गहन समाधि के नीरव पलों में ईश्वरीय गान गूँजता है- याद रखो, हमेशा याद रखो, पवित्र हृदय व्यक्ति ही मेरा सान्निध्य पाते हैं। जो लोग अपनी आकांक्षाओं के कीचड़ से सने हैं, अपनी वासनाओं के अन्धेरे में घिरे हैं, वे परम चेतना का प्रकाश नहीं पा सकते। इसलिए सदा सर्वदा पवित्रता उपलब्ध करने की तीव्र इच्छा रखो। गहराई और अध्यवसायपूर्वक पवित्रता की खोज करो। केवल यही प्रयोजनीय है।
पवित्रता परम सत्य को पाने की ड्योढ़ी है। मेरा चिन्तन करने से पूर्व पवित्रता का चिंतन करो। पवित्रता वह चाभी है जिससे ध्यान रूपी द्वार खुलता है, समाधि के आगार में प्रवेश मिलता है और सर्वशक्तिमान से मिलन होता है।
मेरी शक्ति के समुद्र में स्वयं को फेंक दो। इच्छा न करो। आकांक्षाएँ न रखो। जानों कि मैं हूँ। यही ज्ञान मेरी इच्छा के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ युक्त होकर तुम्हारा उद्धार करेगा। भयभीत न होओ। क्या तुम मुझमें नहीं हो ? क्या मैं तुममें नहीं हूँ ? यह जान लो कि साँसारिक यश- वैभव, ऐश्वर्य- ख्याति सब कुछ एक दिन चली जाती है। मृत्यु जीवन के विभिन्न प्रकारों को निगलती हुई सर्वत्र विद्यमान है। मृत्यु और परिवर्तन आत्मा को छोड़कर अन्य सभी को अपने जाल में फँसाते और बाँधते हैं। इसे जानो। पवित्रता ही इस ज्ञान प्राप्ति का उपाय है। यह आधार भित्ति है। पवित्रता के साथ निर्भयता आती है और आती है स्वतंत्रता और तुम्हारे स्वरूप की अनुभूति, जिसका सार मैं हूँ।
तूफान आने दो। किंतु जब इच्छाएँ तुम्हें जलाये, सन्तप्त तुम्हें सताए और मन चंचल हो तब मुझे पुकारों। मैं सुनूँगा। लेकिन ध्यान रखो, मुझे भावनाओं के अति सूक्ष्म स्पन्दन भी सुनाई दे जाते हैं, किंतु हृदय विहीन वाणी की उच्च पुकार भी मुझ तक नहीं पहुँच पाती। हृदय से पुकारो मैं तुम्हारी सहायता करूँगा । जो मुझे आन्तरिकता पूर्वक पुकारते हैं, मैं उनका त्याग नहीं करता। केवल आन्तरिकता नहीं, अध्यवसाय पूर्वक मुझे पुकारो।
मैं विश्व नहीं, उसमें समायी आत्मा हूँ। तभी तो मुझे विश्वात्मा कहा जाता है। विश्व कितना भी विशाल क्यों न हो, पर वह मेरे लिए पंचभौतिक देह से अधिक कुछ भी नहीं। मेरी प्रीति केवल आत्मा में है। वस्तुओं की बाहरी विशालता से भ्रमित न होओ। दिव्यता न तो रूप में है और न ही विचारों में। वह शुद्ध, मुक्त, आध्यात्मिक, आनन्दपूर्ण, रूप रहित, विचार रहित चेतना में है। जो कलुष, पाप, बन्धन या सीमा से परिचित नहीं है, परिचित हो भी नहीं सकता। हे आत्मन्! अन्दर के अन्तर में तुम वही हो। इसकी अनुभूति तुम्हें होगी। इसका होना अनिवार्य है, क्योंकि जीवात्मा के जीवन का यही लक्ष्य है। स्मरण रखो कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं सर्वशक्तिमान, काल का भी काल महेश्वर महाकाल तुम्हारे साथ हूँ। तुम्हारी समस्त दुर्बलताओं के निवारण के लिए मैं शक्ति हूँ। तुम्हारे समस्त पापों के लिए मैं क्षमा हूँ। तुम्हारी पीड़ा दूर करने के लिए मैं दया हूँ। तुम्हारे कष्टों को मिटाने के लिए मैं करुणा हूँ। मेरी खोज में मैं तुम्हारा प्रेम हूँ। विश्वास करो मैं ही तुम हूँ , तुम ही मैं हो।
आत्मा के संबंध में अन्य सभी विचारों को त्याग दो ; क्योंकि इस विचार में कि तुम्हारी आत्मा मुझसे किसी प्रकार भी भिन्न है सभी अज्ञान और दुर्बलताएँ निहित हैं। ओ ज्योति स्वरूप! उठो, जानों कि मैं ही तुम्हारी आत्मा हूँ और पवित्रता ही मेरे सान्निध्य का पथ है।
प्रातः होते ही सूर्य की किरणें बाग में सोना बिखेर देती। सूर्य की स्वर्णिम रश्मियों का स्पर्श पाकर बाग के कण-कण में नवीन चेतना भर जाती। ढेर सारे रंग-बिरंगे फूल खिलखिला कर हँस पड़ते । फूलों की यह खिलखिलाहट समूची प्रकृति को अपनी ओर आकर्षित कर लेती। पक्षियों का कलरव फूलों की मादक सुगंध के संदेश को दूर-दूर तक पहुँचा देता। इस संदेश को सुनकर अनगिनत तितलियाँ वहाँ अपने आप पहुँच जाती। इन्हीं के साथ ढेर सारी मधुमक्खियाँ भी आ जाती। भंवरों को फूलों का आकर्षण कम न था। वह भी खिंचे चले आते। पूरा बाग सवेरा होते ही इनके स्वर से गुँजायमान हो जाता।
भंवरों का रंग काला था और मधुमक्खियाँ तो बेचारी मटमैले रंग की थीं। तितलियों के ठाट निराले थे। अपने रंग-बिरंगे पंखों में फूलों पर बैठी वे बड़ी सुन्दर लगती थीं। अपनी सुन्दरता पर उन्हें बड़ा घमंड भी था। वे इठला-इतरा कर कभी इस फूल पर, कभी उस फूल पर बैठा करतीं। सोचती हमारे पंख तो फूलों की पंखुड़ियों से भी ज्यादा सुन्दर हैं। हमार कारण ही तो फूलों की शोभा है। हमीं तो बगीचे का आकर्षण हैं। हम न हों तो भला यहाँ कौन आना पसंद करेगा ?
किंतु मधुमक्खियों के पंख तितलियों जैसे सुंदर न थे। वे बेचारी चुपके से आती और फूलों का रस लेकर वापस चली जातीं। उन्हें अपने काम से तनिक भी फुर्सत न थी। सारा दिन फूलों से पराग को इकट्ठा करने और उसे शहद में बदलने में लग जाता। श्रम ही जैसे उनके जीवन का मूलमंत्र था। भंवरे बेचारे तो सारा समय गुनगुनाने में ही पूरा करते। स्वयं प्रसन्न रहकर अपने संगीत से समूचे वातावरण में अपने संगीत-गुँजन का मधुर रस घोलते रहना उनका अनकहा संकल्प था। उनका यह गुँजन फूलों को अतिशय प्यारा लगता। इसे सुनकर वे सब खुशी से झूम उठते।
तितलियों के पास कोई काम न था। वे बेकार ही सारे दिन पूरे बाग में इधर-उधर मंडराया करती थीं। उनका फालतू इधर-उधर मंडराना फूलों को कतई अच्छा नहीं लगता था। वे जानते थे कि तितलियों को अपने सुंदर पंखों पर बड़ा घमंड है और वे किसी को अपने सामने नहीं गिनती। अपने घमंड में फूली-फूली फिरती रहने वाली इन तितलियों को सामान्य शिष्टाचार एवं शालीनता की भी समझ नहीं है।
जहाँ सारी प्रकृति सूर्योदय होते ही समूची सृष्टि में जीवन-संचार करने वाले भगवान सूर्य का नमन करने लगती, वहीं ये तितलियाँ अपनी अकड़ में मारी-मारी फिरतीं। यही नहीं जब-तब ये दूसरों की निन्दा करने से बाज न आती।
एक दिन यही तितलियाँ फूलों से कहने लगीं-” ये मधुमक्खियाँ और भंवरे कितने गन्दे लगते हैं। पता नहीं तुम लोग इनकी गन्दगी और बदसूरती पर क्यों ध्यान नहीं देते हो। ये मधुमक्खियाँ कितनी चिपचिपी और मटमैली, भद्दी हैं। हमारा तो इन्हें छूने का भी मन नहीं करता और भंवरे जरा देखो तो इनकी ओर कितने काले-कलूटे हैं। पता नहीं अपने को क्या समझते हैं, सारा दिन इधर-उधर भिनभिनाते फिरते रहते हैं। इन बदसूरत लोगों से तो हम बात तक करना नहीं पसंद करतीं।
ये जब कभी तुम्हारी पंखुड़ियों पर बैठते हैं, तो कतई अच्छे नहीं लगते। बल्कि एक धब्बे की तरह दिखाई देते हैं। फिर पता नहीं क्यों तुम लोग इन्हें अपने पास आने देते हो। यही नहीं इन्हें अपने ऊपर बैठने देते हो ? जबकि हम तितलियाँ कितनी सुंदर हैं। हमारे पंख भी तुम्हारी पंखुड़ियों की तरह रंग-बिरंगे कोमल और सजीले हैं। हमारे बैठने से तो बाग की शोभा और अधिक बढ़ जाती है। ऐसा लगने लगता है जैसे कोई एक और नई कली बाग में खिल गयी हो।”
तितलियों की बात सुनकर फूल खिलखिलाकर हँस पड़ और कहने लगें “तुम ठीक कहती हो, ये भंवरे काले हैं, जो तुम्हें देखने में सुन्दर नहीं लगते। मधुमक्खियाँ मटमैली हैं, जिन्हें तुमको छूने का मन नहीं करता। परन्तु सुन्दरता उतनी ही नहीं जितनी दिखाई देती हैं। वास्तविक सुन्दरता तो क्रिया एवं भावना में है। शायद इसे देखने-परखने की तुम्हारे पास समझ नहीं हैं।
हम फूलों को भी तुम हमारे रंग-बिरंगे होने के कारण ही सुन्दर कहती हो पर हमारी सुन्दरता सिर्फ हमारे रंग-बिरंगेपन में नहीं, बल्कि पराग और सुगन्ध में है। यही हमारे पुष्प जीवन का सार है। यही हमारा सद्गुण है।
ऐसे ही बहुत सारे गुण इन भंवरों और मधुमक्खियों में भी हैं। भंवरे काले ही सही, परन्तु कितना मीठा राग सुनाते हैं। इनके गुँजन से पूरी बगिया गुंजायित हो जाती है। इनका यह मधुर राग हम सब में रस का संचार करता है और ये मधुमक्खियाँ भले ही मटमैली हैं, किंतु इनकी श्रमशीलता, लोकोपकार की भावना देखते ही बनती है।
ये सारे दिन इस फूल से उस फूल तक घूम-घूमकर पराग एकत्रित करती हैं। इस पराग को अपने अनवरत श्रम से शहद में बदलती हैं। उनका यह मधुर शहद मानव सहित अन्य प्राणियों के लिए पुष्टिवर्धक रसायन है। यह न केवल स्वादिष्ट है बल्कि औषधि के काम में भी आता है।
और तुम तितलियाँ”“‘। तुम क्या देती हो लोगों को ? बेकार में ही अपनी सुन्दरता पर इठलाया करती हो। सुन्दरता के दर्प ने ही तुम्हें नकारा एवं अकर्मण्य बना दिया है।” तितलियाँ फूलों के इस कथन पर अचम्भित थीं। फूल अपनी परिचित मुस्कान के साथ कहे जा रहे थे- “दर्प और दम्भ अच्छा नहीं होता। सभी में कोई न कोई गुण होता है। भले ही वे देखने में सुन्दर न हों, परन्तु उनके सद्गुण उन्हें सुन्दर और उपयोगी बना देते हैं। तुम भी अपने गुणों का विकास करो और सही मायने में सुन्दर बनो
सलाह उनसे पूछो जिनने कोई मंजिल पायी और दृढ़तापूर्वक चलते रहकर सफलता पाई।
विज्ञान एवं विज्ञानवेत्ताओं का दावा है कि वे प्रकृति के मर्मज्ञ हैं। लेकिन यदा-कदा कतिपय ऐसे दृश्य दिखाई पड़ते हैं, जब उन्हें भी दाँतों तले उंगली दबाने को विवश होना पड़ता है। स्वीकार करना पड़ता है कि प्रकृति रहस्यमय है। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसके बारे में ‘ अप्राप्य- मनः सह ‘ ठीक ही कहा है। वेदों में आदि माता के रूप में परिभाषित प्रकृति अपने सौंदर्य एवं गौरव के साथ ऐसी अनगिनत विलक्षणताओं को संजोए है, जो सहज ही मानवीय मन को रोमांचित करती है। साथ ही मानवीय बुद्धि को बरबस ही उस अदृश्य सत्ता के प्रति श्रद्धावनत करती है।
अमेरिका के नेवरास्का क्षेत्र में शीतल एवं मीठे जल की एक बहुत बड़ी नदी है। इसका जल शहद से भी अधिक मीठा है। इसे एक गिलास से अधिक पिया नहीं जा सकता। इस अद्भुत नदी की खोज सन् १९३० में हुई थी। इसका क्षेत्रफल पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिक अभी तक इस नदी के जल की असाधारण मिठास का रहस्य नहीं समझ पाये हैं।
अपने सामान्य क्रम में नदियाँ पर्वत से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक सूखी धरती को हरियाली का वरदान देती है। मानवीय सभ्यता इन्हीं के जल से जीवन एवं प्राण पाती है। ये नदियाँ कहीं झूमती, गाती, इठलाती, शरमाती, कल-कल की आवाज करती व कहीं शाँत-सौम्य भाव से आगे बढ़ती हुई हृदय को पुलकित करती हैं, किंतु प्रकृति ने अपनी इन सन्तानों को अचरज भरी विशेषताएँ भी प्रदान की है। यह जानकर विज्ञानवेत्ता हतप्रभ हैं।
मीठे पानी की अचरज भरी नदी की ही भांति एक नदी है- ‘ रायओद विनाग्रे ‘। यह चिली तथा अर्जेन्टीना देशों के बीच रेखा की तरह बहती है। इसके जल का स्वाद ताजे नींबू पानी जैसा खट्टा है। इसमें इच्छानुसार चीनी या नमक मिला कर शर्बत व शीतल पेय का आनंद लिया जा सकता है। विचित्रताओं के क्रम में पूर्वी अफ्रीका में भूरे रंग के जल की ‘एगारीन्यर्की’ नामक नदी का पानी बीयर जैसा स्वाद लिये है। हालाँकि इसमें अल्कोहल का कोई अंश नहीं पाया जाता। इसका पानी पीने वालों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं पड़ता । बस इसका स्वाद भर शराब जैसा है। वहाँ आस-पास के लोग इसके पानी को उबाल कर पीते हैं।
इसी तरह अल्जीरिया में एक नदी ऐसी है जिसका जल स्याही सरीखा गहरा नीला है। इससे बखूबी लिखा जा सकता है। इस नदी की खोज लगभग आठ दशक पूर्व फ्राँसीसी वैज्ञानिकों ने की थी। वैज्ञानिकों के अनुसार इसके रंग का कारण है लोहा व लेड आक्साइड, जिनका रासायनिक मिश्रण अच्छी स्याही को जन्म देता है। यहाँ की भूमि में इन तत्वों का बाहुल्य होने के कारण ही इस नदी का अस्तित्व है।
विश्व में काली, पीली, संदली, सफेद आदि कई रंगों की नदियाँ हैं, जो अपने सौंदर्य से न केवल प्रकृति की सुषमा में अभिवृद्धि करती हैं, बल्कि देखने वालों को अपनी मनोहारी छटा से मुग्ध करती रहती हैं। साथ ही इनकी विचित्रता मानवीय वृद्धि को हैरत में डाल देती है। इनका यह रंग-बिरंगापन भू धरातल-किनारों व पर्वत श्रृंखलाओं के कारण ही हो सकता है। वहाँ उपस्थित रासायनिक तत्व भी इसका कारण हो सकते हैं।
अपनी रंगों भरी छटा से प्राकृतिक सौंदर्य में श्रीवृद्धि करने के साथ ही उसके रहस्यों को उजागर करने में मसाइलैण्ड की काली नदी तथा चीन की पीली नदी बेमिसाल है। आस्ट्रिया की ब्लू डेन्यूव नदी, भूरी इल्ज नदी तथा पीली इन नदी के मिलने से समृद्ध होकर आगे बढ़ती है। संगम स्थल से काफी दूर तक नदियों की पट्टीदार तिरंगी छटा देखते ही बनती है। स्पेन की ‘रिओरीरो’ नदी में एक ऐसा खनिज विद्यमान है जो हवा के सम्पर्क में आते ही पूरी नदी को खूनी लाल रंग में बदल देता है। उस क्षेत्र में हवाएँ इतनी तेज चलती हैं, नदी उतनी ही रक्तवर्ण हो जाती है।
नदियाँ व झीलों को पार करने के लिए इंसान प्रारंभ से पुलों का निर्माण करता आया है, लेकिन कुछ स्थानों पर प्रकृति ने स्वयं ही पुलों का निर्माण कार्य सम्पन्न किया है। उसके इन निर्माण कार्यों की कारीगरी देखते ही बनती है। फिनलैण्ड के पुनखारजू में एक ऐसा ही अद्भुत पुल बना है, जो प्युरो वेसी झील के आर-पार फैला है। साढ़े चार मील लम्बा और जल सतह से ७५ फीट ऊँचा यह मिट्टी का पुल पूरी तरह से प्रकृति द्वारा बनाया गया है। इसी तरह चीन में निकिएंग नदी पर ३१२ मीटर ऊँचा व ४५ मीटर चौड़ा प्राकृतिक पुल है।
प्रकृति ने अपने नैसर्ग में विचित्र एवं आश्चर्यजनक झीलों को भी संजोया हुआ है। अमेरिका में कई साबुन की झीलें हैं। इनमें से एक झील चालीस फुट से भी ज्यादा गहरी एवं ६ एकड़ भूमि में फैली हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार झील की भूमि में बहुत सा क्षार जमा हुआ है। इसी क्षार में नीचे पृथ्वी से प्राकृतिक तेल मिलकर साबुन की झील को जन्म देता है। इस झील के पानी से साबुन की आवश्यकता भली प्रकार पूरी हो जाती है।
वेस्टइंडीज के त्रिनिदा दनामक द्वीप में एक झील ऐसी है, जिसमें पानी की जगह तारकोल भरा हुआ है। यह झील २९ फीट गहरी व १ मील लम्बी है। सामान्यतया तारकोल ठोस रहता है। कभी-कभी यह बहुत सी जगह पर तरल हो जाता है, व इसमें बुलबुले उठने लगते हैं। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि यह खनिज तेल की सूखी हुई झील है, जो हजारों वर्ष पूर्व किसी भूकम्पीय उथल-पुथल के कारण अस्तित्व में आयी होगी।
आयरलैण्ड में एक अद्भुत झील है, जिसमें जो भी चीज डालो वही पत्थर की बन जाती है। जो पूरी तरह से पत्थर नहीं बन सकती, उसके चारों ओर पत्थर की तह जम जाती है, और धीरे-धीरे वह वस्तु पत्थर की तरह बहुत कठोर हो जाती है। विज्ञानवेत्ता अपने अनेकों अनुसंधान-प्रयत्नों के बावजूद इसका कोई समुचित कारण नहीं खोज पाए हैं। बस वे लोक-कथाओं में प्रचलित किसी शापित झील, जिसमें डालने से कोई भी चीज पत्थर की हो जाती है को प्रत्यक्ष देखकर हतप्रभ हैं।
तेजी से अपना रंग बदलने में गिरगिट का उदाहरण मुहावरे की भाँति प्रयोग किया जाता है। लेकिन आस्ट्रेलिया में एक झील ऐसी है, जो मौसम के अनुरूप रंग बदलती है। नवम्बर दिसम्बर में इसका रंग गहरा नीला हो जाता है, फिर जून में हरा और अगस्त सितम्बर में दूध की तरह सफेद हो जाता है। आश्चर्य की बात यही है कि झील के रंग-परिवर्तन का इसके जल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । यह तो सदैव स्फटिक के समान स्वच्छ रहता है। रंगों के इस आश्चर्य भरे सिलसिले में अफ्रीका की एक झील उल्लेखनीय है जिसका रंग सदैव केसरिया रहता है।
रंग ही नहीं कई और ऐसे अचरज भरे कारनामे हैं, जो झीलों में होते रहते हैं। हवाई द्वीप में एक ऐसी झील है जो आग उगलती है। इसे वहाँ के लोग आग की झील कहते हैं। यह झील मोना नामक ज्वालामुखी के मुहाने पर बनी है, जिसमें उबलता हुआ लावा भरा है। इस झील से हमेशा आग की लपटें एवं धुँआ निकलता रहता है।
विश्व में ऐसी भी कुछ झीलें हैं जो खारे पानी की झीलों के रूप में विख्यात हैं। अफ्रीका की असाल झील, विश्व की सबसे अधिक खारी झील है। कोई भी जानवर दुर्भाग्य से इसमें गिर जाये तो तुरन्त मर जाता है। यह समुद्र तल से ५१० फिट नीचे है। वैसे भी यह अफ्रीका का सबसे निम्नतम स्थल भी है।
इस स्थल व जोर्डान की सीमा पर स्थित मृत सागर यानी की “डेडसी” सागर से ७ से ८ गुना अधिक खारा है। इसमें कोई डूब नहीं सकता। स्नान करने वाले लोग इसमें बड़े मजे से उत्प्लावन का आनन्द लेते हैं। क्योंकि इसमें सिर व पैर पानी के ऊपर ही रहते हैं। इस स्थिति में बैठे-अधलेटे लोग खूब आनन्द में पानी के अन्दर रहते हुए पुस्तक या अख़बार पढ़ते रहते हैं। यह झील ५० मील लम्बे व १० मील चौड़े क्षेत्र में फैली हुई हैं। इसका प्रमुख श्रोत जोर्डान नदी है, जो सागर से ४२९६ फीट नीचे है। अर्थात् यह विश्व की सबसे निचली झील है।
पश्चिमी गोलार्ध की सबसे बड़ी नमकीन झील है, “ग्रेट साल्ट लेक” जो सागर से आठ गुना खारी है। इसमें कोई डूब नहीं सकता। यहाँ तक कि इसमें तैरना भी कठिन है। लोग इसमें भी बड़े मजे से उतारने का आनन्द लेते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार हर साल इसमें तीन मिलियन नमक जुड़ता है।
विचित्रताओं के क्रम में फ्रेंच नाइजीरिया की झील इसमें अपनी एक और अनूठी विचित्रता जोड़ती है। वस्तुतः यह सोडे की झील है। जो पाँच मील लम्बी व १३१२ फीट गहरी है। यही नहीं यह प्रतिवर्ष बड़ी होती जा रही है। इसका स्रोत है तिदिची का ज्वालामुखी, जहाँ से निरन्तर सोडियम कार्बोनेट निकलता रहता है। इसी तरह चेडमे ज्वालामुखी के गड्ढे में सोडे की झील बनी है। सूखने पर इसमें कार्बोनेट नमक की तरह सफेद सतह चमकती रहती है।
भारत में राजस्थान की साँभर झील भी नमक नमक उत्पादन में जगत विख्यात है। प्रतिवर्ष अक्टूबर से मई तक आठ माह के दौरान लगभग दो लाख टन नमक देने के बावजूद जून से सितम्बर तक चार माह में इसका खारापन अचानक गायब हो जाता है। इन दिनों वर्ष के दिन रहते हैं। जब अरावली की पर्वत मालाओं के झरते पानी से नदियाँ उफनने लगती हैं। इन दिनों इसका जल शुद्ध व मीठा हो जाता है। अपने जल के स्वाद परिवर्तन में तिब्बत की अरुरसी झील भी कम विख्यात नहीं है। इसका पानी प्रत्येक बारह वर्ष बाद बारी-बारी से खारे व मीठे जल में बदलता रहता है। विश्व की सबसे बड़ी झीलों में से एक आस्ट्रेलिया की सबसे बड़ी झील, ‘आयर झील’ एक अद्भुत झील है। रेगिस्तान में स्थित यह झील अद्भुत मृग-मरीचिका की तरह प्रकट होती है व विलुप्त हो जाती है। यहाँ मरुस्थलीय गर्म सतह के कारण वाष्पीकरण की प्रक्रिया बहुत तीव्र है। इसमें आने वाली नदियाँ मार्ग में ही सूख जाती हैं। वैसे यह ३६०० वर्गमील क्षेत्र में फैली हुई है। ज्यादातर इसका सूखा या कीचड़ वाला धरातल नमक की चादर ओढ़े रहता है। वर्षा की तेज बौछारों के बाद यह कुछ समय के लिए जीवन्त हो उठती है, लेकिन पानी जल्दी ही सूखने लगता है। सन् १८४० में खोज के बाद से यह सिर्फ दो ही बार पूरी तरह से भर सकी है, लेकिन दोनों ही बार कुछ ही सालों में यह पूरी तरह सूख गयी थी।
आयरलैण्ड की राष्ट्रीय प्रदेश की लोघारिया झील समय-समय पर अचानक गायब हो जाती हैं। इसका कारण इसके अन्दर स्थित एक भूमिगत नहर का होना बताया जाता है। अपने भारतवर्ष में भी अमरावती की बेगमघाट झील भी बारी-बारी से एक वर्ष पानी से भरी रहती है और अगले दो वर्ष पूरी तरह सूखी रहती है।
प्रकृति ने अचरज भरी कारीगरी में नदियों एवं झीलों के रूप में न केवल अपने आश्चर्यों, अनगिनत रहस्यों को उजागर किया है, बल्कि ऐसा भी बहुत कुछ दिया है, जो उसकी सन्तानों को सुविधा एवं सहूलियत दे। गर्म जल की झीलों का पाया जाना कुछ ऐसा ही है। जहाँ मनुष्य तो क्या जंगली जानवर तक ठिठुरती सर्दी में राहत पाते हैं। तिब्बत के बर्फीले यंगवजैन क्षेत्र में गर्म पानी की काफी बड़ी झील है, जो ६१ मीटर तक गहरी व ७३५० वर्गमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। इसका तापमान ४५ से ५८ डिग्री सेंटीग्रेड तक रहता है। तिब्बती लोग इसमें चाय गर्म करते हैं।
न्यू मेक्सिको में जेमेजक्रीक के ४०० फीट लम्बी ५० फीट ऊँची व ५० फीट चौड़ी ‘सोड’ झील गर्म झरनों द्वारा प्राकृतिक रूप से बनाई गयी है। इसी तरह कोस्टारिका के पास ज्वालामुखी पर्वत के मुहाने पर गर्म पानी की झील बना है, जो ३७ एकड़ भूमि में फैली है। यह १००० मीटर गहरी है और विश्व के सबसे बड़ा गर्म जल स्रोत के रूप में विख्यात है। इसका सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि इसके बीचो-बीच ३५० मीटर ऊँचा पानी का स्तम्भ बनता है।
इटली के टेरेष्टो से कुछ दूर पीछे पानी का एक स्रोत है। इसमें अचरज की बात यह है कि यह खारे समुद्रतल से ऊपर उठता हुआ सफेद रंग के गोल घेरे के रूप में दिखाई देता है। भारतवर्ष के हिमाचल प्रदेश में कुल्लू मणिकर्ण क्षेत्र के पहाड़ी अंचल में पार्वती नदी के तट पर उबलते हुए जल का चश्मा है, जिसका तापमान सौ डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर रहता है। तीर्थ यात्री यहाँ इसमें चावल, दाल, व अन्य चीजें पकाते हैं।
नदी व झीलों की ही भाँति झरने व जल प्रपात भी प्रकृति के अभिन्न अंग है। इनमें भी कुछ अपनी विलक्षणता के लिए चर्चित हैं। आस्ट्रिया में एक झरना ऐसा है जो प्रतिदिन पानी के ऊपर ठीक ३-३० बजे अपराह्न एक इन्द्रधनुष प्रतिबिम्बित करता है। टोर्न पर्वत में स्थित इस नेडन जल-प्रपात की इस विशेषता से वहाँ के लोग अपनी घड़ी मिलाते हैं साथ ही प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य को निहार कर प्रफुल्लित होते हैं।
स्काटलैंड का लाश क्रान जल प्रपात १००० फीट ऊँचा है। फिर भी बहुत थोड़े-से लोग ही इसे देख पाते हैं, क्योंकि यह एक बार में सिर्फ ३० मिनट तक ही गिरता है और वह भी केवल मूसलाधार वर्षा के बाद ही। रोडेशिया में शक्तिशाली विक्टोरिया जलप्रपात का एक भाग अपने चमकीले इन्द्रधनुष के लिए विख्यात हैं। इसकी रंगीन छटा वहाँ के निवासियों एवं पर्यटकों को अपने सौंदर्य के जादू से मुग्ध करती रहती है। आश्चर्यों की इस परम्परा में इटली में आरमिया के समीप स्थित झरना एक अनूठी कड़ी जोड़ता है। इसमें सर्दियों में भाप उठता हुआ गर्म पानी होता है व गर्मियों में बर्फ की तरह ठंडा जल।
इन्द्रधनुष की सतरंगी छटा अपने निरालेपन से सबका बरबस मन मोह लेती है और यदि कहीं इन्द्रधनुष के अन्दर इन्द्रधनुष वह भी कई एक साथ दिखने लगे तो, फिर उसकी मन मोहकता को बताने के लिए सम्भवतः शब्द पर्याप्त नहीं होंगे। स्पेन के एक नाविक एन्टोनियो डी उल्लाओ ने एक्वेडोर स्थित एक जलधारा की लहरों में ऐसा ही नजारा देखा। उसे एक इन्द्रधनुष के अन्दर चार इन्द्रधनुष दिखाई दिये।
उसके इस उल्लेख पर यही कहना पड़ता है कि प्रकृति कभी-कभी अपना जादुई डंडा घुमाकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती है कि मनुष्य की बुद्धि ही चकरा जाये। सिगनाइग चू (चीन) के निकट प्रातःकालीन कुहरे के कारण उत्पन्न दृष्टि भ्रम से आकाश में पाँच सूर्य एक साथ दिखाई देते हैं।
आश्चर्यों के इसी क्रम में प्रत्यक्षदर्शियों ने अद्भुत ध्वनियों की घटनाओं का भी उल्लेख किया है। चीन के ही जिंगमेगे क्षेत्र में लगभग ७० कि.मी. दूर बालू का एक टीला है, जहाँ विविध प्रकार की ध्वनियाँ निकलती रहती हैं। एक मुट्ठी रेत उठाकर इस पर डालने से मधुर ध्वनि निकलती है। यदि कोई इस पर गुलमारी लगाए तो इससे कभी रेल के गुजरने की ध्वनि आती है, तो कभी सुदूर आकाश में उड़ रहे हवाई जहाज की ध्वनि।
इटली के टिबोलो नामक पर्वत से निकल रहा फव्वारा भी अपने संगीत के लिए रहस्यमय पहेली बना हुआ है। हजारों वर्षों से निकल रहे इस फव्वारे में माउथआर्गन बजने जैसा संगीत पैदा होता है। ऐसे ही सहारा के रेगिस्तान में बाँसुरी की मीठी आवाज गूँजा करती है।
ब्रिटेन की लाफनिध नामक विशाल झील के किनारे तोप चलने जैसी आवाजें थोड़ी
थोड़ी देर बाद सुनाई देती है, जबकि यहाँ आस-पास कोई सैनिक छावनी या अड्डा नहीं हैं। इन ध्वनियों की विलक्षणता यह है कि इनके भारी विस्फोट के बावजूद झील के जल की स्थिरता में तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी तरह के धमाकों के प्रमाण सुन्दर वन डेल्टा के बोसाल गाँव व गंगा के कछार के विभिन्न स्थानों में मिले हैं। इन पर हुए कई शोध प्रयास इस रहस्य का अनावरण करने में असफल रहें हैं।
प्रख्यात थियोसोफिस्ट कर्नल एच. ए. आलकाट ने भी अपने स्मरण में वारीसाल के रहस्यमय विस्फोटों की सत्यता की पुष्टि की है। उनके अनुसार ये गर्जनाएं इतनी तीक्ष्ण और कर्णभेदी होती थीं कि मानो समीप के किसी सैनिक शिविर से तोप दागी गयी है। “नेचर” पत्रिका में जी.वी. स्काट ने ऐसी ही विलक्षण गर्जनाओं का उल्लेख ब्रह्मपुत्र नदी से ३०० मील दूर चिल्गारी गाँव में नदी तट के आस-पास किया है।
प्राकृतिक आश्चर्यों के इसी क्रम में चलते-पर्वतों एवं गाँवों का उल्लेख भी मिलता है। उत्तरी इटली में मोटेना के समीप स्थित ऐ पर्वत धीरे-धीरे सरक रहा है, जो अब तक अपने स्थान से ४० कि.मी. दूर जा चुका है। आस्ट्रेलिया का पर्यटन ग्राम ग्रामसीन भी हमेशा चलता रहता है। कारण यह है कि १००० फीट मोटी नमक की चट्टान पर टिका हुआ है, जो लगातार अपनी जगह बदल रही है।
प्रकृति में आश्चर्यों एवं रहस्यों की कमी नहीं है। ये सभी आश्चर्य और रहस्य अपनी विचित्रताओं एवं विलक्षणताओं के द्वारा उस परम् आश्चर्य की ओर संकेत करते हैं, जिसके लिए शास्त्रकारों ने “किमार्श्चय परमंग” कहकर जिज्ञासा की है। यही सभी नियमों से परे और सभी नियमों का नियामक है। हमारी-हम सबकी जिज्ञासा उसके प्रति निरन्तर बढ़ती रहें। प्रकृति अपने विविध अचरजों के द्वारा यही प्रशिक्षण देती रहती है।
जीवन एक गीत है, जिसे पंचम स्वर में गाया जा सकता है। जीवन एक स्वप्न है, जिसमें अपने को खोया जा सके तो भरपूर आनन्द का रसास्वादन किया जा सकता है। जीवन अवसर है, जिसे गँवा देने पर सब कुछ हाथ से गुम हो जाता है।
- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
सन् १८५७ की प्रथम भारतीय क्रान्ति का वेग अपनी पूरी तीव्रता पर था। बस ऐसा लगता था, सारे देश की धरती से अँग्रेजों का शासन अब गया, तब गया। अंग्रेज सरकार हैदराबाद राज्य को भी इसकी लपटों से बचा न सकी। यहाँ पर सर सालारजंग नामक एक अँग्रेज परस्त दीवान शासन चला रहा था। उसकी निर्दयता के किस्से मशहूर थे।
हैदराबाद के समीप जौरापुर नाम की छोटी सी रियासत थी। यहाँ के राजा किशोरवय का था। हैदराबाद के जालिम दीवान और बेईमान निजाम की नजर जौरापुर पर थी।
जौरापुर का यह राजा देशप्रेमी था। १८५७ की क्रान्ति की चिंगारी उसके हृदय में ज्वाला बन चुकी थी। रुहेलखण्ड में रहने वाले पठानों और अरब लोगों की एक सेना बनाई और अंग्रेज सेना पर बिजली बनकर टूट पड़ा ।
अँग्रेजों के लिए उसकी वीरता सिरदर्द बन गयी। चालाक दीवान सालारजंग ने उसे फसाने के लिए एक कुटिल चाल चली। तेजस्वी और पराक्रमी बालक राजा दीवान की धूर्तता को न भाँप सका और उसकी चाल में फँस गया। सालारजंग ने उसे कैद कर लिया।
कैद करने के पश्चात सालारजंग ने तरुण राजा से पूछा-बोलो तुम्हारे कितने साथी हैं? साथियों के नाम भी बताओ।”
“नहीं बताऊँगा । मैं किसी का नाम नहीं बताऊँगा। जोशपूर्वक तरुण राजा ने कहा।
उससे राज उगलवाने के लिए फिरंगियों ने दूसरी तरकीब काम में ली। उस बालक कैदी के पास उसके एक परिचित अंग्रेज अफसर निडोज टेलर को पूछताछ के लिए भेजा। निडोज टेलर ने बड़े प्यार के साथ उससे पूछा-” देखो बेटा! तुम तो अंग्रेज सरकार की नीति से अच्छी तरह परिचित हो। उसके पूर्व कि वे तुम्हारा अहित करें, तुम अपनी बुद्धि से काम लो और अपने साथियों के नाम बता दो।”
“टेलर अप्पा ! मैं आपसे आज भी उतना ही प्रेम करता हूँ, जितना पहले करता था। लेकिन यह मेरे देश का सवाल है। मैं अपने प्राण बचाने के लिए अपने देशवासियों के साथ गद्दारी नहीं कर सकता। अँग्रेज सरकार मुझे तोप से ही क्यों न उड़ा दे। देशद्रोही की तरह, कायर की तरह विदेशियों की गुलामी स्वीकार करने से तो शूरवीर की तरह शहीद हो जाना अधिक अच्छा रहेगा।”
“मेरी बात मान लो। मैं तुमसे बड़ा हूँ। मैं तुम्हें गलत सलाह नहीं दे सकता। मैं तुम्हारा अहित नहीं चाहता।” अँग्रेज टेलर ने उसे मनाने की कोशिश की।
“नहीं टेलर अप्पा ! जौरापुर के बालक राजा के स्वर में पर्याप्त दृढ़ता थी- “मैं अपने देश के साथ, अपने साथियों के साथ गद्दारी नहीं कर सकता।”
“समझ से काम लो मेरे बेटे!” टेलर के स्वर में उसे न समझा पाने की हताशा झलकने लगी, नाम बता दो और सम्मान सहित आजाद हो जाओ।”
“धिक्कार है ऐसी आजादी को .... टेलर अप्पा, मैं उन लोगों में से नहीं हूँ, जो यातना के भय से टूट जाते हैं। आप देखना मैं शहीद हो जाऊँगा, लेकिन अपने साथियों का नाम नहीं बताऊँगा
जौरापुर का राजा किसी भी तरह टस से मस नहीं हो रहा था। हार कर निडोज टेलर ने एक नयी चाल चली। अगले दिन वे पुनः बालक राजा के पास पहुँचे और स्नेहपूर्वक पूछा-कहो बेटे कैसे हो ?”
“ कल से अधिक मजबूत। अपने इरादे पर अटल।”
“ मैं यह बात नहीं कर रहा हूँ। अच्छा तुम मेरी एक बात मानोगे ?”
“ सिर्फ नाम बताने को न कहें बाकी आपकी सभी बातें मानने के लिए तैयार हूँ।” “तो फिर चलो अँग्रेज रेजीमेण्ट से मिलकर समझौता कर लो।”
“कैसा समझौता?” जौरापुर के राजा ने चौंककर कहा, फिर कुछ पल रुककर मुस्कुराते हुए बोला-” टेलर अप्पा! आप समझौते की बात कर रहें हैं। मैं तो उनसे मिलना तक पसंद नहीं करता। मैं जौरापुर का राजा हूँ राजा। तोप के मुँह पर मरना पसंद करता हूँ और यह मौत उतनी बुरी नहीं है, जितनी कि देश के साथ गद्दारी कर जीने में है।”
निडोज टेलर हारकर बिना कुछ बोले चले गये। वे अंग्रेज रेजीमेण्ट के पास पहुँचे और जौरापुर के बालक राजा का निर्णय सुना दिया। अंग्रेज रेजीमेण्ट ने उसे फाँसी की सजा सुना दी।
निडोज टेलर पुनः उस साहसी किशोर के पास पहुँचे। बोले- “बेटा! मुझे दुःख है कि अँग्रेज रेजीमेण्ट ने तुम्हें माफ नहीं किया।”
“ मैं थूकता हूँ ऐसी माफी पर।” जोश में वह बोल पड़ा ।
“ टेलर अप्पा! जीवन में मौत सिर्फ एक बार आती है अब यह हमारा काम है कि वह शान से आये। हम उसका स्वागत करें। हम यदि कर्तव्य से गिरते हैं तो वह हमारे लिए कलंक बन जायेगी।”
“ मेरे लिए कोई काम हो तो कहो?” निडोज टेलर ने संवेदना जताते हुए कहा।
“ हाँ टेलर अप्पा! आप से एक प्रार्थना है। आप ऐसी व्यवस्था करवा दें कि मुझे फाँसी न देकर तोप से उड़ाया जाये। मेरी दृष्टि में फाँसी चोरों के लिए है और मैं चोर नहीं देशभक्त हूँ। अगर आपने मेरे लिए तोप के मुँह से उड़ने का प्रबन्ध कर दिया तो आप स्वयं देखेंगे कि मैं कितनी शान और शान्ति के साथ भारतमाता की जय बोलते हुए तोप के मुँह की ओर अटल खड. रहूँगा।”
“नहीं नहीं।” टेलर ने लगभग काँपते स्वर में कहा-मैं कोशिश करूँगा कि तुम्हें मृत्युदण्ड न दिया जाये। अच्छा तो यही रहेगा कि तुम्हें काला पानी भेज दिया जाये।”
“आप ऐसा न करें टेलर अप्पा। काले पानी की सजा से तो मैं तोप की मौत अधिक बेहतर समझता हूँ। कैद तो मेरी प्रजा का छोटे से छोटा पहाड़ी आदमी भी रहना पसन्द नहीं करेगा, फिर मैं तो उनका राजा हूँ। जिऊँगा तो एक वीर की तरह और मरूँगा तो भी एक वीर की तरह।
जौरापुर के राजा के इस वक्तव्य के बाद निडोज टेलर ने बहुत दौड़-धूप की और किसी तरह उसकी सजा को परिवर्तित करवा कर ही दम लिया। लेकिन टेलर को क्या मालूम था कि यह देशभक्त बालक काला पानी की कैद कभी भी स्वीकार नहीं करेगा ?
जिस दिन उसे काला पानी के लिए ले जाया जा रहा था, तभी उसने अपने पास वाले सिपाही की पिस्तौल छीनकर पलक झपकते ही अपने ऊपर गोली दाग ली।
सभी उसके इस बलिदान पर हतप्रभ रह गये। जौरापुर का बारह वर्षीय बालक राजा अब अमर शहीद सुवीर कृष्णमाचारी हो गया। अनेक कंठ बरबस उसकी जय बोल उठें।
उपासनाएँ सफल क्यों नहीं होती ? यह सवाल हर किसी के मन में चक्रवात की तरह घूमता रहता है। सालों-साल पूजा की घण्टी बजाने, माला घुमाने, नाक दबाने, भोग-प्रसाद का लालच देने तथा ऐसी ही अनेक चित्र-विचित्र क्रियाएँ करते रहने वालों को अन्ततः निराशा ही हाथ लगती है। बड़े ही हताश स्वर में वह यह कहते फिरते हैं कि अब तो घोर कलियुग है। इस कलिकाल में भी भला भगवान किसी को दर्शन देते हैं। ऐसा कहते हुए वे भूल जाते हैं कि श्री अरविन्द जैसे ऋषि, स्वामी दयानन्द जैसे तपस्वी, युग नायक विवेकानन्द जैसे संन्यासी, मीरा जैसी भक्त, महर्षि रमण जैसे ज्ञानी इसी युग में हुए हैं।
प्राचीन काल के इतिहास-पुराण देखने से पता चलता है कि कितने ही साधकों और तपस्वियों ने कठिन उपासनाएँ करके अद्भुत शक्तियाँ, विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। स्वयं में वे इतने समर्थ हुए कि दूसरों को अपनी साधना का एक अंश देकर वरदान-आशीर्वाद से लाभान्वित कर सकें। भारत ही नहीं संसार भर का पुराण-साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएँ देवप्रदत्त थीं। ऋषियों, तपस्वियों, संतों के जीवन चरित्रों में अधिकाँश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएँ थीं और उन्हें उन्होंने तप-साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था।
साथ-साथ यह भी देखने में आता है कि घर-बार छोड़कर पूरा समय देवाराधन में लगाने वाले व्यक्ति साधना आरम्भ करने के बाद और भी अधिक गई-गुजरी स्थिति में चले गये। न तो उनमें कोई प्रत्यक्ष विशेषता देखी गयी, न आत्मिक महत्ता, न उन्हें सुख प्राप्त था, न शान्ति। स्वास्थ्य से लेकर सम्मान तक कोई भी सम्पदा उनके पास नहीं थी और न विवेक से लेकर आत्मबल तक कोई प्रतिभा-विशेषता उपलब्ध हुई, वरन् जिस स्थिति में उन्होंने वह उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई, पीछे उनकी स्थिति हर प्रकार बिगड़ती ही चली गयी। भौतिक सुख-सम्पत्ति ना सही, आत्मिक शान्ति और विभूति का प्रकाश मिला होता, तो भी संतोष किया जा सकता था, पर वैसा भी वे कुछ ना प्राप्त कर सके।
यह स्थिति स्वभावतः मन को असमंजस में डालती है। उसी प्रक्रिया का अवलम्बन करने से एक को लाभ, एक को हानि ऐसा क्यों ? एक को सिद्धी दूसरे को निराशा यह किसलिए ? कैसे? वही देवता, वही मंच, वही विधि, एक की उपासना फलित, एक की निष्फल, इसका क्या कारण ? यदि भगवान या देवता और उनकी उपासना अन्धविश्वास है तो फिर इससे कितने ही लाभान्वित क्यों होते हैं ? यदि सत्य है तो उससे कितनों को ही निराश क्यों होना पड़ता है ? जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हर किसी को गर्मी, रोशनी देता है फिर देवता और उनकी उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ क्यों ?
इस उलझन पर अनेक दृष्टियों से विचार करने के उपरांत इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि देवता या मंत्रों में जितनी अलौकिकता दिखाई देती है, उससे लाभान्वित हो सकने की पात्रता साधक में होना निहायत जरूरी है। मात्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना इस संदर्भ में सर्वथा अपर्याप्त है। तेज धार वाली तलवार से सिर काटने की क्षमता है, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन वह क्षमता सही सिद्ध हो सके इसके लिए चलाने वाले का बाहुबल, साहस एवं कौशल भी आवश्यक है। बिजली में सामर्थ्य की कमी नहीं, पर उससे लाभान्वित होने के लिए उसी प्रकार के यंत्र चाहिए। यंत्र-उपकरणों के जमाव में बिजली का उपयोग व्यर्थ ही नहीं होता अनर्थ मूलक भी बन जाता है।
स्वाति के जल से मोती वाली सीपें ही लाभान्वित होती हैं। अमृत उसी को जीवन दे सकता है, जिसका मुँह खुला हुआ है। प्रकाश का लाभ आँखों वाले ही उठा सकते हैं। इन पात्रताओं के अभाव में स्वाति का जल, अमृत अथवा प्रकाश कितना ही अधिक क्यों न हो उससे लाभ नहीं उठाया जा सकता है। ठीक यही बात उपासना के सम्बन्ध में लागू होती हैं। घृत सेवन का लाभ वही उठा सकता है, जिसकी पाचन-क्रिया ठीक हो। देवता और मंत्रों का लाभ वे ही उठा पाते हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व के भीतर और बाहर से विचार और आचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है।
औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है, जो बताए हुए अनुपात और पथ्य ठीक तरह से प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म-उपासना फिर देव-उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं। इससे पहली आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान नहीं देते हैं। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाए उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा। निरन्तर वर्षा होते रहने पर भी आँगन में रखे हुए पात्रों में उतनी ही जल रह पाता है, जितनी उनमें जगह होती है। अपने भीतर की जगह को बढ़ाए बिना कोई बर्तन बादलों से बड़ी मात्रा में जल प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकता। देवताओं और मंत्रों से लाभ उठाने के लिए भी पात्रता नितान्त आवश्यक है।
रुचि, प्रवृत्ति एवं क्रिया की दृष्टि से यदि मनुष्य उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से अपने को सुसम्पन्न कर ले तो उनके कषाय-कल्मषों की कालिमा हट सकती है और अन्तःकरण तथा व्यक्तित्व शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र एवं निर्मल बन सकता है। ऐसा व्यक्ति मंत्र उपासना, तपश्चर्या का समुचित लाभ उठा सकता है और देव-शक्तियों के अनुग्रह का अधिकारी बन सकता है। जब तक यह पात्रता न हो, तब तक उत्कृष्ट वरदान माँगने की दूरदर्शिता ही उत्पन्न न होगी। ऐसी दशा में साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जाये, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा। आसुरी भूमिका पर कहीं कोई सिद्धि मिल भी पायी तो अन्ततः उसी के लिए घातक सिद्ध होगी। अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा, उतना ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़ों पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा-उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही पा लेते हैं।
भगवान एवं देवता कहाँ हैं ? किस स्थिति में हैं? उनकी शक्ति कितनी है? इन सवालों का सही जवाब यह है कि वह दिव्यचेतना सत्ता निखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और पग-पग पर उसके समक्ष जो अणुगति जैसी व्यस्तता के कार्य प्रस्तुत हैं, उन्हें पूरा करने में संलग्न है। उनके समक्ष असंख्य कोटि प्राणियों की जड़-चेतन की बहुमुखी गतिविधियों को संभालने का विशालकाय काम पड़ा है, सो उसी में लगी रहती है। एक व्यवस्थित नियम और क्रम उन्हें इन ग्रह-नक्षत्रों की तरह कार्य संलग्न रखता है। व्यक्तिगत संपर्क में घनिष्ठता रखना और किसी की भावनाओं के उतार-चढ़ाव की बातों पर बहुत ध्यान देना उनके लिए समग्र रूप से सम्भव नहीं। वे ऐसा करती तो हैं, पर अपने एक अंश प्रतिनिधि के द्वारा दिव्य सत्ताओं ने हर मनुष्य के भीतर उसके स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीरों में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, जैसे आवरणों में अपना एक-एक अंश स्थापित किया हुआ है और यह अंश प्रतिनिधि द्वारा सम्पन्न होता है।
व्यक्ति की अपनी निष्ठा, श्रद्धा भावना के अनुरूप यह देव अंश समर्थ बनते हैं और दुर्बल रहते हैं। एक साधक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो तो उसका देवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त समर्थ दृष्टिगोचर होगा और साधना की आशाजनक सहायता करेगा। दूसरा साधक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अन्तरंग में अवस्थित देवअंश पोषण के अभाव में भूखा-नंगा रोगी-दुर्बल बनकर एक कोने में कराह रहा होगा। पूजा भी नकली दवा की तरह भावना रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न बना सकेगी और वह विधिपूर्वक मंत्र, जप आदि करते हुए भी समुचित लाभ न उठा सकेगा।
विराट् ब्रह्म कितना ही महान् क्यों न हो-व्यक्ति की इकाई में वह उस प्राणी की परिस्थिति में पड़ा हुआ लगभग उससे थोड़ा ही अच्छा बनकर रह रहा होता है। अन्तरात्मा की पुकार निश्चित रूप से ईश्वर की वाणी है, पर वह हर अन्तःकरण में समान रूप से प्रबल नहीं होती। सज्जन के मस्तिष्क में मनोविकारों का एक झोंका घुस जाये तो तुरन्त उसकी अन्तरात्मा प्रबल प्रतिकार के लिए उठेगी और उसे ऐसी बुरी तरह धिक्कारेगी कि पश्चाताप ही नहीं, प्रायश्चित किये बिना चैन न पड़ेगा । इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति जो निरन्तर क्रूर कर्म ही करता रहता है, उसकी अन्तरात्मा यदा-कदा बहुत हल्का सा प्रतिवाद ही करेगी और वह व्यक्ति उसे आसानी से उपेक्षित करता रहेगा। ईश्वर दोनों के हृदय में हैं। दोनों की अन्तरात्मा की प्रकृति एक सी है-दोनों ही अपना कर्तव्य निबाहती हैं। पर दोनों की स्थिति सर्वदा भिन्न है। सज्जन ने सत्प्रवृत्तियों को पोषण देकर अपनी आत्मा को निर्मल बनाया है। उसकी प्रबलता कभी शाप-वरदान के चमत्कार भी प्रस्तुत कर सकती है, पर दूसरे ने अपनी आत्मा को निरन्तर पददलित करके उसे भूखा रखकर दुर्बल बना रखा है। वह न तो कभी प्रबल प्रतिरोध कर सकती है और न कभी उसके द्वारा ईश्वर की पुकार आदि की जाय तो उसका कुछ प्रतिफल निकल सकता है।
इस तथ्य को हमें समझना ही होगा। न समझने से हमें असमंजस और भ्रम में पड़ना पड़ेगा, निराशा हाथ लगेगी और सम्भव है, तब उपेक्षा ही नहीं नास्तिकता भी सामने आ खड़ी होगी। तथ्य यही है कि हमने अपने इष्टदेव को अपनी श्रद्धा, निष्ठा एवं स्वयं की प्रवृत्तियों द्वारा इतना परिपुष्ट नहीं बनाया कि वे हमारी प्रार्थना के अनुरूप उठ खड. होने और सहायता कर सकने में समर्थ होते। द्रौपदी के कृष्ण अलग थे, वे एक पुकार सुनते ही दौड़कर आये। हमारे कृष्ण अलग हैं, वे लगभग लंघन में पड़े रोगी की तरह, पुकार सुनने और सहायता के लिए खड. होने का सामर्थ्य उनके हाथ-पैरों में है नहीं, फिर वे प्रार्थना का क्या उत्तर दें ?
हर किसी के मस्तिष्क में गणेश विद्यमान हैं जो बुद्धि-विकास की साधना करके अपने गणेश को परिपुष्ट बना लेगा, वह विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जड़ में पानी नहीं देगा उसके विनायक भगवान सूखे, मूर्छित एक कोने में पड़े रहेंगे। लड्डू-खीर खिलाने, स्तोत्र-पाठ करने पर भी वे कुछ सहायता नहीं कर सकेंगे। बुद्धिमान और विद्वान बनना सम्भव न होगा। यही बात अन्य देवशक्तियों के बारे में भी है।
जो लोग उपासना की जादूगरी, बाजीगरी जैसी कोई चीज मानकर चलते हैं, उनकी कल्पना किन्हीं ऐसे देवताओं की होती है, जो स्तुति, “पूजा” प्रसाद के तनिक से प्रलोभन से ललचाए जा सकते हैं और उनसे इन नगण्य उपहारों के बदले मनचाहे लाभ उठाए जा सकते हैं। ज्यादातर पूजा-उपासना करने वालों मनोभूमि इसी स्तर की होती है। वे विधि-विधानों कर्मकाण्डों या उपहारों का ताना-बाना बुनते रहते हैं और उसी खुराफात से अपना उल्लू सीधा करने की तरकीबें भिड़ते रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मण्डली इसी स्तर की होती है। वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते हैं या कुछ और खेल खड. करके भगवान की आँखों में धूल झोंक कर अपने असली स्वरूप को छिपाते हुए भक्त को मिलने वाले लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।
सच तो यह है कि न भगवान इतने भोले हैं, न कोई देवता इतना सरल है, न कोई मन्त्र ऐसा है जिसे कुछ बार जप-रट कर मनचाहा लाभ उठाया जा सके। उपासना एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है। आध्यात्मिक विद्या अपने आप में एक उच्चस्तरीय साइंस है, जिसमें नियम एवं प्रयोजनों को समझ कर तदनुकूल चलने से लाभान्वित हुआ जा सकता है। यदि यह तथ्य लोगों ने समझा होता तो अध्यात्म मार्ग की देहरी पर पैर रखते ही पहला प्रयोग अपने अन्तरंग में मूर्छित, पददलित, बुभुक्षित, मलिन पड़े हुए अपने अन्तर्यामी इष्टदेव को संभालने-संजोने का प्रयत्न किया होता। उन्हें समर्थ एवं बलवान बनाया होता। इस प्रथम प्रयोजन को पूरा करने के बाद ही मन्त्र, जप, उपासना, पूजा, स्तोत्र आदि के चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निश्चित रूप से हर किसी को उपासना में आश्चर्यजनक सफलताएँ मिली होती और तब किसी को निराश होने अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
संसार में बिखरी सम्पदाओं का उपयोग कितना और कैसे किया जाय- यह पूर्णतः चेतना पर निर्भर है। सीमित में संतोष और असीम की आकांक्षा- यह भी उसी की परिणति है ; पर यहाँ एक बात निश्चित है कि सीमा का उल्लंघन हर प्रकार से पीड़ादायी है। चेतना पर यदि भोगवादी हविश सवार होने लगे, तो इसे अशुभ का आगमन ही समझना चाहिए। गधा धोबी पर चढ़कर चले और साइकिल को सिर पर लादकर चलना पड़े, तो यह असमंजस की बात है। असामान्य स्थिति की बात और है , सामान्य व्यवहार में तो इसे असहनीय और अशोभनीय ही मानना पड़ेगा ।
वस्तु सत्ता जब मानवी चेतना पर अधिकार करती है, उसे जब पूरी तरह सम्मोहित और नियंत्रित करती है, तो इस प्रक्रिया में चेतना का पराभव महसूस किया जाता है। तत्त्ववेत्ताओं ने व्यक्तित्व दोष के रूप में इसके दो कारण गिनाये हैं-लोभ और मोह। यह वास्तव में मानवी मर्यादा का अतिक्रमण है, इसलिए इसकी निन्दा की गयी है। वस्तु की उचित आवश्यकता की पूर्ति के लिए नीतियुक्त उपायों से साधन उपार्जित किये जायें और उनका सीमित उपयोग निर्वाह के लिए करने के उपरान्त जो बचे, उसे लोकोपकारी प्रयोजनों में खर्च कर दिया जाये। यही वस्तुओं के, पदार्थों के, धन वैभव के उपार्जन एवं उपयोग की मर्यादाएँ हैं। उतने में निन्दा की कोई बात नहीं। लिप्सा की भर्त्सना इस कारण की गयी है कि उसके कारण अति उपयोग और संग्रह की ललक उत्पन्न होती है। यह लालसा जब बढ़-चढ़ कर सामने आती है, तो नीति-नियम जैसे बन्धन शिथिल पड़ जाते हैं और व्यक्ति वह सब कुछ कर गुजरने में भी संकोच अनुभव नहीं करता, जिसे आचारशास्त्र के हिसाब से पाप और नीतिशास्त्र के अनुसार अपराध माना गया है। इसे न तो व्यक्ति के लिए हितकर कहा जा सकता है, न समाज के लिए उचित। असंतोष और अराजकता दोनों इससे बढ़ते हैं।
व्यामोह को अनुचित इस कारण से ठहराया गया है कि घोर आसक्ति में पड़कर कहीं ऐसा और इतना कुछ न होने लगे कि मर्यादाओं और वर्जनाओं का अन्तर ही समाप्त हो जाये। मित्रता बुरी नहीं ; पर मित्रतावश जब अनुपयुक्त को वरीयता और योग्य की उपेक्षा होने लगे, तो इससे अन्याय पनपता और अनीति को बल मिलता है। जिनसे मोह होता है, उन्हें अत्यधिक महत्व मिलता है और उतनी सुविधाएँ दी जाती हैं, जो उन्हें उद्धत, अहंकारी, आलसी, अपव्ययी बनाती चलती हैं। मोह के कारण हम जिन्हें भी अनुचित उपहार देते हैं, वे तत्काल तो प्रसन्न होते हैं, पर पीछे प्रखरता नष्ट हो जाने के कारण घाटे में ही रहते हैं। मोह समवितरण और सम्बद्ध क्षेत्र में कर्तव्य-पालन कर सकने का मार्ग रोकता है। प्रेम में सद्गुणों के आधार पर मैत्री पनपती और श्रद्धा एवं घनिष्ठता के रूप में विकसित होती है, जबकि मोह के आधार पर अनुचित लाभ देकर उपकृत किये गये व्यक्ति पोषणकर्ता के लिए घातक बनते हैं।
यहाँ उद्देश्य व्यवहार दर्शन बताना नहीं, वरन् यह स्पष्ट करना है कि मनुष्य में चेतना का स्थान सर्वप्रमुख है। दुनिया की समस्त चीजें और यह काया उसी की सुविधा, प्रसन्नता के लिए है ; किंतु जब वे ही प्रमुख हो जाती हैं और चेतना गौण तो बड़ी कठिनाई पैदा होती है। इन दिनों यही हुआ है। पदार्थ सत्ता के आकर्षण में मनुष्य इस कदर पागल हुआ है कि उस कुचक्र में पड़कर आत्मचेतना अपना मूलभूत वर्चस्व ही गँवा बैठी, फलतः जिस मनुष्य को सृष्टि का स्वामी होना चाहिए, वो अब पैरों में लोटने वाले नौकर की तरह कृतदास बना हुआ है। सृष्टि का मुकुटमणि प्राणी होने के नाते जिसे सुख-शान्तिमय स्वर्गीय जीवन गुजारना चाहिए, वही नर्कतुल्य कष्ट पा रहा है। उसके लिए यह संसार स्वर्ग-सुख लुटाने वाली आनन्द-भूमि नहीं, रौरव की यातनास्थली बना हुआ है। इसका एक मात्र कारण चेतना की सत्ता को जड़-शक्तियों के द्वारा अधिकार किया जा सकता है और ऐसी स्थिति उत्पन्न की जा सकती है, जिसमें उसे अपनी स्वतंत्र चेतना के विरुद्ध किसी भी विचारधारा को मानने और अपनाने के लिए बाधित किया जा सके।
पालतू पशु मालिक के जितने आज्ञाकारी होते हैं, कदाचित वही स्थिति विज्ञान अपने निरंकुश अधिकार के बाद मनुष्य के समक्ष उत्पन्न करे और उसे वैसा ही चाहने और करने के लिए मजबूर कर दे जैसा कि सेवक का स्वामी के प्रति तथा सर्कस के शेर का उसके प्रशिक्षक के प्रति होता है। शरीर के बलपूर्वक उपयोग करने पर प्राणी की स्वतंत्र चेतना विरुद्ध न सही, असहमत तो बनी ही रहती है और भीतर ही भीतर उस स्थिति से छूटने की चेष्टा एवं इच्छा बनाए रहती है ; पर विज्ञान सम्मोहित व्यक्ति तो वैसा भी कुछ न कर सकेगा। स्वेच्छया समर्पण के लिए बाधित किया गया व्यक्ति यही समझता रहेगा कि वह निजी इच्छा से ही सबकुछ कर रहा है ; प्रस्तुत निर्णय उसके स्वयं के ही किये हुए हैं, जबकि उसकी निजी
मौलिकता, चेतना, इच्छा, प्रकृति एवं आस्था पूरी तरह मूर्च्छना की स्थिति में मृतप्राय पड़ी होगी और उसके चिन्तन को दूसरे लोग कठपुतली की तरह संचालित कर रहें होंगे।
गहन अनुसंधान के उपरान्त अँग्रेज विज्ञानी डब्ल्यू. एच. थोरपे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि शरीर में रक्त चढ़ने जैसा ही सहज कार्य तंत्रिका कोशिकाओं में इच्छानुकूल आदतों का प्रवेश करा सकना भी है। अगले दिनों इसे इतनी ही सरलता और कुशलता पूर्वक सम्पन्न किया जा सकेगा तथा मनोनुकूल इच्छाओं का आरोपण एवं प्रतिकूल मान्यताओं की धुलाई इस प्रकार की जा सकेगी, जिसे देखकर लोग न सिर्फ दंग रह जाएँगे, वरन् यह निर्णय करना भी उनके लिए कठिन साबित होगा कि उक्त आस्था उनकी निजी है या बाहर से थोपी हुई।
इस दिशा में शोध-अनुसंधान जारी है कि स्नायु संस्थान के किस भाग में किस प्रकार की क्षमता के संचालक-नियामक केन्द्र हैं ; उन पर यदि विद्युतीय आघात किये जाएँ तो सम्बन्धित अंगों पर उसकी कैसी प्रतिक्रिया होगी अथवा उन केन्द्रों की क्षमताओं पर उसका क्या असर पड़ेगा ? देखा गया है कि विद्युतीय झटकों से गहरी दबी पड़ी स्मृतियाँ स्मृतिपटल पर वैसे ही तत्काल उभर कर सामने आती हैं, जैसे वह अभी-अभी आँखों के सामने ही घटित हुईं हों। इस आधार पर डब्ल्यू. जी. पेनफील्ड जैसे स्नायु विज्ञानियों ने यह मन्तव्य प्रकट किया है कि अतीत की घटनाओं और दृश्यावलियों को वर्तमान में अनुभव कर सकना नितान्त सम्भव है।
आर. ए. डार्ट ने अपनी खोज में पाया कि चिन्तन चेतना के आधार स्तम्भ आर॰ एन॰ ए॰ नामक रसायन की मात्रा को चेतना की विभिन्न परतों के हिसाब से घटा-बढ़कर प्राणियों के चिन्तन की विधि एवं दिशा में परिवर्तन सम्भव है। अमेरिका के तंत्रिका विज्ञानी डा. रोजरहारपी सुदीर्घ काल से संचित अवांछनीय आदतों से पिण्ड छुड़ाने और उनके स्थान पर नये अभ्यासों को गहराई से अपना लेने सम्बन्धी अपनी शोध में सफल हुए हैं।
चूहे-बिल्लियों पर भी इस प्रकार के प्रयोग पूर्णतः सफल हुए हैं। प्राणी शास्त्री ई॰ ओरोवान ने चूहों पर आँशिक नियंत्रण की ऐसी विधि ढूँढ़ निकाली है, जिससे बिल्लियों के प्रति चूहों का आचरण एकदम बदल जाता है। जो चूहे बिल्ली को देखते ही अपने बिलों में दुबक जाया करते थे, वही प्रयोग के पश्चात इतने निडर बनते देखे गये जैसे वे चूहे नहीं शेर हों। अपनी पुस्तक “ए स्टडी आफ विहेवियरल कंट्रोल इन डोमेस्टिक एनिमल्स” में लिखते हैं कि जब चूहों के मेड्युला ओबलोंगाटा वाले हिस्से के अग्रभाग में तनिक गहराई पर बिजली के झटके दिये गये, तो उनका व्यवहार ऐसा हो गया, मानों वे गहरे नशे की स्थिति में हों। उनका उछलना-कूदना एकदम बन्द हो गया और एक जगह पड़े-पड़े वे इधर-उधर लुढ़कते रहे। उनका शरीर-संतुलन बिगड़ गया और पैरों के बल खड़ा हो सकना लगभग असम्भव हो गया।
अब यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया है कि विद्युत, रेडियो और ध्वनि तरंगों के अतिरिक्त भी ऐसे कितने ही रसायन हैं, जिनसे एक हद तक इस प्रकार के कार्य बिना किसी अड़चन के सम्पन्न किये जा सकते हैं। मादक द्रव्यों का प्रभाव पहले से ही विदित है। अब रासायनिक पदार्थों से चिन्तन को मोड़ने, मरोड़ने और इच्छित प्रयोजन की दिशा में घसीट ले जाने में भी सफलता की आशा की जा सकती है। ऐसी कई दवाएँ पहले ही बना ली गयी है, जिनसे दर्द की अनुभूति को घटाया-मिटाया जा सके। यह रसायन रेटिक्यूलर एक्टिवेटिंग सिस्टम को इस कदर जकड़ लेती है कि पीड़ा की अनुभूति हो ही नहीं पाती, भले ही उस दौरान अंगों की कटाई-छँटाई ही क्यों न चल रही हो। विशेषज्ञों का कथन है कि रेटिक्यूलर तंत्र की गतिविधियों को जिस परिमाण में समझा और प्रभावित किया जा सकेगा, उतनी ही मानवी सम्वेदनाएँ नियमित-नियंत्रित हो सकेंगी। तब बिना किसी घटना के भी हर्ष और विशाद की प्रतीति कराई जा सकेगी।
ऐसे अनुसन्धानों से लाभ की सम्भावना है। निश्चय ही इनसे पीड़ितों को फायदा होगा ; पर ऐसा तभी हो सकेगा, जब इन्हें दिमागी दुर्बलता और रुग्णता को दूर करने तक ही सीमित रखा जाये। यदि स्वतन्त्र चिन्तन की दिशा में भी यह मनोवृत्ति रोड. बनकर अड़ी रही और महत्त्वाकाँक्षी अधिनायक जनसमूह का उपयोग मक्खी-मच्छरों भेड़-बकरियों की तरह करने लगें, तो मानव जाति भयंकर विभीषिका में फंस जाएगी। फिर सम्पूर्ण बौद्धिक दासता का एक निरंकुश साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। सिर्फ सत्ताधारी समर्थजन इस दासता से मुक्त होंगे और वे ही मनुष्य-जाति के सार्वभौम स्वामी होंगे, तब प्रगति की दिशाएँ भी रुद्ध और बद्ध हो जाएँगी । मानवी प्रकृति का आधार स्वतन्त्र चिन्तन ही है यों भी उसे प्रभावित करने के सभी सम्भव हथकण्डे सत्ताधारी अपनाते रहें हैं। धर्म, कला, साहित्य, भाषण एवं दृश्य-श्रव्य माध्यमों से मानवी मेधा को मोहित और मृतप्राय बनाने की चेष्टाएँ पहले से ही होती रहीं हैं। अब विज्ञान का सहारा लेकर उस कार्य को अभूतपूर्व तत्परता और शक्ति के साथ पूरा किया जा सकेगा। इस भयानक षड्यन्त्र के विरुद्ध जनमत जाग्रत किया जाना चाहिए और समझाया जाना चाहिए कि स्वतन्त्र चेतना का अपहरण मनुष्य की स्वाभाविक प्रगति के मार्ग में एक दीवार की तरह है। इससे न तो भौतिक उन्नति सम्भव है न आत्मिक, जितनी जल्दी विज्ञान के सत्ताधीशों की इन दुरभिसंधियों से बचा जा सके, उतना ही अच्छा।
समुद्र में डूबे खजाने की तरह ही शरीर के अन्दर का ऐश्वर्य है। दोनों इस दृष्टि से समान हैं कि उन्हें उपलब्ध करने में भारी पुरुषार्थ करना पड़ता है। समुद्री वैभव की प्राप्ति से भौतिक जीवन सम्पन्न बन सकता है ; पर मनुष्य जन्म की सफलता आत्मिक विभूतियों पर निर्भर है।
जब से मनुष्य ने व्यापार करना सीखा, धन-संग्रह की प्रवृत्ति भी तभी से आरम्भ हुई। शुरू में क्षेत्रीय स्तर पर इसका भी श्रीगणेश हुआ, जो बाद में बढ़ते-बढ़ते दूरस्थ स्थानों तक विस्तृत हो गया। व्यक्ति, परिस्थितियों और परिवेश के आधार पर जब पृथक-पृथक राष्ट्रों का गठन हुआ, तो एक देश के अभाव की पूर्ति दूसरे देशों के सहयोग से होने लगी। इसमें वस्तु-विनिमय के साथ-साथ सम्पदा का भी हस्तान्तरण प्रारम्भ हुआ। विपुल-वैभव जलमार्ग से एक देश से दूसरे देशों में आने-जाने लगा। इस क्रम से दुर्घटनाएँ होनी स्वाभाविक थीं। हुईं भी। अगणित जहाज डूबे और असंख्य लोग मरे। उनके साथ ही उस सम्पत्ति की जल-समाधि हो जाती, जिसे वे साथ ला रहे होते। जब लाने वाले नहीं रहें, तो उसका पता कौन बताए कि वह कहाँ डूबी ? फिर भी खोज जारी है और तब से लेकर अब तक इसमें कई सफलताएँ भी मिली हैं।
मनुष्य की भी आत्म सत्ता अनन्त सामर्थ्यवान है। उस समर्थता की प्रखरता को पाने की आकांक्षा तो वह संजोता है ; पर उसे झकझोर कर जगाने का कठिन परिश्रम कौन करे ? यहीं वह लाचार हो जाता है। प्रयास के बिना तो सामने रखा भोजन भी उदरस्थ कर पाना असम्भव है, फिर भी अपनी मूर्छना को मिटाए बिना आत्मसत्ता के ऐश्वर्य को हस्तगत कर पाना किस प्रकार शक्य होगा ? सागर में डूबी सम्पदा की खोज गोताखोर करते हैं, जबकि व्यष्टि चेतना के महासागर में गोता लगाकर विभूतियों को बटोर लाने का काम साधकों का है। जो इतना साहस दिखाते और कठिनाई उठाते हैं, वह जीवन में कृतकृत्य हो पाते हैं ; किंतु कार्य की दुरूहता देखकर जो भयभीत होते और कदम पीछे खीचते हैं, उनके लिए पछतावा ही शेष रहता है।
ऐसा अनुमान है कि अकेले अमेरिकी महाद्वीप के सागर जल में डूबे वैभवयुक्त जहाजों की संख्या एक हजार के लगभग है। सम्पूर्ण संसार के समुद्रों में इनकी तादाद चालीस हजार बतायी जाती है। इनमें से प्रत्येक में इतनी सम्पदा है कि यदि सबको एक जगह इकट्ठा किया जाये, तो उससे भारत जितने विशाल राष्ट्र की कितनी ही समस्याओं का समाधान हो जाये।
धन भौतिक हो अथवा आत्मिक, खोज के अभाव में वह जल में दबे कोश की तरह बेकार पड़ा रहता है। इसमें धन का अपमान है और धारण करने वाले की उपेक्षा। अपमान इस कारण कि इतनी बहुमूल्य सम्पदा की कीमत आदमी नहीं समझ पा रहा और उपेक्षा इसलिए कि वह रत्नगर्भा होकर भी दीन-हीन बना हुआ है। किसी के प्रति न अपमान उचित है, न उपेक्षा।
इसकी तुलना में यदि अन्तराल में दबी हुई दिव्य विभूतियों को जाग्रत किया जा सके, तो दरिद्र कहलाने वाले व्यक्ति की की आत्मिक स्थिति इतनी समुन्नत हो जाएगी, जिसे अनुपम ही नहीं, अद्भुत भी कहा जा सके।
समुद्रों में ऐसे कितने ही खजाने दबे पड़े हैं। उनका बहुत लम्बा इतिहास है। रोमन साम्राज्य के दिनों से लेकर अधुनातन काल तक में जितनी समुद्र दुर्घटनाएँ हुई, उनमें से दस प्रतिशत जहाज ऐसे थे, जिनमें बहुमूल्य वैभव लदा था। सोना, चाँदी, हीरे, मोती के अतिरिक्त उनमें ऐसी मूल्यवान सामग्रियाँ थीं, जो कहीं-कहीं ही बनती और बिकती थीं। यह सब आज भी सिन्धु-गर्भ में बिखरी पड़ी हैं, इनको नहीं निकाल पाने की मानवी असमर्थता के पीछे सबसे प्रमुख कारण जहाजों की डूबने सम्बन्धी जानकारी की कमी है। विशाल जल-राशि में जहाज कहाँ दुर्घटनाग्रस्त हुआ, इसका पता लगा पाना एक एक प्रकार की टेढ़ी खीर है, फिर भी कई बार प्रकाश स्तम्भों के रिकार्ड से एवं कितनी ही बार दूसरे किसी किसी जलयान की उपस्थिति के कारण घटनास्थल की जानकारी मिल जाती है। ऐसे में खोज अभियान में आसानी होती और सफलता मिलने की भी शत-प्रतिशत गुँजाइश रहती है ; किन्तु जहाँ विभीषिका सम्बन्धी कोई भी सूत्र-संकेत न हो, वहाँ इनकी गवेषणा अँधेरे में तीर छोड़ने के समान है। इस स्थिति में भाग्य के भरोसे ही अभियान चलाना पड़ता है, इसीलिए वे अक्सर असफल होते हैं। अनेक बार इसमें प्राचीन दस्तावेजों और दुर्घटनाओं की जानकारी देने वाली पुस्तकों से भी सहायता मिल जाती है ; पर ऐसा प्रायः तब होता है, जब कोष जल में नहीं, जमीन में दबा हो। कहा जाता है कि समृद्धिशाली रोमन साम्राज्य के अनेक खजानों का वर्णन तत्कालीन यूनानी कवि होमर की प्रसिद्ध कृतियों-इलियड एवं ओडिसी में उपलब्ध है। खोजी लोग इनकी मदद से कई खजाने ढूँढ़ निकालने में सफल भी हुए हैं ; पर जब विस्तृत जल क्षेत्र से इन्हें करतलगत करने का प्रश्न हो, तब ऐसे दस्तावेज लगभग निरुपयोगी सिद्ध होते हैं, कारण कि मीलों लम्बी विस्तीर्ण जल-राशि में डूबे जलयान का ठीक-ठाक स्थानोल्लेख कर पाना लेखक के लिए अत्यन्त मुश्किल होता है। स्थान क्षेत्र में यह कठिनाई नहीं होती। वहाँ वास्तविक स्थान का पता बताने वाले कितने ही चिन्ह, संरचनाएँ, यंत्र, उपकरण, स्तम्भ, मकान, दुकान ऐसे हैं, जिनसे आसानी से उन्हें खोजा जा सके।
डूबी सम्पदा को खोज निकालना वर्षों पूर्व अत्यन्त दुरूह कार्य था, क्योंकि तब आज जितने विकसित यंत्र-उपकरण नहीं थे। आजकल इसके लिए गोताखोरों और पनडुब्बियों का सहारा लिया जाता है। आज के गोताखोर ऐसे यंत्रों से सुसज्जित हैं, जिनके सहारे वे घण्टों जल के अन्दर बने रह सके। उनकी पोशाकें भी विशिष्ट होती हैं, जिनकी मदद से वे समुद्र में करीब ६० मीटर की गहराई तक उतर सकते हैं। वर्षों पूर्व ऐसी पोशाकें और साधनों के अभाव में लोग इस प्रकार के दुस्साहसिक कार्य नहीं कर पाते थे। साँस रोककर जितनी गहराई तक जाना और वापस लौटना सम्भव होता था, उतनी ही दूरी तक वे समुद्र में उतरते थे। एक सामान्य व्यक्ति अधिकतम ३-४ मिनट तक साँस रोके रख सकता है। इतनी अवधि में ज्यादा से ज्यादा ६-७ मीटर गहराई तक उतरा जा सकता है। समुद्रों की गहराई ५० मीटर से लेकर १५०० मीटर तक होती हैं। ४ मिनट की अत्यल्प अवधि में वहाँ तक पहुँच पाना असम्भव है, अतः पूर्वकाल में जल में निमज्जित सम्पत्ति को निकाल पाना असाध्य काम था।
आज आक्सीजन सिलेण्डरों की सहायता से खोजी सागर-गर्भ में प्रवेश करते और आवश्यकतानुसार थोड़ा या ज्यादा समय तक वहाँ रह सकते हैं। यह इस बात पर निर्भर है कि प्राणवायु कितनी लम्बी अवधि तक के लिए है। साँस रोकने की कठिनाई अब उन्हें नहीं उठानी पड़ती । सिन्धु की उदरदरी में प्रवेश करने का एक अत्याधुनिक माध्यम पनडुब्बी है। सम्प्रति ऐसी पनडुब्बियों का निर्माण होने लगा है, जिनका उद्देश्य सागर के पेंदे का अध्ययन करना है। वहाँ पाये जाने वाले मूँगे के पहाड़, खनिज लवण के साथ-साथ खजाने की खोज में भी सहायक होती है। यह पनडुब्बियाँ करीब १३०० मीटर तक गहरे जल में अन्वेषण कार्य कर सकती हैं।
पुराने जमाने में इस कार्य के लिए गुलाम रखे जाते थे। जल में डूबे धन को खोज निकालने की स्थिति में उन्हें आजाद कर दिया जाता था। आज स्थिति परिस्थिति वैसी नहीं रही। अब न तो गुलामी प्रथा रही, न उस जैसी मानसिकता। अतः ऐसे जोखिम भरे कार्य के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता। जो स्वयं की इच्छा और रुचि से ऐसा करने को तैयार हो, उनकी बात अलग है, अन्यथा व्यक्तिगत इच्छा के विरुद्ध कुछ करवाना अपराध माना गया है। कुछ वर्ष पूर्व तक ऐसी जलगत सम्पदाओं को ढूँढ़ने में व्यक्तिगत आकांक्षाएँ प्रबल हुआ करती थीं ; किन्तु जब से स्वामित्व सम्बन्धी नियम बदले हैं, तब से रुचियाँ इस ओर क्रमशः घटती चली गयीं। आजकल ऐसी सम्पत्तियों पर खोजने वालों का अधिकार नहीं होता। इस पर स्वामित्व उस देश की सरकार का होता है, जिसके जल क्षेत्र में डूबा वैभव पाया गया। हाँ, अन्वेषक को इसके बदले में इनाम-इकराम देने की व्यवस्था अवश्य है ; पर उसके किसी हिस्से पर उसका कोई हक न होगा। सन् १९८९ तक फ्राँस में ऐसा प्रावधान था कि जो कोई निमज्जित जलयान के धन का पता लगाएगा, उसका एक तिहाई भाग उसका होगा ; पर उसके बाद से नियम कठोर होते चले गये, अतः इधर से लोगों का मोह भंग होता चला गया।
समुद्र के उदर में समाये जलयानों के इतिहास में कई ऐसे यान भी थे, जिनमें अकूत वैभव भरा पड़ा था। सन् १५१२ में मलक्का में डूबे पुर्तगाली जहाज “ फ्लोर डे ला मार” से प्राप्त सोने, चाँदी, हीरे, जवाहरात का जब मूल्याँकन किया गया, तो वह लगभग ३५ हजार करोड़ रुपये का आँका गया। २४ जुलाई सन् १७१५ में डूबे जिस स्पेनी जलयान का खजाना १९९३ में बाँव वैलर को मिला, उसकी कुल कीमत ८ करोड़ रुपये थी। इसमें वैलर को चार सौ से भी अधिक हीरे और १५-२० सोने के बिस्कुट मिले। सन् १८८५ में ईस्ट इंडिया कम्पनी के जहाज से जो धन मिला, वह ५६ करोड़ रुपये के बराबर था। माइकल हैचर को इस जलयान में १३० सोने की छड़ और डेढ़ लाख के करीब चीन में निर्मित बहुमूल्य पोर्सनील के बर्तन मिलें। इनकी तत्काल नीलामी कर दी गयी। डेढ़ सौ बर्तनों का डिनर सेट लगभग सवा करोड़ में एक स्विट्जरलैंड निवासी ने खरीद लिया। इन्हीं दिनों एक अन्य स्पेनी जहाज “ नूसस्त्रा सेनोरा दे अटोका “ की खोज हुई। इसमें नौ सौ के आस-पास चाँदी की ईंटें, कितने ही मणि-माणिक्य व स्वर्णाभूषण थे। इनका मूल्य एक हजार करोड़ रुपये था। बेराक्रुज बेड़ा के १६ जहाजों से प्राप्त धन करीब ६ हजार करोड़ रुपये का था। यह स्पेनी बेड़ा तूफान में फंस जाने के कारण सन् १५५३ में पैड्रे द्वीप में समुद्र गर्भ में समा गया था। इसके उपरांत एक अन्य निमज्जित जलपोत “मेन्डोजा” को भी ढूँढ़ लिया गया। यह पोत सन् १६१४ में दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। इसमें ३४ सौ करोड़ रुपये का सोना-चाँदी मिला। इसके अतिरिक्त कोस्टारिका जल क्षेत्र से प्राप्त ४ करोड़ का एक कोष भी इस शृंखला में सम्मिलित है। इसके अलावा बहुत सारे ऐसे भग्न पोत पाये गये, जिनमें मूल्यवान यंत्र, उपकरण और धातुएँ थीं।
बात चाहे समुद्र में बिखरे वैभव की करें अथवा शरीरगत सम्पदा की, दोनों ही अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। धन के बिना जीवन निर्वाह नहीं हो सकता-यह सच है ; पर महानता के बिना तो मनुष्य की ही मृत्यु हो जाती है और उस कलेवर में शेष रह जाता है नर-पशु धन पाकर गरिमा को गँवाना किसे प्रिय होगा ? वैभव भी मिले और मानवी गौरव भी अक्षुण्ण रहे-दोनों का ऐसा समन्वय ही उपर्युक्त कहा जा सकता है, अन्यथा असुर और मनुष्य में कोई अन्तर न रहेगा। इन दिनों धन की कामना तो सभी करते हैं, पर उस अगाध ऐश्वर्य की उपेक्षा प्रायः हर एक करते देखे जाते हैं, जो चक्रों, उपत्यिकाओं, ग्रन्थियों, भ्रमरों, मातृकाओं और प्राणों के रूप में अपनी ही काया में विद्यमान है। यदि इनमें से प्रत्येक को खोजा और जगाया जा सके, तो जीवन इतना वैभवशाली-गौरवशाली होगा, जिसके आगे समस्त भौतिक सम्पदाएँ तुच्छ ही नहीं, तृणवतु साबित होंगी। दिव्यता के आने पर द्रव्यों की कमी नहीं रह जाती। वह उन्हें घसीट बुलाती है, अतः हमार खोज उस सम्पदा की होनी चाहिए, जिसमें प्रभुता हो। इससे कम में न तो जीवन की सफलता है, न सार्थकता।
उस दिन ईसा शिष्यमण्डली समेत किसी प्रचार यात्रा पर जा रहे थे। रात्रि हो गई। भोजन का सुयोग न बना। ईसा ने कहा-तुम सबके पास जो है इकट्ठा कर लो और उसी से मिल-बाँट कर काम चलाओ।” पाँच रोटी इकट्ठी हुई। मिल-बाँट कर खाई गई। हिस्से में आधी-आधी भी न आई, तो भी सबका पेट भर गया। सोलोमन ने पूछा-महाप्रभु यह कैसा आश्चर्य ? इतने कम से इतनी तृप्ति कैसे ?” ईसा ने कहा “यह मिल-बाँट कर खाने का चमत्कार है।” यही ईश्वर का निर्देश भी है कि सारी विश्ववसुधा के नागरिकों में विश्व के सारे साधन समान रूप से बँट जाएँ ।
अपनी बड़ी बहिन सुरेखा के शरीर पर फटे हुए कपड़ा देखकर वसुन्धरा अपने संभाल न सकी। उसकी आँखों में क्षोभ-रोष और दुःख एक साथ छलक पड़ा । घर की हालत बता रही थी कि यहाँ के रहने वालों को कई-कई दिन खाना नहीं मिलता होगा। वसुन्धरा को अपनी बहिन और उसके घर की हालत देखकर जितना दुःख था उतनी ही हैरानी भी थी। उसे अभी भी अच्छी तरह याद था कि उसके पिता ने बहिन की शादी कराते समय घर की सम्पन्नता का खूब बखान किया था। उसे आश्चर्य हुआ, इतना सम्पन्न घर इतनी जल्दी विपन्न कैसे हो गया? सुरेखा अपनी छोटी बहिन वसुन्धरा के मन में चल रही ऊहापोह को भाँप गयी।
वह हताश स्वर में कहने लगी, “क्या बताऊँ वसु! जबसे मेरे ससुर जी का देहान्त हुआ है, तुम्हारे जीजाजी, मुझे कहते हुए शर्म आती है। वे एकदम आलसी हो गये हैं। कुछ भी काम नहीं करते। वे कहते हैं कि मेरे पिताजी ने मरते समय कहा था, हमारे खेतों में अपार धन है, इन्हें कभी मत बेचना। बेटा इन खेतों से ही तुम्हारा भाग्योदय होगा। बस वसु तब से वे भाग्योदय की प्रतीक्षा कर रहें हैं।”
वसुन्धरा सुरेखा से काफी छोटी थी। परन्तु वह काफी बुद्धिमान और चंचल थी। इन दिनों वह अपनी बड़ी बहिन से मिलने उसके घर आयी थी। उसकी विचारशक्ति की तीव्रता की सभी सराहना करते थे। एकाएक उसके मन में विद्युत गर्मी से कुछ स्फुरित हुआ। इस विचार के सहारे ही उसने सोचा कि उसे अपनी बहिन के घर को किसी तरह सँवारना चाहिए।
उसने अपने दिमाग में बन रही योजना में अपनी बहिन और उसके दोनों बच्चों को भी शामिल कर लिया। उसने बच्चों को समझाया कि वे अपने पिताजी से यह नहीं कहेंगे कि मौसी यहाँ आयीं हैं।
गाँव बहुत बड़ा नहीं था। गाँव में अधिकतर किसान रहते थे, जो खेती करके अपना जीवन यापन करते थे। सुरेखा का पति मोहन भी इसी गाँव का सीधा-सादा सरल स्वभाव का किसान था। लेकिन सीधा होने के साथ ही वह बहुत ही आलसी, सुस्त और कामचोर था। सुबह-सुबह वह गाँव में निकल जाता और सारा दिन बीड़ी पीने, तम्बाकू खाते, गपशप करने में गुजार देता। घर वह सिर्फ खाना खाने के लिए आता था। खाना खाकर सो जाता। यदि घर में कभी समय बचता तो वह भी दोस्तों के साथ ताश-चौपड़ में गुजर जाता।
गाँव वाले उसके इस आचरण को देखकर उसे मोहन के बजाय सुस्तराम कहने लगें थे। अब तो वह सुस्तराम के नाम से मशहूर भी हो गया था। लोग उसका मोहन नाम भूल भी चुके थे। सुस्तराम की इसी सुस्ती के कारण उसकी पत्नी बहुत दुःखी थी। वह पड़ोसी मोतीलाल के खेतों में मेहनत-मजदूरी करती थी। पड़ोसी उसे अनाज और मजदूरी के दो रुपये प्रतिमाह दे दिया करता था। उसके दोनों बच्चे स्कूल जाने के बजाय बैल और गाय चराने जंगल जाते थे।
सुस्तराम को भाग्य की देवी पर विश्वास था। वह इसी कल्पना में खोया रहता था कि एक दिन उसके भाग्य की देवी उसे जरूर दर्शन देंगी। उस पर अवश्य उनकी कृपा होगी और वह धन-धान्य से निहाल हो जायेगा। आज भी वह हमेशा की तरह सुस्तहाल में घर लौटा और खाना खाकर अपने पलंग पर लेट गया। फिर एक बीड़ी पी और सोने की कोशिश करने लगा। कमरे में एक नन्हा दीपक टिमटिमा रहा था।
सुस्तराम की पत्नी नीचे बिस्तर बिछा कर सोई हुई थी। बच्चे दूसरे कमरे में सोये हुए थे। आधी रात के समय किसी आहट की वजह से उसकी नींद खुल गयी। दीपक की मध्यम रोशनी में उसे अपने कमरे में लाल साड़ी में एक सुन्दर स्त्री नजर आयी। उसने घबड़ा कर अपनी पत्नी को जगाया और बोला-
“ देखो तो, ये कौन औरत हमारे घर में घुस आयी है ?” “कौन सी औरत ? मुझे तो कोई नजर नहीं आ रहा है। आपने स्वप्न देखा होगा। सो जाइये और मुझे भी सोने दीजिए।” सुरेखा इतना कहते हुए करवट बदल कर सो गयी।
सुस्तराम आश्चर्य में पड़ गया। वह स्त्री उसके सामने खड़ी थी और मन्द-मन्द मुस्कराए जा रही थी। सुस्तराम के आश्चर्य को तोड़ते हुए वह कहने लगी-मूर्ख उसे सोने दे, मैं तेरे भाग्य की देवी हूँ। मुझे तेरे सिवाय और कोई नहीं देख सकता और न ही कोई मेरी आवाज सुन सकता है। कुछ समझ में आया या फिर मैं जाऊँ ?”
सुस्तराम हड़बड़ा कर बोला-नहीं देवी माँ ! मैं समझ गया आप सिर्फ मेरे भाग्य की देवी हैं। मेरे अहोभाग्य, जो आपके दर्शन हुए। मैं न जाने कब से आपकी प्रतीक्षा कर रहा था।”
“वत्स ! अब तेरे भाग्योदय का समय आ गया है, लेकिन....।”
“लेकिन क्या देवी माँ ?” “तुम्हें मेरी दी शर्तें माननी होंगी। बोल वचन देता है।”
“हाँ माँ! मैं वचन देता हूँ। आपकी शर्त मानूँगा।”
“तो पहली शर्त सुन, मेरे दो दुश्मन हैं, एक है आलसपन और दूसरा समय की बर्बादी। पहले तुम इन दोनों को भगाओ।”
“माँ ! समझ लीजिए मैंने इन दोनों को भगा दिया।” यह कहकर उसने अपनी पत्नी की ओर देखा। वह अपने सिर पर चादर ओढ़े सो रही थी, लेकिन सुस्तराम को क्या मालूम कि वह सारा वार्तालाप सुनकर मुस्कुरा रही थी।
भाग्य की देवी ने बात आगे बढ़ायी, “अब मेरी बात ध्यान से सुन, तेरे पास बीस बीघा खेत और दो-दो बैल हैं या नहीं....?”
“जी हाँ, है देवी माँ।” “तो तू अपने खेतों की जुताई कर वह भी दो बार। बोल यह सब कर सकेगा ?”
“क्यूँ नहीं देवी माँ ? मैं हट्टा-कट्टा आदमी हूँ और धन मिले, मेरा भाग्योदय हो तो क्या नहीं कर सकता।”
बीड़ी, तम्बाकू, पान जैसी गन्दी आदतें नहीं छोड़ सकता ?” “वह भी छोड़ दूँगा।” “सच कह रहा है ?” “माँ ! तुम हमारे भाग्य की देवी हो। भला तुमसे झूठ बोलूँगा।”
“तो समझ ले वत्स ! तेरा भाग्योदय आरम्भ हो गया। तू खेत की जुताई कर..मैं तुम्हें फिर दर्शन दूँगी।” “अच्छा देवी माँ !” सुस्तराम ने आँखें बन्द कर माँ को प्रणाम किया। देवी अन्तर्ध्यान हो गयीं। उसने अपनी पत्नी को झकझोर कर जगाया और देवी के बारे में विस्तार से बताया। सुरेखा बोली-चलो अच्छा हुआ। लेकिन मुझे तो सोने दीजिए और अब आप भी सो जाइये।”
प्रातः मुर्गे ने बाँग दी। सदा देर से सो कर उठने वाला सुस्तराम आज सूर्योदय के पूर्व ही जाग गया। सुरेखा मन नहीं मन मुस्कुराई।
गाँव भर में सुस्तराम के नाम से मशहूर मोहन उठते ही सुरेखा से बोला- “सुरेखा ! मैं आज से ही देवी माँ की आज्ञा के अनुसार खेतों की जुताई कर काम आरम्भ कर रहा हूँ। तुम भी अब किसी और के खेतों में मजदूरी करने के बजाय अपने ही खेतों में मेरे साथ काम करो। अब हम अपने बच्चों को इधर-उधर भटकने के स्थान पर विद्यालय भेजेंगे।”
मोहन अपनी पत्नी सुरेखा और बैलों को साथ लेकर खेत की ओर चल पड़ा । उसके मन में भारी उत्साह था। धन की आस में मन की खुशी चेहरे पर छलकी पड़ रही थी। देवी माँ की आज्ञानुसार वह आलसपन और समय की बर्बादी दोनों को भगा चुका था। आज से उसने बीड़ी-तम्बाकू और पान की आदत भी छोड़ दी। इससे जो पैसे बचने लगें उनसे बच्चों के पढ़ने की किताबें ले आया।
गाँव वालों ने यह सब देखा तो अचम्भित रह गये। एक बुजुर्ग सज्जन अपने मन में बुदबुदाए- चलो अच्छा हुआ सुस्तराम को अकल आ गयी।
कुछ ही दिनों में रात-दिन परिश्रम करके मोहन ने अपने खेतों की साफ-सफाई करके जुताई कर दी। मोहन की पत्नी अपनी छोटी बहिन वसुन्धरा के पास बराबर समाचार भिजवाती रहती थी। खेत का काम पूरा होने की बात सुनकर वसुन्धरा फिर से अपनी बहिन के पास आ गयी और बच्चों के कमरे में छुप गयी।
दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद अब मोहन जल्दी समय पर सो जाया करता था। उसके सारे दुर्व्यसन व्यस्त रहने के कारण अपने आप छूट गये थे। चौपाल पर निठल्ले दोस्तों के साथ अड्डेबाजी, गप-शप कब की बन्द हो चुकी थी।
आज भी वह थककर सो रहा था। रात में देवी माँ पुनः प्रकट हुईं, मोहन को जगाया। उसने देवी माँ को प्रणाम किया। देवी माँ बोली “वत्स मोहन ! अब तुम सुस्तराम नहीं रहे, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ अब मेरी दूसरी शर्त यह है कि अपने खेत में गेहूँ की बुवाई कर दो। ठीक समय पर सिंचाई कर देना। जब गेहूँ की फसल पक कर तैयार हो जायेगी तब मैं एक बार फिर तुम्हारे पास आऊँगी। मेरी बात मानोगे न वत्स?”
“अवश्य देवी माँ !” कहते हुए उसने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। सिर उठाने पर उसने देखा-देवी माँ जा चुकी थीं।
अगले दिन मोहन ने गेहूँ की बुवाई आरम्भ कर दी। बुवाई के बाद मोहन नियमानुसार सिंचाई भी करने लगा। इसी के साथ उसने खाद की सुचारु व्यवस्था की। समय-समय पर उसने निराई-गुड़ाई का क्रम भी जारी रखा। कुछ ही दिनों में गेहूँ की फसल खेत में लहलहाने लगी। मोहन खेत पर ही रहने लगा। वह फसल की रखवाली करता था और एक दिन फसल पककर तैयार हो गयी।
उस रात पुनः देवी माँ ने मोहन को दर्शन दिये।
“उन्होंने कहा-वत्स ! अब आखिरी काम रह गया है। इस फसल को काटकर अपने खलिहान पहुँचाओ। फिर उसमें से गेहूँ निकलवा कर बेच दो। तुम्हारे सामने धन का अपार ढेर लग जाएगा।”
“मैं ऐसा ही करूँगा देवी माँ।” आँखें मूँद कर मोहन ने भाग्य की देवी को प्रणाम किया। देवी माँ लौट गयीं।
देवी माँ की आज्ञा मानकर मोहन ने फसल कटवाकर अपने खलिहान में पहुँचाई। उसमें से गेहूँ निकलवाए। मोहन के सामने अनाज का ढेर लग गया। गाँव भर के लोग उसकी प्रशंसा करने लगें। आस-पास के गाँवों में भी मोहन की फसल की प्रशंसा हो रही थी। व्यापारी गेहूँ खरीदने के लिए उसके द्वार पर आने लगें।
गाँव में बड़े-बूढ़ों ने मोहन को गेहूँ बेचने की सलाह दी। देवी माँ ने भी तो यही कहा था। अपने घर के लिए गेहूँ रखकर उसने सारे गेहूँ व्यापारी को बेच दिये। व्यापारी ने जब उसे नोटों की गड्डियाँ थमानी आरम्भ की तो वह भौचक्का रह गया। सचमुच उसके सामने नोटों का ढेर लग गया। वह सोचने लगा- हे देवी माँ! इतना अपार, इतने धन की तो मैंने कभी कल्पना भी न की थी। इस धन से तो मैं अपने घर की मरम्मत करवा सकता हूँ। सुरेखा और बच्चों के लिए नये कपड़े ला सकता हूँ। अब तो मैं इन रुपयों से बहुत से काम कर सकता हूँ।
अभी वह अपनी सोच में डूबा था, तभी खलिहान में आवाज गूँजी, “वत्स ? क्या अपार धन पाकर हतप्रभ रह गये हो ?”
“देवी माँ !” यह कहकर मोहन ने पलट कर आवाज की दिशा में देखा तो हैरान रह गया, क्योंकि वहाँ लाल साड़ी पहने उसकी पत्नी की छोटी बहिन वसुन्धरा खड़ी थी। मोहन हक्का-बक्का उसे देखता रह गया।
वसुन्धरा कहने लगी-ऐसे आश्चर्य से क्या देख रहे हो, मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है। आपने इस महावाक्य को अपने जीवन में सिद्ध कर दिया।”
“सच वसु, तुमने तो मेरी आँखें खोल दी। मैं तुम्हारा आभारी हूँ। मुझे आज एहसास हो रहा है कि यदि इंसान अपने श्रम, समय और मनोयोग का सही सुनियोजन कर सके तो उसे अपने भाग्यनिर्माता होने का गौरव प्राप्त हो सकता है। मैं आज संकल्प लेता हूँ कि अब सदैव ही परिश्रम करूँगा, समय की बर्बादी न होने दूँगा, अपने मन को अच्छे विचारों पर चिन्तन करने, अच्छी योजनाएँ बनाने में लगाऊँगा। हमारे पिताजी ठीक ही कहा करते थे। सचमुच मेरे खेतों में अपार धन है।
मोहन के इस कायाकल्प पर सुरेखा मुस्करा रही थी, बच्चे खिलखिला रहें थे और ग्रामवासी मन ही मन संकल्प कर रहें थे कि वे भी अपने भाग्यनिर्माता बनने का गौरव हासिल कर के रहेंगे।
“युवा”- अपरिमित उज्जस्विता, उत्साह एवं कुछ कर गुजरने की तमन्ना का नाम है। स्वभाव से ही इनमें वे सभी गुण सहज ही विद्यमान रहते हैं जो किसी भी राष्ट्र व समाज का कायाकल्प करने के लिए पर्याप्त है। इन्हें समाज की आशाओं एवं राष्ट्र के विश्वास का पर्याय
कहना अत्युक्ति न होगी। मनीषीगण किसी देश या समाज के भविष्य को इसके युवा हृदय की आकांक्षाओं एवं जीवन की दिशाधारा देखकर ही आँकते हैं।
अपने महादेश भारत के परिप्रेक्ष्य में यह आकलन करने पर हृदय पीड़ा से भर जाता है। समाज के इस सबसे बड़े महत्वपूर्ण वर्ग की स्थिति आज बहुत ही दुःखद एवं निराशाजनक है। उचित दिशा में उसकी ऊर्जा का सुनियोजन हो सकने के कारण वह सृजन की जगह विध्वंस का वाहक बन गया है। उसकी समस्याएँ दिन-प्रतिदिन बहुत उलझाव भरी एवं व्यापक होती जा रही हैं। इनके दूरगामी परिणामों की कल्पना भर से हृदय दहल जाता है। स्थिति बहुत ही गम्भीर, चिन्ताजनक और विस्फोटक नजर आ रही है।
आशाओं का प्रतीक युवक आज हताशा और निराशा के अंधेरों में खो गया है। उसकी इस दशा का बहुत कुछ दोष हमारी शिक्षा-प्रणाली को है। स्वतंत्र देश आज अपनी स्वाधीनता की स्वर्णजयंती मना रहा है। परन्तु हमारी राष्ट्रीय शिक्षापद्धति अभी भी ब्रिटिश गुलामी की पीड़ा भोग रही है। यह १५० वर्ष पूर्व मैकाले द्वारा प्रतिपादित शिक्षा-नीति की लीक पर चल रही है, जबकि यह शिक्षा-प्रणाली न तो ज्ञानार्जन में अधिक सहायक सिद्ध हो पायी और न ही जीविका उपार्जन में। उज्ज्वल भविष्य के सपने सँजोये देश के युवक इस शिक्षा पद्धति की छत्र-छाया में १५-२० वर्ष की तपश्चर्या के बाद कागज की एक डिग्री हाथ में लेकर निकलते हैं, जो उन्हें बेरोजगारी की दुनिया में सदस्यता दिलाने के लिए पर्याप्त होती है। आज देश भर में १५ करोड़ बेरोजगार हैं, जिनमें १ करोड़ बेरोजगार ऐसे हैं जो कालेज स्तर की शिक्षा ग्रहण किये हुए हैं, लाखों की संख्या में बेरोजगार डाक्टर व इंजीनियर शायद ही भारत के अतिरिक्त अन्य किसी देश में हों। उदारीकरण एवं आधुनिकीकरण की प्रक्रिया ने रोजगार अवसरों पर और दुष्प्रभाव डाला है। एक अनुमान के अनुसार भारतीय बाज़ार में विदेशी घुसपैठ के कारण अगले कुछ वर्षों में लगभग ५० लाख लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ेगा ।
आत्मविश्वासहीन, अपाहिज से हो गये युवकों की स्थिति पर “न घर के न घाट के” वाला मुहावरा एकदम सही लागू होता है। कुण्ठा, निराशा व हीनता की अदृश्य चहारदीवारी में ठोकरें खाते-खाते वह टूट जाता है। उसे जीवन व भविष्य से कोई आशा नहीं रहती। जीवन की कटु यथार्थता से हारे ऐसे ही युवक भारी मात्रा में आज नशे की दुनिया में पलायन कर रहें हैं। नशे में डूबे ऐसे बेहोश युवाओं को यदि कभी होश आया भी तो वे तब तक अपनी शारीरिक, मानसिक सामर्थ्य खो चुके होते हैं।
यदा-कदा जब आन्तरिक विक्षोभ, पीड़ा व कुण्ठा असहनीय हो जाती है तो ये युवा आत्महत्या जैसे विभत्स कृत्य द्वारा अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं। युवकों में बढ़ती आत्महत्या की वृत्ति आज सभी के लिए चिन्ता का विषय बनी हुई है। ९० के दशक में इस शताब्दी की सबसे अधिक आत्महत्याएँ हुईं है, जिनमें सबसे अधिक संख्या किशोरों व युवकों की है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के अनुसार देश में प्रतिदिन २३० व्यक्ति आत्महत्या करते हैं। “सटरडे टाइम्स” के अनुसार देश में हर मिनट में आत्महत्या का प्रयास होता है और प्रत्येक सातवें मिनट में एक आत्महत्या हो जाती है। इनमें लगभग ५५ प्रतिशत ३० वर्ष की आयु से कम वर्ग वाले होते हैं।
बेरोजगारी के चलते पैदा निराशा युवकों के एक बड़े वर्ग को फासिस्टवादी सोच का बना रही है, जो समस्या को सुलझाने के बजाय उलझाने का शार्टकट रास्ता है। फासीवादी सोच समाज में एक हिटलर पैदा करती है, और वह हिटलर समस्याओं को सुलझाने के भ्रम को बनाये रखने के लिए एक समूह शत्रु पैदा करता है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आज भारत में ऐ समूह शत्रु की रचना की जा रही है। समस्याओं को सुलझाने का हिटलरवादी तरीका आज गरीबी, बेरोजगारी तथा महँगाई जैसी समस्याओं को भुलाकर हिंसा का समाजशास्त्र रच रहा है। युवकों की हिंसक भीड़ द्वारा बसों को आग लगाना, रेलगाड़ी की तोड़-फोड़ करना, सार्वजनिक सम्पत्ति को तहस-नहस करना, अध्यापकों का अपमान व मार-पीट बड़ों का तिरस्कार व अवमानना, अपनी समस्याओं का हल सड़क पर उतर कर खोजना, कभी-कभी उत्तेजित होकर नृशंस हत्याएँ तक कर देना आज सामान्य बात हो गयी है। जिस गति से युवा हिंसा की ओर अग्रसर है, उसकी रफ्तार यदि यही रही तो एक दिन हमारे शिक्षालय हिंसा की पाठशालाओं का रूप ले लेंगे।
पिछले दो वर्षों में दुनिया भर में हुए अपराध के आँकड़े इस बात के गवाह हैं कि अपराधों में युवकों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। १९९३ में अमेरिका में २५००० हजार हत्याएँ हुईं, जिनमें ३० प्रतिशत मामलों के अभियुक्त १५-२५ वर्ष के युवा ही थे। भारत में १९९० के सरकारी आँकड़ों के अनुसार दर्ज ६१॰२० लाख अपराधों में ३२॰८७ लाख अपराधी १५ से २५ वर्ष के थे। दूषित शिक्षा-प्रणाली से उत्पन्न कुण्ठा व निराशा से उत्पन्न हिंसा वृत्ति को विकृत राजनैतिक स्वार्थ और बढ़ावा दे रहें हैं। आज विश्वविद्यालय हिंसा व राजनीति के अपराध गढ़ बनते जा रहें है। युवक प्रायः ऐसे मुद्दों में उलझे रहते हैं, जो उनके भविष्य पर विशेष प्रभाव डालने वाले नहीं हैं।
युवकों का राजनीति में हिस्सा लेना जागरूक समाज के निर्माण के लिए एक सीमा तक ही आवश्यक है। विश्व के प्रत्येक राजनीतिक चिन्तक ने एक स्वस्थ लोकतांत्रिक शासन के लिए छात्रों में राजनैतिक चेतना को न केवल अच्छा बल्कि अनिवार्य माना है। शहीद भगत सिंह अपने महत्वपूर्ण लेख “छात्र और राजनीति” में कहते हैं कि छात्रों को राजनीति में आना ही चाहिए, क्योंकि आखिर वे देश के कर्णधार होते हैं। विश्व राजनीति को एक मोड़ देने वाले लेनिन का वोल्शेविक क्रान्ति के दौरान एक महत्वपूर्ण नारा था, “छात्र चेतना राष्ट्र चेतना।”
यदि हम भारतीय उपमहाद्वीप के लोकतांत्रिक संघर्ष के इतिहास को देखें तो युवा छात्रों को अव्वल दर्जे में पायेंगे। भारत में छात्र आन्दोलनों एवं युवा नेतृत्व का इतिहास पुराना एवं प्रभावशाली रहा है। समाजशास्त्री एस. एस. गिल के अनुसार छात्र आन्दोलन की पहली
मिसाल १८८१ में मिलती है, जब युवकों ने आई. सी. एस. के लिए भारत में ही परीक्षाएँ करवाने की माँग उठाई थी। बाद में इस सदी के प्रारम्भ में बंगाल के विभाजन के मुद्दे को लेकर भी छात्रों में जबरदस्त रोष फैला था और उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रभावशाली मोर्चा खोला था। भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलनों का दारोमदार भी युवकों पर ही था। श्री गिल के अनुसार १९०७ से १९१७ के बीच बंगाल में क्रान्तिकारी अपराधों के लिए गिरफ्तार किये गये, १९६ व्यक्तियों में ६८ छात्र व अन्य युवक थे।
भारत में युवाशक्ति का राष्ट्रव्यापी उबाल १९२० में आया, जब गाँधी जी ने नागरिक अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत की थी। अँग्रेजों द्वारा नियंत्रित शिक्षा-संस्थानों को त्याग कर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए उनके आह्वान पर हजारों युवकों ने राष्ट्रीय आन्दोलन में हिस्सा लिया। १९३० में नागरिक अवज्ञा आन्दोलन का दूसरा चरण शुरू होने तक तो युवकों ने स्वाधीनता संग्राम में प्रमुख भूमिका सम्भाल ली। इस दौरान काँग्रेस में शामिल हुए कई युवा नेता आगे चलकर देश के राजनैतिक दिग्गजों में गिने गये। १९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन के बाद तो युवकों की सक्रियता अपने चरम तक पहुँच गयी थी। हजारों युवकों ने इसमें जेल यातनाएँ भोगी थीं।
उसके बाद युवा आन्दोलनों का राष्ट्रीय स्वरूप धीरे-धीरे विलुप्त हो गया और क्षेत्रीय व राज्यस्तरीय आन्दोलनों का दौर आया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन इनमें सबसे महत्वपूर्ण था। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल, बिहार व आन्ध्र प्रदेश में हुए आन्दोलनों में भी युवकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के ५० वर्षों बाद भी कोई व्यापक व प्रतिबद्ध युवा संगठन नहीं विकसित हो पाया है, जो युवकों का मार्गदर्शन करे व उनके विकास के लिए रास्ता साफ करे। स्पष्ट दिशाबोध के अभाव में दिग्भ्रमित व परेशान युवकों के निराश व असन्तुष्ट समूह विकसित हो रहें हैं। पिछले २-३ दशकों से छात्रों के बीच प्रवाहित लोकतांत्रिक ऊर्जा निरन्तर पतन की ओर जा रही है। दूषित राजनीति का काला साया इसके पीछे हाथ धो कर पड़ा है।
आज छात्र राजनीति में राजनैतिक पार्टियों का सीधा हस्तक्षेप रहता है। पहले छात्र नेता छात्रों के बीच एक स्वतः स्फूर्तिनायक हुआ करता था, किन्तु आज वह किसी प्रभावशाली राजनेता का विस्तार भर होता है। उस पर किसी माफिया का वरद्हस्त होता है। जो छात्र राजनीति कभी आदेशों से संचालित होती थी, वह आज बदलते समय में आदेशों से नियंत्रित होने लगी है। पहले युवा नेताओं व छात्रों के बीच इतना राजनैतिक प्रभाव होता था कि चुनावों को जीतने के लिए धन और बल की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। साथ ही वे छात्रों की समस्याओं एवं समाज के प्रति जागरूक होते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। आज का युवा छात्र तो इस राजनैतिक प्रपंच में बुरी तरह फँसा हुआ छूटने के लिए छटपटा रहा है। इतना ही नहीं इन सब पर अपराधों की काली छाया मँडरा रही है।
युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है, जिसका उद्देश्य किसी भी तरह धन कमाना है। धन मोहित इन युवाओं ने अपने भावी व्यवसायों के माध्यम से अपनी सीमाएँ बाँध लीं हैं। वे उच्चस्तरीय नौकरियों व अधिक धन देने वाले व्यवसाय में ही दिलचस्पी रखते हैं। हाल ही में किये गये सर्वेक्षण में राजधानी के युवकों से पूछा गया कि क्या वे गैरपारम्परिक व्यवसायों, कृषि आदि को अपनाना पसन्द करेंगे ? इस पर ९८ प्रतिशत युवकों के नकारात्मक उत्तर मिलें।
धन व सुविधा खोजी इस वर्ग का अपने समाज, राष्ट्र, संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं अमेरिका व यूरोप में पलायन कर जाता है, जहाँ इसे मोटी रकम व पर्याप्त सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हो जाती हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के प्रो॰ सुखाले के अध्ययन के अनुसार ९० प्रतिशत युवा प्रतिभाएँ विदेश जाने के सपने संजोए रहती है। देश के २५ से ३० प्रतिशत डाक्टर प्रतिवर्ष विदेश चले जाते हैं। तकनीकी क्षेत्र की सर्वश्रेष्ठ संस्था आई॰ आई॰ टी॰ से ७० प्रतिशत चुनिंदा प्रतिभाएँ हर साल विदेश पलायन कर जाती हैं।
यह है आज की युवा शक्ति वर्तमान दशा का मोटा सा चित्रण, जो विविध दिशाओं में विश्रृंखलित हैं। एक वर्ग अधिकाधिक धन समृद्धि बटोरने में लगा है, दूसरा वर्ग जीवन की चुनौतियों से पलायन कर आत्मघाती नशे का शिकार बन रहा है। एक वर्ग है जो हिंसा, राजनीति व अपराध की दलदल में फँसा हुआ है।
युवाओं में जो अपरिमित शक्ति है, कुछ कर गुजरने की ललक है वह किसी भी समाज के कायाकल्प के लिए पर्याप्त है। विश्व की बड़ी-बड़ी क्रान्तियाँ इन्हीं युवकों के बल पर हुईं हैं। विश्व के कई देशों में राजनैतिक परिवर्तन में युवाओं की अग्रिम भूमिका रही है। उन्होंने अपने देशों में अधिनायकवादी शासन के खिलाफ राष्ट्रीय आन्दोलनों का सफलतापूर्वक नेतृत्व भी किया है।
रूस में राजशाही के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ने में युवाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। चीन में १९२० व १९३० के दशक में तथा क्यूबा में १९५६ में हुए क्रान्तिकारी आन्दोलनों की रीढ़ युवक ही थे। इन युवाओं ने कई देशों के शासन का स्वरूप बदला व नई व्यवस्था का निर्माण किया। चीन में कुछ वर्ष पूर्व हुआ जबरदस्त लोकतंत्र समर्थक आन्दोलन युवकों के दम पर ही खड. हुआ था। इसी तरह नेपाल के लोकतंत्र बहाली आन्दोलन में भी युवकों की प्रमुख भूमिका थी। लोकतंत्र बुनियादी अधिकारों और स्वाभिमान के लिए युवकों का संघर्ष आज भी कई देशों में चल रहा है, जिसमें हमारा पड़ोसी देश (वर्मा) भी शामिल है।
राजनैतिक परिवर्तनों की तरह आध्यात्मिक क्षेत्र में क्रान्ति व समाज सुधार के क्षेत्र में युवाओं ने अग्रणी भूमिकाएँ निभाई हैं। उनके युवा हृदय से उभरे महान् संकल्पों ने ही बड़े-बड़े सुधार-आन्दोलनों का शुभारम्भ किया। राजकुमार सिद्धार्थ जब अपने नवजात शिशु व पत्नी को छोड़कर धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए चलें, तब वे मात्र २४ वर्षीय युवा ही थे। इसी तरह देश के चारों कोनों में काश्मीर से कामरूप तक व केदारनाथ से काँगड़ी, कन्याकुमारी तक पूरे भारत में अद्वैत वेदान्त का मन्त्र फूँकने वाले, साँस्कृतिक दिग्विजय यात्रा के कर्णधार आचार्य शंकर भी १८ वर्षीय युवा ही थे। शिकागो की विश्वधर्म सभा में भारतीय संस्कृति के सार्वभौमिक वेदान्त दर्शन का सिंहनाद करने वाले स्वामी विवेकानन्द ३० वर्षीय युवक ही थे।
मुगल अत्याचार के विरुद्ध शस्त्र उठाने वाले शिवाजी मराठा, गुरु गोविन्द सिंह और अफ्रीका के रंगभेद के दावानल में कूदकर अहिंसा ब्रह्मास्त्र प्रयोग करने वाले गाँधीजी भी उस समय युवा ही थे। फ्राँस को अँग्रेजी गुलामी से मुक्त करने के लिए उभरे क्रान्तिकारी आन्दोलन का संचालन करने वाला जोन आफ आर्क मात्र १६ वर्षीय युवती थीं। बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन में भाग लेने वाले लाखों भिक्षु-भिक्षुणियाँ युवा ही थे। स्वतंत्रता संग्राम में भरी असंख्य युवाओं ने अपने सुख-भोग का त्याग कर कठोर यातनाएँ सही एवं बड़ी से बड़ी कुर्बानियाँ दी। शहीद भगत सिंह, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, गणेश शंकर विद्यार्थी, राजगुरु, सुखदेव जैसे युवा इस परम्परा के जाज्वल्यमान सितारों के रूप में प्रकट हुए थे, जिन्होंने राष्ट्रीय क्रान्ति में अपनी आहुतियाँ दीं।
स्वतंत्र भारत के युवक आज यह कह सकते हैं उस समय स्वाधीनता लिए राष्ट्रीय क्रान्ति की आवश्यकता थी, लेकिन अब तो भारत स्वतंत्र है ? इसके लिए समय और माँग के अनुरूप क्रान्ति के अर्थ को समझना अनिवार्य है। सामान्य अर्थों में क्रान्ति को एकतरफा तोड़-फोड़ सत्तापलट व व्यवस्था परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है, लेकिन आज का युवा व समाज जिन समस्याओं से आक्रान्त है, उनके समाधान व उपचार के लिए उसी स्तर के गम्भीर एवं व्यापक उपचारों की आवश्यकता है। इसके स्वरूप व उद्देश्य को समझने में भूल नहीं होनी चाहिए। यह व्यक्ति के परिष्कार के द्वारा समाज की एक उदात्त परिकल्पना को साकार करने के निमित्त होती हैं। यह एक बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति होगी। वर्तमान समय में सार्थक क्रान्ति किसी संकीर्ण राजनैतिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक या जातीय स्वार्थ द्वारा प्रेरित नहीं हो सकती। इसका मूल उद्देश्य सृजन है, ध्वंस तो इसकी सामयिक विवशता भर है,
जिसे नये भवन के निर्माण से पूर्व खण्डहर गिराने या गम्भीर रोग उपचार से पूर्व आवश्यक चीर-फाड़ के रूप में समझा जा सकता है।
परिवर्तन के इन महान क्षणों में युवाओं को दुष्प्रवृत्तियों के दुष्चक्रों से उबरकर स्वयं को समग्र क्रान्ति के लिए प्रस्तुत करना चाहिए। समय की इस पुकार को कोई भी भावनाशील एवं विचारशील युवा अनसुना नहीं कर सकेगा। इस आदर्श के लिए स्वार्थों का त्याग करना होगा। इतिहास साक्षी है कि कोई भी महान् कार्य बिना त्याग के नहीं हो सका है।
राष्ट्रीय नवजागरण के पुरोधा स्वामी विवेकानन्द यदि चाहते तो अपनी प्रतिभा के बलबूते ऐश्वर्य भरा जीवन जी सकते थे। आपने २७ जून १९०० को कैलीफोर्निया के शेक्सपियर क्लब में दिये गये भाषण में वे कहते हैं-मेरे समक्ष दो विकल्प थे- एक तो यह कि मैं अपने परिवार का भरण-पोषण करूँ, स्वयं को साँसारिक दायित्वों तक सीमित रखूँ। दूसरा यह था कि उन महान् विचारों का प्रचार-प्रसार करूँ जो सारी मानव जाति के कल्याण के लिए उपयोगी थे। अन्त में फैसला मानव कल्याण के पक्ष में गया। वे कहते हैं कि कोई भी महान कार्य बिना त्याग के सम्भव नहीं। खून से लथपथ हृदय को हथेली पर रखकर क्रान्ति की राह पर चलना पड़ता है, तब महान् कार्य हो पाते हैं।
इसी तरह बुद्ध के सामने भी दो विकल्प थे-एक थी राजसी सुख-सुविधाओं से भरीपूरी जिन्दगी, दूसरी थी मनुष्य जाति के दुःख की समस्या के आध्यात्मिक निदान का त्याग, कष्ट भरा मार्ग। स्वतंत्रता यज्ञ में नवप्राण भरने वाले सुभाषचन्द्र बोस यदि चाहते आई॰ सी॰ एस॰ की ठाट-बाट भरी जिन्दगी अपना सकते थे, लेकिन समय की पुकार सुनकर उन्होंने त्याग, बलिदान का मार्ग ही स्वीकार किया।
इतिहास साक्षी है कि युवाओं ने सदैव समय की पुकार को सुना है। चाहे क्रान्ति आध्यात्मिक, साँस्कृतिक रही हो अथवा फिर राजनैतिक एवं सामाजिक। युवा पीढ़ी ने ही अपनी सुख-सुविधाओं सामाजिक पद-प्रतिष्ठा पारिवारिक मोह-बन्धनों की बेडिय़ों को झटकने का दुस्साहस किया व कूद पड़े थे, उस क्रान्ति के दावानल में, जो युग की अव्यवस्था, असुरता एवं अनीति अत्याचार को ध्वस्त करने के लिए धधक रही थी।
ऐतिहासिक परिवर्तन के इस दौर में युग-निर्माण मिशन ने समग्र क्रान्ति के लिए पुनः युवाओं का आह्वान किया है। आज जहाँ एकतरफा असुरता अपना पूरा जोर लगाकर सर्वतोमुखी विध्वंस का दृश्य प्रस्तुत करने पर तुली है, तो वहीं सृजन की असीम सम्भावनाएँ भी अपनी दैवी प्रयास में सक्रिय हैं। इस बेला में युवा हृदय से यह आशा की जा रही है कि वे अपनी मूर्छा, जड़ता, संकीर्ण स्वार्थ एवं अहमन्यता को त्याग कर युग के अभूतपूर्व साँस्कृतिक दिग्विजय अभियान में स्वयं को जोड़ व अपने समाज, राष्ट्र व विश्व के उज्ज्वल भविष्य को साकार करने में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाएँ।
सोते-सोते वह चौंक कर उठ बैठा। सपने की बात सोचकर उसे कँपकँपी हो रही थी। स्वप्न में उसने देखा कि भगवान शिव और माता गौरी आकाश मार्ग से गुजर रहें हैं। अचानक गौरी माँ ने उसके विशाल भवन को देखकर भगवान आशुतोष से पूछा-भगवन् इतना बड़ा भवन निर्जन क्यों दिख रहा है ? उत्तर में महादेव ने उसके ज्ञानी और महा अहंकारी होने की सारी कथा कह सुनाई। रुष्ट होकर जगज्जननी बोलीं-देव इस ब्राह्मण को ज्ञान का इतना अहंकार, मैं इसे ब्रह्मराक्षस होने का श्राप देती हूँ। जब तक यह दूसरों को ज्ञान वितरित नहीं करेगा, इसकी मुक्ति नहीं हो सकेगी।
बड़ा अद्भुत स्वप्न था। स्वप्न में माता पार्वती का श्राप सुनते ही वह भयभीत हो गया था। रह-रह कर उसे अपना सारा अतीत याद आ रहा था। गोपुर नामक इस गाँव में वह ज्ञानसागर के नाम से प्रसिद्ध था। उच्चकोटि का विद्वान होते हुए भी उसने कभी अपने ज्ञान का लाभ औरों को नहीं होने दिया।
हाँ, उसने धन अर्जित कर अपने लिए सर्व सुविधा युक्त विशाल भवन का निर्माण अवश्य कराया। इस भवन की दहलीज पर न जाने कितने जिज्ञासु, ज्ञानप्रार्थी उससे अनुनय-विनय करने आयें। परन्तु उसने निष्ठुरता पूर्वक सभी को ठुकरा दिया। अपने विशाल भवन में रहते हुए उसने अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया और अनगिनत पाण्डुलिपियाँ तैयार की। जिन्हें बेचकर उसने भारी धन कमाया और अपनी सुविधाओं में बेतहाशा वृद्धि की। लोगों को उसके रंग-ढंग पर आश्चर्य तो हुआ परन्तु बाद में वे उदासीन हो गये।
किन्तु आज के स्वप्न ने तो उसे हतप्रभ कर दिया था। जैसे-जैसे रात कटी। सुबह जगने पर उसे सुनाई दिया, दो राहगीर आपस में बातें करते चले जा रहे थे। पहले ने पूछा-क्या यहाँ सचमुच राक्षस रहता है ? दूसरे ने जवाब दिया- हाँ भाई जल्दी बढ़ चलो। यहाँ ब्रह्म राक्षस रहता है। अभी दिन है तो आ-जा सकते हैं। रात को इस मार्ग पर कोई चलता भी नहीं। उस खिड़की के प्रकाश में कोई परछाई आती-जाती रहती है। इन बातों को सुनकर वह हैरान हो गया। उसे लगने लगा कि स्वप्न की बात सचमुच सच है-आस-पास के लोग उसे इंसान नहीं राक्षस मानने लगे हैं।
उसके मन में आया कि वह बाहर निकल कर लोगों से मिले, उन्हें बताए कि वह राक्षस नहीं इन्हीं की तरह एक इंसान है। अपने विचार को निश्चय में बदल कर उसने अपने भवन का द्वार खोला। बहुत दिनों से बन्द द्वार बड़ी मुश्किल से खुला, लेकिन जैसे ही उसने द्वार से बाहर पाँव रखे कि लोगों में भगदड़ मच गयी। ब्रह्मराक्षस निकला- ब्रह्मराक्षस निकला कहते हुए लोग इधर-उधर दौड़ने-भागने लगे। उसकी सारी चेष्टाएँ बेकार गयीं। अब वह ज्ञान देना चाहता था, लेकिन कोई लेने के लिए तैयार नहीं था। भला ब्रह्मराक्षस के पास कौन अपने बालक को पढ़ने भेजता। उसका मन हाहाकार करने लगा। वह मुक्ति चाहता था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे ?
धीरे-धीरे समय बीतने लगा। गोपुर ने बड़े नगर का रूप ले लिया। सुभागा नामक एक स्त्री जो गुणनिधि नामक पुत्र की माँ थी, अपने बालक को लेकर गुरुकुल गयी। वह बालक के पिता का नाम नहीं बता पाने के कारण अपमानित और दुःखी होकर उस मार्ग से जा रही थी। उस निर्जन भवन को देखकर बालक गुणनिधि ने अपनी माँ से पूछ लिया, माँ यहाँ राक्षस रहता है, ऐसा सब लोग क्यों कहते हैं ? सुभागा ने उत्तर दिया, वह राक्षस था नहीं बेटा! ज्ञान के अहंकार ने उसे राक्षस बनाया है अन्यथा उसके समान विद्वान व्यक्ति इस राज्य में कोई नहीं है। कहकर सुभागा ने रास्ते में चलते हुए अपने पुत्र को ज्ञान सागर की कथा सुनाई।
दूसरे दिन बालक गुणनिधि ने आकर उस जंग लगे विशाल द्वार के पास आकर आवाज लगाई- द्वार खोलो, मैं भीतर आना चाहता हूँ। ज्ञानसागर ने खिड़की से झाँककर देखा, कोई बालक द्वार के पास खड. आवाजें लगा रहा था। उसने पूछा- तुम भीतर क्यों आना चाहते हो? बालक ने हाथ जोड़कर प्रणाम कर कहा- मैं आपसे ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। द्वार खोल दीजिए। ज्ञान सागर ने आश्चर्य से पूछा- क्या तुमने मेरे बारे में लोगों से सुना नहीं ? मुझे देखकर तुम्हें डर नहीं लग रहा है ? गुरु से डर कैसा ? मैं अपनी माता की इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। मुझे ज्ञान दीजिए, द्वार खोल दीजिए।
अनेक वर्षों बाद वह लौह द्वार आवाज करता हुआ खुला। गुणनिधि भीतर चला गया। लौह द्वार फिर बन्द हो गया।
वर्षों तक ज्ञानसागर गुणनिधि को अध्यापन द्वारा उसके ज्ञान की प्यास को तृप्ति देने लगा। किन्तु द्वार पहले की ही तरह बन्द रहते। वह शिष्य के साथ ज्ञान चर्चा करके सुखी होता। गुणनिधि हमेशा उसके साथ रहता। गुणनिधि अपने गुरु के प्रति आश्वस्त और निर्भय था। वह मन लगाकर ज्ञानार्जन करता।
एक शाम गुरु ने अपने शिष्य को अपने पास बुलाकर कहा-पुत्र गुणनिधि आज तुम्हारी शिक्षा समाप्त हो गयी। कल सुबह तुम्हारी माता तुम्हें लेने आएँगी । मैंने अपने भीतर के ज्ञान की एक-एक बूँद तुम्हें दे दी है। इसका उपयोग समाज हित में करना और कभी ज्ञान का अहंकार न करना। सुनकर शिष्य ने गुरु के चरणस्पर्श कर ऐसा ही करने की प्रतिज्ञा की।
दूसरी सुबह सुभागा ने अपने पुत्र को दरवाजे के बाहर खड. होकर आवाज देकर बुलाया। द्वार खुलने पर उसने देखा एक सुदर्शन युवक माथे पर ज्ञान की गरिमा लिए उनके चरणों में झुक रहा है। सुभागा ने उसे सीने से लगाकर माथा चूमते हुए कहा-चलो पुत्र घर चलें। गुणनिधि ने माँ का हाथ पकड़ कर कहा हाँ, माँ, पर पहले मैं अपने गुरु से अनुमति ले लूँ। आओ गुरुदेव से मिलने उस वृक्ष के पास चलें। वापस जाकर माता-पुत्र ने देखा-गुरु वृक्ष के नीचे समाधिस्थ बैठें हैं। उनके प्राण ईश्वर में विलीन हो चुके हैं।
सुभागा ने अपने रोते हुए पुत्र के साथ गुरु का अंतिम संस्कार वहीं भवन के आँगन में किया। दोनों कुछ देर तक मौन खड. रहें। फिर मौन तोड़ते हुए सुभागा अपने पुत्र से कहने लगी-पुत्र गुणनिधि! ज्ञानी होने का अहंकार करने वाला, अपने ज्ञान का व्यापार करने वाला, ब्रह्मराक्षस हो जाता है, और लोकहित में अपने ज्ञान को बाँटने वाला ईश तुल्य होकर ईश्वर में विलीन हो जाता है, जैसे तुम्हारे गुरु हो चुके हैं। मौन गुणनिधि ज्ञान-दान की महिमा को आत्मसात् कर रहा था।
आत्मोत्कर्ष की साधनाओं के लिए मात्र या-कृत्य या कर्मकाण्ड ही सबकुछ नहीं होते। उसके लिए उपयुक्त वातावरण भी चाहिए। बीज कितना ही उत्तम क्यों न हो, पर उसे विकसित- पल्लवित करने का अवसर तभी मिलता है जब भूमि उपजाऊ हो। खाद-पानी की व्यवस्था हो और देख-रेख करने वाले व्यक्ति का संरक्षण मिले। विशेष क्षेत्र में विशेष प्रकार के फल, शाक, अन्न, पुष्प, वृक्ष-वनस्पति जीव-जन्तु आदि जन्मते हैं। हर जगह हर वस्तु का उत्पादन एवं विकास नहीं होता। मैसूर के चन्दन, बलसाड़ के चीकू, भुसावल के केले, नागपुर के संतरे अपनी विशेषताएँ लिये होते हैं। उन पौधों को अन्यत्र उगाकर उस स्तर का विशिष्ट उत्पादन नहीं पाया जा सकता। राजहंस मानसरोवर में ही पाये जाते हैं। वातावरण की अपनी महत्ता है। सेनेटोरियमों में भर्ती होकर रोगी इसलिए जल्दी लाभ प्राप्त करता है कि वहाँ मात्र औषधियों का ही नहीं, आरोग्यवर्द्धक वातावरण का अतिरिक्त लाभ मिलता है। अध्यात्म-साधनाओं के संदर्भ
में भी यही तथ्य लागू होता है। कुसंस्कारों कुकर्मों से भरे वातावरण में रहकर किसी की साधना तपश्चर्या सफल नहीं हो सकती।
स्थान विशेष के साथ जुड़ा इतिहास और वातावरण का महत्व एक सार्वभौम सत्य है। यरुशेलम जैसा ईसाइयों का अन्य धर्मकेन्द्र नहीं बन सकता। संसार भर के बौद्ध भारत में भगवान बुद्ध के लीला-केन्द्रों में अपनी श्रद्धाञ्जलियाँ अर्पित करके ही संतोष की साँस लेते हैं। जैन और सिक्ख तीर्थों के मौलिक स्थानों के सम्बन्ध में भी यही बात हैं। इमारतों और पुरोहितों का प्रबंध अन्यत्र कर लेने पर भी वैसा समाधान हो सकना कठिन है।
स्थानों की, वातावरण की अपनी विशेषता और महत्ता न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से वरन् भौतिक दृष्टि से भी है। धरती के कुछ स्थान ऐसे हैं जिनकी अपनी विशेषता है। वह विशेषता कृत्रिम रूप से अन्यत्र पैदा नहीं की जा सकती। दक्षिण अफ्रीका में विश्व का अधिकाँश सोना पैदा होता है। डेड-सी मृतसागर में अत्यन्त एवं खारा पानी है। बरमूडा त्रिकोण का संपर्क अंतरिक्ष के ब्लैक “होल्स” से माना जाता है। उसके आकर्षण क्षेत्र में आने वाले जलयान और वायुयान प्रायः लुप्त होते रहते हैं। आज भी वैज्ञानिकों के लिए यह क्षेत्र रहस्यमय बना हुआ है।
खगोलविद्या की आवश्यक जानकारी के आधार पर एक विशेष क्षेत्र में भू-चुम्बकीय धाराओं व अन्तरिक्षीय प्रवाहों के आधार पर पिरामिड बने हैं। कोणार्क का सूर्यमन्दिर ऐसे ही स्थान पर बना है जहाँ से सूर्यग्रहण का अनुसन्धान करने के लिए विश्वभर के वैज्ञानिक वहाँ आते हैं। न्यूट्रोन्स कणों के वैज्ञानिक अनुसन्धान की आवश्यकता जब पड़ती है तो वे कोलार की खानों में ही पाए जाते हैं। हिमालय के तिब्बत वाले भाग में चहुँओर बर्फीली घाटियों के बीच स्थित शग्रीला पहाड़ी जैसे क्षेत्र हजारों वर्षों से योगियों की तपस्थली बने हुए हैं। वहाँ का वातावरण ही ऐसा है जिसमें भौतिक काया को सदियों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। वातावरण का ही प्रभाव है कि महान् तपश्चर्याओं का इतिहास हिमालय क्षेत्र के साथ जुड़ा हुआ है। तीर्थस्थानों में जिनके साथ दिव्य-आत्माओं के पुरातन इतिहास जुड़े हुए हैं वहाँ लोग इसलिए जाते हैं कि उनसे जुड़ी हुई प्राण ऊर्जा अपनी प्रबल प्रेरणाओं की भाव-संवेदनाओं को उछाल देती है। गंगा स्नान से जो पवित्रता अनुभव होती है, वह उसी पानी को कुएँ या कुलावे से निकाल कर नहा लेने से पूरी नहीं हो सकती। स्थान और वातावरण का अपना महत्व है। उनमें मानवी चिन्तन-चेतना को मोड़ने-मरोड़ने की अद्भुत क्षमता होती है।
इस संदर्भ में जार्ज वाशिंगटन युनिवर्सिटी के मूर्धन्य मनोचिकित्सा विज्ञानी स्टेनली ग्रीनस्वान ने अपनी कृति “द ग्रोथ आफ दि माइण्ड” में लिखा है कि प्राणवान वातावरण अपने सशक्त प्रभाव से न केवल व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार को बदल सकता है, वरन् मस्तिष्क की भौतिक संरचना तक को प्रभावित-परिवर्तित कर सकता है। इन दिनों इस सम्बन्ध में विभिन्न देशों के चिकित्सा-विज्ञानी एवं मनोवेत्ता अपने-अपने ढंग से अनुसन्धानरत हैं कि किस प्रकार वातावरण के प्रभाव से मनुष्य को ऊर्ध्वगामी बनाया जाये।
अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति करने के लिए आत्मवेत्ताओं ने ऐसे ही वातावरण को प्रमुखता दी है, जहाँ दिव्य ऊर्जा विद्यमान हो, जहाँ उत्कृष्टता उभारने वाला कोई उच्चस्तरीय प्रेरणा स्त्रोत विद्यमान हो। अध्यात्म विभूतियों की उपलब्धि जितनी सहजता से जीवन्त तीर्थों, गंगा जैसी पवित्र नदियों एवं हिमालय जैसे दिव्य सौन्दर्य, वैभव एवं वातावरण में होती है, उतनी अन्यत्र नहीं। गंगा को पवित्रता और हिमालय की प्रखरता का समन्वय होने से यह क्षेत्र देवात्मा हिमालय कहलाता है। अगणित ऐसी विशेषताएँ इस प्रदेश में इस सुयोग-संयोग से ही उत्पन्न हुई, जिनसे प्रभावित होकर देवताओं और ऋषियों को यह भूमि अपने-अपने क्रिया-कलापों के लिए चुननी पड़ी ।
आदिकाल से ही देवात्मा हिमालय ऋषि-मुनियों योगियों, तपस्वियों की तप स्थली रहा है। वेदव्यास ने समस्त वेद शास्त्रों को चार संहिताओं में विभक्त करने से लेकर शिव-पुराण महाभारत तक की रचना इसी की पावन गोद में बैठ कर की थी। आचार्य शंकर ने अपनी साधना यहीं की, एवं प्रख्यात प्रस्थानत्रयी यहीं लिखा था। गौतम बुद्ध, महावीर, ज्ञानानन्द, अशोक, कालीदास, गुरुनानक, कबीर, आदि महापुरुषों ने कभी हिमालय में ज्ञान साधना की थी। सम्राट चन्द्रगुप्त ने राष्ट्रोद्धार का चिन्तन यहाँ के एकान्त एवं शान्त वातावरण में आकर किया था। समर्थ गुरु रामदास को राष्ट्र को संगठित करने एवं एकता के सूत्र में बाँधने की प्रेरणा-शक्ति इसी आद्य स्थान में रामदूत हनुमान से मिली थी। स्वामी विवेकानन्द एवं स्वामी रामतीर्थ ने सनातन धर्म को विश्व व्यापी बनाने की विचारणा तपोभूमि हिमालय की गोद में बैठ कर की थी।
हिमालय की पर्वत-श्रृंखलाओं में कुछ दिनों बैठ कर कवीन्द्र रवीन्द्र ने अपनी जगत विख्यात कविताएँ लिखी थीं। सुभाष चन्द्र बोस संन्यास भावना से प्रेरित होकर बचपन में उत्तराखण्ड के इस पवित्र क्षेत्र का भ्रमण कर मातृभूमि की आजादी के लिए अदृश्य प्रेरणा प्राप्त कर चुके थे। महात्मा गाँधी जी त्रिशूल शृंग के सामने कौसानी पर्वत की चोटी पर बैठकर गीता के अनासक्ति योग के कई परिच्छेद पूरे किये थे। इसके अतिरिक्त श्री ज्ञानदीप शंकर, दयानन्द, राजाराम मोहनराय, महर्षि देवेन्द्र, देशबन्धु चितरंजन दास आदि महापुरुषों ने इस तुषारमण्डित हिमक्षेत्र में कहीं न कहीं अपना आसन जमाया था। भगवान राम, कृष्ण से लेकर भगीरथ तक की कठिन तपस्याओं एवं पाण्डवों के स्वर्गारोहण की कहानी कहता हिमालय आज भी ज्यों का त्यों अपनी उसी भव्यता में विद्यमान है।
यों तो हिमालय अत्यधिक सुविस्तृत भू-भाग पर फैला हुआ है। वह पाकिस्तान से लेकर बर्मा तक चला गया है और यह सारा क्षेत्र ही अनुपम सुन्दरता, अपार सम्पदा एवं दिव्य वातावरण से भरा हुआ है, पर यहाँ उस क्षेत्र की चर्चा की जा रही है जो उत्तराखण्ड का अन्त और दक्षिण खण्ड का मध्यान्तर है, इसे हरिद्वार कहा जाता है। हरिद्वार से आरम्भ होकर देवात्मा क्षेत्र यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ, गोमुख, तपोवन, नन्दनवन वाले उत्तराखण्ड से आरम्भ होकर कैलाश-मानसरोवर तक चला गया है।
हरिद्वार तक ही भागीरथी बहती है, इसके बाद वह गंगा बन जाती है। यह क्षेत्र अभी भी अध्यात्म विभूतियों का केन्द्र है। दृश्य और अदृश्य सिद्ध पुरुष अभी भी इस क्षेत्र में पाये जाते हैं। हरिद्वार से नीचे दक्षिण खण्ड है, जिसमें देश भर के अन्य सभी तीर्थों की गणना होती है। दोनों के मध्य बसी हुई यह भगवान शंकर की परमप्रिय नगरी है। उन्हें दो बार जीवनसंगिनी यहीं से प्राप्त हुई। एक बार दक्ष-कन्या के रूप में सती और दूसरी बार हिमालय पुत्री उमा। सती दाह से शोकाकुल होकर जब शिव ताण्डव करने लगें, तब भगवान विष्णु ने शव का उच्छेदन किया और उसके टुकड़े बिखेर कर देश भर में शक्तिपीठों की स्थापना की। इस दृष्टि से हरिद्वार का महत्व है। इस बार भी उसी की पुनरावृत्ति हुई है, और उसका केन्द्र बना है-इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शान्तिकुञ्ज । इस बार यहाँ से २४ नहीं, २४००० शक्तिपीठों के निर्माण का संकल्प उभरा और शिवसंकल्प का ताण्डव नृत्य दूसरे ढंग से सम्पन्न हुआ।
प्राचीनकाल में जहाँ कहीं तीर्थों की स्थापना की जाती थी, उस स्थापना में प्राकृतिक सौन्दर्य, शान्त वातावरण एवं ऐतिहासिक प्रेरणाओं का महत्व तो था ही, प्रमुख विशेषता वहाँ के तपस्वियों की थी जो उसे एकान्त में जन-कल्याण के लिए अध्यात्म क्षेत्र के अनेकों आविष्कार करने में मूर्धन्य वैज्ञानिकों की तरह लगे रहते थे। साथ ही लोक-शिक्षण की वैयक्तिक एवं सामूहिक योजनाओं का भी सूत्र-संचालन करते थे। उन दिनों तपश्चर्या का अर्थ आत्मपरिष्कार और लोककल्याण की योजनाएँ पूरी करने में उदार साहसिकता का परिचय देना भर होता था, आज की तरह शरीर या मन को अकारण उत्पीड़न देना नहीं, तीर्थ किसी अन्धश्रद्धा, मूढ़मान्यताओं के कारण नहीं अपनी योग्यता एवं सेवा-साधना के कारण प्रख्यात हुए। तपस्वी ही वहाँ ऐसा वातावरण बनाते थे, जिसमें कुछ समय निवास करने वाले अपने में उत्साहवर्द्धक परिवर्तन का अनुभव करते कर सकें। सेनेटोरियम स्वास्थ्य सुधारते हैं। पर तीर्थों में आन्तरिक परिशोधन- परिष्कार की कायाकल्प जैसी जैसी सुविधा हर श्रद्धालु को मिलती थी। शान्तिकुञ्ज-गायत्री तीर्थ को उसी पूर्व परम्परा की अनुकृति बनाने का सूत्र-संचालक सत्ता द्वारा प्रयत्न किया गया है। यहाँ इस बात का अनवरत प्रयास किया गया है। यहाँ वैसा वातावरण बन सके जिसमें प्रवेश या निवास करने वाले किसी गरम भट्टी के समीप पहुँचने जैसी प्राणऊर्जा का अनुभव कर सके और हिमालय के हिमाच्छादित दिव्यक्षेत्र में प्रवेश करने पर मिलने वाली वैसी ही शान्ति व शीतलता पा सकें।
शान्तिकुञ्ज की स्थापना की बात सोचते समय स्थान का चयन भी इसी दृष्टि से किया गया था कि इसकी गणना प्राणवान दिव्यतीर्थों की श्रेणी में की जा सके। सप्तसरोवर के इस क्षेत्र में सप्त-ऋषियों ने यहाँ एक साथ तपश्चर्या की थी। उनकी मानरक्षा के लिए भागीरथी ने स्वयं ही अपनी धारा को सात भागों में विभक्त कर लिया था। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्तऋषियों की तपोभूमि होने के कारण गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज के स्थान की विशेषता को आध्यात्मिक त्रिवेणी संगम कहा जा सकता है। स्थापना के अवसर पर चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरणों का यहाँ आयोजन किया गया। सन् १९२६ से निरन्तर जलने वाली अखण्ड-ज्योति की यहाँ अनुपम स्थापना है। अखण्ड अग्नि पर नौकुण्डीय यज्ञशाला में अनुष्ठानी साधकों द्वारा नित्य हजारों आहुतियों का यज्ञ होता है। नियमित पुरश्चरण क्रम, नवरात्रियों में सामूहिक महापुरश्चरण के अतिरिक्त स्थानीय निवासी तथा बाहर के आगन्तुक सभी अपनी साधना बड़ी मात्रा में करते हैं, जो प्रतिदिन कितने ही लक्षमंत्र जप के समकक्ष हो जाती है।
गायत्री के २४ अक्षरों को चौबीस देव प्रतिमाएँ, अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय करने वाला अभूतपूर्व शोध-अनुसन्धान युग-साहित्य का सृजन, जीवन-साधना का व्यावहारिक सत्र शिक्षण, जड़ी-बूटी उद्यान, अन्तर्ग्रही सूत्र-सम्बन्ध जोड़ने वाली वेधशाला जैसी अनेकों गतिविधियाँ यहाँ चलती हैं जिनके प्रभाव से गायत्री तीर्थ के वातावरण में प्राचीनकाल के तीर्थों जैसी विभूतिवान् विशेषताएँ विद्यमान हैं-वह प्रत्यक्ष है। परोक्ष वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा सप्तऋषियों का प्रतीक-पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है। संस्थापक ऋषियुग्म की सूक्ष्म सत्ता की तपश्चर्या अपना विशेष संरक्षण व प्रभाव उत्पन्न करती है। यही कारण है कि यहाँ के सत्रों में सम्मिलित होने वाले वापस लौटने पर अपने में असाधारण परिवर्तन हुआ अनुभव करते हैं। चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में ऐसी उथल-पुथल हुई देखते हैं, जिसे कायाकल्प के समतुल्य कहा जा सके। ऐसे ही लोगों से यह आशा की जा सकती है कि वे अपने परिवर्तन का प्रभाव दूसरों पर छोड़ेंगे और जलते दीपक की तरह अपने संपर्क क्षेत्र में नवचेतना का आलोक वितरण करेंगे।
अध्यात्म-साधनाओं का प्रयोजन अपने भीतर की महानता को विकसित करना है। बाहर व्यापक क्षेत्र में भी यों तो देवशक्तियाँ विद्यमान है, पर उनके लिए समष्टि विश्व की देखभाल का विस्तृत कार्यक्षेत्र नियत रहता है। मनुष्य की भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न करने, सफलता और वरदान देने का कार्य उनके वे अंश ही पूरा करते हैं, जो बीज रूप में हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। इन्हें जाग्रत कर समष्टिगत विश्वव्यापी देवतत्वों के साथ सम्बन्ध जोड़ना, आकर्षित करना और उनका सहयोग-अनुग्रह प्राप्त करना जिस साधना-पद्धति के सहारे बन पड़ता है, योगशास्त्रों में उसे कुँडलिनी जागरण के नाम से सम्बोधित किया गया है।
योगशास्त्रों में साधना द्वारा अतीन्द्रिय क्षमताएँ जाग्रत करने एवं सिद्धि सम्पन्न बनने के जो सर्वमान्य नियम दिये गये है, उनके सिवाय अध्यात्म-विद्या-विशारदों ने इस मार्ग में शीघ्र प्रगति करके कुछ महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त कर लेने की जो विधियाँ निकाली हैं, उनमें “कुण्डलिनी योग” का विशेष स्थान है। कुण्डलिनी जागरण से शरीर में एक शक्ति का आविर्भाव होता है, जिससे मनुष्य की चैतन्यता बहुत अधिक बढ़ जाती है और वह जब चाहे तब स्थूल संसार की अपेक्षा सूक्ष्म जगत की स्थिति का अनुभव कर सकता है और सीमित क्षेत्र में आबद्ध रहने के बजाये विराट विश्व की गतिविधियों को देखने लगता है। जाग्रत कुण्डलिनी मनुष्य को सब प्रकार की शक्तियाँ , विद्या और अन्त में मुक्ति प्राप्त कराने का साधन होती हैं।
वस्तुतः कुण्डलिनी आत्मशक्ति की प्रकट और प्रखर स्फुरण है। यह जीव की ईश्वर प्रदत्त मौलिक शक्ति है, जिसे परमा-प्रकृति भी कहा गया है। यह महाशक्ति समस्त प्राणियों के शरीर में विराजमान् रहती है। अन्य प्राणी तो इससे कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाते और प्रकृति प्रेरणाओं के आधार पर अपना पेट भरते और वंश वृद्धि करते हुए समाप्त हो जाते हैं, परन्तु मनुष्य ईश्वर का वह वरिष्ठ राजकुमार है जिसको विवेक-बुद्धि मिली हुई है और जिसके सहारे वह अपने दैवी गुणों को विकसित कर सकता है। सामान्य स्थिति में कुण्डलिनी मूलाधार में प्रसुप्त स्थिति में मृत तुल्य पड़ी रहती है। वैसी स्थिति में उससे कोई लाभ उठाना सम्भव नहीं हो पाता। यद्यपि वह ब्राह्मी शक्ति अपने ही अन्दर छिपी पड़ी है, जिसे “कामधेनु” कहा गया है। यदि इस महाशक्ति का ज्ञान प्राप्त किया जा सके और उसकी प्रसुप्ति को जाग्रति में बदला जा सके, तो मनुष्य मानव से महामानव और नर से नारायण बन सकता है।
कुण्डलिनी क्या है ? इसके संदर्भ में शास्त्रों और तत्त्वदर्शियों ने अपने-अपने अनुभव के आधार पर कई अभिमत व्यक्त किये हैं। ज्ञानार्णव तन्त्र में कुण्डलिनी को विश्व जननी और सृष्टि संचालिनी शक्ति कहा गया है-” शक्तिः कुण्डलिनी विश्वजननी व्यापार बद्धोद्यता।” विश्व-व्यापार एक घुमावदार उपक्रम के साथ चलता है। परमाणु से लेकर ग्रह-नक्षत्रों और आकाश-गंगाओं तक ही गति परिभ्रमण परक है। हमारे शब्द और विचार जिस स्थान से उद्भूत होते हैं- व्यापक परिभ्रमण करके वे अपने उद्गम केन्द्र पर लौट आते हैं। यही गतिचक्र भगवान के चार आयुधों में से एक हैं। महाकाल की परिवर्तन प्रक्रिया इसी को कहा जा सकता है। जीव की चक्रारुढ़ मृतका पिण्ड की तरह यही घुमाती है और कुम्हार जैसे अपनी मिट्टी से तरह-तरह के पात्र-उपकरण बनाता है, उसी प्रकार आत्मा की स्थिति उठाने-गिराने की भूमिका भी वही निभाती है। कुण्डलिनी सृष्टि संदर्भ में समष्टि और जीव संदर्भ में व्यष्टि शक्ति संचार करती है।
अध्यात्म-ग्रन्थों में विशेषतः उपनिषदों में कुण्डलिनी शक्ति की चर्चा हुई है, पर उतने को ही पूर्ण पक्ष नहीं मान लेना चाहिए। उतने से आगे एवं अधिक भी बहुत कुछ कहने, जानने और खोजने योग्य शेष रह जाता है। इन अपूर्ण घटकों को मिलाकर हमें वस्तुस्थिति समझने, अधिक जानने के लिए अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए।
विज्ञान की भाषा में कुण्डलिनी को जीवनीशक्ति अथवा चुम्बकीय विद्युत कहते हैं। इसका केन्द्र मस्तिष्क माना गया है, तो भी यह रहस्य अभी स्पष्ट नहीं हुआ है कि मस्तिष्क को अपनी गतिविधियों के संचालन की क्षमता कहाँ से मिलती है। योगशास्त्र इसका उत्तर उस कामशक्ति की ओर संकेत करते हुए देता है और बताता है कि अव्यक्त मानवी-सत्ता को व्यक्त होने का अवसर इसी केन्द्र को मिलता है, वही कामतन्त्र के विभिन्न क्रियाकलापों के लिए आवश्यक प्रेरणा भी देती है। यही वह चुम्बकीय “क्रिस्टल” है जो काया के ट्रांजिस्टर को चलाने वाले आधार खड. करता है।
कुण्डलिनी महाशक्ति का वर्णन विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग तरह से मिलता है। अध्यात्म शास्त्र इसे “ब्रह्माग्नि” कहते हैं और इसका मूल केन्द्र संस्थान ब्रह्मरंध्र को मानते हैं। यही सहस्रार कमल में जाग्रत कुण्डलिनी पहुँचकर साधक को सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। सहस्रार से वह मूलाधार की ओर दौड़ती और वापस आती है। सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा जी को अपने आसन के नीचे की जलराशि तक कमलनाल के सहारे असंख्य बार चढ़ना-उतरना पड़े, तब यह सृष्टि बनीं। इस पौराणिक गाथा में सहस्रार शक्ति को मूलाधार तक आते-जाते रहने का संकेत सन्निहित है।
कुण्डलिनी को “सार्वजनिक जीवन तत्व” भी कहते हैं। इसके भीतर आकर्षण व विकर्षण दोनों ही धाराएँ विद्यमान हैं। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से उन प्रवाहों को “बायोइलेक्ट्रिसिटी” एवं “मैग्नेटिज्म” अर्थात् जैव विद्युत एवं चुम्बकत्व कह सकते हैं। दार्शनिक हर्बर्ट स्पेन्सर के मतानुसार इसे “एन्सेस आफ लाइफ” जीवन का सार कहा जा सकता है। बाइबिल के अनुसार यही तत्व महान् सर्प है। सुप्रसिद्ध मनीषी प्रो. हडसन का कहना है कि इस महान शक्ति का जीवन तत्व का महत्व न जान पाने के कारण प्रायः लोग इसका उपयोग मात्र शरीर साधन में करते रहते हैं और यों ही जीवन की इतिश्री कर लेते हैं। यदि उसके उज्ज्वल पक्ष को समझा और प्रसुप्त को जाग्रत किया जा सके और उस जागरण को महत्वपूर्ण आत्मिक उद्देश्यों में लगाया जा सके तो चेतना क्षेत्र की चमत्कारी सिद्धियाँ, शक्तियाँ हस्तगत हो सकती हैं।
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार-” वह केन्द्र जहाँ समस्त अवशिष्ट संवेदनाएँ संचित-संग्रहित हैं, मूलाधार चक्र कहलाता है। वहाँ पर कुण्डलि क्रियाशक्ति को कुण्डलिनी कहा जाता है।” पाश्चात्य विद्वान आर्थर एवलन ने भी कुण्डलिनी को संग्रहित शक्ति बताया है। उनका कहना है कि जो महत्-ब्रह्मसत्ता ब्रह्माण्ड का सृजन एवं धारण करती है, उसकी व्यक्ति देह में अवस्थित प्रतिनिधि सत्ता का नाम कुण्डलिनी शक्ति है। इस कुण्डलिनी शक्ति की साधना अपने अन्तरंग क्षेत्र में ही करनी पड़ती है और उसकी सफलता जब मेघमालाओं की तरह बरसती है तो अगणित दिव्य-विभूतियाँ-सिद्धियाँ स्वयमेव प्रस्फुटित और पल्लवित होती हैं।
हठयोग प्रदीपिका ३-१ २,३) में कुण्डलिनी शक्ति के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि “जिस प्रकार सम्पूर्ण वनों सहित जितनी भूमि है, उसका आधार सर्पों का नायक शेषनाग है, उसी प्रकार समस्त योग-साधनाओं का आधार भी कुण्डलिनी ही है। जब गुरु की कृपा से सोई हुई कुण्डलिनी जागती है, तब सम्पूर्ण षट्चक्र और ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं और उसी समय प्राण की शून्य पदवी सुषुम्ना, राजपथ के समान हो जाती है, चित्त विषयों से रहित हो जाता है और मृत्यु का भय मिट जाता है।”
अन्यान्य शास्त्रों विशेषकर तंत्र ग्रंथों में कुण्डलिनी के स्वरूप तथा उसके उत्थान का विस्तृत वर्णन किया गया है। कठोपनिषद् में जिस पंचाग्नि विद्या की चर्चा की गयी है, वह कुण्डलिनी महाशक्ति की पंचविधि व्याख्या-विवेचना ही है। श्वेताश्वतर् उपनिषद् में उनके योगाग्नि के रूप में उल्लेख करते हुए कहा गया है-न तस्य रोगी न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयम् शरीरम्॥” चैनिक योगप्रदीपिका में उसे “स्पिरिट फायर” के नाम से सम्बोधित किया गया है। सुप्रसिद्ध तंत्रमर्मज्ञ जान वुडरफ ने उसे “सर्पेन्टाइन फायर” नाम दिया है और कहा है कि इसे जगाने वाला विशिष्ट सामर्थ्यवान बन सकता है। थियोसॉफिकल सोसायटी की संस्थापिका मैडम ब्लेवटस्की ने कुण्डलिनी को विश्वव्यापी विद्युत-शक्ति “कॉस्मिक इलेक्ट्रिसिटी नाम दिया है। उन्होंने उसकी विवेचना विश्व-विद्युत के समतुल्य चेतनात्मक प्रचंड प्रवाह के रूप में की है। उन्होंने अपनी कृति “वायस आफ द साइलेन्स” में कहा है कि सर्पवत् सर्पिल गति अपनाने के कारण ही उस महाशक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं। इस सामान्य गति को योग-साधक अपनी काया में चक्राकार बना लेते हैं। इस अभ्यास से उनकी शक्ति बढ़ती हैं। कुण्डलिनी विद्युतीय अग्नियुक्त गुह्य शक्ति है। वह प्राकृत शक्ति है, जो समस्त प्राणियों एवं पदार्थों के मूल में विद्यमान है।
शरीरशास्त्रियों ने उसे “नर्वस सिस्टम” नाड़ी संस्थान से उद्भूत “नर्वस फोर्स” कहा है। डा रेले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “मिस्टीरियस कुण्डलिनी” में उसकी व्याख्या “वेगस नर्व” के रूप में की है। माँसपेशियों और तंत्रिका तंत्र के संचालन में काम आने वाली सामर्थ्य को ही आध्यात्म प्रयोजनों में काम करने पर कुण्डलिनी संरक्षक बनने का वे प्रतिपादन करते हैं। उनके मतानुसार यह शक्ति जब नियंत्रण में आ जाती है तो उसके सहारे शरीर की ऐच्छिक व अनैच्छिक गतिविधियों पर इच्छानुसार नियंत्रण पाया जा सकता है। यह आत्मनियंत्रण बहुत
बड़ी बात है। इसे प्रकारान्तर से व्यक्ति के अभीष्ट निर्माण की तद्नुसार भाग्य निर्माण की सामर्थ्य कह सकते हैं। वे इसी रूप में कुण्डलिनी का गुणगान करते और उसकी उपयोगिता बताते हुए उसके जागरण का परामर्श देते हैं। हठयोग के व्याख्याकारों, योग विद्याविशारदों ने वस्तिक्षेत्र के गह्नर में अण्डे की आकृति वाले कंद में मूलाधार की उपस्थिति मानी है। शिव संहिता में भी कहा गया है-गुदादद्वयंगुलतश्चोर्ध्व मेढ्रैकाँगुलतस्त्वधः। एव चास्ति समं कंद समता चतुरंगुलम्” अर्थात् गुदा से दो अंगुल नीचे चार अंगुल विस्तार कंद का प्रमाण है। इसी ग्रन्थ में आगे उल्लेख है कि-गुदा एवं मूत्रेंद्रिय के मध्य में जो योनि है, वह पश्चिममुखी अर्थात् पीछे को मुख है, उसी स्थान में कंद है और उसी स्थान में सर्वदा कुण्डलिनी स्थित है।”
षट्चक्र निरूपण के अनुसार मूलाधार स्थित त्रिकोण के भीतर स्वर्ण के समान स्वयंभू लिंग है, जिस पर कमलनाल के समान ब्रह्मद्वार को अपने मुख से ढके हुए विद्युत एवं पूर्ण चन्द्रमा की आभायुक्त अतिसूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति सी रही है। इसी तरह योग कुण्डल्योपनिषद् में उल्लेख है कि मूलाधार के मध्य वह आत्मतेज, ब्रह्मतेज रूपी कुण्डलिनी निवास करती हैं। वह जीव की जीवनी-शक्ति हैं, प्राण-शक्ति हैं। वह तेजस् रूप है। इसी के आगे १/४३-४५ श्लोकों में वर्णन है कि इस अग्निमण्डल में साधक जब प्राणायाम प्रक्रिया द्वारा प्राण-अपान का सम्मिलन कराता है तो अग्नि की लपटें और तीव्र हो जाती हैं। उस अग्नि से गरम होने पर सोई हुई कुण्डलिनी जागती है और लाठी से छेड़ने पर सर्पिणी जिस प्रकार फुफकार कर उठती है, वैसे ही यह कुण्डलिनी भी जाग्रत होती है। जाग्रत कुण्डलिनी षट्चक्रों का बेधन करती हुई सहस्रार कमल में पहुँचती है। जो इस रहस्य को जानता है, ब्रह्मवर्चस् प्राप्त करता है, नर से नारायण बनने का अवसर प्राप्त करता है।
फ्राँस के सम्राट् नेपोलियन ने एक अधिकारी की नियुक्ति उच्च पद पर कर दी। इस नियुक्ति की बात सुनकर नेपोलियन के शुभचिन्तक दौड़-दौड़ आए और कहने लगें कि जिस आदमी की नियुक्ति आपने उच्च पद पर की है, उसके विचार आपके प्रति अच्छे नहीं हैं।
नेपोलियन कहने लगें-आप तो उसके काम के बारे में बताइये। क्या वह काम से जी चुराता है ? अथवा फिर टाल-मटोल करता है। यदि वह अपने कर्तव्य के प्रति सजग है तो उसके विचार मेरे प्रति अच्छे न भी हों तो मुझे इसकी रंचमात्र भी चिन्ता नहीं। मुझे तो उसके काम से मतलब है, व्यक्तिगत विचारों से नहीं।
मानव जीवन एवं प्रकृति जगत में कई बार विचित्र संयोग देखे जाते हैं। सामान्यजन इन्हें चमत्कार, दैवी प्रयास या भाग्य कहकर चुप हो जाते हैं। परन्तु वैज्ञानिकों के लिए इस तरह की घटनाएँ सदा से चुनौती का विषय रहीं हैं। चमत्कार कहकर वे स्वयं को नासमझ या पिछड़ा हुआ घोषित नहीं करना चाहतें, फिर भी उन्हें झुठला नहीं पाते। इसी कारण अपवाद कहकर बहुधा उन्हें टाल दिया जाता है। इतने पर भी संयोग किन्हीं अकाट्य नियमों से बन्धे हुए हैं और रहस्योद्घाटन की अपेक्षा रखते हैं।
इस संदर्भ में सुविख्यात लेखक एवं दार्शनिक आर्थर कोस्लर ने संयोगों को अद्भुत चमत्कार मानते हुए कहा है कि-वे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, उन्हें नकारा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने ऐसी अनेकों घटनाओं के विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि जीव विज्ञान और भौतिक विज्ञान सम्बन्धी आधुनिक खोज प्रकृति की उस मूल शक्ति की ओर प्रबल संकेत करती है जो अव्यवस्था में भी व्यवस्था बनाए रखती है। इसी को देखकर लगता है कि हमारे ज्ञान से परे कोई शक्ति काम कर रही है।”
अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ द रुट्स आफ कॉइन्सीडेन्ट ‘ में कोस्लर ने स्पष्ट लिखा है कि हम निस्सन्देह संयोगपरक चमत्कारों से घिरे हुए है , जिनके अस्तित्व की अब तक हम उपेक्षा करते रहें है। यही कारण है कि इन्हें अन्धविश्वास से अधिक कुछ माना नहीं गया है। यह रहस्य मनुष्य सदियों तक नहीं समझ पाया कि सूक्ष्म जगत कितना अद्भुत , कितना विलक्षण है , ऐसी कितनी ही घटनाएँ इसकी साक्षी हैं।
दार्शनिक कोस्लर ने प्रख्यात मनोवेत्ता कार्ल गुस्ताफ जुँग की एक पुस्तक का हवाला देते हुए लिखा है कि जुँग ने संयोगों के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उन्हें-सिन्क्रोनिसिटी अर्थात् सहसामयिकता नाम दिया जाता है। जुँग ने सहयोगी सुप्रसिद्ध भौतिकविद् बुल्फ गैंग पाउली ने तो यह बात कहकर बला टाल दी थी कि संयोग ऐसे सिद्धान्तों के दिखाई देने पाले चिन्ह है , जिनकी खोज नहीं की जा सकती। लेकिन जुँग ने इतने से ही संतोष नहीं किया , वरन् अपनी खोज को आगे भी जारी रखा। ऐसी हर बात पर जो कारण और परिणाम के सम्बन्धों पर पूरी न उतरती हो , अचेतन का प्रभाव होता है , ऐसा जुँग का मत था। उनका कहना था कि-” यह अचेतन मन ही स्मृतियों का ऐसा गुप्त आकार है जिससे विभिन्न मस्तिष्क एक दूसरे को अपनी बात पहुँचाते हैं “।
सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक मनीषी एलन वान ने अपनी कृति ‘ इनक्रेडिबल काॅइन्सीडेन्स ‘ में कोस्लर की मान्यताओं का प्रतिपादन करते हुए संयोग सम्बन्धी ऐसी १५२ घटनाओं का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है जिनका प्रत्यक्षतः ढूँढ़ने पर कोई कारण नहीं मिलता। ये घटना- प्रसंग अनेकों वैज्ञानिकों को इतने रोचक लगे कि उनसे चुप नहीं बैठे रहा गया। पिछले ५०-६० वर्षों की ऐसी सभी घटनाओं का खोज- बान की व यह पाया गया कि कोई अदृश्य सत्ता , जिसकी अभी खोज नहीं हो पाया है, ऐसे संयोगों के मूल में काम करती है। विख्यात गणितज्ञ डॉ. एड्रियन डाब्स ने विभिन्न परीक्षणों के उपरांत बताया कि इस निखिल ब्रह्माण्ड में ऐसी शक्तियाँ निरन्तर गतिशील रहती हैं जो राडार की तरह भावी सम्भावनाओं का पूर्ण संकेत देती हैं। अपनी उक्त पुस्तक-द रुट्स ऑफ काइन्सीडेन्स” में कोस्लर ने डॉ. डाब्स के विचारों का उल्लेख करते हुए ये कहा है कि सन्देशवाहक शक्तियाँ मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों के सतत् संपर्क में रहती हैं एवं मस्तिष्क में एक प्रकार से पूर्वानुभूती को जन्म देती है।
“इनक्रेडिबल काइन्सीडेन्स” पुस्तक में ऐलन वान ने एक घटना का उल्लेख किया है। प्रिंस एडवर्ड द्वीप के निवासी कोगलान की टैक्सास स्थित गाल वेस्टन नामक स्थान पर सन् १८९९ में एक यात्रा के दौरान मृत्यु हो गयी। उन्हें वहीं के मकबरे में शीशे की परतों से मढ़े हुए ताबूत में दफना दिया गया। एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि सितम्बर १९०० में गाल वेस्टन द्वीप में भीषण तूफान आया और कब्रिस्तान में पानी भर गया। तूफान की स्थिति में ही कोगलान का ताबूत मक़बरे से निकल कर बहता-बहता मैक्सिको की खाड़ी जा पहुँचा। वहाँ से वह ताबूत फ्लोरिडा का चक्कर काट कर अटलांटिक महासागर में आ गया। क्रमशः पानी का प्रवाह उसे उत्तर दिशा में ले गया। आठ वर्ष बाद अक्टूबर १९०८ में प्रिंस एडवर्ड द्वीप के कुछ मछुआरों ने तूफानी लहरों के बीच पड़े डिब्बे को पानी में तैरते पाया तो उत्सुकतावश किनारे लाकर उसे खोलकर देखा। कोगलान का नाम अंकित देख वे तुरन्त पहचान गये। यह समुद्री किनारा उसके गाँव से कुछ ही मील दूरी पर था। कोगलान के शव को उचित सम्मान के साथ उस गिरजे के कब्रिस्तान में पुनः दफना दिया। यह ताबूत भटकते-भटकते किस प्रकार आठ वर्ष बाद मृतक के जन्म स्थान पर पहुँच गया, इस पर आश्चर्य होना स्वाभाविक है।
ख्यातिलब्ध लेखक रिचर्ड बाँक ने अपनी कृति ‘ नथिंग बाइचाँस ‘ में इसी तरह की स्वयं के साथ घटी एक घटना का वर्णन किया है। बाँक सन् १९६६ में अमेरिका के मध्य पश्चिम क्षेत्र में दो फलक वाले एक विमान में यात्रा कर रहे थे। यह विमान दुर्लभ प्रकार का डेट्राइट पी-ए टाइप का था। अमेरिका में उस समय इस तरह के केवल आठ विमान ही बने थे वे विश्व भर में केवल इतने ही थे। विस्काँन्सिन स्थित पायीरो नामक स्थान में रिचर्ड न यह विमान अपने सहचालक मित्र पायलट को चलाने के लिए दिया। विमान उतारते समय साथी से थोड़ी भूल हो गई और विमान क्षतिग्रस्त हो गया। वे लिखते हैं कि- “हमने दबाव को रोकने वाले एक पुरजे को छोड़कर शेष प्रत्येक पुरजे की मरम्मत कर दी थी। इस एक पुरजे की मरम्मत इस लिए न हो सकी कि उसके दुर्लभ होने से वह भाग कहीं भी मिलना सम्भव न था। तभी एक व्यक्ति आया जिसने स्वयं ही उत्सुकतावश उनकी परेशानी पूछी। संयोगवश उसकी विमानशाला में उस विमान के उपयुक्त ४० वर्ष पुराना एक पुर्जा मिल गया और हम अपने वायुयान की मरम्मत कर उसे चला पाने में कामयाब हो गये। यह एक संयोग ही था कि उस अपरिचित इलाके में ठीक वही पुरजा मिल गया जिसे खोज कर हम हार गये थे।”
न्यूजीलैंड के कुक जलडमरु-मध्य में दो शौकिया नाविक महिलाएँ अपना सप्ताहांत बिता रहीं थी। इसी बीच उनकी नाव एक समुद्री चक्रवात में फँस कर उलट गयी। दोनों महिलाएँ कुछ दूर तक तैरी, पर किनारा दूर था, नजदीक कोई दूसरा साधन नहीं था। इसी बीच एक मृत ह्वेल मछली की लाश पानी में तैरती हुई उनके समीप लहरों के साथ आ गयी। वे उस पर चढ़कर उसे नाव की तरह खेती हुई किनारे पर आ गयीं और सकुशल घर पहुँच गईं। इसे संयोग के अतिरिक्त और क्या कहा जाएगा ?
घटना सन् १९७३ की है। फैलमाउथ-अमेरिका के एडविन रॉबिन्सन नामक एक व्यक्ति की आँखों की ज्योति एक सड़क दुर्घटना में चली गयी थी। उसके चिकित्सक डा. विलियम टेलर परीक्षणोंपरांत बताया कि अब नेत्र-ज्योति का सही होना सम्भव नहीं है। संयोगवश १९८२ की जुलाई में वे अकेले घर लौटते हुए भयंकर वर्षा वाले तूफान में फँस गये। पेड़ के नीचे शरण पाने के लिए उन्होंने अपनी धातु की छड़ी का प्रयोग किया तभी जोरों से विद्युतगर्जन हुआ और उन्हें लगा कि समीप ही बिजली गिरी है। वे धक्का खाकर गिर पड़ा । लेकिन पाँच मिनट बाद जब किसी तरह उठे तो पाया कि उनका श्रवण यंत्र तो बेकार हो निकल गया, लेकिन वे इसके बिना भी सुन सकते हैं। आँखों से उन्हें सबकुछ दिखाई भी दे रहा था। प्रसन्न मन वे वापस घर लौटे। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह विज्ञान के समझ में न आ सकने वाले कई वैचित्र्यपूर्ण संयोगों में से एक है, जिसका कोई समाधान नहीं दिया जा सकता है।
मैरी गैलेन्ट प्रान्त के फ्रांसीसी गवर्नर की तीन वर्षीय पुत्री एक समुद्री यात्रा पर पिता के साथ थी। रास्ते में वह बीमार पड़ी और मर गयी। उसकी लाश बोरे में सीकर बन्द कर दी गयी ताकि उसे जल में उपर्युक्त स्थान पर डाला जा सके। कुछ समय उपरान्त देखा गया कि जहाज में पालतू बिल्ली लाश के पास चक्कर काट रही है। आमतौर से बिल्ली लाश से दूर रहती है। सन्देह हुआ कि कहीं बच्ची जीवित तो नहीं है। २४ घंटे बीत चुके थे, फिर भी बोरा खोला गया तो देखा कि लड़की की हलकी-हलकी साँसें चल रहीं हैं। उसकी चिकित्सा हुई और वह ठीक हो गयी। बड़ी होने पर उसका विवाह फ्राँस के राजा लुई चौदहवें के साथ हुआ और वह ८४ वर्ष के आयु तक जीवित रही।
सन् १८२५ की एक घटना है। पश्चिमी जर्मनी के वाइफ कस्बे में समुद्र तट पर भयानक समुद्री तूफान आया। असंख्यों परिवार उसमें डूब गये, फिर भी पालने से बंधे दो बच्चे जीवित अवस्था में किनारे पर पड़े पाये गये, किसी माता ने इन बच्चों के तैरने की सुविधा सोचकर पालने से बाँध दिया होगा। वे डूबे नहीं, किनारे आ लगे। उन्हें एक समुद्री जहाज के मालिक ने उठाया और उनका पालन-पोषण किया। बड़ा होने पर वे पालने वाले के उत्तराधिकारी बनें और जहाजों के मालिक कहलाए। जिन्दगी उन्होंने समुद्र में ही बिताई और अंततः किसी समुद्री तूफान में फँस कर जहाज समेत समुद्र के गर्भ में समा गये।
कैन्सास के आर्थर स्टिवैल ने एक लम्बा रेलमार्ग बनाने की जिम्मेदारी ली थी। काम ठीक तरह आरम्भ नहीं हो पाया था कि एक अप्रत्याशित झंझट आ खड. हुआ। इस जमीन पर एक व्यक्ति ने अपने अधिकार का दावा ठोक दिया। और कोर्ट से निषेधाज्ञा निकलवा कर काम रुकवा दिया। बहुत समय तक इस अवरोध के बाद आर्थर ने सपना देखा कि जमीन का असली मालिक कोई कर्से नामक व्यक्ति है। खोज की गयी। कर्से मर चुका था। उसके उत्तराधिकारी भी इस जमीन के बारे में अनभिज्ञ थे। पर जब सपने के हवाले से उसने जबरन कागजों की खोजबीन करायी, तो ऐसे प्रमाण मिल गये जिनमें वे लोग ही जमीन के असली मालिक सिद्ध होते थे। अन्ततः उन लोगों से समझौता करके रेलवे लाइन का काम फिर चालू किया गया और वह यथासमय पूरा भी हो गया। यह काम पूरा होने पर उसे करोड़ों का लाभ हुआ।
इन्हें संयोग कहें या अदृश्य दैवी सहायता, पर हैं ये अपने आप में बड़ी विचित्र और अबूझ। इनकी गुत्थी सुलझाने में विज्ञानवेत्ता अभी तक सफल नहीं हुए है। एक ऐसी ही घटना ओहियो के फिलिप रैडल नामक व्यक्ति के साथ घटित हुई। फिलिप के दाहिने फेफड़े. में दुर्घटनावश एक गोली लगी और वह इतनी गहरी घुस गयी कि उन दिनों के साधनों को देखते हुए उसे निकालना सम्भव न था। शल्य चिकित्सकों ने असमर्थता व निराशा व्यक्त की और आपरेशन करने से इनकार कर दिया। घायल फिलिप ऐसे ही अस्पताल में पड़ा रहा। एक दिन उसे जोरों की खाँसी आयी और गोली मुँह के रास्ते बाहर निकल गयी।
प्रकृति-जगत और जीव-जगत में इस तरह के कितने ही चित्र-विचित्र संयोग घटित होते रहते हैं। वे लगते तो संयोग, अदृश्य दैवी सहायता या भाग्य जैसे है, पर वस्तुतः उनके पीछे विश्व-व्यवस्था के किन्हीं अकाट्य नियमों को काम करते समझा जा सकता है और उन रहस्यों का पता लगाने हेतु नये सिरे से प्रयास-पुरुषार्थ आरम्भ किया जा सकता है।
मास्को के अजर बेजान के एक दूर दराज गाँव में एक महिला जिसका नाम श्रीमती अल्लाखिरोवा है, ने इस वर्ष १६१ वाँ जन्मदिन मनाया, इनके १५ बच्चे हैं, जिनमें से एक बेटी की उम्र ११४ वर्ष है तथा उसके भी १० बच्चे हैं। इस प्रान्त में जो ईरान से सटा हुआ है १०० वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या डेढ़ हजार और ९० से अधिक पन्द्रह हजार लोगों की आयु है। श्रीमती अल्लाखिरोवा के करीब शताधिक पोते-पोतियाँ और नाती-नातनियाँ हैं। श्रीमती अल्लाखिरोवा इस उम्र में भी अपने घर की देखभाल आप ही करती हैं तथा कालीन की बुनाई भी करती हैं। श्रमनिष्ठा ही इन लोगों की एकमात्र पूजा-उपासना है।
महाराज शीलभद्र जितने रण-कुशल थे, उतने ही नीतिकुशल। उनके शौर्य और पराक्रम से अपराधियों, दस्युओं और समाजद्रोहियों के दिल दहलते थे। पड़ोसी राजा उनसे सन्धि रखने में ही अपनी कुशलता समझते थे। उनकी नीति एवं न्यायप्रियता की वजह से सौराष्ट्र की जनता उन्हें अपना शासक मानने की बजाए पिता मानने में गौरव अनुभव करती थी। हर कोई उन्हें पिता महाराज या बापू महाराज कह कर सम्बोधित करता था। सौराष्ट्र नरेश को भी अपनी प्रजा से अतिशय प्यार था। उन्हें अपने राज्य के नागरिकों के कष्ट-निवारण में आत्मिक तुष्टि का अनुभव होता था।
प्रत्येक माह की पहली तारीख को महाराज प्रजा की समस्याओं को सुनने के लिए विशेष बैठक करते थे। प्रजा बहुत खुश थी। महाराज के सद्व्यवहार की चर्चा सौराष्ट्र के हर घर में थी, परन्तु महाराज के मन में जब-तब दुःख का सैलाब उमड़ता रहता। वह सन्तान न होने की गहरी पीड़ा से आकुल हो उठते थे। महाराज की तीन रानियाँ थीं-सुनन्दा सारंगा व बिन्दुमती। प्रजाजनों के आग्रह एवं मन्त्रियों के अनुरोध से ही महाराज तीन विवाह करने के लिए विवश थे।
गुणसम्पन्न महाराज के व्यक्तित्व में एक दोष था-ज्योतिष पर अन्धश्रद्धा। इस अन्धश्रद्धा की वजह से ही ज्योतिष उनके लिए प्रकाश नहीं अन्धकार का पर्याय बन गया था। महाराज हर काम करने के पूर्व राजज्योतिष बुद्धसेन की सलाह अवश्य लेते। बुद्धसेन का हाँ या नहीं उनके कार्यों का निर्धारण-नियमन करती। यदा-कदा तो ज्योतिष एवं ग्रह-गोचर के चक्रव्यूह में जनहित के कार्य भी आधे-अधूरे पड़े रहते। राज्य के प्रधानमन्त्री गन्धर्वसेन को महाराज की इस अन्धश्रद्धा पर जब-तब बहुत खीज़ होती। परन्तु वह भी राजहठ के कारण विवश हो जाते।
महाराज के जीवन प्रवाह की सामान्य मन्थर गति में एक दिन अचानक उल्लास का ज्वार आ गया। महाराज उस दिन राजदरबार में बैठे राजकीय गतिविधियों का संचालन कर रहें थे, तभी अन्तःपुर की दासी ने आकर सूचना दी कि महारानी बिन्दुमती ने पुत्ररत्न को जन्म दिया है। समाचार को सुनते ही सभी सभासद खुशी के समुद्र में डूब गये। कई पल की खुशियों भरी चुप्पी के बाद दरबार में बधाइयों का ताँता लग गया। हर कोई महाराज को राजकुमार के जन्म पर बधाई दे रहा था। प्रधानमन्त्री गन्धर्वसेन तो राजकीय समारोह के मंसूबे बनाने लगे थे।
तभी महाराज शीलभद्र ने राज-ज्योतिष को दरबार में बुलवाया और पूछा-बुद्धसेन राजकुँवर का कैसा भाग्य है ? क्या सचमुच सौराष्ट्र की जनता का भाग्य जगा है ? क्या नवजात राजकुँवर सौराष्ट्र की यशकीर्ति की और अधिक देदीप्यमान करेंगे। बुद्धसेन को पूरे सौराष्ट्र में ग्रह-नक्षत्रों की गति-चाल का विशेषज्ञ माना जाता था। महाराज के प्रश्नों के उत्तर में बुद्धसेन काफी देर मौन रहें, लेकिन उनके होठों की मद्धिम गति बता रही थी कि वे मन ही मन कुछ गणना करने में व्यस्त है।
अचानक उनके चेहरे पर उदासी के भाव घिर आये। वह खिन्न होकर कहने लगे- महाराज राजकुँवर के जन्म से सौराष्ट्र का भाग्य दाँव पर लग गया है। यदि जन्म के चौबीस घण्टे के अन्दर राजकुँवर का वध न किया गया तो सम्पूर्ण सौराष्ट्र एक बहुत बड़े संकट में फँस सकता है। चौबीस घण्टे की अवधि पार होते ही राजमहल की बड़ी भारी क्षति होगी, सौराष्ट्र के बचाव के लिए शीघ्र ही कोई उपाय ढूँढ़ा जाये। यह सुनकर महाराज ही नहीं सभी काँप गये। उल्लास की उमंगती लहरें स्तब्ध शान्ति में बदलने लगीं। किसी को यह समझ में नहीं आ रहा था ऐसे में कौन क्या कहे ? कौन क्या करे ? महारानियों की मनःस्थिति से सभी वाकिफ थे। वे सौराष्ट्र की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकती थीं। महाराज ने उसी समय एक निर्णय लिया एवं प्रधानमन्त्री गन्धर्वसेन को बुलवाकर कहा-मन्त्री जी! आज सौराष्ट्र का भविष्य खतरे में है। देश की गरिमा किसी भी व्यक्ति के ऊपर है। फिर वह चाहे राजा या राजकुमार ही क्यों न हो। इसलिए तुम शीघ्र ही दूर जंगल में जाकर इस नादान राजकुमार का वध कर आओ। साथ ही प्रमाण के रूप में कुछ साक्ष्य भी देखना चाहता हूँ, जाओ देर न करो।
नवजात शिशु की हत्या, प्रधानमन्त्री गन्धर्वसेन का अन्तःकरण काँप उठा। वह सोचने लगें कि जो बालक अभी-अभी पैदा हुआ है, जो अभी अपना स्वयं का भी हित-अहित नहीं कर सकता है। ऐसा नितान्त असहाय शिशु भला चौबीस घण्टे बाद ही समूचे सौराष्ट्र का किस तरह अहित कर सकेगा। उन्हें ज्योतिषी का कथन एक रूढ़ी एवं मूढ़ता के सिवा और कुछ नहीं लग रहा था, परन्तु महाराज को किस तरह समझाया जाय ?
कुछ सोचते हुए उन्होंने महाराज शीलभद्र से निवेदन किया-महाराज राजकुँवर अभी शिशु है, नवजात शिशु की हत्या धार्मिक दृष्टि से अपराध है। पुराण कथाओं में भी कंस, पूतना, वक्रासुर आदि बालघातियों को पापी व राक्षस की संज्ञा दी गयी है। आप जैसे महाज्ञानी को ऐसा आदेश देना शोभा नहीं देता।
तुम ज्योतिष ज्ञान से अनभिज्ञ हो गन्धर्वसेन। राजकुँवर के ग्रह-नक्षत्र अपने सौराष्ट्र के लिए ठीक नहीं। ऐसी स्थिति में कुँवर का वध ही उचित है। उनकी हत्या के लिए निर्देश मैं अपनी रुचि के कारण नहीं विवशतावश दे रहा हूँ।
लेकिन महाराज ! प्रतिवाद नहीं मन्त्रीवर ! आज्ञा का पालन अविलम्ब होना चाहिए।
जो आज्ञा ! कहते हुए उन्होंने राजहठ के सामने सिर झुका दिया।
इसी के साथ ही वह भारी कदमों से महल में गये और स्वर्णपालकी में खेल रहे नवजात राजकुमार को उठा लिया। सौराष्ट्र के भविष्य के लिए महारानियाँ अपना हृदय चीर कर यह दृश्य देखती रहीं। प्रजा विलाप करती हुई विदा होते राजकुमार के कल्याण के लिए मनौतियाँ मनाने लगें।
नन्हा राजकुमार मानो सौराष्ट्र की भूमि, प्रजा व महाराज, महारानियों को आखिरी बार प्रणाम कह रहा हो कि मैं सौराष्ट्र की धरती के संकट की वजह नहीं हूँ।
आखिर महामन्त्री पालने में खेलते हुए राजकुमार को ले गया। जड़-चेतन सभी यह दृश्य देखकर स्तब्ध थे। मन्त्री ने एक हाथ से नन्हें राजकुमार की पालकी को पकड़ा तो दूसरे हाथ से तेज धार वाली तलवार को, जिससे राजकुमार का अन्त होना था। प्रधानमन्त्री गन्धर्वसेन का हृदय बार-बार भर रहा था। वह बार-बार समाज की रूढ़ियों एवं मूढ़ताओं को कोस रहे थे। भला ऐसे देवरूप राजकुमार का वध वह कैसे कर सकेंगे ? यह सोचते-सोचते नगर से बहुत दूर घने जंगल को पार करते हुए काफी दूर निकल गये।
चलते-चलते जब महामन्त्री गन्धर्वसेन बहुत थक गये तो उन्हें बहुत प्यास लगी। सामने ही एक नदी थी, वह नदी के किनारे गये। उन्होंने पालने में झूलते राजकुमार को नदी के तट पर रख कर पानी पिया व अंजुली भर पानी राजकुमार को भी पिलाया। उस अबोध शिशु को देखकर उनका मन रो उठा। उनके मन में आया कि राजकुमार का वध करने की बजाय वह इस तलवार से अपनी ही गर्दन काट दें या बहती नदी में छलाँग लगा दें। आखिर ईश्वर के निर्माण की हत्या करने वाला वह कौन होता है ? उसने हाथ में पानी लिया और भगवान से प्रार्थना करने लगा।
हे प्रभु ! क्या तुम्हें मेरी इस स्थिति पर दया नहीं आती ? मैं कैसे आपकी सन्तान का वध करूँ ? मेरा हृदय काँप रहा है। मैं अपनी गर्दन काट सकता हूँ, लेकिन महाराज के आदेश का उल्लंघन भी कैसे कर सकता हूँ। मेरी सहायता करो भगवान। कहकर महामन्त्री फूट-फूट कर रोने लगें। उनका रोना सुनकर ईश्वरीय प्रेरणावश वनवासी परिवार की कोई महिला आ गयी। अपने सामने इस अपरिचित महिला को देखकर वह स्तब्ध रह गये।
महामन्त्री से सारे सौराष्ट्रवासी परिचित थे। इस राजाज्ञा की चर्चा भी सर्वत्र थी। वनवासियों के कानों में भी इसकी भनक पड़ चुकी थी। प्रधानमन्त्री ने इस महिला को अपने मन की बात कह सुनाई। महिला का नारी हृदय अबोध शिशु को देखकर छलक उठा। उसने गन्धर्वसेन को अपनी योजना बतायी- यह राजकुमार तुम मुझे दे दो। तुम्हारी तलवार से मैं अपनी एक अंगुली काट डालती हूँ, जिससे तुम्हारी तलवार खून से सन जाय व महाराज को विश्वास हो जाय कि तुमने राजकुँवर का वध किया है। साथ ही चौबीस वर्ष के बाद यहीं राजकुमार महाराज को फिर मिलेगा-यह बात केवल तुम्हीं तक रहेगी। किसी के प्राणों की रक्षा के लिए बोला गया झूठ भी बड़ा सत्य एवं धर्म के बराबर होता है। ये दो अँगूठियाँ हैं, एक तुम पहनो व दूसरी राजकुमार के पास रहेगी, जिससे तुम वर्षों बाद उसे पहचान सकोगे। इतने वर्षों तक तुम्हें इस बात को गोपनीय ही रखना होगा। अब तुम जाओ। कहकर वह महिला राजकुमार के साथ घने वन में अदृश्य हो गयी।
प्रधानमन्त्री गन्धर्वसेन मन ही मन प्रसन्न होकर राजमहल की ओर लौट आए। वनवासी महिला की अंगुली काट खून से तलवार सनने की बात गन्धर्वसेन को हिला देती थी। वह परेशान हो उठें। कहीं महाराज को पता चल गया तो ? सोचते-विचारते दो दिन के बाद राजमहल में पहुँचे। जब उन्होंने खून से सनी तलवार महाराज शीलभद्र को दिखाई तो उन्हें विश्वास हो गया कि प्रधानमन्त्री गन्धर्वसेन ने नन्हें राजकुमार का वध कर दिया है। रानी बिन्दुमती भी हृदय पर पत्थर रखकर यह सब सहन कर गयीं। कुछ समय बाद स्थिति सामान्य हो गयी। नन्हें राजकुमार की बात सब भूल गये।
समय बीतता गया। राजकुमार का जन्म होना इतिहास की घटना हो गयी। समस्त प्रजा सुख-साधनों से सम्पन्न थी। महाराज भी प्रसन्न थे। हाँ सौराष्ट्र के भविष्य की बात कभी-कभी महाराज को अवश्य दुःखी करती, लेकिन वे कर भी क्या सकते थे ? बूढ़े हो चले थे, किन्तु महामन्त्री अभी जवान थे। जब महाराज को लगा कि वे कुछ ही दिन में यह संसार छोड़ देंगे, तो एक दिन उन्होंने उदास होकर महामन्त्री को अपने राजमहल में बुलाया और कहा-
मन्त्री जी! अब मैं कुछ ही दिन का मेहमान हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी मृत्यु से पहले तुम्हारा विवाह व राजतिलक कर दूँ ताकि सौराष्ट्र की प्रजा दुःखी न रहे। तुममें एक योग्य शासक के सभी गुण मैं देखता आया हूँ। ईश्वर के विधान को भला कौन चुनौती दे सकता है। मैं तुम्हारी उपलब्धियों से प्रसन्न हूँ। यह सब देखकर मुझे प्रसन्नता होगी।
राजा को अशान्त देख मन्त्री गन्धर्वसेन कहने लगें- महाराज आप मेरे पिता तुल्य हैं। आपने जीवन भर इतना तप, त्याग किया है। अपनी प्रजा को पुत्रवत् पाला है। भला ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके वंश का दीपक बुझ जाये। इसी के साथ उन्होंने विस्तार से सारी कथा कह सुनाई। अपनी बात का उपसंहार करते हुए वह बोले-महाराज युवराज अपने ही सौराष्ट्र के जंगलों में रह रहें हैं। उनके विद्याध्ययन की व्यवस्था भी चुपचाप होती रही है। अब वह चौबीस वर्ष के हो गये हैं। आप जानते हैं कि इन चौबीस वर्षों में अपने सौराष्ट्र ने दिन-दूनी रात-चौगुनी प्रगति की है। क्या अब भी आपको ज्योतिषी बुद्धसेन की भविष्यवाणी पर विश्वास है ?
सारी बातें सुन कर शीलभद्र समेत सारे राजपरिवार की खुशी का पारावार न रहा। शीघ्र ही महाराज को अपनी भूल का एहसास भी हो आया। उन्होंने भावावेश में गन्धर्वसेन को गले से लगा लिया। राज-परिवार के सभी सदस्य प्रधानमन्त्री के साथ वन की ओर चल पड़ा । वनवासियों ने हर्षोल्लास के साथ युवराज को महाराज को सौंप दिया।
सम्पूर्ण सौराष्ट्र में हर्ष की लहर दौड़ गयी। महाराज ने युवराज देवसेन का भव्य समारोह पूर्वक राजतिलक कर दिया तथा महामन्त्री गन्धर्वसेन को सौराष्ट्र के प्रति किया गया अथक त्याग व सूझ-बूझ से अभिभूत होते हुए उनसे पूछा-मन्त्रीवर ! मैं तुम्हारा चिरऋणी हूँ। अपना सर्वस्व देकर भी मैं तुम्हारा ऋण तो नहीं चुका सकता, फिर भी मेरी प्रसन्नता के लिए तुम कुछ माँग लो।
महाराज के इस कथन पर गन्धर्वसेन ने विनम्रता से कहा-महाराज यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे यही चाहता हूँ कि अपने देश के शासक वर्ग एवं समाज को रूढ़ियों, मूढ़ताओं एवं अन्धपरम्पराओं से छुटकारा दिलाने के लिए प्राणपण से यत्न किया जाये। प्रधानमन्त्री गन्धर्वसेन के इस कथन को सभी ने जीवनसूत्र के रूप में स्वीकार करने की शपथ ली।
आहार से समस्त प्राणी जीवन पाते हैं और सम्पूर्ण शरीरतन्त्र क्रियाशील बना रहता है, यह इसका सर्वमान्य गुण है। इससे थोड़ा ऊपर उठकर विचार करने पर मनुष्य में शुद्ध-अशुद्ध इसकी दो श्रेणियाँ हो जाती हैं, भौतिक दृष्टि से नहीं, आत्मिक और अध्यात्मिक दृष्टि से। आर्ष वांग्मय में आहार को इससे भी अधिक व्यापक अर्थ में लिया गया है।
यों तो आहार का सामान्य अर्थ भोजन होता है, वह भोजन, जिससे हमारे अंग-अवयव समर्थ और शक्तिवान बन सकें और उसे ग्रहण करने वाला जीवित रह सके। स्थूल आहार का इससे अधिक मूल्य और महत्व नहीं। सामान्य जीवन में इससे भौतिक ऊर्जा और शक्ति ही मिल सकती है, पर यदि उस समर्थता को जगाने और उभारने की आकांक्षा हो, जिसे पाकर क्षुद्र महान् और साधक विभूतिवान बनते हैं, तो हमें आहार के उस पहलू पर भी विचार करना पड़ेगा, जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जिसे आर्ष वांग्मय में “आहारशुद्धी सत्वशुद्धीः सत्वशुद्धौ धुवा स्मृतिः। स्मृतिलम्भे सर्वग्रंथीनाम् विप्रमोक्षः।” यह कह कर अभिहित किया गया है।
छान्दोग्य उपनिषद् के इस सूत्र में आहार का आशय मात्र खाद्य पदार्थ नहीं समझना चाहिए। वह तो भोजन का एक छोटा-सा हिस्सा है और आत्मोन्नति की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण भी नहीं है। अध्यात्म जगत में वह सारी चीजें आहार के अन्तर्गत आती है, जिन्हें बाहर से भीतर ग्रहण किया जाता है। आँख, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा यह मनुष्य की पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इन्हीं पाँचों से हम बाहरी दुनिया को अपने अन्दर आमन्त्रित और अनुभव करते हैं। आँख से रूप, कान से शब्द, नाक से गन्ध, त्वचा से स्पर्श और जीभ से स्वाद का आनन्द लेते हैं। भौतिक जीवन में इनके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति में यह अवयव कमजोर अथवा खराब हो गये हों, उसके लिए तो संसार एक प्रकार से नीरस-निरानन्द बन जाता है। अन्धों के आँखें नहीं होती, अतः उनके लिए रात-दिन रूप-कुरूप सुन्दर-असुन्दर जैसे दृश्य जगत के उपादानों का कोई मूल्य रह नहीं जाता। जहाँ सामने कोई रूप अथवा दृश्य न हो, वहाँ किसी दृश्य की कल्पना कर पाना कितना कठिन होगा, इसे किसी दृष्टिहीन से मिलकर जाना जा सकता है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि अन्धों को सपने में दृश्य नहीं, वरन् ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। कारण स्पष्ट है-अचेतन मस्तिष्क भी स्वप्नावस्था में तभी सपने गढ़ पाने में समर्थ होता है, जब वह उन्हें जाग्रत अवस्था में देख और अनुभव कर चुका हो। जहाँ किसी भी प्रकार की छवि ही नहीं, उसकी अनुकृति भला वह किस प्रकार गढ़ा ! इसलिए नेत्रहीनों की दुनिया एक तरह से रसहीन ही कहनी पड़ेगी । मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सम्पूर्ण जगत का अस्सी प्रतिशत ज्ञान आँख से प्राप्त करते हैं, शेष का बीस प्रतिशत बाकी की चार इन्द्रियों से। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि आँख कितना उपयोगी अंग है। जगत में जो कुछ भी सुन्दर, सुखद और आकर्षक है, वह नेत्रों के कारण है। नेत्र न हो, तो दुनिया कितनी उबाऊ प्रतीत होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। यह नेत्र की भौतिक विशेषताएँ हुईं। उसके आध्यात्मिक महत्व भी कम नहीं। हम आध्यात्मिक मूल्य के कितने ही दृश्य प्रतिदिन देखते रहते हैं, पर उनसे तद्नुरूप प्रेरणा ग्रहण करने के लिए तत्वदृष्टि चाहिए। इसके अभाव में ही मनुष्य उनसे वह शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते, जो अन्तराल को समुन्नत बनाने के लिए आवश्यक है। सामान्य दृष्टि एक नारी को रमणी और कामिनी के रूप में देखती है, पर तत्वदृष्टि उसमें भगिनी एवं जननी का रूप निहारती है। यही दोनों के बीच मौलिक अन्तर है। एक उसे पाप-पंक की ओर ढकेलती है, तो दूसरी उसको ईश्वरोन्मुखी बनाती है। इनमें से जो जिसे जितने अंशों में अपनाते और जिस अनुपात में पवित्रता-अपवित्रता धारण करते हैं, उनके लिए आत्मिक क्षेत्र में सफलता-असफलता का नतीजा उसी परिमाण में सामने आता है।
बोलने की सार्थकता सुनने में है। हम सुन न पाये, तो हमारा बोलना बेकार और निरुपयोगी बन जाता है। आनन्द उठाने का एक माध्यम श्रवण तन्त्र भी है। नैराश्य एवं विशाद के कितने ही अवसरों को मनुष्य गीत, संगीत तथा महापुरुषों की वाणियाँ सुनकर गुजार देता है। इनसे उन्हें सुख और सन्तोष की प्राप्ति होती है। इस दृष्टि से कान बहुत उपयोगी अंग है, क्योंकि एक ओर जहाँ वे शब्द-संसार में प्रविष्ट कराकर आदमी को मनोरञ्जन प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर कष्ट-कठिनाइयों में दूसरे के आश्वासन भरे शब्दों के द्वारा मन को धीरज और शीतलता प्रदान करते हैं। यह श्रवण तन्त्र का एक पक्ष हुआ। इसका एक दूसरा पहलू भी है, जो निषेधात्मक है। निषेधात्मक इसलिए कि वह व्यक्ति को निम्नगामी बनाने में संलग्न रहता है। इन दिनों इसका यही पक्ष अधिक सक्रिय है। कान आजकल अच्छाई को ग्रहण और धारण करने में जितनी रुचि नहीं दिखाते, उससे ज्यादा उत्साह बुराई सुनने में अपनाते देखे जाते हैं।
कहीं प्रवचन हो रहें हों, कहीं उपदेश सुनाए जा रहें हों, कहीं धार्मिक आख्यान चल रहें हों पर इन्हें सुनने में कितने लोग रुचि दिखाते हैं। यह कोई छुपी हुई बात नहीं, अधिसंख्यक लोग तो अश्लील गीत-संगीत श्रवण करने एवं ऐसे प्रसंगों को जानने में उत्कण्ठा प्रदर्शित करते हैं, जिससे कि उनका अपना स्वार्थ सिद्ध हो सके, भले ही उससे सामने वाले का, समाज का और राष्ट्र का कितना ही अहित क्यों न होता हो। आज सही, सच्चे और ईमानदार लोगों की बातों पर हम कहाँ कान दे पाते हैं ? पर जो फरेबी है, बेईमान और झूठे हैं, जिनका काम ही तिल का ताड. और राई का पर्वत बनाना तथा सब्जबाग दिखाना है, उन पर सरलतापूर्वक विश्वास कर लेते हैं। यह हमारे श्रवण अंग की कमजोरी और व्यक्ति का सबसे बड़ा दोष है।
शब्द शक्ति की प्रतिनिधि अंग जिह्वा है। बाह्य संसार से यह भी कितनी ही प्रेरणाएँ ग्रहण करती हैं। सामान्य बोलचाल का उत्तर इशारों में भी दिया जा सकता है, पर जहाँ गाली-गलौज हो रही हो, वहाँ उससे चुप रहते बन नहीं पड़ता । जरूरी नहीं कि गाली का उत्तर गाली से दिया जाये। यह ठीक है कि लोहा को काटने के लिए लोहा चाहिए, पर एक दूसरा तरीका यह भी है कि मौन साध लिया जाये। महानता इसी में है, अन्यथा हर प्रसंग का जवाब यदि हर एक को दिया जाने लगे तो कलह-कटुता बढ़ेगी और नौबत मार-पीट से लेकर खून-खच्चर तक पहुँच जाएगी। आग में घी डालने से अग्नि का भड़कना स्वाभाविक है, इसलिए उचित यही है कि आग को स्वयं ही जलकर शान्त हो जाने दिया जाय। इससे अनावश्यक ऊर्जा का क्षरण रुकेगा और संघर्ष टलेगा एवं अन्तराल में शान्ति का अवतरण होगा।
इसी प्रकार स्पेशेन्द्रिय और घ्राणेंद्रिय से भी हमें दिव्यता का ही ग्रहण और धारण करना चाहिए। यदि ऐसा हो सका, तो हमारे सत्व अर्थात् स्वरूप के ऊपर आवरण और आच्छादन नहीं चढ़ेंगे। जो भीतर है, वह हमारा सत्व है, स्वरूप है। हम जो बाहर से ग्रहण करते हैं, वह आहार है। यदि यह शुद्ध हुआ तो हमारे अन्दर जो छुपा हुआ स्वरूप है, वह ढकेगा नहीं, मलिन नहीं पड़ेगा वरन् और निखरेगा तथा प्रखर बनेगा। यही वह स्थिति है, जो हर एक के लिए वाँछित और अभीष्ट है, पर यह प्राप्त कैसे हो ? छान्दोग्य उपनिषद् में ऋषि इसी का समाधान प्रस्तुत करते हुए कहते हैं-” आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः “ अर्थात् समग्र आहार-शुद्धि से कम कीमत पर किसी भी प्रकार इस अवस्था को उपलब्ध नहीं किया जा सकता है।
आहार का ही एक छोटा हिस्सा भोजन है। निश्चय ही भोजन पर ध्यान दिया जाना चाहिए, पर वही सबकुछ नहीं है। इस सम्बन्ध में इतना ही विचार करना काफी है कि वह कैसा है ? नैतिक अथवा अनैतिक। उसकी प्रकृति कैसी है ? सात्विक या तामसिक। जब भोजन बिना किसी हिंसा और पीड़ा के उपलब्ध हो सकता है, तो माँसाहार की क्या उपयोगिता ? जब अन्न, फल और शाक परिपूर्ण और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराते हों, तो पशुओं को मारना कितना उचित है ? उपर्युक्त दोषों के कारण भोजन प्रायः खाने के अयोग्य हो जाता है। इन दो कारणों को छोड़ दिया जाये, तो फिर भोजन की भूमिका आत्मोन्नति के क्षेत्र में कोई विशेष रह नहीं जाती। इसलिए आत्मोत्थान के इच्छुकों को उस सर्वोपरि आहार पर ध्यान देना चाहिए, जो हमारी इन्द्रियाँ बाहर से ग्रहण करती हैं। वह यदि शुद्ध, सुन्दर और श्रेष्ठ हुआ, तो अन्तराल को, जीवात्मा को भी अपने अनुरूप उदात्त और उत्कृष्ट बनाता चलेगा, किन्तु यदि निम्न स्तर का निकृष्ट हुआ, तो उसे हेय और हीन बनाने में भी कोई कसर उठा न रखेगा। इसलिए यहाँ सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
इन दिनों बुद्धि का विकास चरम स्तर तक हुआ है, अतएव जिस भी तथ्य को अपने पक्ष में करना हो, बुद्धि-कौशल के द्वारा तद्नुरूप तर्क प्रस्तुत कर दिया जाता है। आजकल अहिंसा के पुजारी अहिंसा के सम्बन्ध में एक नई दलील देते हैं। वे कहते हैं कि हिंसा होने में रक्त बहता है, अतः खून-खच्चर को हिंसा मानना पड़ेगा । इसके विपरीत जहाँ रुधिर नहीं बहता, भले ही हिंसा हुई हो, तो वहाँ वह हिंसा की परिधि में नहीं आता। विचित्र तर्क है। शायद माँसाहार को अपने पक्ष में करने के लिए उन्होंने यह परिभाषा गढ़ी हो, और इसके अनुकूल हिंसा की अहिंसक विधि खोजी हो, कारण कि अहिंसावादियों के लिए हिंसा द्वारा प्राप्त भोजन अस्पृश्य है, अस्तु उन्हें किसी ऐसे तर्क की आवश्यकता थी, जिसके द्वारा हिंसा को अहिंसक सिद्ध किया जा सके। उपर्युक्त दलील द्वारा उन्होंने यही किया। तिब्बत के कई हिस्सों में लोग पाये जाते हैं, जो स्वयं को अहिंसावादी मानते हैं, पर माँसभक्षण से परहेज नहीं। जब माँस खाना हो तो वे बकरे को फाँसी के फन्दे से लटका देते हैं, प्राणान्त होने के उपरान्त उसे पकाकर खा जाते हैं। कहते हैं इसमें रक्त बहा नहीं, अस्तु यह अहिंसा है। अहिंसावाद के प्रवर्तक भगवान महावीर ने भी इस परिभाषा की शायद कल्पना नहीं की होगी, जैसी कि इन दिनों गढ़ी जा रही है। सच तो यह है कि इसमें हिंसा-अहिंसा की बात कम, बुद्धि-चातुर्य ज्यादा है। बौद्धिक चतुरता से लोगों को आकर्षित तो किया जा सकता है, आत्मिक उन्नति नहीं।
यहाँ किसी की निन्दा-आलोचना नहीं की जा रही है। कहा यह जा रहा है कि तथ्य को सही परिप्रेक्ष्य में समझा और अपनाया नहीं गया एवं केवल बौद्धिक विलासिता में ही उलझा रहा गया, तो हाथ कुछ लगने वाला नहीं, उलटे समय, श्रम और ऊर्जा की बर्बादी होगी। वास्तविकता को अपना कर और ईमानदारीपूर्वक प्रयास कर ही हम आहारशुद्धी और सत्वशुद्धि के पश्चात् “ध्रुव स्मृति” के अगले चरण में पदार्पण कर सकेंगे। ध्रुवस्मृति अर्थात् स्थिर बोध। हम कौन हैं ? क्या हैं ? कहाँ से आए हैं ?कहाँ जाना है ? इसका ठीक-ठाक ज्ञान ही ध्रुव स्मृति है। स्मृति अर्थात् स्मरण याददाश्त नहीं। आत्मबोध की प्राप्ति के उपरान्त हम अन्तिम सोपान में प्रवेश करते हैं- स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनाम् विप्रमाक्षः। जिसे स्मृति लाभ हो गया है, जिसको आत्मज्ञान हो गया, उसकी सारी ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं, वह बन्धन मुक्त हो जाता है। वासना, तृष्णा अहंता यह मनुष्य के बन्धन के निमित्त है। इनसे मनुष्य में ग्रन्थियाँ पड़ने लगती हैं। कोई लोभ की जंजीर में जकड़ा हुआ है, कोई मोह की जंजीर में, किसी को यश की कामना है, किसी को धन की, किसी को पद-प्रतिष्ठा की। सम्पूर्ण जीवन इसी कुचक्र में समाप्त हो जाता है। फिर भी उसकी इच्छाएँ-आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो पाती और आदमी दीन-हीन स्थिति में इस संसार से विदा हो जाता है, किन्तु जिसे आत्मलाभ हो गया, उसकी सारी ग्रन्थियाँ, सारी कामनाएँ, समस्त वासनाएँ विसर्जित हो जाती हैं। उसके आगे फिर कुछ भी नहीं, न धन, न पद, न प्रतिष्ठा कारण कि उसे परम् धन, परम् पद और परम् सुख की प्राप्ति हो गई होती है। यही मानव-जीवन का चरम लक्ष्य है।
उक्त स्थिति सिर्फ खाद्य-पदार्थों के नियमन, नियंत्रण और चयन द्वारा नहीं प्राप्त की जा सकती। इसके लिए समग्र आहार पर ध्यान देना होगा। एक आहार वह है, जो शरीर-रक्षा के लिए ग्रहण किया जाता है। दूसरा वह, जिससे आत्मा की भूख मिटती है। जीवात्मा भूखी हो और शरीर तृप्त हो इससे बात बनने वाली नहीं, हमें ऐसे उपाय करने पड़ेंगे, जिससे जीवात्मा प्रखर बन सके। तृप्ति-तुष्टि की अनुभूति कर सके, पूर्णता की प्रतीति हो और शान्ति अनुभव कर सके। ऐसे ही अध्ययन, श्रवण, सान्निध्य और दर्शन द्वारा उसे खुराक मिलती है। इन्हें यदि परिमार्जित तथा परिष्कृत नहीं किया गया, तो सत्वशुद्धि आत्मशुद्धि एवं आत्मोन्नति की बात करना बेमानी होगी। हम परिष्कृत अध्ययन, परिष्कृत चिन्तन, परिष्कृत श्रवण एवं परिष्कृत दर्शन करें तथा परिष्कृत वाणी बोलते हुए परिष्कृत ही आचरण करें। यदि ऐसा हो सका, तभी यह समझा जाना चाहिए कि समग्र आहार की अवधारणा और उसमें छिपे तत्त्वज्ञान को हम सही-सही समझ सकें, इससे कम में नहीं।
प्रकृति एक विलक्षण पहेली है। उसकी विलक्षणताओं को देखकर स्रष्टा की अपरिमित सामर्थ्य का बोध होता है। सृष्टि के प्रत्येक क्रियाकलाप को गहराई से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि ये सभी कार्य-कारण शृंखला से बंधे हुए हैं। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र उसी कारण शृंखला को जानकर तद्नुरूप अभीष्ट की प्रगति के लिए साधन रूप कारण जुटाने और कार्यसिद्धि का प्रयास करते हैं। वैज्ञानिक प्रगति का आधार भी कार्य-कारण सिद्धान्त को समझ कर तद्नुरूप वैज्ञानिक प्रयोगों को करते हुए नित नई उपलब्धियाँ अर्जित करना है। दर्शन शास्त्र और भौतिक विज्ञान- दोनों में कार्य-कारण सिद्धान्त तथा प्रकृति की समरूपता का सिद्धान्त सर्वमान्य है। उसी आधार पर योजनाएँ बनाना और उन्हें क्रियान्वित करने के लिए आगे बढ़ना सम्भव होता है। कार्यों के परिणामों पर विश्वास न हो तो फिर योजना बनाना न तो सम्भव हो पाये और न उस पर अमल करने का उत्साह ही पैदा हो। राजनीति, समाज-सुधार नव-निर्माण-रचना या विध्वंस का कोई भी कार्य कारण की अनिश्चित की स्थिति में शुरू ही नहीं किया जा सकता। शिक्षा, व्यापार, वाणिज्य, चिकित्सा, कृषि, उद्योग, यातायात, भवन-निर्माण अभियांत्रिकी आदि किसी भी क्षेत्र में प्रवृत्त होने की प्रेरणा ही न पैदा हो।
इसी तरह पदार्थों की प्रकृति में निश्चयात्मकता न हो तो भौतिक विज्ञान की खोजे ही आगे न बढ़ी । एक पदार्थ का एक अंश एक निश्चित देशकाल परिस्थिति में जो प्रतिक्रिया करता है, वही प्रतिक्रिया उस पदार्थ का दूसरा वैसा ही अंश उन्हीं परिस्थितियों में अन्यत्र करे, तो पदार्थ विज्ञान की प्रगति असम्भव हो जाये, क्योंकि तब एक-एक अणु-परमाणु के बारे में अलग-अलग खोज करनी पड़ी । प्रकृति समरूपता का यही सिद्धान्त जीव-विज्ञान मनोविज्ञान एवं तत्त्वज्ञान की विभिन्न शाखाओं के विवेचन का आधार है। प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार ही पदार्थ पैदा करती है। एक बीज से सजातीय पौधा और जीव ही पैदा होता है। आम के बीज से इमली नहीं पैदा होती तो भी कई बार प्रकृति में अनेक विलक्षणताएँ विद्यमान पायीं जाती हैं एवं उत्पन्न होती देखी जाती हैं। बारम्बार परीक्षा से पुष्ट अनुभव से प्रमाणित विधि-व्यवस्था एवं नियम-विधान के अपवाद देखे जाते हैं, चित्र-विचित्र वस्तुएँ देखी पायी जाती हैं, जो प्रकृति के सामान्यक्रम से भिन्न होती हैं।
सामान्यतः ये अपवाद प्रकृति का ही अंग होते हैं। विश्वभर में ऐसी कितनी ही प्राकृतिक विलक्षणताएँ विद्यमान है, जिनका अर्थ विज्ञानवेत्ता भी नहीं समझ पाये हैं। अपने ही देश में कन्याकुमारी में सात रंग की रेत पायी जाती है, जिनमें लाल, भूरी, पीली, रजतवर्णी, नारंगी, नीली और बैंगनी रंग सम्मिलित है। प्रकृति की इसी विलक्षणता को भारतीय पौराणिक कथाओं में इस रूप में व्यक्त किया गया है कि जब भगवान शंकर कन्याकुमारी पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर परिणयबद्ध हुए, तो देवताओं ने सात रंग के फूल बरसाये । तभी से यहाँ की बालू सप्तवर्णी हो गयी।
प्रकृति वैचिऋय के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने वाली ऐसी पौराणिक कथाएँ विश्व के प्रायः सभी भागों में प्रचलित हैं। हिमालय पर्वतमाला के बीच गढ़वाल जिले में स्थित “फूलों की घाटी” भी प्रकृति का ऐसा ही विलक्षण उपहार है। समुद्रतल से बारह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह दृश्यमय घाटी अपने सौन्दर्य और वैचिऋयपूर्ण विविधता में अनुपम है। अपने आँचल में यह कितने ही प्राकृतिक रहस्य छिपाए हुए है। जल के स्थान पर थल में उगने वाला एकमात्र कमल-ब्रह्मकमल यहीं उगता-फूलता है। असंख्य पुष्पों की प्रकृति निर्मित स्वतंत्र क्यारियों की अलौकिक छटा मनुष्य के लिए आश्चर्य और आकर्षण का प्रबल केन्द्र है।
दक्षिणी ध्रुव प्रदेश तो ऐसी विचित्रताओं का विस्तृत क्षेत्र ही है। यहाँ की हवा रंगीन है। कभी-कभी धरती भी रंग-बिरंगी हो उठती है। कभी घना अंधेरा छा जाता है, तो कभी धरती से आकाश तक सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश संव्याप्त दिखाई पड़ता है। क्षितिज का दूर-दूर तक कहीं पता ही नहीं लगता। कभी पृथ्वी घूमती-सी लगती है और लगता है, अब गिरे की तब गिरे। ३०० किलोमीटर प्रति घण्टे से भी अधिक तीव्र गति से हवा बहती है, तो भी उसकी तेज आवाज सुनाई पड़ती, जबकि पृथ्वी में अन्यत्र å-å किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से चलने वाली हवा भी हूँ हूँ करती शोर मचाती सुनी जाती है।
पृथ्वी की ९० प्रतिशत बर्फ ध्रुव प्रदेश में ही है। यदि यह पिघल जाए तो विश्व के सभी समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ दें और सहसा उन सबका जल ढाई सौ फुट ऊँचा हो जाये। अक्टूबर से मार्च तक ६ महीने दक्षिणी ध्रुव में चौबीसों घण्टे दिन रहता है। मनुष्य तो यहाँ सामान्य परिस्थितियों में नहीं रह सकता, किन्तु अनेक जीव यहाँ मजे में रह लेते हैं। इनमें से ६० प्रजाति के ऐसे भी कीड़े हैं, जो गर्मी कि दिनों में ही सक्रिय रहते हैं। शेष समय प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। यदि उनके ऊपर बर्फ जम जाती है, तो भी वे मरते नहीं, प्रसुप्तावस्था में विश्राम करते हैं और बर्फ पिघलते ही फिर सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे भी अनेकों कीड़े-मकोड़े हैं जो सत्तर वर्षों तक प्रसुप्त पड़े रहने पर भी मरते नहीं, वरन् उपर्युक्त अवसर पाते ही पुनः हलचल करने लगते हैं।
यह प्रदेश थोड़ा भी नहीं है, वरन् क्षेत्रफल में अमेरिका का दुगुना है। दक्षिणी ध्रुव प्रदेश में चारों तरफ समुद्र है। बीच में थोड़े से थल भाग हैं, जबकि उत्तरी ध्रुव में भूमि-भाग से घिरा हुआ समुद्र तट है।
ये सभी विलक्षणताएँ प्रकृति का ही स्वाभाविक अंग हैं। इनमें से प्रत्येक कार्य का कारण यदि वैज्ञानिक नहीं भी जान पाते, तो भी वह कार्य-कारण शृंखला का.............
सृष्टि के स्वामी भगवान हैं। उस सर्वोपरि सत्ता के लिए संसार में न तो कुछ असाध्य है, न असम्भव । जो निर्माता है, उसके लिए निर्माण-प्रक्रिया क्यों कर दुःसाध्य होनी चाहिए । उस तरह की बात तो वहाँ सामने आती है, जहाँ सृजेता पंच भौतिक प्रकृति वाला सीमित क्षमता सम्पन्न हो। ईश्वर न तो मनुष्य है, न उस जैसा ससीम। उसकी सत्ता असीम है। उसे अनादि, अनन्त, अनश्वर जैसे नामों से अभिहित किया गया है। इसके अनुरूप उसकी क्षमताएँ और विभूतियाँ हैं । जा शक्ति और सामर्थ्य का भाण्डागार हो, उसके लिए अशक्य क्या हो सकता है ? वहाँ सब कुछ सहज सम्भव है । आध्यात्मिक पुरुषों के जीवन में घटने वाले घटना प्रसंगों से इसकी पुष्टि हो जाती है।
घटना महाराष्ट्र की है । कृष्ण नदी के तट पर करहाड़ नामक एक गाँव है । वहाँ एक ब्राह्मण परिवार रहता था । परिवार में कुल चार सदस्य थे, पति, पत्नी, पुत्र, पुत्रवधू । पुत्रवधू सखूबाई बड़ी सात्विक प्रकृति की सुशीला और सेवाभावी थी। ईश्वर के प्रति उसके मन में अगाध अनुराग था। वह जितना ज्यादा विनम्र थी, उसके सास, ससुर तथा पति उतने ही क्रूर, कर्कश और कठोर थे। वे सखू को सताने में कुछ भी उठा न रखते । प्रातः से लेकर के रात तक घर के कामों में जुटी रहने पर भी उसे भरपेट भोजन नहीं मिलता, फिर भी वह किसी से कुछ नहीं बोलती और अपने कार्य में लगी रहती। सास का इतने पर भी संतोष नहीं होता। वह जब तक उसे गालियाँ सुना न लेती, उसको चैन न पड़ता। कभी-कभी तो मारपीट कर देती। विनम्र बहू इस प्रताड़ना को भी सह लेती और भगवान का कोई मंगल-विधान समझकर मौन हो जाती। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय भी तो नहीं था। वह क्या कर सकती थी? जब पति भी कुचक्र में सम्मिलित हो जाए, तो अपना कहलाने वाला ही कौन रह जाता है, जिसके संग गृहिणी अपने कष्ट-कठिनाई बाँट सके। सखू के दिन ऐसे ही गुजर रहे थे। वह दासी की भाँति सब कुछ सहन कर जाती।
व्यवहार की कुटिलता जब अति का अतिक्रमण करती है, तो मानवी मनोवृत्ति में उससे दो प्रकार के परिवर्तन सम्भाव्य होते हैं या तो पीड़ित व्यक्ति अकस्मात् ही उग्र और क्रूर हो उठेगा अथवा वह और भी अधिक विनम्र और विनयशील बनकर भगवान की ओर उन्मुख होगा। जिनमें साधना और समर्पण की प्रबलता है एवं जो ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानते हैं, उनकी मति-गति इस दूसरी अवस्था की ओर होगी ।
सखू के साथ यही हुआ । वह दिन-दिन अधिकाधिक ईश्वरपरायण बनती गई। भक्ति उद्याम हो गया कि उसके आगे यंत्रणा बौनी पड़ गई। वह अपने में ही खोयी-खोयी रहने लगी। प्रत्यक्ष में तो घर का काम करती रहती, पर उसकी आन्तरिक स्थिति किसी ध्यानस्थ योगी से कम न होती। यदा-कदा इसके प्रमाण भी सामने आने लगे। कार्य करते-करते भक्ति के प्रवाह में कई बार वह इतनी गहराई में उतर जाती कि बाह्य वातावरण से उसका संपर्क लगभग समाप्त हो जाता। ऐसी स्थिति में सास के पुकारने की आवाज भी उसे सुनाई नहीं पड़ती। सास इसे जान-बूझकर की गई अवहेलना समझती और मारपीट शुरू कर देती। बहु मन-ही-मन परमात्मा से प्रार्थना करती कि वह उसकी सास को सद्बुद्धि दे। सखू के इष्ट-आराध्य भगवान विट्ठल थे।
महाराष्ट्र में पण्ढ़रपुर वैष्णवों का पवित्र तीर्थ है। वहाँ प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी को विशाल मेला लगता है। इस अवसर पर महाराष्ट्र के कोने-कोने से लाखों लोग भगवान विट्ठल के दर्शनार्थ वहाँ उपस्थित होते हैं और उनके दर्शन कर धन्य अनुभव करते हैं। इव वर्ष भी यात्रीगण अलग-अलग स्थानों से अपनी अलग-अलग मण्डली बनाकर वहाँ पहुँच रहे थे। यात्रियों का एक इल करहाड़ की ओर से पण्ढ़रपुर जा रहा था। सखू इस समय नदी पर जल भर रही थी। यात्रियों के मेले में जाने की बात सुनकर उसके मन में भी देवभूमि के दर्शन की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई। इतना तो उसे ज्ञात ही था कि परिवार वाले वहाँ जाने की अनुमति उसे नहीं देंगे, अतः उनसे पूछना बेकार है, यह सोचकर उसने उस दल के साथ जाने का निश्चय किया और चल पड़ी। यह समाचार जब ससुराल पहुँचा, तो सब बड़े क्रुद्ध हुए। पति उसे मारपीट कर वापस घर ले आया। योजनानुसार वहाँ उसको दो सप्ताह तक बाँधकर रखने का निश्चय किया गया। इतने दिन में मेला समाप्त होने वाला था। मेला-समाप्ति तक उसे स्वतन्त्र रखना उन्हें असुरक्षित महसूस हो रहा था। उनको भय था कि सखू कहीं पण्ढ़रपुर न भाग जाए, अतः दो काम किए गए, उसे बाँध दिया गया और पन्द्रह दिनों तक निराहार रखना निश्चित किया गया।
व्यक्ति जब हर प्रकार से असहाय हो जाता है और कहीं से किसी तरह की सहायता मिलने की उम्मीद जब नहीं रह जाती, तो वह सर्वशक्तिमान परमात्मा को याद करता है। परमेश्वर भी प्रार्थी की गुहार अनसुनी नहीं कर पाते। पुकार यदि सच्ची और अन्तःकरण से निकली हुई हो, तो वे मदद के लिए दौड़े चले आते हैं। सखू के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब सहायता का कोई कण कहीं से मिलता प्रतीत नहीं हुआ, तो वह मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगी, “दयामय ! यदि जीवन में एक बार भी उस देवभूमि के दर्शन कर पाती, तो स्वयं को बड़ा धन्य समझती, पर ऐसा लगता नहीं कि जीवन में यह शक्य हो सकेगा, कारण कि मैं तो बन्धन में पड़ी हूँ, भूख-प्यास से क्या पाता कब देहपात हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। अब सहारा केवल आप हैं। आप की कृपा हुई, तो शायद मुझे यह सौभाग्य मिले और मैं कष्टों से त्राण पा सकूँ। “
कई दिनों की कातर पुकार से भगवान द्रवीभूत हुए । वे स्त्री वेष धारण कर सखू के पास आए, उसे बन्धन मुक्त किया और कहा-सखू ! अब तुम स्वतंत्र हो। पण्ढ़रपुर जाने से अब तुम्हें कोई रोक न सकेगा। तुम खुशी-खुशी जाओ। जब तक तुम लौट न आओगी, तब तक मैं तुम्हारे स्थान में बँधी रहूँगी । वापस आने में अधिक समय न लगे इसका ध्यान रखना। इतना कहकर भगवान ने उसे विदा किया और उसकी जगह स्वयं बँध गये। सास-ससुर आते और बुरा-भला कह लौट जाते। वे यही समझते रहे कि यहाँ उनकी बहू ही बँधी हुई है। सखू वेषधारी स्त्री भी सखू की तरह का ही आचरण करती। उनकी यातना चुपचाप सह लेती।
इस प्रकार पन्द्रह दिन बीत गये। इस बीच सास-ससुर के मन में तो किसी तरह का कोई पश्चात्ताप नहीं उभरा, पर पति को ग्लानि और भय दोनों हुआ। ग्लानि इस बात की कि इस प्रकार का व्यवहार मानवीय आचारशास्त्र के विरुद्ध है। भय इस कारण था कि कहीं लम्बे समय तक निराहार रहने के कारण वह मर न जाए। यदि ऐसा हुआ, तो सभी मुसीबत में पड़ जाएँगे । यह सोचकर वह सखू वेषधारी भगवान के पास पहुँचा, उसके सारे बन्धन काट डाले और अपने किये पर दुःख प्रकट कर क्षमा-याचना करने लगा। बाद में स्नान-भोजन करने की प्रार्थना की।
भगवान की ठीक उसकी पत्नी की तरह ही व्यवहार कर रहे थे। वे सखू के आने से पूर्व ही अन्तर्धान होने में उसकी विपत्ति की आशंका कर रहे थे, अतः उसके आने तक वहाँ ठहरे रहे। बन्धन मुक्त होकर उन्होंने स्नान किया और भोजन पकाया, फिर अपने हाथ से तीनों को खाना खिलाया। आज के भोजन में अद्भुत स्वाद था। सभी इस बात से आश्चर्यचकित थे कि आज से पूर्व सखू ने इतना स्वादिष्ट भोजन कभी नहीं बनाया। सभी ने मात्र इसे एक संयोग समझा। अपने सुन्दर व्यवहार और सेवा से भगवान ने सबको अपने अनुकूल बना लिया।
इधर पण्ढ़रपुर पहुँचकर सखू उस अद्भुत तीर्थक्षेत्र का स्पर्श पा भावविभोर हो गई वह इस बात को भू गई कि उसकी जगह कोई दूसरी स्त्री बँधी है। इसी उद्भ्रान्ति में पड़कर उसने प्रतिज्ञा कर ली-इस शरीर में प्राण के रहते वह-पण्ढ़रपुर की सीमा से कभी बाहर न जाएगी। अव वहीं घूम-घूमकर वह लोगों की सेवा करने लगी। जिसे भी कष्ट में देखती, उसकी मदद करने तत्काल पहुँच जाती। सखू अपनी इस परमार्थपरायणता के कारण कुछ ही दिनों में विख्यात हो गई। लोग उससे स्नेह करने लगे। कुछ समय पश्चात् अतिशय कार्य के कारण वह बीमार पड़ी और उसकी मृत्यु हो गई। सभी ने उसकी अन्त्येष्टि कर दी। अन्तिम क्रिया करने वालों में एक व्यक्ति उसके गाँव के निकटवर्ती ग्राम का था। उसने देखते ही सखू को पहचान लिया।
भगवान ने जब देखा कि सखू ने प्राण त्याग दिए हैं, तब अपनी मुक्ति का और कोई उपाय न देख उन्होंने उसे पुनर्जीवित करने का फैसला किया। श्मशान भूमि में उसकी राख और हड्डियों को एकत्रित कर उसमें प्राण-संचार कर दिया। सखू नूतन शरीर में जीवित हो उठी । ब्रह्माण्ड की संरचना करने वाली सत्ता के लिए यह कौन-सी बड़ी बात थी? उसके लिए तो निमिष मात्र का कौतुक था। उसे जीवनदान दे, भगवान ने उसको सलाह दी, अब तू यात्रियों के संग घर लौट जा। तेरे लौटने से तेरी प्रतिज्ञा भंग नहीं होगी। प्रण तेरे पुराने कलेवर में घर नहीं लौटने का था, सो वह तो जलकर भस्म हो गया। अब नवीन काया में वापस लौटने में को हर्ज नहीं, सखूबाई तीर्थवासियों के साथ दो दिन में करहाड़ पहुँच गई। सखू का आना जानकार सर्वज्ञ सखू वेषधारी भगवान नदी तट पर घड़ा लेकर पहुँचे। वहाँ उससे दो-चार बातें कीं और घड़ा उसको देकर अदृश्य हो गए। वास्तविक सखू घड़ा लेकर वापस आयी और अपने कार्य में लग गई। यहाँ सभी के परिवर्तित स्वभाव से उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। आचरण में परिवर्तन के कारण घर में शान्ति आ गई थी। अब न तो बहू को घर वालों से कोई शिकायत थी, घरवालों का बहू से। सभी प्रेमपूर्वक रह रहे थे।
इस बीच दाहक्रिया करने वाली पड़ोसी गाँव से उस व्यक्ति को याद आया कि सखू की मृत्यू का समाचार उसके घर तक पहुँचा दिया जाए। वहाँ पहुँचकर उसने सखू को गृहकार्य में व्यस्त देखा, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह मन-ही-मन सोचने लगा कि जब सखू के निष्प्राण शरीर को अगिन की भेंट उसने चढ़ाई फिर उसके जीवित हो उठने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। तब यह कौन है ? कहीं उसका भूत तो नहीं ? उसने उसकी सूक्ष्म पड़ताल की। नहीं, यह प्रेत शरीर नहीं हैं। उसने पढ़ रखा था, प्रेत के पाँव उलटे होते हैं। यहाँ शरीर में पैर सीधे थे। उसकी बुद्धि जड़ हो गई। वह यह निर्णय नहीं कर पा रही थी कि जो कुछ दीख रहा है, वह सत्य है अथवा भ्रम। अन्ततः उसने निश्चय किया कि बिना कुछ कहे लौट चले। कहीं उसकी बात का लोग बुरा न मान जाएँ पर दूसरे ही पल विचार आया कि यदि वह लौट गया, तो वास्तविकता क्या है, यह ज्ञात न हो सकेगा, अतः रहस्य का पता लगना ही पड़ेगा । डरते-डरते उसने सखू की मृत्यु की बात बताई। सब उसे ऐसे देखने लगे, जैसे कोई विलक्षण बात कह दी हो। कुछ क्षण उपरान्त गृहस्वामी ने कहा-सखू तो पण्ढ़रपुर गई ही नहीं, फिर आप यह बात कैसे कह रहे हैं ? मामला और जटिल हो गया। वह सोचने लगा कि जो कार्य उसने स्वयं अपने हाथों सम्पन्न किया, उसे भ्रम मानने का कोई कारण नहीं और गृहपति की बातों में भी इतना बल था कि उस पर सहज ही अविश्वास मुश्किल था। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को आश्वस्त करने में असफल रहे। अन्त में सखू को बुलाया गया। सारी बात बतायी गई और सच्चाई क्या है, यह बतलाने को कहा गया। सखू ने सार वृत्तांत सुनाते हुए भगवान की असीम अनुकम्पा की बात बतायी। सभी इसे सुनकर रोमांचित हो उठ।
भगवान की परिभाषा करते हुए सूत्रकार ने लिखा है- कर्त्तुमकर्त्तु-मन्यथकर्त्तु शक्त ईश्वरः “ अर्थात् जो करने, न करने अथवा अन्यथा करने में समर्थ हो, वही ईश्वर है। उस सर्वोच्च सत्ता के लिए सृष्टि के घटक प्राणी की निर्माण क्यों कर कठिन होना चाहिए। वह तो उतना ही सरल और सम्भव है, जितना मनुष्य के लिए कौतुक रचना। ईश्वरीय सत्ता हमारे अन्दर भी है और बाहर भी। उसकी कृपा का एक कण भी हमको मिल गया, तो हम धन्य अनुभव करना चाहिए, पर समानधर्मी ही समानधर्मी को आकर्षित कर सकने में सक्षम, इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता और यह तथ्य भी गलत नहीं कि दो तत्वों का परस्पर पूर्णरूपेण घुलने-मिलने के लिए उनमें समरूपता होनी चाहिए। असमानता का अवरोध इसमें अड़चन पैदा करता है, हमारी अपनी सत्ता भी परमसत्ता की तरह सरल, निर्मल और निर्विकार हो, तभी उसका, अस्त्र अनुग्रह सम्भव है, इससे कम में नहीं।
अन्तःकरण की गहन परतों तक जिन योग-साधनाओं की पहुँच है, उनमें (९) बिन्दुयोग (२) नादयोग (३) लययोग को प्रमुख माना गया है । इनमें मान्यता, भावना एवं आकांक्षा क्षेत्रों में सुधार-परिवर्तन कर सकने की विशिष्ट क्षमता है।
बिन्दुयोग को त्राटकसाधना भी कहा जाता है। नादयोग को अनाहतध्वनि भी कहते हैं। लययोग का आत्मदेव-साधना कहते हैं। छाया-पुरुष जैसे अभ्यास इसी के अंतर्गत आते हैं। स्थूलशरीर के साथ लययोग, सूक्ष्म के साथ बिन्दुयोग और कारण-शरीर के साथ नादयोग का सीधा सम्बन्ध है। इन साधनाओं के आधार पर इन तीनों क्षेत्रों को अधिक परिष्कृत, आधिक प्रखर एवं अधिक समर्थ बनाया जा सकता है।
स्थिर शरीर-शान्त चित्त, कमर सीधी, हाथ गोदी में, आँखें बन्द, यह है ध्यानमुद्रा का स्वरूप-अनुशासन ध्यान-धारणा आरम्भ करने से पूर्व साधक को अपनी स्थिति ऐसी ही बना लेनी चाहिए। तीनों योगों का सामान्य विवरण इस प्रकार है-
(१) बिन्दुयोग- त्राटकसाधना को आज्ञाचक्र का जागरण एवं तृतीय नेत्र उन्मीलन कहा जाता है। दोनों नेत्रों के बीच मस्तक के भृकुटी भाग में सूक्ष्मतम स्तर का तृतीय नेत्र है। भगवान शंकर की, देवी दुर्गा की तीन आँखें चित्रित की जाती हैं। दो आँखें सामान्य-एक भृकुटी स्थान पर दिव्य। इसे ज्ञानचक्षु भी कहते हैं। अर्जुन को भगवान ने इसी के माध्यम से विराट् के दर्शन कराये थे। भगवान शिव ने इसी को खोलकर ऐसी अग्नि निकाली थी, जिसमें उपद्रवी कामदेव जलकर भस्म हो गया। दमयंती ने भी कुदृष्टि डालने वाले व्याध को इसी नेत्र ज्वाला के सहारे भस्म कर दिया था। संजय इसी केन्द्र से अद्भुत दिव्यदृष्टि का टेलीविजन की तरह-दूरबीन की तरह उपयोग करते रहे और धृतराष्ट्र को घर बैठे महाभारत का सारा आँखों देखा हाल सुनाते रहे।
आज्ञाचक्र को शरीरविज्ञान के अनुसार पीनियल और पिट्यूटरी ग्रन्थों का मध्यवर्ती सर्किट माना जाता है और उसे एक प्रकार का द्विदलीय चक्र-दिव्य दृष्टि केन्द्र कहा जाता है। टेलीविजन, राडार टेलिस्कोप की समन्वय युक्त क्षमता से इसकी तुलना की जाती है। जो चक्षुओं से नहीं देखा जा सकता, वह इसमें सन्निहित अतीन्द्रिय क्षमता के सहारे परिलक्षित हो सकता है, ऐसी मान्यता है। दूरदर्शन, विचार संचालन जैसी विभूतियों का उद्गम इसे माना जाता है। साधारणतया यह प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है और उसके अस्तित्व को कोई प्रचण्ड परिचय नहीं मिलता, किन्तु यदि इसे प्रयत्नपूर्वक जगाया जा सके, तो यह तीसरा नेत्र विचार संस्थान की क्षमता को अनेक गुनी बढ़ा देता है। चूँकि यह केन्द्र दीपक की लौ के समान आकृति वाला बिन्दु माना जाता है, इसलिए उसे जाग्रत करने की साधना को बिन्दुयोग कहते हैं। इसी का एक नाम त्राटकसाधना भी है।
दीपक के प्रकाश की लौ आँखें बन्द करके आज्ञाचक्र के स्थान पा प्रज्वलित देखने का अभ्यास करना होता है, साथ ही यह भी धारणा करनी होती है कि वह प्रकाश समूचे मस्तिष्क में फैलकर उसके प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों को जाग्रत कर रहा है। आरम्भ में यह ध्यान दस मिनट से आरम्भ करना चाहिए और बढ़ाते-बढ़ाते दूनी-तिगुनी अवधि तक पहुँचा देना चाहिए। दीपक का सहारा आरम्भ में ही कुछ समय लेना पड़ता है। इसके बाद आज्ञाचक्र के स्थान पर प्रकाश लौ जलने और उसकी आभा में समूचा मनःसंस्थान आलोकमय हो जाने की धारणा बिन किसी अवलम्बन के मात्र कल्पना, भावन के आधार पर चलती रहती है।
दीपक की ही तरह प्रभातकालीन सूर्य का प्रकाशपुँज लक्ष्य इष्ट माना जा सकता है। गायत्री का प्राण “सविता” भी है। आज्ञाचक्र के स्थान पर हम उदीयमान सूर्य का ध्यान करते हैं, साथ ही यह धारण करते हैं कि सविता देवता की ज्योतिकिरणें स्थूल शरीर में प्रवेश करके पवित्रता, प्रखरता, सूक्ष्मशरीर में दूरदर्शी विवेकशीलता, कारण-शरीर में श्रद्धा, संवेदना का संचार करतीं और समग्र काय-कलेवर को
ज्योतिपुञ्ज बनाती हैं। दीपक या सूर्य दोनों में से किसी को भी माध्यम बनाकर आज्ञाचक्र का जागरण-तृतीय नेत्र का उन्मीलन हो सकता है। शान्तिकुञ्ज में दीपक के स्थान की पूर्ति हेतु नीले प्रकाश के बल्ब लगाए गए हैं। इनसे भी वही लाभ मिलता है। बुझने आदि की झंझट भी नहीं रहता।
(२) नादयोग- यह साधना सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों द्वारा सम्पन्न की जाती है। खुले कान तो एक सीमा तक की समीपवर्ती प्रत्यक्ष ध्वनि ही सुन पाते हैं, किन्तु सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों में ज्ञानातीत दिव्य ध्वनियाँ सुनने की भी क्षमता है। प्रकृति का मूल “शब्द” है। शब्द को ब्रह्म भी कहा गया है। नादयोग में इसी शब्दब्रह्म की साधना है। उस आधार पर दिव्य ध्वनियों को सुनने का अभ्यास किया जाता है और ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अदृश्य रहस्यों को जाना जाता है। अपनी आन्तरिक स्थिति का विश्लेषण-पर्यवेक्षण करने एवं प्रकृति की सामयिक हलचलों का कारण समझकर अपनी ज्ञानपरिधि को अत्यधिक व्यापक बनाया जा सकता है। इसी आधार पर भूतकाल के स्मृतिकम्पन एवं भविष्य में घटित होने वाले प्रकरणों का पूर्वाभास सम्भव हो जाता है। नादयोग की शब्द साधना को “कालजयी” कहा जाता है। ऋषियों को दृष्टा, त्रिकालदर्शी, सर्वज्ञ आदि की सिद्धियाँ इसी आधार पर उपलब्ध होती थीं।
बिन्दुयोग की तरह नादयोग में भी ध्यानमुद्रा पर एकान्त स्थान में बैठते हैं। स्थूल ध्वनियों को रोकने के लिए कान में रुई लगा लेते हैं। इसके उपरान्त प्रयत्न करते हैं कि प्रकृति के गर्भ में प्रवाहित दिव्य ध्वनि तरंगों का सुनना सम्भव हो सके। आरम्भ में बहुत धीमी अनुभव होता है। जो सुनाई पड़ता है, वह वंशी, नफीरी बजने, झींगुर बोलने, भ्रमर गूँजने, बादल बरसने, झरना झरने जैसा हल्का होता है। बाद में अधिक प्रखरता, उत्तेजना और उतार-चढ़ाव भी उत्पन्न होने लगता है, यह दिव्य-ध्वनियाँ बड़ी मोहक और आनन्ददायक होती है। इनकी तुलना सर्प को मृग को मोहने वाले वीणा निनाद से की जाती हैं नारद की वीणा, शंकर का डमरू, सरस्वती का सितारा अलंकार रूप में इस नादयोग के रहस्यों का ही उद्घाटन करने वाले सकते हैं।
(३) लययोग- कला साधना में तीसरा अनिवार्य अभ्यास लययोग का है। इसमें शरीर अभ्यास को आत्मसत्ता के साथ समर्पित-विसर्जित करना पड़ता है। आमतौर से मनुष्य अपने आपको शरीर भर मानता है और उसी की इच्छा, आवश्यकता पूरी करने में जुटा रहता है। आत्मा को, उसके स्वरूप, लक्ष्य एवं उत्तरदायित्व को तो एक प्रकार से विस्मृत ही किए रहता है। यह वह भटकाव है जिसे मायापाश, भवबन्धन आदि नामों से पुकारते हैं।
ध्यानमुद्रा में बैठकर दर्पण को सामने रखा जाता है। साधना के समय अपने स्वरूप के भीतर ही परमात्मा की सत्ता का अनुभव-अभ्यास किया जाता है। अपने चेहरे पर सज्जा-सौन्दर्य की नहीं, एक विशेष दृष्टि डाली जाती है कि इस माँस-पिण्ड के भीतर स्रष्टा का प्रतिनिधित्व करने वाली आत्मसत्ता विद्यमान है। वही इस काया की अधिष्ठात्री है। उसी का उत्कर्ष परम लक्ष्य है। काया उसी प्रयोजन की पूर्ति का वाहन, साधन, उपकरण मात्र है। शरीर की सार्थकता आत्मा के प्रति वफादार, जिम्मेदार और ईमानदार रहने में ही है। आत्मा काया का पोषण तो सही रूप में करे पा साथ ही यह भी ध्यान रखे कि उसे उच्छृंखल बनाने वाली वासना, तृष्णा, अहंता के आक्रमण से सुरक्षा का प्रबन्ध भी होता रहे।
छाया-पुरुष साधना से अपने समतुल्य एक और व्यक्तित्व का निर्माण कर लिया जाता है और वह एक अभिन्न मित्र एवं समर्थ सेवक की तरह निरन्तर साथ देता तथा सहायता करता है। दर्पण साधना से भी उस छाया साधना की उद्देश्य पूर्ति होती है।
बंध-इन तीन योग-साधनाओं के साथ ही चक्रों पर सूक्ष्म प्रभाव डालने वाले बंध अभ्यासों की चर्चा भी अभीष्ट हैं। ध्यानयुक्त साधनाओं में इनका प्रतिफल मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष के रूप में मिलता है। बंध कुल तीन हैं। मूल बंध, जालंधर बंध, उड्डियान बंध। सुषुम्ना नाड़ी में प्राण के स्वतन्त्र प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करने वाली ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा रुद्रग्रन्थि इन अभ्यासों से शीघ्र खुल जाती है। बंध मुख्यतः प्राण-प्रवाह के नियंत्रण हेतु किए जाते हैं, जिनका सुनियोजन ध्यान प्रक्रिया द्वारा किया जाता है।
प्राणायाम करते समय गुदा के छिद्रों को सिकुड़कर ऊपर खींचे रहना मूलबंध कहलाता है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में इससे स्फुरण होती है। चूँकि यह मनुष्य के मूल को बाँधता है, अपव्यय के मार्ग को अवरुद्ध करता है इसलिए यह नाम दिया गया है।
मस्तक को झुकाते हुए ठोड़ी को, कण्ठकूप से लगाने की प्रक्रिया जालन्धर बन्ध कहलाता है। इस बंध का भावार्थ है- जाल को धारण करना अर्थात् ज्ञान तन्तुओं को स्थिर नियोजित करना । चित्तवृत्ति शान्त होती है तथा एकाग्रतापूर्वक ध्यान योग की सिद्धि में सफलता मिलती है। पेट में स्थित आँतों को पीठ की ओर खींचने की क्रिया को उड्डियान बंध कहते हैं। यह अधोमुखी से ऊर्ध्वमुखी बनने की स्थिति की पहली सीढ़ी है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया में सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खोलने हेतु यह सर्वश्रेष्ठ योगाभ्यास है। ये तीनों ही क्रियाएँ अल्पकाल में साधकों को उनकी स्थिति, आवश्यकतानुसार बताई समझाई जाती हैं। निरापद लेकिन फलदायी इन क्रियाओं का प्रयोग जब उपर्युक्त योग-साधनाओं व उपयुक्त प्राणायामों के सम्मिश्रण के साथ किया जाता है तो साधक अपने में अप्रत्याशित परिवर्तन पाते हैं।
साधना काल में इन निष्कर्षों पर पहुँच जाना चाहिए। (१) सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन को अलभ्य सौभाग्य माना जाए और उसकी सार्थकता के लिए उस अवधि को आत्मकल्याण और लोकमंगल के लिए निरत रखा जाए। (२) शरीर को ही सब कुछ न माना जाए। आत्मा का भी हित सोचा जाए। अपनी क्षमताओं तथा सम्पदाओं का उपयोग आत्मकल्याण के निमित्त आवश्यक पुण्य-परमार्थ में भी उपयुक्त मात्रा में नियोजित रखा जाए। (३) भगवान को परिवार के एक सदस्य जितना तो माना ही जाए। उसके निमित्त इतना मन तथा धन तो खर्च किया ही जाए, जितना कि एक परिवार के सदस्य पर होता है। (४) औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाया जाए। परिवार छोटा रखकर स्वावलम्बी एवं सुसंस्कारी बनाया जाए। इसके लिए औचित्य कर्त्तव्यपालन ही पर्याप्त समझा जाए। विलास, संग्रह और उत्तराधिकार में बहुत छोड़ने की ललक पर अंकुश लगाया जाए। क्षमता को समयदान में और सम्पदा को अंशदान में जितना अधिक लगाया जा सकता है, उसकी सम्भावना पूरी तरह परखी और कार्यान्वित की जाए। (५) भावी जीवन को महामानव स्तर का बनाने की उमंग लेकर वापस लौटा जाए। इसके लिए गुण, कर्म, स्वभाव में आदर्शवादी परिवर्तन किया जाए। अंगों की कार्यपद्धति, विधि-व्यवस्था एवं रीति-नीति ऐसी बनाई जाए, जिसकी सहारे क्षुद्रता को महानता में परिवर्तित कर सकना सम्भव हो सके।
इन निर्धारणों को दिनचर्या और परिवार क्षेत्र में प्रयुक्त करते रहने से उन्हें व्यवहार में उतारना एवं समाज क्षेत्र में कार्यान्वित कर सकना सम्भव हो सकता है। परिवारचर्या को नये सिर से नये निर्धारणों के अनुरूप ढालने के लिए सुव्यवस्थित योजना बनाकर उनकी पूर्ति हेतु अगले दिनों निरन्तर प्रयत्नरत रहने का निश्चय किया जाए।
महर्षि जावालि ने उस पर्वत पर ब्रह्मकमल खिला देखा। शोभा और सुगन्ध पर मुग्ध होकर ऋषि को समीप आया देख, पुष्प प्रसन्न तो हुआ, पर साथ ही आश्चर्य व्यक्त करते हुए आगमन का कष्ट उठाने का कारण भी पूछा। जावालि बोले- तुम्हें शिव-सामीप्य का श्रेय देने की इच्छा हुई, सो अनुग्रह के लिए तोड़ने आ पहुँचा। पुष्प की प्रसन्नता खिन्नता में बदल गई। उदासी का कारण महर्षि ने पूछा, तो फूल ने कहा- शिव सामीप्य का लोभ संवरण न कर सकने वाले कम नहीं । फिर देवता को पुष्प जैसी मधुमक्खियों जैसे छोटे कृमि-कीटकों की कुछ सहायता करता रहता , तो क्या बुरा था | आखिर उस क्षेत्र को खद की भी तो आवश्यकता थी, जहाँ से उगा और बढ़ा । ऋषि ने पुष्प की भाव-गरिमा को समझा और वे उसे यथास्थान छोड़कर वापस लौट आए।
एक समय था जब क्यूबा में रहने वाला सेनर एवेलिनो पेरेज नामक एक व्यक्ति व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के आकर्षण और शोध का बहुचर्चित विषय बन गया था। पेरेज की यह विशेषता थी कि वह अपनी इच्छानुसार अपनी एक आँख या एक साथ दोनों आँखों को पुतलियों से दो इंच बाहर निकाल लेता था और उन्हें वापस यथा-स्थान बैठा लेता था। उससे उसकी देखने की शक्ति में किसी भी तरह का दबाव नहीं पड़ता था।
यौगिक अभ्यास और प्राणायाम द्वारा शरीर और प्राणों पर नियन्त्रण करके उन्हें मनमाने ढंग से मोड़ने ढंग से मोड़ने-मरोड़ने के यौगिक प्रदर्शन हमारे देश में कोई अनोखी घटनाएँ नहीं मानी जातीं। यहाँ का प्रायः सामान्य नागरिक भी इस तरह के चमत्कारों से परिचित मिलेगा। कई शिक्षित लोग इसे उनका अन्ध-विश्वास भी मान लेते हैं, पर जिन्होंने भी योग साहित्य का अध्ययन किया होगा, शरीरस्थ चक्रों, गुच्छकों, उपत्यिकाओं का जिन्हें थोड़ा भी विज्ञान ज्ञात होगा, वे इस तरह के आश्चर्यजनक लगने वाले प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि भली प्रकार अनुभव कर सकते हैं। अंतःस्रावी ग्रन्थियों (ग्लैण्ड्स) के बारे में आधुनिक शरीर-शास्त्रियों ने अब तक जो जानकारियाँ प्राप्त की हैं, उनसे भी यह सिद्ध हो गया है कि यदि इन स्रावों (हारमोन्स) पर पूरी तरह नियन्त्रण कर लेना मनुष्य के लिए सम्भव हुआ तो एक दिन वह आयेगा जब हनुमानजी की तरह मनुष्य एक क्षण में “मसक समान” और दूसरे क्षण शत योजना मुख सुरसा बन जाना बिलकुल साधारण बात हो जाएगी।
यह सब मनुष्य की प्रचण्ड इच्छा-शक्ति संकल्प और इनके द्वारा विकसित अभ्यासों की उपलब्धियाँ मात्र हैं। यद्यपि डाक्टर लोग अब भी यह नहीं समझ सके कि पेरेज ने इस तरह आँख की पेशियों पर नियन्त्रण कैसे प्राप्त कर लिया, जबकि यह मात्र नियन्त्रण का कौतुक है। पेरेज की आँखों को इधर-उधर घुमाकर व्यायाम प्रारम्भ किया और यह क्षमता विकसित कर ली। इच्छाशक्ति समुचित एक महान दैत्य है, यदि वह अपनी पर आ जाए, संकल्प रूप धारण कर ले तो मनुष्य ऐसे-ऐसे एक नहीं लाख चमत्कार दिखाई देने वाले परिणाम प्रस्तुत कर सकता है। किसी व्यक्ति का स्वस्थ होना, किसी का जीवन भर रोगी बने रहना, किसी का प्रखर बुद्धि विद्यार्थी होना, किसी का मन्द बुद्धि, किसी का जीवन भर परमुखापेक्षी बने रहना उस मनोबल के ही प्रतिफल हैं, जो मनुष्य को कुछ से कुछ बना देते हैं।
केन्या में सम्बरु नामक एक व्यक्ति ने निश्चय कर लिया कि वह जिन्दगी भर कभी बैठेगा नहीं और सचमुच ही अब वह लगभग ४७ वर्ष का होने को आया, २७ वर्ष का था तब उसने यह प्रतिज्ञा की थी अब तक ३० वर्ष हो गये, खाना, पीना , टट्टी, पेशाब सब उसने खड़े ही खड़े किया। लेटने या खड़े रहने की प्रतिज्ञा मृत्युपर्यन्त निबाहने की आन अब उसकी सामान्य आदत बन गई है, जबकि सामान्य व्यक्तियों के लिए उसकी चर्चा भी कम विस्मयकारक नहीं होंगी। बुफेली अमेरिका के टाममीलिफ के एक भी हाथ नहीं था, पर वह विश्व का माना हुआ गोला चैम्पियन था। उसने १७ बार चैम्पियनशिप जीती। योगी हरिदास अपनी जीभ से भूर-मध्य का स्पर्श कर लेते थे। अफ्रीका के सार्स जिन्जेस ने अपने दोनों ओठ इतने बढ़ा लिए थे कि वह उसकी पत्नी के लिए पूरी तकिया का काम देते थे। ओठों के इस राक्षसी आकार के कारण जिन्जेस न तो कड़ा खाना खा सकता था, न बोल सकता था। ऊपर से वह कहीं भाग न जाए, इस भय से उसकी पत्नी उसके ओठों तकिया बनाकर सोती था, ताकि वह कहीं खिसकने का प्रयास करे तो तुरन्त नियन्त्रित किया जा सके।
अच्छे हों या बुरे परिणाम संकल्प शक्ति को जुटाकर मनुष्य अतिमानव बन सकता है, इसमें सन्देह नहीं। इतने होने पर भी उसे सर्वशक्तिमान नहीं कह सकते। इसलिए कि उसकी इच्छा और माँग ने विरुद्ध आनुवांशिकी, भौतिकी और पराभौतिकी क्षेत्र में ऐसी सैकड़ों घटनाएँ घटती रहती हैं, जिनका नियन्त्रण तो दूर वह उस रहस्य तक को नहीं जान सकता कि उस कारण क्या है ? जबकि निसर्ग में उस तरह का स्वयं में कोई सुनिश्चित सिद्धान्त नहीं होता। उदाहरण के लिए, १७२९ में लन्दन में चार्ल्सवर्थ नामक एक बच्चे ने जन्म लिया। सामान्यतः ४ वर्ष तक की आयु ऐसी होती है, जब बच्चा अच्छी तरह बोल भी नहीं पाता, किन्तु चार्ल्सवर्थ ने आनुवांशिकी के सारे वैज्ञानिक नियमों को उठाकर एक ओर फेंक दिया। चार वर्ष में ही वह पूर्ण वयस्क हो गया। उसके मूँछ, दाढ़ी भी निकल आई। उसके व्यवहार, बात-चीत में भी पूरी तरह बुजुर्गपन टपकने लगा था। सात वर्ष की आयु में उसके सम्पूर्ण बाल सफेद हो गए और इसी वर्ष उसकी मृत्यु हो गई।
आनुवांशिकी के सिद्धान्तानुसार बच्चे में यह तो हो सकता है कि उसके माता-पिता के न होकर बाबा, नाना, परबाबा, परनाना, दादी, परदादी, नानी, परनानी अथवा इससे ऊपर वहाँ तक जहाँ से उस वंश के आविर्भाव का महापुरुष पहुँचता है, भले ही वह ब्रह्माजी ही क्यों न हों, के आनुवांशिकीय लक्षण अवश्य होने चाहिए, जबकि विश्व इतिहास में यह अपनी तरह का एकमेव उदाहरण है, जो मनुष्य की संकल्प शक्ति से भी परे किसी विधेय-सत्ता की ओर संकेत करता है।
एक ही रंग-रूप आकृति के एक से अधिक व्यक्ति हो सकते हैं, पर उनमें ऊँचाई, तिल, मस्से, नाक, भौंह, दाँत, माथा, बाल कहीं न कहीं, कोई न कोई ऐसा अन्तर अवश्य रह जाता है, जिससे उनकी पहचान सरल हो जाती है, किन्तु सन् १७९४ में न्यूयार्क में एक साथ एक ही मुहल्ले में हेनरी, थामस तथा वेनन नाम के तीन ऐसे व्यक्ति निकल आये, जिनकी पहचान स्वयं उनके माता, पिता, भाई बहिनों के लिए दुःसाध्य हो गई। कई बार थामस को घर पहुँचने में देर हो जाती तो उसकी माँ ढूँढ़ने निकलती और सामने पड़ जाता हेनरी, तो वह उसी की पिटाई करते घर ले जाती। बेचारा हेनरी कहता भी कि मैं हेनरी हूँ, पर माँ उसकी आवाज तो पहचानती थी, उन तीनों की आवाज भी एक जैसी थी। आवाजों से भी उन्हें पहचानना कठिन था।
अब तक वे काफी बड़े हो गये थे । लोगों ने समझा अब दाढ़ी , मूँछें में तो कुछ फर्क आयेगा ही, पर न जाने किस सत्ता का निर्माण है यह , जो मनुष्य की सारी कल्पनाओं को भी लाँघकर कल्पनातीत सृष्टि का सृजन करता रहता है । तीनों की मूँछ , दाढ़ी भी एक ही तरह की थीं । अन्त में दाढ़ी, मूँछ की आकृति भिन्न -भिन्न रखने का उन तीनों ने निश्चय किया । हेनरी ठोढ़ी के नीचे के बाल तो साफ रखता था, पर दोनों गालों के नीचे दाढ़ी समानान्तर लटकती थी, उन्हें मूँछ इस तरह जोड़ती थी कि दाढ़ी -मूँछ का आकार अँग्रेजी के एच की तरह बन जाता था । उसके नाम का पहला अक्षर भी यही था । थामस मूछों के अतिरिक्त केवल ठोढ़ी के नाचे मुसलिम कट दाढ़ी रखता था, दोनों गाल के बाल साफ रखने से उसकी मूँछ और और दाढ़ी की आकृति अँग्रेजी के “टी” वर्ण के आकार की हो गई और इस तरह उसकी पहचान सम्भव हुई वेर्नन ने तीसरी युक्ति निकाली उसने अपनी मूँछें तो सफाचट करा लीं और दाढ़ी के बालों की इस तरह कटिंग कराता कि वह दोनों कनपटियों से चलकर ठोढ़ी में अँग्रेजी के वर्ण “वी” की सी आकृति बना देती। इस तरह मानवीय बुद्धि ने एक समस्या का निराकरण ही कर लिया, पर लगता है, वह उस रहस्य का कुछ महत्व ही नहीं समझता कि ऐसा किस नियम के अंतर्गत होता है कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों, वातावरण, माता-पिता आहार-विहार के भी एक-सी शक्ल के वह भी इतने साम्य गुणों वाले कि उनकी पहचान तक न हो सके किसी बहुत ही कुशल कलाकार की तूलिका का ही चमत्कार हो सकता है। उस पूर्ण परात्पर रचनाकार को पाना ही मानव जीवन का लक्ष्य बताया गया है, पर मनुष्य वो अपने साँसारिक बखेड़ों में इतना उलझ गया है, कि इस तरह की दुर्लभ घटनाएँ देखकर भी उसका विवेक जाग्रत नहीं होता। इस तरह के विलक्षण अपवाद मनुष्य ही नहीं जीव-जन्तुओं के भी मिलने लगे तो विकासवाद के सिद्धान्त को एक दूसरा प्रश्न-चिन्ह लग जाता है और उसके समर्थकों के दावों पर सन्देह होने लगता है, कहीं उन्होंने उपहास में ही तो दर्शन को विकृत नहीं कर डाला।
ऐली (इंग्लैण्ड) एच. जी. बाय उनके धर मुर्गी ने ऐसा बच्चा दिया जिसके चार पैर थे। तमाम उम्र इस बच्चे ने यों ही सामान्य स्थिति में बिताई । प्रजनन क्रियाएँ भी उसमें सम्मिलित थीं, पर उसकी सन्तानों में कहीं कोई इस तरह का अद्भुत देखने को नहीं मिला। मैनचेस्टर सागर में कैप्टेन जे0 टी0 बैनेट ने एक ऐसा कछुआ पकड़ा जिसके दो सिर थे। वह कछुआ उन्होंने अपनी मृत्यु पर्यन्त पालकर रखा। जोन्सवर्ग के वाल्टर रडिल मैन के पास एक ऐसी भेड़ थी, जिसके सारे शरीर में बाल उगते थे, किन्तु पीठ के बिलकुल ऊपरी हिस्से में विधिवत घास उगा करती थी। यह एक-विलक्षण संरचना थी, जिसका कोई भी आनुवांशिकी आधार शारीरिक त्रुटि या कारण ढूँढ़ पाना आज तक भी वैज्ञानिकों के लिए सम्भव नहीं हो पाया । यह वैसा ही कठिन कार्य है जैसे धड़ में जमाये दूध को बिलोने वाली रई से समुद्र मंथन की बात सोची जाए । सृष्टि जितनी विराट् है, मानवीय ज्ञान की सीमाएँ उतनी ही नगण्य हैं, अतएव सुनिश्चित अनुभूति प्राप्त न होने तक किसी भी उस परम सत्ता पर अविश्वास नहीं करना चाहिए, जिसकी शक्ति से ही इस विलक्षण निर्माण की प्रक्रिया चलती है।
हस्तक्षेप प्राणि-सत्ता तक ही सीमित नहीं है, लगता है प्रकृति को भी इच्छानुसार बनाने और बदलने की शक्ति का कोई और उद्गम है। स्काटलैण्ड के डंकल्स नामक स्थान में १६ फुट लम्बा, ७ फुट चौड़ा तथा ५ फुट ऊँचा एक पत्थर तीन छोटे-छोटे पत्थरों पर इस तरह टिका है, मानो कोई भीमकाय कछुआ चल पड़ने की तैयारी में हो, पुरातत्व वेत्ताओं के अनुसार यह पत्थर पिछले बीस लाख वर्षों से इसी तरह टिका हुआ हैं, जबकि इस बीच आये अंधड़-तूफानों ने सैकड़ों पहाड़ ढहा दिए। बिना किसी गणितीय आधार के ही यह तीन छोटे सिपाही खड़े अपने महान् सम्राट् की अभ्यर्थना करते जान पड़ते हैं।
एण्डले फ्रान्स में भी इसी तरह वोल्डर (पत्थर) इस तरह नन्हें-से आधार पर नाचते हुए लट्टू की-सी आकृति में खड़ा हैं, मानो उसे किसी विद्युत चुम्बकीय शक्ति ने चारों ओर से साध रखा हो। वैज्ञानिक उस बल की सब तरह जाँच कर चुके, पर वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। विचित्र बात यह है कि यह पत्थर गज़ब की भविष्यवाणी भी करता है, मौसम साफ रहेगा, तो वह अपनी उसी धुरी पर चुपचाप खड़ा रहेगा, किन्तु तूफान आने को हो तो वह धीरे-धीरे हिल-डुलकर उसकी सूचना दे देता है, उस स्थिति में भी उसका सन्तुलन यथावत् रहता है, जबकि यदि दूसरा पत्थर हो तो हाथ के रत्तीभर इशारे से सैकड़ों फीट दूर जा लुढ़क सकता है, पर उसे जोर देकर भी हटाया नहीं जा सका।
भारतीय वेद-पुराण और दर्शन कहते हैं, उसके अपनी इच्छाशक्ति को मुखर करने के उद्देश्य से सृष्टि की रचना की । अनेक-अनेक जीव योनियों की संरचना वस्तुतः इच्छाशक्ति का ही संगठन है, सम्भव है, उससे सर्वशक्तिमान सत्ता परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध न हो, पर इंग्लैण्ड के वाटफोर्ड नामक कस्बे में हुई एक घटना ने यह सिद्ध कर दिया है, मानवीय इच्छाशक्ति किसी न किसी रूप में एक अति समर्थ सत्ता की ही सन्तान है, उसे परमात्मा, विश्वात्मा, ब्रह्मपरमेश्वर कुछ भी कहे, वह विचार की ही श्रेणी का कोई श्रेष्ठ तत्व है। हुआ यह कि लिड नामक एक व्यक्ति को अंजीर बहुत प्रिय थे। उसकी मृत्यु होने लगी तो उसने कहा-अंजीर ने मुझे जीवन में अत्यन्त तृप्ति प्रदान की है, मेरा मन है कि मेरे ताबूत में अंजीर का एक पौधा रखा जाए, मेरी आत्मा उसी से फूटे और इतने फल दे कि हजारों लोग उससे तृप्ति पाएँ।
ऐसा ही किया गया। लिड को जिस ताबूत में रखकर दफनाया गया, उसी में अंजीर का एक नन्हा-सा पौधा भी रख दिया गया। कुछ दिन बाद समय के गर्भ में दबा हुआ वह अंजीर का पौधा पृथ्वी को फोड़कर ऊपर निकल आया। जैसे-जैसे उसका विकास होता गया, वैसे-वैसे कब्र फटती गई और एक दिन वह पूर्ण वृक्ष के रूप में उभर उठा सचमुच सामान्य अंजीर वृक्षों की अपेक्षा उसमें इतने अधिक, मीठे और बढ़िया अंजीर लगते हैं कि खाने वाला उस वृक्ष की याद अवश्य करता है। उसके अंजीरों पर किसी का प्रतिबन्ध नहीं रखा गया ताकि लिड की इच्छा की पूर्ति हो सके।
गीता कहती है कि मृत्यु के समय मनुष्य की जो भी इच्छा हो परमात्मा उसे उसी रूप में स्वीकार और पूर्ण करता है। सम्भवत’ यह भी उसी का एक उदाहरण हो-जो भी हो संसार में कोई ऐसी शक्ति है अवश्य, जो मानवीय सामर्थ्य और प्रकृति से भी बृहत्तर है। इन्हें संयोग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस तरह की और भी घटनाएँ हैं, जो मानवीय बुद्धि को प्रकृति में प्रतिघटित होने को ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करती हैं, जिन्हें न तो वैज्ञानिक नियमों के अंतर्गत कहा जा सकता है, न प्राकृतिक संयोग। सम्भवतः कोरिया की कोयम नदी “नाक्वाह्म चट्टान” इस सम्बन्ध में सबसे प्रामाणिक और सृष्टि की सबसे बड़ी आश्चर्यजनक घटना कह सकते हैं। सन् ६६० में चीन के बादशाह ने कोरिया पर आक्रमण कर दिया। कोरिया नरेश पाकेज, उनके पुत्र, महामन्त्री, मन्त्री और सचिव आदि सभी बन्दी बना लिए गए और उन्हें चीन भेज दिया गया। किन्तु साम्राज्ञी राजघराने की दूसरी स्त्रियों तथा मन्त्री आदि की ७१ (इकहत्तर) स्त्रियों ने कोयम नदी के किनारे ढलवाँ बनी इस चट्टान से नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। ज्ञात नहीं मृत्यु के समय इन साध्वी स्त्रियों की इच्छाएँ क्या थीं, यही भी अविज्ञात है कि परमात्मा उस घटना को क्यों अमर बनाये रखना चाहता है ख् पर यह बड़े आश्चर्य की बात है कि लगभग १४०० वर्ष होने को आये प्रतिवर्ष उस चट्टान पर एक ही नस्ल के केवल ७१ (इकहत्तर) पौधे ही उगते हैं और उनमें १७ ही फूल लगते हैं। यह सभी इकहत्तर फूल एक ही दिन कली से पुष्प का आकार ग्रहण करते हैं और जब तक खिले रहते हैं, सभी इकहत्तर के इकहत्तर। एक दिन वर्ष का, इसी बसन्त ऋतु का वह दिन आता है, जिस दिन ७१ महिलाओं ने सामूहिक जौहर किया था, ठीक उसी दिन सभी इकहत्तर फूल एक साथ नदी में गिर जाते हैं। इस दृश्य को देखने और अपनी भाव भरी श्रद्धा समर्पित करने के लिए हजारों-लाखों व्यक्ति वहाँ एकत्रित होते हैं और यह मानते हैं, सृष्टि में कोई विराट् विचारशील चेतना कार्य अवश्य कर रही है, भले ही दृश्य रूप में वह दिखाई न दे।
दुर्योधन को अपनी माता गान्धारी की वचनसिद्धि का विश्वास था। सो वह अंतिम युद्ध में माता के पास गया और विजय का आशीर्वाद माँगने लगा।
गान्धारी ने इतना ही कहा-जहाँ धर्म होगा, वहीं जीत होगी।” इतना कहने से दुर्योधन का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता था। वह स्पष्ट शब्दों में अपनी विजय का आशीर्वाद चाहता था। माता से उसने वैसा ही आग्रह किया।
गान्धारी ने बताया-आशीर्वाद तभी तक सफल होते हैं, जब तक नीति-न्याय के साथ जुड़े रहते हैं। पक्षपात प्रेरित होने पर वे निष्फल ही नहीं चले जाते, दाता के पास से सदा के लिए उस सामर्थ्य को भी छीन ले जाते हैं। अस्तु मैं तुम्हारी मर्जी से नहीं अपने विवेक से ही आशीर्वचन बोलूँगी।
एक प्रौढ़ की इकलौती लाड़ली बिटिया बीमार पड़ी। इलाज और उपाय की सीमा पार कर लेने पर भी उसे बचाया न जा सका। बाप का कलेजा टूट गया। व्यथा के आँसू रुकते न थे। तो उसने एकान्त साधा। संसार से उसे बुरी तरह विरक्ति हो गई। रोते-रोते वह एक रात गहरी नींद में सो गया। सपना आया-वह देवलोक जा पहुँचा है और वहाँ श्वेत-वस्त्रधारी बालकों का अत्यन्त लम्बा जुलूस निकल रहा है। सभी बच्चे प्रसन्न हैं और हाथ में जलती मोमबत्ती लिए आ रहे हैं। सपने को वह बहुत रुचिपूर्वक देखता रहा। उस पंक्ति में उसकी प्यारी बिटिया भी आ गई। वह उससे लिपट गया और हिचकियाँ ले-ले कर रोने लगा। जब धीरज बँधा, तो देखा और सब बच्चों की मोमबत्ती तो जल रही है, पर अकेली उसी बिटिया की बुझी हुई है। आदमी ने पूछा-बेटी तुम्हारी मोमबत्ती क्यों बुझी हुई है ?” बच्ची ने उदास होकर कहा-पापा-साथ वाले बच्चे उसे बार-बार जलाते हैं, पर आपके आँसू टपक-टपक कर उसे हर बार बुझा देते हैं।”
टाउमी की नींद खुल गई। उसने आँसुओं से बिटिया का हास-प्रकाश बुझने ने देने का निश्चय किया और न केवल आत्मा-शान्ति हेतु, अपितु अपनी बिटिया जैसी अनेकों जीवित प्रतिभाओं को ऊँचा उठाने हेतु कृतसंकल्प हो परमार्थपरायण जीवन जीने लगा।
मानसिक विकास में एक अति उपयोगी प्रयोग है- मनःसंस्थान को शिथिल कर देना। शरीर का पूर्ण शिथिलीकरण प्रकृति प्रदत्त निद्रा, उसी के सहारे मनुष्य अपनी जीवनचर्या सम्पन्न करता और अगले दिन के लिए कार्यकारी शक्ति प्राप्त करता है। निद्रा में व्यवधान पड़ने पर मनुष्य अशक्त एवं विक्षुब्ध दिखाई पड़ता है, नींद न आने की बीमारी लगातार चलती रहे, तो उसकी परिणति पागलपन में हो सकती है। जिन्हें गहरी निद्रा आती है, वे सामान्य आहार-विहार उपलब्ध होते हुए भी नीरोग और बलिष्ठ बने रहते हैं। मानसिक क्षमता भी उसकी बढ़ी-चढ़ी रहती है। अधिक गहरी निद्रा जिसे प्रसुप्ति कहते हैं, दुर्बलों और रोगियों को जीवन प्रदान कर सकती है, आहर और निद्रा दोनों वर्गों की उपयोगिता लगभग समान स्तर की ही मानी जा सकती है।
मनःसंस्थान की उच्चस्तरीय परतों की निद्रा का अपना महत्व है। यदि उसे उपलब्ध किया जा सके तो इस दिव्य संस्थान का अधिक स्वस्थ एवं अधिक समर्थ बनने का अवसर मिल सकता है।
मन की दो प्रमुख परतें है, एक सचेतन दूसरी अचेतन। सचेतन ही सोच-विचार करता है और वह रात्रि को नींद में सोता है। अचेतन को कार्य-संचालन की समस्त स्वसंचालित गतिविधियों की व्यवस्था बनानी पड़ती है। श्वास-प्रश्वास आकुंचन, निमेष-उन्मेष जैसे क्रियाएँ निरन्तर चलती रहती हैं और उन्हीं के आधार पर शरीर का निर्माण होता है। यह सब कुछ अचेतन की गतिविधियों पर निर्भर है। रात का सचेतन के सो जाने पर भी अचेतन क्रियाशील रहता है और स्वप्न देखने, करवट बदलने, कपड़े ओढ़ने, हटाने जैसे कृत्य कराता रहता है।
अचेतन की थकान दूर करने और विश्राम देने के उद्देश्य से ही मृत्यु होती है। मरने और उसके बाद पुनः जन्म लेने के मध्य में जो समय मिलता है, उसे “चिरनिद्रा” नाम दिया गया है। स्वर्ग-नरक जैसी अनुभूतियों का रसास्वादन उसी अवधि में मिलता रहता है।
प्रयत्नपूर्वक यदि अचेतन को थोड़ा या अधिक समय का उथला या गहरा विश्राम दिया जा सके ता भावना चेतना को बहुत राहत मिलती है। इस विश्राम से उसे थोड़ी-सी अवधि में ही नई स्फूर्ति प्राप्त होती है, साथ ही सचेतन के दबाव में दबे रहने वाले अन्तराल में अंकुरित विकसित होने का अवसर भी मिलता है। अन्तराल का विकास ही प्रकारान्तर से आत्मशक्ति का उद्भव-अभिवर्धन कहा जा सकता है।
योगनिद्रा के छोटे-बड़े अनेक स्तर हैं। बड़े स्तर को समाधि कहते हैं। यह निर्विकल्प, संकल्परहित और सविकल्प-संकल्प सहित दो स्तर की होती है। सविकल्प का परिणाम भौतिक और निर्विकल्प का आध्यात्मिक उपलब्धियों के रूप में सामने आता है। योगनिद्रा स्वल्प होती है और समाधि चिर-दीर्घकालीन दोनों ही परिस्थितियों में मन को अधिक शान्त एवं निष्क्रिय बनाने का प्रयत्न किया जाता है।
ध्यानयोग के द्वारा इस स्थिति को प्राप्त किया जाता है, विचार-संकल्प समाप्त तो नहीं हो सकते, पर उन्हें किसी एक केन्द्र पर नियोजित करके बिखराव के दबाव से मनःसंस्थान को मुक्त रखा जा सकता है। इतने से ही मनःक्षेत्र के जागरण एवं विकास में असाधारण योगदान मिलता है।
पाश्चात्य देशों में इस दिशा में जो प्रयोग किये जाते हैं, उन्हें सम्मोहन क्रिया के नाम से जाना जाता है। इसमें स्वसंकेतों द्वारा आत्मविकास का और सम्मोहन द्वारा दूसरों आत्मविकास का और सम्मोहन द्वारा दूसरों को अर्धमूर्छित या मूर्छित करके सुधार-उपचार का प्रयत्न किया जात है। ध्यानयोग मेडीटेशन के नाम से अब यह सर्वसाधारण की जानकारी का विषय बनता जा रहा है। उसका उपयोग प्रायः शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारण में हो रहा है। प्राचीनकाल के अध्यात्म-वेत्ता उस प्रक्रिया का आत्मबल-संवर्द्धन के लिए करते थे। उन दिनों चिकित्सा-उपचारों की आवश्यकता बहुत ही स्वल्प मात्रा में पड़ती थी। संयम और संतुलन के परिपालन से इन दिनों रोग कम ही होते थे, जो वे रक्त शुद्ध रहने के कारण सामान्य जड़ी-बूटियों के उपचार से ही अच्छे हो जाते थे। परिचित मस्तिष्क से ऊपर एक और दिव्यचेतना स्त्रोत है, जहाँ चित्तशक्ति निवास करती है। मनोवैज्ञानिक इसे अचेतन कहते हैं। “सुपर ईगो” के रूप में इसी की विवेचना की जाती रही है। यह देवलोक, अतीन्द्रिय चेतना का केन्द्र एवं ऋद्धि-सिद्धियों का भण्डार माना गया है। इस क्षेत्र पर अधिकार प्राप्त कर लेने वाला अलौकिक, असाधारण, अतिमानव एवं सिद्ध पुरुष बन सकता है।
जब अचेतन जागता है, तब प्रबुद्ध मस्तिष्क सोता है और जब प्रबुद्ध मस्तिष्क जागता है, तब चिन्तन सोता रहता है। दोनों एक साथ कार्यरत नहीं रह सकते। योगनिद्रा उत्पन्न करके पूर्ण या आँशिक समाधि में जाया जा सकता है और अतिमानवी अनुभूतियों के क्षेत्र में प्रवेश किया जा सकता है। यदि चेतन मस्तिष्क पूर्ण सजग रहे और तर्कबुद्धि के साथ निद्रित न होने का संकल्प किए रहे तो आध्यात्मिक जाग्रति असंभव है। जाग्रत मन को निद्रित करके ही अचेतन को अध्यात्म भूमिका में कुछ अधिक योगदान दे सकने योग्य बनाया जा सकता है।
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि चार अवस्थाएँ प्रबुद्ध मन की स्वाभाविक चंचलता को निग्रहित करके एकाग्रता के केन्द्र-बिन्दु पर रोके रखने के लिए हैं। इनमें जितनी सफलता मिलती जाती है, मस्तिष्क शान्त और समाहित होता चला जाता है, साथ ही चित्तशक्ति का जागरण आरम्भ हो जाता है। मानवी संकल्प बन न केवल बाह्य प्रयोजनों में वरन् अपने शरीर की अनिवार्य गतिविधियों को इच्छानुसार नियन्त्रित करने में सफल भी हो सकता है। समाधि स्थिति की प्राप्ति द्वारा कई प्रकार के लाभ उठाये जा सकते हैं-
(१) प्रबुद्ध मस्तिष्क को गहरा विश्राम देकर उसे अधिक स्वस्थ, सक्रिय एवं बुद्धिमान बनाया जा सकता है।
(२) अचेतन मस्तिष्क को जाग्रत करके उसकी अतीन्द्रिय क्षमता बढ़ाई जा सकती है और चमत्कारी सिद्ध पुरुषों की देवभूमिका में पहुँचा जा सकता है।
(३) शरीर की गतिविधियाँ रोक सकने में समर्थ संकल्प बल की आग में संसार की कठिनाइयों को गलाया जा सकता है। जो कठिन हैं, उन्हें सरल बनाया जा सकता है एवं दूसरों को आध्यात्मिक योगदान देकर सुखी बनाया जा सकता है।
(४) दीर्घजीवन का उद्देश्य पूरा करने के लिये कायाकल्प का रहस्यमय अमृत पाया जा सकता है। विज्ञान ने यह स्वीकार कर लिया है कि यदि मनुष्य को चिरनिद्रा में सुलाया जा सके, तो उसे रोगों और थकान के पंजों से छुड़ा कर नवजीवन प्रदान किया जा सकता है। भौतिक विज्ञान ने शीतनिद्रा के रूप में समाधि से मिलती-जुलती एक विधि ढूँढ़ निकाली है। विज्ञानी डेल कारेण्टर के अनुसार मनुष्य को ठण्डा करके गहरी सुषुप्तावस्था में पहुँचाया जा सकता है।
शीतनिद्रा के भौतिक हों या हिप्नोटिज्म स्तर के, मानसिक हों अथवा समाधि स्तर के आध्यात्मिक हो, हर स्थिति में सर्वतोमुखी विश्राम एवं शान्त, एकाग्र समाधान की आवश्यकता अति महत्त्वपूर्ण समझी जाती रहेगी। उसे प्राप्त करके हम अतीन्द्रिय शक्ति-सम्पादन से नये क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं।
योगनिद्रा का तात्पर्य है, चेतना का प्रवाह शरीर निर्वाह की दिशा से हटाकर अंतःक्षेत्र की ओर मोड़ देना। सूखे खेत में पानी भरने पर उसमें हरियाली उगने का उपक्रम आरम्भ होता है। इसके दो लाभ होते हैं, एक तो उच्चस्तरीय क्षमता का अभिवर्द्धन, दूसरे निकृष्ट कुसंस्कारों का निराकरण दोनों कार्य एक साथ चलने लगते हैं। प्रकाश बढ़ता है, तो अन्धकार अनायास ही अपना स्थान छोड़ता है।
मानसिक तनाव एवं विक्षोभ के कारण व्यक्तित्व को अपार हानि होती है। यह उद्विग्नता और कुछ नहीं अन्तराल की असमर्थता भर है। यह असमर्थता और कुछ नहीं, समुचित विश्राम न मिलने की प्रक्रिया है यदि इस कुचक्र को तोड़ा जा सके तो मनःक्षेत्र को अभिनव परिपोषण मिल सकता है और उसकी सामान्य तथा असामान्य क्षमताओं का नये सिरे से विस्तार हो सकता है। कहना न होगा कि अंतःक्षेत्र का यह लाभ भौतिक क्षेत्र की समस्त सफलताओं की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण हैं मनःक्षेत्र के विकास को लक्ष्य रखकर किए जाने वाले किसी भी प्रयास को अति दूरदर्शितापूर्ण कहा जा सकता है।
मनःक्षेत्र का बिखराव रोकने की प्रक्रिया ही ध्यानयोग है, इसके द्वारा सामर्थ्य की खपत में जो बचत होती है उसका अधिकाँश लाभ मस्तिष्क के उस क्षेत्र को मिलता है, जिसे सामर्थ्य की खपत में जो बचत होती है उसका अधिकाँश लाभ मस्तिष्क के उस क्षेत्र को मिलता है, जिसे ब्रह्मचक्र, ब्रह्मरंध्र, सहस्रार आदि नामों से पुकारते हैं। यह इस क्षेत्र में अवस्थित दो अति महत्त्वपूर्ण ग्रन्थियों की समन्वित प्रक्रिया का भ्रमर है। आज्ञाचक्र इसी को कहते हैं। ध्यानयोग की प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में एक रुचिकर वैज्ञानिक तथ्य है कि इस दौरान मस्तिष्क का सक्रिय भाग तुरन्त पीनियल एवं पिट्यूटरी ग्रन्थियों से सम्बन्ध स्थापित कर लेता है यह इनकी हारमोन्स स्राव करने की क्षमता में होने वाले परिवर्तनों से परिलक्षित होता है। ये दोनों ही स्थूल ग्रन्थियाँ अध्यात्म की दृष्टि से बड़ी रहस्यमय हैं। दोनों ही ऐसे रस का स्राव करती हैं, जो हमारी चेतना के स्तर को प्रभावित करते हैं।
पीनियल ग्लैण्ड का दार्शनिकों, रहस्यवादियों ने ‘तीसरा नेत्र’ एवं आत्मा का स्थान कहा है। हमारे प्रमुख सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों में यह एक है तथा आध्यात्मिक विकास हेतु महत्त्वपूर्ण ग्रन्थि हैं। उच्च शक्तियों से सम्बन्ध जोड़ने में वह सहायक है। इसका पूर्ण जागरण हमारी चेतना को भावनात्मक और बौद्धिक स्तर से ऊपर उठाकर और अधिक सूक्ष्म जगत में ले जाता है।
पिट्यूटरी ग्लैण्ड में स्नायु-संस्थान एवं हारमोन संस्थान की परस्पर प्रक्रिया से ही रसस्राव होता है। सारे शरीर की अन्य हारमोन ग्रन्थियाँ चयापचयी एवं भावनात्मक प्रतिक्रिया को पिट्यूटरी प्रभावित करती है।
यह अनन्त विस्तृत परम चेतना का प्रवेश द्वार है। यह भौतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों का मिलन बिन्दु माना गया है। ध्यान-साधना द्वारा इस ग्रन्थि को नियमित कर मनुष्य अपने स्थूल, सूक्ष्म एवं आत्मिक आवरणों का परिमार्जन कर सकता है, पूर्ण मानव बन सकता है।
जब भी कोई योगनिद्रा का अभ्यास करता है, प्रत्येक बार शक्ति प्रवाह ब्रेनसर्किटों के मध्य नये सम्बन्ध स्थापित करता है। मस्तिष्क के अन्धेरे निष्क्रिय क्षेत्र को प्रकाशित एवं सक्रिय करता है। यह हमारी चेतना को बाह्य जगत के पूर्ण व्यवसाय से अलग करता है तथा उसको, अचेतन क्रियाओं को चेतन नियन्त्रण में लाता है।
चिकित्सा क्षेत्र में योगनिद्रा का उपयोग शारीरिक एवं मानसिक रोगों को निवृत्ति के लिए किया जा रहा है और उसमें आशातीत सफलता भी मिल रही है। अमेरिका में अकेले डॉ. हार्समैन ही नहीं अन्य 16 बड़े-बड़े डाक्टर इस सम्मोहन पद्धति का प्रयोग बड़ी सफलतापूर्वक कर रहे हैं। डॉ हार्समैन का दावा है कि सम्मोहन पद्धति से महिलाओं को पीड़ा रहित प्रसव कराया जा सकता है तथा क्षय रोग के रोगियों तथा हृदय रोग के रोगियों को भी यह सम्मोहन पद्धति बड़ी कारगर रही है, क्योंकि इन रोगों में लम्बे समय तक बेहोशी की दवा पर मरीज को रखना खतरनाक है।
सम्मोहन क्रिया द्वारा अब तो कृत्रिम हृदय प्रत्यारोपण अथवा लम्बे समय तक के आपरेशनों तक में सफलता प्राप्त कर ली गई हैं सम्मोहन पद्धति से अति जटिल आपरेशन, मस्तिष्क का आपरेशन, भीतरी टूटी हड्डियों को निकालना, आँतरिक घाव अथवा अति वेदनाशील आपरेशनों पर भी सफलता प्राप्त कर ली गई है। जहाँ औषधियाँ कारगर नहीं होती, जैसे आदतें अथवा स्वभाव में परिवर्तन, वहाँ भी सम्मोहन क्रिया के बड़े अच्छे परिणाम पाये जाते हैं। जिन व्यक्तियों को दिन में 60 से 70 तक सिगरेट पीने की आदत थी, उन्हें सम्मोहन क्रिया द्वारा केवल १० सिगरेटों तक सीमित करने में एवं अन्ततः छुड़वाने में भी सफलता मिली है।
अनेकों नशे की गोलियाँ खाकर सोने वालों, शराबियों, नाखून कुतरने की बुरी आदत वालों, बिस्तर पर पेशाब करने वालों तथा अँगूठा चूसने वाले बालकों पर भी पूरी तरह सम्मोहन क्रिया सफल रही है।
मनःतत्व के विज्ञान एवं उपचार में योगनिद्रा का अति महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसके हलके-भारी अनेक प्रयोग-विनियोग हैं, इन्हें समझने-अपनाने का विज्ञान प्रयत्न सम्मत आधार पर किया जाए, तो निःसन्देह उसका इतना महत्त्वपूर्ण लाभ जनसमाज को मिल सकता है, जितना भौतिक अनुसंधान, आविष्कार से भी नहीं मिल सका। पदार्थ की तुलना में यदि चेतना का महत्त्व स्वीकार किया जाता है, तो यह भी मानना पड़ेगा कि योगनिद्रा जैसे अभ्यास पर सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करने में अतीव उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
१५ अगस्त, १९९७ को हमने अपनी राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के पचास वर्ष पूरे कर लिए। अर्द्ध शताब्दी पूर्व ठीक इसी दिन हम अँग्रेजी राज की दासता से मुक्त हुए थे। स्वतंत्रता दिवस राष्ट्रीय जीवन का एक नया मोड़ था। इस ऐतिहासिक मोड़ पर एक उम्मीद बँधी थी कि अब देश का स्वतंत्र विकास होगा, किसी के आँसू नहीं बहेंगे, कोई भूखा नहीं रहेगा, पिछड़ों व गरीबों का उत्थान होगा, दंगा-फसाद नहीं होगा और सभी खुशी से रहेंगे। इस अवसर पर महात्मा गाँधी ने कहा था, “अन्ततोगत्वा पूर्ण स्वराज्य का दरवाजा खुल गया है। सारे भारत ने इस दिन का इन्तजार किया है। इसकी बाट जोही है और इसके लिए तकलीफें उठाई हैं।” समूचे देश ने स्वतंत्रता मिलने पर उम्मीद की कि हम सभी राष्ट्रवासी आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक सभी क्षेत्रों में प्रगति करेंगे। देश जनसंख्या की दृष्टि से भी विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र होगा।
आज स्वाधीनता के पचास वर्ष पूरे करते समय हम सभी को आत्मसमीक्षा करनी है कि इस पुण्ययात्रा को शुरू करते समय हमने जो राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किए थे, उनको साकार करने में हम कहाँ तक सफल हो पाए हैं? आर्थिक, सामाजिक विषमताओं से मुक्ति, सुखी, समृद्ध, स्वावलम्बी, शक्तिशाली एवं स्वाभिमानी राष्ट्रीय जीवन के निर्माण का जो सपना सँजोया था, उस यात्रा में हम कहाँ पर खड़े हैं?
इसमें कोई सन्देह नहीं कि इन पचास सालों में हमने प्रगति की है। जहाँ अपने देश में एक सुई तक नहीं बनती थी, वहाँ आज हवाई जहाज एवं सुपर कम्प्यूटर तक बनने लगे हैं कृषि क्षेत्र में हरित क्राँति, खेलों में एशियाड आयोजन से लेकर पोखरण न्यूक्लियर विस्फोट व अन्तरिक्षीय क्षेत्र में हमारी उपलब्धियाँ इसकी एक झलक देती हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले इनसेट २-डी के सफल प्रक्षेपण के साथ हमने अन्तरिक्षीय प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता व अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष की दुनिया में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज की है। सुरक्षा क्षेत्र में हमने कई बार पाकिस्तानी आक्रमणों को मुँह तोड़ जवाब देकर विफल किया है। वैज्ञानिकों व तकनीशियनों की संख्या में हमारा विश्व में दूसरा नम्बर है।
इन प्रगति प्रतिमानों पर हमें गर्व है, लेकिन इनके पीछे निहित विसंगतियाँ, इस विकास की समग्रता एवं यथार्थता पर सवालिया निशान लगाते हैं। आजादी के ५० साल पूरे होने के बाद भी आज आम भारतवासी को पेटभर भोजन, तन ढकने के लिए कपड़ा, सिर पर छत और हाथों के लिए काम नसीब नहीं है। ग्रामीण विकास अभी भी अधूरा है। एक तिहाई आबादी अभी भी विकास के लिए तरस रही है। यह सच है कि शहरों का बड़ी तेजी से औद्योगीकरण हुआ है, लेकिन इस दौड़ में गाँव पिछड़ गए हैं। परिणामतः शहरों का तेजी से विकास हुआ है और गाँवों से उसी तेजी से पलायन। हर साल पचास लाख ग्रामीण जन रोजी-रोटी के लिए गाँव छोड़कर शहर जाते हैं। शहरी आबादी भी इसी वजह से ३.५ प्रतिशत हर साल की दर से बढ़ रही है।
आज ७० फीसदी लोग गाँव में रहते हैं व ३० फीसदी शहरों में, लेकिन ६० फीसदी आय सम्पत्ति शहरी क्षेत्र के लोगों के पास है। इनमें से भी ५० प्रतिशत राष्ट्रीय धन मात्र १० प्रतिशत लोगों के हाथ में है। ७० प्रतिशत ग्रामीणों के पास राष्ट्र की मात्र ४० प्रतिशत आय सम्पत्ति है। सारी सुविधाएँ शहरों में ही सिमट कर रह गयी हैं। भारत के हृदय कहे जाने वाले गाँव उपेक्षित पड़े हैं। राष्ट्रीय नव-जागरण के पुरोधा श्री अरविन्द ने चेतावनी भरे स्वरों में कहा था-जो कौम अपने जीवन में ग्रामीण मूल की पुष्टता को शहरी तड़क-भड़क रूपी फूल-पत्तियों के लिए बलिदान नहीं करती, वही स्वस्थ दशा में मानी जाएगी और उसी का स्थायित्व सुनिश्चित होगा।”
आज उद्योगपति गाँवों की जनसंख्या को अपने उत्पादों के उपभोक्ता तो बनाना चाहते हैं, पर देना कुछ नहीं चाहते। अपने को राष्ट्र का कर्णधार कहने वाले राजनेता गाँवों में अपना वोट तो पाना चाहते हैं परन्तु इनके विकास के लिए प्रस्तुत करोड़ों की राशि को स्वयं हजम कर जाते हैं। बुद्धिजीवी भी गाँवों की बातें तो करते हैं लेकिन वहाँ रहना नहीं चाहते। कवि एवं कहानीकार गाँवों पर यदा-कदा कविता या कहानी तो लिख लेते हैं, लेकिन उस ओर जाने में उन्हें असुविधा आड़े आती आती है जबकि आज जिन्हें हम महानगर कहते हैं वहाँ न शुद्ध जल है, न शुद्ध वायु, न शुद्ध दूध है और न शुद्ध सब्जी। यहाँ का सारा वातावरण ध्वनि एवं वायु प्रदूषण से भरा हुआ है।
यह ठीक है कि हमने अन्न क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति की है। लेकिन इसका लाभ छोटे किसान एवं मजदूर वर्ग तक नहीं पहुँच पाया है। अन्न उत्पादन वृद्धि के साथ ही जनसंख्या भी तेजी से बढ़ी है। जनसंख्या की दृष्टि से हर साल एक हरियाणा राज्य भारत में जुड़ रहा है और शायद यही वजह है कि स्वतंत्रता के पचास सालों बाद भी सरकारी आँकड़ों के अनुसार २० करोड़ बच्चे पुरुष-महिलाएँ बिना पेट भर भोजन किए सो जाते हैं। ४७.७ प्रतिशत घरों को पर्याप्त कैलोरी नहीं मिल पा रही है। १० प्रतिशत घरों को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन नहीं मिल पा रहा है। १९ प्रतिशत घरों को पर्याप्त कैलोरी व प्रोटीन दोनों ही नहीं मिल पा रहे हैं।
प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न में कमी आयी है। प्रतिव्यक्ति खाद्य ऊर्जा २२०० किलो कैलोरी के स्थान पर घटकर १८४९ किलो कैलोरी रह गयी है। स्कूल न जाने वाले बच्चों में इसकी असाधारण कमी महसूस की जा रही है। केरल में ३४ प्रतिशत व गुजरात में ७२ प्रतिशत बच्चे इस कमी के शिकार हैं। अभी हाल में ही महाराष्ट्र के दो ताल्लुकों में कुपोषण के चलते ५०० बच्चों की दर्दनाक हर संवेदनशील हृदय को पीड़ा से भर गयी। ४७ प्रतिशत वयस्कों का शरीर द्रव्यमान सूचक १८.५ से कम है, जो इस बात का सूचक है कि समाज बड़े पैमाने पर दीर्घकालिक ऊर्जा की कमी से ग्रसित है।
गर्भवती महिलाओं के होमोग्लोबिन के स्तर से पता चला है कि ८७.५ प्रतिशत महिलाएँ एनीमिया अर्थात् रक्त की कमी की शिकार हैं। जन्म के समय ३० प्रतिशत शिशुओं का भार सामान्य से कम होना आम बात है। इस तरह जन-साधारण को स्वास्थ्य-संरक्षण देने में हम पिछड़े हुए हैं। यह अलग बात है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में वृद्धि हुई है व आम आदमी की औसत आयु बढ़ी है।
शिक्षा के क्षेत्र में सबको प्राथमिक शिक्षा दिलाने के अपने लक्ष्य से अभी भी हम कोसों दूर हैं। शिक्षा का विस्तार निःसन्देह हुआ है। लेकिन यह क्षेत्र भी अपनी तरह की विसंगतियों से ग्रसित हैं। यहाँ अमीर आदमी के लिए अलग शिक्षा-व्यवस्था है तो गरीब आदमी की अलग। हरित क्रान्ति एवं श्वेत क्रान्ति की ही तरह शिक्षा क्रान्ति का लाभ सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से विपन्न व पिछड़े लोगों को नहीं मिल पाया है। आधी आबादी आज भी निरक्षर है। गाँवों के देश भारत में गाँवों की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा हुई है। ग्रामीण लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानकर दोयम दर्जे की शिक्षा प्रदान की जाती है। परिणामतः सर्वाधिक फेल होने वाले, बीच में ही स्कूल छोड़ने वाले और निरक्षर रहने वाले बालक-बालिकाएँ गाँव में ही रहते हैं। अभी तक १,८३,२०८ गाँवों में प्राथमिक स्कूल तक नहीं हैं ६ से १४ वर्ष के बीच के ६ करोड़ ३० लाख बच्चों ने स्कूलों का मुँह तक नहीं देखा है।
जिस भौतिक सुख-समृद्धि व आर्थिक स्वराज्य के वशीभूत होकर हमने रूस की पंचवर्षीय योजना का अनुसरण करके औद्योगीकरण की पश्चिमी शैली को अपनाया था, उसने स्वावलम्बी बनाने की बजाय विदेशी पूँजी व तकनीक का दास बना दिया है। यह अलग बात है कि देखने में स्थूल दृष्टि से हमारी आर्थिक मजबूती बढ़ी है। १९५० के दशक में हमारी बचत दर सकल घरेलू उत्पादन का केवल १० प्रतिशत हुआ करती थी। जो १९८० के दशक में बढ़कर ३५ प्रतिशत तक पहुँच गयी। इसका सीधा-सा अर्थ यह हुआ कि हम विकास कार्यों में पहले की तुलना में अधिक निवेश कर सकते हैं। १९०१ से १९५० तक आर्थिक विकास की औसत दर ३ प्रतिशत थी। आजादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं से १९७० के दशक के अन्त तक यह बढ़कर ५.५ प्रतिशत तक पहुँच गयी। इस दृष्टि से अर्थव्यवस्था में पिछले पाँच दशकों में विकास हुआ है। लेकिन इस विकास का लाभ जनसाधारण तक कितना पहुँच पाया है और आर्थिक स्वराज्य की दिशा में हम कहाँ खड़े है? यह सवाल विचारणीय है।
आज हम विकसित देशों की पूँजी की कठपुतली बन गए हैं। उदारीकरण की आड़ में हमारी नीतियाँ विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तय करता है। उदारीकरण की प्रक्रिया हमें एक नयी तरह की गुलामी की ओर ले जा रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का समूचे भारतीय बाज़ार पर कब्जा हो गया है। ये कम्पनियाँ भारतीय संसाधनों का इस्तेमाल करके भारतीय अर्थतन्त्र पर अपना शिकंजा कसती जा रही हैं और हम अपनी जेब डॉलरों से भरने में मगन हैं।
ताजा आँकड़ों के हिसाब से मैक्सिको और ब्राजील के बाद भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कर्ज में डूबा देश है। हम पर पिछले वर्ष के अन्त तक लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ रुपयों का विदेशी कर्ज था। सरकार एक वर्ष में कुल जितना खर्च करती है, उसका ५५ प्रतिशत इस कर्ज पर ब्याज चुकाने में ही लग जाता है। जनता पर कर लगाकर जो राजस्व प्राप्त होता है, उसका ६७ प्रतिशत इस कर्ज की अदायगी में चला जाता है जहाँ कर्ज बढ़ता जा रहा है, वहीं सरकार की आय की तुलना में व्यय भी बढ़ रहा है। इस तरह राजकोष का घाटा निरन्तर बढ़ता जा रहा है।
हम भूल गए हैं कि उधार, कर्ज व दान की राशि हमें अपनी प्रारम्भिक जरूरतों को पूरा करने व पूँजी की कमी को पूरा करने के लिए मिला था, जिससे कि हमारा आधार मजबूत हो। लेकिन इस कर्ज की राशि को अपनी पूँजी मानकर उसका बेतरतीब उपभोग करने में जुट गए। नतीजा यह रहा कि न ही पूँजी का निर्माण कर पाये और न उद्योगों को कुशलता से चला पाए, बल्कि ऋण के दलदल में आकण्ठ डूबते चले गए। यदि केवल उधार-ब्याज और घाटे की राशि जोड़ लें तो अभी सालों तक शायद अगली पीढ़ी तक हम कर्ज में ही डूबे रहेंगे और आर्थिक स्वराज्य की कल्पना तक मृगतृष्णा ही बनी रहेगी। यही नहीं हम सिर्फ एक दिवालिए राष्ट्र की तरह विदेशियों के दरवाजे खटखटाकर गुहार लगाते रहेंगे।
‘ऋण कृत्वा घृतं पिबेत’ के इस आदर्श को लेकर हमने जो विकास का चित्र खड़ा किया है, उसमें बहुमंजिली इमारतों, पंचसितारा होटलों, सड़कों पर दौड़ती कारों, कम्प्यूटरों, टेलीविजन सेटों की संख्या तो अवश्य बढ़ी है, पर साथ ही विषमता की खाई और चौड़ी हुई है। ऊँची अट्टालिकाओं के बगल में बसी झुग्गी-झोपड़ियाँ हमारे समाजवाद की हँसी उड़ा रही हैं। समाज परिवर्तन के नाम पर हमने आम आदमी की जिन्दगी को पश्चिमी तर्ज के आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण की वेदी पर चढ़ा दिया हैं कुछ गिने-चुने क्षेत्रों को छोड़कर गरीबों के साथ अभी तक न्याय नहीं हो सका है। पिछड़े क्षेत्रों के अधिकाँश लोग वैसे ही हैं, जैसे आजादी के समय थे। ७० फीसदी जनसंख्या आज भी निर्धनता के कुचक्र में फँसी है।
अन्य सफल एशियाई देशों की तुलना में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। हमने कभी स्वयं पर विश्वास ही नहीं किया, बस विदेशी पूँजी व तकनीक का ही मुँह ताकते रहे। नतीजतन हम कोई ऐसी तकनीक नहीं विकसित कर पाए जिसे भारतीय तकनीक कहा जा सके। आज रूसी तकनीक जानना हो तो रूसी भाषा सीखनी पड़ती है, जापानी तकनीकों के लिए जापानी भाषा आनी चाहिए, अमेरिकी तकनीक समझनी है तो उनकी भाषा जाननी पड़ती है, लेकिन भारत न तो अपनी राष्ट्रभाषा विकसित कर पाया है और न ही अपनी तकनीक।
कार्य के अभाव में बेकारों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस वर्ष निकली रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार देश की करीब एक तिहाई आबादी अर्थात् ३० करोड़ लोगों के पास काम नहीं हैं शिक्षित बेरोजगारों की संख्या ४ करोड़ के लगभग है, जो १९९८ तक बढ़कर ६ करोड़ हो जाएगी। दूसरी ओर १ करोड़ १३ लाख से भी अधिक बाल मजदूर अपने बचपन को श्रम की वेदी पर चढ़ा रहे हैं।
५० वर्ष पूर्व ब्रिटिश शासकों द्वारा आयोजित जिस संविधान रचना को हमने लोकतांत्रिक चेतना की अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम साधन मानकर अपनाया था और जिसके माध्यम से हमने जाति, भाषा, क्षेत्र तथा सम्प्रदाय आदि की शताब्दियों पुरानी दीवारों को ढहाकर समतापूर्ण अखिल भारतीय राष्ट्रभाव से ओत-प्रोत एकात्म सर्वधर्म समभाव वाले लोकतांत्रिक जीवन खड़ा करने का उद्घोष किया था, उस दिशा में आज जम कहाँ खड़े हैं?
यह सच है कि हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। तमाम झंझावातों को सहते हुए भी हम अभी तक अडिग हैं। इसे अपनी सन्तोषजनक उपलब्धि मान सकते हैं। जबकि हमारे साथ स्वतंत्र हुए अन्य एशियाई देशों जैसे-पाकिस्तान बंगलादेश, बर्मा, अफगानिस्तान आदि में लोकतंत्र अनेक अवसरों पर डाँवाडोल हुआ है तथा सैनिक तानाशाही या अधिनायकवाद का शिकार हुआ है। इन देशों में लोकतन्त्र की पुनः-पुनः स्थापना के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ा है। कहीं-कहीं तो अब भी संघर्ष कली स्थिति है। इस संदर्भ में अपने देश में लोकतन्त्र की स्थिति को एक उपलब्धि मान सकते हैं?
लेकिन आज इसमें भी दरारें शुरू हो गई हैं व कई तरह की विकृतियों से ग्रसित होता जा रहा है। हमने जाति विहीन समाज की कल्पना की थी, लेकिन आज उस बिन्दु पर पहुँच गए हैं, जहाँ पूरा सार्वजनिक जीवन जाति के इर्द-गिर्द घूम रहा है। बड़े-बड़े नेता निर्लज्जता के साथ जातिवाद का सहारा ले रहे हैं। जिस जातिवाद की समस्या पर राजा राममोहनराय से लेकर महात्मा गाँधी तक ने कठोर प्रहार किये थे, उसी को राजनैतिक स्वार्थों ने पुनः संजीवनी देकर ऐसा जिला दिया है कि यह आज भस्मासुर बनकर खड़ी हो गयी है। यही नहीं धर्म निरपेक्षता की आड़ में साम्प्रदायिकता की राजनीति खुलकर खेली जा रही है। दलीय राजनीति अखिल भारतीय राष्ट्रवाद के अधिष्ठान से हटकर क्षेत्रीय दलों में बिखरती जा रही है।
आजादी के बाद एक सबसे बड़ा खतरा उपस्थित हुआ है, संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादाहीनता का। अपनी मर्यादाओं को तोड़कर अपने अधिकार का विस्तार करने की होड़ पिछले कुछ समय से संवैधानिक संस्थाओं में देखने में आयी है। राष्ट्र की तीन प्रमुख संवैधानिक संस्थाएँ कार्य-पालिका विधायिका और न्यायपालिका ही नहीं निर्वाचन आयोग और प्रेस भी अपनी सीमाएँ लाँघकर स्वाधिकार विस्तार करती पायी गयी हैं। हमारे लोकतंत्र के अन्य स्तम्भ राजनैतिक दल व श्रमिक संगठन कभी के अपनी ऊर्जा खो चुके हैं।
लोकतंत्र में भारतीय जनता का बहुतांश उपेक्षित प्रायः स्थिति में रह रहा है। लगता है कि लोकतंत्र तथा प्रशासन मुख्यतः नेताओं और प्रशासकों की खातिर बनाया और चलाया जा रहा है। एक तरफ संसदीय लोकतन्त्र बोलता है तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत अपना ही रंग दिखाती है। संसदीय लोकतंत्र और जन-सामान्य के लोकतंत्र में वही दूरी है जो फाइव स्टार कल्चर और झुग्गी-झोंपड़ी की स्थिति में है। बुनियादी नैतिक मूल्यों का कोई अर्थ नहीं रह गया है, जिनकी दुहाई देते हुए लोकतंत्र को एक प्रणाली के रूप में अपनाया गया था। इस तरह लोकतांत्रिक नैतिकता संसदीय लोकतंत्र में एक अछूत का जीवन जी रही है।
संसदीय कार्य के निष्पादन में व्यतीत होने वाले समय में निरन्तर कमी आ रही हैं १० वीं लोकसभा में ६८ प्रतिशत समय व्यतीत हुआ था। इस लोकसभा में ३६०० मामले उठाए गए जिसमें अनेक सवाल ऐसे थे, जो जनहित से सम्बन्धित नहीं थे। आज की सच्चाई कड़वी लगने के बावजूद यही है कि लोकतंत्र. के मुखौटे के पीछे एक भ्रष्ट, निरंकुश और सामन्तवादी व्यवस्था काम कर रही हैं आम आदमी लूट-खसोट नौकरशाही के छल-कपट और राजनैतिक झाँसा-पट्टी में पिस रहा हैं हमारा शासन तन्त्र शक्तिशाली और समृद्ध लोगों के हाथ का खिलौना बना हुआ है।
आध्यात्मिक मूल्यों का तिरस्कार एवं उपेक्षा ही वजह है, जिसके कारण राजनीति आज भ्रष्टाचार, अपराध और धन लोलुपता का पर्याय बन चुकी हैं आम-जनता में राजनीति को लेकर संशय और जुगुप्सा का बोध पनप रहा है। राजनीति के स्वरूप में आया यह बदलाव सामाजिक-साँस्कृतिक मूल्यों के विघटन की भी कहानी प्रस्तुत करता है।
स्वतन्त्रता मिलने से पूर्व राजनैतिक क्षेत्र उन लोगों के लिए हुआ करता था, जिन्हें समाज से गहरा लगाव था। इसके बावजूद उन्हें यह मालूम रहता था कि यह काँटों भरी है और सिवाय कष्ट के कुछ मिलने वाला नहीं है। अनिश्चित दिनचर्या, संदिग्ध भविष्य और तमाम खतरों को अनदेखा करते हुए राष्ट्रीय भावना के लिए समर्पित आजादी के इन दीवानों की सन्तुष्टि केवल यह आसरा रहता था कि वे एक बृहत्तर प्रयोजन से जुड़े हुए हैं। उनकी प्रतिबद्धता और आग्रह देश की संवेदना से ओत-प्रोत थी। आजादी के हवन कुण्ड में अपनी आहुति देने के लिए प्रस्तुत सरफरोशी की तमन्ना वाले लोगों में सभी शामिल थे। उनमें जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा की विविधता होने पर भी एक ही लक्ष्य को पाने कली एक जैसी बेचैनी थी। तिलक, गोखले, गाँधी, सुभाष, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, पण्डित नेहरू, चन्द्रशेखर आजाद भगतसिंह जैसे राष्ट्रनायकों ने अपने कर्म में सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह जैसे अनेक मूल्यों को चरितार्थ किया था। उनके आचरण की शुचिता विस्मयकारी और संक्रामक थी। पारस पत्थर की तरह उनके संस्पर्श में आए अनेक व्यक्तियों के मन, विचार और कर्म में भी सहज बदलाव आया।
जबकि आज प्रायः सभी राजनैतिक हस्तियों का कैरियर ग्राफ कुछ ऐसी आड़ी-तिरछी कटी-फटी रेखाओं वाला है, जिसकी कोई सहज व्याख्या नहीं। धवल चरित्र वाले राजनैतिक व्यक्ति शायद ही कहीं ढूँढ़े मिल जाएँ। जो हैं भी वे भी वहाँ घुटन महसूस कर रहे हैं और रोज ही राजनीति छोड़ने के मनसूबे बनाया करते हैं। ताजा इतिहास गवाह है प्रायः सभी नेताओं ने भ्रष्टाचार का रास्ता अपनाया और सत्ता में रहने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए। शर्मोहया छोड़कर इन सभी ने सारे नियमों और कानूनों को तिलाञ्जलि दे रखी हैं पिछला दशक ऐसे ही व्यक्तियों द्वारा अपने लिए शासन का दुरुपयोग करने व स्वयं के लिए अकूत सम्पत्ति खड़ा करने की कोशिशों से भरा पड़ा है।
पहले राजनेता देश को आगे ले जाते थे व जनता उन्हें सिर-माथे बिठाती थीं अब वे भार होते जा रहे हैं। वे देश व सरकार दोनों के लिए भारी पड़ रहे हैं, उनकी रक्षा, देखभाल, सुख-सुविधा और ताम-झाम बेहद खर्चीला होता जा रहा हैं इनकी उपस्थिति से आम आदमी का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। चारों ओर अफरा-तफरी मच जाती है। शील-सदाचार से दूर कई किस्म के मुखौटे ओढ़े इन महानुभावों की गिद्धदृष्टि सब कुछ हजम कर लेने वाली है। इनकी जीवनशैली पुराने राजाओं, सामंतों की विलासिता की याद ताजा कर देती हैं।
इन दशकों में राष्ट्रीय लोकतन्त्र के अस्तित्व के लिए सबसे खतरनाक पहलू उभरा है-राजनीति में बढ़ता माफिया तंत्र का वर्चस्व। सदनों की गिरती गरिमा का सबसे प्रमुख कारण यही राजनैतिक अपराधीकरण ही है। सम्प्रति भारतीय लोकसदन अपराधियों के चरागाह बन रहे हैं। प्रत्येक सदन में अपराधियों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। उत्तरप्रदेश व बिहार इन मामलों में सबसे आगे हैं। उत्तर प्रदेश में ४० जिलों की रिपोर्ट से पता चलता है कि वहाँ ९० उम्मीदवार ऐसे खड़े हुए जिन पर हत्या के मामले चल रहे थे। २८ उम्मीदवार ऐसे थे, जिनकी हिस्ट्री शीट थानों में खुली है। १९९३ में उत्तरप्रदेश की जनता ने ४२५ विधायकों में १८० ऐसे लोगों को चुना था, जिनका आपराधिक इतिहास था। गतवर्ष के लोक-सभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में कुल मिलाकर ४३५ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार खड़े हुए जिनमें २७ लोग चुनकर संसद में पहुँच गए। स्थानीय निकाय एवं पंचायतों में तो अपराध तंत्र पहले से ही अपना वर्चस्व बनाए हुए हुए है।
स्वतंत्रता के पचास साल पूरे होने के बाद भी स्थिति की विषमता बढ़ी-चढ़ी है। आज हम अँग्रेजों के नहीं अपने ही भ्रष्टाचार के गुलाम हैं। भ्रष्टाचार ने न केवल राजनैतिक बल्कि प्रशासनिक जीवन को राहु की तरह ग्रस लिया हैं स्थिति कुछ ऐसी हो गयी है कि अब तो इसे सामान्य आचरण के रूप में लिया जाने लगा है। विभिन्न सरकारों के मंत्री, नौकरशाही से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी से आरम्भ होकर कनिष्ठतम सरकारी कर्मचारी तक सभी कहीं न कहीं भ्रष्ट आचरण की लपेट में है।
इसी के चलते भारत आज विश्व के दस भ्रष्टतम देशों में से एक हैं दिन-प्रतिदिन घोटालों व काण्डों का अन्तहीन सिलसिला शुरू हो गया जो समाप्त होने का नाम ही नहीं लेता है। चारा घोटाला, यूरिया घोटाला, आयुर्वेद घोटाला, कोलतार घोटाला, जमीन पेट्रोल पम्प आवंटन घोटाला, आयात-निर्यात घोटाला, दूर-संचार घोटाला, हवाला काण्ड, सांसद खरीद काण्ड, प्रतिभूति घोटाला आदि इसी अन्तहीन शृंखला की कुछ कड़ियाँ हैं।
राष्ट्रीय स्वाधीनता की अर्द्धशताब्दी पूरी होते-होते जन-मानस को दिशा देने वाला हमारा साहित्य आज दिशाहीनता व मूल्यहीनता की स्थिति में है। सस्ता साहित्य मंडल के संस्थापक व गाँधीवादी प्रख्यात साहित्यकार यशपाल जैन का कहना है कि आजादी के पहले एक ध्येय था, उद्देश्य था जो साहित्य को दिशा देता था, पर आजादी के बाद कोई ध्येय नहीं रहा। पुराने लेखक चुक गए, अधिकाँश तो चल बसे। नई पीढ़ी संघर्ष से घबराती है। इन पचास वर्षों में महिलाओं ने जहाँ पुरुष प्रधान, सुरक्षा, पर्वतारोहण आदि क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, वहीं उन्हें हिंसात्मक अत्याचार एवं शोषण भी कम सहना नहीं पड़ा है।
यही क्यों, विश्व के मानचित्र में केवल भारत ही ऐसा अकेला देश है, जिसने अपने पर सदियों तक हुकूमत करने वाले विदेशियों की भाषा को स्वतंत्रता के पचास सालों बाद भी छाती से चिपकाए रखा है। पिछले सालों में अँग्रेजी भाषा का वर्चस्व पहले से बहुत बढ़ा है। धनी लोग अपने बच्चों को अँग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजते हैं। विश्वविद्यालयों की साँस्कृतिक भाषा अँग्रेजी हैं। भारतीय भाषाओं में विशेषकर हिन्दी साहित्य पर पश्चिम की पतनशील संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। गत ५-६ सालों में जिस कदर देश में वैश्वीकरण का दौर चल रहा है, उसकी गहराई से पड़ताल करें तो यही पाएँगे कि जिस भारतीय सम्पदा को मुगल सल्तनत या अँग्रेज भी भारतीयों से नहीं छीन पाए वह स्वतः ही भारतीयों के हाथों से विदेशियों के पास चली गयी आज न तो हमारा नीम है और न हमारी हल्दी। कहते हैं इन दोनों का पेटेण्टीकरण हो गया है।
इस तरह पचास वर्षों की यात्रा में हम जहाँ खड़े हैं, वहाँ विकास व प्रगति के मुखौटे के पीछे सर्वतोमुखी पतन एवं निराशा के मुखौटे छाए हुए हैं। इसका प्रमुख कारण यह रहा कि भौतिक विकास के साथ साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विकास उपेक्षित रहा। हम पश्चिमी चकाचौंध में आकर उसका अन्धानुकरण करते रहे व अपनी आत्मा को भूल बैठे। पचास साल पहले हमने राजनैतिक स्वतंत्रता की जंग अवश्य जीत ली थी, लेकिन साँस्कृतिक रूप से अभी हम परतन्त्र ही हैं, जो हमारी वर्तमान दुर्दशा का प्रमुख कारण है।
अब समय साँस्कृतिक स्वतंत्रता के इस मोर्चे पर लड़ने का है। युग-निर्माण मिशन की लाल मशाल इसी विजय अभियान की प्रतीक बनी हुई हैं। स्वयं को इससे भावनात्मक एवं वैचारिक रूप से जोड़े बगैर हमारे आर्थिक स्वराज्य, भौतिक विकास, सुसंस्कृत एवं नैतिक समाज के सपने मात्र ही बने रहेंगे, क्योंकि किसी भी राष्ट्र या समाज को महान् बनाने वाली इकाई व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण का रसायन इस भोगवादी संस्कृति के पास नहीं है, जिसका हम अन्धानुकरण कर रहे हैं। राष्ट्रपिता गाँधीजी के शब्दों में, “यह देश इसलिए महान् नहीं है कि यहाँ संसार का सबसे ऊँचा पहाड़ या सबसे पवित्र नदी गंगा हैं बल्कि यह देश इसलिए महान् बना क्योंकि यहाँ हिमालय से भी ऊँचे और गंगा से भी परम पावन मनुष्य पैदा हुए।” राष्ट्र को आज उन्हीं मनुष्यों की खोज है। ऐसे कुछ इनसान हो जाएँ तो देश हर संकट का मुकाबला कर सकता है और हर सपने साकार कर सकता है।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता की स्वर्णजयंती पूर्ण होने के पुण्य अवसर पर देश के प्रत्येक प्रबुद्ध एवं भावनाशील नागरिक का इन पंक्तियों के माध्यम से आह्वान किया जाता है कि वे वर्तमान भोगवादी, पतनकारी प्रवाह से छूटकर साँस्कृतिक गौरव गरिमा के पक्षधर उच्च आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों से भरे युगऋषि के संदेश को सुनने व गुनने को, मनन व अवधारण करने को प्रस्तुत हों, ताकि उसकी ऊर्जा से अनुप्राणित होकर हम राष्ट्र के, स्वधर्म के प्रति जागरूक हो सकें और अपसंस्कृति के मोहक, कुटिल रूप, छद्म व्यूह जाल को तहस-नहस कर अपनी आध्यात्मिक, साँस्कृतिक एवं भौतिक प्रगति के पथ पर आगे कदम बढ़ा सकें और अंधेरे में भटकते समूचे विश्व को प्रकाश पथ दिखला सकें व पुनः अपने उसी राष्ट्रीय गौरव पर प्रतिष्ठित हो जाए, जिसकी कल्पना हम सबने आज से पचास वर्ष स्वतन्त्रता मिलने पर की थी।
राजा मानसिंह के माथे पर पसीने की बूँदें छलछला आयीं। उनके चेहरे पर चिन्ता के भाव सघन हो उठे। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि ऐसे मौके पर वे क्या करें? अभी कुछ ही दिन पहले उन्होंने अपनी सेना युवराज के साथ दक्षिण में सम्राट् अकबर की सहायता के लिए भेज दी थी। इस बात की खबर जब गुजरात के सुल्तान फिरोजशाह को मिली तो उसने एक बड़ी सेना लेकर नागौर पर चढ़ाई कर दी और उस पर अधिकार कर लिया। महाराज मानसिंह अपने परिवार, धन-दौलत और नागौर में बचे-खुचे लोगों सहित राजपूताने की एक पहाड़ी पर बने किले में आ गए थे। किले में खाने-पीने के सामान की तो कोई कमी न थी, पर फिर भी किले की रक्षा करना निहायत जरूरी था। किले में उनके साथ जो योद्धा थे, वे सब वृद्ध थे। जो युवा थे उनकी संख्या बहुत ही कम थी। गुजरात के सुल्तान की सेना किले को चारों ओर से घेर कर बैठी थी। इस स्थिति ने राजा मानसिंह को बहुत ही चिन्ता और परेशानी में डाल रखा था।
जब उन्हें और बुजुर्ग योद्धाओं को कोई उपाय न समझ में आया तो उन्होंने योजना बनायी कि किले के भीतर जितने योद्धा हैं, वे सब अपनी आत्मरक्षा के लिए मर मिटे, हो सकता है इस तरह गुजराती सेना से भिड़ जाने पर बाहर से कुछ मदद मिल जाए। यदि बाहर से सहायता न मिले और हम युद्ध में न बच पाएँ तो हमारी स्त्रियाँ जौहरव्रत का पालन करेंगी। इस तरह का सलाह-मशविरा करके सभी सरदार अपने खेमों में और महाराज अपने अन्तःपुर में चले गए।
जिस समय महाराज अन्तःपुर पहुँचे उस समय उनके चेहरे पर उदासीनता और चिन्ता की लकीरें काफी गहरी हो रही थीं। उनको चिन्तामग्न देखकर सम्पूर्ण राज-परिवार चिन्ता में डूब गया। पिता को आया देख उनकी पुत्री ने पूछा-पिताजी क्या निर्णय लिया?”
राजा मानसिंह ने उत्तर दिया-यदि बाहर से सहायता नहीं मिलती है तो तुम सबको जौहर करके संसार से विदा लेने को तैयार रहना होगा।” मानसिंह की बात सुनकर उनकी वृद्धा माँ बोली-बेटा ! तुम हमारी चिन्ता न करो। हम सच्ची क्षत्राणियाँ हैं और सच्ची क्षत्राणी कभी मरने से नहीं डरती।”
राजा मानसिंह की पुत्री पन्ना उस समय सोलह साल की थी और मानसिंह उसे प्राणों से भी ज्यादा प्यार करते थे। पिता की चिन्ता से परेशान होकर वह एक खिड़की से सामने दिखने वाली पहाड़ी पर नजर गड़ाए थी। उस पहाड़ी पर भी एक किला बना हुआ था और उस किले का मालिक था एक नवयुवक राजपूत उसका नाम उम्मेदसिंह था और पहाड़ी पर बना किला अरिकन्द के नाम से प्रसिद्ध था। उम्मेदसिंह दो वर्ष पूर्व ही इधर आया था और उसी समय से अरिकन्द और नागौर में सरहद के मामले पर विवाद होने से दोनों में शत्रुता चली आ रही थी।
आज अरिकन्द के किले को देखकर पन्ना के मन में श्रावणी पर्व का उल्लास उमंग उठा। उसके भावुक हृदय में राखी के धागों में समायी पवित्रता, भाई-बहिन के रिश्तों की भावनात्मक दृढ़ता छलकने लगी। उसके मन में ये विचार आया क्यों न उम्मेदसिंह को राखी भेजकर उससे नागौर के लिए सहायता माँगी जाय। वह सोच रही थी कि कोई भी सच्चा वीर नारी की आत्मीयता को विधर्मियों-बर्बर नृशंस अत्याचारियों के हाथों लुटते नहीं देख सकता आपसी मतभेद अपनी जगह है, किन्तु बहिन का आमंत्रण, भाई से अपनी रक्षा के लिए आह्वान सभी मतभेदों से कहीं बढ़कर है।
उम्मेदसिंह वीर है, वह सुल्तान के इस हमले से भी हमारी मदद न करे यह सम्भव नहीं। यदि मैं राखी भेजूँ तो मुझे पूरा विश्वास है कि वह मेरे इस धर्म-बन्धन को ठुकराएगा नहीं। वह मेरी ओर से राखी प्राप्त करके हमारी रक्षा हेतु अपनी सेना लेकर अवश्य आएगा।
यही सोचते हुए उसने अपने पिता मानसिंह से कहा-पिताजी क्या अरिकन्द के राजकुमार ने हमारी प्रजा या आपके साथ कोई ऐसा व्यवहार किया है, जिससे उसे क्षमा न किया जा सके?”
मानसिंह ने उत्तर दिया-बेटी ! उसने ऐसा तो कोई भी व्यवहार नहीं किया बस, सरहद की कुछ बंजर भूमि उसके कब्जे में है। दक्षिण से अपनी सेना के आने पर हम युद्ध करके अवश्य प्राप्त कर लेंगे। क्योंकि वह जमीन हमारे पुरखों की है, पर बेटी, इस समय इन सब बातों से क्या मतलब है ? इस समय तो हम गुजरात के सुल्तान की सेना से घिरे हुए हैं।”
राजकुमारी पन्ना ने बहुत ही गम्भीरता से उत्तर दिया-पिताजी मैंने सुल्तान की सेना से रक्षा की एक तरकीब सोची है। यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अरिकन्द के राजकुमार के पास राखी भेजूँ। मुझे पूरी उम्मीद है कि वह मेरी राखी प्राप्त करके हमारी मदद को अवश्य आएगा”
बेटी की बात सुनकर मानसिंह बोले-जिस व्यक्ति से हमारी शत्रुता है, उसी से हम सहायता माँगें, ये बिलकुल सम्भव नहीं हैं इसलिए तू इस बात को भूल जा।”
पिता को क्रोध में देखकर भी पन्ना बड़ी नम्रता से बोली-पिताजी संकट के समय राखी भेजकर सहायता लेने की परम्परा राजपूतों में चली आयी है। यहाँ तक कि राजपूतों द्वारा मुसलमानों तक को राखी भेजकर सहायता माँगी गयी है। महारानी कर्मवती ने मुगल शहंशाह हुमायू को राखी भेजी थी। तब अरिकन्द का राजकुमार तो हमारा स्वजातीय है। फिर राखी की मर्यादा तो स्वजातीय-विजातीय से बहुत ऊपर है। यह तो बहिन की पवित्र भावनाओं द्वारा दिया गया भाई के शौर्य एवं साहस को आमंत्रण है। शौर्य एवं साहस के खरेपन की कसौटी यही है कि वह नारी की गरिमा की रक्षा करे। नारी और पुरुष के बीच इससे अधिक पवित्र, एवं भावमय सम्बन्ध और कोई नहीं हो सकता।”
मानसिंह अपनी बेटी की बातों को ध्यान से सुन रहे थे। वह कहें जा रही थी-अरिकन्द के राजकुमार को राखी भेजने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए हमारा राष्ट्रीय धर्म भी यही सिखाता है कि बाहरी हमले के समय हम सब आपसी मतभेद भुलाकर एक-दूसरे की मदद करें। फिर भी आप मान लीजिए, यदि वह आज गोंडवान किला जीत लेंगे तो कल क्या अरिकन्द का किला जीतने का प्रयास नहीं करेंगे? इस बात को ध्यान में रखकर भी तो वह हमारी रक्षा न सही, अपने किले की सुरक्षा हेतु हमारी सहायता करने के लिए आ सकता है।
राजकुमारी पन्ना की तर्कपूर्ण बात सुनकर मानसिंह अरिकन्द के राजकुमार के पास राखी भेजने को तैयार हो गए। मानसिंह की इस स्वीकृति से राजकुमारी के हृदय में भावनाओं का समुद्र उमड़ उठा सच तो यह था कि उसने अपने सारे तर्क पिता को सन्तुष्ट करने एवं समझाने के लिए प्रयोग किए थे। उसका अंतर्मन तो उम्मेदसिंह को न जाने कब से भाई मान चुका था आज उसकी भावनाएँ पिता की इस स्वीकृति से आँखों में आँसू बनकर छलक आयीं, जिसे उसने बड़े हौले से चुनरी के किनारे से पोंछ डाला।
इसी के साथ उसने किले की अन्य लड़कियों के साथ सोने की तारों की सुन्दर मोहक राखियाँ तैयार करवायी। उन पर हीरे-मोती जड़वाए गए। फिर राजकुमारी पन्ना ने स्वयं अपने हाथों से अरिकन्द के राजकुमार को सम्बोधित करते हुए कुछ भाव-भरी पंक्तियाँ लिखी और इस सबको एक पेटी में सहेज कर रख दिया। इस राखी को उम्मेदसिंह के पास पहुँचाने के लिए किले के सबसे वफादार युवक बेनीसिंह को चुना गया।
बेनीसिंह ने इस राखी वाली छोटी सी पिटारी को साफे में छिपाया और आधी रात के समय बहुत ही सावधानी से रस्सी के सहारे से किले की दीवार पर से नीचे उतर गया। किले के चारों तरफ मुसलमान सेना थी। सन्तरी जगह-जगह पहरा दे रहे थे। उनसे बचता-बचता बेनीसिंह जब कुछ दूर निकल गया तो निश्चिन्त होकर चलने लगा, परन्तु तभी पीछे से किसी ने उसकी गरदन पकड़कर कहा-गुजरात के बादशाह के पास चलो। बेनीसिंह को कमजोर और असहाय समझकर उसने बेनीसिंह का एक हाथ छोड़ दिया। बेनीसिंह तो अवसर की तलाश में था ही, तुरन्त अपनी कमर से कटार निकालकर सैनिक के पेट में घुसेड़ दी।
अचानक किए गए इस वार से सैनिक घबराकर चिल्ला पड़ा और धरती पर गिर पड़ा। सैनिक जैसे ही धरती पर गिरा वैसे ही बेनीसिंह भागने लगा, पर तभी पीछे से उसे दो सैनिक आते हुए दिखाई दिए। सैनिकों को अपने पीछे आते देख बेनीसिंह जल्दी से पास की झाड़ियों में छुप गया, लेकिन इस भागम−भाग में उसका साफा कहीं गिर गया। इस समय उसे अपनी जान से ज्यादा साफे में बँधी राखी वाली पेटी की चिन्ता थी। वो साँस रोके झाड़ियों में छुपा बैठा था। जब उसने देखा कि सैनिक कुछ दूर जा चुके तो वह झाड़ी से बाहर निकला और साफे को खोजने लगा। साफा पास ही पड़ा मिल गया। उसमें राखी वाली पेटिका भी सुरक्षित थी। बेनीसिंह प्रसन्न होकर फिर आगे चल पड़ा, तभी एक घुड़सवार के साथ कुछ व्यक्ति आते हुए दिखाई दिए। आगे रास्ता खराब और ऊबड़-खाबड़ था, अतः वह व्यक्ति घोड़े से उतरा और घोड़े की लगाम साईस को पकड़ाकर पैदल ही अपने साथियों सहित जंगल में घुस गया।
साईस आरामतलब प्रवृत्ति का था। रात में उठकर बेवक्त आने से और भी खफा था। जैसे ही उसकी दृष्टि बेनीसिंह पर पड़ी तो वह और जोर से चिल्लाया-उधर कहाँ जा रहा है? इधर आकर घोड़े की लगाम पकड़। बेनीसिंह फिर चुपचाप उसके पास आया और बोला-मैं घोड़े की लगाम पकड़े रखूँगा-आप आराम करें। साईस के मन की मुराद पूरी हो गयी। लगाम बेनीसिंह को थमा वह पेड़ के नीचे लेट गया।
बेनीसिंह धीरे-धीरे घोड़े को सहलाने लगा। कुछ ही देर में साईस भी सो गया। उसके खर्राटों की आवाज आने लगी। साईस के खर्राटे शुरू करते ही बेनीसिंह कूदकर घोड़े पर चढ़ा और ऐड़ लगाकर अरिकन्द की ओर चल पड़ा। घोड़ा और सवार दोनों ही मजे हुए थे। घण्टों का सफर मिनटों में तय कर के बेनीसिंह सूर्योदय के समय अरिकन्द किले के फाटक पर पहुँच गया।
फाटक पर पहुँचकर बेनीसिंह घोड़े से नीचे उतरा और पहरेदार से कह-मुझे इसी समय राजकुमार उम्मेदसिंह से मिलना हैं एक बहुत ही जरूरी काम है पहरेदार ने उसे एक बार सिर से पैर तक पारखी नजरों से देखा फिर सन्तुष्ट होते हुए उसे उसी समय लेकर महल के अन्दर की ओर चल पड़ा।
जिस समय बेनीसिंह उम्मेदसिंह के पास पहुँचा, उस समय उम्मेदसिंह अपने एक मित्र विजयसिंह के साथ शिकार पर जाने की तैयारी कर रहा था। बेनीसिंह ने झुककर जुहार करते हुए साफे में से राखी की पेटिका निकालकर उम्मेदसिंह के हाथों में रख दी, उम्मेदसिंह एक बार तो नागौर से आए इस आदमी को देखकर चौंका। फिर उसने पेटिका को आहिस्ते से खोला-पेटिका खोलते ही उसे सबसे पहले भोजपत्र का एक टुकड़ा दिखा, जिस पर कुमकुम और केसर से कुछ लिखा था। वह चकित होते हुए उस इबारत को पढ़ने लगा।
प्यारे भैया !
तुम्हारी धर्म-बहिन पन्ना आज तुम्हें राखी भेज रही है। बहिन की राखी भाई के लिए उत्सव भी है और आमन्त्रण भी। बहिन के द्वारा भेजा गया राखी का धागा भाई के लिए शौर्य और साहस की परीक्षा की कसौटी होने के साथ ही आदर्शों के लिए, सनातन धर्म की मर्यादाओं के लिए समर्पित होने हेतु व्रत बंध भी है।
यह पवित्र धागा भेजकर तुम्हारी बहिन तुम्हारी वीरता और पराक्रम का आह्वान कर रही हैं तुम्हें बर्बर और नृशंस आततायियों के विरुद्ध जूझने के लिए रण-निमन्त्रण भेज रही है। नारी का अस्तित्व एवं अस्मिता आज खतरे में है। धर्म की सनातन मर्यादाएँ आज रौंदी जा रही हैं। अपनी संस्कृति को विदेशी और विधर्मी कुचलने के लिए तत्पर हैं। तुम्हें अपनी संस्कृति, अपने धर्म एवं अपनी बहिन की मर्यादा की रक्षा के लिए आगे बढ़ना है। मुझे अपने भैया पर पूरा यकीन है। विश्वास है तुम्हारे कदम आगे बढ़े बिना न रहेंगे।
तुम्हारी बहिन
पन्ना
पन्ना के लिखे शब्दों को पढ़कर उम्मेदसिंह के चेहरे पर वीरता का ओज चमकने लगा। उसने पत्र को पढ़कर भोजपत्र के उस टुकड़े को आदर भाव से माथे से लगाया। बड़ी ही श्रद्धा से उसने हीरे-मोतियों जड़ी सोने के धागे वाली राखी अपनी दाहिनी कलाई में बाँधी। फिर अपने परमविश्वसनीय मित्र विजयसिंह को सम्बोधित करते हुए कहा मित्र, मेरी धर्म-बहिन ने मेरे शौर्य को ललकारा है। उसने मुझे राखी भेजी है और राखी का मोल माँगा है।
अब मुझे शेर और चीते के शिकार पर जाने की जरूरत नहीं हैं। मुझे तो उससे भी बढ़िया शिकार मिल गया है। गुजरात के सुल्तान फिरोजशाह ने राजा मानसिंह को गोंडवान के किले में घेर रखा है और उनकी पुत्री हमारी धर्म-बहिन पन्ना ने राखी भेजकर मुझे सहायता के लिया बुलाया है। अतः मुझे तत्काल उसकी सहायता के लिए रवाना होना है।
उम्मेदसिंह की बात सुनकर विजयसिंह कहने लगा-बहिन पुकारे और भाई चुप रहे, यह कैसे संभव है। मैं भी आपके साथ चलकर शत्रुओं का शिकार करूँगा । विजयसिंह की बात सुनकर उम्मेदसिंह ने उसे गले लगाया। शीघ्र ही जाने की तैयारियाँ की जाने लगी। बेनीसिंह का खूब स्वागत-सत्कार किया गया।
उधर फिरोजशाह गुजरात से तोपों के आने का इन्तजार कर रहा था। इन्तजार की घड़ियाँ लम्बी होती देख उसने भेदिए की मदद से किले पर घुसने का प्रयास करना चाहा। आधी रात के समय जब भेदिया किले की दीवार रस्से की सहायता से चढ़ रहा था तो अचानक ही उसका सिर कटकर नीचे गिरा। इस तरह एक चौकस सन्तरी के कारण फिरोजशाह का ये प्रयास विफल रहा।
अब फिरोजशाह ने सोचा सुरंग या खाई के रास्ते ही से किले में पहुँचा जाय, पर उसे इसमें भी सफलता न मिली। दूसरे दिन किले की दीवार से बहुत ही कठिनाई से ऊपर चढ़कर बेनीसिंह किले के भीतर पहुँचा। मानसिंह के पास पहुँचकर उसने उम्मेदसिंह का दिया हुआ कीमती हार राजकुमारी पन्ना को दिया और तत्पश्चात् उम्मेदसिंह एवं विजयसिंह के सेना सहित सहायता के लिए पहुँचने का सन्देश सुनाया। इस शुभ सन्देश को सुनकर सबके चेहरे की मलीनता दूर होती दिखाई दी। राजकुमारी पन्ना की आँखें खुशी से गीली हो आयी।
उम्मेदसिंह और विजयसिंह जब अपनी फौज लेकर गोंडवान की तरफ रवाना हुए तो उन्होंने सोचा कि हमारी फौज तो कुल पाँच हजार है, जबकि फिरोजशाह की इससे तिगुनी। सामने से लड़ाई जीतने सम्भव न होगा तो क्यों न कोई ऐसा उपाय किया जाय जिससे गुजराती सेना के पास रसद ही न पहुँचे। ये विचार-विमर्श करके वे दोनों अहमदाबाद की तरफ से आने वाले रास्ते में जंगलों में छिप गए। कुछ ही समय बाद उन्हें सूचना मिली कि शत्रु की सेना तोपखाना लेकर पहुँचने वाली है। बस वे तुरन्त तोपखाना नष्ट करने के लिए तैयार होकर बैठ गए।
कुछ देर बाद तोपखाना लेकर आती बैलगाड़ियाँ दिखाई देने लगीं। बैलगाड़ियों के आगे घुड़सवार थे। जब घुड़सवार निकल गए तो उम्मेदसिंह के सैनिकों ने तोप और गोलियों से तोपखाने को नष्ट कर दिया, जिससे बहुत से वीर हताहत हुए। बचे हुए लोगों ने राजपूतों की शरण ली। बची-खुची तोपों को अपने कब्जे में कर लिया गया।
तोपखाने के नष्ट होने के समाचार से फिरोजशाह बहुत निराश हुआ। अब उसे किला जीतने की कोई आशा न रही। उसकी सेना के जवान सोचने लगे कि अब तो राजपूताने से बाहर निकलना सम्भव न होगा। इस समाचार से राजपूतों में हर्श की भारी लहर दौड़ गयी। अब आस-पास के लोग भी मदद को आने लगे।
फिरोजशाह की फौज की परेशानियाँ बढ़ती ही गयीं। रसद मिलना बन्द हो गया। तोपखाना नष्ट हो गया, अब क्या करें ? आखिर में उसने किले पर धावा बोलने का निर्णय लिया। सैनिकों ने किले के फाटक के पास सुरंग लगाकर किले की दीवार तोड़ दी और जोर-जोर से चिल्लाने लगे, पर तभी भीतर से उनके ऊपर पत्थर और तीरों से हमला कर दिया और पीछे से उम्मेदसिंह ने हमला कर दिया। फिरोजशाह किले से कुछ पीछे हटकर जैसे ही उम्मेदसिंह पर हमला करने की सोच रहा था कि विजयसिंह भी अपने सवारों सहित आ पहुँचा। इस तरह से फिरोजशाह की पूरी सेना चारों तरफ से घिर गयी। सन्ध्या के समय तक घमासान युद्ध होता रहा, फिर दोनों सेनाएँ अपने-अपने खेमों में वापिस लौट गयीं।
रात भर फिरोजशाह उम्मेदसिंह से निपटने की योजना बनाता रहा। सुबह के समय उसने अपनी सेना को तीन हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्से को किले के पास रख दिया और दूसरे को किले से कुछ दूर और तीसरे हिस्से को लेकर स्वयं फिरोजशाह उम्मेदसिंह से निबटने को चल पड़ा।
उम्मेदसिंह भी सतर्क था। उसने दूर से ही फिरोजशाह की सेना को आते हुए देख लिया। उसने शत्रु सेना पर सामने से हमला करने की बजाय पीछे से हमला करने का विचार किया और अपनी सेना को लेकर ऐसे स्थान पर चला गया, जहाँ से शत्रु सेना पर आसानी से हमला किया जा सके। उम्मेदसिंह ने यही किया, फिरोजशाह की सेना पर पीछे से हमला किया। सेना ने जैसे ही बचकर भागने का प्रयास किया विजयसिंह की फौज उन पर टूट पड़ी। इस अचानक हुए हमले से शत्रु सेना छिन्न-भिन्न हो गयी।
इसके बाद उम्मेदसिंह अपनी फौज को लेकर तुरन्त किले की तरफ चल पड़ा। मानसिंह किले के ऊँचे बुर्ज पर से सेना को आते हुए देख चिन्तित हो गए, पर राजपूती ध्वज को पहचानकर उन्हें तसल्ली हुई। किले के पास पहुँचकर उम्मेदसिंह के सैनिक शत्रु टूट पड़। तभी पहाड़ी पर से उतर कर कुछ सवार भी शत्रु सेना पर टूट पड़े। इस तरह अचानक और तीव्र हमले से शत्रु सेना के पास भागने के सिवाय कोई चारा ही न था।
फिरोजशाह की सेना के पाँव उखड़ गए। उसने सोचा कि कहीं इस बीच दक्षिण से भी सेना लौट आयी तो हममें से एक भी जीवित न बचेगा। ऐसा विचार कर उनसे राजपूतों के पास सन्धि का प्रस्ताव भेजा, जिसे मानसिंह ने स्वीकार कर लिया। फिरोजशाह अपना लाव-लश्कर उठाकर गुजरात की ओर रवाना हो गया। गुजरात रवाना होने से पूर्व उसने नागौर पर से अपना कब्जा छोड़ दिया।
शत्रु सेना को पराजित कर जब उम्मेदसिंह किले के भीतर पहुँचा तो उसका भव्य स्वागत किया गया। महाराज मानसिंह ने उसे गले लगाते हुए कहा- “बेटे ! तुमने मेरी धन-दौलत-प्रतिष्ठा की रक्षा की है। मैं तुम्हारा ऋणी हूँ” इस पर उम्मेदसिंह ने विनम्रता से कहा- “महाराज! मैंने तो सिर्फ अपनी धर्म-बहिन की पुकार सुनी हैं उसके आमंत्रण को स्वीकार किया है और राखी का मोल चुकाया है।”
राजकुमारी पन्ना पास में ही आरती का थाल सजाए खड़ी थी। उम्मेदसिंह की बातें सुनकर उसकी आँखें भर आयी उसने दोनों हाथों से भाव-भरे मन से उम्मेदसिंह की आरती उतारी, माथे पर कुमकुम तिलक किया और कहने लगी-भैया हिन्दुस्तान की हर बहिन को तुम्हारे जैसा भाई मिले।” पन्ना के इन शब्दों में अनगिनत नारी मन एक साथ करुण स्वर में बिलख उठे। मानों अनगिनत बहिनें अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा के लिए पुकार उठीं कि कहाँ हैं वे भाई, जो राखी का मोल चुका सकें ? राखी की मर्यादा को निभा सकें?
शब्दौतवाद के अनुसार शब्द ही ब्रह्म है। उसकी ही सत्ता है। सम्पूर्ण जगत शब्दमय है। शब्द की प्रेरणा से समस्त संसार गतिशील है। महती स्फोट की प्रक्रिया से जगत की उत्पत्ति हुई तथा उसका विनाश भी शब्दों के साथ हो गया। इन्द्रियों में सबसे अधिक चंचल तथा वेगवान मन को माना गया है। मन के तीन प्रमुख कार्य है-स्मृति कल्पना तथा चिन्तन। इन तीनों से ही मन की चंचलता बनती है, लेकिन यदि मन का शब्द का मध्यमान न मिले तो उसे चंचलता नहीं प्राप्त हो सकती। उसकी गति शब्द की बैसाखी पर निर्भर है। सारी स्मृतियाँ, कल्पनाएँ, तथा चिन्तन शब्द के माध्यम से चलते हैं।
दैनन्दिन जीवन के काम आने वाले शब्दों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-व्यक्त और अव्यक्त। जैनपन्थी इन्हें अपनी भाषा में जल्प और अर्न्तजल्प कहते हैं। जो बोला जाता है उसे जल्प कहते हो। जल्प का अर्थ है- व्यक्त स्पष्ट मन्तव्य है। जो स्पष्टतः बोला नहीं जाता, मन में सोचा अथवा जिसकी मात्र कल्पना की जाती है, वह है- अर्न्तजल्प। मुँह बन्द होने, होंठ के स्थिर पर भी मन के द्वारा बोला जा सकता है, जो कुछ भी सोचा सोचा जाता है, वह भी एक प्रकार से बोलने की प्रक्रिया है तथा उतनी ही प्रभावशाली होती है, जितनी की व्यक्त वाणी।
ध्वनि- विज्ञान ने ध्वनियों को दो रूपों में विभक्त किया है-श्रव्य और अश्रव्य। अश्रव्य-अर्थात् अल्ट्रासाउण्ड-सुपरसोनिक। हमारे कान मात्र २०००० कम्पन आवृत्ति को ही पकड़ सकते हैं। वे न्यूनतम २० कम्पन आवृत्ति प्रति सेकेण्ड तथा अधिकतम २० हजार कम्पन आवृत्ति प्रति सेकेण्ड पकड़ने में सक्षम हैं, पर उनसे कम तथा अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों का भी अस्तित्व है। श्रवणेन्द्रियों की मर्यादा अपनी सीमारेखा को चीन नहीं पाती। फलस्वरूप वे ध्वनियाँ सुनाई नहीं पड़ती। कान यदि सूक्ष्मातीत ध्वनि तरंगों को पकड़ने लगें तो मालूम होगा कि संसार में नीरवता की और कभी भी नहीं है। कमरे में बन्द आदमी अपने को कोलाहल से दूर पाता है। पर सच्चाई यह है कि उसके चारों ओर कोलाहल का साम्राज्य है।
जो कुछ भी बोला जाता है अथवा सोचा जाता है, वह तुरन्त समाप्त नहीं हो जाता, सूक्ष्म रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान रहता, तरंगित होता रहता है। सदियों पूर्व महा-मानवों ऋषि कल्प देवपुरुषों ने क्या की होगा, उसे प्रत्यक्ष सुना जा सके ऐसे अनुसन्धान प्रयोगाविधि में हैं। अभी सफलता तो नहीं मिल पायी है, पर वैज्ञानिक आश्वस्त हैं कि आज नहीं तो कल व विद्या हाथ लग जाएगी। निस्सन्देह यह उपलब्धि मानव जाति के लिए महत्वपूर्ण तथा अद्वितीय होगी, अब तक की वैज्ञानिक उपलब्धियों में वह सर्वोपरि होगी। सम्भवतः उसी आधार पर कृष्ण द्वारा कही गया गीता एवं राम-रावण संवादों का अपने ही कानों से सुनना सम्भव हो सकेगा।
रेडियो, टेलीविजन, राडार की भाँति प्राचीनकाल के आविष्कारों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथा चमत्कारी खोज थी-मन्त्र विद्या। मन्त्र ध्वनि विज्ञान का सूक्ष्मतम विज्ञान था। इसके अनुसार जो कार्य आधुनिक यन्त्रों के माध्यम से हो सकते हैं वे मन्त्र के प्रयोग से भी सम्भव है। पदार्थ की तरह अक्षरों तथा अक्षरों से युक्त शब्दों में अकूत शक्ति को भाण्डागार मौजूद है। मन्त्र कुछ शब्दों के गुच्छक मात्र होते हैं पर ध्वनि शास्त्र के आधार पर उनकी संरचना बताती है कि एक विशिष्ट ताल, क्रम एवं गति से उनके उच्चारण से विशिष्ट प्राचीनकाल में ऋषियों ने शब्दों की गहराई में जाकर उनकी कारण शक्ति की खोज-बीन के आधार पर मन्त्रों एवं छंदों की रचना की थी। पिछले दिनों ध्वनि विज्ञान पर अमेरिका, प. जर्मनी में कितनी ही महत्वपूर्ण खोजें हुई हैं। साउण्ड थैरेपी एक नयी उपचार पद्धति के रूप में विकसित हुई है। ध्वनि कम्पनों के आधार पर मारक शस्त्र भी बनने लगे हैं। ब्रेन वाशिंग के अगणित प्रयोगों में ध्वनि विद्या की प्रयोग होने लगा है। अन्तरिक्ष की यात्रा करने वाले राकेटों, स्पेस शटलों के नियंत्रण-संचालन में भी मौजूद है, पर वैज्ञानिक क्षेत्र में ध्वनि विद्या का अब तक जितना प्रयोग हुआ है, वह स्थूल है, सूक्ष्म और कारण स्वरूप अभी भी अविज्ञात अप्रयुक्त है जो स्थूल की तुलना में कई गुना अधिक सामर्थ्यवान है। मन्त्रों में शब्दों की स्थूल की अपेक्षा कारण-शक्ति का अधिक महत्व है। मानवी व्यक्तित्व की गहरी परतों, मन एवं अन्तःकरण को मन्त्र की सूक्ष्म एवं कारण शक्ति ही प्रभावित करती है। दर्शन का रूपान्तरण विचारों में परिवर्तन उसके प्रभाव से ही होता है।
यों तो वेदों के हर मन्त्र एवं छंद का अपना महत्व है। देखने में गायत्री महामन्त्र भी अन्य मन्त्रों की तरह सामान्य ही लगता है, जो नौ शब्दों तथा २४ अक्षरों से मिलकर बना है, पर जिन कारणों से उसकी विशिष्टता आँकी गया है, वे हैं-मन्त्र के विशिष्ट क्रम में अक्षरों एवं शब्दों को गुँथन प्रवाह, उनकी चक्र-उपत्यिकाओं पर प्रभाव, उसकी महान् प्रेरणाएँ। हर अक्षर एक विशिष्ट क्रम में जुड़कर शक्तिशाली बन जाता है। २४ रत्नों के रूप में अक्षरों के नवनीत का एक मणि-स्फुरण के रूप में गायत्री मन्त्र का प्रादुर्भाव हुआ तथा आदि मन्त्र कहलाया। सामर्थ्य की दृष्टि से इतना विलक्षण एवं चमत्कारी अन्य कोई भी मन्त्र नहीं है। दिव्य प्रेरणाओं की उसे गंगोत्री कहा जा सकता है। संसार के किसी भी धर्म में इतना संक्षिप्त, पर इतना अधिक सजीव एवं सर्वांगपूर्ण कोई भी प्रेरक दर्शन नहीं जो एक साथ उन सभी प्रेरणाओं को उभारे, जिनसे महानता की ओर बढ़ने तथा आत्मबल सम्पन्न बनने का पथ-प्रशस्त होता है।
ब्रह्म की अनुभूति शब्द-ब्रह्म नाद ब्रह्म के रूप में भी होती है, जिसकी सूक्ष्म स्फुरणा हर पल सूक्ष्म अन्तरिक्ष में हो रही है। गायत्री महामन्त्र नाद ब्रह्म तक पहुँचने का एक सशक्त माध्यम है। प्राचीनकाल की तर सामान्य व्यक्ति को भी अतिमानव-महामानव बना देने की सामर्थ्य उनमें मौजूद है। आवश्यकता इतनी भर है कि गायत्री मन्त्र की उपासना के विधि-विधानों तक ही सीमित न रहकर उसमें निहित दर्शन एवं प्रेरणाओं को भी हृदयंगम किया जाय और तद्नुरूप अपने व्यक्तित्व को ढाला जाय। पूरी श्रद्धा के साथ मन्त्र का अवलम्बन किया जा सके तो आज भी वह पुरातनकाल की ही तरह चमत्कारी सामर्थ्यदायी सिद्ध हो सकता है।
१५ अगस्त, १९४७ को राष्ट्रीय स्वाधीनता के रूप में महायोगी श्री अरविन्द का स्वप्न मूर्त हुआ। उन्होंने इसके लिए वर्षों यातनाएँ सही थी। लोकमान्य तिलक सदृश महावीरों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर स्वाधीनता का संग्राम लड़ा था। बाद के दिनों में अलीपुर जेल में मिले भगवान के आदेश को स्वीकार कर पाण्डिचेरी में आकर व इसके लिए तप-साधना में प्रवृत्त हुए और आज से ठीक अर्द्धशताब्दी पूर्व उन्हें अपनी साधना का सुफल राश्ट्र की स्वतन्त्रता के रूप में मिला। कृतज्ञ राश्ट्र ने उनसे इस अवसर पर विशेष सन्देश देने का अनुरोध किया।
उन्होंने इसे स्वीकारते हुए कहा- १५ अगस्त स्वाधीन भारत का जन्मदिन है। यह मेरा अपना भी जन्मदिन भी है। एक गुह्यवेत्ता के रूप में, मैं अपने जन्मदिन को भारतीय स्वाधीनता दिवस के साथ इस प्रकार एक हो जाने कोई दैवयोग या आकस्मिक संयोग नहीं मानता, बल्कि यह मानता हूँ कि जिस कार्य को लेकर मैंने अपना जीवन आरम्भ किया था, उसे मेरा पथ-प्रदर्शन करने वाली भागवत शक्ति ने अपनी अनुभूति दे दी है और उस पर अपनी मुहर भी लगा दी है। इस महान अवसर पर मुझसे संदेश देने की प्रार्थना की कई है, पर शायद मैं सन्देश देने की स्थिति में नहीं हूँ। मैं बस इतना ही कर सकता हूँ कि उन लक्ष्यों और आदर्शों की घोषणा कर दूँ, जिन्हें मैं अपनी बाल्यावस्था और यौवन से पोसता आया हूँ। क्योंकि वे भारत की स्वाधीनता से सम्बद्ध हैं और उस कार्य के अंग हैं, जिसे मैं भारत का भावी कार्य मानता हूँ और जिसमें वह प्रमुख स्थान लिए बिना नहीं रह सकता।
महर्षि की दृष्टि में यह महत्वपूर्ण एवं महान् कार्य है, भारत में वेदकालीन गौरव का नवोन्मेष । भारत के सामाजिक-साँस्कृतिक जागरण के साथ आध्यात्मिक नवजागरण। वह कहते हैं, भारत केवल अपने भौतिक हितों की सिद्धि के लिए विस्तार, महानता, शक्ति और समृद्धि पाने के लिए नहीं उठ रहा, यद्यपि इनकी भी उपेक्षा नहीं करनी होगी और निश्चय ही वह दूसरों की तरह अन्य देशों पर आधिपत्य जमाने के लिए भी नहीं उठ रहा, बल्कि वह उठ रहा है, सारी मनुष्य जाति के सहायक और नेता के रूप में, जगत के हित के लिए।”
भारत की महत्वपूर्ण विशेषता है, उसकी महान् जीवनीशक्ति, अकृत प्राणशक्ति तथा अकल्पनीय उर्वर रचनात्मकता। वह हजारों वर्षों से लगातार अविराम प्रचुरता के साथ अनेक दिशाओं में शाश्वत सृजन करता आया है। गणतन्त्र, राज्य, साम्राज्य दर्शन, सृष्टि शास्त्र, भौतिक विज्ञान, कलाओं, काव्यों, समाज, संस्कृति एवं धार्मिक विधि-विधानों की रचना यहीं हुई है। आध्यात्मिकता यद्यपि शुरुआत से ही भारतीय जीवन की कुँजी रही है, परन्तु यहाँ भौतिक विकास एवं समृद्धि को कभी उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखा गया। भारत वेदकाल से ही भौतिक विधानों एवं शक्तियों की महानता से परिचित रहा है। भौतिक विज्ञानों के महत्व के लिए उसके पास तीव्र दृष्टि रही है।
वह जीवन की कलाओं को संगठित करना जानता, लेकिन उसने देखा कि अतिभौतिक के साथ उचित सम्बन्ध के बिना भौतिक को अपना पूरा अर्थ प्राप्त नहीं होता। सम्भवतः इसीलिए भारत के विकास में तीन तत्व सदैव उपस्थित रहे, आत्मा की शोध से ज्योतिर्मय अध्यात्म, विज्ञान की शोध तथा इन दोनों की समन्वित शक्ति के समुचित सदुपयोग के लिए शास्त्र की रचना। इनमें से कोई भी एकत्रित न था। भारत ने महानतम से लेकर लघुतम या तात्कालिक महत्ता रखने वाले अर्थात् सभी तरह के विशय में उसने सर्वग्राही सूक्ष्म और पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ कार्य किया।
भारत महादेश एक भूखण्ड मात्र नहीं है, वाक् विलास नहीं है और न कोरी मन की कल्पना है। यह महाशक्ति है, जो राष्ट्रनिर्माण करने वाली कोटि-कोटि जनता की व्यष्टि शक्तियों का समाविष्ट रूप है। जैसे-पुञ्जीभूत होने पर एक शक्तिशाली भवानी महिषमर्दिनी का उद्भव हुआ था, वैसे ही कोटि-कोटि जनता की व्यष्टि शक्तियों की जीवन्त समष्टि भारत को भवानी भारती भी कहा जा सकता है। इसकी शक्ति इसकी सन्तानों का विकास करती हैं और इसकी सन्तानें अपनी शक्ति का अर्घ्य चढ़ाकर इसके गौरव को समृद्ध करती हैं। हम यदि अपनी भारत माता के मस्तक को गौरवान्वित करना चाहते हैं, तो इसके लिए हमें अपने स्वभावों को बदलना होगा। स्वतन्त्रता मिलने के बाद देश को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है, जिनमें शक्ति का अधिकतम सीमा तक विकास किया जा सके और जा अपनी इस शक्ति की बूँद-बूँद को निचोड़ कर अपनी भारतभूमि को उर्वर बना सकें। भवानी भारती की ज्वाला को अपने अन्तःकरणों और मस्तिष्कों में धारण कर ये लोग जब निकल पड़ेंगे, तो अपनी भूमि के हर कोने और कन्दरा में वे उस ज्योति को ले जाएँगे ।
वैदिक सभ्यता के नवोन्मेष एवं भारती राष्ट्रवाद की सफलता के लिए राष्ट्र की समूची शक्ति की जाग्रति और उसके संगठन की दृढ़ता जरूरी है। इसके लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि पिछड़े हुए वर्गों को जाग्रत किया जाय और उन्हें राष्ट्रीय जीवन-धारा से जोड़ा जाय। सभी को विकसित करके ही राष्ट्रवाद विकसित हो सकता है। राष्ट्रवाद की पहली और सब चीजों से बढ़कर माँग है, जीवन और अधिक जीवन। स्वतन्त्र भारत के नागरिकों से उसका आह्वान है, आओ, पहले हर तरह से स्वयं को मौत के साये से छुड़ाओ, जिसने तुम्हें दीर्घकाल से अवरुद्ध कर रखा है। स्वयं की अकर्मण्यता, निश्चलता और निष्क्रियता की केंचुल को उतार फेंको। क्योंकि यही लम्बे समय से हमारे राष्ट्रीय जीवन के लिए अभिशाप रही है। यह हमारे राष्ट्रीय जीवन की पहली और अनिवार्य आवश्यकता है।
भारतमाता हमसे हमारे हृदय, हमारे जीवन चाहती है, न उससे कम, न उससे ज्यादा। उसने हमसे आत्मोत्सर्ग की माँग की है। वह हमसे पूछ रही है, कितने लोग हमारे लिए जिएँगे? कितने हमारे लिए मरेंगे। स्वतन्त्र भारत के अभ्युत्थान के लिए ऐसे समर्पित सेवकों की जरूरत है, जो कोई पुरस्कार नहीं माँगते, जिन्हें किसी सुविधा ये ऐसी किसी अनावश्यक चीज की जरूरत न हो, जीवनयापन करके राश्ट्र-निर्माण कर सकें। अगर ऐसे लोग संख्या में कम हैं, तो कोई परवाह नहीं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे जिस पदार्थ से बने है, वह शुद्ध हों। भारत माता की आवश्यकता है, अपनी तलवार के लिए कठोर शुद्ध इस्पात की, अपने किले कि लिए अति विशाल ग्रेनाइट की। ऐसी लकड़ी की जो उनके धनुष में टूट न जाए। जो उनके रथ की धुरी के लिए सच्चा और मजबूत तत्व हो, क्योंकि स्वाधीनता के साथ ही मानवीय महायुद्ध शुरू हो चुका है और उसकी शंखध्वनि सुनाई देने लगी है।
राष्ट्र-निर्माण में युवाओं पर विशेष दायित्व है। क्योंकि एक युवा और नवीन देश इस समय विकसित होने की प्रक्रिया में है और उसे युवाओं को ही सृजित करना है। इस महान् कार्य में कायर, स्वार्थी और वाचाल लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है। दिलेर, स्पष्टवादी, स्वच्छ हृदय, साहसी और दृढ़प्रतिज्ञ नवयुवा ही वह नींव है, जिस पर भावी राश्ट्र की इमारत खड़ी होगी। इसके लिए ब्रह्मतेजस् सम्पन्न युवाओं की आवश्यकता है। यह ब्रह्मतेजस् संसार का संचालन करने वाली महाशक्ति का हमारे अन्तर में निहित शक्ति के समागम, स्वयं का उसके प्रति समर्पण से उत्पन्न विचार और कर्म का बल और ऊर्जा है। ईश्वर के उपकरण के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने वाले ऐसे कुछ ही व्यक्तियों को योगदान राश्ट्र को समर्थ एवं सम्पन्न बना सकता है। ऐसे ही लोग देश को ऊपर उठाएँगे।
श्री अरविन्द कहते हैं, “हमारी पुकार युवा भारत के नाम है। युवकों को ही नवीन भारत का निर्माता होना चाहिए। ऐसे युवक जो मन और हृदय में पूर्णतः सत्य को स्वीकार करने के लिए स्वतन्त्र हैं और महत्तर आदर्श के लिए परिश्रम करने को तैयार हैं। उन्हें अपने जीवन का उत्सर्ग और अपने निम्नतर अहं लाँघ सकने का पुरुषार्थ राष्ट्रहित में करना चाहिए। राश्ट्र और मानवहित के लिए अथक परिश्रम और पूरे मन से अपना उत्सर्ग स्वतन्त्र भारत को स्वर्णिम बनाने में करना चाहिए। वास्तविक जनक्रांति तो स्वतन्त्रता के बाद ही होनी है। इसके लिए हर युवक को अपनी अभीप्सा में महान् और अपनी आहुति में अनन्त होना चाहिए। स्वतन्त्र भारत के नवनिर्माण के महायज्ञ में अपनी बलि के लिए हमें अपनी जीवन, अपनी सम्पत्ति, अपनी आशाओं एवं अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं को आहुति देने हेतु अग्रसर होना चाहिए।”
युवाओं को सम्बोधित करते हुए उनके शब्द हैं,”युवाओं ! तुम भौतिक दृष्टि से ही नहीं, वरन् आध्यात्मिक दृष्टि से भी सब कुछ हो। एक भारतीय युवा ही ऐसा है, जो सब चीजों पर विश्वास कर सकता है, सबका सामना कर सकते हैं। इसलिए पहले भारतीय बना। आर्यों के विचार, आर्यअनुशासन, आर्यचरित्र, आर्यजीवन फिर से अपनाओ। वेद, योग और गीता को फिर से उपलब्ध करो। उन्हें केवल अपनी बुद्धि एवं भावना में ही नहीं अपने जीवन में फिर से व्यवहार लाओ। स्वयं अपने अन्दर की सारी शक्ति के स्त्रोत को पुनः प्राप्त कर लो, फिर अपने आप सभी कुछ तुमसे जुड़ जाएगा। सामाजिक पुष्टता, वैदिक युगीन उत्कर्ष और राश्ट्र का नेतृत्व सभी तुम्हारे कर्तृत्व बनने लगेंगे
महर्षि अरविन्द के अनुसार, उनके स्वप्नों के भारत को चरितार्थ करने में जितनी भूमिका युवाओं की है, उससे कहीं अधिक नारियों की। उनकी दृष्टि में नारी वीरता, सहनशीलता और शक्ति का प्रतीक है। आपस में मिलाना, निराश व्यक्तियों को साहस और प्रेम देना, गिरे हुओं को उठाना, रोगियों की सेवा-सुश्रूषा अपने अन्दर तथा अपने साथ एक आशा, एक विश्वास और अखण्ड उत्साह नारी का परिचय है। नारी का सौन्दर्य है, पूर्ण समस्वरता, नमनीयता, और शक्ति−सामर्थ्य, श्री और शक्ति, कोमलता, सहनशीलता, सर्वोपरि उदात्त भावनाएँ जो अविकारी हैं, जा उनकी परमात्मा पर अटल श्रद्धा का परिणाम होती है
सिद्धान्ततः नारी कार्यकारिणी शक्ति है। नारी के अन्दर वह शक्ति है, जा समस्त संगठन शक्ति के साथ सभी व्योरों में जा सकती है। भारत की नारियाँ अबला नहीं, उनकी ऊर्जा सहनशक्ति पुरुषों से कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। जिस संपत्ति का शासन नारी के हाथ में रहता है, वह समृद्ध होती जाती है। इनके सहयोग से ही देश अधिक विकास कर सकता है। स्वाधीन भारत के नवनिर्माण में स्त्रियों की भूमिका निस्वार्थता की प्रवृत्ति और अधिक मानवीय समाधान लाएगी। भावी भारत की नियति समग्र विश्व का नेतृत्व करने के लिए है। निश्चित ही उसमें नारी की भूमिका वरेण्य होगी।
राश्ट्र-निर्माण में अग्रसर हममें से प्रत्येक को यह गौरव-बोध होना चाहिए कि हमें विधाता ने महान् देश के नागरिक होने का अवसर दिया है। हमारी सभ्यता उतनी ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी नदियाँ। हमारे पीछे उनसे भी कई गुनी महानता का वह इतिहास है, जिससे बढ़कर इतिहास किसी भी देश की सभ्यता का नहीं है। हम उनके वंशज हैं, जिन्होंने तपस्या की थी, चेतना जगत में गहन अनुसंधान के लिए अश्रु तप किये थे। जिन्होंने स्वेच्छा से मानव को सम्भव सभी कष्टों को हँसते हुए स्वीकार किया। हम ऐसे लोग है, जो पीड़ा का स्वागत करते हैं और जिनके हृदय में आध्यात्मिक शक्ति है, जो किसी भी भौतिकबल से अधिक बड़ी हैं।
हम भारतीय हैं, जिनके बीच भगवान ने हमारे इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण क्षणों में दूसरी किसी भी जाति की अपेक्षा अधिक प्रकट किया है। हम भारतवासी हैं, आर्यों के वंशधर । यह आर्य भाव ही है हमारा कुलधर्म और राष्ट्रधर्म । वेदों में आर्य वे लोग हैं, जिन्होंने एक विशेष प्रकार के आन्तरिक और वाह्य व्यवहार को अपना लिया था। जिन्होंने बिना किसी से डरे, बाधा अथवा पराजय से बिना रुके एक अद्भुत संस्कृति व सभ्यता का निर्माण किया, वे देवत्व की पहाड़ी पर एक स्तर से दूसरे स्तर तक उत्तरोत्तर चढ़ते ही गये।
उनके द्वारा रचित संस्कृति एवं सभ्यता के सूत्र शाश्वत हैं, वर्तमान में भी समीचीन हैं। भविष्य में भी अपने महान् देश के भव्य समाज की नव्य रचना इन्हीं के द्वारा होनी है। श्री अरविन्द के अनुसार, इन सूत्रों के आधार पर वर्तमान एवं भविष्य की परिस्थितियों के अनुरूप हमें जिस समाज की रचना करनी है, वह अतिमानसिक समाज होगा, जिसमें प्रत्येक सदस्य स्वयं को औरों की भावनाओं से जुड़ा हुआ महसूस करेगा। आध्यात्मिक साम्यवाद ही इस नए समाज का दार्शनिक सिद्धान्त होगा।
यह साम्यवाद मार्क्स द्वारा प्रतिपादित साम्यवाद से पूर्णतया भिन्न होगा। श्री अरविन्द के अनुसार-इस आध्यात्मिक साम्यवाद की पृथ्वी पर स्थापना की शुरुआत भारत देश से होगी। यह आत्मा के मातृत्व एवं अहंकार की मृत्यु की नींव पर पनपेगा। बलात् लिए गए सहयोग या मशीनी ढंग से साथीपने का अन्त विश्वव्यापी पूर्ण असफलता में होगा। जीवन में उपलब्ध वेदान्त ही सच्चे साम्यवादी समाज के लिए एकमात्र व्यावहारिक आधार है। यही वह साधूनां साम्राज्य है, जिसका स्वप्न ईसाई, मुस्लिम एवं पौराणिक हिन्दू धर्म में देखा था। प्राचीन भारत में सामाजिक जीवन के तीन गढ़ थे-ग्राम्य समाज, विशालतर सम्मिलित परिवार और परिव्राजक सम्प्रदाय। भविष्यत् भारत के समाज को इसी विशालता एवं दिव्यतर समाजवाद की ओर अग्रसर होना है।
इसके निर्माण में हमारी सहायक बनेगी ज्ञान की वह महान् विरासत जो हमारे पूर्व पुरुषों ने हमें सौंपी है। नयी पीढ़ी का व्यक्तित्व निर्माण इसके आधार पर हो सके, इसके लिए एक नयी राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के सृजन की आवश्यकता है। यह कार्य वर्तमान विश्वविद्यालयों की व्यवस्था के विस्तार से सम्भव नहीं। शिक्षा की वर्तमान प्रणालियाँ बुनियादी रूप से मिथ्या, निष्क्रिय एवं निस्तेज हैं। भारतीय ज्ञान सम्पदा को लोकहित एवं देशहित में विस्तारित, प्रकाशित करने का काम तो केवल एक नयी चेतना और एक ऐसी नयी संस्था ही सृजित कर सकती है, जिसका जन्म राश्ट्र के हृदय से हुआ हो। जा पुनर्जीवन एवं आशा से भरपूर हो।
राश्ट्र के निमार्ण में सहायक राष्ट्रीय शिक्षा ऐसी शिक्षा है, जो अतीत से प्रारम्भ होती है और वर्तमान का पूरा उपयोग करते हुए एक महान् राश्ट्र का निमार्ण करती है। हमें भारत के लिए वह सारा ज्ञान, चरित्र और उत्कृष्ट विचार जो उसने अपने अविस्मरणीय अतीत से जमा कर रखे हैं, बचाना है, उसे प्रकाशित करना है। अब तक मानवता ने शिक्षा की उत्तम से उत्तम प्रणालियाँ जो विकसित की हैं, चाहे आधुनिक हों अथवा पुरातन, हमें सभी को समाविष्ट करना चाहिए। इन सभी को समन्वित करके हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जो आत्मावलम्बन की भावना से गर्भित हो, जिसके द्वारा मनुष्यों का निर्माण हो, मशीनों का न हो। ऐसी शिक्षा ही स्वाधीन भारत के भविष्य को स्वर्णिम बना सकती है।
भारत महादेश को अपने नवनिर्माण काल में अनेकों कठिनाइयों, विपदाओं से गुजरना है। इस दौर में भारतमाता विदेशियों से ही नहीं बल्कि अपनी ही सन्तानों द्वारा छली जाएगी। लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि विश्व के इतिहास में ऐसे युग आते हैं, जब उसकी नियति का नियन्त्रण करने वाली अलक्ष्य सत्ता परिवर्तन के विनाशकारी आवेग और पुरातन के प्रति उत्कट अधीरता से भरी जैसी प्रतीत होती है। महामाया आद्यशक्ति ने राष्ट्रों को अपने हाथ में लेकर उन्हें नया रूप देने का संकल्प लिया है। तोपों की आवाज और फौजों के कदमों के धमाके, बड़े-बड़े अधःपतनों के चकनाचूर होने और तेज हिंसात्मक क्रान्तियों के शोरगुल से भरे ये युग तीव्र विनाश और सशक्त सृजन के युग हैं। पूरी दुनिया को गलाने वाली कढ़ाई में डाल दिया गया है। वह नया रूप नया आकार लेकर निकलेगी। वह ऐसा युग है, जब बुद्धिमानों की बुद्धिमानी चकरा जाएगी और प्राज्ञों की प्रज्ञा हास्यास्पद दिखने लगेगी।
अपनी नियति की इस गम्भीर संक्रान्ति में हम लोग अपना धैर्य न खोएँ और न ही हतबुद्धि हो जाएँ। निराशा से अपनी आत्माओं को हतोत्साह न होने दें। स्वतन्त्र भारत के नवनिर्माण के लिए जो लड़ाई हमें लड़नी है, वह प्राचीन युद्धों जैसी नहीं हैं, जिसमें राजा अथवा नेतृत्व करने वाला गिर गया, तो सेना भाग खड़ी हुई। नवनिर्माण के इस महासागर में हमें जिसका अनुसरण करना है, वह हमारी अपनी मातृभूमि है, पवित्र और अविनाशी ।
इस मार्ग में पीड़ाएँ गहरी है और साथ देने वाला भी हमारे अपने अन्तर्यामी परमेश्वर के सिवा और कोई नहीं। ऐसे में हृदय मूर्छित न होने पाए और न ही उदासी छाए तथा कोई अदूरदर्शी उत्तेजना भी न हो, न अंधघाती पागलपन। हमारी भयंकर परिचय का समय प्रारम्भ हो रहा है। मार्ग सरल नहीं होने का, भारत को विश्व-नेतृत्व का मुकुट सस्ते में नहीं मिल जाएगा। भारत मौत के साये की घाटी में, अंधकार और यंत्रणाओं के घोर संग्राम से गुजरेगा। हमें समझ लेना चाहिए कि अभी जो हम कष्ट उठा रहे हैं, वह उस यंत्रणा का एक छोटा सा हिस्सा है, जो हमें भुगतनी है और यही समझकर दृढ़ता एवं समर्थता के साथ नवनिर्माण अभियान में जुट रहें। वर्तमान क्षण में पहली अपेक्षा साहस की है, ऐसे साहस की जो पीछे हटना अथवा सिकुड़ना जानता ही न हो।
हाँ हमारे कार्यों की, हमारे उत्सर्ग की परिणीत सुनिश्चित है। भारत के उज्ज्वल भविष्य का सूर्य उदित होगा और समस्त भारत को अपनी ज्योति से भर देगा। केवल भारत ही नहीं एशिया और समस्त जगत इससे प्लावित होगा। भारत फिर से युवा बनेगा। ऊर्जा के धाराप्रवाह, तरंगित स्त्रोत उसमें प्रवाहित होंगे। उसकी आत्मा फिर से वैसी ही बनेगी, जैसे वह पुरातनकाल में थी। लहरों जैसी विशाल, शक्तिशाली, इच्छानुसार शान्त अथवा विक्षुब्ध, कर्म तथा बल का महासागर। भारत की आध्यात्मिकता भारत की साधना तपस्या, श्रम व शक्ति ही हमारे स्वतन्त्र भारत को महान् बनाएगी। अपने नवनिर्माण के अवसर पर भारतमाता तपस्वियों, संन्यासियों को ही नहीं बल्कि समस्त शक्तिसम्पन्न लोगों की आत्माओं का आह्वान कर रही है।
भारतीय स्वाधीनता की अर्द्ध-शताब्दी इसी १५ अगस्त, १९९७ को पूर्ण हुई। स्वतन्त्रता संग्राम के महानायक एवं दिव्यदर्शी श्री अरविन्द का कथन इस अवसर पर अधिक ज्योतिर्मय हो उठा है। उनका आह्वान यथावत है और पुकार अधिक तीव्र साथ ही मार्गदर्शन स्पष्टतर । जिनमें भी देशभक्ति की जरा-सी भी चिनगारी है, वे इन पंक्तियों को पढ़कर आह्लादित, उद्वेलित एवं अग्रसर हुए बिना न रहेंगे। राश्ट्र के सपूत माँ भारती की दुहिताएँ राश्ट्र नायक की पुकार अनसुनी भी कैसे कर सकते हैं ? हम सभी के हृदय स्वाधीनता की स्वर्णजयंती की पूर्णता पर प्रार्थना के समवेत स्वर उभरें। हे माँ ! हे भारत की आत्मशक्ति । हे जननी ! आज, इस महान घड़ी में जबकि हम जग पड़े हैं और तेरी स्वतन्त्रता के इस उषाकाल में तेरे मुखमण्डल पर ज्योति पड़ रही है, हम तुझे नमस्कार करते हैं। हमें पथ दिखा जिसमें हम सर्वदा महान् आदर्शों के पक्ष में ही खड़े हों और अध्यात्म मार्ग के साधक के रूप में तथा सभी के मित्र एवं सहायक के रूप में तेरा सच्चा स्वरूप मनुष्य जाति को, विश्ववसुधा को दिखा सकें।
(फरवरी १९८९ का वीडियो सन्देश)
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। देवियों, भाइयों! नया समय, नया काम, नई जिम्मेदारियाँ और नया कदम क्या है? इस सम्बन्ध में आज आपको हम बताना चाहते हैं। पहली बात यह है कि नया समय क्या है? यह बारह वर्श का है और बहुत ही महत्वपूर्ण है। तो क्या इसका मतलब यह है कि जमीन पर आ जाएगा? नहीं, ऐसा नहीं होगा, परन्तु आज जो परिस्थितियाँ हैं, जिसमें आप और हम रह रहे हैं, वैसी नहीं रहने वाली है। नया काम क्या होना है? दे काम होने हैं- (१) विनाश की लीला होगी, उस समय बहुत मुसीबतें आयेंगी। उन मुसीबतों से आप भी बच नहीं पायेंगे । बेशक आपके मकान है, खेत हैं, सम्पत्ति है, परन्तु आप भी बच नहीं पाएँगे । चारों दिशाओं में जब आँधी आती है, तो कोई नहीं बच पाता है। यह सारा विनाश एवं सृजन की लीला आप भी देखेंगे तथा हम भी देखेंगे। हो सकता है कि हम स्थूलशरीर से न रहें, परन्तु सूक्ष्म में रहेंगे तथा देखेंगे तथा आपके साथ-साथ रहेंगे। इसमें कोई भी आदमी सुरक्षित नहीं रह सकता है। आप भी नहीं सकते हैं।
मित्रों, प्रकृति नाराज हो गयी है। इसका मतलब है कि इस समय ऐसी बाढ़ें, तूफान और भूकम्प आयेंगे जो आज तक इस पृथ्वी पर कभी नहीं आए। आज गर्मी के दिनों में ठंडक तथा ठंडक के दिनों में गर्मी न जाने कैसा वातावरण हो गया है। बीमारियाँ ऐसी-ऐसी पैदा हो गयी हैं कि अच्छे से अच्छे डाक्टर भी परेशान हैं। वे कहते हैं कि अभी तक हमने ऐसा देखा भी नहीं, पढ़ा भी नहीं तो हम आपको क्या दवा दें। कभी बाढ़ आ जाती है, तो कभी सूखा पड़ता है। इसके अलावा आप देख रहे हैं कि सामूहिक बलात्कार, मारकाट, चोरी, उठाईगीरी जैसे अपराध कितने बढ़ गया हैं। बहुतों को जलाया जा रहा है। इस प्रकार के काण्ड आप लोग रोज देखते तथा पढ़ते हैं। ऐसा वातावरण आपने पहले कभी नहीं देखा था। ऐसा समय कभी नहीं आया।
आपको सामान्य बातें बतला रहा हूँ। भोपाल गैसकाण्ड आपने सुना ही है। इसके अलावा पर्यावरण की बातें-वातावरण की बातें भी है। हवा में जहर घुलता जा रहा है। यह साँस के साथ आँखों में, गर्दन में, गले में, छाती में चला जाता है और आप बीमार हो जाते हैं। पानी में जहर मिल गया है। पहले हम गंगा का पानी ले जाते थे और उसका उपयोग करते थे, परन्तु आज यह प्रचार किया जा रहा है कि गंगा का पानी कोई मत पीजिए। इसमें जहर है। समूचे देश के बड़े-बड़े शहरों के गंदे नाले उसमें मिलाकर उसके पानी को जहरीला बना दिया है। कारखानों का पानी भी उसमें मिलता रहता है। नदी में से कुएँ में भी आता है। आज जो ऑटोमेटिक हथियार बन रहे हैं, उससे जो गैस निकलती है, वह जहरीली है। उससे अगली पीढ़ी जो पैदा होगी, वे लँगड़े, लूले, अंधे होंगे। प्राकृतिक सम्पदा, जैसे खनिज तेल, धातुएँ, कोयला आदि जो जमीन में थीं, उसे हमने खाली करना शुरू कर दिया है। मिट्टी का तेल, डीजल हम निकाल रहे हैं। लोहा, ताँबा, कोयला हम निकाल रहे हैं। पृथ्वी खोखली बनती जा रही है। भीतर से गर्मी कम हो जाएगी, तो पैदावार कम हो जाएगी, भूकम्प आयेंगे। अतः लोगों का समझना होगा कि अन्न कम होगा, जलावन कम मिलेगा, बीमारियाँ बढ़ेगी, तो आदमी परेशान होता चला जाएगा।
एक और डरावनी बात बतलाना चाहता हूँ। लड़ाइयाँ होंगी, उसमें चाहे बन्दूक चले या बम चले, पर आदमी समाप्त होते चले जाएँगे। राग, द्वेश बढ़ता चला जाएगा। इसके बाद इतनी बीमारियाँ फैलेंगी, जो न जाने समाज के कितने लोगों को समाप्त कर देंगी। पहले जो युद्ध से हुआ था, उसमें भी युद्ध से ज्यादा आदमी बीमारियों से मरे थे। केवल विधवाएँ बच गयीं थीं। लोगों को खाने के लाले पड़ गए थे। बच्चे मरते जा रहे थे। यह सेकेण्ड वर्ल्डवार-द्वितीय विश्वयुद्ध की घटना है।
आप घर में रहकर भी बच नहीं सकते हैं। हर चीज की कमी हो जाएगी। आज क्या भाव शक्कर मिलती है, क्या भाव कपड़ा मिलता है? इन सारी की सारी चीजों का अभाव हो जाएगा। आदमी भोजन के अभाव में मरते-खपते चले जाएँगे । दुनिया में बहुत तबाही आने वाली है। अब अगर युद्ध हुआ जैसा कि लोगों न अरबों-खरबों रुपया लगाकर तैयारी कर ली है, अगर वह हुआ तो दुनिया में इतनी तबाही आयेगी कि उसको रोकना मनुष्य के लिए असम्भव होगा। यह अस्त्र-शस्त्र एटम-हथियार ऐसे ही बच्चों के खिलौना थोड़े ही रखें हैं। युद्ध-उन्मादी ये पागल लोग इस जखीरे का प्रयोग अवश्य करेंगे। इसके बाद मनुष्यों के बीच तो तबाही आयेगी ही, परन्तु इसके साथ जमीन की उर्वराशक्ति भी समाप्त हो जाएगी। इस धरती पर रहने वाले लोग दुहरी मार को सहन नहीं कर पायेंगे। अगर परमाणु युद्ध होगा तो जमीन नहीं बचेगी। कहीं पानी भी नहीं मिल सकता है। इस संदर्भ में बहुत से भविष्यवक्ताओं ने बहुत-सी बातें लिखी हैं।
मुसलमानों के धर्मग्रन्थ में लिखा है कि चौदहवीं सदी आयेगी तो इस दुनिया में बहुत तबाही आएगी। इनसान की संख्या बहुत कम हो जाएगी। इसी तरह ईसाई धर्मग्रन्थ-बाइबिल में लिखा है कि ‘सेवन टाइम्स’ आयेगा और दुनिया तहस-नहस हो जाएगी। हिन्दुओं के भविष्य पुराण में लिखा है-भविष्य में जो समय आने वाला है-वह खतरनाक है। दुनिया तहस-नहस हो जायेगी।
मित्रों, इन तीनों के अनुसार यह कौन-सा समय है? यह वही समय है, जिसका हम आपसे जिक्र कर रहे हैं। इस समय के लिए हमें सुरक्षा के लिए व्यवस्था बनानी होगी। आप कहेंगे कि महाराज जी तो क्या हम डंडे लेकर खड़े हो जाएँ। मित्रो! इससे कुछ नहीं होगा। इसके और तरीके हैं। आपने भगीरथ का नाम सुना होगा। एक बार इस धरती पर से पानी खत्म हो गया था। खेतों में पानी नहीं था, पीने के लिए पानी नहीं था। उस समय उन्होंने तप किया और गंगा प्रसन्न हो गयी और धरती पर आयीं। धरती न पानी पी लिया तथा कुएँ में भी पानी आ गया। जो लोग पानी के अभाव में मर रहे थे, वे भी जीवित हो गये। पानी के लिए उन्होंने ये कष्ट उठाया था।
एक बार वृत्तासुर नामक राक्षस हुआ था। वह किसी के काबू-कण्ट्रोल में नहीं आ रहा था। सब लोग त्राहि वर्षों त्राहि कर रहे थे। आज भी इस तरह के वृत्तासुर दिखाई पड़ रहे हैं, जो मिसाइलें, बम, अस्त्र-शस्त्र बना रहे हैं, उनका नाम वृत्तासुर तो नहीं है, परन्तु हैं ये वृत्तासुर ही, जो इस प्रकार के क्रियाकलाप कर रहे हैं।
वृत्तासुर को समाप्त करने के लिए महर्षि दधीचि ने तप किया था और अपने अस्थिपञ्जर को देवताओं को दान कर दिया था। उससे धनुष बनाया गया। उसके बाद वृत्तासुर को समाप्त किया जा सका। आज हम लोग कई तरह के वृत्तासुरों से घिरे हैं। हम तोप, अस्त्र-शस्त्र एटम बमों एवं महँगाई से घिरे हुए हैं। लोग इन खतरनाक खिलौनों से डर रहे हैं। आज किराये के हत्यारे बहुत हो गये हैं। आप पाँच सौ या एक हजार रुपये निकालिए तो जिसको कहेंगे उसी की हत्या हो जाएगी। आज ऐसा ही खराब वक्त आ गया है। इस समय हमें अपने बच्चों, जिनकी संख्या 24 लाख हो गयी है, उनकी बहुत चिन्ता रहती है। उनको हम देश हमारी पत्नी एक रूप में ही देखते हैं। हमें अपने बच्चों से बहुत आशाएँ हैं, परन्तु आप तो अभी नाबालिग हैं। आपको केवल अपना पेट, परिवार दिखलाई पड़ता है। आपको अपने देश, संस्कृति से कोई मतलब नहीं है, तो हम बच्चा ही कहेंगे आपको। आपके पास मानवीय गरिमा नहीं है, तो आप बच्चे नहीं हैं, तो कौन है? हमें बाहर का भी ख्याल है तथा अपने बच्चों का भी हमें खयाल है।
मित्रों, इसी कारण हमने अपनी शक्ति को दो हिस्सों में बाँट दिया है। एक तो हमने दुनिया के लोगों के लिए तथा दूसरी अपने लाखों बच्चों के लिए सुरक्षित रखा है। मान लिया जाए कि हम सौ रुपये कमाते हैं, तो पचास रुपये दुनिया के लिए, हारी-बीमारी के लिए, तथा पचास रुपये अपने बच्चों के लिए हमने रखें हैं। हमने अपने शरीर को स्थूल-शरीर ओर सूक्ष्मशरीर-दो भागों में बाँट दिया है। हमारे बच्चे जा हैं, उनकी रखवाली भी करनी है तथा सलाह भी देना है। सलाह के बिना काम नहीं चलेगा। केवल सलाह ही नहीं देना है, वरन् ऊँचा भी उठाना है, सहयोगी बनाना है। जो महात्मा गाँधी के सहयोगी बने थे, उनके आन्दोलन में भाग लिए थे, उन्हें आज पेन्शन मिल रही है, मिनिस्टर बन रहे हैं। फोटो छप रही है। पर अब कोई कहे कि हमें भी स्वतंत्रता सेनानी बना दीजिए, हम भी चले जाते हैं जेल, तो अब जेल जाने से कोई फायदा नहीं है। ठीक इसी तरह का यह समय है, जिसके बारे में हम आपको बतला रहे हैं। इसमें हमको भी बड़ा काम करना है तथा आपको भी काम करना है। इसके अलावा सारी दुनिया के लोगों को भी हमारा काम करना है। “वसुधैव कुटुम्बकम् की स्थिति लानी है। इनकी भी समस्या का हल करना है। ये समस्याएँ हैं-गरीबी बेकारी,युद्ध और अपराध, जो बढ़ रहे हैं, मनुष्य भेड़िया बन रहा है। हमको इन्हें भी रोकना है। सारे संसार के लिए कुछ करना है।
क्यों साहब! टाप कितने वर्श तक जिन्दा रहेंगे? यह तो केवल १५ वर्षों का चक्कर है। सन् २००० से नया उछाल आना शुरू हो जायेगा, मुसीबतें घटने लगेंगी। गायत्री तपोभूमि एवं शान्तिकुञ्ज से पौध लगाने का काम हमको इसी वक्त करना है। हमें लड़ना भी इसी वक्त है। हमें किससे लड़ना है? सारी कुरीतियों एवं अपराधी वृत्तियों से लड़ना है। हमारे पास बहुत बड़े हथियार हैं, जैसा कि महर्षि दधीचि तथा भगीरथ के पास था। इससे हम लड़ने में भी समर्थ हैं तथा लोगों को राहत देने एवं परिस्थितियों को ठीक करने में भी समर्थ है। हम बीमारी, उठाईगीरी से केवल आपकी रखवाली ही नहीं करेंगे, बल्कि आपको भी लोमस ऋषि के पुत्र शृंगी ऋषि की तरह होना होगा, जो कि अपने पिता के गले में मरा हुआ साँप जो राजा परीक्षित ने डाल रखा था, उसे देखकर क्रोधित हो गये थे और उस साँप को उतार कर उसे जिन्दा कर दिया था। उसे कहा था, तू जा और सात दिन के अन्दर राजा परीक्षित को काट कर समाप्त कर दे। वैसा ही हुआ। शृंगी ऋषि ने राजा दशरथ की रानियों के बच्चा पैदा कर दिया था। वे तपस्वी थे। हम भी तपस्वी हैं। हम तुम्हारी रक्षा भी करेंगे तथा जिस प्रकार शृंगी ऋषि के द्वारा भेजे गए साँप से तबाही हो गयी थी, हम उससे भी रक्षा करेंगे। तपस्वी को पण्डित कहते हैं। मन्त्र बोलने वाले को हम पण्डित नहीं कह सकते हैं। आपकी गोद में हमें राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघन को बैठाना है। हमें आप जैसे छोटे-छोटे आदमियों को समर्थ बनाना है।
मित्रों, अभी आपका गुजारा नहीं होता है। हम चाहते हैं कि आपका गुजारा होना चाहिए। हम समर्थ गुरु रामदास के शिष्य छत्रपति शिवाजी की तर आपको बनाना चाहते हैं, जो एक राजा भी था, गुरुभक्त भी था, सेवक भी था। हमारा ख्वाब कभी भी अधूरा नहीं रहा है। हमारा ख्वाब है कि हमारे चौबीस लाख बच्चे पूर्ण सुरक्षित रहें। उनके ऊपर कोई मुसीबत न आवें। दूसरा हमारा ख्वाब है कि हमारे किसी शिष्य की मिट्टी पलीद न हो। कोई भी समाज के लोग उस पर बुरी नजर न डालें। कोई यह न कहे कि गुरुजी का शिष्य है, मर रहा है, खाने-कपड़े के लिए। हमारे पास जो भी आया है, समुन्नत हो गया है। हम राजा से भी बड़ा महाराजा बनाएँगे आपको। ऐसे जैसे कि सुदामा, जिनका चरण धोकर श्रीकृष्ण भगवान ने पिया था, रानियों न उनका कितना बड़ा स्वागत किया था। मित्रो, हम आपको उस स्तर से कम का नहीं बनाना चाहते हैं। हम आपको विश्वामित्र बनायेंगे, शिवाजी बनायेंगे। ऐसा बनाएँगे कि समाज यह न कहे कि इस व्यक्ति ने केवल खाया, पिया तथा बच्चा पैदा किया है, वरन् समाज की सेवा की है। जिन्हें लोग सैकड़ों, हजारों वर्श तक याद करते रहें, ऐसा हम बनाना चाहते हैं। हम तुम्हें ऐसा नहीं बनाना चाहते हैं कि पुलिस तुम्हारे पास आवे और तुम्हारा सोना, पैसा ले जावे। छापा डाल दे। नहीं, बेटे ! ऐसा हम तुम्हें कदापि नहीं बनाएँगे। भूखे, नंगे, गरीब यानी खाने, कपड़े और मकान की किसी प्रकार की कमी तुम्हें नहीं होने देंगे। हम तुम्हारे लिए किले, कोठी तो नहीं बनाएँगे कि तुम्हारा नाम इतिहास में अमर हो जाए। हम अपने बच्चों को, शिष्यों को बहुत अच्छा बनाएँगे ।
आज जो दुनिया तहस-नहस करने में लगी है, उसे हम एक धुरी पर इकट्ठी करेंगे। सारी पृथ्वी पर एक राज्य होगा। हम एक चक्रवर्ती राजा बनायेंगे। एक धर्म होगा, एक कानून होगा, सारी दुनिया की एक व्यवस्था होगी। कोई बड़ा-छोटा नहीं होगा, यानी कि समानता का अधिकार सबको मिलेगा। विषमता लोगों के बीच नहीं रहेगी। लोगों में एकता होगी। सब आपस में मिल-जुलकर रहेंगे, कुटुम्बी-परिजन बनकर रहेंगे। आपस में मिलकर काम करेंगे। आगे हम सारे विश्व को बनाने जा रहे हैं। यह हमारा एक बहुत बड़ा काम है। आप उसमें अवश्य शामिल रहना। आप हमारे परिश्रम में साथ-साथ रहेंगे, तो आप फायदे में होंगे। जो हमारा इस कम्पनी का शेयर खरीदेगा, उसे काफी मुनाफ़ा मिलेगा। तुम हमारी कम्पनी में शेयर होल्डर बनकर रहना। हम कभी भी नहीं मरेंगे। हम सन् २००० तक बिलकुल मोर्चे पर खड़े रहेंगे।
साथियों, हम स्थूलशरीर में न सही, परन्तु सूक्ष्मशरीर में रहेंगे तथा एक मिनट में २० हजार मील चल सकेंगे ऐसा हमारा विचार है। सूक्ष्मशरीर हमारा असीम है। यह मिट्टी वाला स्थूलशरीर जितना काम कर सकता है, उससे कहीं ज्यादा काम हमारा सूक्ष्मशरीर करता रहेगा। अरे तू चिन्ता मत कर कि गुरुदेव मर गये और अब हमें कौन देखेगा? बेटा तू चिन्ता मत करना, हम तेरे पास स्वयं पहुँच जाएँगे, तेरी निगरानी करेंगे, रक्षा करेंगे, स्वस्थ रखेंगे तथा तुम्हें प्रगति के रास्ते पर बढ़ाते रहेंगे। इस विषम परिस्थिति में हम तुम्हारे छाता बनकर रहेंगे। न केवल छाता बनकर रहेंगे, वरन् तुम्हारे भविष्य को उज्ज्वल बनाने का भी कार्य करेंगे। तुम्हारे खानदान को भी ऊँचा उठाने तथा उनका भविष्य उज्ज्वल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
मित्रों, यह हमारी पचास प्रतिशत शक्ति का उपयोग होगा। अन्य पचास प्रतिशत शक्ति से हम दुनिया को शानदार बनाएँगे। जो जिस भाषा में समझेंगे, उसे हमें उसी भाषा में समझाना होगा। अँग्रेजी, मराठी में जो समझेंगे, उसे उसी भाषा में समझाएँगे। अगर उसे ऐसे नहीं समझेगा, तो हम उसे शक्ति से समझाएँगे, ताकत से समझाएँगे । जो भलमनसाहत से समझेंगे, उन्हें उसी तरह से समझाएँगे । सारी दुनिया को हमें एक करना है, सारी जमीन को एक करना है। जो जमीन दबाकर रखे हैं, उनके सारे एकाधिकार समाप्त करेंगे। सब मिल-जुलकर खायेंगे, काम करेंगे, आगे बढ़ेंगे। एक समानता का मौका होगा। सभी मालिक होंगे। एक बच्चे का भी समान अधिकार होगा। एक शानदार दुनिया का ख्वाब हमारे अन्दर है। आज जहाँ-तहाँ अनीति, अत्याचार, अन्याय, कुरीतियाँ अपराधी-वृत्तियाँ आदि हमें दिख रही हैं। इनसे लड़ने के लिए हमारे भीतर एक शूरमा जाग्रत हो रहा है।
आइंस्टीन जब मरे तो लोगों न उनके दिमाग को खोलकर देखा था कि इनके दिमाग में क्या विलक्षणता थी। अगर हम मरे तो तुम हमारे कलेजे को देखना, तो यह पाओगे कि उसमें लड़ने के लिए बहुत बड़ा साहस है, सामर्थ्य है, जो हनुमान के अन्दर था। हमें बनाना भी है तथा तोड़ना भी है। हमें दोनों में शक्ति लगानी है। यह बातें संसार के बारे में हम कह रहे हैं, पर आपके बारे में यह कहना है कि हम आपकी रखवाली करेंगे तथा आपको ऊँचा भी उठायेंगे। हम कन्धों पर भी आपको बिठाएँगे। कोई पिता यह नहीं चाहता है कि हमारा बच्चा हमसे कमजोर रह जाए। आपको हम दुःखी रहने नहीं देंगे, आपको कठिनाई में हम रहने नहीं देंगे, आपको हम ऊँचा उठाएँगे। सभी दृष्टि से ऊँचा उठाएँगे। पैसे की दृष्टि से कोई अमीर नहीं बन सकेगा। अभी लोग छापा मार रहे हैं, अगले दिनों भी पैसा अधिक नहीं रहने वाला है। हम मालदार नहीं बनायेंगे। आपको हम श्रद्धावान, भावनाशील, विचारशील बनाएँगे। आपको हम महामानव, ऋषि, देवमानव बनाएँगे। हमारा यह विचार केवल आपके लिए ही नहीं, वरन् सारे संसार के लिए है। हम सारे संसार को भी ऊँचा उठाएँगे और शानदार बनायेंगे, जिससे यह अनुभूति होने लगे कि मानो धरती पर स्वर्ग का अवतरण हो गया है। इनसान को इस प्रकार का बनाएँगे कि जैसे देवता होते हैं। यही हमारी योजना है, जो हमने आपको आज बतलायी है। आज की बात समाप्त।
“बुद्ध के एक शिष्य को अभिमान हो गया कि उसने सारे त्रिपिटक रट लिए हैं। दूसरे अन्य शिष्य जो आत्मसाधना और जनसेवा में लगे रहते थे, उन्हें वह अपनी तुलना में कम पढ़ा-लिखा और तुच्छ समझता और यदा-कदा उन सबको निरक्षर भट्टाचार्य कहकर चिढ़ता रहता। एक दिन तथागत ने उसे बुलाकर शील, संयम, तप और साधना के बारे में कुछ व्यावहारिक सवाल पूछे, जिनका उत्तर उस शास्त्रज्ञ शिष्य से देते न बन पड़ा। किन्तु आत्मसाधना एवं लोकसेवा में समान भाव लगे शिष्यों ने व्यवहारिक अनुभव के आधार पर सटीक उत्तर दिए, जिन्हें सुनकर अहंकारी विशय का सारा ज्ञानाभिमान गल गया। तभी महात्मा बुद्ध ने उसे समझाते हुए कहा-ज्ञान का वास्तविक स्त्रोत शास्त्र नहीं वरन् आत्मसाधना एवं लोकसेवा से पवित्र हुआ अन्तःकरण है। पवित्र अन्तःकरण में समस्त ज्ञान स्वतः स्फूर्त होता रहता है।”
॥ ॐ शान्ति ॥
गायत्री परिवार के इतिहास में १७ से २० जून १९७१ के चार दिन कभी भी नहीं भुलाए जा सकते। इसी अवधि में गायत्री तपोभूमि में विदाई समारोह सम्पन्न हुआ। २० जून को परमपूज्य गुरुदेव-वंदनीया माता जी ने अपनी मथुरा से अन्तिम विदाई ली। देश भर से पधारे लाखों परिजनों को उसी तरह पीछे रोता-बिलखता छोड़ा जैसा कभी श्रीराम ने अयोध्यावासियों को छोड़ा था। एक बड़े वर्ग न उनका शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार तक पीछा किया। एक दो नहीं प्रायः पाँच सौ छोटी-बड़ी कारों और बसों का काफिला किसी अघोषित जुलूस की तरह पीछे-पीछे चलता रहा। कभी-कभी अखण्ड-ज्योति साथ लेकर चल रहे परमपूज्य गुरुदेव, वंदनीया माताजी मार्ग में रुकते तो
बीज से बना वट-वृक्ष और अब विराट् बनने की तैयारी
वहीं किसी मेले का सा दृश्य उपस्थित हो जाता, सी मौन, सभी व्यथित हृदय अद्भुत थे, वह विदाई के क्षण- जिन्होंने देखा उनके लिए भी, जिन्होंने सुना उनके लिए भी।
२० जून की रात ठीक बारह बजे परमपूज्य गुरुदेव और वंदनीया माताजी ने शान्तिकुञ्ज में प्रवेश किया । धीरे-धीरे सुनसान शान्तिकुञ्ज में सन्ध्या समय के विहंग कलरव की भाँति जन कोलाहल बढ़ना प्रारम्भ हुआ। अगले दो-तीन दिनों तक शान्तिकुञ्ज की गोद में बैठकर कितनों ने माँ का प्रसाद पाया, नींद ली, पूज्य गुरुदेव से वार्ता सम्पन्न की। वह दृश्य किसी सुनहले स्वप्न सो लगता है, जब सारा देश शान्तिकुञ्ज में एक स्वर्गीय सौन्दर्य वाले सुखी परिवार के रूप में सिमट गया था। परमपूज्य गुरुदेव की १९४० से लेकर १९७१ तक ३१ वर्षों की विकास यात्रा का यह प्रत्यक्ष अभिराम दृश्य था, जिसमें सर्वत्र श्रीराम के प्यार का मानसरोवर निश्छल, निस्तब्ध, दूर-दूर तक फैला दिखाई दे रहा था।
परमपूज्य गुरुदेव ने सप्तऋषियों की इस तपोभूमि शान्तिकुञ्ज में दस दिन बिताये। आगन्तुकों से भेंट परामर्श के साथ-साथ इसी अवधि में वंदनीया माताजी की उत्तरकालीन साधना के सभी सरंजाम भी जुटाते रहे और इस तरह एक सुबह वे शान्तिकुञ्ज छोड़कर कब चले गए, सम्भवतः यह वंदनीया माताजी के अतिरिक्त किसी को भी पता नहीं चल पाया। शान्तिकुञ्ज भी मथुरा की तरह उसी तरह शोक-सागर में डूब गया, जिस तरह किसी दिन भगवान् श्रीराम के तमसा तट पर अयोध्यावासियों को सोते छोड़कर चले जाने के बाद अयोध्या शोक में डूब गई थी।
पूज्य गुरुदेव ने एक वर्श हिमालय में बिताया। इस अवधि में वंदनीया माताजी ने कठोर तपश्चर्या सम्पन्न की। हिमालय फिर पिघला। परमपूज्य गुरुदेव शान्तिकुञ्ज लौटे और १९७२ से उसके बीज वट-वृक्ष बनने की विकास यात्रा प्रारम्भ हुई। पूज्य गुरुदेव बताया करते थे कि एक वर्ष का यह हिमालय प्रवास उनके जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय था, जिसमें उनकी परासत्ता से देशभर में घूमी। उन देव आत्माओं की तलाश जिन्हें नवयुग के अग्रदूतों की भूमिका निभानी थी। मादा कछुआ रेत पर अपने अण्डे देकर नदी में चली जाती है, गहरे जल में रहती है, पर वहीं से संकल्प शक्ति द्वारा अपने अण्डों को पकाती रहती है। बच्चे पकते ही अण्डे फूट जाते हैं, ठीक उसी दिन मादा अपने कुटुम्ब को समेटकर फिर नदी में चली जाती है। ऐसे ही परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार का दधिमंथन किया, नवनीत निकालकर उन्हें शान्तिकुञ्ज को अपना घोंसला बनाने के लिए सहमत किया।
शपथ समारोह में देवसेना का संघबद्ध होना और उसी के साथ देवसंस्कृति दिग्विजय-अश्वमेध यज्ञों की घोषणा प्रत्यक्ष देवासुर संग्राम है, जिसमें देवसंस्कृति-भारतीय संस्कृति का पलड़ा सब तरफ भारी है। इन आयोजनों की सफलता से अहंकार में डूबा महंत समुदाय भी स्तब्ध है और प्रशासनिक जड़ता भी अचम्भित है। यह सब अकाल पुरुष परमपूज्य गुरुदेव का ही सर्वस्व लीला-संदोह है।
पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया ‘माताजी’ परस्पर ‘कहियत भिन्न न भिन्न’ की स्थिति में रहे हैं। एक सूक्ष्म, दूसरा स्थूल उससे शक्ति की अभ्युदय होने में शायद कठिनाई जान पड़ी हो तभी ४ वर्ष पश्चात् ही वंदनीया माताजी ने भी महाप्रयाण किया। यहीं से ऊर्जा अनुदान की अनवरत शृंखला चल पड़ी। शान्तिकुञ्ज से शक्तिपीठों तक का यह विकास उन सभी के लिए महाभारत के बीच ‘ श्रीकृष्ण उचाव ‘ गीता संदेश की तरह है, जिसके पाठ से मन पवित्र होता है, जीवन में धारण करने से स्वर्ग और मुक्ति का पथ प्रशस्त होता है। विगत पच्चीस वर्षों की उपलब्धियाँ शान्तिकुञ्ज के बीज को वट-वृक्ष बनने की कहानी है, जिसके महानायक महाकाल परमपूज्य गुरुदेव और महाकाली माँ भगवती देवी हैं। वही नवयुग के प्रज्ञावतार और “स्वामि युगे युगे” के अधिष्ठाता देव हैं।
रजत जयंती की रूपरेखा- इसी १५ अगस्त से सारा देश अपनी स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती मनाने जा रहा है। विशिष्ट उपलब्धियों की जयंती समारोह मनाने की परम्परा बड़ी उपयोगी है। इससे आत्मचिन्तन, आत्मसमीक्षा और भविष्य के कार्यक्रमों के लिए बल मिलता है, सो स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती के साथ-साथ शान्तिकुञ्ज की रजत जयंती परमपूज्य गुरुदेव के हिमालय से जून १९७२ में शान्तिकुञ्ज आकर ऋषि परम्परा का बीजारोपण करने के २५ वर्श पूरे होने के संदर्भ में इस जुलाई से मनाई जा रही है। मिशनरी गरिमा के अनुरूप समारोह सम्पन्न करने की प्रेरणा अपने पथ-प्रदर्शकों ने दी है। यहाँ उसकी सम्पूर्ण रूपरेखा प्रस्तुत की जा रही है।
अब तक की सम्पूर्ण उपलब्धियों को ७ वर्गों में विभक्त कर ७ समारोह मनाने का निश्चय किया गया था। भूतकाल की उपलब्धियाँ वर्तमान की समीक्षा तथा भविष्य के कार्यक्रमों के साथ-साथ पहली बार राजतंत्र को भी दिशा-निर्देश देने का प्रयास किया गया है, ताकि स्वाधीनता संग्राम के महारथी-महायोद्धा परमपूज्य गुरुदेव की उस कार्यशैली और उपलब्धियों से राजतंत्र का भी वह पथ-प्रदर्शन हो सके, जिसकी कल्पना महामना महात्मा गाँधी जी ने की थी। एक अकेला काँग्रेसी (परमपूज्य गुरुदेव ने राजनीति में काँग्रेस के एक स्वयं-सेवक के रूप में कार्य किया, अनेक बार जेल गए, महामना मालवीय जी, रफी अहमद किदवई, माता स्वरूपरानी नेहरू, देवदास गाँधी आदि के साथ जेलयात्री, किसान आन्दोलन आगरा क्षेत्र के एकमात्र योद्धा) इतना कार्य कर सकता है, तो राजतंत्र उनका अनुगमन कर कितनी बड़ी क्रान्ति कर सकता है, इन सभी ७ वर्ग समारोहों में उसका भी स्पष्ट दिग्दर्शन कराया जा रहा है। इन वर्ग समारोहों का संक्षिप्त विवरण (विस्तृत अगले पृष्ठों पर) इस प्रकार है -
श्रद्धा-समर्पण वर्ग समारोह
गुरुपूर्णिमा २० जुलाई पर शान्तिकुञ्ज की पावन भूमि पर सम्पन्न हुए इस समारोह में इन समयदानियों को आमन्त्रित किया गया था। जो सन् २००० की महापूर्णाहुति तक नियमित रूप से न्यूनतम तीन माह प्रतिवर्ष समय देंगे। अपनी प्रतिभा, क्षमता तथा योग्यतानुसार सेवाएँ देंगे। यह कार्यक्रम अपनी गरिमा व भव्यता के साथ १९-२०-२१ जुलाई की तारीखों में सम्पन्न हो गया। प्रायः पच्चीस हजार कार्यकर्ताओं की इसमें भागीदारी रही। शेष सभी संकल्पित समयदानियों को आगामी वर्षों में आमंत्रित किया गया है।
स्वास्थ्य संरक्षण-पर्यावरण संवर्द्धन वर्ग समारोह
श्रावणी १८ अगस्त की तिथि में जड़ी-बूटी चिकित्सा से जुड़े अथवा जुड़ना चाहते हो, वृक्षारोपण इकोरिस्टोरेषन की समग्र गतिविधियों में भाग लेते हों, उनके विस्तार में सहयोग करने इच्छा रखते हों ऐसे लोग आएँ। राजतंत्र की अपनी इस अति प्राचीन विरासत को बचाने, विदेशों में न जाने देने, संरक्षण प्रदान करने पर गम्भीर चर्चा।
साधना वर्ग समारोह
महालयारम्भ पूर्णिमा १६ सितम्बर (परम वंदनीया माताजी का महाप्रयाण दिवस भी) इसमें वे सभी परिजन भाग ले, जो आस्तिकता-संवर्द्धन में निरत हों। विशेष रूप से सद्चिन्तन और सत्कर्म के मूल आधार गायत्री और यज्ञ को घर-घर विस्तार इस क्षेत्र में सक्रिय अपने परिजनों से भावी कार्यक्रमों पर चर्चा और राजतंत्र बुद्धिजीवी तंत्र से मात्र धर्मनिरपेक्ष न बने रहकर आध्यात्मिक मूल्यों के बुद्धि एवं विकास-सम्मत स्वरूप के संरक्षण पर विचार-विनिमय
सद्ज्ञान-सदिच्छा वर्ग समारोह
शरद पूर्णिमा १६ अक्टूबर- वे सभी परिजन इसमें भाग लेंगे, जो ज्ञान रथ, झोला पुस्तकालय, ज्ञान मन्दिर, विद्या विस्तार केन्द्र आदि चलाते हैं, वेदस्थापना, देवस्थापना प्रज्ञापुराण स्थापन, वाङ्मय स्थापना आदि कार्यों में विशेष उत्साह के साथ कार्य करते रहे हैं, वाक्य लेखन, स्टिकर्स विस्तार अथवा परमपूज्य गुरुदेव के साहित्य विस्तार सम्बन्धी किसी भी कार्यक्रम में भाग लेते हैं। शिक्षा मंत्रियों जैसे राजतंत्र के उन विशिष्टों व अधिकारीगणों को इसमें आमंत्रित किया जाएगा, जो भावी पीढ़ी के बौद्धिक विकास एवं चरित्र-निर्माण की दिशा में पूज्य गुरुदेव के साहित्य को नियोजित कर सकें।
संस्कृति वर्ग समारोह
कार्तिक पूर्णिमा १४ नवम्बर-संगीत कला अभिनय, लोकरंजन, नारी जागरण आदि से जुड़े परिजनों विशेष रूप से विश्व की आधी जनशक्ति नारी समुदाय का सम्मेलन-भारतीय संस्कृति पर हो रहे साँस्कृतिक आक्रमण के विरुद्ध सशक्त मोर्चे की तैयारी।
स्वावलम्बन-शिक्षा वर्ग समारोह
मार्गशीर्ष पूर्णिमा १४ दिसम्बर-देश के एक करोड़ नवयुवकों के लिए रोजगार, युगनिर्माण योजना से जुड़े अब तक प्रशिक्षण प्राप्त विद्यार्थियों, युवकों को सम्मेलन, स्वरोजगार को महत्त्वाकाँक्षी स्वरूप देने की तैयारी। दहेज, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन आन्दोलन को युवा शक्ति द्वारा गति दिया जाना। पावन तीर्थ गायत्री तपोभूमि से प्रारम्भ संघर्ष अभियान का इन सभी सम्मेलनों में समावेश देखा जा सकता है।
इन सभी का समापन बसन्त पर्व १९१८ एक फरवरी को प्रवासी भारतीयों-उनसे जुड़े भारत में रहने वाले उनके सम्बन्धियों, प्रतिनिधियों के समन्वित सम्मेलन के रूप में होगा। भारतीय संस्कृति का विश्वव्यापी विस्तार कैसे होने जा रहा है, इसकी झलक इस आयोजन में देखी जा सकेगी।
भारतवर्ष कभी विश्व की प्रमुखतम आर्थिक शक्ति हुआ करता था। फिर आक्रान्ता इस देश में आये और इसे सीधे सच्चे देश को छलपूर्वक लूट ले गये। संसार के कई देशों में जो भी वैभव है, वह इस देश की लूट है, यह कहने ओर मानने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए। संकोच है, तो बस इतना कि हम अब वह धन लौटाने की प्रार्थना भी नहीं कर सकते। इतने पर भी पेट की रोटियाँ तो इस देश को, इस देश के एक करोड़ बेरोजगार नवयुवकों को चाहिए ही। उसके लिए विदेशियों से नहीं, अपने प्रवासी भाइयों से गायत्री परिवार यह प्रार्थना करेगा कि वे एक और शान्तिकुञ्ज के उपर्युक्त क्रियाकलापों में हाथ बढ़ाएँ। जड़ी-बूटी चिकित्सा विकास एवं ऐसे मेडिकल कालेज ओर हॉस्पिटलों की स्थापना में सहायता दें, जिसमें डाक्टर्स के स्थान पर नाड़ी वैद्य और मारक गुणों वाली एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के स्थान पर मनुष्य शरीर की प्रकृति के नितान्त अनुरूप आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर प्रयोग अनुसंधान और विस्तार हो सके।
युग विचार-विस्तार की जरूरत
परमपूज्य गुरुदेव के साहित्य की आज दुनिया भर में माँग है। परमपूज्य गुरुदेव ने संसार के महापुरुषों के जीवन-चरित इस आशय से प्रकाशित किये थे कि महानताएँ उपार्जित करने वाले आदर्श-सिद्धान्त भावी पीढ़ी पर अवतरित रहें, पर हमारी स्थिति बहुत थोड़ा साहित्य प्रकाशित कर सकने की है। अभी दिल्ली प्रशासन ने यह जीवनचरित अपने स्तर पर प्रकाशित और प्रसारित करने की इच्छा व्यक्त की है। यह बात हमारे तंत्र के लिए शोभनीय नहीं है कि जो काम हमें करना चाहिए, उसकी अपेक्षा दूसरों से करें। साधनों का अभाव हमें अपमान झेलने को विवश करता है। अपने प्रवासी भारतीय चाहें तो शान्तिकुञ्ज में देश व विश्व की सभी भाषाओं में पूज्य गुरुदेव का साहित्य पहुँचाने की व्यवस्था हो सकती है।
परमपूज्य गुरुदेव द्वारा घोषित प्रथम पूर्णाहुति जन्मभूमि आँवलखेड़ा अश्वमेध में बहुत बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय आये थे। पहली मुलाकात प्यार की थी, अब परमपूज्य गुरुदेव के अधूरे स्वप्न पूरे करने की बारी है। इसमें भक्ति के साथ-साथ ज्ञान और कर्म को भी जोड़ना अनिवार्य है। इसमें जितना हित गायत्री परिवार का इस देश का होगा उससे अनेक गुना लाभ अपने उन प्रवासी भारतीयों को भी मिलेगा, जो इस सम्मेलन में भाग लेने आयेंगे । कुछ साहस पूर्ण कदम उठाने के लिए सहमत होंगे ।
महापूर्णाहुति की पूर्व भूमिका
सभी सम्मेलन तीन-तीन दिने के होंगे। पूर्णमासी से दो दिन पहले आना, पहले दिन शान्तिकुञ्ज स्तर का पूर्ण समारोह, पूर्णमासी के दिन राजतंत्र सहित पूर्ण अधिवेशन प्रतिपदा को विदाई, यह कार्यक्रम रहेगा। विशिष्ट और विचारशील अतिथि दोनों ही दिन भाग लेंगे। अंतिम कार्यक्रम २९-३०-३१ जनवरी, १ फरवरी के रूप में चार दिवसीय होगा। आशा की जानी चाहिए कि जिस तरह कुण्डलिनी के षट्चक्रों में सूक्ष्म-जगत की छह महाशक्तियों सन्निहित होती हैं, विशिष्ट योगाभ्यास की क्रियाओं द्वारा उनका जागरण, नियंत्रण और उपयोग किया जाता है, उसी प्रकार प्रस्तुत छह एवं अन्तिम बसंत पंचमी समारोह वह अभ्यास है, जिससे इस मिशन की आत्मा-शान्तिकुञ्ज की सिद्धि के साथ-साथ राष्ट्र की समर्थता भी असंदिग्ध रूप से जाग्रत होगी।
यह समारोह महापूर्णाहुति से पूर्व एक बहुत बड़ी छलाँग है। इसमें शान्तिकुञ्ज का गतिचक्र तेजी से घुमाया जा रहा है, यहाँ के प्रत्येक व्यक्ति का इंच-इंच समय निचोड़ कर उसे पिछली कार्यक्रम के लिए सहयोगी सामग्री जुटाने में लगा दिया गया है। इन समारोहों की तैयारियाँ भी असामान्य स्तर की होंगी, जिनमें, यहाँ के वरिष्ठ-कनिष्ठ सभी को चौतरफा नाचना पड़ेगा। अखण्ड-ज्योति का सितम्बर अंक ‘रजत जयंती समारोह विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। इन आयोजनों के यथार्थ स्वरूप का तभी अनुमान कर सकना सम्भव होगा। १५ जुलाई के प्रज्ञा अभियान पाक्षिक से भी परिजनों को भावी कार्यक्रम की स्पष्ट झलक-झाँकी मिलेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि शान्तिकुञ्ज की तरह ही गायत्री परिवार के सभी छोटे-बड़े संगठन संस्थानों को भी उतना ही सक्रिय होना पड़ेगा। सभी अपने यहाँ की उपलब्धियाँ और भविष्य के कार्यक्रमों की जानकारी दें। इन कार्यक्रमों के परिप्रेक्ष्य में वे लोग क्या कर करते हैं, स्पष्ट बताएँ। जहाँ झगड़े खड़े हों, वे यथासम्भव ठीक कर लें, अन्यथा उन्हें पीछे इस पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ और हाथ लगेगा नहीं, अमृत-वर्षा हुई और हम औंधे मुँह पड़े रह गये।’
समारोह का नाम सुनकर चाहे कोई भी दौड़ पड़ने की हड़बड़ी न करे। इन समारोहों में केवल कार्यकर्ता स्तर के उपयोगी व्यक्तियों को ही आमंत्रित किया जा रहा है। अनपढ़, अशिक्षित भीड़ को यहाँ से भगाया जाए, इसकी अपेक्षा यह छँटनी पहले ही कर लेनी चाहिए। महिलाएँ आयें, पर न तो वृद्ध, गर्भवती आएँ और न ही साथ में किशोर उम्र तक के बच्चे साथ में लाएँ। सभी को आवास केवल तम्बुओं, रावटियों में मिलेगा। शान्तिकुञ्ज व्यवस्था सँभालने वालो से पहले ही भरा हुआ होगा, अतएव कर्म-युद्ध में जूझने वाले स्वयं-सेवक स्तर के केवल योद्धा आएँ। ताकि उनसे कुछ उपयोगी विचार विमर्श हो सके। आगे के कार्यक्रमों को सँभालने सम्बन्धी ठोस उत्तरदायित्व सौंपे जा सकें। वस्तुतः ये समारोह इस वर्ष गायत्री तपोभूमि द्वारा मथुरा घोषित सातों आन्दोलनों को और विराट् रूप देकर क्रियान्वित करने, जिम्मेदारियाँ बाँटने, सुनियोजन-प्रशिक्षण हेतु आयोजित किये जा रहे हैं, इसलिए इनकी महत्ता इसी गंभीरता के स्तर पर समझी जानी चाहिए।
ऐसे समारोहों में कई बार परिजन अपनी समझ के विशिष्ट व्यक्ति लेकर आ जाते हैं। वे उनके लिए विशेष सुविधाओं का आग्रह भी करते हैं, पूरी न होने पर दुःखी और अप्रसन्न होते हैं। कृपया ध्यान दे-शान्तिकुञ्ज साधना-आरण्यक है, जहाँ शासक भी गायें चराते और गोबर साफ करते हैं। ऐसे स्वयंसेवक बनाकर किसी को भी लाया जा सकता है अन्यथा ऐसे व्यक्ति इन सत्रों में नहीं ही लेकर आएँ।
“सावित्री के पिता अपनी गुणवती पुत्री के लिए वैसा ही सुयोग्य वर ढूँढ़ना चाहते थे। उपयुक्त जोड़ा न मिल सका तो पिता ने स्वयं वर-वरण की आज्ञा दे दी । सेना के समेत राजकुमारी चल पड़ी, उसने इस प्रयोजन के लिए अनेक देश -देशांतर छान डाले। राजाओं के रनिवास का घुटन भरा वातावरण उन्हें तनिक भी पसन्द नहीं आया। वे उभयपक्षीय व्यक्तित्व-विकास के लिए कोई योग्य सहयोगी चाहती थीं ।इसके लिए वैभव नहीं आदर्श अपेक्षित था। आदर्शवादी युवक ही उन्हें अपेक्षित था।
प्रवास में गहरी खोजबीन करने के उपरान्त सावित्री को एक लकड़हारा युवक मिल , जो अपने वृद्ध माता -पिता की वानप्रस्थ अवधि में उनके साथ सेवा करने आया था । जंगल से लकड़ी काटकर गुजारा करता, साथ ही अभिभावकों की सेवा में लगा रहता। विद्वान पिता के पास बैठ अपनी सद्ज्ञान-साधना को भी जारी रखता। सावित्री ने उसी जंगल में डेरा डाला। युवक से संपर्क बढ़ाया और उसके व्यक्तित्व को परखा। उसने उसी से विवाह करने का निश्चय कर लिया। पति के साथ रहकर वह भी श्रम करेगी और सेवा - साधना में लगी रहेगी। वर-वधू की सहमति देखकर उनके अभिभावकों ने भी स्वीकृति दे दी। सावित्री भी अपने पति सत्यवान के साथ उसी वनप्रदेश में रहने लगी और उन्हीं के क्रियाकलाप में पूरी तरह सहयोग करने लगी ।वह भी पितृसेवा में निमग्न होकर लोककल्याण के कार्यों में निरत रहने लगीं।
इसी बीच सत्यवान पर मृत्यु ने आक्रमण किया। किसी विषैले सर्प ने काट लिया, किन्तु सावित्री का मनोबल, चरित्र वहाँ काम आया। पिता ने उपचार बताया। आश्चर्य यह हुआ कि मृतक जैसी स्थिति में पहुँचे हुए सत्यवान के प्राण फिर लौट आये। इसे कहते हैं- पतिव्रत धर्म की मृत्यु पर विजय।”
“विचारों के बारे में अति सावधानी बरतनी चाहिए। क्योंकि हम अपने मन से जो कुछ भी बाहर भेजते हैं, उलटकर वैसा वापस आता है। विचार प्रत्यावर्ती अस्त्र है। घृणा और प्रेम के बदले प्रेम इसीलिए मिलता है।”
स्थूल लीला संवरण और उसके बाद - सूक्ष्मीकरण साधना और तदनंतर गायत्री जयंती २ जून, १९९० को परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी स्थूल गतिविधियों को विराम दिया तो एक बार फिर लोगों को लगा, अब इस मिशन का क्या होगा ? महाप्रयाण से पूर्व परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं ही यह बात स्पष्ट कर दी थी कि वे अभी अपना स्थूल शरीर भर छोड़ रहे हैं, लम्बे समय तक वे अपने सूक्ष्मशरीर से शान्तिकुञ्ज में बने रहेंगे और सत्र-संचालन अपने हाथ में बनाये रखेंगे। डाक्टर्स भी इस बात की पुष्टि करते हैं, जब तक मस्तिष्क गर्म रहे तब तक ‘क्लिनिकल डेथ’ घोषित नहीं की जाती सो शान्तिकुञ्ज स्थित उनकी सक्रियता एक प्रश्न रहित यथार्थ है। इस सच को लाखों लोगों ने १९९१ के श्रद्धाञ्जलि समारोह में देखा। रोते हुए अर्जुन को अपना विराट् स्वरूप दिखाकर भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध के लिए जिस तरह सहमत किया, उसी तरह देवसंस्कृति संग्राम के लिए परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म सत्ता न गायत्री परिवार रजामंद किया। वंदनीया माताजी ने उसी तरह सारी कमान अपने हाथों में सँभाल ली, जिस तरह देवी भागवत् में तीनों कालों में विश्रामरत भगवान् विष्णु की अनुपस्थिति में भगवती दुर्गा ने देवताओं का सेनापतित्व सँभाला। परमपूज्य गुरुदेव की अन्तरंग व्यवस्थापिका, वाह्य रणक्षेत्र का इतना कुशल संचालन करेंगी शायद यह विश्वास बहुतों को न रहा हो।
*समाप्त*