संसार को आलोकित करने के लिए सूर्यदेव निरन्तर तपा करते हैं। अपने अविराम तप की ज्वाला में हर-हमेशा जलते रहकर ही वे धरती के दोनों गोलार्द्धों में प्राण और ऊर्जा का संचार करते हैं। मेघों का अभाव कहीं जीवन ही न सुखा डाले, इसके लिए सागर सतत् बड़वानल में जला करते हैं। अपने इस अनवरत अन्तर्दाह को सहकर वे उस सरंजाम को जुटाने में संलग्न रहते हैं, जो तपते-झुलसते जीवन को वर्षा की शीतल फुहार से शान्ति दे सके। सितारे हर रोज चमकते हैं, ताकि मनुष्य अपनी अहंता में ही न पड़ा रहकर विराट ब्रह्म की प्रेरणाओं से पूरित बना रहे। अपनी हर श्वास के साथ संसार भर का जहर पीने और बदले में अमृत उड़ेलने का पुण्य-पुरुषार्थ वृक्षों ने कभी बन्द नहीं किया। कर्म का परोपकार में अर्पण, सृष्टि की मूल प्रेरणा है। जिस दिन यह प्रक्रिया बन्द हो जय, उस दिन विनाश ही विनाश, शून्य ही शून्य, अन्धकार ही अन्धकार के अलावा और कुछ भी नहीं रह जाएगा।
परोपकार की इस पुण्य-प्रक्रिया को जारी रखने के लिए ही नदियाँ राह में पड़ने वाले पत्थरों की ठोकरें सहकर भी सबको जल दान करती रहती हैं। पवन जमाने भर की दुर्गन्ध का बोझ भी सहकर नित्य चलती रहती हैं और प्राण दीपों को प्रज्वलित रचाने को कर्तव्य पाल करती रहती हैं। फूल हँसते और मुस्कुराकर कहते हैं, काँटों की चुभन की परवाह न करके संसार में सुगन्ध भरने और सौंदर्य बढ़ाते रहने में ही जीवन की शोभा है। कोयल कूकती है तो पीछे जो आभा प्रतिध्वनित होती है, उसमें कोलाहलपूर्ण संसार में माधुर्य बनाए रखने का शान्त सरगम गूँजता प्रतीत होता है। अपने नन्हें से बच्चे को चोंच में दाना डालकर चिड़िया अपने वंश का पोषण ही नहीं करती, अपितु असमर्थ और अनाश्रितों को आश्रय देने की परम्परा पर भी प्रकाश डालती है।
जीवन की मूल प्रेरणा है,परमार्थ और लोक-कल्याण के लिए भावभरा आत्मार्पण। ठीक-ठीक आत्मार्पण किए बिना परमार्थ साधना पूरी नहीं होती। आत्माहुति जितनी सम्पूर्ण होगी, परमार्थ की ज्वाला उतनी ऊँची उठेगी। दीप जितना अधिक अपने को जलाता है, ज्योति उतनी ही अधिक प्रखर होती है। जड़े अपने को जितनी अधिक गहराई में दबाई रखती हैं, वृक्ष उतने ही अधिक मजबूत होते और ऊँचे उठते हैं। जीवन को आधार और ऊर्जा प्रदान करने वाला प्रत्येक घटक इसी पुण्य-परम्परा में संलग्न है। सृष्टि में सन्तुलन बनाए रखने के लिए इसके निर्जीव कण तक इस पुण्य-प्रक्रिया को जारी रखने में जुटे हैं। ऐसे में स्वयं को जीवित ही नहीं समझदार भी समझने वाला मनुष्य अपने समाज की उपेक्षा कर दे, परमार्थ से मुँह मोड़ ले, उसकी श्रीवृद्धि और सौंदर्य निखारने का प्रयत्न न करे इससे बढ़कर लज्जा और आपत्ति की बात उसके लिए और क्या हो सकती है।
सूखे के आतंक से धरती का सीना जगह-जगह से दरक गया था। हरियाली का नामोनिशान न बचा था। इनसानों के भोजन और जानवरों के चारे की बात तो दूर, अब तो पीने का पानी तलाशने के लिए भी मीलों भटकना पड़ता था। आर्यावर्त का सबसे सुखी और सम्पन्न राज्य, आज दुर्भिक्ष के जबड़ों में फँसकर त्राहि-त्राहि की पुकार कर रहा था। महाराजा रन्तिदेव जनसाधारण की पीड़ा से संतप्त थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी प्राणप्रिय प्रजा को इस संकट से कैसे उबारें, जिनकी धर्मनिष्ठा, दयालुता, परोपकारवृत्ति एवं शक्ति-समृद्धि की कथाएँ देश-देशान्तर में कही-सुनी जाती थी, आज वही असहाय थे। राजकोष और राज्य का अन्न भण्डार भी अब रिक्त हो चुका था। अब तो अवस्था कुछ ऐसी थी कि राजा और राजपरिवार भी भूख की पीड़ा से विकल हो रहे थे।
भिक्षा माँगना उनके स्वभाव में नहीं था और माँगते तो देता भी कौन? चारों ओर भुखमरी का ताण्डव चल रहा था। राजा रन्तिदेव अपनी महारानी और बच्चे के साथ राजमहल चल पड़ें चुपचाप जन हीन मार्ग पर उनके कदम बढ़ते रहे। वन में कन्द, मूल अथवा फल-पत्ते जाएँ अथवा बिना माँगे कोई दे दे, तो उसी से उन्हें अपनी और अपने परिवार की ज्वाला शान्त करनी थी।
वन में न कन्द था और न मूल, फिर पत्ते तो आते भी कैसे? प्यास से जल रहे गलों को गीला करने के लिए दो बूँदें पानी मिल पाना भी दुर्लभ था। ऐसी अवस्था एक, दो, तीन दिन नहीं पूरे अड़तालीस दिनों तक चलती रही। अल्पवय राजकुमार एवं महारानी के साथ स्वयं राजा रन्तिदेव भी शारीरिक दृष्टि से दुर्बल हो गए थे। उनमें हिलने-डुलने तक की शक्ति शेष न रही। अब तो भगवन्नाम का ही भरोसा था। अब वे तीनों प्रभु का नाम-स्मरण करे हुए जीवन के अन्तिम क्षण की प्रतीक्षा करने लगे।
उनचालिसवें दिन का सूर्योदय हुआ। थोड़ी देर बाद महाराज रन्तिदेव का एक पुराना मित्र आया और सत्कारपूर्वक खीर, मालपुओं के साथ अन्य कई प्रकार के व्यंजनों को उन्हें निवेदित किया। सत्कारपूर्वक खीर, मालपुओं के साथ कई प्रकार के व्यंजनों को उन्हें निवेदित किया। वह अपने साथ एक बड़े पात्र में जल भी लाया था, जिसे उसने पास में रख दिया। तभी एक ब्राह्मण ने आकर कहा-”महाराज! मैं बहुत भूखा हूँ, कुछ भोजन हो तो दीजिए।”
रन्तिदेव को तो जैसे मनोवाँछित वरदान मिला। उन्होंने उस ब्राह्मण को भगवान मानकर आदर के साथ बैठाकर भोजन कराया। ब्राह्मण तृप्त होकर राजा-रानी तथा पुत्र तीनों को आशीर्वाद देता हुआ चला गया। राजा ने शेष भोजन के तीन भाग किए और एक रानी को तथा दूसरा पुत्र को दे दिया। अपना हिस्सा लेकर वे खाने के लिए बैठे ही थे कि एक शुद्र अतिथि आया। राजा रन्तिदेव ने उसे भी भोजन कराया। वह शूद्र भी भोजन करके महाराज का गुणगान करते हुए चला गया। शेष भोजन में महाराज कौर लेकर मुँह में रखने वाले ही थे कि एक चाण्डाल अपने कुत्तों के साथ वहाँ आ पहुँचा तथा कहने लगा-”महाराज हमारी रक्षा करें। मैं और मेरे कुत्ते बहुत दिनों से भूखे हैं। भोजन के बिना अब प्राण निकलने ही वाले हैं।” रन्तिदेव ने उसे अपने भाग का सारा भोजन दे दिया।
उनके पास अब थोड़ा सा जल बचा रह गया। महाराज ने जल का पात्र उठाया ही था कि सुनाई पड़ा - “महाराज। मैं एक अशुभ और नीच श्वपच हूँ। प्यास के मारे मेरे प्राण कण्ठगत हैं। यदि आपने जल नहीं दिया तो मर जाऊँगा। केवल एक-दो चुल्लू भर पानी दीजिएगा।” अपनी बात पूरी करते करते वह प्यास की अधिकता से दूर ही गिर पड़ा था। रन्तिदेव के प्राण भी कण्ठगत ही थे। परन्तु, उन्हें अपने कष्ट का ध्यान नहीं आया। वे उस श्वपच के समीप पहुँचे तथा बोले-”भाई! तुम अच्छी तरह से जल पिया तथा अपने प्राणों की रक्षा करो।”
महाराज रन्तिदेव उसे जल पिलाते हुए अपने मन में एक ही बात बार-बार दुहरा रहे थे, “हे सर्वव्यापी भगवान नारायण! इस जीवन की लालसा से व्याकुल प्राणी के रूप में आप ही मेरे सम्मुख हो। यह जल मैं तुम्हें ही अर्पण कर रहा हूँ। जीने की इच्छा से व्याकुल इस प्राणी के जल देने से मेरी क्षुधा, पिपासा, मानसिक तथा शारीरिक दीनता, खिन्नता विषाद, मूर्छा आदि सब दुःख दूर हो गए।”
महाराज रन्तिदेव ने पात्र का सारा जल उस श्वपच को सत्कार भाव से पिला दिया। उसकी तृषा मिल गयी और वह सन्तुष्ट होकर चला गया। उसके जाते ही वह लड़खड़ा कर वहीं गिरे, परन्तु उन्हें किसी कोमल करो ने सँभाल लिया। शरीर पर कहीं चोट नहीं लगी। वे आश्चर्य से आंखें खोलकर देखने लगे। उन्होंने देखा हँसवाहनारूढ़ चतुर्मुख ब्रह्मा, गरुड़ पर आसीन भगवान श्रीहरि, वृषभ पर विराजमान भगवान महादेव और महिष पर बैठे दण्डधारी यमराज उनके सम्मुख उपस्थित हैं।
“धन्य हैं महाराज आप। ब्राह्मण, शूद्र, चाण्डाल, श्वपच किसी में भी आपकी की भेद-बुद्धि नहीं। सबमें आप अपने इष्ट देव को ही देखते हैं। आपकी सेवा और तप से हम सब देवता प्रसन्न हैं। आप जो चाहो माँग लो।” भगवान श्रीहरि के अधरों पर वात्सल्यसिक्त मुसकान थी।
भाव-विभोर रन्तिदेव की आँखों में प्रभु की बात सुनकर भावबिंदु छलक उठे। वह गदगद कण्ठ से कहने लगे-
न त्वहु कामये राज्यं न र्स्वगं नापुनर्भवमफ। कामयै दुःखतासनाँ प्राणिनामार्त्तिनाशनम्॥
“हे जगत के स्वामी ! हे परमेश्वर! मैं अपनी सद्गति, अष्टसिद्धि अथवा मोक्ष नहीं चाहता। मुझे सब प्राणियों के हृदय में निवास करके उनके सब दुःख भोगने की सुविधा दो, जिससे सब प्राणी दुःखहीन हो जाएँ।”
“ऐसा ही होगा, राजन” भगवान अपने भक्त की परदुःख कातरता से विगलित होकर कह रहे थे- “तुम्हारे जीवन का स्मरण मनुष्यों में यह बोध पैदा करेगा कि जीवन के मर्म अपने दुःखों में चीखना-बिलखना नहीं, बल्कि अन्य दुःखीजनों की पीड़ा निवारण में जुट पड़ना है। जिनमें भी ऐसा विवेक जगेगा वे तुम्हारे तप और त्याग के प्रभाव से स्वतः दुःख मुक्त हो जाएँगे।
भूगर्भशास्त्रियों एवं नृतत्व-विज्ञानियों के अनुसंधान के अनुसार, हिमालय मानव प्रजाति का पिता है।
एक अध्ययन के अनुसार हिमालय पर्वत शृंखला का पहला बड़ा उभार आज से 7 करोड़ वर्ष पहले शुरू हुआ। उसी के समशीतोष्ण भू-भाग में सबसे पहले वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं या औषधीः पूर्वा जाता (ऋग्वेद 10-97-1)। इसके बाद यहीं मानव ने अपना जन्म पाया। धरती माता की गोद और हिमालय पिता के संरक्षण में उसने अपनी सभ्यता का विकास किया। प्रकृति के रहस्यों एवं जीवन की दिव्यताओं की खोज उसने इसी के शुभ्र शिखरों की छाया में पूरी की। इसीलिए विश्व के आदि ग्रन्थ ऋग्वेद में आर्य ऋषियों ने
‘यस्य हेमवन्तो महित्वा आहुः हिमेनाग्नि हिमेवाससो, हिम्वानान् हविष्मान गिरिर्यस्ते पर्वता हिमवन्तारण्यते
प्रथिवी स्यानमस्तु’ कहकर हिमालय की स्तुति की है।
यह स्थान सिर्फ पर्वत शिखरों का पुँज नहीं, बल्कि विश्व की आध्यात्मिक सत्ता का केन्द्र है।
ऋषित्ताएँ एवं देव शक्तियाँ यहीं रहकर विश्वभर में उन्नत प्रेरणाओं एवं उच्चस्तरीय विचारों का संचार करती हैं। श्रीमद्भागवत के बारहवें स्कन्ध में दूसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में महर्षि व्यास ने इसी सत्य का प्रतिपादन करते हुए हिमालय में दिव्य सिद्ध पुरुषों की उपस्थिति बतायी है और उनके एकत्रित होने के केन्द्र को ‘कलाप’ कहा है। 10 वें स्कन्ध के 87 वें अध्याय के 5.6.7 श्लोकों में भी ऐसा ही वर्णन है। भारतवर्ष के वैदिक अथवा पौराणिक साहित्य में ही नहीं, बल्कि जहाँ कहीं भी आध्यात्मिक चेतना ने अपना विकास पाया है, वहीं इस स्थान के महत्व को स्वीकारा गया है। रूस के प्रख्यात सन्त गुरजिएफ ने हिमालय की महिमा और यहाँ रहने वाली विशिष्ट आत्माओं से अपने संपर्क की बात स्वीकार की है। जापान की महिला सन्त हातोसाना के अनुसार, हिमालय दिव्य आत्माओं की निवास भूमि है। यहाँ 15,000 से भी अधिक ऋषित्ताएँ निवास करती हैं। इसका कार्य सृष्टि चक्र के संतुलन में भगवान की सहायता करना है।
थियोसॉफी सम्प्रदाय की संस्थापक मैडम ब्लावतस्की एवं उनकी शिष्या एनीबेसन्ट ने भी यहाँ पर रहने वाली सिद्ध पुरुषों की पार्लियामेंट का वर्णन किया है, जो अध्यात्म क्षेत्र के महत्वपूर्ण निर्णय करती है।
स्वामी योगानन्द ने अपने विश्व विख्यात ग्रन्थ ‘ओटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ में ऐसे अनेक प्रसंगों को वर्णन किया है जिसमें हिमालय के सिद्ध योगियों के चमत्कारी कर्तृत्व का विवरण है। सुविख्यात मनीषी
पाल ब्रण्टन एवं टी. लोबसाँग राम्या जैसे अन्वेषकों ने इस क्षेत्र में समर्थ सिद्ध पुरुषों का अस्तित्व पाया है। दो सौ साल से अधिक समय तक जीवित रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रम जी महाराज के ऐसे अनेक संस्मरणों को लेखन यशपाल जैन तथा अन्य जिज्ञासुओं ने किया है, जिनसे उस क्षेत्र की दिव्य रहस्यमयता उजागर होती है। महामना मदनमोहन मालवीय स्वयं कृष्णाश्रम जी के भक्त थे ओर उनके भक्ति पूर्ण आग्रह से विवश होकर ही उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी थी। स्वामीजी नग्न अवधूत की तरह हिमप्रदेश में निवास करते थे।
हिमालय में जितने छोटे-बड़े तीर्थ स्थान है, उतने अन्यत्र मिलने कठिन है। हरिद्वार इस देवभूमि का द्वार है। यहाँ से आगे बढ़ते ही ऋषिकेश से बद्रीनाथ जाने के रास्ते में देवप्रयाग, नन्दप्रयाग कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग आदि कितने ही प्रयाग तथा उत्तरकाशी, गुप्तकाशी, दिव्यकाशी आदि कितने ही तीर्थ मिलते हैं। इनकी प्रख्याति भले अमरनाथ, ज्वालामुखी, बद्रीनाथ, गंगोत्री जितनी न हो पर दिव्यता को कोई अनुभवी समझ सकता है। ऐसे अनेक छोटे-छोटे तीर्थों की शृंखला यहाँ बिखरी पड़ी है। जिसका सान्निध्य व्यक्ति के अधोमुखी मन को सहज ऊर्ध्वमुख बना देता है। शिव और शक्ति के विभिन्न रूपों के देवस्थान थोड़ी दूर पर गाँवों के समीप एवं पर्वतीय घाटियों में सर्वत्र पाए जाते हैं। सती के आत्मविसर्जन का, पार्वती की साधना का यही स्थान है। शिव ताण्डव भी यहीं हुआ था। उसी अवसर पर उपयोग में लाया गया त्रिशूल उत्तरकाशी के एक प्राचीन स्थान में स्थापित बताया जाता है। जमदग्नि और परशुराम की तप-साधना उत्तरकाशी में ही सम्पन्न हुई थी।
ज्ञान-विज्ञान के अनेकों अनुसंधान इसी देवभूमि के दिव्य अंचल में सम्पन्न होते रहें हैं। रसायन विद्या, आयुर्वेद विचारो की खोज योग विज्ञान के महत्वपूर्ण प्रयोग यहीं की उपज है। सप्तऋषियों की महामनीषी देवमानवों का कार्यक्षेत्र यही भूमि रही है। प्राचीन भारत के स्वर्णिम भाग्य का निर्माण करने वाले गुरुकुल एवं आरण्यकों की परम्परा ने यहीं से जन्म पाया था। राजतन्त्रों के सूत्र संचालक महर्षि वसिष्ठ जैसे धर्माध्यक्षों की तपस्थली यही थी। महाभारत जैसे विश्वकोष स्तर के ग्रन्थ की रचना महर्षि व्यास ने बद्रीनाथ के पास व्यास गुफा में ही बैठकर की थी। लगभग सभी महत्वपूर्ण ऋषिकल्प देवात्माओं की तरह-तरह की गतिविधियाँ हिमालय की सुरम्य घाटियों एवं कन्दराओं में सुविकसित होती रही हैं। उन्हीं प्रयागों से लाभान्वित होकर भारतवर्ष के 33 करोड़ नागरिक कोटि देवता कहलाए। भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की उच्चस्तरीय विभूतियों से भरी-पूरी होने के कारण भारतभूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती रही है। इसकी स्वर्गीय परिस्थितियाँ एवं विभूतियाँ सभी के आकर्षण का केन्द्र बनीं थी। इसे यह वरदान हिमालय ही देता रहा है। जलधारा वाली भागीरथी ही नहीं देवलोक की ज्ञानगंगा का अवतरण एवं प्रवाह भी इसी क्षेत्र से आरम्भ होता रहा है।
बात स्वर्ग की चली, तो इतिहासकार एवं भूगोलवेत्ता दोनों ही इस दृष्टि से एक मत हैं कि प्राचीन समय का स्वर्ग कोई ऐसा स्थान होना चाहिए, जहाँ लोगों का आना जाना बिना किसी खास कठिनाई के होता रहता हो। जहाँ भौतिक समृद्धि एवं आत्मिक विभूतियों की प्रचुरता हो। पौराणिक साहित्य में दशरथ, नारद, नहुष आदि के ऐसे अनगिनत कथानक हैं जिनमें स्वर्ग जाना और वापस आना कुछ उसी तरह बताया है जैसे हम लोग सामान्य स्थानों पर बिना किसी खास कठिनाई के चले जाते हैं। पाण्डवों के स्वर्गारोहण की तुक इसी प्रकार बैठती है कि वे जिन्दगी के अन्तिम समय में उसी शान्तिमय क्षेत्र में रहने के लिए चले आए थे। पाण्डवों ने अन्त समय स्वर्ग के जिए जहाँ से प्रयाण किया था, वह स्वर्गारोहण पर्वत अभी भी वसोधारा पठार के आगे विराजमान है। यह स्वर्ग क्षेत्र उस प्रदेश में था जिसे बद्रीनाथ और गंगोत्री का मध्यवर्ती भाग कह सकते हैं यह हिमालय का हृदय है।
दिव्यदर्शी, समाधिलीन योगियों का मत है कि ब्रह्माण्ड की सघन अध्यात्म चेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इसी क्षेत्र में होता है। भौतिक शक्तियों के धरती पर अवतरण का केंद्रबिंदु विज्ञानवेत्ता ध्रुव प्रदेश को मानते हैं। अध्यात्मवेत्ताओं की वैसी ही मान्यता इस हिमालय के हृदय के सम्बन्ध में है। यह स्वर्ग क्षेत्र ब्रह्माण्डव्यापी दिव्य चेतनाओं का अवतरण केन्द्र है। जहाँ शोध करते हुए, तप करते हुए महामनीषी अपने देवशक्तियों से सुसज्जित करते हैं। अभी भी उस क्षेत्र में स्थूल और सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य सत्ताओं के आस्तित्व पाये जाते हैं। वे अपने क्रियाकलाप से समस्त भूमण्डल को प्रभावित करते हैं।
देवराज इन्द्र की सहायता के लिए महाराज दशरथ अपना रथ लेकर गए थे। पहिया गड़बड़ाने लगा तो महारानी कैकेयी ने उस विपत्ति का समाधान अपने का जोखिम में डालकर किया था। कुछ इसी तरह का आख्यान अर्जुन के बारे में है। जब वे इन्द्र के यहाँ गए थे, तो उर्वशी ने उन्हें सम्मोहित करने की कोशिश की थी, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। जहाँ मनुष्य आ जा सके, वह स्थान धरती पर ही सम्भव है। चन्द्रमा और इन्द्र का मिलजुल कर ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या से छल करना धरती पर ही सम्भव है। दधीचि का देवताओं को अस्थि दान आदि अनेकों पौराणिक आख्यान ऐसे हैं जिसमें देवों और मनुष्यों के सघन सहयोग की चर्चा है। इन पर विवेकपूर्ण ढंग से सोचें तो इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि स्वर्ग कहीं इस धरती का कोई भूभाग है और देवता मनुष्यों का ही कोई वर्गविशेष। इसका समाधान उत्तराखण्ड को ही देवभूमि स्वर्ग मान लेने से हो सकता है। इस क्षेत्र में अभी भी भ्रमण करके ऐसे अनेकानेक प्रमाण उठाए जा सकते हैं जिनके आधार पर पौराणिक स्वर्ग की संगति इस प्रदेश के साथ बिठाई जा सके।
देवार्चन हर मनुष्य का अनिवार्य कर्तव्य था। गीता में भी यज्ञ से देवों की पुष्टि की बात कही गयी है। इसे सर्वसाधारण द्वारा देव प्रयोजनों के लिए विविध-विधि अनुदान प्रस्तुत करना समझा जाना चाहिए। यज्ञ का सीधा मतलब अर्थदान एवं त्याग बलिदान है। देव प्रयोजनों के लिए श्रम, समय, मन, धन आदि से सहयोग करते रहना है। यज्ञ से पूजित देवता मनुष्यों पर सुख-शान्ति बरसाते हैं और यज्ञ न करने वाले विपत्ति में फँसते हैं। गीताकार का यह कथन जन सामान्य देववर्ग को, देवकर्म को समुचित सहयोग प्रदान करते रहने की अनिवार्य आवश्यकता का उद्बोधन कराता है। यह देवगण और कोई नहीं उस समय स्वर्ग क्षेत्र में निवास करने वाले, धर्म प्रेरणाओं एवं भावात्मक परिष्कार के अनगिनत आधारों का निर्माण करने वाले तपस्वीगण ही थे। समस्त विश्व में स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण करने के लिए उनका महाप्रयास जनसाधारण को देवार्चन एवं देवपूजन के लिए अनायास प्रेरित करता था।
स्वर्गीय विभूति कहे जाने वाले कैलाश और मानसरोवर भारतीय हिमालय क्षेत्र में तब भी थे और आज भी है। कैलाशवासी भगवान शंकर कि सिरे से गंगा प्रवाहित होती है, इसकी संगति तिब्बत के कैलाश से मेल नहीं खाती। क्योंकि वहाँ गंगा का गोमुख तक आना भौगोलिक स्थिति के कारण किसी भी तरह सम्भव नहीं है। गंगोत्री से जेलूखागा घाटी होते हुए कैलाश की दूरी लगभग 300 मील है। फिर बीच में कई आड़े पहाड़ आए हैं, जिसकी वजह से कोई जलधारा या हिमधारा वहाँ तक नहीं पहुँच सकती । असली शिवलोक इस धरती के स्वर्ग में ही हो सकता है। शिवलिंग पर्वत के समीप ही गंगा ग्लेशियर है। स्वर्ग गंगा उसी जगह है। गौरी सरोवर की मौजूदगी भी वहीं है। इस तरह गंगा धारण करने वाले महादेव शिव का कैलाश यह हिमालय का हृदय ही हो सकता है। यदि प्राचीन कैलाश यहाँ न रहा होता तो भगीरथ यहाँ तपस्या करने की बजाए शायद तिब्बत चले जाते। इस पुण्यभूमि में शिवलिंग, केदार शिखर और नीलकण्ठ शिखर तीनों ही भगवान शिव के निवास हैं। मानसरोवर की उपस्थिति भी इस देवभूमि में स्वाभाविक है। सुरालय, हिमधारा, सत्पथ हिमधारा तथा वरुण वन नामों से इस क्षेत्र का देवभूमि होना प्रमाणित होता है। अष्ट वसुओं ने जो जगह अपने निवास के लिए चुनी वह वसुधारा भी अलकापुरी के पास ही है। इन सब तथ्यों पर विचार करने से वास्तविक कैलाश एवं मानसरोवर की उपस्थिति इसी प्रदेश में सिद्ध होती है।
इन दिनों तिब्बत वाला कैलाश चीन के प्रतिबन्धों के कारण यात्रा की दृष्टि से सुविधाजनक नहीं है। सरकार जिस यात्रा का प्रबन्ध करती भी है, उसका व्यय भार उठाना औसत नागरिक के बूते की बात नहीं। फिर वहाँ न अपनी भाषा है, न संस्कृति। वहाँ पहुँचकर विदेश जैसा अनुभव होता है। सम्भव है जब कभी भारतीय संस्कृति वहाँ रही हो वह स्थान भी उपयुक्त तीर्थ रहा होगा। पर शिव का वास्तविक निवास, गंगा का असली उद्गम और सच्चे मानसरोवर का दर्शन करना हो तो हमें हिमालय के इसी हृदय क्षेत्र में खोज करनी पड़ेगी। सत्यान्वेषी जिज्ञासु चाहें तो तिब्बत वाले कैलाश और इस हिमालय के हृदय वाले कैलाश यात्रा करके स्वयं निर्णय कर सकते हैं उन्हें स्वयं अनुभव होगा कि यह स्थान कितने दिव्य वातावरण से परिपूर्ण है। तथ्य तो यही है कि असली कैलाश एवं मानसरोवर इसी क्षेत्र में है। वहाँ किसी विदेशी ताकत की छाया भी नहीं पड़ सकती।
हिमालय की यही स्वर्ग भूमि भारतीय संस्कृति की उदय भूमि रही है। इस सत्य की स्वीकारोक्ति श्री साहनी ने ‘मैन इन हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड’ में की थी। इतिहासकार भी अब मानने लगे हैं कि आर्यों का आदि निवास हिमालय में ही था। स्वर्गलोक का जो विवरण पुराणों में मिलता है वह प्रायः कवित्वपूर्ण होने के कारण जहाँ एक ओर उदात्त दृष्टिकोण लिए हैं, वही उत्कृष्ट भाव अभिव्यंजना सजाए है। यह शैली उपयुक्त भी है। लेकिन इसके आधार पर यदि उसका भौगोलिक स्वरूप ढूँढ़ना हो और सौंदर्य पूर्ण वातावरण तलाशना हो तो वह किसी अन्य ग्रह में नहीं बल्कि इसी हिमालय में परिलक्षित होता है।
महाभारत में एक कथा आती है कि अर्जुन द्रौपदी से आग्रह करते हैं कि वह कोई उपहार माँग ले। उत्तर में संकोचपूर्ण स्वर में द्रौपदी कहती है कि मेरे लिए नन्दन वन के पारिपाज पुष्प ला दें, जो जल में नहीं पत्थरों में खिलते हैं। जिनका सौंदर्य स्वर्गीय दिव्यता की अनुभूति करा देता है। कथा के अनुसार अर्जुन, हिमालय पहुँच कर नन्दन वन गए। उन्हें वहाँ के रक्षकों से युद्ध करना पड़ा ओर वहाँ से एक पारिजात पुष्प द्रौपदी के लिए ले आए।
यह नन्दन वन हिमालय क्षेत्र के पुष्पोद्यान का नाम है। यह स्थान गोमुख के आगे तपोवन पार करने पर मिलता है। शिवलिंग पर्वत के पास ही यह क्षेत्र फैला है। यहाँ वर्षा ऋतु के बाद ही बसन्त छा जाता है और सारा फूलों के गलीचे की तरह अपरिमित सुषमा से भर जाता है। ऐसा ही एक बगीचा यातायात के दृष्टि से सुलभ स्थान पर भी है। यह फूलों की घाटी के नाम से मशहूर है। समुद्र तल से 13200 फीट की ऊँचाई पर अवस्थित वह उद्यान विश्वविख्यात है। दस-पन्द्रह मील के इस इलाके में प्राकृतिक रूप से उगने वाले हजारों प्रकार के चित्र-विचित्र पुष्प अनायास ही खिलते हैं। संसार में ऐसा सुंदर और अद्भुत क्षेत्र अन्यत्र कहीं नहीं है। इसे देखने के लिए हर साल हजारों-हजार देशी-विदेशी पर्यटक हर साल पहुँचते हैं।
प्रकृति की इस अनुपम छटा के बारे में विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह उत्पादन प्रकृति का नहीं, विचारशील व्यक्तियों द्वारा अतीत में किया गया शुभारम्भ है। यह पौधे सुनियोजित ढंग से विकसित किये गए हैं। सम्भव है यहाँ कोई महर्षि का तपोवन अथवा फिर कोई राजोद्यान रहा हो एवं भूगर्भ वैज्ञानिकों को इस पूरे क्षेत्र में यज्ञों के उपकरण, बहुमूल्य धातुपात्र, आभूषण अस्त्र आदि भी मिल हैं। जिनसे स्पष्ट होता है इस क्षेत्र में कभी सुसभ्य लोग रहते थे।
जोशीमठ ही नहीं अब बद्रीनाथ तक पक्की सड़क बन गयी है। जोशीमठ से बद्रीनाथ जाने वाली सड़क पर बीच में गोविन्द घाट उतरना पड़ता है, वहाँ से 7 मील पैदल चलकर घाघरिया एक स्थान है। यहाँ से फूलों की घाटी तक एक घण्टे को रास्ता है। कामेट झरना यहाँ का बहुत बड़ा दर्शनीय स्थल हैं यहीं पास के क्यूड़ गाँव से फूलों की घाटी की शुरुआत हो जाती है। जो दस-पन्द्रह मील के बड़े दायरे में फैली हुई है। घाटी की दाहिनी ओर ‘कुबेर भण्डार’ पर्वत है। लोक मान्यता है कि यहीं कहीं देवलोक के कोषाध्यक्ष कुबेर की प्रचुर सम्पदा अभी भी दबी पड़ी है।
गंगा ग्लेशियर से आगे गहन हिमधारा व वरुण वन है। कहते हैं यह पूरा क्षेत्र वरुण देवता का कार्यक्षेत्र रहा है। यहाँ से सुमेरु पर्वत को भली प्रकार देखा जा सकता है। सुबह-शाम के सूर्योदय और सूर्यास्त में इसकी स्वर्णिम आभा इसे सचमुच के स्वर्ण शिखर का रूप देती है। स्वर्णिम सूर्य रश्मियाँ बर्फ से ढकी चोटियों पर जब प्रतिबिम्बित होती है, तब यह पर्व ऐसा लगता है माना सोने का बना हो। पुराणों से इसी सुमेरु को देवताओं का निवास और स्वर्ण विनिर्मित बताया गया है यह उपमा प्रातः और सायंकालीन सुमेरु को देखकर अभी भी चरितार्थ होती है। स्वर्ग में सुमेरु होने की पौराणिक मान्यता से इसी क्षेत्र का स्वर्ग होना सिद्ध होता है।
हिमप्रदेश में इन्द्रधनुषों की बाढ़ सी रहती है। झरनों में, उड़ती फुहारों में बादलों में घाटियों में नमी के कारण उन पर प्रतिबिम्बित होने वाली सूर्य किरणें चित्र-विचित्र रंग के इन्द्रधनुष बनाती हैं। लगता है देवों के ये सप्तवर्ण आयुध इस क्षेत्र में अपना और अपनी अधिपति देव सत्ताओं का आस्तित्व इस क्षेत्र में होने का प्रमाण देते हैं।
हिमालय प्रकृति-शोभी, वन, सम्पदा, बलिष्ठ-जलवायु एवं आध्यात्मिक वातावरण का ही धनी नहीं है, यहाँ प्राचीनकाल में सुविकसित राजसत्ताएँ भी पनपी हैं। पुरातनकाल में इस क्षेत्र के राजा इन्द्र की पदवी धारण करते थे। मध्यकाल में भी महाभारत के अनुसार द्विगर्त, विगत राज्य यहीं के थे। काश्मीर, नेपाल, गढ़वाल, हिमाचल जैसे प्रान्त एवं देश हिमालय की ही सीमा के अंतर्गत है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भूमि समूचे भारत की एक चौथाई हिस्सा है। पंजाब एवं उत्तर प्रदेश के एक बड़े भाग को हिमालय की छाया में रहने का सौभाग्य प्राप्त है।
हिमालय की आत्मा आर्ष साहित्य में ऋषिगणों के माध्यम से मुखरित हुई है। प्रायः सभी पुराणों में इसकी महिमा का गान है। मेघदूत, हर्ष चरित, कुमार सम्भव आदि अनगिनत संस्कृत काव्यों में इसके सौंदर्य की छटा घटनाएँ ही प्राचीन भारतीय साहित्य का आधार है। हिमालय का अनुदान-अवतरण ही उत्तरी पूर्वी एवं पश्चिमी भारत को जल दान देता है। पंजाब-सिन्ध के लिए पंचनद। असम से लेकर वर्मा के लिए ब्रह्मपुत्र। उत्तर प्रदेश, विहार, बंगाल के लिए गंगा यमुना, सरयू आदि सभी हिमालय की देन हैं। बादल बरसते हैं यह ठीक है, पर वस्तुतः निरन्तर हिमालय ही बरसता है। उसके भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही महत्व हैं। भौतिक में वन-सम्पदा , वनस्पति, औषधि, पत्थर तथा खनिज। आध्यात्मिक में वातावरण जिसके प्रभाव से वहाँ का जनसामान्य अभी भी अपेक्षाकृत ईमानदार एवं सदाचारी है। देवताओं, ऋषियों, तपस्वियों का क्रीड़ाप्राँगण है। इसी से तो भगवान ने गीता में ‘स्थावरणाँ हिमालयः’ अर्थात् स्थावरों में हिमालय में स्वयं हूँ, कहा है।
देखने से निर्जीव पाषाण खण्ड प्रतीत होने वाला यह पर्वतराज प्रत्यक्ष देव है। यह अनन्त रहस्यों की दिव्य भूमि है। जीवन इसके कण-कण में है। आज भी इसकी छाया में अनेकों आश्चर्यजनक अनुसंधान चल रहे हैं, जिनके युगान्तरकारी प्रभाव इक्कीसवीं सदी में देखे जा सकेंगे। वहाँ के ऋषिगणों एवं देवशक्तियों की सतत् उपस्थिति के कारण आत्मसाधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीनकाल से लेकर अभी तक बना हुआ हैं। उन्हीं दिव्य सत्ताओं के प्रत्यक्ष आदेश से हिमालय की छाया और गंगा की गोद में शान्तिकुँज बनाया-बसाया गया था, ताकि जन-साधारण यहाँ साधना करके हिमालय के दिव्य अनुदानों का पा सकें और वहाँ के ऋषिगणों देवशक्तियों के सूक्ष्म संपर्क में आकर स्वयं को धन्य अनुभव कर सकें।
आज पंजाब के महाराजा ने विशेष बैठक बुलायी थी इसमें उन्होंने अपने सभी सामन्तों, सरदारों एवं सेनापतियों को आमंत्रित किया था। मन्त्रणा का विषय गम्भीर समस्या थी जिस उनके पड़ोसी काबुल देश के शासकों और निवासियों ने जन्म दिया था। आततायी कबायली अकस्मात पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में चोरी-छुपे घुस आते और खूब लूट-पाट मचाते। सरहद के नजदीक वाले गाँवों के लोग इतने आतंकित हो उठे कि वे अपने गाँवों छोड़कर भागने लगे।
लगातार हो रही इन वारदातों से पंजाब के महाराजा का चिन्तित होना स्वाभाविक था। उन्होंने अपने सभी सरदारों को इसी चिन्ता से अवगत कराने के लिए बुलाया था। वस्तुस्थिति जानकर सभी जोश में आ गए।
परन्तु समाधान क्या हो? महाराजा से अपने प्रधान सेनापति हरिसिंह नलवा की ओर इशारा किया। वह अभी तक चुपचाप बैठे सभी की बातें सुन रहे थे। युवा अवस्था का यह व्यक्ति देखने में जितनी कमनीय व मोहक था उतनी ही विचारशील। साथ में शौर्य का पुँज भी। उसकी बहादुरी के किस्से पंजाब के हर गाँव में कहे, सुने जाते थे। महाराज का संकेत पाकर उन्होंने कहना शुरू किया- “हम हिन्द के निवासी शान्तिप्रिय अवश्य हैं पर कायर नहीं। इस बात को हमें काबुल के निवासियों को उन्हीं के देश में जाकर बताना होगा।” हरिसिंह की इस बात का उपस्थिति सभी सरदारों ने एकमत से समर्थन किया। निर्णय यह हुआ कि उनके नेतृत्व में सेना काबुल की और प्रस्थान करे।
हरिसिंह नलवा का व्यक्तित्व अनोखा था। वे जितने बहादुर थे, उतने ही उदार भी। दीन-दुःखियों की सहायता करना और स्त्रियों को सम्मान देना उनकी विशेषता थी। उनके आक्रमण से सर्वत्र चीख-पुकार मच गयी। काबुलवासी भाग-भागकर जंगलों की शरण लेने लगे। काबुल का सरदार एकदम हतप्रभ हो उठा कि कैसे इस शौर्य के तूफान का मुकाबला किया जाय। उसने अपने सेनापति एवं वीर सामंतों को बुलाया। इस मन्त्रणा में सरदार की युवा पुत्री शहजादी मेहर भी शामिल हुई।
मेहर बेहद खूबसूरत थी। वह वीराँगना भी थी। जब सफेद कपड़े पहनकर वह घुड़सवारी करती तो देखने वालों को लगता जैसे परी जन्नत से जमीन पर उतरी हो। इस वक्त भी वह सभी में सफेद कपड़े पहनकर ही अपने पिता के पास बैठी थी। उस युवती की कजरारी आँखें पिता के उस सैनिक समूह पर लगी थी, जिसके बलबूते पर सरदार ने पंजाब जैसे वीर भूमि के नागरिकों को छेड़ा था।
अर्द्धरात्रि में नलवा के खेमें की ओर कबायली सैनिक बढ़ने लगे। किन्तु नलवा और उसकी सेना सतर्क थी । उन्होंने चारों ओर से कबायलियों को घेर लिया और युद्ध करने लगे। कितनी ही काबुल के सैनिक मौत के घाट उतर गए। हरिसिंह की तलवार तो जैसे बिजली जैसी चमकती थी। काबुल की सेना पर कहर ढाते हुए वह काबुल के सरदार के महल में घुस गया। मेहर ने सुना तो वह अपना घोड़ा दौड़ते हुए वहीं पहुँची पर तब तक हरिसिंह और उसके पिता के बीच युद्ध जम चुका था। काबुल का सरदार टिक न सका। वह हरिसिंह के हाथों मारा गया। हरिसिंह ने सरदार के सिर को धड़ से अलग कर दिया। रक्त का फव्वारा फूट पड़ा। मेहर चीख पड़ी और भागने लगी। उसे पकड़ने के लिए नलवा ने कोई चेष्टा नहीं की।
भागते-भागते घने जंगलों में आ गयीं मेहर का मन अपने पिता की मौत से बेहद आहत था। वह हर हालत में हिन्द से उस बहादुर सेनापति से बदला लेने के लिए कृतसंकल्प थी। वह सोचती रहती कि यदि आमने-सामने प्रतिशोध पूरा न कर सकी तो रूप-जाल में फँसाकर उसे खत्म करूंगी। आखिर वह युवा है, बहादुर होने के साथ मोहक भी है। उसका प्रचण्ड पौरुष मेरे मादक यौवन को देखकर पिघल जाएगा।
एक दिन मेहर को हरिसिंह के खेमे को सुराग मिल गया। वह रात के अँधेरे में अकेली ही तलवार खोंसकर निकल पड़ी। रात्रि का दूसरा पहर हो रहा था। पर नलवा के सैनिक पूरी मुस्तैदी से तैनात थे। मेहर को उन्होंने रोक दिया “तुम इधर क्यों आयी हो?”
“तुम्हारे सेनापति से मिलना है।” वह बोली।
प्रहरी चौंका इतनी रात को? “तुम सुबह आओ। वैसे भी हमारे सरदार किसी लड़की-वड़की से परहेज करते हैं। तुम चली जाओ।”
“असम्भव ! मैं हरिसिंह से मिले बिना नहीं जाऊँगी । तुम उनसे जाकर कहो कि काबुल के सरदार की बेटी मेहर आयी है।”
हरिसिंह ने सुना तो सादर बुला लिया। मेहर का वस्त्र-विन्यास, चेहरे के हावभाव उसके सौंदर्य को अधिकाधिक मादक बना रहे थे। रात्रि के क्षणों और नितान्त एकांतिकता ने किसी भी पुरुष का उन्मत्त कर देने वाली इस मादकता को और अधिक सहायता प्रदान करने की ठान ली थी। लेकिन हरिसिंह किसी और ही धातु के बने थे। उन्होंने उसकी ओर एक नजर डालकर मुसकराते हुए कहा-”बैठो बहिन।”
हरिसिंह की निश्छल मुसकान और बहिन के सम्बोधन से मेहर के मन की सारी विकृति धुल गयी। वह हतप्रभ होते हुए बोली, “ तुमने मुझे बहिन कहा।”
“हाँ, तुम उम्र में मुझ से कुछ छोटी होगी। इसीलिए मेरी छोटी बहिन ही हो। हमें तुम्हारे पिता के मारे जाने का बेहद अफसोस है। पर हमारी मजबूरी समझने की कोशिश करो। क्या तुम अपने यहाँ के लोगों के आतंक से परिचित नहीं हो । हमारी लगातार की चेतावनी से भी जब वे बाज नहीं आए, तब हमें सैनिक अभियान के लिए विवश होना पड़ा।”
मेहर सत्य से अवगत थी। लेकिन अभी तक उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था, कोई व्यक्ति इतना संवेदनशील और उज्ज्वल चरित्र वाला भी हो सकता है। क्योंकि उसके देश में यह असम्भव-सा था। उसने नतमस्तक होते हुए कहा- “भाई जान ! हमने आपकी बहादुरी के बहुत किस्से सुने थे। पर आज जान लिया कि उसका वास्तविक रहस्य क्या है।”
हरिसिंह मुसकराते हुए कहने लगे-”मेरे ही नहीं, किसी के भी शौर्य का रहस्य उसके उज्ज्वल चरित्र में निहित होता है।” अब मेहर सन्तुष्ट थी। वह धीमे कदमों से शिविर द्वार की ओर चल दी।
सत्य के सम्बन्ध में प्रायः यह कहा जाता है कि वह धर्म- अध्यात्म का विषय है। लोकव्यवहार से उसका कोई लेना देना नहीं। भौतिक जगत में तो सर्वत्र असत्य का ही बोलबाला है। सत्य की पूछ कहाँ होती ? यहाँ ईमानदारी औंधे मुँह गिरती और अपनी मौत मरती है, जबकि बेईमानी फूलती-फलती और विस्तार पाती है।
प्रथम दृष्टि में यह तर्क वास्तविक प्रतीत हो सकते हैं पर तनिक गहराई में उतरकर विचार करने पर उनकी .............स्पष्ट झलकने लगती है। यह ............ कि इन दिनों पग-पग पर छल-छल का सहारा लिया जाता है और कदम-कदम पर ऐसे कार्य किये जाते हैं, जिन्हें ......................ही कहना पड़ेगा। इतने पर भी यह कहना गलत न होगा कि सत्य की वैशाखियों के बिना इनकी गति नहीं, भले ही वह नकली ही सत्य क्यों न हो, पर आज की प्रपंचपूर्ण दुनिया में इनका अवलम्बन एक लौकिक व्यक्ति को भी उतना ही अनिवार्य महसूस होता है, जितना कि किसी सत्यान्वेषी को यह एक कटु सच्चाई है कि एक फरेबी भी अपना सौदा सत्य और तथ्य के आधार पर ही तय करता है, भले ही उसका निजी जीवन झूठ वादों से भरपूर हो। जब तक उसे यह भरोसा न हो जाय कि जो कुछ कहा या किया जा रहा है, वह शत-प्रतिशत सच है, तब तक वह उस पर विचार करने के लिए बाध्य नहीं होता। ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि व्यवहारिक जीवन में सत्य का महत्व न्यून और नगण्य जितना है? यथार्थता तो यह है कि आज क्षण-क्षण में हम झूठे-सच का जितना आश्रय लेते हैं उसे अभूतपूर्व ही कहना चाहिए। कदाचित् इसी का देखते हुए गोस्वामी तुलसीदास को यह लिखने के लिए मजबूर होना पड़ा- ‘झूठे लेना, झूठे देना, झूठे भोजन, झूठ चबेना’! यह आज की स्थिति का वास्तविक चित्रण है, किन्तु इस बात को भी दरगुजर नहीं किया जाना चाहिए कि इस झूठे सच ने व्यक्ति और समाज को जितनी दुष्टता और भ्रष्टता की ओर धकेला है, उतना वस्तुस्थिति को वास्तविक रूप में बता देने और स्वीकार लेने में सम्भवतः नहीं होता। अतः यह कहने में हर्ज नहीं कि यथार्थ सच्चाई अनेकों गुना खतरनाक और हानिकारक है। इसे यदि त्याग दिया जाय, तो समाज से न सिर्फ अवाँछनीयताएँ और अनैतिकताएँ घटेंगी, वरन् छोटा-बड़ा अमीर-गरीब जैसी कितनी ही विसंगतियों का सफाया हो जायेगा। नकली सब की छत्रछाया में इन्हें पलने-बढ़ने का अच्छा अवसर मिल जाता है। यह व्यवहार विकृति न हो, तो शायद असल की नकल के धोखे में आकर ठगने-ठगाने को मौका भी न रहे। यह भी इसी बात को सिद्ध करता है कि लौकिक जीवन में सत्य से बिल्कुल पल्ला छुड़ाकर नहीं जिया जा सकता। यह बात और है कि वहाँ उसका उद्देश्य ओछे स्तर की स्वार्थ सिद्धि होता है।
यंत्र-उपकरण बनाने वाली कम्पनियाँ अपने-अपने सामान को सर्वश्रेष्ठ स्तर का घोषित करती है। और उनके गुणों और विशेषताओं के संदर्भ में ऐसे इतने लुभावने विज्ञापन को विस्तार बाँधना पड़े, पर कसौटी में कसने पर यह विशेषताएँ कितनी खरी उतरती हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं। खोटे सिक्के और खोटे माल बनते और चलते रहते हैं। देखने में वे कितने असली प्रतीत होते हैं, पर फिर भी उनका खोटापन प्रकट हो ही जाता है। भला हीरे का मुकाबला काँच कैसे करे? स्वर्ण के आगे रोल्डगोल्ड की क्या औकात? कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली। जहाँ इस विशाल अन्तर को पाटने का प्रयास किया गया हो, वहाँ निर्माण-कौशल और निर्माता की प्रशंसा ही करती होगी, जो पहली दृष्टि में खोटे के खरे होने का भ्रम पैदा करते हैं। कितनी ही लोग इसी भ्रान्ति में पड़कर आये दिन छले जाते हैं। वास्तव में झूठ को चलाने के लिए सत्य की प्रतीत खड़ी करनी पड़ती है, तब जाकर बात बनती है। बिजूके की भूमिका से कौन परिचित नहीं है? सभी जानते हैं कि कृषक लोग पशु-पक्षियों को धोखा देने और प्रहरी की उपस्थिति का झूठा एहसास करने के लिए निर्जीव और नकली रखवाले बनाकर खड़े करते हैं। कुर्ता , पाजामा , टोपी पहनाकर उन्हें असली छवि प्रदान करते हैं। पक्षियों को इससे यथार्थ रखवाले को भ्रम पैदा होता है और वे उससे दूर-दूर बने रहते हैं। यह भी इस बात को प्रमाणित करता है कि सत्य में अप्रतिम शक्ति है, भले ही खोटा होने के कारण उसका प्रभाव सामाजिक ही क्यों न हो, पर मनीषी इस तथ्य से सहमत हैं कि वह शक्तिवाला है और प्रभावित क्षमता है उसके विपरीत असत्य की शक्ति की पोल उस समय खुलती है जब उसकी वास्तविकता का पता सर्वसाधारण का लगता है, तब कैसी घोर जुगुप्सा उसके प्रति उत्पन्न होती है, यह भी सर्वविदित है।
मिलावटखोर अपनी वस्तुओं की शुद्धता के बारे में ऐसी-ऐसी कसमें खाते हैं, जैसे कलियुग में कोई सतयुगी सत्यानुरागी पैदा हो गया हो और असत्य जिसे स्पर्श तक न कर सका है। इसी आधार पर वे अपने माल खपाते और बाजार बनाते हैं। जब तक मिथ्या छुपी रहती, तब तक वे खूब पैसा कमाते हैं। असलियत के उजागर होते ही, दूसरे नाम और दूसरे लेबल से उन्हें पुनः बेचने लगते। इस बार भी एक से एक बढ़कर दवे , पड़ताल की घड़ी आते ही सब झूठ साबित होते हैं।
आध्यात्मिक सिद्धान्तों के प्रबल पक्षधर धर्मतंत्र के दावे भी अब सत्य और तथ्य पर कहाँ पक्के उतरते हैं? अधिकाँश मामलों में उसका आचरण दोहरे व्यक्तित्व का सा होता है। सामने उच्चादर्शों की बाते पीछे व्यक्तित्व का खोखलापन, पर इस आकर्षक मुखौटे के कारण धर्म अध्यात्म के प्रति अब भी लोगों का कुछ आकर्षण बना हुआ है। सही रास्ता सुझाने और उपयुक्त मार्ग में ले चलने वाले तो इक्के दुक्के संस्थान होते हैं, शेष तो दिग्भ्रम पैदा करते हैं। इसके बावजूद धर्म और धार्मिकता अब भी जीवित है। कारण एक ही सत्य का स्वाँग।
कहते हैं कि शासन-सत्ता अथवा राजनीति झूठ का सहारा लिये बिना चलती नहीं, पर इसमें सच्चाई का अल्पाँश भी नहीं है। यदि राजनीति के तत्वार्थ पर विचार किया जाय, तो हम पायेंगे कि राजसत्ता (अथवा शासनसत्ता) के संचालन के निमित्त जो नीति निर्धारित होती है, वास्तव में वही ‘राजनीति’ है । इसमें अनीति, कूटनीति जैसे शब्दों का लेशमात्र भी भाव नहीं। अतः यह कहना गलत होगा कि अन्याय का अवलम्ब लिये बिना कोई राजनेता नहीं बन सकता। यथार्थ में आज राजनीति जिस कदर पतित और भ्रष्ट हुई है कि जब कभी इसकी चर्चा होती है, तो ध्यान इसके शब्दार्थ की ओर न जाकर अनायास भावार्थ की ओर खिंच जाता है। वर्तमान में यह बुराई की पर्याय बनी हुई है। इसलिए शासनतंत्र से पृथक अन्य क्षेत्रों में भी लोग दूसरों के दाँव-पेंच भरे व्यवहार को इंगित करने के लिए उक्त शब्द का बहुतायत से प्रयोग करते हैं। राजनीति यदि वस्तुतः यही है, तो अब इसका उपनयन संस्कार होना ही चाहिए और अर्थबोध कराते हुए यह दीक्षा दी जानी चाहिए कि गरिमा के अनुरूप व्यवहार हो अन्यथा हेय अवस्था में पड़ी रहकर राजनेताओं को और ही न बनायेगी तथा राष्ट्र को घोर विपत्ति में धकेल कर जनता का अपार अहित करेगी। यों नीति का अर्थ सत्य, धर्म, सदाचार है। इस दृष्टि से राजनीति वह हुई जिसमें इन सभी तत्वों का समावेश हो। यही वह स्थिति है जिसमें वह अपने सम्पूर्ण भाव को प्रकट करती है। इस रीति से विचार करने पर यही विदित होगा कि राजनीति भी प्रकारान्तर से हमें सत्याचरण की ही प्रेरणा देती है। इसमें अन्याय को अपनाने अथवा अनीति को आश्रय देने जैसी कोई बात नहीं।
जो सत्य आचरण को केवल अन्तःकरण के लिए आवश्यक बताते हैं वह वस्तुतः हमें दिग्भ्रान्त करते हैं जो यह कहते हैं कि ध्यान ही सत्य है और इसी के द्वारा सत्य के आलोक तक पहुँचा जा सकता है, वह भी एक प्रकार का छलावा है। सच तो यह है कि वाह्य जीवन में शीलवान हुए बिना न ध्यान जमाया जा सकता है।, न अंतर्जगत में प्रवेश किया जा सकता है। यह सूत्र एकदम गलत है कि सत्य का परिपालन अंतर्जगत विषय है, बाहरी दुनिया में इसकी कोई जरूरत नहीं। जब बाहर काक द्वार ही बन्द हो , तो अन्दर प्रवेश पाना किस प्रकार सम्भव होगा? मनुष्य का व्यावहारिक जीवन ही यदि मलिन ओर विकृत रहे तो भला यह आशा कैसे की जा सकती है कि अन्तःकरण पवित्र होगा और ध्यान प्रखर। प्रवेश द्वारा बाहर से भीतर की ओर खुलता है, बाहर बन्द रहने पर अन्दर जाने का मार्ग भी अवरुद्ध ही बना रहेगा। जो व्यवहार को गन्दा रख कर अन्तराल को निर्मल बनाने की बात सोचते हैं उन्हें नादान ही , नासमझ भी कहना पड़ेगा, कारण कि मानवी सत्ता एक सम्पूर्ण इकाई है, वह अन्दर-बाहर अलग-अलग नहीं हो सकती।
काँटे से काँटा निकालने का सिद्धान्त प्रसिद्ध है? लोहा काटना हो तो लोहा चाहिए। विष का इलाज
विष से करना पड़ता है। दीपक को दीपक जलाने में समर्थ है। इसी प्रकार सत्य की प्राप्ति सत्य से ही हो सकती हैं। असत्य आचरण तो इससे कोसों दूर ले जाता है अतः यह कहना ठीक ही है कि सत्य की जितनी आवश्यकता आत्मोन्नति के लिए है, उससे तनिक भी कम वाह्य व्यापार और लोकव्यवहार पर आदृत है। यदि वस्तुस्थिति यही होती तो ईमानदारों की पूजा कहीं ओर कभी नहीं होती, उसे पुरस्कृत नहीं किया जाता, सर्वत्र उसकी अवमानना होती। छल-बल से बेईमान जीत भले जाएँ पर गहराई में उतरकर इस बात की छानबीन की जाय कि सही अर्थों में कौन जीत? कौन हारा तो ज्ञात होगा कि हारे हुए सत्य में वह गर्व , गौरव और संतोष होता है, जिसे असत्य जीत कर भी प्राप्त नहीं कर सकता। उसकी अन्तरात्मा उसे धिक्कारती है। महाभारत युद्ध के दौरान जब कर्ण का अन्यायपूर्ण वध हुआ, तो कहने को तो पांडवों की जीत सुनिश्चित हो गई पर उस तथाकथित विजय पर भगवान का मन कितना उदास था उसे युधिष्ठिर को कहे गये भगवान के इस कथन से स्पष्ट जाना जा सकता है-
उदासी से भरे भगवान बोले-
न भूलें आप केवल जीत को लें, नहीं पुरुषार्थ केवल जीत में हैं, विभा का सार शील पुनीत में हैं। -रश्मिरथी
बाबा भारती और खड्ग सिंह की कहानी भी इसी को उजागर करती है कि अनैतिक की कहीं गति नहीं उसकी सर्वत्र पराजय होती है। यदि दैनिक जीवन में सत्य का मिथ्या आवरण न चढ़ाया जाय, तो भला कौन किसको प्रवंचना में डाल सकेगा? सत्य का सब्जबाग ही व्यक्ति का कुचक्र में फँसाता है। यही असत्य की नैतिक हार हुई। इस दृष्टि से विचार करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा और यही कहना पड़ेगा कि “सत्यमेव जयतिनानृतं” सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं। मुंडकोपनिषद् के ऋषि सिर्फ इतना ही कहकर नहीं रुक गये, वह आगे भी कहते है-
सत्येन पन्था वितो देवयानः। येनाक्रमनतयृषये ह्मपप्तकामा, यत्र तत्सत्यस्यंभरमं निधानम्
अर्थात् जिस मार्ग से आप्तकाम ऋषिगण जाते है। और जहाँ उस सत्य का परम निधान है ऐसा देवों के द्वारा ही खुलता है स्पष्ट है, सत्य पथ के बिना मनुष्य की कोई गति नहीं।
यहाँ यह कहना समीचीन न होगा कि सांसारिक दायित्वों के परिपालन में हम असत्य ही असत्य का सहारा लेते हैं आश्रय तो सत्य की ही लेते हैं, अन्तर सिर्फ इतना है कि वह मिथ्या के लिए और मिथ्या की नींव पर खड़ा होता है। हम कुछ साहस करें पराक्रम दिखाये, छलाँग लगाये तो अगले चरण में वह भी शक्य हो सकता है, जिसमें सत्य का अवलम्बन केवल सत्य के लिए हो, मिथ्या के लिए नहीं यही प्रयोज्य है, यही लक्ष्य है, यही उद्देश्य है और इसी में मनुष्य जन्म की सार्थकता भी।
राम्या जैसे अन्वेषकों ने इस क्षेत्र में समर्थ सिद्ध पुरुषों का अस्तित्व पाया है। दो सौ साल से अधिक समय तक जीवित रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रम जी महाराज के ऐसे अनेक संस्मरणों को लेखन यशपाल जैन तथा अन्य जिज्ञासुओं ने किया है, जिनसे उस क्षेत्र की दिव्य रहस्यमयता उजागर होती है। महामना मदनमोहन मालवीय स्वयं कृष्णाश्रम जी के भक्त थे ओर उनके भक्ति पूर्ण आग्रह से विवश होकर ही उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी थी। स्वामीजी नग्न अवधूत की तरह हिमप्रदेश में निवास करते थे।
हिमालय में जितने छोटे-बड़े तीर्थ स्थान है, उतने अन्यत्र मिलने कठिन है। हरिद्वार इस देवभूमि का द्वार है। यहाँ से आगे बढ़ते ही ऋषिकेश से बद्रीनाथ जाने के रास्ते में देवप्रयाग, नन्दप्रयाग कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग आदि कितने ही प्रयाग तथा उत्तरकाशी, गुप्तकाशी, दिव्यकाशी आदि कितने ही तीर्थ मिलते हैं। इनकी प्रख्याति भले अमरनाथ, ज्वालामुखी, बद्रीनाथ, गंगोत्री जितनी न हो पर दिव्यता को कोई अनुभवी समझ सकता है। ऐसे अनेक छोटे-छोटे तीर्थों की शृंखला यहाँ बिखरी पड़ी है। जिसका सान्निध्य व्यक्ति के अधोमुखी मन को सहज ऊर्ध्वमुख बना देता है। शिव और शक्ति के विभिन्न रूपों के देवस्थान थोड़ी दूर पर गाँवों के समीप एवं पर्वतीय घाटियों में सर्वत्र पाए जाते हैं। सती के आत्मविसर्जन का, पार्वती की साधना का यही स्थान है। शिव ताण्डव भी यहीं हुआ था। उसी अवसर पर उपयोग में लाया गया त्रिशूल उत्तरकाशी के एक प्राचीन स्थान में स्थापित बताया जाता है। जमदग्नि और परशुराम की तप-साधना उत्तरकाशी में ही सम्पन्न हुई थी।
ज्ञान-विज्ञान के अनेकों अनुसंधान इसी देवभूमि के दिव्य अंचल में सम्पन्न होते रहें हैं। रसायन विद्या, आयुर्वेद विचारो की खोज योग विज्ञान के महत्वपूर्ण प्रयोग यहीं की उपज है। सप्तऋषियों की महामनीषी देवमानवों का कार्यक्षेत्र यही भूमि रही है। प्राचीन भारत के स्वर्णिम भाग्य का निर्माण करने वाले गुरुकुल एवं आरण्यकों की परम्परा ने यहीं से जन्म पाया था। राजतन्त्रों के सूत्र संचालक महर्षि वशिष्ठ जैसे धर्माध्यक्षों की तपस्थली यही थी। महाभारत जैसे विश्वकोष स्तर के ग्रन्थ की रचना महर्षि व्यास ने बद्रीनाथ के पास व्यास गुफा में ही बैठकर की थी। लगभग सभी महत्वपूर्ण ऋषिकल्प देवात्माओं की तरह-तरह की गतिविधियाँ हिमालय की सुरम्य घाटियों एवं कन्दराओं में सुविकसित होती रही हैं। उन्हीं प्रयागों से लाभान्वित होकर भारतवर्ष के 33 करोड़ नागरिक कोटि देवता कहलाए। भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की उच्चस्तरीय विभूतियों से भरी-पूरी होने के कारण भारतभूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती रही है। इसकी स्वर्गीय परिस्थितियाँ एवं विभूतियाँ सभी के आकर्षण का केन्द्र बनीं थी। इसे यह वरदान हिमालय ही देता रहा है। जलधारा वाली भागीरथी ही नहीं देवलोक की ज्ञानगंगा का अवतरण एवं प्रवाह भी इसी क्षेत्र से आरम्भ होता रहा है।
बात स्वर्ग की चली, तो इतिहासकार एवं भूगोलवेत्ता दोनों ही इस दृष्टि से एक मत हैं कि प्राचीन समय का स्वर्ग कोई ऐसा स्थान होना चाहिए, जहाँ लोगों का आना जाना बिना किसी खास कठिनाई के होता रहता हो। जहाँ भौतिक समृद्धि एवं आत्मिक विभूतियों की प्रचुरता हो। पौराणिक साहित्य में दशरथ, नारद, नहुष आदि के ऐसे अनगिनत कथानक हैं जिनमें स्वर्ग जाना और वापस आना कुछ उसी तरह बताया है जैसे हम लोग सामान्य स्थानों पर बिना किसी खास कठिनाई के चले जाते हैं। पाण्डवों के स्वर्गारोहण की तुक इसी प्रकार बैठती है कि वे जिन्दगी के अन्तिम समय में उसी शान्तिमय क्षेत्र में रहने के लिए चले आए थे। पाण्डवों ने अन्त समय स्वर्ग के जिए जहाँ से प्रयाण किया था, वह स्वर्गारोहण पर्वत अभी भी वसोधारा पठार के आगे विराजमान है। यह स्वर्ग क्षेत्र उस प्रदेश में था जिसे बद्रीनाथ और गंगोत्री का मध्यवर्ती भाग कह सकते हैं यह हिमालय का हृदय है।
दिव्यदर्शी, समाधिलीन योगियों का मत है कि ब्रह्माण्ड की सघन अध्यात्म चेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इसी क्षेत्र में होता है। भौतिक शक्तियों के धरती पर अवतरण का केंद्रबिंदु विज्ञानवेत्ता ध्रुव प्रदेश को मानते हैं। अध्यात्मवेत्ताओं की वैसी ही मान्यता इस हिमालय के हृदय के सम्बन्ध में है। यह स्वर्ग क्षेत्र ब्रह्माण्डव्यापी दिव्य चेतनाओं का अवतरण केन्द्र है। जहाँ शोध करते हुए, तप करते हुए महामनीषी अपने देवशक्तियों से सुसज्जित करते हैं। अभी भी उस क्षेत्र में स्थूल और सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य सत्ताओं के आस्तित्व पाये जाते हैं। वे अपने क्रियाकलाप से समस्त भूमण्डल को प्रभावित करते हैं।
देवराज इन्द्र की सहायता के लिए महाराज दशरथ अपना रथ लेकर गए थे। पहिया गड़बड़ाने लगा तो महारानी कैकेयी ने उस विपत्ति का समाधान अपने का जोखिम में डालकर किया था। कुछ इसी तरह का आख्यान अर्जुन के बारे में है। जब वे इन्द्र के यहाँ गए थे, तो उर्वशी ने उन्हें सम्मोहित करने की कोशिश की थी, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। जहाँ मनुष्य आ जा सके, वह स्थान धरती पर ही सम्भव है। चन्द्रमा और इन्द्र का मिलजुल कर ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या से छल करना धरती पर ही सम्भव है। दधीचि का देवताओं को अस्थिदान आदि अनेकों पौराणिक आख्यान ऐसे हैं जिसमें देवों और मनुष्यों के सघन सहयोग की चर्चा है। इन पर विवेकपूर्ण ढंग से सोचें तो इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि स्वर्ग कहीं इस धरती का कोई भूभाग है और देवता मनुष्यों का ही कोई वर्ग विशेष। इसका समाधान उत्तराखण्ड को ही देवभूमि स्वर्ग मान लेने से हो सकता है। इस क्षेत्र में अभी भी भ्रमण करके ऐसे अनेकानेक प्रमाण उठाए जा सकते हैं जिनके आधार पर पौराणिक स्वर्ग की संगति इस प्रदेश के साथ बिठाई जा सके।
देवार्चन हर मनुष्य का अनिवार्य कर्तव्य था। गीता में भी यज्ञ से देवों की पुष्टि की बात कही गयी है। इसे सर्वसाधारण द्वारा देव प्रयोजनों के लिए विविध-विधि अनुदान प्रस्तुत करना समझा जाना चाहिए। यज्ञ का सीधा मतलब अर्थदान एवं त्याग बलिदान है। देव प्रयोजनों के लिए श्रम, समय, मन, धन आदि से सहयोग करते रहना है। यज्ञ से पूजित देवता मनुष्यों पर सुख-शान्ति बरसाते हैं और यज्ञ न करने वाले विपत्ति में फँसते हैं। गीताकार का यह कथन जन सामान्य देववर्ग को, देवकर्म को समुचित सहयोग प्रदान करते रहने की अनिवार्य आवश्यकता का उद्बोधन कराता है। यह देवगण और कोई नहीं उस समय स्वर्ग क्षेत्र में निवास करने वाले, धर्म प्रेरणाओं एवं भावात्मक परिष्कार के अनगिनत आधारों का निर्माण करने वाले तपस्वीगण ही थे। समस्त विश्व में स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण करने के लिए उनका महाप्रयास जनसाधारण को देवार्चन एवं देवपूजन के लिए अनायास प्रेरित करता था।
स्वर्गीय विभूति कहे जाने वाले कैलाश और मानसरोवर भारतीय हिमालय क्षेत्र में तब भी थे और आज भी है। कैलाशवासी भगवान शंकर कि सिरे से गंगा प्रवाहित होती है, इसकी संगति तिब्बत के कैलाश से मेल नहीं खाती। क्योंकि वहाँ गंगा का गोमुख तक आना भौगोलिक स्थिति के कारण किसी भी तरह सम्भव नहीं है। गंगोत्री से जेलूखागा घाटी होते हुए कैलाश की दूरी लगभग 300 मील है। फिर बीच में कई आड़े पहाड़ आए हैं, जिसकी वजह से कोई जलधारा या हिमधारा वहाँ तक नहीं पहुँच सकती । असली शिवलोक इस धरती के स्वर्ग में ही हो सकता है। शिवलिंग पर्वत के समीप ही गंगा ग्लेशियर है। स्वर्ग गंगा उसी जगह है। गौरी सरोवर की मौजूदगी भी वहीं है। इस तरह गंगा धारण करने वाले महादेव शिव का कैलाश यह हिमालय का हृदय ही हो सकता है। यदि प्राचीन कैलाश यहाँ न रहा होता तो भगीरथ यहाँ तपस्या करने की बजाए शायद तिब्बत चले जाते। इस पुण्यभूमि में शिवलिंग, केदार शिखर और नीलकण्ठ शिखर तीनों ही भगवान शिव के निवास हैं। मानसरोवर की उपस्थिति भी इस देवभूमि में स्वाभाविक है। सुरालय, हिमधारा, सत्पथ हिमधारा तथा वरुण वन नामों से इस क्षेत्र का देवभूमि होना प्रमाणित होता है। अष्ट वसुओं ने जो जगह अपने निवास के लिए चुनी वह वसुधारा भी अलकापुरी के पास ही है। इन सब तथ्यों पर विचार करने से वास्तविक कैलाश एवं मानसरोवर की उपस्थिति इसी प्रदेश में सिद्ध होती है।
इन दिनों तिब्बत वाला कैलाश चीन के प्रतिबन्धों के कारण यात्रा की दृष्टि से सुविधाजनक नहीं है। सरकार जिस यात्रा का प्रबन्ध करती भी है, उसका व्यय भार उठाना औसत नागरिक के बूते की बात नहीं। फिर वहाँ न अपनी भाषा है, न संस्कृति। वहाँ पहुँचकर विदेश जैसा अनुभव होता है। सम्भव है जब कभी भारतीय संस्कृति वहाँ रही हो वह स्थान भी उपयुक्त तीर्थ रहा होगा। पर शिव का वास्तविक निवास, गंगा का असली उद्गम और सच्चे मानसरोवर का दर्शन करना हो तो हमें हिमालय के इसी हृदय क्षेत्र में खोज करनी पड़ेगी। सत्यान्वेषी जिज्ञासु चाहें तो तिब्बत वाले कैलाश और इस हिमालय के हृदय वाले कैलाश यात्रा करके स्वयं निर्णय कर सकते हैं उन्हें स्वयं अनुभव होगा कि यह स्थान कितने दिव्य वातावरण से परिपूर्ण है। तथ्य तो यही है कि असली कैलाश एवं मानसरोवर इसी क्षेत्र में है। वहाँ किसी विदेशी ताकत की छाया भी नहीं पड़ सकती।
हिमालय की यही स्वर्गभूमि भारतीय संस्कृति की उदय भूमि रही है। इस सत्य की स्वीकारोक्ति श्री साहनी ने ‘मैन इन हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड’ में की थी। इतिहासकार भी अब मानने लगे हैं कि आर्यों का आदि निवास हिमालय में ही था। स्वर्गलोक का जो विवरण पुराणों में मिलता है वह प्रायः कवित्वपूर्ण होने के कारण जहाँ एक ओर उदात्त दृष्टिकोण लिए हैं, वही उत्कृष्ट भाव अभिव्यंजना सजाए है। यह शैली उपयुक्त भी है। लेकिन इसके आधार पर यदि उसका भौगोलिक स्वरूप ढूँढ़ना हो और सौंदर्य पूर्ण वातावरण तलाशना हो तो वह किसी अन्य ग्रह में नहीं बल्कि इसी हिमालय में परिलक्षित होता है।
महाभारत में एक कथा आती है कि अर्जुन द्रौपदी से आग्रह करते हैं कि वह कोई उपहार माँग ले। उत्तर में संकोचपूर्ण स्वर में द्रौपदी कहती है कि मेरे लिए नन्दन वन के पारिपाज पुष्प ला दें, जो जल में नहीं पत्थरों में खिलते हैं। जिनका सौंदर्य स्वर्गीय दिव्यता की अनुभूति करा देता है। कथा के अनुसार अर्जुन, हिमालय पहुँच कर नन्दन वन गए। उन्हें वहाँ के रक्षकों से युद्ध करना पड़ा ओर वहाँ से एक पारिजात पुष्प द्रौपदी के लिए ले आए।
यह नन्दन वन हिमालय क्षेत्र के पुष्पोद्यान का नाम है। यह स्थान गोमुख के आगे तपोवन पार करने पर मिलता है। शिवलिंग पर्वत के पास ही यह क्षेत्र फैला है। यहाँ वर्षा ऋतु के बाद ही बसन्त छा जाता है और सारा फूलों के गलीचे की तरह अपरिमित सुषमा से भर जाता है। ऐसा ही एक बगीचा यातायात के दृष्टि से सुलभ स्थान पर भी है। यह फूलों की घाटी के नाम से मशहूर है। समुद्र तल से 13200 फीट की ऊँचाई पर अवस्थित वह उद्यान विश्वविख्यात है। दस-पन्द्रह मील के इस इलाके में प्राकृतिक रूप से उगने वाले हजारों प्रकार के चित्र-विचित्र पुष्प अनायास ही खिलते हैं। संसार में ऐसा सुंदर और अद्भुत क्षेत्र अन्यत्र कहीं नहीं है। इसे देखने के लिए हर साल हजारों-हजार देशी-विदेशी पर्यटक हर साल पहुँचते हैं।
प्रकृति की इस अनुपम छटा के बारे में विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह उत्पादन प्रकृति का नहीं, विचारशील व्यक्तियों द्वारा अतीत में किया गया शुभारम्भ है। यह पौधे सुनियोजित ढंग से विकसित किये गए हैं। सम्भव है यहाँ कोई महर्षि का तपोवन अथवा फिर कोई राजोद्यान रहा हो एवं भूगर्भ वैज्ञानिकों को इस पूरे क्षेत्र में यज्ञों के उपकरण, बहुमूल्य धातुपात्र, आभूषण अस्त्र आदि भी मिल हैं। जिनसे स्पष्ट होता है इस क्षेत्र में कभी सुसभ्य लोग रहते थे।
जोशीमठ ही नहीं अब बद्रीनाथ तक पक्की सड़क बन गयी है। जोशीमठ से बद्रीनाथ जाने वाली सड़क पर बीच में गोविन्द घाट उतरना पड़ता है, वहाँ से 7 मील पैदल चलकर घाघरिया एक स्थान है। यहाँ से फूलों की घाटी तक एक घण्टे को रास्ता है। कामेट झरना यहाँ का बहुत बड़ा दर्शनीय स्थल हैं यहीं पास के क्यूड़ गाँव से फूलों की घाटी की शुरुआत हो जाती है। जो दस-पन्द्रह मील के बड़े दायरे में फैली हुई है। घाटी की दाहिनी ओर ‘कुबेर भण्डार’ पर्वत है। लोक मान्यता है कि यहीं कहीं देवलोक के कोषाध्यक्ष कुबेर की प्रचुर सम्पदा अभी भी दबी पड़ी है।
गंगा ग्लेशियर से आगे गहन हिमधारा व वरुण वन है। कहते हैं यह पूरा क्षेत्र वरुण देवता का कार्यक्षेत्र रहा है। यहाँ से सुमेरु पर्वत को भली प्रकार देखा जा सकता है। सुबह-शाम के सूर्योदय और सूर्यास्त में इसकी स्वर्णिम आभा इसे सचमुच के स्वर्ण शिखर का रूप देती है। स्वर्णिम सूर्य रश्मियाँ बर्फ से ढकी चोटियों पर जब प्रतिबिम्बित होती है, तब यह पर्व ऐसा लगता है माना सोने का बना हो। पुराणों से इसी सुमेरु को देवताओं का निवास और स्वर्ण विनिर्मित बताया गया है यह उपमा प्रातः और सायंकालीन सुमेरु को देखकर अभी भी चरितार्थ होती है। स्वर्ग में सुमेरु होने की पौराणिक मान्यता से इसी क्षेत्र का स्वर्ग होना सिद्ध होता है।
हिमप्रदेश में इन्द्रधनुषों की बाढ़ सी रहती है। झरनों में, उड़ती फुहारों में बादलों में घाटियों में नमी के कारण उन पर प्रतिबिम्बित होने वाली सूर्य किरणें चित्र-विचित्र रंग के इन्द्रधनुष बनाती हैं। लगता है देवों के ये सप्तवर्ण आयुध इस क्षेत्र में अपना और अपनी अधिपति देव सत्ताओं का आस्तित्व इस क्षेत्र में होने का प्रमाण देते हैं।
हिमालय प्रकृति-शोभी, वन, सम्पदा, बलिष्ठ-जलवायु एवं आध्यात्मिक वातावरण का ही धनी नहीं है, यहाँ प्राचीनकाल में सुविकसित राजसत्ताएँ भी पनपी हैं। पुरातनकाल में इस क्षेत्र के राजा इन्द्र की पदवी धारण करते थे। मध्यकाल में भी महाभारत के अनुसार द्विगर्त ,विगर्त राज्य यहीं के थे। काश्मीर, नेपाल, गढ़वाल, हिमाचल जैसे प्रान्त एवं देश हिमालय की ही सीमा के अंतर्गत है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भूमि समूचे भारत की एक चौथाई हिस्सा है। पंजाब एवं उत्तर प्रदेश के एक बड़े भाग को हिमालय की छाया में रहने का सौभाग्य प्राप्त है।
हिमालय की आत्मा आर्ष साहित्य में ऋषिगणों के माध्यम से मुखरित हुई है। प्रायः सभी पुराणों में इसकी महिमा का गान है। मेघदूत, हर्ष चरित, कुमार सम्भव आदि अनगिनत संस्कृत काव्यों में इसके सौंदर्य की छटा घटनाएँ ही प्राचीन भारतीय साहित्य का आधार है। हिमालय का अनुदान-अवतरण ही उत्तरी पूर्वी एवं पश्चिमी भारत को जल दान देता है। पंजाब-सिन्ध के लिए पंचनद। असम से लेकर वर्मा के लिए ब्रह्मपुत्र। उत्तर प्रदेश, विहार, बंगाल के लिए गंगा यमुना, सरयू आदि सभी हिमालय की देन हैं। बादल बरसते हैं यह ठीक है, पर वस्तुतः निरन्तर हिमालय ही बरसता है। उसके भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही महत्व हैं। भौतिक में वन-सम्पदा , वनस्पति, औषधि, पत्थर तथा खनिज। आध्यात्मिक में वातावरण जिसके प्रभाव से वहाँ का जनसामान्य अभी भी अपेक्षाकृत ईमानदार एवं सदाचारी है। देवताओं, ऋषियों, तपस्वियों का क्रीड़ाप्राँगण है। इसी से तो भगवान ने गीता में ‘स्थावरणाँ हिमालयः’ अर्थात् स्थावरों में हिमालय में स्वयं हूँ, कहा है।
देखने से निर्जीव पाषाण खण्ड प्रतीत होने वाला यह पर्वतराज प्रत्यक्ष देव है। यह अनन्त रहस्यों की दिव्य भूमि है। जीवन इसके कण-कण में है। आज भी इसकी छाया में अनेकों आश्चर्यजनक अनुसंधान चल रहे हैं, जिनके युगान्तरकारी प्रभाव इक्कीसवीं सदी में देखे जा सकेंगे। वहाँ के ऋषिगणों एवं देवशक्तियों की सतत् उपस्थिति के कारण आत्मसाधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीनकाल से लेकर अभी तक बना हुआ हैं। उन्हीं दिव्य सत्ताओं के प्रत्यक्ष आदेश से हिमालय की छाया और गंगा की गोद में शान्तिकुँज बनाया-बसाया गया था, ताकि जन-साधारण यहाँ साधना करके हिमालय के दिव्य अनुदानों का पा सकें और वहाँ के ऋषिगणों देवशक्तियों के सूक्ष्म संपर्क में आकर स्वयं को धन्य अनुभव कर सकें।
आज पंजाब के महाराजा ने विशेष बैठक बुलायी थी इसमें उन्होंने अपने सभी सामन्तों, सरदारों एवं सेनापतियों को आमंत्रित किया था। मन्त्रणा का विषय गम्भीर समस्या थी जिस उनके पड़ोसी काबुल देश के शासकों और निवासियों ने जन्म दिया था। आततायी कबायली अकस्मात पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में चोरी-छुपे घुस आते और खूब लूट-पाट मचाते। सरहद के नजदीक वाले गाँवों के लोग इतने आतंकित हो उठे कि वे अपने गाँवों छोड़कर भागने लगे।
लगातार हो रही इन वारदातों से पंजाब के महाराजा का चिन्तित होना स्वाभाविक था। उन्होंने अपने सभी सरदारों को इसी चिन्ता से अवगत कराने के लिए बुलाया था। वस्तुस्थिति जानकर सभी जोश में आ गए।
परन्तु समाधान क्या हो? महाराजा से अपने प्रधान सेनापति हरिसिंह नलवा की ओर इशारा किया। वह अभी तक चुपचाप बैठे सभी की बातें सुन रहे थे। युवा अवस्था का यह व्यक्ति देखने में जितनी कमनीय व मोहक था उतनी ही विचारशील। साथ में शौर्य का पुँज भी। उसकी बहादुरी के किस्से पंजाब के हर गाँव में कहे, सुने जाते थे। महाराज का संकेत पाकर उन्होंने कहना शुरू किया- “हम हिन्द के निवासी शान्तिप्रिय अवश्य हैं पर कायर नहीं। इस बात को हमें काबुल के निवासियों को उन्हीं के देश में जाकर बताना होगा।” हरिसिंह की इस बात का उपस्थिति सभी सरदारों ने एकमत से समर्थन किया। निर्णय यह हुआ कि उनके नेतृत्व में सेना काबुल की और प्रस्थान करे।
हरिसिंह नलवा का व्यक्तित्व अनोखा था। वे जितने बहादुर थे, उतने ही उदार भी। दीन-दुःखियों की सहायता करना और स्त्रियों को सम्मान देना उनकी विशेषता थी। उनके आक्रमण से सर्वत्र चीख-पुकार मच गयी। काबुलवासी भाग-भागकर जंगलों की शरण लेने लगे। काबुल का सरदार एकदम हतप्रभ हो उठा कि कैसे इस शौर्य के तूफान का मुकाबला किया जाय। उसने अपने सेनापति एवं वीर सामंतों को बुलाया। इस मन्त्रणा में सरदार की युवा पुत्री शहजादी मेहर भी शामिल हुई।
मेहर बेहद खूबसूरत थी। वह वीराँगना भी थी। जब सफेद कपड़े पहन कर वह घुड़सवारी करती तो देखने वालों को लगता जैसे परी जन्नत से जमीन पर उतरी हो। इस वक्त भी वह सभी में सफेद कपड़े पहनकर ही अपने पिता के पास बैठी थी। उस युवती की कजरारी आँखें पिता के उस सैनिक समूह पर लगी थी, जिसके बलबूते पर सरदार ने पंजाब जैसे वीरभूमि के नागरिकों को छेड़ा था।
अर्द्धरात्रि में नलवा के खेमें की ओर कबायली सैनिक बढ़ने लगे। किन्तु नलवा और उसकी सेना सतर्क थी । उन्होंने चारों ओर से कबायलियों को घेर लिया और युद्ध करने लगे। कितनी ही काबुल के सैनिक मौत के घाट उतर गए। हरिसिंह की तलवार तो जैसे बिजली जैसी चमकती थी। काबुल की सेना पर कहर ढाते हुए वह काबुल के सरदार के महल में घुस गया। मेहर ने सुना तो वह अपना घोड़ा दौड़ते हुए वहीं पहुँची पर तब तक हरिसिंह और उसके पिता के बीच युद्ध जम चुका था। काबुल का सरदार टिक न सका। वह हरिसिंह के हाथों मारा गया। हरिसिंह ने सरदार के सिर को धड़ से अलग कर दिया। रक्त का फव्वारा फूट पड़ा। मेहर चीख पड़ी और भागने लगी। उसे पकड़के के लिए नलवा ने कोई चेष्टा नहीं की। भागते-भागते घने जंगलों में आ गयीं मेहर का मन अपने पिता की मौत से बेहद आहत था। वह हर हालत में हिन्द से उस बहादुर सेनापति से बदला लेने के लिए कृतसंकल्प थी। वह सोचती रहती कि यदि आमने-सामने प्रतिशोध पूरा न कर सकी तो रूप-जाल में फँसाकर उसे खत्म करूंगी। आखिर वह युवा है, बहादुर होने के साथ मोहक भी है। उसका प्रचण्ड पौरुष मेरे मादक यौवन को देखकर पिघल जाएगा।
एक दिन मेहर को हरिसिंह के खेमे को सुराग मिल गया। वह रात के अँधेरे में अकेली ही तलवार खोंसकर निकल पड़ी। रात्रि का दूसरा पहर हो रहा था। पर नलवा के सैनिक पूरी मुस्तैदी से तैनात थे। मेहर को उन्होंने रोक दिया “तुम इधर क्यों आयी हो?”
“तुम्हारे सेनापति से मिलना है।” वह बोली।
प्रहरी चौंका इतनी रात को? “तुम सुबह आओ। वैसे भी हमारे सरदार किसी लड़की-वड़की से परहेज करते हैं। तुम चली जाओ।”
“असम्भव ! मैं हरिसिंह से मिले बिना नहीं जाऊँगी । तुम उनसे जाकर कहो कि काबुल के सरदार की बेटी मेहर आयी है।”
हरिसिंह ने सुना तो सादर बुला लिया। मेहर का वस्त्र-विन्यास, चेहरे के हावभाव उसके सौंदर्य को अधिकाधिक मादक बना रहे थे। रात्रि के क्षणों और नितान्त एकांतिकता ने किसी भी पुरुष का उन्मत्त कर देने वाली इस मादकता को और अधिक सहायता प्रदान करने की ठान ली थी। लेकिन हरिसिंह किसी और ही धातु के बने थे। उन्होंने उसकी ओर एक नजर डालकर मुसकराते हुए कहा-”बैठो बहिन।”
हरिसिंह की निश्छल मुसकान और बहिन के सम्बोधन से मेहर के मन की सारी विकृति धुल गयी। वह हतप्रभ होते हुए बोली, “ तुमने मुझे बहिन कहा।”
“हाँ, तुम उम्र में मुझ से कुछ छोटी होगी। इसीलिए मेरी छोटी बहिन ही हो। हमें तुम्हारे पिता के मारे जाने का बेहद अफसोस है। पर हमारी मजबूरी समझने की कोशिश करो। क्या तुम अपने यहाँ के लोगों के आतंक से परिचित नहीं हो । हमारी लगातार की चेतावनी से भी जब वे बाज नहीं आए, तब हमें सैनिक अभियान के लिए विवश होना पड़ा।”
मेहर सत्य से अवगत थी। लेकिन अभी तक उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था, कोई व्यक्ति इतना संवेदनशील और उज्ज्वल चरित्र वाला भी हो सकता है। क्योंकि उसके देश में यह असम्भव-सा था। उसने नतमस्तक होते हुए कहा- “भाई जान ! हमने आपकी बहादुरी के बहुत किस्से सुने थे। पर आज जान लिया कि उसका वास्तविक रहस्य क्या है।”
हरिसिंह मुसकराते हुए कहने लगे-”मेरे ही नहीं, किसी के भी शौर्य का रहस्य उसके उज्ज्वल चरित्र में निहित होता है।” अब मेहर सन्तुष्ट थी। वह धीमे कदमों से शिविर द्वार की ओर चल दी।
सत्य के सम्बन्ध में प्रायः यह कहा जाता है कि वह धर्म- अध्यात्म का विषय है। लोकव्यवहार से उसका कोई लेना देना नहीं। भौतिक जगत में तो सर्वत्र असत्य का ही बोलबाला है। सत्य की पूछ कहाँ होती ? यहाँ ईमानदारी औंधे मुँह गिरती और अपनी मौत मरती है, जबकि बेईमानी फूलती-फलती और विस्तार पाती है।
प्रथम दृष्टि में यह तर्क वास्तविक प्रतीत हो सकते हैं पर तनिक गहराई में उतरकर विचार करने पर उनकी .............स्पष्ट झलकने लगती है। यह ............ कि इन दिनों पग-पग पर छल-छल का सहारा लिया जाता है और कदम-कदम पर ऐसे कार्य किये जाते हैं, जिन्हें ......................ही कहना पड़ेगा। इतने पर भी यह कहना गलत न होगा कि सत्य की वैशाखियों के बिना इनकी गति नहीं, भले ही वह नकली ही सत्य क्यों न हो, पर आज की प्रपंचपूर्ण दुनिया में इनका अवलम्बन एक लौकिक व्यक्ति को भी उतना ही अनिवार्य महसूस होता है, जितना कि किसी सत्यान्वेषी को यह एक कटु सच्चाई है कि एक फरेबी भी अपना सौदा सत्य और तथ्य के आधार पर ही तय करता है, भले ही उसका निजी जीवन झूठ वादों से भरपूर हो। जब तक उसे यह भरोसा न हो जाय कि जो कुछ कहा या किया जा रहा है, वह शत-प्रतिशत सच है, तब तक वह उस पर विचार करने के लिए बाध्य नहीं होता। ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि व्यवहारिक जीवन में सत्य का महत्व न्यून और नगण्य जितना है? यथार्थता तो यह है कि आज क्षण-क्षण में हम झूठे-सच का जितना आश्रय लेते हैं उसे अभूतपूर्व ही कहना चाहिए। कदाचित् इसी का देखते हुए गोस्वामी तुलसीदास को यह लिखने के लिए मजबूर होना पड़ा- ‘झूठे लेना, झूठे देना, झूठे भोजन, झूठ चबेना’! यह आज की स्थिति का वास्तविक चित्रण है, किन्तु इस बात को भी दरगुजर नहीं किया जाना चाहिए कि इस झूठे सच ने व्यक्ति और समाज को जितनी दुष्टता और भ्रष्टता की ओर धकेला है, उतना वस्तुस्थिति को वास्तविक रूप में बता देने और स्वीकार लेने में सम्भवतः नहीं होता। अतः यह कहने में हर्ज नहीं कि यथार्थ सच्चाई अनेकों गुना खतरनाक और हानिकारक है। इसे यदि त्याग दिया जाय, तो समाज से न सिर्फ अवाँछनीयताएँ और अनैतिकताएँ घटेंगी, वरन् छोटा-बड़ा अमीर-गरीब जैसी कितनी ही विसंगतियों का सफाया हो जायेगा। नकली सब की छत्रछाया में इन्हें पलने-बढ़ने का अच्छा अवसर मिल जाता है। यह व्यवहार विकृति न हो, तो शायद असल की नकल के धोखे में आकर ठगने-ठगाने को मौका भी न रहे। यह भी इसी बात को सिद्ध करता है कि लौकिक जीवन में सत्य से बिल्कुल पल्ला छुड़ाकर नहीं जिया जा सकता। यह बात और है कि वहाँ उसका उद्देश्य ओछे स्तर की स्वार्थ सिद्धि होता है।
यंत्र-उपकरण बनाने वाली कम्पनियाँ अपने-अपने सामान को सर्वश्रेष्ठ स्तर का घोषित करती है। और उनके गुणों और विशेषताओं के संदर्भ में ऐसे इतने लुभावने विज्ञापन को विस्तार बाँधना पड़े, पर कसौटी में कसने पर यह विशेषताएँ कितनी खरी उतरती हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं। खोटे सिक्के और खोटे माल बनते और चलते रहते हैं। देखने में वे कितने असली प्रतीत होते हैं, पर फिर भी उनका खोटापन प्रकट हो ही जाता है। भला हीरे का मुकाबला काँच कैसे करे? स्वर्ण के आगे रोल्डगोल्ड की क्या औकात? कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली। जहाँ इस विशाल अन्तर को पाटने का प्रयास किया गया हो, वहाँ निर्माण-कौशल और निर्माता की प्रशंसा ही करती होगी, जो पहली दृष्टि में खोटे के खरे होने का भ्रम पैदा करते हैं। कितनी ही लोग इसी भ्रान्ति में पड़कर आये दिन छले जाते हैं। वास्तव में झूठ को चलाने के लिए सत्य की प्रतीत खड़ी करनी पड़ती है, तब जाकर बात बनती है। बिजूके की भूमिका से कौन परिचित नहीं है? सभी जानते हैं कि कृषक लोग पशु-पक्षियों को धोखा देने और प्रहरी की उपस्थिति का झूठा एहसास करने के लिए निर्जीव और नकली रखवाले बनाकर खड़े करते हैं। कुर्ता , पाजामा , टोपी पहनाकर उन्हें असली छवि प्रदान करते हैं। पक्षियों को इससे यथार्थ रखवाले को भ्रम पैदा होता है और वे उससे दूर-दूर बने रहते हैं।यह भी इस बात को प्रमाणित करता है कि सत्य में अप्रतिम शक्ति है, भले ही खोटा होने के कारण उसका प्रभाव सामाजिक ही क्यों न हो, पर मनीषी इस तथ्य से सहमत हैं कि वह शक्तिवाला है और प्रभावित क्षमता है उसके विपरीत असत्य की शक्ति की पोल उस समय खुलती है जब उसकी वास्तविकता का पता सर्वसाधारण का लगता है, तब कैसी घोर जुगुप्सा उसके प्रति उत्पन्न होती है, यह भी सर्वविदित है।
मिलावटखोर अपनी वस्तुओं की शुद्धता के बारे में ऐसी-ऐसी कसमें खाते हैं, जैसे कलियुग में कोई सतयुगी सत्यानुरागी पैदा हो गया हो और असत्य जिसे स्पर्श तक न कर सका है। इसी आधार पर वे अपने माल खपाते और बाजार बनाते हैं। जब तक मिथ्या छुपी रहती, तब तक वे खूब पैसा कमाते हैं। असलियत के उजागर होते ही, दूसरे नाम और दूसरे लेबल से उन्हें पुनः बेचने लगते। इस बार भी एक से एक बढ़कर दवे , पड़ताल की घड़ी आते ही सब झूठ साबित होते हैं।
आध्यात्मिक सिद्धान्तों के प्रबल पक्षधर धर्मतंत्र के दावे भी अब सत्य और तथ्य पर कहाँ पक्के उतरते हैं? अधिकाँश मामलों में उसका आचरण दोहरे व्यक्तित्व का सा होता है। सामने उच्चादर्शों की बाते पीछे व्यक्तित्व का खोखलापन, पर पस आकर्षक मुखौटे के कारण धर्म अध्यात्म के प्रति अब भी लोगों का कुछ आकर्षण बना हुआ है। सही रास्ता सुझाने और उपयुक्त मार्ग में ले चलने वाले तो इक्के दुक्के संस्थान होते हैं, शेष तो दिग्भ्रम पैदा करते हैं। इसके बावजूद धर्म और धार्मिकता अब भी जीवित है। कारण एक ही सत्य का स्वाँग।
कहते हैं कि शासन-सत्ता अथवा राजनीति झूठ का सहारा लिये बिना चलती नहीं, पर इसमें सच्चाई का अल्पाँश भी नहीं है। यदि राजनीति के तत्वार्थ पर विचार किया जाय, तो हम पायेंगे कि राजसत्ता (अथवा शासनसत्ता) के संचालन के निमित्त जो नीति निर्धारित होती है, वास्तव में वही ‘राजनीति’ है । इसमें अनीति, कूटनीति जैसे शब्दों का लेशमात्र भी भाव नहीं। अतः यह कहना गलत होगा कि अन्याय का अवलम्ब लिये बिना कोई राजनेता नहीं बन सकता। यथार्थ में आज राजनीति जिस कदर पतित और भ्रष्ट हुई है कि जब कभी इसकी चर्चा होती है, तो ध्यान इसके शब्दार्थ की ओर न जाकर अनायास भावार्थ की ओर खिंच जाता है। वर्तमान में यह बुराई की पर्याय बनी हुई है। इसलिए शासनतंत्र से पृथक अन्य क्षेत्रों में भी लोग दूसरों के दाँव-पेंच भरे व्यवहार को इंगित करने के लिए उक्त शब्द का बहुतायत से प्रयोग करते हैं। राजनीति यदि वस्तुतः यही है, तो अब इसका उपनयन संस्कार होना ही चाहिए और अर्थबोध कराते हुए यह दीक्षा दी जानी चाहिए कि गरिमा के अनुरूप व्यवहार हो अन्यथा हेय अवस्था में पड़ी रहकर राजनेताओं को और ही न बनायेगी तथा राष्ट्र को घोर विपत्ति में धकेल कर जनता का अपार अहित करेगी। यों नीति का अर्थ सत्य, धर्म, सदाचार है। इस दृष्टि से राजनीति वह हुई जिसमें इन सभी तत्वों का समावेश हो। यही वह स्थिति है जिसमें वह अपने सम्पूर्ण भाव को प्रकट करती है। इस रीति से विचार करने पर यही विदित होगा कि राजनीति भी प्रकारान्तर से हमें सत्याचरण की ही प्रेरणा देती है। इसमें अन्याय को अपनाने अथवा अनीति को आश्रय देने जैसी कोई बात नहीं।
सब ओर सिसकियों की गूँज थी। जुडिया की उस दुनिया में एक अजीब-सी दहशत का माहौल था। वैसे तो वह पूरा इलाका रेगिस्तानी था। यहाँ पेड़-पौधे-हरियाली नहीं के बराबर थी। लेकिन अगर कहीं कभी कोई घास-फूस या झाड़-झंखाड़ जैसा कुछ उग भी जाता तो मानो उसकी पत्तियाँ भी किसी अनजाने आतंक से काँप-कांप उठती थीं। आतंक की इस भयावह दहशत के साथ ही वहाँ था अंधविश्वासों का घना अँधेरा, बर्बरता और क्रूरता का नंगा नाच। असभ्य जंगली जातियों की सी जीवन-शैली, सामाजिक नीति-नियम, मर्यादाओं जैसा वहाँ कुछ भी न था। केवल थी आतंक भरी सिहरन, माल उसका जो लूट ले जाए, दौलत उसकी जो मार-काट कर छीन ले जाए और औरत उसकी जो उठा ले जाए। इनसान की जान की कीमत वहाँ कुछ भी न थी।
ऐसे विषाक्त अन्धकार में एक संत वहाँ सबके दिलों में उज्ज्वल भविष्य की आशा की ज्योति जगाता फिर रहा था। नाम था, उसका जॉन। उसकी ओजस्वी वाणी जहाँ-तहाँ कबीलों की सभाओं में गूँजने लगती-”ऐ ईश्वर के पुत्रों ! तुम प्रभु की कृपा का फायदा उठाओ। ऐ नवयुवकों ! अपनी जवानी को गलत रास्तों में बरबाद न करो। परिवर्तन की बेला आ गयी है। भगवान ने तुम्हारे उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए अपने युवराज को धरती पर भेजा है। येरुसलम में उत्पन्न उस मसीहा के कदम अब इस ओर मुड़ चले हैं। आओ, उस आने वाले महान अवतार, उस ईश्वर के राजकुमार की अगवानी के लिए मेरे साथ आओ। वह कुछ ही समय के बाद यहाँ की सीमा में प्रवेश करेगा।
कबीले में चुपचाप बैठे लोगों में से कुछ तो सन्त के साथ जाने के लिए उठ खड़े हुए। लेकिन अनेकों उनमें से ऐसे भी थे जो सन्त की बातों पर लापरवाही से हँस दिए। कइयों ने उपेक्षा से मुँह बिचका दिया और कुछ उपेक्षा से मुँह फेर शराब का घूँट पीने लगे। फिर भी एक छोटा-सा समूह सन्त जॉन के पीछे-पीछे जुडिया की सीमाओं की ओर चलने लगा। रास्ते में पड़ने वाले अन्य कबीले के लोगों में से जिनको भी सन्त के आशय का पता चलता, वे भी उनके साथ हो लेते। उज्ज्वल भविष्य के संदेशवाहक ईश्वर के युवराज के स्वागत के लिए इन सभी में तीव्र उत्सुकता थी। इन उत्सुक लोगों में कई आस्थावादी, दुर्बल, दलित, पीड़ित लोग आसमान की ओर हाथ उठाकर प्रार्थना करते और प्रभु को धन्यवाद देने लगती उसने उन सबके लिए अपने प्रिय पुत्र को धरती पर भेजा है। शायद अब उनका उद्धार हो जाएगा।......शायद अब उन्हें दमन और शोषण की भट्टी में जलना नहीं पड़ेगा।........सम्भवतः बर्बर और नृशंस परम्पराएँ अब उन्हें नहीं कुचलेंगी और दूसरी ओर नृशंस, अत्याचारी, बर्बर, क्रूर, अपराधकर्मी यह सोच रहे थे कि देखें तो सही, यह ईश्वर का पुत्र क्या चमत्कार कर दिखाता है, कितना दम है, इसके उज्ज्वल भविष्य के कथन में........।
सन्त जॉन उन सबको बता रहे थे, कि यीशु येरुसलम के बहुत साधारण से परिवार में जन्मे हैं। जब वह मरियम की पवित्र कोख में थे, तभी आसमान में एक अलौकिक सितारा चमका था। इसी चमक ने उनके आगमन की सूचना हम संसार वालों को दी। हम सबको उनके आगमन को बोध कराते हुए बताया-”धरती के निवासियों! तुम्हारे उद्धार के लिए यीशु ने, भगवान के युवराज ने जन्म लिया है, उसका स्वागत करो।”
“पता नहीं, अब तक किसी ने उनका स्वागत किया या नहीं। परन्तु वह जन्मा, बड़ा हुआ और अपने पिता के आदेशानुसार उनके कारोबार में हाथ बँटाने लगा। लेकिन रोजी-रोजगार करने, पैसा कमाने में उसका मन नहीं लगा। वह तो धरती पर स्वर्ग के राज्य की स्थापना करने के लिए आया था। उसका अधिकतर समय ध्यान और सत्संग में व्यतीत होता था। किसी को वस्त्रहीन देखकर अपने कपड़े उतार कर दे देना, किसी को भूखा देखकर अपना भोजन खिला देना उसकी सामान्य दिनचर्या की बात बन गयी।”
सन्त जॉन की ये बातें सुनकर भीड़ उनके पीछे खिंचती चली आ रही थी। अब तक आसमान ने सितारों जड़ी काली चादर ओढ़ ली थी। बातों ही बातों में इसका पता ही न चला। जब वे सब सीमा के पास पहुँचे, रात का अन्तिम प्रहर शुरू हो चुका था। वहाँ आस-पास वियावान जंगल फैला हुआ था। उसी जंगल में से एक ऊबड़-खाबड़ रास्ता दूर.......बहुत दूर जंगलों और सपाट पहाड़ी चट्टानों में से होता हुआ चला जा रहा था.........दूर येरुसलम तक।
उस रास्ते की ओर संकेत करते हुए संत कहने लगे-”देखो ईश्वर का वह महिमामय पुत्र, इसी रास्ते से जुडिया में प्रवेश करेगा। हम सब यहीं पर उसकी प्रतीक्षा करेंगे।”
बातों का यह सिलसिला चलता रहा। रात ढलती गयी और फिर दूर पहाड़ी की ओट से सूरज ने झाँक कर देखा और तभी लोगों ने देखा कि सादा-सा चोगा पहने एक नवयुवक उसी मार्ग पर चला आ रहा है। उसके चेहरे पर ईश्वरीय नूर था, उसकी आँखों से करुणा झर रही थी। उसके हृदय में मानव मात्र के लिए दया का अगाध सागर लहराता मालूम पड़ता था। ममता और प्रेम की दिव्य आभा उसके चारों ओर छिटकी प्रतीत होती थी। उसे देखते ही सब समझ गए कि यही वह उज्ज्वल भविष्य का संदेश-वाहक है, जिसकी चर्चा महात्मा जॉन ने आगे बढ़कर उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। फिर बोले आप थक गए होंगे यीशु। जुडिया के लोगों का आतिथ्य स्वीकार करें।
और फिर समूचा जनसमूह संत जॉन और यीशु के पीछे-पीछे वापस चल दिया। चलते-चलते ही लोग आगे बढ़-बढ़कर यीशु से तरह-तरह के सवाल करते जा रहे थे। कुछ बूढ़े, स्त्रियाँ और आस्थावान लोग उनका हाथ पकड़कर चूम लेते, कई तो घुटने टेककर श्रद्धाभाव से उन्हें देखने लगते। महात्मा यीशु भी आँखों ही आँखों में दयार्द्र भाव से उन सबको देखते और फिर आगे बढ़ने लगते।
भीड़ में से किसी ने हिम्मत करके पूछा-”महात्मन् ! आप जुडिया में किसलिए पधारे हैं?” “मेरा प्रत्येक कार्य धरती पर स्वर्ग के राज्य की स्थापना के लिए है। ”चलते-चलते वह ठहर गए और सवाल पूछने वाले की ओर घूमकर बोले” यहाँ मैं ईश्वर से बात-चीत करने के लिए आया हूँ। मैं देखता हूँ सत्ताधारी लोग निर्बलों पर अत्याचार करते हैं, स्त्रियों की इज्जत लूटते हैं। जो बलवान है, वह दुर्बलों का सब कुछ लूटने में लगा है। मैं ईश्वर से इसका कारण पूछना चाहता हूँ।” कुछ रुककर यीशु बोले,”ऐ जुडिया निवासियों! मैं तुम्हारे, तुम सबके कष्टों के निवारण का उपाय ईश्वर से पूछूँगा।”
यीशु के इस कथन ने सभी को अचरज में डाल दिया। भला ईश्वर से कौन बात-चीत कर सकता है। लेकिन महात्मा जॉन शान्त भाव से मन्द-मन्द मुसकराते रहें, मानो वह भविष्य को पहले ही देख रहे हों। “लेकिन ईश्वर आपको मिलेगा कहा?”एक व्यक्ति ने आश्चर्यचकित हो उनसे पूछा। यीशु के कथन ने उसे हैरत में डाल दिया था।
“ईश्वर मिलेगा, जरूर मिलेगा। उसी तरह मिलेगा, जिस तरह सालों पहले वह मूसा को मिला था। तब, ईश्वर ने स्वयं हिब्रू लोगों को मिस्र वासियों की गुलामी से मुक्त होना का रास्ता बताया था। ऐ जुडिया के निवासियों ! वह इलाका जुडिया के नजदीक है, वीरान, रेगिस्तानी पहाड़ियों वाला वह इलाका जहाँ.......।”
“लेकिन वहाँ तो दुष्ट आत्माएँ निवास करती हैं।” एक और व्यक्ति ने बीच में ही टोकते हुए कहा। उसके चेहरे पर हँसी उड़ाने का भाव था। बोला-”वहाँ ईश्वर कहाँ मिलेगा। पहले कभी मूसा के जमाने में ईश्वर वहाँ रहा करता होगा, मगर अब तो शैतानी रूहें उत्पात करती हैं। क्या एक रात भी गुजार सकोगे वहाँ?”
सभी इस सवाल पर अवाक् थे। यीशु बोले-”क्यों नहीं रह सकूँगा वहाँ? मूसा ने भी इसी तरह वियावान में चालीस दिनों की कठोर साधना की थी। मैं भी वहीं रहूँगा, बिना कुछ खाए-पिए और सुख-सुविधा की चिन्ता किए। मुझे पूरी तरह से यकीन है कि भगवान मेरे सवालों का जवाब जरूर देगा।”
यीशु के शब्दों पर कई लोग आश्चर्य और श्रद्धा से ओत-प्रोत आगे बढ़कर घुटने टेकते और उनका हाथ पकड़ कर चूमते। उनके हाथों को मस्तक और आँखों से लगाते। बूढ़ों, महिलाओं और कमजोरों की आँखों से उनका दयार्द्र चेहरा देखकर प्रेमाश्रु टपक पड़ते। उन्हें यकीन होने लगा था कि वह सचमुच उज्ज्वल भविष्य के संदेशवाहक हैं।
यीशु और महात्मा जॉन आगे की ओर बढ़ने लगे। भीड़ भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। रास्ते का जंगली इलाका अभी तक वे पार न कर पाए थे कि अचानक किसी की कराह सुनकर सबकी नजर दायीं ओर की झाड़ी पर गयी। पास ही पीव और रक्त से लथपथ कुष्ठ रोगिणी वृद्धा पड़ी कराह रही थी। यीशु के कदम वहीं रुक गए। सारी भीड़ वहीं ठहर गयी। एक व्यक्ति बुढ़िया को डाँटते हुए बोला-”ऐ मनहूस बुढ़िया ! तुझे अपनी सूरत अभी दिखानी थी, जबकि प्रभु यीशु हमारे इलाके में आए हैं।”
यीशु ने उस व्यक्ति को चुप रहने का संकेत किया। फिर उस वृद्धा की ओर आगे बढ़े। तभी भीड़ में अनेकों चिल्लाहटें उभरीं, रुक जाइये महात्मन्। उससे दूर रहिए। वह कोढ़ी है। यीशु ने जैसे उन आवाजों को सुना ही नहीं। उन्होंने पानी मँगवाया। फिर वहीं जमीन पर बैठकर बुढ़िया का सिर अपनी गोद में लेकर पूछा-”माँ तुम्हारी यह हालत किसने की है?”
वृद्धा रुँधे गले से सिसकियों के बीच कहने लगी, “मैं अपनी बेटी के साथ जा रही थी। तभी राजा के सैनिक आए। उन्होंने मेरी बेटी का अपहरण कर लिया। मैंने रोकना चाहा, तो मुझे कोड़ों से मारकर यहाँ फेंक गए। अब मेरी बेटी को उनसे कौन छुड़ाएगा?” वृद्धा की पीड़ा आँसू बनकर झरने लगी।
यीशु ने वृद्धा के सिर पर हाथ फेरा। उनकी आँखों में संवेदना छलछला रही थी, बोले-”माँ तुम्हारी बेटी का अपहरण करने वालों को ईश्वर अवश्य दण्ड देगा। जैसा उन्होंने किया है, वैसा ही उन्हें भुगतना पड़ेगा। अब तू उठ और स्वस्थ हो जा। तेरे घावों से खून का रिसना बन्द हो गया है और तेरा कुष्ठ रोग भी दूर हो गया है।”
सारे लोग यह अद्भुत चमत्कार देखकर दंग रह गए। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि बातें करते-करते भला वृद्धा के जख्म कैसे भर गए और उसकी काया कंचन-सी किस तरह चमकने लगी। वृद्धा उठकर घुटनों के बल बैठ गई और एक हाथ से यीशु के चोगे का पल्लू पकड़े दूसरे हाथ में उनका हाथ थामकर पागलों की तरह चूमने लगी।
महात्मा यीशु फिर आगे की ओर बढ़ने लगे। भीड़ भी चमत्कृत-सी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। यह चमत्कार देखकर उन शंकालुओं के दिल का सन्देह भी दूर होने लगा, जो अभी तक तरह-तरह की बातें सोच रहे थे। उन्हें अहसास होने लगा कि यीशु सचमुच ही ईश्वर पुत्र है। भला क्षण भर में ही वृद्धा को इस प्रकार कौन नीरोग कर सकता है।
आखिर सभी लोग बस्तियों वाले इलाके में आ पहुँचे। लोग यीशु के सत्कार की तैयारी में जुट गए। कोई भागकर उनके लिए फलाहार का इन्तजाम कर रहा था, कोई व्यंजन की तैयारी में जुट गया। अनेक लोग शीतल-निर्मल जल लिए खड़े थे। यीशु ने सभी के प्रेम को स्वीकार करते हुए सबके साथ भोजन ग्रहण किया। तत्पश्चात् बोले-”जुडिया के निवासियों ! आज मैंने तुम सभी के साथ जो आहार लिया है अब वह सम्भवतः मुझे अर्से तक देखने के लिए भी नसीब नहीं होगा। क्योंकि मैं कल ही वियावान वीरान रेगिस्तानी क्षेत्र में निकल जाऊँगा.......वहीं जहाँ कभी मूसा ने तप किया था, जहाँ उन्होंने ईश्वरीय प्रकाश को देखा था। मैं वहाँ जाकर प्रभु का साक्षात्कार करूंगा और उनसे वह उपाय पूछूँगा जिससे धरती पर सुख-शांति का साम्राज्य स्थापित हो सके। इसलिए तुम सब मेरी ओर से चिन्तित मत होना।”
उनके इस कथन को सुनकर एक वृद्धा लगभग रोते हुए पुकार उठी-”नहीं, नहीं प्रभु! मैं आपको वहाँ नहीं जाने दूँगी वहाँ शैतान का राज्य है।”
“नहीं माँ! यीशु मुस्कराए। शैतान का राज्य कहीं भी नहीं है। सभी जगह उस परम-पिता का राज्य है और मैं उसी की सत्ता-स्थापित करना चाहता हूँ।”
इस बातचीत में सन्ध्या से रात्रि हो आयी। महात्मा यीशु का उन्नत ललाट चन्द्रमा की कान्ति में दीप्तिमान हो रहा था। उनकी मुखमण्डल-दीप्ति न केवल सम्पूर्ण वातावरण को, बल्कि उपस्थित जनों को आलोकित कर रही थी। वह अपना ढीला-ढाला चोगा पहने अकेले ही दूर एकान्त मार्ग पर बढ़ने लगे। दूर....बहुत दूर......।
जोर्डन नदी की उफनती जलधारा उनकी राह न रोक सकी। दूर तक सूखी-सपाट चट्टानें उन्हें हतोत्साहित न कर पायीं। वह उस वीरान-वियावान तक आ पहुँचे जिसे शैतान का ठिकाना कहा जाता था। वहाँ आकर वह मौन साधे आकाश की ओर इस तरह देख रहे थे, मानो वह अपनी दृष्टि से ही आकाश की खिड़की को खोल देना चाहते हों। शायद इसी खिड़की के पार उनके परमस्नेही पिता का घर था। उनकी पुकार बढ़ती गयी, दिन पर दिन पर बीतने लगे, उन्होंने अन्न-जल कुछ भी नहीं ग्रहण किया। अनगिनत दुष्ट आत्माओं ने उन्हें इस सुनसान क्षेत्र में निर्द्वन्द्व तप करते देखा तो वे चकित रह गयीं। क्योंकि उन्हें मालूम था कोई साधारण मनुष्य इस प्रकार यहाँ नहीं रह सकता। उन्होंने जब यह खबर शैतान को सुनायी तो वह व्यंग से मुसकराया, बोला-”जानता हूँ, वह ईश्वर पुत्र है और उसमें विभिन्न दैवी शक्तियाँ हैं। इससे पहले कि वह अपना पुण्य प्रकाश फैलाए, मैं उसे पथभ्रष्ट कर डालूँगा।”
शैतान के इस निश्चय से बेखबर यीशु उस समय सपाट चट्टानों के बीच एक पत्थर के सहारे ध्यानमग्न थे। उनके शरीर पर जो चोगा था वह कई जगह से फट गया था। दिन और रात बीतने का उन्हें अहसास न था। भूख-प्यास को वे पूरी तरह भूल चुके थे। उनके अन्तःकरण में दुःखी-पीड़ितजनों के लिए प्रार्थना के स्वर गूँज रहे थे।
तभी शैतान उनके सामने प्रकट हुआ। वह उन्हें बहला-फुसलाकर अथवा धमकाकर धर्म मार्ग से हटाना चाहता था। उसके साथ की दुष्ट आत्माओं ने तरह-तरह के प्रपंच रचने शुरू किए। उन्होंने तेज ठण्डी बर्फीली हवाओं से ऐसी सर्दी का प्रकोप उत्पन्न किया कि आदमी का खून तक जम जाय। हाथ-पैर सुन्न हो जाएँ। पर इस प्रकोप का उन पर कोई प्रभाव न पड़ा। वे तो जैसे देहभाव से पूरी तरह ऊपर उठ चुके थे। अविनाशी आत्मा पर भला क्या प्रभाव पड़ता। दुष्ट आत्माओं ने भयावह आँधियों में उन्हें लपेटना चाहा, मगर वह अडिग रहे। फिर बीमारियों द्वारा उन्हें त्रास देने की कोशिश की, मगर बीमारियाँ उनकी आत्मा के संकल्प को प्रभावित न कर सकीं। आखिर ये दुष्ट आत्माएँ स्वयं थक-हारकर भाग गई।
अब बारी स्वयं शैतान की थी। यीशु को इस वीरान-वियाबान में चालीस दिन हो चुके थे। वह अपनी प्रार्थना में तल्लीन थे। लेकिन आज उन्हें अत्यन्त भूख-प्यास और थकावट का अनुभव हो रहा था। यह स्थिति भी शायद शैतान ने ही उत्पन्न की थी। वह चट्टान की ओट से निकलकर पास आकर बोला-”अरे भाई! क्यों इतनी मुसीबतें उठा रहे हो? आखिर क्या कष्ट है तुम्हें? बेकार भूखे-प्यासे मर रहे हो। तुम्हारे पास तो दैवी शक्तियाँ हैं, उनका लाभ उठाकर जीवन का सुख क्यों नहीं भोगते?” शैतान आस-पास पड़े पत्थरों की ओर इशारा करते हुए बोला-”देखो तुम मेरी बातों का जवाब नहीं देना चाहते न सही, पर अभी तुम इन पत्थरों को भाँति-भाँति के व्यंजनों में बदल सकते हो। चाहो तो इन व्यंजनों को कम कीमत में बेचकर धनवान भी बन सकते हो। ऐसा क्यों नहीं करते यीशु? दुनिया आनन्द लेने के लिए है, तप करने या तकलीफें उठाने के लिए नहीं।”
यीशु हल्के से मुस्कराए और बोले-”शैतान यद्यपि तुम वेष बदल कर मेरे पास आए हो, पर मैं तुम्हारी असलियत पहचान गया हूँ। यह सच है कि मेरे पास ईश्वरीय शक्तियाँ हैं, परन्तु मैं उनका दुरुपयोग अपने किसी भी स्वार्थ के लिए नहीं करूंगा। मेरी यह बात जान लो जीवन के लिए सुख भोग नहीं, ईश्वर के आदेशों का पालन आवश्यक हैं।”
अभी वह अपनी बात समाप्त भी न कर पाए थे कि अचानक उन्होंने देखा कि वह जुडिया के एक पहाड़ की चोटी पर खड़े हैं। यह जगह इतनी ऊँचाई पर थी कि यहाँ से दूर-दूर तक बस्तियाँ और नगर दिखाई दे रहे थे। पास ही खड़ा शैतान मुस्करा रहा था। वह दूर तक फैले नगरों व राज्यों की ओर संकेत करते हुए कहने लगा-”यीशु, तुम मेरी बात मानो। तुम चाहो तो मैं अपनी शक्ति से इन सभी राज्यों का अधिपति बना दूँगा। तुम्हारी अपनी दैवी शक्तियों का दुरुपयोग भी नहीं होगा और तुम मिश्र और रोम के सम्राटों से भी अधिक ऐश्वर्य तथा सुख का भोग भी कर सकोगे।”
यीशु हँसने लगे। उनकी हँसी शैतान के इस नए मायाजाल को भी छिन्न-भिन्न करने लगी। वह बोले-”मगर ईश्वरीय सुख के समक्ष इन सुखों का कोई मूल्य-महत्व नहीं है। शैतान! मैं राजनीतिक सत्ता का नहीं, आध्यात्मिक सत्ता का पक्षधर हूँ। मेरा उद्देश्य ईश्वर के स्वर्गीय राज्य को धरती पर उतारना है।”
“लेकिन तुम कष्टों के मार्ग पर ही क्यों चलना चाहते हो?” शैतान इतनी आसानी से हार मानने को तैयार न था। यीशु ने उसे समझाते हुए कहा-”जिसे तुम कष्ट कहते हो-वास्तव में वह तप है। मैं जो कष्ट भोग रहा हूँ और भविष्य में जो कष्ट मुझे भोगने होंगे, वह मानव जाति के विगत दुष्कर्मों का प्रायश्चित है। मुझे मार्ग से विचलित करने का तुम्हारा प्रयास व्यर्थ है।”
हारकर शैतान वापस चला गया। यीशु गहरी समाधि में डूब गए। अब वह भावराज्य में अपने परमस्नेही पिता के समक्ष थे। जो वात्सल्य भरे शब्दों में उनसे कह रहे थे-”यीशु स्वर्ग के राज्य का धरती में अवतरण मनुष्य में देवत्व के उदय से होगा। तुम मानव में सत्प्रवृत्ति का संवर्धन करो। उसे दुष्प्रवृत्तियों और मूढ़ताओं से मुक्त करो। तुम्हारा उद्देश्य कठिन अवश्य है पर असम्भव नहीं। तुम्हारा तप एवं बलिदान व्यर्थ न जाएगा। तुम्हारे बलिदान के दो हजार (2000) सालों बाद अपनी पूर्णता प्राप्त करेगा। तुम्हारे नाम से प्रचलित ईसा सम्वत् की 21 वीं सदी मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती में स्वर्ग के अवतरण को चरितार्थ करेगी। उठो अपने कार्य को प्रारम्भ करो, मानव को प्रबोध दो।” इन्हीं शब्दों के साथ यीशु की समाधि खुल गई और उन्होंने लोगों को ईश्वरीय संदेश सुनाना आरम्भ कर दिया।
मानव-जीवन के विकासक्रम में अंतर्मन की पवित्रता एवं वृत्तियों के परिशोधन-परिष्कार का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अध्यात्म साधना में मन की गति को समझने की इतनी महत्ता, उपयोगिता नहीं, जितनी कि वृत्तियों की समझी जाती है। महर्षि पातंजलि ने योगदर्शन-सूत्र-5 में मन की पाँच वृत्तियों का प्रमुख रूप से उल्लेख किया है- (1) सम्यक् ज्ञान, (2) असम्यक् ज्ञान, (3) कल्पना-शक्ति, (4) निद्रा, (5) स्मृति। उनने मन और शरीर की अभिन्नता को दर्शाते हुए ‘साइकास्मा’ अर्थात् मनःशारीरिक शब्द की व्युत्पत्ति की है। शरीर के पास क्रिया के पाँच उपकरण पाँच इन्द्रियों के रूप में विद्यमान हैं, तो मन की वृत्तियाँ भी क्रिया के पाँच रूप हैं। मन के पास सम्यक् ज्ञान की अकूत-असीम सामर्थ्य है जो अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर-अमृतत्व की ओर ले जा सकती हैं। असम्यक् ज्ञान का स्रोत भी मन के पास है, जिसे ‘विपर्यय’ के नाम से संबोधित किया गया है। वह जीवन को सघन अन्धकार में डुबोकर पतन-पराभव के गर्त में धकेलता और व्यक्ति को व्यर्थ-निरर्थक बनाकर छोड़ता है।
कल्पना-शक्ति मन की तीसरी वृत्ति है। यह सुन्दर भी हो सकती है और असुन्दर भी। व्यावहारिक और अव्यावहारिक भी। सृजनात्मक एवं ध्वंसात्मक भी। इसकी सही-सार्थक दिशाधारा सुनिश्चित होने पर साहित्य, संगीत और कला जैसी प्रतिभाएँ निखरती और लोकश्रद्धा का पात्र बना देती हैं। अनुपयुक्त एवं अनुपयोगी दिशा होने पर लोक-भर्त्सना का भाजन भी बनना पड़ता है, साथ ही साथ जीवन प्रवाह अधोगामी बन जाता है। पाश्चात्य मनोवेत्ता फ्रेडरिक नीत्से द्वारा की गयी ‘सुपरमैन’- अतिमानव की कल्पना ही तो थी, जिसने हिटलर जैसे क्रूर, हिंसावादी तानाशाह को जन्म दिया। बुद्ध, गाँधी व ईसा जैसे महामानव भी मन की कल्पना-शक्ति की उपज हैं, जो करुणा, सत्य और अहिंसा के पुजारी बनकर समूची मानव जाति के लिए सत्य और प्रेम का मार्ग प्रशस्त करने में जीवनपर्यन्त लगे रहे।
मन की चौथी वृत्ति निद्रा हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से नैसर्गिक निद्रा को ही अधिक उपयोगी माना गया है। यदि नींद के समय मन को सचेत रखा जा सके तो समाधि का स्वरूप बन सकता है। गीता में इसी तथ्य की पुष्टि इस प्रकार की गई है कि योगी सोता है तो भी सचेत रहता है। शरीर और मन तो निद्रा में डूब जाते हैं, पर उसे आत्मबोध बना रहता है। इस तरह की योगनिद्रा का अभ्यास करने से शुभ मनोवृत्ति बनती और अनेकानेक तरह की जीवनोपयोगी उपलब्धियाँ, क्षमताएँ हस्तगत होती चली जाती हैं। मन की अन्तिम वृत्ति स्मृति हैं इसकी दिशा सार्थक भी हो सकती है और निरर्थक भी। बुद्ध ने सम्यक्-स्मृति को ही अधिक उपयोगी बताया है, जो जीवन की सच्चाई में उतरती और जागरुकता का आभास निरन्तर कराती रहती है।
महर्षि पातंजलि ने चित्तवृत्तियों के परिष्कार-परिशोधन एवं निरोध के लिए योग को प्रमुखता देते हुए कहा है-’योगष्चित्तवृत्ति निरोधः’। अध्यात्म-वेत्ताओं ने भी मन को वशवर्ती बनाने एवं वृत्तियों को परिशोधित करने के लिए दो प्रमुख आधार-अवलम्बन बताये हैं। वे हैं-जप और ध्यान। इसी आधार पर उसका उदात्तीकरण सम्भव हो पाता है। मन का अर्थ ही है-मनन वाला। पाँडित्य पूर्ण विचार में हम एक विषय को अनेकानेक पहलुओं पर ध्यानाकर्षित किया करते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कुशल जौहरी एक हीरे को विभिन्न दृष्टिकोणों से खरीदता है। इसमें भी वही समीपता का काम करता है, अन्तर मात्र इतना भर है कि अभ्यस्त एवं परिष्कृत मन प्रयोजन केन्द्रित उड़ाने भरता है और अनभ्यस्त-अनगढ़ मन निष्प्रयोजन। सधे निग्रहित मन और बिना सधे मन में जमीन-आसमान का अन्तर होता है। मन को दीक्षित करने के लिए शिक्षा की, आत्मनियंत्रण की, उच्च आदर्शों की, व्यस्त दिनचर्या की आवश्यकता पड़ती है। इन सबके द्वारा व्यक्ति के अन्तराल को कुरेदा जाता है।
कुछ मर्मस्पर्शी गीत अथवा प्रेरक वाक्य व्यक्ति को इतने प्रिया होते हैं कि वह इन्हें गुनगुनाता या विचारता रहता है। ऐसे वाकया या गीत अन्तराल को छू लेते हैं औ भावनाओं को उभारते, आन्दोलित करते हैं। भावनाएँ व्यक्ति के आचार-विचार को प्रभावित करती हैं-ज्ञात-अज्ञात दोनों ही स्थितियों में। यदि ऐसे भावोत्पादक अंशों का चयन व्यक्ति स्वतः कर ले और उ सका गुँथन उसी प्रकार करता जाय तो वे योजनाबद्ध होने के कारण स्थायी लाभ प्रदान करते हैं। ध्यान सहित जप की मनोवैज्ञानिक आधारशिला यही है। योगाभ्यास से जहाँ शारीरिक-मानसिक क्रियाकलाप व्यवस्थित होते हैं, वहीं जप और ध्यान से वृत्तियों के परिशोधन-परिष्कार में सहायता मिलती है।
इंग्लैण्ड के वैज्ञानिकों में टिण्डल का नाम विख्यात है। उनमें प्रतिभा तो थी, किन्तु व्यवस्था न थी। इस कमी की ओर किसी शुभचिन्तक ने अंगुलि-निर्देश किया। अब तो टिण्डल को एक ही रट थी-व्यवस्था-व्यवस्था-व्यवस्था। यह व्यवस्था उनके भीतर इतनी गहरी चुभी कि उन्हें एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक बनाकर छोड़ी।
सामान्यतया जप में शब्द, वाक्य अथवा वाक्यांश की पुनरावृत्ति मन से करते रहना मन को एक दिशा में दौड़ाना है। मन तो बेलगाम घोड़े की तरह भागने वाला है, उसे एक ही क्षेत्र में स्वतः सीमित करना उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति के प्रतिकूल चलाना है। जप चंचलता पर अंकुश लगाता है। इधर-उधर जब मन भटकता है तो उसे बार-बार इच्छापूर्वक-संकल्पपूर्वक वापस लाया जाना जप प्रक्रिया में होता रहता है। यह प्रकारान्तर से अनगढ़ मन को वर्ष में करना ही कहा जाएगा। मन को वशवर्ती बनाने, वृत्तियों को परिशोधित-परिष्कृत बनाने वाले साधनों में जप एवं ध्यान की महत्ता सर्वोपरि है। इस तथ्य को यदि समझा जा सके तो अन्तर्निहित क्षमताओं, भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक विभूतियों से व्यक्तित्व को सम्पन्न बनाया जा सकता है।
चलते-चलते उन दोनों ने मुड़कर एक-दूसरे की ओर देखा। इस घने जंगल में राह ढूंढ़ पाना कठिन लग रहा था। सूर्य अपनी किरणों से बुनी पीली चादर को तेजी से समेटता जा रहा था । न जानें कैसे इसका एक छोटा-सा छोर वृक्षों की फुनगी से अभी तक अटका था। इसके छूटते ही सारा जंगल घने अन्धेरे में डूब जाएगा । उसके पहले ही यहाँ से बाहर निकलना होगा। पर किधर ? किस ओर? उन दोनों की ही आँखों में यह प्रश्न बड़े स्पष्ट रूप से चमक रहा था। वेषभूषा से दोनों साधु लग रहें थे। उनके मुखमण्डल पर तप की सात्विक आभा बिखर रही थी। चलने का अन्दाज उन दोनों के ही गरिमापूर्ण व्यक्तित्व का अहसास कराता था। लेकिन अभी वे दोनों काफी असमंजस में थे। कुछ और सोचते इससे पहले थोड़ी दूर पर सूखी पत्तियों की खड़खड़ सुनायी दी। उस ओर नजर घुमाने पर देखा कि दो व्यक्ति एक ओर से तेजी से बढ़े चले आ रहे हैं। उन्होंने सोचा , इसी ओर बढ़ा जाय, जरूर कोई गाँव होगा।
अपने बढ़ते कदमों के साथ ही ये दोनों साधु भी उन दोनों व्यक्तियों के नजदीक जा पहुँचे। इनका साधुओं का वेष देखकर एक पल के लिए उनके चेहरों पर रहस्यमयी मुसकान थिरक उठी। इस मुसकान को दबाते हुए एक ने प्रश्न किया, “महाराज इस ओर कहाँ चले?”
“आप लोग इस ओर से आ रहे हैं, तो जरूर ही इधर कोई गाँव या बस्ती होगी, यही सोचकर हम लोग भी इस तरफ चल पड़े हैं।” एक साधु ने उनकी जिज्ञासा का समाधान करने की कोशिश की।
“गाँव तो इधर अवश्य है, लेकिन यह सारा का सारा गाँव नास्तिकों का है। आपके ये गेरुए कपड़े देखकर तो सबके सब आपके पीछे पड़ जाएँगे। खाने को मिलेगी गालियाँ और पीने के लिए पीड़ा के घूँट। इधर जाने से अच्छा है आप लोग हमारे साथ चलें। हमारा गाँव यहाँ से थोड़ी दूर अवश्य है किन्तु वहाँ आप लोग आराम से रह सकेंगे।”
“धन्यवाद मित्र, पर आज का कार्यक्रम तो नास्तिकों के गाँव का ही रहेगा।” साधु ने एक हल्की-सी मुसकान के साथ कहा। उनके पाँव-गाँव की ओर बढ़ चले। गाँव के बाहर एक कुआँ था। कुएँ के पास ही एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसके चारों ओर गोल चबूतरा बना हुआ था। कुएँ पर एक डोल-रस्सी भी रखे थे। शायद बाहर से लौटकर आने वाले गाँव के लोग मुँह -हाथ धोकर और साफ-सुथरे होकर गाँव में घुसते थे। कुआँ और चबूतरा देखकर दोनों साधुओं को बड़ी प्रसन्नता हुई। दोनों ने स्नान किया और सफर की थकान मिटाने के लिए चबूतरे पर लेट गए। अभी कुछ ही मिनट बीते होंगे कि एक व्यक्ति कुएँ पर आया और जब वह हाथ मुँह धो रहा था, उसकी नजर उन दोनों साधुओं पर पड़ी । नास्तिकों के इस गाँव में आस्तिकों का कौन-सा काम, उसने सोचा फिर चिल्लाते हुए पूछा-”अरे तुम कौन हो, यहाँ कैसे आए?”
“ये तो हमें भी नहीं मालूम कि हम कौन हैं, इसी सवाल का उत्तर तो हम खोज रहे हैं। गाँव देखा, कुआँ देखा, यहाँ चले आए। सुबह होते ही वापस चले जाएँगे।”
“अगर तुम आस्तिक हो, जैसा कि तुम लोगों के कपड़ों से लगता है, तो तुम्हें हमारे गाँव वालों से बहस करनी पड़ेगी।”
“भाई, जिसे यही मालूम न हो कि वह है कौन, वह आस्तिक या नास्तिक कैसे हो सकता है?” साधु के शब्दों में विनम्रता थी।
कुछ असमंजस में व्यक्ति गाँव की तरफ चल पड़ा । गाँव पहुँचकर उसने गाँव वालों को यह अजीबोगरीब घटना सुना दी।
“जब वे कहते हैं कि उन्हें मालूम ही नहीं कि वे कौन हैं, तो उनसे बेकार की बहस में उलझने से क्या फायदा?” गाँव के एक बुजुर्ग ने अपनी राय जाहिर की।
“लेकिन उनकी वेषभूषा बिल्कुल उन साधुओं की तरह है, जो भगवान और आस्तिकता कर प्रचार करते फिरते हैं।”
“अब सुखलाल भाई तो हैं नहीं, जो कुछ सलाह ले लेते। अभी उनको सोने दो, सुबह बात कर लेंगे। अगर वे आस्तिक है तो उनको स्वीकार करना पड़ेगा कि भगवान, ईश्वर , परमात्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है।” सुखलाल भाई उस गाँव के सबसे अधिक ज्ञानी और नास्तिकवाद के स्तम्भ के रूप में जाने जाते थे। लोग उन्हें आदर से बड़े भाई भी कहते थे।
“लेकिन सुबह तो वे जाने को कह रहे हैं या तो किसी को भेजकर उनको कहा जाय कि वे रुके, हमको उनसे बात करनी है या फिर उनसे सीधे-सादे स्वीकार कराया जाय कि वे भगवान में विश्वास नहीं करते।”
“अरे उन्होंने कुछ खाया-पिया भी है या भूखे ही लेट रहे हैं। यदि भूखे हैं तो आधी रात को भी जा सकते हैं। उन्हें बहस से क्या लेना, कह देंगे भैया जो तुम लोग कहते हो वही ठीक है। अब भूख लगी होगी पहले इसकी व्यवस्था कर लें। उन्हें रोकना ही है तो उन्हें भोजन कराओ, उनसे कहो कि आपसे कुछ जानना है रुकें और हमें लाभान्वित होने का अवसर दें। सुबह उन्हें यहाँ बुलवाओ देखो वे क्या कहते हैं , यदि वे ईश्वर का नाम लेते हैं या धर्म -अध्यात्म की बातें करते हैं, तो उन्हें शास्त्रार्थ की चुनौती दो।” गाँव के बुजुर्ग ने पास खड़े लोगों को समझाने की कोशिश की।
क्का बिल्कुल ठीक कहते हैं। पास ही खड़े लोगों ने समर्थन करते हुए कहा, “काका के साथ एक व्यक्ति और चला जाय और जैसा काका ने बताया है वैसा ही संदेश उन तक पहुँचा दिया जाय।”
सुबह स्नान करने के पश्चात् दोनों साधु गाँव में निर्दिष्ट स्थान पर पधारें। उन्हें दूध-फल का जलपान कराया गया तथा अकेला ही छोड़ दिया गया। कहा गया कि इस समय तो काम है, चर्चा तो सायंकाल होगी। एकान्त स्थान प्रातः का समय , बैठ गए दोनों साधु ध्यान अवस्था में। गाँव वालों ने देखा तो समझ गए कि ये तो आस्तिक हैं। सायं क्या-क्या प्रश्नोत्तर किए जाएँ , इसकी योजना बनने लगी। साधु मस्त थे, ध्यान टूटा तो कुछ बच्चों को अपने पास खड़े पाया। उनमें मस्ती जग गयी, प्रसन्नता से बात-चीत करने लगे बच्चे भी उनसे हिल-मिल गए।
इसी तरह होते-होते साँझ का झुटपुटा हो गया। साधुओं की पूरी गतिविधि नोट कर ली गई । दो बार एक-एक घण्टे के लिए ध्यान में बैठे, खाना खाया विश्राम किया, बच्चों से गप्प मारी किन्तु भगवान का नाम एक बार भी नहीं लिया। क्या कहें इनको नास्तिक या आस्तिक? शाम को सभा जुड़ी , इनको भी वहीं बुला लिया गया।
“क्या आप यह मानते हैं कि इस सृष्टि को भगवान ने बनाया है?” प्रश्न हुआ- “भाई हम लोगों के सामने तो सृष्टि बनायी नहीं गई। जब से हम पैदा हुए हैं तब से सब कुछ ऐसा ही देख रहे हैं, जैसा आजकल दिखाई दे रहा है। “उत्तर मिला। “यदि आप भगवान को नहीं मानते तो ये गेरुए कपड़े क्यों पहनते हैं?”
“गेरुए कपड़ों से भगवान का क्या सम्बन्ध ? आप सबने आग की लपटों को देखा है, कैसा रेग होता है उनका? जब भी आग जलती है, उसकी लपटें किस ओर जाती हैं? क्या कभी आग की लपटों को ऊपर की बजाए नीचे जाते देखा है आप में से किसी ने? गेरुए कपड़ों का मतलब है ज्ञान में ऊपर से ऊपर की ओर जाने का प्रयत्न ।”
“अच्छा तो यह आँखें बन्द कर एक घण्टे तक चुपचाप बैठकर आप दिन में क्या कर रहे थे?”
“देखो, इनसान में तथा अन्य प्राणियों में क्या अन्तर है? प्यास गाय का भी लगती है और आपको भी । आप कुआँ खोदकर पानी निकाल लेते हैं, गाय कुआँ नहीं खोद सकती, क्यों? आप कहेंगे कि इनसान में बुद्धि है गाय में नहीं, ठीक है।”
टब देखिए गर्मी में सूर्य का तापमान हर वर्ष लगभग एक समान होता है, सागर में भी उतना ही जल रहता है, तो फिर मानसून एक समान होना चाहिए या नहीं?”
“हाँ।”
“लेकिन कभी तो एकदम सूखा पड़ जाता है, पीने तक को पानी नहीं मिलता और कभी इतनी वर्षा हो जाती है कि पानी में गाँव के गाँव बह जाते हैं, क्यों? और कभी-कभी तो एकदम गर्मी के मौसम में ओले पड़ने लगते हैं, कहाँ से आ जाते हैं वे ओले?”
“इन बातों का उत्तर तो मौसम वैज्ञानिक ही दे सकते हैं।”
“नहीं, वे केवल तर्क देकर आपको शान्त तो कर सकते हैं परन्तु ठीक-ठीक उत्तर तो उनके पास भी नहीं है। अब तक तो कितने उपग्रह भी भेजे जा चुके हैं, चन्द्रमा , शुक्र तथा अन्य ग्रहों पर लोग पहुँचें भी हैं, जिन पर नहीं पहुँच सके, वहाँ पहुँचने की योजना बना रहे हैं। क्या किसी को कभी आकाश में कहीं ओले या बर्फ के पहाड़ मिले? सवाल यह है कि इतनी गर्मी में वे ओले आकाश में पिघले क्यों नहीं? क्या आप में से कोई इस बात का जवाब दे सकता है।
“आप गाय-भैंस पालते हैं, उसका दूध पीते रहते हैं, फिर आपको लगता है कि इनको गर्भवती होना पड़ेगा, नहीं तो दूध बन्द । गाय-भैंस बच्चा देती हैं, दूध का क्रम चलता रहता है। आठ-दस बच्चा देने के बाद से बुढ़िया हो जाती हैं। आप उसे जंगल में छोड़ देते हैं, कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो जाती है। लगभग यही चक्र मनुष्य के साथ भी चलता है, बचपन, यौवन, बुढ़ापा और मृत्यु । फिर हम सब पशुओं से अधिक क्या कुछ भी तो नहीं।”
साधुओं की वाणी, उनके धारदार तर्क गाँव वालों के सोचने के लिए मजबूर कर रहे थे। उन्हें अपने अन्दर अहसास हो रहा था, कि वे न तो अपने जीवन के बारे में कुछ अधिक जानते हैं और न ही सृष्टि चक्र के बारे में।
“पर इन सब सवालों का जवाब कैसे खोजा जा सकता है?” अनेक आवाजें एक साथ उभरी।
“बाहर से अन्दर जाकर।” साधु कह रहे थे, “ध्यान लगाकर। मन की स्लेट पर जो लेखनी सदैव चलती रहती है, उसको रोक दो। मस्तिष्क जो सदैव उड़ता-बिखरता रहता है, उसे बाँध लो। इसी का नाम है, निर्विचार अवस्था और जहाँ इसमें समर्थ हुए कि प्रश्नों के उत्तर अपने आप थोड़ी देर आँख बन्द करके देखिए यह काम इतना सरल नहीं। विचारों का ताँता लगा ही रहता है। इनकी आवा-जाही रुकती ही नहीं।”
“निर्विचार होने के लिए क्या किसी की मदद की जरूरत है?”
“केवल अपनी।”
“तब ध्यान का भगवान से कोई मतलब नहीं।”
क्या हम लोगों ने अपनी पूरी बातचीत में कहीं भगवान का नाम लिया है? मैं केवल इनसान की बातचीत कर रहा हूँ, आप बीच में भगवान को क्यों घसीट लाए?”
“जिन्दगी में सफलता कैसे मिले इस विषय में भी कुछ मार्गदर्शन दें।”मित्रों, सूर्योदय से एक डेढ़ घण्टा पूर्व का समय बिल्कुल शान्त होता है। नींद के पश्चात् मन और मस्तिष्क भी इस समय शान्त होते हैं। बस इसी समय बैठ जाइए पद्मासन में अथवा पालथी मारकर। चेष्टा कीजिए मन की एकाग्रता की, उसके निर्विचार होने की। हो सके तो जरा स्नान कर लिया जाए ओर ताजगी आ जाएगी। इस अभ्यास के बढ़ने के साथ आप देखेंगे आपकी मानसिक शक्ति का असाधारण विकास हो रहा है। जिन उलझनों को अब तक आप सुलझा पाने में असमर्थ थे वे चुटकियों में सुलझने लगी हैं।”
बातें प्रभावी थी, सभी की समझ में भी आ रही थीं। वे कहने लगे-”हमारे यहाँ के सबसे ज्ञानी व्यक्ति सुखलाल भाई बाहर गए हुए हैं, हम चाहेंगे कि उनके आने तक आप रुकें।ध्यान तो हम सब कल से ही प्रारंभ कर देते हैं।”
“जैसी आप सबकी इच्छा।” साधु मुस्कुराते हुए बोले। अगले दिन हर घर में ध्यान लगाने की चेष्टा में कोई न कोई बैठा था। परन्तु ध्यान इतनी सरलता से लगता है क्या? सब खीझ भी रहे थे लेकिन जिद पर अड़े थे, निर्विचार होना है। सायंकाल गाँव की चौपाल पर फिर सभा जमी। सबने अपनी-अपनी कठिनाइयाँ साधुओं को बताई । किसी को खेती के विषय में याद आने लगता है, किसी के मन पटल पर पत्नी, पुत्र मित्र उभरने लगते हैं। ध्यान जमता नहीं।” बन्धुओं । यह इतना सुगम कार्य नहीं है। यह तो युद्ध है संयम का और इन्द्रियों का। इन्द्रियाँ कहती हैं-फँसा रह क्या करेगा ज्ञान प्राप्त करके। संयम कहता है-मैं तुम्हारा स्वामी हूँ, तुम मेरे वर्ष में कैसे नहीं आओगे। यह युद्ध तो चलता रहेगा। अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम कितने दिन युद्ध करना चाहते हो। वर्षों में भी यदि कोई विजयी हो जाता है तो संसार उसके आगे-पीछे चक्कर काटने लगता है। लेकिन आधा घण्टा-पैंतालीस मिनट बैठना तो पड़ेगा ही। शुरुआत में मन से विकार निकलेंगे, फिर धीरे-धीरे मन शान्त होना शुरू होगा। न चोरी करने का मन होगा, न बेईमानी करने का, बाकी अभ्यास की बात है। भगवान और आस्तिकता की कोई बात नहीं इसमें।” साधु ने कहा।
“महाराज , हमें तो अपने पर ही बड़ी गुस्सा आती है। भला यह भी कोई बात हुई कि अपने हाथ को जैसे हिलाएं वैसे हिलता है, टाँग को जैसे चलाएँ वैसे चलती है। ये बदमाश मन , हमारा होते हुए भी हमारी बात मानता ही नहीं। कुछ ऐसी बात बताओ कि यह मन भी हमारा कहना मानने लगे।”
“इतनी जल्दी तो हार नहीं मानेगा, पर कुछ शिथिल पड़ सकता है।”“कैसे ? जरा बताइए तो?” सभी की जिज्ञासा एक साथ मुखरित हो उठी।
“भूखा मारना प्रारम्भ कर दो इसे । सप्ताह में कम से कम एक दिन नहीं तो दो दिन का उपवास रखो। कष्ट हो तो सब्जी फल, दूध ले लो। इसके उड़ने में कमी आने लगेगी।”
ग्रामीण जन सन्तुष्ट हो गये। उनके लिए ध्यान पूर्णतया नयी बात थी और ऊपर से यह चुनौती भी जब सब अंग उनके कहने में चलते हैं तो यह मन क्यों नहीं चलता। अगले दिन जब सुखलाल भाई घर आए तो आपने ही घर के सब सदस्यों को सबेरे-सबेरे ध्यान करते पाया। वह चकित थे, कि आखिर हुआ क्या है।
गली में कुछ बच्चे खेल रहे थे, उन्होंने उनसे पूछा-”ये आँखें बन्द करके शान्त क्यों बैठे हैं आज सब लोग?”
“ध्यान लगा रहे हैं।”
“किसका?”
“अपना।”
वह कुछ समझ नहीं सका। झुँझलाते हुए पूछा-ध्यान तो देवी देवता का होता है या फिर भगवान का। तुम साफ-साफ क्यों नहीं बताते। बच्चों ने डरते हुए चौपाल में ठहरे साधुओं की ओर इशारा कर दिया।
सुखलाल भाई आग-बबूला होते हुए चौपाल पर पहुँचे। साधु बड़े मजे से चारपाई पर बैठे थे। वही गेरुए वस्त्र, एक की आयु थोड़ी ज्यादा थी, एक अपेक्षाकृत युवक । हो सकता है गुरु-शिष्य रहे हों। अभी वे हँस- हँसकर आपस में बातें कर रहे थे।
“तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए हो? उसने प्रश्न किया।
“भैया हमारी चर्या में विघ्न उत्पन्न तम करो। गाँव के सारे लोग हमें जानते हैं, जो कुछ पूछना है उन्हीं से पूछ लो। वही तुम्हारे सवालों का उत्तर देंगे” और साधु फिर से अपनी बात-चीत में लग गए।
“आत्मा ज्यों ही शरीर की सब स्मृतियाँ भी छोड़ देती है, किन्तु किसी किसी की आत्मा को अपने पुराने शरीर की स्मृतियाँ याद रह जाती हैं, ऐसा क्यों होता है? “ युवा साधु ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की।
“यह क्या आत्मा-परमात्मा का चक्कर फैला रखा है तुमने इस गाँव में? जो होता ही नहीं तुम उसके विषय में भ्रम फैला रहे हो?” सुखलाल झल्ला पड़ा।
“आत्मा नहीं है तो फिर तुम बोल कैसे रहे हो, सोच कैसे रहे हो? शरीर तो मुर्दे का भी हृष्ट-पुष्ट है, दिखाई देता है फिर वह क्यों नहीं बोल सकता? जो शक्ति है, संचालनकर्ता है वही आत्मा है। अब ये चौपाल का पंखा नहीं चल रहा है तुम कहोगे बत्ती नहीं आ रही। पंखा है स्विच है, पर कार्य बन्द है, क्योंकि ऊर्जा नहीं है। क्या तुम्हें ऊर्जा दिखाई देती है? नहीं क्योंकि वह केवल अनुभव की जाती है।”
सुखलाल पैर पटकता हुआ चला गया। उसने भगवान के अंधविश्वास से बड़ी कठिनाई से गाँव वालों को मुक्ति दिलाई थी । मार्क्स, फ्रायड, चार्वाक के तर्कों से उसने ग्रामीणजनों को प्रभावित किया था। उसके प्रयासों से अब तक बहुत से गाँव नास्तिकता की तरफ बढ़ चले थे। उसकी कोशिशों का ही फल था कि आस-पास के गाँवों के लोग, ईश्वर को ढकोसला मानने लगे थे और इन दो लोगों ने उसी के गाँव को सम्मोहित कर दिया ।
शाम को फिर से विशाल सभा जुटी। विशाल इस अर्थ में कि आस-पास के गाँवों के सभी प्रबुद्ध व्यक्ति वहाँ उपस्थित थे। सुखलाल ने उनसे सवाल पूछने शुरू किए।
“तुम नास्तिक हो या आस्तिक?”
“ न+अस्ति अर्थात् नहीं हो। अस्ति अर्थात् हो। अब तुम्हीं बताओ कि तुम हो कि नहीं? यदि तुम कहते हो कि तुम हो तो तुम आस्तिक हुए। यदि तुम इसे परमात्मा के सम्बन्ध में पूछ रहे हो तो? यदि तुम मानते हो कि तुम्हारा अस्तित्व है, तुम्हारी व्यक्तिगत चेतना आत्मा है, तो फिर तुम सबका समूह भी है, इसकी सामूहिक चेतना अर्थात् परमात्मा भी है। यह कैसा है, कहाँ है, हम इस चक्कर में पड़ते नहीं। जब अपने को समझ लोगे तो वह भी समझ में आ जाएगा?”
सुखलाल चुप था। उसके तर्क जवाब दे गए। भला वह अपने को कैसे नकार दे, जीवन को किस तरह से अस्वीकार करे।
“ये गेरुआ कपड़ा क्यों पहनते हो और घूमते क्यों फिरते हो?” उसका अगला सवाल था।
“ये मन को निर्विचार करने का क्या चक्कर है?”
“कुछ भी नहीं। हम तो जीवन जीने की कला बताते हैं। जीवन है तो उसे जीने की कला भी आनी चाहिए। चाहे शरीर हो या फिर मन , उसकी शक्तियों को जानना और सदुपयोग करना, सीखना तो हर एक का अनिवार्य कर्तव्य है। अरे शरीर को तो पशु भी नियंत्रित कर लेते हैं, मन को करो तो जानें ।”
साधुओं की बात ने सुखलाल को सोचने के लिए विवश कर दिया। सभी ग्रामीणजन जीवन जीने की कला को सीखने के लिए प्रयत्नशील हो उठे। चारों ओर प्रसन्नता उमड़ उठी।
पुरुष को शिक्षित करना ऐसा है जो अपने पीछे कुछ नहीं छोड़ जाता। पर स्त्रियों को शिक्षित करना ऐसा है जो अपने पीछे पीढ़ियाँ छोड़ जाती हैं।
आनन्द और सम्मान के पीछे मनुष्य का विवेकयुक्त परमार्थ छिपा रहता है। भले ही वह आँखों से दीख पड़े या नहीं भी।
अतीन्द्रिय क्षमताओं में दिव्यदृष्टि, दूरश्रवण, भविष्य कथन जैसी कितनी ही सामर्थ्यों की गणना होती रहती है। इनमें से भविष्य के अन्तराल में चल रही सूक्ष्म हलचलों को सही-सार्थक रूप से देख व समझ सकने में विरले ही समर्थ होते हैं। इतने पर भी कितने ही व्यक्ति ऐसे होते हैं जो प्रत्यक्ष परिस्थितियों के आधार पर निकट भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का सही आकलन करने में सफल होते हैं। भविष्यवक्ताओं का कहना है कि प्रत्यक्ष परिस्थितियों के आधार पर लगाया गया सत्य का अनुमान असत्य भी हो सकता है। यदि मनुष्य अथवा कोई व्यक्ति वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियों को जानकर अनुकूल क्रियाकलापों को अपना ले, सुरक्षा की ओर ध्यान देना शुरू कर दे तो ऐसे में घटित न होने पर भी भविष्यवाणी को झूठा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सम्भावना होने पर भी प्रयासपूर्वक उसे टाल दिया जाता है। आर्किटेक्ट अपनी योजना में हेर-फेर कर भावी इमारत का स्वरूप बदल सकता है, इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि आरम्भिक स्वरूप झूठा था।
ऐसे ही आकलनकर्ताओं में पाश्चात्य वैज्ञानिक एवं डाक्टर जेराल्ड मैक्समेन का नाम प्रमुख है। उनके अधिकांश भविष्य कथन चिकित्सा क्षेत्र से संबंधित हैं। उन्होंने ‘मेडिसिन इन द ट्वेन्टी फर्स्ट सेंचुरी’ नामक पुस्तक में ‘द पोस्ट फिजिशियन एरा’ नामक शीर्षक से अपने लेख में इक्कीसवीं सदी को चिकित्सा के क्षेत्र में विशेष उपलब्धियों की सदी घोषित किया है। सन् 1976 में ही उन्होंने सन् 1990 के बारे में जिन-जिन रोगों पर विजय प्राप्त करने का संकेत दिया था, वस्तुतः चिकित्साविज्ञानियों को उसमें पूर्णतः सफलता मिल गयी है। उनका यह आकलन उस समय चल रहे विभिन्न प्रयोग-परीक्षणों पर आधारित था।
सन् 1990 तक की उपलब्धियों में गर्भ में ही शिशु-भ्रूण के लिंग का पता लगाने में सफलता, अप्राकृतिक अथवा प्लास्टिक के बने हुए अंग-अवयवों का प्रयोग, कृत्रिम हृदय का आरोपण एवं विभिन्न रोगों के विश्लेषण के लिए कैट स्कैनिंग नामक यंत्र का निर्माण जैसी भविष्यवाणियाँ सत्य सिद्ध हुईं। छूत से फैलने वाले संक्रामक रोगों पर सम्पूर्ण विजय, क्षयरोग, टी.बी., एक्जिमा , कोढ़ जैसे चर्म रोगों के लिए पूर्ण निदान जैसे उनके आकलन क्रमशः सही सिद्ध होते जा रहे हैं।
सन् 1990 से सन् 2050 तक के बारे में उनने लिखा है कि इस अवधि में संश्लेषित रसायनों का प्रयोग कम खर्च वाले भोज्य पदार्थों के रूप में होने लगेगा एवं कैंसर जैसी प्राणघातक बीमारियों के लिए विशिष्ट औषधियों का आविष्कार हो जाएगा। यह खोजें सन् दो हजार से पूर्व ही हो जाएँगी। इसी बीच मानवी मस्तिष्क का प्रत्यारोपण भी सम्मिलित है। इस आधार पर बाल्यावस्था से ही बच्चों को बुद्धिमान, मेधावी , तीव्र स्मरण शक्ति वाला एवं प्रतिभावान बनाया जा सकेगा। सन् 2000 तक मनुष्य शरीर के सभी अंग-अवयवों के आरोपण के लिए विशिष्ट प्रयोग सम्पन्न हो जाएँगे और सरलतापूर्वक किसी भी रोगग्रस्त अंग के स्थान पर स्वस्थ अंग को स्थापित किया जा सकेगा। इस स्थिति में लूले-लँगड़े, गूँगे-बहरे एवं अपंग जैसे व्यक्तियों, पीड़ितों लोगोँ की संख्या कम हो जायेगी और उनके लिए स्वर्णिम भविष्य का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा ।
डॉ. जेराल्ड के अनुसार इससे अगले ही कुछ वर्षों में वृद्धावस्था से मुक्ति पाने के लिए रासायनिक दवाओं का संश्लेषण तो होगा ही, किन्तु सदैव चिरयुवा बने रहने के लिए संयमपरक उन सभी आध्यात्मिक मान्यताओं की पुष्टि विज्ञान द्वारा हो जाएगी जिसे इन दिनों अभी हास-परिहास में टाल दिया जाता है। संयम, नियम, तप-तितिक्षा , ब्रह्मचर्य प्राणायाम, ध्यान, योग-व्यायाम, खान-पान, इन्द्रियों का सदुपयोग जैसे शाश्वत आध्यात्मिक सिद्धान्तों पर विज्ञान एवं चिकित्सा की मुहर लगेगी और उन्हें ही चिरयौवन के महत्वपूर्ण औषधि-उपचार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। परिणामस्वरूप लोग सहज ही इस आध्यात्मिक पथ का अनुसरण करने लगेंगे। अंगों के क्रमिक जैविक विकास के लिए सन् 2007 तक विशिष्ट प्रयोग सम्पन्न हो जाएँगे। जन्म जात आनुवांशिक श्रेष्ठता के लिए कृत्रिम उपायों पर विशेष प्रकार के प्रयोग-परीक्षण होंगे, जिसमें स्थूल उपायों की अपेक्षा चेतना की गहन एवं सूक्ष्म परतों को प्रभावित करने वाले आध्यात्मिक उपचारों को मान्यता मिलेगी। इसमें शारीरिक एवं मानसिक योग प्रक्रिया भी सम्मिलित होगी। इन दिनों चल रही जीन प्रत्यारोपण की प्रक्रिया निरर्थक एवं हानिकारक सिद्ध होगी। सन् 2012 तक मानवी प्रतिभा बढ़ाने के लिए उपयुक्त औषधियाँ खोज ली जाएँगी, लेकिन उसे चिरस्थायी बनाने के लिए अध्यात्म उपचारों का सहारा लेना पड़ेगा। इसके बिना सारे प्रयास व्यर्थ ही साबित होंगे।
इसी क्रम में डॉ. जेराल्ड का भविष्य कथन है कि सन् 2030 तक जेनेटिक्स -अनुवांशिकी पर मनुष्य पूरी तरह नियंत्रण प्राप्त कर लेगा। इक्कीसवीं सदी के मध्य तक चिरयौवन के सिद्धान्तों एवं दीर्घायुष्य प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक उपाय खोज लिये जायेंगे और इस उपाय उपचार से लोगों की उम्र में काफी वृद्धि की जा सकेगी। इन दिनों मनुष्य की औसत आयु 40 से 60 वर्ष के बीच है, अगले दिनों उसे 100 से 120 वर्ष के निकट तक पहुँचाया जा सकेगा। तब अधिकांश व्यक्ति स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होंगे। मानव समुदाय के लिए विज्ञान एवं अध्यात्म के संयुक्त प्रयास की यह सबसे बड़ी देन होगी।
अब विज्ञान-जगत के मूर्धन्य मनीषी भी इस तथ्य को समझने लगे हैं कि अकेले भौतिक विज्ञान के विकास से मनुष्य का सर्वांगीण हितसाधन सम्भव नहीं है। डॉ. जेराल्ड का उक्त कथन इस बात की पुष्टि करता है। आने वाले समय में सचमुच विशिष्ट स्तर के प्रयोग-परीक्षण होंगे और उससे मनुष्य का बहुत बड़ा हितसाधन होगा। इस सम्बन्ध में अध्यात्म क्षेत्र की सेवा सराहनीय होगी। विज्ञान को साथ लेकर वह मनुष्य के सर्वांगीण विकास में निश्चय ही बहुत कुछ कर सकेगा।
सत्संग का मतलब है- उत्कृष्ट विचारों और उदात्त भावनाओं का सान्निध्य । सान्निध्य और संपर्क के प्रभावों से प्रायः हम सभी का परिचय है। हालाँकि यह परिचय आस-पास के परिवेश के उथले और हल्के दायरे तक ही सीमित है। आग के पास बैठने पर गर्मी, बर्फ के समीप जाने पर सर्दी का अनुभव सभी को होता है। शहर, गाँव में आईफ्लू, हैजा, कालरा या प्लेग जैसी महामारी फैलने पर उसके संपर्क में आने वालों का बचना भी कठिन है। इस तरह के रोगियों के संपर्क में आने वाले एक के बाद दूसरा-तीसरा व्यक्ति चपेट में आता चला जाता है और यदि उचित रोकथाम न की गई तो यह सिलसिला बढ़ता ही रहता है। संग अच्छा हो या बुरा अपने अनुरूप प्रभाव छोड़े बगैर नहीं रहता।
जो वस्तुएँ अथवा स्थान बाहर से नजर में आते हैं, उनके गुण-दोषों की विवेचना करना सरल है। यदि वे दोषयुक्त है तो उनसे आसानी से बचा जा सकता है। महामारी के कीटाणुओं से इसलिए बच पाना मुश्किल होता है क्योंकि वे दिखाई नहीं देते। वातावरण में घुले इन कीटाणुओं ने जिस व्यक्ति में अपना घर बना लिया है, यदि उसे ठीक से न पहचाना गया तो खतरा हो जाता है। विचार और भावनाएँ कीटाणुओं से कहीं अधिक सूक्ष्म हैं और कहीं अधिक प्रभावी भी। इनका असली परिचय जानना, इनके हितकारी या अहितकारी स्वरूप को समझना थोड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि कभी कभी हितकारी विचार और भावनाएँ दवा की तरह कड़वे भी होते हैं और हानिकारक विचारों का स्वाद हमारा घटिया आदतों को जायकेदार नजर आता है। लेकिन एक की परिणति हमारा उज्ज्वल एवं उत्कृष्ट जीवन होता है और दूसरे की परिणति हमारे जीवन का पतन के अन्धेरों में समा जाना है।
विचारशीलता और बुद्धिमत्ता का तकाजा, परिणाम को ध्यान में रखकर राह चुनना है और इसी कारण प्राचीनकाल से अब तक दुनिया के हर देश में, विश्व की हर जाति में, संसार के हर धर्म में सत्संग की महत्ता प्रतिपादित की जाती रही है। वैदिक धर्म में तो इसकी महत्ता का ही नहीं, अनिवार्यता का भी प्रतिपादन किया है। कथा-कीर्तन , यज्ञायोजन इसी के विभिन्न रूप रहे हैं। बात अकेले अपने देश की नहीं है। जहाँ कहीं भी, जिस किसी जगह इनसान ने बसेरा किया, इसका अस्तित्व किसी न किसी रूप में रहा है। पश्चिम की दुनिया में जब वहाँ इनसान कबीलों और कस्बों में रहते थे। तब उस समुदाय में कोई प्रबुद्ध व्यक्ति शामेन या मेडिसिन मैन कहा जाने वाला व्यक्ति होता था। वह उस समूह का सम्मानित व्यक्ति होता था, जिसके विचारों में सभी को आस्था होती थी। ये व्यक्ति प्रायः प्रतिदिन समूह में सत्संग किया करते थे। वास्तव में ये सत्संग ही उस समूह की संस्कृति का आधार होते थे।
प्राचीन यूनान में भी सत्संग का प्रचलन था। प्लेटो की पुस्तकों का आधार प्रायः महात्मा सुकरात के प्रवचन रहे हैं। एपीक्यूरस-डेमोक्रिटस, डायोजिजिस आदि सभी के दार्शनिक सत्र प्रायः उनके द्वारा सत्संग में दिए गए उद्बोधन मात्र हैं। ग्रीक सन्तों को फिलासफर्स कहा जाता था। जिसका अर्थ होता था सत्य के प्रेमी । सुकरात के सत्संग ने अनेकानेक लोगों के जीवन में ऐतिहासिक परिवर्तन लाकर एथेन्स में क्रान्ति ला दी थी। ईसामसीह के सत्संग में अनपढ़ मछुआरों, उच्चवर्ग द्वारा उपेक्षित गड़रियों को युगपुरुष , महामानव बना दिया। बाइबिल में इस तरह के परिवर्तन की अनेक कथाएँ पढ़ी जा सकती हैं। भगवान बुद्ध के सत्संग से बर्बर डाकू अंगुलिमाल का परिवर्तित होकर संवेदनशील भिक्षु बनने की कथा से सभी परिचित हैं। उन्होंने लगभग पचास सालों तक भ्रमण करते हुए स्थान-स्थान पर सत्संग आयोजित किये। बौद्ध ग्रन्थों का विशालकाय कलेवर महात्मा बुद्ध द्वारा इन सत्संगों में दिए गए उद्बोधनों से ही अस्तित्व में आया है।
संसार के सभी धर्म-सम्प्रदायों का आधार महापुरुषों द्वारा किया गया सत्संग ही रहा है। सभी सम्प्रदायों की नींव इसी के आधार पर रखी गयी । प्रत्येक धर्मग्रन्थों महान आत्माओं द्वारा दिए गए सत्संगों का संग्रह ही तो है। आप किसके साथ रहते है? प्राचीनकाल से ही इसके महत्व को समझा जाता रहा है। संस्कृत में एक कहावत है-
वरं पर्वन दुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह। न मूर्खजनः सर्म्पकः सुरेन्द्र भुवनेष्तपि॥
अर्थात् एक विचारहीन के साथ स्वर्ग में रहने की अपेक्षा जंगलों में वन प्राणियों के साथ घूमना कहीं अच्छा है।
स्वामी विवेकानन्द ने अपनी पुस्तक मन रहस्य और निग्रह में कहा है कि मन का स्वभाव और स्वरूप को जानें बिना आप उसका संयम नहीं कर सकते। अतः आवश्यक है कि सात्विक मनुष्यों की संगति की जाय और नीच मनुष्यों की संगति से बचा जाय।
फूल जिस तरह अपनी सुगन्धि चारों ओर बिखेरते हैं उसी तरह मनुष्य भी अपने विचारों और भावनाओं के अनुरूप विद्युतकण बाहर फेंकते रहते हैं। ये विद्युतकण जैसे होते हैं, वैसा असर दूसरों पर डालते हैं। उत्कृष्ट विचार और उदात्त भावनाओं वाले व्यक्ति चूँकि स्वयं पवित्र होते हैं, अतः उनके आस-पास का क्षेत्र भी पवित्र होने लगता है। इसी वजह से भागवतपुराण में महर्षि व्यास ने कहा है-आत्मा की शुद्धि साधु सन्तों के साथ से बहुत तीव्र गति से होती है।
अच्छा संग न केवल व्यक्ति के चेतन, बल्कि अचेतन में भी परिवर्तन लाता है। कई नए आयाम व क्षितिज ,खुलते हैं , नई-नई प्रेरणाएँ मिलती हैं, जिससे हमारा समग्र दृष्टिकोण ही बदल जाता है। हम जीवन को नए अर्थों व नई सम्भावनाओं के साथ देखने लगते हैं, धीरे धीरे हमारी अपनी सत्ता , अपने अस्तित्व के प्रति सोच-समझ बदलने लगती है। जाग्रत-विवेक जीवन को नई व स्वस्थ दिशा देता है।
सत्संग की स्वाभाविक परिणति विवेक का जागरण है। गोस्वामी जी महाराज न भी कहा है, बिनु सत्संग विवेक न होई। सामान्यतया हमारा मन कई छद्म विश्वासों, मान्यताओं और ग्रन्थियों का पिटारा है। हमारे विचार मन के इन्हीं वर्तुलों में चक्कर काटते रहते हैं। इसी कारण हमारी चेतना इनसे उपजी अनगिनत ग्रन्थियों में बँधी रहती है। इनसे मुक्त होने के लिए हमें किसी आध्यात्मिक चिकित्सक , मानवीय प्रकृति के ज्ञान में निष्णात सन्त , योगी के संपर्क की आवश्यकता होती है। ऐसे महनीय व्यक्तियों द्वारा किए गए वचन , संप्रेषित विचार व भावनाएँ हमारे मन को जड़ता , प्रमाद व कुवृत्तियों से मुक्त करने में सहायक होते हैं। इनकी संगति से जहाँ पुराने विषम संस्कार दूर होते हैं, वहीं सात्विक संस्कार बढ़ते जाते हैं। मन शुद्ध व अन्तःकरण शीतल हो जाता है।
गोस्वामी जी की-सठ सुधरहिं सत्संगति पाई, काक होहिं पिक बकउ मराला’-जैसी उक्तियों का मर्म अनुभवी पाठक जानते होंगे। घोर नास्तिक डाकू रत्नाकर द्वारा देवर्षि नारद का सत्संग पाने के परिणामों से कौन नहीं परिचित है? इस सत्संग ने ही उन्हें महान ऋषि, विख्यात योगी एवं रामायण जैसे महाकाव्य का रचनाकार बनाया। वे आदि कवि कहलाए। जघाई-मघाई जैसे कुख्यात दुर्जन महाप्रभु चैतन्य की संगति पाकर सन्तों की श्रेणी में जा बैठा । भारतीय इतिहास व संस्कृति में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं।
परन्तु सत्संग के प्रभाव भारत तक ही तो सीमित नहीं। इसी शताब्दी के रशियन सन्त गुर्जिएफ की संगति के प्रभाव को आँसपेन्सिकी सहित अनेकों बुद्धिजीवियों ने स्वीकारा है। एक बार एक फ्रिज पीटर नामक एक सैनिक सेकेंड वर्ल्डवार के अन्त में बहुत परेशानी , कष्ट व मानसिक तनाव की स्थिति में गर्जिएफ के पास पहुँचा। जैसे ही वह उनके पास बैठा, पीटर ने महसूस किया जैसे कोई शक्ति का प्रवाह उसके अन्दर आना शुरू हो गया। थोड़ी देर में वह अपने को स्वस्थ एवं तंदुरुस्त महसूस करने लगा। आफसपेन्सिकी द्वारा जिज्ञासा करने पर गुर्जिएफ ने बताया सत्संग में विचार के साथ भाव भी प्रधान होते हैं। विचारों को पुस्तक अथवा कैसेट से भी पाया जा सकता है लेकिन भावों के संपर्क के लिए प्रत्यक्ष सान्निध्य चाहिए अथवा फिर दोनों का पूर्व परिचय अथवा भावनात्मक संपर्क हो , ताकि भावनाओं को संप्रेषित किया जा सके।
इस भाव शक्ति को गुर्जिएफ ने उच्चभाव ऊर्जा (हायर इमोशनल एनर्जी) का नाम दिया। उनके अनुसार सन्त तपस्वी , योगी व्यक्ति ऐसी ऊर्जा का बहुत बड़ा ट्राँसफार्मर होते हैं। उन्हें यह ऊर्जा परमेश्वर से मिलती है। इस शक्तिधारा से वे किसी को भी जोड़ देते हैं इन जुड़ने वाले व्यक्तियों को उच्चस्तरीय चेतना के लाभ मिलने लगते हैं। परमेश्वर से जुड़े इन महान व्यक्तियों की प्राणिक और मानसिक शक्ति बहुत सूक्ष्म स्तर पर कार्य करती है। ये सूक्ष्म प्रकम्पन हमारे मन को परिवर्तित कर देते हैं व उसे शक्तिसम्पन्न बनाने में समर्थ होते हैं। उनका तेजोवलय हमारे प्राणिक वलय को रूपांतरित कर देता है। उनकी मानसिक शक्ति हमें मनोबल सम्पन्न बना देती है। हम इन परिवर्तनों के प्रति समग्र हों या न हों वे सहज व अनिवार्य रूप से घटते हैं किन्तु इस परिवर्तन के लिए आवश्यक है कि हम ग्रहणशील हों।
जिस भी सन्त-महात्मा के सान्निध्य में हमें अच्छा लगता है, शान्ति महसूस होती है वही हमारे लिए अनुकूल है। दूसरे सन्त भी महान होते हैं किन्तु हमारी प्रकृति के अनुकूल न होने से हम उनके प्रति ग्रहणशील नहीं होते और उनके शुभ प्रभाव को ग्रहण नहीं कर पाते। सत्संग के प्रभाव से ग्रन्थियों के खुलने, मन के पवित्र व शक्तिसम्पन्न होने से हमारी अपनी चेतन सत्ता की गहराइयों से संपर्क स्थापित होता है और हम धीरे-धीरे अपनी आत्मसत्ता के करीब होते जाते हैं, ज्यादा से ज्यादा प्रकाशवान बनते जाते हैं।
सत्संग की शुरुआत होती है ईश्वर का सान्निध्य पा चुके, सत् के स्वरूप से एकात्म हो चुके व्यक्तियों के संपर्क- सान्निध्य से । लेकिन धीरे-धीरे स्थूल संपर्क की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। एक दूसरे से दूर रहकर यहाँ तक कि शरीर न रहने पर भी सत्संग चलता रहता है। यह मानसिक एवं चेतनात्मक स्थिति पर बना रहता है। चूँकि सन्तों का मन अपनी आत्मा-परमात्मा से जुड़ा रहता है, अतः उनसे मानसिक सम्बन्ध हमें अपनी अन्तरात्मा से जुड़ने , एकात्म होने में सहयोग देता है। उससे संपर्क होते ही सब कुछ ज्योतिर्मय हो जाता है।
सत्संगति की महिमा से परिचित होने के बाद यह जिज्ञासा सहज है कि सत्संगति कैसे पाएँ? सुविख्यात अध्यात्मवेत्ता महर्षि रमण ने इसके लिए तीन उपाय सुझाए हैं। उनके अनुसार पहले दर्जे का सत्संग है-निर्विकल्प समाधि में सत्यस्वरूप परमात्मा का संग । लेकिन यह सत्संगति कुछ इने-गिने महायोगियों को ही सुलभ है। दूसरे दर्जे का सत्संग है- ऐसे महान व्यक्तियों का संग, जो ईश्वर से एकात्म है। यानि कि महर्षि रमण, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द आदि योगीजनों का स्तर । परन्तु ऐसे योगियों की प्राप्ति भी कम दुर्लभ नहीं। सच्चे योगी प्रायः लोक संपर्क से दूर रहते हैं। उनके स्थान पर ठग-लुटेरे, ढोंगियों की ही भीड़ देखने को मिलती है। ऐसी दशा में तीसरे दर्जे का सत्संग है, ऐसे महान योगियों के वचनों का भावपूर्ण स्वाध्याय।
महापुरुषों के विचारों को यदि पूरी श्रद्धा, विश्वास एवं हृदय की गहराइयों से पढ़ा जाय, तो धीरे-धीरे हमारी चेतना उस महान व्यक्तित्व से जुड़ने लगती है। फिर तो वह महान व्यक्तित्व ही हमारी उँगली पकड़कर उस परमसत्ता तक पहुँचा देता है। ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं, जहाँ सत्य तथ्य बनकर प्रकट हुआ है। स्वामी विवेकानन्द ने अपनी देह छोड़ने के वर्षों बाद श्री अरविन्द को अतिमानस के रहस्य से अवगत कराया था । ईसामसीह के देह छोड़ने के लगभग ढाई सौ वर्ष बाद सेण्टपाल ने उनके विचारों को पूरी श्रद्धा से अपनाकर प्रभु यीशु का सान्निध्य पाया था।
प्रज्ञा अभियान, युग निर्माण आन्दोलन के संचालक का प्राण-प्रवाह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों एवं युग साहित्य के नाम से जानी जाने वाली हजारों पुस्तकों में अनुभव किया जा सकता है। इसमें निहित विचारों को भावनाओं को गहराई से अपनाकर पाठक न केवल विचारों की बौद्धिक गहनता से परिचित हो सकते हैं, बल्कि उस ऋषि-चैतन्य से संपर्क स्थापित कर सकते हैं, जिसका यह विचार प्रवाह है। यह सान्निध्य ही सच्चा सत्संग होगा। सत्संग का यह स्वरूप वैयक्तिक स्तर पर तो रोज ही किया जाना चाहिए। लेकिन सामूहिक रूप से इसका साप्ताहिक क्रम बनाया जाय तो इसमें भागीदार होंगे वहाँ और उनमें युग स्तरीय चेतना के दिव्य अस्तित्व की अनुभूति किया जा सकेगा।
सम्पूर्ण जीव-जगत् में कदाचित् ही ऐसा कोई प्राणी हो, जिसका युग्म न हो, अन्यथा भगवान ने हर जन्तु के जोड़े बनाये हैं। जहाँ नर है, वहाँ मादा भी होगी। स्वयं सृष्टि ही इसका उदाहरण है। प्रकृति और पुरुष के संयोग से इसकी उत्पत्ति हुई बतायी जाती है। इनमें से यदि कोई तत्व भी अनुपस्थित होता, तो चित्र-विचित्र अद्भुतताओं से भरा यह सुन्दर संसार आज हमारे समक्ष नहीं होता। मनोहारी ग्रह-नक्षत्र और विलक्षणताओं से परिपूर्ण ब्रह्माण्ड नहीं होता। यह सब कुछ दो विपरीत तत्वों के सम्मिलन का ही सत्परिणाम है। मनुष्य में ही नर-नारी के दो पक्षों में से यदि किसी एक की विद्यमानता न होती, तो क्या उसका जीवन आज जितना सरस-सुखद बन पाता अथवा वह अपनी वंशवृद्धि कायम रख पाता? कदापि नहीं। ऐसे में नारी को घृणास्पद, पापपूर्ण, अछूत कहना न सिर्फ मातृसत्ता को कलंकित करने जैसा होगा, वरन् इसे पुरुष-मानसिकता का दिवालियापन भी कहना पड़ेगा।
ऐसा ही एक स्थान यूनान में ‘माउण्ट एथोस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह लघु राज्य एजियन सागर से लगभग 50 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ नारियों का रहना और जाना दोनों ही निषिद्ध घोषित किये गये हैं।
उसकी स्थापना आज से करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व हुई बतायी जाती है। उस समय स्थान-स्थान पर वहाँ अनेक चर्च बनायी गई, जिनका कलाकृतियाँ अब भी लोगों को बरबस आकर्षित करती हैं। संन्यासियों के निवास के लिए तब यत्र-तत्र मठों का निर्माण भी हुआ था, जिनमें लगभग एक हजार संन्यासी रहते थे। स्वयं को विरक्त बताने वाले यह संन्यासी उन दिनों यूनान के दूर-दूर के इलाकों से आकर यहाँ बस गये। सबने मिलकर एक आचार-संहिता का निर्माण किया, जिसमें सर्वोपरि तथ्य यह शामिल किया गया कि यहाँ रहने वालों को नारी संपर्क से हर प्रकार से बचना होगा, उनका चिन्तन-मनन भी वर्जित होगा, उनकी तस्वीर और छवि से अपने आप को दूर रखना होगा। यह शर्तें जिन्हें स्वीकार हुईं, वे ही वहाँ रह सके, शेष वापस चले गये। संहिता में इस बात का भी प्रावधान रखा गया कि यदि बात का भी प्रावधान रखा गया कि यदि कभी अकस्मात् किसी नारी-मूर्ति से आमना-सामना हो जाय, तो तत्काल अपने को आड़ में करना पड़ेगा। स्वयं को छिपाने के लिए और नारी-दर्शन से बचने के लिए वहाँ के प्रत्येक व्यक्ति को सिर में अरबों जैसा एक दुपट्टा बाँधना अनिवार्य होता है। अन्तर सिर्फ इतना है कि अरबों का दुपट्टा सिर के पीछे पीठ पर लटकता रहता है, जबकि इनका चेहरे के सामने पर। सामान्य स्थिति में वे इसे अरबों की भाँति पीछे लटकाये रखते हैं। इनकी मान्यता है कि स्त्रियों का दर्शन-स्पर्शन पाप है, इससे मनुष्य का पतन होता है। कैसी विडम्बना है कि जिस मातृत्व की स्नेह-छाया में पल-बढ़कर आदमी बड़ा होता है और जिस देवी के गर्भ से जन्म पाता है, उसी का दर्शन पातक माना जाता है। विकृत चिन्तन की यह घोर पराकाष्ठा है और अकृतज्ञ मनुष्य का अक्षम्य अपराध । होना तो यह चाहिए कि नारियों को और भी अधिक सम्मान, श्रद्धा और सहयोग उनकी ओर से मिले, ताकि उनके परिपालन में जो कष्ट-कठिनाइयों का उनने सामना किया, कम से कम उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित हो सके, पर मनुष्य की स्वार्थपरता को क्या कहा जाय, जो काम बनते ही तोते की तरह आँखें फेर ले!
कहने को तो लोग यहाँ शान्ति की खोज में आते हैं, पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि शान्ति बाहर की वस्तु नहीं, भीतर का विकास है। जहाँ लोग इसे बाहर तलाश करते हैं, वास्तव में वहाँ वे मृगतृष्णा में भटकते हैं। शान्ति को स्थान और वस्तु से जुड़ा देखना भारी भूल है। इसे आकाँक्षा पूर्ति कहना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि दोनों में जमीन-आसमान जितना अन्तर है। एक आध्यात्मिक है दूसरा भौतिक, एक स्थायी है दूसरा क्षणिक । एक को उपलब्ध कर व्यक्ति काफी सुखद अनुभव करता है, जबकि दूसरे की उपलब्धि लिप्सा को और जाग्रत कर देती है। दोनों ही अपने में अनन्तता को सँजोये हुए हैं, पर एक सुखकारक है, दूसरा कष्टकारक । अतः माउण्ट एथोस में जाकर कोई सचमुच ही शान्ति पा लेगा, यह कहना कठिन है।
यहाँ की जनसंख्या लगभग दस हजार है। इनमें नौ हजार के आस-पास संन्यासी हैं और शेष उनके सेवक, जो हर प्रकार से हर समय उनकी सेवा में लगे रहते हैं। जहाँ संन्यासी और सेवक के दो वर्ग होंगे, वहाँ सही अर्थों में न तो संन्यास सध पाता है, न सेवा ही। कारण कि अंतःवृत्तियों के शमन का नाम ही संन्यास है। यह यदि ठीक-ठीक सम्पादित हो गया, तो उसे सेवक की आवश्यकता नहीं पड़ती, वह स्वयं सेवक बन जाता है और सेवाओं से औरों को कृतकृत्य करता है।
यहाँ के निवासियों का जीवन खेती एवं व्यापार पर चलता है। कृषि में यहाँ अन्न, फल, शाक आदि का उत्पादन होता है। अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियों की भी कृषि होती है। मेवे भी उपजाये जाते हैं। विश्व के कितने ही देशों में इनका निर्यात किया जाता है। सबकी अपनी व्यक्तिगत संपत्तियां हैं। इस दृष्टि से बाहरी दुनिया से यह स्थान पृथक् नहीं। यहाँ धनी और निर्धन-दो प्रकार के संन्यासी हैं। सम्पन्नों से किसी भी प्रकार भिन्न नहीं। जो सुविधाएँ किसी धनपति के पास दूसरे देशों में देखी जा सकती हैं, उन सब वस्तुओं की झांकी यहाँ के धनकुबेरों के यहाँ भी की जा सकती। प्रथम दृष्टि में उनके ठाट-बाट और ऐश-आराम को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन होता है कि सचमुच ही ये संन्यासी हैं। श्रम और कृषि सम्बन्धी कार्य वहाँ के गरीब लोग करते हैं। जिस अनुपात में उनकी मेहनत होती है, उस परिमाण में उन्हें पारिश्रमिक नहीं मिल पाता, फलतः वे भौतिक दृष्टि से दरिद्र ही बने रहते हैं।
वहाँ धार्मिक जीवन बिताने में कोई दोष है, सो बात नहीं, पर पूरे समुदाय के सामूहिक विकास पर भी समुचित ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वह धार्मिक राज्य अपना अस्तित्व अधिक दिनों तक बचाये रख सकेगा, इसकी आशा नहीं की जा सकती। यों अभी तक माउण्ट एथोस में गरीब और अमीर श्रेणी के संन्यासियों के बीच किसी प्रकार का मनमुटाव हुआ, ऐसी बात नहीं, पर जिस कदर दोनों वर्गों में आर्थिक असमानता बढ़ रही है, उसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि भविष्य में वहाँ किसी प्रकार का आन्दोलन नहीं होगा। यदि ऐसा हुआ, तो शान्ति की खोज में गये लोगों को वहाँ अशांति ही पल्ले पड़ेगी और धर्म लाभ के नाम पर रहने वाले संन्यासियों के हिस्से अधर्म लाभ आयेगा।
दैनिक जीवन का अधिकांश भाग वहाँ धार्मिक कृत्यों में ही बीतता है, फिर भी श्रमिक स्तर के जो सेवक लोग हैं, उन्हें इसका सौभाग्य कम ही मिलता है। उनकी तो जैसे नियति ही सेवा और श्रम है। उन्हीं के कारण वहाँ खेती सम्भव हो पायी है, अन्यथा वहाँ के संन्यासी नाममात्र को श्रम करते हैं। ऐसे संन्यासियों की संख्या आधे से अधिक होगी। जो निर्धन स्तर के हैं। जहाँ श्रम से जी चुराया जायेगा, उनके पास सम्पन्नता भला कैसे आ सकती है? परिश्रम की महत्ता सर्वविदित है। इसी से दुर्बल पहलवान, निर्धन धनवान, मूर्ख विद्वान और साधक विभूतिवान बनते हैं। अतः दैनिक जीवन में इसकी उपयोगिता की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
प्रति सप्ताह यहाँ एक विशेष प्रकार का धार्मिक जुलूस और जलसे का कार्यक्रम आयोजित होना है, जिसमें श्रमिकों एवं सेवकों के अतिरिक्त सभी हिस्सा लेते हैं। कार्यक्रम में वहाँ के आचार-संहिता का सब स्मरण करते और संकल्प दुहराते हैं। आयोजकों का कहना है कि मनोभूमि को मजबूत बनाये रखने के लिए इसका आयोजन अनिवार्य है। अन्त में सभी अपने-अपने हाथों में जलती मशालें लेकर एक पूर्व निश्चित मठ की परिक्रमा करते हैं। इस दौरान तरह-तरह के नारे लगाये जाते हैं, जो सभी स्त्रियों से सम्बन्धित होते हैं और यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त होते हैं कि नारी नीच होती है, उससे मानसिक अस्थिरता उपजती और अशांति पैदा होती है। इसीलिए वह चिन्तन, दर्शन, श्रवण सब कुछ के अयोग्य है।
यह कितना हास्यास्पद है कि जहाँ नारी के प्रति इतनी घोर घृणा, वहाँ की उपास्य नारी है। वहाँ मरियम के अतिरिक्त अन्य किसी भी देवता की आराधना नहीं होती। अपने इष्ट के प्रति लोग अद्भुत श्रद्धा रखते और उसी का ध्यान-चिन्तन करते हैं। वहाँ के बाजारों में मरियम के चित्र के अतिरिक्त कोई अन्य नारी तस्वीर नहीं बिकती और न स्त्रियोचित सौंदर्य प्रसाधन नहीं मिलते हैं। वस्त्र के नाम पर दुकानों में सिर्फ भगवा परिधान ही उपलब्ध हैं।
नारी न तो घृणास्पद है, न पापपूर्ण । जो आद्यशक्ति है, उसकी जीवन्त प्रतिमूर्ति भला इतनी हेय कैसे हो सकती है कि उसकी निकटता शान्ति भंग करे? वह तो उलटे शान्ति प्रदान करने वाली त्राता है। ‘गायत्री’ का अर्थ ही है-गाने वाले का त्राण करने वाली । नारी को तो भाव-सम्वेदनाओं का घनीभूत रूप कहना ही उचित होगा, जिसका हृदय करुणा से परिपूर्ण हो, उसकी समीपता कल्याणकारी ही होगी, अहितकर नहीं। उसमें अपना अनहित और अवगति देखने वालों की वास्तव में दृष्टि ही विकृत कहनी पड़ेगी, अन्यथा जिसका अंतःकरण यथार्थ में पवित्र और परिष्कृत हो वह चाहे कहीं भी और किसी भी स्थिति-परिस्थिति में क्यों न रहे, कोई अन्तर पढ़ने वाला नहीं, किन्तु जहाँ अन्तस् में कालिमा ही कालिमा हो, वह काजल की कोठरी में प्रवेश कर उससे बेदाग भला कैसे बच सकता? विकार की खोज बाहर नहीं, अन्दर तलाशनी पड़ेगी , तभी वास्तविक अर्थों में हम निर्विकार बन सकेंगे और यह स्वीकार कर सकेंगे कि नर और नारी यथार्थ में एक सिक्के के दो पहलू हैं। एक को उपेक्षित-तिरस्कृत कर दूसरा गतिवान बना रह सकता है, यह सम्भव नहीं। दोनों परस्पर अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। वैयक्तिक , पारिवारिक , सामाजिक प्रगति में दोनोँ की अपनी-अपनी प्रकार की भूमिकाएं हैं। माँ का दायित्व पिता नहीं निभा सकता और न पिता की जिम्मेदारी माँ भली प्रकार वहन कर सकती है। परिवार में कठोरता भी आवश्यक है और मृदुलता भी । उद्दण्डता को साधने के लिए कठोरता भी चाहिए और सौम्यता भी । परिस्थिति-भेद से दोनों का अपना-अपना मूल्य और महत्व है। कठोरता का प्रदर्शन तो हर कोई कर सकता है ,पर करुणा और सम्वेदना एक नारी ही दे सकती है। प्रगति के लिए दोनों प्रकार की विभूतियों की समान आवश्यकता है, अतएव नारी उपेक्षणीय नहीं, आदरणीय है, उसका सम्मत किया जाना चाहिए।
अंधविश्वासों की मृगमरीचिका में लोग कैसे फँसते हैं, इसकी भी विचित्र विडम्बना है। एक बार नाइजीरिया के एक पादरी जंगली लोगों के बीच फँस गए । वे उन्हें मार डालना चाहते थे।
पादरी ने इन लोगों से कहा-वह जादूगर है। उसके पास बहुत भूत हैं। वह चाहे जिससे उसकी मुलाकात करा सकते हैं।
पादरी के पास एक बड़ा-सा दर्पण था। उन्हें उसमें भूत देखने के लिए बुलाया गया। जो आता, अपना चेहरा उसमें देखता और भूत के साक्षात् दर्शन करके डर जाता।
अबकी बार पादरी ने अन्तिम चमत्कार दिखाया। उसके मुँह में नकली दाँत थे। उसने वे निकाल कर दिखाए और दुबारा मुँह में डाल लिए।
दर्पण में भूत देखना और मुँह से दाँत निकाल कर फिर मुँह में डाल लेना -यह दो चमत्कार इन जंगली लोगों को डराने के लिए काफी थे। वे डर गये और पादरी को अपना गुरु मान लिया । धीरे-धीरे पादरी ने उन्हें ईसाई धर्म में दीक्षित कर लिया।
जाड़ों की गुनगुनी धूप सब ओर नर्म कालीन की तरह फैली हुई थी। समुद्र की मृदुल हिलकोरियों का मधुर कल-कल नाद उसके समूचे अस्तित्व को तरंगित कर रहा था। सागर की विशालता और गहराई, उर्मियों के उतार-चढ़ाव की महकता को उसने पहले भी निहारा था। आखिर उसका अपना भी देश तो समुद्र किनारे ही बसा है। फिर भी यहाँ कुछ खास ही अन्तर नजर आ रहा था। यहाँ और वहाँ के समुद्री किनारों में कुछ ,खास ही अन्तर नजर आ रहा था। यहाँ उसके अपने देश की तरह वैभव की चमक-दमक और वासना की विलास लीलाएँ नहीं, पवित्रता की सुगन्ध बिखर रही थी। भगवान जगन्नाथ के सान्निध्य ने पुरी के इस समूचे क्षेत्र को स्वर्गीय सौंदर्य से भर दिया था।
आज वह यूँ ही सागर तट पर घूमने आ निकला था। यद्यपि भारत आए उसे महीनों गुजर चुके थे पर पुरी आए हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे। उसकी इस यात्रा का मकसद जितना कौतूहलवर्धक था उतना ही रहस्यमय भी। वह भारत की खोज में भारत आया था। यूँ तो पश्चिमी दुनिया अब तक भारत से अनजान नहीं थी। वास्कोडिगामा ने काफी अर्से पहले यहाँ आकर दुनिया जहान को बता दिया था कि यह देश सोने की चिड़िया है। उसने यहाँ के बारे में यहाँ आने से पहले बहुत कुछ पढ़ा था। इस देश के वैभव-समृद्धि के बारे में अनेकों किम्वदन्तियाँ सुन रखीं थीं। पर उसे इन सबके प्रति कुछ खास आकर्षण का केन्द्र वैभव और धन-धान्य से समृद्ध भारत नहीं , ज्ञान -विज्ञान और रहस्यमयी क्षमताओं से भरा-पूरा भारत देश था। जो सामान्य दृष्टि वालों के लिए गुप्त था। उसके यहाँ आने का मकसद इसी गुप्त भारत को खोज निकालना था।
सागर तट पर टहलते- टहलते उसके मन में यही विचार स्पन्दित हो रहे थे। अचानक उसके पाँव किसी अज्ञात प्रेरणा से शहर की ओर मुड़ चले। रास्ते में अनजाने ही उसकी नजर एक ओर जा टिकी और वह सम्मोहित-सा खड़ा उस ओर देखने लगा। रास्ते के एक ओर भीड़ के बीच एक मदारी-सा आदमी खूब भड़कीली वेषभूषा में मजमा लगाए खड़ा है। अपने साफे और पायजामे के कारण वह मुसलमान लगता था। हिन्दुओं के तीर्थस्थानों में एक मुसलमान ? और उसका भी ऐसा रुतबा? यद्यपि हिन्दुओं की सहिष्णुता से काफी कुछ परिचित था, फिर भी इस परिदृश्य ने उसकी उत्सुकता जगा दी। बन्दर नचाने वाले इस साधारण से मदारी में उसे कुछ असाधारण लग रहा था।
उसे देखते ही मदारी ने अपने बन्दर से कुछ कहा, तो बन्दर भीड़ में से उछलता-कूदता उसके पास आया और एक अनोखी अदा से सलाम किया। सलाम करने के साथ ही बन्दर ने अपनी टोपी उतारी और कुछ इस ढंग से सामने बढ़ा दी जैसे भीख माँग रहा हो। आशय को भाँपते हुए उसने टोपी में कुछ पैसे डाल दिए। बन्दर उसे उठाकर अपने मालिक के पास चला गया। मदारी ने फिर बन्दर का अजीब-सा नाच दिखाया। जब नाच खत्म हो गया तो उसने अपने कम उम्र के शागिर्द से उर्दू में कुछ कहा ओर शागिर्द ने निकट आकर उससे प्रार्थना की कि वह उसके साथ पीछे के तम्बू में चले, क्योंकि उसका उस्ताद उससे कुछ खास बातें करना चाहता है।
खास बातें और एक अपरिचित विदेशी से, उसे कुछ अजीब-सा लगा। परन्तु तभी उसे अपना मकसद ध्यान में आया। आखिर वह यहाँ अजीब और रहस्यमय की ही खोज में तो आया है। इस विचार के दिमाग में गूँजते ही उसने शागिर्द की बात मान ली। वह चलने को तैयार हो गया। बढ़ते कदमों के साथ वह उस्ताद के साथ तम्बू में दाखिल हो गया। भीतर प्रवेश करने पर उसने देखा कि तम्बू में कोई छत नहीं थी। चारों ओर चार खम्भे गाड़ दिए गए थे और उनके चारों ओर एक मोटा परदा बाँध दिया गया था। उसके घेरे के बीचों-बीच एक सादी ओर हल्की-सी मेज रखी थी। मेज से थोड़ी दूर पर एक छोटा-सा मूढ़ा था। जिसकी ओर इशारा करते हुए उसने कहा-”तशरीफ रखिए मि0 ब्राण्टन।”
एक अजनबी-अपरिचित व्यक्ति के मुख से अपना नाम सुनकर उसे ताज्जुब हुआ। उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गयीं। इस-भाव मुद्रा को पढ़ते हुए वह मदारी नुमा व्यक्ति मुसकराया। उसकी यह मुसकान हल्की-सी स्मित रेखा लगते हुए अपने में अनगिनत रहस्यों को समेटे थी। मुँह से कुछ न बोलते हुए उसने एक कपड़े में लिपटे दो-दो अँगुल के कई खिलौने निकाले। उन खिलौनों के सिर रंग-बिरंगे मोम के बने थे और उनके पैर कुछ कड़े तिनकों के। पैरों के नीचे लोहे के चपटे टुकड़े ठुके हुए थे। उसने सभी खिलौनों को मेज पर खड़ा किया और स्वयं मेज से एक गज की दूरी पर खड़ा हो गया। वह खिलौनों को उर्दू में हुक्म देने लगा। एक या दो मिनट में सब खिलौने मेज पर उछलते-कूदते हुए नाचने लगे।
डस अनोखे व्यक्ति के हाथ में छोटी-सी एक छड़ी थी। उस छड़ी की गति के अनुसार वे खिलौने नाच रहे थे। कोई भी उनमें से भूलकर भी नीचे नहीं गिरा। दोपहर की खुली रोशनी में वह यह खेल देख रहा था। अब कुछ स्पष्ट था, मेज के नीचे भी कोई नहीं था, जिससे चालाकी की उम्मीद की जाती। फिर भी उसे लगा कि चालाकी के लिए शायद कोई और तरीका अपनाया गया हो। अतः वह मेज के बिल्कुल पास आया ओर गौर से निरीक्षण-परीक्षण करने लगा। अपने हाथ से मेज के ऊपर और नीचे भी टटोलकर देखा कि नहीं कोई चुम्बकीय पदार्थ तो नहीं है अथवा कहीं कोई पतला धागा या बाल तो नहीं बँधा है, लेकिन वहाँ ऐसा कहीं कुछ नहीं था।
अब उसका शक उस छड़ी पर गया जो तमाशा दिखाने वाले व्यक्ति ने अपने हाथों में पकड़ रखी थी। जिसका इशारा पाकर खिलौने नाचने लगते थे। लेकिन छड़ी को हर तरह से उलट-पुलट कर देखने पर भी उसमें कोई बात न लगी। फिर भी तमाशा दिखाने वाले व्यक्ति ने शक को बेबुनियाद करने के लिए छड़ी एक ओर रख दी, और अब उसने इशारे से समझाते हुए कहा कि वह मेज के किसी भी भाग की ओर अपनी अँगुली से इशारा करे और आश्चर्य, जब उसने वैसा किया तो सभी खिलौने ठीक उधर ही आ जाते, जिधर अँगुली से इशारा किया जाता। जिधर अँगुली दिखाई जाती, वे उधर ही आकर नाचने लगते।
फिर उस आश्चर्यजनक व्यक्ति ने अपनी जेब से एक रुपए का सिक्का
नशे की स्थिति में मनुष्य होश-हवास खो बैठता है। चिन्तन और आचरण में असभ्यता और उद्दण्डता की मात्रा बढ़ा लेता है। अपने लिए और दूसरों के लिए संकट खड़े करता है। शक्ति का अपव्यय होने पर जो रिक्तता आती है, उसे भरना भी कठिन हो जाता है। इन दुष्परिणामों को देखते हुए नशेबाजी का सभी विचारशीलों ने विरोध किया है और करने वालों को उद्धत और उद्दण्ड बताकर उन्हें हेय कहा और भर्त्सना का अधिकारी, असभ्य ठहराया है।
मानसिक क्षेत्र में भी एक भयंकर नशा अहंकार का है। यह दुकान पर जाकर खरीदना नहीं पड़ता, अपने ही दृष्टिकोण में विकृति भर जाने पर अनायास ही सड़ी कीचड़ में उपजने वाली दुर्गन्ध की तरह उभर पड़ता है। सड़े काठ में कुकुरमुत्ते बिना बोये ही उग पड़ते हैं। इसी प्रकार अदूरदर्शी मनःस्थिति के साथ सम्पदा, समर्थता और उद्दण्डता का समन्वय बन पड़ता है। वहाँ ऐसा कुछ होने लगता है जैसा कि बाएं का पानी तटबन्धों को तोड़ता हुआ समीपवर्ती खेत-खलिहानों और झोंपड़ी को अपने बहाव से कहीं से कहीं बहा लेता है। उपयोगी, अनुपयोगी का भी उसे ध्यान नहीं रहता है।अनेकों को जल देने वाले कुएँ और जलाशयों को भी कीचड़ से भरकर उनका स्वरूप बिगाड़ देता है। अन्धड़ भी यही करते हैं। जब तूफानी गति पकड़ते हैं तो मजबूत वृक्षों तक को उखाड़ फेंकते हैं। हलकी-फुलकी वस्तुओं को तो वे कहीं से कहीं पहुँचा देते हैं। उद्धत अहंकार भी एक प्रकार का उन्माद है। उसमें शक्ति प्रदर्शन ओर कर्तृत्व की विलक्षणता प्रदर्शित करने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं।
पिछली शताब्दियाँ तथाकथित प्रगतिशीलता के उफान की अवधि मानी जाती हैं। उसकी सबसे बड़ी देन है- विज्ञान का अभूतपूर्व उत्कर्ष। पदार्थ सम्पदा का उसके स्वाभाविक गुणधर्म से विरत करके वस्तुओं का मनचाहा उपयोग कर लेना। संक्षेप में इसी को विज्ञान का कौशल कहा जाता है। पर्यवेक्षण करने पर पता चलता है कि इस प्रकार के प्रयास में मानवी प्रयत्नों ने असाधारण सफलता पायी है। इसके द्वारा आविष्कृत-उत्पादित अनेकों उपलब्धियाँ ऐसी हैं जिन्हें अभूतपूर्व एवं चमत्कारी कहा जा सकता है। अनेकानेक सुविधा−साधन, वाहन, कारखाने, आयुध उसी की देन हैं। इनमें कुछ तो एक सीमा तक उपयोगी भी हैं, पर ऐसों का बाहुल्य रहा है जो न केवल अनावश्यक था, वरन् हानिकारक भी रहा। हर कर्म का परिणाम तत्काल तो प्रतीत नहीं होता। पर पीछे परिणाम सामने आने पर यह पता चलता है कि इसमें क्या उपयुक्त बन पड़, क्या अनुपयुक्त? क्या सही सोचा गया, क्या गलत? यह निष्कर्ष निकलने तक प्रायः बहुत देर हो जाती है और जो अनुचित बन पड़ उसका सुधार अत्यधिक कठिन हो जाता है। नशे की स्थिति में प्रायः यही होता है। अहंकारी भी प्रायः ऐसी ही अवाँछनीयता बरतते रहते हैं।
पिछली शताब्दियों में विज्ञान के क्षेत्र में यही होता रहा है। भौतिक क्षेत्र के आविष्कारों की एक होड़ चल पड़ी। प्रतिभाओं का ध्यान उस ओर गया तो उसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी। जो खोजा गया उसका तात्कालिक लाभ जब सामने आया तो धनपतियों से लेकर शासकों तक का ध्यान उनकी ओर गया। दोनों वर्गों ने सोचा कि उन उपलब्धियों का क्यों न भरपूर लाभ उठाया जाय और क्यों न अपनी सामर्थ्य को अधिकाधिक मात्र. में बढ़ाकर मनचाहा वैभव अर्जित किया जाय। लाभ सभी को सुहाता है, विशेषतया तब जबकि उसके उचित ही नहीं, अनुचित प्रकार के स्वार्थों की भी सिद्धि होती हो।
यों सर्वत्र ऐसा ही नहीं हुआ। बहुत कुछ ऐसा भी बन पड़ा है, जिसे सर्वसाधारण के लिए उपयोगी कहा जा सकता है। जिनने सर्वसाधारण की सुविधाओं में अभिवृद्धि की है, श्रम बचाया है और देर में बन पड़ने वाले कार्यों को जल्दी कर दिखाया है, ऐसे सुविधा-साधन भी उत्पन्न किये हैं जो पूर्वकाल में उपलब्ध नहीं थे। इस स्तर के प्रयासों की सराहना की जाएगी और उस सीमा तक विज्ञान को सराहा ही जायेगा। मानवी प्रयत्नों के सदुपयोग से प्रायः ऐसा ही बन पड़ता है जो सुखद भी हो ओर उल्लासवर्धक भी। हानि तो उस दुरुपयोग से होती है जिसमें उतावली और अदूरदर्शिता का समावेश भरा रहता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पिछले दिनों भी देखा जाता रहा है और इस समय तो और भी भयंकर रूप से सामने है।
प्रकृति ने अपने अनन्त भण्डार में से क्रमशः मनुष्य के सामने उतना ही उद्घाटित करने का क्रम जारी रखा है जितना कि वह हजम कर सके। सामर्थ्य से बाहर की वस्तुएँ बटोर लेने पर तो उसके भार से गर्दन ही टूटती है, सँभालने-सुरक्षित रखने में कठिनाई पड़ती है। पेट की सामर्थ्य से अधिक खाया हुआ अमृत भी विष बन जाता है। यही बात शक्ति और सम्पदा के सम्बन्ध में भी है। पात्रता और मात्रा के बीच संतुलन न बिठाया जा सके तो उससे अनाचार ही बन पड़ता है। होता भी ऐसा ही रहा है।
नवजात भौतिक विज्ञान की अपेक्षाकृत अधिक देखभाल और साज सँभाल रखी जानी चाहिए थी। बुद्धिमान अभिभावक ऐसी ही जिम्मेदारी का परिचय भी देते हैं, अन्यथा हरेक बच्चे का जन्मना ही समस्त प्रसन्नताओं का के.......... नहीं बन जाता? बीमार पड़ने पर व........... समुचित चिकित्सा और परिचर्या अभाव में अपंग भी हो सकता है और जन्मभर के लिए सभी के लिए भार बन सकता है, लाभ के स्थान पर उसे हानि ही हो सकती है। उदाहरण के लिए पिछले दिनों विज्ञान के महत्वपूर्ण .....................का दुरुपयोग होना अपने दुष्परिणामों सहित सामने है।
आटा धीमी गति से चक्की पीसे उसकी पौष्टिकता बनी रहेगी। यदि वह तीव्र गति से घर्षण और दबाव हो तो वह जलकर खाक हो जायेगा। भोजन एक-एक ग्रास करके उदरस्थ किया जाता है। पानी घूँट-घूँट कर पीते हैं। यह क्रियाएँ यदि एक बार करने में उतावली की जाय तो परिणाम में हानि ही हानि हाथ लगेगी। एक सोने का अण्डा नित्य देने वाली मुर्गी का पेट चीरकर जिस उतावले मनुष्य ने जल्दबाजी का परिचय दिया था, उसने घाटा ही उठाया। शेखचिल्ली के सपने तो महत्वाकाँक्षाओं से भरे थे, पर उसने क्रमिक प्रगति को ध्यान में नहीं रखा और आगे बढ़ने के लिए किस गति से चरण उठाये जाने चाहिए, इस निर्धारण की उपेक्षा कर गया। फलतः अब तक ‘शेखचिल्ली’ नाम उपहासास्पद उल्लेख में ही काम में लाया जाता है। स्वार्थ का अतिवादी होना भी एक ऐसी ही विडम्बना है जिसके कुछ ही समय में दुष्परिणाम सामने आ खड़े होते हैं।
नवोदित विज्ञान से ऐसी ही भूलें होती रही हैं। उनकी प्रतिक्रिया इन दिनों भयानक व्यवधान के रूप में सामने है। उसे शासकों और धनाढ्यों के हाथ का खिलौना नहीं बनना चाहिए था, वरन् उद्देश्य निर्धारित करते हुए कदम बढ़ाना चाहिए था। सर्वजनीन हित-साधन को लक्ष्य रखकर चलना चाहिए था और यह अनुमान लगाना चाहिए था कि जिन लोगों के हाथ में यह शक्ति जा रही है, वे उसका अनुचित स्वार्थ-साधन के लिए दुरुपयोग तो न करने लगेंगे। आविष्कर्त्ताओं, अन्वेषकों और शोधकर्ताओं को यदि इतनी क्षमता, विलक्षण मेधा, बुद्धि प्राप्त हुई तो उसी के साथ कंधे पर आयी जिम्मेदारियों को भी वहन करना चाहिए था, पर यह हुआ नहीं। दुरुपयोग करने वालों के प्रलोभन सफल होते रहे। उनने विज्ञान क्षेत्र के मनीषियों को खरीद लिया और उनकी उपलब्धियों का अदूरदर्शिता पूर्वक उपयोग किया।
बड़े कारखाने लगाते समय यह विचार किया जाना चाहिए कि इनके माध्यम से होने वाले प्रचुर उत्पादन से उस कमाई का लाभ कुछेक अमीरों के हाथ ही तो सीमित नहीं रह जायगा। कुछेक कुशल श्रमिकों को ऊँचा वेतन देकर उन्हें खुश तो किया जा सकेगा, पर गृहउद्योग में लगे लोगों की आजीविका छिन जाने से उन्हें बेकारी, बेरोजगारी और भुखमरी का सामना तो न करना पड़ेगा। साथ ही यह भी विचारने योग्य था कि उनके लिए जितनी विशाल मात्रा में ईंधन की जरूरत पड़ेगी, उसका प्रबन्ध करने में धरती पर विद्यमान ईंधन तेजी से समाप्त तो नहीं हो जायगा और एक दिन ऊर्जा संकट के कारण इन विशालकाय संयंत्रों का अस्तित्व ही खतरे में तो न पड़ जायगा। फिर इनकी चिमनियाँ जो प्रदूषण उगलेंगी उनके कारण साँस लेने वाले प्राणियों का जीवन संकट में तो न पड़ेगा? इसी को कहते हैं-अदूरदर्शिता, जिसके प्रभाव में आकर लोग तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मान बैठते हैं और यह सोचने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते कि उसका परिणाम किस रूप में कुछ ही दिनों बाद सामने आयेगा। अनाचारों की विषद शृंखला प्रायः इसी आधार पर बढ़ती और फैलती चली गयी है और अब वह हर क्षेत्र में एक प्रचलन बनकर रह गया है, किसी को अखरता तक नहीं।
द्रुतगामी वाहन से समय की बचत हुई और खर्च भी घटा, पर उनके कारण पृथ्वी में संग्रहित ईंधन भण्डार कितनी तेजी से समाप्त होता जा रहा है, कितनी वायु प्रदूषित होती है, कितनी दुर्घटनाएँ घटित होती हैं, पशु वाहन चलाने वालों का उद्योग किस प्रकार समाप्त होता है इसे भुला ही दिया गया। वह समय दूर नहीं जब कारखानों तथा जल-थल-नभ में विचरण करने वाले वाहनों में कोयले और खनिज तेलों की जिस तेजी से खपत हो रही है, वह एक दिन परे भण्डार को समाप्त कर देगी और यह सारा जादुई महल देखते-देखते ढहकर समाप्त हो जायगा।
औद्योगिक प्रगति को देखकर हम सभी खुश होते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि इसके कारण वायु प्रदूषण एवं जल प्रदूषण का कितना बड़ा खतरा दिन-दिन उग्र होता और निकट खिंचता चला आ रहा है। ईंधन समाप्त कर लेने पर उस तथाकथित प्रगति पर विराम तो लगेगा ही साथ ही जीवन की प्रधान आवश्यकता वायु और जल का भारी विषाक्तता से भरा होने के कारण मनुष्य समेत जीव-जगत के लिए चुनौती बनेगा, तब उस महाविनाश से बच निकलना किस प्रकार सम्भव होगा?
कारखानों और वाहनों के कारण उत्पन्न होने वाला शोर प्रत्यक्ष देखने में कोई बड़ी बात प्रतीत नहीं होती, पर उसके अदृश्य परिणाम की जाँच-पड़ताल करने वाले बताते हैं कि इससे न केवल बरापन, वरन् मानसिक दक्षता घटते जाने और विक्षिप्तता बढ़ते जाने का खतरा निरन्तर बढ़ता जाता है। जीवन के साथ खिलवाड़ करके, भविष्य को अन्धकारमय बनाकर यदि वर्तमान सुविधाओं का जादू महल खड़ा कर लिया गया तो इनसे कितने दिनों, कितनों का, कितना काम चलेगा, यह भी तो सोचा जाना चाहिए था। इसी को कहते हैं ‘नशेबाजों जैसा उद्धत आचरण’- ‘अहंकारियों द्वारा उठाते देखा गया उद्धत क्रियाकलाप’। शक्ति जब कभी भी नासमझों के हाथ में पहुँची है तब उसने सदा ऐसा ही अनर्थ पैदा किया है। इन दिनों हम ऐसे ही संकटापन्न दल-दल में फँसे हुए जीवन-मरण के मध्यवर्ती अधर में लटक रहे हैं। तात्कालिक लाभ हमें प्रगतिशीलता के नाम पर और भी अहंकारी बना रहा है। फलतः जिस राह पर हमारी प्रगति चल पड़ी है, वह बढ़ती ही जा रही है, भले ही उसकी परिणति अगले ही दिनों ऐसी विपत्ति में फँसा दे जिससे उबरने का कोई मार्ग ही शेष न रहे।
ऊपर की पंक्तियों में विशालकाय कारखानों और द्रुतगामी वाहनों की ही चर्चा की गई है। पर इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ इसी स्तर का है जिसमें सुविधा-संवर्धन दीखता है और प्रगति-समृद्धि का भी आभास मिलता है, पर अगले ही दिनों इस आधार पर आने वाली विपत्तियों पर जब कभी जिस किसी को भी सोचने का अवसर मिलता है तब प्रतीत होता है कि हम रास्ता भटक गये और आकर्षक दीखने वाली पगडंडियों पर चल पड़े हैं, जिसमें आगे चलकर दलदलों और झाड़-झंखाड़ों की ही भरमार है।
चाकू कितने ही अच्छे लोहे का बना क्यों न हो, उसकी धार बनाने के लिए पत्थर पर रगड़ना आवश्यक है। स्वाध्याय ऐसा ही पत्थर है, जिसके संपर्क में निरन्तर रहना चाहिए।
संसार में पराजित निराश, भयभीत और सशंकित होकर लोग किसी ऐसे देवता की तलाश में फिरते हैं जो आँखें मूँदकर कुपात्रों पर भी अनुग्रह लुटाता हो।
इन दिनों जिस गति से मानसिक विकृतियाँ और व्याधियाँ बढ़ी हैं, उन्हें साधारण नहीं, असाधारण कहना चाहिए। इसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाय-स्वयं को, समाज को या परिस्थितियों को?
इन बिन्दुओं पर गहराई से विचार करने पर यही ज्ञात होगा कि इसके लिए दोष भले ही व्यक्ति या परिस्थिति को दे दिया जाय, पर मूल त्रुटि अपनी निजी ही कही जायेगी। यदि आदमी में अप्रिय प्रसंगोँ को पचाने और सहजता से उसकी उपेक्षा करने की प्रवृत्ति हो, तो कोई कारण नहीं कि वह सामान्य जिन्दगी न जी सके। मुसीबत वहाँ खड़ी होती है, जहाँ राई का पर्वत बना दिया जाता और छोटे प्रकरण को बढ़ा-चढ़ाकर इतना और इस कदर उलझा दिया जाता है कि व्यक्ति स्वयं भी उसी मकड़-जाले में फँस कर हाथ-पैर पीटता रह जाता है। मक्खियाँ जब मकड़ी के बुने जाले में एक बार फँस जाती हैं, तो फिर लाख कोशिश करने के बावजूद भी निकल नहीं पातीं। यही हाल मनुष्य का होता है। ऐसी स्थिति में उसके पास एक ही विकल्प शेष रह जाता है-आत्महत्या। आदमी सोचता है कि प्रस्तुत मनोवेदना से छुटकारा पाने का यह एक सरल तरीका है, पर शायद यह भूल जाता है कि इस प्रकार की प्रवृत्ति से आगामी जन्म और कठिनाइयों भरा बनता है। यह एक सामान्य सिद्धान्त की बात है कि हमारी रुचि जिस क्षेत्र में जितनी होगी, उसमें उत्तरोत्तर विकास ही होता जायेगा, वह घटेगी नहीं, वरन् बढ़ेगी ही। व्यभिचारियों को व्यभिचार की सुखानुभूति एक बार मिल जाने के उपरांत फिर उस कुटेव से स्वयं को पृथक् कहाँ रख पाते हैं? समय के साथ-साथ पाप-पंक में और धँसते ही चले जाते हैं। वास्तव में मन की गति ही ऐसी है कि उसे एक बार प्रयत्नपूर्वक जिस ओर लगा दिया गया, फिर उस दिशा से हटने का नाम नहीं लेता। शराबी, जुआरी, चोर, बेईमान, भ्रष्ट, दुष्ट सब इसी स्तर के होते हैं। वे अपने व्यसनों में इतने अभ्यस्त बन चुके होते हैं कि मन बार-बार उन्हें उसी राह पर घसीट ले जाता है। यह बात नहीं कि वे इनसे उबरने का प्रयास नहीं करते। अपनी ओर से हर कोई इस भँवर से बच निकलना चाहता है, पर मन रूपी भँवर की गति इतनी प्रबल और प्रचण्ड होती है कि उसके आगे उसका बाह्य प्रयास एक प्रकार से निकम्मा साबित होता और जीवन भर पछतावा ही शेष रहता है।
आत्मघात को अन्तिम उपचार के रूप में अपनाने वालों के साथ भी यही होता है। यह बात नहीं कि इसका फैसला वह एक ही बार में ले लेता है। इस सम्बन्ध में अनेक बार उसकी मनःस्थिति बनती-बिगड़ती है। कई बार वह अपनी मानसिक कमजोरी पर काबू पाने की कोशिश करता है। सोचता है कि अगले कुछ दिनों में शायद वह इस दुःखद स्थिति को परास्त कर सके, पर आगे उसकी मानसिक उलझन उसे और भी बिगड़ती प्रतीत होती है। इस असह्य स्थिति में जीवन समाप्त कर लेने का विचार बार-बार उसके मन में उठने लगता है। फिर वह किसी प्रकार मन को समझाकर एवं कुछ परिस्थिति से समझौता कर दशा को सुधारने की कोशिश करता है, किन्तु यह अवस्था अधिक दिनों तक नहीं रह पाती और अवसाद का कुचक्र पुनः उसे घेर लेता है। वह इससे एक बार फिर बाहर आने का प्रयत्न करता है। जिसमें तनिक भी जीवट शेष होता है, वह इस बार भी अपनी मानसिक दुरभिसंधि से बाहर निकले में सफल हो जाता है पर जिनका मनोबल बरी तरह ध्वस्त हो चुका होता है, वे अपनी जीवन-लीलाएँ यहीं समाप्त कर लेते हैं। यह एक दृष्टि से कायरता है और दूसरी दृष्टि से महापातक भी।
कायरता इसलिए, क्योंकि व्यक्ति ने कठिनाइयों के आगे आत्म-समर्पण कर दिया। पाप इसे इसलिए कहेंगे कि मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य प्रगति करना है, अवगति नहीं, विकास के एक सोपान से अगले सोपानों में प्रवेश करना, पीछे लौटना नहीं। जब कोई वातावरण, व्यक्ति या परिस्थिति से परेशान होकर आत्महत्या करता है, तो यथार्थ में वह अपने अगले जीवन की उन्नति को अवरुद्ध कर लेता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, मन की गति और अभिरुचि पूर्व जन्म में जिस ओर होती है, दूसरे जन्म में भी अनायास ही वह उसी ओर मुड़ जाती है। विगत जन्म में चूँकि उसकी प्रवृत्ति बार-बार आत्महत्या की ओर बनी रहती है, इसलिए आगामी जीवन में भी उसका रुझान उसी ओर बना रहता है और बार-बार छोटी-छोटी बात पर भी मन आत्मघात को करता है। आत्मविद्या के आचार्यों का कथन है कि ऐसे व्यक्तियों की जीवनलीला दूसरे जन्म में भी अक्सर आत्महत्या द्वारा ही समाप्त होती है। यह आत्म-प्रगति के आगे रोड़े अटकाने जैसा हुआ, अतएव इसकी गणना पाप में की गयी है।
मूर्धन्य मनीषी एरिक फ्राँम ने अपनी पुस्तक ‘दि से न सोसायटी’ में इन दिनों की बढ़ती मानसिक व्याधि का मुख्य कारण भौतिकवाद को बताया है। वे कहते हैं कि इन दिनों समाज प्रतिस्पर्धी बन गया है। आज का हर व्यक्ति दूसरे से प्रतियोगिता करता है। गरीब अमीर का स्वाँग रचता और छोटा-बड़े जैसा सम्मान पाना चाहता है। अभीप्सा बुरी बात नहीं। यदि मनुष्य इच्छाओं पर अंकुश लगा दे, तो शायद उसकी भौतिक प्रगति हजारों वर्ष पूर्व जितनी थी, उससे एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाती। आज की उन्नति को मानवी आकाँक्षा का ही परिणाम कहना पड़ेगा, पर एरिक फ्राँम का कहना है कि पुराने जमाने और वर्तमान समय की मनःस्थिति में जो मूल अन्तर आया है, वह यह कि अब इच्छा, सिर्फ आकाँक्षा न रह कर महत्वाकाँक्षा बन गई है। यही खतरनाक है। वे कहते हैं कि इच्छा और आकाँक्षा स्वस्थ मनोवृत्ति है। इसमें प्रगति की कामना और कोशिश तो रहती है, पर यदि किसी प्रकार सफलता न भी मिल सकी, तो इसे सामान्य रूप में ही लिया जाता है, जबकि महत्वाकाँक्षा में अभीष्ट को येन-केन-प्रकारेण प्राप्त कर लेने की प्रबल लिप्सा होती है। इसमें व्यक्ति स्वयं को उससे इतना घनिष्ठ रूप से जुड़ा अनुभव करता है कि यदि किसी प्रकार वह उसे प्राप्त करने में असफल रहा, तो वह उसको झकझोर कर रख देता है। यहीं से उसकी मानसिक परेशानी शुरू होती है। उनके अनुसार हम अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप इच्छा तो करें, पर महत्वाकाँक्षा से बचें। यदि ऐसा हो सका, तो आज के व्यक्ति और समाज मानसिक रूप से उतने ही स्वस्थ बन सकते हैं, जितने पूर्व में कभी थे।
शरीर में अनेक प्रकार के विषाणु प्रवेश करते और विविध लक्षणों वाले रोग उत्पन्न करते ही रहते हैं। इसी प्रकार मनोभूमि में कितने ही प्रकार के विकार अपने स्थान बनाते और जड़ें जमाते हैं। इस क्रम में परिपूर्ण उन्माद न सही, उससे मिलते-जुलते उतने ही घातक, उतने ही भयानक रोग उत्पन्न करते हैं। इनमें कितने ही प्रमुख और विघातक व्याधियाँ हैं। मैलनकोलिया अर्थात् विषादजन्य स्थिति, न्यूरस्थेनिया अर्थात् स्नायु सम्बन्धी असंतुलन, डिमेंषिया पैरालिटिका अर्थात् आवेश का क्षणिक दौरा एवं डिमेंषिया प्रिकोक् अर्थात् किशोरों की हिंसात्मक वृत्ति जैसी कितनी ही विकृत मनः-स्थितियाँ ऐसी हैं, जो बुद्धि और विवेक को अव्यवस्थित कर देतीं और जब, जहाँ जो भी सनक सवार होती है, उसी में मस्तिष्क इस प्रकार और इतनी द्रुतगति से गतिमान हो जाता है कि स्वयं को सँभालना मुश्किल हो जाता है। मनःशास्त्रियों का कहना है कि यह सभी न्यूनाधिक भौतिकवाद की ही देन है।
दूसरी ओर ‘फिलॉसफी ऑफ विविलाइजेषन’ नामक अपनी रचना में अल्बर्ट श्वाइत्जर लिखते हैं कि मानसिक विकृति का वास्तविक कारण जीवन-दर्शन में निहित है। उनके अनुसार, आज का जीवन-दर्शन ही त्रुटिपूर्ण है। जीवन के प्रति हर एक की यही सोच और सही समझ हो और उसका जो यथार्थ उद्देश्य है, उसको ध्यान में रखकर चले, तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य जीवन मानसिक विक्षोभों के भ्रम-जंजाल में पड़कर एक प्रकार से नष्ट हो जाय। वे कहते हैं कि जीवन-दर्शन ऐसा होना चाहिए, जिसमें शाँति, संतोष ओर प्रगति तीनों का सामंजस्यपूर्ण संतुलन हो। आज प्रगति तो है पर शान्ति और संतोष का पूर्णतया अभाव, जबकि होना यह चाहिए कि प्रगति के साथ शान्ति भी हो। इन दिनों भौतिक प्रगति के द्वारा शान्ति प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है, जबकि इस विधि द्वारा संतोष सम्भव नहीं, कारण कि शान्ति अन्दर की उपज है, प्रगति बाहर का प्रयास जब प्रगति के द्वारा शान्ति प्राप्त करने का प्रयत्न होता है, तो चूँकि यह असम्भव है, इसलिए उसके स्थान पर असन्तोष पैदा हो जाता है। यही असन्तोष विकृत होकर अनेकानेक प्रकार की मानसिक कुँठाओं का कारण बनता है, जिसकी अन्तिम परिणति आत्महत्या के रूप में सामने आती है।
मनःशास्त्री आज की मनोविकृति के चाहे जो कारण बतायें, अध्यात्मवेत्ता इस सम्बन्ध में एकमत हैं कि मानसिक आधि का कारण बाह्य परिस्थिति नहीं, व्यक्ति की निजी मनःस्थिति है। यदि उसके अन्दर प्रेम, सहयोग, सेवा, सहकार, करुणा, उदारता जैसे गुण हों, तो पहली बात तो यह है कि प्रतिकूलताओं की सम्भावनाएँ काफी न्यून हो जाती हैं। इतने भर भी यदि परिस्थितियाँ मनोनुकूल न हो सकीं, तो सहिष्णु बनकर उनका सामना किया जाना चाहिए। इस स्थिति में मानसिक उलझनों से छुटकारा पाया जा सकता, इससे कम में नहीं। जो परेशानी का कारण और निवारण बाहर तलाश करते हैं वास्तव में वे भ्रान्ति में होते हैं। ‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है’-यह तथ्य भी इसी बात की पुष्टि करता है कि सब कुछ मनुष्य के निजी सोच और प्रयास में निहित है। वह यदि स्वयं को परिस्थितियों का दास मान ले, तो स्वयं भगवान भी उसे ऊँचा नहीं उठा सकते, किन्तु यदि वह यह मान कर चले कि परिस्थितियों का वह स्वामी और नियंता है, तो न केवल वह अपनी प्रगति को ही अक्षुण्ण बनाये रख सकेगा, वरन् मनः स्थिति भी इतनी शान्त, सुव्यवस्थित और शीतलता से भरी-पूरी होगी जिसे देखकर यही कहना पड़ेगा कि वह कोई साधारण नहीं, असाधारण मनुष्य है।
बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से उनकी माँ पूछ रही थीं-”बेटा! यदि तुम्हारा कोई शत्रु तलवार लेकर मेरी ही गर्दन काटने आ जाये, तो तुम क्या करोगे?” “माँ आज ऐसी अनहोनी बात क्यों पूछ रही हो? भले ही मेरा अंग्रेजों से युद्ध चल रहा हो, पर आपने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा है।” सिराज ने उत्तर दिया।
“पर यह भी तो सम्भव है कि वह कुछ न बिगाड़ने पर मेरा जीना-हराम करने लगे।”
“नहीं ऐसी बात नहीं। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आज आपको मेरी शक्ति पर अविश्वास क्यों हो रहा है? मुझे आपत्तिग्रस्त देखकर, जाफर ने अवश्य मेरे विरुद्ध षड्यन्त्र कर दिया है और मुझे परास्त करना चाहता है, पर मैं पारिवारिक जीवन के कर्तव्यों से उदासीन नहीं हूँ। विश्वास रखो माँ ! मुझसे कितना ही शक्तिशाली शत्रु क्यों न हो, पर मैं अन्तिम समय तक मौत के घाट उतारने में लगा रहूँगा। यह मेरा दृढ़ संकल्प है।”
सिराज की बात सुनकर माँ को सन्तोष हुआ। उसे अपना काम बनता दिखाई दिया। उसने कहा-”बेटे सिराज ! मैं तुम से कई दिन से निराशा की भावना देखती आ रही हूँ। मीरजाफर के षड्यन्त्र से तुम्हारे हौंसले पस्त हो गए हैं और आत्मसमर्पण की बात सोच रहे हो। तुम्हारी मातृभूमि पर शत्रु हथियार उठाये खड़ा है। वह मातृभूमि अकेले तुम्हारी ही नहीं, मुझ जैसी माताओं की भी है।”
माँ की बात बेटे को चुभ गयी। वह माँ का आशय समझ चुका था। शत्रुओं को पछाड़ने के लिए आतुर हो उठा।
अब एक क्षण की भी वह देर न करना चाहता था। वह उठा और तुरंत बाहर चला गया, एक दिन उसका कवच ही उसके शव का आवरण बना।
मनुष्य अपने बुद्धि-कौशल पर गर्व करता हुआ कितना ही इतराता क्यों न फिरे, फिर भी विश्वभर में फैली हुई कितनी ही रहस्यात्मक रचनाएँ ऐसी हैं जिन्हें वह आज तक नहीं समझ पाया है। इस विलक्षणता की कहानी निर्जन स्थानों में, समुद्र तटों पर, बीहड़ वनों में मनुष्य या प्रकृति द्वारा खड़े किये गये नानाविधि महाकाय पाषाण खण्ड कह रहे हैं। इस कहानी को सुनने वाले पुरातत्ववेत्ताओं एवं वैज्ञानिकों का कहना है कि यह निओलिथिक कम्प्यूटर प्राचीनकाल के तथाकथित धर्म गुरुओं ने चन्द्र, सूर्य एवं नक्षत्रों की सूक्ष्म काल गणना हेतु विनिर्मित किये थे। इनके इष्टदेव सूर्य को बताया जाता है। यूरोप एवं मय सभ्यता के शिलाखंडों में काफी अनुरूपता है। इस तरह की अनेकानेक विचित्र, प्राकृतिक संरचनाओं का वर्णन ‘ग्रेट मिस्ट्रीज ऑफ द वर्ल्ड’ एवं ‘वर्ल्ड्स लास्ट मिस्टीरियस लैण्ड’ जैसे ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक किया गया है।
विकासवादी वैज्ञानिकों की मान्यता के अनुसार, मनुष्य का उद्भव कुछ हजार वर्ष पूर्व का है। इंग्लैण्ड के आर्कबिषप उषर द्वारा की गयी बाइबिल की एक व्याख्या के अनुसार तो पृथ्वी पर मानव का सर्वप्रथम प्रादुर्भाव 23 अक्टूबर, 404 ईसा पूर्व हुआ था। अतः इस मान्यता के अनुसार तो इससे पूर्व मनुष्य के कोई अवशेष होने तक की कल्पना नहीं की जा सकती थी, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के फलस्वरूप बहुत पहले से ही भूस्तरीय अनुसंधान करने पर मिलने वाले अवशेषों की छानबीन से यह तथ्य उजागर होने लगा था कि पृथ्वी पर, मानव जीवन का अस्तित्व हजारों वर्षों पूर्व से रहा है। परन्तु पश्चिमी देशों में पायी जाने वाली परम्परा और लिखित प्रमाण इस प्रकार के थे कि पूर्व के देशों मिश्र, मेसोपोटामिया आदि देशों की तरह वहाँ किसी प्रकार की उच्चमानव सभ्यता विकसित होने की कल्पना तक नहीं थी। इसलिए इन देशों में यह मान्यता बना ली गयी थी कि मानव संस्कृति का विकास ईजीप्षियन सागर से लेकर मालटा, स्पेन, पुर्तगाल, फ्राँस, ब्रिटेन और स्केन्डिनेवीआ में हुआ था, जिसे ‘फैलाव का सिद्धान्त’ नाम दिया गया। अतः फ्रांस और ब्रिटेन मेँ पाये जाने वाले महाकाय पाषाण-’मेगालिथिक स्टोन’ मिश्र आदि की संस्कृतियों से कही घटिया, कोई जंगली आदिम जाति की संस्कृति का प्रतीक मान लेना स्वाभाविक था।
लेकिन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ प्राध्यापक अलेक्जेन्डर थोम की खोजों ने तथाकथित विकासवादी वैज्ञानिकों को अपने दृष्टिकोण बदलने के लिए विवश कर दिया। हुआ यों कि सन् 1934 के ग्रीष्म ऋतु में एक दिन वे स्काटलैंड के पश्चिमी तट पर नौका विहार करने निकले थे। चाँदनी रात का समय था। नाव को लंगर डालने के लिए किसी आधार की तलाश कर रहे थे कि अचानक ‘कलानिस’ नामक मेगालिथ पत्थर समूहों पर उनकी नजर पड़ी ।इन रहस्यमय शिलाखंडों के मध्य खड़े होने पर उत्तरी ध्रुव के साथ ही तारामण्डल का स्पष्ट नजारा सामने आया। उनके मन में बिजली सी कौंध गयी मानव के विकास सम्बन्धी सभी पूर्वाग्रह मानो तिरोहित हा गये। इस सम्बन्ध में आम मान्यता को परिवर्तित करने हेतु प्रमाण जुटाने के लिए कष्टसाध्य एवं समय-साध्य कार्य करने का संकल्प मन में उदित हुआ। लगातार तीस वर्ष तक वह इस कार्य में जुटे रहे। उनकी पुस्तक ‘मेगालिथिक साइट्स इन ब्रिटेन’ ने यूरोप के प्रागैतिहासिक काल की इन धारणाओं को आमूलचूल परिवर्तित कर दिया है कि यहाँ के रोमन साम्राज्य से पूर्व के निवासी मध्यपूर्व के निवासियों की तुलना में पिछड़े हुए जंगली स्तर के थे। इस तरह की अनेक मान्यताओं को उपलब्ध प्रमाणों ने उलट कर रख दिया है। उनका कहना है कि विश्व में बिखरे ऐसे अनेकों प्रमाण है जो दर्शाते हैं कि मानव की उत्पत्ति लाखों वर्ष पूर्व इस धरती पर हुई है और वे अपेक्षाकृत कहीं अधिक बुद्धिमान थे।
प्राध्यापक थोम पेशे से एक इंजीनियर हैं। उनका मत है कि विशाल पाषाण खंड-मेगालिथ निर्माता निश्चित ही अति कुशल इंजीनियर रहे होंगे। युक्लिड-जिसे ज्यामिती का पिता माना जाता है, उससे भी हजारों वर्ष पूर्व इन शिलाखंड निर्माताओं ने ऐसे-ऐसे अमिट अवशेष छोड़े हैं जिन्हें देखकर यदि युक्डि होते तो दाँतों तले अँगुली दबा लेते। उदाहरण स्वरूप ‘एवबरी’ नामक स्थान में महाकाय पाषाण खण्डों को स्थापित करने में जिस कुशलता का परिचय मिलता है, उसे देखकर यह जाना जा सकता है कि यह कार्य किन्हीं प्रतिभावानों का है। ऐसे निर्माण अति कुशल और सूक्ष्म साधनों से युक्त प्रतिभावान व्यक्ति ही कर सकते हैं। प्राध्यापक थोम के अनुसार ये निर्माण ग्रह-नक्षत्रों के अध्ययन के लिए एक यंत्र की तरह थे जिनसे ज्यामितीय, गणितीय शिक्षण की पराकाष्ठा परिलक्षित होती है। इसकी विस्तृत जानकारी उनने अपनी दूसरी कृति-’मेगालिथिक ल्युनर आपरेशन्स’ में दी है। इन पुस्तकों में दी गयी जानकारियाँ इतनी सूक्ष्मतम, प्रामाणिक व अकाट्य हैं जिनने आधुनिक विकासवादियों को नये सिरे से सोचने के लिए विवश कर दिया है। इन खोजों की सच्चाई जाने के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य वैज्ञानिक डेविड केण्डल को नियुक्त किया गया, जिन्होंने कम्प्यूटर के माध्यम से उक्त पाषाण खण्डों की जाँच-पड़ताल की और निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि प्राध्यापक थोम की जानकारी शत-प्रतिशत सही है।
आज के प्रगतिशील मनुष्य ने चन्द्रमा की सैर भले ही कर ली हो या अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों की ओर अपने कदम बढ़ा लिये हों, परन्तु वह उक्त निर्माताओं से अपने को श्रेष्ठ नहीं कह सकता। यद्यपि न निर्माणों के समय का आकलन नहीं हो सका है कि वे किस काल में बने और उनका उद्देश्य क्या था, फिर भी समय-समय पर इस सम्बन्ध में प्रयास होते रहे हैं। चार्ल्स द्वितीय के शासनकाल में जॉन ओबेरी नामक वैज्ञानिक को इस कार्य के लिये नियुक्त किया गया था, जिसने सर्वप्रथम इस उत्कृष्ट इंजीनियरिंग के लिए पूर्वजों की सराहना की थी। उनने इस दिशा में जो कार्य किया था, उसका अनुसंधानपूर्ण विवरण डॉ0 विलियम सकले ने अपनी पुस्तक-’स्टोनहेन्ज ए टेम्पल रिस्टोर्ड टू द ब्रिटिश ड्रयूईड्स’ में प्रकाशित किया है। उसके अनुसार इन पाषाण खण्डों का निर्माण ईसा से 460 वर्ष पूर्व हो सकता है। किन्तु शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका के रसायन-शास्त्री बिलियर्ड लिबी ने रेडियो-एक्टिव कार्बन-14 का उपयोग करके-कार्बन डेटिंग द्वारा मापन करके यह बताया है कि इन विशाल पाषाणों का निर्माण ईसा से चार हजार से साढ़े चार हजार वर्ष पूर्व हुआ है। ये मिश्र में पाये जाने वाले पिरामिडों से भी पुराने हैं।
मेगालिथिक पाषाण खण्डों का निर्माण काल ज्ञात हो जाने पर भी यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि किन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इन विशालकाय पाषाण खण्डों का इतनी कुशलता के साथ निर्माण किया गया था और अभी इनका क्या उपयोग हो सकता है? इनके निर्माण में कितना अधिक समय, श्रम और साधन लगा होगा? निर्माताओं ने इस कार्य को इतना महत्व क्यों दिया था? इन तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर एटकिन्सन, जो अलेक्जेन्डर थोम के सहायक अनुसंधानकर्ता है, का कहना है कि एवबरनी खदान जो स्टोनहेन्ज से पन्द्रह मील की दूरी पर है, 81 मेगालीथ पहुँचाने में साढ़े पाँच साल लगे होंगे और इस काम में लगातार 1500 व्यक्तियों ने भाग लिया होगा। उसी समय में बनी सिलबरी हील के निर्माण में एक करोड़ 80 लाख मानव घण्टों की खपत हुई होगी। ये मेगालीथ कितने विशाल थे, इसका अन्दाज फ्रांस में ब्रिटनी में पाये जाने वाले ‘द ग्राण्ड मनेहीर व्रिस’ से लगाया जा सकता है। इन शिलाखंडों का वजन 380 टन है, जो 60 फीट तक ऊँचे हैं। दक्षिण ब्रिटनी के समुद्री तट पर 3000 से अधिक संख्या में करीब साढ़े पच्चीस फीट ऊँचे, 6 फीट चौड़े और सवा दो फीट मोटे शिलाखंड हैं, जो योर्कषायर में ब्रिडलीन्गटन के पास नोर्मन चर्च में खड़े हैं। कहा जाता है कि वे धरती के अन्दर भी बहुत गहराई में धँसे हुए हैं। माना जाता है कि यह सूर्योपासकों के उपासना केन्द्र रहे होंगे, जहाँ से वे ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से सीधे संपर्क साधते रहे होंगे।
सुप्रसिद्ध विद्वान विलियम स्टेकली के अनुसार ड्रयूईड धर्मगुरु सूर्योपासक थे और इन निर्माणों द्वारा ग्रह-नक्षत्रों की सही जानकारी प्राप्त कर अपने उपासना कार्य में वे निरत रहते थे। उत्खनन कार्य में इन्हीं की समाधियाँ पायी गयी हैं, जिसमें ईसाइयों की मान्यताओं से विपरीत उनके शवों के पैर दक्षिण की ओर पाये गये हैं। अन्यत्र अग्निदाह संस्कार करने के प्रमाण भी उपलब्ध हुए हैं। कई सदियों से ड्रयूईड धर्मावलम्बी प्रतिवर्ष उत्तरायण और दक्षिणायन के दो सौर पर्व मनाते आये हैं। प्रतिवर्ष हजारों ड्रयूईड यात्री इन पर्वों पर स्टोन हेन्ज आदि स्थानों में एकत्र होते हैं और साइकिक हीलिंग जैसे चमत्कारिक उपचार करते देखे जाते हैं। अब तो वैज्ञानिक अनुसंधानों ने भी इस तथ्य की पुष्टि कर दी है कि इन स्थानों से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा-’अर्थ एनर्जी’ निस्सृत होती है। इसकी जानकारी प्राप्त करने के लिए ‘डाउजर’-सगुनक दण्डों का प्रयोग किया जाता है। इस ऊर्जा मार्ग को ‘लेज’ नाम दिया गया है।
‘लेज हर्न्टस’ नामक पत्रिका में इस संदर्भ में विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया है। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने व्यापक परीक्षण करने पर पाया है कि इन स्थानों से एक प्रकार की अल्ट्रासोनिक-अश्रव्य ध्वनि तरंगें निकलती हैं और वह भी सूर्योदय से करीब आधा घण्टे पूर्व से प्रारम्भ होकर सूर्योदय के डेढ़ घण्टे बाद तक। कुल मिलाकर दो घण्टे तक ये अश्रव्य तरंगें निकलती रहती हैं, जिन्हें डिटेक्टर के माध्यम से पकड़ा जा सकता है। इतना ही नहीं, एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि उतने समय तक आकाश में स्काई लार्क नामक पक्षियों का समूह भी उस स्थान पर मँडराता रहता है। वैज्ञानिक, इंजीनियर, सगुनक, तत्वदर्शी, मनोचिकित्सक, ज्योतिर्विद्, पुरातत्ववेत्ता आदि सभी आने-अपने ढंग से इन रहस्यों को जानने में अनुसंधानरत हैं। सम्भव है कुछ तथ्यों को रहस्योद्घाटन करने में वे सफल भी हो जाएँ, पर इतने भर से पूर्वजों की तुलना में अपने को अधिक बुद्धिमान नहीं मान बैठना चाहिए।
एक जासु ने सन्त तिरुवल्लुवर से पूछा-”गुरुदेव! भगवान भी कभी हँसता है?”
सन्त मुस्कराए और बोले-”हाँ दो अवसरों पर।”
आगन्तुक की जिज्ञासा और बढ़ी उसने पूछा-”कब-कब?”
सन्त कहने लगे-”पहली बार भगवान तब हँसता है जब इनसान बल और बुद्धि के गुमान में अपनी ही मूलसत्ता ईश्वर को नकारने लगता है। वह भूल जाता है कि वह कहाँ से आया है, यह वैभव-सम्पत्ति सदा रहने वाली नहीं है और मरने के बाद इसे कहीं जान भी है। इनसान के इस भुलक्कड़पन पर भगवान को हँसी आ जाती है।
दूसरी बार भगवान को हँसी तब आती है, जब दो सहोदर भाई किसी जमीन के टुकड़े को नापते हुए कहते हैं, उधर की जमीन मेरी इधर की तेरे। इस मेरी-तेरी में भी बात नहीं बनती तो आपस में लड़ते-झगड़ते, मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। उन्हें इस बात की याद नहीं रहती कि जिस जमीन के टुकड़े के लिए वे लड़ रहे हैं, उसी की धूल में उन्हें मिलना है। उनके न रहने पर भी जमीन का टुकड़ा वैसा ही रहेगा, जैसा कभी उनके रहने से पहले था।”
युगों की दृष्टि से काल को चार भागों में बाँटा गया है-सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। यों मनुष्य की भी शैशव, कैशोर्य, यौवन और बुढ़ापा-यह चार अवस्थाएँ हैं, पर यह जीवन का सुविधा और अवस्थानुसार विभाजन है, विशिष्टतानुसार नहीं।
वैशिष्ट्य के हिसाब से जिन्दगी का यदि वर्गीकरण करना हो, तो उसका तरीका कुछ भिन्न होना चाहिए। शैशवावस्था, किशोरावस्था, यौवन और वृद्धावस्था-यह चार तो आम स्थितियाँ हैं, जो हर एक के जीवन में आती है। अतः इन्हें साधारण ही कहना पड़ेगा। व्यक्तित्व की स्थिति एवं दशा का परिचय इनसे नहीं मिलता। उसके लिए यह देखना पड़ेगा कि वह कितना सक्रिय अथवा निष्क्रिय भूमिका में पड़ा हुआ है। इस आधार पर ही उसका वास्तविक विभाजन सम्भव है। ऐसा इसलिए भी आवश्यक महसूस होता है, क्योंकि कई बार युवक और अधेड़ जैसे लगने वाले लोग भी किशोरों जैसी समझ रखते और गतिविधियाँ अपनाते देखे जाते हैं ऐसे में उन्हें परिपक्व कहना एकदम निर्भ्रान्त नहीं होगा। उनकी अवस्था एक स्थिति का बोध कराती है, जबकि क्रियाकलाप सर्वथा दूसरी का। इससे भ्रम पैदा होना स्वाभाविक हैं। इसीलिए ऋषियों ने व्यक्तित्व का एक दूसरा विभाजन भी आवश्यक समझा। यही सही अर्थों में जीवन का यथार्थ वर्गीकरण है-एक ऐसा वर्गीकरण, जिसके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकना सहज सम्भव हो सके कि मनुष्य चेतना के किस चरण में अवस्थान कर रहा हैं। इस आधार पर समग्र व्यक्तित्व को युगों जैसे ही चार नाम देते हुए चार खण्डों में विभाजित कर दिया गया।
कलियुग व्यक्तित्व का वह हिस्सा है, जिसमें आदमी निद्राग्रस्त जैसी मनोदशा में पड़ा रहता है। वह वासना, तृष्णा, अहंता के दलदल में इस बुरी तरह धँसा होता है कि स्वार्थसाधन के अतिरिक्त उसे कुछ सूझता नहीं। नीति-अनीति का विचार किये बिना जैसे और जितना बन पड़ें, उसे बटोर लेना एवं अपने तथा अपनों का कोठार भरना-यही उसका एकमात्र लक्ष्य होता है। जहाँ प्रत्येक व्यक्ति का चिन्तन इसी परिधि में घूमे और वृत्ति कूपमण्डूकों जैसी बनी रहें, वहाँ श्रेष्ठ आचार एवं उत्तम विचार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? वहाँ सुव्यवस्था एवं स्वच्छ प्रशासन कैसे आ सकते हैं? वहाँ शान्ति और प्रगति की आशा करना दुराशा मात्र होगी। दार्शनिकों ने इसी को ‘तमसाच्छन्न’ स्थिति कहा है और ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ जैसे सूत्रों द्वारा इससे उबारने व ऊँचा उठाने की प्रार्थना की है। अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाँजन शलाकया, चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः। यह श्लोक भी उपरोक्त भाव को ही संजोये हुए सद्गुरु से अज्ञान के अन्धकार से पार लगाने की कामना करता है। यह अज्ञान वस्तुतः है क्या? साधारण भाषा में कहें, तो इसे लोभ और मोह कहना पड़ेगा। हथकड़ी और बेड़ी भी कह सकते हैं। यह दो ऐसे पाश है, जिनके कारण मनुष्य क्षुद्रता के दायरे से बाहर नहीं निकल पाता। एक उसे स्वार्थी बनाता है, तो दूसरा संकीर्ण। इन दोनों का युग्म ही किसी व्यक्ति को पतनोन्मुख बनाने के लिए पर्याप्त है। चेतना की दृष्टि से पतित होना और निद्राग्रस्त बने रहना लगभग एक जैसी अवस्थाएँ हैं, कारण कि दोनों ही उसकी निम्न और अधोमुखी गतियाँ हैं सोये और बेहोश व्यक्ति में कोई विशेष अन्तर नहीं। इस दशा में वह कहाँ, कैसे, किस प्रकार पड़ा हुआ है? इसका उसे तनिक भी भान नहीं होता। नीच लोगों के सिर जब क्षुद्रता सवार होती है, तो वे कितनी और कैसी हीन हरकतें कर बैठते हैं, इसका ही होश उन्हें कहाँ रहता? अतः दोनों की स्थितियाँ करीब-करीब एक जैसी ही कहनी पड़ेंगी। इसीलिए ऐतरेय ब्राह्मण के ऋषि कहते है-’कलिः शयानो भवति’ अर्थात् निद्रालु अथवा हेय मनोदशा में पड़ा रहना ‘कलिकाल’ है। इसे व्यक्तित्व की कलि दशा अथवा वर्तमान सामाजिक अवस्था भी कह सकते हैं।
जाग पड़ना-यह द्वापर के समान है। खुमारी टूटना, मूर्च्छा हटना व्यक्तिगत जीवन में अत्यन्त महत्व के माने गये हैं। इनके रहते करते-धरते कहाँ कुछ बन पड़ता है? महत्वपूर्ण निर्णय पूर्ण चैतन्यता की स्थिति में लिये जाते हैं। मूल्य और महत्व इसी का है, अन्यथा मद्यपी शराब पीकर न जाने क्या-क्या बकते-झकते रहते हैं, उनकी कौन सुनता है। कभी वे स्वयं को मंत्री, कभी पुलिस, कभी राजा, कभी चोर बताते, कभी किसी को गाली देते, तो कभी किसी का उपहास उड़ाते हैं। समझदार व्यक्ति उन्हें एक कान से सुनते और दूसरे से निकाल देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जो कुछ कहा या किया जा रहा है, वह मूर्च्छना की अर्द्धचेतनावस्था में हो रहा है, इसलिए महत्वहीन है। इसी कारण सचेत करते हुए ऋषि कहते हैं कि जागे बिना अब काम चलने वाला नहीं, जागरण ही सब की नियति है। मूर्च्छा तो मौत के समतुल्य है।
यहाँ जागरण का अर्थ उस सद् चिन्तन से लिया जाना चाहिए, जिसके न बन पड़ने पर उदात्त व्यक्तित्व की न तो नींव रखी जा सकती है, न लोकमंगल जैसे कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। इसके लिए सर्वप्रथम उस दिशा में सोचना-विचारना पड़ता है, उसके लाभ-हानि का लेखा-जोखा लेना और उस क्षेत्र के अनुभवियों से परामर्श करना पड़ता है, तब कहीं जाकर इस बात का पक्का निर्णय हो पाता है कि यह घाटे का सौदा नहीं। यही वह अवस्था है, जब मन बार-बार उस ओर आकर्षित होता और उससे मिलने वाली उपलब्धियों की कल्पना कर गदगद होता रहता है। फिर लोभ-मोह और वासना-तृष्णा की हेय लिप्सा मनःस्थिति को अपने खिंचवा में बाँधे रख पाने में सफल नहीं हो पाती। सच्चे अर्थों में यही जाग्रति हैं। इसे ही ‘द्वापर’ कहा गया है। इसी भाव को स्वयं में सँजोये यह आप्त वचन है-संजिहानस्तु द्वापरः’-निद्रा से उठ बैठना द्वापर है।
व्यक्ति का जब चेतनात्मक विकास आरम्भ होता है, तो एक के बाद एक कई सोपान पार करने पड़ते हैं, तब कहीं जाकर अन्त में जीवन के चरम लक्ष्य पर अवस्थिति हो पाती है। यह अवस्थिति सरलता से नहीं मिल जाती। इसके लिए कठिन संघर्ष करना और परिस्थितियों से लोहा लेना पड़ता है। इतना सब क्रियान्वित कर सकने जितनी सामर्थ्य होने पर ही बात कुछ बनती और सफलता हस्तगत होती है। इसीलिए इस राह पर चल पड़ने के लिए कमर कस लेने वर फिर पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए, न बढ़े कदम वापस खींचने चाहिए, कारण कि इस मार्ग का एक-एक कदम भारी अवरोध के समान है, उसे पार करना हिमालय जैसे दुर्लघ्य को लाँघने जैसा है। उस दिशा में अग्रसर एक भी पग गर्व ही नहीं, गौरव भी प्रदान करता है। अतएव ऋषि-निर्देश है कि निद्राग्रस्त यदि जाग पड़ा हो, तो अगले चरण में उसे उठ खड़े होने की तैयारी करनी चाहिए। इससे कम में उस प्रगति को जारी नहीं रखा जा सकेगा, जो मोहनिद्रा त्याग कर आरम्भ की गई थी। इसे सम्पादित करना ही विकास की तीसरी अवस्था-त्रेता है।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति’। शास्त्र-उद्घोष है कि उठ खड़े होना ही त्रेत हैं। खड़े होने से तात्पर्य यहाँ सत्कार्यों के लिए योजनाएँ बनाना, प्रारूप तैयार करना तथा औरों को इस काम के लिए सहमत करना और उनका सहयोग प्राप्त करना है। इसके बाद मिलजुल कर यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि किस प्रकार इस प्रक्रिया को गति दी जा सके और सफलता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को निरस्त किया जा सके, क्योंकि यही वह महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसमें मनोबल गिरने, असहयोग मिलने, अवरोध अड़ने तथा विरोध होने को प्रबल सम्भावनाएँ होती हैं। यदि इसे ठीक-ठाक पार कर लिया गया, तो फिर पटरी पर गाड़ी के लुढ़क चलने में कोई अड़चन शेष नहीं रहती। यही कारण हैं के इस मनः स्थिति को ‘त्रेता’ के समकक्ष खा गया है।
जो उठकर दृढ़तापूर्वक खड़ा हो या, उसका चल पड़ना अवश्यम्भावी है, कारण कि दुनिया में स्थिर कुछ भी नहीं, व चलायमान है। साँसें चल रही है, जीवन चल रहा है, हर अंग-अवयव क्रियाशील-गतिशील है। काया भी अपने ढंग से गतिमान है। उसकी चार अवस्थाएँ इसी की परिणतियाँ हैं। जिस दिन उसमें स्थिरता आ गई, उसी क्षण मनुष्य एक जैसी अवस्था में पड़ा रह जायेगा, उसकी प्रगति अवरुद्ध हो जायेगी। शिशु सदा शिशु ही बने रहेंगे। वे कदाचित् ही प्रौढ़ बन पायें। शायद तब मृत्यु भी न आयेगी, क्योंकि दैहिक गत्यात्मकता ही मरण की हेतु है और मौत यदि जीवन का अनिवार्य अंग न हो, तो आदमी के लिए मुसीबत पैदा हो जाय। कभी न समाप्त होने वाली लम्बी जिन्दगी उसके लिए नीरस-निरानन्द बन जाएगी। इसी कारण काम के पश्चात् जिस प्रकार विश्राम की व्यवस्था है, उसी तरह भगवान ने मौत देकर जीवात्मा के विश्राम का सुयोग बनाया है। पुनः जन्म, उसके बाद फिर मरण-यही उसकी गति-प्रगति है। पदार्थ भी अचल कहाँ हैं? नदियाँ प्रवाहित हो रही हैं, सरिताएँ बह रही हैं, प्रतिपल बदल रही हैं। इसके बिना दूसरा कोई उपाय नहीं। अस्तु, व्यक्ति यदि खड़ा हो गया, तो उसका चल पड़ना असंदिग्ध है। केवल निश्चल बना एक स्थान पर वह रह नहीं सकता। उसे चलना ही पड़ेगा, बढ़ना ही पड़ेगा, बदलना ही पड़ेगा। यही सतयुग है। इसी निमित्त ऋषि कथन है- ‘कृत संपद्यते चरन्’ -चल पड़ना ही सतयुग है। इसलिए वे आगे कहते हैं- ‘चरैवेति, चरैवेति’- चलते रहो, चलते रहो। यही व्यक्तित्व का चरम विकास है।
यहाँ एक बात स्पष्ट है कि मानव सत्कर्म की केवल योजनाएँ-ही-योजनाएँ बनाता रहे, उनका क्रियान्वयन न करे, ऐसा कभी हो नहीं सकता। जो अच्छा सोचेगा, वह अच्छा करेगा भी-यह स्थिर सत्य है। समाज रूपी मन्दिर में यही भगवान की सर्वोपरि सेवा है। इसमें यह तुच्छ जीवन समर्पित हो जाय, इससे बढ़कर उदात्त व उत्कृष्ट और क्या हो सकता है? संसार में यदि कुछ सुखद, सुन्दर एवं श्रेष्ठ है, तो वह परमसत्ता के प्रति निष्ठावान बनने व बनाने की प्रक्रिया के अतिरिक्त दूसरा कुछ हो नहीं सकता। इस विश्व में परम आनन्द की, स्वर्ग-मुक्ति जैसी कोई अवस्था पड़ेगी, जिसे पाकर जीवात्मा धन्य बनती और परमात्मा का आशीर्वाद पाती है। इसी हेतु इस व्यक्तित्व खण्ड को सतयुग-स्वर्णयुग कहकर अभिहित किया गया है।
इस प्रकार उपरोक्त विवेचन से व्यक्तित्व की सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग सम्बन्धी अवधारणा स्पष्ट हो जानी चाहिए। इन्हें यदि शरीर की चार अवस्थाओं में ही घटित करना हो, तो शैशव को सतयुग, किशोरावस्था को त्रेता, यौवन को द्वापर एवं बुढ़ापा को कलियुग कहना पड़ेगा, कारण कि शिशु जब जन्म लेता है, तो उसकी मनोभूमि एकदम निर्मल, निर्विकार होती है। जीवन के दूसरे पड़ाव में आकर वह सच-झूठ, सही-गलत, भला-बुरा, लाभ-हानि, स्वार्थ’-परमार्थ कुछ-कुछ समझने और करने लगता है। फलतः यह त्रेता के समतुल्य है। आयु के तीसरे चरण में यह सब जीवनचर्या का अभिन्न अंग बन जाता और सत्य का अल्पाँश ही शेष रहता है, इसी से यह द्वापर हुआ। चौथेपन में तो बुद्धि का सठियाना प्रसिद्ध ही है। बची-खुची अच्छाई स्वार्थहित में गँवाकर आदमी सब कुछ स्वाहा कर लेता है। अस्तु, इसे आज की परिभाषा में कलियुग मानना ही समीचीन होगा।
लचीले गद्दे पर बैठने से वह नीचे दब जाता है, परन्तु उठने के साथ ही फिर पहले की तरह हो जाता है। इसी तरह साँसारिक लोग जब तक धर्म की बातें सुनते हैं, तब तक उनके विचार धार्मिकता से पूर्ण रहते हैं लेकिन साँसारिक व्यवहारों में लगने के साथ ही वे इन श्रेष्ठ विचारों और ऊंचे आदर्शों को भूलकर पूर्ववत् अपवित्र विचार और आचरण करने लग जाते हैं।
सम्पूर्ण व्यक्तित्व की यह दार्शनिक व्याख्या हुई। यहाँ यह कहना ठीक नहीं कि कलियुग, सतयुग जैसी स्थितियाँ शास्त्रों में निर्धारित काल के गमनागमन पर ही अवलम्बित हैं वास्तव में यह हर व्यक्ति की अपनी-अपनी इच्छा और रुचि पर निर्भर है। वह चाहे तो जीवन भर कलिकाल जैसी हेय अवस्था में पड़ा रहे और चाहे तो तत्क्षण अपनी दशा श्रेष्ठ और समुन्नत स्तर की सतयुगी बना ले। त्रेता, द्वापर दोनों की मध्यावस्थाएँ हैं। अतएव उपरोक्त विभाजन को काल के संदर्भ में समझने की अपेक्षा व्यक्तित्व के सम्बन्ध में समझना ज्यादा उचित, न्यायसंगत और समयानुकूल होगा।
विज्ञान हमेशा से रहस्यों का खोजी रहा है। हालाँकि अभी तक उसकी खोज-बीन सृष्टि के रहस्यों तक ही सीमित रही हैं। लेकिन अब उसने नवयुग के अनुरूप नया रूप लेते हुए सृष्टा का रहस्य जानने की जिज्ञासा प्रकट की है। विज्ञान और वैज्ञानिकों को अब अपने प्रचलित नास्तिकवादी ढर्रें पर संतोष नहीं है। उन्होंने अनुभव कर लिया है कि सृष्टि के मूल कारण, परमसत्य को जाने बगैर उन्हें कभी पूर्णता नहीं मिल सकती। इस अनुभूति को व्यक्त करते हुए किट्टी फर्गसन का ‘द फायर इन इक्वेंशन’ में कहना है कि आधुनिकतम विज्ञान का दृष्टिकोण विस्तृत हुआ हैं सत्य सीमाओं में बँधा नहीं है, इसे समझकर वैज्ञानिकों ने अनन्त व्यापकता में सत्य की पहचान करनी शुरू की है। इस सम्बन्ध में तार्किक, सुलभ, प्रासंगिक एवं वस्तुनिष्ठ प्रतिपादन भी हुए हैं। नयी खोजों से यह साबित हो चुका है कि ब्रह्माण्ड के मध्य एक सुनिश्चित तारतम्य है। जिसका मूल है परमाणु एवं इसके भीतर समाए दूसरे सूक्ष्म कण। इन सारे भीतर समाए दूसरे सूक्ष्म कण। इन सारे कणों के पीछे एक महान शक्तिशाली बल को क्रियाशील होते देखा जा सकता है। फर्गसन का मत है कि व्यष्टि एवं समष्टि के इस समीकरण का संचालन जिस अदृश्य सूत्र से संचालित है, उसकी खोज में तत्पर होना वैज्ञानिक समुदाय का कर्त्तव्य है।
प्रत्येक घटना का एक कारण होता है। अकारण इस ब्रह्माण्ड में कोई घटना नहीं घटती है। भले ही इस कारण को समझना हमार बुद्धि से बाहर हो। यह भी सम्भव है कि वर्तमान में किया गया प्रयोग लम्बे समय बाद अपना निष्कर्ष दे। हर नियम का तुरन्त परीक्षण कर लिया जाए, यह कैसे सम्भव है? इस सोच ने प्रयोगशाला के कैद विज्ञान को खुली हवा में साँस लेने का मौका दिया है।
अभी थोड़े ही समय पहले विज्ञान ने अपने ही बनाए अनेकों मानदण्डों को खुद तोड़ा है। देश-काल सम्बन्धी मान्यताएँ बदली हैं। इस क्रम में सापेक्षतावाद से क्वाँटम सिद्धान्त तक ऐसे नवीन अनुसंधान उभरकर आए हैं, जो अपने आप में आश्चर्य हैं। आज समूचे वैज्ञानिक समुदाय की सोच इस बिन्दु पर टिकी है कि आखिर वह कौन-सा नियम है, जिसके तहत सृष्टि के सारे क्रियाकलाप संचालित हो रहे हैं। अनन्त आकाश में असंख्य तारे, ग्रह-नक्षत्रों की सुनिश्चित गति को पूर्ण रूप से बता पाने में आज के वैज्ञानिक स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे हैं। इसीलिए बिगबैंग थ्योरी के जनक एवं विश्वविख्यात वैज्ञानिक स्टीफेन हाकिंग ने तथ्य की विवेचना करते हुए कहा कि ब्रह्माण्ड का विस्तार सम्बन्धी ज्ञान उस परमसत्ता को जाने बगैर कतई सम्भव नहीं। ईश्वर पर आस्था एवं विश्वास अनिवार्य है, कहते हुए फ्रेड हायल का मानना है कि वैज्ञानिकों को पदार्थ की पूरी जानकारी तभी मिल सकती है, जब उसके कारण को खोज लिया जाए। खगोलविज्ञानी फ्रेड हायल कहते हैं कि यह कारण ही वह सृष्टिकर्ता है।
सारी सृष्टि ऊर्जा के विभिन्न आकार प्रकार है। ऊर्जा कभी विनष्ट नहीं होती। हाँ इसका रूपांतरण जरूर हो जाता है। इस सूत्र को खोज निकालने वालो आइन्स्टीन कहते हैं कि जब भी मैंने स्वयं की बुद्धि एवं विचार पद्धति की क्षमताओं को, सीमाओं को देखा, सत्य उसकी पकड़ से अनन्त दूरी पर दिखाई दिया। वैदिक दर्शन की आवाड्मनस् गोचरम् अप्राप्य मनः सह आदि उक्तियों के अनुरूप अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए विख्यात वैज्ञानिक हाकिंग का कहना है। कि ‘अन्तःप्रज्ञा’ से ही मूल सिद्धान्त को जाना जा सकता है। इस सत्य तक पहुँच पाने का तरीका बताते हुए ‘पींकर’ के शब्द हैं कि जब बुद्धि एवं विचार उच्चस्तरीय चेतना के प्रकाश से प्रकाशित हो जाते हैं, तभी उनमें सत्य प्रतिबिम्बित होता है। जर्मन वैज्ञानिक वारनर हाइजेन वर्ग के अनुसार प्रकृति के रहस्य को बाहर नहीं अन्दर खोजा जाना चाहिए। सृजन के रहस्य मानवीय चेतना की गहराइयों में समाए हैं। वैज्ञानिक हाइजन वर्ग की मान्यता है कि विज्ञान की वर्तमान प्रणाली से प्रकृति के मूल कारण को खोजना आकाश कुसुम खोजने जैसा है। इसकी खोज के लिए विज्ञान को नया रूप देना पड़ेगा, जो मनुष्य को स्वयं के अन्दर निहित परमसत्य को खोजने में सहायक बने।
प्रकृति एक भाग में, एक क्षेत्र में सिमटी नहीं हैं, बल्कि इसका दायरा व्यापक है। इस विस्तार की बात करते हुए सुविख्यात भौतिकी के मर्मज्ञ मूरी जेज मेन ने कहा कि वैज्ञानिकों को उच्चतर आयामों को जानने के लिए सजग एवं सतर्क होना चाहिए। ब्रिटिश अन्तरिक्ष वैज्ञानिक जान डी बेरी ने अपने सुप्रसिद्ध शोधग्रन्थ ‘द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ में उल्लेख किया है कि विज्ञान को प्रकृति के रहस्य आश्चर्य एवं अद्भुत क्रियाओं को जानने तथा उसकी सत्यता क्रियाओं को जानने तथा उसकी सत्यता प्रमाणित करने के लिए अपने नियमों के दायरे को बढ़ाना पड़ेगा। ये सिद्धान्त एवं प्रतिपादन स्पष्ट करते हैं कि विज्ञान और वैज्ञानिक अब अपनी रूढ़ियों को समाप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो चले हैं। वैज्ञानिक दायरे में रूढ़ि शब्द का प्रयोग आश्चर्यजनक किन्तु सत्य जैसा है। जिस तरह से सामाजिक जीवन में सदियों पुरानी परम्पराएँ, मान्यताएँ, आधुनिक परिवेश में औचित्यहीन होने पर भी रूढ़ियां बनकर भार बनी हुई हैं, उसी तरह विज्ञान जगत में भी यह चिर-प्राचीन रूढ़ि रही है कि सत्य और शक्ति सिर्फ पदार्थ में हैं। किन्तु इक्कीसवीं सदी की ओर कदम बढ़ाते हुए समाज और विज्ञान ने अपने को रूढ़ियों के मोहपाश से मुक्त करना शुरू कर दिया है। इसी प्रकार का परिणाम है कि फिजिक्स के पाँव अब मेटाफिजिक्स की ओर बढ़ चले हैं।
विज्ञान का हर नया नियम पदार्थ की एक परत उतार देता है। नियमों एवं खोजों के बढ़ते सिलसिले ने केले के तने की परतों की तरह एक-एक परत को कुछ इस तरह अनावृत किया, कि पदार्थ खो गए। विज्ञानवेत्ता हतप्रभ होकर कहने जगे-”शायद पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं, अस्तित्व सिर्फ चेतना का ही है।” उन्होंने इस बात को स्वीकार करना शुरू कर दिया कि प्रकृति की एक व्यवस्था है और उस व्यवस्था का संचालन परमसत्ता द्वारा होता है। इस तथ्य की पुष्टि करते हुए अपने युग के महान वैज्ञानिक ‘पालडेविस’ ने बड़े दावे से कहा कि भगवान जुआ नहीं खेल सकता। उसकी एक सुनियोजित एवं सुसंचालित व्यवस्था है। इसके संचालक को जानने के लिए आइन्स्टीन के अनुसार प्रकृति से परे निकलना होगा। अतः सिद्धान्तों को सीमाओं में बाँध कर सत्य की खोज सम्भव नहीं है।
विज्ञानवेत्ता यह मानते हैं कि प्रकृति अनन्त रहस्यों की एक किताब है, जिसके हर पत्ते में अजीबोगरीब रहस्य छिपे हुए हैं। इसीलिए जे. बी. एस. इन्डेन ने अपनी अभिव्यक्ति इस तरह से की, कि प्रकृति की विचित्रता एवं विलक्षणता कल्पनातीत है। हमारा मन सके आश्चर्यों की जितनी कल्पना करने में सक्षम हैं, यह उससे कहीं अधिक आश्चर्यमय है। इसे ठीक से समझने के नए शायद हमें मन के दायरे से ऊपर उठना पड़ेगा। थामस एडीसन ने उल्लेख किया है कि अभी तक सूक्ष्मतम कणों का वास्तविक स्वरूप एवं क्रियाकलाप अज्ञात तथा अगम्य है। क्वाँटम मैकेनिक्स ने विश्व तरंगों की तूफानी हलचल माना है। अनिश्चितता के सिद्धांतानुसार किसी मण की गतिविधि एक ही समय, एक ही अवस्था में दोहराए जाने पर हर बार भिन्नता लिए हुए होती है। उनका व्यवहार कभी भी एक समान नहीं होता। इन वैज्ञानिकों के अनुसार असीम को समीप से जानना शायद सम्भव नहीं। टी. एस. इलयट ने ठीक ही कहा है कि परमात्म-तत्व का साक्षात्कार पंचेन्द्रियों से करना बालू का महल बनाने जैसा है।
जैसे-जैसे प्रकृति के गर्भ में झाँकते हैं, नया-नया तथ्य सामने प्रकट होने लगता है। पहले मान्यता थी कि अणु ही पदार्थ का सबसे छोटा कण है। लेकिन अब तो परमाणु से क्वार्क तक की जानकारी हो चुकी है। परमाणु के अन्दर प्रोटान व न्यूट्रान क्वार्क से बने हैं। क्वार्न का मूल आधार फरमीआन को माना जा रहा है। इस कण की खोज इटली के भौतिकविद् एनरीकोफर्मी ने की थी। इसीलिए इसका नाम ‘फरमीआन’ रखा गया। आज के जमाने में संचार के लिए उपयोग में लाई जाने वाली आधुनिकतम प्रणाली टेलीफोन, फैक्स एवं ई-मेल के समान ब्रह्माण्ड के सूक्ष्मतम जगत में यही फर्मीआन संदेशों का आदान-प्रदान करता है। एक कण और है जो स्वयं संदेशवाहक भी है एवं संदेशवाहकों के बीच भी संदेश प्रसारित करता है। इस कण को बोसान के नाम से जाना जाता है। अतः नवीनतम अन्वेषण के अनुसार सृष्टि का सूक्ष्मतम कण या तो फर्मीआन है अथवा बोसान।
इन सूक्ष्मकणों के बीच कहें अथवा ब्रह्मांड में कहें-चार प्रकार के बल प्रमुख रूप से क्रियाशील माने जाते हैं। गुरुत्व बल के तहत बोसान शरीर एवं पृथ्वी के सूक्ष्मतम परमाणु के बीच परस्पर आकर्षण उत्पन्न करता है। एक-दूसरे को आकर्षित करता है। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स में फोटान तथा स्ट्रांग फोर्स में ग्लूआन संदेशवाहक का कार्य सम्पादित करता है। अन्तिम बल है- वीक फोस।, जो रेडियोएक्टीविटी से सम्बन्ध रखता है।
इन बलों के बारे में सन् 1983 में यूरोपियन सेण्टर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (ष्टश्वक्रहृ) के ‘भौतिकी विज्ञानी कार्लोरुबिया सीमनवान डीमीअर’ और इनकी 130 सदस्यीय अीम ने विशद अध्ययन किया। अपने अध्ययन के निष्कर्ष में उन्होंने ख्+, ख्- तथा भ्ठ्ठ की परिकल्पना करते हुए कहा कि ये कण बिना किसी आवेश की परिकल्पना करते हुए कहा कि ये कण बिना किसी आवेश के उदासीन अवस्था में संदेश का प्रचार-प्रसार करते हैं। इस नवीनतम अन्वेषण को करने वालो वैज्ञानिक कार्लारुबिया तथ्य स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्माण्ड के सम्पूर्ण घटक जरूर किसी निश्चित सूत्र से जुड़े हैं।
इस सूत्र का वास्तविक स्वरूप अभी तक विज्ञानवेत्ताओं के लिए भले अज्ञात बना हुआ हो, लेकिन वे इसके अस्तित्व के बारे में सुनिश्चित हैं। इस बात की स्वीकारोक्ति राबर्ट जेस्ट्र्ो ने ‘गॉड एण्ड द एस्ट्रोनामर्स’ में की है। अपनी इस पुस्तक में जेस्ट्रो कहते हैं कि मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं करता था, लेकिन जब से अन्तरिक्ष की अदृश्य लीला मेरे नियमों-सिद्धान्तों से परे होकर भी यथार्थ रूप से दिखाई दी, उस बाजीगर सत्ता पर सहज ही विश्वास होने लगा। आज मैं पूर्णतया आश्वस्त हूँ कि कोई नियामक सत्ता विद्यमान है, जिसके कारण अनन्त ब्रह्माण्ड क्रियाशील है।
‘द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ में स्टीफेन हाकिंग ने विस्तृत एवं विशाल ब्रह्माण्ड की परिकल्पना में अदृश्य सत्ता की भूमिका को स्पष्ट रूप से स्वीकारा है। इस स्वीकारोक्ति के कारण भले ही उन्हें कतिपय रूढ़िवादी वैज्ञानिकों का विरोध झेलना पड़ रहा हो, लेकिन वह कहते हैं कि सत्य का अन्वेषण एवं सत्य का प्रतिपादन वैज्ञानिक का धर्म है और यह एक सच्चाई है कि ब्रह्माण्ड की नियामक सत्ता का अस्तित्व है। इसी तरह रिचर्ड डाकिन्स ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘द ब्लाइन्ड मेकर’ में विकास के क्रम में ईश्वर का अस्तित्व प्रमाणित किया है। उन्होंने ईश्वरीय चमत्कार को भी पूर्णतः विज्ञानसम्मत माना है। इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि जीवन और जगत के अनेक तल है। प्रत्येक तल के अपने सार्वभौमिक नियम हैं। लेकिन ऊपर वाले तल का नियम नीचे के तल के नियम को नियन्त्रित कर सकता है-यही चमत्कार है।
वैज्ञानिक रिचर्ड कहते हैं कि आस्था और श्रद्धा से प्रस्तर की मूर्ति जीवन्त हो सकती है। वस्तुतः ठोस रूप में परमाणु की गति आपस में एक दूसरे से टकराकर निष्क्रिय तथा उदासीन बनी रहती है। यदि इन परमाणुओं को एक ही समय में एकनिष्ठ गति जाय तो ये भी जीवित के समान व्यवहार कर सकते हैं। लेकिन ऐसा होगा तभी जबकि हमारी भावशक्ति, विचारशक्ति किसी उच्चस्तरीय चेतना का आहृय करने और अवतरण, करा सकने में समर्थ हो। डाकिन्स की इस मान्यता के अनुसार मीरा के गिरधर गोपाल का जीवन्त होना कोई कपोल-कल्पना नहीं थीं। रिचर्ड डाकिन्स मानते हैं कि इस तरह की अनगिनत अद्भुत व आश्चर्यजनक घटनाओं के झरोखों से कोई उच्चस्तरीय चेतना यदा-कदा अपनी झलक देती है। उनकी मान्यता है कि समूची सृष्टि का संचालन किसी महत संकल्प से हो रहा है। वैज्ञानिक डाकिन्स के इस सिद्धान्त को प्राचीन ऋषियों ने काफी पहले जान लिया था।
आज के विज्ञानविद् प्रायः इस तथ्य से सहमत हैं कि सत्य वर्तमान सिद्धान्तों की सीमाओं में ही प्रमाणित हो, यह जरूरी नहीं है। अमेरिकन वैज्ञानिक एडवर्ड लारेन्ज ने स्वीकारा है कि मेरे अनेकों प्रयोग प्रचलित नियमों से परे जाकर सिद्ध हुए। अपने जीवन में घटे अनगिनत घटना-क्रमों के अन्त में लारेन्ज ने स्वीकारा कि मेरी भौतिकवादी मान्यताएँ टूट-फूटकर ध्वस्त हो गयीं। उन्होंने इस पर सहमति जताई कि सत्य की शोध प्रचलित विज्ञान की सीमा-रेखाओं तक ही सीमित नहीं रह सकती। सच्चे सत्यान्वेषी को इस दायरे से बहुत आगे बढ़ना पड़ेगा। एक शताब्दी पूर्व जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने भी इसी तरह की अवधारणा विज्ञान जगत के सामने रखी थी।
ज्यों-ज्यों विज्ञान अपनी सीमाओं को बढ़ाता जा रहा है, उसे उतने ही नवीन सत्यों से परिचय एवं नयी शक्ति मिलती जा रही है। अभी तक प्रकाश को सबसे तीव्रगामी माना जाता रहा है, लेकिन सूक्ष्मकणों की खोज ने इसे संदेह के घेरे में डाल दिया है। यही नहीं ब्लैक होल के प्रकाश में आ जाने से तो देश-काल की मान्यताएँ ही बदल गयी हैं।
‘द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ म लेखक जान डिबेरी का तो यहाँ तक कहना है कि संसार में कुछ घटित हो सकता है कि घटनाओं की संचालक सत्ता प्रकृति एवं परमेश्वर है, न कि विज्ञान। वैज्ञानिक तो घटनाओं का विश्लेषण करके बाद में किसी नियम की स्थापना का प्रयास भर करते हैं। लेकिन यह कोई भरोसा नहीं कि भविष्य में घटित होने वाली घटनाएँ उसी नियम के दायरे में घटेंगी। अब तो यह बात पूरी तरह से प्रमाणित हो गयी है कि विज्ञान ने जितना जाना है, उससे कई गुना अभी बाकी है।
जैसे ही विज्ञान के कदम पदार्थ जगत की सीमा पार करते हैं, सुपर नेचुरल जगत का शुभारम्भ होता है। इसी का स्पर्श पाकर वैज्ञानिक समुदाय ने परामनोविज्ञान को विज्ञान की एक शाखा के रूप में स्वीकार कर लिया है। होलोग्राम इसी की उपलब्धि है। विज्ञानवेत्ता वर्मस्टीन के अनुसार परमातत्व रासायनिक तत्वों की पहुँच से बाहर है। भले यह आज वैज्ञानिकों को परिकल्पना जैसा लगे, पर है यथार्थ। यह जितना गूढ़ है, उतना ही सामान्य भी है क्योंकि सृष्टि का प्रत्येक कण उसी की प्रतिकृति है। ‘कैन साइन्टिस्ट बिलीव’ के लेखक सर नेवीलमोट का कहना है कि पदार्थ जगत ईश्वर की रचना का एक नगण्य-सा भाग है। ईश्वर के अस्तित्व का इससे बड़ा संकेत और भला क्या हो सकता है? पदार्थ कोही सर्वस्व समझने की भूल अब और नहीं करनी चाहिए।
जीवन का स्त्रोत किसी अविज्ञात जगत में अवस्थित है। जर्मन मनीषी वुलवर्ट पेनन वर्ग की इस मान्यता कें तहत ब्रह्माण्डीय वेव फंक्श नहीं इलेक्ट्रिक फील्ड, ग्लूआन फील्ड, क्वार्क्स तथा लेण्टान फील्ड में संचारित होता है। विज्ञान जगत में सर्वमान्य ओमेगा प्वाइण्ट बाउण्ड्री के सिद्धान्तानुसार यह क्षेत्र सूक्ष्म से स्थूल की ओर गतिमान है। इसी सूक्ष्म क्षेत्र में चैतन्य चेतना की हलचलें होती हुई देखी जा सकती हैं। पेनन वर्ग कहते हैं कि जीवन का मूल स्त्रोत यह अविज्ञात चेतना ही है जिसे ईश्वर की संज्ञा दी जा सकती है। इस विज्ञात चेतना का स्वरूप अभी वैज्ञानिकों की समझ के बाहर भले हो, पर यदि उन्होंने स्वयं को दुराग्रहों से मुक्त रखा तो अवश्य वे उसका स्पर्श पा सकेंगे।
पेनन वर्ग यह मानते हैं कि वर्तमान पलों में विज्ञान अपनी सीमित परिधि से हटकर जिस आयाम का प्रायोगिक विश्लेषण कर रहा है, वह वस्तुतः अध्यात्म जगत का तत्वाँश है। वैज्ञानिक समुदाय की यह सत्यान्वेषण वृत्ति कल के नवयुग में निश्चित ही विज्ञान के उस स्वरूप का सृजन करेगी जब वह भौतिक विज्ञान न होकर अध्यात्म विज्ञान का रूप ले लेगा और उसके अन्वेषण-अनुसंधान का दायरा पदार्थ की सीमाओं तक संकुचित न रहकर चेतना के उन्नत स्तरों में अपना विस्तार करेगा। इक्कीसवीं सदी में विज्ञान की यही उज्ज्वल भवितव्यता होगी।
धर्मप्रेमियों ने हदीसी धर्मगुरु बालशेम से प्रार्थना की-गुरुदेव! अपने शिष्य मिखाल को आप ही समझाइए कि अब वह योग्य हो गए हैं, उन्हें धर्मगुरु का पद स्वीकार कर लेना चाहिए।
धर्मगुरु बालशेम ने मिखाल को बुलाकर कहा-तुम्हें अपनी जिद छोड़ देनी चाहिए और जनमत एवं मेरे आदेशों का पालन कर गुरुपद स्वीकार कर लेना चाहिए। किन्तु गुरुदेव! मैं जिस पद के योग्य नहीं हूँ, उसे स्वीकार कर लोगों को कैसे गुमराह करूं। मेरी आत्मा तो ऐसा करने की कतई इजाजत नहीं देती।
काला कौआ रोज मुंडेर पर आ बैठता और काँव-काँव करता रहता। छोटे बालक ने अपनी माता से पूछा-माँ! यह कौआ काला क्यों होता है और इतनी जल्दी सुबह-सुबह आकर क्या कहता रहता है?
माँ ने कहा-बेटा! सुबह-सुबह आकर यह सबको सावधान करता है। आओ, सब लोग मुझे ध्यान से देखो और सुनो। भक्ष्य-अभक्ष्य खाने और बिना उचित-अनुचित विचार किए कुछ भी करते रहने से मेरा शरीर कितना काला-कुरूप हो गया है। यही शिक्षा देने यह सबेरे-सबेरे आ जाता है। जिससे पूरे दिन आदमी बुरे काम ओर खान-पान से बच सके।
दमिश्क में एक बार अकाल पड़ा। लोग बेमौत मरने लगे। जो जिन्दा थे वे भी सूखकर पिंजर हो रहे थे। इन्हीं दिनों एक अमीर की सन्त शेख शादी से भेंट हुई। वह भी औरों की तरह सूख रहा था।
शेख सादी ने पूछा, भला आपके पास किस बात की कमी है, आपके यहाँ तो सभी सुख-साधन और पर्याप्त खाने को है फिर आप क्यों चिन्तित लगते हैं?
अमीर ने कहा-महोदय! क्या वह कभी तंदुरुस्त हो सकता है जिसकी बगल में पड़ा बीमार आदमी कराहता है। आस-पास के लोग मुसीबतों से घिरे हों। तो कितना भी निजी सुख हो, जहर बन जाता है।
जिस जिन्दगी से हम इतना प्यार करते हैं, यह अचानक हमें बोझ क्यों लगने लगती हैं? इस सवाल ने इन दिनों सबको उलझन में डाल रखा है। मनोवैज्ञानिक, सामाजिक चेतना के नियामक सभी जानते हैं कि जिन्दगी का सामान्य परिचय देह से होता है। साधारण तौर पर देह में एक छोटा-सा काँटा लगने पर हम सिसक उठते हैं। देह के रख-रखाव, बनाव-शृंगार के लिए रोज न जाने कितने सरंजाम जुटाए जाते हैं। जिस देह से इतना लगाव, उससे यकायक विरक्ति फिर क्यों कि उसे रस्सी से लटका दिया जाए, विष देकर प्राणहीन कर दिया जाए।
रोज के अखबारों में ऐसी न जाने कितनी ही खबरें छपती हैं। जिन्हें पढ़कर पूरे अस्तित्व में एक सिहरन-सी दौड़ जाती है। यदा-कदा तो ऐसा भी सुनने में मिलता है कि अमुक नामी-गिरामी अभिनेत्री ने आत्महत्या की। जिसके पास दौलत शोहरत, रूप-यौवन सभी कुछ था। नहीं था तो सिर्फ जीवन जीने की कला, जिन्दगी के प्रति सकारात्मक नजरिया। सिर्फ एक वर्ग या किसी खास पेशे के लोग जिंदगी से छुटकारा पाना चाहते हों, बात ऐसी नहीं है। समस्या जीवन व्यापी है। छात्र-छात्राएँ, किशोर-युवक, व्यापारी-अभिनेता इसमें सभी शामिल हैं। कोई भी, कभी भी जीवन से उकता जाता है। हैरत तो तब होती है जब तत्वज्ञान का उपदेश देने वाले परिस्थितियों से पलायन करने की सोचते हैं।
अलेक्जेन्डर, वुलकट, लाँगफेलो, वोल्टासर एवं कोकटी ने समन्वित रूप से इस विषय में गम्भीर शोध-अनुसंधान किए हैं। उन्होंने अपने शोध ग्रंथ में आत्महत्या के तकरीबन पचास कारणों पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार इस मनोवृत्ति का मुख्य कारण है-प्राकृतिक जीवनशैली से मुँह मोड़कर कृत्रिम-शैली का अंधानुकरण करना। यह कृत्रिमता का आवरण जैसे ही टूटता है, व्यक्ति निराशा से हतोत्साहित होकर स्वयं को समाप्त करने की ओर कदम बढ़ाता है। कार्ल मैनिंजर अपने अध्ययन ‘मैन अगेंस्ट हिम सेल्फ’ में निराशा से उपजी तीन मनोवृत्तियों का विश्लेषण करते हैं। पहली मनोवृत्तियों का विश्लेषण करते हैं। पहली है-मारने की इच्छा (ञ्जद्धद्ग ख्द्बह्यद्ध ह्लश द्मद्बद्यद्य), दूसरी है मर जाने की इच्छा (ञ्जद्धद्ग ख्द्बह्यद्ध ह्लश ड्ढद्ग द्मद्बद्यद्यद्गस्र), तीसरी है मरने की इच्छा (ह्लद्धद्ग ख्द्बह्यद्ध ह्लश ड्ढद्ग ष्ठद्बद्ग)।
मारने की इच्छा उन व्यक्तियों में होती है, जो स्वभाव से उग्र-आक्रामक एवं बहिर्मुखी होते हैं। ये अपने आवेश में पहले दूसरों को मारने का यत्न करते हैं, फिर असफल हो जाने पर निराशा में स्वयं को समाप्त करते हैं। दूसरे तरीके के व्यक्ति वे हैं जो कुण्ठा और अवसाद में मरना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें मरने से डर भी लगता है। वे चाहते हैं कि उन्हें कोई आसानी से मारकर इस संसार से छुटकारा दिला दें। तीसरे प्रकार के व्यक्ति में घुटन के परिणाम पहले तो मरने की चाहत के रूप में उभरते हैं, फिर वे किसी तरह स्वयं को समाप्त करने की युक्ति बिठाते हैं।
‘साइकोलॉजी फ्राँम द स्टैण्ड प्लाइण्ट ऑफ ए बिहैवियरिस्ट’ नामक शोध ग्रन्थ में जे. बी. वाटसन इस तरह की वृत्तियों के पीछे व्यवहार में उपजे व्यतिक्रम को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके अनुसार समाज में जैसे-जैसे व्यवहार की कृत्रिमता बढ़ी है, इस तरह की प्रवृत्तियों में बढ़ोत्तरी हुई है। के. ए. लेवीन अपने ग्रन्थ ‘डायनिमिक थ्योरी ऑफ पर्सनालिटी’ में भी इसी तथ्य स्वीकार किया है। वाटसन के अनुसार युवाओं के अन्दर बढ़ती कुण्ठा उन्हें जीवन से पलायन की ओर प्रेरित करती है। ‘द अननोन मर्डरर’ में थिरोडोर रीक्स इसके लिए अचेतन की हलचलों को जिम्मेदार मानते हैं। उनके अनुसार मुख्यतया समाज के सुसभ्य कहे जाने वाले वर्ग में घृणा, वैमनस्यता अचेतन में दबी पड़ी रहती है और अपना अनुकूल समय मिलने पर विध्वंसक हो उठती है।
अहंकार को आहत करने वाली परिस्थितियों में व्यक्ति की अन्तर्निहित ऊर्जा विध्वंसात्मक हो जाती है। उसकी सुकोमल एवं संवेदनशील भावनाएँ सूख जाती है। फ्रायड इसे बाहरी परिस्थितियों के दबाव की परिणति मानते हैं। कोई ऐसा व्यक्ति अथवा वस्तु जिसका जीवन से गहरा सम्बन्ध है, के खो जाने से अचेतन मन अनियन्त्रित हो जाता है। इससे उपजी हताशा में व्यक्ति यदा-कदा स्वयं को मार लेता है। शिकागो से प्रकाशित ‘हेराज्ड एण्ड एक्जामिनर’ के अनुसार शेयर मार्केट में शेयर के भावों में यकायक मन्दी आ जाने से कई शेयर धारकों ने आत्महत्या कर ली। एक अन्य समाचार पत्र शिकागो ट्र्ब्यून के अनुसार इस दौरान कई ग्राहकों ने पहले शेयर दलालों को गोली मारी और अन्त में स्वयं को गोली मार ली।
क्रिकेट एवं फुटबाल से गहरा लगाव रखने वालों के बीच भी ऐसी वारदात होने के समाचार प्रकाशित होते रहते हैं। अपने प्रिय खिलाड़ी अथवा प्रिय टीम के हार जाने पर ऐसे लोग खुदकुशी कर लेते हैं। अपने अनियन्त्रित आवेगों के फलस्वरूप परस्पर प्रेम करने वाले प्रेमी-युगल भी निराशाजन्य स्थितियों में जीवन-लीला समाप्त कर बैठते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक अपने देश में प्रेम सम्बन्धी समस्याओं के कारण प्रतिवर्ष 5177 लोग आत्महत्या कर लेते हैं। ब्रेगरी जीलवर्ग ने ‘ कन्सीडरेशन आँन स्युसाइड विथ पार्टीक्युलर रिफरेन्स टू दैट ऑफ ए यंग’ में अपरिपक्व मनः स्थिति को इसके लिए दोषी माना है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति गहरी उदासीनता तथा कुण्ठाओं से घिर जाता है और अपने को समाप्त कर देने पर उतारू हो जाता है। ‘द आरिजिन एण्ड डेवलपमेंट ऑफ द मोरेल आइडिया’ में एडवर्ड मार्क इसके लिए कई कारण गिनाते हैं, जैसे असफल प्रेम या ईर्ष्या, लम्बी बीमारी अथवा बुढ़ापा, दण्ड का भय, उत्पीड़न, पश्चाताप, शर्म, आहत अभिमान, क्रोध व प्रतिहिंसा आदि।
कई जातियों में आत्महत्या एक अद्भुत रिवाज हैं। गोल्ड कोस्ट में थिरसीकिंग जाति के लोग दूसरों को फँसाने के लिए आत्महत्या कर लेते हैं। दोषी व्यक्ति को उनका समाज आर्थिक दण्ड देता है। जिससे मरे हुए व्यक्ति के परिवार का पालन-पोषण हो सके। चौबासे की थिंकेट जातियों में दुश्मनों के दरवाजे पर फाँसी लगाकर आत्महत्या की जाती है। दुश्मन को आक्रमण में पराजित न कर पाने के कारण यह कायरतापूर्ण कृत्य किया जाता है। चीनी लोग जीवित आत्मा की अपेक्षा मृतात्मा को ज्यादा ताकतवर मानते हैं। वे दुश्मन से बदला लेने के लिए आत्महत्या को हथकण्डे के रूप में प्रयुक्त करते हैं।
आत्महत्या का दूसरा पहलू है स्वयं को मार देना। कार्ल मैनिंजर का कहना है कि अति मैनिंजर का कहना है कि अति आक्रामक-वृत्ति से हत्या एवं आत्मा को अत्यधिक दमन करने पर आत्महत्या की परिस्थिति का निर्माण होता है। दूसरों को मारने की असमर्थता के कारण उठा आवेग स्वयं को समाप्त करने के बाद ही थमता है।
‘हौडोनो एस्केप फ्राँम रिएलिटी’ में लुडस जे. ब्रागमेन इसको विस्तार से बताते हैं। इसके मत से व्यक्ति पर व्यथा, वेदना और असहाय अत्याचार जब उनके मानसिक स्तर से अधिक हो जाता है, तो उससे छुटकारा पाने के लिए वह आत्महत्या को ही एकमात्र साधन मानता है।
परिष्कृत अन्तःकरण इनसान के लिए वरदान है तो इस पर अहंकार की कालिमा भयावह अभिशाप। अहं को चोट पहुँचाने पर यह क्रुद्ध नाग जैसा फुफकारने लगता है और प्रतिवाद करता है। प्रतिवाद के न बन पाने से घायल अहंकार विस्फोट कर जाता है। इस तरह आत्महत्या के रूप में अनहोनी घटनाएँ घटित होती हैं।
आत्महत्याओं का कारण हर-हमेशा अचेतन ही नहीं होता। बल्कि सचेतन प्रयास द्वारा भी आए दिन ऐसी वारदातें होती रहती हैं। मनुष्य के अन्दर प्रेम, सहिष्णुता, दया, क्षमा-आस्था-विश्वास में सतत् आ रही कमी और दमन से ऐसी घटनाएँ घटती हैं। ‘क्वाइट स्ट्रीट’ के उपन्यासकार ओसेनोर्गीन ने दण्डित अपराधियों का रोचक अन्दाज में मनोविश्लेषण किया है। अपराधी अपनी विकृत एवं विक्षिप्त मानसिकता के कारण प्राणदण्ड के भय से घबरा जाता है और फाँसी से पूर्व ही खुद को खत्म कर लेता है। आजकल उग्रवादियों के पकड़े जाने पर स्वयं को समाप्त करने की उनकी कोशिशें इसी मनोवृत्ति का संकेत हैं। इसे सिरामण्ड फ्रायड ने ‘मोर्निंग एण्ड मेलोकोलिया’ के अंतर्गत वर्णन किया है।
आत्महत्या का तीसरा पहलू हैं-अन्तर्मुखी व्यक्तियों में मरने की इच्छा। स्वयं अपने में दबाए-समेटे रहने वाले ये व्यक्ति प्रायः अन्दर ही अन्दर घुटन का शिकार बने रहते हैं। जब कभी यह घुटन आवेश बनकर उठती है तो स्वयं उनका विनाश करके छोड़ती है। रथ सोनेल ने अपने शोध निष्कर्ष स्युसाइड नामक ग्रन्थ में इस तरह के अनेकों रोगियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। इसके अनुसार उच्च प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने बाह्याडंबरों के आवरण तले अनेक घिनौने कुकृत्यों को छुपाए रहते हैं। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर किसी के सामने भी नहीं कर पाते। जब स्थिति हाथ से छूट जाती है, तो तमाम कुकृत्यों का पर्दाफाश होने से पूर्व स्वयं को समाप्त करने का प्रयास करते हैं।
‘द कन्सेप्ट ऑफ नार्मल माइण्ड’ में अर्नेस्ट जोन्स की मान्यता है कि गहरी उदासी की वजह से रोगी का सम्बन्ध जीवन के वास्तविक धरातल से टूट जाता है, सदैव नकारात्मक सोच पैदा होती है। प्रसन्नता, आत्म-सन्तोष के स्थान पर भयावह निराश की कालिमा छायी दिखती है। इसकी अंतिम परिणति मृत्यु के वरण में ही होती है। फ्रैंज अलेक्जेन्डर भी अपने शोध निष्कर्ष ‘द नीड फॉर पनिशमेण्ट एण्ड डेथ इंस्टिंक्स’ में कहते हैं अपने अन्दर ही अन्दर घुटते रहने वाले व्यक्ति के अन्दर उठता समुद्री ज्वार-सा विप्लवी भूचाल आत्महत्या का कारण है। इसके अलावा भी आत्महत्या अनेकों प्रकार की होती है-क्रोनिक स्युसाइड, शराब सेवन से आत्महत्या, सामाजिक दुर्व्यवहार, मनोविकार जन्य आत्महत्या आदि।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के हाल के अध्ययन के अनुसार इधर इन दिनों आत्महत्या की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हो रही है, जो कि राष्ट्रीय विकास दर से भी ज्यादा है। भारत में प्रतिदिन 230 व्यक्ति खुदकुशी करते हैं। ‘सटरडे टाइम्स’ के मुताबिक देश में हर मिनट में कोई न कोई आत्महत्या का प्रयास करता है। प्रत्येक सातवें मिनट में एक खुदकुशी हो जाती है। प्रति रिपोर्टेड आत्महत्या के साथ तीन आत्महत्याएँ ऐसी होती हैं जिनका कोई हिसाब नहीं होता। ऐसी दर्द भरी दास्तानों को आँकड़ों में तो नहीं बाँधा जा सकता, पर एक सहज अनुमान के बतौर बढ़ते हादसों का कुछ परिचय जरूर प्राप्त किया जा सकता है। अपने देश में 1989 में आत्महत्याओं की संख्या 40,245 थीं। सन् 91 तक आते-आते यह आँकड़ा लगभग दुगुना यानि कि 70,540 हो गया। वर्ष 14 में यह संख्या तकरीबन 90,000 के आस-पास पहुँच गई। इस दौरान आत्महत्या में प्रति लाख जनसंख्या में 6.8 से 9.9 तक तेजी से बढ़ोत्तरी हुई।
सन् 1993 में कर्नाटक में 8055, केरल में 8124, तमिलनाडु में 7815, तथा आन्ध्रप्रदेश में 7850 लोगों ने खुद अपना जीवन समाप्त किया। जबकि इस दौरान उत्तरप्रदेश में 5945, मध्यप्रदेश में 6251 तथा दिल्ली में 803 लोगों ने आत्महत्या की। पिछले चार वर्षों में उत्तरप्रदेश में आत्महत्याओं में तेजी से वृद्धि हुई है। यहाँ 1991 में 2845, 1992 में 3324 तथा 1993 में 5947 लोगों ने स्वयं को समाप्त किया। पश्चिम बंगाल में पूरे देश की 15 प्रतिशत आत्महत्याएं होती हैं।
बम्बई, देश का कलकत्ता के बाद दूसरा ऐसा महानगर है जहाँ प्रतिवर्ष एक हजार से महानगर है जहाँ प्रतिवर्ष एक हजार से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं। नवीनतम सर्वेक्षण में केरल को जहाँ विकास के क्षेत्रों में अव्वल ठहराया जाता है वहीं, वहाँ आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है। केरल की आत्महत्या दर लगभग 25 है, जो राष्ट्रीय औसत से ढाई गुना अधिक है। केरल के अलावा त्रिपुरा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में भी आत्महत्या की औसत दर कहीं ज्यादा हैं। तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाय तो देश के दक्षिणी राज्यों में उत्तरी राज्यों की अपेक्षा अधिक आत्महत्याएँ होती हैं।
पूरे संसार में आत्महत्याओं का सर्वेक्षण तो और चौंकाने वाला है। विश्व में प्रतिदिन 2000 से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं। यह संख्या प्रतिवर्ष 8 लाख को भी पार कर जाती है। खुदकुशी की दर अमीर कहलाने वाले देशों में सर्वाधिक है। पृथ्वी के स्वर्ग के रूप में अपना परिचय देने वाले स्विट्जरलैंड में आत्महत्या की दर भारत से दुगुनी हैं। जापान में आत्महत्याएँ अपने देश से 17 फीसदी अधिक हैं। इन दिनों भूतपूर्व साम्यवादी देश भी इस क्षेत्र में पीछे नहीं है। वहाँ सामाजिक, आर्थिक स्थिति में जो तेजी से गिरावट आयी है, उससे आत्महत्याओं में भारी वृद्धि हुई हैं। रूस में यह स्थिति भारत से चार गुना से भी ज्यादा बदतर है।
दुनिया के विभिन्न देशों में आत्महत्या की दर प्रति लाख जनसंख्या में कुछ इस तरह हैं-रूस में 40, हंगरी में 37, फिनलैण्ड में 28, डेनमार्क में 23, स्विट्जरलैंड और फ्राँस में 21, जापान में 17, स्वीडन तथा जर्मनी में 16, श्रीलंका में एक ओर तो शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में प्रगति की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर इस छोटे-से देश में प्रति लाख जनसंख्या में आत्महत्या की दर 43 से 47 के बीच अनुमानित है। पिछले पाँच सालों में वहाँ अनुमानित है। पिछले पाँच सालों में वहाँ जनसंख्या तो 3 फीसदी बढ़ी पर आत्महत्याएँ 15 प्रतिशत को पार कर गयीं। सबसे ज्यादा आत्महत्याओं में वृद्धि कोलम्बों और कैण्डी शहरों में हुई और वह भी खासतौर पर 60 साल से ज्यादा उम्र के वृद्ध नागरिकों में।
आत्महत्या के बारे में हृदय विदारक आँकड़े न्यूयार्क टाइम्स ने जून 1990 में प्रकाशित किए थे। वहाँ 37 सदस्यीय टीम ने किशोरवय के बच्चों का सर्वेक्षण किया। इस टीम की रिपोर्ट के अनुसार इस उम्र के लड़कों में से इस प्रतिशत एक न एक बार आत्महत्या का प्रयास कर चुके हैं। किशोर उम्र की लड़कियों में तो यह प्रतिशत 20 का है। हेनरी ए डेविडसन अपनी पुस्तक बीवेयर ऑफ लोनलीनेस’ में लिखते हैं कि एकाकीपन जीवन के लिए बड़ा ही घातक सिद्ध होता है। समुचित स्नेह व प्रेम के अभाव में अधिकतर लोग बसन्त के मौसम में आत्महत्या का प्रयास करते हैं। यह दर शहरी क्षेत्रों में कुछ ज्यादा होती है।
इस सम्बन्ध में एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि ज्यादातर देशों में महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में आत्महत्या की दर कहीं ज्यादा है। भारत में प्रतिवर्ष 0,000 आत्महत्याओं में पुरुषों की संख्या 53000 तथा महिलाओं की संख्या 7000 रही। 1991 से 1914 के बीच निवर्ष आत्महत्या करने वाली महिलाओं की संख्या क्रमशः 32122, 2668, 34393 तथा 37547 रही। इसी अवधि में आत्महत्या करने वाले पुरुषों की संख्या क्रमशः 46324, 47481, -851 तथा 51873 थी। विश्व के परिप्रेक्ष्य में यह आँकड़ा महिला पुरुष के अनुपात में इस प्रकार हैं-रूस में 13:66, - में 18:55, नार्वे में 8:21, कनाडा 6:21 एवं अमेरिका में 5:20 है। इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाओं का उत्पीड़न एवं शोषण कम हुआ है। बल्कि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक सहनशक्ति का होना है। एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार होना है। एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार पुरुष 40 वर्ष की अवस्था में सबसे अधिक आत्महत्या करते हैं।
आत्महत्याओं के विश्लेषण का सवाल सुलझा हुआ है। फिर भी इन आँकड़ों से यथार्थता की थोड़ी बहुत झलक मिल ही जाती है। वर्ष 1994 में अपने देश में गम्भीर रोग के कारण 19761, दाम्पत्य कलह से 4983, पारिवारिक कटुता से 4248, मानसिक रोग के कारण 3031, सम्पत्ति विवाद की वजह से 1987, गरीबी से 1870, दहेज विवाद से 1654 आत्महत्याएँ हुईं। इन घटनाओं का यह सिलसिला प्रियजन विछोह के कारण 1389, बेकारी की वजह से 1297, सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट के कारण 1240, आर्थिक दिवालियेपन और अचानक हुए नुकसान से 1533 एवं अवैध गर्भधारण के कारण 387 आत्महत्याओं के रूप में चला। आँकड़ों के अनुसार परीक्षा परिणाम से निराश होकर प्रतिवर्ष 1500 से 2000 छात्र आत्महत्या करते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि एक आत्महत्या करते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि एक आत्महत्या के पीछे दस आत्महत्या के असफल प्रयास होते हैं। अतएव हर साल परीक्षाओं के आतंक के कारण 15000 से 20,000 बच्चे आत्महत्या की कोशिश करते हैं।
इस प्रकरण में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया है कि भारत में लगभग 55 फीसदी आत्महत्याएँ 30 साल से कम आयु वर्ग में हो रही हैं। जहाँ तक आत्महत्या के तरीकों का सवाल है-1994 की रिपोर्ट के मुताबिक 35 प्रतिशत आत्महत्याएँ जहर द्वारा की जा रही हैं। जार्ज केनन ने अपने शोध निष्कर्ष ‘प्राब्लम ऑफ स्युसाइड’ में भी इसी का समर्थन किया हैं।
आत्महत्याएँ कहीं भी, किसी उम्र में और किसी भी तरफ क्यों न की जाएँ उनके कारणों में असंतोष, निराश एवं कुण्ठा ही रहती है। इसके लिए जहाँ समाज में बढ़ता हुआ हिंसक, उत्तेजक माहौल दोषी है, वहीं व्यक्ति का जीवन लक्ष्य से भटकाव भी कम दोषी नहीं। वह भूल गया है जीवन की सफलता साधन और सम्मान बटोरने में नहीं, आन्तरिक शक्तियों को विकसित करने और ईश्वर सान्निध्य पाने में है। तथ्य पर गहराई से विचार किया जाए तो यही निष्कर्ष सामने आएगा कि शान्ति एवं प्रसन्नता मनः स्थिति पर निर्भर है परिस्थितियों पर नहीं।
इस समस्या का समाधान पाने के लिए जहाँ हमें समाज में अपने साँस्कृतिक मूल्यों का प्रसार-विस्तार करना होगा वहीं व्यक्तिगत जीवन में यह विश्वास जगाना होगा कि हम न तो अकेले हैं और न असहाय। भले हमें सगे-सम्बन्धी, पड़ोसी और समाज निराश कर दे, पर परमात्मा कभी निराश नहीं करेगा और कोई हो न हो पर वह हमारा अवश्य है और उसकी कृपा निश्चित ही हमारे अपने जीवन में सौंदर्य के फूल खिलाएगी। फिर निराशा और पलायन क्यों?
गलत आदत यदि एक बार पड़ जाए, तो बाद में छूट जाने पर भी उसका खामियाजा कभी-कभी भुगतान पड़ सकता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन जब छोटे थे, तभी से उन्हें गप्पे हाँकने की आदत थी। लोग उनका बातों पर सहसा विश्वास नहीं करते थे।
किन्तु बड़े होने पर योग्यता और लोकप्रियता के कारण वे अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिये गये।
राष्ट्रपति होने के बाद वे अपनी ननिहाल गए वहाँ वृद्धा नानी से मिले और बोले-”मैं अबकी बार अध्यक्ष चुन लिया गया हूँ नानी।”
नानी ने पूछा-”किसका?” विल्सन ने कहा-”अमेरिका का।”
बूढ़ी नानी बड़े जोरों से ठहाका लगाकर हँस पड़ी और बोली-
“अरे विल्सन तू बूढ़ा होने को आया, पर तूने अभी गप्पे मारने की आदत नहीं छोड़ी।”
प्रकृति बंधनों को तोड़ने पर उतारू मनुष्य अपनी प्रवीणता पर दिनोंदिन अहंकारी होता चला जा रहा है। फलतः सृष्टि-संतुलन की अदृश्य प्रेरणा और भावी परिणामों की कल्पना की उपेक्षा होती रहती है। यही कारण है कि आये दिन अनेकानेक समस्याओं और संकटों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, वृक्ष-वनस्पतियों के सम्बन्ध में बरती जाने वाली उपेक्षा और निष्ठुरता को ही लिया जा सकता है। इन दिनों मनुष्य द्वारा वनस्पति जगत के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है, वह उपेक्षामात्र न रहकर अनौचित्य और अत्याचार की सीमा में जा पहुँचा है। फलतः उसके दुष्परिणाम भी हाथोंहाथ सामने आ रहे हैं। इन दिनों पेड़ों की कटाई बुरी तरह हो रही है। वन क्षेत्र निरन्तर घटता जा रहा है। होना यह चाहिए कि जलावन, फर्नीचर आदि के लिए जितनी लकड़ी कटे, उतने ही वृक्ष लगे, तब संतुलन बैठे, लेकिन स्थिति विपरीत है। हो यह रहा है कि भूमि से वृक्षों को छीना भर जा रहा है और ऐसा संतुलन नहीं बन रहा है कि जो लिया गया है, उसे वापस भी किया जाता रहे। वृक्ष-सम्पदा को काटते रहने की गति अधिक और लगाने की गति मंद रही तो, इसका परिणाम इतना भयावह होगा जिससे ‘इकोसिस्टम’ का संतुलन बिगड़ जाने पर ऐसी श्रुति उठानी पड़े, जिसके लिए पीछे पश्चाताप करते रहना भर हाथ रह जाय और उसकी पूर्ति समय निकल जाने पर फिर किसी भी प्रकार सम्भव न हो सके।
पेड़ कटते जाने, वन प्रदेश घटते जाने के जहाँ एक ओर अनेकों दुष्परिणाम हैं वहीं दूसरी ओर वृक्ष-वनस्पतियों से हरी-भरी धरती के अनेकों उपकार हैं। यह एक तथ्य है कि वनस्पति जगत और प्राणिजगत एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं। समझा तो अन्न-जल को जीवनाधार जाता है, पर वस्तुतः शरीर यात्रा का प्रमुख माध्यम प्राणवायु है। हवा में ऑक्सीजन का जो अंश पाया जाना है, उसी से शरीर यात्रा संभव होती है। मनुष्य साँस से प्राणवायु खींचता है और कार्बनडाइआक्साइड छोड़ता है। इस ग्रहण-विसर्जन में वनस्पति जगत और प्राणि जगत परस्पर सहभागी हैं। प्राणी कार्बन छोड़ता है, उसे पेड़-पौधे ‘फोटो-सिन्थेसिस’ या प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा अपना आहार बना लेते हैं और बदले में ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिसे प्राणी श्वास द्वारा ग्रहण करते और जीवित रहते हैं। इस प्रकार दोनों ही पक्ष एक दूसरे के सहारे सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। प्राणियों का आहार वनस्पति है। वनस्पति की पोषण देने के लिए प्राणियों द्वारा उत्सर्जित वर्ज्य पदार्थ व उत्पन्न किये गये कूड़े-कचरे को प्रमुख माध्यम माना गया है। दोनों का तालमेल जितना सही रहेगा, उतनी ही यह धरती ‘शस्य श्यामला’ रहेगी और प्राणी जगत के निर्वाह में कमी न पड़ेगी। पर यदि इस आदान-प्रदान का संतुलन बिगड़ा तो न केवल आहार संकट खड़ा होगा, वरन् मनुष्य समेत समस्त जीव-जगत का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
हरियाली की महत्ता वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों के अनुसार जहाँ आस-पास घनी बस्तियाँ बसाई जानी आवश्यक हों, वहाँ बीच में ‘ग्रीनबेल्ट’ हरी पट्टी की गुंजाइश छोड़नी आवश्यक होती है। प्राचीन ऋषियों ने इसी दृष्टि से वन-उपवन लगाने की परम्परा आश्रम के साथ डाली थी। वृक्ष-वनस्पतियों को वे प्राणिजगत का जीवन मानते थे और उसे बढ़ाने को सर्वोपरि प्रमुखता देते थे। वृक्षों की कमी देखकर कवि हृदय ऋषि विह्वल हो उठते थे और धरती से पूछते थे-
“यथापल्लवपुष्पाढ्या यथापुष्पफलर्द्धयः। यथाफलार्द्धिस्वारोहा हा मातः क्वागमन् द्रुमाः॥
अर्थात् पतों के समान ही जिनमें प्रचुर पुष्प के समान ही जिनमें प्रचुर फल से लदे होने पर भी जो सरलता से चढ़ने योग्य होते थे, हे माता पृथ्वी! बता वे वृक्ष अब कहाँ गये?
वस्तुतः विश्वभर में आज वृक्षों और वनों-जंगलों की प्रायः यही स्थिति है। पर्यावरण में भरती जा रही विषाक्तता और उसके दुष्परिणामों से संत्रस्त मानव सब कुछ जानते-समझते हुए भी वनों के विनाश पर उतारू हैं। संसार भर में वनों, जंगलों का कटाव व्यापक स्तर पर अभी भी हो रहा है। सर्वेक्षणकर्ताओं के अनुसार आज पूरे विश्व में प्रति मिनट 77 हेक्टेयर की दर से जंगल काटे जा रहे हैं। अकेले ब्राजील में पिछले एक दशक में 620000 वर्ग मील जंगल का सफाया किया गया, जो कि समूचे फ्राँस के क्षेत्रफल के बराबर है। प्राकृतिक रूप से जंगलों में लगने वाली आग से भी प्रतिवर्ष बहुत क्षेत्र में वृक्ष-वनस्पतियाँ जलकर भस्म हो जाती हैं। इनसे निकलने वाला तेजाबी धुआँ वायुमण्डल में 3.5 किलोमीटर ऊँचाई तक फैल जाता है और वातावरण को विषाक्तता से भर देता है।
विशेषज्ञों का कहना हैं कि पर्यावरण संतुलन एवं जीवन रूपी रथचक्र को सही ढंग से गतिमान रखने के लिए समूचे भूभाग के 33 प्रतिशत क्षेत्र में वृक्ष-वनस्पतियों का होना अनिवार्य है। परंतु आज स्थिति अत्यंत विस्फोटक हो गयी है। अब मात्र दस प्रतिशत भूमि ही सघन वनों से आच्छादित रह गयी है। अपने देश में कुछ दशकों पूर्व तक 70 प्रतिशत भूभाग वनों से आच्छादित था, जो सन् 1854 तक कटते-कटते 40 प्रतिशत रह गया। सन् 1952 में यह घटकर 22 प्रतिशत तक पहुँच गया और आज मात्र 19.5 फीसदी भूभाग में ही जंगल बचे है। अनिवार्य पर्यावरण संतुलन सीमा से वह 13 प्रतिशत कम है। इस संदर्भ में सन् 1989-19 की अवधि में सेटेलाइट की सहायता से किये गये अध्ययन से यह तथ्य उजागर हुआ कि देश में अब कुल 6 लाख 40 हजार, 107 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही वन रह गया है, जो देश के कुल भू-क्षेत्र का मात्र 19.5 प्रतिशत है। मनुष्य ने थोड़े बहुत जो वृक्षारोपण किये भी है, उनसे अभी तक मात्र 1.1 प्रतिशत भू-भाग को ही ढका जा सका है। अपने देश में लगी दस मिलियन हेक्टेयर भूमि ऊसर-बंजर एवं निम्न स्तर की है, जहाँ हरियाली का नितान्त अभाव है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस भूमि को यदि प्रतिवर्ष वृक्षारोपण द्वारा हरा-भरा बनाया जा सके-देश के पर्यावरण को संतुलित बनाया जा सकता है। इससे भूमि का क्षरण व कटाव रुकेगा, साथ ही औसत वर्षा में वृद्धि भी होगी। पर्यावरण एवं वातावरण का संतुलन न केवल मानवी अस्तित्व के लिए वरन् प्राणिमात्र की जीवन रक्षा के लिए नितान्त आवश्यक है।
वृक्ष-वनस्पतियों से धरती हरी-भरी बनी रहे तो उससे मनुष्य को अनेकों प्रत्यक्ष व परोक्ष लाभ है। ईंधन एवं इमारती लकड़ी फल-फूल, औषधियाँ प्रदान करने जैसे अनेकों प्रत्यक्ष लाभ मनुष्य को इनसे तो मिलते ही हैं, बाढ़ रोकने, वातावरण में भरती जा रही विषाक्तता को कम करने व शुद्ध प्राणवायु उपलब्ध कराने जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी हरीतिमा संवर्धन से ही पूरे होते हैं। देखा गया है कि जिन देशों या क्षेत्रों में कृषि क्रान्ति के अंतर्गत खेती के लिए जंगलों का सफाया करके जमीन तैयार की गयी, वहाँ खेती तो पर्याप्त हुई, पर नदियों में विकराल बाढ़ें आने लगीं, जिससे जन-धन की अपार क्षति उठानी पड़ी। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने गहन अध्ययन-अनुसंधान किये है। उनका निष्कर्ष है कि जिस देश में जितने सघन और अधिक वन होंगे, वहाँ नदियाँ उतनी जल्दी नहीं उफनेंगी। अपने देश में भी जैसे-जैसे वन सम्पदा नष्ट होती जा रही है, प्रतिवर्ष नदियों में आने वली बाढ़ों की संख्या में वृद्धि हो रही है, जिससे लाखों लोग बेघर होते और अरबों रुपयों की फसल व सम्पदा बर्बाद होती है। यही कारण है कि अब सरकारें भी हरीतिमा-सम्वर्धन के कार्यक्रम को महत्व देने लगी हैं।
अपने देश में यद्यपि वर्ष भर में तीन महीने ही वर्षा होती है, जबकि विश्व के अनेक देशों में बारहों महीने पानी गिरता रहता है। एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि तीन मास की मानसूनी वर्षा अधिक घनी होती है, इसलिए नदियों में ज्यादा बाढ़ें आती हैं, परन्तु यह कोई महत्वपूर्ण कारण नहीं है। भारत ही नहीं, कई देशों में मानसूनी वर्षा होती हैं, फिर भी वहाँ की नदियाँ यहाँ की अपेक्षा कम विनाश करती हैं। इस सम्बन्ध में विशेषज्ञों का कहना है कि नष्ट होती जा रही वन सम्पदा बाढ़ों की संख्या में अभिवृद्धि का महत्वपूर्ण कारण है। वर्षा की बूँदें जब घने जंगल में उगे वृक्षों पर गिरती हैं तो बहुत-सा पानी वे पत्ते ही सीख लेते हैं और कुछ का वाष्पीकरण भी हो जाता है। अधिक वर्षा होने के कारण पानी की बूँदें जमीन पर गिरती हैं। इसी प्रकार जंगल की वनस्पतियाँ बादल से गिरते हुए पानी को ही सीधे-सीधे उपयोग में ले लेती हैं। पेड़-पौधों द्वारा वर्षा का अधिकाँश पानी सोख लिया जाता है या वाष्पीकृत कर लिया जाता है, जबकि खुले मैदान में वह पानी बह निकलता है। इस सम्बन्ध में कई स्थानों पर परीक्षण और प्रयोग किया गया तो पता चला कि लगातार पन्द्रह घण्टे बारिश हो और पन्द्रह सेण्टीमीटर अर्थात् 6 इंच तक पानी गिरे तो सघन वन से एक भी बूँद पानी जमीन की सतह से नदी-नालों में नहीं बहेगा। जबकि यह लगातार वर्षा खुली जगह में होने पर बड़ी-बड़ी बाढ़ें ला सकती है।
सघन वनों में पानी के न बहने का एक दूसरा भी कारण है। सीधे जमीन पर गिरने वाले पानी की बूँदें जल्दी ही बह जाती हैं, जबकि वृक्षों के पत्तों से होता हुआ गिरने वाला पानी जमीन पर अधिक देर तक ठहरता है उससे भूमि को जल सोखने का भी अधिक समय मिलता है और पानी बहने की अपेक्षा जमीन में गहराई तक उतर जाता है। फलस्वरूप धरती की उर्वरा शक्ति और नमी भी अधिक स्थायी रहती है। देखा गया है कि सघन वनों से छनकर बहने वाला जल अधिक स्वच्छ भी होता है। वह पत्तों से धीरे-धीरे कम वेग से जमीन पर गिरता है और भूमि पर उगे हुए घास-फूस में से धीरे-धीरे बाहर निकलता है। इस स्वच्छ पानी में नदी को गहरा बनाने की शक्ति होती है, जबकि खुले मैदानी भाग से बहने वाला पानी अपने साथ मिट्टी आदि बहाकर लाता और नदियों को उथला बनाता है। पेड़-पौधों की उपस्थिति में भूमि द्वारा पानी का अवशोषण भी अपेक्षाकृत अधिक होता है। साथ ही इनकी दूर-दूर तक फैली जड़े वर्षा के कारण होने वाले भूमि कटाव की भी रोकती हैं। यही कारण है कि अमेरिका जैसे देशों में आज वृक्षारोपण को अधिक महत्व दिया जाने लगा हैं।
वृक्ष-वनस्पतियों का संवर्धन बाढ़ रोकने की दृष्टि से महत्वपूर्ण तो है ही, इसका और भी महत्वपूर्ण लाभ है। वायु प्रदूषण की समस्या समूचे संसार के लिए विनाश का कारण बन गयी है। शहरों में धुआँ उगलती चिमनियों एवं मोटर-गाड़ियों ने वायुमण्डल को इतना विषाक्त बना दिया है कि शुद्ध वायु तो पूरी पृथ्वी पर प्राप्त नहीं हो सकती। दूषित वायु में साँस लेने वाले मनुष्य एवं अन्यान्य प्राणी भी स्वस्थ, नीरोग किस प्रकार रह सकेंगे? शुद्ध वायु ही प्राणों का आधार है। वायुमण्डल में संव्याप्त प्राणवायु ही जीव-जन्तुओं को जीवन देती है। इसके अभाव में अन्यान्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ता जाता है और प्राणिजगत के लिए विपत्ति का कारण बनता है। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी के वायुमण्डल में प्राणवायु कम होती जा रही और दूसरे तत्व बढ़ते जा रहे हैं। यदि वृक्ष-सम्पदा को नष्ट करने की रफ्तार यही रही, जो इन दिनों है तो मनुष्य और अन्य जीवों द्वारा छोड़ी गई साँस जिसमें अन्य उपयोगी तथा विषैली गैसें ही अधिक मात्रा में होती हैं, वे ही इतनी अधिक मात्रा में हो जाएँगी कि पृथ्वी पर जीवन दूभर बन जाएगा। इस समस्या का एकमात्र समाधान भी हरीतिमा संवर्धन ही माना गया है। आज की विध्वंसकारी परिस्थितियों में तो यह ओर भी अधिक आवश्यक हो गया है कि हर किसी को वृक्ष-वनस्पतियों के विकास, वृक्षारोपण एवं पेड़ न काटने के लिए कृत-संकल्प होना ही चाहिए।
मन की चंचल-वृत्ति से घबराने की आवश्यकता नहीं हैं। बिजली तथा वायु की शक्ति की तरह उसके उपयोग की बात सोची जानी चाहिए। अतः मन के द्वारा उत्तेजित वृत्तियों पर नियन्त्रण व अंकुश रखने की आवश्यकता है। फिर उसी चंचल मन से अनेकों उपयोगी कार्य किये जा सकते हैं। जरूरत मन को साधने की है, फिर तो वह उसी प्रकार आत्मा के इशारों पर नाचता है जिस प्रकार मदारी के रीछ-बन्दर और सर्कस के रिंग मास्टर के इशारे पर शेर और हाथी।
नया युग नये मानदण्डों को लेकर आ रहा है। योग्यता की प्रचलित कसौटियां प्रश्न चिन्हों के घेरे में आ चुकी है। किसे योग्य मानें ? किसको उपयोगी कहें ? इन सवालों के जवाब में बुद्धिमत्ता आगे आती रही है आई. क्यू. का ज्यादा होना ही योग्यता की पहचान बनी हैं लेकिन अब मनोविज्ञानी कहने लगे कि जिन्दगी की सभी उलझनों सिर्फ आई. क्यू. के भरोसे नहीं सुलझाया जा सकता। इनका मानना है कि बौद्धिक प्रखरता का जीवन की सफलताओं में सिर्फ बीस फीसदी हाथ हैं शेष अस्सी प्रतिशत ऐसा है जिसका समाधान चतुरता, चालाकी, बौद्धिक दाँव-पेंच एवं वैचारिक प्रखरता के बूते का नहीं। इसे सुलझा पाना इमोशनल कोफीशिएण्ट (ई. क्यू.) यानि कि भाव प्रवणता से ही मुमकिन है। व्यक्ति के जीवन में ई. क्यू. की अधिकता ही उसे क्रोध , तनाव उदासी जैसे मनोविकारों से छुटकारा दिलाकर सोच व सफलता की नूतन दिशा प्रदान करती है।
वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान प्रयासों में पाया है कि जिन्दगी को संचालित करने के दो केन्द्र है। एक तो मस्तिष्क से उपजे विचार तथा दूसरी हृदय से निःसृत भावना। विचार व भावना की संतुलित स्थिति ही ई. क्यू. है। इसके बारे में येल विश्वविद्यालय के मनोविज्ञानी पीटर सैलोव तथा न्यू. हैम्पशायर यूनिवर्सिटी के जान मेयर ने मिल जुलकर गंभीर अध्ययन किया। इनके अनुसार मनोभाव का ठीक-ठीक नियमन ही जीवन की सफलता का आधार हैं व्यवहार मनोविज्ञान पर शोध करने वाले उनियल गोलमैन ने इस विषय पर पहली बार ‘इमोशनल इण्टेलीजेन्स’ नामक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने आई. क्यू. को प्राचीन परम्परा के रूप में उल्लेख किया हैं उनके अनुसार वर्तमान समाज एक संक्रमण बेला से गुजर रहा है। ऐसे में उसके आंतरिक भावों में जो तब्दीली आ रही है, उसका अध्ययन मात्र बुद्धि द्वारा नहीं भाव प्रणव सोच के आधार पर ही सम्भव है। गोलमैन ई. क्यू. को इसका एकमात्र निदान मानते हैं।
मस्तिष्क के विचार व हृदय की भावना का संतुलन जरूरी हैं इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए जान हापंकिंस यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक एवं मनोचिकित्सक डॉ. पाल मैकडग कहते हैं। कि भावना वह शीतल स्रोत है, जो मस्तिष्क को शान्त तथा स्थिर बनाए रखती हैं इस अवस्था में ही सही विचार उत्पन्न हो सकता है। अकेला भाव प्रवण विचार में यह दोष सम्भव नहीं। यह जीवन के किसी नये आयाम को खेलता है।
आज जबकि परिवार संस्था बिखर रही है। सौहार्दता, प्रेम, विश्वास लगभग समाप्तप्रायः है। तनाव, उदासी एवं मानसिक रुग्णता का चारों ओर कुहराम मचा हैं । वैवाहिक जीवन भी घुटन एवं कलह से त्रस्त हैं सिनेमा की वर्तमान अपसंस्कृति से बच्चों तक में हिंसा तथा अपराध की वृत्ति बढ़ रही है। जीवन का लक्ष्य किसी तरह की कोई जुगत भिड़ाकर धनोपार्जन तक संकीर्ण हो गया हैं इन परिस्थितियों में आई. क्यू. नहीं ई. कयू. ही समाधान का सूत्र हैं हावर्ड विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किसी में भय ज्यादा होता है, तो अनुसार किसी में भय ज्यादा होता है, तो कोई क्रोध से परेशान होता रहता है। इन मनोविकारों के रहते, सब कुछ सुविधा साधन होने के बावजूद जिन्दगी का आनन्द नहीं उठाया जा सकता।
ई. क्यू.,आई. क्यू. के विरुद्ध नहीं है बल्कि इसे समग्र व सम्पूर्ण बनाता है जिन्दगी में आई. क्यू. का योगदान तो सिर्फ बीस प्रतिशत है। बाकी 80 प्रतिशत जीवन के क्रियाकलाप , भावनाएँ ई. क्यू. से ही सँभाले जाते हैं। मनुष्य के असामान्य व्यवहार को जानने के लिए न्यूरोसाँइटिस्ट व नृतत्ववेत्ता कॉफी अर्से से खोजबीन करते रहे हैं। मनोवैज्ञानिकों की कोशिश यह जानने की रही है कि किन्हीं विषम परिस्थितियों में जैसे भय के कारण काँपना , हृदय की धड़कनों का बढ़ जाना आदि क्यों होता ?
इन स्थितियों का वैज्ञानिक प्रतिपादन जोजेफ ली एण्ड इमोशन में किया है। इसी सफल प्रयास से मनोवैज्ञानिक मोशनल ब्रेन की कल्पना कर सके। भावनाओं की लहरें मस्तिष्क के लिम्बिक तन्त्र से उठती है। इसका मुख्य स्थान है-अमाइग्ल (Amygdale) । यहीं से भय,क्रोध, घृणा व प्रेम भाव जगता है। यह यादों का स्टोर हाउस भी कहा जाता है। इसी के कारण आँखों में आँसू छलकते हैं। मस्तिष्क का दूसरा मुख्य भाग है हिप्पोकैम्पस। इसको कार्टेक्स तथा अमाइग्ल को नियोकार्टेकस भी कहते हैं। सरीसृप वर्ग में नियोकार्टेंक्स नहीं पाया जाता। यही कारण है कि साँप अपने बच्चों तक को खा जाने में हिचकते नहीं है, लेकिन इनसान में भावों का यह संस्थान होने से ऐसी अप्रिय घटनाएँ नहीं घटती।
झाड़ी को भूत एवं रस्सी को साँप समझने की मानसिक विमूढ़ता के समय भी व्यक्ति सही निर्णय नहीं ले पाता और कुछ क्षणों तक असामान्य व्यवहार करता रहता है। इन परिस्थितियों में उत्पन्न भय से मस्तिष्क में कैसी स्थिति होती है- ‘गैलेन्सी प्रोफेसी’ में जीरोम कैजन ने विस्तार से वण्रन किया है। अमाइग्डल भय का भी केन्द्र है, इसके नष्ट हो जाने से रोगी को भय व्याप्त नहीं होता। कोई व्यक्ति अपने कमरे में बैठा हुआ है, अचानक कुछ आवाज सुनाई देती है। इस आवाज को अमाइग्डल का न्यूरल सर्किट सिस्टम मस्तिष्क की भाषा में रूपांतरण करते हुए कारण का पता लगाता है। यह सर्किट कान से ब्रेन स्टेम होते हुए थैलमस तक पहुँचता है। यहाँ से यह प्रक्षेपण दो भागों में बँट जाता है। इसका छोटा-सा भाग नियोकार्टेकस तथा हिपोकैम्पस के पास तथा दूसरा टेम्पोरल लोब के आडिटरी कार्टेक्स में पहुँचता है। जहाँ इस ध्वनि को परखा जाता है।
हिप्पोकैम्पस स्मृतियों के संग्रह का निकटतम स्थान होने के कारण अपनी पहली यादों पर कल्पना करता है। कि वह आवाज क्या हो सकती है। इस बीच आडिटरी कार्टेस इससे भी तीव्र कल्पना चित्र खींचता है यदि संदेह का निवारण नहीं होता तो अमाइगडल, हिप्पोकैम्पस तथा प्रीफ्रटल कार्टेक्स पुनः कल्पना करने में जुट जाते हैं। इस पर भी समाधान न मिलने की स्थिति में अंततः अमाइग्डल मस्तिष्क के प्रत्येक मुख्य केन्द्र को सूचना के बतौर चेतावनी देता है। इस तरह हाइपोथैलमस, कार्टिकों रापिक हार्मोन (CRH) का स्राव करता है, जिससे पलायन या संघर्ष की क्रिया संचालित होती है। अमाइग्डल ब्रेनस्टेम के लोकस सेसल्यस से नारएपिनेफ्रीन या पारएड्रेनेलिन का उत्सर्जन का पूरे मस्तिष्क में फैला देता है। यह हार्मोन आकस्मिक घटना के संवेग को ग्रहण कर उसका प्रतिकार करता है इसी के फलस्वरूप चेहरे में परिवर्तन तथा हड़बड़ाहट देखी जाती हैं एक अन्य हार्मोन डोपामिन भी भय से सम्बन्ध रखता है।
अचेतन धारणाएं भी भावपूर्ण स्मृतियाँ ही है। इसका केन्द्र भी अमाइग्डल ही है। इस बारे में लैरीकैहील ने प्रसिद्ध अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका नेचर के 20 अक्टूबर , 1994 के अंक में ‘बीटा------------------------------------------
सोचता व निर्णय करता है। हालाँकि नियोकार्टेक्स की सजगता भी सोच में परिवर्तन ले आती है। इस अवस्था को ‘मेटामूड’ कहते हैं। लेकिन इसमें घटनाओं का सही आकलन नहीं हो पाता एवं कभी कभी भ्रम भी पैदा हो जाता है। जैसे आज्ञा का उल्लंघन करके कोई बालक जब सड़क पर दौड़ जाता है, तो पहले उस पर क्रोध आता है परन्तु तत्काल ही भावी आशंका से क्रोध भय में बदल जाता है। डोमासियों इसे ‘सोमेटिक मार्क्स’ के नाम से उल्लेख करते हैं। उनके मतानुसार टी. वी. या सिनेमा देखते समय किसी भयावह दृश्य को देखकर भय से काँपने तथा चेहरे पर पसीना आना इसी का लक्षण है। वास्तविकता का बोध होते ही स्थिति सामान्य हो जाती है, य ही सेल्फ अवेयरनेरा हैं गोलमैन ने ऐसी घटनाओं को आत्म जागरुकता का अभ्यास बताया है।
कुछ आवेगों का नियमन आसान है, पर कुछ का कठिन। उदाहरण के लिए क्रोध का नियन्त्रण बड़ा कठिन है। इसलिए अरस्तू ने ठीक ही कहा है, क्रोध करना सरल है, लेकिन सही समय पर तरीके से उचित व्यक्ति के प्रति क्रोध करना आसान नहीं है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति खुद को सही मानता है और उसके प्रति अवज्ञा का भाव प्रदर्शित किया जाता है तो वह क्रोधित हो जाता है। इस समय उसके शरीर से अतिरिक्त ऊर्जा प्रवाहित होने लगती हैं कैटोकोलामाइन्स नामक न्यूरो-ट्राँसमीटर इस ऊर्जा की तेजी और बढ़ा देता है तनावहीन व्यक्तियों में ऊर्जा का यह क्षरण नहीं के बराबर होता है गोलमेन संयमित क्रोध यानि कि मन्यु को शरीर के लिए उपयोगी मानते हैं। ऐसी अवस्था में शरीर एड्रेनेलिन नामक रसायन के स्राव तथा शिथिलीकरण का अभ्यास करता है इसी तरह चिंता व उत्सुकता भी जरूरी है। ताकि समस्या पर सोच-विचार किया जा सके। परन्तु चिन्ता इतनी भी न हो कि सोच ही कुन्द पड़ जाए।
अच्छे और बुरे के बीच सन्तुलन बनाए रखना आवश्यक है। भावनाओं के साथ लम्बे समय तक विचारों पर कैसे नियन्त्रण रखा जाय, इसका वर्णन मनोविज्ञानी डायनी टाइस ने किया हैं उनका कहना है कि तनाव या गुस्से में निर्णय नहीं लेना चाहिए। शान्ति से घटना का पुनर्विश्लेषण करना चाहिए। भावात्मक प्रतिभा ही इसका एकमात्र निदान है। इसमें अभिवृद्धि के लिए टाइस प्रार्थना एवं प्राणायाम का सुझाव देते हैं।
सफलता के लिए विधेयात्मक चिंतन, साहस तथा आत्मविश्वास पूर्ण भावनाओं की अनिवार्यता है। पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सक माकिन सेलीशमेन ने एक बीमा कम्पनी में ऐसे हजारों उन आदमियों की भर्ती किया जो भावनाओं से उदार एवं समर्पित थे, लेकिन उनकी बौद्धिक दक्षता उतनी नहीं थी। यहाँ तक कि उनमें से कई तो परीक्षा में उत्तीर्ण भी नहीं हो सके थे। परंतु अपनी लगन एवं आत्मविश्वासपूर्ण भावनाओं के कारण उन्होंने कम्पनी को पहले वर्ष में 21 प्रतिशत एवं दूसरे वर्ष 5 प्रतिशत लाभाँश दिया।
सामान्यतया सहानुभूति, शिष्टता, शालीनता आदि व्यवहार तो मनुष्य देखकर सीख जाता है मनोवैज्ञानिकों के अनुसार 90 प्रतिशत भावनात्मक सम्प्रेषण अनुभव द्वारा होता है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सक राबर्ट रोसेन्शल ने प्रोफाइल ऑफ नानवर्बल सेन्सटीविटी’ यानि क्कह्रहृस् टेस्ट ईजाद किया हैं इसके माध्यम से मनोभावों का परीक्षण किया जाता है। इसमें भावों को अभिव्यक्त करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। देस्ट में उत्तीर्ण व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदार तथा शान्त मनः स्थिति के पाए गए। इसमें पास होने वाले छात्रों की कार्यकुशलता अधिक आई. क्यू. वाले छात्रों से बहुत अच्छी थी।
सहानुभूति भी अन्य भावनाओं की तरह एक सहजात गुण हैं। इसे छोटे बच्चों से लेकर बड़ों तक में आसानी से देखा जा सकता है। जीवन की गतिविधियों के लिए इसकी उपादेयता जारी हैं एरिक्सन इन्स्टीट्यूट शिकागो के वर्ट कोहलर तथातथा फ्रानस्टाट ने इस पर कई प्रयोग किए। उनके निष्कर्ष के अनुसार जिन परिवारों में प्रेमपूर्ण सद्भावना एवं सहानुभूति नहीं होती उनके बच्चे हाइपोविजिलेण्ट हो जाते हैं। माता-पिता का तनाव तथा उग्र स्वभाव बच्चों की क्षमताओं को प्रभावित करता है ऐसे में सहानुभूति बफर का काम करती है। इसके प्रभाव से मनोविकार पनपने नहीं पाते हैं कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक राबर्ट होमर ने कुछ ऐसे मनोरोगियों पर इलेक्ट्रिक शॉक का प्रयोग किया लेकिन वह बेअसर रहा। यही वजह है कि ऐसे निर्दय मनोरोगी ही बेखौफ हिंसा व हत्या जैसे जघन्य कृत्य करने में हिचकते नहीं हैं लेकिन जब इन्हीं व्यक्तियों को प्रेम एवं सहानुभूति का स्पर्श मिला, तो उनकी उग्रता में पर्याप्त गिरावट आई।
जीवन का हर क्षेत्र चाहे व्यापार हो या विज्ञान अथवा पारिवारिक एवं सामाजिक परिक्षेत्र हो, भावनात्मक प्रति कारगर सिद्ध हो रही है। जीवन के विकास में ई. क्यू. का अमूल्य योगदान साबित हो रहा हैं गोलमैन ने न्यूजर्सी की विश्वविख्यात कम्पनी बेललैव के इंजीनियरों का हवाला देते हुए कहा है। कि अपने व्यावसायिक काम-काज में इनका दिमाग इलेक्ट्रानिक मेल के समान चलता है, परंतु अपने पारिवारिक-सामाजिक जीवन में ये सभी प्रायः असफल सिद्ध हुए हैं इसी तरह डेविड कैम्पबेल तथा इंग्लैण्ड के तमाम उच्चाधिकारियों का सर्वेक्षण किया। एक ओर जहाँ ये बेहद बुद्धिमान है, वहीं दूसरी ओर चारित्रिक दोष, कार्य में अक्षमता एवं अति महत्वाकाँक्षी पाए गये।
इस अक्षमता एवं असफलता का कारण उनमें भावनात्मक प्रतिभा का अभाव है। उसके बिना पारस्परिक सामंजस्य कार्य के प्रति समर्पण बन ही नहीं पड़ता। जो भावों के महत्व से अपरिचित है, वे टीम वर्क को अपनी बौद्धिक दाँव-पेंच की नीति से क्षति पहुँचाते रहते हैं। गोलमैन तो ड्रग्ससेक्स हिंसा को रोकने के लिए ई. कयू. में अभिवृद्धि को महत्वपूर्ण उपचार मानते हैं अमाइग्उल तथा नियोकार्टेकस का सम्बन्ध ही विचारों व भावनाओं में तारतम्य बनाता है । इसी से विवेकपूर्ण निर्णय बन पड़ता है प्रीर्फण्टल कार्टेक्स नामक पुस्तक में लीन डी सोलेमन ने ‘वर्किंगमेमेरी’ पर विस्तार से प्रकाश डाला है यह मस्तिष्क की सम्पूर्ण मानसिक दक्षता का क्रियात्मक स्वरूप है और प्रीफेण्टल कार्टेक्स से नियन्त्रित होता है। लिम्बिक ब्रेन का संबंध जब इस क्षेत्र से कमजोर पड़ जाता है भावनाओं में कमी आ जाती है, हाँ आई. क्यू. जरूर तेज बना रहता है। ऐसी अवस्था में अच्छे छात्र भी ड्रग्स, अपराध जैसे कुकृत्यों में डूब जाते हैं ओर जब प्रीफ्रण्टल कार्टेक्स का सम्बन्ध कमजोर हो जाता है, तो भावना तो रहती है पर विचार-शक्ति क्षीण हो जाती है, ऐसे भावुक व्यक्ति वैचारिक जगत में उतना प्रखर नहीं हो पाते।
भावनात्मक प्रतिभा की महत्ता, वैज्ञानिकता समुदाय ने अपने निरन्तर किए ‘जीन अनुसंधान-अन्वेषण’ से समझ ली है। यही कारण है कि अमेरिका के विद्यालयों में ऐसे पाठ्यक्रमों को शुरू किया हो, जो छात्रों में बौद्धिक क्षमता के साथ भावनात्मक क्षमता को बढ़ा सकें। न्यूयार्क सिटी के पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल राबर्ट क्रिशबम का कहना हैं कि उन्होंने अपने स्कूल में पाँच साल पहले से ही इसको शुरू कर दिया है। इसके माध्यम से बच्चों को क्रोध, तनाव, उदासी तथा एकाकीपन जैसों मनोरोगों से छुटकारा पाने की उचित शिक्षा एवं मार्गदर्शन दिया जाता है। र्किशबम के अनुसार इस तरह के शिक्षण से बच्चों की आपराधिक वृत्तियों में आश्चर्यजनक रूप से कमी आयी हैं अमेरिका के ही नेशनल एसोसिएशन ऑफ इंडिपेन्डेण्ट स्कूल्स के प्रजीउण्ड मि. पोलर रेलीक्स अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए कहते हैं। कि हमें आई. क्यू. के परीक्षण के बजाय ई. क्यू. टेस्ट को व्यक्तियों की पूर्ण सफलता के लिए जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। उनके मत से यह सीमित एवं संकीर्ण प्रणाली हैं ।
दुनिया के हर कोने , विश्व की हर जाति एवं संसार के हर देश के विचारशीलों का मत है कि वर्तमान जीवन उन तनावों से मुक्ति पाने के आकुल है।, जो उसकी अपनी बौद्धिक क्षमताओं के कारण पनपा हैं इस तनाव को भावनात्मक प्रति के माध्यम से ही समाप्त किया जा सकता है मनुष्य से ही समाप्त किया जा सकता है मनुष्य में भावनात्मक जागरण ही उसे शान्ति, संतोष, प्रेम एवं सहानुभूति पूर्ण वातावरण दे सकता है हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर डा’ एल्विन पीसेट जिन्दगी के उलझे हुए इन धागों का एकमात्र उपाय ई. क्यू. ही मानते हैं। इनके अनुसार अति बौद्धिकता की ज्वालाओं से झुलसे मानव के लिए भाव प्रवणता शीतल जल के समान हैं इससे मानव में संवेदनशीलता का विकास होगा। यह विकास ही उसे परिवार के छोटे दायरे विश्वव्यापी समस्याओं को सुलझाने में सहायक होगा।
भावनात्मक प्रतिभा के विकास के लिए कोलम्बिया विश्वविद्यालय के वाल्टर माइकल प्रार्थना को कारगर उपाय मानते हैं। उनके अनुसार जब हम अपने अस्तित्व की गहराइयों में एकाग्र होकर उस परम दयालु परमात्मा से प्रार्थना करते हैं, तो हमारा सम्बन्ध विश्वव्यापी भावनाओं से हो जाता है। भावनाओं की पवित्र लहरें हमारे व्यक्तित्व में प्रवेश करने लगती है और हमारा अपना व्यक्तित्व किसी दिव्य व्यक्तित्व में रूपांतरित होने लगता है। इस रूपांतरण से हम न सिर्फ योग्य बनते हैं। बल्कि समाज एवं विश्व के लिए उपयोगी एवं उपादेय भी । मनोवैज्ञानिक वाल्टर माइकल के अनुसार सही योग्यता भावी युग में प्रति का अभिनव मानदण्ड होगा।
पड़ोस में एक वृद्ध की मृत्यु हो गयी। गाँव के ढेरों लोग इकट्ठे हो गए ओर लगे सब रोने। उनमें से कुछ ने कहा-भाई रोते क्यों हो आत्मा तो अमर है ? तभी किसी ने संसार की नश्वरता का बखान शुरू किया। इसी तरह कहने-सुनने में बात खत्म हो गयी।
तभी दूसरी बार गाँव में मृत्यु हुई। अब की बार आत्मा को अमर बतलाने वाले घर कोई मरा था। उसी तरह गाँव के लोगों ने इकट्ठे होकर रोना शुरू कर दिया और वही बाते फिर दुहराई जाने लगी-आत्मा अमर है, संसार नश्वर है।
तभी इनमें से किसी समझदार आदमी ने पूछ लिया- जब आप सब जानते हैं। कि आत्मा अमर है और संसार नश्वर तो फिर रोते क्यों हैं ? दूसरा बोला-हमें तो सिर्फ इतना मालूम है कि ये बाते किसी के मरने पर कहीं जाती हैं हम लोग तो इसी तरह आपस में एक दूसरे का व्यवहार चुकाते रहते हैं
समझदार आदमी को पता चल गया कि तोता रटन्त ज्ञान कितना बेकार होता है। वह यही सोचता हुआ आगे बढ़ गया कि सार्थक ज्ञान वहीं है, जो जीवन में उतार लिया जाय।
गुणवान बनने की ललक सभी में की हैं। सभ्यता के शुरुआती दौर में इनसान दुर्गुणों के निवारण-उपकरण एवं सद्गुणों के सम्वर्धन के नए प्रयत्नशील रहा है। मानवीशीलता की सारी कोशिशें इसी के नए होती रही है। सामाजिक नीति-मर्यादाएं, दार्शनिक ज्ञान एवं आध्यात्मिक घटनाओं का आधारभूत उद्देश्य यही रहा है अतीत की इन कोशिशों की भाँति आधुनिक विज्ञान भी इसके लिए प्रयत्नशील है कि मानव की वर्तमान एवं नयी पीढ़ियों को किस तरह गुणी व संस्कृत बनाया जाए ? जेनेटिक्स के रूप में वैज्ञानिक समुदाय की इन्हीं कोशिशों को देखा-परखा जा सकता है।
इन वैज्ञानिकों के अनुसार जिन्दगी बहुसंख्यक क्रियाकलापों का स्वरूप है? क्या है? इसका निर्धारण गुणसूत्र निहित ‘गुण-इकाई’ अर्थात् ‘जीन’ के अनुरूप होता है। अत्यन्त सूक्ष्म संरचना भले इस जीन की गतिविधियाँ आश्चर्यजनक एवं भावी पीढ़ियों में गुण-अवगुणों की क्रियाशीलता का संचालक एवं वाहक है । वैज्ञानिक इसी को मानवीय विकास का मूल आधार मानते हैं। जीनोम क्नोलाजी के विकसित हो जाने से ऐसे अनेकों निष्कर्ष सामने आए है, जो नई पीढ़ी में नए गुणों की रोपाई को सम्भव बताते हैं जेनेटिक्स के विशेषज्ञों का मानना है कि जीन की डिकोडिंग करने का मानवीय व्यवहार एवं वृत्तियों के क्षमताओं के अध्ययन में काफी आसानी आ गई हैं
इनका मानना है कि शरीर के समूचे एलेटिन की सक्रियता सिर्फ 20 एमीनो-सिड़ों पर निर्भर है, जबकि ‘जीन’ कही जाने वाली इन गुण, इकाइयों का ------------------------
वाटसन तथा क्रिक ने डी. एन. ए. को. दो समसूत्री के रूप में प्रदर्शित किया। इसी सूत्र में जी. ए. सी. टी. निश्चित क्रम में माला के समान गुँथे होते हैं। इनके बीच का परिवर्तन उत्परिवर्तन कहलाता है , इनके बीच का परिवर्तन उत्परिवर्तन कहलाता है।, जो जिन्दगी के गुणों में आमूल-चूल बदलाव कर सकता है। फ्रिट्ज लिपमेन ने आर, एन. ए. को संदेशवाहक की संज्ञा दी, जो डी. एन. ए. को संदेशवाहक की संज्ञा दी, डी. एन. ए. में निहित समूहों को भावी पीढ़ियों में पहुँचाता है।
विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि शरीर के जिस अंग में जितने अधिक जीन होंगे वह उतना ही शक्तिशाली तथा महत्वपूर्ण माना जाता है। अपने सोच-विचार से जीवन के सभी क्रियाकलापों का संचालन करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में सर्वाधिक 3195 जीन्स होते हैं। इसके बाद प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए जिम्मेदार श्वेतरक्त कणिका में 2964 जीन होते हैं, जबकि लाल रुधिर कणिका में जीन की संख्या सिर्फ 8 होती है। लीवर में यह संख्या 2091, हृदय में 1195 तथा पेंक्रियास में 1094 होती है। पुरुष के प्रोस्टेट ग्लैण्ड्स में 1203 तथा महिलाओं के गर्भाशय में 1059 जीन पाए जाते हैं। टेस्टिकल में 1232 तथा अण्डाणु में 584 जीन की क्षमता रहती है। हाथ की बस्ि में 904, स्केलेटल माँसपेशी में 735, हाथ की त्वचा में 629 तथा किडनी में 912 जीन होते हैं। जीन की यही संख्या थाइराइड ग्लैण्ड्स में 584 आँखों में 547 तथा सतन में 696 होती है।
मानवीय गुणों के विकास के बढ़ाए गए इस वैज्ञानिक कदम की वजह से सन् 1999 में ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट की स्थापना हुई। इसे आनुवांशिकी के मर्मज्ञ स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के केवेली एस. फ्रेजा तथा कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की मेरी क्लेयरक्रिग एवं एलेन विल्सन द्वारा स्थापित किया गया। उनकी योजना मानवीय गुझा-दोषों के अलग-अलग तरह की गुझा -इकाइयों का संग्रह करे एक बड़ी-सी लाइब्रेरी की स्थापना करने की है। इस स्थापना से इस तरह के अध्ययन एवं प्रयोगों में काफी सहूलियत होगी। जीन मनुष्य की प्रकृति के अनुरूप अपने में अनेकों भिन्न-भिन्न विशेषताएं लिए हुए होते हैं। इस प्रयास से इन भिन्नताओं पर नवीन अनुसंधान कर सकना काफी आसान होगा।
आनुवंशिक तकनीक की विशेषज्ञ मेरी क्लेयर का कहना है कि दो अजनबी व्यक्तियों के बीच काफी जेनेटिक भिन्नता होती है। लेकिन एक ही परिवार के सदस्यों के बीच यह अन्तर काफी कम होता है। अनुसंधान के निष्कर्ष के अनुसार यह अंतर दो जातियों में 85 प्रतिशत होता है, जबकि प्रजातियों के बीच मात्र 6 प्रतिशत ही होता है। भौगोलिक परिस्थितियों का केवल 15 प्रतिशत ही आनुवंशिक अन्तर होता है। अन्य कारणों से 9 प्रतिशत की खिन्नता आती है।
नवीनतम अध्ययन के अनुसार जीन्स मानव मानसिकता को काफी हद तक प्रभावित करते है। इनसान की बौद्धिक क्षमताओं एवं भाववृत्तियों का कारण वैज्ञानिक इन्हीं गुण-इकाइयों को मानते हैं। उनके अनुसार मानसिक विक्षिप्तता एवं अन्य कमियाँ भी इसी की परिणति है। बहत्तर वर्षीय विज्ञानवेत्ता केवेली एस. फ्रोजा ने अपने 1032 पृष्ठ के ग्रन्थ ‘द हिस्ट्री एण्ड ज्योग्राफी ऑफ ह्यूमन जीन्स’ में एक महत्वपूर्ण बात कही है। उनका मानना है कि भौगोलिक परिवेश, परिस्थितियों की भिन्नता । शारीरिक गुणों की क्रियाशीलता वाले जीन्स में उत्परिवर्तन का कारण बनती है। कुछ उसी तरह मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ एवं लगातार सोच−विचार को प्रभावित करने वाली गतिविधियाँ मानसिक गुणों का नियन्त्रण करने वाले जीन्स में उत्परिवर्तन कर सकती है। फ्रोजा के इस कथन से मन की गहरी परतों को प्रभावित करने वाली आध्यात्मिक साधनाओं एवं सामाजिक नीति-मर्यादाओं का मूल्य आँका जा सकता है। क्योंकि ये प्रवृत्तियों का नियन्त्रण करने वाले जीन्स में उत्परिवर्तन को सम्भव बना सकती है। तभी तो एस. फ्रोजा का अपने ग्रन्थ में कहना है कि जादुई जीन के मूल रहस्य को उद्घाटित किया जा सके तो जीवन के विकास की अनन्त संभावनाओं को साकार किया जा सकता है।
जीन के अन्दर पाया जाने वाला रसायन डी. एन. ए. भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। सदर्न कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के लियोनार्ड एडलमेन ने डी. एन. ए. कम्प्यूटर की खोज की है। डी. एन. ए. के इस कम्प्यूटर में असीम व अनन्त क्षमता तथा स्मरणीय होने की सम्भावना है। इसके सामने दुनिया की सारी टेलीफोन तथा ई-मेल जैसी अत्याधुनिक व्यवस्था भी सामान्य है। एडलमेन का कहना है कि इस विधा से ब्रह्मांड के ग्रह-नक्षत्रों निहारिकाओं के बीच आसानी से संपर्क किया जा सकेगा। इस तकनीक का समुचित विकास हो सका तो मानव विकास के साथ अन्य ब्रह्मांडीय गतिविधियों का अध्ययन किया जा सकना आसान हो जाएगा।
साहसिक कार्यों के लिए जीन्स का महत्व कम नहीं है। प्रसिद्ध पत्रिका न्युजवीक के 15 जनवरी, 16 के अंक में एक शोध पत्र का प्रकाशन विस्तारपूर्वक हुआ था। इस शोध पत्र के अनुसार साहस पूर्ण कार्यों में जीन की भागीदारी का समझने के लिए वैज्ञानिकों के दो दलों ने प्रयोग किए। पहले दल के नायक ‘नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट अमेरिका’ के डीन होमर थे। दूसरे दल का नेतृत्व ‘सराह हेरजम मेमोरियल हास्पिटल इजराइल’ के रिचर्ड एवस्टीन ने किया। इन्होंने अपने निष्कर्ष में पाया कि साहसिक कार्यों के लिए डी 4 डी आर नामक जीन महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। यह जीन मस्तिष्क के सुग्राही न्यूरान्स को संदेश प्रसारित करता है। संदेश प्राप्त करते ही न्यूरान की सतह पर फैले हुए ये रिसेप्टर डोपामीन का स्राव तेजी से करने लगती है। अतः मस्तिष्क में डोपामीन का स्तर बढ़ जाता है। डॉ. जोनाथन बेंजामीक के अनुसार डोपामीन आनन्द, साहस व संवेदना का संदेशवाहक है। जब डोपामीन कोशिका में बढ़ता है तो सम्बन्धित कोशिकाएँ मजबूत व उत्तेजित हो जाती है। यह शृंखला अनेकों कोशिकाओं में चल पड़ती है और साहसिक कार्य बन पड़ता है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के विख्यात मनोचिकित्सक सी. राबर्ट क्लोनिंगर का कहना है कि डी 4 डी. आर. जीन की क्षमता व्यक्ति की स्वयं की दृढ़ इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। मैंकगील अस्पताल के माइकेल मिनी के अनुसार दृढ़ इच्छाशक्ति से डी 4 डी आर. में अतिशय वृद्धि सम्भव है। अतएव साहस व इच्छाशक्ति के आधार पर जीन को भी प्रभावित किया जा सकता है।
हिंसा व अपराध के संदर्भ में जीन की भागीदारी के विषय में मेरीलैण्ड यूनिवर्सिटी के डेविड वाशरमैन का मत है, कि यूँ तो हिंसा ठीक-ठीक विज्ञान की परिभाषा के दायरे में नहीं आती, फिर भी इसे जेनेटिक प्रभाव से मुक्त नहीं कहा जा सकता। पूर्व अमेरिकन राष्ट्रपति जार्ज बुश के प्रशासनिक सचिव लुडस सिल्वेनिया ने अपने समय में एक रिर्पोट पेश की थी। इसके तहत सन् 1992 में अमेरिका में 26000 हत्याएँ एवं 60 लाख हिंसक अपराध अधिकतर नवयुवकों द्वारा किए गए। इसके पीछे वास्तविक तथ्यों का पता लगाने के लिए नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के निदेशक व प्रसिद्ध मनोचिकित्सक गेराल्ड एल ब्राउन ने हिंसात्मक वृत्तियों में वृद्धि की वजह सेरोटोनीन को माना। ब्राउन के अनुसार जब सेरोटोनीन में कमी होती है। तो आक्रामकता, उत्तेजना, हिंसा एवं आत्महत्या जैसी घटनाएँ बढ़ जाती है । सेरोटीनीन की मा पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में 20 से 30 प्रतिशत कम होती है। यह नवजात शिशुओं में अधिक तथा किशोरों में कम होती है। उम्र बढ़ने के साथ ही इसकी मात्रा में भी बढ़ोत्तरी होती है। ब्राउन का कहना है कि सेरोटोनीन की मात्र जिस वर्ग में जितनी निश्चित है, उसमें कमी का होना हिंसात्मक प्रभाव को बढ़ाता है।
सन् 1993 में सिरोटोनीन मेआबाँलिक मं जीन का सम्बन्ध होना पता लगा। इंग्लैण्ड में एक उच्चवर्गीय परिवार के एक व्यक्ति में उसके आप्रेशन के बाद किसी वजह से इसकी मात्रा घट गई और वह अति आक्रामक सिद्ध हुआ- कैलीफोर्निया के न्यूरोबायेलिजिस्ट इवान बलवन ने अपने प्रयोगों में जीन्स की गतिविधियों को इस तरह के व्यक्तियों में असन्तुलन का जिम्मेदार पाया। उनका मानना है कि जेनेटिक्स से प्रभावित व्यक्ति प्रायः अपना मानसिक संतुलन गँवा बैठते हैं। आज का विषाक्त वातावरण बनाने के लिए बनार्डन हिली ऐसे ही व्यक्तियों की बहुतायत होना मानते हैं।
अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने इस अन्वेषण के लिए बनायी गयी परियोजना में 58 करोड़ डालर खर्च किए है। इससे जो निष्कर्ष मिले है उससे अपराधियों की पहचान बहुत आसान हो गयी है। डॉ. उविड बेरेट ने अपराधी के हाथ का चिन्ह, लार खून तथा बाल से डी. एन. ए. का विश्लेषण करके खोज-बीन में सफलता प्राप्त की है। ससेक्स इंग्लैण्ड के डिटेक्टिव सुपररिटेण्डेण्ट ग्राहम हिल ने कहा हैिक डी. एन. ए. डाटज्ञ के आधार पर अपराध के पेचीदे मामलों को सुलझाने में सहायता मिली है।
जीवन के गुण-दोष ही नहीं, शारीरिक बीमारियाँ भी जीन से नियन्त्रित होती हैं ये बीमारियाँ आखिर मानसिक दोष ही तो है, जो विस्फोटक स्थिति आने पर दैहिक व्याधियों के रूप में प्रकट होते हैं। सिस्टिक फाइब्रोसिस, मस्कुलर डायस्ट्राफी , सिकलसेल एनीमिया आदि कुछेक आनुवंशिक रोगों का पता लग चुका हैं कतिपय रोगों पर इस तरह का अनुसंधान कार्य चल रहा है ब्रूड मिडिल सेनलस के एण्ड्रयू गार्मेन तथा पीटर सेम्स ने डी. एन. ए. को पालीमिरेस सेम्स ने डी. एन.ए. को पालीमिरेस सेम्स रिएक्शन द्वारा परिवर्धित करके परीक्षण किया है। इस विधि से क्षतिग्रस्त जीन का पता लगा लिया जाता है। इन दोनों वैज्ञानिकों ने डी.एन. ए. को विज्ञान में तहलका मचा दिया है।
नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के ग्रेगवेण्टर ने 35,000 मानव जीन का परीक्षण कर लिया है। उनके निष्कर्ष के अनुसार जब कभी जीन किसी प्रोटीन का निर्माण करता है तो इसके पूर्व m RNA की संरचना बनती है यही m RNA ही प्रोटभ्न संश्लेषण करता है। कोशिका सम्वर्धन के समय एम. आर. एन. ए. पिछली क्रिया के फलस्वरूप डी. एन. ए. का पुनर्निर्माण करता है। यह शृंखला हजारों अणुओं की लम्बी शृंखला हजारों अणुओं की लम्बी शृंखला होती है।इस विधि से मालीक्युलर बायोलॉजिस्ट डी. एन. ए. सूत्र का निर्माण कर सकते हैं। वेण्टर ने इस इस डी. एन. ए. का सुनिश्चित स्थान पता कर लिया है, जिसकी वजह से प्रभावित जीन का पता आसानी से लग सकता है। यदि प्रभावित जीन किसी अन्य जाति या मनुष्यों के जीन के समान हो तो प्रत्यारोपण की धूमिल आशा फिर से प्रज्वलित हो सकती है। () वर्ग की मान्यता है कि अग इस वेणि को सफलतापूर्वक प्रचलन में लाया जा सके तो निश्चित ही एक उपलब्धि मानी जाएगी।
हाल ही एक खोज में स्तन कैंसर के लिए जिम्मेदार जीन का पता चला है ग्रह खोज एन. आई. एच. अमेरिका के डोना शेटक, इडेनस, पार्क सकोलनीक तथा रोजर वीजमैन की एक टीम ने की है। यह जीन है क्रोमसोम-17 का बी. आर. सी. ए. है। यह जीन प्रोटीन संश्लेषण नहीं होने से आस-पास की स्तन कोशिकाएँ पहले ट्यूमर तथा बाद में कैंसर में परिवर्तित हो जाती है। इसी क्रम में बी, आर. सी. 2 तथा 3 व 4 भी ढूँढ़ लिए गए है।
आनुवंशिक रागों में डी. एम. डी. एक ऐसा रोग है जिसमें माँसपेशियाँ सड़ जाती है। यह रोग नवजात शिशुओं से 20 साल के किशोरों तक में होता है। पिछले दो दशकों से नवजात बच्चों में दा जेनेटिक रोग फेनील कीटों न्यूरिया और हाइपोथ्राडीज्म जोरों से फैला हैं बिट्रेन में सिस्टिक फाइब्रोसिस की बीमारी ने 3 प्रतिशत लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है। ग्रीस में थैलेसेमिया एवं नाइजीरिया के एक चौथाई लोग -------------------------------------
‘एक्सपेरीमण्टल साइकोलॉजी लैबोरेटरी ससेक्स’ के निदेशक स्टुअर्ट सरदलैण्ड ने जेनेटिक रोगियों के मनोवैज्ञानिक तत्वों का वर्णन किया है। उनके अनुसार लगातार किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करने पर यह दमित भावना व कुंठा कालान्तर में आनुवंशिक रोगों की सम्भावना को बढ़ा देती है। इसका उपचार है रोगी में प्रेम तथा विश्वास पूर्ण सद्भावना का आरोपण। ‘न्यू इंग्लैण्ड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ सितम्बर 15 के अनुसार रोगों का हल प्रकृतिगत जीवनचर्या एवं शान्त प्रसन्न मनः स्थिति है। जीन हर व्यक्ति की प्रकृति के अनुरूप भिन्न-भिन्न होते हैं। अनिश्चितता के सिद्धान्त के अनुरूप जीन का व्यवहार भी भिन्न-भिन्न हो सकता है। डॉ. माइकेल का मानना है प्राकृतिक एवं संयमित जीवन जीकर ही अपनी जेनेटिक प्रणाली को स्वस्थ रखा जा सकता है ।
लास एंजेल्स के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. डोनाल्ड कोहन ने ‘नेचर मेडिसिन नामक पत्रिका में जेनेटिक रोगों पर एक रिपोर्ट पेश की थी। इन्होंने तीन नवजात बच्चों-एडीनोसीन डीमीनेस डेफीसिएन्सी नामक जेनेटिक रोगों से मुक्ति दिलाई थी। इनके अनुसार शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली प्रकृति का उपहार है। इसे प्रकृति की शरण में जाकर ही ठीक रखा जा सकता है।
बात शारीरिक गुण-दोषों अर्थात् सबल, स्वस्थ अथवा रोगग्रस्त जीवन की हो अथवा फिर मानसिक गुण-दोषों से इसका सम्बन्ध हो, जीन इन पर अपना नियन्त्रण -आधिपत्य रखते हैं। हृदय की भाववृत्तियाँ भी इनसे अछूती नहीं है। यदि जेनेटिक प्रणाली को दोष मुक्त किया जा सके तो मानव का वर्तमान समृद्ध एवं भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। परंतु ऐसा होगा किस प्रकार ? इस महत्वपूर्ण प्रश्न के जवाब में एबीगेल सेल्येरस कहते हैं कि पर्यावरण, सामाजिक परिवेश एवं साँस्कृतिक परिस्थितियाँ जेनेटिक प्रणाली पर अपना महत्वपूर्ण असर डालती है।
यदि पर्यावरण प्रदूषण मुक्त हो, ऐसे स्थान पर दोष मुक्त सामाजिक एवं साँस्कृतिक स्थिति में किसी व्यक्ति को लाकर रखा जाय ओर उसे उत्कृष्ट विचारों एवं उदात्त भावनाओं की ओर प्रेरित किया जाय तो आश्चर्यजनक परिणाम होते हैं। अतीत भारत के प्राचीन ऋषिगणों ने मानव प्रजाति के स्तर को उत्तम बनाए रखने के लिए सामाजिक नीति-मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक साधनाओं का सृजन किया था। विज्ञानवेत्ता एबीगेल भी मानते हैं यदि किसी तरह मन की गहराइयों को प्रभावित किया जा सके तो tcq जीन के प्रभावित होने की सम्भावना बढ़ जाती है ओर यह निर्विवाद है कि ध्यान मन की गहराइयों को प्रभावित करता है इससे tcq का प्रभावित होना लगभग सुनिश्चित है। यह tcq ही वह जीन है जो म्यूटेशन में आश्चर्यजनक ढंग से भाग लेता है। इस म्यूटेशन में ही नए गुण पैदा होते हैं।
हालांकि जेनेटिक प्रणाली को पूरी तरह प्रभावित करने के लिए सिर्फ ध्यान ही नहीं तपश्चर्या संयमित साधनात्मक दिनचर्या भी जरूरी हैं बाल्टीमोर विश्वविद्यालय के अपराध विज्ञान विभाग की प्राध्यापक डायना फिशाविन के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को लगातार प्रताड़ित किया जाय, तो इस तिरस्कार से उनके अन्दर गहरी मनोग्रन्थियाँ बन जाती है यही मनोग्रन्थियाँ बाद में आनुवंशिक अपराध को जन्म देती है। ऐसे व्यक्तियों को यदि प्रेमपूर्ण वातावरण में रखा जाए और उनमें ईश्वरीय आस्था एवं विश्वास का पनपाया जा सके, तो आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम पा जा सकते हैं अब वैज्ञानिक भी मानते हैं। कि प्राचीन ऋषियों द्वारा अन्वेषित अध्यात्म विज्ञान की तकनीकें सिर्फ प्राची परम्पराएँ भर नहीं है । आज उनका उपयोग विज्ञानसम्मत ऐसे प्रयोगों के रूप में किया जा सकता है जो मानव की जेनेटिक प्रणाली को दोष मुक्त बना सके। स्वयं आप भी चाहें तो स्वयं को और अपनी भावी पीढ़ियों को इन्हीं आध्यात्मिक प्रयोगों का आश्रय लेकर गुणवान बना सकते हैं।
राजा जनमेजय ने महर्षि शुकदेव से पूछा-भगवान्! किसी मनुष्य के भले-बुरे भविष्य को कैसे जाना जाए? महर्षि ने उत्तर दिया जिसके विचार अधोगामी और आचरण निकृष्ट दुर्दिन समीप है। अपने का सुधारने और रुष्ट गुणों के अर्जन में जो लोग लगे हों, समझना चाहिए कि ऐसों का भविष्य उज्ज्वल होने वाला है।
पारमार्थिक वातावरण बनाने के लिए जो यज्ञ-प्रक्रिया काम में लाई जाती है, उसे सार्वजनिक प्रयास द्वारा सम्पन्न किया जाता है। एक बड़ा पक्ष यज्ञ का यही है। व्यक्तिगत प्रयोग इससे भिन्न है।
पारमार्थिक प्रयोजनों के निमित्त किये जाने वाले यज्ञों का शब्दार्थ उसी प्रकार किया जाता है उस भूमिका में यज्ञ शब्द के तीन अर्थ है-दान, देवपूजन और संगतिकरण। परमार्थ योजनाएँ पूरी करने के लिए श्रमदान, समयदान और अंशदान की आवश्यकता पड़ती हैं लोककल्याण के कार्य इसके बिना हो नहीं सकते। इसलिए यज्ञ योजना आरम्भ करते समय भी दान-संग्रह की आवश्यकता पड़ती है और उस आयोजन के पश्चात् जो बड़े काम हाथ में लेने हों, उसके लिए भी धन की-साधनों की आवश्यकता पड़ती है। अस्तु, यज्ञ शब्द के एक अर्थ में उस अनुदान संचय की ओर संकेत किया गया है। दूसरा अर्थ है- देवपूजन । ऐसी योजनाएँ सम्पन्न करने के लिए देवजनों की, विद्वानों-मनीषियों की, परमार्थ-परायण की, साधुजनों की बड़ी संख्या चाहिए। ऐसे लोग यदि न हों, और लोभी , दंभी, प्रपंची लोग इस कार्य में आगे हो, उच्च उद्देश्य जिनके न हों, महान व्यक्तित्व जिनके न हो, उनके एकत्रीकरण से भी यज्ञ योजना पूरी नहीं हो सकती और न अभीष्ट प्रतिफल ही उपलब्ध हो सकता है। इसलिए जिस प्रकार यज्ञ साधनों के लिए दान की आवश्यकता है, वैसे ही उसके सूत्र-संचालन के लिए उच्चकोटि के व्यक्तित्व भी आवश्यक है।
यज्ञ का तीसरा अर्थ हैं-संगतिकरण, संगठन। मिल-जुलकर उस कार्य को पूरा करने की प्रवृत्ति । यह भी अनिवार्य रूप से आवश्यक है। दान द्वारा साधन संग्रह कर लिये जाएँ और साधु, विद्वान भी मिल जाएँ, पर उनमें संगठन न हो , एक मन से-एकजुट होकर निर्धारित योजना पूरी करने की लगन न हो तो भी वातावरण में पारमार्थिकता का समावेश करना सम्भव न होगा और यज्ञ का मूलभूत उद्देश्य पूरा न होगा। यज्ञ में केवल अग्निहोत्र ही नहीं होता, उसके पीछे समग्र योजना होती है। लोकमंगल की कितनी ही आवश्यकताएँ और सामयिक समस्याएँ होती है। उन्हें आरम्भ करने एवं प्रगतिशील बनाने के लिए कितने ही कार्यक्रम निर्धारित करने और उन्हें पूर्ण करने के लिए सर्वतोभावेन जुट पाने की आवश्यकता पड़ती हैं यह सारा सुयोग बनने पर यह समझा जाता है कि यज्ञ प्रयोजन पूरा हुआ। इसी समग्रता की ओर यज्ञ शब्द को तीन अर्थों में इंगित किया गया है।
इस प्रकार के यज्ञ आज की परिस्थितियों में बहुत बड़े, रूप में सम्पन्न न हो सकेंगे। इसलिए पाँच कुण्डों , नौ कुण्डी, पच्चीस कुण्डी, अधिक से अधिक एक सौ आठ कुण्डीयों की योजना हाथ में ली जानी चाहिए। इसी के लिए सही तरीके से दान संग्रह करना, लोकसेवी जुटाना और परस्पर संगठन बनाये रहना सम्भव है। इन आयोजनों की रूपरेखा क्या हो , यह प्रा अभियान आयोजकों को बताई जा चुकी है। सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप जो भी आवश्यक परिवर्तन होते रहते हैं, उन्हें भी स्पष्ट कर दिया जाता है ।
इन दिनों जो परिस्थितियाँ है, उन्हें देखते हुए यह कार्य संगठित प्रज्ञा परिवारों के जिम्मे सौंपा गया है, क्योंकि उनके पास तीनों ही साधन है।प्रज्ञा परिवार के सदस्य थोड़ा-थोड़ा पैसा परस्पर एकत्रित करके दान वाले भाग को पूरा कर सकते हैं। वार्षिकोत्सव के रूप में प्रज्ञा आयोजन करने के लिए एक-दो हजार रुपये से भी काम चल जाता है। देव स्वभाव के व्यक्तियों का एकत्रित करने के लिए कहीं अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं हैं शान्तिकुँज की प्रचारक मण्डली इस कार्य के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित की गई है। इस पर केन्द्र का नियन्त्रण है। अनुशासनहीनता पर कड़ी रोकथाम रहने से वानप्रस्थ परिव्राजकों में से गायक व वक्ता इतने निकल आते हैं जिनसे एक छोटा आयोजन भली प्रकार सम्पन्न हो सके। धार्मिक संगठनों में प्रज्ञा परिवार से बढ़कर और कोई संगठन ढूँढ़ा जाना कठिन है। धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण उसकी कार्यपद्धति है। यज्ञ आयोजन के साथ देव दक्षिणा की जो प्रक्रिया है, उसमें सामयिक, व्रतशीलता धारण करने और अवांछनीयताएं, अनैतिकताएं, कुरीतियाँ परित्याग करने की व्रत शीलता जोड़ रखी गयी हैं यह पूर्णतया सामयिक है, जो अपनाया और जो छोड़ा जाना चाहिए, इस सन्दी में आवश्यक साहित्य भी छपा है और गायन तथा प्रवचन में वह सब कुछ है। यज्ञ आयोजन के लिए साधन जुटाने से लेकर व्यवस्था−क्रम बनाने तक की एक सुनियोजित कार्यपद्धति, विधि-व्यवस्था बना रखी गयी है, जिसे कार्यान्वित करने में किसी को कही कोई कठिनाई नहीं पड़ती । छोटे यज्ञों में जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है, वे सभी एक गाड़ी में प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के साथ भेज दिये जाते हैं। फोल्डिंग यज्ञशाला, फोल्डिंग स्टेज, लाउडस्पीकर, संगीत उपकरण आदि साधन इकट्ठे नहीं करने पड़ते। अनुभवी कार्यकर्ता सारा जुगाड़ हाथोंहाथ जुटा देते हैं। एक कुण्ड से लेकर पच्चीस कुण्ड तक का यज्ञ और सम्मिलित होने के लिए निमन्त्रण पत्र तक सभी कुछ सुविधापूर्वक उपलब्ध हो जाते हैं। इस प्रकार संगीतकरण, देवपूजन और दान की तीनों ही अभ्यस्त प्रक्रिया कार्यान्वित होने में कोई कठिनाई नहीं पड़ती। वातावरण संशोधन के लिए सार्वजनिक सहयोग से गायत्री महायज्ञ का जो क्रम गत कई वर्षों से चल रहा है, उसे थोड़ा और उत्साह जोड़कर आगे बढ़ दिया जाए तो यज्ञ आन्दोलन को बहुत ही उत्साहवर्द्धक परिणामों में आगे बढ़ाया जा सकता।
संगतिकरण का तात्पर्य है-संगठनात्मक कार्यक्रम। निजी इमारत वाली प्रज्ञापीठें और बिना इमारत वाले स्वाध्याय मण्डल, प्रज्ञा संस्थानों के लिए पाँच सूत्रीय कार्यक्रम निर्धारित है, जहाँ भी यज्ञ हो, वहाँ इन पाँचों को परिपुष्ट बनाया जाना चाहिए। रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम पाँच-पाँचों को परिपुष्ट बनाया जाना चाहिए। रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम पाँच-पाँच निर्धारित किये गये है। आज की परिस्थितियों में इन दयों को कार्यान्वित करने के लिए यज्ञ-आयोजनकर्ताओं को अपने-अपने यहाँ की स्थिति के अनुरूप जो कुछ भी सम्भव हो, उसे करने में कुछ उठा न रखना चाहिए।
बड़े एवं सामूहिक यज्ञ आयोजनों में कई तरह के प्रयत्न करने पड़ते हैं, कई बार इन आयोजनों में अनेक अड़चनें भी सामने आ खड़ी होती है। इनमें हवनकुण्डों की समस्या भी एक है। छोटी जगह में आग के संपर्क से खतरे भी रहते हैं। उनसे बचा जा सकता है। इसके लिए चलते-फिरते कुण्ड बना लेने का एक तरीका है। दूसरा तरीका उसमें भी सुगम है-’दीपयज्ञ-, थल में अगरबत्तियाँ और दीपक जलाने का। यह दोनों ही तरीके वहाँ प्रयोग में लाने चाहिए जहाँ पूर्ण विधि-विधान की, भाग-दौड़ , शोभा-सज्जा, सम्भव न हों सके। आलस्यवश सस्ता तरीका अपनाना ठीक नहीं। विधिवत् सब काम करने सके श्रद्धा और सज्जा दोनों को ही पूर्ति होती है। सभी आवश्यक कर्मकाण्ड बन पड़ते हैं। और उसमें सम्मिलित होने वालों को पूर्ण विधि-विधान सीखने का अवसर मिलता है। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो वहाँ कुण्ड बनाने या वेदी बनाने की विधि ही अपनानी चाहिए।
यों तो यज्ञ की पुरातन परिपाटी कुण्ड खोदकर अग्नि स्थापित करने की है। नयी या सरल पद्धति मिट्टी की वेदी बनाने की है। धर्मग्रन्थों में इसका नाम -स्थाण्डिल’ है। कुण्ड विधान के साथ कुण्ड, पूजा, पवित्र जल माँगाने की जल यात्रा आदि के विधान है, पर स्थण्डिल स्थापना के सरल विधान के लिए पृथ्वी पूजन का मंत्र पढ़ लेने से, जल अभिसिंचन से काम चल जाता है । कम आहुतियों के हवन में अग्नि के इधर-उधर फैलने, चिनगारियाँ उड़ने का खतरा नहीं रहता।
बहुत दिनों से ताँबे के कुण्ड का भी प्रचलन है। कोई-कोई लोहे का भी बना लेते हैं। यह एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए ले जाने में सरल पड़ते हैं, पर धातुओं का अपना प्रभाव अग्नि प्रज्ज्वलन के साथ वायुमण्डल में फैलता है। ताँबे का प्रभाव तो उतना हानिकारक नहीं हाता, पर लौह मिश्रित अग्नि की ज्वालाएँ हानिकारक प्रभाव निस्सृत करती है।
जहाँ चलते-फिरते हवनकुण्ड को आवश्यकता अनुभव हो, वहाँ उन्हें मिट्टी के बनाकर आग में पका लेना चाहिए। उनमें तीन मंखलाएँ (सीढ़ियाँ) भी सरलतापूर्वक बन सकती है। जिनके हाथ सधे हुए है, वे कुम्हार भी उन्हें मेखला समेत बनाकर पका सकते हैं। साँचा बनाकर सीमेण्ट के भी ढाले जा सकते हैं। इस तरह के चलते-फिरते हवन कुण्डों का यह प्रचलन आसान भी हैं और सस्ता भी। चलते-फिरते हवन कुण्डों का यह तरीका देहातों में विस्तृत रूप से सफल हो सकता है। इस प्रकार के पाँच कुण्ड बनाकर एक ही समय में अधिक लोगों को बिठाकर समय की बचत की जा सकती है। चारों ओर एक-एक होता बिठाकर एक ही पारी में बीस व्यक्ति बिठायें जा सकते हैं। इसमें जमीन के जलने या काले होने का भी डर नहीं रहता। एकिली में एक हवनकुण्ड रख देने से आग से किसी प्रकार का खतरा होने का भी डर नहीं है। समय की बचत तो प्रत्यक्ष रूप से होती है। एक कुण्ड से लेकर एक सौ आठ कुण्ड तक का हवन भी इसी प्रकार हो सकता है। एक महिलाओं के लिए एवं एक पुरुषों के लिए यह कुण्ड रखे जा सकते हैं। यह चलते-फिरते याकुण्ड की विधि वहाँ विशेष रूप से अपनानी चाहिए जहाँ जमीन काली होने या चिनगारियाँ उड़ने का खतरा हो। यह प्रयोग सस्ता भी है और सरल भी। एक बार के बने कुण्ड मुद्दतों तक काम देते रहते हैं। टूट-फूट हो जाय तो नये बन सकते हैं।
उक्त यज्ञ आयोजन विशेष पर्वों, वार्षिकोत्सवों के अतिरिक्त चैत्र और आश्विन की नवरात्रियों में विशेष रूप से किये जाएँ। वसन्त पर्व, गायत्री जयन्ती और गुरुपूर्णिमा के एक-एक दिन के कार्यक्रम भी हर जगह मनाए जाएँ।
उपरोक्त कार्यक्रम ऐसे है जिन्हें करने से दान, देवपूजन और संगतिकरण के कार्यक्रम संक्षेप में सम्पन्न होते हैं।
छोटा किन्तु सुनियोजित -सुव्यवस्थित कार्यक्रम हाथ में लेकर यदि ठीक प्रकार से इसे पूरा करने का प्रयत्न किया जाय तो यज्ञ नाम को सार्थक करने एवं उसके सत्परिणामों को सार्थक करने की आवश्यकता पूरी होती है। यदि इतना भी किया जा सके तो वह कम महत्वपूर्ण नहीं है। इतने भर से इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य की वह पृष्ठभूमि तैयार हो जाएगी जिसमें मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की कल्पना की गयी है। आगे समयानुसार इसमें और भी अभिवृद्धि की जा सकती है।
न्यूयार्क के मेयर की अपने न्याय के लिए ख्याति थी। जो भी मुकदमा उनके सामने आता, उसका ऐसा सटीक फैसला सुनाते कि वादी और प्रतिवादी दोनों सन्तुष्ट हो जाते। उनका फैसला सुनने वालों को लगता कि सचमुच दूध का दूध और पानी का पानी करने की उक्ति चरितार्थ हो गयी।
एक दिन पुलिस ने एक चोर पर मुकदमा चलाया कि उसने रोटियाँ चुराई। मेयर ने निर्णय सुनाया , चूंकि अपराधी ने चोरी की है, इसलिए उस पर दो डालर अर्थदण्ड दिया जाता है । अपना निर्णय सुनाने के बाद उन्होंने वहाँ उपस्थित लोगों की ओर देखते हुए कहा-”आप सब लोग जो यहाँ उपस्थित है, उन पर भी आधा-आधा डालर का अर्थदण्ड दिया जाता है।” फैसला सुनने वाले लोग आश्चर्य में थे कि आखिर ऐसा क्यों ?
सबके चेहरों पर उभर आए प्रश्न चिन्ह को मिटाते हुए वह बोले-”चूँकि हमारी और आप सभी की आपाधापी एवं अति संग्रह का ही परिणाम है कि एक व्यक्ति को भूखा रहना पड़ा एवं मजबूर होकर चोरी करनी पड़ी। इसलिए मैं और आप सभी दण्ड के पात्र है।”
(जनवरी 97 में प्रकाशित लेख का उत्तरार्द्ध)
दिशा भूलने का, जनमानस में हजार वर्ष की कुसंस्कारी प्रक्रिया हटाने की उपेक्षा करने का जो परिणाम होना चाहिए था, वह सामने हैं इन परिस्थितियों में उत्कृष्ट राज नेतृत्व एवं आदर्श शासन तंत्र की आशा रखना व्यर्थ है। राजनेताओं का चुनाव होता है। चुनावों द्वारा प्रतिनिधि चुने जाते हैं और उनके चुनाव से सरकारें बनती है। जनता का जो स्तर है उसमें चुनाव जीतने के लिए पैसे को पानी की तरह बहाने की, जाति-पाति के नाम पर लोगों को बरगलाने की, व्यक्तिगत या स्थानीय लाभ दिलाने के सब्जबाग दिखाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। जो यह सब तिकड़में भिड़ाने में समर्थ न हो, उसका चुनाव जीतना कठिन है। जनता का स्तर ही ऐसा है कि वह वोट का मूल्य और उसके दूरगामी परिणामों को अभी समझ ही नहीं पाई। झाँसे पट्टी और वास्तविकता का अन्तर करना उसे आया नहीं। इसलिए चुनाव में वे लोग जीत न सके जो रामराज्य स्थापित कर सकने में सचमुच समर्थ हो सकते थे। जनता ने अपने स्तर की सरकारें बनाईं, उन सरकारों के संचालकों ने वही किया जो जनता कर रही है या कर सकती है। जड़ के आधार पर पत्ते बनते हैं। धतूरे के बीज से उगे पौधे पर शहतूत कहाँ से लगें?
राज्य शासन के संचालन में जो व्यक्ति काम करते हैं, उनकी मनोभूमि एवं कार्यशैली ही शासन तंत्र के संचालन का स्वरूप निखारती हैं कानून कितने ही अच्छे क्यों न हो, नीतियाँ कितनी ही निर्दोष क्यों, न हो, योजनाएँ कितनी ही बढ़िया क्यों न हो, उनके संचालन का भार जिस मशीनरी पर है उसके पुर्जे यदि घटिया होंगे तो सारा गुड-गोबर होता रहेगा। सरकार कई योजनाएँ बनाती और चलाती है पर उसका स्वरूप जनता तक पहुँचते-पहुँचते विकृत हो जाता है। क्योंकि जिनके हाथ में उस प्रक्रिया के संचालन का भार है वे उतने शुद्ध नहीं होंगे जितने होने चाहिए। अपराधों को रोकने और अपराधियों को पकड़ने की जिम्मेदारी जिस मशीन पर हैं यदि वह ऊँचे स्तर की हो और भावनापूर्वक काम करे तो निस्सन्देह अपराधों का उन्मूलन हो सकता है। उपयोगी कार्यों के लिये ऋण या अनुदान बाँटने वाली मशीन यदि स्वच्छ हो तो वह धन खुर्द-बुर्द न होकर सचमुच सम्पत्ति और सुविधा बढ़ाने में समर्थ हो सकता है। शिक्षा देने वाली मशीन यदि भावनाओं से ओत-प्रोत हो तो छात्रों को ढालने में उन व्यक्तियों का जादू आश्चर्यजनक ढलाई का प्रतिफल प्रस्तुत कर सकता है। सरकारी कानूनों या योजनाओं में उतना दोष नहीं है जितना कि प्रस्तुत प्रक्रिया का संचालन करने वाली मशीनरी की आदर्शवादी भावनाओं का न्यूनतम रूप है।
प्रश्न उत्पन्न होता है कि यह शासन संचालन करने वाली मशीन कैसे उत्कृष्ट बने? तो फिर बात लौटकर वहीं आ गई। सरकारी कर्मचारी आकाश से नहीं उतरते। वे जनता के ही बालक होते हैं। उनने अपने घर-परिवार से सम्बद्ध समाज में जो कुछ देखा, सुना, समझा , अनुभव किया है उसी के आधार पर उनका मानसिक स्तर एवं चरित्र डाला है नौकरी पाते ही वे उन सारे संस्कारों को भुलाकर देवता बन जाये यह आशा करना व्यर्थ है। उसी प्रकार पैसे लेकर वोट बेचने वाली, जाति-पाँति का पक्ष-पात करने वाली , व्यक्तिगत या क्षेत्रीय लाभ के प्रलोभनों से आकर्षित होने वाली अदूरदर्शी जनता से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह उन्हें चुनेगी, जो सुर्योय एवं आदर्शवादी तो है पर पैसा लुटाने या बहकाने वाले हसिकण्ड अपनाने में समर्थ नहीं। यह एक सच्चाई है कि प्रजातन्त्र में जनता के स्तर की ही साकार बनती हैं और उसी स्तर की सरकारी मशीन चलती है।
पार्टियों की सत्ता बदले, इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। पिछले तीन-चार वर्षों में काँग्रेस का एकाधिकार नहीं रहा। कई पार्टियों को अलग या सम्मिलित सरकारें बनीं । उनने भी कोई अलग आदर्श प्रस्तुत नहीं किया, जिस कीचड़ में काँग्रेस का छकड़ा घिसट रहा था उसी में वे खड़क्षड़िया भी धँस गई। सच्चाई यह है कि इन परिस्थितियों में कुछ हो नहीं सकता। प्रबुद्ध लोकमत जाग्रत हुए बिना-”आया राम गया राम” की हथफेरी रुक ही नहीं सकती। अल्पमत को बहुमत में और बहुमत को अल्पमत में बदलने के लिए प्रलोभन और आतंक का वर्तमान दौर अनन्त काल तक चलता रहेगा, यदि विधायकों को अपनी जनता के रोष एवं अवरोध का भय उत्पन्न न हुआ तो। इसी प्रकार जो भी सरकार सत्ता में आयेगी उसके मंत्री यदि अपने समर्थकों के, अपने च्ोत्र के लिये सरकारी मशीन से काम लेंगे तो उन पुर्जों से अपने स्वार्थ साधने की भी छूट देनी होगी। फिर प्रशासन शुद्ध कैसे होगा ?
मूल समस्या यही हैं किस पार्टी की सरकार बने, वह किन योजनाओं को कार्यान्वित करे, यह प्रश्न कम महत्व के है। अधिक महत्व के प्रश्न यह है कि व्यक्तियों को चुनने का जनस्तर कैसे बने ओर सरकारी मशीन में पुर्जे बनने वाले कर्मचारी घर से ही आदर्शवादी एवं भावना सम्पन्न बनकर वहाँ तक कैसे पहुँचे ? यह समस्या पर्दे के पीछे दीखती है पर है यही सबसे महत्वपूर्ण। इसे हल किये बिना तथाकथित प्रगति में खोखलापन ही बना रहेगा। प्रजातंत्र की जड़ जनता है। जहाँ जनता का स्तर ऊँचा होगा, वहीं प्रजातंत्र पसंद है तो उसकी सफलता की अनिवार्य शर्त जनता का भावनात्मक एवं चारित्रिक स्तर भी ऊँचा उठाना ही पड़ेगा अन्यथा शिकायतें करते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा। स्वराज्य प्राप्ति के समय गाँधी जी इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए चिन्तित थे और जोर दे रहे थे कि काँग्रेस शासन का अंग न बने वरन् लोकमानस शासन का अंग न बने वरन् लोकमानस का निर्माण करने के अधूरे किन्तु अतिमहत्वपूर्ण कार्य को सँभालने में ही एकचित होकर जुटी रहे पर क्या किसी ने उनकी सुनी ?
तथ्य तथ्य ही रहेगा। आवश्यकता, आवश्यकता ही रहेगी। एक उसे पूरा नहीं करता तो दूसरी को अपना कंधा लगाना चाहिए। यही रचनात्मक तरीका है। स्वतंत्रता संग्राम में 12 वर्ष तक निरंतर मोर्चे पर लड़ते रहने वाले सैनिक के रूप में अड़े रहने के उपरांत उस संग्राम की पूरक परिधियों के महत्व को हम समझते रहेंगे। हमारा विश्वास है कि बौद्धिक क्रान्ति, सामाजिक क्रान्ति एवं नैतिक क्रान्ति की त्रिवेणी बहाये बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किये बिना हमारे पाप ताप न कटेगा। राजनैतिक स्वतंत्रता का लाभ तभी प्राप्त किया जा सकेगा, जब उसके साथ ही बौद्धिक सामाजिक एवं नैतिक क्षेत्रों के कालनेमि की तरह भ्रमे हुए पराधीनता पाश से मुक्त कराया जा सके। स्वतन्त्रता का एक चरण अभी प्राप्त हुआ हैं तीन मोर्चों पर लड़ा जाना अभी भी शेष है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम उसी प्रयत्न में निरन्तर प्रयत्नशील रहे है, दूसरे सैनिकों ने अपनी वर्दियाँ उतार दी और राज-मुकुट पहन लिये पर अपने लिए आजीवन उस चिंतन लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। राष्ट्र की बात ही क्यों सोचें, विश्व कल्याण का मार्ग भी यही है। जनकल्याण का मार्ग भी यही है जनजागरण और लोक-मानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग है। हम इसी दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ रहे है एवं जहाँ तक हमारा प्रभाव क्षेत्र है उसे उसी दिशा में घसीटते लिए चल रहे हैं।
जैसा कि हम जानते हैं कि जन-मानस के अन्तरंग का स्पर्श करने और कोमल भावनाओं को संवेदनशील बनाने की क्षमता राजतंत्र में नहीं है। उसकी मूल प्रकृति और प्रवृत्ति दूसरी हैं कूटनीति राजनीति का पर्यायवाची बन गयी हैं उस स्तर जो कुछ होगा योग उसमें अकारण ही किसी कूटनीति या दुरभिसन्धि की गन्ध सूंघेंगे। इसलिये राजतंत्र के द्वारा इस प्रकार के प्रयत्न या प्रयोग जब कभी हुए है, उन्हें असफलता ही हाथ लगी हैं यह क्षेत्र वस्तुतः धर्म एवं दर्शन का है। बौद्धिक , सामाजिक एवं नैतिक क्रान्ति के लिए विचारणा का स्तर बहुत गहराई से बदलना होगा। उथला बदलाव कोई परिणाम उत्पन्न न करेगा। उस प्रयोजन की पूर्ति में केवल धर्मतंत्र ही समर्थ हो सकता है। राजनैतिक स्तर पर बालविवाह छुआछूत निवारण, दहेज उन्मूलन, व्यभिचार विरोधी कानून बने हुए है। पर उनको कितना मान मिला ओर कितना परिणाम निकला यह सबके सामने है। भौतिक सुधार करना राजतंत्र का क्षेत्र है। भावनात्मक सुधार के लिए प्रजातंत्र के वातावरण में केवल धर्मतंत्र ही समर्थ हो सकता है। प्रजातंत्र हटाकर अधिनायकवाद आना है तो आतंक के आधार पर विचार परिवर्तन भी सम्भव है पर वह प्रयोग महँगा है। व्यक्ति की विचार स्वतंत्रता अपह्नत हो जाने पर वह एक मशीन मात्र रह जाता है ओर साँस्कृतिक प्रगति की जिस महान प्रक्रिया ने मानव जाति को यहाँ तक पहुँचाया, उसका द्वार ही बन्द हो जाता है। हम प्रजातंत्र पसंद करते हैं। उसमें बहुत खूबियाँ और सम्भावनाएँ सन्निहित है। फिर प्रजातंत्र की परिधि में जनमानस का निर्माण करना धर्म एवं अध्यात्म का ही क्षेत्र रहता है
हम यही कर रहे हैं। धर्म और अध्यात्म को हमने मानव जाति की समग्र प्रगति के लिए नियोजित किया हैं पिछले दिनों उसमें जो अवाँछनीयताएँ घुस पड़ी थी उन्हें सुधारा है। धर्ममंच अब तक प्रतिगामियों का दुर्ग समझा जाता है। हमने उसे नई दिशा दी है और उसकी मूल प्रवृत्ति प्रगतिशीलता को उभारा है। धार्मिक प्रथा-परम्पराओं, रीति-रिवाजों व कर्मकांडों और मान्यताओं के बाह्य स्वरूप को यथावत रखते हुए उनकी दिशा और प्रवृत्ति में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि जिस क्षेत्र की ओर से नाक-भौं सिकोड़ी जाती थी और निराशाजनक माना जाता था अब उसे मानवीय प्रगति की निर्णायक भूमिका संपादन करने में समर्थ माना जाने लगा है। पिछले दिनों कुछ क्षुब्ध वर्ग तोड़-फोड़ में लग गये थे। वे दीर्घकालीन परम्पराओं को उखाड़कर आमूल-चूल परिवर्तन लाना चाहते थे। वे भूल जाते थे कि 80 प्रतिशत देहातों में बसे हुए और 77 फीसदी अशिक्षित देश के लिये धर्म परम्पराओं में क्रान्तिकारी तोड़-फोड़ सरल नहीं है। वे प्रयत्न भी लगभग असफल हो गये। अपनी सुधारात्मक प्रक्रिया आँधी-तूफान की तरह इसलिए सफल होती चली जा रही है कि हमने धर्म-प्रथाओं एवं कलेवरों के बाह्य स्वरूप में हेर-फेर किये बिना उनके मूल प्रयोजन में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया है।
इस प्रकार परोक्ष रीति से हम राजनीति में भाग ले रहे है और राजनैतिक शुद्धता एवं प्रखरता की पृष्ठभूमि तैयार कर हरे है। प्रत्यक्ष राजनीति में बहुत लोग घुसे पड़े है, वहाँ इतनी भीड़ है जिसे बढ़ाया नहीं घटाया जाना चाहिए। प्रजातंत्र की मूल-शक्ति जनता में निर्धारित रहती है। जनता अपना बौद्धिक सामाजिक एवं नैतिक स्तर ऊँचा उठाये बिना अपना बौद्धिक सामाजिक एवं नैतिक स्तर प्राप्त कर नहीं सकेगी।
हम राजनीति से अलग नहीं है, न उसका मूल्य कम रहे है, बात इतनी भर है कि हम जड़ में खाद, पानी लगाने वाले माली बने रहना चाहते हैं। फूल और फल का व्यापार दूसरे लोग करें इसमें न हमें कोई आपत्ति है और न ईर्ष्या । हम अनुभव करते हैं। कि उथले राजनीतिज्ञों की अपेक्षा हम अधिक हम अधिक ठोस अधिक महत्वपूर्ण राजनीति अपना रहे हैं और हमारे प्रयत्नों का फल किसी भी राजनैतिक पार्टी या उसकी सरकार को अपेक्षः सत्परिणाम उत्पन्न करेगा। गाँधी जी का जनमानस निर्माण का काम अधूरा रह गया, हमें शेष काम को पूरा करने वाले कुली, मजूर की तरह जुटे रहना मंजूर हैं दूसरे लोग उनके तप का प्रतिफल चखें-चखते रहे। अपने मुँह से उसके लिए लार टपकने वाली नहीं हैं हम स्वस्थ राजनीति के विकसित हो सकने की सम्भावना वाला भवन बनाने में नींव के पत्थर मात्र बनकर रहेंगे और जो भी हमारे प्रभाव-संपर्क में है, आगे आयेंगे, उन्हें इसी दिशा में प्रेरित आकर्षित करते रहेंगे।
(बसंत पर्व 8 फरवरी, 89 पर दिया गया वीडियो संदेश)
गायत्री मंत्र मारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों, भाइयों! संसार के इतिहास में दो प्रमुख बड़ी क्रांतियां हुई हैं। एक क्रान्ति आज से हजारों वर्ष पूर्व राम-रावण के समय हुई थी। उस चारों ओर रावण का आतंक फैला हुआ था। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची थी। इस आतंक से जनता को बचाने और उसे साँत्वना देने के लिए एक ऐसा समय आया, जिसने सारे वातावरण को बदल दिया। सोने की लंका, एक लाख पूत, सवा लाख नातियों वाले रावण के राक्षस साम्राज्य को राम ने समाप्त कर दिया। उस समय रामराज्य की स्थापना हुई। अपने समय की यह सबसे बड़ी क्रान्ति थी।
दूसरों एक और बड़ी क्रान्ति हुई। उसे महाभारत का काल कहते हैं। उस समय भी जरासंध, कंस, चाणूर से लेकर दुर्योधन तक का आतंक सारी दुनिया में फैला हुआ था। उस समय के आतंक को समाप्त करने की हिम्मत किसी साधारण व्यक्ति में नहीं थी, तब एक शक्ति, एक क्रान्ति आयी और उस समय के दुर्दान्त जरासंध, कंस एवं दुर्योधन जैसों का कहीं ठिकाना नहीं रहा। इसके बाद ही कृष्ण भगवान की भारत को महान भारत बनाने की कल्पना सार्थक हो सकी थी। इसके बाद चाणक्य के सान्निध्य में चन्द्रगुप्त ने भी कोशिश की थी। हम यह कह सकते हैं कि इसमें भी भगवान का योगदान था, अन्यथा महाभारत-निर्माण का काम साधारण नहीं था। एक महान शक्ति के सहयोग से ही यह कार्य हो सका। इन दोनों क्रान्तियों के बारे में आपने रामायण में और महाभारत में पढ़ा होगा। इस पर आजकल टी. वी. सीरियल भी बनाया गया है।
एक तीसरी क्रान्ति इस समय आयी है जिस समय में हम और आप रह रहे हैं। रामायण की क्रान्ति एवं महाभारत की क्रान्ति आपने देखी नहीं है, केवल टी. वी. पर देखी है, सुनी है, तथा किताबों में पढ़ी है। परन्तु यह क्रान्ति रामायण एवं महाभारत से भी ज्यादा बड़ी है। आप चाहें तो इसे अपनी आँखों से भी देख सकते हैं।
बीसवीं सदी इसी परिवर्तन को लेकर आयी है। दो हजार वर्षों से हमारे देश में विदेशी शासन था। धर्म का कोई स्थान ऐसा नहीं बचा था जहाँ मंदिरों, तवद्या केन्द्रों को तोड़ा नहीं गया था। मुसलमान आये, अंग्रेजों से हम कैसे आजाद हो गये, यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। जिसका साम्राज्य सात समुद्रों तक फैला था, उसका शासन कैसे समाप्त हो गया था भारत कैसे स्वतंत्र हो गया? यह प्रश्न सोचने-विचारने योग्य है। इसके पीछे भगवान की शक्ति काम करती रही है। चाहे यह काम गाँधी ने किया हो या किसी और ने किया हो, परन्तु यह काम शक्ति का था व्यक्ति का नहीं। व्यक्ति की सामर्थ्य उतनी नहीं हो सकती है कि इतनी बड़ी ताकतवर सत्ता को उखाड़कर फेंक दे। इस सदी में यह एक बहुत बड़ी क्रान्ति आयी।
परतंत्रता की लम्बी अवधि में, विशेषकर इस सदी में भारतीय संस्कृति प्रायः मृतप्राय हो गयी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक दूसरी क्रान्ति-बौद्धिक, नैतिक एवं साँस्कृतिक क्रान्ति की हुई। भारतीय धर्म अध्यात्म का नया स्वरूप बतलाया गया। संस्कृति की जानकारी लोगों की मिली, लोगों ने प्रयास किया तो भारतीय संस्कृति का सार, वेदों का ज्ञान घर-घर जा पहुँचा। आपने सुना होगा कि अस्तेय नामक एक ऋषि थे, जो समुद्र के अत्याचार को देखकर समुद्र के सारे जल को पीने के लिए उद्यत हो गये थे। ठीक उसी प्रकार इस युग में भी एक साधनहीन व्यक्ति सारे वेदों का सार घर-घर पहुँचाने में समर्थ हो गया। आपको इन बातों पर विश्वास नहीं हो सकता कि इसने हमारी संस्था भी एक है, जिसको प्रारंभ हुए अभी केवल पचास वर्ष हुए हैं, इतने समय में क्या सभी काम पूरे हो गये? कदापि नहीं। अभी तो भारतीय संस्कृति की जानकारी केवल भारत के लोगों को मिली है, बाकी विदेश के लोगों को इसका ज्ञान भी नहीं है इसे उन तक पहुँचाने का कार्य शेष है, उसे भी पूरा करना है। राम-राज्य की स्थापना-सतयुग की स्थापना करना बाकी है। कुछ कठिनाइयों का निवारण तो हुआ है, किन्तु अभी ढेरों काम बाकी है, जिसे पूरा करना है
टाप जिस समय यहाँ बैठे तथा इस महापुरश्चरण में भाग ले रहे हैं, उसे युग संधि का समय, युग परिवर्तन का समय कह सकते हैं। इस-युग परिवर्तन के समय महाकाल का संदेश हर बसंत पंचमी पर आता रहा है। इस प्रकार हमारे जीवन में 65 बसंत पर्व क्रमशः आते चले गये और हर बसंत पंचमी पर एक कान का आदेश आता चला गया तथा वह पूरा होता चला गया। इस प्रकार 65 बसंत पंचमी में महत्वपूर्ण कार्य होते चले गये। अगर इसे हम देखें तो यह देश, समाज और संस्कृति के लिये उतनी ही बड़ी क्रान्ति हुई जितनी कि रावण काल में हुई थी, जिसे भगवान राम ने सम्पन्न किया था। अभी जितना काम हो गया है, उससे भी कहीं ज्यादा काम अभी बाकी हैं अभी युग संधि का बहुत बड़ा काम भगवान को, हमको और आपको मिलकर पूरा करना है। ये बारह वर्ष जो आज बसंत पंचमी से प्रारम्भ होते हैं, अगले दिनों सन् 2000 तक चलते रहेंगे। इसमें बहुत बड़े-बड़े काम होंगे, बड़े-बड़े परिवर्तन होंगे जो लोगों को बाद में दिखाई पड़ेंगे। राम को तथा बन्दरों को भी 12-14 वर्ष का वनवास हुआ था। आपको भी सन् 2000 तक यानी 12 वर्ष का वनवास होगा।
वनवास क्या होता है? वनवास वन होता है जिसमें व्यक्ति को मात्र अपना लक्ष्य याद रहता है और बाकी चीजें गौण हो जाती है। रामराज्य की स्थापना के समय भी हर व्यक्ति जो उसमें सहयोगी था, अपनी घरेलू समस्या को भूल गया था, राम, सीता और लक्ष्मण सब कामों को भूल गये थे और उस एक महत्वपूर्ण कार्य में लग गये थे। पाण्डव भी इसी प्रकार अपना व्यापार, काम-काज भूल गये थे और भगवान के कामों में लग गये थे। अतः हम सबको भी बारह वर्षों के लिए अपने अन्य तमाम कामों छोड़कर भगवान के काम में लग जाना है। इसके बाद क्या होना है? इसके बाद आप देखेंगे कि जिसे हम इक्कीसवीं सदी कहते हैं, उसमें विशाल भारत, जो महाभारत काल में बना था, उससे भी ज्यादा विशाल एवं विख्यात भारत बनकर सामने आयेगा। जिस प्रकार रावण के मरने के पश्चात् रामराज्य की स्थापना हुई थी, उसी प्रकार की कल्पना आप इक्कीसवीं सदी में कर सकते हैं। अगले दिनों इतिहास में एक बहुत बड़ा समय आने वाला है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। यह समय महत्वपूर्ण एवं अनोखा होगा। इस समय आपको क्या-क्या करने होंगे? कौन-कौन से काम करने होंगे? इक्कीसवीं सदी में क्या-क्या चीजें समाप्त होने जा रही हैं तथा क्या-क्या होना वाला है? इस पर एक पुस्तक लिखी जा रही है, जिसे आप देखकर सब बातें समझ सकते हैं।
मित्रों, यहाँ पर हम इक्कीसवीं सदी की बात न करके युग संधि पर विशेष चर्चा करेंगे। यह 12 वर्ष बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। जिस प्रकार लक्ष्मणजी ने 14 वर्ष ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए राम एवं सीता को सहयोग देकर पूरा-पूरा क्रान्ति में सहयोग दिया था, आपको भी लक्ष्मण की तरह होना चाहिए। बड़े काम के लिए बड़ी तैयारी करनी पड़ती है। शादी-ब्याह के समय, मकान बनाने के समय, किसी शत्रु देश से लड़ाई हो जाने पर बड़ी तैयारी करनी पड़ती है। उसी प्रकार इस समय आपको बड़ा काम करना है और इसके लिए आपको बड़ी तैयारी करनी चाहिए। क्या तैयारी करनी चाहिए? आपको मालूम होना चाहिए कि बड़ी शक्तियां, दैवी शक्तियां पर कार्य हेतु अपने ढंग से काम करेंगी, परंतु आपको भी गिलहरी, रीछ-बन्दर, ग्वाल-वालों की तरह अपने जिम्मे का काम करना होगा। आप छोटे हैं तो क्या हुआ? आपको अपने हिस्से का काम करना है।
क्या करना है? इस बार बारह वर्ष के लिए भगवान की यह प्रेरणा आई है कि इन बारह वर्षों में हम सबों को ज्यादा से ज्यादा समय लोकमंगल के लिए देना चाहिए। भगवान का कार्य करना चाहिए। अपना ज्यादा से ज्यादा श्रम, समय, अक्ल भगवान के कार्य में लगाना चाहिए, ताकि हम लोग अधिक से अधिक भगवान का कार्य कर सकें। अगर आप यह समय न भी लगाये तो भी यह कार्य महाकाल का है, जो पूरा होकर ही रहेगा, इसमें राई-रत्ती भर संदेह नहीं है। परन्तु एक बात यहाँ आपको बतला देना आवश्यक है कि आपको तो निमित्त मात्र बनना है। राम और कृष्ण में इतनी शक्ति थी कि वे सारा काम अकेले कर सकते थे, परन्तु उसमें उन्होंने छोटे-छोटे लोगों का सहयोग लिया था। इस कारण से वे लोग भी धन्य हो गये थे।
महाभारत में एक कथा आती है कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बार-बार कह रहे थे कि देख दुर्योधन को तथा विरोधियों को हमने पहले ही मार दिया है। हम तो तुम्हें केवल श्रेय देना चाहते हैं। उठ और युद्ध कर। उस पर भी अर्जुन नहीं उठे तो भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें परुँसक तक कह डाला और बोले अगर मुझे श्रेय नहीं लेना तो दूसरे ले लेंगे, परंतु तू मुझे यह बता कि युद्ध में छेय लेने में तुझे आपत्ति है?
मित्रों, ऐसे अवसर कभी-कभी ही आते हैं जब लोगों को श्रेय मिलता है। पिछले दिनों आजादी की लड़ाई के बाद जो भी काँग्रेस के टिकट पर चुनाव में खड़े हो गये, वे चाहे गरीब आदमी रहे हों या पिछड़े आदमी रहे हो, वे जीत गये और एम.एल. ए., एम. पी. बन गये, मिनिस्टर बन गये। उस समय काँग्रेस की धाक थी। भगवान की प्रेरणा तथा लोगों की श्रद्धा उसके साथ थी। उस समय आजादी की लड़ाई में जो भी लोग सम्मिलित हुए, वे लाभ में रहे हैं। एक बात हम आपको यह बतलाना चाहते हैं कि यह जो क्रान्ति होने वाली है, बीसवीं सदी का मापन होने वाला है, इक्कीसवीं सदी आने वाली है, उसमें भी कुछ भी इसी प्रकार का होने वाला है। इस क्रान्ति में यदि आप सम्मिलित रहे तो हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आप नफे में रहेंगे। आप श्रेय और यश के भागीदार होंगे। भगवान के काम में जो भी व्यक्ति हाथ बँटाता है, वह नफे में रहता है। हम भी तो नफे में रहे है, यह आप देख ही रहे हैं। हमने अपना शरीर भगवान के काम में लगाया तो हम कमजोर नहीं हुए। हमारा अस्सी वर्ष का शरीर अभी भी बारह घंटे काम करता रहता है। हमारा शरीर तथा मन अभी भी कमजोर नहीं हुआ है। अगर हमने अपना शरीर भगवान के काम में नहीं लगाया होता तो हम नहीं कर सकते कि हम जिन्दा रहते या नहीं। जब हम पीछे की ओर मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि हजारों लोग जो हमारी उम्र के थे वे मर गये। किसी को कैंसर हो गया, किसी को मधुमेह आदि की बीमारी हो गयी, पर हम पूर्ण स्वस्थ है।
साथियों हमने अपना शरीर भगवान के काम में लगाया और भगवान ने हमारे भीतर अपना शरीर लगा दिया। और क्या हुआ? हमने जो बोया वह हजार गुना हो गया। हमने बोया और काटा है। हमने अपना सारा का सारा जीवन भगवान के लिए लगा दिया है। जहाँ हमारा जन्म हुआ था, उस भूमि पर आज इंटर कालेज बना है। एक गायत्री कुँड बना हुआ है, जिसमें बारहों महीने पानी भरा रहता है। आँवलखेड़ा छोड़ने के बाद भगवान की कृपा से न जाने क्या-क्या होता चला गया। हमने चौबीस सौ गायत्री शक्तिपीठें बनायी है। इसमें कितनी लागत लगी है, इसका आप अनुमान कर लेवें। यह कहाँ से आ गया? हमने जो बोया है, उसे काटा है। धन के साथ में हमने अपनी अक्ल बुद्धि, चिन्तन, वाणी, लेखनी सभी कुछ केवल भगवान के लिए लगाया, तो आपने देखा न कि हमारी बुद्धि, लेखनी का कितना विकास हुआ। यह सारा भगवान को सौंपने के कारण हुआ है। हमने तो एक साधारण परिवार में जन्म लिया, परन्तु भगवान ने हमें न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। आज संसार भर में लोग हमें एक महापुरुष के रूप , एक महान व्यक्ति के रूप में जानते हैं। हमारे विचार अभी सात भाषाओं में प्रकाशित हो रहे हैं। पाँच लाख ग्राहक तथा पच्चीस लाख पाठक हमारी पत्रिका के हैं। अगर हम किसी स्कूल-कॉलेज में पढ़े होते तो किसी तरह से हमारी बुद्धि का विकास इतना संभव नहीं होता जो आज हो रहा है। यह सारा भगवान के लिए, समर्पित होने का लाभ है तथा समय की माँग के अनुसार कार्य करने का है
किन-किन ने समय को पहचाना और समय की माँग के अनुरूप अपने को समर्पित किया? हनुमानजी की मूर्तियाँ आपने देखी हैं। उन हनुमानजी ने समय को माँग को देखा तथा राम के कार्य लिए समर्पित हो गये। जामवंत ने कहा “रामकाज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भये पर्वताकारा।” इसका नतीजा यह हुआ कि हनुमानजी जो एक बन्दर थे और उन्होंने जब संकल्प कर लिया कि “रामकाज कीन्हें बिनुख् मोहि कहाँ विश्रज्ञम” तब वे भगवान हो गये। सारे जगहों में आज उन्हीं की पूजा होती है। उन्होंने सीता का पता लगाया, लंकादहन किया, समुद्र को लाँघ गये। पर्वत को उखाड़ जाये तथा संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी प्राण बचाये। यह सारे कठिन एवं असंभव कार्य वे कैसे कर पाये। यह सभी कार्य केवल भगवान को समर्पण करने के कारण ही वे कर पाये, अन्यथा किसी भी हालत में एड़ी-चोटी एक करने के बाद भी नहीं कर पाते। हमने अपनी सारी जिन्दगी में एक ही चीज ढूँढ़ी है कि जो व्यक्ति समय की माँग को समझता है तथा भगवान के कार्य में अपनी अक्ल, श्रम, समय, धन−संपदा लगा देता है, वह महान बन जाता है उसकी शक्ति बढ़ जाती है। जो समय के महत्व को समझता है, वह धन्य हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, “तू खड़ा हो जा।” तो वह खड़ा हो गया और निहाल हो गया। हनुमान को भगवान राम ने कहा था कि तू खड़ा हो गया और निहाल हो गया। हनुमान को भगवान राम ने कहा था कि तू खड़ा हो जा तो वे निहाल हो गये॥ हमारे गुरु ने हमसे कहा था कि तू खड़ा हो जा, तो उसने हमें निहाल कर दिया।
मित्रों, आज सन् 1989 के बसंत पंचमी के दिन आपके लिए भी ऐसा ही संदेश आया है कि आप भी खड़े हो जाइये। आप लोग यह नहीं सोचें कि हमारा पेट कैसे भरेगा? हमारी औलाद का क्या होगा? हम आपको पूर्ण विश्वास दिलाते हैं कि आपका पेट भी भरेगा तथा आपकी औलाद भी ठीक रहेगी। हमारा पेट भी भर रहा है तथा हमारी लाखों औलादें भी बड़े आनन्द में हैं और फल-फूल रही हैं। अगर इस बसंत पंचमी के दिन आप अपनी संकीर्णता को निकाल दें तथा भगवान के कार्य के लिए आगे आवें तो आप, हम और भगवान-तीनों धन्य हो सकते हैं।
हमने आपको भगवान के छोटे-छोटे काम सौंपे हैं। आप छोटे-छोटे संगठन बनायें। आप पाँच आदमियों का प्रज्ञामंडल बनायें। सत्संग, हवन प्रारंभ कर दें, ताकि आपके माध्यम से हमारी विचारधारा, युग परिवर्तन की विचार-धारा जो अगले समय में होने वाला है, आपके माध्यम से घर-घर पहुँच जाये। आप अपनी भूमिका अदा करें। आप अपना समय, साधन, श्रम एक अंश युग परिवर्तन के लिए निकालने का प्रयास करें। हम चाहते हैं कि आप प्रज्ञामंडल के माध्यम से युग परिवर्तन का संदेश पहुँचाने का प्रयास करें। हम चाहते हैं कि किसी जमाने में दुर्गाजी शक्ति संगठन के रूप में प्रकट हुई थी- आप भी उसी प्रकार की शक्ति अपने प्रज्ञामंडल द्वारा युग परिवर्तन के लिए इकट्ठा करें। आप भगवान के कार्य में सहयोग देने के लिए आगे आवें। इसके द्वारा ही यानी कि इस संगठन के द्वारा ही युग की समस्या का समाधान हो सकता है। अतः इस महान अवसर पर आपका आह्वान किया जा रहा है।
आज हमने 65 बसंत पूरे कर लिये। हमारी अखण्ड ज्योति की साधना अनवरत रूप से चल रही है। हमने हर बसंत पर्व पर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है तथा उसे पूरा किया है। इस बसंत पर भी हमने तीन कार्यों के लिए कदम बढ़ाया है। पहला प्रज्ञा-मंडल का गठन, दूसरा साप्ताहिक दीप यज्ञ-सत्संग की शृंखला प्रारम्भ करना। तीसरा है- बुराइयों का, दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन करना। इसके द्वारा ही हम इक्कीसवीं सदी- उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। युग संधि की वेला में बुराइयों का उन्मूलन अनिवार्य है, ताकि जो कुछ भी आपको खेत में बोना है, वह सुगमता के साथ फलता-फूलता है रहे और इक्कीसवीं सदी में नई फसल आवे। इक्कीसवीं सदी नये फल-फूलों से लदी हुई आवे। इसके लिए अब केवल बारह वर्ष रह गये हैं। आप लोग अधिक से अधिक अपना समय, श्रम, अकल, धन जब तक आप जिन्दा रहें, लगाते रहें। हम चाहते हैं कि आप इन चीजों को भगवान के खेत में बोयें एवं लाभ प्राप्त करें। जैसे कि लाभ और चमत्कार हमारी जिन्दगी में आये, आपके जीवन में भी वैसे ही लाभ और चमत्कार आयें।?
मित्रों, आपसे हमारा निवेदन है कि आप हमारे हाथ से हाथ, कन्धे से कन्धा, पैर-से-पैर मिलाकर चलें। जिस रास्ते पर हम चले हैं तथा लाभ प्राप्त किया है, उसे आप भी प्राप्त करें। यह इतना बड़ा व्यापार है जितना कभी भी इस संसार में नहीं हुआ। यह बारह वर्ष समर्पण करने, त्याग करने, बीज बोने के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि आप यह कर सके, तो हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि भावी पीढ़ियाँ श्रद्धावनत हो आपको याद करेंगी। इस बसंत पंचमी के पावन अवसर पर हमें आपसे जो करना था, हमने आपको बतला दिया। अब प्राप्त करेंगे। क्या करना है, आप सोचें व शीघ्र निर्णय लें। यह समय अब बार-बार आने वाला नहीं है। आशा है आप हमारी अंतः की हूक को पीड़ा को समझेंगे। हमारी बात समाप्त।
लन्दन की एक सभा में स्वामी विवेकानन्द भाषण कर रहे थे मानव धर्म की प्रतिष्ठा के लिए सच्चे ज्ञान-प्रसार की जरूरत है और इस महत् कार्य के लिए त्यागी, सेवाभावी आत्माएँ चाहिए। यदि मुझे ऐसी सात महान आत्माएँ मिल जाएँ तो संसार का काया-पलट हो सकता है।
सभा में बैठी मार्गेट नोबुल ने सभा समाप्त होने पर स्वामी जी से कहा-”मैं नहीं जानती कि आपको ऐसे छह व्यक्ति मिलेंगे या नहीं पर सातवें की पूर्ति करने के लिए मेरा जीवन समर्पित है।”
इसी मिस नोबुल ने भारत आकर घर-घर ज्ञान का प्रकाश फैलाया और सिस्टर निवेदिता के रूप में भारतवासियों से सच्चा प्यार पाया।
प्रश्न- “अखण्ड ज्योति” के शाँतिकुँज विशेषांक अगस्त 1996 में प्रकाशित लेख “क्या देखा-क्या पाया” पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें मात्र वरिष्ठ राजनेताओं -अभिनेताओं के ही विचार शामिल किए जाते हैं, वह भी सिर्फ प्रशंसाएं, उनके संकल्प मात्र ही। क्या ऐसा संभव नहीं कि आम जनता, टोली प्रचारक, शाखा केन्द्र के प्रतिनिधियों के विचार उसमें प्रकाशित हो सकें?
उत्तर:- शाँतिकुँज रूपी कल्पवृक्ष में, युगतीर्थ में अनेकानेक विशिष्ट, अति विशिष्ट व्यक्तित्व आते रहते हैं। ये सभी मंच से अपने क्षेत्र-विशेष से जुड़े विषयों पर उद्बोधन भी देते रहते हैं। इनमें कुछ राजनेता है, कुछ अधिकारीगण, कुछ समाजसेवी, पर्यावरणविद् एवं कुछ संतगण। सभी के मतों को जो विजिटर बुक्स में दिए गये हैं, सरसरी तौर पर छाँटकर कुछ को ही दिया गया है। अभिनेता मात्र एक हैं एवं एक ऐसे हैं जिनने रामायण सीरियल बनाकर अपनी पहचान संस्कृति क्षेत्र में करायी। संभवतः आपको इन दो पर एवं कुछ राजनेताओं के नामों पर ऐतराज हो। यह भी जान लेना चाहिए कि जो भी बहिरंग जीवन में जैसा भी है, वह शांतिकुंज नामक रूपी पारस का स्पर्श पाकर जो भी अभिव्यक्ति करता है, वह उसकी अकेले की नहीं, उन विचारों का है जो अभिव्यक्त किये गये हैं। आम परिजनों के विचार यदि नामों के साथ अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हों तो पूरी पत्रिका में मात्र यही होगा। जिसका नाम नहीं होगा, वह नाराज होगा, जिसका होगा उस पर कइयों को ऐतराज भी हो सकता है। “प्रज्ञा अभियान” पाक्षिक के माध्यम से सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन, विद्या-विस्तार से प्रकाशित करते हैं ताकि औरों को प्रेरणा मिले। यहाँ तो हमने मात्र एक अंक में कुछ अग्रणी व्यक्तियों की, जिनमें कुछ मुस्लिम परिजन भी हैं एवं महात्मा आनन्द स्वामी जैसे आर्यसमाज के महान संत भी, अभिव्यक्ति दी है, वह भी शाँतिकुँज के बारे में परिजनों के विचार, सम्मतियाँ सदैव आमंत्रित हैं परन्तु प्रकाशन हेतु नहीं।
प्रश्न:- मई 1996 में प्रकाशित “विगत डेढ़ माह की आपबीती, कुछ अनुभूतियाँ” लेख में लिखा था कि संपादक को अपने कई प्रश्नों का जवाब इस डेढ़ माह की अवधि में मिला। वादा भी किया गया था कि प्राप्त ज्ञान संपदा को समय-समय पर आपस में बाँटते रहेंगे। पीड़ा के क्षणों की अनुभूतियों से हम सभी अवगत हो, अपने भी कष्टों का समाधान खोजने की विधा विकसित करना चाहते हैं। (यह प्रश्न अगणित व्यक्तियों ने पत्र द्वारा पूछा है, जवाब यहाँ दिया जा रहा है)
उत्तर:- आपकी और अधिक जानने की जिज्ञासा स्वाभाविक है। जो भी कुछ उन दिनों व बाद की अवधि में समय-समय पर अनुभूति के स्तर पर उपलब्ध हुआ है, उसे लिपिबद्ध कर किसी व्यक्ति विशेष नहीं, किसी भी साधक की जो कि लोकसेवा के मार्ग पर चलते हुए शारीरिक-मानसिक कष्टों का सामना करता है, अनुभूतियों के रूप में, लेख रूप में प्रकाशित किया जाता रहेगा। इससे लोकसेवा के मार्ग पर प्रवृत्त होने वालों को विशिष्ट आत्मबल भी प्राप्त होगा। गुरुसत्ता के सतत् सान्निध्य की अनुभूति कैसे किसी व्यक्ति को अपनी पीड़ा को भी सृजनात्मक आधार दे सकती हैं, यह जानकार सभी परिजन लाभान्वित होंगे।
प्रश्न:- ग्रामीण परिवेश से संबंधित लेख अखण्ड ज्योति में अधिक आना चाहिए। यह जन-जन की पत्रिका है। क्या आप यह नहीं सोचते कि इसे सत्तर प्रतिशत ग्रामीण भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहिए?
उत्तर:-परमपूज्य गुरुदेव ने “अखण्ड ज्योति” को व्यक्ति निर्माण से समग्र समाज व विश्व निर्माण हेतु, “युग निर्माण योजना” मासिक को परिवार एवं समाज निर्माणपरक प्रमुखतम शिक्षण हेतु तथा “प्रज्ञा अभियान पाक्षिक” को कार्यकर्ता, मार्गदर्शिका व मिशन की प्रवृत्तियों से सभी को अवगत कराने का निमित्त बनाकर प्रकाशित करते रहने का निर्देश दिया था। इस कुछ समय पूर्व तक पालन किया जाता रहा है। किन्हीं कारणवश “युग निर्माण योजना” मासिक में वह पक्ष जो ग्रामीण परिवेश के नव-निर्माण, परिवार-समाज निर्माण संबंधी, बहुविधि गतिविधियों संबंधी साहित्य हम दे नहीं पाए। अब इसे “अखण्ड ज्योति” में ही समाहित कर इसी में समग्र चिन्तन देने का प्रयास विगत कुछ अंकों से कर रहे हैं। इसी तत्व-दर्शन का एक व्यावहारिक पक्ष “युग निर्माण योजना” पत्रिका में आता रहेगा। दोनों ही पत्रिकाओं के प्रधान लेखों को गुजराती युग शक्ति गायत्री, बंगाली, उड़िया व मराठी पत्रिकाओं में अनूदित कर प्रकाशित किया जाता रहा है।
प्रश्न:-क्या यह संभव नहीं कि अन्यान्य पत्रिकाओं की तरह “अखण्ड ज्योति” पत्रिका में भी शीर्षक या विषयवस्तु से जुड़े चित्र भी प्रत्येक लेख के साथ दिए जाएँ। इनसे एक नया आकर्षण तो आएगा ही, लोगों को अध्यात्म प्रधान विषय सरलता से समझ में आ सकेगा।
उत्तर:-बिल्कुल संभव है, किंतु वर्तमान बजट में नहीं। अभी पत्रिका “न नफा न नुकसान” नीति पर चल रही है, तब भी अनेकों प्रेमी परिजनों के नाम पड़ी उधार राशि और अधिक कष्ट दे जाती है फिर भी हम पूरी तरह निराश नहीं हैं। परिजन-पाठकगण अपनी ओर से चन्दा नियमित रूप से भेजते रहें तो हम एक शुरुआत तो कर ही सकते हैं। लाइन चित्रों के माध्यम से समझाने का हम प्रयास करेंगे कि लेख की विषयवस्तु क्या है।
प्रश्न:-रोचक कथानक या दृष्टान्त प्रधान पैनेल्स या बाक्स में दी गयी सूक्तियाँ अब पत्रिका में कम देखने में आती है। यदि इन की संख्या बढ़ायी जा सके तो बहुत से नये पाठक जो पहले इन्हीं को पढ़ते हैं, लाभान्वित हो सकते हैं।
उत्तर:- हमारा प्रयास है कि हम इनकी संख्या बढ़ायें। कभी-कभी लेखों की लम्बाई उन्हें स्थान नहीं लेने देती। चूँकि पत्रिका लिखी शांतिकुंज ब्रह्मवर्चस हरिद्वार में जाती है तथा छपाई मथुरा होती है, पेजमेकिंग प्रक्रिया व संपादन में एक “गैप” सी आ जाती है। उसे दूर करने का प्रयास अब उसी आकार में शाँतिकुँज के डी.टी.पी. विभाग में कम्पोज व पेजमेकिंग में कर यहीं से पैनेल्स लगाकर भेजने की व्यवस्था के रूप में किया जा रहा है। संभवतः उससे पत्रिका को और आकर्षक बनाया जा सकेगा। कार्यभार अत्यधिक होने के बावजूद भी यह अब संभव हो सकेगा क्योंकि कम्प्यूटर्स ने यह प्रक्रिया सरल कर दी है।
बसन्त का आगमन कर वर्ष होता है एवं हर बार वह ठिठुरन भी सर्दी से त्राण दिलाता हुआ एक गुनगुनी-सी गर्मी, जो उल्लास का प्रतीक है, के आगमन का निमित्त बन जाता है। बसन्त पर्व, बसंती रंग युगों-युगों से विवेक और बलिदान का प्रतीक बना प्रेरणा देता रहा है। शहीदों ने “बसन्ती चोला रंग डालो” “मेरा रंग दे बसन्ती चोला” एवं “संतों ने इसीलिए तो पहल लिया है यह केसरिया बाना-” इन माध्यमों से अपने अंतः के बलिदानी भाव की अभिव्यक्ति की है। “बसन्ती” शब्द में एक विलक्षण-सी मस्ती समायी पड़ी है। यह लौकिक भी है व अलौकिक भी, जिसकी रसानुभूति उन्हीं को हो पाती है, जो इसे सही अर्थों में समझ पाते हैं।
बसन्त पर्व गायत्री परिवार-युग निर्माण मिशन के प्रणेता-अधिष्ठाता परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का आध्यात्मिक जन्मदिवस होने के साथ-साथ तत्वबोध का पर्व भी है। मिशन हर वर्ष अपना वार्षिकोत्सव इन्हीं दिनों मनाता है। यह उनके अपनी दैवी पोक्ष मार्गदर्शक सत्ता जिसे उनने अपना मास्टर, अपना गुरु कहा, से साक्षात्कार का पुण्य दिवस भी है। इसी दिन महागुरु की प्रेरणा ने युवा शिष्य के अंतःकरण में प्रवेश कर उनके अस्तित्व के हर कण को अलौकिक बोध प्राप्त करा दिया। शिष्य के भावभरे समर्पण ने उसे अपने महागुरु के साथ एकाकार कर दिया। उनके व्यक्तित्व में एक विलक्षण आध्यात्मिक चेतना ज्योतिर्मान हो उठी। सहस्राब्दियों से अनीति-अज्ञान-अभाव के अंधकार से घिरे मानव समुदाय को संप्रदाय-जाति की क्षुद्र मान्यताओं से ऊपर उठाकर एक मानवधर्म व एक संस्कृति की ओर ले जाकर एक विराट विश्व ही नहीं, युग के नवनिर्माण का संकल्प इसी पावन दिन लिया गया था। इसी दिन आगे के वर्षों में वे सारे महत्वपूर्ण निर्धारण किए गए जिनने मिशन की आधारशिला रखी, मानव में देवत्व, धरती पर स्वर्ग का स्वप्न साकार किये जाने का एक ब्ल्यू प्रिन्ट तैयार किया।
प्रस्तुत बसन्त पर्व (11 फरवरी 1997) कुछ ऐसे क्षणों में आया है जब हम संक्रान्ति घड़ियों से गुजर रहे हैं। भारतवर्ष का भविष्य निश्चित ही स्वर्णिम सींवना लिए हमारे सामने खड़ा है किन्तु प्रसव काल की वेदना भरी घड़ियां भी इन्हीं कुछ वर्षों की अवधि में अनुभूत की जा सकेंगी। ऐसे में यह विराट गायत्री परिवार जो करोड़ों व्यक्तियों की प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है, प्रगतिशील धर्मतंत्र का पर्यायवाची है एवं सभी की आशा का केन्द्रबिन्दु है, एक ही आश्वासन अपनी गुरुसत्ता के उनके तत्वबोध दिवस पर दे सकता है कि यह 5-6 वर्षों की घड़ियाँ चैन से बैठने की नहीं, सक्रियता का परिमाण निरन्तर बढ़ा देने वाली होंगी। इन दिनों देवमानवों के रूप में वृक्षों की संपदा अपने पूर्ण यौवन पर हैं। बस वे फूलने-फलने की तैयारी में लगे हैं एवं सारी वसुधा को अपने आम्र बौरों की सृवास से महका देना चाहते हैं। अधिक से अधिक पूर्ण समयदानी इस अवधि में सक्रियता बढ़ाते हुए अपना बलिदानी संकल्प पूरा कर दिखाना चाहते हैं। यही अपेक्षित भी था, उन अंशावतारों से, मध्यावतारों से जो निष्कलंक प्रज्ञावतार की सत्ता का हाथ बँटाने विशेष रूप से इन दिनों धरती पर प्रकटे हैं, कैसी सौभाग्यशाली बेला है है?
प्रस्तुत वेला उल्लास की चहक व ज्ञान की महक से उमंगती उन क्षणों की है जो वर्ष में एक बार ही आती है। हम उनके मानसपुत्र उस उल्लास से अभिपूरित न हों, यह कैसे हो सकता है? हर परिजन स्थानीय स्तर पर ऐसी वेला में अपने घर या अपनी शाखा या अपने प्रज्ञामण्डल, स्वाध्याय-मण्डल में अथवा शक्तिपीठ पर सामूहिक अखण्ड जप में भागीदारी कर युगऋषि की चेतनसत्ता का एक अंश स्वयं में समाहित करने का भावभरा संकल्प लेता है। श्रेष्ठ साधक ही इस अवधि में उभरे उल्लास की सुनियोजित कर उन्हें त्याग-बलिदान, विद्या विस्तार की ओर मोड़ दे पाते हैं। साधनात्मक स्तर पर इसीलिए यह परिपाटी बनायी गयी है, कि सामूहिक अखण्ड जप का क्रम हर स्थान पर चले, चाहे उसमें सक्रिय परिजन एक घण्टा ही भागीदारी कर सकें, अवश्य करें।
यही पर्व मिशन का वार्षिकोत्सव पर्व भी है। माँ सरस्वती का जन्मदिवस होने के कारण सद्ज्ञान-विस्तार का पर्व भी है यह। ऐसे में सामूहिक आयोजन जिसमें पर्वों की प्रेरणा की पुण्य-प्रक्रिया द्वारा सभी तक युगऋषि का जीवन संदेश पहुँचाया जाता है, हर स्थान पर आयोजित होना चाहिए। यह लकीर पीटने की तरह न हो अपितु इसमें पूर्व की प्रगति समीक्षा एवं आगे के महत्वपूर्ण निर्धारणों की चर्चा हो। अब इक्कीसवीं सदी में मात्र गिने चुने चार वर्ष शेष रह गए हैं। कैसे हम आशावाद को जाग्रत-जीवन बनाए रख सकते हैं। एवं अपने क्रिया-कलापों को आदर्शवादी बनाकर “कालनेमि” की माया से नितान्त अप्रभावित रह युगचेतना का संचार कर सकते हैं, यह अपेक्षा सभी हमसे रख रहे हैं।
नवसृजन के भगवत् मुहूर्त की इस बेला में जब हम देव संस्कृति दिग्विजय के अनेकों सोपान पार कर आज एक समानांतर धर्मतंत्र की विराट शक्ति का स्वरूप सबके समक्ष रख पाने में समर्थ हो पाए हैं, तो उसके मूल में युगऋषि का, मातृसत्ता का तप है उनका पुण्य है एवं देह ब्रह्मणत्व है जिसकी सिद्धि आज चहुँओर देखी जा सकती है। हर बसंत पर्व इन सभी की स्मरण दिलाता हम सभी में नूतन शक्ति का प्राण संचार करता आता है।
यही संकेत देता है कि हम ऋषियुग्म के बताए राजमार्ग पर चलकर निश्चित ही उस लक्ष्य को पा लेंगे, जिसके लिए वे हमें संकल्प दिला गए है।
संस्कार महोत्सवों की अभिनव शृंखला सारे भारत में पड़ी है। सारे भारत भर से उनकी माँग है। सभी जिला स्तरीय नगर या कस्बे भी इनका आयोजन करने की क्षमता रखते हैं, अतः उत्साह उभरना स्वाभाविक भी है। इस वर्ष को पुनर्गठन वर्ष नाम दिए जाने के बाद सभी से यह कह दिया गया था कि अपना संपूर्ण उत्साह गाँव में गायत्री यज्ञ व घर-घर में गायत्री उपासना के शंखनाद के साथ संस्कार रूपी बीज के अंकुरित-पल्लवित होने योग्य पृष्ठभूमि बनाने के निमित्त नियोजित कर दें। बहुत कुछ स्थानों पर ऐसा हो भी रहा है। किंतु कही-कहीं बड़े आयोजनों का, विराट भव्य समारोहों का आग्रह उभरकर आ जाता है, बिना किसी प्रकार की तैयारी के। अभी तक जो संस्कार महोत्सव संपन्न हुए है, उनसे बड़ा ही विलक्षण वातावरण उन स्थानों पर बना है एवं गायत्री यज्ञ व एक प्रकार से देव संस्कृति के प्रति रुझान अत्यधिक परिणाम में बढ़ा है। ये संस्कार महोत्सव मूलतः उन स्थानों पर किये गये, जहाँ मिशन का आलोक इतनी तीव्र गति से नहीं पहुँच पाया था। उत्तर भारत , पश्चिमोत्तर , पूर्वोत्तर एवं दक्षिणी भारत के कई भागों से उत्साह उभर कर आया है एवं वहाँ उन्हें संपन्न किए जाने की प्रक्रिया जोर पकड़ रही है, तैयारियाँ चल रही है एवं इस वर्ष की शरद पूर्णिमा तक संभवतः बहुत बड़ा क्षेत्र इस प्रसार में लिया जा सकेगा । अब जो महत्वपूर्ण है, वह समझना है। जहाँ बड़े-बड़े महानगर है वहाँ मुम्बई में संपन्न ज्ञान या की तरह विराट ज्ञान यज्ञ प्रायः चौबीस स्थानों पर सम्पन्न किया जाना है जिनमें इलेक्ट्रानिक एक्जीबिशन , मल्टीमीडिया, डिस्पले, देवात्मा हिमालय का दिग्दर्शन एवं विराट दीप यज्ञ को ही प्रधानता दी जाएगी । यह योग निश्चित ही पाश्चात्य सभ्यता के भौतिक प्रभाव से वहाँ की युवा शक्ति व न्यायों को उबारने में समर्थ हो सकेगा। इसके अलावा अब अन्यान्य प्राप्तों में ग्राउण्ड वर्क, कर सक्रियता पूर्वक संस्कार महोत्सवों की पृष्ठभूमि बनाने वाले अधिकाधिक समयदानियों की आवश्यकता पड़ेगी। यह पूर्ति अपने भावनाशील परिजन ही करेंगे व इसी वसंत पर्व पर “अभी नहीं तो की नहीं” का संकल्प लेंगे।
यदि इस वर्ष हम ज्ञान यज्ञों, विज्ञान सम्मत प्रतिपादन वाली प्रदर्शनियों तथा संस्कार महोत्सवों को सुचारु रूप से संपादित कर सके तो विश्वास किया जाना चाहिए कि अगले वर्ष तक काफी कुछ वातावरण गायत्रीमय एवं यज्ञमय होता दीख पड़ने लगेगा। विराट भव्य आयोजनों में भारी शक्ति व्यय करने के स्थान पर प्रयोगों का यह क्रम चल पड़ा है जो अब सभी को हृदयंगम हो रहा है क्योंकि इससे ऊर्जा का समान वितरण होने में मदद मिलती है। एक चूक जो हम सबसे होती रहती है, वह है अति उत्साह में आकर समाज निर्माण के कार्यों में तत्पर हो जाना, पर अपनी साधनात्मक दिनचर्या या जीवन को गौण मान लेना साधनात्मक पराक्रम अपने स्थान पर जरूरी है एवं वही एक मात्र संबल है जो साधक को पथभ्रष्ट, अहंकारी, उन्मादी नहीं बनने देता न्यूनतम ही सही किसी न किसी रूप में दैनिक जीवन में साधना का समावेश अत्यंत जयरी है यदि यह क्रम चलता रहे तो हमारे आस-पास परमपूज्य गुरुदेव गुरुदेव के श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की एक टीम खड़ी होगी, न कि कुछ कच्ची बुद्धि के खुशामदी पसंद समर्थकगण , जो हमें अपना माध्यम बनाकर कुछ स्वार्थ पूर्ति करते हैं। विराट से विराटतम होते जा रहे संगठन के लिए यह समझना अत्यन्त जरूरी है।
हमारा सामूहिक स्वरूप उभरकर आए एवं वसंत पर्व से वासंती लहरे हमारी अंदर की ठण्डक को दूर कर उसमें कुछ गरमाई ला दे, यही हम सबकी इस वसंत पर्व पर प्रार्थना होनी चाहिएं हम कालनेमि के मायाजाल में न फँसने पाएँ, हमारा आत्मबल इतना बढ़ती जाए कि हम प्रभावित होने के स्थान पर औरों को प्रभावित कर इन्हें इस सशक्त आंदोलन में घसीटते चले , यही हमारा संकल्प इस पावन पर्व पर होना चाहिए। वासंती बयार बेअसर न होने पाए, उसकी यह संचार क्षमता समाप्त न होने पाए, यही हम सब की इस ईशसत्ता से प्रार्थना होनी चाहिए। जिस वासंती स्पर्श से भगतसिंह को मतवाला बनाकर फाँसी का फंदा चूमने की ओर प्रेरित किया था, क्या उसे पाकर भी हम एक कापुरुष की तरह सांस्कृतिक गुलामी भरी जिंदगी जीना चाहेंगे ? नहीं, हम सबका दृढ़मत से यह शिव-संकल्प इस पावन वेला में उभर कर आना चाहिए कि अब बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का एक-एक क्षण राष्ट्रभूमि की सेवा में नियोजित हो। मलीनता व प्रदूषणयुक्त वायु की तरह घोटालों- षड्यंत्रों -कानाफूसियों के झोंके हमें स्पर्श भी न करने पाएँ एवं हम एक साथ एक भी न करने पाएँ हम एक साथ एक स्वर से समूह गान करते हुए उस मातृसत्ता व गुरुसत्ता को एक आश्वासन दे सकें कि अभी भी इस धरती पर बसंती आत्माहुति देने वालों की संख्या कम नहीं हुई है। वह निरन्तर बढ़ती ही चली जाएगी, तब तक जब तक कि साँस्कृतिक क्रांति के माध्यम से यह राष्ट्र सारे विश्व का जगद्गुरु नहीं बन जाता है।
*अखण्ड-ज्योति मात्र एक पत्रिका नहीं, छपे कागज का पुलिन्दा नहीं, अपितु युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा की प्राणशक्ति का एक अंश है, जो आप तक प्रत्यक्ष मार्गदर्शक के रूप में पहुंचा है
*1937 से आरम्भ हुआ यह शक्ति का प्रवाह जो लेखनी संजीवनी के माध्यम से कुछ सौ व्यक्तियों से आरम्भ होकर अब प्रायः दस लाख व्यक्तियों तक पहुँचाता है, एक ऐसा अमृत है जिसका पान करके आप स्नेह सम्वेदना की गंगोत्री से सीधे जुड़ जाते हैं।
सामान्य व्यक्ति से लेकर साधना विज्ञान की गूढ़तम गहराइयों में जाने वाला व्यक्ति भी इसके माध्यम से व्यक्तित्व के परिष्कार, परिवारों में सुसंस्कारिता -सम्वर्धन एवं समाज के नवनिर्माण का व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त करता है।
पारस एवं कल्पवृक्ष की उपमा प्राप्त यह पत्रिका अनेकों व्यक्तियों के जीवन का कायाकल्प कर, उन्हें सही राह पर चलने का शिक्षण दे पाने में समर्थ हो पायी है, अनेकों को अपने वर्तमान व भविष्य सम्बन्धी परोक्ष संरक्षण उसके द्वारा प्राप्त हुआ है।
सरल , सुगम शैली में अध्यात्म के तत्वज्ञान को विज्ञान की , तर्क तथ्य प्रमाण की कसौटी पर कसते हुए हम पत्रिका ने नास्तिकवाद से जमकर मोर्चा लिया है एवं करोड़ों व्यक्तियों को आशावाद की संजीवनी का पान कराया हैं
जीवन जीने की कला का व्यवहारिक अध्यात्म के माध्यम से शिक्षा इस पत्रिका की विशेषता है सरल चुभने वाले दृष्टांतों एवं आदर्श वाक्यों से अनेकों व्यक्ति नित्य प्रेरणा लेते व उल्लास भरे जीवन का शिक्षण प्राप्त करते हैं।
नरपशु से देवमानव बनने की विधा को कैसे जीवन का अंग बनाया जाय , यह इस पत्रिका की मूल धुरी है। गायत्री महाविद्या ओर या ऊर्जा का तत्वज्ञान सद्ज्ञान व सत्कर्म के रूप में उतारने का शिक्षण इस पत्रिका की एक अनूठी विशेषता है।
क्या सद्गृहस्थ रहकर भी जीवन-साधना करते हुए ऋद्धि सिद्धियों का भाण्डागार हस्तगत किया जा सकता है। हाँ, यह पत्रिका अपने लेखों द्वारा यही मार्गदर्शन देती है।
किसी साहित्य की, कथोपकथन की शैली को सरस-रोचक बनाते हुए आदर्शवादी सिद्धान्तों को जीवन में उतारा जाना कैसे सम्भव है, यह शिक्षण आप इस पत्रिका द्वारा प्राप्त करते हैं।
संयमशीलता को उभारकर मनोबल की शक्ति से कैसे प्रतिकूलताओं में बदला जाय, इसका एक समर्थ साकार रूप इस प्राणऊर्जा के प्रवाह में परिलक्षित होता है।
बिना किसी विज्ञापन के, बिना किसी एजेण्ट के “न लाभ न नुकसान” की नीति पर चलते हुए आदर्शों का प्रतिपादन करने वाली एक आध्यात्मिक पत्रिका कैसे सफलतापूर्वक इतनी लम्बी यात्रा पार कर सकती है, इसका एक प्रत्यक्ष जीवन्त उदाहरण अखण्ड-ज्योति है।
आज यह पत्रिका अपने 6 लाख ग्राहकों एवं सहयोगी पत्रिकाओं सहित 10 लाख पाठकों के माध्यम से पचास लाख से अधिक नर-नारियों का मार्गदर्शन कर रही है।
यदि आप अभी तक उसके सदस्य नहीं है, जो आज ही बन जाइये। यदि आप पूर्व सदस्य रहे है, तो देव संस्कृति दिग्विजय अभियान को गतिशील बनाने के लिए न्यूनतम नये पाँच व्यक्तियों को उस पुण्य प्रक्रिया के साथ जोड़कर श्रेय के भागी बनिए।
आवश्यक सूचना
भरपूर प्रयास करने पर भी डाकघर सम्बन्धी समस्याओं का निदान न हो पाने के कारण अखण्ड-ज्योति पहुँचने में अप्रत्याशित विलंब हो रहा है। अतः अखण्ड-ज्योति न पहुँचने की शिकायत प्रत्येक माह की 30 तारीख के बाद ही करनी चाहिए।
हर वसंत ने लिस जीवन के, नये-नये शृंगार किये। उसके वासंती-जीवन ने ‘वासंती-उपहार’ दिये॥
उसके जीवन में वसंत की परिभाषा साकार हुई। उसकी’जीवन को जीने की कला’ वसंत-बहार हुई ॥
उसने वासंती-चिंतन को भी, अनुपम आकार दिये। उसके वासंती-जीवन ने, ‘वासंती-उपहार’ दिये॥1॥
मानवीय चिंतन, चरित्र के उपवन में पतझर देखा। भावों के बिरवे मुरझाये देख, खिंची चिंता-रेखा॥
स्नेह और संवेदन रस से, सूखे बिरवे सींच ये। उनके वासंती-जीवन ने, ‘वासंती-उपहार’ दिये ॥2॥
जीवन भर ही वासंती-बलिदानों का बाना पहिना। वासंती-व्यक्तित्व निखारा, पहिन तितीक्षा का गहना॥
जन-जन को मुस्कानें बाँटीं, खुद पीड़ा के घूँट पिये। उनके वासंती-जीवन ने, ‘वासंती -उपहार’ दिये ॥3॥
‘गायत्री-परिवार’ बनाया अपने प्राण पिला कर के। पाला-पोषा बड़े प्यार से माँ ने स्नेह लुटा कर के ॥
माँ की छाती, हृदय पिता का, थे कितने अरमान लिये। उनके वासंती-जीवन ने, ‘वासंती-उपहार ‘ दिये ॥4॥
बार-बार आत्मचिंतन को, पर्व-वासंती आता है। बलिदानी-जीवनी से जोड़ा, किसने ? कितना ? नाता है॥
या उनके प्राणों को पीकर, उन प्राणों को त्रास दिये। जिनके वासंती-जीवन ने ‘वासंती-उपहार’ दिये ॥5॥
उनके अरमानों की बगिया, कहीं न हम ही मुरझा दें। अहंकार की, राग-,द्वेष की लपटे, उसे न झुलसा दें॥
हर वसंत ने चेताने को, हमें यही निर्देश दिये। उनके वासंती-जीवन ने, ‘वासंती-उपहार- दिये॥6॥
उनके जन्मदिवस पर, अपने मन को संकल्पित कर दें। अहंकार का शीश काटकर, चरणों में अर्पित कर दें॥
ताकि उन्हें विश्वास हो सके, उनके ही अनुरूप जिये। जिनके वासंती-जीवन ने ‘वासंती-उपहार’ दिये ॥7॥
-मंगल विजय ‘विजय वर्गीय’
*समाप्त*