धर्म का पवित्र प्रवाही

धर्म तो गंगा का पवित्र प्रवाह है। जिसका स्पर्श अन्तःकरण में निर्मलता का शीतल अहसास जगाता है। अपनी छुअन से औरों को निर्मल करने वाला धर्म खुद मलिन कैसे हो सकता है। वह भला भ्रष्ट किस तरह हो सकता है ? विधर्मियों द्वारा पवित्र स्थल, धार्मिक स्थल, धर्म आदि को भ्रष्ट किए जाने की बातें बच्चों का बचपना ही तो है। इन्हें सुनकर समझ में नहीं आता कि हँसें या रोएँ। हकीकत में ऐसी बातों से धर्म को तो कुछ नहीं होता; हाँ, अपना अहम् और अपनी स्वार्थी भावनाएँ जरूर जख्मी होती हैं।

स्वधर्मी और विधर्मी- ये सम्भव ही नहीं। धर्म में विधर्म जैसा कुछ भी नहीं होता। इस दुनिया में सूर्य एक है, धरती एक है तो भला धर्म दो, तीन या पाँच किस तरह हो सकते हैं? वास्तव में अज्ञान और अधर्म के लिए संख्या की कोई सीमा ही नहीं है। जितने चाहो, जितनी तरह के चाहो उतने गिन लो।

समूचे विश्व में क्या कोई ऐसा भी इंसान है, जो साँस में कार्बन डाइऑक्साइड लेता हो, कानों से देखता हो और आँखों से सुनता हो। है क्या कोई ऐसा मनुष्य? यथार्थ में ऐसा सम्भव ही नहीं। बायें हाथ से लिखने वाले, दायें हाथ से लिखने वाले, ईश्वर में आस्था रखने वाले और ईश्वर में आस्था नहीं रखने वाले मनुष्य मिलेंगे, किन्तु श्वास में प्राणवायु न लेने वाले जीवित मनुष्य कहीं नहीं मिलेंगे। शाकाहारी, माँसाहारी, काले, गोरे, पीले मनुष्य सबने देखे होंगे, परन्तु वे सबके सब साँस में प्राणवायु ही लेते हैं। इसमें विभिन्नता ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलती। धर्म भी प्राणवायु है। इसमें जो भेद दिखाई देते हैं, वे इसे ग्रहण करने वालों की शक्ल-सूरत के है अथवा फिर अपने अज्ञान से उपजे अधर्म के।

शुद्ध प्राणवायु की ही भाँति शुद्ध धर्म को पाने की कोशिश होनी चाहिए। शुद्ध हवा पाने के लिए हम क्या करते है? उसे अशुद्ध करने वाली चीजों का हटाने की कोशिश करते हैं। ठीक इसी तरह धर्म को अशुद्ध करने वाले तत्वों को हटा दिया जाय, तो शुद्ध धर्म बड़ी ही सरलता एवं स्वाभाविकता से अपने पास आ जाएगा।

धर्म को अशुद्ध करता है कौन? और कोई नहीं, अपने ही झूठे व्यवहार और अपनी ही झूठी मान्यताएँ। इन झूठे व्यवहारों एवं झूठी मान्यताओं को कैसे पहचान जाय? इस पहचान का तरीका बड़ा सरल है। इंसान-इंसान के बीच जा भेद खड़ा करे, परस्पर द्वेश पैदा करे, वे सबके सब मिथ्या-झूठ हैं। जरा सोचिए, यह हम ही कर पाएँगे कि मेरे उसके बीच भेद कौन पैदा कर रहा है, कौन है जो बैर के बीज बोये जा रहा है? यदि “ईश्वर” है, तो सन्देहास्पद है। यदि वह “धर्म” है, तो अधर्म है। यदि वह “शास्त्र” है तो बकवास हैं।

धर्म विवेक को, हमारी आपकी अन्तरात्मा को जाग्रत करता है। वह मनुष्य की आत्मश्रद्धा को बढ़ाता है। धर्म का पवित्र प्रवाह बिना किसी भेद-भाव के मनुष्य मात्र के भीतर प्रेम की फसल को उपजाता है। जो इसके विपरीत करता है, वह अवश्य अधर्म है। इसे हर तरह से छोड़कर धर्म के निर्मल प्रवाह का स्पर्श पाने की कोशिश करना ही मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है।


मेहनत की कमाई

युवराज विक्रमसिंह को गुरुकुल से वापस लौटते ही राजसिंहासन सम्हालना पड़ा। महाराज रणवीरसिंह की आकस्मिक मृत्यु के कारण यह भार बरबस उन पर आ पड़ा था। अब वे एक विशाल साम्राज्य के स्वामी थे। महावीर योद्धाओं की चतुरंगिणी सेना उनके एक इंगित पर सब कुछ करने के लिए सत्रद्ध थी। हीरे-जवाहरात, रत्न-मणियों से भरा-पूरा राजकोष उनके लिए खुला था। दास-दासियाँ हाथ जोड़े उनके संकेत की प्रतीक्षा में आठों प्रहर खड़े रहते थे।

इतनी साधना-सम्पन्नताओं से घिरे रहने के बावजूद विक्रमसिंह को अपना गुरुकुल भूला ना था। जहाँ उन्होंने शिक्षा के साथ श्रमनिष्ठा भी अर्जित की थी। सायं-प्रातः के अध्ययन के अतिरिक्त, गौओं की सेवा, यज्ञ के लिए समिधा लाने जैसे कार्य वहाँ उन्हें करने पड़ते थे। अपने गुरुकुल वास में उन्होंने यही पाया कि बौद्धिक श्रम से शारीरिक श्रम के मूल्य को कम नहीं आँका जा सकता। यही कारण था कि इतने बड़े साम्राज्य के अधीश्वर बनने के बावजूद वे उसे भूले नहीं। राजकोष का उपयोग वे प्रजा के हित में संकल्पपूर्वक करते थे। अपनी आजीविका चलाने के लिए उन्होंने खाली समय में बाँस की टोकरियाँ बनाने का काम शुरू किया। इस काम से उन्हें गुजारे भर के लिए आवश्यक धन जुट जाता था।

महाराज विक्रमसिंह के गुरु राजधानी से थोड़ी दूर पर बसे एक छोटे-से गाँव में रहते थे। वे अब बूढ़े हो चले थे। खेती ही उनकी आय का जरिया था। एक साल बरसात नहीं हुई। खेत सूखा पड़ा था। गुरुजी को जीवनयापन में कठिनाई होने लगी। एक दिन उन्होंने सोचा कि, क्यों न अपने शिष्य राजा विक्रमसिंह के पास जाऊँ। वह मेरी आर्थिक सहायता अवश्य करेगा। उनकी सेवा में सदा तत्पर रहने वाला विनम्र विद्यार्थी अब तो महाराज बन चुका है। अब उसे क्या कमी है। यही सब सोचते-विचारते वे पैदल ही राजधानी की ओर रवाना हो गई। राजमहल पहुँचकर उन्होंने द्वारपाल से राजा को सूचना देने को कहा।

राजा उस समय बाँस की टोकरियाँ बनाने में तल्लीन थे। सूचना पाते ही वे स्वयं द्वार पर आए और अपने गुरुजी के चरणस्पर्श कर आदरसहित महल में ले गए। कुछ देर बाद जब भोजन का समय हुआ तो राजा ने गुरुजी से पूछा, “गुरुजी, आप शाही भोजनशाला में भोजन करेंगे या मेरे साथ? क्योंकि मैं तो केवल दाल-साग, रोटी का साधारण भोजन ही करता हूँ। भोजनशाला में मेहमानों के लिए तरह-तरह के व्यंजन बनते हैं। “

गुरुजी ने कहा- “हम भोजन तुम्हारे साथ ही करेंगे।”

भोजन के पश्चात् गुरुजी ने आराम किया । गुरुजी को वहाँ रहते हुए कई दिन हो गए थे। एक दिन उन्होंने राजा से कहा- “हम वापस गाँव जाना चाहते हैं।”

राजा ने गुरुजी से कहा- “मैं आपको विदाई में कुछ देना चाहता हूँ।”

गुरुजी मन-ही-मन बहुत खुश हुए। राजा ने एक सन्दूक खोला और एक छोटी सी पोटली निकाली। पोटली में चाँदी का एक सिक्का था। राजा ने वह सिक्का गुरुजी को भेंट कर दिया। चाँदी का सिक्का लेते समय गुरुजी दुःख और प्रसन्नता के बीच हिचकोले खा रहे थे। दुःख इस बात का था कि उन्हें इतनी दूर पैदल आने के बावजूद सिर्फ एक चाँदी का सिक्का मिला। भला इस एक सिक्का से उनके अकाल पीड़ित परिवार का क्या हित हो सकेगा। प्रसन्नता इस बात की थी, कि उनका शिष्य सम्राट होने के बावजूद गुरुकुल की पुनीत परम्पराएँ नहीं भूला है। इन्हीं विचारों में खोए वह अपने गाँव चले गए।

संयोग से अगले वर्ष वर्षा अच्छी हुई। गुरुजी ने अपना खेत जोता और चाँदी के सिक्के से बीज खरीद कर खेत बो दिए। कुछ ही दिन में फसल अच्छी लहलहाने लगी। उन्होंने अच्छे दाम में उसे बेचा और खूब धन कमाया। उसी पैसे से दूसरा व्यापार किया, तो उनके घर में जैसे धन की वर्षा होने लगी। उनके दिन आराम से कटने लगे।

एक दिन उन्होंने सोचा कि राजा के दिए हुए चाँदी के सिक्के से ही यह कमाल हुआ है। चलकर कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए।

वे फिर राजधानी पहुँचे। जब राजा गुरुजी के पास बैठे तो उन्होंने राजा से पूछा- “हे राजन्! मैं एक बात पूछना चाहता हूँ। तुमने चाँदी का सिक्का मुझे दिया था, उसने तो हमारे दिन ही फेर दिए। उस चाँदी के सिक्के के कारण अब हम धनवान बन गए हैं। कृपया हमें अब बताओ कि उसमें क्या करामात थी?”

सुनकर राजा ने एक सेवक को बुलाकर कहा- “सेठ सोहनलाल को तुरन्त उसके पिछले साल के बहीखातों सहित बुलाकर लाओ।”

सेठ बहीखाते पलटकर सब खर्चें बतलाता रहा। फिर बोला एक चाँदी का सिक्का एक मजदूर को दिया। राजा ने कहा- “यह बतलाओ कि वह चाँदी का सिक्का एक मजदूर को दिया। राजा ने कहा- “यह बतलाओ कि वह चाँदी का सिक्का मजदूर को क्यों दिया था?” सेठ बोला- “राजन! बरसाती रात थी। बड़ी ही तेज पानी बरस रहा था। कपड़े की गाँठें मकान के ऊपर वाले कमरों में रखी हुई थीं। पानी इतना तेज था कि छत से पानी नीचे कमरे में रखी गाँठों को भिगो रहा था। मैं और मेरा बेटा गाँठें उठा-उठा कर नीचे लाने लगे। लेकिन इतना बोझ हम नहीं उठा सके। हम लोग बहुत थक गए सुबह चार बजे हमने सड़क पर खड़े एक मजदूर को देखा। उसे काम बताया तो वह राजी हो गया। उसने सारा माल अकेले नीचे उतार कर रख दिया। तभी दूर से मंदिरों के घण्टे बजने की आवाज आने लगी। वह मजदूर हड़बड़ाकर बोला, अब मैं जाऊँगा। उस दिन मेरी जेब में केवल एक ही चाँदी का सिक्का था, वह मैंने उस मजदूर को देते हुए कहा, बाकी पैसे फिर ले जाना, सिक्का था, वह मैंने उस मजदूर को देते हुए कहा, बाकी पैसे फिर ले जाना, सिक्का लेकर वह चला गया, पर बाकी पैसे लेने दुकान पर नहीं आया।”

सारी बातें सुनने के बाद राजा बोले- “गुरुजी! वह मजदूर मैं ही था और वह मेरी कड़ी मेहनत की कमाई थी।” अब गुरुजी को चाँदी के सिक्के से हुए चमत्कार का रहस्य समझ में आ गया। वह बोले- “मेहनत और ईमानदारी- जीवन में सफलता प्राप्त करने की कुँजी है। यही कारण है तुम्हारे मेहनत से कमाए गए चाँदी के एक सिक्के ने मेरे दिन फेर दिए।”


विराट ब्रह्माण्ड में हम अकेले नहीं हैं।

रात आती है तो आकाश तारागणों, आकाशगंगाओं और निहारिकाओं से जगमगा उठता है। जगमगाते हुए ये ग्रह-नक्षत्र चिरअतीत से मानव मन में यह जिज्ञासा जगाते रहे हैं कि क्या इस विराट ब्रह्माण्ड में हम अकेले ही हैं अथवा पृथ्वी से बाहर और भी कहीं जीवन है? मानवीय जिज्ञासा के इस स्वाभाविक युगप्रश्न के सुलझ जाने से और कोई लाभ हो या नहीं पर एक बात निश्चित है, तब मानवीय दृष्टिकोण और चिन्तन स्वार्थ-संकीर्णता की अंधेरी गुफा में ही कैद नहीं रह सकेगा। शायद इसी कारण मानवीय सभ्यता के आदिम जमाने से लेकर आज तक अपने समय के मनीषी, वैज्ञानिक भांति-भाँति से इस पहेली का हल निकालने की कोशिश कर रहें हैं। साहित्यकारों ने इन प्रयासों को अपनी कल्पना के रंगों से सजाया है। तभी तो प्रायः हर देश के पुराण-कथा साहित्य में लोक-लोकान्तर की कथाएँ पढ़ी-सुनी जा सकती हैं। सम्भवतः इन सबका उद्देश्य मानवीय दृष्टिकोण व्यापक बनाना रहा है। क्योंकि दृष्टिकोण व्यापक बने तो ही सम्भव है कि जीवन के उच्च रहस्य हमारे सामने अभिव्यक्त हों और हम उच्च आदर्शों और कर्तृत्व में आरुढ़ हों।

लेकिन इन तमाम सारे प्रयासों के बावजूद मनुष्य की चिरकालीन जिज्ञासा अपना सार्थक और यथार्थ समाधान नहीं खो सकी है। हमारी तमाम वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब जानने के लिए सालों−साल की अपनी मेहनत के बाद भी अपनी धरती के पड़ोसियों का सही पता-ठिकाना लगा पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। उनकी व्यापक खोजें, अनगिनत शोध-प्रयत्न अधूरे साबित होते रहे हैं।

किन्तु इक्कीसवीं सदी के बढ़ते कदमों की आहटों के साथ अब लगता है कि इस सवाल से धीरे-धीरे परदा उठ रहा है। अज्ञात के विराट अन्धकार में एक रोशनी की छोटी-सी पर प्रभापूर्ण किरण वैज्ञानिकों को दिखाई दी है। वैज्ञानिक उत्साहित हैं कि वे इस पहेली का हल ढूंढ़ने के नजदीक पहुँच गए हैं। धरती से बाहर जीवन है या कभी था, इस चर्चा को नयी हवा तब मिली जब पिछले महीनों में संसार के सुविख्यात पत्र-पत्रिकाओं में दो खबरें छपीं। इनमें पहली थी हमारे पड़ोसी मंगल ग्रह पर जीवन के संकेत और दूसरी थी बृहस्पति के उपग्रह यूरोपा में जीवन सम्भावना।

भारतीय वैदिक साहित्य एवं ज्योतिष ग्रन्थों में मंगल ग्रह की शिद चर्चा देखने को मिलती है। यहाँ इसे ‘धरणी गर्भ सम्भूतं विद्युतकान्ति समप्रथम्’ कहकर सम्बोधित किया गया है। ज्योतिषशास्त्र इसे उदारमना और सद्भावना प्रिय मानने के साथ युद्ध एवं पराक्रम का देवता मानता है। यूनान-रोम आदि देशों में भी इसे युद्ध और पराक्रम का अधिष्ठाता माना गया हैं। चीन में इसे ऊष्मा और अग्नि के प्रतीक रूप में देखा जाता है। वैज्ञानिक दुनिया का मंगल ग्रह का प्रथम परिचय हालैण्ड के प्रख्यात खगोलविद् हुइजेंस ने 1651 में दिया। सूर्य से 14 करोड़ 10 लाख मील दूरी पर स्थित इस ग्रह का व्यास 4200 मील है। 679 दिन में यह सूर्य की एक परिक्रमा लगा लेता है।

वैज्ञानिक समुदाय इसकी खोज-बीन के प्रयत्न अपने शुरुआती दौर से करता रहा है। सन् 1730 के दशक में विहेल्य वीयर और मेडलर ने मंगल के कई क्षेत्रों के बारे में नई जानकारी दी थी। अनुसंधान की इस शृंखला में इटली के खगोलशास्त्री गियाबत्री शियावरेली ने 1799 ई. में मंगल ग्रह की सतही रेखाओं को देखा था। बाद में उन्होंने इसे इतालवी भाषा में ‘कैनाली; नाम से प्रकाशित भी किया। इसी बात को लेकर 1714 में अमेरिकन खगोलविद् पर्सीवल लाबेल ने एक शोध ग्रन्थ लिखा। जिसमें कैनाली को सिंचाई की नहरों एवं घने गहरे भाग का वनस्पति जगत के रूप में उल्लेख किया गया है। इन तथ्यों में अपनी कल्पना की तुलिका से रंग-भरते हुए अँग्रेजी के प्रख्यात उपन्यासकार एच. जी. वेल्स ने मंगलवासियों के पृथ्वी पर आक्रमण के खतरे की जानकारी देते हुए ‘द वार ऑफ वर्ल्ड’ नामक उपन्यास की रचना की। मंगल ग्रह पर जीवन की कल्पना ने सन् 1967 में ओरसन वैलस को रेडियो नाटक तैयार करने के लिए प्रेरित किया।

कल्पनाओं और जिज्ञासाओं को आंशिक सफलता उस समय मिली, जब सन् 1764 में अमेरिका के ‘मेरीनर-4 ने मंगल ग्रह के 1120 कि.मि. पास पहुँचकर 22 क्लाजअप फोटो खींचकर धरती पर भेजने में कामयाबी पायी। इन चित्रों से वहाँ के ज्वालामुखी एवं मरुस्थल की जानकारी मिल सकी। इसके पहले 1762 में रूस के ‘मार्स-1’ एवं सन् 1764 में अमेरिका के मेरीनर-6 को भेजा तो गया था परन्तु किसी तरह की जानकारी पाने में कोई खस सफलता हासिल नहीं हो सकी। सन् 1761 में अमेरिका द्वारा मेरीनर-6 को रवाना किया गया। जो मंगल के 3400 कि.मी. दूर तक पहुँचकर इसके वायुमण्डलीय दबाव के साथ सतही तापमान के वीडियो चि. को सफलतापूर्वक लिया। इसी वर्ष मेरीनर-9 को मंगल के दक्षिणी गोलार्द्ध के 200 चित्र ले पाने में सफलता मिली।

वर्ष 1971 में रूस ने पुन- अपना अनुसंधान जारी रखते हुए मार्स-2 लेण्डर मो मंगल की जमीन पर उतारा। लेकिन यह धूलभरी आँधियों में नष्ट हो गया। इसी वर्ष मार्स-6 लेण्डर मंगल में उतरकर मात्र 20 सेकेंड तक वहाँ के आंकड़े भेज सका, बाद में नष्ट हो गया। इसी साल अमेरिका का मेरीनर-9 ने यहाँ का 74 प्रतिशत भूगर्भीय सर्वेक्षण करने के साथ इसके दो उपग्रहों कोबोस और डीमोस का पता लगाया। 1976 में रूस का मार्स-4 असफल हुआ, लेकिन इसी साल मार्स-6 लेण्डर 149 सेकेंड तक मंगल का परीक्षण भर कर सका। इसी साल भेजे गए मार्स-7 को भी विफल होना पड़ा। सन् 1965 में अमेरिका के वाइकिंग-1 लेण्डर को मंगल की जमीन पर अपने कदम जमाने में पूरी सफलता मिली। इसके द्वारा 26000 चित्रों को खींचे जाने के साथ वहाँ के ध्रुवों पर बर्फ एवं धरातल पर पानी की खोज की जा सकी। इसी साल वाइकिंग-2 लेण्डर ने अभूतपूर्व अन्वेषण किए। इसके द्वारा वहाँ के वायुमण्डल में आर्गन एवं नाइट्रोजन की उपस्थिति का पता चला और वहाँ जीवन की सम्भावना के संकेतों का भी अनुमान किया जा सका। खोज की यह प्रक्रिया 1992 में अमेरिका द्वारा भेजे गए ‘मार्स आर्ब्जवर’ के द्वारा और भी तीव्र हुई। इसके द्वारा पर्याप्त आंकड़े इकट्ठे किए जा सके।

मंगल ग्रह पर जीवन की सम्भावनाएँ आदिकाल से ही व्यक्त की जाती रही हैं। इसका कारण यह रहा है कि मंगल हमारे पड़ोसी ग्रहों में सबसे अधिक पृथ्वी जैसा है। इसके अलावा आकाश चन्द्रमा और शुक्र के अतिरिक्त अन्य प्राकृतिक पिण्डों से हमारे ज्यादा नजदीक है। अपेक्षाकृत पतले वायुमण्डल वाले इस ग्रह की लाल रंग की सतह पृथ्वी से साफ दिखाई देती है। वजन में यह अपनी धरती के दसवें हिस्से के बराबर और गुरुत्वाकर्षण में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का एक तिहाई है। यहाँ के दिन-रात की कुल अवधि 24 घण्टे, 37 मिनट, 22 सेकेंड होती है। पृथ्वी से 460 लाख किलोमीटर दूर स्थित इस ग्रह के दो चन्द्रमा फोबोस और डीमोस है। फाबोस का व्यास 66 किलोमीटर है डीमोस का व्यास मात्र 10 किलोमीटर है। आधुनिक निष्कर्षों के अनुसार मंगल ग्रह के ध्रुवों पर बर्फ जमी है, तैरते हुए सफेद बादल हैं। यहाँ की हवा का दबाव, ताप एवं जलप्रवाह पृथ्वी के समान ही है। लाल रंग का दिखाई देने के कारण इसे लाल ग्रह या रेड प्लेनेट भी कहते हैं।

यहाँ पर जीवन के चिन्ह मिलने की चर्चा तब प्रकाश में आयी, जब एक छोटे-से उल्कापिण्ड का दो वर्षों तक अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों के एक दल ने घोषणा की 1.7 किलोग्राम का यह उल्कापिण्ड मंगल का है उसमें कभी वहाँ रहे सूक्ष्म जीवन का संकेत मिले हैं। अभी-अभी अमेरिका की प्रसिद्ध पत्रिका न्यूज पीक में 17 अगस्त, 1776 के अंक में प्रकाशित हुआ। इसके विवरण के अनुसार बारह वर्ष पूर्व 27 दिसम्बर, 1974 को अंटार्कटिका के एलानहिल्स के हिमाच्छादित क्षेत्र में सुश्री राबर्ट स्कोर की निगाह गहरे भूरे रंग के एक शिलाखण्ड पर पड़ी। इस उल्कापिण्ड को रासायनिक विश्लेषण हेतु ‘नासा’ के जान्सन स्पेस सेंटर के आठ वैज्ञानिकों के दल को सौंपा गया। इसका नेतृत्व डेविड एस. मैके के हाथों था। इस पिण्ड का नाम उसके स्थान के नाम पर ए.एल.एच. 94002 रखा गया।

वैज्ञानिकों के दल ने अपने अन्वेषणों में पता लगाया कि इस उल्कापिण्ड में कभी वहाँ रहे सूक्ष्म जीवन के स्पष्ट संकेत हैं।

इनके अनुसार 6 अरब वर्ष से भी पहले मंगल पर सूक्ष्मजीवी थे। वे सूक्ष्मजीवी वहाँ पनपे, उन्होंने वहाँ पुनरुत्त्पत्ति की और मर गए। उनके अस्तित्व का सामान्य तथ्य मूलतः इस विचार को प्रोत्साहित करता है कि इस ब्रह्माण्ड में हम अकेले नहीं है। यह उल्कापिण्ड मंगल ग्रह का ही है, वैज्ञानिकों के इस कथन के पीछे कारण यह है कि यह चट्टानी टुकड़ा गर्म किए जाने पर अब भी ऐसी मिश्रित गैस छोड़ता है, जो मंगल के वायुमण्डल की बेजोड़ गैस है। बहुत पहले का मंगल तब अब से बहुत अलग था। तब वहाँ का वायुमण्डल भी पृथ्वी के वायुमण्डल जैसा था। तापमान भी लगभग पृथ्वी जितना था और द्रव रूप में जल वहाँ की सतह पर बहता था।

वैज्ञानिकों के अनुसार ए. एल. एच. 94001 की उत्पत्ति आज से लगभग 3.6 अरब साल पहले हुई होगी। पहले इसके अन्दर कार्बोनेट का निर्माण हुआ। परीक्षण के दौरान अनुमान यह लगाया गया है कि इसके पश्चात् ही मंगल ग्रह का वायुमण्डल एवं तरल पानी प्रभावित हुए। डेढ़ करोड़ वर्ष पहले किसी तारे या धूमकेतु के मंगल ग्रह पर टकराने से यहां उल्कापिण्ड बना होगा। 15,000 वर्ष पहले अंटार्कटिका में गिरने से पूर्व यह पिण्ड सूर्य के चारों ओर परिक्रमारत था। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के रसायनविद् रिचर्ड नारे ने अति संवेदनशील मास स्पेक्ट्रोमीटर द्वारा इस पिण्ड का परीक्षण किया। इस दौरान इसके अन्दर पाए जाने वाले अणु पी. ए. एच. ( पॉली सायक्लिक एरोमेटिक हाइड्रो-कार्बन) के समान दिखाई दिए। पी. ए. एच. दहन के परिणामस्वरूप बनता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि जीवों के अणुओं में ही यह पाया जाता है। अतः नारे का यह कहना है कि यह जीवाणु मंगल ग्रह का है जो जीवन रूपी चैतन्यता का स्पष्ट संकेत करता है।

पी. ए. एच. कार्बोनेट ग्लाब्यूल्स से एकदम मिलता-जुलता है। जब इसका परीक्षण अति संवेदनशील ‘अल्ट्रा हाई रेजोल्यूशन ट्राँसमिशन इलेक्ट्रॉन-माइक्रोस्कोप’ से किया गया तो कार्बेनेट के किनारे 10 से 100 नेनोमीटर की काली और सफेद धारियाँ पायी गयीं। इसमें आयरन यौगिक के मैग्नेराइट एवं पायराइट भी मिले। यह सब प्रायोगिक निष्कर्ष उल्कापिण्ड के बैक्टीरिया के जीवाश्म को सिद्ध करते हैं। जान्सन बेधशाला के डेविड मैके, एवेरेट गिब्सन ने इस कार्बोनेट का तीन आयामी विधि से सूक्ष्म अध्ययन किया। मैके के अनुसार यह बैक्टीरिया 20 एन. एम. लम्बा और 200 एन. एम. चौड़ा है, जो मंगल ग्रह का ही है। कालान्तर में यह बैक्टीरिया कार्बेनेट में रूपांतरित हो गया। अन्तरिक्षशास्त्री एवं प्रसिद्ध लेखक कार्ल साँगा इसे आशा का नूतन संचार मानते हैं। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी लॉस एंजेल्स के पौलियोबायोलॉजिस्ट विलियम स्काँप जो तीन दशक तक पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में अध्ययनरत हैं, उनका मानना है कि यह जीवाश्म मंगल ग्रह में जीवन की उपस्थिति को बल प्रदान करता है। रिजर्व यूनिवर्सिटी के राल्फ हार्वे एवं टेनिसी यूनिवर्सिटी के स्वीकार करते हैं, कि यदि 3.6 अरब वर्ष पूर्व भी मंगल ग्रह में जीवन की शुरुआत हुई है, तो अब तक वहाँ एक विकसित की आशा की जा सकती है। ह्मूस्टन अंतरिक्ष संस्थान के एलेने ट्रीमैन कहते हैं कि यह जीवाश्म विज्ञान के लिए एक नयी उपलब्धि है । सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्टेरीयल इंटेलीजेंस ‘ सेटी’ के वैज्ञानिकों की मान्यता है कि मंगल ग्रह की सतह पर दो किलोमीटर चौड़ी पट्टी है, जहाँ पर जीवनदायक तापमान के बराबर जल का निरन्तर प्रवाह हो रहा है। माइक्रो बायोलॉजी प्रोग्राम विभाग हमफोर्ड वाशिंगटन के अध्यक्ष जीम प्रडीक्शन का कथन है कि अगर आज से साढ़े तीन अरब साल पहले, मंगल में जीवन की झाँकी देखी जा सकती है, तो इस वर्तमान में भी खोज निकाला जा सकता है।

सम्भावनाओं की इस नई दुनिया से मित्रता का हाथ बढ़ाने की चाह में ‘नासा’ के वैज्ञानिक गोल्डीन ने घोषणा की है कि नासा आगामी दस वर्षों में 10 रोबोट मिशन मंगल ग्रह में भेजने की योजना बना रहा है। यही नहीं यहाँ से इसी वर्ष के नवम्बर में यहाँ के लिए ‘मार्स ग्लोबल सर्वेयर’ को भेजा जा रहा है। इसी के बाद दिसम्बर में ‘ मार्स पाथ फाइन्डर; भेजने की भी योजना बन रही है। जापान भी इस क्रम में नीचे नहीं है। वहाँ से भी ब्रोब को मंगल की भू-संरचना के अध्ययन के लिए रवाना किया जा रहा है। यूरोपीय एजेन्सियां भी 2006 तक चार मिशन इस ओर रवाना करने के लिए प्रयत्नशील हैं।

मंगल पर जीवन के चिन्ह पाये जाने की घोषणा के ठीक एक सप्ताह के बाद इस दिशा में एक और उपलब्धि वैज्ञानिकों के हाथ लगी, जो मंगल को लेकर छिड़ी जीवन की चर्चा से भी ज्यादा विचारोत्तेजक थी। क्योंकि मंगल पर जीवन के संकेत बताने वाला उल्कापिण्ड 3.5 अरब वर्ष पहले का था। लेकिन बृहस्पति ग्रह के चन्द्रमा यूरोपा में पायी गयी जीवन के किसी रूप की सम्भावना सबको अचरज में डालने वाली थी। ‘यूरोपा’ के नए चित्रों से वैज्ञानिकों को संकेत मिले हैं कि इसकी सतह पर हिमपट्टियाँ सम्भवतः पतले कीचड़ अथवा पानी में तैर रही हैं। यदि ऐसा है तो सचमुच ‘यूरोपा’ में जीवन का कोई रूप आश्रय लिए हुए है। द्रव जल जीवन के लिए महत्वपूर्ण घटक है और ऐसी स्थिति में यहाँ जीवन की उपस्थिति की सम्भावनाएँ आदिकाल से ही व्यक्त की जाती रही हैं। इसका कारण यह रहा है कि मंगल हमारे पड़ोसी ग्रहों में सबसे अधिक पृथ्वी जैसा है। इसके अलावा आकाश चन्द्रमा और शुक्र के अतिरिक्त अन्य प्राकृतिक पिण्डों से हमारे ज्यादा नजदीक है। अपेक्षाकृत पतले वायुमण्डल वाले इस ग्रह की लाल रंग की सतह पृथ्वी से साफ दिखाई देती है। वजन में यह अपनी धरती के दसवें हिस्से के बराबर और गुरुत्वाकर्षण में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का एक तिहाई है। यहाँ के दिन-रात की कुल अवधि 24 घण्टे, 37 मिनट, 22 सेकेंड होती है। पृथ्वी से 460 लाख किलोमीटर दूर स्थित इस ग्रह के दो चन्द्रमा फोबोस और डीमोस है। फाबोस का व्यास 66 किलोमीटर है डीमोस का व्यास मात्र 10 किलोमीटर है। आधुनिक निष्कर्षों के अनुसार मंगल ग्रह के ध्रुवों पर बर्फ जमी है, तैरते हुए सफेद बादल हैं। यहाँ की हवा का दबाव, ताप एवं जलप्रवाह पृथ्वी के समान ही है। लाल रंग का दिखाई देने के कारण इसे लाल ग्रह या रेड प्लेनेट भी कहते हैं।

यहाँ पर जीवन के चिन्ह मिलने की चर्चा तब प्रकाश में आयी, जब एक छोटे-से उल्कापिण्ड का दो वर्षों तक अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों के एक दल ने घोषणा की 1.7 किलोग्राम का यह उल्कापिण्ड मंगल का है उसमें कभी वहाँ रहे सूक्ष्म जीवन का संकेत मिले हैं। अभी-अभी अमेरिका की प्रसिद्ध पत्रिका न्यूज पीक में 17 अगस्त, 1776 के अंक में प्रकाशित हुआ। इसके विवरण के अनुसार बारह वर्ष पूर्व 27 दिसम्बर, 1974 को अंटार्कटिका के एलानहिल्स के हिमाच्छादित क्षेत्र में सुश्री राबर्ट स्कोर की निगाह गहरे भूरे रंग के एक शिलाखण्ड पर पड़ी। इस उल्कापिण्ड को रासायनिक विश्लेषण हेतु ‘नासा’ के जान्सन स्पेस सेंटर के आठ वैज्ञानिकों के दल को सौंपा गया। इसका नेतृत्व डेविड एस. मैके के हाथों था। इस पिण्ड का नाम उसके स्थान के नाम पर ए.एल.एच. 94002 रखा गया।

वैज्ञानिकों के दल ने अपने अन्वेषणों में पता लगाया कि इस उल्कापिण्ड में कभी वहाँ रहे सूक्ष्म जीवन के स्पष्ट संकेत हैं।

इनके अनुसार 6 अरब वर्ष से भी पहले मंगल पर सूक्ष्मजीवी थे। वे सूक्ष्मजीवी वहाँ पनपे, उन्होंने वहाँ पुनरुत्त्पत्ति की और मर गए। उनके अस्तित्व का सामान्य तथ्य मूलतः इस विचार को प्रोत्साहित करता है कि इस ब्रह्माण्ड में हम अकेले नहीं है। यह उल्कापिण्ड मंगल ग्रह का ही है, वैज्ञानिकों के इस कथन के पीछे कारण यह है कि यह चट्टानी टुकड़ा गर्म किए जाने पर अब भी ऐसी मिश्रित गैस छोड़ता है, जो मंगल के वायुमण्डल की बेजोड़ गैस है। बहुत पहले का मंगल तब अब से बहुत अलग था। तब वहाँ का वायुमण्डल भी पृथ्वी के वायुमण्डल जैसा था। तापमान भी लगभग पृथ्वी जितना था और द्रव रूप में जल वहाँ की सतह पर बहता था।

वैज्ञानिकों के अनुसार ए. एल. एच. 94001 की उत्पत्ति आज से लगभग 3.6 अरब साल पहले हुई होगी। पहले इसके अन्दर कार्बोनेट का निर्माण हुआ। परीक्षण के दौरान अनुमान यह लगाया गया है कि इसके पश्चात् ही मंगल ग्रह का वायुमण्डल एवं तरल पानी प्रभावित हुए। डेढ़ करोड़ वर्ष पहले किसी तारे या धूमकेतु के मंगल ग्रह पर टकराने से यहां उल्कापिण्ड बना होगा। 15,000 वर्ष पहले अंटार्कटिका में गिरने से पूर्व यह पिण्ड सूर्य के चारों ओर परिक्रमारत था। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के रसायनविद् रिचर्ड नारे ने अति संवेदनशील मास स्पेक्ट्रोमीटर द्वारा इस पिण्ड का परीक्षण किया। इस दौरान इसके अन्दर पाए जाने वाले अणु पी. ए. एच. ( पॉली सायक्लिक एरोमेटिक हाइड्रो-कार्बन) के समान दिखाई दिए। पी. ए. एच. दहन के परिणामस्वरूप बनता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि जीवों के अणुओं में ही यह पाया जाता है। अतः नारे का यह कहना है कि यह जीवाणु मंगल ग्रह का है जो जीवन रूपी चैतन्यता का स्पष्ट संकेत करता है।

पी. ए. एच. कार्बोनेट ग्लाब्यूल्स से एकदम मिलता-जुलता है। जब इसका परीक्षण अति संवेदनशील ‘अल्ट्रा हाई रेजोल्यूशन ट्राँसमिशन इलेक्ट्रॉन-माइक्रोस्कोप’ से किया गया तो कार्बेनेट के किनारे 10 से 100 नेनोमीटर की काली और सफेद धारियाँ पायी गयीं। इसमें आयरन यौगिक के मैग्नेराइट एवं पायराइट भी मिले। यह सब प्रायोगिक निष्कर्ष उल्कापिण्ड के बैक्टीरिया के जीवाश्म को सिद्ध करते हैं। जान्सन बेधशाला के डेविड मैके, एवेरेट गिब्सन ने इस कार्बोनेट का तीन आयामी विधि से सूक्ष्म अध्ययन किया। मैके के अनुसार यह बैक्टीरिया 20 एन. एम. लम्बा और 200 एन. एम. चौड़ा है, जो मंगल ग्रह का ही है। कालान्तर में यह बैक्टीरिया कार्बेनेट में रूपांतरित हो गया। अन्तरिक्षशास्त्री एवं प्रसिद्ध लेखक कार्ल साँगा इसे आशा का नूतन संचार मानते हैं। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी लाज एंजेल्स के पौलियोबायोलाँजिस्ट विलियम स्काँप जो तीन दशक तक पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में अध्ययनरत हैं, उनका मानना है कि यह जीवाश्म मंगल ग्रह में जीवन की उपस्थिति को बल प्रदान करता है। रिजर्व यूनिवर्सिटी के राल्फ हार्वे एवं टेनिसी यूनिवर्सिटी के स्वीकार करते हैं, कि यदि 3.6 अरब वर्ष पूर्व भी मंगल ग्रह में जीवन की शुरुआत हुई है, तो अब तक वहाँ एक विकसित की आशा की जा सकती है। ह्मूस्टन अंतरिक्ष संस्थान के एलेने ट्रीमैन कहते हैं कि यह जीव विज्ञान के लिए एक नयी उपलब्धि है । सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्टेरीयल इंटेलीजेंस ‘ सेटी’ के वैज्ञानिकों की मान्यता है कि मंगल ग्रह की सतह पर दो किलोमीटर चौड़ी पट्टी है, जहाँ पर जीवनदायक तापमान के बराबर जल का निरन्तर प्रवाह हो रहा है। माइक्रो बायोलॉजी प्रोग्राम विभाग हमफोर्ड वाशिंगटन के अध्यक्ष जीम प्रडीक्शन का कथन है कि अगर आज से साढ़े तीन अरब साल पहले, मंगल में जीवन की झाँकी देखी जा सकती है, तो इस वर्तमान में भी खोज निकाला जा सकता है।

सम्भावनाओं की इस नई दुनिया से मित्रता का हाथ बढ़ाने की चाह में ‘नासा’ के वैज्ञानिक गोल्डीन ने घोषणा की है कि नासा आगामी दस वर्षों में 10 रोबोट मिशन मंगल ग्रह में भेजने की योजना बना रहा है। यही नहीं यहाँ से इसी वर्ष के नवम्बर में यहाँ के लिए ‘मार्स ग्लोबल सर्वेयर’ को भेजा जा रहा है। इसी के बाद दिसम्बर में ‘ मार्स पाथ फाइन्डर; भेजने की भी योजना बन रही है। जापान भी इस क्रम में नीचे नहीं है। वहाँ से भी ब्रोब को मंगल की भू-संरचना के अध्ययन के लिए रवाना किया जा रहा है। यूरोपीय एजेन्सियां भी 2006 तक चार मिशन इस ओर रवाना करने के लिए प्रयत्नशील हैं।

मंगल पर जीवन के चिन्ह पाये जाने की घोषणा के ठीक एक सप्ताह के बाद इस दिशा में एक और उपलब्धि वैज्ञानिकों के हाथ लगी, जो मंगल को लेकर छिड़ी जीवन की चर्चा से भी ज्यादा विचारोत्तेजक थी। क्योंकि मंगल पर जीवन के संकेत बताने वाला उल्कापिण्ड 3.5 अरब वर्ष पहले का था। लेकिन बृहस्पति ग्रह के चन्द्रमा यूरोपा में पायी गयी जीवन के किसी रूप की सम्भावना सबको अचरज में डालने वाली थी। ‘यूरोपा’ के नए चित्रों से वैज्ञानिकों को संकेत मिले हैं कि इसकी सतह पर हिमपट्टियाँ सम्भवतः पतले कीचड़ अथवा पानी में तैर रही हैं। यदि ऐसा है तो सचमुच ‘यूरोपा’ में जीवन का कोई रूप आश्रय लिए हुए है। द्रव जल जीवन के लिए महत्वपूर्ण घटक है और ऐसी स्थिति में यहाँ जीवन की उपस्थिति की सम्भावनाएँ मंगल से भी कहीं ज्यादा बन जाती हैं। यूरोपा के नए चित्र अन्तरिक्षयान ‘गैलीलियो’ ने 1,46,600 किमी. दूर से खींचे है। इन चित्रों से यहाँ की सतह पर गहरे स्थलों की शृंखला का पता चलता है। ये जगहें कीचड़ की उपस्थिति इस बात पर बल देती है कि यूरोजी जमी हुई बर्फ का कोई ठोस पिण्ड नहीं है, बल्कि इसके भीतर पानी भी है। सामान्यतया अभी तक विश्वास किया जाता रहा है कि यहाँ बर्फ की 70 से 90 कि.मी. मोटी सतह बिछी है।

पर अब इस बात की सम्भावना का स्पष्ट होना कि यूरोपा की अपेक्षाकृत गर्भ और चिकली पर्त के चारों ओर हिमपट्टियाँ तैर रही हैं। इस बात को साफ करती हैं कि कोई शक्तिशाली ज्वारीय बल वहाँ के भूपटल को तोड़ता रहा है। बृहस्पति के इस उपग्रह में जितनी भूगर्भीय गतिविधियाँ सक्रिय होंगी, उसमें जीवन के आश्रय पाने की सम्भावनाएँ भी उतनी ही अधिक होंगी, ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है। जहाँ तक इस उपग्रह की स्थिति का सवाल है, यह बृहस्पति का चौथा सबसे बड़ा और सन् 1610 में गैलीलियो द्वारा टेलिस्कोप से देखा जाने वाला चाँद है। इसका व्यास अपनी धरती के चन्द्रमा से थोड़ा कम है। इसकी सतह का तापमान 145 डिग्री सेल्सियस है। लेकिन इतना कम तापमान वहीं है, जहाँ कुछ ही मीटर चौड़ी बर्फ की पपड़ी इसकी सतह को घेरती है। बाकी इसकी 60 मील की गहराई में पानी का विशाल सागर होने की सम्भावना है।

अन्तरिक्ष यान गैलीलियो वर्ष 1767 में भेजा गया था। इस यान से यूरोपा की भौगोलिक जानकारियों के एक से बढ़कर एक चित्र वैज्ञानिक समुदाय को देखने के लिए मिल रहे हैं। इन चित्रों की स्पष्टता सन् 1791 में वायजर द्वारा यूरोपा के चित्रों से कहीं अधिक है। इन वैज्ञानिकों को बेसब्री से उस दिन का इन्तजार है, जब इसी साल दिसम्बर में गैलीलियो यूरोपा से सिर्फ 100 मील की दूरी से गुजरेगा। तब उसके द्वारा लिए गए चित्र कई और भी रहस्यों को खोलने वाले होंगे।

पृथ्वी से बाहर अन्यत्र जीवन है या नहीं, इसकी खोज में जुटे वैज्ञानिकों को तब और भी प्रोत्साहन मिला, तब उन्हें पिछले दो सालों में अन्य तारामंडलों में 9 ग्रहों का पता चला। इसी के साथ जिस तरह अपनी धरती में जटिल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवन के अस्तित्व का पता लग रहा है, उससे यह बात अच्छी तरह सिद्ध हो जाती है, कि जहाँ कहीं भी पानी होगा, वहाँ सूक्ष्म जीवन रह सकता है। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिकों ने सागर की गहराइयों में, ज्वालामुखी सुरंगों में 315 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी जीवाणुओं का पता लगा है। कोलंबिया नदी के नीचे 1,500 मी. की गहराई पर स्थित चट्टानों में भी सूक्ष्मजीवी पाए गए हैं। इन तमाम बातों से सहज ही यह सवाल जन्म लेता है कि पृथ्वी पर जीवन का विकास एक समय की घटना थी या दूसरे ग्रहों पर होने वाली विभिन्न परिस्थितियों का परिणाम था। किसी भी ग्रह पर सूक्ष्मजीवी की उपस्थिति इस अनुमान को बल देती है कि हमारी आकाश-गंगा में कहीं न कहीं बुद्धिमान सभ्यता मौजूद है।

इस तरह अब इन्सानी सोच को बदल डालने के लिए अनेक अवसर आ जुटे हैं। पहले जहाँ हम अपनी छोटी-सी धरती को द्वीपों और देशों में बाँटते रहते थे। इसके छोटे-से टुकड़े के लिए महाविनाश के सरंजाम जुटाते फिरते थे; वहीं अब वैज्ञानिकों ने चेतावनी दे डाली है कि मानव अभी से अपने को विश्व परिवार का नहीं, ब्रह्माण्ड परिवार का सदस्य मानकर अपनी सोच में बदलाव लाए। वैज्ञानिक जान डॉन के शब्दों में, “हम मुख्य ग्रहाधिपति का एक हिस्सा हैं। हमारे शरीर के अणु दूर के सूर्योदय में गढ़े गए हैं। यह भी सम्भव है कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत अन्य कहीं से शुरू हुई हो और वह किसी धूमकेतु अथवा क्षुद्र ग्रह के जरिए पृथ्वी तक पहुँची हो। यह भी सम्भव है कि जीवन की शुरुआत पृथ्वी पर हुई हो और उसका एक छींटा मंगल के मुँह पर जा पड़ा हो। शायद तभी भारतीय मनीषियों ने मंगल को ‘ धरणीगर्भ सम्भूतं ‘ कहकर सम्बोधित किया है।

जहाँ तक धरती से बाहर किसी और विकसित सभ्यता की बात है, तो इस बारे में कुछ और बातों पर ध्यान रखना होगा। हमारा सूर्य जिससे हमारी पृथ्वी जन्मी, उसकी उम्र लगभग 5 अरब वर्ष है। ब्रह्माण्ड में ऐसे न जाने कितने तारे हैं, जिनकी उम्र 10 अरब साल से भी ज्यादा है। जिस तरह हमारा सौरमंडल बना, उसके एक ग्रह में जीवन विकसित हुआ। इसी तरह यदि 10 अरब वर्ष पहले के तारामंडलों में ग्रह बने होंगे और वहाँ बाद में जीवन विकसित हुआ होगा तो निश्चित ही आज अत्यन्त विकसित होगा। मंगल ग्रह पर तो सूक्ष्मजीवी की उपस्थिति को साढ़े तीन अरब साल पहले की बात माना जा रहा है, इस तरह तो वहाँ भी अब तक विकसित सभ्यता की आशा सँजायी जा सकती है। मनुष्य के चरित्र ( आचरण ) से ही पता चलता है कि यह कुलीन है यह कुलहीन, सच्चा वीर है अथवा यूँ ही डींगे मारने वाला तथा पवित्र है या अपवित्र।

बात कुछ भी हो, लेकिन अभी तक वैज्ञानिकों ने जो तथ्य एकत्रित किए हैं कि इस विराट ब्रह्माण्ड में हम अकेले नहीं हैं, हमारे और भी पड़ोसी हैं। आने वाली इक्कीसवीं सदी में उनका सुनिश्चित पता-ठिकाना लगाए बिना न रहेगी और तब नवयुग प्रस्तुत करने वाली इस अगली सदी मनुष्य देश-जाति और धर्मों की संकीर्ण परिधि में बँधा न रहेगा। समूची पृथ्वी एक राष्ट्र का रूप लेगी, इसमें एक धर्म होगा और एक भाषा बनेगी और एक संस्कृति पनपेगी अगले दिनों हमें अपना परिचय धरती के निवासी के रूप में देना पड़ेगा, तभी हम ब्रह्माण्ड के अन्य सुविकसित प्राणियों से एकता, आत्मीयता स्थापित कर पाएंगे। कुछ ही वर्षों बाद अगली सदी जिस उज्ज्वल भविष्य को लेकर आ रही है उसमें ब्रह्माण्ड परिवार में आत्मीयता से भरे आदान-प्रदान का सिलसिला पनपने की सुनिश्चित सम्भावना है। इसके लिए आवश्यकता अपनी क्षुद्रता छोड़कर व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की है।


नारी शक्ति का न्याय

मेघ छाए हुए थे । हवा सन्न थी। पानी रिमझिम-रिमझिम बरस रहा था। महल के ऊपरी खण्ड के हवाई कमरे में रानी आँखें मूँदे हुए मोतीबाई का भजन सुन रही थीं। मुन्दर जमुहा रही थी। सुन्दर बैठे-बैठे सावधानी के साथ निद्रामग्न हो गयी थी। काशी सचेत थी। भजन की समाप्ति पर रानी का ध्यान टूटा, मुन्दर की जमुहाई टूटी और सुन्दर की निद्रा समाधि भी भंग हो गयी।

उसी समय पहरे वाले ने निवेदन किया, “बरुआ सागर से एक सिपाही आवश्यक समाचार लाया है।”

रानी ने दूसरे कमरे में उसको बुलवाया। उसका आदेश था कि आवश्यक समाचार के लिए समय-कुसमय ने देखा जाए और उनको तुरन्त सूचना दी जाया करे।

रानी सहेलियों के साथ दूसरे कमरे में गयीं।

समाचार लाने वाले ने कहा- “रानी सरकार, रावली के बागियों से सरदार खुदाबख्श की लड़ाई हुई। वे घायल हो गए हैं। साल सिपाही घायल भी हुए हैं। सरदार को तलवार के घाव लगे हैं और सिपाहियों को गोलियों के। भगवान की कृपा से कोई मरा नहीं है और न किसी के लिए इस तरह का भय है। सागरसिंह भाग गया है। लड़ाई रावली में सागर सिंह के घर पर हुई थी।”

समाचार सुनकर सभी सोच में पड़ गए। सागरसिंह का नाम बुन्देलखण्ड भर में आतंक का पर्याय बन चुका था। अपने को कँवर सागरसिंह कहलवाने वाला यह डाकू जितना खतरनाक था, उससे कहीं अधिक शातिर। उसके कारण सेठ-साहूकारों का तो जीना-हराम था। उनका समूचा व्यापार ठप्प पड़ गया था। आम आदमी भी कम आतंकित न था। सागरसिंह के गिरोह के बागी जब-तब उन्हें धमकाते-सताते रहते थे। सागरसिंह और उसके गिरोह के इन्हीं उत्पातों को नियन्त्रित करने के लिए रानी ने सरदार खुदाबख्श को एक कुमक के साथ भेजा था। समाचार लाने वाला उन्हीं के समाचार बता रहा था। जिसे सुनकर वे कुछ सोचने लगी थीं।

लेकिन यह मौन ज्यादा देर तक न रहा। कुछ ही पलों में उन्होंने पूछा- “रावली बरुआ सागर से कितनी दूर है?”

समाचार लाने वाले सिपाही ने उत्तर दिया-”पाँच-छह कोस दूर है, सरकार।”

जवाब सुनकर रानी ने पूछा- “खुदाबख्श को कहाँ चोट आई है और अब क्या हाल है? लड़ाई को कितने दिन हो गए?”

“लड़ाई को आज चौथा दिन है। घाव बाहों और जाँघों में अलबत्ता ज्यादा गहरे हैं।”

“तुम्हें समाचार लाने में इतनी देर क्यों हुई?”

“बेतवा नदी इतनी चढ़ी हुई है कि नाव नहीं लग सकी। सरकार, आज दोपहर कुछ उतरी तो आ पाया हूँ।”

“ठीक है, मैं प्रबन्ध करती हूँ। तुम जाओ।” इतना कहकर रानी अपने कक्ष में लौट आयीं और अपनी सहेलियों से कहने लगीं, कल बरुआ सागर चलना चाहिए।

काशी बोली-”सरकार न जाए”। कुछ ठीक नहीं, किस समय पानी जोर से बरस पड़े, नदी चढ़ आवे। उस दिन जब आपने बरुआ सागर जाने का निश्चय किया, मैं कुछ न कह सकी थी, परन्तु आज तो मैं हठ करूंगी।”

रानी ने कुछ सोचते हुए कहा- “तुम ठीक कहती हो काशी! परन्तु स्थिति की माँग हम पर प्रबल है। यदि कल पानी न बरसा तो अच्छे घोड़ों पर चल देंगे। हाथी भी जा सकता है परन्तु मैं इस समय प्रदर्शन बचाना चाहती हूँ और वह सवारी बहुत धीमी भी है।”

“सरकार को कुछ घुड़सवार साथ ले लेने चाहिए।” मोतीबाई ने सलाह दीं

“लूँगी। दीवान रघुनाथसिंह को सबेरे सूचना दे देना।” रानी ने कहा।

“मैं भी चलूँगी।” काशीबाई का आग्रह था।

“अवश्य चलना।” आग्रह स्वीकार हुआ।

“आज्ञा हो तो मैं भी चलूँ।” मोती बाई ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा।

“नाव न लूँगी तो घोड़े पर नदी पार कर लोगी?”

“सरकार की सेवा में रहते, मुझको आग-पानी किसी का भी डर नहीं रहा।” मोतीबाई के इस कथन पर रानी ने अपनी स्वीकृति दे दी।

रात में पानी थोड़ा-थोड़ा बरसता रहा। सवेरे बादल खुला-सा दिखाई दिया। रानी सहेलियों समेत बरुआ सागर की ओर चल दी। पच्चीस घुड़सवार साथ में ले लिए। दीवन रघुनाथविंह संग में। शीघ्र ही घाट पर दस्ता पहुँच गया। देखा की बेतवा दोनों पाट दाबे पूरे वेग से चली जा रही है।

ऊपर ज्यादा पानी बरस गया था, इसलिए बेतवा बेतहाशा इठला गयी। इवा आँधी के रूप में चल रही थीं मल्लाहों के लिए नाव का लगाना असम्भव था। अनेक घुड़सवारों के हौंसले पस्त होने लगे।

उस पार की पहाड़ियों का लहरियादार सिलसिला हरियाली से ढका पहाड़ियों की चोटी और हरियाली को चूमने के लिए नभ से उतर-उतर कर टकराते चले जा रहे थे। बेतवा का शोर आँधी का साथ पाकर तुमुल हो उठा।

रानी ने गर्दन घुमाकर मोतीबाई की ओर नजर की। वह उस पार की पहाड़ियों से टकराते मेघ-खण्डों पर दृष्टि जमाए थी।

रानी ने आज्ञा दी, “कूद पड़ो।” और वे सबसे आगे घोड़े पर पानी में घुस गयीं।

फिर क्या था, उनकी सहेलियाँ और सब घुड़सवार धार को चीरते दिखाई पड़ने लगे। रानी उनमें सबसे आगे थी।

बेतवाँ की धार पुंज के ऊपर पुंज सी दिखाई पड़ती थी। क्रम अभंग और अनन्त था। जब एक क्षण में ही अनेक बार एक जल पुँज दूसरे में संघर्ष खाता और एक दूसरे से आगे निकल जाने का अनवरत, अथक, अटूट प्रयास करता, तब इतना फेनिल हो जाता कि सारी नदी में फेन ही फेन दिखाई पड़ता था। झाग की इतनी बड़ी निरन्तर बही और उत्पन्न होती हुई राशियाँ आड़े आ जाती थीं कि घुड़सवारों को सामने का किनारा नहीं दिखाई पड़ पाता था।

लहरों के एक पल्लड़ को चीरा, उस पर के झाग को बेधा की दूसरा सामने। शब्दयम प्रवाह की निरर्थक भाषा मानो बार-बार कहती थी- बचो-बचो। सामने की उथल-पुथल से आगे बढ़े कि बग से थपेड़ पड़ी। घोड़े आँखें फोड़े नथुनों से जल फुफकारते बढ़ रहे थे। वे अपना और अपने सवार का संकट समझ रहे थे। सवार के पैर घोड़े से चिपटे हुए और उनके पैरों के नीचे घोड़े का निस्तब्ध टाप और टाप के नीचे न जाने कितनी गहराई। ववारों के चारों ओर भँवर पड़-पड़ जा रही थी। एक भँवर बनी धार की, कि दूसरी तुरन्त मौजूद। परन्तु अपनी रानी और उनकी सहेलियों को आगे देखकर किस सिपाही के मन में अधिक समय तक भय ठहर सकता था?

रानी के घोड़े का केवल सिर ऊपर, शेष भाग पानी और झाग में। रानी की कमर तक झाग, पानी और धार के साथ बहकर आया हुआ झाड़-झंखाड़। धारा की बूँदों की झड़ी उचट-उचट कर आँखों में, बालों पर और सारे शरीर पर बरस रही थी। जब कभी सिपाहियों और सहेलियों को उत्साह देता होता तो हँस-हँस कर शाबाशी देतीं- मानो प्रचण्ड बेतवा की मलिन अंजलि में मुक्ता बरसा दिये हों। धूमरे बादलों के आगे एक ओर बुलबुलों को पाँत निकल गयी। ऐसा लगा जैसे पहाड़ियों और पहाड़ियों से मिलने वाले बादलों को सफेद खौर लगा दी गयी हो।

पहाड़ों की कंदराओं में घुसे हुए, उनको आच्छादित किए हुए बादलों में होकर वह बगुलों की पंक्ति छिपती हुई सी मालुम पड़ी और फिर तितर-बितर हुई, जैसे हिलती हुई साँवली-सलोनी चादर में टँके हुए सितारे। पहाड़ पर बड़े-बड़े और सघन पेड़। गहरे, हरे श्यामल। बगुले एक पेड़ पर जा बैठे, मानो वनदेवी ने प्रभा छिटक दी हो। उस विषम धार के पार थोड़ी देर में कितना सब दिखाई दे गया।

रानी फिर हँसी। बगुलों की सफेदी से रानी के दाँतों ने तुरन्त होड़ लगा दी। वे चिल्लाकर बोलीं, देखो किनारा आ गया! मार लिया पड़ाव। थोड़ी ही देर में पूरा दस्ता नदी पार हो गया। सब भीग गए थे। परन्तु पीठ पर कसे ढके हथियार लगभग सूखे थे। घोड़े ठिठुर गए थे।

घाट पर कपड़े सुखाने, बदलने और घोड़ा को आराम देने में थोड़ा-सा समय लगा। फिर दौड़ लगी और रानी बरुआ सागर के किले में दोपहर के करीब पहुँच गयीं। बरुआ सागर किल विशाल झील के ठीक ऊपर है। झील में बरुआ नाम का बड़ा नाला गिरता है। झील को विशालता इस नाले ने दी है।

घायल सिपाही और सरदार खुदाबख्श इसी किल में पड़े हुए थे।

रानी ने तुरन्त इन सबको देखा। किसी के सिर पर हाथ फेरा, किसी की मरहम-पट्टी की देखभाल की। सिपाही अपनी रानी के स्नेह का पाकर मुग्ध और गदगद हो गए। फिर वह खुदाबख्श के पास पहुँची। खुदाबख्श ने चारपाई से उठने का प्रयत्न किया, परन्तु न उठ सका। रानी को देखते ही उसके आँसू आ गए। चरणस्पर्श करने की कोशिश की । रानी ने फिर सिर पर हाथ फेरा और पास की चौकी पर बैठ गयी। सहेलियाँ खड़ी थीं। खुदाबख्श ने रानी सागरसिंह की लड़ाई का ब्योरेवार हाल सुनाया। सारा हाल सुनकर उन्होंने पूछा, “कुछ पता चला सागरसिंह अब कहा चला गया है?”

“सरकार, गाँव वाले पता नहीं बतलाते। वे ही उनको शरण, भोजन, इत्यादि सब देते हैं। फिर भी इतना तो मालुम हो गया हो कि वह पड़ोस के जंगल में है।” खुदाबख्श का यह जवाब सुनकर रानी कहने लगी, “गाँव वाले डाकुओं से डरते हैं। उनके पास निर्भय होने का कोई साधन नहीं है। अँग्रेजी राज्य ने पंचायतों का सर्वनाश कर दिया है, इसलिए गाँवों से परस्पर सहायता की प्रणाली उठ-सी गयी है और उसने डाकुओं की सहायता देने का रूप पकड़ लिया है। देखूँगी, तुम चिन्ता न करो।”

सन्ध्या के पहले बरुआ सागर के मुखिया और पंच रानी से मिलने के लिए आए। नजर न्यौछावर हुई। रानी ने सबसे कुशल-क्षेम वार्ता की। जब एकान्त पाया, थानेदार ने रानी का सागरसिंह के विषय में सूचना दी। मालुम हुआ कि खिसनी के जंगल में आश्रय पाए हुए है। खिसनी का जंगल बरुआ सागर से बारह मील था। थानेदार को उन्होंने आदेश दिया।

“सबेरे आठ बजे तैयार रहना। किसी को मालुम न होने पावे।”

सबेरे उनके आदेश के मुताबिक सब तैयार हो गए।

रानी अपनी बरुआ सागर के थाने की टुकड़ी के लिए हुए चल दीं। उन्होंने इस टुकड़ी के दो भाग किए। एक को दीवान रघुनाथसिंह की अधीनता में रावली की ओर रवाना किया और दूसरी को स्वयं लेकर खिसनी के जंगल की ओर चल दीं।

दीवान रघुनाथसिंह ने सागरसिंह की हवेली घेर ली। एक गाँव वाले से कहलवा भेजा, हथियार डालकर मेरे पास आ जाआ। रानी साहब कुछ रियायत कर देंगी, नहीं तो हवेली की ईंट से ईंट बजा दूँगा।

गाँव वालों ने कहा, “कुँवर सागरसिंह हवेली में नहीं हैं।”

“तब तो हवेली को पटक देने में और भी सुभीता रहेगा।”रघुनाथसिंह ने डपट कर कहा। लेकिन जब उनको निश्चय हो गया कि सागरसिंह हवेली में नहीं है, उन्होंने रानी के पास सन्देशा खिसनी की ओर भेज दिया। खुद हवेली का घेरा डाले रहे।

रानी जब जंगल घेरने की योजना बना रही थी? तभी उनका सन्देश मिला। उनका मन कह रहा था कि सागरसिंह इसी डाँग में है।

गुप्तचर ने घण्टे भर के भीतर सूचना दी-”दो पहाड़ियों की दुन के सिरे पर एक बड़ी-सी झोंपड़ी में बागी खाने-पीने के सरंजाम में लगे हैं। उनके पास घोड़े हैं।

रानी ने दोनों पहाड़ों की ऊँचाइयाँ बन्दूक वालों से घिरवा लीं और दुन के सिरे पर भी कुछ आदमी भेज दिए। स्वयं तीनों सहेलियों और मोतीबाई के साथ दुन के निकास पर दो कतारों में ओट लेकर घोड़ों समेत ठहर गयीं।

उनकी आज्ञा थी कि ऊपर वाले सिपाही धीरे-धीरे दुन की डाल की ओर बढ़े और जब डाकुओं के जरा निकट आ जाएँ, तब बन्दूकों से फायरिंग करेंगे।

ऐसा ही किया गया।

डाकू बेहद हड़बड़ा गए। खाना-पीना और साज-समान छोड़, घोड़ों की नंगी पीठ पर सवार हुए और दुन के निकास की ओर भागे। निकास पर पहुँचते ही उनके ऊपर सामने से पाँच बन्दूकें चलीं। घोड़े मरे, डाकू घायल हुए। उन लोगों ने बन्दूकों से जवाब दिया परन्तु रानी का दल आड़ लिए हुए था। इसलिए कोई कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

डाकू सिर पर पैर रखकर भागे।

काशी, सुन्दर और मोतीबाई ने अलग पीछा किया।

रानी और सुन्दर के पास से जो डाकू घोड़े पर सवार, जरा पीछे निकला, वह सतर्क था। नंगी तलवार हाथ में, गले में सोने की जंजीर, वस्त्र भी उसके अच्छे थे। जो वर्णन उनको सागरसिंह का मिला था, उससे इस डाकू सवार की हुलिया मिलती थी। रानी ने निर्णय किया कि यही सागरसिंह है। रानी ने मुन्दर को मुस्करा कर इशारा किया। मुन्दर ने होठ दाबे और सपाटे के साथ उस पर टूटी। रानी दूसरी बगल से। सागरसिंह ने घोड़ा तेज किया। इन दोनों ने पीछा किया। जब तक मार्ग ऊबड़-खाबड़ रहा, सागरसिंह बचता हुआ चला गया। जब मार्ग कुछ समतल आया, जमीन मुलयम और कीचड़ भरी मिली सागरसिंह का घोड़ा अटकने लगा। रानी और मुन्दर के घोड़े बहुत प्रबल थे- दोनों काठियावाडी और वे दोनों ही सागरसिंह से कही अधिक कुशल घुड़सवार भी थीं। सागरसिंह को एक ओर से मुन्दर ने दबाया और दूसरी ओर से रानी ने।

रानी के गले में हीरों का दमदमाता कण्ठा डाले थी। उनके चेहरे पर छायी दिव्य आभा की चमक से सागरसिंह की आंखें झपक गयी। वह देखते ही समझ गया कि जिस रानी लक्ष्मीबाई के बारे में बहुत सुना जाता है वह स्वयं आज, इसी क्षण उसके प्राणों की ग्राहक बनकर आ कूदी है।

बुन्देलखण्ड को अपने दुस्साहसी कारनामों से कँपाए रखने वाले इस खतरनाक डाकू को आज भली प्रकार अहसास हो गया कि नारी जिसे वह अबला समझता रहा है, कितनी बलवान है। वह शक्तिस्वरूपा है, समर्थ शक्ति का पुँज है। इसके पहले वह और कुछ करे, कि रानी ने डपटकर कहा, “खबरदार! यदि ज्यादा कुछ करने की कोशिश की तो तलवार मुँह में ठूँस दूँगी।”

सागरसिंह को रानी और मुन्दर के बल की प्रतीति हो गयी थी और उसने अपनी रक्षा को अपने भाग्य के हवाले कर दिया। थोड़ी दूर चलने पर झाँसी की सेना का दस्ता आ धमका। सागरसिंह उस वज्रपाश में से निकला और रस्सियों से बाँध दिया गया। घोड़े पर लादकर यह टुकड़ी एक जगह ठहर गयी। मोतीबाई, काशी और सुन्दर की बाट देखने लगी। रानी ने बिगुल बजवाया। वे तीनों थोड़ी देर में उस स्थल पर आ गयीं। मालुम हुआ कि बाकी डाकू निकल भागे। दीवान रघुनाथसिंह को समाचार देकर रानी बरुआ सागर चली आयीं। उन्होंने कहा,”ये भागे हुए डाकू इस समय हाथ नहीं लगेंगे। समय काफी हो चुका है। बरुआ सागर संध्या के पहले पहुँच जाना चाहिए।

समय पर सागरसिंह रानी के सामने पेश किया गया।

रानी ने पूछा, “तुम्हारा नाम?”

उसने उत्तर दिया, “कुँवर सागरसिंह, श्रीमन्त सरकार।”

रानी मुस्कराई। सागरसिंह उस मुसकराहट से काँप गया। रानी कहा- “कुँवर होकर यह निकृष्ट आचरण कैसा?”

सागरसिंह बोला, “सरकार हमारा वंश सदा लड़ाइयों में भाग लेता रहा है। महाराज ओरछा की सेवा में लड़ा। महाराज छत्रसाल की सेवा में रहकर युद्ध किए। जब अँग्रेज आए तब उनकी आधीनता जिन ठाकुरों ने स्वीकार नहीं की, उनमें हम लोग भी थे। हमको जब दबाया गया, हम लोग बिगड़ खड़े हुए और डाके डालने लगे। मैं अपने लिए और अपने साथियों के लिए गंगाजी की शपथ लेकर कह सकता हूँ कि हम लोगों ने स्त्रियों और दीन-दरिद्रों को कभी नहीं सताया।”

रानी ने कह- “इन दिनों जिन लोगों ने यहाँ तुमने डाके डाले, वे सब मेरी प्रजा हैं, अँग्रेजों की नहीं। डाके के लिए दण्ड प्राणों का है। तैयार हो जाए। तुम्हारे साथी भी न बचेंगे और तुम्हारे उनके घर। मिट्टी में मिलवा दूँगी।”

सागरसिंह ने कनखियों से रानी की आँखों की ओर देखा। उसने इतनी बड़ी, ऐसी कजरारी प्रभापूर्ण आँखें न देखी थीं। उसको ऐसा लगा मानो साक्षात् दुर्गा सामने खड़ी है।

वह बोला, “सरकार, मैं कुछ प्रार्थना कर सकता हूँ?”

रानी ने अनुमति दी।

सागरसिंह ने प्रार्थना की, मुझको प्राणदण्ड गोली या तलवार दिया जावे, फाँसी से नहीं। यदि फाँसी दी गयी तो मेरा और जाति भर का अपमान होगा। बागी बढ़ जावेंगे। घटेंगे नहीं सरकार।”

“तुमको यदि छोड़ दूँ तो क्या करोगे?”

“श्रीमंत सरकार के सामने झूठ नहीं बोलूँगा। यदि काम न मिला तो फिर डाके डालूँगा, परन्तु सरकार के राज्य में नहीं।”

“यदि मैं कहूँ कि तुम डाके बिलकुल न डालो तो इसके बदले में क्या चाहोगे?”

“सरकार की सेना में नौकरी।”

“तुम्हारे कितने साथी हैं?”

“जंगल में पन्द्रह-सोलह थे। गाँव में साठ-पैंसठ हैं और अदृश्य सहायक मेरे सब नातेदार।”

“वे लोग क्या करेंगे।”

“सरकार की आज्ञा हुई, तो सरकार की सेना में मेरे साथ नौकरी।”

“तुम सबसे बड़ी सौगंध किसकी मानते हो?”

“गंगाजी की, अपनी तलवार की और सरकार के चरणों की।”

“मैं तुमको छोड़ती हूँ सागरसिंह। सौगंध खाओ और अपने साथियों सहित झाँसी की सेना में भरती हो जाओ।”

रानी के इस कथन पर सागरसिंह एक पल के लिए अचरज में पड़ गया। उसे इतनी आसानी से अपने क्षमादान की आशा नहीं थी। उसे अपने अंतर्मन की गहराइयों में अनुभव हुआ कि नारी समर्थता में, नहीं-नहीं, क्षमा-करुणा में भी पुरुष से श्रेष्ठ है। नारी के लिए ‘देवी’ का पर्याय सर्वथा उचित है। वह भावों से भर गया। भावनाओं के वशीभूत होकर वह उनके पैरों पर गिर पड़ा, उसकी आँखों से श्रद्धा बिन्दू झर रहे थे। जो सामने बैठी उस देवी का श्रद्धार्चन कर रहे थे, जिसे इतिहास झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के नाम से जानता है।


धर्म के नाम पर चित्र-विचित्र ये परम्पराएँ

धर्म का तात्पर्य शालीनता, सदाचरण, नीतिमत्ता एवं कर्तव्यपरायणता से है। यह प्रयोजन उच्चस्तरीय आस्थाओं के सहारे ही सधते हैं। पर विकृतियों एवं भ्राँतियों को क्या कहा जाय, जिनके धर्मक्षेत्र में प्रवेश पा जाने और गहरी जड़ें जमा लेने के कारण आज भी मानव समुदाय न्याय और औचित्य की तुलना में परम्पराओं से चिपके रहने के लिए ही बाधित है। इस वैज्ञानिक युग में भी जहाँ तर्क, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर किसी चीज की वास्तविकता को जाँचा-परखा और कसौटी पर खरा उतरने के पश्चात् ही अपनाया जाता है, वहाँ धर्म के संबंध में ऐसी बात देखने को नहीं मिलती।

धर्मक्षेत्र में जितने मतभेद एवं मत-मतान्तर देखने सुनने में आते हैं, उतना ओर किसी विषय में शायद ही मिल सके। यह भेद अज्ञानियों में ही नहीं, समझदार और उन्नत-प्रगतिशील लोगों में भी देखने में आता है। हिन्दू गौ को पवित्र मानते और उसका एक रोम भी दूध के साथ पेट में चले जाने पर घोर पाप समझते हैं, वहाँ अन्य सम्प्रदाय वाले उसकी गाय को खुदा के नाम पर काटकर खा जाने में बड़ा पुण्य मानते हैं। ईसाई बिना पाप-पुण्य के झगड़े में पड़े नित्य ही उसके माँस को एक साधारण आहार की तरह ग्रहण करते हैं। यहूदी भगवान की उपासना करते समय मुँह के बल लेट जाते हैं, कैथोलिक ईसाई घुटनों के बल झुकते हैं, प्रोटेस्टेंट ईसाई कुर्सी पर बैठकर प्रार्थना करते हैं। मुसलमानों की नमाज में कई बार उठना-बैठना पड़ता है और हिन्दुओं की सर्वोच्च प्रार्थना वह है जिसमें साधक ध्यानमग्न होकर अचल हो जाय। यदि कहा जाय कि इन सब में एक ही उपासना विधि ठीक है और दूसरी अन्य सभी बेकार हैं, तो भी काम नहीं बनता। अन्य में भी अनेक व्यक्ति बड़े सन्त और त्यागी महात्मा हो गये हैं। धार्मिक क्षेत्र के इसी घोर वैम्य को देखकर मूर्धन्य लेखक एस. बैरिंग गोल्ड ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘ओरीजिन एण्ड डेवलपमेंट ऑफ रिलीजियस बिलीफ’ में लिखा है कि, “संसार में समस्त प्राचीन युगों से अगणित ऐसे धार्मिक विश्वास पाये गये हैं, जो एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं और जिनकी रस्मों तथा सिद्धान्तों में जमीन-आसमान का अन्तर है। एक प्रदेश में मन्दिर का पुजारी देवमूर्ति को मानव रक्त से लिप्त करता है दूसरे ही दिन अन्य धर्म का अनुयायी वहाँ आकर उसे तोड़ कर गन्दे कूड़े के ढेर में फेंक देता है। जिनको एक धर्म वाले भगवान मानते हैं, उन्हीं को दूसरे धर्मानुयायी शैतान कहते हैं। एक धर्म में धर्मयाजक भगवान की पूजा के उद्देश्य से बच्चों को अग्नि में डाल देता है और दूसरे धर्म वाला अनाथालय स्थापित करके उनकी रक्षा करता है और इसी को ईश्वर पूजा समझता है। एक धर्मवालों की देवमूर्ति सौंदर्य का आदर्श होती है और दूसरे की घोर वीभत्स और कुरूप। इंग्लैण्ड में प्रसव के समय जननी को एकान्त स्थान में रहना पड़ता है, पर अफ्रीका की ‘बास्क’ जाति में सन्तान होने पर पिता को कम्बलों से ढ़ककर अलग रखा जाता है और ‘लप्सी’ खिलाई जाती है। अधिकाँश देशों में माता-पिता की सेवा-सुश्रूषा करके उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति प्रकट की जाती है, पर कहीं-कहीं पर श्रद्धा की भावना से ही उनको कुल्हाड़े से काट दिया जाता है। अपनी माता के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के उद्देश्य से फिजी द्वीप का एक मूल निवासी उसके माँ को खौलाता है, जबकि यूरोपियन इसी उद्देश्य से उसकी एक सुन्दर समाधि बनवाता है।”

विभिन्न धर्मों और मतों के धार्मिक विश्वासों में अत्यधिक अन्तर होने का यह बहुत ही अल्प विवरण है। सुप्रसिद्ध विद्वान फ्रेजर ने इस संदर्भ में सोलह बड़े-बड़े खण्डों में ‘गोल्डन वो’ नामक महान ग्रंथ की रचना की है, परन्तु उसमें भी पृथ्वीतल पर बसने वाले अनगिनत फिर्कों, जातियों, सम्प्रदायों में पाये जाने वाली असंख्यों धार्मिक प्रथा-परम्पराओं एवं रस्मों का पूरण वर्णन नहीं किया जा सका है। ये सिद्धान्त, विश्वास और रस्मो-रिवाज हर तरह के हैं। इनमें निरर्थक, उपहासास्पद, भयंकर, कठोर व अश्लील प्रथाएँ भी हैं और श्रेष्ठ, भक्तिपूर्ण, मानवतायुक्त, विवेकयुक्त और दार्शनिकता के अनुकूल विधान भी जाये जाते हैं।

इन धार्मिक रीति-रिवाजों एवं प्रथा-परम्पराओं ने धीरे-धीरे कैसे हानिकारक और निकम्मे अन्धविश्वासों का रूप धारण कर लिया है, गम्भीरतापूर्वक इस पर विचार करने से चकित रह जाना पड़ जाता है। विद्वत् मनीषी डॉ0 लैग लिखते हैं कि एक बार उनने आस्ट्रेलिया के एक मूल निवासी से उसके किसी मृत सम्बन्धी का नाम पूछा। उसने मृतक के बाप का नाम, भाई का नाम, उसकी शक्ल-सूरत, चाल-ढाल, उसके साथियों के नाम आदि सब कुछ बता दिया, पर मृतक का नाम किसी प्रकार से उसकी जवान से नहीं निकला। इस सम्बन्ध में अन्य लोगों से पूछने पर पता लगा कि ये लोग मृतक का नाम इसलिए नहीं लेते कि ऐसा करने पर मृतात्मा कुपित हो उठेगी और उसका अहित करेगी। भारत में ऐसी कितनी ही मान्यताएँ हैं जो निरर्थक हैं। उदाहरण के लिए, अपने देश के गाँवों में जब कोई उल्लू बोल रहा हो तो उसके सामने किसी का नाम नहीं लिया जाता, क्योंकि लोगों के मन में यह भय घुसा होता है कि उस नाम को सुनकर उल्लू उसका उच्चारण करने लगेगा और इससे वह व्यक्ति बहुत शीघ्र मर जाएगा।

अपने देश में अब भी बहुत से लोग स्त्रियों के पर्दा त्याग करने के बहुत विरुद्ध हैं और जो लड़की विवाह-शादी के मामले में अपनी इच्छानुसार विवाह करने के लिए जोर देती है, उसे निर्लज्ज, कुलक्षणी आदि कहकर पुकारा जाता है, परन्तु उत्तरी अफ्रीका के ‘टौर्गस’ प्रदेश में पुरुष बुर्का डालकर रहते हैं और स्त्रियाँ खुले मुँह फिरती है। वहाँ पर स्त्रियाँ ही विवाह के लिए पुरुष ढूंढ़ती हैं, प्रेम प्रदर्शित करती हैं और उसे विवाह करके लाती हैं। ‘बिली’ नाम की जाति में कुमारी कन्याओं को मन्दिर के पुजारियों को दान कर दिया जाता है, जिनका वे उपभोग करते हैं। हमारे यहाँ दक्षिण भारत के मन्दिरों में प्रचलित ‘देवदासी’ प्रथा भी लगभग ऐसी ही है। कांगो में कुमारी कन्याओं का मनुष्याकार देव-मूर्ति के साथ संपर्क कराया जाता है।


धर्म के नाम पर चित्र-विचित्र ये परम्पराएँ

धर्म का तात्पर्य शालीनता, सदाचरण, नीतिमत्ता एवं कर्तव्यपरायणता से है। यह प्रयोजन उच्चस्तरीय आस्थाओं के सहारे ही सधते हैं। पर विकृतियों एवं भ्राँतियों को क्या कहा जाय, जिनके धर्मक्षेत्र में प्रवेश पा जाने और गहरी जड़ें जमा लेने के कारण आज भी मानव समुदाय न्याय और औचित्य की तुलना में परम्पराओं से चिपके रहने के लिए ही बाधित है। इस वैज्ञानिक युग में भी जहाँ तर्क, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर किसी चीज की वास्तविकता को जाँचा-परखा और कसौटी पर खरा उतरने के पश्चात् ही अपनाया जाता है, वहाँ धर्म के संबंध में ऐसी बात देखने को नहीं मिलती।

धर्मक्षेत्र में जितने मतभेद एवं मत-मतान्तर देखने सुनने में आते हैं, उतना ओर किसी विषय में शायद ही मिल सके। यह भेद अज्ञानियों में ही नहीं, समझदार और उन्नत-प्रगतिशील लोगों में भी देखने में आता है। हिन्दू गौ को पवित्र मानते और उसका एक रोम भी दूध के साथ पेट में चले जाने पर घोर पाप समझते हैं, वहाँ अन्य सम्प्रदाय वाले उसकी गाय को खुदा के नाम पर काटकर खा जाने में बड़ा पुण्य मानते हैं। ईसाई बिना पाप-पुण्य के झगड़े में पड़े नित्य ही उसके माँस को एक साधारण आहार की तरह ग्रहण करते हैं। यहूदी भगवान की उपासना करते समय मुँह के बल लेट जाते हैं, कैथोलिक ईसाई घुटनों के बल झुकते हैं, प्रोटेस्टेंट ईसाई कुर्सी पर बैठकर प्रार्थना करते हैं। मुसलमानों की नमाज में कई बार उठना-बैठना पड़ता है और हिन्दुओं की सर्वोच्च प्रार्थना वह है जिसमें साधक ध्यानमग्न होकर अचल हो जाय। यदि कहा जाय कि इन सब में एक ही उपासना विधि ठीक है और दूसरी अन्य सभी बेकार हैं, तो भी काम नहीं बनता। अन्य में भी अनेक व्यक्ति बड़े सन्त और त्यागी महात्मा हो गये हैं। धार्मिक क्षेत्र के इसी घोर वैम्य को देखकर मूर्धन्य लेखक एस. बैरिंग गोल्ड ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘ओरीजिन एण्ड डेवलपमेंट ऑफ रिलीजियस बिलीफ’ में लिखा है कि, “संसार में समस्त प्राचीन युगों से अगणित ऐसे धार्मिक विश्वास पाये गये हैं, जो एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं और जिनकी रस्मों तथा सिद्धान्तों में जमीन-आसमान का अन्तर है। एक प्रदेश में मन्दिर का पुजारी देवमूर्ति को मानव रक्त से लिप्त करता है दूसरे ही दिन अन्य धर्म का अनुयायी वहाँ आकर उसे तोड़ कर गन्दे कूड़े के ढेर में फेंक देता है। जिनको एक धर्म वाले भगवान मानते हैं, उन्हीं को दूसरे धर्मानुयायी शैतान कहते हैं। एक धर्म में धर्मयाजक भगवान की पूजा के उद्देश्य से बच्चों को अग्नि में डाल देता है और दूसरे धर्म वाला अनाथालय स्थापित करके उनकी रक्षा करता है और इसी को ईश्वर पूजा समझता है। एक धर्मवालों की देवमूर्ति सौंदर्य का आदर्श होती है और दूसरे की घोर वीभत्स और कुरूप। इंग्लैण्ड में प्रसव के समय जननी को एकान्त स्थान में रहना पड़ता है, पर अफ्रीका की ‘बास्क’ जाति में सन्तान होने पर पिता को कम्बलों से ढ़ककर अलग रखा जाता है और ‘लप्सी’ खिलाई जाती है। अधिकाँश देशों में माता-पिता की सेवा-सुश्रूषा करके उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति प्रकट की जाती है, पर कहीं-कहीं पर श्रद्धा की भावना से ही उनको कुल्हाड़े से काट दिया जाता है। अपनी माता के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के उद्देश्य से फिजी द्वीप का एक मूल निवासी उसके माँ को खौलाता है, जबकि यूरोपियन इसी उद्देश्य से उसकी एक सुन्दर समाधि बनवाता है।”

विभिन्न धर्मों और मतों के धार्मिक विश्वासों में अत्यधिक अन्तर होने का यह बहुत ही अल्प विवरण है। सुप्रसिद्ध विद्वान फ्रेजर ने इस संदर्भ में सोलह बड़े-बड़े खण्डों में ‘गोल्डन वो’ नामक महान ग्रंथ की रचना की है, परन्तु उसमें भी पृथ्वीतल पर बसने वाले अनगिनत फिर्कों, जातियों, सम्प्रदायों में पाये जाने वाली असंख्यों धार्मिक प्रथा-परम्पराओं एवं रस्मों का पूरण वर्णन नहीं किया जा सका है। ये सिद्धान्त, विश्वास और रस्मो-रिवाज हर तरह के हैं। इनमें निरर्थक, उपहासास्पद, भयंकर, कठोर व अश्लील प्रथाएँ भी हैं और श्रेष्ठ, भक्तिपूर्ण, मानवतायुक्त, विवेकयुक्त और दार्शनिकता के अनुकूल विधान भी जाये जाते हैं।

इन धार्मिक रीति-रिवाजों एवं प्रथा-परम्पराओं ने धीरे-धीरे कैसे हानिकारक और निकम्मे अन्धविश्वासों का रूप धारण कर लिया है, गम्भीरतापूर्वक इस पर विचार करने से चकित रह जाना पड़ जाता है। विद्वत् मनीषी डॉ0 लैग लिखते हैं कि एक बार उनने आस्ट्रेलिया के एक मूल निवासी से उसके किसी मृत सम्बन्धी का नाम पूछा। उसने मृतक के बाप का नाम, भाई का नाम, उसकी शक्ल-सूरत, चाल-ढाल, उसके साथियों के नाम आदि सब कुछ बता दिया, पर मृतक का नाम किसी प्रकार से उसकी जवान से नहीं निकला। इस सम्बन्ध में अन्य लोगों से पूछने पर पता लगा कि ये लोग मृतक का नाम इसलिए नहीं लेते कि ऐसा करने पर मृतात्मा कुपित हो उठेगी और उसका अहित करेगी। भारत में ऐसी कितनी ही मान्यताएँ हैं जो निरर्थक हैं। उदाहरण के लिए, अपने देश के गाँवों में जब कोई उल्लू बोल रहा हो तो उसके सामने किसी का नाम नहीं लिया जाता, क्योंकि लोगों के मन में यह भय घुसा होता है कि उस नाम को सुनकर उल्लू उसका उच्चारण करने लगेगा और इससे वह व्यक्ति बहुत शीघ्र मर जाएगा।

अपने देश में अब भी बहुत से लोग स्त्रियों के पर्दा त्याग करने के बहुत विरुद्ध हैं और जो लड़की विवाह-शादी के मामले में अपनी इच्छानुसार विवाह करने के लिए जोर देती है, उसे निर्लज्ज, कुलक्षणी आदि कहकर पुकारा जाता है, परन्तु उत्तरी अफ्रीका के ‘टौर्गस’ प्रदेश में पुरुष बुर्का डालकर रहते हैं और स्त्रियाँ खुले मुँह फिरती है। वहाँ पर स्त्रियाँ ही विवाह के लिए पुरुष ढूंढ़ती हैं, प्रेम प्रदर्शित करती हैं और उसे विवाह करके लाती हैं। ‘बिली’ नाम की जाति में कुमारी कन्याओं को मन्दिर के पुजारियों को दान कर दिया जाता है, जिनका वे उपभोग करते हैं। हमारे यहाँ दक्षिण भारत के मन्दिरों में प्रचलित ‘देवदासी’ प्रथा भी लगभग ऐसी ही है। कांगो में कुमारी कन्याओं का मनुष्याकार देव-मूर्ति के साथ संपर्क कराया जाता है। ‘बुदा नामक जाति के समस्त फिर्के वाले गाँव की चौपाल पर इकट्ठे होते हैं और उनका धर्म गुरु वहाँ चारों हाथ-पैर से चलता हुआ स्यार की बोली बोलता है और अन्य सब लोग उसकी नकल करते हैं। मलाया में जिस लड़की को कोई प्यार करता है, वह उसके पदचिह्न के स्थान की धूल का उठा लाता है और उसे आग पर गर्म करता है। उसका विश्वास होता है कि ऐसा करने से उसकी प्रेमिका का हृदय पिघलेगा और वह उसकी पत्नी बनने को राजी हो जाएगी। संसार के कुछ भागों में ऐसी भी प्रथाएँ हैं जिनमें फिर्के के ‘भगवान’ का ही बलिदान कर दिया जाता है। कुछ फिर्के वाले, यदि उनकी फसल नष्ट हो जाती है तो अपने राजा तथा पुरोहित को ही मार देते हैं। इस प्रकार विश्वभर में धर्म के नाम पर अगणित अंधविश्वास, हानिकारक ओर घृणित प्रथाएँ प्रचलित हैं। मानवता के उद्धार के लिए उनका हटाया, मिटाया जाना आवश्यक है।

किसी मजहब या सम्प्रदाय में तो भगवान के पुत्र, पौत्र, पत्नी आदि को भी सत्य माना जाता है, तो रूस, चीन जैसे साम्यवादी देशों में ईश्वर की गणना केवल एक ‘विश्व-नियम’ के रूप में की जाती है। एक धर्म वाला संगीत और वाद्य को जहाँ ईश प्रार्थना का आवश्यक अंग मानता है, वहीं दूसरा धर्मवाला इसे महापाप बतलाता है। बिहार के सखी सम्प्रदाय के अनुयायी ईश्वर भक्ति के लिए स्त्री की तरह रहना, यहाँ तक कि मासिक धर्म की भी नकल करना बहुत बड़ी साधना समझते हैं। इसका उद्देश्य यह होता है कि जिस प्रकार एक स़ी अपने पति से प्रेम करके उसमें तन्मय हो जाती है, उसी प्रकार ईश्वर में भी तन्मयता प्राप्त कर ली जाय।

इसी प्रकार देश में ऐसे ताँत्रिक सम्प्रदाय भी पाये जाते हैं जिनमें मद्यपान, मांसभक्षण, पशु-वध और मैथुन भी ‘धर्म’ का एक अंग माना जाता है। दूसरी और जैन धर्म जैसे मत हैं। जिनमें ब्रह्मचर्य पालन के लिए अठारह हजार प्रकार की अश्लीलता से बचने का उपदेश दिया गया है। अगर एक संप्रदाय किसी मानव शरीरधारी को ‘भगवान’ मानता है- जैसे बल्लभ सम्प्रदाय में, तो दूसरा सम्प्रदाय जैसे- वेदान्ती ईश्वर के अस्तित्व से ही इनकार करता है।

सभी मजहबों या धर्मों के भीतर इतने सम्प्रदाय या फिर्के पाये जाते हैं कि उनको गिनना भी कठिन है। लोगों को प्रायः रहस्यवाद में बड़ा आकर्षण जान पड़ता है। इसलिए सदा नये-नये गुरु उत्पन्न होते रहते हैं, साधना या उपासना की एक भिन्न विधि निकाल कर एक पृथक सम्प्रदाय स्थापित कर देते हैं। उनका एक नवीन मन्दिर या मठ बन जाता है। इस प्रकार के सैकड़ों-हजारों नये-नये मत और धार्मिक फिर्के जंगली एवं पिछड़े कहे जाने वाले प्रदेशों में ही नहीं, वरन्- योरोप, अफ्रीका, अमेरिका, एशिया के सभ्य एवं सुसंस्कृत देशों में भी पाये जाते हैं। ऐसी कोई पूजा-पद्धति नहीं है। जिसका आविष्कार और प्रचलन संसार में कहीं-न-कहीं न हो चुका हो। इस संबंध में कैसी भी विभिन्न अथवा असंगत उपासना पद्धति की कल्पना क्यों न की जाय, वह इस पृथ्वी पर किसी-न-किसी जगह अवश्य ही क्रिया रूप में होती मिल जाएगी।

उपरोक्त पंक्तियों में कहने का यह आशय यह नहीं है कि संसार में विभिन्न धर्मों का होना कोई अस्वाभाविक बात है या मनुष्य की गलती है। स्वामी विवेकानन्द के मत से तो यह और भी अच्छा होगा कि प्रत्येक मनुष्य का अपना अलग धर्म हो, जिससे वह अपने पुरुषार्थ के आधार पर ईश्वर को शीघ्र प्राप्त कर सके। वस्तुतः यहाँ कहा यह जा रहा है कि जिस प्रकार जलवायु और देश भेद से मनुष्यों की भाषा और आकृति में अन्तर पड़ जाता है, उसी प्रकार परिस्थितियों एवं वातावरण की भिन्नता के कारण विभिन्न जातियों की संस्कृति में भी अन्तर हो सकता है। परन्तु ऐसी बातें जो प्रत्यक्ष में हानिकारक, क्रूरतापूर्ण और अशिष्टता सूचक हैं, किसी धर्म के नाम पर माननीय नहीं हो सकतीं। उदाहरण के लिए, अपने यहाँ प्रचलित कितने ही देवी-देवताओं मन्दिरों में होने वाले पशु-बलि उल्लेख कर सकते हैं। धर्म के नाम पर बकरी, मुर्गे, भैंसों आदि का काटना किसी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यही बात अनेक धर्मों, फिर्को में प्रचलित अश्लीलता और नशेबाजी की प्रथाओं के संबंध में भी कहीं जा सकती है।

इस संदर्भ में जैसा कि मूर्धन्य मनीषी डॉ0 राधाकृष्णन ने कहा है- “किसी भी धर्म और सभ्यता की श्रेष्ठता के लिए उसमें सच्चाई, आत्मीयता और उदारता के गुणों का होना आवश्यक है। अब पुरोहितों द्वारा स्वार्थ-साधन के लिए केवल बाहरी पूजा-पाठ के दिन समाप्त हो गये। अब लोग धर्म में वास्तविकता के दर्शन करना चाहते हैं। वे जीवन की गहराई में उतरना चाहते हैं, उस पर्दे को हटा देना चाहते हैं जिसने ‘आदि-सत्य’ को छिपा रखा है और उसे जानना चाहते हैं जो जीवन के लिए, सत्य के लिए और न्याय के लिए आवश्यक है।”

मनुष्य को कुछ ऐसी कलाएँ भी जाननी चाहिए, जिससे आपत्तिकाल में भी अपना गुजारा कर सके। पाण्डवों का अनुभव उनके वनवास काल में काम आया। भीम ने रसोइये का, अर्जुन ने नर्तक का, द्रौपदी ने दासी का, इसी प्रकार अपने-अपने कौशल के अनुरूप विराट् नगर में काम प्राप्त कर लिये थे।

अब समय आ गया है जबकि विभिन्न धर्म-संप्रदायों में, फिर्क्रो में प्रचलित अगणित उल्टी-सीधी मान्यताओं, प्रथाओं को विवेक की कसौटी पर कसा जाय और तदुपरान्त ही उन्हें स्वीकार किया जाय। मनीषा का सामयिक उत्तरदायित्व है कि वह धर्म तत्व की आत्मा के प्रकाश को जिन भ्रांतियों, विकृतियों एवं मूढ़-मान्यताओं ने सदियों से घेर रखा हैं, उसके संबंध में यह बतायें कि मूलभूत प्रतिष्ठा के जो अनुरूप हैं, उन्हीं को मान्यता मिले और उन्हें ही अपनाया जाय। निरर्थक-निकम्पी प्रथाओं से पिण्ड छुड़ाया ही जाना चाहिए। धार्मिकता का तात्पर्य आदर्शों के प्रति आस्था, दृष्टिकोण की उत्कृष्टता, चरित्र की पवित्रता और व्यवहार की प्रखरता ही हो सकती है। जो इन रीति-मर्यादाओं को जितने अंश में अपनाता है, वह उसी अनुपात में धार्मिक है। इस तथ्य को भली प्रकार हृदयंगम कर लेना चाहिए।

सृष्टि के कण-कण में समाहित परमात्म-सत्ता

कैवल्योपनिषद 20-21 में सर्व शक्तिमान परमात्मा-सत्ता के सम्बन्ध में उल्लेख है- ॐ अणोरणीयानहमेव तद्वन्महानहं ............. मम चित्सदाहम्। अर्थात्- मैं छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा हूँ। इस अद्भुत संसार को मेरा ही स्वरूप मानना चाहिए। मैं ही शिव और ब्रह्मा का स्वरूप हूँ, मैं ही परमात्मा और विराट् पुरुष हूँ। मैं ही परमात्मा और विराट् पुरुष है। वह शक्ति जिसके न हाथ हैं, न पैर, जिसके सम्बन्ध में चिन्तन किया जा सकता है, वह परब्रह्म मैं ही हूँ। मैं सर्वदा चित्त स्वरूप रहता हूँ। मैं सर्वदा चित्त स्वरूप रहता हूँ। मुझे कोई जान और समझ नहीं सकता । मैं बुद्धि के बिना ही सब कुछ जानने, स्थूल कानों के बिना सब कुछ सुनने और स्थूल आँखों के बिना सब कुछ देखने की सामर्थ्य रखता हूँ।

उपनिषद्कार की इस अनुभूति को साधकों, योगियों और तत्वदर्शियों ने अनेक प्रकार से निरूपित करके परमात्मा की उपस्थिति प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है। हमारी भूल यह है कि मनुष्य देह में धारण होने के कारण हमारी बुद्धि भी मानवीय हो गयी है अर्थात् संसार की प्रत्येक वस्तु को मानवीय लाभ, मानवीय स्वार्थ और यहाँ तक कि ईश्वर और सूक्ष्म दैवी शक्तियों को भी मानवीय स्थूलता से जोड़ने का प्रयत्न करते हैं। इसीलिए संसार के रहस्य समझने में रहे जाते हैं।

वस्तुतः हमें अपने आपको एक बौद्धिक सत्ता मानकर विचार करना चाहिए। जिस दिन इस शरीर को सृष्टि के शेष प्राणियों के साथ बैठा देने की बुद्धि जाग्रत हो जाती है और अपने-अपने में कोई ऐसा प्रकाश कण अनुभव करने की सूक्ष्म दृष्टि आ जाती है, जो केवल इच्छा और संकल्प मात्र से सर्वत्र गमन कर सकता है। सुख-दुःख आदि की अनुभूति कर सकता है और उसी रूप में विश्व दर्शन कर सकता है। उस दिन परमात्मा को समझना सरल हो जाता है। अपने आपको, अपने जीवन लक्ष्य को भी समझना सरल हो जाता है।

उपनिषद्कार के उक्त भाष्य को समझने के लिए चलिये, सर्वप्रथम यह मान लें कि हम कोई शरीर नहीं वरन् एक कल्पना या विचार-शक्ति मात्र हैं। आइये, सर्वप्रथम परमात्मा के अणु स्वरूप का चिन्तन करें। क्या सचमुच कोई ऐसी सत्ता है, जो अणु प्रतीत हो पर उसमें ब्रह्माण्ड की सी चेतना सन्निहित हो?

भौतिक वैज्ञानिकों के अनुसार किसी तत्त्व के छोटे-से कण को परमाणु कहते हैं। इसमें उस तत्व के सभी गुण हैं, वे सभी लोहे के नन्हें से परमाणु में तुम्हें मिलेंगे। परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई है। वह एक इंच के बीस करोड़वें भाग के बराबर होता है। दुनिया का सबसे बड़ा सूक्ष्मदर्शी यन्त्र भी परमाणु को अकेला नहीं देख सकता। परमाणु को तोल लेने लायक तराजू मनुष्य नहीं बना सका है, फिर भी वैज्ञानिकों ने जो जानकारियाँ उपलब्ध की हैं, वे असाधारण है।

यह तो हुई परमाणु-सत्ता की बात, जिसे अभी पूर्णतया जाना नहीं जा सका है। क्योंकि वैज्ञानिक कहते हैं कि उसे जानने के लिए तो उतनी ही सूक्ष्म चेतन शक्ति चाहिए, जो अनुभवों को लिखकर या बोलकर बता सके, जबकि भारतीय तत्वज्ञ कहते हैं कि वह अनुभूति इतनी विलक्षण और विशाल है कि जो मनुष्य उसे पा लेता है वह स्वयं भगवान् हो जाता है।

वैज्ञानिक अब उस ताकत को मानने को विवश हो रहे हैं। सन् 1967 में ‘द मिस्टीरियस यूनीवर्स’ नामक पुस्तक और ‘द न्यू बैक ग्राउण्ड ऑफ साइंस’ में सरजेम्स जीन्स ने लिखा है- “उन्नीसवीं शताब्दी के साइंस में पदार्थ और पदार्थ जगत के जो ऊँचे से ऊँचे सिद्धान्त समझे जाते थे, अब हम उनसे दूर होते चले जाएँगे। जो नई बातें हमें पता चली हैं, उनसे हम विवश हैं कि प्रारम्भ में शीघ्रता में आकर हमने जो धारण बना ली थी, उसे अब फिर से जाँचें। अब मालुम होता है कि जिस जड़ पदार्थ शाश्वत सत्य मानकर बैठे थे। वह गलत है, पदार्थ मन या आत्मा से पैदा हुआ है और उसी का जहूर (रूप) है।”

“मुझे विश्वास है कि आत्मा ही का हस्तान्तरण करती है। “ ये शब्द हरबर्ट स्पेन्सर और चार्ल्स डारविन के साथी एल्फ्रेड रसल वैलेस ने अपनी पुस्तक ‘ सोशल इनविरानमेंट्स एण्ड मॉरल प्रोग्रेस’ में लिखे हैं।

विश्वविख्यात भौतिकविज्ञानी एल्बर्ट आइन्स्टाइन लिखते हैं- “मैं परमात्मा को मानता हूँ। सृष्टि प्रकट है। मैं मानता हूँ कि प्रकृति में एक चेतनता काम कर रही है। विज्ञान के काम का आधार अब इसी विश्वास पर टिक रहा है कि यह संसार यों ही नहीं बन गया वरन् इसमें एक कम और उद्देश्य है, जो समझ और पहचान में आ सकता है। “

प्रसिद्ध यूरोपियन विज्ञानवेत्ता सर ओलिवर लाज ने ‘आत्मा और मृत्यु’ पर भाषण देते हुए सन् 1960 में ब्रिस्टल में कहा था- “इसमें संदेह नहीं कि विज्ञान अब एक नये क्षेत्र में प्रवेश करेगा और उसकी वास्तविकता जानने का प्रयत्न करेगा, पर यह सच है कि हम सब चेतन जगत में जी रहे हैं। यह चेतना शक्ति पदार्थ पर हावी है, पदार्थ उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता । यदि कोई अत्यन्त शक्तिशाली सत्ता न होती, जो हमें पिता की तरह प्रेम करती है तो आज की भौतिक उपलब्धियां इतनी भयानक होतीं कि मनुष्य उसमें जीवित भी न रह पाता।”

वैज्ञानिक मनीषी सर ए. एस. एडिंगटन कहते हैं- “हम अब इस निष्कर्ष पर पहुँच गये है कि कोई असाधारण शक्ति कसम कर रही है, पर हम यह नहीं जानते कि वह क्या कर रही हैं। “ जे. बी. एस. हैल्डेन ने लिखा है- “ हम जिस संसार को एक मशीन समझ बैठे थे, वह आत्म-चेतना की दुनिया है। हम उसे अभी बहुत कम देख पाये हैं, जबकि असलियत वही है। पदार्थ और पदार्थ की शक्तियाँ कुछ नहीं है। असली तो मन और आत्मा ही है। “ इसी तरह से ‘द ग्रेट डिजाइन’ नामक पुस्तक में विश्व के 14 प्रख्यात विज्ञानाचार्यों ने एक सम्मिलित सम्मति प्रकट करते हुए लिखा है- “इस संसार को एक मशीन कहें, तो यह मानना पड़ेगा कि वह अनायास ही नहीं बन गयी वरन् पदार्थ से भी कोई सूक्ष्म मस्तिष्क और चेतना शक्ति पर्दे से उसका नियन्त्रण कर रही है।”

राबर्ट ए. मिल्लीकान ने लिखा है- “विकासवाद के सिद्धान्त से पता चलता है कि जिस तरह प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार पदार्थ पैदा करती है, उससे विपरीत परमात्मा में वह शक्ति है कि वह अपनी इच्छा से ही सृष्टि-निर्माण में समर्थ है। प्रकृति बीज से सजातीय पौधा पैदा करती है। आम के बीज से इमली पैदा होने की शक्ति प्रकृति में नहीं है। पर तरह-तरह के प्राणी प्रकट करके परमात्मा ने अपना अस्तित्व और सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध कर दी। मनुष्य के रूप में उसने अपने आपको भी प्रकट करके रख दिया।” आर्थर एच.काम्पटन ने भी बताया है-”मालुम होता है, हम अपने मस्तिष्क से अलग होकर भी सोच सकते हैं। ये अभी पूरी तरह से तो साबित नहीं है, पर मालुम ऐसा होता है कि मरने के बाद भी चेतनता नष्ट नहीं होता।”

वैज्ञानिकों के इन आशयों को पुष्ट करने वाले ऐसे आश्चर्यजनक प्रमाण भी हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि संसार का नियमन करने वाली सत्ता अत्यन्त सूक्ष्म और सचेतन है, उसकी शक्ति की सीमा से परे कुछ नहीं है। इस संदर्भ में विख्यात मन-शास्त्री डॉ0 नार्मन विन्सेन्ट पील न मरे हुए मनुष्यों की गतिविधियों का बड़ा सूक्ष्म अध्ययन किया। ‘ स्टे एलाइव आल योर लाइफ ‘ नामक पुस्तक में उन्होंने एक संस्मरण लिखा है कि एक मनुष्य मर रहा था, वह अर्धचेतनावस्था में था, जब उसकी आत्मा कुछ-कुछ इस संसार से भी संपर्क साध सकती थीं और नैसर्गिक जगत को भी देख रही थी, उसने बताया कि- “मैं बहुत आश्चर्यजनक ज्योति मधुर संगीत विस्फुटित हो रहा है।” स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि भारतीय तत्वदर्शन में ‘ऊँकार’ की ध्वनि वाला मधुर संगी भी बताया गया है।

पदार्थ को विस्फोट कर शक्ति उत्पन्न करने का विज्ञान सभी जान चुके हैं। एक पदार्थ को कूट करके दूसरे पदार्थ में बदल देने का वैज्ञानिक विधान है, पर एक सूक्ष्म विधान ऐसा भी पाया गया है, जिसमें किसी उपकरण के सहयोग के बिना केवल संकल्प या विचार-शक्ति के द्वारा वस्तुओं तक को अन्तर्धान करने की सत्यता पायी गयी है। एक घटना टैनेसी राज्य के नालटिन नामक स्थान की है। वहाँ डेविड लैंग नामक एक व्यक्ति रहता था। 26 सितम्बर, 1990 की सायंकाल उसने अपने आठ वर्षीय पुत्र जार्ज आर और ग्यारह वर्षीय सरा को खेलने के लिए खिलौने दिये और स्वयं उस मकान की ओर चल पड़ा जो उसी चरागाह के दूसरे सिरे पर बन रहा था। उसकी पत्नी बोली- “शीघ्र लौट आना, मुझे वस्तुएँ खरीदनी हैं, दुकानें बन्द होने से पहले बाजार चलना है।” डेविड लैंग न कहा-” अच्छी बात है, बस पाँच मिनट में वापस आता हूँ। इसके बाद वह मुश्किल से पाँच कदम ही चला था कि एकाएक जिस तरह चक्रवातों में फँसकर कोई तिनका अदृश्य हो जाता है, उसी प्रकार लैंग सबके देखते-देखते अंतर्धान हो गया। आस-पास की चप्पा-चप्पा भूमि, बिल तक छान डाले गये पर वहाँ डेविड की देह का छल्ला तक न दीखा। भूगर्भ विभाग के निरीक्षकों तक ने जाँच कर ली पर डेविड के जीवन के कहीं भी लक्षण दिखायी न दिये।

इस घटना के छह महीने बाद अप्रैल 1991 में डेविड लैंग के दो बच्चों ने देखा कि जहाँ से उनका पिता अंतर्धान हुआ था, उस स्थान के चारों ओर 15 फुट के घेरे में घास एकदम पीली पड़ गयी है। वे उस घेरे के पास चले गये। ग्यारह वर्षीय सरा ने पुकारा- पिताजी! तो उसे बहुत ही दर्द-भरी कमजोर आवाज में डेविड लैंग के ये शब्द कई बार सुनायी पड़े- “हाँ बिटिया, मुझे बचाओ, मुझे बचाओ।” इसके बाद आज तक वहाँ न कुछ सुनायी दिया, न दिखायी दिया। इस घटना से रहस्य का भले ही कुछ पता ने चले, पर एक ऐसी सत्ता का होना अवश्य प्रभावित हो जाता है जो किन्हीं सूक्ष्म शक्तियों द्वारा पदार्थ का लोप कर सकती है। यह घटनाएँ हमें यह मानने के लिए विवश देता है, वस्तुतः वह उतना ही नहीं है, वरन् उससे भी सूक्ष्म और विशाल है और उसका नियमन-नियन्त्रण किसी अदृश्य, चेतन, संकल्प स्वरूप, सर्वव्यापी व सर्वशक्तिमान सत्ता के द्वारा हो रही है। जिसे हमारे चर्मचक्षु देखने में असमर्थ हैं।

सब कुछ दूसरों के सहयोग से अर्जित कर, सामर्थ्य-सम्पदा अर्जित करने के बाद मनुष्य अनायास ही यह भूल जाता है कि किस उद्देश्य के लिए यह वैभव मिला था। कहाँ व किस प्रकार इसका सुनियोजन करना है, वैभव के मद में चूर होकर यह विस्मृत कर पतन के गर्त में गिरने वाले बहुसंख्य व्यक्ति समाज में देखे जा सकते हैं। इस संबंध में श्रीरामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्यों को एक कथा सुनाई।

दो मित्र थे। एक ही गाँव में पड़ोसी बनकर रहते थे। एक का नाम था आत्मा, दूसरे का काया। दोनों ने निश्चय किया, हम सदा मित्र बनकर रहेंगे। एक-दूसरे को ऊँचा उठाने में सहायक रहेंगे।

काया परदेश चला गया। वहाँ उसने व्यापार में बहुत धन कमाया और अमीरों की तरह रहने लगा।

आत्मा को समाचार मिला तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। मैत्री का ध्यान आया और साथ ही पुरानी शपथ का भी। सो वह उसका पता पूछकर चल पड़ा और काया के महल में जा पहुँचा।

गाँव के मित्र को उसने पहचान तो लिया, किन्तु साथ ही यह विचार उठा कि इसके लिए भी कुछ करना पड़ेगा। यह सोचकर उसने अपरिचित की सी मुद्रा बनाली और कहा- “मैं तुम्हें नहीं पहचानता। तुम कौन हो? किसलिए आये हो?”

आत्मा ने सोचा यह मद में अन्धा हो गया है, सो उसने इतना ही कहा- “मैंने सुना था कि तुम अंधे हो गये हो। अब मैंने प्रत्यक्ष स्थिति आँखों से देख व समझ ली। सो उल्टे पैर वापस लौट रहा हूँ।” काया को असमंजस भर हुआ।


एक विलक्षण आर्कीटेक्ट है, प्रकृति

प्रकृति एक अद्भुत इंजीनियर है। उसके निर्माणों में एक-से-एक बढ़कर ऐसी कृतियाँ हैं, जिन्हें देखकर अचम्भा होता है और यह सोचने के लिए विवश होना पड़ता है कि जब जड़ प्रकृति ऐसी सुन्दर संरचना गढ़ सकती है, तो फिर चेतन और बुद्धिमान मनुष्य का तो कहना ही क्या। वह यदि चाहे तो इस विश्व-वसुधा को स्वर्ग-सुषमा प्रदान कर सकता है; पर न जाने क्यों उसकी बुद्धि निर्माण की तुलना में इन दिनों ध्वंस में उलझकर रह गई है। निसर्ग अपनी इन रचनाओं के द्वारा मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि उसके कदम विनाश की ओर नहीं, विकास की ओर बढ़े, वह विध्वंसक नहीं रचनात्मक बनें।

इन्हीं सम्भावनाओं को प्रकट करता हुआ भूमध्य सागर में सारडीनिया नामक एक द्वीप है। इसके उत्तर पूर्व में कैपाड़ी ओरसो अर्थात् ‘भलू अन्तरीप’ स्थित है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस अन्तरीप का मुख्य आकर्षण वहाँ की भालूनुमा एक विशाल संरचना है। जब कोई पर्यटक इस ‘केप अन्तरीप’ की चोटी तक पालू गाँव के रास्ते आता है, तो वह प्रकृति की इस अद्भुत कारीगरी को देखकर आश्चर्य में पड़ जाता है। भालू एक विशाल चट्टान द्वारा निर्मित है, जिसे निकट से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वह उस टापू और समुद्र के विहंगम दृश्य के अवलोकन में निमग्न हो।

प्रकृति की इंजीनियरिंग का ऐसा ही एक नमूना दक्षिण चीन के यूनान प्रान्त में देखने को मिलता है। उक्त प्रान्त की राजधानी कुममिंग से लगभग 60 मील दक्षिण-पूर्व में एक ऊँचे पठार पर पत्थरों का सघन वन है। इस विचित्र पाषाण वन को लोग दूर-दूर से देखने के लिए आते हैं। ‘ पत्थरों का वन’ इस नाम से आश्चर्य अवश्य होता है, किन्तु उसे देखने के बाद नाम की सार्थकता सत्य जान पड़ती है। वस्तुतः वह एक प्रकार का अरण्य ही है, जिसमें पेड़ की जगह पत्थर लगे हुए है, जब कोई पर्यटक दूर से अकस्मात् इस ओर दृष्टि दौड़ाता है, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई विस्तृत वन सामने फैला हुआ हो- ऐसा वन, जिसमें टहनियाँ और पत्ते न हों, सिर्फ तने शेष रहे गये हों। भिन्न-भिन्न आकार और ऊँचाई वाले पाषाण स्तम्भों से युक्त यह स्थल प्रथम दृष्टि में किसी घने जंगल का भ्रम पैदा करता है।

थीसली, ग्रीस में पिण्डस पर्वत की तराई में एक छोटा शहर है- कलाम्बका। इसकी पृष्ठभूमि में उत्तर की ओर विशाल चट्टानी स्तम्भों के दो समूह हैं। ये विशाल स्तम्भ देखने में ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो कोई बौद्ध स्तूप हों। इन समूहों में स्तूपों के अतिरिक्त और भी कितनी ही संरचनाओं की नैसर्गिक अनुकृतियाँ बनी हुई हैं। इनमें से दो विशेष रूप से अपनी ओर यात्रियों का ध्यान आकर्षित करती हैं। ये हैं वहाँ के विशाल स्तूप एवं अगणित कंगूरे वाले गढ़ियाँ। इस सम्पूर्ण प्राकृतिक निर्माण को तनिक हटकर देखने से ऐसा आभास मिलता है, जैसे रजवाड़ों को यह छोटी-छोटी गढ़ियाँ हैं और उन्हीं के निकट उनके पृथक-पृथक शिक्षाओं और सिद्धान्तों का उद्घोष करते उनके अपने-अपने स्तम्भ। इस प्रस्तर रचना को ‘ मिटिओरा’ कहते हैं। ग्रीक भाषा में इसका अर्थ है- ‘ गगनचुम्बी’ । स्तम्भों में कई-कई तो 1700 फुट ऊँचे हैं। इन स्तूपों की शोभा को तब चार चाँद लग गये, जब प्रकृतिगत निर्माणों के ऊपर मानवी संरचनाएं खड़ी की गई। यह अद्भुत निर्माण का विचार कुछ संन्यासियों के मन में तब आया, जब उन्हें संसार से विरक्ति अनुभव होने लगी। ऐसी स्थिति में इन सर्वथा अगम्य स्तूपश्रृंगों पर छोटे निवास बनाकर उन्होंने अपनी इच्छापूर्ति की । चोटी पर स्थिति उनके मठ सचमुच सर्वसाधारण की पहुँच से परे थे। यदि उनसे जुड़ी, अलग होने और मुड़ने वाली सीढ़ी को हटा दिया जाय, तो मठ का संबंध समाज से बिल्कुल ही विच्छिन्न हो जाता है और उनमें रहने वाले व्यक्ति, समाज में मनुष्य के बीच रहकर भी उनका संपर्क मनुष्य और समाज में से एकदम टूट जाता है। निर्माणों की विशेषता यह है कि जब तक ध्यानपूर्वक इन्हें नहीं देखा जाय, तब तक यह विदित नहीं होता कि इनके ऊपर मनुष्यकृत संरचना भी विनिर्मित है। ऐसे मठ वहाँ के खम्भों में बीस से अधिक है। इनका निर्माण 14वीं एवं 15वीं सदी में किया गया था और ये 19वीं शताब्दी तक आबाद रहे। अब ये खाली पड़े हुए हैं। जो भी पर्यटक यहाँ आते हैं, वे प्रकृति और मनुष्य की इन मिली-जुली कृतियों को देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं।

प्रकृति के वास्तुशिल्प का एक अच्छा उदाहरण ‘फ्रांसीसी गुफाओं’ के रूप में देखा जा सकता है। ये कन्दराएँ स्थित हैं। इन गुफाओं की सबसे बड़ी विशेषता उनमें स्थित अनेकानेक कक्ष हैं। हर कक्ष की अपनी-अपनी विशिष्टता है। उसी के आधार पर उनका नामकरण किया गया है। उदाहरण के लिए, उसका एक भाग ऐसा है, जिसमें सिर्फ चमगादड़ रहते हैं। इस आधार पर उस प्रकोष्ठ का नाम ‘ ग्रोटाडिले नोटोले’ अर्थात् ‘चमगादड़ों की गुफा’ रखा गया है। उसके एक अन्य कक्ष का नाम ‘ ग्रोटो ग्रेण्डे डेल वेण्टो’ अर्थात् ‘ ग्रेट केव ऑफ विण्ड’ हवादार गुफा है। कन्दरा के इस भाग में अनेक प्रकाष्ठ हैं। इनका आकार-प्रकार इतना बड़ा है कि उनमें बड़े-बड़े मठ समा जाएँ। इनमें से कुछ में प्राकृतिक प्रकाश की अच्छी व्यवस्था है। विशाल गुफा का एक भाग ‘ साला डेल कैण्डेलाइन’ कहलाता है। उक्त नाम उस हिस्से में स्थित उन अगणित छोटे-छोटे मोमबत्तीनुमा निर्माणों की ओर इंगित करता है, जो देखने से ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो वही जल-जल कर उस भाग को प्रकाशित कर रहे हों। इसी कारण उसका नाम ‘मोमबत्ती वाला कमरा’ रखा गया। एक अन्य कक्ष ‘ सालाडेल इनफिनिटो’ या ‘ रूम ऑफ इनफाइनाइट’ कहलाता है। इस प्रकाष्ठ में बड़े एवं विशाल सुसज्जित स्तम्भ हैं। इन्हें देखने से ऐसा लगता है, जैसे प्रकृति में विशाल खम्भों का निर्माण कर विस्तृत छत को दृढ़ता प्रदान की ही, ठीक वैसे ही जैसे मानवी निर्माणों में देखा जाता है। इनमें से अकेले ग्रण्डे डेल वेण्टो की लम्बाई आठ मील है। उल्लेखनीय है कि फ्रांसीसी गुफा के प्रत्येक कक्ष एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं, उसी प्रकार जिस प्रकार विशाल इमारतों में कमरे परस्पर जुड़े होते हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका में कोलोरेडो नदी के तट पर उसके दक्षिण-पूर्व भाग में ‘उटाह’ नामक स्थान है। यहाँ एक नेशनल पार्क है, जो ‘ मेहराबों वाला पार्क’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस पार्क की विशेषता यह है कि यहाँ कितने ही छोटे-बड़े आकर्षक पत्थरों के मेहराब हैं। इन्हें देखने पर प्रकृति की उस कलाकारिता पर आश्चर्य होता है। जिसने कुशलतापूर्वक गढ़कर इन्हें खड़ा किया। इनमें से कई इतने नाजुक और पतले हैं कि विश्वास नहीं होता। यह निर्माणकाल से अपना अस्तित्व ज्यों बनाये हुए हैं। ऐसे में निसर्ग की निर्माण-कुशलता पर विस्मय होना स्वाभाविक ही है। इस पार्क का सबसे लम्बा मेहराब ‘लैण्डस्केप आर्च’ है। विश्व का यह अपने प्रकार का सबसे बड़ा आर्च है। इसकी लम्बाई 271 फुट है।

प्रकृति की कृतियों में काँगो (दक्षिण अफ्रीका) की कन्दराओं की चर्चा न की जाय, तो उल्लेख अधूरा माना जाएगा। विश्वास किया जाता है कि कन्दरा प्रस्तर युग में आदि मानवों का निवास रही होगी। यह अनुमान उनकी दीवारों में उत्कीर्ण तस्वीरों के आधार पर विशेषज्ञ लगाते हैं किन्तु जिन कारणों से यह विश्व प्रसिद्ध बनीं, वे कारण मानवकृत चित्र नहीं हैं, वरन् प्रकृति की विलक्षण वास्तुकला है। इनके अलग-अलग प्रकोष्ठों में विस्मय-विमुग्ध कर देने वाली रचनाएँ हैं। इनमें विशेष दर्शनीय है वहाँ के ‘क्रिस्टल पैलेस’ ‘ डेविल्स वर्कशाप’ एवं ‘तहखाना’। इनमें कहीं पर्दे की आकृति जैसी रचना है, तो कही। बड़े-बड़े बबूले जैसा निर्माण, कहीं बाँसुरी, तो कहीं लम्बी-लम्बी सुइयाँ। एक स्थान पर ऐसा ढोल है, जो आकृति की दृष्टि से ही ढोल नहीं है, जो आकृति की दृष्टि से ही ढोल नहीं है, वरन् वह ढोलों जैसी ध्वनि भी निकाल सकता है। वहाँ प्रवेश करने पर ऐसा लगता है, जैसे यह सभी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए परस्पर प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हों।

कैलीफोर्निया में नेवादा के निकट एक घाटी है- ‘डेथ वैली’ या ‘ मृत्यु घाटी। इस घाटी का आकर्षण वहाँ की भूमि में विनिर्मित सुन्दर बीहड़ है। इसे देखने से ऐसा आभास होता है, जैसे किसी कुशल शिल्पी के सधे और निष्णात हाथों ने इसे तराशा हो । इसका नाम मृत्यु घाटी इसलिए पड़ा, क्योंकि गर्मियों में वहाँ का तापमान अति उच्च हो जाता है। इसके बावजूद छोटे-छोटे जीवधारी वहाँ मजे में रहते हैं।

इंजीनियरिंग का एक अद्भुत नमूना ग्वाइमस बेसिन में देखा जा सकता है। वहाँ भूगर्भ स्थित एक अनूठा तेलशोधक कारखाना है। इसमें मानव निर्मित कुछ भी नहीं, सब कुछ प्रकृति द्वारा रचित है। पहली बार इस कारखाने का पता तब चला, जब 1970 में ‘ स्क्रिप्ट इन्स्टीट्यूट ऑफ आसनोग्राफी, सैनडियागो’ के डॉ0 पीटर लोन्सडेल एक खोजी यात्रा पर थे। इसी समय यहाँ उन्हें कच्चे तेल का पता चला, जो स्वयमेव परिशोधित होता रहता है।

आखिर इसकी प्रक्रिया क्या है? प्रकृति द्वारा इसका परिशोधन किस प्रकार होता रहता है? इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि ग्वाइमस बेसिन की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है, कि वहाँ यह प्रक्रिया अनवरत रूप से स्वयमेव चलती रहती है। इसीलिए इसे ‘प्रकृति की रिफाइनरी’ कहा गया है। इसकी शोधन प्रक्रिया को समझाते हुए वैज्ञानिक कहते हैं भूगर्भीय टेक्टोनिक प्लेटो की गतिविधियों के कारण ग्वाइमस बेसिन के नीचे की चट्टानों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई हैं। इन दरारों से समुद्री जल रिस-रिस कर काफी नीचे पृथ्वी के गर्भ में पहुँचता रहता है, जहाँ वह पिघली चट्टानों की गर्मी से गर्म होकर पुनः ऊपर उठने लगता है। इस प्रक्रिया में जब वह चट्टानों के संपर्क में आता है और उसके खनिजों को भी अपने में घुला-मिला लेता है, तो इस प्रकार वह सामान्य ज न रहकर खनिज लवणों से युक्त एक प्रकार का रासायनिक घोल बन जाता है। जब यह घोल समुद्र-तल में पहुँचता है, तो वहाँ ठण्डे पानी के संसर्ग में आकर तेजी से ठण्डा होने लगता है, फलतः जल में घुले लवण अलग होकर घनीभूत ठोस का रूप धारण कर लेते हैं। पर्यवेक्षण ने इन्हीं खनिजों को देखा था। इससे ऐसा प्रतीत होती है कि प्रकृति सदा किसी-न-किसी प्रकार के निर्माण में व्यस्त रहती है।

हम संघर्ष नहीं, सहयोग करें। हमारा उद्देश्य ध्वंस नहीं, सृजन हो। प्रकृति की यह विलक्षण कृतियाँ इसी बात की संदेशवाहिका हैं। हम उसकी मूक रचनाओं में अभिव्यक्ति पा रहे इस उपदेश को सुनें, समझें और आत्मसात् करें।

वस्तुतः सुविधा और सम्पदा ही सब कुछ नहीं है। आदर्शों को चरितार्थ करने में, यदि उपलब्धियों का परित्याग करना पड़े, तो उसमें भी हानि नहीं। भरत को राजगद्दी मिल रही थी, पर उनने अनीति के आधार पर उसे स्वीकार करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। इतना ही नहीं, वे अपनी निस्पृहता को सिद्ध करने के लिए राम की तरह जटा-जूट धारण करके घर में ही वनवासी की तरह रहे। सिंहासन पर राम की ही चरणपादुका प्रतिष्ठा की।

इस प्रकार की आत्मीयता से ओत-प्रोत, व्याग और कर्तव्य की पारिवारिकता ने ही राम के परिवार का जन-जन का आराध्य बना दिया। राम का चरित्र अपनी जगह है एवं भरत की अपनी जगह एक मर्यादा का पालन करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में व अवतार-सत्ता के प्रतीक के रूप में पूजे जाते हैं, जबकि दूसरे उनके भाई अपनी पारिवारिक निष्ठा, उत्कृष्टता से जुड़ी आत्मीयता एवं अपनी गुणनिधि के कारण।


ईश्वर तेरे रूप अनेक

सुविख्यात वैज्ञानिक न्यूटन से एक बार उनके मित्र ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा- “आप वैज्ञानिक होकर भी ईश्वर में आस्था रखते हैं? उसकी प्रार्थना किया करते हैं? यदि भगवान सचमुच है तो वह क्या है?”

‘ ज्ञान ‘ न्यूटन गम्भीरतापूर्वक उत्तर दिया। उन्हें कहा- “ हमारा मस्तिष्क ज्ञान की खोज में जहाँ पहुँचता है, वहीं उसे एक शाश्वत चेतना का ज्ञान होता है। कण-कण में यह जो ज्ञान की अनुभूति भरी हुई है। सृष्टि का कोई कण चेतना से वंचित नहीं, परमात्मा इसी रूप में सर्वव्यापी है। ज्ञान की ही शक्ति से संसार का नियंत्रण होता है, विनाश करना चाहो तो भी प्रवेश कर सके। परमेश्वर इस रूप में ही अनन्त विस्तार के जगत में समाया हुआ है। “ न्यूटन की यह मान्यता ईशावास्योपनिषद के इस मंत्र की पुष्टि यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से सब ओर से आच्छादित है। पूरे विश्व-ब्रह्माण्ड में वही समाया हुआ है। सह सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान से भी महान है। ‘ अणोरणीयान्, महतो महीयान्’ सूत्र में भी इसी तथ्य का प्रतिपादन किया गया है।

विज्ञानवेत्ताओं का अनुमान है कि यह जो विश्व -ब्रह्माण्ड दिखाई दे रहा है, वहां 50 करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी में, प्यास में फैला हुआ है। एक प्रकाश वर्ष की दूरी मील होती है । हम जिस सूर्य के प्रकाश से अपना जीवन चलाते हैं, वह जिस आकाशगंगा- ‘नेबुला’ से प्रकाश लेता है, ऐसी-ऐसी दस करोड़ आकाशगंगाएँ अनन्त अंतरिक्ष में प्रकाश फैलाती हुई अरबों सूर्यों को चमक रही हैं। इसमें अन्य ग्रह-नक्षत्रों की संख्या तो गिनी भी नहीं की जा सकती। फिर उनमें रहने वाले प्राणियों की संख्या का तो कहना ही क्या? यह सब कोई अनगढ़ या बेतुकी उपज नहीं, वरन् योजनाबद्ध ढंग से विनिर्मित एक कृति हैं, जिसके अन्तराल में एक विधान है, एक सुव्यवस्था है और एक महान व उच्चस्तरीय बुद्धिमत्ता है। जो यह सिद्ध करती है कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड में एक ऐसी सत्ता काम कर रही है, जिसे परमात्मा, विश्वात्मा कहा सकता है। उसकी महानता, दिव्यता, सर्वज्ञता, सर्वसमर्थता एवं सौंदर्य का बोध कराने के लिए ही ग्रह-गोलकों सहित समस्त जड़-चेतन की उत्पत्ति हुई है। यह सब उसी महासत्ता के घटक हैं।

इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आरिस्टोटल की मान्यता थी कि इतना बड़ा संसार निश्चय ही किसी नियम और व्यवस्था के अंतर्गत चल रहा है। और तो और हमारा मस्तिष्क गणित के द्वारा पहले ही ग्रह-नक्षत्रों के परिभ्रमण पथ पर होने वाले ग्रहण आदि संघातों का लता लगा लेता है, इसका अर्थ है कि संसार अनियमित, बेतुका नहीं। इतने विराट जगत को घुमाने वाला कोई महान शक्तिशाली तत्व होना ही चाहिए और वह केवल ईश्वर ही हो सकता है। भगवान के अतिरिक्त और किसी में यह शक्ति नहीं। परमात्मा ही सृष्टि का संचालक व नियंत्रणकर्त्ता है। ‘ द ग्रेट डिवाइन’ नामक पुस्तक में भी विश्व के प्रमुख विज्ञानवेत्ताओं ने अपने सम्मिलित निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है कि - “ यह संसार निर्जीव यंत्र नहीं है और न ही यह सब अनायास ही बन गया है। जुड़ चेतन हर पदार्थ में एक ज्ञान शक्ति काम कर रही है, उसका नाम भले ही कुछ हो।”

मूर्धन्य मनीषी हर्वर्ट स्पेन्सर की दृष्टि में इस विराट् शक्ति का ही नाम परमात्म-चेतना है, जो संसार की सब गतिविधियों का नियंत्रण उसी प्रकार करती है, जिस प्रकार मुखिया घर का, प्रधान गाँव का , कलेक्टर जिले का, गवर्नर प्रदेश का और राष्ट्रपति सारे राष्ट्रपति सारे राष्ट्र की भोजन, वस्त्र, निवास , सुरक्षा आदि की व्यवस्था करता है। उनके अनुसार -”राज्य के नियमों का हम इसलिए आदर करते हैं क्योंकि हमें राज्य की शक्ति से भय होता है। नैतिक नियमों का पालन न करने पर भी हमें भय लगता है, जबकि हम उसके लिए पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि संसार में कोई सर्वोच्च सत्ता काम करती है, हम उसके परिचय में कभी न कभी रहे है, क्योंकि हम डरते हैं। निर्भीक व्यक्ति नैतिक व्यक्ति ही हो सकता है , इसलिए उसे संसार की व्यवस्था ईमानदारी और न्याय से करने वाला प्रजावत्सल तत्व होना चाहिए ।”

विश्वविख्यात दार्शनिक काण्ट ने हर्वट स्पेन्सर के कथन को अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा है कि -”नैतिक नियमों से स्वीकृति ही परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण और पूर्ण नैतिकता ही उसका स्वरूप है। संसार का बुरे से बुरा व्यक्ति भी किसी न किसी के प्रति नैतिक अवश्य होता है। चोर, डकैत भी नहीं चाहते कि कोई उनसे झूठ बोले, छल या कपट करे। जबकि वे स्वयं सारे जीवन भर यही किया करते हैं। अपने भीतर से नैतिक नियमों की स्वीकृति इस बात का प्रमाण है कि संसार केवल नैतिकता के लिए ही जीवित है, उसी से संसार का निर्माण, पालन ओर पोषण हो रहा है। इसलिए भगवान नैतिक शक्ति के रूप में माना जाने योग्य है।”

नीतिशास्त्रियों की दृष्टि में सत्य और नीतिनिष्ठा द्वारा संसार का नियंत्रण करने वाली ऐसी शक्ति जो प्रत्येक व्यक्ति की आकाँक्षाओं में विद्यमान रहती हैं, वही ईश्वर है। वह सदैव सत्य नीति ही प्रदान करता है। हैब्यू ग्रंथों में इसे ही ‘ जेनोवाह’ कहा गया है। बुद्ध ने यद्यपि स्वयं ईश्वर के अस्तित्व और विवेचन को टाल दिया था, फिर भी अनेक बौद्ध ग्रंथों में लगता है कि वे किसी ऐसी दिव्य शक्ति में विश्वास रखते थे। बौद्ध धर्म के ग्रंथ ‘मसंग’ एवं ‘माध्यमिका कारिका’ में पहेली बुझौबल की तरह उल्लेख मिलता है। “वह न नहीं है और न है, न वह इस तरह है और न किसी तरह, वह न जन्मता है न वर्धित ही होता है और न मृत्यु को प्राप्त होता है। वह कोई एक वस्तु नहीं है, न उसका अस्तित्व है और न ही उसका अस्तित्व नहीं है। न वह दोनों से पृथक है, वह विचित्र रहस्य, वही सत्य है।” तात्पर्य यह कि विश्व की संपूर्ण व्यवस्था किसी सत्य के आधार पर चल रही है।

प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो की ईश्वरीय मान्यता यह थी कि -” ईश्वर अच्छाई का विचार है।” वह कहते थे कि संसार के प्रत्येक व्यक्ति यहाँ तक कि जीव-जन्तु को भी अच्छाई की चाह रहती है। जहाँ अच्छाई होती है, वहीं आनंद रहता है। अच्छाई शरीर ओर सौंदर्य की जो संयम और सदाचार द्वारा सुरक्षित हो, अच्छाई शरीर और वस्त्रों की जो धोने ओर स्नान करने से सुरक्षित हो, अच्छाई वातावरण की, घर, गाँव और नगरों की जो स्वच्छता और सफाई द्वारा सुरक्षित हो, अच्छाई प्रकृति की जो हरे-भरे पौधों और खिलते हुए रंग-बिरंगे फूलों, भोले-भाले पशु-पक्षियों के कलरव और उछलकूद से सुरक्षित हो। इस तरह संसार में हम सर्वत्र अच्छाई के दर्शन करके प्रसन्नता अनुभव करते हैं। यही प्रभुत्व है, इन्हीं से आनंद मिलता है, इन्हीं से संसार में आने का मजा आता है। सो भगवान को यदि मानें तो उसे अच्छाई का वह बीज मानना पड़ेगा जो आँखों को दिव्य, मनोरम और बहुत प्यारा लगता है।

दार्शनिक स्पिनोजा ने विज्ञान और दर्शन दोनों का अध्ययन करके बताया कि “संसार में दो प्रकार की सत्ताएँ काम कर रही हैं-एक दृश्य और दूसरी अदृश्य! एक का नाम प्रकृति या पदार्थ जो दिखाई देता है। दृश्य संसार प्रकृति की ही रचना है, अपना शरीर भी पदार्थ से बना है। इसमें भी धातुएँ, खनिज लवण गैसें आदि भरी पड़ी हैं, पर विचार उससे भिन्न है। यह दिखाई नहीं देता पर हम उसे हर घड़ी अनुभव करते हैं, हमारे जीवन की सारी क्रियाशीलता विचारों की ही देन है। विचार ठण्डे पड़ते ही शरीर ठण्डा पड़ जाता है । विचार मरे कि शरीर मर गया। मृत्यु के अन्तिम क्षण तक विचार प्रक्रिया का बने रहना यह बताया है कि विचार ही विश्वव्यापी चेतना या ईश्वर है। विचार कभी नष्ट नहीं होते,ईश्वर भी अविनाशी है। निःसन्देह अविनाशी विचार ही भगवान है। या यों कहें कि भगवान का स्वरूप गुण और विचारमय ही हो सकता है, चाहे वह किसी शक्ति कणों के रूप में हो अथवा प्रकाश के रूप में, पर विचारों का आस्तित्व संसार में है अवश्य। हम सदैव ही उनसे प्रेरित-प्रभावित होते रहते हैं। विचारों को कोई भी व्यक्ति अपना नहीं कह सकता। फ्रायड जैसे मनोवेत्ता को भी यह कहना पड़ा था कि विचार अवचेतन मन से आते हैं और मनुष्य का उस पर कोई नियंत्रण नहीं, वह कोई स्वतंत्र सत्ता हैं”

ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक हीगेल ने भी भगवान को सामान्य इच्छाओं से उठा हुआ। इच्छाओं को भी नियंत्रण में रखने वाला-’एब्सोल्यूट आइडिया’ अर्थात् परम विचार बताया है। जिस प्रकार प्रत्यक्ष देखने से हमारा मस्तिष्क एक प्रकार से विचारों का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है। इसी तरह सारे विश्व में फैले विचार किसी केन्द्रीभूत सत्ता से प्रस्फुटित हो रहे हैं। जिस प्रकार सूर्य में ऑक्सीजन जलती रहती है और हीलियम के कण उछलते रहते हैं उसी प्रकार संसार के किसी भाग से नियमित विचारों का निर्झर झरता रहता है। उस केन्द्रीभूत सत्ता का नाम हीगेल न परमेश्वर बताया।

इमर्सन और बकेले के मत में सब आत्माओं में श्रेष्ठ शक्ति का नाम ही परमात्मा है। उन्होंने तत्वदर्शन का सहारा लिया था और कहा था कि यह सारा संसार कहीं से उधार प्राण और चेतना ले रहा है। यह चेतना और प्राणशक्ति अपने मूल रूप में एक जैसी ही है। विचार ग्रस्त होने के कारण वह अनेक जीवों के रूप में दिखाई देती है, पर आत्मचेतना के सभी लक्षण मनुष्य ओर अन्य प्राणियों में समान है। जिस तरह बड़े बिजलीघर में विद्युत लेकर छोटे-छोटे बल्ब जलने लगते हैं, उसी प्रकार प्राणियों की चेतना भी किसी मूलतत्व से प्राण और प्रकाश लेकर आस्तित्व में आती हैं। तो सब आत्माओं का उद्गम है, वही परमेश्वर है। यदि आत्माओं का स्वरूप प्रकाश है, तो परमात्मा परम प्रकाश है, यदि ज्ञान या परम विचार है। यह सारी विशेषताएँ वस्तुतः एक ही हैं, कहने भर का अन्तर जान पड़ता है।

डॉ0 ब्रेउले भगवान को जानने के लिए अनुभवों का रूप समझने की प्रेरणा देते हैं। उनका कहना है कि हमारे अन्दर जो अनुभूति कोष हैं, वह पदार्थ ही नहीं , प्रकाश, ताप चुम्बक विद्युत कणों से भी भिन्न है। इसलिए उन्होंने भगवान को परम अनुभव कहा है। यह सारी बातें मिलकर एक अध्यात्मवादी सृष्टि का निर्माण करती हैं, इसलिए दार्शनिकों ने उसे आध्यात्मिक जीवन का आधार कहा है। यह ज्ञान, यह अनुभूति यह अध्यात्म ही ईश्वर है। आद्यशंकराचार्य और उपनिषद् दर्शन उसे ही ‘अयमात्मा ब्रह्म’ ‘ अहं ब्रह्मास्मि” तत्वमसि’ यह मेरी आत्मा ही ब्रह्म है, मैं ही ब्रह्म हूँ परमात्मा तत्व रूप हैं आदि सूक्तों से संबोधित करते हैं। यह सारी विशेषताएँ परमात्मा के स्वरूप के भिन्न-भिन्न विश्लेषण हैं, तत्वतः वह एक ही है।


महत्वाकाँक्षा पर अंकुश (Kahani)

वस्तुतः सारी समस्याओं की जड़, चाहे वह आध्यात्मिक जगत की हों अथवा भौतिक जगत की, अहंता बढ़ी-चढ़ी महत्वाकाँक्षा ही हैं। उस पर अंकुश यदि लगाया जा सके तो प्रगति का राजमार्ग सबके लिए खुला है।

जैन पुराणों में तपस्वी बाहुबलि के चरित्र का वर्णन है। इतनी कठोर तपस्या की थी, पर अहंता नहीं छूटी, तो उस साधना से भी उन्हें शान्ति न मिला। महत्वाकाँक्षाओं का उन्माद उन पर तब भी चढ़ा रहता था। उदास बाहुबलि को उनकी बहिन ने देखा तो असफलता का कारण ताड़ लिया। उसने आते ही कहा- ‘हाथी की पालकी से नीचे उतरो और समझदारों की तरह जमीन पर चलो।”

कथन का मर्म बहिन ने समझाया कि अहंता को छोड़ो-आकाँक्षाओं से छुटकारा पाओ इसके बिना साधना की सफलता मिल नहीं सकेगी। बाहुबलि ने वैसा ही किया और वे देखत-देखते बहुत सिद्ध पुरुष हो गये।


समझ में आया स्वच्छता का दर्शन

शशि सम्पूर्ण रात्रि की यात्रा से थककर अपनी अस्ताचल की सुकोमल शय्या पर शयन करने चला गया था। रात्रि के प्रहरी उलूक आदि पक्षी भी अपने जागरण से अवकाश पा चुके थे। तमः प्रसार के अपकर्म से आकुल रजनी रानी अनेकविध रुदन से पक्षियों को अशान्त बनाकर अब जा चुकी थी। उनके अश्रु बिन्दु ओस कणों के रूप में तिनकों-पत्तों पर सभी जगह साफ-साफ झलक रहे थे। स्वच्छता का भव्य सेनानी भास्कर अपनी किरणों की झाड़ू लिए अंधकार को जगती के समस्त अंचल से सावधानीपूर्वक स्वच्छ करता चला जा रहा था। अवश्य ही उसके इस प्रयास में दिग्देवताओं का मुख अरुणिम धूल से रँगने लगा था। प्रभात के बंदीजन पक्षियों के समूल अपने सामूहिक संकीर्तन में जुट गए थे। उनका स्वर एक साथ सबको सम्बोधित कर रहा था- उठो। आलस्य त्यागा जागो ज्योति का सत्कार करो! जीवन तुम्हारे द्वार तक जयघोष करता आ गया है।

वे कब के उठ चुके है। काल के पद जैसे उन्हें पराजित करने में असमर्थ होकर लौट जाते हैं। अहर्निश अखण्ड कार्यक्रम उनका चलता रहता है। इस अविराम अर्चन में देवी निद्रा को भी यदि कभी कभी कुछ घड़ी पल अवकाश प्राप्त हो जाए तो उनका सौभाग्य वही सबसे अधिक उपेक्षित है अन्यथा वे सबको समय देते हैं पूर्व से निश्चित करके समय देते हैं। इन जनों के रूप में जनार्दन ही तो है। अतः जब वे स्वयं आराधना का अर्घ्य लेने आते हैं, उनके किस रूप की अर्चा......................कर दी जाय। केवल अपने साथ वे ...................हो सकते हैं। उनके शौच-स्नान-आहार-आराम का कोई निश्चित समय नहीं हो रहा हैं इसमें भी यदि दूसरों का आग्रह निमित्त न .................कौन जानता है कि ये कैसे और कब अपनाएँ जाएँ?

यह उनकी बात उनका दृष्टिकोण है। कभी किसी की एक कहानी पढ़ी - एक साधक ने तपस्या करके वरदान पाया कि जिसे अपना वह एक रक्त कण दे देगा उसका असाध्य रोग भी नष्ट हो जायेगा। लोगों ने उसे दो दिन भी जीवित नहीं रहने दिया। सुइयाँ तथा अन्य शस्त्र चुभोने से भी जब उसके देह से रक्त निकलना बन्द हो गया, अन्तिम आने वाले ने उसे पैर बाँधकर वृक्ष से लटकाया । नीचे आग जलाई और किसी प्रकार उसके देह का अन्तिम रक्त बिंदु प्राप्त करके प्रसन्नचित होकर वह लौटा।” कल्पित कथा सही, किन्तु केवल अपने प्रयोजन पर दृष्टि रखने वाले सामान्यजनों की मानस प्रवृत्ति का सम्यक् निरूपण है ओर उनको देखकर लगने लगता है, यह कथा सत्य भी हो तो आश्चर्य नहीं। अपना प्रयोजन प्रत्येक लिए अत्यन्त छोटा लगता है इतना अल्प प्रयास तो उसके लिए उन्हें करना ही चाहिए। सुकोमल पुष्प भी हजारों-हजार हाथों से जब देवता को समर्पित होने लगते हैं। पाषाण का श्रीविग्रह भी किस प्रकार क्षीण एवं जर्जर हो जाता है, प्राचीन मंदिरों में इसे देखा जा सकता है। लेकिन लोक मनोवृत्ति उनकी असुविधा पर किसी की दृष्टि कहाँ जाती हैं

यह तो चलता ही रहेगा। उनकी अन्य प्रवृत्तियों में भी कुछ दर्शनीय है। उनके शरीर पर दो घड़ी रहने वाला कम्लि भी जल से धोने पर ही पुनः उपयोग के योग्य होता है। वे जिस कुश के आसन पर आसीन होते हैं। दूसरी बार उपयोग में आने के लिए उसे भी धोकर सुखा लिया जाना चाहिए। वस्त्र की बात तब बताना अनावश्यक है।

उनका शरीर स्वच्छता तथा उपवास के इन प्रयासों ने उसे काफी दुबला कर दिया है। मल तो वहाँ कहाँ से रहेगा। काया की अनावश्यक मिट्टी भी कई कई बार स्नान में धुलती अनेकों आने वालों के सेवा-सत्कार, आशीर्वाद वरदान देने का श्रम सहती क्षीणतर होती चली गयी है।

स्वच्छता के प्रति उनका इतना आग्रह देखकर इसका दूसरा पहलू भी स्मरण हो जाता है। जो लोग कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गए हैं उन्हें यह मालुम होगा कि पुण्य प्रदेशों उसे यों ही नहीं माना गया है। सत्व ही सघन होकर जैसे सर्वत्र शुभ हिम के रूप में एकत्र है। किसी तरह की दुर्गन्ध वहाँ इस असीम सर्दी में उठती नहीं। कुछ भी तो वहाँ नहीं सड़ता।

वहां के लोग स्नान नहीं करते शरीर में जहाँ कभी पसीना नहीं होता, स्नान की आवश्यकता है या नहीं कहना कठिन है । क्योंकि शास्त्र की दृष्टि स्वास्थ्य की दृष्टि तो नहीं है। कपड़े धोने जैसी कोई क्रिया उस प्रदेश में नहीं है। वे केवल ऊन के बने वस्त्र पहनते हैं। या फिर चर्माम्बर स्मृतिकारों ने भी इन वस्त्रों को वायु से शुद्ध होने वाला माना है। वे उसे हिम शुद्ध करते हैं। कभी लगा कि वस्त्र में स्वदेज प्राणी उत्पन्न हो गए हैं, तो वस्त्र को रात्रि में बाहर खुले स्थान पर छोड़ देंगे। स्वच्छता सम्पूर्ण हो गयी।

अस्वच्छ हैं वे ? रुकिए इतना सरल उत्तर इसका नहीं है वह पुण्य प्रदेश, जहाँ सर्वत्र रक्त जमा देने वाला हिम चारों ओर व्याप्त है। वहाँ पानी से कुछ धो पाना कठिन है। शरीर पर पानी डालते ही वह भी जम जाएगा और उष्णता की उपलब्धि का साधन काष्ठ वहाँ होता नहीं। कुछ क्षुप मात्र इधर-उधर मिलते हैं। वायु शुद्धि-देवभूमि की सहज पावन, रजः स्पर्श से सर्वथा रहित और अविराम अश्रान्त प्रवाहित वायुदेव वहाँ सचराचर की शुद्धि में स्वयं संलग्न है।

हिम प्रदेश की ही तरह मरु प्रदेश में भी जल का अभाव है। जल के अभाव में उत्पीड़ित वहाँ का प्राणी। वहाँ तो बालू शुद्धि के काम आती है। मृतिका सर्वत्र मलिन ही तो नहीं करती। मार्जन का भी तो अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण वहीं है।

प्राणियों के प्राणों की रक्षा के लिए पावस में जो मेघों से जीवन की धारा प्राप्त होती है- जल जीवन है, यह बात उसी प्रदेश में बुद्धि ग्रहण कर पाती है। वर्षा का वह जल कौशल पूर्वक वर्षभर सुरक्षित न रखा जाय, तो प्राण ही असुरक्षित हो जाएँगे। उस जल को जो जीवन का अमूल्य आधार है, यदि कोई दिन में तीन बार स्नान के लिए उपयोग करने लगे, तो उसे जल की इस बरबादी के लिए न उसका परिवार क्षमा करेगा और न समाज।

तब स्वच्छता की आदर्श परिभाषा क्या हो? यह सवाल ओर कोई नहीं उनके परम मित्र भारतीय विद्याओं के अनन्य अनुरागी डॉ0 पाल ब्रान्टन उनसे कर रहे थे। अबकी बार वे अपने इस अनन्य मित्र प्रो0 रामचन्द्र दत्तात्रेय रानाडे से उनके रहस्यवादी दर्शन का रहस्य जानने आए थे। यह उनकी दूसरी भेट थी। उन्हें अनायास ही सब कुछ बदला-बदला लग रहा था। अब प्रो0 रानाडे में स्वच्छता के प्रति पहले वाला कट्टर आग्रह न था। दिन में तीन बार का स्नान, बार-बार के वस्त्र बदलने का आग्रह, दूसरों को अस्पृश्य समझने की धुन सब समाप्त हो गयी थी।

आखिर यह चमत्कार कैसे हुआ? पाल ब्रान्टन के इस आश्चर्य को तोड़ते हुए रहस्यवादी दर्शन के प्रणेता प्रो0 रानाडे कहने लगे-” मैंने अनेक वर्ष अपनी स्वच्छता पर अभिमान किया।” उनकी वाणी में आकर्षण था। उनकी चेष्टा में स्पृहणीय सौजन्य था। उनका वर्णन मन को सम्पूर्ण विवरण ज्ञात कर लेने को समुत्सुक बना रहा था। पाल ब्रान्टन की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।

“शौचातस्वाँग जुगुप्सा परैर संसर्गः आरबाखाँ (2/40) योग दर्शनकार की इस बात को अनेक बार पढ़ने के बावजूद इसके रहस्य की ओर मेरा ध्यान ही नहीं गया। मुझे तो मेरी स्वच्छता ने इससे सर्वथा विपरीत बना दिया था। मुझे लगता था कि मेरे वस्त्र, मेरे पात्र मेरा उपकरण दिव्य हैं। परम पवित्र हैं वे। मेरा शरीर पावन है। दूसरों का तनिक सा स्पर्श मुझे असहाय कष्ट देता था।” वे एकांत में अपने इस विदेशी मित्र के आग्रह पर सुना रहे थे।-” यदि किसी छाया भी मेरे वस्त्रों पर पड़ जाय, मैं उन्हें धो डालता था। अनेक श्रद्धालु आए किन्तु मैंने उन्हें झिड़क दिया। कोई इतना स्वच्छ-पवित्र हो कैसे सकता था कि मेरी कोई शुद्र सेवा भी कर सके।

उन दिनों मैं भी जगन्नाथपुरी गया हुआ था।” अपने आकस्मिक परिवर्तन के रहस्य को उद्घाटित कर रहे थे। “सागर तट का एकान्त रमणीय स्थान, नीलाँचल का निवास किन्तु मैं दूर से नील चक्र के दर्शन करके ही सन्तोष कर लेता था। मन्दिर में जाने पर अनेक लोगों के स्पर्श होगा। अपवित्र हो जाने की आशंका से ही मेरा चित्त व्याकुल हो जाता था।

परैर संसर्ग का कितना भ्रान्त अर्थ माना था मैंने” तनिक स्वस्थ होने पर बोले- “ आत्म तत्व से भिन्न प्रतीयमान समस्त प्रपंच भर हैं उससे असंसर्ग- उसमें अभिनिवेश का अभाव, यह बात तो कभी सूझी ही नहीं। जिस ‘स्वाँग’- अपने शरीर में जुगुप्सा होनी चाहिए, वही परम पवित्र हो गया था मेरे लिए और उससे भिन्न शरीर पर था। उनसे असंसर्ग साधने में ही मैं अपना समस्त पौरुष समर्पित कर चुका था।

अहंकार, घृणा, क्रोध पता नहीं कितना कलुष अपने अन्तःकरण में भर लिया था और भरता जाता था। इतने पर भी मानता था कि मैं स्वच्छ हूँ पवित्र हूँ।” उन्होंने अपने मित्र की ओर नेत्र उठाए- “ आज मुझे पता लगा है कि में कितना मूढ़ था। जल, मिट्टी के द्वारा मल के पिण्ड को ऊपर-ऊपर से धोकर मैंने मान लिया था कि वह स्वच्छ हो गया और इस अहंकार के ही कारण निर्बाध रूप से मेरे चित में कलुष भरता गया।

मुझे अत्यधिक क्लेश होता था, तब जब मैं समुद्र में मछुओं को जाल खींचते देखता था। उनके जाल तथा शरीर से निकली दुर्गन्धित अपवित्र वायु से बचने का कोई उपाय नहीं था। समुद्र तट पर ही मेरा निवास था। कितना भी मैं अपने को द्वार के भीतर बन्द कर लूँ, वह वायु मेरी नासिका में आती थी और उसे अपने शरीर में पहुँचने से मैं रोक नहीं सकता था।”

अचानक वे खुलकर हँसे और कहने लगे- “ कोई भी साधना प्रारम्भ होती है चित्त को शुद्ध करने के लिए, शान्ति एवं सुख की प्राप्ति के लिए यह कहना अधिक उपयुक्त होगा। किन्तु मेरी स्वच्छता की साधना ने मेरे चित्त को अत्यंत मलीन बना दिया था। मुझ जैसा अशान्त एवं दुःखी व्यक्ति मिलना कठिन था।

उस दिन मैं सागर किनारे ही खड़ा था। धवल ज्योत्सना ने उदधि के अन्तर में अपने नभ स्थित आत्मज के प्रति वात्सल्य उठा दिया था। अम्बुधि शत-शत उच्छृंखलित तरंगों से तारकों से घिरे चन्द्रमा को अंकमाल देने के लिए उठता लगता। पूर्णिमा के इस रात्रि को यह अद्भुत दृश्य देखने सहस्र-सहस्र जन सागर तीर पर खड़े थे। मैं भी खड़ा था, पर सबसे दूर।

अचानक भीड़ का एक ज्वार सा आया और मैं सागर की लहरों के बीच था।

उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठाकर पुलिन पर पटक दिया। अकस्मात एक शीतल उज्ज्वल डेढ़ दो हाथ की मछली भी मेरे ऊपर उछल रही थी। वह मेरे शरीर पर छटपटाई और तरंग के आगमन के साथ सागर में चली गयी। दो क्षण लगे इस सब में किन्तु उस शरदपूर्णिमा की रात्रि के वे दो क्षण मेरे जीवन की पूर्णता के क्षण थे।

मछली का शरीर पर छटपटाना- मैं चौंका, घबराया और दुर्गन्ध से व्याकुल हो गया। उठा तो लगा कि पूरे देह से मछली की दुर्गन्ध आ रही है। वही दुर्गन्ध जो दूर से आती थी तो मैं दौड़कर द्वार बन्द कर लेता था। तीव्र घृणा हुई।” कई क्षण फिर निस्तब्ध रहकर बोले-” अचानक मस्तिष्क में जैसे प्रकाश पिण्ड का विस्फोट हुआ हो। निरन्तर अनन्त वारि राशि की लक्ष लक्ष तरंगों से धुलते रहने वाली मछली इतनी अपवित्र , इतनी दुर्गन्धित ओर तेरी यह काया? यह भी तो माँस-मेद, रक्त, कफ, पित्त, अस्थि, स्नायु का पिण्ड है। कुछ घड़े जल से धोकर तू इसे पवित्र-स्वच्छ बना लेगा? प्रभु की कृपा से स्वच्छता का मर्मार्थ समझ में आने लगा था।”

रस्सी पर अनेक वस्त्र अभी भी बाहर सूख रहे थे स्वच्छता का यह क्रम तो अबाध चलता है। प्रकृति अपने स्वभाव से तो सर्वत्र धूलि ही डालती है। विकृत होना उसका स्वभाव है। स्वच्छता कोशिश करके प्राप्त करनी पड़ती है। प्रयास में कमी आएगी। तो आवास हो, शरीर हो, अन्तःकरण हो अवश्य हव अस्वच्छ रहेगा। स्वच्छता का प्रयास तो चलता ही रहना चाहिए। जब तक जीवन है, जाग्रति है, इस प्रयास की अपेक्षा तो रहेगी ही।

“ लेकिन इसकी सफलता तो इस विवेक में है जो शौचात्स्वाँग जुगुप्सा परैर संसर्गः निहित इस तत् का बोध करा दे, कि देह आकर्षण से ऊपर उठकर आत्मतत्व में निमग्नता पा लेना ही स्वच्छता का फलितार्थ है यह मलमूत्र की थैली यह आत्मतत्व की अभिव्यक्ति का साधन बने, दैहिक आकर्षण का नहीं।” उनके इस कथन में पाल ब्रान्टन को उनका रहस्यवाद प्रत्यक्ष हो रहा था । योग दर्शनकार के सूत्र का मर्म आज वे अपने अन्तःकरण में अनुभव कर रहे थे।


परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालें

प्राणिशास्त्र में ‘द आर्ट ऑफ वैटसिन एडाप्शन’ प्राणिशास्त्र का एक बहुचर्चित सिद्धान्त है जिसका अर्थ होता है। सामाजिक बुराइयों से आत्म-रक्षा के लिए अपने आपको बदलना बुराइयाँ कमजोर मन वालो पर आक्रमण करती हैं, हमें अभ्यास से अपने मन को ऐसा बनाना चाहिए जिसमें कोई भी अप्रिय परिस्थिति टकराकर ऐसे लौट जाये जैसे पहाड़ की खाड़ी से समुद्री लहरें।

प्रख्यात जर्मन वैज्ञानिक मूलर ने अपने लम्बे अध्ययन-अनुसंधान के बाद निष्कर्ष निकाला कि वंश परम्परा से कुछ तितलियाँ भिन्न जाति की होती हैं किन्तु वे अपना रंग-रूप और आकार इस तरह बनाती हैं जैसे वह तितलियाँ, स्वाद में कटु होती हैं और दुश्मन जिन्हें खाना तो दूर पास तक नहीं आते । इस तरह वे कमजोर होने पर भी अपना बचाव कर लेती हैं। हमारे जीवन में कैसा ही उतार क्यों न हों, इतिहास से हम उन पुरुषों के जीवनवृत्त ढूँढ़ सकते हैं जिन्होंने हमारी जैसी परिस्थितियों में ही अपने आपको सफलता के द्वार खोज निकाले हों। उनका अनुकरण और अनुशीलन करें तो गई गुजरी स्थिति में भी हम अपने स्वत्व की रक्षा और विकास कर सकते हैं, जो वर्तमान परिस्थिति में हमारे लिए कभी भी संभव न होता।

जीवविज्ञान में ऐसी ही नकल करने की कला है जिसे- ‘द आर्ट ऑफ ...............एडाप्शन’ कहते हैं इसमें ................प्रकृति के लोगों के साथ मिलकर ऐसा संगठन बनाया जाता है, जिससे दुश्मन अपने आप ही पीछा करना छोड़ दे। अध्ययन शास्त्र में उसे तितिक्षा की संज्ञा दी जाती है स्वामी विवेकानन्द जिन दिनों योगाभ्यास कर रहे थे, उनके मन में कई प्रकार की वासनाएँ भी भड़कती रहती थी। कई बार यह गन्दे विचार इतने तीव्र हो उठते थे कि उनका हटाना कठिन हो जाता था। विवेकानन्द हैरान थे, क्या करें कभी उन्हें एक विचित्र दृश्य दिखाई दिया उन्होंने देखा एक ऐसा कीड़ा है, जो चींटियों को बार बार पकड़ कर ऐसे खा जाता है जैसे वासनाएँ सद्गुणों को खा जाती हैं। दुश्मन से बचने के लिए इन चींटियों ने एक तरकीब निकाली। पास ही कुछ ऐसी मकड़ियाँ रहती थी , जिनका आकार ओर रंग-रूप इन चींटियों के तरह का था। चींटियों ने उनसे मेल मिलाप कर लिया और उनके साथ ही रहने लगी। चींटियों और मकड़ियों के पास-पास आ जाने से उनकी संख्या भी अधिक हो गयी।

लोभी व्यक्ति को जिस प्रकार हित-अनहित का, अच्छे बुरे का विवेक नहीं रहता उसी प्रकार उस कीड़े ने भी चींटियों की बढ़ोत्तरी देखी तो उसकी प्रसन्नता का पारावार न रहा। उसने घात लगायी और टप से चींटी के धोखे में एक मकड़ी को पकड़ लिया। उस मकड़ी का स्वाद इतना जहरीला था कि कीड़े को मूर्छा आ गयी। होश आने पर वह इतना डर गया कि फिर उसने दुबारा चींटियों को छेड़ने का साहस नहीं किया। अच्छे की संगत और संगठन में रहने का तब से इन चींटियों ने स्वभाव बना लिया।

डोनाउसक्राइसीपस नामक तितली, ततैये और टिड्डे आदि दुश्मनों से बचने के लिए बहुत चमकीले-भड़कीले लाल, काले, पीले रंग बदलने, दुर्गन्ध छोड़कर अपने आपको क्रोधी और जहरीला दिखाने की क्रिया करते हैं। दुश्मन डरकर भाग जाता है इसी प्रकार मन में उठने वाली बुराइयों को उनके अप्रिय परिणाम दिखाकर डराया और धमकाया जा सकता है। उदाहरण के लिए पढ़ने में मन न लगे तो फेल हो जाने की निराशा का चित्रण, काम न करने पर भूख-प्यास और कपड़े-लत्ते की तंगी का चित्रण, काम-वासना भड़के तो रोग बुढ़ापा और दुर्बलता का चित्रण करके उन्हें डरा देना चाहिए।

हेनरी फोर्ड ने उसी सिद्धान्त के रचनात्मक अभ्यास से औद्योगिक सफलता अर्जित की थी। उन्होंने अपने एक संस्मरण में लिखा है- “व्यापार के प्रारम्भिक दिनों में मुझे बड़ा आलस्य और अनुत्साह रहता, उस समय मैं अच्छे सम्पन्न भविष्य की कल्पना करता। मेरे बंगले होंगे, कारें होंगी, दास-दासियाँ होंगे, सुख के सब साधन होंगे तो कितना अच्छा होगा। इन कल्पनाओं से आलस्य को अन्त हो जाता और मैं फिर दुगुने उत्साह से काम करने लगता । इसी तरह बढ़ते-बढ़ते मैं वर्तमान स्थिति तक पहुँचा।”

जीव-जन्तु अपने बचाव के लिए इस सिद्धान्त का बहुत उपयोग करते हैं, उदाहरण के लिए मोलस्का समुदाय का सीपिया नामक प्राणी अपने शरीर की एक थैली में स्याही जैसा तरल पदार्थ भरकर रखते हैं। अपने इस संचित संस्कार के कारण वे निर्भय विचरण करते रहते हैं। यदि उन्हें सामने से कोई दुश्मन आता दिखाई दिया तो उस थैली का रंगीन तरल पदार्थ काफी दूर तक उड़ेल कर पानी को रंगीन करके स्वयं उसी में छिपकर बैठ जाएँगे। शत्रु शिकार को देख नहीं पाएगा या एक ओर खड़ा ताकता रहेगा, सीपिया अपनी मस्ती से दूसरी ओर से निकल जाएगा। जिन लोगों में ऐसे रचनात्मक स्वभाव होते हैं, वे ही संसार में उच्च सफलताएँ प्राप्त करते हैं जो निराशावादी हर परिस्थिति के फंदे में फँस जाने वाले होते हैं, उन्हें तो छोटे आघात ही मारकर नष्ट कर देते हैं।

तिलचट्टा, कछुआ, साँप, घोंघा, मगर आदि अपनी त्वचा के ऊपर सुरक्षात्मक आवरण रखते हैं और जी चाहे जहाँ विचरण करते हैं। उनका बड़े से बड़ा शत्रु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता । संसार में मान कि विषम परिस्थितियों के अम्बार लगें हैं, अपने अनुकूल जैसी परिस्थितियाँ होती ही नहीं है। इतने पर भी महापुरुष अपने को इतना मजबूत बना लेते हैं कि चाहे लाभ हो या हानि, सुख हो या दुःख यश मिले या अपयश वे अपने आदर्श सिद्धान्तोँ से उन सबको दबाकर मस्ती और निश्चिन्तता का जीवन जीते हैं। ऐसे जीवनक्रम की गीता में बड़ी प्रशंसा की गयी है। कर्म योगी के लिए साँसारिक गतिविधियों से बचाव के लिए ऐसा ही सुरक्षात्मक आवरण रखना नितान्त आवश्यक होता है।

संसार ऐसा विलक्षण है कि यहाँ बहुत शक्तिशाली और रूप गुणशील भी कई बार बुराइयों की आक्रमण की लपेट में आ जाते हैं। इसीलिए धर्मशास्त्र कहते हैं कि न्याय और आत्मा की आवाज के लिए सबको समान रूप से प्रयत्नशील रहना चाहिए, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। दोनों समाज में रहते हैं दोनों को ही सामाजिक उत्तरदायित्वों का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए।

शेर जंगल का राजा होता है, बड़ा शक्तिशाली ओर एकान्तवासी। तो भी कुछ मक्खियाँ और कीड़े उसे काटते हैं कि कई बार उसकी जान के ग्राहक ही बन जाते हैं। उत्तरी अमेरिका में एक खूबसूरत रंगीन पक्षी ‘स्कनस्’ पाया जाता है। वह और सूक्ष्मदर्शी चमगादड़ भी अपने दुश्मनों से अपनी आत्मरक्षा के लिए अपने शरीर से एक विशेष प्रकार की दुर्गन्ध निकालकर दुश्मन को भगाते हैं। तात्पर्य यह कि हमें संघर्ष के क्षणों में उन परिस्थितियों के लिए तैयार रहना चाहिए जो हमारी आदत के अनुकूल नहीं हो। इसके लिए ‘साही’ की तरह पहले से ही तैयार रहना चाहिए। इस जन्तु के शरीर पर छोटे-छोटे काँटे होते हैं। साही के शरीर पर जो मजबूत कांटे होते हैं। साधारणतया वे उसके काम नहीं आते किन्तु जब वह क्रोधित होता है तो इन काँटों को फैलाकर बड़े बड़े दुश्मनों की भी छुट्टी कर देता है। नाराजी ओर क्रोध मनुष्य के लिए हितकारक नहीं पर जिस तरह आत्म रक्षा के लिए यह जीव अपने काँटों को तरेर कर दुश्मन को डराकर भगा देते हैं, उसी तरह मनुष्य को भी प्रतिकूल परिस्थितियों में नाराजी ओर क्रोध व्यक्त करना ही चाहिए। उस समय यही हमारे धर्म हो जाते हैं राष्ट्र रक्षा, सामाजिक जीवन में व्याप्त बुरे तत्वों चाहे वे चोर-डकैत हों अथवा दहेज, रिश्वत लेने वाले, उनके प्रति क्रोध और नाराजी के काँटे तरेरने ही चाहिए। यदि प्रजा अपना अस्त्र नहीं सँभालती तो अपराधी तत्व समूचे समाज पर छा जाते हैं और सर्वत्र त्रास देते हैं।

परमाणु अस्त्र विनाशकारी हैं। इसी तरह अन्य शस्त्रास्त्र भी लगता है कि मानवता के हित में नहीं है, पर सशस्त्र दुश्मन से बचाव की आवश्यकता आ पड़े तो प्रकृति यह बताती है कि आत्मरक्षा के लिए वैज्ञानिक अस्त्रों का भी प्रयोग करना धर्म है। टारपीडो ‘ इलेक्ट्रिक रे’ जैसी मछलियों में शरीर में विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता होती है। साधारणतया वह ऐसा करती नहीं पर यदि कोई दुश्मन पीछा करे तो ये विद्युत करेंट उत्पन्न कर उन्हें मार भगाती हैं। मनुष्य इन सभी गुणों का सम्मिश्रण है। प्रकृति अपने नन्हे जीवों के द्वारा उसे प्रेरणा देती है कि परिस्थिति के अनुसार मनुष्य को अपनी प्रत्येक क्षमता का प्रयोग कर मानवता की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

अमेरिका में ‘हाग्नोज्ड’ नामक एक सर्प पाया जाता है। वर्जीनिया में ‘ ओपोसम’ नामक कंगारू पाया जाता है। दोनों में परले सिरे की चतुराई होती है। ये जब अपने शिकारी को देखते हैं तो ऐसे निश्चेष्ट हो जाते हैं।मानो मर गये हों। शिकारी इन्हें मृत समझकर मुड़ता है तो ये पीछे से आक्रमण कर देते हैं कई बार हमारे सामने भी ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं जब कोई क्षमता काम नहीं देती, उस समय ‘देखि दिनन को फेर रहिमन चुप है बैठिये’ वाली कहावत के अनुसार चुप पड़ जाएँ पर जैसे ही परिस्थिति अनुकूल आये तो फिर क्रियाशील हो जाएँ। आत्मरक्षा, आत्मरक्षा, आत्म विकास ओर सामाजिक संघर्ष हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ है। उसके लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में भिन्न भिन्न स्वरूप बनाकर नाटककारिता का परिचय और अभिनय का आनंद लेते हुए जीना चाहिए। ऐसा रंग-बिरंगा जीवन ही सफल और सार्थक होता है।

समर्थता इन सब गुणों के ऊपर है। संसार में सामर्थ्यवान् लोग जीते हैं। वीरभोग्य वसुन्धरा का उद्घोष सबसे पहले हम भारतीयों ने दिया था। शेर, चीता, हाथी, मगर, सुअर ये बलवान जीवन जंगल में सर्वत्र स्वच्छन्द विचरण करते हैं। इन्हें केवल मनुष्य का ही भय रहता है और किसी का नहीं, क्योंकि इन्हीं अपनी सामर्थ्य पर भरोसा होता है। यह अपनी शक्ति से आत्मरक्षा ही नहीं , आक्रमण भी कर सकते हैं। इसी प्रकार मनुष्य को भी शक्तिशाली होना चाहिए। पाप और दुष्कर्म से बचे रहने के लिए हम भगवान् से तो डरें पर अच्छे उद्देश्य, आदर्श और पार्थिव सुखोपभोग के लिए वर्तमान परिस्थितियों में हमें अपनी आन्तरिक सामर्थ्य को इतना स्वायत्त बनाना चाहिए। कि आवश्यक पड़े तो विरोधियों को बलपूर्वक भी मारा जा सके। जनसंख्या बढ़ाने से नहीं आन्तरिक बदली हुई परिस्थितियों में अपने आपको स्थिर और सम्मानित रख सकते हैं। दुर्बलों के लिए तो संसार में पग पग पर कठिनाइयों के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

संसार परिवर्तनशील है। पल-पल पर परिस्थितियाँ बदलती रहती है । उनसे हम प्रभावित भी होते रहते हैं। इसलिए प्रकृति ने हमें वह सारी क्षमताएँ दी है जिनका समय अनुसार उपयोग करके हम सुरक्षित, सफल और समर्थ व्यक्ति और जाति बन सकते हैं। प्रकृति के असंख्य छोटे-छोटे जीव हमें इसी बात की प्रेरणा देते हैं।


राजकुमार की बुद्धिमानी (Kahani)

एक राजा ने बड़े पुत्र को युवराज बनाने की अपेक्षा अधिक शीलवान को नियुक्त करने की प्रथा आरम्भ की और उसके लिए परीक्षा रखी।

पाँच राजकुमारों के लिए भोजन परोसे गये। जैसे ही वे थाली पर हाथ डालने वाले थे कि चार शिकारी कुत्ते उन पर छोड़ दिये गये। चार राजकुमार तो घबराकर भाग खड़े हुए, पर सबसे छोटा यथास्थान बैठा रहा। उसने चार भगोड़े राजकुमारों के थान कुत्तों के सामने सरका दिये। वे भी खाते रहे और छोटे राजकुमार ने भी पेट भर लिया।

निरीक्षक सबकी कार्यविधि देखते रहे। छोटे ने कहा- “कुत्ते उसे काटते हैं जो अकेले खाता है। बाँटकर खाने वाले को कोई जख्म नहीं उठाना पड़ता।”

इस बुद्धिमानी पर सभी प्रसन्न हुए और उसे ही उत्तराधिकारी चुना।


संयोगों के मूल में छिपे चैतन्य तथ्य

संयोगों की शृंखला में कई बार ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं, जो परस्पर इतने आश्चर्यजनक साम्य सँजोये होती हैं कि देख-सुनकर आश्चर्य होता है। इतने पर भी सच्चाई यह है कि यहाँ संयोग कुछ है नहीं।संयोग और वियोग के रूप में जो कुछ भासता है, उसके पीछे भी एक सुनियोजित तारतम्य है और परोक्ष को प्रेरणा भी। यह बात और है कि उसे हमारी बुद्धि समझ व सुलझा नहीं पाती।

घटना सन् 1966 की है। एक बार मूर्धन्य लेखक रिचर्ड बक अमेरिका के पश्चिमी क्षेत्र में दो फलक वाले एक विमान पर यात्रा कर रहे थे। यह विमान दुर्लभ प्रकार का था; क्योंकि सन् 1929 में निर्मित यह ‘डेट्राइट-पी-2ए’ विमान’ संख्या में सिर्फ आठ ही बने थे। विस्कॉन्सिन स्थित पायेरो नामक स्थान पर रिचर्ड ने यह विमान अपने पायलट साथी को चलाने के लिए दिया। रास्ते भर विमान बिना किसी परेषानी के उड़ता रहा। उतारने का जब समय आया, तो मित्र से थोड़ी भूल हो गई और विमान क्षतिग्रस्त हो गया। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘नाथिंग बायचाँस’ में रिचर्ड मोरिस बक लिखते हैं के दबाव को रोकने वाले एक पुर्जे को छोड़ शेष सब की मरम्मत करा दी गई थी। इस पुर्जे की मरम्मत इसलिए न हो सकी कि उसके दुर्लभ होने से वह भाग कहीं भी न मिल सका था, तभी एक व्यक्ति आया, जिसने स्वयं ही उत्सुकतावश उसकी विमानशाला में उस विमान के उपयुक्त 40 वर्ष पुराना पुर्जा मिल गया तथा वायुयान को फिर से चला पाने में ..........सफल हो गये। यह एक संयोग ही था कि उस अपरिचित इलाके में ठीक वहीं पुर्जा मिल गया, जिसे खोजकर हम हार गये थे।

मूर्धन्य ........... आर्थर कोयेस्लर ने ऐसी अनेक घटनाओं के विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि जीव-विज्ञान और भौतिक विज्ञान और भौतिक विज्ञान सर्वथा आधुनिक खोजें प्रकृति की उस मूल-सत्ता की ओर संकेत करती हैं, जो अव्यवस्था में भी व्यवस्था बनाये रखती है। इसे देखकर यह लगता है कि हमारे ज्ञान से परे कोई शक्ति काम कर रही है।

अपनी पुस्तक ‘दि रुट्स ऑफ कोइन्सीडेन्स; में उन्होंने लिखा है कि निस्संदेह हम संयोगपरक चमत्कारों से घिरे हैं और जिनके अस्तित्व की अब तक उपेक्षा करते रहे हैं, पर वही उपेक्षा आने वाले समय में यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साबित होगी कि प्रकृति जितना और जैसा कुछ दिखाई पड़ती है और उसके जिस स्वरूप के हम अध्ययन-अनुसंधान में निरत हैं, वह केवल उतना ही नहीं है, वरन् उससे भी अधिक इतना कुछ है, जिसे समझने के लिए बौद्धिक प्रतिभा नहीं, आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि चाहिए।

यह सच है कि मूल चेतना को समझे बिना उन घटनाओं की व्याख्या-विवेचना कर पाना लगभग असंभव है, जिन्हें अब तक संयोग कहकर टाला जाता रहा है।

ऐसी ही एक घटना 15वीं शताब्दी की है। लंदन के निकटवर्ती शांपहान कस्बे में एक चर्च है; इसमें एक लकड़ी का पुतला है, जिसके नीचे- ‘फेरीबाल जान चैपमैन’ नाम खुदा है। यह पुतला जान चैपमैन की उदारता और सेवा परायणता का स्मरण अब भी लोगों को दिलाता रहता है।

एक रात जान चैपमैन को स्वप्न हुआ कि वह लन्दन जाये, वहाँ टेक्स नदी के पुल पर उसकी एक आदमी से भेंट होगी; वह आदमी अनजाने ही एक गड़े खजाने का रहस्य बता देगा; उसे निकाल कर लोकमंगल के कार्य में उसका उपयोग करना चाहिए।

नींद खुलने पर चैपमैन ने निश्चय किया कि यदि स्वप्न सच है, तो वास्तविकता का पता अवश्य लगाना चाहिए। वह पैदल ही लन्दन के लिए रवाना हुआ ओर पाँच दिन पश्चात् निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा। टेक्स नदी के पुल पर कई दिनों तक चक्कर काटता रहा, पर संकोचवश स्वप्न की बात किसी को बता न सका। उसी समय एक व्यापारी ने उससे कई दिनों से उसके वहाँ निरुद्देश्य भ्रमण का कारण जानना चाहा। चैपमैन ने स्वप्न की बात बता दी। व्यापारी ने हँसकर कहा कि उसे भी तीन दिन पूर्व इसी प्रकार का एक स्वप्न-संकेत मिला, जिसमें बताया गया कि यहाँ के कुछ ही फासले पर शाँपहान नामक एक कस्बा है, वहाँ चैपमैन नामक एक धर्मपरायण आदमी मिलेगा; उसके घर के पीछे एक बड़ा खजाना गड़ा है, तुम चाहो तो उसे निकाल कर धनकुबेर बन सकते हो। चैपमैन को खजाने का पता मिल गया। वह चुपचाप वहाँ से चल दिया। घर के पिछवाड़े में जब पेड़ के नीचे की जमीन खोदी तो कुछ ही गहराई में उसे सोने और चाँदी से भरा एक घड़ा मिला, उसने सारा धन लोकहित में खर्च कर दिया, एक चर्च और अस्पताल बनवाया एवं बच्चों के पढ़ने के लिए एक पाठशाला खुलवायी। कुछ समय बाद जब उसकी मृत्यु हुई, तो वहाँ के निवासियों ने उस पवित्रात्मा की लकड़ी का एक पुतला बनाकर चर्च में प्रतिष्ठित कर दिया, ताकि उसकी स्मृति अक्षुण्ण रह सके।

एक अन्य घटना कैन्सास की है। वहाँ का एक व्यक्ति आर्थर स्टोवैल ने एक लम्बा रेलमार्ग बनाने का काम हाथ में लिया। काम अच्छी तरह आरम्भ भी नहीं हो पाया था कि एक अप्रत्याशित झंझट आ खड़ा हुआ। उक्त जमीन पर एक दूसरे व्यक्ति ने अपने अधिकार का दावा प्रस्तुत किया और कोर्ट से निषेधाज्ञा निकलवाकर काम रुकवा दिया। बहुत समय तक इस अवरोध के बाद आर्थर ने सपना देखा कि जमीन का असली मालिक कोई कर्से नामक व्यक्ति है। खोज की गई। ज्ञात हुआ कर्से मर चुका है। उसके उत्तराधिकारी भी इस जमीन के बारे में अनभिज्ञ थे, पर जब उन्होंने सपने की बात बताते हुए उनसे संबंधित कागजातों की खोजबीन का अनुरोध किया, तो कुछ ऐसे प्रमाण मिले, जिनसे जमीन उनकी मिल्कियत सिद्ध होती थी। अन्ततः उन लोगों से समझौता करके रेलवे लाइन का काम फिर शुरू किया गया और वह यथासमय पूरा भी हो गया। कार्य पूरा होने से उसे करोड़ों का लाभ हुआ।

उल्कापिण्ड आमतौर से सुनसान जगहों में ही गिरते पाये गये हैं। मनुष्य पर उनका आक्रमण हुआ हो, ऐसी घटना इतिहास में एक ही मिलती है। यह व्यक्ति था इटली का मैन फ्रेडो सेट्टाला। वह वैज्ञानिक था। मजे की बात तो यह कि उसका अनुसंधान उल्कापिण्डों पर ही चल रहा था। खेतों में घूमते समय उल्का का एक छोटा खण्ड उसके ऊपर आ गिरा और उसकी मौत हो गई।

उक्त घटनाएँ विस्मयकारी लग सकती है, पर वह साधारण संयोग है- ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसी मत का समर्थन करते हुए प्रख्यात मनोविज्ञानी डी0 स्काट रोहो अपनी रचना ‘पेरानाँर्मल फेनोमना इन डे-टूडे लाइफ’ में लिखते हैं कि दैनिक जीवन में जिन्हें हम महज संयोग कहकर टाल देते हैं, उनमें कई बार ऐसी असाधारणता नजर आ सकती है, जो अलौकिक हो। संभव है, अनुसंधान द्वारा इस पर से पर्दा हटाया जा सके और यह जाना जा सके कि सामान्य स्थिति में जो संयोग जैसा प्रतीत होता था, उसमें किसी असाधारण अलौकिक सत्ता का हाथ है।

विख्यात दार्शनिक जुँग ने अपने जीवनकाल में ऐसी घटनाओं का बहुत गहन अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि ये सब घटनाएँ पूर्णतः मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्तियाँ हैं। अपने जीवन के अधिकांश भाग में वे इसी विचार पर दृढ़ रहे; किन्तु जिन्दगी के अन्तिम कुछ वर्षों में उन्हें अपनी यह अवधारणा बदलनी पड़ी। इसका एक बड़ा कारण उनका मनःचिकित्सक होना था। इस नाते कई बार उनका ऐसे रोगियों से पाला पड़ जाता, जिनकी समस्याओं से वे स्वयं उलझन में पड़ जाते और मान्यता बदलने के लिए विवश होते। एक ऐसे ही अवसर पर उनका सामना एक महिला रोगी से हो गया। जुँग के लिए सबसे बड़ी समस्या उक्त स्त्री का तर्कशील स्वभाव था। उसकी दलीलें इतनी सटीक होतीं कि कई बार जुँग को भी निरुत्तर हो जाना पड़ता। ऐसी स्थिति में वे उसका सही उपचार नहीं कर पा रहते थे और न इसी बात का विश्वास दिला पा रहे थे कि मन का एक अवचेतन स्तर भी होता है, रोगों की जड़ें इसी स्तर पर जमीं होती हैं। अभी वे कोई अन्य उपाय सोचते, इसी बीच एक घटना घट गई। मरीज ने एक स्वप्न देखा कि उसे कोई गुबरैले की शक्ल का एक सुनहरा आभूषण दे रहा है। वह अपने चिकित्सक से इसकी चर्चा कर रही थी कि जुँग को अपने पीछे ‘खट-खट’ की तेज ध्वनि सुनाई पड़ी। पलट कर देखा, तो पता चला कि एक सुनहरा गुबरैला अन्दर प्रवेश पाने के लिए खिड़की के काँच पर टक्कर मार रहा है। उसने खिड़की खोल दी। गुबरैला अन्दर घुसा, तो उसे पकड़ लिया। उसका सुनहरा रंग काफी हद तक उक्त आभूषण से मिलता-जुलता था। जुँग ने रोगी की ओर यह कहते हुए गुबरैला बढ़ाया कि यह रहा तुम्हारा उक्त आभूषण। इस घटना से महिला हतप्रभ रह गई। उसका तर्कशील मस्तिष्क परिवर्तित हो गया। जुँग को सफलता मिली और स्त्री कुछ ही महीनों में ठीक हो गई।

उक्त घटना ने जुँग को संयोग संबंधी अपनी मान्यता बदलने के लिए बाध्य कर दिया। व लिखते हैं कि इसे संयोग नहीं माना जा सकता। इसमें निश्चित रूप से किसी सत्ता अथवा व्यवस्था का सूक्ष्म हाथ है। यदि ऐसा नहीं है, तो गुबरैले को वहाँ आने की प्रेरणा कहाँ से मिली अथवा महिला को स्वप्न संकेत किसने दिया? इन सब प्रश्नों का उत्तर दे पाना कठिन हो जाएगा। समाधान के लिए प्रख्यात भौतिकशास्त्री एवं नोबुल kHHk bbbbbbbbbbb पुरस्कार विजेता उल्फगैंग पाँली के साथ मिल कर सन् 1952 में उन्होंने एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया और कहा कि ऐसे प्रसंगों में एक अज्ञात सिद्धान्त कार्य करता है। उनका मानना था कि कार्य-कारण-सिद्धान्त से परे कोई चीज इसके पीछे कारणभूत है। उनकी दृढ़ धारणा थी कि दिक्−काल के अन्य प्रकार यदि सचमुच अस्तित्व में हैं तो यह सुनिश्चित है कि संयोग जैसी लगने वाली ये घटनाएँ एक-दूसरे से अविज्ञात रूप से सम्बद्ध हैं।

कुछ ऐसा ही मन्तव्य विख्यात विज्ञानवेत्ता माइकल एस॰ मजेनिगा ने अपनी कृति, ‘चान्स एण्ड अपोरच्युनिटी’ में प्रकट किया है। इससे स्पष्ट है कि यहाँ संयोग जैसा कुछ नहीं है। जो है, वह यह कि हम सब चेतना की एक अविच्छिन्न डोर से परस्पर बँधे हुए हैं और परोक्ष रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं। जिस दिन यह पारस्परिकता और अविच्छिन्नता समझ में आ जाएगी, उस दिन संयोगों का रहस्य उद्घाटित हो जाएगा और यह भी कि संपर्क सूत्र को और अधिक प्रगाढ़ व प्रबल कैसे किया जाय?


अनीति का अन्न (Kahani)

विदुरजी ने जब देखा कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन अनीति करना नहीं छोड़ते, तो सोचा कि इनका सान्निध्य और इनका अन्न मेरी वृत्तियों को भी प्रभावित करेगा। इसलिए वे नगर के बाहर वन में कुटी बनाकर पत्नी सुलभा सहित रहने लगे। जंगल से भाजी तोड़ लेते, उबालकर खा लेते तथा सत्कार्यों व प्रभु स्मरण में समय लगाते।

श्रीकृष्ण जब संधि दूत बनकर गये और वार्ता असफल हो गयी तो, वे धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य आदि सबका आमंत्रण अस्वीकार करके विदुरजी के यहाँ जा पहुँचे। वहाँ भोजन करने की इच्छा प्रकट की।

विदुरजी को यह संकोच हुआ कि शाक प्रभु को परोसने पड़ेंगे? पूछा-”आप भूखे भी थे, भोजन का समय भी था और उनका आग्रह भी, फिर आपने वहाँ भोजन क्यों नहीं किया?”

भगवान बोले-”चाचाजी ! जिस भोजन को करना आपने उचित नहीं समझा, जो आपके गले न उतरा, वह मुझे भी कैसे रुचता? जिसमें आपने स्वाद पाया, उसमें मुझे स्वाद न मिलेगा, ऐसा आप कैसे सोचते हैं?”

विदुरजी भावविह्वल हो गये, प्रभु के स्मरण मात्र से हमें जब पदार्थ नहीं संस्कारप्रिय लगने लगे हैं तो स्वयं प्रभु की भूख पदार्थों से कैसे बुझ सकती है। उन्हें तो भावना चाहिए। उसकी विदुर दंपत्ति के पास कहाँ कमी थी। भाजी के माध्यम से वही दिव्य आदान-प्रदान चला। दोनों धन्य हो गये।


मन एव मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्षयो

मगध सम्राट महाराज बिम्बसार, अपने राजपरिकर के साथ नंगे पाँव चलकर ही तीर्थंकर भगवान महावीर के दर्शनों के लिए जा रहे थे। सबसे आगे उनके सुमुख और दुर्मुख नाम के दो व्यवस्था सचिव चल रहे थे। अचानक सबकी दृष्टि मार्ग के दायीं ओर गई। वहाँ एक वृक्ष के नीचे महातपस्वी प्रसन्नचन्द्र एक पैर पर खड़े हो, भुजाएँ ऊँची कर सूर्यमुखी मुद्रा में अपने ध्यान में तल्लीन थे।

सम्राट श्रेणिक ने एक पल के लिए खड़े होकर उनकी ओर भक्तिपूर्ण दृष्टि से निहारा और महारानी चेलना के साथ उनको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। उन्हें परम तपस्वी प्रसन्नचंद्र के बारे में काफी कुछ स्मरण हो आया। अपनी तपस्या से समूचे लोक को प्रकाशित करने वाले प्रसन्नचन्द्र पहले पोतनपूर के राजाधिराज थे। कुशल प्रशासक, श्रेष्ठ योद्धा, महान न्यायाधीश के रूप में उनकी चतुर्दिक् ख्याति थी। उनके न्याय की कहानियाँ चारों ओर कही-सुनी जाती थीं। सेनापति और महान योद्धा उन्हें अपनी वीरता के आदर्श के रूप में स्वीकार करते थे। व्यापार और धन-धान्य की समृद्धि का पर्याय माना जाता था पोतनपुर का राज्य।

अनेक वर्षों तक प्रसन्नचंद्र ने सुख और ऐश्वर्य का भरपूर भोग किया। भंगुर ऐंद्रियक सुख में भी अमरत्व का भ्रम होने लगे, इस हद तक उन्होंने पृथ्वी के सारभूत सुख भोगे। उनकी रानी चन्द्रकला भी सौंदर्य का घनीभूत पुँज थी। अपने स्वभाव से भी वह ऐसी शीतल थी मानो कि चन्द्रपुरी से आयी हो। राजा को उसका हर .......... ऐसा लगता, जैसे उसमें चन्द्र किरणों का अमृत झरता हो।

एक वसन्त ऋतु की चाँदनी रात में राजा प्रसन्नचन्द्र महल की खुली छत में रत्नपयंक पर अपनी रानी के साथ सोये थे। चाँदनी में वासन्ती फूलों की गन्ध कुछ संदेश देती-सी लगी। राजा का आलिंगन यकायक छूट गया। रानी उस ऊष्मा में अवश, मूर्छित छूटी पड़ी रह गयी। राजा ने ग्रह-तारा खचित आकाश को देखा। लेकिन चन्द्रमा तो स्वयं उनकी शैया में ही आ लेटा है। कितने नक्षत्र लोक, कितने जगत, कितने भुवन, कितने ब्रह्माण्ड ! अनन्त सामने खुल गया।

प्रसन्नचन्द्र को लगा कि इन अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों में उसका अस्तित्व क्या ! एक बिन्दु भर भी तो नहीं। तो उसका होना या न होना कोई मायने नहीं रखता और राजा को अपनी अस्मिता शून्य में विसर्जित होती लगी। उसका ‘मैं’ उसे कपूर की तरह छूतन्तर होता अनुभव हुआ।..... तो वह कौन है और कहाँ टिके वह? मृग शीर्ष नक्षत्र के मृग पर चढ़कर वह मानो अस्तित्व के छोर छू आया। ..... आगे जो सीमाहीन का निस्तब्ध राज्य देखा, तो उस अथाह के समक्ष वह शून्य हो गया।

फूलों की शैया पर लेटी परम सुन्दरी रानी! आस-पास सजी नाना भोग सामग्री। जलमणि की फुलैल मंजूषा। नाना सुगन्ध, आलेपज अलंकारों के रत्न करंडक। ऐंद्रियक सुख के अपार आयोजन। सब कुछ क्षण मात्र में दर्पण की प्रतिच्छाया सा विलीन हो गया। सारे लोकालोक उसकी आँखों में नक्षत्रों की धूल से झरते दिखायी पड़े।

और यह चन्द्रकला? काल के प्रवाह में ऐसी जाने कितनी चन्द्रकलाएँ, हर क्षण तरंगों-सी उठकर मिट रही हैं। इसके चरम तक जाकर भी, क्या इसे पा सका? क्या मैं इसके साथ तदाकार हो सका, जो हुए बिना मुझे अब क्षण भर भी चैन नहीं।

और राजा खुलते शून्य में थरथराते बच्चे की तरह प्रवेश कर गया।

उस काल, उस बेला श्री भगवान् महावीर पोतनपुर के ‘मनोकाम्य उद्यान’ में समवसरित थे। उस दिन सबेरे अचानक महाराज प्रसन्नचंद्र प्रभु के सम्मुख उपस्थित दीखे। वे निरालंब में काँप रहे थे।

“इधर देख राजा और जान कि शून्य है कि सत है। अमूर्त है कि मूर्त है, इधर देख।” अनन्त की अतल गहराइयों को बेधती तीर्थंकर भगवान की वाणी ध्वनित हुई।

राजा ने सिर उठाकर प्रभु को एक टक निहारा। समय से परे अपलक निहारता ही रह गया। फिर हठात् वह बोल पड़ा-

“शून्य भी है, सत भी। मूर्त भी अमूर्त भी। शून्य ही सत हो गया है मेरे लिए। अमूर्त ही मूर्त हो आया है मेरे लिए। यह क्या देख रहा हूँ भगवन्!”

“क्या तू अब भी निरालम्ब है? क्या तू अब भी अकेला है? क्या तू अभी भी नास्ति है? क्या तू अब भी शून्य है?”

“मैं अब निरालम्बी नहीं, स्वावलंबी हूँ। मैं अब अकेला नहीं, क्योंकि मैं अर्हत संयुक्त हूँ। अर्हत के न के बाहर तो कुछ भी नहीं। मैं अब नास्ति नहीं, अमिट-अमित अस्ति हूँ। मैं अब शून्य नहीं, एकमेव सत्ता हूँ।”

“तू कृतार्थ हुआ राजन् ! तू जिनों के महाप्रस्थान का पंथी हुआ।”.......... महाराज प्रसन्नचन्द्र ने दिगम्बर होकर जिनेष्वरी दीक्षा का वरण किया और उसी क्षण उन्हें सम्यक् बोधि का अनुभव हुआ।

महाराज श्रेणिक को जैसे ये सारी बातें एक पल में साकार हो उठीं। जिस दिन राजा प्रसन्नचंद्र भगवान महावीर के यहाँ पधारे थे, उसी दिन वे भी अपनी महारानी के साथ भगवान के दर्शनों के लिए आये थे। यह बहुत पहले की बात है। इधर कई वर्षों से तो राजा प्रसन्नचंद्र, परमतपस्वी प्रसन्नचन्द्र, परमतपस्वी प्रसन्नचन्द्र के रूप में प्रख्यात हो चुके हैं। कायोत्सर्ग का तप उन्हें चेतना की उच्च से उच्चतर श्रेणियों पर ले जा रहा है। वे सूत्रार्थ के परगामी हो गए हैं। सत्ता का स्वरूप उनमें प्राकट्यमान होता दिखायी पड़ता है।

यही सब कुछ सोचते हुए मगध सम्राट श्रेणिक के जुड़े हाथ थोड़ा नमित होकर खुल गए। उनके पैर आगे बढ़ने के लिए समुद्यत हो उठे। सम्राट की इस सोच से बेखबर आगे चल रहे सुमुख मंत्री ने भी रुककर वन्दन किया और साश्चर्य कहा-”अहो, कैसा दिव्य है इनका तपस्तेज। स्वर्ग और मोक्ष भी इनके चरणों पर न्यौछावर हैं।”

तुरन्त ही दुर्मुख ने तीव्र प्रतिवाद करते हुए कहा-”अरे क्या खाक तपस्तेज है! तुझे क्या पता इसके बारे में सुमुख कि यह कैसा पलायनवादी और पातकी है यह साधु। यह पोतनपुर कर राजा प्रसन्नचन्द्र है। अपने बालक राजकुमार पर सारा राज्यभार छोड़ बिना कहें ही यह घर से भाग कर मुनि हो गया है। इस पातकी ने निर्दयतापूर्वक गौवत्स के कोमल कन्धों पर संसार की गाड़ी का बोझ जोत दिया। इसकी अप्सरा जैसी सुकोमल सुन्दरी रानी इसके निष्ठुर विरह में सूखकर काँटा हो गयी है। पर इस कायर को रंचमात्र दया-माया नहीं और इसके मंत्रियों ने चम्पानगरी के राजा अजातशत्रु के महामंत्री वर्षकार से मिलकर, इसके बालक राजकुमार का राज्य हड़प लेने का कुटिल जाल फैलाया है। अरे सुमुख, इस पाखण्डी, पलायनवादी को देखना भी पाप है।”

राजर्षि प्रसन्नचन्द्र के कानों में न जाने कैसे ये शब्द चले गए। उनके ध्यान सुमेरु पर जैसे वज्राघात हुआ। उनकी निश्चल चेतना में दरारें पड़ गयीं। वे चैतन्य के शिखर से लुढ़क कर, चिन्तन के विकल्पों में करवटें बदलने लगे। अहो, धिक्कार है मेरे अकृतज्ञ मंत्रियों को। मैंने निरन्तर उनका सत्कार किया। उन्हें कितना धन-मान दिया, उच्च पद दिया। फिर भी मेरे निर्दोष पुत्र के साथ वे दाँवघात कर रहे हैं। मेरा दुधमुँहा बेटा आज अनाथ है। चन्द्रकला श्री सौभाग्य विहीन होकर छिन्न लता-सी मुर्झायी पड़ी है। वह अपने आपे में नहीं। उसका नारीत्व, उसका मातृत्व सब मिट्टी में मिल गया। मेरे गृहत्याग से ही तो उनकी ऐसी दुर्दशा हो गयी। मरे अपराध की क्षमा नहीं नहीं और वे मेरे मंत्री, मेरे रहते वे मेरे शशक जैसे बालक और मेरी हरिणी जैसी रानी का सर्वनाश कर देंगे? ऐसा कैसे हो सकता है?.............मैं, मेरा, मेरी रानी, मेरा पुत्र, मेरा राज्य, मेरा मंत्री, मेरे शत्रु.......... मैं प्रतिकार करूंगा। मैं .........मेरे, मैं, .........मेरा, मैं.......मैं.......मैं।

...............और व्यथित, विक्षिप्त राजर्षि प्रसन्नचंद्र, अपने मनोदेश में ही, अपने मंख्यों के साथ युद्ध में प्रवृत्त हो गए। युद्ध अन्तहीन होता चला गया। युद्ध में से युद्ध। इस दुष्चक्र का कहाँ अन्त है?

ठीक उसी समय श्री भगवान के समवसरण में सम्राट श्रेणिक जा उपस्थित हुआ। नमन-वन्द के अनन्तर सम्राट ने सर्वज्ञ महावीर से प्रश्न किया-”जयवन्त हो त्रिलोकी नाथ ! अभी वनपथ में राजर्षि प्रसन्नचन्द्र को पूर्ण ध्यान में लीन देखा। कायोत्सर्ग की उस विदेहा दशा में यदि वे मृत्यु को प्राप्त हों, तो वे कौन-सी गति पायेंगे, भगवन्?”

तपाक से प्रभु का उत्तर सुनायी पड़ा-”सातवाँ नरक।”

स्नकर श्रेणिक आश्चर्य से जड़ हो गया। ऐसे महाध्यानी मुनि अन्तिम नरक के रसातल में कैसे पड़ सकते हैं। तब क्या कठोर दुर्धर्ष तप, तीव्र वैराग्य सब कुछ बेकार है। ऐसा तो नहीं प्रभु का उत्तर स्वयं वही सुन न सका हो? शायद उसके सुनने में ही भूल हो गयी सो क्षण भर रुककर श्रेणिक ने फिर पूछा- “हे भगवन् ! राजयोगी प्रसन्नचंद्र यदि ठीक इसी समय काल को प्राप्त हों, तो कहाँ जाएँगे? किस योनि में पुनर्जन्म लेंगे?”

भगवन्त के श्रीमुख से सुनायी पड़ा-”सर्वार्थ सिद्धि के विमान में?”

श्रेणिक बड़ी उलझन में पड़ गया। एक क्षण के अन्तर पर ही भगवान के कथन में भेद कैसा? अविरोध वाक् सर्वज्ञ की वाणी में अन्तर्विरोध कैसे हो सकता है? श्रेणिक ने तत्काल उद्विग्न हो प्रश्न किया-”हे प्रभु आपने क्षण मात्र के अन्तर से दो भिन्न बातें कैसी कहीं?”

उत्तर सुनायी पड़ा-”मन की अवस्था में भेद के कारण। चेतना में हर क्षण नयी-नयी अवस्थाएँ आती-जाती रहती हैं। आत्म परिणामों की गति बड़ी सूक्ष्म और विचित्र है, राजन् ! उत्पाद-व्यय का खेल निरन्तर चल रहा है। उसमें ध्रुव रहना ही तो योग है। मन को समत्व में आसीन कर लेना, उसे परम चेतना से तदाकार कर लेना ही तो परम सिद्धि है। प्रसन्नचन्द्र ध्यान में ध्रुवासीन होकर भीत्र, दुर्मुख के वचन सुन सहसा ही कुपित हो गए। वे समत्व के शिखर से ममत्व के पंक में लुढ़क गए। मेरा बालक राजकुमार, मेरी रानी, मेरा राज्य, मेरे मंत्री? मेरे शत्रु! और वे क्रोधावेश में आकर मन ही मन अपने मंत्रियों से रक्ताक्त युद्ध करने लगे। जब तुमने उनकी वन्दना की राजन्, तब वे इसी मनोदशा में थे। इसी से उस समय वे सप्तम नरक के योग्य थे।

लेकिन जब तुम यहाँ आए, राजन् तब प्रसन्नचंद्र ने यकायक अनुभव किया कि मेरे सारे आयुध तो चुक गए, अब मैं कैसे युद्ध करूं और वे फिर उद्यत हुए कि अहो, मैं अपने शत्रु को शिरस्त्राण से मारूंगा और उनका हाथ शिरस्त्राण खींचने को पहुँचा, तो पाया कि वहाँ शिरस्त्राण नहीं श्रमण की केश लुँचित मुण्ड खोपड़ी थी। तत्काल प्रसन्नचंद्र की प्रत्यभिज्ञा हुई अरे मैं तो सर्वत्यागी महाव्रती श्रमण हूँ। कौन राजा, किसका राज्य, किसका युवराज, किसकी रानी, कौन शत्रु, किसका शत्रु?........ मैं वह कोई नहीं, मैं हूँ केवल एक स्वभाव में स्थित निरंजन आत्मा। वीत-पर्याय, वीतराग, वीतद्वेष, वीतशोक, अवीतमान ध्रुव आत्म।

यों आलोचना, प्रतिक्रमण करते हुए प्रसन्नचन्द्र फिर प्रशस्त ध्यान में अवस्थित हो गए। तुमने जब दूसरी बार प्रश्न पूछा- तब तक उनकी मनोदशा बदल चुकी थी, वे इस थोड़े समयाँश के अन्तर से ही प्रशस्त ध्यान की पराभूमि में विचर रहे थे। सर्वार्थ सिद्धि विमानों के प्रदेश में उनकी चेतना उड़ाने भर रही थी।”

ये सब बातें हो ही रही थीं कि समीप की वनभूमि में राज संन्यासी प्रसन्नचन्द्र के सामीप्य में देव दुँदुभियों का नाद होता सुनायी पड़ा। देवाँगनाएँ पुष्प बरसाती दिखायी पड़ी। विस्मित-चकित भाव से श्रेणिक ने फिर से पूछा- “हे स्वामी, अकस्मात् यह क्या हुआ?”

प्रभु का अविलम्ब उत्तर सुनायी पड़ा-”शुक्ल ध्यान की अन्तिम चूड़ पर आरोहण कर, राजर्षि प्रसन्नचन्द्र को कैवल्य समाधि प्राप्त हो गयी। कल्पवासी देव उनके कैवल्य का उत्सव मना रहे हैं।”

“तीन ही क्षणों में, एक ही आत्मा क्रमशः सप्तम नरक का तल छूकर सर्वार्थ सिद्धि को पार कर, कैवल्य के महासूर्य में आसीन हो गयी? अबुझ है भाव की गति भगवन्!”

“काल के प्रवाह से ऊपर है चैतन्य का खेल, बिम्बसार! महाभाव के राज्य में काल का वर्तन नहीं। अपने ही मन के भावों की गति देख और जान कि तू ठीक इस क्षण कहाँ चल रहा है? इस सत्य को जान ले श्रेणिक ! कि ‘म एव मनुष्याणा करणं बन्ध मोक्षयो’ अर्थात् मनुष्यों का अपना मन ही उनके बन्धन और मोक्ष का कारण है।”

श्रेणिक राज ने अपने भीतर झाँका। एक नीली स्तब्धता में, कितनी सारी गतियाँ और कोई गति नहीं। केवल एक निःस्वप्न में, आप ही अपने में तरंगित।


नैतिकी की उपेक्षा हमें ले डूबेगी

इन दिनों समाज लूट-पाट, राहजनी, उठाईगीरी, धोखाधड़ी, ठगी के जिस अराजकतावादी दौर से गुजर रहा है, उसे देखते हुए समाजशास्त्रियों और नृतत्त्ववेत्ताओं का चिन्तित हो उठना स्वाभाविक ही है। समाजशास्त्री इसके लिए वर्तमान परिस्थितियों को दोषी मानते हैं, तो नृतत्ववेत्ता बुद्धिवाद को जिम्मेदार ठहराते हैं। जो भी हो, इतना तो निश्चित है कि बिगाड़ को सुधारने के लिए अब समाज में मानवी मूल्यों की प्रतिष्ठापना ही मूलभूत जरूरत है। यह नैतिकी को अपनाये बिना संभव नहीं।

यह सच है कि बुद्धिवाद के विकास के साथ-साथ न सिर्फ सुविधा-साधन बढ़े, वरन् आपराधिक वृत्तियों में भी तद्नुरूप बढ़ोत्तरी होती चली गई। इतना ही नहीं, उन तरीकों में भी क्रमिक विकास होता चला गया, जो परम्परागत समझे जाते थे और जिनका प्रयोग लम्बे समय से ठगी और धोखाधड़ी के लिए अपराधी मनोवृत्ति वाले लोगों द्वारा होता था। परिणामस्वरूप आज स्थिति इतनी विषम हो गई है कि कब, कौन, कैसे, कहाँ, किस रूप में किसको ठग ले, कुछ कहा नहीं जा सकता।

इस सामाजिक दुष्प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हुए थोरो ने अपनी पुस्तक ‘डिमाण्ड एण्ड सप्लाई’ में लिखा है कि सामाजिक स्थिरता बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि माँग के अनुरूप आपूर्ति हो। जब कभी इस स्वाभाविक प्रक्रिया में व्याघात उत्पन्न होता है, तो अराजकता जैसी स्थिति पैदा होती है। वे कहते हैं इस अवस्था के लिए कई बातें जिम्मेदार हो सकती हैं- अचानक आपूर्ति का घट जाना, माँग बढ़ जाना, महँगाई का आकाश चूमना, श्रम के अनुरूप धन नहीं मिल पाना, बेरोजगारी बढ़ जाना, श्रम के नाम पर शोषण होना, थोरो इन सभी कारणों को आपाधापी के लिए कारणभूत भी मानते हैं, किन्तु साथ ही यह सवाल भी उठाते हैं कि यदि इन्हें पूरी तरह ..............कर दिया गया, तो क्या धोखाधड़ी और ठगी जैसे मामलों का मूलोच्छेदन सम्पूर्ण रूप से किया जा सकता है? इसका उत्तर स्वयं देते हुए कहते हैं-”शायद नहीं।” उदाहरण के रूप में वे प्राचीन और समृद्ध यूनान का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि होमर ने अपनी कृतियों ‘इलियड’ एवं ‘ओडिसी’ में स्थान-स्था पर इस बात का स्पष्ट संकेत किया है कि तत्कालीन यूनान अपनी समृद्धि के बावजूद अस्थिर था। इस अस्थिरता का करण और कुछ नहीं, वरन् तत्कालीन यूनानवासियों की बढ़ी-चढ़ी महत्वाकाँक्षा के कारण उपजी लिप्सा थी। अधिक वैभव बटोरने के लोभ में वे अपने से ज्यादा सम्पन्न लोगों को लूटने और ठगने में निरत हो गये। परिणामस्वरूप जिस यूनान को अधिक सुखी और अधिक स्थिर होना चाहिए था वही दिन-दिन अस्थिर होता चला गया। उसकी शक्ति धीरे-धीरे चुकने लगी और अन्ततः उसका विस्तृत साम्राज्य, जो कभी अनेक देशों तक विस्तीर्ण था, पतन की ओर चल पड़ा और एक समय के वैभवशाली एवं शक्तिशाली साम्राज्य का देखते-देखते पराभव हो गया।

इस प्रकार यह कहना उचित न होगा कि साधनहीनता और विपन्नता की दशा में लूट-खसोट बढ़ती है। पिछले युगों की बौद्धिक सम्पन्नता आज जैसी थी, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उन्हें सर्वथा साधनहीन युग कहना ही समीचीन होगा, इसके बावजूद नैतिकी का जो उन्नत और उज्ज्वल उदाहरण तत्कालीन समाज ने प्रस्तुत किया, वह आज भी हमारे लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। वास्तव में इस प्रकार के आचरण के लिए जिम्मेदार परिस्थिति को नहीं, मनःस्थिति को माना जाना चाहिए। निस्संदेह पहले और अब की परिस्थितियों में भारी फेर-बदल हुआ है; पर जनसाधारण की मनःस्थिति में जिस पैमाने पर परिवर्तन आया है, उसे साधारण नहीं असाधारण ही कहना चाहिए। आस्थाएँ बदली हैं, मान्यताएँ बदली हैं, आकाँक्षाएँ बदली हैं और भावनाएँ बदली हैं; इन सबका प्रभाव मनः स्थिति पर पड़ना स्वभाविक था। परिणाम वही हुआ, जो होना चाहिए, अर्थात् प्रतिस्पर्धा। आज हर व्यक्ति अपने में अधिक उन्नतिशील और प्रगतिशील से प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्द्विता करता है एवं येन-केन प्रकारेण उसकी बराबरी करने की कोशिश करता है, भले ही इसके लिए उसे नीति-अनीति किसी का भी सहारा क्यों न लेना पड़े तथा किसी भी सीमा तक क्यों न जाना पड़े, वह इसके लिए सदा उद्यत रहता है। छह इंच के इस पेट को भरने के लिए इतना बड़ा अपयश, जिसके लिए जिन्दगी ही नहीं जन्मों भर पछताना पड़े, तो भी कोई परवाह नहीं। यही है नैतिकी का दिवालियापन। इसे नीतिमत्ता की ‘हत्या’ कहें, तो भी कोई अत्युक्ति न होगी। जो व्यक्ति न्यायनिष्ठ है, ईमानदार और सत्याग्रही है, उसके लिए आज के जमाने में जीना मुश्किल है- ऐसी बातें प्रायः वही लोग करते हैं, जो अपने अजगर जैसे विशाल उदर को भरकर भी उसके अधभरे होने का अनुभव करते ओर मौका मिलते ही किसी का भी सब कुछ निगल जाने के लिए लालायित रहते हैं अन्यथा स्वल्प में संतोष करने और संचय से विरत रहने वालों के लिए तो रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने में ही आनन्द आता है। चोरी का डर, न लूटपाट का भय, न ठगी का अंदेशा। एकदम शान्त और निश्चिंत मनःस्थिति।

पर इन दिनों मनोदशा में जिस कदर विकृति आयी है, उससे नैतिक मूल्यों का असाधारण हनन हुआ है। जिस गति से नैतिक मूल्य गिरे हैं, उसी दर से आपराधिक वृत्तियाँ बढ़ी हैं। देखा गया है कि जीवन-स्तर के विकास के साथ-साथ मानवी मूल्यों में उत्थान नहीं, पतन ही हुआ है। शहर से दूर ग्राम्य अंचलों में रहने वाले लोगों का जीवन-स्तर आज भी कोई बहुत ऊँचा नहीं है, पर इस निम्नस्तरीयता के साथ एक प्रसन्नतादायक बात यह जुड़ी होती है कि वे छल, कपट और फरेब से दूर निश्चल और भोले-भाले होते हैं। उनमें चातुरी और धूर्तता नगण्य जितनी होती है, पर अब जैसे-जैसे शहरों का विस्तार हो रहा है और कस्बे शहर का आकार ग्रहण कर रहे हैं एवं गाँव-कस्बों में बदल रहे हैं, वैसे ही वैसे ग्रामीणों की निष्कपटता खोती चली जा रही है। आपा-धापी और छल-छद्म की शुरुआत बस यहीं से होती है। यही बढ़ते-बढ़ते शहरों में सुरक्षा जैसा रूप धारण करते और इसी के साथ आरंभ होता है ठगी, उठाईगीरी, धोखाधड़ी, बेईमानी जैसे आर्थिक अपराधों का एक अन्तहीन सिलसिला।

पाया गया है कि जिस समाज और राष्ट्र का जीवन-स्तर जितना ऊँचा होता है, वहाँ मानवी मूल्यों में गिरावट उतनी ही बढ़ी-चढ़ी होती है, अर्थात् नैतिक अपराध वहाँ उसी अनुपात में ज्यादा होते हैं। अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय विश्व में सर्वाधिक है। दूसरे नम्बर पर कनाडा, फिर ब्रिटेन, उसके बाद जर्मनी, जापान एवं हाँगकाँग का स्थान है। अब यदि इनमें होने वाली धोखाधड़ी और ठगी जैसी वृत्तियों के आँकड़ों पर दृष्टिपात करें, तो पायेंगे कि अमेरिका में प्रति मिनट इस तरह की 142 घटनाएँ घटती हैं, कनाडा 92, ब्रिटेन 84, जर्मनी 81, जापान 60, हाँगकाँग 46। इससे स्पष्ट है जीवन-स्तर ज्यों-ज्यों बढ़ता है, दुष्प्रवृत्तियाँ भी वैसे-ही-वैसे बढ़ती जाती हैं। आधुनिक परिभाषा के अनुसार इसे जीवन-स्तर के विकास की संज्ञा भले ही दे दी जाय, पर वास्तविक अर्थों में इसे जीवन-स्तर का अल्पविकास ही कहना चाहिए।

‘दि एक्वीजिटिव सोसायटी’ में आर0एच0 टाउनी लिखते हैं कि जीवन स्तर का मूल्याँकन आय की दृष्टि से नहीं, वरन् इस दृष्टि से किया जाना चाहिए कि समाज को ऊँचा उठाने में व्यक्ति का निजी योगदान किस स्तर का कितना रहा। यदि धन के आधार पर यह निर्णय होना लगे, तो फिर चोरों, दस्युओं, लुटेरों, उठाईगीरों, ठगों का जीवन स्तर सबसे ऊँचा मानना पड़ेगा; क्योंकि वे अनैतिक वृत्ति से काफी धन जोड़ लेते हैं। यहाँ टाउनी का मत भारतीय अध्यात्म से काफी मेल खता है। वह इसे स्वीकारते हैं कि धन कमाने में हानि नहीं है। हानि उसके उपयोग, उपभोग और प्राप्ति के तरीके में निहित है। आवश्यकता से अधिक वैभव होने पर उसी अनुपात में कुटेवें भी पनपतीं और इनकी अधिकता में अपराधजनित वृत्तियाँ बढ़ती हैं। अतः यदि वर्तमान परिभाषा के अनुसार प्रति व्यक्ति अधिकतम और न्यूनतम आय के आधार पर ही जीवन स्तर की उच्चता और निम्नता का आकलन करने की विवशता आ पड़े, तो उस आय-व्यय के साथ कठोर आर्थिक और आध्यात्मिक अनुशासन भी जुड़ा होना चाहिए, अन्यथा अंकुशहीन स्थिति में जिस तथाकथित उच्च जीवन स्तर की संरचना होती है, उसके एक बानगी हम अमेरिका जैसे अति विकसित एवं समृद्ध राष्ट्र में देख सकते और यह अनुभव कर सकते हैं कि किस तरह इस स्थिति में नैतिकी के परखच्चे उड़ते हैं। तो क्या जीवन-स्तर की उपेक्षा कर दी जाय, उसे ऊँचा उठाने की ओर ध्यान नहीं दिया जाय? नहीं, ऐसा करना भी उचित नहीं होगा। जीवन-स्तर ऊँचा उठना ही चाहिए; पर नैतिकी की कीमत पर उसकी बलि चढ़ाकर नहीं, वरन् उसे जीवन्त और जाग्रत रखकर, अन्यथा यह तथाकथित

उच्च जीवन स्तर भी एक प्रकार का छलावा ही होगा-छलावा अपने ईमान से और उस भगवान से जिसकी विश्व-वाटिका को समुन्नत बनाने का दायित्व हमारे कंधों पर है।

इस संदर्भ में अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के संधिकाल ओर उससे भी पूर्ववर्ती तीन सौ वर्षों के भारत के इतिहास पर दृष्टिपात करना होगा और देखना होगा कि किस प्रकार इन दिनों ठगी और हत्या का ताँडव नैतिकता की अवमानना-उपेक्षा के कारण रच रहा था। आज तो फिर भी संतोष की बात है कि लूटने के बाद व्यक्ति की जान प्रायः बच जाती है, पर तब ऐसे न था। जो ठगा और लूटा जाता, उसे अपनी जान भी गँवानी पड़ती। इसलिए अक्सर लोग घर से बाहर जाने में कतराते; क्योंकि जिनने घर से बाहर कदम रखा और जिन्हें मील-दो-मील की यात्रा करनी होती, उनका लौट कर आ पाना फिर कभी संभव नहीं होता। वे रास्ते से ही गायब हो जाते। सन् 1887 में लिखित और लंदन से प्रकाशित अपनी रचना ‘सीक्रेट मर्डरर्स’ में कैसल्स ने इस स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है। वे लिखते हैं कि उन दिनों के रास्ते इतने रक्तरंजित और आदमखोर हो गये थे कि एकाकी व्यक्ति तो क्या दल-के-दल और समूह-के-समूह लोगों को भी वे निगल जाते थे। द्वारिका के यात्री यदि पुरी दर्शन के लिए निकलते तो पुरी की जगह उन्हें यमपुरी दर्शन के लिए भेज दिया जाता। व्यापारी तिजारत करने जाते तो अपने माल-असबाब, मुनीम, कारिंदे सहित गायब हो जाते। लखनऊ की तबायफें हैदराबाद के लिए प्रस्थान करतीं तो, फिर उनका कोई पता न चलता। बंगाल के गोसाँइयों का दल संगम स्नान के लिए इलाहाबाद को निकलते, तो मानो स्नान पूर्व ही वे पुण्य लोक पहुँच जाते। भदोही की बहुएँ अपनी ससुराल बनारस के लिए रवाना होतीं, तो कहार समेत अदृश्य हो जातीं। मुर्शिदाबाद, कोचीन या लाहौर के व्यापारी सैंकड़ों की संख्या में इकट्ठे होकर चलते; किन्तु फिर भी किस विवर में समा जाने कि उनका कोई सुराग ही न मिलता। कम्पनी-बहादुर के सिपाही छुट्टी में घर जाते, तो फिर उनकी टोलियाँ दोबारा लौटकर नहीं आतीं।

यह ऐंद्रजालिक लीला सिर्फ उत्तर भारत तक ही सीमित थी, सो बात नहीं। सुदूर दक्षिण-पूर्व से लेकर मध्य भारत और काठियावाड़ तक समान रूप से फैली हुई थी। इन चार सौ वर्षों की ठगी काल में लगभग एक करोड़ लोगों को लूटा और मौत के घाट उतारा गया। जूलियस सीजर के जमाने से लेकर द्वितीय विश्वयुद्ध तक में लोग नहीं मरे, उससे भी अधिक लोग अलाउद्दीन खिलजी और विक्टोरिया काल के इस मध्यवर्ती अन्तराल में मौत के सौदागरों द्वारा मार दिये गये। ठगी और लूट के इस धन्धे की सर्वप्रथम जानकारी संसार को फ्राँस के एक पर्यटक एम॰ थेवेनाट्स ने अपनी कृति ‘ट्रैवल्स’ के माध्यम से दी। अपने ग्रन्थ में युवा पर्यटक ने उन तरीकों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, जिसका कि तत्कालीन ठग उन दिनों प्रयोग करते थे। वे लिखते हैं कि लूटपाट के इस धन्धे में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ भी समान रूप से संलग्न थीं, बल्कि शिकार को फँसाने और साथी ठगों के समक्ष प्रस्तुत करने में उनकी ही बढ़ी-चढ़ी भूमिका होती थी। उनने लिखा है कि ठगी में इस्तेमाल होने वाला उनका मुख्य हथियार पीले रंग का एक 1 मीटर 27 से.मी. लम्बा रुमाल था। इसी का फंदा बनाकर वे राहगीरों की गर्दनों में फँसाते और उनकी हत्या कर देते। भिन्न-भिन्न स्थानों में ये लुटेरे भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते थे, यथा- बावरिया, धतूरिया, मेखफँसा, सतमाबाज, पाँगू, कंजड़, ताँती, पिंडारी और गुरंदे आदि।

अपनी पुस्तक ‘वायेज टु दि ईस्ट इंडिया’ में कर्नल विलक्स ने भी उन दिनों का रोमाँचकारी वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि मुगल साम्राज्य के अवसान काल के उन दिनों में सम्पूर्ण भारत एक प्रकार से तमसाच्छन्न बना हुआ था। राज्यों का पतन होता चला जा रहा था। किसी एक केन्द्रीय सत्ता के अभाव में सम्पूर्ण समाज-व्यवस्था एकदम छिन्न-भिन्न होने लगी थी। तब न कोई शक्तिशाली शासक था, न हुक्मबरार, फलतः सर्वत्र लूट-खसोट का वातावरण बना हुआ था। रास्ते सुनसान पड़ गये थे और ताल-तलैया, कुएँ-बावड़ी पानी की जगह लाशों से भरे पड़े थे।

‘ईस्ट इण्डियन गवर्नमेण्ट गजट’ के 19 सितम्बर, 1807 के अंक में कर्नल स्टुअर्ट ने लिखा था कि वर्तमान अराजकता और अपराधवृत्ति दिशाहीनता और नैतिकता की अवहेलना का ही नतीजा है।

‘रेम्बल्स एण्ड रिकलैक्षंस ऑफ एन इण्डियन ऑफीशियल’ नामक कृति में तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर विलियम स्लीमैन ने लिखा है कि तब यदि कोई व्यक्ति मुझसे यह कहता कि नरसिंहपुर जिले में यहाँ से थोड़े ही फासले पर एक ऐसा स्थान है जहाँ ठगी के शिकार हुए सैकड़ों लापता लोग दफन है, तो मैं उसे निश्चय ही पागल घोषित कर देता; पर आज मैं जानता हूँ कि यह बात दिनमान के पूर्व में निकलने जितना ही सत्य है और इसका एकमात्र कारण मानवी मूल्यों की उपेक्षा थी।

‘तुजुके जहाँगी’ नामक अपने ग्रन्थ में जहाँगी ने और कर्नल स्लीमैन ने अपनी ‘रिपोर्ट आँन दि डिप्रैडेशंस कमिटेड बाइ दि ठग गैंग्स ऑफ अपर एण्ड सेण्ट्रल इण्डिया’ में विस्तार से इन ठगों का वर्णन किया है और बताया है कि किस तरह तत्कालीन समाज उन दिनों मानवी मूल्यों से रहित हो गया था।

डब्ल्यू0 कुक अपनी रचना ‘थिंग्स इंडियन’ में लिखते हैं कि एलोरा की कन्दराएँ भारत में ठगी और ठगों की उपस्थिति का सर्वाधिक पुराना और प्रामाणिक दस्तावेज है। वहाँ के एक भित्ति-चित्र में इस वृत्ति का सुन्दर चित्रण मौजूद है। चित्र में एक व्यक्ति को ध्यानमग्न दिखाया गया है। उसके पीछे एक ठग हाथ में फाँसी का फंदा लिए खड़ा है। पार्श्व में शंकर भगवान की तस्वीर भी चित्रित है, जिनकी भृकुटियाँ तनी हुई हैं और वे अपने भक्त की रक्षार्थ तृतीय नेत्र को खोलने का उपक्रम करते प्रतीत हो रहे हैं।

आज भी जिस कदर आर्थिक अपराध बढ़े हैं और राष्ट्रीय स्तर पर जिस प्रकार दिन-प्रतिदिन वित्तीय अनियमितताओं की घटनाएँ सामने आ रही हैं, उससे यदि महाकाल को विवश होकर कुछ करना पड़े, तो कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। पिछले दिनों तो सिर्फ व्यक्तिगत ठगियाँ होती थीं, आज वह राष्ट्रीय स्तर पर हो रही हैं। नैतिकता की दृष्टि से यह अधिक गंभीर और संगीन मामला है। यदि इस पर काबू नहीं पाया गया तो नैतिकी का यह पतन हमें कहीं का न छोड़ेगा।


सारा मनुष्य समुदाय एक परिवार की तरह है (Kahani)

पत्ता पीला पड़ा और झड़कर नीचे गिर पड़ा। देखने वालों ने उसे पत्ते का दोष और दुर्भाग्य बताया। पर जानने वालों ने जाना कि इस पतन को पूरे वृक्ष का परोक्ष समर्थन प्राप्त था। यदि वृक्ष के रसवाही तन्तु समर्थ रहे होते, तो पत्ते के जोड़ ढीले न पड़ते और वह असमय इस प्रकार अपने परिवार से विमुख होकर धूल न चाट रहा होता। पर पूरे पेड़ में घुसी विकृति को दोष कौन दे, पत्ते को ही कोस देना पर्याप्त मान लिया गया- यही जग की रीति है। पारिवारिकता में किसी के उत्थान-पतन के लिए सारा तंत्र श्रेय अथवा दोष का भागीदार होता है।

किसी स्थान पर विशाल भवन का निर्माण हो रहा था। निर्माण-स्थल के समीप ही लगा हुआ था ईंटों का एक ढेर। ईंटों के ढेर में जमी ईंटों ने कहा- गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का निर्माण हमारे अस्तित्व पर ही आधारित है। भवन जब बनकर तैयार हो जाएगा, निस्सन्देह उसके निर्माण का श्रेय मुझे ही मिलेगा।

मिट्टी-गारे ने ईंटों की यह गर्व भरी बातें सुनीं, तो रहा न गया। वह बोली-तुम झूठ बोलती हो। क्या तुम नहीं जानती कि एक सूत्र में पिरोकर, ईंट से ईंट जोड़कर- इस भवन को सुदृढ़ बनाने का श्रेय तो हमें ही है। मेरे अभाव में तो तुम्हारे ये ढेर एक ठोकर मारकर ही गिरा दिये जा सकते हैं।

किवाड़ और खिड़कियों ने इसका प्रतिवाद किया-यह तो सभी जानते हैं कि तुम ईंटों को जोड़-जोड़ कर दीवारें खड़ी करती हो, पर यदि उस मकान में खिड़की-दरवाजे न रहेंगे, तो पूछेगा कौन? उसमें रहने के लिए जाएगा कौन? शिल्पी जो इन सब की बातों को चुपचाप सुन रहा था, अब बोला-आप लोगों में भले ही कितना भी सहयोग क्यों न हो, परन्तु जब तक मेरा हाथ न लगे, सब अपने-अपने स्थान पर ही पड़े रहेंगे।

अब भवन की बारी थी- भवन ने जो कुछ कहा- वह एक स्वीकार्य सत्य था। भवन बोला- सबका महत्व है, परन्तु उससे भी महत्वपूर्ण है- सहअस्तित्व। सहअस्तित्व के अभाव में किसी का व्यक्तिगत कोई महत्व नहीं है, इसलिए आपको अपना झूठा अभिमान छोड़कर सहयोग का महत्व समझना चाहिए।

इस तथ्य को न समझने वाले यह भूलते हैं कि सारा मनुष्य समुदाय एक परिवार की तरह है, उसमें सबका समान अस्तित्व और महत्व है, परस्पर कल्याण का ध्यान रखने में ही भलाई है।


सबसे बड़ा दरिद्र

सोनपुर एक छोटा गाँव था। यह सिंहगढ़ राज्य की सीमा के पास ही था। सोनपुर में एक महात्मा कहीं से विचरते हुए आ गए। उन्होंने गाँव की प्राकृतिक सुरम्यता, मनोरम शान्ति को देखकर विचार किया कि इस गाँव में कुछ दिन ठहरा जाय। महात्माजी के साथ दो शिष्य भी थे, ज्ञान और आनन्द। एक दिन महात्माजी अपने दोनों शिष्यों के साथ भिक्षा माँगने के लिए जा रहे थे। तभी सड़क पर पड़ा एक सिक्का महात्माजी को दिखा। उन्होंने वह चमकता सिक्का उठा लिया और झोली में सहेजकर रख लिया।

इसे देखकर ज्ञान चकित हुआ। वह सोच रहा था-निर्लिप्त वीतराग सन्त को सिक्के से क्या काम? गुरुजी को पहले तो इसे उठाना ही नहीं था, फिर उठा भी लिया तो झोली में सहेजकर किसलिए रखा। ज्ञान की ही भाँति आनन्द का मन भी सिक्के की चकाचौंध में सक्रिय हो गया था। वह कल्पना कर रहा था- काश ! यह सिक्का मुझे दिखता। मैं इसे उठाता तो आज बाजार से मिठाई लाता।

महात्माजी भाँप गए कि इस सिक्के को लेकर उनके शिष्य उलझन में पड़ गए हैं। हँसते हुए वे बोले- “बच्चों! जानते हो यह सिक्का मैंने क्यों उठाया। यह साधारण सिक्का नहीं है। ईश्वर ने मुझे इसलिए दिया है कि इसे मैं किसी सुपात्र को दूँ। सुपात्र मिलते ही मैं इसे उसे सौंप दूँगा। यह उसी की धरोहर है। कहीं लुप्त न हो जाय, इसलिए संभालकर तो रखना ही पड़ेगा।” शिष्य चुप थे।

ज्ञान ने अनुमान किया- सुपात्र तो कोई निर्धन ही हो सकता है। कोई निर्धन न मिला, तब संभव है कि गुरुजी इसे मुझे ही दे दें। यदि ऐसा हुआ तो मैं नई पोथी लाऊँगा। आनन्द सोच रहा था सुपात्र वह जो सिक्के का सही उपयोग करे। यदि गुरुजी ने मुझसे पूछा तो मैं कहूँगा- इस सिक्के की सुन्दर माला लाकर भगवान की मूर्ति को अर्पण की जाय।

भिक्षाटन के बाद महात्माजी गाँव के बाहर डेरे पर आ गए। भोजन-भजन हुआ। दुःखी गरीब महात्माजी के दर्शन के लिए आए। सबने अपनी-अपनी करुण कहानी कही। महात्माजी ने हरेक को नीति पालन, सदाचार और ईश्वर भक्ति की शिक्षा दी। उन्होंने बताया प्रभु दयामय, भक्तवत्सल हैं। उनसे प्रार्थना करनी चाहिए। दयामय प्रभु भक्त की आन्तरिक पुकार सुने बिना नहीं रहते। द्रौपदी, गज की कहानियाँ उन्होंने इतने विश्वास और भावुक मन से सुनाये, कि सुनने वाले भी विभोर हुए बिना न रहे। दोनों शिष्य पास ही थे। वे सोच रहे थे। गुरुजी ने सिक्का किसी को नहीं दिया। इतने गरीब, इतने कष्ट पीड़ितों के बीच कोई सुपात्र-सत्पात्र नहीं। तब कौन है वह सुपात्र जिसे वे वह सिक्का देंगे। दोनों शिष्यों की जिज्ञासा तीव्र हो उठी।

दूसरा दिन भी गुजर गया। एक से एक दरिद्र, दुःखी लोग आए। किन्तु महात्माजी ने किसी को सिक्का नहीं सौंपा। इसी भाँति कई दिन गुजरने लगे। महात्माजी सुपात्र खोजते रहे। प्रतिदिन शिष्य भी अपने मन में अनुमान करते रहते, किन्तु सिक्का जहाँ का तहाँ था।

तभी महात्माजी को खबर मिली कि सिंहगढ़ के महाराज अपनी विशाल सेना के साथ इधर से गुजर रहे हैं। वे पड़ोसी राज्य पर हमला करने आ रहे हैं। राज्य की सीमाओं का विस्तार करना ही उनका उद्देश्य है। सोनपुर सीमान्त गाँव था। घोड़ों की टापों से उड़ती धूल, हाथियों की चिंघाड़ वातावरण में एक अनजानी दहशत भर रही थी। सेना के बढ़ते कदमों के साथ विनाश-लीला के वे दृश्य भी साकार होने लगे, जिसे रचने के लिए सेना आगे बढ़ रही थी और उसके पहले कदम सोनपुर में पड़ने थे।

महात्माजी ने अपने शिष्यों को बुलाया-”वत्स सोनपुर छोड़ने की घड़ी आ गयी। चलो तैयारी करो-चलते हैं।” ज्ञान ने हामी भरी, आनन्द भी सहमत। ज्ञान का विचारी था, युद्ध से जितना दूर रहा जाय, उचित है। आनन्द तो बचपन से ही लड़ाई-भिड़ाई से भयभीत रहता था। मगर दोनों शिष्य सोच रहे थे- आज तक गुरुजी एक गाँव से प्राप्त धन-धान्य कभी दूसरे गाँव लेकर नहीं गए। सिक्का अब तो किसी न किसी को अवश्य देंगे। कौन होगा वह सुपात्र?

शिष्यों सहित महात्माजी चल पड़े। तभी सिंहगढ़ के राजा की सवारी आ गयी। मंत्री, सलाहकारों ने राज को सूचित किया कि ये महात्माजी जा रहे हैं। राजा जानता था कि महात्मा बड़े ज्ञानी, परोपकारी सन्त हैं। वह हाथी से नीचे उतरते हुए बोला-”सिंहगढ़ के राजा सिद्ध महात्मा को प्रणाम करते हैं। सम्पूर्ण राज्य में आपकी चर्चा है। दर्शन का सौभाग्य आज मिला। आप आशीर्वाद दें।”

शान्त भाव से महात्माजी ने अपनी झोली में हाथ डाला। राजा ने सोचा कोई बहुमूल्य सौगात मिल रही है। महात्माजी ने राजा की हथेली पर सिक्का रखते हुए कहा-”हे सिंहगढ़ के अधीश्वर ! तुम्हें मैं यह सिक्का दे रहा हूँ।”

राजा आश्चर्य से हतप्रभ, मंत्री, सहयोगी, सेनाधिकारी सभी के विस्मय का पार न था। दोनों शिष्य तो अचरज से अवाक् थे-सिक्के का सुपात्र राजा कैसे?

सभी को ठगा-सा खड़ा देखकर महात्माजी कहने लगे- “देखो राजा! तुम्हारा राज्य धन-धान्य से सम्पन्न है। तुम्हारे पास अथाह कोष और विपुल सेना है। तुम स्वस्थ, सुन्दर और बलवान हो। तुम्हारी रानी सुशील और गुणवान है। मंत्री, सेनापति, अधिकारी भी योग्य हैं। प्रजा में अमन-चैन भी है। इस पर भी मेरे विचार से तुम सबसे बड़े दरिद्र हो। इसे तुम बहुमूल्य सिक्का समझो। ईश्वर ने यह मुझे विशेष रूप से दिया है। ताकि मैं सुपात्र को दूँ। राजा तुम सबसे बड़े सुपात्र हो।”

राजा महात्मा के सम्मुख नतमस्तक थे। मंत्री, सेनापति, सलाहकार, विद्वान सभी महात्माजी की बात सुनकर सोच में पड़ गए। ज्ञान एवं आनन्द दोनों सोच रहे थे- आखिरकार गुरुजी ने सुपात्र की तलाश कर ही ली।

वातावरण में व्याप्त मौन को तोड़ते हुए महात्मा विश्वास भरे शब्दों में बोले-”हे राजा! मुझे अपार खुशी है। तुम समझ गए होंगे कि मैंने तुम्हें सबसे बड़ा दरिद्र क्यों कहा? इतना सब होते हुए भी तुम्हारे लालच का अन्त नहीं। अपनी इस घोर लिप्सा की पूर्ति करने के लिए तुम क्या कुछ करने के लिए नहीं तैयार हो। न जाने कितने लोग मारे जाएँगे, खेत उजड़ेंगे, लहू बहेगा, हाहाकार मचेगा। तनिक विचार करो नरेश तुमसे बड़ा लालची और दरिद्र और कौन होगा?”

राजा सन्तवाणी का गूढ़ अर्थ समझ गए। उन्होंने सेनापति को संकेत दिया। सेना के कदम वापस मुड़ चले और राजा हाथी पर नहीं महात्माजी के पीछे पैदल-पैदल चल पड़ा था।


गंध का ज्ञान-विज्ञान

मनःस्थिति और मनोविज्ञान बनते-बिगड़ते रहते हैं, कभी एक कारण से, तो कभी किसी दूसरे कारण से। इनमें परिस्थितियों से लेकर परिवेश तक के तत्त्व समान रूप से जिम्मेदार हैं। इस शृंखला में ‘गंध’ की एक और कड़ी जुड़नी चाहिए, जो स्थायी न सही, अस्थायी रूप से तो उन्हें प्रभावित करती ही है।

मनुष्य प्रकृति प्रेमी है, इस कारण वह प्राकृतिक सुगंधों की ओर आकर्षित होता है। इसके लिए वह वन-उपवनों की सैर करता और उसका आनन्द लेता है। लीवर पुल यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ता आस्नि हार्डी का इस संबंध में मत है कि यदि प्रकृति की गोद में जाकर खुशबुओं का लाभ नहीं लिया जा सके तो कोई बात नहीं, कृत्रिम सुगंधों से भी इस कमी की कुछ हद तक पूर्ति की जा सकती है; किन्तु वे सावधान करते हुए कहते हैं कि यह सुवास एकदम हल्की एवं भीनी होनी चाहिए, अन्यथा तेज गंधों के बार-बार के प्रयोग से लाभ कम, क्षति अधिक होगी और घ्राणेन्द्रिय गंध ग्रहण की अपनी क्षमता को धीरे-धीरे खोने लगेगी।

ऐसा देखा भी गया है कि जिस व्यक्ति को प्रतिदिन तीव्र गंधों से वास्ता पड़ता है, अथवा प्रयोगशाला में जिन्हें तीक्ष्ण गंधों के बीच काम करना पड़ता है, उनकी घ्राण शक्ति शनैः-शनैः कमजोर हो जाती है। इस स्थिति में यदि आरंभ में ही सचेत नहीं हुआ गया तो फिर एक ऐसी अवस्था आती है, जिसमें व्यक्ति अत्यन्त तीव्र गन्ध के सिवाय हल्के स्तर की गंधों का पता नहीं लगा पाते। यह अत्यन्त घातक स्थिति है विशेषकर तब जब किसी ................. की सूचना इसके द्वारा मिलने का प्रावधान हो। उदाहरण के लिए कुकिंग गैस को लिया जा सकता है। इसमें गैस रिसाव को अधिक स्पष्ट करने के लिए ..................नामक रसायन की विशिष्ट गंध मिलायी जाती है, ताकि ऐसी दशा में ..................... हो सुरक्षा का उपाय कर सके। य..... यदि नासिका की सूँघने की सामर्थ्य बिल्कुल क्षीण हो, तो यह जीवन के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकती है। इसलिए तीक्ष्ण कृत्रिम गंधों के बार-बार के संपर्क में आने से विशेषज्ञ सावधान करते हैं और कहते हैं कि ऐसा करना कोमल घ्राण अवयव के लिए अहितकर है।

यों तो खुशबू के सर्वोत्तम और निरापद स्रोत पुष्प और पुष्पोद्यान हैं; किन्तु आज इस तरह के उद्यान न तो हर जगह पाये जाते हैं, न हर किसी के लिए यह संभव है कि वह अपने व्यस्ततम समय में से कुछ इसके लिए निकाल सके। ऐसी स्थिति में उन कृत्रिम विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो सर्वसुलभ और सहज सुलभ हों। इनमें इत्र से लेकर अगरबत्तियों तक को सम्मिलित किया जा सकता है। यदि यह सुगंधि-स्रोत अच्छी और हल्की खुशबू वाले हों, तो बहुत सीमा तक पुष्पवाटिका के उद्देश्य को पूरा कर देते हैं सुवासित चन्दन की माला धारण करके भी यह आवश्यकता पूरी की जा सकती है। इसके अविरिक्त पर्वतों के निकटवर्ती वातावरण से भी कुछ परिमाण में इस कमी की पूर्ति हो जाती है। यह सच है कि वहाँ सिर्फ वृक्ष-वनस्पतियाँ ही पाये जाते हैं; पर उनमें एक विशिष्ट प्रकार का सौरभ होता है- इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसका लाभ वहाँ रहकर आसानी से लिया जा सकता है । हिमालय जैसे विशाल पर्वत के साथ एक अन्य विशेषता यह जुड़ी हुई है कि वहाँ ऐसी अनेक फूलों की घाटियाँ हैं, जो सौंदर्य की दृष्टि से ही नहीं, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी हैं। जुलाई से सितम्बर के बीच यह घाटियाँ अपना सम्पूर्ण सौंदर्य बिखेरना आरंभ करती हैं और अपनी रंग-बिरंगी छटा एवं सुरभि के कारण पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। कई बार यह आकर्षण खतरनाक सिद्ध होता है, कारण कि वन्य कुसुमों की मिश्रित सुगंधि में ऐसी मादकता जाती है, कि पर्यटक वहाँ पहुँचकर एक विशिष्ट चेतनात्मक भूमिका में स्वयं को अनुभव करने लगते हैं। अनेक बार यह मादकता इतनी तीव्र होती है कि उसके प्रभाव में व्यक्ति संज्ञाशून्य हो जाता है। इस समय उसके साथ वहाँ कोई और उपस्थित न हो, तो फिर उसके बचने की संभावना नगण्य जितनी शेष रह जाती है। ऐसी एक घटना वर्षों पूर्व तब घटी थी, जब इंग्लैण्ड की एक प्रकृति प्रेमी एवं वनस्पतिशास्त्री महिला जेनी फ्रिडमैन ने हिमालय के उस क्षेत्र की यात्रा की थी; पर फूलों के मादक असर के कारण वह फिर लौट न सकीं और वहीं उनकी मृत्यु हो गई। उक्त घटना के करीब तीन वर्ष पश्चात् फूलों की उस घाटी में एक डायरी पड़ी मिली, जिसमें उनका नाम और बहुत-सी वनस्पतियों का विवरण लिखा मिला। इसी आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि उक्त उपवन की प्रकृति से अपरिचित होने के कारण ही कदाचित् वह इस क्षेत्र में प्रविष्ट हुई और जान से हाथ धो बैठीं।

सुदूर हिमालय के बर्फीले क्षेत्र में ब्रह्मकमल नामक ऐसे पुष्प पाये जाते हैं, जिन्हें सूँघते ही समाधि लगने की बात कही जाती है। इसे हिमालय जैसे दिव्य क्षेत्र की विशेषता ही कहनी चाहिए कि वहाँ चेतना के सामान्य स्तर को उच्चस्तरीय भूमिकाओं में ले जाने वाले प्रसून भी विद्यमान हैं और ऐसे स्थान भी, जिसकी मिट्टी को सूँघने मात्र से समाधि-सुख का आनंद-लाभ हो जाय। सर्वसामान्य के लिए यह भले ही आश्चर्य का विषय हो पर विशेषज्ञ इसे सुगंधि का ही प्रभाव बताते हैं

इसके विपरीत दुर्गन्धों की दुनिया बड़ी ही अरुचिकर है। इसके संपर्क में आते ही मनोदशा बिगड़ने लगती है। कई अवसरों पर तो यह प्रभाव इतना तीव्र होता है कि सिरदर्द, उल्टी और चक्कर आने लगते हैं। सीवर लाइन का मेनहोल यदि खुला हुआ हो, तो उसके समीप से गुजरते ही हाथ अनायास नासिका छिद्रों को बन्द काने हेतु उठ जाता; पर मैला ढोने और टट्टी साफ करने वाले इससे सर्वथा अप्रभावित रहते हैं एवं एक सामान्य कार्य की तरह अपनी ड्यूटी पूरी करते हैं। अन्य लोगों की तरह इसमें न तो उन्हें कोई अनख महसूस होता है, न आपत्ति दिखाई पड़ती है। इससे ऐसा जान पड़ता है कि खुशबू और बदबू के संबंध में गंधों का स्वयं का प्रभाव कम और व्यक्ति का निजी मनोवैज्ञानिक असर ज्यादा प्रभावी होता है। वह अपने ही मनोविज्ञान के कारण किसी गंध को बुरा और किसी को अच्छा मान बैठता है। यदि यह बात नहीं होती, तो सुगंध और दुर्गन्ध के बारे में भिन्न-भिन्न लोगों के विचार पृथक-पृथक नहीं होते। सुगंध को ही लें तो ज्ञात होगा कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए सर्वोत्तम की श्रेणी भिन्न-भिन्न है, जो खुशबू किसी एक के लिए सर्वोत्कृष्ट स्तर की है, वही दूसरे की दृष्टि में निम्नस्तरीय साबित होती, जबकि किसी अन्य के हिसाब से जिसे सामान्य कोटि में रखा गया है, उसी को कई प्रथम स्थान देते हैं। दुर्गन्ध के संदर्भ में भी ऐसा ही मतान्तर देखा जाता है। कोई किसी गंध को बदबू वाले विभाजन में रखते हैं, तो कोई किसी अन्य को। यह भी देखा गया है कि जो किसी के लिए एकदम असहनीय है, वह कई अन्य के लिए उतनी खराब नहीं। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि सुवास और दुर्गन्ध के संबंध में यदि वैयक्तिक मनोविज्ञान को बदला जा सके, तो शरीर-मन पर उसके प्रभावों को भी परिवर्तित करने में सफलता हस्तगत की जा सकती है।

सुमनों में सुरभि है और उससे लोग आकर्षित होते हैं, तो वह अपनी दुर्गन्धि और विकर्षण के लिए भी कुख्यात है। ऐसा ही एक विशालकाय कुसुम अभी इसी जुलाई के अन्तिम सप्ताह में इंग्लैण्ड में चर्चा का विषय था। लगभग डेढ़ मीटर ऊँचा टइटन एरम नामक यह पुष्प लंदन के कीव उद्यान में पिछले 33 वर्षों में पहली बार खिला है। इससे सड़ी लाश, सड़े अण्डे, सड़ी मछली और जलती हुई शक्कर की मिली-जुली तीव्र बदबू आती थी, जिसे देखने के लिए सैंकड़ों की भीड़ उपवन में उमड़ पड़ी सुमात्रात्र, इंडोनेशिया की अपनी मूल भूमि और स्वाभाविक वातावरण में यह हर दूसरे-तीसरे वर्ष खिलता है एवं ‘काँर्प्स फ्लावर’ अर्थात् ‘सड़े मुर्दे की गंध वाला फूल’ के नाम से प्रसिद्ध है। संसार के विशालतम फूलों में यह गिना जाता है और एक सप्ताह के संक्षिप्त जीवनकाल में समाप्त हो जाता है।

इस प्रकार सुगन्धि और दुर्गन्धि के अपने-अपने प्रभाव हैं। सुवास जहाँ मन को प्रफुल्लित करती है, वहीं बदबू घोर जुगुप्सा पैदा करती है। एक मन को उच्च आयामों की ओर ले जाती है, तो दूसरी उसे निम्नगामी बनाती है। बगीचे की सुषमा और सुरभि क्लान्त और दुखी मन को शान्ति प्रदान करती है, जबकि गन्दगी सड़न, अरुचि तथा उबकाई उत्पन्न करती है। आषाढ़ के दिनों की आरंभिक वर्षा से उठने वाली मिट्टी की सोंधी महक किस प्रकार हृदय को गुदगुदा जाती है, इसे सभी जानते हैं ; किन्तु नाली में कीचड़ की सड़ान्ध कितनी बेचैनी पैदा करती है, यह भी सर्वविदित है। इत्र से सुवासित वस्त्र और शरीर सामने वाले को आकर्षित करने में सफल होते हैं, लेकिन वही काया जब मरने के उपरान्त गलती है, तो अपनी दुर्गन्ध के कारण मस्तिष्क को झकझोर कर रख देती है। वन्य प्रान्तों में बहने वाली शीतल-सुगंधित हवा कितनी स्वास्थ्य-वर्द्धक होती है, इसे वनवासियों के स्वास्थ्य-परीक्षण द्वारा जाना जा सकता है, परन्तु शहर का जन-संकुल वातावरण कैसा विक्षोभकारी होता है, यह भी कोई कम उल्लेखनीय नहीं है।

सुगन्ध और दुर्गन्ध मनोभावों को किस हद तक प्रभावित करती हैं, इसे खाद्य पदार्थों के संपर्क में रहकर भी जाना, समझा जा सकता है। भोजन यदि स्वादिष्ट और खुशबूदार हो, तो मन उसे ग्रहण करने के लिए मचलने लगता है। हलवाई की दुकान से उठने वाली मिठाइयों की मीठी सुवास ध्यान को बरबस आकर्षित कर लेती है। फलों की खुशबू हो या पकवानों का सुस्वादुपन-सब अपने-अपने ढंग से मन को लुभाते हैं, पर मानस तब गड़बड़ाता प्रतीत होता है, जब सामने रखे व्यंजन से अरुचिकर बू आ रही हो, वह जला हो, वासी हो अथवा ऐसी वस्तुओं से निर्मित हो, जिनकी स्वाभाविक गंध ही अनाकर्षक हो, ऐसी दशा में कड़ी भूख होने पर भी भोजन रुचता नहीं और उसे बीच में ही छोड़कर आधे-अधूरे पेट उठना पड़ता है। ऐसा बिगड़े मनोवान के कारण होता है।

इस प्रकार खराब गंधों से जहाँ कई प्रकार की शारीरिक, मानसिक तकलीफें शुरू हो जाती हैं, वहीं सुगन्धि के अनेक फायदे भी हैं। उच्चस्तरीय साधनाओं के दौरान जब शरीर में जलन एवं दूसरे प्रकार की शिकायतें बढ़ती हैं, तो सुयोग्य मार्गदर्शक उनके शमन के लिए सुगंधित फूलों की माला पहनने, सुवासित चन्दन की लेप लगाने एवं खुशबूदार अगरबत्ती द्वारा कमरे के वातावरण को सुरभित बनाये रखने की सलाह देते हैं। इससे काय कष्ट में काफी आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त अन्य कितनी ही प्रकार की शिकायतें इस प्रक्रिया से दूर की जाती हैं। इसकी इसी विशिष्टता के कारण अब इस चिकित्सा उपचार के रूप में अपना लिया गया है। उपचार विज्ञान की यह नवीन प्रणाली-’एरोमा थैरेपी’ के नाम से प्रसिद्ध है।

सुगंधि क्या है और दुर्गन्धि किसे कहते है? इस विषय में विवाद की कोई गुंजाइश नहीं। मन पर उनकी भली-बुरी प्रतिक्रियाओं के आधार पर इस निर्धारण में कठिनाई नहीं, कि किसे किस श्रेणी में रखा जाय और किससे बचा एवं किससे लाभ उठाया जाय?


समझदार पुत्र (Kahani)

एक किसान के चार बेटे थे। उनकी बुद्धिमत्ता जाँचने के लिए बेटों को बुलाकर किसान ने एक-एक मुट्ठी धान दिये और कहा इनका जो मर्जी हो सो करो।

एक ने उसे छोटी वस्तु समझा और चिड़ियों को फेंक दिया। दूसरा उन्हें उबालकर खा गया। तीसरे ने सँभालकर डिब्बे में रख दिया, ताकि कभी पिताजी माँगेंगे तो उन्हें दिखा सकूँ। चौथे न उन्हें खेत में बो दिया और टोकरा भर धान पिता के लिए लाकर रख दिया।

पिता ने बोने वाले को अधिक समझदार पाया और बड़ी जिम्मेदारियों के काम उसी के सुपुर्द किये। कहा-परिवार में ऐसे ही गुण विकसित करने पड़ते हैं। ऐसी जिम्मेदारी निभा सकने वालों को ही परिवार का भार सौंपा जा सकता है। भगवान भी ऐसा ही करता है।


सामंजस्य से भरा व्यक्तित्व ही अर्द्धनारी-नटेश्वर

अर्द्धनारी-नटेश्वर की भारतीय कल्पना जिस समय की गई होगी, उस वक्त दार्शनिकों के मस्तिष्क में शायद यह विचार उठा हो कि एकदम क्रूर और कठोर एवं बिल्कुल शान्त और सरल प्रकृति के सर्वथा दो भिन्न व्यक्तित्वों को संतुलित कैसे किया जाय? कारण कि दोनों ही व्यक्तित्व की दो अतियाँ हैं। नृशंसता सदा समाज में अस्थिरता और अराजकता पैदा करती है, जबकि नमनीयता अपनी मृदुलता के कारण सर्वदा प्रवंचित होती है। एक अपनी कठोरता के कारण दूसरों को लूटता है, तो दूसरा अपनी ऋजुता के कारण लुट जाता है। यह दोनों ही स्थितियाँ ठीक नहीं। व्यक्तित्व में अन्याय का सामना करने जितना पौरुष भी होना चाहिए और कठोरता को पिघलाने वाली करुणा भी। इन दोनों गुणों के समन्वित स्वरूप को ही संतुलित व्यक्तित्व की संज्ञा दी जा सकती है। सामाजिक एवं वैयक्तिक विकास इसी स्थिति में आगे जारी रह सकती है। सम्भवतः इसी कारण मनीषियों ने यह विचित्र कल्पना की होगी और इस प्रकार की देव-छवियों को चित्रित कर समाज को इसके पीछे का तत्वज्ञान समझाना चाहा होगा।

पर विज्ञानवेत्ता भारतीय दर्शन की इस कल्पना के पीछे छिपे मर्म को न समझकर ऐसे किसी तथ्य की तलाश करते रहे, जो इसके अनुरूप हो। यह बात और है कि इस खोज-प्रक्रिया में कई ऐसी घटनाएँ प्रकाश में आयीं , जो अर्द्धनारी-नटेश्वर की कल्पना को साकार करती थीं उदाहरण के लिए इंग्लैण्ड के बाँबी क्लार्क को लिया जा सकता है। क्लार्क की शरीर-संरचना ऐसी थी, जिसे न तो पूरी तरह पुरुष ही कहा जा सकता था, न स्त्री ही। उसके वक्षस्थल में एक ओर स्त्रियों जैसा विकसित स्तन था, तो दूसरी ओर पुरुषों जैसी सपाट और चौड़ी छाती। इसके अतिरिक्त पृथक्-पृथक् स्त्री और पुरुष जननाँग भी थे। शरीर की इस विचित्रता के कारण उसके दिमाग में एक योजना आयी वह इसके प्रदर्शन द्वारा पैसा कमाने की सोचने लगा। इसके लंदन के कई स्थानों पर उसने अपनी प्रदर्शनी लगायी। प्रदर्शनी में इस बात की पूरी छूट थी कि यदि किसी को इस पर किसी प्रकार का संदेह हो तो वह इसका निरीक्षण-परीक्षण कर अपनी शंका-निवारण कर सकता है, पर इसके लिए उसे अलग से एक टिकट खरीदना पड़ता। टिकट ले लेने के उपरान्त व्यक्ति को इस बात का अधिकार मिल जाता कि वह उसके शरीर का हर प्रकार से अवलोकन कर सके और इस तथ्य का पता लगा सके कि इसमें कोई धोखा तो नहीं है। मूर्धन्य चिकित्साशास्त्री फ्रेडरिक ड्रिमर ने अपनी पुस्तक ‘वेरी स्पेशल पीपुल‘ में इस प्रसंग का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है और लिखा है कि विज्ञान भले ही इसे शरीर विकास संबंधी विकृति मानता हो, पर वास्तव में यह मानवी हो, पर वास्तव में यह मानवी-सत्ता में निहित नर-नारी के दोनों पक्षों की उपस्थिति का ही प्रमाण है। इसे संरचना संबंधी त्रुटि कहना उतना उचित नहीं होगा, जितना कि सूक्ष्म की स्थूल अभिव्यक्ति ।

अब तो विज्ञान भी इसे स्वीकारता है कि हर व्यक्ति में रस-स्रावों की दो भिन्न प्रकृति होती हैं। एक अपने अन्दर पुरुष प्रधान तत्वों को सँजोये रहता है, तो दूसरा नारी प्रधान । विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि वास्तव में व्यक्तित्व निर्माण में इन्हीं दो की मुख्य भूमिका होती है। शरीर में जब इन रसों का संतुलन गड़बड़ाता है, तो व्यक्तित्व संबंधी दोष पैदा होने लगते हैं। यदि कभी पुरुष शरीर में नारी हारमोन बढ़ने लगें, तो उसकी आकृति-प्रकृति दोनों में ही नारी-लक्षण उभरने लगते हैं। उदाहरण के लिए, आवाज का स्त्रियों जैसी पतली हो जाना, दाढ़ी-मूँछों का चेहरे पर सर्वथा अभाव होना, वक्षस्थल का बाल रहित होना आदि। शरीरशास्त्र की भाषा में कहे तो इसे ‘सेकेण्ड्री सेक्सुअल कैरेक्टर’ (अप्रधान यौन लक्षण) का अभाव होना कह सकते हैं। यह तो प्रकट लक्षण हुए। इसके अतिरिक्त अप्रकट स्तर के कितने ही ऐसे उभार उनमें दिखाई पड़ने लगते हैं, जो पुरुषोचित कम, स्त्रियोचित अधिक जान पड़ते हैं, जैसे शरीर-गठन और डील-डौल पहलवानों जैसा होने पर भी साहस की दृष्टि से वे कायरों से भी गये-बीते प्रतीत होते हैं। कई बार उनमें प्रखरता का इतना अभाव दिखाई पड़ता है कि जो क्षति स्वल्प साहस के प्रदर्शन से टाली जा सकती थीं, उसे भी वे अपनी कमजोर प्रकृति के कारण सहज ही स्वीकार लेते हैं। यह वास्तव में और कुछ नहीं, उस रस-स्राव का ही खेल है, जो व्यक्ति में विपरीत स्वभाव को इतना और इस कदर उभार देता है कि शरीर के साथ उसकी किसी भी प्रकार संगति नहीं बैठती। इसके विपरीत नारी देह में जब पुरुष प्रकृति का आविर्भाव होता है, तो काया की कोमलता समाप्त होने लगती है और इसका पुरुष जन्य शरीर-गठन लेने लगता है। यदा-कदा उनके दाढ़ी-मूंछें भी निकल आती हैं, पर यह उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना कि उनका आन्तरिक परिवर्तन । इस परिवर्तन से उनके आचरण में पुरुषत्व के लक्षण उभरने लगते हैं और उनकी साहसिकता बढ़ी-चढ़ी दिखाई पड़ने लगती है, मनोबल में असाधारण वृद्धि हो जाती है और जिस कार्य को करने में सामान्य महिलाएँ सहमती तथा डरती हैं, उसे वे सरलतापूर्वक सम्पन्न कर लेती हैं। ऐसी नारियों को पुरुष प्रधान नारी कहना अधिक उपयुक्त होगा। इन्दिरा गाँधी, गोल्डामायर, चन्द्रिका कुमार तुँग, बेनजीर भुट्टो, शेख हसीना वाजिद, एक्वीनो एवं पिछले समय की वीराँगनाएँ इसी श्रेणी में आती हैं। जब यह उभार अल्प स्तर का होता है, तो परिवर्तन सिर्फ बाह्य स्तर के रहन-सहन और रुझान तक सीमित होकर रह जाते हैं। स्त्रियों में पुरुष पहनावे के प्रति आकर्षण होना, घर की तुलना में बाहर के कार्यों में अभिरुचि लेना, बढ़-चढ़कर बातें करना, डींग हाँकना , नर जैसी चाल-ढाल होना आदि इस बात के द्योतक हैं। पुरुषों में से कुछ इसका उलटा दिखाई पड़ता है, अर्थात् नारियों जैसा आचार-व्यवहार, रहन-सहन, दब्बूपन, लज्जा-शीलता, मितभाषिता, एकान्तप्रियता आदि, परन्तु नारी सुलभ संवेदना, करुणा, ममता, उदारता का स्पष्ट अभाव इस बात का संकेत है कि पुरुष के भीतर की पूर्ण नारी प्रकट नहीं हो सकी।

अपनी रचना ‘वण्डर वुमन एण्ड सुपरमैन’ में मूर्धन्य लेखक जॉन हैरिस लिखते हैं कि ईसा, सुकरात, बुद्ध महावीर आदि स्त्रैण प्रकृति के थे। उनमें एक सम्पूर्ण स्त्री तो प्रकट हुई भी, पर एक पूर्ण पुरुष का अभाव था। उनने दया, ममता, करुणा, अहिंसा का पाठ तो संसार को पढ़ाया , पर उस गुण से समाज को एक प्रकार से वंचित रखा जिसे शौर्य और साहस कहते हैं। यह वह गुण है जिनके अभाव में व्यक्ति को एकाँगी और एक-पक्षीय ही कहना पड़ेगा और पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। वे लिखते हैं कि नारी को सम्पूर्ण अधिकार पूरे विश्व में आज भी सिर्फ इसलिए नहीं मिल पायें हैं कि वह कोमलाँगी है एवं नहीं है। यदि उसका पुरुष पक्ष भी समान रूप से विकसित होता, तो आज उसकी स्थिति कुछ और होती।

पुरुषों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। उनमें यदि पुरुषोचित गुणों का विकास नहीं हुआ और उनके भीतर की केवल नारी ही प्रकट होकर रह गई, तो ऐसा व्यक्तित्व शोषण का प्रतिकार प्रचण्ड पौरुष से ही संभव है, उसे पैदा किये बिना उससे बच पाना प्रायः असंभव हैं। ईसा को सूली पर चढ़ा दिया गया। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा, भक्त जयदेव के हाथ-पैर काट लिए गये। इन सभी घटनाओं में उस पौरुष का अभाव ही झलकता दिखाई पड़ता है, जिसकी उपस्थिति में प्रतिरोध और पराक्रम बन पड़ते हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि अकेली आक्रामकता उतनी ही खराब है, जितनी कि अकेली मृदुलता, क्योंकि अकेली आक्रामकता निरंकुश बन बैठती है जबकि एकाकी कोमलता असहाय महसूस करती है। चोरों, डकैतों, लुटेरों, आतंकवादियों में नर की प्रखरता तो पूर्ण रूप से प्रकट और प्रत्यक्ष हो जाती है, पर संवेदना के अभाव में वह उपद्रव रचती रहती है। इन दिनों यही हुआ है। सर्वसाधारण की साहसिकता में असाधारण वृद्धि हुई है, पर इसकी सहचरी करुणा के न होने के कारण दिग्भ्रान्त बन बैठी और अराजकता एवं अशान्ति की निमित्त सिद्ध हो रही है। यह अहितकर है और खतरनाक भी।

मानवी प्रकृति लाभ-हानि के परिप्रेक्ष्य में सामान्यतया दो प्रकार की मानी गई हैं। एक में वह स्वयं लाभ उठाकर दूसरों को हानि के गहरे गर्त में धकेल देती है, जबकि दूसरे में स्वयं क्षति सहकर अन्यों को लाभ उठा देने के लिए तैयार हो जाती है या यों कहें कि वह विवश होती है। कई बार इसे उसकी उदारता कहते हैं, तो अनेक अवसरों पर यह कायरताजन्य निर्बलता सिद्ध होती है। इस प्रकार इस सम्पूर्ण संदर्भ में मानवी व्यक्तित्व को कुल चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है- पुरुष प्रधान पुरुष और नारी प्रधान पुरुष-यह पुरुषों की दो कोटियाँ हुईं एवं पुरुष प्रधान नारी तथा नारी प्रधान नारी-यह महिलाओं के दो विभाग हुए। पुरुष प्रधान पुरुष एवं पुरुष प्रधान नारी की स्थिति में चूँकि व्यक्तित्व में नर तत्व हावी होता है, अतः यह प्रकृति व्यक्तित्व और समाज दोनों में ही अस्थिरता पैदा करती है। इसके विपरीत नारी में अपनी प्रधान पुरुष और नारी प्रधान नारी में अपनी ही कायरता और कमजोरी के कारण मनुष्य प्रताड़ना के पात्र बनते हैं। ऐसे में न तो पहली स्थिति ठीक कही जा सकती है, न दूसरी अवस्था को उचित ठहराया जा सकता है, कारण कि दोनों ही असंतुलित व्यक्तित्व हैं। इसलिए दोनों के बीच संतुलन आवश्यक माना गया हैं।

इस प्रकार अर्द्धनारी-नटेश्वर की मूल अवधारणा ही संतुलन-समीकरण जैसे दृष्टिकोण पर आधारित है। इसमें न तो किसी कौतुकपूर्ण संरचना की ओर संकेत है, न ही इस बात का आग्रह कि तुर्त-फुर्त में ऐसा कुछ उपक्रम अपनाया और यह सिद्ध किया जाय कि व्यक्तित्व संतुलित है और उसमें नर-नारी के दोनों तत्वों की समान अभिव्यक्ति हुई है। वास्तव में यह एक समयसाध्य प्रक्रिया है, जिसमें उद्दण्डता को साधते और नमनीयता को उभारते हुए ऐसा कुछ करना पड़ता है, जिससे वे स्थायी और स्थिर हो सके एवं व्यक्तित्व को एक ऐसी अवस्था प्रदान कर सकें जिसे ‘साम्य’ कहा जा सके। यही है अर्द्धनारी-नटेश्वर का वास्तविक तत्वदर्शन । इसे समझा और अपनाया जाना चाहिए।


राजा का समाधान (Kahani)

श्रावस्ती सम्राट चन्द्रचूड़ को विभिन्न धर्मों और उनके प्रवक्ताओं से बड़ा लगाव था। राज-काज से असमंजस में पड़ गए, जब धर्म शाश्वत है, तो उसके बीच मतभेद और विग्रह क्यों?

समाधान के लिए वे भगवान बुद्ध के पास गए और उनसे अपना असमंजस कह सुनाया। बुद्ध हँसे। उन्हें सत्कारपूर्वक ठहराया और दूसरे दिन प्रातःकाल उनके समाधान का वचन दिया।

दिनभर के प्रयास से एक हाथी और पाँच जन्माँध जुटा लिए गए। प्रातःकाल तथागत सम्राट को लेकर उस स्थान नर पहुँचे । किसी जन्माँध का इससे पूर्व कभी हाथी से संपर्क नहीं हुआ। उनसे कहा गया कि वह सामने खड़ा है, उसे छुओ और उसका स्वरूप बतलाओ, अंधों ने उसे टटोला और जितना जिसने स्पर्श किया, उसी के अनुरूप उसे खम्भे जैसा, रस्सी जैसा, सूप जैसा, टीले जैसा आदि बताया।

तथागत ने कहा राजन् सम्प्रदाय अपनी सीमित क्षमता के अनुरूप ही धर्म की एकाँगी व्याख्या करते हैं और अपनी मान्यता के प्रति हटी होकर झगड़ने लगते हैं।

जिस प्रकार हाथी एक है और उसका अंध विवेचन भिन्नतायुक्त । धर्म तो समता, सहिष्णुता, एकता, उदारता और सज्जनता में है। यही हाथी का समग्र रूप है। व्याख्या कोई कुछ भी करता रहे।

राजा का समाधान हो गया और वे ही प्रसन्नतापूर्वक कृतज्ञता व्यक्त करते हुए घर लौटे गये।


विलक्षण प्रकृति के अजब ये अजूबे

यह संसार एक विचित्र रंगमंच है, जहाँ तरह-तरह के अजूबे देखने को मिलते हैं। वैज्ञानिक प्रयास करते हैं कि हर दृश्यमान वस्तु या घटनाक्रम का वे कारण बता सकें, फिर भी अनेक रहस्यों का समाधान वह अपनी तर्कबुद्धि से देने में असमर्थ होते हैं। ऐसी विचित्रताएँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि अविज्ञात क्रिया-कलापों एवं दृश्यों से भरी यह दुनिया आखिर किसने बनायी?

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान सन् 1914 में एक जर्मन जासूस पकड़ा गया। उसका नाम पीटर कार्पन था। फ्राँसीसियों ने इस गिरफ्तारी को एकदम गुप्त रखा। इसके साथ एक दूसरी चाल चली, पीटर के नाम से झूठे समाचार जर्मनी भेजते रहे। जर्मनी से जो उसके नाम का वेतन आता, उसे जाली दस्तखत कर स्वयं रख लेते। सन् 1917 में पीटर को मौका मिला और वह जेल से भाग लिया। दूसरी ओर पीटर नाम से आने वाला पैसा जब बहुत अधिक इकट्ठा हो गया तो फ्रांसीसी गुप्तचर विभाग ने उससे एक गाड़ी खरीदी । संयोग की बात कि शहर में घूमते समय एक व्यक्ति उस गाड़ी की चपेट में आ गया और मर गया। मृतक की खोजबीन की गई, तो पता चला कि वह और कोई नहीं, जेल से भागा जासूस पीटर था। प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन का एक टोही वायुयान मोर्चे का सर्वेक्षण कर रहा था। उसके चालक और सर्वेक्षणकर्ता शत्रु की मशीनगन के शिकार हुए और जहाज में ही मर गये। इतने पर भी वायुयान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ। वह घण्टों दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ। वह घण्टों आसमान में बेतुके चक्कर काटता रहा और अन्त में ईंधन चुक जाने पर शान्ति के समय समतल भूमि पर उतर आया। आखिर वह कौन-सी शक्ति थी, जो उस जड़ यान का संचालन कर रही थी? विज्ञानवेत्ता इसका ठीक-ठीक जवाब नहीं दे सके।

जापान के सासवो नगर का एक नागरिक त्सोको नियमित रूप से त्रिपिटिक का पाठ करता था। जिस पृष्ठ पर पाठ छोड़ता, उसमें एक हरी पत्ती का विराम संकेत लगा देता। आश्चर्य की बात तो यह है कि वह जीवनभर उसी एक पत्ती का प्रयोग करता रहा और पत्ती यथावत् हरी बनी रही। 80 वर्ष की अवस्था में सन् 1975 में जिस दिन उसकी मृत्यु हुई, उस दिन देखने पर वह पत्ती भी सूखी पायी कई । वनस्पति शास्त्र के नियमों की अवहेलना करते हुए वह किस प्रकार इतने लम्बे काल तक हरी बनी रही, इसका कोई विज्ञानसम्मत उत्तर नहीं ढूँढ़ा जा सका।

आस्ट्रेलिया में एक चलती-फिरती पहाड़ी है। यह ‘ग्रामसीन’ के नाम से प्रसिद्ध है और पर्यटकों के लिए एक मनोरंजन पार्क की तरह है। वह अपना स्थान बदलती रहती हैं। कारण यह बताया जाता है कि उसकी तली में 100 फुट मोटी नमक की एक चट्टान है। पहाड़ी की जड़ उसी पर टिकी है। नीचे का नमक नमी, गर्मी और सर्दी से प्रभावित होकर उथल-पुथल करता रहता है और पहाड़ी को इधर-उधर खींचता-धकेलता रहता है।

आस्ट्रिया का टौर्न पर्वत का नोड्रन जलप्रपात संसार के प्राकृतिक आश्चर्यों में से एक है। प्रतिदिन तीसरे पहर ठीक साढ़े तीन बजे उसके ऊपर एक इन्द्रधनुष उदय होता है। इसका समय इतना निश्चित है कि लोग उससे अपनी घड़ी मिलाते और टाइम सही करते हैं।

ब्राजील के एक नगर वेलम टडोपरा में दोपहर 2 से 4 बजे तक पूरे दो घंटे नियमित रूप से वर्षा होती है। इसमें व्यतिरेक कदाचित् ही कभी होता है। उस क्षेत्र के निवासी इन दो घंटों में मध्याह्न अवकाश मनाते हैं।

गर्म और ठण्डे जल के झरने संसार में अनेक स्थानों पर पाये जाते हैं, किंतु इटली के आर्मिया क्षेत्र में अपने ढंग का एक विचित्र निर्झर है। उसमें सर्दी के दिनों गर्म पानी निकलता है और भाप के बादल उठते हैं, जबकि गर्मी के मौसम में उसका पानी बर्फ जैसा ठण्डा बना रहता है।

जिरिनाज पर्वत इण्डोनेशिया में स्थित एक शान्त ज्वालामुखी है। कभी वह गर्म लावा उगलता था, पर अब वैसा कुछ नहीं है। फिर भी उसका चुम्बकीय चक्रवात अभी भी विद्यमान है। एक छोटा-सा बादल उसके गतिचक्र में इस प्रकार फँसा है कि वह परिधि से बाहर आ नहीं पाता । उस शिखर के ऊपर ही मँडराता और चक्र की तरह अनवरत घूमता रहता है। इसका एक कारण ज्वालामुखी की नोंक ने निकलने वाली गर्म हवा का कोई प्रत्यावर्तन ही समझा जाता है।

दक्षिण कोरिया में एविग्नान के निकट एक ठण्डे पानी का झरना है। उसे वाडक्लुर्स का स्रोत कहते हैं। समीप में ही नदी बहती है। नदी के दूसरे तट पर एक अंजीर का पेड़ है। बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के नदी का जलस्तर मार्च माह में हर वर्ष अपने आप बढ़ जाता है और बाढ़ जैसी स्थिति आ जाती है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि नदी का जलप्रवाह उल्टी दिशा में ऊँचाई पर स्थिति अंजीर के पेड़ की ओर बढ़ने लगता है और पेड़ की जड़ को स्पर्श करके वापस लौट जाता है। इस घटना की पुनरावृत्ति हर वर्ष नियत समय पर होती है। वैज्ञानिक लम्बे समय से इसका कारण तलाशते रहे हैं, पर यह अब भी अविज्ञात रहस्य बना हुआ हैं। वहाँ की लोककथाओं में ऐसा उल्लेख मिलता है कि वृक्ष यक्ष है और नदी कोई अप्सरा, जो किसी देवता के कोपभाजन के कारण जड़ योनि में परिवर्तित हो गये। । अभिशाप में थोड़ी छूट यह दी गई कि वे मार्च माह के एक निश्चित दिन मिल सकते हैं। तभी से दोनों का यह विचित्र मिलन चलता आ रहा है। किंवदंती कहाँ तक सत्य है , नहीं मालूम ,पर इस विलक्षण दृश्य को देखने के लिए प्रतिवर्ष वहाँ भारी भीड़ उमड़ पड़ती है।

इन प्राकृतिक आश्चर्यों के अतिरिक्त वनस्पति जगत में भी ऐसा कितनी ही विलक्षणताएँ हैं, जिन्हें इसी स्तर का कहा जा सकता है।

महाराष्ट्र के जलगाँव जिले में अंजिष्ठा मार्ग पर ‘पहुर’ नामक एक छोटा-सा गाँव है। वहाँ से सेदुणी जाने वाले कच्ची सड़क पर मील दूर ‘सोप’ गाँव अवस्थित है, इस गाँव में एक अद्भुत नीम का पेड़ है। इसके प्रत्येक डाल के पत्ते कड़वे हैं किंतु उसमें एक डाल ऐसी है, जिसके पत्तों का स्वाद अत्यन्त मीठा है। कहते हैं कि कड़ोवा महाराज नाम के एक सिद्ध सन्त ने ईश्वर के अस्तित्व और उसकी शक्ति का परिचय देने के लिए ऐसा किया था।

हिन्द महासागर के रियूनियम द्वीप में कैक्टस जाति का एक विचित्र पौधा पाया जाता है। वह अपने जीवन के अन्तिम दिनों में प्रायः पचास वर्ष बाद एक बार ही फूलता है। इसके बाद उसके जीवन का अन्त हो जाता है।

बाई डाँगों अफ्रीका के गाँव मवाई में एक प्रकार का वृक्ष पाया जाता है, जो वनस्पति विज्ञान के नियमों का उल्लंघन कर वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ हैं। इस वृक्ष की जड़ें कील या चूलनुमा होती है। जब कभी तूफान आते हैं, तो वृक्ष लगभग 360 डिग्री कोण से घूम जाता है। इसकी सम्पूर्ण वैज्ञानिक व्याख्या कर पाने में विज्ञानवेत्ता अब तक असफल रहें हैं। नादिया (पं. बंगाल) जिले के कोलड़िया गाँव में एक शिक्षक के घर एक नारियल का ऐसा पेड़ लगा हुआ है, जिसकी शाखाओं से ही उसकी सन्तानें जन्मने लगती हैं। पिछले वर्षों से इस पेड़ ने करीब 100 पौधों को जन्म दिया और सभी उस पेड़ के पत्तों के मूल स्थान से उगे हैं। जब पत्तों में अंकुर उग आते हैं, तो उन्हें जब पत्तों में अंकुर उग आते हैं, तो उन्हें तोड़कर जमीन में गाड़ देने से उससे एक स्वतंत्र पौधा निकल आता है। यदि अंकुर युक्त पत्तों को पेड़ से अलग न किया जाय, तो अंकुर नष्ट हो जाते हैं।

वृक्ष-वनस्पतियों में ऐसी अनेक प्रकार की विचित्रताएँ पायी जाती हैं, जिन्हें देखकर बुद्धि चकरा जाती है। गर्म प्रदेशों में पाया जाने वाला वृक्ष ‘समानी सनम ‘ वनस्पति जगत में अपने ढंग का वनस्पति जगत में अपने ढंग अनोखा वृक्ष है। वह रात्रि में बादल की तरह पानी बरसाता है। उस क्षेत्र के निवासी उसी से अपने जल की आवश्यकता की काफी हद तक पूर्ति कर लेते हैं। यह पेड़ दिनभर अपने डण्ठलों से हवा की नमी सोखता रहता है और अपना भण्डार भर लेता है। जैसे ही वातावरण की गर्मी शान्त होती है वह उस भण्डार को खाली करके उस क्षेत्र के प्राणियों की प्यास बुझाता है। सभी रात्रि की प्रतीक्षा में उसके इर्द-गिर्द जमा रहते हैं। वृक्ष प्राणवायु तो देते ही हैं, हमारा उगला विष प्राणवायु तो देते ही हैं, हमारा उगला विष भी सोखते हैं, पर बादलों की वृष्टि के अतिरिक्त वे स्वयं भी जल बरसा सकते हैं, उसका यह अपने में एक अनूठा उदाहरण है।

तिब्बत में एक अनोखी झील है-’ऊँरुत्सी’। इसका पानी बारह वर्ष तक खारा रहता है और बारह वर्ष के लिए मीठा हो जाता है। यह परिवर्तन-क्रम लम्बे काल से चला आ रहा है। इसी प्रकार इटली के टोरंटो क्षेत्र के समीप समुद्र में सफेद रंग के पानी का एक फुहारा फूटता है। इसका पानी मीठा है। खारे समुद्र में मीठे पानी का फुहारा फूटना प्रकृति की किस विचित्रता का परिणाम है, यह अब तक जाना नहीं जा सका है।

यह सभी अजूबे प्रकृति में ऐसे उदाहरणों के रूप में विद्यमान हैं, जिन्हें अपवाद भर मानकर मन को संतुष्ट कर लिया जाता है। कदाचित् यह स्वीकार लेने में मनुष्य के लिए अपमान जैसी बात नहीं होनी चाहिए कि वह अभी बहुत बौना है और बुद्धि इतनी ठिगनी कि रहस्य की ऊँचाइयों पर क्या कुछ पक-पनप रहा है, उसे देख-समझ पाने जितनी सामर्थ्य उसमें नहीं। समस्या का एकमात्र हल यही हो सकता है कि हम अपनी आध्यात्मिक ऊँचाई को बढ़ाएं, बौद्धिक ठिगनापन तभी दूर हो सकता है।


पशुबलि की कुप्रथा (Kahani)

देवी-देवताओं के नाम पर प्रचलित-अन्धविश्वासों में प्रमुख है-पशुबलि। इस जंजाल में अनेकों फँसते देखे जा सकते हैं।

राजा कुमारपाल प्रजाप्रिय राजा थे। उनके गुरु हेमचन्द्राचार्य सदा उच्च कोटि के परामर्श दिया करते थे। उस राज्य में विजयदशमी के दिन देवी पर पशुबलि बड़े धूम-धाम से मनाई जाती थी। उस दिन सैंकड़ों पशु काटे जाते थे।

गुरु ने राजा को इस कुप्रथा को बन्द करने के लिए कहा। राजा ने कहा प्रजा इसके लिए तैयार न होगी। उसे मैं कैसे रुष्ट करूं। गुरु ने प्रजा को समझने का काम अपने ऊपर लिया।

सजधज कर बलि के निमित्त प्रजाजन पशुओं को लाये। गुरुदेव ने उन सब को एकत्रित करके पूछा-देवी तो सबकी माता है। पशुओं की बलि लेकर तो वह रुष्ट होगी।

प्रजानन ने एक स्वर से कहा-देवी बलि चाहती है और बलि से प्रसन्न भी होती है। यदि ऐसा न होता, तो हम लोग इस प्रथा को क्यों चलाते?

गुरुदेव ने कहा-आप लोगों के कथन की सच्चाई की वास्तविकता अभी परखे लेते हैं। देवी के मन्दिर में सभी बलि चढ़ने वाले पशु बन्द कर दिए गए। सवेरा होते ही दरवाजा खोला गया और देखा गया कि कितने पशु देवी ने भक्षण किए हैं।

दरवाजा खुलने पर सभी पशु गिने गए। एक भी कम न हुआ। गुरुदेव ने उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा-देखा आप लोगों ने । देवी ने एक भी पशु नहीं खाया । उन्हें प्यारा पुत्र समझकर छोड़ दिया। फिर आप लोग ही प्राणि-हत्या क्यों ओढ़ते हैं?

गुरुजी की उक्ति से सभी प्रजाजन सन्तुष्ट हुए। पशुबलि रुक गई और प्रजानन रुष्ट न होने पाए।


कहीं आप मृत सागर की तरह मुर्दे तो नहीं?

जीवित कौन? मृतक कौन, इस बारे में विचार करने पर ज्ञात होता है कि जीवितों और मृतकों में एक मूलभूत अन्तर है। एक अपनी सक्रियता, गतिशीलता और उपयोगिता के कारण प्रथक पहचाने जाते हैं, तो दूसरे अपनी निष्क्रियता और निर्जीवता के कारण चर्चित होते हैं। दोनों ही अपनी-अपनी विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध हैं, कारण कि दोनों दो चरम स्थितियाँ हैं। शरीर जब जन्मता है, तब भी उसकी कम चर्चा नहीं होती और जब अन्तिम यात्रा पर निकलता है, उस समय भी बढ़-चढ़कर उल्लेख होता है। यह दोनों अवस्थाएँ मनुष्य में भी हो सकती हैं और वस्तु में भी, समुद्र-सागर में भी ।

वस्तु मृतक कब मानी जाती है? शरीरशास्त्र की दृष्टि से विचार करें, तो वह पहले ही प्राणहीन है, इसलिए जड़ पदार्थों में उसकी गणना होती है, किन्तु उपयोगितावाद की दृष्टि से विचार करने पर यही कहना पड़ेगा कि जब तक वह उपयोगी है, तब तक जीवन्त है। उपयोगिता समाप्त होते ही वह मृतकों की श्रेणी में आ जाती है। इसलिए टेलीफोन एवं दूसरे यंत्र जब काम करना बन्द कर देते हैं, तो सामान्य रूप से यही कहते हैं कि वह ‘डेड’ पड़ गया, अर्थात् उसकी सक्रियता समाप्त हो गई और उपयोगिता की दृष्टि से निरुपयोगी हो गया।

मनुष्यों में भी जिन्दा और मुर्दा के दो वर्ग हैं। जीवित वे हैं, जिनमें उमंग हो, उत्साह हो, सक्रियता और क्रियाशीलता हो, जिनका चिन्तन क्रान्तिकारी और लोकोपयोगी हो, जिनका जीवन परमार्थ एवं पुरुषार्थ परायण हो वे सब इसी कोटि में आते हैं। जिस स्थान पर नदियाँ बहती और निर्झर प्रवाहित होते हैं, वहाँ दूर तक उनकी कल-कल ध्वनि सुनाई पड़ती है, किन्तु नाले में बहने जल का पता तो बगल से गुजरने वाले राहगीर तक को नहीं चल की लगभग इसी स्तर का अन्तर जीवन्त और मृतप्राय जीवन गुजारने वालों गुजारने वालों में हैं।

सागरों में एक मृत सागर भी है। मृत का इसलिए है कि जीवितों जैसा इसका स्वभाव नहीं जीवन्त जलाशयों में अनेक प्रकार की जीव-जन्तु, वनस्पतियाँ एवं शैवाल होते हैं, किन्तु इसमें इनका सर्वथा अभाव है। इतना ही नहीं, जो भी जलचर अथवा वनस्पतियाँ दूसरी सरिताओं से बहकर इसमें आते हैं, वह क्षणभर भी जिन्दा नहीं रह पाते और तत्काल मौत के शिकार होते हैं।

इसका कारण क्या है? वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके जल में जिस अनुपात में खनिज लवणों की अधिकता है। वही इसका प्रमुख हेतु है। वे बताते हैं कि जहाँ अन्य सागरों में इन लवणों की मात्रा केवल 3.5 प्रतिशत है, वहीं मृत सागर में इनका परिमाण 25 प्रतिशत से भी अधिक है। इन लवणों में सोडियम, कैल्शियम, पोटैशियम, जिप्सम एवं कितने ही प्रकार के ब्रोमाइड हैं। एक अनुमान के अनुसार इस सागर में अब भी लगभग 4 करोड़ टन नमक घुला हुआ है।

प्रचुर मात्रा में लवणों की विद्यमानता के कारण जल का घनत्व काफी बढ़ा-चढ़ा है। इसके जल का घनत्व 1.199 हैं, जो साधारण पानी की अपेक्षा 1.18 गुना अधिक है। इस असाधारण घनत्व के कारण कोई भी वस्तु इसमें डूबने की बजाय तैरने लगती है। यदि कोई व्यक्ति इसमें डूबकर आत्महत्या करना चाहे, तो सागर उसे ऐसा करने से रोकता है। कैल्शियम क्लोराइड की अधिकता के कारण यह पानी स्पर्श और रंग में एकदम तेल जैसा है।

मनुष्य में भी जब सतर्कता, प्रखरता, जागरुकता, परिश्रमशीलता, सेवा, सहिष्णुता एवं संवेदना जैसी विभूतियाँ बढ़ती हैं तो उसका व्यक्तित्व मृत सागर के जल की तरह वजनदार बन जाता है। इस स्थिति में न तो वह स्वयं बुरा करता है और न अपने सामने इसे होने देता है। सागर जल के समान इसे गुरुतर व्यक्तित्व कहेंगे।

इसमें प्रतिदिन करीब 6 मिलियन गैलन पानी जोर्डन व अन्य नदियों से आकर गिरता है। इसलिए पिछले 16 वर्षों में इसका जलस्तर लगभग 20 फुट ऊँचा उठ गया है। इस असामान्य बढ़ोत्तरी के कारण इसके कई टापू जलमग्न हो चुके हैं।

समुद्र तल से यह लगभग 1300 फुट नीचे स्थित है। इसकी गहराई यों तो असमान है, किन्तु इसके उतरी किनारे पर इसकी गहराई सर्वाधिक मापी गई है। यह करीब 1300 फुट हैं। गर्मियों में इसका तापमान 140 डिग्री फारेनहाइट एवं सर्दियों में 80 डिग्री फारेनहाइट हो जाता है।

इसका पूर्वी किनारा सागर तल से कुछ ऊँचा है, जबकि दक्षिणी छोर निकटवर्ती जंगल के कुछ भाग को अपने में डुबोये हुए है। इसके इस सिरे पर खनिज, कच्चा तेल एवं बिटुमिन का भारी भूमिगत भण्डार है।

यों कहने को तो यह मृत सागर है, लेकिन इसके बावजूद भी मूल्यवान है। हाथी जीवित होता है, तो उपयोगी तो होता ही है, किन्तु मरने के बाद भी वह बहुमूल्य बना रहता है। इसी प्रकार इस मृत सागर में इतने प्रकार के इतनी अधिक मात्रा में खनिज लवण हैं कि ‘डेड सी’ होने के बाद भी इसकी कीमत घटती नहीं है। इन सबके दोहन के लिए इसके तट पर कई तरह के कितने ही संयंत्र एवं कारखाने स्थापित किये गये हैं। जोर्डन के कलिया नामक नगर में सागर जल से पोटैशियम क्लोराइड प्राप्त करने का एक कारखाना सोडोम शहर के निकट बनाया गया है। इससे सागर जल द्वारा पोटाश प्राप्त करने के भी कारखाने यत्र-तत्र तटवर्ती क्षेत्रों में लगे हुए हैं।

इसराइल भी इसके जल से कितने ही प्रकार के रसायन प्राप्त करता है इसके अलावा वह दक्षिणी तट पर स्थित भूमिगत भंडारों के भी दोहन का प्रयास कर रहा है उसने इस दक्षिणी किनारे पर तेल की खोज के लिए सागर के नीचे करीब 4 किलो-मीटर गहरी खुदाई करवायी । इसमें तेल तो नहीं मिला पर ‘इन आयला’ नामक बहुमूल्य शैवाल हाथ लग गया। विशेषज्ञों का कहना है कि इस काई से पेट्रोल प्राप्त किया जा सकता है। इसरायली वैज्ञानिकों द्वारा भूमिगत बिटुमिन की प्राप्ति के भी प्रयत्न हो रहे हैं। करीब 49 मील लम्बा और 10 मील चौड़े क्षेत्रफल वाला यह सागर इसराइल और जोर्डन की सीमा पर स्थित है। इसराइल की राजधानी येरुसलम से यह 15 मील दूर पूर्व की ओर है। उत्तर-पश्चिमी हिस्से के अतिरिक्त सागर हर ओर से जोर्डन की सीमा से लगा है। इसे लैक्स एसफालटाइटस कहते हैं, जबकि ओल्ड टेस्टामेण्ट में इसको नाम ‘ईस्ट सी’ कहकर सम्बोधित किया गया है। अरब के लोगों में इसका नाम ‘अलबाहर अलनायित’ अर्थात् मृत सागर रखा है। ‘बहैरत लुत’ नामक इसका एक अन्य नाम भी यहाँ प्रसिद्ध है। इसराइल के लोग इसे ‘याम हा मेलाच’ अर्थात् ‘नमक का सागर’ कहते हैं।

जिस प्रकार मृत शरीर अनेक माँसाहारी जन्तुओं को अपने निकट खींच बुलाता है, इसी प्रकार यह सागर प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इनके ठहरने के लिए तटवर्ती क्षेत्र में अनेक बहुमंजिली इमारतें, होटल और रेस्तराँ बने हुए हैं। मृत सागर के जल की एक बड़ी विशेषता यह बतायी जाती है कि इससे कई प्रकार के त्वचा रोग से ग्रस्त हो गये थे। अनेक प्रकार के उपचार के बाद भी जब वे ठीक नहीं हुए, तो राजवैद्य की सलाह पर उन्हें डेड सी के जल से स्नान कराया गया। कहते हैं कि कुछ दिन स्नान के पश्चात् वे रोग मुक्त हो गये।

इन सब विभूतियों का भण्डार होने के बावजूद वह मृत सागर कहलाता है। यह दुर्भाग्य की बात है। मनुष्य के अन्दर की बात है। मनुष्य के अन्दर भी न जाने कैसी और कितनी एक-से-एक बढ़कर विभूतियाँ हैं, पर सब सोयी पड़ी हैं। उसकी निष्क्रियता और आलस्य प्रमाद उन्हें और गहरी सुषुप्ति में धकेल देते हैं। इसलिए मानव की स्थिति भी लगभग वैसी ही हो जाती है, जैसी यह सागर है। यों वह चलता-फिरता सचेतन प्राणी है, इस दृष्टि से जीवित कहलाने का अधिकार तो है, पर वैभव-विभूति की दृष्टि से, सक्रियता और समर्थता की दृष्टि से उसे एक प्रकार से मृतक ही कहा जाएगा।

मुर्दों की भी दो कोटियाँ हैं, एक वह जो निर्जीव-निष्प्राण है और जो महा प्रस्थान के लिए निकल पड़े हैं। ऐसे शरीर को रखने का विधान नहीं है। उनकी अन्तिम क्रिया जल्द ही कर दी जाती है, अन्यथा देर तक बने रहने पर वे गन्दगी और बदबू फैलाते हैं। दूसरी श्रेणी में वे आते हैं, जो चलते-फिरते तो हैं, पर सब कुछ यंत्रवत् है। एक यंत्र और मनुष्य में इतना अन्तर है कि उपकरण सब कुछ बटन के आधार पर काम करते हैं, उसे दबा दिया, तो वे सक्रिय हो जाते हैं, बन्द कर दिया, तो फिर अनन्त काल तक उसी स्थिति में पड़े रहेंगे। उनमें न तो उमंग होती है, न उत्साह, सब कुछ मशीनी। इसी तर्ज पर यंत्र मानवों की रचना हुई है। उन्हें जो आदेश दिया जाता है, उसे वे गुलामों की भाँति कर डालते हैं, इसके बाद फिर निष्क्रिय बन जाते हैं। उनकी गतिशीलता को देखते हुए कुछ क्षण के लिए उन्हें -चैतन्य’ कह सकते हैं, पर चैतन्यता की वह परिभाषा सही नहीं, जिसमें क्षण में सक्रियता और क्षण में निष्क्रियता दिखाई पड़े। वास्तविक चेतनावान तो उन्हें ही कहना चाहिए, जो हर पल सक्रिय हों, जिनके अन्दर की उमंग उछल-उछल पड़ती हो और जिसे अपने भीतर बाँध रख पाने में काया भी असहाय अनुभव करती हो, जिनके अन्दर प्रखरता हो, तत्परता और तेजस्विता हो और जो और जो हर घड़ी उन्हें लोकमंगल के लिए नियोजित करने को प्रस्तुत हों, सच्चे अर्थों में जीवन्त और जाग्रत कहलाने के वही सुयोग्य अधिकारी हैं।

जाग्रति अर्थात् सुषुप्ति का टूटना । जब जागरुकता बढ़ने लगे, तन्मयता और लगनशीलता अधिक प्रबल होती दीख पड़े , आलस्य-प्रमाद में अप्रत्याशित कमी आ जाये, स्वार्थ -साधना में हृदय घबड़ाता हो, सेवा के प्रति अभिरुचि बढ़ने लगे, उत्साह का उफान आ जाय, तो इसे दिव्य जागरण कहना चाहिए। यह इस बात के प्रतीक हैं कि अन्तराल का प्रसुप्त वैभव अपनी मूर्च्छना तोड़ रहा है और अगले ही दिनों वह अपनी सम्पूर्ण समर्थता एवं प्रखर प्रकाश के साथ प्रकट और प्रत्यक्ष होने वाला है।

हम मृत सागर की तरह मुर्दे न बन जाएँ। हममें गतिशीलता हो और सक्रियता भी। इसी में हमारी महानता है और आन्तरिक सम्पदा की दिव्यता भी।


किसी का भी भविष्य उसका शिष्टाचार बनाता है (Kahani)

एक कुएँ पर चार पनिहारिनें पानी भरने गईं। बारी-बारी रस्सी में घड़ा बाँधकर कुएँ में उतारतीं और पानी खींचती । एक व्यस्त होती, तो तीन खाली रहतीं। इस बीच उनमें कुछ वार्ता छिड़ गई। सभी अपने-अपने लड़कों के गुणों की प्रशंसा करने लगीं। एक ने कहा-मेरे लड़के का गला ऐसा मीठा है कि किसी राजदरबार में उसे मान मिलेगा। दूसरे ने कहा मेरे लड़के ने अपना शरीर ऐसा गठीला बना लिया है कि बड़ा होने पर दंगल में पहलवानों को पछाड़ेगा । तीसरे ने कहा मेरा बेटा ऐसा बुद्धिमान है कि सदा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता है। चौथी सिर नीचे किए खड़ी थी। उसने इतना ही कहा -मेरा लड़का गाँव के और बच्चों की तरह साधारण ही है। इतने में चारों बच्चे स्कूल की छुट्टी होते ही घर चल पड़े। रास्ता कुएँ के पास होकर ही था। एक गाता आ रहा था। दूसरा उछलता। तीसरे के हाथ में खुली पुस्तक थी। सबूत भी उनकी विशेषता का हाथोंहाथ मिल गया। चौथी का लड़का आया, तो उसने चारों के चरण छूकर प्रणाम किया और अपनी माता का पानी से भरा घड़ा सिर पर लेकर घर की ओर चल पड़ा। कुएँ के पास एक वयोवृद्ध बैठा हुआ था। उसने चारों बहुओं को रोककर कहा। यह चौथा लड़का सबसे अच्छा है। इसका शिष्टाचार देखो। किसी का भी भविष्य उसका शिष्टाचार बनाता है।


ससीम मनुष्य व असीम यह ब्राह्मी-चेतना

गंगा यों उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है, पर उसके बीच-बीच में कई स्थानों पर ऐसे मोड़-मरोड़ हैं, जिनमें वह दिशा लगभग उलट-सी जाती है। उत्तरकाशी में कई मील तक गंगा दक्षिण से उत्तर की ओर बहने लगी है। यही क्रम वाराणसी में दुहराया गया है। हवा में चक्रवात और पानी में भँवर भी सामान्य प्रवाह में व्यतिक्रम ही उत्पन्न करते हैं। यद्यपि होते वे भी किसी प्रकृति नियम के अंतर्गत ही हैं। भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट आदि की घटनाएँ आकस्मिक-अप्रत्याशित होती हैं, आश्चर्यजनक लगती हैं फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि वे प्रकृति नियमों के अंतर्गत नहीं हैं। यह बात दूसरी है कि उनके कारण एवं रहस्य मनुष्य की पकड़ में कभी न आये हों।

सामान्य व्यवस्था से भिन्न प्रकार के आश्चर्य जब दृष्टिगोचर हों तो यह नहीं समझा जाना चाहिए कि प्रकृतिक्रम अनगढ़ है और कुछ भी उलटा-पुलटा होता रहता है। नियति के सुनियोजित व्यवस्था−क्रम में इस प्रकार के व्यतिरेक की सम्भावना कहीं भी नहीं है।

प्रकृति के अनुसंधान क्रम में यह तथ्य भी ध्यान रखने योग्य है कि घटनाओं और सम्भावनाओं में ऐसे मोड़ भी विद्यमान है, जो सर्वदा नहीं, यदा-कदा ही दृष्टिगोचर होते हैं। सामान्यतया इन्हें देखकर कौतूहल का आनन्द लेने की बात ही बन पड़ती है, किन्तु विज्ञजनों के सामने यह चुनौती आती है कि वे प्रवाहक्रम को ही अकाट्य न मानें, वरन् प्रकृति के अन्तराल में चलते रहने वाले चित्र-विचित्र मोड़-मरोड़ों की संभावना भी ध्यान में रखें और उनके कारणों को खोज निकालने एवं रहस्यों का उद्घाटनों करने हेतु और अधिक दत्तचित्त हों।

टाइम पत्रिका के 24 अप्रैल, 1984 के अंक में एक घटना प्रकाशित हुई थी। डकोटा प्रान्त (अमेरिका) के रिचर्डसन नगर में एक महिला अध्यापिका पाल्मिन रैबेल आठवीं कक्षा के छात्रों को पढ़ा रही थी कि यकायक उस कमरे को गर्म करने के लिए रखी अँगीठी के कोयले स्वयं प्रज्ज्वलित होने लगे। फिर थोड़ी देर में उछल-उछल कर दीवारों से जा टकराने लगे। कुछ छात्रों को भी लगे। इसके बाद अँगीठी स्वतः दूसरी जगह पहुँच गई। यह वह स्थान था, जहाँ छात्रों की पुस्तकों का एक बड़ा बण्डल रखा हुआ था । आग के संपर्क में आकर गट्ठर जलने लगा। रैवेल व अन्य बच्चे तमाशा देख ही रहे थे कि एक बच्चे की सूचना पर फायर ब्रिगेड आ पहुँची । अग्नि उससे भी शान्त न हुई । कुछ समय बाद वह स्वतः ही शान्त हो गई। वैज्ञानिकों ने इस विचित्र अग्निकाँड की अनेक प्रकार से जाँच की, लेकिन कोई कारण वे खोज नहीं पाये।

आयरलैण्ड के एण्ट्रिल प्रदेश में एक बड़ी झील है-’लौधारिना’। साधारणतया वह पानी से लबालब भरी होती है, किन्तु कभी कभी एक विचित्र आश्चर्य होता है कि झील का पानी पूरी तरह अदृश्य हो जाता है, मात्र कीचड़ ही उसके स्मृति-चिन्ह के रूप में शेष रह जाती है, इतना पानी इतनी जल्दी कहाँ जाता है, इसकी खोज मुद्दतों से चल रही है, किन्तु अभी तक किसी निष्कर्ष पर पहुँचना संभव नहीं हो पाया है।

घटना ऑक्सफोर्डशायर की है। इस क्षेत्र में जमीन के नीचे एक बड़ी नाली बनायी जा रही थी। इस निमित्त एक विशेष स्थान के लिए 6 टन भारी चट्टान की आवश्यकता हुई। उसे लाया गया और काट-छाँट कर काम योग्य बनाया गया, लेकिन एक दिन अकस्मात ही वह विशाल शिला गायब हो गई। कई दिनों तक ढूंढ़ने और जासूसों का सहारा लेने के उपरान्त भी जब कुछ पता न चला, तो उसके लिए 5 हजार पौण्ड का सरकारी इनाम घोषित किया गया, फिर भी उसकी कोई जानकारी न मिल सकी। इतना विशाल और वजनी शिलाखण्ड कहाँ और कैसे गायब हो गया। इसका कोई कारण नहीं जाना जा सका।

मार्च 1939 में अंगोला में भीषण अकाल पड़ा। मनुष्य, जन्तु और पक्षियों में से अधिकाँश या तो मारे गये या अन्यत्र चले गये। वहाँ एक आदिम जाति ‘सीलिज’ रहती है। उन्हें निराहार रहकर भी जीवित रहने की अद्भुत कला ज्ञात है। कई-कई दिनों तक याद भोजन न मिले, तो भी उस प्रतिकूलता को वे आसानी से काट लेते हैं। दो सप्ताह बीत गये। वे किसी प्रकार जल आदि पीकर जीवित बने रहे। तभी एक दिन झाड़ियों के मध्य आधे एकड़ क्षेत्र में मधु जैसा गाढ़ा और कुछ मीठा पदार्थ जमा होने लगा। इसे सभी लोगों ने थोड़ी थोड़ी मात्रा में खाकर वह विषम परिस्थिति गुजारी । आश्चर्य तो यह कि प्रतिदिन लोग इसे खा जाते, किन्तु दूसरे दिन फिर उतना ही वह इकट्ठा हो जाता। यह क्या था, कहाँ से और कैसे आया? इस बारे में जाँचकर्ता कुछ भी नहीं बता सके।

एक घटना अमेरिका अंतरिक्ष यान से संबंधित है। सन् 1960 में उसका 300 पौंड वजन का ‘डिस्कवर’ यान धरती पर उतरा, तब उसका वजन मात्र 125 पौंड था। इसके बाद प्रतिदिन उसका भार घटता ही गया और अपने मूल वजन से काफी कम पर जाकर स्थिर हुआ। वैज्ञानिक चकित थे कि अन्तरिक्ष में और धरती पर उसका भार इतना अधिक घट गया।

प्रकृति की यह सभी चित्र-विचित्र गतिविधियाँ यह रहस्योद्घाटन करती हैं कि शोध-अनुसंधानों की परिधि बड़ी व्यापक है। हमें अपने और आस-पास के कुछ तथ्यों को देख -समझ कर यह नहीं मान लेना चाहिए कि विज्ञान प्रदत्त दृष्टि ने हमें सब कुछ बता दिया है। ईश्वर की लीला विचित्र है । मनुष्य का क्षेत्र सीमित है। फिर भी कुछ तथ्यों को देख-समझ कर यह नहीं मान लेना चाहिए कि विज्ञान प्रदत्त दृष्टि ने हमें सब कुछ बता दिया है। ईश्वर की लीला विचित्र है। मनुष्य का क्षेत्र सीमित है। फिर भी उद्देश्य यही होना चाहिए कि कारण जानने के प्रयास चलते रहें, ताकि सातवीं पुरुषार्थ सीमाबद्ध होकर न रह जाय।


Quotation

तुम्हारे पास दो रुपये हों तो एक की रोटी खरीदो, दूसरे की अच्छी पुस्तक । रोटी जीवन देती है और अच्छी पुस्तक जीवनकला । -अज्ञात


एक रात में सिद्धहस्त

एक बार महारावल जवाहरसिंह के दरबार में भावलपुर -पंजाब से मशहूर संगीतकार ‘मिरजू की औलाद’ उपस्थित हुआ। सरोदवादन के साथ ही गायन में उसका कोई मुकाबला न था। उसे अपनी इस कला पर बहुत गुमान था। उसे अपनी इस कला पर मुकाबला न था। उसे अपनी इस कला पर बहुत गुमान था। वह महारावल के दरबार में उपस्थित हुआ और कहने लगा कि सरोवादन में उससे कोई टक्कर नहीं ले सकता।

जवाहरसिंह कला-पारखी तो थे ही । सो उनको यह बात खटक गयी। उन्होंने बिना सोचे-समझे इसकी परीक्षा के लिए अपने आलमखाना घराने के प्रसिद्ध संगीतकार आरबाँखाँ को दरबार में बुलाया । राजाज्ञा पाकर आरबाखाँ महारावल के दरबार में उपस्थित हो गये। जहाँ वह भागलुपर का रहने वाला मिरजू की औलाद पहले से ही बैठा हुआ था। सारा वाकया जानने के पश्चात् आरबाखाँ ने महारावल से यह विनती की कि भावलपुर के संगीतज्ञ से फिलहाल तो बानगी के तौर पर थोड़ा-बहुत सुन लिया जाय, बाद में उसे और मौका दे दिया जाय।

आरबाखाँ का निवेदन स्वीकार करते हुए महारवल ने ऐसा ही आदेश दिया । इसके बाद ‘मिरजू की औलाद के ठहरने, भोजन आदि का इन्तजाम करा दिया गया।

यह सब देखकर जैसलमेर राज्य के दरबारी संगीतज्ञ आरबाखाँ के सामने चुनौती उपस्थित हो गयी। सरोद जैसे वाद्य को आरबाखाँ ने पहली बार देखा था। उन्हें दरबार में भावलपुर के इस आगन्तुक संगीतकार का सरोदवादन सुनकर विश्वास हो गया कि उसको चुनौती गलत नहीं है। निस्संदेह इस आगंतुक संगीतकार के सरोवादन का मुकाबला करने वाला संगीतकार जैसलमेर तो क्या समूचे राजपूताने में ढूंढ़ नहीं मिलेगा। आगन्तुक संगीतकार की योग्यता में कोई सन्देह नहीं था। पर उसमें दम्भ था। उसके प्रत्येक शब्द से घमण्ड टपकता था। यह ‘अहं’ उन्हें अच्छा न लगा।

प्रश्न उनकी हार-जीत का न था। उसके साथ जैसलमेर की प्रतिष्ठा जुड़ी थी। महारावल की आँखों में उनके प्रति असीम विश्वास था। मानो वे आँखों ही आँखों में कह रहे हों कि आरबाखाँ जैसलमेर की प्रतिष्ठा का भार तुम पर सिर्फ तुम पर सिर्फ तुम पर है। महारावल के इस भरोसे को वह तोड़ना नहीं चाहते थे। पर करें क्या? सरोवादन उन्होंने पहली बार देखा था और मुकाबला तो कल ही होना है। इतनी जल्दी सिर्फ एक रात्रि में भला क्या किया जा सकता था? फिर भी अचानक उनके मन में एक संकल्प उभरा। मन ही मन उन्होंने तय कर लिया कि वह मिरजू की औलाद को कल दरबार में हराकर रहेंगे। आनन-फानन में योजना बना डाली व इसको क्रियान्वित करने में जुट गए।

आरबाखाँ ने दरबार में मिरजू की औलाद को सरोद बजाते हुए ध्यानपूर्वक देखा था। वह तुरन्त ही अपने बढ़ई मित्र के पास पहुँचें व उसके सरोद का हुलिया बताया। बढ़ई ने पाँच-छह घण्टे में ढाई फुट लम्बा सरोद बना दिया व उसमें 150 तार कस दिए।

आरबाखाँ इस सरोद को लेकर रात को घर पहुँचे और अपनी आराध्य देवी माँ शारदा को प्रणाम करके बिना खाए-पिए ‘नखली’ से बजने वाले इस वाद्य को बजाने के रियाज में जुट गए। वह रातभर सरोद वादन का रियाज करते रहे। मानवी पुरुषार्थ जब अपने चरम में पहुँच कर भगवत कृपा से तदाकार हो जाता है, तब कुछ भी असम्भव नहीं रहता। परमेश्वर की अनन्त एवं असीम शक्तियाँ स्वभावतः मानवी प्रयास-पुरुषार्थ के झरोखे से अभिव्यक्ति होने लगती हैं। इन क्षणों में भी यही हुआ। रातभर रियाज करते-करते भोर होते इस सरोद यन्त्र से निकलने वाली सभी राग-रागनियों के स्वर निकालने में वह स्वयं ही पारंगत हो गए।

अगले दिन आम दिनों की तरह आरबाखाँ राजमहल में पहुँचे। दिनभर के राज कार्यों को निबटा लेने के बाद महारावल जवाहरसिंह ने भावलपुर से आए संगीतकार -मिरजू की औलाद ‘ को बुलावा भेजा। महारावल ने उसके आने के साथ ही उससे अपनी कला को प्रदर्शित करने का आग्रह किया। इस आग्रह के साथ मिरजू की उँगलियाँ सरोद पर अपना कमाल दिखाने लगी। महारावल उसके सरोदवादन को बहुत आनन्द से सुनते रहे। उनके मुँह से जैसे-जैसे ही वाह-वाह की आवाज निकली कि भावलपुर संगीतकार बड़े गर्व से कहने लगा, “महाराज, क्या आपने ऐसा मधुर संगीत पहली बार सुना है?”

उत्तर में महारावल ने कहा, “नहीं, हमारे दरबार में भी संगीत का आलमखाना घराना है, कहकर उन्होंने उस्ताद आरबाखाँ को बुलवा लिया। महारावल ने आरबाखाँ के सामने एक बार फिर भावलपुर के संगीतकार के सरोदवादन की प्रशंसा की, इसी के साथ ही उन्होंने आरबाखाँ को अपना संगीत सुनाने का आदेश दिया।

दरबार में फिर से दोनों ही ओर के संगीतज्ञ अपने-अपने साज के साथ बैठ गए। मिरजू की औलाद के सरोदवादन के पश्चात आरबाखाँ की बारी आयी। आरबाखाँ ने कपड़े में लिपटे अपने सरोद को निकाला और अपनी तान छेड़ दी। सरोद के तारों में उनकी उँगलियों की तत्परता उनके चेहरे पर भावों के उतार-चढ़ाव के साथ गतिमान थी। यद्यपि जैसलमेर के आलमखाना घराने के उस्ताद ने अब तक दरबार में सरोदवादन नहीं किया था। पर आज तो वह आगन्तुक संगीतकार की विशेषज्ञता से काफी आगे निकल गया। उसने सभी राग-रागनियां स्वर सहित दरबार में पूरी कलात्मकता के साथ सुना दीं।

यह सब देखकर महारावल मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए। आगन्तुक संगीतकार सकते में आ गया। उसने अपनी सरोद पर लगी लाल कपड़े की ध्वजा को उतार दिया। इसका मतलब था कि वह सरोदवादन में हार गया। उसके द्वारा अपनी हार को स्वीकार करते ही महारावल ने अपने गले में पड़ा हीरे का दमकता कण्ठा आरबाखाँ की ओर प्रसन्नता से उछाल दिया। इसे स्वीकार कर आरबाखाँ ने मिरजू की औलाद के समक्ष नतमस्तक होते हुए उसे यह कण्ठा भेट करते हुए कहा -मेरी ओर से आपको यह गुरु-दक्षिणा । मैंने तो एकलव्य की तरह आप को ही गुरु मानकर यह इल्म सीखा है। आरबाखाँ की इस विनम्रता के समक्ष भावलपुर के संगीतकार का घमण्ड पानी-पानी हो गया था। महारावल जवाहरसिंह भी आरबाखाँ की लगन की महानता को देखकर अभिभूत थे। उन्हें विश्वास हो गया कि मनुष्य की लगन किसी भी असम्भव को सम्भव कर सकती है।


पर्यावरण संरक्षण : हम सबका कर्त्तव्य

मनुष्य और पर्यावरण का परस्पर गहरा संबंध है। पर्यावरण यदि प्रदूषित हुआ, तो व्यक्ति अस्वस्थ होंगे और जन स्वास्थ्य को शत-प्रतिशत उपलब्ध कर सकना किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा। इसके विपरीत वह यदि सुरक्षित और संरक्षित रहा तो सम्पूर्ण स्वस्थता के लिए आकाश पाताल के कुलाबे मिलाने की जरूरत न पड़ेगी और थोड़े से प्रयास से ही वाँछित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकेगा।

इन दिनों सम्पूर्ण विश्व में समग्र स्वस्थता के प्रति चेतना तो जगी है और उसकी प्राप्ति के लिए तरह-तरह के उपाय और उपचार भी हो रहे है; पर पर्यावरण को बचाये बिना इस प्रकार के प्रयास आधे, अधूरे और अधकचरे ही कहे जाएँगे। शरीर खूब स्वच्छ हो और वस्त्र मैले-कुचले बने रहें, तो इसे स्वास्थ्य -संवर्द्धन की दिशा में एकाँगी प्रयत्न ही कहना पड़ेगा। होना यह चाहिए कि स्वास्थ्य-संरक्षण के प्रति जितनी और जिस प्रकार की सतर्कता और तत्परता बरती जा रही है उससे भी कई गुनी अधिक जागरुकता हवा , पानी मिट्टी की सुरक्षा के प्रति बरती जाने की आवश्यकता है, तभी हम सही अर्थों में उस स्थिति को उपलब्ध कर सकेंगे, जिसे समग्र स्वस्थता की संज्ञा दी जा सके।

सम्प्रति न तो साँस लेने के लिए शुद्ध हवा है, न पीने को स्वच्छ जल, यहाँ तक कि मिट्टी भी विषैले रसायनों के कारण निरापद नहीं रही। ऐसी स्थिति में ध्यान अनायास प्राकृतिक वातावरण की ओर खिंच जाता है। अब तक वन्य प्रान्तर ही ऐसे क्षेत्र थे, जिन्हें इन सब से अछूता कहा जा सकता था; पर पर्यटकों की बढ़ती भीड़ ने इन्हें कहीं का न रखा। वन-पर्वत सभी धीरे-धीरे इसकी चपेट में आ रहे हैं। अन्यों की स्थिति तो फिर भी ठीक कही जा सकती है, पर जिस दिव्यता के लिए हिमालय को पहचाना और बखाना जाता था वह भी अब दयनीयता की कहानी कहने लगे हैं। हिमालय को देवात्मा कहा गया है इसके दो कारण हैं। वहाँ का वातावरण इतना शान्त, मनोहारी और रमणीक है कि जाकर फिर जन संकुल वातावरण में लौटने की इच्छा नहीं होती। यह स्थूल वातावरण में लौटने की इच्छा नहीं होती। यह स्थूल वातावरण की चर्चा हुई। वहाँ का सूक्ष्म वातावरण इतना प्राणवान, प्रखर और ऊर्जा से ओत-प्रोत है कि दृश्य-अदृश्य का यह अद्भुत समन्वय उसे ऐसी दिव्यता प्रदान करता है, जिसे ‘देवात्मा’ कहना ही उचित होगा। सूक्ष्म शरीरधारी तपस्वियों और स्थूल देहधारी योगियों की उपस्थिति के कारण भी वह देवात्मा कहलाने योग्य है। आरंभ में हिमालय का यह देवत्वयुक्त वातावरण ही लोगों को आकर्षित करता था। साधक स्तर के लोग बीच-बीच में थोड़े दिनों के लिए वहाँ जाकर निवास और साधना करते, फिर लौट आते। प्रकृति प्रेमी वहाँ जाकर निवास और साधना करते, फिर लौट आते। प्रकृतिप्रेमी वहाँ के चित्ताकर्षक सौंदर्य के कारण उस ओर की यात्रा करते और सप्ताह-दो-सप्ताह के पर्यटन के बाद वापिस आ जाते; किंतु 50 के दशक में एक तीसरे प्रकार के अभियान की शुरुआत हुई। जो हिमालय अब तक अपनी दिव्यता और सुन्दरता के कारण साधकों एवं सैलानियों को आकर्षित करता था, वही अब अपनी सर्वोच्चता के लिए पर्वतारोहियों के आकर्षण का केन्द्र बना। दुनिया की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट यहीं है। कुछ साहसी किस्म के पर्वतारोही उस पर चढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर सके। इसी क्रम में सन् 1953 में न्यूजीलैण्ड के एडमंड हिलेरी और गोरखा तेनजिंग नोरगे ने सर्वप्रथम उस सर्वोच्च शिखर पर चढ़कर अपनी विजस-पताका फहरायी। इसके बाद से तो ऐसे अभियानों की मानों बाढ़-सी आ गयी। हर वर्ष कई-कई दल आरोहण के लिए प्रस्थान करते और सफल-असफल होकर लौट आते। अनेक इस प्रयास में कालकवलित भी हो जाते।

यहीं से हिमालय की दुर्दशा की शुरुआत हुई। आदमी की इन दिनों मानसिकता ऐसी बन गयी है कि वह जहाँ कहीं भी जाता या रहता है वहाँ के पर्यावरण से छेड़-छाड़ अवश्य करता है। यही इस पर्वतराज के साथ हुआ। जब पर्वतारोहण बड़े पैमाने पर आरंभ हुआ, तो पर्यावरण नष्ट होने लगा। यह स्वाभाविक है कि हिमालय जैसे पर्वत के एवरेस्ट जैसे दुर्गम शिखर की यात्रा के लिए कोई प्रयाण करेगा, तो उसके साथ वह सारे सामान और साधन भी होंगे, जो इस विषम परिस्थिति का सामना करने और जीवनरक्षा की दृष्टि से अभीष्ट और आवश्यक हों। उस उत्तुंग ऊँचाई में ऑक्सीजन की सिलेंडर भी होना चाहिए और मज्जा तक ठिठुराने वाली ठंड से बचने एवं गरम पेयों द्वारा शरीर की रक्षा करने के लिए स्टोव भी आवश्यक है। इसके अतिरिक्त गर्म कपड़े, कम्बल , स्वेटर, कोट, जूते, मोजे यह भी अभीष्ट हैं। बर्फीली हवाओं से बचने के लिए तम्बू और उन्हें गाड़ने वाले सामान भी चाहिए। बर्फ काटने वाली कुल्हाड़ी, जीवनरक्षक दवाएँ इनके अतिरिक्त अन्य कितनी ही नितान्त वस्तुओं की जरूरत पड़ती है, जो साथ रख ले जाना पड़ता है। इन सबको गट्ठर बाँधकर तो ले जाया नहीं जा सकता, इसके लिए बड़े-बड़े कार्टूनों कनस्तरों और डिब्बों की आवश्यकता पड़ती है। सारे सामान को इनमें पैकबन्द किया जाता है, फिर बड़ी बड़ी पॉलीथिन चादरों में उन्हें लपेटा जाता है, ताकि बारिश अथवा हिमपात से उनकी सुरक्षा की जा सके। इतना समान पर्वतारोही स्वयं लेकर यात्रा कर नहीं सकते। इन्हें ढोने के लिए मजदूर और जानवर चाहिए। बारह सदस्यों वाले दल के साथ औसतन 35-40 मजदूर और करीब इतने ही भारवाहक खच्चर अथवा पहाड़ी बकरे होते हैं। इन जानवरों को भी खुराक चाहिए, सो वे आस-पास की हरियाली का सफाया करते चलते हैं। बची-खुची कसर मजदूर पूरी करते हैं। उन्हें शीत निवारण के लिए गरमी चाहिए , अतः वे मार्ग में पड़ने वाले वृक्षों को काट डालते हैं । इसके अलावा जहाँ शिविर लगाया जाता है, वहाँ के वृक्ष-वनस्पतियाँ नष्ट हो जाते हैं।

यह उस क्षति की चर्चा हुई, जो पर्वतारोही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्यावरण को पहुँचाते हैं। इसका एक अन्य पहलू भी है। हिमालय के लिए सर्वाधिक खतरनाक यही सिद्ध हो रहा है। अभियान दल जब सफल-असफल होकर ऊँचे पर्वत शिखर से वापसी यात्रा करते हैं, तो उन्हें जिस सामान के बारे में ऐसा महसूस होता है कि अब यह उनके लिए आवश्यक और अनुपयोगी है, उन्हें भार से बचने के लिए वे वहीं चोटी पर अथवा मार्ग में छोड़ते चलते हैं। इस प्रकार पिछले 46 वर्षों में हिमालय एक विशाल ‘जंक यार्ड-कूड़ाघर’ बन गया है।

ऐसा अनुमान है कि एवरेस्ट मार्ग पर शिखर से ठीक पूर्व वाले शिविर-क्षेत्र में लगभग 80-85 हजार किलोग्राम कबाड़ पड़ा है। इनमें कनस्तर, डिब्बे, तम्बुओं के वारदाने खाली ऑक्सीजन सिलेंडर, पॉलीथिन बैग, कार्टून, पुलोवर, जैकेट, स्लीपिंग बैग, बर्फ हटाने वाले फावड़े , बर्फ काटने वाली कुल्हाड़ियाँ, रस्से, जीवनरक्षक और दर्द निवारक दवाइयों के पैकेट, व्हीस्की और रम की बोतलें प्रमुख हैं। पर्वतराज की दूसरी चोटियों के मार्ग पर भी इन कबाड़ों की कमी नहीं। स्वयं एवरेस्ट शिखर पर भी ऐसे कूड़े का बड़ा ढेर इकट्ठा हो गया है-ऐसा हिमालय पर्यावरण न्यास का कहना है। नेपाल सरकार ने अब इस ओर ध्यान देना आरंभ किया और प्रथम कदम के रूप में पर्वतारोहण की शुल्क दर 30 हजार डालर से बढ़ाकर 50 हजार डालर कर दी है। इससे भीड़-भाड़ में कुछ कमी तो अवश्य आयी है, किंतु फिर भी उनके प्रवाह को पूरी तरह रोक पाना इससे भी संभव न हो सका है। इसके अतिरिक्त उसने हिमालय सफाई अभियान के द्वारा बड़े पैमाने में कचरे वहाँ से हटाये गये ।

इस निमित्त भारत में भी एक न्यास की स्थापना की गई है, जिसका उद्देश्य विश्व स्तर पर हिमालय के पर्यावरण को सुरक्षित बनाये रखने के लिए जनचेतना जगाना है। इसके अतिरिक्त यह न्यास समय-समय पर सफाई अभियान भी आयोजित करता रहता है इसी अभियान के परिणामस्वरूप पिछले दिनों एक अमेरिका हाल वेंडल के नेतृत्व में एक सफाई दल का गठन किया गया । इस दल ने करीब 1700 किलोग्राम कूड़ा साफ किया, साथ ही नेपाल के पर्यटन मंत्रालय को इस बारे में एक विस्तृत रूपरेखा तैयार करके दी है, ताकि शेष बचे कूड़े को भी जल्दी से जल्दी हटाने का कार्य आरंभ किया जा सके।

समस्या का यह कोई वास्तविक और स्थायी हल नहीं है। यथार्थ समाधान तो तभी हो सकेगा, जब हर पर्वतारोही इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझे और उसे स्वच्छ , सुन्दर एवं असली रूप में बनाये रखने के लिए सचेष्ट बना रहे अन्यथा सिर्फ सफाई-अभियान के बल पर वहाँ के पर्यावरण को बचाये रख पाना संभव न हो सकेगा, कारण कि मनुष्य की यह सहज और स्वाभाविक वृत्ति है कि वह हर सुदर्शन लगने वाली चीज के साथ छेड़खानी करता है। कहीं कोई बहुत आकर्षक पुष्प खिला हुआ हो, तो वह उसे तोड़कर अपने साथ ले जाने के लिए मचलने लगता है। इस बात को इसकी बुद्धि नहीं सोच पाती कि इससे उपवन की कितनी शोभा बढ़ी है और कितने लोग यहाँ आकर शाँति एवं संतोष की अनुभूति करते हैं, पर स्वार्थी बुद्धि को यह कैसे समझाया जाय कि समष्टिपरक चिन्तन में ही उसकी अपनी भलाई निहित है, व्यष्टिवादी चिन्तन तो घोर स्वार्थपरता के अंधकूप में डुबो देता है।

इक्कीसवीं सदी को महाकाल ने उज्ज्वल भविष्य में मनुष्य का सिर्फ चिन्तन ही नहीं बदलेगा, वरन् वह वृत्तियाँ भी बदलेंगी, जो आज विश्व-समुदाय के लिए गहरे संकट खड़े कर रही हैं। तब मनुष्य मात्र अपने निजी स्वास्थ्य की ही चिंता न करेगा, अपितु उस दिशा में सोचने के लिए भी विवश होगा, जिससे सम्पूर्ण समुदाय के लिए समग्र स्वास्थ्य की प्राप्ति की जा सके। इस दिशा में उसका प्रथम कदम पर्यावरण की रक्षा होगा, कारण कि पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य एक दूसरे से गहरे सम्बद्ध हैं और एक की रक्षा के बिना दूसरे की उपलब्धि किसी भी कीमत पर शक्य नहीं।


परिवार के सहकार-सहयोग में वास्तविक बल है (Kahani)

संयुक्त रहने की फलश्रुतियाँ अनेकों हैं। एकाकी तो प्रखर-प्रतिभा को भी जंग लग जाती है। ऋषि अंगिरा के शिष्य उदयन बड़े प्रतिभाशाली थे, पर अपनी प्रतिभा के स्वतंत्र प्रदर्शन की उमंग उनमें रहती थी। साथी-सहयोगियों से अलग अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास यदा-कदा किया करते थे। ऋषि ने सोचा, यह वृत्ति इसे ले डूबेगी। समय रहते समझाना होगा।

सर्दी का दिन था। बीच में रखी अँगीठी में कोयले दहक रहे थे। सत्संग चल रहा था। ऋषि बोले-”कैसी सुन्दर अँगीठी दहक रही है। इसका श्रेय इसमें दहक रहे कोयलों को है न?” सभी ने स्वीकार किया।

ऋषि पुनः बोले-”देखो, अमुक कोयला सबसे बड़ा, सबसे तेजस्वी है। इसे निकालकर मेरे पास रख दो। ऐसे तेजस्वी का लाभ अधिक निकट से लूँगा।”

चिमटे से पकड़कर वह बड़ा तेजस्वी अंगार ऋषि के समीप रख दिया। पर यह क्या, वह मुरझा-सा गया। उस पर राख की पर्त आ गयी और वह तेजस्वी अंगार काला कोयला भर रह गया।

ऋषि बोले-”बच्चों, देखो तुम चाहे जितने तेजस्वी हो, पर इस कोयले जैसी भूल मत कर बैठना। अँगीठी में सबके साथ रहता, तो अन्त तक तेजस्वी रहता और सबके बाद तक गर्मी देता। पर अब न इसका श्रेय रहा और न इसकी प्रतिभा का लाभ उठा सके।”

शिष्यों को समझाया गया-परिवार वह अँगीठी है, जिसमें प्रतिभाएँ संयुक्त रूप से तपती हैं। व्यक्तिगत प्रतिभा का अहंकार न टिकता है न फलित होता है। परिवार के सहकार-सहयोग में वास्तविक बल है।


शिक्षा के साथ विद्या का समन्वय हो

आज विश्वशांति के लिए राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ, बड़े-बड़े शिक्षा-शास्त्री, मूर्धन्य विचारक, राजनीतिज्ञ, धर्मनेता आदि सभी अपने-अपने ढंग से प्रयत्नशील हैं। कोई शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन की बात कहता है, कोई निरस्त्रीकरण की, तो कोई सत्ता के परिवर्तन पर बल देता है। परन्तु वास्तविकता इससे भिन्न है। आँतरिक शाँति के बिना बाहरी उपायों से शान्ति की कल्पना करना निरर्थक है। सुप्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री के0 जी0 सैयदन ने अपनी कृति ‘एजुकेशन कल्चर एण्ड दी सोशल ऑर्डर’ में इस संबंध में लिखा है कि-”जब तक मानव हृदय में शाँति नहीं है, मानव-मानव के बीच शान्ति नहीं है हमारी शिक्षित वृत्तियों और आदर्शों के बीच शाँति नहीं है, तब तक विश्व में पूर्ण शाँति की संभावना नहीं की जा सकती है। इसके लिए हमें मनुष्य के शैक्षिक-बौद्धिक उत्थान के साथ-साथ उसके नैतिक एवं चारित्रिक सद्गुणों के सर्वांगीण विकास के लिए हर संभव सभी उपाय-उपचार अपनाने होंगे। स्थायी सुख-शांति की स्थापना तभी संभव है।”

जो ज्ञान मनुष्य को सही दिशा, उन्नति का सही मार्ग और जीवन का सच्चा प्रकाश दिखाता है, उसे अध्यात्म कहते हैं। मनुष्य को निम्न धरातल से उठाकर उच्चासन पर बिठाने के लिए अध्यात्म ही कारगर उपाय है, जिसे जाग्रत करने का काम बचपन से ही आरम्भ करना होगा। विवेक जगाने वाली विद्या न रही तो मनुष्य का पतित होना स्वाभाविक है। मनुष्य के भीतर जो कुसंस्कार है, पशुत्व है, जो ........... है। उसे दूर करने का एकमात्र उपाय विद्या की प्रवीणता ही है। जब तक जीवन की दिशा सात्विक नहीं होती, गुण कर्म, स्वभाव में सतत्वों का समावेश नहीं होता, मनुष्य की जड़ता और पशुता तब तक दूर नहीं हो सकती। प्रगति, शाँति और सुव्यवस्था के लिए आवश्यक है कि मनुष्य को बचपन से ही नैतिक दृष्टि से उत्कृष्ट बनाया जाय अन्यथा कल की जिम्मेदारियों को संभालने वाले भावी कर्णधारों की यदि नींव ही कमजोर रही तो फिर योजनाएँ कितनी ही उत्तम क्यों न हों, उन्हें चलाने वाले यदि उपयुक्त स्तर के न हुए तो सफलता संदिग्ध रहेगी। आज वही हो भी रहा है।

शिक्षा वस्तुतः वह है जो व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं का स्वरूप एवं समाधान सुझाये। पर आधुनिक शिक्षा का, विद्या का स्वरूप बहुत कुछ बदल गया है। उसमें नैतिक-शिक्षण और चरित्र निर्माण के लिए कोई स्थान नहीं है, कोरी बौद्धिक उन्नति की ओर ही प्रयत्न है। विद्यार्थियों का चरित्र-बल, कर्मशक्ति,आशा, विश्वास, उत्साह, पौरुष, संयम और सात्विकता जाग्रत करने की शक्ति उसमें नहीं है। जिस विद्या में कर्तव्यशक्ति की प्रेरणा न मिलती हो, स्वतंत्र रूप से विचार करने की बुद्धि न आती हो, परिस्थितियों से टकराने की सामर्थ्य जो न दे सके, ऐसी निष्प्राण-निस्तेज विद्या अगणित समस्याओं के अतिरिक्त और दे ही क्या सकती है? आज सर्वत्र ऐसी ही विद्या का प्रचलन है। प्रतिवर्ष असंख्यों विद्यार्थी ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ लेकर निकलते तो हैं, पर उनमें छल-कपट, धूर्तता, दुश्चरित्रता, फैशनपरस्ती, विलासिता, द्वेष और अहंकार के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई देता। ऐसे व्यक्ति जब महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होते हैं तो देश, समाज व संस्कृति को ऊँचा उठाने की बजाय अपनी करतूतों से उसे कलंकित ही करते हैं।

व्यक्तित्वों का निर्माण राष्ट्र की, विश्व की, मानवता की महती आवश्यकता है, विशेषतया आज के अनास्था, अवाँछनीयता एवं नैतिक अराजकता के वातावरण में। पुराने मूल्याँकन, आधार और प्रचलन बदल गये। नयी पीढ़ी, नयी संस्कृति ने जड़ पकड़ी। इसमें प्रामाणिकता और प्रखरता अपनाने के लिए अभिरुचि रह नहीं गयी। उसी का प्रतिफल है कि व्यक्ति और समाज की अनेकानेक समस्याएँ उलझन में डाले हुए हैं। अनेकानेक संकट सहने पड़ रहे हैं। इनका समग्र समाधान तब तक नहीं निकल सकता जब तक कि जनसाधारण को मानवी गरिमा के अनुरूप अपना दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप ढालने के लिए सहमत-तत्पर न किया जाय। आज की यह महती आवश्यकता है। इस बुद्धिवाद के युग में इस घेरे से लोकमानस को निकालने व अनुशासित करने के लिए ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो नीति, सदाचार, कर्तव्यपरायणता व प्रामाणिकता का पक्षधर हो। इसके अभाव में ही चहुँओर अशांति एवं भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हुई हैं। इस संबंध में मूर्धन्य विद्वान श्री हेमचन्द्र ने वर्तमान समय में अनीति व बेईमानी की बुद्धि का कारण धार्मिक-अर्थात् आध्यात्मिक शिक्षा की कमी का उल्लेख करते हुए-’युग संदेश’ में लिखा है-”सामाजिक और राजकीय क्षेत्र में प्रवर्तित सारी अव्यवस्था की जड़ शिक्षा में धार्मिक प्रशिक्षण का अभाव है।”

यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि धर्म का अभिप्राय नीतिमत्तापूर्ण कर्तव्यपरायण जीवन से है, धर्म के स्थूल स्वरूप से नहीं, जो विभिन्न सम्प्रदायों के रूप में परिलक्षित होता है। धर्म के महत्व के संबंध में प्रसिद्ध समाजशास्त्री ई0ओ0 जेम्स ने अपनी कृति ‘सोशल फंक्सन ऑफ रिलीजन’ में लिखा है कि आज की विकट परिस्थितियों में मानव समाज में धर्म अतिशय महत्वपूर्ण वस्तु बन गया है। धार्मिक सिद्धान्त अथवा नियम मनुष्य के दैनिक जीवन की दुर्बलताओं को धीरे-धीरे मिटाकर उसे दैवी-शक्ति की दिशा में आगे बढ़ाने का उद्देश्य रखते हैं। सामाजिक जीवन को अस्तित्व में लाने वाला उसे सही दिशा प्रदान करने वाला धर्म या अध्यात्म है। परन्तु आधुनिक समय में इसका प्रभाव कम होने से मनुष्य के जीवन और कार्य के बीच सुसंगति नहीं मिलती। असंतोष और अशांति का यह एक प्रमुख कारण है।

गोर्डन मेल्विन ने ‘जनरल मेथड्स ऑफ टीचिंग’ में तमाम दुःखों एवं अशांति का कारण स्वार्थ, संग्रह-परिग्रह की वृत्ति को बताते हुए लिखा है-”यदि व्यक्तिवाद मिट जाय तो संसार अनेक प्रकार के दुखों से मुक्ति पा जाएगा, क्योंकि तब स्वार्थ की भावना ही मिट जाएगी। उनने नैतिक शिक्षा द्वारा नेतृत्व विकास की संभावनाएँ बताते हुए कहा है कि सामूहिक जीवन या समूह प्रवृत्ति द्वारा नेतृत्व शक्ति का विकास सम्भव है, क्योंकि संपूर्ण सामूहिक जीवन का यह विशेष लक्षण है कि उसे प्रखर और प्रामाणिक नेतृत्व चाहिए। नेताओं में त्रुटियों का सर्वत्र उल्लेख मिलता है। इसका कारण यह है कि उन्हें आरंभ से ही न तो नीति व सदाचरणपरक शिक्षा दी गयी और न ही उनके नेतृत्व के लिए आवश्यक प्रशिक्षक दिया गया, जिसके कारण उनकी प्रवृत्ति प्रदत्त विशिष्ट शक्तियों का विकास हो पाता।”

मानव जीवन के साथ नैतिकता का अटूट सम्बन्ध है। ‘एजुकेशन फॉर सिटीजन रिसपान्सीव्लिटीज’ नामक पुस्तक में फ्रैंकलिन ने कहा है कि नैतिकता मनुष्य की स्थिति को उन्नत करने का मार्ग खोजती है, उसके कंधे पर थोपा गया कृत्रिम बोझ उतार देती है, संकटपूर्ण मार्ग को सरल बनाती है और प्रत्येक को उसके जीवन के प्रारंभ से ही बंधनमुक्त कर जीवन में प्रगति करने का उत्तम अवसर देती है। शिक्षा वही सार्थक दिशा दे सकती है जिसमें नैतिकता का समावेश हो। इस संदर्भ में गान्धीजी ने शिक्षा के नैतिक पहलू का विश्लेषण करते हुए कहा है-”जो शिक्षा चित्त शुद्ध न करे, मन-इन्द्रियों को वश में रखना न सिखाये, निर्भयता और स्वावलम्बन न

, निर्वाह का साधन न बताये, सजगता, उत्साह और शक्ति उत्पन्न न कर सके-उस शिक्षा में चाहें जितना जानकारी का भंडार, तार्किक कुशलता एवं भाषा पाण्डित्य हो, फिर भी वह शिक्षा नहीं है अथवा वह अपूर्ण शिक्षा है।”

‘द .......... प्राब्लम्स ऑफ एजुकेशन’ में विलियम कनिंघम ने शिक्षा का व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि शिक्षा मात्र आजीविका प्राप्ति का साधन नहीं है। मनुष्य में पशु से उच्चतर जीवन जीने की योग्यता है, जिससे वह अपना मूल स्रोत, जीवन, भाग्य, प्रकृति आदि की जानकारी पाने की चेष्टा करता है। मानवता एक स्वर से घोषणा कर रही है कि उसका मूल स्रोत ईश्वर है। प्रकृति स्वतंत्र है, उसे भाग्य ईश्वर की इच्छा के साथ जुड़ा हुआ है। अपने जीवन की स्वतन्त्रता का उपयोग उसका भाग्य है। उसमें निष्फल होने पर उसकी सामर्थ्य व दिव्यशक्तियां व्यर्थ हो जाती हैं। उनके अनुसार यथार्थ शिक्षा का उद्देश्य प्रतिभा का, शक्ति का विकास है। बच्चों की शक्तियों की उचित रूप में कसौटी करने से उनके अंतर्भूत सत्व का विकास होता है। इससे वे शक्तियाँ अपना कार्य सुचारु रूप में कर सकती है। जीवन की सफलता के लिए शारीरिक, मानसिक व आत्मिक तीनों ही प्रकार की शक्तियों का विकास अनिवार्य है।

प्रख्यात दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने शिक्षा के विषय में कहा है- “ईश्वर ने हमें जो पुरस्कार दिया है, वह प्रकृति है। उस प्रकृति के अनुरूप होना कर्तव्य है, उस मार्ग का नेतृत्व शिक्षा का कार्य है।” इसी तरह विद्वान ओलोन्जो ने ‘एजुकेशन इन ए डेमोक्रेसी’ नामक पुस्तक में लिखा है कि-”नैतिक शिक्षा का ध्येय सदाचार के लिए मानवी मनोबल को दृढ़कर उसमें अच्छी आदतें डालना है।” महान शिक्षाशास्त्री पेस्टॉलोजी ने कहा है कि-”शिक्षा द्वारा मनुष्य को व्यावहारिक ज्ञान मिलना चाहिए। उसकी नैतिक, बौद्धिक एवं शारीरिक शक्तियों का विकास करने से ही वह मनुष्य हो सकता है, जो शिक्षा का ध्येय है।” महान दार्शनिक अरस्तू ने भी कहा है-”शिक्षा का उद्देश्य सुन्दर चरित्र निर्माण है। चरित्र का निर्माण आदतों और आदर्शों पर निर्भर करता है और उसी के आधार पर समाज, संस्कृति व राष्ट्र का विकास होता है। नैतिक शिक्षा मानव जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।”

मानव प्रकृति प्रदत्त शक्तियों को विकसित कर आदर्श रूप में ढाले और अपना चरित्र निर्माण कर व्यक्तित्व का विकास करे, नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बने, यही जीवन का उद्देश्य है और ऐसा ही जीवन उत्तम माना जाता है। प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन करे, वही सर्वोत्कृष्ट अच्छाई मानी जाती है और यह कार्य मात्र प्रचलित शिक्षा से नहीं वरन् उसके साथ अध्यात्म विद्या के समन्वय से ही सम्पन्न हो सकता है। महान शिक्षाशास्त्री एवं दार्शनिक हरबर्ट स्पेन्सर ने कहा है कि’-मानव समाज में, विश्व में स्थायी, सुख-शांति के लिए आवश्यक है कि शिक्षा को दार्शनिक बनाया जाय। अध्यात्म विद्या की प्राप्ति से ही मानव स्वभाव का रहस्य जाना जा सकता है। शिक्षा की नींव अध्यात्म विद्या पर आधारित होनी चाहिए। इसी के द्वारा बच्चों के विचारों को सर्वप्रथम नियंत्रित करना चाहिए। उसके पश्चात् विभिन्न विचारों का विकास होने पर वह क्रियाशील बनता है और उसके बाद ही चरित्र-निर्माण की संभावना है। उसके लिए सुविचारों के द्वारा धार्मिक एवं नैतिक भाव उत्पन्न करने होंगे। नैतिकता के विकास द्वारा ही चरित्र-निर्माण हो सकता है। शिक्षण का आदर्श चरित्रवान व्यक्तित्व का विकास है। वस्तुतः आज ऐसे ही नैतिक एवं चारित्रिक दृष्टि से उन्नत व्यक्तित्वों की अधिकाधिक संख्या में देश और समाज को आवश्यकता है।


स्वार्थपरता (Kahani)

एक बालक की मृत्यु हो गई। अभिभावक उसे नदी तट वाले श्मशान में ले पहुँचे। वर्षा हो रही थी, विचार चल रहा था कि इस स्थिति में संस्कार कैसे किया जाय?

उनकी पारस्परिक वार्ता में निकट उपस्थित प्राणियों ने हस्तक्षेप किया और बिना पूछे ही अपनी-अपनी सम्मति भी बता दी।

सियार ने कहा-भूमि में दबा देने का बहुत माहात्म्य है। धरती-माता की गोद में समर्पित करना श्रेष्ठ है। कछुए ने कहा-गंगा से बढ़कर कोई तरण-तारणी नहीं है। आप लोग शव को प्रवाहित क्यों नहीं कर देते। गिद्ध की सम्मति थी सूर्य और पवन के सम्मुख उसे खुला छोड़ देना उत्तम है। पानी और मिट्टी में अपने स्नेही की काया को क्यों सड़ाया-गलाया जाय?

अभिभावकों को समझने में देर न लगी कि तीनों के परामर्श सद्भाव जैसे दीखते हुए भी कितनी स्वार्थपरता से सने हुए हैं। उनने तीनों परामर्शदाताओं को धन्यवाद देकर विदा कर दिया। बादल खुलते ही चिता में अग्नि संस्कार किया।


नारी, नर से कहीं अधिक श्रेष्ठ

यों तो पुरुष प्रधान समाज में नारियों को दूसरे दर्जे की नागरिक के रूप में मान्यता मिली हुई है, पर समाज-व्यवस्था संबंधी इस दोष की अवहेलना कर यदि नर-नारी की पारस्परिक तुलना करें , तो कई दृष्टियों में स्त्रियाँ, पुरुषों से श्रेष्ठ साबित होंगी।

उदाहरण के लिए, आयुष्य को लिया जा सकता है। सर्वेक्षणों से ज्ञात हुआ है कि पुरुषों की अपेक्षा नारियाँ दीर्घजीवी होती हैं। ऐसा किसी स्थान अथवा वातावरण विशेष के कारण नहीं, वरन् सम्पूर्ण विश्व में अध्ययनों के दौरान न्यूनाधिक यही तथ्य उभरकर सामने आया है कि स्थान अथवा जलवायु की यह कोई विशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं, अपितु एक जातिगत वैशिष्ट्य है। नारी-शरीर में किन तत्वों की उपस्थिति के कारण ऐसा होता है-यह तो अभी सही-सही नहीं जाना जा सका है; पर शरीरशास्त्रियों ने इस संदर्भ में कई अनुमान अवश्य लगाये हैं। एक अनुमान के अनुसार स्त्रियों में पाया जाने वाला विशेष प्रकार का (XX किस्म का) गुणसूत्र ही इसके लिए जिम्मेदार है। उनके अनुसार महिलाओं में चूँकि गुणसूत्रों की आधी संख्या पिता से और आधी माता से आती है, अतः यह उसकी प्रकृति को न सिर्फ मजबूत बनाते हैं, वरन् आयु की दृष्टि से दीर्घता भी प्रदान करते हैं। पुरुषों की स्थिति में उनमें उपस्थिति Y गुणसूत्र इसमें अड़चनें खड़ी करते हैं। उल्लेखनीय है कि नारियों में सहनशीलता, तनाव झेलने कली सामर्थ्य पुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक होती है। यह विशेषता X परिकर के गुणसूत्रों की विद्यमानता के कारण पायी जाती है। जिस प्रकार समान स्वभाव वाले लोग एक समूह में इकट्ठे होकर अपनी विचारधारा को अधिक प्रबल और प्रखर बना लेते हैं, वही बात नारियों में गुणसूत्रों के संबंध में भी लागू होती है, ऐसा विज्ञानवेत्ताओं का मानना है। फिर भी वे अभी इसे निश्चित रूप से बता पाने में सफल नहीं हो पाये हैं कि यदि X X गुणसूत्र स्त्रियों में दीर्घजीवन के लिए उत्तरदायी है, तो वह कौन सी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा वे इसे क्रियान्वित करते हैं और पुरुषों में यदि Y क्रोमोसोम की विद्यमानता उन्हें अल्पजीवी बनाती है, तो इसमें वह कौन-सा तत्व है जो उसकी उम्र को तुलनात्मक रूप से कम करता है।

कतिपय शरीरवेत्ताओं का विश्वास है कि इसमें नारी रसस्रावों का हाथ हो सकता है। ज्ञातव्य है कि स्त्रियों में कुछ ऐसे हारमोन पाये जाते हैं, जिनका पुरुष-शरीर में अभाव होता है। कदाचित् यह अभाव ही पुरुषों को इस क्षेत्र में पिछड़ा बनाता हो; जबकि प्रकृति प्रदत्त अतिरिक्त रसस्राव महिलाओं के लिए वरदान सिद्ध होता है। यह सच है कि इन रसायनों के कारण नारी-देह की स्वाभाविक संरचना अत्यन्त कोमल हो जाती है, इस कारण उसे कोमलाँगी कहकर पुकारते हैं, पर मिथ्या यह भी नहीं है कि इन्हीं तत्वों के कारण उसकी आन्तरिक बनावट इतनी उदात्त और अभिव्यक्ति ‘देवी’ के उसके सम्बोधन से स्पष्ट प्रतिभासित और परिलक्षित होती है। इसी कारण जब कभी बाल-सुलभ सरलता और कोमलता को भारतीय मिथकों और बहुदेववादी कथाओं में प्रदर्शित करने की आवश्यकता पड़ी, तो उसे नारी स्वरूप में ही दर्शाया गया। सरस्वती, लक्ष्मी, ब्राह्मी, वैष्णवी, शीवी, अजपा, देवमाता, वेदमाता, दुर्गा, काली-यह वस्तुतः देवियाँ नहीं नारी अन्तःकरण की विभूतियाँ हैं, जिनका आवश्यकतानुसार वह प्रयोग करती रहती है। यदि उनका स्वभाव देवमाता की तरह का देवतुल्य और सरस्वती जैसी सात्विक बुद्धि वाला है तो काली, दुर्गा जैसी कठोरता का भी प्रदर्शन वह समयानुसार कर सकती है। इन गुणों को पृथक्-पृथक् पहचानने की सुविधा के लिए ही इन्हें मूर्ति रूप में गढ़ दिया गया है। वास्तव में यह हैं सभी नारी अन्तराल के ही तत्व। इनका सम्पूर्ण और समग्र स्वरूप ‘आद्यशक्ति’- एक सर्वांगपूर्ण नारी के रूप में दर्शाया गया है जिसका एक ही अर्थ है कि यह सम्पूर्ण शक्ति-धारा अथवा गुणावलियाँ उस विशाल और समृद्ध अन्तःकरण के ही तत्व हैं, जिसे ‘नारी’ अथवा गुणावलियाँ उस विशाल और समृद्ध अन्तःकरण के ही तत्व हैं, जिसे ‘नारी’ अथवा ‘देवी’ कहा गया है।

जबकि पुरुष तो केवल पुरुष (कठोर) होते हैं; उनमें अन्तराल की वह सम्पदा कहाँ दिखाई पड़ती, जो नारियों में होती है, साहस और दुस्साहस जैसे तत्त्व तो हो सकते हैं; पर उनके पूरक कोमलता और करुणा, भावना और संवेदना कहाँ होती है। इस दृष्टि से उन्हें एक प्रकार से अधूरा ही कहना पड़ेगा। व्यवहार में भी प्रायः यह देखा जाता है कि कितनी ही माताएँ पति के दिवंगत होने के उपरान्त बच्चों के लिए माता और पिता दोनों ही की भूमिका निभाती हैं; पर ऐसा शायद कहीं देखा जाता हो, जिसमें पिता ने बालकों के लिए माता की कमी पूरी कर दी हों माता की कमी वास्तव में कोई माता ही पूरी कर सकती है, पुरुष-हृदय के वश की यह बात नहीं। इसलिए स्त्री को सर्वांगीण (जिसमें स्त्री और पुरुष तत्त्व दोनों हों) कहने में कोई हर्ज नहीं, जबकि नर को एकाँगी ही कहना पड़ेगा।

नारी का एक नाम -?’ तन्वंगी’ (सुन्दर अंगों वाली) भी है। सुन्दर अंगों की सार्थकता श्रेष्ठ अन्तःकरण के साथ ही हो सकती है, इसी कारण समाज में उसकी पहचान करुणामयी रूप है, भले ही इसके विपरीत गुण भी उसमें विद्यमान क्यों न हो, पर अक्सर उनका प्रयोग वह अत्यन्त विषम स्थिति में अन्तिम अस्त्र के रूप में ही करती है, अतएव उन्हें करुणा की देवी और श्रद्धा की प्रतिमूर्ति कहा जाना उचित ही है। जयशंकर प्रसाद ने भी इसी मत का समर्थन करते हुए अपने उद्गार निम्न रूप में व्यक्त किये हैं-

नारी केवल तुम श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पग तल में, पीयूष-स्रातन्-सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में।

इस प्रकार नारी न केवल आयुष्य में, वरन् आन्तरिक सम्पदा में भी नर से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। उसका अपमान नहीं, सम्मान किया जाना चाहिए।


स्वाद नहीं, स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिए

उत्तम भोजन किसे माना जाय? आहार शास्त्र की दृष्टि से विचार करे, तो जिस भोजन में सारे पोषक तत्त्व विद्यमान हो,, उसे इस श्रेणी में रखा जाना चाहिए। स्वास्थ्य शास्त्र भी न्यूनाधिक इसी मत का समर्थन करता है। पाक विज्ञानियों की मान्यता इससे कुछ भिन्न है। वे भोजन के स्तर का आकलन स्वाद के आधार पर करते हैं। जो जितना स्वादिष्ट व्यंजन, वह उतना बढ़िया भोजन-ऐसा उनका विचार है।

शरीरशास्त्र का निर्धारण शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों पर आधारित है। भोजन चाहे कितना ही स्वादिष्ट क्यों न हो, उसका प्रभाव यदि अवाँछनीय है, तो वह अखाद्य की कोटि में ही रखा जाने योग्य है। इन दिनों खाद्य-अखाद्य की परवाह किसे बिना लोगों का झुकाव स्वाद की ओर अधिकाधिक बढ़ा है, फलतः बीमारियाँ और कुपोषणजन्य समस्याएँ भी बढ़ी हैं। किसी व्यक्ति का रुझान यदि किसी ऐसे भोजन के प्रति है, जिसमें पोषक तत्व के नाम पर कुछ भी नहीं, तो इसका एक बड़ा कारण उसका वह स्वाद ही माना जाना चाहिए, जिसके रसास्वादन का लोभ वह संवारण नहीं कर पाता। इस प्रवृत्ति पर हमें अंकुश लगाना पड़ेगा, जो हमारी स्वादेन्द्रिय को तुष्ट नहीं, शरीर को परिपुष्ट और पोषित कर सके।

यों तो हर प्रकार के खाद्य में न्यूनाधिक पोषण तत्त्व पाये ही जाते हैं, किन्तु उन्हें पकने की वर्तमान विधि के कारण वे अंशतः या पूर्णतः नष्ट हो जाते है॥ इतना होता, तो भी संतोष की बात थी, पर कई बार स्वाद के निमित्त अपनायी जाने वाली विधि के कारण भोज्य पदार्थों में इतने खतरनाक रसायन पैदा हो जाते हैं जिससे गंभीर स्वास्थ्य संकट की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। इन्हीं में से एक है तन्दूरी भोजन।

तन्दूरी भोजन आखिर है क्या? कोई विशिष्ट खाद्य? नहीं, विशेष विधि से पकाये जाने के कारण ही यह विशिष्ट नाम से सम्बोधित होता है; चूंकि इस प्रकार का भोजन सामान्य चूल्हे की जगह ‘तन्दूर’ नामक एक विशिष्ट प्रकार के चूल्हे में बनाया जाता है, अतः इस पर पकने वाला सम्पूर्ण भोजन ‘तन्दूरी भोजन’ कहलाता है इस भोजन के प्रति सर्वसाधारण की अभिरुचि बहुत अधिक दिखाई पड़ती है। इसका एक कारण है, वह यह कि इसमें पका भोजन अन्यों की तुलना में अधिक स्वादिष्ट और रुचिकर होता है अभी पिछले ही दिनों इस भोजन के संबंध में एक चौंकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया है कि इस प्रकार के भोजन से कैंसर की सम्भावना बढ़ जाती है। ‘मलान नेशनल ट्यूमर इन्स्टीट्यूट’ के निदेशक डॉ0 कार्लो सितौरी इस क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से अनुसंधानरत थे। अपने अध्ययन के दौरान उनने पाया कि तन्दूर में सिंकने वाली रोटियों एवं इसमें पकने वाले अन्य भोजनों में ‘वेंजोपाइरीन’ नामक एक घातक रसायन पैदा होता है, जो कैंसरजन्य है। अतः इस प्रकार के भोजन करने वालों में अन्यों की अपेक्षा कैंसर की सम्भावना अधिक बढ़ी चढ़ी होती है।

उल्लेखनीय है कि धूम्रपान की प्रक्रिया में भी बेंजोपाइरीन का निर्माण होता है। डॉ. कार्लो सितौरी एक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि एक किलो माँस पकाने से जितना बेंजोपाइरीन उत्पन्न होता है, वह 600 सिगरेट पीने से पैदा हुए रसायन के बराबर है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सिगरेट पीने में एक बार में जितना बेंजोपाइरीन व्यक्ति ग्रहण करता है, उसकी तुलना में अनेकों गुना अधिक रसायन वह एक बार के भोजन द्वारा उदरस्थ कर जाता है। यदि कोई व्यक्ति एक समय में 250 ग्राम तन्दूरी माँस खाता है, तो बेंजोपाइरीन की दृष्टि से यह 150 सिगरेट पीने के बराबर हुआ। अर्थात् जितना बेंजोपाइरीन 250 ग्राम माँस से प्राप्त हो रहा है, उतने के लिए 150 सिगरेट पीनी पड़ेंगी। स्पष्ट है इतनी सिगरेट एक दिन में कोई भी व्यक्ति नहीं पी सकता। यदि प्रतिदिन 10 के औसत से भी पी जाय, तो इतनी बड़ी संख्या पीने में इसे 15 दिन लगेंगे, अर्थात् एक धूम्रसेवी लगभग दो सप्ताह में जितना रसायन ग्रहण करता है, उतना रसायन करीब 20-25 मिनट के अन्दर ही तन्दूरी भोजन द्वारा शरीर में पहुँचा दिया जाता है। इस प्रकार तुलनात्मक दृष्टि से सिगरेट पीना उतना खतरनाक नहीं, जितना तन्दूरी भोजन।

अब प्रश्न है कि तन्दूरी भोजन में यह घातक रसायन किस प्रकार उत्पन्न हो जात है। इसका उत्तर देते हुए डॉ0 कार्लो कहते हैं कि चूँकि तन्दूर के भीतर तापमान लगभग 800 डिग्री सेण्टीग्रेड जितना होता है, अतः जब इस अति उच्च तापमान में रोटी अथवा माँस को पकने के लिए डाला जाता है तो भोजन का प्रोटीन वाला अंश उच्च तापमान में एक रासायनिक अभिक्रिया द्वारा कैंसरजन्य बेंजोपाइरीन में परिवर्तित हो जाता है।

वाँछितार्थ फलं सौख्यमिंद्रियाणाँच मारणम् । एनदुक्तानि सर्वाणि योगारुढस्य योगिनः॥ षिव संहिता

अभीष्ट प्रयोजनों की प्राप्ति, सुख तथा इन्द्रिय निग्रह यह सब सफलताएँ योग साधक को मिलती हैं।

अनुसंधानकर्त्ता वैज्ञानिक का यह भी कहना है कि ग्राम्य अंचलों में रोटी बनाने के लिए अपनायी जाने वाली विधि ही सर्वश्रेष्ठ है। कारण कि इसमें रोटी आग के सीधे संपर्क में नहीं आ पाती। अध्ययनों से यह भी विदित हुआ है कि लकड़ी की आँच में सिंकी रोटी स्वाद, गुणवत्ता और पौष्टिकता की दृष्टि से गैस, स्टोव, हीटर अथवा पत्थर कोयले के चूल्हे में बनी रोटी से कहीं अधिक अच्छी होती है, क्योंकि यहाँ रोटी धीमी आँच और न्यून ताप पर देर तक सिंकती है, जबकि अन्य माध्यमों में तापमान ज्यादा होने के कारण वह जल्द ही जलने लगती हैं।

हम स्वाद के पीछे न भागे, आहार शास्त्र के अनुशासन को अपनायें और स्वास्थ्य विज्ञान के हिसाब से चलें, तो कोई कारण नहीं कि अधिक स्वस्थ और नीरोग न रह सकें।


अपेक्षित संस्कार जन्म के पूर्व से ही दिये जाए

मनुष्य का शरीर और जीवन भगवान ने नीरोग और क्षमता सम्पन्न बनाया है। पर यदि उसे गर्भावस्था से ही समुचित साज-संभाल करने व भावनात्मक पोषण मिलने की बजाय टोंचते रहा जाय और कुसंस्कारी वातावरण में पाला जाय, तो उस विनाशक्रम का प्रभाव पड़े बिना न रहेगा। उसका आहार-विहार, रहन-सहन, चरित्र उसके पालक-संरक्षक आदि से अंत तक बिगाड़ते ही रहें, तो उसका परिणाम दुःखद ही होगा। वह स्वभावतः शारीरिक-मानसिक रोगों से घिरा रहेगा और अपने-अपने परिवार तथा समाज के लिए भार बनेगा। आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए तथा सम्पन्न व विकसित देशों में ऐसे दुर्दशाग्रस्त व्यक्तियों की संख्या कितनी अधिक है, इसे देखकर दुःख होता है। मनुष्य ने आना, अपनी संतान का-परिवार का यदि समुचित ध्यान रखा हाता और कर्तव्य निवाहा होता तो दयनीय स्थिति इतनी तेजी से न बढ़ती।

कोमल पौधों की कितनी अधिक साज-संभाल रखनी पड़ती है, कुशल माली इस तथ्य से भली-भाँति परिचित होते हैं। छुई-मुई की बेल अँगुली लगने भर से मुरझा जाती है। बीजाँकुरण के पश्चात् यदि कोमल तंतुओं को समुचित मात्रा में जल, वायु, धूप व पोषक तत्व न मिलें तो वे वृक्ष बनने से पूर्व ही सूख कर नष्ट हो जाते हैं। यही तथ्य बच्चों के विकास के साथ भी जुड़ा हुआ है। उदरस्थ भ्रूण माता-पिता के स्वभाव, संस्कार ग्रहण करते और वातावरण के आधार पर अपना व्यक्तित्व बना लेते हैं। आहार-विहार से जहाँ बच्चे की जीवन रक्षा होती है वहीं उसका अनावश्यक अनुपात उसे रोगी बनाता तथा अकाल मृत्यु का कारण बन सकता है।

बच्चे पैदा होने की खुशी मनाना एक बात है, बड़े होने पर उनसे बड़ी बड़ी उपलब्धियों को हस्तगत करने की आशा करना दूसरी। पर इस सबसे बढ़कर बात यह है कि शैशव के दिनों में उनकी जितनी देखभाल आवश्यक थी वह की गयी या नहीं। इस संदर्भ में बरती गयी उपेक्षा से बच्चे का भविष्य अंधकारमय बनता है और अभिभावकों को भी कई प्रकार के पश्चाताप के रूप में उसका दंड भुगतना पड़ता है।

बच्चे को जन्म देना सरल है, पर उसके साथ जुड़े हुए दायित्वों का निर्वाह करना अति कठिन। उपेक्षा और अवहेलना का वातावरण शिशुओं की मनःस्थिति को दूषित एवं दुर्बल बनाकर छोड़ता है। बच्चों का सामान्य विकासक्रम देरी से होना, गुमसुम रहना, क्रोधी या जिद्दी होना, सोते समय साँस रोक लेना, नींद में डरकर उठ जाना, सिर पटकना, गाली-गलौज करना आदि समस्याएँ ऐसी हैं जिनका प्रमुख कारण भावनात्मक पोषण की कमी को ही माना गया है। ऐसे ही बच्चे आगे चलकर अपराधी बनते और अनेकानेक सामाजिक समस्याएँ खड़ी करते हैं। इस संदर्भ में बच्चों के भावनात्मक विकास का गहन अध्ययन करने वाले सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री ब्रूनो बैटलहेम ने अपनी पुस्तक ‘चिल्ड्रन ऑफ द ड्रीम’ में भिन्न-भिन्न प्रकार के दंपत्तियों की मनःस्थिति को प्रकट किया है। उनके अनुसार आज के तथाकथित सभ्य समाज में बच्चों को जन्म दे देना ही एकमात्र कर्तव्य बन गया है। अत्याधुनिक सभ्य कहे जाने वाले संरक्षक माता-पिता पैदा होते ही अपने शिशुओं को पालन-पोषण के लिए उसे किसी और के सुपुर्द कर देते हैं। उनके संरक्षण एवं लालन-पालन की उन्हें कोई आवश्यकता ही नहीं महसूस होती है। ऐसे उपेक्षापूर्ण वातावरण में पले एवं बढ़े बच्चे भी अपने माता-पिता को विस्मृत कर देते हैं और समाज की किसी भी मर्यादा अथवा वर्जनाओं को तोड़ने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं करते हैं। ब्रिटेन, अमेरिका जैसे संपन्न, सभ्य एवं सुविकसित कहे जाने वाले देशों में पिछले दो दशकों में बाल अपराधों की संख्या में 20 प्रतिशत की वृद्धि इसी कारण हुई है। भारत में भी यह रोग तेजी के साथ फैलता जा रहा है। इसका एक प्रमुख कारण जन्मदाताओं एवं संरक्षकों द्वारा आरंभ से ही बच्चों के विकास पर ध्यान न दिया जाना है।

जैसे-जैसे बच्चे बढ़ते जोते हैं, उनकी आवश्यकताएं भी तद्नुरूप बढ़ती जाती हैं, साथ ही उनमें कार्य करने की क्षमता का विकास होता जाता है। इन कार्यों को सुविख्यात बाल मनोविज्ञानी डॉ0 होमर लेन ने दो वर्गों में बाँटा है। प्रथम रचनात्मक कार्य, जिसके द्वारा बच्चा अपने आन्तरिक आनन्द की अभिव्यक्ति एवं अभिवृद्धि करता है। दूसरा है-भोगात्मक कार्य, जिसके माध्यम से वह अपनी बाह्य शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता है और ध्वंसात्मक एवं सुखात्मक कार्य करने लगता है। इन कार्यों से दूसरों को कष्ट देने में भी बच्चों को आनन्द आता है।

किसी व्यक्ति की महानता की परख यह है कि वह अपने से छोटों के लिए क्या सोचता और क्या करता रहा।

इस अवस्था में पालकों को चाहिए कि वे बच्चों ..................................... कार्यों के प्रति अभिरुचि पैदा करें। ध्वंसात्मक एवं भोगात्मक कार्यों के प्रति अनास्था उत्पन्न करने के लिए छोटी-मोटी प्रताड़ना अथवा समझदारी पूर्ण दण्ड देना भी लाभकर हो सकता है। बच्चों के चरित्र निर्माण में नैतिक शिक्षा के प्रवचन या भाषणबाजी कोई प्रभाव नहीं डालते अपितु सृजनात्मक कार्यों के माध्यम से ही बच्चों की नैतिक शिक्षा स्थायी होती है। रचनात्मक कार्यों की ओर अभिरुचि को मोड़ देने पर दूसरों की सेवा का स्वतः आनन्द मिलने लगता है। इससे बच्चों की आन्तरिक क्षमता का विकास होता है। सद्गुणों एवं सत्प्रवृत्तियों के विकास होता है। सद्गुणों एवं सत्प्रवृत्तियों के विकास में यह कार्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे बच्चों में धीरे-धीरे सुसंस्कार भी डाले जा सकते हैं। इसके विपरीत भावनात्मक पोषण से वंचित एवं ध्वंसात्मक कार्यों में संलग्न बच्चों को जब बाह्य सफलता नहीं मिलती, तो उनमें आत्महीनता को भावना घर करने लगती है। फिर जब वह अपनी तुलना रचनात्मक प्रवृत्ति वाले बच्चों से करता है, तो पिछड़ा होने के कारण ईर्ष्यालु और निन्दक हो जाता है। ऐसे बच्चे बड़े होने पर अपराध जगत की ओर मुड़ते और घर-परिवार व समाज के लिए अनेकानेक समस्याएँ खड़ी करते हैं।

इस संबंध में डॉ. होमर लेन ने कई वर्षों तक बच्चों पर पृथक-पृथक प्रयोग किये। अन्ततः उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि प्रायः सभी बच्चे जन्मजात रूप से रचनात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। यह उनके पालकों, जन्मदाताओं पर निर्भर करता है कि वे उसका नियोजन-निर्धारण किस प्रकार से करते हैं। उन्हें सही ढंग से रचनात्मक कार्यों में नियोजित करना एवं प्रोत्साहन देकर, उत्साह बढ़ाकर नये-नये कार्यों के प्रति अभिरुचि पैदा करना अभिभावकों का काम है। सृजनात्मक कार्यों के अभाव में ही बच्चे ध्वंसात्मक व भोगात्मक कार्यों की ओर अग्रसर होते हैं। ध्वंसात्मक व भोगात्मक कार्यों की ओर अग्रसर होते हैं।

ध्वंसात्मक प्रवृत्ति वाले एक बालक के उपद्रव से सभी शिक्षक परेशान थे। संरक्षक एक के बाद एक विद्यालय बदलता। अन्ततः एक योग्य शिक्षक मिल ही गये। उन्होंने उस बालक की उद्दंडता पर मात्र इतनी ही सजा दी कि उसे अन्तिम सीट पर सबसे बैठने को कहा। दूसरे दिन से शिक्षक बच्चे से स्नेहपूर्ण ढंग से मात्र पढ़ाई-लिखाई की ही बात करते और उसे प्रोत्साहित करते। स्नेह-प्रेम एवं प्रोत्साहन की इस शिक्षा ने बालक का कायाकल्प कर दिया। कक्षा का सबसे उद्दंड बालक कुछ ही दिनों में उस विद्यालय का सबसे अधिक प्रतिभाशाली छात्र सिद्ध हुआ।

वस्तुतः बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण माता के उदर में आते ही आरम्भ हो जाता है। अतः आवश्यक है कि नर-रत्नों को जन्म देने के लिए प्राचीनकाल की भाँति अब भी घर-परिवार के वातावरण को स्वच्छ व सुसंस्कारी बनाया जाय। इस संबंध में बरती गयी सतर्कता जन्म लेने वाले बच्चे के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। महाभारत में अभिमन्यु की कथा एक ऐसी ही घटना है, जो यह साबित करती है कि गर्भावस्था से ही बच्चे में संस्कार डाले जा सकते हैं और इच्छानुसार उन्हें ढाला जा सकता है। उसी प्रकार अष्टावक्र का भी उदाहरण है। इन्हें आत्मज्ञान की परिपूर्ण शिक्षा उनके पिता द्वारा गर्भावस्था में ही दी गई थी।

इस तथ्य की पुष्टि अब विज्ञान की नवीनतम शोध-अनुसंधानों से भी हो चुकी है कि माता-पिता के स्वास्थ्य और चिन्तन के अनुरूप ही बच्चे के संस्कार व आदतें बनती हैं और तद्नुरूप ही वह व्यवहार करने लगता है। इस संदर्भ में जर्मन अखबार ‘सर्ज’ ने जर्मन वैज्ञानिकों के नवीनतम एवं महत्वपूर्ण अनुसंधानों को प्रकाशित किया है, जिसके अनुसार वहाँ के बच्चों को माँ के गर्भ में ही प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें गर्भस्थ शिशु को इस आधुनिक संसार की जानकारियाँ सुनाई जाती हैं। भाषा के अभाव में गर्भस्थ शिशु भाषा तो नहीं सीख सकता, किन्तु उसका अवचेतन मन संकेत रूप में अधिकाँश जानकारियों को संग्रहित करता जाती है।

अभी तक प्राप्त परिणामों से यह सिद्ध हो गया है कि जिन-जिन गर्भस्थ शिशुओं को प्रशिक्षित किया गया, जन्म के बाद वे शीघ्रातिशीघ्र साँसारिक जानकारियों को ग्रहण करने लगते हैं। ऐसे बच्चे कम उम्र में ही अपनी आवश्यकताओं की सारी जानकारी बड़ी आसानी से संकेत रूप में माता-पिता को दे देते हैं। इनका विकासक्रम भी अतिशीघ्र होता है। इन बच्चों में शेष सभी विशेषताएँ अन्य बच्चों जैसी ही होती हैं, किन्तु समझदारी, आत्मविश्वास, साहस आदि बातों में अन्य बच्चों की अपेक्षा यह कहीं बहुत आगे होते हैं। जो ज्ञान सामान्य बच्चा दो से तीन वर्ष में प्राप्त कर सकता है, उस स्तर की जानकारी व समझ गर्भकाल में प्रशिक्षित बच्चों में आठ से बारह माह के अन्दर ही आ जाती है। इस तरह के प्रयोग कई देशों में चल रहे हैं। भाषा, विज्ञान , गणित, नागरिकता आदि का प्रशिक्षण अनेकों गर्भस्थ शिशुओं को देने में वैज्ञानिक जुटे हैं। यदि वह प्रयोग पूर्णरूपेण सफल रहे तो महाभारत की उक्त घटना की प्रामाणिकता असंदिग्ध हो जाएगी।

आधुनिक मनोविज्ञानियों ने भी अपने अनुसंधानों में पाया है कि बच्चा माँ के गर्भ से ही सुनना और सीखना प्रारम्भ कर देता है। पाया गया है कि यदि गर्भवती माँ को किसी कविता या संगीत को बार-बार सुनाया जाय तो जन्म लेने के पश्चात् बच्चा उस संगीत या कविता को तुरन्त पहचान व सीख लेता है। गर्भावस्था के बाद जब शिशु जन्म लेता है, उस समय भी उसमें बहुत से गुण पूर्व सीखें हुए प्रतीत होते हैं। रूस परिसंघ के मनोवैज्ञानिक ने कुछ नवजात शिशुओं में तैरने की क्षमता जन्मजात रूप से पायी है। इन्होंने अपने प्रयोग में पाया है कि जन्म से चार माह के अन्दर बच्चे में तैरने की पर्याप्त क्षमता होती है। पानी में डुबो दिये जाने पर बच्चे का साँस लेना रुक जाता है किन्तु बच्चा जल के अन्दर ही मछली की तरह उछल-कूद मचाता रहता है। तैरने वाले बच्चे शीघ्र ही चलने लगते हैं, जबकि न तैरने वाले बच्चों का चलना देर से आरम्भ होता है। बच्चों को जन्म से ही तैरने का अभ्यास कराया जाय तो उनमें यह गुण आजीवन एक सफल तैराक के रूप में बना रहता है।

न योगों नभसः पृष्ठे न भूमौ न रसातले। एवयं जीवात्मानो राहुर्योमं योग विशारदाः॥ -देवी भागवता

अर्थात्-योग न आकाश में है, न पृथ्वी में और न रसातल में योगतत्व के ज्ञाता जीवात्मा तथा परमात्मा की एकता को ही योग कहते हैं।

मनोविश्लेषणात्मक परिस्थितियों के ज्ञाता डॉ. एन्थौनी स्टौर के अनुसार बच्चा बचपन से ही अपने माता-पिता द्वारा सुरक्षा की अपेक्षा-अभिलाषा रखता है, पर वे अपेक्षित संस्कार व संरक्षण देना तो दूर, उनके पास उपेक्षा-अवहेलना ही मिलती है। आज स्थिति यह है कि 36 प्रतिशत माता-पिता का, जन्मदाताओं का दृष्टिकोण ऐसा बन चुका है कि उन्हें बच्चों का पैरों से लिपटना अथवा गले से चिपकना अच्छा ही नहीं लगता। माताएँ समयाभाव के कारण अथवा ‘फिगर’ सही रखने के चक्कर में बच्चे को अपना अमृत तुल्य दूध तक पिलाना नहीं चाहतीं। यदि यही उपेक्षित दृष्टि आगे भी बढ़ती चली गयी तो निकट भविष्य में वात्सल्यभाव ही तिरोहित हो जाएगा। इस भावनात्मक परिपोषण के अभाव में बच्चे या तो मन्दबुद्धि बनेंगे अथवा मानचित्र विकृतियों का शिकार बनकर परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए भारभूत ही सिद्ध होंगे।


अहिंसक समाज की स्थापना ऐसे होगी

समाज-व्यवस्था संबंधी वर्तमान अवधारणा में अपराध और अपराधी के लिए दण्ड का पूरा-पूरा प्रावधान होने के बावजूद देखने में यही आता है कि यह दोनों ही सम्प्रति ‘दिन दूनी रात चौगुनी’ गति से बढ़े हैं ; जबकि सजा का विधान सिर्फ इसलिए किया गया था कि अपराध और अपराधी पर अंकुश लगाकर समाज को स्वस्थ बनाया जा सके; पर ऐसा न हो सका, आखिर क्यों ?

इसके लिए पूर्ववर्ती समाज-व्यवस्था पर दृष्टिपात करना होगा और देखना होगा कि वह कौन-सा तत्व था, जो समाज को अपराध-मुक्त बनाये हुए था। गम्भीर अन्वेषण से एक ही तथ्य उभरकर सामने आता है कि तब अध्यात्म चेतना की जनजीवन में इतनी गहरी पैठ थी कि छोटी-से-छोटी भूल को भी नैतिक अपराध की श्रेणी में गिना जाता और उसके परिमार्जन-परिष्कार के लिए प्रायश्चित प्रक्रिया से गुजरकर अपराध बोध का परिचय दिया जाता। जहाँ इतना कठोर आत्मानुशासन हो, वहाँ उच्छृंखल आचरण भला कैसे बन पड़े। धीरे-धीरे यह अनुशासन घटता चला गया और आज स्थिति एकदम विपरीत हो गयी। आत्मानुशासन विधि-शासन बन गया। अन्दर का अनुशासन घटा, तो संतुलन-सुव्यवस्था के लिए बाह्य शासन जरूरी हो गया। इसी पृष्ठभूमि में कानून और दण्ड का विधान बना।

भिन्न-भिन्न समय और संस्कृतियों में यह विधान भिन्न-भिन्न थे और उनमें अपराध की परिभाषा भी पृथक थी। उदाहरण के लिए , भौतिक विज्ञान के विकास काल को लिया जा सकता है। तब लिखने और बोलने की स्वतंत्रता सीमित थी और प्रचलित मान्यता के विरुद्ध कुछ भी कहना अपराध माना जाता था, जिसके अंतर्गत कर्त्ता को दण्ड स्वरूप कठिन यंत्रणाओं से होकर गुजरना पड़ता । ब्रूनो से लेकर गैलीलियो तक को इसी कारण जीवन से हाथ धोना पड़ा। ब्रूनो को तो जिन्दा जला दिया गया, जबकि कोपरनिकस और गैलीलियो की कठोर यातनाओं के कारण मृत्यु हो गई। दोष सिर्फ इतना था कि उन्होंने एक वैज्ञानिक सत्य को संसार के समक्ष रखना चाहा; पर तत्कालीन पूर्वाग्रही समाज को यह मान्य न हुआ और परम्परा को बदलने संबंधी उनकी इस धृष्टता को अक्षम्य अपराध मानकर उन्हें मृत्युदण्ड दे दिया गया। उन दिनों और उसके पूर्व के समय में छोटी-छोटी बातों के लिए इस प्रकार की दण्ड व्यवस्था सामान्य बात थी। उनके तरीके जाति और संस्कृति के आधार पर अलग-अलग अवश्य थे, पर सभी का उद्देश्य एक होता-प्राणहरण। इस्लाम धर्म में अपराधियों को जनता के सुपुर्द कर दिया जाता, जिनकी चौराहों पर पत्थर मार-मार कर जान ले ली जाती। यहूदियों में इसके लिए गला घोंटने की प्रथा चलन में थी। रोमनों में ऊँची मीनारों से अभियुक्त के नीचे धकेल कर यह सजा दी जाती, जबकि पारसी समाज में गला मरोड़ना उक्त दण्ड-विधान का अभिन्न अंग था। प्राचीन चीन और जापान इनसे भी नृशंस उपाय अपनाते और जीवित व्यक्ति की चमड़ी उधेड़ ली जाती। अँग्रेजों का प्राणदण्ड भी कोई कम भयानक नहीं था, वहाँ जीवित व्यक्ति को खौलते पानी में डालकर उबाल दिया जाता।

तब से लेकर अब तक मनुष्य ने लम्बी विकास-यात्रा की है। इस दौरान उसके चिन्तन में खुलापन आया है और व्यापकता भी आयी है। एक हद तक उसने पूर्वाग्रही मान्यताओं से पीछा भी छुड़ाया है। कुछ समाजवादी और इस्लामी देशों को छोड़ दिया जाय, तो यही कहना पड़ेगा कि वर्तमान समाज और शासन प्रणाली में उतनी और वैसी कट्टरता अब नहीं रही, जिसके लिए पूर्ववर्ती व्यवस्था बदनाम थी। आज न तो किसी बालक को छोटी-सी चोरी के लिए मौत की सजा दी जाती है, जैसा कि प्राचीन इंग्लैण्ड में प्रचलित था और न किसी वयस्क को स्वतंत्र विचार-अभिव्यक्ति के जुर्म में फाँसी के फंदे पर लटकाया जाता है। हाँ, समाज-प्रणाली को छिन्न-भिन्न करने वालों के लिए दण्ड-व्यवस्था अवश्य है, होनी भी चाहिए।

यहाँ बार-बार एक प्रश्न उभर कर सामने आता है कि आज का समाज, व्यक्ति और चिन्तन पहले की तुलना में अधिक विकसित, सभ्य और प्रगतिशील है; शासन-तंत्र भी अधिक सुव्यवस्थित है। इतने पर भी क्या कारण है कि आपराधिक वृत्तियाँ पहले की अपेक्षा ज्यादा बढ़ी हैं। उत्तर एफ. टैनिनबाँन अपनी पुस्तक ‘क्रिमिनोलाँजी’ में देते हैं। वे लिखते हैं कि अपराध को सीधे सभ्यता और प्रगतिशीलता के साथ जोड़ना उतना न्यायसंगत नहीं होगा। हाँ, यह भी कुछ सीमा तक निमित्त कारण हो सकती है, पर वास्तविक कारण समाज में फैली विसंगतियाँ ही हैं, उनके अनुसार यदि कोई दो दिनों का भूखा बालक कहीं से क्षुधातृप्ति के लिए कुछ रोटियाँ चुरा लेता है, तो इसे उसकी आपराधिक मनोवृत्ति कहना गलत होगा और यह कहना भी अनुचित होगा कि माता-पिता ने गीली मिट्टी के समान उसके मन को सद्प्रवृत्तियों के साँचे में गढ़ने की कोशिश नहीं की। वस्तुतः बालक का यह कृत्य दुष्प्रवृत्ति की तुलना में उसकी तात्कालिक माँग और बाध्यता को अधिक दर्शाता है। अतः इसके द्वारा उसके विकासशील व्यक्तित्व का मूल्याँकन करना गलत होगा। यह कहना कि बालक चोर है, यथार्थ में उसके कोमल मन पर कुठाराघात करना होगा। समाज का यही व्यवहार कालान्तर में उसे दस्यु बनने के लिए बाधित कर सकता है। अतएव टैनिनबाँम का विचार है कि ऐसा निष्कर्ष निकालने से पूर्व तथाकथित ‘दोषी’ के सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक पहलू का अध्ययन करना पड़ेगा और देखना होगा कि कहीं उक्त विसंगतियों ने तो उसे ऐसा करने पर मजबूर नहीं कर दिया।

आज किसी ने हत्या कर दी। ठगी कर ली अथवा डाका डाल दिया, तो सिर्फ अपराध के स्वरूप के आधार पर उसे आजीवन कारावास दे दिया जाता है। जिन परिस्थितियों में उसने ऐसा किया, उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता अथवा यों कहना चाहिए कि आज की न्यायप्रणाली वकीलों के हाथ की कठपुतली बनी हुई है जो जिरह करने में जितने वाचाल और वाक्पटु होते हैं, उनकी जीत की सम्भावना उतनी बलवती होती है। वे चाहें तो अपने अकाट्य तर्कों द्वारा सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर दें। ऐसे में न्याय-प्रणाली सर्वथा त्रुटिहीन कहाँ रहे। इसका खामियाजा तो निरपराध को ही भुगतना पड़ेगा। यथार्थ अपराधी तो मौज-मजे करता फिरेगा। इससे उसे अन्याय’-अत्याचार की प्रेरणा ही मिलेगी। एक बिल्कुल ताजा उदाहरण कैलीफोर्निया का है। केविन ग्रीन नामक एक अमरीकी को सोलह साल जेल में काटने के बाद पिछले दिनों 22 जून, 1996 को न्यायालय ने निर्देश घोषित करते हुए रिहा कर दिया। उस पर अपने अजन्मे बच्चे की हत्या का आरोप था। यों न्यायालय ने इसके लिए उससे क्षमा-याचना कर ली; पर सवाल यह है कि क्या इस गम्भीर जुर्म के लिए क्षमा-याचना पर्याप्त है। क्या इससे सम्पूर्ण न्याय-तंत्र की पोल नहीं खुलती ? क्या इस प्रक्रिया में वकील, न्यायधीश, गवाह से लेकर वादी पक्ष तक समान रूप से दण्ड के भागी नहीं हैं, जिनने अन्याय का सहारा लेते हुए एक निर्दोष व्यक्ति को दोषी सिद्ध करने का अपराध किया? क्या किसी को 16 साल जितनी दीर्घ प्रगति से वंचित कर देने की तुलना केवल लिखित या मौखिक क्षमा-याचना से हो सकती है। कदापि नहीं। इस लम्बी अवधि में एक-एक क्षण का उपयोग करते हुए क्या पता वह कहाँ-से-कहाँ पहुँच जाता; कितना आर्थिक, बौद्धिक, नैतिक विकास कर लेता; पारिवारिक स्थिति कितनी प्रतिष्ठापूर्ण बन जाती, कितने लोगों को सही सलाह और प्रेरणा देकर उन्हें सन्मार्गगामी बनाता; अपनी समृद्धि के कारण कितनों को रोजगार देकर समाज का कितना भला करता, कौन जाने? इन सबसे उसे वंचित बना दिया गया। इनकी भरपाई कैसे हो? कौन करे? यह प्रश्न न्यायतंत्र में अनुत्तरित हैं। ऐसे में प्रतिशोध की भावना से अन्याय का शिकार व्यक्ति कुछ कर बैठे, तो इसके लिए जिम्मेदार सामूहिक रूप से वह सभी होंगे, जिनने उसके महत्वपूर्ण सोलह वर्ष छीन लिए। बढ़ते अपराध का एक कारण यह हो सकता है।

दूसरे कारण के संबंध में यह कहा जा सकता है कि इन दिनों की न्याय-प्रक्रिया इतनी जटिल और समयसाध्य हो गई है कि अक्सर न्याय मिलते वर्षों लग जाते हैं, जबकि मुद्दई इसकी तत्काल आवश्यकता अनुभव करता है। इस स्थिति में यदि वह अधीर होकर कानून अपने हाथ में ले ले और इसमें कौन कितना दोषी है-यह कहने की आवश्यकता नहीं।

इसका एक अन्य आर्थिक पहलू भी है। गरीब व्यक्ति, जिसके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं, मुश्किल से वह परिवार की गाड़ी को किसी प्रकार खींचता है, वह यदि शोषण, उत्पीड़न, अन्याय, अत्याचार का शिकार हो जाये तो न्याय की गुहार पैसे के बिना किससे करे? मुकदमें के लिए पैसा चाहिए, पैसा उसके पास है नहीं। इस दशा में वह बागी होकर व्यक्ति , समुदाय अथवा समाज से बदला लेने के लिए उद्यत हो सकता है। कितने ही पीड़ित आये दिन इस कारण बगावत करते और संबंधित व्यक्ति अथवा वर्ग से प्रतिशोध लेते देखे जाते हैं। जब इस प्रकार की शृंखला चल पड़ती, तो फिर पीढ़ियों तक रुकने का

नाम नहीं लेती। इसमें बड़े पैमाने पर धन-जन की बर्बादी होती है। निर्धनता से पिण्ड छुड़ाने के लिए भी लोग अपराध में लिप्त होते देखे जाते हैं।

वर्तमान को टी.वी. संस्कृति का भी इसमें कोई कम बड़ा योगदान नहीं है। इन दिनों टी.वी. और सिनेमा ने अपराध जगत को जितना समृद्ध बनाया है, उसे अभूतपूर्व ही कहना चाहिए। इसका एक ज्वलन्त प्रमाण हाल में घटी पश्चिम बंगाल की इस घटना से मिल जाता है, जिसमें एक पन्द्रह वर्षीय किशोर ने माँ की जघन्य हत्या कर दी और सबूतों को उसी अन्दाज में मिटाने का प्रयास किया, जैसा फिल्म में देखा था । पुलिस द्वारा पूछताछ के दौरान उसने यही कहा कि माँ से उसका कोई बैर नहीं था। वह तो सिर्फ यह अनुभव प्राप्त करना चाहता था कि उक्त तरीके द्वारा हत्या सम्भव है क्या?

जहाँ किशोर मानसिकता इतनी घातक हो, वहाँ की भावी पीढ़ी कैसी होगी, इसका अन्दाज लगाया जा सकता है, पर इसके लिए दोष इस अपरिपक्व मानसिकता को नहीं, वर्तमान संस्कृति को देना पड़ेगा। किशोर तो जिज्ञासु था। वह एक प्रयोग कर रहा था। प्रयोग भी इतना भयावह, जिसे ममतामयी माँ की जान लेकर पूरा करना पड़ा । यदि यही प्रेरणा उसे किसी रचनात्मक दिशा में मिली होती , तो आज वह और उन जैसे अनेकों बालक अपने जीवन के वे महत्वपूर्ण क्षण किसी बालसुधारगृह में नहीं, शोधकार्य में गुजार रहे होते और विज्ञान, कला, साहित्य जगत की महान विभूतियाँ बन जाने की आधारभूमि तैयार कर रहे होते । इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि वर्तमान में मातृ गर्भ में अभिमन्यु और अष्टावक्र जैसे प्रतिभावान बालक नहीं अपराधी और उच्छृंखल ही विनिर्मित हो रहे हैं। इस माता-पिता के चिन्तन और आचरण का प्रभाव न कहें तो और क्या कहें।

पिछले दिनों भारत की प्रमुख अस्सी जेलों में रहने वाले कैदियों का एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ था। इस क्रम में लगभग आठ सौ कैदियों से संपर्क कर यह जानकारी चाही गयी कि उनसे किन परिस्थितियों में कैसे अपराध बन पड़े। करीब 80 प्रतिशत ........................... अभियुक्तों ने यह स्वीकार किया कि उनकी प्रतिपक्ष से किसी न किसी मामले को लेकर रंजिश थी, जिसका परिणाम जुर्म के रूप में सामने आया। 5 प्रतिशत लोगों का कहना था कि वे बिल्कुल निर्दोष हैं। उन्हें जानबूझकर कुचक्र में फँसा दिया गया। जबकि 15 प्रतिशत कैदी ऐसे थे, जो यह मानते थे कि अपराध करना उनकी आदत है। इसके लिए किसी कारण का होना आवश्यक नहीं।

उक्त सर्वेक्षणों से भी यही विदित होता है कि स्वभाव से अपराधी तो बहुत कम ही होते हैं, अधिकाँश ऐसे हैं जिन्हें विवश होकर इस प्रकार के कठोर कदम उठाने पड़ते हैं। यह विवशता शोषण, उत्पीड़न, जमीन-जायदाद, वर्चस्व, जातिगत, सम्प्रदायगत किसी भी प्रकार की ही, इन्हें सामाजिक विषमता यदि किसी प्रकार दूर की सके, , तो फिर अहिंसक समाज की स्थापना कोई कठिन कार्य नहीं, इसकी प्रतिष्ठा स्वयमेव हो जाएगी।

इस प्रकार का प्रयोग साम्यवादी शासन प्रणाली में हो चुका है; पर वह सफल रहा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। मार्क्स ने शासनयुक्त समाज रचना की कल्पना नहीं की। उनके अनुसार साम्यवाद की चरम परिणति शासनमुक्त समाज है, पर समाजवाद में वैसा कुछ हो नहीं सका। बाहर से उसमें भले ही साम्य प्रतीत होता है, पर पूर्व सोवियत संघ में करोड़ों रुबलों के घोटालों से प्रणाली की कलई खुल गई और अन्दर तथा बाहर का विरोधाभास स्पष्ट रूप से सामने आ गया। इस कारण बाद में वह खण्ड-खण्ड होकर बिखर गया। वास्तव में इस शासन तंत्र में कठोर नियंत्रण द्वार भौतिक स्तर पर समानता लाने का प्रयत्न किया गया है; जबकि मानसिक विकास की उपेक्षा कर दी गई। असफलता का सूत्र यही साबित हुआ, कारण कि आन्तरिक परिष्कार के बिना बाह्य समानता संभव नहीं, यदि हुई भी तो वह अस्थायी ही होगी। इस कारण समाजवादी देशों की जनता साम्यवादी तो हो गई, पर वह साम्यनिष्ठ नहीं हो सकी। जिसमें साम्य की निष्ठा नहीं होती, वह न तो अहिंसक हो सकता है, न शासनमुक्त।

अध्यात्म के इसी सूत्र-सिद्धान्त को अपनाते हुए अब बिहार की जेलों में एक अभिनव प्रयोग आरम्भ किया गया, ताकि अपराधियों के विचार परिवर्तित कर उन्हें सन्मार्गगामी बनाया जा सके। उन्हें नियमित रूप से आसन, प्राणायाम, ध्यान, उपासना जैसे अंतरंग को बदलने वाले आध्यात्मिक उपचारों का अभ्यास कराया जाता है। इसके अतिरिक्त फुर्सत के समय स्वाध्याय के लिए सत्साहित्यों का वितरण किया जाता है। बीच-बीच में यज्ञ, दीपयज्ञ, कीर्तन, आरती जैसे कार्यक्रम भी कराये जाते हैं। उनके प्रति स्नेह और प्रेम प्रदर्शित करने के लिए रक्षा-बन्धन जैसे त्यौहारों में उनकी कलाइयों में राखी बाँधी जाती है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर उनसे मिलने और उन्हें श्रेष्ठ चिन्तन देकर रचनात्मक कार्यों के प्रति रुचि जगाने का भी उपक्रम होता रहता है।

इन सबका उत्साहवर्द्धक परिणाम सामने आया है। सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि इससे उनकी शारीरिक-मानसिक परेशानियाँ घटी हैं और सबमें स्वयं को बदलने की अदम्य इच्छा जाग्रत हुई है।

इस कार्यक्रम में दो संगठन क्रियाशील हैं-प्रथम युग निर्माण मिशन, गायत्री परिवार और दूसरा मुँगेर का योग विद्यालय। इटली, फ्राँस की सरकारों एवं यूनेस्को ने इससे प्रभावित होकर बिहार सरकार से इसकी विस्तृत जानकारी माँगी है।

निरक्षरों को साक्षर बनाने का भी समांतर कार्यक्रम इनमें चल रहा है। पिछले एक वर्ष में इस योजना के अंतर्गत सात हजार छह सौ से भी अधिक कैदियों को साक्षर बनाया गया। वर्तमान में 3825 कैदी इस योजना के अंतर्गत अध्ययनरत है। इच्छुक कैदियों को स्वनियोजन और तकनीकी प्रशिक्षण भी दिये जा रहे हैं, ताकि कारामुक्त होकर वे अपना जीविकोपार्जन कर सकें। इस प्रकार बिहार की जेलें अब कारागृह न रहकर एक प्रकार से रिफार्मेटरि (सुधार गृह) बन चुकी हैं। उक्त योजना चलाई जानी चाहिए, ताकि वहाँ से निकलने वाले बन्दी अपराधी नहीं, नेक इंसान बनकर निकलें ।

सच तो यह है कि विसंगतियाँ चाहे सामाजिक हों अथवा पारिवारिक, सभी के मूल में विकृत चिन्तन ही समाये होते हैं। कोई यदि किसी की सम्पत्ति का छल-बल द्वारा अपहरण करता है , तो यहाँ भी धनवान बनने की उसकी संकीर्णता का ही परिचय मिलता है और कोई किसी का शोषण-उत्पीड़न करता है, तो यह भी कर्ता की विकृत मानसिकता को ही दर्शाता है। दोनों ही अपने-अपने प्रकार के अपराध और अपराधियों से समाज को तब तक मुक्त नहीं किया जा सकता, जब तक उनका चेतनात्मक परिष्कार न हो, जेल और कानून तो एक प्रकार के नियंत्रक हैं, मुक्ति प्रदाता नहीं। सम्पूर्ण मुक्ति और अहिंसक समाज को स्थापना अध्यात्म उपचार के अवलम्बन से ही सम्भव है, इससे कम में नहीं।


संख्या के ऊपर श्रेष्ठता का महत्व (Kahani)

महर्षि कश्यप की दो पत्नियाँ थीं, कद्रू और विनिता। उन्होंने उन्हें अपने-अपने उत्तराधिकारियों के निमित्त वर माँगने को कहा। कद्रू ने 1000 शक्तिशाली पुत्र माँगे। उसका विचार था कि बड़ी संख्या में शक्तिशाली पुत्र उसे विनिता से अधिक सम्मान और यश दिला सकेंगे। विनिता ने तेजस्वी, सुसंस्कारी मात्र दो पुत्र माँगे।

कद्रू के नाग हुए एक हजार । थोड़े समय के लिए उसका दबदबा बन भी गया। पर जब विनिता के अरुण और गरुड़ का पराक्रम प्रकट हुआ, तो संख्या के ऊपर श्रेष्ठता का महत्व स्पष्ट हो गया। अरुण बने सूर्य भगवान के सारथी और गरुड़ बने भगवान् विष्णु के वाहन। उन्होंने चन्द्रलोक से अमृत कलश लाकर कद्रू के बन्धनों से माँ विनिता को मुक्त कराया। नाग उनके भय से थर-थर काँपते रहे।

मगध नरेश एक दिन भगवान् बुद्ध के सत्संग में गए और पंक्तिबद्ध बैठे श्रमणों को प्रमुदित स्थिति में देखा, जबकि उन्हें शरीर यात्रा तथा धर्म-प्रचार की प्रव्रज्या में अधिक कष्ट उठाने पड़ते थे।

दूसरी ओर राजपरिवार के सदस्य और शासकीय कर्मचारी हैं, निरन्तर अभाव और अधिक काम की शिकायत करते रहते हैं। इस विसंगति का कारण सत्संग होने पर तथागत से पूछा।

बुद्ध ने कहा-राजन् यह आश्रमवासी वर्तमान में जीते हैं। जो उपलब्ध है, उससे सन्तान सीमित होने के कारण उन पर पूरा ध्यान देते हैं। अनाप-शनाप खर्च नहीं करते । कर्तव्यपालन को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहते हैं।

शान्ति का यही मार्ग है। धर्म विहार हो या हाट-बाजार या राजमहल। सर्वत्र सुख शान्ति का यही एक मार्ग है। जिसे गृहस्थ हो या विरक्त, सभी को अपनाना चाहिए।

एक प्रासंगिक विशेष लेख-


मा गृधः कस्य स्विद् धनम्

त्याग की आभा से प्रदीप्त अतीत और घोटालों की कीचड़ से सना वर्तमान। इस विस्मयकारी बदलाव को देखकर सहसा विश्वास नहीं होता कि यह वही महादेश है, जिसे देखकर भाव-विभोर हुए मैक्समूलर ने कहा था-” यदि संसार में मुझे ऐसे देश की तलाश करनी पड़े, जो सभी प्रकार की सम्भव प्राकृतिक सम्पदा, शक्ति और सौंदर्य से परिपूर्ण हो अर्थात् किन्हीं अंशों में धरती पर स्वर्ग के समान हो तो मैं भारत की ओर संकेत करूंगा। यदि मुझसे पूछा जाय कि इस नीले आसमान के नीचे वह कौन-सा भूभाग है, जहाँ मानवीय चरित्र का पूर्ण विकास हुआ है और जहाँ के लोगों ने बहुत कुछ ईश्वरीय देन को उपलब्ध किया है तथा जीवन की बड़ी-से -बड़ी समस्याओं पर विचार करके उनमें से बहुतों के ऐसे हल निकालें हैं जिन पर प्लेटो और काण्ट का अध्ययन करने वालों को भी ध्यान देना आवश्यक हो गया है, तो मैं सीधा भारत की ओर संकेत करूंगा।

वेद भाष्यकार मैक्समूलर का कथन आज की दशा में कितना अचरज भरा क्यों न लगे, पर उनका संकेत अतीत के उस भारत की ओर है, जिसने त्याग को अपना जीवन-मंत्र बनाया था। जहाँ के जन-जीवन ने अपनी अनुभूतियों और उपलब्धियों के आधार पर ‘त्यागे नैकेन अमृतत्व भानाशुः’ अर्थात् सिर्फ त्याग से ही अमृत तत्व की प्राप्ति होती है, की घोषणा की थी। अपनी इसी गरिमा के कारण इस देश ने अपने अतीत में समस्त संसार का मार्गदर्शन किया। विश्व मानव की प्रगति में उसने अनेकों अजस्र अनुदान दिए। ज्ञान और विज्ञान का उदय, अवतरण हुआ तो सर्वप्रथम यहीं, पर वह इस देश की सीमाओं में अवरुद्ध नहीं रहा। प्रभातकालीन सूर्योदय का श्रेय तो मिला, पर वे किरणें समूची जगती को प्रकाशवान बनाने के लिए निःसृत होती रहीं। इसी कारण भारत को जगद्गुरु कहा जाता था, क्योंकि उसने विश्वसुधा के कोने-कोने में ज्ञान-विज्ञान का प्रकाश फैलाया। उसे चक्रवर्ती शासक माना जाता था क्योंकि उसने समाज व्यवस्था और शासन-सत्ता की स्थापना का मार्ग सुझाया और अनगढ़ मानव को व्यवस्था बनाकर रहने का क्रियात्मक प्रशिक्षण दिया। उसे स्वर्ग सम्पदाओं का स्वामी कहा जाता था, क्योंकि शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, व्यवसाय, कृषि, पशुपालन आदि के सुझाव और साधन यहीं से पहुँचाए गए।

इन सारी गतिविधियों के मूल में भारतवासियों का उज्ज्वल चरित्र था। इसी से समाज को संजीवनी शक्ति मिलती थी। इसी अद्भुत शक्ति की बदौलत ही वह भ्रष्टाचार से मुक्त था। भारत और भारतीयता के महावृक्ष की ऊर्जा, शक्ति, सम्पन्नता की मूल स्रोत थीं, त्याग की भावनाएँ। जो यहाँ के रोम-रोम में रमी थीं। इन्हीं के सूत्रों को लेकर यहाँ की जीवनशैली का ताना-बाना बुना गया था। बात परिवार के छोटे दायरे की हो अथवा फिर समाज के व्यापक विस्तार की; बड़ा वही कहा और माना गया जिसने व्यापक हित के लिए बड़ा त्याग करने का साहस कर दिखाया हो। वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था का ढाँचा त्याग की विस्तृत होती गयी भावनाओं के आधार पर ही खड़ा किया गया था। जो अपनी क्षुद्र कामनाओं, ओछे स्वार्थों में लिप्त थे, उन्हें क्षुद्र अथवा शूद्र कहा गया। जो स्वार्थों से थोड़ा तो ऊपर उठे, लेकिन परिग्रह की लालसा का पूरी तरह त्याग न कर सके, वे वैश्य कहलाए। क्षत्रिय उन्हें कहा गया जो औरों के लिए स्वयं के बलिदान का साहस रखते हों। क्षत्रियः त्यक्तः जीवितः परहित के लिए स्वयं का जीवन त्याग देने के लिए तत्पर होना ही क्षत्रित्व की परिभाषा थी। इन सबसे ऊपर था ब्राहम्णत्व, जिसके लिए कामनाओं, वासनाओं, लालसाओं की कोई गुँजाइश न थी। शास्त्रकारों ने उसके लिए स्पष्ट निर्देश दिए थे ‘न हि ब्राह्मणस्य देहोऽयं क्षुद्र कामाय नेष्यते’ अर्थात् ब्राह्मण जीवन क्षुद्र कामनाओं के लिए नहीं हैं।

वर्ण धर्म की स्थापना त्याग के उत्तरोत्तर विकास के लिए ही की गई थी। हालाँकि आज उसमें इतनी विकृति आ गई है कि उसके वर्तमान स्वरूप को देखकर लगता ही नहीं कभी इसका इतना मोहक एवं सौंदर्यपूर्ण अतीत भी रहा होगा। वर्ण धर्म से जहाँ त्याग की भावनाओं का सामूहिक, सामाजिक विकास होता था, वहीं आश्रम धर्म की स्थापना का उद्देश्य त्याग के आदर्श को व्यक्तिगत जीवन में चरितार्थ करना था।

ब्रह्मचर्य की तपोनिष्ठ गुरुकुल परम्परा में त्याग की भावनाएँ वैयक्तिक जीवन में अनुभवी आचार्यों द्वारा रोपी जाती थीं। गृहस्थ के तपोवन में इनका विकास होता था। और बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय के लिए स्थापित वानप्रस्थ आश्रम में समाज को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियाँ अर्पित करना हरेक का अनिवार्य दायित्व था। इसके पश्चात् संन्यास, जिसे परिभाषित करते हुए गीताकार ने कहा है-’काम्यानाम् कर्मणाँ न्यासं संन्यासं कवयो विदुः’ अर्थात् स्वार्थपूर्ण कर्मों का पूरी तरह त्याग ही संन्यास है और यही संन्यास प्रत्येक भारतीय के वैयक्तिक विकास का चरम बिन्दु था। जिसमें वह सर्वत्यागी बन स्वयं को समाज के लिए पूर्णतया उत्सर्ग करता था।

‘त्याग’ के शीर्ष पुरुष ब्राह्मण एवं संन्यासी ही समाज का शिक्षण करते थे। यह शिक्षण वाणी से नहीं जीवन के क्रिया-कलापों द्वारा दिया जाता था। इसी सत्य को बताते हुए मानवी सभ्यता के आदि व्यवस्थापक मनु महाराज का कथन है-एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रणन्यनः।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षंरेन् प्रथिव्याँ सर्वमानवः।

अर्थात्-इस महादेश में जन्म लेने वाले अग्रणी जन अपने-अपने चरित्र से पृथ्वी के सभी मानवों का शिक्षण करें।

यही है वह अतीत का भारत, जिस पर प्रो. मैक्समूलर मुग्ध हुए थे। यह मुग्धता वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन की त्याग निष्ठा पर थी। अतीत के उन मूल्यों एवं मानदण्डों के प्रति थी, जिनका अब कहीं पता-ठिकाना नहीं लग रहा। आज कोई राजा मान्धाता लंगोटी पहने महायोगी आचार्य शंकर को लालसा भरी दृष्टि से देखकर यह नहीं कह उठता-’कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः’ ये लंगोटी वाले बड़े भाग्यवान वेषधारी स्वयं ही राजपुरुषों के वैभव-विलास की ओर टकटकी लगाए देखते रहते हैं, कि कब उन्हें इसके नजदीक आने, स्पर्श करने, उपभोग करने का मौका मिले।

यही है हमारी संस्कृति के मर्म पर विनाशकारी आघात। जिसे दूसरे शब्दों में ‘त्याग के स्थान पर भोग की प्रतिष्ठा’ भी कह सकते हैं। इस उलट-बाँसी के साथ जन-जीवन के पाँव भी उलटी दिशा में भाग चले हैं। यह सर्वविदित तथ्य है कि भारत की स्वतंत्रता, आधी धोती पहनने वाले गान्धी, आई. सी. एस. की प्रतिष्ठा को पाँव से ठुकरा देने वाले सुभाषचंद्र बोस जैसे त्यागी महामानवों के प्रयास से मिली। लेकिन राजसिंहासन पर बैठने वाले भूल गए कि हमें जो प्रतिष्ठा मिली है उसका कारण तिलक, विनोबा, गोखले, महर्षि अरविन्द के त्याग की परम्परा है। जिसे बनाए रखने का दायित्व अब उन पर है।

गोस्वामीजी ने लिखा है-’प्रभुता पाय काहि मद नाहीं।’ प्रभुता की मदान्धता कहें अथवा प्रभुता की आसक्ति की मोहान्धता, त्याग की आभा से प्रदीप्त भारत पर घोटालों का कीचड़ मला जाने लगा। जिसकी शुरुआत सन् 1942-49 के दिनों जीप दलाली काण्ड के रूप में हुई। इसमें दो हजार जीपों के सौदे के बाद महज 155 जीपों की डिलीवरी हुई। बचा पैसा तत्कालीन प्रतिरक्षा-मंत्री की भव्यता को सजाने-सँवारने में न लग गया। इसी के थोड़े ही वर्षों बाद वर्ष 1957 में डायरियाँ पूर्वी भारत के एक बड़े पूँजीपति मुहम्मद सिराजुद्दीन एण्ड कम्पनी के कलकत्ता व उड़ीसा के दफ्तरों में मिलीं। इनमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख था कि अनेक राजनेताओं ने विभिन्न व्यापारियों से दलाली हड़पी है।

वर्ष 19657 मूँदडा काण्ड के लिए प्रसिद्ध हुआ। जिसमें उद्योगपति हरिदास मूँदड़ा एवं तत्कालीन वित्तमंत्री की मिलीभगत से 160 करोड़ रुपये का घोटाला आसानी से हो गया। आजादी के बाद से घोटालों का सिलसिला शुरू हुआ, उसमें उद्योगपतियों के साथ राजपुरुषों की साझेदारी अवश्य रही। आखिर क्या मजबूरी थी इन राजनेताओं की? आचार्य चाणक्य ने राजा और संन्यासी दोनों के लिए समान रूप से तप और संयम का महत्व बताया है। आजकल के जमाने में राजतन्त्र तो समाप्त हो गया, जनप्रतिनिधि ही राज-काज चलाते हैं। उनके लिए भी आचार्य चाणक्य के उपदेशों को उतना ही महत्व है । लेकिन ये महत्वपूर्ण उपदेश उस समय महत्वहीन हो जाते हैं, जब लोकसेवी होना व्यापारिक महत्व की बात बन जाय।

प्राचीनकाल में लोकसेवी को राजर्षि कहा जाता था। अर्थात् राजा होने पर भी उसका उद्देश्य ऋषित्व प्राप्त करना था।राजर्षि जनक की यह परम्परा स्वतंत्रता के बाद लालबहादुर शास्त्री ने निभाई भी 1 राजनेता के रूप में उन्होंने देश का भरपूर प्यार पाया। त्याग की प्रतिष्ठा को उन्होंने अपने जीवन में भली प्रकार प्रमाणित किया। शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल घोटालों से मुक्त रहा। उनके निधन के बाद व्यवस्था बदली और 1971 में रुस्तम सोहराब नागर वाला ने शीर्ष व्यक्तियों की साँठ-गाँठ से 60 लाख रुपये का घोटाला कर डाला। इसके बाद 1980 में इंडियन ऑयल कारपोरेशन के ठेके में नौ करोड़ रुपए की हेराफेरी हुई। वर्ष 1982 अन्तुले काण्ड के रूप में चर्चित रहा। इन्हीं सालों में मध्यप्रदेश का छोटा-सा कस्बा चुरहट, राजनेताओं के प्रयासों से पर्याप्त चर्चित हुआ। यह चर्चा चार करोड़ दस लाख की हेराफेरी को लेकर हुई और फिर हुआ बोफोर्स काण्ड, जिसमें एक स्वीडिश कम्पनी ने अपनी बोफोर्स तोपें बेचने के लिए 64 रुपये की दलाली दी।

घोटालों में एक नया आयाम जोड़ा प्रतिभूत घोटाले ने। इस शेयर घोटालों में बैंकों के उच्च अधिकारियों, राजनेताओं की मिलीभगत से 10 हजार करोड़ की हेराफेरी की गई। इसी के थोड़े दिनों में चर्चित हुआ हवाला काण्ड, जिसमें अधिकाँश राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के चरित्र को उजागर कर दिया। देश की जनता पेशोपेश में पड़ गई है कि आखिर हम किसे सौंपे शासन का सूत्र संचालन? शायद यही कारण रहा लोकजीवन ने सभी को एक साथ अस्वीकार कर दिया। इसी के बाद 133 करोड़ रुपए का यूरिया घोटाला प्रकाश में आया। कृषि प्रधान देश भारत के किसानों के लिए जिस धन से यूरिया मँगाई जाने वाली थी, वह राजनेताओं और उनके सम्बन्धियों की जेब में चला गया। घोटालों के इस अध्याय में अपनी मार्मिक टिप्पणियाँ जोड़ते हुए सेण्ट किट्स जालसाजी काण्ड और लखू भाई पाठक काण्ड की चर्चा भी जोरों पर है।

राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के दिनों में अपने देश का बिहार चर्चित भी हुआ और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं लोकनायक जयप्रकाश नारायण के कारण लोकप्रिय भी रहा। इन दिनों भी उसका मूल्य एवं महत्व कम नहीं है। पशुपालन घोटाले में एक हजार करोड़ रुपए की हेराफेरी , झारखण्ड क्षेत्र में हुआ 300 करोड़ का दवा घोटाला , 100 करोड़ रुपए का वन घोटाला, 71 करोड़ रुपए का मत्स्य पालन घोटाला, 10 करोड़ रुपए का तारकोल घोटाला, थोड़े ही समय में इन सबकी एक साथ चर्चा से देशवासी हैरत में हैं कि आखिर वह कौन-सा बिहार है, जिसमें महात्मा बुद्ध एवं भगवान महावीर ने अपरिग्रह का उपदेश दिया था ? क्या यह वही बिहार है, जहाँ सम्राट अशोक जीवन के अन्तिम चरण में सर्वत्यागी हो गए थे।

इस तरह के प्रश्न अनगिनत हैं, तो घोटालों की गिनती का भी अन्त नहीं है। एक तरह के घोटाले को सुनकर लगता है कि शायद यह अब तक की सबसे बड़ी रकम है, लेकिन अगले दिन उससे भी बड़ी रकम को सुनकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। अभी कुछ ही समय पूर्व चर्चा में आया केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग का चिकित्सा उपकरण पाँच हजार करोड़ डालर का है। छोटे-मोटे घोटाले तो जैसे रोज की बातें हो गयी हैं। मध्यप्रदेश की एक कम्पनी ‘हिन्दुस्तान काँस्ट्रक्शन लिमिटेड’ की भिलाई इकाई में 150 करोड़ रुपए का घोटाला प्रकाश में आया है। समाचार पत्रों, दूरदर्शन, आकाशवाणी की ध्वनि तरंगों में प्रायः हर दिन किसी न किसी घोटाले अथवा उससे सम्बन्धित चर्चा अब सामान्य बात हो गयी है।

घोटालों की इतनी लम्बी लिस्ट पढ़कर मन सोच में पड़ जाता है आखिर त्यागी-तपस्वी, ऋषि-मुनियों का देश घोटालों का देश कैसे बन गया ? और इन घोटालों की कीचड़ से सन चुके अपने देश का भविष्य क्या होगा? ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनसे प्रायः हर देशवासी आकुल-व्याकुल है। वर्तमान के क्षणों में निराशा का अंधेरा इतना घना हो गया लगता है कि भविष्य की उज्ज्वल किरण कहीं नजर नहीं आती।

पर जिनके पास सूक्ष्म दृष्टि एवं प्रखर चिन्तन है, वे वर्तमान स्थिति का सार्थक विश्लेषण कर सकते हैं। घोटालों के इन चढ़ते-बढ़ते प्रकरणों के पीछे स्पष्ट देखा जा सकता है-अपनी साँस्कृतिक परम्पराओं, जीवन-मूल्यों का अवमूल्यन। हमारे देश की साँस्कृतिक दुरावस्था इतनी कभी नहीं हुई जितनी कि आज है। त्याग की अग्निशिखा, भोग की बूँदों से घिर गई लगती है। ऐसे में आवश्यकता उन व्यक्तित्वों की है, जो अपने स्वार्थों की आहुति साँस्कृतिक क्रान्ति के लिए कर सकें। शिक्षण जीवन एवं चरित्र से होता है। त्याग की भावनाओं से ओत-प्रोत व्यक्तित्व उस सिंह की तरह है, जिसकी एक गर्जना में हजारों भेड़ों को भगा देने की दम है।

भविष्य के सम्बन्ध में उठने वाली आशंकाओं-कुशंकाओं का कोई कारण नहीं है। जिन्हें सूक्ष्मदृष्टि, दिव्यदृष्टि प्राप्त है, वर्तमान प्रकरण को भगवान महाकाल का सफाई अभियान समझ सकते हैं। महारुद्र का कालदण्ड किसी को छोड़ेगा नहीं, वह फिर कितना ही बड़ा क्यों न हो और अपने बचने के कितने उपाय क्यों न कर ले। उपनिषद् के ऋषियों ने बहुत पहले समझाया था, ‘मा गृधः कस्य स्विद् धनम् लोभवृत्ति छोड़ो, भला यह धन किसका हुआ है। ऋषियों की यह आर्य वाणी हममें से कितनों ने कितनी अच्छी तरह समझी, मालुम नहीं, पर आगामी दिनों में महारुद्र का ताण्डव नर्तन, परमेश्वरी प्रकृति का दण्ड विधान प्रायः सभी को इसी तथ्य का बोध करा देंगे। राजनेता, व्यापारी, बुद्धिजीवी कोई भी इस कालचक्र से बच न सकेगा।

यह प्रक्रिया भारत में ही नहीं विश्व के अन्य भूभागों में भी तीव्र होगी। आज भी विभिन्न देशों में इसकी झलक देखी जा सकती है। कोलम्बिया के राष्ट्रपति अर्नेस्टो सैम्पर तथा उनके डेढ़ दर्जन साँसद मादक द्रव्यों के व्यापारियों से धन लेने के आरोप में अपने को फँसा हुआ महसूस कर रहे हैं। ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति फर्नाण्डो काँल्लर द मेल्लों को दिसम्बर 1992 में ऐसे ही आरोपों के कारण पद त्यागना पड़ा था। वे आज बरी भले हो चुके हों, पर कोई भी ब्राजीलवासी उन्हें निर्दोष मानने के लिए तैयार नहीं। वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति जैमे लुसिंची अपना निर्वासन समाप्त कर अभी हाल में ही लौटे हैं। उन पर भी सार्वजनिक कोष से भारी धन गायब करने का आरोप था। अपने विरुद्ध उठे आक्रोश के ही भय से वह कोस्टारिका भाग गए थे, परन्तु यह मामला पाँच साल पहले का था और वेनेजुलाई कानून के अनुसार पाँच साल बीत जाने के बाद किसी मामले की सुनवाई नहीं हो सकती। कानून की इसी कमजोरी का उन्हें लाभ भले मिल गया हो, लेकिन उनके उत्तराधिकारी कार्लोस आँद्रेज पेरेज एक करोड़ सत्तर लाख डालर के सार्वजनिक धन के गबन के आरोप में मुकदमें में फँस चुके हैं। उधर इक्बेडोर के पूर्व सार्वजनिक धन का अपने हित में दुरुपयोग करने का मामला चल रहा है। वे आजकल भागकर कोस्टारिका में शरण लिए हुए हैं, लेकिन कब तक ?

अभी सबसे ताजतरीन मामला दक्षिण कोरिया का है। जहाँ दो पूर्व राष्ट्रपतियों को भ्रष्टाचार एवं राजद्रोह के लिए दंडित किया गया है। इनमें से चुन टू ह्वान को मौत तथा रोह ताई चू को साढ़े बाईस वर्ष के सश्रम कारावास का दण्ड मिला है। इन दोनों को क्रमशः सत्ताईस करोड़ साठ लाख एवं चौंतीस करोड़ सत्तर लाख डालर जुर्माने की सजा मिली है। दोनों पर व्यापारियों को अवैध लाभ पहुँचाने का आरोप था। जापान के पर्वू प्रधानमंत्री नोबुरो ताकेशिता को रिक्रूट घोटाले के कारण इस्तीफा देना पड़ा था। वर्तमान सरकार के खिलाफ भी एक के बाद एक स्कैण्डल उभरते चले जा रहे हैं। इनमें से दो मुख्य हैं। पहला बैंक घोटाले से सम्बन्धित है। इसमें एक खरब डालर का ऋण गलत तरीके से जारी किया था, दूसरा घोटाला स्वास्थ्य मंत्रालय से सम्बन्धित है। इसके अंतर्गत अधिकारियों ने औषधि निर्माता कम्पनियों को दूषित रक्तों से बनी औषधियाँ देने की इजाजत दी थी। इनमें एड्स के विषाणु से सवंमित रक्त भी शामिल थे।

भारत का पड़ोसी देश नेपाल भी भ्रष्टाचार के विस्फोट से उद्वेलित है। वहाँ लगभग 188 करोड़ नेपाली मुद्रा के गबन किये जाने का मामला प्रकाश में आया है। अर्थमंत्री रामशरण, गृहमंत्री खूम बहादुर एवं स्वयं वहाँ के प्रधानमंत्री अपने को फँसा हुआ महसूस कर रहे हैं। यूरोप के प्रख्यात देश इटली में वहाँ के सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लगभग तीन हजार राजनेता एवं व्यवसायी जिनमें तीन पूर्व प्रधानमंत्री भी शामिल हैं, विभिन्न आरोपों का सामना कर रहे हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री फिलिप गोंजालेज भी वर्तमान भ्रष्टाचार विरोधी लहर के थपेड़ों से घिरे हुए हैं। पूर्व आन्तरिक मंत्री जोस बैरिओ न्यू एवो एवं उनके तेरह सहयोगी भी अपनी जालसाजियों के चक्रव्यूह में फँसे चुके हैं। फ्राँस में भी भ्रष्टाचार विरोधी धरपकड़ जारी है। यूँ फ्राँस का कानून राजनेताओं को खास संरक्षण देता है। बावजूद इसके तीन पूर्व कैबिनेट मंत्री तथा राष्ट्रपति पद के दो-दो दावेदार भ्रष्टाचार विरोधी गतिविधियों की चपेट में है।

मध्य अमेरिकी देश मैक्सिको भी धीरे-धीरे इस लहर की चपेट में आता दिख रहा है। पूर्व राष्ट्रपति कार्लोस सैलिनस स्वयं तो अभी अपने को किसी तरह बचाए हैं, लेकिन उनके भाई राल धन गबन एवं राजनैतिक हत्याओं के अपराधी घोषित हो चुके हैं। अफ्रीकी देशों में केन्या का मामला सबसे ऊपर है। केन्या के सेण्ट्रल बैंक से विलुप्त हुए तीस करोड़ डालर की घटना से शुरू में भ्रष्टाचार के उजागर होने की कड़ी देशव्यापी होती जा रही हैं इस कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन्दरगाह घोटाला है। जिसमें अनेक उच्चाधिकारी एवं राजनेता अन्तर्लिप्त हैं। दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला कम्यूनिस्ट देश चीन भी अपने को इस संक्रमण से बचा नहीं पाया है। यद्यपि अभी तक भ्रष्टाचार के आरोप में केवल एक शीर्ष राजनेता को ही पोलित ब्यूरो से बर्खास्त किया गया है। लेकिन इस चक्रव्यूह में अभी अनेकों के फँसने की उम्मीदें हैं।

भ्रष्टाचार निवारण इन प्रयासों के पीछे परोक्ष सत्ता के सक्रिय स्पन्दन अनुभव किये जा सकते हैं। मानवी प्रयासों की एक सीमा होती है, परन्तु सृष्टि की संचालक सत्ता अपने कार्यों का असीम सामर्थ्य के अनुरूप ही अपने कार्यों का असीम विस्तार भी करती है। भारत को केन्द्र बनाकर विश्व परिधि में हो रही हलचलों को इसी रूप में आँका जाना चाहिए। जो कालगति को पहचान सके, वे स्वयं की गतिविधियों पर नियंत्रण कर लें अन्यथा कालचक्र की दुर्बारगति, किसी के भी धन, पद , सामाजिक हैसियत का विचार किए बिना नवयुग की मर्यादाओं का बोध कराए बिना न रहेगी। अब सबको उपनिषद् का यह मार्मिक उद्बोधन सुनना ही पड़ेगा। -’मा गृधः कस्य स्विद् धनम्।’ इस समझदारी की व्यापकता ही भारत को व समस्त विश्व को उसके अतीत का गौरव वापस दिलाने वाली होगी।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(बसंत पंचमी, सन् 1988)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भाइयों, देवियों ! समय सभी के पास है। उसको, ठीक मौके को, कोई देख पाते हैं। उसको हैं, कोई-कोई देख लेते हैं, समझ लेते हैं, उसका ठीक उपयोग कर लेते हैं वे ही मजे में रहते हैं। बाकी लोगों की जिन्दगियाँ तो रहते हैं। बाकी लोगों की जिन्दगियाँ तो ऐसे ही व्यतीत हो जाती हैं, जानवरों के तरीके से पेट भरने में और बच्चे पैदा करने में। इन दो कामों में ही चिड़िया का, जानवरों का, मनुष्यों का, पशुओं का, सबका समान रूप से समय व्यतीत हो जाता है; लेकिन उसका सुयोग और सौभाग्य उठाना उन्हीं लोगों के हिस्से में आया है, जो मौके को ठीक तरीके से समझ पाते हैं और ठीक तरीके से इस्तेमाल कर लेते हैं।

रेलगाड़ी टाइम पर आती है। आप टाइम पर प्लेटफार्म पर पहुँचे तो उसमें सवार हो सकते हैं और अगर समय चूक जाते हैं तो चौबीस घण्टे तक इंतजार कीजिए। कल गाड़ी आयेगी, तब देखा जाएगा और टिकट भी बेकार हो जाएगी। कल नयी टिकट खरीदनी पड़ेगी। इस तरीके से समय को ध्यान में रखना हमेशा आवश्यक है। फसल का बीज, बोने का एक खास समय आता है। उस समय को आप चुका दें और किसी भी वक्त बहुत सा बीज बो दें, ठीक है बो दीजिए, लेकिन वह पैदावार नहीं हो सकती वह आमदनी नहीं हो सकती, जो ठीक समय पर बीज बोये जाने पर हुआ करती है। फसल काटने का भी एक निश्चित समय होता है उस समय पर अगर फसल काट ली , तो अनाज आपके घर आ जाएगा और आपने महीना-पन्द्रह दिन ऐसे ही गँवा दिये तो बाद में थोड़ा’-सा अनाज ही हाथ लग पाएगा।

जिन्दगी में बहुत से ऐसे मौके आते हैं जैसे आपके पड़ौसी में किसी की मृत्यु हो गयी है, और वहाँ से बुलावा आया है कि हमारे घर में गमी हो गयी है, जरा श्मशान घाट तक चलिए। आपने कहा-”नहीं साहब, अभी समय नहीं है। परसों देखा जाएगा, परसों आयेंगे। फिर वह व्यक्ति जिन्दगी भर ख्याल रखेगा कि हमारे घर में हमारी माताजी की मृत्यु हुई थी और ये नहीं आये। ‘ये नहीं आये’ जिन्दगी भर यह कलंक आपके साथ लगा ही रहेगा। समय चूक जाने पर आप उसको पूरा नहीं कर पायेंगे। किसी के यहाँ शादी-ब्याह हो और वह कहे, हमारे यहाँ सब मेहमान आये हैं, आप भी आइये! अरे साहब, पन्द्रह दिन बाद आयेंगे। इस वक्त तो हम नहीं आ सकते, अभी छुट्टी नहीं है, इस वक्त तो हमें बहुत काम है। ठीक है, फिर आपसे जिन्दगी भर कहने को रह जाएगा कि आप ब्याह के मौके पर नहीं आये थे। घर में बच्चा पैदा होता है। सारे घरवाले, पड़ोसी महिलाएँ सब इकट्ठी हो जाती हैं और देखती हैं कि बहू को कोई परेशानी न पैदा हो जाये। समय पर जा पहुँचती है तो ठीक है। बच्चा पैदा हो गया और उसके बाद में वे कहें अरे साहब, हमें खबर तो हो गयी थी, पर हम सो गये थे, हम आये नहीं।

समय का बड़ा महत्व है। समय की कीमत है। समय पर सही काम कर लेना मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमानी और सबसे बड़ी खुशहाली है। आप के लिए भी यह समय खास समय है। इस समय को अगर आप पहचान लें और उसका ठीक उपयोग कर लें, तो समझिये आप बड़े भाग्यवान निकले और आपने अपने जीवन को सार्थक कर लिया। समय रूपी सम्पदा को पाकर आप निहाल हो गये, अगर आप मौके को समझ नहीं पाये, देख नहीं पाये और किस समय में आपको क्या करना चाहिए, इस बात को भुला दिया तो आपको पश्चाताप के अलावा और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। ये बड़ा कीमती समय है। कैसा कीमती समय है? ये ऐसा कीमती समय है जैसे-एक बार रामचन्द्रजी के ऊपर मुसीबत आयी। उन्होंने बन्दरों से कहा, हनुमानजी से कहा, सुग्रीव से कहा था’-” भाइयों, हमारी मदद करो। “ हनुमानजी चले गये मदद करने के लिए रामचन्द्रजी की। थे तो हनुमानजी भी एक बन्दर । वे सुग्रीव के यहाँ नौकरी करते थे। किसी तरीके से अपना गुजारा करते थे, लेकिन जब रामचन्द्रजी के पुकारने पर चले गये, मौके को उन्होंने पहचान लिया तो क्या परिणाम हुआ? फिर वे ऐसे बड़े हो गये जैसे सारी जिन्दगी में कभी नहीं हुए थे। उन्होंने पहाड़ को उखाड़ा, समुद्र को लाँघा, लंका को जलाया और सीताजी की खोज की। रामराज्य की स्थापना के लिए उन्होंने सारे का सारा जीवन लगाया और अपने आप में धन्य हुए। अब उनकी पूजा हर जगह की जाती है। उस समय को हनुमानजी चूक गये होते और रामचन्द्रजी से यह कह दिया होता कि साहब, अभी तो समय नहीं है, सालभर बाद देखा जाएगा। इस समय तो हमें नौकरी से छुट्टी नहीं मिल रही है। अभी तो लड़की का ब्याह नहीं हुआ है। अभी तो ये काम करने को पड़ा हुआ है। तब तो हनुमानजी उस मौके को चुका देने के बाद में सुग्रीव के यहाँ नौकरी ही करते रहते । बन्दर के बन्दर बने रहते और हनुमानजी देवता के रूप में शायद फिर पूजित न हो पाते।

जिन्होंने भी मौके का लाभ उठाया, वे धन्य हो गये! मगर वह समय कौन-सा होता है? वह असामान्य समय होता है जब भगवान पुकारते हैं और सामान्य समय वह होता है, जब मनुष्य भगवान को पुकारता है। यह मनुष्य अपनी मुसीबतें दूर करने के लिए भगवान् को पुकारता ही रहता है, पैसा दीजिए, बाल-बच्चे दीजिए, मुकदमें से छुड़ा लीजिए, झगड़े से बचा लीजिए, बीमारी दूर कर दीजिए। उसके पुकारने पर भगवान् भी कुछ दिया ही करता है। ये बात नहीं कि मना कर देता हो। भिखारी हमारे दरवाजे पर आते हैं तो उन्हें मना नहीं कर देते। किसी को रोटी, किसी को पैसा किसी को कुछ और वस्तु दे करके विदा कर देते हैं। लेकिन , एक मौका ऐसा भी आता है जब माँगने के लिए कोई शक्ति आती है और शक्ति से भी कोई बड़ी शक्ति आ जाये तो, उसे कुछ देने के बाद व्यक्ति धन्य हो जाता है। दशरथजी के यहाँ विश्वामित्र आये। क्या मांगने के लिए आये? बच्चे माँगने के लिए आये। उन्होंने कहा-यज्ञ की रक्षा के लिए हमको इनकी बड़ी आवश्यकता है। स्वयं विश्वामित्र असुरों से लड़ सकते थे। राजा थे वे भी। पहले भी उन्होंने सैकड़ों लड़ाइयां लड़ी थीं, अपनी जिन्दगी में। वे सभी राक्षसों को मार सकते थे, पर स्वयं तो नहीं मारा, क्योंकि ऋषि का धर्म अलग है। ऋषि को अपने-आप पर मानसिक संतुलन बनाये रखना चाहिए। ऋषि को अपनी क्षमाशीलता कायम रखनी चाहिए, लेकिन राक्षसों से लड़ने के लिए तो कोई चाहिए था। उसके बिना तो काम नहीं चलेगा न? ऋषि नहीं लड़ेगा तो दूसरे तो लड़ेंगे।

दशरथजी के मन में पहले तो यह आया कि हमारे बच्चे हैं, हमारे पास रहेंगे, बड़े होंगे, हमारी सेवा करेंगे, हमारा घर देखेंगे, राज-पाठ सम्भालेंगे। क्यों हम ऋषि के यहाँ भेजें? पीछे उनके गुरु वशिष्ठ ने उनको सलाह दी। उनकी समझदारी ने कहा-नहीं इस समय विश्वामित्र माँगने के लिए आये हैं। ये बार-बार नहीं आयेंगे। महर्षि को सहायता देने के लिए सिपाही-सहयोगी तो कहीं और भी मिल जाएँगे, लेकिन आप इस वक्त अपने बच्चों को देकर के धन्य हो सकते हैं। ऐसा मौका दोबारा नहीं आयेगा। इसलिए आप इन्हें खुशी से दे दीजिए और राजा दशरथ ने अपने दोनों बच्चों को विश्वामित्र के हवाले कर दिया।

परिणाम क्या हुआ ? परिणाम ये हुआ कि विश्वामित्र के साथ जानें के बाद दोनों का भला हुआ। ऋषि ने उन्हें अनेकों विद्याएँ सिखाई, अमोघ अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। शंकरजी का धनुष जिसे तोड़ना बहुत मुश्किल था। उस धनुष को तोड़ने में रामचन्द्रजी सफल हुए। परशुरामजी नाराज हुए थे कि हमारे गुरुजी का धनुष किसने तोड़ दिये? सीताजी के साथ रामचन्द्रजी का विवाह हुआ। लंका का विनाश करने में, सारी असुरता का निवारण करने में रामचन्द्रजी सफल हुए। रामराज्य की स्थापना करने में सफल हुए। ये सब कैसे हुआ? अगर राम राजकुमार रहे होते तो शायद इतना न हो पाता। विश्वामित्र की शक्ति और दशरथ की बुद्धिमानी से ही सम्भव हुआ। ठीक समय पर अगर किसी ठीक काम के लिए अपने बच्चे तक देने पड़े तो हर्ज की क्या बात है? ऐसा राजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से किया, फिर गुरु निहाल हो गये, दशरथजी निहाल हो गये, विश्वामित्र निहाल हो गये, विश्वामित्र निहाल हो गये, रामायण लिखने वाले बाल्मीकिजी और रामचन्द्रजी निहाल हो गये और वे सब निहाल हो गये जो भगवान् राम का नाम लेकर भवसागर से पार हो गये। राम अगर विश्वामित्रजी के साथ नहीं गये होते और उन्होंने अपनी अयोध्या में ही समय काटा होता तो राजा बन जाते और नाती-पोतों को खिला रहे होते तब परशुराम और रामचन्द्रजी का हम और आप शायद ही नाम ले पाते, शायद ही जान पाते। सम्भव है कि उनके मन्दिर भी नहीं बनते और रामायण भी नहीं लिखी जाती। मौका था, जिसको गुरु वशिष्ठ ने पहचान लिया, राजा दशरथ ने पहचान लिया और राम-लक्ष्मण ने भी पहचान लिया। सबने पहचान लिया और उस मौके का ठीक लाभ उठा लिया गया। लाभ उठाने का परिणाम यह हुआ कि सब के सब धन्य हो गये और एक बड़ा काम सम्पन्न हुआ।

सुनिये, और भी कुछ हुआ। क्या-क्या हुआ ? बड़े गजब की बाते हुईं। देव मानव थे राजा इन्द्र । महर्षि दधीचि के पास हड्डियाँ माँगने आये। दधीचि ने ठीक मौका देखा, सोचा ये हड्डियाँ तो देनी ही पड़ती हैं। बुखार में आदमी मर जाते हैं। ऐक्सीडेंट में कई बाद मोटरों के आगे आ जाते हैं, रेलगाड़ियों के आगे आ जाते हैं, हड्डियों का कचूमर निकल जाता है। रोज हत्याएँ होती हैं। उन्होंने खुशी-खुशी ठीक मौके पर उच्च उद्देश्य के लिए अपनी हड्डियों का दान कर दिया। उसका क्या परिणाम हुआ? ऐसा शानदार परिणाम हुआ कि महर्षि दधीचि धन्य हो गये। राजा इन्द्र धन्य हो गये और वृत्तानुसार जैसी मुसीबत से त्राण पाने के बाद सारी दुनिया अपने आप में धन्य हो गयी। देवता धन्य हो गये, क्योंकि दधीचि ने ठीक मौके पर ठीक काम किया। और कोई घटना बताइये! मैं आपको कौन-कौन सी घटनाएँ बताऊँ? जिन्होंने सही समय पर सही काम किया। एक थे रामकृष्ण परमहंस। वे एक लड़का के पास गये। वह उनके यहाँ आया करता था बार-बार। सो उसके पास जा पहुँचे। उन्होंने कहा-नरेन्द्र, इस समय मुझे बहुत सख्त जरूरत है और तू इम्तहान देने में लगा हुआ है, पढ़ाई में लगा हुआ है। मेरा कितना काम हर्ज हो रहा है, तुझे समझ में नहीं आता। उसने कहा- अच्छा स्वामीजी। मैं आपके साथ चलता हूँ। आप जहाँ कहीं भी लगा देंगे वहीं जा पहुँचूँगा और वे स्वामीजी के पास चले गये। विवेकानन्द स्वयं नहीं गये, वरन् रामकृष्ण परमहंस उन्हें बुलाने के लिए उनके घर गये और कहने लगे वत्स, हमारे साथ चल। हमारा बहुत जरूरी काम पड़ा हुआ है। भगवान् भी माँगने आते हैं कई बार। इंसान तो माँगते ही रहते हैं, भिखारियों के तरीके से। हमको ये दीजिए, हमको वो दीजिए। लेकिन कभी-कभी ऐसे भी मौके आते हैं जब भगवान् माँगने गये थे। आपको मालूम है कि नहीं! तब बलि राजा बना अपने सिंहासन पर बैठा रहा और भगवान् छोटे रह गये। बलि बड़े हो गये। माँगने के लिए जो भी जाता है, छोटा हो जाता है देने वाला बड़ा हो जाता है। इसी तरह के मौके कितने सारे आये? चाणक्य ने भी ऐसा ही किया था। वे चन्द्रगुप्त को तलाशते उसके घर जा पहुँचे थे और कहने लगे-बेटा, हमारा बड़ा काम हर्ज हो रहा है। तुझे चक्रवर्ती शासक बनना है और भारत को बहुत ऊँचा उठाना है। हमारे उद्देश्य के लिए, बड़े काम के लिए जीवन देना पड़ेगा। उस समय चन्द्रगुप्त ने कहा होता-अरे साहब, मुझे नौकरी करनी है, शादी करनी है, बाल-बच्चे पैदा करने हैं, दुकान चलानी है। तो सम्भव है, न वह मौका चन्द्रगुप्त के जीवन में आया होता और न ही भारत भूमि को वह सौभाग्य मिला कि उन्होंने ठीक मौके को पहचान करके ठीक-ठीक तरीके से समर्पित कर दिया।

और कौन’-कौन सी घटनाएँ हैं ? मैं ढेरों घटनाएँ, ढेरों कहानियाँ सुना सकता हूँ। कौन-कौन सी घटनाएँ सुनेंगे आप? चलिए आपको और सुनाता हूँ। रामदास ने एक लड़के को पकड़ लिया। वह इधर-उधर घूम रहा था। उससे कहा-बेटा तुझे छत्रपति बनना है। तुझे बड़ा काम करना है। नहीं साहब, मेरी माँ इन्तजार कर रही होगी, मुझे घर का कुछ काम करना है। मुझे फुर्सत नहीं है, दो महीने बाद आऊँगा। अगर ये बहानेबाजी बनायी होती, तो शिवाजी को ये सौभाग्य नहीं मिला होता, जो उनको जीवन में मिला। शिवाजी करी घटना आपको बतायी। चाणक्य और चन्द्रगुप्त की घटना आपको बतायी और विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस की घटना आपको बतायी और विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस की घटना सुनायी। दशरथ और रामचन्द्रजी की और ऋषि की बात बतायी। ये सब बातें इसलिए आपको बतायीं कि ठीक उसी तरह का मौका इस समय भी है। इस तरह के मौके पर आप चूक जाते हैं तो फिर हमेशा पछताना ही पछताना आपके हाथ में रह जाएगा। फिर आप यह सौभाग्य दोबारा जब प्राप्त करना चाहेंगे, तो नहीं कर सकेंगे।

आपके मालूम है, राम-रावण युद्ध से पूर्व गिलहरी ने देखा कि ये ठीक मौका है, जब रामचन्द्रजी को जरूरत पड़ी है, उन पर मुसीबत आयी है। सब सहयोग करें, ये रामचन्द्रजी की इच्छा है, इसलिए मुझे भी उनकी मदद करनी चाहिए। गिलहरी ने अपने बालों में बालू भरकर पुल बिखेरना शुरू कर दिया, बस गिलहरी धन्य हो गयी। सब उसकी गाथा गाते हैं और रामायण में मुख्य हो गयी । गिलहरी के फोटो छपते हैं। गिलहरी के वंशज औलाद की पीठ जो कालेपन के निशान पाये जाते हैं, ये रामचन्द्रजी द्वारा स्नेह से हाथ फेरने की वजह से बने थे। ये कैसे हो गया? क्योंकि ठीक समय पर उसने ठीक काम किया।

और किन-किन ने समय पहचाना और भगवान का काम किया? रीछ-वानरों की घटनाएँ को आपको याद ही हैं। गाँधीजी की कल-परसों की बात है। स्वाधीनता संग्राम में जिन-जिन लोगों ने भाग लिया, उन स्वतन्त्रता सेनानियों को आप जानते ही हैं कि वे कौन-कौन हैं। उन्हें स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी होने का सर्टीफिकेट मिला है। उन्हें पेन्शन मिलते हैं। उनको सम्मान मिलता है। उन्हें हर जगह बुलाया जाता है। यात्रा के लिए ‘फ्री पास’ मिला हुआ है। यदि उस समय उनको ध्यान नहीं आता होता, उस समय वे चूक गए होते, तो ये सुविधाएँ और ये सम्मान उन्हें थोड़े ही मिलता। नहीं साहब, अब हमें भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बना लीजिये। भाई साहब, अब कैसे बना लें, वह मौका तो उसी वक्त था। उस वक्त जो आ गया सो आ गया, जो नहीं आया वह रह गया । भगवान गौतमबुद्ध के साथ में जो भिक्षु संघों में शामिल हो गये थे, उन्होंने उस समय के धर्म-चक्र प्रवर्तन के लिए बड़ी भूमिकाएँ निभायीं, जो उस समय नहीं आये, वे रह गये। इसी प्रकार से अन्यान्य लोग हैं। उनमें से जो आ गये रीछ-बन्दर, वे रामचन्द्रजी की सेना में भर्ती हो गये सो हो गये। उनको कितना श्रेय और सौभाग्य मिला, यह आप सभी जानते हैं। उनका नाम लिया जाता है, वे अमर हो गये। जो नहीं आये, ऐसे ढेरों रीछ-बन्दर रहे होंगे, लोमड़ियाँ रही होंगी, खरगोश रहें होंगे, हाथी और शेर रहे होंगे जो अपनी-अपनी माँदों में, अपने-अपने घरों में बैठे होंगे। उन्होंने समय को नहीं पहचाना और युद्ध में भाग नहीं लिया। फिर क्या हुआ उनका ? वे बेचारे वैसे के वैसे जानवर के जानवर ही रह गये, पर जो अपनी जान हथेली पर रखकर उसमें शामिल हो गये, पर जो अपनी जान हथेली पर रखकर उसमें शामिल हो गये, वे रीछ और बन्दर देवता हो गये और वे रामचन्द्रजी के साथ विमान में बैठकर अयोध्या चले गये। देवलोक चले गये। ऐसा मौका बार-बार नहीं आता।

हनुमानजी की तरह अर्जुन यह कहता था कि “मैं भीख माँगकर खा लूँगा और अपना गुजारा कर लूँगा। मुझे क्या अधिकार मिलने से-राज्य मिलने से?” लेकिन भगवान ने कहा-नहीं हमको आवश्यकता है। तुम्हें आवश्यकता नहीं है तो न सही। तुम तो दुकान खोलकर भी अपना गुजारा कर लोगे, पर हम कैसे गुजारा कर लेंगे? हमें तो भारत को महाभारत बनाना है। छोटे से भारत को विशाल भारत के रूप में परिणत करना है। उसमें तुम्हारी आवश्यकता है। अर्जुन पहले तो आनाकानी करते रहे, पीछे विवेकबुद्धि जाग्रत होने पर उन्होंने कहा’- “करिष्ये वचनं तवच” आपका कहना मानूँगा, आपके आदेशानुसार चलूँगा। बस यही घटना हमारे जीवन की भी है। हमारा जीवन जो आज वसन्त पंचमी के दिन आप लोगों के सामने आया, इसकी क्या विशेषता है? इसकी कोई विशेषता नहीं है। मात्र एक विशेषता है-’करिष्ये वचनं तव’ की। एक ऐसी सर्वशक्तिमान सत्ता ने हमारा आह्वान किया और यह कहा कि तुम्हारे पास जो कुछ भी है, वह हमारे हवाले कर दो। हमारे पास क्या था? कुछ भी नहीं था। समय था खाली , सो समय को हमने उनके चरणों पर रख दिया और ये कहा -”हम आपके साथ-साथ चलेंगे। जो आप आज्ञा देंगे, हम वही करेंगे।” और वैसा ही हुआ। सारी जिन्दगी उसी प्रकार से बीत आयी। हमने क्या पाया? क्या खोया? आप समझते हैं न हमने। आप हमारे गाँव चले जाइये, देखिये-हमारे साथ पैदा हुए लोग, दूसरे लोग-कोई दुकान कर रहा है, कोई व्यापार कर रहा है, कोई खेती कर रहा है। सभी जैसे-तैसे मामूली आदमी की जिन्दगी जी रहे हैं, लेकिन हम अच्छी जिन्दगी, शानदार जिन्दगी जी रहे हैं। ये कैसे सम्भव हुआ? यह इसलिए कि ठीक समय पर, ठीक वस्तु का, ठीक पात्र के हाथ में समर्पण हुआ।

आज इसी की माँग है। युग बदल रहा है। सवेरा निकलने वाला है। रात्रि समाप्त होने वाली है। फूल खिलने वाले है। चिड़ियाँ चहचहाने वाली हैं। उषाकाल सन्निकट है। ऐसे पुण्य समय में प्रातःकाल में आपको उठने की जरूरत है। चेतने की जरूरत है। मुर्गा बाँग लगाता और कहता है कि ‘प्रातःकाल हो गया उठिये।’ मन्दिरों में शंख-घड़ियाल बजते हैं और कहते हैं उठिये। मस्जिदों में आवाज लगायी जाती है, कहती है उठिये, सोइये मत। यह सोने का समय नहीं है, पड़े रहने का समय नहीं है। वक्त बर्बाद करने का यह समय नहीं है, यह समय गँवाने का नहीं है। यह समय अपने पेट भरने का नहीं है। यह समय लोभ-मोह का नहीं है। यह समय इसका है कि हम नये विश्व की नयी संरचना के लिए अपने समय को और शक्ति को लगा दें। बस एक ही माँग है- अगर आप मौके को समझ पायें, अपने समय को दें पाये तो आपका कुछ काम हर्ज होने वाला नहीं है। ये आपका बेकार का भय है कि हम चले जाएँगे तो हमारे बाल-बच्चे भूखे मर जाएँगे। हम पर मुसीबत आ जाएगी हमारा काम हर्ज हो जाएगा। ये सब आपके मन की कमजोरी है। “क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं” आपके हृदय की दुर्बलता के अलावा और कुछ भी नहीं है।

इस समय, समय की माँग ये है कि आप अपने समय का, श्रम का, अपनी शक्ति का बड़े से बड़ा भाग समाज की संरचना के लिए, महाकाल की पुकार को पूरा करने के लिए, युग की चुनौती स्वीकार करने के लिए लगाएँ, अपने आप को पेश करें। फिर क्या काम करें? ढेरों के ढेरों काम करने के लिए पड़े हैं। आप जहाँ रहते हैं, वहाँ पेट भरने के लिए काम करने के अतिरिक्त थोड़ा समय बचाना चाहिए। उस बचे समय से आप अपने क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण काम कर सकते हैं। आप ज्यादा समय लगाना चाहें तो हमारी शक्तिपीठें हैं। हमारे पेट का हर्जा होगा। बाबा, पेट-पेट मत चिल्लाइये। पेट नहीं, आदमी की नीयत खराब है। आदमी के पेट की कोई समस्या नहीं है। चिड़िया के सामने, हाथी के सामने पेट भरने की कोई समस्या नहीं है, फिर इंसान के सामने क्या आयेगी? आप ये बहानेबाजी मत बनाइये कि हमारा गुजारा कैसे होगा, घर का क्या होगा, हमारी जिम्मेदारियाँ कौन पूरी करेगा? आप नहीं भी रहेंगे, मर जाएँगे, तो भी आपके बच्चों का, घर बालों का पालन-पोषण होगा। आपके बिना कोई भूखा नहीं करने वाला, न हो तो आप विश्वास करके देख लीजिए।

और कुछ कहना है आपसे? बस एक ही बात कहनी है कि आप अपने समय का थोड़ा हिस्सा अपने लिए रखिए और ज्यादा हिस्सा समाज के लिए, देश के लिए, धर्म के लिए, जन-जाग्रति और लोकमंगल के लिए लगाइये। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आप नफे में रहेंगे। हम नफे में रहे हैं, यकीन कीजिए। हमें देख लीजिए और महापुरुषों की गवाहियाँ देख लीजिए। गाँधीजी ने वकालत की होती, तो सकील के वकील रह गये होते। बिनोवा भावे ने अगर उसी तरह की जिन्दगी जी होती, तो शायद कहीं अध्यापक बन गये होते। जवाहर लाल नेहरू भी कहीं वकालत कर रहे होते। सरदार बल्लभ भाई पटेल मामूली वकील थे, वकील ही रहे होते, लेकिन इन सारे के सारे महापुरुषों ने अपने आप को लोकमंगल के लिए आगे बढ़ाया तो मजे में और नफे में रहे। एक भी नुकसान में नहीं रहा। आज लोगों में यदि साहस हो, हित त्याग की, देशभक्ति की भावना हो, अगर आप मौके को पहचानते हों, तो समझ लीजिए यह युगसंधि की बेला है। युग बदल रहा है। इस समय आप जैसे भावनाशील व्यक्तियों की बेहद आवश्यकता है। आप जन-जागरण के लिए खड़े हो जाइए, कार्यक्रम तो बहुत सरल हैं और हमने सबको बता दिये हैं। इस वक्त के लिए सब चार कार्यक्रम रखे हैं-

नारी जागरण के लिए आपको समय लगाना है। नारी जागरण के बिना पुरुष जाति अधूरी है। पुरुष अधूरा रहेगा तो दुनिया अधूरी रहेगी। आधी दुनिया कैदखाने में पड़ी रहे तो बाकी दुनिया किस तरीके से उठेगी। गरीबी उन्मूलन के लिए हमको बड़ा काम करना है। हमारे यहाँ अधिकांश लोग केवल खेती पर निर्भर हैं और खेतिहर मजदूर विचारे थोड़े दिनों के लिए मेहनत-मजदूरी पाते हैं। फिर उनके लिए कोई काम नहीं रह जाता, अतः कुटीर उद्योगों का विकास करना है। कुटीर उद्योग हमारे देश में कृषि के सहायक बन सकते हैं। आज हर आदमी कमजोर-बीमार होता चला जा रहा है, क्योंकि रहन-सहन, खान-पान आहार-विहार के बारे में उसको जानकारी ही नहीं है। स्वास्थ्य ठीक हो, इसके लिए स्वास्थ्य संगठन हमारा कार्यक्रम है। अतः स्वास्थ्य संगठन हमारा कार्यक्रम है। अतः स्वास्थ्य संगठन के लिए खड़े होना है। चौथा कार्यक्रम है जन-जागरण। इसका अर्थ है-हर आदमी के विचारों को बदल देना, चेतना को बदल देना, भावना को बदल देना। लोगों को देखा है आपने, कैसी घटिया और गन्दगी से भरा जीवन जी रहे हैं। आदमी को कुरीतियों और लोक-मान्यताओं ने किस तरीके से जकड़ रखा है। नशेबाजी और दहेज जैसी प्रथाओं में कितना पैसा बर्बाद होता है? फैशन-परस्ती में लोग कितना पैसा लगा देते हैं? ये ऐसी मुसीबतें हैं जिनसे हमें स्वयं निकलना पड़ेगा और जनता को निकालना पड़ेगा। सरकार मदद करेगी, ठीक है। सरकार अपना काम करेगी लेकिन ये जन-मानस की, घर-घर में जाने की, लोक-चिन्तन बदलने की बात है। जन-जागरण की बात है। इसके लिए आपको ही आगे आना पड़ेगा। इसे कोई और नहीं कर सकता, आप ही कर सकते हैं। आपको करना भी चाहिए।

मैं ये अनुरोध लेकर आपके सामने हाजिर हुआ हूँ कि आप समय को पहचानिये और उसे भगवान् के काम में लगाइये। भगवान् ने- महाकाल ने आपको पुकारा है। इसलिए आपको पुकारा है कि आप दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए, गये-गुजरे लोगों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने के लिए कदम बढ़ायें। अपने आपको त्याग के लिए, बड़े कामों के लिए समर्पित कीजिये। फिर देखिये आप कितने मजे में और कितने खुशहाल रहते हैं। कितने प्रसन्नचित्त रहते हैं। कितना आपको संतोष मिलता है, सम्मान मिलता है, कितना आपको भगवान का अनुग्रह मिलता है। यही तो परीक्षा का समय है। अगर आपमें हिम्मत है और आपका विवेक साथ देता है तो मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि आप जरूर कदम बढ़ाइये। नये युग के निर्माण जैसे बड़े कामों में अपना समय लगाइये-हिम्मत कीजिए। यह हिम्मत आपके लिए इतनी बड़ी साबित होगी जैसे हनुमानजी के लिए साबित हुई थी, अर्जुन के लिए साबित हुई थी और वे धन्य हो गये थे। बस, यही आपसे अनुरोध करना था। आज की बात समाप्त।

॥ ॐ शान्ति ॥


कष्टों का अपना स्वाद और प्रतिफल है (Information)

भगवान श्रीकृष्ण ने किसी बात पर प्रसन्न होकर कुन्ती से वरदान माँगने को कहा। कुन्ती बोली-”मुझे कठिनाइयों से जूझने और समस्याओं को सुलझाने के अवसर मिलते रहें।” कृष्ण ने आश्चर्य से पूछा-ऐसा तो कोई नहीं माँगता।

कुन्ती का उत्तर था- “तभी तो लोग साहसी, दूरदर्शी और प्रतिभावान नहीं बन पाते। कष्टों का अपना स्वाद और प्रतिफल है।”


अपनों से अपनी बात - संस्कार महोत्सवों के माध्यम से युग-परिवर्तन का शंखनाद

हमारा देश विविधताओं से भरा बड़ा ही विलक्षण ऐसा राष्ट्र है, जिसकी साँस्कृतिक धरोहर सहस्रों वर्षों से न केवल अक्षुण्ण है वरन् अनगिनत भाषाओं, सम्प्रदायों, प्रचलनों, रीति-रिवाजों के बावजूद अपना वैशिष्ट्य भी बनाए हुए है, इसके मूल में जाते हैं तो एक ही तथ्य समझ में आता है कि यहाँ की धरती में ऋषिगणों ने जो संस्कारों के बीज डाले हैं उनके कारण ही अध्यात्म प्रधान इस राष्ट्र में जीवन्त प्राण ऊर्जा कण-कण में समाहित है। वैदिक काल के पूर्व से अब तक सारी सृष्टि का जो विकास-क्रम कहा है, उसकी केन्द्रीय धुरी भारतीय संस्कृति ही है, यह डंके की चोट पर कहा जा सकता है।

उपरोक्त पंक्तियाँ इस परिप्रेक्ष्य में लिखी जा रही हैं कि संधिकाल की इस वेला में जब हम पल-पल, धीरे-धीरे युग परिवर्तन की प्रक्रिया में आगे बढ़ते जा रहे हैं, इन संस्कारों को बड़े व्यापक स्तर पर न केवल भारत अपितु पूरे विश्व में पुनर्जागृत किये जाने की आवश्यकता अब अनुभव की जा रही है। यह कार्य गायत्री परिवार ही अपनी गुरुसत्ता प्रदत्त मार्गदर्शन के माध्यम से कर सकता है, इसमें किसी को संदेह नहीं करना चाहिए। सारे भारत व विश्व में सत्ताईस विराट आश्वमेधिक आयोजन एवं श्रद्धाँजलि समारोह (1990) से लेकर विराट प्रथम पूर्णाहुति कार्यक्रम(1995) तक संपन्न कर दिखाने वाले समाज के नवोन्मेष को संकल्पित अखिल विश्व गायत्री परिवार की कार्यक्षमता पर अब सबको विश्वास हो चुका है। प्रयाज व अनुयाज में संपन्न राष्ट्र निर्माण के सशक्त कार्यक्रम तथा पुनर्गठन वर्ष में ग्रामे-ग्रामे यज्ञ, गृहें-गृहें उपासना के उपक्रम में पंचकुण्डीय यज्ञायोजन एवं क्षेत्रीय प्रशिक्षण योजना ने एक विराट सेना समयदानी कार्यकर्त्ताओं की खड़ी कर दी है। भूमि उर्वर है, ऋषि संस्कृति का खाद-पानी डला हुआ है, मात्र संस्कारों के बीज डालने की आवश्यकता भर शेष है।

इसी परिस्थिति को दृष्टिगत रख अनुयाज-पुनर्गठन वर्ष की इस समापन वेला में शाँतिकुँज की ऋषि चेतना ने सूक्ष्म जगत से यह संदेश भेजा है कि इस कार्तिक पूर्णिमा के उपरान्त पहले इस विराट भारत के उन स्थानों पर विराट आश्वमेधिक प्रयोगात्मक स्तर के संस्कार महोत्सव संपन्न किये जाएँ, जहाँ अभी तक मिशन का प्रकाश उतनी सघनता से नहीं पहुँच पाया है। इनमें पूर्वोत्तर के पश्चिम बंगाल के भद्रकाली(हुगली), कलकत्ता, आसाम के तिनसुकिया, महाराष्ट्र में बम्बई व थाणे, आँध्र प्रदेश के चिराला (विजयवाड़ा) एवं हैदराबाद, चैन्नई

(अब मद्रास-तमिलनाडु) तथा बैंगलोर जैसे क्षेत्र चुने गए हैं। बाद में ये आयोजन पूरे भारत में संपन्न होते रहेंगे। संस्कार प्रधान इन आयोजनों में षोडश संस्कार के अंतर्गत दस विशिष्ट संस्कार, जन्मदिवस एवं विवाह दिवस तथा दो विशिष्ट संकल्प-सुसंस्कारिता को जीवन में उतारने के एवं राष्ट्रीय अखण्डता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने हेतु-इस प्रकार चौदह संस्कार सम्पन्न कराए जाएँगे। कुण्डों की संख्या एक सौ आठ एवं आवश्यकतानुसार दो सौ इक्यावन (अधिकतम) तक हो सकती है।

संस्कारों को सम्पन्न कराने हेतु जन-जागरण अभियान प्रयाजक्रम में छोड़ा जाएगा। सभी सम्प्रदाय, मत, जाति, लिंग के व्यक्ति इसमें सम्मिलित हो विराट देव-संस्कृति के एक अंग बनें, यह प्रयास रहेगा। साथ ही एक विराट प्रदर्शनी सभी स्थानों पर लगाई जाएगी, जिसमें मल्टीमीडिया के माध्यम से संस्कारों को विज्ञानसम्मत रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। न केवल संस्कार अपितु भारतीय संस्कृति, अध्यात्म के बहुआयामीय स्वरूप को दृश्य-श्रव्य साधनों के माध्यम से प्रदर्शित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त ऋषि परम्परा, गुरुसत्ता का जीवन-दर्शन देवात्मा हिमालय से लेकर पर्यावरण संरक्षण एवं अन्यान्य रचनात्मक पक्षों पर भी आधुनिकतम प्रदर्शनी होगी। साथ-साथ विचार मंच पर विभिन्न विद्वानों द्वारा सेमिनार वर्कशाप भी चलती रहेंगी। इस पूरे आयोजन का मूल रूप ज्ञान यज्ञ का ही रहेगा।

अगले वर्ष विदेश में ऐसे ही विराट आयोजन न्यूजर्सी (यू0एस0ए0) में 11 से 14 जुलाई, 1997 एवं लंदन (यू0के0) में 22 से 25 अगस्त, 1997 की तारीखों में आयोजित किये गये हैं, जिनकी तैयारी विगत रक्षाबंधन से ही आरम्भ हो चुकी है। विश्वास किया जाना चाहिए कि देश-परदेश की भूमि पर सम्पन्न होने जा रहें इन संस्कार महोत्सवों, जो विशुद्धतः आश्वमेधिक प्रयोगों के युगानुकूल 6 परिवर्धित संस्करण हैं, के माध्यम से गुरुसत्ता के स्वप्नों को पूरा करने एवं देव संस्कृति को विश्वसंस्कृति का रूप देने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण ठोस कार्य सम्पन्न हो सकेगा।


सद्भाव-सम्मान की प्रतिक्रिया फलित होकर मिलती है(Kahani)

हजरत उमर ने एक युद्ध जीता। वहाँ की व्यवस्था सही करने के लिए उनका पहुँचना आवश्यक था। सो वे कुछ साथियों सहित उस यात्रा पर निकल पड़े। तीन आदमियों के पीछे एक ऊँट भी साथ था। दो पीठ पर सवार होते, तीसरा नकेल पकड़ कर आगे चलता।

सिलसिला बराबर चलता रहा और वह नगर आ गया, जहाँ उन्हें पहुँचना था। प्रजा स्वागत की तैयारी किये बैठी थी। एक सवार ने खुद उतर पड़ने और हजरत को सवार होने के लिए कहा।

जवाब था-हम सब की हैसियत एक है। नियत अनुशासन के निबाहने में ही हमारी शान है। हजरत ऊँट की नकेल पकड़े हुए ही शहर में घुसे। उनके इस शिष्ट व्यवहार पर सभी प्रजाजन पुलकित हो उठे। उन्हें मिलने वाले अपरिमित सम्मान का यही कारण था। दूसरों के प्रति सद्भाव-सम्मान की प्रतिक्रिया अनेकों गुनी फलित होकर मिलती है।

*समाप्त*