सद्गुरु को बना लें अपना नाविक

एक था यात्री, दूर देश की यात्रा पर निकला था वह। अभी कुछ दूर ही चला था कि एक नदी आ गयी, किनारे पर नाव लगी थी। उसने सोचा- यह नदी भला मेरा क्या बिगाड़ लेगी? पाल उसने बाँधा नहीं, डाँड़ उसने खोले नहीं, न जाने कैसी जल्दी थी उसे? मल्लाह को उसने पुकारा नहीं। बादल गरज रहे थे। घना अँधेरा आस-पास के वातावरण को भयावह बना रहा था। तेज कड़क के साथ जब बिजली चमकती, तो नदी का पानी भी दहशत से थर्रा जाता। फिर भी वह माना नहीं, नाव को लंगर से खोल दिया और स्वयं भी उसमें सवार हो गया। किनारा जैसे-तैसे निकल गया, पर नाव जैसे ही मझधार में आयी, वैसे ही उसे भँवरों और उत्ताल तरंगों ने आ घेरा। लहरों के थपेड़े मजबूत नाव को चकनाचूर करने लगे। उत्ताल तरंगें बार-बार नाव को ऊपर तक उछाल देतीं और जब नाव लहरों के साथ नीचे गिरती, तो भँवरों का चक्रव्यूह उसे मझधार में डुबा देने में जुट जाता। यात्री विकल और बेबस था। मल्लाह के अभाव में वह असहाय था। आखिरकार नाव ऊपर तक उछली और यात्री समेत जल में समा गयी।

एक दूसरा यात्री आया। कुछ दूर चलने के बाद उसे भी नदी मिली। नदी किनारे लगी नाव टूटी-फूटी थी, डाँड कमजोर थे, पाल फटा हुआ था, तो भी उसने युक्ति से काम लिया। नाविक को बुलाया और बड़ी विनम्रतापूर्वक उससे कहा- मुझे उस पार तक पहुँचा दो। नाविक यात्री को लेकर चल पड़ा। किनारा छोड़ते ही वातावरण भयानक हो उठा। आसमान के सूरज को बादलों ने ढँक लिया। भयानक गरज के साथ मूसलाधार बारिश होने लगी। रह-रह कर जब बिजली कड़की, तो यात्री का हृदय सूखे पत्ते की तरह काँप उठता। नाविक हर बार व्याकुल और भयभीत यात्री के मन को सान्त्वना देता। वह हर बार नाव को बचा लेता और यात्री के मनोबल को टूटने न देता। लहरों ने संघर्ष किया, तूफान टकराये, हवा ने पूरी ताकत लगाकर नाव को भटकाने का प्रयत्न किया, पर नाविक एक-एक को सँभालता हुआ यात्री को सकुशल दूसरे पार तक ले गया।

मनुष्य जीवन भी एक यात्रा है जिसमें पग-पग पर कठिनाइयों के महासागर पार करने पड़ते हैं। इन्द्रियों की लालसायें- मन में पनपते भ्रमों को बहुतायत जीवन को पल-पल पर भटकाने की कोशिश करते हैं, फिर संसार में भयावह संकटों, विघ्नों, परेशानियों की कमी कहाँ है? संसार का हर थपेड़ा जीवन-नौका को नेस्तनाबूद कर देने के लिए प्रयत्नशील रहता है। यहाँ से चित्र-विचित्र आकर्षणों का हर भँवर समूचे जीवन को डूबो देने के लिए आतुर-आकुल रहता है। जो जीवन-यात्रा की शुरुआत से ही सद्गुरु को अपना नाविक बना लेते हैं, उनके हाथों में अपने को सौंप देते हैं, गुरु स्वयं उसकी यात्रा का सरल बना देते हैं, क्योंकि जीवन पथ की सभी कठिनाइयों के वही ज्ञाता और हम सबके वही सच्चे सहचर हैं। अपने अहंकार और अज्ञान में डूबे मनुष्यों की स्थिति तो उस पहले यात्री जैसी है, जो नाव चलाना न जानने पर भी उसे तूफानों में छोड़ देता है और बीच में ही नष्ट हो जाता है।


एक संकल्प ने बदली जीवन धारा

युवराज उदयभान, महाराज प्रसेनजित व महारानी बिन्दुमती के इकलौते पुत्र थे। कुमार उदयभान बचपन से ही संवेदनशील, तेजस्वी व धार्मिक प्रकृति के बालक थे। महाराज ने कुमार के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा की व्यवस्था की। युवक होते-होते उनकी नीति कुशलता, बहादुरी, दयालुता एवं सम्मोहक व्यक्तित्व की चर्चा सुवास बनकर वायु के साथ हर ओर फैल गयी।

विभिन्न देशों के राजा अपनी- अपनी कन्याओं के विवाह-प्रस्ताव महाराज प्रसेनजित के दरबार में भिजवाते, लेकिन हर बार यह सहज मुसकान से उन्हें टाल जाते। कुमार की संवेदनशील प्रवृत्ति उन्हें लोककल्याण के निमित्त परिव्राजक होने के लिए प्रेरित कर रही थी। वह करुणा के अवतार भगवान तथागत के धर्मचक्र प्रवर्तन हेतु समर्पित होना चाहते थे।

युवराज के इन विचारों ने महाराज एवं महारानी की चिन्ता बढ़ा दी। इकलौता पुत्र और वह भी विवाह के लिए राजी नहीं, तो उनका वंश कैसे चलेगा? यही चिन्ता उन्हें रात-दिन परेशान किये रहती। माता-पिता की परेशानी व बार-बार विवाह के लिए आग्रह को देखकर उदयभान विवाह के लिए राजी हो गये।

बसन्त ऋतु का समय था। विदर्भ की राजकुमारी भी अपनी सखियों के साथ बसन्तोत्सव मनाने आयी थी। अनेक राजकुमारियों के बीच राजकुमारी राजेश्वरी के शील, सद्गुणों एवं सौंदर्य को देखकर कुमार एवं उनके माता-पिता ने स्वीकृति दे दी। दोनों ही ओर इस विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। बारात विदर्भ पहुँची।

उन दिनों राजकीय दावतों में मद्य एवं माँस का उपयोग बहुत होता था। इसके बिना भोजन अधूरा समझा जाता था और आतिथ्य में इसका उपयोग अवश्य किया जाता था। विदर्भ के महाराज ने बारातियों का स्वागत करने के इसी उद्देश्य से बहुत सारे पशु-पक्षियों करे पिंजड़े में बन्द कर रखा था। बारात जिस मार्ग से नगर में प्रविष्ट हो रही थी, उसी मार्ग पर वे पशु-पक्षी पिंजड़े में बंधे हुए करुण क्रन्दन कर रहे थे।

दूल्हा बने उदयभान के कानों में उन दी प्राणियों के करुण क्रन्दन की आवाजें गूँजने लगीं। उनका हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने सारथी से पूछा, इन पशुओं को पिंजड़े में क्यों डाल रखा गया है? सारथी ने उत्तर दिया युवराज! इन सभी पशुओं को महाराज ने बारातियों के आतिथ्य के लिए एकत्रित किया है।

उदयभान का हृदय विद्रोह कर उठा। उनके मुँह से सहसा ये शब्द निकले हाय! मेरे लिए इतने प्राणियों का वध? यह ठीक नहीं है। मैं विवाह के प्रेम सूत्र में बंध रहा हूँ, पर मेरे लिये इतने जीवों को कष्ट क्यों दिया जा रहा है? मेरे उल्लास की नींव यदि इतने प्राणियों के विषाद एवं क्रन्दन पर खड़ी होती है, तो क्या मैं इसे उल्लास कहूँ? नहीं। कदापि नहीं। और उन्होंने सारथी को आदेश दिया रथ घुमाया जाय।

सारथी ने कुछ साहस करके कहा, युवराज आपकी तो हजारों व्यक्ति प्रतीक्षा कर रहे हैं। रथ पीछे कैसे मोड़ा जाय। बारात बिना वर की हो जायेगी।

किसकी बारात और किसका विवाह। मुझे इस तरह का विवाह नहीं करना। तुम जल्दी ही राजधानी लौट चलो। उदयभान के कहने पर सारथी ने रथ मोड़ लिया और वापस चल पड़ा। बारातियों में खलबली मची गयी। कोई भी नहीं जान सका कि क्या हुआ? सबने अपने-अपने अनुमान लगाये, लेकिन उदयभान के इतने गहरे अहिंसक मनोभावों की तह में कोई नहीं पहुँच सका। एक ओर महाराज प्रसेनजित दौड़े, दूसरी तरफ से कन्या के पिता और पारिवारिक लोग।

उदयभान के रथ को रोका गया और सबने हाथ जोड़कर कारण जानना चाहा। कुमार ने अत्यन्त विनीत स्वर में कहा, इसमें न तो कन्या-पक्ष की कोई गलती है और न ही मेरे पिताजी की, किन्तु मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण इतने निरीह प्राणियों की बलि हो। सुख जैसे मुझे प्यारा है, वैसे संसार के प्रत्येक प्राणी को। सिर्फ जीभ के क्षणिक स्वाद व तृप्ति के लिए इतना बड़ा प्राणि वध किसी भी तरह व कदापि उचित नहीं है। मेरी अन्तरात्मा इसे स्वीकार नहीं करती।

उदयभान को लाख समझाया गया, पर वे विवाह के लिए राजी नहीं हुए। वे बोले, जो समाज कुरीतियों एवं दुष्प्रवृत्तियों में इतना डूबा हो, उसमें मुझे ऐश्वर्य-विलास का जीवन जीने का कोई हक नहीं। मेरा स्थान तो तथागत के श्रीचरणों में है। मैं आज से अपना जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित करता हूँ।

राजकुमारी राजेश्वरी युवराज उदयभान को पति के रूप में पाकर अपने को धन्य मान रही थी। आज का दिन उसके लिए उल्लास का दिन था, किन्तु उसे क्या पता था कि उसकी आशाओं पर इस तरह पानी फिर जायेगा। जब उसे बताया गया कि कुँवर उदयभान विवाह-मण्डप की ओर बढ़ते हुए वापस लौट गये और लाख मनाने पर भी वे नहीं माने, तब यह सुनकर राजेश्वरी मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ी।

काफी देर पश्चात् जब उसे होश आया, तो उसको समझाया गया और सारी स्थिति से अवगत कराया गया। उसकी माता ने समझाया, बेटी राजेश्वरी! तुम्हारा विवाह तो हुआ नहीं और जब तक विवाह नहीं हो जाता, स्त्री स्वतंत्र होती है। घबराओ नहीं, तुम्हें एक से बढ़कर एक युवराज मिल जायेंगे। चिन्ता छोड़ो, इस तरह अपने आप को किसी के साथ बाँधकर मिटाया तो नहीं जा सकता।

राजेश्वरी ने कुछ सोच-विचार कर शान्त स्वर में जवाब दिया, माताजी विवाह क्या सिर्फ अग्नि की परिक्रमा देने मात्र से थोड़े ही हो जाता है। उदयभान तो मुझे ब्याहने के उद्देश्य से आये थे। इससे बढ़कर और क्या विवाह होगा। वे मुझे छोड़कर संसार के समस्त प्राणियों को अभयदान देने का संकल्प लेकर गये हैं। उन्होंने युगावतार भगवान तथागत के धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया है। इससे बढ़कर अच्छी बात और क्या हो सकती है। वे स्वयं का कल्याण तो कर ही रहे हैं, साथ ही संसार का भी। मैं भी महात्मा बुद्ध की शरण में जाकर आत्मनो मोक्षार्थ जगद्हिताय के जीवन मंत्र की साधना करूँगी । अपने इसी निश्चय के साथ राजकुमारी भी लोककल्याण की साधना में लग गयी।


आस्था-चिकित्सा अंधविश्वास नहीं, एक वैज्ञानिक तथ्य

दिव्य-दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति किसी-भौतिक साधन की सहायता लिए बिना धरती के भीतर छिपे पानी, तेल, धातुओं आदि के भण्डार का पता लगा लेते हैं। इसी प्रकार कुछ लोग अपनी दैवी क्षमताओं से शारीरिक रोगों का कारण जानकर निदान कर देते हैं। पश्चिमी देशों में इन्हें आस्था-चिकित्सक या फेथहीलर कहा जाता है। यद्यपि ऐसे चिकित्सकों एवं उनकी चिकित्सा-पद्धति को अभी वैज्ञानिक मान्यता नहीं मिल सकी है, फिर भी उनकी सफलताएँ स्पष्ट हैं और चौंकाने वाली हैं। विश्वास अथवा आस्था को वैज्ञानिक वैज्ञानिक समुदाय कितना भी अवैज्ञानिक करार दे, किन्तु मानवीय जीवन के इस अद्भुत तत्व की प्रक्रिया एवं परिणाम अपने हर पहलू पर वैज्ञानिक शोध को आमंत्रण देने रहते हैं।

विश्वास कितना वैज्ञानिक है अथवा कितना अवैज्ञानिक, इस विवाद का कोई हल भले ही न निकले, परन्तु इतना तो निस्संकोच कहा जा सकता है कि विज्ञान-जगत का मूल विश्वास है कि हर कार्य का कोई न कोई विशेष कारण होता है। तब फिर यह भी मानना पड़ेगा विश्वास-चिकित्सा का भी विश्वास अकारण नहीं है। हालाँकि विज्ञान अलौकिक शक्यों के अस्तित्व को नकारता है, जो एक छोटी-सी फुंसी से लेकर कैंसर, पागलपन जैसे रोगों का उपचार कर दें, लेकिन आस्था-चिकित्सकों या फेथहीलर लोगों ने कई बार इस मान्यता को बड़े ही चमत्कारिक ढंग से झुठलाया है। उन्होंने अनेकों बार बहुत दूर से रोगी की अनभिज्ञता व असहयोग रहने पर भी सफलतापूर्वक रोगोपचार किया है।

भारत का प्राचीन इतिहास तो ऐसे अनेक उद्धरणों एवं उदाहरणों से भरा है। तप-शक्ति एवं महर्षियों के आशीर्वाद से रोग निवारण की अनेकों कथाएँ पुराण-साहित्य में पढ़ी जा सकती हैं। अथर्ववेद तो जैसे दैवी चिकित्सा की महाविद्या का प्रथम वैज्ञानिक महा कोश ही है। वैदिक विवरण के अनुसार दध्यंग अथर्वण इस महाविद्या के जन्मदाता एवं दैवी चिकित्सा को अनेकों विधियों के आदि आविष्कर्ता थे। परवर्तीकाल में महर्षि वेदव्यास ने उनके अनगिनत अनुसंधानों को संकलित कर उन्हीं के नाम पर अथर्ववेद की रचना की। वैदिक एवं पौराणिक साहित्य के अलावा ईसाइयों के न्यू टेस्टामेण्ट में भी इसका एक उदाहरण मिलता है। बारह वर्षों से एक महिला रक्तस्राव से पीड़ित थी। अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति उपचारों में लगा चुकी थी। ईसामसीह को रोगमुक्त करने की चमत्कारिक शक्ति के विषय में सुनकर वह उनके पास पूर्ण विश्वास से गयी। उनके वस्त्रों को स्पर्श करते ही उसे स्वास्थ्यलाभ हो गया।

यह रोगोपचारक शक्ति कहाँ से आती है? सूक्ष्मजगत से अथवा ईश्वर-प्रदत्त है या फिर ‘ब्रिटिश मेडिकल सोसाइटी फॉर द स्टडी ऑफ रेडियेस्थीसिया’ के अनुसार ‘रेडियेस्थीसिया’ है, जिसका अर्थ है- ‘विकिरण के प्रति मानवीय संवेदना और बोध’। इनके अनुसार पानी-तेल-धातुओं आदि के प्राकृतिक स्रोतों से होने वाले विकिरण के प्रति संवेदनशील व्यक्तियों को इनका ज्ञान हो जाता है। इसी प्रकार कुछ लोग शरीर के रोगग्रस्त भाग को ज्ञात करके उसका उपचार कर देते हैं।

कुछ फेथहीलर या आस्था-चिकित्सक निःसंकोच भाव से स्वीकार करते हैं कि वे उस शक्ति के, जिसका स्रोत कोई भी हो, माध्यम मात्र हैं। कुछ अन्यों के अनुसार उन्हें ऐसे मृत चिकित्सा विज्ञानियों का मार्गदर्शन मिलता है, जो सूक्ष्मजगत में रहकर भी लोककल्याण करना चाहते हैं। उनके साथ कुछ अन्य लोग मिलकर रोग-निदान के लिए एकाग्रतापूर्वक ध्यान-प्रार्थना करते हैं और शक्ति-प्रवाह का माध्यम बन जाते हैं। फेथहीलर हैरी एडवर्ड्स बताते हैं कि, किसी मनुष्य द्वारा स्वीकृत कर लिये जाने पर रोगी के शरीर में उचित शक्ति प्रक्षेपित करते हैं। इस तथ्य पर विश्वास कर लिया जाए अथवा ईश्वर द्वारा किसी शक्ति विशेष के माध्यम से की गयी विशेष कृपा मान लिया जाए, सत्य यही होता है कि फेथहीलर विश्व प्राण अथवा सूक्ष्म प्राण से पर्याप्त प्राणशक्ति को आकर्षित कर रोगी के निष्प्राण प्राय हो चुके शरीर में प्रक्षेपित करता है, जिससे वह रोगमुक्त हो नयी चेतना, नया स्वास्थ्य प्राप्त करता है।

सूक्ष्मजगत से सम्पर्क करके रोगों का निदान सम्भव है अथवा नहीं? इस विवाद का हल भले ही अब तक न निकला हो, किन्तु हैरी एडवर्ड्स ने बहुसंख्यकों की अपनी फेथहीलिंग से रोग मुक्त किया। उन्हें अपनी इस शक्ति का बोध चालीस वर्ष की उम्र के पश्चात् हुआ। उनका जन्म 1893 ई. में लन्दन के एक कम्पोजीटर के यहाँ हुआ था। बचपन से ही वे अत्यन्त जागरूक, संवेदनशील एवं परहित परायण व्यक्ति थे। बाद में उन्होंने युवा स्काउट सेना का नेतृत्व किया व लिबरल राजनीति में सम्मिलित हो गये। महायुद्ध छिड़ने पर रायल ससैक्स रेजीमेण्ट में नाम लिखवाया और भारत भेज दिये गये। महायुद्ध छिड़ने पर रायल ससैक्स रेजीमेण्ट में नाम लिखवाया और भारत भेद दिये गये। यहाँ उन्हें बेंगलोर में रहना पड़ा। बेंगलोर में रहते हुए उन्होंने महर्षि अरविन्द एवं महर्षि रमण के बारे में सुना और इन विभूतियों से उनके आश्रम पर जाकर मुलाकात की। इनके विचारों ने उन्हें गहराई तक प्रभावित किया और वे भारतीय आध्यात्मिक विचारों से जुड़ गये। इसके पश्चात् एक योग्य इंजीनियर के रूप में पर्शिया भेजे गये, जहाँ हजारों लोग अकालग्रस्त व निराश्रित थे। डायरेक्टर ऑफ लेबर के रूप में अपने सेवा कार्यों से लोगों के हृदय में उन्होंने ऐसी जगह बनायी कि प्रस्थान के समय हजारों के नेत्र सजल हो उठे।

इंग्लैण्ड लौटने पर इल्फोर्ड में एक आध्यात्मिक गोष्ठी ने उनकी आध्यात्मिक रुचि को अपेक्षाकृत अधिक विकसित और परिपक्व किया। 1934 में बाल्हम के आध्यात्मिक गिरजाघर में उन्हें सूक्ष्मजगत की मार्गदर्शक आत्माओं के विषय में बताया गया, जो उन्हें प्रेरणा, सहयोग दे सकती थीं। उनके सन्देश भी दिखाये गये। अतः पूर्णतया विश्वस्त होकर वे अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं को जाग्रत करने के लिए प्रशिक्षण लेने लगे। इस दौरान उन्हें विलक्षण अनुभव हुए। उन्हें दिव्य दर्शन होने लगे। ऐसे स्वरों में अनैच्छिक संदेश मिलने लगे, जो उनके अपने नहीं थे। अतिशीघ्र आध्यात्मिक सत्यों पर उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया। अब वे अत्यंत सरलता से सूक्ष्मजगत का माध्यम बन जाते। मुख्य रूप से एक रेड इंडियन वाइट फैदर की आत्मा उन्हें निर्देशित करती थी। उन्हीं के निर्देशानुसार एडवर्ड्स ने एक घरेलू संस्था ‘द फेलोशिप ऑफ स्पिरिचुअल सर्विस’ स्थापित करके रोगियों की सेवा प्रारम्भ की। उन्होंने जैक बैबर तथा अर्नाल्ड क्लेयर जैसी विशिष्ट और प्रख्यात सूक्ष्मजगत के माध्यमों के साथ भी कार्य किया।

प्रत्येक मंगलवार को रोगियों को घर पर ही देखने व उनका विवरण लिखकर प्रति सप्ताह पुनः परीक्षण करते। संध्याकाल में ध्यान एकाग्र करके अतीन्द्रिय शक्तियों से उनके उपचार की प्रार्थना करते। उनके कार्य में उत्तरोत्तर प्रगति हुई और बाद के दिनों में तो एक विशेष सन्ध्या निर्धारित हो गयी। इसका नाम उन्होंने रखा, ‘ऐबसेण्ट हीलिंग’ यानि की अनुपस्थित रोगोपचार। अर्थात् इस दिन उन रोगियों के उपचार को कार्यक्रम बना, जो उनसे मीलों दूर हैं और अपने कष्ट के कारण उन तक पहुँच नहीं सकते। इसके लिए उन्हें एक संवेदनशील व्यक्ति समूह का सहयोग भी प्राप्त हुआ, जो उनके साथ में प्रार्थना करता व दैनिक कार्यों में सहयोग करता। ध्यान के दौरान एडवड्स बहुधा सूक्ष्मशरीर से यात्रा करके ऐसे कमरों में पहुँचते, जहाँ रोगी लेटा होता। इस दौरान वे उसका उपचार होता देखते और लौटकर यात्रा का जो विवरण देने, वह जाँचने पर सत्य साबित होता, मानों उस समय वे सशरीर रोगी के घर गये हों।

उनकी रोगोपचारक शक्तियों ने शीघ्र ही स्थानीय प्रेस व आध्यात्मिक समाचार पत्र ‘साइकिक न्यूज’ को आकर्षित किया। ‘साइकिक न्यूज’ के सम्पादक मौरिस बार्बानेल ने हैरी एडवड्स की जीवनी लिखी, जिसमें एक घटना का विशेष उल्लेख किया। वर्ष 1937 में स्मिथ ना का एक रोगी था, जो बाल्हम में रहता था। उसका उपचार दूर से उसकी अनभिज्ञता में किया गया। पेट-दर्द बढ़ती कमजोरी, वजन में कमी तथा चक्कर आने के कारण कार्य करने में वह असमर्थ हो गया था। विशेषज्ञों ने अपनी जाँच-पड़ताल के निष्कर्ष में बताया कि उसका हृदय काफी कमजोर है और उसके दायें फेफड़े में स्पॉट है। रोगी की पत्नी श्रीमती स्मिथ को उनकी गम्भीर स्थिति का दुःखद समाचार देकर अस्पताल में भरती करने अथवा घर पर सावधानीपूर्वक उनकी देख-भाल करने के लिए कहा गया। श्रीमती स्मिथ ने एडवड्स से अपने पति के रोग की चर्चा की। स्मिथ को चिंतामुक्त करने के लिए न तो रोग की कोई जानकारी दी गयी, न ही एडवड्स से की गयी चर्चा के विषय में बताया गया, क्योंकि वे इस सबको पसन्द नहीं करते थे। उनकी नजर में फेथहीलिंग जैसी प्रक्रियाएँ कोरे अन्ध-विश्वास के सिवा और कुछ नहीं थीं।

जिस दिन चर्चा की गयी थी, उसी रात्रि श्रीमती स्मिथ के शरीर में तीव्र ऐंठन हुई। कराह सुनकर पति की निद्रा भंग हो गयी और उन्हें आश्चर्य हुआ, जब मिस्टर स्मिथ उनके लिए गर्म पानी की बोतल भर लाये। वे इससे भी अधिक आश्चर्यचकित हुईं, जब सुबह शीघ्र उठकर वे उनके लिए चाय बना लाये। स्मिथ के चेहरे का रंग पूर्णतया बदल गया था और थकान भी नहीं थी। सम्पूर्ण परिवार समझ गया था कि उनके स्वास्थ्य में असाधारण सुधार हो चुका है। उस दिन से उनके वजन में काफी तेजी से बढ़ोत्तरी होने लगी और पाँच सप्ताहों में यह वजन कई पाउण्ड बढ़ गया। इसके पश्चात् विशेषज्ञ को दिखाया गया, तो वे अत्यन्त प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि स्मिथ ने इस दौरान अत्यन्त सफल चिकित्सा पूर्ण करवा ली।

‘साइकिक न्यूज’ में वर्णित हैरी एडवड्स के एक और रोगोपचार के विषय में एक डाक्टर का कथन था "चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से अत्यन्त अविश्वसनीय।” यह उपचार भी दूर से ही सम्पन्न किया गया था। हुआ यों कि एक व्यक्ति साइकोसिस बार्बे नामक त्वचा रोग से पीड़ित था। किन्हीं कारणवश उसे उचित उपचार करवाने में विलम्ब हो गया। इसी विलम्ब के कारण विशेषज्ञों ने उपचार की सभी सम्भावनाओं से भी इनकार कर दिया। एक चिकित्सक ने तो यहाँ तक कह दिया कि नौ माह तक कोई चिकित्सा न करवाने के कारण नौ वर्षों में भी स्वस्थ हो जाए, तो सौभाग्य समझना। दो सालों तक लन्दन स्थित अस्पतालों के अनेकों चक्कर काटने के बाद भी उसे कोई फायदा नहीं हुआ। उसके घाव भरे नहीं, बल्कि बढ़ गये। तब एडवड्स से उसकी चिकित्सा के लिए अनुरोध किया गया। एडवड्स की दैवी चिकित्सा के परिणामस्वरूप स्थिति में आश्चर्यजनक सुधार आना शुरू हुआ। तीन माह में ही सारे घाव भर गये। चिकित्सकों को जब उसे दिखाया गया, तो उन्होंने इसे ‘असम्भव किन्तु सत्य’ बताया।

इसी प्रकार दिसम्बर, 1952 में एक पिता ने अपने बेटे का लाइलाज रोग माइलाइड ल्यूकेमिया के विषय में एडवड्स को बताया। एडवड्स के उपचार से स्थिति में चमत्कारी बदलाव आया और तीन महीनों में ही बालक पुनः स्वस्थ हो विद्यालय जाने लगा। अपनी पुस्तक ‘द साइन्स ऑफ स्पिरिट हीलिंग’ में हैरी एडवड्स ने बताया है कि चिकित्सक जब अपना दाया हाथ रोगग्रस्त भाग पर रखता है, तो उसे बाँह से उँगलियों की ओर तरंगों के प्रवाह की अनुभूति होती है। कई बार प्रवाह इतना शक्तिशाली होता है कि हाथों में अत्यधिक कम्पन होना स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। जिसके परिणामस्वरूप यदा-कदा बाँहें भी दुखने लगती हैं।

ऐसे अभूतपूर्व उपचारों को स्थूल नेत्रों से देखने के पश्चात् भी चिकित्सा-विज्ञानी अभी भी इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उनका दृष्टिकोण यही रहता है कि या तो रोग की पहचानने में चूक हुई अथवा फिर उपचार अनायास हो गया। एडवड्स के उपचार उनके जीवनकाल में यद्यपि विवाद का विषय रहे, फिर भी उनके पास सफलताओं का ताँता लगा रहा। इसी वजह से उनका कार्य भी उत्तरोत्तर बढ़ता गया। इनमें से ज्यादातर रोगियों का उन्होंने दूर रहकर, निश्चित समय में उपचार किया। सन् 1944 में उनके बाल्हम स्थित मकान को छह राकेटों से ध्वस्त कर दिया गया। इसमें रोगियों के उपचार व निश्चित किये गये समय के अभिलेखों के नष्ट हो जाने के उपरान्त भी उनका उपचार निरन्तर चलता रहा।

उनकी बढ़ती प्रसिद्धि से रोगियों की संख्या में भी वृद्धि हुई और उन्होंने इवैल, सर्रे स्थित अपने नये मकान में विधिवत् एक रोगोपचार केन्द्र की स्थापना कर ली। वे कभी रोगियों से अपना पारिश्रमिक नहीं लेते थे, किन्तु लोग स्वतः ही इतना दान देते थे कि वे शियर सर्रे में बने और अधिक बड़े मकान बरोजली में चले गये। वहाँ उन्हें सहयोगियों व कार्यालयी सामान के लिए और अधिक स्थान उपलब्ध हो गया।

बरोजली में एक ही वर्ष में 1,26,000 पत्र आये। उसी वर्ष 5,000 रोगी उनके घर आये और 4,600 को एडवड्स ने व्यक्तिगत रूप से स्वास्थ्य लाभ दिलाया। 70 प्रतिशत रोगियों ने अपने स्वास्थ्य में सुधार बताया, जबकि 30 प्रतिशत पूर्णतया स्वस्थ हो गये। उस एक वर्ष में 20,000 व्यक्ति उनके विशेष उपचार सत्रों में उपस्थित हुए, क्योंकि बुद्धोपरान्त उन्होंने विशाल कक्षों में सामूहिक रूप से समस्त देश में उपचार सत्र चलाये। इन सत्रों में उन्होंने ऐसे हजारों लोगों को स्वस्थ किया, जो लम्बे समय से अर्थ्राइटस, मस्कुलर डीसट्रोफी, डिसेमिनेटेड- स्क्लैरोसिस, कर्वेचर ऑफ द स्पाइन, बहरापन, नेत्रहीन तथा अनेकों अन्य कई तरह के रोगों से ग्रस्त थे। ऐसे कई सत्रों में एडवड्स के उपचारों पर संशय करने वाले प्रख्यात चिकित्सकों को भी आमंत्रित किया जाता। उपचार के दौरान उन्हें मंच पर अपनी मुड़ी टाँग अथवा खिसकी हड्डी पर हाथ रखने दिया जाता। सभी ने रोगग्रस्त अंग का विशेष शक्ति द्वारा स्वस्थ होना स्वीकारा।

स्वर्गीय बिवर्ले निकल्स ने अपनी पुस्तक ‘पावर दैड बी’ में स्वयं अपने जीवनकाल के अपने ऊपर हुए अनुभव का जिक्र किया है। एक मोटर दुर्घटना में उनका दाया हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। इसमें उनके हाथ की हड्डियाँ बुरी तरह टूट-फूट गयी थीं। दो सालों तक उन्हें भयंकर पीड़ा रही और वे पियानो बजाने में असमर्थ हो गये। हार्ले स्ट्रीट के विशेषज्ञों के अथक प्रयासों की असफलता के पश्चात् वे प्रख्यात फेथहीलर डॉक्टर ऐश के पास गये। डॉ. ऐश उनकी बाँहों को अपने सामने रखकर बैठ गये। निकल्स ने स्वयं की मानसिक एकाग्रता के द्वारा उपचार में सहयोग का कोई प्रयास नहीं किया, ताकि किसी प्रकार का सम्मोहन सम्भव न हो। पन्द्रह सेकेण्ड के बाद निकल्स ने जो अनुभव किया, उसे उन्होंने इन शब्दों में व्यक्ति किया, “एक अदृश्य शक्ति मेरे शरीर में, बिना किसी त्रुटि के एक विशेष क्रिया करवा रही थी।.... सम्भवतः इसकी तस्वीर भी उतारी जा सकती थी, खींच कर छोड़ी गयी इलास्टिक की रस्सी के समान त्वचा कम्पित हो रही थी, उँगलियों में भी मानो सुपरसोनिक कम्पन हो रहा था।” छह मिनटों के पश्चात् निकल्स ने महसूस किया कि वह बुरी तरह थक चुका है और उसकी पूरी बाँह में असहनीय पीड़ा हो रही है। अतः डाक्टर ऐश से उन्होंने रुकने का आग्रह किया और उनके रुकते ही अन्तिम झटके के साथ बाँह विश्रामावस्था में आ गयी, मानो किसी ने बिजली का स्विच बन्द कर दिया हो। यह क्रिया देख रहे एक मित्र ने कहा- “ऐसा लगा जैसे दोषों को बाहर खदेड़ा जा रहा हो।”

हैरी एडवर्ड, डाक्टर ऐश और ऐसे ही न जाने कितने फेथहीलर और होंगे, जिनके विषय में चिकित्सा विज्ञानी कहते हैं कि वे लोगों के मस्तिष्क भावनाओं व विचारों पर अधिकार कर लेते हैं, जबकि उन्होंने रोगी की अनभिज्ञता में भी उपचार किया। अगर यह भी मान लिया जाय कि वे रोगी की सुषुप्त शक्तियों को जाग्रत मात्र कर देते हैं, तो यह भी ईश्वर की देन ही कही जायेगी, जो सर्वसाधारण को सुलभ नहीं है और विज्ञान के पास जिसका कोई उत्तर नहीं है।

जो दैवी चिकित्सा के सिद्धान्त से परिचित हैं, वे इसका वैज्ञानिक विवेचन कुछ इस ढंग से करते हैं कि रोगमुक्त जीवन का कारण जीवनी-शक्ति या प्राण क्षमता की प्रचुरता है। जब शरीर में अथवा किसी अंग विशेष में किसी कारण विशेष से इस प्राण क्षमता या जीवनी-शक्ति का ह्रास होने लगता है, तो व्यक्ति में प्रतिरोधक क्षमता काम होने लगती है और वह रोगी हो जाता है। यदा-कदा यह स्थिति दुर्घटना की वजह से भी उत्पन्न हो जाती है। सामान्य चिकित्सक इस प्राण शक्ति के क्षरण को औषधियों द्वारा प्राणशक्ति के अभिवर्धन के लिए प्रयास करते हैं, परन्तु प्रक्रिया काफी धीमी एवं क्षीण होती है जबकि योगी-तपस्वी एवं अध्यात्मवेत्ता वातावरण में परिव्याप्त विश्व प्राण के महासागर में अपनी यौगिक एवं आध्यात्मिक प्रक्रियाओं, साधनाओं द्वारा प्राणशक्ति का प्रचुर संग्रह करते हैं। इसी के एक अंश का संप्रेषण वे रोगी व्यक्ति के बेजान हो रहे शरीर का किसी अंग विशेष में करते हैं। प्राणशक्ति की इस प्रचण्ड बौछार से विरोधी शक्तियाँ, रोग पैदा करने वाले जीवाणु-विषाणु निस्तेज हो जाते हैं और व्यक्ति को सर्वथा नयी चेतना का अनुदान मिलता है। मुरझाया जीवन कुसुम फिर से खिलने, खिलखिलाने लगता है।

रोगमुक्त करने की यह विधा स्पष्टतया मूल रूप में भारतीय विधा है। पश्चिम में हैरी एडवड्स आदि फेथहीलर ने इसे थोड़ा बदले रूप में अपनाकर सफलता प्राप्त की है। ये सूक्ष्म शरीरधारी कुछ विशेष आत्माओं के सम्पर्क एवं सहयोग से विश्व प्राण के लहलहाते महासागर में से थोड़ी बहुत प्राण-शक्ति पाकर उसे वितरित करने का क्रम अपनाते हैं, परन्तु दोनों ही सिद्धांतत समान हैं। योग साधनाओं एवं आध्यात्मिक प्रक्रियाओं से प्रायः अपरिचित रहने के कारण उनके द्वारा यह सम्भव नहीं बन पड़ता है कि वे सीधे ही बिना किसी सूक्ष्म शरीरधारी की सहायता से अपने में भरी प्राण क्षमता का संग्रह करें, परन्तु इन सभी का यह मानना अवश्य रहा है कि बिना किसी माध्यम विशेष के सहयोग के भी सामान्य व्यक्ति स्वयं में फेथ पैदा करके यह गहरी भावना कर सकता है कि ईश्वर की महाशक्ति जिसे वैश्वप्राण भी कह सकते हैं, हमारे रोगी शरीर को पूर्णतया रोग मुक्त कर रही है और हम स्वस्थ-सबल हो रहे हैं। यह भावना जितनी गहरी होती जाती है ख् प्रभाव भी उतने ही स्पष्ट होने लगते हैं। धीरे-धीरे आधुनिक मनोविज्ञानी भी इस सत्य को स्वीकार करने लगे हैं, मनोभावनाएँ ही अपने अनुरूप मनुष्य को स्वस्थ या रोगी बनाती हैं। सब कुछ अपनी आस्था या फेथ पर निर्भर है। आने वाला समय ‘फेथ हीलिंग’ या आस्था-चिकित्सा को चिकित्सा जगत में विशेष स्थान दिला दे, तो कोई असम्भव घटना नहीं मानी जानी चाहिए।


बना लोकोत्तर प्रेम का आदर्श लोक

उस दिन साकेत नगर में बसन्त पंचमी के उत्सव का आयोजन था। इस अवसर पर तैराकी प्रतियोगिता भी आयोजित की गयी थी। सरयू घाटों पर दर्शकों का भारी जमघट था। प्रतियोगिता प्रारम्भ हो चुकी थी। निर्णायक और दर्शक दम साधे तैराकों को देख रहे थे।

देखते ही देखते दो तैराक सबसे पहले निश्चित स्थान पर तैरते- बढ़ते दिखे। ‘वे आ गये- वे आ गये’ का भारी शोर बढ़ता गया। बात की बात में अन्तिम झटके में एक आगे और दूसरा तैराक एक कदम पीछे निश्चित स्थान पर पहुँच गये। निर्णायक ने उन्हें संभालते हुए निर्णय दे दिया। पहला स्थान अश्वघोष को मिला। दूसरे स्थान पर नगर के सबसे धनवान् और विख्यात पुरुष की अति सुन्दर कन्या कपिला थी। यवन कुल की कन्या कपिला की सुन्दरता नगर में चर्चा का विषय बनी हुई थी। अश्वघोष पुरोहित कुल का था। वह साकेत महाविद्यालय का होनहार विद्यार्थी और कुशाग्र कवि माना जाता था। इस तैराकी प्रतियोगिता के बाद दोनों का मेल-मिलाप धीरे-धीरे बहुत बढ़ गया।

कपिला साकेत की यवन नाट्यशाला की नायिका के रूप में प्रसिद्ध होती चली जा रही थी। इधर अश्वघोष विद्वानों की गिनती में आ चुका था। राज्य भर में लोग उसकी कविताओं को झूम-झूम कर गाते थे। अश्वघोष के कई नाटक भी खेले गये। कपिला उप नाटकों में नायिका के रूप में अभिनय कर चुकी थी। इस तरह कपिला और अश्वघोष का मेल-मिलाप बढ़ता गया। कपिला विदुषी थी और अश्वघोष विचारक एवं कवि। दोनों में पारस्परिक वैचारिक साम्य था। यह वैचारिक साम्य भावनात्मक एकात्म में कब बदला पता ही न चला।

अश्वघोष के पुरोहित पिता कपिला और अपने पुत्र के प्रेम को जानकर चौंक गये।

अश्वघोष की माता को अपने पति का यह व्यवहार पसन्द नहीं आया। वह यवन कन्या कपिला के ज्ञान व गुणों के कारण उससे अतिशय स्नेह करने लगी थी।

युवक अश्वघोष कपिला से विवाह करना चाहता था। उसकी माँ यह सुनकर बड़ी प्रसन्न हुई। कपिला के माता-पिता को कोई एतराज न था। अश्वघोष उनके निवास स्थान पर कपिला से मिलने जाता था। अपनी कन्या की यही इच्छा जानकर उन्हें प्रसन्नता थी, लेकिन अश्वघोष के पिता एक यवन कन्या को पुत्र वधू बनाने के पक्ष में नहीं थे। इसके उपरान्त भी उसकी माँ अपने उत्साह के कारण पति से नाराज हो रही थी। अश्वघोष इस कारण बड़ा चिन्तित रहने लगा। बार-बार पूछने पर उसने कपिला को अपने पिता को जिद की बात बता दी। सारी बात सुनकर वह सन्न रह गयी। उसके सामने अब कोई रास्ता न था, क्योंकि वह सोच रही थी कि अश्वघोष के बिना उसका जीवन असम्भव है।

कई दिन बीत गये और इन दिनों में वे दोनों आपस में मिल भी न सके। दोनों निराश होकर कुछ सोच नहीं पा रहे थे। कपिला की माँ ने बेटी की हालत देखकर उसे नानी के पास भेजने की बात चलायी। वह सोचती थी कि वहाँ जाकर उसका मन बदल जायेगा। कपिला के पति इस समय परदेश गये थे। कपिला मौन बनी रही। दिन गुजरते गये। गुजरते दिनों के साथ उसका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया।

अश्वघोष कई दिन पहले कपिला से मिला था। इधर वह रोगी की तरह निराहार पड़ गया था। उसकी माँ बड़ी दुःखी हो रही थी। वह बेटे के दुःख से परिचित थी। उसने अपने हठी पति को मनाने की बहुत कोशिश की, परन्तु उस पर कोई असर न पड़ा। इधर अश्वघोष एवं कपिला की हालत दिनों-दिन बिगड़ती जा रही थी। दोनों की ही माँ चिन्तित, परेशान थीं।

आखिरकार ये दोनों अपने- अपने बच्चों की परेशानी लेकर महर्षि ज्योतिर्धर के पास गयीं। ज्येतिर्धर वैदिक धर्म एवं बौद्धधर्म के पारंगत विद्वान ही नहीं, लोकोत्तर सिद्ध भी थे। सभी समुदायों-सम्प्रदायों में उनका भारी मान-सम्मान था। उनकी दैवी शक्ति एवं अलौकिक सामर्थ्य से सभी परिचित थे। दोनों माताओं की बात सुनकर उनकी दृष्टि शून्य में टिक गयी। कुछ पल शून्य की ओर ताकते हुए वे हल्के से मुसकराये, फिर उनको सम्बोधित करते हुए बोले, कल आप दोनों अपने बच्चे को लेकर आना। लेकिन महाप्रभु। ....वे दोनों ही कुछ कहते-कहते रुक गयीं। उनके मन की बात भाँपते हुए वे बोले- चिन्ता न करो, कल वे दोनों इतने स्वस्थ हो जायेंगे कि अपने पाँवों पर चलकर यहाँ आ सकें।

अगले दिन कपिला एवं अश्वघोष अपनी माताओं के साथ उनके सामने थे। अपनी भेदक दृष्टि से देखते हुए महर्षि ज्योतिर्धर उनसे कहने लगे-क्या तुम दोनों सचमुच एक-दूसरे से प्रेम करते हो?

निःसन्देह! दोनों ने लगभग एक साथ कहा।

अपने मन में झाँको अश्वघोष और कपिला तुम भी। तुम दोनों ही पारदर्शी विद्वान हो, फिर क्या यह नहीं जानते कि प्रेम दैवी तत्व है, पार्थिव नहीं। यह लोकोत्तर एवं अतीन्द्रिय होता है, लौकिक एवं एन्द्रिक नहीं। क्या तुम दोनों इतना भी नहीं समझते कि प्रेम देहगत नहीं, आत्मगत होता है।

उन दोनों ने ही सिर झुका लिया।

इधर महर्षि कह रहे थे, बोलो, क्या तुम सच्चे प्रेम के लिए तत्पर हो।

हाँ! अबकी बार उनमें दृढ़ता थी।

तब मोह से मुक्ति पाकर आत्मपरायण होकर जिओ। यह समूचा विश्व विश्वात्मा का ही स्वरूप है। इसकी सेवा करते हुए तुम दोनों की आन्तरिक चेतना परस्पर एकात्म हो सकेगी। जाओ, अपने लोकोत्तर प्रेम का आदर्श लोक के समक्ष चरितार्थ करो।

इसके बाद कपिला एवं अश्वघोष परम त्यागी हो गये। अश्वघोष ने भदन्त रक्षित से दीक्षा ली। उन्होंने वैदिक दर्शन के साथ बौद्ध और यवन-दर्शन का पारगामी अध्ययन किया। सम्राट कनिष्क ने उनका उपदेश सुनकर बौद्ध धर्म अपना लिया। इसके साथ वह उन्हें अपनी राजधानी पेशावर ले गया। कुछ दिन वहाँ बिताकर अश्वघोष ने गान्धार में एक बड़ा महा विद्यालय स्थापित किया। यहाँ मध्य एशिया तक के विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे।

अश्वघोष मूल रूप से कवि और नाटककार थे। सच्चे प्रेम का मर्म जानने के बाद वे परम त्यागी बौद्ध आचार्य हुए। उनके लिए बुद्धचरित और सोन्दरानन्द नाटक, विश्व के अमर काव्य संस्कृत भाषा में प्राप्त हैं। उन्होंने कपिला, अपनी माता, साकेत नगर और सरयू नदी को सदा याद रखा और कभी न भुलाया। उनके काव्य में सच्चे प्रेम की ये स्मृतियाँ सदा-सर्वदा के लिए स्थान पा गयीं।


मानवी काया की विलक्षण संरचना पर एक धारावाहिक लेखमाला- - अड़सठ तीरथ हैं घट भीतर...(2)

रहस्यों से भरी मानवी काया हर किसी के लिए एक चुनौती आज भी बनी हुई है। उन सभी चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए भी, जो चीरफाड़ करके उसके बारे में जानना-समझना चाहते हैं, उन गुह्य विज्ञानियों के लिए भी जो साधना की गहराई में जाकर उसी काया को एक प्रयोगशाला बनाकर भाँति-भाँति के प्रयोग करना चाहते हैं, जिनका शास्त्रों में वर्णन है। इस ‘शरीरक्षेत्र’ के बारे में मानवीत्वचा, अस्थिकवच, रक्तवाही वे हृदय-संस्थान तथा श्वाँस-संस्थानों की चर्चा विगत अंक में की जा चुकी है। जिस शरीर को मनुष्य इतने प्रेम से पालता, पोसता, सींचता है, उसके बहिरंग की मल-मल कर धुलाई-सफाई करता है, उसके बारे में वस्तुतः वह कितना जानता है- यह रहस्योद्घाटन उपरोक्त संस्थानों के परिप्रेक्ष्य में विगत अंक में किया जा चुका है। अब कुछ और अंगों-संस्थानों की चर्चा करें।

“शरीरमाद्यम खलु धर्मसाधनम्” की, की जाती रही व्याख्यानुसार इस शरीर को स्वस्थ बनाये रखना मनुष्य मात्र का एक परम कर्तव्य है, एक धर्म है। यह जिस प्रारंभिक अंग या संस्थान के द्वारा सधता है, उसका नाम है- पाचन-संस्थान इसी के लिए व्यक्ति कमाता, अगणित प्रकार के पुरुषार्थ करता देखा जाता है तथा इसी की पूर्ति के लिए नीति-मर्यादा के नियम छोड़कर ऐसे कार्य कर बैठता है, जिस पर शैतान को भी शर्म आने लगती है। आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है यह। वस्तुतः क्षुधा-भूख एक ऐसी प्रारम्भिक आवश्यकता है जिसकी पूर्ति जन्म लेने वाले शिशु से लेकर अंतिम साँस गिनने वाले बूढ़े तक को करने की आवश्यकता पड़ती है। इतने पर भी बहुत कम जानते हैं कि जितना हम खाते हैं या खाने का जुगाड़ बिठाते हैं, इतने की आवश्यकता इस संस्थान को कभी नहीं रहती। जैसी इस संस्थान की बनावट है वैसा भोजन बहुत कम अनुपात के व्यक्ति स्वयं को दे पाते हैं, जो खाते हैं- विकृत स्थिति में। मात्र छोटी सी ढाई इंच की सवा इंच मोटी जिह्वा पर बैठी 9000 टेस्टबड्स (स्वादेन्द्रियाँ) की खातिर मनुष्य इसी से अपनी कब्र खोदता रहता है। खलील जिब्रान की यह कथनी गलत भी नहीं है, जब आज हम जंक फूड के नाम पर टनों की चापत देखते हैं।

भोजन के मुँह में आते ही प्रायः डेढ़ लीटर की मात्रा में प्रति 24 घंटे अविरल प्रवाहित होने वाले ‘सेलाइवा’ या लार की भूमिका प्रमुख हो जाती है। क्योंकि ठीक से चबाने इससे घुल-मिलकर नीचे जाने पर ही भोजन ठीक से टूटकर पच पाता है। आहार नली जिसे ‘ईसोफेगास’ कहते हैं, प्रति सेकेण्ड दो इंच की गति से इस भोजन को आमाशय में पहुँचाती है। यह नली व इसके अन्दर की माँसपेशियाँ इतनी सशक्त हैं कि यदि मनुष्य शीर्षासन की स्थिति में भी भोजन करे, तो भी ये भोजन आमाशय में ही पहुँचाएँगी, गले से नीचे उतरने के बाद वापस मुँह से बाहर नहीं निकलने देंगे।

आमाशय जिसमें अति तीव्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल होता है, ऊपर से आये भोज्य पदार्थ को तोड़-तोड़कर अच्छी तरह मथता व अंतःस्रावों से सराबोर कर देता है। यही अम्ल यदि त्वचा को छू जाए तो छेद कर दें, किन्तु जब तक सामान्य मात्रा में स्रवित होता रहता है, यह आमाशय की परत को जो कि अत्यधिक नाजुक होती है, प्रभावित नहीं करता। मनुष्य की खान-पान की आदतें जब बिगड़ जाती हैं तो यही अम्ल अपने ही जन्मदाता आमाशय की परत को नष्ट कर ‘पैष्टिक अल्सर’ का कारण बन जाता है। आज जितनी भी जानकारी हमें विज्ञानसम्मत रूप में इस अंग के बारे में मिल पायी है, उसका श्रेय एक कैनेडियन को जाता है। सत्रहवीं शताब्दी में गोली लगने से घायल इस व्यक्ति ने किसी तरह बैण्डेज बाँधकर अपने आमाशय तक हुए छेद को बंद कर अपने को बचाया था। उस छेद के भरने पर भी उसमें से निकलने वाले स्राव का अध्ययन कर 1833 में अपनी जानकारी विश्व को देने वाले एक साथी चिकित्सक के बलबूते आज का चिकित्सक समुदाय जानता है कि पाचन की प्रक्रिया में आमाशय की भूमिका क्या होती है? आज एण्डोस्कोपी, टी.वी., कैमरा आदि द्वारा अन्दर तक की झाँकी देखी जा सकती है, पर जब यह साधन नहीं थे, तब हम इसके बारे में जान पाये थे, मात्र एक जिजीविषा सम्पन्न व्यक्ति के बलबूते, जिसने अपने घाव के साथ जिन्दगी के तीस वर्ष काटे। इस अंग के विषय में एक और विलक्षण तथ्य यह है कि यदि इसे थोड़ा बहुत काटकर या समूचा भी निकाल दिया जाय, तो भी शरीर पर कोई खास असर नहीं पड़ता। यह आये भोजन को सोखता नहीं मात्र तोड़ता व अच्छी तरह मथ देता है। यदि यह काम बाहर से करके भेज दिया जाये, तो बिना आमाशय वाला व्यक्ति भी वर्षों जिन्दा रह सकता है। पेट के कैंसर व बड़े पैष्टिक अल्सर में आज यही किया जाता है एवं बिना एक महत्वपूर्ण अंग के भी शरीर काम करता रहता है। है न कुछ विलक्षण बात। हर कोई यह सोचे कि मेरे बिना काम नहीं चल सकता, तो यह बात तो ठीक नहीं है। शरीर की अनुकूलन क्षमता इतनी अधिक है कि वह अपनी ओर से बहुत कुछ मनुष्य का साथ देने का प्रयास करता है। मनुष्य ही है तो शरीर को यूँ ही नष्ट करता रहता है।

छोटी आँतें तो आमाशय के बाद आरम्भ होती हैं, लम्बाई में प्रायः सप्त गज (21 फीट के बराबर-2.74 मीटर) होती है। इनकी आँतरिक सतह इतनी ज्यादा लहरदार सिकुड़नों की बनी होती है कि इसका परिमणुत्वचा के सम्पूर्ण क्षेत्रफल (18 वर्ग फीट) की तुलना में दस गुना अधिक होता है। यह मात्र अवशोषण प्रक्रिया को एन्ज़ाइम के सम्मिश्रण के बाद बढ़ाने के लिए ताकि खाया हुआ अधिकाधिक उपयोगी भाग रक्तवाही संस्थान में आ जाए। भोजन ग्रहण करने के चार घंटे के बाद आँतों में पहुँचता है। यहाँ वह पाँच घंटे रहता है तब जाकर बड़ी आँत में पहुँचता है, जहाँ से बाहर जाने में उसे 6 से 12 घंटे लगते हैं बड़ी आँत में वही हिस्सा पहुँचता है। जिसकी शरीर को आवश्यकता नहीं है। मात्र पानी व आँतों के रसस्राव यहाँ सोखे जाते हैं। शेष अंदर की मजबूत माँसपेशियों द्वारा धकेल कर बाहर कर दिया जाता है। सारी प्रक्रिया स्वचालित है। शाकाहारी के लिए ही यह आँतों की बनावट बनी है। जितना रेशेदार-सेल्युलोज व रफेड प्रधान भोजन होगा उतना ही यह समग्र संस्थान सही ढंग से चलेगा। जितनी चिकनाई-मसाले आदि की बहुलता होगी, उतनी ही आँतों की कठिनाई बढ़ती जायेगी। मनुष्य को ‘हर्बीवोटस’ माना गया है। इसी के लिए उसके दाँतों की बनावट कुत्तों-चीतों या बिल्लियों के दाँतों से अलग है। उसका जबड़ा चबाने के लिए बना है, हाथों में पंजे नहीं है, आँतों की दीवालों में (अन्दर की सतह में) पाऊच की तरह रास्ते बने हैं जिसमें से रेशेदार शाकाहारी भोजन तो प्रेम से गुजर जाता है, माँस अटक जाता है व सड़ता रहता है। यही नहीं आँतें माँसाहारियों की तुलना में प्रायः तीन गुनी लम्बी हैं, ताकि भोजन अच्छी तरह पीस कर घुल-मिल कर अवशोषित हो, माँस तो इतनी बड़ी आँत में सड़ने लगता है साथ ही आमाशय का अम्ल भी इतना तेज नहीं होता कि माँस को तोड़ सके। इतने सब कारण सामने होते हुए भी लोग पेट को कब्रिस्तान क्यों बना लेते हैं, समझ में नहीं आता-

उपनिषद् कहते हैं।, “अन्नो वै मनः।” अन्न ही मन का निर्माण करता है। जैसा खाए अन्न वैसा बने मन- “आहार शुद्धौ-सत्व शुद्धौ” की उक्तियाँ तभी सार्थक होती हैं जब हम आहार की शुचिता पर, पवित्र साधनों से उसके उपार्जन व उसके सफाई से लेकर आँतरिक ‘कैलोरी प्रधान’ नहीं- शरीर- शुद्धि एवं पुष्टि वाले पक्ष को महत्व देंगे। इस दिशा में लीवर अर्थात् यकृत का महत्व समझना और भी जरूरी है। काव्य में इसका स्िन ‘जिगर’ के नाम से बड़े सम्मान के साथ लिया जाता रहा है, पर इसका अंदरूनी कुब्बत या हिम्मत-जिजीविषा से कोई संबंध नहीं है। अगर इसका महत्व है, तो उन पाँच सौ से भी अधिक महत्वपूर्ण कार्यों के कारण, जिनमें इसकी सबसे प्रधान भूमिका है। आकार में यह शरीर बड़ा वजन में प्रायः डेढ़ किलो का है। पेट में दायीं ओर से बायीं ओर बड़ी दूर तक यह फैला होता है। यकृत को एक प्रकार का शुद्धिकरण यंत्र कहा जा सकता है, जिसमें इसकी भूमिका बड़े खण्डों को छोटों में तोड़कर रक्त में भेजने की रहती है। किसी भी समय देख लिया जाये तो पूरे शरीर का न्यूनतम पन्द्रह प्रतिशत तक यकृत में ही विराजमान् रहता है। यहाँ तक कि आराम के समय भी प्रति मिनट 1200 से 1300 मिलीमीटर रक्त इसमें से सतत प्रवाहित होता रहता है। टूटे भोज्य पदार्थों को शर्करा में बदलकर यह पूरे शरीर में ऊर्जा प्रवाहित करता रहता है। इस अंग का यदि तीन चौथाई हिस्सा काटकर निकाल भी देना पड़े, तो शेष उतनी पुनर्निर्माण की क्षमता होती है कि कुछ ही हफ्तों में पूरा लीवर नया बनकर तैयार हो जाता है। यह इसकी सबसे बड़ी विलक्षणता है। रक्त जो यकृत में प्रवेश करता है। जिन जहरीले तत्वों से भरा होता है, उनकी शुद्धि जिस प्रकार यह अंग करता है उसके लिए इतना ही जटिल संयंत्र यदि बनाना पड़े, तो एक पाँच मंजिल की पूरे ब्लाक की फैक्टरी खड़ी करनी पड़ेगी। इतनी महत्वपूर्ण भूमिका भोजन शुद्धि के क्षेत्र में दस अंग की है कि इसकी महिमा पर ढेरों ग्रन्थ-पाठ्य पुस्तकें लिखी गयी हैं। यकृत का प्रत्यारोपण इसीलिए सर्वाधिक कठिन एवं अत्यधिक महंगा माना जाता है।

यदि हम विटामिन बी समूह अतिरिक्त मात्रा में न लें, तो यकृत के पास इतना रिजर्व स्टॉक है कि यह चार वर्ष तक अपने अंदर से ही उसकी पूर्ति करता रह सकता है। यों विटामिन ए, बी, डी, ई, के का प्रचुर भण्डार लीवर के अन्दर मौजूद होता है व आवश्यकता पड़ने पर उनकी पूर्ति भी होती रहती है फिर भी आहार में उनका अंश बना रहने पर यह रिजर्व स्टॉक सदा भरा रहता है। लीवर बाइलसाल्ट्स व कोलेस्ट्राल का जन्मदाता है। बाइल (पित्त) का काम चिकनाई को वैसे ही साफ कर रक्तवाही संस्थान में सूक्ष्म घटकों व शर्करा रूप में पहुँचाने का है, जैसे किसी ग्रीस जैसी चिकनी प्लेट को सिन्थेटिक डिर्जेन्ट जैसे ‘रिन’ आदि साफ कर देते हैं। कोलेस्टरोल रक्त में बढ़ता तब है जब आहार में चर्बी की मात्रा अधिक होने-सही व्यायाम न होने, आहार से बंधी गलत आदतों के कारण यकृत पर सारा भार आ जाता है। आज सभी इसकी रक्त में मात्रा के विषय में सतर्क बने हुए हैं, क्योंकि यही रक्त वाहिनी नलिकाओं में जमकर थक्का बनाकर हृदय रोग व अन्य घातक-मारक रोगों का जन्मदाता है।

यकृत के बहुत नजदीक के रिश्तेदार हैं- स्प्लीन (प्लीहा), गाल ब्लैडर (पित्ताशय) एवं पैन्क्रियाज (अग्न्याशय)। ये तीनों आँतों से अवशोषित भोज्य पदार्थ पर अपने एन्जाइम्स की प्रतिक्रिया पर ‘पोर्टलवेन’ के द्वारा शुद्धि प्रक्रिया हेतु समग्र रक्त को लीवर भेजते हैं। वहाँ पर इनमें मौजूद बैक्टीरिया, मृतपदार्थ, मृतप्राय रक्तकोष आदि को फिल्टर कर रक्त में विटामिन्स फेट, प्रोटीन व ग्लूकोज मिलाकर मुख्य संस्थान में भेज देता है, जो हृदय द्वारा शरीर के हर जीवकोष में पहुँच जाता है। यह प्रक्रिया एक स्वस्थ लीवर द्वारा भली भाँति हर क्षण सम्पन्न होती रहती है। वायरस (हिप्टोटाइटिस बी. व अन्य इसके साथी) का हमला अथवा भोजन में शराब की अत्यधिकता के कारण जब इस अंग के कोषों में विष तत्व- वसा पदार्थ जमा होने लगते हैं, तो इसकी कार्यक्षमता अत्यधिक प्रभावित हो, पूरे शरीर को अस्वस्थ कर देती है। भोजन में माँसाहार, शराब, चर्बी की अधिकता, खान पान की अत्यधिक अनियमितता, कुपोषण आदि के कारण यही एक अंग ऐसा है, जिसकी हड़ताल सारे शरीर को विजातीय द्रव्यों से युक्त कर सारा कामकाज ठप्प कर देती है। अकेला यही अंग यदि सही ढंग से साथ लिया जाय, आहार-विहार का संतुलन सुनियोजित ढंग से चलता रह सके, तो कोई कारण नहीं कि ‘जीवेम शरदः शतम्’ की उक्ति को सार्थक न किया जा सके। आहार संयम के साथ एक बड़ी व्यापक रेंज वाली अनुकूलन क्षमता वाले अंग जब मनुष्य के पास मौजूद हों, तब भी वह क्यों बीमार पड़ता, त्रास सहता देखा जाता है- यह सोच-सोचकर बार-बार मन कहता है कि अड़सठ तीरथ वाली पंचकोश, षट्चक्रों वाली इस मानवी काया को साधना मनुष्य का सर्वप्रथम पुरुषार्थ होना चाहिये। आध्यात्मिक साधना क्रम इसके बाद ही सफल होते देखे जा सकते हैं। (अगले अंक में जारी)


पतन के कगार पर खड़ी पश्चिम की तथाकथित सभ्यता

भारत का ‘बहुसंस्कृतिवाद’ ही नूतन विश्व का आधार बनेगा

पतन के पश्चात् उत्थान एवं ध्वंस के बाद ही सृजन की असीम सम्भावनायें साकार होती हैं। पुराने खण्डहर के ढहने पर ही भव्य भवन का खड़ा होना सम्भव हो पाता है। दुनिया आज संक्रमण-काल की इन्हीं कष्टकारी परिस्थितियों से गुजर रही है। संसार की सारी व्यवस्थायें टूटकर चरमराने लगी हैं। अपनी सभ्यता को सर्वप्रभुता सम्पन्न घोषित करने वाला पश्चिमी जगत भी आज पतन के कगार पर खड़ा है। रोम, ग्रीस की ही तरह यूरोप की सभ्यता और अमेरिका का बहु-संस्कृतिवाद भी अपनी टूटन और दरकन के भय से आशंकित है। अमेरिका इसके समाधान के लिए आर्थिक व तकनीकी पुरुषार्थ की बात उठा रहा है, जो नदी के तीव्र उफान के सामने बालू-सा बहता नजर आ रहा है। ऐसी विषम स्थिति में सारे विश्व की नजर पुनः भारतीय-संस्कृति एवं सभ्यता की ओर उठ रही है। समस्त पाश्चात्य मनीषी एकमत से स्वीकार कर रहे हैं कि भारत से ही एक नई विश्व-सभ्यता जन्म लेगी।

सभ्यता तथा संस्कृति दोनों मनुष्य की सृजनात्मक क्रिया का परिणाम है। जब यह क्रिया उपयोगी लक्ष्य की ओर गतिमान होती है, तब सभ्यता का जन्म होता है और जब यह मूल्य चेतना को प्रबुद्ध करने की ओर अग्रसर होती है तब संस्कृति का उदय होता है। अतः सभ्यता-साँस्कृतिक क्रिया की ही अनुसंगिक उपज या परिणाम है। राधाकमल मुखर्जी ने ‘द डस्टिनी आफ सिलाइजेशन’ में सभ्यता की परिभाषा- मानव मूल्यों और दुनिया के बीच उनके तरह-तरह के प्रयोगों एवं श्रेणियों में खुले तथा आत्म स्थायित्व प्रदान करने वाले विनियम के रूप में की है। इतिहासवेत्ता डा. मुखर्जी के अनुसार, सभ्यता की उच्चतम स्थिति तब होती है, जब वह मानव की आत्मा को विकास और इतिहास के परे, यहाँ तक कि स्वयं अपने परे जाने के लिए प्रेरित करती है, जार्ज मैकाल्ये ट्रेवेल्यन के मत से निष्काम बौद्धिक जिज्ञासा यथार्थ सभ्यता का जीवन-रस है। महान मनीषी नार्ल्ड टायनबी ने इसका और भी खूबसूरत ढंग से उल्लेख किया है। वह कहते हैं- सभ्यता गति है, स्थिति नहीं, यात्रा है, बन्दरगाह नहीं। सभ्यता किसी संस्कृति की चरम कृत्रिम अवस्था का नाम है। सभ्यताएँ नैसर्गिक धरती के स्थान पर आने वाले कृत्रिम प्रस्तर निर्मित नगर है।

आज विश्व -सभ्यता चारों ओर से टूट दरक रही है। इसमें सब ओर से दरारें ही दरारें दिखाई दे रही हैं। रोमन, ओयभन, ग्रीस आदि सभ्यताओं की अब स्मृति ही शेष रह गयी है। अर्नाल्ड टायनबी के मतानुसार, सभ्यता का अवसान जरूरी है, ताकि मानवीय पुरुषार्थ नूतन सभ्यता की खोज एवं विकास कर सके। इतिहास की यह अश्रुतपूर्व पुनरावृत्ति वर्तमान संक्रमण काल में स्पष्ट दिखाई दे रही है। सुविख्यात चिन्तक मैथ्यू मेल्को अपनी कृति ‘द नेचर आफ सिविलाइजेशन’ में पश्चिमी सभ्यता के विखण्डन के लिए दो मुख्य बिन्दुओं की ओर संकेत करते हैं। पहली बात यह है कि पश्चिमी दुनिया अपनी सभ्यता को सर्वश्रेष्ठ मानती है और दूसरी बात यह है कि इसी के माध्यम से विश्व-सभ्यता की कल्पना की गई है। इसके प्रसार के लिए हर सम्भव उपाय करने में वे मशगूल हैं। अन्य सभ्यता की अच्छाइयाँ उन्हें स्वीकार नहीं। मैथ्यू मेल्को के अनुसार, सम्भवतः इसी संकीर्ण मनोवृत्ति के कारण उन्हें विकास के नाम पर पतन ही हाथ लगा है।

पश्चिमी दुनिया के नाम पर आज अमेरिका ही सामने दिखाई देता है। यूरोप ने भी इसे आत्म स्वीकृति दे दी है। वैसे पाश्चात्य सभ्यता का मूल स्रोत यूनानी सभ्यता है। यूनानी सभ्यता का प्रधान भाव है- आत्मप्रदर्शन। इस तरह पश्चिमी सभ्यता है। यूनानी सभ्यता का प्रधान भाव है- आत्मप्रदर्शन। इस तरह पश्चिमी सभ्यता का मेरुदण्ड शुरुआत से ही विस्तार और आत्मप्रदर्शन रहा है। आर्थर एम. होसिंगर के अनुसार, पश्चिमी सभ्यता होने वाली विशेषताएं- व्यक्ति उदारता, प्रजातन्त्र, साँस्कृतिक स्वतंत्रता व मानवाधिकार हैं। हालाँकि ये विशेषताएँ यथार्थ में वहाँ कितनी जीवंत हैं- इसे अब धीर-धीरे सारी दुनिया जान चुकी है। वैसे भी ये विशेषताएँ तो तब बरकरार रहतीं- जब यूरोप और अमेरिका अपने मूल अस्तित्व को बनाये रख पाते। 1500 साल पुरानी पश्चिमी सभ्यता ने अब अपनी दिशा बदल दी है। आर्थिक रूप से सम्पन्न वहाँ का समाज आज बेहद आधुनिकता के दौर से गुजर रहा है।

इसी के साथ वहाँ की सभ्यता भी किसी न किसी नये संकट से रोज घिरती जा रही है। यों इसका अनुभव काफी समय अधिकाँश चिन्तक करते रहे हैं, मगर यह कोई नहीं बता पाया कि इसका क्या कारण है और इससे बचने का उपाय क्या है? पहले-पहल इस संकट की अनुभूति ओसवाल्ड स्पैंगलर को को हुई थी, जिसने ‘डिक्लाइन आफ द वेस्ट’ लिखकर सारे संसार को चौंका दिया था। इस संकट की अनुभूति के प्रमाण टी.एस. इनियट और अल्हुअस हक्सले में भी पाते हैं। इसका कुछ अहसास और आभास महात्मा गाँधी को भी हुआ था। सम्भवतः इसी वजह से वे पश्चिमी आधुनिकता को शंका की नजर से देखते थे। श्री अरविन्द भी पश्चिमी सभ्यता से सहमत नहीं थे। प्रसिद्ध इतिहासकार अर्नाल्ड टायबी सभ्यता और संस्कृति में तो अन्तर करते ही हैं, साथ में यह भी कहते हैं कि यांत्रिक उन्नति न तो साँस्कृतिक विकास के लिए जरूरी है और न ही उसका सहायक है। उनका विचार है कि कभी-कभी यांत्रिक उन्नति सभ्यता के लिए अवरोध तथा अवनति में सहायक होने लगती है। इतिहास में ऐसे अवसर भी आयें है जब यांत्रिक प्रगति के कारण सभ्यताओं का पतन हुआ, सभ्यताओं की प्रगति तो परिस्थितियों द्वारा दिये जाने वाले नैतिक प्रत्युत्तर के द्वारा होती है।

केरोल क्वीगले ने आर्थिक व व्यापारिक दौड़ में भागती पश्चिमी दुनिया को अवसाद और अवनति का प्रतीक माना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि पश्चिमी सभ्यता सन् 370 और 750 के बीच विकसित हुई। जिसमें सेमेटिक, सारासेन और बारबेरियन संस्कृति का सम्मिश्रण हुआ। इसकी विकासावधि तकरीबन आठवीं से दसवीं शताब्दी के अन्त तक रही। इस दौरान इसमें गति, प्रसार व संकुचन के अनेकों दौर आए। वर्तमान परिवेश में यह सिक्युरिटी जोन के रूप में अनेक आन्तरिक युद्धों, गृह युद्धों तथा अन्य कई तरह की समस्याओं से उलझा हुआ है।

आज आश्चर्यजनक रूप से पश्चिमी सभ्यता के सारे रंगीन अरमान और उपभोक्तावादी संस्कृति के मनसूबे पतन-पराभव के गर्त में ढहते नजर आ रहे हैं। उत्थान की कोशिशें तो बहुत हुईं, पर सबकी सब बाहरी तौर पर व्यक्तित्व-निर्माण चरित्र निर्माण एवं साँस्कृतिक मूल्यों के अभाव में सैनिक, राजनैतिक तथा आर्थिक संगठनों के प्रयास भी बालू के महल की तरह ढह गये। पतन के कारणों में आधुनिक व्यय की दर में कमी एवं बड़े और आर्थिक सम्पन्न देशों की तुष्टिकरण की नीति को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भौतिक स्वरूप को भी बरकरार नहीं रखा जा सका एवं सभ्यता के सारे कारक टूटकर बिखरने लगे। दूसरी ओर अर्थाभाव, जीवन-मूल्यों का ह्रास, साँस्कृतिक संवेदना की कमी समाज को खोखला करती चली गयी। इन समस्त समस्याओं से घिर कर पाश्चात्य सभ्यता पतनोन्मुखी हो गयी है। केरोल क्वीगले ने ‘इवोल्यूशन ऑफ सिविलाइजेशन’ में इस पर चिन्ता जाहिर करते हुए कहा है कि जब कोई सभ्यता या समाज स्वयं की सुरक्षा एवं सामर्थ्य की दृढ़ इच्छाशक्ति को खो देता है, तो उसे कोई नहीं बचा सकता। राष्ट्र की इसी कमजोरी पर चारों ओर से षड्यंत्रकारी, अनैतिक व अलगाववादी तत्वों का प्रहार शुरू होता है। प्रकृति इसी विपन्न परिस्थिति में अपने गर्भ से एक नयी और शक्तिशाली सभ्यता का जन्म हो, किन्तु उनका मानना है कि यह नयी सभ्यता अपना आत्मगौरव भारत के अतीत से पाएगी, क्योंकि पाश्चात्य सभ्यता में तो आत्मा जैसा कोई तत्व है ही नहीं वह तो सिर्फ एक चमकता खोल भर है।

पश्चिमी दुनिया की सम्पूर्ण विशेषता उसकी आर्थिक सम्पन्नता पर टिकी है। बाह्याडंबर ही यहाँ का पारम्परिक मूल्य एवं मानदण्ड है। हाँ, जनसंख्या में कमी, इसकी खासियत जरूर है- विशेषकर मुस्लिम देशों की अपेक्षा। इसी वजह से यह समृद्धि के शिखर पर पहुँच पाया है। इसके बावजूद पूर्वी एशिया की तुलना में यहाँ प्राकृतिक संसाधनों की कमी, बचत व आर्थिक विकास दर में न्यूनता स्पष्ट दिखाई देती है। इसका सबसे अहम् मुद्दा है विज्ञान व टेक्नालॉजी, जिसमें इसने तेजी से विकास किया है। हालाँकि इसके लिए इसने संसार भर से उच्च शिक्षित प्रतिभावानों का हरण किया है। यहाँ से प्रारम्भ होता है ‘अमेरिका का बहुसंस्कृतिवाद’। तमाम देशों के लोगों एवं उनके परिवारों का आ बसने के कारण अमेरिका की अपनी मूल संस्कृति और सभ्यता समाप्त-सी हो गयी है। यूरोप की स्थिति इससे और भी जटिल है।

बहुसंस्कृतिवाद मुख्यतः इन्हीं प्रवासियों के कारण पैदा हुआ है। सर्वप्रथम प्रतिभाओं का आमंत्रण यूरोप में हुआ, फिर अमेरिका में। आज इनकी संख्या इतनी अधिक हो गयी है कि दोनों जगह के लिए यह घातक सिद्ध हो रहा है। इन दोनों संस्कृतियों के पास भारतीय संस्कृति की तरह ऐसा कोई रसायन नहीं है, जो सबके साथ समरसता स्थापित कर उसे आत्मसात् कर ले। आज के समय में पाश्चात्य संस्कृति के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है। यूरोप में यह समस्या अल्पसंख्यक मुस्लिमों द्वारा खड़ी की गई है, जिन्होंने यूरोप के जीवन-मूल्यों आचार-संहिताओं ?, रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं को नकार दिया है। अमेरिका के लिए यह परेशानी बहुसंख्यक हिस्पेनिक्स द्वारा लायी गयी है। हिस्पेनिक्स प्रवासियों को अपने देश में प्रवास दिये जाने के खिलाफ है, जिससे वहाँ संघर्ष की विस्फोटक स्थिति होने की सम्भावना है।

अमेरिका का अरमान है, समस्त विश्व का नियंत्रण अपने हाथों में थामना। इसकी सभ्यता आर्थिक एवं तकनीकी सम्पन्नता है। इसी के बलबूते वह अपना मनसूबा बाँधता है। बेंजामिन फ्रेंकलिन, थामस जेफरमेन, जान एडमस सरीखे नेताओं ने इसकी पुष्टि भी की है। पूर्व राष्ट्रपति थियोडोर रुश्जवेल्ट ने भी इसी को प्रतिपादित किया था। इसके परिणामस्वरूप आज अमेरिकी सभ्यता लगभग उस मुकाम पर पहुँच गयी है, परन्तु अपने साँस्कृतिक अस्तित्व को मिटाकर। आज हर अमेरिकन विचारक यह सोच रहा है कि साँस्कृतिक विविधता अच्छी बात है, परन्तु एक निश्चित मापदण्डों पर। साथ ही वहाँ के विख्यात मनीषी इस बात पर भी हैरान हैं कि भारतीय संस्कृति में आखिर वे मौलिक तत्व कौन से हैं, जिसकी वजह से इसने अपनी तरफ आने वाली हर सभ्यता एवं संस्कृति को अपनाकर भी स्वयं का मौलिक रूप बरकरार रखा है। सेम्युअल पी. हटिंगटन तो यहाँ तक कहते हैं कि अमेरिका को बहुसंस्कृतिवाद का सही एवं मौलिक रूप भारतीय संस्कृति के तत्वों को लेकर गढ़ना चाहिये। उनके अनुसार आज की दशा में तो अमेरिका यूनाइटेड स्टेट्स न होकर यूनाइटेड नेशन्स बनकर रह गया है।

बहुसंस्कृतिवाद पर अपना मन्तव्य व्यक्त करते हुए आर्थर एम. शेरिंनगर ने अपने शोध ग्रन्थ ‘द डिसयूनिटिंग आफ अमेरिका- रिफ्लेक्शन आन ए मल्टीकल्चरल सोसाइटी’ में लिखा- अमेरिका ने कभी भी विकास के लिए संस्कृति एवं आध्यात्मिक मापदण्ड नहीं अपनाये। इसी कारण यहाँ भिन्न-भिन्न संस्कृतियाँ आयीं और अपने ढंग से फैलती गयीं। कुछ ने तो स्वयं की भी पहचान खो दी। इन्हीं सब कारणों से अमेरिका अपनी मूलभूत सभ्यता का अस्तित्व खो बैठा तथा नई जातीय, साम्प्रदायिक, सामुदायिक एवं सामाजिक टुकड़ों में बँट गया।

अमेरिका के विपरीत यूरोप में सभ्यता का आधार धर्म है, किन्तु इस धर्म का मतलब कुछ कर्मकाण्डों एवं कृत्यों की कट्टरता भर है। आध्यात्मिक संवेदना का विस्तार नहीं। परिस्थितियों के अनुरूप यहाँ समस्या भी धार्मिक है। मैशी डोगन ने यूरोपीय सभ्यता की धार्मिक मान्यताओं के पतन को रेखांकित किया है; इनके अनुसार, यूरोप का केन्द्रीय बिन्दु क्रिश्चियेनिटी है, जिसका सतत् ह्रास होता जा रहा है। यहाँ पर सभ्यता के सारे मापदण्ड धर्म पर आधारित हैं। यूरोप में स्वीडिश सबसे अधार्मिक जातियों में गिने जाते हैं ये प्रचलित मान्यताओं को नकार कर लुथेरियन विरासत की माँग करते हैं। इस प्रकार की धार्मिक कट्टरता ने यूरोपीय सभ्यता को खण्ड-खण्ड कर दिया है। राबर्ट बुधनोव के मतानुसार, पश्चिमी सभ्यता किसी एक मत पर आधारित नहीं दीखती। यूरोप ने तो स्वयं को बचाने के लिए ईसाई, रूढ़िवादी और मुस्लिम सभ्यता के बीच एक रेखा खींचने की कोशिश की है ताकि सबका अपना अलग अस्तित्व बना रहे। अमेरिका भी इसे करना चाहता है, लेकिन उसे आशंका है कहीं इससे उसके यहाँ की प्रतिभाएँ पलायन कर जाए, क्योंकि इन्हीं के बलबूते तो वह नयी विश्व-सभ्यता का सपना देख रहा है।

पश्चिमी दुनिया में आर्थिक सम्पन्नता जितनी बढ़ी है, सहूलियत में जितनी बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है, नैतिक पतन उससे भी ज्यादा हुआ है। हर तरफ साँस्कृतिक पराभव, राजनैतिक अस्थिरता के दृश्य देखे जा सकते हैं। इन सबको चार बिन्दुओं में रेखांकित किया जा सकता है-

1- असामाजिक व्यवहार, जैसे अपराध, हिंसा, हत्या व ड्रग्स में वृद्धि।

2- पारिवारिक विखण्डन, अत्यधिक तलाक, कुँआरी गर्भावस्था आदि।

3- सामाजिक व्यवस्था का तार-तार होना।

4- बौद्धिक क्षमता का भारी मात्रा में दुरुपयोग एवं कार्यक्षमता में कमी।

सभ्यता के पतन में युद्ध भी बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका का निर्वाह करता है। युद्ध से सभ्यता चरमरा जाती है एवं विकास अवरुद्ध हो जाता है। इनमें भी गृहयुद्ध प्रथम है। युद्ध से मानव जाति पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। बोस्निया-चेचन्या तथा खाड़ी युद्ध इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। परमाणु हथियारों की होड़ तो और भी सर्वनाश बनती जा रही है। समाज में शान्ति एवं प्रगति के स्थान पर भय और आतंक का वातावरण गहरा रहा है। इसी भय से चीन, जापान, फ्राँस और अमेरिका आदि देश बचाव चाहते हैं।

सभ्यता की ये तमाम चुनौतियाँ पश्चिमी दुनिया खासतौर पर अमेरिकी लोगों में दो तरह से देखी जा सकती है- Discriptivity एवं Normaltivity- पहले के अंतर्गत प्रत्येक समाज को पाश्चात्य मूल्यों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों को अपनाने के लिए बाध्य करना। जो समाज इसे अमान्य ठहराये, उसे झूठा घोषित करना। दूसरे के दायरे में सारा विश्व आता है, जिसमें पश्चिमी सभ्यता को बलपूर्वक फैलाना है, लेकिन पश्चिमी दुनिया के ही सुविख्यात विचारक इन दोनों ही प्रवृत्तियों को हास्यास्पद बताते हैं ; उनके अनुसार, सार्वभौम विश्व-सभ्यता की स्थापना समग्र मानवीय प्रकृति के अनुरूप एवं अनुकूल तत्वों से ही सम्भव है। ये सभी तत्व यदि कहीं एक साथ देखे या पाये जा सकते हैं, तो वह भारतीय संस्कृति ही है। इसी के द्वारा लोग सही मायने में उच्च, प्रतिष्ठित, अधिक उदार, सर्वोच्च तार्किक एवं चरम सभ्य बन सकते हैं।

मार्क्सवाद की असफलता तथा सोवियत यूनियन के नाटकीय विखण्डन ने इस बात का सबूत मिल जाता है कि कोई भी राष्ट्र अपने मूलभूत मानवीय आदर्श एवं साँस्कृतिक परम्परा की गहरी नींव पर ही टिक सकता है। यथार्थ एकता और एकात्मकता, संस्कृति एवं सभ्यता के विकास से सम्भव है, न कि राजनीति एवं विज्ञान द्वारा। जेम्स कुर्थ ‘द रियल क्लैश’ में इसे और बारीकी से बताते हैं। इनके अनुसार, पश्चिमी जगत भले ही आर्थिक रूप से सम्पन्न एवं समृद्धिशाली हो, भले ही इसके अन्य देशों से अच्छे सम्बन्ध भी हों, परन्तु साँस्कृतिक उत्कर्ष के अभाव में यथार्थ विकास नहीं हो सका है। उनकी साँस्कृतिक संकीर्णता की झलक इसी बात में देखी जा सकती है कि एक अमेरिकन भारत के गाँव या श्रीलंका की गलियों में अपनत्व का बोध नहीं कर सकता, जबकि एक भारतीय ‘स्वदेशों भुवनत्रयम’ एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के साँस्कृतिक सूत्रों के आधार पर सारी दुनिया में अपनापन महसूस करता है।

माइकल होवार्ड ‘अमेरिका एण्ड द वर्न्ड’ में पाश्चात्य सभ्यता के पतन के तीन कारण गिनाते हैं। इनमें पहला है झूठ, दूसरा है अनीति और अन्तिम है औरों की भयभीत करने की आदत। होवार्ड के अनुसार, पाश्चात्य सभ्यता का तीव्र विकास बुनियादी नींव पर न होकर आभासी संरचना पर हुआ है। ये अपनी सभ्यता के जिन आदर्शों की बातें करते हैं, वे सिरे से उनमें ही नहीं हैं। होवार्ड ने इसे अनैतिक इसलिए कहा है क्योंकि पाश्चात्य सभ्यता अपने प्रचार-प्रसार के लिए कूटनीति पर टिकी है, जबकि किसी सभ्यता के विकास का आधार उसकी संवेदनशील मानवीय भावनाएँ होनी चाहिये। पतन का तीसरा कारण है- औरों को भयभीत करने की प्रवृत्ति। होवार्ड कहते हैं कि अधिकाँश पश्चिमी देश, जिनमें स्वयं अमेरिका भी शामिल है, दुनिया भर के विकासशील देशों को आर्थिक भय दिखाकर डराते रहते हैं। बात-बात में आर्थिक-प्रतिबन्ध की धमकी इनकी मानसिकता बन गयी है। यही सारी दुनिया अतीत में हुई बौद्धिक प्रगति को जबरदस्ती अपनी बताकर पेटेण्ट कानून से उसे प्रतिबन्धित करना, इसी भयभीत करने की प्रवृत्ति का दूसरा रूप हैं। उदाहरण के लिए समूचा विश्व एवं विश्वविख्यात इतिहासविद् जड़ी-बूटियों के ज्ञान, आयुर्वेद की सफलता सम्पदा को भारतीय होने, भारत में खोजे जाने के प्रमाण देते हैं, फिर भी अमेरिका जैसे देश नीम को पेटेण्ट कराकर उस पर अपना हक जताते हैं। इसी कारण केरोल क्वीगले ने बड़े दावे के साथ भविष्यवाणी की है- पश्चिमी दुनिया सही मायने में यथार्थ रूप में जब कभी सभ्यता का ‘क ख ग ’ सीखने की कोशिश करेगी, उसे भारत की शरण में जाना होगा। उन्होंने तो यह भी दावा किया है कि सन् 2015 तक भारत के प्रभाव से पाश्चात्य जगत अपने नूतन भविष्य का सपना साकार कर करेगा।

आज की विश्व प्रसिद्ध एवं बहुचर्चित पुस्तक ‘द क्लैश आफ सिविलाइजेशन एण्ड द रिमेकिंग आफ द वर्ल्ड आर्डर’ के लेखक सेम्युल पी. हंटिंगटन ने भी बड़े जोरदार ढंग से भारत की ओर संकेत किया है। इनके अनुसार, आज की सभ्यता एवं संस्कृति के अस्तित्व की लड़ाई में भारत की हिन्दू विचारधारा ही एक मात्र निदान प्रस्तुत कर सकेगी। इन्होंने आगे स्पष्ट किया है कि अमेरिका यूरोप की सभ्यता के पतन के साथ एशिया में चीन, जापान व कोरिया सरीखे देशों की सभ्यता का भी यदि अवसान हो जाए, तो भी भारतीय उपमहाद्वीप सारी स्थिति को संभाल सकता है। इसकी इस सामर्थ्य को उजागर करते हुए हंटिंगटन ने कहा है कि भारतीय संस्कृति व सभ्यता ही एकमात्र आशा की किरण है। यही एकमात्र विश्व के सभी धर्मों, सभ्यताओं व संस्कृतियों को उचित सम्मान देने के साथ दर्शन, कला, शिक्षा एवं टेक्नोलॉजी को विकास कर अवसर देकर नयी विश्व-सभ्यता का निर्माण कर सकती है।

युगद्रष्टा एवं मानव जाति के उन्नायक स्वामी विवेकानन्द नये युग का उदय पूर्वी एवं पश्चिमी सभ्यता के मेल में ही देखते हैं। उन्होंने उद्घोष किया है कि जो समाज जाति या सभ्यता आध्यात्मिकता में जितनी आगे बढ़ी है-वह उतनी ही सभ्य, सुसंस्कृत जाति है। भाँति-भाँति के अस्त्र-शस्त्र एवं सुविधा-सरंजाम जुटा लेने से कोई जाति सभ्य नहीं हो जाती। आज की पाश्चात्य सभ्यता का कुछ यही हाल है। इसके साधन तो बस लोगों में दिन-प्रतिदिन भय एवं हाहाकार को ही बढ़ा रहे हैं। श्री अरविन्द के शब्दों में कहें तो एक संसार यह है, जिसमें पाश्चात्य विज्ञान, टेक्नोलॉजी एवं अर्थ सम्पदा को पूजते हुए मानव मन-ही-मन भय से काँप रहा है। एक संसार वह था, जिसमें मनुष्य आत्मसत्ता पर प्रगाढ़ विश्वास करता था और औरों को स्वयं से अभिन्न समझते हुए उनकी सेवा-सहायता करता था, पर संक्रमण के वर्तमान क्षणों के पार मानव का भविष्य देखते हुए वे कहते हैं- यही वह समय है, जिसमें मानवीय सभ्यता का नवजन्म होगा। अतीत के भारतीय गौरव को यथार्थ बनाते हुए एक ऐसी विश्वव्यापी सभ्यता एवं संस्कृति विकसित होगी, जो सब तरह अनोखी, अद्भुत एवं अभूतपूर्व होगी।


“भूत होते हैं” क्या इसमें अब भी कोई संदेह है?

मानिए या न मानिए, फिर भी सच तो यही है कि भूत-प्रेत होते हैं, जो यह साबित करते हैं कि मरने के बाद भी इनसान का अस्तित्व रहता है। भूत-प्रेतों की ये घटनायें एक और भय एवं आतंक पैदा करती हैं, तो दूसरी ओर रोमांच कहीं-कहीं तो वे करुणा का पाठ बन जाते हैं। जान केनिंग ने अपने अध्ययन ‘फिफ्टी ग्रेट घोस्ट स्टोरीज’ में भूत-प्रेतों की कुछ ऐसी घटनाओं का संग्रह-संकलन किया है, जिसमें यह स्पष्ट होता है कि अनगढ़ मनःस्थिति किस प्रकार हमें मरने के बाद भी विक्षुब्ध-परेशान कर सकती है। अतृप्ति की यह आग करने के बाद भी जलाती-झुलसाती रहती है।

विडा मेरी द्वारा उल्लेखित एक घटना की नायिका का भूत ऐसा ही था। कायसो इंग्लैण्ड के अति सुन्दर व्यक्ति थे। अपने किसी राजकार्य के लिए वह इटली गये। वहाँ के शहर फ्लोरेंस में तुसकेनी के ग्रान्ड ड्यूक की पत्नी से उनका प्रेम हो गया। राजनैतिक कारणों से कायसो को मारने का षड्यंत्र रचा गया, जिसका पता चलते ही वह फ्लोरेंस छोड़कर वापस इंग्लैण्ड भाग गये। जल्दबाजी और भाग निकलने की अफरा-तफरी में उनका अपनी प्रेमिका से मिलना नहीं हो सका। कायसो के इस विश्वासघात से दुःखी व ड्यूक के अत्याचार से तंग आकर, प्रेमिका ने आत्महत्या कर ली और भूत बन गयी। भूत बनकर उसने इंग्लैण्ड में अपने प्रेमी कायसो को चेतावनी दी कि वह शीघ्र ही द्वन्द्व युद्ध में मारा जायेगा व तब तक वह इन्तजार करती रहेगी व उसे पश्चाताप करना पड़ेगा। शायद उसे मालूम नहीं है कि उसके बिना बताये अलग होने के विछोह के एक-एक पल को उसने कितनी पीड़ा से बिताया है।

कायसो के कानों में ये शब्द गूँजते रहे। रोज रात को उसकी प्रेमिका का भूत प्रकट होता व चेतावनी देता। कायसो भयभीत रहने लगा। अधिक भयभीत होने के कारण वह अपना रात का समय शहर के एक शराबघर में बिताने लगा। एक रात एक दूसरे शराबी के साथ कायसो का झगड़ा हो गया। झगड़ा द्वन्द्व युद्ध में परिवर्तित हो गया, जिसमें कायसो की मृत्यु हो गयी। देखने वालों ने मृत शरीर के ऊपर एक सफेद छाया देखी, जो उसकी प्रेमिका का भूत था। अपनी अतृप्त इच्छा की तीव्रता एवं आसक्ति की अधिकता के कारण वह अब तक कायसो के इर्द-गिर्द मंडराती रही थी।

ऐसी ही घटना ट्रेन चालक जिम राबर्सन के बारे में है, जिसने अपने मित्र ब्रीएर्ली के कृत्यों से आशंकित होकर आत्महत्या कर ली थी। हुआ यूँ कि राबर्सन और ब्रीएर्ली दोनों अच्छे मित्र थे। जिम की शादी के बाद भी इन दोनों का मिलना- जुलना जारी रहा। जिम के रात्रि ट्रेन चालक होने की वजह से ब्रीएर्ली जिम की पत्नी व बच्चों का हाल-चाल पूछते, अक्सर उनके घर जाते रहते थे। शंकालु जिम को यह घनिष्ठता पसन्द नहीं आयी और उसने अपने मित्र से सम्बन्ध- विच्छेद कर दिया। यदा-कदा पत्र व्यवहार द्वारा ब्रीएर्ली अपने हृदय की व्यथा जिम की पत्नी तक पहुँचा देता। गलती से एक ऐसा ही पत्र जिम के हाथों लग गया। आवेश के वशीभूत होकर पहले तो जिम ने अपनी पत्नी-बच्चों की हत्या की, बाद में स्वयं को ही समाप्त कर लिया।

इसी बीच ब्रीएर्ली की पदोन्नति हो गयी और वह लम्बी दूरी की रेलगाड़ी चलाने लगा। संयोग से उसे वही इंजन मिला, जिसे जिम चलाता था। पहले दिन से ही इसमें भूत लीला होने लगी। पहली बार जब ब्रीएर्ली गाड़ी में सवार हुआ, तो उसे लगा कि इंजन में जिम जो पहले से ही हाजिर है, क्योंकि इंजन के सारे कल-पुर्जे अपने आप ही चलने लगे। ट्रेन चलने का समय हो जाने पर ब्रीएर्ली के हाथ लगाने से पूर्व ही ट्रेन स्वतः ही चलने लगी व तेजी से आगे बढ़ने लगी। जिम के मकान के समीप वाले मोड़ पर चाहते हुए भी ब्रीएर्ली गाड़ी को धीमी नहीं कर पाया। कई दिनों तक लगातार यही क्रम चलता रहा।

एक रात अनहोनी घटना घट गयी। जिम के मकान के समीप ट्रेन की गति धीमी करने का प्रयास चल रहा था, ताकि ब्रीएर्ली एक बार जिम की पत्नी से मिल सके। उसी समय उसके सहयोगी चिल्ला उठे। किसी अदृश्य व्यक्ति का हाथ इंजन में भाप निकालने वाले ढक्कन को खोल रहा था, जिससे भयंकर दुर्घटना हो सकती थी। ब्रीएर्ली ने उस अदृश्य हाथ को रोकने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह तो और अधिक ताकत के साथ ढक्कन खोलता जा रहा था तथा मोड़ पर गाड़ी की गति और तीव्र हो रही थी। यही नहीं, ट्रेन भी दूसरी पटरी पर जा चुकी थी। कुछ समय बाद हाथ अदृश्य हो गया और ट्रेन भी पटरी पर आ गयी। एक भयंकर ट्रेन दुर्घटना अकस्मात् होते-होते बच गयी।

हर रात यही घटना दुहरायी जाने लगी। अदृश्य हाथ उत्तरोत्तर अधिक ताकत के साथ इंजन का ढक्कन खोलने का प्रयास करता। ब्रीएर्ली रोज के इन घटनाक्रमों से घबराकर अपने तबादले की पुरजोर कोशिश कर रहा था। यह उसका इस मार्ग पर अन्तिम दिन था। उस रात उसकी पत्नी व छोटी लड़की भी इंजन से लगे पहले डिब्बे में बैठे थे। ट्रेन अपने आप ही स्टार्ट होकर चल पड़ी और इसकी गति नियंत्रण से बाहर हो गयी थी। भाप तेजी से बाहर निकल रही थी। न गति नियंत्रण में थी और न ही भाप। जिम के मकान के समीप ट्रेन पटरी से उतर गयी व मकान से टकरा गयी। ब्रीएर्ली, उसकी पत्नी व लड़की तीनों छिटक कर बाहर गिर पड़े व वहीं दम तोड़ गये। बड़े आश्चर्य की बात यह रही कि उनके सहयोगी व अन्य लोगों को कुछ नहीं हुआ। वहाँ के समाचारों ने इस समाचार को बड़े ही मोटे अक्षरों में मुख पृष्ठ पर छापा- “जिम के भूत का बदला पूरा हुआ।”

ऐसी ही एक अन्य कथा जीएन नामक युवती के भूत की है। सन् 1670 में रॉबर्ट स्टुअर्ट नामक युवक आलान बेंक से अपनी पढ़ाई के लिए इटली आया। यहाँ उसे जीएन नामक युवती से प्रेम हो गया। रॉबर्ट युवती के प्रति अधिक समय तक वफादार न रह सका। वह उसकी उपेक्षा-अवहेलना करने लगा। बेचारी जीएन इस कारण भारी दुःखी रहती व विलाप करती रहती। जीएन उससे शादी करना चाहती थी, लेकिन स्टुअर्ट इसके लिए तैयार न था। एक दिन दोनों के बीच खूब झगड़ा हुआ, स्टुअर्ट ने उसे छोड़ दिया।

जब स्टुअर्ट उसे हमेशा- हमेशा के लिए छोड़कर आनी घोड़ा बग्घी से घर वापस जा रहा था, उसी समय लगभग बिलखते हुए जीएन ने उसे चेतावनी दी कि वह किसी भी महिला को उससे शादी न करने देगी। यदि उसकी शादी किसी तरह हो भी गयी, तो वह निश्चय ही बीच में आकर उनके दाम्पत्य जीवन को समाप्त कर देगी। यह कहते हुए वह गाड़ी के पहिये से लगभग लिपट-सी गयी व गाड़ी पर चढ़ने का प्रयास करने लगी। स्टुअर्ट ने उसे अनसुना कर चालक को गाड़ी चलाने को कहा। इसी बीच जीएन का हाथ फिसल गया और वह घोड़ा-गाड़ी के सामने गिर गयी। बग्घी उसका सिर कुचलते हुए आगे बढ़ गयी। जीएन ने वहीं दम तोड़ दिया।

इधर स्टुअर्ट घर पहुँचने ही वाला था कि घर से 30 गज दूरी पर गाड़ी में अचानक गड़गड़ाहट की आवाज होने लगी। गाड़ी खींचने वाले घोड़े भयभीत होकर हिनहिनाने लगे व पीछे हट गये। स्टुअर्ट ने बग्घी की खिड़की से आश्चर्य चकित करने वाला दृश्य देखा- जीएन उसका स्वागत करने के लिए अपने दोनों हाथ उठाये खड़ी थी और उसका कुचला हुआ मस्तक झुका हुआ था, जिसे स्टुअर्ट ने आते समय अपनी बग्घी से कुचल दिया था।

आलान बेंक का महल वैसे ही काफी सुनसान था, फिर रात्रि के नीरव माहौल की वजह से वहाँ अजीब भय-सा व्याप्त हो गया था। स्टुअर्ट ने आने से पूर्व ही यहाँ आश्चर्यचकित करने वाली घटनायें घटने लगी थीं। मध्य रात्रि को यहाँ के दरवाजे स्वयं खुल जाते व तेज आवाज के साथ स्वयं ही बन्द हो जाते। कभी-कभी डरावनी आवाजें भी सुनायी देतीं। यदा-कदा तो रक्त की बूँदें गिरते हुए दिखायी देतीं। घर के सामान बिना किसी व्यक्ति की सहायता से इधर-उधर चलने लगते। महल का सारा परिवार इन घटनाओं से त्रस्त था। घर के नौकरों को सामान व्यवस्थित करना मुश्किल हो गया था। हालाँकि इन सब में राबर्ट को ही सबसे अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ा।

1687 में स्टुअर्ट ने एक महिला से विवाह कर लिया। स्टुअर्ट अब आलान बेंक के छोटे नवाब के पद पर थे। जीएन के भूत को महल के लोग ‘पिएर्लिन जीन’ कहा करते थे। स्टुअर्ट की शादी के बाद भूत अधिक कोपाकुल दिखने लगा। उसका उत्पात दो गुना बढ़ गया। स्टुअर्ट जीएन के भूत को निकालने की योजना बनाने लगे, लेकिन सभी तरह के धार्मिक उपचार असफल रहे। अंत में जीएन की चेतावनी को स्मरण करके स्टुअर्ट ने उसका एक चित्र बनाकर उसे अपने व पत्नी के चित्र के बीच लगा दिया।

इसके बाद जीएन का भूत अपेक्षाकृत शान्त हो गया तथा दुबारा नहीं दिखा। धीरे-धीरे सभी कुछ शान्त हो रहा था व सभी चैन की नींद सोने लगे थे। सब यही सोच रहे थे कि अब जीएन का भूत शान्त हो गया है, अतः उसका फोटो हटा दिया गया। सारे उत्पात पुनः शुरू हो गये। समग्र आलान बेंक के लोग भूत ग्रस्त होने लगे। यही नहीं स्टुअर्ट का दाम्पत्य जीवन भी दुःख से भर गया। अब तो जीएन के भूत का कार्यक्षेत्र कमरे, बरामदे के अतिरिक्त आस-पास की भूमि व बगीचे में भी फैल गया।

उग्रता के कारण सामान फेंकने वाले भूत असुविधा एवं भय को बढ़ा देते हैं, पर उनकी यही लीला जब सराय जैसे सार्वजनिक स्थान में शुरू हो जाये, तो भय और आतंक सौगुना बढ़ जाता है। बर्सेस्ट शीयर के डडले क्षेत्र मेँ ‘द जाली कुलिया’ नाम की एक सराय है, जो अपने समय में भूतों के उत्पात का केन्द्र बनी हुई थी। यहाँ भूतों द्वारा सराय में ठहरने वाले यात्रियों को बिस्तर से फेंक दिया जाता था। खड़े लोगों को धक्के मारकर कमरे से बाहर निकाल दिया जाता। मिट्टी के बर्तनों को तोड़-फोड़ दिया जाता। कमरे की घण्टी लम्बे समय तक बजती रहती। सराय में ऐसी भयंकर स्थिति उत्पन्न हो गयी थी कि कोई भी थोड़ी देर चैन से नहीं रह सकता था।

इस सराय के मालिक जमींदार की पत्नी की मृत्यु हो गयी थी। वह एक पुत्री छोड़ गयी। जमींदार का व्यवसाय मंदा हो गया, उधार बढ़ने लगा। उधार बढ़ने के कारण उसे बन्दी बनाने की धमकियाँ आने लगीं। इस सबसे थक-हारकर जमींदार ने पुत्री की हत्या कर दी व स्वयं आत्महत्या कर बैठा। मृत्यु के बाद जमींदार के भूत ने सराय को अपना आश्रय-स्थल बनाया और वहाँ का उत्पात और उग्र हो गया, जो अब तक बना हुआ है।

कभी-कभी भूतों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की ऐतिहासिक भूमिका निभाते भी देखा गया है। माइकल एवं मौली हाइबिक्क ने जान केनिंग की पुस्तक में बर्लिन की सफेद महिला के नाम से प्रख्यात ऐसे ही एक भूत का उल्लेख किया है। बर्लिन के अन्टरडेन लिन्डेन क्षेत्र में अन्तिम छोर में ओल्ड पैलेस नामक एक मुहल्ला है। पर्शिया के प्रथम राजा फ्रेडारिक ने 1611 में इसका निर्माण किया था। यहाँ शक्तिशाली होहेन जाँलर्न जाति के लोग रहते थे। इनके अत्याचार के कारण बनी एक भूत युवती बर्लिनवासियों को दिखी है जो सफेद महिला के नाम से प्रख्यात हो गयी।

इस भूत का एक ही लक्ष्य था- फ्रेडरिक के वंशजों को आने वाली विपत्ति के बारे में सचेत करना। लोगों को कहना है कि जिस भाव से उस युवती की मूर्ति महल में रखी गयी है, उसी भाव में सफेद घाघरा व चुनर पहने हुए वह दिखती है। जान सिगिसमण्ड के शासनकाल में वह पहली बार 1619 में दिखी। जब ओल्ड पैलेस में सेवारत एक लड़का बरामदे में गिर गया, जान सिगिसमण्ड उसकी सहायता के लिए मुड़े तो एक कोने में उस सफेद छाया से आमना-सामना हो गया। छाया घूँघट डाले थी व सिसकते हुए उनकी तरफ आ रही थी। जॉन उसे पहचान गये व मन में भयभीत हो गये, लेकिन जब बरामदे में गिरा लड़का नहीं दिखा, तो सिगिसमण्ड उस छाया के मार्ग में खड़े हो गये व जाँच- पड़ताल करने लगे। सफेद महिला एक हाथ में बालक को रखे थी व दूसरे हाथ में वह बड़ी कुँजी थी, जिससे राजमहल के 600 ताले खुल सकते थे। हाथों को बाहर निकालते ही बालक जमीन पर गिर गया व तुरन्त मर गया। कुँजी छोड़कर सफेद महिला वहीं अदृश्य हो गयी। अगले दिन जॉन सिगिसमण्ड भी मर गये।

फ्रेडरिक की मृत्यु के बाद उनका भतीजा फ्रेडरिक विलियम-द्वितीय ओल्ड पैलेस के राजा बने। फ्राँस की क्रान्ति के दौर में शेम्पेअन पर विजय के बाद, उन्होंने अपनी सेना को पेरिस की दीवार के नीचे जमा होने का निर्देश दिया व स्वयं वरडन की सराय में ठहरे। वहाँ उनके चाचा फ्रेडरिक का भूत सामने आया व बोला कि यदि वह पर्शिया सेना को पेरिस से वापस नहीं ले जाते, तो उन्हें राजा के रूप में कोई सम्मान नहीं करेगा। भयग्रस्त फ्रेडरिक द्वितीय इसका अर्थ न समझ सके। पुनः फ्रेडरिक का भूत बोला- ओल्ड पैलेस की सफेद महिला के बारे में तुम जानते हो, वह तुम्हें चैन से जीने नहीं देगी। फ्रेडरिक इस चेतावनी को गम्भीरता से ले वापस चले गये तथा पाँच वर्ष तक सफलतापूर्वक शासन किया। इस घटना से पता चलता है कि सफेद महिला फ्राँस के ऊपर विशेष निगरानी रखती थी।

1807 की शरद ऋतु में सफेद महिला जेनेवा युद्ध के कुछ दिन पहले पुनः दिखी, जब पर्शियन सेना ने नेपोलियन सेना को वापस जाने की चेतावनी दे डाली थी। एक पार्टी में पर्शिया के राजकुमार लूयान ने एक युवती से पियानो पर इतनी ध्वनियाँ बजाने को कहा, जितनी बार वह फ्रांसीसियों को वह अगले दिन मारेगा। युवती शाम तक बजाती गयी। राजकुमार अगले दिन नेपोलियन को रौंदने चल पड़ा, लेकिन अगली रात वह मरा पाया गया, जबकि फ्रेडरिक विलियम द्वितीय सफेद महिला के संकेत को समझ गये व बर्लिन से भाग गये। नेपोलियन स्वयं ओल्ड पैलेस आये व दो माह तक ठहरे। सफेद महिला अब शान्त थी, शायद फ्राँसीसियों के राज्य से वह सन्तुष्ट थी।

1914 के जून माह में सफेद महिला पुनः दिखी। उस समय ओल्ड पैलेस के शासक केइसर विलियम द्वितीय थे। इस बार वह 1918 के इंग्लैण्ड और जर्मनी के बीच युद्ध की चेतावनी देने आयी थी, जो बाद में सत्य निकली। होहेन जॉलर्न के शासन का दुखद अन्त भी इसी समय हो गया। एक बार पुनः यह सफेद महिला 1945 के अप्रैल माह की 29 तारीख को देखी गयी, जब बर्लिन पर संयुक्त सेना ने गोलाबारी की। सफेद महिला ओल्ड पैलैस गयी। इस बार वह शायद संयुक्त सेना को चेतावनी देने आयी थी। यही कारण था कि फ्राँस और इंग्लैण्ड में परस्पर मित्रता बढ़ गयी और जर्मनी का महत्व अधिक ऊँचा हो गया।

ये भूत जिस प्रकार बड़ों के होते हैं, उसी प्रकार बच्चों के भी। बहुत पहले वेलेण्ड वुड क्षेत्र में दो बच्चे अपने चाचा नरफाँक के साथ घूमने गये थे। दोनों बच्चों को नरफाँक ने स्थानीय हत्यारों को बलि के लिए सौंप दिया। आज तक दोनों बच्चों के भूत वेलेण्ड वुड में विलाप करते हुए दुःख प्रकट करते हुए दिखाई देते हैं। ऐसी ही कहानी युवराज एडवर्ड्स और उसके उसके छोटे भाई रिचार्ड ड्यूक की है, जिनकी आयु क्रमशः 12 और 10 साल की थी। दोनों ही एक किले में रहते थे। यह माना जाता है कि दोनों बच्चों की हत्या उनके सम्बन्धी रिचर्ड तृतीय के निर्देश पर की गयी थी। दोनों बच्चों को सोते समय तकिया द्वारा दम घोट कर मारा गया था, तब से आज तक वह दुर्ग दोनों बच्चों के करुण क्रन्दन से गूँज रहा है।

बच्चे भूत कभी-कभी बड़े लोगों के भूत के साथ देखे गये हैं, ज्यादा तर अपनी माँ के साथ। मध्ययुग में यार्कशायर स्थित बाटन एवं आश्रम में संन्यासी और तपस्विनी आश्रयस्थल बनाकर रहा करते थे। दोनों के भिन्न-भिन्न संकल्प एवं सतीत्व होने के कारण दोनों समुदायों के बीच एक सिर कटी तपस्विनी का भूत देखा गया। विश्वास किया जाता है कि यह सुन्दर एल्फ्रेडा का भूत है। उसका सम्बन्ध दीवार के उस पार स्थित एक संन्यासी से हो गया था। दोनों के मिलन से एक सन्तान का जन्म हुआ। 17वीं सदी के आस-पास एल्फ्रेडा व उसकी सन्तान की हत्या कर दी गयी। तभी से दोनों के भूत बाटन एबे में विनाश का अड्डा बनाये हुए हैं।

महिला भूत को गोद में बच्चा लिये कई स्थानों पर देखा गया है। ऐसा ही महिला भूत इंग्लैण्ड के साउथ वेल्स स्थित एबी वेल्स गिरजाघर के नजदीक कब्रिस्तान में भी देखा गया है। उसको देखने वालों का कहना है कि वह सफेद कपड़े दिखती है तथा बाँहों में झूला लटकाये हुए जाती है, जिसमें कीमती वस्तुएँ रहती हैं। वह धीमे-धीमे सीधे चलती है, न बायें देखती है और न दायें। वह प्रायः एबी वेल्स के कारखाने वाली सड़क पर ही दिखती है। वहीं पुलिया के समीप के मोड़ पर अचानक अदृश्य हो जाती है और उसकी बाँहों में एक बच्चा होता है। अन्ततः महिला एवं बच्चे के भूत एबेवेल्स के कब्रिस्तान तक पहुँचते हैं। वहाँ के द्वार के बाहर जाने वाले लगे मार्ग पर कुछ देर जाने के बाद अदृश्य हो जाते हैं।

एक बार हेनरी अष्टम के निर्देश पर ट्रिनिटी चर्च से लगे माइकेल गेट महिला आश्रम पर डाका डाला गया। आश्रम की महिलाओं ने वीरता पूर्वक सैनिकों को सामना किया व बोलीं- केवल हमारे मृत शरीर के ऊपर से ही तुम लोग जा सकते हो। यदि हम मर भी गयीं तो भूत बनकर जीवन भर तुम लोगों से लड़ती रहेंगी, जब तक कि यहाँ नया आश्रम नहीं बन जाता। यह सुनते ही सैनिकों ने उन्हें मार दिया तथा आश्रम की सम्पत्ति लूटकर ले गये। एक छोटा-सा बच्चा भी छिपकर देख रहा था, उसे भी सैनिकों ने मार दिया। तब से आज तक उस आश्रम के क्षेत्र तथा पवित्र ट्रिनिटी चर्च में महिला भूतों एवं बच्चे के भूत ने अपना आश्रय-स्थल बना रखा है।

इस तरह भूतों को विविध कृत्यों से जुड़ा देखा गया है, जो उनके मरते समय की प्रबल इच्छा और संवेग के अनुरूप होता है। इसके अलावा भूतों को ये सत्य घटनायें मरणोत्तर जीवन की सत्यता को सिद्ध करती हैं। शरीर छूटने भर से जीवन का अन्त नहीं होता, बल्कि वह अपने भूत संवेग एवं वृत्तियों को समेटे किसी सूक्ष्मलोक में विचरण करता रहता है। सूक्ष्म रूप का यह जीवन हमारी वर्तमान भाव वृत्तियों के अनुरूप ही होता है। अतएव समझदारी इसी में है कि वर्तमान चिन्तन एवं भाव वृत्तियों को परिशोधित कर उन्हें ईश्वरोन्मुखी किया जाए।


या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थता

आधी रात का चाँद ऊपर आकर ठहर चुका था और मोयस के स्वरों की तड़प बढ़ती जा रही थी। उसकी बाँसुरी विराम नहीं ले रही थी। तोयसल सुने या न सुने, उसे तो गाना है, वह गाएगा और गाता ही जायेगा। उसकी बाँसुरी से निकलने वाली रागिनी उसके दिल का दर्द दूर-दूर तक फैले, इस वन प्रान्त में बिखेरती ही चली जायेगी। मोयस का कम्पित स्वर तड़प कर तेज और तेज हो गया, ‘ऐ खूबसूरत चाँद-सितारों की दुनिया की मलिका ! तेरा दीदार हमें हर रोज होता है, लेकिन ठीक तेरे तख्त के नजदीक मेरी जिन्दगी का कारवाँ नहीं पहुँच पा रहा और साल के साल के गुजरते जा रहे हैं।’

ऐ नीले आसमाँ की राजदाँ! वस्ल का वह हसीन लम्हा कब आएगा, जब मैं तेरे करीब, बहुत करीब हो जाऊँगा दिलकश मंजरों की ऐ मुजस्सिम बहार! खिजाँ ने मेरी उजाड़ जिन्दगी को हर रोज कुरेदा है कि उम्र के रास्ते पर तमन्नाओं के पीले मुरझाये पत्ते अपनी बदनसीबी की दास्ताँ बियाबाँ को बेताबी से सुनाते हैं और पूछते हैं कि ऐ बूढ़े बियाबाँ! तू अपने पुराने तजुर्बे से बता कि बहार आने में अभी कितनी मंजिल बाकी है।

इसी आशय का एक गीत मोयस की बाँसुरी से प्रस्फुटित हो रहा था। सहसा बिजली की तरह तेज और खीझ भरा स्वर गूँज उठा- मोयस! हमारे सोने का वक्त हो गया, लेकिन तुम्हारा यह तराना बन्द होने नहीं आया। अब रहम भी करो इस बियाबान पर......। मोयस गाते-गाते ठहर-सा गया। तोयसल एक-एक कदम मरदाने ढंग से मजबूती से रखती आयी- बढ़ती आयी और ठीक मोयस के सामने आ खड़ी हुई।

दोनों हाथों कमर पर टिक। बड़ी-बड़ी नरगिसी आँखें रौब से स्थिर। पिंगल केश गुलाबी रूमाल में बंधे। जिसमें से एक दो लटें ढिठाई से हवा में लहरा रही थीं। कमर में तेज धार का पेशकब्ज। हाथ में लम्बा-सा खौफनाक चाकू, जिसके दोनों तरफ की तेज धार रात की चाँदनी में विद्युत की तरह चमक रही थी। दूसरे हाथ में अंगूरों से लदी एक लता, जी चाँदनी की छठा में इतराए जा रही थी।

मोयस को मालूम है कि तोयसल कई-कई शकवीरों को मुल्केअदम की राह दिखा चुकी है, फिर भी वह उसे मासूम समझा है, कुछ ऐसा ही तोयसल का मासूम रूप मोयस की मोहाँध आँखों में बसा है, लेकिन इस वक्त न जाने तोयसल के इस रूप को देखकर वह एक अजीब से ख्याल से चौंक उठा। तोयसल की आँखों में उसे खूनी प्यास उफान लेती दिखाई दे गयी।

मोयस! इस तरह बदहवास होकर मेरा मुँह क्या ताकते हो? जानते हो मेरा काफिला हमेशा इन बियाबानों में अपना पड़ाव क्यों डालता है?

हाँ! शायद आबादी से ऊब पैदा हो गयी है तुम्हें।

तुम्हारा ख्याल गलत है मोयस! ध्यान से देखो इन्हीं बियाबनों में हमारी तुम्हारी कौम के बेशुमार लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, उनके कातिलों के सरदार का भी तुम्हें जरूर पता होगा?

ओह! सेनापति विक्रम की बात करती हो तुम! देखता हूँ तुम्हारा गुस्सा अभी तक गया नहीं तोयसल! विक्रम को तुम भूल नहीं सकीं।

हँ, हँ! यह आवाज एक मर्द बेटे की नहीं हो सकती। मोयस! अच्छा होता कि तुम किसी की दुख्तर बनकर पैदा होते। अरे बेवकूफ! इस जवाँ मर्द की वजह से हम अब सदियों तक सिर उठा कर चलने की ताख खो बैठे। हमारी गर्दनें हमेशा के लिए सिपहसालार विक्रम ने झुका दी है या कि कहो उतार दी है और तुम हो कि उसी को भूलने की बात कहते हो।

क्या बात है तोयसल! तुम मुझ पर नाराज हो या फिर विक्रम पर मेहरबान हो गयी हो? मोयस का संगीत हिरन हो गया।

स्वाल सुनकर तोयसल ने लम्बी-गहरी साँस खींची और धवल चाँदनी की चादर ओढ़े जंगल को देखते हुए कुछ सोचने लगी। फिर धीर-धीरे बोली- काश! वह सिपहसालार मुझे कहीं मिल सकता, सिर्फ चन्द लमहों के लिए। तो फिर मैं उससे सिर्फ एक सवाल करती।

उसके बाद?

मैं उसे काल कर दूँगी, क्योंकि आम शक युवकों की ही तरह शायद वह भी एक औरत के नजदीक कमजोर साबित होगा जिस्मानी प्यास से तड़पता एक बुज़दिल कीड़ा..... अपनी बात को अधूरी छोड़कर वह एक ओर तेजी से मुड़ी। वह कुछ और आगे बढ़ती, तभी उसके सामने मोयस अपनी दयावनी सूरत लिए कहने लगा- काश! तुम मुझे समझ पाती तोयसल!

तोयसल की उजली सपाट पेशानी पर कई सलवटें उभर आयीं। तेज आवाज में बोली- मोयस! बको मत। खामोशी से खेमे में जाओ और सो जाओ। उसे एक ओर छोड़कर अपनी तलाश में आगे बढ़ गयी।

वह जिसकी तलाश में थी, वह महावीर विक्रम अभी जाग रहा था। उसकी आँखों में न आलस्य था, न नींद। यों भी वह रात्रि में नहीं के बराबर ही सोता था। सैनिकों की थकान का विचार करके ही वह पड़ाव डालता था, अन्यथा वह तो चाहता है कि उसकी सैन्यवाहिनी कभी रुके नहीं, कहीं विराम न लें। रात के हाथ भी न रोक सकें उसको।

विक्रम के नाम से समूचे भारतवर्ष को आश्वस्त कर दिया था। शकों के हिंस्र और बर्बर कृत्यों ने अवन्ती ही नहीं, समूचे देश की जनता को आक्रान्त कर रखा था। किसी शान्तिप्रिय गृहस्थ की सुकुमारी कन्या को उठा ले जाना, उसका सर्वस्व हरण कर लेना, मनचाही लूट-पाट मार-पीट उनके सर्वमान्य दैनिक कृत्य थे। शक होना ही आतंक का पर्याय बन गया था। महाराज भतृहरि के संरक्षण एवं वीर विक्रम के सैन्य-संचालन में देश की जनता ने शकों से मुक्ति पायी थी। महाराज भर्तृहरि ने विक्रम को उज्जयिनी राज्य का युवराज सर्वोच्च कर्ता-धर्त्ता महासन्धि विग्रहक, परम भट्टारक, सेनापति समिति का प्रधान नियुक्त किया था। देश की जनता उन्हें शकारि एवं वीर विक्रम के नाम से जानती थी। शत्रु उनके नाम से काँपते थे।

शकों की बर्बरता को समाप्त करने वाले विक्रम अभी नवयुवक ही थे। उनका सुगठित प्रचण्ड पौरुषवान देव-दुर्लभ शरीर देखने वालों के मन को बरबस आकर्षित कर लेता था। उनके चेहरे पर महासंयम का ज्योतिसागर लहराता था। आँखों में एक अनोखी तेजस्विता की दीप्ति थी, जो शत्रुओं एवं अपराधियों में भय का संचार करती थी।

शकों को युद्ध में परास्त करने के पश्चात् अभी वह अपने सैनिक शिविर में ही थे। वहीं सौंदर्यवान ज्योतिकलश-सा अपूर्व मुखमण्डल। पतली नोंकदार मूँछें, तनिक ऊपर को चढ़ी हुई। आँखों में वीर दर्प। दृढ़वद्ध ओष्ट पुटों पर अजेयता की, अडिग निश्चय की रेखा। निरन्तर इन्द्रिय निग्रह का महातेज, अस्वाभाविक गौर स्वर्णिम शरीर। फौलादी लम्बी भुजाएँ । शिरस्राण विहीन मस्तक के पृष्ठ भाग में लम्बे काले बाल लहरा रहे थे। बगल में प्रलम्ब प्रखर नग्न कृपाण दमक रही थी- सुदीर्घ मल्ल वहीं पास में आड़ खड़ा था। विक्रम का यह रूप ही सच है। युद्ध और युद्ध, विजय और विजय। एक पर एक नित नये अभियान। शत्रु-सेनाओं के पीठ दिखाकर भागते सैनिक, उनके हाँफते फेन उगलते भयकातर घोड़े और उन सेनाओं का सतत् पीछा करती उनकी विजयवाहिनी। महावीर विक्रमादित्य को यह दृश्य प्रत्यक्ष देखने का व्यसन था- जीवन व्यसन।

एक भी सशस्त्र शक सैनिक जिन्दा वापस न लौटे, विजयोपरान्त उनका अन्तिम आदेश होता और शकों के पैर भारत की धरती से उखड़ते चले गये। वीर विक्रम को युद्ध अच्छा लगता, विजय अच्छी लगती और शत्रु-सेनाओं को पलायन रुचता। शत्रुओं के समूह में अपना गौरव-ध्वज फहराते वह दिन को भी देखते और रात को भी और वह केसरिया विजय-ध्वज भारतीय गौरव-मान का प्रदीप दिव्य लोक-सा वह अल्प-सा वस्त्र खण्ड उनकी आँखों में रम गया था। वह उन्हें प्रेरणा देता- विजय के लिए नये अभियान का संदेश देता। शत्रु मर्दन और देश-सीमा को निर्भय बनाने को उद्यमिता प्रदान करना। इस भाव के सिवा उसका कोई साथी न था।

उसकी चिर संगिनी तलवार थी, सदा की साथी। सुनील वायुवेगी अश्व था बस। वह राष्ट्रप्रेमी था, कभी कोई प्रमाद, विलम्ब अथवा थोड़ा भी अनिश्चय का प्रसंग प्रस्तुत होने पर वे खुद को ही दण्ड दे डालते थे, अत्यन्त कठोर हो उठते थे वे उस क्षण। उनकी सेना को उस दिन काफी परेशानी उठानी पड़ती। अपने आप पर क्रुद्ध होने पर वीर विक्रम रातों-रात कूँच कर जाते। बरसाती नदी में भी घोड़े डाल देते और बिना पुल के ही सैनिक सामग्री, शिविर आदि पर ले जाने का आदेश दे देते। कभी दुर्गम पहाड़ों पर भी शत्रु सैनिकों का पीछा करने व सत्वर संहार करने की आज्ञा दे डालते और उस क्षण वह स्वयं सेना के आगे होते।

विक्रम के जीवन में स्त्री के लिए न तो कोई मोह था और न ही वितृष्णा। सच तो यह है कि उन्हें स्त्री के रूप में और उसके सौंदर्य आदि गुणों पर सोचने का कभी मौका ही नहीं मिला था। स्त्री के रूप में वह घनिष्ठ रूप में माता सौम्यदर्शना से ही परिचित थे। दूसरे किसी रूप-विरूप की गति उनके जीवन में न थी।

अलबत्ता वह विजयोपरान्त स्त्रियों पर कभी हाथ न उठाते थे। यही नहीं, उन्होंने इसके लिए अपनी सेना को भी सख्त ताकीद कर रखी थी। अनेक अवसरों पर उन्हें शक स्त्रियों ने घर लिया, वे कृतज्ञ थीं उनकी, क्योंकि उन्होंने एक विजयी सेनानायक होते हुए भी उनके बच्चों को कत्ल नहीं किया था और उनके सैनिकों ने उनमें से किसी की अस्मत का सौदा नहीं किया था और उनके सैनिकों ने उनमें से किसी की अस्मत का सौदा नहीं किया था। हालाँकि तोयसल का अपना निजी विश्वास था कि विक्रम के खौफ की वजह से कोई शक औरत उनके करीब जाती ही न होगी, उस मलाव सेनापति के जज्बात की जानकारी किसी को होती तो कैसे? ये शब्द सिर्फ तायेसल के ही थे।

विक्रम अपने किसी अगले अभियान पर एकाग्र मन से सोच रहे थे। प्रहरी दल के तेज खरखराते स्वर गूँजे जा रहे थे। सहसा उन्होंने देखा कि एक प्रहरी उनके शिविर के द्वार के पास आ खड़ा हुआ है, लेकिन वह शीघ्र अन्दर आने का साहस नहीं कर पा रहा है। विक्रमादित्य ने पूछा-क्यों

एक लड़की आपसे मिलना चाहती है। मैंने भरसक उसे मना किया और सुबह आने को कहा, लेकिन वह अभी मिलने की जिद पकड़े हैं।

विक्रमादित्य को इसमें कोई अन्तर नजर नहीं आया कि प्रहरी ने उसे रोका क्यूँ ? लड़की-लड़के द्वैत पर उन्हें केन्द्रित होने का मौका ही कब मिला था? अतः उन्होंने स्वाभाविक तौर पर कहा- जाओ उसे भेज दो........।

प्रहरी गया और शीघ्र ही एक ऊँचे कद की गौरवर्ण की सुनहले बालों वाली अतिशय रूपवती लड़की अन्दर आ खड़ी हुई। उज्ज्वल संगमरमर की सप्राण प्रतिमा ही हो मानो। विक्रम ने प्रश्नसूचक दृष्टि उस पर उठाई। वह लड़की और कोई नहीं तोयसल ही थी। बोली- बहुत मुश्किल से आपका पड़ाव तलाश कर सकी हूँ....।

विक्रम की कम बोलने की आदत थी। उनकी दृष्टि में सिर्फ प्रश्न ही मूर्त था और तोयसल ने देखा कि यह नवयुवक तो मड़ने वाला नहीं दिखता, मानों मुजस्सिम फौलाद हो- कुछ ऐसी सख्ती चेहरे पर, होठों पर नुमाया है। जिस्म भी ऐसा है कि दस से अकेले निपट सके और सुन्दर इतना है कि उसके सम्मोहक रूप पर स्वर्ग की अप्सराएँ भी स्वयं को न्यौछावर कर दें। अपने को सम्भालते हुए थोड़ा ढिठाई से देखते हुए बोली- वीर विक्रम। मैं एक सवाल करना चाहती हूँ।

पूछो। और ये दो अक्षर तोयसल के मन पर मानो सतह खुरच कर दृढ़ता से लिख गये। तुमने शकों के साम्राज्य को झुका दिया, फतह कर लिया, जिसे मैं अभी तक किसी इनसान के लिए नामुमकिन मानती थी। मेरा अपना अकीदा था कि हमारे शक वीरों से बेहतर... पर तोयसल को टोका गया।

अपना काम कहो। विक्रम को अपनी प्रशंसा अच्छी नहीं लग रही थी। जलते लोहे से वजनी और तप्त अक्षर पुनः तोयसल के कलेजे पर अंकित हो रहे। उसे लगा कि वह इस आदमी का मन जरा भी अपनी तरफ नहीं खींच पाई है। आखिर क्यों? क्या यह मुमकिन हो सकता है आज? उसे अपना सवाल याद आया बोली मैं जानना चाहती थी कि फतह के पीछे कौन-सा राज छिपा है? मैं जानना चाहती थी कि तुम्हारे देश की माताएँ कैसी हैं, जिन्होंने तुम्हारे जैसे वीर को जन्म दिया।

विक्रमादित्य एकबारगी खुलकर हंस पड़े। लगा कि उनकी हँसी से ऊपर का नीला आकाश प्रतिध्वनित हो उठा हो। वह भौंचक्की होकर उनका मुँह ताकने लगी। विक्रम उसकी ओर देखते हुए बोले- बहुत खूब, तुमने तो कविता शुरू कर दी....

सेनापति! मेरा सवाल क्या हँसी में उड़ा दिया गया?

पर उनका जवाब भी क्या हो सकता है? मैंने कभी इस पर सोचा नहीं। कहना चाहूँगा कि दुनिया की हर माँ शायद एक नेक इनसान को जन्म देती हैं, लेकिन वह बड़ा होते- होते काफी बदल जाता है या कह लो कि दुनिया के घेरे उसे मनचाहा बदल डालते हैं। तोयसल को उनकी बातें काफी अच्छी लगीं। उसने महसूस किया शकों का विजेता यह महान सेनापति अन्दर से एक भोले बच्चे की तरह मासूम है, भोला है। लेकिन मेरे सवाल का जवाब? फिर पूछा उसने।

बातूनी लड़की! यह भी कोई सवाल है और इसी एक बात के लिए तुम इतनी रात को यहाँ दौड़ी चली आयीं।

मानिनी तोयसल, शकों की राजकुमारी वह अनन्य सुन्दरी युवती अपने मन की समग्र पीड़ा आँखों में भरकर विक्रम को अपलक निहार रही थी। कितनी व्याकुलता प्राणों के आह्लादकारी प्रबल प्रणय की कितनी उत्कट प्रतीक्षा उसकी पुतलियों में उभर आयी थी।

उधर विक्रम अपनी लम्बी खड्ग की चमक को गौर से देखते हुए सोच रहे थे कि यह लड़की भी अजीब है। अगर उसे बाहर निकालते का आदेश देता हूँ, तो नारी का अपमान होता है। शील विवश विक्रम बड़ी नम्रता से बोले- अभी मुझे बहुत काम है, परना कहता कि तुम्हें अपने यहाँ की माताओं के दर्शन करा दूँ।

सच? क्या तुम मुझे अपने साथ ले चल सकते हो। किन्तु वासना को मार्ग खोजने की जल्दी थी। तोयसल ने दुस्साहस की सीमा पार कर ली। वह बेशर्मी से बोली- वीर विक्रम! अगर साथ चलना मुमकिन नहीं, तो तुम मेरी एक आरजू पूरी कर दो....., यकायक वह आगे कुछ कह न सकी।

कहो, क्या चाहती हो.....? विक्रमादित्य के उत्तर में कोई भी लोच नहीं थी। मानो किसी दीवार से कह रहा हो। उनकी नजर पीत चन्द्रमा पर टिकी थी।

यह कि तुम मुझे अपना- सा बेटा दे दो.... तोयसल की आवाज बुरी तरह काँप रही थी। माथे पर पसीने की बूँदें छलक आयीं थीं।

विक्रम हँसे, हँसते रहे दो पल- फिर सरलता से बोले- शक कन्या! तुम गलती पर हो। मेरा किसी से कोई लगाव नहीं। मैं तो बस राष्ट्र का प्रहरी हूँ।

और तायेसल लज्जा व आत्मग्लानि से गली जा रही थी कि देवकुमार से सम्मोहक व्यक्तित्व वाले विक्रम ने उसकी बातों का अर्थ नहीं समझा।

उसने धीरे से लरजती आवाज में फिर कहा- सेनापति विक्रम। मैं तुमसे, खास तुमसे एक बेटा चाहती हूँ, जो बड़ा होकर तुम्हारे तैसा नामवर होगा, तुम्हारे जैसा बहादुर...... और उसने अपना जलता माथा, जलते होंठ विक्रमादित्य के पाँवों पर टिका दिये। दोनों हाथों से उसने उनकी टाँगें जकड़ लीं। विक्रम ऐसे चौंके मानो उन पर बिजली गिरी हो। जो कुछ इस क्षण उनके सामने था, वह उनके संस्कारों के नितान्त विरुद्ध था। ऐसी विषमता उनके सामने कभी समस्या या सवाल बनकर नहीं आयी थी। आखिर उनके संचित संयम व संस्कारों ने सहायता की। उन्होंने एक रास्ता निकाला। बड़े शान्त स्वर में उसे सान्त्वना देते हुए बोले- उठो! भरोसा करो। मैं तुमको बेटा दूँगा- बिलकुल अपने जैसा..... ओह! मेरे वीर सेनापति.... खुशी से उसकी सुन्दर आँखों में आँसू आ गये।

विक्रम उठ खड़े हुए और भुजाओं से पकड़कर उन्होंने तोयसल को भी नितान्त निर्लिप्त भाव से उठाया, फिर उसको थपथपाते हुए बोले-

देखो तुम्हारी आरजू भटक गयी है। मान लो तुम्हारे बेटा हुआ भी, लेकिन क्या यकीन कि वह जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा। वह तुम्हारे ख्वाबों के खिलाफ भी हो सकता है। इसलिये अगर तुम मेरी बात मानो तो एक रास्ता हो सकता है।

वह कौन-सा सेनापति! तोयसल ने असीम व्याकुलता से पूछा।

यह कि तुम मुझे ही अपना बेटा मान लो। आज से विक्रमादित्य तुम्हारा बेटा है। बोलो माता! क्या तुम मुझे माँ कहने का पवित्र हे देती हो? वीर विक्रम के हिम शीतल स्वर से तोयसल विपुल आत्मग्लानि से गलने लगी। लज्जा से उसका मस्तक नत हो गया और विवेक को मानो प्रत्यावर्तन का पथ, खोज मिल गया।

उफ! यह तुमने क्या कहा? तोयसल की चिन्तनशीलता लौटने को हुई। नारी का सम्मान जागता प्रतीत हुआ आर वह सही रास्ते पर लौटी ही आखिर। वह स्थिर हो उठी। अब उसके माथे पर पसीना न था। आँखों में वासनाजनित उत्तेजना या व्याकुलता न थी।

उससे महावीर विक्रमादित्य की तरफ देखा नहीं जा रहा था। एकाएक उसे उजाला मिल गया। उज्जयिनी के इस वीर शिरोमणि को वह श्रद्धा से, स्नेह से और सम्मान से देखते हुए बोली- मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया। उस राज को मैंने जाल लिया, जो तुम्हें फतह पर फतह हासिल करने को बायस है, जिस मुल्क में बेटे ऐसे हों वहाँ की माताएँ कैसी होंगी। दरअसल वे माताएँ ही तुम्हारे जैसे रत्न पैदा कर सकती हैं।

विक्रम खामोश था, शायद निश्चिन्त भी। तोयसल ने विदा लेते हुए कहा-

वीर विक्रम! तुमने मुझे माँ कहा है। मेरे लिए यह बेशकीमती लज्जा एक पाकीजा अमानत है, जिसकी हिफाजत ताजिन्दगी करूँगी, लेकिन तुम......, तुम इस बदकार लड़की को कभी याद करोगे, वह लड़की जो तुम्हें गलत रास्ते पर खींचने आयी थी आज.....? और तोयसल ने दुर्निवार दुःख से अपनी आँखें छिपा ली। कण्ठावरोध हो आया। इससे पहले कि विक्रम उससे कुछ कहे, वह सवेग शिविर से निकल गयी। बाहर रेतीले रास्ते पर स्निग्ध चाँदनी फैली थी। तोयसल उस पर तेजी से बढ़ती जा रही थी। मन शान्त था। शरीर संयत था कि पचास कदम चलने पर मोयस ने उसे रोका।

ठहरो तोयसल! तुम दुश्मन के सिपहसालार के साथ मुँह काला कर आयीं, अब जरा एक बार मेरे साथ भी उसके खेमे तक चलो और देखो कि मर्द का गुस्सा कैसा होता है, मैं पहले उसे मुल्केअदम रवाना कर दूँ, फिर तुम्हें सबक दूँगा.....।

मोयस ने तोयसल को खींचते हुए कहा और उसकी बाँह पकड़ कर वापस घसीटता हुआ उधर

चला, जिधर विक्रम का शिविर था।

आखिर तुम चाहते क्या हो मोयस? तोयसल ने उससे अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा-

क्या चाहता हूँ? यह तुम वहीं देख लोगी । उस मरदूद को मलकुन मौत के हवाले करता हूँ, जिसे तुम अपना सब कुछ लुटा आयी हो। तोयसल तुम इस कदर फाहिशा होगी- मैं क्या जानता था.... उसके हाथ में तेज खौफनाक खंजर चमक उठा।

खबरदार मोयस! अगर आगे तुमने कुछ कहा.....। लगाम लगा ला जबान पर। तू उस बहादुर को कत्ल करेगा और वह भी मेरे साथ जाकर यानि दगा करके? तोयसल ने एक झटक के साथ उसे परे धकेल दिया।

ओह! बदकार लड़की। मैं कमीना हूँ और वह जो गैर मुल्क का, गैर कौम का आदमी है, वह आज तेरा सब कुछ है ? अपनी बात को पूरा करते

हुए गुस्से में वह तोयसल की ओर झपटा, परन्तु तोयसल के फुर्ती से हटने के कारण वह न संभल पाने की वजह से गिर पड़ा और इस हड़बड़ी में उसका चमचमाता खंजर उसी के पेट में धँस गया। अपने ही अप्रत्याशित वार के कुछ ही पलों में वह जमीन पर ढेर हो गया।

तोयसल ने उसकी ओर बड़ी करुण दृष्टि से देखा और अपने आप में बुदबुदायी- यही अंतर है तुममें और वीर विक्रम में। तुम सब नारी को भोग और वासना की दृष्टि से देखते रहे और पराजित हुए और विक्रम ने हमेशा- हमेशा विजय हासिल की। आज मुझे समझ में आया, दृढ़ चरित्रबल और नारी मात्र की प्रति पवित्र भावना में ही विजय का रहस्य समाया है। अपनी इसी सोच में डूबी वह एक ओर चल दी।


भविष्य की दुनिया महिलाओं की होगी

लम्बी गहन अन्धकार भरी रात्रि के बाद दिवस का आगमन नियति का शाश्वत क्रम है। दूर क्षितिज में उभरती सूर्य की लालिमा के साथ बढ़ती प्रकृति की सक्रियता एवं हलचल नये दिन को लेकर आती है। इसी तरह दीर्घकालीन दासता के अंधेरे युग में अपनी गौरव गरिमा से हाथ धो बैठी नारी चेतना अब जाग उठी है। उसे अपने अस्तित्व का भान हो चला है। घर की चारदीवारी की कैद से बाहर जगत में भी झाँक कर देख रही है, देख ही नहीं रही, बल्कि उसमें सक्रियता से भागीदारी भी लेने लगी है। युगों से बन्धन- बेड़ियों को तोड़ती हुई पुरुष बहुल क्षेत्र में प्रवेश करने का साहस कर रही है। कई क्षेत्रों में तो वह पुरुषों को भी पीछे छोड़ गयी है।

देश की लोकतांत्रिक इकाइयों- लोकसभा एवं विधानसभा में भले ही अभी नारी की भागीदारी को सुनिश्चित करने का महिला- आरक्षण-प्रयास पूर्ण सफल न हो सका हो, पर देश के कई प्रदेशों में पंचायतीराज के तहत महिलाएँ बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं। हिमाचल प्रदेश में तो 1985 में ही पंचायतीराज में महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी निश्चित हो चुकी है। पंचायतों के कुल 20,176 निर्वाचित पदाधिकारियों में से 7653 पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं और इनमें से 970 पद महिला प्रधानों के लिए आरक्षित हो चुके हैं। वर्ष 1995 में पंचायती चुनावों में आरक्षित स्थानों पर महिलाओं ने भाग लेकर अपनी जागरूकता का परिचय दिया है। इस समय प्रदेश में अनुमानतः पाँच लाख महिलायें विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं। जिनमें बीस हजार से अधिक सरकारी नौकरियों में तथा 9000 के लगभग उद्योग व अन्य क्षेत्रों में सक्रिय हैं। पहले केवल अध्यापन व नर्सिंग ही महिलाओं के उपयुक्त माने जाते थे। अब विज्ञान, उद्योग, व्यवसाय, वकालत, डाक्टरी, प्रशासन, पर्वतारोहण इत्यादि सभी क्षेत्रों में वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं।

देश के अन्य प्रान्तों में भी महिलायें लोकतंत्र की आधारभूत इकाई पंचायतों में भाग ले रही हैं। हरियाणा व मध्यप्रदेश में क्रमशः 33.33 व 35.74 प्रतिशत महिलाओं सरपंच पद को सुशोभित किया हैं। गतवर्ष दिसम्बर माह में हुए पंचायती चुनावों में हरियाणा में 1978 महिलाएँ सरपंच चुनी गयीं, जिनमें 397 अनुसूचित जाति की थीं। पंचायत समितियों में 37 महिलायें अध्यक्ष पद पर चुनकर आ गयीं। इनमें सात अनुसूचित जाति की थीं। समिति के सदस्यों में 805 महिलायें चुनी गयीं, जिनमें 161 अनुसूचित जाति की थीं।

गतवर्ष अप्रैल में हुए निर्वाचन में उत्तरप्रदेश की पंचायती व्यवस्था में लगभग 15,000 महिलाओं को भागीदारी का अवसर मिला। उड़ीसा में 526 ग्राम पंचायतों में 25,000 से भी अधिक महिला प्रतिनिधि चुनाव जीतीं व 84 नगर निगम में 480 महिला प्रतिनिधि चुनी गयीं। अंडमान में अक्टूबर, 95 के चुनावों में 230 महिला पंचों की सीटों के चुनाव में 526 महिलायें उम्मीदवार बनीं। पंचायत समिति की 25 सीटों के लिए 67 प्रत्याशी खड़ी हुईं। जिला परिषद की 10 सीटों के लिए 34 महिला प्रत्याशी खड़ी हुईं। कर्नाटक एवं पश्चिम बंगाल में लगभग 43 प्रतिशत एवं 35 प्रतिशत स्थान महिलाओं को पंचायती व्यवस्था में प्राप्त हुआ है। त्रिपुरा में महिलाओं के लिए 33.37 प्रतिशत स्थान ग्राम पंचायतों में मिला है। यहाँ एक पंचायत में सभी पदों पर महिला प्रतिनिधि कार्यरत हैं। महाराष्ट्र और अगड़ी जाति की लगभग 60 प्रतिशत महिलाओं ने पंचायत में अपना कब्जा बनाये रखा है। लगभग यही स्थिति उड़ीसा में है, जहाँ कायस्थ जाति की 66 प्रतिशत महिलाओं ने पंचायत में अपना स्थान सुरक्षित किया है। इसी के साथ मध्यप्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है।

यही नहीं महिलायें सामाजिक दुष्प्रवृत्तियों से मोर्चा लेने के क्षेत्र में भी साहस का परिचय दे रही हैं। गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्र में महिलाओं की पहल पर शराबबन्दी का आन्दोलन छिड़ा है। उसमें महिलाओं न संगठित होकर निर्णय लिया कि जो पुरुष शराब पीकर गाँव में आएगा, उसे 500 रुपये जुर्माना देना पड़ेगा। पहाड़ी क्षेत्रों में शराब बरबादी का एक प्रमुख कारण है। यह जहाँ घर में आर्थिक दरिद्रता व लड़ाई -झगड़े का कारण है वहीं सड़कों में दुर्घटनाओं को भी न्योता देती हैं।

देश ही नहीं विश्वपटल पर भी महिलाएँ प्रगतिपथ पर अग्रसर हैं। विश्व-संस्था अन्तर संसदीय संघ के सर्वेक्षण के अनुसार, विश्वभर में गत 50 वर्षों चार प्रतिशत वृद्धि हुई है। विश्व की कुल 38493 संसद सीटों में 4512 सीटों पर महिलायें प्रतिष्ठित हैं। इनमें स्वीडन की संसद में सर्वाधिक 40.4 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। ब्रिटेन और फ्राँस की स्थिति भी इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। ब्रिटेन के निचले सदन ‘हाउस ऑफ कामन्स’ की 651 में से 62 सीटें महिलाओं के पास है। फ्राँस की संसद में भी 577 सीटों में से 37 सीटें महिलाओं के पास हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 1964 में संसदीय लोकतंत्र अपनाने वाले देशों की संसदों के निचले सदन में मात्र 3 प्रतिशत महिलायें थीं, जो 1994 तक बढ़कर 11.7 प्रतिशत हो गयी हैं। संसदीय प्रणाली के पिछले 50 वर्षों के इतिहास में 147 में से 38 देशों की संसद ने संचालन का काम कभी न कभी महिलाओं को सौंपा है। महिलाओं की संसद में न्यूनतम भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अर्जेन्टीना, बेल्जियम, उत्तर कोरिया, नेपाल, ब्राजील और फिलीपीन के कानून बनाए हैं। आँकलन के अनुसार सेंटकीट्स, लिथुआनिया, अजरबेजान, स्पेन, न्यूजीलैण्ड की संसदों में महिला भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

चीन में सरकारी पदों पर कार्य करने वाली महिलाओं में अद्भुत प्रगति हुई है। आज चीन में 38.8 प्रतिशत सरकारी पदों पर अर्थात् 1 करोड़ 32 लाख 80 हजार महिलाएँ आसीन हैं। 1949 में चीन जनवादी गणराज्य की स्थापना के दौरान जितनी महिलाएँ सरकारी पदों पर कार्यरत थीं, आज यह संख्या उससे 200 गुना अधिक है।

ईरान जैसे कट्टर इस्लामी देश में भी मोहम्मद खातमी के राष्ट्रपति बनने के बाद जो उदार हवा बही है, उससे वहाँ की महिलाओं के लिए एक मार्ग खुला है। पहली बार एक महिला श्रीमती मसामा इब्तेकार को उपराष्ट्रपति जैसे उच्च पद पर नियुक्ति किया गया है, जो ईरान के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना रही। इससे विभिन्न दिशाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा है। उधर दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मण्डेला के आने से पूर्व तक महिलाओं की स्थिति दयनीय थी। सत्ता में आने के बाद उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप आज 454 सदस्यीय संसद 118 सदस्य महिलायें हैं। गत 3 फरवरी को स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकारों की घोषणा हुई। महिला साँसदों में लिड़िया कोम्पे जैसी ग्रामीण मूल की महिलायें भी हैं, जिनका जन्म गरीब घर के टूटे-फूटे मकान में हुआ था। इसके परिणाम- स्वरूप वहाँ की ग्रामीण, सिलाई-कढ़ाई जैसे छोटे-मोटे कार्यों द्वारा स्वावलम्बन एवं परिवार पोषण का शिक्षण ले रही हैं।

अबला समझी जाने वाली नारी आज उन क्षेत्रों में कुशलतापूर्वक पदार्पण कर चुकी हैं, जिसे कभी पुरुषों के लिए विशिष्ट रूप से आरक्षित माना जाता था। अभी तक देश में रेल, टैक्सी, बस, ऑटो रिक्शा जैसे वाहनों को चलाने का काम जोखिम भरा होने के कारण पुरुषों का माना जाता था, किन्तु इधर के एक-डेढ़ दशक में महिलाओं ने इस मिथक को तोड़ दिया है। दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा आदि विभिन्न प्रान्तों में महिलायें बस, टैक्सी, ऑटो रिक्शा ही नहीं, बल्कि रेल इंजन ड्राइवर का कार्यभार कुशलतापूर्वक संभाल रही हैं। केरल के कोझीकोड़ जिले में 28 महिलायें ऑटोरिक्शा चलाती हैं। इनमें से एक मुस्लिम महिला सईदा अल्बया जिकायाँ भी है, जो परम्परागत मुस्लिम परिधान पहनकर ऑटोरिक्शा चलाती है। कोझीकोड़ में ही वी.टी. थेरोसियम्मा 15 वर्षों से प्रतिदिन 16 किलोमीटर पैदल चलकर डाक बाँटती हैं।

पहले कभी महिलायें ऑफिस नौकरी तक ही सीमित रहती थीं, आज व्यवसाय के क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं। ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन चैर्म्बस ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री’ की महिला शाखा की सेक्रेटरी शिप्रा चटर्जी के अनुसार, महिलायें जन्मजात व्यवसायी होती हैं। घर चलाना, बढ़ती महँगाई के युग में आर्थिक सन्तुलन बनाये रखना, बच्चों की पढ़ाई को संभालना, परिवार के सभी सदस्यों से अच्छे सम्बन्ध बनाये रखना, ये सभी बातें व्यावहारिक ज्ञान, संवाद कुशलता, मानसिक सन्तुलन व बुद्धि-विवेक की माँग करती है, जो कि किसी भी व्यवसाय को सुचारु रूप से चलाने के लिए आवश्यक गुण हैं। उपरोक्त संगठन की शुरुआत 1983 में 25 महिला सदस्यों के साथ हुई थी, जो आज 750 महिलाओं को प्रतिशत अपने में भर्ती कराता है।

‘विश्व श्रम संगठन’ एवं स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट कोआरेशन एजेन्सी की सामूहिक रिपोर्ट के अनुसार महिला व्यवसायियों की संख्या में उत्साह जनक वृद्धि हुई है। 1980 व 90 के बीच इनमें 8.25 प्रतिशत से 9.85 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में कुल 1518 में से 354 अर्थात् 23.3 प्रतिशत महिला व्यवसायी हैं।

अपने घर की चारदीवारी के बाहर पुरुष प्रधान क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं में एक नाम है- प्रोमिला मदान, जो गत 30 वर्षों से अपने पति के साथ साझेदारी में एक निजी जासूस की हैसियत से अपनी ही कम्पनी ‘गोलियस डिअक्टिव एजेंसी’ में कार्य कर रही हैं। अनिश्चितता एवं खतरे से भरे इस व्यवसाय को अन्य महिलाएँ भी अपना रही हैं। प्रोमिला की जासूसी कम्पनी में इस समय 130 महिला कर्मचारी कार्यरत हैं और उनका कहना है कि महिलायें पुरुषों की अपेक्षा अधिक बेहतर जासूस साहिब होती हैं।

शिवाजी शर्मा इन दिनों गिनी-चुनी महिला प्रेस फोटोग्राफरों में से एक हैं, जो दंगों, प्रदर्शनों, चुनावों व कभी-कभी तो आतंकवादियों को भी अपने कैमरे में कैद करने का साहस करती हैं। वागेश्वरी देवी भारत की एकमात्र शहनाई वादक महिला हैं, जिन्होंने पुरुष व्यवसाय माने जाने वाले शहनाई वादक को चुना है। वह भारत के बाहर विदेशों में भी अपनी कला का जौहर दिखा चुकी हैं। ऐसे ही सुषमा टकयार दिल्ली शेयर बाज़ार की एक दक्ष दलाल हैं। मनीषा बावर्ची हैं, जो अपने पेशे को कुशलतापूर्वक अंजाम दे रही हैं।

महिलाओं को शारीरिक दृष्टि से अबला, कोमलाँगी व दुर्बल समझे जाने का प्रचलन है, इसलिये पौरुष प्रधान सैन्य क्षेत्र में महिलाओं के प्रवेश को विशेष प्रोत्साहन नहीं मिला करता था, लेकिन पिछले कुछ सालों से महिलाओं की इस स्थिति में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है। सेनाध्यक्ष जनरल रोड्रिग्स के कार्यकाल में महिलाओं की सेना में भागीदारी की बात चली थी। आज सैन्य सुरक्षा के हर क्षेत्र में महिलाएँ अपनी सुरक्षा के हर क्षेत्र में महिलाएँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।

थल सेना में महिलाओं का प्रथम बैंच 1993 में शुरू हुआ। इसमें केवल 25 महिलाओं का चयन हुआ था। सेना के प्रति महिलाओं के रुझान को देखते हुए दो साल के अन्दर भरती संख्या को दुगुना कर दिया गया, अर्थात् हर छह माह के बाद लगभग 50 महिलाओं को लिया जाता है। सेना की ओर महिलाओं का बढ़ता रुझान एक आश्चर्यजनक एवं महत्वपूर्ण बात है, विशेषकर जबकि आज के युवा वर्ग में यह रुझान कम हो रहा है। इसी तरह महिलाओं ने वायुसेना में भी अपनी उपस्थिति दर्ज की है। 1993 में भारतीय वायुसेना में पहली बार चुनी गयी नौ महिलाओं ने प्रशिक्षण प्राप्त कर उड़ान भरी व विमान चालक के रूप से अपनी योग्यता सिद्ध की। अब तक वायुसेना में 14 महिला पायलटों की भर्ती हो चुकी है। भारतीय नौ सेना में भी युद्ध पोतों में दो महिला अफसरों की नियुक्ति की गयी है। अब तक नौ सेना में ऑफिस कार्यों तक ही महिलाओं की सक्रियता सीमित थी। करनाल में जन्मी कल्पना चावला इस माह अंतरिक्ष में जाने वाली ‘नासा’ अभियान की पहली भारतीय महिला बन गयी हैं।

विश्व के दूसरे देशों में भी महिलाएँ सेना में प्रवेश पा रही हैं। इनमें डेनमार्क, नीदरलैंड, नार्वे प्रमुख हैं। रूस में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय से महिलाओं को शस्त्र चलाना सिखाया जा रहा है। बेरुल, लेबनान व सउदी अरब जैसे देशों में महिलाओं को रक्षा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। स्विट्जरलैंड में महिलायें गत 50 वर्षों से सेनाओं में काम का रही हैं। इजराइल में महिलाओं को वास्तविक युद्ध का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। खाड़ी के युद्ध में महिलाओं की भागीदारी इस सदी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है, जिसमें उन्होंने इतिहास का यह मिथक तोड़ दिया कि महिलायें युद्ध क्षेत्र में भाग नहीं ले सकतीं।

खेल के क्षेत्र में भी महिलाओं ने पुरुष प्रधान खेलों में प्रवेश किया है व अपनी कीर्ति को चार चाँद लगा रही हैं। भारोत्तोलन जैसे शारीरिक शक्ति प्रधान खेल में कुँजुरानी, मल्लेश्वरी, सुमिता सिंह व भारती सिंह आदि नाम उल्लेखनीय हैं, जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर रही हैं। कुँजुरानी ने तो अपना नाम विश्व के सौ श्रेष्ठ भारोत्तोलकों की सूची में जिसमें सात महिलायें हैं, दर्ज करवाया है, जो सारे देश के लिए गौरव की बात है। मल्लेश्वरी इसमें विश्व रिकार्ड स्तर की उपलब्धियाँ हासिल कर रही हैं। गोल्फ एक ऐसा खेल है, जिसमें पुरुष भी कम ही खेलते हैं, लेकिन भारतीय गोल्फ संगठन की स्थापना कर गोल्फ की महिला खिलाड़ियों ने इस क्षेत्र में भी अपना दखल जमा दिया है। वंदना अग्रवाल, सिमि मेहरा, शालिनी मलिक आदि आज भारतीय गोल्फ के कुछ चर्चित नाम हैं।

इसी तरह पर्वतारोहण एक ऐसा रोमांचक, साहस भरा एवं कठिन कार्य है, जिसमें सामान्यतया पुरुष भी जाने से कतराते हैं, लेकिन भारतीय नारी इस क्षेत्र में भी अपना सिक्का जमा चुकी है। बछेन्द्री पाल, विश्व की सबसे ऊँची चोटी माउण्ट एवरेस्ट पर झंडा गाड़ने वाली पहली भारतीय महिला हैं। संतोष यादव, डिकी डोलमा ने भी एवरेस्ट के शिखर पर पताका फहराकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है। दीपू शर्मा, राधा देवीख् सुमन कौटयाल, सविता मतोलिया आदि अपने दृढ़ निश्चय, साहस एवं आत्मविश्वास के आधार पर इस दिशा में आगे बढ़ने में संलग्न हैं। इस वर्ष स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर बछेन्द्रीपाल के नेतृत्व में आठ महिलाओं के दल ने अपने साहस एवं जीवट के बूते हिमालय पर्वत की 4200 किलोमीटर लम्बाई को साढ़े सात माह के अन्तराल में मथ डालने का दुस्साहस भरा कार्य किया। इस यात्रा में उन्होंने इस हजार फीट से अधिक ऊँचाई पर स्थित 40 दरों को पार किया व कई हिमालय की चोटियों पर भारतीय झण्डे फहराएँ । यात्रा के अन्तिम पड़ाव में यह दल शून्य से भी 20 डिग्री सेंटीग्रेड कम तापमान पर, ग्लेशियर पर तेज बर्फीली हवाओं और पाकिस्तानी गोलीबारी के बीच देश के सर्वाधिक उत्तरी बिन्दु इंदिरा कर्नल पर पहुँचा और राष्ट्रीय ध्वज फहराया।

अंटार्टिक अभियान भी एक अत्यन्त जोखिम एवं रोमांच भरा अभियान है। वर्ष में केवल एक बार ही गिनती के विशिष्ट वैज्ञानिक वहाँ शोध के लिए जाते हैं। बर्फ से ढके इस क्षेत्र में जीवन अत्यन्त विषम है। जन-जीवन नहीं के बराबर है। फिर भी अपने देश की महिलाओं ने इस अभियान में हिस्सा लेकर अपने साहस का परिचय दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी महिलाओं ने आश्चर्यजनक रूप से प्रगति की है। उन्होंने पुरुषों को काफी पीछे छोड़ दिया है। दिल्ली महिला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 1951 में शिक्षित महिलाओं की संख्या कुल 6 प्रतिशत थी, जो 1981 में बढ़कर 61 प्रतिशत हो गयी। इससे पता चलता है कि दिल्ली में शिक्षा के क्षेत्र में कितनी तेजी से विकास हुआ है। दिल्ली के शहरी क्षेत्रों में 69 प्रतिशत व ग्रामीण क्षेत्रों में 52 प्रतिशत महिलाएँ साक्षर हैं। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में लड़कियों के पास होने का प्रतिशत 79 रहा, जबकि छात्रों का प्रतिशत 69.1 रहा। दिल्ली में छात्राओं की उत्तीर्ण दर 76.5 प्रतिशत रही, जबकि छात्रों का प्रतिशत 63.1 रहा। उत्तर प्रदेश की माध्यमिक शिक्षा परिषद की इंटरमीडिएट एवं हाईस्कूल परीक्षा परिणामों में लड़के क्रमशः 62,41 एवं 40.32 प्रतिशत उत्तीर्ण हुए, जबकि लड़कियों का उत्तीर्ण प्रतिशत क्रमशः 82.39 प्रतिशत एवं 69.57 प्रतिशत रहा। पिछले वर्ष भी छात्राओं की उत्तीर्ण दर छात्रों से बेहतर थी।

भारत ही नहीं विदेशों में भी लड़कियाँ प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूली परीक्षाओं में लड़कों को पीछे छोड़ रही हैं। इंग्लैण्ड एवं वेल्स की इकुअल ऑपरचुनिटी रिपोर्ट के अनुसार वहाँ की जी.सी.एस.ई. परीक्षाओं में 48.1 प्रतिशत लड़कियों के ए.बी.सी.डी. ग्रेड पाँच या पाँच से अधिक विषयों में थे, जबकि लड़कों का यह प्रतिशत 39 ही था। रिपोर्ट के अनुसार, 1995 में जहाँ 124 लड़कियाँ स्कूल से बाहर निकलीं, वहाँ लड़कों की संख्या उससे पीछे 100 की थी।

श्रम शक्ति के आधार पर भी महिलाएँ पुरुषों से बहुत आगे निकल रही हैं। यू.एस. ब्यूरो ऑफ लेबर स्टेटिस्टिक्स के अनुसार, अमेरिका में श्रमशक्ति के क्षेत्र में पुरुषों की भागीदारी 1950 की 90 प्रतिशत, 1995 की 75 प्रतिशत तक कमी आयी है, जबकि महिलाओं की भागीदारी 30 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक बढ़ी है।

विश्वभर में साहित्यिक क्षेत्र में भी लेखन एवं पठन दोनों क्षेत्रों में महिलाओं का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। पुस्तक व्यापार में यह एक व्यापक विश्वास है कि महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा अधिक पुस्तकें खरीदती हैं। उपन्यास व कहानियों में प्रकाशकों की धारणा है कि महिलायें महिला लेखक की पुस्तक पसन्द करती हैं। टाइम की सूची में गत पाँच वर्षों में प्रकाशित कल्पित साहित्य के महिलाकरण के सन्दर्भ में कहते हुए टाइम वार्नर ट्रेड पब्लिशिंग के चेयरमैन लारेंस कृषबाम का कहना है कि ऐसा लगता है कि नारी जाग्रति की एक तरह की लहर-सी उठी है। अमेरिकन बुकसेलर एसोसिएशन के अनुसार, फिक्शन साहित्य के खरीददारों में महिलायें 59 प्रतिशत होती हैं व पुरुष 41 प्रतिशत। गैर फिक्शन साहित्य में महिलायें 53 प्रतिशत थीं व पुरुष 47 प्रतिशत। सक्राइबनर के सहसम्पादक जेनरोमन-मन का कहना है कि गत 20 वर्षों में प्रथम श्रेणी की लेखिकाओं की एक बाढ़-सी आ गयी है। अभी हाल में ही अपने देश की महान लेखिका अरुन्धती राय की कृति ‘द गॉड स्माल थिंग्स’ ने पूरे विश्व में धूम मचा रखी है। इसी के लिए उन्हें साहित्य के विश्व में सर्वाधिक प्रतिष्ठित ‘बुकर’ पुरस्कार से नवाजा गया है। इस आधार पर ‘द इकॉनामिस्ट’ पत्रिका ने चौंकाने वाला तथ्य प्रकट किया है कि आगामी दुनिया में भविष्य महिलाओं का होगा।

महिलाओं में तनाव सहने की क्षमता भी पुरुषों की अपेक्षा अधिक पायी गयी है। ‘डिफैन्स इन्स्टीट्यूट ऑफ साइकोलॉजिकल रिसर्च’ नई दिल्ली की शोध के अनुसार, पुरुष एक्जीक्यूटिव, महिला एक्जीक्यूटिव की अपेक्षा तनाव के अधिक शिकार होते हैं। यह अध्ययन 80 स्त्री एवं 80 पुरुषों पर किया गया था, तो पब्लिक सेक्टर में एक जैसी शैक्षणिक योग्यता, आयु, प्रबन्धन स्तर, अनुभव व वैवाहिक जीवन से जुड़े थे। इसी आधार पर दीर्घकालीन कर्मी के रूप में महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ माना जा रहा है। लगता है भविष्य के अनुरूप प्रकृति भी उन्हें अपेक्षाकृत अधिक क्षमतावान् एवं प्रतिभावान के रूप गढ़ रही है।

यह सत्य है कि महिलाएँ अब लम्बी अंधेरी रात्रि के बाद जाग उठी हैं। उन्हें अपनी गरिमा का बोध हो रहा है कि वह किसी भी तरह पुरुष से कम नहीं। नारी चेतना में जाग्रति की यह आँधी अब अपने गौरवपद से वंचित करने वाली सारी प्रतिकूलताओं व बाधाओं को उखाड़ फेंकेगी व अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही दम लेगी। इसके प्रगतिशील चरणों को अब कोई रोक नहीं सकता। आखिर युगपरिवर्तन के अधिष्ठाता महाकाल का भी तो यही संकल्प है, जिसने स्पष्टतः 21वीं सदी को नारी सदी के रूप में उद्घोषित किया है। बेहतर होगा कि अपने पौरुष एवं श्रेष्ठता का दम्भ भरने वाला पुरुष अब चेत जाए व नारी शक्ति के सर्वांगीण उत्कर्ष में बाधक बनने की बजाय उसको हर तरह से सहयोग दे।


संकल्प-शक्ति में है असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाने की सामर्थ्य

मनुष्य में संकल्प और इच्छा की शक्ति सर्वोपरि है। वह जैसी इच्छा करता है, वैसा ही बनने लगता है, उसकी श्रद्धा जैसी होती है, वह उसी के अनुरूप ढलने लगता है। आप्तवचन भी इसी की पुष्टि करते और कहते हैं कि इसमें इतनी अपार क्षमता है कि व्यक्ति कहीं-से कहीं पहुँच सकता और कुछ-से-कुछ बन सकता है। यहाँ तक कि गम्भीर रोगों से छुटकारा पाकर आरोग्यता उपलब्ध करना और स्वस्थ-सानन्द जीवन गुजार सकना इसके द्वारा सहज सम्भव है। समय-समय पर प्रकाश में आने वाले उदाहरण इसकी पुष्टि करते हैं।

ऐसा ही एक प्रसंग एरिक फ्यूच्स का है। न्यूयार्क निवासी इस प्रबन्ध सलाहकार ने इन दिनों विज्ञान जगत में धूम मचा रखी है। उसके बारे में कहा जाता है कि उस पर एड्स जैसे जानलेवा रोग के विषाणुओं का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वैज्ञानिक उसकी इस विलक्षणता से आश्चर्यचकित हैं और उसके रक्त-नमूनों का अध्ययन-विश्लेषण कर रहे हैं एवं उसमें एड्स वायरस प्रविष्ट कराने की कोशिश में लगे हैं। अब तक के इस प्रयास में उन्हें असफलता ही हाथ लगी है। इस सम्बन्ध में कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के शरीर शास्त्री बी. मैकगर्थ का कहना है कि उसके रक्त में निश्चय ही ऐसा कोई तत्व है, जिसके कारण गम्भीर-से गम्भीर रोग के जीवाणु वहाँ निष्क्रिय एवं निष्प्राण हो जाते हैं। यह भी सम्भव है कि वह असाधारण तत्त्व किसी विषाणु के शरीर में प्रवेश करते ही सबल-सशक्त एण्टीबाडीज प्रहरियों की विशाल सभा सेना खड़ी करने की प्रेरणा देता हो। यह तो रुधिर के अध्ययन से ही ज्ञात हो सकेगा कि वह तत्त्व आखिर है क्या?

दूसरी ओर एरिक का इस बारे में कहना है कि विज्ञानवेत्ताओं को उसके रक्त में किसी प्रकार की विशेषता तलाश करने की अपेक्षा इसे उसकी विशिष्ट मानसिक संरचना का परिणाम मानना चाहिये। उनका विश्वास है कि व्यक्ति में यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को किसी अभेद्य दुर्ग की तरह इतना मजबूत बनाया जा सकता है कि उसमें किसी विषाणु का प्रवेश पाना और जीवित रह जाना सरल नहीं।

यों इन दिनों उनके रक्त की जाँच अमेरिका की विभिन्न प्रयोगशालाओं में चल रही है, पर वैज्ञानिकों को उसमें किसी ऐसे तत्व को ढूँढ़ निकालने में आज तक किसी प्रकार की कोई सफलता नहीं मिली, जिसके आधार पर वे यह दावा कर सकें कि उक्त विशेषता अमुक कारण से है। कई दवा कंपनियां उनके खान-पान और दिनचर्या का अध्ययन कर रही हैं। अनेक मनोवैज्ञानिक और मनःचिकित्सक उनकी मानसिक बनावट को समझने का प्रयास कर रहे हैं एवं घण्टों तक उनसे तरह-तरह के प्रश्न करते हैं।

आजकल एरिक अमेरिका की एक एड्स अनुसंधान परियोजना के लिए उदारतापूर्वक रक्तदान कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि उनके इस कार्य से एड्स-उन्मूलन में सहायता मिलती है, तो वे स्वयं को धन्य मानेंगे।

40 वर्षीय एरिक से जब यह सवाल किया गया कि एड्स की समाप्ति के लिए वे समाज की किस प्रकार की सेवा-सहायता करना चाहेंगे, तो उनका उत्तर था कि वैसे तो चिकित्साशास्त्री उनके रक्त को ही सब कुछ मान बैठे हैं और उसे चमत्कारी कर रहे हैं, पर मेरा विचार इससे भिन्न है। वे कहते हैं कि यदि लोगों की मानसिक दृढ़ता प्रखर हो, तो कोई कारण नहीं कि वे इस प्रकार के चमत्कार बीमारियों के सन्दर्भ में न उत्पन्न कर सकें।

इसके विपरीत विज्ञानवेत्ता इस बारे में गम्भीरतापूर्वक विचार कर रहे हैं कि एरिक के रक्त के नमूनों से क्या कोई सफल तथा कारगर औषधि बना पाना सम्भव है क्या? यों तो इस सम्भावना से अनुसंधानकर्ता सर्वथा इनकार नहीं करते, किन्तु यहाँ एक नैतिक प्रश्न आड़े आ जाता है। वे कहते हैं कि उक्त रक्त से कोई टीका अथवा इंजेक्शन जैसी औषधि बनायी तो जा सकती है, पर कठिनाई यह है कि इतना खून कहाँ से आये, जो विश्वभर में फैल करोड़ों रोगियों की औषधि की आवश्यकता पूरी कर सके? यदि एरिक को अधिकाधिक रक्त उत्पन्न करने वाली दवाइयाँ खिलाकर उनसे नियमित रूप से जल्दी-जल्दी रक्तदान कराया जाये, तो क्या यह वर्तमान के उन गाय-भैंसों जैसा उदाहरण नहीं होगा, जिन्हें ऑक्सीटोसीन एवं सोमेटोट्रोफिन (बी.एस.टी.) जैसे हारमोन-इंजेक्शन लगाकर अधिकाधिक दूध प्राप्त करने के नाम पर उनका रस-रक्त निचोड़ लिया जाता है? इसे नैतिक कैसे कहा जाए? दाता की सहमति और स्वीकृति होने पर भी यह मानवीयता के अंतर्गत नहीं आता। इसे अमानवीय स्तर का आसुरी व्यवहार ही कहना पड़ेगा। कोई उच्च आदर्शवादी मानवी संस्कृति इसकी अनुमति कभी नहीं देगी।

एरिक का यह मानना अभी अनसुलझा ही था कि इस क्षेत्र में एक अन्य धमाका हुआ। जूड़ी अपने दो वर्षीय बेटे के साथ सीटल, अमेरिका में रहती है। सन् 1989 में जब उसके पहली संतान हुई, तब वह 20 वर्ष की थी और गर्भधारण से पूर्व ही एड्स ग्रस्त हो चुकी थी। इसे वह भली-भाँति जानती थी, किन्तु मृत्यु का तनिक भी भय उसे नहीं था। चिन्ता और आशंका जैसे उसकी प्रकृति में थी ही नहीं। जिन बातों से सर्वसाधारण की रातों की नींद और दिन का चैन छिन जाता है, वैसी परिस्थितियाँ भी इसकी शान्ति भंग नहीं कर पाती थीं। वह एकदम स्वच्छन्द विचारों की थी। मस्ती में आने पर कहा करती कि ईश्वर ने हमें यह जीवन चिन्तित रहने के लिए नहीं, सुख भोगने के लिए दिया है। हम अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करें और आनन्दपूर्वक रहें, जीवन का यही आदर्श होना चाहिए।

जूड़ी के जब पहला बच्चा हुआ, तो वह भी एच.आई.वी. पाजेटिव (रोगग्रस्त) पाया गया। कारण स्पष्ट था- माता के पाजेटिव रहते बच्चा कदाचित् ही निगेटिव (नीरोग) देखा गया है। सन् 1992 में जूड़ी दूसरी बार फिर गर्भवती हुई। गर्भावस्था के आरंभिक दिनों में वह एड्स ग्रस्त (एच.आई.वी. पॉजिटिव) थी, किन्तु उसने जिस बच्चे को जन्म दिया, वह एच.आई.वी. निगेटिव था अर्थात् पूर्णरूपेण स्वस्थ। डाक्टर चौंके। कहीं परीक्षण में गलती तो नहीं हुई। इसके निराकरण के लिए उन्होंने सावधानीपूर्वक अनेक बार बच्चे का परीक्षण किया। हर बार एक ही परिणाम प्राप्त हुआ कि शिशु नीरोग है। चिकित्सक हैरान थे कि एक रोगग्रस्त माँ पूर्ण स्वस्थ शिशु को कैसे जन सकती है? उन्होंने जूड़ी की दोबारा जाँच की। इससे विदित हुआ कि वह तो पूरी तरह स्वस्थ है। उसके शरीर में एच.आई.वी. वायरस तो है ही नहीं। यह आश्चर्य की बात थी, कारण कि इससे पूर्व अलग-अलग समयों की जाँच, रिपोर्ट्स जूड़ी और उसकी प्रथम संतान को एड्स ग्रस्त बता रही थीं। चार बार के परीक्षणों में हर बार दोनों रोगग्रस्त पाये गये। फिर अचानक जूड़ी इस रोग से स्वतः मुक्त कैसे हो गई? जबकि उसने कोई उपचार कराया नहीं। चिकित्सकों के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। एड्स रोग के इतिहास में यह अपने प्रकार की पहली घटना है, जिसमें रोगग्रस्त होने के बाद रोगी उससे मुक्त हो गया हो। जूड़ी की पारिवारिक चिकित्सक लीसा फ्रैंकेल स्वयं इस घटना से हतप्रभ हैं। वह इस बात से इनकार करती हैं कि जाँच प्रक्रिया में कहीं कोई गड़बड़ी हुई है। वे कहती हैं कि यदि ऐसा होता, तो अलग-अलग समयों और अस्पतालों कराये गये परीक्षणों के नतीजे एक-से नहीं होते। इसका कोई समुचित कारण बता पाने में वह भी असमर्थ है। पिछले एक दशक के शोध-अनुसंधान यह बताते हैं कि एक बार जो इस व्याधि से आक्रान्त हो गया, उसकी अन्तिम परिणति मौत है। ऐसी स्थिति में जूड़ी का एकदम स्वस्थ हो जाना विस्मयकारी ही कहलायेगा, जबकि उसका प्रथम बालक अब भी एड्स पीड़ित है।

इस घटना के बाद शोधकर्ता अब उसके भी रक्त के नमूने इकट्ठे कर रहे हैं। अनेक शोधशालाओं में उनका अध्ययन चल रहा है, पर यहाँ भी अध्ययनकर्ता अब तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके हैं, क्योंकि जाँच में रुधिर बिलकुल साधारण पाया गया है। न्यूयार्क यूनिवर्सिटी में शोधरत स्काँटिश वैज्ञानिक डॉ. बिल पैक्सटन ने अपने अनुसंधान से यह तो सिद्ध कर दिया कि कुछ लोगों पर एड्स के विषाणु एकदम निष्प्रभावी होते हैं, पर वे निमित्त क्या हैं? जिस कारण वायरस निष्प्राण हो जाते हैं- यह बता पाने में वे असमर्थ रहे; लिवरपूल विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्री जे.सी.कूपर विभिन्न लोगों की प्रतिरक्षा प्रणालियों का अध्ययन कर इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि कुछेक व्यक्तियों में यह तंत्र इतना मजबूत होता है कि घातक-से-घातक रोगों के जीवाणुओं को भी लड़ाई में वे परास्त कर देते हैं, पर कुछ लोगों के शरीर रक्षातंत्र में ऐसी कौन सी-विशिष्टता होती है, जिसके कारण वे इतने सामर्थ्यवान बन जाते हैं? इसे स्पष्ट करने में वे भी असफल रहे।

इसी मध्य एक और घटना प्रकाश में आई। यह सत्तर के दशक के अन्तिम चरण की बात है। कैलीफोर्निया की एक महिला फ्रान पीवे का आपरेशन होना था। उसके लिए खून की आवश्यकता हुई, रक्त देकर उसका सफलतापूर्वक आपरेशन कर दिया गया। इस समय तक एड्स-वायरस का पता नहीं चला था। सन् 1988 के मध्य वह बीमार पड़ गयी और एक के बाद एक कई रोगों से आक्रान्त होती चली गई। इस दौरान एच.आई.वी. वायरस का पता चल गया था। चिकित्सकों को सन्देह हुआ कि कहीं उसको एड्स मरीज का खून तो नहीं दे दिया गया? कारण कि अच्छी-से-अच्छी से दवाएँ उस पर एक प्रकार के बेअसर साबित हो रही थीं। शंका-निवारण के लिए जब उसका रक्त-परीक्षण किया गया, तो आशंका सही साबित हुई। वह एड्स ग्रस्त निकली। पीवे को जब इसकी जानकारी हुई, तब अपने भाग्य को कोसने लगी और डाक्टरों की लापरवाही पर क्षुब्ध भी हुई, पर अब क्या हो सकता था। स्वयं को वह इसके लिए तैयार करने लगी, साथ-साथ योगाभ्यास करने लगी। प्रतिदिन लगभग आधे घण्टे तक वह नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करती। इतने पर भी उसका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था। उसके मुँह में छाले पड़ गये, उसे निमोनिया हो गया, पाँव अकड़ने लगे, बीच-बीच में बुखार चढ़ आता, सर्दी-जुकाम भी बना रहता, इसके बावजूद उसके मनोबल को नहीं टूटने दिया। वह स्वयं से संघर्ष कर रही थी।

चिकित्सकों ने उसका गहन अध्ययन प्रारम्भ किया, तो उन्हें एक विलक्षणता नजर आयी। आमतौर पर एच.आई.वी. वायरस शरीर की सी.डी.,टी. कोशिकाओं को मार देता है, परन्तु यहाँ वैसा नहीं हुआ। आरम्भ में उसकी ‘टी’ कोशिकाएँ तो घटीं, किन्तु फिर अकस्मात् उनकी संख्या बढ़ने लगी। यही एक शुभ लक्षण था। इसी बीच सन् 1992 में उसे ब्रिसबेन यूनिवर्सिटी, आस्ट्रेलिया में विजिटिंग फैलोशिप मिली। आस्ट्रेलियाई विजा पाने के लिए एच.आई.वी. परीक्षण जरूरी था। उसे यह भली-भाँति विदित था कि परीक्षण का परिणाम रोग के पक्ष में देने पर उसका सम्पूर्ण शैक्षणिक जीवन ही निरर्थक बन जायेगा। तब वह कहीं बाहर आगे के अध्ययन-अनुसंधान के लिए न जा सकेगी। वह असमंजस में थी कि क्या करें, क्या न करें। इसी समय मन में विचार आया कि राष्ट्र निर्माताओं को गढ़ने वाले अध्यापकों को असत्य का सहारा नहीं लेना चाहिये। अस्तु, स्वास्थ्य के सम्बन्ध में आश्वस्त होने के लिए एक बार फिर वह एच.आई.वी. परीक्षण के लिए गई। आश्चर्य कि इस बार उसे एच.आई.वी. निगेटिव घोषित किया गया अर्थात् पीवे एड्स मरीज नहीं थी। इस पर उसे अचम्भा तो हुआ, पर उसने उसे एक बार फिर वह जाँच करवाने की सलाह दी। एक सप्ताह के उपरान्त पुनः वही परिणाम आया, तो वह चौंकी। चिकित्सकों ने उसकी कोशिकाओं का एक बार फिर अध्ययन किया। इस बार ‘टी’ कोशिकाएँ ही नहीं , ‘डी’ और ‘सी’ कोशिकाएँ भी सामान्य संख्या में पायी गईं। स्पष्ट था, पीवे रोगमुक्त हो चुकी थी, किन्तु कैसे? इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं था।

संकल्प की शक्ति अजेय है। उसको जिस भी दिशा में लगा दिया जायेगा, वहीं चमत्कार उत्पन्न होने लगेंगे। विज्ञानवेत्ता इस बात से अनभिज्ञ हैं। वे अंगों की कटाई-छँटाई और रसायन प्रयोग द्वारा ही केवल स्वस्थ बनाने की विधा जानते हैं। यह शरीर-विज्ञान का एक पहलू हुआ और उसे सुधारने-संवारने की पदार्थपरक प्रक्रिया। इसका दूसरा सूक्ष्म पक्ष इतना सबल और सशक्त है कि उसके सहारे शरीर के कण-कण को इतना समर्थ, सशक्त और ऊर्जावान बनाया जा सकता है कि उसके आगे रोग और रोगाणु तो क्या, अन्तः के कल्याण भी जलकर भस्म हो जायें। इसे चेतना की शक्ति कह लें, संकल्प की शक्ति कह लें अथवा इच्छाशक्ति कह लें बात एक ही है।


काया की तिजोरी में बन्द एक अनमोल खजाना

कुण्डलिनी जागरण की तुलना समुद्र-मंथन से की गयी है। पुराणों में कथा आती है कि प्रजापति के संकेत पर एक बार समुद्र मथा गया। देव और दानव इसका मन्थन करने में जुट गये। असुर उसे अपनी ओर खींचते थे। यह खींचतान दूध में से मक्खन निकालने वाली बिलोने की-मन्थन की क्रिया जैसी चित्रित की गयी है। इसी उपाख्यान में यह भी वर्णन है कि भगवान ने कछुआ का रूप बनाकर आधार स्थापित किया। उनकी पीठ पर सुमेरु पर्वत ‘रई’ के स्थान पर अवस्थित हुआ। शेषनाग के साढ़े तीन फेर उस पर्वत पर लगाये गये और उसके द्वारा मन्थन का कार्य सम्पन्न हुआ। फलस्वरूप अमृत, लक्ष्मी सहित चौदह रत्न प्रकट हुये।

वस्तुतः यह सारा चित्रण अलंकारिक रूप से मानव शरीर में अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति के प्रयोग-प्रयोजन का है। हमारा मूत्र संस्थान खारे जल से भरा समुद्र है। उसे अगणित रत्नों का भाण्डागार कह सकते हैं। स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों की सुविस्तृत रत्न-राशि इसी के मूल केन्द्र में छिपी हुई है। असुरत्व इन शक्तियों को अपनी ओर खींचता अर्थात् कामुकता की ओर घसीटता है, तो देवत्व इसे रचनात्मक प्रयोजनों में नियोजित करने के लिए तत्पर रहता है। यहाँ कच्छप और सुमेरु मूलाधार चक्र में अवस्थित वह शक्ति- बीज है, जो दूसरे कणों की तरह गोल न होकर चपटा है और जिसकी पीठ-नाभि ऊपर की तरफ गोल न होकर चपटी है। इसके चारों ओर महासर्पिणी कुण्डलिनी साढ़े तीन फेरे लपेट कर पड़ी हुई है। इसे जगाने का कार्य, मन्थन का प्रकरण उद्दाम वासना के उभार और अमन के रूप में होता है। देवता और असुर दोनों ही मनोभाव अपना-अपना जोर आजमाते हैं और मन्थन आरम्भ हो जाता है।

कुण्डलिनी कहते हैं गोलाई की आकृति इस समूचे विश्व-ब्रह्माण्ड की है। छोटे-से-छोटा परमाणु भी गोल है। कोई चाहे तो ब्रह्माण्ड-सत्ता अथवा जीव-सत्ता को कुण्डलिनी कह सकता है। ग्रह-नक्षत्र गोल है। पदार्थों के परमाणु तथा प्राणियों के जीवाणु भी गोल हैं। इस गोलाई को कुण्डलिनी समझा जा सकता है यह मोटी व्याख्या हुई। अब इससे अधिक आगे चलना होगा। ग्रह-नक्षत्र गतिशील हैं। वे एक नियत कक्ष में परिभ्रमण करते हैं। आगे बढ़ते और गोल गति से घूमते हुए बार-बार अपनी कक्षा में परिभ्रमण करते रहते हैं। यह परिभ्रमण गोलाकार होने से कुण्डलिनी है। जीव जन्मता, बढ़ता, मृत्यु को प्राप्त होता और फिर उसी क्रम की पुनरावृत्ति करता है- यह कुण्डलिनी चक्र हुआ।

कुण्डली मारकर सर्प बैठता है, इसलिए उसी की उपमा प्रायः काम में लायी जाती है। पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है। आकाश तत्व अनन्त महासर्प है। इस पौराणिक मान्यता में विश्व-ब्रह्माण्ड की तथा पृथ्वी की स्थिति का निरूपण है। पाताल को शेषलोक कहते हैं। ऊपर के ब्रह्मलोक पर भी शेष सर्प का ही आधिपत्य है। विष्णु भगवान सर्प पर सोये हुए हैं। शिवलोक में भी सर्प साम्राज्य है। वे भगवान शंकर के अंग-अंग में लिपटे हुए हैं। इस प्रकार अध-लोक और ऊर्ध्वलोक में पृथ्वी के ऊपर और नीचे सर्पसत्ता का ही आधिपत्य है। इस विवेचन से कुण्डलिनी शक्ति के स्वरूप की आरंभिक जानकारी मिलती है।

शास्त्रों में उल्लेख है कि जो ब्रह्माण्ड में है, वही पिण्ड शरीर में है- ‘यत्पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे।’ मस्तिष्क ब्रह्मलोक है और मूलाधार भूलोक। दोनों पर सर्पशक्ति का आधिपत्य है। मस्तिष्क में सहस्राचक्र सहस्रफन वाला-विष्णु शैया के लिए प्रयुक्त होने वाला महासर्प है। सर्पिणी कुण्डलिनी जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित है। प्राणी के शरीर की उत्पत्ति यहीं से होती है। नारी जननेन्द्रिय की आकृति कुण्डाकार होती है’ नर-नारी दोनों के ही जननेन्द्रिय मूल में एक सूक्ष्म गट्ठर है। उसका कन्द या कुण्ड नाम से अध्यात्म शास्त्रों में विस्तृत वर्णन किया गया है। गोरक्ष पद्धति में ‘कन्द’ के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है- ‘कन्दोर्ध्वे कुण्डलीशक्ति शुभमोक्ष प्रदायिनी।’ अर्थात् मंगलमय मोक्ष-प्रदायिनी कुण्डलिनी शक्ति ‘कन्द’ के ऊर्ध्व भाग में अवस्थित है।

इसी तरह शिव संहिता में उल्लेख है-

गुदाद्द्वयंगुलतश्चोर्ध्वं मेढ्रैकांगुलतस्त्वधः। एवं चास्ति समं कन्दं समता चतुरंगलम्॥

अर्थात् गुदा से दो अंगुल ऊपर और लिंगमूल से एक अंगुल नीचे चार अंगुल विस्तार कन्द का प्रमाण है। इसी में आगे कहा गया है-

पश्चिमाभिमुखी योनिगुदमेढ़ान्तरालगा। तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति कुण्डली सदा॥

अर्थात् गुदा एवं शिश्न के मध्य में जो योनि है, वह पश्चिमभिमुखी है अर्थात् पीछे को मुख है, उसी स्थान में ‘कन्द’ है और उसी स्थान में सर्वदा कुण्डलिनी स्थित है।

इसी तरह कुण्डलिनी का निवास ‘कन्द’ में माना गया है और उसे सुप्त सर्पिणी की संज्ञा दी गयी है। इसकी तुलना विद्युत शक्ति, ऊर्जा एवं आभा से की गयी है। तडिल्लता समरुचिर्विचुत्र लेखेब-भस्वरा सूत्र में उसे बिली की लता रेखा जैसी ज्योतिर्मय बताया गया है। उसी प्रकार अन्यत्र उसका उल्लेख “तडिल्लेखा तन्वी तपनशर्शि वैश्वनरमयी” के रूप में किया गया है। यही प्रचण्ड अग्निशिखा सामान्यतया प्रजनन प्रयोजन पूरा करने का सरंजाम जुटाती है, साथ ही प्राणी के शरीर की स्थिरता एवं प्रगति के लिए जो कुछ आवश्यक है, उसे शक्ति के रूप में उत्पन्न करती है। शक्ति का ही विकसित रूप पदार्थ है। शरीर के अवयव यों तो रासायनिक पदार्थों से बने हैं, पर मूलतः वे शक्ति रूप हैं। शक्ति ही सघन होकर रासायनिक तथा दूसरे पदार्थों का रूप धारण करती है और उन्हीं के संयोग से शरीर बनता है। संक्षेप में, मनुष्य शरीर रचना का मूलतत्त्व-मूल आधार एक विद्युत शक्ति के रूप में उद्भूत होता है। भ्रूण कलल का निर्माण एवं शरीरगत सभी हलचलों, क्षमताओं और विशेषताओं का श्रेय जिन गुणसूत्रों तथा उन पर स्थित हजारों जीन-जोड़ों को दिया जाता है, उनमें जिस वंशानुक्रम सम्पदा को खोजा जाता है, वह वस्तुतः एक सचेतन विद्युत की ही प्रतिक्रियाएँ हैं। यह प्राणविद्युत किसी शरीर का उत्पादन करने से लेकर उसका आजीवन बना रहने वाला ढाँचा खड़ा करती है। इस ढाँचे में शरीर और मन की ही संरचना सम्मिलित है। संक्षेप में प्राणधारियों के काय-कलेवर का अस्तित्व, स्वरूप एवं भविष्य-निर्धारण करने वाली प्राणविद्युत का नाम कुण्डलिनी है। यह यों तो समस्त शरीर में संव्याप्त है, किन्तु उसका केन्द्र ढूँढ़ना हो, तो वह जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित एक सूक्ष्म संस्थान-मूलाधार चक्र से उत्पन्न होती पायी जायेगी।

कुण्डलिनी का दूसरा सिरा मस्तिष्क मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र में है। यह चेतनामूलक है। चेतना यों समस्त शरीर में संव्याप्त है, पर उसका संचार-केन्द्र मस्तिष्क ही है। प्राणविद्युत का ज्ञानपरक सिरा मस्तिष्क में और शक्तिपरक सिरा मूलाधार में है। दोनों प्रायः पृथक् ही रहते हैं और अपने-अपने सीमित प्रयोजनों को ही पूरा कर पाते हैं। पृथक्-पृथक् उनकी शक्ति इतनी ही है कि अपने स्थानीय उत्तरदायित्व को वहन कर सकें। इससे सामान्य जीवन-धारण भर किये रहना और दैनिक क्रियाकलापों का चलते रहना भर सम्भव हो पाता है। बिजली के दो तार अलग-अलग रहें, तो उनसे कोई विशेष प्रयोजन पूरा नहीं होता, पर जब वे मिल जाते हैं, तो उस संयोग से प्रचण्ड प्रवाह उत्पन्न होता है। कुण्डलिनी जागरण की साधना में प्राणविद्युत के दोनों सिरों को आपस में मिला देना होता है। इस मिलन का चमत्कार वैसा ही होता है, जिस प्रकार नर-नारी के मिलन से एक नये परिवार का आरम्भ होता है। कुण्डलिनी जागरण में मूर्च्छना की समाप्ति और चेतना की अभिवृद्धि ही नहीं, दो शक्तिध्रुवों की मिलन प्रक्रिया भी सम्मिलित है।

जिस तरह पृथ्वी के दो ध्रुव हैं- उत्तरी और दक्षिणी, उसी तरह मानवी काया में भी दो ध्रुव हैं। शास्त्रों में उत्तरी ध्रुव की तुलना मानवी मस्तिष्क मध्य से की गयी है और दक्षिणी ध्रुव की जननेन्द्रिय मूल से। मस्तिष्क मध्य को ब्रह्मरंध्र या सहस्रार कहते हैं और जननेन्द्रिय मूल को मूलाधार। कुण्डलिनी वह शक्ति है, जिसका मूलाधार और सहस्रार के बीच अधिक शक्तिशाली प्रवाह चल पड़े, तो जीव और ब्रह्म के बीच एकता से जो महान सम्भावनायें बन सकती हैं, वे दीखने लगें, किन्तु सामान्यतया यह प्रवाह बहुत ही न्यून रहता है। दोनों सिरे अपने-अपने सीमित स्थानीय कार्यों में ही लगे रहते हैं। उनके बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया प्रायः नहीं के बराबर ही होती है।

मूलाधार की क्षमता प्रजनन के लिए उत्साह एवं सामर्थ्य जुटाने में लगी रहती है और उसी प्रवाह में पूर्ति कर पाती है। सहस्रार की सामर्थ्य भी उपार्जन, उपभोग एवं व्यवहार-व्यवस्था में ही अपनी शक्ति को समाप्त कर लेती है। बहुत बार तो दोनों ही केन्द्र अपने जिम्मे आये हुए काम को ही निपटाने में थकान अनुभव करने लगते हैं। सामान्य स्थिति यही है। इस स्थिति को बदलकर इनके केन्द्रों में प्रचुर मात्रा में उच्चस्तरीय सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिए जो विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। यदि साधना- उपासना द्वारा इन केन्द्रों में छिपी बीजशक्ति को उभारना और उच्चस्तरीय बनाना सम्भव हो सके, तो सामान्य-सा दिखने वाला मनुष्य असामान्य बन सकता है।

कुण्डलिनी का निवास मूलाधार चक्र में माना जाता है। उसे प्राण-ऊर्जा जीवनीशक्ति, सृजन प्रेरणा, जिजीविषा, उमंग आदि के रूप में समझा जा सकता है। उसका अनवरत प्रयास काया के समस्त भौतिक प्रयोजनों में आवश्यक समर्थता एवं प्रेरणा उत्पन्न करने में लगा रहता है। वस्तुतः कुण्डलिनी शक्ति अतीव व्यापक है। उसकी बिजली कभी-कभी आकाश में चमकती है, तो चकाचौंध उत्पन्न कर देती है। काम कौतुक मनुष्य को बेचैन और विक्षिप्त बना देता है। इस महाशक्ति का क्षरण रोका और उत्पादन बढ़ाया जा सके एवं जीवन-क्षेत्र के महत्वपूर्ण प्रयोजनों में उसे लगाया जा सके तो उसका परिणाम ऐसा ही होगा, जैसा कि छोटे-से जनरेटर की तनिक-सी क्षमता को विकसित करके विशाल क्षेत्र में बिजली दे सकने योग्य बना देना। जीवनीशक्ति के एक भाग का उपयोग संतानोत्पादन है। परन्तु उससे असंख्य गुने आनन्ददायक और महत्वपूर्ण कार्य जीवन-क्षेत्र में और भी करने के लिए पड़े होते हैं। उन्हें पूरा करने के लिए अभीष्ट मात्रा में शक्ति का उत्पादन कुण्डलिनी जागरण से सम्भव हो सकता है।

यह काया के दक्षिण ध्रुव की बात हुई कुण्डलिनी का दूसरा सिरा मस्तिष्क मध्य सहस्रार में है। यह काया का उत्तरी ध्रुव है। इससे यह जीव-चेतना का, ज्ञान धारण का केन्द्र है। इसे शिक्षण और अनुभव के सहारे आमतौर से विकसित कराया जाता है और वह जितना विकसित हो जाता है, उतनी ही समझदारी बढ़ती है। उसी अनुपात से मनुष्य अधिक आजीविका एवं प्रतिष्ठा प्राप्त कर पाता है। इस केन्द्र की रहस्यमयी परतें कुण्डलिनी जागरण के अभ्यास से उभारी और सशक्त बनायी जा सकती हैं। इस उपार्जन को दिव्यज्ञान या दिव्यदृष्टि कहते हैं! दूरदर्शन, दूरश्रवण जैसी अतीन्द्रिय क्षमताएँ एवं अतीन्द्रिय ज्ञान के कौतूहलपूर्ण चमत्कारों की चर्चा प्रायः होती रहती है। विशिष्ट बुद्धिमानों की अद्भुत मस्तिष्कीय प्रतिभा के आश्चर्य-चकित करने वाले विवरण भी सुनने को मिलते रहते हैं। यह स्कूली शिक्षा या अनुभव-अभ्यास का प्रतिफल नहीं है। इसके पीछे किसी रहस्यमय चेतना-परत का प्रस्फुरण ही काम करता है। दूरदर्शिता, सूझ-बूझ के सहारे लोग ऐसी योजनाएँ बनाते हैं, जिनके सफल होने में कदाचित ही व्यवधान पड़ते हैं, अन्यथा सोचे और निर्धारित किये गये कार्य पूरे होकर ही रहते हैं। इसे भी मानसिक विशिष्टता ही कह सकते हैं, जो सर्वसाधारण में नहीं होती। ऐसी उपलब्धियों में भी उन्हीं गहरी परतों का उभार काम करता है, जिन्हें सामान्य प्रयत्नों से नहीं, वरन् कुण्डलिनी-जागरण जैसे आध्यात्मिक प्रयासों से ही किया जाता है। जिन्हें अनायास ही ऐसी कुछ अतिरिक्त मानसिक क्षमता मिली हो, तो समझना चाहिये कि यह उनकी पूर्व संचित कमाई का प्रतिफल है।

चेतनात्मक उत्कर्ष की उच्चस्तरीय सफलता आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, तत्त्वज्ञान और सद्ज्ञान आदि चार रूपों में देखी जाती है। इनमें से किसी का भी जिसे कोई अंश प्राप्त होता है, तो उसकी ज्ञान-प्रतिभा असाधारण रूप से ऊपर उठने लगती है। तत्त्वदर्शी, महामनीषी, ब्रह्मज्ञानी आत्माएँ अपनी दिव्य क्षमताओं का उच्चस्तरीय प्रयोजनों में उपयोग करना जानती हैं। फलतः वे महात्मा, देवात्मा, ब्रह्मात्मा जैसी भूमिकाएँ सामान्य शरीर धारण किये रहने पर भी निबाहते रहते हैं। उन्हें जड़-जगत की आन्तरिक परिस्थितियों की जानकारी रहती है। उसमें हेरफेर करने की क्षमता भी उनमें पायी जाती है। इसलिये उन्हें सिद्धपुरुष भी कहा जाता है। कुण्डलिनी महाशक्ति का प्रचुर भण्डार परमात्मा ने अपने वरिष्ठ राजकुमार, प्रत्येक मानव को जन्मजात रूप से प्रदान किया है। वह इसी काया की तिजोरी में बन्द है। आवश्यकता मात्र इतनी है कि समुद्र-मन्थन की भाँति हम भी अपनी अन्तः चेतना का मन्थन साधनात्मक उपाय-उपचारों के माध्यम से करके वह रत्न-राशि अर्जित करें, जिन्हें ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। मूर्च्छा को जाग्रति में बदलना और नर से नारायण रूप में विकसित होना, यही कुण्डलिनी जागरण का मूल प्रयोजन है।


बड़ा निराला है प्रतीकों का मनोविज्ञान

प्रतीक और संकेत तब भी थे और अब भी हैं। जब भाषा नहीं थी, तब ये ही पारस्परिक संवाद का माध्यम थे। भाषा के जन्म के बाद भी इनका प्रयोग बन्द नहीं हुआ। सभ्यता की शुरुआत से ही इनके द्वारा भावनाओं तथा आन्तरिक मनोवृत्तियों का आदान-प्रदान किया जाता रहा है। भाषा से भी यही कार्य किया जाता है, किन्तु इसमें जटिल विचार-प्रक्रिया चलती है, समय भी अधिक लगता है, जबकि संकेत तथा प्रतीक आसानी से तुरन्त प्रभाव डालते हैं। किसी विषय के स्पष्टीकरण के लिए शब्द न मिलने पर विशेष हाव-भावों के प्रयोग से समस्या हल हो जाती है। मौन रखना आवश्यक हो या फिर शब्द अधिक प्रभावशाली न हों, तब भी प्रतीकों अथवा संकेतों के माध्यम से अभीष्ट समझाया जा सकता है। आत्माभिव्यक्ति सही मायने में शब्दरहित भाव संचार के द्वारा ही की जा सकती है, क्योंकि कही गयी बात असत्य भी हो सकती है, जबकि शब्दरहित संकेतों के भ्रामक होने की सम्भावना रहते हुए भी ये अधिक विश्वसनीय हैं। इनसे अपेक्षाकृत सार्थक अभिव्यक्ति होती है।

आज के जमाने में विज्ञानवेत्ताओं, अनुसंधानकर्ताओं ने इस विधा पर गहरी खोज-बीन शुरू की है। समाज मनोविज्ञानियों एवं मनश्चिकित्सकों ने अपने इस तरह के सम्मिलित प्रयासों के माध्यम से यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि इससे मानवीय जीवन के कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया जा सकता है। इस तरह के अध्ययन से मानव-चेतना की कई अनदेखी-अनजानी बातें पता चल सकती है। इतना ही क्यों? सम्भव है इससे मानव-जीवन के लिए कोई नयी सम्भावना हाथ लग जाए।

आधुनिक विज्ञान की इस बारे में पहली शुरुआत इंग्लैण्ड में हुई। सन् 1969 में आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में शब्दरहित संचार पर प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। प्रोफेसर राल्फएक्सलाइन एवं माइकन अरगील ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई। उनका कहना था कि मनुष्य भाषा के द्वारा सम्पर्क करता है, किन्तु इसके पूरक के रूप में एवं इसे और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ शब्दरहित संकेतों का सहारा लेता है। शब्दरहित संचार द्वारा चार मुख्य कार्य होते हैं- भावनाओं तथा मनोवृत्तियों का दूसरे के समक्ष प्रकटीकरण, आत्मप्रदर्शन, धार्मिक कृत्य तथा कथन को अपेक्षाकृत अधिक प्रभावपूर्ण एवं स्पष्ट बनाना।

अकेले मानव ही नहीं, पशु-पक्षी भी अपनी भावनाओं एवं मनोवृत्तियों के प्रकटीकरण में शब्द रहित संचार का खासतौर पर सहारा लेते हैं। इस सन्दर्भ में ऐकमैन एवं फ्रीजन ने अपनी पुस्तक ‘अनमास्किंग द फेस’ में काफी बहुमूल्य एवं महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। उन्होंने अपने इस लोक विख्यात ग्रन्थ में चेहरे के छह मुख्य भाव बताए हैं। उनके अनुसार ये भाव हैं- प्रसन्नता, उदासी, भय, आश्चर्य, क्रोध एवं घृणा। मानव मनोविज्ञान के मर्मज्ञ इजार्ड ने अपने ग्रन्थ ‘ह्यूमन इमोशन्स’ में इन भावों में दो की और बढ़ोत्तरी की है। ये हैं- रुचि एवं लज्जा। इनके अतिरिक्त कतिपय मुख्य आन्तरिक वृत्तियाँ भी हैं- मित्रता, क्रूरता, श्रेष्ठता, हीनता तथा प्रेम।

ये सभी विभिन्न भाव और वृत्तियाँ चेहरे पर अपने वाले उतार-चढ़ाव तथा बोलने के स्वर से प्रकट होती हैं। देखने के तरीके, सान्निध्य, स्थूल सम्पर्क तथा शारीरिक मुद्राओं द्वारा भी इन सभी भाव एवं वृत्तियों की अभिव्यक्ति होती है। इनमें से कुछ भाव तो अपने आप ही चेहरे पर आ जाते हैं, जबकि कुछ को काफी कोशिश के बाद चेहरे पर लाया जाता है। इन स्वतः प्रकट भावों को भी स्वेच्छा से नियंत्रित करना या बदलना सम्भव है। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि उचित संकेत का प्रभावशाली संचार करना भी एक कला है। इसकी उत्कृष्टता पर ही निर्भर है। इसी कारण मानसिक रोगियों के सामाजिक व्यवहार में इन संकेतों का सर्वथा अभाव रहता है। यही नहीं, ऐसे व्यक्ति प्रायः बहुत ही कम औरों की ओर देखते- मुस्कराते तथा अन्य चेष्टाएँ करते हैं जबकि सामाजिक व्यवहार में कुशल व्यक्ति वास्तविक मनोभावों के स्थान पर समय व परिस्थिति के अनुकूल भाव ले आने में सक्षम होते हैं।

मइकल अर्गील ने ‘बॉडिली कम्यूनिकेशन’ पुस्तक में लिखा है कि प्रयोगों की एक शृंखला द्वारा आत्मीयता प्रकट करने के लिए शाब्दिक संदेशों से अधिक प्रभाव चेहरे के भावों तथा बोलने के स्वर का पड़ता है। शब्दरहित अभिव्यक्ति का भाषण तथा विस्तृत जानकारी देने के अवसरों पर अधिक न उपयोग होने के बावजूद भी इसी के द्वारा वक्ता तथा श्रोता एक-दूसरे के भावों का अध्ययन करते हैं।

विभिन्न भावों की सर्वाधिक जानकारी चेहरे से ही हो पाती है। कुछ तो बहुत स्वाभाविक होते हैं। जन्मजात गूँगे-बहरे शिशु भी मुसकराते, हँसते तथा रोते हैं। देखने के साथ मुस्कराना सबसे अधिक प्रभावशाली संकेत है। तीन सप्ताह का शिशु भी ऐसा करके अपने अभिभावकों के प्रति सन्तुष्टि प्रकट करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार चेहरे के भावों का नियंत्रण बीस माँसपेशियाँ करती हैं। ये फेशियल नर्वस द्वारा प्रेरित होती हैं- जो सीधे मोटर कॉर्टेक्स के संचालन में होती हैं। नृतत्त्वशास्त्रियों का मत है कि भावों एवं संकेतों का प्रदर्शन वंश-परम्परा एवं संस्कृति से सीखा जाता है। मुख्य शब्दरहित संकेतों का भिन्न संस्कृतियों में भी समान अर्थ होता है, किन्तु भिन्न संस्कृतियों में अवसर के अनुरूप चेहरे के भावों में भिन्नता देखी जाती है। ऐकमैन के अनुसार, एक जापानी सार्वजनिक स्थान पर घृणास्पद दृश्य को देखकर घृणा के भाव उसके चेहरे पर उभर आते हैं। एक जापानी के लिए दूसरे जापानी के भावों को जानना कठिन है, जबकि किसी अंग्रेज या इटली वासी के भावों को वे अधिक समझ सकते हैं। ऐसा इसलिये है क्योंकि जापान में उदासी, क्रोध या अन्य नकारात्मक भावों का प्रदर्शन असभ्यता माना जाता है।

चेहरे के भावों पर नियंत्रण जितना सहज है, बोलने के स्वर व शरीर की मुद्राओं पर नियंत्रण उतना सहज नहीं है। अतः चेहरे पर अपने से रोके गये भाव इनके द्वारा प्रकट हो जाते हैं। भावाभिव्यक्ति का चेहरे के बाद स्वर ही दूसरा प्रमुख रास्ता है। धीमी गति और नीचा स्वर उदासी का, उच्च स्वर, रुकावट युक्त, हाँफती आवाज उत्तेजना का परिचायक है। भावों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति चेहरे से अधिक वाणी कर देती है।

देखने की शैली से भी मनोभाव प्रकट होते हैं। जिनसे हम प्रेम करते हैं। उनसे अधिक उन लोगों को देखना चाहते हैं, जो हमें अधिक आत्मीय होते हैं। बोलते समय अधिक देखना तथा सुनते समय कम देखना प्रभुत्व दर्शाता है। नीचे से लज्जा, ग्लानि एवं उदासी के भाव प्रकट होते हैं। स्पर्श के विभिन्न तरीकों से भी विभिन्न संस्कृतियों में प्रेम प्रकट किया जाता है। निकटता रखना या पास बैठना भी प्रेम को प्रकट करता है। मेज़ के सिरे पर बैठना प्रभुत्व दर्शाता है। इसी तरह शरीर की मुद्राओं से भी कुछ भावों का ज्ञान होता है। टाँगें फैलाकर, पीछे की ओर झुकना व हाथों पर सिर टिकाना अरुचि का द्योतक है।

शब्दरहित संकेतों द्वारा भावों को प्रकट करने की क्षमता अलग-अलग लोगों में भिन्न-भिन्न होती है। स्वतः प्रकट होने वाले संकेत महिलाओं तथा बहिर्मुखी व्यक्तियों में अधिक देखे जाते हैं, जबकि निराश व्यक्तियों व मानसिक रोगियों में कम देखने को मिलते हैं। स्वेच्छा से प्रकट किये गये भाव समाज-व्यवहार में कुशल लोगों तथा नित्य बहुसंख्य लोगों के सम्पर्क में रहने वालों में अधिक देखे जाते हैं।

शब्दरहित संकेतों को समझना भी अपनी व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करता है। मानव शिशु पाँच-छह माह की उम्र से ही चेहरे के भावों को पहचानने लगता है। यह सीखने का नहीं, वरन् परिपक्वता का परिणाम है। परिस्थिति के अनुसार एक संकेत के भिन्न-भिन्न अर्थ हो सकते हैं विवेकवान व्यक्ति स्वैच्छिक तथा स्वतः उत्पन्न दोनों प्रकार के संकेतों को भली प्रकार समझ लेते हैं। महिलायें इनकी खासकर स्वैच्छिक संकेतों की बेहतर जानकार होती हैं। वे स्वर तथा शरीर की मुद्राओं की अपेक्षा चेहरे पर अधिक ध्यान देती हैं, जबकि पुरुष स्वर पर ही ध्यान देता है। लड़कियों में यह योग्यता बाल्यावस्था में ही आ जाती है। हालाँकि जो महिलायें पुरुषों की तरह भावों को समझ लेती हैं, उन्हें लोकप्रियता नहीं मिलती। इसका कारण यह हो सकता है कि महिलाओं से विनम्र तथा नमनीय रहने की अपेक्षा की जाती है। मनोरोगियों की इस क्षेत्र में बहुत कम समझ होती है। अपराधी प्रकृति के लोग अत्यधिक संवेदनहीन देखे जाते हैं। उन्हें तब तक यह ज्ञान नहीं हो पाता है कि वे किसी को कितना क्रोधित कर रहे हैं, जब तक लड़ाई नहीं शुरू हो जाती।

अलग-अलग संस्कृतियों में विभिन्न संकेतों द्वारा विशेष सन्देश देने की परम्परा रही है। पाँचों अंगुलियाँ एक साथ जुड़ी हुई अपनी हथेली ऊपर की ओर उठाने का अर्थ ग्रीस में ‘अच्छा’, इटली में ‘एक प्रश्न’, ट्यूनिसीया में धीरे-धीरे तथा स्पेन में ‘बहुत’ होता है। अधिकाँश यूरोप में सिर को दायें-बायें हिलाने का अर्थ इनकार होता है, जबकि ग्रीस तथा दक्षिणी इटली में सिर को पीछे की ओर झटकना ‘इनकार’ दर्शाता है। अरब में पैर का तलवा दिखाने को बहुत असभ्यता माना जाता है, क्योंकि इसका अर्थ है- तुम मेरे पैरों की धूल के समान हो। ग्रीस में खुला हाथ दिखाना और भी असभ्यता है, क्योंकि इसका अर्थ है- मैं तुम्हारे चेहरे पर मल पोतना चाहूँगा। बोलने के स्थान पर संकेतों- चिह्नों के प्रयोग के कई कारण हैं, जिनमें दूरी- संचार, युद्ध, पानी के अन्दर तैरना आदि है। इटली में बातचीत में संकेतों का काफी ज्यादा प्रयोग किया जाता है।

किसी भाषण के दौरान श्रोता सिर हिलाकर तथा चेहरे के भावों से वक्ता को अपनी रुचि -अरुचि का बोध कराते हैं। वक्ता भी बोलने के दौरान बीच-बीच में अपने श्रोताओं के मनोभावों का अवलोकन कर लेते हैं। सामान्यतया लोग बोलते समय जितना देखते हैं, उससे दो गुना सुनते समय देखते हैं। ऐसा इसलिये क्योंकि बोलते समय-विशेषकर भाषण के आरम्भ में वक्ता का अधिक देखना उसकी एकाग्रता में विघ्न डालेगा, जबकि श्रोता सुनने के अतिरिक्त वक्ता के हाव-भाव में रुचि रखने के कारण अधिक देखते हैं। इसके विपरीत प्रभुत्व सम्पन्न व्यक्ति बोलते समय जितना देखते हैं, उतना सुनते समय नहीं क्योंकि उनके लिए सुनना महत्वपूर्ण नहीं, पर बोलते समय श्रोता कितना सुन रहे हैं, यह वे देखना चाहते हैं।

सुविख्यात मनीषी के. एवरक्लोम्बाई ने ‘ब्रिटिश जर्नल ऑफ डिसीजेज ऑफ कम्यूनिकेशन’ में अपने शोधपत्र में लिखा है कि हम मुँह से बोलते हैं, पर वार्तालाप सम्पूर्ण शरीर से करते हैं। यही क्यों वेशभूषा के द्वारा बिना कुछ कहे भी संदेश दिया जा सकता है। कोई चिकित्सक या वकील अपनी वर्दी में जो प्रभाव डालता है, वह साधारण वस्त्रों में सम्भव नहीं। अमेरिका के एक महाविद्यालय की फुटबाल टीम ने मैच जीतने पर ज्यादातर छात्रों ने महाविद्यालय की टी. शर्ट पहननी शुरू कर दी, क्योंकि यह उनकी विजय का प्रतीक बन गयी।

कुछ धार्मिक कृत्य जैसे विवाह संस्कार आदि में प्रतीकों के द्वारा विशेष संदेश दिये जाते हैं। ये प्रतीक सामाजिक सम्बन्धों तथा चिन्तन-व्यवहार में भारी परिवर्तन ला देते हैं। एक अंगूठी अथवा गाउन पहनाने तथा पादरी के स्पर्श कर देने से पति-पत्नी का सम्बन्ध बन जाता है। शब्दरहित संकेतों एवं प्रतीकों के कारण पादरी की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं। ईसाइयों के कुछ धार्मिक प्रतीक हैं- डबलरोटी, शराब, क्रास । अन्य धर्मों में मृत्यु व जीवन, सूर्य व चन्द्र प्रतीकों की पूजा की जाती है। हिन्दुओं में स्वस्तिक का चिन्ह एवं मूर्ति पूजा इसी का विकसित एवं परिष्कृत रूप है।

धार्मिक भावनाओं को जगाने के लिए ही संगीत, खुशबू, अंधकार, ज्योति, एकान्त तथा विशेष मूर्तियों का उपयोग किया जाता है। किसी राष्ट्र या विशेष समूह को विशेष चिन्ह या ध्वज के द्वारा पहचाना जाता है। ये प्रतीक-चिन्ह लोगों की धार्मिक, आध्यात्मिक, राष्ट्रीय भावनाओं से गहराई तक जुड़े होने के कारण अत्यन्त प्रभावशाली होते हैं। रेमण्ड कर्थ के अनुसार- “संकेतों का ऐसा महत्व योग्यता, स्थायी प्रभाव व एक सृजन शक्ति है- जो शब्द अकेले नहीं कर सकते।” प्रतीकों, संकेतों के साथ शब्दों का प्रयोग उनके अर्थ को अधिक स्पष्ट व प्रभावशाली बनाकर भावनाओं पर गहरा प्रभाव डालता है। ये प्रतीक और संकेत पुरातनकाल से हमारे जीवन में रचे-बसे हैं। इन्हें पहचानने, जानने व अनुभव करने की कला सीखकर हम सामाजिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक कुशल, सक्षम एवं आत्मीयतापूर्ण व्यवहार निभा सकते हैं साथ ही औरों का सहज प्रेम पाकर कृतकृत्य हो सकते हैं।


ईश्वराधना हो तो ऐसी हो

जड़ पाषाण की पूजा को यदि ईश्वर-उपासना कहा जाए, तो भगवान के साकार स्वरूप विराट ब्रह्म की सेवा को क्या कहना चाहिये? आये दिन इस प्रकार के तर्क-वितर्क होते रहते हैं और यह विवाद छिड़ा ही रहता है कि कौन सही और कौन गलत है? किसे अपनाया, किसे छोड़ा जाये? लोकसेवियों के जीवनक्रम और उसकी फलश्रुति को देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि लोकमंगल से बढ़कर दूसरा ऐसा कुछ नहीं, जो सर्वोत्तम ईश्वराधना कहा जा सके। समय-समय पर प्रकाश में आने वाले प्रसंगों से इस तथ्य की पुष्टि होती रहती है।

घटना पश्चिम बंगाल की है। नादिया जिले में हरसोला नामक एक गाँव है। मुगलों के जमाने में वहाँ कहीं से आकर एक क्षत्रिय परिवार बस गया था। गृहस्वामी भानुराय थे। उनके पुत्र का नाम प्रतापराय था। प्रतापराय में उनके माता-पिता के सद्गुणों का अद्भुत समन्वय हुआ था। पिता परोपकारी और दानशील थे, तो माता कुसुमी की ममता ऐसी थी, जो सर्वसाधारण में बिरले ही दिखाई पड़ती हो। उनके दरवाजे पर जो कोई टेर लगाता, उसे कभी भी भूखा नहीं लौटना पड़ा। दूसरे द्वारों पर भले ही उनके पेट को आहार न मिलता हो, पर यहाँ उनकी क्षुधा अवश्य तृप्त होती थी। बिन माँगे भर पेट भोजन और ऊपर से कच्चा अन्न, यह यहाँ का नियम था। इससे आये दिन वहाँ याचकों और भिखारियों की भीड़ लगी रहती। भिखारियों का प्रबन्ध कुसुमी संभालती और भानुराय याचकों के दुःख-दर्द सुनते। हरेक को आवश्यकतानुसार समुचित धन और अन्न दिया जाता।

सम्पत्ति और सत्प्रवृत्ति का समभाव यदा-कदा और यत्र-तत्र ही देखा जाता है। जहाँ सम्पदा होती है, अक्सर वहाँ कुटेवों के कुचक्र विपदा बनकर छाये रहते हैं। यह परिवार इसका अपवाद था। यहाँ धन तो था, पर धन के साथ अगले वाले व्यसन नहीं।

प्रतापराय में इन सुसंस्कारों की गहरी छाप थी। उनमें एक साथ परोपकार, सदाचार, सद्व्यवहार और करुणाजन्य स्नेह-प्यार यह सब तत्व इकट्ठे हुये थे। माता से संवेदना मिली थी और पिता से परमार्थपरायणता। इनके सम्मिलन से वे इतने दिव्य हो उठे थे, जिसे कि आज कहने-सुनने की चीज भर माना जाता है। धार्मिकता उन्हें विरासत में मिली थी। वे ईश्वरभक्त थे। सेवा कार्यों से जो समय बच जाता, उसे इसी में लगाते। वे उच्चकोटि के तपस्वी भी थे। स्वयं तपकर, कष्ट उठाकर, दूसरों को सुख पहुँचाना उन्हें अच्छा लगता था। उनकी अपनी इच्छा इतनी भर थी कि उनसे किसी को कष्ट न पहुँचे। मोटा खाना, मोटा पहनना उनका आदर्श था। इससे अधिक की न तो उनने कभी आकांक्षा की, न आवश्यकता समझी। यों वे चाहते तो शौक-मौज में धन खर्च कर सकते थे, पर इससे वे सदा दूर रहे।

जिसने संतोष का सुख चख लिया, उसके लिए अति का कोई महत्व नहीं और जिसे धन की लिप्सा लग गई, उसके आगे कुबेर की सम्पदा भी स्वल्प है। प्रतापराय स्वल्प-संतोषी थे। उनके आगे ही अन्य गाँवों के जमींदार धन जोड़ने और कोठार भरने में जहाँ अपना सुख-चैन गँवाते रहते, वहीं उनका परिवार उसे लुटाकर दूसरों को सुखी बनाता और स्वयं आनन्दित रहता। इस परिवार की कृतज्ञता से गाँव वाले इतने लदे थे कि आगे कोई सहायता लेने में संकोच अनुभव करते, अस्तु अब जिस किसी को कोई जरूरत पड़ती तो वे अपनी सोने-चाँदी की कोई अमानत लेकर वहाँ पहुँचते और बदले में धन प्राप्त करते थे। वैसे राय परिवार में गिरवी रखने का धंधा नहीं होता था। इसे तो गाँववालों ने अपनी झेंप मिटाने और सहज अनुभव करने के लिए निजी तौर पर शुरू किया था, फिर भी इसे गिरवी नाम देना उचित न होगा, कारण कि गिरवी में वस्तु के मूल्याँकन के आधार पर धन दिया जाता है। वस्तु जितने की होगी, रुपया उतना ही मिल सकेगा, जबकि वहाँ ऐसी कोई व्यवस्था न थी। धन लेने वालों से न पूछताछ की जाती, न आभूषण देखे जाते। बस जरूरत की रकम दे दी जाती। पिता भानुराय के समय ये ही यह उपकार-वृत्ति चल रही थी, जिसका प्रतापराय यथावत निर्वाह कर रहे थे।

परिवार में अब प्रतापराय और उनकी पत्नी रह गये थे। माता-पिता का देहान्त हो चुका था, किन्तु सेवा वृत्ति की जो पौध उन दोनों ने लगायी थी, वह अब वृक्ष बनने की तैयारी कर रही थी। उनके यहाँ माता-पिता के समय में सिर्फ भिखारी ही भोजन पाते थे। इसे उनने सदावर्त की शक्ल दे दी थी। अब वहाँ भिखारी से लेकर असहाय, अनाथ, बेसहारा, दरिद्र सबको भोजन मिलता था। निर्धन भी दूर-दूर से आर्थिक सहायता पाने के लिए आने लगे थे। पहले यह सिर्फ गाँव के लोगों तक ही सीमित था। वह अब अनेक गाँवों तक फैल चुका था। प्रतापराय भी मुक्तहस्त से उनकी मदद करते और जिसे जितनी रकम की आवश्यकता होती, उसे बिना किसी पूछताछ के दे देते। उनका नाम-पता खाते में चढ़ा लिया जाता। अमानत की वस्तु रखने के लिए प्रतापराय ने बैठक खाने में लोहे के एक बड़े सन्दूक की व्यवस्था की थी। सब अपने-अपने गहने नाम-पते के साथ उसी में रख जाते और जब भी, जितने दिनों बाद भी रुपया लौटाने आते अपनी अमानत उस बक्से से निकाल ले जाते। प्रातपराय इन आभूषणों को न तो पैसा देते समय देखते, न उन्हें ले जाते समय। सब कुछ उधार लेने वालों की ईमानदारी पर निर्भर था।

जो जैसा होता था, वह औरों को भी वैसा ही समझता है। सत्पुरुष सामने वाले को सत्पुरुष ही मान बैठते हैं, किन्तु किसी की धारणा मात्र से दुनिया बदल तो सकती नहीं। जो जैसा है, वैसा ही बना रहेगा। बेईमान यदा-कदा ही संत बनते देखे जाते हैं। अधिकाँश मामलों में अवसर की तलाश में रहते और मौका मिलते ही सब कुछ हड़पने को तैयार हो जाते हैं। प्रतापराय के साथ यही हुआ। उनकी सरलता और ईमानदारी को देखकर कुछ लोगों की नीयत खराब हो गई। चार दुष्टों ने उन्हें ठगने का कुचक्र रचा। एक ने अपने डिब्बे में कंकड़-पत्थर भरे, शेष तीन ने थैलियों में, फिर बारी-बारी से वे चारों डिब्बा और थैलियाँ लेकर आये। उन्हें सन्दूक में रखकर रुपये ले गये।

कुछ समय बाद योजनानुसार उनमें से एक आया और रुपया लौटाते हुए सन्दूक से अपना डिब्बा निकाला। उसने उसे वहीं खोला और कंकड़ों को जमीन पर डालकर रोने-चिल्लाने लगा, प्रतापराय को बहुत बुरा-भला कहा और अपने जेवर माँगने लगा। प्रतापराय हक्के-बक्के रह गये। उनने समझाने की बहुत कोशिश की और यह बताना चाहा कि इस बारे में उन्हें कोई पता नहीं। रुपया लेकर सामान ले जाने वालों में से ही शायद किसी ने यह चोरी की हो, पर उसे न तो समझना था, न समझा। इसी बीच शेष तीन भी आ गये। उनने भी वही नाटक किया। रुपये लौटाये और थैलियाँ उठायी । उन्होंने यह प्रकट नहीं होने दिया कि उनके बीच परस्पर कोई परिचय है। उन थैलियों से भी पत्थर निकले। अब तो उपस्थित लोगों को भी विश्वास हो गया कि प्रतापराय ने बेईमानी की है। सभी ने उन्हें गालियाँ देनी शुरू कर दीं तथा धूर्त, बेईमान, पाखण्डी कहने लगे।

बंगाल में उन दिनों मुसलमानों का शासन था। चारों धूर्तों ने लोभ देकर काजी को पहले ही मिला लिया था। न्याय का प्रपंच रचा गया। प्रतापराय को जेल की सजा हो गई। उनका घर-द्वार धन-सम्पत्ति खेत-खलिहान सब कुछ जब्त कर लिया गया। बाद में काजी सहित चारों लोगों ने उसे परस्पर बाँट लिया। पत्नी मालती घर से निकाले जाने के उपरान्त अपनी इष्ट मूर्ति भगवान कृष्ण को साथ लेकर मायके चल पड़ीं। गाँव वालों ने काजी से शिकायत कर दी। मालती पकड़ मंगायी गई। भगवान के स्वर्णाभूषण छीन लिये गये। तत्पश्चात् जब्त माल को चुराने के जुर्म में मालती को भी सजा हो गई। जेल का दरोगा भला आदमी था। उसने मालती को प्रतापराय के साथ ही ठहरा दिया।

जो दूसरों की सेवा-सहायता में तत्पर रहते हैं, भगवान भी उनकी सहायता करते हैं। राय दम्पत्ति को ईश्वर पर दृढ़ विश्वास था। कारागृह जाने के उपरान्त दोनों ने सोचा कि वे निर्दोष अवश्य हैं, पर परमात्मा के यहाँ बिना दोष के दण्ड का कोई विधान है नहीं। निश्चय ही पूर्व जन्म के किसी पाप का यह परिणाम है, अन्यथा इतनी अंधेरगर्दी यदि परमसत्ता के यहाँ होने लगे, तब तो सृष्टि-संचालन ही उनके लिये दूभर हो जाये और उसे सर्वव्यापी, न्यायकारी सत्ता कहने में भी संकोच होने लगे। उसे परमपिता कहने का यही अर्थ है कि उस सर्वोपरि सत्ता का चिन्तन लौकिक पिताओं की तरह नहीं, उससे भिन्न, उदात्त और उत्कृष्ट स्तर का है। साँसारिक पिताओं की दृष्टि में उसका कोई पुत्र अधिक और कोई कम प्रिय हो सकता है, पर परमपिता का प्यार सबके लिए एक समान है। उसके राज्य में किसी प्रकार के भेदभाव की कोई गुँजाइश नहीं

वे निश्चिन्त हो गये और ईश्वर चिन्तन में लीन रहने लगे। उनकी जगह अन्य कोई होता, तो कदाचित अब तक नास्तिक हो गया होता, पर आस्तिकता की परीक्षा ऐसे ही अवसरों पर होती है, जब यह देखा जाता है कि व्यक्ति की श्रद्धा कितनी अटल तथा विश्वास कितना अडिग है, वह ईश्वरीय न्याय को किस हद तक बर्दाश्त कर सकता है। जो इसमें उत्तीर्ण होते, वे बहुत कुछ खोकर भी सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं। धन-साधन गँवाकर भी परम धन प्राप्त कर लेना उन्हीं के वशवर्ती होता है, जो धन परम धन के मार्ग में आड़े आता हो, वह किस काम का? राय दम्पत्ति ने आज यह तत्त्वबोध प्राप्त कर लिया था। वे सर्वस्व गँवाकर भी सर्वोपरि सत्ता को उपलब्ध कर लेने के कारण धन्य अनुभव कर रहे थे। आज उन्हें ईश्वर-दर्शन हुआ था। साक्षात्कार में प्रभु ने कहा- पूर्व जन्म के शेष बचे भोगों को इस कष्ट के बहाने भुगताकर समाप्त करा दिया गया। अब तुम मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। निश्चिन्त रहो और मेरा कार्य करो। इतना कहकर वे अन्तर्ध्यान हो गये।

उधर उस काजी और पाखण्डियों का बुरा हाल था। उनके कुकर्म पर न्यायकारी सत्ता का हाथोंहाथ उन्हें दण्ड मिला। सबको गलित कुष्ठ हो गया। थोड़े ही दिनों में उनकी दशा दयनीय हो गई। जिस धन को अनीतिपूर्वक उनने हड़पा था, उसका अभी वे अच्छी तरह उपभोग भी नहीं कर पाये थे कि परिणाम सामने आ गया। काजी की पत्नी बुद्धिमान थी। उसे यह समझते देर न लगी कि ऐसा क्यों हुआ है? निरपराध प्रतापराय को सताने का ही यह फल है- इसे उसका मन बार-बार कहता था- उसने काजी को समझाया कि अब उबरने का एक ही उपाय है कि प्रतापराय से क्षमा माँग ली जाये। उसके माफ करने से संभव है रोग दूर हो जाये। काजी को यह बात जंच गई। वह और चारों षड्यंत्रकारी प्रतापराय और मालती के पास आये। दोनों को कारामुक्त कर दिया गया। सबने उनके पैरों पर गिरकर माफी माँगी और गिड़गिड़ाकर कहने लगे कि आप सर्वथा निर्दोष हैं। हम सबने झूठा आरोप लगाया था। अब क्षमा करें और व्याधि दूर करने के लिए भगवान से प्रार्थना करें।

प्रतापराय ने उन्हें उठाया। उनके शरीर पर हाथ फेरते हुए परमात्मा से प्रार्थना करने लगे। कहते हैं कुछ देर तक ऐसा करने के पश्चात् न सिर्फ उनके रोग ठीक हो गये, वरन् उसके चिन्ह तक समाप्त हो गये। उन्हें देखने के बाद अब ऐसा नहीं लगता था कि कभी वे कुष्ठग्रस्त हुए हों। यह देखकर गाँव वालों को सच्चाई का पता लग गया। उन लोगों ने भी वास्तविकता की जानकारी न होने के कारण प्रतापराय को काफी भला-बुरा कहा था और गालियाँ दी थीं। उस व्यवहार के कारण उन सबने भी किसी न किसी रूप में आधि-व्याधि भुगती थी। अब वे अनुभव कर रहे थे कि ये विपत्तियाँ उन पर क्यों आई। प्रतापराय ने सभी को क्षमादान दिया।

काजी ने उनकी सारी सम्पत्ति लौटा दी, उपहार भी दिया। उन सबको प्रतापराय ने गरीबों में बाँट दिया। अपने लिये जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा रखकर शेष को भूमिहीनों को दे दिया। वे पति-पत्नी उसी पर उपजे अन्न से अपना निर्वाह करने लगे। पहले वे पीड़ा-निवारण में संलग्न थे, अब उसके दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष पतन-निवारण का जिम्मा उठाया एवं लोगों को सद्ज्ञान दान देने लगे।

प्रतापराय से प्रभावित होकर काजी ने वहाँ एक महल बनवाया, जिसका नाम ‘राय की गढ़ी’ रखा। आज भी उसका अवशेष वहाँ देखा जा सकता है।

इस विराट विश्व को आस्तिकता की कर्मस्थली माना गया है। यहाँ के चलते-फिरते मानवी पुतले ईश्वर की साकार प्रतिमाएँ हैं। जो इनकी सेवा-सहायता रूपी पूजा-उपासना में संलग्न रहते हैं, भगवान की अनुकम्पा उन्हीं पर बरसती है। निर्जीव पत्थर के विग्रह की चिह्न-पूजा मात्र कर आज तक किसने क्या पाया है? यदि किसी को सचमुच कुछ मिला है तो इसे उपासना मात्र ही नहीं, चेतना सम्पन्न मनुष्य की उस पूरा की फलश्रुति मानी जानी चाहिये, जिसे ‘सेवा’ कहते हैं।


कब होगा संवेदना का स्वर्णिम सूर्योदय?

निशा के सितारों जड़े आँचल से झाँकते हुए प्रातः के सुनहले प्रभाव में सारा नगर नयनोन्मीलन कर रहा था। भुवन भास्कर की अरुणिमा आभा अभी भी रात्रि की निविड़ यवनिकाओं से मुक्ति पाने के लिये संघर्ष कर रही थी। रात्रि की नीरवता के पश्चात् प्रातः का यह कोलाहल स्वाभाविक होते हुए भी कुछ अटपटा-सा लग रहा था। कदम्ब पुष्पों से सुवासित स्वच्छ समीर समूचे वातावरण को स्निग्ध सुगन्धित प्रदान करते हुए इस प्रभात का मधुर आलिंगन कर रहा था। दूर तक सपाट जमीन पर नागिन की तरह बल खाती सड़क जहाँ अपनी आधुनिकता पर गर्व से इठलाती चली जा रही थी, तो वहीं उसके दोनों किनारों पर अपना उन्नत भाल उठाये सफेदे के वृक्षमानव के उस कमाल को प्राकृतिक छटा प्रदान कर रहे थे। शिमला के राजभवन के एक विशाल एवं आकर्षक कमरे में ये दोनों पिता-पुत्री भी अपने- अपने लिहाफों में लिपटे हुए उस शीत का आनन्द ले रहे थे। पुत्री अपनी पितृभक्ति के लिए लोक विख्यात थी, तो पिता अपनी देशभक्ति के लिए। पिता ने जहाँ अपने समूचे जीवन को देश-सेवा के लिए अर्पित किया था, वहीं पुत्री ने स्वयं को अपने को उस गौरवशाली पिता की सेवा हेतु समर्पित कर दिया था। इन दिनों भी वे पिता के स्वास्थ्य के चलते चिकित्सकों की सलाह पर यहाँ आयी थीं।

प्रातः के उस मनोरम वातावरण में उन दोनों ने बाहर घूमने के लिए राजभवन से पाँव बाहर निकाले ही थे कि शीत से काँपती हुई एक करुण पुकार उनके कानों से टकराई । “बा...बू.... मैं.... भू.... ख....से.... म.... रा... जा... रहा हूँ। आवाज सुनकर पहले तो यही लगा कि यह भी कोई प्रकृति की प्रवंचना होगी, पर क्षण-प्रतिक्षण की वह पुकार अद्भुत रूप से दैन्य व करुणा से उन दोनों के ही हृदय को कचोटने लगी। सोचा-आखिर कौन होगा, इतनी सुबह। लाखों ही घूमते हैं इन सड़कों पर। पर आवाज में कुछ ऐसा चुम्बकत्व था कि उनके करुणा से छलकते अन्तःकरण ने बरबस ही पाँवों की दशा को मोड़ दिया।

प्रातः की उस शीत में खादी का गरम शाल लपेटे होने के बावजूद सर्दी की वजह से दाँत बज रहे थे। कल्पना ही नहीं की जा सकती थी कि उस सर्दी की भयावह शीत में कौन है- जो इतना शोर मचाने का साहस कर रहा है, कुछ और नीचे उतरने पर देखा- पेड़ के नीचे एक क्षीणकाय भिखारी अपनी जीर्ण-शीर्ण गुदड़ी में सिकुड़ा पड़ा कराह रहा था। पास ही सड़क पर एक कुत्ते का मृतक शरीर पड़ा था। शायद अभी-अभी कोई कार उसे कुचल गयी थी। परन्तु अभी चीखा कौन था? चीख तो निश्चित ही किसी मानव कण्ठ की मालूम होती थी। उन दिनों पिता-पुत्री को इस पर कुछ अचरज हुआ। अपनी जिज्ञासा के समाधान के लिए वे दोनों भिखारी के पास जा पहुँचे और उससे धीमे स्वर में जानना चाहा-बाबा अभी चीखा कौन था? उत्तर मिला- मैं! वे हैरान होकर बोले, पर कुचला तो एक कुत्ता गया है। कुत्ता मर गया, भिखारी उपहासपूर्ण ढंग से हंस पड़ा- हा....हा...हा...!!! अच्छा ही हुआ वह मर गया- भूखे भटकने से तो कुत्ते की मौत मरना ही अच्छा है, पर मैं तो सोच रहा था कोई इनसान ही मर गया।

मानव के दुख की कल्पना मात्र से ही मानव का हृदय पसीज उठा था। कुछ क्षण रुककर वह बोला- तब तो मुझे और जोर से चीखना चाहिये। कुत्ता मरा है न- इनसान से उत्तम प्राणी मरा है। इनसान तो कुत्तों से भी गया- बीता है।

मानव के मुख से मानव जाति की निन्दा सुनकर उन दोनों पिता-पुत्री को थोड़ा क्रोध भी आया और थोड़ा आश्चर्य भी हुआ। देखा- वह अन्धा था,

सोचा शायद पागल भी हो। जेब से एक चार आने का सिक्का निकाल कर उसके आगे डाल दिया। इसी के साथ उनके पाँव वापस राजभवन की दिशा में लौट चले, पर राजभवन के शान्त एवं सुविधापूर्ण वातावरण में भी उसकी वही करुणापूर्ण पुकार उसके मनों में गूँजने लगी। वे विचार करने लगे- मानव से घृणा करने वाला मानव, मानव से ही घृणा-याचना भी करता है। वाह रे विधाता! विधि की इस विडम्बना का भला कौन पार पर सका है। उसके पागलपन में उनका दृढ़ विश्वास हो गया।

वे दोनों रोज ही सुबह-शाम स्वास्थ्य की दृष्टि से घूमने जाते और नित्य-प्रति ही, प्रायः- शाम उसी भिखारी को उसी स्थान पर बैठा पाते। अन्यमनस्क मन से भी गुजरते हुए वह बरबस ध्यान आकर्षित कर लिया करता था। वह उनके कुतूहल का विषय बन चुका था। अपनी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए उन देशभक्त का बृद्धमन उसकी अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता था। उनकी उत्सुकता बढ़ती ही गयी। एक दिन वह उसे किसी तरह से कह-सुनकर जैसे-तैसे राजभवन ले आये। वहाँ पहुँचते ही वह बोला-बाबू क्या करोगे मेरी कहानी सुनकर! दिल के दर्द को लोग गाकर व्यक्त कर सकते हैं, हँसकर बता सकते हैं, परन्तु न तो मेरे पास गाने की क्षमता है और न ही हँसने की और रोऊँ तो कहाँ तक?

एक जमाना था बाबू, जब शिमला की इन्हीं सड़कों पर मैं अपने घोड़े और इक्के को सरपट दौड़ाया करता था। मेरा इक्का-घोड़ा नगर का सम्मान था। मालूम है बाबू, बड़े-बड़े नेता, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू और न जाने कौन-कौन सफेद झक खादी पहनने वाले लोग मेरे इक्के में बैठा करते थे। अंग्रेज साहब भी हमारे इक्के की तारीफ करते थे। सफेद खादी वाले स्वराजी लोग तब बड़ी-बड़ी बातें कहा करते थे। स्वराज आने पर सबको खुशियाँ मिलेंगी, पर कहाँ, मेरा तो सब कुछ चल गया। मेरी एक औरत थी, एक फूल-सा नन्हा बच्चा था। बोलते- बोलते उसका गला रुंध गया। आवाज साफ करते हुए बोला- चाँद भी छिप जाता है, फूल भी तो दो दिन में धूल में ही मिल जाता है। शहर में बीमारी फैली, मेरी बीबी और बच्चा भी उसके शिकार हो गये। घोड़ा और इक्का बेचना पड़ा। शहर में डाक्टर मिलना कठिन हो गया था, अपना सब कुछ मैंने दाँव पर लगा दिया, परन्तु अपनी बीबी को नहीं बचा सका। बीमारी के आखिरी दिन थे। डाक्टर को सारी पूँजी दे चुका था और पैसा पास में था नहीं। मैं डाक्टर के पास जाकर गिड़गिड़ाया, प्रार्थना की, मिन्नतें कीं, उसके पाँवों पर अपनी पगड़ी रख दी, परन्तु वह टस से मस नहीं हुआ।

मैं उससे पूछ ही बैठा- डाक्टर! क्या पैसा ही सब कुछ है? और किसी चीज का कोई मूल्य नहीं है। अपनी सारी पूँजी मैं तुम्हें दे चुका हूँ, क्या इससे तुम्हारा पेट नहीं भरा? इसके जवाब में उसने मुझे जो फटकार लगायी, वह आज भी भुलाये नहीं भूलती।

ओह! वह बड़े ही आर्द्र स्वर में बोला- बाबू! निर्धनता भी पाप है, धोखा है, एक छल है, प्रवंचना है। इसी कारण एक दिन मेरा बेटा भी मुझे छोड़कर चला गया। मैं उसका भी इलाज न करा सका। इतनी बड़ी दुनिया में मैं बिलकुल अकेला। सर्वथा निस्सहाय, निर्बल और निष्प्राण- बस दिन-रात रोना ही जैसे मेरा नसीब हो गया। आखिर सोचा इस संसार में जो आया है उसे जाना है, फिर दुख या शोक कैसा, संसार का तो मतलब ही यही है- ‘संसरति इति संसारः’ का तात्पर्य भी तो यही होता है। मन में आया- क्यों ने कुछ काम करूँ । मेरे बीबी -बच्चे नहीं तो दूसरों के तो हैं- क्यों न उनकी सेवा करूँ । माँ-बच्चों का मिलना मेरे दुखते घावों पर मरहम बन जायेगा। मन तो ममता का प्यासा है, दिल तो प्यार का भूखा है। जहाँ बच्चों का स्निग्ध प्यार मिलेगा, जहाँ स्वामी की शरण मिलेगी, जहाँ बहिन का स्नेह मिलेगा, जहाँ ममतामयी माँ मिलेगी, वहीं जीवन काट लूँगा।

आखिर नौकरी मिल ही तो गयी। उस सामने की कोठी की ओर देखो, उसी में मेरे सपनों का संसार बसा और उजड़ा है। वहीं सपना मैंने संजोया था, प्यार से, लगन से परन्तु भाग्य भी कितना निष्ठुर है। मेरे स्वप्नों का महल धूल में मिल गया और मैं देखता रह गया। आह! की पीड़ा भरी कराह के साथ उसकी अंधी आँखों में खून उतर आया। उन क्षणों में पिता-पुत्री दोनों ही स्वयं को बड़ा दुर्बल एवं अशक्त महसूस कर रहे थे।

शायद उसकी पहेलियों का उत्तर भी वही जानता था। उनकी जिज्ञासा ने कुतूहल का रूप ले लिया और फिर आश्चर्य का। वह सोच रहे थे- मनुष्य क्या-क्या नहीं करता, समय-समय उसके दिल में अरमानों के सागर उमड़ा हैं, उमंगें करवटें लिया करती हैं, सोये भाव जागते हैं, मानव उन्हें संजोता है, संवारता है और न जाने क्या-क्या करता है, केवल इसी आशा में शायद सुनहरा प्रभात अपनी अरुणिमा आभा से अतीत की संध्या की कालिख धो दे। वाह रे मानव! प्रभात आता है एक नया तेज लिये, स्वर्णिम आभा लिये, एक नया संदेश लिये, पर मानव अतीत की गहराइयों में बैठकर ऊपर नहीं उठना चाहता, उस प्रभात का आलिंगन नहीं करना चाहता, भविष्य की देदीप्यमान उज्ज्वलता का अभिनन्दन करना नहीं चाहता। अपने मन के अंधियारे में वह प्रकाश ढूँढ़ता है, परन्तु मिलती है उसे केवल निराशा की कालिख। उस अथाह सागर में वह विकल-बेबस हो जाता है। बार-बार प्रयास करता है, परन्तु थमने वाले, उबारने वाले हाथों की संवेदना के अभाव में वह हर बार फिसल जाता है।

बाबू! वह पुनः बोल उठा, मैं बहुत भाग्यशाली था। नौकरी के संसार में अपना अस्तित्व बनाये बैठा था। मेरा कोई न था और मेरा सब कोई था। जी-जान से मैं सबकी सेवा करता था। एक दिन मेरे छोटे बाबू को तपेदिक हो गयी। मैं दिन-रात उनकी सेवा किया करता, उन्हें कहानियाँ सुनाया करता। उन्हें प्रसन्न रखने की कोशिश करता और निरन्तर ईश्वर से प्रार्थना करता। वाह रे मालिक! मेरा बाबू ठीक हो गया। वह फिर हँसने-खेलने लगा ठीक पहले की तरह। मैंने प्रभु को धन्यवाद दिया, मेरा कर्तव्य पूरा हुआ, परन्तु रोगी के दिन-रात सम्पर्क में रहने से महीने के पश्चात् मुझे तपेदिक ने आ घेरा। पहली बार महसूस हुआ, कितनी गन्दी होती है यह बीमारी, पर बाबू मेरे पास कोई नहीं आया, सबकी संवेदना जैसे कुन्द हो गयी थी।

मेरा एकमात्र साथी कुत्ता था, एक नन्हा-सा प्यारा-सा कुत्ता। मुसीबत में वही मेरा साथी था, उसी के मस्तक पर हाथ फेरा करता था, उसे ही पुचकारा करता था और वह यूँ दुम हिलाता था, मानो मेरा अपना ही कोई सगा हो। ईश्वर ने उसे मानव की बोली नहीं सिखायी थी, पर मानव से वह बेहतर था। बाबू, मुझे कोई पानी तक को भी नहीं पूछता था।

मेरे स्वाभिमान को चोट लगी, मेरी आत्मा कराह उठी, ओह! मैंने इन्हें सब कुछ दिया, अपना सर्वस्व लुटा दिया और मेरी यह कदर? वह सब जो मुझे असम्भव लगता था, वह सम्भव में बदला और एक दिन बाबू मेरे कुत्ते को भी मुझसे अलग कर दिया गया और कुछ दिनों पश्चात् मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। यह कहते हुए उसने गहरी साँस ली और कहने लगा- बड़ा सज्जन था मैं, पर आवश्यकता मनुष्य को असहाय कर देती है। मैं दर-दर की ठोकरें खाने लगा। मुझ रोगी को कोई काम देना नहीं चाहता था। मैंने अपने पैरों पर खड़े होने के लिए क्या नहीं किया? जिसे मैंने सब कुछ दिया था, उसी ने मुझे धोखा दिया।

मेरे लिये चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा था। आत्महत्या करना चाहता था, पर इतना साहस नहीं जुटा पाया वरन् हताश होकर रास्ते का भिखारी बन गया। उस बीमारी में मेरी आँखें भी चली गयीं। मेरी दुनिया अँधेरी हो गयी। मेरे अरमानों के दीप बुझ चुके थे। मेरी आत्मा मर चुकी थी। मेरी आशाओं पर तुषारापात हुआ था। मेरे लिये इस संसार में सब कुछ विराना था। एक दिन सुना था कि देश स्वतंत्र हो गया है। मेरे पास से कुछ लोग आपस में बतियाते हुए गुजर रहे थे- अब यह होगा- वह होगा! पर मैं पूछता हूँ- क्या इनसान की संवेदना स्वतंत्र हो सकी है। क्या इनसानी भावनाएँ पैसों की गुलामी से आजाद हो सकी हैं? क्या देश स्वतंत्र होने से मेरे जैसे लोगों को- आप जैसों की संवेदना- सहानुभूति मुक्त रूप में मिल सकेगी? नहीं न..... कहते हुए वह हँसा- फिर जैसे कोई बड़ी गहरी बात बता रहा हो, ऐसे रहस्यपूर्ण स्वर में बोला- सच कहता हूँ, बाबू- मनुष्य से तो अच्छे जानवर हैं- जिनकी संवेदना न तो धन की बन्दी है और न ही प्रतिष्ठा की। आप लोगों से अच्छा तो मेरा कुत्ता था, कितने प्यार से बैठता था मेरे पास। लगता था उसके मन में अभी भी अपने कुत्ते के मारे जाने का दर्द था।

उसकी अटपटी बातों से वे सज्जन गहरे सोच में पड़ गये। अपनी पुत्री को सम्बोधित करते हुए बोले- मणि! ठीक ही तो कहता है, अगर देशवासियों की भावनाएँ स्वतंत्र न हो सकीं, तो देश की स्वतंत्रता भी पूर्ण नहीं है। हाँ बाबू, पुत्री ने अपने पिता से सहमति जतायी। जिनके व्यक्तित्व ने कभी सारे अंग्रेजी राज्य को दहशत में डाल रखा था, देशवासी जिन्हें लौह पुरुष कहते थे। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल सोच में थे कि देशवासियों की संवेदनाओं को धन, पद, कुल, जाति और अहं की बेड़ियों से कैसे मुक्त किया जाये।

संध्या का समय था। आकाश में रजनी के स्वागत में नन्हें- नन्हें दीप टिमटिमा रहे थे पंछी लौटकर अपने नीड़ों की ओर जा रहे थे। बादलों की आँख -मिचौली में तारों की झिलमिल नीचे की झील को एक अद्भुत छटा प्रदान कर रही थी, परन्तु वे शून्य में निहारते हुए इनसानी जीवन की इस निष्ठुर प्रवंचना का कारण पूछ रहे थे। रात हो गयी थी, चारों ओर दीप जल उठे थे, परन्तु उन सबके प्रकाश में भी वे अन्यमनस्क मन से सोच रहे थे- काश! अपने देशवासियों की भावनाएँ भी इसी तरह से प्रकाशित हो उठें। सभी उजाला फैला सकें। भावनाओं का प्रकाश हो तो फिर समस्याओं का अँधेरा कहाँ टिकेगा?

परन्तु अभी तो निशा चुपके से अपना आँचल पसार रही थी, शायद देश को अभी प्रतीक्षा करनी थी- इक्कीसवीं सदी के नव-प्रभात के लिए। संवेदनाओं के अरुणिमा सूर्योदय के लिए। जब इनसान, इनसान की गरिमा में प्रतिष्ठित होकर औरों के दुख-दर्द को समझ सकेगा। उसका जीवनमंत्र होगा- सुख बांटो-दुख बंटाओ।


प्रगति की होड़ में हलाहल से भर रहे हैं हमारे सागर

आज पर्यावरण-प्रदूषण इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि अब तक सुरक्षित माने जाने वाले सागर भी इससे अछूते नहीं रहे। कुछ वर्ष पूर्व ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें कहा गया था कि प्राकृतिक संसाधनों में समुद्र ही एक ऐसा संसाधन है, जो प्रदूषण से अभी मुक्त है। अब यह धारणा गलत साबित हुई है।

समझा जा रहा था कि पृथ्वी के दो-तिहाई भाग को आच्छादित करने वाले समुद्रों पर, उसके एक- तिहाई हिस्से में निवास करने वाले मनुष्यों के कचरे का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, पर यह विश्वास मिथ्या सिद्ध हुआ है। कहीं-कहीं का समुद्री जल इतना जहरीला हो गया है कि उसका प्रयोग निषिद्ध घोषित कर देना पड़ा। इस विषाक्तता से वहाँ के जलीय जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। वर्तमान प्रदूषण का सबसे प्रमुख कारण है- बढ़ते रासायनिक उद्योग। इससे निकलने वाले रासायनिक कचरे से निपटने के लिए समुद्रों को उपयुक्त स्थान मान लिया गया है और बड़े पैमाने पर उसको उसमें बहा दिया जाता है। इन कचरों में सामान्य रसायनों से लेकर विषैले रसायन तक सम्मिलित होते हैं। बड़े औद्योगिक देश अपने रेडियोधर्मी कचरे को भी स्टील के बड़े-बड़े पात्रों में सीलबन्द कर सागर में जल-समाधि दे देते हैं। जब तक ये बन्द हैं, तब तक तो कोई खतरा नहीं, लेकिन जिस दिन इनकी समाधि टूटी, उसी दिन से विनाशलीला रचना शुरू कर देंगे। एक बार वे जल में मिल गये, तो फिर लम्बे काल तक उनकी विद्यमानता वहाँ बनी रहती है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सत्तर के दशक में डी.डी.टी. का प्रयोग पश्चिमी देशों में वर्जित घोषित कर दिया गया, पर उसका प्रभाव आज भी वहाँ के समुद्री जीवों में देखा जा सकता है। जब सामान्य-सा रसायन इतनी लम्बी अवधि तक अपनी उपस्थिति का प्रमाण दे रहा है, तो रेडियोधर्मी जैसे घातक तत्वों की तो बात ही और है। डी.डी.टी. का प्रयोग वहाँ बन्द हो चुका है, पर एक अन्य जहरीले रसायन- आर्गैनोहैलोजन का व्यापक प्रयोग आरम्भ हुआ है। इससे जो संकट एक बार टलता दिखाई पड़ रहा है था, उसका खतरा अब पुनः मंडराने लगा है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर होने वाले तेल वाहक जहाजों की दुर्घटनायें भी पर्यावरण को गंभीर रूप से क्षति पहुँचाती हैं। पिछले दिनों इस प्रकार के कई प्रसंगों में मीलों दूर तक कच्चा तेल फैला, जिससे उस क्षेत्र के असंख्य जलचर मारे गये।

यह तो सीधे समुद्री जल को प्रदूषित करने की घटनायें हुई, पर जो कचरा स्थल भाग में फेंका जाता है, वह भी अन्ततः वर्षा जल के साथ समुद्र में ही पहुँचता है। इस प्रकार समुद्रों को दोहरी हानि झेलनी पड़ती है। नदियों और नालों में बहाये जाने वाले कचरे भी प्रकारान्तर से सागरों को ही प्रदूषित करते हैं। जिन समुद्रों के तट पर औद्योगिक शहर बसे होते हैं अथवा घनी आबादी होती है, देखा गया है कि वहाँ का तटीय जल अत्यन्त प्रदूषित हो जाता है। विशेषज्ञ इसका कारण बताते हुए कहते हैं कि ऐसे मामलों में किनारे का जल बीच के जल से ठीक प्रकार नहीं मिल पाता, अतएव प्रदूषण की सघनता वहीं सीमित होकर रह जाती है और धीरे-धीरे बढ़ती रहती है। ऐसे समुद्री जल में मुख्य रूप से पारा, शीशा एवं ताँबे जैसी भारी धातुओं के यौगिक होते हैं, जो नदी, नालों और झीलों के पानी के द्वारा वहाँ इकट्ठे हो जाते हैं। इनमें सूक्ष्म जीवी जीवनधारियों की संख्या भी कोई कम नहीं होती।

सूक्ष्मजीवी बैक्टीरिया से होने वाला प्रदूषण आमतौर पर तटवर्ती जल तक ही सीमित होता है, जबकि रसायनों के अंश मध्यवर्ती समुद्र में भी पाये जाने लगे हैं। यह अंश, विभिन्न उद्देश्यों को लेकर जबसे समुद्र का दोहन आरम्भ हुआ है, तब से ज्यादा घनीभूत होने लगे हैं पहले खनिज तेल और खनिजों की ही गहरे समुद्रों में खोज की जाती थी, अब हीरे की भी तलाश होने लगी है। हीरे की यह खोज सागर की तली में उतर कर रोबोट करते हैं। हाल ही में ऐसा एक रोबोट ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। समुद्री गर्भ से इस प्रकार की छेड़छाड़ और प्रदूषण से वहाँ के जल-जीवन को अब खतरा पैदा हो गया है। इसके कारण जल-जीवों की कितनी ही प्रजातियाँ लुप्त होने लगी हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, समस्त पृथ्वी पर जन्तुओं के 33 वर्ग पाये जाते हैं। इनमें से 30 वर्ग समुद्र में भी विद्यमान हैं। 15 वर्ग ऐसे हैं , जिनका एक भी प्रतिनिधि स्थल भाग में नहीं है। यह तो ज्ञात प्रजातियाँ हुईं। ऐसा अनुमान है कि गहरे जल में लाखों की संख्या में ऐसी अविज्ञात प्रजातियाँ हैं, जिनके बारे में प्राणिशास्त्रियों को भी कोई जानकारी नहीं। इसके अतिरिक्त कितनी ही प्रकार की उपयोगी वनस्पतियाँ भी हैं, इनका खाद्य के रूप में प्रयोग होता है। इनमें सर्वप्रमुख शैवाल है। वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार, समुद्री शैवाल की तीन-चार किस्में ऐसी हैं, जिनमें प्रचुरता से प्रोटीन पायी जाती है। इनमें प्रधान प्रजातियाँ निम्न हैं- आइसोक्राइसिस गल्बाना, डुनेलियेला टर्टियोलेक्टा, टेटासेल्मिस सुयोसिका एवं क्लोरेला स्टिगमैटोफेरा। इनमें सबसे अधिक प्रोटीन डुनेलियेला (55 प्रतिशत) में, उसके बाद टेटासेल्मिस (41 प्रतिशत) में तथा आइसोक्राइसिस एवं क्लोरेला में (36 प्रतिशत) पायी जाती है। इस दृष्टि से भविष्य में इनका भोजन के रूप में एवं विशेष रूप से प्रोटीन-स्रोत के रूप में बहुतायत से प्रयोग होने की बढ़ी-चढ़ी संभावना है।

यदि समुद्रों का प्रदूषण दिन-दिन इसी प्रकार बढ़ता गया, तो फिर इन वनस्पतियों का उपयोग कर सकना मुश्किल हो जायेगा। ऐसा अनुमान है कि प्रतिवर्ष समुद्रों में विभिन्न स्रोतों से 60 लाख टन से भी अधिक पेट्रोलियम पदार्थ पहुँच जाते हैं। धात्विक यौगिकों की मात्रा भी कोई कम नहीं होती। यह सब समुद्री वनस्पतियों द्वारा अवशोषित कर लिये जाते हैं। इस स्थिति में यदि इनका उपयोग खाने अथवा दवा बनाने के काम में किया गया, तो इनका विषैला प्रभाव खाने वाले पर गंभीर परिणाम उत्पन्न करेगा और जल्द ही उसे मृत्यु के मुख में धकेल देगा।

अपने देश में भी सागर तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण की समस्या गंभीर होती जा रही है। भारत का कुल भूभाग 3290 लाख हेक्टेयर है। यहाँ 100 से अधिक स्वतंत्र नदियाँ और इससे दुगुनी सहायक नदियाँ हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 6000 किलोमीटर लम्बा इसका समुद्रतट है। आबादी का करीब 25 प्रतिशत भाग इसी तटवर्ती क्षेत्र में बसा है। बारह राज्यों की सीमाएँ इस तटवर्ती क्षेत्र को छूती हैं। इनमें केरल, कर्नाटक, आँध्रप्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, पाण्डिचेरी, लक्षद्वीप तथा अण्डमान निकोबार द्वीप समूह हैं। भारत के चार महानगरों में से तीन समुद्र किनारे बसे हैं। शहरों के आकार-प्रकार जीवन-स्तर और उद्योगों की प्रकृति एवं संख्या के आधार पर उपरोक्त शहरों के तटीय इलाकों का प्रदूषण स्तर भी भिन्न-भिन्न है।

महाराष्ट्र में मुम्बई, ठाणे, कल्याण के अतिरिक्त 24 अन्य शहरों का प्रदूषण समुद्र में ही जाता है। इनमें दो प्रकार के उद्योग हैं- वस्त्र तथा रसायन। मुम्बई में इन कचरों के समुद्री जल में डाले जाने के कारण उस क्षेत्र के जल का रंग हरा हो गया है। इसी से प्रदूषण की सघनता का अन्दाज लगता है। मुम्बई के जलीय क्षेत्र में प्रदूषण के दो अन्य कारण भी हैं। एक तो वहाँ के समुद्र से तेल निकाला जाता है, जिससे लगभग नियमित रूप से छोटे-बड़े स्रोतों से वहाँ पर तेल का रिसाव होता रहता है। अभी पिछले दिनों मुम्बई हाई की एक पाइप से बड़े पैमाने पर यह रिसाव हुआ था, जिससे जलीय क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को नुकसान पहुँचाया था। गोवा में भी निर्यात किये जाने वाले अयस्कों और तेल के टैंकरों से वहाँ का समुद्र प्रदूषित होता रहता है। इस दिशा में पर्यटकों और तटवर्ती होटलों की भी कोई कम बड़ी भूमिका नहीं है।

कर्नाटक राज्य में समुद्री किनारे पर कुल 12 शहर बसे हैं। ये करीब 300 किलोमीटर का इलाका घेरते हैं। इनमें अगणित छोटे-बड़े उद्योग हैं। इनका सम्पूर्ण कचरा समुद्र में छोड़ा जाता है। एक अनुमान के अनुसार, प्रतिदिन यहाँ के जल में 20 हजार घन मीटर प्रदूषणकारक तत्व डाले जाते हैं, जिनमें 25 टन के करीब कार्बनिक पदार्थ होते हैं। कुद्रमुख खदानों से निकाले गये और अयस्कों के निर्यात के लिये बनाया गया न्यू मैंगलोर पोर्ट तथा कारवार का नौसैनिक अड्डा भी दो ऐसे स्रोत हैं, जो प्रदूषण फैलाते हैं।

पांडिचेरी और तमिलनाडु के लगभग एक हजार किलोमीटर लम्बे समुद्रतटीय क्षेत्र में सैकड़ों की संख्या में उद्योग हैं। उनमें दवाई, कागज, उर्वरक, सीमेंट, वस्त्र, चीनी, खनन और अयस्क-संवर्द्धन उद्योग प्रमुख हैं। इनका अर्द्ध उपचारित तथा अनुपचारित कचरा समुद्र में ही डाल दिया जाता है। इनमें स्थित बड़े और सघन आबादी वाले शहरों का कूड़ा भी नदी-नालों के माध्यम से यहीं आ मिलता है। पर्यटन स्थल के रूप में समुद्री किनारों का विकास भी प्रदूषण को बढ़ावा ही देता है। मद्रास का इन्नोर ताप बिजलीघर समुद्री जल को जिस ढंग से विषैला बना रहा है, वह गम्भीर चिन्ता का विषय है। संयंत्र का सम्पूर्ण राख समुद्र में डाल दिया जाता है। वर्षों से चले आ रहे इस प्रदूषण के कारण पानी का स्वाभाविक रंग एकदम बदल गया है तथा वह जल क्षेत्र जीवन विहीन बन गया है। यदि जल्द ही कोई उपाय नहीं किया गया, तो निकटवर्ती गहरे जल की जीवों पर इसका घातक प्रभाव पड़ने की आशंका पर्यावरणविद् व्यक्त कर रहे हैं।

केरल तट भी शहरीकरण की मार की कहानी कह रहा है। यहाँ के शहरों की एक दर्जन नगरपालिकाएं अपनी गन्दगी समुद्र में प्रवाहित करती हैं। उद्योग भी उन्हीं का अनुकरण कर रहे हैं। वहाँ करीब 2500 छोटे-बड़े उद्योग हैं। इनमें प्रतिदिन 3 लाख घनमीटर औद्योगिक कचरा समुद्र में जा मिलता है। मत्स्य पकड़ने वाला जहाज, नौसैनिक अड्डे और पर्यटन- यह सब भी इस विभीषिका को बढ़ा ही रहे हैं। कुल मिलाकर यहाँ का भी दृश्य अन्य तटीय इलाकों की तरह ही होता जा रहा है।

आन्ध्रप्रदेश के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और उड़ीसा की भी मिलती-जुलती कहानी है। हल्दिया, पाराद्वीप, विशाखापट्टनम, काकीनाड़ा- यह सब बड़े बन्दरगाह हैं। बन्दरगाहों का जल क्षेत्र वैसे भी प्रदूषित होता है, जिस पर यदि आस-पास बड़े औद्योगिक शहर हों, तो स्थिति और गंभीर बन जाती है। हल्दिया और विशाखापट्टनम घनी जनसंख्या वाले बड़े शहर हैं। यहाँ कितने ही प्रकार के उद्योग स्थापित हैं। विशाखापट्टनम के समुद्री जल में तेल और ग्रीस की एक पतली पर्त स्पष्ट देखी जा सकती है। इसके कारण वहाँ का पानी काला दिखाई पड़ता है और उस क्षेत्र की मछलियों की संख्या घटी है। यदि मछलियों की संख्या कम हुई है, तो निश्चय ही अन्य जलजीवों पर भी इसका बुरा असर पड़ा होगा। कलकत्ते का अधिकाँश कचरा, चाहे वह घरेलू हो अथवा औद्योगिक- सब हुगली नदी के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में जा मिलता है।

प्रदूषण की गंभीरता का अनुमान लगाने के लिए जब विशेषज्ञों ने कुछ प्रमुख तटवर्ती क्षेत्रों के जल-नमूनों का अध्ययन किया, तो वहाँ की विषाक्तता अप्रत्याशित रूप से बढ़ी-चढ़ी पायी गयी। ठाणे के जल-विश्लेषण से वहाँ लेड और कैडमियम की मात्रा अत्यधिक पायी गयी। लेड 830 माइक्रोग्राम और कैडमियम 330 माइक्रोग्राम प्रतिलीटर देखा गया। पारा प्रतिलीटर 780 माइक्रोग्राम था। कोचीन में पेट्रोलियम पदार्थ 150 माइक्रोग्राम प्रतिलीटर मौजूद था। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के समुद्री जलों में आक्सीजन की कमी सुस्पष्ट थी। यही कारण है कि पहले की तुलना में अब वहाँ जलीय जीवों की संख्या घटी है।

“जल ही जीवन है”- इस कथन में सच्चाई का बहुत कुछ अंश है। निराहार मनुष्य कई दिनों तक जिन्दा रह सकता है, पर प्यास की अकुलाहट को वह ज्यादा समय बर्दाश्त नहीं कर सकता। वर्तमान में पेय जल की आवश्यकता हम कुएँ, तालाबों, झरनों से पूरी करते हैं, किन्तु जमीन के नीचे का जल-स्तर तेजी से गिरता चला जा रहा है। अपने वाले वर्षों में एकदम न्यून हो जाये अथवा सूख जाये, तो कोई आश्चर्य नहीं। ऐसी स्थिति में पेय जल के लिए हमें समुद्रों पर ही आश्रित रहना पड़ेगा। समुद्र यदि विषैले हो गये, तो फिर मनुष्य के पास दो ही विकल्प शेष रहेंगे- या तो वह प्यासा मर जाये अथवा पानी के नाम पर हलाहल पीकर मरे, दोनों स्थितियों उसे मरना ही पड़ेगा। समय रहते समस्या का हल ढूँढ़ लेने वाले को समझदार कहते हैं। मनुष्य के पास अभी भी वक्त है। वह इस दिशा में सोचे और निर्णय करे कि उसे क्या करना चाहिये?


वह, जो ज्वालामुखी के गर्भ में जाकर भी लौट आया

साहस, मनोबल, उमंग, उत्साह ऐसे आध्यात्मिक गुण हैं, जिनके आगे कठिनाइयाँ भी हार मान जाती हैं। जब यह सब एक जगह इकट्ठे होते हैं, जो सफलता सुनिश्चित मानी जाती है।

ऐसे प्रसंग आये दिन देखने को मिलते हैं, जिसमें व्यक्ति का साहस टूटते ही हाथ आई सफलता गँवानी पड़ती है। इतना ही नहीं, कई बार जान- जोखिम में भी पड़ते हुए देखा जाता है। इसमें विपरीत तो मनोबल को बनाये रखकर विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य को अक्षुण्ण रखते हैं, विजयश्री उनके चरण चूमती है।

ऐसी ही एक घटना प्रसिद्ध आस्ट्रेलियाई भूगर्भवेत्ता ए. किचनर के जीवन में घटित हुई। किचनर भू-वैज्ञानिक थे, अतः ज्वालामुखियों के अध्ययन के प्रति उनकी विशेष रुचि थी। वे घण्टों तक जागृत और सुषुप्त ज्वालामुखियों वाले क्षेत्र के आस-पास घूमा करते एवं उनकी प्रकृति का अध्ययन करते रहते। कुछ स्वयं के अध्ययन तथा कुछ दूसरों के अनुभव और विवरण से उन्होंने इनकी काफी जानकारी एकत्रित कर ली। इतने पर भी वे पूर्णतया संतुष्ट न हो सके, कारण कि वे ज्वालामुखी के अन्दर की वास्तविक स्थिति के बारे में जानना चाहते थे, जबकि इस संबंध में उपलब्ध जानकारी अनुमान पर आधारित थी। अनेक पुस्तकों के अध्ययन से उन्हें इतना ही ज्ञात हो सका कि इस तरह के प्रयास पहले भी हुए हैं, पर सफलता किसी को भी नहीं मिली। इससे वे तनिक हतोत्साहित तो हुए, किन्तु शीघ्र ही उन्होंने उस भाव-विचार को दूर भगा दिया। उनने निश्चय किया कि इस कार्य को अब वे स्वयं पूरा करेंगे और किसी सुलगते ज्वालामुखी की उदरदरी में प्रवेश कर वहाँ की वस्तुस्थिति का पता लगाएँगे । इस निमित्त उन्होंने विश्व के अनेक ज्वालामुखियों के विस्तृत विवरण प्राप्त किये और उनका अध्ययन आरम्भ किया। गहन विचार-मन्थन के उपरान्त इस कार्य के लिए उनने स्ट्रोबोली नामक ज्वालामुखी का चयन किया। यह सिसली द्वीप के उत्तर में स्थित है। स्ट्रोबोली विश्व के उन गिने-चुने ज्वालामुखियों में से एक है, जो बराबर आग उगलता रहता है। इसी कारण हर वर्ष इसका आकार-विस्तार परिवर्तित हो जाता है। किचनर उक्त ज्वालामुखी से भली-भाँति परिचित थे और कई बार वहाँ की यात्रा कर चुके थे। लोग इसके समीप जाने से अक्सर कतराते थे, कारण कि वह कब फट पड़े, कुछ कहा नहीं जा सकता।

किचनर ने उसमें प्रवेश करने का जब पूर्णरूपेण मन बना लिया, तो इस निर्णय की जानकारी अपने सहयोगियों को दी। सब इस निश्चय को सुनकर भौंचक्के रह गये। कुछ ने उनको सनकी मान लिया, क्योंकि वे इसे अच्छी तरह जानते थे कि किचनर ने जो दुस्साहस करने का फैसला किया है, वह साक्षात मौत से खेलने के समान है। कई मित्रों ने उन्हें समझाने का प्रयास भी किया, लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा। वे अपने निश्चय पर अटल थे। दोस्तों ने ही हार मान ली। अब किचनर ने अपने अभियान के बारे में विस्तारपूर्वक बताया और उन्हें क्या करना है- इस संबंध में जानकारी दी।

तैयारी शुरू कर दी गई। इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि किसी सुलगते ज्वालामुखी के भीतर के अति उच्च तापमान को बर्दाश्त कैसे किया जाये? विशेषज्ञों से राय ली गई अन्ततः फैसला यह किया गया कि प्रवेशार्थी की सारी पोशाक एस्बेस्टस से बनायी जाये। जूते, हैट, कमीज, पैन्ट सब कुछ उसी से विशेष प्रकार से निर्मित किये गये। एस्बेस्टस की यह विशेषता है कि वह ऊँचे-से-ऊँचे तापमान को भी सहजता से बर्दाश्त कर लेता है, जबकि अन्य चीजें उस तापक्रम पर जल जायेंगी या गल जायेंगी। नीचे उतरने के लिए रस्से भी उसी के बनवाये गये। शरीर को जलने से बचाने के लिए एस्बेस्टस के कपड़े के मध्य कपास की एक मोटी पर्त डाल दी गयी। इसके अतिरिक्त इस विशेष पोशाक के नीचे पहनने के लिए ताप अवरोधक ड्रेस तैयार की गई। सबसे ऊपर अग्निरोधक आवरण चढ़ा हुआ था। भीतर उतरकर साँस लेने के लिए विशिष्ट तरह के आक्सीजन मास्क भी बनाये गये। इन पर भी एस्बेस्टस की मोटी पर्त चढ़ा दी गई।

सब कुछ योजनानुसार तैयार हो जाने के पश्चात् किचनर और उसके साथी सभी उपकरणों के साथ स्ट्रोबोली के लिये प्रस्थान कर गये। स्ट्रोबोली समुद्र के मध्य में स्थित एक छोटा टापू है। इसके पर्वत की चोटी पर उक्त ज्वालामुखी स्थित किचनर अपने सहयोगियों के साथ वहाँ पहुँचे, विशेष रूप से निर्मित पोशाक और मास्क पहनकर वह तैयार हुए। इसके उपरान्त एक चर्खी की सहायता से उन्हें नीचे उतारा जाने लगा। मौत के कुँए में उतरने से पूर्व किचनर ने अपने मित्रों, सहायकों और बड़ी संख्या में उपस्थित दर्शकों का अभिवादन किया। सबने तालियाँ बजाकर इसका उत्तर दिया एवं उत्साहवर्द्धक किया। किचनर के चेहरे पर आज अद्भुत उत्साह था। वह एक ऐसे जोखिम भरे अभियान के लिए चल पड़े थे, जिसमें सुरक्षित वापस लौट पाना संदेहयुक्त था, फिर भी उन्हें उसकी परवाह नहीं थी।

साहसियों के समक्ष मौत सदा परास्त हुई है। आज फिर एक बार एक दुस्साहसी का मृत्यु से आमना- सामना होने जा रहा था। इसमें किसकी विजय, किसकी पराजय होने वाली है- इसे देखने के लिए वहाँ सैकड़ों लोग मौजूद थे। चर्खी धीर-धीरे चल रही थी और किचनर को शनैः-शनैः नीचे की और लिये जा रही थी। बड़ी सावधानीपूर्वक वह अन्दर का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए गहराई में उतरते चले जा रहे थे। बीच-बीच में अपने कैमरे से फोटो भी खिंच रहे थे। कुँए में उतरने से पूर्व उनके मन में जो-जो आशंकायें उठ रहीं थीं, अब वह सब निराधार साबित हुईं थीं, सबसे बड़ा संदेह तो यह था कि तो पोशाक उस अतिशय तापमान से बचने के लिए बनायी गयी है, क्या वह उससे रक्षा कर पाने में सफल होगी? उनकी दूसरी चिन्ता यह थी कि वहाँ के अध्ययन के लिये जो यंत्र-उपकरण साथ ले जाये जा रहे थे, क्या वे सही-सही काम कर सकेंगे? पर अब वे एकदम आश्वस्त थे। पोशाक ताप से उनकी रक्षा करने में समर्थ साबित हुई थी। कैमरे एवं दूसरे यंत्र भी ठीक ढंग से काम कर रहे थे।

चर्खी लगातार चलती चली जा रही थी ज्वालामुखी की दीवारों से रह-रहकर आग की लपटें निकलतीं और फिर अदृश्य हो जातीं। इन लपटों के कारण दीवारें कहीं-कहीं बिलकुल लाल हो उठतीं, ऐसे जैसे कोई रक्त तप्त लौह-खण्ड हो। यत्र-तत्र ये लपटें काफी विकराल हो गई थीं, पर इनके अतिरिक्त सम्पूर्ण दीवार शान्त और सुरक्षित थी, सो बात नहीं, जगह-जगह से दीपशिखा की तरह छोटी-छोटी लाल-पीली लपटें निकल रही थीं। इन सबके कारण वहाँ का दृश्य इतना मनोहारी हो गया था, मानो दीपमालिका का ज्योति-पर्व आ उपस्थित हुआ हो।

लगभग बीस मिनट बाद किचनर ज्वालामुखी की तली में पहुँचे। यह करीब नौ सौ फुट नीचे थी। जिसमें गर्म लावा और किसी-किसी में सघन धुँआ भर हुआ था। उनके सहयोगी यह आशंका कर रहे थे कि शायद किचनर वहाँ की धरती पर न उतर सकें और ट्राली परसे ही उन्हें अपना निरीक्षण-परीक्षण पूरा करना पड़े, कारण कि इतने उच्च तापमान पर वहाँ की चट्टानें ठोस स्थिति में बनी रह सकेंगी, ऐसी उनने कल्पना भी नहीं की थी, लेकिन उनका अनुमान गलत साबित हुआ। कई चट्टानें ऐसी थीं, इन्हीं में से एक में किचनर ने अपने पाँव रखे और तली का अवलोकन करने लगे। आस-पास कई और शैलखण्ड थे। बीच-बीच में गहरे आग के गड्ढे। इन गढ्ढों का व्यास बारह फुट से लेकर पैंतीस फुट तक था। इनसे रह-रहकर भस्मीभूत बनाने वाली भीषण ज्वालाएँ निकलती थीं। कुछ क्षण चवे इनके निकलने और शान्त होने का क्रम निहारते रहे। जब उनके समयान्तराल का कुछ-कुछ अन्दाज मिला, तो वे उसी क्रम से उनके भीतर झाँक-झाँक कर देखने लगे। उन्होंने देखा अन्दर पिघली चट्टानें उबल रही थीं। रंग-बिरंगी गैसों व धुओं का वहाँ विचित्र संयोग था। वे उनकी तस्वीर उतारने लगे।

एक गड्ढे का अध्ययन कर वे दूसरे के समीप पहुँचते और उसकी भी इसी प्रकार से गहरी जाँच करते। एक समय जब वे एक गड्ढे का निरीक्षण कर रहे थे, तो अचानक उसके खौलते लावे में ज्वार आ गया। किचनर सतर्क थे। वे तुरन्त एक किनारे तट गये। उनके हटते ही एक जोरदार विस्फोट हुआ। उसी के साथ उस गड्ढे में से लावे का फव्वारा फूटा। लावे का अधिकाँश भाग उसी गड्ढे में गिर गया, परन्तु फव्वारा इतना ऊँचा था कि ज्वालामुखी के मुख से निकलकर उसका कुछ हिस्सा समुद्र में जा गिरा। बाहर प्रतीक्षा में खड़े उनके सहयोगी बेचैन हो उठे। मन शंकित होने लगा। किचनर को कुछ हुआ तो नहीं? वे सुरक्षित तो हैं? पर संदेहों को दूर करने का उनके पास कोई उपाय नहीं था। उनने इन्तजार करना ही उचित समझा।

उस भयंकर ज्वार को देखकर स्वयं किचनर के मन में भी ऐसे ही विचार उठ रहे थे। वे सोच रहे थे कि लावे के इस फव्वारे को देखकर निश्चय ही बाहर खड़े उनके मित्र भयभीत हुए होंगे और उनके हताहत होने की आशंका कर रहे होंगे, पर किचनर पूर्णतया सुरक्षित थे।

वे स्थान-स्थान से गैसों, खनिजों के नमूने घूम-घूमकर एकत्रित करते रहे, फोटो खींचते रहे और उन लोमहर्षक क्षणों का आनन्द उठाते रहे।

लगभग तीन घण्टे बीत चुके थे। उस भीषण ताप में काम करते-करते किचनर को थकान महसूस होने लगी। वहाँ ऐसी कोई सुरक्षित जगह भी नहीं थी, जहाँ एक क्षण स्थिर होकर बैठा जा सके। जाने कब कहाँ से लावा फूट पड़े, इसका क्या भरोसा? अस्तु सदा सावधान रहकर बराबर चलते- फिरते रहना पड़ता था। इतने लम्बे अन्तराल तक खड़े-खड़े किसी रोमांचकारी वातावरण में काम करना निस्सन्देह थकाने वाला होगा। इसी बीच आक्सीजन समाप्त हो गयी। इसका संकेत तुरन्त उनने रस्सा हिलाकर अपने सहयोगियों को दिया। सहायकों ने संकेत समझकर तत्काल उन्हें ऊपर खींच लिया। ऊपर पहुँचते-पहुँचते वे मूर्च्छित हो चुके थे। अविलम्ब उन्हें चिकित्सा सहायता दी गई। थोड़ी ही देर में वे होश में आ गये। यह देखकर उपस्थित जनों ने हर्षध्वनि कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।

आज पहला अवसर था, जब कोई जीवित ज्वालामुखी के भीतर घुसकर जिन्दा लौटा हो। यह सौभाग्य किचनर को मिला। वे इसके श्रेयाधिकारी बने। इसके पूर्व न तो यह दुस्साहस हुआ था, न आगे होने की संभावना है।

सफलता सदा साहसियों को ही मिलती है- यह कथन उतना ही तथ्यपूर्ण है, जितना यह कि पुरुषार्थी साहसी होते हैं। दोनों का अपना युग्म है। जहाँ साहस होगा, वहाँ पराक्रमी डरपोक, ऐसा कहीं देखा नहीं जाता। उमंग-उत्साह भी इन्हीं के अनुचर-सहचर हैं। धैर्य तो ‘धी’ सम्पन्नों की प्रमुख विशेषता है। यह आध्यात्मिक सम्पदा कहलाती है। जहाँ इन तत्वों का समुच्चय- समाहार होगा, वहाँ सफलता अवश्यम्भावी होती है।- ऐसा विद्वानों का अभिमत है।


Quotation

क्या जीवन वस्तुतः ऐसा ही है- जिसे रोते- खीजते किसी प्रकार पूरा किया जाये? इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि अनाड़ी हाथों में पड़कर हीरा भी उपेक्षित होता है, तो बहुमूल्य मानव जीवन क्यों न भार बनकर लदा रहेगा।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


देश के हर गाँव को विकास का तीर्थ बनाना होगा

स्वतंत्रता -प्राप्ति के बाद देश में जैसे-जैसे आर्थिक एवं औद्योगिक विकास की गति तीव्र हुई, नगरों की संख्या और उनमें निवास करने वाली जनसंख्या दोनों में ही तेजी से बढ़ोत्तरी हुई। ग्रामीण भारत आज शहरों के दम घोंटू वातावरण में जीवन एवं रोजगार की राह तलाश रहा है। एक तो नगरों की आबादी का प्रबल दबाव और उस पर गाँवों से शहरों की आरे पलायन, ढेर की ढेर समस्याओं को रोज जन्म दे रहा है। कारखानों और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के कारण देश में हर साल पाँच लाख लोग शहर में आकर बस जाते हैं। आज स्थिति यह है कि भारत की कुल जनसंख्या की 26 प्रतिशत आबादी अर्थात् 21.7 करोड़ लोग शहरों में निवास करते हैं।

सन् 1951 से आज तक शहरीकरण पर एक नजर डालें तो इसकी भयावहता और विस्तार का अनुमान लगता है। पिछले चालीस वर्षों पूर्व शहरों की कुल जनसंख्या 12 प्रतिशत थी। सन् 1951 में नगरों की कुल संख्या 2085 तथा इनकी जनसंख्या 61,629,646 थी। उत्तरोत्तर इसमें वृद्धि हुई और 1961 में यह स्थिति 2270 व जनसंख्या 7,75,62,000 हो गयी। यह क्रमशः 1971 में 2476 व 106, 966, 534 थी। 1981 में औद्योगीकरण में भारी वृद्धि हुई, जिसके फलस्वरूप नगरों की संख्या 3245 तथा जनसंख्या 15,64,19,768 हो गई। सन 1991 में नगरों की संख्या 3609 तक जा पहुँची और इसमें रहने वाले लोग बढ़कर 21,28,67,337 हो गये। अब तक तो इनमें काफी बढ़ोत्तरी हो चुकी होगी। एक आकलन के अनुसार, शहरों में 10 से 12 प्रतिशत जनसंख्या-वृद्धि हर साल हो रही है। बाहर से आने वालों की तुलना यदि शहरों की जनसंख्या-वृद्धि से की जाये तो पता चलता है कि यह दो गुनी है। शहरी भारत में जनसंख्या का घनत्व दुनिया के किसी भी देश से अधिक है। भारत में नगरीय संख्या का प्रतिशत विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है, परन्तु नगरों में निवास करने वाली कुल जनसंख्या कई-कई विकसित देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक है।

भारतीय जनगणना विभाग द्वारा भारतीय नगरों को जनसंख्या के आधार पर 6 वर्गों में बाँटा गया है। पहले वर्ग में एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगर आते हैं। दूसरे वर्ग में 50 हजार से एक लाख, तीसरे वर्ग में 20 से 50 हजार, चौथे वर्ग में 10 से 20 हजार, पाँचवें वर्ग में 5 से 10 हजार वाले नगर आते हैं। छठे वर्ग में 5 हजार के आस-पास निर्धारित संख्या मानी गयी है। सन् 1951-61 के दशक में पाँचवें वर्ग में 405 कस्बों को पुनः अवर्गीकृत कर ग्रामीण क्षेत्रों में परिवर्तित किया गया था। विकास के साथ ही प्रथम, द्वितीय व तृतीय वर्ग के नगरों की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई। सन् 1971 में इन तीनों वर्गों की संख्या क्रमशः 215, 270 व 738 थी, जो सन् 1991 में बढ़कर 296, 341 व 927 पहुँच गयी। चतुर्थ श्रेणी के नगरों में भी इधर काफी वृद्धि हुई है। वर्तमान समय में प्रथम वर्ग के शहरों में कुल नगरीय जनसंख्या का 65.20 फीसदी भाग निवास करती है।

आँकड़ों के मुताबिक़ सन् 1971 में जहाँ एक लाख वर्ग की आबादी वाले 151 शहरों में सिर्फ 8 की ही आबादी 10 लाख से अधिक थी। सन् 1991 में यह संख्या बढ़कर 16 पहुँच गयी। अनुमान है कि 2001 तक 26 शहरों की जनसंख्या 10 लाख से ज्यादा होगी। एक से पाँच लाख तक की आबादी वाले 319 शहर हो जाने का अनुमान है। महानगरों का विकास भी कुछ इसी तरह बढ़ा है। सन् 1901 में भारत में कलकत्ता ही एक मात्र महानगर था। सन् 1911 से 1941 तक यह संख्या 2 तक सीमित रही। 1951 में यह संख्या 5,1961 में 7, 1971 में 9,1981 में 12 तथा 1991 में 23 हो गयी। इन आँकड़ों से पता चलता है कि 1981 से 91 के दशक में इसमें लगभग दुगुनी वृद्धि हुई।

शहरीकरण की यह रफ्तार बाढ़ की तरह बढ़ रही है। सन् 1971 में जहाँ देश की कुल जनसंख्या का 20.2 प्रतिशत भाग शहरों में निवास करता था, वही आज यह दर 30 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गयी है। अगर यही स्थिति चलती रही तो सन् 2001 तक यह प्रतिशत 35 व 2011 तक 40 तक पहुँच जाने की सम्भावना है। नगरीय जनसंख्या की बढ़ोत्तरी का मुख्य भाग है- औद्योगिक विकास। इसी वजह से गाँवों की ओर से जनसंख्या शहरों की ओर पलायन करती है। इससे अनेकानेक समस्यायें उठ खड़ी होती हैं। इन समस्याओं को मुख्यतः चार भागों में बाँटा जा सकता है-

1- पर्यावरण समस्या, 2- आवास समस्या, 3-रोजगार समस्या, 4- अन्य सामाजिक समस्यायें।

शहरी जनसंख्या के विस्फोटक दबाव व औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप सर्वाधिक प्रदूषण वायु तथा जल का है। महानगरों में प्रदूषण का मुख्य कारण है वाहन एवं औद्योगिक संस्थाओं द्वारा निकले वाली विषैली गैसें एवं जहरीले रसायन। इनमें प्रमुख हैं- सल्फर डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सीसा एवं नाइट्रस ऑक्साइड । ‘नेशनल एन्वायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट नागपुर’ के अनुसार सन् 1990 में उद्योगों से प्राप्त सल्फर डाइ ऑक्साइड की मात्रा 45000 टन प्रतिवर्ष थी, जो बढ़कर सन् 2000 तक 48000 टन प्रतिवर्ष हो जाने की संभावना है। कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा 1980 के 1,40,000 टन प्रतिवर्ष से बढ़कर 1980 में 2,65,000 टन हो गयी थी। यह भी सन् 2000 ते 4 लाख टन प्रतिवर्ष हो जाने की आशंका है।

मुम्बई की सड़कों पर आठ लाख वाहन प्रतिदिन 4500 टन प्रदूषण उगलते हैं। दिल्ली में मोटर-वाहनों कारखानों और अन्य स्रोतों से रोजाना 2500 टन प्रदूषित पदार्थ निकलते हैं। यही स्थिति कलकत्ता, चेन्नई एवं अन्य बड़े महानगरों की भी है। कार्बन मोनोऑक्साइड दुपहिया व तिपहिया पेट्रोलचालित वाहनों से निकलती है। सम्पूर्ण शरीर में रक्त आक्सीजन वहन करने की क्षमता को यह गैस कम कर उसे प्रभावित करती है। नाइट्रोजन ऑक्साइड वाहनों में ईंधन दहन के समय में पैदा होता है। यह श्वास-पथ को सवंमित करने के साथ-साथ अन्य व्याधियों जैसे- सिरदर्द, आँखों में जलन व जुकाम उत्पन्न करता है। सल्फर डाइऑक्साइड रंगहीन गैस है। यह गैस डीज़ल के धुँऐ से निकलती है। इससे श्वाँस सम्बन्धी समस्यायें जैसे-खाँसी दमा आदि पैदा होती है।

सीसा विषैला पदार्थ है, जो हवा में तैरते सूक्ष्म कणों के रूप में व पेट्रोल में मौजूद रहता है। मोटर वाहनों से निष्कासित हवा का लेड धुल के रूप में संचयित होता है। शहरों की सड़कों के प्रति मिलीग्राम धूल में 2 ग्राम सीसा पाया जाता है। वाहनों से निकलने वाला कार्बनिक सीसा जब साँस के साथ अन्दर जाता है, तो धीरे-धीरे विष बन जाता है। इससे दिमाग को नुकसान, लकवा, मिरगी जैसे रोग और मृत्यु तक हो सकती है। कलकत्ता, मुम्बई और दिल्ली के वातावरण में इसकी मात्रा तेजी से बढ़ रही है। एन.ई.ई.आर.आई. (नीरी) की रिपोर्ट के अनुसार, प्रति दस लाख भाग में यह कलकत्ता में 1 से 1.6 तक, मुम्बई में 0.2 से 1.4, दिल्ली में .2 से 1.8 तक है। जबकि हवा में इसकी मानक मात्रा 0.5 तक ही मान्य है। मुम्बई की आधी आबादी के खून में प्रति 100 मिलीग्राम रक्त में 30 माइक्रोग्राम सीसा पाया जाता है। 50 माइक्रोग्राम की मात्रा दिमाग को क्षति पहुँचाने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। इससे कैंसर की सम्भावना भी प्रबल हो जाती है।

पाँली साइकिलक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन डीज़ल इंजन का अधजला ईंधन है। यह कैंसर के अलावा खाँसी, आलस्य व आँखों की जलन पैदा करता है। दुपहिया और तिपहिया वाहन कार की तुलना में छह गुना अधिक हाइड्रोकार्बन और तीन गुना अनावश्यक तत्व उत्सर्जित करते हैं। औद्योगिक नगरों में ठण्ड के समय, तापीय प्रतिलोमन के समय कल-कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला धुँआ एवं सल्फर के स्थिर वायु के साथ मिश्रण के कारण धुँऐ वाला कोहरा भी पनपता है। जो स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी खतरनाक है।

शहरीकरण की समस्या ने जल को भी विशेष रूप से प्रभावित किया है। शहरों में पक्के आवासों की बढ़ोत्तरी से वर्षा का जल रिसकर भूमि के अन्दर नहीं पहुँच पाता है, फलस्वरूप धरातलीय जल-भण्डार में मिल जाने से भी अपार क्षति होने की संभावना है। महानगरों से निष्कासित कचरा व जल ने आस-पास की नदियों को प्रदूषित, उथला व नाले के रूप में परिवर्तित कर दिया है। ध्वनि प्रदूषण ने तो जैसे अनेकानेक आसन संकटों को अनायास आमंत्रित कर दिया है, जिससे ब्रेन सम्बन्धी अनेकानेक बीमारियाँ फैल रही हैं।

पर्यावरण के पश्चात् सबसे महत्वपूर्ण समस्या आवास की है। वर्तमान समय में भारत में तीन करोड़, 10 लाख आवासीय इकाइयों की कमी है, जिसमें 206 लाख आवास की कमी ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 104 लाख की कमी शहरी क्षेत्रों में है। इसके अतिरिक्त सुविधाजनक मकानों की भारी मात्रा में कमी है। सन् 2000 तक लगभग सात मिलियन आवासों की कमी हो जाने का अंदेशा है। नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, कुल नगरीय आबादी का 14.68 प्रतिशत झुग्गी-झोपड़ियों में निवास करता है। यहीं क्यों भारत के विभिन्न महानगरों की कुल नगरीय आबादी का एक बड़ा भाग झुग्गी-झोंपड़ियों में निवास करता है।

दिल्ली को ही लें, यहाँ का 40 प्रतिशत हिस्सा गंदी बस्तियों में निवास करता है। यहाँ पर दो तरह के स्लम हैं। कटरा श्रेणी के मकान पक्के होते हैं, परन्तु यह खण्डहरनुमा और इसकी छत उड़ी हुई होती है। दूसरी श्रेणी में झुग्गी बस्तियाँ आती हैं। जहाँ ज्यादातर लोग ईंट, गारे या सिर्फ मिट्टी की दीवारों और कमजोर छत के नीचे निवास करते हैं। सन् 1990 में दिल्ली में 929 झुग्गी-बस्तियाँ थीं, जिसमें ढाई लाख झुग्गियाँ थीं, इनमें 15 लाख लोग रहते थे। 1994 में इन बस्तियों की संख्या बढ़कर 1080 हो गयी, जिसमें करीब 6 लाख झुग्गियाँ थीं। इनकी कुल आबादी 27 लाख थी। वर्तमान स्थिति में झुग्गी बस्ती 1100 के आस-पास हैं। इस प्रकार के आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि झुग्गी बस्तियों में आबादी का घनत्व मुम्बई में 38.30, कलकत्ता में 35.35, दिल्ली में 30.19, चेन्नई में 31.87, अहमदाबाद में 26.16, बेंगलोर में 10.02, कानपुर में 40.31 तथा लखनऊ में 38.63 प्रतिशत है।

नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार भारत में कुल नगरीय आबादी का लगभग 14.68 प्रतिशत झुग्गी-झोंपड़ियों में निवास करता है। दिल्ली में हर साल औसतन 11 हजार नयी झुग्गियाँ बसती जा रही हैं और इनका जीवन नारकीय यातनाओं के समान है। मुम्बई में फुटपाथ पर रहने वालों संख्या ढाई लाख है। इनमें आधे लोग ऐसी झोंपड़ियों में निवास करते हैं, जिनका आकार 5 वर्गमीटर से भी कम होता है। दूसरी ओर सुविधा सम्पन्न आवास की दर भी आसमान छूती प्रतीत हो रही है। व्यस्त एवं सघन इलाकों में एक फ्लैट का किराया प्रति माह 1 लाख रुपये तक है। पश्चिमी भारत में औद्योगिक विकास का ध्वजावाहक सुरत नगर की 30 फीसदी जनसंख्या 300 घनी बसी गन्दी बस्तियों में रहती है।

भारत में शहरीकरण के कारण 19 प्रतिशत परिवार 10 वर्गमीटर क्षेत्र से भी कम जगह में रहते हैं। इनमें से 44 प्रतिशत परिवार तो एक कमरे में ही रहते हैं। सरकार की नई भवन निर्माण नीति में शहरी जनसंख्या के 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-निर्वाह करते हैं। शहरों की स्थिति डार्विन के सिद्धान्त सरवाइकल ऑफ द फिटेस्ट’ का शिकार होती जा रही है। एक ओर समाज अति आधुनिकतम टेक्नोलॉजी, सेल्युलर फोन, पेजर से इन्टरनेट तक की सुविधाओं का उपभोग कर दिन-दूना-रात चौगुना विकास कर रहा है।, तो दूसरी ओर सिर छिपाने हेतु छत भी नसीब नहीं हो पा रही है और है भी तो मानवीय विकास के लिए एक कलंक का पर्याय बनकर। भारतीय महानगरों की गन्दी बस्तियों में ही अपराध का नरक भी बसता है। इन्हीं की छाँव में देह व्यापार, नशा, हिंसा, हत्या आदि सभी कुछ पनपते, विकसित होते हैं। प्रमुख समाज विज्ञानी प्रो. मार्शल के मतानुसार श्रीलंका, थाईलैण्ड, हाँगकाँग की स्वयं की स्थिति कलकत्ता तथा कानपुर से बेहतर है।

नगरों की जनसंख्या-वृद्धि के साथ-साथ रोजगार की समस्या भी गहराई है। दिल्ली में हर साल लगभग ढाई लाख व्यक्ति रोजगार की तलाश में आते हैं। रोजगार के अभाव में मजदूर

वर्ग के बढ़ने के साथ- सामाजिक सन्तुलन में कमी आती हैं व अव्यवस्था बढ़ती है और यहाँ से अपराध का जन्म होता है। इन समस्याओं के अलावा शिक्षा-व्यवस्था सफाई, बीमारी आदि अनेकों ऐसी समस्याएँ हैं, जो शहरीकरण के साथ सुरसा की तरह मुँह फैलाती चली जा रही है।

कम संसाधन एवं शहरों में बढ़ती जनसंख्या का आत्मघाती विस्फोट निश्चय ही राष्ट्र की भारी परेशानी का कारण है। इसे रोकना है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के नये-नये आयाम विकसित करने होंगे। इसी के साथ नगरीय क्षेत्रों की औद्योगिक इकाइयों को बाहरी क्षेत्रों में स्थानान्तरित कर देना चाहिये एवं बाह्य क्षेत्र में विकास ध्रुव केन्द्र की स्थापना करनी चाहिए। इससे शहरों को विकेन्द्रीकृत करने में सहायता मिल सकती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर एवं लघु उद्योगों की स्थापना करके शहरी क्षेत्र के आकर्षण को कम करने में सफलता मिल सकती है। साथ ही इससे लोगों में स्वावलम्बन एवं आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी। शहरीकरण की समस्या से निबटने का उपाय है- भारतीय गाँवों को विकास की मुख्य धारा में जोड़ना। बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के बदले- ग्रामीण जीवन को पवित्र एवं समृद्ध बनाना होगा। अपने देश का हर गाँव, विकास का तीर्थ बन सके, तो ही राष्ट्रीय जीवन का भविष्य उज्ज्वल होगा।


आइये! इस शीतऋतु में अपना स्वास्थ्य ऐसे सँवारें

हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर केवल आहार-विहार का ही नहीं, वरन् ऋतु-परिवर्तन व जलवायु का भी प्रभाव पड़ता है। यों तो ऋतुओं में परिवर्तन प्रकृति के अनुसार होते हैं, परन्तु इनकी अस्थिरता, अनियमितता जो आजकल देखी जाती है, वह मनुष्य द्वारा उत्पादित विषाक्तता के कारण है और इसका दुष्परिणाम हम सब भुगत भी रहे हैं- विभिन्न प्रकार की आपदाओं व महामारियों के रूप में। वायु-मण्डल एवं वातावरण को प्रदूषित करने से प्रकृति में जो व्यवधान उत्पन्न हुए हैं, उसका खामियाजा मनुष्य समेत सभी प्राणियों को भुगतना पड़ रहा है। इन परिस्थितियों में यदि ऋतुओं के अनुकूल खान-पान रहन-सहन आचार-व्यवहार पर ध्यान न दिया जाये, तो प्रकृति- प्रतिकूलता से स्वास्थ्य रक्षा कर पाना संभव नहीं हो पाता। यही कारण है कि वातावरण में थोड़ा हेर-फेर होते ही व्यक्ति बीमारियों का शिकार बन जाता है। ऋतुओं के अनुकूल आहार-विहार का पालन करने से न केवल शरीर की रोग-प्रतिरोधी क्षमता का विकास होता है, वरन् शरीर नीरोग, पुष्ट और बलिष्ठ बनता है। शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य का आधार हमारा आहार-विहार आचार- व्यवहार है।

‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का निवास होता है, यह कथन अक्षरशः सत्य है। जो शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ होगा, उसकी आत्मा भी स्वस्थ एवं समुन्नत होगी। स्वस्थ-समुन्नत आत्मा के लिए शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है। कारण पंचमहाभूतों से विनिर्मित यह काया ही आत्मा का आश्रयस्थल है-वाहन है। इसके पूर्ण रूप से स्वस्थ होने से बाहर-भीतर चारों ओर सामर्थ्य ही सामर्थ्य दृष्टिगोचर होती है।

यों तो प्रत्येक क्षेत्र में हृष्ट-पुष्ट एवं बलिष्ठ स्वस्थ शरीर की अनिवार्य आवश्यकता है। उपार्जन से लेकर भोजन तक और संघर्ष से लेकर मनोरंजन तक ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसमें रुग्ण या अस्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति सफलता एवं सार्थकता पूर्वक बस सकें। किसान से लेकर क्लर्क तक, उद्योगपति से लेकर श्रमिक तक- यदि वह शरीर से स्वस्थ एवं समर्थ नहीं होगा, तो अपना उपार्जन क्रम नहीं चला सकता। यदि किसी तरह चलाता भी है तो उसका काम सुन्दर एवं संतोषजनक नहीं हो सकता। रोगी, अस्वस्थ शरीर व्यक्ति प्रतिस्पर्द्धा के इस युग में अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता। शीघ्र ही वह या तो रोगी होकर चारपाई पकड़ लेगा या पूर्णरूप से क्षीणकाय होकर सब कुछ गवा बैठेगा। ठीक यही बात अध्यात्म क्षेत्र में, साधना समर में लागू होती है। स्वास्थ्य सुख से वंचित असमर्थ शरीर वाला व्यक्ति आध्यात्मिक क्षेत्र में कौन-सी और कितनी उन्नति कर सकता है, कितना आगे बढ़ सकता है, इसका उत्तर भी केवल नकारात्मक ही हो सकता है।

आत्मोन्नति के इच्छुक अध्यात्मवादी साधकों की सबसे प्रमुख एवं प्रथम साधना यह है कि वे अपने शरीर को पूर्ण रूप से स्वस्थ एवं पुष्ट बनायें। संयमी और समर्थ बनें। जो असमर्थ व्यक्ति साधारण दैनिक श्रम नहीं कर सकता, अपने जीवन-शकट तो ठीक से खींच नहीं सकता, वह साधना-समर में आवश्यक नियमों, संयमों का निर्वाह कर सकेगा- काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, डाह आदिक शत्रुओं से डटकर मुकाबला कर सकेगा, ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर उच्चस्तरीय साधना-तपश्चर्या के लिए स्वस्थ एवं पुष्ट शरीर की तो अनिवार्य आवश्यकता होती है, जिसे पुरा किये बिना कोई भी व्यक्ति साधनापथ पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए जिस निर्मलता, निर्विकारता एवं निर्भयता की आवश्यकता है, वह शरीर को सबल, स्वस्थ-संवर्द्धन की दृष्टि से सबसे उपयुक्त बताया गया है। अश्विन नवरात्र के बाद शरद ऋतु आरम्भ हो जाती है। इसका काल सामान्यतः 15 नवम्बर तक माना जाता है। तत्पश्चात शिशिर और हेमन्त ऋतुएं आती हैं, जो जनवरी तक चलती हैं। इसके बाद ही वसन्त का आगमन होता है। आयुर्वेद के मतानुसार, मकर संक्रान्ति के पश्चात् जब सूर्य उत्तरायण होने लगता है, तब से ठंड घटना और गर्मी का बढ़ना आरम्भ हो जाता है। इससे मानव शरीर का शोषण पहले की अपेक्षा अधिक होने लगता है और रुक्षता तथा उत्ताप की वृद्धि होती है। इसका सन्तुलन बिठाने को उन दिनों चिकनाई युक्त ठंडे पदार्थ जैसे ठंडाई आदि का सेवन लाभदायक माना जाता है। इसी प्रकार शीत ऋतु में जब सूर्य के दक्षिणायन होने से उसकी किरणों की शक्ति कम पड़ जाती है और वे शोषण कम कर पाती हैं तथा शरीर का उत्ताप भी घट जाता है, उस समय जठराग्नि प्रबल हो जाती है। अतः उस समय उष्ण वीर्य वाले पौष्टिक, भारी तथा चिकने पदार्थ भी आसानी से हजम हो जाते हैं। अष्टांग संग्रह 4-12 में उल्लेख भी है-

“देहोष्माणो विशन्तोऽन्नः शीशेशीतानिलाहताः। जठरे पिण्डितोष्माणं प्रबलं कुर्वतेऽनलम्॥

अर्थात् इस शीत ऋतु में शरीर की ऊष्मा वातावरण में व्याप्त शीत के प्रकोप एवं ठंडी वायु के स्पर्श से शरीर के अन्दर ही रुककर बढ़ती और बलवान होती हैं इस ऊष्मा की उष्णता उदर में स्थित जठराग्नि को बढ़ाकर प्रबल बनाती है, जिससे पाचन संस्थान की सक्रियता बढ़ती है और वह भारी तथा गरिष्ठ आहार को भी पचाने में समर्थ हो जाता है। चरक संहिता में सूत्र स्थान के अध्याय 6, श्लोक 9 में तथा सुश्रुत संहिता में सूत्र स्थान के अध्याय 6, श्लोक 9 से 12 में भी यही बातें कही गयी हैं।

इन दिनों ठंड विशेष रूप से बढ़ जाती है। शीतलहर भी इसी ऋतु में सर्वाधिक चलती है। इससे बचने के लिए स्वेटर, शाल जैसे गरम ऊनी कपड़े पहनने पड़ते हैं। शीत ऋतु में रात बड़ी और दिन छोटा होता है, अतः विश्राम करने की अवधि भी लम्बी हो जाती है। इससे पाचन-शक्ति प्रदीप्त हो उठती है और जो भी खाया जाये, आसानी से पच जाता है। इन दिनों भूख सहन करना, देर से भोजन करना, हल्का और पोषक तत्वों से रहित आहार लेना शारीरिक दौर्बल्यता का कारण बनता है। अतः ठण्ड के दिनों में पोषक तत्वों से भरपूर आहार लेना स्वास्थ्य-संवर्द्धन की दृष्टि से आवश्यक हो जाता है। हमारे यहाँ इसी सिद्धान्त के आधार पर प्राचीनकाल से जाड़े के मौसम में पौष्टिक पाक, लड्डू आदि बनाकर सेवन करने का रिवाज है। अब बदलती परिस्थितियों में बहुत कुछ परिवर्तन हो गया है और घी, मेवा आदि पौष्टिक पदार्थ शुद्ध रूप से बड़ी कठिनाई से मिलते हैं और मिलते भी हैं तो बहुत महँगे, जिन्हें जनसामान्य की जेब स्वीकृति नहीं प्रदान करती। इसके अतिरिक्त एक प्रमुख कारण यह भी है कि पढ़े-लिखे लोगों में शारीरिक श्रम तथा व्यायाम का अभाव हो जाने के कारण अधिक भारी पाठक और लड्डू आदि को ठीक तरह से पचाने की शक्ति भी नहीं रह गयी है।

ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य-संरक्षण एवं बलवर्धक हेतु कुछ परीक्षित व प्रामाणिक आयुर्वेदीय नुस्खे दिये जा रहे हैं, जिन्हें ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता, चिकित्सा-विज्ञानियों ने वर्षों शोध के बाद सबके उपयुक्त पाया है। ये हैं-

(1) च्यवनप्राश, (2) छुहारा-पाक (3) अश्वगंधा। यह तीनों ऐसे हैं, जिन्हें हर स्थिति का व्यक्ति घर बैठे बना सकता है और अपना तथा अपने परिजनों की स्वास्थ्य रक्षा कर सकता है।

शीत ऋतु में सर्वाधिक खपत होने वाले टानिकों में च्यवनप्राश की गणना की जाती है। जनसामान्य इन्हें औषधि के रूप में ही प्रयुक्त कर पाते हैं। महँगी होने के कारण समूचे परिवार के लिए खरीद पाना विरलों के लिए ही संभव हो पाता है। परन्तु इन्हें यदि घर पर स्वयं बना लिया जाये, तो यह सस्ती भी पड़ती है और प्रामाणिक भी रहती है, साथ ही पूरे परिवार के लिए महीनों तक उपलब्ध रहती है। आवश्यकता पड़ने पर जब चाहे जितनी मात्रा में बनाया जा सकता है। ठंड के दिनों में आँवला भी सर्वत्र विशेषकर ग्रामीण अंचलों एवं वन्य प्रदेशों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है। इसकी पिट्ठी बनाकर रख ली जाये, तो वह साल भर सुरक्षित बनी रहती है और आवश्यकतानुसार उससे च्यवनप्राश बनाया जा सकता है। बनाने की विधि एवं प्रयुक्त होने वाली सामग्री इस प्रकार है-

च्यवनप्राश

(प्रति 1 किलोग्राम के लिए)

सामग्री- इसमें प्रयुक्त होने वाले प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं-

(1) एक किलो हरा पक्का आँवला, (2) 100-150 ग्राम घी, (3) 40 जड़ी-बूटियों का जौकुट पाउडर-340 ग्राम, (4) शक्कर- 1500 ग्राम, (5) शहद 100 से 150 ग्राम।

इसके अतिरिक्त नीचे दिये गये क्रमांक (6) से क्रमांक (12) तक कह सामग्री धूप में सुखाकर अलग-अलग मिक्सी या सिलबट्टे से बारीक पीस कर कपड़े से छानकर तैयार कर लें। ये हैं-

(6) वंशलोचन- 15 ग्राम (7) छोटी पीपल-12 ग्राम, (8) लौंग-10 ग्राम, (9) तेजपत्र-6 ग्राम, (10) दालचीनी- 6 ग्राम, (11) नागकेशर- 6 ग्राम, (12) इलायची बीज- 6 ग्राम।

च्यवनप्राश में जिन जड़ी- बूटियों का जौकुट पाउडर (क्रमाँक-2) लिया जाता है, उनका विवरण इस प्रकार है-

(1) बेल छाल (2) अग्निमंथ (अछाल) (3) श्योनाक (4) गंभारी छाल (5) पाढल छाल (6) शालपर्णी (7) पृष्ठिपर्णी (8) मुग्दपर्णी (9) माषपर्णी (10) गोखरु पंचाँग (11) छोटी कटैली (12) बड़ी कटैली (13) बला मूल (14) पिप्पली मूल (15) काकड़ा सिंगी (16) भुई आँवला (17) मुनक्का (18) पुष्कर मूल (19) अगर (20) बड़ी हरण (21) लाल चंदन (22) नील कमल (23) विदारी कंद (24) अडूसा मूल (25) काकोली (26) छीर काकोली (27) ऋद्धि (28) सिद्धि (29) जीवन (30) ऋषभक (31) मेदा (32) महामेदा (33) कचूर (34) नागरमोथा (35) पुनर्नवा (36) बड़ी इलायची (37) गिलोय (38) काकनासा।

इन सभी 38 वनौषधियों में से प्रत्येक की प्रति किलो आँवले पर 7-7 ग्राम सात-सात ग्राम) लेकर जौ के बराबर बारीक कूट-पीस लें। ये सभी जड़ी- बूटियाँ शान्तिकुञ्ज से सम्पर्क द्वारा या आयुर्वेदिक फार्मेसियों से खरीदी जा सकती हैं। हरिद्वार की फार्मेसी में यह च्यवनप्राश की जड़ी-बूटियों के पाउडर के नाम से भी मिलती हैं। अगर ये जड़ी-बूटियाँ उपलब्ध न हों, तो 40 ग्राम अश्वगंधा, 40 ग्राम शतावर, 40 ग्राम प्रज्ञापेय चूर्ण लेकर च्यवनप्राश की जड़ी बूटियों की जगह इनका क्वाथ बनाकर भी पौष्टिक प्राश बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं, अगर क्रमांक-25 काकोली से लेकर क्रमांक-32 महामेदा तक की जड़ी -बूटियाँ उपलब्ध न हों, तो भी उनकी जगह अश्वगंधा, शतावर, विदारीकंद, बाराही कंद का उपयोग उतनी ही मात्रा में कर सकते हैं।

विधि- च्यवनप्राश बनाने की विधि विस्तारपूर्वक इस प्रकार है-

(1) जड़ी-बूटियों के जौकूट पाउडर को एक किलो पानी में 24 घंटे पहले भिगो देना चाहिए-

(2) एक किलो ताजे हरे आँवलों को एक लीटर पानी में डालकर प्रेशर कूकर में उबालना चाहिये। जब तीन बार सीटी आ जाये तो कुकर को उतार कर 15 मिनट तक ठंडा होने देना चाहिये।

(3) उबले हुए आँवलों की गुठली निकालकर अलग कर देने के पश्चात् गूदे को स्टील की चलनी या कद्दूकस के चिकने वाले हिस्से या सूती कपड़े या आटा छानने कर छलनी में घिसे, जिससे अनावश्यक रेशे अलग हो जाते हैं। मुख्य उद्देश्य यहाँ पल्प यानी गूदे से रेशे अलग करना है।

(4) अगर रेशे न निकल सकें, तो गुठली निकाले हुए आँवले के गूदे को मिक्सी में डालकर पेस्ट बना लें और फिर आगे बढ़ें ।

(5) अब इस पेस्ट को ऊपर बताये हुए अनुपात के हिसाब से देशी घी में मंद आँच पर तब तक तले, जब तक आँवले की पिट्ठी, घी लगभग पूरी तरह न छोड़ दे। इस तरह से तैयार की हुई पिट्ठी को कई महीनों तक शीशे या स्टील के बर्तन में सुरक्षित रखा और आवश्यकतानुसार प्रयुक्त किया जा सकता है।

(6) आँवला उबालने के पश्चात् नीचे बर्तन में जो पानी शेष बच रहता है, उसे सुरक्षित रखा लेना चाहिये और इसी पानी में च्यवनप्राश की जड़ी-बूटियों के जौकुट पाउडर को, जो 24 घंटे पहले एक लीटर पानी में भिगाया गया था, मिलाकर मंद आँच पर दो घंटे तक उबालना चाहिये। आँच-लौ जितनी धीमी रहेगी, क्वाथ भी उतना ही बढ़िया बनेगा।

(7) क्वाथ को ठंडा होने पर छान लें और इस छने पानी को लगभग 10-12 घंटे तक एक जगह पर स्थिर रूप से रखा रहने दें, जिससे कीट (गंदला पदार्थ) नीचे बैठ जायेगा। छने पानी के साथ कीट चले जाने पर बनने वाले च्यवनप्राश में कड़वाहट आ जाती है।

(8) अब इसे सावधानीपूर्वक दूसरे बर्तन में उड़ेल लें, जिससे कीट अलग हो जायेगी और जल अलग।

(9) अलग किये हुए औषधीय जल में 1500 ग्राम (डेढ़ किलो) शक्कर डालकर थोड़ी देर तक उबालना चाहिये। इसी बीच गरम दूध के हलके छींटे मारते रहें, जिससे मैल ऊपर आ जाता है। इसे अलग कर देना चाहिये। पिट्ठी को प्रारम्भ से ही ढक कर रखें। जब चाशनी में डाल दें एवं एवं बर्तन को चूल्हें से उतारकर पिट्ठी को चाशनी में खूब घोटे या पिट्ठी को अलग बर्तन में लेकर उसमें तीन तार वाली चाशनी डालकर पेस्ट- सा बना लें। फिर पेस्ट को चाशनी में डालकर एकरस कर लें। यहाँ यह बात ध्यान रखने योग्य है कि अधिक देर तक भुनी हुई पिट्ठी रखी रहने से उसकी ऊपरी सतह पर काले रंग की कड़ी पपड़ी-सी जम जाती है। उसे फेंकना नहीं चाहिये, वरन् उसे अलग कर मसल कर पिट्ठी के समान चिकना बनाकर पिट्ठी में ही मिला लेना चाहिए।

(10) जब उक्त चाशनीयुक्त पिट्ठी एकरस हो जाये, तब कुनकुनी स्थिति (हल्का गरम) में ही क्रमांक-6 से 12 का पाउडर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में डालकर घुटाई करते रहें।

(11) जब लगभग ठंडा हो जाये तब शहद डालकर पूरी तरह मिला लें।

(12) 24 घंटे तक ठंडा होने के लिए छोड़ दें। अब 1 किलो आँवले से लगभग ढाई किलो च्यवनप्राश तैयार है।

(13) अगर ज्यादा आँवले का च्यवनप्राश बनाना है - जैसे तीन किलो आँवले का बनाना है, तो सामग्री में 3 से गुणा कर जितनी बैठे, उतनी सामग्री लेनी है, परन्तु चाशनी तीन तार की ही होगी।

(14) च्यवनप्राश ज्यादा गाढ़ा या पतला (नरम) करना है, तो चाशनी को क्रमशः थोड़ी गाढ़ी या पहली कर दें। अगर अधिक कड़ा सख्त हो गया है तो 20 चम्मच (100 मि.ली.) पानी में 3 चम्मच घी मिलाकर उबालें। जब पानी खौलने लगे, तो गाढ़ा च्यवनप्राश उसमें डाल दें। एकरस होते ही उतार कर ठण्डा कर लें।

ध्यान देने योग्य विशेष बातें-

(1) अगर घी 125 ग्राम ली जाए, तो च्यवनप्राश उत्तम क्वालिटी का बनता है।

(2) बिना रेशे निकले हुए च्यवनप्राश को तीन माह में उपयोग कर लेना चाहिये।

(3) विशिष्ट प्रकार का च्यवनप्राश बनाने के लिए उक्त विधि से तैयार किये हुए ढाई किलो च्यवनप्राश में निम्नलिखित वस्तुएँ मिलाई जा सकती हैं-

केशर- 3 ग्राम, मकरध्वज-4 ग्राम, चाँदी वर्क-10 पत्ते, शुक्ति भस्म- 12 ग्राम, प्रवालभस्म- 12 ग्राम, अभ्रक भस्म- 15 ग्राम, शृंग भस्म-15 ग्राम। भस्मों, केशर एवं मकरध्वज को आयु एवं आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार कम भी किया जा सकता है।

च्यवनप्राश में मिलाने से पूर्व केशर एवं मकरध्वज को अलग-अलग महीन घोट लिया जाता है, तत्पश्चात् इन दोनों को भस्मों में मिलाकर पुनः घुटाई की जाती है, फिर 50 ग्राम शहद में सभी को अच्छी तरह मिला लिया जाता है। इसके बाद इसे च्यवनप्राश में थोड़ा-थोड़ा डालते हुए मिलाते हैं। अच्छी तरह एकरस हो जाने पर एक दिन के लिये इसे बर्तन में खुला छोड़ देते हैं और फिर स्वच्छ डिब्बे में बंद करके रख देते हैं। च्यवनप्राश को सूखा भी बनाया जा सकता है।

सूखा च्यवनप्राश बनाने की विधि-

पहले जड़ी-बूटियों का क्वाथ एवं शक्कर लेकर उबाले और जब चार तार की चाशनी बन जाये, तब कड़ाही को पूरी तरह ठण्डी करें या एक दिन तक रहने दें। चाशनी ठण्डी होने पर बूरा बना लें या एक साथ भी बूरा बना सकते हैं। जब बूरा की स्थिति आ जाये, तब पिट्ठी एवं पिसा हुआ सूखा पाउडर डालकर अच्छी तरह से मिलाते हुए दुबारा बूरा बना लें इसमें शहद नहीं डाला जाता। संक्षेप में जड़ी बूटी क्वाथ+शक्कर+पिट्ठी+क्रमांक-8 से 12 तक औषधियों का पाउडर।

इस तरह से तैयार दोनों ही प्रकार के च्यवनप्राश में से किसी एक का सुबह-शाम एक-एक चम्मच दूध के साथ सेवन करते रहने पर व्यक्ति सदैव स्वस्थ बना रहता है। विटामिन-सी की अधिकता के कारण जीवनी-शक्ति स्फूर्ति व प्रसन्नता बढ़ती है और वृद्धावस्था में भी नौजवानों जैसी स्फूर्ति, सक्रियता एवं मस्ती बनी रहती है। आयुर्वेद शास्त्रों में इसे भूख को बढ़ाने वाला, खाँसी-श्वाँस वात, पित्त रोगनाशक, शुक्र एवं मु़ दोष हरने वाला, बुद्धि व स्मरण-शक्तिवर्धक प्रसन्नता, वर्ण एवं कान्तिवर्द्धक बताया गया है।

2- छुहारा पाक

सामग्री- (1) गुठली निकला छुहारा- 100 ग्राम (2) शक्कर- 400 ग्राम (3) दूध-1 किलो (4) घी- 100 ग्राम (5) पिप्पली- 6 ग्राम (6) सफेद मूसली- 3 ग्राम (7) काली मूसली- 3 ग्राम (8) लौंग-3 ग्राम (9) जायफल- 3 ग्राम (10) तेजपत्र- 3 ग्राम (11) जावित्री- 3 ग्राम (12) वला मून या बीज- 3 ग्राम (13) पिस्ता- 3 से 10 ग्राम (14) चिरौंजी- 3-10 ग्राम (15) बादाम- 3-10 ग्राम (16) अखरोट गिरी- 3.10 ग्राम (17) काजू- 3-10 ग्राम

बनाने की विधि-

1- छुहारों को सर्वप्रथम पानी से साफ कर लें और उनके ऊपर की टोपी (जहाँ फल पेड़ से जुड़ता है) तथा बीच की गुठली को निकाल दें।

2- दूध (खोवा बनाने वाला) को पहले उबालकर ठंडा कर लें, फिर उसमें साफ किये छुहारे डालें और उसे दूध में ही 12 से 24 घंटे तक फूलने दें। अगर दूध खराब होने का डर हो, तो बीच-बीच में उबाल लें।

3- क्रमांक 6 से 12 तक की चीजों को मिक्सी या सिल में पीसकर कपड़े से छानकर पाउडर तैयार कर लें।

4- ड्राई फ्रूट (मेवा) को मिक्सी में डालकर या सिल में पिस कर चिरौंजी के बराबर टुकड़े कर लें। मेवा (ड्राई फ्रूट) की और किस्में भी बढ़ायी जा सकती हैं।

5- दूध में फूले हुए छुहारों को मिक्सी या सिल में पीस कर पेस्ट बना लें।

6- इस पेस्ट में पिप्पली चूर्ण मिलाकर कढ़ाई या किसी बर्तन में औटा कर खोवा (मावा) बना लें।

7- खोवा तैयार होते ही साथ-साथ उसमें 60 ग्राम के लगभग घी डालकर तब तक तलना चाहिये, जब तक लाल रवेदार मावा तैयार न हो जाये और वह घी न छोड़ दे।

8- 150 ग्राम पानी में 400 ग्राम शक्कर डालकर तीन बार की चासनी आने पर उसमें भुना हुआ मावा डाल दें, साथ ही जड़ी- बूटियों का तैयार पाउडर भी डाल दें।

9- थोड़े समय पश्चात् उसमें टुकड़े किये हुए ड्राईफ्रूट (मेवा) डाल दें।

(10)- जब मिठाई जमने की स्थिति में आये, तब बचा हुआ घी डालकर खूब चलाये ।

(11) मिठाई जमने की स्थिति से थोड़ा और कड़ा होने पर उतार लें।

12- एक थाली में घी डालकर मिठाई को उसमें जमा दें। 15 मिनट बाद चाकू से लाइन खींच दे और 30 मिनट बाद छोटे-छोटे पीस काटकर अलग-अलग कर दें। ठंडा होने पर सुरक्षित डिब्बे में भरकर रख लें।

13- विशेष प्रकार का छुहारा पाक बनाने के लिए क्रमांक-9 की स्थिति आने पर ड्राईफ्रूट (मेवा) के साथ-साथ निम्नलिखित वस्तुएँ और मिलाई जाती हैं-

(1) केसर- 1 से 3 ग्राम (2) लौह भस्म- 3 ग्राम (3) अभ्रक भस्म- 3 ग्राम (4) बंग भस्म- 3 ग्राम।

केशर और भस्में मिला देने से छुहारापाक की गुणवत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है और यह निम्न रोगों को दूर करता है- खून की कमी, रजोदोष, धातु-क्षीणता कमजोरी आदि। मात्रा- 10 से 20 ग्राम तक ली जाती है। शीत ऋतु में यह ज्यादा उपयोगी सिद्ध होती है। केशर, भस्में एवं क्रमांक-5 से लेकर 12 तक की जड़ी- बूटियाँ छोड़कर भी मिठाई बनायी जा सकती है। यह बहुत ही पौष्टिक टानिक है।

3- अश्वगंधापाक

सामग्री- (1) अश्वगंधा चूर्ण- 100 ग्राम, (2) दूध- 1500 ग्राम, (3) शक्कर- 1 किलोग्राम, (4) दाल- चीनी- 4 ग्राम, (5) तेजपत्र-4 ग्राम, (6) इलायची-4 ग्राम, (7) नागकेशर-4 ग्राम, (8) जायफल- 2 ग्राम, (9) गोखरु बीज-2 ग्राम, (10) वंशलोचन-2 ग्राम, (11) जटामाँसी-2 ग्राम, (12) चन्दन- 2 ग्राम, (13) जावित्री- 2 ग्राम, (14) पीपलामूल- 2 ग्राम, (15) लौंग- 2 ग्राम, (16) खैरसार (कत्था)- 2 ग्राम, (17) सिंघाड़ा- 2 ग्राम, (18) कौंचगिरी- 2 ग्राम, (19) अख़रोट गिरी- 2 ग्राम, (20) केशर- 2 ग्राम, (21) अभ्रकभस्म- 2 ग्राम, (22) बंग-भस्म 2 ग्राम, (23) लौह-भस्म 2 ग्राम, (24) प्रवाल भस्म- 2 ग्राम।

बनाने की विधि-

1- क्रमांक- 4 से 16 तक की औषधियों का बारीक कपड़छन पाउडर बना लें।

2- क्रमांक 17 से 19 तक की वस्तुओं के छोटे-छोटे टुकड़े काटकर सुखा लें और फिर उनका भी पाउडर बना लें।

3- केशर को बारीक पीसकर उसमें सभी भस्म एक के पश्चात् एक मिलाकर एकरस कर लें।

4- इसके बाद सभी पाउडरों अर्थात् क्रमांक 4 से 16, 17 से 19 एवं 20 से 24 को मिलाकर रख लें।

5- दूध में कपड़छन किया हुआ अश्वगंधा चूर्ण मिलाकर खोवा तैयार कर लें।

(6) शक्कर की दो तार की चाशनी बनाकर उसमें पहले खोवा डालकर अच्छी तरह मिला दें। फिर सभी पाउडरों के मिश्रण को थोड़ा-थोड़ा मात्रा में डालकर तरह से पूरी मात्रा को उसमें मिला दें।

7- पाउडर मिल जाने पर एक थाली में थोड़ा सा घी लगाकर उसमें मिठाई का जमा लें। जम जाने पर चाकू से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर अलग कर दें। ठण्डा होने पर दूसरे दिन स्वच्छ डिब्बे में रख लें, और खाने में प्रयुक्त करें।

8- ग्रीष्म ऋतु में अश्वगंधापाक में केशर नहीं डालना चाहिये। साथ ही यदि कोई औषधि सरलता से उपलब्ध न हो रही हो तो उसे छोड़ा जा सकता है। सुबह खाली पेट इसके एक-दो पीस खाकर दूध पी लिया जाये तो दिन भर ताजगी एवं स्फूर्ति बनी रहती है। कमजोरी एवं वार्द्धक्यता दूर करने के लिए यह सर्वोत्तम टानिक है।

उपरोक्त तीनों प्रकार के टानिक ऐसे हैं जिन्हें हम परिस्थिति का व्यक्ति स्वयं बना सकता है और परिवार की स्वास्थ्य रक्षा कर सकता है। अधिक मात्रा में बनाने के लिए उक्त लिखित सामग्रियों को उसी अनुपात से दुगुनी-तिगुनी आदि मात्रा में लेकर आसानी से बनाया जा सकता है। शीत ऋतु के लिए यह उत्तम बलवर्धक रसायन है ही, अन्यान्य ऋतुओं में भी बराबर इनका सेवन किया जा सकता है।

यहाँ एक और आयुर्वेद रसायन का परिचय दिया जा रहा है जो स्वास्थ्यवर्द्धक होने के साथ-साथ स्मृति और मेधावृद्धक है। इसका नाम है सरस्वती पंचक।

4- सरस्वती पंचक

सरस्वती पंचाक के घटक सामग्री (पुरुषों हेतु)-

1- ब्राह्मी, (2) मिठीवच, (3) जटामाँसी, (4) अमृता, (5) मुलहठी।

यह पाँचों ही वनौषधियों पंसारियों के यहाँ आसानी से मिल जाती है। इसके तैयार पाउडर शान्ति कुँज, हरिद्वार में सदैव उपलब्ध रहते हैं। पाँचों घटकों की समान मात्रा लेकर मिश्रित कर ली जाये। और साफ कार्क लगे बोतल में रख ली जाये। सुबह दूध या शहद से एक चम्मच पाउडर का नित्य सेवन करते रहने पर इस रसायन के सेवन से जो लाभ होता है उनमें प्रमुख हैं-

1- मेधा व स्मृति वृद्धि, 2- तनाव, उदासी एवं उत्तेजना जैसी अगणित माँसिक परेशानियों का निवारण, 3- शारीरिक दुर्बलता तथा अनिद्रा रोग में अचूक असरकारक, 4- कब्जियत में फायदेमन्द, 5- लोग्रेड फीवर की उत्तम दवा, 6- ब्लडप्रेशर में राहत।

महिलाओं के लिए प्रयुक्त होने वाले सरस्वती पंचाक के घटकों में उनकी प्रकृति के अनुसार कुछ अन्तर रखा गया है।

सरस्वती पंचक के घटक (महिलाओं हेतु)- (1) ब्राह्मी, (2) शंखपुष्पी, (3) शतावर, (जटामाँसी), 5- मुलहठी

इसके निर्माण व सेवन की विधि-सेवन की विधि ऊपर जैसी ही है। इसके सेवन से एक शारीरिक कमजोरी में लाभ, 2- मेधावृद्धक, प्रतिभा संवर्धक, (3) तनाव, उलझन व उत्तेजना, छुटकारा, (4) अनिद्रा रोग दूर (5) ब्लडप्रेशर और ला ग्रेड फिवर में फायदेमन्द जैसे अनेकों लाभ होते हैं-

उक्त दोनों ही प्रकार के सरस्वती-पंचक को क्वाथ रूप में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। क्वाथ बनाने की विधि यह है कि रात्रि में पाँचों घटकों की एक-एक चम्मच मात्रा लेकर एक लीटर पानी में भिगो दिया जाये। सुबह उसे मंद आँच पर उबाला जाए और जब चौथाई अंश पानी रह जाये, तब उसे चूल्हे पर से अलग हटाकर ठंडा होने तक छोड़ दिया जाये। तत्पश्चात् पकड़े से छानकर क्वाथ अलग कर लिया जाये। इस क्वाथ के दो भाग बनाकर एक सुबह दूसरा शाम को पी लिया जाये। इस तरह आसानी से स्वास्थ्य संरक्षण ही नहीं, संवर्द्धन भी किया जा सकता है।


विशिष्ट समय को समझे, अपनी रीति-नीति बदलें - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों! यह समय बहुत ही संकटमय है। हर जगह असुरता छाई हुई है। इस समय ताड़का, कुम्भकरण, सुबाहु-सभी अपना ताण्डव नृत्य दिखा रहे हैं। इस समय महान व्यक्तियों को महान कार्य करना है। हर युग में ऐसे व्यक्तियों ने विशेष काम किया है। बड़े आदमी ही बड़े काम कर सकते हैं। छोटे आदमी छोटे काम कर सकते हैं। बड़े काम करने के लिए आत्मा को जगाना पड़ता है, उसे गरम करना पड़ता है। छोटे आदमी बड़े काम नहीं कर सकते। हाथी जो काम कर सकता है, छोटे जीव-जन्तु उसे नहीं कर सकते। सामान्य जीव का केवल उद्देश्य होता है- पेट एवं प्रजनन परन्तु असामान्य व्यक्ति का उद्देश्य यह नहीं होता है। यह मनुष्य, जो देवता बन सकता था, उसकी महत्त्वाकाँक्षाओं ने उसे बर्बाद कर दिया। वह मकड़ी के जाल में फँस गया, मिट्टी में मिल गया। वह सारे जीवन भर केवल दो ही काम करता रहता है- एक पेट तथा दूसरा प्रजनन। परन्तु असामान्य व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता है। उसके अन्दर एक हलचल होती है, एक हूक उठती है। समय की पुकार को वह अनसुनी नहीं कर सकता, संकटों से जूझने के लिए उठ खड़ा होता है।

महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के पास पहुँचे। उन्होंने कहा यह असामान्य समय है। इन बच्चों का यदि भविष्य बनाना चाहते हैं, इन्हें देवता बनाना चाहते हैं, तो इन्हें हमें सौंप दीजिये। दशरथ ने कहा- “जैसा आपका आदेश।” विश्वामित्र उन बच्चों को ले गये तथा शुरू से अन्त तक उन बच्चों ने असामान्य काम किया। असामान्य समय में, असामान्य व्यक्ति असामान्य काम करता है। राम तथा लक्ष्मण ने असामान्य जीवन जिया । वे सिद्धान्तवादी तथा आदर्शवादी थे। ऐसे ही व्यक्ति समाज को नयी दिशा देते हैं तथा लोग उनके बनाये रास्ते पर चलते हैं। जब आवश्यकता पड़ी, तो हनुमान् जी आ गये, सुग्रीव आ गये तथा अन्य हजारों रीछ-बन्दर आ गये। अगर रामचन्द्रजी अयोध्या में रहकर अन्य राजा-महाराजाओं जैसे मौज-मस्ती में डूब रहते, तो कोई भी उनकी बात नहीं मानता। परन्तु उनके असामान्य व्यक्तित्व को देखकर हनुमान् जी भी प्रभावित हो गये तथा असामान्य समय में असामान्य काम- जैसे समुद्र का लाँघना, सीता की खोज करना, पर्वत उठा लाना, राम-लक्ष्मण को कंधे पर बिठा कर ले जाना, आदि न जाने कितने महान कार्य कर दिखाये।

अगली पंक्ति में बैठने तथा काम करने के लिए मौका केवल असामान्य व्यक्तियों को मिलता है। वे ही असामान्य समय को पहचान पाते हैं। सामान्य आदमी को तो विशेष समय दिखायी नहीं पड़ता। गुरुगोविन्द सिंह जी को विशेष समय दिखायी पड़ा। वे असामान्य आदमी थे। उन्होंने देखा कि यह देश गुलामी की जंजीरों से कैसे छुटकारा पा सकता है। उन्होंने सोचा कि हर व्यक्ति अपने-अपने बच्चों को बहादुर सैनिकों की तरह बनाता और उनसे साहस का काम कराता तो समाज में एक आदर्श उपस्थित होता। उन्होंने इस आवश्यकता को समझा और सोचा कि उनकी शुरुआत अपने-आप से करनी चाहिये। पराये बच्चों को माँगने से पहले अपने बच्चों को इस काम में लगा देना उचित होगा। ऐसा सोचकर उन्होंने एक, दो, तीन, चार- इस तरह सभी बच्चों को बारी-बारी से उस आन्दोलन के लिए अर्पित कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि चार लाख आदमियों ने गुलामी की जंजीरों से मुक्ति के लिये उस आन्दोलन में अपने-आप को झोंक दिया। उन्होंने दम तब लिया जब आन्दोलन में गर्मी आ गयी।

असामान्य बनें, अवसर को पहचानें

मित्रों, आजादी का आन्दोलन कहाँ से शुरू हुआ? पंजाब से शुरू हुआ था। पंजाब के राजा रणजीत सिंह सबसे पहले राजा थे, जिन्होंने इस आजादी के आन्दोलन में अपना सहयोग सबसे पहले दिया था तथा आजादी की लड़ाई को गति प्रदान की थी। इसके बाद अन्य लोग आते गये। गुरुगोविन्द सिंह, रणजीत सिंह जैसे योद्धा धर्मतंत्र व राजतंत्र दोनों ओर से पहली पंक्ति में आगे आये। इसके बाद काम बढ़ता गया तथा उसमें लोग सहभागी बनते चले गये। इतिहास को देखते हैं तो मालूम पड़ता है कि असामान्य समय में लोगों को कुर्बानी देनी पड़ती है। यह काम जबर्दस्ती से नहीं होता है, वरन् लोगों के भीतर एक हूक पैदा होती है और लोग स्वेच्छा से अपनी कुर्बानी देते हैं। गाँधी जी ने अपने आपको अर्पित किया उसके बाद लाखों आदमी उनके साथ आ गये। 79 आदमियों को लेकर गाँधी जी जब साबरमती आश्रम से चल पड़े और ‘नमक आन्दोलन’ शुरू कर दिया, तो पीछे लाखों लोग आ गये। अगर गाँधीजी स्वयं बैठे रहते तथा दूसरों को कहते, तो शायद यह काम नहीं हो पाता। गाँधीजी सभी आन्दोलनों में आगे रहे। गाँधीजी के जेल जाने के बाद सारे देश में आग लग गयी। स्वराज आन्दोलन कहाँ से शुरू हुआ? अपने-आप से शुरू हुआ। आपत्तिकाल की समस्या का हल केवल अपने-आप से ही सम्भव है। ऐसा साहस भरा कार्य वे असामान्य व्यक्ति ही कर सकते हैं जो असामान्य समय को पहचानते हैं।

मित्रों, असामान्य आदमी स्वयं आगे चलकर समाज को यह बतलाता है कि महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इसके लिये कुर्बानी देनी चाहिये, तो लोग आगे आकर कार्य करते हैं। ऐसा साहस असामान्य आदमी ही कर सकता है। व्यक्ति पहले आदमी को परखते हैं कि यह मजबूत आदमी है, सिद्धान्त का आदमी है और कसौटी पर खरा सिद्ध होने के पश्चात् उसके कहने पर आगे आते हैं। भगवान बुद्ध के जो सबसे प्यारे शिष्य थे, सबसे पहले उनको अपना घर-बार छोड़ने के लिये निवेदन किया गया था। अगर भगवान बुद्ध ने केवल लोगों को आशीर्वाद से धन व बच्चे दे दिये होते, तो शायद सारे विश्व में जो धर्मचक्र प्रवर्तन की क्रान्ति हुई, शायद वह नहीं हुई होती।

ऋषि क्या करते थे? क्या वे माला घुमाते थे? नहीं बेटे, वे माला नहीं घुमाते थे, वरन् वे सारे दिन समाज की सेवा किया करते थे। आज तो जो सबसे घटिया काम है, उसके लिये लोग आगे आते हैं। महान कार्य करने की किसी की भावना ही नहीं है। तपस्वी, सन्त, ऋषि जो सबसे छोटा काम करते थे सेवा का, अगर आप भी यह करने लगें, तो आपके जीवन में भी चमत्कार आ जायेगा। उन्होंने व्यक्ति की, समाज की, देश और धर्म की, संस्कृति की सेवा की थी। लोगों के दुख, तकलीफों को दूर किया था। भगवान बुद्ध ने एशिया को ही नहीं बल्कि, सारी दुनिया को बदल दिया था। वे त्याग तपस्या की मूर्ति थे आप नाटक का मुखौटा पहनकर हनुमानजी नहीं बन सकते हैं। उसके लिये त्याग करना पड़ता है। ऋषियों के अन्दर सबसे महत्वपूर्ण एक बात होती है कि वे समय को पहचानते हैं। वे समय का परिचय का प्राप्त कर अग्रिम पंक्ति में आ खड़े होते हैं तथा दूसरों को नसीहत देने से पहले अपने आपको इस योग्य बनाने का प्रयास करते हैं कि इसका प्रभाव समाज पर पड़ सके। इसके बाद ढेरों आदमी उस रास्ते पर चलना शुरू कर देते हैं।

मित्रों, इंजन जब पटरी पर चलना शुरू कर देता है, तो डिब्बे अपने-आप चलना शुरू कर देते हैं। बड़े आदमी, जिनका कि व्यक्तित्व होता है, जब वे आगे चलते हैं, तो उनके सहयोगी, अनुयायी स्वयं पीछे चलने लगते हैं। रामचन्द्रजी के सबसे प्यारे हनुमान् तथा लक्ष्मण थे। उनसे उन्होंने कहा कि आपको आगे चलना चाहिये। वे चले। बुद्ध ने भी जो सबसे प्रिय शिष्य थे, जब उनसे उन्होंने कहा कि आपको सबसे आगे चलना चाहिये, तो वे चले। युग-निर्माण योजना की भी वही कहानी है। हमारे गुरु ने हमसे कहा कि चलना होगा और हम चले। इसके बाद लाखों लोग चलने लगे। लक्ष्मण का अनुकरण भरत ने किया। भरत का अनुकरण शत्रुघ्न ने किया। इस प्रकार रामचन्द्रजी के अनुकरण का सिलसिला चल पड़ा। सारे के सारे लोग उनके अनुयायी हो गये। इसका परिणाम ये हुआ कि सारी प्रजा चल पड़ी। इसके फलस्वरूप रामराज्य की स्थापना हो गयी।

मित्रों, दुनिया में एक ही तरीका है, जब असामान्य लोग असामान्य काम के लिये चलते हैं, तभी काम बनता है। इस दुनिया के अंतर्गत जो छोटे-छोटे व्यक्ति थे, जिनके अन्दर प्राण था, जो जीवन्त थे, उन्होंने ही आगे कदम बढ़ाया तथा उनके पीछे लोग चले। हमें महाराणा प्रताप का जीवन दिखाई पड़ता है। महाराजा राणाप्रताप को क्या कमी थी? उनके पास सभी चीजें थीं। वे अच्छे खाते-पीते व्यक्ति थे, पर उनके भीतर स्वराज की भावना जागृति हुई, उन्होंने राज-पाट छोड़कर जंगल का रास्ता पकड़ लिया। वे अपने बीबी बच्चों को कहीं भी रख देते थे। थे तो राजा ही, चाहते तो उनके खाने पीने की व्यवस्था कहीं भी हो जाती, परन्तु वे तबाह हुए, जंगलों में भटकते रहे, घास की रोटी खाते रहे, लेकिन अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। बन्दा वैरागी जैसे लोग किस तरह तबाह हुए, आप नहीं जानते हैं। उन दिनों कुछ लोगों ने अपनी लड़कियों की शादी मुगल राजाओं के साथ कर दी थी। वे अपने को राजपूत कहते थे और अपने को बड़ा राजा कहते थे। उसी जमाने में बहुत से ऐसे लोग थे, जो उन आक्रान्ताओं से लोहा ले लिया करते थे तथा अपने को कुर्बान तक कर देने में कोई कमी नहीं रखते थे। उन्होंने अपने सारे परिवार के लोगों को इस आग में झोंक दिया, परन्तु अपनी शान को नहीं जाने दिया। वे असामान्य लोग थे, जिन्होंने परिस्थिति को समझा तथा मुकाबला किया।

कहीं आप ‘समझदार’ तो नहीं?

आप बहुत समझदार आदमी हैं? आप अगर समझदार नहीं होते, तो इस जमाने में जब सारी दुनिया मरने को बैठी है, उस समय आप लोभ, मोह, वासना, तृष्णा का जीवन जी रहे हैं। इसके साथ ही यह सोच रहे हैं कि हमें यह फायदा कैसे हो जाय, वह फायदा हो जाय? हमारे बच्चे कैसे ऑफिसर बन जायें ताकि अधिक पैसा कमा सकें। इस मामले में आप बहुत समझदार आदमी हैं, परन्तु सिद्धान्तों से, आदर्शों से, अक्ल से समझदार नहीं हैं। आप कैसे समझदार हैं? कौवे की तरह से समझदार हैं। वह हर मामले में चौकस होता है, चालाक होता है, उस्ताद होता है। उस्ताद होते हुए भी उसके हिस्से में खाने-पीने की जो चीजें होती हैं, उसको वह अपने लिये रखता है, परन्तु अन्य जीव उसे छिन कर खा लेते हैं, इसलिये वह नासमझ माना जाता है। सारे पक्षियों में बेकार माना जाता है। मित्रों, मैं ये कहना चाहता हूँ कि यह विशेष समय है, इसे पहचानने की कोशिश करें। अगर आपकी आँखें हैं तो देखें, अगर नहीं हैं तो मैं क्या कह सकता हूँ? मैं कुछ नहीं कहना चाहता हूँ। आप अध्यात्मवादी हैं, तो आपको कुछ करना चाहिये। आपको सिद्धि मिली है, मुक्ति मिली है, तो आपको समाज की सेवा करनी चाहिये।

आदमी को अध्यात्मवादी तब माना जा सकता है जब वह दूसरों के दुख दर्द को बाँटकर उसे सुख, प्रसन्न बनाने का प्रयत्न करे। ऐसे व्यक्ति को दूसरों के दुख-दर्द को दूर करने के लिये बलिदान होना पड़ता है। भजन करने से कोई कुछ मिलता है? भजन करने वाले की नियति क्या है? यह भगवान जानना चाहता है। आप पैसा कमाने के लिये अवलाद प्राप्त करने के लिये भजन करते हैं, तो आपके इस उद्देश्य को भी वह जानता है। आप भजनानन्दी हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत लाभ के लिये भजन करने वाले अध्यात्मवादी नहीं होते हैं। ऐसे व्यक्ति से अध्यात्मवादी की उपाधि हम छीन लेते हैं, जो व्यक्तिगत लाभ के लिये भजन करते हैं। उनको जो अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये, सिद्धि के लिये भजन करते हैं, उनको मैं अध्यात्मवादी नहीं कह सकता हूँ। उनको मैं भौतिकवादी ही कहूँगा। ऐसे लोगों को ब्रह्मवर्चस का वह ब्रह्मतेज प्राप्त नहीं हो सकता है, जो लोकसेवी, संत, ऋषियों को मिलता रहता है। अतः आपको भी अपने-आपको तपाना चाहिये। जप करना चाहिये, परन्तु उस शक्ति को, उस ऊर्जा को समाज के कष्ट के, दुख दर्द के निवारण के लिये बाँट देना चाहिये, तभी आप सन्त, ऋषि कहला सकते हैं।

मित्रों, ऐसा कौन है जो कन्या के सयानी हो जाने पर उसके योग्य लड़का अर्थात् वर की तलाश न करे तथा उसकी शादी अपनी सामर्थ्य के अनुसार न करे। कोई भी व्यक्ति ऐसा निष्ठुर नहीं होता, जो अपने बच्चों के लिये कुछ न करे। हम आप लोगों को प्यार करते हैं तथा आपको हमेशा देने को तैयार रहते हैं। हर सामर्थ्यवान का यह कर्तव्य होना चाहिये कि वह अपने से कम सामर्थ्यवान व्यक्ति को प्यार दे। अगर हम एक दूसरे को प्यार नहीं करते हैं, तो हमारा गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार बनाना बेकार है। हमने हमेशा प्यार ही बाँटा है और चाहते हैं कि आप भी प्यार बाँटे । हम एक सन्त हैं तथा सन्त परम्परा के अनुसार हमारा नैतिक दायित्व है कि हम दूसरों की सहायता करें, उन्हें ऊँचा उठाये, उनके प्रगति के रास्ते खोल दें। हमें अपने समीपवर्ती लोगों, पड़ोसियों का ध्यान रखना चाहिये अगर किसी को बुखार हो, तो हमें उसकी मदद करनी चाहिये और चिकित्सक के पास ले जाना चाहिये। मित्रों, इसी तरह हमें उस समय का भी ख्याल रखना चाहिये, जिसमें हम जी रहे हैं। उस समय में हमें आगे बढ़कर युग -समस्याओं का हल करना चाहिये।

हमें दिखाई देता है भविष्य

मित्रों, यह आपत्तिकालीन समय है। मानव जाति आदि संकट के एक कगार पर खड़ी है ऐसे कगार पर खड़ी है कि उनके किनारे अगर ढह गये तो वह औंधे मुँह सीधे खाई में चली जायेगी तथा मनुष्य का बहुत बड़ा अहित होगा। इस प्रकार मनुष्य का भविष्य अन्धकारमय है। ऐसी विषम परिस्थिति में असामान्य मनुष्यों को शान्त नहीं बैठना है। यह आपत्तिकाल है। आपको तो दिखाई नहीं पड़ रहा है, परन्तु हमें दिखाई पड़ रहा है। ऐसे व्यक्ति जिनकी आँखों में माइक्रोस्कोप फीट होता है, सूक्ष्म चीजें भी देख लेते हैं। हमें भी दिखाई पड़ रहा है कि भविष्य में अगले दिनों क्या होने वाला है। बहुत भयानक स्थिति है। मनुष्य एक ऐसे कगार पर खड़ा है, जहाँ से गिरने पर वह खाई में जा सकता है तथा विनाश की स्थिति आ सकती है। दूसरी ओर अच्छा भी हो सकता है, परन्तु इसकी सम्भावना कम है।

यह आपत्तिकालीन समय है। इस समय वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी तथा अर्थशास्त्री- तीनों मिलकर यानि अर्थ, विज्ञान और बुद्धि तीनों ने मिलकर ऐसी रचना की है जिसे रावण, कुम्भकरण एवं मेघनाद की संज्ञा दी जा सकती है। बुद्धिवाद में ऐसी जकड़न आ गयी है कि सिद्धान्तवाद, आदर्शवाद पूर्णतः समाप्त हो गया है। आज आदमी का हृदय समाप्त हो गया है। आदमी आज जानवर हो गया है। जानवर तो भी मर्यादा में रहता है, परन्तु आदमी आज नर-पिशाच होता चला जा रहा हैं। उसे मर्यादा का भी ध्यान नहीं है। उसकी नीयत ईमान को खोलकर देखें तो आपको मालूम पड़ेगा कि मनुष्य ने न जाने किसका कलेवर पहन रखा है। उसके भीतर न जाने साँप बैठा है, न जाने राक्षस बैठा है, यह पता ही नहीं चलता है। आदमी के भीतर अगर आप झाँके, तो अन्दर बैठे राक्षस को देख कर आपको नफरत हो जायेगी। आज चारों तरफ नफरत की दुनिया दिखायी पड़ रही है। विज्ञान, बुद्धि और अर्थ तीनों ने मिल कर शालीनता की सीता का अपहरण कर लिया है। राम-लक्ष्मण रूपी धर्म अध्यात्म दोनों बिलखते हुए मारे-मारे फिर रहे हैं। इन तीनों ने न जाने कैसे षड्यंत्र रच दिया है। आदमी प्यार को, आदर्श को, शालीनता को भुला बैठा है। और मनुष्य कलेवर में पिशाच बन बैठा है।

साथियों भूत-पलीत का नाम आपने सुना है, वह भी इतनी हानि नहीं पहुँचा रहा है, क्योंकि उसके हाथ पैर नहीं हैं। जिसके हाथ पैर न हों भला वह क्या कर सकता है? वह चल फिर नहीं सकता, दौड़ नहीं सकता। अतः उससे डर नहीं है, लेकिन जिन्दा आदमी का भूत इंसान को परेशान कर रहा है, क्योंकि उसके पास हाथ-पैर भी है, और हाथ भी है, पैर भी है और अक्ल भी है। उसके पास दूसरी चीजें भी हैं। उसके पास ताकत भी है। आदमी का भूत अगर किसी पर हावी होगा, तो जिन, भूत, पिशाच, राक्षस सभी एक कोने पर रखे रह जायेंगे, तो वह मुर्दा भूतों से ज्यादा खतरनाक साबित होगा। हो भी यही रहा है। वास्तव में आज आदमी के भीतर की शालीनता समाप्त हो गयी है। वह राक्षस एवं पिशाच बन गया है।

आज परिस्थितियाँ इस तरह बनती जा रही हैं कि आदमी मरेगा, तबाह हो जायेगा। आज जनसंख्या इस कदर बढ़ रही है कि उसका क्या कहना? अगर यह इसी हिसाब से बढ़ती रही, तो एटम बम की कोई आवश्यकता नहीं होगी। आदमी भूख से, प्यास से तड़प-तड़प कर मर जायेगा। जिस तरह बंगाल में अकाल पड़ा था उस समय भूख से तड़प-तड़प कर हजारों लोग मर गये थे। जापान के नागासाकी शहर पर डाले गये बम से लोग तबाह हो गये थे। इसी तरह जनसंख्या बढ़ाने के फेर में आदमी लगा रहा तो उसका विनाश सुनिश्चित है। कितने ही लोग ज्योतिषियों को हाथ दिखाते हैं और यह कहते हैं कि देखना हमारे हाथ में बेटा है या नहीं? अरे तेरे हाथ में तो सत्यानाश लिखा है। कई लोग आकर कहते हैं कि गुरुजी मेरे औलाद नहीं है। उनसे में यही कहता हूँ बेटा अभी तो भी तू शान्ति से रह रहा है अन्यथा बेटा-बेटी तेरी चमड़ी नोंच डालेंगे। अरे तू समझता नहीं। अगर इसी तरह से आबादी बढ़ती रही तो पानी की एक-एक बूँद के लिये लोग तरस जायेंगे। सड़क पर चलने के लिए रास्ता नहीं मिलेगा। आदमी परेशान हो जायेगा। आप समझते नहीं तबाही की दुनिया आ रही है। आपत्तिकाल का समय आ रहा हैं। अगर किसी वैज्ञानिक के मन में खुराफात आ जाये और वह एटमी हथियारों के भण्डार में माचिस की एक तिल्ली सुलगा दे, तो सारा विश्व जलकर तहस-नहस हो जायेगा।

मित्रों, परिवार में, खानदान में जितने अधिक सदस्य बढ़ेंगे, उतनी ही मनुष्यों को परेशानियाँ आयेंगी, वह परेशान होगा। किसी आदमी के परिवार में 28 सदस्य हैं अर्थात् 28 आदमी एक परिवार में है उनमें आपस में प्रेम, सहकार है नहीं, चूहे-बिल्ली की तरह से रह रहे हैं। चूहे-बिल्ली से डरते हैं, बिल्ली चूहे से डरती है। ऐसे परिवार में आदमी की स्थिति ठीक उसी प्रकार हैं। आज जमाने में जिसका जितना बड़ा परिवार है वह उतना ही अधिक अशान्त है। विदेशों में बच्चों के बड़े होते ही माँ-बाप उन्हें अलग कर देते हैं और कहते हैं कि जाओ अपनी अलग व्यवस्था बनाओ। योरोप इस मामले में सही है, जो इस डाकू को पहले से ही अलग कर देता है। उसे गले लगाने से क्या फायदा? वहाँ लोग औलाद को घर से निकाल देते हैं और कहते हैं चल यहाँ तेरा कोई काम नहीं है। कारण वहाँ परिवार में प्रेम, मुहब्बत, सहकार नहीं है। बेटे के भीतर यह भावना नहीं है कि जब हमारा बाप बूढ़ा होगा, तो हमें उसकी सेवा करनी है, व्यवस्था बनानी है। बहिन भाई में प्रेम नहीं है। बहिन की शादी से पहले भाई की जो बहू आती है वह नर-पिशाचिनी यह कहती है कि हमें 650 रुपये मिलते हैं। इसे घर से निकाल दीजिये, फिर हम दोनों होटल में खाना खायेंगे, क्लबों में डाँस करेंगे और सिनेमा देखेंगे।

यह तो यूरोप की स्थिति है। अपने यहाँ भी अगर आपके पास 15 हजार रुपये हैं तथा बच्चे हैं पाँच, तो हर के हिस्से में 3 हजार रुपये आते हैं इसके लिये भी मारकाट है। उसे आप अगर एक को पढ़ाने में, गजटेड ऑफिसर बनाने में खर्च कर देते हैं तो बाकी बच्चों के गले में फाँसी लगा देंगे या मार देंगे? या फिर उसे मैट्रिक तक पढ़ाने के बाद उसे घर से निकालिये तथा यह कहिये कि निकल घर से, अपने-आप पढ़ तथा अपने पैरों पर खड़े हो। बेटे, आज की परिस्थितियों में आपको दुश्मन से भी होशियार रहना चाहिये तथा बड़े बेटे से भी होशियार रहना चाहिये। दुश्मनी के मामले में बड़ा बेटा, जिसके लिये आपने सबकुछ दाँव पर लगा दिया है, उसमें तथा साँप-बिच्छू में कोई फर्क नहीं पड़ता है। आज इस बारे में हर आदमी को यह विचार करना चाहिये कि कुटुम्ब बढ़ाने हमें कोई फायदा नहीं है, वरन् इसके द्वारा केवल बर्बादी ही बर्बादी है। जापान इस मामले में काफी होशियार है। यदि वहाँ मियाँ बीबी मिलकर 9 सौ रुपये भी कमाते हैं तो कहते हैं हम सिनेमा देखेंगे, होटल में खाना खायेंगे, मस्ती में रहेंगे। बच्चों से क्या फायदा? उन्हें पढ़ाने में, योग्य बनाने में, शादी-ब्याह करने में काफी खर्च होगा। इसके अलावा हमारी मौज-मस्ती में भी वे विघ्न डालेंगे। जापानी इस मामले में विचार करते हैं वे चाहते हैं कि बच्चे न हों।

बेटे! यह क्या होने जा रहा है? यह संयुक्त प्रणाली का सत्यानाश होने जा रहा है। आज सामाजिक सहयोग-सहकार का वातावरण समाप्त होता जा रहा है। आदमी इतना स्वार्थी, लोभी होता जा रहा है, जिसे देखकर लगता है कि मानव जाति की सारी की सारी श्रेष्ठ परम्परायें नष्ट होने वाली हैं। आदमी को दुश्मनों से डर लगे या न लगे, परन्तु अपने कुटुम्बियों से काफी भयभीत रहता है कि न जाने वे कब किस चक्कर में डाल सकते हैं। बरबाद कर सकते हैं आज ऐसी ही स्थिति बन रही है। बुढ़ापे में व्यक्ति फूट-फूट कर रोएगा, कलपेंगा कि हाय रे ! औलाद ने, सम्बन्धियों ने हमें लूट लिया, बरबाद कर दिया। मित्रों, यह जमाना आता हुआ चला जा रहा है। आदमी मरे या जिये, यह मैं नहीं कहता परन्तु आदमी के भीतर जो आत्मीयता थी, मनुष्यता थी, वह नष्ट हो जायेगी, बढ़ती हुई जनसंख्या की वजह से, बढ़ते हुए विज्ञान की वजह से, बढ़ती हुई अक्ल की भरमार की वजह से, आदमी की स्वार्थपरता की वजह से। हम और आप ऐसे ही बुरे समय में रह रहे हैं।

अगर इसी तरह की स्थिति बढ़ती चली गयी, तो हमारा और आपका भविष्य बहुत अन्धकारमय होता चला जायेगा। राजनीतिज्ञ जिस रास्ते पर आपको ले जा रहा हैं, वह हमें अन्धकारमय लग रहा हैं। हमारे विद्वान आपको जिस रास्ते पर ले जा रहे हैं। वह हमें अंधकारमय लग रहा है। संत-महात्माओं की प्रवृत्ति और विचारों को देखकर तो हमें रोना आता है। उनके क्रिया-कलापों को देखकर मैं काँप जाता हूँ और सोचता हूँ, हे-भगवान ये क्या कर रहे हैं? हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे भगवान! अगर इस संसार से कोई वर्ग नष्ट होना हो, तो सबसे पहले बाबाजियों का वर्ग नष्ट होना चाहिये। आप कहेंगे कि गुरुजी आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? बेटे, यह इसलिये कह रहा हूँ कि कतिपय संत-महात्मा अपने कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों से भटक गये हैं। मनुष्य में जो मानवता का शिक्षण भरा पड़ा रहा था, वह मरती चली जा रही है। आदमी अपनी महानता के जिस बलबूते पर इस सृष्टि का मुकुटमणि बना, वह गिरते-गिरते समाप्त होता चला जा रहा है।

गुरुजी! फिर क्या होगा? मित्रों, इस दुनिया में मक्खी-मच्छर रहते हैं, तो इस दुनिया की कोई शान नहीं है। कीड़े- मकोड़े, टिड्डी, खटमल भी दुनिया में रहते हैं, पर उनसे कुछ लाभ है क्या? मैं नहीं जानता कि क्या लाभ है, लेकिन अगर आदमी भी इस प्रकार से ज्यादा पैदा होंगे, तो निश्चय ही दुनिया में तबाही आयेगी। लोग परेशान होंगे। आज जो दुनिया में मनुष्यता समाप्त हो रही है, आदमी के अन्दर जो श्रेष्ठ माद्दा था, जो महानता थी, आदमी के भीतर जो देवत्व था, आज वह समाप्त होता चला जा रहा है। आदमी के भीतर जो भगवान बैठा था, वह धूमिल होता चला जा रहा है। भगवान माने आदर्श, आदर्श माने श्रेष्ठ विचार। मित्रों, हमें जिस भगवान की आवश्यकता है, जो हमें ऊँचा उठाता है, उसका नाम है सिद्धान्त, आदर्श। उसका नाम है- मानवीय गरिमा, जो समाप्त होती चली जा रही है। ऐसे अन्धकार को देखकर हमें दुख होता है कि इसी प्रकार की यदि स्थिति रही, तो आगे आदमी, आदमी की जान का ग्राहक बन जायेगा। उसके जीवन में तबाही आयेगी।

अब अगले दिनों यह होगा

मित्रों उस समय आदमी-आदमी का खून पियेगा। आदमी, आदमी का माँस खायेगा। आदमी-आदमी को गिरायेगा। आदमी, आदमी को दुख देगा, परेशान करेगा। आदमी, आदमी का प्राण पियेगा। मर्द औरत का प्राण पियेगा और औरत, मर्द का। भाई, भाई का प्राण पियेगा। भाई, बहिन का प्राण पियेगा। बेटा, बाप का और बाप, बेटे का प्राण पियेगा। साथ रहकर भी लोग एक-दूसरे का प्राण पियेंगे। यह आपत्तिकाल का सपना जो हमने आपको दिखाया है, वह गलत नहीं है। इस समय पैसा, अक्ल, रोटी बढ़ेगी, परन्तु यही अक्ल, पैसा और रोटी अपने को खायेगी। इनसान परेशान हो जायेगा। अगले दिनों विश्वविद्यालय बहुत बनने वाले हैं, कारखाने बहुत बनने वाले हैं, परन्तु हम आपको सावधान कर रहे हैं कि आने वाले समय में हर चीज की कीमत बढ़ने वाली है। हर चीज हमें मुश्किल से प्राप्त होगी। लोहे जैसी चीज का भी मूल्य बढ़ने वाला है। लोहे का मूल्य सोने के बराबर होगा। मुसीबत ही मुसीबत आने वाली है, यदि अभी से हम सचेत नहीं हुए तो।

इस आपत्तिकालीन समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है- आदमी का आध्यात्मिकता से जुड़ना। आध्यात्मिक पारस से जो जुड़े हैं, वे पारस बन गये। विवेकानन्द, दयानन्द पारस बन गये। लोहे को पारस से छुआने पर वह सोना बनता है, कहा नहीं जा सकता, परन्तु यह एक सच्चाई है कि आध्यात्मिक पारस से जुड़ने पर ही लोहे जैसा व्यक्ति सोना यानी प्राणवान, तेजवान, गुणवान्, समृद्धिवान बन जाता है। उनकी अक्ल, आदर्श, सिद्धान्त महान होते हैं। वे श्रेष्ठ व महान बन जाते हैं

मित्रों, अमृत के बारे में हमें यह पता नहीं कि कोई मरने के समय पी ले तो वह बच सकता है। ऐसा तो हमने सुना नहीं है। यदि ऐसा अमृत हुआ होता, तो रामचन्द्रजी को मरने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बहुत सारे भगवान हुये थे, उनकी भी मरने की आवश्यकता नहीं होती। इसलिये मैं सोचता हूँ कि ऐसा अमृत कोई नहीं है। नहीं महाराज जी, शास्त्रों में पुराणों में अमृत के बारे में बहुत लिखा है। बेटे, उसी के बारे में मैं कह रहा हूँ, जिसे पीकर लोग अजर-अमर हो जाते हैं- जैसे राजा हरिश्चन्द्र। गाँधी जी ने एक ड्रामा देखा और वे हरिश्चन्द्र हो गये। गाँधी जी मर गये? नहीं बेटे, गाँधी जी कैसे मर सकते हैं। ईसामसीह मर गये? नहीं बेटे, वे कैसे मर सकते हैं। भगवान बुद्ध मर गये? नहीं, वे नहीं मरे। वे अमर हो गये। कैसे व्यक्ति अमर होते हैं? ऐसे व्यक्ति जिनके अन्दर शालीनता पैदा हो जाती है। आदर्श और सिद्धान्त जिनके रोम-रोम में समा जाता है, वही व्यक्ति अमर हो जाते हैं।

आदमी के अन्दर अगर शालीनता न हो, तो वह नर-पिशाच बन जाता है। जिस आदमी के मुँह से पिशाच अट्टहास करता हुआ चला ता है, अगर उसे उसी तरह बढ़ने दिया जाये, जो वह बहुत खतरनाक हो सकता है। आज मनुष्य ने न जाने क्या-क्या बना लिया है। पहले हवाई जहाज 600 कि.मी. प्रति घण्टे की रफ्तार से उड़ता था। आदमी ने इस दूरी को समाप्त कर दिया है। चन्द्रमा पर जो राकेट भेजा गया था, उसकी गति छह हजार से 7 हजार मील थी। वह सारी पृथ्वी पर ढाई घण्टे में घूम जाता है। आज तो हर चीज की चाल तेज हो रही है। विनाश की भी चाल तेज हो रही है।

पहचानिए तो कि आप कौन हैं?

यह समय आपत्तिकाल का है, जो एक ओर सुन्दर सपने संजोये हुए है, तो दूसरी तरफ विनाश की लीला भी मुँह बायें खड़ी दिखाई पड़ रही है। आप दोनों के बीच में खड़े हैं। आपको यह दिखाई नहीं पड़ता है। आप कौन हैं? आप जाग्रत आत्मा हैं। हमने जो हार युगदेवता के लिये बनाया है, वह भगवान के इस बगीचे में अच्छे से अच्छे फूलों को लेकर बनाया है, ताकि अच्छी से अच्छी माला युगदेवता के चरणों में चढ़ाई जा सके। आपको हमने बड़ी मुश्किल से ढूँढ़ा है। आपने ढूँढ़ा है हमें? नहीं बेटे, हमने आपको ढूँढ़ा है। हमने अच्छे-अच्छे रत्नों को ढूँढ़ा है। हमने अखण्ड ज्योति आपके पास भेजी थी। आपने मंगाई थी? नहीं, हमने भेजी थी। बेटे, जिस तरह राम लक्ष्मण को लेने विश्वामित्र दशरथ के पास गये थे, वैसे ही हमने आपके बाप के पास जाकर आपको ढूँढ़ा है। आप समझते नहीं हैं कि हमने कैसे आपको ढूँढ़ा हैं। रामकृष्ण परमहंस विवेकानन्द के पास गये थे? वे कहते थे कि तू क्या करेगा- नौकरी करेगा? हरे हमारा काम हर्ज हो रहा है और तू नौकरी के फेर में पड़ा हैं हम लोगों को मुक्त करने आये हैं। हमारा काम अलग है। हमारा ‘जॉब’ अलग है। हम देश, समाज, राष्ट्र को दिशा देने आये हैं। तू नौकरी करने के लिये नहीं पैदा हुआ है। उनको रामकृष्ण परमहंस ने मजबूर किया और वे चल पड़े।

बेटे तू भी नहीं समझ रहा है। हम भी तुझे मजबूर कर रहे हैं। हमारे पास तू आता रहता है, परन्तु मनोकामनाएँ लेकर आता है। अगर ऊँची तमन्ना लेकर आया होता, तो तू धन्य हो जाता। हम जब अपने गुरुजी के पास जाते हैं, तो हमारी तमन्नाएँ ऊँची रहती हैं तथा हम महान बन जाते हैं। वहाँ से हम महान बनकर आते हैं। हम उनसे कहते रहते हैं कि गुरुदेव हमारा जीवन कुछ और होना चाहिये। हमारे ब्राह्मण तथा संत जीवन में कुछ कमी रह गयी है। उसमें कुछ और प्रखरता, तेजस्विता आनी चाहिये तलवार पर धार दी जाती है तो वह ज्यादा मूल्यवान बन जाती है। हम चाहते हैं कि हमारे ब्राह्मण तथा संत के जीवन में भी कुछ धार आवे ताकि हम और काम कर सकें। जब कभी हिमालय जाता हूँ, तो हमारे और हमारे गुरु के बीच बातचीत होती है, लड़ाई-झगड़ा होता है। हम केवल एक ही बात कहते हैं कि हमारे भीतर कसक है, जान है, दम है। गुरुवर हमसे आप और अधिक काम कराइए, काम लीजिये। हमारी धार को तेज कर दीजिये, ताकि हम अधिक काम कर सकें समाज की सेवा कर सकें। यही हम दोनों में लड़ाई-झगड़ा होता रहता है। वे कहते हैं कि तू तो बच्चा है और हम कहते हैं कि हम बच्चे नहीं बड़े हैं, आप हमें लड़ाई में भेजिये, फिर देखिये कि हम अपनी पैनी तलवार से क्या करके आते हैं।

परन्तु हमें दुख है कि आपकी और हमारी लड़ाई कुछ घटिया किस्म की होती है। मैं आपको यह बतलाना नहीं चाहता, किन्तु हम जब आपके ख्यालों को, ख्वाबों को पढ़ते हैं तथा देखते हैं, तो हमारा अन्तःकरण रो पड़ता है तब हम यह चाहते हैं कि आपकी सहायता करनी चाहिये। मित्रों, मुझे आदमी की सहायता करनी चाहिये, परन्तु आप जब सहायता माँगते हैं, तो हमें दुख होता है। अब आप बड़े हो गये हैं, तो आपको यह कहना चाहिये कि पिताजी! हम आपकी सहायता करेंगे, परन्तु आप कहते हैं कि पिताजी हम बच्चे हैं, आप हमारी सहायता कीजिये। अभी आप दो सौ मन लेकर चल रहे थे, अब हमारा भी ढाई सौ मन वजन ले लीजिये। ठीक है बेटे, हम तो लेकर चल देंगे। हम तो देश, समाज, राष्ट्र, धर्म, संस्कृति का वजन लेकर चल रहे हैं, तेरा भी लेकर चलेंगे। हमारे अन्दर क्षमता है कि इतना वजन लेकर चल सकें, परन्तु बेटे, इससे बनता क्या है? क्या आपको संतोष हो जायेगा?

मित्रों, इस शिविर में आपको बुलाने के पीछे हमारा विशेष उद्देश्य सन्निहित था। आप कहते हैं कि हमें कुण्डलिनी जागरण सिखा दीजिये, ब्रह्मवर्चस साधना सिखा दीजिये। बेटे यह मत कह, बल्कि यह कह कि हमें बाजीगरी सिखा दीजिये। मित्रों, बाजीगरी में व्यक्तित्व-निर्माण की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल बाहरी क्रियाकलापों से, आडम्बरों से वह पूरी हो जाती है। किसान को मेहनत करनी पड़ती है, पसीना बहाना पड़ता है, न फसल मिलती है, लेकिन बाजीगर बिना किसी मेहनत के केवल जमीन पर से मिट्टी उठाना है तथा हाथों की हेरा-फेरी करके पैसा कमा लेता है। इससे क्या मतलब है? हम अच्छी तरह से जानते हैं कि पूजा से, भजन से, सिद्धियों तेरा मकसद है। साधना से क्या मकसद है। यह मैं सब अच्छी तरह जानता हूँ। तू जो देखना चाहता है, वह तो मैं इसी तरह दिखा सकता हूँ। आपको पाने की लालसा कम है, सो दिखाने से काम चल सकता है। आप लोग सिद्ध


अब दवाइयाँ खेत-खलिहानों में पैदा होंगी

इन दिनों बीमारों को रोग की स्थिति में गोलियाँ और कैप्सूल खाने पड़ते हैं, पर आने वाले समय में इनकी जगह सब्जियाँ खा लेने से ही शायद काम चल जाये। ऐसी सम्भावना जीन वैज्ञानिकों ने व्यक्त की है और कहा है कि तब दवाइयाँ फैक्ट्रियों में नहीं, वरन् खेतों में उगेंगी।

इसे विज्ञान की सफलता ही कहनी चाहिये कि जो रसायन पहले जीव-जन्तुओं से प्राप्त किये जाते थे, उन्हें अब वनस्पतियाँ पैदा करेंगी। इस नवीन खोज से उन लाखों निरीह प्राणियों की हत्या से बचा जा सकेगा, जो प्रतिवर्ष विज्ञान की बलि चढ़ जाया करते थे। शरीर शास्त्रियों को जब यह ज्ञात हुआ कि प्राणियों के जीन्स की कलमें वनस्पतियों में लगाया जा सकना सम्भव है, तो उन्होंने इस दिशा में तरह-तरह के प्रयोग करने आरम्भ किए, जिसके फलस्वरूप उन्हें कई महत्वपूर्ण सफलताएँ हस्तगत हुईं और यह जाना जा सका कि मानवी जीन्स की खेती पौधों में सरलतापूर्वक की जा सकती है।

जानने योग्य तथ्य यह है कि ‘जीन’ जीवधारियों में पायी जाने वाली वह इकाई है, जो उनके आकार-प्रकार शक्ल−सूरत, रूप-रंग गुण-अवगुण जैसी समस्त निजी विशेषताओं के लिये जिम्मेदार होती है। इसमें कोई जीन-परिकर भी उत्तरदायी हो सकता है अथवा एक अकेला जीन भी। अलग-अलग खूबियों के लिये पृथक्-पृथक् समूह अथवा एकल जीन होते हैं। इन्हीं को पहचानकर जब किसी विशेष जीन अथवा जीन-समूह को किसी पौधे में प्रविष्ट कराया जाता है, तो उस में वही खूबी पैदा हो जाती है, जो उस प्राणी में थी।

यहाँ प्राणियों के गुण वनस्पतियों में उत्पन्न करने का मात्र इतना ही तात्पर्य है कि उनमें पैदा होने वाले ऐंजाइम और रसायन जीन प्रत्यारोपण के साथ पौधों में भी निर्मित होने लगते हैं। इसका यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिये कि उन जैसे चलने-फिरने बोलने अथवा आकार-प्रकार सम्बन्धी वैशिष्ट्य वनस्पतियों में उत्पन्न हो जायेंगे। यदि यह प्रयोग पूर्णतया सुफल रहा, तो आगामी समय में चिकित्सक दवाइयों के अपने पुर्जों में रासायनिक गोलियों के स्थान पर यह लिखा करेंगे कि बीमार को सुबह-दोपहर-शाम एक-एक शलजम और आलू एक सप्ताह तक खिलाया जाये। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये साधारण खेतों में आने वाली सामान्य सब्जियाँ नहीं होंगी। इन्हें जीन तकनीक के प्रयोग से कुछ विशेष खेतों में पैदा किया जायेगा और ये दवाओं के स्थानापन्न होंगे। इनको सिर्फ मरीज ही खा सकेंगे। सर्वसाधारण के उपयोग के लिये ये नहीं होंगे। इनकी सर्वप्रमुख विशेषता यह होगी कि वाँछित तत्व इनमें प्राकृतिक रूप से ही मौजूद रहेंगे।

इस प्रकार के सफल प्रयोग करने का श्रेय स्विट्जरलैंड के विज्ञानवेत्ताओं को मिला। यहाँ के शरीर शास्त्रियों ने एक ऐसे मानव जीन को शलजम के पौधे में डाला, जो इण्टरफेराँन पैदा करता था। इण्टरफेराँन एक प्रकार का प्रोटीन है। यह वायरसों को नष्ट करता है। वैज्ञानिकों का विश्वास था कि इण्टरफेराँन निर्मित होने के कारण शलजम अब स्वस्थ-सुरक्षित रहेंगे, वायरसों का उन पर आक्रमण नहीं होगा, पर ऐसा नहीं हो सका। यह उनकी आस्था पर एक तरह का कुठाराघात था, किन्तु इससे वे विचलित नहीं हुए। जब ऐसे शलजम का उन्होंने परीक्षण किया, तो विदित हुआ कि उनमें बड़ी मात्रा में इण्टरफेराँन निर्माण हुआ है। यह इण्टरफेराँन ठीक वैसा ही था, जैसा मानव शरीर में पाया जाता है। इतना ही नहीं, उसकी क्रियाशीलता और कार्यपद्धति भी उसी जैसी थी। यह उसका उत्साहवर्द्धक पक्ष था। अब वैज्ञानिकों के हाथ एक ऐसी सरल, सस्ती और निरापद प्रणाली लग गई थी, जिसके द्वारा बड़े परिणाम में यह रसायन नैसर्गिक रूप से बनाया जा सके।

एक असफल प्रयोग के सार्थक परिणाम का यह एक अच्छा उदाहरण है। वनस्पति शास्त्री इस प्रयोग के द्वारा शलजम की खेती को वायरसों के हमलों से सुरक्षित रचाना चाहते थे, किन्तु इसके उपरान्त जो सूत्र उपलब्ध हुआ, उससे भविष्य में स्वास्थ्य-रक्षा के क्षेत्र में सुनिश्चित रूप से एक नवीन क्रान्ति आएगी, ऐसा विशेषज्ञों का मत है।

एक अन्य प्रयोग में कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्राणिशास्त्रियों ने ‘एण्टीबॉडी’ पैदा करने वाला एक ऐसा जीन तम्बाकू के पौधे में डाला कि उसने पादपीय ‘एण्टीबॉडी उत्पन्न करना शुरू कर दिया। ‘एण्टीबॉडी जन्तु एवं मनुष्य के शरीर में कार्य करने वाली ऐसी ‘सैनिक’ हैं, जो जीवाणुओं और विषाणुओं के आक्रमण से शरीर की रक्षा करती है। किसी भी जीवाणु का जब हमला होता है, तो वे उनसे लड़ने के लिये तत्पर हो उठती है। इस प्रकार सदैव सतर्क सिपाही की तरह वे हमारी रक्षा करती हैं। तम्बाकू के पौधों में बनने वाली इस ‘एण्टीबॉडी का नाम वैज्ञानिकों ने “प्लाण्टीबॉडी’ रखा है। इन्हें बच्चों के लिए निर्मित डिब्बाबन्द दूध आदि में मिलाने की सोची जा रही है।

इस शृंखला की अगली कड़ी के रूप में ‘हेसेल्टन फर्मास्यूटिकल’ नामक एक अमरीकी कम्पनी के अनुसंधानकर्ताओं ने जब वहाँ के एक स्थानीय जंगली पौधे में एक विशिष्ट मानवी जीन डालता, तो पौधा ‘ल्यूएनकेफैलिन’ नामक एक महत्वपूर्ण रसायन पैदा करने लगा। उल्लेखनीय है कि उक्त रसायन मानवी मस्तिष्क का एक अत्यन्त उपयोगी उत्पाद है। इसका उपयोग कई प्रकार की औषधियों के निर्माण में किया जाता है।

अब इसी प्रकार के प्रयोग अनेक देशों की दवा निर्माता कम्पनियों और शोध संस्थानों ने आरम्भ किये हैं और कितने ही प्रकार के मूल्यवान रसायन उत्पन्न कर रहे हैं। कुछेक कंपनियाँ आलू और तम्बाकू से मानवी महत्व का उपयोगी प्रोटीन ‘एल्ब्यमिन’ बना रही हैं। आग से जले लोगों के लिए यह एक प्राण रक्षक पदार्थ की भूमिका निभाता है। इसके अतिरिक्त भी इसके अगणित उपयोग हैं।

फलों और सब्जियों में दवाइयाँ भरी होने से एक साथ दोहरे प्रयोजन पूरे होंगे । जहाँ एक ओर से वे औषधि की आवश्यकता पूरी करेंगे, वहीं साथ-साथ शरीर को पोषण भी प्रदान करेंगे। इससे पृथक्-पृथक् दवा लेने और भोजन करने के झंझट से बचा जा सकेगा। स्वास्थ्य रक्षा के लिए भविष्य में रासायनिक दवाओं के स्थान पर लोगों को हरी सब्जियाँ खानी पड़ें, तो कोई आश्चर्य नहीं।


सावधान! कहीं आप ‘फास्टफूड’ के रूप में जहर तो नहीं खा रहे?

तेजी से दौड़ती जिन्दगी और समयाभाव ने रोजमर्रा के जीवनक्रम में फास्टफूड का आविष्कार किया है। आज यह भोजन का अंग बन चुका है। महानगरों की फास्टलाइफ बेहतर फास्टफूड की ओर आकर्षित हुई है। युवाओं के लिये तो जैसे यह खास फैशन है। युवक स्मार्ट और पतले बनने के लिए एवं युवतियाँ अपने शारीरिक सौंदर्य को बढ़ाने हेतु सन्तुलित भोजन के बदले फास्टफूड की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इस खाद्य क्रान्ति ने समाज के हर आयु एवं वर्ग को प्रभावित किया है। पाश्चात्य जीवनशैली की यह देन हमारी अपनी जिन्दगी पर छाती जा रही है, परन्तु इसके झटपट तैयार होने और सुन्दर दिखने, स्वादिष्ट लगने के मुखौटों के पीछे झाँकने की किसी को फुर्सत नहीं। सच तो यह हैं कि यह खाद्य धीमा जहर है, जो हमारे शरीर एवं मन दोनों को धीरे-धीरे ही सही, पर पूरी तरह समाप्त करता जा रहा है। इस रासायनिक भोजन के बदले सन्तुलित एवं प्राकृतिक खाद्य पर निर्भर रहना ही एकमात्र विकल्प है।

जिसे फास्टफूड कहा जाता है, दरअसल वह पाश्चात्य जीवनशैली की एक बेबसी या मजबूरी है। वहाँ के परिवार के सभी सदस्य कामकाजी होने के कारण यह उनकी जरूरत बन गयी है। वहाँ के लोग भी इसके अस्वास्थ्यकर परिणामों को देखकर इसके खिलाफ खड़े हो गये हैं और हम लोग हैं, जो अपनी आँखें मूँदकर विवेक को ताक पर रखकर उसे अपनाने में गर्व महसूस करते हैं। इटली का मशहूर पीजा यहाँ आकर छा गया है। बर्गर यूरोप और अमेरिका का लोकप्रिय भोजन है। बर्गर की शाकाहारी एवं माँसाहारी दोनों ही किस्में प्रचलित हैं। अपने देश के उच्चवर्ग में जहाँ सैंडविच, हाटडॉग, आइसक्रीम और शीतल पेय की लोकप्रियता बढ़ रही है तो वहीं मध्यवर्गीय परिवारों में कैंडी, पेस्ट्री, कुकी, टाँफी, स्वीट ड्रॉप, जेम, जेली, कैचप आदि का आकर्षण प्रबलतम हो रहा है।

वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों दोनों ने ही इसके इस्तेमाल के प्रति सचेत किया है। विकसित देशों में खाद्य पदार्थों में मिलाये जाने वाले रासायनिक तत्वों की संख्या 20 हजार से भी अधिक है। कुछ रसायन तो खाद्य पदार्थ को संरक्षित, संश्लेषित करते हैं और कुछ को उसे रंगने व स्वादिष्ट बनाने हेतु प्रयोग में लाया जाता है। इनका प्रयोग करने वाले विकसित देश अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के लोगों के पेट में प्रतिवर्ष औसतन डेढ़ किलो घातक रासायनिक पदार्थ पहुँच जाता है। इसके प्रयोग एवं प्रचलन के बढ़ने के साथ ही इसकी मात्रा भी बढ़ती जा रही है। इनमें से कुछ रसायन तो शरीर की चर्बी में वर्षों पड़े पर रह सकते हैं। जिससे कैंसर जैसी असाध्य बीमारी की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं

भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मानव पोषण विभाग के डॉ. उमेश कपिल की मान्यता है कि आजकल के प्रचलित फास्टफूड में प्रायः विटामिन ए, सी कैल्शियम और लौह तत्व की कमी होती है। इस संस्थान के अनुसार, 10 से 21 वर्ष के किशोर-किशोरियों का आकर्षण फास्ट-फूड के प्रति कुछ ज्यादा ही बढ़ा है, जबकि इस उम्र में शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिये सन्तुलित आहार कही आवश्यकता अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ती है। भारतीय पोषक संस्थान, हैदराबाद के आँकड़ों के अनुसार, सन्तुलित आहार में 13 से 15 वर्षीय किशोर को कम से कम 425 ग्राम अनाज, 50 ग्राम दाल, 100 ग्राम हरी सब्जियाँ, 60 ग्राम अन्य सब्जियाँ, 250 ग्राम दूध, 40 ग्राम चिकनाई, 50 ग्राम गुड़ या शक्कर की जरूरत होती है। इसी प्रकार एक वयस्क व्यक्ति को लगभग 1000 कैलोरी भोजन प्रतिदिन चाहिये, जबकि 16 से 18 वर्ष की लड़कियों को प्रतिदिन 2060 कैलोरी की जरूरत होती है। फास्टफूड पर्याप्त कैलोरी तो प्रदान करता है, परन्तु इसमें आवश्यक विटामिन का सर्वथा अभाव होता है। इसीलिये यह भोजन शरीर में मोटापन लाने के बावजूद स्वस्थ नहीं रख सकता। अभी हाल ही में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की शोध वैज्ञानिक डॉ. शोभा रामचन्द्रन ने दिल्ली पब्लिक स्कूल के बच्चों में एक सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण में यह पाया गया कि 16 से 18 वर्ष के संभ्रांत परिवारों के बच्चे ज्यादातर किसी न किसी फास्टफूड के शौकीन हैं और इसी वजह से ये एविटामिनोसिस रोग के शिकार हैं। इनमें से 36 प्रतिशत किशोर देखने में तो मोटे लगते हैं, लेकिन विटामिन ‘ए’ की कमी से प्रभावित है।

डॉ. उमेश कपिल के अध्ययन से पता चलता है कि फास्टफूड में नमक या चीनी की अत्यधिक मात्रा होती है। नमक के ज्यादा प्रयोग से रक्तचाप बढ़ने की आशंका होती है, जबकि मीठे का ज्यादा उपयोग शरीर में चीनी के सन्तुलन को बिगाड़ देता है। परिणामतः एड्रेनेलिन बढ़ जाता है और तनाव व तंत्रिका तंत्र सम्बन्धी रोग पनपने लगते हैं। साथ ही इस तरह के भोजन में फाइबर्स, (रेशे) का अभाव होता है, जिससे डाइवर्टीकुलेसिस, पाइल्स, हार्निया, एपेंडीसाइटिस तथा पथरी जैसी बीमारी हो सकती है। फास्टफूड पर निर्भर रहने वाले युवक-युवतियाँ ज्यादातर रक्ताल्पता, नेत्ररोग एवं अस्थिरोग से ग्रसित होते हैं। सेन्टर ऑफ साइन्स इन पब्लिक इन्ट्रेस्ट के द्वारा प्रकाशित 500 पृष्ठों की एक पुस्तक में कहा गया है कि फास्टफूड में वसा, शर्करा तथा सोडियम की मात्रा अधिक होती है। जिसकी वजह से हृदय रोग, हड्डियों की कमजोरी तथा कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। माँस जनित आहार को सुरक्षित रखने के लिए प्रयुक्त सोडियम नाइट्रेट से भी कैंसर की सम्भावना बनी रहती है।

डबलरोटी को भी स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य कर नहीं माना जाता। इसमें पाँलिपेकसी एथलीन मोनोस्टीअरेट, प्रोपियोनिक एसिड, नाइट्रेट क्लोराइड, पोटेशियम ब्रोमेट, अमोनियम सल्फेट, क्लोरीन डाइआँक्साइड आदि होता है। इसी तरह नूडल्स (सेवइयाँ) को अधिक समय तक खाने योग्य बनाये रखने के लिये सोडियम ग्लूटामेट रसायन का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी खासियत यह है कि यह स्वादहीन स्वाद ग्रन्थियों को भ्रमित कर स्वाद का अहसास दिलाता है। सोडियम ग्लूटामेट सफेद रंग का होता है और पानी में घुलनशील होता है। सन् 1969 में अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के डॉ. जे. ओलेन ने अपने कुछ प्रयोगों में इस रसायन का इंजेक्शन बनाया और शिशु नहीं चूहों को दिया। इससे चूहों की मस्तिष्क कोशिकाएँ नष्ट हो गईं और कैंसर जैसी अप्रिय स्थिति पैदा हो गयी। इस रसायन ने गिनीपिग बन्दरों और हैमरस्टरों पर भी इसी तरह के परिणाम प्रस्तुत किये। मोनो सोडियम गलूटामेट मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस को प्रभावित करता है। सैक्रीन, साइक्लोमेट और ऐसेसल्फम भी भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं, जबकि इनमें भी कैंसर की आशंका बनी रहती है।

कोल्डड्रिंक्स युवकों-युवतियों के आधुनिक होने की पहचान बन गया है। अपने को अभिजात्य कहने वाले लोग भी इसे बड़े चाव से इस्तेमाल करते हैं। इस कार्बोनेटेड पेय का रासायनिक विश्लेषण करने पर बड़े ही भयावह नतीजे सामने आये हैं। पेय को लज्जतदार और सुगंधित बनाने के लिए प्रयुक्त फ्लेवरिंग एजेण्ट अघुलनशील होता है। इसको घुलनशील बनाने के लिए प्रयोग में आने वाले डिस्परिंग एजेण्ट को ब्रोमिनेटेड बेजीटेबल ऑयल कहते हैं। यह पदार्थ मानव कोशिकाओं को नष्ट कर कैंसर को जन्म देता है। इसी कारण आज भारत सहित 129 देशों में इस रसायन का उपयोग पूर्णतया वर्जित कर दिया गया है। हालाँकि अभी तक इसके विकल्प को स्पष्ट नहीं किया गया है। जिससे इस पेय के प्रति आशंका और भी बढ़ जाती है। विशेषज्ञों ने कोल्डड्रिंक्स को हृदयरोग, ट्यूमर, पेट के रोगों तथा अन्य कई रोगों के लिए भी जिम्मेदार माना है।

पश्चिमी तकनीक पर आधारित आइसक्रीम में दूध और क्रीम की जगह तेल और जन का मिश्रण होता है। दूध का एक अंश मात्र होता है। इसको चिकना बनाने के लिए स्टेबलाइजर मिला दिये जाते हैं। साथ ही इसमें अन्य अनेकों रसायनों की भरमार होती है। उदाहरण के लिये, ऑक्सीकरण निवारक, परिरक्षक तत्व, सोडियम, न्यूट्रेलाइजर्स, बफर्स के अलावा सोडियम कार्बोक्सीमेथिल, सेल्यूलोज का आम प्रयोग किया जाता है। आइसक्रीम में कोका के स्थान पर एमिल फेनोल एसीटेट, बेनीलिन और प्रोपीलीन ग्लाइकोल का प्रयोग होने लगा है, जो काफी खतरनाक है।

खाद्य पदार्थों को आकर्षक बनाने के प्रयास में विभिन्न रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें से पीले रंग के लिए मेटोनिल रसायन का प्रयोग किया जाता है, जिससे मुँह में छाले होना, पाचन-क्रिया में गड़बड़ी, गले में दर्द, शरीर पर काले धब्बे, दमा जैसी बीमारी की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। टॉफी, चाकलेट, तरह-तरह के रंगीन लड्डू आदि के अलावा मक्खन को आकर्षक बनाने हेतु पीले रंग का प्रयोग होता है। जिसके प्रभाव से लीवर सिरोसिस होने की भारी सम्भावना पैदा हो जाती है। इसी तरह दूध में मोटी मलाई के लिये ब्लाटिंग पेपर का इस्तेमाल किया जाने लगा है।

पेय पदार्थों में नारंगी रंग के विशेष प्रभाव हेतु रोडामेन औरेंज नामक रसायन का उपयोग होता है। ब्लू वी.आर.एस. नीले रंग के लिये एवं पलाओहिट हरे रंग हेतु प्रयोग में लाया जाता है। ये रसायन यकृत, गुर्दे, दिमाग और तिल्ली से सम्बन्धित रोगों को आमंत्रण देते हैं। वैज्ञानिकों ने इसके प्रयोग के खिलाफ गंभीर चेतावनी दे रखी है। सन् 1954 में इसके लिये कानून भी बना, परन्तु अब तक इसकी धज्जियाँ ही उड़ती रही हैं। हैदराबाद के सेण्ट्रल प्लाण्ट प्रोटेक्शन ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट और मैसूर के फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्ययन- अनुसंधान से पता चलता है कि विभिन्न हानिकारक रसायनों की मात्रा भारतीय भोजन में इतनी बढ़ गयी है, जो मानव की सहन शीलता से परे है।

तुरन्त भोजन और बेमौसम स्वाद की चाह ने डिब्बाबन्द भोजन की संस्कृति पनपा दी है। महानगरों से लेकर कस्बों तक भारी मात्रा में इसका प्रचलन चल पड़ा है। अपने देश में इस तरह के भोजन का कुल कारोबार 130 करोड़ रुपये हैं। जिसमें फास्टफूड, नूडल्स, साँस, पीजा, बर्गर और डिब्बाबन्द तैयार भोजन शामिल है। इडली, बड़ा, साँभर, रसगुल्ला, सूप आदि का डिब्बाबन्द मिक्स पाउडर 20 करोड़ से ऊपर का कारोबार करता है। डिब्बाबन्द सब्जियों, फलों, सूप वगैरह का व्यापार भी 20 करोड़ होने का अनुमान है। यही नहीं अकेले अपने देश में 775 करोड़ रुपये सालाना से ज्यादा कारोबार बोतल बन्द या डिब्बा बन्द शीतल पेयों और फलों के रस का है। इसमें इमली का रस मटर, प्याज, आलू, टमाटर और अदरक का गाढ़ा शोरबा के तीन करोड़ से ऊपर होने का आकलन है। डिब्बाबन्द गुलाब जामुन, रसगुल्ला और पेड़ों का सालाना व्यापार 30 करोड़ के आस-पास है फलों के रस का कारोबार 120 करोड़ रुपये हैं। करोड़ों रुपये के इस व्यापार में सन् 1991 से 14 फीसदी प्रतिवर्ष की असाधारण वृद्धि हो रही है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में विदेशी कम्पनियों ने इसमें भारी-भरकम इजाफा किया है।

इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुहार्तो ने पिछले दिनों जकार्ता में आयोजित तीन दिवसीय परम्परागत खान-पान सुधार कार्यक्रम में फास्टफूड की हानियों को बताते हुए कहा कि चटपटे, स्वादिष्ट विदेशी फास्टफूड की जगह परम्परागत व्यंजनों को प्रश्रय देना चाहिये। चिकित्सा-विशेषज्ञों एवं विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि अमेरिका भी फास्टफूड कल्चर का विरोध करने लगा है। ऐसे में इसे अपनाना कतई विवेकसम्मत नहीं है।

कहा जाता है कि जैसा खाए-अन्न वैसा बने मन। सन् 1970 में ब्रिटेन के मनोवैज्ञानिक डॉ. इयान मैंजीज ने अपने अध्ययन में पाया है कि संस्कारित खाद्य के बदले फास्टफूड लेने वाले बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति व आक्रामकता बढ़ जाती है। कैलीफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक स्टीफन शोवेंट ह्वेलर ने भी इस तथ्य को स्वीकारा है कि फास्टफूड लेने वालों में मानसिक विकृतियाँ बढ़ती हैं। वे शाकाहारी व सन्तुलित भोजन को सर्वाधिक उपयुक्त मानते हैं। वर्ष 1993 के जर्नल ऑफ क्रिमिनल जस्टिस एजुकेशन में फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के अपराध वैज्ञानिक सीरे जैफ्फरी ने स्पष्ट किया है कि मस्तिष्क में सिरोटोनिन का स्तर घट जाने से आक्रामक प्रवृत्ति बढ़ जाती हैं के अनुसंधान में यह पाया गया है कि फास्टफूड के प्रयोग से मस्तिष्क में सिरोटोनिन का स्तर कम हो जाता है।

विभिन्न वैज्ञानिक-विश्लेषण एवं अनुसंधान फास्टफूड की कमियों और खामियों को गिनाते हुए ‘धीमे किन्तु स्वादिष्ट जहर’ की संज्ञा देते हैं। इसमें समाये अगणित रसायन भाँति-भाँति के शारीरिक एवं मानसिक रोगों को जन्म देते हैं। समझदारी एवं विवेक का तकाजा इसका इस्तेमाल बन्द करने में ही है। शाकाहारी व सन्तुलित भोजन में वे सभी आवश्यक पोषण-तत्व होते हैं, जो स्वास्थ्य एवं सौंदर्य को बढ़ाते हैं। परिष्कृत एवं पवित्र भोजन से मन एवं भावनायें भी शुद्ध सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिये।


साँस्कृतिक क्रान्ति, जो सुनिश्चित रूप से होकर रहेगी

टेलीविजन के बीसियों चैनल पर जब सैकड़ों धारावाहिकों की भरमार है, तब ऐसे में एक नये धारावाहिक व फिर उसकी शृंखला के निर्माण में मिशन को क्यों प्रवृत्त होना पड़ा? परिजनों की यह जिज्ञासा स्वाभाविक है, इसके जवाब में यही कहना उचित है कि यह अनौचित्य के विरुद्ध महाक्रान्ति का शंखनाद है, समग्र नैतिक क्रान्ति की रणभेरी है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह कला में जीवन मूल्यों की प्राण प्रतिष्ठा के महोत्सव का शुभारम्भ है। यह सर्वविदित है कि पढ़ी बातों से सुनी गयी बातें ज्यादा असर करती हैं। सुने गये तथ्यों से देखे गये दृश्य हमेशा ज्यादा प्रभावशाली होते हैं। ये केवल विचारों एवं बुद्धि के दायरे में हलचल पैदा करने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि भावनाओं को भी उद्वेलित-आन्दोलित करते हैं। यही कारण है कि इनके प्रभाव की सीमा रेखा विचारशीलों, बुद्धिमानों तक सिमटी-सिकुड़ी नहीं है। अपढ़-गँवार यहाँ तक कि अबोध बच्चे तक इनसे प्रेरित-प्रभावित होते रहते हैं। दृश्य-श्रव्य माध्यम यानि कि चलचित्र और धारावाहिकों के बारे में यही तथ्य लागू होता है।

युगद्रष्टा परमपूज्य गुरुदेव इस सत्य की स्वीकारोक्ति करते हुए जुलाई, 1970 की अखण्ड-ज्योति में लिखते हैं- सिनेमा इस युग में एक नये जादू की तरह आया है। उसने कोमल भावना वाले उदीयमान नवयुवक-नवयुवतियों को अपने सम्मोहन पाश में कस कर जकड़ा है। यह सस्ता मनोरंजन जन-साधारण को अच्छा लगा है और एक प्रकार से सर्वत्र उसका स्वागत हुआ है। सबकी आत्मा धीरे-धीरे सिनेमा में समाती चली जा रही है। विज्ञान का यह जादू जनमानस एवं लोकभावनाओं पर सीधा प्रभाव डाल रहा है। उसकी गहरी छाप पड़ रही है।

कला की चर्चा करनी हो, तो अब सिनेमा को प्रमुख स्थान देना पड़ेगा। यह सिनेमा यदि आदर्शवादिता, उत्कृष्टता, समाज-निर्माण जीवन की समस्याओं के हल एवं विश्वशान्ति की ओर उन्मुख रहा होता, तो स्वस्थ मनोरंजन के साथ लोकमंगल की आशाजनक सम्भावनायें प्रस्तुत कर सकता था, पर ‘मरे को मारे शाह मदार’ वाला दुर्भाग्य यहाँ भी आ विराजा। हजार वर्षों की पराधीन, पिछड़ी, पथभ्रष्ट कौम को स्वस्थ मार्गदर्शन देने की अपेक्षा सिनेमा उल्टी दिशा में ही घसीटने लग पड़ा। फिल्मों के कथानक, अभिनय, गायन, नृत्य आदि में प्रेरक प्रसंग यदा-कदा ही दिखाई देते हैं। अधिकतर कामुक, अश्लील, उग्रता, उच्छृंखलता एवं पशु प्रवृत्ति को भड़काने वाले प्रसंग ही अधिक मिलते हैं। सिनेमा- संगीत ही वस्तुतः आत का युग-गायन है। कला जैसी मानव अन्तःकरण की अभिव्यंजना करने वाला वृत्ति जब इस प्रकार अधःपतित होती चली जायेगी, तो मानवीय आदर्शों का प्रवाह भी पतनोन्मुख होने से क्यों रुकेगा? आज की स्थिति यही है।

सिनेमा का इतिहास तकरीबन सौ साल पुराना है उसमें भी भारतीय सिनेमा ने स्वतंत्रता के कुछ ही पूर्व अपनी ठीक-ठीक शुरुआत की थी। यदि अपने देश के सिनेमा इतिहास के प्रत्येक दशक का विश्लेषण-मूल्याँकन करें, तो यही पायेंगे कि इसमें उत्तरोत्तर गिरावट आयी है।

अभी कुछ ही समय पूर्व वर्तमान दशक के पिछले वर्षों में प्रदर्शित फिल्मों, धारावाहिकों का विश्लेषण कर विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि इनसे समाज को क्या मिलता है? उनके अनुसार बड़े अमीर लोगों को फैशन और आधुनिकतम स्टाइल मिलती है। सुपरहिट फिल्मों में नायक खुली सड़क पर मारधाड़ मचाता है। पुलिस भी तमाशा देखती रहती है। वह दस-बीस को घायल कर एम्बुलेंस में ठूँस कर अस्पताल भेज देता है और निडर होकर चला जाता है। न पुलिस हस्तक्षेप करती है और न समाज का कोई व्यक्ति। फिर यदि किशोर जनसामान्य जीवन में यही कहानी फिल्म की जुबानी दुहराते हैं, तो देखी हुई को ही तो करते हैं। तब जाकर पुलिस और आम जनता को ज्ञात होता है कि फिल्म का असर कहाँ कितना हुआ। भारत में जहाँ आर्थिक विषमता चरम सीमा पर है, वहाँ फिल्मों में प्रदर्शित हिंसा उत्प्रेरक का काम करती है और आर्थिक विषमताओं के भार से दबा हुआ व्यक्ति ये सब कुकृत्य करने पर उतारू हो जाता है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार समाज के ऊपर इनके प्रभाव के निम्नलिखित तथ्य प्रकाश में आये हैं- (1) डकैती करने का ज्ञान, (2) घर में छिपी हुई तिजोरियों का पता लगाने की युक्ति, (3) घर में प्रवेश करने के लिए मास्टर कुँजी का प्रयोग, (4) डायल टटोलकर तिजोरी खोलने की युक्ति, (5) खिड़की को बिना किसी शोर के तोड़ डालने की युक्ति, (6) चुम्बन- आलिंगन और बलात्कार का ज्ञान, (7) मार-पीट के चमत्कारी तरीके, (8) सिगरेट, शराब और नशीली दवाओं का सेवन, (9) आत्म हत्या की प्रेरणा, (10) अभिभावकों से लड़कर घर छोड़कर भाग जाने की प्रेरणा, (11) भद्दे उत्तेजक और अधनंगे पहनावे का प्रयोग, (12) क्लब, डिस्कोथेक आदि में जाने का शौक और वहाँ कैबरे आदि गन्दे नृत्य का प्रयोग, (13) हेरोइन, कोकीन जैसे खतरनाक नशे एवं हथियार आदि के स्मगलिंग करने के नये-नये तरीके, (14) बम, विदेशी सामान आदि को छुपाने का ज्ञान। इस तरह के और भी सैकड़ों उदाहरण हैं, जिससे यह साबित होता है कि फिल्मों का कितना बुरा प्रभाव समाज पर पड़ रहा है। स्थिति तब और विकट हो जाती है, जब यह सर्वमान्य सत्य हो कि अपने देश में समाचार पत्रों तथा अश्लील पुस्तकों से फिल्मों का प्रभाव कहीं सैकड़ों गुना अधिक है।

बात सिनेमा घरों तक ही बनी रहती तो भी सहनीय थी, क्योंकि इसके अच्छे-बुरे असर किशोर-किशोरियों युवक-युवतियों एवं वयस्कों तक ही सीमित थे, पर अब केबल टेलीविजन का प्रचलन एवं वीडियो क्रान्ति होने से अब इसके प्रभाव के दायरे में घर-आँगन में खेलने वाले अबोध बच्चे भी आ गये हैं। अब इन्हें भी टेलीविजन के विभिन्न चैनलों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की तर्ज पर नाचते - मटकते देखा जा सकता है। बच्चे तो अनुकरणशील होते हैं, वे तो सहज भाव में बिना कुछ जाने-समझे नकल करने में संलग्न हो जाते हैं। उनकी यह अबोध आया संस्कारों के बीजारोपण की है। संयोग से या फिर परिस्थितिवश उन्हें जो संस्कार मिल रहे हैं, उसे देखते हुए यह आशा कैसे की जा सकती है कि वे भविष्य में शिवाजी एवं राणाप्रताप की तरह चरित्रवान एवं तेजस्वी राष्ट्रनायक बनेंगे।

यहाँ न तो लोकरंजन को अनुपयोगी ठहराया जा रहा है और न ही सिनेमा जैसे सशक्त तन्त्र को निरर्थक ठहराया जा रहा है, वरन् उन तथ्यों पर प्रकाश डाला जा रहा है, जिनके कारण अपने देश में मनोरंजन का यह माध्यम अपनी उपयोगिता-उपादेयता नहीं सिद्ध कर पा रहा है। कहा जा चुका है कि जनमानस में भली-बुरी प्रेरणाएँ भरने का यह सबसे सशक्त मनोवैज्ञानिक माध्यम है। जिसका सदुपयोग कितने ही देशों ने नवनिर्माण के लिये किया है तथा कितने ही कर रहे हैं। विकृतियों की चर्चा इसलिये की जा रही है, क्योंकि सिनेमा जैसा तंत्र अपने देश में जन कुत्सा भड़काने में संलग्न होकर पतनोन्मुखी गतिविधियों को ही बढ़ावा दे रहा है। दोष तन्त्र का नहीं, वरन् उस पर आधिपत्य रखने वाले उन समर्थ सम्पन्न व्यक्तियों का है, जो धन की संकीर्ण स्वार्थपरता से अभिप्रेरित होकर कला के देवता को कीचड़ में धकेलने को तत्पर हैं। समाज और देश की जिन्हें थोड़ी भी चिन्ता नहीं है। पैसा ही उनका इष्ट है, जिसके लिये वे सामाजिक हितों की बलि देने में थोड़ा भी नहीं हिचकते।

अपेक्षा इनसे कुछ विशेष नहीं की जा सकती। अपवादों की बात अलग है, पर मात्र उनसे बात नहीं बनती, बहुतायत तो सिनेमा तंत्र पर आधिपत्य रखने वाले ऐसे व्यक्तियों की है, जो संकीर्ण स्वार्थपरता सके दलदल से निकलने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में प्रयास अपने ही स्तर पर करना होगा। हालाँकि एक तरीका यह भी हो सकता है कि सिनेमा उद्योग के समानान्तर एक नया ऐसा सिनेमा-तंत्र खड़ा कर दिया जाये, जिसका एकमात्र लक्ष्य हो- नवसृजन की, समाज एवं देश के सर्वांगीण विकास की प्रेरणाएँ उभारना। इसके लिये धनशक्ति और प्रबुद्ध जनशक्ति की आवश्यकता है। थोड़े से भावनाशील ऐसे निकाल आयें, जो इस कार्य के लिए पूँजी लगाने के लिए तैयार हो जायें और थोड़े प्रतिभावान ऐसे मिल जायें जो अपनी विभिन्न प्रकार की क्षमताओं को इसमें नियोजित कर सकें, तो व्यापक अभियान छेड़ा जा सकता है।

सिनेमा तंत्र को मात्र लगातार कोसते रहने से समाधान नहीं निकलेगा कुछ ठोस कदम उठाने ही पड़ेंगे। गाँधी जी का खादी ग्रामोद्योग आन्दोलन विदेशी सामानों के विरोध में उभर कर सामने आया और जन-जन में लोकप्रिय हुआ। उत्कृष्टता हर किसी को लोकप्रिय है, पर ऐसी प्रेरणा देने के लिये सशक्त आधार चाहिये। मनोरंजन मनुष्य की एक आवश्यक माँग है। जनमानस की इस माँग की आपूर्ति प्रचलित सिनेमा तंत्र भली-बुरी प्रेरणाओं के साथ कर रहा है। उत्कृष्ट फिल्मों-श्रेष्ठ धारावाहिकों का निर्माण होने लगे, तो कोई कारण नहीं कि नवनिर्माण का महान प्रयोजन पूरा होता न रह सके। बुराई को देखकर बुराई पनपती और अच्छाई से सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है। अच्छी फिल्मों एवं उत्कृष्ट धारावाहिकों के निर्माण के लिए तंत्र खड़ा होते ही पुराने सिनेमा निर्माताओं को अपना ढर्रा बदलने के लिए विवश होना पड़ेगा।

नवम्बर, 1974 की अखण्ड- ज्योति के पृष्ठों में परमपूज्य गुरुदेव ने इस सम्बन्ध में एक योजना प्रकाशित की थी। उन्हीं के शब्दों में तीसरी योजना फिल्म निर्माण की है। यह एक तथ्य है कि भारत के समस्त समाचार और विचार पत्रों के जितने पाठक हैं, उससे कहीं अधिक लोग हर दिन सिनेमा देखते हैं। रेडियो-प्रसारण सुनने वालों की संख्या भी इन सिनेमा दर्शकों के सामने फीकी पड़ती है। प्रचार का सबसे प्रमुख और सबसे व्यापक साधन इन दिनों फिल्म मंच ही बना हुआ है। इस मंच से जो सिखाया गया है, सिखाया जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। ऐसी दशा में यही उचित समझा गया कि फिल्म-निर्माण का एक समानान्तर मंच तैयार किया जाये जो अनुपयुक्त के मुकाबले उपयुक्त को रखकर जनता को यह निर्णय करने का अवसर दे कि उसे क्या अपनाना और क्या छोड़ना है?

योजना यह है कि भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप को इस रूप में प्रस्तुत किया जाये कि वह आज की समस्याओं का समाधान करने में समर्थ हो सके और विश्व संस्कृति के रूप में, मानव संस्कृति के रूप में मान्यता प्राप्त कर सके। इसके लिए अपने गौरवास्पद, साँस्कृतिक इतिहास को कलात्मक, किन्तु प्रेरक आदर्शवादी परम्पराओं के साथ प्रस्तुत करना पड़ेगा। इस प्रयोजन की पूर्ति करने वाले कथानकों से हमारा पुराण-साहित्य विशालकाय समुद्र की तरह बिखरा पड़ा है। उसमें से मनचाहे मोती कितनी ही बड़ी संख्या में बीने जा सकते हैं आर उन आधारों को लेकर व्यक्ति और समाज को बदल देने वाले भटकाव और दिशा निर्देश देने वाले अगणित ऐसे कथानक निकल सकते हैं, जिनके आधार पर फिल्म बनायी जाती रहे और लोकरंजन के साथ लोकमंगल का प्रयोजन बहुत सरलता से और सफलता से सम्पन्न किया जाता रहे।

यों पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों पर कितनी ही फिल्में बनीं और चली हैं। धार्मिक, तीर्थयात्रा परक कितनी ही फिल्में सामने आयी हैं, पर उनमें निरुद्देश्य कथा-प्रसंग ही भरे पड़े हैं। दिशा और प्रेरणा मिलने की अपेक्षा उनसे चमत्कारवाद से अन्धविश्वास जैसी प्रतिगामी मान्यताएँ ही दर्शकों के मन पर जमती हैं। ऐसा कुछ भी उनमें नहीं होता जिससे दर्शक की अन्तरात्मा आदर्शवादी चेतना अपनाने के लिए हुलसे-उमगे अपने प्रयास इस क्षेत्र में सर्वथा अभिनव एवं अद्भुत ही होगे, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। चिर-प्राचीन को चिर-नवीन के साथ जिस प्रकार हर क्षेत्र में संयुक्त किया गया है, वहीं समन्वय इस फिल्म निर्माण प्रक्रिया में भी होगा। इसके द्वारा क्रान्तिकारी परिणाम उत्पन्न होने की आशा की जा सकती है।

आश्चर्य की ही बात है कि इस प्रयोजन के लिये पूँजी के नाम पर एक पैसा भी हाथ में न होने पर भी यह विश्वास किया जा रहा है कि निकट भविष्य में यह मात्र कल्पना न रहेगी, वरन् कोई न कोई ऐसा आधार बन जायेगा, जिससे फिल्म निर्माण जैसी महँगी योजना को भी कार्यान्वित किया जा सके। हम सदा से असम्भव समझे जाने वाले कार्य हाथ में लेते रहे हैं और साधन-विहीन स्थिति में भी दुस्साहसपूर्ण कदम उठाते रहे हैं। असफलता का मुख कदाचित ही कभी देखना पड़ा है। युग की पुकार यदि जनमानस को अवांछनीयता की दिशा में घसीट ले जाने के लिये है, तो उसे भी इसलिये अपूर्ण न रहने दिया जायेगा कि अपने हाथ खाली हैं और साधनों का सर्वथा अभाव है। आकांक्षा की प्रबलता यदि सदुद्देश्य की दिशा में चल रही हो, तो उसकी पूर्ति के लिए दैवी साधन जुटते रहे हैं, जुटते रहेंगे।

कुछ फिल्मों के कथानकों की बात इन दिनों मस्तिष्क में चल रही है- जैसे-

(1) भगवान के दस अवतारों की संयुक्त कथा। इस आधार पर आज की स्थिति में ईश्वरीय मार्गदर्शन का पुनः स्मरण कराया जाना और यह बताया जाना कि आज की स्थिति में वे प्रेरणाएँ किस प्रकार हमारा क्या मार्गदर्शन करती है।

(2) सप्तऋषियों द्वारा अपनाई गयी सात अतिमहत्त्वपूर्ण लोक-निर्माण की प्रवृत्तियों का संचालन। आज की स्थिति में उन प्रवृत्तियों को अपनाकर युग की आवश्यकता पूरी करने की प्रेरणा। आज के साधु-ब्राह्मणों के लिए तथा लोकसेवियों के लिये लोकोपयोगी अभियानों के संचालन का सही मार्गदर्शन।

(3) ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दुर्गा, गणेश आदि के रूप में भगवान का लोकमंगल की अनेक प्रवृत्तियों का प्रस्तुतीकरण । अनीति को निरस्त करने और नीति -धर्म को प्रोत्साहित करने वाले परोक्ष दैवी सहायताओं का सूत्र-संचालन इसी आधार पर प्रस्तुत अनेक दैवी-चरित्रों का समन्वयकरण।

(4) भारत के प्रमुख तीर्थ स्थानों के निर्माण आरम्भ की वे आदर्शवादी कथाएँ, जिनकी स्मृति में इन तीर्थ स्थानों की आधारशिला रखी गयी। प्राचीनकाल में तीर्थ स्थानों में महामनीषियों द्वारा संचालित लोकशिक्षण का स्वरूप। तीर्थ यात्रियों की पदयात्रा से राष्ट्रीय एकता एवं धर्मचेतना का अभिवर्द्धन।

(5) पुराणकाल के महापुरुषों के आदर्श चरित्रों और उनके द्वारा जनकल्याण के लिए किये गये कार्यों का चित्रण। हरिश्चन्द्र, दधीचि, प्रह्लाद, कर्ण, जनक, चरक, सुश्रुत आदि अगणित महामानवों के चिन्तन एवं कर्तृत्व का ऐसा निर्माण, जो आज की स्थिति में हमें कुछ करने की प्रेरणा दे सके। इन महापुरुषों की अलग-अलग फिल्म न बनाकर उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं को एक ही धारावाहिक में आबद्ध किया जाये, ताकि कार्यक्रमों की भिन्नता रहते हुए भी महामानवों का लक्ष्य एक ही रहने की बात समझ में आये।

(6) रामायण का-रामावतार का इस प्रकार का चित्रण, जिसमें प्रत्येक पात्र को आदर्शवादी परम्पराओं के विविध पक्षों का निर्वाह करते हुए दिखाया जाये। रामायण को भक्ति ध्यान तक सीमित न रखकर उसे जनकल्याण का हर क्षेत्र प्रभावित करने वाले प्रबल प्रयास के रूप में प्रस्तुतीकरण।

(7) कृष्णावतार एवं महाभारत का अमर इतिहास आज बताये जा रहे स्वरूप की तरह तत्कालीन घटनाओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाये कि उसमें बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अवांछनीयताओं का उन्मूलन करने के लिये सर्वतोमुखी संघर्ष स्पष्ट हो सके। जो इस समय के लिए ही नहीं, सदा-सर्वदा के लिए मार्गदर्शक कहा जा सके।

(8) सन्तचरित्र, तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, रामकृष्ण, विवेकानन्द आदि। उन्होंने अपने समय की समस्याओं को हल करने में किस प्रकार नेतृत्व किया, इसका अविज्ञात किन्तु वास्तविक चित्रण। एक धारावाहिक में इन सभी सन्तों को वीडियो के रूप में प्रस्तुत किया जाना।

(9) भारत के ऐतिहासिक महापुरुषों और उनके क्रियाकलापों का दिग्दर्शन । चाणक्य, चन्द्रगुप्त, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे आदि के प्रेरणाप्रद इतिहास का क्रमबद्ध चित्रण। उनके साथ जुड़ी हुई प्रेरणाओं का उभार।

(10) भारतीय नारियों और बालकों का मानवतावादी परम्पराओं के निर्वाह में अनुपम योगदान। कुन्ती, मदालसा, सावित्री, शकुन्तला, पन्ना धाय आदि की गौरव-गाथाएँ रोहिताश्व, प्रह्लाद, ध्रुव, गोरा-बाइल फतेहसिंह, जोरावर आदि बालकों के महान कृत्यों का हृदयस्पर्शी चित्रण।

परमपूज्य गुरुदेव ने जिन दिनों अपनी इस दस सूत्री रूपरेखा में धारावाहिक का मन्तव्य स्पष्ट किया था, उस समय धारावाहिकों का प्रचलन नहीं था, परन्तु भविष्य दृष्टा गुरुदेव ने उसी समय बता दिया था। मूल कथानक एक समूची सुव्यवस्थित कथा के रूप में होगा। भिन्न-भिन्न कथानक उसी सन्दर्भ में अलग-अलग कड़ियों के रूप में जुड़ते चले जायेंगे। इस प्रकार उसमें बिखरापन प्रतीत नहीं होगा, वरन्, एक ही माला में गुंथे हुए मोतियों की तरह अनेक सन्दर्भों का समावेश हो जाने में उसकी सुन्दरता- विविधता एवं संक्षेप में अनेक विषयों की जानकारी होने का एक नया प्रयोजन पूरा होगा।

युवा और वयस्क जहाँ अपनी जीवन की समस्याओं को समाधान पा सकेंगे, वहीं अबोध बच्चों में शुभ संस्कारों का बीजारोपण होगा। ‘मन्थन’ के रूप में इसी प्रयास का शुभारम्भ किया गया है। यह वस्तुतः उसी योजना का क्रियान्वयन है, जो परमपूज्य गुरुदेव ने 1974 में बनायी थी और इसी वर्ष की नवम्बर अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो में प्रकाशित की थी।

धारावाहिक ‘मन्थन’ के माध्यम से परमपूज्य गुरुदेव का वही सपना मूर्त रूप लेने जा रहा है। यूँ इसकी शुरुआत तो काफी समय पहले ही हो गयी थी, पर तकनीकी उलझनों वश इसका प्रसारण न हो सका, परन्तु अब दैवीचेतना की अनुकम्पा से प्रायः सभी उलझनें सुलझ गयी हैं और सम्भवतः आगामी वर्ष 1998 में परिजन अपने दूरदर्शन के प्रसारण में इसे देख सकेंगे। यह धारावाहिक आगामी अनेक धारावाहिकों की वह पहली कड़ी है, जिसमें अपने देश के विभिन्न महान पुरुषों, महिलाओं के प्रेरणाप्रद प्रसंगों को नवनिर्माण अभियान के मार्गदर्शक के रूप में दिखाया जायेगा। दूसरे शब्दों में, यह बुद्धकाल से लेकर भारतीय स्वतंत्रता तक का साँस्कृतिक इतिहास है। जिसमें साँस्कृतिक क्रान्ति के उन सभी तत्वों का समावेश है, जो आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने पहले कभी थे।

इसके निर्माण में अपने ही मिशन के कर्मठ परिजन भाई आगे आये हैं। इस निर्माण कार्य की योजना में मिशन के युवा कार्यकर्ता, केन्द्रीय तंत्र के मार्गदर्शन में समर्पित भाव से जुटे हैं। इस पहले पुष्प के विकसित होते ही ‘देवात्मा हिमालय’ ‘पूज्य गुरुदेव की जीवनगाथा’ जैसे कई और भी धारावाहिकों का निर्माण एवं प्रसारण सम्पन्न होना है। पहले ही धारावाहिक ‘मन्थन’ का प्रसारण होते ही हम देखेंगे कि भारतीय जनता को अपनी गरिमामयी परम्पराओं से किस प्रकार परिचित प्रशिक्षित किया जा सकता है और उनसे लोकमानस का कायाकल्प करने में कितनी महत्वपूर्ण सहायता किन सकती है। आज भले ही यह प्रयास प्रकाश की पहली किरण के रूप में वर्तमान परिस्थितियों के घोर अन्धकार को चीरते हुए शनैः-शनैः आगे बढ़े रहा हो, पर कही न कहीं से-किसी प्रकार पूज्यवर का महान संकल्प मध्याह्नकालीन प्रचण्ड सूर्य के रूप में प्रकाशित होगा, यह सुनिश्चित है।


यह कौतुक किस काम का?

कला की उपयोगिता कौतुकपूर्ण रचना गढ़ने में नहीं, इस बात पर निर्भर है कि उससे लोगों को कितनी सहायता और मार्गदर्शन मिलता है। जो निर्माण जितने अंशों में इस उद्देश्य की पूर्ति करते हैं, उन्हें उतना ही सफल माना जाता है।

ऐसा ही एक निर्माण अमेरिका के कोनी द्वीप में हुआ था। सन् 1881 से पूर्व वहाँ के लिए जो जहाज प्रस्थान करते, वे अक्सर भटक जाते थे। उनके मार्गदर्शन की वहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी। न कोई लाइट-हाउस था, न ऐसा कुछ, जिसके सहारे दूर से ही द्वीप का अनुमान लगाया जा सके। यात्रियों को इससे बड़ी असुविधा होती थी और वहाँ पहुँचने में प्रायः काफी समय लग जाता था।

टी.सी. ब्रिटनर ऐ अमरीकी इंजीनियर थे। बहुत समय से वे कुछ ऐसी संरचना वहाँ करवाना चाह रहे थे, जिससे पर्यटकों को सुविधा हो और जहाजों को दूर से ही स्थान की जानकारी मिल सके, पर उनकी समझ में कुछ आ नहीं रहा था कि ऐसा क्या हो सकता है, जो एक साथ लोगों में कौतूहल पैदा करे और उपयोगी भी हो, यात्रियों का मनोरंजन करे और जिस उद्देश्य के लिए उसे विनिर्मित किया गया है, उसमें सफल भी हो।

इसी बीच उन्हें इंग्लैण्ड जाना पड़ गया। साथ में कुछ मित्र भी थे। वहीं उनको प्रसिद्ध इमारतें, राजभवन तथा चिड़ियाघर देखने थे। महलों का अवलोकन करते हुए वे चिड़ियाघर देखने थे। महलों का अवलोकन करते हुए वे चिड़ियाघर पहुँचे। वहाँ दो दशक पूर्व भारत से एक जोड़ा हाथी भेजा गया था। इसके पूर्व इंग्लैण्ड के लो इससे अपरिचित थे। ब्रिटनर और उनके साथी हाथी को देखकर आश्चर्यचकित रह गये, अमेरिकियों ने हाथी कभी देखा नहीं था। उन्होंने समझ कोई चौपाया दैत्य है। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि दुनिया में इतना विशाल कोई जन्तु भी हो सकता था। अधिकारियों ने उनको आश्वस्त किया कि वास्तव में यह जानवर ही है, कोई दैत्य नहीं।

ब्रिटनर का मस्तिष्क सक्रिय हो उठा। वह उसे बहुत ध्यान से देखने और उसके अंग-अवयवों पर विचार करने लगे। चूँकि वह स्वयं एक आर्किटेक्ट थे, अतः उसकी विशाल और विलक्षण आकृति को देखकर उनके मन में विचार उठा कि क्यों न इसी आकार-प्रकार की इमारत बनायी जाये? उन्होंने हाथी का रेखाचित्र तैयार किया और फिर अमेरिका लौट गये।

अमेरिका जाकर उन्होंने महीनों के विचार- मन्थन के उपरान्त हाथी-शक्ल की इमारत का एक नक्शा तैयार किया। में भवन की सम्पूर्ण बारीकियाँ निहित थीं। कहाँ यात्रियों के ठहरने के कमरे होंगे, कहाँ आडिटोरियम होगा। चारों पैरों में क्या बनाया जाये? सूँड़ का किस रूप में उपयोग हो? आदि।

ब्रिटनर वहाँ एक होटल बनाना चाह रहे थे, कारण कि कोनी द्वीप में पर्यटकों के ठहरने की कोई समुचित व्यवस्था न थी। वे वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य देखने आते थे, पर जितना उन्हें आनन्द मिलता, उतना ही कष्ट भी उठाना पड़ता था। इसके अतिरिक्त कई बार वे बीमार पड़ जाते थे। उनके उपचार का भी ठीक प्रबन्ध नहीं था।

दो वर्ष में वह भव्य होटल बनकर तैयार हुआ। उसमें कई मंजिलें थीं। एक साथ वहाँ दो हजार लोग ठहर सकते थे। उसके सारे कमरे हाथी के पेट में बैठे हुए थे, जिसके मध्य में एक बड़ी नृत्यशाला थी। उससे सटा एक सभागार था। उसके चारों ओर कमरे बने हुये थे। हाथी के सिर में एक प्लेटफार्म बना हुआ था। उस प्लेटफार्म से सूँड़ के निचले सिरे तक सम्पूर्ण सूँड़ में एक फिसलपट्टी थी, जिसके सहारे स्त्रियाँ, बच्चे, बड़े फिसलकर बाहर मैदान में पड़े हुए मोटे-मोटे नर्म गद्दे पर आकर गिरते थे। हाथी के नेत्रों के स्थान पर काँच की दो गोल खिड़कियाँ थी। इसमें तीव्र प्रकाश की व्यवस्था थी। प्रकाश मीलों दूर से जहाजों को दिखाई पड़ जाता था। इसी के सहारे वे अब बिना भटके वहाँ पहुँच जाते थे। रात में जलयान इस प्रकाश के माध्यम से वहाँ पहुँचते, जबकि दिन में हाथी का विशाल कलेवर उन्हें कोनी द्वीप का जानकारी देता। सम्पूर्ण हाथी एक विशेष रंग से होता था, जिसके कारण दिन में वह बहुत तेज चमकता था। यह चमक विशाल दूरी से भी जहाज की दूरबीन की पकड़ में आ जाती थी। हाथी की पीठ पर एक हौदा बना हुआ था। इसका आकार भी असाधारण था। हौदे के चारों ओर घास का सुन्दर मैदान था। वहाँ बैठ कर यात्रीगण उस नयनाभिराम द्वीप का आनन्द उठाते और दूर-दूर तक फैली जलराशि का विहंगावलोकन करते। हाथी का सम्पूर्ण शरीर चार वृहदाकार टाँगों पर टिका था। देखने में यह पैर लगते थे, पर वास्तव में सीढ़ियाँ थीं जिसके सहारे हाथी के उदर में प्रवेश किया जाता था। उसके दाँतों और पूँछ सहित शरीर में कितने ही रोशनदान थे। दोनों कानों में दो दूरबीनें लगी थीं। पर्यटक उसके सहारे समुद्र में आते जाते जहाजों का पर्यवेक्षण करते थे। हौदे के ऊपर एक मानवाकृति बैठी हुई थी। वह वास्तव में एक शक्तिशाली दूरबीन थी। जब जल क्षेत्र का विस्तृत और व्यापक निरीक्षण करना होता, तब इसका प्रयोग किया जाता। दिन में तीन बार सुबह, दोपहर और शाम को हाथी की चिंघाड़ सुनायी पड़ती थी। यह इतनी जीवन्त थी, जैसे कोई सचमुच का हाथी चिंघाड़ रहा हो। यह वस्तुतः एक सायरन की आवाज थी। सुबह, दोपहर और शाम में इसका बजना इस बात का संकेत था कि सबेरे का नाश्ता, दोपहर का भोजन और शाम की चाय तैयार है। इसकी आवाज सुनकर वहाँ रुके लोग चाय-नाश्ते के लिए चल पड़े। इसी के लिए यह संकेतात्मक ध्वनि वहाँ अभी भी सुनी जा सकती है।

इस निर्माण की सारी विशेषताओं व उस पर हुआ अपरिमित खर्च को देखने के बाद यही समझ में आता है कि मानवीय पुरुषार्थ में बहुत कुछ कर दिखाने की क्षमता है, किन्तु प्रयोजन अथवा उद्देश्यहीन ऐसे निर्माण किस काम के, जबकि औरों के पास रोज के खाने का भोजन भी मुयस्सर भी न हो। कुछ विचित्र निर्माण करने, कुछ अलग दिखाने का यह क्रम विगत वर्षों में अनेकों रूपों में सारे विश्व में चला है एवं इन पर अरबों खरबों डालर की राशि लगी है, पर यह विश्व- मानवता के काम आयी क्या? यही चिन्तन यदि रहता, तो मानवीय मेधा के विलक्षणता के बावजूद आज दो वर्गों में इतनी बड़ी खाईं नहीं दिखती। निर्माण तो हो, पर कौतुक के लिए नहीं, सर्वजनहितार्थ सृजन के लिये ही।


केन्द्र के समाचार-महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ, विश्वव्यापी हलचलें

विगत डेढ़-दो माह में मिशन की विश्वव्यापी हलचलों ने जो मोड़ लिया है, जिस त्वरित गति से सारी नवीनतम उपलब्धियाँ हस्तगत होती चली जा रही हैं, उससे यही आभास होता है कि गुरुसत्ता अपने दिव्य अनुदानों को अनवरत बरसा रही है। संधिकाल की घड़ी निकट आ पहुँची है, परिवर्तन सुनिश्चित है, बस हम सभी को थोड़ा धैर्य बनाये रख सक्रियता का अनुपात बढ़ाते चलना है। शेष कार्य स्वतः होता चला जायेगा। इस पृष्ठ पर जिन सूचनाओं को दिया जा रहा है, वह प्रायः सभी प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ में पढ़ते रहे हैं। कार्यकर्ताओं को वह मुखपत्र चूँकि सब तक नहीं पहुँच पाता, इन पंक्तियों द्वारा सभी अखण्ड-ज्योति परिजनों को महाकाल के बढ़ते चरण तीव्रतर होते जा रहे इस अभियान की झलक भर दी जा रही हैं।

संस्कार महोत्सवों की भारत भर में धूम-

इस वर्ष एक निराली छटा के साथ आरम्भ हुए विराट संस्कार महोत्सवों ने नये-नये कीर्तिमान हर जगह स्थापित किये हैं। एक साथ चौदह सदस्यीय चार टोलियों के द्वारा आरम्भ हुए इस अभियान की उपलब्धियाँ इतनी असाधारण हैं कि उनकी परिणति परिजन आज से तीन वर्ष के अन्दर महापूर्णाहुति के माध्यम से ही देख व समझ सकेंगे। एक अक्टूबर, 1997 से आरम्भ ये महोत्सव अब पूरे 1998 में एवं 1999 के पूर्वार्द्ध तक तय हो चुके हैं। भारत के पूर्वी छोर पर सिक्किम-आसाम-बंगभूमि व अरुणाचल प्रान्त से लेकर पश्चिम में बाडमेर, जामनगर, भुजकच्छ तथा उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में मदुराई, बंगलौर आदि क्षेत्रों में ये सम्पन्न हो रहे हैं। नेपाल के विगत वर्ष हुए जनकपुरधाम के साथ नेपालगंज-नवलपरासी में ये सम्पन्न हो चुके। इसी दिसम्बर में पीरगंज में भी कार्यक्रम हो चुकेगा। यह उमड़ा हुआ उत्साह जिसमें एक साथ अनेक स्थानों पर संस्कार सम्पन्न हो रहे हैं व अगले दिनों होने जा रहे हैं, उज्ज्वल भविष्य की एक झलक सबको दिखा रहे हैं। भूमि के संस्कार भी इनके साथ जाग रहे हैं। देवशक्तियों का संगतिकरण प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मिशन की उपलब्धियों को मान्यता-

हिन्दुत्व एक जीवन-शैली का नाम है जो सबसे पुरातन है। यह जीवन में कुछ शाश्वत तत्त्वों का समावेश करती है जो हमें न केवल सृष्टि के अविरल चल रहे प्रवाह के साथ जोड़ते हैं, हमें आत्मा की अमरता के साथ आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग भी बताते हैं। इसी विराट हिन्दू धर्म रूपी महासागर में अनेकों पंथ-संप्रदाय आये व समाते चले गये। ऐसा विराट-उदार सामाजिक प्रवृत्ति वाला प्राचीनतम धर्म मात्र हिन्दू धर्म ही है, जो वैदिक काल से चला आया है व अनेकानेक प्रहारों के बावजूद अपना अस्तित्व बनाये हुए है। पिछले दिनों विश्वभर में अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा संस्कारों की विस्तार प्रक्रिया से लेकर पारिवारिक जीवन में आस्तिकता तथा बच्चों में आध्यात्मिक रुझान व देवसंस्कृति के प्रति लगाव बढ़ाने के निमित्त की गयी सेवाओं को अमेरिका की संस्थाओं द्वारा मान्यता दी गयी। नवम्बर 97 की पहली तारीख को ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका’ की कैलीफोर्निया प्रान्त की नगरी लॉस एंजेल्स में प्रायः चालीस हजार से अधिक प्रवासी परिजनों व अमेरिकी नागरिकों की उपस्थिति में सम्पन्न दशहरा- दीपावली मेले में शान्तिकुञ्ज के प्रतिनिधि को ‘हिन्दू ऑफ दि ईयर 97’ पुरस्कार द्वारा सम्मानित किया गया। इसमें एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि के साथ क्रिस्टल का एक मनोहारी प्लेक भी है तथा पूरे अमेरिका में कार्य कर रहे हमारे प्रवासी भाइयों का प्यार सम्मान भी मिला हुआ है, जिसका कोई मूल्याँकन नहीं किया जा सकता। यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में मिशन व इसके संस्थापक पूज्यवर को मिलने वाले अनेक गुना बड़े सम्मानों, उपलब्धियों की दिशा में एक मील का पत्थर तो है ही, संगठन की मात्र विगत सात वर्ष की अवधि में विश्वविस्तार की दिशा में किये गये प्रयासों को दी गयी एक मान्यता भी है। यह सम्मान हर उस स्वयंसेवी कार्यकर्ता का है, जिसने न्यूनाधिक रूप से जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया है।

अमेरिकी चिकित्सकों के बीच व्याख्यान

7 नवम्बर 97 को हर्बल हीलिंग संजीवनी विद्या एवं ध्यान पर प्राय’ 6 घण्टे तक व्याख्यान चला। इससे एक नया प्रवेश-द्वार खुला है। न्यूजर्सी के ‘क्राइस्ट अस्पताल’ में हुई इस वर्कशाप में प्रायः डेढ़ हजार अमेरिकन मूल के नागरिकों, चिकित्सकों ने अपनी भागीदारी को इच्छा व्यक्त की थी, किन्तु स्थान का सीमाबन्धन मात्र डेढ़ सौ के लिये ही था अतः आयोजकों को कड़ाई से एक प्रश्नावली द्वारा छँटाई कर प्रवेशपत्र दिये गये। निःशुल्क आयोजित इस वर्कशाप की प्रणेता अस्पताल की प्रमुख एवं डाँटा ब्लास्टर कैम्पेन में भारत की अगुआ रहीं डॉ. ललिता मेसन, जो पैंतीस वर्षों से वहाँ ख्याति प्राप्त चिकित्सक भी थीं। उनके द्वारा आयोजित इस वर्कशाप को अखण्ड-ज्योति पत्रिका के संपादक ने तीन खण्डों में- (1) मेडीटेशन टूवड्स रिवर्लस ऑफ स्ट्रेस, (2) आर्ट ऑफ लिविंग तथा (3) हर्बल हीलिंग। बिना किसी विराम के धाराप्रवाह अंग्रेजी में लगातार छह घंटे तक मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर ग्राफिक्स व कलर ट्राँसपेरेंसी तथा प्रज्ञायोग-ध्यान-प्राणायाम-आसन आदि के प्रत्यक्ष डिमाँस्ट्रेशन द्वारा प्रस्तुति दी। तनाव के बारे में अधिकाधिक जानने को उत्सुक यह युवा प्रौढ़ दोनों ही वर्गों का सम्मिश्रित चिकित्सक समुदाय पूज्यवर की विचारधारा से अनुप्राणित हो हतप्रभ सुनता रहा। बीच में सबको प्रज्ञापेय जब दिलाया गया, तो न केवल उन्होंने स्फूर्ति का अनुभव किया, यह भी देखा कि कैसे समय निकलता चला गया व औरों को सिखाने के लिए सीखने आये ये सभी ध्यानस्थ होते चले गये। पहली बार पश्चिम को आयुर्वेद की मूल गौरव-गरिमा से परिचित कराया गया। प्रायः सौ प्रकार की जड़ी-बूटियाँ व उनका साहित्य सबको बाँटा गया। अब ऐसी वर्कशॉप्स की माँग पूरे अमेरिका व कनाडा से बीस-पच्चीस की संख्या में मार्च में वसंत के बाद के लिए अभी से आ रही है। न्यूजर्सी में अगले वर्ष 24, 25, 26, जुलाई, 1998 की तिथियों में होने जा रहे विराट वाजपेयी स्तर के ज्ञानयज्ञ व संस्कार-महोत्सव के प्रयाज के क्रम में यह कार्यक्रम आयोजित था। उपलब्धियाँ असाधारण स्तर की रही हैं।

भारत मूल के दो चिकित्सका- अध्यात्मविदों का ऐतिहासिक मिलन-

विगत बारह दिवसीय अमेरिका प्रवास की ही एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है- ‘एजलेस बॉडी-टाइमलेस माइण्ड’ ‘सेवन स्प्रिचुअल लॉज ऑफ सक्सेज’ जैसी किताबों द्वारा विश्वविख्याति पाने वाले दिल्ली से एम.डी. की डिग्री प्राप्त एवं वर्तमान में ‘सान डियागो’ अमेरिका में कार्यरत डॉ. दीपक चोपड़ा से शान्तिकुञ्ज के प्रतिनिधि- इन पंक्तियों के लेखक की डेढ़ घंटे तक चली चर्चा। डॉ. दीपक चोपड़ा ने प्रायः पच्चीस से अधिक पुस्तकें अध्यात्म व चिकित्सा विज्ञान की पृष्ठभूमि पर लिखी हैं, सभी ‘बेस्टसेलर’ रही हैं एवं उनका विश्वभर की तीस भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। उसको सुनने वाला एक विशिष्ट तबका अमेरिका में है। स्वयं डॉ. दीपक की जिज्ञासा थी युगऋषि के विचारों को प्रत्यक्ष जानने-समझने की। दोनों की डेढ़ घण्टे तक चली वार्ता में कई विषयों को प्रत्यक्ष जानने- समझने की। दोनों की डेढ़ घण्टे तक चली वार्ता में कई विषयों पर महत्वपूर्ण विचार-विमर्श हुआ, जिसमें धुरी थी “वैदिक संस्कृति-देव संस्कृति को कैसे विश्वभर में फैलाया जायेगा” दो एक ही पृष्ठभूमि के व्यक्तियों का यह मिलन अगले दिनों महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ लेकर आयेगा, ऐसा प्रतीत होता है।

आडियो विजुअल क्रान्ति अब महत्वपूर्ण मोड़ पर-

पिछले दिनों हालीवुड में शान्तिकुञ्ज के गायक-वादक बन्धुओं द्वारा दो सी.डी. (काम्पेक्ट डिस्क), आडियो कैसेट्स व आडियो बुक बनायी गयीं, जिनका विमोचन एक नवम्बर के कार्यक्रम में हुआ। अपने आप में निराली ‘भावसुमन’ व ‘युग की पुकार’ नाम से रिलीज की गयी ये उिस्क व आडियो बुक पूरे पश्चिम में तेजी से लोकप्रिय होती चली जा रही है।’ ‘आल वर्ल्ड गायत्री परिवार लॉस एंजेल्स कैलीफोर्निया’ की यह प्रस्तुति महापूर्णाहुति की पूर्व तैयारी में प्रसारित होने वाले ऐसे अनेकों प्रचार, माध्यमों में सबसे पहली है। अब यह शान्तिकुञ्ज से भी उपलब्ध है। इंग्लिश में हिन्दुत्व व भारतीय संस्कृति के शाश्वत सनातन तत्वों पर भी एक रिकार्डिंग पिछले दिनों हुई है। दो सी.डी. व आडियो बुक के रूप में यह दिसम्बर अंत तक आ जायेगी। इसके अतिरिक्त कम्प्यूटर पर चलने वाली मल्टीमीडिया द्वारा संस्कृति का वैविध्यपूर्ण स्वरूप दिखाने वाली ‘सी.डी. कॉम’ भी शान्तिकुञ्ज के युवा कार्यकर्ताओं द्वारा तैयार की जा चुकी है। विदेश के लिए ये रिलीज कर दी गयी है। भारत में ये वसंत पर विमोचन कर दी जायेगी। शान्तिकुञ्ज के इलेक्ट्रानिक मीडिया ने भी पिछले दिनों परमपूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी के संदेशों को उनकी वाणी में, उनके प्रतिनिधियों की वाणी में तथा उनके विचारों को आडियो बुक रूप में प्रायः तीस आडियो कैसेट्स तथा बारह वीडियो कैसेट्स के माध्यम से जन-जन के लिए सुलभ कर दिया है। उससे पूज्यवर के विचार घर-घर तक पहुँच सकेंगे।

महामहिम दलाई लामा शान्तिकुञ्ज में-

पिछले दिनों धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में सम्पन्न संस्कार महोत्सव में गये दल के आमन्त्रण पर महामहिम दलाई लामा शान्तिकुञ्ज डेढ़ घण्टे के लिये आये। बीस नवम्बर को वे अपने देहरादून कैम्प से अपने बीस अनुयाइयों के साथ युगतीर्थ आये, पूरे आश्रम का अवलोकन किया व विष्णु के नवें अवतार बौद्धावतार के उत्तरार्द्ध प्रज्ञावतार के क्रियाकलापों को विस्तार से जाना। हिन्दू धर्म, मानवधर्म के रूप में समस्त विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करता है एवं हिन्दू तथा बौद्ध मिलकर सारे विश्व को एक नयी दिशा दे सकते हैं, यह विचार उन्होंने अपने मंचीय वक्तव्य में प्रकट किये। वर्तमान में बौद्धधर्म बहुसंख्य राष्ट्रों में प्रचलित है एवं उसके निर्विवाद प्रतिनिधि रहे हैं श्री दलाई लामा। वे हिमालय की प्रतिमा का दर्शन कर व यह जानकर कि सारे विश्व के प्रज्ञा परिजन नित्य देवात्मा हिमालय की चेतना का ध्यान करते हैं- बड़े प्रसन्न हुए व अपना पूरा सहयोग इस अभियान में देने का आश्वासन उन्होंने दिया।

संस्कृति वर्ग का सम्मेलन एक अभिनव छाप छोड़ गया-

13, 14, 15, 16, नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा की बेला में शान्तिकुञ्ज में सम्पन्न यह सम्मेलन अभिनव रूप में ऐसी स्थापनाएँ कर गया है कि अब संस्कृति-कला प्रकोष्ठ’ के रूप में नयी विधा केन्द्र में खोल दी गयी है। संस्कृति के वैविध्यपूर्ण स्वरूप, साहित्य में साँस्कृतिक प्रदूषण, इलेक्ट्रानिक मीडिया साँस्कृतिक विस्तार, आहार-विहार वेशभूषा तथा पर्व-त्योहार जैसे पाँच विषयों पर प्रथम दिवस (13/1/97) एक वर्कशॉप का आयोजन किया गया, जिसमें शान्तिकुँज के व मूर्धन्य कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रखे एवं परिजनों के विचारों को सुना। दूसरे दिन नारी शक्ति की इक्कीसवीं सदी में भूमिका पर वर्क शॉप थी, जिसे शान्तिकुञ्ज की बहिनों ने प्रस्तुति दी व संध्या को ब्रह्मवादिनी बहिनों द्वारा ही दीपयज्ञ भी कराया गया। 12/11/97 को देश की विविधता से भी संस्कृति का प्रदर्शन एक विराट जुलूस के रूप में हरिद्वार नगरी में हुआ, जिसमें देश के कोने-कोने से आये कलाकारों का प्रस्तुतिकरण भी था तथा विभिन्न प्रकार की झाँकियाँ भी। 7 किलोमीटर लम्बे मार्ग पर निकले इस जुलूस ने न केवल नगरवासियों-कार्तिक पूर्णिमा पर आये लाखों तीर्थ यात्रियों के मनों पर अमिट छाप छोड़ी है। अन्तिम दिन साँस्कृतिक कार्यक्रम दिन भर चले, जिसमें हिमाचल-पंजाब से लेकर पूर्वी बिहार, बंगभूमि, गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा से लेकर दक्षिण की संस्कृति का तथा प्रगतिशील अभिनय कला का लोकरंजन से लोकमंगल की विधा के अभिनव, प्रस्तुतिकरण को सभी ने देखा व सराहा। और ऐसे सम्मेलन प्रतिवर्ष होते रहेंगे व इस विधा को और विस्तार दिया जायेगा।

केन्द्र की इन गतिविधियों की यह शृंखला बड़ी लम्बी है। इसे यहीं विराम देकर पाठकगण को भविष्य में जनवरी से अप्रैल, 1998 में हरिद्वार नगरी में होने जा रहे विराट कुम्भ मेले में आने व और समीप से इन सत्प्रवृत्तियों से जुड़ने का आमन्त्रण यह पत्रिका देती है।


अपनों से अपनी बात- - प्राणचेतना का यह प्रवाह अवरुद्ध न होने पाए

अखण्ड-ज्योति पत्रिका अपने आप में एक ऐसी स्थापना है, जिसे हम अपनी आराध्य सत्ता परमपूज्य गुरुदेव की ‘भावकाया’ का नाम दे सकते हैं। उन्हीं के विचार इसमें विभिन्न लेखों के रूप में अभिव्यक्ति पाते हैं। 1940 से अविराम प्रकाशित हो रही यह पत्रिका संजीवनी विद्या के बहुमूल्य सूत्रों का ऐसा समुच्चय है, जैसा आज के वैचारिक प्रदूषण के युग में बड़ी मुश्किल से देखने को मिलता है। तपते हुए रेगिस्तान में यदि ठण्डे जल की धारा किसी को मिल जाये, शीतल पवन की बयार स्पर्श कर जाये ता उसे जैसी राहत मिलती है, उससे कहीं अधिक आज के तनाव भरे-संत्रास से, क्षोभों से भरे समय में इस पत्रिका के स्वाध्याय से मिलती है। गुरुसत्ता के प्राण सँजोये प्रति माह सबके घर पहुँचने वाली यह ज्ञान सम्पदा मात्र छपे कागजों का एक पुलिन्दा भर नहीं है, अपितु प्रतिपल का मार्गदर्शन देने वाली, अनगढ़ सुगढ़ बना देने वाली एक पारसमणि की तरह है।

पिछले साठ वर्षों में अगणित व्यक्तियों ने इस पत्रिका रूपी कल्पवृक्ष के नीचे अपनी समस्याओं के समाधान पाये हैं, मनोकामनाओं की पूर्ति का मार्ग खोजा है, आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करने वाली कुँजी पायी है। शिशु, किशोर, मातृसत्ता, युवा व प्रौढ़ सभी के लिए हर तरह की मार्गदर्शक सामग्री इसमें विद्यमान रहती है। यही कारण है कि यह सभी को समान रूप से प्रिय है एवं प्रत्येक घर में इसकी एक तारीख से ही प्रतीक्षा होने लगती है।

हममें से हर कोई जानता है कि हम जिस समय से गुजर रहे हैं, यह बड़ा विषम व प्रतिकूलताओं से भरा है। एक-एक घड़ी कैसे गुजर रही है, सबको इसका अहसास है। वैचारिक प्रदूषण से भरे इस जमाने में ‘इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य’ का नारा लेकर सबके अन्दर आशावाद जगाने वाली यह एकमात्र ऐसी विचार-सम्पदा है, जो हमें सही सोचने, स्वयं को व्यवस्थित जीवन जीना सीखने की कला के सूत्र प्रदान करती है। 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक की ऊर्जा से मार्गदर्शन प्राप्त कर सतत् अपनी ज्योति प्रज्वलित रख प्रकाशित होती आ रही यह पत्रिका इस अंक के साथ अब अपने नये वर्ष में इसमें प्राणऊर्जा का प्रवाह और उद्दात्त व प्रचण्ड वेग के साथ बहता देखा जा सकेगा। व्यक्ति, परिवार, समाज-निर्माण की बहुमुखी विधा पर बहुविध मार्गदर्शन परिजन इसके माध्यम से पा सकेंगे। युगपरिवर्तन कैसे हो रहा है? कैसे अगले दिनों होने जा रहा है, इसकी एक झाँकी इसमें प्रत्यक्ष अभी भी देखी जा सकती है, आगे और स्पष्ट रूप से देखी जा सकेगी। इसके साठ पृष्ठों में विज्ञान व अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों से लेकर, अध्यात्म के बहुआयामी स्वरूप को कूट-कूट कर भरा देखा जा सकेगा।

बिना किसी विज्ञापन के प्रकाशित होती चली आ रही इस पत्रिका को, जो बिना किसी लाभ-हानि के लागत मूल्य मात्र में सब तक पहुँचती रहती है, इसी मूल्य पर अगले दिनों भी परिजन पाते रहेंगे। सभी को ज्ञात है कि इस पत्रिका का वार्षिक चन्दा साठ रुपये, आजीवन सात सौ पचास रुपया तथा विदेश के लिए पाँच सौ रुपया वार्षिक है। बढ़ती महंगाई के बावजूद इसमें कोई अभिवृद्धि नहीं की जा रही है। पाठकगण अधिक से अधिक परिजनों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित करें, इससे बड़ा पुण्य इस युग में और कोई नहीं हो सकता। जो वार्षिक ग्राहक हैं- वे आजीवन बन सकें, तो संरक्षक बनकर एक ऐसी पूँजी को बढ़ाने के बड़भागी बनेंगे, जो हमारी आध्यात्मिक विरासत रही है व जो अगले दिनों के लिए मानवजाति का भविष्य लिखने का कार्य कर रही है। किसी को भेंट-उपहार में देने के लिए भी अखण्ड-ज्योति के एक वर्ष के चंदे से श्रेष्ठ कुछ और वरेण्य नहीं हो सकता। ज्ञानदान को सबसे बड़ा दान माना गया है।

अगले दिनों कुछ विशेषांक परिजनों को पढ़ने को मिलेंगे-बसंत पंचमी के उपलक्ष्य में फरवरी का ‘युगपरिवर्तन विशेषांक गायत्री जयंती पर्व के समय ‘साधना विशेषांक तथा गुरुपूर्णिमा की पावन बेला में ‘समर्पण विशेषांक प्रकाशित करने की योजना है, जिसमें अगणित संस्करण एवं भविष्य की योजनाएँ होंगी, इसके अलावा एक विशेष तौर पर अगले ही माह से साधना-प्रक्रिया पर एक लेखमाला आरम्भ की जा रही है। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अखण्ड-ज्योति में दी जाती रही विभिन्न साधनाएँ विधि-विधान के साथ माह व वर्ष के उल्लेख के साथ प्रति माह इसमें पाठकगण पढ़ते रहेंगे। इसके अतिरिक्त हरिद्वार के कुम्भ महापर्व के सम्बन्ध में प्रथम चार माह विशेष सामग्री प्रकाशित होती रहेगी। कथा-साहित्य चुभने वाले संस्मरण, सद्वाक्यों की संख्या भी अब अधिक होगी। बीच-बीच में श्वेत-श्याम रंगीन चित्र भी विशेषांक के साथ देखने को मिलते रहेंगे। निश्चित ही ऐसी संस्कृति सम्पदा से भरी सामग्री को कोई भी छोड़ना नहीं चाहेगा। ये युग परिवर्तन के महत्वपूर्ण क्षण हैं। इन पलों में कब कौन कालनेमि विचार रूप में आकर दिमाग गड़बड़ा दें, इसके लिए सतत् स्वाध्याय ही कलियुग की एकमात्र औषधि मानकर नियमित पूज्यवर एवं मातृसत्ता का सत्संग पाने की दृष्टि से किया जाना चाहिये। यही हम सबको तारेगा। आशा है कि परिजन आराध्य की जलाई इस ज्योति को और देदीप्यमान, जाज्वल्यमान बनायेंगे। इसका प्रकाश हर कोने तक पहुँचाएँगे ।

*समाप्त*