गायत्री को गुरुमंत्र कहा जाता है। गुरुतत्त्व द्वारा मिलने वाली श्रद्धा, प्रेरणा, भाव-संवेदना एवं अनुशासन का प्रकाश गायत्री महामंत्र में सन्निहित है। इसीलिए गायत्री को गुरुमंत्र कहा गया है। यों तो कितने ही मंत्र हैं-वैदिक, पौराणिक, तांत्रिक। इन मंत्रों की संख्या का ठीक-ठीक अनुमान लगा पाना भी सम्भव नहीं है। ऐसी स्थिति में गायत्री को ही गुरुमंत्र क्यों कहा गया? यह विचारणीय हो सकता है। भारतीय संस्कृति में गुरु की व्याख्या करते हुए उसके दो महत्वपूर्ण कार्य बतलाये हैं-एक ज्ञानवर्द्धन और दूसरा अशुभ निवारण। गायत्री की शक्ति के भी दो पक्ष हैं। पहला सृजनात्मक और दूसरा अशुभ निवारण। गायत्री की शक्ति के भी दो पक्ष हैं। पहला सृजनात्मक और दूसरा विध्वंसात्मक। गायत्री की सृजनात्मक शक्ति को ‘ब्रह्मविद्या’ कहा जाता है और ध्वंसात्मक शक्तियों को ‘ब्रह्मास्त्र’। साधक की तुलना राजहंस से की जाती है, जिस पर आरुढ़ गायत्री महाशक्ति साधक का कल्याण करती है और दुखदायी विघ्नों का निवारण करती है।
इसी महाशक्ति की चर्चा जब युगशक्ति के रूप में की जाती है तो “परित्राणाय साधूनां” और विनाशाय च दुष्कृताम् की अवतार प्रतिज्ञा पूरी होती है। सृजन और ध्वंस वस्तुतः एक सम्मिलित पूरक प्रक्रिया है। नया कुछ निर्माण करना हो तो पुराने को हटाना पड़ता है। भारतीय अध्यात्म शास्त्रों में वर्णित भगवान के अवतारों की वही क्रियापद्धति रही है, अधर्म, अनीति और आतंक का निवारण और धर्म, नीति, सत्प्रवृत्तियों का प्रोत्साहन-अभिवर्द्धन। इस संदर्भ में एक बात और उल्लेखनीय है-अवतारों की संख्या चौबीस ही क्यों गिनी जाती है? जबकि समय-समय पर कितनी विभूतियाँ अवतरित होती रहीं और अपनी निर्माण प्रक्रिया को पूर्ण करती रहीं। इस संख्या में नाम या क्षेत्र विशेष का महत्व नहीं है। वस्तुतः संकेत युगशक्ति के रूप में अवतरित होती रहने वाली गायत्री महाशक्ति की ओर है। उसे नाम और रूप भले ही चाहे जो दिया जाता रहा हो।
गायत्री के चौबीस अक्षरों में वे सभी सिद्धान्त सूत्र रूप में सन्निहित हैं, जिनके आधार पर युगान्तरकारी परिवर्तन प्रस्तुत होते हैं। ईश्वरीय-शक्ति का अवतरण-प्राकट्य हर ऐसे सन्धिकाल में होता है, जब परिवर्तन के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता। उसके स्वरूप और क्रियाकलाप में हेर-फेर अवश्य होता रहता है। पृथ्वी को समुद्र से निकालने और हिरण्याक्ष का संहार करने के लिए वाराह हेतु नृसिंह अवतार, आततायियों का संहार करने के लिए परशुराम, मर्यादा की स्थापना के लिए कृष्ण और बौद्धिक क्राँति के लिए बुद्ध को अवतरित होना पड़ा। इस अवतरण प्रक्रिया में कहीं भी जड़ता नहीं है, अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना ही प्रधान लक्ष्य रहा है।
इस बार नवयुग की-युगशक्ति गायत्री की अवतरण प्रक्रिया भी असुरता के उन्मूलन और देवत्व के उदय के सनातन उद्देश्य से पूर्ण है। परिस्थितियों के अनुरूप उस चेतना के उदय हेतु प्रयासों का स्वरूप भी भिन्न होगा। कारण पहले असुरता सीधे आक्रमण करती थी और समाज व्यवस्था को अस्त-व्यस्त, तहस-नहस करती थी। परन्तु आज असुरता ने छद्म आक्रमण की नीति अपनाई और वह जनमानस में विकृतियाँ उत्पन्न कर रही है। आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा इस व्यापक स्तर पर होने लगी है कि उनके लिए कटिबद्ध व्यक्ति अपवाद बनते जा रहे हैं। अतः अवाँछनीयता, असुरता को निरस्त करने का यह धर्मयुद्ध धर्मक्षेत्र में-अन्तः-करण की गहराई में उतर कर लड़ा जाना है और जनमानस के परिष्कार द्वारा, आस्थाओं के परिशोधन द्वारा नवयुग के निर्माण में ग्वाल-वालों की, रीछ-वानरों की भूमिका निभाने के लिए हर जागरुक व्यक्ति को आगे आना है।
यह युग-परिवर्तन की संधिवेला है। सन 2000 तक की अवधि ऐसी है। व्यक्ति और समाज को पतन-पराभव के गर्त में धकेलने वाली दुर्बुद्धि का अन्त होने जा रहा है। सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का उषाकाल सन्निकट है। उज्ज्वल भविष्य के अरुणोदय में विलंब नहीं। इतने पर भी इस संकट की सम्भावना है कि चलते-चलते आसुरी दुष्प्रवृत्तियाँ अपना आक्रमण तीव्र करें और ‘मरता सो क्या न करता’ की उक्ति चरितार्थ करने में कोई कोर-कसर न उठा रखें। युग संधि की इस वेला में इस प्रकार की उथल-पुथल सम्भावित है। वातावरण में भरती जा रही विषाक्तता, जनसंख्या अभिवृद्धि, अणु-आयुधों और विस्फोटों की भरमार, मानवी चिन्तन और चरित्र में निकृष्टता एवं आचरण में भ्रष्टता का असाधारण समावेश, अन्तर्ग्रही परिस्थितियों एवं क्रुद्ध प्रकृति की विनाश-लीला के मिले-जुले परिणाम मानव समाज के लिए अहितकर ही हो सकते हैं। युगसन्धि की इस वेला में इस खतरे से सावधान रहने और बिना किसी भय-आतंक के, शौर्य और साहस के साथ इन्हें निरस्त करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है।
स्रष्टा अपनी कलाकृति का संतुलन इस सीमा तक नहीं बिगड़ने देगा कि विनाश की विभीषिका शालीनता की संस्कृति को निगल जाय। ऐसे अवसरों पर भगवान की युगान्तरीय चेतना सूक्ष्मजगत में अवतारी प्रवाह बनकर गतिशील होती है और उस प्रवाह में जाग्रत आत्माएँ नवसृजन के उत्तरदायित्वों को वहन करने के लिए अन्तःप्रेरणा से प्रेरित होकर उत्साहपूर्वक कार्यक्षेत्र में उतरती हैं। नैष्ठिक साधकों से लोकमंगल के लिए भी इन अवसरों पर कुछ पुरुषार्थ-परमार्थ करते रहने और युगपरिवर्तन के लिए आवश्यक वातावरण बनाने एवं प्रखर व्यक्तित्वों के निर्माण का योजनाबद्ध तरीके से प्रयत्न करते रहने का अनुरोध किया गया है। युगधारा को अधिकाधिक द्रुतगामी बनाने के लिए निष्ठावान साधकों की संयुक्त शक्ति का अभियान ही अधिक प्रभावी सिद्ध होगा। ऋषियों की संयुक्त शक्ति ने ही महाशक्ति दुर्गा का, सीता का अवतरण किया था। आज भी उसी संयुक्त प्रयास की, संयुक्त शक्ति की आवश्यकता है। नैष्ठिक गायत्री उपासक अपने आत्मनिर्माण एवं लोकनिर्माण के व्रतों को अपनाने और क्रियान्वित करने के लिए प्रयत्नशील रहकर युगसन्धि में जागरुक आत्माओं की भूमिका भली-प्रकार सम्पन्न कर सकेंगे। महाकाल ने समस्त श्रद्धावानों, आस्तिकों को यह प्रेरणा अपनाने और प्रस्तुत सुअवसर का समुचित लाभ उठाने का आमंत्रण भेजा है, इसे अपनाने में हर दृष्टि से लाभ ही लाभ है।
इन दिनों जाग्रत आत्माओं को अपनी आत्मशक्ति का अधिकाधिक विकास करना चाहिए। अशुभ को निरस्त करने और सृजन को समर्थ करने के लिए आत्मशक्ति की इन दिनों विशेष आवश्यकता है। उसे उपलब्ध करने के लिए उपासना का एक अभिनव उपक्रम आरम्भ किया गया है, जिसे प्रज्ञा परिवार के समस्त परिजनों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। उनके संपर्क में जा भी जीवन्त-आत्मचेतना सम्पन्न व्यक्ति आयें, उन्हें भी अपनाने के लिए कहा जाना चाहिए।
युगसन्धि की इस विषम वेला में की जाने वाली साधना का रूप इस प्रकार है-
1- दैनिक उपासना में न्यूनतम गायत्री महामंत्र की तीन माला का जप अथवा 24 मंत्र लेखन अथवा पाँच गायत्री चालीस पाठ। नैष्ठिक साधक इतना तो करें ही, अधिक बन पड़े तो और भी उत्तम है।
2- गुरुवार को अस्वाद व्रत एवं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन।
3- अश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में सामूहिक गायत्री अनुष्ठान।
इस नियमित उपासना-क्रम के अतिरिक्त प्रातःकाल की शक्ति-संचार साधना है। यह सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक की अवधि में किसी भी समय 15 मिनट तक की जा सकती है। प्रक्रिया इस प्रकार है। उपासना-कक्ष या कोलाहल रहित स्थान में ध्यानमुद्रा में बैठें। ध्यानमुद्रा अर्थात् स्थिर शरीर, शान्तचित्त-सुखासन (पालथी मारकर), कमर सीधी-हाथ गोदी में-आँखें बन्द।
-अब धीरे-धीरे साँस खींचें। अनुभव करें कि हिमालय केन्द्र से प्रेरित विशिष्ट प्राण प्रवाह श्वास के साथ घुलकर शरीर के भीतर पहुँच रहा है।
-यह प्राण प्रवाह युक्त साँस मल-मूत्र छिद्रों के मध्य अवस्थित मूलाधार चक्र तक पहुँच कर उससे टकराता है।
-प्राणवायु के टकराने से मूलाधार में सोई पड़ी सर्पिणी के सदृश्य कुण्डलिनी शक्ति में हलचल उत्पन्न होती है।
-कुण्डलिनी श्वास में घुले प्राण प्रवाह को पीकर जाग्रत और परिपुष्ट होती है। उस जागरण से स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को बल मिलता है।
-साँस को खींचते समय प्राण के मूलाधार चक्र तक पहुँचने का और रोकते समय मूलाधार से टकराने तक कुण्डलिनी जागने की धारणा की जाए।
-साँस छोड़ते समय यह भावना की जाए कि प्राणवायु मेरुदण्ड मार्ग से ऊपर उठती हुई मस्तिष्क मध्य केन्द्र तक पहुँचती है और वहाँ से वह नासिका द्वारा अनन्त अंतरिक्ष में बिखर जाती है। यह समस्त प्राण प्रवाह ब्रह्माण्ड में फैलता है। उसके प्रवाह से विभीषिकाएँ निरस्त होती हैं और अनुकूलताएँ बढ़ती हैं।
-यह एक प्राणायाम हुआ। उसमें पूरक, कुँभक और रेचक तीन ध्यान हैं। तीनों के उद्देश्य हैं-धारण, जागरण एवं संचार। इससे आत्मसत्ता की प्रखरता बढ़ती है और वातावरण के अनुकूलन में सहायता के अनुकूलन में सहायता मिलती है।
-जप की दैनिक, व्रत की साप्ताहिक और अनुष्ठान की छमाही साधना करने का नियम बनाया जाना चाहिए और उसे निष्ठापूर्वक निभाया जाना चाहिए। कारणवश कभी व्यतिरेक उत्पन्न हो जाए तो उसकी पूर्ति अगले दिनों कर ली जाए।
यह साधना देखने में सामान्य किन्तु परिणाम में असामान्य है। इसमें विशेष महत्व शक्ति-संचार साधना का है। इसे हिमालय पर अवस्थित अध्यात्म ध्रुव केन्द्र का-महाकाल का अनुदान समझा जाए। सन् 2000 तक यह विशिष्ट प्राण प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर प्राण प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर चलता रहेगा। प्रज्ञा परिजनों को यह अतिरिक्त अनुदान है। इसका स्वरूप प्राण प्रवाह है, जिसे संकल्पपूर्वक खींचने पर साँस के साथ भीतर प्रवेश करने का अवसर मिलता है। दूसरा कुम्भक भाग-मूलाधार में अवस्थित दिव्य कुण्डलिनी शक्ति को जगाता है। उसे प्रसुप्ति का जागरण समझा जाए। अतीन्द्रिय क्षमता अन्तराल में छिपी पड़ी है। उसे जगाने पर साधक में दैवी शक्तियाँ बढ़ती और परिपुष्ट होती हैं।
तीसरे पक्ष रेचक को विश्व-कल्याण के निमित्त प्रस्तुत किया गया साधक का योगदान कह सकते हैं। दूषित और विक्षुब्ध वातावरण पृथ्वी के इर्द-गिर्द छाया हुआ है। विपत्तियों और विभीषिकाओं के बरसने की आशंका इसी काली घटा से है। इसे धकेल कर अनन्त ब्रह्माण्ड में तिरोहित करना है। इस प्रयोजन के लिए संचार साधन द्वारा छोड़ा गया प्राण प्रवाह अभीष्ट उद्देश्य को पूरा कर सकेगा। प्रज्ञा परिजनों द्वारा एक नियत समय पर किये जाने वाली यह प्राण वर्षा अवाँछनीयता को धकेलने और खदेड़ने का काम भली-प्रकार कर सकेगी। लाखों-करोड़ों परिजनों द्वारा निष्ठापूर्वक नियमित रूप से निर्धारित समय पर साँस द्वारा छोड़ा गया प्राण प्रवाह जहाँ प्रतिकूलताओं को खदेड़ने में सफल होगा, वहाँ इस बात की भी पूरी-पूरी आशा है कि अनुकूलताएँ दिव्यलोकों से खर्चें और प्राणियों में सद्भावना तथा पदार्थों में सार बनकर पृथ्वी पर उतरें।
इस साधना की न्यूनतम अवधि पन्द्रह मिनट रखी गयी है। अधिक समय बढ़ाना हो तो उसे हर सप्ताह एक मिनट के क्रम से बढ़ाया और अधिकतम आधा घण्टा तक पहुँचाया जा सकता है। इससे अधिक न किया जाए। बालक एवं दुर्बल व्यक्ति दस मिनट ही करें। जो आत्मिक दृष्टि से प्रौढ़ एवं परिपक्व हैं वे एक-एक मिनट बढ़ाते हुए आधा घण्टे तक पहुँचा सकते हैं। अधिक भोजन से उत्पन्न होने वाली हानियों की तरह इस प्राण-संचार साधना को भी उपयुक्त सीमा तक सीमित रखने को ही कहा गया है।
युग-सन्धि की यह विशिष्ठ साधना सभी नैष्ठिक परिजन तो कर ही रहे हैं, किन्तु आवश्यक यह भी है कि इस नवरात्रि से इस साधना उपक्रम से अधिक से अधिक नये व्यक्तियों को अवगत करायें और मिशन से जोड़ें, ताकि आत्मकल्याण एवं विश्वकल्याण का उभयपक्षीय प्रयोजन पूरा कर सकना सम्भव हो सके।
प्रतिमाओं में देखे जाने वाले भगवान मनुहार करने पर भी नहीं बोलते हैं, लेकिन अन्तःकरण वाले भगवान जब दर्शन देते हैं तो बोलने के लिए, बातें करने के लिए व्याकुल दिखते हैं। यदि हम अपने को तनिक-सा अंतर्मुखी कर सकें, तो उनके स्वरों की झंकृति स्पष्ट सुनाई देने लगेगी। न जाने कब से वे हमसे कह रहे हैं-” मेरे इस अनुपम उपहार मनुष्य जीवन को इस तरह न बिताया जाना चाहिए, जैसे कि बिताया जा रहा है। ऐसे न बरबाद करना चाहिए, जैसे कि बरबाद किया जा रहा है। ऐसे न गंवाना चाहिए, जैसे कि गंवाया जा रहा है। यह महत्वपूर्ण प्रयोजन के लिए है। ओछी रीति-नीति अपनाकर मेरे इस अनोखे-अनूठे अनुदान का उपहास न बनाया जाना चाहिए।
जब और भी बारीकी से उनकी भाव-भंगिमा और मुखाकृति को देखेंगे तो प्रतीत होगा कि वे विचार-विनिमय करना चाहते हैं और कहना चाहते हैं कि बताओ तो सही-इस जीवन-सम्पदा का इससे अच्छा उपयोग क्या ओर कुछ नहीं हो सकता जैसा कि किया जा रहा है? वे उत्तर चाहते हैं और सम्भाषण को जारी रखना चाहते हैं।
लेकिन उत्तर तो हम तभी दे सकते हैं, जब अपने को बारीकी से जानने की कोशिश करें। अपनी गहरी छान-बीन करें। स्वयं की रुचियों-प्रवृत्तियों की जाँच-पड़ताल करें? विचारों को ही नहीं संस्कारों को भी परखें। आखिर कहाँ और कौन-सा वह तत्व है, जो हमें भगवान से सम्भाषण नहीं करने दे रहा है, आखिर किस वजह से हम उन्हें उत्तर देने से कतरा रहे हैं, किस कारण हमारी जीवन-सम्पदा नष्ट होती चली जा रही है?
कारण कुछ भी हो, अवाँछित तत्व जहाँ कहीं भी हो उसे अपने से निकाल फेंके। परिष्कृत होते ही अहसास होगा, अन्तरंग में अवस्थित भगवान की झाँकी, दर्शन, संभाषण, परामर्श और पथ-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं है। उसमें गाय, बछड़े जैसा विह्वल वात्सल्य भी है। परमात्मा हमें अपना दुग्ध अमृत-अजस्र अनुदान के रूप में पिलाना चाहते हैं। पति और पत्नी की तरह भिन्नता को अभिन्नता में बदलना चाहते हैं। हमारी क्षुद्रता को अपनी अनन्तता में बदलना चाहते हैं। हमें अपनाने की अपने में आत्मसात कर लेने की उनकी उत्कंठा अति प्रबल हैं।
फिर देरी क्यों? विलम्ब किसलिए? हम ईश्वर के बनें, उसके होकर रहें, उसके लिए जिएँ। अपने को इच्छाओं और कामनाओं से खाली कर दें। उसकी इच्छा और प्रेरणा के आधार पर चलने के लिए आत्मसमर्पण कर सकें, तो परमेश्वर को अपने कण-कण में लिपटा हुआ, अनन्त आनन्द की वर्षा करता हुआ पाएँगे। आनन्द की यह वर्षा हमारे रोम-रोम को पुलकन, प्रफुल्लता, उल्लास और शक्ति से भर देगी। जीवन कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाएगा।
उसके आँखें भले ही न थीं, लेकिन आवाज काफी सुरीली थी। लोग उसके गीतों को मुग्ध होकर सुनते थे। उसने भी काफी पद, दोहे, चौपाइयाँ, भजन आदि याद कर रखें थे। जिस किसी बस्ती में वह जाता, आस-पास भीड़ जमा हो जाती। सभी उसे आदर से अन्धे बाबा कहकर पुकारते।
प्रतिदिन उसके लिए किसी न किसी घर से खाना आ जाता था। वह हमेशा गाँव से थोड़ी दूर बगीचे में बने मन्दिर में रहता था। बाहर के यात्री भी बगीचे में आते, बाबाजी के दर्शन करते और कुछ प्रसाद-दक्षिणा आदि दे जाते।
धीरे-धीरे बाबा के पास काफी रुपए इकट्ठे होने लगे। अब वह खाली समय में बार-बार उन्हें गिनता रहता। उसके मन में अब लोभ अंकुरित होने लगा था। उसे बराबर यही लगता रहता कि ये रुपए और ज्यादा कैसे बढ़ें? उसने रुपयों से गिन्नियाँ खरीद लीं और उन्हें एक थैली में डालकर अपनी कमर में बाँध लिया। सोते-जगते, उठते-बैठते हर समय उसका मन गिन्नियों में उलझा रहता। कहीं कोई इन्हें चुरा न ले जाय, इस चिन्ता में उसकी सारी प्रसन्नता काफूर हो गयी।
अन्धे बाबा के पास गिन्नियाँ हैं, यह बात कुछ ठगों को पता चल गयी। उन्होंने तत्काल बगीचे में आकर बाबा के दर्शन किए। प्रणाम के अनन्तर उन्होंने कहा-हम बहुत बड़े जौहरी हैं और तीर्थयात्रा पर निकले हैं। आज का दिन धन्य है जो आप जैसे सन्त-पुरुषों के दर्शन हुए। आप आज हमारे यहाँ प्रसाद ग्रहण कीजिए। उन्होंने बड़े प्रेम से बाबा को भोजन कराया और दक्षिणा में एक सोने का सिक्का बाबा को भेंट किया।
सोने के सिक्के की खनकदार आवाज सुनते ही बाबा का मन ललचा उठा। अन्धा होने के बावजूद बाबा सिक्कों को उनकी खनक से पहचान लेते थे। उनका मन खुशी से फूला न समा रहा था।
ये ठग तीन दिन वहाँ ठहरे और प्रतिदिन बाबा को बढ़िया जायकेदार भोजन कराने के साथ सोने का एक-एक सिक्का भेंट किया। तीसरे दिन ठगों ने जाने की तैयारी की और बाबा से बोले-महात्मा जी! आपके दर्शन करके हमें बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। इसीलिए हम यहाँ तीन दिन रुके रहे। आगे हमें अनेक-तीर्थ स्थानों पर जाना है। पर हमें एक कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।
बाबा ने पूछा-वह क्या कठिनाई है? उन्होंने कहा-महाराज, हमने ऐसा निर्णय ले रखा है कि हर रोज किसी न किसी सन्त-महात्मा को भोजन करवाकर तथा उन्हें स्वर्ण मुद्रा दक्षिणा में देकर ही अन्न-जल ग्रहण करेंगे, लेकिन प्रतिदिन यात्रा करते हुए सच्चे साधु का मिलना बेहद कठिन है। अतः हमें अपनी प्रतिज्ञानुसार अक्सर कभी एक दिन, कभी दो दिन व्रत करना पड़ता है। यदि आप तीर्थयात्रा में हमारे साथ चलें तो हमें प्रतिदिन आपके दर्शनों का लाभ मिलता रहेगा और नियम की पूर्ति भी होती रहेगी।
इस प्रकार का प्रस्ताव सुनकर अन्धे बाबा बड़े प्रसन्न हुए। वे मन ही मन सोचने लगे कि मेरे लिए यह बड़ा सुअवसर है। प्रतिदिन भोजन के बाद एक स्वर्ण मुद्रा भी दक्षिणा में मिल जाएगी और तीर्थयात्रा भी हो जाएगी। उन्होंने तुरन्त स्वीकृति दे दी और कहा ऐसा पवित्र कार्य तो तुम जैसे भाग्यशाली पुरुष ही सकते हैं, अन्यथा मुझ जैसे सूरदास को भला कौन तीर्थयात्रा करवाएगा।
बस देरी क्या थी? उन ठगों को तो यही इन्तजार था। उन सबने रथ तैयार करवाया और अन्धे साधु को बिठाकर वहाँ से रवाना हो गए। दो-तीन दिनों में उन्होंने काफी लम्बा रास्ता पार कर लिया और प्रतिदिन बाबाजी को भोजन करवाकर एक-एक सिक्का भेंट से बहुत प्रसन्न थे। उनको ठगों पर कोई शक नहीं हुआ।
एक दिन यात्रा करते हुए बहुत घना जंगल आया। ठगों ने अवसर देखकर कहा-बाबाजी, यह बड़ा बीहड़ जंगल है। पर्वतों व घाटियों में होता हुआ यह रास्ता बहुत घुमावदार है। यहाँ से एक सीधी-पगडण्डी गाँव को जाती है। वहाँ हमें आज रात तक पहुँचना है। किन्तु इस पगडण्डी से रथ पार नहीं हो सकता। रथ तो चक्कर काट कर ही गाँव पहुँचेगा। आप भी ऊबड़-खाबड़ रास्तों में रथ पर परेशान हो जाएँगे। यह पगडण्डी इतनी समतल है कि आप लाठी के सहारे चलते हुए भी एक घण्टे में पहुँच जाएँगे। शाम को हम सब मिल जाएंगे, अन्यथा आप को अधिक कष्ट होगा।
बाबा की समझ में यह बात आ गयी। वह रथ से उतर गया। ठगों ने कहा-बाबाजी, जोखिम वाली कोई भी वस्तु आप साथ मत रखिएगा। जंगल का मामला है, क्या मालूम कोई चोर-उचक्का मिल जाए। बाबा ने अपनी कमर से बँधी सिक्कों वाली थैली खेलकर रथ में रख दी बाबा के मन ठगों के प्रति पूरा विश्वास जम चुका था। ठगों का काम बन गया। सारा धन उनके कब्जे में आ गया। चलते-चलते उन्होंने फिर बाबा से कहा, सम्भल कर चलते रहिएगा।
अन्धा बाबा लाठी के सहारे अकेला चल पड़ा। कुछ दूर आगे बढ़ने पर एक व्यक्ति ने बाबा को दूर आगे बढ़ने पर एक व्यक्ति ने बाबा को दूर से देखा और आवाज लगाई-बाबा, इधर कहाँ जा रहे हो? यह मार्ग नहीं है। आगे खाई है। आप गिर जाओगे। ठहरो, आगे मत बढ़ो। बाबा ने सोचा-अवश्य कोई धूर्त व्यक्ति है, जो मुझे गुमराह करना चाहता है। उन्हें ठगों द्वारा कही बात याद आयी, क्या मालूम रास्ते में कोई चोर-उचक्का मिल जाए। उस राहगीर ने ज्यों-ज्यों बाबा को रोकना चाहा, त्यों-त्यों बाबा ने तेजी से आगे कदम बढ़ाए। बाबा ने उसकी एक नहीं सुनी। परिणाम यह हुआ कि बाबा एक गहरे गड्ढे में जा गिरे। राहगीर ने दौड़कर उन्हें जैसे-तैसे ऊपर निकाला। बाबा के सिर पर गहरा जख्म था, राहगीर की बातों-”आँखों से नहीं, आदमी लोभ से अन्धा हो जाता है। लोभ ने मेरे मन की रोशनी समाप्त कर दी।”
उन्होंने राहगीर को सम्बोधित करते हुए कहा-”भाई तुम्हें जो मिले उसे मेरी कहानी सुनाते हुए कहना, कोई किसी को नहीं ठगता। आदमी खुद ही अपने लोभ से ठगा जाता है। लोभ मनुष्य का सब कुछ यहाँ तक कि प्राणों का भी हरण कर लेता है।” अपनी बात पूरी करते-करते अन्धे बाबा के प्राण पखेरू उड़ गए। राहगीर उनकी बातों को सोचते हुए थके पाँवों से आगे बढ़ चला।
उन्होंने राहगीर को सम्बोधित करते हुए कहा-”भाई तुम्हें जो मिले उसे मेरी कहानी सुनाते हुए कहना, कोई किसी को नहीं ठगता। आदमी खुद ही अपने लोभ से ठगा जाता है। लोभ मनुष्य का सब कुछ यहाँ तक कि प्राणों का भी हरण कर लेता है।” अपनी बात पूरी करते-करते अन्धे बाबा के प्राण पखेरू उड़ गए। राहगीर उनकी बातों को सोचते हुए थके पाँवों से आगे बढ़ चला।
अविकसित जीवों में नर और मादा का संयोग हुए बिना भी सन्तानोत्पत्ति का क्रम चलता रहता है। बहुत से पौधे ऐसे हैं जिनकी टहनियाँ काटकर जमीन में लगा दी जाएँ तो वे उगती हैं और स्वतन्त्र पेड़ का रूप ले लेती हैं। ईख इसी किस्म का पौधा है। गाजर का पौधा उगाने के प्रयोग भी वनस्पति वैज्ञानिक सफलतापूर्वक कर चुके हैं। हाइड्र् नामक एक सूक्ष्म प्राणी भी शरीर के गिरे टुकड़ों में से कई स्वतन्त्र हाइड्र् बनाने की सामर्थ्य रखता है। हर वनस्पति के भिन्न लिंगी पराग या बीज में उभयपक्षी लिंग भेद हों ही, आवश्यक नहीं।
यह सारी चर्चा यहाँ इसलिए छेड़ी गयी है कि इन दिनों अमैथुनी सृष्टि की चर्चा विज्ञान जगत में एक चटपटी खबर के रूप में हो रही है। ‘क्लोनिंग’ प्रक्रिया के माध्यम से बिना किसी प्रकार मैथुनी प्रक्रिया के एक जीव के जीवकोश से अन्यान्य कई हमशक्ल ‘क्लोन्स’ पैदा किये जाने का वर्णन समाचार-पत्रों में विस्तार से आ रहा है। सभी हतप्रभ हैं, भयभीत भी तथा विज्ञान के इस आविष्कार की चर्चा काफी मिर्च-मसालों के साथ सरगर्मी पर है। ‘मनुष्य द्वारा सृष्टि का सृजन’ शीर्षक से स्काटलैण्ड के वैज्ञानिक आयन हेल्मुट द्वारा वयस्क भेड़ के धन की कोशिका से ‘डाँली’-नामक एक भेड़ का प्रयोगशाला में बन जाना एवं अब उसका आठ माह तक स्वस्थ विकास होते हुए जीवित बने रहना यह खबर एक धमाके की तरह पूरे संसार में पिछले माह फैल गयी। बिना किसी शुक्राणु व डिम्ब के निषेचन के ‘मैमक्स’ संवर्ग की इस भेड़ के क्लोन ने जो कि हूबहू अपने स्त्रोत की हमशक्ल है, वैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या विज्ञान का यह आविष्कार मानव हित में है। अमैथुनी सृष्टि जिसे पार्थिनोजेनेसिस नाम दिया गया है, भी लागू होती है, यह प्रश्न सबके मन में उपज ही रहा था, कि मनुष्य के और भी समीप बन्दर समुदाय में से न्यूक्लियर ट्रांसप्लाण्ट प्रक्रिया के द्वारा एक बन्दर के भ्रूण से क्लोन पैदा करदो हमशक्ल बच्चे पैदा करके दिखा दिये गए। फरवरी 1997 में राँसलीन इंस्टीट्यूट स्काटलैंड के भेड़ वाले प्रयोग के बाद डॉन बुल्फ द्वारा आँटेगाँन (यू.एस.ए.) में यह प्रयोग विगत माह मार्च में सम्पन्न किया गया। इससे यह सम्भावना प्रबल हो गयी कि अब मानव की प्रतिकृति-क्लोन भी बन पाने में अधिक देरी नहीं है एवं जितने चाहें उतने हमशक्ल व्यक्ति अब किसी की भी जीवकोशिका की क्लोन बनाकर पैदा किये जा सकेंगे।
‘इकालेविन’ के उपन्यास ‘द बाँयज फ्राम व्राजील’ में हिटलर के क्लोन बनने का सनसनीखेज वर्णन था एवं कई बार लोगों को भय लगने लगता था कि कहीं यह हकीकत तो नहीं। हिटलर के क्लोन अनगिनत यदि किसी प्रयोगशाला में पैदा होने लगेंगे तो नाजीवाद-तानाशाही व द्वितीय विश्वयुद्ध की भयावह यादें पुनः लौट आयेंगी। अब स्काटलैंड व आँटेगाँन के आविष्कारों के बाद ‘जैवनैतिकी’ के प्रबल पक्षधरों ने कहना चालू कर दिया है कि वह दिन दूर नहीं जब शायद बिना किसी नारी गर्भाशय के मनुष्य के सही या गलत-देवदूत या शैतान जो भी रूप हों-उसके अनेकानेक हमशक्ल पैदा किये जा सकें। 1996 में ‘मेगन व माँर्गन’ नामक दो भेड़ों के क्लोन राँस्लीन इंस्टीट्यूट टीम द्वारा ही पैदा किये गए थे। तब वे भ्रूण से अण्डे व उनसे उत्पत्ति रूप में बनी अनुकृतियाँ थीं। ये अनुकृतियाँ पहले से जीवित भ्रूण के पृथक्-पृथक् कोशिकाओं से पैदा हुए अण्डे से बनी थीं। किन्तु अब! अब तो यह प्रक्रिया किसी भी जीवित मानव अथवा पूर्व से सुरक्षित रखे जीवकोष अथवा शरीर के किसी भी अंग से पार्थिनोजेनेसिस प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न कर दिखाई जा सकती है। एल्डुअस हक्सले का ‘ब्रेव न्यूवर्ल्ड’ उपन्यास वास्तव में फिर हकीकत साबित हो सकता है।
विज्ञान जगत में यह जो कुछ भी हुआ है, यह कितना नैतिक है, कितना अनैतिक एवं इसके आविष्कार पक्ष पर क्या किस सीमा तक, कितना प्रतिबंध लगाया जाय, उनकी गहराई में जाने से पूर्व थोड़ा इस बारे में भारतीय संस्कृति का तत्वज्ञान, पौराणिक कथाओं का मिथकवाद क्या कहता है, यह देख लें। हिन्दूधर्म में ब्रह्म जो कि पुरुष हैं, के माध्यम से सन्तानोत्पत्ति एवं इस सृष्टि के उद्भव का प्रतिपादन है। जब सन्तान की उत्पत्ति के लिए स्त्री और पुरुष का समायोजन अनिवार्य है, तब अकेले ब्रह्माजी अमैथुनी सृष्टि उत्पन्न करने में किस प्रकार समर्थ हुए होंगे?
मार्कण्डेय पुराण में अनुसूया के तीन पुत्र चन्द्रमा, दत्तात्रेय, महर्षि दुर्वासा के जन्म का विवरण आता है। यह तीनों ही देवशक्तियों के अंशावतार थे। उनकी चेतना का सम्बन्ध ब्रह्मांड की अद्भुत शक्तियों के साथ था जबकि शरीर का निर्माण रासायनिक ढंग से हुआ था। कथा कुछ इस तरह की है-सती अनुसूया ने ऋतु स्नान किया। सौंदर्य की दृष्टि से वे अपरिमित रूप की धनी थीं। स्नान के बाद तो जैसे स्वयं कामदेव ही उनके शरीर में उतर आए। रजोदर्शन के उपरान्त पुष्पों का शृंगार किए अनुसूया को देखकर महर्षि अत्रि का मन कामोद्वेग से विचलित हो उठा। उत्पन्न विकार को व्यर्थ न जाने देने के लिए उनने तीन प्रकार के रसायन-सतोगुणी विष्णु का अंध, रजोगुणी ब्रह्म का अंश, तमोगुणी शिव का अंश तैयार किए। यह तीनों ही एक प्रकार से अण्ड थे किन्तु भ्रूण के विकास के लिए चूँकि उचित परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, इन तीनों को उनने बाद में अनुसूया के गर्भ में बिना संभोग के प्रतिष्ठित कर दिया। कालान्तर में यही तीनों गर्भ चन्द्रमा, दत्तात्रेय, दुर्वासा के रूप में अपने-अपने रासायनिक गुणों के साथ दैवी गुण लेकर जन्मे। तीनों सन्तानों में क्रमशः विष्णु, ब्रह्म एवं महादेव के दैवी गुणों का बाहुल्य था। पर यहाँ भी अत्रिऋषि को, भले ही यह अमैथुनी सृजन करना पड़ा हो, आवश्यकता नारी गर्भाशय की इसीलिए पड़ी हो, आवश्यकता नारी गर्भाशय की इसीलिए पड़ी ताकि उन्हें परिवेश मिल सके, संस्कार माता आदि के मिल सकें।
एक और उदाहरण अमैथुनी सृजन का तामस मुनि की उत्पत्ति के रूप में मिलता है। उनमें शारीरिक दृष्टि से पशुओं के लक्षण थे, क्योंकि स्वराष्ट्र् नामक राजा के प्रभाव से हरिणी के गर्भ से वे उत्पन्न हुए थे। मानसिक दृष्टि से वे प्रकाण्ड पण्डित थे। नृपति स्वराष्ट्र् ने जिस शक्ति के प्रभाव से यह सृजन कार्य किया था, वह पंचाग्नि विद्या का गहन अध्ययन एवं तप के उपरान्त प्राप्त की गयी थी। रावण के साथ भी एक पौराणिक मिथक जुड़ा है। उसने मन्दोदरी के उदर से एक भ्रूण को जन्म दिलाया था, जो कि एक विलक्षण वैज्ञानिक प्रयोग था। प्रयोग में कुछ कमी मंत्रोच्चारण की रह जाने से उसने प्रयोग असफल मानते हुए उस भ्रूण को समुद्र में फिंकवा दिया था। इस भ्रूण की विलक्षणता यह थी कि उसमें लाखों वीर्यकोश एक साथ विकसित हो गए थे। अविकसित दबी स्थिति में भ्रूण में पनप रहे सजीव इस पिण्ड की गति यह हुई कि यह बहते-बहते पीपल की जड़ों में अटक गया। सम्मिलित भ्रूण छितर गया और वे सब पीपल का दूध चूस-चूस कर उसी तरह बढ़ने लगे जिस तरह एककोशीय जन्तु विकसित होता है। समुद्री आहार व किनारे के वनस्पतियों से पले इन एक लाख शिशुओं में से प्रथम बालक नारान्तक नाम से ख्याति को प्राप्त हुआ। शेष भाइयों को लेकर उसने ‘विहवाबल’ नामक राजधानी बनाकर स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया। सभी एक लाख भाई जुड़वा समान लगते थे। जीवनी-शक्ति की कमी से वे सभी अल्पायु में ही समाप्त हो गए व राज्य भी। किन्तु एक तथ्य इस मिथक से ज्ञात होता है कि आज वैज्ञानिक जो प्रयोग कर गाय, भेड़ व बन्दर के भ्रूण से अनेकों क्लोन तैयार करने के रूप में कर रहे हैं, वह ज्ञान आज से हजारों वर्षों पूर्व भी था। सृष्टि की संलग्न व्यवस्था के अंतर्गत न होने के कारण वह प्रयोग कभी विनाशकारी दिशा में सफल नहीं हो पाया। अध्यात्म रामायण बाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग की चर्चा से पता चलता है कि विभिन्न युगों में विज्ञान प्रगति की चरम सीमा पर था।
भगवान राम अपने भाइयों सहित जिस प्रक्रिया के द्वारा जन्में थे, उसमें पिता का कोई भी अंश विद्यमान नहीं था। इतिहास प्रसिद्ध है कि जब दशरथजी की आयु ढलने लगी और उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई तो उन्होंने गुरु वशिष्ठ के पास जाकर अपनी अन्तर्वेदना प्रकट की। वशिष्ठ ने तब शृंगी ऋषि को बुलाकर पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। इस यज्ञ में चरु में देवशक्तियों का आह्वान कर उसे तीन रानियों में बाँट दिया गया। एक-एक भाग मिलने का कारण कौशल्या और कैकेयी को एक-एक तथा दो भाग मिलने के कारण सुमित्रा ने लक्ष्मण व शत्रुघ्न के रूप में दो बालकों को जन्म दिया। देवशक्तियाँ कृत्रिम गर्भाधान द्वारा मानव आकृतियों में लाई जा सकती हैं, यह इस घटनाक्रम से प्रमाणित होता है। कुमारी मरियम द्वारा ईसा को जन्म देना तथा कुन्ती द्वारा कर्ण सहित पाण्डवों को जन्म देना देवशक्तियों के तेज के प्रकटीकरण द्वारा ही सम्भव हुआ। कुन्ती व माद्री दोनों पाण्डु की पत्नियाँ थीं। कुन्ती ने प्राप्त वरदान द्वारा यम का आह्वान कर युधिष्ठिर, इन्द्र का आह्वान कर भीम को जन्म दिया। उसी ने पाण्डु के शापग्रस्त होने की स्थिति में सोम के अंश से माद्री को नकुल की प्राप्ति करायी थी। कुमारी अवस्था में जन्मे कर्ण सहित उपरोक्त सभी संततियाँ अमैथुनी सृष्टि का उदाहरण हैं। मात्र सहदेव ऐसे थे जो सहवास से जन्मे थे और वही ऐसे थे जिनमें देवतत्व का अंश कम एवं साँसारिकता का भाव अधिक था। पाण्डु की मृत्यु का कारण भी यही कामसेवन बना। हमारा सांस्कृतिक इतिहास ऐसी अनेकानेक घटनाओं से भरा पड़ा है जिनमें अमैथुनी प्रजनन द्वारा अनेकों महापुरुष, महाबली व आसुरी तत्व भी जन्मे। इससे यह ज्ञात होता है कि आज यदि ‘डाँली’ का जन्म होता है तो इस पर विस्मय करने की आवश्यकता नहीं, यह विज्ञान तो पूर्व में भी था। किन्तु यदि यह सही है कि इंसान का क्लोन बना पाना अब अधिक दूर की नहीं, कुछ ही पलक झपकने में बीत जाने वाले समय में होने वाली भवितव्यता है तो कुछ पक्ष आज की मानव जाति के स्वरूप को देखते हुए विचारणीय हैं।
परखनली में 1993 में हाँल एवं स्टिल मैन ने कृत्रिम रूप से कई जुड़वें बच्चे एक भ्रूण से कौरवों को पैदा करने की तरह उत्पन्न करने का प्रयास किया था। सभी असामान्य बनावट के व विकृत निकले व समाप्त हो गए। किन्तु उससे शोध की दिशा में एक रास्ता बना। बिना निषेचन के, बिना पुरुष की मदद से क्या महिला शिशु को जन्म दे सकती है अथवा क्या बिना नारी की मदद से पुरुष अपना हमशक्ल (क्लोन) तैयार कर सकता है, उस दिशा में 1993 से ही प्रयोग तेज गति पकड़ने लगे थे। डाँली का जन्म व आँटेगाँन में बन्दरों की जोड़ी का जन्म लेना उसी की परिणति है। किन्तु क्या यह मनुष्य के साथ सम्भव है एवं यदि है भी तो क्या अगणित प्रयासों के बाद कोई मनुष्य अपना वंश चलाने, समाज में आतंक फैलाने, कोई वाद पनपाने या पूरे विश्व पर कब्जा करने के लिए ऐसा सफल प्रयोग कर विनाशकारी परिणति को प्राप्त हो सकता है? यदि हाँ तो यह सृष्टि के लिए विज्ञान का सर्वाधिक घातक एवं अनैतिक कदम माना जाएगा। फिर कर्म सिद्धान्त का क्या होगा? कहा तो यह जाता रहा है एवं उसी पर पूरा अध्यात्म दर्शन गीता का ज्ञान टिका हुआ कि मनुष्य पिछले जन्मों में न जाने कितने पुण्य करता है, तब जाकर उसे मनुष्य योनि मिलती हैं। “मानुषात् हि श्रेष्ठतरं किंचित” सुरदुर्लभ मानुस तन पावा” की समस्त उक्तियाँ तब निरर्थक हो जाएँगी। तब चार्वाक एवं फ्रायड का भोगवाद का भी। कोई भी कह देगा कि आप अब वंश की कोई चिंता नहीं करें-बालक,जवान, बूढ़े जैसा कहें वैसे ही हम प्रयोगशाला से मँगाकर आपको दिलवा देंगे। यह तो एक अजीब नैतिक और सामाजिक संकट पैदा कर देगा। इसी मुद्दे पर आज हर उस देश में जहाँ ‘क्लोनिंग’ की प्रौद्योगिकी काफी विकसित है, अच्छी-खासी बहस चल रही हैं।
विदेश में यह बहस चल ही रही थी एवं प्रतिबंध लगाने के लिए बेल्जियम में एक प्रस्ताव पारित किया ही जा रहा था कि एक और खबर ऐसी आयी, जिसने सबको हिलाकर रख दिया। ‘सण्डे टाइम्स’ लन्दन में 9 मार्च को छपा कि बेल्जियम में ब्रुसेल्स के निकट वाँन हेलमाँण्ट अस्पताल के प्रमुख डॉ. रॉबर्ट शोयस्कान ने दुर्घटनावश कृत्रिम गर्भाशय के दौरान एक मानव प्रतिकृति तैयार कर दी थी जो कि इस समय चार वर्ष की हो चुकी, है। यह चार वर्षीय बालक बेल्जियम के किस स्थान में रह रहा है, यह भी एक जीवविज्ञानी मार्टिन निजेस के हवाले से छपा। उनका कहना था कि राबर्ट ने एक जमाए हुए उर्वरित अण्डे की सतह पर काँच की एक छड़ रगड़कर यह निर्माण किया था। अगले ही दिन डॉ. रॉबर्ट का खण्डन वाला बयान छपा एवं उनने कहा कि यह बालक आय. वी. एफ. पद्धति से उत्पन्न हुआ है एवं इसमें इसके पिता व माता दोनों के अंशों का उपयोग किया गया है। बालक क्लोन नहीं हैं, यह प्रमाणित कर दिया गया तब लोगों ने जाना कि यह एक शरारत भरा समाचार जानबूझ कर दिया गया था। कुछ भी हो एक खतरा तो सबके समझ जैव प्रौद्योगिकी ने पैदा कर ही दिया है कि कभी भी ऐसा भी कुछ घट सकता है।
विज्ञान एक दुमुँही तलवार भी बन सकता है एवं उपयोगी भी। यदि उसका सुनियोजित इस्तेमाल किया जाता है। आज जब मानव प्रतिकृतियों की चर्चा चल रही है एवं सभी कहते हैं कि भले ही भेड़ का क्लोन बनाने में 278 में से एक में सफलता मिली है, चोरी से मानव के लिए किए जा रहे प्रयासों को रोका नहीं जा सकता। भोगवादी देहात्मवादी मनुष्य इन प्रयासों को करता हो रहेगा, क्योंकि उसकी दृष्टि मात्र रसायनों से निर्मित काया पर है। विज्ञानविदों का कहना है कि यदि हमशक्ल तैयार हो भी जाय तो जरूरी नहीं कि वह वैसी ही बुद्धि, तीक्ष्ण मेधा, स्मृति, चरित्र व संस्कार लिए हुए हो। यह इसलिए कि जीन्स तो मात्र शरीर संरचना का निर्धारण करते हैं। संस्कार चिन्तन-चेतन एवं भावनात्मक आध्यात्मिक विकास के उपक्रमों से सम्पन्न हो पाते हैं। बुद्धिमान भावनाशील, राष्ट्रभक्त पिता का क्लोन भी वैसा ही निकलेगा जरूरी नहीं।
विज्ञान की इस विधा, जिसमें अनुकृतियाँ तैयार की जाती हैं, का यदि सदुपयोग हुआ एवं जेनेटिक्स के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाली उपचार प्रक्रिया के रूप में नियोजित हुआ, तो यह निश्चित ही युगान्तकारी खोज मानी जाएगी। हो सकता है इससे ऐसे मॉडल तैयार हो सकें, जिनमें जीव शरीर में मानव अंग पैदा किये जा सकें, जिनका प्रत्यारोपण आज एक बहुत बड़ी चिकित्सीय आवश्यकता बन गया है। न्यूक्लियर ट्रांस्फर के पूर्व यदि दानदाता की कोशिकाओं में टीश्यू कल्चर में ही वाँछित परिवर्तन कर दिए जाएँ तो हो सकता है, कैंसर, डायबिटीज, एथेटोस्क्लेटोसिस (जो हार्टडीजिज का मूल कारण है) का उपचार खोज लिया जाए। कई जीव-जन्तुओं में जेनेटिक्स के इसी स्तर के प्रयोग कर मनुष्य के लिए कई उपयोगी औषधियाँ उनके शरीर में तैयार कर चिकित्सा-जगत को प्रदान की जा सकती हैं। यह सब इस पर निर्भर करता है कि प्रयोक्ता की विवेक-बुद्धि मानव हित में कार्य कर रही हैं या नहीं।
मात्र रासायनिक परिवर्तन के लिए किये जा रहे भौतिक प्रयास चमत्कारी आनुवंशिकीय परम्पराएँ स्थापित नहीं कर सकते। समर्थ, सुयोग्य सुसन्तति के लिए हमें पुनः भारतरय अध्यात्म, संस्कृति के मार्गदर्शन की ओर जाना होगा। मनुष्य की अन्तश्चेतना स्वनिर्मित है। वह मनुष्य की अन्तश्चेतना स्वनिर्मित है। वह वंश परम्परा से नहीं, संचित संस्कारों और प्रस्तुत प्रयत्नों के आधार पर विकसित होती है। माँ व पिता का परिवार परिकर एवं वातावरण का, संस्कारों का इसमें विशेष योगदान होता है। जब तक गंभीरता से विचार-विमर्श कर सारे राष्ट्र के वैज्ञानिक एक साथ बैठकर इस पक्ष पर चिन्तन नहीं करेंगे, बताकर उसके साथ भेड़ के क्लोन बनाने जैसे हथकण्डे रचते रहेंगे एवं मनुष्य जाति का अस्तित्व खतरे में डाल देंगे। कम से कम भगवान को यह सब मंजूर नहीं है एवं वह ऐसा होने नहीं देगा।
काकिनाड़ा काँग्रेस, 1922 में खादी प्रदर्शनी का भी आयोजन था। प्रदर्शनी के द्वार पर एक दुर्बल-सी स्वयंसेविका पदस्थ थी।
प्रदर्शनी हेतु प्रवेश टिकट का मूल्य दो आने था। एक व्यक्ति बिना टिकट दिखाये अन्दर जाने लगा स्वयंसेविका ने रोक दिया व उससे टिकट माँगा। उस व्यक्ति ने जेब टटोली और कहने लगा कि उसके पास पैसे नहीं हैं। अतः वे कला प्रदर्शनी कल देख लेंगे। पास ही एक वयोवृद्ध काँग्रेसी सज्जन खड़े थे, उन्होंने स्वयंसेविका से कहा-”इन्हें जाने दो, ये बहुत बड़े नेता है। उत्तर मिला, चाहे कितने ही बड़े नेता हों, मुझे यही आदेश है कि बिना टिकट किसी को न जाने दिया जाए, मैं तो नियम को जानती हूँ नेता को नहीं। यह सुन उस व्यक्ति ने स्वयंसेविका की पीठ थपथपाई। उन कांग्रेसी सज्जन से दो आने उधार माँगकर टिकट खरीदा।
वह स्वयंसेविका थी-श्रीमती दुर्गाबाई देशमुख, जो आगे चलकर संसद-सदस्या, योजना आयोग की सदस्या एवं समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्षा बनीं और वह व्यक्ति थे जवाहर लाल, जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने।
कठिनाइयों से घिर गए तो क्या हुआ? ये पल तो हर किसी के जीवन में कभी न कभी तो आते हैं। हाँ समय थोड़ा-बहुत कम-ज्यादा हो सकता है। लेकिन इन्हें देखते ही रोने-बिलखने लगना, निडाल होकर बैठ जाना, दोनों हाथों से माथा थामकर अकर्मण्य बन जाना, विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर चलना ही पड़ेगा कि जीवन आरोह-अवरोह के ताने-बाने से बुना गया है। धूप-छाँव की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षीय हलचलें होती ही रहती हैं और होती ही रहेंगी। सर्वथा सुख’-सुविधाओं से भरा जीवनक्रम कदाचित ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती है। तट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनन्द लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।
सदा दिन नहीं बना रहे रात कभी आए ही नहीं, भला यह कैसे हो सकता हैं? जन्मोत्सव ही मनाए जाते रहें, मरण का रुदन सुनने को न मिले यह कैसे सम्भव हैं? सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुःख के दिन कभी न आएँ यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आंखें मूँद लेने के समान है। बुद्धिमान वे हैं, जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुःख की घड़ी आने पर उनका सामना करने के लिए आवश्यक शौर्य, साधन इकट्ठा करते हैं।
इसके अलावा दुःख सिर्फ रुलाता ही नहीं है, परिस्थितियाँ से निबटने के लिए प्रचण्ड साहस और शौर्य का संचार भी करता है। इसकी पीड़ा हमें औरों की वेदनाओं का अहसास भी दिलाती है। जिसने कभी पीड़ा भोगी ही नहीं, वह दूसरों के कष्टों को भला क्या समझेगा? विकल वेदना की छटपटाहट तो वही समझ पाता है, जो स्वयं परेशानियों के चक्रव्यूह से घिर चुका हो। फिर दुःख भला किसके जीवन में नहीं आए। ईश्वर के अवतार प्रभु श्रीराम स्वयं वन-वन भटके। अपरिमित सामर्थ्य के धनी होते हुए रावण के छल-कपट के जाल में फँसना पड़ा। पर उनकी विकलता-अकर्मण्यता का पर्याय नहीं शौर्य का मानदण्ड बनी। लोकविजेता रावण को पराभूत होना पड़ा।
धर्मराज युधिष्ठिर अपनी सारी नीतिनिष्ठा के बावजूद शकुनि के कुचक्र में फँसे बिना न रहे। अपमान के अनेकों जहरीले घूँट पीकर भाइयों सहित निर्वासित होना पड़ा। लेकिन वनवास की अवधि उन्हें अलौकिक तप से सम्पन्न कर गयी। अर्जुन ने प्रायः सभी दिव्यास्त्र इसी अवधि में प्राप्त किए। कष्टों ने पाँचों भाइयों की संघर्ष क्षमता, साहस परायणता को इतना बढ़ा-चढ़ा दिया कि कठिनाइयों का कुचक्र तार-तार होकर बिखर गया।
कठिनाइयाँ कैसे और किस तरह? इन सवालों के उत्तर में हरेक की अपनी-अपनी अनुभूतियाँ हैं। लेकिन प्रायः सभी का यह मानना है कि ऐसे ईर्ष्यालु इस दुनिया में कम नही, जो किसी का सुख-सन्तोष फूटी आँखों से नहीं देख सकते। जिनके अन्धेर-अनाचार में बाधा पड़ती है, वे भी शत्रु बन बैठते हैं। अनुचित लाभ उठाने के उत्सुक भी शोषण एवं आक्रमण से बाज कहाँ आते हैं। इन आसुरी तत्वों का अस्तित्व अनादिकाल से रहा है और अनन्त काल तक रहेगा। उनसे बच निकलना कठिन है। हाँ, इतना हो सकता है कि अपना शौर्य, साहस इतना विकसित कर लिया जाए कि उन्हें छेड़-छाड़ करने का साहस ही न हो। व्यक्तिगत समर्थता बढ़ाने के साथ ही आदर्शों के पक्षधरों को भी बढ़ाकर भी आततायियों की गतिविधियों पर अंकुश किया जा सकता है। प्रतिरोध और प्रतिकार बढ़ाकर आक्रमणकारियों से अपनी आँशिक सुरक्षा हो सकती है। उनका सामना ही न करना पड़े, कुछ अनुचित, अवाँछनीय सामने आए ही नहीं, ऐसा सोचना आकाश कुसुम पाने जैसी बाल कल्पना है। अवरोधों से जूझने और संघर्षों के बीच अपना रास्ता बनाने के अतिरिक्त यहाँ और रास्ता है ही नहीं।
परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो, कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले, यह असम्भव नहीं। परिवार के सरलक्रम में कोई साथी बिछुड़ जाए और शोक, सन्ताप के आँसू बहाने पड़े यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी-न-कभी यह सहन करना ही पड़ता है। मनचाही सफलताएँ किसे मिली हैं? मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं, जो बड़े अरमानों से सँजोये घोंसले को उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दें और एक-एक तिनका बीनकर बनाए गए उस घरौंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें। ऐसे अवसरों पर दुर्बल मनः स्थिति के लोग टूट जाते हैं।
नियति क्रम से हर वस्तु का, हर व्यक्ति का अवसान होता ही है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाए इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिरअतीत से अपने स्थान पर जमी-अड़ी बैठी हैं। लुटेरों ने अपना टकराना बन्द नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी यहाँ गलत है कि चट्टान ने कभी हार नहीं मानी।
पलायन नहीं संघर्ष, बुज़दिली नहीं साहस, अकर्मण्यता नहीं शौर्य, रुदन के आँसू नहीं मन्यु की प्रचण्डता ही मनुष्य की गौरवपूर्ण परिभाषा है। कठिनाइयों से घिरे हैं तो क्या हुआ? न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। परिस्थितियों के हर कुचक्र को पहले से दूने उत्साह से छिन्न-भिन्न करके ही हमें अपनी मानवी-अस्मिता को सिद्ध करना चाहिए। नियति की चुनौती को स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी-गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है। अच्छा यही है कि इससे घबराने की बजाय ऐसा ही श्रेयस्कर जीवन जिएँ।
धन बढ़ने के साथ-साथ उनकी लोभवृत्ति और कंजूसी भी बढ़ती गयी। कहाँ से लाएँ, कितना कमाएँ और कैसे बचाएँ? इन्हीं प्रश्न-चिन्हों के चक्रव्यूह में उनका मन छटपटाता रहता पण्ढरपुर के पास पुरन्दरगढ़ में उनकी महलनुमा हवेली थी। उनके पिता वरदाप्प स्वयं एक समृद्ध एवं सुप्रसिद्ध व्यक्ति थे। पिता से उन्हें विरासत में अपार सम्पत्ति मिली थी। स्वयं वह भी कुशल व्यापारी थे। विजयनगर और गोलकुण्डा के राज्यों से हीरा, मोती, माणिक्य आदि बहुमूल्य रत्नों का व्यापार करके अपनी सम्पत्ति उन्होंने अनेकों गुना बढ़ा ली थी।
लेकिन धन की मादकता भी अजब है। वह जितना अधिक उपयोग में लाया जाता है, उतनी ही उसकी प्यास भी बढ़ती है और तो और उसके पाने का मद भी कुछ कम नहीं होता। अन्य नशीले पदार्थ तो बिना उपयोग के अपना असर नहीं दिखा पाते, किन्तु धन की तो बात ही निराली है, इसके मिलते ही मस्तिष्क के सारे स्नायु उत्तेजना से भर जाते हैं और अधिक की चाह में लोभ और कंजूसी भी बढ़ती जाती है। इन दोनों के प्रभाव से उदारता,दया, क्षमा आदि सद्गुणों का प्रायः लोप होने लगता है। उनके साथ भी कुछ ऐसा ही होने लगा। धन के ढेर के बढ़ने के साथ ही उनकी कृपणता भी बढ़ती गयी। एक पैसा भी किसी को देना उनके लिए प्राण देने से भी अधिक कष्टदायी हो गया। माँगने वाला उन्हें अपना शत्रु ही दिखाई पड़ता था।
परन्तु प्रकृति विकासधर्मी है। उसकी स्वाभाविक वृत्ति विकृति नहीं संस्कृति है। जीवन में विकृतियाँ आती अवश्य हैं, परन्तु वे स्वाभाविक नहीं हैं। सच तो यह है कि हम जब विकास को नकारते हैं, तभी विकृतियों से भर जाते हैं। प्रकृति तो हर-हमेशा घटनाओं-परिस्थितियों-व्यक्तियों का समायोजन विकृतियों के निवारण एवं संस्कृति को संवर्धित करने के लिए करती रहती है। उस दिन उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनको इस कृपणता के कीचड़ से निकालने के लिए दयामय प्रभु स्वयं एक गरीब ब्राह्मण का वेश बनाकर एक दिन उनके यहाँ पहुँचे और बड़े ही विनम्र भाव से प्रार्थना की-ग्रामीणों के अपढ़ बच्चों को शिक्षित, संस्कारित करने के लिए मैं पाठशाला खोजना चाहता हूँ। आप सम्पन्न हैं। मेरी कुछ सहायता करें।
उन्होंने अपनी जान छुड़ाने के लिए कहा-आज तो भारी व्यस्तता है आप कल आइए। उन्हें क्या पता था कि यह ब्राह्मण कल सचमुच आ जाएगा। किन्तु जब वह दूसरे दिन फिर आ धमका तो उन्होंने उसे फिर से कल आने को कहा। इस प्रकार छह महीने बीत गए। वे रोज उसे कल आने को कहते और वह कल फिर आ जाता। आखिर एक दिन उन्हें उस पर क्रोध आ गया। इसी गुस्से में झल्लाकर उन्होंने एक दिन खोटे सिक्कों से भरी थैलियाँ उसके सामने पटक दीं और कहने लगे, इन थैलियों में जो तुम्हें पसन्द आए उसमें से एक सिक्का निकाल लो और दफा हो जाओ। ब्राह्मण ने थोड़ी देर अचरज से उनकी ओर देखा और थैलियों को बिना छुए ही वे चले गए।
वहाँ से ब्राह्मण देवता उनके घर जा पहुँचे। उनकी पत्नी से अपने उद्देश्य को बताते हुए सहायता की माँग की पत्नी उदार स्वभाव की थी। पति की अतिशय कंजूसी एवं लोभवृत्ति से उसे दुःख होता था। भगवान में उसका विश्वास था और परिव्राजकों, लोकसेवियों के प्रति उसकी भक्ति थी। परन्तु पतिदेव इतने कंजूस थे कि पत्नी के हाथ में एक पैसा भी नहीं रहने देते थे। लोकसेवी ब्राह्मण को उसने अपने पिता से प्राप्त नकफूल ही श्रीकृष्णपर्णमस्तु कहकर दे दिया।
उन्होंने तो समझा था कि दरिद्र ब्राह्मण से पिण्ड छूटा पर वह ब्राह्मण नकफूल देकर चार सौ मुहरें माँगने लगा। पत्नी का आभूषण पहचान कर उसे अपनी पत्नी पर बड़ा क्रोध आया। जिस ब्राह्मण ने उन्हें छह महीनों तक तंग किया, जिसे वे लगातार बहानेबाजी करके टरकाते रहे, उसे इतना कीमती आभूषण उसी के घर से मिल जाए, यह कोई साधारण बात न थी। किसी तरह गुस्सा दबाते हुए उन्होंने उसे यह कहकर विदा कर दिया-इसे मेरे पास रहने दीजिए, कलम आपको मुहरें दे दूँगा।
ब्राह्मण चले जाने पर आभूषण को तिजोरी में बन्द करके वे सीधे भागते हुए घर आए। तेजी से आने के कारण उनकी साँस फूल रही थी। अपने भावों को छुपाते हुए उन्होंने स्त्री से पूछा-तुम्हारा नकफूल कहाँ है, जिसे तुम सुबह तक पहने थीं। बेचारी स्त्री उसे क्या उत्तर देती? पति के क्रोधी स्वभाव को वह जानती थीं उसे चुप देखकर वह गरज उठे-अभी जाकर नकफूल दे नहीं तो जीते-जी तुझे पृथ्वी में गाड़ दूँगा।
अब स्त्री बेचारी क्या करे? आभूषण तो वह दान कर चुकी थी और पति से सच्ची बात कह नहीं सकती थी। भय के कारण रखा है और भागी’-भागी भीतर चली गयी। आत्महत्या कर लेने के अलावा उसे कोई दूसरा मार्ग नहीं सूझा। एक कटोरी में विष घोलकर उसने भगवान से प्रार्थना की-दयामय! मैंने तुम्हारी प्रसन्नता के लिए आभूषण ब्राह्मण को दिया था। प्रभु! मुझे जीवन का मोह नहीं है, जीवन जाता है तो जाए। हे अन्तर्यामिन! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हों तो मेरे पतिदेव की बुद्धि शुद्ध कर दो। अब से वे लोकसेवियों का सम्मान करें, उन्हें लोकहित के लिए दान दें और तुम्हारा स्मरण करें। मुझे मृत्यु का किंचित मात्र भी भय नहीं है। मैं तुम्हारे श्री चरणों में आ रही हूँ।
प्रार्थना करके जैसे ही उसने कटोरी मुख की ओर बढ़ाई, कोई वस्तु टप से उसमें आ गिरी। गिरने की आवाज से चौंक कर उसने देखा यह तो उसी का नकफूल है। बन्द कमरे में जहाँ एक पक्षी तक नहीं आ सकता, वहाँ नकफूल कहाँ से आ गिरा? भगवान की इस अलौकिक कृपा पर उसकी आँखें भर आयीं। भूमि पर मस्तक रखकर उसने प्रभु को प्रणाम किया।
इधर उसके पति खड़े-खड़े सोच रहे थे कि नकफूल तो वे दुकान की तिजोरी में बन्द करके आए हैं और चाभी भी उन्हें के पास है। स्त्री को डाँटने-फटकारने पर वे चिन्ता में थे कि सबेरे जब ब्राह्मण मुहरें लेने आएगा, तब उसे क्या उत्तर देना होगा? इतने में उनकी पत्नी ने नकफूल लाकर उनके हाथ पर रख दिया। थोड़ी देर पहले तिजोरी में बन्द किया गया आभूषण हाथ में रखा देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। नकफूल लेकर वे बिना कुछ कहे शीघ्रता से दुकान पर गए। वहाँ तिजोरी ठीक बन्द मिली। पर खोलने पर देखा कि आभूषण उसमें नहीं है। इस चमत्कार को देखकर उनके हृदय को धक्का लगा। उनकी बुद्धि का अँधेरा छट गया। मस्तक झुकाए वे घर आए और नकफूल पत्नी को देते हुए बड़ी गम्भीरता से बोले-लक्ष्मी! सच-सच बताओ कि क्या बात है। मैं आश्चर्य में पड़ गया हूँ। तुमने जिसे नकफूल दिया था, वे ब्राह्मण कौन हैं? तुम्हें यह फिर कैसे मिला?
पति के बदले भाव और कातर स्वर को सुनकर लक्ष्मी देवी ने सारी बातें सच-सच बता दीं। सारी बातें सुनकर उनकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। वे हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगे-प्रभु! आपने मुझ अधम से लोकसेवी ब्राह्मण के रूप में याचना की और मैं आपको टालता रहा। मेरे लोभ, मेरे पाप न देखकर आपने मेरी पत्नी के प्राण बचाए। बड़ी देर तक वे जड़ की भाँति खड़े-खड़े पत्नी की ओर एकटक देखते रहे। इसके बाद उन्होंने उसी समय स्नान किया और पत्नी के साथ भगवान की पूजा की।
पूजा के पश्चात् वे खड़े ही हुए थे कि द्वार पर आहट हुई। मुड़कर देखने पर पता चला यति श्रेष्ठ स्वामी व्यासराय जी द्वार पर खड़े हैं। पति’-पत्नी दोनों उन्हें आदर-सत्कार से घर के अन्दर लाए। दिव्य-दृष्टा व्यासराय उन दोनों की भावनाओं से अवगत थे। वे उनको भावनाओं से अवगत थे। वे उनको सम्बोधित करते हुए बोले-श्रीनिवास! धन अमृत है और जहर भी। यदि श्रेष्ठ रीति से इसका अर्जन किया जाए, सत्प्रवृत्ति-सम्वर्धन एवं लोकहित के इसका व्यय हो, तो यह अमृत है। इससे व्यक्ति और समाज साजीवन पाता है। इसके विपरीत यदि लूट-खसोट, छल, बेईमानी से धन इकट्ठा किया जाए, वैभव के प्रदर्शन अथवा विलासिता के लिए इसका उपयोग हो अथवा फिर कृपण व्यक्ति इसका उपयोग ही न करे, तो यह विष है। इससे जहरीली भावनाएं ही पनपती हैं।
समझ गया यतीश्वर। श्रीनिवास एवं लक्ष्मी ने उन्हें माथा नवाते हुए कहा। दूसरे दिन उन्होंने अपना सारा धन गुरुकुल, चिकित्सालयों के लिए अर्पित कर दिया। लोकहितार्थ सारा धन अर्पित करके वे दोनों पति-पत्नी जन-जीवन में धार्मिक भावनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए व्रती हो गए। सर्वथा अपरिग्रही होकर वे पण्ढरपुर पहुंचे। नाम कीर्तन-भगवद् कथा के माध्यम से वे जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण देने लगे।
अपरिग्रह उनका व्रत बन गया। वे कहा करते थे-धन संग्रह एवं सुविधा संग्रह का मतलब है, स्वयं पर अविश्वास, भगवान पर अविश्वास एवं समाज पर अविश्वास। इन तीनों में से जिसको एक पर भी भरोसा है, तो वह संग्रह नहीं कर सकता। यदि उसे खुद पर भरोसा है, तो वह अर्जित धन को लोकहित में यह सोचते हुए व्यय करेगा, कि आवश्यकता पड़ने पर फिर कमा लेंगे। यदि प्रभु पर विश्वास है, तो उसका सतत् चिन्तन होगा, दयामय प्रभु। लोकहित में लगे मुझ सेवक का येगक्षेम वहन करेंगे और यदि समाज पर भरोसा है, तो अपनी उपार्जित सम्पत्ति को यह सोचते हुए व्यय करेगा, जिस समाज की सेवा में संलग्न हूँ, वह हमारे जीवन निर्वाह की व्यवस्था अवश्य करेगा। जिसे इन तीनों पर एक साथ भरोसा हो उसका कहना ही क्या?
धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण के कार्य में इन्हें बड़े-बड़े कष्ट झेलने पड़े। थोड़े दिन पण्ढरपुर रहकर वे विजयनगर चले गए। वहाँ के नरेश श्री कृष्णदेव राय रत्नों के व्यापारी श्रीनिवास से पहले से परिचित थे। अब उन्हें भक्त के रूप में देखकर राजा को आश्चर्य भी हुआ और श्रद्धा भी। यदि श्रेष्ठ व्यासराय जी भी उन दिनों विजयनगर में ही रहते थे। महाराज कृष्णदेव भी इन्हीं के शिष्य थे।
स्वामी जी ने इन्हें भी अपना शिष्य बताया। गुरु ने इन्हें भी अपना शिष्य बताया। गुरु ने उनका नाम पुरन्दरदास रखा। अब तक लोगों ने उनका वैभव सम्पन्न जीवन देखा था। आज उनके अकिंचन जीवन देखकर हर किसी का मन उनके प्रति गहरी श्रद्धा एवं सम्मान से भर गया।
पुरन्दरदास जी में इतनी प्रगाढ़ भगवद्भक्ति थी कि इनके गुरुदेव व्यासराय जी ने स्वयं इनकी महिमा का गान किया था। साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा, आत्मजाग्रति के चारों आधार इनमें सम्यक् रूप से प्रतिष्ठित हुए थे। गुरुदेव ने इन्हें जनमानस के परिष्कार के लिए प्रेरित करते हुए कहा, यही सबसे श्रेष्ठ लोकसेवा है। यदि चिन्तन परिष्कृत होगा, तो कर्म भी सात्त्विक ही होंगे। गुरुकृपा से इनमें कवित्व शक्ति जाग्रत होंगे। गुरुकृपा से इनमें कवित्व शक्ति जाग्रत हुई थी। इनके पदों में लोकशिक्षा, वैराग्य, तत्वज्ञान और भगवद्भक्ति के गम्भीर भाव हैं। कर्नाटक संगीत के ये उद्धारक कहे जाते हैं। इनके कीर्तन के पद दक्षिण भारत में आज भी प्रिय हैं। कहा जाता है कि इन्होंने पौने पाँच लाख श्लोक बनाए थे।
लगभग चालीस वर्षों तक वे प्रव्रज्या करते हुए जन-जीवन में भाव-संवेदना एवं विचारशीलता का संचार करते रहे। अस्सी वर्ष की अवस्था में सं’.1562 विक्रमाब्द में वे भगवद्धाम पधारे। उनकी शिक्षा, उनके पद, उनके ग्रन्थ लोक-मंगलकारी हैं। कन्नड़ भाषा में उनका साहित्य भक्तों का प्रिय धन है। एक स्थान पर वे कहते हैं’-”इस संसार में प्रभु ही अनेक रूपों में लीला कर रहे हैं। उनके किसी भी रूप के प्रति न तो घृणा का भाव रखो, नहीं उपेक्षा का। न मालूम वे भक्तवत्सल किस रूप में कब तुम्हारी परीक्षा करना चाहते हैं। न जाने कब वे तुम्हारी परीक्षा सेवा लेना चाहते हों।”
अमीर वह है जो आमदनी से कम खर्च करता है। दरिद्र और दुखी वह है जो आँखें मूँदकर खर्च करता है। अगले दिनों उसे अनर्थ भी करने पड़ेंगे।
धर्म वह है जो मनुष्य की पशुता पर नियमन कर सके। जिसमें रोग मिटाने की क्षमता न हो वह उपचार किस काम का।
आर्य जाति के विश्वास के अनुसार वेद मनुष्यकृत न होकर अपौरुषेय और अनादि हैं। ईश्वर और प्रकृति के समान वे भी नित्य हैं। प्रलय होने पर भी उनका अन्त नहीं हो जाता। षड्दर्शनों में साँख्यदर्शन सृष्टिकर्ता के रूप में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। पर उसके पास मत में भी वेद स्वतः प्रमाण है। वेद की प्रामाणिकता के प्रतिपादन के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह अपने आप में ही प्रमाण है। उसे न मनुष्य ने बनाया है और न किसी मुक्त पुरुष ने। वह अनादि तथा अनन्त है। योगदर्शन ईश्वर में विश्वास रखता है और ईश्वर के समान वेद को भी अनादि मानता है। मीमाँसा दर्शन में शब्द को नित्य प्रतिपादित किया गया है, क्योंकि शब्द नित्य है। वे ईश्वर के निःश्वास रूप हैं। श्वास-प्रश्वास की क्रिया सब प्राणियों में स्वाभाविक रूप वेद ईश्वर के समान ही अनादि व नित्य है। वेदान्त दर्शन को भी यही मत अभीष्ट है। उसके अनुसार भी वेद ‘महान् भूत’ (ब्रह्म) के निःश्वसित हैं। ब्रह्म वेद की योनि (कारण) अवश्य है, पर वेद उसकी कृति नहीं है। वेद तो ब्रह्म के ऐसे श्वास-प्रश्वास के समान हैं, जो स्वाभाविक रूप से निःसरित होते रहते हैं। इसीलिए सृष्टि तथा प्रलय दोनों अवस्थाओं में वे बने रहते हैं। न उनका कभी प्रारम्भ होता है और न अन्त। वैशेषिक दर्शन में वेदों को ‘पौरुषेय’ माना गया है, पर उसके अनुसार पौरुषेय का अभिप्राय ईश्वरकृत है। वेद मनुष्यकृत न होकर परमपूज्य ईश्वर की कृति हैं। जगत का कर्त्ता परमेश्वर नित्य, आप्त और सर्वज्ञ है। साथ ही वह करुणा का आगार भी है। इस कारण सृष्टि की उत्पत्ति मनुष्यों के कल्याण के लिए वेदों का भी उपदेश कराता है। वेद उसी ज्ञान का नाम है या वेदों में वही ज्ञान विद्यमान है, जिसका उपदेश मनुष्यों के हित कल्याण व मार्ग-प्रदर्शन के लिए ईश्वर द्वारा किया जाता है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार वेद ईश्वर के वचन है, क्योंकि वे ईश्वर की कृति हैं, अतः वे प्रमाण रूप है।
जो विचारक वेद को अपौषेय एवं अनादि मानते हैं या जो उन्हें ईश्वर की ऐसी कृति प्रतिपादित करते हैं जिसका महाप्रलय द्वारा भी अन्त नहीं होता, जो ‘नित्य’ है, उनकी दृष्टि में वेदों के रचना-काल सम्बन्ध में विचार-विमर्श करना ही निरर्थक है। जब उनकी रचना मनुष्यों द्वारा कभी की ही नहीं गई, तो उनका रचनाकाल के विषय में विचार करने का लाभ ही क्या है। वैदिक सूक्तों एवं मन्त्रों के साथ जिन ऋषियों के नाम दिये गये हैं, वे उनके कर्त्ता व रचयिता न होकर,’दृष्टा’ मात्र थे। ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति ही यह कही गई है-’ऋषेर्ज्ञानार्थत्वाद् मन्त्रं दृष्टवन्तः’ मन्त्रों के द्रष्टा होने के कारण ही वे ऋषि कहाते हैं।
जो विचारक वेद को अपौरुषेय एवं अनादि मानते हैं या जो उन्हें ईश्वर की ऐसी कृति प्रतिपादित करते हैं जिसका महाप्रलय द्वारा भी अन्त नहीं होता, जो ‘नित्य’ है, उनकी दृष्टि में वेदों के रचना-काल सम्बन्ध में विचार-विमर्श करना ही निरर्थक है। जब उनकी रचना मनुष्यों द्वारा कभी की ही नहीं गई, तो उनके रचनाकाल के विषय में विचार करने का लाभ ही क्या है। वैदिक सूक्तों एवं मन्त्रों के साथ जिन ऋषियों के नाम दिये गये हैं, वे उनके कर्त्ता व रचयिता न होकर, ‘दृष्टा’ मात्र थे। ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति ही यह कही गई है-’ऋषेर्ज्ञानार्थत्वाद् मन्त्रं दृष्टवन्तः’ मन्त्रों के दृष्टा होने के कारण ही वे ऋषि कहाते हैं।
इसके विपरीत आधुनिक पाश्चात्य विद्वान वेदों को मनुष्यकृत मानते हैं और वैदिक वेदों को मनुष्यकृत मानते हैं और वैदिक ऋषियों को मन्त्रों का सृजेता समझते हैं। उनके अनुसार वेदों की रचना किसी एक व्यक्ति द्वारा किसी एक समय में न की जाकर बहुत से व्यक्तियों (ऋषियों) द्वारा विविध समयों में की गई थी। ऋग्वेद अन्य तीन वेदों की तुलना में अधिक प्राचीन है और इस वेद के भी कतिपय मण्डल व सूक्त ऐसे हैं, जिनकी अन्य मण्डलों की तुलना में अधिक बाद के समय में रचना हुई थी। इस मत के लिए वे जहाँ वेदमन्त्रों में निर्दिष्ट ऐतिहासिक घटनाओं को आधार बनाते हैं, वहाँ साथ ही भाषा शास्त्र की दृष्टि से भी इस मत का प्रतिपादन किया जाता है। वेद के सम्बन्ध में कौन-सा मत सही है, इसका निर्णय कर सकना हमारे लिए सम्भव नहीं है।
वेदों के रचनाकाल के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वानों का मत भिन्न-भिन्न है। उन्नीसवीं सदी के मध्य भाग में प्रो. मैक्समूलर ने यह विचार प्रकट किया था, कि ऋग्वेद की रचना 1200 ईस्वी पूर्व के लगभग हुई थी। छठी सदी ई.पू. में महात्मा बुद्ध ने याज्ञिक कर्मकाण्ड के विरुद्ध आवाज उठायी थी। उसके समय याज्ञिक विधि-विधानों का भली-भाँति विकास हो चुका था और यज्ञों का प्रतिपादन करने वाले ब्राह्मण ग्रन्थों तथा श्रोत-सूत्रों की भी रचना हो चुकी थी। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य इस समय विद्यमान था। इस वैदिक साहित्य के विविध भागों-सूत्रग्रन्थों, ब्राह्मणों और संहिताओं के निर्माण के लिए यदि दो-दो सौ वर्षों का समय लगा हो, तो ऋग्वेद की रचना मैक्समूलर के अनुसार 1200 ई. पूर्व के लगभग ही होनी चाहिए। प्रो. मैक्समूलर ने अपने मत की पुष्टि में कोई प्रमाण नहीं दिये थे। उन्होंने केवल एक कल्पना ही प्रस्तुत की थी। पर बहुत से पाश्चात्य विद्वान चिरकाल तक उनके मत को स्वीकार्य समझते रहे। बाद में कोई बीस वर्ष पश्चात् प्रो. मैसमूलर ने स्वयं यह सम्भावना प्रकट की कि ऋग्वेद की रचना का काल 3000 ई. पूर्व तक भी हो सकता है।
प्रो. मैक्समूलर के बाद विल्सन, कीथ, कोलबुक और मैकडानल्ड आदि पाश्चात्य विद्वानों ने भी वेदों के रचनाकाल की अपने-अपने चिन्तन अनुसार व्याख्या करने का प्रयत्न किया। उन्होंने भी किसी वैज्ञानिक या युक्तियुक्त आधार पर अपने मत प्रकट नहीं किये, अपितु प्रायः कलपना व अनुमान का ही आश्रय लिया। तुर्की के बोगज कोई नामक स्थान पर प्राप्त एक उत्कीर्ण लेख में इन्द्रमित्रावरुणो और नास्तयौ का उल्लेख है, जो वैदिक देवता है। इस लेख को 1400 ई. पूर्व का माना जाता है। 18वीं से 12वीं दी ई. पू. तक बैबिलोनिया में जिस जाति का शासन था वह शूरिअ (सूर्य) और मर्य्त (मरुत) की उपासिका थी। इसी प्रकार के अन्य अनेक तथ्यों का पता लगने पर पाश्चात्य विद्वानों के लिए यह आवश्यक हो गया, कि वे वैदिक संहिताओं के रचनाकाल को 1200 ई. पूर्व से अधिक पुराना प्रतिपादित करें। विंटरनिट्ज ने वेदों के कतिपय भागों को 2500 ई. पूर्व के लगभग तक पुराना माना और जैकोबी ने 4500 ई. पूर्व के लगभग का।
भारतीय विद्वानों के मन्तव्य पर आधुनिक युग के भारतीय विद्वानों ने वेदों के निर्माणकाल का जिस ढंग से निरूपण किया है, यह अधिक महत्वपूर्ण तथा युक्तिसंगत है। ज्योतिष तथा भूगर्भ-शास्त्र आदि विज्ञानों का सहारा लेकर इन विद्वानों ने वैदिक साहित्य के रचनाकाल को पाश्चात्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित समय से बहुत अधिक पुराना माना है। ज्योतिष की गणना के आधार पर श्री शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने शतपथ ब्राह्मण का रचनाकाल 3000 ई. पूर्व के लगभग में प्रतिपादित किया है। इसके लिए उन्होंने शतपथ ब्राह्मण की ये कण्डिकाएँ प्रस्तुत की हैं-”एकं द्वे त्रीणि चत्वारीति वाड्अन्यानि नक्षत्राण्यभैता एव भूयिष्ठा यत्कृतिकास्तदभूयानमे वैतदुपैति तस्मात् कृत्तिकास्वादधीतः एता ह वै प्राच्यै दिशो न च्यवन्तें। सर्वाणि ह वाड्अन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यै दिशश्यामेवास्यैः नद्दिश्याहितौ भवतस्तस्मात् कृत्तिका स्वादधीत।”
इन कण्डिकाओं में यह कहा गया है कि कृतिका नक्षत्र का उदय ठीक पूर्व दिशा से होता है। यह नक्षत्र पूर्व दिशा से हटकर उदय होते हैं, पूर्व दिशा से विचलित होते हैं। शतपथ के इस कथन से यह सूचित होता है कि इस ब्राह्मण ग्रंथि की रचना उस समय में हुई थी, जबकि कृतिका नक्षत्र का उदय ठीक पूर्व दिशा में हुआ करता था। पर वर्तमान समय में कृतिका नक्षत्र ठीक पूर्व दिशा में उदित नहीं होता। वह कुछ उत्तर की ओर हटकर उदय होता है। दीक्षितजी ने ज्योतिष की गणना द्वारा यह प्रदर्शित किया है, कि वह समय जबकि कृतिका का उदय ठीक पूर्व दिशा में हुआ करता है, अब से 5000 वर्ष के लगभग पहले था। इसलिए शतपथ ब्राह्मण की रचना के समय को 3000 ई. पू. के लगभग मानना उचित होगा। ऋग्वेद का काल इससे भी पहले होगा।
वेदों के काल-निर्णय के सम्बन्ध में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जिन युक्तियों व प्रमाणों का सहारा लिया है, वे भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उन्होंने अनेक वैदिक सूक्तों के आधार पर यह प्रतिपादित किया है, कि ऋग्वेद के समय में सूर्य के मृग शिरा नक्षत्र में उदय होने पर उत्तरायण एवं नववर्ष का प्रारम्भ होता था। ज्योतिष की गणना के अनुसार ऐसा समय 4280 ई. पू. में था और तभी ऋग्वेद के बहुसंख्यक सूक्तों की रचना हुई थी।
श्री अविनाश चन्द्र दास ने वेदों के काल के निर्णय के लिए भूगर्भ-शास्त्र का आश्रय लिया है। उनके अनुसार ऋग्वेद की रचना के समय में आर्य लोग
वेदों का रचनाकाल एक तालिका
पाश्चात्य विद्वान् वेद का जो काल मानते हैं, वह निम्न तालिका से प्रकट हैं-
1-मैक्समूलर 1200 से 2500 वर्ष ईसा पूर्व
2-मैकडानल 1200 से 2000 वर्ष ईसा पूर्व
3-कीथ 1200 वर्ष ईसा पूर्व
4-वूहृर 1500 वर्ष ईसा पूर्व
5-हाँग 2000 वर्ष ईसा पूर्व
6-हृटनी 2000 वर्ष ईसा पूर्व
7-विल्सन 2000 वर्ष ईसा पूर्व
8-ग्रिफिथ 2000 वर्ष ईसा पूर्व
9-थ्योडोर 2000 वर्ष ईसा पूर्व
10-विण्टरनिट्ज 2500 वर्ष ईसा पूर्व
11-जैकोबी 3000 से 4000 वर्ष ईसा पूर्व
भारतीय विद्वान वेद के काल को पाश्चात्य विद्वानों की अपेक्षा अधिक ले जाते हैं, जैसा कि निम्न तालिका से स्पष्ट है-
1-शंकर बालकृष्ण दीक्षित 3000 वर्ष ईसा पूर्व
2-लोकमान्य तिलक 6000 से 10000 वर्ष ईसा पूर्व
3-सम्पूर्णानन्द 18000 से 30000 वर्ष ईसा पूर्व
4-अविनाशचन्द्र दास 25000 से 50000 वर्ष ईसा पूर्व
5-देवेन्द्रनाथ मुखेपाध्यायऊपरोक्त अनुसार
सप्तसिन्धु देश में निवास करते थे और इस देश के पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण में समुद्र था। सप्तसिन्धु देश की अन्यतम नदी सरस्वती उस समय पर्वत से निकलकर समुद्र में जा मिलती थी। वर्तमान समय में सरस्वती नदी में जल नहीं है और जिस मार्ग से वह पहले बहा करती थी, वह राजस्थान का मरुस्थल है, किसी प्राचीन समय में वहाँ समुद्र था और सरस्वती नदी वहीं सिंधु सागर में जा मिलती थी।
ऋग्वेद में गंगा और यमुना का तो उल्लेख है, पर उनके पूर्व की नदियों तथा उत्तरी भारत के मगध, अंग, बंग आदि प्राच्य जनपदों का इस वेद में उल्लेख नहीं है। ऋग्वेद के एक मंत्र से पूर्व (पूर्वी) और अपर (पश्चिम) समुद्रों की सत्ता सूचित होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वेद के समय में आर्य लोग जिस सप्तसिन्धु देश में निवास करते थे, उत्तर, दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिम में वह समुद्रों से घिरा हुआ था। पूर्वी समुद्र से बंगाल की खाड़ी का आशय नहीं लिया जा सकता, क्योंकि ऋग्वेद में न पूर्वी जनपदों का उल्लेख है और न गण्डक, सरयू आदि पूर्वी नदियों का। इसी प्रकार दक्षिण भारत की भी किसी नदी, पर्वत या जनपद का उल्लेख ऋग्वेद में नहीं है। यह सम्भव भी नहीं था, क्योंकि उस समय यह क्षेत्र समुद्र से आवृत्त था। ऋग्वेद द्वारा सप्तसिन्धु देश के विषय में जो सूचनाएँ प्राप्त होती हैं, वे भूगर्भशास्त्र द्वारा भी प्रमाणित हैं। इस विज्ञान द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है, किसी प्राचीनकाल में भारत की भौगोलिक दशा वर्तमान से बहुत भिन्न भी। उस समय राजस्थान और पूर्वी भारत के प्रदेशों के स्थानों पर समुद्र था और एक अन्य समुद्र पामीर की पर्वतमाला के उत्तर में (आधुनिक तुर्किस्तान ओर मंगोलिया के क्षेत्र में ) भी विद्यमान था। ऋग्वेद की रचना इन्हीं भौगोलिक दशाओं के समय में हुई थी। भूगर्भशास्त्र के अनुसार ये भौगोलिक दशाएँ 25,000 वर्ष हो चुके है, यह मानना युक्तिसंगत होगा।
आधुनिक विद्वानों के मत में चारों वेद एक ही समय में नहीं बने थे। विविध ऋषियों द्वारा समय-समय पर जिन मन्त्रों व सूक्तों की रचना होती रही, उन्हें बाद में महर्षि वेदव्यास ने संहिताओं के रूप में संकलित कर दिया। पर यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वेदव्यास के समय तक वैदिक मन्त्रों की रचना पूर्ण हो चुकी थी और उनके बाद किसी छंदोवद्ध सूक्ति को वैदिक ऋचा या मन्त्र की स्थिति प्राप्त नहीं हुई।
प्राचीन भारतीय अनुश्रुति के अनुसार वेदव्यास महाभारत के समय में हुए थे और सम्भवतः परीक्षित जनमेजय के समय तक जीवित रहे थे। इस दशा में वेदों की रचना महाभारत के समय 3102 ई. पूर्व या 1406 ई. पू. तक पूरी हो चुकी थी, यह स्वीकार करना होगा। इस प्रसंग में यह निर्देश कर देना भी आवश्यक है कि नृतत्वशास्त्र और इतिहास के क्षेत्र में जो नई खोजें पिछले वर्षों में हुई है।, उनके द्वारा मानव सभ्यता के आदि युग का समय बहुत प्राचीन प्रमाणित होता जा रहा है। साथ ही वैदिक युग को भी अधिक प्राचीन प्रतिपादित करने की प्रवृत्ति अब बढ़ रही है।
वेद अपौरुषेय वाणी हैं। समग्र रूप में वे संभवतः काफी समय बाद क्रमबद्ध रूप में सबके समक्ष आए हों किन्तु इतना सुनिश्चित है कि उनका सृजन देववाणी का सुन-सुनकर, स्मरण कर-सत्य की अनुभूति कर उसका महिमा गान करने के साथ काल-गति के साथ होता रहा है। अतः इनके समग्र प्राकट्यकाल पर मतवैभिन्य हो सकता है, किन्तु विश्व संस्कृति-धर्म के मूलभूत आधार के रूप में ये चिरपुरातन हैं एवं इन्हीं के प्राकट्य के साथ धरती हैं एवं इन्हीं के प्राकट्य के साथ धरती पर साँस्कृतिक दृष्टि से विकसित मानव का विकास हुआ, इस तथ्य को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं। ज्ञान-विज्ञान के भाण्डागार हमारी वैदिक सम्पदा को महर्षि दयानन्द के बाद परमपूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माताजी द्वारा सरल भाष्य के माध्यम से जन सुलभ कराया गया है, यह संस्कृति की सबसे बड़ी सेवा है। यही नहीं यह ज्ञान अब विद्यालयों में पूरे भारतवर्ष ही नहीं विश्व के हर व्यक्ति के घरों में पहुँचना आरम्भ हो गया है, तो यह मानना चाहिए कि वह समय निकट है जब मनुष्य अपनी गौरव-गरिमा भरे अतीत को, भारत जगद्गुरु के पद को पुनः प्राप्त कर लेगा। इस भवितव्यता को एक सुनिश्चित संभावना मानना चाहिए।
एक बार विद्यार्थी कपिल चोरी के अपराध के सन्देह में पकड़े गये। उन्हें राजा के सामने लाया गया। राजा को जब वास्तविकता मालूम हुई कि कपिल सिर्फ सन्देह में ही पकड़े गये थे, क्योंकि कपलि सिर्फ दो मासा स्वर्ण पाने के लालच में राजा को आशीर्वाद देने ही आये थे और वह बात आरक्षकों को मालूम नहीं थी।
राजा ने कपिल से मुँह माँगा इनाम माँगने को कहा। कपिल ने सोचा धन माँग लूँ तो अच्छा है, किन्तु धन बिना सत्ता के सुरक्षित नहीं रह सकता। अस्तु, साथ में सत्ता भी होनी चाहिए। अस्तु, कम से कम एक चौथाई राज्य तो राजा से माँगना चाहिए।
किन्तु चिन्तन चलता रहा। कपिल ने सोचा-हिस्से के रूप में राज्य प्राप्त करने पर राजा के बेटों और मुझमें प्रतिस्पर्धा की भावना जाग्रत हो सकती है। आपस में लड़ाई-झगड़े की पूर्ण सम्भावना है तो फिर पूरा राज्य हासिल कर लूँ।
तब कोई झगड़े की सम्भावना न रहेगी। किन्तु चिन्तन निरन्तर अबाध गति से चलता रहा और कपिल अपने आप में तृप्त न हो सके।
तभी राजा ने उनसे पुनः कहा-कपिल! बोलो तुम्हें क्या चाहिए। जो चाहों माँग लो। राज्य का खजाना तुम्हारे लिये खुला है।
कपिल कुछ क्षण मौन रहे और बोले-राजन्! मैंने निर्णय किया है, कि मैं इस अर्थ-संग्रह को त्याग कर आज से अपरिग्रही जीवन बिताऊँगा।
विद्यार्थी कपिल जीवन और धन एवं वैभव का मोह छोड़कर दुनिया के एक सत्य की आँच में तपने चले गये।
महाराज वीरभद्र रणबाँकुरे योद्धा होने के साथ विद्याप्रेमी भी थे। उनके दरबार में विविध विषयों के प्रख्यात विद्वान थे। साहित्य, दर्शन, ज्योतिष आदि अनेक गूढ़ विषयों पर सारगर्भित चर्चाएँ करने में उन्हें विशेष आनन्द प्राप्त होता था। एक बार उन्होंने अपने दरबार की विद्वान् मंडली के सामने एक प्रश्न रखा-”जब भाग्य पहले से ही निश्चित है तो मनुष्य के प्रयासों का क्या औचित्य है?” विद्वानों ने अपनी क्षमतानुसार प्रश्न का उत्तर देने की काफी कोशिश की, लेकिन राजा साहब को अपने सवाल का सन्तोषजनक समाधान न मिला।
उनके दरबार में चतुरसिंह नाम का एक व्यक्ति था। उसकी बुद्धि की तीव्रता के किस्से सब ओर कहे-सुने जाते थे। इन किस्सों में उसकी बुद्धि-कुशलता की जितनी झलक मिलती थी, उससे कहाँ अधिक उसकी कुटिल स्वार्थपरता झलकती थी। दरबार में महाराज द्वारा सवाल उछाए जाने पर उसे अपने बचपन के साथी विशाल का ध्यान आया। विशाल अध्ययनकाल में अपनी विलक्षण प्रतिभा से गुरुजनों को चकित कर देता था। उसकी मेधा जितनी तीव्र थी, भावनाएँ उतनी ही उदात्त थीं। इसी कारण अनेकों बार राजसेवा का प्रस्ताव मिलने पर भी उसने शिक्षा को अपना कार्यक्षेत्र चुना।
इन दिनों वह राजधानी से थोड़ी दूर एक अरण्य में अपने गुरुकुल का संचालन कर रहा था। चतुरसिंह ने सोचा यदि विशाल ने प्रश्न का सही समाधान कर दिया तो महाराज मुझसे प्रसन्न होंगे और यदि वह उत्तर देने में असफल रहा तो उसकी सारी ख्याति धूल में मिल जाएगी। एक तीर से दो शिकार कर देने की अपनी इस कूटनीतिक योजना वह मन ही मन मुस्कराया।
उसके मन में विशाल के प्रति गहरी ईर्ष्या थी।
गुरुकुल के दिनों में वही उसका एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी था। अध्ययन में उसने कभी उसे आगे नहीं निकलने दिया। अतः ईर्ष्या बहुत पुराने समय से जल रही थी। हालाँकि विशाल के मन में चतुरसिंह के लिए किसी भी तरह का रोष अथवा ईर्ष्या का कोई चिन्ह न था।विशाल अपने हाल में मस्त था। उसे किसी तरह की कोई शिकायत न थी।
एक दिन मौका देखकर चतुरसिंह ने महाराज वीरभद्र से विशाल की विद्वत्ता का गुणगान कर दिया। महाराज ने उसे बुलाने की स्वीकृति दे दी। राजदरबार से आमंत्रण पाकर विशाल को हलकी-सी चिन्ता हुई। वह सोचने लगा कि महाराज ने उसे क्यों याद किया है। फिर भी उसे महाराज की नीति व न्याय पर पूरा भरोसा था।
ठीक समय पर वह उनके दरबार में उपस्थित हुआ और अपना परिचय दिया। महाराज वीरभद्र ने उसका उचित स्वागत किया तत्पश्चात् उन्होंने अपना प्रश्न विशाल के सामने दुहराया।
विशाल बोला,”श्रीमान! यहाँ कई श्रेष्ठ विद्वान उपस्थित हैं। मैं तो साधारण-सा शिक्षक हूँ। फिर भी अपनी अल्पबुद्धि से मैं आपके सवाल का उत्तर देने का प्रयास करूंगा। मेरी राय में मनुष्य भाग्य का क्रीतदास नहीं है। यदि सब कुछ पूर्व निश्चित हो तो मानव की समस्त गतिविधियाँ याँत्रिक हो जाएँगी। वह एक निरीह प्राणी से अधिक कुछ भी नहीं रह जाएगा। जबकि वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है।”
सभी विद्वान और महाराज वीरभद्र विशाल की बातें ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। विशाल का कथन जारी था, “जीवन की अनेक दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के समय व्यक्ति के जीवन में जब कभी मानसिक संघर्ष की घड़ी आती है तो उस समय वह अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार मार्ग चुनने को स्वतन्त्र होता है। यदि वह कुमार्ग को चुनता है, तो उसके दुष्परिणाम उसे भुगतने ही होंगे।”
अपनी बात कहते-कहते विशाल की वाणी ओजस्वी हो उठी। वह कह रहा था,”बुराई का एक अपनी आकर्षण होता है। विवेकी व्यक्ति उसके जाल में नहीं फँसता। वह सही निर्णय लेकर उन्नति पथ का राही बन जाता है। जबकि गलत रास्ता चुनने वाला पतन के गर्त में पहुँच जाता है और अपनी गलती छिपाने के लिए वह कहता है कि उसके भाग्य में बर्बाद होना ही लिखा था। श्रम, पुरुषार्थ, लगन व विवेक से किया गया कार्य सदैव मंगलकारी होता है।”
इतनी सुन्दर विवेचना सुनकर महाराज वीरभद्र का हृदय गदगद हो गया। उन्होंने अपने गले से मोतियों की माला उतार कर विशाल को भेंट कर दी। विशाल प्रसन्नतापूर्वक लौटा। उसकी पत्नी मोतियों की माला देखकर बहुत प्रसन्न हुई। लेकिन चतुरसिंह की ईर्ष्या की चिंगारी ज्वाला बनकर धधक उठी, उसके मन में छल-कपट की योजनाएँ घूमने लगीं।
एक रात वह चुपके से विशाल के घर में घुस गया। विशाल और उसकी पत्नी बरामदे में सोए हुए थे। उसने धीरे से साँकल खोली और अन्दर गया। उसे सामने एक छोटा-सा बक्सा दिखाई दिया। उसे लगा शायद वह मोतियों की माला इसी बक्से में होगी। उसने उसे ज्यों ही खोला उसकी पत्नी जाग गए। वे इतनी रात गए चतुरसिंह को अपने निवास पर देखकर हैरान रह गए।
विशाल ने पूछा “तुम इस समय में यहाँ क्या कर रहे थे? तुमने इस बक्से को क्यों खोला? लगता है तुम्हें बिच्छू ने काट लिया है। सोने से पूर्व मैंने यहाँ एक बिच्छू देखा था। मैंने सोचा था सुबह होने पर इसे जंगल में छोड़ दूँगा। यही सोचकर मैंने इसे बक्से में बन्द कर दिया था।”
चतुरसिंह के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। वह घबराकर विशाल के पैरों में गिर पड़ा और कहने लगा-”तुमने दरबार में ठीक ही कहा था, मनुष्य स्वयं अपने दुर्भाग्य का जनक होता है। मुझे मेरी दुष्टता का फल मिल गया। तुम मुझे क्षमा कर दो, अन्यथा मैं कहीं भी मुँह दिखाने लायक न रहूँगा।” उसकी आँखों से पश्चात्ताप के आँसू बह रहे थे।
विशाल ने कहा, “यदि तुम्हें मोतियों की माला की इतनी ही चाह थी तो तुम मुझसे कहकर देखते। मैं तुम्हें वह माला सहर्ष भेंट कर देता। विवेक के वरदान को ठुकराकर तुमने गलत मार्ग क्यों चुना?” चतुरसिंह बहुत शर्मिन्दा था। वह सिर नीचा किए अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे मालूम हो गया था, मनुष्य अपने भाग्य का निर्माण विवेक के बलबूते ही कर पाता है।
परामनोविज्ञानियों के अनुसार जीवितावस्था में मानव जीवन का तीन भाग उपचेतन अथवा परामन के अधीन रहता है। मृत्यु के उपरान्त जाग्रत मन का अस्तित्व तो समाप्त हो जाता है, किन्तु उसका मौलिक तत्व, जिसमें वासना, संस्कार और समस्त भौतिक वृत्तियाँ रहती है, उपचेतन मन में चला जाता है। यही कारण है कि मरने के पश्चात् उपचेतन मन की शक्ति और अधिक बढ़ जाती है। इतना ही नहीं, विराट् मन अथवा परमचेतना से भी उसका संपर्क और घनिष्ठ हो जाता है। परामनोविज्ञान का यह अत्यन्त गम्भीर विषय है, जिस पर प्रेतविद्या के सारे सिद्धान्त अवलम्बित हैं।
गुह्यविद्या के आचार्यों के मतानुसार जीवात्मा के तीन स्वरूप होते हैं-मानवात्मा व प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। मानवात्मा व प्रेतात्मा तब कहलाती है, जब जीवात्मा का निवास वासनामय शरीर में होता है। सूक्ष्मात्मा उस अवस्था का नाम है, जब वह अत्यन्त सूक्ष्म परमाणुओं से निर्मित सूक्ष्मतम शरीर में अवस्थान करती है। इस प्रकार जीवात्मा की तीन अवस्थाएँ और तीन भोग शरीर हैं।
वासनामय शरीरधारी प्रेतात्माओं का जो जगत है, उसे वासनालोक या प्रेतलोक कहा गया है। कुछ आचार्यों का विचार है कि प्रेतलोक सुदूर कहीं अन्तरिक्ष में स्थित है, पर अधिकाँश की धारणा इससे भिन्न है। उनके अनुसार प्रेतलोक वास्तव में कहीं अन्यत्र नहीं, वरन् इसी पृथ्वी पर दूध और पानी की तरह घुला-मिला है।
वासना को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-अच्छी और बुरी। इस आधार पर प्रेतलोक को भी वर्गों में बाँटा गया है-एक वह, जिसमें अच्छी वासना वाली मृतात्माएँ निवास करती हैं। इसे पितृलोक कहते हैं। दूसरा वह, जिसमें बुरी वासनाओं वाली अतृप्त, असंतुष्ट और विक्षुब्ध आत्माएँ देवात्मा कहलाती हैं। इनमें मनः शक्ति और विचार-शक्ति अति प्रबल होती है। प्राण-शक्ति और इच्छाशक्ति की की उनमें प्रबलता होती है, किन्तु प्रेतात्माओं में सिर्फ वासना की प्रबलता रहती है। वासना की शक्ति ही उनकी वास्तविक शक्ति है।
यों विज्ञान अब तक भूत-प्रेतों के अस्तित्व को नकारता रहा है, पर पिछले दिनों के शोध-अनुसंधानों के दौरान कुछ ऐसी उपलब्धियाँ हस्तगत हुई, जिसने विज्ञानवेत्ताओं को यह सोचने पर विवश कर दिया कि स्थूल पदार्थों की कोई सूक्ष्म प्रतिकृति भी होती है क्या अथवा मनुष्य की कोई मरणोत्तर सत्ता भी है क्या? विज्ञानियों के मस्तिष्क में यह प्रश्न तब उभरे, जब पीटर एफ, ड्र्कर एवं सी. डब्ल्यू. मिल्क नामक दो अमरीकी शोधकर्मी एक अनुसंधान के दौरान इन्फ्रारेड फोटोग्राफी कर रहे थे। तस्वीर लेने के उपरान्त जब उनने उनका अध्ययन करना आरम्भ किया, तो वे यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि जहाँ निर्जन और सपाट मैदान था, वहाँ चित्र में अनेक महल और मोटर दिखाई पड़ रहे थे। यह कैसे हुआ? उनकी समझ में कुछ नहीं आया। तब वे उस स्थान का इतिहास जानने की कोशिश करने लगे। गहन छानबीन और विस्तृत अध्ययन से ज्ञात हुआ कि लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व वह स्थान आबाद था और वहाँ कई बड़ी इमारतें थीं। इसका अर्थ यह हुआ कि हर पदार्थ की अपनी एक सूक्ष्म अनुकृति होती है, जो उसके साथ-साथ मौजूद रहती है। वर्षों बाद स्थूल संरचना के न रहने पर भी उसकी वह सत्ता यथावत् बनी रहती है।
इस निष्कर्ष पर पहुँचने के पश्चात् वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड और उसमें फैली हुई ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का कोई अंग हो, जो ब्रह्माण्ड के नियमन, संगठन और संचालन का कार्य करती है। उनके सामने ब्रह्माण्ड की अनेक गुत्थियों में से एक गुत्थी यह भी है कि मनुष्य की चेतना का मूल स्वरूप क्या है ओर उसका ब्रह्माण्डीय चेतना से क्या सम्बन्ध है? एक और भी प्रश्न है कि क्या प्रकट चेतना से परे मनुष्य किसी अव्यक्त चेतना का भी स्वामी है, जो इस पदार्थ जगत के नियमों से ऊपर है तथा जो मनुष्य को प्राकृतिक शक्तियों से परे कहीं अधिक सूक्ष्म पराभौतिक शक्तियाँ प्रदान करती है?
इन प्रश्नों पर विचार करने से पूर्व यहाँ पराचेतना और मन को समझ लेना आवश्यक है। पराचेतना वास्तव में ‘आत्मा’ को कहते हैं और परमचेतना परमात्मा है। इस आधार पर मन के दो रूप हुए-चेतन और अचेतन। चेतन मन को ही जाग्रत मन भी कहते हैं। अचेतन मन पराचेतना (आत्मा) का एक महत्वपूर्ण अंश है। इसी प्रकार चेतन मन परमचेतना (परमात्मा) का प्रमुख अंश है। मन का एक बहुत बड़ा अंश किसी अज्ञात रहस्यमय आवरण में छिपा हुआ है। चेतन मन के इस छिपे हुए भाग को ‘उपचेतन मन’ कहते हैं। उपचेतन मन दो प्रकार के कार्य करता है-एक ओर अदृश्य लोकों एवं अदृश्य प्राणियों के विचारों, इच्छाओं आदि को ग्रहण करता है, वहीं दूसरी ओर मानवीय विचारों, भावनाओं, इच्छाओं आदि को सम्प्रेषित करता है। इसी उपचेतन की रहस्यमयी शक्ति के माध्यम से प्रेत-पितर अपने विचारों, भावनाओं, इच्छाओं और संकल्पमय उद्देश्यों को मानव मस्तिष्क में प्रेषित करते हैं, जो बाद में मानवीय विचारों, भावनाओं, इच्छाओं आदि में परिवर्तित होकर भौतिक रूप और आकार ग्रहण करते हैं।
प्रेतात्माएँ जिस वातावरण में रहती हैं, उसे वासनालोक या प्रेतलोक कहा जाता है। मनुष्य का जन्म वासना के ही कारण होता है। इसलिए सन्त पुरुष वासनाओं के, इच्छाओं के त्याग पर बल देते हैं, ताकि ये आत्मोत्थान के मार्ग में बन्धन न बन जाएँ। जो वासनाओं का, आकाँक्षाओं का त्याग नहीं कर पाते, दूसरे शब्दों में जो अपना चिन्तन और दृष्टिकोण अध्यात्मवादी नहीं बना पाते, उनका उपचेतन मन का सम्बन्ध बराबर वासनालोक की प्रेतात्माओं से बना रहता है, जिसके कारण प्रेतात्माएं उनके सिर चढ़कर अपनी अवाँछनीय आकाँक्षाएँ आसानी से पूरी करती रहती हैं। इन दिनों नैतिकी का जितना अधिक अवमूल्यन हुआ है, उतना कदाचित् ही पहले कभी रहा हो। यही कारण है कि आज सर्वसाधारण द्वारा उलटा सोचते और उलटा करते ही बन पड़ रहा है। कारण उनका संपर्क उच्च आयामों के देवतुल्य आत्माओं से न होकर उनके मन-मस्तिष्क पर सदा निम्न स्तर की निकृष्ट आत्माओं का ही आधिपत्य बना रहता है। यही हमारे आध्यात्मिक विकास के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा और बारबार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेने का निमित्त बन जाता है।
जिनका गुण, कर्म, स्वभाव जैसा होता है, मृत्यु पश्चात् सूक्ष्मलोक में भी वे उसी स्तर की अनुभूति करते हैं। उदाहरण के लिए जो अपने भौतिक जीवन में अशान्त, असंतुष्ट और विक्षुब्ध होते हैं, उनका पारलौकिक जीवन भी पिशाचों की तरह उन्मादग्रस्त बना रहता है। इसके विपरीत जो मनीषी, कलाकार, साहित्यकार, साधक स्तर के लोग हैं, वे मरणोत्तर जीवन में भी अपने इर्द-गिर्द वैसा ही वातावरण बनाये रहते हैं। ये आत्माएँ अपने स्तर के व्यक्तियों से संपर्क साधते और उनकी विचारणाओं ओर भावनाओं को प्रभावित करते हैं। उनकी जिन इच्छाओं का आवेग कमजोर होता है, वे चेतन मन की परिधि तक आते-आते काफी क्षीण व दुर्बल हो जाती है, अतः मानवी क्रिया-कलापों पर इनका कोई विशेष असर नहीं पड़ता, किन्तु जिनमें वासना का वेग प्रचण्ड होता है, उनकी वह भावनाएं पूर्ण रूप से चेतन मन में प्रकट होती हैं। इस प्रकार वासना वेगयुक्त विचारों के मानसिक जगत अनुसार काम जाने-अनजाने कर बैठता है। बाद में वह यह सोचकर आश्चर्यचकित हो उठता है कि अचानक या अपने आप उससे यह काम कैसे हो गया।
प्रेत शरीर केवल भोग शरीर है। मानव शरीर भोग और कर्ममय दोनों है। भौतिक शरीर के द्वारा भोग भी किया जाता है और कर्म भी। इसीलिए प्रेतात्माओं जैसी भेग शरीरधारी आत्माएँ भेग का उपभोग करती और तृप्ति अनुभव करती हैं। जैसे कोई व्यक्ति जीवन में शराबी रहा है। मरने के पश्चात् पार्थिव शरीर के अभाव में शराब तो पी नहीं सकता, इसलिए जो व्यक्ति शराब पीता होगा, उसके अचेतन मन में प्रभाव डालकर उसकी प्रेतात्मा उसे प्रेरित करेगी और जब वह शराब पीने लगेगा, तो वह प्रेतात्मा उस व्यक्ति के शराब के माध्यम से मदिरा के तत्वों को ग्रहण कर तृप्ति अनुभव करेगी, किन्तु इसकी तनिक भी जानकारी उस मद्यपी को न मिल सकेगी। इसी प्रकार जो व्यक्ति जीवन भर लूट-पाट, हत्या, आगजनी, चोरी, डकैती आदि कृत्यों में संलग्न रहा, मरने के बाद भी वह अपने जैसे स्वभाव और संस्कार के व्यक्तियों की तलाश में रहता है, ताकि वह उन पर सवार होकर वैसी ही दुरभिसंधि रच सके। इन कामों में उसे आत्मिक सुख की प्रतीत होती है।
इस प्रसंग में यह भली’-भाँति समझ लेना चाहिए कि क्रोध या आवेशवश अचानक बिना किसी पूर्व योजना अथवा उद्देश्य के कोई अप्रिय कार्य अनचाहे में किसी व्यक्ति द्वारा हो जाता है, तो इसकी पृष्ठभूमि में इसी प्रकार की अतृप्त प्रेतात्माओं की वासनाएँ ही रहती हैं। ऐसे ही किसी गंभीर चिन्तन में निमग्न व्यक्ति की बुद्धि जब समस्या के समाधान में निरुपाय होती प्रतीत होती है, तभी न जाने कहाँ से वैसे विचार की एक ऐसी किरण मस्तिष्क में कौंध उठती है कि हल सरल और साधारण जान पड़ने लगता है। इस सहायता में भी अदृश्य आत्माओं का ही हाथ है। गुह्मवेत्ताओं का कथन है कि मनुष्य की पचास प्रतिशत विचारणाएँ ऐसी ही अगोचर आत्माओं द्वारा प्रेरित होती है। शेष में पचास प्रतिशत विचार ही ऐसे होते हैं, जिन्हें उनके निजी और मौलिक कहे जा सकते हैं।
उच्च कोटि की प्रेतात्माएँ एक विशेष सीमा तक प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित कर सकने में समर्थ होती हैं। इसी प्रयोजन से सृष्टि के गूढ़ तत्वों से तथा साथ ही जीवन के रहस्यमय तथ्यों से परिचित होने के लिए ताँत्रिक साधना के सभी सम्प्रदायों में किसी न किसी रूप में प्रेत साधना प्रचलित है, किन्तु प्रत्येक सम्प्रदाय के अलग-अलग साधना, नियम, पद्धति और विधियाँ हैं और किस पद्धति ए0 किस विधि से किस प्रकार की प्रेतात्माएँ अधिकार में आती हैं और उनसे कौन-सा काम लिया जा सकता है-इन सब बातों का भी ताँत्रिक साहित्य में उल्लेख मिलता है।
आत्मा परमात्मा का अंशधर है। इसमें भी वही सारी शक्तियाँ और विभूतियाँ है।, जो ईश्वर में हैं, पर लौकिक जीवन में हम उसे इतना मलिन और कलुषित बना देते हैं कि उसकी वास्तविक विभूति का परिचय हमें मिल ही नहीं पाता और इसी दीन-हीन अवस्था में इस संसार-सागर से हम विदा हो जाते हैं तथा पारलौकिक जीवन प्रेत-पिशाचों जैसा बिताने कि लिए विवश होते हैं। यदि भौतिक जीवन में व्यक्ति अपनी चेतना को तनिक भी परिष्कृत कर सके, तो न सिर्फ वह मन और आत्मा की दिव्य शक्तियों को पाकर निहाल हो सकेगा, वरन् ऐसी उच्चात्माओं का अदृश्य सहयोग भी अर्जित, आकर्षित कर सकेगा, जो उसकी भौतिक सफलता को सुनिश्चित कर सकें।
इंग्लैण्ड का सम्राट जेम्स अपने कोष में अधिक से अधिक धन एकत्र करने के लिए धन लेकर उपाधियाँ वितरित किया करता था। वह जानता तो था मात्र उपाधि प्राप्त कर लेने से कोई व्यक्ति महान नहीं बन जाता, परन्तु मूर्खों के तुच्छ अहंकार की संतुष्टि के लिए वह ऐसा करके अपनी भी स्वार्थ सिद्ध करता रहा । एक दिन एक व्यक्ति ने उससे कहा-”महाराज, मुझे सज्जन की उपाधि दे दीजिए।” जेम्स ने उत्तर दिया-”मैं तुम्हें लार्ड, ड्यूक, दार्शनिक, विचारक तो बना सकता हूँ। लेकिन सज्जन नहीं बना सकता।” यह सच है, कि सज्जनता अच्छे संस्कारों से पैदा होती है, उसे खरीदा नहीं जा सकता।
‘हिन्दू’ शब्द में मानवता का मर्म सँजोया है। अनगिनत मानवीय भावनाएँ इसमें पिरोयी है। सदियों तक उदारता एवं सहिष्णुता का पर्याय बने रहे इस शब्द को कतिपय अविचारी लोगों ने विवादित कर रखा है। यह ठीक है कि वेदों, उपनिषदों, प्राचीन संस्कृत एवं पाली ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। किन्तु ऐसा नहीं है कि इस शब्द में पिरोये भाव उस समय नहीं थे। उस समय इन भावों की अभिव्यक्ति ‘आर्य’ शब्द से होती थी। आर्य यानि कि मानवीय श्रेष्ठता का अटल मानदण्ड। तब से लेकर बाद तक भारतीय जन-जीवन विभिन्न संस्कृतियों एवं भाषाओं को आत्मसात करता चला गया। या यूँ कहें विविध संस्कृतियाँ भारतीय श्रेष्ठता में समाती चली गयीं और श्रेष्ठ मनुष्यों-सुसंस्कृत मानवों का निवास स्थान अपना देश अजनामावर्ष, आर्यावर्त, भारतवर्ष कहलाते हुए हिन्दुस्तान कहलाने लगा और यहाँ के निवासी आर्य, भारतीय और हिन्दू कहलाए।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ में जब यह कहते हैं कि हमारे पुराने साहित्य में तो हिन्दू शब्द आता ही नहीं है, तो वे हिन्दुत्व में समायी भावनाओं का विरोध नहीं करते। मानवीय श्रेष्ठता के मानक इस शब्द का भला कौन विरोध करेगा। उदारता एवं सहिष्णुता तथा समस्त विश्व को अपने प्यार का अनुदइन देने वाले हिन्दुत्व के प्रति सभी का मस्तक अनायास झुक जाता है। हाँ इस शब्द का पहले-पहल प्रयोग जिस ग्रन्थ में मिलता है ‘मेरुतन्त्र’। इसमें भी हिन्दू शब्द का अर्थ किसी धर्म विशेष से नहीं है। इसके तैतीसवें अध्याय में लिखा है “शक एवं हूण आदि का बर्बर आतंक फैलेगा। अतः जो मनुष्य इनकी बर्बरता से मानवता की रक्षा करेगा वह हिन्दू है।” मेरुतन्त्र के अतिक्ति भविष्य पुराण, मेदिनी कोष, हेमन्त कोसी कोष ब्राहस्पत्य शास्त्र, रामकोष, कालिका पुराण, शब्द कल्पद्रुम, उद्भूत रुपकोष आदि संस्कृत ग्रन्थों में इस शब्द का प्रयोग मिलता है। ये सभी ग्रन्थ दसवीं शताब्दी के आस-पास के माने जाते हैं।
इतिहासकारों एवं अन्वेषण-कर्ताओं का एक बड़ा वर्ग इस विचार से सहमत है कि हिन्दू शब्द की प्रेरक सिन्धु नदी है। सिन्धु नदी के कारण ही यूनानियों ने उस क्षेत्र के वासियों को इन्ववाई कहा, जो आगे चलकर इंडियन बन गया। पण्डित नेहरू के अनुसार हिन्दू शब्द प्रत्यक्षतः सिन्धु से निकाला है, जो इसका पुराना और नया नाम है। इसी सिन्धु शब्द से हिन्दू, हिंदुस्तान या हिन्दुस्तान बने हैं और इण्डस, इण्डिया भी। ऋग्वेद में सिन्धु शब्द लगभग दी सौ स्थानों पर प्रयुक्त हुआ है। डॉ. वी. डी. सावरकर की पुस्तक ‘स्लेक्ट इन्सक्रिप्सशन’ में कहा गया है, सिन्धु नदी के पूर्वी एवं पश्चिमी दिशाओं के बीच के क्षेत्र एवं निवासियों को फारस अर्थात् वर्तमान ईरान के शासक जिरक एवं दारा हिन्दु नाम से पुकारते थे। आचार्य पाणिनि ने अष्टाध्यायी में सिन्धु का अर्थ व्यक्तियों की वह जाति बतायी है, जो सिन्धु देश में रहते हों।
समकालीन इतिहासकार, अन्वेषणकर्ता एवं शिक्षाशास्त्री हिन्दू को फारसी भाषा का शब्द मानते हैं। फारसी भाषा में हिन्दू एवं हिन्दू से बने अनेक शब्द मिलते हैं। हिन्दुवी, हिन्दनिया, हिन्दुआना, हिन्दुकुश, हिन्द आदि फारसी शब्दों में यह झलक देखी जा सकती है। फारस की पूरब दिशा का देश भारत ही वास्तव में हिन्द था। पूरब दिशा से सिन्धु में मिलने वाली तीन नदियाँ हैं, झेलम,
रावी एवं सतलूज। पश्चिम की ओर से भी तीन नदियाँ सुवास्तु, कुम्भारका, (काबुल) एवं गोमल (गोमती) सिन्धु नदी में मिलती हैं। इन्हीं विशिष्ट धाराओं एवं सिन्धु नदी से सिंचित होने वाले प्रदेश का नाम सप्तसिन्धु या हप्तहिन्दु था।
वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश एवं अफगानिस्तान इसी क्षेत्र का भाग है। फारसी शब्दावली के नियमानुसार संस्कृत का अक्षर ‘स’ फारसी भाषा के अक्षर ‘ह’ में परिवर्तित हो जाता है। इसी कारण सिन्धु शब्द परिवर्तित में इसी से हिन्दू हो गया। कालांतर में इसी से हिन्दू या हैन्दव एवं हिन्द शब्द प्रयुक्त हुए। हिन्दू शब्द जेन्दावेस्ता या धनदावेस्ता जैसी फारसी की प्राचीन धार्मिक पुस्तक में सर्वप्रथम मिलता है। एक फारसी ग्रन्थ शतीर के 163 वें श्लोक में हिन्द शब्द मिलता है। जिसमें महर्षि व्यास जी सम्राट गसताशिप को अपना परिचय देते हुए कहते है-मेरा जन्म हिन्द में हुआ है। संस्कृत एवं फारसी भाषा के अतिरिक्त भी अनेकों ग्रन्थों में हिन्द या हिन्दू शब्द का प्रयोग किया गया।
श्री वासुदेव विष्णुदयाल ने अपनी पुस्तक ‘द एसेन्स ऑफ द वेदाज एण्ड एलाइड स्क्रिपचर्स’ में पृष्ठ 3-4 पर आचार्य सत्यदेव वर्मा ने’ इस्लामिक धर्म ग्रन्थ पवित्र कुरान के संस्कृत अनुवाद की भूमिका में श्रीतनसुख राम ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू धर्म परिचय’ के पृष्ठ 31 पर लिखा है कि अरबी भाषा के एक अंग्रेज कवि लबी बिन अखतब बिन तुरफा ने अपने काव्य संग्रह ‘सीरतुलकुल’ में हिन्द एवं वेद शब्द का प्रयोग किया है। ये महान कवि इस्लाम से 2300 वर्ष पूर्व हुए हैं। अरबी में हिन्दू शब्द का मिलना यह अवश्य सुनिश्चित करता है कि यह शब्द यूनान, फारस, यूरोप एवं अरब देशों में प्रचलित था और यह भी कि विश्व की परिक्रमा में विभाजित अधिकार समकालीन राष्ट्र इस शब्द को धर्म विशेष अथवा सम्प्रदाय विशेष के अर्थ में नहीं बल्कि सद्गुण सम्पन्न मानव जाति या क्षेत्र विशेष के अर्थ में प्रयोग करते थे।
श्री रामधारीसिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखा है कि उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में जब भारत में फिरंगियों का प्रकोप बढ़ गया था और जागरुकता की लहर चली, तब बहुत से व्यक्ति हिन्दू नाम त्याग कर अपने आपको आर्य कहने लगे। क्योंकि ये दोनों ही शब्द समान अर्थ रखते हैं। वी. डी. सावरकर हिन्दुत्व पुस्तक में लिखते हैं, “हिन्दू उद्बोधन हमें विश्व ने दिया है, जिसकी उत्पत्ति का केन्द्र सिन्धु नदी है। दुनिया हमें जो सम्बोधन देती है, यदि वह हमारी भावना के विपरीत है, तब तो सभी नामों को दबा देना सरल है। परन्तु विश्व यदि हमें ऐसा नाम देता है जिससे हमारी वर्तमान एवं भूतकालीन विशिष्टता प्रदर्शित होती है, तब वह नाम अवश्य ही दूसरे नामों को भुला देगा। हमारा हिन्दू नाम इतना गौरवशाली है कि उसके वेग से हमारा सर्वसम्मत नाम भरतखण्ड भी पृष्ठभूमि में चला गया। दूसरे देशों के वासी भी हमारे सिन्धु या हिन्दु नाम से परिचित हैं और इसलिए हमें उस नाम से ही सम्बोधित भी करते हैं।
हिन्दु शब्द से मानवीय आदर्शों का परिचय मिलता है। साथ ही सिन्धु क्षेत्र सम्बन्धित होने के कारण इससे हम अपना राष्ट्रीय परिचय भी पाते हैं। हिन्दु शब्द को जब हम साम्प्रदायिक संकीर्णताओं से जोड़ते हैं तो हम अपनी महानता, विशालता एवं गर्व को संकुचित मानसिकता में बन्दी बना देना चाहते हैं। भारत में अपना अस्तित्व रखने वाले सभी धर्मों, सम्प्रदायों की मान्यताएँ एवं उपासना विधि, भाषा, वेशभूषा, रीतिरिवाज, धार्मिक विश्वास भले ही आपस में न मिलते हों, परन्तु सभी अपना सम्मिलित परिचय एक सस्वर में गाते हुए यही देते हैं, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा। हो भी क्यों न, हिन्दू और हिन्दुस्तान इन सभी जातियों, प्रजातियों एवं उपजातियों की मातृभूमि है। जहाँ सभी को रहने का समान अधिकार है।
मानवीय गौरव के प्रतीक इस शब्द से अपना नाता जोड़ने में महाराणा प्रताप एवं शिवाजी सरीखे देशप्रेमियों ने गर्व का अनुभव किया। शिवाजी की वीरता, पराक्रम एवं श्रेष्ठता की अनुभूति करते हुए राखी हिन्ददानी, हिन्दवान को तिलक राख्यों आदि शब्दों का प्रयोग किया है। गुरु गोविन्दसिंह ने भी इस शब्द के निहितार्थ का भावविभोर होकर गान किया है। संस्कृत व्याकरणाचार्यों ने भी इस शब्द के अर्थ को कुछ विशेष ही बताया है। अद्भुत रूप कोश में लिखा है, दुष्टता का नाश करने वाले हिन्दू कहलाते हैं। हेमन्त कोश के अनुसार हिन्दू वह है जो नारायण यानि के ईश्वर की भक्ति करता है। रामकोश में लिखा है, हिन्दू न तो दुष्ट होता है न, अधर्मी अथवा नहीं किसी की पीठ पीछे बुराई करता है। जो सत्यधर्म, सत्यवचन का पालन करता हो, विद्वान एवं वेद धर्म का उपासक हो वहीं हिन्दू है।
शब्द कल्पद्रुम के अनुसार हीन दुष्याति इति हिन्दू अर्थात् जो अपनी हीनता एवं बुराई को स्वीकार कर उसे छोड़ने के लिए तैयार होता वह हिन्दू है। ‘द धर्मस्मृति’ के अनुसार हिंसा से बचने वाला, सदाचारी ईश्वर की राह पर चलने वाला। हिन्दू है। आचार्य माधव के अनुसार ओंकार मूलमंत्र में आस्था रखने वाले, पुनर्जन्म में विश्वास करने वाले, गौ’-सेवक, ऋषि भरत को अपने पूर्व पुरुष मानने वाले, हिंसा को अधर्म समझने वाले हिन्दू है। पारिजात हरण नामक एक प्राचीन नाट्य ग्रन्थ में कहा गया है, अपनी तपस्या से शारीरिक दुर्गुणों एवं पापों को धोने वाला, दुष्टता का त्याग करने वाला, असुरता से संघर्ष करने वाला हिन्दू है।
आचार्य विनोबा भावे का कहना था, वर्णाश्रम को मानने वाला, गो-सेवक, वेदज्ञान का पुजारी, समस्त धर्मों को सम्मान देने वाला, दैवी तत्वों एवं देव शक्तियों का उपासक, मोक्ष प्राप्ति की जिज्ञासा रखने वाला, पुनर्जन्म पर विश्वास रखने वाला एवं अहिंसा को जीवन में आत्मसात करने वाला ही हिन्दू है।
डा. राजबली पांडेय के अनुसार भारतवर्ष में बसने वाली जन-जातियों करे को कमलाकर एक समाज का नाम हिन्दू एवं इनके मिले-जुले धर्म, मान्यताओं, विश्वास एवं परम्पराओं की आत्मा ही हिन्दुत्व है। जितनी प्रजातियाँ बाहर से आयी, उन्होंने भी धीरे-धीरे हिन्दू जाति या हिन्दुत्व है। मनीषी श्री श्यामगुप्त कहते हैं, द्रविण एवं आर्य संस्कृति के मिलन को हिन्दुत्व कहते हैं। महन्त विगुजियेनाथ के अनुसार-हिन्दुत्व एक भव्य राष्ट्रीय समाजवाद का नाम है। जिसने समस्त भारतीय समाज को एक धागे में पिरो दिया है। इसकी उदात्त साँस्कृतिक भावनाएँ बौद्ध, जैन, सिख, मुस्लिम, ईसाई सभी को अपने प्यार, अपनत्व में समेट लेती है।
पण्डित रामगोविन्द त्रिवेदी के अनुसार हिन्दू धर्म, हिन्दू मर्यादा, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू एकता, हिन्दू परम्परा, हिन्दू कलाएँ आदि सभी हिंदुत्व की परिधि में आ जाते हैं। हिन्दुत्व का मुखमंडल इतना आभावान है कि इसकी रक्षा के लिए वह भी अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर हो सकते हैं, जो हिन्दुत्व के नियम को कदाचित ही स्वीकारते हों। इसकी मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत मान्यताएँ किसी भी धर्म, सम्प्रदाय या मत को अपने ममत्व से भिगो देती हैं।
महात्मा गाँधी ने हिन्दुत्व के प्रति अपना मत व्यक्त करते हुए कहा था, यदि मुझे हिन्दू धर्म की प्रशंसा करने के लिए कहा जाय तो मैं केवल यह कहूँगा कि यह अहिंसा द्वारा सत्य की खोज है। मनुष्य जो ईश्वर में विश्वास न रखे, परन्तु वह स्वयं को हिन्दू कह सकता है, क्योंकि हिन्दू धर्म वास्तव में सत्य की खोज हैं। यह सत्य में विश्वास रखने वाला धर्म है।
आज बदले हुए परिवेश में मान्यताएँ बदली हुई हैं। कतिपय चतुर लोग, अहं की प्रतिष्ठा के लिए शब्दों का मोहक जाल बिछाते रहते हैं। बहेलिए की फँसाने वाली वृत्ति, लोमड़ी की चाल की अथवा फिर भेड़ियों की धूर्तता कभी उन आदर्शों को स्थापित नहीं कर सकती, जिनकी स्थापना के लिए इस देश के सन्तों, ऋषियों, बलिदानियों ने आपने सर्वस्व की आहुति दे दी।
हिन्दुत्व की खोज आज हमें आदर्शवादी मान्यताओं में करनी होगी। इसमें निहित सत्य को मानवीय जीवन की श्रेष्ठता में, सद्गुण-संवर्द्धन में खोजना होगा। धार्मिक कट्टरता एवं साम्प्रदायिक द्वेष नहीं ‘वसुधैव कुटुम्ब-कम्’ का मूलमंत्र ही हिन्दुत्व का सत्य है। यह विवाद का नहीं विचार का विषय है। स्वार्थपरता एवं अहंता से ऊपर उठकर उदारता एवं सहिष्णुता अपनाकर ही हम सच्चे और अच्छे इनसान बन सकते हैं। मानवीय श्रेष्ठता का चरम बिन्दु ही हमारे आर्यत्व एवं हिन्दुत्व की पहचान बनेगा।
सन्तुलन एवं सामंजस्य प्रकृति मूलभूत सिद्धान्त है। जड़ से चेतन तक सभी इस नियम से बँधे हैं। आपस में टकराव करने, अनुशासनहीनता बरतने एवं सन्तुलन के नियम में व्यवधान पैदा करने की किसी को कोई छूट नहीं है। क्योंकि पारस्परिक लयबद्धता ही प्राकृतिक विकास का आधार है। इसमें व्यतिक्रम आने का मतलब है-अशान्ति और उद्वेलन के भँवर में जीवन का फँस जाना। ऐसी परिस्थिति में सन्तुलन एवं सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रकृति अपना रोष प्रकट करती है। गुस्से में भरी माँ की तरह विघटन एवं आतंक फैलाने वाले अपने उत्पाती बच्चों को दण्डित करती है। उसके दण्ड से कोई नहीं बच पाता।
प्राकृतिक नियम व्यवस्था उसी तरह अनंतता में व्याप्त है, जिस प्रकार स्वयं ईश्वर का अस्तित्व है। इससे परे कोई नहीं है। ग्रह-नक्षत्र, निहारिकाएँ, आकाश-गंगा सभी उसके अनुशासन में बँधे हैं। प्राकृतिक नियमों के लिए सम्मिलित रूप से बताने के लिए एक बहु-प्रचलित शब्द है-’कालचक्र’। सामान्य जन-जीवन में यह शब्द बहुतायत में कहा-सुना जाता है। वैज्ञानिकों ने अपनी विज्ञान की भाषा में इसको भाँति-भाँति से परिभाषित किया है। ‘द एक्सीडेंटल यूनीवर्स’ में पी. सी. व्ही. डेविस ने दो तरह के प्राकृतिक समय का उल्लेख किया है, हब्बल समय और न्यूक्लियस समय। हब्बल समय द्वारा ब्रह्मांडीय परिवर्तन की नाप-जोख होती है। इसके उल्टे न्यूक्लियस समय परिवर्तन के छोटे-से-छोटे रूप को जाँचा-परखा जाता है।
मोटेतौर पर देखने में इन दोनों के बीच कोई सामंजस्य नहीं दिखाई देता। दोनों एक दूसरे से अलग नगज आते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार इन दोनों के बीच का अनुपात 1040 है। भौतिक वेत्ता इसे स्थिराँक मानते हैं। गुरुत्वाकर्षण एवं वैद्युत चुम्बकीय मान भी इतना ही होता है। इसका भेद बताते हुए नोबुल पुरस्कार विजेता पाल दिराक ने लिखा था, कि इसका मतलब इतना ही है कि विराट और सूक्ष्म को एक ही प्रकृति नियन्त्रित करती है। बहुत बड़ा हो जाने और बहुत छोटे बन जाने से कोई प्रकृति के नियमों का अतिक्रमण नहीं कर सकता। यह स्थिराँक इसी की सूचना देता है। प्रख्यात ब्रिटिश अन्तरिक्ष शास्त्री जान ग्रिबीन ने इसे ‘द गोल्डी लाक्स इफेक्ट’ द्वारा वर्णन किया है। उनके अनुसार अँधेरा और प्रकाश, सत्य और असत्य, ज्ञान व अज्ञान के बीच भी प्रकृति का सन्तुलन सिद्धान्त निर्बाध रूप से कार्य करता है।
भले ही अलग-अलग वातावरण में जीवन का स्वरूप हमें अलग-अलग दिखाई दे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है किसी को प्रकृति की नियम व्यवस्था से छुटकारा मिल गया। सभी उसके पारिस्थितिकी तंत्र से संचालित है। बाहरी अलगाव के बावजूद सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े है। मौसम चक्र, ऋतु-परिवर्तन एक निश्चित समयावधि में होता है। उद्भिज से वृक्षों तक तथा कीड़े-मकोड़ों से मनुष्य तक सभी प्राकृतिक नियमों से संचालित एवं नियंत्रित है। किसी को भी इसमें व्यतिक्रम पैदा करने, व्यवधान डालने की कोई छूट नहीं। जिसने भी उत्पात मचाने की कोशिश की, वहीं कालचक्र की चपेट में आया।
विज्ञानवेत्ता एम. डेविस ने अपने शोध निबन्धों में ढाई से तीन करोड़ साल पहले हुए डायनोसौर के विनाश का वर्णन किया है। उनके अध्ययन के मुताबिक डायनोसौर की सब ओर आधिपत्य जमाने वाली प्रवृत्ति अपने समय में प्राकृतिक सन्तुलन के लिए खतरा बन गयी थी। पहले प्रकृति ने उन्हें सामान्य दण्ड देकर नियंत्रित करने की कोशिश की। जब वे अपनी आदत से बाज न आए तो सौर-परिवार के सदस्य प्लेटो के बाहर ‘ओर्ट क्लाउड’ का निर्माण हुआ। धूमकेतुओं से बने इस बादल के प्रभाव से भीमकाय महाबली डायनासोर्स की समूची प्रजाति समाप्त हो गयी।
वृक्ष’-वनस्पति, कीट-पतंग, जीव-जन्तु यहां तक कि मनुष्य इनमें से किसी की वृद्धि दर यदि अनियमित होने ले जाय, तो प्रकृति की दूसरी सन्तानों के लिए भारी खतरा हो जाएगा। माँ कभी लिए भारी खतरा हो जाएगा। माँ कभी नहीं चाहती कि उसकी एक सन्तान दूसरी का हक छीने। यदि वह प्रजाति प्रकृति के संकेतों को समझ कर स्वयं ही अपना नियंत्रण को समझ कर स्वयं ही अपना नियंत्रण नहीं कर लेती, तो उस पर प्रकृति का कुपित होना निश्चित है। बात सही भी है। अब पीपल के ही वृक्ष को ले लें, एक वृक्ष से अरबों की संख्या में बीज पैदा होते हैं, लेकिन सभी बीजों के विकास के लिए अनुकूलन कैसे सम्भव हो सकता है? यही परिस्थिति हर एक के लिए है। इसमें आयी अव्यवस्था भले थोड़े समय के लिए सृष्टि में संकट पैदा करती दिखाई दे, लेकिन महाशक्ति प्रकृति को उसे नियंत्रित करना कोई कठिन काम नहीं है।
इकोसिस्टम या पारिस्थितिकी तन्त्र हमेशा वितरण, संग्रहण और संगठन के बूते बनता है। व्यक्ति और समुदाय इसकी प्राकृतिक इकाई हैं। ‘द मैसेज ऑफ इकॉलाजी’ में सी. जे क्रेब्स इस इकाई को उसके चारों ओर के वातावरण तथा भूगोल के साथ प्रतिपादित करते हैं। उसके अनुसार किसी भी जीव को इस वातावरण से लाभान्वित होने का हक तो है। परन्तु उसे वातावरण को हानि पहुँचाने का हक नहीं है। जब किसी भी जीव की प्रजाति अपने किसी भी व्यवहार से प्राकृतिक वातावरण को नुकसान पहुँचाती है, तो उसे किसी न किसी तरह से प्रकृति स्वयं सन्तुलित एवं नियंत्रित करती हैं।
‘द रैबिट इन आस्ट्र्लिया’ नामक पुस्तक में के. मेयर्स ने खरगोशों पर रोचक वर्णन किया है। वर्ष 1858 में एच. एम. एस., लाइटनिंग मोलबोर्न आए। उस समय वह अपने साथ एक दर्जन यूरोपियन खरगोश ले आए थे। तीस साल में ये खरगोश 15 लाख वर्ग किलोमीटर में आग की तरह फैल गए। मरुस्थल से अल्पाइन घाटी तक तथा समुद्र तट से विस्तृत घास के मैदान तक इनका विस्तार हो गया। इनकी असाधारण वृद्धि का वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना था, सो पड़ा। आत्मनियंत्रण के अभाव में प्रकृति की प्रेरणा से ये खरगोश स्वयं ही किसी जहरीली घास को पाकर मौत का शिकार बन जाते हैं। इस प्राकृतिक नियंत्रण बन जाते हैं। इस प्राकृतिक नियंत्रण ने उनके ऊपर काफी कुछ अंकुश लगा दिया है।
हो भी क्यों न? प्रत्येक जाति की वृद्धि के लिए एक निश्चित क्षेत्र होता है। जब कभी ये जातियाँ अपने स्थान से बाहर भी अपना वर्चस्व कायम कर लेती है, तो प्रकृति या तो उन्हें आत्मनियंत्रण की प्रेरणा देती है, अथवा स्वयं ही उन्हें किसी न किसी तरीके से नियंत्रण में ला देती है। अमेरिकन वैज्ञानिकों ने जीवन के इस पहलू की वैज्ञानिक खोज-बीन की है और इसे इकोवेव कहा है। यही नहीं अमेरिका ने अपने देश की बढ़ती जनसंख्या के लिए एक कार्ययोजना बनायी है। 134 अरब डालर की इस योजना में विदेशी लोगों को प्रश्रय देने सम्बन्धी सभी पहलुओं पर विचार किया जा रहा है।
जनसंख्या वृद्धि दर पर अंकुश जीव-जंतुओं पर ही नहीं, वनस्पतियों पर भी लागू होता है। काफी पहले अमेरिका से आस्ट्रेलिया में ओपुन्सिया केक्टस लाया गया था। 1925 में यह क्वीन्सलैण्ड और विक्टोरिया के तकरीबन एक लाख वर्ग मील में बुरी तरह से फैल गया। इसके इस अमर्यादित फैलाव ने वहाँ दूसरे पौधों का जीना दूभर कर दिया। प्रकृति उसकी इस निरंकुशता को सहन नहीं कर पायी और कालान्तर में अनेक रोगों का शिकार होकर ओपुन्सिया केक्टस स्वयं ही हृस की ओर बढ़ता गया।
इस बारे में ध्यान रखने की चीज यह भी है कि जिस किसी स्थान विशेष में जीव अथवा पौधों की जो प्रजाति होती है, वहाँ उनके कुछ अन्य सहयोगी सदस्य होते हैं। सहयोग-सहकार की प्रेरणाएँ देने वाले प्रकृति के स्पन्दन उन्हें आपस में एक-दूसरे पर निर्भर करने के लिए प्रेरित करते हैं। इस क्रम में दोनों ही सदस्य एक दूसरे को नियन्त्रित रखते हैं। इसके अभाव में दोनों में से कोई अकेला थोड़े समय के लिए चाहे जितनी प्रगति कर ले, लेकिन बाद में उसे नष्ट होना ही पड़ता है। ओपुन्सिया केक्टस के साथ यही हुआ। अमेरिकन वातावरण में पक्षियों की एक विशेष प्रजाति उस पर अवलम्बित थी। बाहरी तौर पर तो वह केक्टस को नुकसान ही पहुँचाती थी। लेकिन यह नुकसान ही उसकी वृद्धि दर नियन्त्रित रखता था। इसके अभाव में अथवा पक्षियों को लाभ न देने की स्थिति में उसे नष्ट होना पड़ा।
प्रकृति सतत् हमें आत्मनियंत्रण एवं सहयोग-सहकार के लिए प्रेरित करती रहती है। एच. डब्लू हुक ने अपने शोध’-ग्रन्थ ‘लेमिंग माइग्रेशन’ में लेमिंग चूहे का ब्योरा दिया है। ये चूहे आर्कटिक टुण्ड्र में रहते हैं। वहाँ ये बर्फ की भीषण ठण्ड को झेल लेते हैं। जब इनकी संख्या बढ़ जाती है, तो पहाड़ों से होते हुए खेतों में घुस जाते हैं और काफी बड़ी मात्रा में फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं। कुछ तो यहीं मर जाते हैं, जिससे उस क्षेत्र में पीलिया आदि अनेक बीमारी फैल जाती है। शेष सारे चूहे समुद्र में कूदकर अपनी जान देते हैं। पहाड़ों,ग्लेशियर आदि दुर्गम क्षेत्रों को पार करते हुए समुद्र में इनका सामूहिक आत्महत्या करना एक रहस्य बना हुआ है।
लेमिंग की जनसंख्या में विध्वंसक वृद्धि क्रम से होती है। शुरुआत में आर्कटिक क्षेत्र के प्रति पाँच एकड़ में एक चूहा होता है। बर्फ पिघलने के साथ ही ये बड़ी संख्या में वृद्धि करते हैं। तीन या चार सप्ताह में एक मादा आठ चूहों को जन्म देती है। ये नवजात चूहे एक माह के अन्दर ही वयस्क होकर प्रजनन शुरू कर देते हैं, इस तरह एक दो माह में प्रति एकड़ इनकी संख्या एक से बढ़कर बीस तक पहुँच जाती है। एक साल में उल्लू, लोमड़ी, गिद्ध आदि के शिकार हो जाने के बावजूद भी ये सौ की संख्या को पार कर जाते हैं। इनकी बढ़ी हुई संख्या को सन्तुलित करने के लिए प्रकृति इन्हें आत्महत्या करने को विवश करती है।
‘द आर्कटिक टुण्ड्र्’ में ए. एम. शुल्टज ने इन चूहों की जनसंख्या एवं व्यवहार पर विस्तार से प्रकाश डाला है। शुल्टज के अनुसार जनसंख्या में वृद्धि होते ही ये आपस में मारकाट प्रारम्भ कर देते हैं। वयस्क चूहे बच्चों को मार डालते हैं। प्रजनन के लिए भी उनमें होड़ लगती है। एक मादा चूहा अत्यधिक प्रजनन के कारण अपनी क्षमता को ही खो देती है। इनमें पारस्परिक संघर्ष भी भयंकर होता है। कमजोर व हारे हुए चूहे बहुतायत में इस स्थान से पलायन कर जाते हैं। जिससे पुनः साम्य उपस्थित हो जाता है।
प्रकृति अपने क्रिया-कलापों में संख्या की अतिशय वृद्धि को सदा से नियंत्रित करती आयी है। समुद्र में जब भी सिल्वर फिश, हेरिंग एलेवाइल्स जैसी मछलियों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती है, उसके अगले चक्र में इनकी संख्या रहस्यमय ढंग से कम हो जाती है। पक्षियों और तितलियों में भी यह स्थिति देखने को मिलती है। बोल्टेरन सिद्धान्तानुसार परिस्थिति-तंत्र में हर जैविक घटक की महत्ता है। एक घटक में अनियंत्रित वृद्धि का तात्पर्य है-उससे सम्बन्धित अन्य जीवों में कमी होना, जिससे समूचा तंत्र असन्तुलित हो जाता है। इसी को ठीक करने के लिए यह व्यवस्था बनी हुई है।
समुद्र में एक तरह का भूरा शैवाल पाया जाता है। इसे केल्प कहते हैं। ये समूहबद्ध होकर समुद्र की लम्बी यात्रा करते हैं। इस तरह इनकी कालोनी की लम्बाई चालीस फीट तक हो जाती है। सूर्य का प्रकाश और हवा इनकी दुश्मन है। इसी वजह से ये सतह से काफी नीचे रहते हैं। इनकी संख्या में जब अनियंत्रित बढ़ोत्तरी होती है, तो गोलाकार व काँटेदार ‘सी-अर्चिन’ इन्हें खा जाता है और जब सी-अर्चिन अपनी जनसंख्या की मर्यादाओं को तोड़ता है, तो ‘सी-ओटर’ इसे अनुशासन सिखा देता है। ‘सी-ओटर’ जापान के कुरील द्वीप तथा ‘काम-चक्सर’ में पाया जाता है। इसका आमाशय कँटीले सी-अर्चिन को पचा डालता है। इसी प्रकार प्रकृति की अनुशासन व्यवस्था चलती रहती है।
ई. टी. गिलार्ड ‘ने लिविंग बर्ड्स ऑफ द वर्ल्ड’ नामक पुस्तक में उत्तरी अमेरिका के जंगलों में पाये जाने वाले पक्षियों का वर्णन किया है। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में वहाँ ये पक्षी प्रचुर संख्या में थे। एक दिन दोपहर को सौ वर्ग मील के दायरे में इन पक्षियों ने एक साथ अरबों की संख्या में अण्डे दिए। यह स्थान ग्रेट लेक्स के चारों ओर स्थित है। अण्डों के बोझ से वृक्षों की टहनियाँ टूट गयीं। यही नहीं यह स्थान अण्डों से उत्पन्न सल्फर गैस से इतना प्रदूषित हुआ कि करोड़ों-अरबों की संख्या में कबूतर मर गए। पक्षी वैज्ञानिक एलेक्जेंडर विल्सन ने लिखा है कि एक दिन में ही लगभग दो अरब पक्षियों को मरा देखा गया। यह घटना 1800 के आस’-पास की है। लेकिन एक ही शताब्दी के बाद भारी संख्या में अण्डा देने वाले पक्षियों की यह प्रजाति समाप्त प्राय हो गयी। इस प्रजाति का अन्तिम पक्षी 1 सितंबर, 1994 की सिंसीनेटी जुलोजिकल गार्डन में मर गया।
प्रकृति साम्य का सूत्र हाथी अच्छी तरह से समझते हैं। एक हाथी के लिए प्रतिदिन तीन सौ पौण्ड भोजन की आवश्यकता पड़ती है। इस दर से एक हाथी एक साल में 100 वर्ग मील का सफाया कर सकता है। ऐसी स्थिति में धरती में हाथी ही हाथी दिखाई देंगे, जंगलों का नामोनिशान तक मिट जाएगा। लेकिन समझदार हाथी ऐसा होने नहीं देते। वे जंगलों में चारों ओर घूमते रहते हैं तथा समय-समय पर स्थान भी बदलते हैं। यही नहीं अपनी प्रजनन दर को भी कम करके रखते हैं, जिससे हाथी और प्रकृति व्यवस्था के बीच सामंजस्य बना रहता है।
लेकिन इंसान को इतनी भी समझ नहीं है। अमेरिकन जैवविज्ञानी ए. एच. एर्लीक ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘द हृमेन पापुलेशन’ में इस बात का विस्तार से विवेचन किया है। उनके अनुसार सम्भवतः अपने बौद्धिक दर्प में आकर मानव ने प्रकृति की व्यवस्थाओं को चुनौती दे डाली है। अपने घमण्ड की मदहोशी में चूर होकर मनुष्य ने अपनी अनियंत्रित और उच्छृंखल इच्छाओं व वासनाओं से उसने जनसंख्या की स्थिति विस्फोटक कर दी है और भारी विश्व संकट पैदा कर दिया है। आज सारा विश्व जनसंख्या के गहरे कुचक्र में फँस गया है।
इस क्रम में हिन्दुस्तान सबसे आगे है। इसीलिए यहाँ विकास मात्र स्वप्न बनकर रह गया है। क्योंकि इतनी अधिक जनसंख्या को सर्वप्रथम रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया करना पहली जरूरत है। जनसंख्या की बढ़ोत्तरी यदि ऐसे ही त्वरित गति से होती गयी तो आगे के कुछ ही सालों में आबादी करोड़ों की सीमा रेखा को पार कर अरबों में पहुँच जाएगी। सन् 1929 के बाद हर दशक में भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ती चली गयी है। 1989 से 19 के बीच के दशक में 16 करोड़ 80 लाख की वृद्धि हुई, जो फ्रांस और इटली की कुल आबादी से कहीं ज्यादा है। अपने देश की जनसंख्या और क्षेत्रफल के बीच काफी विसंगति है। देश की कुल जनसंख्या का 16 प्रतिशत है, जबकि इसका क्षेत्रफल का 2.4 फीसदी है।
जनसंख्या वृद्धि जो सन् 1989 से 19 में 2.13 थी, अब 2.3 हो गयी है। इतनी बड़ी जनसंख्या को भोजन मुहैया कराने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा खाद्यान्न उत्पादन प्रतिवर्ष 54 लाख टन से भी अधिक बढ़े, जबकि वह औसतन केवल 40 लाख टन की दर से ही बढ़ पाता है। कमोवेश यह स्थिति केवल अपने देश की नहीं बल्कि सारे विश्व की है।
मर्यादाओं को तोड़ने का परिणाम है-जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि। परन्तु जीव-जन्तुओं, वृक्ष-वनस्पतियों पर अंकुश रखने वाली प्रकृति इंसान को भी छोड़ती नहीं है। वह अपनी क्षमताओं और उपलब्धियों पर कितना भी घमण्ड क्यों न करे, पर प्रकृति के कुपित होते ही उसका सारा घमण्ड धरा रह जाता है। एड्स नामक भयावह रोग इंसान के ऊपर प्रकृति का कोप ही है। जो उसने मानव को आत्म-नियंत्रण सिखाने के लिए किया है। यदि वह अपनी यौन उच्छृंखलताओं को नहीं त्यागता तो उसे एड्स रोगी बनकर तड़प-तड़प कर मरने के लिए उद्यत होना पड़ता है।
अंधविश्वास कहें या प्रकृति का अग्र रूप, बोस्निया का सामूहिक नर-संहार इसी संतुलन की ओर इंगित करता है। ‘डार्क नेचर’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक में मनीषी लायल वाट्सन ने मनुष्य की हिंसा व आक्रामकता को लेमिंग चूहे की तरह दर्शाया है, जो स्वयं मार-काट करके अथवा फिर सामूहिक आत्महत्या करके मर जाते हैं। ‘टाइम’ के 16 मई, 1994 के अंक में नेन्सी जिब्स ने अफ्रीका में भयंकर हत्या का वर्णन किया है। नेन्सी का कहना है कि अफ्रीकी जनजातियाँ जब उग्र हो जाती है, तो कुछ भी कर गुजरते हैं। अपनी अन्ध-परम्परा के वशीभूत होकर वे अपनी ही जाति के लगभग 50 हजार लोगों की हत्या कर चुके है। इस प्रथा से पूरी जाति ही नष्ट होने के कगार पर है।
‘द वोयेज ऑफ द बीगल’ में चार्ल्स डार्विन ने प्रकृति की इसी नियम व्यवस्था का रोचक वर्णन किया है। डार्विन की मान्यता है कि शरीर की
प्रत्येक कोशिका से लेकर विराट-ब्रह्माण्ड तक सभी एक ही स्त्रोत से ऊर्जा पाते हैं। जीवन के प्रत्येक घटक के लिए आत्मनियंत्रण एवं दूसरे घटकों के साथ सामंजस्य प्रकृति का अनिवार्य अनुशासन है। इसी से लयबद्धता पैदा होती है और जीवन संगीत अपना उत्कृष्ट रूप पाता है।
डार्विन ने इस कृति में उल्लेख किया है कि मैंने ब्राजील के घने जंगलों में प्रथम दिन ही प्रकृति की इस अद्भुत व्यवस्था का अवलोकन किया। मानव बुद्धि इस तथ्य को हृदयंगम करे या न करे सृष्टि का हर घटक इसी चैतन्य ऊर्जा से अनुप्राणित और अनुबन्धित है। इकॉलाजी को समझने वाले इसी को ऊर्जा शृंखला के रूप में उद्घाटित करते हैं।
ब्रह्माण्ड में एक अणु का भी उतना महत्व है, जितना किसी नक्षत्र का। परमाणु के अन्दर परिक्रमा करने वाले इलेक्ट्रानों में भी व्यतिक्रम आ जावे तो तबाही मच जाती है। हर घटक चाहे वह इलेक्ट्रॉन हो या जीवाणु, पादप हो या फिर प्राणी, अपने नियमों, अनुशासन को पालन करते हुए चलते हैं। इसी तरह वातावरण व जीवन के बीच भी अंतर्संबंध में स्नेह-सूत्र जुड़े हुए है। इस व्यवस्था को तोड़ने वाला चाहे कोई भी हो, उसे दण्डित होना पड़ता है। ऐसे में मानव की मर्यादाहीनता, उच्छृंखलता को प्रकृति कैसे प्रश्रय दे सकती है। अच्छा है वह समय रहते चेत जाए। प्रकृति ने इसलिए उसे बुद्धि-विवेक का अनुदान दिया है, ताकि उसे आत्मनियंत्रण, आत्म-संयम तथा सहयोग, उदारता को अपनाने में कोई दिक्कत न हो। सृष्टि के सबसे बुद्धिमान प्राणी का गौरव इसी में है कि वह स्वयं मर्यादित रहे और दूसरे को मर्यादित रहने में सहयोग दे।
परिस्थितियों के प्रबल थपेड़े, समय के विकट झंझावात अक्सर इन्सानी पुरुषार्थ को चकनाचूर कर देते हैं। उसके अरमानों का घोंसला तिनके-तिनके होकर हवा में बिखर जाता है। ऐसे में थका-टूटा-निराश जीवन सहारा ढूँढ़ता है। लेकिन दुनिया तो उसका साथ देती है, जो सफलता के शिखर पर विराजमान है। दीन-दयनीय तो इस संसार में प्रायः दुत्कारे और ठुकराए ही जाते हैं। उन्हें तो परम प्रेमास्पद प्रभु ही अपनाते हैं। एक नारायण ही हैं जो अपने चिरआत्मीय सखा नर के प्रति पल-पल अपना प्यार उँड़ेलते रहते हैं। उसके हृदय से पुकार उठते ही वे दौड़ पड़ते हैं। उनकी अपरिमित शक्ति जीवन के अंधेरों को छिन्न-भिन्न करने में जुट जाती है। लेकिन ऐसा होता तभी है जब हम भावनाओं की गहराई से पुकारें। यह भाव-भरी पुकार ही प्रार्थना है।
गज-ग्राह की कहानियाँ, द्रौपदी की आर्त पुकार की बातें हम बचपन से कहते-सुनते आए है। हमारी आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास का ये आधार भी रही हैं। लेकिन इनमें कोई वैज्ञानिकता है, इस ओर हमारा ध्यान कम ही गया है। बुद्धिपरायण पश्चिमी दुनिया ने अभी कुछ दिनों पहले प्रार्थना के वैज्ञानिक पहलुओं पर ढूँढ़-खोज की गहरी कोशिश की है। प्रार्थना से होने वाले चमत्कारी परिवर्तनों का बारीकी से विश्लेषण किया है। इन्हीं में से एक है। राबर्ट. ए. शुल्लर, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘द वर्ल्डज ग्रेटेस्ट कम वेकर्स’ में इसमें निहित सत्य को कई उदाहरणों के माध्यम से प्रतिपादित जार्ज कार्बर का है, जो दक्षिण अमेरिका में मिसौरी के ग्रामीण अंचल में एक गुलाम नीग्रो परिवार में जन्मे। बचपन से ही माँ-बाप का साया उनके सिर से उठ गया था। दक्षिण अमेरिका में चल रहे गृह-युद्ध के दिनों में एक नीग्रो गुलाम बालक के उत्कर्ष की कोई सम्भावना न थी। लेकिन प्रार्थना असम्भव को सम्भव करती है। यह पंक्ति उसके हृदय में विद्युत रेखा की तरह रह-रह कर कौंध उठती थी। अश्वेत समुदाय दुःख-दर्द भी उसके हृदय को कचोट रहा था। उनके उत्थान का अदम्य संकल्प बाल-हृदय में उभर आया। उसने सोचा भले ही हमारे हाथों में जरा-सी ताकत हो, लेकिन हमारे परम प्रेमी प्रभु तो सर्वसमर्थ हैं। उसने कहीं से हेनरी डेविड थोरी की एक उक्ति सुन रखी थी कि यदि कोई लोकहित की दिशा में दृढ़ता से अग्रसर होता है व आदर्शवादी जीवन को जीने का साहस करता है, तो उसे देर-सबेर अप्रत्याशित सफलता अवश्य मिलता है। क्योंकि हर अच्छे काम के प्रेरक स्वयं परमात्मा हैं और उनकी शक्ति श्रेष्ठ कार्यों में सतत् क्रियाशील रहती है।
बालक कार्बर को दृढ़ विश्वास था कि अश्वेत का उत्थान होगा। असहाय, उपेक्षित एवं अशिक्षित बालक अपनी भगवत्प्रार्थना के बल-बूते अपने आदर्शों को रूप देने में जुट गया। गरीबी, अपने ही लोगों द्वारा उपेक्षा, उपहास एवं समाज द्वारा तिरस्कार के बावजूद कार्बर ने ओवा स्टेट के कृषि कालेज से डिग्री हासिल कर ली और अलवामा के स्केगी इन्स्टीट्यूट में नौकरी करने लगा। वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में उनकी ख्याति दिनों दिन बढ़ने लगी। समस्या के समान के नए-नए तरीकों को खोज निकालने में उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक जा पहुँची। अपनी प्रयोगशाला को उन्होंने ‘प्रभु की लघु कार्यशाला’ नाम दिया। यहाँ वे घण्टों कृषि सम्बन्धी प्रयोग करते। मकसद एक ही था-संघर्षरत अश्वेत किसानों की मदद करना था। एक बड़ी समस्या थी कपास की खेती का विकल्प तैयार करना, जिससे भूमि नवीकृत हो सके। साथ ही कपास को नुकसान पहुँचाने वाले कीट से भी राहत मिल सके।
समस्या के समाधान के लिए वे अपनी प्रयोगशाला गए और भावों की गहराइयों में उन्होंने प्रभु से समाधान सुझाने के लिए प्रार्थना की। प्रार्थना के क्षणों में उन्हें मूँगफली की खेती का सुझाव मिला। साथ ही मूँगफली के अलग-अलग तकरीबन तीन सौ उत्पाद उनकी अंतःदृष्टि में चमकने लग। इन्हें तैयार करने के संकेत भी उभरे। प्रार्थना के क्षणों पाए इस समाधान के बारे में जब उन्होंने किसानों से बात की, तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। क्योंकि उनमें से कोई इसके सीमित उपयोग के कारण स्वीकार करने के लिए तैयार ही न था। लेकिन जब उन्होंने इसके अलग-अलग तीन सौ उत्पादों की चर्चा की और प्रयोगशाला में तैयार किए गए इसके नमूनों को दिखाया तो सबके सब हैरान रह गए।
इतनी शीघ्र और इतनी सारी चीजों की खोज-पूरा देश चमत्कृत हो उठा। पर वे शान्त मन से प्रभु कृपा के समक्ष नत-मस्तक थे। उन्हें ईसा की वह वाणी याद थी कि प्रभु कृपा हो तो एक लम्बा-तगड़ा ऊँट भी सुई के छेद से गुजर सकता है। उन्हें गोरे लोगों की काँग्रेस कमेटी में अपने उत्पादों को सिद्ध करने का आमन्त्रण मिला। जब उन्होंने काँग्रेस कमेटी में मुख्य कक्ष में प्रवेश किया, तो सभी लोग इस बात के लिए हैरान थे कि यह तो एक गुलाम नीग्रो है। अतः उन्हें बोलने के लिए सिर्फ दस मिनट ही दिए गए, जबकि उन्हें अपने नमूने खोलने में ही इससे दुगुना समय लगने वाला था। जैसे जादूगर टोप से खरगोश एवं कबूतर निकालता है उसी तरह कार्बर मूँगफली से बने तेल, काफी, दूध,आटा, व्यंजन निकालते व समझाते जा रहे थे। उन्हें अब तक दो घण्टे से भी अधिक बीत चुके थे। सभी लोग उनकी बात के प्रत्येक शब्द को गौर से सुने जा रहे थे। उनकी बातों से प्रभावित अनेकों गणमान्य लोग उनके संकल्प को पूरा करने के लिए सहयोग हेतु प्रस्तुत हुए। कार्बर प्रार्थना की संजीवनी के बल पर अश्वेतों के कल्याण के लिए जीवन भर संलग्न रहे और उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।
प्रार्थना असम्भव को सम्भव कैसे बनाती है? इसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण डोनाल्ड मैकेंजी ने अपने अध्ययन ‘प्रेयर एण्ड इट्स सीक्रेट’ में प्रस्तुत किया है। उनका कहना कि भावों के केन्द्र में जाकर मनुष्य सहज ही विश्व-चेतना समस्त प्रकार की शक्तियों, सब तरह के ज्ञान का आगार है। इसके संपर्क में आते ही ऊर्जा, उल्लास, शक्ति अपने आप ही मानवी अस्तित्व में भर अपने आप ही मानवी अस्तित्व में भर जाती है। अनन्त ज्ञानमय इस महत् चेतना का स्पर्श उसमें सूझ एवं समाधानों को भी स्फुरित करता है। हालाँकि मनोवैज्ञानिक डोनाल्ड मैंकेंजी अपने विश्लेषण में प्रार्थना के लिए कुछ आवश्यक शर्तों का भी उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार यथार्थ प्रार्थना तभी सम्भव है जब हमारा पुरुषार्थ चरम बिन्दु पर जा पहुँचा हो और हम अहं वृत्ति से सर्वथा मुक्त हों। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि प्रार्थना न तो आलसियों के लिए है और न अहंकारियों के लिए।
क्योंकि अपने पुरुषार्थ के चरम बिन्दु पर पहुँचकर ही हम अपनी चेतना के चरम शिखर पर पहुँच पाते हैं। लेकिन के चरम शिखर पर पहुँच पाते हैं। लेकिन यह चरम बिन्दु मानवीय चेतना का चरम बिन्दु होता है। इसके आगे ईश्वरीय चेतना का दायरा है, जिससे एकाकार होने में हमारा अपना अहंकार बाधक बनता है। अपनी चेतना के चरम बिन्दु पर पहुँचने के साथ ही यदि हम अपनी अहं-वृत्ति से छुटकारा पा लें, तो फिर ईश्वरीय चेतना से धुलने-मिलने में कोई बाधा नहीं। ऐसे में ईश्वरीय शक्तियों का सहज प्रवाह इन्सानी अस्तित्व से होकर बहने लगता है। ईश्वर की अनन्त शक्तियों के सामने सारे अवरोध, विघ्न-बाधाएँ तुच्छ और मिथ्या सिद्ध होती हैं।
लाखों श्रोताओं की चहेती एवं ग्रैमी पुरस्कार विजेता गायिका ग्लोरिया गेदर ने अपने जीवन में कुछ ऐसी ही ईश्वर-निष्ठा जगायी। वह अपने पति के साथ मिलकर लगभग 200 गीत लिख चुकी हैं। उनके तीस से अधिक एलबम लाखों-करोड़ों दिलों की धड़कन बने हुए है। 60 लाख से अधिक संगीत गोष्ठियों में उनका कोकिल स्वर गूँज चुका है। फिर भी उनका कहना है कि वह एक गायिका नहीं है। क्योंकि गायिकी के क्षेत्र में अपनी असमर्थता से परिचित है। उन्होंने सालों साल अपने गले की असमर्थता भागों है। न जाने कितनी बार वह उपेक्षा, अवहेलना एवं उपहास की पात्र बनी है।
सब प्रकार से थक-हारकर उन्होंने इयामय प्रभु की शरण ली। रात के अँधेरे में वह अकेले बैठकर रो-रोकर प्रार्थना करती। प्रभु तू सर्व-समर्थ है। घनी अँधेरी रात की तरह मेरा अपना जीवन भी अँधेरे से भरा है। अन्तर्यामिन! मैं गाना चाहती हूँ। तेरी शक्ति को अपने कण्ठ से अभिव्यक्त करना चाहती हूँ। इसी तन्मयता में दिन गुजरते रहे और एक क्षण वह भी आया जब उसकी भर्राई आवाज सुरीलेपन में बदल गयी। उसके विस्मय का ठिकाना न रहा। कार्यक्रमों की भरी माँग आने लगी। प्रभु के प्रति कृतज्ञ होकर उससे अपने प्रत्येक कार्यक्रम से पूर्व अपने विचार प्रस्तुत करने का क्रम शुरू किया।
प्रत्येक संगीत गोष्ठी से पूर्व कुछ मिनट ग्लोरिया के हृदयस्पर्शी संदेश के लिए रखे जाते। जिसमें वह अपनी प्रार्थना के अनुभूत क्षणों को भवस्पर्शी ढंग से सुनाती। अधिकाँश लोगों के लिए संध्या सुनाती। अधिकाँश लोगों के लिए संध्या कार्यक्रमों के ये नीरव क्षण एक विशेषता बन गए। ग्लोरिया प्रभु से वार्ता के अपने अनुभव लोगों को बताती। उसका विश्वास था कि ये अनुभव दूसरों के विचार बदल सकते हैं। गायन के कार्यक्रम में अपनी त्रुटियों के लिए वह प्रभु से प्रार्थना करती। उसके भावों का सार यही होता कि वह वहाँ अपने बारे में कुछ सिद्ध करने के लिए नहीं है और अपनी अपूर्णताओं के बावजूद यदि वह कुछ अच्छा कर सकती है तो यह प्रभु की कृपा से होता है। इस तरह के ईश्वरीय अवलम्बन का अद्भुत परिणाम यह होता हक उसे हर पल यही अनुभव होता कि परमात्मा की चेतना उसके माध्यम से क्रियाशील है। वह अपने को भगवत् चेतना से तरंगित अनुभव करती। यह अनुभव जहाँ उसके उल्लास को बढ़ाता वहीं उसके प्रत्येक कार्य को और अधिक परिमार्जित व प्रखर बना देता।
इस तरह प्रभु का समर्थ अवलम्बन न केवल मानव की क्षुद्रता को पूर्ण करता है। बल्कि उसके कार्यों को अधिक सौंदर्यशाली बना देता है। भगवान के स्पर्श से मनुष्य की कमियाँ विशेषताओं में बदल जाती है। खरोंचें सुन्दर कृति का रूप ले लेती हैं और त्रुटियाँ विस्मय का स्त्रोत बनने लगती है।
जहाँ मनुष्य की अपनी शक्ति चुक जाती है, जब बाहर से कोई आशा की किरण नहीं दिखाई देती, ऐसे अंधकार भरे क्षणों में ईश्वरीय हस्तक्षेप असम्भव को भी सम्भव बना देता है। असाध्य रोग को ठीक कर देता है व जर्जर काया में भी नए प्राण फूँक देता है। प्रार्थना द्वारा हम उस ऊर्जा शक्ति एवं जीवन के आदि स्त्रोत से जुड़ जाते हैं व उसकी कृपा को चमत्कार के रूप में अनुभव करते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण डॉ. क्रिस नियर्ज का है, जिनका मस्तिष्क एक दुर्घटना में चूर-चूर हो गया था।
घटना 1963 की है, तब मात्र चौदह वर्षीय क्रिस अपने मित्र जान के साथ दक्षिण कैलीफोर्निया में भ्रमण के लिए गए थे। आधा घण्टा साइकिल भ्रमण का आनन्द लेते हुए दोनों थक-हारकर एक नदी के किनारे एक चट्टान के सहारे आराम करने बैठे गए। दोनों बातचीत में मस्त थे। अचानक एक दहाड़ती आवाज ने उनका ध्यान बँटाया। ऊपर से चार फुट व्यास का एक बड़ा पत्थर उनकी ओर तेजी से लुढ़कता हुआ आ रहा था। क्रिस जान को बचाने के लिए एक तरफ खींच रहा था कि पत्थर ने क्रिस के सिर पर टक्कर मारकर उसे चट्टान पर दे पटका। क्रिस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा। दर्द के मारे वह चिल्ला रहा था। किसी तरह क्रिस को अस्पताल पहुँचाया गया। रिपोर्ट के अनुसार मस्तिष्क बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। चिकित्सक क्रिस के जीवन की सम्भावना से निराश थे। उन्हें उसके बचने की कोई आशा न थी। रात भर क्रिस का जीवन बचना कठिन लग रहा था। चिकित्सक इस बात के लिए भी परेशान थे कि यदि तरह वह बच भी गया, तो स्नायुओं के क्षतिग्रस्त होने से कहीं वह मानसिक विकलाँग अथवा फिर दृष्टिहीन न हो जाय।
लेकिन उसके माँ-बाप को प्रार्थना की शक्ति पर विश्वास था। डॉक्टर ने सुझाया कि प्रार्थना करनी ही है तो बालक की मृत्यु की करें, क्योंकि बालक यदि जीवित रहा तो जीवन भर एक बोझ बनकर रहेगा। चिकित्सक के निराश भरे सुझाव की परवाह किए बिना माँ-बाप ने सभी शुभचिन्तकों, मित्रों, कुटुम्बियों को फोन द्वारा सूचित किया। निश्चित समय पर एक साथ सभी ने क्रिस के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की। सभी के हृदय भाव-विह्वल थे। उनकी अन्तर्चेतना प्रभु के विश्वास से पूरित थी। क्रिस रात भर ठीक रहा। आप्रेशन के तीन दिन बाद वह उठा। चारों ओर ट्यूब ही ट्यूब लगे थे। मस्तिष्क से द्रव्य निकालने के लिए’-वह मधुमेह से पीड़ित भी था।
डॉक्टरों को यह देखकर अचरज लग रहा था कि दुर्घटना के बाद या आप्रेशन के दौरान उसका डायबिटीज किसी तरह आड़े नहीं आया। यह भी अजूबा था कि अगले सप्ताह उसकी शर्करा की मात्रा संचालन में कोई दिक्कत नहीं हुई। प्रत्येक दिन क्रिस की स्थिति में तीव्रता से सुधार हो रहा था। अस्पताल से निकलने के बाद मनोवैज्ञानिकों ने उसका बुद्धि-परीक्षण किया। उसका आई. क्यू. राष्ट्र के ऊपरी दो प्रतिशत व्यक्तियों में था। छह सप्ताह बाद वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया। अपना काम अपने हाथों से करने लगा।
ऐसा ही एक किस्सा अमेरिका के जेनवर कस्बे के संगीत समारोह की शान मार्गी किंग नामक महिला का है। मात्र 14 साल की उम्र में उसकी गर्दन के हिस्से में काफी ज्यादा उभार-सा हो आया। डाक्टरी जाँच करने पर मालूम पड़ा कि यह हाडकिन्ज रोग है। रिपोर्ट के मुताबिक वह छह माह से अधिक जीवित न रह सकेगी। माँ-बाप कुछ कर नहीं सकते थे। डाक्टरी स्तर पर कोई विकल्प नहीं था। नियमित उपचार करने से मार्गी के जीवन में कुछ दिन अवश्य जुड़ सकते थे। संकट से उबरने का कोई सहारा न रहा तो भगवान की सहायता माँगी गयी। प्रार्थना का सहारा लिया गया। जो भी परिचित, शुभचिन्तक थे, वे सभी प्रार्थना के शुभ कार्य में जुट गए। इनको दृढ़ निश्चय था कि प्रार्थना के सहारे कुछ भी हो सकता है।
प्रभु अपने को पुकारने वालों को कभी निराश नहीं करते। दो-दिन बाद से ही एक्सरे-फिल्म में प्रार्थना का चमत्कार स्पष्ट होने लगा। एक्सरे रिपोर्ट असम्भव को सम्भव होता बता रही थी। काफी बड़ा ट्यूमर दिन-प्रतिदिन छोटा पड़ रहा था, प्रार्थना के काम में प्रतिदिन तन्मयता आती गयी। अन्ततः एक्सरे रिपोर्ट में रोग का कोई नामोनिशान न था। असाध्य मरणासन्न स्थिति, सुधरे स्वास्थ्य में तब्दील हो रही थी। प्रार्थना गले के स्वास्थ्य में ही कारगर नहीं हुई बल्कि प्रभु के अनुदान से मार्गी की आवाज भी काफी सुरीली हो गयी। उसकी संगीत साधना के फलस्वरूप सन् 1963 में वहाँ का सर्वश्रेष्ठ गायकी का पुरस्कार भी उसे मिला।
प्रार्थना की शक्ति के चमत्कारी प्रभाव का एक अन्य उदाहरण हैं, ‘सेण्ट ज्यूड चिल्ड्र्न्स रिसर्च हास्पिटल मेम्फिस टेनेसे’ के संस्थापक डेनी थेमस। अपने व्यावसायिक जीवन के शुरुआती दिनों में वे घाटे दर घाटे से गुजर रहे थे। उनका दिवाला निकल चुका था। ऋण के बोझ से डेनी का समूचा अस्तित्व दबा हुआ था। वह अपने जीवन के विकटतम क्षणों से गुजर रहे थे। टेट्र्यट के एक व्यक्ति ने उन्हें प्रार्थना की शक्ति का अवलम्बन लेने का सुझाव दिया। डेनी ने कर्ज से उबरने व जीवन में खुशहाली व सफलता के लिए प्रभु से प्रार्थना का नियमित क्रम शुरू किया।
अधिक समय नहीं बीता था कि अनवरत सफलता के सुअवसरों का दौर शुरू हो गया। अब वह ऋण भार से मुक्त हो रहे थे। मध्यम सुरक्षा जीवन में पूर्ण सफलता का आश्वासन दे रही थी। ईश्वरीय सहायता के प्रति कृतज्ञता भाव से उन्होंने बच्चों की सहायता के विचार से एक रिसर्च अस्पताल की स्थापना की। वहाँ चल रहे शोध प्रयासों से बच्चों के जीवन में उजाला आने लगा। इसी के साथ ही वे प्रार्थना से होने वाले दैनिक चमत्कारों का प्रचार देश भर में करने लगे।
कतिपय बुद्धिपरायण व्यक्ति प्रार्थना की शक्ति में विश्वास जैसा लगता है। लेकिन सच तो यह है। कि प्रार्थना न तो अंधविश्वास है और नहीं यह अवैज्ञानिक प्रक्रिया है। हाँ इतना जरूर है, प्रार्थना सफल उसी की होती है, जो प्रार्थना करने योग्य हो। आलसी, अहंकारी, दुष्प्रवृत्तियों में रस लेने वाले कुमार्गगामी व्यक्ति भावभरी प्रार्थना नहीं कर पाते। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रभु इनसे प्यार नहीं करते। वे इनकी नहीं सुनना चाहते। बल्कि ये व्यक्ति ही अपने दुर्गुणों के चक्रव्यूह में फँसकर भगवान से विमुख हो बैठे हैं।
दुर्गुणी व्यक्ति अपने में पवित्र एवं भावमय मनः स्थिति को नहीं खोज पाता, जहाँ प्रार्थना अंकुरित होती है। ऐसी अन्तर्चेतना के निर्माण के लिए स्वयं को पवित्र, द्वेषमुक्त बनाना पड़ता है। पवित्र हृदय ही भावों के महासागर का रूप लेता है। पवित्र भावनाओं की तरंगें प्रभु की चेतना को पल भर में स्पर्श कर लेती हैं। इसका यह स्पर्श मनुष्य की चेतना से तुरन्त जोड़ देता है। फिर तो एक अद्भुत प्रवाह, एक अलौकिक शक्ति हमारे अस्तित्व में प्रवाहित होने लगती है। इस महाशक्ति के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। जो कार्य हमें कठिन व दुष्कर मालूम होते हैं। प्रभु की शक्ति के लिए वे सर्वथा सहज हैं।
सामान्यक्रम में हम संकटों के घिर कर ही भावप्रवण बनते हैं। यही कारण है प्रार्थना के चमत्कार भी हमें ऐसी ही परिस्थितियों में देखने को मिलते हैं। लेकिन यदि हम अपने अन्तर्भावों को पवित्र बनाते जाएँ, स्वयं को अहंवृत्ति एवं पारस्परिक द्वेष से मुक्त रखें तो हर पल हमारे जीवन में प्रार्थना के चमत्कार घट सकते हैं। यही नहीं हमारा जीवन एक के बाद एक चेतना के उच्चस्तरीय स्तरों पर आरुढ़ हो सकता है।
प्रार्थना सिर्फ संकटापन्न स्थिति का निराकरण नहीं है। साधना, तपस्या, उपासना की अनूठी विधि भी है। ईसा, सन्त पाल, सन्त आइन्स्टाइन सभी प्रार्थना के बल पर ही सिद्ध महापुरुष बने थे। दादू, रज्जब, नानक, कबीर, रैदास जैसे सन्तों का तो जैसे यह जीवन का आधार ही था। वे इसी प्राण वायु के बल पर ही जीते थे। ध्यान रहे प्रार्थना किसी जीते थे। ध्यान रहे प्रार्थना किसी भिक्षावृत्ति अथवा याचना का पर्याय नहीं है। यह तो प्रभु से मिलन की भावभरी पुकार है। हृदय इस प्रकार के उठते ही परम कारुणिक प्रभु भक्त से मिलने के लिए, उसके कष्ट को दूर करने के लिए आकुल-आतुर हो उठते हैं। उनका स्पर्श हमें खाली संकटों से ही नहीं मुक्त करता, अनेकों दुर्लभ ईश्वरीय विभूतियाँ भी दे डालता है।
समाज के पुराने पड़ चुके ढाँचे में आज हर ओर दरारें दिखाई देती हैं। रीति-रिवाज, मान्यताएँ, प्रथा-परम्पराएँ सभी पुरानेपन को भारी टूट-फूट से गुजरना पड़ रहा है। यह इस बात की सूचना है कि पुराने के भीतर से नया प्रकट होने को है। अण्डे के भीतर से चूजा निकलने के पहले अण्डा हर तरफ से दरक जाता है। पुराने ढाँचे में आयी दरारें इस सत्य का संकेत हैं कि समाज, राष्ट्र, सम्पूर्ण विश्व के जर्जर हो चुके ढाँचे को, नया आकार मिलने वाला है। लेकिन अन्य बड़ी क्रान्तियों की भाँति यह महाक्रान्ति भी तभी सफल होगी जब नवयुग के समाज के अनुरूप जीवन-दर्शन को अपनाया जाएगा। मनीषी पाल रिकोयर ने ‘हिस्ट्री एण्ड दुथ’ में लिखा है कि समस्या मात्र इतिहास को दुहराने की नहीं है, बल्कि उसकी गहराई में जाकर निरन्तर नयी खोज करने की है। अपनाकर ही ऐसे समाज का निर्माण सम्भव है, जिसका व्यापक विस्तार समस्त विश्व को एक सूत्र में बाँधकर उसे स्वर्ण युगीन स्वरूप देगा।
भविष्य का समाज जिन गुणों से युक्त होना चाहिए, इसकी विस्तार से चर्चा दाना जोहर एवं इयान मार्शल ने अपनी पुस्तक ‘द क्वाँटम सोसाइटी’ में की है। आज सामाजिक, राजनैतिक और वित्तीय कारणों से हमारी पारस्परिक निर्भरता बढ़ती जा रही है। संसार के किसी एक कोने में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तन से भी समस्त विश्व प्रभावित होता है। टोकियो के स्टाक बाजार में कोई परिवर्तन होता है, तो उसका प्रभाव लन्दन और न्यूयार्क में कुछ ही घण्टों में दिखाई देने लगता है। पैकिंग में होने वाली क्रान्ति यूरोप और अमेरिका में उम्मीदें जगा देती है। व्यक्तिगत कारखानों, यहाँ तक कि घरेलू उद्योगों में प्रयुक्त निर्माण विधियों का भी सीधा प्रभाव पृथ्वी के पर्यावरण पर पड़ता है। किसी एक व्यक्ति के पूर्णतया व्यक्तिगत कार्य का प्रभाव सम्पूर्ण समाज पर पड़े बिना नहीं रहता, यहाँ तक कि व्यक्ति स्वयं भी समाज में होने वाली गतिविधियों से प्रभावित होता रहता है।
यदि एक व्यक्ति के विवाह की परिणति तलाक में होती है, तो अन्यों के ऐसा करने की सम्भावना बढ़ जाती है। फलस्वरूप विशाल स्तर पर पारिवारिक ढाँचा गड़बड़ाने लगता है। परिवार समाज की इकाई है। इकाइयाँ टूटेंगी तो समाज कैसे बचेगा? यदि पत्नी पति से अथवा पति पत्नी से विश्वासघात करता है तो अन्यों में भी यह प्रवृत्ति पनपने लगती है। इसी प्रकार दूसरों की रुचियों, निर्णयों, समाज में घटित अपराधों, धार्मिक गतिविधियों, विभिन्न घटनाक्रमों का भी हमारी व्यक्तिगत रुचियों एवं निर्णयों पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अत्यन्त विकसित संचार माध्यमों, कम्प्यूटरों से हमें अति शीघ्र समाज का रुझान ज्ञात हो जाता है। जिससे इस बात की सम्भावना बढ़ जाती है कि हम भी वैसा ही करेंगे।
मनोविज्ञानी राँस स्टेग्नर ने अपने अध्ययन ‘पर्सनालिटी एण्ड इट्स सोशल वैल्यू’ में इस बात का काफी खुलासा किया है। उनके अनुसार परिवर्तनों के दौर ने दुनिया को इस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है कि हम सिर्फ अपने लिए नहीं जी सकते। क्योंकि परिस्थितियाँ एक बात हमें साफ तौर पर समझा रही हैं कि वर्तमान यान्त्रिक विचारों के अनुसार यदि हम सिर्फ अपनी रुचियों, अपने हितों को ध्यान में रखकर ही जीवन जीते हैं।, तो उसमें न तो समाज का हित है और न हमारा अपना। आज के परिवेश में स्वार्थपूर्ण जीवनशैली चहुँओर से होने वाले प्रहारों के समक्ष टिक नहीं सकती।
अति हर चीज की बुरी होती है। न तो व्यक्तिवाद की अति अच्छी और नहीं समूहवाद की अति से काम चलने वाला है। यों दोनों ही व्यवस्थाएँ व्यवस्था कम समस्या को ही अधिक जन्म देती है। राजतंत्र एवं तानाशाही के पतन यदि व्यक्तिवाद की अति की बुराई की कहानी कहते हैं तो रूस एवं पूर्व यूरोप में साम्यवाद का पतन समूहवाद की अति के दोषों की कथा सुनाते हैं। अब तो ब्रिटेन, स्वीडन तथा अन्य पश्चिमी यूरोपीय देशों में भी उदार समाजवाद के प्रति भी विशाल स्तर पर अभिरुचि घटी है। साठवें एवं आरम्भिक सत्तरहवें दशक में इज़राइल के किब्बट्ज आंदोलन के अधोपतन से सभी परिचित हैं। यही नहीं अमेरिका में लोकप्रिय अनेकों साम्यवादी आन्दोलनों से मोह भंग हुआ है। अब तो इक्कीसवीं सदी ऐसी किसी व्यवस्था की प्रतीक्षा में है-जो स्वार्थपरक व्यक्तिवाद तथा चरम समूहवाद के बीच की होगी। इसमें दोनों गुणों का उचित समन्वय होगा।
विचारक्रान्ति अभियान के सूत्र-संचालक पूज्यवर समय-समय पर ऐसी ही किसी व्यवस्था के बारे में भविष्य-वाणी करते रहे हैं। आध्यात्मिक साम्यवाद की वकालत पहले-पहले यहीं इसी युगतीर्थ से शुरू की गयी थी। आज समूचे विश्व के मनीषी, इसकी उपयोगिता एवं उपादेयता की जोर-शोर से चर्चा कर रहे हैं। उनका कहना है कि नित्य नए अनुभवों, प्रयोगों पर आधारित विभिन्न मतों, अनेक दृष्टिकोणों का सामना करना आज के समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। आज सभी का मत है कि एक लीक पर चलने तथा किसी विषय पर एक ही दृष्टिकोण से विचारने की प्रवृत्ति में बदलाव लाना आवश्यक हो गया है।
एक दृष्टिकोण के स्थान पर विभिन्न दृष्टिकोणों का सम्मान करते हुए तथा अनेक तत्वों को ध्यान में रखकर नवीन कार्यशैली बनाने की प्रवृत्ति का विकास करना होगा। एक ही विचार-शैली के अंतर्गत कार्य करने की अपेक्षा सामूहिक दृष्टिकोणों, अनुभवों, विचारों के आधार पर सर्वश्रेष्ठ के चुनाव को महत्व एवं सम्मान मिलना अवश्यंभावी है। इससे प्रगति के नए द्वार खुलेंगे और क्रान्तिकारी परिणाम मिलते चले जाएँगे। विश्व समुदाय व्यवस्था के व्यक्तिवादी एवं समाजवादी सभी रूपों को देख-परख चुका है। हाँ आध्यात्मिक भावनाओं से सम्पन्न इन दोनों के एक समन्वित रूप की परख होना बाकी है। समय की स्वीकारोक्ति भी यही है।
सुविख्यात सामाजिक चिन्तक आन्द्रेत्रिदों ने अपनी पुस्तक ‘न्यू लेसन्स इन सोशल सिस्टम्स’ में इस सत्य का गहराई से विश्लेषण किया है। उनके अनुसार बुद्धि-प्रवण मानव में भावनाशीलता अंकुरित होने को है। लचीले तथा कम कट्टरवादी समाज की संरचना प्रारम्भ हो चुकी है। घरेलू तथा सामाजिक जीवन में पग-पग जटिलताओं, अनिश्चितताओं के बावजूद वहाँ कुछ नए होने की तैयारियाँ चल रही हैं। पारिवारिक, सामाजिक सम्बन्धों में तीव्रता से परिवर्तन हो रहा है।
नवीन पारिवारिक ढाँचा, नवीन तकनीकी व्यवस्था, नवीन सूचना स्त्रोत, नवीन व्यवसाय प्रणाली, सभी उदारता तथा लचीलेपन की माँग करते दिखाई देते हैं। यन्त्र की भाँति व्यक्तियों के निश्चित कार्य तथा कठोर प्रबन्धन के अंतर्गत विशाल मानव समुदाय की अपरिमित शक्तियों, योग्यताओं की न तो पहचान हो पाती है न ही उनका समुचित उपयोग एवं विकास सम्भव होता है। चमत्कारी परिणाम देने वाली असीमित कल्पनाओं, सम्भावनाओं को प्रतिबन्धित कर दिया जाता है। मनुष्य एक यन्त्र मात्र नहीं है। ईश्वर ने उसे एक ऐसा मस्तिष्क दिया है जो कठिन तक अनिश्चितताओं का सामना करके भी बड़ी से बड़ी अनबूझ पहेलियों का हल चुटकियों में निकाले में समर्थ है। ऐसे शानदार मस्तिष्क का समुचित उपयोग ऐसे-ऐसे सृजन करेगा, जो आज असम्भव तथा कल्पना से परे है।
वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक ढाँचे में परम्परा-विरासत अथवा बाह्य शक्तियों के आधार पर थोपी गयी व्यवस्था सभी को माननी पड़ती है। ऐसी प्रबन्ध व्यवस्था को अब लोग बिना प्रश्न किए स्वीकार नहीं कर सकते। इस असहनीय स्थिति को ठुकराकर ऐसी नयी व्यवस्था का बनना स्वाभाविक हो गया है, जिसके अंतर्गत आम मनुष्य के चिन्तन, व्यवहार के आधार पर निर्णय लिए जाएंगे। सँपूर्ण व्यवस्था-तंत्र अन्तरात्मा की आवाज पर टिका रहेगा।
औद्योगिक सभ्यता द्वारा उत्पन्न पर्यावरण प्रदूषण पृथ्वी के लिए विकराल समस्या बन चुका है। मनुष्य भी उसी प्रकृति में रहता है। प्रकृति की रक्षा किए बिना मानव को विकास एवं रक्षा सम्भव नहीं। आध्यात्मिक साम्यवाद के अंतर्गत भविष्य में एक ऐसी सामाजिक भावना का विकास होगा, जो मानव को प्रगति और प्राकृतिक संरक्षण दोनों के बीच पूर्ण सामंजस्य स्थापित करेगी।
जीवन में पूर्ण शान्ति और आनन्द का समावेश करने लिए समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना जरूरी है। उपभोगवाद तथा सीमित स्वार्थ के मध्य तालमेल बिठाया जा सके, भविष्य में ऐसी व्यवस्था बनेगी। इस क्रम में सामाजिक दृष्टिकोण में मीमाँसा का सहारा लिया जाएगा। अर्थात् लिए आवश्यक होगा कि समाज किसलिए है? उसके उद्देश्य और दिशाएँ क्या है? अपने प्रत्येक चिंतन और क्रिया-कलाप का विश्लेषण करते रहने की प्रेरणा देने के लिए ही अध्यात्म की संरचना की गयी है। एक आध्यात्मिक व्यक्ति अथवा संगठन जाति, धर्म व देश की सीमाओं से ऊपर होता है। आध्यात्मिक साम्यवाद की समस्वरता को साधकर भावी विश्व स्वयमेव ही एक सूत्र में बँधता चला जाएगा।
पुरातन विज्ञान और पारस्परिक स्थापित धर्म, ब्रह्माण्ड के इतिहास और विशेषताओं तथा मनुष्य के गुणों, प्रवृत्तियों को भली प्रकार जानने में समर्थ नहीं है। इस पर विडम्बना यह है कि विज्ञान व धर्म दोनों ही एक दूसरे के कट्टर विरोधी की भूमिका में है। दोनों ही अब तक एक दूसरे की सार्थकता पर प्रहार करते आए हैं।
इस किंकर्तव्यविमूढ़ता से उबारने के लिए ब्रह्मवर्चस से प्रतिपादित वैज्ञानिक अध्यात्म की दिशा-विश्वमानस को दोनों के ही समन्वित रूप की सार्थकता समझाएगी। यहाँ हर किसी को यह जान लेना चाहिए कि ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान कोई संस्था नहीं बल्कि दिशा है। यहाँ से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष मार्गदर्शन लेकर भविष्य में अनेकों संस्थाएँ खड़ी होंगी, अनेकों मनीषी, वैज्ञानिक स्वयं को नवसृजन के लिए सर्वतोभावेन समर्पित करेंगे और तब वैज्ञानिक अध्यात्म के अनेकों पहलुओं पर शोध का ताँता लग जाएगा। ऐसा सिलसिला चल पड़ेगा जो उपलब्धियों के अर्जन के साथ उनके उपयोग की कला भी सिखाएगा।
आध्यात्मिक साम्यवाद की व्यवस्था के अंतर्गत समाज की नैतिक एवं आध्यात्मिक जड़ों के विषय में पूर्ण-रूपेण सही जानकारी प्राप्त करने हेतु अनेकों प्रयास किए जाएँगे। इन प्रयासों के द्वारा विज्ञान द्वारा प्रदत्त जानकारियों का विरोध होने की अपेक्षा उनका भली प्रकार उपयोग एवं विकास हो सकेगा। यान्त्रिक विज्ञान अथवा वैज्ञानिक भौतिकवाद के द्वारा यह कार्य सम्भव नहीं था। ये बात बीसवीं सदी के इन अंतिम वर्षों में सभी की समझ में आ चुकी हैं और अब विज्ञान का अध्यात्म के प्रति झुकाव इक्कीसवीं सदी के आते-आते स्पष्ट होने लगा है।
उपरोक्त गुणों से युक्त समाज निश्चित रूप से मानव की उज्ज्वल भवितव्यता को साकार करेगा। इसमें रहने वाले लोगों को जीवन के प्रत्येक पहलू की पूर्ण जानकारी होगी। मनुष्य से एवं मनुष्य का प्रकृति से कैसा सम्बन्ध होना चाहिए, राजनैतिक तथा नैतिक निर्णय किस प्रकार लिए जाएँ, शहरी व्यवस्था कैसी हो, बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाए, उद्योग-व्यवसायों का कुशल प्रबन्धन कैसे हो तथा जीवन के मौलिक सिद्धान्त तथा लक्ष्य क्या हैं? आदि सभी कुछ आध्यात्मिक साम्यवादी प्रणाली में पूरी तरह से स्पष्ट होगा। इक्कीसवीं सदी का आगमन मानव के लिए ऐसे ही बीसवीं सदी के इन बचे हुए दो-चार वर्षों में होने वाली टूट-फूट से न तो घबराना चाहिए और न ही निराश होना चाहिए। हालाँकि आगामी पाँच-छह वर्ष भारी उथल-पुथल के हैं। लेकिन यह उथल-पुथल प्रसव पीड़ा की है, जो नए समाज के जन्म का कारण बनेगी। इन वर्षों में हमें आने वाले नवयुग के स्वागत की तैयारी प्राणपण से करनी चाहिए।
महाराजा ने झुँझलाकर अपने पाँच साल के बेटे के गाल पर जोर का तमाचा जड़ दिया। बेटा ‘रवि’ चकरा कर गिर गया। महाराज के झुँझलाने, डाँटने और रवि के थप्पड़ मारने की आवाजें रानी ने भी सुनी। वह पर्दे के पीछे किसी काम में व्यस्त थी। रवि के गिरने की गूँज से उनका मातृ-हृदय उद्वेलित हो उठा। वह भागी-भागी आयी, किन्तु महाराज की चढ़ी हुई त्योरियाँ देखकर सहम-सी गयी। उन्हें देखते हुए महाराज ने तीखी आवाज में आदेश दिया,”कोई भी इस रवि से बात नहीं करेगा।”
उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी कौन-सी भूल कर दी उनके बेटे ने। वह अपने पुत्र की कोमल भावनाओं से परिचित थीं। उन्हें मालूम था कि उनका बेटा शरारती नहीं है। किसी को सताना-परेशान करना उसके स्वभाव में नहीं है। वह तो बस प्राकृतिक दृश्यों, देवी-देवताओं के चित्रों में मुग्ध रहता है। यदा-कदा खड़िया, मिट्टी से कुछ वैसा ही चित्रित करने का प्रयास करता है। उसके इस बाल-सुलभ चित्राँकन में भी कुछ ऐसा रहता है कि हृदय की संवेदना छलक कर जीवन की सतह पर आ जाय।
उसकी यह प्रवृत्ति महाराज को परेशान करती थी। आज भी वह कुछ इसी परेशान हो उठे थे। इस समय अट्टालिका पर टहलते हुए सोच रहे थे-कि आखिर कितनी कोशिश की रवि को सुधारने की। उनकी इच्छा थी बेटा सैनिक बने, शूरवीर सैनिक। किन्तु वह है कि मानता ही नहीं।
रवि के बारे में सोचते-सोचते एक गम्भीर श्वास छोड़ा और कक्ष में आकर सिंह के चमड़े से मढ़े आसन पर जा बैठे। उनके मन में यह भी आया कि अपने रवि को समझाने के लिए किसी और से कहें। परन्तु फिर सोचने लगे कि विधि का लिखा भला कौन टाल सकता है। फिर उनका पितृ-हृदय अपने पुत्र के प्रति संवेदनशील हो उठा। वह आसन से उठे और भारी कदमों से चलते हुए रवि के पास जा पहुँचे। अब उनका हाथ बेटे के सिर पर था।
आज की घटना से उन्हें काफी मानसिक सन्ताप पहुँचा। कहीं किसी मन के कोने में उन्हें लगने लगा था कि हर व्यक्ति की अपनी मौलिकता होती है। व्यक्ति की अपनी मौलिकता होती है। व्यक्ति की रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ, संस्कार ही उसके जीवन की दिशा तय करते हैं। दूसरा तो सिर्फ इनके परिशोधन-परिमार्जन में सहायता कर सकता है। यही कुछ सोचकर उन्होंने रवि को टोका-टाकी न करने का निश्चय किया।
चाचा राजवर्मा स्वयं संवेदनशील प्रकृति के इंसान थे। छोटा रवि जब कभी जमीन पर, दीवारों पर, आँगन में लाल-पीले रंगों से चित्र बनाता था, तो उसके चाचा डाँटने-डपटने की बजाय उसे प्रोत्साहन देते। जब वह आड़ी-तिरछी-गोल रेखाओं को खींच कर ताली बजाता, तो राजवर्मा भी उसके साथ ताली बजा-बजाकर नाचने लगते।
राजवर्मा स्वयं एक अच्छे चित्रकार थे। अंजोर कला-पद्धति के विशिष्ट जानकार के रूप में उनकी भारी प्रसिद्धि थी। कला का ज्ञान उन्होंने अंजोरी कला के पोट्र्ट चित्रकार अलविरी नायडू से पाया था। रवि की माँ अम्बाबाई खुद भी एक कुशल चित्रकार थीं। रवि में महान चित्रकार होने के गुण हैं, तब वह फूली न समायी थीं।
यह वर्मा परिवार केरल राज्य के ‘किलमनूर’ नामक गाँव में रहता था। गाँव कोई खास बड़ा न था, किन्तु वर्मा परिवार की वजह से इसकी ख्याति दूर-दूर तक पहुँची थी। इसकी वजह यही थी कि त्रावणकोर राज-परिवार की कन्याओं के विवाह के लिए वर इसी परिवार से पसन्द किए जाते थे, इसीलिए परिवार के सदस्यों को राजा कहकर संबोधित किया जाता था। उस समय त्रावणकोर की राजधानी त्रिवेन्द्रम थी। राजधानी होने की वजह से यह स्थान उस समय राज्य के कला-कौशल, प्रगति-समृद्धि का मुख्य केन्द्र बना हुआ था।
रवि की कला में और अधिक निखार आए, यह सोचकर राजवर्मा उसे अपने साथ त्रिवेन्द्रम ले गए। रवि की आयु उस समय चौदह साल की थी। इतने दिनों में उसने चाचा की संगत में अच्छी चित्रकारी सीख ली थी। इतना ही नहीं, अब तो वह यदा-कदा चाचा से भी अच्छे चित्र बना लेता था। राजा राजवर्मा को त्रावणकोर के राजदरबार में काफी सम्मानित स्थान प्राप्त था। बातचीत के दौरान उन्होंने महाराजा के समक्ष अपने भतीजे का गुणगान किया। महाराजा को थोड़ी देर तक तो यकीन ही नहीं आया। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि आखिर चौदह साल का बच्चा चित्रकारी में इतना निपुण कैसे हो सकता है। महाराजा को विश्वास दिलाने के लिए राजवर्मा ने रवि द्वारा बनाए गए कितने ही चित्र उन्हें दिखाए।
इन चित्रों को देखकर त्रावणकोर के महाराज इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने तुरन्त रवि को अपने यहाँ रखने की इच्छा जाहिर की ।उन दिनों वहाँ के राजदरबार में और भी ख्याति प्राप्त कलाकार थे। उन्होंने राजवर्मा को आश्वासन दिया कि यहाँ रवि को सभी चित्रकारों में प्रोत्साहन मिलता रहेगा। राजवर्मा को भी लगा कि त्रिवेन्द्रम का कलात्मक वातावरण रवि के लिए प्रेरणादायक रहेगा। यहाँ रहकर वह आसानी से अपने भविष्य को कहीं अधिक उज्ज्वल बना सकता है। यही सोचकर उन्होंने महाराज के अनुरोध को स्वीकार कर लिया।
त्रिवेन्द्रम के राजदरबार में रवि को पर्याप्त आदर-सम्मान मिला। इस प्रसन्नता में उसके काफी दिन तो आसानी से गुजर गए। लेकिन धीरे-धीरे उसे लगने लगा महाराज का निकट सम्बन्धी होने पर भी दरबारी चित्रकारों के मन में भारी द्वेष है। इसे दूर करना काफी कठिन कार्य है। कई बार तो स्थितियाँ। ऐसी बनती कि स्वयं महाराज को हस्तक्षेप करना पड़ता।
ऐसा ही एक चित्रकार था-’रामास्वामी नायडू’। त्रावण्कोर के दरबार में उसकी कला की काफी चमक थी। लेकिन बड़ा चित्रकार होने पर भी उसके मन की द्वेष-वृत्ति काफी विकराल थी। सम्भवतः इसलिए कला उसके लिए प्रसिद्धि का साधन थी-हृदय की भाववृत्ति नहीं। रवि को उसके द्वेष के दंश प्रायः लगते रहते थे? यदि वह चाहता तो महाराज से उसकी शिकायत कर सकता था। दण्डित करवा सकता था। परन्तु उसके कलाकार हृदय ने कभी इसकी इजाजत नहीं दी। वह चुपचाप उसके और अन्य कलाकारों के अत्याचार सहन करता रहा। समय बीतता गया और उसकी प्रतिभा नित्य उन्नत होती रही।
रवि की कला कुत्सा के कलुष से सर्वथा मुक्त थी। वह तो भारत के अतीत के दैवी भावों को लोक हृदय में उतारना चाहता था। पौराणिक कथा-गाथाएँ उनके चित्रों का विषय थीं। उसकी कला-साधना सतत् चलती रही और जब त्रिवेन्द्रम में आयोजित एक ललित कला प्रदर्शनी में उसके चित्रों का प्रदर्शन किया गया, तो देखने वाले स्वयं चित्रवत् रह गए। दरबारी चित्रकारों की द्वेषवृत्ति अपनी ही शर्म में डूबने लगी।
1866 में महाराज ने अपनी सबसे छोटी बहिन का विवाह रवि से कर दिया। अब तो वह राजा रविवर्मा बन गए। उन्हीं दिनों एक अँग्रेज कलाकार ‘थियोडोर जेन्सन’ त्रिवेन्द्रम आया। वह चित्रकार कला की एक विशेष पद्धति में सिद्धहस्त था। राजा रवि जब एक दिन उस विदेशी चित्रकार की चित्रशाला में गए, तो उसकी कला-कुशलता पर मुग्ध हुए बिना न रहे। अँग्रेज कलाकार की पद्धति को सीखने की लालसा उनके कलाकार मन में अंकुरित हो आयी। उन्होंने जेन्सन से इसके लिए विनम्र आग्रह किया कि वह उन्हें अपनी विशिष्ट पद्धति सिखा दे।
परन्तु जेन्सन को अपनी पद्धति का भारी अभिमान था। उसने साफ इन्कार कर दिया। यदि रवि चाहता तो इसके लिए उसे महाराज से आदेश भी दिलवा सकता था। लेकिन ऐसा करना उसने उचित नहीं समझा। किसी दबाव डलवाना उसकी संवेदनशील प्रकृति के विरुद्ध था। इसके लिए उसने एक दूसरा उपाय सोचा। अब की बार जेन्सन से विनयपूर्वक अनुरोध किया कि वह भले ही उसे अपनी कला न सिखाए, परन्तु उसे चित्रकारी को इसमें कोई एतराज करने की जरूरत न महसूस हुई। उसने उपेक्षा-भव प्रदर्शित करते हुए अनुमति दे दी।
अब बारी थी-राजा रविवर्मा की सूझ-बूझ की सूक्ष्मता की, प्रतिभा की प्रखरता एवं अध्यवसाय की कड़ी परीक्षा की। उन्हें विश्वास था कि मानवीय व्यक्तित्व अपरिमित क्षमताओं का भण्डार है। यदि कठोर परिश्रम एवं पूर्ण मनोयोग का आश्रय लिया जाय तो असंभव जैसा कुछ भी नहीं। वे नित्यप्रति जेन्सन के स्टूडियो में जाने लगे। जेन्सन रविवर्मा के साथ घण्टों एक साथ रहने पर भी कोई बात-चीत नहीं करता था। शायद इसमें उसे अपना जातीय अभिमान आड़े आता था। स्टूडियो में पूर्ण निस्तब्धता रहती थी। राजा रविवर्मा तन्मयता से थियोडोर जेन्सन को ब्रुश चलाते हुए देखा करते थे। कुछ दिनों बाद जेन्सन तो स्वदेश वापिस लौट गया, लेकिन रविवर्मा लम्बी अवधि तक उस नई विद्या का अभ्यास करते रहें।
इसके साथ ही उनकी चित्रकारी में अनेकों नए आयाम प्रकट होते गए। कइयों ने उनकी इस मोहक सफलता का राज जानना चाहा। उत्तर में वे मुस्कुराते हुए कहते-प्रश्न कला की सफलता का नहीं है। सफलता तो एक-सी होती है, भले ही वह कला के क्षेत्र में हो अथवा फिर जीवन के किसी और क्षेत्र में। सफल होने का सिद्धान्त एक ही-व्यक्तित्व की समस्त शक्तियाँ एक ही उद्देश्य के प्रति समर्पित हों। लेकिन मार्ग में अवरोध भी तो आते हैं? प्रश्नकर्ता की जिज्ञासा अस्वाभाविक न थी। हालाँकि उनका समाधान और भी रोचक था-ऐसे प्रश्नों के उत्तर में वह कहते-यदि दृढ़ संकल्प हो, अध्यवसाय हो, तो रुकावटें ठोकर तो देती हैं, लेकिन हर ठोकर तो देती हैं, लेकिन हर ठोकर के बाद, हर रुकावट के बाद प्रगति का प्रवाह और वेगवान हो उठता है।
कला-साधना में उनकी तन्मयता रुकावटों व अवरोधों के बावजूद बढ़ती गयी। 1876 में त्रावनकोर के अँग्रेज रेजीडेण्टा ने उनकी मद्रास में लगी ललित कला प्रदर्शनी को देखा। इसमें उनके द्वारा बनाया एक चित्र ‘शृंगार करती नायर जाति की एक नारी’ का था। नारी के कोमल एवं संवेदनशील भावों का इतना मार्मिक कचत्राँकन ने उस गवर्नर का मन मोह लिया। इस चित्र पर उन्हें गवर्नर की ओर से स्वर्ण पदक का प्रथम पुरस्कार मिला। गवर्नर के अनुरोध से इसी चित्र को उन्होंने विएना की ‘ललित कला प्रदर्शनी’ में भी भेजा। वहाँ भी इस चित्र की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। इन सफलताओं से उत्साहित और प्रेरित होकर उन्होंने एक दूसरा चित्र ‘शृंगार करती हुई एक तमिल स्त्री,’ का बनाया। बाद में इन दोनों चित्रों को 1875 में ‘प्रिन्स आफ वेल्स’ की त्रिवेन्द्रम यात्रा के अवसर पर भेंट कर दिया गया।
तैल चित्रों में निपुणता पाने के बाद फिर से उन्होंने अपना सम्पूर्ण ध्यान भारत की पौराणिक कथाओं की ओर केन्द्रित किया। उनका कहना था कि कभी किसी देश व समाज को अपने अतीत के गौरव को विस्मृत नहीं करना चाहिए। उनकी मान्यता थी कि अपने देश के वैदिक एवं पौराणिक वाङ्मय में मानव में दैवी तत्वों को उभारने वाली सारी सम्भावनाएँ हैं। कला के द्वारा इन तत्वों को सहज भावगम्य बनाया जा सकता है। उनकी कला का यही उद्देश्य था।
उनकी चित्र बनाने की प्रतिभा सहज थी। ऐसा लगता था कि उनका हृदय संवेदना का निर्मल सरोवर है, जिसमें प्राकृतिक सौंदर्य एवं दैवी भाव स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित हो उठते थे। यह साफ-अक्स ही उनको सफल-चित्रकार की महिमा से मण्डित करता रहता था। देखते-देखते उनके चित्रों की माँग चारों दिशाओं से आने लगी। जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने बम्बई में ‘आर्लिए-ग्राफिक’ नाम से एक प्रेस की स्थापना की। इसके बाद भारत के लगभग प्रत्येक कला-प्रेमी के घर में उनके चित्र मिलने लगे।
उनके द्वारा बनाए गए पौराणिक चित्र इतने भावनापूर्ण एवं आकर्षक होते थे कि अनगिनत लोग उन्हें देखकर कह उठते कि रविवर्मा ने साक्षात में देवताओं का दर्शन किया है, उनका संपर्क पाया है। 5 अक्टूबर, 1906 उनका दैवी व्यक्तित्व दैवी चेतना से एकाकार हो गया।
5 साल के जिस बालक को अपनी सहज संवेदनशील प्रकृति के कारण प्रताड़ित होना पड़ा, कलाकार की वही प्रकृति उसे एक महान विभूति के रूप में प्रतिष्ठित कर गयी। स्वयं की प्रकृति की मौलिकता को पहचाना जा सके और उसे कलाकार की रीति से सँवारा जा सके-तो जीवन का विकास शतगुणित, सहस्रगुणित हो उठता है।
आधुनिककाल में विकासवाद एक महत्वपूर्ण शास्त्र है। वैज्ञानिक और ऐतिहासिक शास्त्र है। वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दोनों ही विचारधाराओं में उसका प्रवेश हो गया है। वैज्ञानिक विचारधारा में प्राणियों की विभिन्न जातियों की उत्पत्ति में विकासवाद को मान्यता दी जाती है और ऐतिहासिक विचारधारा में मानवी-बुद्धि के विकास अथवा ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धि में विकासवाद को आधार माना जाता है। साधारण दृष्टि से देखने पर यह बात ठीक-सी प्रतीत होती है, परन्तु गहराई से विचार करने पर इसका खोखलापन स्पष्ट हो जाता है।
आरम्भ में अमीबा (एककोशीय प्राणी) की भाँति के सूक्ष्म जल जन्तु हुए। धीरे-धीरे जलीय कीट, मछली, मेढक, कछुआ, वराह, रीछ, बन्दर, वनमानुष आदि विभिन्न प्राणि स्तरों को पार करता तथा विभिन्न प्राणि स्तरों को पार करता तथा विकसित होता हुआ मनुष्य बन गया। आदिकालीन एक कोश के प्राणी से मनुष्य तक पहुँचने के लिए मध्य में जीवन के न जाने कितने स्तर पार किये गये ।तब कहीं लाखों-करोड़ों वर्षों में मनुष्य अपने वर्तमान रूप में आया है।
इस विचार के अनुसार यदि हम मनुष्य की उत्पत्ति को एक करोड़ वर्ष पूर्व मानें और हैकल की ‘हिस्ट्री ऑफ क्रिएशन’ पुस्तक में लिखी हुई प्राणियों की कड़ियों के बाद मनुष्य की उत्पत्ति मानें और प्रत्येक कड़ी को एक करोड़ वर्ष का समय दें, तो प्रथम वर्ष होते हैं। लोकमान्य तिलक के ‘गीता रहस्य’ में डॉक्टर गैडी की साक्षी से लिखा है कि ‘मछली से मनुष्य होने में 53 लाख 75 हजार पीढ़ियाँ अमीबा से मछली होने में बीती होंगी, अर्थात् अमीबा से आज तक लगभग एक करोड़ पीढ़ियां बीत चुकीं कोई पीढ़ी एक दिन और कोई सौ वर्ष जीती है। यदि सबका औसत 25 वर्ष मान लें तो इस हिसाब से भी प्राणियों के प्रादुर्भाव को आज 25 करोड़ वर्ष होते हैं। यह भी माना जाता है कि पृथ्वी के हो चुकने के करोड़ों वर्ष बाद प्राणी हुए और प्राणियों की उत्पत्ति से आज तक 25 करोड़ वर्ष हो गये। इस प्रकार यह अवधि विकासवादियों की निश्चित की गई अवधि (दस करोड़ वर्ष) से बहुत आगे निकल गई है। ऐसी दशा में समय की दृष्टि से यह विकासवाद कितना लचर है-यह स्पष्ट है।
आधुनिक विकासवाद के अनुसार प्राणी के क्रमिक विकास में उसकी आवश्यकताजन्य इच्छा तथा उसको पूरा करने के लिए किये गये चिरकालीन अभ्यास के परिणामस्वरूप होने वाले आकृति-परिवर्तन के उदाहरण के रूप में अफ्रीका के मरुदेश में पाये जाने वाले लम्बी गर्दन वाले जिराफ नामक पशु का उल्लेख किया जाता है। कहते हैं, यह पहले ऐसा नहीं था, जैसा आज देखा जाता है। जिराफ ने जब वृक्षों पर नीचे के पत्ते खा लिये तो ऊपर के पत्ते खाने की इच्छा हुई। अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह गर्दन उठा-उठाकर प्रयत्न करने लगा। चिरकाल तक ऐसा करते रहने से उसकी गर्दन लम्बी हो गई।
परन्तु परिस्थिति के अनुरूप, आवश्यकतावश आकृति परिवर्तन की मान्यता युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होती। बकरी जब नीचे के पत्ते चुग लेती है तब तने पर यह टहनियों पर अगले पैर टिकाकर पत्ते चुग लेती है। लाखों वर्षों से वह इसी तरह अपना पेट भरती आ रही है। परन्तु आज तक न उसकी गर्दन बढ़ी, न उसका अगला भाग लम्बा हुआ और न उसके लिए चारे की कमी हुई। यहाँ यह भी विचारणीय है कि गर्दन बढ़ाने की बजाय जिराफ में बन्दर की तरह पेड़ पर चढ़ने की प्रवृत्ति का विकास क्यों नहीं हुआ? न जाने कब से मनुष्य उत्तरी ध्रुव तथा ग्रीनलैण्ड जैसे शीत प्रधान देशों में बसा हुआ है, किन्तु शीत से बचने की इच्छा तथा आवश्यकता के होते हुए भी उसके शरीर पर रीछ जैसे बाल लम्बे बाल राजस्थान की तपती मरुभूमि में रहने वाली भेड़ के होते हैं, वैसे ही हिमालय के शीत प्रधान देश में रहने वाली भेड़ के होते हैं। अफ्रीका के अति उष्ण प्रदेशों में दीर्घरोमा रीछ और रोमरहित गैंडा एक साथ रहते हैं। अपने ही देश में एक जैसी परिस्थिति में रहने वाली गाय और भैंस में इसके विपरीत अन्तर देखा जाता है। भैंस का चर्म पहला, चिकना और लघु रोम होता है। इसके विपरीत गाय को चर्म अपेक्षाकृत कठोर और रोम बहुल होता है। विकासवाद के अनुसार आत्मरक्षा की भावना के कारण हरिण, चीतल, नीलगाय आदि अनेक प्रकार के जंगली पशुओं में नर के सींग होते हैं, मादा के नहीं। क्या आत्मरक्षा के लिए सींगों की आवश्यकता नर को होती है, मादा को नहीं? जंगली पशुओं की अपेक्षा की मनुष्य द्वारा पालित व सुरक्षित गाय, भैंस आदि को कम खतरा होता है। फिर क्या कारण है कि उनमें नर-मादा दोनों के सींग होते हैं। फिर, कोयल के मधुर कण्ठ और मोर के सुन्दर पंखों का प्राणरक्षा से क्या सम्बन्ध है? फिर भी ये दोनों गुण अपने-अपने स्थान पर विद्यमान हैं। कौवे को क्या अपनी काँ-काँ अच्छी लगती होगी और मोर के सुन्दर पंख देखकर क्या मोरनी को ईर्ष्या नहीं होगी?
भाई और बहिन एक ही परिस्थिति में उत्पन्न होते और बढ़ते हैं। पर बहिन के मुँह पर दाढ़ी-मूँछ का नाम भी नहीं होता। हाथी और हथिनी एक ही परिस्थिति में रहते हैं। पर हथिनी के मुँह में बाहर को निकले बड़े दाँत नहीं होते। विकासवाद के अनुसार इसके विपरीत होना चाहिए था। प्राणिमात्र में आत्मरक्षा की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। यह प्रवृत्ति पतंगे में भी होनी चाहिए। दीपशिखा के संपर्क में आते ही वह जल जाता है। न जाने कब से जलता आ रहा है, परन्तु उसने कभी भी उससे बचने का प्रयास नहीं किया। इसके लिए उसे कोई विशेष प्रयत्न भी नहीं करना पड़ता। दीपशिखा से तनिक दूर रहने का अभ्यास मात्र करना था। किन्तु लाखों-करोड़ों वर्षों में वह इतना भी नहीं कर पाया।
बया नामक छोटी चिड़िया जैसा सुन्दर घर बनाती है, वैसा मनुष्य से केवल एक पीढ़ी नीचे माना जाने वाला बन्दर नहीं बना सकता। पर यह भी सत्य है कि जैसा घर यह लाखों-करोड़ों वर्ष पहले बनाती थी, आज भी वैसा ही बनाती है। मकड़ी जाला बनाती है। मधुमक्खी छत्ता बनाती है और फूलों से पराग लाकर और उसे मधु बनाकर उसमें एकत्र करती है। किन्तु उन्होंने ये कलाएँ किसी से सीखी नहीं-ये उनके अपने आविष्कार भी नहीं हैं। उन्होंने अपनी ये कलाएँ अन्य प्राणियों को सिखाई भी नहीं। जिसको जो आता है और जैसा आता है, वह उसे उसी रूप में करता आ रहा है।
लैमार्क नामक विद्वान ने चूहों की दुमें काटकर बिना दुम के चूहे पैदा करने चाहे। चूहों की अनेक पीढ़ियों तक वह ऐसा करता रहा, पर बिना पूँछ के चूहे पैदा न हुए। हिन्दुओं के लड़के-लड़कियाँ लाखों वर्षों से कान छिदवाते आ रहे हैं, हजरत इब्राहिम के समय से यहूदी और मुसलमान खतना कराते आ रहे हैं, चीनी स्त्रियाँ न जाने कब से पैर छोटे करने का प्रयास कर रही हैं। परन्तु न हिन्दुओं के घरों में कनछिदे बच्चे पैदा हुए, न मुसलमान के यहाँ खतना की हुई सन्तान पैदा हुई और न चीनी घरों में छोटे पैरों वाली लड़कियाँ पैदा हुई।
जब मनुष्य जैसा सर्वोत्कृष्ट प्राणी तैयार हो गया, तो निचले स्तर के सभी पशु-पक्षियों का सर्वथा लोप हो जाना चाहिए था। परन्तु हम देखते हैं कि आज भी मछली से मछली, भेड़ से भेड़ और कुत्ते से कुत्ते ही पैदा हो रहे हैं। यहाँ तक कि जिस बन्दर से मनुष्य बना कहा जाता है, उससे भी बन्दर ही पैदा हो रहे हैं, मनुष्य नहीं। फिर, विकास तो विकास है, उसकी कोई अन्तिम सीमा नहीं आ सकती। तो फिर विकास का क्रम कैसे रुक गया? मनुष्य से आगे अन्य कुछ क्यों क्यों नहीं बना।
इस प्रकार के सैकड़ों उदाहरण दिये जा सकते हैं, जो विकासवाद द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त के व्यतिक्रम को स्पष्ट करते हैं। वस्तुतः जो योनियाँ जिस प्रकार की हैं, वे सदा से वैसी ही हैं और भविष्य में भी वैसी ही बनी रहेंगी। आवश्यकता, तन्मूलक इच्छा, अभ्यास एवं वातावरण या परिस्थिति के कारण उनमें किसी प्रकार परिवर्तन सम्भव नहीं। अत्यन्त प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियों में अनेक जातियाँ नष्ट भले हो जाएँ, पर उनमें ऐसा परिवर्तन नहीं हो सकता जो उनकी नैसर्गिक जाति को बदल डाले। इन सब बातों से प्रमाणित होता है कि आदिम मनुष्यों ने हीन मस्तिष्क प्राणियों से विकसित होकर उन्नति नहीं की, प्रत्युत वे परमात्मा की विशिष्ट रचना थे और आज के उत्तम मस्तिष्कों की अपेक्षा अधिक उन्नत एवं विकसित थे।
वनस्पतिशास्त्र के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान डाक्टर बीरबल साहनी से पूछा गया-”आप कहते हैं कि आरम्भ में एक सेल के जीवित प्राणी थे, उनसे उन्नति करके बड़े-बड़े प्राणी बन गये। आप यह भी कहते हैं कि आरम्भ में बहुत-थोड़ा ज्ञान था, धीरे-धीरे उन्नति होते हुए ज्ञान उस अवस्था को पहुँच गया जिसको विज्ञान आज पहुँचा हुआ है। तब आप यह तो बताइये कि प्रारम्भ में जीवन कहाँ से आया और प्रारम्भ में ज्ञान कहाँ से आया? क्योंकि जीवन शून्य से उत्पन्न हो गया और शून्य से ज्ञान उत्पन्न हो गया, यह नहीं माना जा सकता। डाक्टर साहनी ने उत्तर में कहा-”इसके साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं कि आरम्भ में जीवन या ज्ञान कहाँ से आया। हम इस बात को स्वीकार करके चलते हैं कि आरम्भ में जीवन भी था और कुछ ज्ञान भी था।” सच तो यह है कि जब जड़ पदार्थों में स्वयं संचालन तथा समन्वय की शक्ति है ही नहीं, तो विकासवाद के सिद्धान्तानुसार अरबों वर्ष में भी जड़ परमाणुओं में इस प्रकार संचालन कि अन्ततोगत्वा जीवित प्राणियों का विकास हो सके, असम्भव है। अंतिम सत्य यही निकलता है कि हमें अध्यात्मवाद के आधार पर विकासवाद को परिभाषित कर मनुष्य की सर्वोत्कृष्टता पर ही मोहर लगानी होगी। मनुष्य श्रेष्ठ था, अंदर से आज भी है, वही उसे बनना भी होगा। यही अध्यात्म की विकास यात्रा है।
युद्ध के बाद ज्यूरिख में भयंकर अकाल पड़ा, साथ ही महामारियाँ भी फूट पड़ीं। इस आग से जूझने के लिए स्वयंसेवकों की जरूरत पड़ी।
ज्यूरिख के समाजसेवी संगठन ने पीड़ितों की सहायता के लिए एक सेवा-समिति गठित की। स्वयं-सेवकों के लिए मार्मिक अपील छपी।
इस पुकार को सुनकर एक नवविवाहित दम्पत्ति सामने आये। पति का नाम था सूसो, पत्नी का सेरलाओं। वे सेवा का आवेदन लेकर आये।
संगठनकर्त्ताओं ने कहा-यदि सच्चे अर्थों में सेवा करनी है, तो आप लोग सन्तानोत्पादन न करने का व्रत लें, अन्यथा उस झंझट के कारण आप सच्चे मन और समय तक लगनपूर्वक काम न कर सकेंगे। विचार कर दूसरे दिन आने के लिए उन्हें कहा गया।
पति-पत्नी दूसरे दिन नियत समय पर सेवाधिकारी के पास पहुँचे। उनने बाइबिल हाथ में लेकर आजीवन बच्चे न जनने की और सदा सेवा धर्म में लगे रहने की प्रतिज्ञा की।
संगठनकर्त्ताओं की आँखों में आँसू छलक आये। उन्होंने उस सच्चे सेवाव्रती दम्पत्ति को हृदय खोलकर आशीर्वाद दिया और काम में जुटा दिया। उनके आदर्श ने अनेकों को प्रेरणा दी और वैसे ही व्रतधारी स्वयं-सेवक एक हजार की संख्या में भर्ती हो गये।
विपत्ति से जूझने में इन सबने मोर्चा सम्हाला और लाखों के प्राण बचायें। सूसो दम्पत्ति के अग्रिम कदम उस क्षेत्र में अभी भी भावनापूर्वक स्मरण किये जाते हैं। उन दिनों भी उन्हें धर्मप्राणों से बढ़कर आदर मिला था। समाज को समर्पित ऐसे अग्रदूत विरले ही होते हैं, पर इतिहास में वे अमर बन जाते हैं।
रंगों की मोहक छटा का जादू मन को अनायास मोहित कर लेता है। अपने पसंदीदा रंग को देखते ही हम बरबस आकर्षित हो जाते हैं। लेकिन जिस रंग को हम पसंद करते हैं, कोई जरूरी नहीं उसे दूसरा भी पसन्द करे। रंगों की यह पसंदगी-नापसंदगी हर एक की अपनी मानसिक संरचना पर निर्भर है। यदि मन-पसंद रंगों की पसंदगी के आधार पर हम अपने और औरों के व्यक्तित्व के भेद को सही-सही जान सकते हैं। रंगों की पहचान प्रकाश तरंगों के छोटे-बड़े होने की वजह से होती है। तरंगों की आवृत्ति के आधार पर ही रंग का निर्माण होता है। मन से उत्पन्न विचारों की भी अपनी आवृत्ति होती है। यह आवृत्ति अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होती है। अतः मन का भी अपना रंग होता है। जिसे जाँच-परखकर उसकी आदतों, व्यवहारों का अध्ययन आसानी से किया जा सकता है।
मूलतः रंग तीन प्रकार के होते हैं, लाल, नीला और हरा। लाल रंग से प्रभावित होने वाला मन वास्तविक तथ्यों पर टिका रहता है। नीला रंग वास्तविकता का निर्धारण करता है। हरे रंग से आकर्षित मन एक नई दिशा में अनुसंधान करने के लिए हमेशा लालायित रहता है। इन रंगों का आकर्षण भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में अलग प्रकार का होता है। मनोविज्ञानी इन्हीं रंगों का विश्लेषण करके व्यक्ति के चिन्तन, आचरण एवं आदतों के बारे में सटीक विवेचन कर देते हैं। इसकी अगर समुचित जानकारी हो सके तो जीवन के कई अदृश्य पहलुओं को जाना जा सकता है।
मनोविज्ञानी राबर्ट शूलर के ग्रन्थ ‘माइन्ड एण्ड इट्स नेचर’ के अनुसार एक समान मनोभाव वाले व्यक्तियों की रुचि समान होती है एवं इनके पसंद के रंगों में भी समानता होती है। मनोविज्ञानी शूलर की शोध के अनुसार-(1) हरा रंग नूतन मार्गदर्शन को व्यक्त करता है। (2) सही जानकारी एवं स्पष्ट तथ्य लाल रंग से प्रकट होता है। (3) निर्धारणों का टूटना नीले रंग से व्यक्त होता है।
मानव मन के विशेषज्ञ जेरी रोड्स एवं स्यूथेम ने इस विषय पर काफी प्रभावशाली विवेचन अपनी पुस्तक ‘द कलर्स ऑफ योर माइन्ड’ में किया है। उनके अनुसार इन रंगों के अलावा भी हार्ड एवं साफ्ट रंग की प्रवृत्ति बेहद संवेदनशील होती है। इसके अंतर्गत संगीतकार, पेन्टर, एक्टर, कवि आदि आते हैं।
हार्ड मन का लाल रंग तथ्यों की जानकारी देता है, नीला रंग विचारों को प्रभावित करता है तथा कई योजना में विश्वास दिलाने का कार्य रंग करता है। साफ्ट मन का नीला रंग अपने विचारों की अभिव्यक्ति में सक्षम होता है। हरे रंग में आन्तरिक कल्पना का अमोचन एवं लाल रंग तथ्य पूर्ण सत्य को प्रकाशित करता है। समाज में दोनों ही प्रकार के व्यक्तियों का सम्मिश्रण होता है।
मनीषी अन्यथोनी स्टोरर ‘कलर्स एण्ड इटस् मैसेज’ में कहते हैं कि हरे रंग में अन्वेषण-आविष्कार सम्बन्धी विचार प्रबल होता है। यह ताल-मेल भी बिठाता है। लाल व नीले रंग में प्रेरणा भी भरता है। कठिन से कठिन समस्या का निदान पल भर में निकाल लेता है। चुनौतियों को स्वीकारते हुए आशावादी दृष्टिकोण को बनाए रखता है। ऐसे व्यक्ति हाजिर-जवाबी होते हैं। हास्य रस के लेखक प्रायः इसी श्रेणी में आते हैं। बी. बी. सी. सेवा के प्रसिद्ध हास्यरस लेखक फ्रेंक माइनर तथा डेनिस नार्डन इसी कारण प्रख्यात हुए। उनका पसंदीदा रंग हरा ही था। इस प्रकार की प्रकृति को ईश्वरीय वरदान कहा जाता है। आध्यात्मिक जीवन का रहस्य इन्हीं रंगों से मिला-जुला माना जा सकता है। पश्चिम जगत इस रंग का आज तक सही विश्लेषण नहीं कर पाया है। तनाव एवं मनोरोग को दूर कर सदैव प्रसन्नता की आभा से चमकते रहने वाला यह रंग अनोखा एवं अद्भुत है।
हरे रंग को पसन्द करने वालों की प्रवृत्ति प्रायः अन्तर्मुखी होती है। यह लाल (तथ्य परक) तथा नीले (तर्क परक) रंग को बखूबी नियंत्रित करता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि कल्पनाओं की अभिव्यक्ति को यथार्थ के धरातल पर चित्रण कर लेता है। गहरे रंग को पसन्द करने वाले लोग प्रायः अति भावुक होते हैं। अतः इन्हें स्वनियन्त्रण रखना आवश्यक है। हल्के हरे रंग से आकर्षित व्यक्ति हमेशा अवसर चूकते रहते हैं। हरा रंग नयी योजना, दिशाओं का अन्वेषण करता रहता है, परन्तु इसमें हल्कापन यानि कि कमी आ जाने से सारे आसार धूमिल हो जाते हैं। लेकिन इन्हें अनावश्यक एवं अप्रिय घटनाओं से बचने के लिए लाल तथा नीले रंग से सामंजस्य बिठाए रहना चाहिए,
लाल रंग प्रकृति हरे रंग को नयी योजना का बोध कराता है तथा नीले रंग को यथार्थ का ज्ञान देकर निर्णय की सुविधा पहुँचाती है। लाल रंग हरे एवं नीले रंगों के बीच का सेतु है। प्रबल भावनाओं की स्थिति में सिर्फ लाल रंग ही सही निर्णय लेने की क्षमता रखता है। इसीलिए यह प्रामाणिक व वास्तविक तथ्य को सामने ला पाता है। गहरे लाल रंग वाले व्यक्तियों की पोशाक साफ-सुथरी, चमचमाते जूते, कपड़ों का चयन मौसम के अनुकूल होता है। बाहर से देखने पर इनका जीवन बड़ा नियमित व संयमित होता है। जबकि ये ऐसे होते नहीं हैं। हल्के लाल रंग वाले अन्दर बाहर से एक होते हैं। इन्हें संयमित कहा जा सकता है। ये संवेदनशील भी हो सकते हैं।
गहरे लाल रंग से प्रभावित व्यक्ति वास्तविक तथ्य तक पहुँचना चाहते हैं। परन्तु सदैव सच्चाई का पता नहीं लगा पाते। यही कारण है कि इनके जीवन में तनाव, कुण्ठा तथा असंतोष का भाव जन्म लेता है। ये पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं। हल्के लाल रंग में याददाश्त की कमी होती है। स्वयं की कमी को ये स्वीकारते नहीं हैं पर यह रंग ज्यादा आक्रामक नहीं होता, क्योंकि इन्हें भूलने की आदत होती है।
यूँ देखें तो जीवन की सुव्यवस्था में लाल रंग का महत्वपूर्ण योगदान है। यह प्रशासनिक, व्यापारी, एकाडण्ट्स के साथ-साथ साहित्य, पत्रकारिता आदि की व्यवस्था भी जुटाता है। यह रंग जीवन में संवेगों के संचार का कार्य करता है, साथ ही शारीरिक तथा भौतिक संबा की अनुभूति भी कराता है। दृश्य, श्रवण, स्वाद, स्पर्श गंध, पीड़ा आदि बाह्य उद्दीपन इसी का परिणाम है। कभी-कभी ये इन्ट्रोस्पेक्शन के रूप में जज, वकील, पुलिस, डाक्टर आदि के पेचीदे प्रकरण में समाधान के सूत्र ले आता है। चूँकि यह भौतिक संबा का रंग है, इसलिए चेहरे पर उठने-गिरने वाले भावों को पढ़ पाने की क्षमता इसमें अंतर्निहित होती है।
इस प्रकार अनुभूति को और भी क्रियात्मक और ठोस रूप में जानने का प्रयास हल्के रंग द्वारा सम्भव बन पड़ता है। इसके अर्न्तत भविष्यवाणियाँ भी प्रकाशित होती हैं। एच. जी. वेल्स ने शताब्दी पूर्व अपने लेख में लन्दन के व्यापारियों के ऑफिसों के ध्वस्त होने का वर्णन किया था। अभी कुछ समय पहले यह घटना सत्य सिद्ध हुई। अनेकों उपन्यासों एवं काल्पनिक वैज्ञानिक कहानियों में इसी प्रकार कुछ मात्रा में अंतर्दर्शन का बोध प्राप्त होता है। गहरे रंग में भी इसी प्रकार का बोध होता है।
नीले रंग से प्रभावित मन समस्याओं का समाधान बुद्धिसंगत ढंग से करता है। किसी भी जटिल सवाल का युक्तिपूर्ण हल निकालना इनकी विशेषता है। गहरा नीला रंग स्पष्टतया तार्किकता का परिचायक है। इस प्रकार के लोग अपनी कही हुई बातों को कभी वापस नहीं लेते। व्यापारिक क्षेत्रों में यह नुकसानदायक है। इसके विपरीत हलके नीले रंग की वृत्ति कार्यों की चुनौती को स्वीकारती है। जिससे इन्हें सफलता भी मिलती है।
महर्षि अरविन्द के पत्रों के द्वितीय भाग में रंगों का विस्तार से वर्णन हुआ है। इनके अनुसार रंगों के आध्यात्मिक अर्थ का उल्लेख करना आसान नहीं है। रंग के स्थान, मिश्रण, गुण और मात्रा के अनुरूप इसका अर्थ बदल जाता है। सत्ता का रंग नहीं होता। मन का अपना लाक्षणिक रंग है पीला, चैत्य का गुलाबी तथा प्राण का बैंगनी। अन्य रंग भी इसी प्रकार अपनी-अपनी गतिविधियों का सृजन कर सकते हैं। प्राण में हरा और गहरे लाल तथा बैंगनी रंग का संचार हो सकता है।
गहरा नीला रंग उच्चतर आध्यात्मिक सम्पन्न मन का द्योतक है। हलका नीला प्रायः अलौकिक मन का प्रकाश है। हालाँकि श्री अरविन्द ने इन रंगों का उल्लेख पसंदगी-नापसंदगी के रूप में किया है। लेकिन इन रंगों का मूल्य एवं महत्व बाहरी पसंदीदा रंगों से कहीं ज्यादा है। क्योंकि ये हमारी मानसिक अवस्था का अपेक्षाकृत अधिक गहराई से विवेचन करते हैं। योगीराज अरविन्द के अनुसार चाँदनी जैसा सफेद नीला कृष्ण चेतना का आभास देता है। कृष्ण का रंग हीरे जैसा फीका नीला, लवेण्डर जैसा नीला तथा गहरा नीला होता है। सभी नीले रंग कृष्ण भगवान के द्योतक नहीं है।
लवेण्डर जैसा नीला सम्बोन्धि-मन में कृष्ण का प्रकाश है। बैंगनी भागवत कृपा, शुभेच्छा या प्रकाश है। इस रंग का अंतर्दर्शन आध्यात्मिक चेतना को शिखरों से पृथ्वी तक प्रवाहित होना दर्शाता है। बैंगनी कृष्ण की कृपा का भी रंग है। यह कृष्ण के संरक्षण की प्रभा है। नीला उसका अपना विशेष और महत्वपूर्ण रंग है।
लाल रंग भौतिक तत्व का रंग है। रक्त आभा वाला पुरुष भौतिक सत्ता की शक्ति सम्पन्न हो सकता है। गहरा लाल व्यि प्रेम है। सुनहरा उच्चतर सत्य को प्रकाशित करता है। सुनहरा रंग महाकाली की शक्ति का द्योतक है। जो शरीर में कार्य करने वाली सबसे सबल शक्ति है। सुनहरे लाल रंग में रूपांतर की प्रबल शक्ति भरी होती है। नारंगी रंग को अतिमानस का रंग होती है। नारंगी रंग को अतिमानस का रंग कहते हैं। यह भौतिक चेतना और सत्ता में प्रकट हुआ सच्चा प्रकाश है। इसे गुह्य ज्ञान या अनुभूति का रंग भी माना जाता है।
सूर्य का रंग सत्य का रंग है। वह जब प्राण में मिल जाता है तब मिश्रित रंग हो जाता है। यहाँ यह सुनहरा और हरा है। भौतिक स्तर पर आकर यह रंग सुनहरा लाल या मन में सुनहरा पीला बन जाता है। अतिमानस सूर्य से प्रकाशित होकर भिन्न-भिन्न स्तरों से गुजरते हुए परिवर्तित होता जाता है। पीला चिन्तनशील मन है। उसकी आभाएँ मानसिक प्रकाश की विभिन्न तीव्रताओं को सूचित करती है। चैत्य प्रकाश का रंग उसके द्वारा प्रकट होने वाली वस्तुओं के अनुरूप होता है। चैत्य प्रेम गुलाबी या पाटल होता है। चैत्य पवित्रता श्वेत होती है। लालिमा युक्त गुलाबी रंग का गुलाब चैत्य प्रेम या समर्पण तथा सफेद गुलाबी रंग शुद्ध आध्यात्मिक समर्पण को दर्शाता है। गुलाबी रंग ईश्वरीय प्रेम का रंग है।
अंतर्दर्शन में श्वेत रंग का प्रकाश उस विशुद्ध सचेतन शक्ति का रंग है जिससे सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं। यह परिशोधन की शक्ति को निर्देश करता है और दिव्य चेतन के आगमन की सूचना देता है। बैंगनी सहानुभूति, एकता एवं वैश्व करुणा का प्रतीक है। हरे रंग में शोधन, सामंजस्य एवं रोग-निवारण की शक्ति होती है। हरा रंग प्रकरण के अनुसार विविध तथ्यों का प्रतीक हो सकता है। भाव प्रधान प्राण में यह भावमय उदारता के विशिष्ट रूप का रंग है। प्राणमय भौतिक स्तर में इसका अर्थ स्वस्थ शक्ति होता है। यह कर्म और क्रिया की प्राणिक ऊर्जा है। इसी तरह जामनी रंग प्राणिक शक्ति का रंग है और किरमिजी रंग साधारणतया भौतिक शक्ति का। इसे प्राण एवं शरीर में प्रेम का प्रकाश भी कह सकते हैं।
रंग बाहरी हो या भीतरी, हमारी बाहरी पसन्द हो या फिर अंतर्दर्शन में मिलने वाली झलक, स्पष्टतया हमारे मानसिक स्तर एवं चेतना की स्थिति का अहसास कराती है। इस आकलन के पश्चात् हम अपने व्यक्तित्व को और अधिक निखार सकते हैं। मन को और अधिक आभासम्पन्न बना सकते हैं। नजरों के बदलते ही नजारे बदलते देर नहीं। एक बार दृष्टिकोण सुधरा-तो सारी सृष्टि रंगमय एवं मनोरम आभाओं से युक्त दिखेगी। शान्ति, प्रेम एवं सद्भावना अपने आप ही इन्हीं रंगों में समाहित लगने लगेंगे।
राणा हम्मीर डूबते सूरज की लालिमा को गवाक्ष से एकटक निहार रहे थे। क्षण-क्षण बदलती किरणों के संग महाराज के मन की विचार-लहरें भी प्रतिक्षण बदल रहीं थी, वह अपने ही ख्यालों में मन्द बयार के साथ झूल रहे थे। यदा-कदा उनके उन्नत ललाट पर चिन्ता की रेखाएँ उभर उठतीं। न जाने कितनी देर तक वे अपलक शून्य की ओर निहारते रहे। अचानक कोई आहट पाकर वे पलटे तो पाया कि महल की परिचारिका दबे पाँव आकर दीप प्रज्वलित करने को तत्पर हैं अस्ताचलगामी भगवान सूर्यदेव का रथ न जाने कब का क्षितिज से दूर जा चुका है। हल्की उजास ही बाकी बची थी।
दरवाजे की हल्की आहट हुई। उन्होंने देखा कि एक राज कर्मचारी हाथ बाँधे खड़ा है। महाराज ने उसे संकेत से बोलने के लिए कहा। अनुमति पाकर वह कहने लगा, “मुहम्मद शाह, आपके सम्मुख पेश होने की इजाजत चाहते हैं।” महाराज के चेहरे पर भावों का एक गहरा उतार-चढ़ाव आया और उन्होंने हलकी-सी हुँकारी भरकर पेशी की रजामन्दी दे दी।
क्षण मात्र में ही मुहम्मद शाह ने कक्ष में दाखिल होकर जुहार की। क्षीण स्मित के साथ उन्होंने उसे सामने रखे आसन पर बैठने का संकेत किया। कक्ष के दीपाधारों पर अब तक अनेकों दीप जगमगाने लगे थे। गवाओं से घना अँधेरा अन्दर आने के लिए आतुर था। मुहम्मद शाह था तो शरणागत, लेकिन राणा हम्मीर ने उसे शाही मेहमान का दर्जा दिया हुआ था। इस समय वह कुछ कहने की बाट जोह रहा था। कुछ देर चुप रहकर उसने अपनी बात शुरू की, “महाराणा, गुस्ताखी माफ हो, कुछ अर्ज करने की इजाजत चाहता हूँ।”
तेरहवीं सदी के उत्तरार्द्ध का समय अलाउद्दीन के अत्याचारों से आक्रान्त था। उसने अपने दहशतअंगेज कारनामों से सभी को झुका रखा था। लेकिन ऐसे में भी रणथम्भोर का यह दुर्ग अपना मस्तक ऊपर उठाए खड़ा था। रण और थम्भोर दो पहाड़ियों के सिरमौर बने इस दुर्ग में राणा हम्मीर की वीरता की आभा प्रदीप्त थी।
इतिहासकारों के अनेकों दस्तावेज आज भी इस दुर्ग के अभिमानी वीरों के किस्में कहते हैं। ऐतिहासिक अनुमान के अनुसार इसका निर्माण आठवी शती के आस-पास हुआ। चौहानों के अनेक वंशज वहाँ राज करते रहे और समय-समय पर आक्रान्ताओं से लोहा लेते रहे। कभी हार तो जीत, यहाँ की प्राचीरों ने देखी। किन्तु यह दुर्ग इतिहास में अभेद्य ही माना जाता रहा। दिल्ली के शहंशाह हर हमेशा इसे जीतने की तदबीरें भिड़ाते रहे। लम्बे अरसे तक हार-जीत से लुका-छिपी खेलता यह दुर्ग तेरहवीं सदी के अन्तिम पड़ाव पर परम यशस्वी राव हम्मीर देव के अधिकार में था। राव जयसिंह का यह होनहार सपूत समूचे हिन्दुत्व की शान बना हुआ था। रणकुशल योद्धा होने के साथ उसने दैवी भावनाओं से ओत-प्रोत हृदय भी पाया था। अपनी राजनैतिक कुशलता से उसने चौहान साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार मालवा से माँडलगढ़, उज्जैन व धार तक किया।
दिल्ली के तख्त पर इस समय अलाउद्दीन खिलजी की हुकूमत थी और उसकी नजर चौहानों के गढ़ रणथम्भोर के किले को हासिल कर पाना इतना आसान नहीं था और न ही आसान था राणा हम्मीर के हठीले हौंसले को तोड़ना। हठी हम्मीर अब तक कोई युद्ध हारे ही न थे। खिलजी को यह सब मालूम था। मगर लोभ ने उसे अन्धा बना दिया और इसी वजह से बार-बार हार का मुँह देखने के बावजूद भी वह इन दिनों दुर्ग पर घेरा डाले पड़ा था। दुर्ग के सामने स्थित पहाड़ी पर उसका पड़ाव था। दस सालों की लम्बी लड़ाई में खिलजी तब तक हारता ही आया था। लेकिन अबकी बार रसद और गोला-बारूद की कमी की खबरें उस तक पहुँच चुकी थीं। खिलजी राजपूती पराक्रम से अनजान नहीं था। जौहार और साका के रचाने के रोमाँचक हौंसलों से अभी भी उसका दिल दहल जाता था। लेकिन फिर भी अपने लोभ से वह उत्साहित था।
दिल्ली दरबार से अपमानित किया हुआ मुहम्मद शाह इस समय राव हम्मीर की शरण में था। खिलजी के प्रति अपनी भरपूर सेवाओं के बदले उसे तिरस्कार ही मिला था। रणकौशल में मँजा हुआ मुहम्मद शाह हम्मीर की इनसानियत के सामने भाव-विगलित था।
लगातार चलते युद्ध ने दुर्गवासियों को थका डाला था। इस बार खिलजी को घेरा डाले दस महीने से ऊपर बीत चुके थे। मुहम्मद शाह को दुर्ग की स्थिति और महाराज की चिन्ता का पूरा अहसास था। इसी चिन्ता से महाराज का कुछ ध्यान बँटाने की तरकीब पेश करने वह आज महाराजा के कक्ष में हाजिर हुआ था। मन्द मुस्कान लिए हम्मीर देव उसकी ओर देख रहे थे। वह कहे जा रहा था, “गुस्ताखी माफ हो, हुजूर, क्या यह खादिम जान सकता है कि जनाब ने मनोरंजन की महफिलों से क्यों मुँह मोड़ रखा है?”
हम्मीर देव कुछ गम्भीर स्वर में बोले,”कुछ अच्छा नहीं लग रहा है, मुहम्मद।”
“हुजूरे आला, आपकी सल्तनत में तो ऐसे नायाब फनकार हैं जिनकी चमक यहाँ से लेकर दिल्ली दरबार तक पहुँची हुई हैं।”
महाराज ने जिज्ञासापूर्वक उसकी ओर देखा, जिसके उत्तर में उसने मालवा की धारा नर्तकी का जिक्र करते हुए अपनी योजना सामने रखी। योजना के अनुसार नर्तकी दोनों पहाड़ियों के दो छोरों के बीच बँधी रस्सी पर नाचते हुए खिलजी के पड़ाव स्थिति का ब्योरा देगी। जिससे आक्रमण में आसानी हो सकेगी।
“लेकिन यह तो काफी जोखिम भरा काम है। क्या धारा इसके लिए तैयार हो जाएगी?”
“हुजूर खुद ही उससे पूछ लें।”
योजना की बारीकियों को समझते हुए महाराज ने मनोरंजन के इस अद्भुत आयोजन की स्वीकृति दे दी।
मालवा की नट जाति की थी धारा। भगवान ने उसके पैरों में ही ही अद्भुत लास्य ही नहीं दिया था वरन् उसके पोर-पोर में बिजली भर दी थी। उसके ‘डोरी नृत्य’ की चर्चा पूरे हिन्दुस्तान में फैल चुकी थी। चम्पई रंग पर भँवरे-सी मँडराती काली आँखें। सुतवाँ नाक व गुलाब की कनियों से ओंठ। सुगठित देह और जंघाओं को छूती, बलखाती नागिन-सी चोटी-देखने वालों को सम्मोहित कर देती थी। नृत्य की उसकी मुद्राएँ किसी रंगमंच में नहीं हवाओं के अधर में ही सम्पन्न होती थी पहाड़ की एक चोटी से दूसरी चोटी पर वह डोर पर ठुमकते हुए यूँ आती थी जैसे कोई हंसिनी तैर रही हो।
नृत्य का आयोजन दिवस के तीसरे प्रहर के पश्चात् रखा गया था। सूर्य के रथ चक्र पल-पल पश्चिम की ओर सरकने लगे थे। तभी बुर्ज की चौखट पर धारा नटनी किसी देवलोक की अप्सरा की तरह प्रकट हुई। आज उसका शृंगार असाधारण था। नख से शिख तक आभूषणों की आभा विकीर्ण हो रही थी। अपनी बलखाती चोटी को उसने खुला ही छोड़ दिया था। सतरंगी चूनर पश्चिम की ओर बढ़ रहे सूर्य देव की रश्मियों से जगर-मगर हो रही थी। नीले आसमानी घाघरा-चोली में राजी वह धरती की कोई नारी नहीं, स्वर्गलोक की अलौकिक अप्सरा लग रही थी। न जाने कब से उसके हृदय में चाह थी कि समस्त प्रदेश के लोकनायक राव हम्मीर के समक्ष कला प्रदर्शन का मौका मिले।
लेकिन हम्मीर की रुचि राग-रंग में न होने के कारण वह अब तक वंचित ही रही थी। आज उसे मौका मिला था, एक खास जिम्मेदारी के साथ। राणा ने उसे जब जिम्मेदारी के बारे में बताया, तो उसने हर्षित होते हुए कहा, “मैं भी राज्य की नागरिक हूँ, देश की रक्षा के लिए मैं अपना फर्ज खुशी से निभाऊँगी।” इस स्वीकारोक्ति के साथ महफिल सज चुकी थी। नगाड़े बज उठने को आकुल थे। धारा बुर्ज पर हम्मीर देव के सामने झुकी हुई उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रही थी। खचाखच भरे महल के प्राँगण, अटारियों, झरोखों से उत्सुक आँखें धारा पर लगी थीं। सन्नाटा छाया हुआ था। महाराज ने मुस्कुरा कर धारा का अभिवादन कबूल किया और आयोजन प्रारम्भ करने का आदेश दिया।
क्षणमात्र में नगाड़ों की गूँज से समस्त रणथम्भोर लगा। हवाओं में धारा की सुरीली तान गूँज उठी। उसके साथी नट ताल दे-दे कर तान में तान मिलाने लगे। समूचा वातावरण धारा के नृत्य के साथ थिरक उठा। जनसमूह साँस रोके, सम्मोहित-सा इस दृश्य को देख रहा था। ऐसे में धारा डोरी पर अपने आसमानी सफर को तरंगित कर रही थी।
वह नृत्य करते-करते डोरी के मध्य तक आ पहुँची थी। पीछे की पश्चिमी पहाड़ी पर सूर्यास्त होने में अभी कुछ देर थी। अद्भुत दृश्य था। ऐसा लग रहा था, मानो नर्तकी सूर्य किरणों पर ही नाच रही हो। उसके अद्भुत लयकारी पर प्रकृति भी थाप दे रही थी। नीचे घाटी में चलती तेज हवाएँ थमकर आज का नजारा देखने को उतावली थीं। किसी को याद नहीं वह कब दूसरे सिरे तक पहुँच गयी।
बारी अब उसके लौटने की थी। नृत्य करते हुए उसकी नजर खिलजी की सेना के पड़ावों की स्थिति पर थी। धारा का पद-संचालन खिलजी की सेना में रोमाँच उत्पन्न कर रहा था। धारा के तलवे बार-बार खिलजी की आँखों के सामने कौंध जाते। उसे यह सब किसी जहर बुझे तीर की तरह लग रहा था। खेमे में हुक्म जारी कर दिया गया कि जो धारा को मारेगा, वह मुँह माँगा इनाम पायेगा। किले में जाकर धारा को मार पाना संभव नहीं था। अतः यही सबसे उत्तम मौका था। लेकिन ऐसा निशानेबाज था कहाँ?
खिलजी के खास सिपहसालार याकूब खाँ ने गुजारिश की कि यह काम केवल एक शख्स अंजाम दे सकता है और वह है ओदन सी। सुल्तान ने उसे फौरन पेश करने का हुक्म दिया। अब तक डोरी पर नाचते-नाचते धारा दोनों पहाड़ियों के मध्य में आ पहुँची थी। उसका हर कदम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहा था। किन्तु उसे अपने दुर्भाग्य का आभास न था। शिकारी निशाना साध चुका था। उसकी ख्याति से धारा भी भली’-प्रकार परिचित थी।
लेकिन उसे भी आज अपने देश व धर्म का कर्ज चुकाना था। बर्बर और नृशंस खिलजी की सारी की सारी ब्यूह रचना को अब तक वह भली-प्रकार देख-समझ चुकी थी। राणा हम्मीर को सारी सूचनाएँ दिए बगैर वह मरना नहीं चाहती थी। ओदन सी ने निशाना साधते हुए अपना तीर कमान से छोड़ दिया। धारा डोरी पर लहराई और तीर उसकी गर्दन के पास से होकर निकल गया। देखने वाले दर्शकगण धारा की जान की खैर मना रहे थे।
अब क्या होगा? इस सवाल का जवाब कोई खोज पाता, तब तक ओदनी सी का दूसरा तीर छूट चुका था। इस बार तीर के धँसते ही उसके नृत्य में और तेजी आ गयी। ओदनी सी तीर छोड़े जा रहा था। धारा किले की ओर कदम बढ़ाती जा रही थी। तभी एक तीर ने उसकी पीठ को छेद दिया। लेकिन अब वह किले के अन्दर प्रवेश कर चुकी थी। दर्शकों का समूह साँस रोके। उसके नृत्य को ही नहीं, जिजीविषा और राष्ट्रप्रेम को देख रहा था।
महाराज के सिंहासन के पास पहुँचते-पहुँचते वह डोरी से गिर पड़ी। अनेकों हाथों ने उसे लपक लिया। घाव गहरे थे, बचने की आशा कम ही नजर आ रही थी। उसे महाराज को खिलजी की सेना का पूरा विवरण देने की जल्दी थी। महाराज के बुलाए वैद्य को उसने इशारे से रोका और अटकते हुए वह सारा विवरण सुनाने लगी। सारी बातें सुनाकर वह हिचकियों के साथ बोली-”महाराज! मैंने अपना फर्ज पूरा किया। खिलजी की बर्बरता को रोकने की जिम्मेदारी अब आप पर है।” अन्तिम शब्द कहते हुए उसकी गर्दन एक ओर लुढ़क गई।
सबके सब स्तब्ध थे। ऐसी नायाब कलाकार का ऐसा करुण अन्त देखकर प्रत्येक हृदय चीत्कार उठा। सभी के सिर उसके महान बलिदान के सामने झुक गये। राणा हम्मीर देव ने धारा की सूचनाओं के आधार पर खिलजी की फौज पर दो तरफ से आक्रमण किया। इस अचानक आक्रमण को खिलजी की सेना झेल न सकी। उसके पैर उखड़ गए। राणा हम्मीर ने विजयोपरान्त घोषणा की-”आज की यह विजय धारा के बलिदान की विजय है। जब तक देश में बलिदान की परम्परा कायम है। यहाँ मानवता की मर्यादाएँ भी अक्षुण्य रहेंगी।”
जहाँ उपदेश अधिक दिए जाते हैं वहाँ गम्भीरता कम होती है। जहाँ गम्भीरता होती है वहाँ बात कम और काम अधिक का वातावरण रहता है।
खोज-तनाव-उद्विग्नता हमारे वर्तमान जीवन की परिभाषा बन गयी है। रोजमर्रा की जिन्दगी में हैरान, परेशान होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे मढ़ते रहते हैं और यह पूरी तरह से बिसरा देते हैं कि इसके लिए कहीं हम खुद भी जिम्मेदार हो सकते हैं। जीवन के प्रति हमारा अपना नजरिया-आस-पास के लोगों के प्रति अपना स्वयं का दृष्टिकोण भी जिम्मेदार हो सकता है। मनोवैज्ञानिकों की सलाह मानें तो सबसे पहले हमें अपनी खीज-तनाव के कारण खुद में खोजने चाहिए। आस-पास के लोगों, परिस्थितियों के प्रति अपने नजरिए की छान-बीन करनी चाहिए। ऐसा कर सके तो पता चलेगा कि सारी उद्विग्नता का कारण हमारी मानसिकता का बाहरी वातावरण से संगीत न बैठना है और इसके लिए वातावरण की अपेक्षा हम खुद जिम्मेदार हैं।
एलन वाट्स ‘प्रेग्रासिंग आँफ द माइन्ड’ में कहते हैं कि वातावरण जड़ है, सोच-विचार रहित है, जबकि हम स्वयं सचेतन हैं। अपने सोचने-विचारने के तौर-तरीकों में फेर-बदल करना हमारे लिए एक आसान बात है। थोड़े से प्रयास के साथ ही हम वातावरण से समस्वरता स्थापित कर सकते हैं। इसी तरह आस-पास के लोगों के व्यवहार पर टीका-टिप्पणी करना, उन्हें अनर्गल बकते-झकते रहना, रह-रहकर उन पर दोषारोपण करना, समस्या का कोई सार्थक समाधान नहीं है। क्योंकि सभी-अपनी प्रवृत्तियों एवं संस्कारों के वशीभूत हैं, फिर औरों पर अपना क्या वश? ऐसे में उन पर खीजने, झल्लाने से हमारा तनाव कम होने की बजाय बढ़ेगा ही, तब क्यों न हम समस्याओं के समाधान अपने अन्दर खोजें।
एक सत्य और है-बाहरी माहौल को प्रभावित करने वाले घटकों की संख्या भी काफी है। चाह कर भी सब पर एक साथ काबू पा सकना हमारे वश में नहीं है। बहुत कोशिशों के बावजूद हम कुछ हद तक ही परिस्थितियों को बदल सकते हैं। हाँ! अपने आन्तरिक दृष्टिकोण में परिवर्तन करना अपना बिल्कुल निजी मामला है। इसके फेर-बदल में हम पूरी तरह स्वतन्त्र ही नहीं सक्षम भी हैं। स्वस्थ एवं सुखी जीवन का यह एकमात्र कारगर उपाय है। जब हम अपने परिकर के साथ सहअस्तित्व की अनुभूति के साथ रहते हैं तो तनाव अपने आप दूर हो जाता है। लेकिन निषेधात्मक चिन्तन और मन में संचित घृणा, द्वेष, ईर्ष्या और भय के संस्कारों के कारण वातावरण से तालमेल बिठाना थोड़ा मुश्किल जरूर है।
इसके लिए आवश्यक है कि मन से बुरे विचारों का कूड़ा-कचरा निकाल फेंका जाय। लेकिन होता इसका उल्टा है। हममें से प्रायः प्रत्येक व्यक्ति सफलता पाने की तीव्र तृष्णा से ग्रसित है। हर वक्त उसे यह भय सताता रहता है कि कहीं वह असफल न हो जाय। जिससे उसे अपने परिवार तथा परिचितों के बीच शर्मिन्दा न होना पड़े। उसके इस भय को अभिभावक और शिक्षक मिलकर बढ़ा देते हैं। अपनी अस्मिता से जुड़ा यह सवाल इस कदर उसके मन पर छा जाता है कि वह लगातार भर और चिन्ता से ग्रसित रहने लगता है। जीवन का हर कृत्य उसके लिए आपातकालीन कार्य बन जाता है और वह लगातार तनाव में रहने लगता है।
ऐसा नहीं हैं कि सफलता के लिए प्रयास कना कोई बुरी बात है। लेकिन यदि अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन किया जा सके तो इसे कर्तव्य भावना से तनाव रहित होकर भी किया जा सकता है। तनाव मुक्त होकर किए गए प्रयास में सफल होने की उम्मीदें भी अधिक होंगी। यदि इसके साथ देशहित और लोकहित की उदात्त भावनाएँ जोड़ी सकें तो मन हर-हमेशा उत्साह एवं प्रफुल्लता से भरा रहेगा। हमारे किए गए काम के सौंदर्य में भी भारी निखर आ जाएगा। इस प्रकार हमारी पूर्व मान्यताएँ जिन्हें साइकोलॉजिस्ट मेण्टल प्रोग्रामिंग कहते हैं, हमारे जीवन का निर्धारण करती है। गलत एवं निषेधात्मक मेण्टल प्रोग्रामिंग हमारे गलत चिन्तन एवं गलत शिक्षा का परिणाम है।
अब न्यूरोलॉजिस्ट भी मानने लगे हैं कि बचपन से आज तक हमने जो भी कुछ अनुभव किया हैं, माता-पिता, गुरुजनों, दोस्तों, परिचितों से सुना है सबका सब हमारे मस्तिष्क रूपी कम्प्यूटर की स्मृति में मौजूद है। वास्तव में हमारे समस्त क्रिया-कलापों और व्यवहार का निर्धारण इन्हीं के द्वारा होता है। प्रत्येक क्षण हमारा मस्तिष्क बाहर व भीतर से कुछ सन्देश ग्रहण करता रहता है। मस्तिष्क का लिम्बिक सिस्टम इन संदेशों की तुलना संरिब्रल कार्टेक्स की यादों में संचित पूर्व अनुभवों से करता है। यदि ये संदेश उनमें मेल खाते हैं तो स्पाइनलकार्ड के शीर्ष पर स्थित रेटिक्यूलर सिस्टम उसे चेतन स्तर पर प्रतिक्रिया के लिए भेज देता है। निश्चित ही हम इन पूर्व संचित संस्कारों के प्रकाश में एक निश्चित तरीके से बाह्य संदेशों की प्रतिक्रिया करते हैं। अर्थात् जीवन की किसी भी परिस्थिति के लिए हमारा रवैया हमारी पूर्व निर्धारित मनः स्थिति या मेन्टल प्रोग्रामिंग पर निर्भर है। यदि परिस्थिति हमारी मनः स्थिति के अनुकूलन होती है, तो हमें किसी प्रकार का मानसिक तनाव नहीं होता। जबकि वातावरण से प्राप्त संदेश यदि हमारी पूर्व मान्यताओं से मेल नहीं खाते, तब हमारा लिम्बिक सिस्टम तनावपूर्ण प्रतिक्रिया करता है।
सही पूछो तो प्रकृति ने तनाव की प्रक्रिया हमारे संरक्षण के लिए बनायी है। भले ही हम उसका गलत उपयोग करते रहे। सामान्य क्रम में लिम्बिक सिस्टम इसलिए तनाव पैदा करता है ताकि हमारा समस्त शरीर व मन खतरे के प्रति सजग हो जाए और हम कठिन परिस्थिति का सामना कर सके। जैसे कि किसी अंधे मोड़ पर से गुजरते समय अचानक से कोई कार हमारे सामने आ जाए। तब ये लिम्बिक सिस्टम हमारी माँसपेशियों व शरीर के सभी तन्त्रों को ओवर एक्टीपेट कर देता है, ताकि हम तेजी से प्रतिक्रिया व्यक्त कर अपनी रक्षा कर सकें।
ये अति संवेदनशील प्रतिक्रिया जीवन की हर परिस्थिति के लिए हर समय जरूरी नहीं है। केवल आपात स्थिति के लिए है। किन्तु हम अपनी मनोदशा को इतनी भयातुर बना लेते हैं कि हर परिस्थिति को एक खतरे व चुनौती के रूप में देखते हैं और हमेशा घृणा, भय, क्रोध जैसे मनोद्वेगों से ग्रसित रहते हैं। संकुचित, असमंजसपूर्ण और निषेधात्मक मेण्टल प्रोग्रामिंग के कारण हमेशा परिस्थिति से अनावश्यक संघर्ष करते रहते हैं। फलस्वरूप जीवन दुखद और तनावपूर्ण हो जाता है। इसके विपरीत यदि हम अपने नजरिए को विस्तृत, सकारात्मक तथा यथार्थवादी रखें और परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठाने की कोशिश करें, तो आसानी से सन्तुलन और सामंजस्य बैठ जाता है। प्रसन्नता और सफलता भी हासिल होती हैं। जीवन भी अपेक्षाकृत आसान और खुशहाल बन जाता है। इसीलिए महान दार्शनिक ‘मारकुम ओरेलियस’ ने कहा है हमारा जीवन वैसा ही होता है, जैसा हमारे विचार उसे बनाते हैं।
नैपोलियन को गौरव, शक्ति तथा ऐश्वर्य जैसी सभी चीजें प्राप्त थीं। फिर भी उसने सेण्ट हेलना में कहा, मैंने अपने जीवन के छह दिन भी कभी सुखपूर्वक नहीं बिताए। इसके ठीक विपरीत अन्धी, गूँगी तथा बहरी हेलन केलर का कहना था, कि मेरे लिए जीवन अत्यन्त मोहक वस्तु है।
स्पष्ट है कि शान्तिपूर्ण जीवन जीने के लिए अपनी मनः स्थिति में परिवर्तन आवश्यक है। जिसकी पर्याप्त क्षमता ईश्वर ने मनुष्य को प्रदान की है। महाकवि मिल्टन के शब्दों में हमारा मस्तिष्क अपने में ही स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना सकता है। बस सवाल निषेधात्मक एवं विधेयात्मक चिन्तन का है। यह पूरी तरह हम पर कि हम क्या अपनाते हैं।
मनीषी डेल कार्नेगी ने काफी मेहनत के बाद एक पुस्तक लिखी है। इसका नाम उन्होंने रखा है, हाऊ टु स्टाप वरीइंग एण्ड स्टार्ट लिविंग’। इस किताब में उन्होंने अपने पैंतीस वर्ष के अनुभवों को समेटा, संजोया है। इसी में एक जगह लिखा है कि मैं विश्वास पूर्वक कह सकता हूँ कि मनुष्य अपने विचार परिवर्तन द्वारा चिन्ता, भय तथा विभिन्न प्रकार के रोगों का निवारण कर सकता है। यही नहीं वह अपने जीवन को आमूल-चूल बदल सकता है। मैंने हजारों बार ऐसे विलक्षण परिवर्तन अपनी आँखों से देखे हैं।
यूँ भी आज हम और हमारा जीवन जो कुछ भी है, जैसा भी है, अपने बचपन से गढ़े हमारे मानस का अपने बचपन से गढ़े हमारे मानस का प्रतिबिम्ब ही है। जीवन में अब तक जैसा वातावरण व परिस्थिति आयी उसी के अनुरूप हमारी धारणाएँ, विचार व मान्यताएँ बनी है। चूँकि वातावरण एवं परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, इसलिए हमारे मेण्टल प्रोग्रामिंग में भी परिवर्तन होता रहता है अतः यदि हम चाहें तो अपने विवेक, सही दृष्टिकोण, सही विचारों द्वारा इस परिवर्तन को सचेतन बना सकते हैं। अपने मुताबिक दिशा दे सकते हैं। आत्मनिरीक्षण, आत्मविश्लेषण द्वारा अपनी वर्तमान अनुचित धारणाओं को जानकर उन्हें श्रेष्ठ विचारों द्वारा बदल सकते हैं।
इस बारे में जरुरत है तो बस मन में जीवन को बदलने की इच्छा व लगन की। फिर स्वाध्याय, मनन, चिन्तन द्वारा श्रेष्ठ विचारों को जानकर, समझकर उन्हें आत्मसात कर सकते हैं। इसके लिए हर रोज अपनी दिनचर्या शुरू करने से पहले कतिपय श्रेष्ठ वैचारिक सूत्रों का मनन करना चाहिए। यह प्रक्रिया हर कार्य अथवा किसी विशेष कार्य को करने से पहले की जाय तो ओर भी अच्छा। इस क्रम में धीरे-धीरे हमारा दृष्टिकोण उनके अनुरूप ढल जाएगा और वे विचार हमें अन्दर से सहायता करते रहेंगे। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक एमिल कू ने इसे ही ‘काँशियस आटोसजेशन’ का नाम दिया है।
यह वह तरीका है, जिसकी शिक्षा सदियों से हमें महापुरुषों द्वारा दी जारी रही है। जब बुद्ध, विवेकानन्द जैसे महामानव हमें दूसरों के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने को कहते हैं, तब वास्तव में इसके पीछे शान्त, सुखी समुन्नत जीवन जी सकने की ही दृष्टि निहित है, ताकि हमारी चेतना उच्च आयामों की ओर बढ़ सके। विधेयात्मक चिन्तन हमारा व्यक्तित्व टूटने और बिखरने से बचता है।
जब हम किसी व्यक्ति विशेष, समूह विशेष अथवा परिस्थिति विशेष के प्रति द्वेषपूर्ण भारत रखते हैं, तो ऐसी भावनाओं के अंकुरित होते ही, इनका एक व्यापक सिलसिला चल पड़ता है। ऐसे समय में हमारी चेतना विचारों के निचले, ओछे एवं छिछले, उथले आयामों से अपना संपर्क साधती है। यह प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार है जैसे हम अपने रेडियो ट्रांजिस्टर को किसी विशेष प्रसारण केन्द्र से ट्यून करते हैं और परिणाम में वहाँ की स्वर-लहरियाँ हमारे यन्त्र पर बजना शुरू हो जाती है। बस कुछ इसी तरह मानसिक चेतना जब विचारों की घटिया सतह से अपना सामंजस्य स्थापित करती है, तो दुर्विचारों का पूरा प्रवाह हमारी मनोभूमि पर बाढ़ की तरह आ धमकता है।
ये विचार हमारी मनोभूमि की सारी वैचारिक उर्वरता सोख लेते हैं। यहीं घृणा और द्वेष की ऐसी सफल तैयार होती है, जो हमारे व्यक्तित्व को आतंकवादियों की तरह छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटने के लिए प्राण-पण से जुट जाती है। व्यक्तित्व का यह बिखराव हमें निर्वीर्य-निस्तेज एवं शक्तिहीन बना देता है। इसके विपरीत विधेयात्मक चिन्तन के लिए प्रयास करते ही हमारी चेतना विचारों के उच्चस्तरीय आयामों से जुड़ने लगती है। उच्चस्तरीय आयामों से जुड़ने लगती है। अनायास ही हम हम देव-चेतना, ऋषि चेतना के संपर्क में आ जाते हैं। हमारी मनोभूमि में जैसे अलौकिक प्रकाश की बाढ़ आ जाती है। जीवन के अँधेरे कोने में भी उजाले से भर जाते हैं।
व्यक्तित्व की टूट-फूट मरम्मत का सिलसिला अपने आप चल पड़ता है। टूटन-बिखराव, अखण्डता एवं समर्थता में बदलने लगती है। यही चेतना के उच्चस्तरीय आयामों से संपर्क हमें अलौकिक शक्तियों से भर देता है। विभूतियों एवं उपलब्धियों की तो जैसे बाढ़ आ जाती है। घृणा और द्वेष के स्थान पर सबके प्रति प्यार पनपता है। ऐसी अनूठी उपलब्धियों से हम वंचित क्यों है? आज ही इसके बारे में सोचें और निषेधात्मक भावों को झटक कर फेंक दें और अपना लें विधेयात्मक चिन्तन के उस रास्ते को, जो हमारी जिन्दगी को शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों से भर दे।
धर्म क्या? जीवन में इसे धारण करने का क्या उपाय हो सकता है, क्या किसी मत में दीक्षित हो जाना ही धार्मिक बनने की पहचान है? आये दिन इस प्रकार के प्रश्न उठते ही रहते हैं, जिन पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए। यों तो धर्म को इन दिनों मत-मतान्तरों से जोड़ दिया गया है; पर सच्चाई यह है कि वह बाहर की वस्तु नहीं, भीतर का विकास है। उसे समाज में नहीं, व्यक्ति के अन्तराल में ढूँढ़ा जाना चाहिए। जो बाहर है, वह तो रास्ता भर है। उसके सहारे मंजिल तक पहुँचना पड़ता है। आज मंजिल की उपेक्षा कर मार्ग को सर्वोपरि मान लिया गया, फलतः वह दिवास्वप्न बनकर रह गया है। राह की सुरम्यता में जब तक हम खोते रहेंगे, तब तक ऐसा ही होता रहेगा और वास्तविक लक्ष्य से हम दूर बने रहेंगे, जयशंकर प्रसाद के शब्दों में कहें, तो यही कहना पड़ेगा-
इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रान्ति-भवन में टिक रहना, किन्तु पहुँचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं।
यह राहहीन स्थिति वास्तव में उपलब्धि की ही अवस्था है। इसी के साथ मानवी अन्तःकरण में यथार्थ धर्म का उदय होता है। अतः यह कहना ठीक ही है कि धर्म व्यक्ति और समष्टि के बीच के तादात्म्य की फलश्रुति है, जबकि व्यक्ति और समाज के मध्य का संबंध सम्प्रदाय कहलाता है। धर्म और सम्प्रदायवाद में उतना ही अन्तर है, जितना जीवित और मृत में । जहाँ धर्म होगा, वहाँ सर्वत्र सुगंधि बिखरती रहेगी, जहाँ सम्प्रदायवाद होगा, वहाँ सड़न और दुर्गन्ध होगी। मृत काया से और क्या आशा की जा सकती है? वहाँ तो मनः-स्थिति बिगाड़ने वाली, अरुचि, उबकाई, घृणा-यही सब पनपेंगी। प्रफुल्लता-प्रसन्नता, करुणा-उदारता, सेवा-सहकारिता-यह तो जीवन की सहचरी और चैतन्यता की लक्षण हैं। अतः परम चैतन्य होना और धार्मिक होना और धार्मिक बनना-दोनों एक ही बात है। यह तभी संभव है, जब अवतरित हो। इससे कम में धर्म का विकास शक्य नहीं। यह न तो उपदेश है, न शास्त्र-ज्ञान वरन् इसको स्वयं में जीना और व्यवहार में उतारना पड़ता है। उपदेश और शास्त्रवचन तो इसे उद्बुद्ध करने के उपाय मात्र हैं। अस्तु, केवल उपदेशक और शास्त्रज्ञ होने के कारण ही किसी को धार्मिक नहीं कहा जा सकता। उसे विद्वान तो कह सकते हैं, पर ज्ञानवान नहीं-उसको तथ्यान्वेषी तो कहा जा सकता है, पर तत्वदर्शी नहीं और जो तत्वज्ञ नहीं, वह भला धर्मज्ञ कैसे हो सकता है?
इन दिनों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम कलेवर को आत्मा मान बैठे हैं। जब काया आत्मा का स्थान ग्रहण कर ले, तो वैसी ही विसंगतियाँ धर्मक्षेत्र में पैदा होने लगती हैं, जैसी इन दिनों दृष्टिगोचर हो रही हैं। तब सम्प्रदाय ही धर्म कहलाने लगता है और इसके अनुयायी धार्मिक। जहाँ उल्टी गंगा बहेगी, वहाँ उल्टा क्रम भी चल पड़ेगा। फिर शान्ति नहीं, अस्थिरता का साम्राज्य होगा। वहाँ करुणा नहीं, कटुता दिखलाई देगी। पुण्य के स्थान पाप लेने लगेंगे। दया की जगह नृशंसता का बोलबाला होगा। प्रेम ईर्ष्या में परिवर्तित हो जाएँगे। सहयोग वृत्ति असहयोग जन्य बनने लगेगी। उदारता की जगह लोग संकीर्णता अपनाते देखे जाएँगे। परोपकार भाव तिरोहित हो जाएगा। दूसरों की सेवा की जगह लोग अपनी सेवा कराते दृष्टिगोचर होंगे। इच्छा-आकाँशा, आस्था, मान्यता, भावना, संवेदना, श्रद्धा-निष्ठा का सम्पूर्ण क्षेत्र इस मध्य इतना विकारग्रस्त हो जाता है कि कुछ अच्छा सोचते और अच्छा करते बन ही नहीं पड़ता। परिणाम यह होता है कि वातावरण बनने की बजाय बिगड़ने लगता है और जो केन्द्र धर्म-धारणा संचारित करने के लिए बनाये गये थे, वे कलह-कटुता के निमित्त बनने लगते हैं। धर्म-धारणा पीछे छूट जाती है और वहाँ से सम्प्रदायवाद का पृष्ठ पोषण होने लगता है, यह आज की स्थिति का विश्लेषण हुआ।
धर्म और सम्प्रदाय में यदि कोई अन्तर है, तो उसे उतना ही विशाल होना चाहिए, जितना कि आकाश और पाताल, कारण कि धर्म हमें उच्चादर्शों के प्रति श्रद्धावान बनाता है और इस बात की प्रेरणा देता है कि हमारा अन्तस्तल अहंकारपूर्ण नहीं, अहंशून्य होना चाहिए। जहाँ अहमन्यता होगी, विवाद और विग्रह वहीं पैदा होंगे। जहाँ सरलता होगी, वहाँ सात्विकता पनपेगी। सरल और सात्विक होना दैवी विभूतियाँ हैं। जो इन्हें जितने अंशों में धारण करता है, उनके बारे में यह कहा जा सकता है, कि वे उस अनुपात में धार्मिक हैं। इसलिए यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि धर्म हमें देवत्व की ओर ले चलता है, जबकि सम्प्रदाय अधोगामी बनाता है। कट्टरवाद, उग्रवाद-यह सभी सम्प्रदायवाद की देन हैं। साम्प्रदायिक होने का अर्थ है-कूपमण्डूक होना, अपने वर्ग एवं समूह की ही चिन्ता करना। अपने वर्ग एवं समूह की ही चिन्ता करना। इसके विपरीत धर्म हमें अधिक उदार बनाता तथा आत्मविस्तार का उपदेश देता है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’- यह इसी की शिक्षा है। इसलिए संसार में जितने धार्मिक पुरुष हुए हैं, वे किसी एक वर्ग अथवा समुदाय तक ही सीमाबद्ध होकर नहीं रह गये, कितने ही अन्य मतावलम्बियों को भी उनने ऊँचा उठाया और आगे बढ़ाया। सन्त कबीर यों जाति से मुस्लिम थे; पर उनके अनुगत शिष्यों में हिन्दू भी कोई कम नहीं थे, स्वयं उनके गुरु भी हिन्दू थे। मृत्यु के उपरान्त कबीर की अन्तिम क्रिया दोनों समुदायों ने अपनी-अपनी रीति से सम्पन्न की। बुद्ध भारतीय थे। उनने जिस मतवाद की शुरुआत की, तत्कालीन समय में उसे मानने वाले विश्व के अनेक देश और अगणित जातियाँ थीं। सबने भगवान बुद्ध का शिष्यत्व ग्रहण किया या यों कहें कि तथागत ने देश और जाति से ऊपर उठकर सभी को अपनाया था, बात एक ही होगी। यह सिर्फ कबीर और बुद्ध की बात नहीं, वरन् जितने भी धार्मिक पुरुष हुए हैं, सबने ऐसा ही किया। यह धर्म की विशेषता है।
सम्प्रदाय असहिष्णु होता है। वह उन्माद भड़काता और आतंक फैलाता है। जाति, भाषा, लिंग, क्षेत्र आदि के आधार पर विभेद करना-यह सम्प्रदाय का काम हैं। धर्म तो ईश्वर की तरह समद्रष्टा है। वह कहता है कि परमात्मा हम सबका रक्षक है। सम्प्रदाय का कहना है कि हम सबको परमात्मा की रक्षा करनी चाहिए। कहीं कोई शूद्र मन्दिर के ईश-विग्रह को अपवित्र न कर दे, कोई काफिर मस्जिद में न घुसे, किसी तनखैये का गुरुद्वारे में क्या काम! बस इसी ऊहापोह में अपना सम्पूर्ण जीवन बर्बाद कर लेते हैं। इसकी तुलना में यदि अपने अन्तःकरण के असंबंध में इस बात का ध्यान रखा जाय कि वहाँ किसी शूद्र तत्व का प्रवेश न हो, कोई नास्तिक उस क्षेत्र को श्रद्धाहीन न बना सके, तो सही अर्थों में हम अपनी आत्मा की, आत्मदेव की रक्षा कर सकेंगे। यदि ऐसा हो सका, तो यह सुनिश्चित है कि उक्त अन्तःकरण में उस दिव्य ज्योति का अवतरण होगा, जिसके कारण आत्मा धर्मात्मा और अन्ततः परमात्मा बनती है।
वास्तव में मन्दिर-मस्जिद के निर्माण क्यों किये जाते हैं? इसलिए कि कर सकें, भावश्रद्धा अभिव्यक्त करें और सिजदा कर सकें। धर्मतत्व के विकास के यह बाह्य उपचार हो सकते हैं, पर देखा यह जाता है कि नित्य नये-नये उपासना गृहों के सृजन के बाद भी सच्चे धार्मिक इक्के-दुक्के ही पैदा हो पाते हैं। अधिकाँश तो उन्हीं के झमेले में उलझ कर रह जाते हैं और निर्माण के पीछे का उद्देश्य ज्यों-का -त्यों धरा रह जाता है, इसका निराकरण एक ही प्रकार से हो सकता है कि मन्दिर-मस्जिद धरित्री पर ईंट-गारे के नहीं, हृदय-भूमि में भाव-संवेदनाओं के उपादान से विनिर्मित हो सकें और उनमें आस्था तथा श्रद्धा की देवी की प्रतिष्ठापना की जा सके। यथार्थ धर्म तभी विकसित हो सकेगा और ऐसे ही लोग वस्तुतः सच्चे धर्मप्राण कहला सकेंगे।
शास्त्र वचन है-
उत्तमो ब्रह्मसद्भावो ध्यानभावस्तु मध्यमः। स्तुतिर्जपाऽधमो भावो बहिः पूजाऽधमाधमा॥
अर्थात् बाह्माजा यह मूर्तिपूजा सबसे नीचे की अवस्था है। आगे बढ़ने, ऊँचा उठने का प्रयास करते समय मानसिक प्रार्थना साधना की दूसरी अवस्था है। सबसे उच्च अवस्था वह है, जब परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाय।
उक्त कथन से भी यही विदित होता है कि मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारे यह धर्मतत्व की उपलब्धि की दिशा में सबसे निचले सोपान हैं। जिस प्रकार बालक को चलना सिखाने के लिए तिपहिये गाड़ी का सहयोग देना पड़ता है, उसी स्तर की भूमिका उपासनागृह धर्मलाभ के इच्छुकों के लिए पूरी करते हैं। इससे आगे की प्रगति के लिए हमें दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा करनी पड़ेगी और पुरुषार्थ करना पड़ेगा। यह असंभव भी नहीं, कारण कि धर्म के नाम पर संसार ने खून की जो नदियाँ बहायीं, मानव-हृदय की और किसी प्रेरणा ने वैसा नहीं किया। धर्म के नाम पर मनुष्यों ने जितने चिकित्सालय, धर्मशाला, अन्न-क्षेत्र, कुआँ, तालाब, स्कूल बनाये उतने और किसी प्रेरणा से नहीं। मनुष्य-हृदय की और कोई वृत्ति उसे सेवा कार्य के लिए प्रेरित नहीं कर पाती। धर्म के नाम पर आदमी जितना निष्ठुर हुआ है, वैसी निष्ठुरता पैदा करने की शक्ति और किसी में नहीं। ऐसे ही वास्तविक धर्म भावना व्यक्ति को जितना अधिक कोमल, सरल और निर्मल, निष्पाप बनाती है, उस क्षमता का अन्यत्र अभाव निकलता है कि सत्य का यदि सही-सही पल्ला थाम कर आगे बढ़ा जाय, तो इसमें इतना बल है कि वह हमें धर्म-लाभ कराकर ही छोड़ेगा। धर्म-लाभ एक ही सत्य के दो नाम हैं, कोई पृथक्-पृथक् वस्तु नहीं।
मनीषी का कथन है-”धर्म एवं हतो हन्ति धर्मों रक्षति रक्षतः” अर्थात् मरा हुआ धर्म मार डालता है, रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है। वर्तमान सामाजिक परिस्थिति को इस सत्य के प्रमाण रूप में देखा जा सकता है। इसमें दो मत नहीं कि आज राष्ट्र की जो दुर्गति हुई है, उसमें तथाकथित धर्म का भी बड़ा हाथ है। धर्म को खतरा अधर्म से नहीं, नकली धर्म से होता है। अधर्म तो प्रत्यक्ष है, उसमें दुराव-छुपाव जैसी कोई बात तो होती नहीं, अतः वहाँ सावधान और सतर्क होने के लिए काफी समय मिल जाता है, फलतः इसमें काफी समय मिल जाता है, फलतः इसमें उतनी हानि की सम्भावना नहीं रहती। खतरनाक वे हैं, जो धर्म की आड़ लेकर काम करते हैं, जो धर्म की आड़ लेकर काम करते हैं। कारण कि वहाँ असली आवरण में नकली व्यक्ति होता है। कोई अभिन्न मित्र यदि धोखा दे दे, तो क्षति की वहाँ अपार सम्भावना होती है; क्योंकि सखा होने के नाते सामने वाला उस पर आँख मूँद कर विश्वास करता है। यह प्रवंचना यदि दो कम परिचित व्यक्तियों के बीच हो, तो ठगने वाला अपनी चाल में पूरी तरह सफल नहीं हो पाता। कारण स्पष्ट है। धूर्त की लच्छेदार बातों में आकर व्यक्ति उस पर विश्वास तो कर लेता है, पर साथ ही एक प्रच्छन्न अविश्वास भी बनाये रखता है, इसलिए धोखा-धड़ी का मौका आने पर काफी हद तक वह अपने आप को बचा लेता है। अर्थशास्त्र की यह मान्य धारणा है कि असली सिक्कों को चलन से बाहर करने की सामर्थ्य केवल नकली सिक्कों में है। इसलिए जब नकली सिक्के बाजार में होते हैं, तो असली तिजोरियों में बन्द हो जाते हैं और नकली चलने लगते हैं।
धर्मक्षेत्र में यहीं हुआ। फलस्वरूप समाज की उन्नति की जगह उसका नैतिक अवमूल्यन होता चला गया, व्यक्ति दुर्गतिग्रस्त बन गये, न मन में संतोष, न जीवन में शान्ति, जिन्दगी नर्क तुल्य हो गई। इससे बचने का तरीका क्या है? ऋषि इसका भी उपाय बताते हैं-”तस्माद् धर्मों न हन्तव्यो मा नो हन्तव्यो मा नो धर्मों हतो वधीत्”। अर्थात् धर्म को नहीं मारना चाहिए, जिससे मरा हुआ धर्म हमको न मार सके। ऐसा तभी हो सकता है, जब हमारी अन्तरात्मा परमात्मा की अंशधर होने की बात हृदयंगम कर सके और उसकी गरिमा के अनुरूप क्रिया-कलाप अपनाये। इसी स्थिति में धर्म को जिया जा सकता है और धार्मिक बनने की राह पर चलते हुए अन्ततः उसकी उपलब्धि की जा सकती है।
संसार में अनेक जाति के लोग पाये जाते हैं। उनकी आकृति में क्षेत्र के आधार पर कुछ अन्तर भी पाया जाता है। फिर भी उनका नाम एक ही रहता है। हाथी, घोड़ा, गधा, बैल आदि पशु और मोर, कबूतर, बतख, सारस आदि पशु-पक्षी संसार भर में एक ही नाम से जाने जाते हैं। साँप, बिच्छू, चींटी, दीमक आदि की भी अपनी-अपनी जातियाँ हैं। वे कहीं का भी अपनी-अपनी जातियाँ हैं। वे कहीं भी बसें, जानी एक ही नाम-रूप के अनुरूप जाएँगी। मनुष्य भी एक प्राणी है। वह संसार के किसी भी क्षेत्र में रहे, कोई भी भाषा बोले, चेहरे की आकृति में कुछ अन्तर भले ही हो पर वह माना मनुष्य ही जाएगा। मनुष्य की एक जाति है। उसके अंग-अवयव एक जैसे ही होते हैं। कहीं भी बसने वाला, चमड़ी के किसी भी रंग वाला होने पर भी उसकी जाति मनुष्य ही रहेगी।
जाति की एक पहचान यह भी है कि वह अपने ही वर्ग में सन्तानोत्पादन कर सकता है। जाति की भिन्नता होगी तो जोड़ा न मिलेगा। वे तो प्रणयकेलि करेंगे और न प्रजनन में समर्थ होंगे। मनुष्य-मनुष्य की यदि अनेक जातियाँ रही होतीं तो उनके भी प्रणय सम्बन्ध न बनते, प्रजनन में समर्थ न होते, पर ऐसा अन्तर कहीं भी देखा नहीं जाता। मनुष्य जाति के सभी प्राणी यत्किंचित् भिन्नता रहने पर भी यौनाचार करने और वंश वृद्धि कर सकने में समर्थ पाये जाते हैं। ऐसी दशा में उनकी जाति एक ही रहेगी।
भारत का जातिवाद अपने ढंग का विचित्र है। यहाँ पुरातनकाल में वर्ण भेद आरम्भ हुआ। तब उसका आधार कर्म-व्यवस्था था। शिक्षक, सैनिक, व्यवसायी, शिल्पी वर्गों में उनकी पहचान बनी थी। पर वह स्थायी नहीं अस्थायी थी। व्यवसाय बदलने की सदा से सबको छूट रही है। इस आधार पर कोई भी अपना वर्ण बदल लेता था। अभी भी यह व्यवसाय भेद वाला वर्गीकरण चलता है। उनके संगठन भी बनते हैं। किसान सभा, श्रमिक संघ, व्यापारी मण्डल, अध्यापक सभा, रिक्शा यूनियन आदि संगठनों के वे लोग सदस्य रहते हैं, जो उस व्यवसाय में सम्मिलित रहते हैं। व्यवसाय बदल जाने पर वर्ग भी बदल जाते हैं, जो आज अध्यापक है, कुछ समय बाद वह सेना पुलिस में भर्ती हो सकता है। इस प्रकार उसके वर्ग समयानुसार बदलते रहेंगे। इतने पर भी उसकी जाति मनुष्य ही रहेगी। यहाँ तक कि वंश परिवार भी यथावत् बना रहेगा। वर्ग या वर्ण जीवन में अनेक बार बदला जा सकता है। फिर भी मानवी स्नेह-सहयोग की दृष्टि से उनके बीच एकता ही बनी रहेगी। वोटर की एक ही जाति ही बनी रहेगी। वोटर की एक ही जाति है, भले ही वह किसी भी क्षेत्र में रहता हो, कोई भी व्यवसाय करता हो।
इस सीधे-सादे प्रश्न को मध्यकाल के अन्धकार युग ने बेतरह उलझा दिया है। जन्म के, वंश के आधार पर जातियाँ मानी जाने लगीं। बात यहाँ तक तक रहती तो भी काम चलता रहता, पर जब उनके बीच ऊँचा-नीच का भेदभाव आरम्भ हुआ तो अपने-पराये की आपाधापी भी चल पड़ी। जातियों में से उपजातियाँ निकलीं और छोटे समुदायों के रूप में देशवासी विभाजित हो गये। कुछ वर्ग अपने को वंश के आधार पर ऊँचा और दूसरों को नीचा मानने लगे। गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर वर्गीकरण हो भी सकता है, पर वंश के आधार पर यह विभाजन चल पड़े और ऊँचा-नीच की मान्यता बढ़े तो उसे आश्चर्य ही कहा जाएगा।
यह आश्चर्य इन दिनों तो परम्परा के रूप में परिपक्व होता चला जा रहा है। हर वर्ग के अनेकों वर्ग हैं और वे अपने को प्रथक जाति मानते हैं और ऊँच-नीच का भेदभाव बरतते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि वंशों में कितनी ही उपजातियाँ हैं। वे एक-दूसरे के साथ रोटी-बेटी तक का व्यवहार नहीं करतीं। अपने को उपजाति के सीमित दायरे में ही संकुचित करती हैं। सामाजिक उत्सव-आयोजनों में अपने ही वर्ग को एकत्रित किया जाता है। विवाहों में सम्मिलित होने वाले बाराती प्रायः उसी जाति के होते हैं। यह संकीर्णता व्यवसाय से लेकर राजनीति तक में घुसती चली गयी है। यहाँ तक कि वोट डालते समय तक देखा जाता है कि प्रतिनिधि अपनी जाति का है कि दूसरी जाति का। उसकी योग्यता, ईमानदारी पर कम और अपनी जाति वाला होने पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
बड़ी कहलाने वाली जातियों की तरह यह बीमारी छोटी जातियों में भी फैली है। वे भी रोटी-बेटी का व्यवहार अपने ही छोटे दायरे में करते हैं। छूत-अछूत सभी इस दृष्टि से एक ही लकीर पर चल रहे हैं। अछूत छूतों से शिकायत करते हैं कि उनके साथ भेदभाव बरता जाता है। पर जब अछूत-अछूत के बीच वहीं वर्गभेद की, ऊँच-नीच की बात चलती है, तो और भी अधिक आश्चर्य होता है।
विभेद और विभाजन के इस कुप्रचलन से समूचे समाज को भारी क्षति पहुँची है। भाषावाद, प्रान्तवाद, सम्प्रदायवाद के कारण धड़ेबन्दी का कोढ़ पहले से ही चल रहा था। इसमें जाति-पाँति, ऊँच-नीच की खाज और जुड़ जाने से समाज में कुरूपता, विकृतता का दौर भी जुड़ गया है। कहने भर को हम भारतीय हैं, पर भावनात्मक विभेदों को देखते हुए यह लगता है कि एकता की शक्ति को हम खण्डित करते चले जा रहें हैं। नारंगी बाहर से एक फन दिखाई पड़ती है, पर उसका छिलका उतारने पर प्रकट होता है कि उसके भीतर कितने ही ऐसे खण्ड हैं जो एक-दूसरे से अपनी अलग पहचान बनाते हैं। यह दुखद दुर्भाग्य की स्थिति है। जो कमी रह गयी थी। उसे जातिवाद पूरा कर रहा है। संकीर्णता और कट्टरता का उभार बना रहने पर हम सब अनेक खण्डों में बँटते जा रहे हैं। ऐसी दशा में अमोघ समझी जाने वाली एकात्मता की शक्ति का अक्षुण्ण बने रहना कठिन है।
जातिगत आपा-धापी के साथ दूसरों को बिराना समझकर उनकी उपेक्षा करने का भी रिवाज बनता है। इस संकीर्णता के दूरगामी दुष्परिणाम होते हैं। व्यवसाय में, नौकरियों में चुनाव में अपने वर्ग को अधिक लाभ होने, अधिक सफलता मिलने के प्रयत्न चलते हैं। इसकी प्रतिक्रिया दूसरों पर होती है। वे भी जैसे की तैसा बरतने की नीति अपनाते हैं और खाई चौड़ी होती चली जाती है। आगे चलकर यही विष बेल लड़ाई, गवाही, मुकदमेबाजी आदि के रूप में चलती है। फिर न्याय-नीति की दृष्टि ओझल हो जाती है और जातिवाद, सम्प्रदायवाद और प्रान्तवाद की कट्टरता हर व्यवहार पर हावी होने लगती है। बात यहाँ तक बढ़ती है कि अपनी जाति का बहुमत बनाकर शासन-सत्ता पर अधिकार जमा लेने तक की योजनाएँ बनने लगती हैं। परिवार नियोजन के द्वारा जनसंख्या न बढ़ने देने के सर्वमान्य औचित्य की उपेक्षा की जाने लगती है कि हमारे वर्ग की अधिकाधिक सन्तानें हों, ताकि वोट बढ़ें, अपने प्रतिनिधि जीतें। उनके संरक्षण में अपने लोगों को अधिकाधिक लाभ मिले। स्पष्ट है कि वर्ग विशेष को अधिक लाभ मिलने लगेगा, उनका अनुचित लाभ मिलने लगेगा, उनका अनुचित पक्षपात क्रम चलेगा, तो उसकी प्रतिक्रिया होगी। ईंट का जवाब पत्थर से देने की बात सोची जाने लगेगी। फलतः कलह बढ़ेगा और ऐसे विग्रह खड़े होंगे, जिनसे निपटना कठिन हो जाएगा।
सभी जानते हैं कि मिलजुलकर रहने से संयुक्त शक्ति विकसित होती है और उसके बड़े-बड़े लाभ मिलते हैं। बुहारी की सींकें, कपड़े के धागे बिखर जाये तो उनकी उपयोगिता समाप्त हो जाएगी। संयुक्त शक्ति के रूप में विकसित हुए देश-जापान, इसराइल जैसे छोटे होने पर भी प्रगति पथ पर तेजी से अग्रसर होते हैं। बड़ी-बड़ी कठिनाइयों को पार कर लेते हैं। पर जहाँ बिखराव का बोलबाला होते हैं वहाँ सारी शक्ति आपसी लड़-झगड़ में ही समाप्त हो जाती है। ईर्ष्या-द्वेष का, आक्रमण-प्रतिशोध का, प्रतिशोध के प्रतिशोध का सिलसिला चलता ही रहता है और परिणति सबके लिए सब प्रकार अहितकर ही होती है।
अपने देश में जाति-पाँति के साथ विवाह-शादियों का भी उपक्रम जुड़ गया है। लोग अपनी-अपनी जातियों में ही लड़की-लड़कों का विवाह करना चाहते हैं। उपजातियों में, गोत्रों में बँटते-बँटते हर वर्ग का दायरा बहुत छोटा रह गया है। उतने ही दायरे में लड़की-लड़के ढूंढ़ने पर इच्छित स्तर के जोड़ नहीं मिलते। विवशता में उन्हीं लोगों में से वर-वधू का चुनाव करना पड़ता है। योग्यों की कीमत बढ़ जाती है। अयोग्यों में से ही किसी का चुनाव करना पड़ता है। इसीलिए देखा जाता है कि अयोग्य साथी ढूँढ़कर ही किसी प्रकार काम चलाना पड़ता है। यदि चुनाव का दायरा विशाल रहा होता तो
अपि पौरुषमादेयं शास्त्रं चेद्युक्तिबोधकम्। अन्यक्तवार्षमपि त्याज्यं, भाव्यं न्याय्यैकसेविना॥ -योगवसिष्ठ 2/18/2
दूर-दूर तक मारे फिरने की, खुशामद करने की, महँगा दहेज देने की आवश्यकता न पड़ती। पास-पड़ोस में ही अच्छे लड़के-लड़की मिल जाते। उनकी प्रकृति परम्परा के सम्बन्ध में भी आवश्यक जानकारी रहती और विवाह सफल होते रहते। पर जब उपजाति के फेर में दूर-दूर तक की भाग-दौड़ करनी पड़ती है, तो उस परिवार की स्थिति और लड़की-लड़के के स्वभाव की वास्तविक जानकारी नहीं हो पाती। अन्धा जुआ खेलना पड़ता है ओर उसमें कई बार अनुपयुक्तता भी हाथ लगती है। उपजातियों के फेर में विवाह-शादियों की समस्या पेचीदा होती जाती है। इसका समाधान सरल था। जाति भेद को आड़े न आने दिया जाता तो बिना बोली सरलतापूर्वक सस्ते में संबंध बन जाया करता। संकीर्णता के बन्धन भी शिथिल होते। आत्मभाव का दायरा बढ़ता।
अपने देश में पिछड़ापन भी वर्ण जाति के साथ जुड़ गया है। लोग ही पिछड़े नहीं रहते वरन् समुदाय भी जाति बन्धन में बँधे होने और वैसी ही रीति-रिवाज अपनाये रहने के लिए गई-गुजरी स्थिति में ही पड़े जनजातियों तथा अनुसूचित जातियों के पिछड़ेपन का यही प्रमुख कारण है कि वे गये-गुजरे स्तर का निर्वाह करने के लिए बाधित हो रही हैं। यदि उन्हें विकसित लोगों के साथ घुलने-मिलने का अवसर मिला होता तो एकता और समता की अभिवृद्धि हुई होती। कोई उन्नति-अवनति के दायरे में न बँटा होता। सभी लोग एक ही स्थिति में रहते हैं। इसके लिए भावनात्मक परिवर्तन करने होंगे। मान्यताएँ बदलनी पड़ेंगी और आदतों में सम्मिलित हो रही उन परम्पराओं में आमूल-चूल परिवर्तन करना पड़ेगा, जो अपने समाज को तथाकथित ऊँचे और नीचे माने जाने वाले लोगों को जाति के आधार पर ऊँचा-नीचा मानने के लिए उकसाती हैं।
इसे बुद्धिमानों की मूर्खता ही कहनी चाहिए, जिसने विभेद और विभाजन की दीवारें खड़ी कीं। इस भूल ने हिन्दू समाज के एक बहुत बड़े भाग को समतावादी धर्मों में सम्मिलित होने के लिए प्रोत्साहित किया है। यदि स्थिति यही रही तो हिन्दू धर्म की जाति-पाँति व्यवस्था को अन्यायमूलक मानकर और लोग भी उससे कटते-हटते चले जाएँगे। समझदारी इसी में है कि इस त्रासदी से बचने के लिए ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का विस्तार अधिकाधिक बड़े स्तर व मंच पर किया जाय, युग-निर्माण योजना यही कर रही है।
सामान्य पुरुष द्वारा कहा गया शास्त्र भी यदि युक्तियुक्त, सत्य का बोध कराने वाला हो तो वह ग्रहण कर लेना चाहिए। अन्य इसके विरुद्ध ऋषि प्रोक्त ही क्यों न हो, त्याज्य है।
दीनू काका! महाराज की सवारी आ रही है-तुम भी तैयार हो जाओ........ बूढ़ा दीनू एक बड़ी-सी काष्ठ पट्टिका पर झुका का झुका ही रहा-हाँ, हूँ करके उसने शायद यह जताने की कोशिश की कि वह सामने खड़े अपने पड़ोसी की बात सुन रहा है। लेकिन चटाई से उठा नहीं।
दीनू का घर कच्ची मिट्टी सामने चबूतरा था। चबूतरे के नीचे एक ओर गाय बँधी थी। जो मजे से जुगाली कर रही थी। पास के खूँटै से बँधा उसका बछड़ा अपनी माँ की ओर कौतुक से देखे जा रहा था। चबूतरे के ऊपर चटाई बिछाए बैठा हुआ दीनू अपने काम की धुन में था। रोज सुबह से कार्य शुरू कर देना उसका अनिवार्य नियम बन गया था। काम करते हुए वह अपनी धुन में ऐसा खो जाता कि खाने-पीने की सुध तक बिसर जाती। ऐसे में उसे किसी की टोका-टाकी एकदम भली न लगती थी।
अपने काम के लिए उसी दूर-दूर तक प्रसिद्धि थी। अपने महीन औजारों से जब वह लकड़ी पर लता-वल्लरियाँ, पेड़-पौधे, देवी-देवताओं के विग्रह उकेरता तो देखने वाले दाँतों तले उँगलियाँ दबा लेते। उसके हस्तशिल्प की प्रशंसा से स्वयं सम्राट हर्षवर्धन भी परिचित थे।
इस समय भी जबकि सम्राट की सवारी उसके गाँव से होकर गुजरने वाली थी-वह अपने काम में तल्लीन था।
इस समय भी जबकि सम्राट की सवारी उसके गाँव से होकर गुजरने वाली थी-वह अपने काम में तल्लीन था।
दीनू काका, राजा के हाथी के साथ दो सौ बड़े हाथी पीछे-पीछे चलते हैं। सभी के गले में सोने की भारी-भारी जंजीरें और घंटियाँ झूलती हैं। मालूम है काका, अपने राजा के पास बहुत सोना है, हीरे-मोतियों, कीमती जवाहरातों की भी कमी नहीं।
सोने की बात क्या करता है रे? असली चीज है राजा की परदुःख-कातरता। सुना नहीं, पिछले साल कुम्भ में अपना सब कुछ दुःखी-गरीबों के लिए दे डाला। गरीबों के लिए रोजी-रोजगार, छोटे−छोटे उद्योग-धन्धे, पाठशालाएँ, चिकित्सालय सब कुछ उसी के तो करवाए हुए हैं। दूसरों का दुःख उसको सहन नहीं होता, तभी तो उसने अपने तन के कपड़े तक दे डाले। तब बहिन ने उसे कपड़े दिये।
एक बात है काका, राज आ रहा है, लेकिन हमें जरा भी डर नहीं लग रहा। गाँव के लोग कुछ भेंट-पूजा चढ़ाना चाहते थे, ताकि उसका भली प्रकार स्वागत हो सके, परन्तु राजा के आदमियों ने मना कर दिया वे कहने लगे-आपको ऐसे करने से राजा को बुरा लगेगा।
दीनू ने ये सारी बातें शायद ही सुनी हों, वह शिवजी की जटा-जूट के ऊपर चन्द्रमा उकेरने में ऐसा मगन था कि लगता था जरा-सा भी इधर-उधर करने से शायद चन्द्रमा की चमक फीकी हो जाएगी। उसे भान हो रहा था कि वह नकली नहीं असली चन्द्रमा बना रहा है। फिर अभी तो उसे शिव की जटाओं से निकलती हुई गंगा के प्रवाह को दिशा देनी है। प्रवाह गड़बड़ाया, तो सारी मेहनत उसी के साथ बह जाएगी।
तभी गाँव की सीमा पर नक्कारा बजने की आवाज गूँजी। पड़ोसी उत्सुकता से आकुल होकर उधर ही बढ़ गया। दीनू को वे तुमुल वाद्य ध्वनियाँ भी नहीं सुनायी दी। वह इन सबसे बेखबर अपने काम में लगा रहा।
पूर्ण निश्चिन्तता एवं पूरे मनोयोग से वह अपना काम करता था। उसे चिन्ता हो भी तो किस बात की। परम्परागत व्यवसाय उसके परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त था। अन्न-वस्त्र की कठिनाई उसे कभी आयी ही नहीं। घर आए अतिथियों की सेवा करना वह अपना धर्म समझता था। तन-मन की स्वस्थता उसे सहज प्राप्त थी। कच्चे चबूतरे पर चटाई बिछाकर जब एक बार वह लकड़ी के टुकड़े में अपनी कला के प्राण डालना शुरू करता, तो विभिन्न आकृतियों एवं देव-विग्रहों को सजीव बनाए बिना न रहता। बड़े इत्मीनान एवं अपूर्व धीरज ने उसकी कला को सफलता के चरम बिन्दु तक पहुँचा दिया था। उन दिनों भारत की वास्तु, स्थापत्य, शिल्प तथा अन्य कलाएँ श्रम के इसी मार्ग से गुजरती थीं।
सम्राट हर्षवर्धन की सवारी निकट आ पहुँची थीं। सारा रास्ता दर्शनार्थियों की भीड़ से भर चुका था। चारों ओर उत्साह युक्त कोलाहल, उल्लासमय जय-जय की ध्वनि एवं विभिन्न वाद्यों की गूँज वातावरण को उद्वेलित कर रहे थे।
बड़े अचरज की बात थी कि बूढ़ा दीनू जैसे आज अंध, बधिर बन गया था। सम्राट अपने दल-बल के साथ गुजर गए-उसे मालूम ही न पड़ा। सैकड़ों सजे-धजे हाथियों की गर्जना एवं घण्ट-निनाद ने धरती-अम्बर को महागूँज से भर दिया। दर्शनार्थियों के पैरों और सिपाहियों के घोड़ों की टापों से उड़ी धूल से सूर्य धूमिल पड़ गया। लेकिन दीनू की श्रम समाधि न भंग हुई तो नहीं भंग हुई।
सम्राट के सैनिकों ने इसे दीनू के काम की तल्लीनता नहीं, जान-बूझ कर की गयी अवहेलना समझा और इसी के अपराध में उसे पकड़ लिया।
पकड़े जाने पर वह जोर से चौंक उठा। उसने अचकचाई नजरों से सैनिकों की ओर देखा। तनिक हकलाते हुए अचरज भरे स्वरों में वह बोल- मैंने तो कुछ नहीं किया-भरोसा न हो तो मुखिया से पूछ लो। बाद में जब लोगों ने उसे बताया तो उसे भी अनुभव हुआ कि अपराध तो हुआ ही है। राजा की सवारी कब निकली, यह वह जान ही न सका-राजा की अगवानी नहीं कर सका। उससे सामान्य शिष्टाचार का निर्वाह तक न हुआ। यह सोचकर उसे आत्मग्लानि हो आयी।
गाँव से थोड़ी दूर पर सम्राट का शिविर लगा था। संध्या को उसे वहीं उपस्थित किया गया।
सम्राट हर्षवर्धन उस वृद्ध व्यक्ति को अपने सामने खड़ा देखकर पूछने लगे-”कहो, क्या कष्ट है?”
एक पल के लिए वह सम्राट को ताकता ही रह गया। महाराज हर्ष के मुखमण्डल पर तेजस्विता की प्रखरता के साथ सौम्य भावों का अपूर्व सामंजस्य था। उनके स्वरों में उसे ऐसा लगा-मानो भरपूर ममत्व और मनुष्य के प्रति करुणा की अजस्र निर्झरिणी प्रवाहित हो रही है। उस भव्य व्यक्तित्व के सम्मुख वह सिर्फ विनत होकर रह गया।
दण्डनायक ने बड़े अदब के साथ उसका अपराध कह सुनाया-
सम्राट! इसने धृष्टता की है, महाराजाधिराज की शान में गुस्ताखी की है। इसने राजकीय मर्यादाओं की अवहेलना की है।
क्या किया है इस निरीह वृद्ध ने? हर्षवर्धन का स्वर नम्र ही बना रहा। जैसे उन्होंने अपने दण्डनायक की बातों पर ध्यान दिया ही नहीं।
सम्राट की सवारी जब इसके दरवाजे के सामने से होकर गुजर रही थी-उस समय भी यह खड़ा न हुआ। इसने महाराज की अभ्यर्थना नहीं की। अगवानी और स्वागत-सत्कार की बात तो दूर-इस आदमी ने अपनी आँखें तक नहीं उठाईं। अतः अब अभियुक्त के रूप में श्रीमान के समक्ष उपस्थित है।
महाराज हर्ष हल्के से हँस पड़े। कहने लगे-इस सौम्य वृद्ध पर तुम्हारा यह अभियोग उचित नहीं मालूम पड़ता। बल्कि तुम्हारी यह भाषा तो जैसे हम लोगों का ही उपहास करती है। तुम जिसे स्वागत-अगवानी, राजकीय सम्मान-मर्यादा कहते हो, बहुत सम्भव है, इस साधारणजन को उसका कोई बोध ही न हो।
फिर वे वृद्ध दीनू को सम्बोधित कर कहने लगे-क्यों भाई! डरो नहीं। तुम्हीं बताओ, क्या तुमसे कोई अपराध हुआ है।
महाराजाधिराज! अपराध तो हुआ ही है-अभी जो कहा गया-वह सच है।
क्या सच है? तुम क्या कहना चाहते हो? क्या तुमको मैंने कोई हानि पहुँचाई है? क्या तुम्हें मेरी किसी नीति से विरोध है? यदि ऐसा कुछ है तो निर्भीक होकर साफ-साफ कहो। हर्षवर्धन को अपने विरोधी भी प्रिय हैं। हो सकता है तुम्हारे ग्राम का राजकर्मचारियों ने कोई अहित कर डाला हो। राजा को चिन्ता हुई कि कहीं यह राज्य द्वारा या किसी राज्याधिकारी द्वारा सताया हुआ तो नहीं है।
महाराज, मैं सुखी हूँ-आपकी छत्र -छाया में हमारा पूरा गाँव प्रसन्न है। मुझसे अपराध बन पड़ा है, पर महाराज मैंने यह जानबूझकर नहीं किया। दीनू का स्वर बहुत साफ था।
सम्राट का संकेत पाकर, दण्डनायक विवरण देने लगा-श्रीमान् पूरी राजकीय यात्रा इसके दरवाजे के सामने से होकर निकल गई, लेकिन इसने सिर तक न उठाया। ऐसा अंधा-बहरा बनकर बैठा रहा-मानो इसके आँख-कान हो ही नहीं।
अरे! यह भी कोई अपराध है। उस वृद्ध को सम्बोधित करते हुए वे कहने लगे-तुम्हारे जैसे वृद्ध हर्षवर्धन के स्वागत में खड़े रहें, इसका कोई औचित्य नहीं। क्यों काका! उस समय तुम क्या कर रहे थे, बताओगे? सम्राट के स्वर में स्नेह था।
महाराज! मैं काष्ठ पट्टिका में शिव का चित्र उकेर रहा था। भूल गया कि आपका आगमन हो रहा है।
ओह! तो यह बोलो कि तुम शिल्पकार हो। इस राज्य बोलो कि तुम शिल्पकार हो। इस राज्य के कलाकार हो और इस दर्जे के कलाकार हो कि काम की तन्मयता में तुम्हें बहिर्जगत भूल जाता है। बाहर की हलचलें तुम्हारा ध्यान भंग कर पातीं। श्रम-साधना की यही तो खासियत है और तुम उससे भूषित हो।
सम्राट! आप मुझे जो भी दण्ड दें मेरे सिर माथे होगा। अपनी कला तो कुछ नहीं आपके सुराज की ही देन है।
लेकिन रुको, सुराज्य का निर्माण तो तुम जैसे श्रमसाधक ही करते हैं। श्रम साधने से ही राज्य में श्री-समृद्धि, शक्ति-समृद्धि एवं शान्ति आती है। हमें खेद है कि अपनी इस वृद्धावस्था में भी तुम इतना कठिन परिश्रम करते हो। क्या नाम है आपका?
दीनू! बड़े ही संकोच से उसने अपने नाम के दो शब्दों का उच्चारण किया।
ओह! तो आप हैं शिल्पी दीनू! आर्य अपराध तो आपसे नहीं राज-कर्मचारियों से हुआ है।
महाराज के इस कथन से सभी अचरज में थे। लेकिन महाराज कहे जा रहे-सम्राट की मर्यादा से श्रम की मर्यादा कहीं अधिक है। सम्राट राज्य का सेवक और रक्षक भर है, लेकिन श्रम साधक उसका निर्माता है।
फिर वे प्रधानामात्य की ओर देखकर बोले-महामंत्री! आर्य दीनू को राज्य की ओर से यथेष्ट भूमि पुरस्कार में दी जाय। इन्होंने जीवन भर कठोर श्रम किया है। अब अपने जीवन की संध्या में इनकी व्यवस्था करना राज्य का दायित्व है।
महाराज मैं धन्य हो गया। वह जमीन में पा चुका। मेरी प्रार्थना है कि उस भूमि में गायों के लिए चरागाह बना दिया जाय।
क्यों, तुम्हें भूमि नहीं चाहिए? महामंत्री को अचरज हों रहा था। नहीं श्रीमान, दीनू अपने बच्चों को श्रम की पूँजी देकर जाएगा। इसी से उनकी रोटी चलती रहेगी। मेरे बाबू कहते थे कि पसीने की बूँदों से भगवान प्रसन्न होते हैं। पसीने का अन्न ही अमृत है। मेरे बच्चे यही सीखें-यही मेरी अभिलाषा है। दीनू की आँखों में श्रम की गरिमा का तेज था।
युगान्ते प्रचलेद् मेरुः, कल्पान्ते सप्तसागराः। साधवाः प्रतिप्रर्न्नधद्, न चलन्ति कदाचन्॥ -चाणक्य 13/19
युग के अन्त के मरु और कल्प के अन्त में सातों समुद्र चले जाते हैं किन्तु सन्त पुरुष स्वीकृत सिद्धान्त से कभी विचलित नहीं होते॥
महाराज हर्ष प्रसन्न हो उठे। उन्होंने स्वयं खड़े होकर दीनू को विदा किया। वह श्रम की मर्यादा का खड़े होकर सम्मान कर रहे थे।
आधी घड़ी भर बाद दीनू पगडंडी पर धीमी गति से चला जा रहा था। ऊपर तारों का मध्यम प्रकाश था, नीचे अंधकार की घनी कालिमा थी, लेकिन दीनू के हृदय में श्रम-साधना की पुलकन एवं पूर्ण सन्तुष्टि का प्रखर आलोक था। उसकी आँखों में श्रम की मर्यादा एवं गरिमा के दीप जल रहे थे। क्योंकि आज वह इसी के कारण सम्राट द्वारा सम्मानित हुआ था। उसने निश्चय कर लिया था-वह अपने घर को ही नहीं, पूरे गाँव, समूचे समाज को श्रम की मर्यादा सिखाएगा। इस सोच ने उसके पैरों की गति तेज कर दी।
‘मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्षयो’ की बहुप्रचलित उक्ति प्रायः हर रोज अनगिनत मनुष्यों द्वा कही सुनी जाती है। मन के माहात्म्य का परिचय हर किसी को अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में मिलता रहता है। द्वेष-दुर्भाव हों या फिर प्रेम-सद्भाव, व्यक्ति की मनोभूमि में ही अंकुरित और पल्लवित होते हैं। मन में समायी कंपूचिया-प्रवृत्तियां, संस्कार ही इनसान के व्यवहार में प्रतिबिंबित होकर उसे आकर्षक अथवा घृणास्पद होकर उसे आकर्षक अथवा घृणास्पद बनाते हैं। मन और उसके विज्ञान को जाने बिना मनुष्य का वास्तविक परिचय पाना असम्भव है। इनसानी जिन्दगी को जानने, उसे सँजाने-सँवारने के लिए मन के विज्ञान की खोज, इस क्षेत्र में गहन व सतत् अनुसंधान बेहद जरूरी है।
परमपूज्य गुरुदेव का समूचा जीवन इसी के प्रति समर्पित रहा। उन्होंने ईश्वर की अनूठी कृति मनुष्य को जाना ही नहीं, उसकी प्रकृति को बारीकी से समझा। यही नहीं उसमें आयी विकृति के निदान खोजे और उसकी संस्कृति को सँवारने में अपना मौलिक योगदान दिया। विचारक्रान्ति की कथा-गाथा, युग-निर्माण आन्दोलन का इतिहास, प्रज्ञा-अभियान के क्रियाकलाप मानव मन के सर्वांग विज्ञान के विविध पहलुओं की कहानी कहते हैं। अपने युग के महान अध्यात्मवेत्ता के रूप में उन्होंने अपने प्रवचनों, गोष्ठियों, लेखों और पुस्तकों में इस सत्य को अनेकों बार दुहराया कि अध्यात्म एक उच्चस्तरीय मनोविज्ञान हैं।
आज के जमाने में मनोविज्ञान के महत्व से सभी वाकिफ हैं। शायद इसका कारण यही है कि इनसान की व्यक्तिगत एवं सामाजिक जिन्दगी की हर समस्या मन के ही किसी न किसी कोने में उपजती है और मन के ही किसी कोने में उसके समाधान मिलते हैं। काम कोई भी हो, उसकी सफलता बहुत कुछ करने वालों की मानसिकता पर निर्भर है। यदि हम मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों और प्रेरणाओं को समझने की कोशिश करें तो हमारे लिए व्यक्ति के व्यवहारों की दिशा और गति का अनुमान लगाना सरल हो जाएगा।
मानव मन में ही घृणा, द्वेष और युद्ध के बीज होते हैं। इस बात को आज सभी मानने लगे हैं यदि हम संसार में शान्ति और सुरक्षा चाहते हैं तो हमें इनसानी दिमाग में छुपी अशान्ति और घृणा को दूर करना होगा। जीवन के हर क्षेत्र में समाज के विभिन्न स्तरों पर व्यक्ति के व्यवहार दिखाई पड़ते हैं। व्यक्ति के व्यवहारों का ही नहीं उसके प्रेरक तत्वों का वैज्ञानिक अध्ययन करना मनोविज्ञान का कार्य है। ‘मनोविज्ञान’ मन का विज्ञान है। मन क्या है? क्या मन का वैज्ञानिक अध्ययन हो सकता है? इन सवालों के सार्थक हल खोजने के लिए ही पूज्य गुरुदेव ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में अनुसंधान के अनुष्ठान आयोजन कर गए हैं।
हमारी भारतीय परम्परा और पश्चिमी परम्परा जिसमें यूरोप और उत्तरी अमेरिका प्रमुख है, मनोविज्ञान की ऐतिहासिकता में अपना मूल्यवान स्थान रखती है। ब्रह्मवर्चस् के शोध प्रयासों की विशेष ध्यान दिया गया है, जिन्हें पहले के मनीषी और मनोवैज्ञानिक किसी कारणवश नहीं सुलझा सके। अनुसंधान का यह शोध प्रारूप कुछ ऐसा है जिसकी एक झलक हमारे मन से पूर्व एवं पश्चिम का भेद भुला देती है। जिस प्रकार हम विज्ञान के अन्यान्य क्षेत्रों में विश्व दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं, उसी प्रकार मनोविज्ञान के अध्ययन में भी सर्वांग दृष्टि की आवश्यकता है। इसमें भी विश्व दृष्टिकोण की स्थापना की जरूरत है। लेकिन अभी तक इस क्षेत्र में जो भी अध्ययन और अनुसंधान हुए हैं, उनमें मनोविज्ञान के क्षेत्र में भारत की देन की अवहेलना ही हुई है। इसलिए यह जरूरी है कि हम संसार के अन्य देशों का विशेषकर पश्चिमी देशों का ध्यान भारत में हुए मनोविज्ञान के विकास की ओर आकर्षित करें।
ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में हो रहे अनुसंधान के प्रति अखण्ड ज्योति के पाठकों एवं विशेषज्ञों की जिज्ञासा प्रारम्भ से रही है। समय-समय पर मिलने वाले उनके पत्रों में यही तत्व झलकला रहा है। इस बारे में कहना इतना ही है कि गुरुदेव द्वारा प्रेरित एवं प्रवर्तित ब्रह्मवर्चस् का शोध आयोजन मानवीय चेतना में आ गयी विकृतियों के निदान एवं उसकी अन्तर्निहित शक्तियों के जागरण हेतु किया गया है। जड़ प्रकृति पर अध्ययन एवं अनुसंधान का सिलसिला जारी है। इस प्रयास में इनसान को अनगिनत सुविधाएँ एवं शक्तियाँ मिली हैं। लेकिन अपने इस प्रयास में जुड़ी विश्व मनीषा यह भूल गयी कि यदि मानवीय चेतना को परिमार्जित एवं परिशोधित करने की तकनीकें न खोजी गयीं तो जड़ प्रकृति से पायी गयी सारी उपलब्धियाँ सर्वनाशी सिद्ध होंगी।
चेतना जगत के महावैज्ञानिक परमपूज्य गुरुदेव ने विज्ञान के इतिहास में पहली बार घोषणा की कि शोध-अनुसंधान चेतना क्षेत्र में भी हो। सर्वांग मनोविज्ञान इसी का दूसरा नाम है। यूँ अब तक गुरुदेव के विचारों के विविध पहलुओं पर दर्जनों छात्र-छात्राएँ पी. एच. डी. की उपाधियाँ प्राप्त कर चुके हैं। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के मार्गदर्शन में किए-गए इन कार्यों की व्यापक प्रशंसा हुई है। विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ विद्वानों ने गुरुदेव के विचारों के मूल्य को स्वीकारा और सराहा है। अनेकों विशेषज्ञ तो इस बात पर आश्चर्य भी प्रकट कर चुके हैं कि आखिर वे कैसे इतने अलग-अलग विषयों पर अपना बहुमूल्य अनुदान प्रस्तुत कर सके।
पी. एच. डी. एवं डी. लिट. उपाधियों के लिए मार्गदर्शन एवं दिशा-दर्शन अब ब्रह्मवर्चस् के क्रियाकलापों का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। अनेकों ज्ञान-पिपासु शोधार्थी यहाँ आकर अपने शोध-कार्य के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। पूज्य गुरुदेव के ज्ञान-वितरण की परम्परा का यहाँ समुचित रूप से निर्वाह हो रहा है। लेकिन यह तो यहाँ के काम का छोटा-सा, बहुत छोटा-सा हिस्सा है। असली चीज तो मानवीय चेतना पर किया जाने वाला अनुसंधान हैं।
पश्चिमी देशों में मनोविज्ञान के विकास पर अनेकों पुस्तकें हैं। ये पुस्तक मानवीय चेतना का विशद ज्ञान तो नहीं पर उसका साँकेतिक इतिहास अवश्य प्रस्तुत करती है। ब्रेट का अमरग्रन्थ ‘हिस्ट्री ऑफ साइकोलॉजी’ तीन भागों में प्रकाशित हुआ था। पहले भाग के अट्ठारहवें अध्याय में ब्रेट ने भारतीय मनोविज्ञान का उल्लेख किया है। उन्होंने वेदान्त, साँख्य और वैशेविज्ञान तथा बौद्ध दर्शनों में भारतीय मनोविज्ञान के स्वरूप पर प्रकाश डाला है। उनका यह प्रयास एक छोटी ही सही, पर अच्छी शुरुआत जरूर बना। इसी तरह की एक कोशिश हेराल्ड आई. कैप्लान, अल्फ्रेड एम. फ्रीडमैन एवं बेंजामिन जे. सैडोक ने अपने द्वारा सम्पादित ग्रन्थ ‘कम्प्रेहंसिव टेक्स्ट बुक ऑफ साइकियाट्री’ में की। उन्होंने अपने इस ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में सभ्यता की सुबह में मनोचिकित्सा की शुरुआत को स्पष्ट करते हुए वेद, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता एवं षड्दर्शनों में मनोचिकित्सा के तत्वों का संक्षेप में किन्तु सारगर्भित विवेचन किया है। इसी विवेचन में अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए ‘हिस्टोरिकल एण्ड थ्योरिटिकल ट्र्ण्ड्स इन साइकियाट्री’ नामक इस प्रथम अध्याय के लेखक डॉ. जार्ज मोरा का कहना है कि यह सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि पश्चिमी दार्शनिक मूल रूप से प्राकृतिक दार्शनिक है। चीनी दार्शनिक सामयिक दार्शनिक हैं, परन्तु भारतीय दार्शनिक मनोवैज्ञानिक दार्शनिक हैं।
जार्ज मोरा की यह उक्ति भारतीय ऋषियों की मनोवैज्ञानिक विरासत की महत्ता स्पष्ट करती है। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे इस शृंखला में आगे कुछ काम नहीं हो सका। आधुनिक जीवन की आपाधापी कुछ ऐसी रही कि ब्रेट के महान ग्रन्थ के तीन भागों को जब एक जिल्द के लघुरूप में आर. एस. पीटर्स ने प्रस्तुत किया, तो वह इस संक्षिप्त ग्रन्थ में भारतीय मनोविज्ञान के सम्बन्ध में कुछ भी न दे सके। यही बात फैटलन और सैडोक ने अपने ग्रन्थ का संक्षिप्त संस्करण निकालते वक्त की। उन्होंने जब ‘कम्प्रिहेंसिव बुक ऑफ साइकियाट्री’ को दो खण्डों में समेटा तो भारतीय मनोविज्ञान के तत्वों पर ध्यान देना भूल गए।
फ्रायड की सन्तानों की यह भूल उतना मायने नहीं रखती जितनी कि ऋषियों की सन्तानों द्वारा अपने पूर्व पुरुषों की विरासत की उपेक्षा। आज भारत में मनोविज्ञान का अध्ययन पश्चिमी मनोविज्ञान तक ही सीमित है। भारत में इस समय कितने मनोवैज्ञानिक हैं, जो भारतीय मनोविज्ञान तक ही सीमित है। भारत में इस समय कितने मनोवैज्ञानिक हैं, जो भारतीय मनोविज्ञान से परिचित हैं? पश्चिमी मनोविज्ञान के पुजारी भारतीय मनोवैज्ञानिक अपने अज्ञान को यह कहकर छुपाते हैं कि भारत में मनोविज्ञान था ही कब? जो कुछ भारतीय मनोविज्ञान के नाम पर लिखा गया है वह वास्तव में भारतीय दर्शन है, धर्मशास्त्र है, मनोविज्ञान नहीं हैं मनोविज्ञान भी आज के जमाने की उपज है।
पश्चिमी मनोवान के अन्ध भक्तों की ये बातें इस आधार पर हैं कि दर्शन और मनोविज्ञान दो अलग विषय है। यहाँ यह अपेक्षित नहीं है कि इस बारे में ज्यादा विवाद किया जाय। लेकिन यह तो ऐतिहासिक सच्चाई है कि अपने शुरुआती दौर से लेकर अब से कुछ दशाब्दियों पूर्व तक अकेले भारत ही नहीं दुनिया के सारे दर्शनों में मनोविज्ञान सम्मिलित था। ज्यों-ज्यों हम भौतिकवादी होते गए, त्यों-त्यों दर्शन एवं मनोविज्ञान के सम्बन्ध-सूत्र कमजोर पड़ते गए। विज्ञान के नाम पर भौतिकवादी दृष्टिकोण मनोविज्ञान के दार्शनिक आधार को छोड़ता गया। ये बातें किसी को भी बदलती परिभाषाओं के अध्ययन से मालूम हो सकती हैं।
पहले मनोविज्ञान में आत्मा की प्रधानता थी। लेकिन कुछ सदियों बाद आत्मा को दार्शनिक एवं धार्मिक तत्व मानकर बहिष्कृत कर दिया गया। उसके स्थान पर मन यानि कि माइण्ड को स्वीकार किया गया। इस बारे में एक परिहासपूर्ण कहावत प्रचलित है-’व्हाट इस माइण्ड? नेवर मैटर। व्हाट इस मैटर? नेवर माइण्ड।’ यह कहावत भले ही हँसी भरी हो, फिर भी इसमें एक निहित सत्य है। मन क्या है? इसके उत्तर में यह निश्चित है कि मन कोई मैटर (पदार्थ) नहीं है। तब फिर मन क्या है, जिसकी खोज मनोवैज्ञानिक करते हैं? इस सवाल का सन्तोषजनक हल न खोज पाने के कारण भौतिकवादियों ने मनोविज्ञान के अध्ययन का विषय जीव का व्यवहार निश्चित किया।
व्यवहार देखा जा सकता है और वैज्ञानिक प्रणाली द्वारा व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है। अध्ययन के इसी क्रम में संरचनावाद, क्रियावाद व्यवहारवाद आदि की मनोवैज्ञानिक विधाओं का जन्म हुआ। अध्ययन के इस क्रम में मनोविज्ञान का विद्यार्थी जीव विज्ञान का विद्यार्थी बनकर रह गया। मन को जानने-समझने की बजाय वह शरीर की जानकारी इकट्ठी करने में जुट गया। मनुष्य में आत्मा नाम का कोई चेतन तत्व है या नहीं, इससे किसी को कोई मतलब नहीं। गेस्टाल्ट साइकोलॉजी के प्रवर्तक थोड़ा कर नहीं पाए। लेकिन पहली बार जब फ्रायड ने मन के अचेतन और अवचेतन रूपों पर इतना प्रकाश डाला कि मानवीय व्यवहार के अध्ययन में जुटे लोग घबरा गए और आखिर मनोवैज्ञानिकों को स्वीकार करना पड़ा कि शरीर व मन के सम्मिलित स्वरूप का अध्ययन मनोविज्ञान का विषय है। इसके लिए उन्होंने एक नया शब्द ‘साइकोसोमेटिक’ बनाया। साइकिक का मतलब हुआ ‘मन’ और सोमा के मायने ‘शरीर’।
इस तरह हम यह साफ समझ सकते हैं कि मनोविज्ञान के अध्ययन का केन्द्रीय विषय किस प्रकार भौतिकवादी प्रभाव में अपने रंग बदलता रहा है। बात यहीं खत्म नहीं हुई, मन के परे क्या? यह सवाल आज भी मनोवैज्ञानिकों को हतप्रभ किए हुए है। इसका उत्तर ढूँढ़ने के लिए रोज नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं। पैरासाइकोलॉजी के नाम से नया मनोविज्ञान जन्म पा चुका है। ई. एस. पी. (एक्स्ट्र् सेन्सरी परसेप्शन) पर प्रयोग हो रहे हैं। ई. एस. पी. के प्रसिद्ध खोजी डाक्टर जे. बी. राइन की पुस्तक ‘न्यू फ्रंटियर्स ऑफ माइण्ड’ इस सम्बन्ध में एक अनोखी शुरुआत की कहानी कहती है। काफी पहले ‘द अमेरिकन वीकली’ में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था। इस लेख में डाक्टर राइन ने मृत्यु के बाद के जीवन की वैज्ञानिक रीति से जानकारी प्राप्त करने के प्रयासों का वर्णन किया है और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे है-सिद्ध नहीं कि मृत्यु के बाद जीवन को विज्ञान असत्य सिद्ध कर पाया है। उन्हें मृत्यु के बाद जीवन का अस्तित्व सिद्ध करने के प्रमाण तो मिले हैं, परन्तु उनकी ठीक-ठीक वैज्ञानिकता सिद्ध करनी बाकी है। वे लिखते हैं, हमारे पास अभी कोई निर्भर योग्य परीक्षण नहीं है। हमें शायद बिलकुल नए तरीकों को काम में लाना होगा।
कहना न होगा कि यह चुनौती पूर्ण कार्य अभी भी बाकी है। यही नहीं, मानवीय चेतना के अभी अनगिनत ऐसे पहलू हैं, जिनका वैज्ञानिक अध्ययन अभी बाकी है। ब्रह्मवर्चस् ने अपने संस्थापक द्वारा किए गए मार्गदर्शन के अवलम्बन के सहारे युग की इस चुनौती को स्वीकार किया है। मन के रहस्य एवं मन के परे की बातों की ढूंढ़-खोज के लिए वैज्ञानिक तकनीकें विकसित की जा रही है और यह सुनिश्चित विश्वास है कि सर्वांग मनोविज्ञान अपने नाम के अनुरूप मानवीय चेतना का सर्वांग अध्ययन कर सकेगा।
परमपूज्य गुरुदेव भारतीय ऋषियों की दार्शनिक परम्परा के नवीनतम संस्करण है। उनके लिए सदा से दर्शन दिमागी कसरत नहीं वरन् आध्यात्मिक अनुभव व सिद्धि रहा है। उन्होंने अपनी साधनाओं से मानव प्रकृति की सूक्ष्मता को भली प्रकार जाना और उसकी विभिन्न क्षमताओं को जगाने में सफल रहे। अपनी मनोवैज्ञानिक सर्वांगता में उन्होंने कुछ पहलू रचे जो बाद में ब्रह्मवर्चस् की शोध का आधार बने। इस शोध की आधार-भूत मान्यताएँ इस प्रकार हैं-
1- मनुष्य आध्यात्मिक प्रकृति का है। वह विकास के सिद्धांत को मानते हैं, परन्तु डार्विन की मान्यताएँ उन्हें स्वीकार नहीं। उनके अनुसार यथार्थ में विकास चेतना के नए आयामों का प्रकटीकरण है। चेतना के नए आयामों का प्रकटीकरण है। जीवों के शरीरों का विकास इन्हीं नए आयामों के अनुरूप होता रहता है। मानवीय चेतना के विकास का नया आयाम व चेतना है। देव मानव को अपने अनुरूप आदर्शों, व्यवहारों एवं सम्बन्धों की खोज करनी होगी।
2- जीवन के दो पक्षों अन्तः और बाह्य में से पूर्ववर्ती भारतीय मनोवैज्ञानिक अन्तःपक्ष को स्वीकार करते रहे हैं। आधुनिक पश्चिमी मनोवैज्ञानिक जीवन के बाहरी पक्ष को ही स्वीकारते हैं। ब्रह्मवर्चस् की शोध में सम्पूर्ण जीवन को स्वीकार किया गया है। इस शोध में आत्मानुभूति एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं के जागरण का जितना महत्व है, लोकव्यवहार भी उतना ही मूल्यवान है। यहाँ अब तक की गयी शोध के निष्कर्ष यही बताते हैं कि व्यक्ति का आन्तरिक जीवन जितना अधिक सामंजस्यपूर्ण एवं उन्नत होगा, वह परिवार एवं समाज के लिए उतना ही कर्तव्यनिष्ठ, सदाशय एवं उदार होगा।
3- इस शोध की तीसरी एवं आधारभूत बात यह है कि मानव की योग्यता की कसौटी सिर्फ बौद्धिक प्रतिभा नहीं है। परमपूज्य गुरुदेव ने योग्यता के मानदण्ड के रूप में बुद्धि के साथ भावनाओं को भी स्वीकार है और उन्होंने भविष्य के योग्य मनुष्यों के युग को भावनाओं का युग कहा है। भावना विहीन बुद्धि कुचक्र ही अधिक रचती है। त्याग-बलिदान का उत्सर्ग तो भावों से ही पैदा होता है। अब तो पश्चिमी मनोवैज्ञानिक भी भावनाओं में ही जीवन के समाधान ढूँढ़ने लगे है। डेनियल गोलमैन की रचना इमोशन इन्टेलीजेन्स इसी का प्रमाण है।
4- ब्रह्मवर्चस् के अनुसंधान प्रयास में सर्वांग मनोविज्ञान की अध्ययन प्रणाली के रूप में इन्ट्रोस्पेक्शन एवं इंट्यूशन दोनों को ही समान रूप से स्वीकार किया गया है। पश्चिमी मनोवैज्ञानिक सहज बोध को अंतर्दर्शन की तुलना में कुछ भी महत्व नहीं देते। जबकि भारतीय मनोविज्ञान के लिए सहज बोध का ही मूल्य है, लेकिन यहाँ पर मानव सर्वांग प्रकृति के अध्ययन के लिए इन दोनों की उपयोगिता को स्वीकारा गया है।
अनुसंधान के इस प्रयास में मानवीय चेतना के विविध पहलुओं को छोटे-छोटे उपविषयों में बाँटा गया है। इन उपविषयों के अनुरूप प्रयोगों की प्रक्रिया सुचारु से गतिमान है। इस क्रम में तथ्य-संग्रह शान्तिकुँज के साधना सत्रों में भागीदार साधकों के माध्यम से किया जाता है। इसी के साथ युगनिर्माण आन्दोलन के विविध क्रियाकलापों की मनोवैज्ञानिकता को परखने का सिलसिला भी जारी है।
परमपूज्य गुरुदेव ने धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण के रूप में समाज के मनोवैज्ञानिक विकास के लिए एक सशक्त पद्धति का आविष्कार किया था। अपने युग में इसकी उपादेयता और भी बढ़ जाती है, जबकि इनसान आत्म-परिचय से अनजान है। विज्ञान के इस युग में अध्ययन की वैज्ञानिक प्रणाली के आधार पर उसने अपने बारे में जो कुछ मालूम किया है, वह उसकी तुलना में नहीं के बराबर है जो कि वह अपने बारे में नहीं जानता। इस अनजानेपन के ही कारण चित्तवृत्तियों के उन्मुक्त व्यवहार की वकालत करने वाले फ्रायड योग दर्शन के सूत्र योगाश्चित्तवृत्ति निरोध का मर्म नहीं समझ सकते। इसका निहितार्थ तो ब्रह्मवर्चस् जैसी प्रयोगशाला में ही खोजा जा सकता है।
इस शोध प्रयास में एक तथ्य यह भी स्वीकार किया गया है कि अध्ययन की प्रणाली विषय के अनुरूप होनी चाहिए। जो चीज तौलने की है उसे नापना अर्थहीन है। मानव मन भी इसी तरह है। इसके अध्ययन में हर कहीं उपकरणों का आग्रह स्वयं ही अवैज्ञानिक है। यहाँ तो यन्त्रों के साथ ही अन्तर्ज्ञान भी जरूरी है।
उपयोगिता के इस क्रम में वहाँ के शोध अनुसंधान में पूर्वी दर्शन, पश्चिमी दर्शन, पूर्वी मनोविज्ञान, पश्चिमी मनोविज्ञान, साइकियाट्री एवं आयुर्वेद के सूत्रों को समुचित रूप से स्वीकारा गया है। इन सब से कहीं उपादेय गुरुदेव की वह मनोवैज्ञानिक पद्धति है, जिसे उन्होंने उच्चस्तरीय मनोविज्ञान एवं सर्वांग मनोविज्ञान कहा है। अध्ययन के क्रम में अनेकों विशेषताएँ एवं उपलब्धियाँ सामने आयी हैं। जिन्हें पाठकों के आग्रह पर अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित किया जाता रहेगा। विषयक विस्तारपूर्वक अध्ययन के लिए एक महाग्रन्थ का कलेवर वाँछित है, जो समयानुसार विशिष्ट शोध रीति से जनम लेगा और अध्ययन की यह शृंखला बन्धन के नहीं मुक्ति के रहस्य खोलेगी। सर्वांग मनोविज्ञान के तत्वों को जानने के बाद अपना मन बन्धन का नहीं, मुक्ति का कारण बनेगा।
13 फरवरी, 1969 को गाँधी आश्रम अहमदाबाद में दिया गया गया प्रवचन
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों, भाइयों! एक समय की कथा है कि एक भूखा चाण्डाल एक ब्राह्मण के यहाँ आया। वह बहुत भूखा था। उस ब्राह्मण ने, उनकी पत्नी तथा सभी बच्चों ने अपने-अपने हिस्से की रोटी उस चाण्डाल को दे दी। चाण्डाल रोटी खाकर संतुष्ट हो गया। उसने रोटी खाई, पानी पिया और उसके बाद एक स्थान पर कुल्ला किया, अपनाने हाथ धोये। उसके हाथ धोने के बाद एक नेवला आया। कहते हैं कि वह वहाँ पर लोटने लगा और लोटते ही उसके काले बाल सुनहरे हो गये। उस नेवले से लोगों ने पूछा कि तू तो काला था, सुनहरा कैसे हो गया? उसने कहा’-एक स्थान पर यज्ञ हुआ है। वहाँ मैं गया था और लोट लगायी तो मेरे बाल सुनहरे हो गये।
मित्रो, यज्ञ महान् चीज हैं, जो बड़े आदमी ही नहीं छोटे आदमी भी कर सकते हैं। आप समझते हैं कि लोग हवन करें तथा पैसे खर्च करें तो ही यज्ञ होगा, पर यह आवश्यक नहीं है। आप अगर किसी बुढ़िया के, किसी बहिन या भाई के आँखों के मोतियाबिन्द का आपरेशन करा देते हैं तो वह भी यज्ञ है। आप यदि इस प्रकार का यज्ञ करने वाले हैं या करते हैं तो आपको हम एक श्रेष्ठ यजमान, श्रेष्ठ होता कहेंगे तथा आपका स्वागत करेंगे। आपने उस बुढ़िया को जिसे आँखों से नहीं दिखता था, अगर अपने ढाई सौ रुपये खर्च करके उसकी आँखों में नई ज्योति ला दी है, तो हम आपको होता कहेंगे, यजमान कहेंगे और यह कहेंगे कि आप सच्चे हवनकर्त्ता है। यह हमारी संस्कृति है, तथा हर इनसान का कर्त्तव्य है कि वह दूसरों की मुसीबतों के समय पर सहयोग करें। आदमी दूसरों के दुःखों, मुसीबतों एवं तकलीफों का ध्यान रखे।
अगर इस प्रकार का हमारा दृष्टिकोण होगा तो क्या हमारे समाज में समस्याएँ रहेंगी? क्या यहाँ कोई चोरी करेगा? क्यों कोई कहीं डकैती डालेगा? नहीं मित्रो, कोई नहीं करेगा। इनसान के सामने तब कोई समस्या नहीं रहेंगी। उसकी भावनाओं में परिवर्तन आयेगा। वह यह सोचेगा कि वह जंगलों में नहीं चल रहा है, वरन् ट्रेन में चल रहा है। चोरी करने से पूर्व व्यक्ति सोचेगा कि जिसे वह नुकसान पहुँचाने जा रहा है, तो क्या आवश्यकता के पैसे उसके पास हैं जिसकी हम जेब काटकर उसे परेशान करने जा रहे हैं। वह बेचारा कहाँ भीख माँगेगा, कहाँ मारा-मारा फिरेगा। आज अगर हमारी स्थिति में ऐसा ही परिवर्तन हो जाये तो फिर इस प्रकार की समस्याएँ कहाँ रहेंगी? बर्बादी कहाँ रह जाएगी,? मित्रो! अपराध कैसे रह पायेगा अगर मनुष्य अपने दिल के अन्दर इस भावना को जोड़े ले तो अभी हमारे शरीर तो इनसान के हैं परन्तु दिल हैवान के है। अगर दिल इनसान के होते तो कोई समस्या नहीं होती। अगर रामायण की एक चौपाई आपको याद हो जाए तो हम समझेंगे कि आपने पूरी रामायण पढ़ ली। वह है “सियाराम मय सब जग जानी। करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी”। यदि यह दृष्टिकोण आ जाय तो कैसे कोई किसी के स्वास्थ्य को चौपट कर देगा। धनिया खरीदने आये हैं रामा-दसे गधे की लीद मिला हुआ धनिया कैसे दे दूँ? अरे हम अगर गायत्री के सिद्धान्तों पर, आध्यात्मिकता के सिद्धान्तों पर चलने वाले हों तो क्या हम पाप कर सकते हैं? नहीं, कभी नहीं कर सकते और न ही अपराध कर सकते हैं। अगर पाप और अपराध समाज से मिट जाए तो चहुँओर खुशहाली अपने आप आ जाएगी। आज अगर इस प्रकार के सिद्धान्त लोगों में आ जाते, गायत्री और यज्ञ की फिलॉसफी लोगों की समझ में आ जाती तो इनसान महान बन जाते।
आपने नाच क्या सीख लिया, बर्बादी को न्यौत बुलाया। यह बेकार की चीज है। मित्रों आज नृत्याँगना आपके देश चीज हैं। मित्रो आज नृत्याँगना आपके देश एवं समाज की तबाही कर रही है। अगर नृत्याँगना आपके जीवन में न आती तो मजा आ जाता। उसके स्थान में न आती तो मजा आ जाता। उसके स्थान पर मोहब्बत आ जाती तो हम यह समझते कि आपके जीवन में यज्ञ का सिद्धान्त आ गया। अगर आप मोहब्बत अपनी धर्मपत्नी से कर लेते तो मजा आ जाता। आप तथा आपकी धर्मपत्नी एक दूसरे के लिये जान देकर जिया करते तो मजा आ जाता। तब आपके परिवार में एक नया उत्साह एवं उमंग पैदा हो जाती। मित्रो, यह भी यज्ञ का ही सिद्धान्त है। अभी तो आपकी धर्मपत्नी यदि आपके भोजन में थोड़ा कम या ज्यादा नमक डाल देती है, बर्तन साफ करने में थोड़ी-सी कमी रह जाती है, तो आप उसे भला-बुरा कहते हैं और उसे मारने तक उतारू हो जाते हैं। यह कैसी विडम्बना है। आपने यह कभी नहीं सोचा कि वह अपने माँ-बाप को छोड़कर आयी है। वह आपसे न पेमेण्ट माँगती है न पेन्सन माँगती हैं, न सण्डे की छुट्टी माँगती है।
कितनी महान् है यह नारी जाति। ऐसी देवी को आपने नहीं देखा होगा। आपने पत्थर की देवी को देखा होगा, जो बकरे तक खा जाती है। अगर आप इस देवी की आरती नहीं उतार सकते हैं, पूजा नहीं कर सकते हैं तो कम से कम भाव-संवेदना भरी आँखों से देख तो लिया करें। अगर इस प्रकार जीवन जीना सीख लें, प्यार भरा जीवन जीना सीख लें तो मजा आ जाएगा।
अगर आपने अपने घर-परिवार, बीबी-बच्चों को संस्कारवान नहीं बनाया, अपनी भाव-सम्वेदना प्रगट नहीं की तो आपके लिये तबाही आयेगी। आप जब बुड्ढे हो जाएँगे तो आपको कोई नहीं पूछेगा। याद रखिये आप में से अधिकाँश व्यक्ति अब बुड्ढे होने वाले हैं। आपके बाल भी हमारे जैसे सफेद होने वाले हैं। आपकी दाढ़ी सफेद होने वाली है। आपकी आँखों में भी चश्मा अब लगने वाला है। आपका बच्चा भी जब बड़ा हो जाएगा तो आपको मजा चखायेगा कि आपने उसकी माँ को भला-बुरा कहा है। माँ जब गुस्से में अपने बच्चे को दूध पिलाती है तो उस समय बच्चे को भी माँ-बाप के प्रति क्रोध आता है। आपका व्यवहार जो इस समय हुआ है-आप देखना कि बुढ़ापे में आपकी बहू और आपकी पत्नी कैसे गुस्सा निकालती हैं। अगर घर में लोग आपस में प्रेम करना सीखते, मोहब्बत करना सीखते तो मजा आ जाता तथा उनका जीवन धन्य हो जाता, आध्यात्मिकता हमारे घर में भर जाती। सारे घर में आनन्द-उल्लास का वातावरण रहता।आपस में प्रेम-भाव होते। घर-परिवार ही स्वर्ग बन जाता।
अध्यात्म का मतलब होता है प्रेम, आत्मीयता। एक समय की बात है-स्वामी रामतीर्थ जापान गये। वे एक फैक्टरी देखने गये। सभी अपने-अपने कामों में लगे थे। एक बार मुस्कान के साथ बाबाजी को देख लिया तथा अगले ही क्षण पूरी तत्परता के साथ हर आदमी अपने-अपने कामों पर लग गया। किसी के पास इतना समय नहीं था कि उन्हें देखे, बात करे। जापान के लोग बड़े परिश्रमी होते हैं। सप्ताह में 5 दिन काम करते हैं, परन्तु उससे ही जापान नित्य प्रगति पर बढ़ता जा रहा है। वे पूरे मनोयोग के साथ काम करते हैं। वे राष्ट्र का महत्व समझते हैं। उनका कहना है कि हम मजदूर हैं तो क्या? हमें अपने देश को आगे बढ़ाना है। हम सप्ताह में 5 दिन परिश्रम करेंगे तथा देशहित में उत्पादन बढ़ायेंगे। दो दिन अपने परिवार के साथ हँसी-खुशी का जीवन जियेंगे। कारखाने से आने के बाद सब हँसी-खुशी का जीवन जीते रहते हैं। कोई चाय बनाता है, कोई गीत गाता है। सब आनन्द से विभोर हो जाते हैं। रामतीर्थ बहुत ही प्रभावित हुए। आपको प्यार आता है? कभी नहीं। आप तो अपनी बीबी की हमेशा शिकायत करते हैं। वह काली है, मोटी है। शादी के समय भी दहेज लेकर नहीं आयी। आप कभी खुश नहीं रहते हैं।
स्वामी रामतीर्थ का वहाँ व्याख्यान हुआ। उन्होंने कहा-”हम संस्कृत के श्लोकों को पढ़कर आपको वेदान्त का, अध्यात्म का शिक्षण क्या दें। आपको देखकर हम नतमस्तक हैं। आप सब सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी हैं। आप में से हर आदमी काम के प्रति इतना ईमानदार है कि उसका क्या कहना? आप कार्य को भगवान की पूजा समझते हैं।” आपको हम कहना चाहते हैं कि आपसे हमें शिकायत नहीं हैं। आप शंकर जी के मन्दिर में जाते हैं या नहीं, यह हम नहीं कह सकते हैं, परन्तु आप पक्के अध्यात्मवादी हैं। यदि आप जापान वालों की तरह कर्म-योगी हैं। आपको भगवान ने जो चीज दी है, उसका उपयोग जानते हैं। भगवान ने मनुष्य को हँसने की कला दी है, यह आप बखूबी जानते हैं। आपका त्याग सराहनीय है जो आपस में प्रेम-मोहब्बत का जीवन जीते हैं। यदि ऐसा जीवन है तो आप सचमुच भगवान की पूजा करते हैं।
हमारे देश में हम 350 रुपये पाते हैं। उसमें से 50 रुपये आप सिनेमा में खर्च कर देते हैं। 20 रुपये आप सिगरेट में फूँक देते हैं। आपको तो बजट बनाना भी नहीं आता है। अगर आप पूरे 350 रुपये बच्चों के विकास के लिये, प्रगति के लिये खर्च देते तो आपके परिवार की स्थिति कुछ और ही होती। अगर किसी को हँसना आता है, हँसाना आता है, प्यार करना आता है, बजट बनाकर खर्च करना आता है, तो वह हमारे शब्दों में सच्चा अध्यात्मवादी है, गायत्री का उपासक है, यज्ञकर्त्ता है।
सारे विश्व की समस्या का हल यज्ञीय दर्शन से संभव है। इसके द्वारा ही युद्ध की समस्या, चीन, पाकिस्तान की समस्या हल हो सकती है तथा विश्व में शान्ति द्वारा हो सकता है। आज विश्व के सामने जो प्रमुख समस्याएँ हैं वे हैं-(1) युद्ध (2) दुश्मन (3) पराजय। अगर आपस में मिल-बैठकर विचार करें-जैसे पंचायत में होता है, तो दुनिया की हर समस्या का हल हो सकता है। दुनिया में खून-खराबा समाप्त हो सकता है। समुद्र के खारे जल को मीठा बनाया ‘काई’ उगाई जा सकती है, जिससे खाद्य समस्या का हल हो सकता है। बंजर एवं बेकार पड़ी जमीन को रहने योग्य बनाकर जनसंख्या अभिवृद्धि की समस्या का हल हो सकता है। आदमी अगर मेहनत तथा मशक्कत करे तो पहाड़ों पर भी खेती की जा सकती है। अगर हम पानी की व्यवस्था पूरी कर लें तो प्यासों को नया जीवन दे सकते हैं। हम युद्ध के लिये जो खर्च करते हैं, उसे मनुष्य के विकास में खर्च कर दे तो इनसान के अन्दर खुशी आ सकती है। तो इनसान के अन्दर खुशी आ सकती है। मित्रो, यही है यज्ञीय फिलॉसफी। इससे रेगिस्तान को हरा-भरा बना सकते हैं। अभी जो गोला-बारूद बनाया जा रहा है, अस्त्र-शस्त्र बनाये जा रहे हैं, उसके स्थान पर अगर ट्यूबवैल बनायी जाय तो मनुष्य को कितना फायदा होगा। इस प्रकार हर गाँव में खुशहाली आ सकती हैं। अगर हम युद्ध के खर्चें को बन्द कर दे तो अभी जितना अकल और पैसा मिसाइल और राकेट बनाने में खर्च होता है, अगर वह खेती के विकास में, अन्न उगाने में, बच्चों की शिक्षा, गरीबों के विकास में खर्च हो जाये तो मजा आ जावे।
हम सारी समस्याओं का हल अकल, पैसा तथा राजनीति के द्वारा नहीं कर सकते हैं, अगर कर सकते हैं तो केवल इनसानियत से। इसके द्वारा ही राष्ट्रीयता के झगड़े, युद्ध के झगड़े, भाषा, प्रान्तवाद, जातिवाद, सीमा विवाद आदि सारी समस्याओं का हल हो सकता है। आप महात्मा गाँधी की जय बोलते हैं, परन्तु उनके आदर्शों को धारण नहीं करते हैं। आप कुर्सी के लिये इस तरह से लड़ते हैं जैसे कुत्ते रोटी के लिए लड़ते हैं। अरे भले आदमी, अगर आप भारतीय-संस्कृति के संरक्षकों को याद करते, उनके कार्य, त्याग, सेवा को याद करते तो मजा आ जाता। अगर आप यह कहते कि आप कुर्सी पर बैठो, हम इधर ही रहकर सेवा करेंगे। जैसा कि राम को भरत ने मजा आ जाता। आदमी के छोटे दिल और व्यवहार के कारण न जाने कितनी समस्याएँ खड़ी हो गई हैं। राजनीति पैदा करके नेताओं ने प्रान्त को, देश को बर्बाद कर दिया। काहे का विवाद-एक ही भूमि में भारत में लोग पैदा हुए, अगर ये विचार आ जाते तो मजा आ जाता।
जरा-सी दीवाल की समस्या ने एक ही देश के निवासियों को हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी बना दिया और वे एक दूसरे को अपने-अपने क्षेत्र से निकालने लगे। एक ओर पाकिस्तानी तो दूसरी ओर हिन्दुस्तानी हैं। कमोवेश वही झगड़ा अब प्रान्तीयता के नाम पर हो रहा है। यदि मध्यप्रदेश का पानी महाराष्ट्र में चला गया। कर्नाटक का पानी मद्रास चला गया। तो क्या हुआ? अरे भले आदमियों, छोटी-छोटी समस्याओं के लिये अपने जीवन का सर्वनाश क्यों कर रहे हो। आपस में एक दूसरे का गला क्यों काट रहे हो। धिक्कार है तुम्हारी इनसानियत को। मित्रो, थोड़ी-सी अकल हमारे अन्दर आ जाती तो हम सारी समस्याओं को हल कर लिया करते।
मित्रो! इन समस्याओं का हल किसी असेम्बली से नहीं होने वाला है। इसका हल मनुष्यों के बड़े दिल तथा उदारता से ही सम्भव है। इसके लिये यज्ञीय दर्शन को समझना होगा। उसे आचरण में लाना होगा। आज समूची मानव जाति, सारे देश विश्वयुद्ध के शिकंजे में इस तरह फँसे हुए हैं कि उसका क्या कहना? आज हर जगह तलवार लटकी हुई है। न जाने कब तलवार गिर जाये और गला कट जाये। कोई भी किसी समय भी इसका भुक्तभोगी बन सकता है।
मित्रो! आज चौबीसों घण्टे मानवता त्राहि-त्राहि कर रही है। उसे ही शाँति तथा चैन की नींद हराम हो गयी है। सभी मछलियों की तरह तड़प रहे हैं। मित्रों, इस मानवता को त्राहि से बचाने के लिए कौन काम करेगा? इसमें काम करेगा बड़े दिल वाला तथा उदारता सम्पन्न मानव। यदि मनुष्य का दिल तथा उदारता बढ़ती चली जाएगी तो ‘एटम बम’ भागते हुए चले जाएँगे, छिपकली की तरह से और तब उस समय मनुष्य के त्याग की सराहना होगी। आदमी मौत को घृणा की दृष्टि से देखेगा। लोगों की निगाह, दृष्टिकोण, बाप, भाई, भतीजे की तरह होगी। उस परिस्थिति में कौन बरसायेगा मौत किसी के लिये, आप बतलाइए न। मित्रो, इसे ही कहते हैं त्याग, सद्भावना, यज्ञ। यह त्याग ही दुनिया में नया रूप लायेगा। बड़े दिल एवं उदारता से ही दुनिया का कायाकल्प होगा। यह आज नहीं तो कल आयेगा ही। कल नहीं तो परसों अवश्य आयेगा। परसों नहीं तो 1000 वर्ष बाद आयेगा, परन्तु वह दिन जब भी आयेगा, सभी लोग भारतीय संस्कृति के अनुयायी होंगे तथा बड़ा दिल तथा उदारता उनके अस्त्र-शस्त्र होंगे। उसी दिन विश्व की मानवता शान्ति पा सकेगी तथा अमन-चैन जिन्दगी जी सकेंगे। उस समय इस धरती पर स्वर्ग होगा। मानवता का विकास उनके आदर्श-सिद्धान्त होंगे। मित्रो, जब कभी भी दुनिया में शान्ति आयेगी, वह दिन भारतीय संस्कृति के विकास का दिन होगा तथा लोग भारतीय संस्कृति के आधार यज्ञ के दर्शन का झण्डा फहरायेंगे। हर आदमी के दिल एवं दिमाग में यज्ञीय भावना जाग्रत हो रही होगी। हमारे समाज एवं परिवार का निर्माण यज्ञीय आधार पर हुआ है, अतः उसका विकास तद्नुरूप ही होना चाहिए। मैं आपको बतला देना चाहता हूँ कि जिस दिन लोगों के मन में यज्ञीय भावना जाग्रत हो जाएगी, उस दिन से ही शाँति आयेगी। लोग अमन-चैन का जीवन जी सकेंगे। समाज और देश का वातावरण बदल जाएगा। हम उसी दिन का ख्वाब देखते रहेंगे। आप से भी मेरा अनुरोध है कि आप भी उसी दिन का ख्वाब देखें। हम चाहते हैं कि यह भारतीय अध्यात्म, भारतीय विचारधारा दुनिया में फैले, विश्व में फैले तथा दुनिया में शाँति आवे, खुशी आवे।
मित्रो, यह दिन अवश्य आयेगा ऐसा हमारा विश्वास है। आपका हमने थोड़ा-सा कीमती समय लिया, भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता की थोड़ी-सी मोटी बातों को समझाने का प्रयास किया। भारतीय परम्पराओं के आधार पर गायत्री एवं यज्ञ की वास्तविकता एवं परम्पराओं को थोड़ा-बहुत समझने में शायद आपको यह काम आये। शायद यह विचार पसन्द आये, शायद आप ऊँचे आदर्शों पर चलने की कोशिश करें।
हमें विश्वास है कि सारी दुनिया में जब भी खुशी आयेगी, सारी दुनिया में जब शाँति आयेगी, जब भी सारी दुनिया की समस्याओं का हल होगा, तो लोगों को इसी सिद्धान्त को अपनाना होगा जो हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व गायत्री एवं यज्ञ के सिद्धान्त के रूप में बतलाया था। हमारे ऋषियों ने इस सिद्धान्त को सारे विश्व को दिया था तथा सारे विश्व को दिया था तथा सारे विश्व के लोग इस गायत्री एवं यज्ञ के सिद्धान्त को जिसे हम सद्विचार एवं सत्कर्म के सिद्धान्त, सद्भावना एवं सद्विवेक का सिद्धान्त कहते हैं, लोगों ने इस खुशी के साथ अपनाया था तथा इसे सर्वसम्मति से माना था। इस प्रकार की भावनाओं के कारण ही हमारे पूर्वज सब जगह वंदनीय तथा पूजनीय थे। उनका सब जगह आदर-सत्कार था। उनकी बातों को सब माना करते थे। “धियो यो नः प्रचोदयात्” एवं “इदं न मम्” का नारा सारे विश्व में गूँजता रहता था। आज भी वह सिद्धान्त ज्यों का त्यों है। युग बदल गया हो, कलियुग आ गया हो, सतयुग चला गया हो, परन्तु आसमान जहाँ का तहाँ है। सारे जहाँ के तहाँ हैं। सूर्य, इंद्र जहाँ के तहाँ हैं। उसी प्रकार गायत्री एवं यज्ञ के सिद्धान्त जिसे हम आदर्श या मानवता के विकास का सिद्धान्त कह सकते हैं, वह भी जहाँ के तहाँ हैं। दुनिया को संदेश देने के लिये यह दोनों झण्डे फहरा रहे हैं तथा फहराते रहेंगे। विश्व के प्रत्येक लोगों को अंततः इसी झण्डे के नीचे आना होगा तभी वे स्थायी शाँति प्राप्त कर सकते हैं, ऐसा हमें विश्वास है। आज की बात समाप्त। ॐ शान्ति....।
धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चि गेहिनी। स्तेयमनुसूयं दया च भगिनी भ्राता मनः संयमः॥ यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद् भयं योगिनः।
अर्थात्-”धैर्य जिनका पिता तथा क्षमा जननी है। चिरशान्ति जिनकी पत्नी है, सत्य पुत्र है, दया भगिनी है, मन का संयम भ्राता है, पृथ्वी ही जिनकी शय्या है, दिशाएँ वस्त्र हैं, ज्ञानामृत भोजन हैं, जिसके ये सब कुटुम्बी हैं ऐसे योगीजनों को किससे भय हो सकता है।”
सैन्य अनुशासन की इसलिए प्रतिष्ठा की जाती है कि उस समुदाय में सभी को एकता, समस्वरता, सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्तियों का पल-पल पर परिचय देना पड़ता है। सभी की वर्दी एक जैसी होती है। सभी को भोजन साथ-साथ करना पड़ता है। सभी कदम से कदम मिलाकर चलने के आदी होते हैं। किसी को व्यक्तिगत आपाधापी करने की छूट नहीं होती। नियम-अनुबंधों का पूरी तरह परिपालन करने के लिए सभी को प्रशिक्षित एवं अभ्यस्त किया जाता है। मन-मर्जी चलाने की, अनुबंधों को तोड़ने की, निर्धारित कर्त्तव्यों के परिपालन में आना-कानी करने के लिए किसी को भी स्वच्छन्दता प्राप्त नहीं होतीं। प्रकारान्तर से यही समाजवाद की आरम्भिक शिक्षा है।
इस अनुशासन में स्वच्छता, सुव्यवस्था बरतने के लिए हर सदस्य को आदत डालनी और सतर्कता बरतनी पड़ती है। कोई भी मैला-कुचैला नहीं रह सकता। किसी के भी कपड़ों में सिलवट, सिकुड़न नहीं होती, दाग-धब्बे वाली पोशाक कोई नहीं पहन सकता। चलने में पंक्तिबद्ध चलने का क्रम अपनाना पड़ता है। सीना तानकर चलना पड़ता है। बुड्ढों की तरह कमर झुकाकर चलते हुए उनमें से किसी को भी देखा जाता। यह सतर्क अनुशासन और जागरुक व्यक्तित्व के लक्षण हैं। जिन्हें सामान्य नागरिकों को भी अपने व्यक्तिगत जीवन में अनुकरणीय आदर्श मानकर अपनाना चाहिए। इस संगठन में किसी को भी स्वेच्छाचार बरतने का मन भर साहस नहीं होता। उच्छृंखलता का आभास मिलते ही बड़े साहब के आगे पेशी होती है और भविष्य में वैसा न करने की कड़ी चेतावनी के साथ आवश्यक प्रताड़ना भी मिलती है।
सभ्य नागरिकों में से प्रत्येक को अपना व्यवहार इसी प्रकार से स्वेच्छापूर्वक रखना चाहिए। यह नागरिक कर्त्तव्यों का अनुशासन है, जो सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी गतिविधियों में समाविष्ट करना ही चाहिए। प्रयत्न यही होना चाहिए कि परिधान-आच्छादन निर्वाह, सजधज के सभी एक जैसे रहें। ऐसी मनमर्जी न बरतें, जिसमें स्वेच्छाचार अपनाने का लाँछन लगे।
दुर्गुणों में सर्वप्रथम है’-संकीर्ण स्वार्थता की कीचड़ में सना हुआ ‘व्यक्तिवाद-। इसी से प्रेरित होकर लोग अपने आप को सार्वजनिक स्तर में संतुष्ट न रखकर अपने लिए विशेष सुविधाएँ चाहते हैं। बड़प्पन व प्यार में शेखी जताने, विशिष्ट सिद्ध करने के लिए चित्र-विचित्र पाखंड रचते हैं। कीमती पोशाकें पहनते हैं। शृंगार से सजाते हैं। ठाट-बाट रोपते हैं। फिजूलखर्ची में धन जुटाकर अपनी अमीरी का ढिंढोरा पीटते हैं। औसत निर्वाह में संतुष्ट न रहकर किसी भी प्रकार अपनी सम्पन्नता, विशेषता जताने के लिए महँगे आडम्बर अपनाते हैं। इस उद्धतपन के लिए आकुल-व्याकुल रहने वाले महत्वाकाँक्षी अपनी हविस पूरी करने के लिए अनाचार अपनाते, आक्रामक बनते हैं और अपराधी स्तर की गतिविधियाँ बिना हिचक अपनाते हैं। अवाँछनीयताएँ तो पहले से ही आरंभ होती हैं। अनौचित्य भरे पाप-पुण्यों का सिलसिला यहीं से चलता है। पतन और कुछ नहीं बढ़े-चढ़े व्यक्तिवाद का ही सामान्य प्रतिफल है। इस उन्माद से पीड़ित व्यक्ति जो कुछ बुरे से बुरा कर गुजरे वही कम है।
होना यह चाहिए कि व्यक्ति अपने आप को समाज का एक अविच्छिन्न और सामान्य घटक मात्र समझे। महत्वाकांक्षाओं को साधारण साधना के साथ न जोड़े और यह आकाँक्षा सँजोये रखे कि आदर्शों के परिपालन में अपने को हर किसी से आगे रखना है। सामूहिक उन्नति को ही अपनी उन्नति मानना है। यही मनोवृत्ति और रीति-नीति अपनाना सच्चे अर्थों में धार्मिकता या आध्यात्मिकता है। लोक-व्यवहार की भाषा में इसी को समतावाद, समाजवाद आदि नामों से पुकारा और सराहा जाता है। इस नैतिक अनुशासन में बँधने पर हर किसी को समाजनिष्ठ बनना पड़ता है। सार्वजनिक हित को सर्वोपरि मानना पड़ता है। भले ही इसमें अपने को सामान्य बनकर रहना पड़ता हो। चतुर कहे जाने वाले स्वार्थियों की तुलना में घाटा स्वीकार करना पड़ता है। पाप छोड़ने और पुण्य-परमार्थ अपनाने की बात इसी प्रकार बन पड़ती है कि व्यक्तिवाद पर और अधिकाधिक कड़ा अंकुश लगाया जाय और लोकहित के लिए, सत्प्रवृत्ति-संवर्धन के लिए जितना अधिक उदार साहस अपनाया जा सके उतना अपनाकर दिखाया जाय। मर्यादाओं और वर्जनाओं की उपेक्षा करने, मनमौजी उद्दंडता अपनाकर असामाजिकता पर उतारू होना, यही पाप की एकमात्र परिभाषा है। इसी को अन्याय कहते हैं। जो उसे अपनाते हैं उसे मानवी गरिमा से रहित या पतित कहा जाना चाहिए। उसकी भर्त्सना ही की जानी चाहिए, भले ही उसने कितनी ही बड़ी सफलता पाई या कितनी ही अधिक सम्पदा एकत्रित क्यों न की हो। व्यक्तिगत जीवन में, समाज परिकर में अनेक प्रकार के विग्रह, संकट और अनाचार खड़े करने का अपराधी व्यक्तिवाद को ही माना जाना चाहिए।
जो जितना अधिक खुदगर्ज है, समझना चाहिए कि वह सभ्य समाज का सदस्य कहलाने से उतना ही दूर है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसकी समस्त सुविधाएँ, विशेषताएँ, उपलब्धियाँ, सार्वजनिक सहयोग से ही उपलब्ध हुई हैं। इतने पर भी लोकहित की उपेक्षा करने वाले को कृतघ्न ही कहा जाएगा। स्वार्थपरता की सघनता ही मनुष्य को निष्ठुर, कृपण, अनाचारी बनाती है। ऐसों को नरपशु से अधिक और कुछ नहीं माना जा सकता, भले ही वह बड़प्पन के कितने ही बड़े सरंजाम क्यों न जुटा चुका हो। समता, समस्वरता, शालीनता, सज्जनता इसी में है कि व्यक्ति समाजनिष्ठ होकर जिये। अपनी विभूतियों का लोकहित में उत्सर्ग करे। व्यक्तिवाद के विषवृक्ष से अनेकों शाखा-प्रशाखाएँ फूटती और दुष्प्रवृत्तियों की अगणित पत्तियाँ निकलतीं हैं। अहंकार, अनाचार, अपव्यय, लालच, संग्रह, आत्मविज्ञापन, आलस्य, प्रमाद, विलास आदि की उत्पत्ति कर उद्गम आदर्शों की अवमानना ही है। इसी कारण व्यक्ति निष्ठुर बनता है। कृतघ्नता अपनाता है। उदार व्यवहार, सहयोग-सहकार के अवसर आने पर बगलें झाँकता है। ऐसी दशा में चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता जुड़ ही नहीं पाती। दुर्भाग्य से हमारे दर्शन और इतिहास में भी वैज्ञानिक सुख-सुविधा, स्वार्थ-मुक्ति, सिद्धि, देव अनुकम्पा आदि की ही विशेष रूप से चर्चा है। सामाजिकता की उपेक्षा से ही जाने लगी तभी से विघटन अनेक रूपों में प्रकट होते गये। आर्थिक आधार को लेकर अनेकों संगठन बनते हैं। अनाचारी षड्यंत्रों का गिरोहबंदी के आधार पर व्यवसाय चलता है। पर उदारचेता सज्जन इसके लिए कोई सुदृढ़ संगठन नहीं बना पाते कि सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन व्यापक रूप से संभव हो सके। इसी कमी के कारण देवता असुरों से हारते हैं। आज भी अनाचारी जीत बोलते और सदाचारी हाथ मलते, पराभव पाते दीख पड़ते हैं।
व्यक्ति की सत्ता और महत्ता यदि सद्भावना और न्याय व्यवस्था की पक्षधर रही होती ताक अतीत का सतयुग अभी भी बना होता। धरती पर स्वर्ग का वातावरण होता और जन-जन को ऐसा देव-जीवन जीते देखा जाता जो स्वयं सुख-शान्ति से उल्लसित रहता और दूसरों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने के लिए ऐसा कुछ करता रहता जिससे यह स्नेह-सौजन्य, सहयोग के आन्तरिक वैभव और अभ्युदय की भी कमी न रहती। यह आस्था-संकट ही है जिसके कारण समूह का अंग बनकर रहना और सार्वजनिक प्रगति की व्यवस्था बन पड़ने में पग-पग पर व्यवधान, मजबूरीवश देखना पड़ता है। इस संकट से निपटने के लिए, हमें लोक-मानस का परिष्कार करने के लिए नये सिरे से नये-नये प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ेगी। प्रचलित चिन्तन को असाधारण मोड़ देना पड़ेगा।
आस्था-क्षेत्र का दूसरा संकट है-अनौचित्य को सहन करते और अपनाते रहना। प्रचलित मान्यताओं, प्रथा-परम्पराओं में से अधिकाँश ऐसी हैं जो न्यायानुमोदित नहीं हैं। उनके पीछे तर्क, तथ्य, प्रमाण के ऐसे आधार नहीं हैं जिनके सहारे उन्हें अनुचित ठहराया जा सके। फिर भी अभ्यास में आने के कारण न केवल उन्हें सहन किया जाता रहता है वरन् उचित जैसी लगने के कारण आग्रह पूर्वक समर्थन भी किया जाता रहता है। कितनी ही मूढ़-मान्यताएँ ऐसी ही हैं। अन्धविश्वासों की हानियाँ सुनते-समझते रहने पर भी लोग उनके साथ बुरी तरह लिपटे रहते हैं। तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण उनका समर्थन नहीं करते, फिर भी परम्परा इसी को अपनाये रहने की आदत आवश्यक परिवर्तन को भी अंगीकार करने के लिए सहमत नहीं होती।
उदाहरण के लिए जाति-पाँति के आधार पर चलने वाली ऊँच-नीच मान्यता हो सकता है और न न्याय की कसौटी पर वह प्रथा सही सिद्ध हो सकती है। फिर भी जाति-उपजातियों के आधार पर चलने वाली ऊँच-नीच की मान्यता उन लोगों के भीतर भी किसी कदर जमी होती है, जो प्रत्यक्षतः उसे अमान्य ठहराने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कहते रहते हैं। जातिवाद ने राजनीति से लेकर अर्थनीति तक में अपनी जड़ें जमा ली है। सामाजिक बुराई तो वह है ही उसे विघटन का एक बड़ा कारण माना जा सकता है और प्रगति पथ पर अड़ा हुआ एक भारी चट्टान जैसा अवरोध।
नर वरिष्ठ और नारी के कनिष्ठ मानने की मान्यता भी ऐसी ही है, जिसका कोई औचित्य नहीं। आधी जनसंख्या को इसी आधार पर शोषित और गुलाम बनकर रहना पड़ता है। आधी जनसंख्या अपने को उनका अधिपति मानती और मनमाने दुर्व्यवहार करते रहने को अपना अधिकार जताती है। मनुष्य जाति के दोनों पक्ष अविच्छिन्न रूप से एकता और समता की धुरी से जुड़कर गाड़ी के दो पहियों की तरह सच्चे अर्थों में प्रगति पथ पर अग्रसर होते हैं, पर देखने में कुछ और भी आता है। उनके बीच अघोषित शोषक और शोषित का स्वरूप ही प्रथा-प्रचलन में सम्मिलित है।
मुहूर्तवाद, भाग्यवाद, ज्योतिष, फलादेश, जादू-टोना, देवदर्शन, चित्र-विचित्र कर्मकाण्डों का कोई तथ्यपूर्ण आधार नहीं बन पड़ता, फिर भी अधिकाँश लोग उनको अपनाकर ही चलते देखे जाते हैं। आहार-विहार के क्षेत्र में हमारी अधिकाँश आदतें ऐसी हैं जिन्हें स्वास्थ्य संतुलन और अर्थ-व्यवस्था की दृष्टि से हानिकारक ही मान जाएगा। नशेबाजी, माँसाहार, कपड़ों से लदे रहने, सौंदर्य प्रसाधनों पर समय और धन खर्चने जैसी बातों को यदि उपयोगिता की कसौटी पर कसा जाय तो वे सर्वत्र निरर्थक ही सिद्ध होती हैं। फिर भी आदत से मजबूर होकर किसी न किसी प्रकार उन्हें अपनाते ही रहते हैं। सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद आदि के नाम पर चलने वाले विभेदों, विग्रहों के पीछे भी कोई तथ्यपूर्ण आधार का कारण नहीं खोजा जा सकता।
इन दिनों मानव जीवन बुरी तरह अवाँछनीयताओं और कृत्रिमताओं से जकड़ा हुआ है। उनमें न्याय-नीति के प्रति भी अवमानना और उपेक्षा का भाव देखा जाता है। शिष्टाचार छोड़ा और स्वेच्छाचार अपनाया जा रहा है। दूसरों के साथ व्यवहार करते समय यह भुला दिया जाता है कि अपने को यदि दूसरे की स्थिति में रहना और वह सब सहन करना पड़ता तो कैसा लगता? अधिकाँश अनाचार इसीलिए पनपते हैं कि लोग अपने लिए मनमर्जी बरतने की छूट चाहते हैं और दूसरों के अधिकारों के हनन की जरा भी परवाह नहीं करते। पशु-पक्षियों के साथ हमारा व्यवहार प्रायः ऐसे ही अनाचार पर अवलम्बित होता है। माँसाहार के अपनाने के लिए असाधारण स्तर की निष्ठुरता भी अपनानी पड़ती है। कोई यह नहीं सोचता कि वध किये जाने वाले प्राणी के स्थान पर यदि हम रहे होते तो कैसा लगता। चोरी, ठगी, प्रपंच, अन्याय, शोषण पर आधारित अनेकानेक अपराधों के पीछे अनौचित्य को सहन-समर्थन करने, अपनाने का भाव ही काम करता रहा है। इस कारण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र में अनेकानेक दुष्प्रवृत्तियाँ उपजी और आँधी-तूफान की तरह बढ़ी हैं।
युग-विभीषिकाएँ एकता और समता पर आधारित सद्भावनाओं का परित्याग करने से ही उत्पन्न हुई हैं। इसी प्रकार ‘व्यक्तिवाद’ और ‘अनौचित्य’ को प्रश्रय देने में दुष्प्रवृत्तियों का विस्तार हुआ है, जो हर किसी के लिये हर प्रकार दुष्परिणाम ही प्रस्तुत करता है। इन्हीं के कारण वायुमंडल और वातावरण विषाक्त हुआ है। प्रकृति को कुपित होकर सर्वनाशी संकट उत्पन्न करने के लिए बाधित किया है। मानवी चिंतन साँसारिक व्यवस्था को ही नहीं प्रकृति संतुलन को भी बिगाड़ता है। इस समय के प्रस्तुत घटाटोप से बचना हो तो उनके मूल कारण मानव चिन्तन और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
आनुवंशिक कारण प्रतिभा एवं बौद्धिक क्षमताओं के लिए जिम्मेदार होते हैं, आनुवांशिकी का यह सिद्धान्त चिरकाल से मान्यता प्राप्त है। इसी आधार पर प्रतिभाओं की खेती करने-प्रखर बुद्धि सम्पन्न व्यक्तियों को जन्म देने के लिए भौतिक विज्ञान द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रयोग-परीक्षण किए जा रहे हैं, टेस्ट ट्यूव बेबी जैसे कृत्रिम जेनेटिक इंजीनियरिंग के प्रयोगों द्वारा अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति हो सकेगी, यह सन्दिग्ध है, पर जो प्रयास वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे हैं, उनके पीछे मूल प्रेरणा उपरोक्त मान्यता की हैं। पर प्रतिभाओं के अध्ययन से जो निष्कर्ष सामने आते हैं, उनसे पता चलता है आनुवांशिकी का सिद्धान्त अपने में परिपूर्ण नहीं है। एक सीमा तक उसमें सच्चाई का अंश है। प्रयास एवं पुरुषार्थ का महत्व आनुवंशिक कारणों से किसी भी प्रकार कम नहीं है, वरन्! उनसे अधिक ही है। इनका सुनियोजन भली-भाँति हो सके तो प्रचलित उस मान्यता को भी झुठलाया जा सकता है कि प्रतिभा जन्मजात प्राप्त होती है तथा पैतृक विशेषताएँ उसके लिए जिम्मेदार हैं।
प्रायः देखा यह जाता है कि जो बच्चे जन्म से ही मेधावी दिखाई पड़ते हैं, श्रम का पल्ला छोड़ बैठने पर उनकी वह विशेषता मारी जाती है। किसी भी क्षेत्र में अपने मानसिक अवसाद के कारण प्रवीणता हासिल नहीं कर पाते और प्राप्त जन्मजात प्रखरता का लाभ नहीं उठा पाते। इसके विपरीत जन्म से ही बुद्धि की दृष्टि से मन्द दिखाई पड़ते हुए भी कितने बालक अपने सतत् अध्यवसाय, प्रयत्न, पुरुषार्थ एवं मनोयोग द्वारा असाधारण प्रतिभा के धनी बन जाते हैं। यह चमत्कारिक परिणति वस्तुतः उन अनवरत प्रयत्नों की होती है, जिनका महत्व प्रायः नहीं समझा जाता अथवा समझते हुए भी जिनकी उपेक्षा की जाती है।
अपवादों की बात अलग है, अन्यथा सामान्य रूप से यह सिद्धान्त शत प्रतिशत सही है कि विशिष्ट स्तर की प्रतिभा अर्जित करने के लिए विशेष प्रकार का पुरुषार्थ करना पड़ता है। पैतृक विशेषताओं का हस्तान्तरण पीढ़ी दर पीढ़ी होता है, आनुवांशिकी का यह सिद्धान्त जितना सच है, उतना ही सत्य यह भी है कि अभीष्ट स्तर के प्रयास के बिना उन गुणों का विकास सम्भव नहीं है, जो पैतृक विरासत के रूप में जन्मजात मिलते हैं। मल्लशाला में जाए बिना-सतत् अभ्यास किए बिना कोई पहलवान कहाँ बनता है, चाहे वह जन्म से कितना ही स्वस्थ एवं नीरोग क्यों न हो। संगीत, गायन, वादन, कला, अभिनय आदि में दक्षता, विशिष्ट स्तर के अभ्यास के उपराँत ही आती है। बिना प्रयत्न एवं साधना के किसी ने इन क्षेत्रों में विशिष्टता हासिल कर ली हो, ऐसा न देखा गया और न ही सुना गया।
आगे बढ़ने, ऊँचे उठने, प्रगति करने का एक ही शाश्वत मूलमन्त्र है-प्रचण्ड पुरुषार्थ का अवलम्बन। संसार में जो जातियाँ एवं समाज समुन्नति के शिखर पर चढ़े हैं, उन्होंने इसी महामन्त्र को हृदयंगम किया, अपने व्यावहारिक जीवन का अंग बनाया। फलतः उनकी कार्यक्षमता बढ़ती तथा बुद्धि निखरती गयी। व्यक्तियों एवं जातियों दोनों ही के इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि प्रचण्ड अध्यवसाय, कर्मठता का परिचय देकर बौद्धिक क्षमता पैनी की जा सकती तथा अवनति के गर्त से निकला जा सकता है। प्रख्यात है कि कालीदास जन्म से ही महा मूर्ख थे। पत्नी की प्रताड़ना ने उनके पुरुषार्थ को झकझोरा-प्रसुप्त आत्मविश्वास को जगाया। आत्म-विस्मृति के कूप-मण्डूक से निकलते तथा ज्ञान की अनन्य साधना का पल्ला पकड़ते ही संस्कृत के उद्भट विद्वान बन गए, उनकी कृतियाँ आज भी अनुपम, अतुलनीय तथा अमर बनी हुई हैं। विद्वान वोपदेव भी बचपन में मन्दबुद्धि है, पर अपने लगन एवं प्रयासों द्वारा उच्च कोटि के विचारक बने। उल्लेख मिलता है कि विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन बाल्यावस्था में मन्दबुद्धि थे। पर उनमें लगन, अध्ययन के प्रति अपूर्व रुचि थी। फलतः वे असाधारण प्रतिभा के धनी बने तथा भौतिक विज्ञान के आविष्कारों के क्षेत्र में वह कर गए, जिसका लोहा विश्व के मूर्धन्य भौतिकविद् भी मानते हैं। उनके सापेक्षवाद के सिद्धान्तों की यथार्थ व्याख्या-विवेचना करना कितना कठिन, कितना दुष्कर जान पड़ता है, यह भौतिक वेत्ता भली-भाँति जानते हैं।
प्रस्तुत पंक्तियों में आनुवंशिक विशेषताओं की महत्ता को नकारा नहीं जा रहा है, वरन् यह कहा जा रहा है कि व्यक्तिगत प्रयास एवं पुरुषार्थ का महत्व जन्मजात प्राप्त विशेषताओं से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आकृति, रंग, रूप, कद आदि शारीरिक विशेषताएँ तो बहुत कुछ पैतृक गुणों के आधार पर विकसित होती हैं। पर प्रकृति को गढ़ने, बदलने एवं अभीष्ट स्तर का बनाने में मनुष्य पूर्णतया स्वतन्त्र है। एक सीमा तक ही पैतृक स्वतन्त्र है। एक सीमा तक ही पैतृक गुणों का उनमें योगदान होता है। प्रकृति के अंतर्गत आदतें, स्वभाव, संस्कार, बौद्धिक क्षमताएँ जैसे सभी व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण घटक आ जाते हैं। उनका परिशोधन एवं विकास अपने स्वयं के बलबूते हर व्यक्ति कर सकने में पूर्णतया सक्षम है।
फिर कारण क्या है कि अधिकाँश व्यक्ति दीन-हीन बने, गयी गुजरी-स्थिति में दिन काटते हैं, मूढ़ताग्रस्त रहते तथा किसी भी क्षेत्र में प्रखरता का परिचय दे नहीं पाते? उनके लिए अपना जीवन शकट सन्तुलित रूप से खींचना भी क्योंकर कठिन पड़ता है? उत्तर स्पष्ट है-”अवसादग्रस्त रहने के कारण उनकी क्षमताएँ कठिन पड़ जाती है। बेकार पड़े रहने-उपयोग में न आने पर लोहे में जंग लग जाती है। ठीक यही हालत मानवी क्षमताओं की होती है। वे उपयोग में न आये तो अपनी विशेषताएँ खो बैठती हैं। शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक शक्तियाँ श्रमशीलता के आधार पर ही पैनी बनती हैं। निर्विवाद यह तथ्य स्वीकार करना होगा कि जिस जाति अथवा समाज में कर्मठता, तत्परता की मात्रा जितनी अधिक होगी वे उतनी ही अधिक प्रगति करेंगे। उनकी सम्पन्नता एवं बौद्धिक क्षमता दोनों ही द्रुतगति से बढ़ेंगी। इसके विपरीत मेधावी नस्ल होते हुए भी प्रमादग्रस्त हो जाने-कर्मठता का सम्बल छोड़ बैठने पर वह जाति अपनी जातीय विशेषता गवाँ बैठेगी। जातियों एवं समाज के उत्थान-पतन के इतिहास इस बात के साक्षी हैं। रोम, बेबोलियन, यूनानी, जर्मनी सभ्यता के अभ्युदय एवं अवसान की घटनाएँ अभी ताजी हैं। नाजियों को अपनी कौम पर गर्व था। अपनी नस्ल एवं रक्त को वे सर्वश्रेष्ठ मानते थे। हिटलर का ऐसा विश्वास था कि जर्मनों का रक्त में सम्मिश्रण होने से उनकी जातीय विशेषता समाप्त हो जाएगी। नस्लवाद को अतिशय महत्व एवं प्रश्रय उसने इसीलिए दिया। ऐसा ही कुछ विश्वास श्वेतों का है। फलतः रंगभेद का विकृत स्वरूप इस चरम बुद्धिवादी युग में दिखाई पड़ रहा है। पर यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं रह गयी है कि अपनी प्रचण्ड कर्मठता का परिचय देकर पिछड़ी जातियाँ एवं समाज प्रगतिक्रम में निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं तथा उन्हें भी पीछे छोड़ते जा रहे हैं, जिन्हें अपनी नस्ल पर गर्व था।
प्रतिभा किसी बपौती नहीं वरन् पुरुषार्थ की चेरी है। वह प्रसाद बरतने पर खो सकती है और प्रयत्नों द्वारा बढ़ायी भी जा सकती है। अल्स्टर विश्वविद्यालय ने एक आश्चर्यजनक निष्कर्ष ‘डेलीमेल’ पत्रिका में प्रकाशित कराया है। रिपोर्ट संबद्ध विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्रोफेसर रिचार्डलिन के शोध प्रबन्ध पर आधारित है। जिसमें उक्त प्रोफेसर ने कहा है कि जापानियों की प्रतिभा दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। विश्वभर में जापानी सबसे अधिक बुद्धिमान हैं। औसतन प्रति सौ में से एक जापानी की बुद्धिलब्धि (आई. क्यू.) 145 होती है, जबकि पश्चिम के अन्य प्रगतिशील देशों में उतनी बुद्धिलब्धि का एक मनुष्य प्रायः एक हजार मनुष्यों में से होता है। अर्थात् औसतन पश्चिम की तुलना में दस गुने अधिक प्रतिभाशाली जापान में हैं। डेलीमेल समाचार पत्र में यह भी लिखा है कि जापानी एवं अन्य एशियाई देशों के नागरिक पीढ़ी दर पीढ़ी अधिक बुद्धिमान होते जा रहे हैं और उसी अनुपात से आगे भी बढ़ रहे है। इसका कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने सम्भावना, व्यक्त की है कि जापानियों की कर्मठता, कार्यों के प्रति प्रगाढ़ दिलचस्पी तथा समय के सदुपयोग जैसे सद्गुणों से उनकी बौद्धिक प्रखरता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कार्यों में तन्मयता एवं तत्परता से हस्तगत हुई प्रवीणता, दक्षता तथा मानसिक प्रखरता आनुवंशिक परतों तक को प्रभावित कर रही है, वह विशेषताएँ अपने साथ अतिरिक्त गुणों को साथ जोड़ती हुई, पीढ़ी हस्तान्तरित हो रही है।
उल्लेखनीय है कि तकनीकी क्षेत्र में जापान का लोहा संसार के सभी देश मानते हैं। रेडियो, टेलीविजन तथा इलेक्ट्रानिक्स के सभी आधुनिक सामान जितने बढ़िया, सस्ते तथा टिकाऊ जापान में बनते हैं उतने अन्यत्र नहीं। अपनी मेहनत, ईमानदारी तथा वफादारी के लिए जापानी विश्वविख्यात हैं। समय एवं श्रम को उन्होंने सबसे देवता माना है तथा उनकी उपासना से अदृश्य देवताओं के वरदान की तुलना में अधिक अनुदान पाया है।
एक ओर जापान की प्रगति की दास्तान सामने है, वहीं दूसरी ओर अपने देश की विपन्न, पिछड़ी स्थिति भी सामने है, जहाँ कि बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण बेरोजगारी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। जो सरकारी अथवा गैरसरकारी सेवाओं में काम कर रहे हैं, उनकी कामचोरी, हड़ताल की दुष्प्रवृत्ति के कारण कितनी हानि उठानी पड़ती है, यह किसी से छुपा नहीं है। इसके कारण उत्पादन तो घटता ही है, मानसिक अवसाद के रहते धीरे-धीरे मस्तिष्क की उर्वरता भी समाप्त हो जाती है।
छुट्टियों के नाम पर समय-सम्पदा का कितना बड़ा भाग अधिकाँश कर्मचारी व्यर्थ गँवाते हैं, इसका एक रोचक आँकड़ा दिल्ली विश्वविद्यालय के ही दो अध्यापकों ने प्रस्तुत किया है। श्री ओ. पी. मित्तल तथा श्री आर. पी. मित्तल के अनुसार यदि दिल्ली विश्वविद्यालय का एक अध्यापक अपनी समस्त सुविधाओं का उपयोग करें तो वह 35 वर्ष की नौकरी में 28 वर्ष छुट्टियों में व्यतीत कर सकता है। शिक्षा ही नहीं अन्य सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थानों में काम कर रहे कर्मचारियों की भी लगभग यही स्थिति है। हड़ताल आदि का व्यर्थ गया समय इसके अतिरिक्त है।
भौतिक समृद्धि अभीष्ट हो अथवा विशिष्ट स्तर की प्रतिभा, तो इसके लिए सर्वप्रथम उस मनोवृत्ति से छुटकारा पाना होगा जो व्यक्ति को आलस्य, प्रमाद के पाश में बाँधे रहती है, उसे चंगुल से निकलने नहीं देती।
एक दिन बादशाह सुबुक्तगीन शिकार के लिए गए। दिन भर इधर-उधर भटकने के बाद उन्होंने एक हिरनी को अपने बच्चे समेत घास चरते देखा। उन्होंने तीर चलाने की बजाय चुपचाप बच्चे को पकड़ मुड़कर देखा कि हिरनी उनके पीछे-पीछे चली आ रही है और उसकी आँखों से आँसू गिर रहे हैं।
यह देखकर बादशाह का दिल पिघल गया और उन्होंने हिरनी के बच्चे को छोड़ दिया। हिरनी बच्चे को पाकर खुशी से उससे चाटने लगी और जब तक बादशाह उसकी नजरों से ओझल नहीं हो गए, वह उन्हें देखती ही रही। बादशाह सुबुक्तगीन को लगा कि उन्होंने हाथ आया शिकार भले ही खो दिया लेकिन बदले में एक गहरी आत्मसंतुष्टि पा ली, जो हिरनी के बच्चे का वध करके कभी नहीं मिलती।
मनुष्य के विषय में जब भी विचार किया जाता है, उसकी स्थूल काया-बाह्य संरचना पर ही मुख्यतः ध्यान केन्द्रित होता है। जड़वादी दार्शनिक, प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक काया के साथ-साथ मन की सत्ता का अस्तित्व भी स्वीकारते हैं। यही स्थिति चिकित्साविज्ञानियों की भी है। वे यह तो मानते हैं कि मानसिक विकार एवं भ्रान्याँ रोगोत्पत्ति में एक प्रमुख कारण हैं, पर वे भी प्रधानता शारीरिक लक्षणों, उनकी बाह्य प्रतिक्रियाओं पर देते चले आये हैं। एनाटॉमी एवं फिजियोलॉजी विज्ञान इन दो से परे किसी भी सत्ता के अस्तित्व को नकारते हुए चिकित्सा हेतु मनः विश्लेषण, तनाव शासक औषधियों एवं शारीरिक लक्षणों के तात्कालिक उपचार क्रमों को ही प्रधानता देता है।
वर्तमान प्रचलित चिकित्सा-पद्धतियों का विकास तो अभी-अभी गत कुछ शताब्दियों में हुआ है, परन्तु भारतीय आयुर्वेद विज्ञान रोग की जड़ के निदान का वर्णन कर उपचार हेतु दैनन्दिन के जीवनक्रम में उपलब्ध होने वाली जड़ी-बूटियों तथा रसायन आदि की व्यवस्था करता आया है। इस विज्ञान में रोगोत्पत्ति, निदान व चिकित्सा हेतु समग्र मानव और उसके आंतरिक जीवन पर विचार किया जाता है।
चरक संहिता के अनुसार-
धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत्कुरुतेऽशुभम्। प्रज्ञापराधं तं विद्यार्त्सवदोषप्रकोपणम्॥
अर्थात्-”बुद्धि, धैर्य और स्मृति से भ्रष्ट होकर मनुष्य जो अशुभ कर्म करता है, उसे प्रज्ञापराध जानना चाहिए, उससे सर्वदोष प्रकुपित होते हैं।”
किसी भी चिकित्सा विज्ञान में पूर्वजन्म के अशुभ कर्मों एवं उनकी इस जन्म में रोगों के रूप में परिणति का वर्णन इस प्रकार न हुआ होगा, जैसा कि महर्षि चरक ने किया है। वे कहते हैं-’पूर्व जन्म का कर्म भी, जिसे दैव कहते हैं, कालान्तर में रोगों का हेतु देखा जाता है।’
प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर ये प्रतिपादन प्रयोगशाला में सिद्ध भले न किये जा सकें, पर इनकी दैनन्दिन जीवन-व्यापार में लीला सर्वत्र दृष्टिगोचर होती रहती है। ‘प्रज्ञा’ को आयुर्वेद ने परमपवित्र एवं अमूल्य निधि बताया है जो मानव को सृष्टा का वरदान है। जो इसे जितना प्रखर, परिष्कृत बनाये रखता है वह न केवल अपने आपको व्यक्तित्व सम्पन्न बनाता है अपितु अपने स्वस्थ जीवन का पथ भी प्रशस्त करता है।
इस शब्द को आधार बनाकर स्वस्थ-अस्वस्थ मानसिकता एवं तदनुसार रोगों का निर्धारण कितना सूझबूझ कर किया गया है, यह आज की व्याधियों के अनेकानेक सिद्धान्तों एवं रोगोत्पत्ति पर किये गये प्रतिपादनों को पढ़कर पता चलता है। ‘कीटाणुवाद’ जो आज ऐलोपैथी चिकित्सा-पद्धति का मूल आधार है, को भी चरक ने अस्वीकार नहीं किया है। अन्तर बस इतना ही है कि इसे पूर्व जन्म के पाप कर्म का फलोदय इस जन्म में उस प्रज्ञापराध की जीवनी-शक्ति के ह्रास में परिणति तथा प्रतिक्रिया रूप में जीवाणु वर्ग का शरीर में प्रवेश बताते हैं। ‘आल्टरनेटिव मेडिसिन’ के समर्थक अब आधुनिक विश्व में बढ़ते जा रहे हैं। वे भी जीवाणु के आक्रमण को अनास्था-असन्तुलन की फलश्रुति मानते हैं। यह अनास्था ही शास्त्रों में ‘प्रज्ञापराध’ के रूप में वर्णित की गयी है।
प्रज्ञापराध का कारण है-विवेक से च्युत होना। काम, क्रोध, लोभ इत्यादि के वश में होकर मनुष्य जब स्वयं पर संयम खो बैठता है, तब उसे उचित-अनुचित का भान नहीं रहता। वह अनायास ही ऐसा अपराध कर बैठता है जो काया के स्वस्थ जीवनक्रम को असन्तुलित कर देता है। असंयम चाहे वह मानसिक हो अथवा रसेन्द्रियों-कामेन्द्रियों के माध्यम से शारीरिक, समय की अनियमितता हो अथवा अर्थ एवं वाणी का असंयम-इस की परिणति होती है असन्तुलित चित्तवृत्ति में। यही अपनी बाह्य अभिव्यक्ति शारीरिक रोगों के लक्षणों के रूप में करती है। विडम्बना यह है कि उपचार इन लक्षणों का किया जाता है, न कि उस जड़ का जो गहरे में बैठी रहती है एवं उपयुक्त परिस्थितियाँ पाकर फूटती रहती है।
चरक के अनुसार प्रज्ञापराध का वास्तविक रूप इस प्रकार है-
“संग्रहेण चातियोगबर्जं कर्म वाड्मनः शरीरमहितमनूपदिष्टं यत्तच्व मिथ्यायोगं विद्यात्। इति त्रिविधं विकल्पं त्रिविधिमेव कर्म प्रज्ञापराध इति व्यवस्थेत्!”
अर्थात् “मन, वचन और शरीर के लिए अहितकर और शास्त्र निषिद्ध अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग इन त्रिविध विकल्प रूप कर्मों को प्रज्ञापराध कहते हैं।”
आयुर्वेद का यह कथन कि वेगों (ड्र्इव या मोटिव) को अनुचित रूप से रोकने या बलपूर्वक प्रवृत्त करने से रोगोत्पत्ति होती है-वैज्ञानिक शोध का विषय है। मल-मूत्र-वीर्य-वायु का प्राकृतिक प्रवाह न तो एकाएक रोकना चाहिए, न ही उन्हें बलपूर्वक रोकना चाहिए, न ही उन्हें बलपूर्वक क्षरित होने देना चाहिए, क्योंकि फिर ये ही अन्ततः रोगों का कारण बनते हैं।
इन अपराधों के अतिरिक्त वाणी के अपराधों को भी प्रज्ञापराधों में गिना गया है और उन्हें रोगों का कारण माना गया है। वाणी का सदुपयोग और दुरुपयोग ही आनन्द व उद्वेग का, स्वास्थ्य एवं अस्वस्थता का कारण बनता है, ऐसा शास्त्रों का मत है । वाणी के संयम को वाङ्मय तप बताया गया है, जो स्वास्थ्य का सहज साधन है। इसी आधार पर बताया जाता है कि रोगी से कहे गये प्रेम-सहानुभूति से युक्त चिकित्सक के वचन रोगी का आधा रोग दूर कर देते हैं। संयत और सत्य वचन युक्त मृदु वाणी-व्यवहार एक सुसंस्कृत और स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण हैं।
प्रज्ञापराध व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसकी प्रतिक्रियाएँ समाज के हर घटक पर होती हैं और सामाजिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव पड़ता है। दुष्कर्मों का बढ़ना-उनसे सूक्ष्म वातावरण का प्रदूषित होना तथा उसकी परिणति प्रकृति पर दुष्प्रभाव के रूप में होना एक तथ्य है। वस्तुतः प्रज्ञापराध और कुछ नहीं, प्रकारान्तर से आस्था-संकट है, अनास्था रूपी दैत्य का दुष्प्रभाव ही है। यही व्यष्टिगत व समष्टिगत रोगों का मूल कारण है। राष्ट्र के समग्र स्वास्थ्य हेतु, इसके निवारण हेतु पक्षधर मान्यताओं का व्यापक प्रचार-प्रसार अति आवश्यक हैं।
बरसात आने पर जब बादलों की रिमझिम झड़ी लगती है, तो सूखे हुए नदी-नाले, पोखर-सरोवर भी उफन पड़ते हैं। हर-कहीं जल ही जल दिखाई देने लगता है। खेतों और मैदानों की छटा हिलोरें लेते सागर की सी मालूम पड़ती हैं।
जलमग्नता के इस प्रवाह में कूड़ा-कचरा भी बहने और तैरने लगता है। प्रवाह में पड़कर घास के तिनके भी बिना श्रम के कहीं से कही बहते हुए चले जाते हैं। बड़े और भारी वृक्ष भी पानी के इस बहाव में असम्भव कही जने वाली यात्राओं को अनायास ही पूरी कर लेते हैं। कई बार तो इन लकड़ी के लट्ठों और बहते हुए पेड़ों पर पशु-पक्षी ही नहीं इंसान तक पार हो जाते हैं। लेकिन यह लाभ मिलता तभी तक है, जब तक बरसात का मौसम रहता है और बादलों से वर्षा की अजस्र जलधार बरसती है।
इन्सानी जिन्दगी में भी यदा-कदा ऐसे मौसम आ जाते हैं। मानवता को ऐसा सुअवसर तब मिलता है जब भगवान की इच्छा से कोई देवदूत, महामानव धरती पर आते हैं अथवा स्वयं भगवान ही मानव के वेश में आ जाता है। ये अवतारी चेतनाएँ सूखे संसार को हरियाली से भरने के लिए अजस्र रूप में अमृत जैसी जलाधार बरसाते हैं। उस समय मरे हुए कीट-पतंगों तक के बीज भी हरे हो जाते हैं। घास-तिनकों में भी जीवन लहलहाने लगता है। इस मौके का फायदा उठाकर कितने ही सद्भाव सम्पन्न सहज ही भव-सागर से पार हो जाते हैं और अपने सूखे-नीरस जीवन को हरा-भरा और सरस बना लेते हैं।
भगवान राम आए, वानर-भालू तक तर गए। भीलनी शबरी, अभिशप्त अल्या, उपेक्षित केवट, राक्षस विभीषण सभी धन्य हो गए। भगवान कृष्ण के समय अनपढ़ गँवार ग्वाल-वालों को सहज ही वह लाभ मिल गया जो औरों को कठिनाई से भी नहीं मिलता। बुद्ध ने सामान्य मनुष्यों को ऋषि, तिरस्कृत वेश्या आम्रपाली एवं क्रूरकर्मा डाकू अंगुलिमाल तक को लोकोत्तर महामानव बना दिया। गाँधी के समय न जाने कितने साधारण व्यक्ति इतिहास पुरुष बन गए।
लेकिन यह अमृत वर्षा होती कभी-कभी ही है। दूरदर्शी, विवेकवान व्यक्ति उस अवसर को पहचानने में और उसका लाभ उठाने में चूकते नहीं। साधारण समय में, सामान्य प्रयत्नों से जो पाया जाना किसी प्रकार भी सम्भव न होता, वह ऐसे ही मौकों पर बिना माँगे, अनचाहे, अनायास ही मिल जाता है। चतुर किसान वर्षा का लाभ लेते हैं। पर जो उस अवसर का महत्व नहीं जानते, वे समय निकल जाने पर पछताते ही रह जाते हैं।
राम का सहारा लेकर हनुमान ऊँचे उठे। कृष्ण का पल्ला पकड़ कर अर्जुन अमर हो गए। बुद्ध के साथ आनन्द-अशोक की चर्चा होती रहेगी। ईसामसीह के साथ बिना पढ़े-लिखे मछुआरे सन्त-महापुरुषों की श्रेणी में आ विराजे। गाँधी के साथ विनोबा और जवाहरलाल जुड़े रहेंगे। रामकृष्ण परमहंस के साथ विवेकानन्द, समर्थ रामदास के साथ छाई हुई बेल भी आकाश को छूने लगती है।
स्वाति नक्षत्र की वर्षा का लाभ लेकर सीप में मोती, बाँस में बंसलोचन, केले में कपूर उत्पन्न होने की बात सुनी जाती है। जो चूक जाते हैं, उन्हें एक साल तक इन्तजार करना पड़ता है। समय व्यक्ति के लिए नहीं लौटता। व्यक्ति को समय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है और जब तक वह आए तब तक सतर्कता और तत्परता बरतनी पड़ती है।
देवदूतों का अवतरण विश्व की समस्याओं को हल करने के लिए होता है। वे ‘धर्म संस्थापनार्थाय, विनाशाय च दुष्कृताम्’ के ईश्वरीय संकल्प को पूरा करने के लिए आते हैं। बाधाएँ उनके सामने स्वयं ही साधनों में परिवर्तित हो जाती हैं। पर्वत के समान विशाल अवरोध उनकी महत् शक्ति के समक्ष राई से भी अधिक नगण्य हो जाते हैं। अपनी अपरिमित शक्ति से वे ईश्वरीय प्रयोजन को पूरा करने के साथ-साथ जाग्रत आत्माओं का कल्याण भी करते हैं।
हो भी क्यों न? जहाज में बैठकर सैकड़ों-हजारों को पार जाने का अवसर मिलता है। पर एक बहती टहनी पर बैठकर कौवा भी पार नहीं हो सकता। स्वल्प सामर्थ्य वाले अपना तक कल्याण नहीं कर सकते, दूसरों को क्या पार करेंगे। सकुशल और स्वल्प प्रयास में पार जाने वाले मजबूत नाव और कुशल नाविक का सहारा लेते हैं और तैरना न जानते हुए भी उफनती वेगवती नदी को पार कर लेते हैं।
मानवीय इतिहास के वर्तमान पल भी प्रज्ञावतार की प्रखर तप−साधना से अमृत योग में बदले हैं। युगदेवता ने असहाय एवं दीन-हीनों को अपने जहाज में आ बैठने के लिए आवाज लगायी है। उन्होंने हम सभी को आश्वासन दिया है कि उनके समर्थ आश्रय में अब कोई अपने को निराश्रय न समझे। युग चेतना के महावट की शीतल छाया ने हर अशान्त-क्लान्त, पीड़ित को आमंत्रण दिया है।
अमृत योग के ये पल अब अधिक नहीं हैं। पार्थ सारथी के गीतोपदेश के ये स्वर हमें सिर्फ 2000 तक ही सुनने को मिलेंगे। बाद में ये गुँजन सूक्ष्म से कारण में बदल जाएँगे। फिर तो उन्हीं के हृदयों में उनकी गायी गीता धड़केगी, जो उनकी चेतना से जुड़ चुके हैं। इतिहास पुरुष बनाने, महामानव के रूप में हमें गढ़ने के लिए युग के महानायक महाकाल को हमारी बेसब्री से प्रतीक्षा है।
उनका आश्रय, जहाज का आश्रय लेकर पार जाने की तरह है। बुद्धिमान वहीं होंगे, जो इसकी महत्ता, अलौकिकता का ध्यान रखकर इस जहाज में आने की शीघ्रता करेंगे। इक्कीसवीं सदी ऐसे के लिए अनगिनत अनुदान-वरदान, उपलब्धियाँ, विभूतियाँ लेकर आ रही है।
उनका आश्रय, जहाज का आश्रय लेकर पार जाने की तरह है। बुद्धिमान वहीं होंगे, जो इसकी महत्ता, अलौकिकता का ध्यान रखकर इस जहाज में आने की शीघ्रता करेंगे। इक्कीसवीं सदी ऐसे के लिए अनगिनत अनुदान-वरदान, उपलब्धियाँ, विभूतियाँ लेकर आ रही है।
मिलेनियम-सहस्राब्दी-स्वर्णयुग-सतयुग कहें या इक्कीसवीं सदी। 3600 सेकेंड प्रतिघण्टे की रफ्तार से समय बीतता जा रहा है और वह जादुई क्षण निकट आ रहा है जब अन्तरिक्ष गणना-यंत्र (कोडोमीटर) में तीन शून्य का स्थान होगा। सभी उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कोई इसे ‘फादर टाइम्स बिग डे’ नाम से सम्बोधित कर रहा है, तो कोई चतुर्विद विचारशून्य काल। जो भी हो सहस्राब्दी का नववर्ष, नई दशाब्दी, इक्कीसवीं से सभी की अपेक्षा है, कर रहे हैं-उज्ज्वल हो-स्वर्णिम हो, हितकारी हो, परिवर्तनकारी हो, सतयुगी हो एवं ऐसा क्षण हो जो सहस्राब्दी की कलुष-कालिमा को धो डाले। स्वर्णिम प्रकाश की किरणों-सा हो, जिसमें सहस्र वर्षों का अंधकार एक क्षण में सिमट जाये और नवप्रभात, नव सूर्योदय की लाली से यह विश्व-वसुधा जगमगा उठे। बीसवीं शताब्दी के 17 वर्ष बीत चुकें हैं-तीन वर्ष बीतना शेष है। सहस्राब्दी से जुड़ी सभी घड़ियों में 39 दिसम्बर, 1999 का अलार्म लग चुका है, जो समय आते ही घनघना उठेगा। इक्कीसवीं सदी का आकलन करने वाले ‘द कमिंग आफ.....और द क्रेश आफ.....विषय पर अपने-अपने विचार अभिव्यक्त कर रहे हैं। कुछ कालिमापूर्ण सदी का आकलन कर रहे हैं, तो कुछ उसे स्वर्णिम बता रहे हैं। सहस्राब्दी की वैज्ञानिक प्रगति के आधार पर कुछ लेखक मानवता को चेतावनी दे रहे हैं तो कुछ समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत कर रहे हैं। शहरीकरण एवं पर्यावरण से जुड़े वैज्ञानिक मनुष्यता को डरा-धमका भी रहे हैं कि प्रदूषण के कारण साँस लेना भी मुश्किल होगा, किन्तु अधिकाँश वैज्ञानिक, दार्शनिक, समाजशास्त्री आने वाली सहस्राब्दी को उज्ज्वल एवं स्वर्णिम बता रहे हैं।
अवसरवादी, व्यापारी, उद्योगपति भी इस सहस्राब्दी ‘मिलेनियम’ की तरंग को पकड़ रहे हैं और उसे भुनाने की योजनाएँ अभी से बना रहे हैं। सौंदर्य प्रसाधनों में ‘मिलेनियम’ नाम प्रचलित हो रहा है। न्यूयार्क में स्थित सौंदर्य प्रसाधन एवं सुन्दरता बढ़ाने वाला होटल ध्यानाकर्षण के लिए ‘मिलेनियम’ शब्द का विन्यास ‘मिलेनियम ब्यूटी’ के रूप में कर रहा है। न चिपकने वाले रसोई उपकरण बनाने वाली कम्पनी ने ‘फार्वर वेयर मिलेनियम’ नाम से प्रचलित नया उत्पादन उपभोक्ताओं के सामने प्रस्तुत किया है। म्यूचुअल फंड का नाम ‘न्यू मिलेनियम’ भी है। पत्रिका, डायरी, काफीमग, टी शर्ट, जूते, टाई, टोपी, बैंक योजनाएँ एवं हजारों उत्पादन इस नाम से प्रचलित हो रहे हैं। ‘थर्ड मिलेनियम रिसर्च इनकार्पोरेट सिएटल’ द्वारा किसी व्यक्ति के जीन्स को काँच के कैप्सूल में सुरक्षित रखने की योजना बना रहे हैं। वे कहते हैं आप अपने जीन को बीसवीं शताब्दी से इक्कीसवीं शताब्दी की यात्रा करायें। क्रिस्लर द्वारा एक आधुनिकतम कार बनायी गयी है, जिसका नाम रखा गया है ‘मिलेनियम’। मिसेज वाटरु इक्कीसवीं सदी को ‘सायकिक वाटर फाल’ की संज्ञा देती हैं। अमेरिकी साहित्यिक समीक्षक ‘हेराल्ड ब्लूम’ ने अपनी नई पुस्तक ‘आनेन आफ द मिलेनियम’ में मधुर भक्तिव्यता को स्पष्ट किया है। मैक्डोनाल्ड, टाकोनेल, पीजाहट एवं व्हाइटहेन जैसे सुप्रसिद्ध रेस्तराओं में एक विशेष प्रकार के व्यंजन बनाने एवं उस 31 दिसम्बर, 1999 की रात्रि को एक साथ सभी केन्द्रों में देने की योजना बना रही है, जिसका नाम रखा गया है। ‘मिलेनियम व्यंजन’।
रिचार्ड एडोस ने ‘एन्नेडामिनी एडी 1000’ नामक किताब लिखी है, इसमें उनने बताया है कि कुछ लाख वर्षों बाद यह पृथ्वी राख में बदल जाएगी और नई सृष्टि नयी प्रकृति के साथ प्रारंभ होगी, जिसे स्वर्णिम युग, सतयुग, दैवी युग की उपमा देंगे। जो भी हो अभी तक जो नहीं घटा वह होने जा रह है। सभी आकलन कर रहे हैं, भविष्य के बारे में बता रहे हैं। भविष्यवाणी को मात्र ‘भयावह कल्पना’ कह रहे हैं। इससे पता नहीं लोग कितना भयभीत हो रहे हैं, लेकिन नया युग, नई सहस्राब्दी कम्प्यूटर से जुड़ी दुनिया के लिए भय का विषय बना हुआ है। उसकी योजना ध्वस्त हो रही है, क्योंकि वे वर्ष को दो अंकों से प्रदर्शित करते हैं, न कि चार अंकों से। जैसे मार्च की तेहसवीं तारीख को रविवार है। अतः कम्प्यूटर लिखेगा 23-3-17 स्हृ । लेकिन कम्प्यूटर प्रोग्राम में पहले के दो अक्षर वर्ष में पढ़े नहीं जाते हैं जैसे 1997 में जब 2000 आयेगा तब दो हजार में 1-1-00 आयेगा। अधिकाँश बड़े कम्प्यूटर में दो अंकों में 11 बड़ी संख्या है-तब सुपर मार्केट में बिकने वाली ब्रेड पर तिथि अंकित होगी 01-01-00 अर्थात् सौ साल पुराने हैं, इसे फेंक दें। अधिकाँश कम्प्यूटरों में जनवरी 1-1900 सोमवार के स्थान पर शनिवार आयेगा, इसका अर्थ है स्कूल की घंटी रविवार को बज उठेगी। कम्प्यूटर रेल-समय, पत्रिका सभी पूरी तरह बदल जाएँगी। किन्तु क्रेटिड कार्ड के विवरण में 20 लाख से ज्यादा रुपया देने का संकेत होगा। यदि कोई छात्र 1992 में जन्मा हो और किन्डर गार्डन में पढ़ने के लिए आयेगा। उसका नाम डाटाबेस में डाल दिया गया हो तो 2000 में ढूँढ़ने पर उसे 108 वर्ष का बतायेगा न कि 8 वर्ष का। नई सहस्राब्दी 2009 से चालू हो रही है, न कि 2000 से। इस गणितीय सत्य को वैज्ञानिकों ने स्वीकारा, जिससे यह सहस्राब्दी वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों के लिए समस्या खड़ी किए हुए है। क्योंकि शून्य का कोई वर्ष नहीं है। यह दुनिया एक बी.सी. से एक ए.डी. में गई। इसलिए 2000 वर्ष आगे चलकर ए.डी. 2009 है, न कि ए.डी. 2000।
यही गणित की गड़बड़ी अब सभी के लिए परेशानी का कारण बन रही है। कुछ भी हो जो भी कुछ होने जा रहा है, ऐतिहासिक है। इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का नारा युगदेवता ने दिया है। वह इक्कीसवीं सदी चैत्र माह की प्रतिपदा से विक्रम संवत्सर आरंभ होने के साथ 54 वें वर्ष में प्रवेश कर गयी। यह इक्कीसवीं सदी तो अँग्रेजों की है-आज की दुनिया की है। वे इसे अपनी तरह से मनाने की सोच रहे है, पर अध्यात्मवादी इसे उज्ज्वल भविष्य की पूर्ववेला मानते हुए युग संधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति रूप में मनाने को संकल्पित हैं। आप भी सोचिए कि आप किस श्रेणी में आते हैं?
अनेक परिजनों ने इस स्तम्भ का स्वागत करते हुए अनेक प्रकार के सुझाव दिए हैं। कइयों ने लम्बे-लम्बे लेख लिख भेजे हैं, आग्रहपूर्वक प्रकाशन करने के दबाव के साथ तो कइयों ने राष्ट्र की, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की समस्याएँ सुलझा पाने में अखण्ड-ज्योति की असमर्थता, अशक्यता की चर्चा कर उस पर भी अपनी टिप्पणियाँ दी हैं। कइयों को उज्ज्वल भविष्य की भवितव्यता पर संदेह है, तो कइयों को लगता है कि एक प्रश्न के समाधान से उनकी अनेक जिज्ञासाओं का उत्तर मिल जाता है। इसी ऊहापोह में विगत माह यह स्तम्भ छपने में जाने से रह गया। यह शृंखला अब पुनः आरंभ करते हैं-इस आश्वासन के साथ कि महाकाल की प्रज्वलित यह ज्योति जो अखण्ड दीपक के प्रकाश से अनुप्राणित है, सत्परामर्श द्वारा लोगों को सत्पथ दिखाने का कार्य अनवरत करती रहेगी। प्राण ऊर्जा सूक्ष्म संरक्षण दे रही गुरुसत्ता की ही मूल में है। उसी की शक्ति से यह ज्योति प्रज्वलित है एवं अगणित निराशा के अंधकार में भटकने वालों के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ की तरह है। हमें हमारे लेखन, संपादन क्रम में आप सभी के सुझावों-परामर्शों से बड़ी मदद मिलती है। अतः पुनः आपका इस स्तम्भ में स्वागत है। एक क्षमा निवेदन। किसी भी प्रश्नकर्ता का नाम दे पाना इसमें संभव नहीं है। इसके कुछ विशेष कारण हैं, जो समझदार हैं, समझ जाएंगे।
प्रश्न- गायत्री मंत्र तो हमारे पास युगों से रहा है। इसके होते हुए भी हमारा पतन हुआ। हमने हजारों वर्षों की दासता भोगी। अतएव अब यह कैसे कारगर सिद्ध होगा?
उत्तर- गायत्री मंत्र एक विलक्षण थाती है भारतवर्ष के पास। यह सद्बुद्धि की प्रार्थना मात्र ही नहीं हैं, इससे भी कुछ अधिक शब्द विज्ञान पर आधारित एक ऐसी ऋचा है जिसका उच्चारण सूक्ष्मजगत में परिवर्तन लाता रहता है। हम दो हजार वर्षों की गुलामी भोग इसीलिए रहे हैं कि हमने इसकी उपेक्षा की। स्मृतियों में मिलावट करके-मध्यकाल के ग्रंथकारों ने इसे नारी शक्ति के लिए व ब्राह्मण जाति को छोड़कर अन्यों के लिए जपने योग्य नहीं है, ऐसा कह दिया। पारस पत्थर तिजोरी में रखा रहे, किसी को हितकारी नहीं, करोड़ों टन सोना राष्ट्रीय कोष में हो एवं राष्ट्र सबसे भीख माँग रहा हो इसे विडम्बना नहीं तो क्या कहा जाएगा। गायत्री मंत्र को स्वार्थान्धों ने नारी शक्ति से भी छीन लिया एवं मानव मात्र से भी। परमपूज्य गुरुदेव ने अनेकानेक विरोध सहकर इस गायत्री मंत्र को जिसे शापित-कीलित घोषित कर दिया था, लाखों गृहस्थियों को, नवयुवकों को जीवन जीने की सच्ची राह की ओर मोड़ दिया। जैसे-जैसे गायत्री परिवार बढ़ता जा रहा है सतयुग की वापसी की संभावना सुनिश्चित होती जा रही है, क्या यह नहीं बताता कि यह मंत्र कितना प्रभावशाली-चमत्कारी, सामर्थ्यपूर्ण है। जो गायत्री जपता है-भाव-विह्वल होकर नित्य सविता देवता का ध्यान करते हुए इसे अंतःकरण में धारण करता है-वह ब्राह्मण स्वतः बन जाता है। आज के जातिवाद से ग्रसित युग में मात्र गायत्री मंत्र ही एकता के सूत्र में सबको बाँध सकता है।
सुझाव- एक सुझाव इसी प्रश्न के अतिरिक्त अन्य सज्जन का आया है कि “जहाँ गायत्री मंत्र संस्कृत में प्रथम पृष्ठ पर दिया जाता है, वहाँ उसी का हिंदी अर्थ भी साथ में दिया जाय तो ध्यान करते समय जप के साथ भावार्थ के ध्यान का भाव बराबर सबके मन में रहेगा। सब संस्कृत के ज्ञाता नहीं हैं, अतः साधारण व्यक्ति भी हिंदी में समझ सके, ऐसा भावार्थ लिखें।” यह सुझाव अत्यन्त उत्तम है। ऐसा हम अगले अंक से ही करेंगे एवं प्रयास करेंगे कि गायत्री मंत्र के गेय पक्ष की ओर भी सब का ध्यान जाय। उच्चारण कैसा हो-नियमादि क्या हों-यह समय-समय पर छपता रहता है किंतु एक लेख गायत्री उपासना के व्यावहारिक पहलुओं पर नियमित आता रहे, इसका ध्यान रखेंगे।
प्रश्न- पत्रिका में लेख बड़े परिश्रम के साथ एवं बड़ी शोध के बाद लिखे जाते हैं, फिर उनमें कभी-कभी तथ्यों की गलतियाँ कैसे रह जाती हैं?
उत्तर- जागरुक पाठक समय समय पर कमियों को बताते रहते हैं इससे ज्ञात होता है कि अखण्ड-ज्योति कितने ध्यान से पढ़ी जाती है। प्रयास यही रहता है कि प्रेस में जाने से पूर्व पत्रिका के एक-एक लेख की एक-एक लाइन का एक-एक अक्षर प्रामाणिकता की कसौटी पर कसकर ही दिया जाय। कभी-कभी भूलवश एक-दो गलतियाँ ऐसी रह गयी है जिनके बारे में परिजनों ने पत्र भी लिखे हैं एवं आगे यही प्रयास है कि इन्हें और कड़ाई से परखकर ही छपने में जाने दिया जाय। पत्रिका शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस में लिखी जाती है एवं प्रकाशित होती है मथुरा से। कभी-कभी हाथ से लिखे को गलत पढ़ लिया जाने पर भी तथ्य त्रुटि में बदल जाता है। डी.टी.पी. से एवं कम्प्यूटर से यह गलती अब रोकी जा सकती है एवं सारा प्रूफ यहीं पढ़ा जाकर मुद्रण हेतु भेजा जाय, ऐसी व्यवस्था बनायी जा रही है।
प्रश्न- सारे भारत व विश्व में क्या परिवर्तन हो रहा है, क्या-क्या गतिविधियाँ संस्था की चल रही हैं, इस पर ‘शांतिकुंज समाचार प्रधान’ 2 पृष्ठ नियमित आते रहें तो लाखों पाठक लाभान्वित होंगे। ‘पाक्षिक’ के माध्यम से कुछ कार्यकर्त्ताओं तक ही संदेश जाता है। अखण्ड-ज्योति द्वारा यह संदेश अनेकों तक जाएगा।
उत्तर- इस विषय में हम विचार कर रहे हैं। सीमित पृष्ठों में सभी जानकारियों से भरे लेख, साधना-मार्गदर्शन के साथ, कैसे इन पृष्ठों का आवंटन किया जाय, यह चिंतन चल रहा है। संभव हुआ तो अगले अंक से ही यह स्तंभ आरम्भ करेंगे। इसमें महापूर्णाहुति की तैयारी के विभिन्न चरण भी होंगे।
क्रमशः
इस बार इस स्तम्भ के अंतर्गत परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1989-90 में लिखी गयी ‘नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी’ पुस्तक का एक अंक अंश दे रहे हैं, जिससे परिजनों को महापूर्णाहुति का स्मरण दिलाया जा सकें।
छोटा बीज कुछ ही दिनों में बड़ा वृक्ष बन जाता है। शिलान्यास छोटे रूप में ही होता है; पर समयानुसार वह भव्यभवन बनकर खड़ा हो जाता है। यह युग संधि है। अभी जो छोटा दीख रहा है, वह अगले दिनों विशालकाय ऐसा बोधिवृक्ष बन जाएगा, जिसके नीचे तपस्वी सिद्धार्थ को बोध हुआ; वे बुद्ध बने और जिसकी शाखाएँ देश-विदेशों में दिव्य बोध का संदेश देने पहुँचती रहीं।
बीज बोने का समय थोड़ा ही होता है। वृक्ष का अस्तित्व लम्बे समय तक स्थिर रहता है। सन् 1990 से लेकर सन् 2000 तक के दस वर्ष जोतने, बोने, उगाने, खाद-पानी डालने और रखवाली करने के हैं। इक्कीसवीं सदी से वातावरण बदल जाएगा, साथ ही परिस्थितियों में भी भारी हेर-फेर होगा। इस सभी के विस्तार में एक शताब्दी ही लग जाएगी-सन् 2000 से सन् 2099 तक। इस बीच इतने बड़े परिवर्तन बन पड़ेंगे, जिसे देख कर जन-साधारण आश्चर्य में पड़ जाएँगे। सन् 1900 में जो परिस्थितियाँ थीं, वे तेजी से बदलीं और क्या से क्या हो गया-यह प्रत्येक सूक्ष्मदर्शी जानता है। जिनकी दृष्टि मोटी है, उनके लिए तो जमीन-आसमान सदा एक से रहते हैं। अगले दिन इतने आश्चर्य भरे परिवर्तनों से भरे होंगे, जिसे देखकर प्रज्ञावानों को यही विदित होगा कि युग बदल गया। अनुभव होगा कि मनुष्य का शरीर तो पहले जैसा ही है, किन्तु उसका मानस, चिन्तन, दृष्टिकोण असाधारण रूप से बदल गया और समय लगभग ऐसा आ गया, जिसे सतयुग की वापसी कहा जाय, तो अत्युक्ति न होगी।
प्राचीनकाल में समय की गति धीमी थी, परिवर्तन क्रमिक गति से होते थे। पर अबकी बार प्रवाह तूफानी गति से आया है और दो हजार वर्षों में हो सकने वाला कार्य, मात्र एक सौ वर्ष में पूरा होने जा रहा है। नयी शताब्दी नये परिवर्तन लेकर तेजी से आ रही है।
सन् 90 से 2000 तक का समय भारी उथल-पुथल का है। उसके लिए मानवी प्रयास पर्याप्त न होंगे। दैवी शक्ति की इसमें बड़ी भूमिका होगी। इसी की इन दिनों ऐसी तैयारी चल रही है, जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।
नर-पशु, नर-कीटक, नर-पिशाच स्तर के जीवन-यापन करने वालों में से ही बड़ी संख्या में ऐसे इन्हीं दिनों निकल पड़ेंगे, जिन्हें नर-रत्न कहा जा सके। इन्हीं को दूसरा नाम दिव्य प्रतिभा-सम्पन्न भी दिया जा सकता है। इनका चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा होगा, जिसका प्रभाव असंख्यों को प्रभावित करेगा। इसका शुभारंभ शाँतिकुँज से हुआ है।
युग संधि महापुरश्चरण का श्रीगणेश यहाँ से हुआ है। इसका मोटा आध्यात्मिक स्वरूप जप, यज्ञ और ध्यान होगा। उसे उस प्रक्रिया से जुड़ने वाले सम्पन्न करेंगे, साथ ही साथ पाँच-पाँच दिन के दिव्य प्रशिक्षण-सत्र भी चलते रहेंगे। साधारण प्रशिक्षणों में कान, नाक, आँखें ही काम करती हैं। इन्हीं के माध्यम से जानकारियाँ मस्तिष्क तक पहुँचती हैं; वहाँ कुछ समय ठहर कर तिरोहित हो जाती हैं, पर उपरोक्त पाँच दिवसीय शिक्षण सत्र ऐसे होंगे, जिसमें मात्र शब्दों का ही आदान-प्रदान न होगा, वरन् प्राण शक्ति भी जुड़ी होगी। उसका प्रभाव चिरकाल तक स्थिर रहेगा और अपनी विशिष्टता का ऐसा परिचय देगा, जिसे चमत्कारी या अद्भुत कहा जा सके।
सन् 1990 के वसन्त पर्व से यह सघन शिक्षण आरंभ होगा और वह सन् 2000 तक चलेगा। इन दस वर्षों को दो खण्डों में काट दिया है। संकल्प है। कि सन् 1995 की वसन्त पंचमी के दिन एक लाख दीप कुण्डों का यज्ञ आयोजन उन सभी स्थानों पर होगा, जहाँ प्रज्ञापीठें विनिर्मित और प्रज्ञाकेन्द्र संस्थापित हैं। किस स्थान पर कितने बड़े आयोजन होंगे, इसका निर्धारण करने की प्रक्रिया अभी से आरंभ हो गयी है। प्रथम सोपान सन् 1995 में और दूसरा सोपान वसन्त 2000 में सम्पन्न होगा। स्थान वे रहेंगे, जहाँ अभी से निश्चय होते जाएँगे।
इन महायज्ञ के यजमान वे होंगे, जो अगले पाँच वर्षों में नियमित रूप से साप्ताहिक सत्संगों का आयोजन करते रहेंगे। आयोजनों में दीपयज्ञ, सहगान-कीर्तन, नियमित प्रवचन और युग साहित्य का स्वाध्याय चलता रहेगा। स्वाध्याय में जो पढ़ नहीं सकेंगे, वे दूसरों से पढ़वाकर सुन लिया करेंगे। इस प्रकार की प्रक्रिया नियमित रूप से चलती रहेगी।
अपेक्षा की गयी है कि सन् 15 तक एक लाख यज्ञ हो चुकेंगे और शेष 1 लाख सन् 2000 तक पूरे होंगे। कुल दो करोड़ देवमानव इनमें सम्मिलित होंगे। यह तो आयोजनों की चर्चा हुई। इन आयोजनों में सम्मिलित होने वाले अपने-अपने संपर्क क्षेत्र में इसी प्रक्रिया को अग्रगामी करेंगे और आशा की जाती है कि इन इस वर्षों में सभी शिक्षितों तक नवयुग का संदेश पहुँच जाएगा। इस प्रयोजन के लिए युग-साहित्य के रूप में एक-एक रुपये मूल्य की बीस पुस्तकें छाप दी गयी हैं।
वाणी और लेखनी के माध्यम से अगले दस वर्षों में जो प्रचार कार्य होता रहेगा, उसका आलोक युगान्तरीय चेतना विश्व के कोने-कोने में पहुँचा देगी-ऐसा निश्चय और संकल्प इन्हीं दिनों किया गया हैं।
*समाप्त*