शाश्वत सौंदर्य का बोध

मैंने पूछा-”मैं किसे प्यार करूं?”- तो ध्यान की गहराइयों से एक आवाज आयी- “उन्हें, जिन्हें लोग दलित, गर्हित और गया-गुजरा समझते हैं। जो निन्दा और भर्त्सना के पात्र हो चुके हैं। उनके मित्र बनकर उन्हें प्यार और प्रकाश दो। तुम्हारा गौरव इस पर नहीं कि तुम्हें संसार में बहुत से लोग प्यार करते हैं, वरन् तुम संसार को प्यार करके गौरवान्वित होगे।”

मैंने कहा-”लोग कहते हैं कि जो त्वचा, वर्ण और शरीर से सुन्दर नहीं हैं, उन्हें देखने से सुख और शान्ति नहीं मिलती।” मेरी प्यारी आत्मा ने कहा-”तुम असुन्दर के माध्यम से उस शाश्वत सौंदर्य की खोज करो, जो त्वचा, वर्ण और शरीर के धुँधला बादल छट जाएगा तो सौंदर्य के अतिरिक्त कुछ रह ही न जाएगा।”

मैंने जानना चाहा- ऐसा भी तो है, लोग शरीर, कुल-जाति से सुन्दर होते हुए भी मानसिक मलीनता से ग्रस्त हैं। वासनाओं के अँधेरों से घिरे हैं। तब क्या मैं उनसे घृणा करूं? हृदयाकाश में प्रदीप्त ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल से आता हुआ एक स्वर पुनः गूँजा-नहीं, घृणा मत करना, घृणा उनके अँधेरों को और अधिक घना करेगी। इससे उनकी मलीनता और अधिक प्रगाढ़ होगी। उन्हें अधिक और अधिक प्यार की जरूरत है। प्रेम का निर्मल जल उन्हें परिशुद्ध करेगा। प्रेम की उज्ज्वलता उनके अँधेरों को प्रकाशित करेगी और वासनाओं को समाप्त। मलीनताओं के नष्ट होते ही उनका शाश्वत सौंदर्य स्वतः प्रकट हो जाएगा। वैसा ही सौंदर्य जिसके ध्यान में तुम इन क्षणों में तल्लीन हो।

मैंने कहा-”ये संसार कोलाहलपूर्ण है। सर्वत्र करुण और कठोर क्रन्दन गूँज रहे हैं, तुम बताओ मैं सुनूँगा क्या?”

अविचल और शांतभाव से मेरे हृदय में शीतलता जगाती हुई वेदमाता गायत्री की एक और स्वर झंकृति सुनायी दी-”वत्स ! उन शब्दों को सुना करो जिनका उच्चारण न जिह्वा करती है, न आठ और न कण्ठ। नीरव अन्तराल से जो मौन प्रेरणाएँ और परागान प्रस्फुटित होता रहता है, उसे सुनकर तेरा मानव जीवन धन्य हो जाएगा।

तब से मैं किसी भी वर्ण, त्वचा और शरीर वाले दीन-दुःखी को प्यार करने में लगा हूँ। उन्हें भी मैं अपने निर्मल प्रेम के जल से धोता हूँ, जा वासनाओं की मलीनता से ग्रस्त हैं। मेरे अन्दर अब प्यार के सिवा और कुछ नहीं। तब से मैं हृदय गुहा में आसीत सौंदर्य के ध्यान में निमग्न हूँ तभी से मौन की शरण होकर उस स्तोत्र को सुनकर आनन्दपूरित हो रहा हूँ, जिसे युगों से नभोमण्डल का कोई अदृश्य गायक गाता और शाश्वत सौंदर्य का बोध कराता रहता है।


पूजा का मर्म

सब प्रजाजन उपस्थित हो गए।

श्रीमान की आज्ञा तथा जगतपति के दर्शन के सौभाग्य को कौन अतिक्रमण कर सकता है महाराज? किन्तु..........

किन्तु-किन्तु-परन्तु क्या मंत्रीवर? यह किन्तु क्या? आनर्त महाराज कुछ चंचल एवं उद्विग्न हो उठे। क्या मेरे किसी पूर्व पाप अथवा दुर्भाग्य से भगवान इधर से नहीं पधारेंगे? उन्होंने मार्ग बदल दिया है? आह ! मैं इतना अधम हूँ कि उनके श्रीचरणों में दो पुष्प भी नहीं चढ़ा पाऊँगा।

“आप व्यर्थ व्याकुल होते हैं। भगवान इधर से ही पधार रहे हैं।” हाथ जोड़कर वृद्ध मन्त्री ने कहा। “दूतों ने समाचार दिया है कि प्रभु की मध्याह्न सन्ध्या अपनी ही सीमा में होगी।”

“तब किन्तु क्या?” आश्वस्त होकर महाराज ने पूछा।

“महाराज ! मेरा कुछ और ही अर्थ था। वह सोमपीढ़ बढ़ई........।”

“ओह, वह श्रद्धामय वृद्ध !” महाराज ने मन्त्री को बीच में रोका।

वह सबसे प्रथम प्रभु के श्रीचरणों में अपना उपहार रखना चाहता है। उसे ऐसा कर लेने दो। उन चरणों में राजा और भिक्षुक का भेद नहीं। वहाँ केवल प्रेम ही पुरस्कृत होता है और हमें यह स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि वह वृद्ध इस मार्ग में हम सबका नरेश है। उसे सम्मानपूर्वक सबसे पहले पूजन करने दो।

“पर वह आए भी तो श्रीमान् !” मन्त्री ने नम्रता से कहा।

“वह नहीं आया ?” महाराज जैसे आकाश से गिरे।

“जी ! वह नहीं आया और आना चाहता भी नहीं।” मन्त्री ने बहुत ही नम्रता से उत्तर दिया। “मेरे विश्वस्तजनों ने मुझे सूचित किया है।”

“ऐसा हो नहीं सकता।” महाराज के स्वर में विचित्र आश्चर्य था। “मंत्रीवर ! तुम जानते हो उस वृद्ध को ! भगवान के हस्तिनापुर जाने का समाचार पाकर ही वह प्रेमोन्मत्त हो गया था। उसी दिन से उसने मार्ग के तोरण द्वार बनाने प्रारम्भ कर दिए थे। कल मध्य रात्रि तक वह सिंहासन सजाने में लगा था। मेरा तो पूर्ण विश्वास है कि उसी के प्रेम के कारण प्रभु ने इधर से द्वारिका जाना निश्चित किया है।”

“श्रीमान उचित कहते हैं।” मंत्री ने कहा। “उसने कुछ भी पारिश्रमिक हम लोगों के बारम्बार आग्रह करने पर भी ग्रहण नहीं किया है। साथ ही वह इतना श्रम न करता तो यह तोरण द्वार इतना सुन्दर बन भी न पाता।”

“तब वह प्रभु के ठीक आगमन के समय उपस्थित न हो, यह कैसे हो सकता है?” महाराज का गला भर आया था। तुम स्वयं जाकर ले आओ उसे।”

“जो आज्ञा।” राजकीय रथ लेकर प्रधानमंत्री उस बढ़ई को लेने चल पड़े।

कुछ ही देर में रथ वहाँ जा पहुँचा, जहाँ एक फूस की झोपड़ी है। फूस की दीवार और फूस के छप्पर। गोबर से लिपी-पुती स्वच्छ। एक कोने में बढ़ई के औजार समेट कर रखे हैं। एक ओर पुआल पड़ा है और एक केले के पत्ते पर पुष्पों की वनमाला, चावल, चन्दन सजा रखा है। ताँबे के लोटे में सम्भवतः जल होगा।

पूजा का सब उपहार तो सजा है ; पर पुजारी सावधान हो तब न? मंत्री ने रथ उसी झोपड़ी के द्वार पर रोका था। उन्होंने देखा-बूढ़ा भगवन्नाम का स्मरण करता हुआ अपने काम में तल्लीन है। उसके हाथ लकड़ी के टुकड़े पर कारीगरी करने में लगे हैं। नाम स्मरण के साथ हृदय की भावनाएँ रह-रहकर आँखों से छलक उठती थीं।

“आपको महाराज स्मरण कर रहे हैं।” मंत्री के वचनों से उसकी तन्मयता भंग हुई। सकपकाकर उसने दोनों हाथ जोड़ लिए और इस प्रकार मन्त्री के मुख की ओर देखने लगा मानो कुछ सुना ही नहीं।

“श्री द्वारिकाधीश के दर्शनों के लिए आपको ले चलने मैं रथ लेकर आया हूँ। प्रभु पहुँचने वाले हैं।” मन्त्री ने आग्रह किया।

“आपने व्यर्थ कष्ट किया?” वृद्ध की अंजलि बँधी थी और उसके स्वर में अत्यधिक नम्रता थी। “हम इस प्रकार महाराजाओं की भाँति प्रभु के दर्शन नहीं करते।”

“तब किस प्रकार आप दर्शन करेंगे?” मंत्री आश्चर्यचकित था।

“जब वे मेरे द्वार पर आवेंगे- “ वृद्ध ने सरलता से कहा। इस बूढ़े के गर्व पर मंत्री हँसी को रोक न सके। जो राजसूय में प्रथम पूज्य मानेंगे, जो महाराज के आग्रह पर भी राजसदन में आने की प्रार्थना को अस्वीकृत कर चुके हैं। जिनके दर्शन के निमित्त स्वयं महाराज सीमा तक दौड़े गए हैं। वे इस झोंपड़ी के द्वार पर आएँगे? मंत्री को इस गर्व से अरुचि हुई। उन्होंने पीठ फेर ली। पता नहीं उन्होंने सुना भी या नहीं। वृद्ध ने कहा- प्रभु का कथन है- स्वकर्मणा तर्म्यचम सिद्धि विन्दति मानवः। अपने कर्म से उनकी अर्चना करके मनुष्य उन्हें प्राप्त करता है। मैं तो बस यही कर रहा हूँ। यह कहते हुए वह अपने काम में जुट गया।

रथ जैसे आया था, वैसे ही लौट गया।

गरुणध्वज दृष्टि पड़ा। कोलाहल मच गया। सब लोग दौड़े। स्वयं महाराज पैदल पूजा का थाल लिए आगे-आगे बालकों की भाँति दौड़ रहे थे। यह क्या? रथ तो दूसरी ओर मुड़ गया। भगवान उधर कहाँ जा रहे हैं? लोग आश्चर्यपूर्वक उधर ही चलने लगे।

रोको दारुक ! प्रभु ने सारथी को आज्ञा दी और वह चारों कर्पूरगौर अश्व वहीं स्थिर हो गए।

वृद्ध बढ़ई कुछ समझ सके, तब तक तो रथ से कूदकर मयूर मुकुटधारी एक नीलोज्ज्वल ज्योति उसके सम्मुख खड़ी हो गयी। एक ओर मुख ऊपर उठाकर देखा। खड़े होने का अभी तो अवकाश नहीं मिला था। वैसे ही मस्तक उनके श्रीचरणों पर लुढ़क गया।

महाराज, मन्त्री, सामन्त, सेनापति आदि सभी धीरे-धीरे पहुँच गए। सब आश्चर्य से एवं संकोच से प्रभु के रथ के पास ही खड़े थे। दीनबन्धु दीन के द्वार पर खड़े थे और दी उनके श्रीचरणों पर पड़ा था। स्वकर्म से उनकी अर्चना में सतत् तत्पर उन्हें पा चुका था। पूजा की सामग्री केले के पत्ते पर धरी ही रही। उसे छूने का अवकाश एवं स्मृति किसे?

बहुत देर हो गयी। न तो प्रभु हिले और न वृद्ध ! बड़े संकोच से हाथ जोड़कर दारुक ने कहा, “महाभाग ! प्रभु कब से खड़े हैं। पूजा तो कर लो।”

“दारुक ! पूजा तो हो गई! उन कमल नेत्रों से दो बिन्दु उस वृद्ध के मस्तक पर पड़े। जीव-ब्रह्म की एकता से बड़ी पूजा क्या है? वह पूजा तो सचमुच ही हो गयी थी। श्रीचरणों पर वृद्ध का शरीर ही पड़ा था। वह तो श्यामसुन्दर से श्यामसुन्दर से एक हो चुका था।


अपनी प्रतिभा को यूँ बरबाद तो न करें

प्रतिभाएँ ईश्वरीय अनुदान हैं। वे लोक-मंगल के लिए सौंपी गई ईश्वरीय अमानत हैं। प्रतिभाशाली उस प्रतिभा का ट्रस्टी होता है। उसे चाहे जैसे खर्च करने का उसे अधिकार नहीं। वस्तुतः इस ईश्वरीय सृष्टि में मनमानी का अधिकार किसी को भी नहीं। जब स्वयं ईश्वर ने अपने को नियम-व्यवस्था में बाँध रखा है, तब और किसी के द्वारा नियमोल्लंघन क्यों कर सहन होगा? इसलिए प्रतिभाशाली को अपनी विशिष्टता का बोध होने के साथ ही उससे जुड़े विशेष कर्त्तव्यों का भी बोध होना ही चाहिए। प्रतिभा के विशेष उपहार को अपनी वासना, तृष्णा, अहंता की पूर्ति के लिए नहीं, लोक-मंगल की पुण्य-प्रवृत्ति के लिए उपयोग में लाना चाहिए। दूसरे शब्दों में प्रत्येक प्रतिभाशाली को स्वधर्म का स्मरण रहना चाहिए और धर्मनिष्ठ बनना चाहिए।

ऋग्वेद के अनुसार, मानव की समष्टि आत्मा अभी भी एक ही स्वर पुकारती है- “हमें देवों के पाप से बचाया जाये।” कुमार्गगामी प्रतिभाएँ जितना अहित कर सकती हैं उतना कोई नहीं कर सकता है। हम अपने पानों से भी अधिक देवों के, प्रतिभाओं के पापों का दण्ड भोग रहे हैं और दुर्गति के गहन गर्त में पड़े कराह रहे हैं। इस स्थिति तक पहुँचने में हमारे प्रमाद ही नहीं, देवों का पाप भी बहुत हद तक जिम्मेदार है।

प्रतिभाओं के अनेक क्षेत्र हैं- दर्शन, अध्यात्म, साहित्य, राजनीति, सिनेमा, रंगमंच, नृत्य, गीत, संगीत समेत समस्त ललित कलाएँ आदि। इन सभी मानवीय विभूतियों को सत्यगामी होना चाहिए अन्यथा वे समाज में अनर्थ फैलाती हैं।

एक प्रतिभा और है, उसने उपरोक्त सभी अन्य विभूतियों से अग्रिम पंक्ति में अपना स्थान बना लिया है। उसका नाम है- धन। इन दिनों धन का वर्चस्व अत्यधिक है। सारी कलाएँ उससे हेठी पड़ गई हैं और लगभग सभी ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है। धन का प्रलोभन देकर गायक, वादक, चित्रकार, अभिनेता, कवि, साहित्यकार, पत्रकार, धर्मगुरु, राजनेता सभी अपने वश में किये जा सकते हैं और उन्हें कठपुतली कर तरह नचाया जा सकता है अथवा यों कहना चाहिए कि सभी कलाएँ धन की कृपा-कटाक्ष प्राप्त करने के लिए, अपना शील-सतीत्व बेचने के लिए लालायित फिर रही हैं। प्रतिभाएँ धन के द्वारा खरीदी जा रही हैं और वे खुशी-खुशी अपना आत्मसमर्पण करके उसकी इच्छानुसार नाचने के लिए बाजारू वेश्या की तरह अपना साज-शृंगार सजाये बैठी हैं। इस प्रकार आज धन प्रतिभा शेष सभी प्रतिभाओं की निर्देशक बन बैठी है।

धन की प्रतिभा को लोभ, परिग्रह और कृपणता के बंधनों से छुड़ाना होगा। धनी भी एक कलाकार है। भले ही वह कलाकारिता उचित हो या अनुचित, पर उसे स्वीकार तो करना ही पड़ेगा। जिन दिनों 90 प्रतिशत लोग जीवन निर्वाह की मूलभूत आवश्यकता जुटाने के लिए दैनिक आवश्यकताएं भर पूरी नहीं कर पाते, उन दिनों किसी का धनी, अमीर, मालदार बन जाना सचमुच किसी विलक्षण व्यक्ति का ही काम है। अधिक उपार्जन की क्षमता समझ में आती है पर जिन दिनों दसों दिशाएं अज्ञान, अभाव और अशक्ति की पीड़ा से बुरी तरह कराह रही हों, उन दिनों लोक-मंगल की आवश्यकताओं से आँखें मींचकर जो अर्थ संग्रह कर सकता है, अमीरी और अय्याशी जुटा सकता है, उसे पत्थर के कलेजे वाला आदमी ही कहा जाएगा। घोर अनुदार, परम कृपण और स्वार्थान्ध के लिए ही यह स्थिति प्राप्त कर सकना संभव है। सो इन विशेषताओं से सम्पन्न धनी व्यक्ति को महापुरुष तो नहीं, विलक्षण जरूर कहा जाएगा। यह विलक्षणता ‘कला’ नहीं तो और क्या है। धनी भी कलाकारों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा है, उसे पीछे कौन ढकेले?

इस अग्रिम पंक्ति में खड़ी प्रतिभा को कुमार्गगामी नहीं होने दिया जाना चाहिए। उसे अति नम्रतापूर्वक समझाया जाना चाहिए कि अन्य कलाओं की तरह संपन्नता भी एक परम पवित्र विभूति है और इसका उपयोग लोक-मंगल के लिए ही होना चाहिए। कमाये कोई कितना ही, पर अपने और अपने परिवार के लिए खर्च भारतीय जनता के औसत स्तर ध्यान रखकर ही करे।

अमीरी और विलासिता का ठाट-बाट वाला जीवन अब अगले दिनों प्रशंसा या प्रतिष्ठा का आधार नहीं रहेगा वरन् जनता का रोष ही उभरेगा। बिना बेईमानी कमाया हुआ ही सही, पर जो पीड़ित मानवता की कराह को अनसुनी कर निष्ठुरता और कृपणता के साथ जो जमा कर रखा है, वह अवाँछनीय ही कहा जाएगा। अगले दिनों ऐसे संग्रही जनता की अदालत में अपराधियों की तरह खड़े किये जाने वाले हैं, आध्यात्मिकता और धार्मिकता तो अनादि काल से परिग्रह को, संग्रह को पाँच प्रधान पातकों में गिनती रही है। अब समाज की भावनाएँ भी उस संबंध में अधिक उग्र हो चली हैं। उसने धनी को सम्पन्न मानने की अपेक्षा अधिक दुष्ट-दुराचारी मानना आरंभ है और अगले ही दिनों समाजवाद, साम्यवाद की उँगलियाँ गले तक डालकर जो खाया है उसे उगलवा लेने की तैयारी हो रही है। समाजवादी देशों में धनियों का बड़ा उत्पीड़न और तिरस्कार हुआ है। देर-सबेर सारे संसार में वही होने वाला है। शंकरजी को बेलपत्र, गंगाजी को दूध और हनुमान जी को प्रसाद, महन्त जी को माल-पुए खिलाकर अब किसी को ईश्वरीय सहायता की आशा नहीं करनी चाहिए और लंबल माला सटकने वाले और रोज गंगाजल पीने वाले को अपनी धार्मिकता की दुहाई अब नहीं देनी चाहिए, क्योंकि उसे घड़ियाल के आँसू भर माना जाएगा। राजाओं के राज, जमींदारों की जमींदारी जा चुकीं, अब अमीरों की अमीरी जाने को तैयार बैठी है। सरकारी टैक्सों की दर दिन-दिन बढ़ रही है। इनकम टैक्स, सुपर टैक्स, संपत्ति टैक्स, मृत्यु टैक्स आदि की कैंची तेजी से चल रही है। कुछ दिन बाद इन झंझटों में व्यर्थ सिरफोड़ी से बचने के लिए समाज सीधे, व्यक्ति की निजी संपदा पर कब्जा कर लेगा। यह एक कड़ुई किन्तु सुनिश्चित सच्चाई है। इसलिए हर धनवंत कलाकार को पूर्व चेतावनी, नेक सलाह दी जानी चाहिए कि वह बेटे, पोतों के लिए दौलत जमा न करे। अमीरी का ठाट-बाट न जुटाये। सोने-चाँदी की सलाखें जमीन में न गाढ़े और तिजोरियाँ भरने के फेर में न रहे। इस फेर में वह प्रशंसा का नहीं, भर्त्सना का पात्र ही रहेगा।

बेटे-पोतों के लिए सात पीढ़ी को बैठे-बैठे खाने के लिए दौलत जमा करते जाना उनके साथ अत्यंत दुष्टता बरतना है। हराम की कमाई किसी को दुर्गुणी और पतनोन्मुख ही बना सकती है। अपनी संतान को हराम खाऊ के घृणित स्तर पर पटकने की कुचेष्टा किसी को नहीं करनी चाहिए। उन्हें पढ़ा-लिखाकर स्वावलंबी बना देने भर की बात तो समझ में आती है, पर इस प्रक्रिया का औचित्य समझ में नहीं आता कि कमाऊ वंतान के लिए बाप अपनी कमाई मुफ्त के माल पर गुलछर्रे उड़ाने के लिए छोड़ जाय। पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे करने के बाद बचा हुआ हर पैसा विशुद्ध रूप से इस अभावग्रस्त समाज को मिलना चाहिए और ईमानदारी के साथ वही असली हकदार है। बेटे को बाप की कमाई मिलनी ही चाहिए, यह सामंतवादी अर्थ भ्रष्टता संसार में से जितनी जल्दी मिट जाय उतना ही अच्छा है।

यों, वर्तमान धनवानों ने जिस ढंग से कमाया है और जिस मनोवृत्ति से संग्रह किया है उसे देखते हुए यही सोचा जा सकता है कि वे वह पैसा 1-बेटे-पोतों को विलासी, हरामखोर बनाने के लिए छोड़ेंगे। 2-चोरों, डॉक्टरों, शराबघरों एवं वेश्याओं के यहाँ फेंकेंगे। 3-राजनैतिक दाव-पेंचों में खर्च करेंगे। 4-विवाह-शादियों में होली फूँकेंगे। 5-अमीरी का ठाट-बाट और शान-शौकत का ढोंग खड़ा करेंगे। 6-मरने के बाद मुकदमेबाजी और सरकारी टैक्सों में उसे बह जाने देंगे। 7-सस्ती स्वर्ग की टिकट खरीदने के लिए छुट-पुट कर्मकाण्डों के बहाने धर्म वंचकों से जेब कटायेंगे। 8-कोई तुरन्त नामवरी का या प्रतिष्ठा का लालच दिखा दे तो उसमें थोड़ा बहुत लगा देंगे। धर्मशाला सदावर्त का विज्ञापन बोर्ड भी उन्हें रुचिकर लग सकता है। 9-कोई ठग उन्हें लंबे-चौड़े सब्जबाग दिखाकर ठग ले जा सकता है। ऐसे ही किसी औंधे-सीधे मार्ग में उनकी कमाई जा सकती है पर मानवीय उत्कर्ष के सच्चे आधार-लोकमानस के परिवर्तन में शायद ही इस वर्ग में से किसी की रुचि पैदा की जा सके।

दीखती निराशा ही है, पर कोशिश करनी चाहिए कि कोई विवेकशील धनी प्रतिभा दूरदर्शिता का परिचय दे और मनुष्य को भावनात्मक परतंत्रता के कारागार से छुड़ाने में अपनी कमाई का कुछ अंश लगा सके। एक भामाशाह उस युग में भी निकला था, जिसने राणाप्रताप की नसों में नया रक्त भरा था और पर्दे के पीछे भारतीय स्वतंत्रता का एक गौरवपूर्ण अध्याय खोला था। हो सकता है उसकी परम्परा का कोई बीज कहीं पड़ा अंकुरित हो रहा हो और प्रोत्साहन का अभिसिंचन पाकर हरे-भरे पत्र-पल्लवों से लदकर फलने-फूलने तक बढ़ चले। धनियों को कहना चाहिए-भावनात्मक नवनिर्माण के पुण्य-प्रयोजन में सहयोग देने से बढ़कर और कोई दान-पुण्य हो नहीं सकता। समझ और सदाशयता जीवित हो, तो वे वस्तुस्थिति पर विचार करें और उदारता की एक बूँद उस प्रयोजन के लिए भी खर्च कर दें, जिस पर मानव जाति एवं समस्त संसार के भाग्य-भविष्य बनने-बिगड़ने की संभावना बहुत कुछ निर्भर है।

आज मानव जाति की बौद्धिक, सामाजिक, नैतिक स्वतंत्रता की रक्षा और प्रतिष्ठा करने के लिए फिर पैसे की जरूरत है। विचार क्रान्ति का रथ साधनों के अभाव में रुका खड़ा है। ज्ञान-यज्ञ की ज्वाला समिधाओं के अभाव में प्रज्ज्वलित होने का अवसर प्राप्त नहीं कर रही है। सामाजिक कुरीतियों को फाँसी पर कैदी की तरह समाज जकड़े पड़ा है। इन कुत्साओं और कुण्ठाओं के विरुद्ध धर्मयुद्ध की भेरी तो बज गई पर कारतूस खरीदने को पैसा नहीं। सो हर जिंदादिल धनी का हर फालतू पैसा इसी प्रयोजन के लिए लगना चाहिए। युग ने, भगवान ने धनवंत कलाकारों को इसके लिए पुकारा है। ये अनसुनी भी कर रहे हैं और करेंगे भी, पर गाँठ यह भी बाँध रखी जाय कि इस प्रकार ‘बचाये रखने’ की चतुरता उन्हें आज की उदारता की तुलना में अत्यधिक महँगी और अत्यधिक कष्टकारक सिद्ध होगी। कैसे? इस प्रश्न का उत्तर निकटवर्ती समय ऐसी अच्छी तरह देगा जिसका कभी विस्मरण न किया जा सके।

नये युग में प्रत्येक प्रतिभा को समाज और परमेश्वर की धरोहर ही समझा जाएगा तथा यह देखा जाएगा कि जिसे वह अमानत सौंपी गई है, वह उसका दुरुपयोग न करने पाए। प्रत्येक प्रतिभा को धर्मनिष्ठ, सत्कर्मनिरत, सन्मार्गगामी होना ही चाहिए। कला जीवन के लिए है और जीवन की विकासमान गति में योगदान देने में ही उसकी सार्थकता है, न कि उसे विकृतियों में फँसाने, सड़ाने और संकीर्ण बनाने में। धनोपार्जन की कला को भी धर्मनिष्ठ बनना चाहिए।


विदुषी मदलसा (Kahani)

विदुषी मदलसा ने अपने इच्छानुरूप स्वभाव के बच्चे ढालने आरम्भ किए। वे ब्रह्मज्ञानी बच्चे चाहती थीं। उसी विशेषता वाले सभी बालक जन्मे। वे सभी ब्रह्मज्ञानी थे। राजा ने मदालसा से कहा-”एक पुत्र राजकाज चलाने के लिए भी तो चाहिए। इसलिए एक बालक राजर्षि स्तर के लिए भी जन्म दो।” मदालसा ने उस बार वैसा ही प्रयत्न किया और बालक प्रतापी राजा बना।

माता जैसा चाहे उसी के अनुरूप संतान को जन्म देने की सामर्थ्य रखती है।


समग्र परिवर्तन चेतना-स्तर ही सम्भव

यंत्र-उपकरण खराब हो जाए, तो उनके अन्दर के कल-पुर्जोँ की ही सुधार-मरम्मत करनी पड़ती है। कारण कि बाहरी श्रेष्ठता का महत्वपूर्ण आधार भीतरी विज्ञान है। वह यदि गड़बड़ा जाय, लड़खड़ा जाय, तो बाह्य ढाँचा के ठीक दीखने पर भी वह किसी काम का नहीं रह जाता।

मनुष्य के साथ भी ठीक यही बात है। वह यदि श्रेष्ठ, शालीन और सज्जन है, तो यह उसकी भीतरी सुव्यवस्था का परिणाम है और यदि दुष्ट-दुर्जन है तो इसका भी कारण अन्दर की अव्यवस्था है। दोनों का आधार अन्तस् में ही स्थित है। वह यदि ठीक हो जाय, तो व्यक्ति के सुधरते देर न लगेगी। जिस समाज में व्यक्ति सुधर जाएँगे, वहाँ का समाज भी सभ्य होगा, यह निश्चित है।

आजकल लोग बदलना तो चाहते हैं और विकास की आकाँक्षा भी रखते हैं; पर वह सब बुद्धि के स्तर पर, चेतना के स्तर पर नहीं। यहाँ एक बात जान लेना जरूरी है कि बुद्धि के स्तर पर परिवर्तन कभी सम्भव नहीं; जो शक्य है वह इतना ही कि उस आधार पर नियंत्रण तो हो सकता है, रूपांतरण नहीं। नियंत्रण हुआ भी तो वह अस्थायी ही होगा और उसके उठते ही सब कुछ पूर्ववत् हो जाएगा। जो पहले परिवर्तन जैसा प्रतीत होता था, वह सब भ्रान्ति और नियंत्रण की तात्कालिक परिणति मालूम पड़ेगी।

संसार में साम्यवादी व्यवस्था एक प्रकार की क्रान्ति का परिणाम थी। वह भी अपने ढंग से समाज को सुधारना एवं बदलना चाहती थी और पूँजीवादी व्यवस्था में जिन त्रुटियों से व्यक्ति-व्यक्ति के बीच जमीन-आसमान जितना अन्तर रह गया था तथा जिसके कारण उस व्यवस्था में चोरी, उठाईगीरी, बेईमानी, ठगी, अपराध, अपहरण, हत्या जैसे काण्ड होते थे, उसे मिटाकर एकता, समता जैसा वातावरण पैदा करना चाहती थी, किया भी; पर यह व्यवस्था कितनी सफल रही, इसे समाजवादी देशों, विशेषकर सोवियत संघ के विघटन से भली-भाँति जाना-समझा जा सकता है। जिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार की कल्पना नहीं की जा सकती, वहाँ करोड़ों रुपये का घोटाला पकड़ा गया। ‘अपराधी को मार दो, अपराध समाप्त हो जाएँगे’ जहाँ सुधार संबंधी यह नीति रही हो, वहाँ इसके बाद भी अपराध और अपराधी प्रच्छन्न रूप से उद्भिजों की तरह पनपते रहे, आखिर क्यों? कारण एक ही है कि यह एक बुद्धि के स्तर पर अपनायी गई व्यवस्था थी। इसे परिवर्तन की तुलना में नियमन कहना ज्यादा उचित होगा। क्योंकि जहाँ परिवर्तन घटित होगा, वहाँ फिर उसके पूर्व स्थिति में लौट जाने की सम्भावना समाप्त हो जाती है। परिवर्तन सदा स्थायी होता है। अस्थायी तो नियंत्रण होता है, जिसके हटते ही पुरानी स्थिति वापिस आ जाती है। साम्यवादी प्रणाली में यही हुआ। वहाँ आरंभ में ऐसा लगता है कि सब कुछ बदल गया; पर वास्तविकता इससे कोसों दूर होती है। कानून द्वारा रत्नाकरों को नियंत्रित कर लेने और उनकी गतिविधियों पर रोक लगा देने का यह तो अर्थ नहीं हुआ कि दस्यु, वाल्मीकि बन गये, उनका हृदय-परिवर्तन हो गया। शायद इस मर्म को न समझ पाने के कारण ही संसार में आये दिन ऐसी व्यवस्थाएँ बनती और बिगड़ती रहती हैं। जिस दिन इसे समझ लिया जाएगा, उसी क्षण परिवर्तन घटित हो जाएगा। फिर बुद्धि के स्तर पर बदलाव सम्पन्न कर लेने का कोई दुराग्रह न करेगा।

इन दिनों यह आग्रह इसलिए होता दिखाई पड़ता है; क्योंकि भौतिक जगत में बुद्धि को सर्वोपरि तत्व के रूप में मान्यता मिली हुई है। यहाँ कोई यदि प्रगति करता है, तो उसके पीछे बुद्धि कौशल ही कारणभूत होना स्वीकार किया जाता है और किसी की अवनति होती है तो उसका निमित्त भी प्रायः बौद्धिक विपन्नता ही माना जाता है। इसलिए लोग सब कुछ बुद्धि के आयाम में ही सम्पन्न कर लेना चाहते हैं। उनके लिए स्मृति का विकास भी बुद्धि के स्तर पर होना चाहिए और एकाग्रता का विकास भी। यह कितनी बेतुकी बात है। जो केवल चेतना के स्तर पर घटित हो सकते हैं, उन्हें हम बुद्धि के डाईमेंशन में सम्पन्न करना चाहते हैं। यह नितान्त असंभव है। बुद्धि के द्वारा तर्क, निर्णय, निष्कर्ष, शंका आदि ही हो सकते हैं। जहाँ बुद्धि का प्रयोग होगा, वहाँ शंकाएँ उत्पन्न होंगी और तर्क भी पैदा होंगे; क्यों और कैसे के सवाल भी खड़े होंगे। यह स्वाभाविक है। आदमी यदि ऐसा न करे, तो उसे बहुत बड़ा धोखा हो सकता है। दलील न हो, तो प्रवंचना हो सकती है और संदेह न हो तो, ठगी का सम्भावना बनी ही रहती है। इसलिए हर विश्वास के पीछे एक अविश्वास छिपाये रखना पड़ता है। तभी मनुष्य अपनी लौकिक सफलता कायम रख पाता है। तर्क की शक्ति न्यायालयों में देखी जा सकती है। वहाँ इसी आधार पर झूठ-सच का फैसला होता है। वहाँ दलील का प्रयोग न हो, तो कदाचित् निर्णय और न्यायालय दोनों ही बन्द हो जाएँ। जो वकील वहाँ तर्क देने में जितना कौशल का प्रयोग और प्रदर्शन करते हैं, उनकी सफलता की सम्भावना उतनी ही अधिक आँकी जाती है, जबकि कमजोर पक्ष मुकदमा हारता देखा जाता है। इस हार-जीत में सच-झूठ का उतना महत्व नहीं, जितना इस बात का कि किसने कितने सटीक और सबल तर्क प्रस्तुत किये, भले ही वह झूठे क्यों न हों, पर जीत सर्वदा उसी की होगी। सच्चे और निर्बल तर्क वालों को तो सर्वत्र पराजय ही झेलनी पड़ती है।

यह सब बुद्धि का चमत्कार है। इससे लौकिक प्रगति तो सम्भव है; पर जहाँ वैयक्तिक परिवर्तन या आत्मिक उन्नति की बात आती है वहाँ यह असहाय साबित होती है। इसके लिए तो प्रयोग के स्तर पर, अनुभव के स्तर पर उतरना पड़ेगा। बात तभी बन सकेगी, विकास तभी हो सकेगा, सुधार की संभावना फलवती तभी हो सकेगी। यह सुधार अन्तस् की प्रयोगशाला में, चेतना की अनुसंधानशाला में प्रवेश किये बिना असंभव है। कारण कि चेतना का जीवन-ध्यान का जीवन ही प्रयोग का जीवन है। कोई व्यक्ति उसे बुद्धि के आयाम में समझना चाहे, तो वह सफल न हो सकेगा, उसे समझ न सकेगा। आज तक ध्यान को जिसने भी समझा है, उसे प्रयोग के आधार पर समझा है। ज्ञान के आधार पर, मीमाँसा के आधार पर, तर्क और बुद्धि के आधार पर नहीं। यही रूपांतरण की कुँजी है।

जब यह कहा जाता है कि हमने स्वयं को सुधार लिया, आदतों को परिवर्तित कर लिया, तो वास्तव में इसका आशय विकृत चेतना को निकाल बाहर करने से होता है, असंतुलन को हटाने-मिटाने से होता है। यह विकृति न हटे, असंतुलन न घटे तो शायद सुधार संशोधन की प्रक्रिया भी सम्पन्न न हो सकेगी। सुधार सदा अन्तर का करना पड़ता है; क्योंकि बिगाड़ का मूलभूत कारण वहीं मौजूद होता है। बाहर तो उसकी अभिव्यक्ति मात्र होती है। बाहर तो उसकी अभिव्यक्ति मात्र होती है। उसका निमित्त ढूँढ़ना हो, तो हमें चेतना जगत में डुबकी लगानी पड़ेगी और यह देखना पड़ेगा कि उस सूक्ष्म विकृति से कौन-से अवयव और संस्थान प्रभावित हुए हैं, किन ग्रन्थियों ने काम करना बन्द कर दिया है, किन उपत्यिकाओं, किन मात्रिकाओं, कौन-से भ्रमरों, कैसी नाड़ियों और किस प्रकार के प्राणों के कारण यह उपद्रव खड़े हुए हैं। कारण जान लेने के उपरान्त चेतना विज्ञान के आधार पर उसका निवारण सरल हो जाता है।

आज अंगों की रुग्णता को मिटाने के लिए स्थूल-बौद्धिक उपचारों का प्रयोग किया जाता है। किसी के गुर्दे खराब हो गये हों, किसी की तिल्ली ने काम करना बन्द कर दिया, तो उसे ठीक करने के लिए औषधि का प्रयोग करते हैं। यह ठीक है कि दवाओं से आराम मिलता है, पर वह स्थायी होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनसे बाह्य लक्षण दब भर जाते हैं; पर आन्तरिक असंतुलन यथावत् बना रहता है। इस असंतुलन को चेतना विज्ञान द्वारा ही ठीक किया जा सकता है। व्यसनियों का दुर्व्यसन, व्यभिचारियों का व्यभिचार ठीक करने का यही एकमात्र माध्यम है। इसी कारण पाश्चात्य देशों में रोगों के शारीरिक उपचार के साथ-साथ रोगियों का मानसिक लेखा-जोखा लेने का भी प्रावधान है। मनोवैज्ञानिक पड़ताल के दौरान इसी प्रक्रिया को पूरा किया जाता है। इससे बीमारियों के इलाज में काफी सहायता मिलती है। कई बार जो रोग औषधि प्रयोग से ठीक नहीं होते, वे मनोवैज्ञानिक उपचार से समाप्त होते देखे जाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि मनोविज्ञान चेतना विज्ञान के काफी निकट है। इसमें मन की गहराइयों में उतरकर व्यवहार की प्रतिकूलता का कारण खोजना पड़ता है और यह देखना पड़ता है कि किस मानसिक विकृति के कारण उक्त प्रकृति दोष पैदा हुआ। निमित्त ज्ञात हो जाने के बाद उस विकार को हटाने के लिए उपयुक्त सुझाव एवं संकेत मानसिक स्तर पर दिये जाते हैं, जिनका कि यदि नियमित रूप से अभ्यास किया गया, तो कुछ ही दिनों में रोगी स्वस्थ होते देखे जाते हैं। यह अन्दर की प्रक्रिया है। इसे अध्यात्म के निकट की विधा कह सकते हैं। यही कारण है कि मनःशास्त्री लोग आदतों के सुधार-संशोधन में का फल हद तक सफल होते पाये जाते हैं।

शरीरशास्त्र की खोज इससे स्थूल स्तर की है। वह आदतों, अभ्यासों, दोष-दुर्गुणों का कारण शारीरिक स्तर का मानता है और इसके लिए ‘रसस्रावों’ एवं ‘जीनों’ को जिम्मेदार बताता है। इन्हें यदि नियंत्रित किया जा सके, तो स्वभावों को बदल पाना सम्भव है, ऐसा विज्ञानवेत्ता कहते हैं; पर अभी तक ऐसी कोई विधा उनके हाथ लग नहीं पायी है, जिससे मनोभूमि को उच्च और उदात्त बनाया जा सके। कुछ अपवादों को यदि छोड़ दिया जाय, तो यही कहना पड़ेगा कि रसायनों द्वारा व्यवहार परिवर्तन संभव नहीं। यदि शक्य लगता प्रतीत होता भी है, तो यह स्थिति तभी वक बनी रह पाती है, जब तक औषधि सेवन जारी रहे, उसके बन्द होते ही दशा पूर्ववत् हो जाती है।अतः इसे परिवर्तन न कहकर अस्थायी नियंत्रण कहना ज्यादा समीचीन होगा।

स्थायी परिवर्तन जप, ध्यान, प्राणायाम जैसे चेतना को प्रभावित करने वाले अभ्यासों के बिना संभव नहीं। कई बार कुछ विशिष्ट किस्म के लोगों में इन आध्यात्मिक उपचारों की अनुपस्थिति में भी परिवर्तन होता दृष्टिगोचर होता है। वहाँ इसका कारण संकल्प बल होता है। यह एक आध्यात्मिक गुण है और चेतना को सीधे प्रभावित करता है। यह बल जिसमें जितने अंशों में होता है, उसमें आत्मिक प्रगति उसी हिसाब से होती चलती है। जहाँ आत्मोत्थान हो, वहाँ यह समझा जाना चाहिए कि चेतना के धरातल पर भारी फेर-बदल हो रहा है। यह आन्तरिक क्रिया की परिणति है, भले ही उसका दृश्य स्वरूप बाह्य स्तर का स्थूल जैसा क्यों न लगे।

यहाँ कहा यह जा रहा है कि बाहर यदि रूपांतरण सम्पन्न करना हो, तो शुभारम्भ भीतर से करना होगा। आज इसका उलटा हो रहा है और बाहर से बाहर को बदलने का प्रयास किया जा रहा है। अल्सर पेट में हो और लेप ऊपर चढ़ाया जाय- यह कितना हास्यास्पद है। कुछ ऐसा ही उपक्रम इन दिनों समाज सुधार के संबंध में अपनाया जा रहा है। विश्वभर में इस निमित्त बड़े-बड़े आँदोलन और अभियान रचे जा रहे हैं, जबकि समाज की इकाई व्यक्ति की उपेक्षा की जा रही है। सच्चाई तो यह है कि व्यक्ति-सुधार हो जाय, तो समाज-सुधार स्वतः घटित हो जाएगा; क्योंकि समाज की आत्मा व्यक्ति है। वह यदि कलुषित बना रहें, तो समाज रूपी शरीर की व्याधि दूर न हो सकेगी। आज भ्रष्टाचार, आतंकवाद, अनीति, अन्याय, अत्याचार, दंगे-फसाद को रोकने के लिए विश्व-स्तर पर क्या कुछ उपाय नहीं किये जा रहे हैं, इतने पर भी तथ्य यह है कि दिन-दिन उनमें बढ़ोत्तरी ही हुई है, कारण कि हमने आत्मा की जगह कलेवर में सुधार करना चाहा है, अन्तस् के स्थान पर बाह्य को बदलना चाहा है। यह असंभव है।


Quotation

उच्च भावना के साथ किया हुआ प्रत्येक सत्कर्म यज्ञ है। आत्मशोधन आध्यात्मिक- अप्रत्यक्ष यज्ञ है।


प्रकृति की पाठशाला में ब्रह्म-विद्या का पाठ

ज्ञान प्राप्ति के लिए चिरकाल तक तप-अनुष्ठान करने के बाद भी जब दत्तात्रेय को अपनी उपलब्धियों से संतोष न हुआ तो वे ब्रह्मा के पास पहुँचे। विधिवत अर्चन-वंदन करने के बाद दत्तात्रेय ने कहा- “भगवन् ! मैं उपयुक्त गुरु की खोज करने के लिए अब तक कई स्थानों पर भटकता रहा, अनेक गुरुओं, संत-महात्माओं के पास पहुँचा, परन्तु मुझे कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि जिसकी मुझे आवश्यकता थी वह मुझे प्राप्त हो गया है। कृपा कर ज्ञान प्राप्ति का मार्ग बताइये।”

जिससे ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है वह सद्गुरु तो प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण में विद्यमान है, ब्रह्मा ने कहा- “वत्स आवश्यकता केवल उसी गुरु को खोजने की है- जिस व्यक्ति का अंतःकरण कषाय-कल्मषों से युक्त हो गया है, तपश्चर्या और साधना द्वारा जिससे अपने मल विकारों को नष्ट कर लिया है तथा अंतःकरण को पवित्र, निष्कलुष बना लिया है, वह व्यक्ति अपने चारों आर विस्तीर्ण प्रकृति को देखकर ही धर्म और अध्यात्म का तत्व ज्ञान सीख सकता है।”

प्रजापति ब्रह्मा से यह सूत्र प्राप्त कर दत्तात्रेय पृथ्वी पर लौट आये और उन्होंने प्रकृति में घटने वाली छोटी से छोटी घटनाओं को देखकर उनका निरीक्षण कर ब्रह्मविद्या का अध्ययन किया और जीवनमुक्त हो गये। प्रकृति की खुली हुई पुस्तक पढ़कर अपने आस-पास घटने वाली सामान्य घटनाओं का निरीक्षण करके दत्तात्रेय ने जब अध्यात्म ज्ञान की सिद्धि कर ली, तो वे उन्मुक्त विचरण करते हुए जन-जन को आध्यात्मिकता का संदेश सुनाने लगे। राजा से रंक तक और भोगी से रोगी तक हर कोई उनकी अमृतवाणी श्रवण कर आत्मिक आह्लाद का अनुभव करने लगता।

एक बार राजा यदु ने दत्तात्रेय से पूछा- महात्मन् ! संसार के अधिकांश लोग काम और लोभ के वशवर्ती होकर कष्ट पा रहे हैं। आपने यह जीवनमुक्त अवस्था कैसे प्राप्त की? कृपा कर आप मुझे यह बताइये कि आपको आत्मा में ही परमानंद का अनुभव कैसे होता है तथा आपने यह अपने किस गुरु के चरणों में बैठकर प्राप्त की है।

ब्रह्मवेत्ता दत्तात्रेय जी ने उत्तर दिया- “मैंने अपने अंतःकरण से अनेक गुरुओं द्वारा मूक उपदेश प्राप्त किया है।”

राजा यदु की जिज्ञासा और बढ़ी तथा उन्होंने पूछ ही लिया- “अनेक गुरु? किस प्रकार? क्या नाम हैं उन गुरुओं के?”

एक साथ किये गये इन अनेक प्रश्नों का उत्तर देते हुए दत्तात्रेय ने कहा- “राजन ! ज्ञान प्राप्ति के लिए अकेले गुरु से ही काम नहीं चलता। उसके लिए अंतःकरण में स्थित सद्गुरु की शरण भी जाना पड़ता है, जो कौन गुरु है और क्या शिक्षा दे रहा है? इसका विवेचन करता व समझता है। इस सद्गुरु ने मुझे 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण करायी। उन गुरुओं में पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा, हाथी, मधुमक्खी, हिरण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कन्या, बाण बनाने वाला, कुँआरी कन्या, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट हैं।”

“ब्रह्मन् ! यह सब तो जड़ अथवा निर्बुद्धि हैं, इन्होंने आपको क्या उपदेश दिया?” राज यदु ने यह पूछा तो दत्तात्रेय ने बताया जड़ और निर्बुद्धि होते हुए भी प्रकृति तो उस लीलामय की चेतन लीला है। यदि हम अपने अंतःकरण को निर्मल और परिष्कृत बना सकें, तो इस प्रकृति से ही बहुत कुछ सीख सकते हैं। जैसे पृथ्वी से मैंने धैर्य और क्षमा की शिक्षा ली। लोग पृथ्वी पर कितना आघात और उत्पात करते रहते हैं, पर वह न तो किसी से बदला लेती है तथा न रोती-चिल्लाती है। प्राणी जाने-अनजान एक-दूसरे का अपकार कर ही डालते हैं। धीर पुरुष को चाहिए दूसरे की विवशता को समझ कर वह न तो अपना धीरज खोये और न ही किसी पर क्रोध करे।”

“वायु से मैंने यह शिक्षा ली है कि जैसे अनेक स्थानों में जाने पर भी वह कहीं आसक्त नहीं होता और किसी का भी गुण-दोष नहीं अपनाता, वैसे ही साधक भी किसी का न तो दोष ग्रहण करे और न किसी से आसक्ति तथा द्वेष ही करे।”

जितने भी चल-अचल पदार्थ हैं उनका आश्रय स्थान एक ही है आकाश। आकाश को देखकर मैंने यह जाना कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड में जितने भी चर-अचर जीव हैं और स्थिर-अस्थिर पदार्थ हैं, उनमें विद्यमान आत्मा ब्रह्मस्वरूप से सर्वत्र व्याप्त है।

जल स्वभाव से ही स्वच्छ, मधुर और पवित्र है। जल को देखकर ही मैंने यह प्रेरणा प्राप्त की कि साधक को भी अपना स्वभाव स्वच्छ, शुद्ध, मधुर और पवित्र रखना चाहिए। अग्नि तेजस्वी और ज्योतिर्मयी होती है और उसके तेज को कोई दबा नहीं सकता। उसके पास संग्रह, परिग्रह के लिए कोई पात्र नहीं है और वह सब कुछ भस्म कर डालती है। भले-बुरे सभी पदार्थों को भस्म कर डालने पर भी वह किसी वस्तु के दोषों से लिप्त नहीं होती, इसी तरह साधक को भी तेजस्वी, इन्द्रियों से अपराजित और विषयों से निर्लिप्त रहना चाहिए।

चन्द्रमा की गति तो नहीं जानी जा सकती परन्तु काल के प्रभाव से उसकी गति घटती-बढ़ती रहती है। वस्तुतः वह न तो घटता है और न बढ़ता है। वैसे ही जन्म से लेकर मृत्यु तक और मृत्यु से लेकर पुनः जन्म तक जितनी भी अवस्थाएँ बदलती हैं, वे सब शरीर की ही अवस्थाएँ हैं। आत्मा का उनसे कोई सम्बन्ध नहीं है। सूर्य अपनी किरणों में से पृथ्वी का जल खींचता है और समय पर उसे बरसाता है, जैसे ही योगी पुरुष भी समय और विषयों को ग्रहण और त्याग करते हैं, किन्तु सूर्य की भाँति उसमें आसक्त नहीं होते।

अजगर से मैंने यह सीखा कि साधक को हर स्थिति में संतुष्ट रहना चाहिए। समुद्र वर्षा ऋतु में नदियों की बाढ़ के कारण न तो बढ़ता है और न ही ग्रीष्म ऋतु में जब नदियाँ सूखने लगती हैं, तो घटता है। उस समुद्र से मैंने यह प्रेरणा ग्रहण की कि साधक को साँसारिक पदार्थों की प्राप्ति पर न तो प्रफुल्लित होना चाहिए तथा न ही उनके नष्ट हो जाने से खिन्न होना चाहिए।

पतंगा दीपक के रूप पर मोहित होकर उसकी शिखा में कूदता है और जलकर मर जाता है। वैसे ही अपने इन्द्रियों को वश में न रखने वाला पुरुष नाशवान पदार्थों में फँसा रहता है, उसकी सारी चित्तवृत्तियाँ उनके उपयोग के लिए ही लालायित रहती हैं। वह अपनी विवेक-बुद्धि खोकर पतंगे के समान ही नष्ट हो जाता है।

भौंरा छोटे-बड़े अनेक पुष्पों से उनका सार मात्र ग्रहण करे। हाथी से शिक्षा मिलती है कि साधक काठ की बनी पुतले से भी मोह न करे। हाथी काठ की हथिनी को देखकर ही शिकारियों द्वारा खोदे गये गढ्ढे में जा गिरता है तथा उस कारण मृत्यु को प्राप्त होता है। इसी प्रकार काष्ठ मूर्ति में भी साधक की आसक्ति उसके पतन का कारण बन जाती है। आसक्ति का आकर्षण बड़ा ही मोहक जान पड़ता है, थोड़ी-सी भी फिसलन सत्यानाश का परिणाम उपस्थित करना है। इसलिए पतन से बचने की मार्ग की उचित सीख हाथी से मिली।

मधु निकालने वाली मक्खी से राजन मैंने जान पाया कि जिस प्रकार वह प्रयत्नपूर्वक रस का संचय करती है उसी प्रकार लोभी व्यक्ति भी धन का संचय करते हैं। लोभी मधुमक्खी का संचित रस अन्य लोग ही ले उड़ते हैं। उसी तरह लोभी मनुष्य का संचित धन भी कोई दूसरा ही भोगता है। हरिण वादक यंत्रों के कारण श्रवणेंद्रियों के विषयों में आसक्त होकर अपना प्राण गँवाता है, उसी प्रकार साधक को श्रवणेंद्रियों के विषय की आसक्ति पतन की ओर धकेलती है। सुनकर तथ्य पर सहज विश्वास कर लेना दुःखद परिणाम प्रस्तुत कर सकता है। मछली काँटे में फँसे हुए माँस के टुकड़े में अपने प्राण गँवा देती है वैसे ही स्वाद का लोभी मनुष्य भी अपनी जिह्वा के आगोश में सर्वस्व भूल जाता है और मौत के मुँह में जा समाता है।

प्राचीनकाल में विदेह नगर में पिंगला नाम की अति सुन्दरी वेश्या रहती थी। उसके मन में धन की बहुत कामना थी, इसलिए सह सदा ही यह सोचा करती थी कि कोई धनी पुरुष आकर उसे अपना धन दे जाएगा। एक दिन वह आधी रात तक इसी तरह प्रतीक्षा में खड़ी रही, अत्यधिक देर हो जाने से उसका मुँह सूख गया और चित्त व्याकुल हो गया, पर उस रात को उसे निराश ही रहना पड़ा। इस निराशा के कारण उसे वैराग्य हो गया। इससे मैंने यह सीखा कि दूसरों से आशा करना, उन पर निर्भर रहना ही सबसे बड़ा दुःख है। दूसरों से आशा न कर अपने प्रयत्नों पर ही निर्भर रहना सबसे बड़ा सुख है। उस रात जब पिंगला ने दूसरों से आशा करना छोड़ दिया तो वह सुख की नींद सो सकी।

एक बार किसी कुमारी कन्या के घर, उसे वरण करने के लिए कई वर और उसके परिजन पहुँचे। संयोग से उस दिन घर के लोग कहीं बाहर गये हुए थे। इसलिए कन्या ने स्वयं ही उनका आतिथ्य सत्कार किया और उन्हें भोजन कराने के लिए घर के भीतर एकाँत में धान कूटने लगी। धान कूटते समय उसकी कलाई की चूड़ियाँ बज रही थीं। उससे उसे बड़ी लज्जा हुई। उसने एक-एक करके सारी चूड़ियाँ उतार दीं, केवल एक ही रखी। मैंने उससे यह शिक्षा ग्रहण की कि साधक के चित्त में जब बहुत-सी वृत्तियाँ हों तो वहाँ भी इसी प्रकार का कोलाहल उत्पन्न होता रहता है। चित्तवृत्तियों के निरोध को ही योग कहा गया है। योग का आरंभ यहीं से होता है। लक्ष्य प्राप्ति हेतु साधक को संसार की स्वप्नमयी दुनिया में अपनी इच्छाओं को न रमने दे वरन् समस्त आशाओं को सीमित कर अपने चित्त में एकनिष्ठ और पवित्र बनाना आवश्यक है। इसलिए साधक को अपने चित्त में एक ही ध्येय का अवलम्बन करना चाहिए।

एक बाण बनाने वाला अपने कार्य में इतना तन्मय हो गया था कि उसके पास से ही राजा की सवारी दल-बल के साथ निकल गयी, पर उसे इस बात का पता ही नहीं चला, क्योंकि वह अपने काम में पूरी तरह तन्मय था। उससे मैंने यह शिक्षा ली कि साधक भी अपने ज्ञातव्य के चिंतन में तन्मय रहे तो उसे संसार में होने वाली उथल-पुथल अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। तन्मयता ही वह कारण है जो मनुष्य के अन्दर सोयी पड़ी सुषुप्त शक्ति के समुचित विकास में सहयोग करती है। तन्मयता को आधार मानकर ही ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, साहित्य, कला आदि अनेक क्षेत्रों में नवीन खोज, आविष्कार एवं शोध हुआ और समाज को लाभ मिला। अतः साधक को तन्मयतापूर्वक अपने कार्य को अंजाम देना चाहिए।

कोई पक्षी अपनी चोंच में माँस का टुकड़ा लिए बैठा था। उसे छीनने के लिए दूसरे पक्षियों ने उसे अपनी चोंचों से मारना शुरू कर दिया। जब उस पक्षी ने चोंच में दबाये हुए टुकड़े को फेंक दिया तो वह कष्ट से मुक्त हो गया। अनावश्यक संग्रह ही दूसरों के मन में ईर्ष्या को जन्म देता है और दूसरों को ईर्ष्या के कारण कष्ट पहुँचाता है। यदि संग्रह रूपी लिप्सा ने अभीष्ट तृष्णा का रूप धारण कर लिया तो चिंतन और श्रम पूरी तरह उसी दिशा में लगा रहेगा। फिर साधक के लिए उच्चस्तरीय अध्यात्म प्रयोजन मात्र एक कल्पना की वस्तु बनकर रह जाएगा। फलतः वे सारे कार्य अपूर्ण ही पड़े रहेंगे, जिनके लिए यह बहुमूल्य जीवन का अनुपम उपहार मिला है। दूरदर्शिता इसी में है कि संग्रह उतना ही किया जाये जिससे सामान्य निर्वाह की गाड़ी चलती रहे और साधक को अभीष्ट प्रयोजन में कोई विघ्न-बाधा न पड़ने पावे।

इसी प्रकार साँप से मैंने यह शिक्षा ली कि संन्यासी को मठ या मण्डली बनाने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। अध्यात्म का पथ एकाकी का पथ होता है। जीवन की यात्रा भी एक एकाकी रूप से जन्म से प्रारम्भ होती है। निर्भय, निर्विघ्न हो अपने पथ पर दृढ़ हो साहस मनोबल लिए बढ़ते रहना चाहिए।

मकड़ी बिना किसी सहायक के अपने ही मुँह के तारों द्वारा जाला बना लेती है, इसी में विहार करती है और फिर उसे ही निगल जाती है। मकड़ी के इस कार्य से मैंने सर्वशक्तिमान भगवान की विश्व रचना के कार्य को समझने का प्रयत्न किया है। मकड़ी के जाले की तरह पंचतत्वों के प्रपंच में फँसने की अपेक्षा आत्मा को जानने वाला व्यक्ति ही पराशक्तिओं, महा समर्थ और अतीन्द्रिय क्षमताएँ एकत्रित करता है। यह संसार चेतना का ही खेल है, यहाँ मकड़ी के समान क्रियाशील, साहसी, कठिनाइयों से हिम्मत न हारने वाले पर देर तक विचार-विमर्श करके जीवन की आवश्यक नीतियाँ निर्धारित वाले व्यक्ति ही सफल होते हैं। उस तरह सृष्टिकर्ता बिना किसी सहायक के अपनी ही माया से इस ब्रह्माण्ड को रचता है, उसमें जीवरूप से विहार करता है और अपने आप को ही लीन करके अंत में अकेला ही शेष रह जाता है।

भृंगी किसी कीट को पकड़ कर अपने रहने के स्थान में बंद कर देता है और कीड़ा भय से उसी का चिंतन करते-करते तद्रूप हो जाता है, उसी प्रकार साधक को भी केवल परमात्मा का ही चिंतन करके परमात्मा रूप हो जाना चाहिए। विसके और वैराग्य की शिक्षा देने के कारण यह मेरा शरीर भी एक गुरु है। यद्यपि यह शरीर अनित्य है, तो भी इससे परम पुरुषार्थ का लाभ हो सकता है। मैंने इस प्रकार प्रकृति के चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की तथा जीवनमुक्त होने का मार्ग पाया।

भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध में दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं का सविस्तार वर्णन आया है और इस आख्यान का प्रतिपाद्य मर्म रहस्य यही है कि व्यक्ति यदि सीखना चाहे तो उसके लिए आवश्यकता केवल तीव्र लगन और आकुल जिज्ञासा भर की है। ये सभी साधन-सुविधाएँ उपयोगी हैं और आवश्यक भी पर ज्ञान प्राप्ति में आधारभूत दृष्टि से यह आवश्यक है कि व्यक्ति में ज्ञान प्राप्त करने के लिए कितनी उत्कण्ठा है, कितनी लगन है और कितनी साध है।

भागवत पुराण के एकादश स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- ज्ञान प्राप्त करने के लिए अकेले गुरु से ही काम नहीं चलता; बल्कि उसके लिए स्वयं भी सोचने, समझने और चतुर्दिक् होती रहने वाली छोटी-छोटी घटनाओं से भी बहुत कुछ समझना आवश्यक है। साधक यदि अपनी दृष्टि को सूक्ष्म और ग्राह्य बनाये, तो उसके चारों ओर ब्रह्मविद्या का महाविद्यालय खुला पड़ा है, प्रकृति ने अपनी प्रिय संतान के लिए अपने ही आँगन में ब्रह्मविद्या का भाग्योदय मंदि खोल रखा है। कोई उसमें नम्र याजक पूजक की तरह जाये तो सही।


कला की शापित अप्सरा (Kahani)

महर्षि दुर्वासा को उनके तप से विचलित करने के लिए ,रूपगर्विता अप्सरा वपु अपनी पूर्ण साज-सज्जा के साथ चल दी । वपु ने सोचा सर्वत्र मेरा ही प्रभुत्व क्यों न रहे?

सारा वनप्रान्त गूँज उठा उसके थिरकते गीत और पायलों की झंकारों से। दुर्वासा की कुटिया के समीप ही वह जा पहुँची। उन्मादकारी स्वरलहरी महर्षि के कर्णकुहरों में प्रवेश करने लगी।

ऋषि का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने योग-दृष्टि से देखा, तो सब कुछ समझने में उन्हें देर न लगी। अप्सरा उन्हें लुभाने और पथभ्रष्ट करने आई है। तप को वासना परास्त करे, यह कल्पना उन्हें बुरी लगी। उन्हें क्षोभ हो आया, आँखें लाला हो गईं।

कुटी के बाहर निकल कर उस रूपगर्विता की थिरकन को एक क्षण के लिए ऋषि ने देखा और कहा-”अभागी ! तुझे जो सौरभ मिला था, उससे तू जगत की प्रसुप्त भक्ति-भावना को जगा सकती थी, सरसता को अमृत की दिशा में मोड़ सकती थी, पर हाय री मूर्खा ! तू तो उल्टा ही करने को उद्यत हो गई। जा अपने कर्म का फल भोग। तू पक्षी की योनि में मारी-मारी फिरेगी। तेरे चार पुत्र होंगे, पर वे अपंग ही बने रहेंगे।”

महर्षि का शाप मिथ्या कैसे होता। वपु अप्सरा का कलेवर छोड़कर एक साधारण-सी चिड़िया बन गई। अण्डे दिये, उनसे चार बच्चे निकले। पर वे चारों अपंग थे। रूपगर्विता अप्सरा के पास पश्चात्ताप ही शेष था, कला की देवी वपु अपने नृत्य संगीत से आज भी दुर्वासना को भड़काकर जनमानस में अपनी प्रभुता जमाने में संलग्न है, पर लक्ष भ्रष्ट होने के कारण निराश्रित पक्षी की तरह इधर-उधर मारी-मारी फिरना पड़ रहा है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही बच्चे कला से उत्पन्न होते हैं। पर वासना का लक्ष बन जाने से तो वे अपंग ही रहेंगे।

कला की अप्सरा को आज भी शापित वपु की तरह पश्चाताप करना पड़ रहा है। वासना के लिए उसका किया हुआ नृत्य भला और किसी परिणाम तक पहुँचता भी कैसे?


संगठित जातियाँ चट्टान की तरह मजबूत होती हैं।

आस्ट्रेलिया के उत्तरी तट पर एक चट्टान है, 1200 मील लम्बी, भूगोल में उसका विशिष्ट स्थान है। नाम है ‘ग्रैट बैरियर रीफ’ इसकी चौड़ाई न्यूनतम 20 फीट है, कहीं-कहीं पर तो वह एक मील तक चौड़ी हो गई है। 50 मीटर नीचे तक जाने वाली यह चट्टान जिसके समीप जाने से बड़े-बड़े जहाज भी भय खाते हैं सचमुच कोई पत्थर की चट्टान नहीं है वरन् ‘स्टोनी कोरल्स’ जाति के एन्थ्रोजोआ जीव होते हैं। उनका चट्टान की तरह एक उपनिवेश (कालोनी) में रहना यह बताता है कि संगठन में कितनी सामर्थ्य है। छोटे-छोटे जीव संगठित होकर इतने शक्तिमान हो सकते हैं तो हम बुद्धिशील भारतीय जातीय एकता के बंधन मजबूत करके समर्थ क्यों नहीं हो सकते?

चट्टान के भीतरी भाग में कोमलता भरी हुई, पर ऊपर इतनी सुदृढ़ता क्यों? यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है। भीतर के सब जीव श्रम विभाजित कर अपना-अपना काम करते रहते हैं। कोई खाद्यान्न जुटाता है तो कोई बच्चे सेता है। बाहरी रक्षा पंक्ति के एन्थ्रोजोआ कैल्शियम कार्बोनेट का बहुत भारी आवरण ऊपर चढ़ा लेते हैं। इस तरह वे एक चट्टान की आकृति में मजबूत दुर्ग के समान सुरक्षित बने रहते हैं, यदि उन्होंने परस्पर मिलने की सुदृढ़ता न दिखाई होती, आपस में बिखरे और विश्रृंखलित बने रहते तो आज उनकी वंशावली या तो होती ही नहीं, होती भी तो बहुत संभव है, पूर्व भारतीयों के समान पराधीन या विश्व में अल्पसंख्यक रह गये होते।

आवश्यकतानुसार यह विभिन्न आकृतियाँ बनाते रहते हैं, कभी पंखे जैसा होकर ‘सीफैन’ कहलाते हैं, तो कभी प्राचीनकाल के मोरपंख की लेखनी जैसे जिन्हें ‘सीपेन’ कहते हैं। इसी जाति का ‘एटाल’ नामक जीव बैलों व घोड़ों के खुरों में जड़े जाने वाले नाल जैसा होता है, जिसकी दोनों भुजाओं के बीच की दूरी 50 मील तक हो सकती है। विभिन्न आकृतियों में संगठन का स्वरूप यह इंगित करता है कि हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि कैसे ही स्वरूप में रहें, शासन और सामाजिक व्यवस्थाओं के स्वरूप भले ही बनते-बिगड़ते रहें, पर धर्म व संस्कृति की दृष्टि से अपनी एकता कभी भंग न करें, तभी हम संसार की भयंकरता से, द्वन्द्वों और आक्रमणों से टक्कर ले सकते हैं।

काम वितरण करके भी एक जाति एक परिवार की तरह रह सकती है। संसार के अनेक जीवों में यह सिद्धान्त पाया जाता है, जिसका नाम ‘पोली मार्फिज्म’ है। एक ही जीव कई प्रकार का आकार बनाकर रहते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य अपने समाज व समुदाय की सुरक्षा व विकास करना ही होता है।

सीलेन्ट्रेटा समुदाय के ‘साइनोफोरा’ वर्ग में पाये जाने वाले फाइसेलिया, वेलेला, पोरपिटा, टेंटिला कैल्किफोरा आदि जीव श्रम वर्गीकरण करके जीते हैं पर उनमें पारस्परिक एकता व मैत्री भी इतनी घनिष्ठ होती है

कि कोई भी बाहरी जीव उँगली नहीं उठा सकता। किसी समय भारतीय समाज में भी यही व्यवस्था थी। सारी हिन्दू जाति एक पिता की संतान की तरह रहती थी। सुविधा की दृष्टि से कोई ब्राह्मण का, समाज को संस्कारवान बनाने का कार्य करता था, कोई देश की सुरक्षा का क्षत्रिय कर्म। कुछ भरण-पोषण का उत्तरदायित्व सँभालते थे, कुछ सेवा-सुश्रूषा के स्थूल कार्य करते थे।

इसी संगठन की शक्ति ने भारत को अपराजेय कर रखा। फाइसेलिया जीव पुर्तगाल के सिपाही की हैट की तरह की आकृति बनाकर अपने जाति के सब अण्डे-बच्चों को समेट कर सुरक्षित कर लेते हैं। कुछ भोजन में, कुछ सुरक्षा व्यवस्था में, रहकर संगठन को बनाये रखते हैं। ‘गोनोज्वाइड’ नामक इन्हीं जीवों की एक श्रेणी प्रजनन का काम करती है, शेष सब संयमित जीवनयापन करते हैं। उनका एक ही काम रहता है अपने समाज की सेवा और सुरक्षा। हमारी आन्तरिक व्यवस्था भी ऐसी ही थी। जब तक संयमी व सेवाशील समाज सुधारकों की कमी न रही, देश विश्व का सिरमौर रहा। महान सांस्कृतिक गरिमा के धूमिल होने का एकमात्र कारण रहा विघटन।

संगठित जातियाँ संख्या में थोड़ी ही हों तो भी वे सारे संसार में अँग्रेजों की तरह एकछत्र राज्य कर सकते हैं। मनुष्य क्या जीवों में भी अनूठा उदाहरण है। ‘वाल्वाक्स’ नामक प्रोटोजोआ। यह हमेशा एक कालोनी में संघबद्ध रहता है। परस्पर मिले-जुले होने पर गेंद की आकृति बना लेते हैं और कहीं भी समुद्रभर में घूमते रह सकते हैं। सुरक्षा, आजीविका और प्रजनन के सब कार्य इनमें भी वितरित होते हैं।

संगठन और जातीय एकता, शक्ति और सुरक्षा के आधार हैं। कोई भी देश और जाति तब तक विकसित नहीं हो सकती, जब तक उनका यह प्राथमिक आधार ही सुदृढ़ न हो।


दुःखेन साध्वी लभते सुखानि (Kahani)

अज्ञातवास में द्रौपदी से मिलने के लिए कृष्णपत्नी सत्यभामा गयीं। उनने पाया कि इस अभावग्रस्त और कष्टसाध्य स्थिति में भी द्रौपदी बहुत प्रसन्न एवं स्वस्थ थीं। सत्यभामा ने इसे आश्चर्यपूर्वक देखा और पूछा-”हम महलों में रहकर भी सुखी नहीं हैं। तुम वनवास में भी प्रसन्न हो। सुख की कुँजी जो तुमने पाई, सो हमें भी बता दो।” द्रौपदी ने स्मित स्वर से कहा- “दुःखेन साध्वी लभते सुखानि” जो दूसरों के लिए कष्ट उठाने को तैयार रहता है उसे सदा सुख ही सुख मिलता है।


पुस्तकों की प्रयोगशाला में महापुरुष

दक्षिण अफ्रीका की बात है, उस दिन गाँधीजी ने ग्लैडस्टन की जीवनी पढ़ी थी। एक प्रसंग था जिसने गाँधीजी के जीवन की एक धारा को उलट कर रख दिया। “एक दिन एक आम सभा हो रही थी। उसमें ग्लैडस्टन के साथ उनकी धर्मपत्नी भी थीं। ग्लैडस्टन को चाय पीने की आदत थी। चाय बनो का कार्य उनकी पत्नी ही करती थीं। आम सभा के बीच ग्लैडस्टन ने चाय पीने की इच्छा की तो श्रीमती ग्लैडस्टन ने बिना किसी झिझक, लज्जा या संकोच के अपने हाथ से वहीं चाय बनाई। पति को पिलाई और कप-प्लेट हाथ से साफ किये। ऐसा उन्होंने कई स्थानों में किया।”

इस घटना को पढ़कर गाँधीजी के जीवन में जो प्रतिक्रिया हुई, उसका उल्लेख उन्होंने स्वयं इन शब्दों में किया है-”पत्नी के प्रति वफादारी मेरे सत्य के व्रत का अंग थी, पर अपनी स्त्री के साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, यह बात दक्षिण अफ्रीका में ही स्पष्ट रूप से समझ में आई।”

लोग पुस्तकें पढ़ते हैं पर जो पढ़ा गया है उस पर चिन्तन, मनन और वार्तालाप नहीं करते। उससे पढ़े हुए का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों के सार जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जाएँ, तो सामान्य-सी परिस्थितियों में हर व्यक्ति उत्कृष्टता के चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। पुस्तकें गौघृत और दुग्ध के समान पौष्टिक आहार हैं। जो मन, बुद्धि, आचार-विचार, विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ प्रशस्त करती है।

गाँधीजी ने उक्त प्रसंग राजचन्द्र भाई को बड़े कौतूहल के साथ सुनाया। इस पर राजचन्द्र भाई ने कहा-”बापू इसमें आश्चर्य की क्या बात है? अब आप बताइये अपनी बहिनें, बेटियाँ और छोटे-छोटे बच्चे क्या ऐसे कार्य कहीं भी नहीं कर सकते? बड़ों की आज्ञापालन में तो उन्हें प्रसन्नता ही होती है, पत्नी के इस व्यवहार को असामान्य मानने का एक ही कारण हो सकता है, पत्नी से कोई आकाँक्षा। साधारण लोग अपनी धर्म-पत्नी को कामवासना की दृष्टि से देखते हैं। उससे नारी के प्रति हीनता का भाव आता है। यही भाव हम उसके साथ प्रत्येक कार्य में आरोपित करते हैं। पत्नी उसे ही बुरा मानती है, यदि उसे हीनता या कामुकता की दृष्टि से न देखा जाय तो सचमुच प्रत्येक स्त्री ग्लैडस्टन की धर्मपत्नी की तरह ही बहिन-बेटियों की सी सेवा बिना लज्जा या संकोच के कर सकती है।”

गाँधीजी को यह बात बड़ी महत्वपूर्ण लगी। ग्लैडस्टन के जीवन चरित्र को पढ़ने से जिस मर्म को वह नहीं भेद पाये थे, वह वार्तालाप से खुल गया। तब तक कस्तूरबा और उनमें प्रायः झगड़ा हुआ करता था। उस दिन से बापू ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और इतिहास जानता है कि इसके बाद कस्तूरबा गाँधी ने गाँधीजी के सच्चे मित्र की भाँति खुलकर सहयोग प्रदान किया। उन्होंने उनके साथ जेल जाने तक में भी झिझक या संकोच नहीं किया। स्वाध्याय शीलता और पढ़े हुए को जीवन में पचाने के अभ्यास ने गाँधीजी को महान बना दिया। रस्किन की लिखी पुस्तक ‘एण्ड दि लास्ट’ पुस्तक तो गाँधीजी के सारे जीवन की मार्गदर्शिका रही।

दस वर्ष की आयु में स्कूल जाना छुड़ा दिया गया क्योंकि पिता गरीब था। घर का काम-काज करने के लिए उसकी आवश्यकता आ गई। वह अपने ही शहर सन जान (अर्जेण्टाइना) में दुकानदारी करने लगा। छह वर्ष दुकानदारी में ही बीते।

इन वर्षों में वह पढ़ने के लिए समय अवश्य निकाला करता था। समय ही क्यों वह प्रत्येक पढ़े हुए पर विचार किया करता और उन्नति के अनेक मनसूबे बनाया करता। इस बालक की जीवनी से पता चलता है कि उसकी क्रियाशीलता बड़ी विलक्षण थी। पुस्तकें पढ़ने का उस पर तुरंत प्रभाव होता है और वह प्रभाव उसके जीवन में कोई न कोई परिवर्तन ही लाने वाला होता। व्यापार में ईमानदारी, समाज सेवा और राजनीतिक धड़ेबाजी से संघर्ष करने की हिम्मत भी उसे ऐसे ही मिली, पर मुसीबत यह थी वह पढ़ा-लिख नहीं था।

एक दिन वह फ्रैंकलिन की जीवनी पढ़ रहा था। फ्रैंकलिन को भी दस वर्ष की आयु में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी, पर उसने अपने अध्यवसाय से स्वतः ही दुनिया की पाँच भाषाएँ सीखीं और एक साथ वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं राजनीतिक के रूप में विश्वविख्यात हुआ। यह पढ़कर उस युवक ने विचार किया क्या वह दूसरा फ्रैंकलिन नहीं बन सकता? बन सकता है? उसके मन में कहा- अध्यवसाय से क्या संभव नहीं। वह उस दिन से पढ़ने लगा। अँग्रेजी, चिली, फ्रेंच कई भाषाएँ सीखीं और राजनिति में भाग लेने लगा। इस पर उसे देश निकाला दे दिया गया। वह काफी दिन तक चिली में रहकर देश में राजनैतिक स्वार्थबाजी के विरुद्ध संघर्ष करता रहा। उसने पत्रकार के रूप में अर्जेण्टाइना निवासियों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध संगठित कर दिया और एक दिन विद्रोह की ज्वाला फूट ही गई। युवक स्वदेश लौटा और एक दिन वह अर्जेण्टाइना का उपराष्ट्रपति बना। इस महत्वपूर्ण पद पर पहुँचकर भी उसने जनसेवा का मार्ग न छोड़ा, उसने अर्जेण्टाइना को साक्षर बनाने का अभियान चलाया और उसे इतना तीव्र किया कि आज अर्जेण्टाइना दुनिया के देशों में सबसे शिक्षित देश में गिना जाता है। अमेरिका तक ने उसकी सेवाएँ उपलब्ध कीं। एक पुस्तक की प्रेरणा ने इस युवक को ‘डोमिंगो फास्टिनो सारमिण्टो’ के नाम से विश्वविख्यात कर दिया।

वर्मा की क्लैग घाटी पर आजाद हिन्द सेना का मुकाबला अँग्रेज सेना की टुकड़ी से हो गया। आजाद हिन्द सेना के कुल तीन जवान और अँग्रेजों की 169 सैनिकों की टुकड़ी। इस भीषण परिस्थिति में नेताजी बैठे स्वामी विवेकानंद की पुस्तक पढ़ रहे थे- पुस्तक के इस अंश ने ‘जब संकटों के बादल सिर पर मँडरा रहे हों, तब भी मनुष्य को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। धैर्यवान व्यक्ति भीषण परिस्थितियों में भी विजयी होते हैं।” नेताजी को भारी प्रकाश दिया।

घाटी से खबर आयी क्या तीनों सैनिक पीछे हटा लिए जाएँ। नेताजी के हृदय में छुपे विवेकानंद के विचार फूट पड़े, बोले- नहीं जब तक एक भी सैनिक जीवित रहता है, चौकी खाली न की जाये। तीन सैनिक रात भर गोली चलाते रहे। प्रातःकाल तो वे मुठभेड़ की लड़ाई के लिए चढ़ दौड़े। जब उस चौकी पर पहुँचे तो देखा अँग्रेजों के कुछ सिपाही तो मरे पड़े हैं, शेष अपना सामान छोड़कर भाग गये हैं।

स्वामी विवेकानन्द के साहित्य ने उनमें अगाध निर्भयता, धैर्य और साहस भर दिया। वे जो कुछ भी पढ़े उसके एक-एक वाक्य को अपने जीवन का एक-एक चरण बना लिया। उसी का प्रतिफल था कि वे जापान, सिंगापुर और जर्मनी जहाँ भी गये उसी प्रकार स्वागत हुआ जिस प्रकार स्वामी विवेकानंद का अमेरिका और इंग्लैण्ड में। यह श्रेय स्वाध्याय की ही है, जो सुभाष की जीवनशिला पर क्रियाशीलता बनाकर खुद चुका था।

निराशा और घुटन की जिन्दगी से ऊबकर बालक अपने एक मित्र के पास गया। तब वह एक वकील के पास क्लर्की करता था। मित्र से उसने कुछ धन की सहायता के लिए कहा तो मित्र ने इनकार कर दिया। निराशा और एक कदम आगे बढ़ गई।

इस निराशा ने उसे एकाँत जीवन में ढकेल दिया। सौभाग्य से इस समय का सहचर बना सद्साहित्य। स्वाध्याय, चिंतन, मनन से मस्तिष्क में विचारों का समुद्र लहराने लगा।

फिर उसने समुद्र का मंथन किया। इच्छा तो थी एक वकील बनने की पर ज्ञान-संचय उसे अपनी ही ओर खींच ले गया। बालक लेखक बन गये। पढ़े हुए विचारों को परिमार्जित रूप देने वाला यही बालक प्रसिद्ध उपन्यासकार बना। उसे 19वीं शताब्दी का उपन्यास स्रष्टा कहा जाता है। अनेक प्रकार के ज्ञान के समन्वय से उसने विश्व को एक नई समन्वयपूर्ण विचारधारा दी।

सात वर्ष के एक बालक में पढ़ने की अभिरुचि जाग गई। जब उसके दोस्त मटरगस्ती कर रहे होते तब वह कोई कहानी-कविता, नाटक और धार्मिक पुस्तकें पढ़ रहा होता। हर्बर्ट स्पेन्सर, स्टुअर्ट मिल और टिण्डल की पुस्तकों न उसे बहुत प्रभावित किया, फिर उसने बेकार किस्म के उपन्यास, कहानियाँ पढ़ना छोड़कर सृजन साहित्य में रुचि ली। वह एक स्टेट एजेंट के यहाँ नौकरी कर रहा था, तब भी अच्छी पुस्तकें पढ़ने का चाव उसने न छोड़ा, इससे उसके जीवन में बुराइयों का प्रवेश नहीं हो सका। पश्चिम में जन्म लेकर माँसाहार का कट्टर विरोधी यही बालक एक दिन जार्ज बर्नार्ड शाँ के नाम से विख्यात हुआ। उसने जब लेखनी उठाई तो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ नाटककारों की श्रेणी में जा बिराजा।

एक फटी-सी पुस्तक मेरे हाथ लगी। आरंभ के कुछ पृष्ठ फटे थे। पर प्रत्येक पुस्तक से कोई न कोई अच्छी बात सीखने का मुझे व्यसन हो गया था। इस पुस्तक को पढ़ने से मुझे कुछ बहुत ही मार्मिक पंक्तियाँ हाथ लगीं, उन्हें मैंने अपनी डायरी में नोट कर लिया। यह पंक्तियाँ एक कहानी की थीं और इस तरह थीं- “मैं किसान हूँ, मुझे किसान होकर जीने दो और वैसे ही मरने भी दो। मेरा पिता किसान था अतः उसके पुत्र को भी वैसा ही होने दो।” मुझे दस वर्ष बाद पता चला कि यह शब्द जार्ज ए॰ ग्रीन के थे।

इन प्रत्येक पुस्तक से मैंने अनीति के विरुद्ध संघर्ष, मानव जाति से प्रेम के पाठ पढ़े और सीखे। यों कहूँ कि पुस्तकों का सारांश ही उतरकर मेरे जीवन में समा गया, जो कुछ भी सफलता दिखाई दे रही है वह उनका ही आशीर्वाद है।

आप समझ गये होंगे यह शब्द मैक्सिम गोर्की के हैं। मानवता की सेवा के लिए उन्हें बहुत समय तक याद किया जाता रहेगा।

संसार की अधिकांश प्रतिभाएँ पुस्तकों से निकली हैं। पढ़ते हम लोग भी हैं, पर पढ़कर अपने जीवन को महान बनाने का जो अवसर जवाहरलाल नेहरू, मार्क्स स्टालिन, माइकल फैराडे, डार्विन, लूथर बरबेंक, गैलियस आदि ने प्राप्त किया उस रहस्य को हम कहाँ जान पाये? हम भी इनकी तरह पढ़े हुए आदर्शों को अपने जीवन में उतार सके होते तो हमारी श्रेणी भी गाँधी, गोर्की जैसे महान् प्रसूत पुत्रों में रही होती।


हालैण्ड के नागरिकों की देशभक्ति (Kahani)

फ्राँस ने हालैण्ड पर हमला किया, पर वह बहुत बड़ा और साधन-सम्पन्न होते हुए भी उस छोटे से देश पर विजय प्राप्त न कर सका।

इस पर खीज कर फ्राँस के राजा लुई चौदहवें ने मन्त्री कालवर्ट को बुलाया और पूछा कि-इतना बड़ा और समर्थ होते हुए भी फ्राँस क्यों जीत नहीं पा रहा है?

कलवर्ट गम्भीर हो गये। उनने नम्रतापूर्वक धीमे शब्दों में कहा-”महत्ता और समर्थता किसी देश के विस्तार या वैभव पर निर्भर नहीं करती, वह तो वहाँ के नागरिकों की देशभक्ति और बहादुरी पर निर्भर रहती है।

हालैण्ड के घर-घर में, बच्चे को राष्ट्र की सशक्त इकाई के रूप में ढाला जाता है। यह साधना उन्हें दुर्धर्ष बनने की शक्ति देती है।

हालैण्ड के नागरिकों की देशभक्ति का विस्तृत विवरण विदित होने पर फ्राँस ने अपनी सेना वापस बुला ली।


मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।

उस दिन प्रकृति देवी को अरुण ने प्रकाश से नहलाया, ऊषा ने उसके माथे पर कुमकुम का तिलक लगाया, बालसूर्य ने उसे स्वर्णिम वस्त्र पहनाए। ऐसी पवित्र बेला में स्नानादि से निवृत्त होकर चित्रलेखा राजधानी अवन्तिका के राजमहल में अपने कक्ष में बैठी श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय कर रही थी। घनी, काली केशराशि उसकी पीठ पर लहरा रही थी। वायु के मन्द झोंके उससे अठखेलियाँ कर रहे थे। शान्त-स्निग्ध मुख की आकृति पर एक अलौकिक आभा बिखरी थी। उसके विस्तीर्ण नयन गीतामृत का रसपान कर रहे थे। संसार के अस्तित्व को ही नहीं, स्वयं के अस्तित्व को भी वह भूल गयी थी। नयन रसपान कर हृदय कोष को भर रहे थे और आत्मा अमृतमयी अनुभूति का आस्वादन कर रही थी। एक अजर और अमर व्यक्ति का भाव उसके चेहरे पर प्रकाशित हो रहा था।

सादे रेशमी वस्त्र में उसने भगवद्गीता की पोथी भगवान श्रीकृष्ण के सिंहासन पर रखकर श्रद्धाभाव से प्रणाम किया। प्रणाम करने के अनन्तर उसने मुख फेरा ही था, तभी एक दावी ने आकर कहा-”राजकुमारीजी आपको महाराज ने स्मरण किया है।”

जाओ निवेदन करो, मैं अभी आती हूँ। दासी के जाने पर वह उठी। उसे आशंका थी कि पिताश्री सुबह होते ही बुलाएँगे। कल ही तो वह उज्जयिनी के गुरुकुल से अध्ययन समाप्त कर लौटी थी। चित्रलेखा ने वहाँ ग्रन्थ के अध्ययन एवं आचार्यों से संस्कृत और प्राकृत भाषा में धार्मिक, सामाजिक तथा व्याकरण शास्त्र में पूर्णता प्राप्तकर ली थी। संगत और नृत्य शास्त्र में उसकी विशेषज्ञता पर सभी आश्चर्यचकित थे। इतना ही नहीं, वह असाधारण सुन्दरी भी थी। मानो किसी श्रेष्ठ शिल्पी ने संगमरमर की प्रतिमा गढ़ी हो और प्रकृति ने उसमें साँसों का स्पन्दन भर दिया हो। ब्रह्मचर्य की साधना से उसके शरीर पर दिव्य कान्ति झिलमिला रही थी। ज्ञानार्जन से मुख की दीप्ति प्रखर हो चुकी थी।

वह अपने पिताश्री के कक्ष में आयी और उन्हें प्रणाम कर उनके सम्मुख एक आसन पर बैठ गई।

कुछ क्षण महाराज वीरभद्र पुत्री की ओर देखते रहे। चित्रलेखा इस समय नितान्त साधारण पीली साड़ी पहने थी। महाराज को लगा जैसे यह राजवंश तथा राजपरिवार का अपमान है। उन्होंने रुखाई से कहा-”पुत्री तुम भूल गयीं कि तुम मालव सम्राट की पुत्री हो। मालवा राज्य की राजकुमारी हो और राजपरिवार में तुम्हारा स्थान उच्च है। मैं पूछता हूँ कि तुमने अपने शरीर पर जो वस्त्र धारण किए हैं क्या वह राजवंश के योग्य हैं? क्या एक राजकुमारी की वेषभूषा को तुम्हारे वस्त्र चरितार्थ करते हैं?

चित्रलेखा ने शान्त भाव से कहा-”पिताश्री अपराध क्षमा करें। यदि मैं यह निवेदन करूं कि मानव का मूल्य वस्त्रों से नहीं आँका जाता। वह तो केवल मात्र शरीर को ढकने का साधन है। सद्गुण सम्पत्ति का आन्तरिक विकास ही मानवीय उच्चता को दिग्दर्शित करता है। मैं तो एक साधारण-सी मानवी हूँ किन्तु आपकी पुत्री होने के कारण ही मैं राजकुमारी हूँ।”

और इसीलिए तुम्हें राजपरिवार की वेषभूषा धारण करनी चाहिए। जब तग राजमहल में रहती हो, राज कुल की सदस्या हो, तुमको यहाँ के नियम मानने होंगे। समझीं, भविष्य में ध्यान रखना। महाराज वीरभद्र ने एक निरंकुश शासक की तरह अन्तिम निर्णय दे दिया।

सुसंस्कृत, आर्य पुत्री की भाँति चित्रलेखा पिता की आज्ञा का प्रतिवाद करना अनुचित समझती थी। उसने नतमस्तक होकर कहा- “जैसी आज्ञा, पिताश्री।”

चित्रलेखा ने उनकी आज्ञा को विनयपूर्वक मान लिया तो वह प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, मुझे परम आनन्द है क्योंकि तुमने मेरा कहना मानकर यह प्रमाणित कर दिया कि तुम सुशील हो, पितृभक्त हो। एक सवाल मैं तुमसे और करना चाहता हूँ। अभी तुम्हारे आने से पूर्व मैंने सुलेखा को बुलाया था। तुम से जो प्रश्न करना चाहता हूँ वहीं प्रश्न मन सुलेखा से किया था। उससे मुझे जो उत्तर दिया, उससे मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई। मुझे भरोसा है कि तुम भी निःसंकोच होकर उत्तर दोगी और मुझे आनन्दित करोगी।

चित्रलेखा बोली, “परम पूजनीय पिताजी, उत्तर प्रश्न पर निर्भर करता है। आप सवाल करें, आपकी पुत्री चाहेगी कि उसके उत्तर से पिताश्री प्रसन्न हों।

महाराज ने पुत्री को अपलक निहारते हुए कहा-”बेटी तुम्हारा बाल्यकाल समाप्त हो गया है। शिक्षा ग्रहण कर तुम पण्डित हो गयी हो। अब वह समय आ गया है कि तुम अपने जीवन साथी के संदर्भ में सोचो यदि मन ही मन किसी राजकुमार को तुमने वरण कर लिया हो तो उस भाग्यशाली का नाम बताओ, हम तुम्हारे सुख के लिए उसी से तुम्हारा विवाह करेंगे। यही प्रश्न हमने तुम्हारी बड़ी बहिन सुलेखा से किया था, तो उसने निःसंकोच होकर चेदिपति महाराज शिशुपाल से विवाह करने का अपना निश्चय प्रकट किया और मैंने सहर्ष स्वीकृति दे दी। अतएव तुम भी बिना किसी हिचक के अपने मनोभावों को प्रकट करो।

चित्रलेखा ने सोचा भी नहीं था कि उसके पिताश्री इस समय उससे ऐसा सवाल करेंगे। किन्तु उत्तर तो देना ही था। उसने स्थिर चित्त से कहा-”पिताश्री लज्जा और संकोच का परित्याग कर मैं इस सवाल का जवाब कैसे दे सकूँगी? मेरा दृढ़ विश्वास है कि माता-पिता अपने स्नेह और प्रेम के वश अपनी सन्तान के भविष्य का ध्यान रखते हैं। मैं प्राणपण से आपकी तथा पूजनीया माताजी की रुचि का, निर्वाचन का स्वागत करूंगी। आप जिस वर को मेरे योग्य समझें, उसके साथ मेरा विवाह कर दें। मेरे मन में जीवन-साथी के सम्बन्ध में अस्पष्ट भाव भी कभी नहीं जागा है। फिर मन ही मन वरण करने की बात की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। किसी पुरुष के अनजान में नारी का यह समर्पण एकाँगी है, अव्यावहारिक है, अधर्म भी है। मन से वरण किया गया पुरुष ही नारी का आराध्य पति होता है। यदि कोई नारी किसी पुरुष का मन ही मन वरण करे और वह पुरुष मना कर दे तो उस परित्यक्ता नारी का भविष्य क्या होगा? समाज में उसका स्थान कहाँ होगा? कैसे वह अपना जीवन व्यतीत करेगी?”

मानवीय दृष्टिकोण से, धार्मिक रीति से तथा सामाजिक परिणाम को लक्ष्य कर दिया गया वह उत्तर सुनकर महाराज वीरभद्र को बड़ी प्रसन्नता हुई। लेकिन उसके मनोभावों को कैसे जाना जा सकता है? आज तो वे अपनी पुत्री से प्रश्न पर प्रश्न किए जा रहे थे तथा उसकी परीक्षा ले रहे थे। उन्होंने कहा, “पुत्री तुम्हारा उत्तर सुनकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई। अब एक सवाल और तुमसे करना चाहता हूँ। बताओ बेटी यह ऐश्वर्य, यह वैभव, यह राजकीय सम्मान तुम्हें किसके भाग्य से प्राप्त हैं? यही सवाल हमने सुलेखा से भी किया था। उसने जो उत्तर दिया, उसे सुनकर हमारी खुशी का ठिकाना नहीं हैं।”

चित्रलेखा ने शांत मन से कहा-”क्या मैं उनका उत्तर सुन सकती हूँ पिताश्री।”

महाराज ने कहा- “क्यों नहीं पुत्री, जरूर सुन सकोगी। उसने कहा था कि उसे यह वैभव, ऐश्वर्य और मान-सम्मान सभी मेरे यानि कि अपने पिता के भाग्य से प्राप्त है।”

चित्रलेखा मन ही मन में हँस पड़ी, किन्तु हँसी का कोई भाव भी उसने चेहरे पर आने नहीं दिया। लेकिन वह झूठ को भी स्वीकार नहीं कर सकती थी। सत्य की उपासिका थी वह। उसका दृढ़ विश्वास था कि आत्मनिर्माण का आधार ही सत्य है। सत्य की मजबूत नींव पर आत्मनिर्माण का गगनचुम्बी मन्दिर निर्मित है। यदि सत्य को वहाँ से हटा दिया जाय तो श्रद्धेय ऋषियों, मुनियों अवतारों, अध्यात्मवेत्ताओं ने अपनी तप-तितीक्षा से जो मन्दिर बनाया, वह ढह जाएगा। नहीं वह असत्य को कतई स्वीकार नहीं करेगी। इस निश्चय के साथ ही उसके नेत्रों में एक पावन ज्योति दीप्त हो उठी। वाणी में अपूर्व ओज आ गया। उसने कहा-”पिताश्री मैं अभयदान चाहती हूँ, मैं अपनी बड़ी बहिन का प्रतिवाद करना नहीं चाहती। उनकी अपनी मान्यताएँ हैं। मेरे अन्तर्यामी कहते हैं कि असत्य को कभी स्वीकार न करो। सत्य पथ से कभी विचलित न हो। पिताश्री मैं विनयपूर्वक निवेदन करती हूँ कि प्रत्येक मानव अपने-अपने कर्मों का फल पाता है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। आज किए गए कर्म ही कल परिपक्व होकर भाग्य बनते हैं। ऐसी स्थिति में मैं भी अपने पूर्व अर्जित पुण्यों के फल से इस समय सुख का भोग कर रही हूँ।

महाराज वीरभद्र को यह उत्तर रुचिकर न लगा। उनके हृदय का वात्सल्य भाव अचानक तिरोहित हो गया। उनके शरीर में रहने वाला पिता अन्तर्ध्यान हो गया। मन ही मन वह क्रोधित हो गए। उन्होंने केवल इतना कहा-”ठीक है जाओ।”

विवेकशील चित्रलेखा को यह समझते देर न लगी कि उसके उत्तर से पिताश्री असन्तुष्ट हो गए हैं। सम्भव है उन्हें क्रोध आया हो। वह अपने कक्ष में आ गयी।

क्षण, पल, निशि, वासर बीतते गए। उपर्युक्त घटना की याद भी धुँधली होती गई। एक दिन मालवराज वीरभद्र अपने अंगरक्षकों और मन्त्रियों समेत भ्रमण पर जा रहे थे। नगर की सीमा पर बने सार्वजनिक उद्यान में देखा तो कुष्ठ रोगियों का एक समूह ठहरा हुआ है। इस समय एक युवा कुष्ठी अपने साथी कुष्ठियों के बीच बैठकर आध्यात्मिक प्रवचन कर रहा है। कण्ठ मधुर, वाणी ओजस्विनी, विचारधारा उच्चतम महाराज कौतुकवश खड़े हो गए और प्रवचन सुनने लगे। युवा कुष्ठी जब राजपुरुषों के समूह को प्रवचन सुनते देखा, तो अधिक स्फुरित हो अपनी विद्वता और पाण्डित्य प्रकट करने लगा। महाराज उसके अगाध ज्ञान, अपूर्व वर्णन शैली से बहुत प्रभावित हुए। प्रवचन समाप्त हुआ। महाराज ने पूछा-”युवक किस देश के रहने वाले हो? शुभ नाम क्या है? किस जाति के हो?

“महाराज, यह जानकर आपको क्या लाभ होगा? अतीत के गर्भ में मैंने अपना इतिहास गाढ़ दिया हैं। मैं अब उसे खोदना नहीं चाहता। अब वर्तमान ही मेरा साथी है। मैं मात्र वर्तमान को ही भोगता हूँ, उसमें से किस भविष्य का जन्म होगा, मैं इसकी चिन्ता नहीं करता। कुष्ठी का अतीत उसके शरीर पर विद्यमान है। वर्तमान आप देख ही रहे हैं। भविष्य की कल्पना कर लीजिए। नाम, ग्राम में रखा ही क्या है?

विद्वतापूर्ण उत्तर सुनकर महाराज के मस्तिष्क में अतीत की वह घटना सजीव हो उठी। उनके अंतरमन में आवाज उठी-इसी के साथ चित्रलेखा का विवाह कर दो। वह सोचने लगे-यह अयोग्य नहीं है। विद्वता में यह चित्रलेखा से कम नहीं। बौद्धिक पक्ष से उसे जैसा पति चाहिए, वैसा ही यह है। निश्चय ही शरीर पक्ष से यह अयोग्य है कि चित्रलेखा भी तो साँसारिक विषय-भोगों की निन्दा करती रहती है। फिर वह तो कहती है मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। देखें इन विपरीत स्थितियों में वह अपने किस भाग्य का निर्माण करती है। लेकिन एक कुष्ठी से एक राजा अपनी पुत्री से विवाह करने की प्रार्थना कैसे करे?

विहँस कर युवा कुष्ठी ने पूछा-”क्या सोचने लगे ‘महाराज?”

महाराज अचानक चौंकते हुए बोले, युवक मैं तुम्हारी इस अवस्था को देखकर द्रवित हो उठा हूँ। चाहता हूँ कि तुम्हें कुछ दूँ। किन्तु क्या दूँ सोच नहीं पाता। मैं चाहता हूँ कि तुम माँगो, मैं तुम्हें दूँ।

कुष्ठी युवक ने उपहास से हँसकर कहा-”कथनी और करनी में बड़ा अन्तर होता है महाराज, सोच-समझकर कहिए।”

राजा के वचन पर सीधे चोट थी। वीरभद्र के शरीर में विद्यमान क्षत्रिय खून उबल उठा। क्रोध भरे स्वर में उन्होंने कहा-युवा मैं क्षत्रिय नरेश हूँ, वचन देकर पीछे हटना मेरा स्वभाव नहीं। माँगो जो चाहो माँग लो।

कुष्ठी ने स्थिर दृष्टि से महाराज की ओर देखते हुए कहा- “मैं आपकी पुत्री चित्रलेखा से विवाह करना चाहता हूँ। क्या यह मँगनी स्वीकार है?”

अंगरक्षक सैनिकों के नेत्रों में शोले दहक उठे। सबने म्यान से तलवार खींच ली। किन्तु मालव नरेश को तो मनचाहा वरदान मिल गया था। उन्होंने संकेत से सैनिकों को रोक दिया। नाटकीय क्रोध शब्दों में भरकर वह बोले और कोई समय होता तो तुम्हारी इस धृष्टता पर मृत्युदण्ड ही दिया जाता, किन्तु मैं वचनबद्ध हो चुका हूँ। तुम्हें उत्तर देने से पूर्व मैं तुमसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि तुम तो परदेशी हो, तुम्हें कैसे मालुम कि मेरे पुत्री है, उसका नाम चित्रलेखा है? कुष्ठी ने बीच में ही कहा-महाराज आपके दो पुत्रियाँ हैं। बड़ी सुलेखा और छोटी चित्रलेखा।

मालव नरेश ने कहा, जब तुम्हें इतना सब मालुम था तो तुमने चित्रलेखा को ही क्यों माँगा?

युवक की आँखें आर्द्र हो उठीं। कण्ठ जैसे अवरुद्ध हो गया। उसने कहा “महाराज, आपकी प्रजा के सभी लोग जानते हैं कि आपकी दो कन्याएँ हैं। कह सकता हूँ उन्हीं के द्वारा मुझे यह बात मालुम हुई। किन्तु नहीं, मैं पूर्व से ही यह सब जानता हूँ। रही चित्रलेखा को माँगने की बात तो मैंने सुना है वह कहती है कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करता है। मैं उसकी इस बात की सच्चाई जानना चाहता हूँ कि मेरे साथ नितान्त विपरीत परिस्थितियों में वह किस तरह अपने जीवन को सँवारती है। बात को समाप्त करते हुए उसने कहा- तो मँगनी स्वीकार है।

स्वीकार है। कहते हुए महाराज मुस्करा पड़े। यह तो सब उनके मन की ही बातें थीं, जो अभी युवा कुष्ठी ने कही थीं।

विवाह की बात सुनकर चित्रलेखा ने कोई प्रतिकार न किया। किपनता के निश्चय के विरुद्ध उसने एक शब्द भी नहीं कहा। हाँ, प्रजाजनों तथा उसकी माता ने विरोध किया तो वह बोली, कि इस विवाह में उसकी सम्मति है। स्वेच्छा से ही उसने स्वीकृति दी है। तब सब शान्त हो गए।

विदा के समय महाराज का हृदय भर आया। उनके हृदय में बैठा राजा तिरोहित हो गया और पिता अचानक जाग्रत हो उठा। आँखें भर आयीं, उन्हें पश्चाताप होने लगा। उन्होंने भर्राये गले से कहा, बेटी मैंने कुष्ठी के साथ विवाह करके तुम्हारा जीवन दुःखमय बना दिया।

चित्रलेखा के भी नेत्रों से भावबिन्दु छलक रहे थे। अतीत के स्पन्दनों से भरपूर उस वातावरण को छोड़ने का दुःख उसे भी हो रहा था। उसने अपने मन को संयत करके गम्भीर स्वर में कहा-पिताश्री, इसमें आपका कोई दोष नहीं। आप तो केवल निमित्त मात्र हैं। होनी होकर ही रहती है फिर अनिष्ट कुछ हुआ ही नहीं। उनकी देह से मुझे क्या काम? आपने बताया है कि वह अपूर्व विद्वान हैं, महान ज्ञानी हैं। मुझे ऐसे ही पति की आवश्यकता थी।

इस उत्तर से उपस्थित जनसमूह रो उठा। चित्रलेखा ने अपनी सदाशयता, सेवा-भावना से सभी को मोहित कर लिया था। उससे विलग होना सभी के लिए कष्टकर था।

चित्रलेखा को लेकर युवा कुष्ठी विश्वजित् उद्यान में आ गए। मालव नरेश ने चाहा कि उद्यान में ही उन दोनों के लिए एक महल बना दें। किन्तु विश्वजित् को यह स्वीकार नहीं था। उसने कहा, विश्वजित् किसी की दया पर नहीं जीता। वह विश्व का है, विश्व उसका है। उसे महल की आवश्यकता नहीं। महाराज के नेत्र चित्रलेखा की ओर उठे, तो उसने भी अपने पति के कथन पर मौन सहमति प्रकट की।

अपने कुष्ठी साथियों की सहायता से उसी उद्यान में झोपड़ी बनाकर दोनों पति-पत्नी रहने लगे। चित्रलेखा ने पति सेवा की पराकाष्ठा कर दी। वह नित्यप्रति प्रातः उठती, उष्ण जल से विश्वजित् के घावों को धोती। उन पर औषधि लगाती। इस कर्तव्य-कर्म के कारण सभी घाव बन्द हो गए थे। उसके इस अपूर्व त्याग को देखकर विश्वजित् का अन्तःकरण भी द्रवित हो उठा।

एक दिन एक गहरी उसाँस लेकर वह कहने लगा, मुझे क्षमा करना देवि ! अपने स्वार्थवश तुम्हारा जीवन नष्ट कर दिया।

ऐसा न कहिए देव ! ऐसा न कहिए ! इस समय मैं जितनी सुखी हूँ, उतनी विगत जीवन में कभी नहीं रही। मानव सेवा फिर पति सेवा बड़े पुण्य से मिलती है। आप किंचित मात्र भी दुःखी न हों। बोलते-बोलते उसका गला भर आया।

चार मास तक यही क्रम चलता रहा। उन्हीं दिनों उज्जयिनी में गायत्री विद्या के महासिद्ध आचार्य विद्यारण्य आए हुए थे। पंचदर्शीकार विद्यारण्य श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य होने के साथ दक्षिण भारत के विख्यात राज्य विजयनगरम् के शासक हरिहर के गुरु भी थे। उनके तप से समूचा भारत आलोकित हो रहा था। महाकाल की नगरी में उनके आगमन को सुनकर लोगों को ऐसा लगा, जैसे उज्जयिनी निवासियों पर कृपा करने के लिए कहा कालेश्वर ने स्वयं आचार्य का बाना पहन लिया हो।

उनके दर्शन के क्रम में चित्रलेखा भी एक दिन जा पहुँची। उसकी सारी बातें सुनकर वे कहने लगे-बेटी, गायत्री महामंत्र जीवन निर्माण का सूत्र है। भाग्य निर्माण की कुँजी है। तुम्हारे पति के पूर्व संचित पापों का अन्त निकट है। फिर भी प्रायश्चित आवश्यक है। तुम दोनों सृष्टि के आदि देव सविता का ध्यान करते हुए गायत्री साधना करो। रविवार के व्रत के साथ उन्होंने चौबीस लाख मंत्रों के गायत्री जप का विधान समझा दिया और कहा कि इसी एक वर्षीय साधना के द्वारा सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा।

हुआ भी यही, पति-पत्नी ने विधिपूर्वक साधना की। एक वर्ष पूरा होते-होते विश्वजित् अपने पाँच सौ साथियों के साथ रोगमुक्त हो गए। उनके शरीर दिव्य कान्ति से झिलमिला उठे। चित्रलेखा का आनन्द गगन चूमने लगा। विश्वजित् ने कहा-एक दिन तुमने मेरा अतीत जानना चाहा था, उसका उत्तर देना का समय आ गया है। मैं स्वर्गीय राजा रत्नसिंह का पुत्र हूँ और चम्पापुरी का वर्तमान शासक हूँ। मेरी देह पर जब कुष्ठ रोग के चिन्ह उभर आए तो प्रजा की इच्छानुसार राज्य संचालन का भार मैंने अपने काका शूरसेन को अस्थाई रूप से सौंप दिया। शूरसेन राजकार्य में कुशल एवं प्रतापी थे। उनके संरक्षण में मेरा राज्य सुरक्षित रहेगा, ऐसा मेरा विश्वास था। मैं रोगमुक्ति की खोज में निकल पड़ा। आज तुम्हारे सहयोग से वह भी हो गया।

रोगमुक्ति की सूचना महाराज वीरभद्र को मिली। वह भागे-भागे आए। यहाँ आने पर पता चला युवा विश्वजित् चम्पापुरी का शासक भी है। इस खुशी के पीछे सक्रिय चित्रलेखा की साधना से वह अवगत थे।

कुछ दिन उज्जयिनी में रहने के पश्चात् मालव नरेश वीरभद्र, विश्वजित् और चित्रलेखा एवं विश्वजित् के साथियों के साथ चम्पापुरी आए। शूरसेन को सूचना मिलने पर वह आतुरता से दौड़े आए। उन्हें विश्वजित् से पुत्रवत् प्रेम था। उसे नीरोग देखकर उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उनके समेत नगरजन चित्रलेखा की कर्मनिष्ठा, तप साधना की प्रशंसा कर रहे थे। सबको विश्वास हो चुका था, सचमुच मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। विपरीत परिस्थितियाँ नवनिर्माण में बाधक नहीं, बल्कि उनसे जीवट एवं संघर्षवृत्ति का ही जागरण होता है।


ज्योति-अवतरण की साधना और उसका विज्ञान

ध्यान-धारणा की साधना में अन्तिम स्थिति प्रकाश-अवतरण की मानी गई है। इस दशा में साधक का अन्तर-बाह्य ज्योतिर्वान होकर उसकी सम्पूर्ण सत्ता इससे ओत-प्रोत हो जाती है। यही ब्रह्मज्योति है। ब्रह्म-दर्शन इसे ही कहा गया है।

ज्योति-अवतरण का अभ्यास आज्ञाचक्र में त्राटक से आरंभ किया जाता है। यह त्राटक अन्तर-बाह्य का सम्मिश्रण होता है। इसके लिए गर्दन की ऊँचाई और सीध में स्वयं से लगभग ढाई फुट की दूरी पर घी का दीपक प्रज्ज्वलित करके रखा जाता है। लौ की ऊँचाई करीब आध इंच होनी चाहिए। इसके लिए मोटी बत्ती और पिघला घृत आवश्यक है। अब इसके सामने बैठकर बारी-बारी से आँखें मूँद और खेल कर इस लौ पर धारणा का अभ्यास किया जाता है। कुछ काल पश्चात् जब अभ्यास परिपक्व हो जाता है तो ज्योति अन्तर में स्थिर और स्थायी बन जाती है। फिर दीपक के अवलम्बन की आवश्यकता नहीं रहती और नेत्र बन्द होते ही आज्ञाचक्र के स्थान पर वह अनायास प्रकट हो उठती है। इसे प्रकाश का ‘स्थिरीकरण’ कहते हैं। अगले चरण में उस प्रकाश का विस्तार करना होता है। दीर्घकाल की साधना के पश्चात् वह ज्योति विस्तृत होते-होते सम्पूर्ण जीवन सत्ता में परिव्याप्त हो जाती है। सहस्रार उस दिव्य तेज से प्रतिभासित हो उठता है। इसी स्थिति में आत्मसत्ता का ब्रह्मसत्ता से मिलन-संयोग होता है। आत्मबोध, तत्वबोध का यह त्रिविध सम्पादन साथ-साथ सम्पन्न होकर साधक को उसके अन्तिम लक्ष्य पर प्रतिष्ठित कर देता है।

अब विज्ञान की दृष्टि से सविता अवतरण की इस प्रक्रिया पर तनिक विचार करें कि वह इसे किस प्रकार से प्रतिपादित करता है। ज्ञातव्य है कि मानवी मस्तिष्क में पीनियल नामक एक महत्वपूर्ण ग्रन्थि है। इस ग्रन्थि के बारे में विज्ञान जगत में वर्षों से यह संदेह तो था कि आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में इसका कोई महत्वपूर्ण हाथ होना चाहिए, पर सबूत के अभाव में इस संभावना को बल नहीं मिल पा रहा था। काफी समय बाद गैस्टन और मैनाकर (1968 में ) ने ‘साइन्स’ नामक पत्रिका में एक शोध निबन्ध प्रकाशित कराया, जिसमें उनने पीनियल को प्रकाश केन्द्र (फोटोरिसेप्टर) के रूप में सिद्ध किया था। अभी कुछ वर्ष पूर्व उनकी इस बात की पुष्टि हो गई कि पीनियल का प्रकाश संबंध है। विसकान्सिन विश्व-विद्यालय के वैज्ञानिक एस. एच. स्नीडर ने अपने अनुसंधान में बताया कि रोशनी का पीनियल पर सीधा असर पड़ता है और उस प्रभाव से उससे एक हारमोन निकलता है, जो सेरोटोनिन कहलाता है। उनका मानना है कि सेरोटिन का विभूतियों के विकास से निकट का रिश्ता है। वे यह भी कहते हैं कि मन्द और शीतल प्रकाश में स्राव की मात्रा अधिक होती है, जबकि तीक्ष्ण उत्तेजक रोशनी इस रस-स्राव को घटाती है। उपरोक्त दोनों विज्ञानवेत्ताओं के निष्कर्षों को यदि मिला दें, तो उसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि मानवी काया आँखों के बिना भी रोशनी को महसूस कर सकती है। अंधे व्यक्तियों पर किये गये प्रयोगों से इस बात की पुष्टि हों गई। बस, विज्ञानियों को इसी सूत्र में ज्योति-अवतरण की साधना का रहस्य छिपा प्रतीत हुआ। वास्तव में जिस प्रकार माचिस की तीली में आग छिपी होती है और जब तक उसे रगड़ा न जाय, वह अग्नि अप्रकट स्तर की बनी रहती है, ठीक उसी प्रकार मानवी मस्तिष्क में पीनियल ग्रन्थि की भूमिका प्रकाश केन्द्र के रूप में है। सामान्य स्थिति और साधारण व्यक्ति में वह केन्द्र प्रसुप्त पड़ा रहता है, इसलिए यदि कोई ऐसा व्यक्ति आँख बन्द कर उस दिव्य प्रकाश को देखना चाहे, तो इसमें वह सफल नहीं हो पाता है। इसके लिए साधनात्मक उपचारों द्वारा उस केन्द्र को सक्रिय आगे बढ़ती है वैसे-वैसे एक दिव्य जागरण आरम्भ होता है और वह ज्योति प्रकाश-बिन्दु के रूप में त्रिकुटी में प्रकट होता है। अन्तिम अवस्था में यही प्रकाश कलल विस्तृत होकर सम्पूर्ण सहस्रार को प्रकाशित कर देता है। यही व्याप्ति अथवा ब्रह्म प्रकाश है।

लोहा को लोहे से काटा जाता है। इसी प्रकार ज्योति को ज्योति से प्रज्ज्वलित करने का विधान है। प्रकाश की कमी को पूरा करने के लिए प्रकाश की कमी को पूरा करने के लिए प्रकाश तत्व की ही आवश्यकता पड़ती है। कोई अन्य तत्व इस कमी की पूर्ति नहीं कर सकता। इसीलिए सविता अवतरण की साधना में प्रकाश को माध्यम बनाया जाता है। दीपक ज्योति के स्थूल प्रकाश द्वारा पीनियल में समाहित व्याप्ति प्रकाश पर बार-बार आघात किया जाता है। इस आघात के फलस्वरूप उत्पन्न रगड़ से वहाँ एक प्रकार की स्फुरणा उत्पन्न होती है। यह स्फुरणा ही अदृश्य प्रकाश को दृश्य में परिवर्तित करना आरम्भ करती है। अपनी चरमावस्था में यह ज्योति इतनी उज्ज्वल, शीतल और स्पष्ट होती है कि आँख बन्द होते ही वह सामने साकार हो उठती है।

कहते हैं विवेकानन्द जब छोटे थे, तब रात में बिस्तर पर जाते और आँखें मूँदते ही उन्हें अनायास इस दिव्य प्रकाश के दर्शन होते थे। चूँकि उनके साथ ऐसा नित्यप्रति ही हुआ करता, इसलिए उनने यह धारणा बना ली थी कि इस प्रकार का ज्योति-दर्शन सामान्य बात है और सम्भवतः हर एक के साथ होता हो। यह तो बाद में ही ज्ञात हो सका कि यह साधारण बात नहीं है। ऐसा अनायास होना पूर्वजन्म की उच्च साधनात्मक पृष्ठभूमि को दर्शाता है, अन्यथा वर्षों के अभ्यास के बाद भी कइयों को इसमें निराशा ही हाथ लगती है।

प्रकाश अवतरण की इस साधना में विभूतियों का जागरण भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। साधक दिव्य दृष्टि सम्पन्न तो बनता ही है, इसके अतिरिक्त भी अन्य कितनी ही सिद्धियाँ करतलगत होती हैं। इस दिव्य दृष्टि क्षमता के बारे में आचार्यों का मत है कि ऐसा उस व्याप्ति प्रकाश के कारण ही सम्भव हो पाता है, जो मस्तिष्क से निःसृत होता है। जब किसी के जीवन के बारे में कुछ विशेष जानना होता है, तो इच्छा मात्र से यह प्रकाश-किरण सामने वाले व्यक्ति के भीतर प्रवेश करती और उसके मन में क्या कुछ पक रहा है। यह उद्घाटित करती है। इसके अतिरिक्त भावी सम्भावनाओं और भूतकालीन घटनाओं पर भी काफी प्रकाश डालती है। परोक्ष दर्शन की यह प्रक्रिया लगभग वैसी ही समझी जानी चाहिए, जैसी एक्स-किरण जिस प्रकार शरीर की भीतरी संरचना और गामा किरण इस्पात जैसी कठोर वस्तु की आन्तरिक बनावट का भेद खोल देती है, वैसे ही यह अपार्थिव प्रकाश किरण अपना कार्य पूर्ण करती और भले-बुरे व्यक्तित्व को पल में प्रकट कर देती है।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है पीनियल ग्रन्थि प्रकाश के रस का भी उद्गम स्थल है। यह सेरोटोनिन आखिर है क्या? इस बारे में वैज्ञानिक अभी अनुमान भर लगा सके हैं । कुछ विज्ञानियों का मत है कि तनावजन्य स्थिति को दूर करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके आगे वे कुछ भी बता पाने में असमर्थ हैं। यदि अनुसंधान कर्ताओं के इस कथन को सत्य मान भी लिया जाय, तो भी इसे सम्पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकारा जा सकता, कारण कि अध्यात्म की दृष्टि से जिसे इतना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वह अवयव इतना स्थूल कार्य करे- यह बात गले नहीं उतरती । हाँ, ऐसा हो सकता है कि क्रिया स्थूल पक्ष को शोधकर्मियों ने परख लिया हो; पर इसकी जो सूक्ष्म और अदृश्य स्तर की गतिविधियाँ हैं, उसको जाँचने में वे विफल हो गये। इसी आधार पर उनने इसके गोचर पहलू की व्याख्या-विवेचना कर दी, जबकि अगोचर आयाम अछूता पड़ा रहा। सत्य तो यह है कि पदार्थ का अदृश्य पक्ष इतना महत्वपूर्ण है कि उसकी किसी प्रकार उपेक्षा नहीं की जा सकती; पर असत्य यह भी नहीं है कि पदार्थ विज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं और उसमें सामर्थ्य नहीं। पदार्थ के इस आयाम की भली-भाँति व्याख्या तो अध्यात्म विज्ञान ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं।

अध्यात्म विज्ञान में प्रत्येक पदार्थ की प्रकृति दो प्रकार की बतायी गई है। एक वह जिसे दृश्य अथवा स्थूल कहा गया है। यह पदार्थ की बाह्य संरचना और प्रकट प्रभाव से संबंधित पक्ष कहकर पुकारते हैं। यह पदार्थ का संस्कारजन्य पहलू है। भोजन करने से पेट भर जाता है। यह इसका स्थूल प्रभाव और स्वभाव हुआ; किन्तु इसका सूक्ष्म संस्कारजन्य पक्ष वह है, जो हमारे चिन्तन, चरित्र और भावनाओं को प्रभावित करता है। यह अनुभूतिजन्य है। वैज्ञानिक यंत्रों और उपकरणों से इनका निरीक्षण-परीक्षण कर पाना अभी संभव नहीं हुआ है।

सेरोटिनन की शरीर-क्रिया संबंधी भूमिका के बारे में अनुसंधान कर्ताओं ने तो अपनी सम्भावना प्रकट कर दी; पर उसकी सूक्ष्म भूमिका को उपेक्षणीय कैसे रखा जाय? संभव है साधक में ऋद्धि-सिद्धियों का द्वार खोलने में इसका उच्चस्तरीय योगदान हो। कारण कि सामान्य स्थिति और अवस्था में जो सिर्फ आवश्यक शरीर क्रिया तक सीमित होता है, उसी का साधनात्मक उपचारों के माध्यम से जब इच्छानुसार नियंत्रण होता है, तो साधक की इच्छाओं, आकाँक्षाओं , आस्थाओं और भावनाओं में उदात्तता स्फुट झलकने लगती है। यहीं पर सामान्य व्यक्तियों और एक यथार्थ साधक में अन्तर स्पष्ट होता है और यह भी प्रकट होता है कि स्थूल अवयवों की भूमिका सिर्फ शरीर-क्रिया के संचालन तक ही सीमित नहीं है, वरन् उससे भी आगे व्यक्तित्व को गढ़ने-ढालने में उनका उच्चस्तरीय योगदान होता है। इसी क्रम में ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग प्रशस्त करता हुआ साधक ‘साधना से सिद्धि’ के अपने अन्तिम पड़ाव पर पहुँचता है।

पेड़ों के नीचे ज्योति-अवतरण साधना का विशेष महत्व बताया गया है, कारण कि उस दौरान वृक्ष और साधक दोनों के मध्य एक विशिष्ट स्तर का तारतम्य जुड़ जाता है, जो उसकी प्रगति में सहायक सिद्ध होता है। ज्ञातव्य है कि वृक्षों में सेरोटिनिन से मिलता-जुलता एक रस-स्राव मेलाटोनिन पाया जाता है। यह हारमोन केले, पीपल और बरगद जैसे पेड़ों में सर्वाधिक परिमाण में पाया जाता है। कदाचित् इसीलिए इनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व इतना अधिक बताया गया है। धर्मकृत्यों में, शादी-विवाहों में केले के तने और पत्तों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। इसी प्रकार हिन्दू धर्म में पीपल वृक्ष को पवित्र माना गया है। गीता में कृष्ण ने पेड़ों में स्वयं को अवश्य (पीपल) बताया है॥ इन दोनों के बाद बरगद का ही स्थान है। महात्मा बुद्ध ने इसी वृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त किया था। इससे भी इस विटप का महात्म्य सिद्ध होता है।

इस प्रकार सविता अवतरण की साधना में उपरोक्त बातों पर यदि ध्यान रखा गया, तो साधक की सफलता सुनिश्चित है। वह ब्रह्म-ज्योति दर्शन के साथ-साथ अनेक ऐसी विभूतियों का भी स्वामी बन जाता है जो साधारण अवस्था में असम्भव है।


Quotation

संयम के बिना सन्तुलन नहीं रहता। सन्तुलन के अभाव में जीवन सुनियोजित नहीं बनता। इसके बिना प्रगति सम्भव नहीं। जो प्रगतिशील नहीं वह जीवन मृतक के समान है।


श्रद्धा शक्ति है, विश्वास शिव

आत्मशक्ति की अनुभूति के लिए ये दो ही सम्बल प्रख्यात हैं- श्रद्धा और विश्वास। तुलसीदास ने मानस के प्रारम्भ में ही मंगलाचरण के द्वितीय श्लोक में इसकी स्पष्ट व्याख्या की है-

भवानीश्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरुपिणौ। याभ्याँ बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम्॥

अर्थात् मैं उन श्रद्धा एवं विश्वास रूपी भवानी और शंकर की वन्दना करता हूँ, जिनके बिना अंतःकरण में अवस्थित परमात्म-सत्ता को सिद्धजन देख नहीं सकते। यह श्लोक संक्षेप में अध्यात्म के तत्वज्ञान के आधारों का निरूपण है।

प्रख्यात जर्मन विद्वान हेनरिख जीमर ने ‘मिथ्स एण्ड सिम्बल्स इन इण्डियन आर्ट एण्ड सिविलाइजेशन ‘ नामक अपने ग्रन्थ में लिखा है कि विष्णु, रुद्र, शक्ति, शिव, ब्रह्मा आदि विविध पौराणिक प्रतीक युगों-युगों के अनुभूत जीवन तथ्यों और सत्य की अभिव्यक्ति है। वस्तुतः देवसत्ताओं की आराधना और प्रसन्नता का लाभ उठाना तभी संभव है, जब हम उनके स्वरूप का ठीक-ठीक समझ सकें तथा उनके वर्णन-विश्लेषण के निहितार्थ को, उनमें अन्तर्निहित तत्वज्ञान को भली-भाँति हृदयंगम कर सकें।

भगवान शंकर और भगवती पार्वती का तात्विक स्वरूप क्या है? यह समझने के लिए शैव-शक्ति दर्शनों का गंभीर अध्ययन-मनन उपयोगी है। श्रद्धा और विश्वास अंतःकरण की शक्तियाँ हैं। स्थूल शरीर की शक्ति क्रिया है, सक्रियता के बिना न तो जीवित रहा जा सकता है। न ही प्रगति-उपलब्धि संभव है। इस सक्रियता का प्रेरक है- चिन्तन बुद्धि का व्यापार है। समझ-सूझबूझ, विचार, कल्पना, निर्णय सब इसी के अंग हैं। किन्तु चिंतन की दिशा क्या होगी, यह निर्भर करता है अंतः में उठने वाली भाव-संवेदनाओं के स्वरूप पर। अंतःकरण को ही कारण शरीर कहा जाता है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य का आधारभूत कारण उसके अंतःकरण में उठी उमंगे, आकाँक्षाएं, प्रेरणाएँ ही होती हैं। अंतःकरण की प्रेरणा ही जीवन-दिशा का निर्धारण करती है। इस अंतःकरण में घनीभूत भाव संवेदना का नाम ही श्रद्धा है।

कोई भी व्यक्ति वही होता है, वैसा ही बनता चला जाता है, जैसी उसकी श्रद्धा होती है। बुद्धि और सक्रियता श्रद्धा के ही अनुगामी होते हैं। एक जैसी बुद्धि और एक जैसी क्रियाशीलता भिन्न-भिन्न दिशाओं में प्रयुक्त होने पर आकाश-पाताल जैसे अंतर उपस्थित करा देती है। यह अन्तर भिन्न-भिन्न श्रद्धा के ही परिणामों का होता है। अम्बपाली की श्रद्धा जब तक रूप-सौंदर्य की अधिकाधिक प्रशंसा प्राप्त करने में ही जीवन की सार्थकता देखती-समझती थी, जब तक वह नगर वधू थी। वही सौंदर्य, वही गतिशीलता, वही बुद्धि से, विवेक से, अध्यात्म से, आत्मविकास एवं लोकमंगल के अभ्यास से जुड़ गई तो जीवन की दिशाधारा ही बदल गई, वह प्रख्यात बौद्ध भिक्षुणी बन गई। लोगों में कामजन्य आकर्षण को पैदा करने वाली अब उनमें विवेक लूटने और लुटाने वाली अब उस वैभव को हेय एवं आत्मवैभव को ही वास्तविक उपादेय मानने लगी। रत्नाकर डाकू की श्रद्धा बदल गई तो वह महाकवि वाल्मीकि हो गया। महाविद्वान आचार्य रावण की श्रद्धा ने उसे क्रूरकर्मा राक्षस बना डाला। दुराचरण और निरंकुश भोग की श्रद्धा में दुर्योधन को तब तक चैन से नहीं बैठने दिया, जब तक अपने सभी स्वजनों, सम्बन्धियों, सहयोगियों का और स्वयं अपना भी विनाश उसने नहीं करा डाला। यदि उसकी श्रद्धा मातृत्व, मैत्री और सहयोग में रही होती, तो महाभारत न हुआ होता और आज भारतवर्ष का इतिहास ही भिन्न होता। उस महाविध्वंस में इतनी विकसित सभ्यता न नष्ट हुई होती तो संभवतः आज भी यह देश ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी ही रहा होता।

क्रिया और विचारणा भी चेतना की ही शक्तियाँ हैं। किन्तु उनका स्वरूप एवं उनकी दिशा श्रद्धा के ही अनुरूप होती है। इसलिए श्रद्धा को मानवीय चेतना की मूल शक्ति कहा जा सकता है। गीता में भी कहा है-

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।

अर्थात् व्यक्ति श्रद्धामय ही है। जिसकी जो श्रद्धा है वह वही है। तात्पर्य यही कि किसी का व्यक्तित्व क्या है, कैसा है। इसे जानने-समझने का एक ही अर्थ और एक ही उपाय है कि उस व्यक्ति की श्रद्धा का स्वरूप क्या है ? जीव की स्थिति श्रद्धा से लिपटी हुई है। जैसी श्रद्धा, वैसी स्थिति, वही स्वरूप।

भगवती पार्वती को जगज्जननी कहा गया है। यह स्वाभाविक ही है। श्रद्धा ही आन्तरिक व्यक्तित्व को जन्म देने वाली, उसके स्वरूप को निर्धारित, विकसित करने वाली दिव्य जननी है। यह श्रद्धा विश्वास से जुड़कर संकल्प और सक्रियता की प्रेरक बनती है। संकल्प तभी उत्पन्न होता है जब विश्वास दृढ़ होता है। जिस कार्य, लक्ष्य या बात पर विश्वास ही नहीं, उसके प्रति संकल्प उदय भी नहीं हो सकता। विश्वास की प्रतिक्रिया ही संकल्प है और संकल्प ही सक्रियता का जनक है। इसलिए विश्वास को श्रद्धा रूपी पार्वती के अनन्य सहचर हैं, विश्वास रूपी शंकर।

श्रद्धा व्यक्तित्व की आदि शक्ति है और विश्वास ही परम कल्याणकारी दिव्यसत्ता है। ‘श्रितृ’ धातु में ‘उत’ प्रत्यय जोड़कर ‘श्रत’ शब्द बनता है। ‘श्रित्र सेवायाम्’ के अनुसार इसका धात्वर्थ है- सेवा करना।

यह ‘श्रत’ भाव धारण किया जाना श्रद्धा है। जिसके प्रति सेवा की भावना रखी जाय, जिसे पुष्ट, प्रबल बनने में योग दिया जाय, उसके प्रति व्यक्ति की श्रद्धा है, यह मानना चाहिए। सेवा और उपासना बिना आत्मीयता के सम्भव नहीं। शास्त्र में कहा है-’शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ अर्थात् स्वयं शिव रूप बनकर ही शिव की उपासना, भजन, सेवा करनी चाहिए। अतः सच्ची श्रद्धा उसी के प्रति मानी जा सकती है, जिससे अभिन्न आत्मीयता की अनुभूति हो और जिसके जैसा स्वयं बनने की उत्कृष्ट इच्छा एवं प्रयास हो।

श्रद्धा और विश्वास इन दो बीजों का विकास रूप ही व्यक्तित्व वृक्ष है। जैसी श्रद्धा और जैसा विश्वास होता है, वैसी ही आकाँक्षा, प्रेरणा तथा वैसा ही संकल्प प्रबल होता है। उसी दिशा में सक्रियता बढ़ती है और तद्नुरूप साधन सहयोग जुटाये जाते हैं। गन्तव्य का निर्धारण विश्वास ही करते हैं। उस दिशा में निरंतर बढ़ते जाने की प्रेरणा और शक्ति उन्हीं से मिलती है। व्यक्तियों, साधनों और परिस्थितियों का सरंजाम उसी स्तर का जुटाया जाता है और जो कुछ अनायास जुटता चला जाता है, वह भी उसी के अनुरूप ही। अतः व्यक्तित्व की पहचान उसके भीतर गतिशील श्रद्धा एवं विश्वास से ही हो सकती है। विश्वास शब्द को ‘विश्’ और ‘वास’ इन दो शब्दों से मिलकर बना माना जाता है। ‘विश्’ का अर्थ है ‘प्रविष्ट होना’ तथा ‘वास’ का अर्थ ‘निवास करना’ है। जो भाव-संवेदना अंतःकरण में गहराई से प्रविष्ट हो, उसे विश्वास कहते हैं। अंतःकरण में गहराई से प्रविष्ट हो, वहीं निवास करे, गहराई तक जमी हो, उसे विश्वास कहते हैं। अंतःकरण में कुछ समय उमड़-घुमड़कर तिरोहित हो जाने वाली भाव तरंगें संकल्प, उपलब्धि और कल्याण का आधार नहीं बन सकतीं। स्थायी और सुदृढ़ विश्वास-भाव ही शंकर अर्थात् कल्याण करने में समर्थ हैं।

उत्कृष्ट श्रद्धा-विश्वास ही शिव-पार्वती का युग्म है। अस्थायी भावोन्माद न तो श्रद्धा है, न विश्वास। उससे न तो शक्ति प्राप्त होती है, न ही कल्याण। अंतःकरण में सुदृढ़ता से गहराई तब जमी हुई भावनाएँ और आकाँक्षाएँ ही श्रद्धा- विश्वास हैं। वे प्रगति एवं पुरुषार्थ का आधार हैं। कृतित्व तथा कल्याण का साधन- सम्बल वे ही हैं। उल्लसित वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य सत्श्रद्धा एवं सत्विश्वास के द्वारा ही निर्मित होते हैं। जो आचरण में न अभिव्यक्ति हो, संकल्प के रूप में न उदित हो, प्रखर भावनाओं का जनक न बने, वह विश्वास नहीं। जो क्रियाशक्ति से न जुड़ सके, जो अंतःकरण में प्रगाढ़ भाव-संवेदनाओं के रूप में न स्थित हो और चिंतन तथा क्रिया का आधार न बन सके वह श्रद्धा नहीं। रामचरितमानस में गरुड़ ने काकभुशुण्डि से आत्मसाधना की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए कहा है कि- “सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई।” सात्विक श्रद्धा ही सुन्दर गाय है। यह गाय “जप, तप, व्रत, यम, नियम, अपारा” यानि, यम, नियम, जप , तप आदि चारा ही खाती है। यह चारा हरा हो, उसमें जीवन हो प्राण हो। जीवंत संवेदनाएँ ही इन्हें प्राणवान बनाती रही हैं।

तेई तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ शिशु पाई पेन्हाई ॥

अर्थात्- ऊपर कहे हरे चारे को जब श्रद्धा रूपी धेनु चरती है और उससे पोषण प्राप्त करती है, तब भाव रूपी बछड़े को देखकर वह पिन्हाती है, उसके थनों में दूध उतर आता है। इस दूध को निर्मल मन रूपी अहीर विश्वास रूपी पात्र में दुहता है। श्रद्धा का दूध भाव रूपी पात्र में दुहता है। श्रद्धा का दूध भाव रूपी बछड़े को पाकर निर्मल मन द्वारा विश्वास के बर्तन में दुहा जाता है।

इससे श्रद्धा का तात्विक स्वरूप उसके पोषण, आहार या आधार और विश्वास से उसका सम्बन्ध स्पष्ट होता है। भाव-विहीन, जप-तप विहीन, नियमों का उल्लंघन करने वालों की श्रद्धा से धर्म रूपी दूध नहीं दुहा जा सकता। उस स्थिति में विश्वास का बर्तन रीता ही रह जाता है। उस बर्तन को दूध से भरने के लिए साधना के श्रद्धा, बाँझ ही बनी रहती है।

श्रद्धा शक्ति है और विश्वास शिव बिना शक्ति के शिव शव है। बिना शक्ति के और शिव के जीवन, जीवन नहीं है, वह निष्फल है। सार्थक जीवन के लिए श्रद्धा एवं विश्वास रूपी भवानी तथा शंकर की नित्य आराधना आवश्यक है तभी अंतरात्मा की चेतना शक्ति को देखा-समझा जा सकता है।


सच्ची भक्ति (Kahani)

मैं तो इतने दिनों से भगवान की भक्ति कर रही हूँ- एक स्त्री ने सन्त को बताया, पर मुझे तो आज तक उन्होंने कभी स्वप्न में भी दर्शन नहीं दिये। आप कहते हैं कि वे आप से कभी अलग नहीं होते।

बात यह थी कि वह स्त्री भक्ति तो करती थी, पर अपने परिवार, पड़ोसी और सम्बन्धियों सबके साथ उसका व्यवहार बहुत रूखा और अहंकारपूर्ण था। घर वाले भी उसके आचरण से दुःखी थे।

सन्त बोले-”आज भगवान से पूछकर बतायेंगे, आपसे क्यों नहीं मिलते। “ दूसरे दिन स्त्री मिली तो वह बोले-”माई भगवान तुम पर नाराज हैं, कह रहे थे कि वह हमारे बच्चों से लड़ती, मारती, पीटती और द्वेष रखती है, उससे मिलने का मन नहीं करता।”

स्त्री समझ गई। उस दिन से उसने अपना व्यवहार मीठा बना लिया। फलस्वरूप दूसरे लोग उसे इतना प्यार और आदर देने लगे कि वह उस शाँति में ही भगवान की उपस्थिति अनुभव करने लगी।


देवसत्ताएँ-चैतन्य ऊर्जाएँ

देवसत्ताएँ चेतना-ऊर्जा हैं। मूल कणिकाएँ और भौतिकीय ऊर्जा विकिरण उनके भौतिक पक्ष हैं। आन्तरिक चैतन्य विशिष्टता उनका आध्यात्मिक पक्ष है। समस्त देवगण प्राण-ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं। भौतिक द्रव्य में क्रियाशीलता ऊर्जा उनकी आधिभौतिक अभिव्यक्ति है। वस्तुतत्व त्रैत स्वरूप या त्रिस्तरीय-त्रिआयामी होता है। यही कारण है कि भारतीय मनीषियों ने वस्तुतत्व का निरूपण करते समय तीनों ही स्तरों पर उनका विवेचन-विश्लेषण किया है। वस्तुसत्ता के तीनों रूपों को समझने के साधन, उपकरण, माध्यम और विधियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, मात्र भौतिकी के द्वारा तीन स्तरों की तत्व विवेचना संभव नहीं होती। आधुनिक भौतिकी वस्तुओं के आधिभौतिकी स्वरूप की ही खोजबीन करती है। उनको आधिदैविक ही चाहिए। भौतिक-द्रव्य से विनिर्मित उपकरण चाहे जितने सूक्ष्म हों, वे आधिभौतिक अर्थ को ही प्रकाशित कर सकते हैं। किन्तु भौतिक विज्ञान के इस युग में बुद्धिमान लोगों की भी प्रवृत्ति मूलतः आधिभौतिक अर्थ को समझने की होने के कारण आधिदैविक अर्थों को भी आधिभौतिक प्रतीकों द्वारा ही संकेतित करना आवश्यक है। यह बहुत कठिन भी नहीं है। क्योंकि भारतीय प्रज्ञा ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए सदैव ऐसे शब्दों को प्रचुरता से चुना है, जिनके साथ तीन स्तरों पर तीन अर्थ होते हैं, आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक।

देवों को प्रजापति की अतिसृष्टि कहा जाता है। सृष्टि का क्रम इनके उपरान्त है। सृष्टि के प्राणी मर्त्य हैं। देवता अमर हैं, क्योंकि से अमृतपान किये हुए हैं। अमृतों की पाँच कोटियाँ हैं, ऐसा छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित है। इन पाँचों अमृतों के अनुगत पाँचों देव वर्ग हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में इनका विवरण यों है।

तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन। ( छा. 3/7/1)

अर्थात् यह जो पहला अमृत है, उससे वसुगण जीवन धारण करते हैं। वे अग्निमुख द्वारा ही उसे धारण करते हैं।

अथ यदिद्वतीयममृतं तद्रुदा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन। ( छा. 3/7/1)

अर्थात् जो दूसरा अमृत है, उससे रुद्रगण जीवन धारण करते हैं। उनका मुख इन्द्र है।

अथ यत्ततीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन। ( छा. 3/8/1)

अर्थात् यह जो तीसरा अमृत है, उससे आदित्यगण जीवन धारण करते हैं। उनका मुख है वरुण।

अथ यच्चुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन। ( छा. 3/9/1)

अर्थात् चौथे अमृत से मरुत सोम मुख से जीवन धारण करते हैं।

अथ यत्पेचमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्राह्मण मुखेन। ( छा. 3/10/1)

अर्थात् यह जो पाँचवाँ अमृत है, उससे ब्रह्म रूपी मुख से साध्यगण जीवन धारण करते हैं।

इस प्रकार पाँच अमृतों के अनुगत ये पाँच मुख्य देव इस प्रकार हुए वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत एवं साध्य। ये सभी चेतन विकिरण-ऊर्जाओं के वर्ग हैं इनके आधिभौतिक स्वरूपों को आधुनिक भौतिकी की भाषा में क्रमशः रेडियो विकिरण, अवरक्त विकिरण, दृश्य विकिरण, एक्स किरण एवं गामा किरण समझा जा सकता है। इनके मुख्य रूप अग्नि, इन्द्र, वरुण, सोम एवं ब्रह्म को क्रमश फोटोन, अल्फा, मेसान, लेक्टान एवं न्यूक्लिआन कण के स्तर पर सक्रिय चेतना ऊर्जाएँ समझा जा सकता है। ये ही मूल कणिकाएँ सृष्टि के, द्रव्य के परमाणुओं का गठन करती है। सर्वव्यापी चैतन्य अमृत सत्ता की शक्ति का अंश ही इन मूल कणिकाओं का भी प्राण है। इन सभी मुखों में वही अमृत समाहित होता तथा इन्हें जीवन प्रदान किये रहता है। चेतन विकिरण ऊर्जाएँ अपनी क्रीड़ा उसी सर्वव्यापक अमृत सत्ता की शक्ति से करती हैं। वे उसका ही अंश हैं। उससे भिन्न कोई सत्ता संभव ही नहीं।

इन पाँच प्रधान देव वर्गों के साथ ही अश्विन कुमारों का अपना विशेष स्थान है। क्योंकि वे देवताओं के वैद्य हैं। विश्वेदेवा देवताओं की सबसे ऊँची कोटि को कहा जाता है। जो अतिसूक्ष्म चिन्मय शक्तियाँ हैं। इस प्रकार प्रमुख देव वर्ग ये सात हुए-आदित्य, वसु, रुद्र, मरुत, साध्य, अश्विन, विश्वेदेवा।

देवशक्तियों के वाचक प्रतीकों के आधिभौतिक अर्थ भी होते हैं और उन्हें भौतिक विज्ञान के द्वारा समझा-जाना जा सकता है। हाँ, अवश्य ही वैदिक विज्ञान की भाषा आधुनिक भौतिक की भाषा से भिन्न थी। इसीलिए इन शब्दों का वर्तमान वैज्ञानिक शब्दों से साम्य नहीं है। किन्तु अर्थ साम्य पूरी तरह है। अतः देवशक्तियों के स्वरूप को समझने के लिए वैदिक वैज्ञानिक पर्याय समझना बौद्धिक वर्ग के लिए उपयोगी संभव तभी है जब देवशक्तियों को इन पर्यायों के आधिभौतिक अर्थ में ही न समझ लिया जाय, अपितु इस समानता को, देववाद को समझने का सूत्र मानकर ग्रहण किया जाय। स्थूल भाव ही ग्रहण कर लेने पर भ्राँति बनी रहेगी। यहाँ देवशक्तियों के सूक्ष्म स्वरूप को समझने के लिए आधुनिक भौतिकी के अविज्ञात सूत्रों का सहारा लिया जा रहा है, उन्हें ग्रहण करते समय उपर्युक्त सतर्कता बरतनी भी आवश्यक है। आदित्य-छान्दोग्य उपनिषद् में बताया गया है कि आदित्य में और नेत्र में एक ही देवता है।

अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषों दृश्यते सैवर्क्तत्साम तदुकथं तद्यजुस्तद्दह्म तस्यैतस्य तदेव रुपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम। (छा. 1/7/5)

अर्थात् जो नेत्रों के मध्य में देवसत्ता है, वह वही जो उस आदित्य में है। इसीलिए वहीं पर आगे यह भी कहा गया है कि चाशुष और आदित्य दोनों की एकता जानने वाला ऊर्ध्वलोकों में गमन करता है। बृहदारण्यक उपनिषद् में भी इस एकता का ऐसा ही कथन है। उसके भाष्य में शंकराचार्य ने लिखा है-

विद्युति त्वचि, हृदये चैका देवता। (बृहदा. 2/1/4 का शंकरभाष्य)

आगे श्री शंकराचार्य ने यह भी लिखा है-

तेजस्वीति विशेषणाम् तस्यास्तत्फलम्।

अर्थात् विद्युत त्वचा और हृदय में एक ही देवता है, उसका फल है। उससे ज्ञात होता है कि दर्शन शक्ति कारणी भूत दृश्य प्रकाश की किरणों में क्रियाशील चेतन शक्ति की संज्ञा आदित्य है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि प्रधानतः अदित से सात आदित्य ही उत्पन्न हुए । ये सात आदित्य दृश्य प्रकाश के सात प्रकारों के प्रतीक देवता है। ज्यामितीय दृष्टि से दिशाओं की संख्या छह है-आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, दाहिने और बायें ।

इन छहों दिशाओं को प्रकाशित करने वाले दृश्य विकिरणों के प्रतीक छह आदित्य और होने चाहिए। किन्तु चेतन प्राणी अपने सम्मुख रखी वस्तु के ऊपर, नीचे, दायें, बायें और आगे तो देख सकते हैं, पीछे नहीं देख पाते। इसीलिए वस्तुओं की आकृतियों के निर्धारक पाँच आदित्य ही कहे गये। प्रत्येक आदित्य एक दिशा में वस्तु के विस्तार के निर्धारक दृश्य विकिरण का दैवी प्रतीक है। दिव्य सत्ता है। इसलिए आदित्य बारह ही हैं। पीछे की दिशा के लिए कोई आदित्य नहीं होता। ये सभी आदित्य शक्तियाँ सविता की ही रश्मियाँ हैं यह स्पष्ट है।

वसु-ऋग्वेद के अनुसार वसुओं की दो विशेषताएँ हैं। एक तो वे जाग्रत हैं। अर्थात् शब्द संवाहक एवं शब्द प्रदाता है। दूसरे वे मेरुविर्भदये अर्णसो धायपजः। (ऋग्वेद 1/58/3) हैं अर्थात् अर्णव में यदि कोई फेंक दिया जाता है और वह वसुओं की शरण में जाता है, तो वे उसे बलपूर्वक पार कराते हैं। इस कार्य में वे अति कुशल हैं। इस पर विचार करने पर विदित होता है कि रेडियो तरंगों की संचालक चेतन क्रिया शक्ति ही वसु है। रेडियो प्रसारण केन्द्र में वक्ता या गायक अथवा वादक के मुख से वाद्य यंत्र जो तरंगमयी ध्वनि ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसे विद्युत स्पंदनों में परिवर्तित किया जाता है और उन विद्युत स्पन्दनों को उच्च आवृत्ति वाली रेडियो तरंगों पर आरुढ़ कर दिया जाता है। ये रेडियो विकिरण ही आकाश मार्ग से ध्वनि तरंगों के विद्युत-स्पंदनों को बलपूर्वक पार कराते हैं और संग्राहक यंत्र तक पहुँचाते हैं, जहाँ मूल स्वरूप में ध्वनि पुनः प्रकट होती है। आधुनिक आकाशवाणियों एवं दूरदर्शन के साधन वसु ही होते थे और अब भी होते हैं। क्योंकि शक्ति तो वही है प्रविधि भले भिन्न हो।

रुद्र-ऋग्वेद (1/3/3) के अनुसार “ रुद्राणों रोदन कारिणों।”

अर्थात् जो रुदन कराये वह रुद्र हैं। ऋग्वेद में भी कहा गया है कि “रुद्राय क्रूर अग्नये।” अपनी तेजस्विता से भस्मीभूत कर देने वाली प्रचंड शक्ति रुद्र है। पौराणिक भाषा में इसलिए रुद्र को तृतीय नेत्र सम्पन्न कहा गया है, जिसके खुलते ही प्रचण्ड ताप निकलता है। रुदन कराने का अर्थ भी द्रवीभूत करना हैं। अतः उस प्रचण्ड तापशक्ति की अभिमानी देवसत्ता का ही नाम रुद्र है, जो अपने प्रखर ताप से अत्यंत तप्तकारी प्रभाव उत्पन्न करती है और लौह पिण्डों तक को गलाकर द्रवीभूत कर सकती है। वसु शक्ति सम्पन्न रेडियो विकिरणों से अधिक सूक्ष्म, अधिक उच्च आवृत्ति वाली रश्मियों में सक्रिय देवसत्ता रुद्र है, यह छान्दोग्य उपनिषद् में मधु विद्या के वर्णन से स्पष्ट है। उसमें अमृत के पाँच वर्गो का विवेचन है, जो ऊर्जा की सूक्ष्मता के आरोहक्रम से गिनाये गए हैं। इनमें प्रथम क्रम वसुओं को दिया गया है और कहा गया है कि प्रथम अमृत से ही वसुगण जीवन धारण करते हैं। रुद्र वसुओं से अधिक सूक्ष्म हैं। उनकी रश्मियाँ उच्चतर आवृत्ति वाली हैं। आधुनिक भौतिक की भाषा में ये अवरक्त किरणें हैं। अवतरण किरणों में सक्रिय चेतन सत्ता ही रुद्र हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में यह भी कहा गया है कि वसुओं की अपेक्षा रुद्रों का भोगकाल दूना है। मरुतगण वायु के देवता है। ऋग्वेद के अनुसार वे तीक्ष्ण तथा भेदन सामर्थ्य से सम्पन्न होते हैं। किन्तु ये रुद्र की तरह तापकारी, रुलाने, गलाने वाले नहीं हैं। क्योंकि मरुत का शब्दार्थ ही हैं, ‘मारुदन्त’ जो रुलाते नहीं, पीड़ा नहीं देते किन्तु सूक्ष्म और भेदन क्षमता से युक्त हैं, वे मरुत हैं।

भारतीय तत्वदर्शन में जिसे वायु तत्व कहा गया है, वह आधुनिक भौतिकी के इलेक्ट्रॉन कण का पर्याय है मरुत का इलेक्ट्रॉन अथवा वायुतत्व से भी सम्बन्ध होना चाहिए। इन सभी विशेषताओं का विचार करने पर एक्स किरणों में क्रियाशील देवशक्ति ही मरुत प्रतीत होती है। एक्स किरणों का तरंग-दैर्ध्य इलेक्ट्रॉन की आनुषंगिक तरंग-दैर्ध्य स्तर का होता है। एक्स किरणें शरीर में प्रविष्ट होने पर भी पीड़ा नहीं पहुंचाती। सूक्ष्म होती है और भेदन में समर्थ होती हैं। इससे एक्स किरणों की मरुद्गणों से समानता प्रकट होती है।

साध्य मरुद्गणों से भी अधिक सूक्ष्म चैतन्य ऊर्जा है। इसे आदित्रु की उर्ध्वादिक सम्बंधी किरणें भी कहा गया है। जिस प्रकार परमाणु के मध्य में है। जिस प्रकार परमाणु के मध्य में नाभिक होता है, उसी प्रकार आदित्य के मध्य में यह मधु स्थापित है। परमाणु के नाभिक सदा संक्षुब्ध से रहते हैं और उनमें तीव्र हलचल होती रहती है। साध्य देवों को भी आदित्य के मध्य में क्षुब्ध होता हुआ मधु कहा गया है। सूक्ष्मता और संक्षोभ से सम्बन्ध दिखाये जाने से पता चलता है कि विकिरणधर्मी गामा किरणों में सक्रिय चेतना शक्ति को ही साध्व देव कहा गया है। वे मरुद्गणों से ऊपर अधिष्ठित हैं। गामा किरणें भी एक्स किरणों से अधिक सूक्ष्म होती हैं। वे विघटनशाली संक्षुब्ध परमाणु नाभिकों से उत्सर्जित होती हैं।

अश्विन तैत्तिरीय ब्राह्मण में दोनों अश्विनों को देवों के वैद्य, हवियों का वहन करने वाले, विश्वेदेवों के दूत तथा अमृत के रक्षक कहा गया है।

अश्विन या अश्विनीकुमार दो हैं। अश्विन या अश्विनीकुमार दो हैं। अश्वयन का अर्थ प्रसरण, विसरण या फैलना है। वे गणदेवों का प्रभाव प्रसारित करते हैं, उनकी श्रेष्ठता के अमृत स्तर को सुरक्षित रखते हैं। इन सब बातों का विचार करने पर चलता है कि विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंग के उभय घटक ही दो अश्विनीकुमार हैं। प्रत्येक रश्मि तरंग वस्तुतः विद्युत ऊर्जा और चुम्बकीय ऊर्जा की समयुग्मित तरंग होती है। ये दोनों ही घटक समरूप होते हैं। दोनों अश्विनीकुमार भी समरूप होते हैं। इन घटकों के आयामों के द्वारा ही किसी तरंग का प्रभाव आगे बढ़ता है। जितनी अधिक इनकी आवृत्ति होगी, उतनी ही सूक्ष्म किरण होगी। अग्निकण फोटान कणों में ऊर्जा के परिमाण की कमी या अधिकता के ही अनुसार गणदेवों या सूक्ष्म प्रवाह तरंगों का स्वरूप वैविध्य विनिर्मित होता है।

इसलिए उस ऊर्जा के संवाहक विद्युत चुम्बकीय घटकों के आयामों को अश्विनों के बाहु कहा गया है, जिनसे वे अग्नि में अर्पित हव्य को ऊर्जा रूप में वहन करते हैं।

अग्नि को देवों का पुरोहित कहा गया है। बृहस्पति भी उसका पर्याय नाम है। उसे देवमुख के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि वह चैतन्य विकिरण ऊर्जाओं का मुख जैसा ही है। मात्र विश्वेदेवा उससे भी सूक्ष्म चैतन्य ऊर्जाएं हैं। विश्वेदेवा-आर्षग्रंथों में विश्वेदेवा के दो भिन्न-भिन्न समूहों की चर्चा है। कहीं संख्या तेरह बतायी गयी है, कहीं इक्कीस। ये अति श्रेष्ठ देव शक्तियाँ है, जो आकाश के अज्ञात प्रदेशों से आती हैं। अनंत अंतरिक्ष के अज्ञात प्रदेशों से आती हैं। अनंत अंतरिक्ष के अज्ञात प्रदेशों से बरसने वाली अतिसूक्ष्म कास्मिक किरणों में क्रियाशील चित् शक्ति ही विश्वदेव है। आधुनिक विज्ञान अभी इनके आधिभौतिक पथ का ही अनुसंधान नहीं कर पाया है। फिर देव सत्ताएँ तो भौतिकी के कार्यक्षेत्र और अन्वेषण क्षेत्र से सर्वथा भिन्न चैतन्य ऊर्जाएँ हैं। उन्हें अनुभव करने का माध्यम श्रद्धा है। ऐसा शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है। बिना श्रद्धा के देवसत्ताओं की अनुभूति कर सकना, उनके अनुदान पा सकना असम्भव है। श्रद्धा ही उन चेतन ऊर्जाओं से संबंध जोड़ती है।


Quotation

आलस्य जीवन्त मनुष्य की कब्र है। यदि आलस्य न अपनाया गया होता तो अविद्या और दरिद्रता का दुःख लोगों को क्यों भुगतना पड़ता।


इस मूल्यवान जीवन को खोकर तुम्हें क्या मिलेगा (Kahani)

तीन दिन से पत्नी और बच्चों को भोजन न मिला था। गृह-स्वामी प्रयत्न करने पर भी एक समय का भोजन न जुटा सका। अन्ततः वह निराश हो गया, उसे अपना जीवन बेकार लगने लगा।वह अपने घर से चला गया और आत्म-हत्या करने की तैयारी पर विचार करने लगा। कुछ क्षण बाद वह व्यक्ति संसार से विदा होने को था।

पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “मित्र ! इस मूल्यवान जीवन को खोकर तुम्हें क्या मिलेगा? निराश होने से तो कोई लाभ नहीं। मैं मानता हूँ कि तुम्हारे जीवन में आई हुई विपत्तियाँ ऐसा करने के लिए विवश कर रही हैं, पर क्या तुम इन विपत्तियों को हँसते-हँसते पीछे नहीं ढकेल सकते?”

आत्मीयता से परिपूर्ण शब्दों को सुनकर वह युवक रो पड़ा। सिसकियाँ भरकर अपनी मजबूरी की सारी कहानी सुना दी। अब तो सुनने वाले व्यक्ति की आँखों में भी आँसू थे। यह सहृदय व्यक्ति जापान का प्रसिद्ध कवि शिनीची ईं गुची था।

उस युवक की परेशानियों ने भावुक कवि शिनीची को प्रभावित किया, उसने वहीं यह संकल्प किया कि मैं अपनी कमाई का अधिक भाग उन व्यक्तियों की सेवाओं में लगाया करूंगा, जो अभावग्रस्त हैं। उस समय कवि शिनीची ने युवक के परिवार की भोजन व्यवस्था हेतु कुछ धनराशि दे दी, पर घर लौटकर उसने गुप्त दान पेटी बनाई और चौराहे पर लगवा दी।

उस पेटी के ऊपर लिखा गया-”जिन सज्जनों को सचमुच धन की आवश्यकता हो, वह इस पेटी से निकाल कर अपना काम चला सकते हैं। यह धन यदि कतिपय अभावग्रस्त व्यक्तियों की सहायता में लग सका, तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। धन्यवाद।” उस पेटी पर नाम किसी व्यक्ति का न था। क्योंकि शिनीची की कर्म और सेवा में परदुःख कातरता का यह गुण ही उन्हें महामानव का पद दिलाता है।


सूक्ष्म शरीर-प्रकाश शरीर

श्रीमती जे. सी. ट्रस्ट ने एक ऐसे व्यक्ति को चुना , जो छोटी-छोटी बातों में उत्तेजित हो जाता था। वह दिन में कई बार क्रुद्ध हो जाने के कारण बहुत दुबला पड़ चुका था, सर्दी-गर्मी के हलके परिवर्तन भी उसकी कष्टदायक प्रतीत होते, उसे कोई न कोई बीमारी प्रायः बनी रहती थी।

एक बार जब वह गुस्से में था, तब श्रीमती ट्रस्ट ने उसे लिटा दिया और उसके नंगे शरीर पर बालू की हलकी परत बिछा दी। उनके शिष्य, अनुयायी और कई वैज्ञानिक भी उपस्थित थे। उन सबने बड़े कौतूहल के साथ देखा कि जिस प्रकार पानी की भरी काँसे की थाली को बजाने से पानी की थरथरी काँसे के अणुओं में उत्तेजन और स्पंदन का आभास कराती है, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर से भी प्रकाश अणु निरंतर निसृत होते रहते हैं।

क्रोध जैसे उत्तेजनशील आवेश के समय यह प्रकाश अणु बड़ी तेजी से थरथराते हुए निकलते हैं। जो व्यक्ति जितना अधिक शाँत, कोमल चित्त, मधुर स्वभाव, मितभाषी, स्थिर बुद्धि होता है, उसके सूक्ष्म शरीर के प्रकाश अणु बहुत समय तक शरीर में उष्णता, शक्ति और सहनशीलता बनाये रखते हैं।

रसायनविज्ञ रोमेल ने भी इस तथ्य को एक प्रयोग द्वारा सिद्ध करके दिखा दिया कि शरीर में निरंतर विद्युत चुम्बकीय उर्मियाँ (कम्पन) निकलती रहती हैं और मानव अणुओं को बाहर निकालते रहते हैं। शरीर से जीवन अणुओं कास निकलना एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है। उसकी अपेक्षा महत्वपूर्ण जानकारी है, शरीर में पहले से व्याप्त इन प्रकाश अणुओं में से धूमिल मटमैले, गन्दे संस्कारों वाले प्रकाश अणुओं के स्थान पर दिव्य अणुओं का विकास। यदि इस विकास प्रक्रिया को कोई जान ले तो संसार को अद्भुत विद्या के शक्तिमयी रहस्य को हस्तगत कर सकता है। किसी के कष्ट निवारण छाया शरीर का नियंत्रण, परकाया प्रवेश और समाधि अवस्था में सुदूर प्रान्तरों एवं ग्रह’-नक्षत्रों में विचरण सब इसी विद्या की शाखाएँ हैं। बाइटल फोर्स के रूप में प्रकाश अणु निःसृत होकर श्वास-प्रश्वास के माध्यम से शरीर में प्राण शक्ति का कार्य करता है।

परकासनी (इन्फ्रारेड) विकिरण तो शरीर में पर्याप्त भीतर ही भीतर बिखर जाती है। मनुष्य की त्वचा एक मिलीमीटर गहराई तक इन किरणों को सम्प्रेषित करती रहती है। काली चमड़ी वालों में यह प्रकाश-कण सोखने की क्रिया धीमी होती है। फिर यही तथा विद्युत चुम्बकीय तरंगें स्नायु सूत्रों तथा विद्युत चालकों प्रोटानों के माध्यम से शरीर के सभी कोनों में फैल जाते हैं।

शरीर के दूसरे अवयव जैसे- कोशिकाओं, रक्त, माँस मज्जा, काँर्टिक्स तथा स्नायु सूत्रों में भी प्रकृति की अन्य वस्तुओं की भाँति कई प्रकार के विकिरणों को ग्रहण करने, परिवर्तन, शोषण, सम्प्रेषण तथा पुनः विकिरण करने को भी क्षमता होती है। प्राणायाम द्वारा प्राणों का नियंत्रण और योगाभ्यास द्वारा उन शरीर संस्थानों को जाग्रत कर जो प्राण-शक्ति को आकाश में से बहुतायत से खींच सकते हैं।

इस प्रमाण के लिए रूसी खगोल शास्त्री श्री चिटोव्स्की को भारी तप करना पड़ा। इनके अनुसार सूर्य आदि की चमक और उसके 11 वर्षीय सन स्पाट्स से मनुष्य की मनोदशा से गहरा सम्बन्ध है। इसका सम्बन्ध जिन थाइराइड एड्रीनल और पिट्यूटरी ग्रंथियों से है। वे सब नलिकाविहीन होती हैं। इन अंतःस्रावी ग्रन्थियों में प्राण का प्रवाह इस प्रकार होता है जिस प्रकार तार में विद्युत कण। जैसे-जैसे यह प्रकाश कण होते हैं, वैसे-वैसे भाव उठते हैं। सूर्य की तेज धूप में क्लान्ति, क्रोध, वीरता जैसे भाव आते हैं तो चन्द्रमा के प्रकाश में आह्लाद और शीतलता के। अब यदि कोई व्यक्ति अपना ध्यान किसी प्रकाश स्रोत पर लगाता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारी नलिका विहीन ग्रंथियाँ उस स्रोत विशेष से विद्युत चुम्बकीय सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं और वह कण तेजी से हमारे अंदर भरने लगते हैं।

उदाहरण के लिए गायत्री उपासना के साथ सूर्य का ध्यान भी करना पड़ता है। ध्यान की अवस्था में सूर्य के विद्युत-चुम्बकीय प्रवाह से अपने मस्तिष्क की चोटी वाले स्थान से नलिका विहीन ग्रंथियों का संबंध जुड़ जाता है और सूर्य के तेज कण हमारे शरीर ओजस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी होता चला जाता है। जिस दिन शरीर के सभी प्रकाश अणु बदल जाते हैं उसी दिन साधक गायत्री सिद्ध या सूर्य की सी गति वाला हो जाता है।

इस तरह सुँदर, शुद्ध स्थान में रहकर, महापुरुषों व देवस्थानों के संपर्क में आकर, प्राणायाम-प्रत्याहार आदि के द्वारा तथा जप और ध्यान के माध्यम से साधक प्रकाश अणुओं या प्राण शरीर पर नियन्त्रण करना व विकास करना ही सीखता है। इस तरह वह शक्तिशाली बनता व महान् जीवनोद्देश्य पूरा करता है।


सत्संग गंगा है (Kahani)

रामकृष्ण की धर्मपत्नी शारदामणि महिलाओं का अलग सत्संग चलाती थीं। उसमें अधिकाँश धार्मिक प्रकृति और संभ्रान्त घरों की महिलाएँ आती थीं।

एक महिला सत्संग में ऐसी भी आने लगी जो वेश्या के रूप में कुख्यात थी। इस पर अन्य महिलाएँ नाक-भौं सिकोड़ने लगीं और उसे न आने देने के लिए माताजी से आग्रह करने लगीं।

इस पर माताजी ने कहा-सत्संग गंगा है, वह मछली, मेढ़कों के रहने पर भी अशुद्ध नहीं होती। तनिक-सी मलिनता में ही जो अशुद्ध हो जाय वह गंगा कैसी? तुम लोग सत्संग की शक्ति पहचानो और उसे गंगा के समतुल्य मानो।


बनाने वाले के हाथ

“ तू बनाकर भी व्यर्थ करता है। अपने ही निर्माण को कुचल देने में तुझे आनन्द आता है?” इन वाक्यों के साथ भाव के अतिरेक में कभी उसके नेत्र छलक उठते, कभी उसके नेत्र छलक उठते, कभी हलकी-सी मुसकान चेहरे पर बिखर जाती। कोई नहीं जानता वह कौन है? पता नहीं कैसे वह यहाँ आया। गाँव के लोग जब एक सवेरे सोकर उठे , उन्होंने देखा कि उनके गाँव की गलियों में कही से एक नया व्यक्ति आ गया है। गौर वर्ण, लम्बी आँखें, ऊँची नुकीली नासिका, उन्नत ललाट, इकहरा शरीर। सम्भवतः किसी उच्चकुल का है, सम्भवतः अत्यन्त पढ़ा-लिखा विद्वान है। सम्भवतः इसलिए कि केवल अनुमान ही किया जा सकता है।

उसके वस्त्र फटे और मैले होकर भी बताते हैं, वे कभी स्वच्छ थे, सुन्दर थे, मूल्यवान थे। उसके केश उलझे होकर भी कहते हैं, वे कभी सुलझे और सुसज्जित थे, सुगन्धित तैल से सिंचित होते थे। उसकी भाव-भंगिमा, उसकी चाल-ढाल, उसकी दृष्टि कहती थी , वह कभी सम्मान पाता था, सत्कृत होता था। लेकिन वह कुछ बोलता नहीं किसी से। कुछ पूछने पर प्रश्नकर्ता के मुख की ओर घूरने लगता और फिर या तो ठहाका मारकर हँसने लगता है। यदा-कदा उसके चेहरे पर हलकी सी स्मित अथवा नेत्रों में आँसू भी छलक पड़ते। लोग उसकी ओर बड़ी तरस भरी दृष्टि से देखते हुए कहते-बेचारा पागल है।

गाँव के दयालु लोग-वे लोग उसे स्नेहपूर्वक रूखी-सूखी रोटियाँ खिला देते हैं। उसे यदा-कदा एकाध वस्त्र मिल जाते हैं। जाड़े के दिन हैं। रात्रि में वह किसी न किसी अलाव के पास लुढ़क जाता है।

बड़ा रमणीक गाँव है। नहर का पानी सींचता है यहाँ के खेतों को और इन खेतों में गेहूँ, चना नहीं होता। जहाँ के खेत तो खेत नहीं, बगीचे हैं। जहाँ तक नजर जाय पाटल के पौधे लहरा रहे हैं। गुलाब की खेती होती है यहाँ। इत्र बनने के लिए यहाँ से गुलाब के फूल अन्यत्र जाते हैं। जब पुष्प का समय होता है, मीलों तक खिले गुलाब के पुष्पों से मण्डित धरती की शोभा-जो यहाँ आया नहीं-जिसने इस क्षेत्र को देखा नहीं, वह यहाँ के सौंदर्य का अनुमान तक नहीं कर सकता।

मोगरा, चमेली और दूसरे पुष्पों के भी पौधे जहाँ-तहाँ हैं। जल ही जगत का जीवन है। जहाँ जल की पर्याप्त सुविधा है, जीवन अपने अनेक रूपों में प्रस्फुटित, पल्लवित, प्रफुल्लित होगा ही। छोटे-छोटे उपवन हैं। सघन तरु हैं; किन्तु यह तो सब विनोद है, विलास है, उस भूमि का, वहाँ के निवासियों का। वहाँ का जीवन तो है गुलाब और उसका साम्राज्य है वहाँ।

जाड़े के दिन, कठोर शीत, सम्पूर्ण प्रकृति ही तो इस शिशिर में ठिठुर जाती है। गुलाब के पौधों में कलियाँ तो आजकल भी आती हैं किन्तु इस मीलों लम्बी-चौड़ी हरीतिमा में अपनी सुरभि-प्रसारित कर सके। अपने सौंदर्य से लोक-लोचनों को आहृद दे पाये। अपने पराग से भ्रमरों की मूंछें पीताभ बनाकर मुस्करा सके, कदाचित ही किसी एकाध कलिका को ही यह सौभाग्य मिलता है। कोई ही कलका पुष्प बन पाती है। कठोर शीत-बेचारी कलियों का बाहरी पर्दा झुलस जाता है। उसकी पाटल द्युति कालिमा से कलुष हो जाती है। जैसे शीत के भय से कलिका सिकुड़ी-ठिठुरी पड़ी रह जाती है और जब जीवन विकसित न हो पाये-सूख ही तो जाएगा वह।

देवता! तू देवता है न? इसे सार्थक कर दे तब । उस पागल को एक ही सनक है, वह सर्दी से ठिठुरी-मुर्झायी ढेर-सी कलियाँ तोड़ लेता है और शंकरजी की पिण्डी पर चढ़ा आता है। तोड़ता है और चढ़ाता है, दिन में कितनी ही बार ? कोई संख्या नहीं। कोई क्रम नहीं। आखिर वह पागल जो ठहरा।

शिवलिंग पर गुलाब की सूखी, मुरझायी कलियाँ चढ़ाकर वह चुप-चाप बैठा हुआ न जाने किन-किन भावों में खोया रहता है। यदा-कदा उसके मुख से अस्फुट शब्द भी सुनायी पड़ते हैं, देव तू तो महाकाल है, कालचक्र को अपने इशारे से नचाने वाला। न जाने कौन-सी मिट्टी कब किस खिलौने का रूप धारण कर लेगी-इसे तेरे सिवा और कौन जानता है। निर्माता तो तू ही है- जीवन का जगत का, जीवन और जगत के विभिन्न रूपों का। खिलौने टूटकर मिट्टी में बदलते हैं, मिट्टी फिर खिलौने में बदल जाती है। उसके इस अस्फुट शब्दों का कोई अन्त नहीं।

यह तो पाटल की भूमि है। इस शिशिर में भी प्रफुल्लित सौ-दो-सौ पुष्प यहीं नहीं मिलेंगे, ऐसी तो कोई बात नहीं है लेकिन वह पागल है न। उसकी दृष्टि जैसे पुष्पों को देखती ही नहीं। वह तो कलियाँ तोड़ता है, चुन-चुन कर मुरझाई, सूखी-सी कलियाँ और फिर उन्हें देवता पर चढ़ा आता है।

“अपने ही निर्माण को कुचल देने में तुझे आनन्द आता है ?” कभी-कभी वह किसी बड़ी-सी कली को तोड़ लेता है। गुलाबी पंखुड़ियाँ शीत से सूखकर पीताभ हो गयी होती है, कुछ कालिमा आ गयी होती है, कली अपने ही उस अवगुण्ठन में दृढ़ता से आबद्ध हो गयी होती है और वह उसे इस प्रकार देखता है जैसे कोई गूढ़ रहस्य ढूँढ़ता हो।

सौंदर्य , सौरभ, सौकुमार्य का यह निर्माण और फिर उसे आबद्ध करके व्यर्थ बना देना। अनेक बार वह आकाश की ओर बड़ी रहस्यमयी दृष्टि से देखता है। देखते-देखते उसके नेत्रों पर भाव तैरने लगते हैं।

शायद उसे किसी रहस्य की खोज है। सम्भवतः अपने जीवन के रहस्य की खोज। भविष्य की ओर झाँकते नयन-वर्तमान की यवनिका उठाकर अतीत में रहस्य के सूत्र खोजने लगते हैं। बड़ी-बड़ी आशाएँ थीं उसके पिता भगवती प्रसाद जी को उससे। आखिर वह उनका एकमात्र पुत्र जो था। जगदीश, हाँ तब यही नाम था उसका। इस पर सभी पारिवारिकजनों की आशाएँ टिकी हुई थीं। पिता के स्नेह के साथ सृष्टिकर्ता का भी उसे भरपूर स्नेह मिला है। सुन्दर-सुगठित देह है, जन्मजात प्रतिभा है और सम्पन्न घर मिला है। अनेक बार उसे देखकर उसके पिता मन ही मन कह उठते हैं।

‘शुचीनाँ श्रीमताँ गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।’

ब्राह्मण का यह पवित्र कुल और भगवती प्रसाद जी को तो भगवान शंकर की भक्ति पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुई है। जगदीश शैशव में ही मातृहीन हो गया यह ठीक है, किन्तु पिता ने उसे कभी माता के अभाव का अनुभव नहीं होने दिया। पुत्र का लालन-पालन और शिक्षा एक अच्छे सम्पन्न जमींदार के एकमात्र पुत्र के उपयुक्त हो, जगदीश को यह सब प्राप्त हुआ।

बचपन में जब जगदीश भस्म का त्रिपुण्ड लगाकर भगवान शंकर को मस्तक झुकाना था, जल-पुष्पादि चढ़ाकर उस गौर सुन्दर शिशु की शोभा देखने ही योग्य होती थी। अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त करके, ग्रेजुएट होकर भी वह वैसा ही आस्तिक, वैसा ही सुशील, वैसा ही विनम्र बना रहा। वह दोनों समय सन्ध्या करता है, बड़ी-सी चोटी रखता है, भस्म का त्रिपुण्ड लगाता है। जमींदार का पुत्र होकर, उच्च शिक्षा पाकर भी ग्राम के ........................ कहे जाने वाले लोगों से ...............................जाने में , उनसे दादा-चाचा कहकर बात करने में, उनकी सेवा-सहायता करने में उसे कभी हिचक नहीं होती।

गाँव के लोग भगवती प्रसाद जी को देवता कहते हैं उनकी कोठी गाँव के पीड़ितों का, रोगियों का आश्रय है। ............................ की दरिया, बड़े बर्तन गैस आदि सामग्री तो जैसे सार्वजनिक सामग्री है। किसी के यहाँ कथा-कीर्तन, ब्याह या दूसरा कोई उत्सव हो तो वह उन सामग्रियों का बड़ी सरलता से उपयोग करता है। लेकिन जगदीश भैया तो गाँव के लोगों के आत्मीय हैं। अपने घर के हैं। वे कब किसके घर पहुँचकर बीमार की खोज-खबर करने लगें। किसके दर्द करते मस्तिष्क पर औषधि मल दें, किसके रोते बालक की मुट्ठी में पैसे धर देंगे इसकी कहाँ तक कोई गणना कर सकता है। वे तो दया, सहानुभूति, सेवा और आत्मीयता की मूर्ति ही हैं।

जगदीश प्रतिभाशाली है। शिक्षा के समय वह कक्षा में सदा प्रथम रहा है। परीक्षा में विश्वविद्यालय में प्रथम रहा है। सरकार ने उसे पुरस्कृत किया है। पिता नहीं चाहते कि वह शिक्षा के लिए विदेश जाय और विदेश जाने की उसकी अपनी भी रुचि नहीं है। उसके घर कमी किस बात की है कि वह नौकरी करेगा।

जगदीश के मन में उच्च अभिलाषाएँ हैं और ये उचित भी हैं। वह प्रतिभा सम्पन्न है। कालेज के व्याख्यानों में वह सदा प्रशंसित होता रहा है। उसकी कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में आदरपूर्वक छापी जाती हैं। वह यशस्वी होना चाहता है और कोई कारण नहीं कि उसे यश न मिले। एक सुप्रसिद्ध पत्रिका के संचालकों ने उसे आमंत्रित किया है-पत्रिका का सम्पादन करने के लिए। पिता ने अनुमति दे दी है। वह जाएगा-परसों यात्रा करेगा। चला तो वह दस दिन पहले जाता; किन्तु एक महाकाव्य लिखने में लगा था वह पिछले वर्ष से । उसके महाकाव्य के अनेक अंश पत्रिका में छप चुके हैं। जिसने भी उसे सुना है, भूरि-भूरि प्रशंसा की है। आज अपना महाकाव्य उसने पूरा कर लिया है।

भगवती प्रसाद जी को अपने पुत्र से बहुत आशाएँ हैं। उनका पुत्र यशस्वी होगा। उनके कुल का गौरव बढ़ाएगा। जगदीश को अपने महाकाव्य से बहुत आशाएँ हैं। चार दिन बाद वह एक श्रेष्ठ पत्रिका का सम्पादक होगा, उसका महाकाव्य छपेगा। उस महाकाव्य पर मंगला प्रसाद पारितोषिक मिलेगा। जगदीश हिंदी संसार में सबसे कम अवस्था का सबसे अधिक प्रख्यात पुरुष होगा।

भगवती प्रसाद की आशाएं, गाँव के लोगों की आशाएं, जगदीश की आशाएं-स्रष्टा ने सबको सुयोग दिया। किन्तु स्रष्टा सुयोग देकर सफल ही होने देगा, यह कहाँ निश्चित रहता है। बलिया सदा से बाढ़ पीड़ित क्षेत्र है और गंगाजी की यह बाढ़-ऐसी भयंकर बाढ़ की तो कोई कल्पना ही नहीं कर सकता था। इस प्रकार अचानक कहीं बाढ़ आया करती है। कहते हैं कहीं कोई पर्वत टूटकर गिर गया था। गंगाजी का या उनकी किसी सहायक धारा का प्रवाह रुक गया था। जब धारा के वेग से गिरे पर्वत का बाँध टूटा, किनारे के नगर एवं ग्रामों में प्रलय आ गयी।

कितने ग्राम बहे, कितने मनुष्य या पशु मरे, कितनी हानि हुई यह कोई कैसे अनुमान करे। सरकारी कर्मचारी इधर-उधर दौड़-धूप कर रहे थे। जहाँ गाँव थे, समुद्र के समान वहाँ जल लहरा रहा था। उस प्रखर धारा में सर्वत्र एक बार घूम आना भी सरकारी नौकाओं के लिए शक्य नहीं था। जो गए, वे तो गए ही। जो बच गए थे, उनको बचाए रखने की चिन्ता कम बड़ी नहीं थी। स्थान, अन्न, वस्त्र, औषधि सहस्र-सहस्र लोगों के लिए दो चार दिनों में इनका प्रबन्ध कर लेना क्या कुछ हँसी-खेल है।

भगवती प्रसाद जी, जगदीश, उनका ग्राम-सरकारी कागजों में यह लिख दिया गया है कि गंगा की बाढ़ ने उस किनारे के ग्राम को पूरा ही बहा दिया। अब तो वहाँ गंगाजी ने अपना नवीन प्रवाह बना लिया है। क्या हुआ ग्राम का, ग्राम के लोगों का, भगवती प्रसाद जी का, जगदीश का कौन जानता है। उस बाढ़ के प्रलय प्रवाह में व्यक्तियों की खोज क्या रह सकती है?

जगदीश उस बाढ़ के प्रलय प्रवाह में भी बच गया। प्रारब्ध प्रबल था, किसी झोंपड़ी का बहता छप्पर हाथ आ गया था। बहुत दूर जाकर उसे मल्लाहों ने निकाल लिया। दुर्बलता, अनाहार, ज्वर, शोक-बेचारा जगदीश-ऐसी अवस्था में आ पहुँचा। वह कहाँ-कहाँ किस प्रकार भटकता यहाँ पहुँचा है, यह उसे भी स्मरण नहीं है।

खूब बड़ा-सा सुन्दर, सुरंग पुष्प खिला था। इस शिशिर में इतना बड़ा, इतना मोहक पुष्प-जगदीश कभी पुष्पों की ओर ध्यान नहीं देता। किन्तु इस लम्बे-चौड़े खेत में वह एकाकी पुष्प और इतना बड़ा। गाँव में आजकल नगर से एक युवक आया है। लम्बे घुँघराले बालों में सुगन्धित तैल लगाए वह प्रायः घूमता रहता है। उसका वेश, उसके वस्त्र, उसकी चाल-कोई कवि होगा। पता नहीं क्यों जगदीश जब उसे देखता है देखता ही रहता है और फिर हँस देता है। वह युवक भी घूमने आया है। वह उस पुष्प के पास खड़ा है, बड़े स्नेह से पुष्प को देख रहा है, बहुत सम्भव है कि उसका पुष्प को इस प्रकार देखना ही जगदीश की दृष्टि पुष्प की ओर खींच सका हो।

जगदीश उस युवक को देखता है और पुष्प को देखता है, वह आज कलियाँ तोड़ना भूल गया है। युवक पुष्प को तल्लीनता से देख रहा है। इधर खड़े होकर कुछ गुनगुना कर वह पुष्प को देखे जा रहा है। कितना सौंदर्य प्रेमी है यह। कितना स्नेह है इसका पुष्प से। जगदीश उसे चुपचाप देख रहा है।

युवक ने अपनी सुकोमल पतली अंगुली से फूल की टहनी हिला दी। पुष्प झूम उठा। युवक देखता रहा। अब उसने पुष्प की पंखुड़ियाँ धीरे से स्पर्श कीं। दो क्षण और-और-और-अरे युवक ने पुष्प को तोड़ लिया। तोड़कर नेत्रों से लगाया, कपोलों पर फिराया और पुष्प को लिए चल पड़ा। चल पड़ा उसके पीछे-पीछे वह भी।

युवक ने पुष्प को अपने कोट की जेब में रखा, फिर निकाला, फिर रखा बार-बार सूँघा, बार-बार घुमाया और यह क्या ? वह पुष्प की एक-एक पंखुड़ी नोंचता भूमि में गिराता चला जा रहा है। अपने गुनगुनाने में मस्त चला जा रहा है। पुष्प के प्रति उसका कुछ स्नेह भी था, यह जैसे उसे स्मरण भी नहीं। पागल जगदीश चीख पड़ा और भागा-भागा वह उलटे पैर सीधे उस शंकरजी की पिण्डी के पास पहुँचा, जहाँ उसने आज सबेरे से अंजलि भर-भर कर मुरझायी कलियाँ चढ़ाई थीं।

देवता! तू देवता है। तू ठीक करता है। ये कलियाँ धन्य हैं। ये सफल हैं। ये पुष्प बनती तो इन्हें भी कोई तोड़कर बिखेर देता। इनकी पंखुड़ियाँ भी कोई पैरों से कुचल देता। कहते-कहते उसके नेत्रों से आँसू की धाराएँ झरने लगीं। वह अपने अश्रुप्रवाह से भगवान महाकाल का अभिषेक करने लगा। जगत का प्यार जिस पर उमड़ता है, उसे कुचल देता है, नष्ट कर देता है। जगत कृतघ्न है। वह जिसे चाहता है, चूस लेता है।

जगदीश एक-एक कली को उठाता था, सिर से लगाता था और फिर भगवान शंकर की मूर्ति पर चढ़ा देता था। वह अपनी धुन में मस्त है, उसके जो मन में आती है, करता है। वह कहता जा रहा है- लेकिन हे प्रभु! तू सौंदर्य, सौरभ, सौकुमार्य देता क्यों है ? अपने आप में वह आबद्ध होकर कुचल उठे-उसमें घुटता रहे, ऐसा तू क्यों करता है ?

इसलिए कि मैं अन्तर में हूँ। अन्तर में स्थित मुझे ही अर्पित होकर जीवन सार्थक होता है, अनन्त होता है, धन्य होता है। जब कोई एकान्तनिष्ठा से विश्व के अधिदेवता को सम्बोधित करता है, वह पागल है या सचेत, इसका प्रश्न ही नहीं रह जाता। वह चिंतन उसे अपने चैतन्य के अनन्त प्रवाह से निश्चय ही आप्लुप्त कर देता है। उसे उस सर्वव्यापी को कोई हृदय की वाणी से सम्बोधित करे और उत्तर न मिले, यह तो कभी हुआ नहीं, हो सकता भी नहीं। जगदीश का अन्तर्यामी आज उसके लिए जाग गया है। वैसे तो वह नित्य जागरुक हैं। लेकिन आज वह जगदीश को उत्तर देने लगा है।

‘जो अपनी प्रतिभा, अपने सद्गुण, अपने ऐश्वर्य से जगत को तुष्ट करना चाहता है, वह बहिर्मुख होता है। जगत से उसे दो क्षण का स्नेह, कृत्रिम सुयश एवं सौहार्द्र मिलता है और वह नष्ट हो जाता है। जगत उसे चूस लेता है, नष्ट कर देता है।’ वह आज अपने अन्तर्यामी की दिव्य वाणी सुन रहा है। मैं जिस पर कृपा करता हूँ, उसे अन्तर्मुख बनाता हूँ,। उसे जगत के लोभी-लालची नेत्रों से बचाता हूँ। उसका सौरभ, उसके सद्गुण, उसके भाव अपने अन्तर में स्थिति मुझे समर्पित होते हैं। वह आनन्दमय हो जाता है। क्रीड़ा करता है।

‘राम कीन्ह चाहहि सोई होई।’

पगल जगदीश-लेकिन उसका नाम यहाँ कोई नहीं जानता। यहाँ तो वह केवल पागल कहा जाता है। अब वह रोते नहीं देखा जाता। वह रामायण की एक अर्द्धाली का आधा हिस्सा गुनगुनाया करता है और सदा-सर्वदा आनन्द में विभोर रहता है। खूब खुलकर हँसता है वह। उसकी हँसी में जीवन-बोध की सरगम गूँजती है।

‘तुम क्या गाते हो ?’ कोई भी उससे जब चाहें पूछ ले, उसका एक ही उत्तर है- “अरे रोना’-धोना मत! घबराना भी मत। राम जो करते हैं, बड़ा अच्छा करते हैं। वे हम सबका सदा मंगल ही करते हैं।”

गाँव के बाहर जो मन्दिर है, उस पर एक सन्त आए थे। बड़ी प्रसिद्धि थी उनकी। गजानन महाराज नाम था उनका। थे भी वे बड़े महान सन्त । उन्होंने उसे देखकर प्रणाम किया । बहुत देर तक उसके सामने विभोर खड़े रहे। लगता था दोनों में अन्दर ही अन्दर कुछ बात हुई। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह प्रसन्नता बिखरी हुई थीं। वे बड़े आदर भरे स्वर में गाँव वालों से बोले- धन्य हो तुम लोग, जो तुम्हारे यहाँ इतने बड़े सन्त, तत्वज्ञानी, परमहंस रहते हैं। गाँव के भोले लोग- गजानन महाराज की बात को सुनकर उसकी यथासम्भव सेवा करते हैं। उसे महात्मा मानते हैं। वह महात्मा है ? लेकिन वह महात्मा न हो तो महात्मा होगा कौन ? एक युवक जो लेखक था, जो सम्पादन बनने जा रहा था, सन्त बन गया, परम हो गया। बनाने वाले के हाथ बड़े समर्थ हैं, वह किसे कब क्या बना देगा।


स्वप्न के झरोखे से अंतःस्थिति की झाँकी

स्वप्न जीवन का अनिवार्य अंग है। जिस प्रकार जाग्रत स्थिति में मनुष्य अपनी समझ, मनःस्थिति और भावनाओं के अनुसार चित्र-विचित्र कामनाएँ करता रहता है। उसी प्रकार सुषुप्तावस्था में स्वप्न देखता रहता है। यों जागते हुए भी लोग अपनी कल्पनाओं के चित्र बनाने और उन्हें देखकर आनन्दित होते रहते हैं। मनोविज्ञान की प्रचलित मान्यता के अनुसार सपने आने का मुख्य उद्देश्य मन में दमित वासनाओं का और इच्छाओं की पूर्ति करना है। लेकिन अध्यात्म विज्ञान के अनुसार कई बार सपनों के माध्यम से अंतर्जगत की झाँकी से भी मिलती है और उस झाँकी से वह सब कुछ देखा, समझा जा सकता है जो गहन से गहन विश्लेषण और निदान परीक्षा द्वारा भी सम्भव नहीं है।

मनोविज्ञान के अनुसार यथार्थ जगत में अप्राप्त सुखों और सफलताओं का आनन्द उठाने के लिए स्वप्न प्रकृति की वरदान तुल्य अवस्था है। सोते समय जब कोई स्वप्न रहित निद्रा में कदाचित ही प्राप्त होती है। क्योंकि स्वप्न देखकर मनुष्य कई अनचाहे दबावों और तनावों से अनायास ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है। जीवन के कटु अनुभव, अवश परिस्थितियाँ तथा विक्षुब्ध कर देने वाली चिन्ताएँ स्वप्न के माध्यम से चेतन मन को पार कर अचेतन में जा डूबती हैं और मनुष्य पुनः सामान्य मनःस्थिति प्राप्त कर लेता है।

उदाहरण के लिए, किसी का अकारण ही अपमान कर दिया जाय तो इसमें अपमानित होने वाले का क्या वश हो सकता है ? अवश और निर्दोष होते हुए भी अपमान का दुःख और दबाव अनचाहे ही एकत्रित होते रहते हैं। यदि ये सभी दुःख और क्षोभ एकत्रित होते रहे तो मनुष्य के चित्त पर विषाद का इतना बोझ इकट्ठा हो सकता है कि उस बोझ के कारण मानसिक संतुलन ही लड़खड़ा जाय। स्वप्न ऐसी अप्रिय स्थितियों का समाधान कर उनकी स्मृति को विस्मृति की कूड़ेदानी में फेंक कर चलता है और मनुष्य के चित्त पर दुःख का कोई बड़ा बोझ नहीं बन पाता। जिससे कि चरमराकर उसके टूटने का भय खत्म हो जाता है।

इसके अतिरिक्त मनुष्य बहुत कुछ चाहता है। पर जितना चाहता है वह सब प्राप्त नहीं होता। उसमें से अधिकाँश उसकी सामर्थ्य के बाहर की बात होती है। फिर भी इच्छा पूरी न होने पर असंतोष तो रहता ही है। यह असंतोष बढ़ता ही रहे तो मनोविक्षिप्तता आ घेरती है। ऐसी अवस्था में संतुलन को टूटने से बचाने के लिए स्वप्नों में मनचाही उपलब्धियाँ और सुख प्रस्तुत हो जाता है।

विज्ञान और मनोविज्ञान के क्षेत्र में स्वप्नों को लेकर कई खोज हुई हैं। उनसे प्राप्त निष्कर्षों से अभी तक तो स्वप्नों के विश्लेषण द्वारा व्यक्ति पर पड़ने वाले या उसे अनुभव होने वाले व्यक्त-अव्यक्त दबावों का ही पता लगाया जाता था। लेकिन अब स्वप्नों के माध्यम से रोग निदान भी किया जाने लगा है। ऐसे-ऐसे रोगों का निदान स्वप्न विश्लेषण द्वारा सम्भव हो सका है, जिनके लक्षण चिकित्सा उपकरणों की पकड़ में भी नहीं आते हैं।

26 वर्षों के प्रयोग, निरीक्षण और विश्लेषणों के पश्चात् रूस के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. कासाविकन ने प्रतिपादित किया है कि रोग लक्षण प्रकट होने से पूर्व ही स्वप्नों के माध्यम से अपने आगमन की सूचना दे देते हैं।

कुछ ही दिनों बाद यह स्थिति आने वाली है कि कोई स्वस्थ व्यक्ति स्वप्न विशेषज्ञ के पास जाकर अपने सपनों के बारे में बतायेगा और उस आधार पर विशेषज्ञ सतर्क कर देंगे कि अमुक रोग आपके शरीर में घुसपैठ कर रहा है।

इसी विषय पर शोध करने वाले एक दूसरे रूसी मनःचिकित्सक ने अपनी पुस्तक ‘स्वप्नों का वैज्ञानिक अध्ययन’ में लिखा है , व्यक्ति के भविष्य एवं उसके स्वास्थ्य सम्बंधी भावी सम्भावनाओं पर स्वप्नों के द्वारा काफी प्रकाश पड़ता है। इतना ही नहीं शरीर और मन से पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देने वाले व्यक्तियों के स्वप्न भी यह बता सकते हैं कि किन रोगों का आक्रमण होने वाला है।

सामान्य जीवन में अनागत घटनाओं पर स्वप्नों के माध्यम से पूर्वाभास होने के ढेरों प्रमाण बिखरे पड़े हैं। टीपू-सुल्तान के सपने, लिंकन द्वारा अपनी मृत्यु का पूर्वज्ञान, क्रैनेडी की हत्या का पूर्वाभास आदि तो प्रख्यात उदाहरण हैं। स्वप्नों के माध्यम से सुदूर स्थित अति आत्मीयजनों के साथ घटी दुःखद घटनाओं की जानकारी के विवरण भी मिलते हैं। परंतु रोग विवेचन के उदाहरण कुछ वर्ष पूर्व ही देखने में आये हैं।

फ्रायड के अनुसार जब मनुष्य मूल प्रवृत्ति की दृष्टि से स्वाभाविक इच्छाओं को नैतिक या अन्य तरह के दबावों के कारण पूरी नहीं कर पाता और उनका दमन कर देता है तो चेतन मन उन इच्छाओं को अचेतन मन में धकेल देता है। ये इच्छाएँ अचेतन मन स्वप्नों के माध्यम से उनकी पूर्ति करता है। फ्रायड के इस सिद्धाँत के तहत अनेकानेक मनोरोगों का विश्लेषण स्वप्न के माध्यम से संभव हो सका। रोगों की जड़ तन में नहीं मन में,यह सोचा जाने लगा, तो इस दिशा में किये गये प्रयासों से यह भी निष्कर्ष सामने आया कि रोगों का कारण मनुष्य के मन में दबी इच्छाएँ, दूषित संस्कार भी हो सकते हैं। डॉ. ब्राउन, डॉ. पीले, मैगडूगल, हैंडफील्ड और डा. जुँग आदि प्रसिद्धि मनःशास्त्रियों ने तो यहाँ तक कहा कि फोड़े-फुँसी से लेकर टी.बी. और कैंसर जैसी बीमारियों तक में प्रत्येक बीमारी का कारण कोई न कोई दमित इच्छा, अनैतिक कार्य या दूषित संस्कार है। मनुष्य बाहर से कैसा भी दिखाई दे या अपने को दिखाने का प्रयास करें, उसके बाहरी व्यक्तित्व और दमित इच्छाओं तथा दूषित संस्कारों में अनवरत एक द्वन्द्व चलता रहता है। यह अन्तर्द्वन्द्व ही रोग को जन्म देता है।

डॉ. स्टेकिल ने इस सिद्धाँत की पुष्टि में अपने कई रोगियों का उदाहरण प्रस्तुत किया है। कई चिकित्सकों के पास इलाज कराने और कोई लाभ न होने पर निराश होकर अस्थमा का एक रोगी डॉ. स्टेकिल के पास आया। उसने अपने रोग का पूरा इतिहास डॉक्टर को बता दिया। रोग और हुए उपचार का विवरण देखने के बाद रोगी से बातचीत करते हुए डॉ. स्टेकिल ने एक विचित्र बात देखी। रोगी के अनुसार उसे स्वप्न की एक विशेष स्थिति में, जब वह अपने आपको बकते हुए देखता था, तभी डरकर अचानक जाग उठता और उसकी साँस उखड़ने लगती।

डॉ. स्टेकिल ने सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से विश्वास जीत लिया और उस काँटे को उगलवा लिया, जो उस के मन में चुभ रहा था। विगत जीवन में एक बहके कदम से रोगी जो कुछ अनुचित कर बैठा था। उसकी स्मृति निरंतर रिसती रहती थी। डॉक्टर से अपने मन का पाप बता देने के बाद रोगी का चित्त कुछ हलका हुआ तो वह सपना भी आना बंद हो गया और धीरे-धीरे रोग भी जाता रहा।

आयुर्वेदिक आचार्य बाराहमिहिर ने कला प्रकाशिका में स्वप्नों के द्वारा त्रिदोष ज्ञान का सविस्तार विवेचन किया है। स्मरणीय है आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त और कफ ये त्रिदोष ही समस्त रोगों के मूल कारण हैं। ‘कला प्रकाशिका’ में उल्लेख आया है कि जो व्यक्ति स्वयं को स्वप्न में प्रायः घिरा हुआ या अग्नि और उससे संबंधित दृश्य देखता है, उसके शरीर में वात और पित्त का प्रभाव बढ़ा हुआ देखता है, इसी प्रकार रक्त वर्ण वस्तुएँ रक्त विकार की ज्वाला और पुष्प पित्त दोष अथवा श्लेष्मा के सूचक बताये गये हैं।

आचार्य सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता में लिखा है स्वप्न से केवल रोग निदान में ही सहायता नहीं मिलती वरन् रोगी मनुष्य के रोग की वृद्धि या सुधार का भी पता चलता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कुछ स्वप्नों के प्रकार भी दिये हैं जैसे प्रमेह तथा अतिसार के रोगी को यदि पानी पीने का स्वप्न दिखे तो निश्चय ही रोग बढ़ेगा। श्वास रोगी रास्ते में चलने या दौड़ने का स्वप्न देखे तो यह भी कष्ट वृद्धि का सूचक है।

महान् मानसशास्त्री डॉ. कार्ल जुँग का कहना है कि जब कोई स्वप्न बार-बार आता है तो निश्चित ही उसका सम्बन्ध मनुष्य के भावी जीवन से रहता है। ऐसे स्वप्नों की कभी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। वह पूर्वाभास भी हो सकता है और शरीर के स्वप्न द्वारा रोग दस्तक भी।

स्वप्नों की व्याख्या को लेकर विदेशों में भी कई पुस्तकें लिखी गई हैं। लेकिन इस विषय में अधिकाँशतः भविष्य सूचक स्वप्नों के द्वारा रोग निदान की विज्ञानसम्मत गवेषणाओं का अभी श्रीगणेश ही हुआ है। इस क्षेत्र में किये जा रहे प्रयासों और प्राप्त निष्कर्षों से बीस-पच्चीस वर्ष बाद रोगों के आगमन के पूर्व ही उनसे निपटने की सतर्कता बरतने के लिए आश्वस्त हुआ जा सकेगा। तब जानकार लोग उसे किसी साइकियाट्रिस्ट के पास जाने की सलाह दे सकेंगे। ठीक उसी तरह जैसे आज साँस उखड़ने और चक्कर आने पर डाक्टर के पास जाने की सलाह दी जाती है।

स्वप्नों के माध्यम से इस प्रकार अंतर शरीर और मन की यहाँ तक कि आत्मिक स्थिति की भी बहुत कुछ जानकारी मिल जाती है। सर्वविदित है कि मनुष्य के भीतर दैवी और आसुरी दोनों ही प्रवृत्तियाँ बसती हैं। मनुष्य के भीतर भगवान और शैतान दोनों ही विद्यमान हैं। किस का आधिपत्य है और कौन दुर्बल है? यह स्वप्नों के विश्लेषण द्वारा बड़ी सरलतापूर्वक जाना जा सकता है। कहने को भले ही कोई कहता रहे कि हम सपने नहीं देखते, स्वप्न रहित नींद लेते हैं। पर यह सत्य नहीं है। यह बात अलग है कि किसी को सपने याद नहीं रहते हों पर बिना स्वप्न की नींद कभी नहीं आतीं।

स्वप्नों की भाषा बहुत बेतुकी, असंगत और आधारहीन है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक संरचना भी भिन्न-भिन्न होती है। इसलिए स्वप्नों की व्याख्या के लिए कोई सर्वमान्य सिद्धाँत स्थिर नहीं किया ला सकता। परन्तु जिस दिन स्वप्नों की सटीक और सही व्याख्या संभव हो सकेगी, उस दिन मनुष्य के कई रहस्यों का पता लगाया जा सकेगा और वह उपलब्धि मनुष्य के लिए वरदान तुल्य सिद्ध होगी।


मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद (Kahani)

अमृतपान की अभिलाषा में उत्तुंग मुनि कठोर तप करने लगे। समयानुसार इन्द्र प्रकट हुए और वर माँगने के लिए कहने लगे । उत्तुंग ने अपना मनोरथ कह सुनाया।

इन्द्र यह कहकर अंतर्ध्यान हो गये कि-”जल्द ही आपका मनोरथ पूर्ण होगा। जो कमी है, उसे तब तक और पूरा कर लें।”

बहुत दिन बीत गए, उमंग तीर्थ प्रव्रज्या पर निकले। मरुभूमि का लम्बा क्षेत्र मार्ग में आ गया। पानी का कोई प्रबन्ध ही नहीं था। गला सूखने लगा। उद्विग्न होकर उत्तुंग एक पेड़ की छाया में लेट गये।

इतने में एक चाण्डाल सामने से आया। साथ में जल-पात्र था, बोला-”लीजिए, अपनी प्यास बुझा लीजिए।”

उत्तुंग चाण्डाल का जल पीने को सहमत न हुए। अनुरोध स्वीकृत होते न देखकर, वह वापस चला गया। किसी प्रकार उत्तुंग उस क्षेत्र से प्राण बचाकर निकले और त्रिवेणी तट पर पहुँच कर प्यास बुझा सके।

रात्रि को उन्होंने स्वप्न में इन्द्र को देखा। वे बोले-” उस दिन मैं चाण्डाल वेश में अमृत लाया था, आपने वापस कर दिया। अब यदि उसे पुनः प्राप्त करने की इच्छा हो, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद बुद्धि दूर करने के लिए दूसरा तप करें।”


कानून न्याय की आत्मा की हत्या न करे

व्यक्ति का समाज के प्रति और समाज का व्यक्ति के प्रति क्या कर्तव्य है ? उसकी मर्यादाओं का निर्धारण नीतिशास्त्र, नागरिकशास्त्र और समाजशास्त्र के अंतर्गत हो जाता है। प्राचीनकाल में इन्हीं का संक्षिप्त सार लेकर धर्मशास्त्र के व्यवहार पक्ष का निर्धारण हुआ था। मनुष्य की लिप्साएँ और लालसाएँ बहुधा अत्यन्त तीव्र हो उठती हैं और उस आवेश में यह भुला दिया जाता है कि उचित, अनुचित के भेद को ध्यान में रखकर ही स्वार्थों की पूर्ति की जानी चाहिए। इसी आवेश पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सदाचारपरक मर्यादाओं की स्थापना की गई है।

थामस एक्वीनास ने कहा था- ईश्वर की इच्छा के द्वारा संचालित संसार में शाश्वत नियम कार्य कर रहे हैं। कानून का, न्याय व्यवस्था का आधार इन्हीं नैतिक नियमों पर निर्धारित रहना चाहिए । विचारक गोटियस ने सार्वभौम एवं सर्वजनीय न्याय व्यवस्था को ही आदर्श माना है और कहा है कि उसका आधार ईश्वरीय निर्देश समझने वाले मानवी अंतःकरण के उच्च स्तर से निकले ‘प्राकृतिक नियम’ ही होने चाहिए।

योरोप में केल्सन और कोटलेर प्रभूति विचारकों ने इस बात को भी महत्व दिया कि उच्च आदर्शवादिता को आधार मानकर केवल सज्जनों के योग्य ............................ व्यवस्था बन सकती है। दुष्ट-दुष्टता वर्ग के लिए प्रतिशोधात्मक और .................................. कठोरता अपनाया जाना भी आवश्यक है।

...................... और ऐरिसाटाटिल ने ‘न्याय के आधार पर न्याय के सिद्धान्त’ पर काफी विस्तृत विवेचन किया है। वे प्राकृतिक न्याय ‘नेचुरल जस्टिस’ के सार्वभौमिक और प्रचलित न्याय ................................. जस्टिस’ के अंतर को बताते हुए कहते हैं कि प्राकृतिक न्याय के अनुसार जो किसी से उधार लिया गया है, उसे वापिस किया ही जाना चाहिए। किन्तु प्रचलित न्याय का सिद्धान्त यह है कि तीन या छह वर्ष बाद उस देनदारी से कानूनी छुटकारा मिल सकता है। प्राकृतिक न्याय शाश्वत है, उसे धर्म या नीति अथवा ईश्वर आज्ञा की संज्ञा दी जा सकती है किंतु प्रचलित न्याय सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाये जाते हैं और वे समय-समय पर बदलते रहते हैं।

ज्रिस प्रूडेन्स के मर्मवेत्ता सालमंड और पोलक ने अपराध की परिभाषा में एक कड़ी और जोड़ी कि मात्र दूसरों को हानि पहुँचाना ही नहीं, अपने कर्त्तव्यों की उपेक्षा करके समाज की व्यवस्था और विकासक्रम में बाधा पहुँचाना भी कानून की धाराओं में सम्मिलित कर लिया गया।

श्रोनेरिस का कथन है कि कानूनों का पालन मात्र आतंक या राज्य आज्ञा से ही नहीं हो सकता, उसे वास्तविक मान्यता तभी मिलती है जब जनता उसे उचित समझती और पसंद करती है। वे कहते हैं- “कानून ही न्याय हो ऐसी बात नहीं, रक्षा के लिए कानून के अस्त्र का प्रयोग किसी न किसी रूप में करना ही पड़ेगा।”

ऐसे प्रसंग भी आते हैं जब लोग व्यक्तिगत कर्तव्य उत्तरदायित्वों की आशा करके ऐसे कर्म करते हैं, जिनसे दूसरों के उचित अधिकारों का हरण होता है एवं सामाजिक अव्यवस्था फैलती है। इस प्रकार की उच्छृंखलता का निरोध नियंत्रण आवश्यक हो जाता है। यदि उन दुराचरणों की ऐसे ही उपेक्षा की जाय तो अपराधी तत्व अपना मार्ग निर्बाध पाकर और भी अधिक दुस्साहस करने पर उतारू हो जाते हैं। इसलिए समाज की अन्य व्यवस्थाओं के साथ-साथ अपराध नियंत्रण भी एक आवश्यक माना गया है। राजसत्ता द्वारा ऐसी व्यवस्था बनाई गई है कि मर्यादाओं का उल्लंघन करके अनाचरण करने वालों को अपराधी ठहराया जाय। उन्हें पुलिस पकड़े, न्यायालय विचार करे और दण्ड विधान करके उनको समाज की नाराजगी से अवगत कराये और दूसरों को अवगत कराये कि किसी का अनाचरण समाज को सहज स्वीकार नहीं। उसे सार्वजनिक तिरस्कार का कष्टसाध्य दण्ड प्रताड़ना का भागी बनना ही पड़ेगा। फलस्वरूप यह सर्वसाधारण की दृष्टि से अवाँछनीय व्यक्ति ही गिना जाएगा और लोगों के विश्वास के अभाव में पग-पग पर जन असहयोग अनुभव करके अपने प्रगति पथ को अवरुद्ध अनुभव करेगा। समाज इतनी प्रताड़ना देता है। लोकजीवन को पहुँचाई गई क्षति का प्रतिशोध लेना हो तो उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।

आस्टिन ने कानून की पद्धतियों का वर्गीकरण करते हुए 1. मानसिक चेतना (साइकिक अवेयरनेस) 2. उद्देश्य (मोटिव) 3. मंशा (इंटेन्शन) को ध्यान में रखकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की बात कही है। घटना का बाह्य स्वरूप देखकर किसी नतीजे पर पहुँचने की जल्दबाजी न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं करती। आस्टिन ने ईश्वर के प्रति और स्वयं अपने प्रति कर्तव्य का पालन करने के लिए हर नागरिक को प्रतिबंधित माना है और सौंपे हुए अथवा स्वीकार किये कर्तव्यों की उपेक्षा-अवहेलना करना एवं लापरवाही बरतने को भी अपराधों की श्रेणी में ही गिना है।

दण्ड विधान के तीन सिद्धान्त हैं।

1-प्रतिबंधात्मक (प्रीवेन्टिल थ्यौरी)

2-सुधारात्मक (रिफारमोटिव थ्यौरी)

3-भय उत्पादक (डिटरेन्ट थ्यौरी)

प्रतिबंधात्मक थ्योरी के अंतर्गत दण्ड विधान संभावित अपराधी को, अपराध के लिए उद्यत होने से रोकता है। सुधारात्मक थ्योरी से अपराधी को समाज के अनुरूप ढलने के लिए अभ्यस्त एवं तत्पर बनाने का प्रयास किया जाता है। भय उत्पादक थ्योरी के अनुसार व्यक्ति के साथ निर्मम व्यवहार करके दूसरों को आतंकित करने का प्रयास किया जाता है ताकि और लोगों को वैसा करने की हिम्मत न पड़े । कानून में हृदय परिवर्तन के तत्व नहीं है। वह न्यूनतम नैतिकता के विरुद्ध आचरण करने भर के विरुद्ध है।

परम्पराओं पर स्वीकृति की मुहर लगा देने वाले ऐसे कानून भी कम प्रचलित नहीं हैं जिनका न्याय अथवा विवेक से कतई संबंध नहीं है। पुरुषों को कई स्त्रियों को उस प्रकार के अधिकार से वंचित करना, जाति या धर्म विशेष को अतिरिक्त सुविधाएँ देना, गुलाम प्रथा जैसी परिपाटियों को सहन करना, सामाजिक कुरीतियों की हानियाँ अनैतिकताएँ जैसी होने पर भी उन्हें पुराने ढर्रे के अनुकूल चलाने देना भले ही बहुसंख्यकों को अभीष्ट हो पर उससे न्यायतत्व की रक्षा नहीं होती। बहुसंख्यकों की अनुचित इच्छा को भी अल्पसंख्यक वहन करें, यह औचित्य नहीं। भले ही कानून में उस अवाँछनीयता को सहन या अस्वीकार किया गया हो।

दंड किसे, कितना, इस विधि व्यवस्था के अनुसार किया जाय, इसका दर्शनशास्त्र ‘जूरिस प्रूडेन्स’ कहलाता है। इस विधि-विधान के आधार पर अपराध के कारण, स्वरूप एवं परिस्थितियों पर विचार करके यह निर्धारण करना पड़ता है कि अपराध किस मनःस्थिति में, किस परिस्थिति में किया गया। यह विवेचन किये बिना मात्र अपराध का बाह्य स्वरूप देखकर भावावेश में हलके या कठोर दण्ड की व्यवस्था कर दी जाय तो यह व्यक्ति और समाज के प्रति अन्याय ही होगा। न्याय तो अपराधी को ही मिलना चाहिए। उसे उतना ही दण्ड मिलना चाहिए जितना कि वह अंतरंग और बहिरंग दृष्टि से भ्रष्ट हुआ है।

कानून पत्थर की लकीर नहीं है। क्रिया के बदले क्रिया प्रस्तुत कर देना न्याय की विडंबना भर है। कोई समय था जब चोरी करने वाले के हाथ काट दिये जाते थे, राजद्रोह में मृत्यु दंड दिया जाता है। व्याभिचारी की आँखें फोड़ दी जाती थीं। खून का बदला खून के रूप में लिया जाता था। दंड व्यवस्थाएँ अत्यंत निर्मम होती थीं। कोड़े मार कर चमड़ी उखाड़ देने से लेकर, मल द्वार में कील ठूँसकर कुत्तों से माँस नुचवाने की, तड़पा-तड़पा कर देर में मारने वाले नृशंस दण्ड प्रक्रियाओं का प्रचलन था। शासन के अतिरिक्त व्यक्ति भी अपना बदला चुकाने में स्वतंत्र थे। इसमें राज्य कुछ विशेष हस्तक्षेप न करता था। उस जमाने में कानून थे तो पर उनमें क्रिया के बदले क्रिया कर ही सिद्धान्त काम करता था। अपराधी ने किन परिस्थितियों में वह अपराध किया, इसका विचार नहीं किया जाता था। उन दिनों प्रायः शासकों और पुरोहितों की इच्छा ही ‘कानून’ थी। वे चाहे जिस अपराध पर चाहे जो दृष्टिकोण अपना लेने में प्रायः स्वतन्त्र जैसे ही थे। ऐसी दशा में न्याय का बाह्य स्वरूप जो भी दीखता हो-उसके आतंक से लोगों को आतंकित कितना ही कर दिया जाता हो, पर उस तत्व की रक्षा नहीं होती थी जिसे ‘न्याय की आत्मा’ कहना चाहिए और जिसे प्राप्त कर सकना स्वस्थ समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए उपलब्ध होना ही चाहिए। विधि विज्ञान ‘जूरिस प्रूडेन्स’ इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। सालमंड कानून का औपचारिक उद्गम स्थल राज्य के संकल्पित निश्चय (विल आव दी स्टेट) को मानते हैं और उसे नागरिकों द्वारा शिरोधार्य करने का परामर्श देते हैं, पर यह तभी संभव है जब वह संकल्पित निश्चय वस्तुतः ‘राष्ट्र’ का हो। आज तो प्रजातंत्र के नाम पर वस्तुतः अल्पसंख्यकों की सरकारें बनी होती हैं। अनेक छल-छद्म अपनाकर एक छोटा गुट किसी प्रकार चुनाव जीत लेता है और सत्ता पर अधिकार जमा लेता है। ऐसी दशा में उसके बनाये हुए कानून किस प्रकार राष्ट्र की आत्मा का संकल्प मान लिये जाएँ ? और यदि वे अनुचित हैं तो कैसे जनमानस उनके सामने नतमस्तक हो जाय? अधिनायकों, राजवंशियों तथा सैनिकों द्वारा हथियायी निरंकुश सत्ता को तो राष्ट्र का संकल्प मानना और भी अधिक उपहासास्पद है, ऐसी दशा में उनकी इच्छानुसार बनाये गये कानूनों का पालन करने के लिए जनसाधारण को भले ही विवश किया जाय , उसे हृदयंगम या स्वीकार्य नहीं बनाया जा सकता है।

विधिशास्त्र-’टीलियोलाजिकल’ वर्ग के विचारक यह माँग करते हैं कि कानून बनाने के अधिकार राजसत्ता को नहीं वरन् इसके लिए निष्पक्ष और दूरदर्शी विचारकों की एक स्वतंत्र न्याय संस्था रहे। राजसत्ता पर आरुढ़ वर्ग अपने लोगों के लिए लाभदायक ऐसे कानून भी बना सकता है जो अनुचित एवं अन्याय युक्त हों। ‘पाउण्ड’ ने इस बात पर जोर दिया है कि न्याय को यदि ढकोसला ही न बनाये रहना हो तो उसकी वर्तमान परिधि को विस्तृत किया जाना चाहिए। न्यायाधीश को सत्ता निर्देश की कठपुतली मात्र रखने की अपेक्षा उसे विश्लेषणकर्ता और न्याय की आत्मा का संरक्षक बनने देना चाहिए। चुनाव जीतने वाले अथवा सत्तारूढ़ दल की इच्छा ही कानून बन जाय तो मानव की वह माँग पूरी न हो सकेगी, जिसके लिए कानून विज्ञान का सृजन हुआ है।

भूतकाल में प्रचलित परम्पराएँ ही कानून थीं। यह सोचने की जरूरत नहीं समझी जाती थी कि उस प्रथाओं एवं मान्यताओं में औचित्य का अंश कितना था। रोमन ला का ‘लेक्सटैलियानिस सिद्धान्त’ यह कहता था अपनी रक्षा आप करो। उसमें ‘जैसे को तैसा’ आधार की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि जितनी चोट तुम्हें लगी है, बस उतनी ही चोट तम आक्रमणकर्ता के ऊपर लगा सकते हो। योरोप में ऐसा भी कानून बहुत दिन तक रहा कि अभियोगी के परिवार को क्षतिपूर्ति का धन दिलाकर अपराधकर्ता को मुक्त कर दिया जाता था। नकली सिक्का बनाने वाले को उबलते पानी में डालकर मार डालने, किसी विवाहित स्त्री का चुँबन लेने पर होठ सील देने, कर्ज अदा न करने पर ऋणी को गुलाम की तरह बेचकर वसूली करने, राजकर्मचारियों के साथ अभद्रता करने वालों के अंग काट लिये जाते थे। उन दिनों की यह न्याय-व्यवस्था तब उचित समझी जाती थी। निहित स्वार्थों के समर्थन में तब ऐसा ही विधान सही माना जाता था पर आज वह रीति-नीति अनुचित लगती है। हो सकता है कि आज की विधि-व्यवस्था भविष्य में अनीति युक्त समझी जाय। साम्यवादी विचारक इसी प्रकार सोचते भी हैं। वे प्रचलित कानूनों को, निहित स्वार्थों को खुलकर खेलने की मान्यता देने वाली पद्धति भर मानते हैं। वर्तमान न्यायालय उनकी दृष्टि में न्याय की आत्मा से बहुत दूर है।

आधुनिक विधिवेत्ता सामान्य समझदारी, विवेक, प्राकृतिक न्याय, युक्ति तर्कवाद, सुविधाजनक वास्तविकता, सार्वजनिक-नीति, जनहित, मानवता आदि तथ्यों को ध्यान में रखकर न्याय’-सिद्धान्तों के निर्धारण पर बल देते हैं और इसकी सामयिक विवेचना का निर्णय राजसत्ता के हाथों सौंपते हैं। ‘जूरिस प्रूडेन्स आफ इंटेरेस्ट’ की संज्ञा इसी मान्यता को दी गई है। राज्य की प्रभुसत्ता सार्वजनिक हित के संरक्षण में विनिर्मित होनी चाहिए तभी वह विधि निर्धारण कर सकेगी अन्यथा डाकुओं के गिरोह की तरह यदि किसी वर्ग विशेष ने बलात् शासन तंत्र पर कब्जा कर लिया है तो उसके कानून न्यायालयों में प्रयुक्त होने पर भी न्याय की आत्मा का संरक्षण न कर कर सकेंगे। मानव अधिकारों के सार्वभौम शाश्वत स्वरूप की रक्षा की कानूनी व्यवस्था में समुचित सुरक्षा होनी ही चाहिए।

विचारक सैग्विनी कहते हैं किसी जमाने में मनुष्यों को खरीदने-बेचने की गुलाम प्रथा को कानूनी मान्यता प्राप्त थी। राजसत्ता ने उसके समर्थन में नियम बनाये थे और न्यायाधीश उसी आधार पर फैसले करते थे, इतने पर भी उनसे न्याय की आत्मा के साथ न्याय हुआ यह नहीं कहा जा सकता।

फंक्षनल स्कूल शैली के विचारक डीन पाउण्ड ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि न्यायाधीश की स्वतंत्र चेतना को बाधित न किया जाय। राजसत्ता उसे यह भी निर्णय करने दे कि अपराध करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली परिस्थितियों को भी दोषी ठहराया जाय और उन्हें भी निरस्त करने के लिए आवश्यक सुझाव अथवा आदेश दे सकने का भी न्यायाधीशों को अधिकार दिया जाय। जिस व्यवस्था में अधिक लोगों को अधिक सुख मिले, उसकी दृष्टि में कानून का लक्ष्य यही होना चाहिए।

आस्टीन ने कर्तव्य, अधिकार, हानि, दण्ड, अधिवाचना की व्याख्या करते हुए कानून सर्वदेशीय और सर्वकालीन तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया है पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। कोई कानून सर्वजनीय, सर्वकालीन, सर्वदेशीय एवं शाश्वत नहीं हो सकता, उसमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन होता है और होना चाहिए।

समाज में सुरक्षित जीवन, उचित व्यवस्था की स्थिरता एवं पारस्परिक विवादों के निपटारे के लिए कानून का विकास हुआ है पर देखना यह है कि मात्र अपराधी को दोषी-दण्डनीय मानकर अपराधों का निराकरण किया जा सकता है? क्या समाज व्यवस्था के दोष व्यक्ति को अपराध करने के लिए विवश या प्रोत्साहित नहीं करते? यह सामाजिक पक्ष जब तक विकृत बना रहेगा तब तक अपराधों की शृंखला भी गुप्त या प्रकट रूप से चलती ही रहेगी। विद्वान केल्सन ने इस बात पर खेद व्यक्त किया है कि न्यायतंत्र में न्यायाधीश एक याँत्रिक इकाई मात्र है। उसे राजसत्ता द्वारा निर्धारित निर्देशों को ही सब कुछ मानना पड़ता है और ‘न्याय प्रकृति’ की उपेक्षा करनी पड़ती है। नियम निर्धात्री राजसत्ता न तो निर्दोष होती है और न निर्भ्रान्त। दोषयुक्त कानूनों के आधार पर किसी ऐसे व्यक्ति को भी दण्ड दिया जा सकता है जो वस्तुतः अपराधी न हो अथवा उसे अपराध करने के लिए विवश किया गया हो।


मेहनत की कमाई का दर्द (Kahani)

एक सद्गृहस्थ लुहार था। श्रम और कुशलता से परिवार का पालन-पोषण भली प्रकार कर लेता था। उसके लड़के को अधिक खर्च करने की आदत पड़ने लगी। पिता ने पुत्र पर प्रतिबन्ध लगाया,कहा तुम अपने श्रम से चार चवन्नियाँ भी कमा कर ले आओ, तो तुम्हें खर्च दूँगा अन्यथा नहीं।

लड़के ने प्रयास किया, असफल रहा तो अपनी बचत की चार चवन्नियाँ लेकर पहुँचा। पिता भट्टी के पास बैठा था। उसने हाथ में लेकर चवन्नियाँ देखीं तथा कहा “यह तेरी कमाई हुई नहीं है।” यह कहकर उन्हें भट्टी में फेंक दिया। लड़का शर्मिन्दा होकर चला गया।

दूसरे दिन फिर कमाई की हिम्मत न पड़ी, तो माँ से चुपके से माँग कर ले गया। उस दिन भी वही हुआ तीसरे दिन कहीं से चुरा लाया। परंतु पिता को धोखा न दिया जा सका। वह हर बार मेहनत की कमाई नहीं कहकर उन्हें भट्टी में फेंकता रहा।

लड़के ने समझ लिया बिना कमाये बात नहीं बनेगी। दो दिन मेहनत करके वह किसी प्रकार चार चवन्नियाँ कमा लाया। पिता ने उन्हें देखकर भी वही बात दोहरायी तथा भट्टी में फेंकने लगा। लड़के ने चीख कर पिता का हाथ पकड़ लिया। बोला- क्या करते हैं पिताजी, मेरी मेहनत की कमाई इस बेदर्दी से भट्टी में मत फेंकिए।

पिता मुसकराया बोला-बेटा ! अब समझे मेहनत की कमाई का दर्द। जब तुम निरर्थक कामों में मेरी कमाई देते हो, तब मुझे भी ऐसी ही छटपटाहट होती है।

पुत्र की समझ में बात आ गयी, उसने दुरुपयोग न करने की कसम खायी और पिता का सहयोग करने लगा।


कलाकार की पहचान

बादशाह बेला बाग में अपने वजीर टोडरमल के साथ टहल रहे थे। जब कभी बादशाह किसी खास सोच में होते तो वह गुलाब कल कली तोड़कर सूँघने लगते। आज भी जब उन्होंने ऐसा किया तो उनका वजीर टोटरमल भाँप गया कि शहंशाह जरूर किसी खास उधेड़बुन में हैं। उसने झट पूछा- हुजूर अपने मन की बात बताएँ? शायद मैं आपकी मदद कर सकूँ।

वजीर की बात पर शहंशाह के चेहरे पर गहराई तनाव की लकीरें मिटने लगीं और हलकी-सी मुसकान के साथ संगमरमर के तख्त पर बैठ गए। उन्होंने कहा, “हाँ मैं यही सोच रहा था कि अपने पास सब कुछ है, पर एक अच्छा कलाकार नहीं है। सोचता हूँ, एक कलाकार का चुनाव करवा लूँ।”

“क्यों नहीं, क्यों नहीं, आप आज्ञा दें कलाकार का चुनाव फौरन हो जाएगा।” वजीर ने विनम्रता से जवाब दिया।

बादशाह जोर से हँसे फिर गम्भीर होकर बोले, “कलाकार का चुनाव मैं स्वयं करूंगा। मैं और किसी को यह जिम्मेदारी नहीं सौंपूँगा।”

बादशाह की यह बात टोडरमल को काँटे की तरह चुभ गयी। उसे लगा शायद उस पर से बादशाह का विश्वास उठ गया है। उसने कुछ न कहा। आज्ञा लेकर चुपचाप चला गया।

शीघ्र ही राज्यभर में कलाकार के चुनाव के लिए ढिंढोरा पिटवा दिया गया। शीघ्र ही देशभर के कलाकार अपनी-अपनी कलाकृतियाँ लेकर आने लगे। महल में कलाकारों का ताँता लग गया।

टोडरमल ने सब कलाकारों की कलाकृतियाँ महल के एक कमरे में रख दीं। फिर कलाकार विदा कर दिए गए, इसके बाद वजीर ने बादशाह के पास पहुँचकर उनसे कलाकृतियाँ देखने का आग्रह किया।

बादशाह महल के उस कमरे में जा पहुँचे, जहाँ सभी कलाकृतियाँ रखी गयी थीं। कलाकृतियों का इतना बड़ा ढेर देखकर वह म नहीं मन बड़े प्रसन्न हुए, उन्होंने कहा, अपने राज्य में इतने कलाकार हैं, यह मुझे मालुम ही न था। इतना कहकर वह कलाकृतियाँ देखने के लिए झुके।

नहीं हुजूर, आप बैठ जाएँ। मैं आपको कलाकार का एक-एक नमूना दिखाता जाऊँगा। वजीर के लहजे में विनम्रता का भाव था।

शहंशाह एक सिंहासन पर बैठ गये। वजीर ने कला के नमूने पेश करने शुरू किये, वह हर एक नमूने को देखने के साथ वाह-वाह करते जाते। हाथ में इन नमूनों को लेते-लेते उनके हाथ थक गये। टोडरमल ने यह बात ताड़ ली। वह बोला, “जनाब ए आला, अभी सिर्फ 436 कृतियाँ और हैं। कल-परसों देख लें।

शहंशाह को अपनी गलती महसूस हुई। बोले, नहीं टोडरमल वह मेरी गलती थी। कलाकार की परख तो तुम ही कर सकते हो और वह उठ खड़े हुए। बादशाह के जाने के बाद टोडरमल ने कला के सारे नमूने कलाकारों को लौटाने का आदेश दिया। उसने अगले दिन सब कलाकारों को महल में आने का निमन्त्रण दिया।

डसने कहा, ‘कलाकारों की परख एक दिन में निश्चित समय में उनकी बनाई रचना से होगी। बनाने का समय भी महल के सामने खाली पड़ी जमीन पर होगा। यह घोषणा सुनकर कई कलाकार मन ही मन चिढ़ गए। उधर टोडरमल ने कलाकारों की सुविधा के लिए रातों रात व्यवस्था करवाई। अगली सुबह वह स्वयं कलाकारों के स्वागत के लिए वहाँ पहुँचा।

पर राज्य में इतने कलाकार होने पर भी केवल तीन कलाकार ही चुनाव में भाग लेने आए। उसने उन तीनों कलाकारों का गर्मजोशी से स्वागत किया और पहले से तैयार किए हुए अलग-अलग तीन खेमों में उन्हें अपनी रचनाएँ तैयार करने का आदेश दिया। तीनों कलाकार दिनभर अपनी-अपनी रचनाएँ बनाने में लगे रहे। शाम को कलाकृतियाँ पूरी होने पर वे वजीर के पास गए। वजीर ने बादशाह तक खबर पहुँचाई तो वह उसी समय कलाकृतियाँ देखने आ गए।

पहला कलाकार बादशाह और वजीर को लेकर अपने खेमे में गया। खेमे में चौकी पर परदे से ढका एक चित्र रखा था। कलाकार ने चित्र पर ढका परदा हटाया। चमचमाते रंगों से सुशोभित बादशाह का चित्र सामने था। वजीर चुप रहा, पर बादशाह अपने चित्र की खूबसूरती पर मोहित हो गए।

बेमिसाल, लाजवाब, फनकार, शहंशाह चित्र उठाकर बाहर रोशनी में आ गए। धूप में चित्र के रंग और भी चमक उठे।

वजीर बादशाह को लेकर दूसरे कलाकार के खेमे में पहुँचा। दूसरा कलाकार खेमे के दरवाजे पर उनकी अगवानी के लिए खड़ा था- वह उन्हें लेकर खेमे में घुसा। घुसते ही बादशाह की नजर एक तरफ रखी मेज पर गई। चौकी पर तश्तरी में ताजे अंगूरों के दो गुच्छे रखे थे। सबकी दृष्टि एक साथ अंगूरों पर पड़ी। सबके मुँह में पानी आ गया। इतने बढ़िया अंगूर देखकर बादशाह लपककर बोले-क्या ये अंगूर हमारे लिए हैं कलाकार?

जी बादशाह सलामत।

बस बादशाह ने गुच्छे में से एक अंगूर का दाना तोड़ा और मुँह में डाल लिया, मुँह में डालते ही मिट्टी का अंगूर घुल गया। वह थू-थू करने लगे, पर मिट्टी थूकते हुए भी वह कलाकार की कलाकृति से बेहद प्रभावित थे।

अब तीसरे की बारी थी। तीसरा खेमा पेड़ों के झुरमुट की ओर था। उस ओर पहुँचते ही सबने देखा पेड़ों की आड़ में एक घायल शेर लेटा है। एकाएक सभी सहम गये। अभी वह आगे बढ़ते कि वजीर ने कुछ इशारा किया, सिपाही राजमहल के पालतू शेर को ले आए। पालते शेर एकबारगी गुर्राया और एक छलाँग में घायल शेर के पास पहुँच गया। लेकिन यह क्या वह तो घायल शेर के सिर पर अपना सिर टिकाकर आँसू बहा रहा था। बड़ा मार्मिक दृश्य था। सभी भावुक हो उठे।

बादशाह ने वजीर की ओर देखते हुए पूछा, यह शेर कैसे आया, उसका शिकार किसने किया? वजीर ने मुसकराते हुए तीसरे कलाकार की ओर इशारा किया। कलाकार विनम्रता से बोला- हुजूर यह घायल शेर मिट्टी का है। बस यह मार्मिक दृश्य एक कलाकृति है।

उसके इस कथन के साथ ही श्रेष्ठ कलाकार का चुनाव हो गया था। बादशाह ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा- श्रेष्ठ कलाकार वही है जो अपनी कला से संवेदनाओं को जाग्रत कर दे। उससे प्रेम, सहानुभूति, आत्मीयता पैदा करे। तुम्हारी कला ने शेर जैसे हिंस्र जानवर के मन में भी संवेदना जाग्रत कर दी। निश्चित ही तुम श्रेष्ठ कलाकार हो।


आखिर क्यों प्रकृति कुपित है?

पिछले दशक में संसार को प्राकृतिक प्रकोपों के बीच से अधिक गुजरना पड़ा है। सूखा, बाढ़, भूकम्प की घटनाओं में तीन-चार वर्षों से जितनी वृद्धि हुई है, उतना पहले कभी नहीं देखा गया। मौसम में इतना अप्रत्याशित परिवर्तन शायद ही कभी हुआ हो। वातावरण इतना असंतुलित हो गया है कि यह ठीक पता नहीं कि मौसम में कब क्या परिवर्तन हो जाय। कहीं ठण्ड बढ़ी है तो कहीं गर्मी, रेगिस्तान में बाढ़ आना एवं उपजाऊ भूमि वर्षा के बिना बंजर होना एक आश्चर्यजनक, अद्भुत एवं अप्रत्याशित घटना है। प्रकृति को इतना क्रुद्ध पहले कभी नहीं देखा गया है। मौसम की विचित्रता, प्राकृतिक असंतुलन को देखने से लगता है कि कहीं हम प्रलय काल के निकट तो नहीं हैं, जिसकी कल्पना प्रस्तुत करते हुए ऋषि कहते हैं-

यत्र तत्र भूस्खलनं च कदाचित् भूकम्पनम्। क्वचित् वृष्टिरनावृष्टिः जायते तस्मिन क्षणे। (मत्स्य पुराण)

उस समय सर्वत्र भूस्खलन और भूकम्प आते हैं। कहीं अतिवृष्टि और कहीं अनावृष्टि होती है।

तथ्य चाहे जो भी हो, प्रकृति के असंतुलन की बात से इनकार नहीं किया जा सकता। अप्रत्याशित प्रकृति प्रकोप यह सोचने को बाध्य करते हैं कि इस असंतुलन का कारण क्या है? दैवीय प्रकोप या मनुष्य की स्वयं विनिर्मित परिस्थितियाँ। अध्यात्म तत्वदर्शन के अनुसार इस प्रकार की प्रकृति प्रकोप को दैवी आक्रोश समझा सकता है और उसका कारण मनुष्य की उस संकीर्ण स्वार्थपरता को माना जा सकता है, जिसके कारण देवता रुष्ट होते हैं। ऐसे प्रसंग न आने पायें इसके लिए मनुष्यों और देवों के बीच परस्पर सद्भाव सम्पन्न आदान-प्रदान बना रहना चाहिए। यह कार्य यज्ञ परम्परा को प्रखर बनाये रहने से ही सम्पन्न हो सकता है। गीता का कथन है-

देवान्यातयत तेन ते देवा भावयन्तुः वः ।

तुम सब यज्ञीय कर्मों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करो। देवता प्रसन्न होकर अपने अनुग्रह की वर्षा करेंगे।

देवताओं को प्रसन्न रखने से अभिप्राय यहाँ प्रकृति को संतुलित एवं व्यवस्थित रखने से भी है। प्रकृति दैवीय शक्तियों की क्रीड़ा भूमि है। उसके अनुदानों से विश्व-वसुन्धरा पुष्पित, पल्लवित होती तथा समुन्नत बनती है। विभिन्न दैवीय शक्तियाँ ही अपना स्थूल परिचय प्रकृति की हलचल बनकर देती हैं। जिनका अलंकारिक वर्णन पौराणिक उपाख्यानों में आता है। इनमें वर्णन है कि देवता मनुष्य के सत्कर्मों से प्रसन्न होकर अनुदान बखेरते हैं। उन देवताओं के अनुग्रह को प्राप्त करने के लिए इन्हें प्रसन्न रखना होता है। प्रसन्न रखने का अभिप्राय यहाँ उन्हें प्रसाद-उपहार देने से नहीं है, न उनकी आवश्यकता ही देवी-देवताओं को है। वे शक्तियाँ मात्र अनुनय-विनय पर प्रसन्न नहीं होतीं। मानवी मर्यादा के नियमों पर चलना तथा आदर्शवादी परम्परा अपनाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।

बिजली प्राप्त करने के लिए धन-ऋण तारों को व्यवस्थित कर तार लाइन बनानी पड़ती है। उनका सम्बन्ध पावर हाउस से जोड़ना पड़ता है। विद्युत संचार की प्रक्रिया तब कहीं जाकर आरम्भ होती है और बल्ब में चमकती, पंखे में चलती तथा हीटर को गर्म करती देखी जाती है। इसे चाहे दैवीय अनुग्रह माना जाय अथवा नियम-मर्यादाओं के पालन का प्रतिफल।

प्रकृति के अनुग्रह को भी इसी प्रकार समझा जा सकता है। यह अनुदान उच्चस्तरीय नियम-व्यवस्था के अधीन चलते रहने से ही मिलता रहता है। जिस प्रकार बिजली के नंगे तारों के छूने वाले उनके प्रकोप के भाजन बनते, दुर्घटनाग्रस्त होकर मरते देखे जाते हैं, उसी प्रकार प्राकृतिक व्यवस्था में अवरोध पैदा करने वाले, उसके कोप का भाजन बनते हैं। चाहे उसे प्राकृतिक प्रकोप कहा जाय, चाहे मानवीय कृत्य अथवा दैवी आक्रोश।

प्रकृति के प्रकोपों में यह बढ़ोत्तरी कुछ वर्षों से ही आयी है। यह बढ़ोत्तरी विघातक अनुसंधानों, परमाणु परीक्षण के साथ बढ़ी है। औद्योगीकरण से प्रदूषण के संकट का अभी हल नहीं निकल पाया था कि परमाणु परीक्षण की विभीषिका भी आकर जुट गई। इस दोहरे प्रहार ने सारी प्राकृतिक व्यवस्था को ही चरमरा दिया।

न्यूटन का प्रतिपादन है- “प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। इस विपरीत प्रक्रिया के वेग एवं मात्रा में ही समानता नहीं होती, बल्कि उसके स्वरूप एवं प्रतिफल में भी एकरूपता होती है।”

अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे का बुरा सर्वविदित है। कहने को तो यह सिद्धाँत पुराना पड़ गया, किन्तु इसके पीछे तथ्य सनातन है। यह सिद्धान्त सृष्टि के कण-कण में कार्य कर रहा है। गेहूँ का बीज पृथ्वी में पड़कर असंख्य बीज रूप में फलित होता है। अच्छाइयाँ एवं बुराइयाँ अपने अनुरूप प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती हैं।

शास्त्रों में वर्णन है कि मनुष्य जितनी गंदगी फैलाता है, उसकी स्वच्छता के लिए तथा वातावरण को परिशोधित करने के लिए यज्ञ कृत्य करने चाहिए। यज्ञ देवता वातावरण को परिशोधित करते तथा संतुलित रखते हैं। उसके प्रभाव से ऋतुएँ समय पर आती हैं। संतुलित वातावरण मानवी सुख-समृद्धि का आधार बनता है। पौष्टिक अन्न, वनस्पतियाँ उपजाती हैं। मनुष्य स्वस्थ एवं नीरोग बनता है, यज्ञ प्रयोगों के सत्परिणामों से सभी परिचित हैं। अतीत में जब तक यज्ञ प्रक्रिया चलती रही प्रकृति का संतुलन बना रहा। कहते हैं कि भारत में कभी दूध-दही की नदियाँ बहती थीं। आध्यात्मिक की नहीं भौतिक अनुदानों से भी भारत ने विश्व मानव को तृप्त किया था। कालान्तर में यही प्रक्रिया बन्द हो गई। मनुष्य का भ्रष्ट चिंतन तथा दुष्ट कर्तृत्व वातावरण में ऐसे प्रदूषण भरने लगा, जो वायुमण्डल में बढ़ती जाने वाली विषाक्तता से भी अधिक भयंकर है।

निस्संदेह प्राकृतिक असंतुलन का दोषी मनुष्य स्वयं है। दोषारोपण चाहे भगवान पर किया जाय अथवा देवी-देवताओं पर, इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, परिणामों को तो भुगतना ही पड़ेगा।

इस प्राकृतिक प्रकोपों ने अपार सम्पत्ति को तो नष्ट किया ही, नरसंहार भी कम नहीं हुआ। समस्त प्राणियों को उसका श्राप सहना पड़ा। इस क्षति का लेखा-जोखा तैयार किया जाया तो प्रतीत होगा कि प्रकृति एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से लौटाने पर उतारू हो गई है।

भूकम्प, बाढ़, भूस्खलन जैसे प्राकृतिक प्रकोपों के कारणों पर भी विचार किया जाय तो इस संदर्भ में आँखें खोल देने वाले तथ्य सामने उपस्थित होते हैं। भूकम्प के बारे में ‘इलास्टिक रिवाइण्ड सिद्धान्त’ सर्वविदित है। इसके अनुसार अनेक स्थानों पर पृथ्वी काँपती है। जिससे टूट-फूट होती है। बड़ी−बड़ी अट्टालिकाएँ पलभर में धराशायी हो जाती हैं। वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार पृथ्वी एक गर्म पिघलता हुआ गोला है, जिसकी ऊपरी परत पर मिट्टी की एक हल्की एवं ठण्डी परत जमी है। कई स्थानों पर यह पपड़ी कमजोर है। बनावट में असमानता होने तथा असमान फैलाव-सिकुड़न के कारण पृथ्वी के भीतर स्थित चट्टानें कहीं-कहीं तनी हुई रहती हैं। जब तनाव किसी प्रकार बढ़ जाता है अथवा किसी बाहरी दबाव से झटका लगता है तब वे टूट जाती हैं। यही प्रक्रिया भूकम्प का कारण बनती है। पृथ्वी की यह पपड़ी जहाँ-जहाँ कमजोर है प्रायः भूकम्प का झटका वहीं महसूस किया जाता है।

परमाणु विस्फोट के समय उस स्थान की पृथ्वी में कम्पन होता है। यह कम्पन कमजोर एवं तनावपूर्ण चट्टानों को झटका देकर तोड़ देता है। यह आवश्यक नहीं कि जिस स्थान पर परमाणु परीक्षण हो रहा है वहीं की चट्टानें टूटे, बल्कि दूरवर्ती पृथ्वी की कमजोर चट्टानों को भी तोड़ सकती हैं। भूकम्प का झटका इन स्थानों पर महसूस किया जाता है।

अनेक स्थानों पर भूकम्प का झटका अनुभव होने का कारण है, भूकम्प से उठी कम्पन तरंगों का पृथ्वी के एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलना। ये तरंगें दो प्रकार की होती हैं। एक तरंग तो पृथ्वी के ऊपरी पृष्ठ से होकर चलती है, जिसे पृष्ठीय तरंग कहते हैं। दूसरी तरंग पृथ्वी के भीतर जाकर दो भागों में बँट जाती है। एक को एस तथा दूसरी को पी तरंगें कहते हैं। विभिन्न गति से चलती हुई ये तरंगें पृथ्वी के अधिक घने केन्द्रीय भाग से टकराकर लौटती हैं। जहाँ दोनों तरंगें एक-दूसरे को प्रबलित करती हैं, वहाँ भूकम्प का झटका तीव्र महसूस किया जाता है। वैज्ञानिकों का मत है कि कुछ समय पूर्व उत्तरकाशी के पास हुए भू-स्खलन एवं भूकम्प जिसके फलस्वरूप हिमालय की विशाल चट्टानें टूटकर गिर पड़ी थीं, के पीछे उपरोक्त प्रक्रिया ही कारण थी।

परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न होने वाली भूगर्भीय तरंगों से भूकम्पों की संख्या में अभिवृद्धि हुई है। अनुदान प्रक्रिया द्वारा ये तरंगें पृथ्वी की मजबूत चट्टानों को भी तोड़ने में समर्थ हैं। इनकी गति यदि पृथ्वी में चट्टानों की प्राकृतिक कम्पन के समान है, तो चट्टानों के टूटने की सम्भावना और भी बढ़ जाती है। रिजोनेन्स की शक्ति से हर कोई परिचित है। पुल पार करते हुए सिपाहियों के कदम मार्च को तोड़ दिया जाता है। एक साथ, एक गति, एक ताल के क्रम से ध्वनि के रिजोनेन्स से पुल टूटने की सम्भावना रहती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक स्थान के परमाणु परीक्षणों से किसी अन्य स्थान पर कभी भी, बहुत समय बाद भी भूकम्प आ सकता है।

समुद्री तूफानों के आने में भरी इस प्रकार के परीक्षणों की बात वैज्ञानिक स्वीकार करने लगे हैं। सामान्य लहरों की अपेक्षा कभी-कभी तो इन तूफानों में लहरों की ऊँचाई अप्रत्याशित रूप से डेढ़ सौ फीट तक पहुँच जाती है। इनका वेग दो सौ मील प्रति घण्टा तक देखा गया है। पिछले दिनों भयंकर समुद्री तूफान में उन लहरों की विनाशकारी शक्ति देखने में आयी। विश्वास किया जाता है समुद्री तूफानी लहरों का सम्बन्ध ज्वार लहरों से है। किन्तु वैज्ञानिकों का कहना है कि उन तूफानी लहरों का कारण पृथ्वी की सतह अथवा समुद्र के भीतर हुये भूकम्प भी होते हैं।

बाढ़ की घटनाओं में असामान्य वृद्धि कुछ वर्षों से देखी जा रही है। अभी पिछले वर्ष की भयंकर बाढ़ ने करोड़ों व्यक्तियों को बेघर कर दिया। असंख्य लोग मरे। न केवल भारत बल्कि अन्य देशों को भी भयंकर बाढ़ का सामना करना पड़ा है। बाढ़ के कारणों का पता लगाने पर जो तथ्य सामने आए हैं वे बताते हैं कि यह स्वयं मनुष्य की क्रियाएँ हैं, जो प्रतिक्रिया स्वरूप इस प्रकार की विभीषिकाएँ खड़ी करती है। सामान्यतया वर्षा की प्रक्रिया में समुद्र का पानी सूर्य की गर्मी से भाप बनकर उड़ता रहता है। वहीं ठण्डा होकर जल की बूँदों में बदल जाता है। इन्हीं बूँद समूहों को बादल कहते हैं। ये बूँदें हलकी होने के कारण पृथ्वी पर गिरने लगती हैं। यह वर्षा की सामान्य प्रक्रिया संतुलित रूप से चलती रहती है। असंतुलन की स्थिति तब बनती है जब वायुमण्डल में स्थित ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड आवेश युक्त हो जाती हैं। परमाणु परीक्षण से यही प्रक्रिया सम्पन्न होती है। विस्फोट से उत्पन्न रेडियोधर्मी पदार्थ ऊपर वायुमण्डल में जाकर ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड को आवेशित करते हैं। आयन की स्थिति में आने पर इन पर पानी की बूँदें अधिक जमा होने लगती है। बूँदों का अतिरिक्त जमाव अधिक वर्षा का कारण बनता है।

नदियों में आयी बाढ़ का एक कारण परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न अधिक ताप से पहाड़ों पर जमी बर्फ का पिघलना भी है। इसके साथ वर्षा का संयोग जुट जाने से स्थिति और भी संकट पूर्ण हो जाती है।

प्रकृति संतुलन बिगड़ता जा रहा है। परिणाम सामने है- विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक विक्षोभ। निस्संदेह वर्तमान संकटपूर्ण परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी मनुष्य स्वयं है। इस विषाक्तता के परिशोधन की व्यवस्था तो बनाई ही जानी चाहिए, नये परमाणु परीक्षणों पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए। भेदभावपूर्ण परमाणु परीक्षण संधि (सी0टी0बी0टी0) को किसी एक देश की तानाशाही को नकारते हुए व्यापक संधि हेतु विश्व जनमत का समर्थन लेना चाहिए। एक ओर तो परमाणु परीक्षण निरंतर जारी है और दूसरी ओर संधि प्रस्ताव का घड़ियाली आँसू बहाया जा रहा है। स्वार्थ नीति पर चलते हुए विश्व शाँति प्रयास की ओर नहीं जाया जा सकेगा। साथ ही अधिक उत्पादन के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा विशालकाय उद्योगों की स्थापना की होड़ सभी देशों में चल रही है। बड़े उद्योगों से उत्पादन तो बढ़ेगा किन्तु उनसे उत्पन्न होने वाली घातक विषाक्तता का यदि लेख-जोखा लिया जाय तो उत्पादन की अपेक्षा कहीं अधिक महँगा पड़ेगा। प्रदूषण की वृद्धि रोकने के लिए बड़ उद्योगों का कुटीर उद्योगों में परिवर्तन किया जाय। उससे उत्पादन में कमी हो सकती है॥ किन्तु दूरगामी परिणामों की दृष्टि से देखा जाय तो बड़े उद्योगों से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण जितनी क्षति पहुँचाते हैं, उसकी तुलना में यह हानि अत्यल्प होगी। वस्तुओं का उत्पादन कम हो ते भी गुजारा किया जा सकता है। आवश्यकताओं में कटौती करके काम चलाया जा सकता है, किन्तु उद्योगों के प्रदूषण की प्रतिक्रिया स्वरूप होने वाले प्राकृतिक विक्षोभों को सहन करना असह्य है।

वातावरण की विषाक्तता के परिशोधन में यह उपचार की सनातन परम्परा ही सफल हो सकती है। यज्ञीय-दर्शन को जनसामान्य के चिन्तन में उतारा जा सके तो सत्प्रवृत्तियों के विकास में असामान्य योगदान मिलेगा। चिंतन की भ्रष्टता एवं कर्तृत्व की निकृष्टता का परिष्कार भी इसी प्रकार संभव है। इस बात से कोई भी विचारशील इनकार नहीं कर सकता कि भ्रष्ट चिंतन एवं निकृष्ट कर्तृत्व वातावरण को इसी प्रकार दूषित कर रहे हैं, जिस प्रकार परमाणविक परीक्षण।

यज्ञ देवता की प्रतिष्ठापना इस युग की माँग है। सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्द्धन यज्ञीय प्रवृत्तियों के प्रसार से ही सम्भव है। वातावरण के संतुलन, परिशोधन तथा प्राकृतिक प्रकोपों के रोकथाम के लिए यज्ञानुष्ठान का प्रचलन व्यापक स्तर पर करना होगा।


दीनबन्धु ऐंड्रूज (Kahani)

दीनबन्धु ऐंड्रूज में विश्व−मानवता के प्रति प्रेमभावना, माँ की प्राणिमात्र के प्रति करुणा के कारण विकसित हुई थी।

“माँ देखना, मैं कितनी अच्छी चीज लाया हूँ।”

“अरे, यह क्या ले आया। यह तो किसी चिड़िया के अण्डे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि तू चिड़िया के तीनों अण्डे उठा लाया है। जब वह अपने घर लौटेगी, तो बहुत रोयेगी बेटा।”

“अच्छा माँ! यह चिड़िया के अण्डे हैं। मुझे क्या मालूम था?” वह बालक लंगड़ाते-लंगड़ाते उस पेड़ तक गया, क्योंकि चोट के कारण उसके पैर में दर्द हो रहा था। वह पेड़ पर चढ़ा और उसने सब अण्डे उसी घोंसले में रख दिये और पेड़ के नीचे बैठा तब तक रोता रहा, जब तक कि वह चिड़िया पेड़ पर न आ गयी। चिड़िया को देख कर, उसका सारा दर्द जाने कहाँ चला गया और हँसता-कूदता अपनी माँ के पास लौट आया। यह बालक और कोई नहीं, वरन् दीनबन्धु ऐंड्रूज थे, जो जीवनभर दीनों को अपना भाई समझकर प्यार करते रहे। माँ के दिये यह संस्कार जीवन भर उनकी अमूल्य थाती बन कर रहे।

काशी में अध्ययन कर देवदत्त शास्त्री लौटे, तो अपने यहाँ के नरेश के पास गये। उनसे प्रस्ताव रखा-मैं आपको गीता का भाष्य सुनाना चाहता हूँ। नरेश ने नम्रतापूर्वक कहा-”आप कृपया घर जाएँ। सात बार गीता और पढ़ें, फिर आयें। तब मैं आपका भाष्य सुनूँगा।” शास्त्री जी पहले तो क्रुद्ध हुए। घर जाकर पत्नी से परामर्श किया, तो उनने कहा-”क्या हर्ज है, राजा ने कहा है तो पाठ कर लें, फिर जाएँ।” अतः वे पढ़ने लगे। पढ़कर राजा के समीप पहुँचे। इस बार फिर नरेश ने सात बार पढ़कर आने को कहा। घर गये, तो पत्नी ने फिर समझाया- “राजा भी विद्वान हैं, उनके कथन में कोई गूढ़ अभिप्रायः सम्भव है।” शास्त्रीजी नित्य एकान्त में पुनः गीता पढ़ने लगे। तीसरे दिन सहसा उनका ध्यान गीता के तत्त्वज्ञान की ओर गया। उसके बोध से प्रशिक्षण पाकर भीतर उमड़ने वाले आनन्द-प्रवाह से वे विभोर हो उठे। पछताये कि गीता भी कोई व्याख्या की वस्तु है, यह तो समझने और जीने की प्रक्रिया है, दिशा है। भला इस कामधेनु को भी यों बेचना चाहिए-दरबार में। महीने बीत गये। शास्त्रीजी को राजा के यहाँ जाना अनावश्यक लगा। तभी नरेश एक दिन उन्हें खोजते आ पहुँचे। चरणों में शीश झुकाकर बोले- “अब आप गीतामय हो गये हैं। मुझे कृतार्थ करें गीता सुनाकर, क्योंकि अब आपके मुख से सचमुच गीता का तत्त्वज्ञान निकलेगा।”


मनुष्य से कहीं अधिक संवेदनशील हैं वृक्ष-वनस्पति

निष्कलुष हृदय में दूसरों के दुर्भाव, दुर्विचार उसी प्रकार अनुभव होने लगते हैं जैसे सामने वाला व्यक्ति स्वयं अपने मुँह से उन्हें व्यक्त कर रहा हो। पवित्र अंतःकरण वाला व्यक्ति दूसरों के हृदय की भावनाओं की परख स्वतः ही कर लेता है। पेड़-पौधे जिन्हें न किसी से लगाव होता है, न दुःख; निष्कलुष और पवित्र अंतःकरण व्यक्ति की तरह ही यह ताड़ लेते हैं कि पास आने वाला व्यक्ति या प्राणी शत्रु या मित्र है। अमेरिका के प्रोफेसर वोगल ने इस तरह के कई प्रयोग किये और उन्होंने जो जानकारियाँ एकत्रित कीं वे बेहद ही चौंकाने वाली और आश्चर्यजनक थीं।

पेड़-पौधे न केवल अपने पास आने वाले व्यक्तियों के भले-बुरे भावों को पहचान लेते हैं। बल्कि उन भावनाओं से प्रभावित भी होते हैं। प्रो0 वोगल ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया कि पौधे उन्हें उखाड़ने या नष्ट करने के विचार मात्र से पूरी तरह आतंकित हो जाते हैं। यह सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने एक मित्र विवियन विले के सहयोग से एक पग योग की योजना बनायी। इसके लिए उन्होंने गमले में लगे हुए दो पौधों को चुना। इन दोनों पौधों को उन्होंने अपने शयन कक्ष में रखा था, जब भी वे वहाँ जाते तो पौधे के प्रति अच्छे भाव और शुभ विचार अपने मन में लाते। इधर विले अपने शयन कक्ष में रखे पौधे के पास जब भी जाते तो पौधे को उखाड़ने, नष्ट करने या तोड़ने का विचार करते। दोनों मित्र प्रातःकाल जब उठते तो इसी प्रकार के विचार करते।

एक माह बाद देखा गया तो विले वाला पौधा पहले की अपेक्षा सूखकर पीला पड़ने लगा था। दोनों को जो खाद-पानी दिया गया था वह एक ही तरह का था। फिर भी परिवर्तन नोट किया गया। संभव है यह मात्र संयोग रहा हो। यह सोचकर वोगल तथा विले पहले के भावों से विपरीत भावनाएँ जगाने लगें। अर्थात् वोगल अपने पौधे से शत्रुवत् भाव करते और विले मित्रवत्। महीने भर बाद ही दोनों पौधों पर यह परिणाम नोट किया गया कि वोगल वाला पौधा सूखने लगा तथा विले का पौधा हरा-भरा रहने लगा।

इन लम्बे प्रयोगों के बाद प्रो0 वोगल ने कुछ और प्रयोग भी किये, उन्होंने अपनी प्रयोगशाला में एक पौधे को ऐसे यंत्र से जोड़ा, जो पौधे की आँतरिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों को कम्पन के रूप में अंकन करता था। पौधों को इस यंत्र के जोड़ने के बाद वोगल ने अपनी हथेलियों को पौधे के चारों ओर पास किया तथा साथ ही अपने मन में पौधे के प्रति मित्रता के भाव भी जगाने लगे। प्रो0 वोगल ने देखा कि पौधे के साथ लगे हुए यंत्र ने कागज पर एक ग्राफ खींच दिया है।

दूसरी बार प्रो0 वोगल ने दूसरी तरह की भावनाएँ अपने हृदय में लाये तो यंत्र ने दूसरी तरह का ग्राफ बनाया। फिर उन्होंने पहले वाली कोमल भावनाओं को ही जगाया तो पहले वाले ग्राफ जैसा ही ग्राफ बना। इन प्रयोगों को वोगल ने कई बार दोहराया और हर बार एक जैसे ही निष्कर्षों पर पहुँचे।

प्रो0 वोगल ने इन प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को वनस्पति विज्ञानियों के एक सम्मेलन में कहा तो कई वैज्ञानिकों ने उनके प्रयोगों में रुचि दर्शायी। एक वनस्पति विज्ञानी डॉ0 विलेम जोंस ने स्वयं इस प्रयोग को अपने हाथों से किया और संतोषजनक परिणाम प्राप्त किये। यही नहीं उनके कुछ भावों पर पौधों ने विपरीत प्रतिक्रियाएँ भी दर्षायीं। एक बार जब डॉ0 जोन्स ने प्रो0 वोगल की प्रयोगशाला में प्रवेश किया तो पौधे ने कम्पन देना एकदम बंद कर दिया। प्रो0 वोगल ने उस वैज्ञानिक से प्रश्न किया कि आप इस समय क्या विचार कर रहे थे? तो डॉ0 जोंस ने उत्तर दिया कि इस पौध की तुलना अपने घर में लगे एक पौधे से कर रहा था। उनके घर में बगीचे में उसी पौधे की जाति का एक दूसरा पौधा लगा हुआ था। डॉ0 जोंस उस पौधे से इस पौधे की तुलना करते हुए सोच रहे थे कि मेरे उपवन में लगा हुआ पौधा कितना हरा-भरा और तरोताजा है, जबकि यह पौधा सूखा-सूखा सा लगता है। शायद यह गमले में लगा हुआ है इसलिए ऐसे हुआ है।

प्रो0 वोगल के उस पौधे ने इस घटना के दो हफ्ते बाद तक कोई कम्पन अंकित नहीं किया। मशीन ठीक-ठाक काम कर रहीं थी, फिर भी कम्पन क्यों नहीं हुआ? इसका उत्तर देते हुए प्रो0 वोगल ने कहा कि आगंतुक वैज्ञानिक अपने मन में पौधे के प्रति जो भाव लाये थे और उसके प्रति जो हीनता की भावना व्यक्त की थी, उससे उसकी भावनाओं को बड़ी ठेस पहुँची थी और इसी कारण उसने कोई बात करने, प्रतिक्रिया व्यक्त करने से इनकार कर दिया था।

पेड़’-पौधे भी अनुभव करते हैं और उनमें भी संवेदनाएँ होती हैं, इस तथ्य को न्यूयार्क के प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी क्ली वैक्स्टर ने सिद्ध कर दिखाया है, क्ली बैक्स्टर ने पेड़-पौधों की प्रतिक्रिया को मापने के लिए विशिष्ट यंत्र गैल्वेनोमीटर का उपयोग किया। आमतौर पर गैल्वेनोमीटर में सुई का उपयोग होता है परन्तु इस मीटर में सुई के स्थान पर पेन का इस्तेमाल किया गया था ताकि कम्पनों को अंकित किया जा सके।

क्ली बैक्स्टर ने इसके बाद पेड़ की एक पत्ती को उबलती हुई काफी की प्याली में डाल दिया, पत्ती पेड़ से जुड़ी हुई हालत में ही प्याली में डाली गयी थी। परन्तु इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई क्ली बैक्स्टर ने एक दूसरा प्रयोग किया। उसने विचार किया कि वह पत्ती को जलाकर राख कर देगा। इस विचार के आते ही बैक्स्टर ने माचिस की तीली जलाने के लिए आगे हाथ बढ़ाया। लेकिन वह अभी माचिस हाथ में उठा भी नहीं पाया था कि गैल्वेनोमीटर ने पेड़ में कम्पनों को तेजी से अंकित करना आरंभ कर दिया। पेन की नोक बहुत तेजी से कागज पर चलने लगी थी।

यद्यपि बैक्स्टर पेड़ से दूर खड़ा था और वह अपने स्थान से हिला तक नहीं था, तो क्या पेड़ ने बैक्स्टर के विचारों को जान लिया था और इस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया दर्शायी थी। बैक्स्टर के मन में यह प्रश्न बिजली की तरह कौंधने लगा। प्रश्न का उत्तर जानने के लिए उन्होंने माचिस की एक तीली जलायी और पत्ती के पास ले गये। यह करते हुए बैक्स्टर के मन में पत्ती को जलाने का कोई विचार नहीं था। वह पत्ती को जलाने का नाटक कर रहे थे। शायद पौधे ने बैक्स्टर के आँतरिक भावों को पहचान लिया हो और वह समझ गया हो कि युवा वैज्ञानिक केवल नाटक कर रहा है। इसलिए पौधे में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

इसके बाद बैक्स्टर ने सचमुच पत्ते को जलाने का निश्चय कर लिया और इस इरादे से लौ को आगे बढ़ाया। बैक्स्टर ने जैसे ही तीली को आगे बढ़ाया, पौधे ने गैल्वेनोमीटर के माध्यम से एक झटके के साथ अपना भय व्यक्त किया। यंत्र की नोक कागज पर चलने लगी।

इन ग्राफों को सुरक्षित रख लिया गया और यही प्रयोग अन्य किस्म के पौधों पर भी दोहराने की योजना बनाई गयी। बैक्स्टर ने इसके लिए कुछ युवा वैज्ञानिकों का एक दल बनाया और पच्चीस तरह के अलग-अलग किस्म के पेड़-पौधे लिये। ये पौधे देश के विभिन्न कोनों से मँगाये थे। सभी पौधों पर विचारों के होने वाले प्रभाव को अलग-अलग गैल्वेनोमीटर से आँका गया, तो वही परिणाम सामने आये जो पहले आये थे। प्रयोगशाला में कोई कुत्ता, बिल्ली, बंदर लाया जाता तो पौधे भय से अलग-अलग कंपन करते। जैसे बिल्ली के प्रवेश पर वे सबसे कम भयभीत हुए, कुत्ते के समय उससे ज्यादा और बंदर के समय सबसे ज्यादा। यहाँ तक कि कोई व्यक्ति प्रयोगशाला में किसी पौधे के प्रति दुर्भावना लेकर आता तो पौधा उसे भी अंकित कर देता।

गैल्वेनोमीटर द्वारा अंकित किये गये कंपनों को किसी प्रकार ध्वनि तरंगों को रूपांतरित किया गया। तरंग के सूक्ष्म से सूक्ष्म कम्पन कभी ध्वनि में बदल देने वाले यंत्र से जब उन ध्वनियों को सुना गया तो उनमें कहीं भय, कहीं प्रसन्नता, कहीं हर्ष तो कहीं उल्लास की ध्वनियाँ निकलती थीं।

भयभीत होने, प्रसन्नता व्यक्त करने तथा शत्रु को पहचानने में समर्थ होने के अतिरिक्त पेड़-पौधे गर्मी और सर्दी भी महसूस करते हैं। उन्हें प्यास भी लगती है तथा उन्हें भी एक निश्चित मात्रा में खनिज लवणों और पोषक तत्वों की जरूरत होती है। यह खोज रूस के प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री लियोनिड ए॰ पनिशकिन तथा कैरोमोनेव ने की है।

इन अनुसंधान ने वनस्पति विज्ञान के इस क्षेत्र में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत किया है। कोई आश्चर्य नहीं कि पेड़-पौधों को इस तरह के व्यवहार को देखते हुए उन्हें जानवरों, प्राणियों से अलग न माना जाय। भावसंवेदनाओं की दृष्टि से वृक्ष-वनस्पति को यंत्र की श्रेणी का ही कहा जा सकता है। अभी तो यही पता चला है कि दुर्भावनाओं, धमकियों, सद्भावों और दूसरों पर होने वाले अत्याचारों पर पेड़-पौधे भिन्न-भिन्न प्रतिक्रिया करते हैं। कौन जाने उनकी प्रतिक्रियाओं में उपेक्षा, परामर्श, तिरस्कार या मित्रता की भावनाएँ व्यक्त होती हों और कोई आश्चर्य नहीं कि उनकी बुद्धि, नैतिक चेतना तथा आध्यात्मिकता मनुष्य से अधिक उन्नत स्तर की हो। मनुष्य और वनस्पति में अंतर है तो इतना भर ही है कि वनस्पति मनुष्य की भाषा में बात नहीं कर सकता है, तो मनुष्य ही वनस्पति, जगत की भाषा में बात करने में कहाँ समर्थ है? अतः संवेदनशील वन-सम्पदाएँ संसार की धरोहर हैं, उन्हें बचाना, संरक्षण एवं समुचित स्नेह-प्यार देकर विकसाना हर मनुष्य का कर्त्तव्य है। जिससे भाव-सम्वेदना का विस्तार वनस्पति जगत में भी हो सके।


ब्रह्मवादिनी सुलभा (Kahani)

ब्रह्मवादिनी सुलभा अपने परिभ्रमण काल में एक बार राजा जनक से मिलने पहुँची। उनने सुन रखा था कि जनक को अपने ज्ञान का अहंकार हो गया है और वे अपना परिचय देते हुए, समय-समय पर आत्मश्लाघा व्यक्त करते हैं। विनम्रता का ध्यान नहीं रखते। सुलभा से परिचय पूछे जाने पर वे मौन रहीं और राजा से ही अपना परिचय देने को कहा। जब कथन पूरा हो गया, तो सुलभा ने अपना सामान्य परिचय देते हुए कहा- “लक्ष्य की एकता और गुण सम्पदा से परिपूर्ण अपने योग्य वर न मिलने पर उन्होंने सदा ब्रह्मचारिणी रहने का व्रत लिया है और सदा धर्मोपदेश के लिए परिभ्रमण करती रहती है।” किसी का साहस नहीं पड़ा कि उन्हें अकेली देखकर दुर्बुद्धि का परिचय दे।

महाभारत शान्तिपर्व में जनक-सुलभा संवाद बहुत विस्तार से दिया गया है। सुलभा ने वाणी के आठ गुणों और आठ दोषों का वर्णन करते हुए, परोक्ष रूप से जनक की अहमन्यता को निरस्त करने का प्रयत्न किया। जनक संकेत समझ गये और भविष्य में उन्होंने विनयशीलता का सम्भाषण में अधिकाधिक समावेश किया।


कैसा है आपका अभ्युदय?

आपने कभी अपने अभ्युदय का स्वप्न देखा है? आप जानते होंगे कि यह स्वप्न भी कितना सुखदायी, कितना भव्य होता है। लेकिन कितनों का वह स्वप्न पूरा होता है? फिर वह तो स्वप्न है, स्वप्न पूरा हो जाय, वही एक स्वप्न बना रहे तो फिर स्वप्न क्या? एक स्वप्न पूरा होगा, यह आशा भी जान पड़े, इससे पहले तो दूसरा स्वप्न सजीव हो उठता है और-और-और किसी के मन की भूख कभी पूरी हुई है।

आपको आश्चर्य होगा- एक है जो कहता है-”मेरा स्वप्न पूरा हो गया। भले मेरा वही स्वप्न ज्यों का त्यों पूरा नहीं हुआ; किन्तु मेरे स्वप्न की सीमा हो गयी। मेरा जो कुछ होना-हवाना होगा, हो रहेगा। मैं अपने अभ्युदय का शिखर देख चुका। रही वहाँ पहुँचने की बात, सो आज या दस दिन पीछे। जो मेरा काम नहीं, उसके लिए मैं व्याकुल नहीं बनता।

आपको और अधिक आश्चर्य होगा- उसके सारे स्वप्न नष्ट हो गए हैं। उसका एक भी स्वप्न सफलता की ओर बढ़ा नहीं। किन्तु वह इतना प्रसन्न है, जैसे वही इस सारे विश्व का सम्राट है।

एक दूसरा भी है। उसके स्वप्न सत्य ही होते रहे हैं। उसने स्वप्न देखा और जुट पड़ा। सफलता की देवी उसके आगे जैसे हाथ बाँधे खड़ी रहती है। वह ऐसा है कि उसके समकक्ष बैठने का स्वप्न भी बहुतों के लिए असम्भव-सा स्वप्न है। वह उन्नत है, यशस्वी है, सबल है। अधिकांश की दृष्टि में वह अभ्युदय के शिखर पर पैर रखकर खड़ा है।

आपको फिर भी आश्चर्य होगा- वह कहता है-”मेरा स्वप्न यदि सत्य हो पाता। मैं अभी अभ्युदय के महापर्वत के नीचे ही तो खड़ा हूँ। मस्तक उठाने पर उसका शिखर देख तक नहीं पाता मैं।

वह चाहे जितना गर्विष्ठ दिखे, चाहे जितना झल्लाए, यह सब तो अपनी दुर्बलता छिपाने के उसके प्रयत्न हैं। वह कितना दीन, कितना लघु, कितना दुर्बल है, अपने आपमें, यह वही जानता है। यह सब मिलकर उसे निरन्तर अशांत, क्षुब्ध, चिन्तित बनाए रखते हैं। उसका क्या दोष है यदि वह झल्ला उठता है अथवा बाहर से अपने को गर्विष्ठ, सन्तुष्ट होने की कोशिश करता है।

आपने कभी पर्वतों की चोटी पर चढ़ने का मन किया है? एक चोटी पर चढ़े तो दूसरी उससे ऊँची दिखती है। दूसरी पर चढ़ो तो तीसरी और तीसरी पर चढ़ो तो चौथी। चलता रहता है यही क्रम। उन्नति-अभ्युदय-उसके स्वप्न नए-नए होते रहते हैं। वह जब मस्तक उठाता है उसे प्रत्येक क्षेत्र में बड़े, अपने से बहुत बड़े दिखते हैं। वह बढ़कर उन्हें छूने का प्रयत्न करता है, छू लेता है और सिर उठाता है। किन्तु वहाँ तो बड़े, बहुत बड़े, दूसरे सामने खड़े दिखते हैं। उसका मस्तक झुक जाता है। वह फिर उद्योग में लगता है।

नीचे-नीचे-बहुत नीचे तक लोग हैं उसके। वे भी मनुष्य हैं। उनका भी जीवन है। उनके भी स्वप्न होंगे। उनका भी सुख-गौरव होगा ही। उनका भी काम चल जाता है। लेकिन पर्वत पर चढ़कर नीचे देखा जाय- कितने तुच्छ दिखते हैं नीचे के पदार्थ। वह क्यों नीचे देखे? नीचे के तुच्छ समुदाय पर वह क्यों ध्यान दे। वहाँ वह अपने स्थान को देखने की कल्पना करे-छिः।

उसे ऊपर जाना है। अभ्युदय प्राप्त करना है- महत्तर अभ्युदय। वह बड़ा होना चाहता है। ऐसा बड़ा, जिससे बड़ा और कोई न हो। कम से कम अपने क्षेत्र में उसे सर्वोच्च होना ही चाहिए। वह प्रयत्न कर रहा है- निरन्तर प्रयत्न कर रहा है।

यह तो संसार है। यहाँ क्या महत्ता की कोई सीमा बनी है? एक से बड़ा दूसरा और दूसरे से बड़ा तीसरा। यहाँ क्या इसकी कोई सीमा हो सकती है। उसका स्वप्न, उसका अभ्युदय, उसकी महत्ता-लेकिन कोई अनन्त आकाश की माप लेने चल पड़े तो उसका कार्य कब समाप्त होगा, यह आप बता सकते हैं?

उसकी अशांति, उसकी उलझन, उसकी व्यग्रता, उसका असन्तोष बढ़ता जा रहा हैं यह तो कहावत है न कि पैसे वाला रोबे पैसे को और रुपये वाला रोबे रुपये को। सौ पैसे वाले के पास दुःख पैसे भर और रुपए वाले के पास दुःख रुपये भर तो रहना ही ठहरा।

अभ्युदय के, साँसारिक ऐश्वर्य के क्षेत्र में वह बढ़ता जा रहा है और साथ ही बढ़ता जा रहा है, उसका दुःख, उसका असन्तोष, उसकी व्यग्रता। वह आज किसी शिखर पर खड़ा है तो वह अशांति का शिखर है। आप बाहर से उसे कैसा भी देखें ओर कोई भी नाम दें, सत्य तो सत्य ही रहता है।

आपको आश्चर्य तो होना ही ठहरा। ये दोनों ही मित्र थे दोनों एक ही पाठशाला की एक ही कक्षा में पढ़ते थे। दोनों साधारण स्थिति के किसानों के पुत्र थे। क्या हुआ जो दोनों के आकार में कुछ अन्तर था। दो मनुष्यों के आकार में अन्तर तो होता ही है। ब्रह्मा बाबा तो जैसे एक साँचा दो बार काम में लेना जानते ही नहीं। लेकिन दोनों के स्वभाव प्रायः एक से थे। दोनों तीक्ष्ण-बुद्धि थे। दोनों परिश्रमी थे और सबसे बड़ी बात तो यह कि दोनों के स्वप्न प्रायः एक जैसे ही थे।

खूब बड़ा-सा ईंटों का मकान, अच्छा-सा दालान, द्वार पर नीम का पेड़ चार बड़े-बड़े बैल, दो मुर्रा भैंसें, एक गाय। दोनों कभी-कभी बैठ जाते, कहीं एकान्त देखकर और अपने स्वप्नों का विनिमय करते। दोनों मिलकर उसमें थोड़ा-बहुत सुधार करते-चार बड़े-बड़े निवार के पलंग, एक तख्ता, एक छोटी चौकी, दस-बारह मोढ़, कुछ मचिया, एक हुक्का- नहीं-नहीं एक चमकता काँसे की बड़ी भारी नली वाला गड़गड़ा और एक हुक्का भी। गड़गड़े के बिना द्वार की कहीं शोभा बनती है।

दोनों ने अपने ग्राम के मुखिया को अपना आदर्श मान रखा था। बालक ही थे दोनों। मुखिया के घर में, द्वार पर उन्हें जो कुछ जैसे दिखता था, वह वैसे ही उनके स्वप्न में सम्मिलित हो जाता था। उनके लिए मुखिया ही संसार का सर्वश्रेष्ठ पुरुष था। केवल एक बात में थोड़ा-सा मतभेद था दोनों में। द्वार पर घोड़ा रहे या हाथी। मुखिया के द्वार पर घोड़ा था; किन्तु उन्होंने हाथी देखा था। सुना तो जिसके द्वार पर हाथी झूमे, वह बहुत बड़ा आदमी माना जाता है। लेकिन उसका मन झिझकता था- इतनी बड़ी कल्पना उन्हें करनी चाहिए या नहीं।

दोनों में बहुत मित्रता, बहुत एकता सही। लेकिन दोनों के प्रारब्ध तो एक थे नहीं। एक के पिता-माता उसे छोड़कर परलोक चले गए। उसकी पढ़ाई छूट गयी। उसके घर जो कुछ था, दूसरों ने अवसर लेकर दबा दिया। उसका घर तक धीरे-धीरे खण्डहर होता गया। घर छोड़कर उसे बाहर जाना पड़ा और फिर घर धरा क्या था जो वह लौटकर आता। प्रारब्ध ने जहाँ जैसे भटकाया-भटकता रहा।

दूसरे को ननिहाल की सम्पत्ति मिली, पढ़ाई का सुयोग मिला। अवसर-अनुकूल आते गए, वह बढ़ता गया। गाँव उसने भी छोड़ दिया है। नगर के बाहर उसकी बड़ी विख्यात कोठी है। बगीचा है, मोटरें हैं, नौकरों की भीड़ है। अब उसे कहाँ अवकाश है कि गाँव जाय। गाँव पर उसके चचेरे भाई रहते हैं। उन्होंने वहाँ पक्का मकान बनवा लिया है। अब वहाँ एक तो क्या कई गड़गड़े रहते हैं। हाथी और घोड़ा दोनों साथ रहे वहाँ और अब तो दोनों का स्थान मोटर ने ले लिया है। लेकिन उसे कहाँ अवकाश है यह सब जानने का। वह एक नन्हें से गाँव की बात कहाँ सोचता बैठ सकता है। वह गाँव उसे कब का भूल चुका है।

जीवन की दिशा बदलती है, उसके स्वप्न बदलते हैं जब घर ही नहीं रहा, घर के स्वप्न को समाप्त हो जाना था। वह पहले जब घर छोड़ने को विवश हुआ, स्थान-स्थान पर भटकता रहा, उसके स्वप्न छोटे होते गए। कभी बढ़े भी तो बढ़ने का आगे स्थान न देखकर संकुचित हो गए। निराशा, विफलता, प्रतिकूलता ने उसे दी उदासीनता, दृढ़ता, तटस्थता। क्या कठिनाई आवेगी या आ सकती है, इसे सोचना अब उसे व्यर्थ जान पड़ता है। इतनी कठिनाइयाँ, इतने संकट वह झेल चुका है कि अब और क्या नया होना है। क्या सुख, क्या सुविधा मिलेगी या मिल सकती है, इसमें उसे रस रहा ही नहीं है। जब उन्हें दो दिन में नष्ट होना ही है, वे आवें या जायें। उसने अनुभव कर लिया है इस भटकने-भटकाने में कि सुख-सुविधा का बने रहना भी कोई अर्थ नहीं रखता। बहुत शीघ्र उनका रस बासी पड़ जाता है। वे फीके पड़ जाते हैं।

सुख न चाहे ऐसा प्राणी हो कैसे सकता है। दुःख सभी को उद्विग्न करते हैं, सुख सभी को लुभाते हैं। लेकिन दुःख भोगते-भोगते भी एक टेव पड़ जाती है। आप कह सकते हैं कि उसे टेव पड़ गयी है। लेकिन बात ऐसी नहीं है। उसके मन ने उससे कभी पूछा था- ऐसा नहीं हो सकता कि कठिनाइयाँ आती रहें और हम मौज में बने रहें। सुख का स्वाद बासी और फीका पड़ जाता है, तो दुःख का स्वाद तीखा ही क्यों बना रहे। वह क्या बासी नहीं पड़ेगा? दुःख भी बासी पड़ता है। दीर्घ रोगी अपने रोग के कष्ट को उतना अनुभव नहीं करता जितना नय रोगी अनुभव करता है। जो विपत्ति ही विपत्ति भाग्य में लाया हो, उसे दुःख बासी होना जानते कितने दिन लगते हैं।

वह भी अभ्युदय चाहता था। परिस्थिति ने उसे विचार का स्वभाव दिया था। विचार के अतिरिक्त करने को था ही नहीं उसके पास। वह अपने विचार अभ्युदय का स्वप्न देखने लगा था-”दुःख यदि मन को स्पर्श ही न करे? आने के पहले ही वह बासी हो जाय? सुख बासी होकर दुःख हो जाता है, यह तो सबका नित्य का अनुभव है। सुख ताजा किया ही न जाए तो? उसे लगा कि उसने दुःख को सदा के लिए बासी बना देने का मर्म देख लिया है।

पर्वत की टेड़ी-मेढ़ी, आड़ी-तिरछी शिलाएं धारा के प्रवाह में पड़कर बराबर हो जाती हैं, चिकनी हो जाती हैं, गोल हो जाती है। बहुत लुढ़कना पड़ता है उन्हें, बहुत टक्कर खानी पड़ती है। कभी कोई ग्रामीण उन्हें उठाकर यदि पीपल के नीचे या वेदी पर रख दे, तो वे भगवान शंकर की प्रतिमा बन जाती हैं। वह कहता है, मैं लुढ़का और टकराया, गोल तो हो चुका। सुख आवे या दुःख, दोनों मुझे छूते चले जाते हैं। मेरा अभ्युदय तो हो चुका। मन्दिर की मूर्ति बनना कुछ मेरे बस की बात नहीं। जिसे जब बनाना होगा, बना देगा।

तुम इस अभ्युदय कहते हो? उन ईंट और पत्थरों को? इन चाटुकारों के समुदाय को? वह आज अपने पुराने मित्र से मिलने आया है। उसके मित्र की महानता आपको स्वीकार करनी पड़ेगी। उन्होंने अपने पहरेदारों को नहीं कहा-’मुझे अवकाश नहीं है। कह दो, फिर कभी आवें।’ उन्होंने नहीं सोचा कि एक कंगाल, अप्रख्यात, साधारणतया अपठित जैसे व्यक्ति के लिए वे क्यों अपना मूल्यवान समय नष्ट करें। वे गए स्वयं द्वार तक उसे ले आये। उसका स्वागत किया। उसे जलपान कराया। उसके सन्तोष के लिए उसके साथ एकान्त में बातें करने बैठे। लेकिन आने वाला भी तो अद्भुत है। वह तो ऐसे बोल रहा है, जैसे अपनी पाठशाला के उसी पुराने छात्र से बोल रहा हो। सचमुच तुम्हारे पास अब कोई स्वप्न नहीं है? तुम सुखी और सन्तुष्ट हो।

‘कहाँ की बात करते हो तुम !” उन्होंने एक लम्बी श्वास ली। अभ्युदय की तो बात ही दूर है। अभी तो ठिकाने से उसका श्रीगणेश भी नहीं हुआ है। लेकिन मैं प्रयत्न में लगा हूँ। मेरा अभ्युदय, मेरा अभ्युदय तो वह कि विश्व के लोग शताब्दियों तक मुँह में अंगुली दबाए रह जाया करें।

कुछ लोग तुम्हारे वैभव पर अब भी चकित रह जाते हैं। उसने कहा चकित रहने वाले दस हों, दस हजार हों या दस करोड़ हों। दस दिन वे चकित रहें या दस शताब्दी, बात तो वह की वही रहेगी।

‘तुम अब अद्भुत हो गए हो।’ उन्होंने उसकी ओर हँसकर देखा।

‘तुमसे अद्भुत नहीं।’ वह हँसा नहीं-तुम तो ईंट, पत्थर और मूर्खों द्वारा की गयी प्रशंसा में अभ्युदय मान बैठे हो। तुमने कभी सोचा है कि अभ्युदय का अर्थ होता है सुख, शान्ति और सन्तोष? कितना मिला वह तुम्हें अपने उद्योग में?’

‘तुम्हें मिला है वह?’ उन्हें अच्छा नहीं लगा कि यह कंगाल उनका इस प्रकार परिहास करे, ये अपने उद्योग में नितान्त विफल लोग दूसरों का उपहास करके ही सन्तोष करते हैं।

कभी तुम पर कोई संकट आया है? उसने उनके प्रश्न का उत्तर न देकर एक नया ही प्रश्न कर दिया।

संकट किस पर नहीं आता। अब उनके स्वर में उपेक्षा मात्र थी।

कभी तुम्हें संकट पर किसी अज्ञात शक्ति को पुकारना पड़ा है? कभी तुम्हें लगा है कि संकट तुम्हारी बुद्धि या शक्ति से नहीं, किसी अज्ञात के संकेत से दूर हो गया है। वह उपेक्षा का तो सदा का अभ्यस्त ठहरा, कोई नवीनता उसे उपेक्षा में लगी नहीं थी। वह तो अपनी बात अपने ढंग से कहने का अभ्यासी है।

मैं आस्तिक हूँ। भगवान में मेरा विश्वास है। उन्होंने स्थिरतापूर्वक कहा।

सो तो है, लेकिन तुमने कभी यह भी सोचा है कि जीव का अभ्युदय उस भगवान से भी कुछ सम्बन्ध रखता है या नहीं? वह गम्भीर होता जा रहा था।

मुझे धार्मिक अध्ययन का अवकाश नहीं मिलता। उन्होंने यह कहना अपने गौरव के अनुकूल नहीं समझा कि वह इस विषय में उनसे अधिक जानता है।

जो विपत्ति में अकारण हमें सहायता देता है, हमारे अभ्युदय में उसकी सहायता हमें अपेक्षित नहीं होनी चाहिए? वह जो कुछ कहना चाहता है, उसके निकट आता जा रहा हूँ।

उसकी सहायता तो हमें सदा ही अपेक्षित है। अब सहसा उनके स्वर में फिर स्नेह आया। बड़े से बड़ा व्यक्ति भी दुर्बल होता है। संसार तो है ही दुर्बलता का क्षेत्र। जहाँ दुर्बलता है, वहीं दैन्य है और अपेक्षा है। वे जैसे अनुरोध कर रहे हों-तुम मेरे लिए प्रार्थना नहीं करोगे?

माता-पिता से प्रार्थना नहीं करनी पड़ती। शिशु का कल्याण किसमें है, यह वे स्वयं जानते हैं। शिशु के अभ्युदय में वे उसके नित्य सहायक होते हैं। वे मना करें, उधर न जाय ; वे प्रोत्साहित करें, उधर बढ़ने का प्रयत्न करे। शिशु का अभ्युदय तो उनके हाथों में सुरक्षित है। अब की बार उसने अपनी पूरी बात जैसे समाप्त कर दी। उठकर खड़ा हो गया विदा लेने के लिए।

अद्भुत पागल है। उन्होंने रोका नहीं। उनके पास व्यर्थ नष्ट करने को समय नहीं था। उसकी बातें सोचने-समझने के स्थान पर अनेक योजनाएँ थीं और उनमें सफलता प्राप्त करने के लिए तत्काल उन्हें व्यस्त हो जाना चाहिए था। उसे द्वार तक विदा करके वे अपने कार्य में लग गए।

दोनों मित्रों को अपने-अपने मार्ग से जाना ठहरा, दोनों के अभ्युदय के आदर्श भिन्न हो चुके थे अब। दोनों के स्वप्न, किन्तु अब एक के पास तो कोई स्वप्न ही नहीं है। वह कहता है- जो अचानक अज्ञात रहकर भी आपत्ति में मुझे बचा लेता है, मेरा अभ्युदय उसके हाथ में सुरक्षित है। क्या है वह, मैं इस झमेले में नहीं पड़ता। आज या कल, मेरे पिताजी के पास जो है, वह मेरा नहीं है, ऐसा कहने वाला ही मूर्ख है।

पानी का प्रवाह आता है, प्रवाह में पड़ा पत्थर कभी हिलता है, डोलता है, कभी गोल होता है, कभी तट पर पड़कर धूप में गरम हो उठता है। वह घिस-घिस कर गोल हो गया- बस। मन्दिर में आराध्य पीठ पर उसे धरना न धरना, तो धरने वाले की इच्छा। किन्तु अब उसे प्रवाह से कुछ लेना नहीं, तट पर पड़ती धूप में तपते रहने में कुछ बिगड़ता नहीं। वह कहता है-”मैं तो अब गोल-गोल पत्थर हो गया।”

पानी का प्रवाह आता है, पर्वत की बड़ी शिला पर टकराता है। शिला का कण-कण टूटता, गिरता रहता है। घिसती, टूटती, क्षीण होती रहती है शिला। मैं इतने प्रवाह से ऊपर खड़ी हूँ। उसका यह गर्व उसे तृप्त करता हो तो भले करे। लेकिन उसकी दो ही गति हैं-कण-कण टूटकर रेत बन जाना या प्रवाह में लुढ़क कर गोल होने के लिए अपने को छोड़ देना। किसमें अभ्युदय है उसका।

एक के पास स्वप्न हैं। स्वप्न सत्य करने की धुन है। सबके पास स्वप्न होते हैं। सबके स्वप्न सत्य नहीं होते। सबमें वह धुन नहीं होती। लेकिन स्वप्न सभी के पास हैं। जो जैसा है वैसे है उसके स्वप्न। चोर विश्व का सर्वश्रेष्ठ चोर बनना चाहे, तपस्वी विश्व का सर्वोत्तम तपोनिष्ठ होने का विचार करे, कवि विश्व कवि की उपाधि की आकाँक्षा करे-यह तो अब चल ही रहा है। प्रत्येक विषय में रिकार्ड स्थापित करने की प्रतिद्वन्द्विता चल रही है। अभ्युदय है रिकार्ड स्थापित कर देने में?

एक के पास स्वप्न ही समाप्त हो गए हैं। उसे न सुख-सुविधा की बहुत लालसा है, न अभाव-आपत्ति का कोई विशेष भय। वह तो साक्षी हो गया है। उसका कहना है- अभ्युदय तो वह, जहाँ सुख का सागर उमड़-उमड़ कर चरणों में चुप बैठ जाय और दुःख का झंझावात फुँकार मारता-मारता सिर पटक कर स्वयं थक जाय। सुख, शाँति और संतोष अभ्युदय तो बस इनकी पूर्णता में है और वह पूर्णता कुछ मनुष्य के वश की नहीं। वह तो जो नित्य पूर्ण है, उन परमात्मा के ही श्रीचरणों में सुरक्षित है। मनुष्य का तो उन चरणों में अनुराग हो, उनकी ओर प्रीति से देखे-बस हो गया।

आप भी तो अभ्युदय चाहते हैं, कैसा है आपका अभ्युदय। अपने अभ्युदय के विचारों को आप इन दोनों मित्रों में से किसके साथ रखना पसन्द करेंगे?


शील (Kahani)

महर्षि बोधायन अपनी शिष्य मंडली को लेकर तीर्थाटन के रूप में धर्म-प्रचार के लिए निकले। रास्ते में एक सरोवर के तट पर वट वृक्ष के नीचे विश्राम किया। प्रातः अन्य शिष्य उठ बैठे; किन्तु गार्ग्य ज्यों के त्यों पड़े रहे। ऋषि ने जगाया, तो शिष्य ने धीमे स्वर से कहा-”मेरे पैरों में एक भयंकर सर्प लिपटा पड़ा है, सो गया है, थोड़ी देर में वह जागेगा और चला जाएगा, इसलिए अभी मुझे यथावत् ही पड़े रहना चाहिए।” थोड़ी देर में सर्प जगा और झाड़ी में खिसक गया। गार्ग्य उठे और गुरु-वन्दन करने गए। अन्य शिष्यों ने इसे साहस कहा और प्रशंसा की। बोधायन ने कहा-”गार्ग्य कानिर्णय धैर्य और विवेकयुक्त था। इसलिए उसे साहस की अपेक्षा शील कहना उत्तम है।” इस शील का अभ्यास ही जीवन को सही रूप में, आदर्शयुक्त ढंग से जीने के लिए जरूरी है। शिक्षा इसके बिना अपूर्ण है।


क्रोधित होने से पहले यह भी सोचें

क्रोध का कारण बताते हुए गीता में कहा गया है, “कामात् क्रोधोऽभि-जायते।” कामनाओं में विक्षेप उपस्थित होने पर उस विक्षेप के कारण के प्रति क्रोध उत्पन्न होता है। तीन-चार महीने के बच्चे को यदि कोई थप्पड़ मार दे तो उस थप्पड़ की पीड़ा से वह रो तो उठेगा, किंतु उठे हुए हाथ और स्वयं की पीड़ा का अंतर सम्बन्ध उसे ज्ञात नहीं रहता, इस हाथ से थप्पड़ मारे जाने के कारण मुझे पीड़ा हो रही है, यह जानकारी उसे नहीं रहती, इसलिए उसके रुदन में क्रोध का आवेग नहीं रहता। इस प्रकार क्रोध, दुःख, कष्ट के कारण के बोध से उत्पन्न होता है। अपनी हानि या दुःख का कोई कारण उपस्थित होने पर क्रोध का आवेग पैदा हो जाता है। अपने मनोरथों को विफल कर सकने वाले अभीष्ट प्राप्ति के मार्ग में बाधक का स्पष्ट परिचय पाकर क्रोध उदित होता है। यह क्रोध का सामान्य स्वरूप हुआ।

किन्तु मनुष्य की कोई भी प्रतिक्रिया सरल, यंत्रवत् नहीं होती। इसलिए क्रोध के स्वरूप और उसकी अभिव्यक्ति के ढंग, दोनों में बहुतेरी भिन्नताएँ होती हैं।

क्रोध मस्तिष्क में उभर पड़ने वाला एक आवेग विशेष है। मस्तिष्कीय संरचना कुछ ऐसी है कि जिस भी आवेग का उसमें बार-बार उदय हो, उसके संस्कार गहरे होते जाते हैं और फिर वह आवेग स्वभाव का एक अंग बनता जाता है। एक ही बाधक विषय वस्तु के प्रति दो लोगों की प्रतिक्रिया भिन्न-भिन्न होती है-एक क्रोध से लाल-पीला होकर मरने-मारने पर उतारू हो जाएगा, दूसरा उस बाधा के निवारण का गंभीर प्रयास प्रारंभ कर देगा। यह भिन्नता मस्तिष्क में पड़ गये संस्कारों की ही है। असफलता प्राप्त होने पर जब क्रुद्ध होने की ही प्रवृत्ति दृढ़ हो जाती है, तो फिर यह क्रोध उस बाधक तत्व के प्रति ही सीमाबद्ध नहीं रहता, अपितु संपर्क में आने वाले लोगों से अकारण क्रुद्ध व्यवहार का प्रेरक बन बैठता है।

मन की जटिलताएँ भी मनुष्य के क्रोधी स्वभाव का कारण होती हैं। मनुष्य अपनी मानसिक जटिलताओं में उलझा, उद्विग्न रहा आता है और यह उद्वेग जिस-तिस पर क्रोध बनकर बरस पड़ता है।

इस प्रकार मोटेतौर पर क्रोध के तीन प्रकार गिनाए जा सकते हैं। प्रथम कामना पूर्ति में अवरोधक बाधक विषय के प्रति क्रोध, जो बाधक को हानि पहुँचाने की भावना से जुड़ा रहता है। दूसरा असफलता से क्रुद्ध मनःस्थिति में संपर्क में आए अन्य व्यक्तियों पर कारणवश या अकारण ही व्यक्त होने वाला क्रोध। तीसरा लम्बे अभ्यास से व्यसन-सा बन चुका क्रोध, जो स्वभाव का स्थायी अंग बन जाता है।

पहले प्रकार का क्रोध लोक-व्यवहार में सर्वाधिक स्वाभाविक माना जाता है। सामाजिक जीवन में उसे एक तरह की स्वीकृति प्राप्त है। किन्तु क्रोध एक विचार मात्र नहीं है, वह एक भावावेग है। उसका सम्पूर्ण शरीर संस्थान और मनःसंस्थान पर प्रभाव पड़ता है। प्रथम तो बाधक को हानि पहुँचाने की जो भावना है वह भी परिणाम में अपने पक्ष में कभी-कभार ही जा पाती है। सम्भव है जिसे हानि पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है, वही कल भिन्न अवसर पर अपने लिए उपयोगी सिद्ध हो। हमारी कामना पूर्ति में वह बाधक बनता दीख रहा है, किन्तु कल को वही कामना ही महत्वहीन लग सकती है और किसी अधिक महत्वपूर्ण कामना में आज का बाधक सहायक के रूप में आ सकता है।

इससे भी बड़ी बात यह है कि क्रोध में दुःख या हानि के कारण को नष्ट कर देने की या क्षतिग्रस्त कर देने की भावना इतनी तेजी से उमड़ती है कि अपनी भूल या दोष की ओर तो ध्यान नहीं ही जाता,जो करने जा रहे हैं, उसके परिणाम का भी विचार नहीं आ पाता। ऐसी स्थिति में कई बार पूर्व में हो गई हानि के साथ ही क्रोध में किए गये कामों से और बड़ी हानि हो जाती है।

क्रोध मन को उत्तेजित और खिंची हुई अवस्था में रख देता है, इससे शरीर में भी तनाव आ जाता है। रक्त संचालन तीव्र हो उठता है और अनावश्यक गर्मी शरीर में आ जाती है। विचार शक्ति शिथिल हो जाती है। तीव्र रक्त संचालन से चेहरा तमतमा उठता है, ओठ फड़कने लगते हैं, आँखें लाल हो उठती हैं। भीतरी अवयवों पर भी ऐसा ही अनिष्ट और दूषित प्रभाव पड़ता है। हृदय स्पंदन तेज हो जाता है, आँतों का पानी गर्मी से सूखने लगता है। पाचन क्रिया शिथिल पड़ जाती है, रक्त में एक प्रकार का विष उत्पन्न हो जाता है, जो जीवनी-शक्ति को क्षीण कर देता है। एड्रीनल ग्रंथियों से क्रोध की स्थिति में जो हार्मोन्स स्रवित होते हैं वे रक्त के साथ मिलकर जिगर में पहुँचते हैं और वहाँ जमे ग्लाइकोजन को शर्करा में बदल देते हैं। यह अतिरिक्त शक्कर शरीर पर विघातक प्रभाव डालती है। इस प्रकार क्रोध से बाधक तत्व को हानि हो या नहीं, अपनी हानि अवश्य होती है। क्रोध के कारण तो कोई क्षति कभी-कभार होती है, क्रोधी व्यक्ति की स्वयं क्षति हर बार होती है।

फिर कामनाएँ भी बहुरंगी होती हैं। किसी की प्रत्येक कामना की पूर्ति असंभव तो है ही, अनुचित भी है, क्योंकि उनमें से कई दूसरों की कामनाओं के विरुद्ध होती है। किसी एक की सब कामनाएँ पूरी हो जाने का वरदान यदि मिल जाए, तो उसमें अनेकों की अनेक कामनाएँ विफल होने का शाप भी सम्मिलित समझना चाहिए। इसलिए अपनी प्रत्येक कामना की पूर्ति को आवश्यक मानने और उसमें बाधा उत्पन्न होते ही क्रोध से भड़क उठने की मनःस्थिति को अपरिपक्व और क्षुद्र कहा जाएगा। फिर उस क्रोध की प्रतिक्रिया में औरों का भी क्रोध भड़क उठने की सम्भावना और उस सम्भावना के परिणामों का सामना करने को भी तैयार रहना चाहिए।

क्रोध के अधिकांश कारण तो अत्यन्त सामान्य व छोटे होते हैं। कई बार तो वे सर्वथा आधारहीन ही दिखाई पड़ते हैं। ऐसे भी समाचार सुनने में आते रहते हैं कि किसी छोटी-सी बात पर क्रोधावेश में आकर मरने तक पिटाई कर दी। यह अविवेकी क्रोध और उन्मत्त अहंकार के स्वाभाविक किंतु भयंकर परिणाम हैं।

ऐसे घातक परिणामों को लक्ष्य कर ही यह कहा गया है कि क्रोधी ‘अन्धा’ होता है। वह केवल उस ओर देखता है, जिसे वह दुःख का कारण या अपनी कामनाओं का बाधक समझता है। उसका नाष हो, उसे हानि, दुःख, कष्ट पहुँचे, यही क्रोधी का लक्ष्य होता है। वह लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाता, क्योंकि क्रोध एक अति वेगवान मनोविकार है। सोचने-विचारने का समय वह मस्तिष्क को देता ही कब है। वह तो आँधी-तूफान की तरह पूरे मनोजगत पर सहसा छा जाता है और अनर्थकारी कार्य सम्पन्न करने के बाद ही हटता है। इसीलिए तो ऋषियों ने कहा है-

यषसस्त पसष्चैव क्रोधो नाषकरः परः ।

अर्थात् मनुष्य द्वारा बहुत प्रयत्नों से अर्जित यश और तप को भी क्रोध नष्ट कर डालता है।

यह तो बाधक तत्व को हानि पहुँचाने की उत्तेजना उत्पन्न करने वाले क्रोध के दुष्परिणाम हैं। जब क्रुद्ध मनः-स्थिति में संपर्क में आए अन्य व्यक्तियों के प्रति रोषपूर्ण व्यवहार किया जाता है, तब वह तो सर्वथा अनुचित एवं अन्यायपूर्ण होता है। उसका परिणाम भी अधिक हानिकारक होता है। जिसे यों अकारण अपमानित किया गया है, उसके मन में अपमान का यह शूल निरन्तर चुभता रहता है और उसका परिणाम हर प्रकार से अशुभ ही होता है। आफिस से बिगड़कर आया ऑफिसर या क्लर्क पत्नी को पीटकर एवं बच्चों से नाराज होकर पारिवारिक सुख में आग लगाता है। बाहर का क्रोध घर के नौकर पर उतारने वाले, क्षुब्ध नौकर द्वारा छिपकर की जाने वाली चोरी, लापरवाही वह क्षति को भोगते हैं। क्रुद्ध मनःस्थिति में मित्रों, परिचितों से दुर्व्यवहार करने वालों को मैत्री सुख और परिचितों की सहानुभूति से वंचित रहना पड़ता है। साथ ही निंदा व तिरस्कार भी सहना पड़ता है।

क्रोधी मनुष्य दूसरे के समर्थ-शक्तिशाली होने पर जब अपने मन्तव्य में सफल नहीं हो पाता, वो वह स्वयं अपने ऊपर वैसी ही क्रिया करने लगता है, जो वह दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए करने की सोच रहा था।

अनौचित्य को देखकर उत्पन्न होने वाले विवेक नियंत्रित क्रोध की बात भिन्न है। भारतीय मनीषियों ने इसे मन्यु की संज्ञा दी है तथा दिव्यता का अंश बताया है। सामाजिक जीवन में वैसे क्रोध की जरूरत बराबर पड़ती है, उनमें दया, विवेक आदि उत्पन्न करने में बहुत समय लगता है और तब तक वे अत्यधिक अनर्थ कर चुके होते हैं। लोक कल्याणकारी क्रोध की, मन्यु की बात भिन्न है। उस क्रोध का जन्म उद्वेग-उत्तेजना से नहीं, विवेक-विचार से होता है। जनसामान्य के क्रोध में प्रतिकार और परपीड़न की ही उग्रता होती है। क्रोध का मन के दूसरे विकारों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। अस्थिरता, क्षणिकता, कुण्ठा, उद्वेग, अहंकार, असहिष्णुता आदि उसके सहचर है। चिड़चिड़ापन कमजोर व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाला क्रोध-आवेश ही है।

सात्विक आहार, प्रसन्नता एवं शाँत विचारों से क्रोध को जीता जा सकता है। क्रोध की बाह्य अभिव्यक्ति दबाकर मन ही मन लम्बे समय तक सुलगते रहना ही ‘बैर’ है। यह बैर क्रोध से भी भयंकर हानियाँ उत्पन्न करता है।

जब कभी क्रोध उमड़े तो एक प्रयोग कर देखना चाहिए। क्रोध का उभार होते ही चुपचाप कमरे में चले जाएँ और दर्पण में अपना चेहरा देखें। आप स्वयं देखेंगे कि चेहरे पर आयी तमतमाहट ने सौंदर्य को तनिक भी बढ़ाया नहीं, कम ही किया है। मुँह फीका पड़ गया है, जैसे तेज ज्वर चढ़ा हो। थोड़ी देर टहलने के बाद या तत्काल ही पानी से मुंह धोए और पोंछ कर फिर शीशे के सामने खड़े हों। पहले चेहरे और अब के चेहरे में अंतर स्पष्ट दिख जाएगा। क्रोध से बचकर मुसकराहट लाने का प्रयास जारी रखें। क्रोध को दूर से ही नमस्कार कर लें।

क्रोध सदैव जल्दबाजी का परिणाम होता है। जब कोई गलत कार्य होता दिखे या कोई हानि हो जाए, तो उसके कारण का निश्चय करने में जल्दबाजी न करें। स्मरण करें कि पहले विचारक्रम में बहुधा कारण खोजने में चूक हो जाती है। अतः अनुचित या हानिप्रद कार्य के घटनास्थल से इधर-उधर हट जाएँ, किसी सुरम्य उद्यान में टहलें या किसी प्रियजन के पास पहुँच जाएँ। उससे स्नेहपूर्ण बात करें। कुछ न हो सके तो एक गिलास ठण्डा पानी पिएं और क्रोध को शाँत करें। इस आवेग को भड़कने देने में घाटा ही घाटा है। शमित करने में लाभ ही लाभ है। इसलिए विश्व के समस्त धर्मशास्त्रों और नीति ग्रंथों में क्रोध को विनाशकारी अतः त्याज्य ही ठहराया गया है।


सच्चा त्याग और मोक्ष (Kahani)

सत्संग में बार-बार त्याग की महिमा का वर्णन आता था। उसे ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताया जाता था। सुनने वालों में से एक भावुक भक्त जरायुध ने अपनी सारी सम्पदा दान कर दी। फिर भी उन्हें न शान्ति मिली और न ईश्वर प्राप्ति हुई। जरायुध महाज्ञानी शुकदेव के पास पहुँचे और बोले-”जनक तो संग्रही हैं, तो भी उन्हें ब्रह्म ज्ञान हुआ है और मैं सब कुछ त्याग चुका, तो भी शान्ति लाभ न कर सका। इसका क्या कारण है?” शुकदेव ने कहा-”आवश्यक वस्तुओं का परमार्थ प्रयोजन में लगा देना तो नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है।

आध्यात्मिक स्तर के त्याग में हर वस्तु का ममत्व छोड़ना और उन्हें ईश्वर की धरोहर समझना पड़ता है। शरीर और मन भी सम्पदा है, उन्हें ईश्वर की अमानत मानकर उसी की इच्छानुसार प्रयुक्त किया जाने लगे तो समझना चाहिए कि सच्चा त्याग हुआ और मोक्ष का मार्ग मिला।”


पूर्वाग्रह का दुराग्रह न पालें

प्राचीन और अर्वाचीन की दीवार सत्य और असत्य के निर्णय में सहायक नहीं हो सकती। पुराना अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। जो नया है उसमें उपयुक्त भी है और अनुपयुक्त भी। यह परख विवेक एवं गुण-अवगुण की कसौटी पर की जानी चाहिए। उसमें नये और पुराने का पक्षपात नहीं रखा जाना चाहिए। ‘जो पुराना सो अच्छा, जो नया सो बुरा’ यह कोई तथ्य नहीं। इसके लिए दुराग्रह करने पर हम सत्य के निकट नहीं पहुँचते वरन् उससे दूर ही हटते जाते हैं।

पुराने समय के लोग सत्य की शोध में जितने सफल हुए, उसे अंतिम नहीं मान लेना चाहिए। सत्य के परम लक्ष्य तक पहुँचने में अभी लम्बी मंजिल पार करनी है और उस पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे ही बढ़ते चलना पड़ेगा। जो निष्कर्ष पूर्वजों ने निकाले वे अंतिम नहीं थे। उनने भावी प्रगति का मार्ग अवरुद्ध कर दिया है, यह मानकर नहीं चलना चाहिए। एक समय एक परिस्थिति में जो बात उपयुक्त जँचती है उसमें आगे चल कर सुधार करना पड़ सकता है। ऐसा विशाल दृष्टिकोण रखकर ही सत्य की शोध में प्रगति हो सकती है।

किसी जमाने में पृथ्वी को चपटी, ब्रह्माँड का केन्द्र, स्थिर माना जाता था। ग्रह-गणित का खाँचा भी इस मान्यता पर फिट बैठ गया। पीछे उस ज्ञान में प्रगति हुई। पृथ्वी को गोल, असंख्य सौर-मंडलों में से अपने ‘आदित्य’ सूर्य का छोटा ग्रह, पाँच गतियों में भ्रमण करने वाला माना गया। पुराने आग्रह पर अड़े रहना आवश्यक नहीं। चंद्रमा सौरमंडल का स्वतंत्र ग्रह है। इसी बात पर अड़े रहने से कुछ लाभ नहीं, चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है। इस तथ्य से इनकार करके यदि पुरातनवादी ही बने रहे तो सत्य से विमुख ही अपने को सिद्ध करेंगे।

अनेक प्राचीन सिद्धान्त सही हैं। वे प्राचीनकाल में जैसे सत्य थे, उपयोगी थे वैसे ही आज भी यथावत् हैं। सत्य, न्याय, प्रेम, संयम, सद्व्यवहार की उपयोगिता भूतकाल की तरह वर्तमान में अक्षुण्य है। सत्य के लिए काल का आग्रह उचित नहीं। तन ढकने की आवश्यकता प्राचीनकाल में समझी गई थी, वह तथ्य आज भी यथास्थान है। पर जिस तरह की पोशाक पुराने लोग पहनते थे, वैसी ही आज भी पहनी जाय, यह आवश्यक नहीं।

सर्दी के दिनों में भारी और गर्मी में हलके वस्त्र पहनने पड़ते हैं। ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ वस्त्रों का स्तर बदल जाता है। बदली हुई परिस्थिति का ध्यान न रखकर यदि कोई व्यक्ति पूर्व परम्परा का पालन करे और एक ही तरह का वस्त्र हर ऋतु में पहनने के लिए अड़ा रहे तो उसे बुद्धिमान नहीं कहा जाएगा। भले ही वह अपने को पुरातन पंथी मानता रहे।

प्राचीनकाल में कार्य और व्यवसाय के विभाजन की दृष्टि से समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्गों में बाँटा गया था। अभी भी बुद्धिजीवी, संरक्षक, उत्पादक एवं श्रमिक इन चार वर्गों में संसार के समस्त समाज बँटे हुए हैं। योग्यता, प्रकृति, परिस्थिति एवं अभिरुचि के अनुसार इस कार्य विभाजन में किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। पर कठिनाई तब उत्पन्न होती है जब वंश या कार्य के कारण किसी वर्ग को उच्च और किसी को निम्न बताया जाने लगा। यह विषय इतना गहरा उतर गया है कि लोग ऐसी मूढ़-मान्यता अपनाकर ऊँच-नीच का ढोंग रचते हैं और विवाह-शादियों में इसी आधार पर दहेज का वारा-न्यारा करते हैं। बहुत सोचने पर भी इस ऊँच-नीच की मान्यता को कोई औचित्य समझ में नहीं आता। शास्त्रों और पूर्व पुरुषों की दुहाई देना व्यर्थ है। हिन्दू धर्म इतना अनुदार और संकीर्ण हो ही नहीं सकता कि वह मनुष्य-मनुष्य के बीच घृणा-द्वेष बढ़ाकर सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने वाली खाई खोदे।

समयानुसार कितनी ही प्रथा-परम्पराओं में भारी हेर-फेर होता रहा है। सघन वन प्रदेशों में कृषि और पशु पालने के लिए भूमि और जल की व्यवस्था देखकर लोग किसी जमाने में बिखरे हुए छोटे गाँव बसाकर रहते थे। हिंस्र पशुओं और दस्युओं से जूझने के लिए आजीविका के लिए बड़े कुटुँब की आवश्यकता पड़ती थी। उन दिनों बहुपत्नी प्रथा तथा अधिक संतान को सौभाग्य चिन्ह मानने का कारण था। आज के विकसित समाज में बहुपत्नी प्रथा अवाँछनीय हो गई है और जनसंख्या बढ़ने से संतान निग्रह की आवश्यकता अनुभव हुई। पुरानी मान्यताओं को बदलने के लिए समय ने हमें विवश कर दिया है। अब पूर्वाग्रह के लिए लड़ने वाला परम्परावादी अदूरदर्शी ही माना जाएगा।

पुरानी रस-भस्मी अच्छी मानी जाती है, पर पुराना घी कोई नहीं खाता। एक समय की उपयोगी वस्तुएँ समयानुसार निरर्थक हो जाती हैं। तब उसे सुधारने या बदलने की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा न होने पर विश्व के हर विचारशील वर्ग द्वारा संकीर्ण, अनुदार एवं अन्यायी होने का आरोप लगता है। बात यहीं तक सीमित नहीं। रूढ़िवादिता, अंधविश्वास से क्षुब्ध हुए लोग अगले दिनों प्रतिशोध की भावना से ओत-प्रोत हो क्या कुछ न कर गुजरेंगे, उसका अनुमान लगा सकना किसी भी दूरदर्शी के लिए कठिन नहीं होना चाहिए। अच्छा हो हम समय रहते चेतें, अपनी भूल सुधारें। मान्यताओं और परंपराओं में हेर-फेर होते रहने का क्रम अनादि काल से चला आ रहा है। उसके लिए हमें अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए, इसी में हमारा कल्याण है।


शिक्षा का सर्वोत्तम समय (Information)

एक महिला शिकागो के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री फ्राँसिस वेलैण्ड पार्कर से यह पूछने गई कि वह अपने बच्चे की शिक्षा कब से प्रारम्भ करे? पार्कर ने पूछा, आपका बच्चा कब जन्म लेगा? महिला ने कहा-वह तो पाँच वर्ष का हो गया। इस पर पार्कर ने कहा-मैडम ! अब पूछने से क्या फायदा। शिक्षा का सर्वोत्तम समय तो पाँच वर्ष तक ही होता है, सो आपने यों ही गँवा दिया।


विज्ञान भी कहता है-’ब्रह्म सत्यं जगन्माया’

विज्ञान ने अब इतनी प्रगति कर ली है कि वह भौतिकवादी मान्यताओं को पीछे छोड़कर आध्यात्मिक शक्तियों के अनुसन्धान और अनुशीलन की कक्षा में जा पहुँचा है। अल्बर्ट आइन्स्टीन का सापेक्षवाद (थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी) इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है और उससे यह ज्ञात होता है कि वैज्ञानिक भी जिस अंतिम सत्य की जानकारी के लिए बेचैन हैं उसके लिए उन्हें पदार्थ की भौतिकीय जानकारी (फिजीकल नॉलेज ऑफ एलीमेन्ट्स) से हटकर चतुष्विमतीय (फोर डाईमेंशनल) अथवा उससे भी अधिक विमतीय (मल्टी डाईमेंशनल) संसार और तथ्यों का अध्ययन करना आवश्यक होगा।

डाईमेंशन का अर्थ है- आकार। आकार में जितनी बातें सम्मिलित हों, उतने ही डाईमेंशन की वह वस्तु होगी। सरल या सीधी रेखा, जिसमें सिर्फ लम्बाई होती है। एक विमतीय (वन डाईमेंशनल) आयत (रेक्टैन्गिल) जिसमें लंबाई और चौड़ाई होती है। द्विविमतीय (टू डाईमेंशनल) और इसी प्रकार कोई ठोस वस्तु लें तो उसमें लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई (थ्री डाईमेंशनल) होंगे। संसार के जितने भी पदार्थ हैं, वह इन्हीं तीन प्रकार के आकारों के अंतर्गत आते हैं। हमारे पास जो भी वस्तुएँ हैं, वह इन्हीं तक सीमित हैं, इसलिए भौतिक विज्ञान जब भी किन्हीं वस्तुओं का अध्ययन करता है वह इसी सीमा की जानकारी दे पाता है।

लेकिन अल्बर्ट आइन्स्टीन ने बताया कि यह गलत है। जब तक हम एक और चौथे डाईमेंशन ‘समय’ की कल्पना नहीं करते, तब तक वस्तुओं के स्वरूप को अच्छी प्रकार समझ ही नहीं सकते। सभी पदार्थ समय की सीमा से बँधे हैं अर्थात् हर एक वस्तु का समय भी निर्धारित है, उसके बाद या तो वह अपना रूपांतर कर देता है या पदार्थ रूप नष्ट हो ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। मनुष्य शरीर भी एक दिन नष्ट हो जाता है, फिर वस्तुओं के बारे में तो कहना ही क्या? मनुष्य धोखे में रहता है कि यह वस्तु मेरी है, इस पर मेरा अधिकार है, इसका मैं उपभोग करूंगा, यह मेरे काम की है, इसका उपार्जन मैंने किया है। पर इस चौथे डाईमेंशन को ध्यान में रखकर विचार करें तो पता चलेगा कि जिन वस्तुओं को हम अपना कहते हैं, वह न अपनी है न किसी दूसरे की, सब प्राकृतिक परमाणुओं से बनी आकृतियाँ मात्र हैं। उनका कोई निश्चित स्वरूप नहीं। समय की मर्यादा में बँधे परमाणु जब टूट-टूट कर अलग हो जाते हैं तो वस्तु का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। इस तरह पानी के बुलबुले के समान संसार बनता-बिगड़ता रहता है। स्थिर-तत्व तो कुछ और ही है।

आइन्स्टीन का संपूर्ण सापेक्षवाद का सिद्धान्त इसी तथ्य को समझना है। आज वैज्ञानिकों, भौतिकवादी, शिक्षितों और पाश्चात्य देशों के निवासियों तक को इस सापेक्षवाद के सिद्धान्त ने उलझन में डाल दिया है। बड़े-बड़े डिफ्रेंन्शियल कैलकुलस (एक प्रकार की गणित) और बाइनामियल जैसी थ्योरम्स को समझ लेना आसान समझा जाता है किन्तु आइन्स्टीन के सापेक्षवाद की भावानुभूति को समझना दुस्तर हो रहा है। कारण कि वह संसार, सांसारिक परिस्थितियों, प्रकृति और मानवीय चेतना का एक ऐसा अध्ययन है जो मनुष्य को संसार की यथार्थता से अवगत कराती है और उसे जीवन के प्रति एक नये प्रकार का दृष्टिकोण अपनाने की सम्मति प्रदान करती है। जिसमें प्रकृति ही प्रकृति, पदार्थ ही पदार्थ नहीं वरन् एक परम तत्व (एब्सेलूट एलेमेन्ट) भी है, जिसके जानने से ही संसार की वास्तविकता का पता लगाया जा सकता है। भारतीय अध्यात्म विज्ञान उसे ही ईश्वर, परमात्मा, परमगति और संसार की सर्वोच्च सत्ता मानता है, दोनों सिद्धान्त एक स्थान पर मिल रहे हैं। केवल नाम और अनुभूति के तरीके (वे ऑफ कान्सेप्शन) में अंतर है।

संसार में जितने भी पदार्थ हैं वह 1-समय 2-स्थान 3-गति 4-कारण-इन चार के अंतर्गत ही आते हैं। हम समय की सीमा में बँधे हैं अर्थात् हमारा एक निश्चित समय है। अधिकतम अपनी आयु भर के अन्दर की वस्तुएँ सोचते-विचारते हैं, न तो जन्म से पहले की कल्पना है और न मृत्यु के बाद की, इसलिए जो कुछ भी करते हैं उसका सीधा संबंध इस समय से ही होता है। उसके बाहर का कोई भी संसार हमारे मस्तिष्क में नहीं आता।

होना यह चाहिए कि हम परम समय को ध्यान में रखकर ही अपने क्रियाकलाप निर्धारित करें। भारतीय आचार्यों ने आचार-संहिता तैयार करते समय इस बात को ध्यान में रखा था और ऐसी व्यवस्था की थी कि मनुष्य पूजा-उपासना, संयम, सेवा-सदाचार का पालन करता हुआ अपने भौतिक कर्तव्य पूरे करे, ताकि आत्म-शक्तियों का क्षय न हो। शक्ति को विघटित कर देने से मनुष्य इस जीवन में भी दुःखी होता है और वह निम्नगामी योनियों की ओर आकर्षित हो जाता है। बढ़ी हुई शक्ति चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक उससे यह जीवन तो सफल होता ही है उस परम स्थिति को प्राप्त करने में भी लाभ मिलता है। इस विज्ञता का ही परिणाम है कि भारतीय जीवनशैली आज भी अपने ही ढंग की है। उसमें पाश्चात्य ढंग के विकारों के लिए कोई स्थान नहीं।

‘समय’ की तरह ही हम ‘स्थान’ से भी बँधे हैं। अब विज्ञान और समाज शास्त्र ने इतनी उन्नति कर ली है कि सारी पृथ्वी एक परिवार की तरह हो गई है और हमारी प्रत्येक क्रिया का प्रभाव सारे विश्व में पड़ता है। अब हम संपूर्ण पृथ्वी की घटनाओं और हलचलों के बारे में विचारते हैं पर इससे पहले का मनुष्य अधिक से अधिक अपने देश की बात सोच पाता था; क्योंकि उसके लिए संसार उतने ही देश (स्थान) में बँधा था। कोई समय ऐसा भी रहा होगा, जब उसका यह विस्तार का संसार और भी छोटा रहा होगा। आज तो मनुष्य स्वार्थी नहीं रह सकता, उसे विवश होकर संसार के और लोगों के हित पर ध्यान देना अनिवार्य हो गया है। पहले उसके कर्तव्य की सीमा बहुत छोटी थी। सापेक्षवाद के चार अनुभागों में दूसरा ‘स्थान’ हमें यह बताता है कि हम जितने संसार से परिचित हैं, उतने से ही अपने कर्त्तव्य से जुड़े रहते हैं और उतने लोगों की भलाई या बुराई को ध्यान में रखकर काम करते हैं।

एक अन्य तथ्य यह है कि हम ‘गति’ के नियमों से भी बँधे हुए हैं। प्रकृति के सभी परमाणु क्रियाशील हैं। छोटे-छोटे टीले बढ़कर पहाड़ बन जाते हैं और छोटी-छोटी नालियाँ, नदियाँ, गड्ढे, तालाब बन जाते हैं और पौधे विशालकाय वृक्ष। हमारी पृथ्वी में दिन-रात और जलवायु संबंधी परिवर्तन भी गति के ही परिणामस्वरूप होते हैं। प्राकृतिक गतिशीलता से हम स्वयं भी प्रभावित होते हैं। ऐसा कोई भी पदार्थ या प्राणी इस धरती पर नहीं है जो इन परिवर्तनों से प्रभावित न होता हो। हमारे सुख-दुःख भी इनके साथ जुड़े हुए हैं, कभी-कभी परिवर्तन हमारी इच्छाओं के अनुरूप होते हैं तो हमें सुख मिलता है और कभी-कभी प्रतिकूल होने से हमें दुःख और कष्ट का अनुभव होने लगता है। तात्पर्य यह है कि गति हमारे भौतिक जीवन को ही नहीं चेतन विचार और भावनाओं को भी प्रभावित करता है।

आज हम जिस स्थिति में हैं, वह अनेक घटनाओं का क्रमबद्ध इतिहास होता है। इसे ही ‘कारण’ कहते हैं। जो आइन्स्टीन के सापेक्षवाद सिद्धान्त का चौथा तत्व है। हमारा जन्म भी स्वयं भी कारण के विकास की प्रतिक्रिया है। इसी प्रकार संसार में जो कुछ भी है, वह पूर्व से घटनाबद्ध है। कोई भी प्रभाव या परिणाम कारण के बिना संभव नहीं है।

यह चार बातें हैं जो हमारे जीवन को घेरे हुए हैं। हम समय, स्थान, गति और कारण से बँधे हुए हैं। इन चार के अतिरिक्त हम और कोई बात सोच भी नहीं सकते। सही बात तो यह है कि हमारे विचार इन चार बातों में इतने आसक्त हो गये हैं कि हम इससे आगे की कोई बात सोच ही नहीं पाते। इन चारों से जो जितनी संकीर्णता में बँधा रहता है वह उतना ही स्वार्थी, संकीर्ण और भोगवादी होता है। जो व्यक्ति केवल वर्तमान की बात सोचता है, भूत और भविष्य के निष्कर्षों का लाभ नहीं लेता, वही पाप और स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों को स्वयं भी करता है और दूसरों को भी प्रोत्साहित करता है। इसी प्रकार जो केवल अपने शरीर या अधिक से अधिक अपने परिवार के ही हित की बात सोचता है, उसके कार्य भी संकीर्ण और दुःखद होते हैं। विकास संबंधी अवस्था को भी जो बहुत छोटी सीमा में मानते हैं और भौतिक जगत में होने वाली गतिविधियों में किसी दूरवर्ती कारण को नहीं देखते, वे गलत लक्ष्य बनाते या अधिक से अधिक अपने स्वार्थ की बात सोचते हैं। संकीर्णता की यह मनोवृत्ति ही संसार में दुःख का कारण है। इसी का नाम माया या भ्रम कहा गया है।

मैं अरु मोर तोर तै माया । जेहिवष कीन्हें जीव विश्व निकाया॥

अर्थात् मैं और मेरे, तू और तेरे की संकीर्णता ने ही मनुष्य को भौतिक बंधनों में बाँध लिया है, इसी का नाम माया है।

मानवीय चेतना और मानवीय लक्ष्य का विस्तृत अध्ययन, चिन्तन और मनन करने के बाद आइन्स्टीन को भी कहना पड़ा कि मनुष्य का इस प्रकार समय, स्थान, गति और कारण की संकीर्णता में बँधना उसकी भयंकर भूल है। उन्होंने बताया कि ये संपूर्ण चीजें है ही नहीं। संसार में न तो समय का कोई अस्तित्व है, न स्थान का, न गति का और न किसी कारण या परिणाम का। यह चारों मस्तिष्क की उपज हैं और हम जब तक इनसे प्रतिबंधित हैं, तब तक अंतिम सत्य की अनुभूति नहीं कर सकते। अंतिम सत्य वह है जो इन चारों से बँधकर नहीं इनको बाँधकर रखता है। जो स्वयं इनसे प्रभावित नहीं होता वरन् इन्हें प्रभावित करता है। उन्होंने बताया जो भी है, जैसा भी है, मस्तिष्क इन चारों से ऊपर का एक बहु-विमतीय (मल्टीडाईमेंशनल) तत्त्व है, उसे इन चारों चीजों से मुक्त कर दिया जाय तो परम स्थिति को अच्छी तरह जाना जा सकता है, वही संसार का अंतिम सत्य परमात्मा, परमपद, मोक्ष या स्वर्ग और मुक्ति की स्थिति है।

इतने बड़े दृश्य संसार को मिथ्या कह देना एक वैज्ञानिक के लिए साधारण बात नहीं थी। उन्हें सापेक्षवाद के सिद्धान्त पर नोबुल पुरस्कार प्रदान किया गया था, इसलिए जो लोग इस सिद्धान्त की गहराई को नहीं समझ सके, उनका प्रश्नों पर प्रश्न करना स्वाभाविक था। आइन्स्टीन से पूछा गया कि-”यह जो समय और पदार्थों की हमें अनुभूति होती है, दिखाई देते हैं यह सब क्या है? उनने उत्तर दिया-’माया’ अर्थात् सापेक्षता। हमने अनुभव कर लिया है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय 24 घण्टे का होता है। समय कोई भौतिक पदार्थ नहीं है यह तो दो घटनाओं के बीच की अवधि की माप है, जो कभी शाश्वत सत्य नहीं हो सकता। क्योंकि यदि आप चंद्रमा में बैठे हों तो एक बार सूर्य के उदय होने और अस्त होने में 12 ग 7 = 84 घंटे लग जाते हैं। 84 घंटों को यदि 60 मिनट के घंटों में बाँटे तो वहाँ का दिन 100 घंटे से भी बड़ा होगा, इसलिए समय कोई स्थिर या शाश्वत वस्तु नहीं है। सृष्टि जहाँ से आरंभ हुई है, वहाँ से लेकर सृष्टि जहाँ समाप्त होगी, वहाँ तक को समय की इकाई क्यों न मानें? कारण कि अंतिम सत्य तो यही दो घटनाएँ होंगी। हमारे जन्म से मृत्यु तक का समय इसी विशाल समय की सापेक्षता ही तो है। इसलिए जब तक हम उस अंतिम समय को नहीं जान लेते, समय संबंधी सारे माप और उनको प्रभावित करने वाले कार्य सब गलत हैं।

इस दृष्टि से केवल वही कार्य और कर्त्तव्य हमारे लिए सच्चे होते हैं, जो समय की इस परम गति को प्रभावित करते हैं। शेष सभी कार्य चाहे उसमें खाना, पहनना, चलना, उठना,बैठना भी क्यों न सम्मिलित हो गलत भ्रम है। यह कार्य वैसे दोनों ही परिस्थितियों में उभयनिष्ठ रहते हैं। इसलिए हम अपने जीवन में उन्हीं कार्यों को शुद्ध व यथार्थ मानते हैं, जिनसे हमें परम-काल गति की अनुभूति में सहायता मिलती है। केवल भौतिक सुख के लिए किये गये सभी कार्य व्यर्थ हैं। उसमें हमारा चाहे कितना ही श्रम, बुद्धि, कौशल, साधन क्यों न प्रयुक्त हो रहा हो।

हमारे लिए कोई भी स्थान सत्य नहीं है। हमारे द्वारा वस्तुओं को पहचानने के अतिरिक्त स्थान का कोई अर्थ ही नहीं है। जिस प्रकार समय अनुभव के अतिरिक्त कुछ नहीं था, इसी तरह स्थान हमारे मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न काल्पनिक वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। वस्तुओं को समझने तथा उनकी व्यवस्था जानने में सहायता मिलती है, इसलिए स्थान की कल्पना को हम सत्य मान लेते हैं अन्यथा स्थान एक निश्चित तरीके के परमाणुओं के अतिरिक्त और है भी क्या? परमाणु भी इलेक्ट्रान्समय होते हैं, इलेक्ट्रॉन एक प्रकार की ऊर्जा निकालता रहता है जो तरंग रूप में होता है। जिन वस्तुओं के इलेक्ट्रॉन जितनी मंदगति के हो गये है, वह उतने ही स्थूल दिखाई देते हैं। यह हमारे मस्तिष्क की देखने की क्षमता पर निर्भर करता है। यदि हम पृथ्वी को छोड़कर सूर्य जैसे ग्रह में बैठे हों तो पृथ्वी एक प्रकार के विकिरण के अतिरिक्त और कुछ न दिखाई देगी। इसलिए स्थान भी वस्तुओं की संरचना का अपेक्षित (रिलेटिव) रूप है। उसकी यथार्थता भी परम अवस्था पर ही हो सकती है।

‘गति’ का ज्ञान भी हमारी सापेक्ष बुद्धि का परिणाम है। अभी हम कहते हैं कि यह हमारा कमरा स्थिर है। ऐसा कहने का हमें इसलिए अधिकार है कि पृथ्वी के साथ हमारा कमरा भी घूम रहा है। यदि एक स्टेशन पर दो गाड़ियाँ समान गति से एक ही दशा में दौड़ रही हों तो दोनों गाड़ियों के सवार अपने आपको स्थिर अनुभव करेंगे। किन्तु एक गाड़ी 45 मील प्रति घंटा की गति से पूर्व को जा रही हो और दूसरी 45 मील प्रति घंटा पश्चिम की ओर तो दोनों गाड़ियाँ जिस स्थान पर साथ-साथ होंगी वहाँ एक-दूसरे की गति 90 मील प्रति घंटा अनुभव करेंगी। इससे यह सिद्ध होता है कि ‘गति’ भी एक ‘परमगति’ की सापेक्ष है। उसमें भी कोई अंतिम सत्य नहीं है।

पदार्थों के ‘कारण’ के संबंध में भी हम पूर्ण सापेक्ष हैं। थोड़े से तत्व चाहे उन्हें पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु कहें अथवा हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, सल्फर, जिंक, कोबाल्ट, एसिड्स कहें, इन्हीं से मिल-जुल कर भौतिक पदार्थों का बनना-बिगड़ना चालू रहता है। हमारे कोई भी कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ इन तत्वों की परस्पर रासायनिक क्रिया का ही परिणाम होते हैं। परंतु जब हम पदार्थ के अंतिम टुकड़े परमाणु को संरचना, जो कि रासायनिक क्रिया में भाग लेता है, पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि संपूर्ण पदार्थों में आवेश का अन्तर है अन्यथा मूलभूत तत्व कोई और ही है। पदार्थ शक्तियों के परिवर्तित रूप हैं इसी प्रकार शक्तियों की भी एक अंतिम स्थिति होनी चाहिए। इसका आभास प्रकाश की क्वांटम थ्योरी से होता है। अर्थात् संसार का कारण भी भौतिक नहीं कोई परम तत्व है।

उस परम अवस्था को कैसे अनुभव करें, जब आइन्स्टीन से यह प्रश्न किया गया तो उनका जवाब था हम समय, स्थान, गति और कारण की सापेक्ष अवस्था से यदि अपने मस्तिष्क

को ऊपर उठा दे तो उस परम अवस्था की अनुभूति कर सकते हैं। हमारी सापेक्ष अवस्था की अनुभूति ही माया है किन्तु यदि हम इन चारों से ऊपर उठकर संसार का अनुभव करें तो अंतिम सत्य की अनुभूति कर सकते हैं। सापेक्षवाद के सिद्धान्त का यही संक्षेप में सार और निष्कर्ष है।


“ईश्वर के सान्निध्य से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है (Kahani)

गुरुकुल सघन वृक्षों की छाया में चलता था। ऋतु की विषमता से बचने के लिए कुछ पर्ण-कुटीर भी बने थे। प्राचार्य पिप्पलाद छात्रों को जहाँ ज्ञान-विज्ञान के अनेक विषय पढ़ाते , वहाँ साथ-साथ यह भी कहते रहते कि “ईश्वर के सान्निध्य से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।” छात्रों में अधिक तार्किक थे आश्वलायन। उनने अवसर पाकर जिज्ञासा प्रस्तुत की-देव, ईश्वर की निकटता से शान्ति मिले, इतना तो समझ में आता है, पर ऐश्वर्य मिले, इसका क्या तुक? आचार्य ने समयानुसार उत्तर देने की बात कहकर प्रसंग टाल दिया। शिक्षण सत्र समाप्त हुआ। पुराने छात्रों की विदाई और नयों की भरती का क्रम चल रहा था। पुराने छात्रों में राजकुमार सुतीक्ष्ण भी थे। छात्रों के मध्य कौटुम्बिकता और समता का व्यवहार चलता था। विदाई के समय आचार्य ने आश्वलायन ने सुतीक्ष्ण को अपने घर पधारने के लिए निमन्त्रण दिया। बात तो असमंजस की थी, पर राजा ने पुराने सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। यथासम्भव साज-सज्जा के साथ वे पधारे। घर छोटा था। साधनों के अभाव से राज्याधिकारियों ने प्रबन्ध स्वयं कर लिया। आवभगत और वार्तालाप के उपरान्त राजा विदा हुए, तो उन्होंने निर्धन मित्र के लिए बहुत से सुविधा-साधन जुटा दिये। देखते-देखते वे निर्धन से सुसम्पन्न हो गये। समय बीता, आश्वलायन की फिर एक बार पिप्पलाद से भेंट हुई। आचार्य ने पुराना प्रसंग याद दिलाया और पूछा-राजा का संपर्क यदि दरिद्रता दूर कर सकता है, तो ईश्वर का सान्निध्य ऐश्वर्य प्रदान क्यों नहीं कर सकता? देर तो लगी, पर आश्वलायन का संदेह पूरी तरह दूर हो गया।


विषम परिस्थिति में नवयुग की तैयारी - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

(पू.गुरुदेव द्वारा अगस्त 1988 में दिया गया वीडियो संदेश)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों! गज-ग्राह का आख्यान तो आपने सुना होगा; गज-ग्राह के मुँह में फँसा हुआ जब बेबस हो गया, बेहाल हो गया और कोई रास्ता उसको दिखायी नहीं पड़ा तो उसने भगवान को पुकारा, क्योंकि भगवान के सिवाय कोई और सहायता करने वाला था नहीं, उसके पास। तो भगवान को किस तरीके से पुकारा ? भगवान को पुकारने के लिए अनेकों उपाय हैं। कहीं कीर्तन किये जाते हैं, कहीं यज्ञ किये जाते हैं, कहीं अनुष्ठान किये जाते हैं, कहीं जप किये जाते हैं, लेकिन बेचारा गज! यह सब नहीं कर सकता था। उसने एक फूल उसी पानी में से कहीं से उठा लिया और अपनी सूँड़ को ऊँचा करके भगवान को जोर-जोर से पुकारा। भगवान ने उसकी भावना को समझा, हृदय को समझा, मुसीबत को समझा, उसके कष्ट को समझा, अन्तरात्मा को समझा, और दौड़ करके आये तथा अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह को मार डाला और गज को छुड़ा लिया। आपको यह कथा मालूम है न ?

ठीक यही कथा, मनुष्य जाति के सामने इस समय भी उपस्थित हुई है। मनुष्य जाति को आप गज के तरीके से मान सकते हैं, जो फिलहाल अनेकों मुसीबत में फँसी हुई है। बहुत-सी मुसीबतें तो पहले भी हमने बतायीं थीं। फिर बता रहे हैं! वातावरण बिगड़ रहा है, वायुमण्डल बिगड़ रहा है, जनता की संख्या अंधाधुँध पैदा होती हुई चली जा रही है। विकिरण बढ़ रहा है, युद्ध की सामग्रियाँ बढ़ रही हैं, जिससे कि हर आदमी की मुश्किलें बढ़ती चली जा रही हैं। यह सब बातें तो पहले भी आपको बतायीं थीं, लेकिन इस साल, जिस साल कि आप सब सामने बैठे हुए हैं, इसकी कुछ विशेष मुसीबतें हैं। उन विशेष मुसीबतों की ओर आपका ध्यान जाना चाहिए, आपको उनका अनुभव करना चाहिए। अभी इस साल कितनी महँगाई है, आपको मालूम है? टमाटर बाजार में बीस रुपया किलो मिल रहा है, आपको मालूम है न, महँगाई का क्या हाल है? महँगाई के मारे सामान्य आदमी का सौ में से निन्यानवे आदमियों का कचूमर निकल रहा है।

दूसरी मुसीबत इस समय की क्या है? प्रकृति हमसे नाराज हो गयी है और उसने नाराज होकर वर्षा के ऊपर अपना प्रभाव डाला है। समय पर वर्षा न होने की वजह से क्या-क्या मुसीबतें आ रहीं हैं, आपको मालुम है न? खेती सूख रही है, कुओं का पानी नीचा होता चला जा रहा है, डेम और नदियों का पानी पहले की अपेक्षा घटता चला जा रहा है। पानी की कमी से बिजली कम पैदा होने की मुसीबत आ रही है। बिजली की कमी से बत्ती, पंखे , कल-कारखानों की पचासों समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं, और गाँवों में तो बिजली के बिना ट्यूबवैल चल नहीं पाते। कोई और तरीका तो है नहीं सिंचाई का, क्योंकि नहरों, तालाबों के सूखने से पानी का कोई और इंतजाम नहीं है। हमारे यहाँ ज्यादातर बिजली पानी से ही बनती है। पानी का अभाव हुआ तो बिजली बनाना तो दूर पीने का पानी, नहाने का पानी, खेती का पानी और ट्यूबवैलों से जो कुछ निकल सकता था वह सब भी दैनिक आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर सकता। पानी की एक बड़ी भारी मुसीबत है।

महँगाई एक, पानी दो इनके अतिरिक्त एक और तीसरे नम्बर की मुसीबत है जो कि आप लोगों के सामने है। वह कौन-सी है? वह यह है कि पुराने जमाने में जब अकाल पड़ते थे और खाने-पीने की चीजों का अभाव होता था, तो लोग भीख माँगने लगते थे, पर आजकल तो आप जानते ही हैं कि चोरी, उठाईगीरी और डकैतियों के अलावा और कोई तरीका ही नहीं रह गया है। एक ही सबसे सस्ता तरीका है कि हत्या, चोरी और उठाईगीरी की जाये। अवाँछनीय तत्वों की वृद्धि होने की इस साल विशेष संभावना है, आक्रमण बढ़ेंगे और तरह-तरह की मुसीबतें भी बढ़ेंगी। यह तीसरे तरह की मुसीबत है।

क्या साम्प्रदायिकता कुछ ठंडी हुई है ? नहीं, यह बिल्कुल ठण्डी नहीं हुई? विवाद एक जगह ठण्डा नहीं होने पाता कि कहीं और तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। यह साम्प्रदायिकता उपद्रव कृष्ण जन्मभूमि से लेकर बाबरी मस्जिद तक, हर जगह इसी के लिए धुआँ निकल रहा है, हर तरफ आग लग रही है। यह आग विकराल रूप धारण कर ले तो कोई अचम्भे की बात नहीं मानी जाएगी। आतंकवाद! आतंकवाद को आप देख रहे हैं न? कहीं बम फट रहे हैं, कहीं गोलियाँ चल रही हैं, कहीं कुछ और हो रहा है। ये सारी की सारी मुसीबतें-पाँचों मुसीबतें इस तरह की हैं जो कि आजकल हम सब लोगों के ऊपर ठीक उसी तरीके से छायी हुई हैं, जैसे गज के ऊपर मुसीबत आयी थी। अब हम लोग क्या करें ? जो कोई उपाय होगा, वह किया भी जाएगा। जनता करेगी, गवर्नमेंट करेगी, समाज से भी किया जाएगा। जो कुछ भी उपाय संभव है, हम सब लोग करेंगे ही। उसके बारे में तो मुझे कुछ कहना नहीं है। गवर्नमेंट इसके सम्बन्ध में मार्गदर्शन करती ही है। समाज के नेता भी बताते रहते हैं कि इस मुसीबत के वक्त में पानी कम खर्च करना चाहिए। बिजली भी कम खर्च करनी चाहिए। तालाब बनाना चाहिए, कुएँ खोदने चाहिए। सब अलग-अलग उपाय बताते ही हैं। ये भौतिक तरीके हैं। लेकिन इससे भी बड़ा एक आध्यात्मिक उपाय है, जो गज ने अपनाया था। वह क्या ? उसने भगवान को पुकारा था। देवताओं और दैत्यों में जब भी लड़ाई हुई, देवता मुसीबत में आये, तो वे भाग कर के भगवान के पास में गये और यह कहा कि हमारी मुसीबत को आप दूर कर दीजिए। तब भगवान ने कोई न कोई उपाय निकाला, चाहे दुर्गा का निर्माण किया हो, चाहे सीता का , दधीचि की अस्थियों से इन्द्र वज्र बनाया हो, चाहे स्वर्ग से गंगा को धरती पर लाया गया हो, जो भी उपाय किया गया हो, लेकिन किया जरूर गया। ऐसे बड़े उपाय भगवान के द्वारा ही संभव है, इनसान के द्वारा यह संभव नहीं है। भगवान को पुकारने के लिए हमने इस समय में एक बड़ा उपयोगी और बड़ा ही आवश्यक उपाय आपके सामने है और आपको बताया भी जा चुका है कि अब यज्ञ वैसे नहीं होने चाहिए, जिनमें कि सैंकड़ों-हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। जनता भी देने लायक स्थिति में नहीं है और यदि देने लायक भी हो, तो जनता में से हरेक का यह ख्याल है कि यज्ञ से पानी बरसने की संभावना के बारे में हम आपको कोई विश्वास नहीं दिला सकते। फिर इस साल का पूरा समय कैसे कटेगा? हम आपको इस बात की ठीक जानकारी दे करके डराना नहीं चाहते, हैरान नहीं करना चाहते, पर यह जरूर कहेंगे कि वर्षा का सम्बन्ध उससे जुड़ा हुआ है। यज्ञ के सम्पन्न होने पर वर्षा न होने पर जनता क्या कहेगी आपको ? आपका उपहास होगा और यज्ञ का अपमान होगा, हमारा अपमान-जिनने स्कीम बनायी है। इसलिए यज्ञों को तो हरेक जगह जैसे पिछले साल हुए थे वैसे ही करना है। अन्तर सिर्फ इतना है कि उनके स्थान पर नये यज्ञों की शैली प्रचलित की है, जो गरीब से गरीब व्यक्ति के यहाँ भी आसानी से सम्पन्न करा सकते हैं। वे कौन से यज्ञ हैं ? वे दीपयज्ञ हैं। दीपयज्ञ में एक थाली में पाँच दीपक रखे जाते हैं। यह यज्ञ का समान हुआ। थाली अपने घर से लेकर के चौक पूर कर उसे सजा लें, एक रुपये का समान उसमें रख लें, तो बड़े मजे से यह यज्ञ हो सकता है। यज्ञ के कर्मकाण्ड तो सब वही हैं, जो सामान्य यज्ञ में हुआ करते हैं। दो एक बातें कम कर दी हैं जैसे घृत-अवघ्राणम्, भस्मधारणम्, वसोधारा आदि। बाकी यज्ञ के देव आवाहन मंत्र और यज्ञ का सारा स्वरूप वही है। केवल वस्तुएँ कम कर किये जाने में कोई बुराई है ? नहीं कोई बुराई नहीं है। यहाँ याज्ञवल्क्य-जनक का संवाद कुछ ऐसा ही है। जनक ने पूछा कि कोई खराब वस्तु हो और हम यज्ञ न कर पायें, तो कैसे हवन करें? तब याज्ञवल्क्य जी ने कहा-”यज्ञ करना तो आवश्यक है। वह तो करना ही चाहिए। गायत्री और यज्ञ तो हमारी भारतीय संस्कृति के माता-पिता है। इनका पूजन तो करना ही चाहिए। इनको तो भोजन कराना ही चाहिए। वायुमण्डल, वायु संशोधन के कार्य के लिए तो इन्हें करना ही चाहिए। वातावरण संशोधन का काम तो हाथ में लेना ही चाहिए , पर वस्तुएँ कम कर सकते हैं।” तब राजा जनक ने पूछा-क्या वस्तुएँ कम कर सकते हैं? उन्होंने कहा- “घी अगर आपके पास न हो , तो केवल हवन सामग्री से जो वनस्पतियों से बनता है, उससे ही आप हवन कर लें ।” इस तरह बिन घी के आप हवन कर लें। उन्होंने फिर कहा- वर्षा नहीं होगी तो वनस्पतियाँ भी पैदा नहीं होंगी। तो फिर कैसे हवन करेंगे? तो याज्ञवल्क्य जी ने कहा- “आप लकड़ियों की समिधाओं से भी हवन कर सकते हैं।”कहने का आशय है कि कम से कम वस्तुओं से हवन कर सकते हैं। इसी तरह मुसीबत के समय में आपातकालीन परिस्थितियों में हमने दीपयज्ञ करने के लिए कहा है लोगों से और लोगों ने स्वीकार भी किया है। इसको आपको मिलेंगी, उसके कारण से पुण्य उतना ही मिलेगा जितना कि यज्ञ कुण्डों को खोदकर के हजारों रुपया इकट्ठा जो किया करते थे। लगभग उतना ही पुण्य मिल जाएगा इस यज्ञ से ।

यह यज्ञ का तरीका है- एक। यज्ञ का तरीका नम्बर दो- सबेरे प्रातःकाल सूर्योदय के समय पर यज्ञ प्रारंभ हो जाना चाहिए। जब तक धूप फैलती है और ठण्डक रहती है। अपने घर के काम का वक्त होता है, दुकान खोलने का वक्त होता है। उस समय से सबेरे का कार्यक्रम तो वैसे ही समाप्त हो जाएगा, यह भी आपको भुला नहीं देना चाहिए। सायंकाल का कार्यक्रम यह है कि सायंकाल को कीर्तन किया जाये । पुराने कीर्तनों और हमारे कीर्तनों में थोड़ा फर्क है। पुराने कीर्तनों में केवल रामभजन हुआ करते थे। ‘रामभज’ में हरे रामा, हरे रामा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा; बस केवल रामधुन होती थी। हमारे कीर्तनों में विचार और टिप्पणियाँ भी जुड़ी हुई हैं। यह आपको सौ-सौ कुण्डीय यज्ञ के समय भी बताया गया था। सौ कुण्डीय यज्ञ के लिए हमने बुलाया भी था। सौ कुण्डीय यज्ञ में आप भी उत्साहपूर्वक भाग ले करके आये थे। अब भी आप सौ कुण्डीय यज्ञ कर सकते हैं। सौ रुपये लागत आयेगी इसमें। बड़े मजे से इसे आप का सकते हैं।

यज्ञ के बाद में व्याख्यान के बाद में देवदक्षिणा

आवश्यक है। देवदक्षिणा में यह आवश्यक है कि आप अपनी बुराइयों का त्याग करें और अपनी अच्छाइयों को बढ़ायें। ये भी वातावरण संशोधन का एक बड़ा कार्य है। जो प्रकृति हमसे नाराज हुई है, जो मुसीबतें आयी हैं, ये सब मनुष्य के स्वभाव, मनुष्य के गुण, मनुष्य के कर्म , मनुष्य की वृत्तियों में फर्क आ जाने के कारण आयी हैं। आप इसको भी ठीक कर सकते हैं। यानि कि यज्ञ के बाद में जब देवदक्षिणा दी जाये तो उसमें अपनी कोई न कोई एक अच्छाई बढ़ायी जाये। ये काम करना भी आवश्यक है। यही देवदक्षिणा है। दक्षिणा के लिए पंडित जी को एक हजार रुपये देंगे और उनको पाँच कपड़े देंगे, खाना देंगे, नहीं। ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है। ये सामूहिक यज्ञ है। देवी-देवताओं का हम आह्वान करेंगे, उनका पूजन और सम्मान करेंगे। यज्ञ में जो आदमी आयेंगे, जो भी यज्ञ में सम्मिलित होंगे, जो आदमी आयेंगे, जो भी आहुतियाँ देंगे वे सारे के सारे सहकर्मी होंगे, सहयोगी होंगे। इनमें से कोई ऐसा पंडित नहीं होगा जो दक्षिणा के लिए आया हो। यदि कोई पैसे की नौकरी के लिए आता है वह देवता नहीं हो सकता, ब्राह्मण नहीं हो सकता! पैसे की नौकरी की जरूरत नहीं है आपको। लेकिन देवी-देवताओं को दक्षिणा तो देनी ही पड़ेगी, जिनको आपने बुलाया है, जिनसे आपने उम्मीद रखी है कि इन्द्र देवता है, वर्षा करें तो आखिर उनके चरणों पर हमें फूल तो रखना चाहिए। देवता आयेंगे तो कुछ पूजन-अर्चन तो करना ही चाहिए आपको। पूजन करने की विधियों में ये भी शामिल है कि आपको देवदक्षिणा के रूप में कोई न कोई बुराई त्यागनी पड़ेगी और कोई एक अच्छाई धारण करनी पड़ेगी।

ये सौ कुण्डीय यज्ञ क्वार की पूर्णिमा यानी कि शरद पूर्णिमा को प्रारम्भ करेंगे और चैत्र की पूर्णिमा को समाप्त करेंगे । ये पूरे छह महीने हो जाते हैं। छह महीने के बीच आपको एक कार्य करना चाहिए कि अपने गाँव में, अपने नगर में, अपने मोहल्ले में प्रत्येक घर के साथ संपर्क बढ़ाना चाहिए। यह संपर्क यज्ञ है। संपर्क यज्ञ का अर्थ है कि प्रत्येक घर में आप जाइये और प्रत्येक घर के लोगों की तैयार कीजिए। आपके कुटुम्ब को, आपके परिवार को, आपके घर के लोगों को भी हमको ये कुछ शिक्षाएँ देनी हैं और साथ-साथ में भगवान का स्मरण भी कराना है। आपके घर में सुख-शाँति भी लानी है। अतः प्रत्येक घर में एक यज्ञ का आयोजन करने का कार्यक्रम आपको इन छह महीनों में जारी रखना चाहिए। आवश्यकता हुई तो फिर कहेंगे कि छह महीने से भी ज्यादा जारी रखिए। फिलहाल आपको छह महीने का संकल्प तो दिला ही रहे हैं । इन छह महीनों में अपने नगर में, अपने गाँव में, अपने मोहल्ले में कोई घर ऐसा मत रहने दीजिए, जहाँ यह एक कुण्डी यज्ञ ना हुआ हो।

एक कुण्डी यज्ञ का आप मतलब तो समझ ही गये हैं न? एक थाली में पाँच धूपबत्तियाँ और पाँच दीपक रखें। थाली को हल्दी, रोली अथवा आटे द्वारा सजा भी सकते हैं। ये दैनिक उपयोग की वस्तुएँ हर घर में रहती ही हैं। यदि आपको ये मालुम पड़ता हो कि एक घण्टे के समय में पाँच धूपबत्तियों में खर्च ज्यादा हो जाएगा, पाँच दीपक में खर्च ज्यादा हो जाएगा, तो आप किफायत भी कर सकते हैं पाँच दीपक हैं पहले एक जलाइये। पहला बुझने लगे तो दूसरा जला दीजिए। दूसरा बुझने लगे तो तीसरा जला दीजिए। तीसरा बुझने लगे तो चौथा जला दीजिए, फिर पाँचवाँ जला दीजिए। इस तरीके से एक-एक दीपक से काम चल सकता है। पाँच दीपक की स्थापना तो करनी ही पड़ेगी क्योंकि यह पाँच देवों का आह्वान है। इसमें पाँच प्राणों का आह्वान है, पाँच तत्वों का आह्वान है। अतः पाँच दीपकों की यह स्थापना तो करनी ही पड़ेगी। धूपबत्ती के संदर्भ में भी यही बात है। अगर आपको कहीं किफायत की बात मालूम पड़े और ये मालूम पड़े कि गरीबी बहुत ज्यादा है तो पैसे का खर्च और भी कम कर सकते हैं। तब पाँच धूपबत्तियों में से एक जला दीजिए, चार बिना जली रहने दीजिए एक धूपबत्ती जलाकर खत्म होने को हो तब दूसरी जला दीजिए। जब वह खत्म हो तो तीसरी फिर चौथी और पाँचवीं जलाएँ। इस तरीके से पाँच बार में पाँच धूपबत्तियों के जो आपने बंडल बनाये और पाँच दीपक बनाये, उनको एक-एक करके पाँच हिस्से में जलाएँ तो पाँचवें हिस्से से आपका काम चल जाएगा और किफायत भी हो जाएगी । मैं किफायत की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि अगले दिनों आपको पैसे की तंगी पड़ेगी, ज्यादा खर्च करना मुसीबत लायेगा। जो आदमी ज्यादा खर्च करता है वह ज्यादा फायदे की भी उम्मीद करता है, लेकिन जिसका थोड़ा खर्च हुआ है उस बेचारे का थोड़ा समाधान हो जाये तो भी काम चल जाता है। यज्ञ इसीलिए लोगों को अखरता है। यज्ञ के नाम पर कम से कम खर्च कराना चाहिए। जो विधियाँ आपको बतायी गयी हैं, उसी के हिसाब से हर घर में जाकर के यज्ञ कराना चाहिए। घरों में जो यज्ञ आप करायें, उसमें ये कुछ बातें शामिल करें। वास्तव में यह हम परिवार गोष्ठियों के रूप में पारिवारिक यज्ञ कर रहे हैं। इसमें परिवार निर्माण का उद्देश्य छिपा हुआ है, जो कि समाज निर्माण से भी सम्बन्धित और यज्ञ के निर्माण और समाज-निर्माण के बीच की इकाई यह परिवार निर्माण है। परिवार पारिवारिक यज्ञों के माध्यम से होगा। इसमें सुबह परिवार यज्ञ किया जाये और शाम को कीर्तन की व्यवस्था की जाये। भले ही महिलाएँ मिल-जुलकर कर लें। कोई बात नहीं है, पर करना जरूर चाहिए। लेकिन साथ में जो देव दक्षिणा वाला प्रकरण है उसे नहीं भूलना चाहिए। देवदक्षिणा हर घर के यज्ञ में भी होनी चाहिए। और क्या-क्या होना चाहिए ? कुछ खास बाते हैं जो जरूर करनी चाहिए। प्रथम तो यह कि प्रातःकाल सूर्योदय के समय पर भगवान का स्मरण करना। इस समय यह बहुत ही आवश्यक है। सूर्योदयकाल की अपनी खास विशेषता है। चाहे सुबह कर लेंगे, दोपहर को कर लेंगे, शाम को कर लेंगे! नहीं भाईसाहब! बिल्कुल सबेरे ही सूर्योदय के समय पर ही नाम स्मरण करना होगा, चाहे आप नहाये हों या न नहाये हों। सूर्योदय काल में एक ही तरीके से एक ही समय में, एक ही प्रकार का कार्य करने से उसकी शक्ति सौ गुनी हो जाती है, इसीलिए यह प्रातःकाल का जप आवश्यक बताया गया है। उसके बारे में आप घर-घर में जाकर हर आदमी से मिलकर कहिए कि प्रातःकाल का जप करना शुरू करें, चाहे दस मिनट का ही क्यों न हो।

इसके सिवाय एक और बात है। हमारे देश को गिराने वाली कुछ चीजें हैं। उनसे अपने आपको उबारने की कोशिश करनी चाहिए । शिक्षा की कमी इस तरह की है कि आदमी जानवर की तरह भयानक हो जाता है। न उसके ज्ञान के कपाट खुलते हैं, न उसको नयी जानकारियाँ मिलती हैं, न समाज में क्या हो रहा है ये पता चलता है, न उसे, लोग किस तरीके से आगे बढ़ रहे हैं ये जानकारियाँ मिलती हैं। वह एक तरीके से कुएँ का मेढ़क बनकर रहता है। इसलिए आपको शिक्षा के बारे में प्रौढ़-शिक्षा आन्दोलन को इन्हीं यज्ञों के साथ में जोड़कर प्रारम्भ कर देना चाहिए। आप लोगों में से जो कोई पढ़े-लिखे हों, उन्हें यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि “हम पाँच बिना पढ़े-लिखों को तो जरूर ही पढ़ा देंगे। “ चाहे तो आप उनके घर जाइये, चाहे एक महीने पढ़ाइये या छह महीने पढ़ाइये, चाहे दो वर्ष पढ़ाइये। आप यहाँ से एक संकल्प लेकर के जाइये कि “पाँच व्यक्तियों को तो पढ़ायेंगे ही।” परिवार में होने वाले यज्ञों की यह प्रमुख बात है। जो व्यक्ति पढ़ा नहीं सकते, वे पढ़ तो सकते हैं। घरों में बुड्ढे-बुढ़िया, जवान स्त्रियाँ बिना पढ़ी होती हैं। उनको पढ़ाने का एक आन्दोलन हमें इसी यज्ञ योजना में शामिल करना है।

दूसरा एक और आन्दोलन है जो इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह क्या है? जो कुछ भी हम कमाते हैं वह सब पेंदे के छेद में से होकर निकल जाता है। फूटे हुए घड़े में पानी चाहे जितना डालते जाइये, पर पेंदे में बने छेद में से होकर सब निकल जायेगा और घड़ा खाली का खाली बना रहेगा। इस पेंदे का छेद है- हमारे समाज में ब्याह-शादियों में होने वाला खर्च। खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र, बेईमान बनाती हैं। यह तो हमने आपको पच्चीसों बार कहा है और कहते रहेंगे हमेशा ! हमारा देश जो तबाह हुआ है इसमें ब्याह-शादियों वाली बात ऐसी है कि इसको अगर खर्चीली बनाये रखा गया तो आप समझिये कि हम आमदनी बढ़ाने का चाहे जितना प्रयत्न करें तो भी हम गरीब बने रहेंगे। इसके लिए क्या करना चाहिए? आप सब लोगों को इसके लिए ये प्रतिज्ञाएँ करनी चाहिए, अभिभावकों को ये प्रतिज्ञाएँ करनी चाहिए कि “हम अपने बच्चों और बच्चियों की शादियों में धूमधाम नहीं करेंगे-एक। दिखावा नहीं करेंगे-दो। दहेज नहीं लेंगे और न देंगे-तीन और जेवर नहीं चढ़ाएंगे चार।”

ब्याह-शादियों में जेवर और दहेज का कितना बड़ा सम्बन्ध है, ये आपको मालुम नहीं है। लड़के वाला माँगता है दहेज। क्यों माँगता है? क्योंकि उससे जेवर माँगा जाएगा। लड़की वाला माँगता है जेवर और लड़के वाला माँगता है दहेज। ये दोनों ही बातें मरेंगी तो एक साथ ही मरेंगी। अगर जिन्दा रहेंगी तो दोनों ही बाते जिन्दा रहेंगी । आप अकेले दहेज को बंद करना चाहें और ये चाहें कि हमारी लड़की पर जेवर जरूर के लिए सोना? आज सोने का कितना महँगा भाव है। चार हजार रुपये का दस ग्राम बिक रहा है। इसमें अगर मान लो कोई आदमी पचास ग्राम का भी जेवर बनवाना चाहे तो उसको बीस हजार रुपया चाहिए। यह कहाँ से आएगा? अतः जेवर के लिए वह दहेज माँगता है, तो क्या बुरा करता है। दहेज के बंद करने की यदि बात करनी चाहिए, तो जेवर को बंद करने की बात भी करनी चाहिए, अतः आप ब्याह-शादियाँ इस तरीके से कराइए जिसमें न दहेज दिया जाये, न जेवर लिए जायँ । जिसमें न बारात चढ़ाई जाये, न धूमधाम की जाये। न बैण्ड बाजे बजाएँ और न बेकार के काम किये जाएँ। घरेलू उत्सव होते हैं। हमारे घर में होली-दीपावली होती है, तीज-त्यौहार होते हैं, उसी तरीके से पाँच आदमी उस तरफ के आ जाएँ और पाँच यहाँ घर के हों। अपने घर में छोटा-सा हवन कर लिया जाये और शाँति से ब्याह कर दिया जाये। इस तरह के विवाह बहुत कम दाम पर होते हैं। किसी को दहेज ही देना हो तो अपनी बेटी के लिए इंदिरा विकास पत्र में रकम जमा कर सकता है, जो पाँच साल में दूनी हो जायेगी।

इस तरह की ब्याह-शादियों की परम्परा चलाना भी हमारा इस वक्त का कार्यक्रम है। दहेज हिन्दू समाज का कोढ़ है। यह हिन्दू समाज का कलंक है। शिक्षा का अभाव होना हमारे देश के लिए कलंक है। दहेज का, ब्याह-शादियों में फिजूलखर्चियों का होना हमारे देश का कलंक है। इसको दूर करने के लिए आप लोगों को इस तरह के कार्यक्रम का प्रयास करना पड़ेगा और इन्हीं यज्ञों के साथ में इन दो कार्यक्रमों को भी मिलाना पड़ेगा।

ब्याह-शादियों का एक और भी तरीका है। ज्यादातर होता है कि मोहल्ले वाले, पड़ोसी, यार-दोस्त, मित्र और सम्बन्धी ये कहते हैं कि नहीं साहब नाक कट जाएगी , बात बिगड़ जाएगी । ऐसा तो नहीं होना चाहिए। धूमधाम तो होनी ही चाहिए। मोहल्ले में फलाने का इतना बड़ा ब्याह हुआ था, आपको क्यों नहीं करना चाहिए? जहाँ इस तरह की मुसीबतें हों, जहाँ इस तरह के गिद्ध-कौए चारों ओर से घेरे हों आपको और यह मालुम पड़ता हो कि इस मुसीबत से निकलने का कोई उपाय नहीं है, तो हम आपको निमन्त्रित करते हैं कि आप कन्या को ले आइये, लड़के को ले आइये और पाँच-पाँच आदमी दोनों पक्षों के आ जाइये और यहाँ शाँतिकुँज में आप बड़े मजे में विवाह करके ले जाइये-बिना खर्च किये। यहाँ किसी तरह का खर्च किये। यहाँ किसी तरह का खर्च नहीं पड़ेगा। न यहाँ किसी तरह का दिखावा करना पड़ेगा । न फर्नीचर देना पड़ेगा। न कोई दहेज माँगने की हिम्मत करेगा, न कोई जेवर चढ़ाने का नियम है। पाँच आदमी आएँगे। आप यहाँ खाना खाइये। यहाँ के चौके में एक हजार आदमी खाना खाते हैं। पाँच आदमी बारात के आ जाएँ; वे हमारे मेहमान की तरह खाना खा जाएँगे तो हमारा क्या बिगड़ जाएगा। इसलिए इस तरह के विवाहों का, मेरी समझ से ये ज्यादा अच्छा है कि इस रिवाज को फैलाने के लिए आप स्थानीय स्तर में सफल नहीं हो पाते हैं तो आप इनमें तो बड़ी आसानी से सफल हो जायेंगे कि हमारे जो विवाह होगे वे हमारे गुरुद्वारे में होंगे। शाँतिकुँज में विवाहों का यही प्रचलन चलेगा। यह तीर्थस्थान भी है। देवताओं का यहाँ यज्ञ भी होता है, ऐसे शुद्ध स्थान पर विवाह संस्कार सम्पन्न करें। जैसे शुभ मुहूर्त करी बात सोची जाती है वैसे ही आप शुद्ध स्थान की बात सोचिए। मुहूर्त की बात मत सोचिए? आप कभी भी ले आइये की बात मत सोचिए? आप कभी भी ले आइये। यहाँ हमेशा ब्याह हो जाता है क्योंकि यहाँ शुभ वातावरण है, शुभ भूमि है, शुभ एवं पुनीत स्थान है। इसीलिए यहाँ हमेशा ब्याह हो जाता है क्योंकि यहाँ शुभ वातावरण है, शुभ भूमि है, शुभ एवं पुनीत स्थान है। इसलिए यहाँ मुहूर्त की जरूरत नहीं है, आप इस बात को जान लीजिए ।

दो बातें और रह जाती हैं इसके सिवाय। पहली है नशेबाजी की बात, आप नशेबाजी को छुड़ाइये, नहीं तो अगली पीढ़ियाँ घटते-घटते, गिरते-गिरते किसी काम की न रह जाएँगी। आपको यह तो मालुम ही है कि नशे से शरीर मारा जाता है, बुद्धि भी मारी जाती है, पैसा भी बर्बाद हो जाता है और बच्चों का भविष्य भी खराब हो जाता है। आदमी ऐसा बन जाता है जिसका न कोई विश्वास करता है, न कोई पास बैठने देता है। पीढ़ियों की यह गिरावट अगर बनी रही तो पचास-चालीस वर्ष में एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी कमजोर होगी दूसरी पीढ़ी कमजोर होगी। दूसरी के बाद तीसरी कमजोर होगी और हम वास्तव में फिर इस लायक हो जाएँगे कि हमको अपने शरीर को धकेलना मुश्किल हो जायेगा। इसीलिए करना आपको यह चाहिए कि नशेबाज के विरुद्ध भी जो कुछ आपके लिए संभव हो, उसको जरूर करना चाहिए।

नशेबाजी के सिवाय एक और बात है। साग-भाजी उगाने की तो हम कह नहीं सकते, क्योंकि जब वर्षा का अभाव होगा तो आप साग-भाजी कहाँ से उगा पायेंगे? साग-भाजी मनुष्य के जीवन के लिए उतनी ही आवश्यक है-जितना अनाज। अनाज से कम आवश्यक नहीं है। आप साग-भाजी उगाने के लिए अपने घरों में इंतजाम कीजिए। पानी आप पीते हैं सो ठीक है, पर जब आप कुल्ला करते हैं, नहाते हैं तो पानी बहकर बेकार चला जाता है।

उस पानी को इकट्ठा कर लीजिए और अपने घरों में, गमलों में, टोकरों में, पिटारों में, किसी में जो आपने उगा रखा है, उसी में उस पानी को आप डाल दीजिए। जो आपके स्नान से बचा हुआ है, जो आपके हाथ धोने से बचा हुआ है-उस पानी को भी साग-भाजी में डाल दें , तो साग-भाजी पैदा हो सकती है। मान लीजिए कि उस साग-भाजी से आप घर का पूरा खर्चा नहीं भी चला सकते हैं तो उससे कम से कम चटनी का काम तो चल ही सकता है। रूखी रोटी खाने के बजाय आप चटनी से तो काम चला सकते हैं। चटनी ही एक ऐसी चीज है कि जिससे हमारे लिए बड़ी सहूलियत मिलती है। आपकी ये-धनिया है, पोदीना है, पालक है, अदरक है, मिर्च है और टमाटर है। ये चीजें तो आसानी से लगा सकते हैं। कोई और साग नहीं बो सकते तो आसानी से इकट्ठा कर सकते हैं।

तो साहब ! साग-भाजी का लगाना एक, नशेबाजी का विरोध करना दो, ब्याह-शादियों में खर्च न होने देना’-सादगी के साथ ब्याह करना तीन और प्रौढ़ शिक्षा के बारे में ज्यादा से ज्यादा प्रचार करना-चार! छोटे बच्चों का तो यह भी है कि गवर्नमेंट स्कूलों में पढ़ा लेते हैं लेकिन बड़ों की संख्या तो दो तिहाई है। दो तिहाई हमारे देश के बिना पढ़े-लिखे लोग हैं। उनको शिक्षित करने की बात पर हम लोगों को ध्यान देना चाहिए, तैयारी करनी चाहिए। अब इन सभी बातों को ध्यान में रखकर के हमारे यज्ञों की पूर्णता इन बातों में जोड़नी चाहिए कि आपके यज्ञ के साथ-साथ में भावनाएँ जुड़ी हुई हों, सेवाएँ जुड़ी हों। देश को ऊँचा उठाने , आगे बढ़ाने की मनोवृत्ति भी जुड़ी हुई हो। यज्ञ भी जुड़ा हुआ हो, कीर्तन भी जुड़ा हो और भगवान का नाम स्तवन भी जुड़ा हो । साथ ही अपनी बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को बढ़ाने का प्रयत्न भी जुड़ा हुआ हो। इन सब को मिलाकर चलेंगे तो आप यह मान लीजिए कि यज्ञ में जो भी बड़े से बड़ा कार्यक्रम होगा-इन कार्यक्रमों के आधार पर ही वह पूरा हो जाएगा और वही फल मिलेगा आपको, जो बड़े यज्ञों से मिलना चाहिए। मुझे आशा है कि आप इन बातों को ध्यान से सुनेंगे और उसको कार्यान्वित करने में कुछ कसर उठा नहीं रखेंगे-इतना ही निवेदन है आप सब लोगों से। ॥ॐ शान्ति॥


अज्ञान का निवारण ही सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ है (Kahani)

अज्ञान का निवारण ही सबसे बड़ा पुण्य-परमार्थ है। वह स्वाध्याय से, ज्ञानार्जन से ही संभव है। उत्तराखण्ड के एक प्राचीन नगर में सुबोध नामक राजा राज्य करते थे। महाराज का नियम था-राजकीय कार्य प्रारम्भ होने से पूर्व वे आये हुए याचकों को दान दिया करते थे। इस नियम में उन्होंने कभी भूल नहीं की। एक दिन जब सब लोग दान पा चुके , तो एक विचित्र स्थिति आ खड़ी हुई। एक व्यक्ति ऐसा आया जो दान के लिए हाथ तो फैलाये था, पर मुँह से कुछ न कहता था। सब हैरान हुए, इसे क्या दिया जाय? एतदर्थ बुद्धिमान व्यक्तियों का सलाहकारी बोर्ड बैठाया गया। किसी ने कहा वस्त्र देना चाहिए, किसी ने अन्न की सिफारिश की। कोई स्वर्ण देने को कहता तो कोई आभूषण। समस्या का यथार्थ हल न निकला। सुबोध की कन्या उपवर्गा भी वहाँ उपस्थित थी, उसने कहा-राजन्! ये व्यक्ति न बोल सकता है, न व्यक्त कर सकता है उसके लिए द्रव्याभूषण सब व्यर्थ हैं। ऐसे लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ दान तो ज्ञान-दान ही है। ज्ञान से मनुष्य अपनी सम्पूर्ण इच्छाएँ, आकाँक्षाएँ आप पूर्ण कर सकता है और दूसरों को भी सहारा दे सकता है। इसीलिए इन्हें ज्ञान दान दीजिये । उपवर्गा की बात सबने पसन्द की। व्यक्ति के लिए शिक्षा की व्यवस्था की गई। राजा ने उस दिन अपने दान की सार्थकता समझी। यही व्यक्ति आगे चलकर उसी नगरी का विद्वान मन्त्री नियुक्त हुआ।


नवरात्रि में उपासना से जगेगी सुप्त चेतना

नवरात्रि को देवत्व के स्वर्ग से धरती पर उतरने का विशेष पर्व माना जाता है। उस अवसर पर सुसंस्कारी आत्माएँ अपने भीतर समुद्र मंथन जैसी हलचलें उभरती देखते हैं। जो उन्हें सुनियोजित कर सके वे वैसी ही रत्नराशि उपलब्ध करते हैं जैसी कि पौराणिककाल में उपलब्ध हुई मानी जाती है। इन दिनों परिष्कृत अंतराल में ऐसी उमंगे भी उठती हैं जिनका अनुसरण सम्भव हो सके तो दैवी अनुग्रह पाने का नहीं देवोपम बनने का अवसर भी मिलता है। यों ईश्वरीय अनुग्रह सत्पात्रों पर सदा ही बरसता है, पर ऐसे कुछ विशेष अवसर भी आते हैं, जिनमें अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल सके। इन अवसरों को पावन पर्व कहते हैं। नवरात्रियों का पर्व मुहूर्तों में विशेष स्थान है। उस अवसर पर देव प्रकृति की आत्माएँ किसी अदृश्य प्रेरणा से प्रेरित होकर आत्म-कल्याण एवं लोकमंगल के क्रिया-कलापों में अनायास ही रस लेने लगती हैं।

बसन्त आते ही कोयल कूकती और तितलियाँ फुदकती दृष्टिगोचर होती हैं और भौंरे गूँजते हैं जबकि अन्य ऋतुओं में उनके दर्शन भी दुर्लभ रहते हैं। वर्षा आते ही मेंढक बोलते हैं और मोर नाचने लगते हैं जबकि साल के अन्य महीनों में उनकी गतिविधियाँ कदाचित ही दृष्टिगोचर होती हैं। आँधी तूफान और चक्रवातों का दौर गर्मी के दिनों में रहता है। ग्रीष्म का तापमान बदलते ही उनमें से किसी का पता नहीं चलता। ठीक यही बात नवरात्रियों के समय पर भी लागू होती हैं। प्रातः काल और सायंकाल की तरह इन दिनों की भी विशेष परिस्थितियाँ होती हैं, उनसे सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह उभरते और मानवी चेतना को प्रभावित करते हैं। न केवल प्रभावित करने वाली वरन् अनुकूल उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बनती हैं इसे समय की विशेषता कह सकते हैं। जीवधारियों में से अधिकाँश को इन्हीं दिनों प्रजनन की उत्तेजना सताती है और वे गर्भाधान सम्पन्न कर लेते हैं। इसमें प्राणी तो कठपुतली की तरह अपना रोल पूरा करता है, सूत्र-संचालन तो किसी ऐसे अविज्ञात मर्मस्थल से होता है जिसे सूक्ष्म जगत या अंतर्जगत के नाम से मनीषी व्याख्या-विवेचना करते रहते हैं। नवरात्रियों में कुछ ऐसा वातावरण रहता है जिसमें आत्मिक प्रगति के लिए प्रेरणा और अनुकूलता की सहज शुभेच्छा बनते देखी जाती है।

सूर्य के उदय और अस्त होते समय आकाश में लालिमा छाई रहती है और उस अवधि के समाप्त होते ही वह दृश्य भी तिरोहित होते दिखता है। इसे काल प्रवाह का उत्पादन कह सकते हैं। ज्वारभाटे हर रोज नहीं अमावस्या, पूर्णमासी को ही आते हैं उमंगों के संबंध में भी ऐसी ही बात है कि वे मनुष्य की स्वउपार्जित ही नहीं होती वरन् कभी-कभी उनके पीछे किसी अविज्ञात उभार का ऐसा दौर काम करता पाया गया है कि चिंतन ही नहीं कर्म भी किसी ऐसी दशा में बहने, बढ़ने लगता है जिसकी इसके पूर्व वैसी आशा या तैयारी जैसी कोई बात नहीं थी। ऐसे अप्रत्याशित अवसर तो यदा-कदा ही आते हैं पर नवरात्रि के दिनों अनायास ही अंतराल में ऐसी हलचलें उठती हैं जिनका अनुसरण करने पर आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनने में ही नहीं, सफलता मिलने में भी ऐसा कुछ बन पड़ता है मानो अदृश्य से अप्रत्याशित अनुदान बरसा हो।

ऐसे ही अनेक लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शी, ऋषियों, मनीषियों ने नवरात्रि में साधना का अधिक महात्म्य बताया है और इस बात पर जोर दिया है कि अन्य अवसर पर न बन पड़े सही पर नवरात्रि में आध्यात्मिक तप साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म उन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाममार्गी साधक अभीष्ट मंत्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं।

नवरात्रि देव पर्व है। उसमें देवत्व की प्रेरणा और दैवी अनुकम्पा बरसती है। जो उस अवसर पर सतर्कता बरतते हैं और प्रयत्नरत होते हैं, वे अन्य अवसरों की अपेक्षा इस शुभ मुहूर्तों का लाभ ही अधिक उठाते हैं। भौतिक लाभों को सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। संकटों के निवारण और प्रगति के अनुकूलन में सिद्धियों की आवश्यकता पड़ती है। उस आधार पर जो मिलता है उसे वरदान कहा जाता है। नवरात्रियाँ वरदानों की अधिष्ठात्री कही जाती है, पर इस शुभावसर का वास्तविक लाभ है-देवत्व की विभूतियों का जीवनचर्या में समावेश । वह जिसे जितनी मात्रा में मिलता है वह उतना ही कला क्षमता का नरदेव कहलाता है। देवता स्वर्ग में नहीं रहते अपितु महामानवों के रूप में इस धरती पर विचरते हैं। नवयुग देवत्व प्रधान होगा। उसमें वे प्रयत्न चलेंगे जो मनुष्य में देवत्व बसते हैं वहाँ स्वर्ग होता है। जहाँ स्वर्ग होगा वहाँ देवता ही बसते होंगे। इसी तथ्य के आधार पर यह अपेक्षा की गई है कि उत्कृष्ट व्यक्तियों द्वारा जो सुखद वातावरण बनेगा, उसे धरती पर स्वर्ग के अवतरण की उपमा दी जा सकेगी।

युग संधि की नवरात्रियों में विशेष संभावना इस बात की है कि उनमें अदृश्य लोकों में देवत्व की अतिरिक्त वर्षा हो और उस अनुदान को पाकर देव मानवों का समुदाय अधिक प्रखरता सम्पन्न होता हुआ दृष्टिगोचर होने लगे। युग परिवर्तन की अवतार प्रक्रिया को गतिशील बनाने में इन देवमानवों का ही योगदान प्रमुख रहा है। तत्वदर्शी कहते हैं कि अवतार अकेले ही अपना प्रयोजन पूरा नहीं कर लेते, उनके साथ-साथ अनेक सहयोगी भी होते हैं और वे भी देवलोक से उसी प्रयोजन के लिए शरीर धारण करते हैं। पाँचों पाण्डव पाँच देवताओं के अवतार थे। हनुमान, अंगद आदि के बारे में भी ऐसी ही मान्यता है। इन दिनों सृजन योजनाओं में देवमानवों का यह साहस एवं प्रयास ही अग्रिम मोर्चा संभालता दिखाई देगा। नवयुग सृजन की प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने तथा उस दिशा में कदम बढ़ाने का यही शुभ मुहूर्त है। प्रज्ञा युग की प्रेरणा को अपनाने और विधि-व्यवस्था को चरितार्थ करने के लिए यों हर घड़ी पवित्र और महत्वपूर्ण है, पर इस प्रयोजन के लिए नवरात्रि पर्व की अत्यधिक गरिमा मानी गई है। यों उपासना की चिन्ह-पूजा भी बीजारोपण की दृष्टि से उपयोगी मानी गई है और उसे किसी भी रूप में, किसी भी मनःस्थिति में अपनाये रहने पर जोर दिया गया है। फिर भी उसे निष्ठापूर्वक अपनाने की प्रौढ़ता का स्तर सदा ऊँचा ही रहता है। उच्चस्तरीय सत्परिणामों की आशा-अपेक्षा योजनाबद्ध तपश्चर्या अपनाकर की जाने वाली साधना के साथ अविच्छिन्न रूप से संबंधित है।

नवरात्रि पर्व का ऋतु संध्या मुहूर्त विज्ञान की दृष्टि से ही नहीं विशिष्ट साधना पद्धति के कारण भी महत्वपूर्ण माना गया है। नैष्ठिक साधकों के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान साधना एक अत्यावश्यक पुण्य परम्परा के रूप में सदा-सर्वदा से अपनाई जाती रही है। सर्दी और गर्मी दो ही प्रधान ऋतुएँ हैं, उनका मिलन एक प्रकार से वैसा ही संधिकाल है जैसा कि रात्रि के अंत्र और दिन के प्रारंभ में प्रभातकाल के रूप में उपस्थित होता है। सन्धियाँ सदा मार्मिक होती हैं। शरीर में अस्थिपंजर से बने हुए जोड़ों को भी संधियाँ कहते हैं। इन्हीं के यथावत रहने पर काया की विभिन्न क्रिया-प्रक्रियाएँ गतिशील रहती हैं। यह जोड़ यदि जकड़ने लगे तो फिर चलना-फिरना तो दूर मुड़ना भी संभव न रहेगा। मशीनों के संबंध में भी यही बात है। उनकी क्षमता एवं गतिशीलता उनकी संधियों के सही गलत होने पर ही निर्भर रहती है। इन दिनों युगसंधि चल रही है और अपना शाँतिकुँज पच्चीसवें वर्ष के पूरा करने पर रजत जयंती वर्ष मना रहा है। अतएव जाग्रत आत्माओं को आपत्तिकालीन व्यवस्था की तरह युग धर्म के निर्वाह में जुटना पड़ रहा है। ऋतु संध्या आश्विन और चैत्र में जिन दिनों आती है। उन नौ-नौ दिनों की अवधि को नवरात्रि कहते हैं। ऋतुओं में ऋतुमती होने और वातावरण में नये-नये अनुदान भर देने का दृश्य सूक्ष्म जगत में इन्हीं दिनों दृष्टिगोचर होता है। ऐसे-ऐसे अनेकों कारण हैं जिनके कारण अध्यात्म क्षेत्र में साधना प्रयोजनों के लिए यह समय विशेष रूप से उपयुक्त माना गया है। जिस प्रकार प्रभात काल की उपासना अधिक फलवती होती है और संध्या के नाम से पुकारी जाती है। उसी प्रकार नवरात्रियों का समय भी दोनों संध्याओं के समतुल्य माना गया है।

नवरात्रियों की नौ दिवसीय साधना, चौबीस हजार जप का लघु अनुष्ठान के साथ सम्पन्न करनी चाहिए। यदि जप प्रातः पूरा नहीं हो सकता है तो सायंकाल उसे पूरा कर लेना चाहिए। उपासना क्षेत्र में नर-नारी को एक समान अधिकार है। ईश्वर के लिए पुत्र-पुत्री दोनों समान हैं।

अनुष्ठान काल में जप तो पूरा करना ही पड़ता है, कुछ विशेष तपश्चर्याएँ भी इन दिनों करनी पड़ती हैं, जो इस प्रकार हैं-

1-नौ दिनों तक पूर्ण ब्रह्मचर्य से रहा जाय। यदि स्वप्नदोष हो जाये तो दस माला प्रायश्चित की अधिक की जाएँ।

2- नौ दिन उपवास रखा जाय। उपवास कई स्तर का हो सकता है- फल-दूध पर, शाकाहार, खिचड़ी दलिया आदि। आलू, टमाटर, लौकी आदि शाक में नमक भर डालना चाहिए। मसाला इन दिनों छोड़ दिया जाय। बिना नमक या शक्कर का साधारण भोजन भी एक प्रकार का उपवास ही है। जिनसे जैसा बन पड़े उन्हें अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार उपवास का क्रम बना लेना चाहिए। फलाहार-शाकाहार दो बार किया जा सकता है। अन्नाहार लेना हो तो एक बार ही लेना चाहिए। प्रातःकाल खाली पेट जिससे न रहा जाय, वे दूध, छाछ, नींबू पानी, शरबत कोई पतली चीज ले सकते हैं।

3- भूमि शयन, चारपाई का त्याग। पृथ्वी या तख्त पर सोना।

4- अपनी सेवाएँ स्वयं करना। हजामत, कपड़े धोना, स्नान आदि दैनिक कार्य बिना दूसरों के श्रम का उपयोग किये स्वयं ही करना चाहिए। भोजन बाजार का बना नहीं खाना चाहिए। स्वयं पकाना संभव हो तो सर्वोत्तम अन्यथा पत्नी, माता आदि का बना भोजन लेना चाहिए। घनिष्ठ परिजनों की सेवा ही ली जा सकती है।

5- चमड़े की बनी वस्तुओं का त्याग। चूँकि इन दिनों शत-प्रतिशत चमड़ा पशुओं की हत्या करके ही प्राप्त किया जाता है और वह पाप उन चमड़ा उपयोग करने वालों को भी लगता है। इसलिए चमड़े के जूते, पेटी, पट्टे आदि का उपयोग उन दिनों न करके रबड़, कपड़ा आदि के बने जूते-चप्पलों से काम चलाना चाहिए।

यह पाँच नियम अनुष्ठान काल में पालन किये जाने चाहिए। जप का शताँश हवन किया जाना चाहिए। प्रतिदिन हवन करना हो तो 27 आहुतियां, अंत में करना हो तो 240 आहुतियों का हवन करना चाहिए। पूर्णाहुति के बाद प्रसाद वितरण, कन्या भोजन आदि का प्रबन्ध अपनी सामर्थ्य अनुसार करना उत्तम है। अच्छा तो यह है कि एक या दो दिन का सामूहिक आयोजन किया जाय, जिसमें गायत्री महाशक्ति का स्वरूप और उपयोग संबंधी प्रवचन हों। अंत में सत्संकल्प दुहराया जाना हमारे हर धर्मानुष्ठान का आवश्यक अंग होना चाहिए।

जो उपयोग अनुष्ठान नहीं कर सकते वे 240 गायत्री चालीसा का पाठ करके अथवा 2400 गायत्री मंत्र लिख कर भी सरल अनुष्ठान कर सकते हैं। इसके साथ पाँच प्रतिबंध अनिवार्य नहीं, पर ब्रह्मचर्य आदि नियम जितने कुछ पालन किए जा सकें, उतना ही उत्कृष्ट माना जावेगा।

युगसृजन अभियान में नवरात्रि पर्व को साधना सत्र के रूप में नियोजित करने और सफल बनाने पर आरंभ से ही बहुत जोर दिया जाता रहा है। इसमें उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। उपासना से आत्मकल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही है। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ-वानर, कृष्णकाल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि महान प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सज्जनों की सहकारिता सम्पादित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीता को जन्म देकर और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने का आधारभूत कारण बना था। इन पुराण गाथाओं से सृजनशिल्पियों को भी यही प्रेरणा मिलती है कि वे जागरुक जन को तलाश करें और उनकी आँतरिक प्रखरता का भावभरा प्रयास करें। इस प्रयोजन के लिए नवरात्रि नौ दिन तक चलने वाले साधना सत्रों से बढ़कर अधिक उपयोगी एवं अधिक सरल व्यवस्था अन्य कदाचित् ही करना बन पड़े। महान साँस्कृतिक परम्पराओं का पुनर्जीवन और सृजन के अभीष्ट आत्म-ऊर्जा का अभिवर्द्धन तथा जन-जीवन में उत्कृष्टता के समावेश का जैसा स्वर्ण सुयोग साधना सत्रों में मिल सकता है, उसकी तुलना का उपयोग-उपचार कदाचित ही कहीं खोजा जा सके। रात्रि के ज्ञानयज्ञ में वह सब कुछ कहा जा सकता है जो प्रज्ञावतार के युगांतरीय चेतना को जनमानस में प्रतिष्ठापित करने के लिए आवश्यक है।

इन तथ्यों की जानकारी तो प्रज्ञापुत्रों को पहचान भी रही है और वे नवरात्रि आयोजनों को इसी उदाहरण को लेकर पूरा करने एवं अधिकाधिक उत्साहवर्द्धक बनाने का प्रयत्न करते रहे हैं। इस बार उसमें प्रचण्ड आश्वमेधिक अनुष्ठानों एवं प्रथम पूर्णाहुति के अभूतपूर्व सफलता के बाद अग्रसर रजत जयंती वर्ष का अभिनव उत्तरदायित्व भी जुड़ गया है। नैष्ठिक साधकों , सृजन सेनानियों के अनंतगुनी विस्तार को देखते हुए जनसामान्यों में भी इन्हीं दिनों साधना क्षेत्र में नये संकल्पों का बीजारोपण एवं विकास हुआ है। प्रत्येक नैष्ठिक साधकों को न केवल नवरात्रि अनुष्ठान साधना स्वयं करनी है वरन् जनकल्याण निमित्त अभी से लगना है तथा पुरानों को प्रोत्साहन तथा नये भावनाशीलों को तथ्यों से परिचित कराने का प्रयास भी करना है। इस बार के नवरात्रि 13 से 21 अक्टूबर का आयोजन पिछले दिनों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी एवं प्रेरणाप्रद बन सके, इसके लिए समग्र तत्परता उत्पन्न करने वाली भाव श्रद्धा को उभारने, उछालने की आवश्यकता है।


अपनों से अपनी बात -

ईश्वर तो रोम-रोम में समाया है। किसी के अहित की कामना करना ही अपने लिए संकट बुलाना है। दधीचि पुत्र पिप्पलाद ने जब माता से अपने पिता की देवताओं द्वारा अस्थियाँ माँगे जाने और उनसे बने वज्र से अपने प्राण बचाने का विवरण सुना, तो उनके मन में देवताओं के प्रति बड़ी घृणा उपजी । अपना स्वार्थ साधने के लिए दूसरों का प्राण हरण करने का छल करने वाले यह लोग कितने नीच ; इनसे पिता को सताने का बदला लूँगा। पिप्पलाद तप करने लगे। लम्बी अवधि तक कठोर तपश्चर्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव प्रकट हुए और बोले- वर माँग। पिप्पलाद ने नमन किया और बोले-देव प्रसन्न हैं तो अपना रुद्र रूप प्रकट कीजिए और इन देवताओं को जलाकर भस्म कर दीजिए।

शिव स्तब्ध रह गये पर वचन तो पूरा करना था। देवताओं को जलाने के लिए तीसरा नेत्र खोलने का उपक्रम करने लगे; इस आरम्भ की प्रथम परिणति यह हुई कि पिप्पलाद का रोम-रोम जलने लगा। वे चिल्लाये-बोले, भगवान् यह क्या हो रहा है? देवता नहीं, उलटा मैं जला जा रहा हूँ। शिव ने कहा-देवता तुम्हारी देह में तो ही समाये हुए हैं। अवयवों की शक्ति उन्हीं की सामर्थ्य है। देव जलें और तुम अछूते बचे रहो, यह नहीं हो सकेगा। आग लगाने वाला स्वयं ही जल मरता है।

पिप्पलाद ने अपनी याचना लौटा ली। शिव ने कहा-देवताओं ने त्याग का अवसर देकर तुम्हारे पिता को कृत-कृत्य और तुम्हें गौरवान्वित किया है। मरना तो होता ही है, न तुम्हारे पिता बचते , न काल के ग्रास से वृत्तासुर बचा रहता। यश-गौरव प्राप्त करने का लाभ प्रदान करने के लिए देवताओं के प्रति कृतज्ञ होना ही उचित है। पिप्पलाद का भ्रम दूर हो गया। उनकी तपस्या आत्मकल्याण की दिशा में मुड़ गयी।

महाकाल के गतिचक्र की एक झलक-झाँकी


विश्व-संस्कृति के संदेशवाहक बनने हेतु स्वयं को तैयार करें

परमपूज्य गुरुदेव युग परिवर्तन का प्रसंग आते ही एक वाक्य सदैव दुहराते थे-”इन दिनों सारे विश्व को कुसंस्कारों से मुक्त करने के लिए, श्रेष्ठ वातावरण विनिर्मित करने हेतु समस्त ऋषिगण संकल्पित हैं।” उनका यह कथन विश्व-पटल पर चल रही गति-विधियों को देखकर आज साकार होता दिखाई दे रहा है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि आगामी दस वर्षों में संधि वेला की अंतिम घड़ियों में जब सतयुग की लाली जन-जन को दृष्टिगोचर होने लगेगी तब संस्कारों को परिष्कृत करने वाली चिन्तन प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन लाने वाली ऋषि संस्कृति, देव संस्कृति, हिन्दू संस्कृति ही उसका आधार बनेगी। अपने राष्ट्र में भले ही उसके चिन्ह अभी उस व्यापक परिमाण में दृष्टिगोचर न हो रहे हों, सारे विश्व राष्ट्र में यह परिवर्तन प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है, उसके लक्षण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

पिछले दिनों सुदूर पश्चिम के कनाडा राष्ट्र के क्यूबेक प्रान्त की राजधानी ‘माण्ट्रियल’ में सम्पन्न अंतिम सत्ताइसवाँ आश्वमेधिक आयोजन (प्रथम पूर्णाहुति समारोह-आँवलखेड़ा तो इस कड़ी का समापन कार्यक्रम था-अश्वमेध महायज्ञ से भी काफी विराट् ऋषियुग्म की सत्ता को समर्पित एक श्रद्धाँजलि समारोह) , जिसे प्रयाज ये अनुयाज तक पूरा कर इन पंक्तियों का लेखक अपने सोलह सदस्यीय दल के साथ लौटा है इस तथ्य की साक्षी देता है। सारा पश्चिम जिस शान्ति, सादगी, तनावमुक्त जीवन-पद्धति को तलाश रहा है, वह उसे मात्र भारतीय संस्कृति में हिन्दुत्व के व्यापक विराट् परिवेश में नजर आ रही है।

हम चाहे कितना भी इस तथ्य को नकारें ,एक तथ्य अपने स्थान पर सही है कि धर्म-संस्कृति के प्रति झुकाव भारत से बाहर के अन्यान्य देशों में अधिकाधिक बढ़ता देखा जा सकता है। भारत स्वतंत्र होने के बाद हमारे यहाँ

से भेजे गये भारतीय विदेश सेवा (आय.एफ.एस.) के अधिकारीगण तो भारतीय संस्कृति के संदेशवाहक नहीं बन पाए, न ही उन्होंने यह प्रयास किया कि वे कहीं से भारत के प्रतिनिधि नजर आएं, किंतु प्रवासी भारतीयों ने इस भूमिका को बखूबी निभाया है एवं अब अमेरिका, कनाडा, इंग्लैण्ड सहित यूरोप व अन्यान्य देशों के नागरिक उनके माध्यम से शाँति, अहिंसा, मैत्री, पारिवारिक सहकार का संदेश पाते दिखाई देते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी पुस्तक ‘समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान’ (1947) में यह तथ्य स्पष्ट शब्दों में उद्घोषित करते हुए लिखा था कि “हमारे प्रवासी भाई व बहिन जो डेढ़ सौ वर्षों से अब तक वहाँ जाकर बसते रहे हैं।, भारत रूपी हृदय की रक्तवाही नलिकाएँ हैं। भारत से यदि भाव संवेदना रूपी रक्त-संचार यदि यथावत होता रहा तो यही 3 करोड़ प्रवासी परिजन हमारे देश के सच्चे राजदूत कहे जाएँगे। “ आज वह कथन सही होता दीख रहा है। अब संख्या साढ़े पाँच करोड़ से अधिक है किन्तु वे ही अब निमित्त बन रहे हैं भारतीय-संस्कृति के विश्व-संस्कृति में परिवर्तित हो रही प्रक्रिया के, वहाँ संव्याप्त समस्याओं का समाधान सुझाने वाले वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के संदेश के । लगता बड़ा विचित्र है किंतु यह नितान्त सत्य है एवं तेजी से पश्चिमी सभ्यता को अंगीकार करती जा रही भारतीय जनता के लिए एक तमाचा भी है।

यों तो, भारत से गायत्री परिवार की विधिवत् संगठनात्मक प्रक्रिया आरंभ हुआ यह छठा वर्ष एवं इस बीच चार शानदार आश्वमेधिक आयोजन प्रथम पूर्णाहुति के पूर्व वहाँ भी हो चुके हैं फिर भी इस पुनर्गठन वर्ष में जब सारे भारत में कोई बड़ा आयोजन नवम्बर, 15 के बाद निषिद्ध कर दिया गया था, विगत वर्ष के लिए प्रस्तावित व फिर आगे बढ़ा दिया गया क्यूबेक कनाडा का ‘माण्ट्रियल अश्वमेध महायज्ञ’ कुछ अभूतपूर्व विशिष्टताएँ लिए सम्पन्न हुआ है, एक प्रकार से विराट् अखिल विश्व गायत्री परिवार के लिए एक मील का पत्थर प्रमाणित हुआ है एवं सभी के लिए अपरिमित संभावनाएँ सामने लेकर आया है। इस यज्ञ का अनेकानेक विशिष्टताओं के कारण याद किया जाता रहेगा।

(1) फ्रेंच बहुल आबादी वाले सुदूर पश्चिम के सेण्ट लारेन्स नदी तट पर स्थित माण्ट्रियल नगर का यह आश्वमेधिक आयोजन सबसे कम प्रवासी भारतीयों वाले भाग में प्रचण्डतम सफलता के साथ संपन्न हुआ।

(2) इस महायज्ञ में पहली बार भारत से इन पंक्तियों के लेखक व वर्तमान में गायत्री परिवार का सारा कार्य-भार वहन कर रहीं श्रीमती शैलबाला पंड्या (आत्मजा परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा) सहित 14 अन्य वरिष्ठ सदस्यों अर्थात् सोलह सदस्यीय दल विदेश में इस विराट् आयोजन हेतु प्रस्तुत हुआ।

(3) शून्य से पैंतीस डिग्री कम तापमान में विगत सर्दी में अपने कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर बाँटे गए आमंत्रण के प्रतीक अक्षतों का यह परिणाम निकला कि बिना किसी भेदभाव के सभी पंथों, संप्रदायों एवं धर्मों के लोगों ने न केवल शोभायात्रा में वरन् तीनों दिन यज्ञ में भाग लिया एवं विभिन्न संस्कार सम्पन्न कराके हिन्दू संस्कृति-देव संस्कृति के प्रति अपना अक्षुण्ण लगाव प्रमाणित किया।

(4) मौसम विभाग की भविष्यवाणी के विपरीत एवं गुरुवार को टेण्ट लगाते समय तेज आंधी सहित हुई बारिश के बावजूद गुरुसत्ता का सुरक्षा कवच पूरी अवधि में सक्रिय रहा। शुक्रवार 26 जुलाई 1996 से लेकर मंगलवार 30 जुलाई तक सारा यज्ञ क्रम व्यवस्थित रूप से सम्पन्न हो जाने एवं टेण्ट आदि हट जाने से लेकर पूरे जैरी पार्क क्षेत्र की सफाई हो जाने तक हलकी ठण्डी हवा बहती रही, पानी बिल्कुल नहीं गिरा एवं सब कुछ हो जाने के बाद हुई तेज बारिश से सारी सफाई भी हो गयी।

(5) पहली बार आश्वमेधिक देवमंच से

फ्रेंच, इंग्लिश, हिन्दी एवं गुजराती चारों भाषाओं में मंत्रार्थ एवं विभिन्न वक्तव्य दिये जाते रहे। इसका लाभ उपस्थित फ्रेंचभाषी स्थानीय जनता ने, इंग्लिश मात्र में बात करने वाले वहीं जन्मे प्रवासी बालक-बालिकाओं ने तथा पंजाब व गुजरात बाहुल्य क्षेत्र के पूरी उत्तरी अमेरिका व कनाडा से आए नागरिकों ने लिया।

(6) कनाडा मूल के स्थानीय मेम्बर ऑफ पार्लियामेण्ट, संस्कृति विभाग के प्रान्तीय मंत्री, नगर के मेयर सहित भारतीय समुदाय का संसद (कनाडा) में प्रतिनिधित्व करने वालों ने न केवल भागीदारी की, मंच पर आकर अपने भावोद्गार भी व्यक्त किए तथा यज्ञ भी सम्पन्न किया।

(7) क्यूबेक के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले समाचार पत्र ‘द गजट’ ने इसे ‘सन फेस्टिवल’ (सविता महोत्सव) नाम देते हुए इसे पूर्वी संस्कृति का पश्चिमी समुदाय के हितार्थ ही नहीं, विश्व एकता व पर्यावरण के लिए किये जाने वाला एक विशिष्ट उपक्रम वर्णित किया ।

(8) नारी-शक्ति ने सत्तर प्रतिशत से अधिक उपस्थिति दिखाते हुए प्रमाणित कर दिया कि नारी सदी-इक्कीसवीं सदी सुनिश्चित रूप से आने वाली है एवं संस्कार-परिवर्तन की प्रक्रिया वही आरम्भ करेगी।

(9) इस महायज्ञ में पूरे नार्थ अमेरिका की सौ से अधिक शाखाओं के दस हजार व्यक्तियों सहित, कनाडा की दस शाखाओं एवं यूके (इंग्लैण्ड) दक्षिण व पूर्वी अफ्रीका तथा न्यूजीलैण्ड, फिजी के अतिरिक्त त्रिनिदाद-टोबेगो में बसे पश्चिमी भारत (वेस्ट इण्डीज) के नागरिकों की भी भागीदारी रही।

(10) कनाडा सरकार ने इस महायज्ञ हेतु निःशुल्क सारा वह स्थान उपलब्ध कराया जो कि नगर के केन्द्र में ही नहीं था, अपितु जहाँ अभी तक कभी भी किसी धार्मिक आयोजन की स्वीकृति नहीं दी गयी थी। माण्ट्रियल के जैरी पार्क में 26, 27 व 28 जुलाई (शुक्रवार से रविवार तक) सम्पन्न हुए इस आयोजन को सारे नगर की जनता ने उत्सुकतापूर्वक आकर बार-बार देखा व सूर्य देवता को पर्यावरण संरक्षण के निमित्त दी जा रही आहुति के माहात्म्य को स्वीकारा, जिसके कारण मौसम की भविष्यवाणी भी गलत सिद्ध हो गयी थीं।

(11) स्थानीय टेलीविजन के चैनलों द्वारा इसे प्रमुख समाचारों सहित पूरे फीचर के रूप में प्रसारित किया गया एवं यह आयोजन टोरेण्टो सहित पूरे कनाडा के पाँच हजार मील चौड़े क्षेत्र में पश्चिमी तट पर स्थित बैंकूवर तक देखा गया।

(12)विज्ञान व अध्यात्म के समन्वयात्मक स्वरूप को प्रदर्शित करने वाली प्रदर्शनी को तीन दिन में पचास हजार से अधिक नागरिकों ने देखा, जिसमें युवा वर्ग के बालक-बालिकाओं ने उत्साहपूर्वक सभी को समझाया। स्लाइड व लेसर प्रोजेक्टरों द्वारा पहली बार इसे जन-जन द्वारा देखा गया व सभी ने इसकी स्थापना करने वाले परमपूज्य गुरुदेव के समग्र वाङ्मय के 44 खण्डों को देखकर अपनी अभिव्यक्ति यही दी कि विचारक्रान्ति अब सुनिश्चित है।

(13) इसी महायज्ञ में गुरुसत्ता की सूक्ष्म प्रेरणा द्वारा मंच से आगामी वर्ष के आयोजनों के विश्वव्यापी-भारतव्यापी स्वरूप के ‘संस्कार महोत्सवों ‘ के रूप में सम्पन्न होने की घोषणा की गयी एवं इसका भारत से बाहर प्रथम आयोजन ‘न्यूजर्सी ‘ में जुलाई, 1997 में होने की विधिवत् घोषणा भी कर दी गयी एवं वहाँ के परिजनों को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी गयी । इन आयोजनों को नहीं, ज्ञान यज्ञ की महत्ता को निरूपित किया गया तथा पहली बार एक साथ सौ कम्प्यूटर्स से मल्टीमीडिया द्वारा भारतीय संस्कृति के विज्ञानसम्मत स्वरूप को पश्चिमी जगत को दिखाने वाली एक विराट् प्रदर्शिनी व साँस्कृतिक महोत्सव जिसमें 251 जोड़ों के आदर्श विवाह एवं अन्य सभी संस्कार सम्पन्न किये जाने की बात कही गयी। इसी उद्घोषणा ने भारत में आगामी वर्ष बसंत के बाद सम्पन्न होने वाले आयोजनों की रूपरेखा भी बना दी।

(14) पहले भी चार अश्वमेध महायज्ञ विदेश में लीस्टर (यूके), टोरोण्टो (कनाडा), तथा शिकागो (उ. अमेरिका) में सम्पन्न हो चुके हैं। किंतु पहली बार इन पाँचों यज्ञों का अनुयाज चौदह सदस्यीय दल द्वारा विधिवत् इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सम्पन्न होता जा रहा है एवं सुनियोजित ढंग से ज्ञानघटों , वेद स्थापना, ज्ञान मंदिरों की स्थापना के रूप में केन्द्र से जुड़ी शाखाओं के माध्यम से पूरे अमेरिका, कनाडा एवं इंग्लैण्ड में स्थापनाएँ सम्पन्न हो चुकी हैं।

इस संक्षिप्त वृत्तांत से परिजन, जो पाक्षिक ‘प्रज्ञा अभियान’ के माध्यम से समय-समय पर विदेश की धरती पर प्रज्ञावतार के लीली संदोह को जानते समझते रहे हैं, भलीभाँति उन तथ्यों को हृदयंगम कर सकते हैं जो परिवर्तन की प्रक्रिया की एक झलक दिखाते हैं। वस्तुतः इस आयोजन के 28 जुलाई को सम्पन्न हो जाने के बाद अब जाकर यह अहसास हो पाया है कि ऋषियुग्म की सत्ता की अनुकम्पा किन’-किन रूपों में बरसी है।

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान के बढ़ते साधनों ने आज धरती के सुदूर छोरों को एक-दूसरे के समीप ला दिया है, साइबर टेक्नालॉजी का एक हाइवे-राजमार्ग तैयार हो चुका है जिसका यदि सदुपयोग किया जा सके तो प्रसुप्त प्रतिभाओं से लेकर इक्कीसवीं सदी का निर्माण करने वाले भावी नागरिकों के मस्तिष्कों को अभी से ढाला जा सकता है। यह कार्य परमपूज्य गुरुदेव के विराट परिमाण में प्रकाशित साहित्य के छपे प्रारूप के अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी भलीभाँति कर सकता है, यह योजना इस यज्ञ के तुरन्त बाद जन्मी एवं इसने क्रिया रूप ले लिया। निर्णय लिया गया कि परमपूज्य गुरुदेव के समग्र वाङ्मय को, जो उनकी लेखनी से लिखा एकमात्र प्रामाणिक ऐसा संग्रह है जो पहली बार विधिवत् विषयवार प्रकाशित हुआ है, अँग्रेजी सहित विदेश की चार प्रमुख भाषाओं फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश एवं जापानी में केवल प्रकाशित किया जाय अपितु, इनकी काम्पेक्ट डिक्स (सी.डी) भी तैयार कर दी जाय। जिसे भारत व बाहर के करोड़ों व्यक्ति अपने कम्प्यूटर के माध्यम से देख-सुन सकें। मिशन के समग्र परिचय का दिग्दर्शन कराने वाली प्रश्नोत्तरी प्रक्रिया द्वारा भारतीय संस्कृति संबंधी सभी जिज्ञासाओं का समाधान करने वाली तथा गायत्री-मंत्र एवं प्रज्ञा गीतों की सी.डी. बनाने का भी निर्णय इस प्रवास में लिया गया एवं दो सी.डी.,आडियो कैसेट्स का निर्माण कर उसका विधिवत् शुभारम्भ कर दिया गया है।

जो व्यक्ति पढ़ नहीं सकते अथवा जिनके पास पढ़ने के लिए समय नहीं है अथवा प्रमादवश स्वाध्याय नहीं कर पाते, उनके लिए -आडियो बुक’ लगभग एक हजार की संख्या में आगामी एक वर्ष में तैयार करने का निर्णय लिया गया है। विदेश में अब इनका प्रचलन अत्याधिक है। ज्ञानेन्द्रियों में आँखें देखें या कान सुनें, कोई फर्क नहीं पड़ता । मस्तिष्क की ग्रहणशीलता पर निर्भर करता है कि स्वाध्याय सार्थक हो पा रहा है या नहीं। पूज्यवर के साहित्य के महत्वपूर्ण अंश अब ‘ऑडियो बुक्स’ के रूप में भी शाँतिकुँज की रजत जयंती के उपलक्ष्य में प्रतिमाह निकलते रहेंगे एवं दीपावली उनके प्रथम किश्त निकल जाय, यह विदेश प्रवास से लौटकर सुनिश्चित कर लिया गया है, इसी तरह वीडियो के माध्यम से नन्हें-मुन्हें बच्चों के लिए एनीमेशन फिल्मस से लेकर बड़ों के लिए एक्शन साँग्स, एकाँकी नाटिकाएँ एवं पूज्यवर एवं मातृसत्ता का संदेश और भी प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने की योजना बनी है।

यह माना जाना चाहिए कि महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया अपनी चरमावस्था पर पहुँच रही है एवं उपरोक्त वर्णन मात्र उसकी एक झलक-झाँकी भर है। भारतीय संस्कृति बनना है एवं प्रत्येक परिजन को उसके लिए अब संदेशवाहक बनने हेतु कमर कसकर आश्विन नवरात्रि की इस संधि-वेला में स्वयं को तैयार कर लेना चाहिए।


VigyapanSuchana

आँवलखेड़ा आयोजन की कोई वार्षिकी नहीं मनायी जा रही है-

परिजनों को सूचनार्थ निवेदन है कि इस पुनर्गठन वर्ष से बड़े आयोजनों की वार्षिकी के आयोजन को निरस्त किया जा रहा है। अश्वमेधों आदि की वार्षिकी मनाने की एक परम्परा बन जाने से पूर्व घोषित पाँच वार्षिक आयोजनों-बसंत पंचमी, गायत्री, जयंती, गुरुपूर्णिमा एवं चैत्र-आश्विन नवरात्रि पर्वों की महत्ता पर प्रभाव पड़ने लगा था एवं सभी पर अतिरिक्त आर्थिक भार के साथ चंदा संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ने की आशंका पनपती दीख रही थी। यही देखते हुए आँवलखेड़ा आयोजन (प्रथम पूर्णाहुति) को स्थानीय स्तर पर ही हर पूर्णिमा पर मना लिया जाएगा। उस दिन परिजन अपने-अपने स्थानों पर 108, 1008, या 2000 वेदी दीपयज्ञ आयोजित कर इसे अपने ही स्तर पर आयोजित करें।

ऊर्जा अनुदान सत्र अब चैत्र नवरात्रि संवत् 2054 तक चलेंगे-

पूर्व में घोषणा की गयी थी कि कुल चौबीस ऊर्जा अनुदान सत्र 29 दिसम्बर, 1996 तक ही चलेंगे किंतु उनकी बढ़ती माँग व प्रत्येक में तीन हजार से अधिक की संख्या को देखते हुए अधिक से अधिक को लाभान्वित करने हेतु इन्हें 1997 की चैत्र नवरात्रि तक बढ़ा दिया गया है। अब 1997 में भी संवत् 2054 के चैत्र मास शुभारंभ तक 11 अप्रैल तक अर्थात् 11 अतिरिक्त सत्र सम्पन्न होंगे। आगामी वर्ष नवरात्रि 8 से 16 अप्रैल की अवधि में है। सभी परिजन इन सत्रों का लाभ ‘शाँतिकुँज’ के इस ‘रजत जयंती वर्ष’ में ले सकते हैं।

*समाप्त*