी अनुग्रह से पाये गये हैं। पुरुषार्थ अपने स्थान पर सराहनीय है किंतु यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि जो उपलब्ध है उसमें परोक्ष रूप से किसी अदृश्य व्यवस्था का योगदान सम्मिलित नहीं है।
यह सामान्य जीवन की बात हुई। इसके अतिरिक्त अनेकों बार ऐसी घटनाएं भी दृष्टिगोचर होती हैं जिन्हें अदृश्य-सत्ता की विशिष्ट सहायता कहा जा सकता है। ऐसे बहुधा प्रसंगों को संयोग कहकर टाल दिया जाता है पर यदि गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह मात्र संयोग नहीं है। प्रकृति व्यवस्था में ऐसे संयोगों के लिए कोई गुंजाइश नहीं है जो साधारण नियमों का व्यक्तिक्रम करके किसी विशेष व्यक्ति को विशेष अवसर पर विशेष प्रकार की सहायता पहुँचा सके।
हमारे शास्त्रों एवं पौराणिक ग्रन्थों की कथाओं में विभिन्न लोकों का वर्णन मिलता है, जिनके बारे में उल्लेख है कि उन लोकों में निवास करने वाली जीवन मुक्त-आत्माएँ विचरण करती रहती हैं और शरीरधारी पृथ्वीवासियों की सहायता हेतु सतत् तत्पर रहती हैं। इन लोकों को भौतिकी के ‘डाईमेंशन’ के आधार पर नहीं समझा जा सकता। क्योंकि सूक्ष्म होने के कारण इनकी स्थिति ‘फोर्थ डाईमेंशन’ अर्थात् चतुर्थ आयाम से भी परे होती है। किन्तु साधना एवं तप-पुरुषार्थ से अर्जित दिव्य-दृष्टि सम्पन्न शरीरधारी साधक स्वयं को सूक्ष्म रूप में बदल कर अथवा स्थूल स्थिति में इन आयामोँ के रहस्यमय संसार का दिग्दर्शन कर सकते हैं। इस संसार में अपने कर्मों के अनुरूप सूक्ष्म-आत्मायें फल पाती हैं और उसी आधार पर एक निश्चित अवधि तक उसमें उन्हें रहना पड़ता है। यह एक सुनिश्चित तथ्य हैं।
शास्त्रों के अनुसार जन्म - मरण के चक्र में घूमता हुआ जीव स्वर्ग-नरक, प्रेत - पिशाच, पितर, कृमि-कीटक, पशु-पक्षी एवं मनुष्य योनि प्राप्त करता है। इस दौरान उसे जो-जो गतियाँ प्राप्त होती हैं। शास्त्रों में उन्हें दो भागों में बाटा गया है। इनमें से दो को कृष्ण -गति तथा दूसरे को शुक्ल - गति कहते हैं। इन्हें धूमयान तथा देवयान भी कहा गया है। छांदोग्योपनिषद् में इन गतियों और जीवात्मा की विभिन्न स्थितियों का विस्तार से वर्ण किया गया है। गीतकार ने भी कहा है -
त्रैविद्या माँ0 सोमपाः पूतापापा यज्ञैरिष्द्वा र्स्वगति प्रार्थयन्ते। यौरिष्द्वा र्स्वगति सुरेन्द्रलोक - मश्रन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोक विशाल क्षीणे पुण्ये मर्त्यकलोक विश्न्ति।
अर्थात् “वैदिक कर्मकाण्ड कर सकाम यज्ञों के द्वारा यज्ञ भगवान की पूजा द्वारा यज्ञशेष के सोमपान से निष्पाप बन कर श्रेष्ठ व्यक्ति स्वर्ग लोक को प्रयाण करते हैं और वहाँ विभिन्न प्रकार के भोगों को भोगते हैं। उस विशाल स्वर्गलोक में अनेकानेक भोगों को भोगने के उपरान्त जब पुण्य कर्म समाप्त हो जाता है तो जीव पुनः इसी मृत्युलोक में आ जाते हैं।” यहाँ यज्ञ से तात्पर्य प्राणाग्नि के स्फुरण एवं व्यक्तित्व के उदात्तीकरण से है। भजन-पूजन प्रक्रिया के कर्म-काण्ड अनिवार्य तो हैं, पर प्रधान नहीं। वे कलेवर मात्र हैं।
अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार सूक्ष्म-दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति पृथ्वी पर बैठे-बैठे ही समस्त लोकों व उनमें निवास कर रही सूक्ष्म - आत्माओं से संपर्क साधने में समर्थ होते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ सूक्ष्म-सत्तायें अन्तरिक्षीय लोकों में ही नहीं, वरन् पृथ्वी पर भी निवास करती हैं। वे अपनी ओर से शरीरधारियों से संपर्क स्थापित करने का पूरा प्रयास करती है, परन्तु सूक्ष्म करने वाली शक्तियों की क्षमता से अनभिज्ञ मानव समुदाय के भयभीत होने से वे संकोच करती हैं जब कि दृष्टा स्वयं को ही नहीं वरन् समूचे प्राणि-समुदाय को परोक्ष के वैभव से लाभान्वित कराते हैं।
थियोसॉफिकल सोसायटी के मेडम ब्लेवटस्की एवं लेडवीटर जैसे मूर्धन्य मनीषियों का मरणोत्तर जीवन पर पूर्ण विश्वास रहा है। उनके मतानुसार जीवात्मा का सतत् विकास होता रहता है। इस कार्य में सृष्टा की विधि-व्यवस्था में सहयोग देने हेतु महान सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है जिसका केन्द्र हिमालय के हृदय-प्रदेश उत्तराखण्ड में है जिसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुँचे पाते, किन्तु अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्मायें प्रवेश पाती रहती है। जब भी पृथ्वी पर कोई संकट आता है, श्रेष्ठ व्यक्तियों - सत्पात्रों को सहयोग देने हेतु वे पृथ्वी पर भी आती है। मुण्डकोपनिषद् के द्वितीय मुण्डक में उल्लेख हैं।
एह्योहीति तमाहुतयः सुवर्चसः, सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति। प्रियाँ वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्यः, एष वः पुण्य्सुकृतो ब्रह्मलोकः॥
अर्थात् “यज्ञ कर्म के फल से जो दिव्य लोक के अधिकारी होते हैं, ऐसे पुण्यात्मा पुरुष के मृत्यु काल में ज्योतिष्मति आहुतियाँ - ‘आवो आवो- कहकर पुकारती है तथा सूर्य किरणों की सहायता से दिव्य-लोक में ले जाती हैं वहाँ मधुर वचनों से उनकी अभ्यर्थना करती हैं। ऐसे पुण्यात्माओं की दिव्य-लोकों में गति होती हैं।”
इस प्रकार शास्त्र-वचनों में परोक्ष जगत एवं वहाँ रहने वाली अदृश्य सूक्ष्म-आत्माओं के अस्तित्व के समर्थन में तो प्रतिपादन मिलते ही हैं। पृथ्वी पर बसने वाली श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा उनसे संपर्क स्थापित कर आदान-प्रदान के क्रम का प्रसंग भी प्रकाश में आता है। वैज्ञानिकों के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारियों में ‘एक्टोप्लाजम’ नामक एक सूक्ष्म-द्रव्य विद्यमान होता है । जो चतुर्थ आयाम से ऊपर की स्थिति है। संभवतः जीवात्मा उसी का उपयोग कर भौतिक आकार ग्रहण करती है, जैसा कि अनेकानेक उदाहरणों द्वारा सिद्ध होता है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘परसोनीफिकेशन’ कहा जाता है। परामनोविज्ञानियों ने इस क्षेत्र में अब गहरी रुचि दिखाई हैं। और वे निरन्तर अनुसंधानरत भी हैं।
प्रत्यक्षवाद को ही प्रमुख मानने वाले कतिपय वैज्ञानिकों के परिहास की उपेक्षा कर कितने ही मूर्धन्य परामनोवैज्ञानिकों एवं भौतिकविदों ने ऐसी घटनाओं का संकलन कर विश्लेषण किया है और पाया है कि कोई अदृश्य शक्ति-जिसकी अभी तक खोज नहीं हो पायी है, ऐसे प्रसंगों का कारण बनती है जिन्हें परोक्ष अनुदान-सहायता के रूप में देखा जाता है, लेकिन संयोग या अपवाद करार दिया जाता है। इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध भौतिक - विज्ञानी मार्टिन गार्डनर ने लिखा है कि “इस संसार में नित्य हजारों व्यक्तियों के साथ ऐसी छोटी-बड़ी घटनायें घटती रहती हैं। यदि इनमें से कुछ को संयोग या अपवाद मान भी लिया जाय तो भी कुछ ऐसी विलक्षण होती हैं कि उन्हें मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता।”
ब्रिटेन के सुविख्यात भौतिक शास्त्री एवं गणितज्ञ एड्रियन डाँब्स ने विभिन्न अनुसंधानपूर्ण परीक्षणों के उपरांत निष्कर्ष निकाला है कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड में ऐसी सूक्ष्म संदेश वाहक शक्ति-धारायें निरन्तर प्रवाहित होती रहती है जो मानवी ज्ञानेन्द्रियों से संपर्क स्थापित करती हैं। इन तरंगों की वेवलेन्थ तरंग दैर्ध्य लगभग एक समान होती हैं। ‘द रुट्स आफ कोइन्सीडेन्स’ नामक पुस्तक में आर्थर कोएस्लर ने लिखा है कि - “इस माध्यम से ब्रह्माण्ड व्यापी अदृश्य चेतन-शक्तियाँ शरीरधारी मनुष्यों से संपर्क साधती, उन्हें पूर्वाभास कराती, मार्गदर्शन करती व संकट के समय मनोबल बढ़ाने वाला उत्कृष्ट चिन्तन देती हैं। इन्हीं को अदृश्य सहायक की ‘इन्विजिबल हेर्ल्पस’ की उपमा भी दी जा सकती है। संभवतः उच्च स्तरीय सहायक आत्मायें सूक्ष्म-जगत का प्रत्यक्ष-जगत से संपर्क जोड़ने के लिए यही माध्यम अपनाती हों।
विश्व में ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं जिनमें व्यक्तियों को ऐसे अप्रत्याशित लाभ मिले जो प्रयत्न करने पर संभवतः न मिल पाते हैं। इन्हें दैवी अनुग्रह, भाग्य, पूर्व-पुण्य अथवा वैज्ञानिकों की भाषा में संयोग कहा जाय पर वे हैं ऐसे जिनकी मानवीय प्रयत्न-पुरुषार्थ से कहीं कोई संगति नहीं बैठती । वैसी आशा - अपेक्षा भी नहीं रखी जाती, पर अब विचित्र संयोग सामने आता है जब वह उलझन उठना स्वाभाविक है कि प्रयत्न की परिणति वाला सिद्धान्त यहाँ क्यों उलट गया ?
वास्तव में अदृश्य - जगत अपने आप में परिपूर्ण रहस्य रोमाँच से भरी एक दुनिया है। वह उतनी ही विलक्षण है जितनी की हमारी निहारिका, सौरमण्डल एवं ब्रह्माण्ड का यह दृश्य परिकर है। मनुष्य की स्वयं की अपनी दुनिया एवं समाज व्यवस्था है। उसी तरह जलचरों, सूक्ष्मजीवी बैक्टीरिया, वायरस, पर - जीवी, कृमिकीटकों आदि का भी अपना एक विलक्षण जगत हैं। उनकी भी अपनी रीति-नीति है और मनुष्य की दुनिया से सर्वथा भिन्न आवश्यकतायें एवं कठिनाइयाँ है जो दृश्यमान नहीं हैं, ऐसे अदृश्यमान लोक मरणोत्तर जीवनावधि में रह रहे जीवधारियों का भी है जिसके प्रमाण-उदाहरण आये दिन मिलते रहते हैं। पितर एवं अदृश्य सहायक यहीं हरते हुए निर्धारित समय व्यतीत करते हैं तथा समय आने पर समान-गुणधर्मी आत्माओं से अपना संपर्क जोड़कर स्नेह सौजन्य का- सहयोग का सिलसिला चलाते हैं। पितरगण अपने श्रेष्ठ जीवन काल की ही तरह मरणोत्तर स्थिति में भी किसी के काम आने सहायता पहुँचाने अथवा हितकारी परिस्थितियाँ बनाने में योगदान करना चाहते हैं। संतों, ऋषियों, महामानवों का अस्तित्व सदियों तक उनके इसी स्वरूप के कारण बना रहता है। वे अपने सूक्ष्मशरीर से विभिन्न लोकों में आवागमन का क्रम बनाये रख सकते हैं। कोई भी शरीरधारी साधक साधना पराक्रम द्वारा मात्र अपनी इच्छा-शक्ति के बल पर सूक्ष्म-लोकों में भ्रमण कर इन महान आत्माओं से संपर्क स्थापित कर सकता है। समय-समय पर जो विकट समस्याओं मानवी पुरुषार्थ से सुलझाती दिखाई देती हैं, अथवा अदृश्य अनुदान पृथ्वीवासियों को मिलते हैं, उनके मूल में सृष्टा की यही विधि-व्यवस्था काम करती है। अनास्था इसे संयोग कहती है पर आस्थावानों को दैवी-सत्ता की अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञ होने एवं परोक्ष के प्रति अपना श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने का तथ्य भरा आधार उपलब्ध होता है।
प्रगति चाहे भौतिक हो या आंतरिक, स्वस्थ शरीर उसके लिए सर्वप्रथम आवश्यक है। शरीर यदि अस्वस्थ हो, रुग्ण हो, दुर्बल हो तो भौतिक प्रगति के लिए आवश्यक प्रयास करना सम्भव नहीं हो सकेगा। थोड़े से ही रम में शरीर थक जाएगा और बहुत बार तो श्रम करने योग्य भी स्थिति नहीं रह जायेगी। इसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए भी शरीर का स्वस्थ, नीरोग होना आवश्यक है। जितनी भी साधनाएँ की जाती हैं, आत्मिक विकास के लिए, जितने भी उपक्रम करने पड़ते हैं वे शरीर के द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। अस्वस्थ शरीर से साधना के लिए बैठना तक सम्भव नहीं रह जाता। इसीलिए, शास्त्रकारों ने कहा हैं, ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् वास्तव में शरीर ही पहला धर्म साधन का आधार है। यौगिक क्रियाओं से लेकर परमार्थ उपकार और लोक-मंगल के कार्यों तक में शरीर का ही उपयोग करना पड़ता है।
शरीर का महत्व इसलिए है कि उसमें आत्मा निवास करती है। उच्चस्तरीय विकसित आत्मा ही किसी व्यक्ति को महामानव देव मानव बनाती है, परन्तु उन्हें महान बनाने वाले कृत्य शरीर द्वारा ही सम्पन्न करने होते हैं। किसी व्यक्ति का प्रथम परिचय शरीर के प्रति उसके व्यवहार से ही लगता है। सम्भाषण, वार्त्तालाप, संवाद विचार-विमर्श और क्रिया-कलापों का परिचय तो बाद में चलता है पहले उसका व्यक्तित्व शरीर माध्यम से ही समाने प्रस्तुत होता है और वह अपने शरीर को जिस ढंग से संवार, सम्हाल कर रखता है, जैसा स्वच्छ-सुथरा दिखाई देता है वैसा ही उसके व्यक्तित्व का प्रथम प्रभाव पड़ता है। कहने का आशय यह है कि मानवीय सत्ता का प्रथम कलेवर उसका अपना शरीर ही है और वह जीवन को सभी उद्देश्यपूर्ण ढंग से सार्थक बना सकता है जबकि उसका शरीर स्वस्थ हो।
शरीर द्वारा ही योगीजन यौगिक सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं और सर्वोत्तम उपलब्धि, मानव जीवन की सार्थकता मोक्ष शरीर से किये गए कर्मों द्वारा प्राप्त करते हैं। इसीलिए महर्षि चरक ने कहा है -
सर्वमन्यत्परित्यज्य शरीर मनुपालतेय्। तद्भावे हि भावानाँ सर्वभावः शरीरिणाम्॥
अर्थात् - “सबसे पहले शरीर रक्षा, स्वास्थ्य रक्षा की ओर ध्यान देना चाहिए क्योंकि देहधारियों के लिए अच्छे स्वास्थ्य के अभाव में सारा संसार ही अभावमय है।” प्रश्न उठता है अच्छा स्वास्थ्य किसे कहते हैं ? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि किसी रोग न होना ही अच्छा स्वास्थ्य है। शरीर के साथ-साथ मन का निरोग होना भी आवश्यक है। शरीर स्वस्थ तभी रह सकता है जब मन भी स्वस्थ हो। इसे यों भी कहा जा सकता है कि मन यदि रुग्ण हो तो शरीर भी बीमार पड़ जाता है अन्यथा प्रकृति के शरीर का निर्माण इस कुशलता के साथ लिया है कि वह छोटे-मोटे झटके तो यों ही पार कर जाता है और उनसे जरा भी प्रभावित नहीं होता। प्रभावित तब होता है, जब मन भी रुग्ण हो या विकार ग्रस्त होता है।
कभी कहा जाता था कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है किंतु अब यह मान्यता बदल गई है। और कहा जाने लगा है कि मन यदि स्वच्छ और स्वस्थ हो तो शरीर के अंग अवयव इतने समर्थ और पुष्ट होते हैं कि वे आने वाले विकारों का स्वयं ही उपचार कर लेते हैं। प्रसिद्ध शरीरविज्ञानी डॉ0 एलवर्ट टोके ने लिखा है कि “निश्चित ही देह में अनेक सूक्ष्म और नाजुक भाग हैं और यह भी सही है कि शरीर की सामान्य क्रिया में थोड़ा-सा, रत्तीभर परिवर्तन भी बहुत बड़ा प्रभाव डाल सकता है। किन्तु उससे ज्यादा सही यह है कि शरीर में इन दुष्प्रभावों को रोकने, विघटन का प्रतिरोध और रोगवाही कारणों को नष्ट करने की अद्भुत क्षमताएँ हैं।”
डॉ0 एलबर्ट ने अपनी पुस्तक ‘ह्यूमन बॉडी एण्ड हाऊ इट वर्क्स’ पुस्तक में शरीर की इस अद्भुत क्षमता पर विस्तार से प्रकाश डाला हैं। रोग के वाहक कारणों को शरीर में प्रवेश करने से सर्व प्रथम तो त्वा ही रोक देती है। बहुत से रोग-वाहक ऐसे होते हैं जो रोमकूपों से भी बारीक होते हैं तथा त्वचा के छिद्रों से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। ऐसे वाहकों से लड़ने और उन्हें नष्ट करने के लिए त्वचा के नीचे मृत कोशिकाओं की अभेद्य सुरक्षा पंक्ति तैयार रहती है, जो किसी सुदृढ़ दुर्ग की भाँति उन्हें प्रवेश करने से रोक देती हैं।
रोगाणु यदि शरीर के खुले अंगों अर्थात् मुख या नासा गुहाओं ने उन्हें भी रोकने के लिए रक्षा चौकियाँ बिठा रखी हैं और ऐसा जाल बिछा रखा है कि बेचारे उससे बच कर आगे बढ़ ही नहीं सकते । उदाहरण के लिए यदि ये नासिका गुहा में प्रवेश भी कर जायँ तो कुछ आगे चल कर ऐसी श्लेष्मिक झिल्लियों का सामना करना पड़ता है जिनसे एक तरफ चिपचिपा द्रव स्रवित होता रहता है। अधिकाँश उसी स्राव में फँसकर रह जाते हैं और आगे नहीं बढ़ पाते। इस पर भी कोई पुष्ट, धूर्त, रोग कीट इस स्राव से बचकर आगे बढ़ जाने में सफल हो जाता है तो श्वास नली में नासिका गुहा से भी अधिक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रहती है। वहाँ भी झिल्लियाँ और श्लेष्मा की दीवारें होती हैं इसके अतिरिक्त लहराते हुए रोमाभ भी होते हैं जो उनका रास्ता रोक लेते हैं। ये रोमाभ न केवल उन्हें रातें रोक लेते हैं बल्कि उन्हें वापिस बाहर जाने के लिए भी विवश कर देते हैं।
इतने पर भी कोई विजातीय जीवाणु यदि आगे बढ़ने में सफल हो जाते हैं तो उनके लिए आहार नली और पाचन क्षेत्र में ऐसा मारक अम्लीय द्रव वहाँ विद्यमान रहता है जो उनके लिए विष का काम करता है और अधिकाँश जीवाणु इस अम्लीय घातक विष से मर जाते हैं फिर भी यदि कोई जीवाणु बच जाता है। तो वे धकेल कर पाचन संस्थान के उस क्षेत्र में फेंक दिये जाते हैं जहाँ उनके लिए इधर-उधर हाथ-पैर मार कर शरीर दुर्ग में अस्त-व्यस्तता फैलाने का कोई अवसर नहीं रहता और उन्हें मल-मूत्र के साथ वापिस उसी संसार में पहुँचना पड़ता है जहाँ से कि वे आये थे।
जिस स्थान पर चोट लगती है या घाव होता है वहाँ सूजन इसी कारण आ जाती है कि वहाँ तीनों तरह के रक्षक बड़ी संख्या में आ जमा होते हैं। रुधिर के श्वेतकण तो सीधे इन रोगाणुओं को भक्षण करने लगते हैं, परन्तु न्यूट्रोफिल जीवाणुओं से मरणासन्न तक संग्राम करते हैं। या तो वे जीवाणुओं को नष्ट कर डालते हैं अथवा लड़ते-लड़ते स्वयं वीरों की तरह मर जाते हैं। इन मरे हुए रक्षकों और आक्रमण जीवाणुओं के शव ही पीव और मवाद के रूप में बाहर निकलते हैं।
कई बार इस युद्ध में आक्रमणकारी जीवाणु जीत जीते हैं और अन्दर के क्षेत्र में घुस-पैंठ कर जाते हैं। उस स्थिति में ये अगला आक्रमण लसिका वाहिनियों पर करते हैं। या कि वही इनके सामने होती हैं। लसिका वाहिनियों के पथ पर सलिका ग्रन्थियों के रूप में पहले से ही ऐसी व्यवस्था रहती है कि वे बिना कोई युद्ध चुनौती दिए चुपके से उन्हें कैद कर लेती है। इन ग्रन्थियों में बाह्य विजातीय तत्वों के लिए बड़ी-बड़ी छलनियाँ होती हैं। आगे प्रवेश करने के लिए जीवाणुओं को उन्हें पार करना ही होता है और ये छलनियाँ इतनी संवेदनशील होती हैं कि किसी भी बाह्य तत्व या विजातीय कणों के आते ही उन्हें तुरन्त कैद कर लेती हैं। इन कैदियों को उनके निश्चित निर्धारित स्थान पर ले जाया जाता है और जब उन्हें कारावास दिया जाता है तो प्रायः जलशोध की शिकायत हो जाती है जो सामान्य उपचार से ही ठीक हो जाती है।
यहां रक्षा व्यवस्थाएँ ही आमतौर पर विजातीय द्रव्यों, रोगों के उत्पन्न करने वाले कारणों, से निबटने के लिए पर्याप्त हैं, परन्तु प्रकृति इतनी होशियार है कि उसने एक अतिरिक्त व्यवस्था अलग से कर रखी है, जो इन व्यवस्थाओं के असफल हो जाने पर काम आती है। यह व्यवस्था शरीर में बहने वाले रुधिर के कण-कण में व्याप्त हैं।
कभी-कभी कोई विशेष जीवाणु या उनके विषाक्त उत्पाद रक्त पर पहली बार आक्रमण करते हैं तो उसका प्रतिपिण्ड तुरन्त नहीं बन पाता। उस स्थिति में रोग उत्पन्न हो जाते हैं किन्तु रोग की अवस्था में भी प्रतिपिण्ड जब बनने लगते हैं तो इतनी तीव्रता से बनते हैं कि वे रोग को नष्ट करके ही मानते हैं। जब रोग समाप्त हो जाता है तो यह इस बात का प्रतीक है कि रक्त में उस विजातीय द्रव्य के प्रतिपिण्ड बनने की क्षमता आ गई है और दुबारा रोग के उत्पन्न होने पर प्रतिपिण्ड बनने में कोई विलम्ब नहीं होगा।
इस प्रकार प्रकृति ने रोगों से बचने, उनसे लड़ने और उन्हें उत्पन्न करने वाले कारणों को नष्ट करने की क्षमता या व्यवस्था स्वयं ही उत्पन्न कर ली है। इसके उपरान्त भी लोग बीमार पड़ते हैं तो कारण समझ में नहीं आता कि इतनी सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था होने पर भी लोग बीमार क्यों पड़ते हैं ? स्वस्थ रहने के लिए वास्तव में विशेष कुछ उपाय करना आवश्यक नहीं है। आवश्यकता इतनी भर है कि वे कारण दूर हो जाएँ तो शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता या उसकी सुरक्षा व्यवस्था को दुर्बल बनाते हैं।
वे कारण हैं खान-पान और रहन-सहन की गलत आदतें। डॉ0 कार्टलने का कहना है कि मनुष्य किन्हीं बाहरी कारणों से नहीं बल्कि हमेशा गलत खान-पान और गलत रहन-सहन के कारण ही बीमार पड़ता है। यह जानते हुए भी कि शरीर सभी प्रकार के भौतिक और अध्यात्मिक उत्कर्ष का साधक है, वह स्वस्थ रहे तभी हर प्रकार से आनन्दित रहा जा सकता है, खान-पान और रहन-सहन की गलत आदतें डालना नासमझी पूर्ण आत्मघाती प्रक्रिया की सिद्ध होती है।
शास्त्रकारों ने शरीर को परमात्मा का मंदिर कहा है। इसमें ईश्वर का अंश आत्मा निवास करता है। मन्दिर को गन्दा नहीं रखा जाता, वहाँ कूड़ा-कचरा नहीं फैलाया जाता, वहाँ की व्यवस्था नहीं बिगाड़ी जाती तो क्या कारण है परमात्मा के जीवित जाग्रत और प्रत्यक्ष मन्दिर की व्यवस्था तोड़ी-मरोड़ी जाय तथा वहाँ अस्त-व्यस्तता उत्पन्न की जाय।
इतना उच्च दृष्टिकोण नहीं भी अपनाया जाता तो कम से कम यही विचार करना चाहिए कि प्रकृति हमारी कितनी चिन्ता करती है। उसने स्वस्थ रहने और रोगों से बचने के लिए कैसी अनुपम व्यवस्था की है ? उस व्यवस्था को भंग करना नासमझी ही नहीं, प्रकृति द्रोह भी है - जिसका दण्ड रोग, बीमारी और अकाल मृत्यु के रूप में हर किसी को भोगना ही पड़ता है।
शिप्रा के तट पर उन दिनों घनघोर वन था, जो दूर दूर तक फैला हुआ था। इस वन में प्रवेश करते ही उसकी नजर एक बारहसिंघे पर पड़ी, जो कई हिरणियों के झुण्ड में सम्राट की भांति विचर रहा था। वह मृगमण्डली तथा मृग छौनों को निर्भय होकर चरने का अवसर देने के लिए लम्बे सींग ताने बल और विकट अकड़ में तना हुआ था। अश्वारोही ने उस अनमोल पशु को सींगों पर आकाश सा उठाते देखा जैसे वह क्षण क्षण धरती खोदता इधर उधर ताकता उसे चुनौती दे रहा हो।
अश्वारोही के चेहरे पर एक विद्युत रेखा सी कौंधी और उसने अपना अश्व इस बारहसिंघे के पीछे डाल दिया। मृग यूथप उसे अपनी ओर आता देखकर प्राण रक्षा के लिए घने वन की तरफ भागा। घोड़ा स्पर्धावश उस पर वज्र सा टूटा, किन्तु वन निरन्तर घना होता जा रहा था। अश्व की गति मन्द पड़ने लगी। घुड़सवार ने लगाम ढीली कर अश्व को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया। लगातार पीछा होते देखकर मृग सघन झुण्ड में साँस साधकर खड़ा हो गया। इस बीच हिरणियाँ और मृग शावक न जाने कब के पीछे छुट चुके थे। अश्व उसकी गंध सूँघता हुआ उसके निकट आ पहुँचा।
तब घबराकर बारहसिंघा जिधर से आया था, उधर लौटा और वन के बाहर मैदान की ओर दौड़ा। कदाचित् उसे मैदान में अपने साथियों की चिन्ता हो आयी थी। अब अश्वारोही को सहूलियत थी। वन विरल होते ही अश्व बाज की तरह उसे पछियाने लगा। बेबस होकर मृग मैदान में चौकड़ी भरने लगा। अश्वारोही को लक्ष्य संधान की सुविधा हुई। उसने कान तक प्रत्यंचा खींच कर मृग के पृष्ठ भाग में बाण मारा। बाण लक्ष्य पर लगा। थोड़ी देर तक तो मृग भागता रहा- किन्तु लगातार खून बहने से उसकी गति शिथिल होने लगी थी। इस बीच एक सधा हुआ बाण उसके पेट में प्रवेश कर गया। मृग करुण नाद कर गिर गया।और छटपटाने लगा अश्वारोही निकट पहुँच कर अश्व से कूद पड़ा और मृग की मरणासन्नता देखने लगा। उसके चेहरे पर हर्ष-विषाद के सम्मिलित भाव उभरे। शायद मृग की दशा ने उसे दुःखी कर दिया था और आखेट में इतना अनमोल पशु पाकर उसे प्रसन्नता हो रही थी ।
अभी वह विश्राम के लिए कुछ दूर पर एक वृक्ष की छाया में खड़ा ही हुआ था, कि उसने एक अद्भुत दृश्य देखा। हिरणियों का एक झुण्ड अपने शावकों समेत मरणासन्न मृग के निकट आ खड़ा हुआ। हिरणियां करुण चीत्कार करती हुई धरती पर गिरने लगीं। वे जमीन पर लोटती-पोटती माथा मारती और अचेत हो होकर पसर जातीं। उसने ऐसा तो कभी सोचा भी न था। वन पशुओं में ऐसा प्रेम। वह आँखें फाड़े यह दृश्य देख रहा था। उसे अब अपनी करनी पर पछतावा हो रहा था। अचेत हिरणियों से घिरा मृत मृग दुर्घटना और दुर्भाग्य का प्रतीक सा लग रहा था, तभी एक चमत्कार घटित हो गया। दोपहरी की तेज धूप में पसीने पसीने हो रहे उसने देखा कि निकट के वन कुँज से एक योगी प्रकट हुआ।
उसने अपने माथे से टपकते पसीने को पोंछकर हरिण की ओर आते तपस्वी का दर्शन किया। हवा संयोगवश उसी दिशा से बह रही थी। अतएव उसे एक अनजान किन्तु मोहक सुगंध का अनुभव हुआ। जैसे उस बीहड़ वन में कमल वन प्रकट हो गया हो। हवा के झोंकों में यही पह्नगंध बह रही थी। राजमहलों के तेल और गंध इसके सामने दुर्गन्धित प्रतीत हो रहे थे। उसकी नासिका उस गंध पीयूष को सूँघती हुई तृप्ति का अनुभव करने लगी और उसकी थकान जाती रही।
वह योगी दूर से आग से बवण्डर की भाँति दीखा था। वह चलता नहीं उड़ता हुआ लग रहा था। आश्चर्य क्या कोई हवा में उड़ भी सकता है। अभी वह कुछ और अधिक सोच पाता कि एक ज्वालापुँज नजरों के सामने था। उसका आकार अब तक साफ हो चुका था। वह गुदड़ी पहले था, जो इतनी ढीली-ढाली थी कि शरीर के ऊपरी भाग को ढकती हुई घुटनों तक नीचे आ गयी थी। पिंडलियाँ खुली हुई थीं। इन्हें देखते ही लगता था कि नित्य व्यायाम और दूर की यात्राओं से उसके हरिण जैसे चपल-पुष्ट पैरों में अष्ट धातु को ऐंठ कर नसों पर माँस चढ़ाया गया हो। उसकी भुजाएँ भी वज्र की सी बनी प्रतीत हो रही थीं।
नजदीक से देखने पर योगी का चेहरा किसी दैत्य लोक के प्राणी सा लगता था। खरे सोने की तरह तपे गौरवर्ण में उसका कंठ शंखाकार था और भव्य मुख्य पर बड़े-बड़े कटोरे जैसे नेत्रों में करुणा का जल भरा था। इन क्षणों में उन नेत्रों में क्रोध मिश्रित चिन्ता भी झलक रही थी। शुक सी नासिका वाले योगी के होठों का कटाव कलात्मक था। नासिका छिद्र न तो छोटे थे, न बड़े लेकिन इस समय रुद्रभाव के कारण क्रोधित नाग की तरह तप्त श्वाँस छोड़ रहे थे।
योगी के मुख पर श्मश्रुयों, मस्तक पर शिव तिलक और शीश पर केशों का जटा-जुट था, जो हवा में उड़ते तो नाग की तरह तहराते प्रतीत होते। केशों में लालिमा और चमक ऐसी थी जैसे नागों ने अभी हाल में ही केंचुल छोड़ी हो। वे कभी चंवर से डुलते, कभी हवा में उड़कर फणाकार हो जाते, जैसे शिव के शीश पर कराल व्याल भ्रमण कर रहे हों। योगी की भुजाओं तथा मणिबन्ध स्थल पर रुद्राक्ष की मालाएँ लिपटी थीं और बांये हाथ में कमण्डलु तथा दाहिने हाथ में त्रिशूल था जो धूप में काल सर्प सा दमक रहा था। मृग की करुण पुकार सुनकर योगी खड़ाऊ छोड़कर नंगे पाँव ही लपकता चला आ रहा था। किन्तु कुश-काँटों और पत्थरों ने उन्हें घायल नहीं किया था शायद पावों की कोमलता देखकर काँटे भी संकुचित हो उठे हों।
स्वास्थ्य, शक्ति, तेज, मेधा, ज्ञान, अलौकिकता और फिर इन बसेस परे होने की किरणें छिटकाता हुआ योगी मृग के निकट पहुँचा, किन्तु इसके पूर्व ही अश्वारोही ने भाग कर योगी को प्रणाम किया और दण्डवत् करता हुआ उसके चरणों पर जा गिरा। योगी की प्रज्वलित दृष्टि राजा पर पड़ी। उस बेधड़क दृष्टि के पड़ते ही अश्वारोही के शरीर में आग सी लग गयी। उसने योगी के पाँव पकड़ लिए और लेटे-लेटे ही कहा।
“योगिराज ! क्षमा करें, मैं उज्जयिनी का भर्तृहरि हूँ, मृगया के व्यसन में यह अपराध मुझसे हुआ है।”
योगी न उसके प्रमाण का उत्तर नहीं दिया और कुछ उपेक्षा से उसकी ओर देखते हुए कहा - “तो तू हैं भर्तृहरि।”
“हाँ, महाराज! मैं ही हूँ वह अज्ञानी अपराधी और व्यसनी।
“क्रूर क्षत्रिय। तूने इस बेबस, हरिण परिवार को अनाथ कर दिया। ये हिरणियां इससे कितना प्रेम करती थीं। तेरे सामने ही सिर पटक-पटक कर प्राण त्यागने को तत्पर हो गयीं। बर्बर मनुष्य। इस दारुण पाप को कोई प्रायश्चित नहीं। अब बता-तू तो राजा है मालव सम्राट। इस निरीह प्राणी को जीवित कर....क्या तू इसके प्राणों को वापस कर सकता है?”
भर्तृहरि हतप्रभ थे। उन्हें अपनी असहायता और असमर्थता साफ-साफ अनुभव हो रही थी। वह घबराते हुए बोले-”प्रभो ! यह सामर्थ्य तो आप में ही है। आप इसे प्राण दान दें। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि कभी किसी निरीह प्राणी का आखेटि नहीं करूंगा। किन्तु स्वामिन्। अपनी शक्ति से इस मरणासन्न मृग को बचा लें।”
योगी के तेजस्वी मुख पर हल्की सी स्मित रेखा चपल विद्युत सी कौंधी गयी। वह कह रहे थे - “मालव सम्राट ! तू तो प्रतापी हैं, तेरा वैभव है, तू एक मृत जीव को प्राण नहीं दे सकता तो शासन और सत्ता का गर्व कैसा ? किस बल पर तू सर्व समर्थ होने का दंभ करता है ?”
“गर्व ? कैसा गर्व प्रभु। मैं तो इस समय लज्जित हूँ। प्रभु, आप इस मृग को जीवित कर दें।”
“तथास्तु! जा मुझे क्षमा किया। अब उठ और इस मृग के शरीर से बाण निकाल। जल्दी कर।”
भर्तृहरि ने धरती पर बैठ कर धीरे-धीरे दोनों बाण निकाले। रक्त का फव्वारा छूटा। लेकिन अपनी पगड़ी को फाड़ कर उसे रोका। योगी ने झोली से कोई औषधि निकाली, उसे कमण्डलु के जल से अभिमंत्रित किया और मृग के घावों में भर दिया। यह सब करने के बाद योगी ने अचेत पड़ी हिरणियों पर हाथ फेरा। निर्भय हरिण शावकों ने योगी के निकट आकर उसे चारों ओर से घेर लिया और वे उसे प्यार से देखने लगे, उसे चाटने लगे। राजा ने अंगरखे से मेवा मिष्ठान निकाल मृग शावकों को दिया, पर उन्होंने मुँह फेर लिया। वे भयभीत होकर राजा की अपेक्षा कर, योगी के पैर चाटते हुए कुछ ने की आशा में खड़े हो गए।
योगी ने झोली से कुछ अन्न निकाला, वे उसके हाथ से उसे खाने लगे। मालव सम्राट उस करुण और ममता भरे दृश्य को देखकर आँसू बहाने लगा। एक क्षण पश्चात् हिरणियां उठीं, शकी लुटी बैठी रहीं। पुनः पैर रोप - रोप कर जिस किसी तरह खड़ी हुई। फिर प्राण दाता योगी की ओर कुछ इस प्रकार बढ़ी कैसे कन्यायें अपने पिता की ओर बढ़ती है। उनकी आँखों में याचना के भाव थे कि हमारे मृग को बचा लो। फिर वे अपने मृग के पास गयीं, और उसे सूँघने लगीं।
योगी पुनः मृग के निकट गया। वरद मुद्रा में वह झुका-उसके पास बैठकर उसका मुख पकड़कर अपनी गोद में रखा, प्यार किया। पुनः नेत्र बन्द कर मंत्र पढ़ता रहा। पुनः घावों को स्नेह से छुआ। मृग के शरीर में कंपन हुआ। दो क्षण बाद मृग फड़का और उठने के प्रयत्न में लगा। उठ बैठा और खड़ा हो गया। योगी अभी भी रजा की ओर न देख कर अनवरत संजीवनी मंत्र बुदबुदा रहा था और मृग में अपनी दया दृष्टि से बल का संचार कर रहा था। कुछ समय पश्चात् बारहसिंघा लड़खड़ाता हुआ चला, चलता रहा - अचानक उसने उछाल भरी और भागने लगा। मृग टोली और मृग शावक प्रसन्न होते हुए उसके पीछे दौड़ें।
मृगदल के वन में लुप्त होते ही योगी ने मालव सम्राट की ओर देखा, जो जारी घटना पर आश्चर्य से अभिभूत था। वह सोच रहा था - धिक्कार हैं, भौतिक शक्तियों पर, धिक्कार है राजदर्प पर, जिसमें प्राण लेने की शक्ति तो हैं पर देने की नहीं। आह! योग-बल, आध्यात्मिक - बल, क्षात्र -बल से अधिक महत्तर है। उसने श्रद्धासिक्त होकर पुनः एक बार योगी के पाँव पकड़ते हुए कहा - “प्रभु ! आप तो साक्षात् महाकाल के अवतार हैं।”
“नहीं, भर्तृहरि !” योगी ने मुसकराते हुए कहा- “मैं तो महाकाल का छोटा सेवक गोरखनाथ हूँ।”
महायोगी गोरखनाथ! भर्तृहरि मन ही मन बुदबुदाए। उनके प्राणों में एक संकल्प उभरा-आध्यात्मिक मार्ग पर आरुढ़ होने का। संकल्प। शिष्य की पुकार गुरु ने सुनी। गुरु की शक्ति शिष्य धारण करले लगा।
परमहंस विशुद्धानंद एक बार अपने शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। सब उन्हें दत्तचित्त होकर सुन रहे थे। कुछ समय के पश्चात् अचानक उन्होंने एक शिष्य को इंगित करते हुए उसे तुरन्त घर चले जाने का आदेश दिया। शिष्य अचकचाया; पर चूँकि गुरु की आज्ञा थी, अतः वह इंकार नहीं कर सका। उपस्थित से कुछ विस्मित हुआ । बाद में पता चला कि उक्त व्यक्ति के अबोध बच्चे की अंगुली सरौते में आ जाने के कारण कट कर अलग हो गई थी। अब उपस्थित जनों को उनके इस विचित्र व्यवहार का रहस्य ज्ञात हुआ; किन्तु कुछ जिज्ञासु अपनी जिज्ञासा रोक न सके और उक्त घटना पर प्रकाश डालने के लिए विशुद्धानन्द से आग्रह करने लगे, तब परमहंस ने बताया कि मन की सामर्थ्य अपार है। यदि उसे निग्रहित कर लिया गया, तो घड़ी भर में ही कहीं भी जाकर वह सब कुछ पता लगाकर लौट सकता है। इतना ही नहीं, मन की इस अद्भुत शक्ति से असंभव जैसे कार्यों को भी संभव और सरल बनाया जा सकना शक्य है।
फ्राँसीसी परामनोविज्ञान वेत्ता डॉ0 पाल गोल्डीन मनःचेतना की असाधारण सामर्थ्य की जानकारी देते हुए कहते हैं कि पाँच ज्ञानेन्द्रियों की सुनने, बोलने, देखने, सूँघने तथा स्पर्शानुभूति क्षमता से हम सभी परिचित हैं ; पर इनसे भी महत्वपूर्ण एक और शक्ति है - पराचेतना शक्ति, जिसे ‘छठी इन्द्रिय’ कहा जा सकता है। आश्चर्य है कि हम लोग इस बलवती सामर्थ्य के बारे में बहुत कम जानते हैं। इसे प्रयासपूर्वक जगाया और उभाजा जा सकना संभव है। इस स्थिति में इसका लाभ स्थूल इन्द्रिय की तुलना में कई गुना अधिक और आदर्शजनक होता है। वे कहते हैं। कि यदि इस प्रकार की क्षमताओं को उभारने वाले आध्यात्मिक अनुशासनों का जीवन में पालन किया गया, तो व्यक्ति ऐसा और इतना शक्ति सम्पन्न बन सकता है। जिसे असाधारण और अद्भुत कहा जा सके।
उल्लेखनीय है कि अध्यात्मिक अनुशासनों को आरम्भ में विज्ञान ने निराधार भावुक मान्यताओं की संज्ञा दी थी और कहा था, उनका कोई प्रामाणिक आधार नहीं है; पर अब वैसी बात नहीं रही। मनःचेतना के क्षेत्र में जो खोजें हुई हैं, उन्होंने यह तथ्य सामने खड़ा कर दिया है कि मस्तिष्क मात्र चिन्तन का एवं शरीर-संचालन का ही उत्तरदायित्व निभाने तक सीमित नहीं है। उसकी परिधि इतनी व्यापक और विस्तृत है कि अतीन्द्रिय अनुभूतियों और चमत्कारों का भी तथ्य उसी के अंतर्गत स्वीकारना पड़ेगा। समय-समय पर बुद्धि को चकराने वाले प्रसंग वास्तव में और कुछ नहीं, वरन् परिष्कृत मन-मस्तिष्क के ही कौशल हैं। आये दिन ऐसे कितने ही चमत्कार प्रकाश में आते रहते हैं।
समस्त अलौकिक क्षमताओं के केन्द्र व्यक्ति के मस्तिष्क में विद्यमान हैं ; किंतु वे केन्द्र ही चेतना नहीं हो सकते। चेतन- सत्ता उससे भिन्न है। उसके छोटे स्वरूप को अध्यात्म विज्ञान में ‘आत्मा’ कहा गया है जबकि उसका विराट् स्वरूप परब्रह्म कहलाता है। परमात्मा, भगवान, देव देवी सब उसी शक्ति के भिन्न-भिन्न नाम और अभिव्यंजनाएँ हैं। उसकी अनुभूति और अभिव्यक्ति करने का साधन यह मस्तिष्क ही है। कोट खूँटी पर टाँगा जा सकता है। खूँटी के गिर जाने पर उस पर टँगा कोट भी गिर जायेगा ; किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि खूँटी ही कोट है अथवा कोट ही खूँटी है। दोनों की दो भिन्न और स्वतंत्र सत्ताएँ हैं।
विज्ञान अब तक स्थूल शरीर के ही निरीक्षण - परीक्षण में उलझा रहा, अस्तु अलौकिक क्षमताओं के कारण के बारे में कुछ भी बता पाने में असमर्थ रहा ; किन्तु शरीर की पदार्थपरक जो जानकारी इस क्रम में उसने हस्तगत की, उसे भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। निस्सन्देह आगे के शोध-अनुसंधान के निमित्त और अधिक जानकारी प्राप्त करने एवं और अधिक गहराई में उतरने यह पिछला ज्ञान भी उपयोगी साबित होगा और महत्वपूर्ण भी।
भौतिक विज्ञान परमाणु सत्ता की सूक्ष्म प्रवृत्ति का विश्लेषण करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँच रहा है कि एक ही अणु में सक्रिय दो इलेक्ट्रानों को पृथक् दिशा में खदेड़ दिया जाय, तो भी उनके बीच प्रच्छन्न पारस्परिक संबंध बना रहता है। वे कितनी ही दूर रहें, दर्पण में प्रतिबिम्ब की तरह अपनी स्थिति का परिचय एक-दूसरे को देते रहते हैं। एक इलेक्ट्रॉन को किस तरह प्रभावित किया जाय, तो इतनी दूर चले जाने पर भी दूसरा पहले इलेक्ट्रॉन के समान प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। रोजेन, पोटोल्स्की जैसे वैज्ञानिकों ने भी यह माना है कि इस छोटे से घटक की यह गति निस्संदेह एक विश्वव्यापी ड्रामे का ही छोटा रूप हो सकता है।
एड्रियान ड्राव्स न तो यहाँ तक स्वीकार किया है परमाणु का प्रत्येक घटक विश्व ब्रह्माण्ड का परिपूर्ण घटक है अर्थात् प्रत्येक अणु में ब्रह्माण्डीय सत्ता ओत-प्रोत है। यह भारतीय अध्यात्मिक की ‘अणु में विभु’ वाली मान्यता से काफी मेल खाता है। रुडोल्फ स्टीनर ने एक कदम आगे बढ़कर स्वीकार किया है कि ब्रह्माण्ड में एक मूलभूत चेतना काम कर रही है, जो जीवाणुओं में तथा परमाणुओं में पृथक्-पृथक् ढंग से काम करती है। भारतीय दर्शन में ब्रह्म की परा और अपरा शक्तियाँ इसी तथ्य का निरूपण करती हैं।
परमाणु की इलेक्ट्रॉन प्रक्रिया को यंत्रों से जितना जाना जा सका है, वह अत्यल्प है ; अधिकाँश की जानकारी गणितीय गणनाओं पर आधारित है। इसी तरह जीवाणुओं की मूलभूत प्रक्रिया के लिए ईश्वर ने जो यंत्र बनाया है, उसका नाम ‘मस्तिष्क’ है। इस यंत्र की रोग पद्धति से सर्वांगपूर्ण जानकारी कर लेने के कारण ही भारतीय दर्शन वेद-वेदान्त के उस अलभ्य ज्ञान तक पहुँच गया, पर विज्ञान अभी तक मस्तिष्क के बारे में बहुत सीमित जानकारी ही अर्जित कर सका है। इसी कारण विश्वव्यापी सूक्ष्म सत्ता से अभी तक उसका तालमेल नहीं हो पाया है, फलतः अलौकिक और आश्चर्यजनक घटनाओं प्रसंगों को समझने में वह विफल रहा है। ज्ञातव्य है कि जो अतीन्द्रिय घटनाएँ प्रकाश में आती है, उनमें भी प्रधान माध्यम मस्तिष्कीय बोध ही होता है, चाहे वह पूर्व जन्म का ज्ञान हो, पूर्वाभास या दिव्य - दर्शन।
किन्तु मस्तिष्क सिर्फ ऐसी अलौकिकताओं को ग्रहण करने तक ही सीमित है, सो बात नहीं। वह ऐसी शक्तियों से भरपूर है, जिसकी तुलना इन्द्र के ऐश्वर्य और कुबेर के भण्डार से की जा सकती है।
घटना बंगाल के प्रसिद्ध सन्त रामकिंकर योगत्रयानन्द से संबंधित है। एक बार उन्हें कुछ आवश्यक कागजात कलकत्ते से नवद्वीप अपने एक शिष्य के पास भेजने थे। वे इतने महत्वपूर्ण थे कि यदि शिष्य को समय पर नहीं मिलते, तो भारी आर्थिक हानि संभावना थी। अतः उन्हें तुरन्त भिजवाने का प्रबन्ध करना आवश्यक था, पर सम पर उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति उपलब्ध नहीं हो सका, जो इस दायित्व को वहन कर सके। अन्ततः कोई उपाय न देख उन्होंने उसे योगबल द्वारा वहाँ भेजने का निश्चय किया। सारे कागजातों को एक बड़े लिफाफे में डालकर उसे पूजा की कोठरी में रख दिया और दरवाजों को अन्दर से बन्द कर लिया। दस मिनट बाद जब वे बाहर आये, तो रसोइया उनका इन्तजार कर रहा था। कोठरी का दरवाजा अन्दर से बन्द दे कर उसने सोचा कि योगत्रयानन्द ध्यान कर रहे हैं। अतः उनके बारह आते ही रसोइये ने इस असमय में ध्यान का कारण पूछा तो उन्होंने वास्तविकता बतायी, कहा वस्तुतः वे ध्यान नहीं कर रहे थे, वरन् एक गहन योग क्रिया में निरत थे और कुछ आवश्यक सामग्री कहीं भेज रहे थे। रसोइये ने जब यह जिज्ञासा की कि भौतिक माध्यम के बिना भी भौतिक वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानान्तरित की जा सकती हैं क्या ? तो उनका उत्तर था - मन की असीम सामर्थ्य के अंतर्गत ही ऐसा हुआ है और इस तरह के और भी कितने ही विस्मयकारी प्रसंग इससे संभव बनाये जा सकते हैं।
जानने, समझने, पढ़ने सोचने में जिस क्षमता का उपयोग करते हैं, वह मस्तिष्कीय सामर्थ्य का भौतिक स्थल पक्ष है ; किन्तु जब हम उसके सूक्ष्म पहलू का स्पर्श करते हैं, तो वहीं प्रचण्ड मानसिक शक्ति के रूप में सामने आता और ऐसे कौशल कर दिखाता है, जिससे दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। मस्तिष्क का यह पक्ष अभी विज्ञान की पहुँच से परे है। आशा है, चेतना के इस पक्ष पर भी उसकी पकड़ा जल्दी ही मजबूत होगी और जल्द ही उसकी सूक्ष्म व्याख्या वैसे ही करने में समर्थ होगा, जैसा कि इन दिनों वह स्थूल मस्तिष्क की विस्तृत और व्यापक विवेचना करने में सफल हुआ है, तब फिर ऋद्धि-सिद्धियों और चमत्कारों को लोग यथार्थ के धरातल पर आधारित सत्य के रूप में आसानी से स्वीकार कर सकेंगे।
सन्त एकनाथ इन दिनों गृहस्थ थे। परम्परा के अनुसार पितरों का श्राद्ध करना आवश्यक था। पितृ-पक्ष में उन्हें भी वह व्यवस्था करनी थी। परिवार का दबाव भी था। ब्राह्मण दरिद्र के घर घटिया भोजन करने के लिए जाने में आनाकानी करले लगे। उन्हें दक्षिणा मिलने की भी आशा न थी। एकनाथ के अनुनय-विनय पर भी जब ब्राह्मण न पसीजे, तो उन्होंने अछूत बालकों को बुलाकर ब्रह्मभोज करा दिया। इस पर सब ओर चर्चा होने लगी। पितरों ने स्वप्न दिया - अछूत बालकों के द्वारा भोजन मिलने पर बहुत संतुष्ट हैं। विरोधियों का समाधान हो गया।
मुख से शब्द का उच्चारण न हो तो चेहरा कितना ही सुन्दर क्यों न हो, उसका कुछ महत्व नहीं रह जाता। गूँगा व्यक्ति संकेतों के बल पर कुछ काम चलाऊ इशारे भले ही कर ले मनोभावों का आदान-प्रदान करने में किसी प्रकार समर्थ नहीं हो सकता । वाणी भावनाओं का परिवहन करती है। दूसरा क्या कहता है इसे समझाती है और स्वयं क्या कहना चाहती है इसका प्रकटीकरण करती है। सूरदास अन्धे थे तो भी वाणी की दृष्टि से मुखर होने के कारण सूर-सागर लिख सके। नेत्रों की उपयोगिता अपने लिए जानकारियाँ एकत्रित कर देने के लिए है, पर वाणी का महत्व उससे अधिक है। उसके माध्यम से पढ़ा और पढ़ाया जा सकता है। स्वामी दयानन्द के गुरु विरजानन्द नेत्र विहीन थे तो भी वे चारों वेदों के ज्ञाता और उद्भट विद्वान थे। मनुष्य की काया में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इन्हें पाँच देवता कहते हैं इनमें वाणी प्रमुख है। उसे सरस्वती कहा जाता है। सब इन्द्रियाँ एक ओर और वाणी एक तुला पर रखी जा सकती है।
यह सामान्य व्यवहार की बात हुई। आध्यात्म प्रयोजनों में भी वाणी की महिला अगाध बताई गई हैं। सत्संग उसी के माध्यम से होता है। मन्त्र धारण की माध्यम जिव्हा ही है। प्रत्यक्ष ब्रह्म के दो स्वरूप है। एक शब्द-ब्रह्म दूसरा नाद ब्रह्म। वार्तालाप में शब्द ब्रह्म का प्रयोग होता है। संगीत में-गीत वाद्य में नाद-ब्रह्म का प्रयोग है। मन्त्र शब्द-ब्रह्म है। सत्संग शब्द-ब्रह्म है। शिक्षा का समस्त प्रयोजन इसी माध्यम से होता है। योगाभ्यास में नादयोग से परब्रह्म की परावाणी इसी माध्यम से सुनी जाती है। देवताओं की वाणी नाद माध्यम से ही प्रकट होती है। शिव का डमरू, कृष्ण की बंसी, नारद का तमूरा, चैतन्य की खरताल, मीरा के मजीरा, सरस्वती का सितार यह सभी दिव्य वाणी बोलते थे। कोकिल, भ्रमर आदि वाणी के माध्यम से ही प्रख्यात हुए हैं। जन-मानस को उद्वेलित करने में वाणी का ही प्रयोग होता है। इसे वशीकरण मन कहा गया है। मीठे वचनों की तुलना वशीकरण मन्त्र से की गई है। इसमें सहस्र तलवारें भी सन्निहित है। द्रौपदी के मुख्य से आठ अक्षर कड़ुए निकले थे कि उतने भर से महाभारत खड़ा हो गया और अक्षौहिणी सेना का सफाया हो गया।
सामान्य क्रिया-कलाप से लेकर आध्यात्मिक एवं उच्चस्तरीय प्रयोजनों में वाणी के माध्यम से व्यक्ति ज्ञानवान तो बनता ही है, शक्तिवान भी बनता है। वाणी में शक्ति की भी अवधारणा है। वचन देने और वचन निभाने में जीवन निछावर कर दिये जाते हैं। कन्यादान वाग्दान ही है। संकल्प करके राजा हरिश्चंद्र ने अपना राज्य और स्त्री बच्चे दान कर दिये थे। “भुज उठाय प्रण कीन्ह”। राम में असुर कुल का संहार करने में कितना बड़ा जोखिम उठाया, क्या नहीं किया। गुरु दीक्षा में गुरु अपनी शक्ति हस्तान्तरित करता है और गुरु दक्षिणा में शिष्य अपनी जीवन सम्पदा निछावर कर देता है। वाणी में विनोद, आक्रोश, स्नेह, समर्पण सब कुछ है। प्रयोग करते ही मनुष्य की मूर्खता, विद्वता, तत्काल प्रकट होती है। मित्रता और शत्रुता दोनों ही रंग बदलती हैं। जिव्हा से बढ़कर मनुष्य के पास दैवी वरदान और कुछ है नहीं। यह छिन गई हो तो समझना चाहिए कि जीवन का भयंकर अभिशाप हैं। गूंगा व्यक्ति न अपने मन की कह सकता है और न दूसरे की समझ सकता है। इस एक ही अभाव में सारे अभाव सन्निहित हैं। जिसे दिव्य वाणी मिली है उसे सब कुछ मिला है। इसलिए उसे मधुवती कहा गया है। जिव्हा को परिष्कृत करना सरस्वती की साधना कही जाती है।
शाप और वरदान इसी के द्वारा दिये जाते हैं। संयम में अस्वाद और मौन दो को उच्चस्तरीय साधना बताया हैं। आहार के संयम से आरोग्य और दीर्घ जीवन दोनों मिलते हैं। मौन धारण का अभ्यास समस्त तपों में उच्च कोटि का है। एकाग्रता और एकात्मा की दोनों ही साधनाएँ मौन धारण से बनी है जिससे जिव्हा की यह दोनों साधनाएँ करली समझना चाहिए, कि उसका इन्द्रिय संयम समग्र हो गया। जिसका इन्द्रिय संयम पूर्ण हो गया वह सच्चे अर्थों में तपस्वी है। तपस्वी की वाणी अमोध होती है। वह शब्द बेध-बोलता है। बैखरी वाणी रोकने पर मध्यमा परा और पश्यन्ती वाणियाँ भी वशवर्ती हो जाती है। उसमें मन्त्र सिद्ध होते ही उसके दिये हुए वरदान सफल होते हैं।
नाद ब्रह्म का सिद्ध पुरुष परमात्मा की वाणी सुनता है। दूर श्रवण और दूर विचार प्रेरणा नाद-योग की सिद्धियाँ है, विचारों को पढ़ाना इसी माध्यम से होता है। मन्त्र में स्वर प्राण है। केवल अक्षर मन्त्र नहीं है। सस्वर पाठ करने को ही मन्त्र पाठ कहते हैं। सामगान को सिद्धियों का स्त्रोत कहा गया है। सामगान सहित गाये हुए मंत्र नाद-ब्रह्म बनते हैं। मन्त्र का जो फल एवं माहात्म्य बताया गया है वह सस्वर उच्चारण कर्ता के लिए घातक बताया गया है।
उद्गाता जिन मन्त्रों का यजन एवं गायन करते हैं। उनके फल यथावत् प्राप्त होते हैं। रोग निवारण, मानसिक, संशोधन, वातावरण परिष्कार एवं अदृश्य जगत पर अधिकार यह प्रतिफल जिन मन्त्रों के बताये गये हैं वे यजन और स्वर से संयुक्त होने पर ही होते हैं।
भगवान मनु ने कहा है - “महायज्ञैश्य यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियतं तनुः।” अर्थात् यज्ञ तथा महायज्ञ का आश्रय लेने पर मनुष्य शरीर ब्राह्मण बनता है। इसके अभाव में याचक एवं उद्गाता मात्र बन कर रह जाता है। अध्वर्यु वह है जिसने मन्त्रों को सिद्ध किया है। सिद्ध मन अनायास नहीं हो जाता उसे स्वसार प्रवीण पारंगत करना पड़ता है। माली के संरक्षण में फूलने फलने वाले उद्यान की तरह मन्त्र की सफलता भी सिद्ध पुरुष के संरक्षण में होती हैं।
मन्त्र का शुद्ध उच्चारण, तपश्चर्या पूर्वक संयम साधना, गुरु के संरक्षण, अटूट श्रद्धा-यह सभी बातें जिस साधना में जुड़ जाती है, उसकी सफलता असंदिग्ध होती है जो ऐसे ही उलटे-सीधे अक्षर दुहराते रहते हैं। पुस्तक में लिखे हुए शब्दों को याद कर लेना मन्त्र नहीं है। उन्हें अक्षरों की पंक्ति कहना चाहिए। उसे याद कर लेना कविता याद कर लेने के सम्मान है। ऐसे मन्त्र का प्रयोग कौतूहल मनोरंजन के समान है। मंत्र को साधना और विचार और स्वर के साथ सिद्ध करना होता है। इसके लिए प्रवीण पारंगत का संरक्षण चाहिए।
‘श्री’ का माहात्म्य
‘श्री’ का व्यक्तिगत जीवन में क्या महत्व हैं ? गंभीर विचार-मंथन से इन संबंध में इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि व्यक्तित्व को समुन्नत, सुविकसित, समृद्ध ओर कान्तिवान बनने का सम्पूर्ण तत्वज्ञान इस एक ही अक्षर में समाविष्ट है। इसकी उक्त उपादेयता को देखते हुए जो इस बारे में सोचते, विचारते और वैसा बनने के लिए तद्नुरूप कदम बढ़ाते हैं, वास्तव में वहीं ‘श्रीवान्”-श्रीमान्” कहलाने के अधिकारी हैं, शेष तो श्रीहीनों की तरह दुत्कारे जाते और विस्मृति के गर्त में तिरोहित हो जाते हैं।
शतपथ ब्राह्मण की एक गाथा में ‘श्री’ की उत्पत्ति का वर्णन है। वह प्रजापति के अन्तस् से आविर्भूत होती हैं। अपूर्व सौंदर्य एवं तेजस् से सम्पन्न हैं। प्रजापति उनका अभिनन्दन करते हैं और बदले में उस आद्य देवी से सृजन क्षमता का वरदान प्राप्त करते हैं।
ऋग्वेद में श्री आर लक्ष्मी को एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् में ‘श्री’ का अन्न, जल, गोरस एवं वस्त्र जैसी समृद्धियाँ प्रदान करने वाली आद्यशक्ति के रूप में उल्लेख है। गृह सूत्रों में उसे उत्पादन की उर्वरा शक्ति माना गया है। यजुर्वेद में ‘श्री’ और ‘लक्ष्मी’ को विष्णु की दो पत्नियाँ कह कर उल्लेख किया गया है। - “श्रीश्चते लक्ष्मीश्चते सपत्न्यौ”। श्री सूक्त में भी दोनों को भिन्न मानते हुए अभिन्न उद्देश्य पूरा कर सकने वाली बताया गया है - “श्रीश्च लक्ष्मीश्च”। इस निरूपण में ‘श्री’ को तेजस्विता और ‘लक्ष्मी’ को सम्पदा के अर्थ में लिया गया है।
शतपथ ब्राह्मण में ‘श्री’ की फलश्रुति की चर्चा करते हुए कहा गया है कि वह जिन दिव्यात्माओं में निवास करती हैं, वे तेजोमय हो जाते हैं। अथर्ववेद में पृथ्वी के अर्थ में ‘श्री’ प्रयोग अधिक हुआ है। धरती माता एवं मातृभूमि के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति करने के लिए ‘श्री’ का उच्चारण एवं लेखन होने का इन ऋचाओं में स्पष्ट संकेत हैं।
आरण्यकों में ‘श्री’ को सोम की प्रतिक्रिया अर्थात् आनन्दातिरेक कहा गया है। गोपथ ब्राह्मण में उसकी चर्चा शोभा-सुन्दरता के रूप में हुई है। श्री सूक्त में इसकी जितनी विशेषताएं बतायी गयी हैं, उनमें सुन्दरता सर्वोपरि है। वाजसनेयी आरण्यक में ‘श्री’ और लक्ष्मी की उत्पत्ति तो अलग-अलग कहीं गई हैं, पर पीछे दोनों के मिल कर एकात्म होने का कथानक है।
चित्रों में लक्ष्मी को कमलासन पर विराजमान हाथियों द्वारा स्वर्ण कलाओं से अभिषिक्त किये जाने का चित्रण मिलता है। कमल सौंदर्य का प्रतीक है, गज साहसिकता की निशानी है, स्वर्ण वैभव का चिन्ह है, जल शान्ति, शीतलता और संतोष का द्योतक है। इन विशेषताओं के समुच्चय, को ‘लक्ष्मी’ कह सकते हैं। कन्याओं को ‘गृह लक्ष्मी’ कहने का रिवाज है। यह व्यर्थ ही नहीं है। वास्तव में उनमें लक्ष्मी तत्व की अधिकाँश विशेषताएँ मौजूद होती है। ऐसे में उनका गृह लक्ष्मी कहलाना सार्थक ही है। ‘श्री’ शब्द में लक्ष्मी की उपरोक्त स्थिति को अपनाने का प्रोत्साहन है। पुराणों में ‘श्री’ की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई बतायी गई है। यहाँ इससे प्रबल पुरुषार्थ का संकेत है। अनुर्वर खारे जलागार से भी पुरुषार्थी लोग वैभव-वर्चस्व प्राप्त कर सकते हैं - इस तथ्य को लक्ष्मी - जन्म के उपाख्यान से महामनीषियों ने निरूपित किया है। कल्प सूत्र की एक था में भगवान महावीर के किसी पूर्व जन्म में उनकी माता त्रिशला होने का वर्णन है, जिसने दिव्रु स्वप्र में ‘श्री’ के दर्शन की प्रतिक्रिया अपनी गोद में भगवान को खिला सकने के रूप में प्राप्त हुईं।
‘श्री’ की प्रतिष्ठा जब किसी नाम के आगे होती है तो वह अपने दिव्य गुणों के कारण उसे भी गरिमावान बना देती है। इसी कारण किसी को गरिमा प्रदान करने और सम्मान देने के लिए उसके नाम के आगे ‘श्री’ लिखने का सामान्य प्रचलन है। आध्यात्मिक पुरुषों, राजनेताओं, सम्मानित व्यक्तियों के नाम के पूर्व ‘श्री’ लगाने का इतना ही तात्पर्य है कि वे प्रतिष्ठित व्यक्ति है। इसलिए ‘श्री’ का सम्पुट लगने मात्र से व्यक्तित्व की पदवी बहुत कुछ मानस में प्रतिभासित होने लगती है। चोरों, डकैतों, उठाईगीरों, लुटेरों, अपहर्त्ताओं, आतंकवादियों को इसी कारण ‘श्री’ लगाकर सम्बोधित करने का प्रचलन नहीं है ; क्योंकि वे श्री को अभिव्यक्त करने वाले गुणों को धारण नहीं करते और उनका सम्पूर्ण जीवन लोगों को सताने और उत्पीड़ित करने में ही बीतता है। यह ‘श्री’ में निहित तत्व दर्शन के विरुद्ध है।
‘श्री’ को भारतीय धर्म में इतना महत्व क्यों दिया गया है ? इस पर विचार करने से प्रतीत होता है कि व्यक्तित्व को आन्तरिक सौंदर्य, व्यावहारिक तेजस्विता और भौतिक समृद्धि के प्रति आस्थावान और प्रयत्नशील रहने के लिए संकेत है। आत्मिक और भौतिक प्रगति के संतुलित और भौतिक प्रगति के संतुलित समन्वय से ही व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास होता है। ‘श्री’ को नाम के पहले जोड़ने में इसी सद्भावना एवं शुभकामना की अभिव्यंजना है कि श्रीवान् बनें - सर्वतोमुखी प्रगति की छिषा में अग्रसर हों।
भगवान के अगणित नाम है ; पर उनमें से सबसे सुबोध और सार्थक नाम है ; सच्चिदानन्द। सत् का अर्थ है - शाश्वत, टिकाऊ, न बदलने वाला न समाप्त होने वाला।
इस कसौटी पर केवल परब्रह्म ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टि के मूल में वहीं है। परिवर्तनों का सूत्र संचालक भी वहीं है। उसी के गर्भ में यह समूचा ब्रह्माण्ड पलता है। सृष्टि तो महाप्रलय की स्थिति में बदल भी जाती है और फिर कालान्तर में नया रूप लेकर प्रकट भी होती रहती है। किन्तु नियन्ता की सत्ता में इससे कोई अन्दर नहीं आता। इसलिए परब्रह्म को ‘सत्’ कहा गया है।
चित् का अर्थ है - चेतना, विचारणा। जानकारी, मान्यता, भावना आदि इसी के अनेकानेक स्वरूप है। मानवी अन्तःकरण में इसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के रूप में देखा जाता है। मनोविज्ञानी इसका वर्गीकरण चेतन, अचेतन, सुपर चेतन के रूप में करते हैं। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं में भी चेतना अपने मूल स्वरूप में यथावत् बनी रहती है। सत्, रज, तम् प्रकृति में भी वहीं चेतना प्रकट और प्रत्यक्ष होती रहती है। मृत्यु के बाद भी उसका अन्त नहीं होता। विद्वान और मूर्ख सभी में अपने विभिन्न स्तरोँ के अनुरूप वह विद्यमान रहती है।
जड़ पदार्थ और प्राणि समुदाय के बीच मौलिक अन्तर तक ही है - चेतना का न होना। जड़ पदार्थों के परमाणु भी गतिशील रहते हैं। उनमें भी उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है ; किन्तु निजी ज्ञान का सर्वथा अभाव रहता है। किसी प्रेरणा से प्रभावित होकर वे ग्रह-नक्षत्रों की तरह धुरी एवं कक्षा में घूमते तो रहते हैं ; पर संदर्भ में अपना कोई स्वयं का निर्धारण कर सकने की स्थिति में नहीं होते, जबकि प्राणि अपनी इच्छानुसार गतिविधियों का निर्धारण करते हैं।
प्राणियों की चेतना बृहत्तर चेतना का एक अंग अवयव मात्र है। इस ब्रह्माण्ड में अनन्त चेतना का भण्डार भरा पड़ा है। उसी के द्वारा पदार्थों को व्यवस्था का एवं प्राणियों को चेतना का अनुदान मिलता है। परम चेतना को ही परब्रह्म कहते हैं। अपनी योजना के अनुरूप वह सभी को दौड़ने एवं सोचने की क्षमता अर्थात् चेतन कहते हैं।
इस संसार का सबसे बड़ा आकर्षण ‘आनन्द’ है। आनन्द जिसमें जिसे प्रतीत होता है वह उसी ओर दौड़ता है। व्यभिचारियों को वेश्यालयों में ही स्वर्ग-सुख का आनन्द मिलता है। शराबी अपनी ही दुनिया में मस्त रहते हैं। गरीब रूखे-सूखे भोजन में षट्-रस व्यंजनों जैसा स्वाद और आनन्द लेते हैं। मजदूरों का तो कहना ही क्या। दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद जब चारपाई पर पड़ते हैं, तो सुख की नींद में ऐसे खो जाते हैं, मानों उससे बढ़कर उनके लिए कदाचित् ही कोई दूसरा सुख हो। इसी प्रकार वैज्ञानिक, कलाकार, कृषक, संगीतकार सभी को अपने-अपने क्षेत्रों में अद्भुत रस मिलता है। यह प्रकारान्तर से आनन्द के मूल-स्रोत का ही एक अंश मात्र है। इसे अक्षय नहीं कहा जा सकता है। पानी के बबूले की तरह इसका सृजन और विसर्जन होता रहता है। देखा गया है किसी को किसी क्षेत्र में यदि सुख की अनुभूति हो रही है। तो कुछ ही काल पश्चात् वह उसे नीरस और निरानन्द प्रतीत होने लगता है और ‘रस’ की खोज उसकी अन्यत्र चल पड़ती है। मूल अथवा शाश्वत ‘आनन्द’ की प्रकृति ऐसी नहीं। उसमें नीरसता अथवा एकरसता जैसी शिकायत नहीं होती। उस परम आनन्द में मन नशे की भाँति डूबा रहता है और उससे वह बाहर आना नहीं चाहता ; किन्तु सांसारिक क्रिया-कलापों के निमित्त उसे हठपूर्वक बाहर जाना पड़ता है। यह अध्यात्म तत्वज्ञान वाला प्रसंग है और अन्तःकरण की उत्कृष्टता से संबंध रखता है। ऐसी स्थिति में आत्मा को स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वर-प्राप्ति, समाधि जैसे आनन्दों की अपेक्षा रहती है।
वस्तुतः आनन्द प्रकारान्तर से ‘प्रेम’ का दूसरा नाम है। जिस भी वस्तु व्यक्ति एवं प्रवृत्ति से प्रेम हो जाता है, वही प्रिय लगने लगती है। प्रेम घटते ही उपेक्षा चल पड़ती है और यदि उसका प्रतिपक्ष ‘द्वेष’ उभर पड़े, तो फिर वस्तु या व्यक्ति के रूपवान, गुणवान होने पर भी वे बुरे लगने लगते हैं। उनसे दूर हटने या हटा देने की इच्छा होती है।
अँधेरे में जितने स्थान पर टार्च की रोशनी पड़ती है। उतना ही प्रकाशवान होती है।
वहाँ का दृश्य परिलक्षित होने लगता है। प्रेम को ऐसा ही टार्च-प्रकाश कहना चाहिए, जिसे जहाँ भी फेंका जायेगा, वहीं सुन्दर, प्रिय एवं सुखद लगने लगेगा। वैसे इस संसार में कोई भी पदार्थ या प्राणी अपने मूल रूप में प्रिय या अप्रिय है नहीं। हमारे दृष्टिकोण, मूल्यांकन एवं रुझान की आनन्ददायक अथवा अप्रिय, कुरूप जैसी परिस्थितियाँ गढ़ते-बनाते रहते हैं।
आनन्द ईश्वर की विभूति है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रिय ही सुखद है अर्थात् ईश्वर ही आनन्द है। उसी के आरोपण से हम सुखानुभूति करते और प्रसन्न होते हैं। यह स्पष्टतः जानना चाहिए कि परब्रह्म के अनेकानेक नाम हैं। उनमें से उसके प्रमुख तीन गुणों को समन्वय जिसमें है, उसे ‘सच्चिदानन्द’ कहते हैं।
अनुयाज - पुनर्गठन - 1 विशेष लेखमाला - 3
(गताँक से जारी)
हाथी और मन में बहुत से मिलते-जुलते गुण पाये जाते हैं। बल और मद में स्वेच्छाचारिता और उत्पात-वृत्ति में उपयोगिता और सेवा में उनमें समानता है। नियन्त्रण में रहे तो हितकारी व बड़े-बड़े कार्य सरलता से सम्पन्न कर देते हैं। अहं या अज्ञान से कभी सन्तुलन खो दे तो जिस व्यक्ति, वस्तु, व्यवस्था या झपट पड़ें उसी को रौंद कर चकनाचूर भी कर देते हैं। आधुनिक विज्ञान भी अपने प्रयोगों के आधार पर अब इस ऋषि प्रणीत सत्य से सहमत है कि ‘मन ही शरीर पर शासन करता है।’ असीम शक्ति सम्पन्न यह मन यदि चाहे तो पतन, पीड़ा व बनघन की खन्दकों में मनुष्य को ढकेल मोक्ष की ऊँचाइयों पर उसे पहुँचा दें। अतः हाथी और मन दोनों को महावत और तीन फलकों वाले अंकुश के नियंत्रण में रखने में ही भलाई है।
इस शक्तिशाली मन को महावत ‘सद्विवेक’ ईश्वर ने सभी मनुष्यों को दे रखा है। शान्ति और प्रगति के इच्छुक व्यक्ति को केवल यह व्यवस्था बनानी पड़ती है कि सद् विवेक जगाता रहे, मन पर सवार रहे और तन फलकों वाले अंकुश को हाथ में लिये रहे। उचित-अनुचित की परख और निर्णय करने वाला महावत तो सद्विवेक है। तीन फलकों वाला यह अंकुश कौन है ?
स्वाध्याय, मनन, चिन्तन ये तीन शब्द ही तीन फलकों वाला अंकुश है जिसे युग निर्माण योजना-गायत्री परिवार अश्वमेध महायज्ञों के प्रथम अनुयाज कार्यक्रम के रूप में अपनाने और जन-जन में प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहे है। शब्द कोष में इनके जो भी अर्थ दिए गए हों, पर पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रवचनों लेखों तथा पंचकोशी साधना विवरण में जिन विशिष्ट अर्थों में इनका प्रयोग किया है वही हमारे लिए ग्रहण करने योग्य है। उनके बताये अर्थ ही हमें जानना चाहिए, उन अर्थों में ही इन तीन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
अधिकाँश व्यक्ति यह मान लेते हैं कि पढ़ने या अध्ययन करने का दूसरा नाम ‘स्वाध्याय’ है। यह सही नहीं है। इस भ्रम को दूर कर लेना चाहिए। पढ़ना, अध्ययन करना, स्वाध्याय करना तीन बिल्कुल ही भिन्न-भिन्न क्रियाएँ हैं। उनके उद्देश्यों में, क्रिया पद्धतियों में तथा परिणामों में कोई एकरूपता या समानता नहीं है।
समय काटने के लिए व्यक्ति कहानी, कविता, उपन्यास जो भी मिल जाए पढ़ लेता है। क्या घटनाएँ हुईं, किस प्रकार हुई, क्या परिणाम हुए यह जान लेता है। पर इन सबसे वह अपना कोई संबंध नहीं मानता। वह तो मात्र पाठक है। बस समय काट लिया। यह पढ़ना है। परीक्षा के लिए छात्र इस प्रकार नहीं पढ़ता। पाठ्यक्रम से संबंधित पुस्तकें ही पढ़ता है। रुचि-अरुचि भूलकर ध्यानपूर्वक पढ़ता है। पढ़ी गई बातों को याद रखता है। पूछे जाने पर दुहरा भी देता है। परन्तु ध्यानपूर्वक पढ़ी गई और याद रखी गई बातों से उसकी दिनचर्या को जीवन शैली या स्वभाव को कुछ लेना देना नहीं है। वह तो मात्र छात्र है, बस परीक्षा की तैयारी कर ली। यह ‘अध्ययन’ है।
जिज्ञासु भी ध्यानपूर्वक पढ़ता है। अधिक जानने की उत्सुकता के कारण रुचिपूर्वक पढ़ता है। गई बातों को याद रखता है, अन्य व्यक्तियों को सुनाता भी रहता है। परन्तु जिस प्रकार सामान्य परिचय वाले आगन्तुक को घर के बाहरी कमरे तक ही सीमित रखा जा है, घर के भीतरी भाग में प्रवेश नहीं दिया जाता, वैसे ही जिज्ञासु, भी प्राप्त जानकारियों को बुद्धि तक ही सीमित रखता है। अपने ‘भीतर’ प्रवेश करने की अपनी रुचियों - मान्यताओं से मिलने की अपने स्वभाव व व्यक्तित्व को नापने की उन्हें अनुमति नहीं देता। वह तो मात्र जिज्ञासु है। बस, उत्सुकता तृप्त कर ली। यह भी ‘अध्ययन’ है।
पिता दशरथ की कीर्ति पर कलंक न लगने पाये, भाल न झुकने पाए, इस हेतु श्रीराम ने भरत के लिए राज्य छोड़कर सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया। भरत उन्हें वापिस लाने व राज्य सौंपने वन में गए, किन्तु श्रीराम पिता के वचन की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए दृढ़ बने रहे। चक्रवर्ती राजा का पद व ऐश्वर्य उन दो भाइयों के पैरों के बीच गेंद के समान ठोकर खाता रहा। लाखों व्यक्ति रामचरित मानस की इस कथा को जानते हैं, नित्य पाठ परायण भी करते हैं। इनमें से कुछ कथा का अध्ययन भी करते हैं और अपनी तर्कशक्ति बढ़ाते हैं, इन पर विद्वतापूर्वक लेख भी लिखते और भाषण देते हैं। बस यहीं तक इस कथा की उनके लिए उपयोगिता है। मस्तिष्क तक ही इस कथा को प्रवेश करने की अनुमति है। अपने जीवन व्यवहार को, मानसिकता को वे ज्योँ का त्यों अछूता बनाये रखते हैं। वे निश्चिंत हैं कि इस पढ़ने - अध्ययन करने का उनके निजी जीवन से न तो कोई सीधा संबंध है, न ही उसमें झाँकने का अधिकार है। उनकी जीवन शैली मन का रुझान हृदय के भाव-कथा की पहुँच के बाहर है। अर्थात् उनकी मान्यता है कि ज्ञान और जीवन एक दूसरे में न घुल सकने वाले दो असम्बद्ध तत्व हैं। एक दूसरे को न छू सकने वाले नदी के दो किनारे हैं।
पढ़ने या अध्ययन करने से बिल्कुल ही भिन्न ‘स्वाध्याय’ है। वह न तो समय काटने के लिए किया जाता है, न ही मात्र बौद्धिक ज्ञान बढ़ाने के लिए ।स्वाध्याय के लिए भी पढ़ा जाता है किन्तु ध्यानपूर्वक। इसलिए सरसरी दृष्टि से देखने पर तो यह अध्ययन करने जैसा लगता है। पर इसकी पैठ बाहरी कमरे पर, बुद्धि पर समाप्त नहीं हो जाती। बुद्धि के बहुत आगे तक, बहुत ‘भीतर’ तक स्वाध्याय की पहुँच है। राम-भरत मिलन की कथा के पाठ्यकर्ताओं में निश्चय ही कुछ व्यक्ति ऐसे होंगे जो इस कथा को विवेक के संग अन्तस् में भी ले जाते हैं कथा में से झर रही राम और भरत की मानसिकता एवं भावात्मकता के सामने वे अपनी मानसिकता एवं भावात्मकता को खड़ा करते और तुलना करते हैं। अपने पिता व भाई के प्रति स्वयं उनकी कैसी मनोवृत्ति, कैसी भावना, कैसा व्यवहार है ? इसे परखते हैं। राम-भरत की निर्लोभ वृत्ति वे प्रेम भाव तथा राम-दशरथ के कर्तव्य भाव के दर्पण में अपनी सूरत देखने का वे साहस करते हैं। यह ‘स्वाध्याय’ है।
स्वाध्याय की इस लम्बी व गहरी पैठ के कारण उसके उद्देश्य व परिधि, पद्धति व व्यूह रचना पढ़ने - अध्ययन करने की अपेक्षा नहीं अधिक व्यापक, विशिष्ट व उच्चस्तरीय है - स्वाध्याय हमें अपनी पकड़ में समेट लेता है।
वह हमारा सचेतन है। हमारे अंतःकरण से लेकर अन्तरात्मा तक पहुंचने - छूने-जगाने का उस अबाधित अधिकार है।
पढ़ी गई बातों से हम अपनी मानसिकता - भाव संवेदना को अछूता नहीं रख सकते । वे हमारे लिए ही लिखी गई हैं।
प्राप्त हुए ज्ञान व अनुभव से हम अपने व्यक्तित्व को अप्रभावित नहीं रख सकते। वे हमारे लिए ही रचे गये हैं।
हम भी उन्हें अपने “भीतर” तक इसलिए ले गए हैं कि यदि कदम कीं भटक गए हों, तो भटकाव का एहसास हो जाए। कदम यदि सही दिशा में जा रहे हों तो चाल तेज करने का उत्साह जाग जाए।
स्वाध्याय हमें अपना निरीक्षण स्वयं करने के लिए बाध्य कर देता है। इसलिए स्वाध्याय मात्र पुस्तक का अध्ययन नहीं है।
‘स्व’ का अपने आपका अध्ययन स्वाध्याय है। खोजी प्रकाश को भीतर की ओर मोड़ना स्वाध्याय है।
वृक्ष से अलग हो गए और फिर सूख कर जर्जर हो गए पत्ते की दुर्दशा सबने देखी है। अपने स्वयं के हल्केपन तथा आसपास बह रही वायु के प्रवाह के कारण बेचारा इधर से उधर भटकता और टूटता रहता है। जीवन जीने की कला से मुँह मोड़ लेने वाले व्यक्ति की भी यहीं दुर्गति होती है। दुर्बल व अस्थिर मन किये लोभ-मोह अहं की आँधियों में वह भी भटकता टकराता, तनावग्रस्त व जर्जर हुआ फिरता है। पोषक रस देने वाली जड़ों से सम्बन्ध तोड़ लेने वाले पत्ते व मानव की यही भवितव्यता है।
वृक्ष की टहनी से जुड़े पत्ते को भी सबने देखा है। वृक्ष की जड़ों से रस आता है और टहनी उसे पत्ते तक पहुँचाती रहती है। रसवन्त पत्ता हरा−भरा होकर उल्लासपूर्वक झूमता है। अन्धड़ उसे गिरा नहीं पाता, ताप उसे सुखा नहीं पाता। नैतिकता व आध्यात्मिकता की जड़ें से श्रेष्ठ विचारों का रस ऐसे ही निरन्तर प्रवाहित होता रहता है। टहनी के समान जो इस अमृत रस को व्यक्ति तक पहुँचा कर उसे जीवन्त बनाएँ रखता है - वह स्वाध्याय है। कुविचारों के विष की काट भी इस अमृत रस से ही हो सकती है। अतः मनोमय कोश की शुद्धि का सबसे प्रधान एवं सबसे महत्वपूर्ण साधन यह है कि मस्तिष्क में अधिक से अधिक समय तक श्रेष्ठ विचारधारा प्रवाहित होती रहे। शुद्धता, शान्ति व प्रगति के इच्छुक व्यक्ति इसी लिए नित्य-नियमित स्वाध्याय करते हैं।
इस विवेचना से हम यह न सोचें कि दोषों की ओर इंगित करने वाला स्वाध्याय अपनी ही नजरों में अपने को गिरा लेने की प्रक्रिया है। उत्तम वैद्य रोगी की नाड़ी देखता है, रोगों को खोजता है, रोगी भी अपने दोष स्वीकार करता है। परन्तु इस पूरी प्रक्रिया में वैद्य रोगी को हीन दृष्टि से नहीं देखने लगता, उस निकृष्ट व्यक्ति नहीं मानने लगता। वह रोगी को उसके रोग बताया है और धैर्य भी बाँधता है। उत्तम वैद्य के समान स्वाध्याय भी भीतर व बाहर के स्वभाव एवं आचरण दोषों को खोजता है। मानव जीवन का लक्ष्य क्या है और अभी कहाँ भटक गए हैं, कहाँ अटक गए हैं, इसका अनुसन्धान स्वाध्याय करता है। अपने दोषों को दुर्बलताओं को जानना और जानकारी स्वीकार कर लेना स्वयं ही प्रमाण है कि दोषों से मुक्त होने की राह भटके व्यक्ति में आकाँक्षा है। यह हीनता का नहीं वीरता का लक्षण है। दोष को जानकारी उसे सहज भाव से स्वीकार करते ही स्वच्छ जीवन जीने का भाव जागता है। स्वाध्याय-वैद्य अपनी ही नजरों में अपने को कभी नहीं गिराता, कभी निराश नहीं करता। वह सदैव आश्वासन देता है, विश्वास जगाता है कि सुबह का भूला शाम को घर वापिस आ जाय तो भटका हुआ नहीं कहलाता है। वह तो अंतःकरण के दोषों से जूझने का संकल्प उठाता है। अतः नैतिक आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक साधक को बिना हिचके स्वाध्याय-वैद्य के सम्मुख नित्य अपने मानस को प्रस्तुत करते रहना चाहिए।
स्वाध्याय का दूसरा पक्ष भी उतना भी सशक्त एवं प्रेरक है। मानवी अन्तःकरण में दोष ही दोष नहीं होते, गुण भी होते हैं। स्वाध्याय श्रेष्ठताओं की ओर भी संकेत करता है, पीठ भी थपथपाता है, बढ़ - चलने का उत्साह भी बढ़ाता है। स्वाध्याय मानसिक दृढ़ता, भाव शक्ति व आत्मबल को विकसित करने का प्राणवान प्रेरणा स्रोत है। अपने उजलेपन को जानना और उसे परमात्मा का अनुग्रह मानना उतना ही आवश्यक है जितना कि अपने मैलेपन की जानकारी। इस प्रकार ‘कृतज्ञता’ जैसी दैवी सम्पदा को स्वाध्याय सहज की उपलब्ध करा देता है।
उपरोक्त विवेचना से यह न सोचा जाय कि स्वाध्याय के लिए मात्र पढ़ना-अध्ययन करना, सत्साहित्य को माध्यम बनाना अनिवार्य है, तो उसे हटा दें। यदि ऐसा होता तो अनपढ़ कबीर अंतर्मन की स्थितियों को गहन सूक्तियों में कैसे बता पाते ? अन्धे सूरदास कन्हैया के प्रति अपनी आन्तरिक प्रीति को मन मोह लेने वाले पदों में कैसे गा पाते ? आत्म साक्षात्कार जैसे अत्यन्त क्लिष्ट विषय को रामकृष्ण सीधे-सादे उदाहरणों से कैसे स्पष्ट कर पाते ? तुलसीकृत ‘रामचरित मानस’ अपने अन्दर सृष्टि विज्ञान, वेदान्त, उपनिषद् ज्ञान जैसे गूढ़ विषय को इतने सरल ढंग से कैसे समझा पाते? ‘स्व’ का अध्ययन करने के लिए, अपने अन्तस् की स्थिति को पहचानने और उसका मूल्यांकन करने के लिए सत्साहित्य एक मात्र माध्यम नहीं है, मात्र एक माध्यम है। ‘प्रेरणाप्रद वचन’ दूसरा माध्यम है। विवेक’ तीसरा माध्यम है। अपने या दूसरों के कर्म देखें, उद्देश्य पहचानें, परिणाम भी समझें, यह ‘अनुभव’ चौथा माध्यम है। अनेकानेक माध्यम हैं जिनकी सहायता से अन्तस् में झाँका जा सकता है। हाँ, यह अवश्य है कि इन अनेकानेक माध्यमों में से सत्साहित्य को माध्यम बनाकर स्वाध्याय करना अधिक सरल है। सत्साहित्य सरलता से उपलब्ध भी हो जाता है। इसलिए स्वाध्याय के लिए इसे प्रायः चुन लिया जाता है। पर जिसे जो माध्यम सरल व उपयुक्त समझ पड़े वह वही अपना ले। महत्व माध्यम का नहीं है। महत्व उस उमंग, महत्वाकाँक्षा का है जो अपने व्यक्तित्व को निखारने के लिए उमड़ती रहती है। महत्व उस ग्लानि का पतन के प्रति उस असन्तोष का है, उस प्रत्येक प्रेरणा का है जो ऊपर, और ऊपर उठने के लिए अन्तःकरण को कचोटती रहती है। भगवान करे यह उमंग और यह कचोट किसी को चैन न लेने दे।
क्या आप जानते हैं ?
नया सफेद कपड़े का टुकड़ा हल्दी से रंगिये। कपड़ा सुखा कर उसमें तुलसी-मूल लपेटिये। कपड़े को नए घड़े में रखकर, मिट्टी का नया ढक्कन रखिये।
नया मकान बनाते समय इस घड़े को मकान की नींव में रख दीजिये। मकान पर बिजली कभी नहीं गिरेगी। तीव्रता के कारण यदि कभी गिरी तो सीधे पृथ्वी में समा जाएगी। मकान बच जायगा।
तुलसी - मूल में अधिक मात्रा में विद्युत - शक्ति होती है।
तुलसी की लकड़ी की माला पहनने से
(क) बिजली का भय कम हो जाता है।
(ख) शारीरिक विद्युत सुरक्षित रहती है।
(ग) व्यक्ति दीर्घजीवी व स्वस्थ रहता है। सदाचार को बनाए रखने में अधिक सफल होता है।
तुलसी के पौधे के सामने और समीप बैठकर किया गया धर्मकृत्य, विशेषतः जप अधिक प्रभावी होता है।
तुलसी से समीप विविध रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु नहीं आ पाते। आस-पास का क्षेत्र भी कीटाणु रहित हो जाता है। वायु शुद्ध होती है। सात्विक भावों को स्वाभाविक रूप से संचार होता है। अतः मनःशुद्धि व स्वास्थ्य लाभ होते हैं।
गाय के दही (ताजा) में 35-40 श्यामा तुलसी (न मिले तो सामान्य तुलसी) मसल कर सुबह शाम सेवन करने से 40-60 दिन में कैंसर नष्ट हो जाता है।
घनी आबादी वाले बड़े शहरों में वृक्षारोपण द्वारा प्रदूषण रोकना सम्भव नहीं है (स्थानाभाव) ऐसे शहरी क्षेत्रों में गमलों में तुलसी लगाकर रखने से घर तक शहर का वायु-प्रदूषण दूर किया जा सकता है।
तुलसी की चाय रोज पीने से मलेरिया कभी नहीं होता।
(गताँक से जारी)
प्रत्येक व्यक्ति जाग्रत अवस्था में कुछ न कुछ सोचता, कल्पनाएँ करता रहता है। कभी कोई एक बात मन में आती है, दूसरे ही क्षण कोई दूसरी, फिर कोई और। इधर से उधर निरन्तर उछलकूद करता हुआ यह उच्छृंखल मन थकता नहीं । मन से यदि पूछा जाय कि दिन भर की इस लगातार परिश्रम से तुमने क्या-क्या प्राप्त कर लिया, कौन सी सफलताएँ हाथ लगीं, तो उस तरंगी के पास बताने के लिए सार्थक कुछ भी न होगा। चंचल मनःस्थिति के कारण, अथवा परिस्थिति के दबाव के कारण अथवा विचार करने की कला से अनभिज्ञ होने के कारण अधिकाँश व्यक्तियों का मानस ऐसी ही धमाचौकड़ी से भरा होता है। यह निरुद्देश्य अपरिणामी विचार-तरंग है।
इससे विपरीत प्रकृति की यह व्यवस्था है कि व्यक्ति की स्वीकृति पाकर ही कोई बाहरी वस्तु उसके भीतर प्रवेश कर सकती है। स्वीकृति पाकर भोजन मुँह में जाता है तो चबाने से लेकर पेट में अम्लों की प्रतिक्रियाओं तक से गुजरना पड़ता है है। इन सबके बाद ही वह रक्त बनकर व्यक्ति के शरीर का, अस्तित्व का एक भाग बन पाता है। किसी विचार तरंग को जीवन का, व्यक्तित्व का एक भाग बनाना हो तो उसे भी पाचन क्रिया जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। किसी विचार का विश्लेषण कर उसे अच्छी तरह का विश्लेषण कर उसे अच्छी तरह से सभी दृष्टिकोणों से समझ लिया जाता है। फिर अनुपयोगी अंश को हटाकर उसके सार-भाग पर, सारगर्भित निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है। यह उद्देश्यपूर्ण परिणामी प्रक्रिया ‘मनन’ है।
मनन उच्छृंखल विचारणा नहीं है। स्वाध्याय जैसी अति महत्वपूर्ण क्रिया के पश्चात् सम्पन्न किये जाने वाले मनन में विचार क्रमबद्ध व प्रगतिशील होते हैं, निर्धारित दिशा मेँ दूर तक और गहराई तक जाते हैं और किसी निष्कर्ष अथवा निर्णय अथवा प्रेरणा पर निश्चय ही पहुँचते हैं।
मनन का सामान्य अर्थ गम्भीरतापूर्वक विचार करना है। स्वाध्याय के संदर्भ में मनन का अर्थ है “अपने विगत जीवन तथा वर्तमान जीवन का गम्भीरतापूर्वक अवलोकन करना और अपने व्यक्तित्व के स्तर को ऊपर उठाने की प्रेरणा देना।” अतः मनन उद्देश्यपूर्ण विचार करने की शैली हैं । मनन स्थूल हानि-लाभों को महत्व नहीं देता।
व्यक्ति की मानसिकता तथा गतिविधियाँ उसके जीवन एवं व्यक्तित्व पर बुरा-भला कैसे प्रभाव डाल रही हैं, यह खोजना उसके लिए अधिक महत्वपूर्ण है। वह उन दुष्परिणामोँ का चित्रण करता है जो किसी हीन मनोवृत्ति अथवा भ्रष्ट आचरण के कारण प्राप्त हो सकते हैं। वह उन सत्परिणामों का भी चित्रण करता है जो किसी श्रेष्ठ जीवन-नीति व रीति को अपनाने पर सम्भावित है। अर्थात् मनन निम्रता के विरुद्ध सचेतक तथा श्रेष्ठता के प्रति प्रेरक है। अतः सामान्य विचारधारा की अपेक्षा मनन के उद्देश्य, पद्धति तथा कार्यक्षेत्र अधिक व्यापक हैं- मनन भटके मन का ध्रुवतारा है।
वह खोजकर्ता व सचेतक भी है। इस नाते उसे हमारे जीवन की सामान्य गतिविधियों तथा विचारणाओं से लेकर परम गोपनीय तथ्यों तक को देखने व परखने की स्वतंत्रता।
हम उसे अपने भीतर गहराई तक जाने ही इसलिए देते हैं कि वह हमें अन्तस् का असली चेहरा दिखा दे।
प्रत्येक परिस्थिति में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना उसकी प्रकृति है, हितकारी प्रेरणा देने उसकी पद्धति है, और दिशा बोध कराना उसका उद्देश्य है।
अतः वह हमारा शुभाकाँक्षी है। उसकी परख की हम अपेक्षा नहीं कर सकते।
हम सभी ने अपने भीतर जो मान्यताएँ और विचारधाराएँ बना रखी हैं, उनमें से आधी से अधिक भ्रान्त, अनुपयुक्त और दोषपूर्ण होती हैं। उन्हें पहचानना और उनसे उबरना मनन है।
यह भी भ्रान्त धारणा है कि भीतर दबी कालिखों को उजागर करके मनन अपने ही प्रति हीन भावना उत्पन्न करेगा। स्वाध्याय के समान मनन भी उत्तम वैद्य है। वह न तो हीनता की भावना जगाता है न ही निकृष्टता की। शारीरिक असंयम से दूषित पर्यावरण में रहने से शरीर का रोगी हो जाना स्वाभाविक है। मानसिक असंयम से, चारों ओर संव्याप्त दूषित वातावरण से मन का मैला हो जाना, बुद्धि का भ्रष्ट हो जाना भी स्वाभाविक है। मनन गहरे उतर कर मानस में उन मनोवृत्तियों, दृष्टिकोणों तथा आदतों की खोज करता है जहाँ यह दोष उपजते और पोषण पाते हैं और वैसे ही कर्मों के रूप में दैनिक जीवन में दिखाई देते हैं। दोष यदि और गहरे पैठ गये हों तो भाव-क्षेत्र हृदय का निकृष्ट हो जाना भी उतना ही स्वाभाविक है। अन्तस् के दोषों से मुक्त होने के इच्छुक साधक को मनन करते समय अपने दोष सहज भाव से स्वीकार कर लेना चाहिए। उत्तम वैद्य के समान मनन तब धैर्य बँधाता है। मानसिक एवं भावात्मक स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने की आकाँक्षा जगाता है, राह बताता है और उस पर चलने की हितकारी प्रेरणा देता है।
विवेक के सामने दोषों को स्वीकार कर लेने से अपने वर्तमान आचरणों व मनोभावनाओं के प्रति ग्लानि होगा स्वाभाविक है, ग्लानि होनी भी चाहिए। दोष स्वीकार करना और ग्लानि का होना दोषों से मुक्त होने की इच्छा का लक्षण है, अतः दोनों आवश्यक हैं। यह ग्लानि हीनता की भावना उत्पन्न नहीं करती। वह तो अपनी ही अनुचित मानसिकता के विरुद्ध उठी प्रबल प्रेरक शक्ति (मोटिवेटिंग फोर्स) है। वह इस निम्न स्थिति में परिवर्तन लाने का संकल्प जगाती है। वह मानो कहती है, “निकृष्ट व्यक्ति वह है जो फिसलता है, कीचड़ में गिरता है, गिरकर वहीं पड़ा रहता है। निकृष्ट वह नहीं है जो कीचड़ से निकल कर तत्काल उठ खड़ा होता है और कीचड़ पोंछता है। उठो ! जागो ! अभी भी समय है अब सचेत रहना।” ऊर्जा भरी यह ग्लानि तब मनन के निष्कर्षों को कार्यान्वित कराने लगती है। तभी सुधार प्रारम्भ हो जाता है।
मनन का दूसरा पक्ष भी ऐसा ही प्रेरक व उत्साहवर्धक है। स्वाध्याय दोषों की ही नहीं, श्रेष्ठताओं की भी जानकारी देता है। तो उत्साहित हुआ मनन इन श्रेष्ठताओं के मूल को भी इन्हीं मनःक्षेत्र तथा भाव-क्षेत्र में खोजता है। जैसे बाह्य जगत में आदि कोई व्यक्ति मानव सेवा का कार्य कर रहा है तो इसका कारण उसके मन की परहित वृत्ति है। यह श्रेष्ठ-वृत्ति यदि उसके मन में गहरे समा गई है, यदि उसे बार-बार उसके मन को परहित चिन्तन की ओर खींच ले जाती है, तो इसका कारण यह है कि वह परमार्थ वृत्ति भाव क्षेत्र हृदय में स्थित ‘उदारता’ से निरन्तर पोषण पा रही है। मनन इस परिहित वृत्ति और उदारता की भावना का अवलोकन और मूल्याँकन करता है, उन पर यदि स्वार्थ अथवा यश की कामना की धूल जमने लगी हो तो सचेत करता है निखार आ रहा हो तो प्रसन्नता और सन्तोष व्यक्त करता है मनन व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार इन श्रेष्ठताओं की ओर बढ़ाने की सम्भावना ढूंढ़ता है। महामानवों के जाज्वल्यमान उदाहरण प्रस्तुत कर और आगे बढ़ने का प्रोत्साहन देता है और इस अनुग्रह के लिए सर्वोच्च सत्ता तथा गुरुसत्ता के प्रति कृतज्ञतापूर्वक नमन अर्पित करता है। मनन सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है, अतः वह श्रेष्ठता के साधक का विश्वसनीय साथी है।
मनन का तीसरा पक्ष उन श्रेष्ठताओं से संबंधित है जो यद्यपि अभी साधक में नहीं है किन्तु जिन्हें अपने व्यक्तित्व में अधिक निखार लाने के लिए विकसित किया जाना चाहिए। ऐसी श्रेष्ठताओं के विकास में क्रियापरक मनन बहुत सहायक होता है। क्रियापरक मनन यह खोज करता है कि अमुक श्रेष्ठता के विकास के लिए हृदय में किस भाव का जाग्रत होना आवश्यक है। इस भाव को जाग्रत करने के लिए मानस में किस वृत्ति का सुदृढ़ निर्माण करना अनिवार्य है, तथा ऐसी मनोवृत्ति निर्मित करने के लिए दिनचर्या में कौन से कार्य तथा व्यवहार अधिक से अधिक अभ्यास में लाने होंगे ? इस प्रकार के क्रियापरक मनन नवीन श्रेष्ठ कार्यों को आरम्भ करने का उत्साह जगाते हैं, व्यक्तित्व को विकसित करने का अवसर बढ़ाते हैं तथा अन्ततः जीवात्मा की उच्चतर स्थिति प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। अतः क्रियापरक मनन को बल और पोषण देने के लिए सत्साहित्य अध्ययन को अपने नित्य कर्म में सम्मिलित करना प्रगति के प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति के लिए बहुत हितकारी सिद्ध होगा।
‘हमारा युग निर्माण सत्संकल्प’ जीवन योग की साधना की श्रेष्ठतम सामग्री है। इसका स्वाध्याय व मनन परिजन नित्य किया करें। चाहें तो उसका एक ही पद चुन लें। उसके संदर्भ में गम्भीरतापूर्वक विचार किया करें कि इस पद में लक्ष्य क्या है और हम कैसा जीवन जी रहे हैं, यह हमारे ही विकास का प्रश्न है। अतः अपनी जीवन शैली में कौन सा परिवर्तन किस प्रकार से करना हमारे लिए सम्भव है। यह मनन प्रतिदिन हम करें। निश्चय ही यह अभ्यास स्वभाव एवं व्यक्तित्व के विकास में अति हितकारी सिद्ध होगा।
स्वाध्याय - मनन की जोड़ी हीनताओं को हटाने, न्यूनताओं को पूरा करने तथा श्रेष्ठताओं को बढ़ाने में सक्रिय योगदान दे सकती है। हमारी नियमितता और निष्ठा उसके साथ जुड़ी हो तो वह अत्यन्त सन्तोषप्रद प्रगति की अनुभूति अनिश्चय ही करा सकती है।
मनन मनोमय कोश की उच्चस्तरीय साधना है। यह कोश की शुद्धि का सबसे प्रधान एवं सबसे महत्वपूर्ण साधन है कि मस्तिष्क में अधिक से अधिक समय तक श्रेष्ठ विचारधारा प्रवाहित होती रहे। अतः इस साधना के इच्छुकों को अपनी रीति-नीति को परिमार्जित करना होगा। हीन श्रेणी के जिन विचारों ने मनोभूमि पर अधिकार कर रखा है, मनन द्वारा उसकी सफाई करनी होगी। व्यक्ति के खुले तथा गोपनीय जीवन में झाँक करने वाला मनन दोषों को हटाने व श्रेष्ठताओं को बढ़ाने का प्रमुख प्रेरणा स्रोत है। उसमें विलक्षण ऊर्जा व क्षमता है। यदि साधक निष्पक्ष भाव से और ईमानदारीपूर्वक मनन द्वारा यह खोजने और स्वीकार करने का साहस कर सके कि अमुक कार्य को करने का उसका असली उद्देश्य क्या था ? उस समय उसकी मनोवृत्ति क्या चल रही थी, क्या सुझाव दे रही थी? हृदय में कौन सी इच्छा जागी हुई थी ? ईश्वर, समाज और स्वयं की दृष्टि में क्या यह सब उचित माना जा सकता है, अथवा इन मनोभावों में सुधार की आवश्यकता है, तब मन उस सत्यनिष्ठ साधक को क्रमशः उस स्थान तक पहुँचा देने की क्षमता रखता है, जहाँ से मनोमय कोश के विकास का राजमार्ग प्रारम्भ होता है। इस उपलब्धि में ‘चिन्तन’ की प्रभावशाली प्रक्रिया ‘मनन’ का बहुत सहयोग करती है।
लोकसेवी को दूसरों से संपर्क करते समय, उन्हें सत्प्रेरणाएँ प्रदान करते समय निन्दा आलोचना से हमेशा बचना चाहिए। हो सकता है वह आलोचना सुधार की भावना से की गयी हो, पर सुनने वाले के मन पर उसकी उलटी ही प्रतिक्रिया होती है। वह उसे अपना अपमान समझने लगता है और बैर को बाँध लेता है। जैसे किसी से कहा जाय “ आप बड़े गलत आदमी है ऐसे काम क्यों करते हैं ? “ तो उस वाक्य में व्यक्ति के प्रति घृणा की भावना की व्यक्त होती है। कहने वाला भले सदाशयी हो पर वह अपने मन में शत्रुता की गाँठ बना लेगा। यदि सुधार की भावना से कहना था तो यों कहना ज्यादा ठीक रहता कि- “इस काम में तो हानियाँ हैं। ये दोष हैं, ये दुष्परिणाम हैं। आपने भूल के कारण ऐसा कर लिया भविष्य में बचें तो अच्छा है, ताकि इससे होने वाली हानियाँ न उठानी पड़ें।” आवश्यक लगने पर इस भूल को सुधारने के लिए मार्गदर्शन भी दिया जा सकता है।
लेकिन ऐसे सुझाव भी किसी के सामने दिये जायँ तो वह भी सुनने वाले को ठेस पहुंचाएंगे इसलिए निन्दा आलोचना तो की ही न जाय, सुधार के उद्देश्य से त्रुटियाँ भी अकेले एकाँत में जहाँ लोकसेवी और वह व्यक्ति ही हो ऐसे स्थान पर ही बतायी जायँ। निन्दा आलोचना से बचते हुए समीक्षा और सुझाव एकान्त में दिये जायँ पर प्रशंसा-सराहना करने का कोई भी अवसर हाथ से न जाने दिया जाय। सेवा कार्यों में जो भी व्यक्ति कोई सहयोग देने के लिए आते हैं, उनमें अच्छे तत्वों की, परमार्थ निष्ठा की मात्रा रहती ही है। प्रशंसा करने पर-व्यक्ति के कार्यों और उसकी निष्ठा को सराहा जाने पर उसे उन अच्छे तत्वों के विकास की प्रेरणा मिलती है, प्रशंसा सबके सामने की जाय, पर उस प्रशंसा के साथ यह सतर्कता रखी जाय कि कहीं प्रशंसित व्यक्ति में मिथ्याभिमान न आने लगे।
अनावश्यक प्रशंसा से व्यक्ति में मिथ्याभिमान भी उत्पन्न होता है और वह प्रशंसा चापलूसी के स्तर की बन जाती है। प्रशंसा और चापलूसी में वही अन्तर है जो अमृत और विष में। प्रशंसा से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है और वह अपना उत्कर्ष करने की ओर बढ़ने लगता है जबकि चापलूसी व्यक्ति में मिथ्याभिमान जगा देती है जो उसे पतन के गर्त में धकेल देती है और दिग्भ्रमित कर देती है। प्रशंसा और चापलूसी की एक कसौटी है। जब किसी व्यक्ति के गुणों को सराहा जाता है, उसके कार्यों के साथ ही उसकी निष्ठा भावना को भी सम्बोधित किया जाता है तो वह प्रशंसा होती है। उसे साधारण से साधारण व्यक्ति भी यह अनुभव करने लगता है कि हमें इन गुणों के कारण प्रशंसा मिल रही है अतः इन गुणों का विकास करना चाहिए। चापलूस व्यक्ति के स्वर में प्रायः हीनता का भाव रहता है तथा वह जिसकी प्रशंसा की जा रही है उसकी तुलना उसी स्तर के व्यक्ति से भी करता है और तृतीय पुरुष को हर दृष्टि से घटिया सिद्ध करने की चेष्टा करता है।
प्रशंसा से प्रोत्साहन तो मिले पर उसके कारण अहंकार न जागे इसलिए प्रशंसित व्यक्ति की न किसी से तुलना की जाय और न ही उसके दोषों को गुणों के रूप में बखान किया जाय। इस तरह की प्रशंसा व्यक्ति को अभीष्ट दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
कमियाँ और विशेषताएँ सभी में होती हैं स्वयं लोकसेवी भी पूर्णतः निर्दोष या समस्त विशेषताओं से युक्त नहीं होता। अपनी कमियों को हम जिस प्रकार दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, साथ ही यह भी पसन्द नहीं करते कि उनकी चर्चा सार्वजनिक रूप से हो, उसी प्रकार कोई भी अपनी कमजोरियों को सार्वजनिक रूप से चर्चित होना या सबके सामने सुनना पसन्द नहीं करता। जहाँ तक हो सके अपनी ओर से उन्हें व्यक्तिगत लक्ष्य कर न कहा जाय तो ही अच्छा रहता है। सामान्य सिद्धान्त के रूप में उनका विश्लेषण अलग बात है, अन्यथा व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी के रूप में उनकी चर्चा करना सम्बन्धित व्यक्ति के मन में कटुता उत्पन्न कर देता है। कार्यकर्ताओं को अपने दोषों को सुधारने के साथ गुणों के विकास की दिशा भी देनी चाहिए। उन गुणों के विकास को सबके सामने प्रोत्साहन दिया जाय तो लोकसेवी की सुधार चेष्टा में और भी प्रखरता आ जाती है।
जन संपर्क के समय शिष्ट और शालीन व्यवहार तथा प्रशंसा और प्रोत्साहन के साथ-साथ लोकसेवी को चर्चा संवाद में धैर्यवान भी होना चाहिए। लोकसेवी को निश्चित रूप से लोगों तक अपनी बात पहुँचानी है, व एक सन्देश लेकर पहुँचता है पर लोग उसे अपने प्रतिनिधि तथा मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। इसलिए वे अपनी समस्याओं और कठिनाइयों को उसके सामने रखना चाहते हैं और लोकसेवी से यह आशा करते हैं कि वह उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनेगा, उसकी कठिनाइयों पर ध्यान देगा तथा उनका समाधान सुझायेगा। इस जन-अपेक्षा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए तथा न ही अपनी बात कहने के लिए उतावलेपन से काम लिया जाय। लोकसेवी जन सामान्य के पास एक सन्देश लेकर पहुँचता है, सन्देश सुनाया जाय, अपनी बात कही जाय पर कहने की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब सुनने वाला सुनने के लिए तैयार हो।
प्यार और अपनत्व को पाकर सहज ही कृतज्ञता और कृतृत्यता की अनुभूति होती है। विगत दिनों की अस्वस्थता के दौरान अपना मन भी परिजनों की संवेदना के अमृत सिंचन से इन्हीं भावों में भीगता रहा है। अब तक हजारों की संख्या में प्राप्त पत्रों और टेलीफोन सन्देशों में आत्मीय परिजनों की व्याकुलता, चिन्ता और तरह-तरह की आशंकाओं की झलक मिलती रही है। इसके समाधान में पहले तो कुछ दिनों तक यही उचित समझा गया कि उनमें से हर एक को व्यक्तिगत पत्र लिखकर शंका का समाधान कर दिया जाय और उनकी संवेदना से अभिभूत अपने मनोभावों को उन्हें बता दिया जाय लेकिन जब पत्रों का अम्बार बढ़ता चला गया तो मिशन की ओर से प्रति मास प्रेमी स्वजनों को भेजी जाने वाली ‘पाती’ अखण्ड ज्योति में अपने उद्गारों को व्यक्त करना एक विवशता बन गयी।
पीड़ा भी प्रभु का वरदान है। पहले इस कथन की यत्किंचित् अनुभूति ही हुई थी। लेकिन विगत डेढ़ मास में इस तत्व की कहीं अधिक सघन और ठोस अनुभूति करने को मिली। पीड़ा के इन क्षणों में चेतना के आवरण प्याज के छिलकों की भाँति एक के बाद एक करके उतरते चले गए जिन्दगी अनुभूतियों का पिटारा है, कड़वे कसैले, मृदु-सुस्वादु सभी तरह की अनुभूतियों से भरे क्षण-हरेक की जिन्दगी में आते हैं। अथवा यों कहें कि जीवन इन मनोरम और डरावनी पगडंडियों से गुजरता है। उसे गुजरने के लिए मजबूर होना पड़ता है। एक ही हमें अभिलाषा रहती है दूसरे से हम कतराना चाहते हैं। एक प्रिय लगता है दूसरा अप्रिय। यह सब आखिर क्यों ?
इन सवालों का जवाब मुझे इन्हीं दिनों मिला। यों पिछले ढाई वर्षों से मुझे पीठ के नीचे दर्द की तकलीफ थी, किन्तु किसी तरह गुरुसत्ता के आशीर्वाद से काम चलता रहा एवं अश्वमेध/मिशन के विस्तार का कार्यक्रम प्रथम पूर्णाहुति तक सरलता पूर्वक सम्पन्न होता रहा। इस बीच शरीर पर अत्यधिक दबाव पड़ने के कारण मार्च-अप्रैल माह में डिस्क प्रोलेप्स तकलीफ बढ़ने के कारण दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भरती होना पड़ा इसी दौरान अनेकों की अनेकों तरह की शंकाएं उभर कर आयीं। “जिनके काम में आप दिन-रात व्यस्त रहते हैं। वे समर्थ प्रभु आपको बिना किसी बाहरी सहायता के स्वस्थ क्यों नहीं कर देते ?” आप जैसे नजदीकी एवं अनन्य शिष्य पर यह आकस्मिक आपत्ति क्यों ? इन सवालों के ढेरों बौद्धिक उत्तर मेरे पास थे। अपने व्यापक अध्ययन के दौरान पढ़े गए अनेकानेक घटना प्रसंगों की स्मृति भी मुझे थी जिनका उल्लेख करके शंकाओं का समाधान सम्भव था। पर वह तो मात्र बौद्धिक कुशलता होती। जबकि मेरा हृदय समाधान के उन स्वरों को खोज रहा था, जो सम्बोधि की गहराई में पनपे हों।
तभी 13 अप्रैल को आपरेशन का क्षण आ गया। सवा आठ बजे प्रातः चिकित्सक के एनेस्थीसिया देने के साथ ही मेरा मन अवचेतन में विचरण करने लगा। ऑपरेशन और एनेस्थीसिया के मेरे पूर्व अनुभव भी हैं । लेकिन अबकी बार खासियत यह रही कि चेतना अवचेतना में खोई नहीं, उसने धीरे-धीरे अचेतन की परतें पर कर लीं। अतिचेतन का प्रवेश द्वार खुल गया। गम्भीर शान्ति नीरवता व प्रकाश के साम्राज्य में परम पू0 गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी की वात्सल्य बिखेरती मनोहर छवियाँ मेरे सामने थीं। वाणी और शब्दों से परे भावों का आदान-प्रदान होता रहा। प्रश्न मिट गए, शंकाएँ जाती रहीं। इस गहरी समाधि की सी दशा में वह सब कुछ अनुभव हुआ जिसे हजारों लाखों पुस्तकों से भरे पुस्तकालय में खोज पाना असम्भव था।
मीरा के विषपान एवं ईसा की सूली के रहस्यों का खुलासा हुआ। भक्तों-सन्तों एवं धार्मिक लोगों के कष्ट पूर्ण जीवन का भेद समझ में आया । यह बात पता चली कि चेतना के उन्नत स्तर पर छलाँग लगाने के लिए जीवात्मा किस तरह स्वयं को कष्ट में डालती है। इसके साथ ही शरीर और मन की प्रकृति के बारे में बहुत सारे नये तथ्यों का पता चला जो मेरे जैसे चिकित्सा वैज्ञानिक के लिए भी अलौकिक एवं अनूठे थे। ज्ञान के इस खजाने को हासिल करने के साथ ही बाह्य जगत के प्रति सचेतनता आयी बेहोशी जाती रही। तकरीबन साढ़े पाँच घण्टे की आपरेशन की व उसके बाद की अवधि बहुत ही आश्चर्यकारी अनुभूतियों को अपने में समेटे रही।
जीवन की सामान्य क्रियाएँ तो आपरेशन के तुरन्त बाद ही शुरू हो गयीं थीं। आठ दिन बाद ही दिल्ली के इस अपोलो अस्पताल से शान्ति कुँज की वापसी भी हो गयी। 3 से 6 माह तक बिस्तर पर ही लेटे रह काम करते रहने का चिकित्सकों का निर्देश भी मिल गया। इतने बंधनों के बाद भी मन अपने आराध्य की स्मृति में अभी भी पुलकित एवं प्रफुल्लित है। महात्मा कबीरदास की वाणी कितनी सार्थक है-
गुरु कुम्हार सिष कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहाय दै, बाहर मारत चोट॥
हमारी खीज, असन्तुष्टि, शिकायतें सम्भवतः इसीलिए बनी रहती है क्योंकि बाहरी चोटों की ओर तो हमारा ध्यान जाता है लेकिन आन्तरिक सहायता करने वाले उसके करुणा से भरे हाथों की ओर हम नहीं देखते। अपनी दृष्टि चोटों की ओर कम और उनके हाथों के स्नेह भरे स्पर्श की ओर अधिक टिकी रही।
ऐसा लगा कि बुरी से बुरी परिस्थितियाँ भी यदि प्रभु का वरदान समझकर स्वीकारी जा सकें, उनका उचित उपयोग किया जा सके, तो वे ऐसा कुछ दे जाती है, जिसे दे पाना अच्छी से अच्छी परिस्थितियों के बूते की बात नहीं। हाँ ऐसा करने के लिए हमें गुरु सत्ता पर परमात्म सत्ता पर प्रगाढ़ विश्वास करना होगा। विश्वास मन का एक बहकाव मात्र भी नहीं है। विश्वास एक ऐसी वस्तु है, जो हमारे हृदय में रहती है। हृदय से ही ईश्वर का वास है। विश्वास के सहारे ही उसका सान्निध्य सुलभ है। इसी सान्निध्य के कारण घनीभूत पीड़ा तमाम सारी विस्मयकारी अनुभूतियों का वरदान मुझे दे गयीं। यदि पाठक चाहेंगे तो ज्ञान की इस सम्पदा को समय-समय पर आपस में बाँटते रहेंगे। अभी तो इतना ही कहने का मन है-
सुख के माथे सिल पड़े, नाम हृदय से जाय। बलिहारी वा दुःख की, पल-पल नाम रटाय॥
-प्रणव पण्ड्या
एम॰ जी0 एम॰ मेडिकल कालेज, इन्दौर (म0प्र0) में प्रबुद्ध वर्ग के समझ मई, 1970 में दिया गया उद्बोधन पाठकों के लिए प्रस्तुत है। यह बौद्धिक सन्देश ही आगे चलकर ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का मूलभूत आधार बना; - पढ़ें।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ--
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।
मित्रो ! विकास क्रम में आज हम कहाँ जा पहुँचे हैं, आइये जरा इस पर विचार करें। विज्ञान के इस युग में आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व का व्यक्ति आदि कहीं हो और वह आकर हमारी इस दुनिया को देखे तो कहेगा कि यह कितने अचंभे की दुनिया है, यह भूत-पलीतों की दुनिया है। यदि वह सड़कों पर, रेल पटरियों पर जायेगा तो वहाँ से भाग खड़ा होगा, क्योंकि लोहे की पटरियों पर भागने वाली रेलगाड़ियाँ और आसमान में उड़ने वाले हवाई जहाज पुराने जमाने के लोगों के लिए अचंभे की बातें थीं। दिल्ली से बोलने वाला व्यक्ति इन्दौर में बैठे हुए व्यक्ति से ऐसे बातें करता है जैसे वह सामने ही बैठा हो। आज के इस विज्ञान की प्रगति के क्या कहने ? उसने टेलीविजन से लेकर न जाने क्या-क्या बना लिया है। एक जमाना था जब तीर कमान से लड़ाइयाँ लड़ी जाती थीं और जब आदमी के शरीर में तीर चुभ जाता था तो उसे निकालने के लिए घोड़े की पूँछ से रस्सी बाँध दी जाती थी और घोड़े को भगा दिया जाता , तब कहीं जाकर तीर बड़ी मुश्किल से शरीर में से बाहर निकलता था। व्यक्ति बच गया तो बच गया - मर गया तो मर गया। पुराना जमाना था। आज मेडिकल साइंस ने - सर्जरी की साँस ने न जाने क्या से क्या चमत्कार दिखा दिये शरीर के भीतर की चीजें दिखाने से लेकर निकाल बाहर करने तक के कितने चमत्कार विज्ञान ने कर दिखायें हैं। यह मनुष्य की बुद्धि का चमत्कार है- विज्ञान का चमत्कार है। यह हमारा जमाना वैज्ञानिक चमत्कारों का जमाना है।
पिछली शताब्दियों में मनुष्य ने जो विकास किया उसकी तुलना में आज की दुनिया कुछ मायने में बहुत आगे है। संसार के बारे में कहा जाता है कि इसको बने हुए दस लाख वर्ष हो गये । इन दस लाख वर्षों में ऐसा वक्त कभी नहीं आया जैसा कि आज हमारे और आपके सामने सुख और सुविधाओं से भरा हुआ है। टेक्नालॉजी और बौद्धिक दृष्टि से हमारा युग और समय कितना प्रगतिशील और समृद्धिशाली है, कहा नहीं जा सकता। पिछले दिन प्रगति के दिन तो नहीं थे, अवसाद के दिन थे, लेकिन गिरावट के दिन तो नहीं ही थे। मनुष्य इतना नीचे कभी भी गिरा नहीं था जितना कि वह आज गिरता हुआ चला जा रहा है। शरीर की दृष्टि से इतना खोखला वह कभी नहीं हुआ जितना कि आज हो गया। आज हमारे लिए एक मील चलना भी मुश्किल हो जाता है। सवारी अगर हमारे पास न हो तो हम किस तरीके से चल सकते हैं ? अपनी अटैची और होल- डाल लेकर किस तरीके से स्टेशन से घर तक पहुँच सकते हैं ? यह बहुत मुश्किल है हमारे लिए। हमारे बुजुर्ग कैसे थे ? मैंने अपने नाना जी को आँख से देखा था जब वे चालीस मील तक सफर करते थे और पूर्णमासी के दिन गंगाजी नहाने जाया करते थे। उन्होंने जवानी के दिनों से ही ये कसम खायी थी कि मैं पूर्णमासी के दिन गंगा जी नहाने अवश्य जाया करूंगा। चालीस मील दूर हमारे गाँव से गंगा है। हमारे नाना जी सबेरे सफर करने के लिए निकलते थे और रात में ही गंगाजी जा पहुँचते थे। सबेरे स्नान किया और वहाँ से रवाना होकर चालीस मील दूर शाम को घर आ जाते थे। अस्सी मील का दो दिन का यह सफर आज हमारे लिए मुश्किल है, आज हम नहीं चल सकते। शारीरिक दृष्टि से हम दुर्बल होते हुए चले गये।
दांपत्य जीवन जिसमें कि सुख और सौभाग्य की गरिमाएँ रहती थीं; और संतोष की धाराएँ बहती थीं; जहाँ एक-दूसरे के प्रति निष्ठा और विश्वास का क्या कहना। रामायण में एक प्रसंग आता है जब लव-कुश ने देखा कि हनुमान जी और लक्ष्मण जी अश्वमेध के घोड़े को लिए चले जा रहे हैं तो उन्होंने पूछा आप लोग कौन हैं ? उत्तर मिला मैं लक्ष्मण हूँ और मैं हनुमान हूँ। उन्होंने कहा- आप वही लोग हैं जिन्होंने हमारी माँ को जंगल में वनवास में अकेला और असहाय छोड़ दिया था। लक्ष्मण ने आँखें नीची कर लीं। बच्चों ने कहा अच्छा तो हम अब आपको इसका मजा चखाते हैं। बस लव-कुश ने हनुमान जी को पकड़ लिया और उनकी पूँछ पेड़ से बाँध दी। लक्ष्मण जी को भी पकड़ा और एक रस्सी से पेड़ से बाँध दिया और माँ के पास गये। माँ से कहा-माँ ! तो यही वे आदमी हैं जिन्होंने आपको जंगल में अकेला छोड़ दिया था। माँ ! हम इनको अब मजा चखाते हैं। माँ ने कहा-नहीं बच्चों ! ये तुम्हारे पिता के भाई हैं और तुम्हारे पिता के प्रति मेरी कितनी गहन निष्ठा है, तुम नहीं जानते मुझे वनवास में किस लिए छोड़ा गया ? संसार के इतिहास में दाम्पत्य जीवन के आदर्श उपस्थित करने के लिए। तुम्हारे लिए यह मुनासिब नहीं कि अपने बुजुर्गों का अपमान करो, इनको छोड़ देना चाहिए। राम ने जब मुझे वनवास भेजा था तब भी उनका मन-मेरा जीवन, मेरा स्वरूप और मेरे आदर्श विश्व के सामने एक अभूतपूर्व उदाहरण रखते का था। उन्होंने कष्ट उठाये तो क्या, पर पुराने जमाने के दाम्पत्य जीवन की आज के हमारे दाम्पत्य जीवन के तुलना नहीं हो सकती। आज जिसकी आग में सारा विश्व जल रहा है। यूरोप जल चुका, अमेरिका जल चुका और वही आग धधकती हुई हमारे हिन्दुस्तान की तरफ बढ़ती चली आ रही है। रूप का भूखा मनुष्य, धन का भूखा मनुष्य, सेक्स का भूखा मनुष्य, दाम्पत्य जीवन के महान आदर्शों को भूलता हुआ चला जा रहा है और सारी दुनिया में एक तहलका मचता चला जा रहा है। श्मशान के तरीके से मनुष्य जलता चला जा रहा है। हर वक्त लम्बी चौड़ी प्रेम की चिट्ठी लिखी जाती रहती है और लम्बे चौड़े आश्वासन दिये जाते रहते हैं लेकिन यकीन नहीं होता किसी स्त्री को कि छः महीने बाद हमारे गृहस्थ जीवन का क्या होगा? इसी तरह किसी मर्द को यकीन नहीं होता कि छः महीने बाद हमारे गृहस्थ का क्या होगा ? लम्बे-चौड़े प्रेम-पत्रों को लिखे जाने के बावजूद हर मनुष्य इतना अशान्त होता हुआ चला जा रहा है।
अमेरिका जैसे सम्पन्न देश में जहाँ हमारे बच्चे भाग करके वहाँ न जाने क्या-क्या सीखने जाते हैं। वहाँ की जितनी प्रशंसा की जाय कम। लेकिन वहाँ का दांपत्य जीवन व गृहस्थ जीवन इतना जटिल और घटिया होता चला जा रहा है। आदमी के मस्तिष्क पर टेन्शन ही टेन्शन सवार रहता है। सारी रात वहाँ आदमी को चैन नहीं पड़ता । ट्रेंक्युलाइजर की गोलियाँ खाकर लोग रात गुजारते हैं। ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, डायबिटीज न जाने क्या-क्या बीमारियाँ घेरे रहती हैं। खाने की चीजों का ठिकाना नहीं। मेरा एक मित्र है, कहता है- हम पानी नहीं पीते, यहाँ बराबर फलों के जूस की बोतलें आती रहती हैं और सारे दिन हम पानी की जगह पर फलों का जूस पीते रहते हैं। पहले आदमी सूखी रोटी खाकर के सुख चैन की साँस लिया करता था और विश्वास दिलाया करता था कि हम सुखी लोगों में से हैं, पर अब हमारा दाम्पत्य जीवन न जाने कैसा है ? हमारे गृहस्थ जीवन में न जाने कैसी लग गई आग? हमारे बच्चे अभिभावकों के प्रति जैसे निष्ठावान होने चाहिए थे, नहीं हैं। अब श्रवण कुमार की सिर्फ कहानियाँ है। ये चाहें तो आप पढ़ सकते हैं ; चाहें तो आप सुन सकते हैं। आपको श्रवण कुमार देखने का सौभाग्य अपने घर में अब नहीं मिल सकता। आपको रामायण काल की कहानी किताब में पढ़नी चाहिए, पर आपको ये उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि आपके घर में बच्चे राम और सीता जैसे हों। पर पिता का मन संदेह से भरा हुआ पड़ा है कि हमारे पाँच बच्चे हैं लेकिन बड़े होने पर न जाने क्या होगा ? हमारा सामाजिक जीवन, राष्ट्रीय जीवन, हमारा आर्थिक जीवन कितना जटिल और कितना जकड़ा हुआ बनता चला जा रहा है। विज्ञान की प्रगति के बावजूद, धन की प्रगति के बावजूद इनसान के लिए एक अजीब समस्या उत्पन्न होती चली जा रही है। इसे आपको समझना पड़ेगा, इस पर विचार करना पड़ेगा कि ऐसा आखिर क्यों है ?
मित्रो ! आप लोगों के ऊपर, नई पीढ़ी के ऊपर वो जिम्मेदारियाँ आ रही हैं, आयेंगी और आनी चाहिए। आप लोगों को व्यक्तिगत जीवन, राष्ट्रीय जीवन, सामाजिक जीवन और आर्थिक जीवन की कठिनाइयों को हल करना पड़ेगा। आप लोगों में से अधिकाँश को वह रोल अदा करना पड़ेगा जो कि राष्ट्रीय जीवन और व्यक्तिगत जीवन को विकसित करने के लिए किया जाना चाहिए। जिम्मेदारियाँ अपनी जगह पर रहेंगी और इसके लिए श्रम बहुत करना पड़ेगा। आज राष्ट्र के सामने, व्यक्ति के सामने अनेकानेक समस्यायें हैं, जो यह कहती हैं कि हमको हल किया जाय। किस तरीके से हल किया जाय मैं आपको एक छोटा का फार्मूला देकर जाना चाहता हूँ। आप लोगों में से किसी आदमी को खासतौर से विद्यार्थियों को अगले दिनों कुछ जिम्मेदारियों के वजन अपने कंधे पर उठाने पड़ेंगे और आप लोगों को वे काम करने पड़ेंगे जो कि राष्ट्र निर्माताओं को करने पड़े हैं। तब आपको किस आधार पर व्यक्ति का निर्माण, समाज का निर्माण, राष्ट्र का निर्माण और आज की उलझी हुई समस्याओं को हल करने के लिए क्या करना होगा ? इसके लिए एक फार्मूला यह है कि व्यक्ति को अपने अन्तःकरण में प्रवेश करना पड़ेगा। समस्याओं के हल बाहर नहीं, बल्कि भीतर तलाश करने पड़ेंगे। समस्याएँ बाहर से पैदा नहीं होतीं। समस्यायें भीतर की हैं और बाहर दिखायी पड़ती हैं। आदमी अपने भीतर से समस्याएँ पैदा करता है और बाहरी जीवन में वे केवल प्रस्तुत हो जाती हैं। मेरे भीतर एक रूह काम करती है। मेरा एक तार काम करता है। वही काम कर रहा है भाषण वही दे रहा है, पुस्तकें उसी ने लिखी हैं, समाज के नव निर्माण के ख्वाब उसी ने देखे हैं। बाहर जो भी क्रिया-कलाप आप देखते हैं वह बाहर का नहीं है मेरे भीतर के अंतरंग-चेतना के हैं। समस्याओं के बारे में भी यही बात है। बीमारियाँ भी बाहर से दिखाई पड़ती हैं, बुखार बाहर से आया मालूम पड़ता है, खाँसी बाहर से खाँसने में दिखाई पड़ती है पर वस्तुतः वह भीतर से पैदा होती है।
समस्यायें वे उलझनें हैं जिन्होंने हमारे राष्ट्र को, समाज को, व्यक्ति को और सारे विश्व को जकड़ कर रखा है। ये हमारे भीतर से पैदा हुई है। मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूँ कि जब आपको इनके समाधान ढूँढ़ने पड़े तो सिर्फ आपको बाहर की ओर ही नहीं, भीतर की ओर भी गौर करना चाहिए कि मनुष्य का व्यक्तित्व और समाज का अंतरंग कहीं गड़बड़ तो नहीं हो गया। यदि गड़बड़ हो तो उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। समाज की और व्यक्ति की उलझी हुई समस्याओं को हल करने के लिए बाहरी उपचार करना ही काफी नहीं है। इलाज की सामग्री ढूंढ़ी जानी चाहिए, रिसर्च की जानी चाहिए कि दवाइयों के द्वारा बीमारियों से छुटकारा कैसे पाया जाय ? आदमी की सेहत को कैसे अच्छा बनाया जाय ? लेकिन आपको ये भूलना नहीं चाहिए कि अंतरंग जीवन अगर सुव्यवस्थित न हो सका तो हमारे स्वास्थ्य की समस्या नहीं हल हो सकेगी।
सेण्डो का नाम आपने सुना होगा जिसकी की सैण्डोकट बनियान अक्सर पहनी जाती है। अपने जमाने में वह यूरोप का एक ख्यातिप्राप्त पहलवान हुआ है। एक समय था जब पहलवानों में सेण्डो का नाम पहले लिया जाता था। अब तो दूसरे लोग भी हो गये हैं। बचपन में वह बीमार रहा करता था- सर्दी-जुकाम से पीड़ित रहा करता था। अपने पिता के साथ एक दिन वह म्यूजियम देखने गया। वहाँ पहलवानों की तस्वीरें देखकर पूछा-पिताजी क्या मैं भी पहलवान बन सकता हूँ ? पिता ने कहा हाँ ! ये सुनकर जिज्ञासा भरे स्वर में सैण्डो ने कहा - पिताजी बताइये हमको पहलवान बनने, मजबूत बनने के लिए क्या करना चाहिए ? उन्होंने कहा- बेटे मजबूत के सारे आधार, दीर्घ जीवन के सारे आधार मनुष्य के भीतर सन्निहित हैं, पर आदमी इस चीज को भूल गया। आदमी अगर अपनी भूलों को सुधार सके तो बेहतरीन स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है। बेटे ! हमने अपना पेट खराब कर डाला। खुराक से ज्यादा खाकर और वे चीजें खायीं जो हमारे मुनासिब नहीं थीं। इन्द्रियाँ हमारे लिए काम करने को थीं, पर हर इन्द्रिय के भीतर से हमने अपनी शक्ति का इतना हिस्सा खर्च कर डाला जितना कि पैदा नहीं होता था। हमने अपने दिमाग को इस तरीके से चिन्ताओं से, दूसरी चीजों से उलझाये हुए रखा कि हमारे स्वास्थ्य को नियंत्रित करने वाला नर्वस सिस्टम अस्त व्यस्त हो गया। हम इन तीन बुराइयों को अगर दूर कर सकें तो लम्बी जिन्दगी जी सकते हैं और कोई भी आदमी पहलवान बन सकता है। पिताजी ! हमें दवा खाने की जरूरत नहीं है ? उन्होंने कहा- नहीं बेटा दवाएँ तो सिर्फ बीमारियों को ठीक करने के लिए हैं। ये टेम्पोरेरी एनर्जी दे सकती हैं। किसी आदमी को मजबूत व दीर्घजीवी बनाने के लिए दवाएं कारगर सिद्ध नहीं हो सकतीं। अगर दवा कारगर रही होतीं तो जितने भी डाक्टर हैं वे दूसरे लोगों का इलाज करने से पहले अपना इलाज करते और जन सामान्य से बेहतरीन एवं पहलवान दिखायी देते। सैण्डो ने स्वास्थ्य के उन नियमों का जिनको मैं अध्यात्म का अंश कहता हूँ पालन किया और पहलवान बना।
आप इसको संयम कहिए। शब्दों से क्या होता है ? मुझे उसको अध्यात्म कहने दीजिए। जुबान का संयम , इन्द्रियों का संयम, मस्तिष्क की विचारधाराओं का संयम, उठने-बैठने का संयम और अपने आहार-विहार का संयम, अगर आदमी इतना कर सकता हो, तो उसकी सेहत ठीक की जा सकती है। पुराने जमाने में डॉक्टर भी नहीं थे। तब तो कोई-कोई हकीम जड़ी-बूटी, नीम की पत्ती और काली मिर्च बताने वाले ही पाये जाते थे। इन्हीं से बीमारियाँ अच्छी हो जाती थीं। इन सारी वजहों में एक वजह ये है कि आदमी अपने आपको खोखला बनाता हुआ चला जा रहा है। आप नई पीढ़ी के लोगों में से संभव है किसी को राष्ट्र का स्वास्थ्य मंत्री बनना पड़े। तो मैं आपसे एक निवेदन करके जाना चाहता हूँ कि चाहे आप अस्पताल खुलवाना, मेडिकल साइंस पर रिसर्च कराना, पर ये मत भूलना कि आदमी के स्वास्थ्य का मूलभूत आधार संयम ही होता है ? जिसको हमने कई बार आध्यात्मिकता कहा है और पुराने लोग पुकारते थे- संयमशीलता ! संयमशीलता लोगों को सिखायी जानी चाहिए। बेहतरीन स्वास्थ्य और स्वास्थ्य की समस्या का हल निश्चित रूप से इस बात पर टिका हुआ है कि आदमी अपने आहार-विहार, इन्द्रियों और दिमाग के इस्तेमाल, पेट के इस्तेमाल के बारे में, पुनः जाने, इनको ठीक तरीके से काम में लायें। आप लोगों को कभी स्वास्थ्य मंत्री बनना पड़े तो मेरे इस छोटे से नाचीज फार्मूले को याद रखना।
एक अन्य दूसरी बात की ओर भी मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ कि हमारे कहने के अनुसार प्लानिंग की जाय और इसकी एक योजना बनायी जाय और हर आदमी को सिखाया जाय कि आपको गृहस्थ बनने से पहले सौ बार विचार करना चाहिए कि आप बच्चों की जिम्मेदारी उठाने में समर्थ हैं या नहीं। आप अपनी पत्नी को वह स्नेह और प्यार देने में समर्थ हैं, जिसके आधार पर वह नन्हा सा फूल नन्हा सा पौधा, जो आपके अन्दर वह योग्यता है क्या ? इंसान की खुराक अनाज नहीं, रोटी नहीं, दूध नहीं, ये सिर्फ जिस्म की खुराक है। आदमी जिस्म नहीं है। आदमी में शरीर के अलावा भी एक चीज है- जिसको जीवात्मा कहते हैं और रूह कहते हैं और वह जीवात्मा प्रेम की मुहब्बत की प्यासी है। प्रेम और मुहब्बत धर्मपत्नी को नहीं मिल सके तो उसकी प्रतिक्रियाएँ लत होती चली जायेंगी और हमारे घरों में वह निष्ठाएँ पैदा न हो सकेंगी जो कि छोटे-छोटे घरोंदों को छोटे-छोटे किराये के मकानों को ऐसा बेहतरीन बनाती हैं जिस पर स्वर्ग न्यौछावर किया जा सके। दो आदमी का स्नेह एक और एक मिलकर ग्यारह हो सकते हैं। राम और लक्ष्मण मिलकर दो नहीं थे एक और एक ग्यारह थे। जानदार चीजें एक और एक दो नहीं होती, एक और एक मिलकर ग्यारह होती हैं- अगर उनके भीतर निष्ठाएँ हों और एक-दूसरे के प्रति वफादारी हो। हमारे दाम्पत्य जीवन- हमारे गृहस्थ जीवन गरीबी में भी सुख के आधार बन सकते हैं और एक दूसरे से इतना प्रसन्न-संतुष्ट रह सकते हैं इसका कोई ठिकाना नहीं।
यूरोप में एक गरीब दम्पत्ति थे। विवाह का दिन आने वाला था। दोनों एक-दूसरे को उपहार देने के इच्छुक थे, पर साधन कैसे जुटायें ? पति के दिमाग में बहुत दिनों से ख्वाब था कि अपनी स्त्री के सुनहरे रेशम जैसे बालों के लिए सोने की क्लिप लाकर दूँ और पत्नी का मन था कि विवाह के दिन अपने पति की घड़ी के लिए सोने की चेन लाकर दूँ, लेकिन दोनों की जेबें खाली थीं। स्त्री बालों के व्यापारी की दुकान पर गयी और बाल बेचकर घड़ी की चेन खरीद लाई। उधर उसका पति अपनी घड़ी बेचकर क्लिप खरीद लाया। विवाह का दिन आया तो पति ने पत्नी से कहा, “हम आपके लिए सोने की क्लिप लाये हैं पर आपने सिर पर रुमाल क्यों बाँध रखा है ? इसे खोलिए हम आपके बालों में क्लीप लगायेंगे।” पत्नी बोली हम आपके लिए घड़ी की चेन लाये हैं लेकिन आज आपके हाथ पर ये रुमाल कैसे बंधा है ? दोनों ने एक- दूसरे के रुमाल खोले तो देखा कि बाल कटे हुए हैं और कलाई खाली। एक के हाथ में चैन ; दोनों की आँखों में वफादारी और एक-दूसरे के प्रति निष्ठा के आँसू बहने लगे। भाइयों, जिन लोगों में इस तरह की भावनायें- निष्ठायें हैं, वहाँ हम यही कह सकते हैं कि दाम्पत्य जीवन में स्वर्ग आ गया।
एक और अभी थोड़े दिनों पूर्व झाँसी की घटना है। एक आदमी का विवाह हुआ बीबी घर में आयी और तीन महीने स्वस्थ रही। उसके बाद उसे टी0 बी0 हो गयी, भगवान की माया ! बाईस साल तक वह स्त्री जिन्दा रही। टी0 बी0 से हालात ऐसी हो गयी थी कि उस को करवट लेना तक मुश्किल हो गया था। लेकिन उसके पति का एक ही काम था। आफिस जाने से पहले स्त्री को नहलाना, कपड़े साफ करना, सिर में कंघी करना, शाम को आकर फिर घर का सारा काम करना, उसका सारा का सारा समय उसी में चला जाता था। मित्रों ने कहा- आप सिनेमा नहीं जाते ? उसने कहा- हमारी बीबी बीमार है और मैं उसकी सेवा वफादारी से करता हूँ। इससे अधिक संतोष कहाँ मिल सकता है। सिनेमा में क्या है जिसे देखकर चैन और खुशी प्राप्त हो सके। उसमें भी तो हम यही देखने जाते हैं कि हमारा दाम्पत्य जीवन खुशहाल कैसे हो ? मेरी कर्तव्यपरायणता देखकर जब उसकी आँखों में से आँसू की बूँदें ढुलक पड़ती हैं तो मैं तो ये समझता हूँ कि ये हीरे मोती से ज्यादा बड़े उपहार है और जब उसकी हालत देखकर मेरी आँखों में मुहब्बत के आँसू छलक उठते हैं तो वह समझती है कि स्वर्ग उस पर न्यौछावर हो गया ?
साथियों ! पारिवारिक जीवन की सुख-शान्ति शक्ल सूरत पर नहीं टिकी है, ये तो आदमी की सीरत पर टिकी है, ये तो आदमी की सीरत पर टिकी हुई है। मनुष्यों को कहिए जब आपको विवाह करना पड़े तो सूरत देखने की अपेक्षा सीरत और रंग देखने की अपेक्षा उसकी भावनाओं को देखना पसंद करें। अपने साथी का ‘कष्ट’ ढूँढ़ने की अपेक्षा गुण-कर्म और स्वभाव ढूँढ़ना पसंद करें। अगर आप को बच्चों के निर्माण की राष्ट्रीय जिम्मेदारी उठानी पड़े, अगर आपके पास मुहब्बत है तो आप बच्चे पैदा करने से पहले यह भलीभाँति समझ लें कि बच्चे के विकास के लिए खुराक काफी नहीं हैं बोर्नविटा काफी नहीं हैं, अच्छे कपड़े काफी नहीं हैं स्कूलों के जलखानों में भेज देना काफी नहीं है। इन जलखानों में बच्चे सिर्फ एटीकेट सीख सकते हैं। कपड़े की क्रीज कैसे खराब हो जाती है ? कैसे ठीक रखी जा सकती है, ये सभ्यता और शिष्टाचार सीख सकते हैं, पर उनका भावात्मक विकास नहीं हो सकता ? क्योंकि जिन माँ- बाप के मनों में परिवार के प्रति, एक दूसरे के प्रति प्यार-मुहब्बत और आदर्श कर्तव्यनिष्ठा भरी है, उनके व्यवहार से ही बच्चे में भावनात्मक विकास हो सकता है। आज परिवारों में इनका अभाव है। इंग्लैण्ड और अमेरिका में ऐसे बहुत सारे बच्चे पैदा होते हैं जिन्हें मां - बाप संभालने की स्थिति में नहीं होते और उन्हें अनाथालय में भर्ती करा दिया जाता है। सरकार उनको बेहतरीन शिक्षा , बेहतरीन खुराक देती है। फिर भी प्यार- मुहब्बत की कमी से उनका भावनात्मक विकास नहीं हुआ। इसीलिए जो सरकारी अनाथालयों में पाले गये, उनमें से कोई भी बच्चा राष्ट्र का कर्णधार नहीं हो सका, कोई भी महापुरुष नहीं हुआ, कोई लेखक-कवि नहीं हुआ। अधिकाँश आदमी उनमें से फौजी होते हैं। ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने मुहब्बत को नहीं पिया। आदमी को मुहब्बत पिलायी जानी चाहिए, खासतौर से बच्चों को, बोर्नविटा नहीं !
मुहब्बत अगर हम पिला सकते हों तो हमारे बच्चे बेहतरीन राष्ट्र निर्माण के लिए कितने उपयोगी और व्यक्ति के लिए कैसे उपयोगी बन सकते हैं, इसका एक छोटा सा उदाहरण मैं आपको सुनाता हूँ। विनोबा भावे की माँ को अपने बच्चे भी पालने पड़े और अपने पड़ोसी का एक बच्चा भी। उनकी पड़ोसिन एक बच्चा दे गयी और कह गयी थी कि अब हम दुनिया से जा रहे हैं, मेरे बच्चे का तुम पालन करना। विनोबा भावे की माँ उस बच्चे का भी पालन करने लगी उसको वे घी से चुपड़ कर गरम-गरम रोटी खिलाती थी और अपने बच्चों को सूखी और बासी रोटी। विनोबा ने एक दिन अपनी माँ से पूछा माँ ! हम बच्चे एक जैसे हैं फिर तुम फर्क क्यों करती हो, एक गर्म रोटी खिलाती हो और एक को ठण्डी। एक को घी की, एक को बिना घी वाली । इस फर्क का क्या कारण है ? हम बच्चे हैं तो एक जैसा खाना क्यों नहीं देतीं ? माँ ने कहा बेटे ये मेरी पड़ोसिन का बच्चा है, इसलिए ये भगवान का बच्चा है। तु मेरा बच्चा और तेरे साथ मेरी ममता जुड़ी हुई है, और इसके साथ भगवान की जिम्मेदारियाँ जुड़ी हुई हैं। क्योंकि एक माँ अपने बच्चे को मेरी गोद में सौंप कर गयी थी, सो भगवान के बच्चे के लिए जो करना चाहिए मैं वही इसके साथ करती हूँ। मुहब्बत से भरी विनोबा की माँ उस बच्चे का पालन करती रही, उनने स्वार्थ को नहीं देखा। विनोबा जी की जीवन कथा में लिखा है कि सुबह के वक्त जब माँ चक्की पीसती थी, मैं उनके पास जाता था और मुझे भूख लग आती थी तो जो चने वे पीसती थीं, उसी को खाकर रह जाता था। विटामिन ए, विटामिन बी और विटामिन सी प्राप्त नहीं कर सके विनोबा जी। लेकिन भोजन के साथ-साथ वह खुराक खाते रहे जो कि इनसानी खुराक है- मतलब मुहब्बत ! अगर आपके पास वह मुहब्बत है तो आपको बच्चे पैदा करने चाहिए, बच्चों के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए अन्यथा नहीं ! ईसा मसीह से एक आदमी ने पूछा आपने भगवान देखा है ? उन्होंने कहा- हाँ, तो दिखाइये। ईसा एक छोटा बच्चा उठाकर ले आये, और बोले यही भगवान है। इसका मन निर्मल, भावनायें निश्छल हैं, काम, क्रोध, मद मोह, मत्सर इत्यादि बुराइयों से यह बचा हुआ है। जो इनसान इन बुराइयों से बचा हुआ है। जो इनसान इन बुराइयों से बचा हुआ है उसे भगवान होना चाहिए और इनसान के रूप में भगवान देखना हो तो ये बच्चा है।
बच्चों के पालन के लिए जो निष्ठायें और वफादारी होनी चाहिए थीं, वह हमारे पास नहीं हैं। यही कारण है कि हमारे बच्चे बागी हो गये। बच्चा बैठा था इन्तजार में कि पिताजी आयेंगे, बन्दर-भालू और खरगोश की कहानियाँ सुनाएंगे, गोदी में लेंगे, कंधे पर बिठाएंगे, घुमाने ले जायेंगे और पिताजी साइकिल से आये। बच्चे दौड़े पापा आ गये, किसी ने पायजामा पकड़ा किसी ने कुर्ता और उछलने लगे और पत्थर जैसे हम बच्चों को डांटने फटकारने लगे- भागों यहाँ से सारे कपड़े गन्दे कर दिये। बच्चे सहम कर माँ की गोद में छिप गये सोचा शायद माँ आँखों के आँसू पोंछ देगी। पिता ने कहा- इन शैतानों को संभालो, हमें सिनेमा जाना है, क्लब जाना है। जिन बच्चों ने स्नेह पाया ही नहीं, उनका विकास कैसे होगा ? हम शिकायत करते हैं बच्चे अनुशासनहीन है, कहना नहीं मानते, बुजुर्ग की इज्जत नहीं करते और मास्टरों को धमकाते हैं, युनिवर्सिटी के शीशे फोड़ देते हैं और यह नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे बेचारे। छोटेपन से यही देखा और सीखा है। इस रोकने की जिम्मेदारी मास्टरों, अध्यापकों की नहीं, वरन् उन लोगों की है जिन्होंने बच्चे पैदा किये, किन्तु उससे पहले ये नहीं सोचा कि हमारे पास मुहब्बत नहीं है तो भगवान को क्यों बुलाएं। ये विचार करना चाहिए था कि लोहे के दिल, पत्थर के दिलवाले, हम विलासी और कामी व्यक्ति बच्चों की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते। ऐसे लोगों को यह कहना चाहिए कि भावी नागरिकों को महापुरुषों के रूप में विकसित करना चाहते हों और ये चाहते हों कि हमारे देश के नागरिक महान बनें, ओजस्वी बनें, शक्तिवान बनें, नेता बनें और महत्ता एवं महिमा को लेकर प्रकट हों तो उनके लिए दौलत जमा करना काफी नहीं है, बल्कि उनमें गुणों का विकास ही वह प्रमुख तत्व है जो छोटे और गरीब आदमियों को दुनिया की निगाहों में अजर अमर बना सकता है। छोटे घरों में पैदा हुए मनुष्यों को बादशाह बना सकता है, ऊँचे पदों पर पहुँचा सकता है।
राजस्थान में हीरालाल शास्त्री नाम के 45 रुपये मासिक वेतन पाने वाले एक संस्कृत के अध्यापक हुए हैं। 26 वर्ष की उम्र में उनकी का देहान्त हो गया। लोगों ने कहा- दूसरी शादी कर लीजिए। उन्होंने कहा- पहली पत्नी की सेवा और वफादारी का तो कर्ज चुका नहीं पाया और आप लोग दूसरी शादी की बात करते हैं। वे नौकरी छोड़कर अपनी पत्नी के गाँव में चले गये और निश्चय किया कि इस गाँव की एक लड़की ने मेरी सेवा-सहायता की, मैं इस गाँव की सेवा करूंगा और कन्या पाठशाला खोलने के इरादे से गाँव की लड़कियों को एक पेड़ के नीचे पढ़ाने लगे। कुछ लोगों ने मजाक भी उड़ाया पर वे अपनी निष्ठा पर अडिग रहे। यह देख गाँव के भले लोगों ने छप्पर डाल दिया, बच्चियाँ पढ़ने लगीं। लोगों ने सोचा जो आदमी कष्ट मुसीबतों को सहकर दूसरों की सुविधा और राष्ट्र की प्रगति, गाँव की प्रगति के लिए काम कर रहा है, उसका नाम इनसान के रूप में भगवान होना चाहिए। फिर क्या था- रुपया-पैसा, सोना-चाँदी, लोहा-सीमेंट भागते चले आये और उस स्थान पर वनस्थली नाम का विद्यालय बनकर खड़ा हो गया। हिन्दुस्तान में यह महिला विश्व विद्यालय पहले नम्बर का है जिसमें हवाई जहाज उड़ाने से लेकर स्कूटर चलाने तक और विभिन्न विषयों का प्रशिक्षण दिया जाता है। स्वाधीनता के बाद जब पहली गवर्नमेंट बनायी गयी तो इन्हीं हीरालाल शास्त्री को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया। मनुष्य का आध्यात्मिक विकास इस बात में नहीं कि उसके पास धन कितना है, अय्याशी और विलासिता के साधन कितने हैं ? ये मनुष्य की महानताएँ या प्रगति की निशानियाँ नहीं है। प्रगति की निशानियाँ आदमी के अंदर की हिम्मत और जीवट है जिसके आधार पर आदमी सिद्धान्तों का पालन करने में समर्थ हो पाता है।
कोरिया के एक किसान याँग का नाम सुना है आपने ? जिस तरह हमारा यहाँ गाँधी जी की तस्वीरें घरों में अंगी रहती हैं, दक्षिण कोरिया में याँग की तस्वीर टंगी रहती हैं। नयी फसल जब तैयार होकर आती है तो पहले याँग की पूजा होती है और बाद में अनाज का उपयोग किया जाता है। 1821 में जब कोरिया में अकाल पड़ा उस बुरे समय में लोग भूखों मरने लगे। याँग ने अपने बच्चों और बीबी को बुलाकर कहा- देश में पन्द्रह बीस लाख लोग भूख से तड़प कर मर रहे हैं, हमारे पास अनाज है जिसे खाकर हम जिंदा रह सकते हैं लेकिन अगले वर्ष वर्षा हुई और अगर बीज न मिल सका तो सारे का सारा कोरिया मनुष्यों से रिक्त हो जायगा इसलिए अनाज खाने की अपेक्षा बीज के लिए रखा जाय। अनाज के कोठे को बन्द करके सरकारी बैंक की सील लगवा दी और कहा- वर्षा होने पर जब बीज की जरूरत पड़े तभी इसे खोला जाय। बीबी बच्चों सहित पांचों प्राणी भूखों मर गये वर्षा होने पर बीज को बोया गया और याँग वहाँ का देवता बन गया क्योंकि उसने अपने स्वार्थ और हविश का त्याग किया था।
महानताएं सिखायी जाती हैं, बड़प्पन नहीं। अमीरी नहीं महानता। हमें लोगों के मस्तिष्क बदलना चाहिए। अगर राष्ट्र को महान बनाना हो, व्यक्ति को महान बनाना हो, राष्ट्र को समर्थ और मजबूत बनाना हो तो हमको लोगों से यह कहना चाहिए कि पहले हर व्यक्ति स्वयं बदले, अपने परिवार को बदले तब अपने आस-पास के परिकर को बदले। दुनिया बदल रही है- सुधर रही है, ऐसे में हम कैसे बच सकते हैं ? हमको महत्वाकाँक्षायें नहीं, जगानी चाहिए। आज आदमी के भीतर महत्वाकांक्षा भड़क गयी है। हर आदमी महत्वाकाँक्षी है और बड़ा आदमी बनना चाहता है- अमीर बनना चाहता है। मैं खुशहाली और अमीरी के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन मैं यह कहता हूँ कि अमीरी ही काफी नहीं है। अमीरी के साथ-साथ मनुष्य के भीतर जो महानताएं प्रसुप्त पड़ी हैं, उन्हें भी जगाया जाना चाहिए जैसे इंग्लैण्ड के नेलसन एवं जापान के गाँधी कागावा ने अपने भीतर से जगायी थी।
नेलसन इंग्लैण्ड की सेना में एक सामान्य सिपाही था, किन्तु जब उसने देखा कि उसके देश की सेनायें बुरी तरह दुश्मनों के हाथों पिट रही है तो वह अपने अफसरों के पास गया और बोला- सिपाहियों को बन्दूकें ही काफी नहीं हैं। सिपाहियों में जोश, देशभक्ति की भावना ही विजय दिलाती है। यह काम मुझे सौंपा जाय। बड़े अफसरों ने उसे यह काम सौंप दिया और नेलसन जिस निष्ठा के साथ, देश भक्ति के साथ जिस उमंग के साथ लड़ा वे उमंगें हमने भारतीय सैनिकों में पाकिस्तान के साथ लड़ाई के समय देखी है जो टैंकों से टकराने में भी पीछे नहीं रहे और अपनी जान की बाजी तक लगा दी। नेलसन ने यही किया। उसने अपने सीने पर बम बाँधे और दुश्मनों के टैंकों के सामने आ गया। टैंक द्वारा उसे कुचला गया। लेकिन टैंक भी बमों के धमाके के साथ उड़ गये। घायल एवं लहु लुहान नेलसन जब खड़े होने योग्य नहीं रह गया तो उसने अपने आपको एक पेड़ से बँधवा लिया और अपनी सेना का मार्गदर्शन करने लगा। शरीर से , फेफड़े से खून के फव्वारे छूट रहे थे, फिर भी वह मोर्चे पर डटा रहा। इंग्लैंड जब जीत गया तो खुशियों का समाचार नेलसन के कान में सुनाया गया, तो उसने कहा- अब मुझे मरने में कोई डर नहीं, मेरी मौत खुशी का उपहार है। अब मैं शान्ति के साथ अपनी अच्छाई के साथ मरूंगा और इतना कहकर उसने अंतिम साँस ली।
इसी तरह कागावा ने अपना पेट काट
कर बीमारों, भिखारियों, अपाहिजों, कोढ़ियों और शराबियों की दशा सुधारने में सारा जीवन खपा दिया। जैसे हिन्दुस्तान में गाँधी जी की तस्वीरें हर जगह टंगी हुई मिलेंगी, वैसे ही जापान के हर घर में कागावा का चित्र टंगा हुआ मिलेगा। जैसे हर हिन्दुस्तानी बच्चे को गाँधी जी का नाम मालूम है, वैसे ही जापान के हर नागरिक को कागावा का नाम मालूम है। इसलिए मालूम है कि उसने देश के पिछड़े लोगों के लिए सारी जिन्दगी जद्दोजहद की। कागावा का नाम अजर-अमर हो गया। इंग्लैण्ड का हर नागरिक कृतज्ञता के भावों से भरा हुआ है नेलसन के लिए और जापान का कागावा के लिए, कोरिया का हर नागरिक कृतज्ञता के भावों से भरा हुआ है याँग के लिए। यही महानता है।
भाइयों, हमें महत्वाकाँक्षाओं को भूल जाना चाहिए और मनुष्य के भीतर उन्नति की भावना, महानता की भावना विकास करनी चाहिए- अमीरी की नहीं, अय्याशी की नहीं। कारण अमीरी आदमी के अंदर व्यसन पैदा कर देती है और उनके बच्चों को चोर बना देती है। आदमी को बीमार बना देती हैं और साथ ही सामाजिक जीवन में दुष्ट परम्परायें कायम हो जाती हैं। अतः इस बात को हमें और आपको जानना चाहिए। अगर आपको स
अपने परिवार द्वारा घोषित तीन अनिवार्य पर्वों को भक्ति-पर्व, शक्ति-पर्व तथा ज्ञान-पर्व की संज्ञा दी गयी है। उनमें से गायत्री -जयन्ती भक्तिं-पर्व के रूप में हमारे सामने आ रहा है। इस वर्ष गायत्री-जयन्ती 28 मई 1996 को पड़ रही है। यह पर्व प्रज्ञा-परिवार के उक्त प्रमुख पर्वों में से एक है। यों तो अपने देश और में अनेकानेक पर्व-त्यौहार प्रचलित है। प्रत्येक को मनाने का अपना ढंग है और उन सभी में अति महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ तथा शिक्षायें भरी पड़ी है। देश , काल और मात्र के अनुरूप आवश्यक सभी को हो सकती है, परन्तु उन सभी को एक सार्वदेशिक- सार्वभौमिक आन्दोलन के रूप में नहीं लिया जा सकता । सुविधा और आवश्यकता की दृष्टि से प्रज्ञा परिवार ने जिन प्रमुख पर्वों पर विशेष रूप से आयोजन कर मनाने का निश्चय किया है तथा उनमें से जिन तीन महा पर्वों को अनिवार्य मानकर प्राथमिकता दी गयी है, गायत्री -जयन्ती उनमें से एक है।
प्रज्ञा-परिजनों ने उपरोक्त तथ्य को न केवल स्वीकार ही किया वरन् उसे व्यवहार में लाने तथा क्रियान्वित करने में ही कम तत्परता नहीं बरती। पर्वायोजनों का उद्देश्य ही लोकमानस में कुछ विशेष शिक्षाओं और प्रेरणाओं को उभारना है। इस दृष्टि से गायत्री-जयन्ती का अपना अलग विशेष महत्व है- विशिष्ट शिक्षण है- विशिष्ट संदेश है जिसे समझना चाहिए-समझाया जाना चाहिए तथा अंगीकार भी किया जाना चाहिए।
पौराणिक प्रतिपादन के अनुसार सृष्टि के आदि में ब्रह्मा ने जिस शक्ति की साधना की और विश्व-निर्माण तथा उसके संचालन करने में उपयुक्त सक्षमता, ज्ञान, विज्ञान और अनुभव प्राप्त किया, उसी का नाम गायत्री है। इसी शक्ति के बल पर आदि से वर्तमान पर्यन्त सृजन और अभिवर्धन की यही प्रक्रिया चलती चली आ रही है। उस शक्ति को दूसरे शब्दों में आत्मबल भी कहा जाता रहा है। गायत्री-महामंत्र की साधना का सर्वोपरि सत्परिणाम है भी आत्मबल और वह जिसमें जितनी अधिक मात्रा में विद्यमान होगा, वह गायत्री महाशक्ति का श्रेष्ठ उपासक माना जायेगा। गायत्री-महामंत्र से वे संभावनायें कैसे साकार हो सकती है, और क्या प्रक्रिया पद्धति है इसकी साधना की -इसका स्पष्ट और विस्तृत विवेचन तो गायत्री महाविज्ञान में ही पढ़ा जा सकता है। यहाँ कहने का प्रयोजन इतना भर है कि गायत्री का सम्बल पकड़ कर उस शक्ति को सहज ही अर्जित किया जा सकता है।
गायत्री -जयन्ती के साथ ही एक और भी महत्वपूर्ण पर्व जुड़ा हुआ है- “गंगा-जयन्ती”। कहते हैं कि इसी दिन भगवती गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। राजा सगर के साठ हजार पुत्र अपने कुकर्मों के फलस्वरूप अग्नि में जल रहे थे। उनके कष्टों का निवारण गंगा जल से ही किया जा सकता था। उन्हीं सगर के वंशज भागीरथ ने निश्चय किया कि मैं गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाऊँगा और वे इस निश्चय को पूरा करने के लिए कठोर तप साधना में लग गये। अपने लिए नहीं, साठ हजार सगर पुत्रों के लिए। इस तप साधना में तो भागीरथ को किंचित भी स्वार्थ नहीं था, अतः उनके निःस्वार्थ परमार्थ प्रयोजन को देख कर स्वर्ग में रह रही गंगा का हृदय पसीजा। ऐसे निःस्वार्थ और परमार्थ परायण प्रबल संकल्पी का पुरुषार्थ देखकर वह धरती पर आ गयी पर उन्हें धारण कौन करे ? उसके लिए पात्रता चाहिए। इस कठिनाई को भगवान शंकर ने हल कर दिया और उनकी जटाओं में गंगा का अवतरण हुआ। सगर पुत्रों का उद्धार हुआ।
यही नहीं गंगा भूमि को सींचती हुई तृषित प्राणियों की प्यास बुझाती हुई , मलीनों को पवित्र करती हुई और अशाँतों को शान्ति प्रदान करती हुई धरती पर बह चलीं। पर्व भले ही दो मनाये जायँ, परन्तु वे दोनों हैं एक ही । गायत्री महाशक्ति के अवतरण और गंगावतरण में सूक्ष्म तथा स्थूल का ही अंतर है अन्यथा उनमें से एक को सूक्ष्म तथा दूसरे को स्थूल कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।
आत्म-शक्ति का अवतरण ठीक गंगावतरण के स्तर का है और इसके अवतरण की आवश्यकता सदैव बनी रहती है। आज के युग में तो यह और भी अधिक आवश्यक बन गया है। गंगावतरण से पूर्व तो साठ हजार सगर पुत्र ही अपने पापों की अग्नि में जल रहे थे, परन्तु आज तो स्थिति यह है कि सारा संसार ही अर्थात् 600 करोड़ मनुष्यों में से अधिकाँश ही पाप-तापों में जल रहे हैं। इन पाप-तापों से, विकृतियों और विपत्तियों की दहन-कारक ज्वालाओं में जल रहे मानव पुत्रों को शीतलता कैसे मिले ? उनका शमन कौन करे ? इन पाप-तापों, विकृतियों और विपत्तियों से आत्म-शक्ति की-ऋतम्भरा प्रज्ञा की-उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की ज्ञान-गंगा ही मुक्ति दिला सकती है। समूची मानवता कुबुद्धि और दुर्भावना ग्रस्त पतनोन्मुखी सगर -सुतों की तरह आग में जल रही है। उनका उद्धार सद्बुद्धि और सद्भावना के शीतल गंगाजल से ही संभव हो सकेगा।
परन्तु ऐसी ज्ञान-गंगा के अवतरण के लिए निःस्वार्थ , परमार्थ परायण और कर्मशील तपस्वी भागीरथों की आवश्यकता है। इस भूमिका को निभाने का दायित्व जाग्रत आत्माओं को सौंपा गया है। कहना नहीं होगा कि प्रज्ञा परिवार ऐसी ही जाग्रत आत्माओं और संस्कारवान व्यक्तियों की मणि-मुक्ता है। ज्ञान -गंगा के अवतरण हेतु ज्ञानयज्ञ की-विचार क्रान्ति की-लोकमानस में घुसी विकृतियों और विडम्बनाओं को निकाल बाहर कर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों तथा सद्गुणों के स्थापन की निष्ठा-साधना को वर्तमान युग की प्रधान तपश्चर्या माना गया है। क्योंकि जब तक ये प्रवृत्तियां सफलतापूर्वक चलेंगी नहीं, ज्ञान -गंगा के अवतरण का प्रयोजन पूरा नहीं होगा। गायत्री जयंती के इस पावन पर्व पर हममें से प्रत्येक को भागीरथ और शंकर भगवान की भूमिका निभाते हुए ज्ञानगंगा के अवतरण के लिए कटिबद्ध होने का व्रत लेना चाहिए।
लेकिन व्रत लेना मात्र ही पर्याप्त नहीं होगा। व्रत तो एक से एक बढ़िया और एक से एक श्रेष्ठतम लिए जा सकते हैं और लिए भी जाते हैं। उनका वास्तविक परिणाम तो तभी मिल सकता है जबकि कर्मठतापूर्वक लिये हुए व्रतों को पूरा करने में भी संलग्न हुआ जाय। गायत्री-जयंती के उपलक्ष में लिये गये व्रतों को पूरा करने के लिए गंगा की तरह निर्मल, निःस्वार्थ और अपने पुण्य-प्रयासों द्वारा दूसरों के कषाय-कल्मष धोना , अपना सुविधा जनक सुरम्य निवास छोड़कर मैदानों, ऊबड-खाबड़ पर्वतीय इलाकों और बीहड़ निर्जन क्षेत्रों में बहने का सत्साहस भी होना चाहिए। यह साहस करने में घाटा कुछ भी नहीं है। निरन्तर लोकमंगल के लिए अनुदान देती रहने वाली गंगा को कहाँ घाटा रहा ? गंगोत्री से तो वह एक छोटी सी धारा के रूप में निकली है और निरन्तर देते रहने के बावजूद भी बंगाल में, जहाँ वह सागर में मिली हैं, उसका हजारों गुना बड़ा स्वरूप विस्तृत हुआ है। इतना ही नहीं, इससे पूर्व जब गंगा स्वर्ग की सुख-सुविधाओं का परित्याग कर पृथ्वी पर आयी तो उसे इतने त्याग का अनुदान भी हजारों गुना मिला। उसके त्याग से हर कोई प्रभावित हुआ, हिमालय ने अपना अक्षय कोष-दे दिया, बादलों ने वारिद का आश्वासन दिया, कितने ही नदी, नद, नाले अपना अस्तित्व छोड़कर गंगा ही सत्ताओं के त्याग-समर्पण से छोटी सी धारा बनकर गोमुख से बही गंगा अंत में गंगा सागर बन गयी। यह स्पष्ट उद्बोधन है जाग्रत आत्माओं को कि लोकमंगल के लिए स्वयं को समर्पित कर देना जरा कष्ट साध्य तो है, परन्तु जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग भी यही है और इसमें हानि कुछ नहीं, लाभ ही लाभ है, पुण्य ही पुण्य है।
युग निर्माण के प्रज्ञा परिजनों को लोकमंगल की भावनायें मुखर करने तथा उसे प्रवृत्ति को अपनाने के लिए सदैव प्रोत्साहित किया जाता रहा है। उन्हें निरन्तर यह प्रेरणा दी जाती रही है और आत्मबोध कराया जाता रहा है कि युग परिवर्तन ईश्वरीय आकाँक्षा है, उसकी पूर्ति के वे माध्यम बनें तो वस्तुतः वे हैं। साधनों और सामर्थ्यों की चिन्ता नहीं करनी है पुरुषार्थ और लगन इन दो हाथों से हम जुट पड़ने का साहस कर सकें तो उसी सत्ता का सहयोग निरन्तर मिलता रहेगा जिसकी आकाँक्षा में हम निमित्त हैं और यदि इतना साहस भी हम न कर सके तो हम जैसा अभागा और कौन होगा ? सहस्राब्दियों बाद ही कभी ऐसा अवसर आता है जब जाग्रत आत्माओं को नव निर्माण का दायित्व सौंपा जाता है। यद्यपि वह ईश्वरीय आकाँक्षा है, परन्तु मानवीय सामर्थ्य का भी उपयोग किया जा सके, इस उद्देश्य से विशिष्ट व्यक्तियों को ही इस प्रयोजन की पूर्ति का माध्यम बनाया जाता है और उसे पूरा करने से कोई भी समझदार व्यक्ति चूकना, अवार गंवाना पसंद नहीं करता।
गायत्री जयन्ती के इस पुण्य अवसर पर अब जबकि अपनी भावनाओं को-भक्ति को-समर्पण को उत्कृष्टता प्रदान करने का स्वर्णिम सुयोग आ ही खड़ा हुआ तो हममें से प्रत्येक को अपनी भावनात्मक कारीगरी की गलती का परीक्षण अथवा उपयोग करना ही चाहिए। भक्ति-पर्व पर आदर्श भक्ति-भावना को जगाकर अपने शुष्क अंतःकरण को स्नेहधारा से सिंचित करने से चूकना नहीं चाहिए। यही नहीं गायत्री महाशक्ति के ज्ञान-गंगा के अवतरण को जन-साधारण के लिए भी चर्चागम्य ही नहीं अनुभूतिगम्य बनाने के लिए प्राण पण से प्रयास करना चाहिए।
कहने की आवश्यकता नहीं कि आज के समाज में विकृतियाँ कितनी गहराई तक प्रविष्ट हो गई हैं। शरीर की सामान्य चोटें ऊपरी मलहम-पट्टी से ठीक हो सकती हैं, किन्तु रक्तविकार जन्य भाव तो रक्त शोधन से ही ठीक हो सकते हैं, ऊपरी मलहम-पट्टी उसके लिए पर्याप्त नहीं। सगर पुत्रों का दाह-कष्ट गंगा के संसर्ग से ही दूर हो सकता था और इस दुर्भाग्यग्रस्त मानव समाज को भीषण दाह से मुक्ति दिलाने की सामर्थ्य गायत्री-महाविद्या में निश्चित रूप से है।
इस पर्व पर हर परिजन, हर शाखा संगठन एवं हर शक्तिपीठ-प्रज्ञापीठ को यह प्रयास करना चाहिए कि जन-जन के मानस क्षेत्र में गायत्री महाविद्या का अवतरण कराया जा सके। समझना चाहिए कि अपनी भावनाओं में प्रभावशाली ढंग से उभार लाने तथा उनके गौरवशाली उपयोग की कारीगरी में उतने ही अंशों में सफलता मिल सकी है।
स्मरण रहे कि पर्वायोजनों का प्रमुख उद्देश्य जन चेतना को जाग्रत करना तथा सही दिशा प्रदान करना है। उसके लिए धार्मिक वातावरण तथा प्रभावशाली शिक्षण आवश्यक है। अतः प्रयास यही किया जाता चाहिए कि आयोजनों में जितने भी कार्यक्रम रखे जायँ उन्हें प्राणवान बनाने का ध्यान रखा जाय, साथ ही इस संदर्भ में जो कुछ कहा जाय व्यवस्थित ढंग से कहा जाय। सब कुछ बता देने के उत्साह में सारी बात उलझ कर न रह जाये। बोलने वाले व्यक्ति और कहे जाने वाले विषयों का अभी से निर्धारण कर लिया जाये तो कार्य सुन्दर और प्रभावशाली ढंग से सुगमता पूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
गायत्री जयन्ती की तैयारियाँ यह अंक हाथ में पहुँचने तक तीव्र हो चुकेंगी। विभिन्न कार्यक्रमों के साथ पर्व का उद्देश्य और संदेश जन-जन तक पहुँचाने का लक्ष्य सभी शाखायें स्वभावतः रखेंगी ही। इसके लिए पूर्व तैयारी ठीक ढंग से कर लेनी आवश्यक है। वक्ता तथा विषय दोनों ही उपयुक्त तथा पूर्व-निर्धारित रहने से उद्देश्य भली प्रकार पूरा होगा।
गायत्री पर्व पर कहने के लिए बहुत कुछ है । गायत्री के नौ शब्द, तीन व्याहृतियां और तीन चरण कुल मिलाकर चौबीस अक्षर होते हैं। इनमें से प्रत्येक का अर्थ गायत्री महाविज्ञान तथा गायत्री सम्बन्धी वाङ्मय के सात खण्डों में दिया हुआ है। इनमें से एक-दो की व्याख्या को जानने से उससे आज के मनुष्य तथा समाज को क्या प्रेरणा मिलती है ? इसका तारतम्य बिठाया जा सके तो इस युग की किसी भी समस्या पर प्रकाश डालने की गुँजाइश निकल सकती है। इसी प्रकार गायत्री के प्रत्येक अक्षर की व्याख्या विवेचना से नवनिर्माण अभियान के प्रत्येक पहलू पर प्रकाश डाला जा सकता है।
गायत्री सद्ज्ञान की, ऋतम्भरा प्रज्ञा की, विवेकशीलता और दूरदर्शिता की देवी है। उसके तीन चरणों में यही तथ्य ओत-प्रोत है। उन्हें विचार-क्रान्ति, नैतिक- क्रान्ति और सामाजिक-क्रान्ति की त्रिवेणी के रूप में जनमानस में बिठाया जा सकता है। शास्त्रों में सूत्र ही तो होते हैं। व्याख्या करना प्रवचनकर्ता का काम है। सूत्रों पर वृत्ति किस प्रकार विस्तृत की जाय और सुनने वालों के लिए उसे प्रेरणाप्रद कैसे बनाया जाय, इसका कोई निर्धारित क्रम नहीं है। यह वक्ता की सूझ-बुझ और मनोभूमि पर निर्भर है। ग्रामोफोन के रिकार्ड की तरह एक ही तरह की तोता रटंत यह व्याख्या लोग करने लगें तो उन्हें शिक्षक भले ही कहा जाय, पर युग निर्माता नहीं कहा जा सकता। गायत्री पर्व पर बोलने वालों में इतनी समझ होनी चाहिए कि इस महामंत्र के अक्षरों और शब्दों की, उसके तीन चरणों की तथा मूल भावना की इस ढंग से व्याख्या करें कि उसमें युग-निर्माण मिशन के क्रिया-कलाप की संगति ठीक तरह बैठ जाय।
उपयोगी बात कहना कोई कठिन काम नहीं। परमपूज्य गुरुदेव की कृपा से युग निर्माण साहित्य एवं पत्रिकाओं के पृष्ठों पर इस दृष्टि से श्रेष्ठतम सामग्री जगह-जगह बिखरी पड़ी है और अब तो उन्हें वाङ्मय के रूप में संकलित भी किया जा रहा है, उन्हें पढ़कर हृदयंगम कर लेने और तात्कालिक वातावरण तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप थोड़ा पुट सिद्धान्त के साथ बोल देने में रोचकता भी बढ़ती है, साथ ही वह अधिक व्यावहारिक भी लगने लगता है। अंतः अपने मिशन के सिद्धान्तों को इसी ढंग से जनता को हृदयंगम कराने का प्रयास किया जाना चाहिए।
गायत्री महामंत्र पूजा पाठ भर का मंत्र नहीं है। उसमें मानवी-प्रकृति का हर पक्ष भली प्रकार समाविष्ट है। नारी को भगवान के रूप में मानने का प्रत्यक्ष प्रतिवादन की इतना बड़ा है कि उससे नारी को पर्दाप्रथा से-पददलित स्थिति से ऊँचा उठाकर युग नेतृत्व की क्षमता विकसित करने की योजना प्रस्तुत की जा सकती है। दहेज जैसे नारी के गले में पड़े हुए नागपाश के विरुद्ध आक्रोश उत्पन्न किया जा सकता है और भी कुछ ढूँढ़ना हो तो इन्हीं अक्षरों में सब कुछ ढूँढ़ा जा सकता है। उनमें सब कुछ मौजूद है। भावनात्मक नव निर्माण के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के सभी सूत्र इस महामंत्र में विद्यमान है। भावनात्मक , नवनिर्माण का उद्देश्य लेकर ही अपना महान अभियान चल रहा है।
गायत्री मंत्र की आध्यात्मिकता का प्रयोगात्मक रूप क्या है, इसकी व्याख्या के रूप में इस युग के विश्वामित्र परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीया माताजी के जीवन क्रम को एक सर्वांगपूर्ण शास्त्र के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। गायत्री उपासना का समय स्वरूप क्या है और उसकी सिद्धियाँ क्या अभी भी संभव है ? और वह लाभ मिले तो मिले कैसे ? इसके लिए उनके समान साधनात्मक जीवन को प्रस्तुत करते हुए अध्यात्म प्रेमियों को उस पथ का अनुकरण करने की प्रेरणा दी जा सकती है। वहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य है कि चमत्कार से किसी को कोई मार्गदर्शन नहीं मिलता। प्रायः परमपूज्य गुरुदेव की चर्चा आते ही परिजन उनके चमत्कारी पक्ष की उभारने-कहने के जोश में आ जाते हैं और समझते हैं कि इन चमत्कारी बातों से जनता जल्दी प्रभावित होगी। यद्यपि परमपूज्य गुरुदेव-परम वंदनीया माताजी के प्रति उनका अपना श्रद्धा-विश्वास एक अलग पक्ष है, पर जनता के सामने इसे कैसे प्रस्तुत किया जाय, यह अलग ही बात है। इसलिए उनके चमत्कारी पक्ष का कहीं थोड़ा बहुत संकेत मात्र आवश्यक है। अन्यथा उनके साधना पक्ष को ही उभार देना आवश्यक है। अलौकिक पक्ष उभारने से लोग उसके प्रति श्रद्धा तो व्यक्त करते हैं, पर उनका अनुसरण करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। व्यावहारिक पक्ष उभारने से लोग वैसा ही बनने और वैसा ही करने की बात सोचते हैं तथा सही अर्थों में लाभ होने लगता है। अतः जन-साधारण में प्रेरणा भरते समय इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए।
मूर्तिमान पवित्रता की देवी गंगा और भावना क्षेत्र में इन्हीं सत्प्रवृत्तियों का संचार ज्ञानगंगा-गायत्री करती है। दोनों का परस्पर सम्बन्ध-समन्वय है। गायत्री को भावना कह सकते हैं तो गंगा को क्रिया । गायत्री जब व्यावहारिक जीवन में ओत-प्रोत होती है तो व्यक्ति के क्रिया -कलाप गंगा के स्तर के ही पवित्र एवं उदात्त होते हैं। यह तथ्य यदि इस अवतरण पर्व पर समझ लिया जाय और समझने तक ही सीमित न रहकर उसे कर्मरूप में परिणत किया जाय तो व्यक्ति और समाज दोनों ही धन्य हो सकते हैं और धरती पर स्वर्ग के अवतरण तथा व्यक्ति में देवत्व के उदय का स्वप्न साकार हो सकता है।
प्रज्ञा परिजनों के लिए गायत्री जयन्ती का अधिक महत्व इसलिए भी है कि अपनी आराध्य-सत्ता की यह पुण्य जयन्ती भी है। इसी पावन पर्व पर परमपूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्म एवं कारण रूप से व्यापक होने के लिए विश्व-कल्याण हेतु स्वेच्छा से स्थूल काया का त्याग किया था। इस पावन-पर्व पर की गयी गायत्री महाशक्ति की उपासना-साधन अनन्त गुना फलदायी होती है फिर इस बार की गायत्री-जयंती तो हस्त-नक्षत्र पर पड़ रही है जो सर्वार्थ-सिद्धि प्रदान करने वाला योग है। इस वर्ष यह शुभ संयोग उपलब्ध होने से प्रत्येक प्रज्ञा परिजन इसका अधिकाधिक लाभ उठावेंगे और परम-पूज्य गुरुदेव-परम वन्दनीया माताजी द्वारा निर्देशित कार्यों को अधिक मुस्तैदी से पूरा करने में जुट पड़ने का संकल्प लेंगे और महाकाल के साथी-सहचर होने का पुण्य-गौरव अर्जित करेंगे, ऐसी आशा-उपेक्षा है।
गायत्री-महाशक्ति को मंत्रराज कहा गया है। इससे बढ़कर समूचे मंत्र-विज्ञान में कोई ऐसा मंत्र नहीं है जिसे मुकुटमणि की उपमा दी जा सके। उसका प्रादुर्भाव परब्रह्म द्वारा निस्सृत आकाशवाणी से हुआ है। ब्रह्माजी ने उसके तप से वह सामर्थ्य पाई जिससे वे जड़-चेतन सृष्टि का सृजन कर सके। भौतिक प्रयोजनों में उसे ‘सावित्री’ और अध्यात्म प्रगति के संदर्भ में ‘गायत्री’ कहा जाता है। एक ही तत्व के यह दोनों पक्ष हैं। उपयोग भेद से ही उसके दो नाम पड़े हैं। सावित्री के कल्पना चित्रों में उसके पाँच मुख बनाये जाते हैं। यह प्रकृति के पाँच तत्वों और चेतना की पाँच प्राण धाराओं का साँकेतिक उल्लेख है।
गायत्री महामंत्र में चौबीस अक्षर हैं, पर उसके साथ ही प्रणव और तीन व्याहृतियाँ लगी हुई हैं। प्रणव अर्थात् ओंकार-प्रत्येक वेदमंत्र से पूर्व लगाये जाने की सनातन परम्परा है। तीन चरण वाली गायत्री का एक-एक बीज तीन व्याहृतियों के रूप में सँजोया गया हैं । ईश्वर-जीव, प्रकृति-पुरुष, सत्-चित्-आनन्द, ब्रह्मा-विष्णु-महेश, स्वर्ग-लोक, भूलोक एवं पाताल-लोक, सत, रज, तम् आदि का तत्वदर्शन इन व्याहृतियों में समाविष्ट है। यदि इनकी व्याख्या की जाय तो समूचा अध्यात्म दर्शन इन तीन व्याहृतियों की व्याख्या में ही निरूपित हो जाता है। जिस तीन चरण से महादानी बलि का समूचा साम्राज्य नाम लिया था, उन तीन को त्रिविध गायत्री के साथ जोड़ा जा सकता है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का स्वरूप भी उस व्याहृति विवेचना के आधार पर समझा जा सकता है।
समस्त देवता गायत्री की उपासना करते थे। ऋषियों, अवतारी महामानवों का भी वही अवलम्बन रहा। मनुष्यों में शिखा और यज्ञोपवीत के रूप में गायत्री को अपनी काया तथा बुद्धि में समाविष्ट होने की भावना रखना और उसकी यथासंभव नित्य नियमित उपासना करने का विधान है। इसमें सद्बुद्धि के लिए मात्र प्रार्थना ही नहीं है, वरन् यह तथ्य है कि इस उपासना से बुद्धि में प्रखरता का, सत्प्रेरणाओं का अभिवर्धन है। यह बात दूसरी है कि उसका प्रयोग किस काम के लिए किया जाय। देवता श्रेष्ठ के लिए और दैत्य निकृष्ट के लिए भी बुद्धि की प्रतिभा का प्रयोग करते रहे है।
जिस प्रकार पुष्प में रूप भी होता है, गंध भी, रस भी और पराग भी, उसी प्रकार गायत्री के प्रत्येक अक्षर में अनेकानेक प्रकार की विशेषतायें भरी हुई हैं। मस्तिष्क देखने में एक है, पर उसके भीतर अगणित क्षमताओं के स्थान और कोश हैं। उनमें से कुछ ही अभ्यास में आने पर जाग्रत रहते हैं, शेष निरर्थक पड़े रहने के कारण मूर्च्छित या प्रसुप्त स्थिति में चले जाते हैं। ठीक इसी प्रकार गायत्री महामंत्र का प्रत्येक अक्षर अपने-अपने परिसर में परिपूर्ण है। परमाणु प्रत्यक्ष में एक होता है, पर उसके तनिक से अन्तराल में इलेक्ट्रान , प्रोट्रान, न्यूट्रोन, पाजिट्रान, मेसाँन आदि अनेक सूक्ष्म घटक अपनी-अपनी कक्षाओं में बिना टकराये परिभ्रमण करते रहते हैं। सौर मण्डल के समस्त नियम-उपनियमों का उस छोटी सी परिधि में अपनी तद्रूप सत्ता के रूप में विवरण वहाँ देखा जा सकता है। इस संदर्भ में यथा संभव जानकारी ब्रह्मा जी ने अपने चार मुखों से चार वेदों का सृजन करते हुए दी है। उस जानकारी से मनीषियों का अवगत कराया है। उस कथन को और भी अधिक सुबोध बनाने के लिए ऋषियों ने उपनिषद्, ब्राह्मण , आरण्यक, सूत्र आदि में अधिक खुलासा करने का प्रयत्न किया है। पुराणकारों ने उन्हीं तथ्यों को अलंकार से जोड़ते हुए कथा-उपाख्यानों के रूप में गढ़ दिया है। इस प्रकार समूचे अध्यात्म वाङ्मय पर गायत्री का ही आलोक छाया हुआ देखा जा सकता है।
गायत्री के 24 अक्षर हैं। उनमें से प्रत्येक में अनेकानेक रहस्य भरी विभूतियों के भाण्डागार भरे पड़े हैं। अवतार चौबीस हुए हैं। देवताओं में प्रमुख चौबीस है। देवियाँ भी महाशक्ति के रूप में चौबीस ही गिनायी गयी हैं। ऋषियों में भी चौबीस की प्रमुखता है। यह आध्यात्मिक प्रकरण हुआ ! इसे देव पक्ष भी कह सकते हैं। संख्या में 24 होने के कारण इन सब को गायत्री की चूड़ामणि का ही एक-एक मणिमुक्तक कह सकते हैं।
चौबीस अक्षरों वाला गायत्री महामंत्र अपने आप में एक महाविद्या है- महाविज्ञान है। उसके एक-एक अक्षर में इतना ज्ञान-विज्ञान एवं दार्शनिक तत्वज्ञान सन्निहित है जिसका पूरी तरह पता लगाना कठिन है। आध्यात्मिक और भौतिक सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान उसके गर्म में मौजूद हैं। गायत्री के इन 24 अक्षरों में आयुर्वेद शास्त्र भरा हुआ है। ऐसी-ऐसी दिव्य औषधियों और रसायनों के बनाने की विधियाँ इन अक्षरों में संकेत रूप में मौजूद हैं, जिनके द्वारा मनुष्य असाध्य रोगों में सोना बनाने की विद्या का संकेत है। इन अक्षरों में अनेकों प्रकार के आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि दिव्य हथियार बनाने के विधान मौजूद है। प्रकृति की विलक्षण सूक्ष्म-शक्तियों, अनेक दिव्य-शक्तियों पर अधिकार करने की विधियों के विज्ञान भरे हुए हैं। ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करने, लोक-लोकान्तर के प्राणियों से सम्बन्ध स्थापित करने, ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधि जानने तथा उन्हें प्रभावित कर अपने अनुकूल बनाने, अतीत तथा भविष्य से परिचित होने, अदृश्य एवं अविज्ञात तत्वों को हस्तामलकवत् देखने जैसे अनेकों, प्रकार के विज्ञान मौजूद हैं जिनकी थोड़ी सी भी जानकारी यदि मनुष्य प्राप्त कर ले तो वह भूलोक में रहते हुए भी देवताओं के समान दिव्य-शक्तियों से सुसम्पन्न बन सकता है।
तंत्र-पक्ष बीजाक्षरों से आरम्भ होता है। उससे शक्ति विशेष का उद्भव होता है और उसके प्रतिफल आध्यात्मिक ऋद्धि और भौतिक सिद्धियों के रूप में परिलक्षित होते हैं। इस पक्ष का भी प्रत्येक घटक 24 की संख्या में ही है। इससे प्रकट है कि तंत्र परिकर का विज्ञान और विधान भी गायत्री का ही स्वरूप विस्तार है। तंत्र में यों शाबर मंत्रों का भी हलका-फुलका प्रयोग होता है, पर मूलतः वह गायत्री विज्ञान का विस्तार ही जब उस क्षेत्र की गहराई में प्रवेश करना पड़ता है तो सुदृढ़ और सुनिश्चित अवलम्बन के रूप में गायत्री ही दृष्टिगोचर होती है।
देवी-देवता के सम्बन्ध में किसी भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। वे ईश्वर से पृथक या प्रतिद्वन्द्वी नहीं। उनकी अलग सत्ता भी नहीं है। परब्रह्म इस विश्व-ब्रह्माण्ड की अनेकानेक गतिविधियों का सूत्र संचालन करता है। वे कार्य जिस रूप में क्रियान्वित होते हैं, तब उनको देखते हुए पृथक नाम दे दिया जाता है। जिस प्रकार एक ही व्यक्ति वकील, चिकित्सक, गायक, लेखक, व्यवसायी हो सकता है, उसी प्रकार भगवान को अनेक कार्य करते हुए देखकर समयानुसार अनेक कार्य करते हुए देखकर समयानुसार अनेक अलग-अलग संबोधन प्रयुक्त किये जा सकते हैं। वकालत करते समय वकील साहब और कुश्ती लड़ते समय पहलवान जी कहा जा सकता है। वही बात ईश्वर की देव-संज्ञाओं के सम्बन्ध में भी है।
परिस्थितियां मनुष्य बिगाड़ तो लेता है, पर उन्हें सँभालना नहीं बन पड़ता । ऐसे आड़े समय में भगवान अवतार लेते हैं, कोई तूफानी आन्दोलन खड़ा करते हैं। उसके प्रवाह में कितने ही पुराने पेड़ उखड़ जाते हैं। कितने ही तिनके और पत्ते आसमान चूमने लगते हैं। चक्रवात बनते और कौतूहल भरी घटनायें, परिस्थितियां प्रस्तुत करते हैं। यह अवतार सत्ता का स्वरूप हुआ। ब्रह्म एक जगह एकत्रित नहीं हो सकता। यदि उसकी समग्रता एक स्थान पर एकत्रित हो जावे तो फिर अन्यत्र जो कुछ हो रहा है, वह किस प्रकार हो सकेगा ? योगी, तपस्वियों और प्रतिभावान मनीषियों में उसका आवेश ही अधिक मात्रा में भर जाता है। उसके माध्यम से विचित्र क्रिया-कलापों की शृंखला चल पड़ती है। दृश्यमान अवतार उसी को समझा जाता है। भारतीय मान्यता के अनुसार अब तक चौबीस अवतार हुए हैं। उनमें से प्रत्येक गायत्री के एक-एक अक्षर के फलित होने के रूप में समझा जा सकता है।
देवताओं और देवियों के युग्म को इसी प्रकार समझा जाता है जैसे समुद्री ज्वार-भाटा एवं नदी की लहरें। जल का भाग ऊँचा उठने पर दूसरा भाग नीचा रह जाता है। इन दोनों के आधार पर ही प्रवाह में गतिशीलता दृष्टिगोचर होती है। बिजली की ऋण और धन दो धारायें साथ-साथ चलती हैं। देवी और देवता परस्पर अति निकट हैं। एक दूसरे के साथ शक्ति का आदान-प्रदान चलाते रहते हैं। प्रकृति की इसी विविध विलक्षणता को देवी-देवताओं के नाम से पुकारा जाता है। इन दोनों वर्गों में 24-24 की प्रधानता है। उतने ही गायत्री के अक्षर भी है।
योगी-तपस्वी तो साधारण शरीरधारी होते हैं और समयानुसार जन्मते-मरते रहते हैं, किन्तु ऋषि जन्म-मरण के बन्धनों से मुक्त होकर अपनी सूक्ष्म सत्ता यथावत् बनाये रहते हैं। प्रत्यक्ष दीखते नहीं, तो भी इतना कर्तृत्व सम्पन्न करते हैं जितने अनेकों स्थूल शरीर मिलकर भी नहीं कर सकते। वे अदृश्य जगत पर छाये रहते हैं और ऐसी संभावनायें, परिस्थितियाँ विनिर्मित करते रहते हैं, जिन्हें समर्थ देहधारियों के अनेकानेक शरीर मिलकर भी नहीं कर सकते। सप्त ऋषियों के शरीरों को मरे तो युगों बीत गये, पर उनके शक्ति-केन्द्र अभी भी रात्रि के समय आकाश में चमकते हैं। इतना ही नहीं, वे व्यक्ति को ऊँचा उठाने और समाज के वातावरण को बदलने का भी परोक्षतः माहौल बनाते रहते हैं। इन महर्षिगणों की सत्ता भी सूक्ष्म शरीर धारी देवमानवों में गिनी जाती है। ऋषियों में से कितने ही किन्हीं सामान्य लोगों की व्यवस्था संभालने भेजे गये होंगे, पर पृथ्वी पर इन दिनों जिनका प्रभाव और दायित्व है, उनकी संख्या 24 में गिनी गयी है। इन्हें अदृश्य आदि मानव भी कह सकते हैं। जीवन मुक्त भी और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर्ता भी । यह भी गायत्री के 24 अक्षर ही हैं।
ब्राह्मी क्षेत्र के यह चार ही घटक हैं-अवतार, देवता, देवियाँ और ऋषि। भौतिक पक्ष प्रत्यक्ष भी है और पुरुषार्थ परायण भी। इन्हें दूसरे शब्दों में सामर्थ्य के धनी शक्ति पुँज या दैत्य कह सकते हैं। दैत्य का अर्थ है-विशाल, सशक्त, जाइण्ट। दैत्यों में से सभी बुरे नहीं होते। बलि, विभीषण, प्रहलाद आदि दैत्य कुल में ही उत्पन्न हुए थे। दैत्य वर्ग की साधना के भी चार चरण हैं- बीजाक्षर, शक्ति संचय की तप साधना, भौतिक क्षेत्र की चमत्कारी सिद्धियाँ तथा अंतिम हैं-ऋद्धियाँ।
बीजाक्षरों में स्वरों के साथ अनुस्वर जोड़ देने से वह मकारान्त हो जाता है। जैसे- क, ख, ग, घ को बीज मंत्र के रूप में प्रयुक्त करना हो तो उन्हें कं, खं, गं, घं- इस रूप में कहा जायगा। एक बार में एक ही अक्षर प्रयुक्त होगा। उन्हें नकारान्त, मकारान्त बोला जायेगा। अक्षरों का समन्वय न करने, समुच्चय गुच्छक न बनने से एकाकी रहने पर वह बीज मंत्र बन जाता है। इसका उच्चारण इस प्रकार होता है कि मुख, जिह्वा आदि में हलचल तो होती रहे, पर उच्चारण दूसरों को सुनाई न पड़े । मात्र अपने ही मस्तिष्क और हृदय में गूँजता रहे। इस प्रकार के उच्चारण की प्रतिक्रिया समस्त जीवकोशों में एक विशेष प्रकार का कम्पन-प्रवाह उत्पन्न करती है। यह कम्पन विशेष प्रकार की ऊर्जा का सृजन करता है जिसके आधार पर अपने तथा दूसरों के अनेकानेक कार्य सिद्ध किये जा सकते हैं।
‘शक्ति’ शब्द का संक्षिप्त उल्लेख करने का समग्र तात्पर्य है-शक्ति-संचय और आत्म-शक्ति संचय के दो ही मार्ग हैं- एक योग, दूसरा तप। तप द्वारा अपने आपको संयम-साधना की भट्टी में तपा कर खरे सोने की तरह बनाया जाता है। योग में ब्रह्माण्डीय चेतना की अजस्रता के साथ अपने आपको जोड़ा जाता है। ब्रह्म-चेतना, विश्व-चेतना, आत्मिक और भौतिक शक्तियों का भंडारण निवास हैं । योग द्वारा उसी के साथ जुड़ा पाता है। तप के द्वारा उसे उपयुक्त ढाँचे में ढाला जाता है। दक्षिण-मार्गी और वाम-मार्गी साधक अपने-अपने ढंग से अपना-अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए यह योग और तप की समन्वित शक्ति साधनायें करते हैं। दोनों पक्षों के लिए 24-24 साधनायें निर्धारित हैं। उन्हें गायत्री हिमगिरि से निस्सृत गंगा-यमुना के रूप में समझा जा सकता है।
पंचायत की कल्पना में भविष्य की स्वर्णिम आभा की झलक देखी जा सकती है। इक्कीसवीं सदी के भारत की शासन व्यवस्था के प्रायः सभी सूत्र इसमें संजोये हैं। पहले भी व्यवस्था के इसी स्वरूप और सूत्र को अपना कर भारतीय संस्कृति विशेषकर भारतीय राज्य व्यवस्था ने चक्रवर्ती होने का गौरव हासिल किया था। इसी रक्षा कवच के बलबूते हमारी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता, सुदृढ़ता और सुव्यवस्था मृत्युंजयी बनी रही।
इसी का उल्लेख करते हुए सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ0 राधा कुमुद मुखर्जी ने कहा है- “स्थानीय स्वायत शासन के स्वतन्त्र विकास के फलस्वरूप देश को कछुए की खोल की तरह सुरक्षित, शान्ति का एक स्वर्णिम स्थान प्राप्त हुआ जहाँ राष्ट्र की संस्कृति उस समय अपनी सुरक्षा कर लेती थी जब देश के राजनैतिक गगन पर तूफान फुट पड़ता था। एक के बाद दूसरे विदेशी विजेता आ-आ कर अपना आधिपत्य जमाते रहे, लेकिन यहाँ के ग्राम संघ ज्वार-भाटों से अप्रभावित रहने वाली समुद्री चट्टानों की तरह सर्वथा अप्रभावित रहे।
सही कहें तो पंचायत व्यवस्था न केवल शासन व्यवस्था के रूप में बल्कि यहाँ की जीवन-पद्धति के रूप में विकसित हुई थी। वैदिक काल में तो गाँव से लेकर राष्ट्र तक ही नहीं अपितु समूचे विश्व भर की शासन व्यवस्था पंचायत प्रणाली पर आधारित थी। ऐतरेय ब्राह्मण में इस तथ्य का उल्लेख करते हुए कहा गया है-
साम्राज्यं भोज्यं स्वराज्यं वैराज्यं परमेष्टयं राज्यं महाराज्यं आधिपत्तमय। समन्तपयायी स्यात्-सार्वभौमः सर्वायुधः आन्तादाराधात्। पृश्चिवयं समद्रं पर्यात्तया एक राष्ट्र इति।
और यही कारण था कि पंचायत की अवधारणा गाँव तक ही न सिमट कर जन राज्य तक चली गयी
इमं देवाडअसपत्नध्ष्टं सुवध्वं महते क्षताया महते-जान राज्याय।
वैदिक साहित्य में वैदिक काल के स्वर्णिम युग की खोज करने पर पता चलता है कि उस समय तक तो ‘राजा’ शब्द का प्रचलन ही न हुआ था। समिति, आमन्त्रण और ग्राम सभा आदि शब्दों का ही प्रचलन दिखाई देता है। जो वेद मनीषियों के अनुसार पंचायत के ही पर्यायवाची शब्द थे। रामायण काल में पंचायत व्यवस्था भारतीय लोकतन्त्र की इकाई के रूप में सुविकसित थी। इसी के माध्यम से ही गांवों की स्वायंत्ता, स्वावलम्बन एवं सत्ता का विकेन्द्रीकरण सम्भव बन पड़ता था। महाभारत में जिस संघ-राज्य का उल्लेख मिलता है उसमें गाँव से लेकर राष्ट्र तक की शासन व्यवस्था इसी पंचायत प्रणाली पर ही आधारित थी। थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ यह व्यवस्था कौटिल्य काल तक चलती आयी।
आचार्य पाणिनि के समय में घर से लेकर गणराज्य तक का प्रशासनिक ढाँचा पंचायती व्यवस्था पर ही आधारित था। हाँ इसके स्वरूप में जरूर थोड़ा-बहुत परिवर्तन हो गया था। उस समय ‘पूरा’-’गण’ और ‘संघ’ आदि पंचायत के पर्यायवाची शब्दों के रूप में प्रचलित थे। बौद्धकाल में भी ग्राम सभा से लेकर गणराज्य की लोक तान्त्रिक व्यवस्था होने के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। अकेले लिच्छवी गणराज्य में 770 राज्य या गणराज्य होने का उल्लेख आता है। न सिर्फ प्रशासनिक बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों में पंचायत-प्रणाली ही व्यावहारिक मानी जाती थी। तत्कालीन जैन साहित्य में अरायाणि, गणरायनि, दो एरव्यणि, वैरज्जाणि एवं विरुद्धरज्जाणि के नाम से जिन स्थानीय शासनों का उल्लेख मिलता है, वे विभिन्न प्रकार की पंचायतें ही थीं। मौर्यकाल में शासन व्यवस्था का राष्ट्रीय स्वरूप राज तांत्रिक होने पर भी स्थानीय शासन प्रबन्ध पंचायतों के माध्यम से ही किया जाता था। मुगल काल में भी ग्रामीण पंचायतें बरकरार रहीं। हाँ ईस्ट इण्डिया कम्पनी की घुसपैठ के साथ ही इनके पतन की शुरुआत हुई। सुविख्यात मनीषी डॉ0 अल्तेकर ने सही की कहा है-” अंग्रेज शासकों ने ग्राम पंचायतों की इस प्राचीन परम्परा का ध्वंस कर हमारे देश के प्रति सर्वाधिक घातक कुकृत्य किया है।”
अँग्रेज की इस करनी के पीछे उनकी यह सोच थी कि भारत साँस्कृतिक दृष्टि से सर्वाधिक समृद्ध देश है और इसकी साँस्कृतिक जड़ें गाँवों में हैं। जब तक इन्हें खोखला नहीं किया जाता इस देश को पूरी तरह गुलाम बना पाना सम्भव नहीं। इसी वजह से न केवल उन्होंने यहाँ के इतिहास की विकृति करने की कोशिशें की बल्कि पंचायत व्यवस्था को भी अपने घातक प्रहारों का निशाना बनाया। इस दृष्टि से भारत के इतिहास की व्याख्या विनोबा जी ने बहुत ही मौलिक ढंग से की है। उन्होंने कहा है कि प्राचीन काल में देश भी आजाद था और गाँव भी आजाद थे। जब अरब और मुगल आए तो देश गुलाम था किन्तु गाँव आजाद थे ? अँग्रेजों के समय में देश भी गुलाम था और गाँव भी गुलाम थे। अंग्रेजों के जाने के बाद देश तो आजाद हो गया लेकिन गाँव गुलाम ही रह गाए।
इस गुलामी से छुटकारा पाने के लिए विनोबा और महात्मा गाँधी दोनों ने ही पंचायतों को पुनर्जीवित और पुनर्गठित करने पर बल दिया था। लेकिन मूलभूत बात यह है, कि उनके अनुसार पंचायत पद्धति के द्वारा ही केन्द्रीय एवं राज्य सरकार का गठन किया जायगा। बापू के शब्दों में- ‘आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। हर गाँव में जम्हूरी सल्तनत या पंचायत का राज्य होगा। उनके पास पूरी सत्ता और ताकत होगी ऐसा समाज, अनगिनत गाँवों को बनाना होगा। उसके पास फैलाव एक के ऊपर एक के ढंग पर नहीं, बल्कि लहरों की तरह एक के बाद एक ही शक्ल में होगा। जिन्दगी मीनार की शक्ल में नहीं होगी जहाँ ऊपर की तंग चोटी के नीचे चौड़े पाए को बड़ा होना पड़ता है। वहाँ तो समुद्र की लहरों की तरह जिन्दगी एक के बाद एक घेरे की शक्ल में होगी और व्यक्ति उसका मध्य-बिन्दु होगा जो हमेशा अपने गाँव की खातिर मिटने के लिए तैयार होगा, गाँव अपने इर्द-गिर्द गांवों के लिए मिटने के लिए तैयार रहेगा। ‘गाँधी जी ने अपनी आखिरी वसीयत में भी कांग्रेस संविधान को पंचायत में भी कांग्रेस संविधान को पंचायत पद्धति पर आधारित नियमों के अनुसार ‘लोक सेवक संघ’ के स्वरूप में संगठित करने की अनुशंसा की थी। वे तो लोक सभा एवं विधान सभाओं का अप्रत्यक्ष निर्वाचन एवं गठन पंचायत पद्धति से ही चाहते थे, ताकि वास्तविक लोकताँत्रिक विकेन्द्रीकरण हो सके। अधिकाधिक स्वावलम्बन इसका आर्थिक और “पंच बोले सो परमेश्वर” यानि सर्वसम्मति, सर्वानुमति से चुनाव, इसका साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक आधार है।
परमपूज्य गुरुदेव ने वर्तमान व्यवस्था पर असन्तोष व्यक्त करते हुए एक स्थान पर लिखा है- “शासन की असफलता से हम दुःखी हैं। इस असफलता का निवारण युग निर्माण आन्दोलन का मुख्य अंग है। अगले दिनों समाज व्यवस्था, शासन-व्यवस्था को हम अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित एवं परिवर्तित करेंगे। समाज व्यवस्था के प्रयत्नों से जन जीवन इतना प्रबुद्ध हो सकेगा कि उसे कोई अपनी कुटिल चालों से बहका न सके। चुनाव में पार्टी को नहीं, व्यक्ति के जीवन स्तर की प्रामाणिकता को ही परखा एवं चुना जायगा। पार्टियाँ भी अब की तरह जातीय, क्षेत्रीय रूपों में अपना अस्तित्व न रख पाएँगी।
चुनाव की प्रक्रिया में भारी फेर-बदल होगी। पंचायती राज्य ही अपना क्रमिक विकास विश्व शासन तक करेगा। ग्राम पंचायत में चुने हुए लोग क्षेत्र पंचायत का, क्षेत्र पंचायत वाले जिला पंचायत का, जिला पंचायत वाले प्रान्त पंचायत का और प्रान्त पंचायत वाले राष्ट्रीय पंचायत का चुनाव करेंगे। यही क्रम अन्ततः विश्व शासन को जन्म देगा। इस प्रक्रिया से लाभ यह होगा कि अधिक ऊँची पंचायत के लिए अधिक उत्तरदायी अधिक योग्य वोटर होंगे और उनसे अधिक विवेकशीलता और जिम्मेदारी की आशा की जा सकती है।
आज पंचायत इसलिए प्राण-हीन है, क्योंकि उनके पास कुछ है ही नहीं। सरकारी अनुदानों की राहत पर चलने वाली इन पंचायतों से न तो लोक-शक्ति निकल सकती है और न लोक-योजनाएँ। पंचायत पर जो रिपोर्ट, प्रकाशित हुई है, उनमें यह साफ नजर आता है कि पंचायतें खुद के लिए कानूनों में प्रदत्त टैक्स लगाने या वसूलने से हमेशा परहेज करती है और सरकार के अनुदानों की और टकटकी लगाकर देखती रहती हैं । इस लिए जब तक सरकार से मिलने वाले अनुदानों की आशा- सम्बल समाप्त नहीं हो जाएगी, हम स्थानीय पुरुषार्थ प्रकट होने की अपेक्षा नहीं कर सकते।
भारतीय संविधान के 73 वें संशोधन विधेयक में गाँवों को स्वयं पूर्ण बनाने की बात विस्मृति कर दी गयी है। कुछ हजार रुपये उन्हें दे दिए जाएंगे, यह कहना तो पुरुषार्थ-हीनता को बढ़ावा देने वाली भिक्षावृत्ति है। दुर्भाग्य तो और हो जाता है, जब गाँव की योजना भी जिला एवं केन्द्र से आने वाली हो । जब पंचायत की अपनी योजना नहीं अपना राजस्व नहीं, फिर स्वशासन कैसा राज्य एवं केन्द्र सरकारों की भिक्षा की ओर टकटकी लगाकर देखती रहने वाली पंचायतों में तेजस्विता एवं लोक-योजनाएँ नहीं पनप सकतीं।
समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आर्थिक लोकतन्त्र की स्थापना करना पंचायत का मुख्य मुद्दा होना चाहिए। लेकिन अभी तक इसमें विफलता ही मिली है। आर्थिक लोकतंत्र के साथ-साथ सत्ता के लोकताँत्रिक विकेन्द्रीकरण की दृष्टि से भी पंचायतें सब से अधिक प्रभावशाली एवं शक्तिशाली इकाई नहीं बन सकीं जिन पर राज्य और केन्द्र निर्भर करे। इसके विपरीत अभी तो पंचायतें लोक ताँत्रिक सत्ता-वृत के बाहर एक अत्यन्त कृत्रिम एवं ऐच्छिक संस्था बनी हुई है। विधान सभाओं के हाथों पंचायत की तकदीर साँप देने से पंचायत कभी पुरुषार्थ बन भी नहीं सकती। इसको जब तक केन्द्र या राज्य सरकार का अंग माना जाता रहेगा, तब तक पंचायतों की अस्मिता की रक्षा नहीं हो सकती। असल में चाहे वे बलवन्त राय मेहता हो या सामुदायिक विकास के अर्थ कर्ता-धर्ता श्री एस॰ के0 ढ़े हो, इन महारथियों ने पंचायतों को योगात्मक आर्थिक लोकतन्त्र के उपकरण बनाने के विषय में कभी गम्भीरता पूर्वक विचार ही नहीं किया। यदि ऐसा किया गया होता तो अशोक मेहता कमेटी की पंचायतों को पर्याप्त संवैधानिक अधिकार दिए जाने की सिफारिश न करनी पड़ती। आर्थिक लोकतन्त्र के बिना पंचायतों के नाम से इस तरह के प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण को इसीलिए भीमराव अम्बेडकर ने अज्ञान, अंधविश्वास एवं गतिहीनता की संज्ञा दी थी।
जब तक नीचे से ऊपर तक की शासन व्यवस्था एक-दूसरी से समुद्री लहरों की भाँति सम्बद्ध नहीं होंगी, पंचायत को सच्ची प्रतिष्ठा मिलना असम्भव प्रायः है। यही नहीं, स्थानीय स्वशासी निकायों तथा केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों के बीच अधिकारों एवं अनुदानों के लिए खींचतान की स्थिति बनी रहेगी इस समस्या का हल तभी सम्भव है, जबकि केन्द्रित राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था को उलटकर विकेन्द्रित किया जाय । यह बात किसी तरह की समानान्तर व्यवस्था से सम्भव होती नजर नहीं आती। इसके लिए तो समूची चुनावी प्रक्रिया को भी पंचायती आधार देना होगा। अन्यथा पंचायतों को दी जाने वाली वर्तमान संवैधानिक संजीवनी भी उतनी कारगर न सिद्ध होगी। दरअसल वर्तमान संविधान द्वारा बनायी गयी दुहरी समाज व्यवस्था में जहाँ नागरिकों को आजीविका का मौलिक अधिकार है और न जमीन जोतने वालों को जमीन का अधिकार है। वहाँ सच्चा लोकतन्त्र विकसित हो पाना सम्भव नहीं। फिर वहाँ जन योजना, जन-तन्त्र , जन-समाज की बात सोचना भी दिया स्वप्न देखने के सदृश है।
इसीलिए भारत के साँस्कृतिक जीवन में ‘पंचायती व्यवस्था’ को अति महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। गाँधीजी की ग्राम स्वराज्य की कल्पना, बिनोवा जी की ग्रामदान की सोच इसी की पर्याय रही है। इस प्रक्रिया में नीचे स्तर से ग्राम विकास के लिए काफी गुँजाइश रहती है। सारा गाँव एक परिवार का रूप ले लेता है। पारम्परिक पंचायत प्रणाली में ‘निर्णय प्रक्रिया की भी एक खासियत रही है कि यहाँ बहुमत या अल्पमत रही है कि यहाँ बहुमत या अल्पमत के आधार पर कोई निर्णय नहीं किया जाता। गाँव के लोगों द्वारा चुने हुए पाँच लोगों की सभा ही सर्व सम्मति से निर्णय करती है।
गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरित में इस बात को बार-बार कहा है-
जो पंचहि मत लागै नीका। करहु हर्षि हिय रामहि टीका॥ मोरिबात सब विधिहि बनाई॥
जबकि वर्तमान संसदीय प्रणाली बहुमत एवं अल्पमत के कारण विरोध की राजनीति बन कर रह गयी है। विरोध के इसी जहर ने विकेन्द्रीकृत होकर ग्रामीण जीवन को भी पंगु कर दिया है और आज गाँव एक परिवार के रूप में नहीं टुकड़े और गुटों में बँटा दिखाई देता है। और पंचायतें राजनीतिज्ञों की दूसरे दर्जे की टीम के खिलाड़ियों का खेल बनकर रह गयी है।
इसका समाधान सर्वसम्मति, आम राय या सर्वानुमति की ही प्रणाली से सम्भव है। हर देश की अपनी परम्परा होती है। भारत की संस्कृति का स्वर समन्वय है। यही इस देश की परम्परागत साधना रही है। यही कारण है कि पंचायत प्रणाली में भी ‘पंच परमेश्वर’ यानि कि आमराय द्वारा निर्णय-प्रक्रिया पर जोर दिया गया है। ‘सदा सवंगत सर्वहित’ ही पंचायत का बीज मंत्र है। यही वह प्रक्रिया है जिसकी शुरुआत आज भले छोटी दिखे, परन्तु अपने विस्तार में यह धरती पर स्वर्ग के अवतरण का दृश्य उपस्थित करेगी। वर्तमान में किए गए पंचायत राज की कोशिशें इक्कीसवीं सदी में अपना ऐसा कुछ विकसित रूप उपस्थित करेगी, जब गाँव से राष्ट्र तक के प्रशासकों का निर्वाचन प्रजातन्त्र जन के द्वारा किया जायगा। वैदिक पंचायतों के समय में भी निर्वाचन बहुमत के द्वारा नहीं सर्वमत के द्वारा ही किया जाता था। इस प्रकार विरोध का विष फैलने के अवसर ही नहीं थे। अथर्ववेद में कहा भी गया है-
सर्वास्त्वा राजन् प्रदिशोहयन्तूपसद्यो नमस्यो मवेह। त्वाँ विशो वृणताँ राज्याय त्वामिमा; प्रदिशः पंचदेवी॥ -अधर्व 3।4।र-र
अर्थात्- हे लोकनायक ! समस्त दिशाएँ तथा उपदिशाएँ आपको पुकारें ! आप अपने क्षेत्र में सबके लिए वन्दनीय बनें। हे तेजस्विनी ! ये प्रजाएँ आपको शायन का संचालन करने के लिए स्वीकार करें तथा पाँचों दिशाओं के पंच आपके मत से एक हों।
आज की पंचायती कल्पना कल इसी रूप में साकार दिखेगी। विरोध का स्थान आम राय लेगी। अकेली सत्ता ही गाँव में नहीं आएगी, बल्कि गाँवों का पराक्रम पुरुषार्थ भी जगेगा और प्राचीन भारत की वैदिक संस्कृति फिर से अपना खोया गौरव प्राप्त करेगी।
बचत की आदत स्वयं एक शिक्षा है। वह सद्गुण उत्पन्न करती है, संयम की शिक्षा देती है। व्यवस्था सिखाती है, भविष्य के सम्बन्ध में सोचना सिखाती है। इस प्रकार एक संत की संगति का लाभ देती है।
*समाप्त*