संवेदना की देवी अपनी गरिमा बनाए रखे

सौंदर्य की तलाश गलत नहीं है। यही वह तत्व है, जो मनुष्य की कोमल संवेदनाओं को सक्रिय करता है। अधर में लटके हुए ग्रह-नक्षत्रों में चुम्बकीय गुरुत्वाकर्षण क्रियाशील न रहा होता, तो सृष्टि पता नहीं कब परस्पर टकराकर नष्ट-भ्रष्ट हो गयी होती। ठीक वैसा ही चुम्बकत्व नारी सौंदर्य में भी है। इसमें मानव की कल्पनाओं में कोमलता भरी है, विचारों में भाव प्रवणता उपजाई है। मानव सभ्यता के आदि से यह साहित्य एवं सृजनात्मक गतिविधियों का प्रेरणा स्त्रोत रहा है। मानवीय कर्तृत्व में इसी ने सदाशयता भरी है।

इसकी तलाश में यदि हम निष्ठुर बन जाएँ, संवेदनहीन हो जाएँ तो इसका मतलब यही है कि हम राह भटक गए। यदि ऐसा न रहा होता तो इसकी खोज में तत्पर संवेदना की देवी नारी जाने-अनजाने हजारों-लाखों निरीह प्राणियों का रक्त-पान करने वाली पिशाचिनी न बन जाती । यह कथन किसी को कितना ही चौंकाने वाला क्यों न लगे; लेकिन आज की दशा में इसे ‘आश्चर्यजनक किन्तु सत्य ही’ कहा जाएगा। प्राचीनकाल की एक ऐतिहासिक किंवदंती है कि रोम सम्राट जूलियस सीजर की प्रेमिका महारानी क्ल्योपेट्रा अपने सौंदर्य को चिरस्थाई रखने के लिए प्रतिदिन एक गुलाम हब्शी के रक्त से स्नान करती थी। अब न तो रानी क्ल्योपेट्रा है और न उसका चिरस्थायी सौंदर्य। हाँ, उसकी नृशंसता की कथाएँ अवश्य प्रचलित हैं। जो नारी की संवेदना पर एक दर्द भरा प्रश्न चिन्ह अवश्य लगाती हैं।

यह प्रश्न आज की नारी की संवेदनशीलता पर भी हैं जिसके शृंगार प्रसाधनों का निर्दयतापूर्वक वध होता है। जिन प्राणियों को इस हेतु अपार कष्ट सहते हुए प्राण गँवाने पड़ते हैं, वे उन उपयोग करने वालों को सुन्दर कहते होंगे या कुरूप, यह उन्हीं से जाकर पूछा जाये। इन विडम्बनाओं में जो धन खर्च होता है, वह भी असामान्य होता है। यदि उसे सत्प्रयोजनों में लगाया गया होता, तो कुछ सत्परिणाम भी सामने आते। पर इस दुर्बुद्धिजन्य निष्ठुरता को क्या कहा जाय, जो सुन्दर दिखने के लिए अनगिनत प्राणियों के जीवन से खिलवाड़ करती रहती है। सौंदर्य की इस तलाश के कार्यक्रम में अनुसंधान के नाम पर प्रति वर्ष करोड़ों प्राणियों की बलि दी जाती है। इस अत्याचार के विरोध में स्कूल ऑफ रुरास्पेस मेडिसिन के शोध मनोविज्ञानी डॉ. बोनाल्ड बोर्नेस ने आज से एक दशक पहले ही अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने पशुओं पर होने वाले अमानुषिक अत्याचारों का विवरण तैयार किया है। वह किसी भी सहृदय व्यक्ति का दिल पिघला देने वाला है। डॉ. बोनाल्ड बोर्नेस के लेखों व विचारों से प्रभावित होकर पश्चिमी राष्ट्रों की जागरुक जनता के दिल में निरीह मानवेत्तर प्राणियों के दिल में निरीह मानवेत्तर प्राणियों के प्रति सद्भावना जगी है और इन हत्याओं का विरोध किया जाने लगा है।

सौंदर्य प्रसाधनों में चैनल नं. 3 एक विशेष सुगन्ध है। जिसे अनेक देशों में इस्तेमाल किया जाता है। इसे बनाने वाली कम्पनी की संचालिका जेक्स लील ने बताया कि इस सुगन्ध को बनाने के लिए अफ्रीका के जंगलों में पायी जाने वाली सिवेट बिल्ली के प्राण लिए जाते हैं। इस बिल्ली को लोहे के नुकीले पिंजड़े में बन्द कर दिया जाता है। जिसमें उसे लकड़ी से मार-मार कर पागल कर दिया जाता है। ऐसा करने पर उसकी ग्रन्थियों से एक प्रकार का रस स्रवित होने लगता है। इसके बाद बिल्ली की पूँछ और पीछे के पैर बाँध कर उसके पेट में सुगन्धि वाली ग्रन्थि में चीरा लगाया जाता है। बिल्ली को बाँधकर रखा जाता है। यह क्रिया लगातार 10-12 दिन तक की जाती है। प्रायः इतने समय के बाद बिल्ली मर जाती है। तभी उसे छोड़ा जाता है। यह सुगन्ध जिसे चैनल नं. 3 के नाम से जाना जाता है, वजन में सोने से भी 4-5 गुना महँगी कीमत में बिकता है।

शैंपू, आफ्टर शेव लोशन, युडी-कोलन आदि के परीक्षण के लिए खरगोश का उपयोग किया जाता है। खरगोश का उपयोग किया जाता है। खरगोश को एक पिंजड़े में जकड़कर बन्द कर दिया जाता है। नए बनाए शैंपू की 2-4 बूँदें उसी आँखों में डाली जाती हैं। जिससे खुजली, जलन व चिरमिराहट का अनुमान लगाया जाता है। इस प्रयोग में खरगोश अन्धा तक हो जाता है। इसी प्रकार लोशन के प्रयोग के लिए खरगोश की चमड़ी में टेप चिपकाकर उसे झटके से खींचा जाता है। यह क्रिया तब तक दुहराई जाती है, जब तक माँस न दिखाई पड़े। बाद में लोशन या युडीकोलन लगाकर 3-4 दिन तक खरगोश को हिलने-डुलने नहीं दिया जाता। कभी-कभी खरगोश प्रयोग पूरा होने के पूर्व ही मर जाते हैं।

सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में इक्ट्रोजन नामक जो पदार्थ प्रयुक्त होता है, वह गर्भवती घोड़ी के पेशाब से प्राप्त किया जाता है। इसके लिए घोड़ी के जीन्स को ऐसा नियन्त्रित किया जाता है कि एक लम्बे समय तक कष्ट सहते हुए भी गर्भधारण किए रहती है। उसे इस बीच अधिक पेशाब करने वाली विषाक्त औषधियाँ भी दी जाती हैं। अन्त में उसकी जान लेकर ही छोड़ा जाता है। इसी प्रकार अन्य तरह के परफ्यूम, क्रीम आदि बनाने का इतिहास भी अनेक बेरहमियों से भरा है। इसके लिए व्हेल मछली से लेकर बछड़ों, खरगोशों आदि न जाने कितने निरीह प्राणियों को निर्ममता से मारा जाता है।

एक आँकड़े के अनुसार अकेले वर्ष 1994 में अमेरिका में सौंदर्य सामग्री के निर्माण हेतु 2 करोड़ निरीह पशुओं की हत्या की गयी। जर्मनी में यह संख्या 60 लाख तथा इंग्लैंड में 1 करोड़ और रूस में लगभग डेढ़ करोड़ रही।

सुन्दरता की इस खोज में बरती जाने वाली संवेदनहीनता की बात छोड़ भी दें, तो भी इस प्रकार की सामग्री का उपयोग नितान्त विवेकहीन भी है। इसके निर्माण में अनेक तरह की ऐसी रासायनिक सामग्री का प्रयोग किया जाता है, जिसका उपयोग स्वास्थ्य के लिए विष की तरह मारक है। अमेरिका के ‘कालेज ऑफ एलरजीज’ में किए गए अनुसंधान में पाया गया है कि शृंगार के रूप में प्रयुक्त काजल, नेलपालिश पाउडर, क्रीम एवं अन्य प्रसाधनों से प्रायः सुन्दरता मिलने को जगह नुकसान ही अधिक होता है।

काजल में प्रायः ऐंटीमनी सल्फाइड के स्थान पर लेड सल्फाइड का प्रयोग की अधिक होता है। यह लेड आँखों के सफेद भाग से रक्त में पहुँचकर लाल रक्त कणिका के निर्माण में बाधा पहुँचाता है, जिससे रक्ताल्पता का खतरा होता है। सुहाग के प्रतीक सिन्दूर में भी लेड होता है, जो शरीर के लिए घातक दुष्प्रभाव छोड़ता है। गर्भवती महिलाओं में तो सीसे का प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशु पर भी पड़ सकता है और इससे उसकी असमय मृत्यु भी हो सकती है। नाखून में चमक लाने वाली नेलपालिश में प्रयुक्त होने वाला ‘फिनाँल’ और ‘टोल्यूएन’ से अनेक तरह की बीमारियाँ होती हैं। इससे नाखून का बदरंग होना इसके सिरों पर सूजन एवं त्वचा पर एलर्जी होना सामान्य बात है।

प्रसिद्ध उपभोक्ता पत्रिका ‘दि उत्सान कंज्यूमर’ के अनुसार ‘ब्लैक हिना हेयर डाई’ में हानिकारक रसायन ‘पैराफेनायल डायमीन’ मिलाया जाता है। जिससे बालों का गिरना एवं भूरापन होना आम बात हो गयी है। मलेरिया के कंज्यूमर एसोसिएशन का सर्वेक्षण तो यह बताता है कि हेयर डाई के अत्यधिक प्रयोग से कैंसर तक की सम्भावना रहती है। अध्ययन के तहत ऐसी महिलाओं में ड्राडकिंस लिम्फोमा (एक प्रकार का कैंसर) होने का खतरा 50 प्रतिशत बढ़ जाने की सम्भावना पायी गयी। पी.जी. मेडिकल कालेज चण्डीगढ़ के आप्थेलमोलाजी विभाग के अनुसार हेयर डाई मोतियाबिंद की बीमारी को भी बढ़ावा दे सकता है। आज के अत्याधुनिक शैम्पू, क्रीम आदि प्रसाधनों में प्रयुक्त सोडियम लाइरील सल्फेट, मिथाइल हाइड्रोक्सी बेंजोएट आदि रासायनिक पदार्थों से कैंसर तक हो सकता है। इसी तरह खूबसूरती के लिए लगाई जाने वाली लिपिस्टिक न केवल होठों को काला कर रही है, बल्कि चर्म रोगों को जन्म दे रही है। आँखों के सौंदर्य को उभारने के लिए प्रयुक्त होने वाले लाइनर एवं मरकरा से आँखें सूज रही हैं। इस तरह त्वचा के दोषों को छिपाने वाली सामग्रियाँ ही त्वचा के रोगों की कारण बन रही हैं।

इसे संवेदनहीनता एवं विवेक-हीनता की कहेंगे कि सौंदर्य की खोज के इस उपक्रम में करोड़ों निरीह प्राणियों की निर्मम हत्या और अरबों-खरबों रुपया खर्च करने के बावजूद कतिपय खतरनाक बीमारियाँ ही पल्ले पड़ी हैं। सौंदर्य में वृद्धि होने के स्थान पर उसका सत्यानाश ही बदली है। अब भी समय है। इस भटकन से जितना जल्दी उबर जाय, उतना ही अच्छा। इस खर्चीले और झंझट भरे जंजालों में फँसने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि अपने स्वभाव में थोड़ा अन्तर करके कुरूपता को बहुत अंशों में हटाने, सौंदर्य को किसी सीमा तक चमकाने का प्रयत्न किया जाय। यह सम्भव है और स्वाभाविक भी।

यूं तो स्वस्थ, नीरोग शरीर, प्रसन्न मन से उपजी मुक्त खिलखिलाहट-सदाशय व्यवहार किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है, तो भी दिनभर की दौड़-धूप, गृहस्थी के काम-काज से मलिन हुए चेहरे को निखारना ही हो तो, अच्छा है पुनः प्राकृतिक वस्तुओं की ओर लौट पड़ें। इसमें न तो निर्ममता है और न किसी तरह की विवेकहीनता। इस तरह के प्रयोग स्वास्थ्य के लिए लाभदायक भी हैं।

बात बालों की हो तो ब्राह्मी, आँवला, रीठा, शीकाकाई का चूर्ण बराबर भागों में मिलाकर किसी लोहे के बर्तन में भिगोकर रख दें। इसके पानी से बाल धोने पर बालों का झड़ना, सफेद होना थोड़े समय पश्चात् ही रुक जाता है। इतना ही नहीं सिरदर्द जैसी बीमारियाँ भी ठीक होती हैं, मस्तिष्क को भी बल मिलता है।

चेहरे की चमक एवं कोमलता बरकरार रखने के लिए खीरे को छील कर इसके रस में आधा नीबू का रस मिलाते हुए घोल बना लें। इस घोल को गुनगुना कर इसमें 4-5 बूँद गुलाब जल डाल लिया गया। इसे रुई द्वारा चेहरे व गर्दन पर लगाकर 15 मिनट पश्चात् चेहरे को धो डालने से चेहरे की चमक और कोमलता में निखार आता है।

दही बाहरी त्वचा के सौंदर्य के लिए किसी कारगर औषधि से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इससे त्वचा की लावण्यता, कमनीयता और कान्ति में वृद्धि होती है। बेसन-दही मिलाकर चेहरे पर लेप करने से चेहरे की कुरूपता बढ़ाने वाले मुंहासों की सफाई होती है, त्वचा में निखार आता है। दही और शहद को चेहरे और गर्दन के आस पास लेप करके त्वचा का ढीलापन दूर किया जा सकता है। इससे त्वचा में कसाव बढ़ती है। पालक के उबले पानी में दो चम्मच दही और जौ का आटा या बेसन मिलाकर लगाने से चेहरे की हर तरह की कमियाँ दूर होती हैं।

चेहरे की कान्ति बढ़ाने के अतिरिक्त यदि स्थायी रूप से किसी प्रभावकारी क्रीम का उपयोग करना चाहें, तो उसके लिए चन्दन और केसर को घिसकर हल्दी के साथ अच्छी तरह से मिला लें। इसे सुखाकर रखा जा सकता है। नियमित अथवा आवश्यकता पड़ने पर पानी में पेस्ट बनाकर मुख पर लगा लें। यह क्रीम अन्य सभी तरह की क्रीम से कहीं अधिक प्रभावकारी सिद्ध होगी।

चेहरे की कान्ति बढ़ाने के अतिरिक्त यदि स्थायी रूप से किसी प्रभावकारी क्रीम का उपयोग करना चाहें, तो उसके लिए चन्दन और केसर को घिसकर हल्दी के साथ अच्छी तरह से मिला लें। इसे सुखाकर रखा जा सकता है। नियमित अथवा आवश्यकता पड़ने पर पानी में पेस्ट बनाकर मुख पर लगा लें। यह क्रीम अन्य सभी तरह की क्रीम से कहीं अधिक प्रभावकारी सिद्ध होगी।


जगज्जननी की कृपा से नारी का स्वरूप बोध

हे माँ। आपका सान्निध्य पाकर हम जान सके कि नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, शक्ति है, पवित्रता है, कला है और वह सब कुछ है जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धि है, रिद्धि है और वह सब कुछ है जो मानव प्राणी के समस्त अभावों, कष्टों एवं संकटों को निवारण करने में समर्थ है। यदि उसे श्रद्धासिक्त सद्भावना अर्पित की जाए तो वह विश्व के कण कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओत प्रोत कर सकती है।

आपका वात्सल्य पाकर हमें बोध हुआ है कि नारी सनातन शक्ति है। वह आदिकाल से उन सामाजिक दायित्वों को अपने कन्धों पर उठाए आ रही है, जिन्हें केवल पुरुष के कन्धों पर डाल दिया गया होता , तो वह न जाने कब लड़खड़ा गया होता, किन्तु विशाल भवनों का असह्य भार वहन करने वाली गाँव के समान वह उतनी ही कर्तव्यनिष्ठा, उतने ही मनोयोग, संतोष और उतनी ही प्रसन्नता के साथ उसे आज भी ढोए चल रही है। वह मानवीय तपस्या की साकार प्रतिमा है।

भौतिक जीवन की लालसाओं की उसी की पवित्रता ने रोका और सीमाबद्ध करके उन्हें प्यार की दिशा दी। प्रेम नारी का जीवन है। अपनी इस निधि को वह अतीत काल से मानव पर न्यौछावर करती आयी है। कभी न रुकने वाले इस अमृत निर्झर ने संसार की शान्ति और शीतलता दी है।

हे जगज्जननी ! आपकी कृपा से हम अपने अन्तःकरण में इस ऋषि वाणी को अनुभव करते हैं:-

विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ता सकला जगत्सु। त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्ति॥

हे देवि ! समस्त संसार की सब विधाएं तुम्हीं से निकली हैं और सब सिद्धियाँ तुम्हारी स्वरूप हैं, समस्त विश्व एक तुम्हीं से पूरित है। अतः तुम्हारी स्तुति किस प्रकार की जाए ?

अन्तःकरण में इस भाव की घनीभूत अनुभूति से प्रेरित होकर हम सब आपकी सन्तानें, आपकी द्वितीय पुण्यतिथि के अवसर पर अखण्ड ज्योति के इस अंक को नारी अंक के रूप में आपको समर्पित करते हैं। भावों की इस पुष्पाँजलि को स्वीकार करो माँ ! और हम सब पर सदा की भाँति अपने आँचल की वरद् छाया बनाए रखना।


जीवन की शाँति माँ के चरणों में

सूफी सन्त बायजीद को संसार से विरक्ति हो गयी, उन्होंने गृह परित्याग कर दिया और ब्रह्म आराधना में लीन हो गए। अपने बेटे की याद में रोते रोते बायजीद की माँ ने आँखें खो दीं। बायजीद ने यह सुना तो अत्यन्त दुखी हुए। उन्होंने कहा - मनुष्य जीवन की शान्ति माँ के चरणों पर रखी है। मेरा कितना दुर्भाग्य था कि उसे खोजने बाहर निकला। बायजीद घर लौट पड़े और अपना शेष जीवन माँ की सेवा, मातृत्व के उद्धार में लगाया।

संसार में आया हर प्राणी माँ से अधिक और किसी का ऋणी नहीं। दूसरे अपेक्षा करते हैं, पर वह उत्सर्ग करती है। उसकी करुणा, स्नेह, ममता और वात्सल्य का रस पीकर ही मनुष्य, मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है। अयोध्या के सिंहासन पर राम आसीन हो चुके थे। राज्य की प्रजा को किसी तरक की कोई पीड़ा या कष्ट तो नहीं है, यह जानने के लिए उनके गुप्तचर परिभ्रमण किया करते थे और प्रतिदिन सायंकाल राम को सारी जानकारियाँ दिया करते। एक दिन एक गुप्तचर ने भगवान श्रीराम को एक ऐसी घटना बताई, जिससे मातृत्व की यथार्थ महिला झलकती है।

एक माँ अपने बेटे को स्तन पान करा रही थी। बालक का मन क्रीड़ा में लगा था, सो वह बार बार स्तन से मुख हटा लेता था। माँ हर बार स्तन मुँह में डालती और बालक हर बार वही अरुचि व्यक्त करता। भावविभोर माँ ने तब बच्चे को सम्बोधित करके कहा - मेरे लाल ! हम तुम दोनों रामराज्य में जन्मे हैं, जहाँ हर व्यक्ति अज्ञान, अशक्ति और अभाव से मुक्त है। इस राज्य में किसी का पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ का हर प्राणी संसार चक्र के आवागमन से मुक्त हो जाता है। फिर न मुझे माँ के रूप में जन्म लेना है, न तुझे मेरे बेटे के रूप में। तुझे जी भर कर दूध पिलाने की मेरी आकाँक्षा अधूरी न रह जाए तात ! सो तू मेरा मीठा दूध छककर पी।

गुप्तचर यह संवाद देते देते भाव विह्वल हो जाता है, स्वयं प्रभु श्रीराम के नेत्रों से करुणा झरने लगती है। माँ की ममता का यह उपाख्यान कठोर से कठोर हृदय में भावनाओं का ज्वार ला देता है।

माँ सर्वव्यापी सत्ता की प्रतिकृति है। देश जाति की संकीर्णताएं उसकी नम्रता को कभी अवरुद्ध नहीं कर पायीं। उसी की भाव संजीवनी ने पौरुष को महानता प्रदान की है। उसी ने खुद मानव को मानवीय गरिमा प्रदान की है। राम, कृष्ण, गौतम, महाराणा प्रताप, शिवाजी, वीर हम्मीर, सुकरात, अरस्तू आदि सभी महापुरुषों के जीवन में छलकने वाली सम्वेदना, प्राण और प्रकाश उनके जीवन उनकी माँ के स्तनों से होकर आया है।

इस महान महिमामयी माँ की प्रतिष्ठा ही मानवता की सच्ची प्रतिष्ठा है। नारी के विविध रूपों में माँ के ही संस्कार सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। उनकी पवित्रता की रक्षा, मातृत्व का सम्मान और उसके उपकारों का मूल्य चुकाने का हमारा कर्तव्य सो नहीं जाना चाहिए। माँ के ऋण आज से ही चुकाए जाएं ।तो भी वह मरने तक शायद ही चुक पाएं, वे इतने असीम हैं, इतने अनन्त हैं।

आधुनिक सभ्यता के अनेक अभिशापों में एक यह भी है कि इतने कष्ट इतनी पीड़ाएं झेलकर जिस माँ ने जन्म दिया, उसी की अब उपेक्षा होने लगी हैं। उसका अनादर बढ़ रहा है। विलासिता के प्रति जन आकर्षण ने ही नारी के माँ रूप की अवहेलना और उसके रमणी तथा कामिनी स्वरूप की उपासना शुरू कर दी है। इसे यों भी कह सकते हैं कि आज का मानव शान्ति शीलतादायिनी निर्झरिणी से दूर मरुस्थल की मृग मरीचिका में भटक गया है। निराशा, अशान्ति, असन्तोष, कलह, कटुता में खीझते हुए दम्पत्ति सामाजिक जीवन भी यही बुराइयां फैलाते हैं। यह एक कटु सत्य है जो माँ के प्रति कृतज्ञ नहीं हो सकता, वह समाज को भी कभी अपना नहीं मानता। ऐसे स्वार्थ व संकीर्णता की प्रवृत्ति वाला व्यक्ति किसी के भी साथ छल कर सकता, धोखा दे सकता है। मूल प्रश्न व्यवहार का नहीं दर्शन का है। यदि लोग मान्यता बनाने लगें, तो हानि की सम्भावनाएं बहुत अधिक बढ़ जाती हैं। यही कुछ आज दृष्टिगोचर होता है। कृतज्ञता का अभाव तो केवल बर्बर और खूँख्वार जानवरों में ही होता है। यह सामाजिक जीवन का एक ऐसा पाप है, जो जीवन को जंगली बना देता है। माँ के प्रति बरती गयी कृतघ्नता, किसी भी रूप में हितकारक नहीं, चाहे वह वैयक्तिक हो या सामाजिक। इससे मातृत्व का तो कुछ न बिगड़ेगा, अपनी भावनाओं से तो वह भाव विभोर रहने का आनन्द लेगी ही, मनुष्य ही अपने पैरों आप ही कुल्हाड़ी मारने जैसा स्वयं का अहित करेगा।

माँ के प्रति कोमलता और पवित्रता के विचार प्रत्येक जाति, हर संस्कृति में अभिव्यक्त हुए हैं। रोमन कैथोलिक धर्म में मेडोना और पुत्र के रूप में यीशु के चित्र की पूजा की जाती है इसे पुत्र और माँ की सघन आत्मीयता की अभिवन्दना कहा जाना चाहिए। लीबिया में मातृत्व को कानूनी रूप से इतना सम्मान प्राप्त है कि उसी से उसकी महत्ता अभिव्यक्त होती है। क्रूर से क्रूर व्यक्ति भी माँ के पास आकर कुछ क्षणों के लिए जलते हुए विद्वेषी जीवन में शान्ति का अनुभव करते हैं। भारतीय संस्कृति में तो, या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, कहकर उसे सर्वव्यापी होने की संज्ञा दी है। जो उसकी महिमा और गरिमा को देखते हुए उचित ही है। नारी को भाव प्रवणता का पर्याय कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह उसका जन्मजात संस्कार है। इसी कारण वह बाल्यावस्था से ही स्नेह और श्रद्धा की पात्र बनी रहती है। यदि उसे आत्मसम्मान मिलता रहे, तो वह अपनी तपश्चर्या से आरे समाज को गौरवान्वित कर सकती है। बाल्यकाल में वह पिता, बड़े भाइयों का स्नेह दुलार पाकर घर भर के काम करती घूमती है, तो गृहस्थ जीवन में वह त्याग के सिंहासन पर आरुढ़ होती है। घर भर की सेवा साधना, पति का स्नेह-अभिसिंचन जैसा वह करती है, सृष्टि का कोई अन्य प्राणी शायद की करता है। माँ के रूप में तो वह भावनाओं की साकार प्रतिमा ही है। इतना त्याग ईश्वरीय सत्ता के अतिरिक्त कोई और नहीं कर सकता। उसके इस अनुग्रह का आभार व्यक्त करने के लिए भारतीय संस्कृति ने उसे परमेश्वरी का स्थान दिया और परमात्मा के नारी रूप माता गायत्री की उपासना प्रचलित की। यह सर्वव्यापक और विश्व उपासना के रूप में सम्मानित हुई। उसी से मातृसत्ता की महिमा प्रतिपादित होती है।

माँ का आशीर्वाद रहने तक यह देश सर्वशक्ति सम्पन्न राष्ट्र रहा, पर अब उसके पतन के सारे देश को अन्धकार के गर्त में जा धकेला। अब जबकि हम प्रगति के लिए उठ खड़े हुए हैं, माँ का आशीष लेना अत्यावश्यक है। उसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। बढ़े भी तो प्रगति स्थिर रख सकेंगे, यह सन्देह जनक ही रहेगा।


प्राचीन भारत की प्रगति का मर्म

आजकल भले ही नारी का कार्यक्षेत्र घर गृहस्थी तक सीमित कर दिया गया हो, पर प्राचीनकाल में वैसा नहीं था। सुविख्यात पाश्चात्य इतिहासवेत्ता अर्नाल्ड टायनबी के शब्दों में “आज के उन्नत और विकसित, सभ्य कहे जाने वाले देशों के लोग जिस समय नदियों और तालाबों, झरनों में घुटनों के बल झुककर जानवरों की तरह पानी पीते थे, तब भारत वासियों ने भूगोल, खगोल, विज्ञान, चिकित्सा, यंत्र विद्या के साथ गुह्य विधाओं का भी असाधारण विकास कर लिया था। आज का मानव चन्द्रमा पर पहुँचने में विज्ञान के बल पर अब समर्थ हुआ है। लेकिन भारत के प्राचीन महर्षि अपने योगबल से लोक लोकान्तरों का भ्रमण कर आते थे।” प्रश्न उठता है इतिहास में तो इसका विवरण मिलता नहीं। इसका उत्तर उक्त इतिहासकार ने इस प्रकार दिया है कि - “ भारतीय महर्षियों ने इतिहास लेखन को कभी महत्व नहीं दिया, क्योंकि उनकी दृष्टि में भौतिक घटनाओं से भी अधिक मूल्यवान दूसरी उपलब्धियाँ थीं। जिसे उन्होंने साँकेतिक भाषा में वैदिक साहित्य में सूत्रबद्ध कर दिया और उन्हें उपलब्धियों के बल पर ही हजारों वर्ष पूर्व भारत ने ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति कर दिखाई।

क्या यह प्रगति अकेले पुरुष ने की, नारी ने इसमें कोई योगदान नहीं दिया ? यदि ऐसा होता तो फिर प्रगति की चाल कछुए के समान रही होती और आज की तरह ही हम सब उसके कदम से कदम मिलाकर चलने में असमर्थ होते। प्राचीनकाल में नारियों ने पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर सहयोग किया और ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में विकास के साथ साथ समाज, राजनीति, धर्म, कानून, संगठन आदि सर्वांगीण उन्नति में पुरुष की सच्ची सहचरी बनकर रही। उसे प्रेरणा देती रही, बल प्रदान करती रही।

तभी तो प्राचीनकाल में भारतीय समाज को विश्व में सर्वाधिक उन्नत स्थिति प्राप्त है। नारी शिक्षा का आज भले अवमूल्यन किया जाता हो, भले ही उसके लिए वेद शास्त्रों और ऋचाओं - मन्त्रों तक का पाठ निशिद्ध ठहराया गया हो, लेकिन अतीत के भारत में ऐसा कोई विधि निषेध नहीं था, कि ज्ञान का क्षेत्र नारी के लिए वर्जित है और उसमें स्त्रियों को कोई भाग नहीं लेने दिया जाना चाहिए। ज्ञान क्षेत्र में नारी अनादि काल से ही नर के समान ही रही है। अनेक वेद मंत्रों के अवतरण में ऋषियों के ही नहीं, ऋषिकाओं के भी नाम मिलते हैं। नर और नारी को समान ऋषिपद प्राप्त होता था। वैदिक ऋचाओं की दृष्टा के रूप में विश्ववारा, गोधा, सरमा, अपाला, घोषा, शची, लोपामुद्रा आदि ऋषिकाओं का बड़ा सम्मानपूर्ण स्थान था। यही नहीं सर्वोच्च सप्तऋषि पद तक में नारियों को स्थान मिलता था। अरुन्धती का सप्त ऋषि पद पाना सर्वविदित है, पर आज स्थिति सर्वथा उलटी है। इन सब तथ्यों को भुलाकर महिलाओं को वेद मन्त्रों के पाठ तक का अधिकारी भी नहीं माना जाता। यह दुःख के साथ आश्चर्य की भी बात है कि जब नारियाँ वेद मन्त्रों की दृष्टाएं हो सकती हैं तो वेद मन्त्रों के पढ़ने की अधिकारिणी कैसे नहीं हो सकती हैं ? यह छोटी सी बात भी नहीं समझी जाती।

अध्यात्म और ज्ञान के क्षेत्र में नर और नारी का भेद करना किसी भी दृष्टि से युक्ति संगत नहीं ठहरता। ब्रह्म को लिंग भेद से परे माना जाता है। उसके अव्यक्त रूप को मानवी बुद्धि समझ नहीं पाती। प्राणी उसे समय सके इसलिए ब्रह्म ने स्वयं को व्यक्त किया, तो नर और नारी दोनों के रूप में प्रकट हुआ। नर के रूप में वह परम पुरुष के रूप में प्रकट हुआ तो नारी के रूप में उसे आदि शक्ति परमचेतना कहा जाता है। पुरुष और प्रकृति के जिन दो नामों से उसे जाना जाता है उनमें एक पुल्लिंग हैं, तो दूसरा स्त्रीलिंग।

शास्त्रों में ब्रह्म के तीनों रूपों को जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा जाता है वहीं उसे आदि शक्ति, महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूप में भी व्यक्त हुई माना जाता है। पुराणों में जहाँ कहीं भी देवासुर संग्राम का वर्णन आता है, वहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि देवता जब पराजित होने लगते थे तो देवी शक्ति किसी न किसी रूप में उनकी सहयोगिनी बनकर आगे आती है और उन्हें विजयी बनाती थी। यह सारे तथ्य नारी की दृष्टि से अध्यात्म क्षेत्र में कनिष्ठ समझने वाली मान्यता को निरस्त करते और अप्रामाणिक ठहराते हैं।

कहा जा सकता है कि यह तो मानवेत्तर अलौकिक शक्ति की चर्चा हुई। वह किसी भी रूप में व्यक्त होने के लिए लिए स्वतंत्र है और नर या नारी किसी भी रूप में क्रीड़ा कल्लोल कर सकती है। इससे नारी के ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में पारंगत होने की बात सिद्ध नहीं होती है। यह सोचना गलत है। आज तमाम प्रतिबन्धों और निषेधों के कारण नारी यदि इस क्षेत्र में अपेक्षित प्रतिभा नहीं प्रदर्शित कर पा रही है तो उसका कारण यह नहीं है कि वह सदा से अयोग्य या अक्षम रही है। वस्तुस्थिति यह है कि जिन दिनों नारी आगे बढ़ने और अपनी प्रतिभा को विकसित करने के लिए स्वतंत्र थी, उन दिनों उसने हर क्षेत्र में अपनी योग्यता और उपयोगिता की धाक जमा रखी थी।

इस तरह के असंख्य प्रमाण शास्त्रों में मिलते हैं। वेदानुशासन में जब चला जाता था, तब महिलाओं ने ऐसे ऐसे महान कार्य करके दिखाए भी हैं कि उनकी भूमिका को हटा दे तो इतिहास का स्वरूप ही बदल जाता है और वह सारहीन रह जाता है। रामायण में सीता के चरित्र को निकाल दिया जाए तो रामायण में बाकी कुछ नहीं रहता। द्रौपदी, कुन्ती, गान्धारी का चरित्र निकाल देने पर महाभारत की महत्ता क्या रह जाएगी ? पाण्डवों का सारा जीवन संग्राम ही अधूरा रह जाएगा। इसी प्रकार भागवत् में से देवकी, यशोदा और गोपियों का चरित्र हटा दिया जाए तो कृष्ण एक साधारण पुरुष बनकर रह जाएंगे। शिवजी के साथ पार्वती, विष्णु के साथ लक्ष्मी का नाम हटा लिया जाए तो इनके चरित्र आधे अधूरे रह जाएंगे।

यों कहने को नारी को अबला कहा जाता है, पर आसुरी उत्पादों के कारण जब देवतागण घबड़ा उठे तो असुरों का संहार करने में मातृशक्ति दुर्गा ही समर्थ हुई। यह तो हुई शक्ति संगठन संबंधी बात। पर समाज के अन्य क्षेत्रों में भी नारी ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। जब पृथ्वी पर भगवत् शक्ति के अवतरण की आवश्यकता हुई तो मनु तप करने लगे। उनका अकेले का तप सफल नहीं हुआ तो मनु पत्नी शतरूपा भी तपश्चर्या में लगीं। फलतः तप सफल हुआ और शतरूपा ने कौशल्या के रूप में राम को अपनी गोद में खिलाया।

इसी प्रकार भगवान के अवतरण हेतु द्वापर में पुनः आवश्यकता अनुभव हुई। प्राचीन उदाहरणों से सीख ग्रहण कर महर्षि कश्यप ने अपनी धर्मपत्नी अदिति के साथ तप किया। अदिति यशोदा बनीं और उन्हें पूर्ण कला के अवतार भगवान कृष्ण का पालन पोषण करने का श्रेय मिला। राम और कृष्ण भगवान हैं। अवतार सिद्धान्त के विरोधी भी उन्हें महापुरुष मानते हैं, पर जिनकी कोख से उन्होंने जन्म लिया, जिनकी गोदी में पैर पसारे, जिनका दूध पिया और जिनका संरक्षण और दुलार पाया उन माताओं का गौर व राम और कृष्ण से बढ़कर ही है, कम नहीं।

भगीरथ द्वारा गंगावतरण के लिए तपश्चर्या की कथा सर्वविदित है। पर बहुत थोड़े लोग जानते हैं कि सूखे विन्ध्याचल को हरा भरा बनाने के लिए अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूईया ने तपश्चर्या की और चित्रकूट से मन्दाकिनी नदी को बने के लिए विवश किया। इस उपाख्यान का उल्लेख रामचरित मानस के अयोध्याकाण्ड में भगवान राम के चित्रकूट निवास के प्रसंग में मिलता है।

सन्तति निर्माण में माता की भूमिका पिता से हजार गुना अधिक है। देवी उशिज ने अपने पुत्र कक्षिवान को अपने ही संरक्षण सान्निध्य में रखकर शिक्षा दी थी और उसे विद्वान बनाने के अतिरिक्त योग विद्या में निष्णात बनाया। योग विद्या के प्रकाण्ड विद्वान और मर्मज्ञ ऋषि पंचिशिख, जिन्होंने इस विषय पर कई ग्रन्थ लिखे हैं। उनमें महर्षि ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह ज्ञान उन्हें अपनी माता सुलभा से मिला।

भरत जिनके नाम पर आगे चलकर इस देश का नाम ही भारत वर्ष पड़ गया, उनका पालन पोषण अकेले वनवासिनी शकुन्तला ने किया था। वह इतना पराक्रमी था कि बचपन से ही शेर के बच्चों के साथ खेलता था। निष्ठा और लगन के प्रतीक माने जाने वाले ध्रुव का पालन पोषण भी अकेले उनकी माता सुनीति ने वन में किया था। अपने शिखण द्वारा उन्होंने ऐसे संस्कार दिये कि ध्रुव ने बचपन में ही जीवन के रहस्य को पा लिया। परमात्मा की अनुभूति को धारण कर उन्होंने आगे चलकर देश को कुशल प्रशासन दिया।

लव-कुश का पालन पोषण वाल्मीकि के आश्रम में अभावग्रस्त स्थिति में सीता ने ही किया और उन्हें इस योग्य बनाया कि अजेय हनुमान तथा लक्ष्मण को भी उनके सामने पराजित होना पड़ा।

राजा शान्तनु ने जब गंगा के साथ विवाह किया तो गंगा ने यह शर्त रखी कि उनकी सभी सन्तानें सरिता तट पर ऋषि आश्रमों में भेज दी जाएंगी। इस समझौते के अनुसार सात पुत्र तो ऋषि आश्रम में भेज दिए गए, जो सातवसु के नाम से प्रसिद्ध हुए। अन्तिम आठवीं सन्तान थी भीष्म। शान्तनु के अनुरोध पर गंगा इस बात के लिए राजी हो गयीं कि राज्य संचालन के लिए उन्हें छोड़ा जाए, लेकिन उनकी शिक्षा दीक्षा स्वयं गंगा के निर्देशन में रहे। हाँ, भीष्म अपने भाइयों की तरह रहे ब्रह्मचारी ही।

ज्ञान - विज्ञान और आध्यात्मिक प्रतिभा के क्षेत्र को ही लें तो उसमें भी ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। महर्षि पुलोमा की पुत्री शची महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में रहकर ज्ञान - विज्ञान में प्रवीण बनी थी। उसकी साधना तथा प्रतिभा से प्रभावित होकर देवराज इन्द्र उसे माँगने के लिए पुलोमा के द्वार पर पहुँचे। वहीं ऋषि कन्या शची आगे चलकर इन्द्राणी बनी। मनु ने जब वाजपेय यज्ञ किया तो कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया जो उसे महायज्ञ का पौरोहित्य सम्हाल सके। उस स्थिति में मनु ने अपनी पुत्री और उस काल की महान मनीषी इला को यज्ञाचार्य नियुक्ति कर उस अनुष्ठान को सम्पन्न कराया।

महाराज जनक दरबार में महाविदुषी गार्गी और महर्षि याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है। इस शास्त्रार्थ में याज्ञवल्क्य को गार्गी के पाँडित्य और वैदुष्य का लोहा मानना पड़ा। उन दिनों गार्गी के समतुल्य विदग्धा, उद्दालिका, वीचावली, अनुसूया, गौतमी, यमी, सूर्या आदि विदुषियाँ भी प्रख्यात थी। इसी प्रकार आद्य शंकराचार्य और मंडनमिश्र के शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र की पत्नी देवी भारती निर्णायक बनी थीं। यह भी हो सकता था कि वे पक्षपात कर अपने पति को विजयी घोषित कर देती। लेकिन शास्त्रार्थ में प्रतिवादी की भूमिका निभाने वाले आचार्य शंकर एवं अन्य विद्वानों को देवी भारती की निष्पक्षता पर पूरा भरोसा था तथा उस महान विदुषी महिला ने अपने पर किए गए विश्वास को प्रमाणित कर निष्पक्ष निर्णय भी दिया। आचार्य स्वयं उसकी विद्वता से प्रभावित हुए और उसे देवी सरस्वती की उपमा दी। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध ज्योतिष विद्वान भास्कराचार्य द्वारा रचित “सिद्धाँत शिरोमणि” पुस्तक का उत्तरार्द्ध उनकी पुत्री लीला द्वारा ही लिखा गया था, यह सर्वविदित है।

ज्ञान और विद्वता के क्षेत्र में ही क्यों शौर्य, साहस और पराक्रम में भी भारतीय नारी इतनी बढ़ी-चढ़ी थी कि उसे अबला कहना हास्यास्पद लगता है। शिवधनुष जो राजा जनक के महल में रखा था और अच्छे अच्छे बलवीर उसे उठा नहीं पाते थे, सीता ने उसे उठाकर दिखाया। तभी जनक को सीता स्वयंवर में यह शर्त रखनी पड़ी कि जो इस धनुष को तोड़ देगा, उसके साथ ही सीता का विवाह होगा। इन्द्र ने शम्बर से युद्ध के लिए राजा दशरथ से सहायता माँगी। दशरथ अपनी सेना सहित इन्द्र की ओर से लड़ने गए। उस युद्ध में कैकेयी भी साथ गयी थीं और अपने पति को भारी प्राण संकट से बचाया था। उसी से प्रसन्न होकर दशरथ ने दो वरदान देने का वचन दिया था।

एक बार श्रीकृष्ण से चित्रसेन गंधर्व को उसके छोटे से अपराध का बड़ा कड़ा दण्ड दे दिया। चित्रसेन अर्जुन को शरण आया। शरणागत की रक्षा का प्रण निभाने के लिए अर्जुन ने श्रीकृष्ण का सामना किया। उस समय अर्जुन के रथ का संचालन द्रौपदी ने बड़ी कुशलता के साथ किया था। कृष्णार्जुन युद्ध में यह कथा बड़े विस्तार के साथ आती है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में धनुर्धारी महिलाओं का उल्लेख मिलता है और यह भी वर्णन आता है कि उन्हें लड़कों के समान ही शिक्षा दी जाती थी।

शौर्य और पराक्रम ही क्यों ? धर्म और समाज, संस्कृति की सेवा के लिए भी नारियों ने बढ़ चढ़ कर बलिदान प्रस्तुत किए हैं। आचार्य बृहस्पति की पुत्री देवहूति और भावभव्य की कन्या रोमशा अपने पिता तथा पति से आज्ञा लेकर विभिन्न क्षेत्रों में धर्म प्रचार के लिए गयी थीं। अभ्रण ऋषि की कन्या ने तो एक गुरुकुल भी खोल रखा था, जिसमें छात्र - छात्राओं को समान रूप से प्रवेशाधिकार थे।

नेतृत्व का जहाँ तक प्रश्न है महिलाएं उसमें भी पीछे नहीं रही हैं। इन्द्र को दिशा निर्देश तो इन्द्राणी ही देती थीं। धृतराष्ट्र तो राज्य संचालन में असमर्थ थे। यह कार्य उनकी पत्नी गाँधारी ही करती थी। ऐतिहासिक तथ्यों को देखें तो राज्यश्री, रानी पद्मावती, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर जैसे अगणित उदाहरण हैं। उदाहरणों का अन्त नहीं।

बात प्रतिभा प्रमाणित करने और स्वयं विकसित होने तक सीमित नहीं है। प्रतिभा से कहीं अधिक उनका त्याग है। जहाँ उन्होंने स्वयं को पर्दे के पीछे रखकर अपने पतियों को समाज निर्माण, आत्मनिर्माण में सहायता दी। धर्मपत्नी के रूप में उन्होंने अपने पतियों को अधिक योग्य बनाने और महान कार्य सम्पन्न करने में महत्वपूर्ण योगदान प्रस्तुत किए। सर्वविदित है कि महान विदुषी विद्योत्तमा का विवाह अशिक्षित कालीदास से हुआ था। विद्योत्तमा इतनी विद्वान थी कि उसने विवाह के लिए शास्त्रार्थ की शर्त रखी थी। कई विद्वान आए, उन्होंने शास्त्रार्थ किया और हार गए। अन्त में चिढ़कर छल बल से उन्होंने मूढ़ कालीदास से उसका विवाह करा दिया। विद्योत्तमा को जब इस बात का पता चला तो उसने अपने पति को उत्तेजित किया और उसमें ज्ञान के प्रति लगन पैदा की। इसके बाद उनके अध्ययन की अच्छी व्यवस्था बना दी। जिसके फलस्वरूप मूढ़मति कालीदास, महाकवि कालीदास बन गए।

इसी प्रकार रत्नावली ने अपनी सुख सुविधाओं को तिलाँजलि देकर अपने पति तुलसीदास की प्रतिभा को कामुकता से ईश्वरभक्ति की ओर मोड़ दिया। यह रत्नावली का ही सत्साहस था जिसने समाज को तुलसीदास जैसा सन्त और रामचरितमानस जैसा महान ग्रन्थ उपलब्ध कराया। स्वयं रत्नावली भी उच्च कोटि की साहित्यकार थी और उसकी लिखी कई रचनाएं इन दिनों भी उपलब्ध हैं। प्रसिद्ध विद्वान वाचस्पति मिश्र को अपने ग्रन्थ लेखन कार्य में लगे रहने देने के लिए उनकी पत्नी भामती ने उपार्जन और निर्वाह की व्यवस्था जुटाने का दायित्व स्वयं सम्हाला था। वह मूँज की रस्सी बंटती थी और उससे जो भी उपार्जन होता था उसी से अपना और अपने पति का निर्वाह चलातीं।

धर्मपत्नियों के रूप में इस तरह के अनेकानेक उदाहरण मिलते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि उन दिनों आदर्शवादी नारियाँ भोगविलास, सुविधा अथवा अपने संरक्षण के लिए विवाह नहीं करती थीं, वरन् उनका उद्देश्य अपने पतियों के महान कार्यों में हाथ बंटाना होता था। सुख सुविधाओं को लात मारकर उन्होंने अपना जीवन आदर्शों की पूर्ति के लिए किन्हीं सुयोग्य विद्वानों और कलाकारों को आजीवन अपना साथी चुनना श्रेयस्कर समझा और उनके कार्यों में महान योगदान दिया।

मैत्रेयी महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी थी। वह किसी साँसारिक सुख के लिए नहीं अपितु विशुद्ध आत्म साधना के लिए उनकी सहधर्मिणी बनी। साँसारिक सुखेच्छा के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। राजकुमारी सुकन्या ने अन्धे और अति वृद्ध च्यवन महर्षि से केवल इसलिए विवाह किया था कि वह उनकी तपस्या एवं शोध के लिए आवश्यक साधन जुटा सके। उपयुक्त सेवा सहायता कर सके। राजा अश्वपति की प्राणप्रिय पुत्री विदुषी एवं अति रूपवती पुत्री राजकुमारी सावित्री ने एक वनवासी और निर्धन युवक सत्यवान से मात्र इसलिए विवाह किया कि वह उसके वनौषधि शोध कार्य में सहायक होकर लोक मंगल के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे सके।

इस तरह के असंख्य प्रमाण हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में आदर्शवादी नारियों ने अपनी प्रतिभा, क्षमता और योग्यता का लाभ समाज को देने के लिए बढ़-चढ़कर योगदान दिये। यह सब इसी कारण सम्भव हो सका कि उन्हें अपनी योग्यता के विकास की पूरी - पूरी छूट थी और इस तरह की व्यवस्थाएं भी समाज की ओर से बनायी जाती थीं कि वे अपनी योग्यता और क्षमताओं का विकास कर सकें। इन व्यवस्थाओं और अवसरों का लाभ उठाने में स्त्रियों भी संकोच नहीं करती थीं और अनेक माध्यम से स्वयं का विकास करते हुए समाज को भी उन विकसित क्षमताओं से लाभान्वित करती रहीं।

दुनिया की बदलती परिस्थितियों और कतिपय महान क्रान्तिकारियों के प्रयासों से देश स्वतन्त्र हुआ। स्वतंत्रता को हासिल किए लगभग पचास वर्ष भी होने जा रहे हैं। इतना समय किसी राष्ट्र को अपनी स्थिति सुधारने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। परन्तु वैसा हो नहीं सका। विकास हुआ तो है पर गति वैसी नहीं है जैसी कि होनी चाहिए। इसका कारण एक ही है प्राचीन भारत की प्रगति का मर्म नहीं समझा गया। नारी के विकास के लिए समुचित व्यवस्थाएं नहीं बनायी गयीं। जो छुट पुट प्रयास हुए भी हैं तो सदियों से दबी दबाई गई नारियाँ उनसे लाभ उठाने में संकोच करती हैं। यह स्थिति शोचनीय ही नहीं दुर्भाग्यपूर्ण भी है। इस दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने का एक ही उपाय है कि महिलाओं पर से इस तरह के प्रतिबन्ध हटाये जावें। उनके संबंध में अपनी मान्यता और दृष्टिकोण बदला जाए तथा इस तरह की व्यवस्था बनायी जाए जिससे स्त्रियाँ निःसंकोच अपनी क्षमता और प्रतिभा को विकसित कर सके। इस ओर प्रयत्नशील कदम, इतिहास का रुख अपनी ओर मोड़ सकते हैं और भारत पुनः अपनी उसी गौरव गरिमा को अर्जित कर सकता है।


धर्मशास्त्रों में नारी की गरिमा

यह सही है कि मध्य युग में अपने देश में पतनशील प्रवृत्तियों के विकासक्रम में सामाजिक संरचना हर तरह से दूषित होती गयी। सुविधा प्राप्त शक्तिशाली वर्ग ने अपनी अन्ध मान्यताएं शेष वर्ग पर थोपने के लिए हर सम्भव हथकण्डे अपनाए। एक ओर जहाँ धन सम्पदा थोड़े से लोगों के हाथों में केन्द्रित कर शेष को उनका मुँह जोहते रहने वाला बना डाला गया, वहीं धर्मशास्त्रों में भी पुरोहितों द्वारा मनचाहे अंश जुड़वाए गए। इन्हीं प्रक्षिप्त अंशों के बल पर धर्मशास्त्रों की दुहाई देकर नारी के प्रगति की राह अवरुद्ध की गई अन्यथा यदि भाषा की प्राचीनता के आधार पर विवेकपूर्ण अध्ययन किया जाए तो यही पाएंगे कि वैदिक साहित्य, शास्त्रीय प्रतिपादन नारी की गरिमा गान करते अघाते नहीं।

सबसे पहले यदि प्राचीन ग्रंथों में नारी के लिए प्रयुक्त सभी शब्दों की व्युत्पत्ति पर ही विचार करें, तो भी स्पष्ट हो जाएगा कि मध्यकालीन अन्धकार युग से पहले अपने यहाँ महिलाओं के प्रति समाजशास्त्रियों का मनोभाव क्या था ?

उदाहरण के लिए महिला शब्द को ही लें - मह + इल च् + आ = महिला। मह का अर्थ श्रेष्ठ या पूजा हैं पूज्य, श्रेष्ठ जो है वही महिला। लौकिक संस्कृति में आदर देने के लिए स्त्रियो के लिए मान्य शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह वस्तुतः वैदिक संस्कृति के मेना शब्द से बना है। ऋग्वेद में मेना शब्द नारी अर्थ का वाचक है और यास्क कृत निरुक्त (3/21/2) में इसकी व्युत्पत्ति दी गई है -

मानयन्ति एनाः (पुरुषाः)

अर्थात् - पुरुष इनका आदर करते हैं इसलिए इन्हें मेना कहते हैं।

इसी प्रकार स्त्री अर्थ का बोधक ‘ग्ना’ शब्द भी ऋग्वेद में आया है , जो देव पत्नियों के लिए प्रयुक्त है। किन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों में यही शब्द मानवी के लिए प्रयुक्त है। जिनकी यास्क ने व्याख्या की है - “ग्ना गच्छन्ति एनाः”। पुरुष ही उसके पास जाते हैं, सम्मानपूर्वक बात करते हैं। उसे पुरुष से अनुनय की आवश्यकता नहीं पड़ती।

स्त्री शब्द तो सर्वाधिक प्रचलित है। भाष्यकार महर्षि पतंजलि के अनुसार “स्त्यास्यति अस्याँ गर्भ इति स्त्री”। उसके भीतर गर्भ की स्थिति होने से उसे स्त्री कहा गया है।

जहां तक नारी शब्द का प्रश्न है, वह नर की ही तरह नृ धातु से बना है और इसका सामान्य अर्थ है क्रियाशील रहने के कारण ही नारी हुई। जो गति करे, हलचल करे वह नर एवं नारी। किन्तु ऋग्वेद में नृ का प्रयोग नेतृत्व करने, दान देने और वीरता करने के अर्थ में किया गया है। उस दृष्टि से नर और नारी में यही तीनों विशेषताएं होनी चाहिए।

सुन्दरी शब्द ऋग्वेद में सूनरी का विकसित रूप है; वेदों में सूनरी उषा को कहा गया है अर्थात् शोभा वाली। ललना और मानिनी शब्द को स्पष्ट ही है। जिसकी इच्छाशक्ति प्रबल हो वह ललना और जिसमें स्वाभिमान हो वह मानिनी।

ये तो हुए शब्द। यह यदि प्राचीन ग्रन्थों में नारी के प्रति व्यक्त उद्गार देखें, तो स्पष्ट हो जाता है कि नारी के व्यक्तित्व के प्रति सम्मान का भाव उनमें है और उस सदैव एक स्वतंत्र चेतन सत्ता के रूप में ही स्मरण किया गया है। वेदों में तो नारी के गौरव का अनेक प्रकार से वर्णन है। एक स्थान पर नारी को ब्राह्मण कहा गया है। “स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ” (ऋग्वेद 8।33।19) इसका अभिप्राय यह है कि वह स्वयं विदुषी होते हुए अपनी सन्ता को सुशिक्षित बनाती है। ब्रह्म ज्ञान का अधिष्ठाता है। यही यज्ञों का संचालन करता है। वह ज्ञान-विज्ञान में श्रेष्ठ होता है। अतः उसे यज्ञ में सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। उसी प्रकार नारी को ज्ञान-विज्ञान में निपुण होने के कारण ब्रह्म बताया गया है।

ऋग्वेद के दशम मण्डल के 159 वें सूक्त में शची का गौरव वर्णित है शची का कथन है -

अहं केतुरहं मूर्धाऽमुग्रा विवाचिनी।

ममेदनु क्रतुँ पतिः सेहानाया उपाचरेत्।

-ऋग्वेद 10।159।2

अर्थात् - मैं ज्ञान में अग्रगण्य हूँ, मैं स्त्रियों में मूर्धन्य हूँ। मैं उच्चकोटि की वक्ता हूँ। मुझ विजयिनी की इच्छानुसार ही मेरा पति आचरण करता है।

वेदों में नारी का गौरवमय स्थान इससे भी ज्ञात होता है कि नारी को ही घर कहा गया है -

जायेदस्तं मधवन्त्सेदु योनि स्तदित्वा युक्ता हरयो वहन्तु॥ - ऋग्वेद 3।53।4

अर्थात् घर, घर नहीं है अपितु गृहिणी ही गृह है। गृहिणी के द्वारा ही गृह का अस्तित्व है। यही भाव एक संस्कृत सुभाषित में कहा गया है कि गृहिणी ही घर है “न गृहं गृहमित्याहुः, गृहिणी गृहमुच्यते।”

यही नहीं स्त्री को सरस्वती का रूप मानते हुए कहा गया है -

प्रति तिष्ठ विराडसि, विष्णुरिवेह सरस्वति। सिनीवालि प्र जायताँ, भगस्य सुमतावसत्॥ अथर्ववेद - 14।2।15

हे नारी ! तुम यहाँ प्रतिष्ठित हो। तुम तेजस्विनी हो। हे सरस्वती ! तुम यहाँ विष्णु के तुल्य प्रतिष्ठित होना। हे सौभाग्यवती नारी ! तुम सन्तान को जन्म देना और सौभाग्य देवता की कृपा दृष्टि में रहना।

स्त्री की प्रतिष्ठा अपने गुणों और योग्यता के आधार पर ही है। अतः कहा गया है -

स्वैर्दक्षेर्दक्षपितेह सीद, देवानाऽसुम्ने बृहते रणाय। -यजु. 14।3

हे नारी ! तुम अपनी योग्यता से ज्ञान का कोश होकर, देवों के कल्याण तथा महान आनन्द के लिए इस घर में रहो।

वेदों की ही तरह ब्राह्मण ग्रन्थों में भी नारी का गौरव वर्णित है। यहाँ नारी को सावित्री कहा गया है - “ स्त्री सावित्री”।

जैमिनीय उप. ब्रा. 25।10।17। तैत्तिरीय ब्राह्मण में इसे आत्मा का अर्द्धांश बताया है –

अर्धों वा एष आत्मनः यत पत्नी।

तैत्ति. ब्रा. 3।3।3।5 इसी में एक अन्य स्थान पर बताया गया है - नारी के बिना यज्ञ अपूर्ण है। अतः सपत्नीक यज्ञ करें।

अयज्ञो वा एषः। योऽपत्नीकः। तैत्ति. ब्रा. 2।2।2।6।

यही नहीं शतपथ ब्राह्मण में कहते हैं - यावत् जयाँ न विन्दते, असर्वो हि तावद् भवति। शतपथ ब्रा. 5.2.1.10. अर्थात् पत्नी के बिना जीवन अधूरा है। ऐतरेय ब्राह्मण का कथन है - जाया गार्हपत्यः (अग्निः) ऐत. ब्रा. 8.24 - पत्नी गार्हपत्य अग्नि हैं यही नहीं शतपथ ब्राह्मण में स्त्री के अपमान को निन्दनीय माना गया है - न वै स्त्रियं हनन्ति। शत. ब्रा. 11.4.3.2। तैत्तिरीय के अनुसार - “श्रिया वाएतद् रुप्यं यत् पत्नयः।” तैत्ति. ब्रा. 3.9.4.7 अर्थात् पत्नी गृहलक्ष्मी है, साक्षात श्री है।

उपनिषद्कारों ने तो नर और नारी में कभी कहीं भेद किया ही नहीं। उन्होंने तो नर और नारी दोनों में ही एक ही तत्व का अस्तित्व, एक ही चेतना की छाया देखी है। तभी तो उन्होंने गाया है - यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्त्याभ्यमृतः।

- वृहदारण्यक उपनिषद् 3।7।15

ये सब भूतों में रहता हुआ भी सबसे पृथक है, जिसे सारे भूत नहीं जानते। सारे भूत जिसका शरीर है, जो सब भूतों में स्थित होकर उनका नियन्त्रण करता है। वह तेरी आत्मा हैं वह सब में व्याप्त है और किसी में भी विशेष अविशेष नहीं है।

इस तात्विक अभेदता के बावजूद व्यावहारिक रूप से अधिक जिम्मेदारी वहन करने के कारण स्मृतिकारों ने नारी को विशेष सम्मान देने के निर्देश दिए हैं, मनु का कहना है -

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रा फलाः क्रियाः॥ - मनु 3।56

अर्थात् - जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ इनका सम्मान नहीं होता, वहाँ प्रगति, उन्नति की सारी क्रियाएं निष्फल हो जाती हैं।

एक अन्य थान पर कहा गया है -

यदि कुलोन्नयने सरसं मनो, यदि विलासकलासु कुतूहलम्। यदि निजत्वमभीप्सितमकेदा, कुरु सताँ श्रुतशीलवतीं तदा॥

अर्थात् - यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे कुल की उन्नति हो। यदि तुम्हें ललित कलाओं में रुचि है। यदि तुम अपना और अपनी सन्तान का कल्याण करना चाहते हो तो अपनी कन्या को विद्या, धर्म और शील से युक्त करो।

पारस्कर गुह्यसूत्र में तो स्त्रियों की गौरवमयी गाथा के गुणमान को गर्व के साथ वर्णित किया गया है। तामद्य गाथाँ - गास्यामि ता स्त्रीणामुक्तमं यश इतिः। पार. गृह्य. 1.7.2। वृहत्संहिता में कहा गया है - “पुरुषाणाँ सहस्रं च सती स्त्री समुद्धेरत।” अर्थात् सती स्त्री अपने पति का ही नहीं, अपने उत्कृष्ट आचरण की प्रत्यक्ष प्रेरणा से सहस्रों पुरुषों का उद्धार यानि श्रेष्ठता की दिशा का मार्गदर्शन करती है। व्यास संहिता का वचन है - “यायन्त विन्दते जायाँ, तावदर्धोभवेतपुमान्” अर्थात् पत्नी के प्राप्त होने के पूर्व तक पुरुष अधूरा है।

अन्य शास्त्रकारों की ही भाँति पुराणकार भी नारी की गरिमा का उल्लेख करने के पीछे नहीं रहे। मार्कण्डेय पुराण में सभी स्त्रियों को आदि शक्ति का ही स्वरूप माना गया है -

विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः। स्त्रियः समस्ता सकला जगत्सु॥

अर्थात् - समस्त स्त्रियाँ और समस्त विधाएं देवी रूप ही हैं।

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार वैवस्वत मनु की धर्मपत्नी ने पुत्रेष्टि यज्ञ के समय कन्या उत्पन्न होने की याचना की -

तत्रश्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत्। दुहिर्त्रथमुपागम्य प्रणिपत्य प्रयोवता॥ - श्रीमद्भागवत् 9।1।14

इसी यज्ञ से इला की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मवैवर्त पुराण में राजा कुशध्वज की पत्नी मालावती के उदर से उत्पन्न हुई वेदवती नामक कन्या का वर्ण है, जो बचपन से ही वेदोच्चारण में प्रवीण थी।

वेदध्वनिं सा चकार, जातमात्रेण कन्यका। तस्माताँ ते वेदवर्ती प्रवदन्ति मनीषिणः॥

सततं मूर्ति मन्तष्च, वेदाष्च चत्वार एवं च। सन्ति यस्याष्च जिह्वाणे, साच वेदवती स्मृता॥ - ब्रह्मवैवर्त. प्रकृति. अ. 14

वह कन्या पैदा होते ही वेद की ध्वनि करने लगी। इस कारण से वे बुद्धिमान लोग उसका वेदवती कहने लगे। निश्चय ही चारों वेद मूर्तिमान होकर सदा उसकी जबान के अनुभाग में रहते थे। इसलिए उसका नाम वेदवती था।

तन्त्रशास्त्र के प्रणेता तो शक्ति के उपासक ही रहे हैं। यही कारण है कि उनकी नारी के प्रति श्रद्धा, पुराणकारों से भी कहीं अधिक मुखर ढंग से अभिव्यक्त हुई है। शक्ति आगमतन्त्र के तारा खण्ड में कहा गया है -

नारी त्रैलोक्य जननी, नारी त्रैलोक्य रुपिणी। नारी त्रिभुवनादारा, नारी शक्ति स्वरुपिणी॥ - शक्ति आगम तन्त्र, ताराखण्ड 13.44

इसी शास्त्र के प्रणेता का आगे कथन है -

न च नारी समं सौख्यं, न च नारी समागति, न च नारी सदृषं भाग्यं, न च भूतो न भविष्यति।

न च नारी सदृषं राज्यं, न च नारी सदृषं तपः, न च नारी सदृषं तीर्थं, न भूतं न भविष्यति।

न नारी सदृषो योगो, न नारी सदृषो जपः, न नारी सदृषो योगो, न भूतो न भविष्यति।

न नारी सदृषो मन्त्रः, न नारी सदृषं तपः, न नारी सदृषं वित्तं, न भूतो न भविष्यति। - शक्ति आगम तन्त्र, ताराखण्ड 13.46,48

विभिन्न शास्त्रों में प्रतिपादित नारी की इस विशिष्टता का आधार उसकी अन्तर्निहित क्षमता एवं सद्गुण सम्पत्ति है। जिसे प्राचीन समय में विकसित होने के पूरे अवसर थे। यही नहीं प्राचीन पूर्वजों के मन में उसके लिए भरपूर सम्मान और समता की भावना थी। यों तो व्यावहारिक यथार्थ यही है, जिसके पास सामाजिक प्रभुता होती है, उसी का सब सम्मान करते हैं। इसलिए नारी की वर्तमान उपेक्षित स्थिति के लिए वेद, शास्त्र, पुराण आदि को दोष देने और अर्थहीन विवाद खड़े करते रहने तथा ठोस कार्य कुछ न करने के स्थान पर जरूरत इस बात की है कि नारी को पुनः वैसा ही सक्षम, समर्थ बनाया जाए, जैसा कि प्राचीन शास्त्रों में वर्णित है।


मैं नारी हूँ

मैं नारी हूँ। मैं अपने पति की सहधर्मिणी हूँ और अपने पुत्र की जननी हूँ। मुझ सा श्रेष्ठ संसार में और कौन है, तमाम जगत् मेरा कर्मक्षेत्र है, मैं स्वाधीन हूँ, क्योंकि मैं अपनी इच्छानुरूप कार्य कर सकती हूँ। मैं जगत में किसी से नहीं डरती। मैं महाशक्ति की अंश हूँ। मेरी शक्ति पाकर ही मनुष्य शक्तिमान है।

मैं स्वतंत्र हूँ, परन्तु उच्छृंखल नहीं हूँ। मैं शक्ति का उद्गम स्थान हूँ, परंतु अत्याचार के द्वारा अपनी शक्ति को प्रकाशित नहीं करती। मैं केवल कहती ही नहीं करती भी हूँ। मैं काम न करूं, तो संसार अचल हो जाए। सब कुछ करके भी मैं अहंकार नहीं करती। जो कर्म करने का अभिमान करते हैं, उनके हाथ थक जाते हैं।

मेरा कर्मक्षेत्र बहुत बड़ा है। वह घर के बाहर है और घर के अन्दर भी। घर में मेरी बराबरी की समझ रखने वाला कोई है ही नहीं। मैं जिधर देखती हूँ, उधर ही अपना अप्रतिहत कर्तव्य पाती हूँ। मेरे कर्तव्य में बाधा देने वाला कोई नहीं है, क्योंकि मैं वैसा सुअवसर किसी को देती ही नहीं। पुरुष मेरी बात सुनने के लिए बाध्य है - आखिर मैं गृहस्वामिनी जो हूँ। मेरी बात से गृह संसार उन्नत होता है। इसलिए पति के सन्देह का तो कोई कारण ही नहीं है और पुत्र, वह तो मरा है ही, उसी के लिए तो हम दोनों व्यस्त हैं। इन दोनों को , पति को और पुत्र को अपने वश में करके मैं जगत् में अजेय हूँ। डर किसको कहते हैं, मैं नहीं जानती। मैं पाप से घृणा करती हूँ। अतएव डर मेरे पास नहीं आता। मैं भय को नहीं देखती इसी से कोई दिखाने की चेष्टा नहीं करता।

संसार में मुझसे बड़ा और कौन है ? मैं तो किसी को भी नहीं देखती और जगत में मुझसे बढ़कर छोटा भी कौन है ? उसको भी तो कहीं नहीं खोज पाती। पुरुष दम्भ करती है कि मैं जगत में प्रधान हूँ, बड़ा हूँ, मैं किसी की परवाह नहीं करता। वह अपने दम्भ और दर्प से देश को कंपाना चाहता है। वह कभी आकाश में उड़ता है, कभी सागर में डुबकी मारता है और कभी रणभेरी बजाकर आकाश वायु को कंपाकर दूर दूर तक दौड़ता है, परन्तु मेरे सामने तो वह सदा छोटा ही है, क्योंकि मैं उसकी माँ हूं। उसके रुद्र रूप को देखकर हजारों लाखों काँपते हैं, परन्तु मेरे अंगुली हिलाते ही वह चुप हो जाने के लिए बाध्य है। मैं उसकी माँ - केवल असहाय बचपन में ही नहीं सर्वदा और सर्वत्र हूँ। जिसके स्तनों का दूध पीकर उसकी देह पुष्ट हुई है, उसका मातृत्व के इशारे पर सिर झुकाकर चलने के लिए वह बाध्य है।

गर्वित पुरुष जब सिंह, व्याघ्र आदि हिंस्र प्राणियों की अपेक्षा और भी अधिक हिंस्र हो जाता है, कठोरता के साथ मिलते मिलते उसकी कोमल वृत्तियाँ जब सूख जाती हैं। जब वह राक्षसी वृत्तियों का सहारा लेकर जगत को चूर चूर कर डालने के लिए उतारू हो जाता है। तब उस शुष्क मरुभूमि में जल की सुशीतल धारा कौन बहाती है ? मैं ही, उसकी सहधर्मिणी ही। उसको, अपने पास बैठाकर अपना अपनत्व उसमें मिलाकर मैं उसे कोमल करती हूँ। मेरी शक्ति अप्रतिहत है। प्रयोग करने की कला जानने पर वह कभी व्यर्थ नहीं जाती।

बाहर के जगत में मेरे कर्तव्य का विस्तार होते हुए भी मैं अपने घर को नहीं भूलती। वह मेरे पिता, पति, भाई और पुत्र की आश्रय भूमि हैं उन्हें यहाँ मेरी सुशीतल छाया नहीं मिलेगी, तो वे विश्रान्ति कहाँ पाएंगे। उनका समूचा अस्तित्व मेरी गोद में अनायास समा जाता है। यही कारण है कि मेरी कर्मभूमि उनकी कर्मभूमि से कहाँ विशाल है। पुरुष जिस काम को नहीं कर सकता, उसको मैं अनायास ही कर सकती हूँ प्रमाण, पुरुष के अभाव में संसार चल सकता है परन्तु मेरे अभाव में अचल हो जाता है सब रहने पर भी कुछ नहीं रहता।

मैं पढ़ती हूँ, सन्तान को शिक्षा देने के लिए , पति के थके मन को शान्ति देने के लिए। मेरा ज्ञान मानव जीवन में विवेक का प्रकाश फैलाने के लिए है। मैं गाना बजाना सीखती हूँ - शौकीनों की लालसा पूर्ण करने के लिए नहीं, नर हृदय को कोमल बनाकर उसमें पूर्णता लाने के लिए, पुरुष की सोयी संवेदना जगाने के लिए। मैं स्वयं नहीं नाचती, वरन् जगत को नचाती हूँ।

मैं सीखती हूँ - सिखाने के लिए। शिक्षा के क्षेत्र में मेरा जन्मगत अधिकार है। मैं गुलाम नहीं पैदा करती। मैं प्रकट करती हूँ आदर्श, सृजन करती हूँ मानव, महामानव। महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक, दयानन्द, विवेकानन्द, अरविन्द सब मेरी ही देन है।

मैं खड्गधारिणी काली हूँ, पाखण्डों का वध करने के लिए। मैं दश प्रहरणधारिणी दुर्गा हूँ, संसार में नारी शक्ति को जगाने के लिए। मैं लक्ष्मी हूँ - संसार को सुशोभन बनाने के लिए। मैं सरस्वती हूँ - जगत में विद्या वितरण के लिए। मैं धरणी हूँ - सहिष्णुता के गुण से। आकाश हूँ - सबकी आश्रयदायिनी होने से। वायु हूँ - सबकी जीवनदायिनी होने से और जल हूँ सबको रससिक्त करने वाली - दूसरों को अपना बनाने वाली होने से। मैं ज्योति हूँ - प्रकाश के कारण और मैं माटी हूँ - क्योंकि मैं माँ हूँ।

मेरे धर्म के विषय में मतभेद मतान्तर नहीं है। मेरा धर्म है नारीत्व, मातृत्व। मुझ में जातिभेद जनित कोई चिन्ह नहीं है। सम्पूर्ण नारी जाति मेरी जाति है।

मैं सबसे अधिक छोटा बनना जानती हूँ परन्तु मैं बड़ी स्वाभिमानी हूँ। मेरे भय से त्रिभुवन काँपता है। मैं जो चाहती हूँ, वही पाती हूँ, तो भी मेरा मान जगत प्रसिद्ध है।

पुरुष कामुक है इसलिए वह अपने ही समान मानकर मुझको कामिनी कहता है। पुरुष दुर्बल है, सहज ही विभक्त हो जाता है, इसी से मुझे दारा कहता है। मैं सभी सहती हूँ, क्योंकि मैं सहना जानती हूँ। मैं मनुष्य को गोद में खिलाकर मनुष्य बनाती हूँ। उसके शरीर की धूलि से अपना शरीर मैला करती हूँ, इसलिए कि मैं यह सब सह सकती हूँ।

रामायण और महाभारत में मेरी ही कथाएं हैं। इनमें मेरा ही गान हुआ है। यही कारण है जगत को और जगत के लोगों को जीवन विद्या का शिक्षण देने में इनके समान अन्य कोई भी ग्रन्थ समर्थ नहीं हुआ। मैं दूसरी भाषा सीखती हूँ, परन्तु बोलती हूँ अपनी ही भाषा और मेरी सन्तान इसलिए उसे गौरव के साथ मातृभाषा कहती है।

मुझको क्या पहचान लिया है ? नहीं पहचाना, तो फिर पहचान लो। मैं नारी हूँ, इक्कीसवीं सदी में अपना प्रभुत्व लेकर आ रही हूँ।


वे प्रथम दंपत्ति

मैं तुम्हारे स्पर्श को पहचानता हूँ। पुरुष ने सहज स्वर से कहा। “मुझे तुमसे कोई भय नहीं और न मैं उस प्रकार चौंककर भागूँगा, जैसे तुम भागती हो।” उसने धीरे से दोनों हाथ पकड़ लिए और नेत्रों से उन्हें हटाते हुए पीछे देखा।

“सचमुच तुम बड़े निर्भीक हो।” नारी के स्वर में किंचित आश्चर्य था। “यदि कोई डायनोसौर या गुरिल्ला होता हो ?”

“डायनोसौर आँखें नहीं ढक सकता और न इस पहाड़ी पर चढ़ सकता है।” पुरुष ने हाथ छोड़ दिया था। “गुरिल्ले के हाथ तो होते हैं किन्तु वह आँखें ढ़ककर शान्त न खड़ा रहता। मैंने तुम्हें गुफा में सोते देख लिया था।”

“यदि मैं उठकर तुम्हारे सिर पर पत्थर दे मारती ?” नारी को स्वतः आश्चर्य था कि उसने ऐसा क्यों नहीं किया। उसकी आखेट भावना कहाँ चली गई थी ? “मेरे पास खूब बड़ा पाषाण भल्ल है।”

“मुझे पता है।” पुरुष ने सहज स्वर में कहा - “मैंने उसे देख लिया था, द्वार पर से। मेरे भल्ल से आधा ही तो है। मैं एकाकी ऊब गया हूं। तुमसे मित्रता करना चाहता हूँ। तुम आक्रमण कर सकती हो, यह बात मेरे ध्यान में थी। किन्तु मैंने सोचा तुम अधिक चोट नहीं पहुंचा सकोगी। सुकुमार हो तुम।”

“तुम बड़े दुष्ट हो।” नारी इस नवीन स्तुति से प्रसन्न हो गयी थी। आज प्रथम बार उसकी किसी ने प्रशंसा की थी। उसे विचित्र लगी यह स्तुति। तनिक हंसते हुए उसने कहा “मेरी गुफा तक सोते समय आ गए। भीतर झाँकते रहे। गुफा की ओर पीठ करके बैठक गए। कुशल थी कि भूख नहीं लगी थी, नहीं तो मारकर खा भी जाते।” भय से सचमुच वह सिहर उठी और दो पग पीछे हट गयी।

“मुझे माँस से घृणा है।” पुरुष ने विरक्ति भाव से एक ओर थूक दिया। “फल और जड़ें मुझे अच्छी लगती हैं और खूब मिल भी जाती हैं। आखेट तो मैं केवल डायनोसौर, गुरिल्ले और शेर जैसे उन जानवरों का करता हूँ, जिनसे मुझे आक्रमण का भय है।” अपनी भुजा उठायी उसने, सुपुष्ट मांसपेशियों पर नारी की दृष्टि आकर्षित हुए बिना न रहीं।

पुरुष की ओर प्रशंसा भरी दृष्टि से देखते हुए वह बोली, “लेकिन डायनोसौर तो बहुत बड़ा होता है, उसे कैसे मार लेते हो ? “ उसके कथन में पुरुष के पौरुष के प्रति आश्चर्य मिश्रित प्रशंसा थी। इस ओर से अनभिज्ञ पुरुष ने कहा “डायनोसौर भारी भरकम जरूर होता है, लेकिन अपने सिर पर की गई चोट को वह बर्दाश्त नहीं कर पाता।”

“ओह” नारी ने मृदु स्वर से कहा, “ मैं अवश्य चीख पड़ती, यदि तुम्हें अपनी गुफा में देख लेती।” अब तक वह समीप आकर बैठ गयी थी।

“भय की बात तो थी।” पुरुष के स्वर में आदेश का भाव था। “तुम गुफा द्वार खुला छोड़कर सो गयी थी। कोई भी शेर या गुरिल्ला भीतर घुस सकता था। ऐसा नहीं करना चाहिए।”

“सचमुच भूल हो गयी।” नारी जैसे सफाई दे रही हो। “बहुत थक गयी थी। एक हिरण के पीछे बहुत भागी थी प्रातः से। आकर लौटी और सो गयी। ऐसा कभी पहले नहीं हुआ।”

“मैं तुम्हारी गुफा देख लूँ।” पुरुष उठ खड़ा हुआ। उत्तर की उसे कोई अपेक्षा न थी। नारी उसका अनुगमन कर रही थी।

“तुम मृगचर्म पर सोती हो ?” एक विस्तीर्ण शिला पर वह फैला था। “यह है तुम्हारा भल्ल ? बहुत छोटा है और हलका भी है।” पुरुष ने उसे उठाया, उछाला ऊपर को और फिर पकड़कर यथास्थान रख दिया।

“अब मैं सोउंगा।” गुफा को उसने अधिक बारीकी से नहीं देखा। मृगचर्म पर लम्बा लेट रहा। जैसे यह उसी की गुफा हो।” तुम यदि कहीं जाने लगो तो गुफा द्वार शिलावरुद्ध कर देना।” अत्यन्त परिचित की भाँति उसने कहा।

“तुमने न तो कन्द देखे, न फल।” पुरुष के गुफा में प्रवेश करते समय तो नारी डर रही थी कि वह उसका संचय खा जाएगा। किन्तु उसकी निरपेक्षता ने उसके मन में दूसरी भावना जाग्रत कर दी। सम्भवतः यह अतिथि सत्कार का प्रथम प्रयास था इस धरती पर। “मैंने पूरा मधुछत्र ला रखा है और नारियल पात्र में झरने का शीतल जल भी है।”

“मैं तुम्हें लूटने नहीं आया था। पुरुष उठ बैठा। किंतु अब तो कुछ खिला दो।” उसने उठकर कोई वस्तु ढूंढ़ने या पाने का प्रयास नहीं किया।

“जो अच्छा लगे खा लो !” नारी अचानक ही गृहिणी हो गयी थी। उसने सब कन्द और फल पुरुष के सामने रख दिए। एक नारियल के खोपरे में मधुछत्र निचोड़ दिया और जल पात्र भी ला रखा। “मेरे लिए थोड़ा मधु छोड़ देना।”

“मैं अकेला कहाँ भोजन करने जा रहा हूँ।” नारी का हाथ पकड़कर पुरुष ने उसे भी समीप बैठा लिया। “तुम भी खाओ ! फल और कन्द बहुत हैं और मधु भी दोनों के लिए पर्याप्त है।” पहली बार पुरुष ने स्थिर बैठकर भरपेट भोजन किया।

भोजन करके लेट गया वह उसी मृगचर्म पर। लेटते ही खर्राटे लेने लगा। नारी देखती रही, देखती रही उसे और फिर अपना पाषाण भल्ल उठाकर द्वार पर जा बैठी।

“तुम्हारी गुफा छोटी है।” भली प्रकार निद्रा लेकर पुरुष उठा था। गुफा से निकलकर नारी के समीप बैठते हुए उसने कहा, “अब दोनों साथ साथ एक ही गुफा में रहें, यही अच्छा होगा। मेरी गुफा पर्याप्त बड़ी है और इससे कहीं अधिक सुरक्षित भी।”

उसी दिन सायंकाल नारी अपना भल्ल और नारियल पात्र एवं मृगचर्म लेकर पुरुष की गुफा में आ गयी। सम्भवतः उसी दिन से नारी ने स्वगृह त्याग कर पतिगृह का निवास अपनाया।

अभी भी धरती पर महाकाय डायनासौर का अभाव नहीं हुआ था। दलदलीय भूमि में वे चालीस से साठ हाथ लम्बे प्राणी जिनका रूप मगर एवं गिरगिट से मिलता जुलता था, भरे पेड़ थे। प्रायः ये झील के पन्द्रह बीस हाथ जल ही में रहते थे। जहाँ सघन लम्बी घासें उगी होतीं।

सूखी धरती पर सबसे बड़ा प्राणी था, मैग्नेशियम। यह भी डायनोसौर प्रजाति का ही था। फल एवं पत्ते इसके आहार थे। कंचे बड़े पेड़ों की तीन चार फुट मोटी डालियों को वह मूली के समान तोड़ डालता था। शेर व्याघ्र को वह इस प्रकार चीर फेंकता, जैसे हम सब प्रातः काल दातून चीरते हैं। उसके अतिरिक्त शेर, व्याघ्र, उनी भैंसे, त्रिखंगी गैंडा ये सब महाभयंकर प्राणी थे उस घोर वन में।

वृक्षों पर गुरिल्ले भरे पड़े थे और वे सब माँसाहारी जाति के थे। ये दलदल से दूर रहते थे। तीन चार हाथ लम्बे पतंगे भी अपने पैर धसाकर पशुओं का रक्त पी जाने को बहुत थे। उनकी स्फूर्ति और गति ठीक आज के जुलाहे पतिंगे सी थी। सूखी भूमि एवं खोहों में अजगर तथा दूसरी जाति के सर्पों की कमी नहीं थी।

सबसे भयंकर थी डायनोसौर की एक अन्य प्रजाति। वह पृथ्वी पर, दलदल पर और जल में समान गति करता था। यह माँसाहारी अपने से दूने तिगुने मैग्नेशियम या अन्य प्रकार के ब्राँटोसौर का सरलता से शिकार कर लेता था। उसके पंजे व्याघ्र से भी अधिक सुदृढ़ थे। दूसरे पशु इसके लिए चींटी जैसे तुच्छ थे।

दिनभर भयंकर गर्मी पड़ा करती थी। धरती ढकी थी ऊंचे वृक्षों, लताओं एवं घासों से। दलदल अधिक था। वायु में नमी भरी ही रहती थी। संध्या अल्पकालीन होती थी। रात्रि में सूची भेद्य अन्धकार को ज्येष्ठ की छाया या धूप की भांति एक से दूसरी पंक्ति को डुबाते आते देखा जा सकता था।

मानव जलप्लावन के पश्चात् आर्यावर्त में नाम को ही था। उस समय इसका नाम शाकद्वीप था। हमें पता नहीं उस समय दूसरा मानव भी वहाँ था या नहीं। हमें केवल इसी वन्यमानव का पता है, जो आज की समूची मानव प्रजाति का आदि पुरुष था। एक उजाड़ टीले पर जिसके चारों ओर खुली भूमि थी, कुछ दूर वह गुफा में रहता था। टीले में एक ही गुफा थी और गुफा के दरवाजे पर खूब सघन ऊंचा एक पेड़ था। सुरक्षा की दृष्टि से उस मानव ने यह स्थान चुना था।

वह रक्षा के लिए एक खूब भारी पाषाण भल्ल रखता था। उसकी गुफा में शेर एवं भैंस के कई कच्चे चमड़े पड़े थे। जंगल में फल, कंद एकत्र करते समय इन आक्रमणकारी पशुओं का उसने आखेट किया था। सुपुष्ट माँसपेशियाँ, वृक्षों पर चढ़ने एवं सरकने को पुट्ठे, घुँघराले काले बाल, कुछ अधिक बड़े रोम, मंदे एवं श्मश्रु, उसका साढ़े चार हाथ ऊंचा साँवला शरीर बड़ा भव्य था।

उस दिन वह कन्द लेने गया था। सहसा चौंक पड़ा। हाथ में छोटा सा भल्ल लिए, कुछ छोटा, कुछ दुर्बल यह कौन प्राणी है ? लताओं की ओट में ही रहा वह। निकट से देखने का अवकाश मिला। उसके केश अधिक लम्बे हैं। शरीर पर रोम भी नहीं, न मूँछें ही हैं और न दाढ़ी। वृक्ष पर दो ऊंचे माँस पिण्ड।

उसने लक्षित कर लिया उसका अपने शरीर से अलगाव। उसका शरीर चिकना और कोमल है। माँसपेशी जैसे है ही नहीं। पता नहीं क्यों उसे दूसरे मानव के प्रति वह आकर्षित हो गया। यह आकर्षण सजातीयता के कारण ही था सम्भवतः। जलप्लावन में वह शिशु ही था, तभी वह अकेला रह गया था। वह पुरुष स्त्री के भेद से अब तक परिचित ही नहीं था। लताओं की ओट से तनिक दूर हटकर वह उसके दृष्टि पथ में आया। निकट प्रकट होने से यदि आक्रमण कर दे तो ? वह भयभीत नहीं था , किन्तु इस सजातीय प्राणी का वध उसे अभीष्ट नहीं था। यह भी सम्भव था कि वही डरकर भाग जाये। ऐसा होने पर परिचय का पथ ही अवरुद्ध हो जाएगा।

उसने भी इसे देखा। चौंकने के पूरे लक्षण प्रकट हुए। देखता रहा एकटक वह प्राणी इसे देर तक। सम्भवतः सादृश्य एवं वैभिन्नय की तुलना कर रहा था। अचानक किलकारी मारी उसने। न जाने किन पुरातन संस्कारों अथवा ईश्वरीय प्रेरणा से उसके मन में गूँज उठी, ओह, नारी है।’ पुरुष अपने मन ही मन कह उठा। चपल है, इसीलिए और उसका कण्ठ स्वर भी कितना कोमल है। उत्तर में उसने किलकारी नहीं दी। जानता था कि इसकी गम्भीर ध्वनि से वह डर जाएगी। केवल वह हंस पड़ा। हाथ के संकेत से उसे समीप बुलाया और उसकी ओर बढ़ा। सहसा वह भाग खड़ी हुई। लम्बी छलाँगें लीं हिरण की भाँति और एक दूसरे झुरमुट में होती अदृश्य हो गयी। पुरुष ने पीछा तो किया पर व्यर्थ। उसे खेद हुआ। पता नहीं क्यों, मन अवसाद से भर गया। फल और कन्द एकत्र न कर सका। गुफा में लौट आया और अपनी शिला पर चुपचाप पड़ा रहा।

अब पुरुष नित्य उसी ओर जाने लगा, जिधर नारी दिखाई पड़ी थी। क्या वह दूसरी ओर के जंगल से परिचित है ? अथवा वह भी पुरुष को देखना चाहती है ? कौन जाने ? वह तो सदा दूर ही रहती है। हंसती है, किलकती है किन्तु बुलाने पर अपनी ओर मनुष्य को आते देखते ही भाग खड़ी होती है।

एक दिन पुरुष लताकुन्ज में छिपा बैठा रहा। समय से बहुत पहले गया था वह। वह आयी, इधर उधर देखती रही देर तक। क्या वह पुरुष को ढूंढ़ रही थी ? उसने देखकर उसके मुख पर खिन्नता के चिन्ह प्रकट हो गाए। उदास होकर लौट पड़ी। पुरुष ने चुपचाप पीछा किया। वह सीधे अपनी गुफा पर गयी। पुरुष ने निवास स्थान दूर से देखा और लौट आया। ,

तब से न जाने कितनी बार वह उसकी गुफा के द्वार तक गया होगा, पर मिला नहीं शायद वह उसे नाराज नहीं करता चाहता था। नारी के प्रथम दर्शन से ही उसके मन में कोमल भावनाएं अंकुरित हो गयी थी। जो शायद इतने दिनों में प्यार में बदल गई थीं यह धरती का पहला प्यार था। नारी भी तो उसे देखना चाहती थी, पाना चाहती थी। पर उसे तो उसका निवास भी नहीं मालूम था।

और आज जबकि वह नारी के गुफा के पास पहुँचा, तो वह सो रही थी। न जाने क्या सोचकर वह वहीं पास में बैठ गया। न जाने कितनी देर तक बैठा रहा वह। उसे पता तो तब चला, जबकि नारी ने पीछे से आकर उसकी आँखें बन्द कर लीं और फिर तो अपरिचय-परिचय में बदल गया। दूरी समीपता में बदल गई। प्यार और प्रगाढ़ हो उठा।

अब तो कितने दिन उन दोनों को साथ रहते भी बीत गए। “मेरा मन अब यहाँ नहीं लगता।” एक दिन पुरुष ने नारी से कहा। वह गुफा में पुरुष के समीप ही बैठी थी। “ यहाँ मैं दो बार अस्वस्थ हो चुका।”

“तब चलो।” नारी ने निश्चिन्त उत्तर दिया। “हम दोनों मेरी पहली गुफा में रहें या जहाँ आपकी इच्छा हो।”

“मेरी बीमारी, ओह” पुरुष का स्वर खिन्न था। “पता नहीं कहाँ कहाँ से तुम अधजले खरगोश ले आती हो।”

“तुम तो यों ही रूठ जाते हो।” पुरुष के कन्धे पर अपनी दाहिनी भुजा रखते हुए नारी ने कहा, “यह खूब स्वादिष्ट था, यह तो तुम्हीं कहा करते हो। दावाग्नि तपने दो, मैं ढेरों ला दूँगी।”

बीमारी में नारी पुरुष को छोड़कर फल एकत्र करने भी नहीं जा सकी थी। सौभाग्य से समीप के वन में दावानल धधक उठा। पुरुष को प्रथम बार आग में पका माँस मिला। वह उसका स्वाद भूल नहीं पाता था। कच्चे माँस को भी उसने मुख में डाला, किन्तु खा नहीं सका।

“मैं दावाग्नि को ढूँढूँगा।” पुरुष निश्चय कर चुका था। दावाग्नि को। नारी चौंकी, ना, ना ! कहीं उसी में फंस गए तो ? वह भय विह्वल हो उठी। इतने दिनों में उसकी प्रीति प्रगाढ़ हो उठी थी। वह पुरुष को खोना नहीं चाहती थी।

“मैं दूर रहकर ही उसे ढूँढूँगा।” पुरुष ने समझाते हुए कहा और सुरक्षित रहूँगा।”

हम खरगोश भूनेंगे। एक क्षण में नारी खिल उठी “ उसे उसी में भूनेंगे। दावाग्नि काष्ठ हो तो खाता है, हम उसे काष्ठ खिलाते रहेंगे। वह बड़ा और मोटा होकर हमें नहीं खा सकेगा और हम उसे मरने भी नहीं देंगे। हम उसे अपनी गुफा से दूर ही पालेंगे, दूसरी गुफा में।” नारी ने पूरा आविष्कार कर लिया था, अग्नि रक्षण प्रणाली का। लेकिन उसे भय था कि अपनी गुफा में पालने पर अग्नि रात्रि को सोते समय कहीं उन्हीं दोनों को न खा जाए।

“तुम्हारे लिए ढेरों कन्द और फल दो चार दिन में यहाँ एकत्र कर दूँगा और कई मधुछत्र भी।” पुरुष ने नारी के उल्लास में कोई योग नहीं दिया। पता नहीं क्यों वह आज उदासीन हो रहा था। मैं एकांकी जाऊंगा।”

एकाँकी ? नारी चौंकी। “मुझे साथ नहीं चलने दोगे ? मैं तुमसे कुछ नहीं माँगूँगी। तुम्हारे लिए फल और कन्द ला दिया करूंगी। तुम्हारे दावाग्नि को पालूँगी।” उसका गला भर आया था। पुरुष के कण्ठ में उसने दोनों भुजाएं डाल दीं।

“ऐसा कुछ नहीं !” रक्षतापूर्वक नारी के हाथों को कण्ठ से अलग करता हुआ पुरुष कह रहा था “में एकाँकी ही जाऊंगा।”

“तब मुझे मार डालो।” वह सहसा खड़ी हो गयी। पुरुष का भल्ल कोने में से उठा लायी। उसे पुरुष के सम्मुख बढ़ाकर उसके सम्मुख खड़ी गयी। नेत्रों से दो धाराएं चल रही थीं और हिचकी बंध गयी थी। पुरुष ने भल्ल लिया ही नहीं, भल्ल नारी हाथों से छूटकर धड़ाम से गिर पड़ा। वह वहीं बैठकर घुटनों में मुख छिपाकर सिसकने लगी।

“ओह, मैं तुम्हारे प्रेम के सामने पराजित हुआ।” वह सचमुच स्वयं को नारी की भावनाओं से बंधा महसूस कर रहा था। उसकी हिंस्र वृत्तियाँ भी इतने दिनों में कोमल भावनाओं में बदलने लगी थीं। “लेकिन तुमने मुझे खूब जान तो लिया है न ? उसे स्वर में आशंका का पुट था।”

“जान लिया है, तुमने खूब अच्छी तरह से शेर को, टीले को।’8 नारी ने अब समझ लिया था कि पुरुष की आशंका झूठी थी। अतएव उसके स्वर में रोष था, “मुझे तो यह जानना भर पर्याप्त था कि तुम विश्वसनीय हो, मेरे दुःख सुख के साथी हो, बस प्रेम कहो या अपनत्व उसके लिए विश्वास मात्र पर्याप्त है।” पुरुष उसकी इन भावनाओं के सामने अपनी शारीरिक बलिष्ठता के दर्प को चकनाचूर हुआ महसूस कर रहा था। उसने आज से पूरी तरह अपने को नारी के हवाले कर दिया। आज वह पूर्ण रूप से गृहस्वामिनी बन चुकी थी। वह उसका सहायक था। इस धरती पर वे प्रथम दम्पत्ति थे।


गरीब लड़की और राजकुमार (Kahani)

एक गरीब की लड़की थी। असाधारण सुन्दर। उस देश का राजकुमार उस पर मोहित था। प्रणय निवेदन करने लगा। लड़की सहमत न थी।

जब लड़की के पिता पर बहुत दबाव पड़ने लगा और न मानने का संकट दिखने लगा तो लड़की ने स्वयं ही राजकुमार के विचार बदल देने का जिम्मा लिया।

इस बार राजकुमार आया तो लड़की ने उसे एक सप्ताह बाद आने का निमन्त्रण दिया।

इस बीच उसने दस्त की दवा लेनी शुरू कर दी। मल को एक घड़े में भरती चली गई। एक सप्ताह में वह हड्डियों का ढाँचा भर रह गई।

राजकुमार आया। देखा तो लड़की अस्थिपंजर मात्र थी। सारा यौवन हवा में उड़ गया था। आश्चर्य से उसने पूछा, यह क्या हुआ।

लड़की ने उंगली का इशारा करके घड़ा दिखाया और कहा - “रूप यौवन उसमें कैद है ? चारपाई पर मेरा असली रूप पड़ा है।”

राजकुमार ने घड़े को उघाड़कर देखा तो उसमें एक सप्ताह में जमा किया हुआ मल मूत्र भरा था।

राजकुमार को समझने में देर न लगी कि जो चमकता था, वह यही घिनौना जंजाल था। कुरूप अस्थिपंजर चारपाई पर पड़ा था। उसने रूपासक्ति छोड़ दी और लड़की को गुरु मान नमन करता हुआ घर वापस चला गया।


परिवार संस्था की धुरी नारी

धुरी के बिना पहियों को गतिशीलता और उपयोगिता पर ही नहीं अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है। धुरी के कमजोर पड़ते ही एक एक कर सारी लीतियाँ बिखरने लगती हैं और पहिया बेकार हो जाता है। ठीक यही बात परिवार में नारी के सम्बंध में है। नारी परिवार की धुरी है उसके संवेदन सूत्र ही परिवार को आपस में जोड़े रखते हैं। इनके टूटते ही परिवार को बंटते, बिखरते, टूटते, नष्ट होते देर नहीं लगती। इसी कारण स्वामी स्वामी दयानन्द ने लिखा है, “एक पुरुष के शिक्षित और सुसंस्कृत होने का अर्थ है, अकेले उसी का उपयोगी बनना, किन्तु एक स्त्री यदि शिक्षित, समझदार और सुयोग्य हो तो समझना चाहिए कि पूरे परिवार के सुसंस्कृत बनने का सुदृढ़ आधार बन गया।”

वैसे भी स्त्री के बिना परिवार बसाने की कल्पना नहीं की जा सकती। यों तो अकेला पुरुष भी परिवार बसाने में असमर्थ है और अकेली स्त्री भी, किन्तु मुख्य भूमिका किसकी है ? यह तय करना हो तो स्त्री पर ही ध्यान केन्द्रित हो जाता है। कारण कि परिवार की आन्तरिक व्यवस्था में उसी की भूमिका महत्वपूर्ण है। परिवार में सुख-शाँति, सौमनस्य और सुव्यवस्था का वातावरण बनाने का उत्तरदायित्व मुख्यतः स्त्री को ही निभाना पड़ता है। इसीलिए उसे गृहिणी, सुगृहिणी गृहस्वामिनी और गृहलक्ष्मी कहा जाता है यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि स्त्री के लिए तो इस तरह के सम्बोधन प्रयुक्त किए जाते हैं, पर पुरुष के लिए ऐसा कोई सम्बोधन नहीं है। बहुत हुआ तो उसे गृहस्वामी भर कह दिया जाता है। जबकि स्त्री के लिए सुगृहिणी, गृहलक्ष्मी जैसे विशिष्टता सूचक सम्बोध नहीं प्रयुक्त होते हैं। पुरुष के लिए ऐसा कोई विशेष अर्थ देने वाला सम्बोधन नहीं है।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि नारी वास्तव में परिवार का हृदय और प्राण है। यद्यपि परिवार का अस्तित्व और वातावरण उसके सभी सदस्यों पर निर्भर करता है, किन्तु सूत्रधार का स्थान निर्धारित करना हो, यह देखना हो कि परिवार का अस्तित्व मुख्यतया किस पर निर्भर है , तो यह कहने में संकोच का कोई कारण नहीं है कि वह गृहिणी है। समाजशास्त्री भी मानते हैं कि यदि स्त्री न होती तो पुरुष को परिवार बसाने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं होती और न वह इतना क्रियाशील बनता तथा न ही इतना उत्तरदायी बनने के लिए प्रयत्नशील रहता।

स्त्री और पुरुष का युग्म बनते ही मानव जाति के इतिहास में परिवार की आधारशिला रखी गयी और सभ्यता का विकासक्रम आरंभ हुआ। परिवार में नारी का स्थान और महत्व निर्धारित करते समय यह तथ्य भली भाँति समझ लेना चाहिए कि गृहिणी से तात्पर्य पत्नी ही नहीं है स्त्री चाहे किसी भी रूप में हो, वह जिस परिवार में होती है, वहाँ के वातावरण को अनिवार्य रूप से प्रभावित करती है। माता, पत्नी, बुआ, बहिन, चाची, ताई, दादी, ननंद, भौजाई, देवरानी, जेठानी आदि सभी रूपों में नारी परिवार के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रखी है और वहाँ के वातावरण को, उस घर के सदस्यों को प्रभावित करती है।

उसकी उदारता और सहिष्णु संवेदना ने अब तक जीवन के आधारभूत मूल्यों को बरकरार रखा है। ये आधारभूत मूल्य क्या हैं ? इस सवाल के जवाब में यही कहना होगा, सर्वोपरि, यह आत्म-भावना के विस्तार की प्रक्रिया है। व्यावहारिक स्तर पर यही आत्मभावना सहयोग सहकार के रूप में प्रतिफलित होकर मानवीय प्रगति का मूल आधार बनती है। स्वार्थवाद, अलगाव, एकाकीपन की निषेधात्मक प्रवृत्तियों को दूर करना तथा बन्धुत्व, सौहार्द्र, सामूहिकता की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देना माँ के प्रारंभिक प्रशिक्षण की मूल्यगत उपलब्धि है। सम्मिलित श्रम एवं पुरुषार्थ की प्रवृत्ति तथा उपार्जित धन को मिल बाँट कर आवश्यकतानुसार एवं संतुलित ढंग से खर्च करने की प्रवृत्ति का सर्वोत्तम प्रशिक्षण उसी के द्वारा दिया जाता है। शील, शिष्टाचार, सौजन्यता की श्रेष्ठ भावनाएं उसी सान्निध्य में पल्लवित होती हैं। दूसरे के लिए त्याग की दैवी प्रवृत्ति के विकास की प्रारंभिक पाठशाला परिवार ही है।

मनुष्य नैसर्गिक रूप में एक अत्यन्त लचीला प्राणी होता है वातावरण के अनुरूप ? उसकी विशेषताएं ढलती चली जाती हैं। इसीलिए छोटे बच्चों को मिट्टी के लोदे जैसा कहा जाता है, जिनके गढ़ने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से माँ पर ही होती हैं जिन्हें वह अपने भावों और विचारों के अनुरूप ? आकार दे सकती है मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण में पर्यावरण एवं प्रशिक्षण का अत्यधिक महत्व है। पशु-पक्षियों जैसी वर्गीय समानता, समरूपता उसमें कदापि नहीं पायी जाती। व्यक्ति-व्यक्ति में गुण, कर्म, स्वभाव की अनन्त विविधताएं तथा भिन्नताएं होती हैं। बिना प्रशिक्षण के मनुष्य रामू भेड़िया और चिंपैंजी जैसी स्थिति में पड़ा रहता। उसके लिए अविराम प्रशिक्षण केन्द्र दिन रात निरन्तर नारी के सूत्र संचालन में चलने वाली परिवार पाठशालाएं ही कर पाती हैं।

परिवार की पश्चिमी जगत में स्वीकृत व्याख्या में मानव जीवन के सीमित पहलुओं की ही परितुष्टि हो पाती है, क्योंकि उसने नारी के पत्नी रूप को ही प्रधानता दी है। यही कारण है कि नारी के अन्यान्य रूपों से झरने वाली भाव संवेदनाओं के सहस्रों रंगों से वह व्यवस्था वंचित ही रहती है मानव के भाव जगत की हजारों परतें पश्चिमी परिवार व्यवस्था में सूनी, उजाड़ एवं प्रकाश रहित ही पड़ी रहती है। भाव संवेदनाओं की इन्द्रधनुषी छटाएं वहाँ कभी भी नहीं उभरती। माँ बाप, वृद्धों के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा, भाई बहिन का अनूठा प्यार, आत्मानुशासित मर्यादा और अन्तरंग स्नेह। ननंद-भाभी, जिठानी देवरानी, बुआ, भतीजे आदि के सम्बंधों का रंगारंग परिदृश्य, बहुरंगी, बहुआयामी, आलोक वर्णी भावनाओं का उनके लिए अज्ञात, अपरिचित ही है। दुनिया में कुछ भी इतना एकाँगी, सीमित और संकीर्ण नहीं, जितना कि नारी को सिर्फ पत्नी रूप में मान्यता देने वाली परिवार व्यवस्था से जुड़ी भाव संवेदनाएं हैं।

इस सृष्टि में हर क्षेत्र विविध रंगी है। गिरि, पर्वत, नदी, झरने, वृक्ष, फल, फूल, प्रकाश, छाया, बादल सभी हजार हजार रूप रंगों, सहस्रों तरह के परिदृश्यों में देखे पाए जाते हैं। मनुष्य तो प्रकृति का लाड़ला बेटा है। उसके चिन्तन और अनुभव जगत की सामर्थ्य तो और भी विस्तृत और अकूल है। फिर वह पारिवारिक संवेदना के नाम पर दो चार तरह की ही संवेदनाओं से परिचित हो नर नारी का यौनाकर्षण, काम भाव, सन्तान के प्रति मोह, वृद्धों के प्रति सामान्य औपचारिकता परिवार के नाम पर हो, तो उस उसके विराट व्यक्तित्व के अनुरूप शोभा नहीं देता। प्रारंभ से यदि इतने सीमित रिश्ते और भावनात्मक रंग ही उसे ज्ञात रहे तो इससे उसके व्यक्तित्व में एकाँगिता ही आएगी।

निःसंदेह विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न, विशिष्ट संवेदनशील व्यक्ति बिना पारिवारिक प्रशिक्षण के भी आत्मीयता की परिधि को विश्व ब्रह्मांड तक विकसित कर लेते हैं किन्तु औसत जनसामान्य प्रायः प्रशिक्षण प्राप्त संवेदनाओं की ही गूँज भर रहता है। यह आकस्मिक बात नहीं है कि जिन दिनों नारी की संवेदनशीलता अपने सभी रूपों को संयुक्त परिवार के रूप में अभिव्यक्त कर रही थी, उस समय इस देश के औसत नागरिक में भी व्यावहारिक बन्धुत्व, आत्मीयता, मैत्री तथा सामाजिकता के गुण विमान थे। जो कि पश्चिम के आधुनिक सभ्य युग में मंचों और गोष्ठियों में जोर शोर से कहे सुने जाते हैं। व्यवहारिक जीवन में तो अलगाव, दुराव, कुण्ठा, एकाकीपन का ही प्राबल्य है।

इसीलिए पारिवारिक जीवन में नारी के विधि रूपों से पनपे बहुरंगी संवेदन सूत्रों का सीधा सम्बंध जीवन मूल्यों के विकास एवं प्रशिक्षण से है यही उसका मूल आधार है। जहाँ इस मूल आधार की उपेक्षा प्रारंभ हुई, वहाँ इस व्यवस्था का मूल्य कम होने लगता है यह वस्तुतः मनुष्य के जीवन दर्शन का एक अंग है जहाँ आत्मीयता एवं ममता का यह जीवन दर्शन नहीं है। वहाँ इस व्यवस्था की टिकाऊ बनाए रख पाना भी कठिन होगा। जब नींव ही हिलने लगे तो ऊपरी मरम्मत कब तक काम दे सकती है।

स्त्रियों द्वारा परिवार का वातावरण प्रभावित होते रहने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि पुरुष सदस्य अधिकाँशतः बाहर रहते हैं। वृद्ध या असमर्थ पुरुष घर में रहते भी हैं तो वे स्त्री की तरह वहाँ के वातावरण को प्रभावित नहीं कर पाते, क्योंकि स्त्रियो में कोमलता, संवेदना, करुणा, स्नेह और ममता की जो विशेषताएं रहती हैं, पुरुषों में उनका प्रायः अभाव ही रहता है और इन्हीं विशेषताओं के कारण महिलाएं घर के सदस्यों के अधिक निकट रहती और उन्हें जाने अनजाने आधारभूत जीवन मूल्यों में प्रशिक्षित करती रहती हैं। नारियों में कोमलता, दयालुता की कोई सीमा नहीं होती। घर के किसी सदस्य में यदि एकबारगी कोई दुर्गुण हो तो भी माता, बड़ी बहिन, काकी आदि उसे क्षमा कर देती है। इसके अतिरिक्त वह उसे अभीष्ट ढाँचे में ढालने के लिए कोई भी कष्ट आसानी से झेल लेती है।

इतिहास प्रसिद्ध उदाहरण है कि शिवाजी के पिता, मुसलमान राजा के दरबार में नौकरी करते थे और उनकी आधीनता मानते थे। किन्तु जीजाबाई अपने पुत्र को स्वातंत्र्य योद्धा के रूप में ही विकसित करना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने सभी आवश्यक सतर्कताएं बरतीं और अपने पति के प्रभाव से बचाते हुए शिवाजी को उसी ढाँचे में ढाला। यह आश्चर्यजनक ही है कि पिता जिसकी रोटी खाते हों, जिसके प्रति कृतज्ञ हों और सन्ता से भी अपने जैसा बनने की अपेक्षा रखते हों, वह पुत्र विपरीत दिशा में ही विकसित हो जाए, पिता से अलग मनोभूमि वाला ही बन जाए, किंतु यह आश्चर्य माँ के महत्व को देखते हुए अस्वाभाविक नहीं है।

नारी की भूमिका सन्तान के ही नहीं पूरे परिवार के निर्माण में पुरुष की अपेक्षा हजार गुनी महत्वपूर्ण होती है। सुप्रसिद्ध फ्रेंच साहित्यकार नोबुल पुरस्कार विजेता रौम्या रोलाँ की उपलब्धियों के पीछे उनकी बहिन की स्नेहपूर्ण सेवा और त्यागभाव था। हिन्दुस्तान के बादशाह शाहजहाँ की विलासी प्रवृत्तियों को ईश्वरोन्मुख करने का श्रेय उसकी पुत्री जहाँनआरा को है। मेवाड़ के राणा उदयसिंह के व्यक्तित्व का निर्माण पन्नाधाय के हाथों हुआ था। इसीलिए परिवार संस्था के महत्व के साथ नारी का महत्व अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। ध्यान रखा जाना चाहिए कि नारी को गृहिणी और गृहलक्ष्मी के सम्मानजनक विशेषण से इसीलिए सम्बोधित किया गया है क्योंकि उसमें प्रकृति ने नैतिक दृष्टि से सुदृढ़ और स्वभाव की दृष्टि से दैवी गुण सम्पन्न सम्भावनाएं प्रचुर मात्रा में भरकर रख दी हैं। उसमें मधुरता तथा सद्भाव का अमृत बहता रहता है। तभी मेवाड़ की महारानी कर्मवती ने अलग मजहब का कहे जाने वाले हुमायूँ को राखी बाँधकर अपने परिवार का अभिन्न सदस्य बना लिया। उसके प्रेम से विवश होकर बादशाह हुमायूँ ने सगे भाई की भूमिका निभाई। अपने इसी प्रेम के सहारे महिलाएं घर के अशान्त सदस्यों को धैर्य बंधाती तथा परिवार संस्था की नींव मजबूत करती हैं।

कहना नहीं होगा कि परिवार की सुख शान्ति का आधार उसके संग में रहने वाला स्नेह, सहयोग और सद्भाव ही है। घर में इसी से स्वर्गीय वातावरण का सृजन होता है और गृहिणी इस वातावरण का निर्माण करती है क्योंकि उसकी आन्तरिक व्यवस्था की नियन्त्रक वही हैं अतएव परिवार में सुसंस्कारिता भरा वातावरण बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उसी की है। परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे की सुविधा का ध्यान रखें, परस्पर आदर सम्मान करें, एक दूसरे का सहयोग करे और स्नेह सद्भाव तथा उदारता भरा व्यवहार करे, सुसंस्कृत परिवारों के लिए यह नितान्त आवश्यक है और इसके लिए प्रेरणा भरने का काम महिलाएं ही अधिक कुशलतापूर्वक कर सकती है।

इसके लिए आवश्यक है कि नारियाँ अपना स्वयं का व्यवहार भी उसी स्तर का रखें। छोटों के प्रति असीम दुलार, स्नेह और ममता बराबर वालो के प्रति प्रेमपूर्ण स्निग्ध व्यवहार तथा बड़ों के प्रति श्रद्धा एवं समान बरतना चाहिए। साथ ही विवेक भी बरतना चाहिए। परिवार की भावनात्मक और विचारात्मक आवश्यकताओं तथा परिवार के सदस्यों की निर्माण संबंधी जिम्मेदारी महिलाएं इस प्रकार बड़ी सरलतापूर्वक पूरी कर सकती है उनके इस दायित्व वहन से टूटती, बिखरती परिवार संस्था फिर से अपना खोया सौंदर्य पा सकी है। इस प्रकार वे परिवार की धुरी बनकर समाज के लिए सच्चे अर्थों में देवी बन सकती है।


पत्नी गुरु बनी

द्वार के सामने निकलती पशुओं की कतार को देखकर वह चिल्लाया - उट् उट्। भीतर से पति की वाणी सुनकर गृहिणी निकली। उसके कानों में ये शब्द बरबस प्रवेश पा गए। व्याकरण की महापण्डिता, दर्शन की मर्मज्ञा नागरी और देवभाषा की यह विचित्र खिचड़ी देखकर सन्न रह गयी। आज विवाह हुए आठवाँ दिन था। यद्यपि इस एक सप्ताह में बहुत कुछ उजागर हो चुका था मालुम पड़ने लगा था कि जिसे परम विद्वान बताकर दाम्पत्य बन्धन में बाँधा गया था, वह परम मूर्ख है। आज ऊंट को संस्कृत में बोलने के दाम्भिक प्रयास ने अनुमान पर प्रामाणिकता की मुहर लगा दी।

उफ ! इतना बड़ा छल ! ऐसा धोखा ! वह व्यथित हो गयीं व्यथा को पीने के प्रयास में उसने निचले होंठ के दाहिने सिरे को दाँतों से दबाया। ओह ! नारी कितना सहेगी तू ? कितनी घुटन है तेरे भाग्य में ? कब तक गीला होता रहेगा तेरा आँचल आंसुओं की निर्झरिणी से। सोचते सोचते उसे ख्याल आया कि वह उन्हें भोजन हेतु बुलाने आयी थी। चिन्तन को एक ओर झटककर उसने पति के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा, “आर्य भोजन तैयार है।”

“अच्छा।” कहकर वह चल पड़ा। भोजन करते समय तक दोनों निःशब्द रहे। हाथ धुलवाने के पश्चात् गृहिणी ने ही पहल की - “स्वामी”।

“कहो” स्वर में अधिकार था। “यदि आप आज्ञा दे तो मैं आपकी ज्ञानवृद्धि में सहायक बन सकती हूँ।” “तुम ज्ञान वृद्धि में “ ? आश्चर्य से पुरुष ने आंखें उसकी ओर उठाई।” स्वर को अत्यधिक विनम्र बनाते हुए उसने कहा, “अज्ञान अपने सहज रूप में उतना अधिक खतरनाक नहीं होता, जितना कि तब जब कि व ज्ञान का छद्म आवरण ओढ़ लेता है।”

“तो ........ तो मैं अज्ञानी हूँ।” अटकते हुए शब्दों में भेद खुल जाने की सकपकाहट झलक रही थी।

“नहीं नहीं आप अज्ञानी नहीं हैं।” स्वर को सम्मानसूचक बनाते हुए वह बोली, “पर ज्ञान अनन्त है और मैं चाहती हूँ कि आप में ज्ञान के प्रति अभीप्सा जगे। फिर आयु से इसका कोई बन्धन भी नहीं। अपने यहाँ आर्य परम्परा में तो वानप्रस्थ और संन्यास में भी विद्या प्राप्ति का विधान है। कितने ही ऋषियों ने, आप्त पुरुषों ने जीवन का एक दीर्घ खण्ड बीत जाने के बाद पारंगतता प्राप्त की।

“सो तो ठीक है पर .............।”

पति की मानसिकता में परिवर्तन को लक्ष्य कर उसका उल्लासपूर्ण स्वर फूटा - “मैं आपकी सहायिका बनूँगी।”

“तुम मेरी शिक्षिका बनोगी ? पत्नी और गुरु।” कहकर वह ही - हो - ही करके हंस पड़ा। हंसी में मूर्खता और दम्भ के सिवा और क्या था ?

पति के इस कथन को सुनकर उसके मन में उत्साह का ज्वार जैसे चन्द्र पर लगते ग्रहण को देख थम गया। वह सोचने लगी आह ! पुरुष का दम्भ। नारी नीची है, जो जन्म देती है वह नीची है, जो पालती है वह नीची हैं जिसने पुरुष को बोलना चलना, तौर तरीके सिखाए वह नीची है और पुरुष क्यों ऊंचा है ? क्यों करता है, सृष्टि के इस आदि गुरु की अवहेलना ? क्योंकि उसे भोगी होने का अहंकार है। नारी की सृजन शक्ति की मानता और गरिमा से अनभिज्ञ है।

क्या सोचने लगी ? पति ने पूछा। अपने को सम्हालते हुए उसने कहा, “कुछ खास नहीं। फिर कहने से लाभ भी क्या ? “

“नहीं कहो तो ?” स्वर में आग्रह था।

सुनकर एक बार फिर समझाने का प्रयास करते हुए कहा - “हम लोग विवाहित है। दाम्पत्य की गरिमा परस्पर के दुःख सुख, हानि लाभ, वैभव-सुविधाएं, धन - यश को मिल जुलकर उपयोग करने में है। पति पत्नी में से कोई अकेला सुख लूटे, दूसरा व्यथा को धारा में पड़ा सिसकता रहे, क्या यह उचित है ?”

“नहीं तो।” पति कुछ समझने का प्रयास करते हुए बोला।

“तो आप इससे सहमत है। कि दाम्पत्य की सफलता का रहस्य स्नेह की उस संवहन प्रक्रिया में है जिसके द्वारा एक के गुणों की उर्जस्विता दूसरे को प्राप्त होती है। दूसरे का विवेक पहले के दोषों का निष्कासन, परिमार्जन करता है।”

“ठीक कहती हो।” नारों की उन्नत गरिमा के सामने पुरुष का दम्भ घुटने टेक रहा था।

“तो फिर विद्या भी धन है, शक्ति है, ऊर्जा है, जीवन का सौंदर्य है। क्यों न हम इसका मिल बाँट कर उपयोग करें ?”

“हाँ यह सही है।”

“तब आपको मेरे सहायिका बनने में क्या आपत्ति है ?”

“कुछ नहीं।” स्वर ढीला था। शायद नारी की सृजन शक्ति के सामने पुरुष का अहं पराजित हो चुका था।

“तो शुभस्यशीध्रं।” और वह पढ़ाने लगी अपने पति को। पहला पाठ अक्षर ज्ञान से शुरू हुआ। प्रारंभ में कुछ अरुचि थी, पर प्रेम के माधुर्य के सामने इसकी कड़वाहट नहीं ठहरी। क्रमशः व्याकरण, छन्द शास्त्र, निरुक्त, ज्योतिष आदि छहों वेदाँग, षड्दर्शन, ज्ञान की सरिता उमड़ती जा रही थी। दूसरे के अन्तर की अभीप्सा का महासागर उसे निःसंकोच धारण कर रहा था।

वर्षों के अनवरत प्रयास के पश्चात् पति अब विद्वान हो गया था। ज्ञान की गरिमा के साथ वह नतमस्तक था, उस सृजनशिल्पी के सामने, जो नारी के रूप में उसके सामने खड़ी थी।

सरस्वती की अनवरत उपासना उसके अन्तर में कवित्व की अनुपमेय शक्ति के रूप में प्रस्फुटित हो उठी थी। वह कभी का मूढ़ अब महाकवि हो गया। देश देशान्तर सभी उसे आश्चर्य से देखते, सराहते और शिक्षण लेने का प्रयास करते। वह सभी से एक ही स्वानुभूत तथ्य कहता, “पहचानो, नारी की गरिमा, उस कुशल शिल्पी की सृजनशक्ति, जो आदि से अब तक मनुष्य को पशुता से मुक्त कर सुसंस्कारों की निधि सौंपती आयी है।”

महाराज विक्रमादित्य ने उन्हें अपने दरबार में रखा। अब व विद्वत कुलरत्न थे। दाम्पत्य का रहस्य सूत्र उन्हें वह सब कुछ दे रहा था, जो एक सच्चे इनसान को प्राप्त होना चाहिए। स्वयं के जीवन से लोकजीवन को दिशा देने वाले ये दंपत्ति थे महाविदुषी विद्योत्तमा और कविकुल चूड़ामणि कालिदास। जिनका जीवन दीप अभी भी हमारे अधूरे पड़े परिवार निर्माण के कार्य को पूरा करने के लिए मार्गदर्शन कर रहा है।


भावी माता की सुविधाओं की अवहेलना न की जाए

गर्भस्थ शिशु पर माँ के संस्कारों, विचारों और व्यवहार की छाप पड़ती है। इन विचारों और व्यवहार का स्वरूप मात्र गर्भवती नारी के व्यक्तित्व पर निर्भर नहीं करता। परिवार की परिस्थिति, परिवार के अन्य सदस्यों को उसके साथ व्यवहार आदि से कोई भी नारी अप्रभावित नहीं रह सकती। उसके खान पान में जो विशेष सावधानी आवश्यक है, वह मात्र उसके ही वश में नहीं है परिस्थितियां कैसी हैं, अन्य लोगों का व्यवहार कैसा है ? इस पर भी बहुत कुछ निर्भर रहता है।

अधिकाँश गर्भवती नवयुवती दुर्बल, पीले से चेहरे वाली दिखती हैं। यह उनकी मनःस्थिति का परिणाम नहीं। माँ बनने की मधुर कल्पना उनके अन्तस् को गुदगुदा रही होती है। भावी शिशु के मनोरम क्रियाकलापों की स्वप्निल झाँकी उसे पुलकित करती रहती है। ऐसी स्थिति में इस तेजहीनता का कारण उसकी मनःस्थिति नहीं, परिवार के लोगों का व्यवहार ही हो सकता है। गर्भ की अवधि एक महत्वपूर्ण कालखण्ड है। उस समय उसके लिए सात्विक, पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है। आहार संबंधी त्रुटि में जहाँ गर्भिणी की आदतें या जीभ के चटपटेपन की ललक कारण बनती है, वहीं परिवार के सदस्यों की उपेक्षा भी। पति और पवार प्रमुख का कर्तव्य है कि गर्भवती के समुचित आहार की व्यवस्था करें। दूध और घी परिवार के सभी सदस्यों को यदि सुलभ नहीं है तो गर्भवती गृहिणी स्वयं के लिए उसे लेने में निश्चय ही हिचकेगी, पसन्द नहीं करेगी। परिवार के अन्य छोटे बच्चों , देवरों एवं ननंदों को चुपके से खिला पिला सकती है अतः परिवार के बड़ों को या पति को ध्यानपूर्वक अपने सामने उसका संकोच मिटाते हुए, उसे ये पोषक पदार्थ देने चाहिए। उसे प्रेमपूर्वक समझाना चाहिए कि यह विशेष व्यवस्था उसके लिए थोड़े ही हैं, यह तो गर्भस्थ बच्चे के लिए है।

गर्भकाल में जी मिचलाने, बदल टूटने, सिर चकराने, घबराहट आदि की शिकायतें सामान्यतया हो जाती हैं। मुँह का स्वाद भी बिगड़ा बिगड़ा रहता है। इसी कारण महिलाएं मिट्टी, खड़िया आदि खाने की ओर झुकती हैं। उस समय उन्हें समझाकर ऐसे अभक्ष - भक्षण से विरत रखना चाहिए तथा उनके लिए हलके, सुपाच्य, पौष्टिक भोजन की व्यवस्था की जानी चाहिए।

भावी जननी के लिए अधिक श्रम भी वर्जित है। कठोर तथा भारी वस्तुएं घर में उठाने की आवश्यकता पड़े तो उसे वे स्वयं न उठाने लगें इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। काम या क्रोध की उत्तेजना भी गर्भवती नारियों के लिए हानिकारक है। भावी शिशु के पिता को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। ऐसे में एक ओर तो उन्हें पत्नी के प्रति अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार पर विशेष ध्यान देना है, दूसरी ओर कामोत्तेजना से भी बचे रहना है। पति की अपेक्षा पत्नी के मन में सदैव हताशा उत्पन्न करती है। उसे यह लगने लगता है कि गर्भ के कारण उसका शरीर बेडौल हो जाने से अब वह उतनी सुन्दर नहीं रह गयी। इसी कारण उसके पति उसको उपेक्षा करने लगे हैं।

गर्भवती माँ की संवेदना इस समय अत्यधिक तीक्ष्ण रहती है। ऐसे समय पति की आत्मीयता उसे शक्ति और स्फूर्ति देती है पति को इस अवधि में पत्नी से प्रसन्नतादायक वार्तालाप के लिए अवश्य समय निकालना चाहिए। परिवार के अन्य सदस्यों विशेषकर सास, ननद, जेठानी, देवरानी का व्यवहार कोमल, प्रेमपूर्ण होना आवश्यक है। इसमें भी पति की ही प्रमुख भूमिका रहती है, क्योंकि घर के लोग उसका रुख देखकर ही व्यवहार करते हैं। पति का प्रेम गर्भवती नारी के लिए विश्व का सर्वोत्तम टॉनिक है। उसके आन्तरिक स्नेह सलिल से सींचकर पत्नी का मन हरा भरा हो जाता है और वह छोटे मोटे अभावों को फिर कुछ भी नहीं गिनती। इससे गर्भस्थ बालक पर भी इन छोटी मोटी कमियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ने पाता।

अधिकाँश भारतीय परिवारों में यह रिवाज है कि प्रथम प्रसव मायके में हो। उसका आधार मात्र इतना ही है कि वहाँ गर्भवती अपने कष्ट अपनी माँ से निःसंकोच कह सकेगी और माँ भी उस हेतु दौड़ धूप करेगी। परंतु अब यह प्रथा समाप्त कर देने योग्य ही है प्रथम तो, मायके में यदि भाई भाभी की चलती हुई, तो भावी जननी को संकोच और दबाव ही झेलना पड़ता है। दूसरे यह प्रथा इसलिए भी त्याज्य है कि यह ससुराल पक्ष की दायित्व से कतराने की प्रवृत्ति है। हाँ, जहाँ लड़की के माता पिता समर्थ सम्पन्न हों और उनका तथा गर्भवती का, दोनों का मन यही हो कि प्रथम प्रसव मायके में ही हो, तो वहाँ भेजने में कोई आपत्ति नहीं। पर एक प्रथा के रूप में इसे नहीं माना जाना चाहिए।

भावी माता को जहाँ तक हो सके घर के अन्य कामों से छुट्टी दे देनी चाहिए। वह भावी शिशु के लिए ही कपड़े , टोपी, नैपकीन, मोजा, गिलाफ, गुदड़ी आदि सीने बुनने का काम करती रहे। इससे उसके मन में होने वाले बच्चे के प्रति उत्सुकता एवं ममता का भाव प्रगाढ़ होगा। साथ ही उसके मन में अनावश्यक आशंकाएं न पैदा हों, इसका ध्यान रखा जाए। मिलने जुलने आने वाली अनेक महिलाएं प्रसव पीड़ा का अतिरंजित वर्णन कर गर्भवती नवयुवती को व्यर्थ ही डराती हैं। इसका प्रसव के समय प्रतिकूल परिणाम होता है। भयभीत नारी प्रसवकाल में शरीर में तनाव पैदा कर लेती है, जिससे उसका कष्ट बढ़ जाता है। यदि उसके मन में उत्साह हो तो प्रसव क्रिया सुगमता से, बिना किसी कष्ट के सम्पन्न हो जाती है।

गर्भवती नारी के कमरे की साज सज्जा पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। ताकि लेटते, उठते उसके मानस पटल पर सद्विचार व श्रेष्ठ मानस प्रतिभाएं कौंधती रहें। महामानवों, देवदूतों, राष्ट्रभक्तों, वीरों-वीराँगनाओं के चित्र ओजस्वी, उत्कृष्ट विचार पैदा करते हैं। श्रेष्ठ भावों से युक्त आदर्श वाक्यपट भी कमरे में टाँगें जा सकते हैं। सिनेमा के हीरो-हीरोइन के अश्लील भाव-भंगिमाओं अथवा मार धाड़ की मुद्रा वाले चित्र न रखे जाएं तो बेहतर है अन्यथा इन्हें देखकर किसी समय चित्त दूषित हुआ या सस्ती कल्पनाएं उभरीं तो इसका दुष्परिणाम गर्भस्थ शिशु पर अवश्यंभावी है।

कमरे में स्वच्छ वायु एवं सूर्य का प्रकाश भी आता हो। आक्सीजन की पर्याप्त मात्रा गर्भकाल में मिलती रहनी अति आवश्यक है अन्यथा शरीर के दूषण की सफाई में प्राणवायु उतनी समर्थ न हो सकेगी। इसका भ्रूण एवं गर्भवती दोनों पर गलत प्रभाव पड़ेगा।

परिश्रम न करने का अर्थ यह भी नहीं कि गर्भकाल में छुई-मुई बनकर चाहे जब लेटे रहा जाय, इससे तो स्वास्थ्य नष्ट होगा। स्वयं की स्थिती को असामान्य मानकर गर्भवती सारे दिन लेटे-लेटे ही न बिताने लगे, इसकी सतर्कता रखी जानी चाहिए। उसका चलना-फिरना बहुत आवश्यक है। हाँ, अधिक भार न उठाना चाहिए। विशेषकर गर्भ के प्रथम तीन मास में वह अधिक बोझ न उठाए, इसका ध्यान रखा जाय, अन्यथा रक्तस्राव की सम्भावना रहती है।

वह अधिक थके भी नहीं । जब थकान प्रतीत हो, विश्राम कर ले। थकान की स्थिति में चारपाई पर आराम से लेटकर पैरों के नीचे गद्दी या तकिया रख देने से अधिक आराम मिल जाता है। गर्भिणी महिला को आठ-नौ घण्टे दिन में विश्राम अवश्य कर लेना चाहिए। अधिक थकान से निद्रा-नाश की शिकायत पैदा हो जाती है।

सायंकालीन भोजन के उपरान्त थोड़ा-सा टहल लेने से नींद अच्छी लगती है। तला-भुना, दुष्पाच्य भोजन कदापि न ग्रहण किया जाय। हलका भोजन ही गहरी नींद लाता है। गहरी नींद गर्भिणी व भ्रूण दोनों के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।

पाश्चात्य देशों में गर्भवती महिलाओं को पूर्व प्रसव व्यायाम की विशेष विधियों के प्रशिक्षण का प्रचलन है। इन व्यायाम, अभ्यासों से पेडू कूल्हे, पैरों आदि की माँसपेशियाँ पुष्ट होती है। रीढ़ व जोड़ों में लचीलापन बढ़ता है। सामान्य भारतीय गृहिणी यदि घर के काम करती रहे, तो पर्याप्त व्यायाम हो जाता है। दही मथने, चक्की चलाने जैसे कामों से उन्हीं व्यायामों का परिणाम प्राप्त होता है, जो पाश्चात्य देशों में प्रचलित है। प्रातः काल टहलने से भी गर्भिणी को विशेष लाभ होता है। इस समय शरीर की स्वच्छता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। भली-भाँति स्नान करना आवश्यक है। आलस्यवश ऐसा न करने से हानि होती है। त्वचा की सफाई से शरीर में स्फूर्ति भी बनी रहती है।

गर्भवती महिलाओं को ऊँची एड़ी वाले जूते पहनने का लोभ कदापि नहीं करना चाहिए। इससे गर्दन, पीठ व पेट की मांसपेशियां पर खिंचाव होगा। मेरुदण्ड भी प्रभावित होगा। प्रातःकाल सूर्य-प्रकाश के सेवन से विटामिन-डी प्राप्त होगा। इससे भ्रूण के अस्थि निर्माण के लिए आवश्यक पोषण प्राप्त होगा। साथ ही सूर्य प्रकाश से शरीर में सामर्थ्य की वृद्धि होती है।

परिवार के आत्मीयजनों का कर्तव्य है कि भावी माता के मन में अनावश्यक चिन्ता न पैदा करें। उसकी श्रेष्ठ व हितकर इच्छाओं की पूर्ति का हर सम्भव प्रयास करना चाहिए। प्रसन्नता, सन्तोष और उत्साह का वातावरण उसके चारों ओर रहें। परन्तु यह सम्भव तभी है जब परिवार में शालीनता और कोमलता संस्कार के रूप में विद्यमान हो।

महाभारत के द्रोणपर्व में वर्णन है कि अर्जुन की अनुपस्थिति में अन्य किसी पाण्डव द्वारा चक्रव्यूह भेदन न जानने के कारण, उस दिन के युद्ध में चक्रव्यूह को भेद सकने की समस्या आ खड़ी हो गयी, क्योंकि आचार्य द्रोण ने जान-बूझकर उस दिन चक्रव्यूह रचा था. किन्तु अभिमन्यु ने इस कठिन व्यूह को भेदने की बात कही। युधिष्ठिर के प्रश्न करने पर कि “तुमने यह कहाँ सीखा ?” अभिमन्यु ने बताया कि जब वह गर्भ में था, तभी एक दिन उसकी माता सुभद्रा की पीड़ा तीव्र हुई। उपचार से भी आराम न होने पर अर्जुन ने सुभद्रा का मन बहलाने के लिए रोचक शैली में चक्रव्यूह भेदन की कला सुनाना प्रारम्भ किया। शेष सब गोपनीय रहस्य तो अर्जुन सूना गए, किन्तु अन्तिम सातवें द्वार के बेधन की विधि बताना बाकी रह गया, तभी सुभद्रा को नींद आ गयी और अर्जुन चुप हो गए। अभिमन्यु ने कहा कि ध्यान से सुनने के कारण मुझे वह सब स्मरण है, किन्तु अन्तिम द्वार का बेधन न बताए जाने के कारण उसकी विधि नहीं जानता। इस कथा से यह तो स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय तत्वदर्शी यह जानते थे कि माता के विचारों, वह जो सुनती है, समझती, देखती और विचार करती है, उस सबका गर्भस्थ शिशु पर संस्कार अंकित होता है।

महान सेनापति नेपोलियन के बारे में यह बताया जाता है कि जब वह गर्भ में था, तब फ्राँसीसी क्रान्ति के समय युद्ध की स्थितियों में नैपोलियन की माँ को प्राण रक्षा के लिए एक निर्जन पहाड़ी में जाना पड़ा। दूर चारों और सैनिकों के पदचाप गूँजते थे, तलवारों की झनझनाहट, बन्दूक की गोलियों की सनसनाहट और तोपों की गड़गड़ाहट सुनायी पड़ती थी। वह महिला इन्हीं ध्वनियों को सुनती, दृश्य भी देखती व उसी संदर्भ में उसका चिन्तन क्रम भी चलता रहता। गर्भस्थ शिशु पर इसका प्रभाव पड़ा और बड़े होने पर युद्धभूमि उसका सर्वाधिक प्रिय स्थान बन गयी। वह सदा सैनिकों के साथ मोर्चे पर रहता तथा उसके ही तम्बू के पास आ -आकर शत्रु की तोपों से छूटे गोले गिरते रहते। नेपोलियन अविचलित अपने कार्य में संलग्न रहता। इस निर्भयता और रणप्रियता में गर्भ अवधि की घटनाओं का भी प्रभाव निश्चित ही था।

इससे स्पष्ट हैं कि गर्भवती के परिवेश का अत्यधिक महत्व है। यह परिवेश प्रफुल्लता, प्रेरणा और प्रोत्साहन देने वाला हो। पराक्रम, साहस, सात्विकता और सच्चरित्र के भावों का संचार करे। ऐसी व्यवस्था करना घर के जिम्मेदार लोगों का कर्तव्य है। यदि अर्जुन सुभद्रा को वह अनूठा रणकौशल न समझाते तो अभिमन्यु में चक्रव्यूह भेदन को जन्मजात सामर्थ्य कहाँ से होती ? अतः गर्भवती पत्नी से न केवल घरेलू व्यवस्था सम्बन्धी परामर्श करते रहना और प्रेमपूर्ण व्यवहार रखना पति का कर्तव्य है, अपितु उससे उत्कृष्ट आदर्शोन्मुख चर्चाएं करना भी पति एवं पारिवारिक जनों के लिए वाँछित है। पत्नी की भावभरी संवेदनाओं को श्रेष्ठता की दिशा देते रहना गर्भकाल में पति का विशेष कर्तव्य है। भावों माँ का चिन्तन स्तर परिष्कृत नहीं है तो इसमें भावी पिता का, भावी दादा-दादी, भावी बुआ-चाची आदि का दोष कम नहीं आंका जाएगा ।

इस प्रकार भावी जननी के समुचित आहार, स्वच्छ निवास स्थल, सौम्य मनः-स्थिति, प्रगतिशील चिन्तनक्रम और समुचित श्रम तथा विश्राम की व्यवस्था जुटाना, पति एवं परिवार के आत्मीयजनों का कर्तव्य है। ऐसा करने की पात्रता व शक्ति अर्जित किए बिना, एक नवागन्तुक सुकुमार अतिथि को आमन्त्रित करना अनुचित और अपराधपूर्ण कृत्य है।


नारी की वरिष्ठता-वैज्ञानिकों की दृष्टि में

इतना जल्दी निर्णय करने से पहले वैज्ञानिकों से तो पूछ लीजिए, वे क्या कहते हैं ? वैज्ञानिकों के अनुसार मृत शरीर के अस्थि पिंजर को देखकर नर-नारी की परख आसानी से की जा सकती है, क्योंकि उनकी बनावट में थोड़ा अन्तर प्रकृति ने रख छोड़ा है। नारी की हड्डियाँ पुरुष की अपेक्षा छोटी, चिकनी और सरल होती हैं। मस्तक की ऊँचाई कम, नीचे का जबड़ा हलका, दाँत छोटे, ठोड़ी ऊँची, सीने के बीच की हड्डी (स्टरनम) छोटी तथा टेड़ी, छाती पतली, रीढ़ की हड्डियों के गुटके गहरे देखकर नारी का अस्थि पिंजर पहचाना जा सकता है। लम्बाई भी पुरुष की तुलना में कम होती है। माथे की हड्डियाँ अपेक्षाकृत कम मजबूत और कम कड़ी होती है। आँखों के गड्ढे अण्डाकृत, गहराई कम, वक्षस्थल की अस्थि दीवार पुरुष की अपेक्षा कुछ अधिक फैली होती है। गले के नीचे वक्षस्थल से थोडा ऊपर दोनों पार्श्वों में दो’ क्लेविकल’ हड्डियाँ होती है। ! वे भी अपेक्षाकृत चिकनी पतली तथा टेड़ी होती है।

स्त्रियों के हाथ पुरुष की तुलना में छोटे होते हैं, किन्तु तर्जनी लम्बी और अँगूठा छोटा होता है। संधियां छोटी होती है। मेरुदण्ड पुरुष का प्रायः 2 फुट 4 इंच होता है, जबकि औसत स्त्री का 2 फुट ही पाया जाता है। स्त्रियों का वस्ति गह्वर 90-100 होता है, जबकि पुरुषों का 70-75 ही पाया जाता है। उरु अस्थि पुरुष की 47-3 और नारी की 41-3 होती है। पैर की अस्थि (टीविया) पुरुष की 78-5 और नारी की 67-8 होती है। पैर कुछ छोटे होते हैं। पैर की मध्यमा उँगली तो निश्चित रूप से छोटी और सीधी होती है। पेट का फैलाव इसलिए अधिक रहता है कि उसमें भ्रूण का निर्वाह ठीक तरह हो सके।

नारी की मांसपेशियों में जल का अंश अधिक रहता है। यही उन्हें कोमलता का आकर्षण प्रदान करता है। मस्तिष्कीय पदार्थ पुरुष का 49 ओंस और नारी का 44 ओंस पाया जाता है। छोटा मस्तिष्क पुरुष में एक ओंस साढ़े आठ ड्राम और स्त्रियों का एक ओंस सवा आठ ड्राम होता है। हृदय पिण्ड पुरुष का 10 से 12 ओंस और स्त्रियों का 8 से 10 ओंस होता है। फेफड़े का वजन पुरुष का 1400 ग्राम और स्त्री का 1260 ग्राम अनुपात में पाया गया है। गुर्दे, पुरुष के साढ़े 4 से 6 ओंस और नारी के 4 से साढ़े 5 ओंस तक होते हैं। पुरुष की मूत्र नली 8 से 9 इंच लम्बी और स्त्रियों की डेढ़ इंच भर होती है।

आहार अपेक्षाकृत वे कम करती है। शरीर का ताप पुरुष से अधिक होता है। नाडी स्पन्दन प्रति मिनट पुरुष का 70 और नारी का 80 रहता है। श्वास नर के 15 और नारी के 17 चलते हैं। माँसपेशियों का वजन पुरुष में 400 और स्त्रियों में 350 होता है। स्वप्न भी वे ही अधिक देखती है। नारी के यौवन के उभार का अधिक प्रभाव थाइराइड ग्लैण्ड पर अधिक पड़ता है। उसके यौवन अंगों में तेजी से उभार आता है। इस ग्रन्थि के विकास पर नारी की ‘प्रवृत्ति ‘ बहुत कुछ अवलम्बित रहती है। स्वस्थ पुरुष में रक्त का वजन 1060 और स्त्रियों में 1050 पाया जाता है। रक्त कणों का औसत पुरुषों में 50 लाख और स्त्रियों में 45 लाख पाया गया है। स्वर यन्त्र पुरुषों का बड़ा और कड़ा होता है, नारी का छोटा ओर कोमल। शरीरों के आकार में यह थोड़ा-सा अन्तर ही शायद नर की वरिष्ठता के दर्प का कारण बन बैठा। लेकिन वास्तविक रूप से वरिष्ठता का मापदण्ड क्या है ? इस प्रश्न का थोड़ी गहराई में चलकर उत्तर ढूंढ़ें तो अधिकाँश तथ्य, प्रमाण एवं शोध अध्ययन से प्राप्त वैज्ञानिक निष्कर्ष नारियों के पक्ष में जाते हैं और उनकी श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, शारीरिक बनावट में यत्किंचित् न्यूनता भी नारी के विशिष्ट उत्तरदायित्व वहन किए जाने के कारण ही है। सौ इसे भी वरिष्ठता के दर्जे में ही रखा जाएगा।

इसे ठीक तरह से न समझे जाने के कारण ही शरीर की दृष्टि से पुरुष को अधिक समर्थ और बलिष्ठ मान लिया गया। संभवतः इसी उथले आधार पर समर्थता का मूल्याँकन करने वाले किसी व्यक्ति ने नारियों को अबला के सम्बोधन से सम्बोधित किया होगा। जबकि तथ्य यह है कि बाहरी ताकत की दृष्टि से पुरुष सबल भले ही दिखाई पड़े, आन्तरिक जीवनी-शक्ति की दृष्टि से नारियाँ कहीं अधिक समर्थ होती है। माटी दृष्टि शरीर बल को ही प्रधानता देती है, जबकि स्थायी सामर्थ्य, सुस्वास्थ्य एवं आरोग्य का केन्द्र-बिन्दु भीतर की विद्यमान जीवनी-शक्ति हैं।

शरीरशास्त्रियों ने सही अर्थों में शक्तिशाली उसे माना है, जिसके अन्दर इस आन्तरिक शक्ति की प्रचुरता है। शरीर से बलिष्ठ होना, एक बात है और जीवनी-शक्ति सम्पन्न होना सर्वथा दूसरी बात है। यह आवश्यक नहीं है कि जो शरीर से ताकतवर हो वह जीवनी-शक्ति का भी धनी हो। इसके विपरीत यह भी आवश्यक नहीं है कि जीवनी-शक्ति सम्पन्न व्यक्ति शरीर से अधिक हृष्ट-पुष्ट हो। यह सच है कि जिस शरीर बल को प्रधानता दी जाती है, उस क्षेत्र में पुरुष यत्किंचित् ज्यादा है, पर जहाँ तक स्वास्थ्य आरोग्य की मूल आधार जीवनी-शक्ति का प्रश्न है-नारियाँ पुरुषों की तुलना में कही अधिक समर्थ होती हैं।

काफी खोजबीन करने के बाद शरीरविज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँच गए हैं कि स्त्रियों की प्रतिरक्षा प्रणाली पुरुषों की अपेक्षा कही अधिक सशक्त होती है। उनके अनुसार इसका कारण है रक्त में पाये जाने वाला एक विशिष्ट प्रकार का प्रोटीन जिसे ‘इग्यूनोग्लोबुलिन-एम’ के नाम से जाना जाता है। स्त्रियों के शरीर में यह पुरुषों की अपेक्षा अधिक बनता है। शरीर रक्षा के लिए यह एक बड़ा शक्तिशाली घटक है। यही कारण है कि वे पुरुषों से कही अधिक स्वस्थ, सानन्द दिनचर्या व्यतीत करती देखी जाती है।

अमेरिकी चिकित्साविज्ञानियों द्वारा इस तथ्य की पुष्टि हो चुकी है कि दिल का दौरा पुरुष वर्ग को ही अधिक होता देखा जाता है। उनकी दृष्टि में अमेरिका के लगभग 4 करोड़ 20 लाख से भी अधिक पुरुष वर्ग के लोगों को दिल अथवा रक्तवाहिनी का कोई न कोई रोग बना ही रहता है। उनसे अधिक पूछताछ करने पर एक ही जवाब मिलता है कि इसके लिए वातावरण और परिस्थितियाँ दोषी हैं। जबकि वास्तविकता वैसी नहीं है। मूल कारण तो शारीरिक-मानसिक संरचना में निहित है।

स्त्रियों के सम्बन्ध में एक अति महत्वपूर्ण बात प्रकृति की विशेष अनुकम्पा ही कही जा सकती है, वह है ‘इस्ट्रोजन’ नामक हारमोन। इसके रूप में उन्हें ऐसा अमोघ अस्त्र हाथ लगा है, जो किसी भी प्रकार के हृदय रोग से मुक्ति दिलाने में हर सम्भव सहायक सिद्ध होता है। यही कारण है कि स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा किसी भी प्रकार की शारीरिक कष्ट-कठिनाई को सहन करने की क्षमता अधिक होती है। इतना ही नहीं मनः- चिकित्सकों द्वारा किए गए प्रयोग -परीक्षणों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि किसी भी समस्या के समाधान में पुरुष वर्ग को अधिक तनावग्रस्तता का सामना करना पड़ता है। ऐसी अवस्था में उनके हृदय की धड़कन तीव्र हो जाती है, जबकि स्त्रियों के हृदय की धड़कन में कोई विशेष अन्तर नहीं आता और न उत्तेजना उभारने वाले ‘एड्रिनेलिन’ नामक हारमोन का स्राव अधिक मात्रा में होता है । दिल के दौरे पुरुषों की तुलना में कम पड़ने का यही एक प्रमुख कारण है। स्टजर्ज विश्वविद्यालय न्यूजर्सी के साइको एंडोक्राइनोलजिस्ट डॉ0 रयनिश ने दीर्घ काल तक मस्तिष्क पर चोट खाए नर-नारियों का अध्ययन किया। उनके द्वारा निकाले गए निष्कर्ष सम्बन्धित विषयों पर और अधिक प्रकाश डालते हैं। डा0रायनिश के अनुसार स्त्री तथा पुरुष के मस्तिष्क की क्रियाओं में भिन्नता होती है। पुरुष की कुछ क्रियाएँ मस्तिष्क के वाम गोलार्द्ध तथा कुछ दक्षिणी गोलार्द्ध से नियन्त्रित होती हैं। दोनों के बीच परस्पर उतना समायोजन नहीं हो पाता, जितना कि नारियों में। महिलाओं में क्रिया नियन्त्रण व्यवस्था दोनों गोलार्द्धों में समान रूप से बँटी होती है। पुरुषों में इस सन्तुलन कि चरम परिणति गम्भीर मस्तिष्कीय चोटों के समय दिखायी पड़ती है। अपने सहयोगियों के साथ डॉ0 रायनिश ने अनेक केसों में देखा कि अधिकाँश पुरुषों के वाम मस्तिष्क में चोट लगने तथा क्षतिग्रस्त होने पर उनकी बोलने की क्षमता नष्ट हो जाती है और यदि दाहिने भाग पर चोट पहुँचती है तो देखने की क्षमता नष्ट हो जाती है, जबकि महिलाओं में ऐसा प्रायः कम ही होता है। दोनों के बीच इस अन्तर के कारण को उपरोक्त वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क बताया हैं।

कनाडा में एलवर्ट विश्वविद्यालय के सुविख्यात मनो चिकित्सा विज्ञानी प्रो0 पीयर क्लोर हेनरी ने स्त्री- पुरुष की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विशिष्टताओं को बड़ी गहराई से निरखा, परख है। उनके द्वार किए गए परीक्षणों से एक ही तथ्य हाथ लगा है कि मस्तिष्क के दायें-बायें भाग का क्रमिक एवं सन्तुलित विकास होने के फलस्वरूप ही स्त्रियों में आक्रामक एवं हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ नहीं भड़कती। दोनों का समान रूप से नियन्त्रण रह सकने के कारण ही वे मानसिक दृष्टि से स्वस्थ एवं तनावमुक्त पायी जाती है। पुरुष का एक मात्र दांया भाग ही अधिक सक्रिय होता पाया गया है, जिसकी वजह से किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए वह अत्यधिक बेचैनी प्रकट करता और अपने पुरुषत्व का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए तुरन्त करने में लग जाता है। मस्तिष्क के बायें भाग पर उसका नियन्त्रण कम ही रहता है। जबकि वाणी में शालीनता और सामाजिक प्रवृत्तियों को प्रभावित करने की क्षमता इसी भाग में अधिक होती हैं।

अमेरिकी नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेण्टल हेल्थ’ के एक मनःचिकित्सक के अनुसार मस्तिष्क के दायें एवं बायें गोलार्द्ध की इसी नियन्त्रण क्षमता के कारण नारियाँ में परिस्थितियों से समायोजन करने की क्षमता पुरुषों से लगभग पाँच गुनी अधिक होती है। महिलाओं में अन्तर्ज्ञानात्मक प्रतिभा भी अधिक पायी जाती है । समस्याओं का समाधान भी स्त्रियाँ पुरुष से अधिक शीघ्रता से ढूंढ़ लेती है। असन्तुलनजन्य मनःविक्षेप पुरुष को ही अधिक परेशान करते हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि विश्व में नारियों की तुलना में पुरुष मानसिक रोगियों का अनुपात चार गुना है।

इसी कारण वैज्ञानिकों ने यह घोषित किया है महिला होना प्रकृति का सबसे बड़ा अनुदान है। लेब्रास्का विश्वविद्यालय के डॉ0 डेविड परतीलो एवं एक अन्य वैज्ञानिक मार्टिन के अनुसार, महिलाओं में एक्स क्रोमोसोम्स का होना प्राकृतिक उपहार हैं। इनका कहना है कि पुरुषों में ‘वाई’ क्रोमोसोम्स होने के कारण ही वे कम उम्र के होते हैं। एक्स क्रोमोसोम, वाई की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है। इसी लिए महिलाओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिकतम होती है। यही वजह है कि आधुनिक विश्व में अलग-अलग देशों में संस्कृतियां, अहार, जीवन-शैली तथा बीमारियों के कारण भिन्न-भिन्न हैं, लेकिन एक बात सभी देशों में समान है कि महिलाएँ पुरुष से अधिक जीती है। अस्सी वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं की संख्या पुरुषों से लगभग दो गुनी है।

‘वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन’ की रिपोर्टानुसार सामान्यतया संसार में लड़कियों की अपेक्षा पैदा होने वाले लड़कों का अनुपात अधिक होता है। पर कुछ ही दिनों में उनमें से कितने ही लड़के मर जाते हैं। मृत्यु का यह अनुपात लड़कों में लड़कियों की तुलना में अधिक है। एक अध्ययन के अनुसार अकेले भारत में औसतन 140 लड़कों के मुकाबले 100 लड़कियां पैदा होती है। 15-16 के बाद यह अन्तर 100-100 का हो जाता है। अर्थात् 15-16 वर्ष की उम्र के पश्चात् 33 से 35 प्रतिशत लड़कों की मृत्यु हो जाती है। इससे भी स्पष्ट होता है कि महिलाओं में प्रतिरक्षा प्रणाली पुरुषों से अधिक सामर्थ्यवान है।

शारीरिक, मानसिक वरिष्ठता के साथ नारी की भावनात्मक विशेषताओं के विषय में जितना भी गुणगान किया जाय कम ही होगा। जिस आन्तरिक संवेदनशीलता की प्राप्ति के लिए विविध प्रकार के साधनात्मक उपचार किए जाते हैं, उसे वह जन्मजात प्राप्त है। अपना यौवन निचोड़कर शिशु को पिलाने वाली, शिशु की एक मुसकान पर बलिहारी हो जाने वाली, अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाली माँ भावनात्मक विशेषताओं का भला किन शब्दों में वर्णन किया जाय ? नारी हर तरह का त्याग-बलिदान करने में बेमिसाल है। भाव सम्पदा की दृष्टि से तो पुरुष नारी से सैकड़ों मील पीछे छूट जाता है। ये सभी तथ्य एक स्वर से यही स्पष्ट करते हैं, नारी तरह से पुरुष से श्रेष्ठ है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सामाजिक प्रगति भी उसी के नेतृत्व में अधिक अच्छी तरह होगी । उसके वर्चस्व एवं नेतृत्व का भावी युग हर तरह से कल्याणकारी होगा।


जननी और जन्मभूमि के लिए बलिदान

सम्वत् 1727 की माघ बदी की षष्ठी थी। आज ही गोधूलि बेला में रायबा का विवाह होने को है। तानाजी आनन्द में फूले नहीं समाते। जिधर देखो उधर ही आनन्द का सागर उमड़ा रहा है। एक ओर शहनाई की मधुर ध्वनि गूँज रही थी। दूसरी ओर कुछ लोग गप-शप कर रहे थे। एक तरफ खाना-पीना चल रहा था। तानाजी काफी व्यस्त मालुम पड़ रहे थे स्वाभाविक थी उनकी व्यस्तता-आखिर उनके इकलौते बेटे का विवाह जो है। इसी बीच उनके पास एक सज्जन ने आकर कहा, “तानाजी आप एक कब आए?” “बस चला ही आ रहा हूं।” “हम समझे थे कि अब आप नहीं आएँगे। भाभी बेचारी चिन्ता में घुली जा रही थी।”

“आने को तो जी बहुत छटपटा रहा था भाई ! पर महाराज इजाजत ही नहीं दे रहे थे।”

“वाह,यह भी कोई बात है। बड़े भले हैं, तुम्हारे महाराज । पुत्र का विवाह हो और पिता को आने के लिए इजाजत न दी जाए।”

“तुम नहीं जानते भाई कि इन दिनों स्वराज्य किन विकट परिस्थितियों में है। आलमगीर देश-धर्म -संस्कृति के पीछे हाथ धोकर पड़ा है। ऐसे समय क्या हो जाय, कुछ निश्चित नहीं। इसलिए महाराज का अकेला रहना ठीक नहीं था। अन्य सरदार अन्यत्र राष्ट्र सेवा में लगे है। कल दो-तीन सरदार वापस आये, तब महाराज ने मुझे आने की अनुमति प्रदान की ।सच कहता हूँ भाई, मुझसे विदा होते समय महाराज की आंखों में आँसू आ गए थे। मेरा भी हृदय भर आया। मैंने बार-बार कहा महाराज आप निश्चिन्त रहिए, मैं विवाह के दूसरे दिन ही वहाँ से निकलकर श्रीचरणों की सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा। फिर भी महाराज के आँसू नहीं रुक सके ।”

अभी ये बातें हो ही रही थी, कि इतने में किसी ने आकर कहा, श्री शिवाजी महाराज की ओर से एक सिपाही आया है, आपसे मिलना चाहता है। तानाजी ने साश्चर्य कहा, “महाराज की ओर से सिपाही आया है? जरूर कोई विपत्ति आ पड़ी है।”

त्वरित गति से तानाजी बाहर आए। सवार ने झुककर अभिवादन किया। तानाजी ने कहा, “कहो भाई, सब कुशल तो है न ? महाराज तो आनन्द में हैं ?”

सवार ने एक खरीता तानाजी के हाथ में दिया । खरीती पड़ते ही उनका चेहरा उतर गया। निराशा, उद्वेग का प्रतिबिम्ब उनके भव्य चेहरे पर उदित हो उठा। वे चिन्ता में डूब गए। कुछ क्षणों के पश्चात् उन्होंने सवार से कहा , “ठीक है। घोड़े को छोड़ दो, भोजन कर लो, तब तक मैं भी तैयार होता हूँ।”

“नहीं सरदार, महाराज का हुक्म है कि वहाँ ठहरना नहीं, तानाजी को साथ लेकर उलटे पाँव लौट आना।”

“ठीक है तो मैं अभी चलता हूँ।” अन्दर आकर उन्होंने पूकारा, “सूर्याजी !” “आया दादा।” सूर्याजी आकर अदब के साथ खड़े हो गए। “सूर्याजी।” “आज्ञा?” “रायबा को बुलाओ, रायबा की माँ को भी बुला लेना। सबको अभी तुरन्त इसी वक्त बुला लो।

“क्यों ,क्या हुआ दादा । आपका चेहरा कुम्हलाया-सा क्यों है?”

“सब मालूम हो जाएगा । पहले सबको बुला लो।” पलक झपकते सबके सब इकट्ठे हो गए । हर एक के चेहरे पर आश्चर्य घनीभूत हो रहा था । तानाजी ने सबको एक साथ सम्बोधित करते हुए कहा ,”मैं आप सभी से क्षमा चाहता हूं। मैं अपने पुत्र के विवाह में सम्मिलित नहीं हो सकता । महाराज का पत्र आया है। माता जीजाबाई ने मुझे फौरन बुलाया है। आदेश मिला है एक क्षण की भी देरी किए बिना फौरन रामगढ चले आओ। अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहर सकता। आप सभी ने अपना कीमती समय नष्ट करके मेरे घर पधारने का जो कष्ट किया है, उसके लिए मैं आप सभी का चिरऋणी हूँ मेरी आप सबसे प्रार्थना है, अब आप मुझ पर दया करके महाराज की सेवा में उपस्थित होने की अनुमति दीजिए । मेरे पुत्र रायबा का विवाह आप सब मिलकर सम्पूर्ण कर दीजिए।”

सबके सब मूक हो गए । किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहें ? एक वृद्धा जो दूर के रिश्ते में तानाजी की काकी होती थी, “बोल पड़ी ,वाह यह भी कही हो सकता है। ताना तुम पागल तो नहीं हो गए हो ? अरे बेटा, तुम वर के पिता हो, तुम्हारे बिना विवाह कैसे होगा ? वर-वधू को हल्दी चढ़ चुकी है, विवाह नहीं रुक सकता । तुम कही नहीं जा सकते । आज की ही तो बात है, कल सुबह उठकर चले जाना।”

तानाजी ने कहा, “अब मेरा यहाँ एक पल के लिए भी रुकना जन्मभूमि और राष्ट्रमाता जीजाबाई के प्रति विश्वासघात करना है। अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहर सकता।”

एक रिश्तेदार बीच में ही बोल उठे, “किन्तु रायबा तुम्हारा इकलौता बेटा है। क्या उसका विवाह करके उसके जीवन को सुखमय बनाना तुम्हारा कर्तव्य नहीं है ?”

“ नहीं , रायबा मेरा पुत्र नहीं है। मैं स्वीकार करता हूँ, कि मैं उसका जन्मदाता पिता हूँ किन्तु वह देश की सन्तान है। मैंने उसे स्वदेश पर न्यौछावर कर दिया है।”

बुढी काकी चिल्ला उठी, “नहीं ताना, मैं तुझे हरगिज नहीं जाने दूँगी । मैं अब पका-पान हूँ , कब टपक पड़ूं कोई ठीक नहीं । रायबा का यह विवाह देखकर ““‘।”

तानाजी की पत्नी ने वृद्ध की ओर देखते हुए कहा,” अरे काकी, यह आप क्या कह रही है ? अपने सुख के लिए क्या जन्मभूमि के साथ विश्वासघात किया जा सकता है। हम लोगों ने तो जन्म भूमि पर मर मिटने की शपथ ली है। इसके लिए स्वयं को न्यौछावर कर देना अब हमारा प्रथम कर्तव्य है। माता जीजाबाई , हम सबकी माँ हैं, सारे राष्ट्र की माँ हैं, उन्होंने याद किया हैं । न मालूम कौन-सा संकट उपस्थित हो गया है। मैं सरदार को परामर्श देती हूँ कि वे एक क्षण का विलंब किए बगैर रायगढ के लिए प्रस्थान करे और माता श्री के चरणों में उपस्थित हो जाएँ।”

रायबा ने अपने विवाह के समय की कटार निकाल कर आवेश के साथ कहा, “माताजी ,पूज्य पिताजी और उपस्थित अतिथि वृन्द, मैं इस कटार को छूकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि जब तक हमारी जन्मभूमि अपना खोया हुआ गौरव पुनः वापस नहीं पा लेगी , मैं विवाह नहीं करूंगा। देश संकट में हो और मैं विवाह करके ऐश करूं। आर्य नारी का सतीत्व खतरे में हो और हम रंगरेलियाँ मनाएँ। हमारी संस्कृति सिसक रही हो और हम आराम की जिन्दगी बसर करे। इससे अधिक शर्म की बात और क्या होगी ? पिताजी, चलिए मुझे भी माता जीजाबाई के श्रीचरणों में उपस्थित करके जन्मभूमि की सेवा का अवसर दीजिए।”

रायबा की बात सुनकर सब चिल्ला पड़े, “रायबा धन्य हो, तानाजी तुम धन्य हो।हम तुमको अकेले नहीं जाने देंगे हम भी तुम्हारे साथ चलकर देश की सेवा करेंगे।”

रायबा ने कहा, “हर-हर महादेव ! “ प्रचण्ड नाद हुआ, “हर-हर महादेव !”

इसी के साथ समय की दूरी को मराठी घोड़े अपनी टापों के नीचे रौंदते हुए आगे बढ़ चले । दूर से ही उत्तर की ओर वाले बुर्ज पर पड़ी । उस पर एक वृद्धा टहल रही थी । उसकी तेजस्विनी आँखें उस किले के सामने वाले दूसरे किले पर बार-बार टिक जातीं । देखते-देखते दो अश्रुबिन्दु उनकी आँखों से लुढ़क पड़े । इसी समय बाल सूर्य कोमल किरणों ने उनके मस्तक को छूकर वन्दना की । चाँदी से सफेद बाल उन उज्ज्वल किरणों से और भी दीप्तिमान हो उठे । तानाजी ने भी उन्हें दूर से ही माथा नवाया। यही थी, स्वराज्य की जननी, मराठी वीर सपूतों की माता जीजाबाई । जिनके प्रत्येक इंगित पर महाराष्ट्र का हर एक बच्चा जन्मभूमि की बलिवेदी पर हँसते-हँसते बलिदान हो जाता था। इन क्षणों में वह विचारमग्न थी।

इसी समय उन्होंने सुना, “माँ साहिबा, तानाजी अपने पुत्र रायबा के सहित आ गया।” तानाजी और रायबा ने कहा, “ माता प्रणाम। “ और दोनों ने झुककर अपना मस्तक माँ चरणों में रख दिया। माता जीजाबाई ने गदगद कण्ठ से कहा, “आ गए ताना ! “

शिवाजी ने माता के शब्दों में कातरता का अनुभव किया । कहा-”माँ तुम्हारी वाणी कह रही है, कि तुम्हारे हृदय में दुःख के बादल उमड़ रहे है । माँ”।”

“शिवा, ताना । अब कब तक तुम्हें कष्ट दूँ। तुम्हारा सारा जीवन मैंने कंटक मय बना दिया। जो यौवन सुख में बिताना चाहिए, जिन दिनों तुम्हें ऐशोआराम करना चाहिए, वही तुम्हारे सुख के स्वर्ण दिवस मैंने नष्ट कर दिए । तानाजी , रायबा का विवाह करके ही तुम आये हो न ?”

“नहीं माँ, रायबा का विवाह मुहूर्त गोधूलि के समय का था और मैं तो प्रातः काल ही वहाँ से चल दिया और माँ रायबा ने भी प्रतिज्ञा की है कि जब तक हमारी जन्मभूमि अपना गौरव वापस नहीं पा लेती , विवाह नहीं करूंगा ।”

“हूँ, तो मैंने उसका भी सुख छीन लिया। उसका ही क्यों, ऐसे कितने ही नौनिहालों का सुख छीन लिया । कौन ऐसी माता होगी , जो जान-बूझकर अपने पुत्रों को आग में ढकेल देगी । पर मैं हूँ वही अभागिन । भावी सन्तान जब इस अतीत इतिहासों के पन्ने उलटेगी, तब कहेगी जीजाबाई ने अपने पुत्रों की बलि दी थी।”

“माँ आज तुम यह क्या कह रही हो तुमने मुझे अमर बना दिया, मेरे मित्रों को अमर बना दिया । तुम न होती माँ तो आर्य धर्म का नाम मिट जाता । आर्य कन्याओं का सतीत्व लुट जाता। भावी सन्तान जब-जब इस अतीत इतिहास के पन्ने उलटेगी, तब तुम्हारे चरणों पर उसका मस्तक झुक जाएगा । माँ, जिस पुण्यमयी कामना की साधना के लिए आपने भारत के नवयुवकों को प्रोत्साहित किया, वह सफल हो गयी । तुम अपने हृदय को निर्बल बनाओगी, तो हम किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकेंगे ?तुम्हारे आशीर्वाद से ही तो माँ देव संस्कृति की उज्ज्वल किरणों से सारा देश आलोकित हो उठा है ।”

यकायक वृद्धा की आंखें चमक उठी । मुख तमतमा गया । शब्दों में उज्ज्वल किरणों की बात तुमने खूब कही । क्या इन किरणों के प्रकाश में आर्य नारियों के सतीत्व लूटे जाते हैं ? क्या इन्हीं के प्रकाश में किसानों की खड़ी फसलें जलाई जाती हैं ? जो ये विधर्मी करने में जुटे हैं,।” अपनी बात पूरी करते-करते उन्होंने वह सब दुःख कह सुनाया जो सिंहगढ़ के पास वाले गाँवों के लोगों ने आकर उनसे कहा था। अब तुम्हें ध्यान में आया तानाजी कि मैंने तुम्हें क्यों बुलाया है।

दोनों मराठा वीरों का मुख तमतमा उठा। आंखों से चिनगारियाँ बरसने लगीं। क्रोध से शरीर धधक उठा । म्यान से तलवार निकालकर शिवाजी माता के चरणों में झुककर बोले “कल जब पूर्व दिशा में सूर्य भगवा रोग फैलायेगा, तब इधर तुम्हारा यह बालक सिंहगढ़ पर भगवा ध्वज लहराएगा । माँ, मुझे आशीष दो।”

इसी समय तानाजी ने आवेग से कहा “ठहरो महाराज, माता ने इस आवेग से कहा सफल करने के लिए मुझे बुलाया है। माता सिंहगढ़ पर भगवा ध्वजा फहराने का पहला अधिकार मेरा हैं। क्षमा चाहता हूँ महाराज ! माताजी , यह बालक तुम्हारे श्रीचरणों की शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता है कि कल प्रातः सिंहगढ़ में देव संस्कृति की ध्वजा फहराऊँगा। मुझे आशीर्वाद दो माँ कि मैं विजय प्राप्त करूं । “ तानाजी ने अपना मस्तक माता के चरणों में रख दिया।

जीजाबाई की आंखों में आनन्द का सागर उमड़ पड़ा । उन्होंने तानाजी के मस्तक पर हाथ रख दिया। उनके मस्तक पर आनन्दाश्रु गिरने से अभिषेक-सा होने लगा। जीजाबाई ने गदगद स्वर में कहा, “जाओ मेरे बहादुर ताना जाओ , माँ भवानी तुम्हें शक्ति प्रदान करे। जाओ मेरे लाल ! विजयी होकर लौटो।”

तानाजी का विशाल वक्ष स्थल गर्व से फूल उठा । तलवार निकालकर उन्होंने जयघोष किया, “हर-हर महादेव ।”

इसी के साथ वे अपने सैनिकों के साथ सिंहगढ़ जा पहुँचे। किले के पास पहुँचकर उन्होंने पुकार -”सूर्या जी ?“ “हाँ दादा।”

उत्तर की तरफ वाले बुर्ज की ओर से में किले पर चढ़ने की कोशिश करूंगा। तुम दक्षिण दिशा वाले बुर्ज की ओर से चढ़ो।”

बड़े भाई की आज्ञा पाकर सुर्याजी दक्षिण की ओर वाले बुर्ज की तरफ चल पड़े। उत्तर दिशा की ओर वाले बुर्ज के ठीक नीचे आकर तानाजी बोले “लगता है, मामा ,हम ठीक स्थान पर आ पहुँचे है, जसवन्ती (तानाजी की शिक्षित गोह) को ऊपर चढ़ा देना चाहिए।”

अस्सी वर्षीय शेलार मामा ने आँखों को सिकोड़कर किले की ओर देखते हुए कहा, “नहीं ताना, उधर जो दीवार है, वही हमारे कार्यं के लिए अधिक उपयुक्त होगी।”

“हाँ मामा ठीक कहते हो, आपकी बात ज्यादा सही है। “अँधेरा न होता तो मामा देखते कि उनकी बात से भाँजे का चेहरा आनन्द से खिल उठा है।

तानाजी ने जसवन्ती को हाथ में लेकर वन्दन किया और जय भवानी कहने के साथ पूरी ताकत से उसे किले पर फेंक दिया। पर अरे यह क्या ? वह ऊपर टिकी नहीं, नीचे आ गयी । तानाजी आहत होकर बोले, “अरे-रे, मामा जसवन्ती नीचे आ गयी, असगुन हुआ।”

“तुम भी क्या बात करते हो ताना । बेटा माता और मातृभूमि के लिए प्राणों की बाजी लगानी होती है। लाओ मुझे दो जसवन्ती । देखो तुम्हारा बूढ़ा मामा आज क्या करके दिखाता है।”

शेलार मामा ने जसवन्ती को हाथ में लेकर सहलाते हुए कहा, “भवानी क्या बच्चों को इस तरह निराश किया जाता है ? जाओ देवी । वे तो उसे प्राणपण से निभाएँगे ही । जसवन्ती ने शायद वृद्ध के हृदय की बात सुन ली, तभी तो वह दीवार से जाकर मजबूती से चिपक गयी और मन्द गम्भीर शब्द नाद हुआ हर-हर महादेव।

तीन सौ मराठा वीर किले पर चढ़ गए। शेष दो सौ का चढ़ना बाकी रह गया । तभी दुश्मन के एक सिपाही ने उन्हें देख लिया और बात की बात में किले में सजगता उत्पन्न हो गयी । घमासान युद्ध शुरू हो गया। शत्रु सैनिकों में से किसी ने उस रस्सी को काट दिया जिससे मराठे ऊपर चढ़ रहे थे ।

मराठा वीरो का उत्साह अवर्णनीय था। निराशा, चिन्ता और भय तो जैसे उनके दिलों में था ही नहीं । उनका सुनिश्चित विश्वास था कि संसार भर की तमाम ताकत एक तरफ हो जाय फिर भी विजय हमारी होगी ।

तानाजी और शेलार मामा मुगल सिपहसालार उदयभानु की तलाश में चले । वह इस समय सुख की नींद सो रहा था। एक सिपाही ने जाकर खबर दी कि किले पर मराठों ने आक्रमण कर दिया है। वह हड़बड़ाकर उठा और अपनी ढाल-तलवार लेकर बाहर निकल आया। महल के द्वार पर ही तानाजी से उसकी मुठभेड़ हो गयी।

हर-हर महादेव तथा जय एकलिंग के नारे लगाते हुए दोनों एक दूसरे से भिड़ गए। लड़ते-लड़ते तानाजी की ढाल टूट गयी। उदयभानु ने तानाजी को दूसरी ढाल लेने का मौका नहीं दिया। तानाजी अपने बायें हाथ पर वार झेलते रहे। अन्त में उदयभानु के एक प्राणघातक वार ने उन्हें धराशायी कर दिया। शेलार मामा चिल्ला पड़े- “उदयभानु युद्ध के नियमों से अपरिचित हो क्या ? तुम नहीं जानते कि ढाल टूट जाने पर कोई सच्चा वीर इस तरह विपक्षी पर तलवार नहीं चलाता। अच्छा ,होशियार हो जाओ।”

वह अस्सी साल का बूढ़ा उदयभानु पर झपट पड़ा । उसके वारों ने युवक उदयभानु के हौसले पस्त कर दिए। उदयभानु ने अपना सारा साहस जुटाकर शेलार मामा पर जोर का हमला किया दोनों एक दूसरे का वार खाकर स्वर्गधाम सिधारे।

अभी मराठों के हौसले पस्त होते, इतने में दक्षिण की और से सूर्याजी अपने पाँच सौ सैनिकों सहित किले के अन्दर घुस आए। फिर घमासान युद्ध शुरू हो गया। थोड़ी ही देर में शत्रु सैनिक भाग खड़े हुए । सूर्योदय के भगवा रंग के साथ ही सिंहगढ़ पर भगवा ध्वज फहराने लगा।

माता जीजाबाई प्रातःकाल से ही रामगढ के किले के बुर्ज पर खड़ी थी । सिंहगढ़ पर भगवा ध्वज को फहराते देखकर उनकी आँखों में आनन्द छलक उठा। उनके मुख से अचानक निकल पड़ा, “शाबाश ताना , तुम चिरंजीवी हो।”

सूफी संत बीबी राविया की ईश्वर भक्ति दूर-दूर तक प्रख्यात थी। वे दिन-रात प्रभु के ध्यान में मग्न रहती थी । इबलीस उन दिनों बड़ा नास्तिक था । एक दिन किसी ने उनसे पूछा-”आप इबलीस की निन्दा करती हैं या नहीं । “ राबिया बीबी ने विनीत भाव से कहा-”मुझे उपासना से ही अवकाश नहीं मिलता । फिर बुराइयाँ तो मुझमें ही सैकड़ों भरी पड़ी हैं। उनको सुधारूं या दूसरों के दोष-दर्शन में अपना समय व्यर्थ गँवाऊँ।”वह सज्जन राबिया बीबी की भक्ति से बड़े प्रभावित हुए और दूसरों की कभी भी बुराई न करने की प्रेरणा लेकर घर गये।

“नहीं माँ तानाजी चिरंजीवी नहीं अमर हो गया।”कौन ? शिवा । देखो बेटा ताना ने सिंहगढ़ जीत लिया। हाँ माँ, गढ़ जीता पर सिंह ““। कहते-कहते गला रुँध गया। मेरा सिंह , मेरा ताना, कहां गया बता ।शिवा बता। आकाश की ओर देखकर शिवाजी ने मस्तक झुका लिया। चुप क्यों हो गया शिवा ? कहाँ गया मेरा ताना बता ? बहुत परिश्रमपूर्वक शिवाजी कह सके, माँ वह वी-र-ग--ति-प्र--प्-त- ह-ए। मेरा ताना मारा गया। हाय ! दोनों हाथों से मुँह छिपाकर जीजाबाई रोने लगी ।

तभी रायबा और सूर्याजी अपने विजयी सैनिकों सहित वहाँ आ पहुँचे । माता जीजाबाई और महाराज को सम्बोधित करके रायबा ने कहा, माता जी और महाराज ,आप मेरे पिताजी की मृत्यू पर शोक कर रहे हैं । मेरे पिता जननी और जन्मभूमि पर बलिदान हो गए। उनकी मृत्यु पर शोक करना, उनकी स्वर्गवासी आत्मा के प्रति अन्याय होगा, महाराज।”

माता जीजाबाई ने भावातिरेक में छाती से लगाते हुए कहा, “धन्य हो रायबा वीर पिता के बहादुर पुत्र ऐसे ही हुआ करते हैं।” इतने में मराठा वीरों का प्रचण्ड जयनाद गूँजा ,”हर-हर महादेव’।


आखिर यह दारुण दुर्दशा कब तक सही जाय ?

नारी की जो आज स्थिति है, उसे किसी प्रकार न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। मनुष्य के कुछ जन्म सिद्ध अधिकार है। प्रत्येक मानव प्राणी को अपनी मर्जी का नैतिक जीवन जी सकने की स्वतन्त्रता रही है और होनी भी चाहिए। मैत्री के आधार पर कोई किसी के लिए कुछ भी त्याग कर सकता है, पर कैदी के अतिरिक्त अन्य किसी को बलात् बन्धन में बाँधने का , उसका बलात् उपयोग करने का अधिकार नहीं हैं। लेकिन नारी इस मूलभूत अधिकार से भी वंचित है ?कन्या का, उसके अभिभावक कहीं भी किसी के साथ भी ब्याह कर सकते हैं या बेच सकते हैं। पति उसे बलपूर्वक अपने अधिकार में रख सकता है और अनिच्छा होते हुए भी जो चाहे सो अपनी मर्जी के अनुसार करा सकता है। उसके साथ चाहे जैसा व्यवहार कर सकता है। पशुओं जैसी मार पीट कर सकता है, लुक-छिपकर जान भी ले सकता है। यह स्थिति मनुष्य के मौलिक अधिकारों के विपरीत है। किसी के भी जीवन पर इतने कड़े प्रतिबन्धों का होना, न्यायोचित तो नहीं कहा जा सकता है। पर्दा प्रथा का दण्ड जिसे भुगतना पड़ता है, उसकी स्थिति तो और बदतर है किन्तु शताब्दियों से चल रही अवाँछनीय परम्पराओं ने इन्हीं विडम्बनाओं को मर्यादा के रूप में मान्यता दे दी है।

इस स्थिति में चिरकाल तक रहती चली आयी महिलाएँ धीरे-धीरे अपनी मानवीय उपलब्धियों से वंचित होती चली और आज की दुःखद स्थिति आ पहुँची। घर के छोटे-से पिंजड़े में आजीवन कैद रहने के कारण उसका स्वास्थ्य चौपट हो गया । खुली हवा, खुली धूप, हाथ-पाँव हिलाने की स्थिति न मिलने पर स्वास्थ्य का सर्वनाश होता ही है। छोटी आयु में विवाह हो जाने पर किशोरावस्था और नवयौवन के दिनों होने वाले शारीरिक विकास की जड़ें ही कट जाती है। शरीरशास्त्र का स्पष्ट निष्कर्ष है कि बीस वर्ष से कम आयु में सन्तानोत्पादन-नारी के स्वास्थ्य को मटियामेट करके रख देता है। उसे छोटी-बड़ी अनेक बीमारियाँ आरम्भ से ही घेर लेती है। और मरते दम तक साथ रहती है। पेडू का दर्द,कमर का दर्द, पेट दुखना, मासिक धर्म की अनियमितता, श्वेत प्रदर पेशाब में जलन जैसे रोग स्पष्टतः शक्ति से अधिक मात्रा में जननेन्द्रिय का दुरुपयोग किए जाने के ही दुष्परिणाम है।

छोटी आयु से ही कच्चे अंग- अवयवों पर जब दाम्पत्य हलचलों का अमर्यादित भार पड़ेगा ,तो उससे स्वास्थ्य की जड़ें खोखली होनी ही है। स्त्रियों में अधिकांश को अपच, सिर दर्द, अनिद्रा, हाथ-पैरों में टूटन, आँखों में जलन, मुँह में छाले, थकान, सुस्ती, बेचैनी जैसी शिकायतें बनी रहती हैं । इसका कारण उनकी जीवनीशक्ति का क्षीण हो जाना ही होता है। जिन लड़कियों का अपना शरीर ही सुविकसित नहीं हो पाया, उनके ऊपर समय से पहले बच्चे पैदा करने का भार पड़ेगा , तो वह शक्ति, जो अपना शरीर पुष्ट कर सकती है, सहज ही समाप्त हो जाएगी । बच्चे का शरीर आखिर माता का शरीर काटकर ही तो बनता है। उसका रक्त, माँस, हड्डी आदि जो कुछ है, वह स्पष्टतः माता के पास जो शरीर संपत्ति थी , उसी का एक टुकड़ा अलग से टूटकर खड़ा हो गया । जो दूध बच्चा पीता है, वह माता के रस-रक्त के अतिरिक्त और क्या है ? उसे बच्चा पीता रहेगा तो माता के शरीर में उसकी कमी पड़ेगी ही । जो रक्त-माँस लड़कियों के अपने स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए आवश्यक था, वही यदि सन्तान में निकलता चला जाय तो स्पष्ट है कि इस कारण उसे स्वास्थ्य की दृष्टि से दुर्बल, रुग्ण और गई-गुजरी स्थिति में रहना पड़ेगा । दुर्बल के पास न तो रूप बचता है, न यौवन, न उत्साह ,न स्फूर्ति, न ताजगी , न मुसकान । लड़कियों को छोटी आयु से ही दाम्पत्य जीवन के दबाव में जिस प्रकार पिसना पड़ता है, वह उनकी अकाल मृत्यु का बहुत बड़ा कारण हैं। प्रसव पीड़ा से लाखों महिलाएँ हर साल बेमौत मरती है इसका कारण उनके प्रजनन अंगों की दुर्बल स्थिति होते हुए भी असह्य दबाव का पड़ना हैं । प्रसव काल में जितना रक्त आता है, जितना कष्ट होता है, उसे परिपुष्ट माता का स्वास्थ्य ही सहन कर सकता है। कमजोर शरीर वाली लड़कियों के लिए तो यह बेमौत मारे जाने जैसा अभिशाप है।

यहाँ नहीं कहा जा रहा है कि विवाह नहीं करना चाहिए और बच्चे उत्पन्न नहीं करने चाहिए , लेकिन यह सब बातें सहज, स्वाभाविक रीति से होनी चाहिए। स्त्री का स्वास्थ्य जितना दबाव पड़ना चाहिए । किन्तु इस क्षेत्र में नारी सर्वथा असहाय है, वह इस संदर्भ में मुँह नहीं खोल सकती । पति की इच्छापूर्ति के लिए उसे विवश होना पड़ता है । सन्तानोत्पादन के लिए शरीर में गुंजाइश न होने पर भी उसे वह भार बलात् उठाना पड़ता है। अपना स्वास्थ्य नष्ट होने, दुर्बलता, रुग्णता और अधिक बढ़ने, अस्वस्थ सन्तानें जनने, गर्भपात आदि होते रहने, असह्य प्रसव पीड़ा न सह सकने, अकाल मृत्यू को गले न बाँधने जैसे विचार उसके मन में उठते रह सकते हैं, पर वह कह कुछ नहीं सकती, कर कुछ नहीं सकती पराधीन की स्वेच्छा क्या ? उसकी अपनी मर्जी कहाँ ? उसे अपने स्वास्थ्य की बात सोचने का अधिकार ही किसने दिया है?

नारी पुरुष की तुलना में शारीरिक दृष्टि से जितनी दीन, दुर्बल बनकर रह रही है, यह सहज स्वाभाविक स्थिति नहीं हैं। पश्चिमी देशों की महिलाएँ हर क्षेत्र में, स्वास्थ्य में भी पुरुषों के समतुल्य है। यह अभागा भारत ही है जिसने नारी को मानवोचित अधिकारों से वंचित किया। फलस्वरूप जो परिस्थिति उत्पन्न हुई, उसने नारी के स्वास्थ्य को खा लिया । इसे भाग्य का, भगवान का दोष कहकर मन को समझाया जा सकता है, पर वस्तुतः यह पुरुष के ही अनाचार, अत्याचार का दुष्परिणाम है । जिसे रोते, कराहते, छटपटाते नारी तो भुगतती है, पर इस स्थिति से पुरुष भी कुछ अधिक प्रसन्न नहीं रह सकता है । इससे उसे भी कुछ लाभ उठाने का अवसर नहीं है । शोषित तो मिटता ही है शोषक को भी विधि का विधान सुख की साँस नहीं लेने देता। नारियों को अस्वस्थ बनाकर उसके मलिक कहलाने वाले भी इस स्थिति में क्या सन्तोष अनुभव कर रहे हैं ? रोते-कराहते स्वर आखिर उन्हें भी तो कुछ तो कष्ट देंगे ही। सहानुभूति समाप्त हो गई हो, तो भी खीझ और झुँझलाहट तो सताती ही रहेगी । उससे तो पीछा नहीं ही छूटेगा।

शारीरिक स्वास्थ्य की ही तरह मानसिक स्वास्थ्य से भी नारी को वंचित रहना पड़ रहा है। जिसकी अपनी कोई इच्छा,महत्वाकाँक्षा, मर्जी, पसंदगी न हो, जिसे जन्म से मरण तक बिना उचित -अनुचित का अन्तर किए केवल आज्ञा पालन ही करना है, उसके लिए अपना भविष्य निर्माण की बात सोचना ही निरर्थक है। प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के विकास में स्वतन्त्र चिन्तन का, महत्वाकाँक्षाओं का, कुछ कर सकने का परिस्थिति का प्रधान योगदान होता है।वह न मिले तो खाद-पानी न मिलने वाले पौधे की तरह ज्वलन्त सम्भावनाएँ भी नष्ट हो जाती है। ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा कितनी ही क्यों न हो, मालिकों की मर्जी के बिना उसका उपयोग कर सकने का महिलाओं के लिए कोई अवसर नहीं । इच्छा तो आखिर हर किसी की कुछ न कुछ होती ही है। उन्हें फलवती करने का जब अधिकार ही नहीं , तो आकाँक्षाओं की चिंता और राख मनःक्षेत्र में घुटन की दुर्गन्ध ही भरे रहेगी ।

पग-पग पर प्रतिबन्ध, क्षण-क्षण में तिरस्कार जिसके भाग्य में लिखा हो, वह दुर्भाग्य के आँसू ही बहाता रह सकता है। नारी निष्प्राण मशीन रही होती तो अच्छा था। पर जानदार प्राणी होने के कारण उसका अपना निज का मन भी है और निज की कुछ इच्छाएँ भी । स्वभावतः वे फैलाने , फूटने का, फलने-फूलने का अवसर चाहती हैं पर इसके लिए अधिकार रहित नारी के लिए गुंजाइश कहाँ ? चौबीसों घण्टे उसे मन को मारना पड़ता है और उस दुष्ट को देखो जो मरता तो है नहीं, उलटे विद्रोही बनकर नाना प्रकार के उपद्रव खड़े करता है। इन्हें तरह-तरह के मनोरोगों के, मनोविकारों के रूप में देखा जा सकता है।

मृगी, हिस्टीरिया से ग्रसित रोगियों में तीन-चौथाई नारी और एक चौथाई पुरुष होते हैं। तरह-तरह की सनकें, चिड़चिड़ापन , अनुदारता , दुःख, असन्तोष आशंका , दोषारोपण जैसी मानसिक विकृतियाँ उन्हें घेर रहती है। सनकी, जिद्दी , अव्यवस्थित, नासमझ, बेवकूफ, स्वार्थी आदि न जाने कितने दोष उन पर लगाए जाते रहते हैं। जो किसी कदर ठीक भी होते हैं। निराश , चिन्ता, भय, भीरुता, आशंका , अविश्वास से ग्रसित उनमें से बहुतों को देखा जाता है। सन्तोषजनक मुसकान शायद ही किसी के चेहरे पर हर घड़ी खेलती हुई देखी जाएगी । यह आदत जिनमें बचपन में थी भी , गृहस्थी में आते ही समाप्त हो जाती है। असन्तोष और क्षोभ से उद्विग्न करता है, वहाँ खिलौने देकर पुचकारता भी है। शृंगार, सजधज ,फैशन की भौंड़ी तरकीब बताकर कहता है, कुछ न सही तो इस खिलौनों से मन बहलाओ, अपना जी हलका करो।

प्रायः विकृत मन वाली महिलाएँ शृंगार प्रसाधन अपनाकर अपना खोया सम्मान इस बनावट के सहारे किसी हद तक प्राप्त कर लेने की बात सोचती है। इसमें उन्हें मिलता तो कुछ नहीं । पैसा और समय तो गँवाती ही है, मूर्ख,हास्यास्पद और छिछोरी भी बनती है। प्रशंसा पाने चली थी उपहास लेकर लौटती है। व्यंग्य रूप में ही कोई मसखरा उनके मुँह पर उस सजधज की शायद प्रशंसा, भी कर देता होगा । ये विडम्बनाएँ वे स्वेच्छा से नहीं , छलिया मन के विचित्र बहकावे में फँसकर रचती है । असन्तोष को सन्तोष में परिणत करने का कुछ भी औंधा-सीधा मार्ग वे खोजती है। इन्हीं में से एक शृंगारिक सजधज भी है अन्यथा शालीन नारी का व्यक्तित्व तो स्वच्छ , सभ्य और सरलता , सादगी के साथ ही जुड़ा रहता है। विवेक और उद्धत शृंगार का प्रत्यक्ष बैर है, जहाँ एक एक रहेगा, वहाँ से दूसरे को पलायन करना ही पड़ेगा

स्मरण शक्ति की कमी आवेशग्रस्तता, जिद्दीपन , शंकालु अनुदारता, अदूरदर्शिता, मन्दबुद्धि आदि मानसिक त्रुटियाँ स्त्रियों में बहुधा अधिक होने की बात कही जाती हैं । यदि यह सच है तो इतना ही कहा जा सकता है कि यह उनकी आन्तरिक घुटन की प्रतिक्रिया है अन्यथा मानसिक बनावट में वे पुरुषों से पीछे नहीं आगे ही रहती है। स्कूल-कालेजों के परीक्षाफल इसके प्रमाण में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। लड़के अधिक और लड़कियां कम फेल होती है। अच्छे डिवीजन लड़कियों के हिस्से आते हैं । वे छुरे, चाकू तमंचे लेकर नकल के बल पर पास होने की उद्दण्डता भी नहीं बरतती। अपनी सहज प्रतिभा एवं स्वाभाविक श्रमशीलता के आधार पर अच्छे नम्बरों से पास होती रहती है। अन्य क्षेत्रों में भी नारी को जब भी जितना भी अवसर मिलता है, सदा उसने अपनी बौद्धिक प्रखरता का परिचय दिया है। न वे शरीर की दृष्टि से दुर्बल है और न मानसिक दृष्टि से पिछड़ी हुई है। परिस्थितियों ने ही उन्हें दुर्दशाग्रस्त बना दिया है। आज तो वे दुर्बल और रुग्ण ही नहीं मन्दबुद्धि और मानसिक रोगों की व्यथा भी बेतरह सहन कर रही है।

इस स्थिति से उनका उबरना नितान्त आवश्यक है अन्यथा वे स्वयं के लिए परिवार के लिए, समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान देने की जगह, भार भूत ही बनी रहेंगी । रुग्ण व्यक्ति अपनी बेकारी , पीड़ा परिचर्या चिकित्सा आदि के कारण स्वयं दुःखी रहता और अपने सम्बन्धियों को दुःखी करता है। नारी की शारीरिक, मानसिक अस्वस्थता हर दृष्टि से , हर क्षेत्र के लिए दुखद परिणाम ही प्रस्तुत करेगी।

राजनैतिक दृष्टि से, पराधीन रहने वाला देश आर्थिक दृष्टि से ही शोषित नहीं होता, वरन् साँस्कृतिक, मानसिक , चारित्रिक और बौद्धिक दृष्टि से भी अपंग हो जाता है। ठीक इसी तरह सामाजिक दृष्टि से पराधीन बनाई गयी नारी भी अपनी प्रखरता और उपयोगिता गँवा बैठी है। तथ्य को समझा जाना चाहिए और विषवृक्ष के पत्ते तोड़ने की अपेक्षा उसकी जड़ काटी जानी चाहिए। नारी को हर क्षेत्र में विकास का अवसर मिलना चाहिए और उसके पिछड़ेपन को मिटाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किया जाना चाहिए । अपहरणकर्ता के रूप में पुरुष का ही दोष अधिक है । इसलिए प्रायश्चित, परिमार्जन, प्रतिकार की दृष्टि से उसी को आगे आना चाहिए । आघात पहुँचाने वाले को हर्जाना भी देना चाहिए और क्षतिपूर्ति के लिए प्रबल प्रयास करके कलंक कालिमा को जल्दी से जल्दी धो डालने के लिए कमर कसकर तत्पर होना चाहिए।


आप माँ हैं, माँ ही बनी रहें

माँ की ममता, पिता का प्यार ,सहेलियों का स्नेह और मधुर विनोद के सुखद वातावरण को छोड़कर बेटी बेटी अपने ससुराल आती है। यह आगमन उसके दूसरे जन्म की तरह है। बचपन के सुखद सम्बन्धों से विदा होते समय उसकी आंखों में विरह-वेदना के सागर उमड़ आते हैं। ऐसे अवसर पर माँ की स्नेहिल पुचकार और पिता के संरक्षण के समान ही वातावरण मिलना आवश्यक हो जाता है। नए घर में पदार्पण करने पर उसे पूरा वातावरण बदला नजर आता है। सभी परिजन नए-नए दिखते हैं। वहाँ वह किंकर्तव्यविमूढ़ की सी स्थिति में आ जाती है। यदि उसे वहाँ भी सास का मधुर आश्वासन मिल सके, उसका सम्मान दिया जा सके तो, नवविवाहित बहू को किंचित मात्र परायापन महसूस न होगा। वह अपने सारे दुःखों को भूलकर इस अपरिचित वातावरण में शीघ्र ही घुल- मिलकर सुख का अनुभव करने लगेगी । बहू के लिए ऐसा स्नेहिल व्यवहार उपस्थित करने का सारा श्रेय सास को रहता है। वह चाहे तो उसे अपनी बेटी बनाकर रख सकती है या इसके विपरीत दासी के समान भी । यह सब उसके प्रति भावनाओं पर निर्भर करता है।

सास केवल सास नहीं , वह वात्सल्यमयी माँ भी होती है। इस गौरवान्वित पूजनीय पद से विभूषित होती है। उसके हृदय में अपनी लड़की के प्रति अपार स्नेह भारा रहता है। वह उसके सुखों का ध्यान रखती है। पुत्री से किसी कार्य में भूल हो जाने पर, काम बिगड़ जाने पर वह उसे सहन कर लेती है। उसकी आँखों में रोष नहीं आता, उसे प्रेमपूर्वक समझा दिया जाता है। उसका सहज सरल हृदय बेटी के प्यार के रूप में ही प्रदर्शित होता है। पराए घर से आयी बहू भी किसी माँ बेटी होती हैं। वह पराई तो होती है, किन्तु सास का हृदय तो माँ का ही रहता है। उसे तो अपने हृदय में कुटिलता लाकर माँ शब्द की गरिमा कम नहीं करनी चाहिए। वास्तविक रूप से देखा जाए ओर सोचा जाए तो बहू ही जीवन भर सेवा करने वाली, गृहस्थी की भावी मालकिन परिवार के भाग्य को बनाने वाली ,पुत्र के जीवन की साथी , धर्म की पुत्री , सच्चे प्यार की पात्र तथा उत्तराधिकारी होती है।

नए परिवार में आते ही उसे इसकी कुल परम्परा , रीति -नीति , सदस्यों के स्वभाव को समझने का अवसर नहीं मिल पाता और आते ही उस पर क्षमता से अधिक भार लाद दिया जाता है। सेवा रसोई व्यवस्था तथा अन्य काम उसे ही बिना सहयोग-सहारे के करने पड़ते हैं। वह इनसे पूरी तरह परिचित नहीं रहती । फलतः जीवन के व्यवहार में, शिष्टाचार में, गृहव्यवस्था में भूल हो जाना स्वाभाविक है। ऐसे अवसर पर भूल का प्रतिफल झिड़क रोष , ताने तथा आक्षेपों के रूप में मिले तो वह दुःखी होती है, निराश हो जाती है। बहु के अन्तःकरण में भी कोमल हृदय, भावनाएँ सम्वेदनाएँ छिपी रहती है। वह कोई खरीदी गई भौतिक जड़ वस्तु नहीं, न ही दासी होती है, जिसके साथ स्नेह विहीन , बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया जाए । मानवता यही कहती है कि बहू के साथ अपने पेट से जन्मी पुत्री से भी ज्यादा प्यार किया जाना चाहिए। जो भी सास स्वयं को बहु कि माँ समझकर रहती है, उसके अनुरूप ही आचरण करती है, उसके घर में सदा-सर्वदा ही सुख की वंशी बजती रहती है।

नवविवाहिता बहू को गृहस्थी के कर्तव्यों को निभाने की योग्यता, व्यावहारिकता और जिम्मेदारी का ज्ञान न होने पर गृहव्यवस्था का भार सम्हालना एक मुसीबत का कारण बन जाता है। ऐसे नयेपन में सास-ससुर तथा अन्य सदस्यों का स्नेह ,उनकी सहानुभूति न मिल पाने की अवस्था में परिवार के दुःख का अनुभव होता है। उस परिवार के प्रति आत्मीयता नहीं जुड़ पाती । सास का दायित्व है कि बहू को अपनी बेटी के समान सभी कार्यों में प्रशिक्षण दे। उसे सहानुभूति प्रदान करे तथा यथासम्भव परामर्श सहयोग भी प्रदान करे।

बहू की छोटी-छोटी भूलों और गलतियों को पहाड़ के बराबर बताने वाली तथा इनकी चर्चा हर जगह करने वाली सास दूसरों को भी ऐसी प्रेरणा देती है। इस प्रकृति को देखकर अन्य महिलाएँ भी तमाशा देखने के लिए उसके कान भरने शुरू कर देती है। कान की कच्ची सास उस पर विश्वास कर लती है और बहू का जीवन दूभर कर देती है। किन्हीं अन्य लोगों द्वारा बहू की निन्दा की जाने पर उसे प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए । बहू का पक्ष लेकर उसकी अच्छाइयों को सामने लाकर प्रशंसा ही करनी चाहिए । निन्दक इससे आगे ऐसी बातें करना छोड़ देता है। बहू की गलती के सुधार का आश्वासन देकर उसकी इज्जत बचा लेना ही सुयोग्य सास के लक्षण है। सास के इस तरह के व्यवहार से बहू के मन में सास के प्रति सम्मान और श्रद्धा का सहज उदय होता है। अपनी बहू की निन्दा सुनकर उसमें नमक - मिर्च मिलाकर बढ़ा देने वाली सास कुटिला ही कही जा सकती है। इससे हृदय की कुटिलता ही उजागर होती रहती है।

लड़की माँ के घर लाड़ - प्यार में पली होती है। वहाँ पर भाभी द्वारा ही सभी कार्य कराये जाते हैं। भाभी की उपस्थिति में ननद रानी से कम नहीं मानी जाती । फलतः उसे गृहस्थी के कार्यों का अनुभव नहीं हो पाता। अतः उसे सहयोग तथा प्रोत्साहन देना अति आवश्यक होता है। सास का कर्तव्य है कि वह अपने अनुभवों का लाभ उसे दे। अपने संरक्षण में गृहस्थी के कार्यों में दक्ष किया जाना ही इस सम्बन्ध का श्रेष्ठ आदर्श है।

अपने घर में नए प्रगतिशील विचार वाली शिक्षित बहू के प्रवेश से सास को प्रसन्नता होनी चाहिए। उसके क्रिया-कलापों में अपना सहयोग देकर प्रोत्साहन देना तथा प्रशंसा की जानी चाहिए, न कि उससे ईर्ष्या कर उसकी निन्दा । युग के बढ़ते चरणों के साथ घर -परिवार की परम्पराओं लोगों के व्यवहारों में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। दुनिया के साथ चलने के लिए आवश्यक भी है कि उसके कदमों के साथ अपने कदम मिलाकर चलें । पुरानी रूढ़िवाद में जकड़ी सास को नवपीढ़ी के लोगों के व्यवहार पसन्द नहीं आते खास कर बहू के । यदि वे व्यवहार उसकी

बेटी करती है, तो वे क्षम्य होते हैं। उनके लिए सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, किन्तु बहू के ऊपर प्रतिबन्ध लगाए जाते हैं।

प्रगतिशील विचारधारा वाली बहु के विचार प्राचीन रूढ़ियों के शिकंजे में फँसी सास को पसन्द नहीं आते। उसके नव आदर्शों को देखकर वह आगबबूला होती रहती है। अपने पति के साथ हँसना-बोलना, मनोरंजन करना, अध्ययन करना, पास-पड़ौस की महिलाओं के साथ वार्ता करना, उनके साथ हेल-मेल बढ़ाना तथा अन्य व्यवहार उसे फूटी आँख नहीं सुहाते। वह अपनी पुरानी रूढ़ियों को छोड़ना नहीं चाहती और बहू को भी अपने चरण-चिह्नों का अनुगमन करने के लिए बाध्य करती है। उसकी स्वाधीनता को वह किसी भी हद तक क्षमा नहीं कर पाती। इन्हीं बातों को लेकर बहु को डाँटती है तथा जमाने का रोना रोती रहती है।

किसी परिवार में मूढ-मान्यताओं के कारण भी कलह पैदा होता है। पारिवारिक, आर्थिक अभाव, गरीबी, घर में चारी, किसी की मृत्यु, धन -जन की हानि, फसल में घाटा, पढ़ाई या तरक्की में रुकावट, प्रकृति-प्रकोप, हारी-बीमारी, दुर्घटना आदि को बहू के आगमन तथा उसकी छाया के साथ जोड़ दिया जाता है। किसी सयाने या ओझा से इस बात की साक्षी भी प्राप्त करली जाती है। इस भ्रम में फँसकर बहू के अन्य गुणों पर पर्दा डालकर उसके प्रत्येक कार्य में बुराई ही देखी जाती है। उसके द्वारा कोई अच्छा कार्य सम्पन्न हो जाने पर या सफलता मिल जाने पर श्रेय स्वयं सास ले लेती है या अपनी पुत्रियों को देती है, किन्तु यदि किसी के द्वारा भी कोई काम बिगड़ जाए तो उसका सारा दोष बहु पर मढ़ दिया जाता है।

आर्थिक दृष्टि से वर एवं वधू पक्ष वालों की समानता कहीं-कहीं ही मिलती है। अक्सर बहू धनी परिवार से ब्याही जाती है या अपेक्षाकृत गरीब परिवार से। इन दोनों ही स्थितियों में सास बहू को उलाहना देती है। धनी परिवार से ब्याही बहू के ठाठ-बाठ..सभ्य व्यवहारों को देखकर उसे जलन होती है। उसे यह शंका बनी रहती है कि परिवार के अन्य सदस्यों की दृष्टि में बहू की इज्जत बढ़ न जाय, जिससे स्वयं की इज्जत कम हो जाएगी। अतः उसकी प्रगति में सहयोग देने की अपेक्षा, उसके कार्यों की निन्दा कर उसका सम्मान गिराना चाहती है। बहू को चालाक, निकम्मी, बदमिजाज, घमण्डी आदि का दोष लगाकर अन्य सदस्यों के कान भरती है। स्वयं की बड़ाई कर ढ़ींग हाँकती हैं। गरीब घर की बहू आने पर अपने धन का रोब गाँठती है तथा उसके पीहर के घर के अभावों का ताना देकर उसे तिरस्कृत करती है। हर बात पर उसका अनादर कर नौकरानी तथा उपेक्षित की तरह व्यवहार करती है। घर की व्यवस्था में उसकी सलाह नहीं ली जाती है, न ही सम्मान दिया जात है।

जबकि होना यह चाहिए कि नवदंपत्ति की भावनाओं की सन्तुष्टि के लिए उन्हें पूरा अवसर दिया जाय। उनके दाम्पत्य सूत्र को स्थायित्व देने का अवसर प्रदान कर उन्हें सजीव बनाने में अपनी ओर से पूरा प्रयास किया जाना चाहिए। बहू-बेटे का जीवन आत्मीयतापूर्ण वातावरण में व्यतीत हो रहा हो, तो अपने भाग्य की सराहना की जानी चाहिए। उनकी उन्नति-प्रगति की आशा हो तो उसमें अपनी ओर से बाधाएँ उपस्थित नहीं करनी चाहिए। इस तरह के आदर्श विचार किसी परिवार में आ जाएँ तो ये सुखों का आधार तथा प्रगति का द्वार खोलने में सहयोगी हो सकते हैं।

बहू के सामने या अन्य किसी भी व्यक्ति के सामने उसके माँ-बाप से सम्बन्धित कोई चर्चा, विवाह में लेन-देन, बारात, दहेज आदि की उखाड़ -पछाड़ कर उसके पीहर वालों का अपमान नहीं करना चाहिए और न ही उनके प्रति भर्त्सना भरी बातों का प्रयोग, हो सके तो हमेशा ही उनकी बड़ाई करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता ही प्रदर्शित करनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का सजीव अंश सेवा के लिए समर्पित किया है। बहू के साथ हास-परिहास भी इसी तरह शीलयुक्त किया जाना चाहिए, न कि व्यंग्योक्ति से उसके हृदय में तीर की तरह चुभने वाला । वह अपनी प्रशंसा सुनकर अच्छाई की ओर अग्रसर होती रहेगी तथा सदा ही अपेक्षाकृत अच्छा बनने का प्रयास करेगी। सास में मुँह से बड़ाई सुनकर बहू भी उसका आदर करती है, हर काम में सहयोग देती है तथा आगे बढ़कर उसकी जिम्मेदारी लेती है।

गृहस्थी का अधिकार बहू को सौंपना, उसके मन में नए परिवार के प्रति अपनत्व की भावना को परिपुष्ट करना होता है। इसके सत्परिणाम कर्तव्यों के प्रति निष्ठा में दिखाई देते हैं। प्रत्येक कार्यों में अपनी मालिकी जताना, आदेश देना तथा घर-गृहस्थी की रोजमर्रा की सामग्री को ताले में बन्द रखना अविश्वास की जड़ होती है। इससे भी बहू अपने आप को पराई ही महसूस करती रहती है और वह किसी भी काम को कर्तव्य परायणता के साथ नहीं करती । इससे सारे परिवार की आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अतः उसे धीरे-धीर गृहस्वामिनी का अधिकार सौंपना हर तरह से उत्तम है। उस पर निगरानी रखी जाए, सुझाव दिया जाए परन्तु अधिकार जमाए रखना घातक एवं हानिकारक ही सिद्ध होता है।

बहू भी कुटुम्ब का अभिन्न अंग है। भविष्य में वह घर की मालकिन बनने वाली होती है। अतः उसके हर काम में रोक-टोक करना उचित नहीं । उसकी इच्छाएँ होती हैं, भावनाएँ होती हैं, आत्मा की भूख होती है। इनको परखते हुए उसे मर्यादित स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। ताकि वह स्वयं की आत्माभिव्यक्ति कर सके, अपनी प्रतिभाओं को विकसित कर सके। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता समाप्त हो जाने पर क्षमता कुण्ठित हो जाती है, घर काटने को दौड़ता है तथा आत्मिक शक्ति नष्ट हो जाती है। नए परिवार में घुलने-मिलने से लेकर दाम्पत्य हास-परिहास तक के सभी कार्यों के लिए उचित अवसर मिलना चाहिए। इस स्वतन्त्रता में बाधा आने पर संयुक्त परिवार का विभाजन हो जाने के संकट आ जाते हैं। अतः सास को बड़ी विवेकशीलता के साथ व्यवहार करना चाहिए। यदि व बहू को बेटी के समाने प्यार से रखे और स्वयं माँ की अनुभूति करें । इस पारस्परिक अपनत्व को देने वाला, घर में सुख-शांति बनाए रखने वाला एक ही मूल मंत्र है “आप माँ है, माँ ही बनी रहें।”


द्रौपदी के प्रश्न

सहस्रों दीप मालिकाओं से सुसज्जित उस विशाल सभागार में द्यूतक्रीड़ा का आयोजन हुआ था। धूप-अगरु में सुवासित उस प्रेक्षागृह में दूर-दूर से कौतुकप्रिय जन आए थे। प्राचीन कुरुवंश की प्रमुख दोनों शाखाओं में आज रोचक द्यूत स्पर्धा थी। औत्सुक्य और कौतूहल के क्षण अब तक श्मशान की भयावह शान्ति में बदल गए थे।

सभागार के केन्द्र में उच्च सिंहासन पर नेत्र ज्योति ही न महाराज धृतराष्ट्र विराजमान थे। निकट ही उनकी साध्वी पत्नी गान्धारी नेत्रों पर वस्त्र पट्ट बाँधे बैठी थीं। पुत्र स्नेह में वे दोनों आँखों से ही नहीं विवेक से भी अन्धे हो चुके थे। पुत्र मोह की पट्टी दोनों के नेत्रों पर बँधी थी। अधर्म की पट्टी बाँधे रहने से उनके ज्ञान-चक्षु भी मूंद चुके थे।

अनेक प्रकाण्ड विद्वान, मनीषी, विधिमर्मज्ञ, धर्मज्ञाता, साधू पुरुषों एवं पराक्रमी राजपुत्रों से सुशोभित वह सभामण्डप जगमगा रहा था। वहाँ परम प्रतापी पितामह भीष्म थे। प्रसिद्ध धनुर्विद गुरुवर द्रोणाचार्य थे। महर्षि विदूर थे। शरद्वान पुत्र कृपाचार्य थे। इन सबमें प्रत्येक का व्यक्तित्व अज्ञान रूपी अन्धकार में प्रकाश स्तम्भ की भाँति था। एक-एक का व्यक्तित्व मणि -स्तम्भ सा जाज्वल्यमान था। ऐसा उनका नीर -क्षीर विवेक था और ऐसा उनका धर्मानुकूल आचरण था।

किन्तु........आज वे समस्त मनीषी, वे समस्त ज्ञान पुँज निस्तेज थे। आज वह राजसभा उनकी उपस्थिति में भी श्रीहीन थी। वे सब क्षुब्ध थे। अनिष्ट की काली छाया अपने डैने फड़फड़ाती जैसे सभा के चारों ओर मँडरा रही थी।

सभागृह के मध्य भाग में पाँचों पाण्डव बैठे थे। अपने ही दुर्व्यसन द्युत विलास से पराजित। उनके कभी न झुकने वाले मस्तक झुके हुए थे। चौड़े पुष्ट स्कन्ध आज शिथिल थे। वे महातेजस्वी योद्धा, अपमान से क्षुब्ध एवं असहाय को जैसे लौह पिंजर में बाँध दिया गया हो। उनके अस्त्र- शस्त्र, आभूषण एवं किरीट उतरे हुए एक ओर भूमि पर रखे हुए थे। सबसे सब राज्यश्री हीन, सत्ताच्युत, उपहास एवं अपमान के पात्र।

भयंकर नीरवता के पल थे। बीच-बीच में हलकी-सी हँसी दबी-दबी सुनायी पड़ती थी दुर्योधन की मित्र मण्डली से। वे भी प्रतीक्षारत थे। विराट सी प्रतीक्षा पूरे सभागार में छायी हुई थी सब श्वास रोके बैठे थे।

अचानक द्वार पर सामूहिक हाहाकार की ध्वनि से सज्जनगण सिहर उठे। पाण्डवों ने विचलित हो अपने हाथों से हृदय थाम लिए। सबकी दृष्टि मुख्य द्वार की ओर घूम गयी। महाराज द्रुपद की महाविदुषी युवराज्ञी तथा महापराक्रमी पाण्डवों की सती साध्वी पत्नी, इंद्रप्रस्थ की साम्राज्ञी द्रौपदी को दुशासन हाथ पकड़कर खींचता ला रहा था। पीछे-पीछे आकुल-व्याकुल सखियाँ, दास-दासी, परिचारक एवं सेवकों की रोती-बिलखती भीड़ चली आ रही थी।

छोड़ दे पापी !........ मेरे परमपूज्य श्वसुर महाराज धृतराष्ट्र की राजसभा है। इस धर्मस्थल पर अधर्म नहीं होता दुष्ट। दुराचारी छोड़! यहाँ न्यायप्रित विद्वजन बैठे हैं, वयोवृद्ध बैठे हैं- क्यों उनके कोप का भाजन बनना चाहता है नराधम! पाँचाली का स्वर प्रखर थी। “ मुझे बचाएँ तात! माता गान्धारी .......” पाँचाली दौड़ पड़ी महाराज धृतराष्ट्र एवं महारानी गाँधारी की शरण में। कितना विश्वास था उसको कि वे धर्मज्ञ हैं और वे रक्षा करेंगे। कितनी बड़ी भ्रान्ति।

राजसिंहासन की ओर भागती द्रौपदी की वेणी पकड़कर दुशासन ने तड़ित वेग से झटका दिया। वेणी खुल गयी। नील कुन्तल केशराशि लहरा गयी। वेणी में गुँथित चन्द्रमल्लिका की पुष्पामाल्य टूटकर गिर गयी। दुष्ट ने निर्ममता से पाँवों से उसे कुचल दिया। शुभ्र शेवंती चन्द्रमल्लिका की पुष्प कलिकाएँ नवतारिकाओं-सी नीले मेघ केशों से झरने लगीं।

अथाह पीड़ा से पाँचाली का हाथ तत्क्षण वेणी पर पहुँचा, किन्तु अनायास वह निश्चल हो गयी। भरी सभा में जहाँ महान् तत्वज्ञानी और धर्मज्ञ बैठे हैं! और कोई विरोध नहीं कर रहा!! कोई प्रतिवाद नहीं!!! अपमान से उसका मुखमण्डल आशक्त हो गया। क्षोभ और पीड़ा से मुख विवर्ण हो उठा। उसका कोई रक्षक नहीं?

उसने एक बार फिर सभी की ओर देखा-धर्मज्ञों, नीतिज्ञों एवं महावीरों की सभा को। सभी चुप्पी साधे थे। उसने बिलखते हुए पूछा- “क्या स्त्री मात्र वस्तु है, पदार्थ है, जिसका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं, जब जो चाहे जिस तरह उपभोग करे? मैं महाराज पाण्डु की स्नुषा आपकी कन्या ही हूँ। पितामह उठिए। नारी को विवश करने वाले के हाथों को उखाड़ फेंकिये। आँचल पसार कर भीख माँगती हूँ। कुरुओं की इस राजसभा में शील का व्यापार मत होने दीजिए। उठिए, स्त्रियों की लज्जारक्षण परम्परा इस मदान्ध नीच को खड़ग से दिखा दीजिए।”

परन्तु...........

पितामह भीष्म! कुरुकुल का मेरुदण्ड! मेरुदण्ड! ऋषिवर्य वशिष्ठ का अधीत वेद शिष्य! बृहस्पति और शुक्राचार्य से शास्त्राध्ययन करने वाला पराक्रमी क्षत्रिय। च्यवन, भार्गव और मार्कण्डेय से धर्म का गम्भीर ज्ञान प्राप्त करने वाला धर्मज्ञ। शान्तनु महाराज का साक्षात गंगापुत्र। काशिराज और उग्रायुध के दाँत खट्टे कर देने वाला वीर। जिनसे धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की उन्हीं जमदग्नि पुत्र परशुराम को धर्मयुद्ध में पराजित कर, ‘सत्शिष्य गुरु से कुछ न कुछ श्रेष्ठ ही होता है’ सिद्ध करने वाला विख्यात धनुर्धारी। आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले तेज का ज्वलितपुँज । वह भीष्म भी सिर झुकाकर चुप था।

“तात् विदुर! आप महात्मा हैं, धर्मज्ञ हैं। आप ही धर्म की व्याख्या कर सकते हैं बताइए क्या नारी का कोई स्वतंत्र जीवन नहीं है। बताइए आर्य युधिष्ठिर को मुझे दाँव में लगाने का क्या अधिकार है? तात धृतराष्ट्र! आचार्य द्रोण! कृपाचार्य! गुरुपुत्र अश्वत्थामन! आर्य अमात्य! आप सब चुप क्यों हैं।” आज द्रौपदी के एक-एक स्वर में हृदय विदीर्ण करने वाली आर्तता थी। वह बिलखती हुई हाथ फैलाकर आक्रोश करती हुई प्रत्येक आसन के सामने होकर आगे सरकने लगी। “हस्तिनापुर के श्रेष्ठ पुरुषों! समराँगण में चमकने वाले वीर योद्धाओं! भारतवर्ष के तत्त्वज्ञानी मनीषियों! मैं आप सबसे पूछती हूँ, क्या आप सभी ने नारी की कोख से जन्म नहीं लिया? अरे स्त्री की कोख से जन्म लेने वाले पुरुषों! एक स्त्री का विलाप आपके पुरुषार्थ को जाग्रत नहीं कह रहा है।”

एक हाथ फैलाकर दूसरे हाथ से दुशासन को धकेलती हुई, वह एक के बाद एक आसन के सम्मुख आक्रोश करती हुई आगे बढ़ रही थी। प्रलय की महानदी में जैसे कोई देवदारु वृक्ष लुढ़कता हुआ चला जाता है। वैसे ही दुशासन उसकी विपुल केशराशि की पिण्डलियों तक लम्बी लटों के साथ लुढ़कता हुआ खिंचा चला जा रहा था। यह दुशासन के पौरुष को ज्वलन्त चुनौती थी, जिसे वह सह न सका। चिढ़कर बौखलाया हुआ दुशासन उसकी लटों को अपने हाथ के चारों ओर लपेटकर द्रौपदी की गरदन को बारम्बार झटके देने लगा।

उसने बड़ी व्यथा से अपने पतियों की ओर देख। बड़ी करुण मुद्रा में उसने युधिष्ठिर को सम्बोधित कहते हुए कहा-”आप धर्मराज कहे जाते हैं, क्या धर्म मीमांसा का सार, नारी को वस्तु समझने में है? क्या यही है धर्मशास्त्रों का निर्णय कि नारी को जुए में दाँव पर लगा दिया जाय?”

द्रौपदी के मुख से जैसे प्रश्नों की झड़ी निकल रही थी।

पर कोई उत्तर नहीं! कोई नहीं बोलता! सब निरुत्तर थे। वह चारों ओर देख रही थी-किरीटयुक्त शीश झुके हुए थे। महामनीषियों के हाथ नेत्रों पर थे। लोग नत-नयन थे। इन महारथियों, मनीषियों एवं वेद-वेदांत के मर्मज्ञों में से किसी में साहस नहीं थी कि एक बिलखती- छटपटाती नारी के प्रश्नों का उत्तर दे पाता। नत शिर! नत नयन! किस ग्लानि में? किस क्षोभ में? किस पश्चाताप में? इतनी विराट सभा में कोई उसका नहीं। उसके अपने कहलाने वाले पति भी उसके अपने नहीं। किसी में साहस नहीं कोई धर्म का पक्षधर नहीं।

इतने में उसकी बातों से चिढ़े हुए दुर्योधन ने पुकारा-”दुशासन। इस वाचाल स्त्री का साहस कि सबको धर्म एवं शास्त्र सिखाए। उतार दो इसके समस्त वस्त्र- परिधान! यहीं इसी भरी सभा में इसे नग्न कर दो”

अविश्वसनीय! कानों पर विश्वास नहीं हो रहा। इस नीचता पर भी कुरुकुमार उतर सकते हैं। क्षणभर को द्रौपदी प्रबल प्रभंजन में पड़ी सुकुमार दीपशिखा-सी प्रकम्पित हो उठी। किन्तु दूसरे ही क्षण उसने मन हो समस्त मानवीय शक्तियों से हटाकर परमात्मा में एकाग्र कर लिया। इन क्षणों में वह सभी रिश्ते-नातों से ऊपर थी। देह, मन, प्राण से उसकी चेतना सिमटकर सृष्टि संचालक को समर्पित हो चुकी थी।

वह आकुल स्वर से पुकार उठी- “ऐसी विकट परीक्षा तो भगवती सीता की भी नहीं ली गई थी। भगवती सीता को जब अधम रावण हरकर ले जा रहा था तो पशु-पक्षियों तक ने उसके लिए संघर्ष किया था। जटायु ने प्राणों का उत्सर्ग किया था और ये मूर्धन्य विद्वान, शिलाओं से जड़वत् बैठे हैं। आह री! का पुरुषों की सभा।

तभी दुर्योधन की वाणी पुनः गूँजी- “उतार ले इसके वस्त्राभूषण दुशासन।”

दुशासन आगे बढ़ चला है। अब कोई नहीं रक्षक।

पाँचाली भय से थरथरा गई। उसकी अन्तरात्मा से अन्तिम प्रश्न उभरा- हे भगवान्। क्यों सृजन किया तूने नारी का? प्रभु आखिर क्या अस्तित्व रह गया है नारी का तुम्हारी सृष्टि में? क्या वह सिर्फ भोग, बलात्कार, उत्पीड़न सहने के लिए बनी है? हे अन्तर्यामी! हे जनार्दन! हे कृष्ण! अब सब कुछ तुझ पर निर्भर है।

अन्तरात्मा से उभरा यह प्रश्न अब की बार अनुत्तरित नहीं रहा।

प्रश्न के उत्तर में देखते-देखते क्षितिज से महादैत्यों की भाँति कालमेघ हुँकारें भरते उठ खड़े हुए। चारों दिशाओं से भयंकर भूत-प्रत-पिशाचों की भाँति प्रलयंकारी विराट काले जलधर उमड़ उठे। अन्तरिक्ष में पड़ी सोती हुई दामिनी चीत्कार करती हुई जाग पड़ी और आग उगलती हुई दिग्दिगन्त में कौंध गयी। दीर्घ काले केश फैलाए पिशाचिनी सी हाथ में नग्न खंग लिए, उन्माद से थरथराती हुई दौड़ पड़ी तड़ित ज्वाल चारों ओर। वज्र लपलपा उठा। वृक्षों को अरअराकर गिराता हुआ, प्रासादों को कँपकंपाता हुआ, झंझावात भैरवानाद करता हुआ हृरहरा उठा। शेषनाग सहस्र फनों से फुंफकार उठे। पृथ्वी का कठोर मर्म तड़क गया। धरा डोल रही थी। भूकंप चक्रवात! झंझा! महावात !

धूलि का कण-कण जैसे अपार शक्तिवान वज्र बन गया था। आज अणु-अणु कुपित हो उठा था भयंकर घर्षण था, नाद था। जैसे युगान्त का महाघण्ट बज रहा हो।

कोई कुछ नहीं समझ रहा था कि अकस्मात् ये आवाजें कहाँ से आ रही हैं? सभाभवन की छत में प्रकाश के लिए बनाए गए थाली जैसे गोल छिद्र से एक प्रकाश पुँज सीधे भीतर आया और द्रौपदी के समस्त अंग पर फैल गया। घनघोर झंझा के बीच दुशासन के हाथों की तीव्रता के अनन्त गुने वेग से द्रौपदी की साड़ी का छोर बढ़ने लगा। भगवान् महाकाल की करुणा झर रही थी द्रौपदी पर। कालचक्र को थामने वाले हाथ आज नारी की रक्षा के लिए कृतसंकल्प थे।

शरीर में शक्ति न रहने के कारण हाथ नीचे और दुशासन घिसटता हुआ जैसे-तैसे अपने आसन के पास पहुँचा। उसके स्वेद भरे मस्तक से कुछ बूँदें उसी के आसन पर टपक पड़ी। वह खड़ा-खड़ा ही उन बूँदों पर धड़ाम से गिर पड़ा। जैसे शक्ति बिल्कुल न रही हो। प्रायः सभी के मन में उसके प्रति घृणा थी। अपनी बातों के उसका समर्थन करने वाले आतंकित थे।

सभागृह के मध्य वस्त्रों से घिरी द्रौपदी अपने दोनों हाथ आकाश की ओर जोड़े भाव-निमग्न खड़ी थी। उसके नेत्रों से आँसू झर रहे थे। अचानक वातावरण को अपनी गूँज से झंकृत करती हुई किसी अदृश्य वाणी के स्वर फैलने लगे-”नारी सृष्टि का संवेदना शक्ति है। उसका सृजन हिंसा और बर्बरता के शमन के लिए किया गया है। वह सृजन की देवी है। पुरुष का पौरुष विस्तार और अनुगमन के लिए है। जिस पौरुष ने उसके अपमान का साहस किया है उसे नष्ट होना पड़ेगा।

देवी द्रौपदी ! तुम्हें अपमानित करने वाली बर्बरता नष्ट होगी। सभा में विद्यमान पुरुष अपनी वीरता, विद्वता, साहस का उचित उपयोग नहीं कर सके । अतएव भावी समय में उनकी प्रधानता स्वयमेव समाप्त हो जाएगी। यह समस्त मानव समाज ऐसा समय अवश्य देखेगा-जब धरा पर नारी का प्रभुत्व आएगा। नारी अभ्युदय का नवयुग मेरा अटल विधान है।” महाकाल के इन स्वरों में नारीत्व अपने प्रश्न का समाधान पा चुका था। द्रौपदी अभी तक भावनिमग्न हो परावाणी की इस अनुगूंज को सुन रही थी।


नारी जाग्रति का स्वरूप पहचानें

‘नारी जाग्रति’ इन दो शब्दों में पीड़ा, व्यथा, संवेदना, सहानुभूति एवं आक्रोश के अनगिनत भाव समाए हुए हैं। इन शब्दों में आधी दुनिया का सच है। इसे जब अभियान का दर्जा दिया जात है तो सच्चाई ओर मुखर हो उठती है, भाव अधिक व्यापक हो जाते हैं। इसके अंतर्गत उन प्रयासों की गणना की जाती है, जिनका उद्देश्य महिलाओं की दशा में सुधार लाना, उन्हें ऊँचा उठाना, उनकी सामाजिक स्थिति सँवारना है। पश्चिम में इस तरह की कोशिशों की शुरुआत 18 वीं सदी में हुई और पूर्व विशेषतया भारत में यह प्रक्रिया 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध से शुरू हुई। भले ही ये प्रयास छुट-पुट हुए, फिर भी समूची एक शताब्दी से अधिक समय बीत जाने पर भी महिला जाग्रति का कोई स्पष्ट स्वरूप, सामाजिक, साँस्कृतिक पटल पर उभर कर नहीं आ सका है। शब्दों में निहित भाव एवं सच्चाई सही ढंग से क्रियान्वित नहीं हो सकी हैं।

यह तभी सम्भव है, जब हम इसके लिए तत्सम्बन्धित देश और समाज की ऐतिहासिक, साँस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को जानने-समझने की कोशिश करें। जिस तरह एक रोगी की दवा, दूसरे रोगी के लिए जहर साबित हो सकती है, उसी तरह एक वाले उपाय दूसरे देश और समाज में कारगर साबित होने वाले उपाय दूसरे देश और समाज में सामाजिक एवं साँस्कृतिक पतन का कारण साबित हो सकते हैं। ये बात पश्चिम एवं भारत के सम्बन्ध और संदर्भ में कही जा रही है। भारत में कार्य करने के लिए हमें यह जानना होगा कि स्थिति के कारण क्या हैं? ये कैसे उपजे? और इनके निवारण की रणनीति क्या हो? आदि सवालों पर गम्भीरता से विचार किया जाय, तभी अपने देश में नारी जाग्रति के लिए की जाने वाली कोशिशें सार्थक हो सकती हैं। वर्तमान सामाजिक संरचना का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि कतिपय प्रबुद्ध नारियों को छोड़कर अधिकांश की स्थिति किसी न किसी तरह बन्धक -सी है। इसके मूलतः दो कारण हैं अनिश्चितता और असुरक्षा। अनिश्चितता का सम्बन्ध आर्थिक क्षेत्र से है। आज की स्थिति में इस क्षेत्र में प्रायः पुरुषों का वर्चस्व है और अर्थशक्ति युग-शक्ति के रूप में पूजी जा रही है। परिणाम स्वरूप पुरुष वर्ग सरलता से उन पर शासन करने में सक्षम हो जाता है। उन्हें भी अनिश्चितता निवारण हेतु बरबस शासित होना पड़ता है।

असुरक्षा के पीछे साहस को दबा दिए जाने का भाव है। उनके मानस में सदियों से यह भाव भरा गया है कि तुम अक्षत हो, दुर्बल हो, यहाँ तक कि अबला शब्द नारी का पर्याय बन गया है। कहा जाता है लगातार सौ बार कहा गया झूठ भी सच प्रतीत होने लगता है। स्थिति ऐसी हुई इस समूचे वर्ग ने अपने को अबला मान भी लिया। इस मान्यता के कारण सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें पुरुषों का आश्रय जरूरी हो गया। एक युग में तो यह नीति ही बन गयी कि बचपन में उनकी रखा पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र करे। नारी प्रत्येक स्थिति में रक्षणीय है। जैसे-जैसे उक्त दोनों कारणों की जड़ें गहरी होती चली गयीं महिलाओं की स्थिति बंधुआ, आश्रित की सी हो गयी। यहाँ तक कि उसका स्वतन्त्र अस्तित्व ही न रह गया। पति, पिता, पुत्र से ही उसका परिचय होने लगा। यदि मानवीय सभ्यता के ऊषाकाल की ओर लौट चलें, उस समय की सामाजिक स्थिति पर नजरें घुमाएँ, जबकि सामाजिक संरचना हो रही थी। तक यह साफ हो जाता है कि कारण क्यों उपजे, कैसे पनपे और किस तरह आज की स्थिति में बबूल के बगीचे की तरह मानवीय सभ्यता की राह में कंटक बिखेरने वाले हुए? नृतत्वशास्त्री ई.बौरग्युनन अपने अध्ययन ‘साइकोलॉजिकल एन्थ्रोपोलाजी’ में बताते हैं कि प्रारम्भ में नर और नारी दोनों ही वैचारिक, बौद्धिक, मानसिक क्षमताओं की दृष्टि से समान थे। एच कोचेटेवा का पैलियो एनाटॉमी में कहना है कि उनकी पारस्परिक शारीरिक क्षमताएँ भी झोंपड़ी बनाने आदि अनेक कार्यों में बराबर की भागीदारी रखते थे। छोटे-बड़े जैसा कोई भाव ही न था।

ए. मारशाक ने ‘रुटस ऑफ सिविल सिविलाइजेशन’ में सामाजिक संरचना के प्रारम्भिक स्वरूप को स्पष्ट किया है। धीरे-धीरे यह संरचना जटिल हुई, परिवार संस्था बनी और परिपक्व हुई। ऐसी स्थिति और गहराइयों का अध्ययन गुणों का अध्ययन गुणों और मौलिकता को आधार मानकर करना शुरू किया। पुरुषों में वीरता, कर्मठता और नारियों में करुणा और ममत्व जैसे गुणों की प्रधानता पायी गयी। सामाजिक संरचना का ताना-बाना बुनते समय आवश्यकता हुई कि श्रम व कार्यक्रम का विभाजन किया जाय।

इस विभाजन में यह ध्यान रखा गया कि प्रत्येक के मौलिक गुणों के अनुरूप उसे काम मिले। इससे दो लाभ सोचे गए, प्रथम तो व्यक्ति की अपनी मौलिक क्षमता अपनी चरम स्थिति प्राप्त करे, दूसरे समाज को उसका अधिकाधिक लाभ मिले । इसी प्रक्रिया के अंतर्गत नारी को पारिवारिक दायित्व संभालने का अवसर मिला। क्योंकि शिशु पालन, प्रशिक्षण, पारिवारिक संगठन, ममता आदि की विशेष आवश्यकता थी। पुरुष को यह जिम्मेदारी मिली कि वह परिवार के लिए सुविधा जुटाने, सुरक्षा करने का भार वहन करे।

उस समय छोटे-बड़े की भावना न थी समाज मातृ प्रधान था, वैदिक काल तक यही बात थी ।नारी के दो स्वरूप थे , एक सद्योवधू, दूसरा ब्रह्मवादिनी। सद्योवधू की जिम्मेदार थी कि वह परिवार को सुदृढ़ बनाए, समाज को सुयोग्य एवं संस्कारवान सन्तति दे। ब्रह्मवादिनी का दायित्व था कि वह नारियों की जाग्रति बनाए रखे । उन्हें कर्तव्य मार्ग पर आरुढ़ रहने के लिए प्रोत्साहित करती रहे। इसी संदर्भ में महाभारत में एक सुलभा नाम की संन्यासिनी का जिक्र आता है, जो घूम-घूम कर अपने इस दायित्व को निभाती थी । मातृ प्रधान समाज होने के कारण सन्तान का परिचय प्रायः माँ के नाम के साथ जोड़कर दिया जाता था। इतरा के पुत्र होने के कारण ऐतरेय नाम हुआ, जो बाद में उपनिषद्कार हुए। जाबाला के पुत्र होने के कारण सत्यकाम, सत्यकाम जाबाल के रूप में प्रचलित हुए।

परिवर्तित मूल्यों के अनुरूप समाज का स्वरूप भी बदला। लगातार आक्रमणों में भागीदारी, परिवार व समाज की सुरक्षा प्रदान करते रहने के कारण पुरुषों का गौरव बढ़ता गया। धीरे-धीरे स्थिति यह आयी

कि सुविधा और सुरक्षा जुटाते रहने के कारण पुरुषों ने अपने वर्चस्व को मान्यता दी। लगातार किसी कार्य व भाव को करने व स्वीकार करने से मन की संरचना उसी के अनुरूप ढलने लगती है। शरीर भी वैसा ही हो जाता है।

हुआ भी यही, कोमलता स्त्रियों का भूषण हो गयी, भीरुता को शृंगार माना जाने लगा। मध्ययुगीन अन्धकार के छापों ने इसे और बढ़ावा दिया। विकृत होती परम्पराएँ आज रूढ़ियां बन चुकी है। इन्हें तब तक नहीं तोड़ा जा सकता जब तक नारी पुनः असुरक्षा व अनिश्चितता को परे न झटक दे। अर्थात् उसका साहस उभरे व आर्थिक क्षेत्र में समानता सिद्ध करे।

नारी जागरण की क्रिया-पद्धति यही होनी चाहिए। इसके लिए इन्हीं दोनों मोर्चों पर लड़ना होगा, किन्तु इनमें से आर्थिक क्षेत्र को प्रधानता देनी होगी। क्योंकि यह सामान्य सूत्र है कि परावलम्बी कभी साहसी नहीं हो सकता। साहस के बिना सुरक्षा का भाव मिलने से रहा। आर्थिक क्षेत्र में प्रगति के लिए आवश्यक नहीं कि नौकरी ही की जाय। गृह उद्योग चलाने, उसमें निष्ठापूर्वक अपने को नियोजित करने में सफलता असंदिग्ध हो जाएगी।

गृह उद्योग, कुटीर उद्योग की परम्परा यदि नारी समुदाय के बीच चल पड़े तो यह उत्पादक-श्रम की प्रक्रिया स्वाभिमान जगाए बिना न रहेगी । आज के स्थिति में, मशीनों ,मिलों, फैक्ट्रियों के युग में ये बाते हास्यास्पद लग सकती है। हो सकता है यह भी सोचा जाय कि नारी जागरण से इसका सम्बन्ध क्या है ? किन्तु यह सोच उन्हीं की होगी जो मानव मन की संरचना से अपरिचित है। नमक आन्दोलन, दाँडी मार्च और चरखा इन सबका स्वराज्य से दूर-दराज तक का कोई सम्बन्ध नहीं था । किन्तु इनमें से प्रत्येक ने जो जन -क्रान्ति फैलाई, उससे शायद ही कोई अपरिचित हो।

ऐसा ही एक प्रयास गृह उद्योगों का है। भले ही उससे दो-तीन रुपए रोज का काम क्यों न हो; किन्तु जब खाली समय यों ही बिताने वाली महिलाएँ इसमें जुटेंगी तो न केवल उनकी श्रमशीलता बढ़ेगी, बल्कि महत्व भी जगेगा। उन्हें यह स्पष्ट अनुभव होगा कि हम भी कुछ कर सकती है।यह उभरा हुआ साहस, शिक्षा व उत्कृष्ट विचारो से मिलकर असुरक्षा के भाव को भी दूर फेंक देगा।

किन्तु इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण काम है, महिलाओं में इसके प्रति रुचि जगाना। यह कोई कम कठिन काम नहीं है। सदियों से एक ही भाव में रहते हुए उनके मन में यह जम गया है कि यह सब काम हमारे लिए नहीं है। पालतू तोते पिंजरा खोल देने पर भी नहीं उड़ते। इधर-उधर घूम-टहल कर फिर वापस आ जाते हैं। इनकी मुक्ति के लिए इतना काफी नहीं है कि पिंजड़े का दरवाजा खोल दिया जाय। कार्य तब सधेगा जब उन्हें उड़ना सिखाया जाय।

इण्डोनेशिया में इस तरह के कार्य में अग्रणी की भूमिका निभाई रेडन एडजंग कार्तिनी ‘ ने। उन दिनों इण्डोनेशिया में नारी जाति की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। उनका न कोई अधिकार था, न सम्मान । घर में उन्हें दासियों की भाँति रखा जाता। प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लेने पर भी कार्तिनी बचपन से ही नारी की इस दयनीय दशा के प्रति दुःखी रहा करती। इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें बारह वर्ष की अल्पायु में सिर्फ इसलिए स्कूल छोड़ना पड़ा क्यों कि वह नारी जाति की सदस्या थी। बड़ी होने पर रेडन ने अपनी दो बहिनों को साथ लेकर नारी जागरण में जुटा गयी। लेखनी वाणी, कर्मठता तीनों ही विधाएँ उन्होंने अपनायी । नारी प्रगति के लिए लेख लिखकर समाज के कर्णधारों, बुद्धिजीवियों का ध्यान इसके प्रति आकर्षित किया। घर-घर जाकर महिलाओं में शिल्प, गृह उद्योग के माध्यम से आर्थिक स्वावलम्बन हेतु रुचि पैदा की। इस सम्बन्ध में उन्हें काफी कुछ सफलता भी मिली । इसी कारण 21 अप्रैल को उनका जन्म दिन ‘नारी विकास के मोल के पत्थर’के रूप में इण्डोनेशिया में बड़ी धूम-धाम तथा सम्मान से मनाया जाता है।

ऐसा ही प्रयास भारत में किया श्रीमती उर्मिला शास्त्री ने। यों इनका जन्म कश्मीर में हुआ। बाद में गान्धीजी के संपर्क में आयी। इसी बीच धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री से विवाह भी हुआ। उन दिनों पुरुषों के सभा-सम्मेलन तो हुआ करते थे, महिलाएँ जाग उठी है, इसका बोध कराने के लिए 30 जनवरी 1930 को मेरठ में एक विशाल महिला सम्मेलन का आयोजन किया और इसकी अध्यक्षा के रूप में विचारोत्तेजक भाषण दिया। इसमें महिलाओं को जाग्रत होने का उद्बोधन था। उन्हें उठ खड़े होने की प्रेरणा थी। सन 1937 में उन्होंने मेरठ में एक महिला दस्तकारी स्कूल की स्थापना की। आरम्भ में उन्हें इस स्कूल की अध्यापिकाओं एवं प्रबन्ध खर्च अपनी गाँठ से करना पड़ा। आज यह उर्मिला दस्तकारी स्कूल के रूप में उनके कार्य के जीवन्त स्मारक के रूप में क्रियाशील है।

अभी तक किए गए ये प्रयास सराहनीय और प्रेरक तो हैं पर छूट-पुट होने के कारण अधिक व्यापक नहीं हो सके हैं। समय की माँग यह है कि व्यवस्थित, सुनियोजित रूप से महिला जागरण का प्रयास एक आन्दोलन अभियान के रूप में गतिमान हो। शान्तिकुँज और उसके संस्थापक ने समय की इस चुनौती को साहस के साथ स्वीकार किया है। इसके प्रयासों की व्यापकता और अब तक की उपलब्धियों से भारतीय जनमानस अपरिचित नहीं है। यहाँ से संचालित अभियान ने भारतीय नारी की व्यथा को समझते हुए विशुद्ध भारतीय परिवेश के लिए अपने आन्दोलन की मौलिकता प्रस्तुत की हैं। इसको और अधिक व्यापक बनाने के लिए बुद्धिजीवी पुरुषों की क्रियाशीलता का आह्वान करने के साथ इन पंक्तियों में आने का अनुरोध किया जा रहा है।

क्योंकि अनुकरण-अनुसरण मनुष्य की सहज मनोवृत्ति है। कोई भी चीज सैद्धांतिक रूप में समझ में नहीं आती है। पर उसके व्यावहारिक स्वरूप व परिणामों को देखते ही उसे सहज अपनाने का मन करता है। विज्ञान अपनी इसी विशेषता के कारण विजयी हुआ और लोगों के गले उतरा है। जैसे-जैसे इस प्रयास में तेजी आएगी, सन्तोषजनक परिणाम भी दिखाई देंगे। नर और नारी एक समान का सूत्र एक तथ्य बनकर उभरेगा। शान्तिकुँज द्वारा संचालित नारी जाग्रति अभियान से जुड़कर नारियाँ नारी जाग्रति के दो शब्दों में छुपी पीड़ा, व्यथा, संवेदना सहानुभूति एवं आक्रोश का सही भाव बोध पा सकेगी। ऐसा बोध जो पश्चिम के नारी मुक्ति आन्दोलन से एक दम अलग है। जिसे जानकर नारियाँ अपनी उस गरिमा व वर्चस्व को पा सकेगी, जिसके आधार पर उन्हें अगले दिनों बड़ी जिम्मेदारियाँ व दायित्व वहन करने है।


नारी शिक्षा के लिए शिक्षित नारी आगे कदम बढ़ाये

जहाँ शिक्षा का अभाव रहेगा, वहाँ अज्ञान का अंधेरा छाया रहना स्वाभाविक है। विकास और प्रगति की अनेक बातें कही सुनी जाने के बावजूद अपने देश में नारी शिक्षा की स्थिति को अभी भी बदतर ही का जाएगा। बीसवीं सदी के अन्तिम दशक का आधा समय बीत जाने पर भी भारत 25 करोड़ महिलाओं की अशिक्षा से अभिशप्त है। देश की मौजूदा जनसंख्या में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या कोई तीन करोड़ बीस लाख कम है। लेकिन साक्षरता का ग्राफ इससे भी कहीं अधिक गिरा हुआ है। हमारे देश में 4 से 14 साल तक के बच्चों की संख्या तकरीबन 20 से 21 करोड़ है। उनमें से मात्र 6 से 7 करोड़ बच्चों का नाम स्कूल में दर्ज मिलता है। लड़कियों की संख्या तो इससे भी न्यून है। पूरे देश में 50 फीसदी बच्चे पांचवीं कक्षा में पहुँचने से पूर्व ही स्कूल छोड़ देते हैं। 6 से 14 वर्ष की 75 प्रतिशत लड़कियों का नामांकन तक स्कूलों में नहीं कराया जाता। इसी तरह 14 से 16 आयुवर्ग के करीब ढाई करोड़ स्कूल न जाने वाले बच्चों में 16 प्रतिशत लड़कियाँ हैं।

इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य लाने के लिए प्रयत्नशील दुनिया के विभिन्न देशों के कदमों के साथ भारत के पाँच भी इस ओर सक्रिय हुए हैं उत्तर प्रदेश में विश्व बैंक के सहयोग से 10 जिलों में शिक्षा का प्रयास जारी है। बिहार में बिहार की शिक्षा परियोजना को वर्ष 1993 में यूनीसेफ सहायता प्राप्त हुई है। महिला शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु गर्ल्स एण्ड वुमेन एजुकेशन एनीसियेटिंग फण्ड से भारत को 10 करोड़ डालर की राशि मिली है। नवोदय विद्यालय की स्थापना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र के सर्वाधिक प्रतिभाशाली बच्चों को प्रोत्साहन कर शिक्षा देना है। इनमें वर्ष 1992-93 में लड़कियों की की संख्या 29 प्रतिशत रही। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में महिलाओं के प्रवेश के प्रतिशत में 26.6 का वृद्धि हुई है।

महिला साक्षरता परियोजना से भी महिलाओं में शिक्षा के प्रति रुचि जाग्रत हो रही है। इस. आई. डी. ए. के सहायतार्थ दो स्वीडिश परियोजनाएं शिक्षाकर्मी वर्ष 1987 से तथा लोक जुम्बिश वर्ष 1992 से क्रियाशील हैं। आंध्रप्रदेश प्राथमिक शिक्षा परियोजना जिसे ब्रिटिश ओ. डी. ए. ने क्रियान्वित किया तथा 1993 में जिला प्राथमिक शिक्षा परियोजना ने भी अच्छी सफलता अर्जित की है। इस योजना की लागत 19 करोड़ 50 लाख रुपये की थी। इन परियोजनाओं से लड़कियों के नामाँकन की संख्या में प्रगति हुई है और लड़कियों को आगे की पढ़ाई जारी रखने में मदद मिली है।

अपने देश में इन सबके बावजूद महिला शिक्षा की स्थिति काफी दयनीय है लेकिन ऐसा नहीं है कि लड़कियों की प्रतिभा लड़कों से कम है। उलटे तथ्यों से तो यह पता चलता है कि लड़कियों की नैसर्गिक प्रतिभा, लड़कों से कहीं बहुत आगे हैं। वर्ष 1996 के शिक्षा परिणाम में छात्राओं की सफलता का प्रतिशत लड़कों से काफी अच्छा रहा। इस वर्ष केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के बारहवीं कक्षा की परीक्षाओं में छात्राओं के पास होने का प्रतिशत गतवर्ष के 75.3 प्रतिशत से बढ़कर 76.9 प्रतिशत रहा। लड़कों का उत्तीर्णांक 68.4 प्रतिशत रहा, जो विगत वर्ष 67.6 प्रतिशत था। लड़के - लड़कियों के पास होने के प्रतिशत में सबसे बड़ा अन्तर चण्डीगढ़ केन्द्र में 13 फीसदी का रहा। विविध परीक्षा केंद्रों में उत्तीर्ण होने के प्रतिशत में अन्तर लड़के - लड़कियों के बीच इस तरह रहा - दिल्ली में 64.1 एवं 74.3 प्रतिशत, अजमेर में 79.3 तथा 82.2 प्रतिशत, चण्डीगढ़ में 67.7 तथा 80.1 प्रतिशत, इलाहाबाद में 70.6 एवं 79.9 प्रतिशत और गुवाहाटी में ये अन्तर 52.2 एवं 56.3 प्रतिशत का रहा। सभी स्थानों पर लड़कियों आश्चर्य जनक रूप से लड़कों से आगे रहीं।

तमिलनाडु में मैट्रिक परीक्षा में इस वर्ष लड़कियाँ लड़कों से आगे रहीं। एस. एस. एल. सी की परीक्षाओं में 4.71 लाख विद्यार्थियों में 68.84 प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए। जिनमें 71.69 प्रतिशत छात्राएं थीं व 66.44 छा थे। मैट्रिक परीक्षा में 42,000 विद्यार्थियों में 95.04 प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए। जिनमें लड़कियाँ 2 प्रतिशत आगे रहीं। एंग्लो इंडियन स्कूल में 4200 पढ़ने वालों में 96.98 प्रतिशत छात्राएं उत्तीर्ण हुईं। यह प्रतिशत लड़कों से काफी आगे था।

ये सभी परिणाम यही स्पष्ट करते हैं कि नारी जाति की जन्मजात प्रतिभा पुरुष से कहीं बढ़ चढ़कर है। आज यदि उनकी शिक्षा का प्रतिशत कम है तो इसके पीछे सिर्फ एक कारण है कि उन्हें उपयुक्त अवसर नहीं दिया गया। लेकिन इसमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जितनी महिलाएं देश में शिक्षित हैं, वे यदि कमर कस लें तो महिला जगत् का कायाकल्प कर सकती हैं। यों तो स्कूली और कॉलेजी शिक्षा प्राप्त को शिक्षित नारी कहा जाता है पर आज समय की माँग है कि इनमें वे नारियाँ भी शामिल की जावें जो पढ़ी लिखी तो कम हैं, किन्तु नारी कल्याण के लिए जिनके हृदय में ज्वालामुखी धधक रही है राष्ट्रीय आन्दोलन में पढ़ी लिखी नारी के अतिरिक्त सामान्य नारियों ने भी आन्दोलन को सक्रिय रखने में पूर्ण सहयोग दिया था। क्या महात्मा गाँधी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गाँधी उच्च शिक्षित नारी थी ? नवजागरण के लिए तो बस छलकती भावनाएं और धधकता साहस चाहिए। ऐसा हो सके तो फिर सदी भर नारियाँ भारतीय महिलाओं में नवजागरण का शंख क्यों नहीं बजा सकती। इतिहास के पृष्ठों को मोड़ देने वाले मुट्ठीभर ही रहे हैं, वे तो नेतृत्व के अनुयायी मात्र रहे हैं। झाँसी की वीर रानी लक्ष्मीबाई थोड़ी सी महिलाओं की सेना के बल पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा सकती हैं तो क्यों अल्पसंख्यक होते हुए शिक्षित नारी, नारी शिक्षा व बहुमुखी प्रगति के लिए तहलका नहीं मचा सकी हैं ? निश्चित ही ऐसा किया जा सकता है, केवल साहस एवं संगठन बटोरने भर की देर है। फिर तो बस इक्कीसवीं सदी के आते आते वह समाज को कुशल नेतृत्व देने में स्वयं को सक्षम सिद्ध कर सकेंगी।


प्रेम के मोल भगवान बिके

सूर्यग्रहण के महापर्व पर कुरुक्षेत्र में अपार मानव समुदाय एकत्र हुआ था। अधिकांश ऋषिगण तथा राजाओं के समुदाय आये थे। महान स्नान के पुण्य को प्राप्त करने का सुअवसर तो था ही, श्रीकृष्ण के सामीप्य देव - दुर्लभ लाभ सबसे बड़ा आकर्षण था। द्वारिका में ऋषि जा सकते थे; किन्तु वहाँ राजसदन में उन आरण्यवासियों को वह उल्लास कैसे मिल सकता था, जो इस विस्तीर्ण तीर्थभूमि में सहज सुलभ था। नरपति कोई भी कुशस्थली जाय, उसे यादवाधीष का अतिथि ही होकर तो रहना होता। यहाँ राजाओं के भी अपने शिविर हैं। साथ ही श्रीकृष्ण दर्शन का महान सुयोग। महाराज उग्रसेन अपने पूरे परिकर के साथ पधारे थे। यादवों की सभा में विराजमान मधुसूदन की जो उपस्थिति है, उनका सान्निध्य, चरण वन्दन का सौभाग्य यहाँ सहज सुलभ है।

इस महोत्सव के मंजु उल्लास में वसुदेवजी के महायज्ञ किया। कोई आगत ऋषि-मुनि ऐसा नहीं था जो इस यज्ञ में ऋत्विक् बनने न आया हो। यज्ञ और दान की महिमा, कुरुक्षेत्र की इस भूमि में समन्तपंचक क्षेत्र में अल्पदान का भी अतिशय महात्म्य बार-बार सभी के कानों में पड़ा। सम्यभामा जी के चित्त में एक लालसा जागी। उन्होंने एक दिन अपने आवास में पधारे देवर्षि से पूछा- “देव ! दान में जो कुछ दिया जाता है, वह वस्तु अक्षय होकर उपलब्ध होती है, यह सत्य है। “

“हाँ देवि ! यदि दाता में शुद्ध श्रद्धा हो, दान पुण्य स्थल पर, शुभ समय में और सत्यपात्र को दिया जाए। “ देवर्षि ने किंचित आश्चर्य से पूछा -” किन्तु श्रीहरि की वल्लभा को ऐसा क्या अप्राप्य है, जिसकी वे कामना करें। उनकी उपलब्धि को तो काल स्पर्श नहीं करता। “

मैं कुछ दान करना चाहूँ आप स्वीकार करेंगे ? सत्यभामा जी ने देवर्षि के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। उनमें शुद्ध श्रद्धा नहीं है, ऐसी आशंका भला कौन करेगा। यह भगवान परशुराम की पुण्य यज्ञस्थली धर्मक्षेत्र इस जैसा पुण्य यज्ञस्थली धर्मक्षेत्र इस जैसा पुण्य स्थल उपलब्ध है और दान का महापर्व काल है। सम्मुख खड़े परम भक्त देवर्षि नारद यदि दान ग्रहण करना स्वीकार कर लें तो श्रेष्ठतम सत्पात्र की समस्या सुलझ गयी।

“नारद निवास हीन परिव्राजक है और नितान्त अपरिग्रही।” देवर्षि ने फिर भी कहा-”देवि! ऐसा कोई भाग्यहीन नहीं, जो आपके करों से प्राप्त दान को अपने जन्म-जन्मान्तर का पुण्यफल न माने।”

“तब आप कल प्रातः दर्शन देने का अनुग्रह करें।” सत्यभामा जी ने उन्हें बड़ी श्रद्धा से नमन करते हुए कहा।

दूसरे दिन अभी प्रातः हुई ही थी। नित्य कर्म, सन्ध्या हवन आदि समाप्त करके भगवान श्रीकृष्ण अपने आसन पर विराजे ही थे कि सत्यभामा जी ने आकर उनके चरणों पर मस्तक रखते हुए एक मन्दस्मित के साथ उनसे पूछा- “आप मुझसे सचमुच प्रेम करते है?”

“आप तो इस प्रकार सभी से कहते हैं।” सत्यभामा जी में मान नहीं उच्छलित राग था। “मेरा तो यह मेरे हाथ का कंगन है। जिसे चाहूँ उसे दे दूँ।”

“यह जन भी तुम्हारा इसी प्रकार का रत्नाभरण है, इसे भी जिसे चाहो दे सकती हैं। “माधव का कमल मुख सहज हास्यभूषित हुआ।

“सच?” सत्यभामा ने अद्भुत भंगिमा से देखा। “आपका कुछ विश्वास नहीं।”

“देवि! यह तीर्थ भूमि है और में आजकल नियम पालन कर रहा हूँ, यह आप जानती हैं।” श्रीकृष्ण चन्द्र सुप्रसन्न थे।

अभी बातें हो ही रही थी, इतने में नारायण गोविन्द की मधुर ध्वनि के साथ देवर्षि का वीणा की झंकार सुनायी दी। द्वारिकानाथ ने देवर्षि का जब तक स्वागत किया, सत्यभामा जी स्वर्णपात्र में जल कुश ले आयीं।

“अहं श्रीकृष्ण पत्नी सत्यभामा, ब्रह्मपुत्राय नारदाय त्वाभिमं पतिं प्रददे।” सविधि सम्पूर्ण देश-कालादि उच्चारणपूर्वक हाथ में जल-कुश लेकर सत्यभामा ने संकल्प का उच्चारण किया।

इसी के साथ देवर्षि ने दाहिना हाथ बढ़ाकर वह कुश-अक्षत ग्रहण कर लिया। प्रातः वन्दन के लिए उपस्थित अन्य सभी ने आश्चर्य से एक दूसरे का मुख देखा।

“श्याम ! नारद परिव्राजक है। अब उठो और मेरे साथ चलो।” देवर्षि ने वीणा उठाई। श्रीकृष्ण चुपचाप उठ खड़े हुए।

“ भगवान! आप इनका उचित मूल्य ले लें।” सत्यभामा ने अब हाथ जोड़कर प्रार्थना की।

“देवि! नारद परिग्रही नहीं है। कोई भी वस्तु लेकर मैं क्या करूंगा। दान में प्राप्त वस्तु का विक्रय ग्रहण करने वाले व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर है और मैं श्री कृष्ण का विक्रय नहीं करूंगा।” देवर्षि ने खुलकर हँसते हुए कहा। “देवी ने ठीक सोचा था कि इस पावन स्थली में इनका दान करके आप इन्हें अक्षत रूप से प्राप्त कर लेंगी; किन्तु यह तो ऐसा धन नहीं है कि इसका लोभ नारद के मन में न हो। श्रीकृष्ण आओ चलें।”

नारद का कथन सुनकर सत्यभामा का मुख फीका पड़ गया। देखते-देखते कुछ ही क्षणों में समस्त यदुवंश वहाँ एकत्रित हो गया। देवर्षि का कथन अनुचित है, यह भी कोई कैसे कह दे। अपने आराध्य को बेचने की बात तो किसी सामान्य साधक के मन में भी नहीं आता।

“दया करें प्रभु!” महारानी रुक्मिणी अन्त में आगे आयीं।

“दया तो आप कर रही हैं करुणामयी।” देवर्षि सहसा गम्भीर हो गए। आप कह सकती हैं। कि यह दान अवैध है। श्रीकृष्ण पर आपका स्वत्व सर्वाधिक है। किन्तु आपको यह विवाद नारद से तो नहीं करना। फिर भी अगर चाहती हैं तो मैं इन निखिल ब्रह्माण्डनायक का उचित मूल्य लेने को प्रस्तुत हूं।

“मैं दूँगी मूल्य। आप जो माँगना चाहें, ले लें। “सत्यभामा सोल्लास आगे आ गयीं।

‘निखिल ब्रह्माण्डनायक’ रुक्मिणी के अधरोष्ठ काँपे। वे झुककर पीछे हट गयीं। वे जानती थीं कि उनके आराध्य भावेक गम्य हैं। जो उन्हें जैसा मानता-जानता है उसके लिए वे वैसे ही होते हैं। अब इस समय देवर्षि उन्हें निखिल ब्रह्माण्डनायक देखना चाहते हैं- तब उन अनन्त कोटि ब्रह्माण्डधीश का मूल्य कहाँ से आएगा? सत्यभामा के उल्लास में उन्हें केवल बालचापल्य दिखा।

“उचित मूल्य देवि!” नारदजी किंचित व्यंग के ढंग से हँसे। “इन्हें तुला पर बैठा दीजिए। नारद के लिए तो रत्न, स्वर्ण तथा शिलाएं समान हैं। आप दूसरी ओर ताम्र लोह, पाषाण भी रखें तो मुझे आपत्ति नहीं है। श्रीकृष्ण तुल जायँ, बस मुझे इतना चाहिए।”

विशाल तुला स्तम्भ तत्काल स्थापित हो गया। यदुकुल शिरोमणि की पट्टमहिषी अपने प्राणधन को रत्नों से तौल देने के उत्साह में थीं। किन्तु रत्न, स्वर्ण राशि, रजत भी जब पर्याप्त नहीं हुआ, ताम्र तक पर यदुवंशी उतर आये। अन्ततः उन्हें श्रीकृष्ण को खोना तो था नहीं।

“ये भावमय हैं। आप दूसरे तुला पर संकल्पित धन का कोई प्रतीक भी धरेंगे, तो वह अपना सम्पूर्ण भार दगा।” देवर्षि ने समझाया।

रानियाँ निराभूषण हो चुकी थीं। किसी यादव के शिविर में तथा शरीर पर एक आभूषण नहीं बचा था। पाण्डव शिविर ही नहीं, दूसरे मित्र राजाओं के शिविर भी उस तुला पर रिक्त हो चुके थे। इतने पर भी श्रीकृष्ण जिस पलड़े पर थे, वह भूमि पर स्थिर धरा था।

‘सम्पूर्ण राज्य एवं राजकीय कोष।’ एक साथ महाराज उग्रसेन तथा चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर ने अपने मुकुट तुला पर धर दिए। तुला किंचित भी तो हिली होती। उसमें तो क्षुद्रतम कम्पन भी नहीं हो रहा था। केवल स्थिर खड़े थे एक ओर पितामह भीष्म और दूसरी ओर पाण्डव साम्राज्ञी द्रौपदी, दोनों के नेत्र झर रहे थे। दोनों के कण्ठों से प्रायः गदगद स्वर साथ ही फूटे-’भक्तवत्सल।’

वत्से! माता देवकी ने रुक्मिणी की ओर देखा।

“मातः! मैं उनकी चरण सेवक हूँ।” उन लक्ष्मी स्वरूप ने मस्तक झुका लिया। “मैं अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ स्वयं भी तुला पर बैठ जाऊँ तो भी निखिल ब्रह्माण्ड का वैभव अपने नायक की समता नहीं कर सकेगा।

“तुम?” माता ने श्री हलधर की ओर देखा।

यह ठीक है कि श्रीकृष्ण मेरे अनुज हैं। श्री बलदाऊ ने माता को कोई आशा नहीं दी। “लेकिन इस समय तुला में उनका समत्व करने जैसा साहस मैं अपने में नहीं पाता हूँ।”

“बेटी। ऐसे अवसर पर सम्मान रखना चाहोगी तो काम चलेगा नहीं।” माता रोहिणी ने सत्यभामा के कंधे पर हाथ रखा। “ब्रजराज के शिविर में जाओ। श्याम प्रेम के मोल बिकता है और वहाँ प्रत्येक इसका धनी है। किसी को भी ले आओ वहाँ से।”

आश्चर्य की बात नहीं थी कि ब्रज के शिविर से कोई अब तक वहाँ आया नहीं था। श्रीकृष्ण को सहन नहीं था कि ब्रज के जन द्वारिका के शिविर में आकर किसी की भी उपेक्षा देखें। उन्होंने बाबा से आग्रह कर रखा था “द्वारिका के जिस किसी को श्रीचरणों का दर्शन करना हो, उसे यहाँ आना चाहिए। केवल विशेष रूप से आमन्त्रित होने पर ही यहाँ का कोई भी उस शिविर में जाएगा।”

ब्रज के लोग तो कन्हाई के संकेत पर प्राण देने वाले। उन्होंने देखना भी नहीं चाहा कि द्वारिका के शिविर का स्वरूप कैसा है। सत्यभामा जी तो इस समय विह्वल हो रही थीं। वे रथ में बैठीं और रथ जब ब्रजराज के शिविर के सम्मुख रुका, उन्होंने यह भी नहीं देखा कि उन द्वारिका की महारानी को कौन, कैसे देख रहा है। रथ से उतरकर वे दौड़ी ओर सीधे श्री वृषभानु जी के शिविर में जाकर श्री राधा जी के चरणों में सिर रख दिया उन्होंने। बहिन शीघ्र चलो। इस विपत्ति से मुझे बचा लो।

“चलो महारानी।” श्री वृषभानू-नन्दिनी को बड़ा संकोच हुआ। उन्होंने बड़ी त्वरा से सत्यभामा को उठाकर अंकमाल दी। यह भी नहीं पूछा कि विपत्ति क्या है और कहाँ चलना है उन्हें? जैसे बैठी थी वैसे ही वे उठ खड़ी हुई। उनकी दो सखियों ने स्वतः उनका अनुगमन किया। क्योंकि उन्होंने तो किसी को कोई संकेत तक नहीं किया। रथ पर ही उन्होंने सुना कि विपत्ति का रूप कैसा है।

“वत्से!” माता रोहिणी ने दौड़ कर उन्हें गले लगा लिया था, रथ से उतरते ही “तू आ ही गयी?”

संकेत से ही उन श्री रासेष्वरी ने सत्यभामा जी को सूचित किया कि तुला के दूसरे पलड़े पर जो कुछ भी अब तक रखा गया है। उसे उठा लिया जाना चाहिए। वे माता देवकी की पदवन्दना करने बढ़ीं तो तुला रिक्त होने लगी।

अपने कण्ठ में पड़ी वनमाला से एक तुलसीदल निकाला उन्होंने। नमित मुख बढ़ीं वे और वह दल कितने स्नेह, कितने सुकोमल ढंग से तुला पर उन्होंने धरा-कोई अतिशय श्रद्धालु अपने आराध्य पर भी कदाचित् ही ऐसे दल अर्पण कर पाता हो। तुलसीदल तुला पर चढ़ा और तुला का दूसरा पलड़ा उठ गया। तुला सन्तुलित, सर्वथा संतुलित हो गयी।

क्षणार्द्ध लगा इसमें। सभी आश्चर्य चकित थे। देवर्षि ऐसे आतुर होकर बढ़े मानों कोई अन्य उस दल को उठा लेगा- ऐसा भय हो उन्हें। उस दल को उठाकर उन्होंने अपनी जटाओं में छिपा लिया। रोम-रोम पुलकित, स्वेद स्नात स्वर्णांग, अजस्र स्रवित लोचन, वे उपाम नृत्य करने लगे, किन्तु गदगद स्वर से वाणी नहीं फूट रही थी।

उनकी इस दशा से सभी अवाक् थे। सबको आतुरता थी इस रहस्य को जानने की। आखिर यह सब कैसे हो गया? प्रभु का इंगित समझकर देवर्षि कहने लगे-”योग, जप, तप, कठिन साधनाएँ सभी नारी हृदय के भाव विकास के समक्ष फीकी है। श्री राधाजी में नारी हृदय के भावविकास का चरमोत्कर्ष है। वह प्रेम स्वरूपा है और प्रभु प्रेम के मोल बिकते हैं। तभी तो उन्होंने अपने प्रेम के मोल से निखिल ब्रह्माण्ड नायक को खरीद लिया। उनके भागवत् प्रेम के प्रतीक इस तुलसीदल को पाकर मैं भी धन्य हो गया। “इतना कहते हुए देवर्षि नारद फिर प्रेम विभोर होकर उन्मदन्त्य करने लगे।


संकीर्णता के रहते पूजन पुजारी और पूजा दोनों का मुँह काला ही करता है (Kahani)

चीन की एक बौद्ध भिक्षुणी के पास बुद्ध की प्रतिमा थी। एक दिन महाबुद्ध उत्सव हुआ। अनेक बुद्ध प्रतिमाएँ लाई गई। उनकी सामूहिक पूजा-अर्चना करने का कार्यक्रम बना। भिक्षुणी पूजा की सामग्री से अपनी ही प्रतिमा की अर्चना करना चाहती थी। धूप, दीप, नैवेद्य समारोह में जलाने पर उसे भय था कि दूसरी प्रतिमा उसकी सुगन्ध लूट ले जाएगी। इस हानि से बचने के लिए इसने अपनी धूप का धुँआ एक बाँस की पोंगली द्वारा अपनी प्रतिमा की नाक से सटा दिया। थोड़ी ही देर में प्रतिमा का मुँह काला हो गया, दर्शकों को वह कुरूप लगी और पूजने तथा लाने वाले की भर्त्सना हुई। खिन्न भिक्षुणी से समारोह के अधिष्ठाता ने कहा, “संकीर्णता के रहते पूजन पुजारी और पूजा दोनों का मुँह काला ही करता है।”


स्वतन्त्रता की खोज में दिग्भ्रमित न हों

स्वतन्त्रता की खोज में नारी किधर चल पड़ी? चौंकने से इस सवाल का हल नहीं निकलेगा। जरूरत वर्तमान भ्रान्ति से उबरने और स्वतन्त्रता का वास्तविक अर्थ खोजने की है। समय की प्रगति के साथ सामाजिक क्रूर बन्धनों से महिलाएँ धीरे-धीरे छुटकारा पाती जा रही हैं। बहुत पिछड़े, अशिक्षित, अहंकारी, अनुदार लोगों में ही अब घूंघट, पर्दा प्रथा की कठोरता शेष रह गयी है। बाकी समझदार लोग अब अपनी बच्चियों को भी शिक्षा दे रहे हैं और उन्हें घर से बाहर काम करने के लिए जाने देने के प्रतिबन्ध भी उठा रहे हैं। महिलाओं का उत्साह और रुझान भी इसी दिशा में है। प्रगतिशील विचार-धारा का प्रतिपादन भी यही कहता है। स्वतन्त्रता और समानता के सम्मान एवं औचित्य का जो व्यापक समर्थन हो रहा है। उसने भी नारी के ऊपर लदे हुए पिछले सामन्ती बन्धनों को काटने में सहायता दी है। इन अनेक कारणों के मिल जाने से नारी की स्वतन्त्रता एक नया युग आरम्भ हुआ है। आधे मानव समाज को सामाजिक पराधीनता के अवाँछनीय बन्धनों से इस प्रकार मुक्ति पाते देखकर सर्वत्र प्रसन्नता और सन्तोष की ही अभिव्यक्ति होनी चाहिए।

पर दुर्भाग्य की करामात तो देखिए, वह पिछली खिड़की से छद्मवेश बनाकर फिर घुसपैठ करने में लग गया है और वह नारी पराधीनता के नए किस्म के जाल-बन्धन बुनकर फिर ले आया है। मजे की बात यह है कि इस बार पराधीनता स्वतन्त्रता का नकली लिबास ओढ़कर आयी है। सभी भ्रम में पड़कर बिना असलियत को समझे-बूझे उसे उत्साह के साथ अपनाते जा रहे हैं। पहले लोहे की जंजीरों से कैदी बाँधा जाने लगे तो इसे कोई प्रगति भले ही कहता रहे, पर वस्तुतः ये बन्धन भी उतने ही दुःखद रहेंगे। जितने कि लोहे वाले समय में थे।

नारी को पुरुष के समान ही अपने व्यक्तित्व के विकास और लोकनिर्माण में अपनी प्रतिभा का समर्थ योगदान कर सकने का अवसर मिले, तभी उसकी स्वाधीनता सच्ची और सार्थक कही जा सकती है। यदि उपलब्ध नारी स्वातंत्र्य को यही दिशा मिली होती तो सचमुच मानव जाति का एक बहुत बड़ा सौभाग्य होता। इससे उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ देखकर सन्तोष व्यक्त किया जा सकता था, पर हुआ ठीक इससे उलटा है।

पत्रकार, कलाकार, साहित्यकार, चित्रकार, कवि, अभिनेता, गायक, वादक सब मिलकर नारी को भ्रमित करने में लग गए हैं। उन्होंने अमीरों और विलासियों की कामुक और कुत्सित मनोकामना पूर्ण करने के लिए कल्पवृक्ष की तरह फूल और फल देना आरम्भ कर दिया है। उनकी सारी बुद्धि, कौशल और क्रियाकलाप इस दिशा में लग गया है कि नारी को रमणी और कामिनी के रूप में उसी तरह बने रहने दिया जाय जैसी कि वह सामन्ती जमाने में थी। फर्क सिर्फ इतना बना रहे कि तब वह बलात् बन्धित की जाती थी, अब यह सब नारी स्वतन्त्रता के नाम पर हो। इस कार्य को इतनी चतुरता से सम्पन्न किया जाय कि नारी उसी गर्हित स्थान पर स्वेच्छापूर्वक खड़ी रहे, जहाँ उसका शोषण पूर्ववत् निर्बाध गति से चलना रहे।

समकालीन सामाजिक परिदृश्य में इसे नारी के प्रतिभा विकास की कसौटी माना गया है। जो जितने कुत्सित ढंग से अपनी देह का प्रदर्शन कर सके, वह उतनी ही प्रतिभावान है। इसे इतने मोहक ढंग से प्रचारित, प्रतिपादित किया जाता है कि हर युवा लड़की की तमन्ना मिस इंडिया से मिस युनिवर्स पर जाकर टिकती है। इसमें प्रलोभन भी कम नहीं है। अपने देश में इस सौंदर्य प्रतियोगिता में 50 से 60 हजार रुपए तक एक प्रतियोगी के लिए खर्च किया जाता है। प्रतिभा के इस नए मानक के खिलाफ जेहाद घोषित करने वाली नाजोमी वुल्फ के अनुसार-”यह नारी की समूची क्षमताओं को देह तक सीमित करने वाली खतरनाक साजिश है।” उसके अनुसार नारी को दिखता यह मुक्ति का मोहक पथ उसके लिए अन्ततः सर्वनाशी सिद्ध होता है। यह एक राजनैतिक मुहिम है, जो पूर्णतया उसके खिलाफ जाती है।

नारी के खिलाफ की जा रही इस राजनैतिक चतुराई ने देह प्रदर्शन को बाकायदा उद्योग का दर्जा दे डाला है। अमेरिका में यह उद्योग 33 बिलियन डालर लाभ कमाता है। अपने देश में भी इसके माध्यम से भारी-भरमार लाभांश कमाने वाले उद्योगपति कम नहीं हैं। चारों तरफ मॉडलिंग एजेन्सियों की भरमार है, जिसमें आधुनिकता एवं स्वतन्त्रता के नाम पर नारी की देह, विज्ञापनों की वस्तु बनकर रह गयी है। सिनेमा के विज्ञापनों से लेकर कैलेंडर, साबुन, शैम्पू, दंतमंजन, जूते-चप्पल तक में नारी की देह ही प्रदर्शित की जाती है। सिगरेट से लेकर शराब की बोतलों तक में उसी की छवि प्रदर्शित की जाती है। बाजार की हर वस्तु की बिक्री का ठेका मानो नारी के देह प्रदर्शन ने ही ले लिया है। दूरदर्शन, सिनेमा हर कहीं प्रदर्शित किए जाना वाले विज्ञापन में दर्शकों के लिए एक ही संदेश होता है- यदि तुम अमुक वस्तु का उपभोग करोगे तो सुन्दर नारी का भी उपभोग कर सकते हो। सर्वाधिक आश्चर्य मिश्रित दुःख इस बात का है कि इस संदेश को देने वाली नारियाँ ही होती हैं, जो इस कार्य की सफलता को अपनी प्रतिभा की कसौटी मान बैठी हैं।

समाजशास्त्री जान विलकिन्स ने अपने एक अध्ययन ‘सोशल विक्टिम्स इन मॉर्डन एज’ में इस तरह के देह प्रदर्शन उद्योग को आपराधिक उद्योग की संज्ञा दी है। उनके अनुसार इस कार्य से न केवल भागीदार युवतियाँ मनोविकृतियों का शिकार हुई हैं, बल्कि दर्शकों की मानसिकता भी आपराधिक बनी है। जान कानेथ गाल्बेथ के अनुसार, “इस उद्योग को बढ़ावा मिलने से कम उम्र की लड़कियाँ विशेषकर कालेज की छात्राएँ अपनी मानसिक, बौद्धिक योग्यता में बढ़ोत्तरी करने के स्थान पर देह प्रदर्शन के नए-नए तरीके खोजने में व्यस्त हैं। क्योंकि इससे वे आसानी से अधिक रुपया कमा सकती हैं।”

फिल्म हो या दूरदर्शन, मॉडलिंग हो या पत्रकारिता का क्षेत्र हर कहीं नारी की अनावृत देह का विनाशकारी प्रदर्शन छाया हुआ है। जो समाज द्वारा वैयक्तिक आजादी के बतौर मिलता है। सुप्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाएँ फैशन परेड के अर्द्धनग्न चित्रों से भरी रहती हैं। इनमें प्रकाशित सामग्री का स्तर भी चित्रों की ही भाँति विषैला होता है। स्वतन्त्रता के इस भ्रामक अर्थ ने ‘मातृ देवों भव’ का उद्घोष करने वाले देश की बुनियादी नींव हिलाकर रख दी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली जैसे अनेक महानगरों में देह प्रदर्शन के नए-नए ढंग सिखाने वाले केन्द्रों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। इस तरह के प्रदर्शन जिन्हें केवल कारोबारी मुकाबला समझा जो सकता है और जिनका आयोजन सौंदर्य प्रसाधन तथा अन्य फैशनेबल ड्रेसें और आभूषण बनाने वाली कम्पनियाँ किया करती हैं की प्रतिष्ठा, मान्यता में असाधारण वृद्धि हुई है।

यह वृद्धि स्वतन्त्रता की खोज में जुटी आधुनिक नारी की अभिरुचि और उसके भटकाव को भी प्रदर्शित करती है। ‘प्रेस एशिया इंटरनेशनल’ के हवाले से दिल्ली में मनोवैज्ञानिकों की गोष्ठी में अभी कुछ ही दिनों पहले स्वीकारा गया कि युवतियों में मानसिक और मनोवैज्ञानिक बीमारियों का कारण सौंदर्य प्रतियोगिताएँ और मॉडल बनने का शौक है। बात यहीं तक सीमित रहती, तो भी खैर थी। स्वतन्त्रता पाने की आकुलता में जो स्वच्छ मनोवृत्ति पनपी है, उसका परिणाम बताते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि स्त्रियों में एड्स की दर पुरुषों की अपेक्षा तेजी से बढ़ रही है और इस शताब्दी के अन्त तक अनुमान है कि 40 लाख महिलाएँ इस बीमारी के चंगुल में फँसकर दम तोड़ देंगी। संगठन के आँकलनों के नजरिये से अकेले वर्ष 1993-94 में ही लगभग 12 लाख महिलाएँ इस भयंकर रोग एड्स से संक्रमित होकर जीवन और मौत के संघर्ष में झूल रही हैं।

यही नहीं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के एक शोध से यह भी पता चलता है कि स्त्रियों में एड्स का संक्रमण तीव्र गति से चिन्ताजनक रूप लेता जा रहा है। एड्स के विषाणु किशोरियों एवं युवतियों में ज्यादा तेजी से पाँव पसार रहे हैं; जबकि प्रौढ़ उम्र वाली स्त्रियों में यह दर काफी कम है। यह वास्तव में सबसे चिन्ताजनक पहलू है; क्योंकि युवतियों में एड्स के प्रसार में वृद्धि का सीधा सम्बन्ध और प्रभाव अगली पीढ़ी पर पड़ने का अंदेशा है। गर्भधारण करने की सबसे उपयुक्त उम्र की महिलाएँ यदि एड्स से संक्रमित हुई तो इससे सीधा अर्थ यही निकलता है कि अधिकाधिक संख्या में नवजात शिशुओं का एड्स ग्रस्त होना। अर्थात् अगली पीढ़ी का अन्धकारमय भविष्य, जो एड्स से जकड़ा हुआ होगा।

आज विश्व कि लगभग हर देश में एड्स के मामले और तेजी से सिर उठा रहे हैं। भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। समूचे विश्व में 30,000 स्त्रियाँ प्रतिवर्ष एड्स के विषाणु से संक्रमित होती हैं। इनमें से लगभग 75 प्रतिशत कालेज में पढ़ने वाली किशोरियां एवं युवतियाँ होती हैं, जो स्वतन्त्रता की खोज में भटक चुकी हैं।

यह खोज गलत नहीं हैं। हर कोई स्वतन्त्र रहना चाहता है। फिर नारी के लिए तो स्वाभाविक है कि वह सदियों के बन्धनों को तोड़ देने का प्रयत्न करे। इसमें आज यदि वह सफल नहीं है, तो इसका कारण यही है कि उसने इसे पूरी तरह बाहरी तत्त्व मान लिया है। प्रख्यात विचारक जान डीवी अपनी किताब ‘फ्रीडम एण्ड कल्चर’ में कहते हैं, “स्वतन्त्रता व सक्षमता एक दूसरे से बहुत घनिष्ठतापूर्वक जुड़े हैं। शारीरिक मानसिक, बौद्धिक ताकत का सही उपयोग तभी बन पड़ता है जब उनका संचालन स्व अर्थात् आत्मा के विधान से हो। इसके अभाव में इन सामर्थ्यों का जखीरा आदमी को उस पशु के रूप में बदल देता है, जो दूसरों की तबाही के साथ खुद को भी तबाह कर लेता है।”

पर आधुनिक नारी जीवन में केवल बाहरी बदलाव लाकर सुख-शांति और स्वतन्त्रता की खोज में जुटी है। इन प्रयासों और परिणामों को देखने से साफ होता है कि इनका आधार स्वतन्त्रता न होकर स्वच्छन्दता है। इससे जुड़ने पर सक्षमता, निर्माण के स्थान पर ध्वंस ही करती है।

स्वतन्त्रता और स्वच्छन्दता एक-सी लगने पर भी पूरी तरह विरोधी है। पहले में व्यक्ति और समूह आत्मा को जीवन का केन्द्र मानता हुआ ऊँचे उद्देश्यों एवं आदर्शों के लिए जीता है। दूसरे में जीवन के आधार सुख-भोग भर रह जाते हैं। इनमें किसी तरह की विघ्न-बाधा बर्दाश्त नहीं होती। ऐसी दशा में व्यक्ति और समाज दोनों ही साधक-सुविधाओं की बढ़ोत्तरी को ही सब कुछ मान लेते हैं।

स्वतन्त्रता के नाम पर स्वच्छन्दता के लिए किए जा रहे इन प्रयासों ने न केवल नारियों के लिए, बल्कि पूरे समाज में असुरक्षा व अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। यही मानसिकता व्यावहारिक धरातल पर हिंसा और अपराध के रूप में दिखाई पड़ती है। सही कहा जाय तो यह पशुओं का गुण-धर्म है! उन्हें यह मालुम ही नहीं कि स्वतन्त्र होना हमारी ही कोई अवस्था है अथवा यह कहा जाय कि उन्हें इस पर विचार करने के लिए रुचि अथवा समय नहीं। वह सहज ही इसे दैहिक धरातल पर अथवा वस्तुओं, साधक-सामग्रियों में देखते हैं। उनमें न सृजन की भावना होती है, न भावी कल्याण की चिन्ता।

स्वतन्त्रता के वास्तविक अर्थ से अनभिज्ञ इन आधुनिक नारियों की भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। इससे उबरने के लिए उन्हें देह के धरातल से ऊपर उठना होगा। उनके लिए यह बात समझ लेना जरूरी है कि प्रतिभा का अर्थ मात्र देह का प्रदर्शन और इसका औद्योगीकरण नहीं बल्कि मानसिक, बौद्धिक क्षमताओं का भरपूर विकास एवं लोकमंगल के लिए उनका नियोजन है।

इस वास्तविक स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए सम्बल की जाने वाली इस क्रान्ति की शुरुआत व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही स्तरों पर करनी होगी। इसमें जुट पड़ने का मतलब है- आदर्शपरायण जीवन जीने के लिए जुट पड़ना। शारीरिक, मानसिक शक्तियों का सदुपयोग सेवा, सहायता, कर्तव्य परायणता के निर्वाह में करना न कि सुख-भोग में। जीवन सही ढंग से आत्मा का यन्त्र बन सके। इसके विविध क्रिया-कलापों में पवित्रता, प्रखरता, सदाशयता आदि गुण स्थान पा सकें । इसके लिए बिना रुके प्रयत्न करना होगा। जैसे-जैसे मानसिकता में उच्च चिन्तन का शासन स्थापित होता जाएगा, क्रान्ति की गति बढ़ती जाएगी। बढ़ती गति के साथ इसका प्रभाव क्षेत्र भी बढ़ेगा। जिससे अकेली नारी नहीं समूची नारी जाति अपनी उस खोयी स्वतन्त्रता को पा सकेगी, जिसे वह आकुलतापूर्वक खोज रही है।


एंड्रू जैक्सन (Kahani)

अमेरिका के राष्ट्रपति एण्डरु जैक्सन की माता को एक जहाज पर नर्स के रूप में विदेश जाना पड़ा। तब जैक्सन चौदह वर्ष के थे। माता ने अपने पुत्र को एक बहुमूल्य संदेश भेजा। जिसमें लिखा था, “एण्डरु यदि मैं जीवित वापिस न लौटूँ तो जिन्दगी भर मेरी एक बात याद रखना- इस संसार में हर मनुष्य को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है और वे उन्हें ही मिल सकते हैं जो स्वयं ईमानदार हैं।”


क्या है सौंदर्य की परिभाषा

कमरे में आदमकद शीशे के सामने बैठे हुए उसे काफी देर हो गयी। न जाने यह दर्पण उसे क्या बता रहा है, अथवा वह खुद ही इस काँच के टुकड़े में कुछ ढूंढ़ रही है। जरीदार लाल साड़ी , हाथों में भरी-भरी काली चूड़ियां, अंग-प्रत्यंगों में अपनी आभा विकीर्णित करते सुवर्ण आभूषण, सिर में लाल रंग की रेखा बनाता सिन्दूर उसके नववधू होने की पहचान दे रहे थे। कीमती साजो-सामान से भरा-पुरा कमरा ऐश्वर्यवान होने की गवाही देने के लिए काफी था। उसकी निजी थाती के रूप में अलमारी में करीने से सजी पुस्तकें, यह बता रही थीं कि यहाँ विद्या का भी वास है।

धन-ऐश्वर्य-विद्या अभिरुचि के बावजूद वह उदास थी। पलकें व्यथा के भार से बोझिल थीं। मुख पर उभरने वाली आड़ी-तिरछी रेखाओं ने उदासी का स्पष्ट रेखाँकन किया था। मुख मनुष्य का भाव-दर्पण है। किन्हीं गहन आयामों में होने वाली हलचलें, भावों का आलोड़न-विलोड़न इसमें उभरे बिना नहीं रहता। अनायास उसने होंठ सिकोड़। माथे की लकीरें बिखरीं और कुछ शब्द फिसल ‘सौंदर्य’ किसे कहते हैं ‘सुन्दरता?’ शब्द अस्फुट होने के बावजूद स्पष्ट थे। पता नहीं किससे पूछा था उसने यह सवाल?

वैसे दिखने में यदि उसके नाक-नक्ष तराशे हुए नहीं हैं तो कुरूप भी नहीं कहा जा सकता। अन्धी-कानी, लँगड़ी- लूली, बहरी तो वह है नहीं। सुन्दरता की पहचान क्या महज चमड़ी की सफेदी है? मोहक चाल, इतराती मदभरी आँखें, तराशी हुई संगमरमरी देह यष्टि, जो अपनी रूप ज्वाला में अनेक को झुलसा दे। उनके चरित्र चिन्तन को अपने हाव-भावों से दूषित कर दे अथवा व्यक्तित्व के गुणों का समुच्चय, चरित्र उच्च मानवीय गुणों से युक्त हो और कर्तृत्व सत्प्रवृत्तियों का निर्झर हो जिसकी विशालता के कारण अनेक जिन्दगियाँ विकसित हों। उसके पूछे गए प्रश्न के यही दो उत्तर हैं, जो आदि काल से वातावरण में गूँज रहे हैं- किसी एक को चुनना है।

वह उठ खड़ी हुई। विषाद की लकीरें गहरी पड़ीं। सोचने लगी- विवाह हुए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए। पति का उसके प्रति यह व्यवहार, ताने, व्यंग्य, कटूक्तियों की मर्मपीड़क बौछार सुनते- सुनते उसका अस्तित्व छलनी हो गया है। यदि उसके पास वासनाओं को भड़काने वाली रूप राशि नहीं हैं, तो इसमें उसका क्या दोष है? गुणों के अभिवर्द्धन में तो वह बचपन से प्रयत्नशील रही है। बेचैनी से उसके कदम कमरे की दीवारों का फासला तय करने लगे। विचारों की धारा प्रवाहमान हुई। रूपराशि भले दो जीवनों में क्षणिक आकर्षण पैदा करे, पर सम्बन्धों की डोर मृदुल व्यवहार के बिना कहाँ जुड़ पाती है? चरित्र की उज्ज्वलता के बिना भी कभी आपस में विश्वसनीयता पनपी है? रूपराशि क्या क्ल्योपेट्रा के पास कम थी, जिसकी रूप ज्वाला के अंगारों में मिश्र और रोम तबाह हो गए, विश्वविजयी कहलाने वाला सीजर पतंगे की तरह जल-भुन गया।

आज निर्णय की घड़ी है। निर्णय की घड़ी क्या-निर्णय हो चुका। पति साफ कह चुके, “मैं तुमको अपने साथ नहीं रख सकता।” उनकी दृष्टि ने शरीर के अलावा और कुछ कहाँ देखा? यदि देख पाते तो ... काश.....! बेचैनीपूर्वक टहलते-टहलते पलंग पर बैठ गयी। अचानक उसने घड़ी की ओर देखा, शाम के 5-15 हो चुके। अब तो वे आने वाले होंगे। नारी सदियों से एक वस्तु रही है, पुरुष के पुरुष हाथों का खिलौना। याद आने लगा उसे इतिहास की अध्यापिका वह वह कथन- “यूनान के भारत में प्रवेश के बाद मगध में नारियों की हाट लगने लगी थी। रूप विक्रेता नारी के लज्जावसन तक तार-तार कर फेंक देते। खरीददार आकर उन्हें इस तरह टटोलते, जैसे कोई कसाई देख रहा है कि पशु में कितना माँस है। “महामति चाणक्य ने इस घिनौनी प्रथा का अन्त कराया। अब कहाँ है चाणक्य? कहाँ सुप्त है वह ब्राह्मणत्व? आज क्या नारी नहीं बिकती? सोचते-सोचते उसका मन विकल हो उठा।

तभी दरवाजे पर बूटों की खड़खड़ाहट सुनाई दी। शायद.......मन में कुछ कौंधा। अपने को स्वस्थ-सामान्य दिखाने की कोशिश करने लगी। थोड़ी देर में सूटेड-बूटेड, ऊँचे, गठीले शरीर के एक नवयुवक ने प्रवेश किया। उसके मुखमण्डल पर पुरुष होने का गर्व था। एक उचटती-सी नजर उस पर डालकर वह कुर्सी पर बैठा व प्रश्न दाग बैठा-”हाँ तो क्या फैसला किया तुमने?”

घुटन या संघर्ष में से वह पहले ही संघर्ष चुन चुकी थी। पति का निर्णय अटल था, अतः उसने बन्धनों से मुक्ति पा ली। अधूरी पढ़ाई फिर चली, समय के सोपानों के साथ उसने कदम बढ़ाए। बढ़ते कदमों ने उसे स्वातंत्र्य यज्ञ का होता बनाया। संवेदना शक्ति बनी व गुणों के वृक्ष पर कविता के प्रसून खिले और यह कविता बन गयी नारी की अनकही संवेदनाओं की कथा। साहित्य के क्षितिज पर एक ‘निहारिका’ का अवतरण हुआ, जिसमें भावों के ब्रह्माण्ड सँजोये थे। कविता के भवन में उसका सौंदर्य दीपशिखा बन चमका। भावना के सौंदर्य से भरी इस महीयसी को भारत देश ने ‘महादेवी’ के रूप में जाना।


Quotation

जिस देश या राष्ट्र में नारी-पूजा नहीं होती, वह देश या राष्ट्र कभी महान या उन्नत नहीं हो सकता। नारी रूपी शक्ति की अवमानना करने से ही आज हमारा अधःपतन हुआ है। स्त्रियाँ माता की प्रतिमा हैं, जब तक उनका उद्धार न होगा, हमारे देश का उद्धार होना असम्भव है।

-स्वामी विवेकानन्द


दांपत्य जीवन में मधुरता का रहस्य

विवाह के समय वर और वधू दोनों के मन में अपने दाम्पत्य जीवन को लेकर कई मीठे-मीठे सपने उठते रहते हैं और हृदय को गुदगुदाती रहती है। इन संकल्पों और सपनों को समय समय पर दोहराया भी जाता है। पत्नी के रूप में पति को जो साथी मिलता है, उसे वह अपने सबसे अधिक निकट और सर्वाधिक घनिष्ठ पाता है। पति के रूप में स्त्री को जो साथी मिलता है, उसमें वह अपनी कई अपेक्षाओं की पूर्ति का आधार खोजती है।

इस जीवन की शुरुआत में पति-पत्नी एक दूसरे से जो स्नेह,संरक्षण, सहयोग, प्रेम, मार्गदर्शन और प्रतिदान प्राप्त करते हैं वह चिरकाल तक एक दूसरे के लिए आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। लेकिन प्रायः वह आकर्षण शीघ्र ही चुक जाता है और लगने लगता है कि दोनों में एक असन्तोष, एक विरक्ति की भावना बढ़ती जा रही है। विवाह के थोड़े ही दिनों बाद पति को पत्नी का सौंदर्य पुराना लगने लगता है। पत्नी के लिए पति का परिचय नया नहीं रह जाता। उनका जीवन रोते-झींकते, लड़ते-झगड़ते बीतना आरम्भ हो जाता है। पति-पत्नी के सम्बन्धों में तनाव पैदा होना इसलिए अस्वाभाविक नहीं है कि मनुष्य का स्वभाव भूल करने और गलतियाँ करने का ही होता है। ये भूलें दाम्पत्य जीवन में भी होती हैं पर स्थिति समस्या तब बन जाती है, जब उस स्वाभाविक कमजोरियों को बात का बतंगड़ बनाने के प्रयत्न होने लगते हैं। इसके स्थान पर यदि गलतियों और त्रुटियों को सहज मानवीय कमजोरी मानकर चला जाय तो प्रेम और आकर्षण में कमी नहीं आने पाती, क्योंकि तक गलतियों के प्रति दृष्टिकोण दूसरा हो जाता है।

दंपत्ति को अपने जीवन-साथी के प्रति सम्पूर्ण हृदय से प्रेम करते हुए एक दूसरे से सन्तुष्ट रहना चाहिए । कहीं कोई गलती भी होती है तो समझना चाहिए कि वह अस्वाभाविक नहीं है और इसलिए उसे अस्वाभाविक रूप से नहीं लेना चाहिए। साथी के गुण व दोषों को स्वाभाविक मानकर चला जाय, साथ ही दोषों का परिमार्जन और गुणों का अभिवर्द्धन किया जाता रहे तो उससे एक दूसरे के प्रति गहरी समझ और प्रगाढ़ ऐक्य की भावना उत्पन्न होकर बढ़ने लगती है, जो दाम्पत्य जीवन की सफलता के लिए एक आवश्यक कदम है।

एक दूसरे के प्रति समझ-बूझ पूर्ण रवैया तथा सहनशीलता का भाव रखना भी बहुत जरूरी है। भगवान ने एक कंकड़ को भी दूसरे कंकड़ के समान नहीं बनाया तो दो व्यक्तियों की मनोभूमि और विचारधारा एक दूसरे के समान कहाँ से बनाता? इस विविधता में ही सृष्टि की सुन्दरता है। अतः यह समझना भी जरूरी है कि पति-पत्नी की विचारधाराएँ और मनोभूमियाँ एक समान होना सम्भव नहीं है। दोनों के वैचारिक दृष्टिकोण, मान्यता और सोचने का ढंग एक जैसा हो यह संयोग कम ही देखने में आता है। यदि इस तथ्य के प्रति समझपूर्ण रवैया नहीं अपनाया गया तो पति-पत्नी दो भिन्न ध्रुव बन जाते हैं और उनके जीवन में आवश्यक ताल-मेल नहीं रह जाता।

विचारों में ही नहीं, यह विविधता पसन्दगी में भी रहती है। पति-पत्नी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे विचारों की ही तरह एक दूसरे की पसन्द पर आक्रमण न करें। उन्हें एक दूसरे के विचारों को, पसन्दगी को अपने से भिन्न होते हुए भी इज्जत करना, उसे स्वीकार करना तथा तदनुसार अपने साथी को प्रसन्न रखने के लिए तत्पर रहना चाहिए। यह सहनशीलता न केवल साथी की एक दूसरे के लिए उपयोगिता सिद्ध करती है, वरन् उनके पारस्परिक प्रेम को और अधिक प्रगाढ़ करती है।

कुछ समय के लिए अलग-अलग रहना भी पारस्परिक प्रेम की ताजगी बनाए रखने के लिए आवश्यक है। थोड़े समय का विछोह पति-पत्नी को भावनात्मक दृष्टि से और भी निकट ला देता है। साथ रहते-रहते एक दूसरे की भावनाओं और उपयोगिता को समझ पाने की स्थिति प्रयास करने पर भी कम ही प्राप्त होती है, जितनी कि अलग-अलग रहने से होती है। पत्नी सोचती है कि वह होते तो ऐसा करते, अमुक कठिनाई हम तक आने ही न देते या कितना सूना हो जाता है उनके बिना? पत्नी के साथ रहते हुए पति को उसके हर काम में कोई न कोई कमी नजर आती है। पर जब पत्नी मायके चली जाती है, तो पति अनुभव करता है कि पत्नी के रहते उसे कितना आराम और कितना सुख मिलता था? यह अल्पकालिक बिछोह एक दूसरे को समझे का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है, जिसमें कि उन्हें एक दूसरे की आवश्यकता अनुभव होती है।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पति समझता है, पत्नी उसकी उपेक्षा कर रही है। या पत्नी पति को अपनी उपेक्षा करता हुआ अनुभव करती है। बहुत बार तो इस तरह की भ्रान्ति ही होती है और कई बार इस तरह के अनुभव के पीछे शारीरिक अस्वस्थता या मानसिक उलझनें भी कारण बन जाती हैं। उन कारणों का पता लगाए बिना यह धारणा बना लेना गलत है और इससे अनेक गलतफहमियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जो दाम्पत्य सम्बन्धों को रिक्त बना देती हैं। असली कारणों को खोजा जाए, तो यही पता चलेगा कि बेकार ही अब तक सोच-सोचकर परेशान रहे, ऐसी कोई बात ही न थी।

दम्पत्ति को एक दूसरे की प्रशंसा द्वारा भी अपने सम्बन्धों के वातावरण में प्रफुल्लता और माधुर्य का रस घोलते रहना चाहिए। प्रशंसा की चमत्कारी शक्ति सर्वविदित है और यह एक कला भी है। इस कला का मूल सिद्धान्त है कि प्रशंसा करते समय गुणों को, सत्कार्यों को प्रमुखता दी जाय और सुनने में भी अपने सत्कार्यों, व्यक्तित्व तथा व्यवहार को विकसित करने की कामना की जाय। न कि अहंकार का वैभव प्रदर्शित किया जाय। पत्नी ने अपनी सूझ-बूझ से कोई नुकसान होने से बचा लिया या कोई कार्य सुरुचिपूर्ण ढंग से कर दिया तो उसकी मुक्त-कंठ से सराहना की जानी चाहिए। यहाँ यह सोचना गलत है कि यह तो उसका दायित्व था- इसमें प्रशंसा करने की क्या जरूरत है? पत्नी भी यदि अपने पति की प्रशंसा में कृपणता बरतती है, तो वह अपने पति के हृदय में स्थायी स्थान बनाने में असफल रहती है।

अपने दाम्पत्य जीवन को सफल और मधुरता के साथ जीने का यही रहस्य है कि विवेकसम्मत रीति-नीति अपनायी जाय और बिना सोचे-समझे न तो कोई कदम उठाया जाय, न आशंकाएं की जाएँ। पारस्परिक प्यार और समर्पण के आदर्श का पालन करते हुए कठिन परिस्थितियों में भी दाम्पत्य जीवन की मधुरता बरकरार रखी जा सकती है।


ये हत्याएँ-आखिर क्यों?

आखिर क्यों? क्या अपराध है उसका? जिस मासूम ने अभी दुनिया में कदम भी न रखा हो, जिस अबोध की आँखों में संसार का चित्र भी न उभरा हो, जिसका भी कोई जानी-दुश्मन हो सकता है? ये प्रश्नवाचक चिह्न अटपटे जरूर हैं, परन्तु वर्तमान समाज की क्रूर व्यवस्था का एक नग्न सत्य है। पितृ सत्तात्मक समाज पुत्र से वंश-बेल को आगे बढ़ाने की सड़ी-गली परम्परा को बदले हुए परिवेश और परिस्थितियों में भी ढोए फिर रहा है। इस रूढ़िग्रस्तता की आसक्ति ही है, जिससे प्रेरित होकर बेकसूर कन्या अपनी भ्रूणावस्था में ही माँ की कोख से जबरदस्ती खींचकर फेंक दी जाती है।

जनसंख्या नियन्त्रण के साधन के रूप में गर्भपात, भ्रूणहत्या को कानूनी, सामाजिक स्वीकृति मिलना प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मानवता के लिए एक-अभिशाप बन गया है; क्योंकि इसी की आड़ में कन्याओं की गर्भ में ही पैशाचिक हत्याएँ हो रही हैं। पुराने जमाने के इतिहास-पुराणों में, लोक-कथाओं में ऐसे राक्षस-पिशाचों का जिक्र आता है, जो छोटे बच्चों का मारकर खा जाते थे। बाल हत्यारे इन राक्षसों की कथाओं को सुनने पर हर किसी का मन घृणा से भर जाता है। अपरिपक्व भ्रूण तो बालक से भी मासूम होता है, उसकी हत्या करने वालों को क्या कहा जाए? जो इनके हत्यारे हैं, क्या उनमें सचमुच पिता का प्यार और माता की ममता स्पंदित होती है? यदि ऐसा तो शायद वे ऐसा क्रूर कर्म कभी न कर पाते।

पुत्र प्राप्ति की प्रबल इच्छा एक मृगतृष्णा ही तो है, आखिर क्या दे रहे हैं पुत्र आज अपने माता-पिता को? इस प्रश्न का उत्तर प्रायः हर घर में लड़कों द्वारा माँ-बाप की जमीन -जायदाद हथियाने के बदले उन्हें दिए जाने वाले शर्मनाक अपमान-तिरस्कार में खोजा जा सकता है। इसे मोहान्धता ही कहेंगे कि रोजमर्रा की ऐसी सैकड़ों-हजारों घटनाओं को देखने के बाद भी पुत्र प्राप्ति की लालसा नहीं मिटती। इस लालसा को मिटाए जाने के बदले कन्या को जन्म लेने के पहिले ही मिटा दिया जाता है। विज्ञान और आधुनिक तकनीकी ज्ञान जैसे- एमिनियों सेंटेसिस, अल्ट्रासाउंड स्केनिंग आदि ने इस क्रूरता को और बढ़ावा दिया है।

इस सबके परिणामस्वरूप वर्तमान समाज में गर्भपात की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष साठ लाख गर्भपात कराए जाते हैं। इनमें से केवल छह लाख गर्भपात ही वैध होते हैं। इन गर्भपात ही वैध होते हैं। इन गर्भपातों में बहुलता कन्या शिशुओं की होती है। 1976-77 में यह संख्या 2,78,370 थी, जो 1986-87 में बढ़कर 5,84,218 हो गयी। 1995-96 के आँकड़े तो सर्वथा चौंकाने वाले हैं। अब तक तो इनकी संख्या 10 लाख से भी पर जा चुकी है। ये तो सरकारी आंकड़े हैं, गैर सरकारी आँकड़ों का आसानी से अन्दाजा लगाया जा सकता है। यूनीसेफ के अनुसार 10 प्रतिशत महिलाएँ विश्व जनसंख्या से लुप्त हो चुकी हैं। जिसके पीछे भ्रूणहत्या, गर्भपात आदि कुकृत्य ही मुख्य कारण हैं। इस त्रासदी के लिए दो शत्रु हैं रूढ़िवादी महिलाएँ और संकीर्ण पुरुष। भारत में एक करोड़ बीस लाख लड़कियाँ पैदा होती हैं जिसमें अस्सी लाख अपने जीवन का पन्द्रहवाँ जन्म दिन नहीं देख पातीं । इस अध्ययन के मुताबिक दुनियाभर के पिछले एक दशक में हुए 15 करोड़ अवैध गर्भपातों में से अकेले 4 करोड़ अवैध गर्भपात भारत में हुए। जिसमें 70 प्रतिशत गर्भपात गर्भधारण के 12 सप्ताह के बाद कराए गए; क्योंकि बारह सप्ताह के उपरान्त ही भ्रूण के लिंग का पता चला, कि वह बेटी है और उसका जन्मने के पहले ही गला घोंट दिया गया।

कलकत्ता के एक सम्मेलन में इस तरह के गर्भपात की निंदा करते हुए मदर टेरेसा ने कहा-हम ममता के तोहफे को मिटा नहीं सकते। स्त्री और पुरुष के बीच कुदरती समानता के लिए यह हिंसक हथकण्डा समाज के लिए पतन-पराभव की ओर ही तो चलता है। इस सारे कारनामे में पुरुष के पौरुष पर कोई टिप्पणी करने का साहस कौन करे? क्योंकि वह दुनिया के सामाजिक कारोबार का नियन्ता जो है। शायद उसने अपना वर्चस्व साबित करने के लिए पुत्र पैदा करने की वैज्ञानिक विधि भी ईजाद कर ली है। फ्राँस के एक वैज्ञानिक महोदय लड़के पैदा करने के लिए सोडियम और पोटेशियम युक्त भोजन की सलाह देते हैं। परन्तु रीनल या हाइपरटेंशन की समस्या इस आकाँक्षा से कहीं ज्यादा बलवती होती है। डॉ. रोनाल्ड ऐरीकन्स के प्रयोग से ‘Y’ क्रोमोसोम जो लड़का होने के लिए जिम्मेदार है, में कम जेनेटिक द्रव्य होने से तीव्र गति करता है। इसमें और तीव्रता लाने के लिए प्रोटीन एल्बुमीन का प्रयोग किया जाता है। उत्सर्जन के दौरान विशिष्ट लवणयुक्त घोल से शुक्राणु को तनु कर दिया जाता है, ताकि ‘Y’ क्रोमोसोम तीव्रता से बढ़कर अण्डाणु को निषेचित कर सके। यह विधि आजकल विदेशों में काफी प्रचलित हो ही है। इसकी एक विधि में शुक्राणु के घनत्व को कम करने के लिए परकोल रासायनिक द्रव्य का उपयोग किया जाता है एवं अन्य एक विधि आई.व्ही.एफ. तकनीक द्वारा भी अण्डाणु को निषेचित किया जाता है।

उपरोक्त विधियों के बारे में HEFA (Thr Human Fertilization and Embryology Authority) इंग्लैण्ड के रायल कालेज ऑफ आबस्टीकल्स एण्ड गाइनोकोलॉजी तकनीकी के विशेषज्ञों ने इन्हें मेडिकल कारण बताकर स्पष्ट किया है कि इससे आनुवांशिकी-व्यतिक्रम रोग जैसे हीमोफीलिया आदि होने का खतरा होता है। यह सब न तो हो तो भी पुत्र प्राप्ति की यह अभिलाषा, कन्याओं के प्रति नफरत से भरी होने के कारण मानवीय भावनाओं के सर्वथा खिलाफ है। साथ ही यह नजरिया हमारी आधुनिक कही जाने वाली प्रगतिशील सोच, चौतरफा तरक्की पर कई तरह के सवालिया निशान लगाती है। आज के वैज्ञानिक युग में भी इस तरह की अवाँछनीय सोच एवं कृत्य एक आश्चर्य है। इसी का परिणाम है कि 1981 की जनगणना में हजार पुरुषों के अनुपात में 935 महिलाएँ थीं जो 1981 में आकर 927 हो गयी।

अदिति और मद्रास स्कूल ऑफ सोशल वर्क ने बिहार और तमिलनाडु में बालिका शिशु हत्या पर सर्वेक्षण किया, जो दर्शाता है कि महिलाओं की संख्या कम होती जो रही है। नवीन सर्वेक्षण में मुताबिक देश के 9 राज्यों के 65 जिलों में यह लैंडिक असन्तुलन 9 इतना भयावह है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का महिला और बाल-कल्याण विभाग भी चिन्तित हो उठा है। इन 65 में से 55 जिलों में छह साल तक बच्चों में 1100 लड़कियाँ है और शेष दस जिलों में 1000 लड़कियाँ है और शेष दस जिलों में यह अनुपात 1150 और 1000 का है। उत्तर भारत में जो 60 प्रतिशत से भी ज्यादा लड़कियों की शादी 17 वर्ष पर करने से पूर्व हो जाती है। इसके बाद उनके साथ गर्भवती होने तथा गर्भपात कराने का लम्बा सिलसिला शुरू हो जाता है। विभिन्न अनुमानों के हिसाब से यहाँ 6 से 8 लाख प्रतिवर्ष भ्रूण हत्याएँ होती हैं।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में 30 गाँवों के सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी के अनुसार ज्यादा से ज्यादा लड़ने प्राप्त करने की कोशिश में हर महिला ने पाँच से लेकर तेरह तक सन्तानें इकट्ठा कर डाली हैं। इन्हीं कुछ सालों में अकेले बिजनौर जिले में 84 हजार से भी अधिक कन्या भ्रूणों से छुटकारा पाया गया है। कन्या द्रोह का यह सिलसिला कन्या भ्रूण की हत्याओं तक ही सीमित नहीं है। इन अपने को इनसान कहलाने वाले पिशाचों को यदि भ्रूण हत्या में किसी तरह यदि सफलता न मिल पायी तो उन्हें कन्या को जन्मते ही मार देने में कोई संकोच नहीं। बिहार के कटिहार जिले में 1200 नवजात बच्चियां प्रतिवर्ष मार दी जाती हैं। एक दाई एक माह में तीन एवं वर्ष भर में 36 बालिकाओं को मार देती है। जब एक जिले में इन मासूम हत्याओं का यह औसत है, तो पूरे प्रदेश में 15,000 दाइयाँ इसी काम में संलग्न हैं। सर्वेक्षणकर्ताओं का अनुमान है कि इस तरह 50,000 मासूम कन्याएँ इस धरती पर आते ही मौत की गहरी नींद में सुला दी जाती थी, अब भूमिहर, ब्राह्मणों, यादव, हरिजन, आदि प्रायः सभी जातियों में होने लगी है।

मारने के तरीके तो और लोमहर्षक हैं, जहर, तम्बाकू, काला नमक, गीले तौलिए और बालू में थैले जैसे साधनों से बह जघन्य कृत्य सम्पन्न किया जाता है। 9 बच्चों की मारने वाले हत्यारे बाप से इस विषय में पूछने पर उसने बताया-”लड़कियों के कारण हमें सबके सामने सिर नीचा करना पड़ता है।” शायद सिर ऊँचा रखने के ख्याल में उसे अपने किए की, नृशंसता का कोई ध्यान नहीं रह गया। दिल्ली विश्वविद्यालय में एम.फिल.के लिए पेश थीसिस ‘द साइलेंट डेथ्स’ में बताया गया है कि इन बाल हत्यारे कंस और पूतना जैसे अमानुषिक लोगों में स्नातक व स्नातकोत्तर लोग भी संलग्न है। देश के सभी राज्यों में लड़कियों का महाविनाश देश की जलवायु के साथ खिलवाड़ करने वाले वनों की कटाई जैसा किया जा रहा है।

बर्बर मानसिकता, नृशंस अमानुषिकता का यह परिदृश्य जब भारत से उठकर विश्व के अन्य देशों में घूमता हो तो चीन, जापान, और अन्य अनेक देश भी इस में पीछे नहीं रहते। चीन की स्थिति तो और भी बदतर है। चीन की जनसंख्या 1.17 अरब है तथा प्रतिवर्ष एक करोड़ 70 लाख लड़कियाँ लापता हो जाती हैं। लड़कियों को मार देने को वहाँ वंश वृद्धि को रोकने का उपाय माना जाता है। नहीं मालुम वहाँ के निवासी अपने इस हास्यास्पद तरीके में कितने सफल हो रहे हैं? पर यह सुनिश्चित है कि वे इनसान की शकल में होने पर भी इनसानियत से वंचित हैं।

कन्या शिशु की हत्या के पीछे इस आधुनिक सोच और अत्याधुनिक तरीके की बर्बरता ने सामाजिक चेतना को झकझोर दिया है। सर्वप्रथम भारत में सन् 1870 में लार्ड मेयो ने भारत में अधिनियम आठ पारित करके कन्या शिशु की हत्या पर पाबन्दी लगायी थी। इससे पहले भी 1715 और 1804 में इस सम्बन्ध में अधिनियम बना दिए गए थे। लेकिन यह प्रभावी नहीं हो पाया। राष्ट्रीय अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं, जिससे पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में सात गाँवों में जाँच करने पर 104 लड़के और मात्र एक लड़की पायी गयी । इन गाँवों के सर्वेक्षण का हवाला यह स्पष्ट करता है कि उन ग्रामीणों को कन्या विवाह कभी देखने को नहीं मिला।

भारत स्वतन्त्र हो गया, पर हमारे मन अभी अपनी पुरानी सोच के गुलाम हैं। तभी तो इस पर अंकुश लगाने के लिए सन् 1988 में महाराष्ट्र विधानसभा में विधेयक पारित कर भ्रूण जल परीक्षण को अवैध घोषित कर अग्रदूत की भूमिका निभायी। सात वर्षों बाद मई 1994 में राजस्थान सरकार ने उक्त परीक्षण पर पाबन्दी लगाकर प्रशासन की सार्थकता को सिद्ध किया। तभी तो वहाँ गर्भस्थ शिशुओं का लिंग परीक्षण करने के लिए दोषी व्यक्ति को तीन माह की सजा और दस हजार जुर्माने का प्रावधान है। दूसरी बार दोषी पाए गए व्यक्ति को पाँच साल की कैद व 50,000 जुर्माना भरने का नियम बनाया गया है। पंजाब में इस तरह के अपराधी को तीन साल की कैद व जुर्माने का प्रावधान है।

इन सरकारों के अपने राज्यों में रोक लगाने से पहल 1975 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने गर्भ जल परीक्षण पर रोक लगा दी थी। ‘फोरम अगेंस्ट सेक्स डिटरमिनेशन एण्ड सेक्स प्री सेलेक्षन’ नाम से इन भ्रूण हत्याओं को रोकने के लिए एक फोरम भी गठित हो चुका है। अब तो केन्द्र सरकार भी जुलाई 1994 में एक बिल पास कर चुकी है। अधिनियम की धारा 312 के अनुसार अजन्मे शिशु की हत्या एक अपराध है। अपराधी को 3 वर्ष की सजा या जुर्माना भरना होता है। धारा 315 के तहत तो इस सम्बन्ध में 10 वर्ष की सजा तक का दण्ड है। इन तमाम सारे कानूनों के बावजूद मानवीय बुद्धि की कुटिलता इन कानूनों का, संविधान का मजाक उड़ाती रहती है। अपनी घिनौनी सोच की मृगमरीचिका को पकड़ने के लिए रोज अनगिनत भ्रूण हत्याएँ होती रहती हैं।

इन हत्याओं से विश्वभर के विचारशील सहमे हुए हैं। सभी एक स्तर से सोच रहे हैं, क्या हम सब मनुष्य कहलाने वाले वाकई मनुष्य हैं? ‘वुमंस ग्लोबल लीडरशिप’ के डायरेक्टर चार्चोट बंच ने कहा है-”प्रजातन्त्र, विकास, शान्ति और वातावरण की तरह नारी को पुनः परिभाषित किया जाना नितान्त आवश्यक है।” महिला विश्व सम्मेलन के यू.एन. सेक्रेटरी जनरल गरट्युड मोंगला के मतानुसार-महिलाओं के प्रति वर्तमान दृष्टिकोण इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी है। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्वतन्त्रता का अधिकार देने से भी वंचित रखना चाहते हैं। यह हमारी बर्बर मानसिकता हमारे मनुष्यत्व पर प्रश्न चिन्ह है। अच्छा हो मनुष्य जाति अपनी गरिमा पर इस सवालिया निशान को समय रहते मिटा डाले और कन्या के जन्म को अपने परिवार में देवी अवतरण की भाँति प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करे। आगामी भविष्य इन्हीं कन्याओं का है। भगवान् महाकाल अपने अटल विधान से इक्कीसवीं सदी में यही साबित करने वाले हैं-”कन्या प्राप्ति ही सौभाग्य का प्रतीक है-पत्र प्राप्ति नहीं।” यह स्थिति अवश्यंभावी है, तब अपने ऊपर हत्यारे होने का कलंक क्यों लें? किसलिए ये मासूम हत्याएँ करें?


नारी के प्रति अपराध-संस्कृति पर आघात

भारतीय संस्कृति सृजन और संवेदना की संस्कृति है। इसका मूर्त रूप है, नारी। जिसका समूचा अस्तित्व सृजन एवं संवेदना के स्पन्दनों भावनाओं से मानवीयता पुष्पित-पल्लवित होती रहती है। कोई भी व्यक्ति अथवा समाज कितना सुसंस्कृत है? इस सवाल का जवाब, उसका नारी के प्रति किए जाने वाले व्यवहार में खोजा जा सकता है। महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार हमारी सभ्यता और संस्कृति पर प्रश्नचिह्न लगाता है। नारी के प्रति अपराध, संस्कृति पर आघात है। इनमें दिन-पर-दिन हो वाली बढ़ोत्तरी ने समूचे साँस्कृतिक अस्तित्व को संकट में डाल दिया है।

विगत एक दशक में इसमें दोगुनी वृद्धि हुई है। गृह मंत्रालय के ‘क्राइम ब्यूरो’ के अनुसार प्रत्येक छह मिनट तरह का एक अपराध घटित होता है। वर्ष 1992 में अपराधों की संख्या 82,812 रही। वर्ष 1993 में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों की संख्या 84,000 जा पहुंची। बढ़ते अपराधों के कारण महिलाओं की स्थिति भयावह एवं असुरक्षित बनती जा रही है। इन अपराधों के चक्रव्यूहों में फँसकर महिला अपने दैवी स्वरूप की गरिमा को खोकर एक भोग्य वस्तु के दर्जे तक गिर गयी है। उसे पुरुष प्रधान समाज में अनेक भयावह परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है और वह शारीरिक एवं आर्थिक शोषण के नाम बलि होती जा रही है। यौन शोषण प्रदूषण की भाँति फैल रहा है। कोई दिन अखबार में ऐसा नहीं आता जब कहीं बलात्कार की घटना न घटती हो । बलात्कारी घटनाओं में प्रारम्भ से अन्त तक जिन पारिवारिक एवं मानसिक यंत्रणाओं से स्त्री को गुजरना पड़ता है, उसकी कल्पना तक कँपा देने वाली है। बलात्कारी दरिंदे, पुलिस व वकीलों के उलूल-जुलूल सवाल, परिवार एवं समाज की उपेक्षा, लाँछना एवं बहिष्कार हर स्तर पर वह नारकीय यन्त्रणा से गुजरने के लिए विवश होती है।

वर्ष 1990 में महिला बलात्कार के 10,000 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 15 प्रतिशत की आयु 16 वर्ष से कम व 20 प्रतिशत की 10 वर्ष से कम थी। यह संख्या 1991 के 10,410 से बढ़कर 1992 में 10,827 हो गयी। बच्चियों के साथ बलात्कार 278 प्रतिशत बढ़ा है। 1990 में यह संख्या 394 थी जो 1991 में 1091 हो गयी। इनमें से अनेक न्याय की अंतहीन प्रतीक्षा में अभी तक आँसू बहा रही हैं। 1991 में अदालतों में लटके 29983 मामलों में से 24410 मामले तो साल के अन्त तक लटके रहे। गत दो दशकों में यानि 1974 से 1993 के बीच 2962 से 11,117 तक बढ़ोत्तरी जा पहुँची है। इस वृद्धि दर को गणित की भाषा में 400 प्रतिशत कहा जाएगा। इसी तरह महिलाओं के अपहरण में 1980 से 11,759 अर्थात् 30 प्रतिशत वृद्धि हुई है।

वर्ष 1993 की राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रत्येक महीने 937 महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं। 1799 महिलाओं से छेड़खानी की जाती है व सताया जाता है, अर्थात् प्रत्येक दिन 32 महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं व 57 महिलाओं से छेड़खानी की जाती है। इनमें से 50 प्रतिशत बलात्कार का शिकार 10 वर्ष के नीचे की बच्चियाँ होती हैं। अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश महिलाओं के संदर्भ में सबसे असुरक्षित प्रान्त है। यहाँ प्रत्येक दिन औसत 7 महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं। व 15 महिलाओं से छेड़खानी की जाती है। अर्थात् मास में 207 बलात्कार व 464 छेड़खानी की घटनाएँ होती हैं। जो कि देश भर का क्रमशः 22.1 प्रतिशत व 26.6 प्रतिशत है।

मध्यप्रदेश के बाद दूसरा नम्बर उत्तरप्रदेश का है। जहाँ प्रतिमास 146 बलात्कार व 201 छेड़खानियाँ होती हैं। महाराष्ट्र में प्रति महीने 95 बलात्कार व 250 छेड़खानियाँ होती हैं। स्त्रियों को सताने की 50 प्रतिशत से अधिक घटनाएँ मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश एवं महाराष्ट्र में होती हैं। राजस्थान में अभी हाल में भँवरी देवी काण्ड हुआ है, वहाँ 74 बलात्कार व 132 छेड़खानियाँ प्रतिमाह होते हैं। आंध्रप्रदेश, बिहार व बंगाल अन्य तीन ऐसे प्रान्त हैं, यहाँ क्रमशः 69,98 व 62 बलात्कार होते हैं। अर्थात् प्रत्येक दिन दो से अधिक बलात्कार होते हैं। दिल्ली में 1993 में 321 बलात्कार में मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें 177 छोटी उम्र की अपरिपक्व लड़कियों से, 35 मामले 7 साल की छोटी बच्चियों से तथा 118 मामले 12 से 19 वर्ष की लड़कियों से घटित हुए। 1994 में 162 बलात्कार की घटनाएँ हुई जिनमें 928 बच्चियाँ थीं। आगे के दिनों में यह ग्राफ निरन्तर बढ़ता हुआ पाया जा रहा है।

इस बीच बलात्कार के दोषी पुरुषों को अदालत से छोड़ दिए जाने से अपराधियों की संख्या भी बढ़ी है। 1993 में 30.3 प्रतिशत अपराधियों को सजा मिली, जबकि 1990 में 41.5 प्रतिशत को सजा मिली थी। दूसरा दुःखद पहलू यह है कि 80 प्रतिशत मामले लटके रहते हैं। कुल मिलाकर भारत में इस तरीके में अपराध के लगभग 7,000 मामले दर्ज किए जाते हैं। असली आंकड़े शायद इससे भी अधिक हों, क्योंकि अधिकांश मामले पुलिस की रिपोर्ट में ही नहीं आ पाते हैं।

पाकिस्तान में महिला प्रधानमंत्री होने के बावजूद भी महिलाएँ दूसरे दर्जे के नागरिक की स्थिति में जीने के लिए मजबूर हैं। वहाँ विवाहित महिलाओं में से 80 प्रतिशत परिवार में होने वाली ज्यादतियों की शिकार हो रही हैं। पाकिस्तान के महिलाधिकारों के लिए संघर्ष संगठन की मुख्य समन्वयक शहनाज बुखारी का कहना है कि गत दो वर्षों में महिलाओं से ज्यादतियों के 380 मामलों की जानकारी वहाँ के दो सरकारी अस्पतालों से मिले आँकड़ों से मिली है। इस साल पहिले पाँच महीनों में ही महिलाओं पर अत्याचार के लगभग 80 मामले प्रकाश में आए हैं। इसी तरह दहेज के कारण प्रतिदिन 5 से 10 महिलाओं पर बलात्कार की शिकायत रहती है।

विदेशों में महिला यौन शोषण की समस्या और बदतर है। ‘टाइम’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार तेल अबीव (इसराइल) में वेश्यालयों की संख्या गत 5 सालों में 30 से बढ़कर 150 हो गयी है। चीन में गत 15 सालों में वेश्यावृत्ति, यौन रोगों एवं नारी विरोधी अपराधों में तेजी से वृद्धि हुई है, जबकि 1970 तक वहाँ इसका नामोनिशान नहीं था उत्तरी भारत अमेरिका में एक अध्ययनानुसार 4 में से एक लड़की 14 वर्ष की आयु से पूर्व ही यौन शोषित की जाती है। इसके अलावा 6 में से एक लड़की का यौन शोषण किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट जिसमें ‘सेण्टर आफ कंसर्न पर चाइल्ड लेबर’ का सर्वेक्षण सम्मिलित है, बताती है कि भारत में लगभग 4 लाख बाल वेश्याएं हैं। इसके अलावा भारत में स्त्री जाति पर घृणित अत्याचारों का स्वरूप अभी 1994 में उजागर में 500 बच्चियों के साथ बल प्रयोग की घटना भी प्रकाश में आयी।

दहेज नारी के जीवन का एक अन्य अभिशाप है। जिसकी वेदी पर हर माह सैकड़ों वधुएँ बलि चढ़ाई जाती हैं। शादी महज एक घिनौना व्यापार बनकर रह गयी है। वर्ष 1986,87 एवं 88 में कुल 5282 वधुएँ दहेज की बलि चढ़ी, जिसमें उत्तरप्रदेश का स्थान प्रथम था। उत्तरप्रदेश में 1986 में 461 व 1987 में 533 हत्याएँ हुई। तीन वर्षा में 1781 हत्याएँ हुई । इसी वर्ष उत्तरप्रदेश में 1 जनवरी से 30 अप्रैल के बीच चार माह में 311 हत्याएँ हुई। जिनमें 146 दहेज हत्याएँ व 65 उत्पीड़न के मामले थे। 1990 में हत्या के 1152 मामले दर्ज किए गए हैं।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश भर में 1993 में 5817 दहेज के कारण मौतें हुई जो पिछले वर्ष से 17.2 प्रतिशत अधिक थीं। उत्तरप्रदेश में 163 दहेज से मृत्यु हुई, जो इस वर्ष प्रतिमाह की दर से सर्वाधिक थी। महाराष्ट्र एवं आंध्रप्रदेश में क्रमशः 32 एवं 48 दहेज से मृत्यु हुई। मध्यप्रदेश एवं राजस्थान में 31 का औसत रहा। पूर्व उत्तर राज्य इस अपराध से अछूते रहे। दिल्ली में औसत प्रतिमाह एक दहेज से मृत्यु हुई।

सन् 1993 में दहेज अपराधियों में 34.5 प्रतिशत को ही सजा मिली जबकि 1992 में 37.8 को दण्डित किया गया था। बलात्कार के मामलों की ही तरह अदालतों में 80 प्रतिशत मामले लटके रहे। दहेज से होने वाली महिलाओं की मृत्यु की वर्तमान स्थिति यह है कि हमारे देश में औसतन प्रतिवर्ष दहेज के कारण 200 मौतें होती हैं। इसमें उत्तरप्रदेश में सबसे ज्यादा 500 मौतें होती हैं। दहेज की वजह से मध्यप्रदेश में लगभग 200, महाराष्ट्र में 225, बिहार में 120, राजस्थान में 110 आन्ध्र प्रदेश में व पश्चिम बंगाल में क्रमशः 90,90 कर्नाटक में 80, तमिलनाडु में 50 व कश्मीर में 10 मौतें प्रतिवर्ष होती हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ते इन अपराधों से किसी भी विचारशील का सिर शर्म से झुक जाता है। वर्ष 1990 में महिलाओं के प्रति किए गए अपराधों के कुल 68,317 मामले दर्ज किए गए थे। जबकि 1993 में इनकी संख्या 83,954 से भी अधिक जा पहुँची। अर्थात् 23 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी रही।

आर्थिक एवं यौन शोषण के साथ ही महिलाओं के श्रम शोषण की समस्या भी अभी बरकरार है। संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वेक्षण के अनुसार आज महिलाएँ दुनिया का दो तिहाई श्रम करती हैं, जिसका उन्हें मात्र आठवाँ हिस्सा मिलता है। एक तिहाई गृहस्थियाँ महिलाओं की कमाई से चलती हैं व दो तिहाई महिलाएँ घरों में काम करती हैं। महिलाओं का आर्थिक योगदान 30 प्रतिशत है। अधिकतर महिलाएँ असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं। 63 प्रतिशत महिलाएँ खेतिहर मजदूर हैं और पशुपालन व दुग्ध सम्बन्धी उद्योगों में काम कर रही हैं। लगभग 80 प्रतिशत कामगारों में अधिकांश महिलाएँ ऐसी हैं जो अपने घरों में झुग्गियों के भीतर बैठकर कताई, रंगाई आदि का काम करती हैं। भारत के पहाड़ी क्षेत्र में बैल का एक जोड़ा वर्ष भर में 1064 घण्टे काम करता है। पुरुष 1210 घण्टे व एक महिला 3485 घण्टे श्रम करती है। श्रम शोषण का यह अपराध शारीरिक एवं आर्थिक अपराध का सम्मिश्रण ही कहा जाएगा।

नारियों के प्रति बढ़ते अपराध की ही यह परिणति हैं, जो भारत में स्त्री-पुरुषों के अनुपात में निरन्तर कमी आती जा रही है। 1901 में भारत में पुरुष-स्त्री अनुपात 1000 एवं 978 था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय यह स्थिति 1000 एवं 945 रह गयी। 1971 में यह 1000 एवं 930 था। वर्ष 1991 के आँकड़ों के अनुसार महिलाओं की संख्या प्रत्येक वर्ष 1000 पुरुष के पीछे 927 रह गयी है। यह निश्चित ही एक असामान्य एवं अप्राकृतिक स्थिति है। किसी भी उन्नत देश में स्त्री-पुरुष अनुपात 1000 या उससे अधिक की पाया जाता है। जैसे- अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्राँस, जापान, जर्मनी और आस्ट्रेलिया में वर्ष 1992 में महिलाओं की यह संख्या प्रति 1000 पुरुषों के पीछे क्रमशः 1050, 1050,1020, 1050, 1030, 1080, और 1000 थी। ऐसा होना प्राकृतिक भी है क्योंकि जीव-विज्ञान के अनुसार प्रकृति ने पुरुषों की अपेक्षा स्त्री की जीवित रहने के लिए अधिक सक्षम बनाया है। सामान्यतया स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा बीमारियों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है। रोचक तथ्य यह है। कि जन्म के समय जन्म का अनुपात पुरुषों के पक्ष में होता है। 1000 बालिकाओं के पीछे 1050 से 1070 बालक जन्म लेते हैं। लेकिन बाद में यह अनुपात उलटकर स्त्रियों के पक्ष में हो जाता है, क्योंकि स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा मजबूत होती हैं।

प्रकृति से लड़कर जीतने वाली नारी को पुरुष की बर्बरता, नृशंसता के कारण लगातार जान गँवानी पड़ती है। इसलिए नहीं कि वह पुरुषार्थ की तुलना में अक्षम है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह बर्बर और नृशंस नहीं है। वह अपने अन्तः करण की कोमल संवेदना, भावना एवं सदाशयता के हाथों विवश है। ध्वंस नहीं सृजन उसकी विवाह गुड़ियों का खेल नहीं, यह प्रेम की वह व्यवस्था है जो हमारी मानसिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक इन्द्रियों का विकास करता है। जहाँ यह आवश्यकता पूरी न हो यह मानना चाहिए वहाँ विवाह नहीं खेल होता है।

-स्वामी विवेकानन्द

मूल वृति है। सम्भवतः इसी कारण वह अपने ऊपर होने वाले अपराधों एवं अत्याचारों को सहती जा रही है। परन्तु अधिक नहीं, सहने की भी एक सीमा होती है। अच्छा यही है, अपराधी पुरुष समय रहते चेत जाएँ। ऐसा न हो कि महाकाली की अंशधर देवी शक्तियाँ अपना प्रचण्ड रूप प्रकट कर दें और उसमें अपराधी पतंगों की तरह जलने, भुनने भस्म होने लगें। विचारशीलता यही कहती है, पुरुष के पौरुष की गरिमा नारी को संरक्षण देने, संस्कृति को अभिवर्द्धित करने में है। इसी में हम सुसंस्कृत एवं समुन्नत कहला सकते हैं। नारियाँ अपना प्रचण्ड रूप प्रकट करें, इससे पहले ही हम अपने व्यवहार से प्रमाणित कर दें कि हम सभ्य एवं सुसंस्कृत हैं।


तप और करुणा से भरे हैं, महिलाओं के व्रत-त्योहार

कहते हैं महर्षि अगत्स्य ने विशाल महासागर को सिर्फ दो चुल्लू में पी लिया था इसी तरह यदि भारतीय नारी के समूचे व्यक्तित्व को सिर्फ दो शब्दों में मापना हो तो वे दो शब्द होंगे -’तप’ एवं ‘करुणा’। इन दो शब्दों में निहित भावनाओं से बचपन से ही उसका अस्तित्व ओत-प्रोत रहता है। जैसे-जैसे वह बड़ी होती जाती है। ये भावनाएँ भी परिपक्व एवं प्रगाढ़ होती जाती हैं। इस परिपक्वता एवं प्रगाढ़ता में उसका तप प्रखर होता है, करुणा उदात्त बनाती है। भारतीय नारी के जीवन में ये दोनों ही अन्योन्याश्रित हैं। उसके तप का प्रेरणा स्त्रोत है करुणा ओर करुणा की अभिवृद्धि होती है, दिन पर दिन बढ़ने वाले तप की प्रखरता से ।

उसकी यह तप, करुणा ही उसके द्वारा अनुष्ठित व्रत-उपवासों में दिखाई देती है। महिलाओं के द्वारा किया जाने वाला हर व्रत किसी न किसी विशेष तप से अनिवार्य रूप से सम्बन्ध है। वे व्रत उसकी कोरी भावुकता नहीं है। इसके पीछे ऋषि प्रणीत विज्ञान है। उत्तरायण, दक्षिणायन की गोलार्द्ध स्थिति, चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाएँ, नक्षत्रों का भूमि पर आने वाला प्रभाव, सूर्य की अंश किरणों का मार्ग, इन सबका महिलाओं की शरीरगत ऋतु अग्नियों के साथ सम्बन्ध होने से विशिष्ट परिणाम को ध्यान में रखकर ही इनका निर्धारण किया गया है।

बदलते समय के बावजूद महिलाओं के हर व्रत की अपनी विशेषता है। जो संवत्सर के प्रारम्भ से ही शुरू हो जाते हैं। चैत्र की नवरात्रियों के बाद महिलाएँ वैशाख कृष्ण पक्ष की अष्टमी का व्रत करके शीतला देवी का पूजन करती हैं। महिलाएँ पवित्र मन से शीतला अष्टमी का व्रत करके शीतला देवी को प्रसन्न करती हैं। ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को सावित्री पूजन किया जाता है। महिलाएँ अपने अखण्ड सुहाग के प्रतीक के रूप में यह व्रत करती हैं।

कोकिला व्रत अषाढ़ माह की पूर्णिमा को दक्षिण भारत में मनाया जाता है। लड़कियाँ सुयोग्य वर की प्राप्ति हेतु इस व्रत को किया करती हैं। सावन माह का प्रत्येक मंगलवार मंगला गौरी पूजन के नाम से जाना जाता है। इसी तरह सावन मास के सोमवार को व्रत कुँआरी लड़कियां अपने उत्तम वर की प्राप्ति के लिए करती हैं। लड़कियों एवं महिलाओं के लिए करती हैं। लड़कियों एवं महिलाओं के लिए इसी श्रावण मास की पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है। इस दिन रक्षा-बन्धन के रूप में भाई के सुखद जीवन की मंगलकामना करती हैं।

भादों बदी तृतीया मिर्जापुर जिले में कजरी तीज, विशेष उत्सव के रूप में मनायी जाती है। ग्रामीण बालाएँ वर्षा ऋतु के इस दिन अपने पति के सुखद जीवन के लिए गीत गाती हैं। इसी महीने की कृष्ण पक्ष चतुर्थी का माताएँ पुत्रों की रक्षा हेतु बहुला चौथ का व्रत करती हैं। इसी के दो दिन बाद हलपष्ठी का व्रत होता है, जो पुत्र और सुहाग की रक्षार्थ महिलाओं द्वारा किया जाता है। हरतालिका तीज इस महीने का सुप्रसिद्ध व्रत है। यह व्रत इस महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को किया जाता है। इसे कुँआरी और विवाहिता दोनों ही करती हैं। शिव-पार्वती के पूजन के साथ इसे उत्तर वर की प्राप्ति एवं सुखद दाम्पत्य के लिए सम्पन्न किया जाता है। भादो बदी अष्टमी को राधालक्ष्मी एवं महाअष्टमी व्रत दोनों ही किए जाते हैं। इसे करने पर महिलाओं की अपनी छोटी-मोटी भूल का प्रायश्चित हो जाता है।

साँझी का त्यौहार आसोज लगते ही पूर्णमासी से अमावस्या तक मनाया जाता है। कुँआरी लड़कियाँ अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए इसे अपनाती हैं। आशा मँगौती का व्रत श्राद्धो के दिन की आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी से प्रारम्भ कर लगातार आठ दिनों तक किया जाता है। इस व्रत को कुँआरी लड़कियाँ ही करती हैं।

आश्विन कृष्ण नवमी को मातृनवमी कहा जाता है। जिस प्रकार पुत्र अपने पिता, पितामह आदि पूर्वजों के निमित्त पितृ पक्ष में तर्पण करते हैं। उसी प्रकार सुगृहणियाँ भी अपनी दिवंगत सास, माता आदि के निमित्त इस दिन तर्पण आदि करती हैं।

कार्तिक कृष्ण पक्ष को चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को करवा चौथ किया जाता है। यह स्त्रियों का मुख्य व्रत है। इस दिन का उपवास दाम्पत्य प्रेम को बढ़ाने वाला हाता है। क्योंकि उस दिन की गोलार्द्ध स्थिति, चन्द्रकलाएँ, नक्षत्र प्रभाव एवं सूर्यमार्ग का सम्मिश्रण शरीरगत अग्नि के साथ समन्वित होकर शरीर एवं मन की स्थिति को ऐसा उपयुक्त बना देता है, जो दाम्पत्य सुख को सुदृढ़ और चिरस्थायी बनाने में बड़ा सहायक होता है। इसी महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीय को भैया दूज मनायी जाती है। इसमें बहिनें भाई के सुखद जीवन के लिए मंगलकामना करती हैं। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी का व्रत महिलाएँ सूर्योपासना के साथ सम्पन्न करती हैं। इस व्रत का धन- धान्य एवं पति-पुत्र की समृद्धि के लिए विशेष महत्व हैं। इस महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी का महत्व कार्तिक स्नान करने वाली महिलाओं के लिए विशिष्ट है।

शीतला षष्ठी व्रत माघ कृष्ण पक्ष की षष्ठी को महिलाएँ करती हैं। इसे करने से आयु तथा सन्तान की कामना फलवती है। इसका महत्व ज्यादातर बंगाल में है जैसे बिहार में सूर्य षष्ठी को अति विशिष्ट माना जाता है। इन व्रतों अतिरिक्त जिस अमावस्या को सोमवार हो, उसी दिन सोमवती अमावस्या का व्रत विधान होता है। यह भी नारियों का प्रमुख व्रत है। प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी को महिलाएँ सन्तान कामना के लिए प्रदोषव्रत का भी पालन करती हैं।

इन सारे व्रतों में प्रायः अधिकांश को भारतीय नारियों, द्वारा पूरा करते देखा जा सकती है। कठोर तप-तितीक्षा, छलकती संवेदना से भर हृदय के लिए वह स्वयं को तिल-तिल करके गलाती रहती है। अपने तप के द्वारा घर की समस्त आपदाओं विपदाओं, संकटों को शमन करती रहती है। उसकी इसी तपश्चर्या के कारण भारत की परिवार संस्था इन विषम परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है और आगामी दिनों में यही उज्ज्वल भविष्य का आधार बनेगी।


नारी अभ्युदय का सूर्योदय

सूर्य कोठरी में कैद नहीं रह सकता। उसकी किरणें बरबस अँधेरे का दूर भगा देती हैं। हर अँधेरा कोना उजाले से भर जाता है। अगले चार कदमों के साथ ही नारी अभ्युदय का सूर्य उदय होने वाला है। अब नारी की क्षमताएँ, उसकी प्रतिभा घर की चहारदीवारी में कैद न रहेगी । जीवन के हर क्षेत्र में, संसार के हर देश में, विश्व के हर कोने में उसकी प्रतिभा के चमत्कार देखने को मिलेंगे। समय का हर पल उसके विकास की एक नयी किरण बनकर प्रकट होगा। इक्कीसवीं सदी की इस भवितव्यता की आभा अभी के वर्तमान और पिछले कुछ पहले के अतीत में देखी जा सकती है। इस सूर्योदय की अरुणिमा की पहली किरण तब प्रकाशित हुई जब उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में राजाराम मोहनराय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे नेताओं ने अपने सुधार आन्दोलनों में नारी शिक्षा व उत्थान को प्रमुख स्थान दिया ।

इन्हीं प्रयासों के परिणाम स्वरूप प्रथम महिला कॉलेज कलकत्ता में खुला 1870-80 के बीच प्रथम महिला स्नातक बनी। इसी के बाद सन् 1882 में प्रथम महिला कानूनी शिक्षा के लिए ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय गयी। 1883 में प्रथम महिला डॉक्टरी पढ़ने विदेश गयी। इसी बीच अनेक महिला शिक्षा संस्थाएँ खुलीं। स्त्री शिक्षा क्षेत्र में अग्रणी महिला सुधारकों में श्रीमती रमाबाई रानाडे, पण्डिता रमाबाई, सरलादेवी चौधरी, लेडी अबला बोस, श्रीमती पी.के.रे. आदि प्रमुख रहीं । डॉ. कर्वे का योगदान भी सराहनीय कहा जाएगा। सत्य व ज्ञान की, खोज में भारत आयी विदेशी महिलाओं ने भारत में नारी अभ्युदय की सुबह लाने के अथक प्रयास किए। इनमें थियोसोफिकल सोसायटी की संस्थापक मैडम ब्लावतस्की, श्रीमती एनीबेसण्ट,सिस्टर निवेदिता एवं मीरा बेन के प्रयासों को प्रेरणा स्त्रोत माना जाएगा।

1917 में श्रीमती माग्रेट कजिंस, श्रीमती बेसेण्ट व श्रीमती सरोजिनी नायडू के अथक परिश्रम के बाद 1920 में स्त्रियों ने चुनावों में भाग लिया। 1929 में पारित बाल विवाह अधिनियम महिलाओं की स्थिति सुधारने में एक नया मोड़ था। राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं का वास्तविक पदार्पण 20 वीं सदी के प्रारम्भ से हुआ। प्रथम दशक में महिलाओं ने स्वदेशी आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरे दशक में महिलाएँ सीधे राजनीति में उतर पड़ीं । 1917 में श्रीमती बेसेण्ट की अध्यक्षता में काँग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही मताधिकार की माँग की । 1917 में ही माग्रेट कजिंस ने मद्रास में ‘वूमेन्स इंडियन एसोसिएशन’ नामक अखिल भारती स्तर पर प्रथम महिला संगठन स्थापित किया।

इन प्रयासों के कारण 1919 में महिलाओं को सीमित मताधिकार प्रदान किए गए। 1926 तक महिलाओं को पुरुषों के समान मत देने का अधिकार मिल गया। अप्रैल 1926 में स्त्रियों ने प्राँतीय विधान-सभाओं में चुनाव लड़ने का अधिकार भी प्राप्त कर लिया। डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी प्रथम महिला विधायक के रूप में विधानसभा में पहुँची व शीघ्र ही विधानसभा की उपाध्यक्ष बनीं । 1925 में श्रीमती सरोजिनी नायडू काँग्रेस के अध्यक्ष पद पर सुशोभित हुई। 1927 में ऑल इण्डिया वुमेन्स कांफ्रेंस की स्थापना हुई। जिसका नारा रहा-”समान अधिकार समान दायित्व।” आज भी यह संगठन महिलाओं की उन्नति के लिए सक्रिय सबसे बड़ा सशक्त संगठन है।

1930 में गाँधीजी के आवाहन पर हजारों महिलाएँ नमक आंदोलन में कूद पड़ी थीं। इसमें 17000 महिलाएँ गिरफ्तार हुई। 1932 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन व 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में हजारों महिलाएँ जेल गयीं। आन्दोलन के साथ महिलाओं ने वैधानिक क्षेत्र में भी प्रतिनिधित्व किया। राउण्ड टेबल कांफ्रेंस व कमेटियों में बेगम शाहनवाज,श्रीमती राधाबाई, सुव्रायन, श्रीमती सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, श्रीमती लक्ष्मी मेनन, श्रीमती राममूर्ति, श्रीमती माणिकलाल जैसी विदुषी महिलाओं ने सक्रियता से भाग लिया।

1937 में प्रान्तों में काँग्रेस मंत्रिमण्डल बने तो 80 महिलाएँ विधानसभा में चुनी गयीं । उत्तरप्रदेश मंत्रिमण्डल में श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित पहली महिला मंत्री बनीं। 1940 में विभाजन के समय दंगों में शान्ति स्थापना व पाकिस्तान से अपहृत स्त्रियों को सुरक्षित बचाने के प्रयास में महिलाओं ने अपने शौर्य- साहस का परिचय दिया। इनमें प्रमुख थीं श्रीमती रामेश्वरी नेहरू, श्रीमती अवम्मा मथाई, श्रीमती सुचेता कृपलानी व कमलादेवी चट्टोपाध्याय। भारत के संविधान निर्माण में महिलाओं का योगदान पुरुषों से किंचित भी न्यून नहीं रहा। इस ऐतिहासिक कार्य में अपना योगदान देने वाली महिलाएँ थीं, लीला रे, सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृतकौर, हसाँमेहता, दुर्गाबाई, रेणुका रे, कमला चौधरी, अम्मुस्वामी नाथन, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी आदि। शायद इसी भागीदारी का परिणाम रहा कि हमारे संविधान में स्त्री, पुरुषों को समान अधिकार दिया गया। जो भारतीय नारी की प्रगति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।

इसी के परिणामस्वरूप सन् 1952 से लेकर अब तक महिलाओं का भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। 1952 में 489 सीटों में से 22 महिला साँसद चुनकर आयीं। 1957 में यह स्थिति 494 में से 27 की रही ।1962 में 494 में से 34, 1967 में 520 में से 31, 1971 में 518 में से 22, 1977 में 542 में से 19, 1980 में 542 में से 28 1984 में 542 में से 44, 1989 में 543 में से 27 1991 में 543 में से 39 एवं 1996 में 543 में से 36 रही है। आज अपने देश में 7 राष्ट्रीय दल, 38 राज्यस्तरीय दल तथा कुल 436 पार्टियाँ है। इतनी पार्टियों में तमाम बाध्यताओं के बावजूद चार हजार प्रत्याशियों में इस बार चुनाव क्षेत्र में 102 महिलाएँ उतारी गयीं थी। जिनमें 36 महिलाएँ लोकसभा में चुनकर आयी हैं।

प्रशासन के क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी सक्रिय रही है। कु. अन्नाजार्ज प्रथम आई.ए.एस. महिलाएँ सैकड़ों है। कुछ महिलाएँ आई.पी.आई.एफ.एस. में भी आयी हैं। किरण बेदी आई.पी.एस. की एक बहुचर्चित जुझारू महिला ऑफिसर हैं। प्रशासन क्षेत्र में महिलाओं की प्रगति के हर वर्ष नए आयाम जुड़ते जा रहे हैं।

सामूहिक स्तर पर महिलाओं की प्रगति ने 70 वें दशक में जोर पकड़ा है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे मान्यता मिली है 1975 में मेक्सिको में 930 देशों की 600 महिलाओं का एक वृहत सम्मेलन हुआ था। जिसकी तत्कालीन उपलब्धियाँ चाहे नगण्य रही हों, लेकिन इसके दस वर्षीय कार्यक्रमों ने आगे निश्चित ही महिलाओं की स्थिति पर अपना प्रभाव डाला। इसके बाद राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न गोष्ठियों, सेमिनारों द्वारा विचार-विमर्शों में गति आयी। प्रगति व विकास की नयी आयी। प्रगति व विकास की नयी योजनाएँ बनायी गयीं, क्रियान्वित की गयीं। इनका लेखा-जोखा पहले देशों के क्षेत्रीय सम्मेलन में हुआ व फिर 1980 में कोपेनहेगन के विश्व महिला सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार केन्द्रित कुल 48 प्रस्ताव पास हुए व कुल 145 देशों ने भाग लिया। सन् 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय कुल 32 देशों की महिलाओं को वोट देने का अधिकार था। सन् 1975 में 124 देशों में यह अधिकार मिल गया। 1985 का विश्व महिला सम्मेलन नैरोबी में हुआ। चौथा विश्व महिला सम्मेलन गतवर्ष 1995 के सितम्बर माह में चीन की राजधानी पेंकिग में हुआ। इसमें 182 देशों की कुल 30,000 महिलाओं ने भाग लिया। इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि औरत को एक सामान्य इनसान के रूप में मान्यता मिली । यह बात सर्वसम्मति से स्वीकारी गयी कि वह उतनी ही इनसान है जितना कि पुरुष। इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि शामिल होने वाले देशों में से 89 देशों ने कई ठोस वायदे किए। 67 देशों ने समयबद्ध कार्यक्रम लागू करने की घोषणा की। इससे पूर्व किसी सम्मेलन में ठोस वायदे नहीं हुए थे। इस सम्मेलन में महिलाओं के कुछ उन अधिकारों पर चर्चा हुई जिन्हें महिलाओं का अधिकार नहीं माना जाता । महिलाओं के शक्तिकरण की बात भी आमतौर पर स्वीकार की गई।

यद्यपि इन बृहद् सम्मेलनों में किए जाने वाले विचार-विमर्श का कोई त्वरित परिणाम नहीं निकलता है, लेकिन फिर भी जैसा कि राष्ट्र संघ के महासचिव बुतरस घासी कहते हैं-”इन विचार- विमर्शों से समस्याओं के प्रति एक विश्व जनमत तैयार होता है। सभी बड़े राष्ट्रों में इन समस्याओं के निदान के लिए भले ही कोई त्वरित सहमति न हो सकी हो लेकिन समस्याएँ व निदान दोनों चिह्नित होते हैं। समझदारी पर एक राय बनती है। यह कोई कम उपलब्धि नहीं है।

नारी अभ्युदय के इन्हीं विश्व -व्यापी प्रयासों के कारण हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती जा रही है। अकेले अमेरिका में, पत्रिकाओं में 42 प्रतिशत समाचार पत्रों में 33 प्रतिशत महिलाएँ कार्यरत हैं। जबकि 1971 में वहाँ मात्र 3 प्रतिशत महिला वकील थीं, 1985 में उनकी संख्या 13 प्रतिशत तक बढ़ी है। गतवर्ष वकालत के प्रथम वर्ष में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या 44 प्रतिशत थी। यहाँ पर सुरक्षा जैसे पुरुष प्रधान क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी पर्याप्त है। 1994 में वायुसेना में 24 प्रतिशत महिलाएँ भर्ती हुई थीं। 1994 में ऑफिसर पदों पर सेना में 16 प्रतिशत जूनियर महिला अधिकारी, वायुसेना में 18 प्रतिशत व नौसेना में 14 प्रतिशत महिला अधिकारी थीं।

ईरान जैसे कट्टरपंथी मुस्लिम देश में नारी वर्ग, नवजागरण के आलोक से अछूता नहीं है। वहाँ शिक्षा क्षेत्र में 74 प्रतिशत महिलाएँ हो गयी हैं। विश्वविद्यालयों में भी चिकित्सा विज्ञान जैसे जटिल विषय में 45 प्रतिशत छात्राएँ अध्ययन कर रही हैं। पत्रकारों में 13 प्रतिशत महिलाएँ रिपोर्टिंग का काम करती हैं। इतना ही नहीं महिलाओं द्वारा संसद में 25 प्रतिशत स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित करने की माँग जोर पकड़ रही है।

जापान के टोकियो शहर में 158 टैक्सी चालकों में 17 महिला चालक हैं। इन महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा कार्य करने में अधिक कुशल व सक्षम पाया गया है।

भारतीय समाज में भी महिलाओं के प्रगतिशील कदमों में काफी तेजी हुई है। पुरुष प्रधान क्षेत्र में भी महिलाएँ अपना वर्चस्व दिखाने लगी हैं। सरकार द्वारा सेना, वायुसेना व सुरक्षा व्यवस्था में स्त्रियों का नियोजन एक क्रान्तिकारी परिवर्तन है। हरिता दिओल वायुसेना में उड़ान भरने वाली प्रथम महिला पायलट बन गयी हैं। कई अन्य महिलाएँ भी वायुसेना में प्रवेश पा चुकी हैं। इससे पहिले सेना, नौसेना व मर्चेण्ट नेवी में भी महिलाओं को प्रवेश मिल चुका है। अल्का खुराना प्रथम महिला लेफ्टिनेंट बनी हैं।

माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला बछेन्द्री पाल के निर्देशन में एक पूरा महिला समूहा माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने में सफल रहा है। पर्वतारोहण ही नहीं पुरुष प्रधान खेलों में भी भारतीय महिलाओं ने भारत के गौरव को बढ़ाया है। भारोत्तोलन के क्षेत्र में कुँअरानी देवी, मल्लेष्वरी देवी, नीलम लक्ष्मी, भारती सिंह की प्रतिभा की सराहना हर किसी ने की है।

इतना ही क्यों अब की बार अटलाँटा ओलम्पिक में महिला खिलाड़ियों की संख्या में पिछली बार की तुलना में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई हैं। अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक कमेटी के अनुसार इस बार ओलम्पिक में कुल 3780 महिला खिलाड़ियों ने भाग लिया । जबकि एथेंस में अब से सौ साल पहले जब ओलम्पिक खेल शुरू हुए थे, तब इस महाप्रतियोगिता में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं दी गयी थी। लेकिन इस बार न केवल महिला खिलाड़ियों की भागीदारी में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी हुई, बल्कि उन्होंने सबको चकित करते हुए अपने-अपने राष्ट्रों के लिए स्वर्ण, रजत, काँस्य पदक भी बटोरे।

खेल ही नहीं, प्रतिभा का कोई भी क्षेत्र हो, नारियाँ पीछे नहीं हैं। विश्व में सर्वाधिक प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से अब तक 25 महिलाएँ अलंकृत हो चुकी हैं। हालाँकि यह संख्या कुछ अधिक नहीं है फिर भी नारी के प्रतिभा के प्रकाश को उजागर करने के लिए इसे पर्याप्त कहा जाएगा। इनमें से 9 महिलाओं को शान्ति के क्षेत्र में, आठ को अन्य उत्कृष्ट कार्यों के योगदान में यह पुरस्कार दिया गया है। इस सबके अतिरिक्त सार्वजनिक एवं कामकाजी

पी.एस.आई.एफ.एस.मे आयी हैं। किरण बेदी आई.पी.एस. की एक बहुचर्चित जुझारू महिला ऑफिसर हैं। प्रशासन क्षेत्र में महिलाओं की प्रगति के हर वर्ष नए आयाम जुड़ते जा रहें।

सामूहिक स्तर पर महिलाओं की प्रगति ने 70 वें दशक में जोर पकड़ा है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे मान्यता मिली है। 1975 में मेक्सिको में 930 देशों की 600 महिलाओं का एक वृहत सम्मेलन हुआ था। जिसकी तत्कालीन उपलब्धियां चाहे नगण्य रही हों लेकिन इसके दस वर्षीय कार्यक्रमों ने आगे निश्चित ही महिलाओं की स्थिति पर अपना प्रभाव डाला। इसके बाद राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न गोष्ठियों, सेमिनारों द्वारा विचार-विमर्शों में गति आयी। प्रगति व विकास की नयी योजनाएँ बनायी गयीं , क्रियान्वित की गयीं । इनका लेखा-जोखा पहले देशों के क्षेत्रीय सम्मेलन में हुआ व फिर 1980 में कोपेहेगन के विश्व महिला सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार केन्द्रित कुल 48 प्रस्ताव पास हुए व कुल 145 देशों ने भाग लिया।

सन 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय कुल 32 देशों की महिलाओं को वोट देने अधिकार था। सन् 1975 में 124 देशों में यह अधिकार था। सन् 1975 में 124 देशों में यह अधिकार मिल गया। 1985 का विश्व महिला सम्मेलन नौरोबी में हुआ । चौथा विश्व महिला सम्मेलन गतवर्ष 1995 का के सितम्बर माह में चीन की राजधानी पेंकिग में हुआ इसमें 182 देशों की कुल 30,000 महिलाओं ने भाग लिया। इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि औरत को एक सामान्य इनसान के रूप में मान्यता मिली। यह बात सर्वसम्मति से स्वीकारी गयी कि वह उतनी ही इनसान है जितना कि पुरुष । इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि शामिल होने वाले देशों में से 89 देशों ने कई ठोस वायदे किए । 67 देशों ने समयबद्ध कार्यक्रम लागू करने की घोषणा की । इससे पूर्व किसी सम्मेलन में ठोस वायदे नहीं हुए थे । इस सम्मेलन में महिलाओं के कुछ उन अधिकारों पर चर्चा हुई जिन्हें महिलाओं का अधिकार नहीं माना जाता। महिलाओं के शक्तिकरण की बात भी आमतौर पर स्वीकार की गई। यद्यपि इन बृहद् सम्मेलनों में किए जाने वाले विचार-विमर्श का कोई त्वरित परिणाम नहीं निकलता है, लेकिन फिर भी जैसा कि राष्ट्र संघ के महासचिव बुतरस घाली कहते हैं -” इन विचार -विमर्शों से समस्याओं के निदान के लिए भले ही कोई त्वरित सहमति न हो सकी हो, लेकिन समस्याएँ व निदान दोनों चिह्नित होते हैं। समझदारी पर एक राय बनती है। यह कोई कम उपलब्धि नहीं है। नारी अभ्युदय के इन्हीं विश्व-व्यापी प्रयासों के कारण हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती जा रही है। अकेले अमेरिका मे, पत्रिकाओं में 42 प्रतिशत समाचार पत्रों में 33 प्रतिशत महिलाएँ कार्यरत हैं । जबकि 1971 में वहाँ मात्र 3 प्रतिशत महिला वकील थीं, 1985 में उनकी संख्या 13 प्रतिशत तक बढ़ी है। गतवर्ष वकालत के प्रथम वर्ष में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या 44 प्रतिशत थी। यहाँ पर सुरक्षा जैसे पुरुष प्रधान क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी पर्याप्त है। 1994 में वायुसेना में 24 प्रतिशत, सेना में 19 प्रतिशत व नौसेना में 17 प्रतिशत महिलाएँ भर्ती हुई थीं। 1994 में ऑफिसर पदों पर सेना में 16 प्रतिशत जूनियर महिला अधिकारी, वायुसेना में 18 प्रतिशत व नौसेना में 14 प्रतिशत महिला अधिकारी थीं।

ईरान जैसे कट्टरपंथी मुस्लिम देश में नारी वर्ग, नवजागरण के आलोक से अछूता नहीं है।वहाँ शिक्षा क्षेत्र में 74 प्रतिशत महिलाएँ साक्षर हो गयी हैं। विश्वविद्यालयों में भी चिकित्सा विज्ञान जैसे जटिल विषय में 45 प्रतिशत छात्राएँ अध्ययन कर रही हैं। पत्रकारों में 13 प्रतिशत महिलाएँ हैं। अखबार में काम करने वाली लगभग 22 प्रतिशत महिलाएँ रिपोर्टिंग का काम करती हैं। इतना ही नहीं महिलाओं द्वारा संसद में 25 प्रतिशत स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित करने की माँग जोर पकड़ रही है।

जापान के टोकियो शहर में 158 टैक्सी चालकों में 17 महिला चालक हैं। इन महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा कार्य करने में अधिक कुशल व सक्षम पाया गया है।

भारतीय समाज में भी महिलाओं के प्रगतिशील कदमों में काफी तेजी हुई है। पुरुष प्रधान क्षेत्र में भी महिलाएँ अपना वर्चस्व दिखाने लगी हैं। सरकार द्वारा सेना, वायुसेना व सुरक्षा व्यवस्था में स्त्रियों का नियोजन एक क्रान्तिकारी परिवर्तन है। हरिता दिओल वायुसेना में उड़ान भरने वाली प्रथम महिला पायलट बन गयी हैं। कई अन्य महिलाएँ भी वायुसेना में प्रवेश पा चुकी हैं। इससे पहिले सेना, नौसेना व मर्चेण्ट नेवी में भी महिलाओं को प्रवेश मिल चुका है। अल्का खुराना प्रथम महिला लेफ्टिनेंट बनी हैं।

माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला बछेन्द्री पाल के निर्देशन में एक पूरा महिला समूह माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने में सफल रहा है। पर्वतारोहण ही नहीं पुरुष प्रधान खेलों में भी भारतीय महिलाओं ने भारत के गौरव को बढ़ाया हैं। भारोत्तोलन के क्षेत्र में कुँअरानी देवी, मल्लेष्वरी देवी, नीलम लक्ष्मी, भारती सिंह की प्रतिभा की सराहना हर किसी ने की है।

इतना ही क्यों अब की बार अटलाँटा ओलम्पिक में महिला खिलाड़ियों की संख्या में पिछली बार की तुलना में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक में कुल 3780 महिला खिलाड़ियों ने भाग लिया । जबकि एथेंस में अब से सौ साल पहले जब ओलम्पिक खेल शुरू हुए थे, तब इस महाप्रतियोगिता में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं दी गयी थी । लेकिन इस बार न केवल महिला खिलाड़ियों की भागीदारी में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी हुई , बल्कि उन्होंने सबको चकित करते हुए अपने-अपने राष्ट्रों के लिए स्वर्ण, रजत, कांस्य, पदक भी बटोरे।

खेल ही नहीं, प्रतिभा का कोई भी क्षेत्र हो, नारियाँ पीछे नहीं हैं। विश्व में सर्वाधिक प्रतिष्ठित नोबुल पुरस्कार से अब तक 25 महिलाएँ अलंकृत हो चुकी हैं। हालाँकि यह संख्या कुछ अधिक नहीं है फिर भी नारी के प्रतिभा के प्रकाश को उजागर करने के लिए इसे पर्याप्त कहा जाएगा। इनमें से 9 महिलाओं को शान्ति के क्षेत्र में, आठ को साहित्यिक रचना हेतु , शेष आठ को अन्य उत्कृष्ट कार्यों के योगदान में यह पुरस्कार दिया गया हैं। इस सबके अतिरिक्त सार्वजनिक एवं कामकाजी क्षेत्रों में महिलाएँ खुलकर बाहर आ रही है। इससे महिला मुक्ति, स्वतन्त्रता एवं आत्मनिर्भरता का नया मार्ग खुला है।

तमिलनाडु के पुददु कोट्टई जिले की 20,000 से भी अधिक महिलाओं ने ट्राइसन स्कीम के अंतर्गत साइकिल चलाना सीख लिया है। इसी जिले में 170 पत्थर की खदानें महिला ठेकेदारों द्वारा सफलतापूर्वक चलायी जा रही हैं। अन्य लोगों के अतिरिक्त इनके पति भी इनके आधीन यहाँ रोजगार करते हैं। इनमें से कुछ पढ़ी-लिखी महिलाएँ यहाँ का सारा हिसाब-किताब सँभाल रही हैं। मद्रास में दो बच्चों की माँ 24 वर्षीय रा. बासन्ती तिपहिया स्कूटर चलाकर अपनी रोजी-रोटी कमाती है। बेंगलोर में भी एक महिला ऑटो रिक्शा चलाकर अपने घर का खर्च चलाती हैं।

आंध्रप्रदेश के नेल्लोर जिले में दोवागुँटा गाँव की स्त्रियों ने 1991 में नशा विरोधी आन्दोलन छेड़ा था। जिसके परिणामस्वरूप 1995 से आंध्रप्रदेश में नशाबंदी लागू कर दी गयी । नशाबंदी लागू होने के बाद नेल्लोर जिले में महिलाओं ने एक वर्ष के अन्दर 7 करोड़ रुपए बचत के एकत्र किए । जिसका उपयोग स्त्रियों , बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य , भोजन आदि की व्यवस्था के लिए किया जा रहा है।

गत 15 वर्षों में नारी आन्दोलनों के कारण कई कानूनों में सुधार हुआ है। महिलाओं के लिए नीतियाँ बनी है, एक राष्ट्रीय आयोग का गठन भी किया गया हैं। इनमें पंचायती राज्य एक्ट के अंतर्गत पंचायत व नगर निगम में 30 प्रतिशत आरक्षण की सुनिश्चितता एक महत्वपूर्ण एवं क्रान्तिकारी कदम हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों की 800,0,00 गरीब महिलाएँ सार्वजनिक पदों पर कार्य करेंगी । इससे ग्रामीण महिलाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यों के प्रति जागरुकता पैदा होगी, जो नारी अभ्युदय के लिए बहुत शुभ लक्षण है।

महिलाओं के संपत्ति सम्बन्धी अधिकार में कानूनी संशोधन किए गए हैं। 1985 के प्रतिभा रानी केस के साथ स्त्रीधन पर महिला के पूरे अधिकार की घोषणा हुई है। शोभा रानी केस (1987) के बाद दहेज माँगना क्रूरता घोषित किया गया है? इसके अनुसार दहेज माँग करने पर विवाह रद्द करने की माँग जायज है। अब महिला को मिली संपत्ति पर महिला का पूरा अधिकार हैं। गुजरात में खोंच लगाने वाली औरतों ने कानूनी लड़ाई जीत ली है। उनको फुटपाथ पर सामान बेचने की अनुमति मिल गयी है।

बढ़ती हिंसा के कारण महिलाओं के लिए महिला थानों की व्यवस्था की जा रही है। जयपुर में पहला सम्पूर्ण महिला थाना खुला है। तमिलनाडु में चार महिला थाने खुले हैं। दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए विशेष कक्ष खुले 10 से ज्यादा वर्ष हो चुके है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में सरकार सात महिला पुलिस थाने खोलेगी । स्वाभाविक है इन सबकी प्रभारी अधिकारी महिलाएँ ही होगी।

वर्तमान में हरियाणा पहला राज्य है जिसने महिलाओं के कल्याण के लिए अलग से महिला तथा शिशु विकास निदेशालय बनाया है व महिला विकास निगम की स्थापना की है । पंचायत व म्युनिसिपल अधिनियम के अंतर्गत महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया है। प्रदेश के कुल 5,958 सरपंचों में 1994 महिलाएँ है और 54,159 पंचों में 17920 औरतें है। यहाँ तकनीकी संस्थानों में तथा स्नातक स्तर तक बालिकाओं की शिक्षा निःशुल्क कर दी गई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हरियाणा से लगे जिलों मुजफ्फरनगर, सहारनपुर मेरठ में शराब के विरुद्ध महिलाओं ने बीड़ा उठा लिया है और मुजफ्फरनगर के खिलाफ एक संगठित आवाज की आवश्यकता को अनुभव करते हुए वर्ष 1996 को पुनर्जागरण वर्ष के रूप में मनाने का संकल्प लिया है।

गाँव हो या देश अथवा फिर विश्व का व्यापक परिसर, हर कहीं नारी अभ्युदय के सुर्योदय की किरणें अपना प्रकाश फैलाने लगी है। शीघ्र ही संसार का हर कोना, जीवन का हर क्षेत्र इनके आलोक से प्रभावित हुए बिना न रहेगा। अगले चार वर्षों के साथ ही नारी का वर्चस्व अपनी प्रखरता स्वयमेव सिद्ध कर देगा। स्वयं को पहचानें, नारी अभ्युदय का सुर्योदय अपने ताप से पुरुषों के उद्धत अहं को जलाकर राख कर दे , उसके पहिले ही उसकी अभ्यर्थना करने की तैयारी करने में ही बुद्धिमता है।


जमींदार और बुढ़िया( Kahani)

उस जमींदार ने विधवा बुढ़िया का खेत बलपूर्वक छीन लिया । बुढ़िया ने गाँव के सभी लोगों के पास इस अत्याचार से बचने की पुकार की, पर किसी की हिम्मत जमींदार के सामने मुँह खोलने की न हुई। दुःखी बुढ़िया ने स्वयं ही साहस समेटा और जमींदार के पास यह कहने पहुँची कि खेत नहीं लौटाते तो उसमें से एक टोकरी मिट्टी खोद लेने दें, ताकि उसे कुछ तो मिलने का संतोष हो जाय। जमींदार रजामंद हो गया और बुढ़िया को साथ लेकर खेत पर पहुँचा। उसने रोते-धोते एक बड़ी टोकरी मिट्टी से भर ली और कहा उसे उठवाकर मेरे सिर पर रखवा दें।

टोकरी बहुत भारी हो गई थी। जमींदार अकड़कर कहा-”बुढ़िया इतनी सारी मिट्टी सिर पर रखेगी तो दबकर मर जायेगी। ”बुढ़िया ने उलटकर पूछा-”यदि इतनी-सी मिट्टी से मैं दबकर मर जाऊँगी, तो तू पूरे खेत की मिट्टी लेकर जीवित कैसे रहेगा।-”

जमींदार ने कुछ सोचा, उसका सिर लज्जा से झुक गया और बुढ़िया के खेत लौटा दिया।


नारी उत्कर्ष का उज्ज्वल भविष्य के लिए महत्व समझा जाय

नारी उत्कर्ष अपने समय का सबसे बड़ा काम है। उसके बिना नवयुग की आशा का पूरा हो सकना बन ही न पड़ेगा। सुविधा साधन बढ़ाने से जीवनयापन में सरलता तो हो सकती है, पर उतने भर से जीवन तो नहीं बनता। जीवन खाने-सोने गम्भीरता व गरिमा तो स्तर पर निर्भर है। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व ही वह आधार है, जिसके सहारे अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी स्वर्गीय संभावनाओं को मूर्तिमान बनाया जा सकता है। इस कमी के रहते यदि सुविधा-साधन उपार्जन को महत्वहीन नहीं बताया जा रहा है, बल्कि यह कहा जा रहा है कि उत्कृष्ट व्यक्तित्व की गरिमा सर्वोपरि है। उसकी उपेक्षा की गयी तो प्रगति का रथ दल-दल में फँसे का फँसा ही रह जाएगा। अतएव नवयुग के उज्ज्वल भविष्य की आशा करते हुए हमें यह सोचना होगा कि समुन्नत एवं सुसंस्कृत समाज के घटक बन सकने योग्य, सुयोग्य एवं आदर्शवादी नागरिकों की फसल कैसे उगायी जाय?

देश में, विश्व में, मानव रत्नों का उत्पादन बढ़े, यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और इसकी पूर्ति सुसंस्कृत नारी के अतिरिक्त और कोई कर ही नहीं सकता। बौद्धिक ज्ञान की अभिवृद्धि स्कूलों में हो सकती है। शिल्प-उद्योग की शिक्षा उद्योगशालाओं में - विज्ञान की प्रयोगशालाओं में मिल सकती है। पर व्यक्तित्व को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने का कार्य परिवार की प्रयोगशाला में नारी के अतिरिक्त और कौन कर सकता है?

बच्चे आसमान से नहीं उतरते। वे माता के शरीर का ही भाग होते हैं। उनमें विद्यमान चेतना का सिंचन -परिपोषण भी माता के द्वारा ही होता है। गर्भस्थ शिशु में प्रसुप्त चेतना को जाग्रत और विकसित करने का काम माता का अचेतन ही करता रहता है। प्रसव के उपरान्त शिशु का आहार माता के वक्षस्थल से ही मिलता है, जो माता के शरीर ही नहीं मन की भी संयुक्त प्रक्रिया अपने साथ जोड़े रहता है। बच्चा इसी को पीता है और न केवल भूख बुझता है - शरीर बढ़ाता है, वरन् चिन्तन एवं दृष्टिकोण का भी अनुदान इसी के आधार पर प्राप्त करता है। मानवी विद्युत के विज्ञान को जो लोग समझते हैं उन्हें स्वीकार करने में तनिक भी कठिनाई न होगी कि प्रबल विद्युत सम्पन्न व्यक्ति अपने से दुर्बल साथियों को अनायास ही प्रभावित करता व छाप छोड़ता रहता है। पर्यवेक्षण से इस तथ्य को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है कि मनुष्य पर सूक्ष्म स्तर का प्रभाव अन्य सबकी अपेक्षा माता का ही अधिक पड़ता है।

नवयुग की नई फसल के लिए नए धान रोपने पड़ेंगे और उनके लिए नई भूमि तैयार करनी होगी। सभी जानते हैं कि ऊसर, बंजर, रेतीली, खारवाली, खाद-पानी रहित कंकड़-पत्थरों से भरी हुई ऊबड़-खाबड़ भूमि में अच्छी फसल उगाना अन्य ऊपरी उपचारों से भी सम्भव नहीं होता। अच्छी भूमि की आवश्यकता समझी जा सकती है, तो फिर यह मानने में किसी को कोई कठिनाई न होनी चाहिए कि अगली प्रखर पीढ़ी के निर्माण की भूमिका सुविकसित नारी के अलावा और किसी के लिए सम्पन्न कर सकना सम्भव नहीं।

पीढ़ियां जनने और सुयोग्य बनाने से भी पूर्व पारिवारिक वातावरण का नव निर्माण आवश्यक है। बच्चों को प्रभावित करने के लिए यह नितान्त आवश्यक है। आज की स्थिति में सुखद परिवर्तन लाने की दृष्टि से भी यह ऐसा कदम है जो अविलम्ब उठाया जाना चाहिए। नारियाँ परिवार की धुरी है। पूरा परिवार -चक्र उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। पारिवारिक सुख के लिए अर्थ साधनों की आवश्यकता से कोई इनकार नहीं करता’; पर ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि इस प्रयोजन के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता सद्भावना एवं सुव्यवस्था की है। यह दोनों तत्त्व विद्यमान रहेंगे तो अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी हँसते-हँसाते दिन गुजारे जा सकते हैं। स्नेह-सौजन्य, सहकार, सद्व्यवहार ही वह पूँजी है, जिसके सहारे एक साथ रहने वाले मनुष्य पारस्परिक आदान-प्रदान से, छोटे से परिवार में स्वर्गीय वातावरण का सृजन कर सकते हैं।

प्रश्न यहाँ भी यही उत्पन्न होता कि ऐसा वातावरण किस प्रकार उत्पन्न हो, उसका सृजन कौन करे ? इस ताले की कुंजी सुगृहिणी के हाथ में है। पुरुष सुयोग्य और सुसम्पन्न होने पर इस संदर्भ में सिर्फ हाथ बँटा सकता है, साधन जुटा सकता है, पर आगे बढ़कर कोई भूमिका निभा सकना उसके लिए सम्भव नहीं हो सकता; क्योंकि उसकी भूमिका परिवार व्यवस्था में बहुत ही स्वल्प होती है। नहाने, खाने, सोने जैसे ढर्रे के नित्य कामों को करने में ही उसका अधिकांश समय बीत जाता है। निपटने के तुरन्त बाद आजीविका उपार्जन अथवा दूसरे आवश्यक कार्यों के लिए उसे बाहर भागने कह जल्दी पड़ती है। ऐसी दशा में वह झल्लाने -समझाने की रस्म पूरी कर देने के अतिरिक्त अन्य कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा ही नहीं पाता। यह कार्य तो सुयोग्य गृहिणी ही कर सकती है, गृहलक्ष्मी को जो नाम दिया गया है, वह अलंकार या भावुकता नहीं, उसके पीछे तथ्य है। लक्ष्मीजी के व्यक्तित्व, कर्तव्य ने अपने लोक को स्वर्ग बनाया, इस पौराणिक प्रतिपादन का प्रत्यक्ष उदाहरण देखना हो तो किसी गृहलक्ष्मी के घर में जाकर वहाँ बरसने वाले स्नेह, सौजन्य और सज्जनोचित क्रिया -कलापों के माध्यम से सहज ही देखा जा सकता है।

हमारे घरों में ऐसा वातावरण बने तो उस प्रयोजन की बहुत कुछ पूर्ति मात्र भावनात्मक आधार पर ही हो सकती है, जिसके लिए प्रचुर सम्पदा का संग्रह आवश्यक समझा जाता है। उत्कृष्ट व्यक्तियों के लिए नयी पीढ़ी कार्यक्षेत्र में उतरे, इसकी प्रतीक्षा करने की भी आवश्यकता नहीं है। आज जैसी भी परिस्थितियाँ है, उन्हीं में परिवार के उद्यान इस स्तर के बनाए जा सकते हैं, जिनमें लगे वृक्ष आज की अपेक्षा कल ही अधिक छाया, हरियाली और फल-फूलों की सम्पदा प्रदान करने लगें। परिवारों का वातावरण सुसंस्कारी बनाया जा सके तो उसमें रहने,पलने वाले व्यक्ति कुछ ही समय में दूसरे ढाँचे में ढले हुए प्रतीत होंगे और परिवर्तन की प्रक्रिया कल से ही आरम्भ हो जाएगी।

आन्दोलनों की चकाचौंध में हमें वे ही कार्य महत्वपूर्ण मालुम पड़ते हैं, जिनके लिए धुआँधार शोर मचता है और कर्णबेधी नगाड़े बजते हैं। लोग यह भूल जाते हैं कि महत्व उपद्रवों, धमाकों एवं बवंडर उन सृजनात्मक प्रवृत्तियों का है जो मनुष्य की अन्तः चेतना को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। परिवार का वातावरण यदि परिष्कृत किया जा सके तो उनमें पलने और परिपक्व होने वाले व्यक्ति कल से ही प्रसन्नचित्त, सत्प्रयोजनों में निरत होते और सन्तुष्ट, उल्लसित दिखाई पड़ सकते हैं। ऐसे लोगों की न केवल क्रियाशक्ति, विवेकशीलता ही बढ़ेगी, वरन् ये सृजनात्मक प्रयोजनों में बढ़-चढ़कर अनुदान भी प्रस्तुत कर रहे होंगे।

व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती कड़ी परिवार है। लोग व्यक्ति की समीक्षा करते हैं और समाज की आलोचना करते हैं। इन्हीं दो को सुधारने के लिए तरह-तरह के प्रयत्न होते हैं और आन्दोलन चलते हैं। पर यह भुला दिया जाता है कि व्यक्ति के निर्माण का अधिकांश उत्तरदायित्व परिवार पर है और समाज की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, परिवार के समूह का नाम ही समाज है। परिवार वह मध्यबिन्दु (न्यूक्लियस) है, जिसकी धुरी पर सार शक्ति -सन्तुलन टिका है, यदि परिवार का महत्व स्वीकारा जाय तो फिर यह मानने में कोई कठिनाई न रहेगी कि उसका स्तर एवं वातावरण बनाने में सुसंस्कृत नारी ही प्रधान भूमिका प्रस्तुत कर सकती है अन्य लोग तो सहायक समर्थक भर हो सकते हैं। नारी उत्कर्ष अभियान प्रकारांतर से परिवारों को स्वर्ग समतुल्य बनाने का ऐसा सृजनात्मक काम है, जिसके सत्परिणामों को सोचने भर से आंखें चमकने लगती है।

उपरोक्त दो बाते तो इस उथली दृष्टि से सोची गयी हैं, जैसे कि गाय पालने से दूध, खाद और बछड़े आदि मिलने के लाभों का लेखा-जोखा लगाया जाता है। यदि और अधिक मानवी दृष्टिकोण से नारी समस्या पर विचार करना हो तो फिर यों सोचना होगा कि नारी भी मनुष्य ईश्वर प्रदत्त कुछ मौलिक अधिकार अपने साथ लेकर आता है। उस पवित्र धरोहर पर अनावश्यक और अवाँछनीय प्रतिबन्ध नहीं लगाए जाने चाहिए। नारी यदि मनुष्य है तो उसे स्वास्थ्य रक्षा का, शिक्षा का, स्वावलम्बन का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए। अस्तित्व की रक्षा -उमंगों की स्वतन्त्रता और विकास की अनुकूलता चाहना कोई ऐसे अपराध नहीं है जिसे बलपूर्वक रोका जाय और परम्पराओं के नाम पर हथकड़ी -बेड़ी पहना दी जाय।

पददलित नारी से किसने क्या पाया ? वह अपने पालने वालों के लिए गले का पत्थर बनकर रह गयी। कैदी भी जेल में कुछ श्रम करते हैं, पर जेलर से लेखा - जोखा माँगने पर वे साफ तौर से स्वीकार करेंगे कि यह घाटे का व्यवसाय है। कैदी जो कमाते हैं, उससे कई गुना खर्च उनके ऊपर बैठता है। प्रतिबन्धित नारी भी अपने संरक्षकों के लिए किस प्रकार उपयोगी और लाभदायक सिद्ध हो सकती है?

यदि नारी को उसके मानवी अधिकार वापिस कर दिए जाएँ तो उसमें पुरुष की नहीं -बल्कि उसके अनाचार की ही हार होगी। इस विजय में नारी की नहीं, न्याय की ही जीत होगी। जो लोग न्याय, औचित्य,समानता,मनुष्यता,धर्म,कर्तव्य आदि का समर्थन, प्रतिपादन करते हैं और अवाँछनीयता को निरस्त करना चाहते हैं, उन्हें यह कार्य अपने घर से ही आरम्भ करना चाहिए। हमारे परिवारों में प्रत्येक नारी को यह अनुभव होना चाहिए कि वह कैदी तरह विवशतापूर्वक नहीं, इस घर में नवनिर्माण की सृजन शिल्पी बनकर रह रही है। उनके ऊपर कर्त्तव्य तो लदे है, पर कुछ अधिकार भी हैं। कम से कम अपनी स्वास्थ्य रक्षा, शिक्षा एवं स्वावलम्बन के लिए मानवोचित सुविधा प्राप्त करने जैसी छूट उन्हें मिल गयी है। ऐसा किया जा सके तो घर से बाहर भी हमारी आवाज वह बल होगा, जिससे न्याय का समर्थन उचित ठहराया जा सके।

करनी और कथनी में अन्तर रखकर हम किसी को भी ऐसा उपदेश नहीं दे सकते, जिसे अपनाने के लिए वह सहमत हो सके। सामाजिक न्याय इस युग की सबसे प्रबल माँग है। यह अपने उद्देश्य की दिशा में एक-एक कदम आगे बढ़ा रही है। सम्भवतः यह इतनी प्रचण्ड है कि कोई इसे रोक न सकेगा। अच्छा हो कि हम अपने घरों में उसका स्वागत-समर्थन आरम्भ करें और सिद्ध करें कि समय की माँग को समझने और स्वीकार करने में हम समर्थ हो गए हैं।

विकसित नारी अपने व्यक्तित्व को समुन्नत बनाकर राष्ट्रीय समृद्धि के सम्वर्द्धन में कितना बड़ा योगदान दे सकती है? इसे उन देशों में जाकर आंखों से देख या समाचारों से जाना जा सकता है, जहाँ नारी को मनुष्य मान लिया गया है और उसके अधिकार उसे सौंप दिये गये है। उपयोगी श्रम करके प्रगति में योगदान दे रही है परिवार की आर्थिक समृद्धि बढ़ा रही है। सुयोग्य बनकर रखने पर अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रही है और परिवार को छोटा -सा उद्यान बनाने और उसे सुरक्षित पुष्प-पल्लवों से भरा-पुरा बनाने में सफल हो रही रही है।पुरुष कन्धे से कन्धा मिलाकर चलन वाली नारी किसी पर भार नहीं बनती,वरन् साथियों को सहारा देकर प्रसन्न होती और प्रसन्न रखती देखी जा सकती है। हम विकसित देशों के प्रशंसक है,भाषा, पोषक आदि को अपनाने में गर्व अनुभव करते है फिर क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उनके व्यवहार में आने वाले सामाजिक-न्याय की नीति को अपनाएँ और कम से कम अपने घर में नारी की स्थिति सुविधाजनक एवं सम्मानास्पद बनाने में भी पीछे न रहें।

नारी देवत्व की मूर्तिमान प्रतिमा है। यों दोष तो सबमें रहते हैं, सर्वथा निर्दोष तो एक परमात्मा हैं। अपने घर की नारियों में भी दोष हो सकते हैं, पर तात्त्विक दृष्टि से नारी की अपनी विशेषता है -उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति। पुरुषार्थ प्रधान पुरुष अपनी जगह ठीक है, पर आत्मिक सम्पदा की दृष्टि से वह नारी से पीछे ही रहेगा। अगले दिनों द्रुतगति से बढ़ता आ रहा नवयुग निश्चित रूप से अध्यात्म मान्यताओं से भरा-पुरा होगा। मनुष्यों का चिन्तन, दृष्टिकोण उसी स्तर का होगा। व्यवस्थाएँ और परम्पराएँ उसी ढाँचे में ढलेंगी। जनसाधारण की गतिविधियाँ उसी दिशा में उन्मुख होंगी। शासनतन्त्र, धर्मतन्त्र, समाजतन्त्र और अर्थतन्त्र का सारा क्लेश उसी स्तर पर पुनर्निमित होगा। ऐसी स्थिति में नारी को हर क्षेत्र में विशेष भूमिकाएँ निबाहनी पड़ेंगी, विशेष उत्तरदायित्व सँभालने पड़ेंगे, कारण कि अध्यात्म की विभूतियाँ जन्मजात रूप से उसी को अधिक परिणाम में उपलब्ध हुई हैं।

नारी उत्कर्ष की आवश्यकता का प्रतिपादन करने और औचित्य सिद्ध करने के उनके आधार हैं। उनमें से किसी को भी अपनाकर विचार किया जाय तो आवश्यक प्रतीत होगा कि समय की माँग को देखा जाय-उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखा जाय तो नारी उत्कर्ष अपने समय का सबसे बड़ा काम प्रतीत होगा। अच्छा हो कि औचित्य को अपनाने के लिए अग्रगामी बनने वाले विवेकशीलों की पंक्ति में हमारा अपना नाम भी सम्मिलित रहे।


महिला जागरण की यह चिनगारी-दावानल बनेगी - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

इस अंक में प्रस्तुत है परमपूज्य गुरुदेव का एक उद्बोधन, जो अब से ठीक इक्कीस वर्ष पूर्व इन्हीं दिनों 19 सितम्बर, 1975 में शाँतिकुँज परिसर में दिया गया था। यह उद्बोधन यहाँ ‘ महिला जाग्रति अभियान’ के अंतर्गत चल रहे कन्या प्रशिक्षण सत्रों के दैनिक उद्बोधनों की शृंखला की एक कड़ी मात्र है। किन्तु इसका एक-एक शब्द ऐसा है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि उन दिनों था, विशेषकर इसलिए भी कि हम युग परिवर्तन के उस क्षण के अति निकट आ पहुंचे हैं, जिसमें मातृसत्ता प्रधान इक्कीसवीं सदी को नारी सदी कहा गया है। नारी उत्कर्ष के लिए कुछ सोचने व कर गुजरने के लिए पढ़े, आत्ममंथन करें व गहन मनन करें- अमृतवाणी का।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों ! भगवान बुद्ध ने धर्मचक्र के नाम से अपना आन्दोलन चलाया था। यह क्या था? धर्म के चक्र को घुमा देना। भगवान बुद्ध ने इसका शुभारम्भ किया और सम्राट अशोक ने इसे आगे बढ़ाया आपको अपने राष्ट्रीय झण्डे के अंतर्गत जो अशोक चक्र दिखाई पड़ता है, वह धर्मचक्र के प्रवर्तन का चिन्ह है। इसका मतलब जो रुकी हुई धाराएँ थीं उनको भगवान बुद्ध ने फिर से प्रवाहवान बना दिया, जाग्रत कर दिया और फिर से चला दिया। तालाब का पानी रुका हुआ हो तो सड़ जाता है। नदी का पानी चलता रहता है। प्रवाह माने पानी का बहाव। नदी के पानी की धारा अगर छोटी भी हो तथा पानी चल रहा हो तो वह सड़ेगा नहीं। तालाब कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका पानी सड़ने लगता है। उसी प्रकार मनुष्य को भी प्रगति की ओर चलना पड़ता है। उसे बार-बार विचार करना पड़ता है कि हमसे गलतियाँ कहाँ हुई ? क्या हुई ? इस प्रकार के विचार करते रहने से आदमी का बहाव ठीक रहता है। आज का दिन वह है जिसमें हमें विचार करना होगा कि पिछले दिनों हमसे क्या-क्या भूलें हुई हैं ? कहाँ हमने गलतियाँ को हैं? उन्हें सुधारने की आवश्यकता है। यह धर्मचक्र प्रवर्तन का दिन है, प्रातःकालीन उदयमान सूर्य का दिन है, अन्धकार की समाप्ति का दिन है। आज हमको अपनी गतिविधियों पर नये सिरे से विचार करना होगा। एक विचार हमारे सामने आता है और आना भी चाहिए कि गाड़ी के दो पहियों में से एक पहिया छोटा हो गया है। इस स्थिति में गाड़ी आगे कैसे चलेगी ? गाड़ी आगे चल नहीं सकती है। हमने-आपने कई बार यह सूना है कि अमुक रोड पर मोटर, ठेलागाड़ी पलट गयी। अगर हम इस दुर्घटना पर निगाह डालें तो यह पायेंगे कि उस मोटर ठेले का एक पहिया पंचर हो गया था। इस पंचर के कारण ही गाड़ी पलट जाती है और दुर्घटना हो जाती है। इसमें क्या होता है कि एक पहिया बड़ा हो जाता है और एक पहिया हवा निकल जाने के कारण छोटा हो जाता है उस समय उसके ऊपर लदा हुआ माल एक तरफ झोंका लेता है और संतुलन बिगड़ने के कारण गाड़ी पलट जाती है। कई बार तो ड्राइवर, कन्डक्टर की मृत्यु भी हो जाती है और कीमती ट्रक चकनाचूर हो जाता है। यह सारा का सारा खेल केवल जरा-सी असावधानी से घटित हो जाता है। इसके कारण मालिक को और ड्राइवर के घर वालों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

इसी प्रकार मनुष्य रूपी गाड़ी भी दो पहियों की है। इसमें एक का नाम पुरुष तथा दूसरे का नाम स्त्री है। ये दोनों अलग-अलग नहीं हैं। आपने अर्द्धनारीश्वर का चित्र तो देखा ही होगा। आधे अंग में शंकर एवं आधे में पार्वती, आधे अंग में राधा एवं आधे में कृष्ण की मूर्तियां बनायी जाती हैं। आधे में सीता ओर आधे में राम होते हैं। यह मूर्तियां आपको जगह-जगह के मेलों में मिलती रहती हैं। वहाँ आपने इन्हें देखा भी होगा तथा अपने घर में रखा भी होगा। इसका मतलब है कि दोनों अंग समान हैं, दोनों अंग मिले-जुले हैं तथा दोनों अंग बराबर महत्व के हैं। मनुष्य के दोनों हाथ बराबर के हैं, अगर किसी के थोड़े उन्नीस-बीस हो जायें, तो हम कुछ कह नहीं सकते हैं परन्तु सामान्यतया दोनों हाथ बराबर के हैं। गाँधीजी का जब दाहिना हाथ थक जाता तो वे बायें हाथ से लिखने का काम करते थे। उसी प्रकार वे चरखा को दायें हाथ से कातने थे। जब वह थक जाता था तो चरखा का पहिया घुमा देते थे और बायें हाथ से कातने का काम किया करते थे। हम एवं आप अभ्यास के कारण ही दायें हाथ से ज्यादा काम कर लेते हैं, परन्तु अगर हमें अभ्यास करें तो देखेंगे कि दायें हाथ से बायाँ हाथ भी कम काम नहीं करता है। बहुत से लोगों को हमने देखा है कि वे बायें हाथ से भी दायें हाथ की तरह ज्यादा और जल्दी काम करते हैं। इसी प्रकार हमारी दोनों आंखें बराबर हैं। इनमें से न कोई हमारी मालिक है और न कोई गुलाम है। इनमें न कोई हिन्दू है और न कोई मुसलमान है, बल्कि एक ही नस्ल की हैं। हमारी दो टाँगें हैं, इनमें से कोई बड़ी एवं कोई छोटी नहीं है। अगर बड़ी-छोटी टाँगें हो जाये तो हमारा चलना मुश्किल हो जाएगा। फिर स्त्री और पुरुष में भेद क्यों? शरीर के दोनों अंगों की भाँति वे समान हैं। इसलिए दोनों की साथ-साथ, पाँव से पाँव मिलाकर, कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए। हमारी प्रगति का रास्ता दोनों के द्वारा ही संभव है।

प्राचीनकाल के इतिहास को उठाकर जब देखते हैं तो हमें कहीं भी कोई फर्क दिखाई नहीं पड़ता। एक बार की बात है- देवताओं ने राजा दशरथ को युद्ध में सहायता करने के लिए बुलाया था। निमन्त्रण पाकर उनका साथ देने के लिए दशरथ उस युद्ध में गये। इस देवासुर संग्राम में उनकी रानी कैकेयी, जो कि धनुष-बाण चलाने में निपुण थी, घुड़सवारी भी कर लेती थी, उनके साथ गयी थी। कहते हैं कि उस देवासुर संग्राम में जब दशरथ के रथ का पहिया कील निकल जाने के कारण डगमगाने लगा, तो उसे वीराँगना कैकेयी ने देख लिया और राजा दशरथ को पता भी नहीं लगने दिया और अपने हाथ की अंगुली उस पहिये में लगाकर सारे युद्ध में डटी रही। वास्तव में वह किसी भी प्रकार राजा दशरथ से कम नहीं थी। वह बराबर की योद्धा, बराबर की वीर, बराबर की शुरमाँ और बराबर की शक्तिशाली महिला थी जो रणनीति में भी निपुण थीं।

एक बार श्रीकृष्ण-अर्जुन में लड़ाई हुई थी, ऐसा एक काव्य में लिखा है। पता नहीं सत्य है या गलत है, परन्तु यह बात सही है कि जब अर्जुन लड़ने के लिए श्रीकृष्ण के पास गये, उस समय सारथी द्रौपदी थी, जो रथ चला रही थी और अर्जुन धनुष-बाण चला रहे थे। दोनों ही बराबर के योद्धा-लड़ाई लड़ने वालों में से थे। रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती का नाम हमें मालूम हैं। उन्हें हम भुला नहीं सकते। हम यह कहना चाहते हैं कि न केवल लड़ाई के सम्बन्ध में बल्कि विद्या एवं ज्ञान के संदर्भ में भी नारियाँ नर से कभी भी, किसी क्षेत्र में पीछे नहीं रही । राजा जनक की सभी में गार्गी एवं याज्ञवल्क्य का संवाद होता है। प्रश्नोत्तर का क्रम चलता है, गार्गी जब याज्ञवल्क्य से प्रश्न-पर प्रश्न पूछती चली गयीं तो उनको पसीना आ गया और वे चक्कर में पड़ गये। गुस्से में आकर याज्ञवल्क्य जी ने कहा कि अगर तुम इसी तरह बार-बार सवाल करती चली गयीं तो हम तुम्हें शाप दे देंगे और तुम्हारा सिर कटकर नीचे आ जाएगा। गार्गी ने कहा- बस हो गया, क्या आपका ज्ञान केवल सिर काटने वाली बात तक ही सीमित है ? अरे ऋषिवर! आप हमारे प्रश्नों का उत्तर दीजिए, चुप क्यों हो गये ? मित्रों, हम कहना यह चाहते हैं कि गार्गी भी उसी प्रकार की विद्वान एवं विदुषी महिला थी, जिस प्रकार याज्ञवल्क्य ऋषि थे। प्राचीनकाल के इतिहास को हम देखते हैं तो हमें पता चलता है कि वे वेद को बनाने वाली तथा मंत्रों की द्रष्टा रही हैं। सात ऋषियों में एक अनुसूया का भी नाम आता है। वे इतनी महान थीं कि सात ऋषियों का नेतृत्व करती थीं।

हम क्या कह सकते हैं ? अगर प्राचीनकाल की धर्म-संस्कृति के इतिहास को देखें, तो आपका पता चलेगा कि उनका स्थान कितना महान था ? नर-नारी दोनों में कोई फर्क नहीं था। अगर हम ध्यान से देखते हैं तो हमें पता चलता है कि नारियाँ सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, साँस्कृतिक, धार्मिक, वीरता एवं पारिवारिक किसी भी क्षेत्र में नर से पीछे नहीं रहीं। गाड़ी के दोनों पहिये बराबर थे। पटरी पर गाड़ी ठीक चल रही थी। हम उन दिनों प्रगति पथ पर निरन्तर आगे बढ़ते चले जा रहे थे। परन्तु हाय रे हमारा समय, हाय रे हमारा दुर्भाग्य! जिसने न जाने हमें क्या-क्या सिखा दिया तथा न जाने क्या-क्या करने को हमें मजबूर कर दिया। जब हम अपने गौरवमय अतीत का विचार करते हैं तो यह पाते हैं कि भारतीय संस्कृति एवं धर्म के अंतर्गत नारी को हमेशा शक्तिरूपा एवं भगवान माना जाता था और उसकी स्तुति इस प्रकार करते थे-

या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

नारी हमारी माँ है और नारी हमारी धर्म-पत्नी भी है। वह हमारी गृहिणी है। घर उसी ने बनाया है, अगर वह नहीं होती तो हम जंगलों में भिखारी एवं फकीर की तरह धूम रहे होते । हमारा कोई भी महत्व नहीं होता। हम नशे में पड़े रहते, होटल में खाना खा रहे होते एवं मस्जिद में नमाज पढ़ रहे होते अथवा मंदिर में कीर्तन- भजन गा रहे होते। हमारी धर्मपत्नी ने हमारे लिए एक घोंसला बनाया, जिसमें जब हम थककर आते हैं तो जाकर विश्राम करते हैं। अगर व नहीं होती तो हमें न जाने कहाँ जाना पड़ता और न जाने हम किस तरह से मारे-मारे फिरते होते।

मित्रों, नारी हमारी बेटी हैं, जो हमारे और आपके अन्दर सौजन्य एवं स्नेह भरती है॥ हमारी आँखों में पवित्रता भरती है और उसे जीवित रखती है। अगर बहिन हमारी न हो, तो हमारे एवं अन्य स्त्रियों में कुत्ते एवं कुतिया की तरह रिश्ता हो जाता और उस समय हर आदमी इसी धरती पर शालीनता एवं मर्यादा का उल्लंघन करने लग जाता। बहिन हमारे ऊपर अंकुश लगाती है ताकि हम इस संसार में एक संस्कारवान इनसान के रूप में जी सकें। परम पवित्रता की मूर्ति हमारी बेटी, शालीनता एवं मर्यादा की प्रतीक हमारी बहिन, घोंसला बनाने वाली हमारी धर्मपत्नी, हमारी सहयोगी, वीर योद्धा, अर्द्धांगिनी और हमारी माँ, जिसके पेट में हमने अपना नौ महीने का समय बिताया। उसके पेट में हमने नौ महीने पैर पसारे और उसकी छाती का दूध पिया है ! उसे हम कैसे भूल सकते हैं। वास्तव में हम नारी को माँ, पत्नी, बहिन, बेटी किसी भी रूप में देखें। हर रूप में वह त्याग, तपस्या, क्षमा करुणा और दया की मूर्ति हमें दिखायी पड़ती हैं जिसके कारण हमें मनुष्य होने का गौरव प्राप्त हुआ है। वह पूज्य है, जिसका भारतीय संस्कृति एवं धर्म में कितना महत्वपूर्ण स्थान था, परन्तु हाय रे भगवान! आज हम जब उसकी स्थिति देखते हैं तो हमें रोना आता है कि हे भगवान ! उसका रूप क्या हो गया ! नारी के दयनीय रूप को आज हम देखते हैं तो हमें बड़ा दुःख बड़ा क्लेश होता है। आजकल यह सब उनके अभ्यास में आ गया है, स्वभाव में आ गया है।

हम अभ्यास की बाबत क्या कह सकते हैं ? रोम में कैदियों को एक ऐसे बन्द कमरे में रख जाता था, जहाँ रोशनी भी नहीं पहुँचती थी। जब उन्हें रिहा किया जाता था तो वे पागलों की तरह से भागते थे और यह कहते थे कि हमें सूरज की रोशनी नामंजूर हैं। हम बाहर नहीं जाएँगे। हमें अंधेरे में ही रहना अच्छा लगता है। वे भगवान से प्रार्थना करते थे कि हम अंधेरे में ही रहें ताकि हमारी आँखों की रोशनी बनी रह सके। इसी प्रकार आज के समाज, परिवार व्यक्ति के अंतर्गत यह स्वभाव-सा बन गया है कि उन्हें नर-नारी के बीच कोई अन्तर दिखाई नहीं पड़ता है। स्त्रियाँ घर में खाना बनाती हैं, घर का अन्य काम करती रहती हैं। हम बाहर खेतों में, कारखानों में काम करते हैं। इसमें क्या फर्क है, इसमें क्या सोचना है ? परन्तु यह कहने की बात नहीं है। यह भेद आपको तब मालूम पड़ सकता है जब आपको स्त्री बना दिया जाय। आपके ऊपर जादू का डंडा फिरा दिया जाय और आपको स्त्री बना जाय। आप सबके लम्बे-लम्बे बाल हो जायें तथा दाढ़ी-मूंछें समाप्त हो जायें। सबके दो-तीन-चार बच्चे हो जायें। आपको यह हुक्म दे दिया जाय कि आप घर से बाहर नहीं निकल सकते हैं। आपको जब भी बाहर जाना हो तो एक आदमी को लेकर जाना होगा। आप कहेंगे। कि गुरुजी! हम तो मर जाएँगे। हमें इस प्रकार दंडित मत करो। हम तो दफ्तर से आते हैं और सिनेमा देखने चले जाते हैं। भला ऐसा कैसे हो सकता है कि हम घर के जेलखाने में बन्द रहें। यह तो हमारे लिए बड़ा मुश्किल होगा। चलिए, इतना नहीं तो इतना ही हम करते हैं कि आप में से हर आदमी को कल से कम से कम घूँघट मार कर दफ्तर , बाजार जाना होगा! आप कहेंगे कि कोई आदमी इस तरह नहीं रह सकता है। गुरुजी, हमारी तो मिट्टी पलीद हो जाएगी ओर हम कहीं के नहीं रहेंगे, हम तो बर्बाद हो जाएँगे! वास्तव में यह सत्य है कि इस प्रकार की प्रथा तो इनसान के लिए गैर मुनासिब है। बेटे! जिस प्रकार के बन्धन जानवर बर्दाश्त नहीं कर पाते, वे बन्धन इनसान पर लगा दिये जाएँगे तो वह कैसे बर्दाश्त करेगा ? जानवर मुँह खोलकर सड़क पर चल सकते हैं तथा चिल्ला सकते हैं, परन्तु यह क्या तुक है कि हमारी पत्नी मुँह नहीं खोल सकती। हमारे मारने-डाँटने पर वह कुछ न कहे तथा घर में चिल्लाये भी नहीं, यह कैसे हो सकता है ? और अगर वह चिल्लायेगी तो हमारे पड़ोसी इकट्ठे हो जाएँगे तथा हमारी बेइज्जती हो जाएगी। यदि इस बात को वह अपने भाई से, बाप से कह दे तो, आप उसे भला-बुरा कहते हैं कि तूने हमारी शिकायत क्यों की ? बेटे ! बात-बात पर हम यह कहते हैं कि हम मर्द हैं ओर तु औरत है। इसलिए हमारी बात को तुझे अपने भाई से नहीं कहना चाहिए और हम जैसे कहते हैं।, तुझे वैसा ही करना चाहिए। ये विचित्र परिस्थितियां जैसे-घूँघट वाली, लड़के एवं लड़की में भिन्नता वाली, शिक्षा से वंचित हो जाने वाली न जाने क्यों और कहाँ से उत्पन्न हो गयी हैं जिसके कारण नारियों की स्थिति दयनीय हो गयी है। भगवान न करे कहीं आपको लड़की बना दिया जाय और आपकी बहिन को लड़का बना दिया जाये तथा घर में भैंस का दूध आये और आपको न दिया जाये तो आपकी क्या मनःस्थिति होगी । जरा सोचने का प्रयास करें कि अगर आपकी मम्मी यह कहें कि लड़कियाँ दूध नहीं पीती हैं, अगर वे दूध पी लेंगी तो उनकी मूँछें निकल आयेंगी। लड़की बाद में कहती है कि मम्मी हम दूध नहीं पियेंगे, पर हमारी मूँछें मत निकलवाना।

बेटे ! एक ही माँ के पेट से जन्मे दो बच्चों में से एक को पढ़ने के लिए स्कूल भेजा जाता है और दूसरे को नहीं भेजा जाता है। एक को अपनी जायदाद में से हिस्सा दे दिया जाता है और दूसरे को दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया जाता है। यह कैसी विडम्बना है हमारे समाज की ? इतना ही नहीं लड़के की शादी होती है तो पैसा लिया जाता है और जब लड़की की शादी होती है तो समाज के लोग यह कहते हैं कि इस मरी हुई गाय को हम खरीदने के लिए तैयार नहीं हैं, अगर इसका देना ही चाहते हैं तो इसके कफ़न के लिए, इसके खाने के लिए आपको पैसा देना होगा। तब हम यह कहते हैं कि हमारी लड़की गूँगी , बहरी, अंधी नहीं है। आपके घर में चार रोटी खायेगी, फटे-पुराने कपड़े पहनेगी परन्तु आपके घर का काम करके पैसा चुका देगी। आप हमसे पैसा क्यों माँगते हैं ? आपके घर में सफाई का काम, खाना बनाने का काम, बच्चा पैदा करने का काम, चौकीदारिन का काम करेगी तथा आपसे तो केवल चार रोटी ही तो लेगी। साहब आप पैसा क्यों माँगते हैं ? जिस लड़की को योग्य बनाया, जो कि बी.ए., एम.ए. पास है। आप उसके पिता से पैसा माँगते हैं, लानत है आपको।

आपको मालूम नहीं है हमारे आश्रम में जो महिलाएँ खाना पकाती हैं, उनको हम खाना देते हैं, कपड़े देते हैं, उनका स्वास्थ्य खराब होने पर दवा-दारु की भी व्यवस्था करते हैं तथा हर महीने साठ रुपये उनके बैंक खाते में पैसा भी जमा करते हैं । बेटे, तुम्हें मालूम होना चाहिए कि केवल खाना पकाने की मजदूरी इतनी होती है, जबकि घर की महिलाएँ तो किफायतशारी होती है। आप को तो उन्हें इससे भी अधिक देना चाहिए क्योंकि वे सफाई करती हैं, कपड़े धोती हैं। आपको एक बात और बतायें, जब हम गायत्री तपोभूमि में रहते थे, उस समय आस-पास ज्यादा बस्ती तो थी नहीं, सो चोर आया करते थे। तब हमने एक बूढ़ा चौकीदार रखा था। हम उसको पचास रुपये माहवार देते थे। अब हम आपसे पूछते हैं कि आपकी स्त्री चौकीदारिन है कि नहीं ? हाँ साहब है तो, क्योंकि हम तो सुबह आफिस चले जाते हैं, दुकान चले जाते हैं और शाम को कभी-कभी ज्यादा काम होने पर रात को भी आते हैं। वह सारे दिन घर की रखवाली करती है और रात में भी करती है। आप पचास रुपये प्रतिमाह के हिसाब से दिन एवं रात के सौ रुपये निकालिये ! अगर यह घर में नहीं होती और आप आफिस चले जाते, तो चोर आते और आपके कमरे का ताला तोड़कर सारा सामान चुराकर ले जाते, यह हिसाब आपको जोड़ना चाहिए कि खाना पकाने का, चौकीदारी का, कपड़ छोने का, बाल-बच्चा पैदा करने का घर को व्यवस्थित रखने का कितना पैसा खर्च करना पड़ेगा, उतना पैसा हिसाब से दीजिए। यह सब हम साँसारिक बातों का जिक्र करते हैं। आपसे! अभी हम उसकी आत्मा की बात नहीं करते! इतना होने के बाद भी आप पन्द्रह-बीस हजार रुपये माँगते हैं। इस बात पर कभी तो आपको सोचना चाहिए कि यह क्या है ?

मित्रों, यह अनीति है, भ्रष्टाचार और अन्याय है, दुष्टता है, अत्याचार है। जिस दिन ये चीजें समाज का अंग बन जाएँगी, उस दिन समाज का सत्यानाश हो जाएगा। यहाँ पर मनुष्यता का कोई मूल्य ही नहीं रह जाएगा। वह समाज नष्ट हो जाएगा, वह समाज कभी फल-फूल नहीं सकता है । हजार वर्ष तक गुलाम बनाकर मुसलमान शासक हमारे ऊपर बुरी तरह से हुकूमत करते रहे। इतनी बुरी हुकूमत दुनिया में कभी भी नहीं हुई। इतने कत्लेआम किसी जमाने में नहीं हुए होंगे। शहर के शहर, गाँव के गाँव जिसमें स्त्री, पुरुष और बच्चे सभी रह रहे होगे, उन्हें उन लोगों ने साफ कर दिया। ऐसे अत्याचार दुनिया में कहीं नहीं हुए। ये केवल हिन्दुस्तान के ऊपर हुए हैं। इसका कारण हम हैं, क्योंकि हमने आज तक अपने आधे अंग पर जुल्म किया है। यदि ये जुल्म हम जानवरों पर करते, मुर्गे पर करते भी तो कोई और बात थी, परन्तु इन अज्ञानियों ने तो अपनी बेटी, बहिन, माँ और धर्मपत्नी को खाया है और रोज ही उनका जनाजा निकलता जा रहा है। हम बच्ची को पढ़ाना नहीं चाह रहे हैं। क्योंकि हमें दहेज में मोटी रकम देनी होगी।

सामाजिक अत्याचार की बात हम क्या कहें ? हमारे पिताजी की जब मृत्यु हुई तो हमें याद है कि हमारे घर में महाब्राह्मण आये थे। उन्होंने भोजन किया, उसके बाद उन्होंने कहा कि हमारे मुँह को भरो। फिर उन्होंने अपना मुँह खोल दिया और सभी लोगों ने उनके मुँह में पैसा डालना शुरू किया। उस सस्ते के जमाने में उनके मुँह में लगभग चालीस या पचास रुपया आ गये। उस जमाने में उनका ही काफी महत्व था। आज जो दहेज माँग रहे है। उन निखट्टू लोगों की तुलना हम उन्हीं महाब्राह्मण से करते हैं, जिन्हें कोई शर्म नहीं कि घर में शोक का वातावरण है और हम पैसे के लिए बाध्य कर रहे हैं। हमने समाज के अंतर्गत नारियों को शिक्षा से, घर के सामान्य अधिकारों से वंचित कर दिया है और दहेज के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। वास्तव में हमने इन्हें इनके मौलिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया है। हमने यह कभी नहीं सोचा कि इससे समाज की क्या स्थिति होगी। हर संस्था वालों ने सरकार ने इस बात की पुष्टि की है कि हर आदमी अपने मौलिक अधिकारों का भाग करने के लिए स्वतंत्र है। फिर भी हमने स्त्रियों को इससे वंचित क्यों किया ? यह एक मूल प्रश्न हम सब के सामने है।

हम पूछते हैं कि आप क्या लड़की कन्यादान करेंगे ? क्यों? यह कोई बेचने का सामान है जो आप बुड्ढे से मोल-तोल करके बेच रहे हैं। यह सम्पत्ति नहीं है, इनसान है। राष्ट्रसंघ के संविधान में यह स्वीकार किया गया है कि नर एवं नारी दोनों के मौलिक अधिकार एक हैं, मानवीय अधिकार एक हैं, मानवीय अधिकार एक हैं। दोनों मनुष्य है इसलिए उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं। हमारे भारतीय संविधान ने भी यह घोषणा की है कि हम नर एवं नारी की भिन्नता को नहीं मानते हैं। हम दोनों को इनसान मानते हैं। दोनों को स्वाधीन मानते हैं। दोनों को स्वेच्छा एवं सहयोग पर विश्वास करते हैं। कोई किसी की संपत्ति या मिलकियत नहीं हो सकते हैं। परन्तु हमारे व्यवहार में यह कहाँ आ रहा है। आज भी स्त्री तो हमारे गले का पत्थर बनी हुई है, वह भार बनी हुई है। आज वह हमारे लिए सहायक नहीं है। उसके बाप ने पढ़ने नहीं दिया, हमने उसे पढ़ने नहीं दिया। उसके विकास के लिए किसी ने प्रयास ही नहीं किया । वह स्वावलम्बी नहीं है, कोई उद्योग नहीं कर सकती है, खेती बाड़ी , नौकरी नहीं कर सकती है। वह तो चार-पाँच बच्चों की माँ है। वह क्या कर सकती है।

हमारी नौकरी क्लर्क की है। हमें ढाई सौ या तीन सौ रुपये मासिक वेतन मिलता है। हम उस परिस्थिति में मर जाते हैं तो हमारे मरने के बाद उस बीबी का क्या होगा, जिसके पास चार पाँच बच्चे मौजूद हैं। कोई जमाना था जब जेठ, देवर बच्चों को पाल लिया करते थे। कोई जमाना था जब भाई कहता था कि हम अपनी बहिन का पालन कर लेंगे, हमें कोई चिन्ता नहीं है। परन्तु आज जमाना बदल चुका है, परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। आज कोई एक भी उसके सहयोगी या सहायक नहीं बन पा रहे हैं। यह कलयुग है, यह सन् उन्नीस सौ पचहत्तर है। जिसमें भाई अपने भाई के खून का प्यास बना हुआ है। वह चाहता है कि भाई की मृत्यु बाद भाभी को हम जहर दे दें, बच्चों को लावारिस करदें ताकि खेत के हम मालिक बन जायें। इनका पैसा, गहना हमें मिल जायें, कहा भाभी को घर से भगा देते हैं, कहते हैं तू कौन होती है। ये मेरे भाई की कमाई है, इसमें मेरा हम है। इन पाँच बच्चा का क्या होगा ? वह मायके जाती है, तो उससे कहा जाता है वापस वहीं जाओ और देवर-जेठ के जूठे बर्तन साफ करो। ये उन स्त्रियों का हाल है जिन्हें हम धर्मपत्नी, अर्द्धांगिनी कहते हैं। बेटे! हमें ही यह सोचना होगा कि हमारी भी कोई जिम्मेदारी है या नहीं? हम तो कपड़े और चार रोटी के टुकड़े फेंककर निश्चित हो जाते हैं। आप बी.ए. पास है तथा आपकी पत्नी मैट्रिक है तो आप उसे पढ़ाने का प्रयास करें, उसे भी बी.ए. पास कराइए अधिक बच्चे पैदा करके उसकी सेहत खराब न करें, उसके लिए जालिम तथा हत्यारे न बनें। आप इनसान हैं तो इनसानियत की बात कीजिए और इस समस्या को गम्भीरता के साथ सोचिए।

महात्मा गाँधी दक्षिणी अफ्रीका गये थे। वहाँ गोरे एवं काले में अन्तर समझा जाता था काले में अधिकांश हिन्दुस्तानी थे। उनके स्कूल, बसें सब अलग थी गोरे, काले लोगों को बहुत नीच समझते थे। गाँधीजी ने वहाँ सत्याग्रह प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने कहा कि हम भी इनसान हैं तथा हमें भी गोरे लोगों की तरह रहने का मौका मिलना चाहिए । हमें भी हमारा हम मिलना चाहिए। इस काले-गोरे की मान्यता को विश्व की मानवीय संस्था राष्ट्रसंघ ने अस्वीकृत कर दिया। उन्होंने कहा कि नस्ल की वजह से कोई बड़ा-छोटा नहीं हो सकता आदमी अपने कर्त्तव्य-कर्मों से बड़ा-छोटा हो सकता है। अच्छे काम करेंगे तो आपका सम्मान हो सकता है तथा बुरे काम करेंगे तो आपका अपमान हो सकता है। वंश-जाति की वजह से आप अपने को बड़ा नहीं समझ सकते। आपके बाप-दादा ब्राह्मण थे, परन्तु आप ब्राह्मण नहीं हो सकते। गाँधीजी ने वहाँ कहा कि गोरे-काले का अन्तर नहीं होना चाहिए । इस पर उन लोगों ने कहा कि आप जो हमसे कहते हैं, वह भेदभाव पहले भारत में समाप्त कीजिए।

मित्रों, स्त्रियाँ भी इनसान हैं, उन्हें भी वे अधिकार प्राप्त होने चाहिए, जो मर्दों को प्राप्त हैं। उन्हें भी यज्ञोपवीत, हवन, यज्ञ, गायत्री उपासना का अधिकार होना चाहिए। इसके लिए हमने अब तक लड़ाई लड़ी है और आगे भी लड़ेंगे। बाप-दादों की बातों को हम नहीं जानते, वे अंधकार के जमाने में पैदा हुए थे। मध्यकालीन युग में स्त्रियों पर तरह-तरह के बंधन लगाये गये थे। उससे पहले प्राचीनकाल का जो समय था, वह दिन का समय था। उस समय में उनका गौरवमय अतीत था। वे लक्ष्मीनारायण, सीताराम, राधेश्याम के रूप में विराजमान थीं। हम सरस्वती का त्यौहार, बसंत पंचमी, लक्ष्मी का दिन, दीपावली तथा दुर्गा का दशहरा, गायत्री का गंगा दशहरा मनाते हैं। यह क्या हैं ? बेटे, यह स्त्रियों का सम्मान ! प्राचीनकाल में दोनों एक-दूसरे को सम्मान देते और कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। ये देवी थी। हर नारी के नाम से साथ देवी शब्द इसीलिए प्रयुक्त होता था। हम इन्हें भगवान का ही शक्ति रूप मानते थे। शास्त्रों में नारी को हमने भगवान माना है और सारे पूजा-पाठ उसी के निमित्त हैं। नवरात्रि में हम नवदेवियों की पूजा करते हैं।

मध्यकाल में बाप-दादों ने आपके अंदर जो मान्यताएँ बना दीं, वे वस्तुतः आन्ता और अंधकार युग की देन हैं। हमें मालूम है एक जमाना ऐसा भी आया था, जिसमें जिसकी लाठी उसकी भैंस होती थी। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती थी। यह जंगल के कानून थे जो इनसान को खा जाते थे। आल्हा-ऊदल, मलखान की कहानी तो आपने पढ़ी है न । वे क्यों लड़ाई लड़ना चाहते थे ? ये लड़ाई लड़ना चाहते थे ? ये लड़ाई बिना सिर-पैर की थीं। इसमें न कोई इनसाफ की, न इनसानियत की और न ही आजादी की लड़ाई थी, यह तो केवल उनके अहंकार की लड़ाई थी और यह यह थी कि हम उसकी लड़की को छीनकर भाग जाएँगे। यह सामन्तवादी, जमींदार एवं ठाकुरों का युग था। इनका साम्राज्य सारे हिन्दुस्तान में और कहीं-कही तो हिन्दुस्तान से बाहर भी फैल गया था। उस जमाने में लुटेरे दो चीजें लुटते थे। एक तो जवान मर्दों को, जिनसे बैलों की तरह काम कराते और गुलाम बनाकर रखते थे। आपको मालूम नहीं मिस्र के पिरामिड में तीस लाख गुलामों का खून किया गया था। जब तक गुलाम जवान रहे, उनका उपयोग किया जाता रहा और जब वे बुड्ढे , असमर्थ हो गये तो उन्हें मार दिया गया।

इसी सामंतशाही युग में लूट का दूसरा चरण यह उठा कि जहाँ कही भी जवान औरतें दिखीं, उनको चुरा लिया गया, अपहरण कर लिया गया। रईस, जमींदारों के यहाँ सौ से लेकर एक हजार तक औरतें रखी गयी। आप सोच सकते हैं कि इस परिस्थिति में वहाँ बगावत पैदा हो सकती थी या नहीं ? इन लोगों ने उन स्त्रियों पर लगाम लगाकर, चेहरे पर नकाब, बुर्का लगाकर बहुत ही कन्ट्रोल में रखा आपको मालूम नहीं है जब आजादी मिल गयी तो हैदराबाद के राजा निजाम पर साढ़े सात सौ औरतों ने ‘क्लेम’ किया था। आप जरा विचार करके देखें कि किसी के यहाँ अगर दो औरतें होती हैं तो खून-खच्चर होता है और जहाँ साढ़े सात सौ औरतें होंगी वहाँ खून खच्चर नहीं होगा तो क्या होगा ? इसी कारण उन्हें बन्धनों में रखा जाता था ताकि वे बगावत न करें, कहीं जहर न देदें और अपने द्वेष एवं अहंकार वंश कोई घटना न कर दे। उन्हें घूँघट में इसलिए रखा जाता था ताकि उनके आँसू उनके पड़ौसी ,भाई, बाप को दिखायी न पड़े सकें, नहीं तो कोई भी उनके साथ सहानुभूति कर सकता है। यह उस जमाने की बात है जब मुसलमान हमारे देश में आये और उन्होंने बहुपत्नी प्रथा को प्रारम्भ किया था। इसके बाद हिन्दुओं के यहाँ भी यह परम्परा धीरे-धीरे शुरू हो गयी।

उस जमाने में पंडित लोग भी कहीं-कहीं ऐसे उदाहरण दे दिया करते थे कि जब भगवान श्रीकृष्ण के सोलह हजार छह सो आठ पत्नियाँ हो सकती हैं, तो आप क्यों नहीं रख सकते? आप कम से कम सोलह सौ तो रख ही सकते हैं। ऐसी विडम्बना मध्यकाल में पंडों-पुरोहितों ने फैलाकर नारी समाज पर घोर अपराध किया था। वे लोग राजा जनक के सौ रानियों का, उनकी पटरानियों का विवरण देते थे।वे राजा दशरथ की भी चार रानियों की बातें करते थे। क्या आप उन्हें ही बाप-दादे कहेंगे , जो लूटकर औरतें लाते थे और बंदिशों में रखकर उनके साथ अत्याचार करते थे। आप उन्हें बाप-दादा मानने से इनकार करें, यह हमारी राय है । इन्हीं लुटेरों से सयानी लड़कियों को बचाने के लिए माँ-बाप ने छोटी उम्र में शादी ब्याह यानि बाल विवाह शुरू कर दिये। तब सोलह वर्ष की लड़की की गोद में बच्चा आ जाता था। वह कमजोर हो जाती थी, चल-फिर भी नहीं सकती थी, परन्तु माँ-बाप यह कहकर संतोष कर लेते थे कि हमारी लड़की जैसी भी है, कम से कम जिन्दा तो रह जाएगी। कोई डाकू-लुटेरा उठाकर तो नहीं ले जाएगा। उस जमाने में जो कुछ भी रहा हो उसे हम यह मान सकते हैं कि लोगों ने आपत्ति धर्म का पालन किया और कम उम्र में बच्चों का विवाह करा दिया। मजबूरी में आदमी न जाने क्या -क्या कर देता है।

बेटे, आज ये परिस्थितियाँ हमारे सामने अस्वाभाविक हैं। इनका समापन होने की, सुधार होने की आवश्यकता है। हम अपनी मान्यताएँ, अपना दृष्टिकोण बदलें, अन्यथा ऐसी स्थिति में मनुष्य का जीवन कैसे चल सकता है ? हमने अपनी जिन्दगी में हो अपने बीबी-बच्चों को अनाथ कर दिया। उनके भविष्य में गुजारे का भी काई प्रबन्ध नहीं किया। हमने इस बात पर गंभीरता से विचार किया है कि स्त्रियों को स्वावलम्बी होना चाहिए। इसके लिए उन्हें पढ़ाने की , प्रोत्साहन की आवश्यकता है। विदेशों में महिलाओं के जिम्मे सौ प्रतिशत काम हैं। वहाँ पुरुष वर्ग फैक्टरी तथा सरकारी ऑफिसों में काम करते हैं, बाकी कृषि, सामाजिक कार्य तथा स्कूल-कालेजों में स्त्रियाँ ही काम करती हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक गाड़ी के दो पहियों की तरह हैं।क्या वहाँ लोग जीवन नहीं जो रहे ? अपने देश में लोगों को यह शंका है कि यहाँ की नारी आगे बढ़ जाएगी तो हमारा जीवन गुजारना मुश्किल हो जाएगा। इन मान्यताओं को हमें बदलना होगा। जब तक हम एक-दूसरे के पूरक बनकर काम नहीं करेंगे, हमारा विकास संभव नहीं है। जापान में जाकर देखिये वहाँ महिलाएँ कैसे आत्मविश्वास से काम करती हैं।

एक हम हैं जो सोचते हैं कि वह आगे बढ़ेगी तो उसके पंख निकल आएँगे । वह हमें मारेगी, गाली देगी, जवाब देगी और भी न जाने क्या-क्या कुकल्पना करते हैं। अगर आप कोई गलत कार्य करते हैं तो वह नाराज क्यों नहीं होगी ? अगर आप गाली देंगे तो वह गाली देगी। आप शराफत के साथ पेश आएँगे तो वह भी शराफत से पेश आएगी। अगर आप प्यार भरा व्यवहार करेंगे तो वह भी आपसे प्यार भरा व्यवहार ही करेगी ! अतः आप गलत काम की बजाय अच्छा काम ही करें। आप शीशे के सामने हाथ जोड़ेंगे तो उधर से भी हाथ जोड़ता व्यक्ति नजर आएगा। अतः जैसा व्यवहार करेंगे वैसा ही उसका व्यवहार होगा। हम अपना सुधार कर लें तो सब ठीक हो जाएगा। बेटे, हम कठोर हैं, स्त्रियाँ कठोर नहीं होतीं। औरतें माँ होती हैं, बहिन होती हैं, बेटी होती हैं, पत्नी होती हैं। जिनके हृदय में करुणा, दया एवं प्यार भरा हुआ होता है। यह समय दूसरा आ गया है। अब हमें इनसाफ को और सत्य को लेकर चलना होगा। हमारे मिशन का उद्देश्य धर्म प्रचार का तो है ही, उसके साथ ही बेइन्साफी के विरुद्ध लोहा लेना भी हमारा काम है। केवल ज्ञान-अर्जन, अनुष्ठान कराना हमारा उद्देश्य नहीं है, बल्कि दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन करना भी हमारा उद्देश्य है।

एक बार द्रोणाचार्य से लोगों ने पूछा- आप अपनी पीठ पर तीर-धनुष क्यों रखे हैं ? आप तो संत हैं, ब्राह्मण हैं। उन्होंने कहा-

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श्रेष्ठतर माताएँ (Kahani)

माँ हर स्थिति में माँ है । बच्चे को संकट में डालकर भी शिक्षण देना उसका कर्तव्य है । घोंसले में बैठके नन्हें से परिन्दे ने पर फड़फड़ाये और सहम कर जहाँ था, चिपककर बैठ गया । बच्चे को भयभीत देख माँ ने उसे घोंसले से धकेलते हुए कहा - “ जब तक तू भय नहीं छोड़ेगा, उड़ना कहाँ से आयेगा ? “ दूसरे क्षण परिन्दा हवा में उड़ रहा था ।

चित्तौड़ के राजकुमार एक चीते का पीछा कर रहे थे । वह चोट खाकर झाड़ियों में जा छिपा था । राजकुमार घोड़े को झाड़ी के इर्द-गिर्द घुमा रहे थे ; पर छिपे चीते को बाहर निकालने में वे सफल न हो पा रहे थे ।

किसान की लड़की यह दृश्य देख रही थी । उसने राजकुमार से कहा - “ घोड़ा दौड़ाने से हमारा खेत खराब होता है । आप पेड़ की छाया में बैठे । चीते को मार कर मैं लाये देती हूँ ।” वह एक मोटा डंडा लेकर झाड़ी में घुस गई ओर मल्ल युद्ध में चीते पछाड़ दिया । उसे घसीटते हुए बाहर ले आई और राजकुमार के सामने पटक दिया ।

इस पराक्रम पर राजकुमार दंग रह गये । उन्होंने किसान से विनय करके उस लड़की से विवाह कर लिया । प्रख्यात योद्धा हमीर उस लड़की की कोख से पैदा हुआ था । माताओं के अनुरूप संतान का निर्माण होता है।

सुभद्रा की कोख से अभिमन्यु जन्मे थे । अंजनी ने हनुमान को जन्म दिया था । श्रेष्ठतर की माताएँ अपने गुण, कर्म, स्वभाव के अनुरूप ही श्रेष्ठ संतानों को जन्म देती है। हिरण्यकश्यपु के घर प्रह्लाद जैसा भक्त होना ;नारी की -उनकी धर्मप्राण माता कयाधू की योग्यता का प्रमाण है।


अपनों से अपनी बात - - नारी जागरण के लिए सुयोग्य नारियाँ आगे आएँ

अपने वर्ग का पिछड़ापन दूर करने के लिए प्रायः सभी क्षेत्रों में दूरदर्शी एवं भावनाशील व्यक्ति आगे आते हैं । भारत की स्वाधीनता भारतीयों ने ली । बंगला देश के लिए बंगालियों ने लड़ाई लड़ी । मजदूर यूनियन अपनी रक्षा के लिए प्रयत्नशील है। व्यापारी, कर्मचारी, किसान दलाल सभी अपने -अपने वर्ग की समस्याओं को लेकर योजना बनाते हैं।

महिला जाग्रति की आवश्यकता को पूरा करने के लिए सुयोग्य एवं सेवा भावी महिलाओं को आगे आना चाहिए । भारत की दशा कुछ विचित्र है । यहाँ नर-नारी का संपर्क संकीर्णता की दृष्टि से देखा जाता है, उस पर नाक -भौं सिकोड़ी जाती है तथा उँगली उठायी जाती है। ऐसी दशा में पुरुषों का इस दिशा में सफल हो पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । ऐसी दशा में यही मार्ग रह जाता है कि इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए स्वयं महिलाएँ आगे आएँ ।

भगवान ने जिन्हें विद्या और भावना दी है, साथ ही इतनी सुविधा भी है कि घर -परिवार से कुछ समय सेवा-कार्यों के लिए निकल सकना कठिन नहीं है, उन्हें तो इस क्षेत्र में कदम बढ़ाना ही चाहिए । जिनके बच्चे बड़े हो चले है, परिवार में दूसरे लोग गृहव्यवस्था को सँभालने वाले है, नौकर आदि का प्रबन्ध है उनके लिए तो यह विशेष कर्तव्य हो जाता है कि वे महिला जागरण के लिए नियमित रूप से समय लगाना आरम्भ कर दे । परिवार वाले अनिच्छा प्रकट करते हों तो भी उन्हें अनुनय -विनय करके, दुःख -असन्तोष प्रकट करके तर्क व कारण समझाकर यह प्रयत्न करना चाहिए कि उन पर लगे बन्धन धीरे-धीरे शिथिल होने लगे । प्रयास के लिए भावनाएँ हो, हृदय में गुरुसत्ता के लिए समर्पण हो तो यह सब कुछ असम्भव नहीं ।

हर गाँव -मुहल्ले में कुछ महिलाएँ इस स्थिति में होती है कि वे चाहें तो महिला जागरण के कार्य को अपने हाथ में ले सकें । युग निर्माण शाखा के कार्यकर्ताओं को स्वयं या अपनी पत्नियों के सहयोग से उनसे संपर्क करना चाहिए और उन्हें नवजागरण की पुण्य -प्रक्रिया से परिचय कराना चाहिए । धीरे-धीरे उन्हें युग निर्माण साहित्य पढ़ाना चाहिए, ताकि नवजागरण की आवश्यकता पूरी करने में सुयोग्य महिलाओं के योगदान के महत्व को भली प्रकार समझ सकें ।

ऐसी कुछ महिलाओं को एकत्रित होकर ‘युग निर्माण महिला मण्डल’ का गठन करना चाहिए । ऐसे काम हमेशा मिल-जुल कर संगठित रूप से ही सम्भव हो सकते हैं। ऐसे महिलाएँ मिल जुलकर एक टोली बनाकर उन प्रवृत्तियों को अग्रगामी बना सकती है, जो महिला जागरण की दृष्टि से अनिवार्य है। इस महिला मण्डल को प्रथम रचनात्मक कार्य अपराह्न काल की प्रौढ़ महिला पाठशाला चलाने का कार्य हाथ में लेना चाहिए । जिसमें (1) साक्षरता (2) युग निर्माण विचार पद्धति (3) गृहोपयोगी शिक्षण (4) युग संगीत, इन चार बातों का प्रबंध हो । जहाँ चार नहीं वहाँ कम रखे जा सकते हैं। पर युग निर्माण विचार पद्धति की शिक्षा तो अनिवार्य होनी ही चाहिए ।

इस पाठशाला के अतिरिक्त दूसरा काम यह उठाना चाहिए कि गाँव , मुहल्ले की शिक्षित महिलाओं की सूची तैयार की जाय और इनके पास जाकर तीसरे प्रहर अवकाश के समय नवनिर्माण का साहित्य पढ़ने के लिए सहमत करना चाहिए । लाभ समझाने से वे आसानी से समझ भी जाएँगी । ज्ञान वृद्धि के साथ -साथ इसमें समय को रुचिपूर्वक काटने का मनोरंजन भी तो हैं गठन पाठन के इस क्रम महत्व नहीं है। जो महिलाएँ अधिक पढ़ी-लिखी नहीं है, उनके लिए इसमें प्रेरक कथाओं -कहानियों के रूप में ऐसी सामग्री नियमित प्रकाशित होती है, जो उन्हें नवयुग को विचार -पद्धति से परिचित कराने के साथ अनगिनत प्रेरक भावनाओं को उमगाने वाली होगी । पत्रिका और साहित्य के रूप में चलते फिरते पुस्तकालय की व्यवस्था बनाना महिला मण्डल का दूसरा काम है।

तीसरा कार्य साप्ताहिक रूप से महिला सत्संग का प्रबन्ध होना चाहिए, जिसमें सम्मिलित भजन-कीर्तन,कथाप्रवचन तथा शंका समाधान का प्रबन्ध रहे । इसमें आवश्यकतानुसार प्रमाणिक पुरुष भी बुलाए जा सकते हैं। इसमें व्यक्ति और समाज की विशेषतया महिलाओं से सम्बन्धित समस्याओं पर प्रकाश डाला जाना चाहिए और उसका हल बताया जाना चाहिए । जिन स्थानों पर सक्रिय युग निर्माण कार्यकर्ताओं की टोलियाँ हो वहाँ महिला जागरण शाखाएं समर्थ ओर सशक्त न हो, यह दुःखद बात है । ऐसे स्थानों पर अपेक्षा यह की जाती है कि धर्ममंच की कार्यक्रमों में भी महिलाएँ पूरे उत्साह के साथ भाग लें । यज्ञो के संचालन , विविध संस्कारों के सम्पादन के आचार्यत्व से लेकर युग संदेश देने तक हर धार्मिक, बौद्धिक कार्यक्रम में उनको समान भागीदार रहना चाहिए ।

इस क्रम में बच्चों के जन्मदिन संस्कार, पुँसवन, मुण्डन जैसे संस्कार महिलाएँ स्वयं ही भली -भांति संचालित कर सकती है। कर्मकाण्ड एवं धर्मकृत्य पूरा का पूरा उन्हें ही संभालना चाहिए । मंत्र एवं सामूहिक रूप से बोलें । व्याख्या कोई एक महिला कराये । सम्भव हो तो अन्त में उपस्थित समुदाय का उद्बोधन भी करना चाहिए । इससे नारियों में ऐसे आत्मविश्वास का उदय होगा, जो भावी पीढ़ी के लिए अमृत और इस समाज के लिए देवता के वरदान से कम नहीं होगा । थोड़ा- सा संकोच , थोड़ी -सी झिझक दूर की जा सके और साहस , सूझ-बूझ का परिचय दिया जा सके तो कई हजार परिवारों में यह क्रम अविलम्ब प्रारम्भ हो सकता है। पीछे तो यह परम्पराएँ अपने आप ही घर घर पनपने वाली है । श्रेय तो आगे बढ़कर चलने का है, सो वह हिम्मत इस देव परिवार को महिलाओं में प्रस्फुटित होनी ही चाहिए ।

महिला शाखाओं के गठन, सदस्यता प्रमाण पत्र, साहित्य आदि के लिए शांतिकुंज से परामर्श किया जा सकता है। इन प्रयत्नों को अगली सदी की अगवानी के रूप में उत्साह एवं उल्लास के साथ किया जाना चाहिए । जिस क्रम में ये प्रयत्न अग्रसर होंगे, उसी अनुपात में भारतीय समाज की शान्ति, प्रगति एवं प्रसन्नता सम्भव होगी ।

*समाप्त*