उथली और मजबूत किनारों से रहित नदियां तनिक-सौ वर्ष होने पर सब ओर बिखर पड़ती है और बाढ़ का रूप धारण कर पास-पड़ौस के खेतों, गाँवों को नष्ट-भ्रष्ट कर देती हैं। इसके विपरीत वे नदियाँ भी हैं, जिनमें प्रचंड वेगयुक्त जलधारा बहती है किन्तु उफनने की दुर्घटना उत्पन्न नहीं होती। कारण कि वे गहरी होती हैं और उनके किनारे मजबूत व सुदृढ़ होते हैं।
तनिक-से आकर्षण और भय का अवसर आते ही मनुष्य अपने चरित्र और ईमान को खो बैठता है। थोड़ी-सी प्रतिकूलता, तनिक-सी विरोधी परिस्थितियाँ उसे सहन नहीं होतीं और आवेशग्रस्त स्थिति उत्पन्न कर देती है।इसका कारण व्यक्ति का आंतरिक उथलापन हैं। व्रतशील जीवन की कमी है। ऐसे लोग तभी तक अच्छे लग सकते हैं, जब तक कि परीक्षा का अवसर नहीं आता। जैसे ही परीक्षा की घड़ी आयी, वैसे ही वे मर्यादाओं को तोड़-फोड़ कर उथले नालों की तरह बिखरते हैं और अपने पड़ौस, समाज व पूरी मनुष्यता के लिए बाढ़ का संकट उत्पन्न करते हैं।
मजबूत किनारों का तात्पर्य है-व्रतशील जीवन। व्रत आदर्शों के प्रति विश्वास है, निष्ठा है। व्रत के द्वारा मनुष्य लक्ष्य तक पहुँचने हेतु आत्मशक्ति सँजोने-अर्जित करने का प्रयत्न करता है। विश्वास जितना सशक्त होता है, निष्ठा जितनी अविचल होती , संकल्प जितना सुदृढ़ होता है व्यक्ति उतनी ही सुगमता से तथा सफलता से जीवन की पूर्णता प्राप्त करता है।, शक्ति, शक्ति है। इसका समुचित उपयोग तभी सम्भव है, जबकि यह एकत्रित हो और समुचित दिशा की ओर केन्द्रित हो। व्रत से यही असाधारण कार्य सम्पन्न होता है। इससे मानवीय जीवन की खोती-बिखरती शक्तियाँ एकत्रित-एकाग्र होकर जीवन-लक्ष्य की दिशा में प्रवाहित होने लगती है।
हर दिन व्रत है, दिन का हर पल व्रत है। सुख-समृद्धि, सन्तान-स्वास्थ्य आकाँक्षा में किया जाने वाला प्रयत्न भी व्रत है, तो सिद्ध-बुद्ध मुक्त अवस्था प्राप्त करने हेतु साधुता का साधते रहना भी व्रत है। खाना भी व्रत है, नहीं खाना भी व्रत है। जीवन संग्राम में जूझना भी व्रत है।, मौन-ध्यानी बनकर एकासन पर बैठे रहना भी व्रत है। जीवन का हर कर्म, जीवन का हर प्रयत्न व्रत हो सकता है, यदि उसमें ईश्वर से एकात्मता की आकाँक्षा और आत्मा की जागरुकता निहित हो। आत्मा-बल को जगाने-साधने का प्रयत्न ही व्रत है। व्रत में आत्मा, परमात्मा ही ओर उन्मुख होती है, यानि जीवन की परमात्मान्मुखता ही व्रत है।
व्रत के हजारों-हजारों नाम हैं। सातों वारों के व्रत हैं। पन्द्रहों तिथियों के व्रत हैं। बारह मासों के व्रत हैं। विभिन्न धर्म एवं सम्प्रदाय अपने देश, काल एवं परिस्थिति के अनुरूप इनका औचित्य समझाते हैं। परन्तु ये सभी जहाँ एकत्रित रूप से सम्मिलित हो ऊर्ध्वगामी प्रेरणाएं स्वतः उमँगने लगती हैं। जीवन की हर श्वास में परमात्मा की सुवास भर जाती है। इस व्रत सिद्धि के चमत्कार इतने हैं कि जिन्दगी का हर क्षण आश्चर्यजनक सफलता एवं आत्मिक प्रगति से भरापूरा लगने लगता है। इसको जिन्होंने अपनाया है- केवल उन्हीं के लिए सम्भव है कि महामानवों के लिए शोभनीय मार्ग पर अनवरत रूप से बढ़ सकें। व्रतशील जीवन का सार मर्म है- जीवनलक्ष्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट साधन एवं साहस का सुसंचय।
दोषों को खोजना, दुर्गुणों को देखना, उनका विरोध करना अच्छा काम है, लेकिन तब जब यह काम अपने से शुरू किया जाय। हम खुद की बुराइयों की ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकते हैं। दूसरों के बारे में पता लगाना काफी मुश्किल काम हैं उनके बारे में तो उतना ही पता चल सकता है जितना बाहर से दिखाई-सुनाई पड़ता है। प्रायः हर किसी के जीवन में लुका-छिपी का खेल चलता रहता है। जो दिखाई-सुनाई पड़ता है वह होता नहीं और जो असलियत होती है उसे देख-सुन समझ पाना मुश्किल है। यह सर्वमान्य तथ्य हमारे अपने जीवन में भी लागू होता है। जब हमारी अपनी असलियत को दूसरे नहीं जान पाते, तब हम भला औरों की सच्चाई कैसे जान सकते हैं। इसलिए दोषों की निन्दा और उनके उन्मूलन की कोशिश हमें खुद अपने आप से शुरू करनी चाहिए। दूसरों की बुराइयाँ हम जान भी जाएँ तो भी क्या फायदा? उन पर हमारा कोई दबाव तो है नहीं। वे हमारी बात मान ही लें, यह कोई आवश्यक नहीं। सबसे ज्यादा हमारा दबाव-प्रभाव अपने ऊपर ही है। इसलिए यदि सुधारने के काम की शुरुआत करनी हो तो इसे अपने आप से ही आरम्भ किया जाना चाहिए।
ऐसी शुरुआत बड़े हिम्मत का काम है। दूसरा कोई हमारी कमियाँ गिनाये भी और वे सच्ची भी हों, तो अपना अहंकार उसे मानने नहीं देगा। लेकिन जब हम अपना विश्लेषण स्वयं करते हैं, दोष-दुर्बलताओं का स्वयं खींचते हैं, तो बेचारे अहं की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। उसे सच्चाई स्वीकार करते ही बनता है। इस स्वीकृति के बाद अनुभव होता है कि जिसे दुर्गुणों से छुड़ाने और पापों से बचाने की जरूरत है - वह प्रथम व्यक्ति और कोई नहीं हम स्वयं है। अपनी कुरूपता स्वीकार करने में जिसे डर नहीं और उसमें उसके निवारण की हिम्मत है, वह किसी बड़-से-बड़े शूरवीर से कम नहीं।
सच तो यह है कि हम बाहर से अपने को कितना ही बड़ा बहादुर क्यों न मानें, पर शायद ही हमको अपने से बड़ा कोई दूसरा कायर मिले। इसी कायरता के कारण अपने दोषों-दुर्गुणों को छिपाने में अपना सारा मनोबल लगा देते हैं। इसका आधा भी यदि इनके निवारण में लगा दें, तो बड़ी सरलतापूर्वक निर्मल और निष्पाप हो जाएँ जो हमारे अन्दर की असंख्य सोई पड़ी गुप्त शक्तियों के जागरण में बाधक हैं। महापुरुषों का जीवन बुराइयों को देखना और उनका निवारण करना सीखा है। यदि हमें भी महानता की चाह है तो रास्ता वहीं है जिस पर सारे महापुरुष चले हैं। दूसरों को तुच्छ समझने और उनका छिद्रान्वेषण करने से भला क्या हासिल होगा? बल्कि ऐसा करके हम अपना मनुष्यत्व भी खो बैठेंगे।
जो इस काम में हमारे सहयोगी बन सकें, वही हमारे सच्चे मित्र हैं। उन्हें ही अपने मित्रों में सम्मिलित करना चाहिए जो हमारा दोष दर्शा सकें और कुमार्ग से हटाने का साहस उत्पन्न करें। आमतौर पर होता यही है कि चापलूसी भाती है और दोषों की चर्चा करने वाला शत्रु लगता है। हम चोरी का धन्धा करते हों और कोई चोर क दें, बेईमानी करते हों और कोई बेईमानी कह दे तो बहुत बुरा लगता है और इससे लड़ने-मरने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसे अपनी कायरता ही कहना चाहिए कि वस्तुस्थिति को बताने वाले दर्पण में अपनी कुरूपता देखना हमें सहन नहीं होता और अपने अपराध का दण्ड उस दर्पण को तोड़ने के रूप में देना चाहते हैं। कई बार ऐसे तर्क प्रस्तुत करके हम अपना बचाव करते हैं कि हमीं अकेले तो नहीं हैं, दुनिया में और तो बहुत लोग कर रहे हैं, उन्हें क्यों नहीं लोग रोकते?
अपनी दुर्बलताओं के इसी बचाव के कारण हम और हमारा व्यक्तित्व सारी जिन्दगी अविकसित ही बने रहते हैं। वे जाने कौन-सी दुष्प्रवृत्ति हमारे न जाने किस प्रतिभा के अंकुर हो दबाए बैठी है, उसके पुष्पित-पल्लवित होने में अवरोध पैदा कर रही है। जरूरत सिर्फ उन अवरोधों को जानने और हटाने की है, जो हमारे अन्दर दोषों-दुर्गुणों के रूप में पल रहे हैं।
अच्छा यही है कि हम अपने दोषों की समीक्षा के लिए आज और अभी आगे बढ़ चलें। ताकि अपने व्यक्तित्व के विकास में रुकावट डालने वाले सारे अवरोध भी हट जाएँ और किसी दूसरे को अपने लिए निन्दा करने का दोष भी न सहना पड़े। फिर चर्चा या निन्दा उतनी आवश्यक भी नहीं है जितना कि अपने सुधार के लिए किया गया प्रयत्न। कोई हमारी निन्दा करे और हम किसी की निन्दा करें, इससे समस्या का समाधान नहीं हो जायेगा। बुराइयों का अन्त करने के लिए सिर्फ चीख-पुकार या नारे-बाजी पर्याप्त नहीं। उसके लिए तो ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इसमें सबसे पहला और सबसे प्रभावशाली कदम यह हो सकता है कि हम अपने दोषों को साहसपूर्वक स्वीकार करें। यह स्वीकारोक्ति हर किसी के सामने की जाय यह जरूरी नहीं। परन्तु हमें अपनी बुराइयों को स्वयं अपने सामने मानने में, आत्मीय गुरुजनों के समक्ष स्वीकारने और परमेश्वर की समर्थ सत्ता की साक्षी में कहने में तनिक-सी भी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। हम यदि ऐसा कर सकें तो हमारी आत्मा, गुरुजनों का आशीष और भगवान का अनुग्रह हमारे अपने अन्दर अपूर्व साहस को जन्म देना। ऐसा साहस, जिसके बलबूते अपनी दुर्बलताओं को उखाड़ फेंकने के लिए वह पराक्रम-पुरुषार्थ दिखा सकेंगे जो सच्चे और बहादुर योद्धा ही दिखाया करते हैं। अपने आप से लड़ना और अपने आप को शुद्ध बना लेना बाहर की दुनिया को निर्मल-निष्पाप बना सकते की सबसे बड़ी योग्यता और वीरता की सबसे बड़ी निशानी है।
निर्मल-निष्पाप हृदय में ईश्वरीय विभूतियाँ पुष्पित-पल्लवित होती हैं। ऐसे ही व्यक्ति अपनी निष्कलुष भावनाओं से परमात्म-सत्ता से एकाकार होते हैं। महापुरुषों का जीवन इस बात का साक्षी है कि वे पर दोष-दर्शन के स्थान पर सतत् आत्मनिरीक्षण करते रहें। अच्छा यही है अपनी त्रुटियाँ खोजें और उन्हें दूर करें। यही अपनी शक्तियों को पहचानने और उन्हें विकसित करने का राजमार्ग है।
अरुणोदय की पहली किरणें पर्वत शिखरों पर पड़ती हैं। धरती की सतह पर तो प्रकाश काफी देर बाद उतरता है। संसार में होने वाले घटनाचक्रों का ताना-बाना भी पहले चेतना के किन्हीं उच्च लोकों में बुना जाता है। उनकी परिणति तो काफी समय बाद हम सभी को ऐतिहासिक परिवर्तन के विस्मयकारी तथ्यों के रूप में देखने को मिलती है। जो अपनी चेतना के शिखरों पर आसीन हैं, ऐसे दिव्यदृष्टा मनीषी भविष्य के गर्भ में पके इन घटनाक्रमों को अपनी दिव्य क्षमताओं से भली प्रकार देख-जान लेते हैं और उन्हें जन-सामान्य के हित में प्रस्तुत भी कर देते हैं, ताकि व्यक्ति और समाज स्वयं को भविष्य के अनुरूप सँवार सकें, अपने में अपेक्षित फेर-बदल कर सकें। उनका यह कार्य मौसम के गतिचक्र को समझने वाले विज्ञानवेत्ताओं की तरह है, जो अपने ज्ञान से जन सामान्य को भूकम्प, सूखा, बाढ़ आदि के प्राकृतिक उपद्रवों से सावधान करते हैं और उन्हें खतरे की पूर्व सूचना देकर भारी हानि से बचा लेते हैं।
भविष्य-कथन आश्चर्यजनक होते हुए भी वैज्ञानिक सत्य है। जो मौसम के गतिचक्र को जानते हैं वे दिसम्बर-जनवरी की ठिठुरन भी सर्दी में भी पसीने और उमस भी गर्मी की सटीक भविष्यवाणी कर देते हैं। ठीक इसी तरह जिन्हें कालचक्र की गति का ज्ञान है उनके भविष्य-कथन समय अपने पर पूरी तरह सच और खरे साबित होते हैं। 471 वर्ष ईसा पूर्व में विख्यात चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा था - “सबको बनाने वाला इतना दयालु है कि वह अच्छे-बुरे प्रतीकों से भविष्य की जानकारी हमें देता है। बुद्धिमान वे होते हैं जो इस ज्ञान से लाभ उठाकर कर्म करते हैं।” नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ.0 अलैक्सिस कैरेल तो भविष्य-ज्ञान की वैज्ञानिकता के संदर्भ में एकदम विश्वस्त थे। उनके अनुसार, मौसम विषयक वैज्ञानिक भविष्य-कथन तो अभी हमें अनदेखे समय की जानकारी कराने वाले विज्ञान का बचकाना-सा ज्ञान है और हम उसे ही सब कुछ माने हुए हैं। वह दिन भी दूर नहीं, जब भविष्य को जानकर उसमें सुधार भी किए जा सकेंगे।
जो भविष्य-कथन और भविष्यवाणियों की आलोचना करते हैं, वे भी आँशिक रूप से सही हैं। क्योंकि उन्हें इसकी वैज्ञानिकता से वास्ता नहीं पड़ा। वे मान लेते हैं कि भविष्य-दर्शन महज तुक्के है तीर नहीं। जबकि विज्ञान मानता है कि त्रिआयामी प्रतीत होने वाले संसार के उनके अज्ञात आयाम और हैं। उसमें चौथे आयाम के रूप में समय को स्वीकार भी कर लिया है। भविष्य को इसी के अंतर्गत मान्यता मिली है। वैज्ञानिकों का मानना है, तो जब ज्ञात समय का आयाम है, तो जिस अज्ञान समय के गर्भ से यह समय आता है, उनका भी वजूद जरूर होगा। हजारों वैज्ञानिक टाइम मशीन की सम्भावना पर कार्य कर रहे हैं, जिसकी मदद से भूत या भविष्य के दौर में यात्रा की जा सकेगी।
वैज्ञानिक इसके माध्यम से समय की उन्हीं गहरी परतों को कुरेदने की कल्पना कर रहे हैं, जिन्हें कोई साधनात्मक ऊर्जा से सम्पन्न व्यक्तित्व सहज की अपने मन में प्रतिबिम्बित कर लेता है। ऐसे प्रयास हमेशा से होते रहे हैं, भले ही उनका यन्त्रीकरण न किया जा सका हो। विख्यात खगोलशास्त्री डेविडसन ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट पिरामिड इट्स डिवाइन मैसेज’ में मिश्र के कतिपय उन भविष्यवेत्ताओं के भविष्य-कथनों को संकलित किया है, जो उन्होंने पिरामिडों में अंकित किए। ये अंकन प्रतीकों के रूप में हैं। डेविडसन का अपनी पुस्तक में मानना है कि इन पिरामिडों पर पृथ्वी के जन्मकाल से लेकर प्रलय तक की घटनाएँ अंकित हैं। भविष्यवाणियों के अनेक विषय हैं, जैसे विभिन्न सम्राटों, देशों तथा जातियों का भविष्य, प्रमुख क्रान्तियों तथा सामाजिक परिवर्तनों से सम्बन्धित भविष्यवाणियाँ और मानवता का भविष्य।
पिरामिड गणनाओं के अनुसार 1924 ई॰ के बाद से सही निकली भविष्यवाणियों की संख्या 63 है। इनमें से प्रमुख हैं - 1929 में विश्वव्यापी मन्दी का दौर, 1933 में हिटलर का जर्मनी पर कब्जा, 1939 में दूसरे विश्वयुद्ध का आरम्भ, 1945 में इस विश्वयुद्ध का अन्त, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी का बँटवारा, 1947 में भारत को स्वतन्त्रता और उसके साथ ही विभाजन, 1964 में इजराइल की स्थापना, 1960 में अफ्रीका के 16 देशों की स्वतन्त्रता, 1964 में अमेरिका-वियतनाम युद्ध और भारत-पाकिस्तान जंग, 1969 में चाँद पर मनुष्य का पहुँचना, 1971 में भारत में पृथक हुए पाकिस्तान का विभाजन तथा एक नये देश का जन्म, 1975 में सउदी अरब के शाह फैजल की हत्या, 1976 में विश्वव्यापी भूकम्पों से भारी जन हानि, 1977 में मिश्र के विश्व अरब देशों का गठबन्धन, 1979 में शाह इरान सत्ता च्युत तथा अयातुल्लाह खोमैनी का सत्तारूढ़ होना, 1980 में ईराक-ईरान के बीच युद्ध शुरू, तेल राष्ट्रों की उन्नति, विभिन्न देशों में राष्ट्र नेताओं की हत्याएँ, व्यापक जातीय संघर्ष और अकाल का दौर।
1924 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में डेविडसन ने पिरामिडों की भविष्य वाणियों के आधार पर निष्कर्ष में लिखा था कि एक ऐसा दौर आएगा, जब दुनिया में तेज रफ्तारी, सुविधाओं तथा आराम के अनोखे साधनों में अपनी नैतिकता तथा सामाजिक जिम्मेदारियाँ भुलाकर आपाधापी में लगे लोगों का बोलबाला होगा। तब विनाशक युद्ध की सम्भावनाएँ बढ़ेंगी, जिसमें विश्व के सभी देशों की अकल्पनीय बर्बादी और तबाही होगी। प्राकृतिक आपदाएँ कहर बरसाएँगी। मौसम आश्चर्यजनक ढंग से बदल जाएगा। यह व्यापक उथल-पुथल सन् 2000 तक चलती रहेगी। इसके बाद नए मानव धर्म का उदय होगा। यह आध्यात्मिक युग होगा। इस दौरे का रहनुमा एक संत पुरुष होगा। पूरी मानव जाति लम्बे समय तक सुख भोगेगी।
भविष्य-कथन को वैज्ञानिक आधार देने वालों में पाँवेल और उनकी पत्नी तमारा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 40 वर्षीय पाल्यीच पाँवेल रूसी जैव ब्रह्माण्ड आयोग के अध्यक्ष हैं और तमारा उनसे चार साल छोटी उन्हीं की प्रशासनिक सहायक है। ये दोनों दो बाद भारत आ चुके हैं। इन्होंने अपने अनेक प्रयोगों के द्वारा जाँचा-परखा और खरा प्रमाणित किया है। रोमिनिया की क्रान्ति, नेल्सन मंडेला की वापसी, सोवियत संघ का नया रूप होने सम्बन्धी इनकी भविष्यवाणियों ने विश्व के विचारशीलों को भविष्य-विज्ञान नए सिरे से सोचने के लिए विवश किया।
समूचे विश्व के घटनाक्रमों को अपनी भविष्य की तीसरी आँख से देखने वाले पाँवेल का मानना है, इस समय पृथ्वी की मीन दशा चल रही है और 2001 से से लेकर 2003 तक क्रमशः समाप्त होती चली जाएगी। कुम्भ दशा आने वाली है। कुम्भ शुभ व अशुभ का ध्रुवीकरण करता है। उनको अलग-अलग करता है। पाँवेल के अनुसार, इस दौरान अचानक और व्यापक बदलाव होंगे। मानव राज्य, राजनीति और दबावों से मुक्त होने लगेगा। राज्य का एक नया स्वरूप उभरेगा। पूरे संसार में में मान जाति की एकता की हवा चलेगी। मैत्री, कल्याण भावना, असत्य और बुराई का खात्मा और सत्य का बोलबाला-इस मानव एकता के मूल आधार होंगे। परन्तु इससे पहले संघर्ष और संकट आयेगा। उससे सारा विश्व निखरेगा। अन्तिम परिणाम के रूप में हर व्यक्ति, मानव समाज,राजनीतिक दलों, राज्यों व मानवों के आपसी सम्बन्धों में भी परिवर्तन होगा। मानवता अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचेगी।
भारतवर्ष की प्राचीन ऋषिगणों ने भविष्य-विज्ञान सम्बन्धी जो अन्वेषण-अनुसन्धान किए हैं, हालाँकि इसके प्रभाव और तकनीक को स्पष्टता से जानने वाले कम ही हैं, फिर भी इसकी महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता। भृगुसंहिता की सभी भविष्यवाणियाँ महर्षि भृगु तथा उनके बेटे आचार्य शुक्र के बीच बातचीत के रूप में हैं। जैसे श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के संवाद। हर भविष्यवाणी आचार्य शुक्र के इस सवाल के जवाब देती है।- वद् नाथ दयासिन्घो देशस्य लग्न शुभाशुभम् । येन विज्ञात मात्रेण त्रिकालज्ञो भविष्यति॥ भृगुसंहिता के विशेषज्ञों के विवरण के अनुसार मेष राशि में शनि तथा बृहस्पति की युति पूरे विश्व इतिहास पर प्रभाव डालती है। यह ग्रह दशा 28 मई सन् 2000 को पड़ेगी। इसी के बाद भारत अधिक ताकतवर होता जाएगा और विश्व के इतिहास को अपने प्रभाव से कुछ नया देने में समर्थ होगा। भारत की कुण्डली में छठा स्थान गुप्त शक्तियों का है। इसी से पुनरुत्थान, नए फैसले तथा बदलाव होते हैं। आगामी कुछ वर्षों में ही देश का प्रशासन भी आमूल-चूल रूप से क्रान्तिकारी बदलाव को लाएगा। पूरा देश किसी एक मिशन को लेकर काम करेगा। प्राचीन भारतीय चिन्तन को बढ़ावा मिलेगा।
अपनी चेतना के किसी उन्नत शिखर पर बैठकर भविष्य की स्पष्ट झाँकी निहारने वाले ऋषि हैं- मुनिवर याधव। याधव मुनिवर का जीवनक्रम सामान्य देहाती किसान का सा रहा है। उन्होंने न कभी तड़क-भड़की वाले कपड़े पहने, न अँगूठियाँ। उनके पास न तो कीमती मालाएँ रही और न भ्रामक शब्द जाल। अपनी चेतना के उन्नत शिखरों पर आरुढ़ होकर उन्होंने अपने ही विगत 53 जन्मों की झाँकी पायी। जीवन के तत्व बोध प्राप्त किया।
टब तक उनकी अनेकों भविष्य-वाणियाँ सही साबित हुई है। तमिलनाडु के अम्मानपुर गाँव में जन्में मुनिवर याघव के अनुसार भारत विश्व को एक नया नेतृत्व प्रदान करेगा। आगामी चौदह वर्षों में साम्प्रदायिक कट्टरता स्वयमेव समाप्त हो जाएगी। तब केवल एक मानव धर्म शेष रह जाएगा। जिसे आध्यात्मिक धर्म के रूप में सभी अपनाएँगे। लेकिन यह सब होगा अनेकों संकटों एवं परेशानियों की आग में तपकर भारत ही नहीं, समूचा विश्व अपने स्वर्णिम समय में प्रवेश करेगा।
ज्योतिष विज्ञान को अपने वैज्ञानिक प्रतिपादनों एवं बौद्धिक कुशलता से विश्वमंच पर प्रतिष्ठित करने वाले में प्रो0 बी.बी. रमन का अपना स्थान है। इनके द्वारा सम्पादित “द एस्ट्रोलाजिकल मैगजीन” में समय-समय पर अनेक भविष्य -कथनों का उल्लेख होता रहता है। जिनमें से कुछ को अवश्य सामयिक कहा जा सकता है। डॉ. रमन ने एक पुस्तक का सम्पाउन अभी हाल में ही किया है- “ नो वर्ल्ड वार इन 2000 ए डी.” में लेखक ने तरह-तरह के उदाहरणों एवं प्रमाणों से यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि तृतीय विश्वयुद्ध की कोई सम्भावना नहीं है।
ज्योतिषीय गणना को आधार बनाकर लिखे गए इस लेख के अनुसार पृथ्वी के नष्ट होने की सम्भावना कम नहीं है। विश्व स्तर पर ऐसे प्रयास होंगे जो मानवता को तीसरे विश्वयुद्ध की आग से बचाए रखेंगे। लेखक का मानना है कि भविष्य में होने वाले युद्धों की सीमाएँ और सम्भावनाएँ खाड़ी युद्धों से अधिक न होंगी, मगन 27 मई सन् 2000 से ऐसी सम्भावनाओं प्रबलता बढ़ेगी जो विश्व शान्ति, सद्भावना, एकता के किसी नए आयाम को जन्म दें इस तरह 21 वीं सदी का प्रारम्भ समूची दुनिया में शान्ति और सद्भावना का नया युग लेकर आएगा। सत्य के साथ असत्य को मिलाकर चलना प्रपंच है। सत्य को पहचानें और उसे पकड़े रहें। इतने में भी परमार्थ सध जाएगा।
भविष्य की झलक चाहे ज्योतिष के झरोखों से पायी जा रही हो, अथवा उसे अपनी चेतना के हिमालय पर बैठकर निहारा जा रहा हो, निष्कर्ष एक ही है “इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य”। पूर्व दिव्यदृष्टा मनीषी हों अथवा फिर भविष्य-ज्ञान को विज्ञानसम्मत प्रक्रिया मानकर चलने वाले वैज्ञानिक, इन सभी के प्रतिपादन इस तथ्य को स्वीकारते हैं। कि उज्ज्वल भविष्य का अरुणोदय इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ को नवयुग के नवप्रभात का रूप देगा। हमें, हम सबको इस नव-प्रभात के स्वागत की तैयारी नवयुग की नयी मान्यताओं, नवीन मानदंडों को अपनाकर करनी है। स्वयं के जीवनक्रम में तमसो मा ज्योतिर्गमय की उक्ति को सार्थक-चरितार्थ करके ही हम नवयुग में अपने भविष्य को उज्ज्वल बना पाएंगे।
“यहाँ कोई धर्मात्मा है?” इस युग में बड़ा अटपटा प्रश्न है यह। मन्दिर बनाने वाले, गिरजाघर की इमारतें और मस्जिद की मीनारें ऊँची करने वाले तो बहुत हैं लेकिन जिसकी आत्मा धर्म में लीन हो, ऐसे व्यक्ति की खोज बड़ी विचित्र थी। भला यह भी काई बात हुई कि कोई भरी भीड़ से पूछने लगे कि उसमें कोई भला आदमी है? पर सच्चे साधुओं को सच बोलने, सच जाने और सच्चा जीवन जीने में कब संकोच होता हैं?
अकाल पड़ा है। पिछले वर्ष इन्द्रदेव ने इतनी अधिक कृपा की कि भूमि में पड़ा बीज उगकर भी सड़ गया अतिवृष्टि किसी प्रकार झेल ली गई, किन्तु इस वर्ष तो मेघों के देवता भूल ही गए हैं कि इस ओर भी उनकी सेना आनी चाहिए। इस प्रदेश में भी प्राणी रहते हैं और उन्हें भी जल ही जीवन देता है आषाढ़ निकल गया तब तक आशा थी किन्तु अब तो श्रावण भी सूखा ही समाप्त होने जा रहा है।
घरों में अन्न नहीं है। खेत और चरागाहों में घास के सूखे तिनके भी नहीं बचे। तालाब सूख चुके हैं। कूंओ में कीचड़ मिला पानी प्यास बुझाने के लिए रह गया है। कितने दिन वह भी काम चला सकेगा? ऐसी अवस्था में पशु कितने मरे, कौर गिने? जिसे जहाँ सूझा, वह उधर निकल गया परिवार लेकर। पूरा प्रदेश उजड़ने लगा है। वृक्षों के सूखते पत्ते और छाल जब आदमी का आहार बनने लगें, तब विपत्ति कितनी बड़ी है, कोई भी समझ सकता है। सरकारी सहायता आयी है। कुछ संस्थाएं भी सेवा के क्षेत्र में उतरी हैं, किन्तु जलते तवे पर कुछ पानी की बूँदों के पड़ने से गर्मी ही भड़कती है।
यज्ञ-अनुष्ठान तो हुए ही, अनेक लोक प्रचलित टोटके भी हुए किन्तु गगन के नेत्रों से अश्रु उतरे नहीं। देवता रुष्ट हुए तो तुष्ट होने का नाम ही नहीं लेते। ऐसे समय में सबसे भारी विपत्ति आती है साधुओं और फकीरों। इनमें से कुछ कच्चे होते हैं, कुछ सच्चे। जो कच्चे थे, भिक्षा व्यवसाय ही जिनका जीवन था, वे तो सबके सब भग गए। बचे सिर्फ हनुमंत टीले के बाबा बजरंगदास। प्रचण्ड तपस्वी और औषढ़ स्वभाव के बाबा बजरंगदास की लोकोत्तर सिद्धियों और अलौकिक चमत्कारों की चर्चा चारों ओर थी। इन दिनों तो उनकी कुटिया क्षुधातों के लिए कल्पवृक्ष बन गयी है। मध्याह्न में पवन पुत्र को नैवेद्य अर्पित करके सदा की भाँति अब भी बाबाजी उच्च स्वर से “ भण्डार में भगवत्प्रसा की सीताराम!” घोषित करते हैं और उस समय जो भोजन के लिए आ जाय, उसे अपने आप पंगत में बैठने का अधिकार है। इन दिनों प्रतिदिन दो-ढाई सौ व्यक्ति भोजन करते हैं।
पता नहीं कहाँ से आता है इतना अत्र उनके पास। पूछने से आता है इतना अन्न उनके पास। पूछने पर एक दिन कहने लगे-”ये संकट मोचन हनुमान यहाँ किसलिए खड़े हैं। भूमि में अन्न नहीं होगा तो देश का प्रशासक भूखा मरेगा, किन्तु अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता हनुमानजी के भक्तों के लिए तो आकाश को भी अन्न की वर्षा करनी होगी।”
ऐसे अडिग विश्वासी,अक्खड़ अवधूत ने जब आस-पास सबको सूचना भेजकर कुटिया में बुलवाया, बड़ी आशा हो गयी थी गाँव के श्रद्धा-प्राण लोगों को। अवश्य बाबाजी इस दैवी विपत्ति का कोई उपाय पा चुके है। किन्तु जब सायंकाल श्री हनुमानजी के सम्मुख आठ गाँवों के लोग एकत्र हो गए, तो बाबाजी पूछते है-”यहाँ कोई धर्मात्मा है?”
कोई और धर्मात्मा हो या न हो, बाबाजी तो है। अब देवता के सम्मुख झूठ भी कोई कैसे बोले? धोती के भीतर सभी नंगे। किससे कुछ ऊँचा-नीचा नहीं होता है? किन्तु बाबाजी तो एक-एक की ओर देखने लगे। ऐसे में चुपचाप आंखें नीची कर लेने के अतिरिक्त किसी के पास और क्या उपाय है?
“श्री मारुति प्रभु का आदेश है कि यहाँ इस इलाके में जो एकाकी धर्मात्मा है, उसका आश्रय लिया जाय।” बाबाजी कह रहे थे- “केवल वही इस अकाल को टाल सकता है। उसके असम्मान के कारण हय विपत्ति आयी है। देवता भी धर्म का आश्रय लेने वालों का अपमान करके कुशलपूर्वक नहीं रह सकते हैं।”
कौन हैं वे? सब अपने हृदय में सोचने लगे। कोई साधु आस-पास अब इन महाराज को छोड़कर रहे नहीं। जो दो-तीन कुटिया बनाकर रहते भी थे अकाल पड़ने पर तीर्थयात्रा करने निकल गए हैं। कोई ब्राह्मण, कोई विद्वान, कोई भगत लेकिन इनमें से किसी का अपमान होने की बात तो सुनी नहीं गयी। ऐसे व्यक्तियों पर तो गाँव के लोगों की सहज श्रद्धा है। अब इस अकाल के समय में किसी को कुछ देने से किसी ने मना कर दिया हो तो हो सकता है, किन्तु क्या विवश मनुष्य का यह ऐसा अपराध है कि उस पर इतना भयंकर दैवी-कोप पूरे इलाके को भोगना पड़े।
श्री हनुमानजी ने कहा है कि उसका पता लगाना होगा। बाबाजी को स्वप्न में आदेश हुआ है, यह वे बता गए। उन्होंने यह भी कह दिया कि इससे अधिक स्पष्टीकरण की आशा अब करनी नहीं चाहिए। देवताओं को परोक्ष कथन ही प्रिय है। आप सब प्रयत्न करें। मैं भी कल प्रातः-काल से पता लगाने लगूँगा।
ग्रामीण जन अपने-अपने ढंग से इस खोज में जुटे। लेकिन बीतते दिनों के साथ उन्हें निराशा ही हाथ लगी। बाबाजी के प्रयत्न का अपना ढंग था। वह ध्यान की गहराइयों में डूबकर अपनी खोजबीन करते और वह अपने इसी प्रयत्न के फलस्वरूप आज इस हरिजन बस्ती के एक कोने पर बनी झोंपड़ी के द्वारा पर आ गए। श्री पवन कुमार ने जिनका संकेत दिया, वे धर्मात्मा कौन है, यह पता लगाने की धुन उन्हें। जो आस्तिक नहीं है, भगवान में जिनकी आस्था नहीं है, वह तो धर्मात्मा हो नहीं सकता। गाँव में बसे लोग एक दूसरे से अच्छी प्रकार परिचित होते हैं। बाबा बजरंगदास प्रायः आस-पास के ग्रामीणों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। उनमें जहाँ भी कुछ आशा की जा सकती थी, उन सभी को अपनी ध्यान दृष्टि से देख लिया। आज अचानक उनके ध्यान में हरिजन बस्ती की यह झोपड़ी उभरी और वे इस ओर चल पड़े।
पूरी चमारटाली की झोंपड़ियाँ सटकर बनी हैं, किन्तु यह झोंपड़ी सबसे थोड़ी दूर हैं। केवल नाम ही इस झोंपड़ी के स्वामी का अलगू नहीं हैं, वह दूसरों से सब बातों में कुछ भिन्न है। गाँवों की हरिजन बस्तियों में आजकल दो भगत हैं वे भूमि पर सोते हैं। अपने हाथ से बना भोजन और अपने हाथ से खींचा जल काम में लेते हैं। किन्तु बाबा बजरंगदास उन्हें जानते हैं। वैसे भी वे लोग प्रायः प्रतिदिन हनुमंत टीले पर पहुँचते हैं। लेकिन अलगू सबसे भिन्न है। उसे लँगड़े बछड़े, बीमार कुत्ते, अधमरे गणे और आस-पड़ौस की सेवा से अवकाश ही नहीं कि कहीं आज-जाए। उसका स्मरण आते बाबाजी चौंके थे।
सुनते हैं कि बेटे का ब्याह करके अलगू का बाप मरा था, किन्तु स्त्री टिकी नहीं। वह कहीं और चली गयी। अलगू तब से अकेला है। जूते बनाकर पेट पाल रहा है।
एक गाय थी अलगू की, किन्तु अतिवृष्टि में वह ठण्ड से अकड़ कर चल बसी। गाय के बछड़े का एक पैर बचपन में ही टूट गया था किसी काम आ सके, ऐसा चह रहा नहीं। यही हाल उसके कुत्ते और गधे का हैं, ये दोनों भी बीमार, अपाहिज ही हैं। लेकिन अलगू कहता है कि -”उपयोगी होना ही तो सब कुछ नहीं है। संवेदना तो उपयोगी, बेसहारा को अपनाने और सहारा देने में है। उपयोगिता के आधार पर सहारा देना प्यार नहीं व्यापार है।” लोग उसकी इस बात का परिहास करें तो करते रहें। उसे किसी की कोई परवाह नहीं।
यही बात गाँव के बूढ़े-बीमारों की सेवा के बारे में है। उनका भी एक सहारा अलगू ही है। किसी की दवा लाकर देगा, किसी की मालिश करने बैठ जाएगा। हरिजन बस्ती के सारे बच्चे अपने अलगू काका को ही समय घेरकर रहते हैं। उनमें से किसी को अपने घर की याद आती ही नहीं। अलगू अपने इस सब कामों में बहुत खुश है। उसे ने तो मन्दिर जाने की फुरसत है और ही तो मन्दिर जाने की फुरसत है और न ही मालाओं की संख्या का हिसाब रखने की। यूँ वह प्रायः हर वक्त अपना काम करते समय राम-राम रटता रहता है।
इस वर्ष कुओं का पानी घटने लगा, किन्तु अलगू की कुइयाँ का पानी आज भी नहीं घटा है। हरिजन बस्ती में सरकारी कुआँ दो वर्ष पहले बना है। उससे पहले हरिजन गाँव के बाहर के कुएँ से पानी लाते थे। पानी लेने गया था वह उस दिन कुएँ पर, तो गांव के ठाकुरों के खेत में पानी जा रहा था उस कुएँ से। अलगू ने मोट का पानी न लेकर कुएँ से खींचना चाहा तो ठाकुर ने कुछ कहा- सुना। लौटकर वह यह कच्ची कुइयाँ खोदने में लग गया था सात दिन में इस कुइयाँ में पानी आ गया था और हरिजनों के लिए पक्का कुआँ बनने तक यह कुइयाँ ही हरिजनों की पूरी बस्ती को जल पिलाती थी। अब थोड़ी-सी भूमि घेर रखी है अलगू ने। दूसरा कोई होता तो उसमें चार बेल लगाता-कुम्हडे, तोरई की । किन्तु अलगू उसमें कभी ज्वार बोता है, कभी अरहर, कभी सन और कुछ न हो तो घास। अपने बछड़े और गधे का पेट भरने को छोड़कर उसे दूसरी चिन्ता ही नहीं रहती। इस अकाल में भी उसका घेरा घास से हरा है। सबेरे-शाम वह पानी खींच-खींच कर थक जाता है उस घेरे को गीला रखने के लिए।
आज बाबा बजरंगदास को अचानक ध्यान में नजर आया कि अलगू धर्मात्मा है। वह कहाँ कोई नौकरी-व्यापार करता है कि उसे कुछ काला - सफेद करने को विवश होना पड़े। उल्टे वह तो दिन-रात सेवा और परोपकार में लगा रहता है। उन्हें पक्का विश्वास हो गया कि अलगू ही वह धर्मात्मा है, हनुमानजी ने जिसके लिए संकेत किया है।
अलगू तो हक्का-बक्का रह गया कि उसकी झोंपड़ी के द्वारा पर ये बाबाजी आये हैं। उसके पास तो उन्हें आसन देने योग्य भी कुछ नहीं है। दूर पृथ्वी पर सिर रखकर वह काँपता हुआ खड़ा हो गया। पास ही चटाई पर गाँव का बूढ़ा-बीमार भंगी पड़ी खाँस रहा था। अभी वह उसी की मालिश करने में जुटा था। बाबाजी ने उससे पूछा-”यह तुमने किससे सीखा कि इस तरह सेवा किया करो।”
“मुझ चमार को भला कौन बताएगा-”अलगू उसी प्रकार दीन स्वर में बोला। “एक बार काशीजी गया था। दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर कथा हो रही थी। कथावाचक सन्त कह रहे थे सब प्राणियों में भगवान का वास है। उनकी सेवा भगवान की सेवा है और यही सच्चा धर्म है।
“ओह, तो तुम उनके शिष्य हो।” बाबा बजरंगदास ने श्रद्धापूर्वक पूछा।
“नहीं, मुझे भला कोई क्यों चेला बनाने लगा? मैं तो दूर से उनके सामने मत्था टेककर चला आया था। मेरी गौ माता मर गयी, तो मुझे उन महात्मा की बात याद आ गयी।” मैं बछड़े की सेवा करने लगा, यह बीमार कुत्ता और गधा एक दिन इधर आ गए, तो इनकी भी सेवा करनी शुरू कर दी।अब कोई मुझ नीच जाति से आप जैसे महात्मा या कोई ब्राह्मण तो सेवा कराएंगे नहीं, सो अपनी ही बस्ती के बीमारों की सेवा कर लिया करता हूँ। अपने शरीर से जिसके लिए जो बन पड़ता है-करने में जुटा रहता हूँ।”
“भाई अलगू मैं साधु हूँ और तुम्हारे दरवाजे पर आया हूँ।” बाबा बजरंगदास ने विनय के स्वर में कहा-”तुमसे भिक्षा माँगता हूँ। तुमको कभी ठाकुर ने गालियाँ दी थी, उनको क्षमा कर दो।”
“इसमें क्षमा की बात क्या है? बड़े लोग तो छोटों
को डाँटते-डपटते ही रहते हैं। मैं तो कभी का भूल गया था महाराज। आप कहाँ की इतनी पुरानी बात उठा लाए है।”
“तुम भूल गए, किन्तु तुम्हारे भगवान नहीं भूले। जिनकी तुम हर रूप में सेवा करते हो। यह अकाल इन्हीं की कोप से आया है।” बाबाजी ने हाथ जोड़ लिये। मैं तुमसे क्षमा माँगने-प्रार्थना करने आया हूँ कि कहाँ के लोगों पर, पशु-पक्षी आदि सभी प्राणियों पर दया करो। तुम अपने भगवान से प्रार्थना करोगे तो अवश्य वर्षा होगी।
“महाराज! मेरे प्रार्थना करने से वर्षा हो जाय, लोगों की विपत्ति मिटें तो मैं प्रार्थना क्यों नहीं करूंगा।”
बाबा बजरंगदास के विदा होते ही अलगू अपने झोंपड़े के कोने में बैठकर अन्तर्यामी को पुकारने लगा। उसका हृदय ही उसका मन्दिर, मस्जिद और गिरजाघर था। “वर्षा कराओ प्रभु! सबकी विपत्ति दूर करो भगवान।” यह आँख बन्द किए बोलता ही जाता था। उसे पता भी न था कि वायु वेग कब बढ़ा। कब आकाश भूरे घने मेघों से ढक गया। वह तो तब चौंक कर उठा, जब मेघ गर्जन के साथ बरसात की मोटी-मोटी बूँदों ने द्वार से आकर उसकी पीठ भिगो दी।
सृजेता की ही भाँति उसका सृजन भी अपूर्व है। सौंदर्य की अपूर्वता और रहस्यमयता इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में निहारी जा सकती है। तारों भरा आकाश की थाल, दूध की नी-सी प्रवाहित आकाश-गंगा एवं निरन्तर निहारती निहारिकाएं इसका शृंगार है। इसी के एक कोने में टँगे सूर्य की रश्मियां दिन में ताप देती है। तो शाम होते ही चन्द्रमा की छलनी से छनकर रात को शान्त, शीतल, समुज्ज्वल करती है। इसके आश्चर्यों का अन्त नहीं। सच तो यह है कि अपने रचनाकार के अनुरूप ही ब्रह्माण्ड का वैभव और इसका विस्तार भी अनंत है। प्राचीन वैदिक ऋषियों, मध्यकालीन दार्शनिकों से लेकर आधुनिक वैज्ञानिकों तक सभी इसके रहस्यों के अन्वेषण में तत्पर रहे है। ऋषियों ने नेति-नेति कहकर इसकी महिमा का गान किया, तो दार्शनिक अज्ञेय कहकर चकित रह गए और वैज्ञानिक तो आज भी आश्चर्य से अभिभूत होकर इसका ओर-छोर तलाशने में लगे है।
प्राचीन वैदिक भारत के मनीषियों ने बहुत पहले ही कहा था “पृथ्वी स्थिरा चला भाति” अर्थात् पृथ्वी स्थिर है लेकिन चलती हुई प्रतीत होती है। लेकिन उनका यह कथन काफी समय तक उपेक्षित बना रहा । उस समय किसी को सूझा तक नहीं कि अपनी धरती विराट ब्रह्माण्ड का एक छोटा-सा हिस्सा है, उसका केन्द्र नहीं। उल्टे पश्चिमी जगत में ब्रह्माण्डीय ज्ञान की शुरुआत करने वाले अरस्तू ने पृथ्वी को ब्रह्माण्ड का केन्द्र बताते हुए कहा, कि इसी के चारों ओर सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रह-नक्षत्र चक्कर लगाते हैं। बाद में यह सिद्धांत प्लोटेमी, कापरनिक्स, जर्मनी के कप्लर एवं गैलीलियो के नये सिद्धांतों से कटता-छँटता न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण बल के सिद्धांत पर आ टिका। आकर्षण एवं प्रतिकर्षण बल के इस सिद्धांत ने विज्ञान जगत में एक नया आयाम दिया। इसके अनुसार गुरुत्वाकर्षण बल ही वह कारण है, जा अनन्त ब्रह्माण्ड में, अनन्त तारों, नक्षत्रों, ग्रहों के बीच एक सन्तुलन बनाए रहता है।
वर्ष 1929 में एडवीन हब्बल ने अपने अन्वेषणों से यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि ब्रह्माण्ड का प्रसार सतत् हैं हालाँकि कार्ल पेपर ने इसमें कई सन्देह भी व्यक्त किए और कुछ नए संशोधनों की जरूरत बतायी। वैसे तो नए प्रयोग और उनसे प्राप्त होने वाले निष्कर्षों से पुरानी बातें समाप्त हो जाती है। फिर भी यदा-कदा ऐसा भी होता है कि नए सिद्धांत पुराने सिद्धांतों को नए रूप में प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, मर्करी का नया सूत्र न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण बल से सम्बन्धित है और आइन्स्टीन का सापेक्षतावाद न्यूटन के गति के नियमों से पुष्ट होता है। कुछ भी हो नयी खोजों से दो बातें सामने आयीं पहली ब्रह्माण्ड का समय के साथ परिवर्तन एवं दूसरी ब्रह्माण्ड की प्रारम्भिक अवस्था का होना। इन दोनों ही बातें ने विश्व के शीर्ष वैज्ञानिकों को यह सोचने के लिए मजबूर किया कि कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर है, जिसकी चेतना इस समस्त ब्रह्माण्ड में तरंगित है और उसी की सचेतन इच्छा समस्त सृजन, परिवर्तन व विनाश के जिम्मेदार है।
न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण बल के निष्कर्ष से किसी भी वस्तु का द्रव्यमान उसके गुरुत्वीय बल पर निर्भर करता है। इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड में चक्कर काटते ग्रहों की गत्यात्मक जानकारी उपलब्ध हो पाती है, उनकी संरचना की नहीं। हालाँकि संरचना को ठीक तरह से जाने बगैर उनकी गति को पूरी तरह से नहीं जाना जा सकता। इस सम्बन्ध में किए जाने वाले अन्वेषणों की सतत् प्रवृत्ति से दो महत्वपूर्ण नियम प्रकाश में आए। इन्होंने विज्ञान जगत में हलचल मचा दी। इनमें से एक है-ब्रह्माण्ड के सतत् विस्तार का अध्ययन करने वाला आइन्स्टीन का सापेक्षतावाद और दूसरा है ब्रह्मांड के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म कणों को स्पष्ट करने के लिए क्वाँटम का नियम। आणविक ऊर्जा तथा माइक्रो इलेक्ट्रानिक सिद्धांत इन्हीं दोनों नियमों की उपज है।
ब्रह्मांड की खोज-बीन की इन कोशिशों में जो इसके निरत्र विस्तार का रहस्य उजागर हुआ, उसे वैज्ञानिकों ने “डूप्लर प्रभाव” का नाम दिया। इसी सिद्धांत के द्वारा स्पेक्ट्रम से तारों की दूरी का अनुमान लगाया जाता है। स्पेक्ट्रम के नीले रंग के आस-पास पड़ने वाला तारों का प्रकाश उनकी समीपता का सूचक है। जबकि लाल पट्टी में पड़ने वाला प्रकाश उनके दूर होने का द्योतक हैं इस प्रयोग से वैज्ञानिकों ने अभी हाल में यह पता लगाया है कि तारे सुदूर क्षेत्र में खिसकते जा रहे हैं। विश्व विश्रुत वैज्ञानिक हक्लर भी इस निष्कर्ष से सहमत थे। इसकी सहमति को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत से हमें सिर्फ ब्रह्माण्ड की स्थिरता का बोध हुआ था, लेकिन आइन्स्टीन के सापेक्षतावाद ने हमें इसकी गतिशीलता के सत्य से परिचय कराया।
ब्रह्मांड के इस गतिशील स्तार की सूक्ष्मताओं का अध्ययन करने ब्रह्माण्ड विज्ञानी फ्रेड हायल ने तीन बातें करते हुए भारतीय दर्शन के “यतः शून्यम् प्रविलीयन्ते” के सत्य को वैज्ञानिकता प्रदान की। उन्होंने अपने प्रथम बिन्दु को स्पष्ट करते हुए कहा-(1) ब्रह्माण्ड का प्रसार धीरे-धीरे बढ़ते हुए पुनः शून्य में विलीन हो जाता है। (2) दूसरे बिंदु के रूप में उन्होंने बताया कि यह प्रसार शून्य से नियत क्रम से अपना विस्तार करता है। इस दूसरे बिंदु में उन्होंने “इमानि सर्वानि जायन्ते” की सत्यता प्रमाणित की और अपनी तीसरी बात के रूप में उन्होंने इस विस्तार का क्रमशः तीव्रतर होना बताया।
उनके अन्वेषित ये तथ्य प्राचीन भारतीय ऋषियों के अन्वेषणों की वैज्ञानिकों के बारे में बताते हैं। साथ ही ब्रह्म की अद्भुत परिकल्पना को वैज्ञानिकों आधार प्रदान करते हैं। खगोल विज्ञानी फ्रेडहायल के अनुसार एक हजार लाख वर्ग में ब्रह्माण्ड पाँच से दस प्रतिशत बढ़ जाता है। बिगबैंग थ्योरी यह बताती है कि ब्रह्म से ब्रह्माण्ड उपजा और उसमें काल और दिक् भी पनपा। इसके अनुसार दस से बीस हजार लाख वर्ष पूर्व से दो आकाश गंगा के बीच की दरी शून्य थी। पेन्जीया और विल्सन ने रेडियो तरंगों से यह पता लगाया कि ब्रह्माण्ड का घनत्व आज की अपेक्षा पहले अधिक था। कैंब्रिज समूह के वैज्ञानिक मार्टिन रायल के तत से अपना ब्रह्माण्ड आकाश के मध्य स्थित है। इवेजीन लीफशील और ईशान खालान-नीकोव के निष्कर्ष अनुसार बहुत सम्भव है कि पहले कभी आकाश-गंगा में तारे आपस में एक-दूसरे के पास रहते हो, बाद में ये दूरी बढ़ी हो।
तथ्य कुछ भी हो, लेकिन आइन्स्टीन के अनुसार यह शत-प्रतिशत सत्य है कि ब्रह्माण्ड और उसका विस्तार किसी तरह का आकस्मिक संयोग नहीं, बल्कि ब्रह्म की सोच-समझकर की गयी रचना है। जो अपने रचनाकार की तरह अनन्त है और अनन्त आश्चर्यों से भरी है। यही नहीं अपने रचयिता से पूरी तरह से एकात्म है। यह ब्रह्माण्ड किस शक्ति से परिचालित है? इस बारे में वैज्ञानिक दृष्टि से अवलोकन किया जाय तो क्वाँटम सिद्धान्त के अनुसार कण एक तरंग है। प्रत्येक कण में ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा होती है जो सर्वोच्च अवस्था में पायी जाती है। जो कल तक पदार्थ का सूक्ष्मतम कण माना जात था, आज के ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा होती है जो सर्वोच्च अवस्था में पायी जाती है। जो कल तक पदार्थ का सूक्ष्मतम कण माना जात था, आज के प्रायोगिक निष्कर्ष से वह भी कणों से मिलकर बना माना जा रहा है। तो फिर वास्तव में सूक्ष्म है क्या? इस सवाल के जबाब में मूरीजेलमेन ने क्वार्क की खोज की। इस खोज पर ही उन्हें नोबुल पुरस्कार मिला। उनकी इस खोज के अनुसार प्रोटान और न्यूट्रान भी कणों से मिलकर बने है, इन्हीं कणों की क्वार्क कहते हैं। क्वार्क छह तरह के होते है- डाउन, स्ट्रैन्ज, चार्म्ड, बाँटम अप एवं टाप।
प्रोटान और न्यूट्रान तीन-तीन क्वाकों से बने होते हैं। प्रोटान में दो अप और एक अप र्क्वाक होता है। इन कणों में समायी ऊर्जा को इलेक्ट्रान बोल्ट द्वारा नापा जाता है प्रत्येक कण की एक धुरी होती है, जिस पर वे घूमे है। प्रत्येक कण का एक प्रतिकण भी मौजूद है। ठीक उसी तरह से जैसे देव शक्तियों की विरोधी आसुरी शक्तियाँ है। इन कणों की ऊर्जा जिस माध्यम से उत्सर्जित होती है उसे “फोर्स कैरिंग पार्टिकल” कहते हैं। इस तरह के बल वाहक कण चार तरह के होते हैं। वे चार प्रकार अपने चार बलों के अनुरूप ही है। इनमें से पहला है- गुरुत्व बल कण, दूसरा है विद्युत-चुम्बकीय बल कण, तीसरे को दुर्बल नाभिकीय बल कण कहते हैं और चौथा प्रकार है- मजबूत नाभिकीय बल कण। यही आपस में मिल-जुलकर ब्रह्माण्ड में स्थिरता , गति और सन्तुलन स्थापित करते हैं।
इनमें से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और कमजोर न्यक्लियर बल के विलय से जो ऊर्जा निकलती है, उसे वैज्ञानिकों ने ग्राण्ड यूनीफिकेशन थ्योरी से समझाने की कोशिश की है। उनके अनुसार यही वह प्रक्रिया है, जिससे सौरमण्डल गतिमान होता है। अनिश्चितता के सिद्धांत के अनुसार प्रोटान के तीन क्वार्क की ऊर्जा निश्चित नहीं होती और इसी कारण प्रोटान कभी भी नष्ट हो सकता है। इतना ही नहीं, इसी वजह से इसका निर्माण भी कभी भी सम्भव हो सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना ब्रह्मांड के सृजन और विनाश को वैज्ञानिक रूप देती है क्यों कि सृष्टि का कण-कण प्रोटान और न्यूट्रान से विनिर्मित है। कुछ र्गलक्सी क्वार्क से बने होते हैं, तो कुछ एण्टी क्वार्क से। एक ही स्थिति में क्वार्क एवं एण्टी क्वार्क से बना तारा कम गतिशील होगा। ग्राण्ड यूनिफिकेशन थ्योरी से यह भी पता चलता है कि अपने सृजन के समय ब्रह्माण्ड अत्यधिक तापयुक्त रहा होगा। इस ऊष्मा का कारण है एण्टी क्वार्क का इलेक्ट्रान और एण्टी इलेक्ट्रान एण्टी क्वार्क में बदलते रहते हैं और अन्ततः एण्टी क्वार्क से फिर क्वार्क में बदल जाता है। बदलाव की यह सारी प्रक्रिया ही भयंकर ऊष्मा की उत्पत्ति का कारण है।
अपने विस्तार की तेजी के अनुपात में ही ब्रह्माण्ड का तापमान भी कम होने लगता है। आज की तुलना में इसकी वृद्धि दुगुनी हो जाय तो वर्तमान तापमान भी घटकर आधा रह जाएगा। बिगबैंग थ्योरी के अनुसार अपनी शुरुआत में ब्रह्माण्ड की गर्मी काफी ज्यादा थी, लेकिन प्रसार के साथ ही तापमान में कमी आती गयी। इसी वजह से प्रोटान और न्यूट्रान कणों की ऊर्जा भी कम हुई। परिणामस्वरूप आपस में जुड़कर ड्यटीरियम का निर्माण हुआ। इस ड्यूटीरियम में एक प्रोटान और एक न्यूट्रान की उपस्थिति होती है। ड्यूटीरियम से दो प्रोटान और दो न्यूट्रान वाला हीलियम बना। इसी तरह क्रमशः तत्वों के संयोग से भारी तत्वों का निर्माण होता चला गया। ताप कम हुआ और दाब में बढ़ोत्तरी हुई। जीवन निर्माण के तत्व विनिर्मित होते गए और अनंतः ईश्वर की चैतन्य सत्ता ने अपने अनेक चेतन रूप प्रकट किए।
ब्रह्माण्ड की इस विस्तार प्रक्रिया में जहाँ भी गुरुत्वाकर्षण बल प्रक्रिया हुआ वह स्थान स्थिर हो गया। इस स्थिर स्थान ने अण्डाकार आकृति लेकर गोल-गोल घूमना प्रारम्भ कर दिया। इसी स्थान को आकाश -गंगा के रूप में मनीषी वैज्ञानिकों ने जाना। लाखों वर्षों बाद इन तारों ने पुनः सिकुड़ना शुरू किया। सिकुड़ने से मध्य भाग में घनत्व काफी बढ़ गया और बाहरी आवरण विस्फोट के साथ फट गया। इसी विस्फोट को सुपरनोवा कहते हैं जो आकाश गंगा में तारों की चमक के साथ झिलमिलाता नजर आता है।
अपनी अनन्तता में अनन्त आश्चर्यों को सँजोए यह ब्रह्माण्ड आज तक वैज्ञानिकों के यन्त्रों और उनके अन्वेषणों से आँख-मिचौली करता रहा हैं। इसके अनन्त आकार एवं सुव्यवस्थित सूत्र-संचालन के पीछे अब वैज्ञानिक भी किसी ऐसी अदृश्य शक्ति को स्वीकारने लगे है जो संप्रभु और सर्वव्याप्त है। जैसे जैसे उन्होंने अपनी खोज के दायरे बढ़ाए हैं वैसे-वैसे उनके सामने असंख्य अनुत्तरित सवाल भी खड़े होते गए है। अब तो अत्याधुनिक अन्वेषणों से प्राप्त निष्कर्ष यह भी कहने लगे है कि अनन्त आकाश में एक से अधिक ब्रह्माण्डों की उपस्थिति सम्भावित है। विज्ञान के एण्ट्रापी सिद्धांत ने अपने मत को दो बिंदुओं में स्पष्ट किया है। पहला बिंदु है वीक थ्योरी का, जिसके अनुसार निर्माण प्रक्रिया विस्फोट से हुई। एक क्रमोत्तर विकास में जीवन का प्रादुर्भाव हुआ। तारों के विस्फोट से अवशेष पदार्थों से सौर-मण्डल बना। बाद में यह ठण्डा होकर बुद्धिमान जीवों का आश्रय स्थल हुआ। दूसरा बिंदु स्ट्राँग थ्योरी का है, जो यह बताती है कि हमारे जैसी सभ्यता अन्य ग्रहों-नक्षत्रों में होने की बात स्पष्ट है।
मैसाचुशेट्स इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के विज्ञानवेत्ता एलेन गथ के अनुसार, प्रारंभिक विस्फोट के समय तापमान अधिक था, जिसके कारण प्रसार तेजी से हुआ। एक साथ ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स कमजोर पड़ गए। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ब्रह्माण्ड में 1080 लाख कणों की मौजूदगी हैं क्वाँटम सिद्धांत के अनुसार कणों की ये तरंगें अपने वास्तविक रूप में चैतन्य ऊर्जा की उच्चतम अवस्था है। यही नहीं इन कणों में समान रूप से आधी-आधी ऋणात्मक और धनात्मक ऊर्जा का आवेश है। जो न केवल परस्पर सन्तुलन स्थापित करती है। बल्कि परिणाम में ब्रह्माण्ड के रचयिता ब्रह्म के निष्क्रिय, निर्विशेष, निर्विकल्प, शून्यता का बोध कराती है।
यही निष्क्रिय शून्यता ही ब्रह्माण्ड के सारे कारोबार की धुरी हैं जो स्थिर रहते हुए भी गति की प्रेरणा और आधार है। यही निर्विकल्प शून्य अवस्था “महाकाल” है, जिससे काल गतिमान हुआ। वैज्ञानिक समुदाय में यह बाते पहेली की तरह पूछी जाती है कि घण्टा, मिनट की तरह ही क्या ब्रह्माण्ड भी समय के साथ संचालित होता है या फिर यह स्वयं समय का नियंत्रण और नियमन करता है? इस पहेली के जवाब में वैज्ञानिक मर्फी कहते हैं कि समय तीर की तरह बढ़ता है इसे तीन भागों में विवेचित किया जा सकता है। पहला थर्मोडायनेमिक एरो ऑफ टाइम। इसके अनुसार कप टेबल से गिरकर टूटना-इसमें कप का टेबल में होना भूतकाल को दर्शाता है, जबकि टूटना भविष्य को इंगित करता है, जिसमें विघटन की दर बढ़ती है, इस नियम के अंतर्गत आता है।
दूसरा है-साइकोलॉजिकल एरो ऑफ टाइम-इसमें किसी वस्तु, स्थान घटना आदि के बीत जाने का बोध होता है और तीसरा कास्मोलाजिकल एरो ऑफ टाइम, यह समय बताता है कि ब्रह्माण्ड सतत् वृद्धि एवं विकास के पथ पर अग्रसर है। मर्फी के अनुसार ब्रह्माण्ड के क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित विकास के क्रम को उनके दूसरे एवं तीसरे नियमों से प्रतिपादित किया जा सकता है। मर्फी कहते हैं कि प्रचार की व्याख्या क्वाँटम के गुरुत्वीय नियमानुसार सुनियोजित एवं स्पष्ट होती है। ब्रह्माण्ड अनन्त है इसकी सीमाएँ नहीं है। क्वांटम सिद्धान्त, अनिश्चयता के सिद्धान्त का सहयोगी है। क्योंकि घनत्व और कणों की रचना में कही एकरूपता नहीं पायी जाती। परन्तु फिर भी प्रसार को क्रमबद्ध माना जा सकता है।
मर्फी का मानना है कि थर्मोडायनेमिक्स एरो ऑफ टाइम के विपरीत यदि अपने विस्तार के बजाय ब्रह्माण्ड सिकुड़ने लगे तो एक बहुत बड़ा कौतूहल और महान आश्चर्य का विषय होगा। क्योंकि ऐसा होने पर विघटन पूर्वक निर्माण की ओर चलेगा। मृत जीवित होने लगेंगे, वृद्ध जवानी को ओर बढ़ेंगे और जवानी नादान, बचपन की मुड़ने लगेगी। परिणामतः भविष्य की ओर बढ़ने के बदले यात्रा भूत की ओर हो जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं है और न होने की उम्मीद है। कारण कि ब्रह्माण्ड हमेशा निश्चित सीमाओं में सिमटने के बदले अपना सतत् विस्तार ही करता रहता है।
सतत् विस्तार की यह प्रक्रिया की यह प्रक्रिया ही सृष्टि के कण-कण को गतिमान बनाए रखे है। यह गतिमयता प्रत्येक कण में व्याप्त ऊर्जा के कारण और यह ऊर्जा ही समस्त गतिविधियों का मूल स्त्रोत है। पहले कभी भारत के वेदान्त परायण ऋषियों ने उद्घोष किया था, सृष्टि में नाम-रूप मिथ्या है, सिर्फ चित शक्ति और उसका मूल कारण ब्रह्म ही सत्य है। आज ब्रह्माण्ड की खोजबीन में जुटे वैज्ञानिकों ने भी निष्कर्ष प्रतिपादित करना शुरू किया है कि तरंगित ऊर्जा ही सत्य है और इस सत्य से भी परे है, ब्रह्म की शून्यता। जिसे सत्य का चरम और परम रूप भी कहा जाता है।
अपने इस सत्यान्वेषण में वैज्ञानिकों ने जहाँ ब्रह्माण्ड के अनन्त आश्चर्यों को देख नेति-नेति कहना शुरू कर दिया है। वही एक सम्भावना भी व्यक्त की है। कि जिस तरह सौरमण्डल की प्रतिमण्डल की प्रतिकृति परमाणु है उसी तरह ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति मनुष्य है।
हर युग की अपनी समस्याएँ होती है और तदनुसार नये चिन्तन से सामयिक समाधान मिलते हैं। जो विचार मंथन के लिए प्रेरित करे, वही युग साहित्य है।
जब नाम, रूप मय यह समस्त ब्रह्माण्ड चैतन्य ऊर्जा का प्रवाह है, ऐसे में यदि मनुष्य नाम-रूप से ऊपर उठकर स्वयं को चैतन्य ऊर्जा के इस प्रवाह से एकात्म-एकाकार कर ले। तभी वह ब्रह्माण्ड के यथार्थ रहस्य को खोज सकता है और वैज्ञानिकों की कल्पना है कि आश्चर्य नहीं हक यदि वह ऐसी एकात्मता में कह बैठे-”अहं ब्रह्मास्मि”
वैज्ञानिक जिसे आज कल्पना मान रहे है और जिसे अपनी भविष्य के शोध का आधार बताते हैं। पूर्ववर्ती वैदिक ऋषियों ने उसे अपनी चेतना में अनुभव किया था। इसी अनुभूति के बल पर वे कह सके थे-यत पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे। एकात्मता के इसी अनुभव ने उन्हें चित शक्ति के प्रवाह के उस मूल स्त्रोत तक पहुँचाया था, जो उनके अहं ब्रह्मास्मि के अनुभव का आधार बना। कल का भविष्य इस आध्यात्मिक अनुभव को वैज्ञानिक प्रयोगों से अनुभूत करेगा। यदि नाम, रूप की आसक्ति से हम ऊपर उठ सके तो हम भी इसके भागीदार होगे। बस आवश्यकता आसक्ति से उपराम होने की है।
ध्वनि से सम्बन्धित एक सर्व ज्ञात तथ्य है कि समपान कम्पन गति वाले एक अँग्रेजी के वाई के आकार के उपकरण (टयूनिंग फार्क) तथा एक तार को ले। तार पर एक छोटा सा टुकड़ा मोड़कर रख दे। अब टयूनिंग फार्क को किसी ठोस से टकराकर कम्पन उत्पन्न करे और तार के समीप लाये। स्पष्ट दिखाई देता है कि कागज का वह छोटा सा टुकड़ा नाचने लगा। जबकि तार और टयूनिंग फार्क के मध्य संपर्क का माध्यम केवल आकाश था। टयूनिंग फार्क के कम्पन समान अवस्था वाले तार में भी कम्पन उत्पन्न कर देते हैं। तार के इन वास्तविक कम्पनों के कारण ही कागज का टुकड़ा नाचने लगता है। एक और प्रयोग है। पंचम स्वर पर चढ़े हुए तबले को कसकर रख दे। बरसात के दिनों में यदि बादल पंचम स्वर में गरज उठे तो उसकी गड़गड़ाहट का पृथ्वी में रखे हुए तबले पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यह देखें। तबले का चमड़ा अपने आप फट जाएगा। यह शब्द की शक्तिशाली तरंगों के द्वारा होता है।
इन दो प्रयोगों के समान ही समान तत्वों वाले मनुष्य और सूर्य में मानसिक सम्बन्ध स्थापित करने का काम वह 24 अक्षरों के कम्पन करते हैं, जिन्हें गायत्री मन्त्र कहा जाता है। ठीक उसी प्रकार सूर्य और मनुष्य में तात्त्विक एकता है। शास्त्रकार का कथन है-”सूर्यात्मा जगतस्थस्थुशष्च” सूर्य जगत की आत्मा है। जबकि हमारी चेतना हमारे शरीर जगत की आत्मा है। इन दो चेतनाओं को समान गति से कम्पित और सम्बन्ध स्थापित कर सकने की सामर्थ्य उन 24 अक्षरों में है, जिसे गायत्री मन्त्र कहते हैं।
विज्ञान का यह नियम है कि उच्चस्तर या अधिक शक्ति का प्रवाह निम्न स्तर अथवा कम शक्ति वाले केन्द्र की ओर तब तक बहता है, जब तक कि दोनों समान न हो जायें। गायत्री से प्राप्त सिद्धियाँ इसी तादात्म्य की परिपक्व अवस्था ही है, जब मनुष्य भौतिक शरीर में हो सूर्य की चेतना के समान सर्वव्यापी, सर्वदर्शी और सर्वसमर्थ हो जाता है, वह न केवल जलवायु, लोगों के स्वास्थ्य, मन की बातें जान लेने की सामर्थ्य पा लेता है वरन् इनसे भी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म गतिविधियों और शक्तियों का स्वामी हो जाता है, यह सारे संसार को भी नष्ट कर सकता है, किन्तु सूर्य देवता से संपर्क स्थापित होने के बाद गायत्री उपासक में उन्हीं को सी करुणा, सद्बुद्धि और सद्गुण, सद्विचारों को अधिक से अधिक सत्कर्मों में लगाने लगता है तो उसकी साधना की सफलता और भी सत्त्वर हो उठती है।
कोई मनुष्य शाँत और प्रसन्न-मुद्रा में बैठा हो, उस समय अन्य कोई उसके पास जाकर भावनापूर्वक कुछ निवेदन कर तो उसमें आशातीत समर्थन प्राप्त किया जा सकता है। बजाय तब जबकि वह अस्त-व्यस्त और अशाँत स्थिति में हो। कोई तालाब स्वच्छ और शाँत हो तो उस पर एक छोटा-सा कंकड़ फेंककर ही रंगों का उत्पादन किया जा सकता है। यह भाव और विज्ञान दोनों का मिला-जुला स्वरूप है। भारतीय आचार्यों ने जो आचार संहिताएँ और वैज्ञानिक प्रयोग किये है, वे उक्त सिद्धान्त को दृष्टि में रखकर ही किये। पिछले दिनों उसी सूक्ष्म दर्शन का एक प्रयोग गया था। वह सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ के रूप में था। शास्त्रों में उल्लेख है कि कुछ विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट रीति से गायत्री उपासनाएँ एवं यज्ञादि प्रक्रियाएँ सम्पन्न की जाये तो उनसे सूर्य देव की आध्यात्मिक शक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित एवं केवल अपने लिए वरन् सम्पूर्ण समाज, राष्ट्र और विश्व के लिये सुख-समृद्धि और शाँति का अनुदान उपलब्ध किया जा सकता है।
अक्टूबर 1958 का सहस्र कुण्डी यज्ञ जो मथुरा में गायत्री तपोभूमि में सम्पन्न हुआ, एक ऐसा ही प्रयोग था। पीछे मौसम वैज्ञानिकों ने भी इस मान्यता के एक भाग की पुष्टि कर दी। 1 जुलाई, 1957 से 35 दिसम्बर, 1958 तक खगोलशास्त्रियों से अन्तर्राष्ट्रीय शाँत सूर्य वर्ष (इंटरनेशनल इयर ऑफ दि क्वानेट सन) संक्षेप में ‘इक्विसी’ मनाया। यह नाम इसलिये रखा गया कि इन दो वर्षों में सूर्य बिलकुल शाँत रहा और अध्ययन करने का अवसर मिला। लगभग इसी अवधि से उस यज्ञ की तैयारी हुई थी। साधकों ने एक वर्ष पूर्व से ही गायत्री के विशेष पुरश्चरण प्रारम्भ किये थे और नवम्बर 1958 में 4 दिन तक यज्ञ कर कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूर्णाहुति दी थी। गायत्री का देवता सविता है, इसलिए इस गायत्री अभियान का भी उद्देश्य उसका अध्ययन और प्रयोग भी था और उन उपलब्धियों से सारे विश्व समाज को लाभान्वित कराना भी जो ऐसे अवसरों पर देव शक्तियों को सुविधापूर्वक अर्जित को जा सकते हैं।
उस यज्ञ के बाद से विश्व की गतिविधियों का अध्ययन करने वाले यह देखकर आश्चर्यचकित है कि न केवल प्रकृति अपने विधान बदल रही है वरन् लोगों की भावनाएँ और विचार भी तेजी से बदल रहे है। अमेरिका एवं योरोप की विलासिताप्रिय और भौतिकवादी प्रज्ञा भी अध्यात्म का आश्रय पाने के लिए भागी चली आ रही है। भारतवर्ष को तो उसका सुनिश्चित लाभ मिलने वाला है, भले ही उसका प्रत्यक्ष दर्शन 1999 के बाद दिखाई दे। अपने दैनिक जीवन में सूर्य की शाँत स्थिति प्रातः और संध्या के समय होती है, भारतीय आचार्यों ने यह दोनों ही समय जप के लिए उपयुक्त बताये है, इसी प्रकार नवरात्रि पर विशेष साधनाएँ करने का जो विधान है, वह सूर्य की इस आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक शक्ति का खोज का ही फल है एवं पूर्णतया विज्ञानसम्मत है।
सृष्टि के स्वामी भगवान है। उनके प्रति अगाध श्रद्धा और अटल विश्वास के साथ सम्पूर्ण समर्पण किया गया मानापमान, सुख-दुख जैसी हर तरह की परिस्थितियों को उनका मंगल विधान समझते और उनमें एकरस रहते हुए समस्त भार उनको सौंप दिया गया, तो फिर भक्त की सारी जिम्मेदारी को वे अपने कंधों पर वहन कर लेते हैं। यही है भगवद् शरणागति। समर्पण योग इसी को कहते हैं।
आये दिन इस प्रकार की कितनी ही घटनाएँ घटती रहती है, जिनमें इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद होता है कि भक्त यदि निष्कपट भाव से ईश्वर पर पूर्णरूपेण अवलम्बित हो तो सहायता असंदिग्ध है। ऐसी ही एक घटना का उल्लेख सुप्रसिद्ध विद्वान पण्डित गोपीनाथ कविराज ने अपनी पुस्तक ‘साधु दर्शन एवं सत्प्रसंग’ में किया है। प्रसंग शशिभूषण सान्याल नामक एक बंगाली भक्त का है। वे अत्यन्त सरल, संयमी और विनीत स्वभाव के थे। ईश्वर के प्रति उनका अनुराग अद्भुत था। अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे अपनी कठिनाई किसी के समक्ष प्रकट नहीं करते कहते इसकी आवश्यकता नहीं है। अन्तर्यामी ईश्वर सब कुछ जानते हैं। उनकी इच्छा हुई तो क्षणमात्र में ही सब कुछ अनुकूल हो सकता है। वह गृहस्थ थे। उनकी छोटी गृहस्थी में कुल तीन सदस्य थे-वह स्वयं, उनकी पत्नी और एक पुत्र। नौकरी करना उन्हें रुचता नहीं था, अतः भक्तों द्वारा जो कुछ मिल जाता, उसी से किसी प्रकार उनकी गृहस्थी चलती।
यों चिकित्सा के वे मर्मज्ञ थे और एक साथ आयुर्वेद, एलोपैथी, होम्योपैथी, क्रोमोपैथी, बायोकेमिक जैसी कितनी ही प्रणालियों का उन्हें तात्विक एवं प्रायोगिक ज्ञान था। वे चाहते, तो इनके द्वारा पर्याप्त धनोपार्जन कर सकते थे और अपनी गृहस्थी को अभाव रहित बना सकते थे पर ऐसा उनका स्वभाव था नहीं। इसका यह मतलब नहीं कि वे चिकित्सा करते ही नहीं थे। उनके घर पर बीमार और रोगी व्यक्तियों की बड़ी संख्या बनी रहती। वे दूर-दूर से चिकित्सा कराने हेतु उनके पास पहुँचते। इसके अतिरिक्त शास्त्र अध्ययन करने वाले शिक्षार्थी भी रहते थे। सबकी वे निःशुल्क सेवा करते थे। इतना ही नहीं, उनकी भोजन-व्यवस्था भी उन्हीं के ऊपर थी। इसे वे अपना कर्त्तव्य समझते।
जिन दिनों का यह प्रसंग है, उन दिनों वे वराह नगर (कलकत्ता) में रहते थे। एक बार उनके सामने भारी अर्थ संकट उपस्थित हुआ। वे उधेड़बुन में पड़ गये कि अर्थाभाव को दूर करने के लिए चिकित्सा-शुल्क ग्रहण करना चाहिए या नहीं? ऊहापोह बढ़ने लगी। समाधान का कोई उपाय न पाकर मन व्याकुल हो उठा। बेचैनी इतनी बढ़ी कि सर्वदा सौम्य-मूर्ति से प्रतीत होने वाले वे आज अचानक एकदम असामान्य हो गये। तभी अकस्मात वायु से उड़कर किसी छित्र पुस्तक का एक खण्ड पत्र उनके समीप आ गिरा। वह किसी वैदिक वाङ्मय का अंश था। उस पर लिखा था कि ब्राह्मण वृत्ति वालों के लिए भेषज का आश्रय ग्रहण करना उचित नहीं। वे समझ गये कि चिकित्सा-वृत्ति को जीविकोपार्जन का साधन नहीं बनाया जा सकेगा।
समाधान पाकर वे निश्चिंत हो गये। उस दिन कहीं से भी कुछ नहीं जुट पाया। माँगना उनके स्वभाव में था नहीं। अयाचित भाव तथा शुद्ध अन्तःकरण से जो कुछ उपलब्ध होता, उसी से सब का निर्वाह चलता पर आज तो निराहार रहने जैसी स्थिति आ उपस्थित हुई। शायद भगवान अपने भक्त की परीक्षा ले रहे हों। वह तो खुशी-खुशी अनाहार रह जाएं पर परिकर के अन्य सदस्यों का क्या हो? यह सोच-सोच कर उनका मन कचोटता पर उपाय क्या हो? कहीं कोई आशा दीख नहीं पड़ती! हार का तब सबने विल्व पत्र का रस ग्रहण कर वह दिन बिताया। दूसरा दिन भी इसी प्रकार कटा। तीसरा दिन आ गया। दोपहर तक कहीं से कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ पर सान्याल महाशय अविचलित भाव से अपने दैनिक कार्यों में लगे रहे। बीमारों की चिकित्सा की और विद्यार्थियों को शास्त्र ग्रन्थ पढ़ाया, उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। इस समय भी वे एकदम अक्षुब्ध और शान्त थे, मानो कुछ भी असामान्य घटित हुआ हो। इन तीन दिनों में उनके कार्य और व्यवहार में तनिक भी परिवर्तन नहीं हुआ। सभी कुछ यथाविधि कथाक्रम चलता रहा, अतएव मिलने आने वाले भक्तों और श्रद्धालुओं को भी इसका किंचित आभास नहीं मिल सका कि विगत दो दिनों में क्या कुछ असाधारण घटित हो गया।
तीसरे दिन का अपराह्मोत्तर काल आया। यह ब्रह्मसूत्र ग्रन्थ पर चर्चा का नियत समय था। इस निमित्त प्रदिनद बड़ी संख्या में आस-पास के विद्वत्गण उपस्थिति होते। कहते हैं कि उस रोज रामकृष्ण परमहंस के अन्तरंग शिष्य स्वामी अभेदानन्द भी वहाँ मौजूद थे पर तब काली महाराज के नाम से जाने जाते थे मीमाँसा प्रारम्भ हुई। सान्याल महाशय एक-एक सूत्र की व्याख्या साधन द्वारा उपलब्ध ज्ञान के आधार पर करने लगे। सब मंत्रमुग्ध हो उसे सुन रहे थे। ऐसी सुन्दर और वीन विवेचना कदाचित ही उनने पहले कभी सुनी हो। धीरे-धीरे कर दार्शनिक व्याख्या गहन-से गहनतर भूमिका में प्रवेश करने लगी। उसी समय डाक विभाग का पत्रवाहक एक रजिस्ट्री लेकर वहाँ उपस्थित हुआ। पत्र सान्याल महाशय के नाम था और उसे किसी “मित्र” नामधारी व्यक्ति ने भेजा था। उन्होंने हस्ताक्षर करके पत्र ग्रहण किया। इसके बाद उसे खोल कर आद्योपान्त में नहीं मन पढ़ डाला। तत्पश्चात् पत्र बगल में रख करके बैठ गये। उपस्थित लोगों ने देखा कि उनकी आंखें सजल हो उठी है। केवल इतना ही नहीं, उनसे अविरल अश्रुधारा प्रभावित होने लगी। सब स्तब्ध रह गये।जिनके नेत्रों से आँसू बड़े-से-बड़े दुःख में भी नहीं निकल पाते थे, आज वे इस प्रकार बरस रहे हैं-लोगों को यह बड़ा विचित्र-सा लगा। 15 मिनटों तक यह सब कुछ चलता रहा। श्रोतागण मौन पर आश्चर्यचकित होकर देखते रहे। यह एक अभूतपूर्व दृश्य था।
अन्ततः मौन भंग हुआ। अभेदानन्द बोले-महाराज, बात क्या है? क्या कोई शोक-संवाद आया है? आपकी आँखों में यह जल कैसा? जितने हँसने-हँसते अपने प्रिया शिशु को श्मशान ले जाकर चिता पर सुलाया, वे आज इस प्रकार शोकविहल होंगे- यह समझ में नहीं आता और न बुद्धि इसे स्वीकार करना चाहती है किन्तु प्रत्यक्ष में तो ऐसा ही कुछ दीख रहा है। आखिर इस अन्तर्विरोध का कारण क्या है? पत्र पढ़ कर आप इस प्रकार हतप्रभ क्यों हो गये, इसे स्पष्ट करने की कृपा करें?”
यह सुनकर उनकी धीर-गंभीर वाणी उभरी। वे बोले-” यह शोक के आँसू नहीं है। शोक मुझे विचलित नहीं कर पाता। मैं भगवद् करुणा से अभिभूत हूँ। उनकी कृपा का स्मरण कर कठोर संयमी होने के बावजूद अश्रु का संवरण नहीं कर पाता। आज इसीलिए अश्रुपात हो रहे है। इसमें न तो हर्ष है, न निषाद, वरन् करुणा सिन्धु के दिव्य अनुग्रह से उपजे अन्तःकरण की यह परिणति है।” इतना कहकर उन्होंने पत्र भक्तों के सम्मुख रख दिया और उसे पढ़ लेने का आग्रह किया। पत्र प्रेषक ने उसमें लिखा था कि विगत रात्रि को उसने एक अद्भुत स्वप्न देखा । सपने में भगवान काशी-विश्वनाथ प्रकट होकर कह रहे थे कि अत्यन्त भूखे है। कई दिनों का उपवास है। भक्त के भूखे होने से भला वे अन्न कैसे ग्रहण कर सकते है? वे कह रहे थे कि उनका एक परम भक्त आहार की व्यवस्था न हो पाने के कारण कई रोज से निराहार है। उसकी इस अवस्था से मुझे असह्य कष्ट हो रहा है। तुम यदि मुझ पर तनिक भी भक्ति रखते हो, तो अविलम्ब उसके भोजन की व्यवस्था करो। इतना कहकर उन्होंने स्वप्नद्रष्टा को सान्याल महाशय का नाम और उनका पूरा पता बता दिया। इसके अतिरिक्त स्वर्णाक्षरों में उसे लिखकर भी बता दिया। इसके उपरान्त उन सज्जन की नींद खुल गई। उन्होंने सर्वप्रथम स्वप्नद्रष्टा नाम और पता नोट किया, तत्पश्चात् इन्ष्योर करके पाँच सौ रुपये का नोट उक्त पते पर भेज दिया। पत्र के अन्त में एक टिप्पणी लगाते हुए उनने लिखा कि यद्यपि वे व्यक्तिगत रूप से उन्हें नहीं जानते और न उनके ठिकाने की ही सही जानकारी है, फिर भी उन्हें विश्वास है कि उनका स्वप्न मिथ्या नहीं होगा और पत्र एवं रुपये यथास्थान सुरक्षित पहुँच जाएँगे।
इसके उपरान्त सान्याल महाशय ने पिछले तीन दिनों से जिस प्रकार घर की व्यवस्था चल रही थी, उसे खोल कर कहा। यह भी बताने में संकोच न किया कि वे सभी तीन रोज से अनाहार है। उन्होंने यह भी कहा कि चूँकि उनका एकमात्र अवलम्ब भगवान हैं, अतः अपने कष्ट को संसार के समक्ष उद्घटित करने की उनकी यत्किंचित् भी इच्छा न हुई। उन्हें यह अडिग विश्वास था कि जिनको उनने सब कुछ समर्पित किया है, उन भगवान के लिए यह निमिष मात्र का व्यापार है। इतना कहकर वे बोले कि भगवान की इसी करुणा की बात स्मरण करके उनके नेत्र भर आये थे। यह सुनकर सभी आनन्दविभोर हो उठे और ईश्वर के नाम-कीर्तन करने लगे। उस दिन शास्त्र-मीमाँसा यहीं समाप्त हो गई।
परमेश्वर सर्वप्रथम भक्त की ऋजुता और निष्कपटता देखते हैं। इस कसौटी पर खरा उतरने के पश्चात् तो उस पर अयाचित अजस्र अनुग्रह की वर्षा आरंभ हो जाती हैं आज तो पग-पग पर विश्वासघात होते और कुचक्र रचे जाते हैं। किस पर विश्वास किया जाय और किसे अप्रमाणिक माना जाय? यह निर्णय करते बुद्धि चकराने लगती है, कारण कि असल की नकल का बाजार इन दिनों खूब गर्म है। असली आवरण में नकली लोग दादुरों की तरह वृद्धि कर रहे हैं। ऐसे में यदि उनकी यह शिकायत हो कि सर्वसाधारण के लिए सम्प्रति भगवद् करुणा संभव नहीं, तो इसमें मिथ्या क्या है? क्योंकि वर्तमान मानवी चिंतन जितना पतित और विकृत हुआ है, वैसा शायद पहले कभी नहीं हुआ। जब साधारण मनुष्य तक गंदगी पसन्द नहीं करते, तो फिर यह आशा कैसे की जा सकती है कि सर्वोपरि भगवद् चेतना गन्दे आचार-विचार वालों पर अवतरित होगी अथवा उनकी सहायता करेगी। परिष्कृति उनको सबसे प्रिय है। इतना यदि हो सका, तो उनकी समर्थ सहायता पाने के लिए कुछ विशेष करने और कहीं बाहर जाने की जरूरत न पड़ेगी। ईश्वरीय चेतना सर्वत्र समान रूप में विद्यमान है। उसे यदि उपासनागृह के एकान्त में अनुभव किया जा सकता है, तो कोई कारण नहीं कि मरुस्थल के नितान्त निर्जन में उसका साक्षात्कार न किया जा सके। वह देश-काल के बन्धन से सर्वथा परे है। उसे कहीं भी, कभी भी उपलब्ध करने में कोई अड़चन नहीं। अवरोध है, तो सिर्फ निजी सत्ता की गुणवत्ता के संदर्भ में। उसे यदि हटाया और मिटाया जा सके, तो परमेश्वर का सहयोग तत्काल और तत्क्षण अर्जित करने में कोई विलम्ब नहीं।
समर्पण योग इसका अगला चरण है। इसमें हर स्थिति और हर परिस्थिति को भगवान की ही अनुकम्पा मानकर स्वीकार और संतोष करना पड़ता है। दूसरों शब्दों में कहें, तो अपनी इच्छा-अनिच्छा, पसन्द-नापसन्द, रुचि-अरुचि सब कुछ को विसर्जित कर ईश्वरीय आकाँक्षा को ही सर्वोपरि रूप में अंगीकार करना पड़ता है। इतना हो सका और परमेश्वर के प्रति अकृत्रिम श्रद्धा उपज सकी, तो फिर “योगक्षेमं वहाम्हम्” के भगवद् वचन के चरितार्थ होने में देर नहीं लगती।
जीवन की तरह आकाश भी असीम और अनन्त सत्ताओं और संभावनाओं से भरा है। इसका सामान्य स्वरूप ही मोटे साधनों से देखा-समझा जा सकता है। आंखों की शक्ति बहुत स्वल्प है, वह पीछे की वस्तुओं को बिल्कुल ही नहीं देख सकतीं, दायें-बायें भी थोड़ा-सा ही दीखता है। चार दिशाओं में से सही रीति से वह केवल एक ही सामने वाली दिशा में देख पाती हैं, सो भी एक सीमित परिधि और परिमित आकार तक। चर्म चक्षुओं से सामने प्रस्तुत संसार को भी पूरी तरह नहीं देखा जा सकता, तो अंतःक्षेत्र में काम करने वाली शक्तियों को देखने-समझने में उनसे क्या सहायता मिल सकती है? आत्मा, परमात्मा, अन्तःकरण और अन्तर्निहित दिव्य सत्ताओं को देख-परख पाना चर्मचक्षुओं का नहीं, ज्ञान चक्षुओं का काम है।
जीवन की तरह आकाश की भी असीमता है। उसका अधिकाँश भाग आँखों की पकड़ से बाहर है। जिस प्रकार अंतर्गत सूक्ष्म जगत के अवलोकन ज्ञान-चक्षु कराते हैं, उसी प्रकार विस्तृत आकाश के पर्यवेक्षण के लिए भी विशिष्ट उपकरण चाहिए। यह उपकरण दूरबीन है। इस यंत्र को जितना अधिक विकसित-परिष्कृत किया जा सका है, उसी अनुपात से आकाश संबंधी जानकारियाँ बढ़ती चली आयी है। खगोल विद्या की उपलब्धियों का श्रेय ज्ञान-चक्षुओं की पैनी दृष्टि को मिलता रहा है।
यहाँ मेला-ठेला या प्राकृतिक दृश्यों को देखने के लिए पर्यटकों के गले में लटकने वाली दो नाली दूरबीन की चर्चा नहीं हो रही है। इनका उद्देश्य मनोविनोद भर है। कुछ अधिक दूर की वस्तुओं को थोड़ा स्पष्ट करके दिखाने वाली इन दूरबीनों को ‘बाइनोक्यूलर’ कहते हैं। फौजी प्रसरेजल के लिए उनसे कुछ सुधरे हुए टेलिस्कोप काम में आते हैं।
किन्तु जब उद्देश्य आकाश की छानबीन करना और दूरस्थ पिण्डों की जानकारी प्राप्त करना हो, तब और अधिक शक्तिशाली टेलिस्कोपों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी प्रथम दूरबीन सन् 1609 में गैलीलियो ने बनायी थी। इससे वस्तुओं को उसके वास्तविक आकर से तीन गुना बड़ा देखा जा सकता था। उन दिनों इतना भी बहुत था। सूर्य के धब्बे, चन्द्रमा के पहाड़, बृहस्पति के चारों उपग्रह उससे देख लिये गये थे।
इसके बाद समय बीतने के साथ-साथ उनमें सुधार और विकास होता गया। अमेरिकी खगोलवेत्ता एल्लरी हाले ने सन् 1936 में सौ इंच व्यास को दूरबीन बनायी, जिसे विल्सन पर्वत पर स्थापित किया गया। यह 60 करोड़ प्रकाश वर्ष तक के आकाशीय पिण्डों को दृष्टिगोचर बनाती थी। इसके उपरान्त हाले ने 200 इंच व्यास की दूरबीन बनाने का काम हाथ में लिया, जो उनकी मृत्यु के दस वर्ष पश्चात पूरा हो सका। इसे 1948 में पालोमर पर्वत पर स्थापित किया गया। बहुत समय तक वही संसार का सबसे बड़ा दूरवीक्षण यंत्र होने का गौरव प्राप्त करता रहा।
पूर्ववर्ती सोवियत संघ इस क्षेत्र में अमेरिका से बाजी मार ले गया। उसने 238 इंच व्यास वाली दूरबीन बनायी और उसे सेमिकोदनिकी पर्वत पर स्थापित किया। अमेरिकी दूरबीन 450 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर तक प्रकाश को दिखा सकती थी, तो रूसी यंत्र 6 अरब प्रकाश वर्ष दूर के दृश्य आँखों के सामने लाकर खड़े कर देता है।
इस बड़ी दूरबीन से दस हजार किलोमीटर पर खड़ा हुआ मनुष्य ऐसा दिखाई पड़ेगा, मानो बीस मीटर की दूरी पर खड़ा है। इतनी दूरी पर कोई माचिस की तीली जलाये, तो इसकी सहायता से वह प्रकाश भी साफ दिखाई देगा।संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि हमारी आँखों की तुलना में इस अमेरिकी दूरबीन की ताकत दस लाख गुनी और रूसी दूरबीन की तीस लाख गुनी अधिक है।
दूरवीक्षणों का काँच बनाना बहुत ही मुश्किल काम है। उन्हें घिसना, पालिश करना इतना नाजुक है कि एक धूल कण भी आड़े आ जाय, तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। इतने घिसाव में 70 ग्राम काँच की एक पर्त उतारनी पड़ेगी और उस परिवर्तन से उस मशीन को फिट करने में नये सिरे से हेर-फेर करने पड़ेंगे। उस खरोंच को निकालने के लिए पूरे काँच पर से एक माइक्रोन मोटाई की पूरी पर्त उतारनी पड़ेगी। रूसी दूरबीन 850 टन भारी है। इसका फोकस ठीक करने के तथा दिशा घुमाने के लिए स्वसंचालित बिजली की मशीनें लगी हुई है।
न तो सुविस्तृत आकाश की जानकारियाँ देने वाली दूरबीन बनाना सरल है और न अंतर्दृष्टि को विकसित करना। यह दोनों ही बड़े प्रयत्न और मनोयोग के सहारे सम्पन्न होती है। उनके लिए उपलब्ध साधनों को भी झोंकना पड़ता है। इस उपलब्धि में जितनी सफलता मिलती है, उतनी ही सशक्तता हाथ लगती है। अन्तर्ग्रही उड़ानों की सफलता उन दूरबीनों के कारण ही संभव हुई है। भविष्य में मनुष्य विश्व-ब्रह्माण्ड पर जितना आधिपत्य स्थापित कर सकेगा, उसमें भी योगदान इन दूरबीनों का ही रहेगा। अन्तःचेतना की ज्ञान-दृष्टि ही मानव जीवन के असीम विकास का पथ प्रशस्त करती है।
दृष्टिगोचर होने वाले अनन्त आकाश को प्राचीन खगोलवेत्ताओं ने बारह भागों में बाँटा है, जिन्हें बारह राशियों कहते हैं। कौन-सा ग्रह-नक्षत्र किस समय कहाँ है? इसका निर्धारण राशि-क्षेत्र का विभाजन किये बिना हो ही नहीं सकता। जिस प्रकार अंकगणित 9 तक के अंक और एक शून्य की मान्यता स्थिर कर लेने के उपरान्त ही गाड़ी आगे चलती है, उसी प्रकार खगोल विद्या में आकाश का विभाजन कर लेने पर ही किस ग्रह की स्थिति कब, कहाँ, कैसी थी या होगी-इसका आधार खड़ा किया जा सकता है।
बारह महीने सूर्य की बारह राशियों के हिसाब से बने है। एक महीना सूर्य एक राशि पर रहता है। बारह महीनों में यह वर्ष-
प्रदक्षिणा पूरी हो जाती हैं यों परिक्रमा पृथ्वी की ही होती है और सूर्य का स्थान बदलना वस्तुतः पृथ्वी के थान बदलने की प्रतिक्रिया रूप से ही परिलक्षित होता है, तो भी इससे सूर्य की राशि कक्षा निर्धारित करने में कुछ अन्तर नहीं पड़ता।
आकाश को देखकर राशियों का क्षेत्र विभाजित करने का क्रम उन चिन्हों के आधार पर निरूपित किया गया है, जो चिरस्थायी बने रहते हैं और जिनकी मूल स्थिति में अन्तर नहीं आता। यह चिन्ह आकाश स्थित निहारिकाओं के रूप में स्थिर किये गये है। निहारिकाओं के अब तो नाम भी दे दिये गये हैं, प्राचीनकाल में इन्हें आकृतियों की समतुल्यता के आधार पर पहचाना जाता था। यह पहचान ऐसी है, जिसमें भूल होने की कम से कम संभावना है।
खगोलशास्त्री बराहमिहिर ने अपने “ वृहज्जातक” ग्रन्थ में बारहों राशियों की आकृतियों का निर्धारण किया है। यूनानी ज्योतिषी भी प्रायः उसी से मिलती-जुलती मान्यता रखते हैं। अब नवीनतम ज्योतिष विज्ञान ने राशियों का क्षेत्र-विभाजन जिन निहारिकाओं को मील के पत्थर मानकर किया है, उन्हें भी आकृति की दृष्टि से पुराने ज्योतिष शास्त्र की तुलना में ही लिया जा सकता है।
वैदिक पंचाँग में मेष राशि को सींग वाले मेढ़े की आकृति का माना है। निहारिका “एन.जी.सी. 4449” का फोटो भी इसी आकृति का है। वृष राशि का सींगों वाला साँड़ निहारिका “ओरायन” से बिल्कुल मिलता है। कर्क निहारिका “एम. 17” केकड़े की आकृति जैसी ही है। कन्या राशि को नाव बैठी एक लड़की के रूप में अंकित किया जाता है यह “एन.जी.सी 4594” के चित्र से मेल खाती है। धनु को आधा घोड़ा और आधा धनुर्धर मनुष्य अंकित किया गया है, जो “एन.जी.सी. 6618” निहारिका से काफी साम्य रखती है। मकर राशि को मगर की आकृति का माना गया है। यह “एन.जी.सी. 7474 की अत्यन्त निकटवर्ती है।” कुम्भ घड़े का आकार है, यह “एन.जी.सी. 7293” की छवि है। मीन को दो तैरती हुई मछलियों की शक्ल प्राप्त है, जिनका मुख एक-दूसरे की पूँछ की ओर है यह चित्र निहारिका “एन.जी.सी. 253” से बिल्कुल मिलता-जुलता है।
इस प्रकार आठ राशियों की आकृति निहारिकाओं के चित्रों से मिल जाती है। शेष चार की आकृति इसलिए नहीं मिलती कि उस क्षेत्र की निहारिकाएं बहुत विरल हैं ओर उनके फोटो उतने स्पष्ट नहीं आते। इन दिनों जितने अन्तर्ग्रही स्पष्ट चित्र खींचने वाले कैमरे उपलब्ध है, उतना कार्य प्राचीनकाल में खुली आँखें नहीं कर पाती है।
जिन चार राशियों की आकृतियाँ आकाशस्थ निहारिकाओं में नहीं देखी जा सकी, वे हैं-मिथुन अर्थात् स्त्री-पुरुष, सिंह-शेर, तुला-तराजू, वृश्चिक-बिच्छू शेष आठ का वर्णन ऊपर किया जा चुका है। इन आकृतियों को तुलनात्मक समझना चाहिए। सचमुच के बैल, सिंह, मगर मछली आदि की तलाश कोई आकाश में करने लगे और यह मान बैठे कि इस प्रकार के प्राणी वहाँ निवास और भ्रमण करते हैं तो यह भूल होगी।
ठीक इसी प्रकार देवी-देवताओं का चित्रांकन समझा जाना चाहिए। उस आकृति-प्रकृति के कोई जीवधारी देवता अमुक स्थान पर, अमुक प्रकार का जीवनयापन करते होंगे-जो ऐसा समझते हैं, वे भूल करते हैं। वस्तुतः विभिन्न शक्तियों और विभिन्न चेतनाओं की क्षमताओं और संभावनाओं को ध्यान में रखकर उनकी आलंकारिक प्रतिमाएँ गढ़ ली गई है। इसे गढ़ेपे की प्रक्रिया को बान बोध कह सकते हैं। छोटे बालकों को आरंभिक कक्षा में अ-अमरूद,आ-आम, इ-इमली, ई-ईख आदि आकृतियाँ दिखाकर अक्षर-बोध कराते हैं, उसी प्रकार संघ शक्ति को दुर्गा, णन शक्ति को लक्ष्मी, ज्ञान शक्ति को सरस्वती आदि आलंकारिक प्रतिमाएँ गढ़कर यह बताया गया है कि यह सभी भौतिक और आत्मिक शक्तियाँ उपलब्ध करने योग्य है।
जिन्हें संसार भवबन्धन दीखता है, वे जमीन खेद कर पाताल पहुँचें या सीढ़ियाँ लाँघकर आसमान पर चढ़ें। व्यावहारिक जीवन तो इस संसार में रहते हुए सहयोगपूर्वक ही जिया जा सकता है।
राशियों की आकृतियाँ न तो अनावश्यक है, न भ्रांत। वस्तुस्थिति समझाने का यह प्रतीक निर्धारण अलंकार है। इससे इन्हें समझना सरल पड़ता है। दिव्य शक्तियों को देव सत्ता के रूप में चित्रित किया जाना भी इसी स्तर का है।उनकी पूजा-प्रक्रिया में अप्रत्यक्ष रूप में उन चेष्टाओं का संकेत है, जो उन विभूतियों को उपलब्ध कराने में सहायक होती है। आकाश के निरीक्षण के लिए दूरबीन आवश्यक है और जीवन सत्ता की असीम संभावनाओं को समझना तथा उस दिशा में प्रगति करने का आधार हमारी सूक्ष्म दृष्टि ही हो सकती है। भगवान शंकर का तृतीय नेत्र, मनुष्य का आज्ञाचक्र इसी ज्ञान-चक्षु उन्मोलन की आवश्यकता का संकेत करते हैं।
केवल एक प्रार्थना आप स्वीकार कर लें।” युवक ने कप्तान से लगभग गिड़गिड़ाकर कहा-”मैं जहाज पर रहूंगा। हरिशरण को आप नौका पर ले लें।”
“कप्तान?” हरिशरण ने बड़े दृढ़ स्वर ने कहा- “चिट्ठियों ने जो निर्णय किया है, उसे बदलने का अधिकार आप को भी नहीं है। शीघ्रता कीजिए। देर करने से नौका भी जहाज के साथ जाएगी।”
जहाज का पेंदा फट चुका था। बड़ा भयंकर तूफान आया था समुद्र में। जहाज को नियन्त्रण में रख पाना असम्भव हो गया और निश्चित मार्ग से भटकने का जो फल हो सकता था हुआ। किसी समुद्र में डूबे पर्वत से (मूँगे का पर्वत भी हो सकता है) जहाज टकरा गया। पेंदे के मार्ग से समुद्र का पानी शीघ्रता से भरता जा रहा था। बचने का कोई आशा नहीं थी।
बेतार के यन्त्र से समाचार चारों ओर भेजे जा चुके थे। लेकिन इतनी शीघ्र सहायता पहुँच सके, इसकी कोई आशा नहीं दिख रही थी। कोई भी अच्छा बन्दरगाह पास नहीं। रक्षा नौकाएँ उतारी गयी। वृद्ध, बालक एवं महिलाएँ उन पर बैठा दी गयी। अन्त में केवल एक नौका रही। उस पर केवल पन्द्रह व्यक्ति बैठ सकते थे। “कौन बैठे? किसे मरने की छोड़ दिया जाए?” कप्तान ने चिट्ठियां डलवायी और जो पन्द्रह नाम पहले निकले, उन्हीं पर बिठाना निश्चित हो गया।
बड़ी विचित्र है इन दोनों की मित्रता। एक ओर प्राणों के लाले पड़े है और प्राणों के लाले पड़े है और यह मनमोहन है कि अड़े है- मैं नौका पर नहीं जाऊँगा। मेरे स्थान पर हरिशरण जाएँगे।
“मनमोहन बचपना मत करो। चिट्ठी तुम्हारे नाम की निकली है। हरिशरण कोई बात सुनना नहीं चाहते। जाकर नौका पर बैठो।”
“कोई चलो, पर चलो!” कप्तान को इससे मतलब
नहीं कि कौन चलेगा उसे शीघ्रता है-”मैं और प्रतीक्षा नहीं कर सकता है।”
“आप नौका खोल दें?” मनमोहन ने दृढ़ स्वर से कहा-”हम दोनों साथ मरेंगे।”
“हरिशरण जी। आप भी पधारें।” कप्तान इस मित्रता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने नौका में एक व्यक्ति का अधिक भार होने पर कोई भय हो सकता है, इस बात की उपेक्षा कर दी। “हम सोलह व्यक्ति लोग नौका में।”
लेकिन नौका में बैठ जाने से ही प्राण रक्षा हो जाय, ऐसी आशा किसी की नहीं थी। तूफान-वह तूफान जिसमें जहाज पथ-भ्रष्ट होकर फट गया था, शान्त नहीं हुआ था। उस तूफान में रक्षा नौकाओं की रक्षा का ही कितना भरोसा?
जिसकी आशंका थी, वही हुआ। रक्षा नौका लहरों के प्रवाह में बह चली-बहती गयी और लहर के थपेड़ों से, शार्क या अन्य किसी जल-जन्तु के आघात से पता नहीं कैसे सहसा टुकड़े -टुकड़े हो गयी। अभागे यात्री-सागर की उत्ताल तरंगें और ऊपर खुला आकाश-कोई उनका क्रन्दन सुनने वाली भी नहीं था।
समाचार पत्रों में दूसरे दिन उस जहाज के डूबने का समाचार छपा। एक भारतीय जहाज उस समय समुद्र में कही पास ही था। उसने बेतार के यन्त्र पर सहायता की पुकार सुनकर दौड़ लगायी। समाचार पत्र तथा देश के शासकों एवं संस्थाओं ने भारतीय जहाज के कर्मचारियों के साहस को धन्यवाद दिया था। भयंकर तूफान के चलते उस भारतीय जहाज ने डूबते जहाज तथा रक्षा नौकाओं पर बैठे प्रायः सभी यात्रियों को बचा लिया था। केवल एक रक्षा नौका नहीं मिल सकी। उसके कुछ यात्री, जिनमें डूबने वाले जहाज का कप्तान भी था। समुद्र में टूटे तख्तों के सहारे तैरते हुए उठाए गए थे। एक जहाज दुर्घटना में डूब जाय और पाँच-सात प्राणियों की हानि हो-किसी को गिनने जैसी बात नहीं लगी।
इस ढूँढ़-खोज से बेखबर उसने हम कहाँ है? कहते हुए आंखें खोली। खुरदरी काली चट्टान पर कोई उसका सिर गोद में लिए बैठा था। प्रचण्ड धूप ने पत्थर को गरम कर दिया था। कितनी देर मूर्छित रहा वह, पता नहीं। नेत्र खोलने पर एक बार इधर-उधर देखना चाहा। समुद्र के किनारे ही पड़ा था वह और उसका मस्तक अपने मित्र की गोद में था।
“तुम उठ सकते हो?” हरिशरण ने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-”तनिक प्रयत्न करो। थोड़ी दूर खिसकने से हम छाया में पहुँच जाएँगे। उठने की उसने चेष्टा की और वह ओ-ओ करके वमन करने लगा। समुद्र का जो पानी पेट में चला गया था, उसका निकल लाना अच्छा ही हुआ। नौका डूबने पर दोनों भाग्य से एक ही तख्ते को पकड़ सके। उसके बाद क्या हुआ यह किसी को पता नहीं। लहरों के थपेड़ों ने श्वास लेना असम्भव प्रायः कर दिया। मूर्छा आ गयी उन्हें।
हरिशरण कुछ पहले जागे। मूर्छा से ही नहीं महामृत्यु से जगने जैसा लगा उन्हें। लहरों ने किनारे की चट्टान पर पटक दिया था। अंग-अंग जैसे टूट गया था। शरीर के कितने स्थान फटकर घाव बन गए है, यह जानने-समझने की शक्ति नहीं थी। मस्तक दर्द से फटा जा रहा था और पेट में जैसे ज्वालामुखी जाग गया हो। मिचली आयी और सबसे पहले मुख में अंगुली डालकर डालकर वमन की क्रिया को उन्होंने सहायता दी।”
“मनमोहन कहाँ है?” पेट में गया समुद्र का जल निकलते ही पीड़ा इतनी कम हुई थी कि मस्तिष्क हिलाकर इधर-उधर देखा जा सके। उनका मित्र उनसे तीन-चार हाथ पर चित्र पड़ा था। उसके शरीर के घावों से निकल कर रक्त उस काली शिला जहाँ-तहाँ जम गया था।
समुद्र का ज्वार उतर गया है। तूफान प्रायः शान्त हो चुका था। हरिशरण को अपनी पीड़ा भूल गयी। वे पेट के बल धीरे-धीरे खिसकने लगे। वह चार हाथ की दूरी चार योजन जैसी बन गयी थी। शरीर तवे की भाँति ज्वर से जल रहा था और ऊपर धूप में असह्य तेजी थी। किसी प्रकार खिसकते हुए वे मित्र के पास पहुँचे। शरीर छूते ही यह आश्वासन मिल गया-जीवन है।
“हम कहाँ हैं?” मनमोहन ने उठने का प्रयत्न किया और फिर लुढ़क गया। दोनों की दशा लगभग एक जैसी थी।
“कहाँ है, यह कौन जाने, किन्तु यहाँ से कुछ गज वर वृक्ष है। तुम साहस करा!” हरिशरण समझते थे कि चाहे जो हो, वृक्षों तक खिसक ही चलना चाहिए। यहाँ पड़े रहने तो तो मृत्यु निश्चित है। पीने योग्य पानी कहीं आस-पास है या नहीं, पता नहीं और यहाँ धूप तथा ज्वर के कारण कण्ठ सूख रहा है।
“पानी?” मनमोहन ने माँग नहीं की। उसने केवल जानना चाहा कि आस-पास कहीं जल है या नहीं?
“तुम छाया तक खिसक चलो तो मैं जल की खोज करने का प्रयत्न करूं।” हरिशरण ने उठने में सहायता दी। वैसे स्वयं उनके लिए उठना और खिसकना अत्यन्त कष्टकारक हो रहा था किन्तु वे नहीं चाहते थे कि मनमोहन को यह अनुभव हो कि उन्हें भी कुछ पीड़ा है।
“तुम्हें कहाँ चोट लगी? बड़ा तीव्र ज्वर है तुम्हें।” मनमोहन ने अब हरिशरण का हाथ पकड़ा ओर उनकी ओर देखना प्रारम्भ किया। उठने का प्रयत्न करने के बदले वह उनके मुख की ओर एकटक देखने लगा। उसके नेत्रों से धारा चलने लगी।
“मुझ कुछ नहीं हुआ।” हरिशरण ने उसके नेत्र पोंछ दिए। तुम रोओ मत! जो आपत्ति आ पड़ी है, उसे साहस तथा धैर्य से ही टाला जा सकता है। उठो तो सही।
दोनों ही इस योग्य नहीं थे कि उठ कर खड़े हो जाते। बैठकर एक दूसरे के सहारे खिसते, रुकते किसी प्रकार वृक्ष की छाया में पहुँचकर दोनों प्रायः लुढ़क गए। नेत्र खुलते नहीं थे। हरिशरण नेत्र बन्द किए-किए ही मित्र को आश्वासन दे रहे थे।
हे बजरंगबली! मनमोहन श्री हनुमान जी के उपासक हैं। वे अपने आराध्य का इस संकट में स्मरण न करें, तो कब स्मरण करेंगे।
सहसा एक धमाका हुआ। दोनों चौककर बैठ गए। दोनों के मध्य वृक्ष के ऊपर से एक बन्दर गिर पड़ा था और थर-थर काँप रहा था। अपने सब अंग उसने समेट लिए थे ओर सिर दोनों घुटनों में दबा रखा था।
“शेर आ रहा है।” सोचने-समझने का समय नहीं था। पचास गज से भी कम दूरी रह गयी थी। वृक्षों के बीच से निकल कर वनराज चडकड करता बड़ी धीर गति से बढ़ा आ रहा था। बन्दर शेर के भय से ही काँ रहा था और शेर के भय से ही वृक्ष से लुढ़क भी पड़ा था वह।
“शरणागत है यह!” मनमोहन को निश्चय करने में दो क्षण भी नहीं लगे। वह बन्दर को अपने पेट के नीचे दबाकर उसके ऊपर झुक गया। मरना ही है तो हम तीनों साथ मरेंगे। “हरिशरण अपने मित्र को नीचे करके उसके ऊपर झुक रहे।”
“क्या करते हैं आप?” लेकिन मनमोहन को न हिलने का समय मिला न बोलने का। एक हाथ से हरिशरण ने उसका मुख बन्द कर दिया। शेर पास आ गया था।
शेर सचमुच वन का राजा है। काली धारियों से सजा उसका पीला वर्ण, उसकी गम्भीर चाल और सबसे बढ़कर उसका गौरवपूर्ण स्वभाव। वह न गीदड़ जैसा ओछा है, न चीते जैसा धूर्त। उस वनराज के सम्बन्ध में कोई नहीं कर सकता कि कब वह क्रोध करेगा, कब कृपा करेगा और कब क्षमा कर देगा?
शेर पास आया। दो क्षण रुका रहा। कौतुक से देखता रहा टीले के समान एक-दूसरे पर पड़े तीनों प्राणियों को। उसने कदाचित सोचा होगा-यह कौर-सा पशु है, अपने वन में ऐसा गोलमटोल पशु तो मैंने देखा नहीं। कैसी गन्ध आती है इससे? बन्दर की और बन्दर से विचित्र भी। मैं माँरुगा इस? वन का राजा मैं इस बिना पैर के कछुए के समान पड़े रहने वाले पशु को माँरू। क्या हुआ जो यह खूब बड़ा कछुआ है। कोई प्राणी अपरिचित आहार सहसा मुख में नहीं डालता। शेर किसी विवशता से मनुष्य भक्षी न बन जाय, तब तक मनुष्य पर चोट नहीं करता ओर उस वन में मनुष्य आया होगा-सन्देह है।
शेर जैसे आया था, वैसे ही दूसरी ओर चला गया। जब वह ओझल हो गया, हरिशरण उठकर बैठ गए। मनमोहन ने भी बन्दर के ऊपर से अपने को अलग किया। बन्दर कई क्षण वैसे ही सिकुड़ा बैठा रहा। इसके बाद जब उसने नेत्र खोलें-पहले दो पैरों पर खड़े होकर इधर-उधर देखना प्रारम्भ किया और फिर उन दोनों मनुष्यों को देखता और कई प्रकार के संकेत करता रहा। सम्भवतः कृतज्ञता प्रकट कर रहा था। सहसा वहाँ से वह एक ओर भागने लगा और वृक्षों की डालियों पर कूदता बन में चला गया।
“पास ही कहीं जल होना चाहिए।” हरिशरण ठीक कह रहे थे। शेर पानी पीने गया हो सकता है या फिर पानी पीकर लोटा होगा।
समुद्र के किनारे कहीं मीठा पानी होगा, यह तो कठिन ही है। मनमोहन ने इधर-उधर देखना प्रारम्भ किया। छाया की शीतलता ने बहुत कुछ कष्ट कम कर दिया था अकस्मात जो भय आया था, उसकी शरीर पर अनुकूल प्रतिक्रिया हुई थी। बहुत पसीना आया और ज्वर उतर गया।
“लगता है महावीरजी ही हमारी रक्षा करने आए थे?” मनमोहन ने फिर गदगद कण्ठ से कहा।
“मालूम पड़ता है, हमारे लिए उन्होंने एक नवीन मित्र भेज दिया है। हरिशरण ने देख लिया था कि वह बन्दर लौट रहा है। वृक्षों पर से चढ़ना-उतरना बड़ा कठिन हो रहा है, उसके लिए किसी प्रकार दो बड़े-बड़े कच्चे नारियल मुख और एक हाथ के सहारे पकड़े चला आ रहा है उन्हीं की ओर।
इस अनोखी मित्रता के सहारे दिन-रातों में और दिवस में बदलने लगीं। इस बीच ये दोनों पास के वनवासियों से भी घुल-मिल गए। इन दिनों हरिशरण को अपने मित्र के आचरण-व्यवहार में कुछ बदलाव महसूस हुआ। उन्होंने अपने मित्र को समझाने का निश्चय किया। आज वे उसे एकान्त में इसीलिए ले आज थे। वे उसे तेज स्वर में कुछ समझा रहे थे।”
“मैं मनुष्य हूँ हरिशरण! मनुष्य के संयम की एक सीमा है।” मनमोहन ने मस्तक झुका रखा था।
“तुम भारत लोटने को उत्सुक नहीं हो या तुम उसे भारत ले जाने के लिए प्रस्तुत हो?” हरशिरण ने सीधा सवाल किया।
“मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और मेरा हृदय भारत में ही है।” जन्मभूमि के स्मरण से ही मनमोहन ने नेत्र भर आए।” हम वहाँ इस जीवन में पहुंच सकेंगे या नहीं, कौन जानता हैं?”
“तुम उसे साथ ले चलने का साहस करोगे, यदि चलने का अवसर आवे?” हरिशरण ने फिर पूछा।
“उसे ले चलना छिः।” मनमोहन ने मुख बनाया। “यह कैसी बात सोचते हो तुम? यह कैसे सम्भव है? आवश्यकता भी क्या है इसकी?”
कोई आवश्यकता नहीं है ? बड़ा तीक्ष्ण व्यंग्य था। वह एक वन्य कन्या है। कुरुपा है। असभ्य जाति की है। तुम्हें इसी से अधिकार है कि उसको जैसे चाहो ठगो।
इसमें ठगने की क्या बात है? मनमोहन ने सिर उठाया-उसकी जाति में कुछ पतिव्रत नहीं चलता। उसे कोई असुविधा नहीं होती है।
तुमने बता दिया है? स्वर कठोर हो गया-न बताया हो तो मैं उसके पिता को बता दूँ कि तुम विवाहित हो और भारत लौटने के उत्सुक भी।
“ यह सुनते ही पागल हो जाएगा।” मनमोहन चौंक पड़ा। उसके मित्र ने मन में यह बात आयी कैसे? वही मित्र जिसने उसे बचाने के लिए अनेकों यत्न किए। यह अचानक बदलाव उसने कुछ सोचते हुए कहा-”तुम चाहते हो कि वह क्रूर जंगली मेरी बोटियाँ कुत्तों को खिला दे?
“यह कुछ बुरा नहीं होगा।” हरिशरण पर कोई प्रभाव न पड़ा।”मेरे मित्र पर इतना पतन हो जाए कि वह भोले वनवासियों को धोखा देकर उनकी कन्याओं से अपनी कुत्सित वासना पूरी करना चाहे, इससे अच्छा है कि वह मार डाला जाय।”
दोनों ही भाग्य से जहाँ पहुँच गए थे, वह कोई वन्य भूमि थी। ऊँचे वृक्ष, घनी लताएँ और सभी प्रकार के वन पशु। यह तो उन्हें बहुत पीछे पता चला कि वे अफ्रीका महाद्वीप पर हैं। भूलते-भटकते एक गाँव में पहुंच गए थे वे। चारों ओर ऊँची लकड़ियों का सुदृढ़ घेरा बनाकर बीच में जंगल काटकर स्वच्छ भूमि निकाल ली यहाँ के लोगों ने। कुछ झोपड़ियाँ है उस भूमि के मध्य। केले लगे है आस-पास और कुछ खेत भी है। सामान्य जंगली जातियाँ आखेट जीवी होती हैं और यह गांव इसमें अपवाद नहीं। केवल इतनी बात है कि अफ्रीका के घोर वनों में रहने वाली जातियों के समान यहाँ के लोग नरभक्षी या मानव शत्रु नहीं है।
समुद्र का यह तट दूर-दूर तक जहाजों के ठहरने योग्य नहीं है। कहने को यह गांव ब्रिटिश उपनिवेश का भाग है किन्तु इतनी दूर है, उपनिवेश की मुख्य बस्तियों से कि गांव के बड़े-बूढ़ों को स्मरण है कि गाँव में एक बार तीन शिकारी साहब कुट हब्शी मजदूरों के साथ आये थे। जब हरिशरण और मनमोहन ग्राम में पहुँचे-उनका स्वागत-सत्कार हुआ। गांव के लोगों ने समण-ये दोनों साहब ही हैं। कपड़े पहनने वाला उनके लिए साहब हो गया या साहब का कृपापात्र। वे तो कमर में छाल लँगोट लगाते हैं। स्त्रियां खजूर के पत्तों का घाघरा पहनती है।
कोलतार जैसा काला शरीर मोटे-मोटे होंठ, पीले गन्दे दाँत उनकी भाषा का एक शब्द मनमोहन नहीं जानता था। हरिशरण विद्या व्यसनी हैं। यात्रा से पहले ही उन्होंने मूक संवाद (केवल होंठ हिलाकर बातचीत) बड़े परिश्रम से सीखी। प्रायः सभी जंगली जातियाँ बातचीत की यह पद्धति जानती हैं। अफ्रीका में यह नित्य की बात है कि दो ऐसी जाति के हब्शी परस्पर मिलें जो एक-दूसरे की भाषा नहीं जानते। मूक संवाद की पद्धति को उसे महाद्वीप की सार्वभौम भाषा माननी चाहिए। इस भाषा के कारण ग्राम के निवासियों का परिचय कर लेने में हरिशरण को कोई खास कठिनाई नहीं पड़ी। मनमोहन ने भी अपने मित्र से यह भाषा कुछ गिने-चुने दिनों में सीख ली। अर्द्धनग्न लड़कियाँ और युवतियाँ भले ही वे अत्यन्त कुरूप सही, किन्तु मनुष्य के भीतर जब वासना जगती है.....। मनमोहन को उनके मध्य में ही रात-दिन रहना था। पता नहीं क्यों, उनमें से कई इस गोरे दिखने वाले युवक से बहुत आकर्षित हो गयी थी। मनमोहन ने भी एक से अधिक घनिष्ठता बढ़ा ली और बात इस सीमा तक पहुँच गयी कि उसके सावधान मित्र को उसे अकेले ले जाकर समझाना आवश्यक जान पड़ा।
“तुम मित्र हो?” दो क्षण तो मनमोहन स्तब्ध खड़ा रहा।
“हाँ, और मैं आपने मित्र को कुपथ पर नहीं चलने दे सकता।” हरिशरण ने बड़े दृढ़ स्वर में कहा।
“मैं क्या करूं? तुम मुझे क्षमा कर दो।” स्वर में बहुत थोड़ी ग्लानि थी। “देखो मनमोहन। मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ। तुम जानते हो कि मैं झूठ नहीं बोला करता। हरिशरण का स्वर बड़ा गम्भीर बन गया था- तुम यह भी जानते हो कि तुम पर थोड़ी भी विपत्ति हो तो मुझे उसे मिटाने के लिए मर-मिटने में भी प्रसन्नता होगी। लेकिन मेरा मित्र दुराचारी कुमार्गगामी हो जाए, धूर्त कपटी बने और मरने के बाद जन्म-जन्म तक नरकों में सड़े, इसकी अपेक्षा में पसन्द करूंगा कि वह मार डाला जाए। उसके देह का मोह मुझे नहीं रोक सकेगा।
हरिशरण के इस कथन को सुनकर उसे अपने पर ग्लानि होने लगी। वे दोनों मित्र नित्य ही जंगल में घूमने जाते हैं।
समुद्र और उसमें अग्नि लगा देना हरिशरण ने अपनों नित्य-नियम बना लिया था। एक दिन उनका परिश्रम सफला। उधर से निकलने वाले एक जहाज ने धुआँ देख लिया। कौतुकवश ही किनारे आया था वह जहाज, किन्तु उसके कप्तान को भी कम प्रसन्नता नहीं हुई, इन दो मित्रों का इस प्रकार उद्धार करने में।
अपने घर में पहुँचकर मनमोहन अपने मित्र की प्रशंसा करते नहीं अघाया। उसने कहा-हरिशरण जी मेरे सच्चे मित्र हैं। आखिर सच्चे मित्र की परिभाषा यही तो है-”कुपथ निवारि सुपंथ चलावा।” यदि वे न होता मैं कब का डूब चुका होता। वे सभी से कहते-मित्रता ही करनी है, तो आप भी मेरी तरह कोई सच्चा मित्र तलाशिए।
मत्स्यपुराण, अध्याय 252 से 256 एवं अग्निपुराण, अध्याय 93 में ऐ आख्यान का वर्णन आता है। उल्लेख के अनुसार, सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी ने एक वृहदाकार जीवन्त पुरुष की संरचना की। उसके विशाल कलेवर को देखकर देवता भयभीत हो गये। निदान के रूप में ब्रह्मा के आदेश पर बलपूर्वक उसे पृथ्वी पर लिटा दिया गया। वह पुनः उठ ने सके, इसलिए जिन-जिन देवताओं ने उसके जिन-जिन अंगों का पकड़ रखा था, उस पर अपना स्थायी निवास बना लिया। परिणाम यह हुआ कि वह आदि पुरुष-वास्तुपुरुष पृथ्वी तल पर दबा रह गया। ब्रह्माजी ने आशीर्वाद दिया कि भवन-निमार्ण के समय तुम्हारी अर्चना होगी, उसको तुमको पोषण मिलेगा। तुम्हारे अंगों के स्वभाव-गुण के हिसाब से जो भवन रचना करेंगे, वह सदा सुख-शान्तिपूर्वक उसमें निवास कर सकेंगे। इसके विपरीत जो ऐसा न करके तुम्हारी उपेक्षा करेंगे, उन्हें कष्ट-कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
उक्त मिथक के आधार पर आज के बुद्धिवादी युग में धरती के नीचे किसी शरीरधारी की कल्पना तो नहीं की जा सकती पर सूक्ष्म देवसत्ता की मान्यता में कोई हर्ज नहीं। वास्तव में जमीन के भीतर दबा यह वास्तुपुरुष ऐसी ही एक सूक्ष्म सत्ता है। पुराणों की यह शैली रही है कि उसमें किसी भी तथ्य को सोधे-सोदे ढंग से न कहकर उसको अधिक रोचक और अधिक ग्राह्य बनाने के लिए आलंकारिक रूप दे दिया जाता है वास्तुपुरुष के संदर्भ में भी यही बात है। ऐसी मान्यता है कि यह सुषुप्तावस्था में पड़ा हुआ है। भवन-निमार्ण से पूर्व हिन्दू संस्कृति में इसलिए उसे चैतन्य भूमि-पूजन किया जाता है। इससे उस देवसत्ता का संरक्षण सुनिश्चित होता है। यों आधुनिक सोच रखने वाले और पश्चिमी विचारधारा में ढले लोग इसे एक अन्ध-मान्यता भर मानते और इसकी उपेक्षा करते हैं पर यह बिल्कुल सत्य है कि स्थान और इमारतों की अपनी सूक्ष्म सत्ताएँ होती है।
पाँडिचेरी की श्रीमाँ कहा करती थीं (स्वेत कमल, पु.104) कि यह भूमिखण्ड और राष्ट्र के पृथक सत्ता और आत्मा होती है। उस आत्मा का का अपना एक चैत्यपुरुष होता है, अर्थात् उसकी एक सचेतन सत्ता होती है। आवश्यकता पडने पर वह साकार रूप भी धारण कर सकती है। धर्मानुष्ठानों में स्थान और वास्तु से संबंधित इन्हीं सत्ताओं को “ऊँ स्थन देवताभ्या नमः ॐ वास्तु देवताभ्यो नमः”कहकर अभिवादन किया जाता है। भवन-निर्माण के दौरान जो इस वास्तुचेतना को नहीं जगाते इसकी पूजा-अर्चा नहीं करते, वहाँ वास्तुदेव का तिरस्कार होता है। फलतः उसमें रहने वाले लोग सुखी नहीं रह पाते कोई-न-कोई बाधा उपस्थित होती ही रहती है। इसके अतिरिक्त ऐसे मकानों में अशान्ति का एक अन्य कारण भी मौजूद होता है। जिस प्रकार मानवी काया में अनेक मर्मस्थल होते हैं।, उन पर यदि वजनी भार लाद दिया जाय, तो शरीर को कष्ट होने लगता है, वैसे ही प्रत्येक छोटे-बड़े भूखण्ड में लेटे तद्नुरूप वास्तुपुरुष के भी कई मर्म स्थान है। उसके वास्तुपुरुष मंडल के पदविन्यास को भली-भाँति समझे बिना चाहे जहाँ जो निर्माण करना अहितकर है। निमार्ण के समय पूरब, उत्तर, दक्षिण के अतिरिक्त छह अन्य दिशाओं ईशान, आग्नेय नैऋत्य, वायव्य, ऊर्ध्व एवं अधः-इन सब पर भी विचार करना होता है। ज्योतिषशास्त्र में इन सबकी अपनी-अपनी महत्ता और विशेषता बतलायी गई है। प्राचीनकाल में जितने भी निमार्ण होते थे, सबमें वास्तुपुरुष मंडल के साथ-साथ इन दसों दिशाओं पर भी पूर्ण रूप से विचार किया जाता था। इसके बाद ही सृजन का आरंभ होते था। इसलिए वह संरचनाएँ भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से हितकर साबित होती थी।
आज भवन-रचना पूर्व इस प्रकार के विचार से वास्तुकार इसलिए बचते हैं, क्योंकि उनके गले वास्तुपुरुष की अवधारणा नहीं उतरती, वे इसे किसी सनकी मस्तिष्क की उपज मानते हैं। दूसरे उनके पास इतना सब कुछ विचार कर सकने जितना न तो समय है, न ज्ञान। ऐसी स्थिति में इन दिनों इमारतें स्थापत्य वान के अनुरूप कैसे हो सकती है? इसमें सर्वाधिक दोष आधुनिक विज्ञान का है उसने हर उस तथ्य को, जिसकी बुद्धिसंगत व्याख्या असंभव थी अंधविश्वास मान लिया। जहां मान्यता के प्रति दुराग्रह हो, वहाँ सत्य का अन्वेषण कैसे संभव है? परिणाम यह हुआ कि वर्तमान स्थापत्य शास्त्र ने संरचनाएँ खड़ी करने के संबंध में दिखा स्थान और वास्तु चेतना की महत्ता को एकदम अस्वीकार कर दिया यही कारण है कि अब उसमें सब कुछ सुविधानुसार ही विनिर्मित होते हैं जबकि प्राचीन वास्तुशास्त्र ऐसा करने से स्पष्ट रूप से माना करता है। उसमें शयनकक्ष, स्नानघर, पाकशाला, बैठकखाना, एवं इनमें खुलने वाले दरवाजे, खिड़कियां-इन सभी के निर्धारित दिशा, संख्या और स्थान है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण, द्वितीय खण्ड, अध्याय 29 तथा तृतीय खण्ड, अध्याय 94-95 में इसका विस्तृत वर्णन हैं इसमें यहाँ कहा गया है कि इस विद्या का वास्तविक ज्ञाता किसी भी घर का भोजन चखकर यह बता पाने में समर्थ है कि वहाँ रसोईघर किस दिशा में है। दिखा-परिवर्तन से भोजन के स्वाद में परिवर्तन आता है- ऐसा इसके निष्णातों का कथन है। वे यह भी स्वीकारते हैं कि पाकशाला, शयनगृह, बैठकघर आदि की दिशाएँ नियमानुसार नहीं होने से शरीर और संबंधी अनेक प्रकार की जटिलताएँ पैदा हो सकती हैं यह सींव है कि ऐसे कमान में रहने वाला व्यक्ति मनोरोगी हो जाय और इस बात की भी संभावना भी बनी रहती है कि उसमें कई प्रकार की बिमारियों की गंभीरता और सामान्यता इस बात पर निर्भर करती है कि निर्धारण के कितने करीब अथवा दूर है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इमारत को बनाने में किस स्तर की भूल हुई है? त्रुटि का जो स्तर होगा, रोग की गंभीरता भी उसी अनुपात में कम या अधिक होगी। इन दिनों शरीर-मन संबंधी व्याधियाँ जिस गति से और जितनी बढ़ी है उसे अभूतपूर्व ही कहना पड़ेगा। इसका एक कारण वास्तुशिल्प संबंधी उक्त गड़बड़ियाँ हो सकता है।
यह तो स्थापत्य कला संबंधी गलतियों और उसकी परिणतियों की चर्चा हुई। अब तनिक इसके दूसरे पहले पर भी विचार कर लिया जाय तो उत्तम होगा। यह वह पक्ष है जिसमें वास्तुशिल्प की बारीकियों को ध्यान में रखते हुए संरचनाएँ विनिर्मित की जाती है। इससे उसमें रहने वाले लोग और वस्तु, दोनों प्रभावित और लाभान्वित होते हैं। इसका एक ज्वलंत उदाहरण मिश्र के पिरामिड हैं। सर्वविदित है कि उनमें अब भी सैंकड़ों वर्ष पूर्व मृत व्यक्तियों के शव (ममी) निर्विकार पड़े हुए हैं सड़न तक नहीं आयी है ऐसा वास्तु विद्या के नियमों का उल्लंघन कर बने आज के भवनों में संभव नहीं। उनमें तो दूसरे दिने से ही निर्जीव देह में विकार के लक्षण प्रकट और प्रत्यक्ष होने लगते हैं।इस विद्या के आचार्यों का मत है कि पूर्ण वास्तुशास्त्र सम्मत होने के कारण पिरामिडों का संपर्क ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की उन तरंगों से हो जाता है, जो उपयोगी एवं लाभकारी हैं। इन ऊर्जा तरंगों के संसर्ग में रहने के कारण ही उनके अन्दर की वस्तुएँ लम्बे काल तक एक जैसी स्थिति में बनी रहती है। प्रयाग-परीक्षणों के दौरान देखा गया है कि ऐसी संरचनाओं के साथ कई विलक्षण परिणाम जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए यदि इनके अन्दर भोंथरे ब्लेड को रख दिया जाय, तो उसकी धार तेज हो जाती है कोई अशान्त व्यक्ति कुछ समय उसमें बैठा रहे, तो उसे शान्ति मिलती है। यह भी विदित हुआ है कि इनके भीतर यदि कोई व्यक्ति नियमित धान का अभ्यास करे, तो थोड़े ही समय में वह उसकी गहराइयों में उतर जाता है। यह उसी ऊर्जा का नतीजा है, जिसके स्वाभाविक रूप में मिल पाने के कारण इन दिनों की इमारतों में अशान्ति और अस्वस्थता पैदा होती हैं। पिरामिडों में इसके लिए दीवारों का विशिष्ट झुकाव, उनके आधार व मध्य का पारस्परिक अनुपात एवं इन सबका उस स्थान के वास्तुपुरुष मंडल के साथ उपयुक्त तालमेल- इस आधार पर उपयोगी तरंगों को आकर्षित किया जाता है, जो आजकल के सामान्य और सुविधानुकूल निर्माणों द्वारा शक्य नहीं है।
उड़ीसा के कोणार्क मन्दिर के बारे में प्रसिद्ध है कि सम्पूर्ण मन्दिर के निमार्ण के उपरान्त जब उसके शिखर का निर्माण के उपरान्त जब उसके शिखर का निर्माण आरम्भ हुआ, तो बनाने के बाद वह बार-बार गिर पड़ता था। मुख्य शिल्पकार के हर प्रकार के प्रयास जब निष्फल हो गये, तो उसे बनवाने के लिए राजा नरसिंह देव की ओर से मुनादी पिटवायी गई और निर्माता को पुरस्कृत करने की घोषणा भी हुई। अन्ततः एक युवा वास्तुशिल्पी उसे सफलतापूर्वक बनाने में समर्थ हुआ। कहते हैं कि वास्तु गणना में मुख्य शिल्पी से कुछ त्रुटि रह गई थी, जिसे दूर कर नवागन्तुक ने उसका सफल निर्माण किया। इससे भी स्पष्ट है कि वास्तुपुरुष मंडल का कितना सुनिश्चित असर पड़ता है और उसके हिसाब से यदि सृजन कार्य न हुआ तो वास्तु-कार्य में कैसी और कितनी अड़चने आती है?
कई बार उक्त प्रतिकूलता से दैनिक जीवन में कठिनाइयों का आभास स्पष्ट रूप से मिलने लगता है। जब कभी कोई व्यक्ति किसी कारणवश एक मकान को छोड़कर दूसरे में रहना प्रारंभ करता है, पहले वाले की तुलना में अधिक प्रगति, समृद्धि और शान्ति है। आम बोलचाल की भाषा में इसकी ही लोग यह कहकर चर्चा करते हैं कि उक्त मकान उसे खूब फला अथवा अमुक स्थान उसको फला नहीं। वास्तव में मकान, स्थान और दुकान के फलने-न-फलने में उस भूमिखण्ड के वास्तुपुरुष और उस पर विनिर्मित संरचना-प्रकार का बहुत बड़ा हाथ है। कहा जाता है कि दिल्ली का लाल किला किसी भी बादशाह को नहीं फला। इसका कारण बताते हुए वास्तुविद् कहते हैं कि उसमें पूर्व की ओर कोई द्वारा नहीं होने से ही उससे जुड़े शासकों पर विपत्तियां आती रहीं। विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रतिकूल संरचनाओं से वास्तुदेव के कुपित हो उठने की सींवना बढ़ जाती है। ऐसा यदि हुआ, तो उसमें रहने वालों की शान्ति भंग होती है और आये दिन उन्हें कष्ट-कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसकी कारण से निर्माण पूर्व “भूमि पूजन” एवं निर्माण के पश्चात् गृह प्रवेश के नाम पर धार्मिक कर्मकाण्ड आयोजित किये जाते हैं, ताकि निर्माण-प्रक्रिया में यदि कोई भूल रह गई हो ओर उससे उन वास्तुदेव को कष्ट हो रहा हो तो इसे निर्माता का अज्ञान समझ कर वे क्षमा करें और पूजा-उपचार द्वारा प्रसन्न एवं तुष्ट होकर उसमें रहने वालों को भी शान्ति तथा तुष्टि प्रदान करें।
यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि जब सम्पूर्ण पृथ्वी के लिए ब्रह्माजी ने एक ही बृहदाकार वास्तुपुरुष की सृष्टि की, तो फिर अलग-अलग स्थानों और मकानों के पृथक्-पृथक् वास्तुदेव कैसे हो गये? विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि एक बड़े चुम्बकीय इकाइयों की अवधारणा है। यह पृथक्-पृथक् उसी प्रकार के कार्य सम्पन्न कर सकते हैं, जैसे बड़ा चुम्बक। शरीर में भी जितनी ही कोशिकाएँ होती है। सभी के अपने-अपने कार्य है। यह समस्त इकाइयाँ मिलकर एक वृहत काया की रचना करती है। विज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि शरीर की हर कोशिका में एक पूर्ण मनुष्य छिपा है। आज इसी सिद्धांत पर क्लोनिंग प्रक्रिया द्वारा समाज के किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति अथवा महापुरुष की कार्बन काँपी तैयार करने पर शरीरशास्त्री विचार कर रहे हैं वास्तु विज्ञानियों का मत है कि ठीक इसी प्रकार धरती के विशाल वास्तुपुरुष की संरचना छोटी-छोटी इकाइयाँ से हुई है। यह वास्तु इकाइयाँ हर छोटे-बड़े भूखण्ड के अनुरूप छोटी-बड़ी वास्तु सत्ताओं का निर्माण और उस भूभाग का स्वतंत्र प्रतिनिधित्व करती है। अतएव मकान चाहे अत्यन्त छोटे स्थान में स्थित एक कमरे वाला हो अथवा विस्तृत भूमि में खड़ा भव्य भवन, इससे स्थापत्य देव को उपस्थिति से कोई अन्तर नहीं पड़ता। इमारत छोटी हो सकती है, उसके अनुरूप उसका वास्तुपुरुष भी छोटा हो सकता है, इतने पर भी उसकी शक्ति में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। दूसरे शब्दों में कहें, तो यहाँ छोटे-बड़े का भेद करना न्यायसंगत न होगा।
आत्मा परमात्मा का अंशधर है। उसी का प्रकाश उसमें समाया हुआ है। जब वह प्रकाश सम्पूर्ण रूप में अभिव्यक्ति पात है, तो फिर परमात्म-चेतना और मानवी-चेतना में कोई अन्तर रह नहीं पाता। मनुष्य ईश्वरमय बन जाता है और ईश्वर छोटा-बड़ा नहीं होता, और न ही उसकी शक्ति छोटी-बड़ी होती हैं यदि वह शुद्ध चेतना किसी क्षुद्र कण में प्रकट हुई, तो वहाँ भी अपनी उसी समर्थता का परिचय देगी, जैसी कि वह जानी-मानी जाती है। इसलिए सूक्ष्म जगत में आकार का कोई महत्व नहीं। वह सिर्फ भौतिक संसार की ही नाप-तौल में सहायक है। अस्तु, आधुनिक शिक्षा प्राप्त अभियंताओं और स्थापत्यकारों को यहाँ आकर-भेद और उससे उपजी वास्तुपुरुष संबंधी मान्यता में किसी प्रकार का कोई असमंजस नहीं करना चाहिए।
तनिक और गहराई में उतरकर उस बारे में विचार कर सकें, तो ज्ञात होगा कि वास्तुपुरुष की उक्त अवधारणा कोई एकदम नवीन है, सो बात नहीं। भारतीय संस्कृति में कण-कण में ईश्वरीय चेतना की विद्यमानता स्वीकारी गई है। यदि वह सत्ता सर्वव्यापी है एवं अणु-अणु में मौजूद है, तो नाम चाहे तीर्थदेवता, वास्तुदेवता, स्थानदेवता, ग्रामदेवता, इष्टदेवता कुछ भी दे दें, है वह सभी उस सर्वोपरि परमेश्वर के ही द्योतक। इन्हें गुणबोधक नामान्तर कहना ही उचित होगा। जब वह भवन और उनके निवासियों का संरक्षण कार्य सँभालते हैं तो वास्तुदेवता। किसी स्थान से संबद्ध होते हैं तो स्थानदेवता। ग्राम की सुरक्षा का भार वहन करते हैं तो ग्रामदेवता एवं वैयक्तिक समृद्धि का निमित्त बनने पर इष्टदेवता कहलाते हैं। अतः वास्तुपुरुष को सत्ता, महत्ता और मान्यता के संबंध में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
प्राचीन तीर्थों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वे चैतन्य हुआ करते थे और लोग वहाँ निवास कर उससे लाभान्वित होते थे। यहाँ भी इस चैतन्यता को स्थापत्य पुरुष की चेतना के ही संदर्भ में समझा जाना चाहिए। पुराने जमाने में तीर्थ अक्सर गुरुकुल-आरण्यकों में हुआ करते थे। वहाँ केवल अध्ययन-अध्यापन, शिक्षण-प्रशिक्षण के ही कार्य नहीं होते, वरन् उपासना और साधना भी साथ-साथ चलती थी। बीच-बीच में सामूहिक धर्मानुष्ठान भी होते थे इससे वहाँ का स्थापत्व पुरुष जाग्रत हो उठता और भूमि में आकर तीर्थ सेवी शुद्ध अन्तः करण से कोई सात्विक कामना करें, तो वह पूरी हुए बिना नहीं रहती। इसीलिए उन दिनों प्रायश्चित प्रक्रिया ऐसे ही तीर्थों में आकर करने का विधान था, ताकि वहाँ के जीवन्त तीर्थदेव के सम्मुख दोष प्रकटीकरण और दण्ड स्वरूप स्वेच्छया तितीक्षा ग्रहण कर क्षमा याचना की जा के। तीर्थ चेतना से काफी माँगना प्रकारान्तर से भगवद् चेतना से ही क्षमा माँगने के समान है। निष्कपट अन्तरात्मा से जब अपने किये पर वास्तविक पश्चाताप उभरता है, तो वह उसे सुनती स्वीकारती और उसमें रियायत भी करती है। इसी कारण से सूर्यदेव नमस्कार के क्रम में सर्वेभ्यस्तीथेभ्यो नमः यह कहकर उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट किये जाते हैं। यथार्थ में हम यह अभिनन्दन-अभिवन्दन किसके प्रति दर्शाते है? क्या तीर्थ की इमारत और संरचना के प्रति? नहीं, यह अभिवादन समस्त तीर्थों के जीवन्त वास्तुपुरुष के प्रति निवेदित है।
शान्तिकुँज ऐसा ही एक चिन्मय तीर्थ है। विगत 25 वर्षों से करोड़ों की संख्या में होने वाला नित्य जप और नियमित यज्ञ के फलस्वरूप यहाँ के वास्तुपुरुष का जो दिव्य जागरण हुआ है, उसे अद्भुत और असाधारण ही कहना चाहिए। इसकी अनुभूति यहाँ आने और रहने वाला हर तीर्थसेवी कर सकता है, जिस आध्यात्मिकता की प्यास और आत्मोन्नति की ललक हो एवं जो उसके हिसाब से स्वयं को गढ़ने तथा ढालने के लिए तैयार हो जिसकी चेतना थोड़ी भी परिष्कृत हो ऐसा प्रत्येक व्यक्ति यहाँ के वास्तुदेव का जीवन्त मार्गदर्शन ओर प्रेरणा अन्तस् में अनुभव कर सकता है। इतना ही नहीं, उनकी अनुकम्पा भी उन पर बरसती है।
इतना स्पष्ट हो जाने के पश्चात् विज्ञजन को यह स्वीकारें में कोई ऊहापोह नहीं करनी चाहिए कि सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान परमेश्वर का प्रकाश ही सर्वत्र विभिन्न रूपों में प्रकाशित हो रहा है। वास्तुपुरुष की मूल मान्यता में भी उसी की आभा और ऊर्जा नामान्तर भेद से क्रियाशील हैं हमें उसकी सत्ता ओर महत्ता को स्वीकार करते हुए उस पर श्रद्धा और समर्पण करना चाहिए, तभी अंधाधुँध अट्टालिकाओं से भी भवन निर्माण संबंधी त्रुटियों के कुप्रभाव से वह हमारी रक्षा की व्यवस्था कर सकेंगे।
स्वेच्छापूर्वक अपनाई गई दरिद्रता मनुष्य का सही मानव बनाती है किन्तु आलसी के ऊपर लदी हुई दरिद्रता उसकी अकर्मण्यता का स्वाभाविक दुष्परिणाम होता है।
एक कुत्ता मुँह में रोटी दबाये, नहीं के किनारे-किनारे जा रहा था। उसे अपनी परछाई दिखाई दी। मन आया कि इस पानी में चल रहे कुत्ते की रोटी भी क्यों न छीन ली जाय? वह आक्रमण के लिए पानी में कूद पड़ा और परछाई को काटने के लिए जैसे ही मुँह खोला, वैसे ही मुँह की रोटी भी बह गई। इसे कहते हैं तृष्णा, जो पास है उसे भूलकर और पाने की इच्छा रखने वाले का विपत्ति में फँसना।
परीक्षा में असफल होने के कारण सीनियर सेकेण्डरी के छान ने आत्म हत्या की। रोजगार न मिलने के कारण अनेक नवयुवक मानसिक विक्षिप्तता के शिकार। विवाह न हो पाने के कारण चार लड़कियों ने अपनी जीवन-लीला समाप्त की। व्यापार में घाटे की वजह से करोड़पति व्यापारी सदमे से पागल हुआ। ऐसे न जाने कितने और भी होंगे जो अपने कार्य-क्षेत्र अथवा उद्देश्य की पूर्ति में असफल हो जाने पर घुटन-कुण्ठा और विक्षिप्तता के शिकार हो जाते हैं। यदा-कदा तो ये अपनी इन्हीं मनोवृत्तियों के चक्रव्यूह में फँसकर जीवन को भी गँवा बैठते हैं इस तरह के अनगिनत उदाहरणों का ब्यौरा हम रोजमर्रा के समाचार पत्रों में पढ़ते हैं और एक आह या सिसकी के साथ अपना सिर थाम लेते हैं। इसी के साथ मस्तिष्क में कुछ सवाल गूँजते हैं, क्या यही है जीवन? क्या इसका पर्याय सफलता के अलावा ओर कुछ नहीं?
जीवन में सफलता के महत्व से हम सभी परिचित हैं। लेकिन इसी को जीवन का पर्याय मान लेना और असफल होने पर समूचे जीवन को ही नकार देना न केवल स्वयं के प्रति, बल्कि समूची मनुष्यता के प्रति अन्याय है। जीवन का उद्देश्य इसकी शारीरिक मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक शक्तियों, का उत्तरोत्तर एवं निरन्तर विकास हैं यह क्रमिक एवं शाश्वत है। सफलता और असफलता तो क्षणिक हैं कोई भी व्यक्ति न तो स्थायी असफल होता है और न स्थायी सफल। जिस परीक्षा को पास कर हम खुशी में फूले नहीं समाते, अगले क्षण से हमारी अपनी नजर से समाते, अगले क्षण से हमारी अपनी नजर में ही उसका महत्व घटने लगता है और हम किसी नयी परीक्षा की तैयारी में लग जाते हैं। इसके अलावा हमें आज मिली सफलता किसी विशेष कार्य-क्षेत्र की हैं, न कि समूचे जीवन की। किसी एक क्षेत्र में असफल हुआ व्यक्ति दूसरे किसी अन्य क्षेत्र में गौरवपूर्ण उपलब्धियां अर्जित कर सकता है।
इन सब बातों के अलावा परिवर्तन के नियम से संचालित विश्व में दिन-रात सर्दी-गर्मी, धूप-छाँव की तरह सफलता-असफलता का क्रम भी सहज प्राकृतिक है। यहाँ स्थायी असफलता ना की काई चीज नहीं है। जो असफलता आज हमें दिखाई पड़ती है वह वस्तुतः अभीष्ट सफलता का एक सोपान मात्र होता है लेकिन एक ही बार में सब कुछ पा लेने की ललक बिना तनिक-सा भी असफल हुए पूर्ण सफलता की कल्पना करती है। इसी वजह से असफलता की सहज रूप से स्वीकार कर पाना असम्भव हो जाता है और कई तो प्रगति की दिशा में अपना प्रयास तक छोड़ बैठते हैं।? निराशा, कुण्ठा, घुटन, हताशा, विक्षिप्तता ऐसे ही व्यक्तियों की दुःखद नियति बन जाती है।
पाश्चात्य मनीषी डॉ0 वाल हाँक ने मानव मन की स्थितियों का अपनी पुस्तक “हाऊ टू डू व्हाट यू वान्ट टू डू” में गहन विश्लेषण किया हैं उनका मानना है जो बिना असफल हुए पूर्ण सफल होने का आग्रह करते हैं वे कभी भी अपनी क्षमताओं को पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाते। क्योंकि वे धरती पर किसी यथार्थ वस्तु की अपेक्षा चन्द्रमा पर किसी कल्पित लक्ष्य पर तीर मारते हैं। इस मानवीय काया द्वारा हवा में करतब दिखाने वाले काल्पनिक सुपरमैन की भूमिका कल्पना में ही सम्भव है। यथार्थ में उसका कोई सरोकार नहीं हो सकता। ऐसे व्यक्तियों को उनका प्रमुख सुझाव यह है कि बहुत अच्छा करने की अपेक्षा यह अधिक महत्वपूर्ण है कि कुछ किया जाय। यह न भूला जाय कि प्रत्येक कार्य की एक छोटी-सी शुरुआत होती है। हजारों मील की यात्रा एक छोटे से पग से प्रारम्भ होती है व पर्वत शिखर तक पहुँचने का मार्ग उसके सबसे निचले भाग से होकर जाता है। यात्रा के पहले कदम पर काँटा चुभ जाने से अथवा पर्वत शिखर पर चढ़ने की शुरुआत में ही हलकी-सी ठोकर लग जाने से ही निराश हो जाना, यात्रा से मुँह मोड़ लेना, कर्तव्य से पलायन कर जाना न केवल अशोभनीय है बल्कि हास्यास्पद भी।
मनोवैज्ञानिक जियोफेरी बैटसन ने जीवन की समस्याओं पर पर्याप्त विवेचन करते हुए एक पुस्तक लिखी है आर्ट ऑफ लिविंग इस पुस्तक में उनका मानना है कि मनुष्य की अहं वृत्ति जीवन में कितनी सहायक है? यह तो नहीं कहा जा सकता। हाँ, इसकी बाधाएँ जीवन में पल-पल पर अनुभव करने को मिलती है। बैटसन के अनुसार, अहँ की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर कतिपय लोग काफी प्रबल पुरुषार्थ करते एवं सफलता अर्जित करते देखे जाते है! लेकिन ऐसे लोग प्रायः हवाई घोड़े पर यात्रा करने वाले होते हैं उनका यह हवाई घोड़ा जब कभी आसमान से गिरता है, उनकी समूची जिन्दगी चकनाचूर होकर बिखर जाती है। उनकी यही अहं की प्रतिष्ठा उन्हें असफल होने पर आत्महत्या का मार्ग सुझाती है। इसी के कारण उनका जीवन घुटन और अवसाद से घिर जाता है। अपने अनेक प्रयोगों, भिन्न-भिन्न मनोवृत्तियों वाले लोगों का विश्लेषण करने के बाद जियोफेरी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जीवन जीने का सर्वोत्तम तरीका है अपने अहं का किसी उच्चतर उद्देश्य के लिए समर्पण यदि ऐसा हो सका तो हर असफलता सफलता का नया मार्ग सुझाती है। क्योंकि जब जीवन का पर्याय सफलता नहीं उच्चतर उद्देश्य होता है उसे पूरा किए बिना जीवन को समाप्त करना अथवा घुटन और अवसाद से घिरकर जीवन से पलायन करना उचित नहीं प्रतीत होता। सतत् प्रयास ही व्यक्ति को अभीष्ट सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। स्वेटमार्डन ने लिखा है कि लोग भूल जाते हैं कि जीवन की उन्नति किसी एक प्रयत्न की सफलता पर आधारित नहीं होती, वह तो निरन्तर श्रम एवं प्रयत्न पर र्नीर करती है। जीवन की उन्नति के अवसर लगातार परिश्रम, निरन्तर अध्यवसाय तथा अचल निष्ठा से आते हैं। एक साथ सब कुछ पा लेने की ललक जिनमें होती है वे एक बार में शत-प्रतिशत सफल होना चाहते हैं मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह अपने आप में एक भ्रामक धारणा हैं एक पत्थर के बड़े टुकड़े को तोड़ने के लिए हथौड़े से कई प्रहार किए जाते हैं। लेकिन इसके छोटे-छोटे टुकड़े उसके अंतिम एक प्रहार में होते हैं। तो क्या इसका अभिप्राय यह हुआ कि अन्तिम चोट से पहले के सभी प्रयासों को विफल माना जाय। पर ऐसा तथ्यतः गलत है। एक ही बार में सब कुछ हासिल कर लेने की मनोवृत्ति वाले लोग अन्तिम चोट के पहले के प्रयासों को कितना ही विफल मानें, लेकिन इनकी अपनी महत्ता है। जो अपनी प्रत्येक चोट के साथ अन्तिम सफलता की भूमिका तैयार कर रहे थे।
अतः कोई सफल होता है या असफल, यह पूरी तरह व्यक्ति की मनोवृत्ति एवं उसकी धारणाओं पर निर्भर करता है जो एकाकी सफलता को ही पाना चाहते हैं, वे प्रायः स्वयं को एक असफल व्यक्ति मान बैठते हैं। दुःख हताशा, निराशा, हीनता उनकी नियति बन जाती हैं उनका जीवन किन्हीं अनजाने अँधेरा में खोता चला जाता है।
जीवन में सफलता का मूल मंत्र है, हर असफलता को सफलता के प्रथम पग के रूप में स्वीकार करना। इस स्वीकारोक्ति के साथ सतत् प्रयास में निरत रहा। प्रयास कितना ही अधूरा, छोटा या अपूर्ण क्यों न हो, यदि यह सतत् जारी रहा तो प्रत्येक चरण में हुई भूलों से कुछ सीखते हुए सुधार का क्रम भी चलता रहेगा और अनंतः समय आने पर पूर्णता का लक्ष्य भी प्राप्त हो जाएगा।
“स्काई इज द लिमिट” के लेखक एवं सुविख्यात मनोवैज्ञानिक डॉ0 वायने डायर का कथन है तुम तब तक असफल नहीं हो जबकि तुम अपने ध्येय की प्राप्ति में प्रयासरत हो। ध्येय को पाने से पहले यदि तुम्हें असफलता दिखाई दे तो वह झूठी है, दिखावटी है, बनावटी है उसे अस्वीकार कर दो। हाँ इस अनुभव से कुछ सीख सको तो सीख लो और लक्ष्य के अगले पड़ाव की ओर आगे बढ़ते रहो। बिना ऐसे अनुभवों के कुछ सीखा नहीं जा सकता। संसार में अब तक जो भी सफल व्यक्ति हुए है उन सभी को भरी असफलताओं का सामना करना पड़ा हैं लेकिन वे प्रत्येक असफलता से कुछ सीखते हुए अन्त में अभीष्ट सफलता प्राप्त कर सके। इस संदर्भ में थामस एडीसन का उदाहरण अतीव प्रेरक हैं उनसे एक बार पूछा गया कि बैटरी की खोज में हुए 2500 असफल प्रयासों के बाद उन्हें कैसा लगा? उन्होंने जो उत्तर दिया वह हम सबके लिए महत्वपूर्ण है। “असफलता! मैं तो असफल हुआ ही नहीं।” अब मैं बैटरी न बनाने के 2500 उपायों को जानता हूँ।
विश्वविख्यात गणितज्ञ आइन्स्टीन अपने विद्यार्थी जीवन में सबसे अधिक कमजोर गणित में थे। इसी विषय में उन्हें प्रायः असफलता उनकी सफलता का साधन बनी और वे गणित के क्षेत्र में कुछ अद्भुत एवं अद्वितीय करने में सफल रहे। सुविख्यात योद्धा एवं भारतीय इतिहास के महानायक हेमचन्द्र विक्रमादित्य अपने प्रारम्भिक जीवन में एक छोटे से दुकानदार थे, उन्हें तलवार थामी, तो हर असफलता उनके लिए सफलता की सीढ़ी बन गयी। सुविख्यात कवयित्री एवं विदुषी महादेवी वर्मा अपने वैवाहिक जीवन में असफल रहीं। लेकिन इससे निराश और हताश होने की जगह उन्होंने अपने को साहित्य साधना एवं समाज सेवा में पूरी तरह समर्पित कर दिया और अनेकों की प्रेरणा स्त्रोत बनी। अतः देखा जाय जात तो जीवन में पूर्ण असफलता नाम की कोई चीज नहीं है। जब हम स्वयं को एक असफल व्यक्ति मान बैठते हैं तो हम अपनी उन्नति की समस्त सम्भावनाओं के द्वारा बन्द कर देते हैं।
डॉ0 चोपड़ा अपनी पुस्तक “हाउ टू एचीव टोटल सक्सेस इन लाइफ” में लिखते हैं कि हम सफलता की अपेक्षा असफलता से अधिक सीखे है क्योंकि प्रत्येक असफलता यह स्पष्ट करती चली जाती है हमें क्या नहीं करना चाहिए था और क्या करना बाकी रह गया है। दीर्घकालीन या स्थायी असफलता का सबसे बड़ा कारण यह भ्रामक मान्यता है, जो असफलता को एक खराब चीज मानती है व इससे बचने का सुझाव देती है। इससे बचने के प्रयास में व्यक्ति कुछ भी प्रयास नहीं करते व अन्ततः अपनी असफलता को सुनिश्चित करते जाते हैं।
थ्योरी ऑफ सक्सेस फोर्सेस में वे कहते हैं कि असफलता सफलता की एक अति सशक्त प्रेरक शक्ति है। प्रत्येक असफलता के साथ एक ऐसी शक्ति उत्पन्न होती है जो, सफलता को अधिक सुनिश्चित करती है। एक शिशु का उदाहरण देते हुए उन्होंने उसे अधिक स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। उनके अनुसार एक शिशु चलने के अपने प्रथम प्रयास में असफल रहता है। लेकिन प्रत्येक बार गिरने के साथ ही वह कुछ सीखता जाता है और समस्त असफलताओं से वह स्वयं को सन्तुलित करना व बिना गिरे चलना सीख जाता है। अतः सफल होने के लिए हमें असफलता को आवश्यक प्रेरक शक्ति के रूप में ही स्वीकार करना होगा। यदि हम असफलता से भागने की कोशिश में जीवन से पलायन करने की कोशिश करते रहे तो हम सफलता से भी उतना ही दूर चले जाएँगे।
थ्वलियम जम्स अपनी पुस्तक ““ विल टू बिलीव में लिखते हैं कि “असफलता का भय एक ऐसा भूत है जो मनुष्य के भीतर की सारी शक्ति को खींच लेता है व उसकी रचनात्मकता का समाप्त कर देता है। अपनी शक्ति खो देने पर व्यक्ति असमर्थ हो जाता है। यह भय मस्तिष्क पर पर्दा डाल देता है तथा मन को कायर बना देता है। अतः जीवन में प्रगति के लिए अनिवार्य है कि असफलता के भ्रामक भूत को मन से भगा दे। इसे सफलता की दिशा में एक आवश्यक सोपान मानते हुए इससे आवश्यक शिक्षण ले।” ऐसा किया जा सका तो फिर किसी को किसी भी परिस्थिति में निराशा, घुटन व कुण्ठा के अँधेरों में न भटकना पड़ेगा और न ही उसे जिन्दगी से पलायन करने की सूझेगी। उल्टे ऐसी स्थितियों में उसे सफलता की नयी राहें मिलेंगी और जीवन प्रकाश पथ पर सतत् और अविराम बढ़ता रहेगा।
“माँ !” इसी सम्बोधन के साथ समूची मनुष्य जाति का नारी से प्रथम परिचय होता है। इस शब्द में समायी ईश्वरीय भावनाएं ही उसके जीवन के पालन-पोषण और संरक्षण का आधार बनती है। ईश्वरत्व उसके सामने माँ के रूप में साकार हो उठता है। भावनाओं की इसी सघनता की वजह से मानव ने अपनी सभ्यता का प्रथम पग रखते ही परमेश्वर को “माँ” कहकर नमन किया। उसके नारी रूप की प्रतिष्ठा और पूजा की। संसार की विभिन्न सभ्यताओं की जन्मदात्री वैदिक सभ्यता का बोध कराने वाले साहित्य में स्थान-स्थान पर इस सत्य के प्रमाण मिलते हैं।
क्तिपय मनीषी और विचारक वेदों में शक्ति उपासना की बात को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार ऋग्वेद के 24 वे अध्याय में दी गई घोषा, गोधा, विश्ववारा आदि ऋषिकाओं की सूची सही हो सकती है, किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि वैदिक भारत में परमात्मा की नारी रूप में उपासना करने का प्रचलन था। इन मनीषियों के मत से भारतवर्ष में शक्ति उपासना का प्रचलन तान्त्रिक पूजा-पद्धतियों समय से शुरू हुआ। तान्त्रिक प्रणाली में बहुतायत से प्रचलित शाक्तमत को वे अपने प्रमाण के रूप में उद्धृत करते हैं।
इन विचारशीलों की बातों में सत्य आधे-अधूरे रूप में ही प्रस्तुत हो सका है। तान्त्रिक पद्धतियों में प्रचलित शक्ति उपासना की बात से इन्कार नहीं किया जा सकता परन्तु तन्त्र के जन्मदाता वेद ही हैं। तन्त्र ने अपनी शक्ति उपासना वेदों से ही विरासत में पायी है। ऋषियों की मातृ भक्ति की परिचय इसी से हो जाता है कि उन्होंने समस्त ज्ञान के मूल कारण को वेदमाता के रूप में स्वीकारा। वेदों की अनेक ऋचाओं में इस बात का स्पष्ट विवरण मिलता है कि वैदिक संस्कृति में इन्द्र, अग्नि, वरुण, पूषा आदि पुरुष प्रधान नामों के साथ परमेश्वर की श्रद्धा, नद्य, राका, मही, ऊषा, सूर्या, सरस्वती आदि नारी प्रधान नाम, नामों से भी स्तुति की गई है। जहाँ तक प्रधानता और प्रमुखता का सवाल है, उसके उत्तर में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि प्राचीन ऋषिगण परमेश्वर के नारी रूप के प्रति सतत् श्रद्धा अर्पण करते रहे है।
परमात्मा के नारी रूप के प्रति अपनी गहरी आस्था के कारण ही उन्होंने “अदित” को श्रेष्ठतम देवता देवमाता के रूप में स्वीकार किया है। एक संदर्भ विशेष में उसे गौ रूप धारिणी भी कहा। वेदों ने परमात्मा के एक अन्य महत्वपूर्ण नारी रूप की सरस्वती रूप में अर्चना की है। सरस्वती यूँ तो एक नहीं भी थी किन्तु ऋग्वेद के मंत्र में उसे “अम्बितमे, नदीतम, देवितम।” अर्थात् श्रेष्ठतम माता, महानतम नदी तथा उच्चतम देवी के रूप में सम्बोधित किया गया है। सरस्वती को ज्योति का समुद्र तथा बुद्धि की अधिष्ठानी सत्ता के रूप में भी प्रार्थना की गयी है। उसे इला और भारती नाम की देवियों से भी संबद्ध बताया गया है। और इन तीनों को “तिस्नोदेवी” के रूप में संमुक्त बताया गया है। बाद के वैदिक साक्ष्यों में वाक् की अवधारणा का परिचय इन्हीं तीनों देवियों के रूप में मिलता है। ऋग्वेद के एक अन्य मंत्र (29.9.99) में अग्नि के अंतर्गत इला, सरस्वती एवं भारती को एकात्मता प्रतिपादित की है।
वेदों में नारी तत्व की सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति वाक् के रूप में मिलती है। वाक् की परमात्मा का वह अचिन्तनीय, अदृश्यमान और सूक्ष्मतम स्वरूप है जो उसके मूल निर्गुण तत्व से सगुण की ओर उसके मूल निर्गुण तत्व से सगुण की ओर आने की प्राथमिक अभिव्यक्ति है। यही शब्द ब्रह्म है इसीलिए कालान्तर में परमेश्वर के नारी रूप को शब्द ब्रह्ममयी, परात्परमयी, ज्योतिर्मयी और वाङ्मयी आदि विशेषणों से सम्बोधित किया है। बाद के समय में विकसित शाक्तदर्शन एवं उससे जुड़ी साधना पद्धति का मूल आधार वाक् की ही अवधारणा है। इस संदर्भ में ऋग्वेद का देवी सूक्त या वागाम्भूण्ी सूक्त (मण्डल 10 सूक्त, सूक्त 125) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वैदिक इतिहास के अनुसार महर्षि अम्भूण की पुत्री वाक् इसकी मंत्रदृष्टा ऋषि थी। यह सूक्त पराशक्ति के विश्व रूप का दर्शन कराता है। सूक्त के कतिपय मंत्र दृष्टव्य हैं-
अर्थात् - मैं रुद्रों तथा वसुओं के साथ संचार करती हूँ। आदित्यों एवं देवताओं के साथ रहती हूँ। मैं मित्र एवं वरुण को धारण करती हूँ। मैं ही इन्द्र,अग्नि और आविष्वनों का अवलम्बन हूँ। मैं ही साम, त्वष्टा पूषा और भग को धारण करती हूँ और भली-भाँति यज्ञ करने वाले और सोम देने वाले यजमान को धन देती हूँ। मैं ही राष्ट्र की प्रभुसत्ता हूँ, वसु अर्थात् ऐश्वर्य या धन की कोष रूपा हूँ। ज्ञानमयी एवं यज्ञों से तुष्टि प्राप्त करने वाले देवों में प्रमुख हूँ। देवताओं ने मुझ अनेक स्थानों में प्रतिष्ठित किया है और मैं अनेक लोकों और अनेक रूपों में रहती हूँ। जो भी जीव प्राण धारण करता है, देखता है, सुनता है, वह मेरे ही माध्यम से यह सब कर पाता है। जो मुझे नहीं पहचानते वे क्षीण हो जाते हैं। जिज्ञासुओं सुनो जो मैं कहती हूँ वह श्रद्धास्पद है। देवों और मनुष्यों (सुनो) ये मेरे ही शब्द हैं, मैं जिसे चाहूँ उसे ब्रह्मज्ञानी, ऋषि मेधावान बना सकती हूँ। पवित्रात्माओं के शत्रुओं का विनाश करने के लिए मैं ही रुद्र के धनुष की प्रत्यंचा को तानती हूँ। द्युलोक, पृथ्वीलोक को आविष्ट कर मनुष्यों के लिए युद्ध करती हूँ। मैं समुद्रवासिनी हूँ, किन्तु मैंने ही ब्रह्मा को उच्चतम स्थान पर प्रतिष्ठित किया है। मेरा विस्तार सभी लोकों में है और मैं ही अपने विस्तृत देह से द्युलोक को छूती हूँ। मैं ही वायु की तरह सब लोगों को गतिमान बनाती हूँ। मैं पृथ्वी, स्वर्ग से परे हूँ, यह मेरी महनीयता है।
इस सूक्त की अन्तर्भावना से ही बाद में समय में ताँत्रिक प्रणाली और उसकी शाक्त परंपरा में वागम्भृणी सूक्त की प्रतिष्ठा अन्य वैदिक मंत्रों की अपेक्षा कहीं अधिक है। बाद के शाक्त तन्त्रों की आधारशिला इसी पर रखी गयी। वाक् गूढ़तम अवस्था “परा” की है। पश्यंती के रूप में वह शब्दों को अन्तर्निहित रूप में स्पन्दित करती है। मध्यमा की अवस्था में शब्द छन्दात्मक होने लगते हैं और उनका प्रकटीकरण वैखरी स्थिति में होता है यही कारण है कि वाक् बीज से शाक्त दर्शन एवं पद्धतियों में षटचक्रांक में थिरकने वाले अक्षरमाला से माला से प्राणवाहा कुण्डलिनी शक्ति की अवधारणा का विकास हुआ है।
ऋग्वेद में ही एक अन्य स्थान पर सुष्टि के नारी तत्व को रक्षत्र पुंजों से शोभायमान रात्रि के रूप में वर्णित किया गया है। इसीलिए इस दशम मण्डल के 127 वें सूक्त को रात्रि सूक्त भी कहा है। इसमें रात्रि के द्युतिमान अन्धकार को माँ की ऐसी गोद बताया है, जिसमें मानव रूपी शिशु निश्चिंत होकर सुख की नींद सो पाता है। काली, कालरात्रि अथवा तामसी के रूप में करुणामयी नारी शक्ति की परवर्ती कल्पना का मूलस्रोत यही सूक्त है। उत्तर वैदिक साहित्य से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण सूक्त और भी है-श्री सूक्त। इसमें ऐश्वर्य, सुवर्ण, रजत, समृद्धि से जुड़ी भक्तों पर अनुग्रह करने वाली श्री, श्रीमाँ अथवा लक्ष्मी का उल्लेख है। उसे सूर्य (द्युति) मयी या चन्द्र (द्युति) मयी, स्वर्णवर्णा हरिणी के रूप में स्मरण किया गया है। कमलवासिनी के रूप में भी देवी का उल्लेख आता है। इसी सूक्त में लक्ष्मी को स्वर्णामयष्टि के रूप में भी वर्णित किया गया है। यह रूप पौराणिक ज्योतिकूट से अपना पर्याप्त साम्य रखता है इस सूक्त में कमला या लक्ष्मी का जो स्वरूप प्रतिपादित है, उसे ही बाद में गजलक्ष्मी के रूप में अंकित किया गया । इसके प्रमाण मरहुत और साँची के बौद्ध शिल्प में देखे जा सकते हैं।
प्रवर्तीकाल में इसने मूर्ति का रूप ले लिया और लोक स्तर पर परमात्मा के नारी स्वरूप की मूर्तियां पूजी जाने लगी। वैदिक अदिति ओर सरस्वती मंत्र एवं यज्ञ के माध्यम से उपस्थित होती थी। इसे ही बाद में शाक्त उपासकों ने चक्रिका के रूप में पूजा। ये चक्र वस्तुतः एक प्रकार के प्रारम्भिक मंडल या यंत्र होते थे। जिनके बीच में ज्यादातर एक बड़ा छेद होता था और अन्दर की परिधि और किनारों पर वृक्ष विशेषकर ताल वृक्ष, देवी की रूढ़िबद्ध मूर्ति, पशु-पक्षी और मंगल चिन्ह भी उकेरे गए मिलते हैं। पुरातत्त्वविदों ने इन्हें तक्षशिला, रोपड़, दिल्ली, मथुरा वाराणसी, पटना आदि स्थानों से प्राप्त किया है और इनकी तिथि तीसरी शती पूर्व से लेकर पहली शती पूर्व तक आँकी है।
वेदों से विकसित हुए ताँत्रिक वाङ्मय की ही भाँति पौराणिक साहित्य में भी शक्ति उपासना का पर्याप्त निरूपण किया गया है। देवी भागवत, मार्कण्डेय और कलिका पुराण में नारी तत्त्व का माहात्म्य एवं उसकी दैवी सम्पदाओं का विवरण भरा पड़ा है। ब्रह्मवैवर्त में भी राधा का सृष्टि की आहृादिनी शक्ति के रूप में चित्रण किया गया है। वैदिक युग से पुराण युग तक परमात्मा के मातृ स्वरूप को पहुँचाने के लिए उपनिषदों का कम योगदान नहीं रहा। केनोपनिषद में उमा को वैदिक प्रधान देवता इन्द्र को ‘ब्रह्म’ का उपदेश देने का श्रेय दिया गया और गायत्री-सावित्री, सरस्वती आदि की उपासना का वृहदारण्यकोपनिषद में स्वतन्त्र रूप वर्णन करके इस भावना को बल दिया। इसे पौराणिक शक्ति उपासना की पृष्ठभूमि में भी स्वीकार किया जा सकता है, जहाँ देवी को सर्वस्व माना गया है। उदाहरण के लिए,सीतोपनिषद में सीता के सम्बन्ध में कहा गया है कि सीता ही विश्व का कल्याण करने वाली है। वे ही सब प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश का कारण है। वे सर्वदेव स्वरूपा, सर्वलोकमयी, सर्व आश्रयभूता, सर्वकीर्ति सम्पन्न, सर्वधर्म सम्पन्न, सभी पदार्थों और जीवों की आत्मा, सर्वदेव गंधर्व, मनुष्य आदि प्राणियों की स्वरूपभूता है। वे सभी प्राणियों की देहरूपा और विश्वरूपा है।
जनमानस में परमात्मा के नारी रूप ने इस भावना का रूप लिया, तब इसकी उपासना व्यापक रूप से की जाने लगी। मातृ उपासना का निरूपण अधिकाँशतः इसके भयनिवारिणी व शत्रुविनाशिनी गुणों से हुआ है। वैदिक युग में जो स्थान अदिति को प्राप्त था, पौराणिक युग में वही स्थान आदि को मिला। देवों के सम्मिलित तेजाँश को धारण करने वाली दुर्गा को भी इसी का रूप माना गया। जिस शक्ति में समस्त देवताओं का तेज सम्मिलित हो, उसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं है। अतः देवी को देवताओं की अपेक्षा अधिक सम्मानित स्थान दिया गया है।
प्रथम शती ईसवी में देवी के स्वरूपों का और अधिक विस्तार हुआ। इसी समय से फलकों पर द्विहस्ता, चतुहस्ता के रूप में महिषासुर को गला घोटकर मारती हुई महिष मर्दिनी के अंकन की प्रथा शुरू हुई। प्रारम्भिक मूर्तियां गठन में ग्राम्य रही, लेकिन बाद में इनमें परिष्कृति आ गयी और इसमें वाहन के साथ सिंह भी जुड़ गया। इसी के साथ सिंहवाहिनी दुर्गा पूजित हुई। सिंहवाहिनी दुर्गा एवं पुरुष देवताओं को शक्तियों के रूप में मातृकाओं की उपासना भी प्रचलित हुई। ये मातृकाएँ थी, ब्रह्माणी, महेष्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा। इस युग में यह विश्वास प्रचलित हो चुका था कि पुरुष देवताओं की क्षमता का मूल स्त्रोत उनकी शक्ति है, जो देवी तत्त्व या मातृतत्त्व से अभिन्न है। पुरुष का देवत्व पूर्णतः महाशक्ति की कृपा पर आधारित है।
इतिहासविदों का यह भी मानना है कि चतुर्थशती के आस-पास परात्पर परमेश्वर को ‘माँ’ के रूप में जन-जन में पूजा जाने लगा था। पौराणिक कथानक अब तक विधिवत शाक्त दर्शन का रूप ले चुके थे। यही नहीं शक्ति तत्त्व की रहस्यमयता एकेष्वरीवाद का रूप धारण कर चुकी थी। इसी महाशक्ति का दस भिन्न रुपों में दस महाविद्याओं के रूप में भी वर्णन हो चुका था। इन सभी महाविद्याओं की और उनकी नित्याअसें की कल्पना, मात्रा, वर्ण उनके आयुधों, मंत्रों तथा स्वरूप की प्रतीकात्मकता से जुड़े हुए है। षोडशी, त्रिपुरा, भुवनेश्वरी, मातंगी, लक्ष्मी एवं बगलामुखी श्रीविद्या समूह की देवियाँ है। जबकि काली, तारा, धूमावती तथा छित्रमस्ता काली कुल से सम्बद्ध है। इनमें प्रत्येक के अपने आवरण के देवी-देवता है। जिनका उपासक यंत्रादि पूजा में आह्वान करते हैं। इसके अलावा अनेक योगिनियों डाकनियों, यक्षिणियों, विद्याचारियों आदि अलग विद्याओं और समूहों से और तन्त्राचारों से ये साधनाएँ जुड़ी है।
यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि श्री विद्याकुल की देवियाँ-मनोहारी, सौंदर्य, तारुण्य एवं अनूठी कान्ति धारिणी है। जबकि काली कुल की देवियाँ तेजस्वी तथा द्युतिमान होने पर भी मानवीय कल्पना के सौंदर्य से परे है। उनमें भयावहता, अनन्तता, नग्नता है। पर उन सभी में निस्सीम करुणा भरी हुई है और अपनी सन्तानों के लिए अनुग्रह द्वार खले हुए है। उनके साधन का मुख्य स्त्रोत वैराग्य है, जिसका प्रतीक श्मशान है। त्रिपुरा,राजराजेश्वरी, भुवनेश्वरी आदि श्री कुल की देवियों या दुर्गा, सरस्वती आदि देवी स्वरूपों के लिए ऐसा साधना विधान नहीं है।
परमात्मा की मातृ रूप में उपासना की स्वीकारोक्ति बौद्धों में भी है। सेक्कोपदेश टीका में वाराही, नारायणी ब्राह्मी, परमेश्वरी आदि का नाम आता है। वज्रयान साहित्य को पढ़ने से लगता है कि इन देवियों की उपासना मंत्रों और मूर्ति सहित प्रचलित हो गयी थी। हृनसाँग ने लिखा ने लिखा है कि नालन्दा में तारा और हारीति की उपासना होती थी। बौद्ध धर्म में शाक्त तत्त्वों के प्रवेश का श्रेय ‘गह्मसमाज तन्त्र ग्रन्थ’ को है। जिसमें पाँच ध्यानी बुद्धों और उनकी शक्तियों का उल्लेख है। बौद्धों ने आदि शक्ति को ‘प्रज्ञा पारमिता’ का नाम दिया। ये ज्ञान और बुद्धि प्रदान करने वाली है।
हिन्दू और बौद्ध तन्त्रों में कोई विशेष भेद नहीं है। बस यूँ कह सकते हैं कि सिर्फ शब्दों का अन्तर है। धना पद्धति भी प्रायः एक जैसी है। हिन्दुओं में जैसे विश्व-शक्ति का जोड़ा है, वैसे ही बौद्धों में तार (बौद्ध ओंकार को तार भी कहते है) तारा का युग्म है। तारा के सम्बन्ध में 33 संस्कृत ग्रन्थ उपलब्ध बताए जाते हैं। ये तारा महायान सम्प्रदाय की है। हीनयान सम्प्रदाय में ‘मणिमेखला देवी’ की उपासना होती है। बौद्धों के वज्रयान सम्प्रदाय से विकसित हुए नाथ सम्प्रदाय ने भी शक्ति उपासना के महत्त्व को स्वीकारा है। मत्स्येन्द्र नापथ के ‘कौल ज्ञान निर्णय’ ग्रन्थ में इस सत्य के पर्याप्त संकेत मिलते हैं। इसके अतिरिक्त ‘सिद्ध सिद्धान्त पद्धति’ में पाँच शिव और पाँच उनकी शक्तियों का नाम आता है- अपरशिव परमशिव, शून्यशिव, निरन्जनशिव और परमात्मशिव की क्रमशः शक्तियाँ है, विजाशक्ति, पराशक्ति, अपराशक्ति, सूक्ष्माशक्ति और कुण्डलिनीशक्ति। नाथ पंथ में परमात्मा के मातृस्वरूप की कुण्डलिनी शक्ति के रूप में उपासना करने का विशेष प्रावधान है।
बौद्ध धर्म, नाथ पंथ की तरह ही जैन साधकों ने भी शक्ति उपासना को श्रद्धापूर्वक अपनाया। जैन धर्म में 24 तीर्थकर माने जाते हैं। उनके बायीं ओर शासन देवी का निवास है। इन शासन देवियों की संख्या भी 24 ही है। इनमें से चक्रेष्वरी, अम्बिका, पद्यावती 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की शासन देवी है। इनके स्वतन्त्र मन्दिर और पूजा विधान बताए गए है। इनको त्रिपूर, भैरवी, त्रिपुरा, नित्या, तोतला, त्वरिता और कामसाधिनी नाम से भी पुकारा जाता है। इनकी विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ मिलती है। जिनमें दो, चार, आठ, बारह, बाईस और चौबीस भुजाएँ प्रदर्शित की जाती है।
अम्बिका नेमिनाथ तीर्थंकर की शासन देवी है। जैन पुराणों में उनका विस्तृत वर्णन मिलता है इनके भी अलग मन्दिर, पूजा विधान और स्त्रोत आदि उपलब्ध हैं गौरी से इनकी तुलना की जाती है। गौरी के दो पुत्रों गणेश और कार्तिकेय की ही भाँति इनके भी दो पुत्र है। दोनों का वाहन सिंह है। चक्रष्वरी आदिनाथ ऋषभदेव की शासन देवी है। इनके वाहन स्वरूप व आयुध वैष्णवी और नारायणी और नारायणी से मिलते-जुलते हैं। सिद्धायिका चौबीसवें तीर्थकार भगवान महावीर शासन देवी है। अपराजिता और कामचण्डालिनी भी इनके नाम है। इनका वर्ण श्याम और दिगम्बरी है। जैन पुराणों में इन्हीं चार शासन देवियों को प्रमुखता दी गयी है।
जैनधर्म ईश्वर की सत्ता को भले प्रत्यक्षतः न माने, लेकिन उसके मातृ स्वरूप की किसी न किसी रूप में श्रद्धासिक्त हो उपासना करता है। जैन कवियों ने शक्ति सम्प्रदाय के ‘सारस्ववतकल्प’ को माना है। सिद्ध सारस्वताचार्य श्री बालचन्द्र सूरि ने अपने महाकाव्य बसन्त विलास के आरम्भ में शक्ति पद्धति को स्वीकार किया है। वह अपनी दिव्य कवित्व शक्ति का श्रेय सरस्वती देवी की उपासना को ही देते हैं। जैन धर्म के दोनों सम्प्रदायों श्वेताम्बर और दिगम्बर में शक्ति की उपासना का प्रचलन है। उनकी मान्यताओं में भिन्नताएँ हो सकती है किन्तु भाव में भिन्नता नहीं है।
भावों की यह एकात्मता बताती है कि माँ की गोद में जन्में मनुष्य ने जब धरती पर अपने पहले पग रखे तो उसे भी माँ कहा। चतुर्दिक् दिखने वाली प्रकृति को भी उसने माँ कहकर ही पुकारा और समस्त सृष्टि के रचनाकार परमेश्वर को भी छलकती भावनाओं के साथ मातृ रूप में ही आह्वान किया। यही कारण है-वैदिक काल से प्रचलित मातृ उपासना पद्धति पौराणिक काल में फली-फूली। बौद्ध और जैन धर्मों ने भी इसे अपनाया। नाथ व सिद्ध सम्प्रदायों पर भी इसका प्रभाव पड़ा और जब समूचा युग संकटापन्न हो जीवन-मरण के संघर्ष को झेल रहा, तब ऐसे में अनन्त करुणामय परमेश्वर माँ की ममता लेकर युग शक्ति गायत्री के रूप में अवतरित हुआ है। वेदमाता गायत्री अपनी सभी सन्तानों में मातृ शक्ति के प्रति श्रद्धा जाग्रत करने, नवयुग को नारी युग में बदलने के लिए संकल्पित हो उठी हैं उनके इस संकल्प में भागीदार बनने वाले ही उनके अनुदानों का मनचाहा लाभ उठा सकेंगे।
बसंत आ गया। प्रकृति ने पुष्पांजलियाँ चढ़ाई, महकें बरसाई। जन-जन को अपनी हर श्वास में परिमल का आभास होने लगा। किले के महल में महारानी ने चैत्र की नवरात्रि पूरे समारोह के साथ मनाने का आयोजन किया था। यह भव्यता और दिव्यता का अपूर्व सम्मिलन था। महल में गौरी की प्रतिमा स्थापित की गई। पूजन होने लगा। माँ गौरी की प्रतिमा आभूषणों और फूलों के शृंगार से लद गई। धूप-दीप तथा नैवेद्य ने उल्लास को शतगुणित कर दिया। हल्दी-कुमकुम के इस उत्सव में सारे झाँसी नगर की नारियाँ व्यग्र-व्यस्त हो गई। परन्तु उनमें से बहुत थोड़ी-सी गले में पुष्पहार डाले थी। न जाने कैसे उनमें से अनेक को यह भ्रम हो गया था कि युद्ध प्रिय महारानी हम लोगों का शृंगार नहीं पसन्द करती। इसलिए जब वे सभी पूजन के लिए रनिवास में आयी तो उनके पास चढ़ाने के लिए पुष्प अवश्य थे, लेकिन गले में, माला कुछ के ही पड़ी थी।
किले में जाने के लिए सभी जातियों को आजादी थी। किले के उस भाग में जहाँ भगवान भोलेनाथ और गणेश का मन्दिर है और उसको शंकर किला कहते थे, सब कोई जा सकते थे। यहाँ तक कि महारानी ने अपने कक्ष में जहाँ गौरी की स्थापना की थी, सभी को आने की इजाजत दे दी थी। भले ही यह कुछ उच्चपदस्थ सवर्णों के मन में अखरा हो, परन्तु किसी ने भी प्रकट में एतराज नहीं किया था। उन्हें मालूम था कि ‘मानव मात्र एक समान, जाति-वंश सब एक समान’ के सूत्र के प्रति पूर्ण श्रद्धावती रानी सरकार के सामने कुछ कहने पर झिड़की ही सुनने को मिलेगी।
सुन्दर ललनाओं को आभूषणों से सजा हुआ देखकर रानी को हर्ष हुआ, परन्तु अधिकाँश के गले में पुष्पमालाओं का अभाव उनको खटका। उन्होंने सभी की ओर देखते हुए कहा, “तुम लोग हार पहनकर क्यों नहीं आई? गौरी माता को क्या अधूरे शृंगार से प्रसन्न करोगी?”
स्त्रियों के मन में एक लहर उद्वेलित हुई। लालाभाऊ बख्शी की पत्नी उन सभी की अगुआ बनकर आगे आयी। वह यौवन की अगुआ बनकर आगे आयी। वह यौवन की पूर्णता को पहुँच चुकी थी सौंदर्य मुखमण्डल पर छिटका हुआ था। बख्शिन जू कहलाती थी। हाथ जोड़कर बोली, “जब सरकार के गली में माला नहीं है तब हम लोग कैसे पहने?”
रानी उसका इंगित समझ गयी। बख्शिन जू के बहाने पर उनको हँसी आ गयी। पास आकर उसके कन्धे पर हाथ रखा और सबको सुनाकर कहने लगी। “बाहर मालिने तरह-तरह के हार गूँथे बैठी हुई है। एक मेरे लिए ले आओ। मैं भी पहनूँगी। तुम सब पहनो और कीर्तन-भजन गाकर माता को प्रसन्न करो।”
महिलाएँ होड़ ही-सी में मालिनों के पास दौड़ी। परन्तु मुन्दर पहले माला ले आयी। बख्शिन जू जरा पीछे आयी। मुन्दर माला पहनाने वाली थी कि रानी ने उसको मुस्कुरा कर रोक दिया। वे कहने लगी-”देख तू अभी कुमारी है, दूसरे तेरे हाटथ से फूल तो रोज लेती ही रहती हूं। आज बख्शिन जू के फूलों का आशीर्वाद लेना चाहती हूँ।”
रानी का कथन सुनकर मुन्दर संकोच से एक ओर हट गयी। बख्शिन जू हर्षोत्फुल्ल हो गयी। उनके हार पहनाने के बाद अन्य स्त्रियों ने भी रानी को हार पहनाए गए पहनाए गए कि वे ढक गयी और उनको साँस लेना दूभर हो गया। सहेलियां उनके हार उतार-उतार कर रख देती थी और वह पुनः-पुनः ढक दी जाती थी।
अन्त में कोने में खड़ी हुई एक नववधू माला लिए बढ़ी। उसके कपड़े बहुत रंग-बिरंगे थे। चाँदी की जेवर पहने थी। सोने का एकाध ही था। सब ठाठ सोलह आना बुँदेलखण्डी। पैर के पैंजनों से लेकर सिर की दाँवनी तक सब आभूषण झाँसी की अपनी अनोखी कला की पहचान करा रहे थे। रंग जरा साँवला वाकी चेहरा रानी की आकृति, आँख-नाक से बहुत मिलता-जुलता। महिलाओं की भीड़ में हल्का-सा घूँघट काढ़े इस अनोखी स्त्री को रानी पहचाने बिना न रह सकी। उन्होंने मुस्कराकर कहा-”आओ झलकारी पहना दो अपनी माला।” झलकारी, यह नाम रानी के लिए नया नहीं था। उन्हें यह अभी याद नहीं कि अपने सिपहसालार खुदाबख्श से सुनी थी। जिसे उन दिनों उन्होंने डाकुओं का आतंक समाप्त करने के लिए तैनात किया था।
उसने उनको सुनाते हुए कहा था-जब झलकारी अपनी किशोरवय सहेलियों के साथ जंगल के बीच से गुजर रही थी। तभी एक कड़कती आवाज ने उन सबको चौका दिया। “अपने-अपने गहने उतार दो और मेरे हवाले करो।” डाकू को देखकर किशोरियाँ काँपने और रोने लगी। उन्होंने अपने-अपने गले से हँसती और कड़े उतार कर डाकू के सामने रखने शुरू कर दिए। “अब तू क्या देख रही है?” डाकू ने उसे घुड़की दी। “उतार अपने गहने।”
“उतार तो रही हूँ। पाँव के कड़े तो उतार कर रख दिए है। हँसली डोरे में फँस गयी है।” उसने कहा।
“अरे तो डोरे तोड़ डाल न।” डाकू कड़का।
वह बोली, “अब रोना तो यही है। डोरा मजबूत है टूटता ही नहीं। तुम ही कटार से डोरा काट दो। नहीं, तुम क्यों तकलीफ करो। मैं ही डोरे को काट देती हैँ। जरा कटार देना तो।”
“ठीक है।” डाकू ने कहा और उसे कटार दे दी। कटार हाथ में आते ही वह एकदम शेरनी की तरह उछली और देखते ही देखते कटार डाकू के कलेजे में घोंप दी। डाकू वही ढेर हो गया।
खुदाबख्श से इस घटना की चर्चा सुनने के बाद ही रानी उससे मिली थी। उन्होंने ही उसकी शादी झाँसी के एक बुनकर जाति के पूरन से करवाई थी लेकिन उसकी वीरता किसी बहादुर सैनिक से कम न थी।
शायद यही सोचकर, रानी ने जब महिलाओं की फौज बनाने का निश्चय किया, तब उसकी बागडोर झलकारी के हाथ सौंप दी। उनके इस निर्णय का सबसे मुखर विरोध दीवान दूल्हा जू ने किया था। उसने अपना एतराज प्रकट करते हुए कहा था। उसने अपना एतराज प्रकट करते हुए कहा था-”जाति को इस कोरिन को सिपहसालार बनाना ठीक नहीं है, रानी सरकार।”
प्रत्युत्तर में रानी ने उसे डपट दिया, “चुप करो दूल्हा जू। कुल का गर्व नहीं, कर्म का गौरव महान होता है। किसी की जाति नहीं, उसके गुण ही उसे बड़प्पन प्रदान करते हैं।”
आज वही झलकारी उनके सामने नववधू के रूप में सजी-धजी खड़ी थी। उसके इस रूप को देखकर कोई नहीं कह सकता था, नयी-नवेली दुल्हन के रूप में पर्व मनाने आयी वह स्त्री लड़ाई के मैदान में अकेले सैकड़ों-हजारों बहादुर सिपाहियों पर भारी पड़ती है। अपनी जुड़वा बहिन-सी लगने वाली झलकारी को रानी ने हाथ पकड कर अपने पास बिठाते हुए पूछा-”तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?”
“ठीक चल रहा है रानी सरकार। झाँसी की नारियाँ बिना किसी जाति भेद अथवा वर्ग के सैन्य कला में निपुण हो रही हैं। घुड़सवारी, तीरंदाज़ी तलवारबाजी में प्रवीण महिलाओं की संख्या अब सैकड़ों को पार करती हुई हजारों में पहुँच रही है।”
झलकारी का यह कथन सुनकर रानी के गौर मुख पर ऊषा की अरुण स्वर्ण रेखाएँ सी सिंख गयीं। वह मुस्कराई जैसे एक क्षण के लिए ज्योत्सना छिटक गयी हो। जरा सिर हिलाया मानो मुक्त पवन ने फूलों से लदी फुलवारियों को लहरा दिया।
रानी उन सभी में नव प्राणों का संचार करती हुई कहने लगीं-”नारियाँ राष्ट्र धर्म एवं संस्कृति का जीवन है। उनकी जाग्रति का मतलब है राष्ट्रीय जीवन की जाग्रति, धर्म में नवचेतना का संचार एवं संस्कृति का पुनर्जीवन। तम सबके उत्साह और उमंग को देखकर अब मैं कह सकती हूँ, कि अपने देश के उज्ज्वल भविष्य का अरुणोदय शीघ्र होगा।”
“सरकार हमारी महारानी हैं। आपके एक इशारे पर हम सबका सर्वस्व न्यौछावर है।” अबकी बार वख्शिन जू के चेहरे पर पर्याप्त दृढ़ता थी।
तो फिर सुनो, चहल-पहल को बन्द करके रानी ने स्त्रियों से कहा-”दो-चार दिन के भीतर ही अपनी झाँसी के ऊपर गोरों का आक्रमण होने वाला है। अबकी बार का आक्रमण पिछले हमलों से ज्यादा खतरनाक है। जनरल रोज अपनी भारी कुमक लेकर तेजी से बढ़ा चला आ रहा है। तुम में से अनेक युद्ध विद्या सीख गयी हैं। जो जिस कार्य को कर सके वह उस कार्य को हाथ में ले लड़ने वालों के पास गोला-बारूद, खाना-पानी इत्यादि ठीक समय पर पहुंचता हथियार भी चलाना पड़ेगा। तुममें से कोई मेरी बहिन के बराबर हो, कोई माता के समान। अपने देश-धर्म संस्कृति की लाज तुम्हारे हाथ में है। ऐसे काम करना, जिनसे हमारे पूर्वजों को कीर्ति मिले और भावी पीढ़ियाँ प्रेरणा एवं मार्गदर्शन प्राप्त करें। प्रेरणा एवं मार्गदर्शन प्राप्त करें।”
अपने इस कथन के साथ उन्होंने कहा, अब एक बार सब भगवान का नाम लो-हर-हर महादेव।
सबिस्त्रयों के कण्ठ से ध्वनित हुआ-”हर-हर-महादेव।”
उन कोमल किन्तु दृढ़ कण्ठों से निकला हुआ हर-हर महादेव अनन्त दिशाओं में, अनन्त काल में, अनन्त अमर नाद बनकर समा गया।
झाँसी की अनेक स्त्रियों ने उसी दिन रानी के पास सैनिक वेश में अपना निवास बनाया। ये ही स्त्रियाँ जो घर पर बात-बात में तुनक उठती थीं, जरा-सा कारण पाने पर परस्पर लड़ बैठती थीं, संध्या के समय वस्त्राभूषणों और फूलों से सुसज्जित होकर थालों में दिए रख-रखकर मंदिरों में पूजन के लिए जाती थी, वे ही स्त्रियां सैनिक वेश में तलवार बाँधे और कन्धे पर बन्दूक साधे, चुपचाप अपना-अपना कर्त्तव्य पालन करने में निरत हो गयीं। उनका शृंगार और वाक् युद्ध तलवार की म्यान में समा गया। यह सब झलकारी द्वारा दिए गए सैनिक प्रशिक्षण का कमाल था। लोगों की कल्पना थी कि अंग्रेज रात को झाँसी पर हमला करेंगे। झाँसी सचेत थी, परन्तु रात को हमला नहीं हुआ।
हमला 23 मार्च को हुआ। जनरल रोज ने “नाऊ और नेव्हर” के आदेश प्रसारित किए। लेकिन झाँसी के बहादुर सिपाहियों की चतुरता और वीरता के सामने अंग्रेज कुछ कर नहीं पा रहे थे। एक बार नहीं कई बार अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा गौस खाँ के तोपखाने, खुदाबख्श की तलवार की धार के सामने उनको मुँह की खानी पड़ रही थी, लेकिन जातीय अभिमान में फूले-फले दूल्हा जू की घृणित गद्दारी से ये बहादुर शहीद होते गए और आखिर रानी को लड़ाई नए सिरे से जारी रखने के लिए कालपी जाने का निर्णय लेना पड़ा थोड़े से लोगों के साथ वह भाड़ेरी फाटक से बाहर हो गयी। उनके निकलने के बाद झलकारी ओर उनके साथियों ने फाटक फिर बन्द कर लिया।
रानी और उसके साथियों को कोट के बाहर की भूमि का राई-रत्ती पता था। अंधेरे में वह सहज बढ़ती चली गयी। बातचीत बिलकुल धीरे-धीरे होती थी। अंजनी की टौरिया के पास ओरछे की सेना का कड़ा पहरा था और एक अँग्रेज छावनी का। यहाँ रोक-टोक हुई और लड़ाई भी। यहाँ से रानी के साथ केवल दस-बाहर सवार गए और मुन्दर।
टागे निमग र्मा। अगाध अँधेरा। झींगुर झंकार रहे थे उनके ऊपर घोड़ों की टापों की आवाज हो रही थी। सब ओर सन्नाटा छाया हुआ था। पीछे झाँसी में आग जल रही थी और आवाजें आ रही थीं। आगे अन्धकार में जंगल और गढमऊ के पहाड़ लिपटे हुए, दवे हुए से दिखाई पड़ रहे थे। चिड़ियां पेड़ों पर से भड़भड़ा कर उड़ती और घोड़ों को चौका देती। आगे का मार्ग अंधकारपूर्ण और भविष्य तिमिराच्छन्न ज्यों-त्यों करके आरी नाम के ग्राम के पास से यह टोली बढ़ गयी। पहुज नहीं मिली। लोगों ने चुल्लुओं से पानी पिया और फिर आगे बढ़ने लगे। कभी धीमी गति से कभी तेजी के साथ। अब तक ये काई दस-बारह मील ही आगे बढ़े होंगे।
इधर रोज के खेमे में सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी। अभी वह कुछ कर पाता इसके पहले झलकारी ने एक योजना सोची और उसको क्रियान्वित करने का निश्चय किया। अपने इस निश्चय के साथ वह सीधी तनकर खड़ी हो गयी।
उसने अपना शृंगार किया। बढ़िया से बढ़िया कपड़े पहने, ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मीबाई करती थीं। कपड़े तो उसे समय-समय उसकी अपनी रानी सरकार से मिलते रहते थे परंतु गले के लिए हार न था। सो उसने काँच की गुरियों के कण्ठे को गले में डाल लिया और प्रातःकाल की प्रतीक्षा करने लगी।
पौ फटते ही वह घोड़े पर बैठी और बड़ी ऐंठ के साथ अंग्रेज छावनी की ओर चल दी। हाथ में कोई हथियार न लिया। चोली में केवल एक पिस्तौल रख ली।
थोड़ी दूर पर गोरों का पहरा मिला। टोकी गई।
झलकारी को अपने भीतर भाषा और शब्दों की कमी पहले-पहल जान पड़ी। लेकिन उसे मालूम था कि गोरों के साथ चाहे जैसे बोलने में कोई हानि न होगी।
झलकारी ने टोकने के उत्तर में कहा, “हम तुम्हारे जंडेल के पास जाउत है।”
यदि कोई हिन्दुस्तानी उसकी इस ठेठ बुन्देलखण्डी को सुनता और उसके वेष एवं योजना के बारे में सुनता तो से हँसी आए बिना न रहती।
“रानी-झाँसी की रानी, लक्ष्मीबाई।” झलकारी ने बड़ी हेकडी से जवाब दिया।
उसके इन शब्दों में न जाने क्या जादू था, कि
पूरी अंग्रेज छावनी में हड़कम्प मच गया। एक अफरा-तफरी की लहर छा गयी। आस-पास खड़े गोरे सिपाहियों और अफसरों के चेहरे दहशत में पीले पड़ गए।
झलकारी उन सबसे चेहरों पर चढ़ते-उतरते रंगों को देख रही थी। उसे अपनी बाई सरकार के नाम के जादू का असर समझ में आ रहा था मन ही मन उसे अपने पर गर्व अनुभव हो रहा था कि वह कितनी भाग्यशालिनी है, जो उसे देवी जैसी अपनी रानी सरकार के साथ काम करने का मौका मिला। लेकिन उसने आन्तरिक भावों को अपने चेहरे पर प्रकट नहीं होने दिया।
गोरे उसे अभी तक घेरे खड़े थे। उन्हें एकाएक सूझ नहीं रहा था। गोरे सिपाही खुशी में पागल हो गए। उनसे बढ़कर खुशी झलकारी थी।
उसको विश्वास था कि मेरी जाँच-पड़ताल और हत्या में जब तक अँग्रेज उलझेंगे तब तक रानी को इतना समय मिल जाएगा कि वे कालपी पहुँच सकें।
झलकारी रोज के सामने पहुँचाई गयी। वह घोड़े से नहीं उतरी। रानियों की सी शान, वैसी ही अभिमान, वही हेकड़ी, रोज भी थोड़ी देर के लिए धोखे में आ गया।
शक्ल-सूरत वैसी ही सुन्दर। केवल रंग वही नहीं था।
श्रोज ने मेजर स्टुअर्ड से कहा, “हाड हैण्डसम, दो डार्क एण्ड टैरिबल।” (कितनी सुंदर है, यद्यपि श्यामल और भयानक)।
परन्तु छावनी में राव दूल्हा जू था। वह खबर पाकर तुरन्त एक आड़ में आ गया। उसने बारीकी के साथ देखा। उसे अच्छी तरह मालूम था कि महारानी मरते दम तक छावनी की ओर आने वाली नहीं। यह जरूर उनकी हमशक्ल झलकारी ही है, जो यहाँ धोखा देने आयी है।
और वह रोज के पास आकर बोला, “यह रानी नहीं है जनरल साहब, झलकारी कोरिन है। रानी इस प्रकार सामने नहीं आ सकती।”
झलकारी ने दूल्हा जू की पहचान लिया। सामने
देशद्रोही को देखा तो उसका खून उबल गया। वह अपना आपा खो बैठी। गरजी, “अरे पापी ठाकुर होकै तैने का करो?”
अपनी जाति के घमंड में चूर रहने वाला दूल्हा जू जमीन में गड़ गया। वह वहाँ से भाग पाता, इतने में झलकारी ने अपनी रिवाल्वर से गोली दी।
लेकिन दुर्भाग्य, झलकारी का निशान चूक गया। गोली पास खड़े अँग्रेज फौजी को लगी और वह वही ढेर हो गया। उसने फुर्ती से दूसरी गोली दागनी चाही पर इसी बीच रोज ने अपने पिस्तौल से उस पर गोलियाँ चला दी। वह खून से लथपथ होकर गिर पड़ी। परन्तु उसे सन्तोष था कि उसने अपनी रानी सरकार को सुरक्षित कालपी पहुँचा दिया। इसी सन्तोष के साथ उसने दम तोड़ दिया।
अब तक रोज और स्टुअर्ड को उसकी योजना का पता चल चुका था। पर कोई इतना साहसी भी हो सकता है, स्टुअर्ड को यकीन नहीं हो रहा था। वह बोला-”शी वाज मैड।” (वह पागल थी)।
रोज ने सिर हिलाकर कहा, “नो स्टुअर्ड, इफ वन परसेंट ऑफ इण्डियन वीमन बिकम सो मैड एज दिस गर्ल वाज, वी विल हैव टू लीव आल दैट वी हैव इन दिस कन्ट्री एण्ड सरटेनली इण्डिया विल लीड द वर्ल्ड।” (नहीं स्टुअर्ड यदि भारतीय स्त्रियों में एक प्रतिशत भी ऐसी पागल हो जाएँ, जैसी यह स्त्री थी तो हमको हिन्दुस्तान में अपना सब कुछ छोड़कर जाना पड़ेगा और निश्चित ही भारत विश्व का नेतृत्व करने लगेगा) । रानी को जब कालपी में झलकारी के बलिदान की खबर मिली तो वह भरे कंठ से बोली-”उसने अपने जीवन में यह सिद्ध कर दिखाया कि महानता कुल के गर्व में नहीं, कर्म के गौरव में होती है।” इसी के साथ उनकी आँखों से कुछ भाव बिन्दु टपक पड़े। यही उस वीरांगना को सच्ची श्रद्धांजलि थी।
अपने समय की प्रख्यात लेखिका मेरी स्टोव किशोरावस्था में बहुत सुन्दर लगती थी। इसकी चर्चा और प्रशंसा भी बहुत होती थी। इस पर लड़की को गर्व रहने लगा और वह इतरा कर चलने लगी।
बात पिता को मालूम हुई। तो उन्होंने बेटी को बुलाकर प्यार से कहा-”बच्ची किशोरावस्था का सौंदर्य प्रकृति की देन है। इस अनुदान पर उसी की प्रशंसा होनी चाहिए। तुम्हें गर्व करना हो तो साठ वर्ष की उम्र में शीशा देखकर करना कि तुम उस प्रकृति की देन को लम्बे समय तक अक्षुण्य रखकर अपनी समझदारी का परिचय दे सकी या नहीं। “
प्रियजनों के सुख-दुख में सम्मिलित होना-सम्वेदना, सहानुभूति रखना मित्र धर्म का आवश्यक कर्त्तव्य है।यह आत्मीयता का क्षेत्र जितना विस्तृत हो उतना ही उत्तम है, पर जो परस्पर घनिष्ठ है उनके प्रति भावनात्मक सद्भावना एवं क्रियात्मक सहयोग का बरतना तो आवश्यक कर्त्तव्य हो जाता है। ऊँची स्थिति में तो यही आत्म-विस्तार आत्मिक प्रगति का माध्यम ही बन जाता है। परिवार और समाज की सुदृढ़ता इसी आदान-प्रदान पर पनपती है।
मात्र साथ-साथ से कोई प्रियजन-प्रेमास्पद नहीं बनता। जिनके बीच सुख-दुख की जितनी सम्वेदना होती है। जीवधारियों के बीच पनपने वाली यह आत्मीयता हो ऐसी सुखद सम्वेदना उत्पन्न करती है, जिसे संसार का सबसे बड़ा कहा गया है। प्रेम ही परमेश्वर है की उक्ति से यही तथ्य उभरता है कि भावनात्मक दिव्य अनुभूतियाँ सघन आत्मीयता के आधार पर पनपती है और उन्हीं से जीवन में सरसता उत्पन्न होती है। एक बाड़े में तो कितनी ही भेड़े भी रहती है-एक जेल में कितने कैदी बन्द होते है-रेल के डिब्बों और धर्मशालाओं में एक साथ कितने ही व्यक्ति घिचपिच बैठे रहते हैं, पर इस पर निकटता के बीच सघनता कहाँ होती है? ऐसी दशा में उनका साथ भी अखरता है। हर मुसाफिर चाहता है कि जितना भीड़ कम हो उतनी ही फैलने-फूटने की सुविधा मिले।
प्रियजनों के बीच जो स्नेह-सम्मान भरा सद्भाव होता है और जो सहयोग के रूप में विकसित होकर सर्वतोमुखी प्रगति बनता है-उसी को मित्रता अथवा प्रेम कहना चाहिए, देखना है कि हम अपनी आत्मीयता को सार्थक बनाने के लिए संपर्क क्षेत्र के प्रियजनों के साथ सुख-दुख की सम्वेदनाओं का आदान-प्रदान करते हैं या नहीं? यदि नहीं तो उस भूल का परिमार्जन तत्काल करना चाहिए। अन्यथा उस संपर्क का मूल्य उतना ही बाजारू बन जाएगा जितना कि ग्राहक और दुकानदार के बीच उथले स्तर पर पनपता और विलिप्त होता रहता है।
स्वजनों के साथ सद्भाव, सहयोग के आदान-प्रदान का स्तर ऊँचा उठाने का शुभारम्भ यदि अधिकतम घनिष्ठों से करें तो यह अधिक युक्ति-युक्त होगा और प्रभावी भी।
सबसे निकटवर्ती, सबसे घनिष्ठ और सदा-सर्वदा साथ रहने वाला अपना प्रियजन -शरीर। ऊपरी दृष्टि से हमारे साथ वह गहरी मित्रता निबाहता है और जीवन धारण करने में सर्वोपरि भूमिका निबाहता है। स्वामिभक्त इतना कि पल्ला पकड़ने के दिन से वियोग की अन्तिम घड़ी तक साथ देगा और अनवरत श्रम करेगा। “अहिर्निशि सेवामहे” का सूत्र साइनबोर्डों पर लिखा तो अनेकों जगह देखा गया है, पर उसे सच्चे मन से सार्थक करने में निरत रहने वाला सेवक तो शरीर ही है। जो कुछ पाया-कमया गया है उसका अधिकाँश श्रेय इस काया को ही है। जितनी गहराई में उतरते जाया जाय-प्रियजनों के समूह में सबसे अधिक उपकारी-सहयोगी और घनिष्ठतम साथी यह शरीर ही है। अब तक की इसकी सेवाएँ इतनी है, जिन्हें तौलने पर लगता है संसार के अन्य सभी के मिले-जुले उपकारों से भी इसके उपकार कही अधिक भारी है। ऐसे प्रियजन के लिए हमारे रोम-रोम में कृतज्ञता भरी रहनी चाहिए। भले ही उसे वाणी से व्यक्त न करें।
इस प्रियपात्र के अनुदानों के बदले में अपने भी कुछ प्रतिपादन है ही। उसकी सरसता और सुविधा के लिए अपनी ओर से भी बहुत कुछ किया गया है। आहार, निद्रा की सुविधा, सुरक्षा की, आमोद-प्रमोद की सुविधा जुटाने में दुर्बलता और रुग्णता हटाने में भरसक प्रयत्न किया गया है। यह दूसरी बात है कि इस हित साधन में दूरदर्शिता का अभाव रहने से पाले हुए बन्दर द्वारा मालिक की मक्खी मारने के लिए तलवार चलाकर चोट पहुँचाने की कहानी की तरह परिणाम उल्टा ही निकला है।
शरीर से हम लाभ तो कई प्रकार के उठाते हैं, पर उसके प्रति कर्त्तव्य पालन में प्रायः उपेक्षा ही बरतते रहते हैं। यदि ऐसी ही कुछ चलता रहा हो तो उस भूल के परिमार्जन का आज का दिन ही सबसे अच्छा मुहूर्त माना जाय।
जिस प्रकार साथी-सहयोगी से दुख-दर्द की बात पूछी जाती है, उसी प्रकार अभिन्न मित्र शरीर से भी पूछा जाना चाहिए कि उसे व्यथा ग्रसित तो नहीं रहना पड़ रहा है। बुरी आदतों की रेती से अपनी गरदन, अपनी ही रेती से तो नहीं रेती जा रही है? इन प्रश्नों का उत्तर काया के अवयव वाणी या लेखनी से तो व्यक्त नहीं कर सकते, अपनी स्थिति सामने रखकर यह विदित तो भली प्रकार करा सकते हैं कि उन्हें किस परिस्थितियों में गुजारा करना पड़ रहा है।
दर्पण लेकर चेहरे का निरीक्षण किया जा सकता है। त्वचा में लालिमा और चमक की कमी, आँखों के आस-पास गड्ढे, काले निशान, पुतलियों में मुर्दनी, गालों पर झुर्रियाँ, गरदन पर लटकती हुई खाल, दृष्टि की मन्दता, बालों का पकना, झड़ना, खोपड़ी पर जमने वाली फुंसी, कानों से कम सुनाई देना, जुकाम, सिर भारी रहना, नींद की कमी जैसी शिकायतों में से कुछ को भी देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि काया के इस शीर्ष स्थान को उपयुक्त पोषण नहीं मिल पा रहा है। जितना मिलता है, उससे अधिक खर्च करना पड़ रहा है और स्थिति दिवालिये जैसी बनती जा रही है। स्मरण शक्ति की कमी, सूझबूझ का अभाव, संकोच छाया रहना और किसी महत्त्वपूर्ण प्रसंग से अपने को बचाये, छिपाये रहना जैसे लक्षण भी इसी सिर शीर्ष की दयनीय दुर्बलता की प्रकट करते हैं।
सिर के बाद दूसरे नम्बर का विभाग है-धड़। इसमें हृदय, फेफड़े, जिगर, आभामय, आंतें, गुर्दे जैसे महत्त्वपूर्ण अवयव सटे हुए है। इन सबसे पूछा ना सकता है कि आप लोग किस स्थिति में अपना निर्वाह कर रहे है। अन्य अवयव तो अधिक गहराई में है और उनकी सही जानकारी कुरेदबीन के बाद ही लगती है, पर पाचन तन्त्र वह सब कुछ सहज ही बता देता है। जो उसे आये दिन सहन करना पड़ता है। जो भोजन किया जाता है वह ठीक तरह नहीं पचता। आंतें मल विसर्जन ठीक तरह नहीं कर पाती। पेट भारी रहना, खुलकर भूख न लगना जैसी अभ्यस्त कठिनाइयाँ यों देखने में छोटी लगती है, पर घुन की तरह वे जीवनी-रक्त इतनी स्वल्प मात्रा में बनते हैं कि बरतने भर से शरीर की आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती और थकान छाई रहती है। पेट में पड़े हुए अपच आहार का सड़ना स्वाभाविक है। यह सड़न, अपान वायु, डकार, जम्हाई, मुँह में छाले, टोन्सिल आदि के रूप में देखे जाते हैं। यह सड़न गैस बनकर जोड़ों में दर्द, हृदय की धड़कन, सिर दर्द जैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है। अपच की सड़न विषाक्त गैस बनती हैं वह रक्त के साथ साँस के साथ समस्त शरीर में भ्रमण करती है और जहाँ कही अपने ठहरने के लिए स्थान पाती है वही डेरा डालकर बैठ जाती है। यही है विभिन्न नाम रूप वाली बिमारियों का प्रभाव कारण। यदि भोजन ठीक तरह पचता रहे, सड़न उत्पन्न न हो तो शरीर को जर्जर बनाने वाले दर्द, दाह, सृजन, गठन, व्रण आदि चित्र-विचित्र रोग नहीं उभरते हैं। पोषण के अभाव में स्वास्थ्यघाती बाह्य आक्रमणों से जूझना कठिन पड़ता है और भीतर से उत्पन्न होने वाली विकृतियों को निकाल बाहर करना दुष्कर बना जाता है। इतने विवरण का एक शब्द में निचोड़ यह है कि अपच के कारण तीन-चौथाई बीमारियों का त्रास सहना पड़ता है, दुर्बलता घेरे रहती है और अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है।
शरीर अपना परम स्नेही और घनिष्ठ स्वजन-सम्बन्धी है। उसकी दयनीय स्थिति पर चिन्ता करना और दुख होना उचित ही है। यदि इस दिशा में निष्ठुरता बरसी गई तो यही समझा जाएगा कि अपनी मित्रता झूठी है। जन्म से लेकर मरण तक के साथी अहिर्निश सेवा संलग्न स्वामिभक्त सेवक के कष्टों की भी यदि चिन्ता न की ला सकी और संकट से उभरने की आकाँक्षा न उठी तो इसका अर्थ यही होगा कि अपेक्षाकृत दूर रहने वाले, कम संपर्क में रहने वाले, कम उपयोगी, कम उपकारी स्वजनों के प्रति मित्र की गहराई तक पहुँच सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा। बाहर से मोह के आवरण से ढका स्नेही होने का मुखौटा पहनकर किन्हीं की अपने प्रेमी होने का झूठा आश्वासन भले ही दिया जाता रहे।
अभ्यास में आने से तो हर बुरी स्थिति भी सह्य और स्वाभाविक लगने लगती है। ऐसी दशा में अपने शरीर को दुर्दशा पर भी यह मानकर सन्तोष किया जा सकता है कि वह दूसरे कितनों से अच्छी है, पर यह तो कोई तर्क नहीं हुआ। ऐसे तो चोट भी यह कह सकता है कि वह हत्यारा जितना क्रूर तो नहीं है। इस तर्क के आधार पर उसकी सज्जनता कहाँ सिद्ध हुई? यह कहने से वह सज्जनों की श्रेणी में कैसे गिना जा सकेगा?
तुलनात्मक अध्ययन से ही वस्तुस्थिति का पता चलता है। चले देखें कि नीरोग शरीर वालों की तुलना में हम कितनी गई-गुजरी स्थिति में है। खेलों के मैदान में गेंद के साथ-साथ उछलते हुए खिलाड़ी, बलिष्ठता की प्रतियोगिताओं में बाजी मारते हुए विजेता, दैनिक काम-काज में फुर्तीली चिड़ियों की तरह खिले हुए चेहरे अपने ईद-गिर्द ही अनेकों देखे जा सकते हैं। देखना चाहिए कि इन्हें कौन सी अतिरिक्त सुविधाएँ मिली हुई है, जिनके सहारे वे ऐसी सुदृढ़, सशक्त और सौंदर्यवान काया का आनन्द ले सके और अपने पास क्या कमी है जिससे उनसे वंचित रहना पड़ा?
स्वस्थ और सुन्दर दीखने वाले लोग से मिलकर उनके निजी जीवनक्रम की गहराई में उतर कर बहुत बारीकी से देखा गया, पर ऐसा कुछ हाथ न लगा जिससे यह समझा जाता कि इन लोगों ने अमुक साधनों को अतिरिक्त सौभाग्य के रूप में पाया और ऐसे अच्छी स्वास्थ्य के अधिकारी बने। अपने ऊपर कोई अतिरिक्त विपत्ति भी छाई हुई नहीं है, जिसके दबाव से शरीर को इस गई-गुजरी स्थिति में रहना पड़े। इतने पर भी यह असाधारण अन्तर क्यों दिखता है अपने संपर्क क्षेत्र में अपने से भी गई-गुजरी स्थिति में रहने वालों में से ढेरों के स्वास्थ्य कही अच्छे है फिर इस अन्तर का कारण क्या होना चाहिए। यह खोजना ही पड़ेगा अन्यथा इस असन्तुलन की जड़ तक न पहुँचा जा सकेगा और यदि सुधार करना हो तो उसका उपाय भी समझ में न आयेगा। अपने परमस्नेही शरीर के दुख में सम्मिलित होगा, उसकी दुर्बलता एवं रुग्णता हो हटाने के लिए प्रयत्न करना अपना परम पवित्र मित्र धर्म है। सही ही कहा गया है, “शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्।”
शेखावटी (राजस्थान) में जन्मे एक युवक को भरी जवानी में संन्यास लेने की उमंग उठी। परिवार में वह नितान्त एकाकी था, इसलिए कुछ कठिनाई भी नहीं हुई। तीर्थों में भ्रमण करते रहे और पण्डों तथा बाबाओं की करतूतों को ध्यानपूर्वक देखते रहे। उन्हें यह समुदाय तनिक भी न सुहाया और लौटकर अपनी मातृभूमि चले आये।
उनने हर घर में एक अन्न घट रखा, जिसमें एक मुट्ठी अन्न डालने का नियम था। इतने भर से गाँव में प्राथमिक पाठशाला चल पड़ी। यह प्रयास उनने अन्य गाँवों में भी आरम्भ किया और करीब 100 स्कूल खुल गये। अब हाईस्कूल और कॉलेजों के लिए भी उनने चंदा इकट्ठा किया और साथ उनका सुसंचालन भी, वे सभी दिनों-दिन प्रगति करते गये। संगारिया को केंद्र बनाकर उनने विभिन्न विषयों के सात कॉलेजों की स्थापना की।
स्वामी जी लगातार तीन बार लोकसभा के सदस्य चुने गये। अपने प्रभाव का उपयोग वे शिक्षण विस्तार तथा कुरीति निवारण में करते रहे। यह सक्रिय संन्यास सब प्रकार सार्थक बना सहकर्मियों के लिए आदर्श बना। मरणपर्यन्त उनका उत्साह युवकों जैसा रहा।
सब ओर कुछ नया होने की अभिलाषा है। पुरानी विचारधाराओं जीवन-मूल्यों को भी अपने नवीनीकरण की प्रतीक्षा है। सुविख्यात विचारक प्रिंस क्रोपाटिकन के अनुसार यह प्रतीक्षा इस बात का द्योतक है कि पुरातन के गर्भ से नवीनता जन्म लेने जा रही है। उन्होंने अपनी पुस्तक क्रान्ति की भावना में क्रान्ति के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए बताया है कि युग की प्राचीनता के दरकने-टूटने का अर्थ है-नवयुग के जन्म की घड़ी आ गयी। अब नए समाज का जन्म नक्षत्र उदित होने को है।
किसी भी समाज का जन्म भले ही किन्हीं स्थितियों-परिस्थितियों के कारण होता दिखाई दे। पर उसका वास्तविक गर्भाशय कोई न कोई विचारधारा अथवा चिन्तन प्रणाली होती है। इसी की ऊर्जा से नवसमाज के भ्रूण को पोषण मिलता है, उसमें परिपक्वता आती है। बाद में भी उसी विचार-प्रणाली से जन्मी प्रथा-परम्पराएँ इसका विस्तार करती हैं जन्म लेने वाले समाज के जीवन की दीर्घता, सबलता और सुदृढ़ता अपनी जन्मदात्री विचारधारा के अनुरूप ही होती है। समाज की व्यापकता एवं विस्तार भी इसे जन्म देने वाली चिन्तन प्रणाली की समग्रता के अनुरूप ही होती है।
संसार की प्राचीन सामाजिक समस्याओं का अवलोकन करें तो तथ्य खुद-ब-खुद स्पष्ट होते जाते हैं। यूनान की प्राचीन सामाजिक संरचना की बनावट में सुकरात, अरस्तू, डेमोकिक्रटस, हैराक्लाइटस की कारीगरी स्पष्टतया देखी जा सकती है। यही सत्य मिश्र एवं सुमेरियन सभ्यता में भी देखने को मिलते हैं। सप्त सिन्धु के किनारे उपजा भारतीय समाज भी अपने प्राचीन ऋषिगणों की विचारधारा के संरक्षण में पालित-पोषित हुआ है।
प्राचीन विचारधाराएँ विभिन्न भौगोलिक अंचलों में पनपी थी। यदि उन्हें एक स्थान से भी ले जाया गया हो, तो भी उन्होंने वहाँ पहुँचकर अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप स्वरूप धारण कर लिये। अभी दो हजार वर्षों पूर्व भारतवर्ष में जन्मी महात्मा बुद्ध की चिन्तन प्रणाली, यही से चीन, जापान, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया आदि अनेक देशों में गयी। और जाने के साथ ही अपनी मौलिक विशेषताओं को बनाए रखने के बावजूद वही के अनुरूप ढल-बन गयी। आज यदि विभिन्न देशों में फैले बौद्ध समाज की रीति-रिवाजों, प्रथा-परंपराएं, कर्मकाण्डों, पर्वों-त्यौहारों, का विवेचन-विश्लेषण करें, तो उनमें परस्पर काफी बड़ा फर्क देखने को मिलता है। ऐसा ही फर्क अन्य चिन्तन प्रणालियों से उपजी दूसरी सामाजिक संरचनाओं में भी है।
उन्नीसवीं सदी से प्रारम्भ हुई वैज्ञानिक क्रान्ति ने मनुष्य के चिन्तन और जीवन में भारी उलट-फेर कर दी। तर्क एवं प्रयोगों ने जहाँ भावुकता एवं आस्था परायण चिन्तन शैलियों को सकते में डाल दिया, वही द्रुतगामी संचार एवं परिवहन के साधनों में भौगोलिक सीमा रेखाओं को एक-दूसरे से मिला दिया। विचारों और साधनों के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रवाहित होने लगने से स्थितियाँ बदल गयी। ऐसे में प्राचीन मूल्यों एवं मानदंडों का टूटने-दरकने लगना स्वाभाविक है।
इसकी शुरुआत न्यूटन की याँत्रिक जीवन दृष्टि से हुई। यन्त्र विज्ञान की सबसे बड़ी विभूति सर आइजक न्यूटन ने यूँ तो अपनी खोजें यान्त्रिक जगत के लिए की थी। लेकिन इनका विश्वास था कि यान्त्रिकता के नियम, कानून चिन्तन एवं जीवन में भी लागू किए जा सकते हैं। और हुआ भी यही, जीवन और समाज धीरे-धीरे याँत्रिक व्यवस्था में ढलने लगा। वैसे सर न्यूटन की यह सोच कोई नई बात नहीं थी। पहले भी प्राचीन यूनानी दार्शनिकों का विश्वास था कि सामाजिक एवं राजनैतिक सम्बन्धों तथा बाहरी दुनिया के बारे में सोचने के तौर-तरीकों में गहरा सम्बन्ध है। हइराक्लीइटस के संघर्ष एवं तनाव के सिद्धान्त समाज में लोगों पर भी लागू होते हैं। डेमोक्रिटस एवं एविक्यूरिस ने पृथ्वी को केन्द्र-बिन्दु के रूप में देखा, जिसके चारों ओर ग्रह-नक्षत्र, तारोँ को गतिमान बनाने वाले ईथर का भँवर है। उसने अपने तत्कालीन समाज में इसे सामाजिक परिवर्तन के लिए एक महत्त्वपूर्ण नियम की मान्यता दी।
हालाँकि बाद में हुई खोजें इन सिद्धान्तों को बदलती, सुधारती रही। लेकिन एक बड़े समय तक रहे इन प्रभावों से कोई इन्कार नहीं कर सकता है। बअब न्यूटन की ही खोज को ले लें, इन्हीं को अ धार बनाकर फ्राँसीसी चिन्तकों ने इतिहास और अध्यात्म के प्रश्नों के हल ढूँढ़ने के प्रयास किए। इसी वैज्ञानिक दृष्टि से धर्म को भी नए सिरे से प्रतिपादित करने की कोशिश चल पड़ी । इन कोशिशों को देखकर मधुर व्यंग्य करते हुए अमेरिकन दर्शनशास्त्री जियोरजियो डि सेन्टिलाना ने कहा था, “ये लोग इसी प्रकार एक धर्म बनाने की कोशिशें कर रहे है, जैसे इन्होंने इमारतें, पुल, एवं मशीन बनायी है।” कुछ भी हो, न्यूटन की याँत्रिक जीवन दृष्टि का असर काफी व्यापक रहा। उनके तीनों गति नियम-अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में लगभग प्रत्येक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक चिन्तकों के लिए आदर्श बने रहे।
थामस हाब्स, जाँन स्टुअर्ट मिल, जानलाँक इन सभी ने नवीन याँत्रिक भौतिक शास्त्र से प्रेरित होकर अपने चिन्तन की कड़ियाँ जोड़ी और अपनी राजनैतिक एवं सामाजिक रचनाओं को प्रस्तुत किया। दर्शनशास्त्री लाँक तो न्यूटन से इतना प्रभावित थे कि स्वयं न्यूटन के आधीन काम करने वाला मजदूर बताने में गौरव अनुभव करते थे। उडम स्मिथ ने भी याँत्रिकी सिद्धान्तों से प्रभावित होकर स्वतन्त्र बाजार, वित्तीय व्यवस्था तथा श्रम विभाजन के सिद्धान्त बनाए है। ‘सोशियोलाँजी’ शब्द के जन्मदाता आगस्ट काँमटे ने भी इसी से प्रभावित होकर समाज विज्ञान को पहले-पहल सोशल फिजिक्स (समाज भौतिकी) कहा।
न्यूटन के अनुसार समूची दुनिया छोटे-छोटे अणुओं से बनी है। इनके बीच आकर्षण, विकर्षण का क्रम चलता रहता है राजनैतिक और सामाजिक चिन्तकों ने इसी सूत्र का छोर पकड़कर अपने विचारों में मनुष्यों के आपसी व्यवहार की व्याख्या कर डाली। उनके अनुसार, व्यक्ति सर्वथा अपने हितों की रक्षा करने वाली राह ही चुनता है और इसी के परिणामस्वरूप टकराहट या संघर्ष अथवा विकर्षण का जन्म होता है। आकर्षण तो तभी सम्भव है जब दो व्यक्ति अपने पारस्परिक हितों को पूरा करें, हालाँकि ऐसी स्थिति बहुत कम आती है।
न्यूटन के इसी याँत्रिक भौतिकवाद ने औद्योगिक एवं तकनीक संस्कृति को जन्म दिया। बदलते समय के अनुसार यान्त्रिक जीवन दृष्टि में जैसे-जैसे संशोधन और विकास होता रहा, औद्योगिक एवं लोकतान्त्रिक फलती-फूलती गयी। पश्चिमी व्यक्तिवाद एवं लोकतान्त्रिक संरचना दोनों ने ही इसी से अपने-अपने अस्तित्व को बनाए रखने के कारण ढूँढ़े। आज हमें जो सामाजिक संरचनाएँ दिखाई पड़ रही है, उसके पीछे यही रहस्य सक्रिय है।
यान्त्रिक जीवन दृष्टि ने मानव समाज को कतिपय सुविधाएँ पहुँचायी है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस व्यवस्था की सब से बड़ी खामी भावनाओं को सर्वथा इन्कार कर देती है। यन्त्रीकरण ने मनुष्य और प्राकृतिक जगत के बीच गहरी खाई खोद दी। प्रकृति को इंसान से बुरी तरह अलग मान लिया। प्रकृति पर विजय प्राप्त करना, उसका भरपूर उपभोग, उपयोग करना मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य रह गया। जिसके परिणामस्वरूप आज घोर प्राकृतिक असन्तुलन दिखाई पड़ने लगा। पर्यावरण चीत्कारने लगा और पूरी की पूरी प्राकृतिक व्यवस्था चरमरा उठी।
बात यहीं तक सीमित नहीं रही। यान्त्रिक दृष्टि से उपजी औद्योगिक सभ्यता में जीने वाला इंसान भी एक यन्त्र बन गया। उसके व्यक्तिगत एवं सामाजिक सम्बन्धों तथा उसकी आध्यात्मिक पासा की अनगिनत यंत्रों के बीच पिसना पड़ता है। बस चारों ओर एक ही धुन रह गयी है अधिक से अधिक कमाई? क्यों और किसलिए? इसे सोचने को किसी को फुरसत नहीं है। तभी तो आज की इस सामाजिक दशा पर आश्चर्य एवं दुख प्रकट करते हुए सुविख्यात विचारक टामस बेरी को कहना पड़ा-”मानव मस्तिष्क इतने संकीर्ण दायरों में कभी नहीं रहा। सच तो यह है कि यान्त्रिक व्यवस्था में विचारशीलता एवं भाव प्रवणता का कोई स्थान ही नहीं है। उसे यह तक मालूम नहीं है कि मनुष्य का जीवन और विचार ब्रह्माण्ड में कहाँ और कैसे उत्पन्न हुए।”
लेकिन अचानक अपने विकास के चरम तक पहुँच चुकी इस यान्त्रिक जीवन व्यवस्था में चारों ओर से दरारें पड़नी शुरू हो गयी। सत्य के पीछे विज्ञान के वे नये अन्वेषण है जिन्होंने यान्त्रिक सिद्धान्तों को गया-गुजरा और बीते समय की बात करार दे दिया है। इन नए अन्वेषणों की पृष्ठभूमि तो उसी समय बन गयी जब युगाचार्य स्वामी विवेकानन्द ने मानव सभ्यता को भविष्य का बोध कराते हुए कहा था- “कि अब विज्ञान को आध्यात्मिक होना पड़ेगा और अध्यात्म को वैज्ञानिक। वेदान्त नए युग के समाज का वैचारिक आधार बनेगा।”
उनकी इस वक्तृता के कुछ ही दिनों बाद सुविख्यात भौतिकशास्त्री वारनर हाइजेनवर्ग भारत आए। उनकी इस यात्रा का उद्देश्य विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर से वेदान्त के सूत्रों को समझना था, ताकि वे इसे अपनी अगली खोजों का आधार बना सकें। अपनी इस सफल यात्रा के बाद उन्होंने अनिश्चितता के सिद्धान्त की खोज की फिर तो समूचे विज्ञान जगत में क्रान्ति उठ खड़ी हुई। क्वाँटम आदि की नयी धारणाएँ प्रकाश में आयी। इन अन्वेषणों के प्रभाव से विश्व भर के विचारशील, साहित्यकार यह सोचने के लिए विवश हुए कि दुनिया के सारे भेद विवश हुए कि दुनिया के सारे भेद मिथ्या है। कोई भी वस्तु पदार्थ अथवा व्यक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं है। समूचे विश्व में एक चेतन सत्ता की लहरें तरंगित हो रही है।
अपनी इस अनुभूति को शब्द देते हुए मनीषी एल्विन टाफ्लर ने भविष्यवाणी की, मशीनी युग अब समाप्ति की कगार पर है। इसकी छवि अब हमें आकर्षित नहीं कर सकती। न ही यह हमारी संस्कृति क्रान्ति उठ खड़ी होगी, जो मनुष्य को वैयक्तिक एवं सामाजिक स्तर पर जीने का तरीका सिखाएगी। इस तरह की क्रान्ति की आवश्यकता एवं उपयोगिता बताते हुए एडबर्ड डिबोरी का अपनी पुस्तक ‘हैण्डबुक फाँर द पाजिटिव रिवाँल्यूशन’ में कहना है कि सकारात्मक सामाजिक क्रान्ति के हथियार मशीनों की खड़-खड़ और बारूद के धमाके नहीं, मानव की मूल वृत्तियों एवं विचारों में बदलाव है। मशीनों की भौतिक शक्ति भी तभी कारगर साबित होगी, जब मानव अपने गुणों में परिवर्तन करे।
विज्ञान की क्वाँटम धारणा के आधार पर नये समाज की कल्पना करने वालों में दाना जोहर एवं इयान मार्शल मुख्य है। उन्होंने विचारों के प्रतिपादन में एक पुस्तक लिखी है ‘क्वाँटम सोसाइटी’। इसमें उन्होंने नवयुग के समाज की ऐसी कल्पना की है, जो वैज्ञानिक होते हुए आध्यात्मिक तत्व चिन्तन के प्रमुख सूत्र एकात्मकता, व्यापकता एवं सामंजस्य को अब विज्ञान ने भी खोज लिया है। भावी समाज में विज्ञान की उपलब्धियाँ मनुष्य में एक ऐसे चिन्तन को प्रदीप्त करेंगी जो आध्यात्मिक भावों से भरा होगा। आज की टूटती-दरकती व्यवस्था से सब और कुछ ऐसा नया जन्म लेगा जहाँ पराएपन की अनुभूति न होगी।
उन्होंने अपने इस ग्रन्थ में स्वयं के विचारों की
अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि नवयुग के नये समाज के सदस्य एक नृत्य मण्डली की तरह रहेंगे। जो लय और ताल की तरह अपने विचारों और भावनाओं में पूर्ण सामंजस्य बरतेंगे। ऐसे समाज की जड़े गहराई तक समस्त प्रकृति, वृक्ष, वनस्पति, नदियां, पर्वत, सूर्य, चन्द्र समूचे भूमण्डल, तारा-मण्डल ही नहीं आत्मिक सत्य तक भी जुड़ी होगी। उनका मानना है कि जब न्यूटन की धारणाओं ने सब ओर समूची जीवन की व्यवस्था को बदलाव न ला दे। इक्कीसवीं सदी में वैज्ञानिक अध्यात्म पर आधारित नव्य समाज की भव्य संरचना सुनिश्चित है। इसका विस्तार सब ओर सब कही होगा। इसी के प्रभाव से जाति, वर्ग, प्रथा-परम्पराओं, रीति-रिवाजों, सामाजिक एवं राजनैतिक स्थितियों में नया ही नया नजर आएगा। अच्छा हो नवयुग के आगमन की इस सुनिश्चितता को समझकर हम भी अपना नवीनीकरण कर डालें। स्वयं में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग के विस्तार के प्रयत्नों में जुट जाएँ।
विश्व के सामने आज अनेक समस्याएँ ऐसी है जो अपना तत्काल समाधान चाहती है। उन्हीं में से एक सर्वप्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण समस्या है-निरन्तर बढ़ती हुई आबादी के लिए खाद्य सामग्री जुटाना। पृथ्वी पर इन दिनों प्रायः 6 अरब मनुष्य है। अभी जब इतनों के लिए तन ढकने के लिए वस्त्र, पेट भरने के लिए अन्न एवं सिर छिपाने के लिए आच्छादन की व्यवस्था नहीं हो पा रही है तो अगले ही कुछ वर्षों में जब यह संख्या 10-11 अरब हो जाएगी तो फिर इतने जनों का पेट कैसे भरेगा? खाद्य समस्या कैसे सुलझेगी? तब क्या लोग भूखों मरेंगे या फिर छीना-छपटी पर उतारू होकर मत्स्य न्याय की कहावत चरितार्थ करेंगे? मानव-अस्तित्व से सीधा जुड़ा हुआ यह एक ऐसा ज्वलन्त प्रश्न है जिसके सम्बन्ध में विश्व-मनीषा का चिन्तित होना स्वाभाविक है।
इस संदर्भ में अर्थशास्त्रियों, समाज विज्ञानियों एवं विचारशील मनीषियों ने गहन विचार-मंथन किया है और जो निष्कर्ष प्रस्तुत किये है, वे उज्ज्वल भविष्य की आशा बँधाते हैं। ‘द प्लेन टुथ’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक हरबर्ट डैब्ल्यू आर्म्स स्टोंग ने अपनी पुस्तक ‘दि वन्डरफुल वर्ल्ड टूमारो’ में विश्व की खाद्य समस्या के निराकरण की संभावनाओं को प्रकट करते हुए बताया है कि इन दिनों यह समस्या जितनी भयावह दिखाई पड़ रही है वस्तुतः वह उतनी है नहीं। आज विश्व की कुल भूमि का 10 प्रतिशत भाग ही कृषि योग्य बन पाया है, लेकिन मानवी पुरुषार्थ एवं प्रयत्नशीलता को देखकर यही कहा जा सकता है। कि अगले दिनों इक्कीसवीं शताब्दी में कालाहारी, सहारा और गोबी जैसी विशाल मरुभूमि को भी हरा-भरा बनाया जा सकेगा, जिससे विश्व के खाद्य उत्पादन में वृद्धि होगी। इतिहास साक्षी है कि बड़ी-से-बड़ी एवं कठिन-से-कठिन परिस्थितियों पर भी मानवी पुरुषार्थ विजयी होता रहा है। पुरुषार्थी को ही ईश्वरीय सहायता भी मिलती है। अतः कोई कारण नहीं कि मरुस्थल की हरा-भरा बनाने में कोई कठिनाई आयेगी। मरुभूमि का ही नहीं-समुद्री सम्पदा का दोहन भी इक्कीसवीं सदी में पूरी तरह कर सकना संभव हो सकेगा और इस तरह बढ़ी आबादी का पेट भरा जा सकेगा।
न्यूयार्क में ‘हडसन इन्स्टीट्यूट’ के संचालक तथा ख्यातिलब्ध भविष्यवक्ता हरमन काहन का कहना है कि इक्कीसवीं सदी में विश्व की खाद्य समस्या जनसंख्या वृद्धि के बावजूद भी सुलझा ली जाएगी। उनने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘द नेक्स्ट टू हन्ड्रेड ईयर्स’ में उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करते हुए कहा है कि सन् 2176 तक संसार में गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी और बेकारी की समस्या समाप्त हो जाएगी विश्व की आर्थिक व्यवस्था अधिक सुदृढ़ बनेगी।
लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठेगा। सुख और समृद्धि का वातावरण बनेगा। विज्ञान एवं तकनीकी का और अधिक विकास होगा। सुविधा-साधनों की कोई कमी न रहेगी। आवश्यकता के अनुरूप विद्युत आपूर्ति भी हो सकेगी। धरती की समस्त खनिज सम्पदा का भरपूर सदुपयोग बन पड़ेगा, जिससे प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ेगी।
‘वर्ल्ड रिसोसेंज इंस्टीट्यूट, वाशिंगटन, डी. सी’ के प्रवक्ता रौबर्ट रेपेटो ने अपनी पुस्तक ‘द ग्लोबल पौसीबल-रिसोसेंज, डवलपमेंट एण्ड द न्यू सेंचुरी’ में बताया है कि सन् 1960 से लेकर 1992 तक की अवधि में विश्व की प्रतिव्यक्ति आय में 3.5 प्रतिशत की अभिवृद्धि हुई है। अविकसित माने जाने वाले कोरिया जैसे राष्ट्रों ने अपनी प्रतिव्यक्ति आय को 1910 डालर तक पहुँचाया है। पिछले लगभग दो दशकों में उसने 6.6 प्रतिशत तक की अभिवृद्धि की है। सघन आबादी वाले राष्ट्रों की इस विकासोन्मुख प्रवृत्ति को देखकर इतना ही कहा जा सकता है कि सन् 2000 तक संसार का हर अविकसित राष्ट्र अपने प्रयत्न-पुरुषार्थ का परिचय देकर विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़ा होगा और इक्कीसवीं शताब्दी में कोई भी देश गरीब नहीं रहेगा। खाद्यान्न की समस्या का समाधान भी होकर रहेगा। कारण स्पष्ट है कि पिछले दिनों न्यूनतम आय वाले राष्ट्रों के खाद्यान्न उत्पादन में भी 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इन देशों ने नारी-शिक्षा के महत्त्व को भी समझा है, जिससे यह संभावना सुनिश्चितता का रूप धारण करने जा रही है कि इक्कीसवीं सदी नारियों के लिए उज्ज्वल संभावनाएँ लेकर आयेगी और अशिक्षा तथा अज्ञान का अंधकार मिटेगा। सारे संसार की महिलाएँ स्वतंत्र रूप से सुख-शाँति का जीवन जी सकेगी।
विश्व के अनेक देशों विशेषकर गरीब, पिछड़े एवं अविकसित कहे जाने वाले राष्ट्रों के सामने इन दिनों न केवल शिक्षा एवं आवास की समस्या गंभीर रूप धारण किये हुए है, वरन् उन्हें भूखों भी मरना पड़ रहा है। पर अगले दिनों यह स्थिति बदलने वाली है और सभी को जीवनयापन करने योग्य साधन-सुविधाएं उपलब्ध होने वाली है। इस सम्बन्ध में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सुप्रसिद्ध खगोलज्ञ ऐरिक जेू चेसन ने अपनी कृति ‘कौस्मिक डौन’ में कहा है कि आज विश्व की तीन-चौथाई आबादी अविकसित देशों में निवास करती है, जहाँ समय-समय पर बाढ़, दुर्भिक्ष एवं सूखा जैसी अनेक प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप होता रहता है। लेकिन विकसित राष्ट्रों के पास आवश्यकता से अधिक खाद्यान्नों का भण्डारण संग्रहित होता जा रहा है। अगले दिनों यह प्रवृत्ति बदलेगी और वे अपनी उदार वृत्ति का परिचय देकर खाद्य समस्या सुलझाने में प्रयत्नशील होगे। संश्लेषित खाद्य सामग्री के निर्माण से विश्व की बढ़ी हुई आबादी की भूख मिटाने की की समस्या का समाधान ढूँढ़ लिया जाएगा। कृत्रिम तरीकों से विनिर्मित ये खाद्य पदार्थ पोषक तत्वों से भरपूर होंगे, जिससे कुपोषण जैसी समस्या तब लोगों के सामने नहीं रहेगी इतना ही नहीं, अभी विश्व में सैन्य शक्तियों को प्रोत्साहित करने और अणु आयुध जुटाने व विकसित करने में जो धन व्यय किया जा रहा है, बुद्धिमत्ता विकसित होने पर उस राशि को रचनात्मक कार्यों को पूरा करने, शिक्षा, आवास एवं आहार जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को जुटाने पर खर्च किया जाएगा। चैसन ने इसे विश्व नियन्ता की परिवर्तन प्रक्रिया की सुनियोजित संभाव्य योजना की संज्ञा दी है, जिसकी प्रेरणा से युद्धोन्माद की प्रवृत्ति शाँति का स्वरूप धारण कर लेगी। अशक्त एवं अभावग्रस्तों के प्रति स्नेह सद्भाव का वातावरण बनेगा और तब न लोगों की भूखे पेट सोना पड़ेगा और न अज्ञान व अभावग्रस्त रहना पड़ेगा।
अमेरिका के लैस्टर आर. ब्राउन ने भी अपनी पुस्तक ‘वर्ल्ड विदाउट बाँर्डर्स’ में बताया है कि इक्कीसवीं शताब्दी में विज्ञान और तकनीकी अपने सुविकसित स्तर तक जा पहुँचेगी। वह मानव जाति के लिए अभिशाप न बनकर वरदान साबित होगी। विनाश के स्थान पर विकास को ही प्रोत्साहन मिलेगा। इसका अनुमान विश्व के अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों की सक्रियता को देखकर लगाया जा सकता है कि इक्कीसवीं शताब्दी आरम्भिक चरणों तक हर किसी को जीवनोपयोगी साधनों की उपलब्धि भरपूर मात्रा में हो सकेगी, जिससे जीवन स्तर भी सुधरा हुआ होगा।
ब्राउन ने अपनी उक्त पुस्तक में मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य का जो खाका खींचा है, उसका प्रमुख आधार विश्व व्यवस्था को माना गया है। उनके अनुसार निकट भविष्य में अर्थ प्रधान समाज व्यवस्था का अंत होकर समता का स्वरूप विकसित होगा, जिससे किसी को भी गरीबी, बेकारी और भुखमरी का शिकार नहीं बनना पड़ेगा। इन दिनों बेकारी की समस्या इसलिए भी है कि लोग गाँवों को छोड़कर शहरों की ओर भागते हैं, लेकिन अगले ही कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति बदलेगी और ग्रामीण क्षेत्रों को अधिक विकसित करने के लिए लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे लोगों की अभिरुचि प्रदूषण रहित ग्रामीण अंचल में रहने की बनेगी। इक्कीसवीं शताब्दी में नगर की घिचपिच से ऊबकर लोग देहातों में रहने और अपना रोजगार चलाने को प्राथमिकता देंगे। कितने ही देशों में यह प्रक्रिया चल भी पड़ी है और उसके उत्साहवर्द्धक सत्परिणाम भी सामने आये है। इसी तरह कृषि क्षेत्र में नौर्मन बौरलौग जैसे विख्यात वैज्ञानिकों ने खाद्यान्नों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ऐसी नयी विधियों की खोज निकाला है जिनके फलस्वरूप हरितक्राँति का ग्रामीण अंचल में व्यापक विस्तार होता जा रहा है। कृषि उपज की वृद्धि हेतु इस प्रकार के अनुसंधान एवं प्रयोग बड़े पैमाने पर चल पड़े है, जिसके फलस्वरूप निकट भविष्य में कुपोषण जैसी समस्या पर शीघ्र ही काबू पाया जा सकेगा।
पिछले दिनों संयुक्त संघ के तत्वावधान में विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन की एक संगोष्ठी आयोजित की गयी, जिसमें ‘वर्ल्ड साँयल चार्टर’ नामक एक योजना प्रस्तुत की गयी। इसका प्रमुख प्रयोजन सन् 2000 तक भूमि की उर्वरता
एक राजा के चार मन्त्री थे। उनमें से तीन तो थे चापलूस। चौथा था दूरदर्शी और स्पष्ट वक्ता।
राजा मरा तो पहले मन्त्री ने बहुमूल्य पत्थरों का स्मारक बनवाया। दूसरे ने उसमें मणि-मुक्त जड़वाये। तीसरे ने सोने के दीपक जलवाये। सभी ने उनकी स्वामिभक्ति को सहारा। चौथे मन्त्री ने उस स्मारक के आस-पास धना बगीचा लगवा दिया।
तीनों की राशि बेकार चली गई। चोर चुरा ले गये, पर चौथे का बगीचा फल देता रहा, मालियों के कुटुम्ब चलते रहे और राहगीरों को विश्राम करने तथा बनाने वाले का इतिहास पूछने का अवसर मिलता रहा।
में सुधार करके खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने तथा कुपोषण की समस्या को समाप्त करने का था। इस योजना में खाद्यान्न की उपयुक्त वितरण प्रणाली पर जोर दिया गया है और कहा गया हक इक्कीसवीं शताब्दी में इसे प्रत्येक देश अपनाने लगेगा, जिससे हर व्यक्ति को आहार में पोषक तत्वों की अधिक से अधिक मात्रा उपलब्ध हो सके। भारत के सम्बन्ध में विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न एवं विकासशील देशों में कुपोषण से पीड़ित व्यक्तियों की कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा भारत में निवास करता है, जहाँ प्रतिदिन पाँच हजार बच्चे इस कड़ी में जुड़ते जाते हैं और कितने ही अकाल मृत्यु के गाल में समा जाते हैं। इस तरह विश्वभर में 24 लोग प्रति मिनट क्षुधा से संत्रस्त होकर दम तोड़ देते हैं, जिनमें पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे भी सम्मिलित है। हर वर्ष समूचे संसार में 1 करोड़ 80 लाख से भी अधिक संख्या में लोग भूख और कुपोषण के कारण मरते हैं। पिछले 150 वर्षों में संसार भर में हत्याओं, युद्धों और विभिन्न प्रकार की क्रान्तियों में जितने लोग मारे जा चुके है, उससे कही अधिक पिछले कुछ वर्षों की अवधि में भूख से पीड़ित होकर लोगों को अपनी जीवन-लीला समाप्त करनी पड़ी है। इनमें भारत देश भी सम्मिलित है।
मूर्धन्य अर्थशास्त्रियों एवं कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में जनसंख्या के बढ़ते दबाव को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि अनाज की प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन की उपलब्धता 462 लेकर 510 ग्राम से भी अधिक बढ़ाने की द्रुतगामी योजनाओं की क्रियान्वित किया जाय। अपने देश को विकसित देशों की शृंखला में जोड़ने के लिए इक्कीसवीं शताब्दी के स्वरूप को ध्यान में रखकर चलना होगा। अनुपजाऊ परती एवं ऊसर बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने, समुचित जल प्रबंधन की व्यवस्था का प्रयोग करके खाद्यान्न की उपलब्धता बढ़ाने के प्रयत्नों की प्रमुखता देनी होगी। सामाजिक एवं आर्थिक योजनाओं के क्रियान्वयन पर ध्यान देना होगा। वर्तमान के स्वरूप को दृष्टिगत रखते हुए भविष्य के लिए प्रगतिशील एवं प्रयत्नशील बनाना तथा जन-सामान्य को जागरुक बनाना ही वह एकमात्र उपाय है, जो बढ़ती जनसंख्या पर अंकुश लगाकर सभी के लिए समुचित आहार एवं समग्र स्वास्थ्य वाले सुखद भविष्य का निर्माण कर सकता है।
प्रकृति के जीव-जन्तु एक दूसरे पर आश्रित है। विसर्ग का यह नियम है कि उनकी संख्या सदा संतुलित है कि उनकी संख्या सदा संतुलित रहे। असंतुलन अव्यवस्था उत्पन्न करता है। इस कारण वह जन्तुओं के जन्म-मरण का क्रम इस प्रकार नियंत्रित रखता है कि सब कुछ सहज-सामान्य ढंग से चलता रहे। जब इस विधान में कोई बाहरी हस्तक्षेप होता है, तो असंतुलनजन्य अव्यवस्था से पूरा पर्यावरण तंत्र ही लड़खड़ा उठता है और जो नहीं होना चाहिए, वह सब होने लगता है। यही है आज की स्थिति।
मनुष्य इस सृष्टि का सर्वोपरि प्राणी है। इस नाते उसका यह दायित्व बनता है कि वह प्रकृति के नियम में कोई व्यवधान पैदा न करे। यदि आदमी उसको स्वाभाविकता में कोई दखल न दे, तो उसका प्रवाह यथाक्रम चलता रहता है। किन् बौद्धिक समृद्धि हेतु अथवा स्वार्थपरतावश जब इस सहज प्रवाह से छेड़खानी होती है तो नैसर्गिकता बिगड़ती और संकटपूर्ण स्थिति उत्पन्न होती है। इन दिनों यही हो रहा है। वन्य प्राणी इस तादाद में पकड़े और मारे जा रहे है कि उससे वहाँ का पारस्परिक समीकरण गड़बड़ाता है, जिससे प्राकृतिक वातावरण को काफी हानि पहुँचाती है।
फ्रेड हायल ने अपनी पुस्तक ‘इनकाउण्टर विथ दि फ्यूचर’ में एक घटना का उल्लेख किया है। वे लिखते हैं कि आज से लगभग तीन दर्शक पूर्व अफ्रीका के जंगलों में शेर और हिरनों की काफी संख्या थी। उनके बीच आपसी संतुलन भी था। किन्तु इसके बाद वहाँ शेरों का शिकार इस परिणाम में बढ़ा कि मात्र तीन वर्षों के अन्तराल में ही उनकी संख्या घटकर एक-चौथाई रह गई। परिणाम यह हुआ कि जो हिरन पहले शेरों द्वारा नियंत्रित होते थे, अब वे निरंकुश हो गये और उन्मुक्त रूप से वृद्धि करने लगे, फलतः इस अल्पावधि में ही उनकी संख्या बढ़कर तिगुनी से भी अधिक हो गई। अधिक हिरनों के लिए भोजन भी अधिक चाहिए। जितना आहार था, उसे बढ़ी हुई संख्या ने कुछ ही महीनों में चट कर डाला। इससे भुखमरी की समस्या उत्पन्न हो गई। हिरन धीरे-धीरे मरने लगे। एक वर्ष के अन्दर-अन्दर उनका सम्पूर्ण सफाया हो गया। हिरनों के न रहने से बचे हुए शेरों के लिए आहार सम्बन्धी कठिनाई पैदा हो गई, जिससे शनैः-शनैः वे भी भूख के मारे दम तोड़ने लगे। जल्द ही, भोजन के अभाव में शेष की भी मृत्यु हो गई। इस प्रकार वन का प्राकृतिक वातावरण एकदम अप्राकृतिक हो गया।
यों तो शिकार प्राचीनकाल में होते थे। पर तब यह शौकिया था और इस ‘मृगया’ कहते थे। आज यह एकदम व्यावसायिक हो गया है। शिकार के तरीकों में भी बदलाव आया है। आरम्भ में इसके लिए तीर, धनुष, भाले, वल्लभ, बर्छे का प्रयोग होता था। शिकारों को घेरने-पकड़ने के लिए शिकारी कुत्ते और बाज पाले जाते थे। बन्दूक के आविष्कार के बाद शिकारियों का काम सरल हो गया। आज तो इसके लिए टेलिस्कोपिक गनों का सहारा लिया जाता है, ताकि अचूक ओर सही निशाने के आधार पर शिकार की एक बार में ही मार गिराया जा सके।
मुगलकाल में इस क्षेत्र में एक अभिनव प्रयोग हुआ और जानवरों की पकड़ने के लिए प्रशिक्षित चीतों का इस्तेमाल होने लगा। यह नवीन युक्ति सर्वप्रथम मुगल सम्राट जहाँगीर के मस्तिष्क में उपजी। इसके लिए उनने कुछ प्रशिक्षकों की नियुक्तियाँ की और जंगलों से पकड़े गये चीतों का प्रशिक्षण कार्य प्रारम्भ किया। जल्द ही उन्हें इस प्रकार साथ लिया गया कि वे अपनी जिम्मेदारी भली-भाँति समझने और निभाने लगे। शिकार के समय जब उन्हें साथ लाकर जंगल में छोड़ा जाता, तो वे हिरनों पर टूट पड़ते और उनके ढेर लगा देते। ‘तुजुके जहाँगीर’ नामक अपने ग्रन्थ में जहाँगीर ने अनुमान लगाते हुए लिखा है कि बारह वर्ष की उम्र से लेकर पचास साल की अवस्था में उनने लगभग 19,600 छोटे-बड़े जन्तुओं का शिकार किया था।
बाद में तत्कालीन दूसरे राजाओं ने भी इस निमित्त चीते पालने आरम्भ किये सन् 1858 में प्रकाशित अपने ग्रन्थ ‘इण्डियन हण्ट्स’ में प्रिन्स एलेक्सी साँल्टिकफ ने इसका विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। वे लिखते हैं, कि भरतपुर के महाराज के पास भी शिकारी चीते थे। वे सब एक सुन्दर हरे-भरे उपवन में रहते थे। आखेट के लिए जब जाना होता, तो उन्हें बैलगाड़ियों में बिठाकर ले जाया जाता। गाड़ी में सवार कराने के बाद उनकी आँखों की पट्टी खोल दी जाती और चीतों को बन्धन मुक्त कर दिया जाता। चीते चारों ओर का सूक्ष्म निरीक्षण करने के उपरान्त गाड़ी से उतरते। इसके बाद दबे पाँच हिरनों के झुण्ड से 60-65 गज दूर पहुँचकर घात लगाकर बैठ जाते फिर विद्युत-की-सी गति से सब अपने-अपने शिकार पर टूट पड़ते और थोड़े ही पल में उन्हें धराशायी कर देते। यदि उन्हें कभी ऐसा महसूस होता कि उनकी उपस्थिति का एहसास शिकार को हो गया है, तो वे अपने अगले दोनों पैर आगे की ओर फैलाकर जमीन से चिपक कर बैठ जाते। उनका यह संकेत समझकर साथ गये लोग दूसरी ओर से हिरन जब भागते हुए इस ओर आते, तो पहले ही से घात लगाये बैठे चीते उन पर छलाँग लगाकर उनका काम तमाम कर देते। शिकार हो जाने के पश्चात् फिर पहले की तरह उनकी आँखों पर पट्टी चढ़ाकर उन्हें वापस लाया जाता था। सभी शासक इस दृश्य का आनन्द लिया करते थे।
अंग्रेज इतिहासकार जेम्स फाँरविन ने भी अपनी रचना ‘द इण्डियन एम्परर्स’ में इस बात की चर्चा की है कि 19 वीं शताब्दी में भारतीय सम्राटों द्वारा आखेट के लिए चीतों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता था। वे लिखते हैं कि गुजरात के चीते इस काम के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते थे। इसमें हिन्दू और मुसलमान बादशाह दोनों ही समान रूप से रुचि रखते थे। मुर्शिदाबाद के नवाब मुबारकउल्ला का उल्लेख करते हुए उनने लिखा है कि उनकी पशुशाला ऐसे अनेक शिकारी चीतों से भरी हुई थी। बंगाल के नवाब के पास भी ऐसी कई पशु शालाएँ थी। इसके अतिरिक्त अनेक बाग भी थे, जिनमें पालतू चीते स्वच्छन्द रूप से विचरण करते थे।
मनुष्य का यह विचित्र स्वभाव है कि वह अपने शौक और स्वार्थ के लिए पर्यावरण को बिगाड़ने में तनिक भी संकोच अनुभव नहीं करता, भले ही बाद में उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़े। पर तत्काल उसे इसकी चिन्ता कहाँ होती है? जिस दिन उसको यह सद्बुद्धि मिल गई और वह इतना सोच सका कि यहाँ स्वाभाविकता ही सर्वोपरि है। उसे नष्ट कर वह कभी सुख-चैन से नहीं रह सकता, शायद उस दिन प्रकृति स्वयं को धन्य अनुभव करे और मनुष्य को शत-शत धन्यवाद प्रेषित करे। पर कदाचित अभी वह समय आया नहीं, अन्यथा शौक के रूप में शुरू हुई परम्परा व्यवसाय न बन गयी होगी।
आज माँस, खाल और हड्डियों के लिए वन्य जन्तुओं का जिस परिमाण में सफाया हो रहा है, वैसा शायद ही पहले कभी हुआ हो। शरीर विज्ञानियों को अपने अध्ययन-अनुसंधान के लिए देह चाहिए। मनुष्य पर वे मनमाना प्रयोग कर नहीं सकते। ऐसे में सरल उपाय एक ही रह जाता है कि बन्दरों, खरगोशों जैसे वन्य प्राणियों तथा गिनी पिगों जैसे पालतू जीवों पर परीक्षण किये जाएँ। इस निमित्त प्रति वर्ग लाखों की संख्या में जीवधारी विश्व भर में पकड़े जाते हैं। सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में इनमें भी ज्यादा की तादाद में वे मारे जाते हैं। इससे शेर, बाघ जैसे माँसाहारी जन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जब प्रकृति प्रदत्त उनके आहार को मनुष्य लूट जाय, तो भला से जिन्दा कैसे रहे? उनके लिए इस दशा में दी ही उपाय शेष बचते है-या तो तड़पकर भूखों मर जाएँ अथवा अपना स्वभाव बदलकर आदमखोर बनें।
इन दिनों यही हुआ है। जीवन सबको प्रिय है। मृत्यु कौन चाहता है? जब शेरों के स्वाभाविक आहार घटने लगे और मौत की नौबत आने लगी, तो उनने मनुष्यों की अपना भोजन बनाना शुरू किया। यही से दोनों के बीच दुश्मनी प्रारम्भ हुई। मनुष्य को इसका लाभ मिला। नरभक्षी होने के बहाने उसने बाघों को मारना शुरू किया। इससे खाल बेचकर पैसा बनाने का भी अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। बाघ मारे जाने लगे, तो बड़ी तेज से उनकी संख्या घटने लगी। ऐसी स्थिति में सरकार का चिन्तित होना स्वाभाविक था। अतः सन् 1973 में उनके संरक्षण के लिए बाघ परियोजना नाम से एक कानून घोषित किया गया, जिसके अंतर्गत बाघों का शिकार निषिद्ध घोषित किया गया। अभ्यारण्यों वृद्धि हुई। सन् 1973 में समूचे देश में इनकी कुल संख्या 1800 थी। आज बढ़कर 4000 से अधिक हो गई है। निस्सन्देह इसे परियोजना की सफलता कहा जा सकता
ऋषि कर्दम के तप से भगवान प्रसन्न हुए। उन्हें आशीर्वाद दिया। नारद जी के परामर्श पर स्वयंभू मनु अपनी दूसरी पुत्री देवहूति ऋषि को अर्पित करने के लिए पहुँचे। कर्दम बोले-”मेरी शर्त सुन ले। मुझे कामपत्नी नहीं, धर्मपत्नी चाहिए। दाम्पत्य काम-विकास के लिए नहीं, काम को मर्यादित करने के लिए होता है। मैं एक सत्पुत्र की प्राप्ति के बाद संन्यास धर्म का पालन करूंगा। आपकी पुत्री को यह स्वीकार हो तो ही सम्बन्ध होगा।”
मनुजी ने कहा-”बेटी यह तो विवाह के पूर्व ही संन्यास की बात करने लगे।” किन्तु देवहूति भी कम न थी। बोली-”कामाँध होकर संसार सागर में डूबने के लिए गृहस्थाश्रम नहीं है। मैं भी कोई संयमी जितेन्न्कामाँध होकर संसार सागर में डूबने के लिए गृहस्थाश्रम नहीं है। मैं भी कोई संयमी जितेंद्रिय पति ही चाहती हूँ।”
विवाह हो गया। दोनों के तपस्वी जीवन के प्रतिफल के रूप में कपिल जी उत्पन्न हुए, जो 24 अवतारों में से एक माने गये।
है। पर इसका एक दुःखद पहलू भी है। संरक्षण-कानून से इनकी संख्या तो बढ़ गई पर अवैध वनों की कटाई से इनके प्राकृतिक वासस्थल सिमटते-सिकुड़ते चले गये। इसका असर वहाँ निवास करने दूसरे वन्य प्राणियों पर पड़ा और उनकी संख्या अप्रत्याशित रूप से घटने लगे, तो भोजन के लिए और दूसरे जीव घटने लगे, तो भोजन के लिए उन पर निर्भर रहने वाले बड़े माँसाहारी जन्तुओं को या तो कई-कई दिनों तक निराहार रहना पड़ता अथवा स्वल्पाहार पर दिन गुजारने पड़ते। ऐसी अवस्था में जो भी उनके समाने पड़ जाएँ, उन्हीं पर वे टूट पड़ते। बाघों के बढ़ते आक्रमणों का यह भी एक कारण है।
एक अनुमान के अनुसार यदि वन्य प्राणियों के प्राकृतिक वासस्थल को 70 प्रतिशत कम कर दिया जाए तो वहाँ पर निवास करने वाले 50 प्रतिशत जीवधारी विलुप्ति के कगार पर पहुँच जाएँगे। यदि वन-उन्मूलन की गति यही रही, तो आगामी 35 वर्षों में 15 प्रतिशत प्राणियों और प्रजातियों के लोप होने का खतरा है। रेड डाटा बुक में 600 ऐसे प्राणियों का उल्लेख है, जो धरती से विलुप्त होने की स्थिति में आ चुके है।
अभ्यारण्यों की स्थापना से बाघों की संख्या बढ़ाने पर तो वन विभाग के अधिकारियों ने खूब ध्यान दिया। पर उसी अनुपात में वे दूसरे वन्य जीवों के संरक्षण पर ध्यान न दे सके, जिससे कि उनके आहार की आपूर्ति होती रह सके और उन्हें अपनी प्रकृति बदलने पर मजबूर न होना पड़े। उदाहरण के लिए, बान्धवगढ़ अभ्यारण्य को लिया जा सकता है। लगभग दो दर्जन बाघों वाले इस आश्रयस्थल में उनकी वार्षिक आवश्यकता 1500 चीतलसें कर है। जबकि वहाँ चीतलों की वार्षिक उपलब्धता मात्र 1000 है। धीरे-धीरे अब इसमें भी कमी आती जा रही है। ऐसे में खुराक की खोज में वे अपने स्वाभाविक वासस्थल को त्याग कर समीपवर्ती गाँवों में आ धमकते हैं और वहाँ जो भी मिल जाता, उसी को अपना शिकार बना लेते हैं।
उत्तरप्रदेश के तराई वाले क्षेत्रों और बंगाल के सुन्दरवन अभ्यारण्य में ऐसी घटनाएँ तो अब आम बात हो गई है। एक रिर्पोट के अनुसार वर्तमान में सुन्दरवन में करीब 200 बाघ है। प्रतिवर्ष लगभग इतनी ही यहाँ बाघों द्वारा मनुष्यों के मारे जाने की घटनाएँ घटती है। इस प्रकार अब तक कुल 600 से ज्यादा ऐसी घटनाएँ यहाँ घट चुकी है। महाराष्ट्र स्थित संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान की भी लगभग यही कहानी है। वहाँ के बाघ समय-समय पर आबादी वाले क्षेत्र में पहुँचकर आतंक मचा जाते हैं। यही हाल देश के डेढ़ दर्जन के करीब अभ्यारण्यों के बाघों का है। सूचना है कि वे सब अब नरभक्षी बनते जा रहे है।
बाघों के इन उत्पातों से तंग आकर समीपवर्ती लोग अब उन्हें जहर देकर मारने लगे है। एक आँकड़े के अनुसार, सन् 1987-88 में दुधवा राष्ट्रीय पार्क में 13 बाघों की मौत विषाक्त आहार से हुई। जबकि 1987-88 में वहाँ इस प्रकार की 8 मौतों की सूचना है। कई बार इन्हें मारने का तरीका ऐसा होता है, जिसमें बमों का इस्तेमाल किया जाता है। मृत पशुओं में इन बमों को छिपा कार रख दिया जाता खाने। के लिए बाघ जैसे ही अपना मुँह खोलते और उसमें दाँत चुभोते, बम तत्काल फट पड़ता। इस प्रकार उनकी तत्क्षण मौतें हो जाती।
यों इस प्रकार की घटनाओं में केवल वन्य प्राणी दोषी है, यह कहना भी ठीक न होगा। जब उनके स्वतंत्र विचरण क्षेत्र में मनुष्य हस्तक्षेप करेगा, तो उनका नाराज होना स्वाभाविक ही है। ऐसे में वह यदि आक्रमण कार घुसपैठिये की हत्या कर दें, तो शायद इसमें उसका अपराध कम और मनुष्य का अधिक है-यह मानने में हर्ज नहीं। सुन्दरवन क्षेत्र में प्रायः इसी कारण आये दिन इंसानों पर बाघों के हमले होते हैं। उक्त अभ्यारण्य में कई जलागार है। इसमें मछलियों की प्रचुरता है। लोग उन्हें पकड़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। बाघ जल के लिए इन्हीं पर अवलम्बित होते हैं। ऐसे में जब कभी दोनों का आमना-सामना होता है, तो इस भिड़न्त में इंसान ही हारता है। इसके अतिरिक्त वहाँ के जंगल में यदा-कदा इन हिंसा जन्तुओं के चंगुल में फँसकर जान से हाथ धो बैठते हैं। दुधवा अभ्यारण्य में गन्ने की खेती होती है। वहाँ पलने वाले एक-चौथाई बाघ इन्हीं खेतों में रहते हैं फसल की कटाई का जब समय आता है, तो वे काटने वालों पर अचानक हमला करते देते हैं, जिससे प्रतिवर्ष कइयों कीक जान चली जाती है।
प्रोजेक्ट टाइगर परियोजना अच्छी बात है। पर केवल बाघों की संख्या बढ़ा देने मात्र से तो प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं। हमें अपनी दृष्टि की और अधिक विस्तृत और व्यापक बनाना चाहिए और देखना चाहिए कि वन्य क्षेत्रों से किन-किन जन्तुओं का लोप होता जा रहा है, उन सभी के संरक्षण और अभिवर्द्धन का उपाय किया जाना चाहिए, तभी वास्तविक अर्थों में जंगलों के मूल वातावरण को लौटाया जा सकेगा, अन्यथा इस प्रकार का प्रयास एकाँगी और अधूरा साबित होगा तथा जिस पर्यावरण को संतुलित बनाने के उद्देश्य से यह सब आरम्भ किया गया था। वह उपहास बनकर रह जाएगा।
नई दिल्ली राष्ट्रीय प्राकृतिक संग्रहालय की एक रिर्पोट के अनुसार वन्य प्राणियों की 81 प्रजातियों का अस्तित्व इन दिनों संकटपूर्ण है। शेर जो कि इस सदी के प्रारम्भ में अपने यहाँ 1000 थे, अब उनकी संख्या घटकर मात्र 200 रह गई है। काले, सफेद तेंदुए भी घटते जा रहे है। हिमालय जैसे बर्फीले क्षेत्र में पाया जाने वाला हिमबाघ भी अब उतने नहीं रहे। सम्प्रति इनकी संख्या सिर्फ 200 के आस-पास रह गई है। कस्तूरी मृग कभी हिमालय और उनसे जुड़ी पर्वत श्रेणियों की शान थे। पर अब उनके दर्शन दुर्लभ हो गये है। इसी प्रकार हिरन की एक अन्य प्रजाति ‘डान्सिग डियर’ भी यदा-कदा ही देखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त चीता, जंगली भैंसा, लाल पण्डा, बारहसिंगा, बबून, चिम्पाँजी, ओरैंगटन, जंगली कछुआ, धनेश तथा गैण्डा यह सब उस तादाद में नहीं दिखाई पड़ते, जितने गर्व से तीन दशक पूर्व देखे जाते थे।
पारस्परिकता (इण्टरडिपेन्डेन्स) का सिद्धान्त सर्वविदित है। आदमी से लेकर पशु-पक्षी पर्यन्त सभी एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े है। जब तक यह तंत्र प्रकृति के अधीन होता है, तब तक सब कुछ सामान्य ढंग से चलता रहता है। किन्तु मनुष्य की स्वार्थपरता जब इस पर हावी होती है तो उसे अस्त-व्यस्त कर रख देती है। पर्यावरण असंतुलन की वर्तमान स्थित को देखते हुए मनुष्य ने अपने कर्तृत्वों की समीक्षा नहीं की, तो फिर उसके लिए पछतावा ही होता रहेगा।
एक जिज्ञासु कबीर के पास पहुँचा, बोला-”दो बाते समाने है। संन्यासी बनूं या गृहस्थ।” कबीर ने कहा-”जो भी बनो, आदर्श बनो।”
उदाहरण समझाने के लिए उन्होंने दो घटनाएँ प्रस्तुत की।
अपनी पत्नी को बुलाया। दोपहर को प्रकाश तो था, पर उन्होंने दीपक जला लाने के लिए कहा, ताकि वे कपड़ा अच्छी तरह बुन सकें। पत्नी
दीपक जला लायी और बिना कुछ बहस किये रखकर चली गई।
कबीर ने कहा-”गृहस्थ बनना हो तो परस्पर ऐसे विश्वासी बनना, कि दूसरे कीक इच्छा ही अपनी बने।”
दूसरा उदाहरण सन्त का देना था। जिज्ञासु को लेकर एक टीले पर गये, जहाँ वयोवृद्ध महात्मा रहते थे। वे कबीर को जानते न थे। नमाज के उपरान्त उनसे पूछा-”आपकी आयु कितनी है?”बोले-”अस्सी बरस।”
इधर-उधर की बातों के बाद कबीर ने कहा-”बाबाजी, आयु क्यों नहीं बताते?” सन्त ने कहा था-”बेटे अभी तो बताया था, अस्सी बरस! तुम भूल गये हो।” टीले से आधी चढ़ाई उतर लेने पर कबीर ने सन्त को पुनः पुकारा और नीचे आने के लिए कहा। वे हाँफते-हाँफते आये। कारण पूछा, तो फिर वही प्रश्न किया-”आपकी आयु कितनी है?” सन्त को तनिक भी क्रोध नहीं आया। वे उसे पूछने वाले की विस्मृति मात्र समझे और कहा-”अस्सी बरस है।” हँसते हुए वापस लौट गये।
कबीर ने कहा-”सन्त बनना हो तो ऐसा बनना, जिसे क्रोध ही न आये।”
सूरज चमकीले नीले दक्षिणी प्रशान्त सागर पर चढ़ आया था। उसकी सुनहली किरणें सागर की विशाल जलराशि को स्वर्णिम बना रही थी। तभी वानुआटु गणतन्त्र के द्वीप टाना से तकरीबन पौने छह मीटर लम्बाई की “माटुपा गोफेसो” (भाइयों की नाव ) समुद्र की तरंगों से अठखेलियाँ करती हुई चल पड़ी। उस नाव पर थे 34 वर्ष के युवक मैली व्हाइट क्राँस, जो अपने राष्ट्र में एक सहकारी भण्डार में व्यवस्थापक के पद पर कार्यरत थे। उन्हीं के साथ था उनका 26 वर्षीय चवेरा भाई पीटर्सन आयरी, नाविक के रूप में जिसके साहसिक कारनामे आस-पड़ौस में कहे-सुने जाते थे। ये दोनों भाई उस दिन 17 अप्रैल, 1981 को गुड फ्राइडे के दिन अपने एक रिश्तेदार के शव को वापस लाने का इन्तजाम करने टाना गए थे, ताकि उसका अन्तिम संस्कार किया जा सके और अब वे टाना के उत्तर अनीवा द्वीप वापस लौट रहे थे। उनके लिए यह दो घण्टे का फेरा वैसा ही था, जैसे हम सबके लिए रोजमर्रा की बस की सवारी।
करीब आधे घण्टे बाद 25 हार्स पावर के इंजन में अजीब-सी घरघराहट उभरी और कोई 10 किलोमीटर बाद मोटर एक तेज आवाज के साथ बन्द हो गयी। सन्दूकनुमा छोटे-से केबिन और दोनों किनारों पर बेंचनुमा सीटों वाली लकड़ी की यह नाव इधर-उधर बहकने लगी। आयरी ने स्पार्क प्लग की जाँच की, छोटी-मोटी अन्य खराबियों का पता लगाने की कोशिश की, स्टार्च करने वाली रस्सी खींची लेकिन कोई नतीजा नहीं। और तब उन्होंने ईंधन की टंकी खींची, वह खाली थी।
माटुपा गोफेसो में एक दिशा सूचक यन्त्र, एक ट्राँजिस्टर रेडियो और चार चप्पू थे। दोनों भाई एक गहरी साँस भरते हुए नाव खेने लगे। उन्हें भरोसा था कि टाना और अनीवा के बीच रोज चक्कर लगाने वाली कोई नाव उन्हें जल्दी ही इस संकट से उबार लेगी। मगर दक्षिण पूर्वी हवा का एक तेज झोंका आया और उन्हें अनीवा से दूर, बहुत दूर खदेड़ता चला गया।
आयरी ने अपने नौका चालन में अब तक अनेकों साहसिक कारनामे अंजाम दिए थे। अपनी 26 वर्ष की उम्र में, उम्र के वर्षों से भी ज्यादा प्रतियोगिताएँ जीती थी। उसने हिम्मत नहीं हारी और सोने के काम आने वाली केवड़े की बुनी चटाई और दो पतवारों की सहायता से एक बादबान तान दिया। उसे अभी भी उम्मीद थी कि हवा उन्हें वानुआटू गणतन्त्र के एक-दूसरे से सटे 72 द्वीपों में से एक ऐरोमाँगा के उत्तर की ओर जरूर ले जाएगी।
लेकिन झँझोड़ती हुई हवा उन्हें बड़ी निष्ठुरता से उत्तर-पश्चिम की ओर धकेल रही थी। आयरी समझ रहा था कि अगर इसी दिशा की आरे बढ़ते रहे तो एरोमाँगा पहुंचना असम्भव हो जाएगा। उसने बादबान उतार दिया। हवा के साथ तेजी से बहते जाने की रफ्तार धीमी करने के उद्देश्य से व्हाइट क्राँस ने शकरकन्द से भरा 40 किलो का एक बोरा रस्सी में बाँध कर बोट के पीछे दुँबाल से लटका दिया। उन्हें अभी भी आशा थी कि पास से गुजरती कोई नाव उन्हें बचा लेगी।
परन्तु ऐसी किसी नाव का कोई नामोनिशान न था। झुटपुटा होते-होते झोंके और प्रबल हो उठे और क्षुब्ध सागर में उनकी बोट को धकेलते चले गए। आधी रात बीतते दोनों भाई लस्त-पस्त पड़ गए। आखिर उन्होंने बारी-बारी से दो-दो घण्टे पहरे देने का फैसला किया। क्योंकि आस-पास से गुजरते किसी जहाज को देखने के लिए उनमें से किसी एक का जगना निहायत जरूरी था।
दिन चढ़ा तो उन्हें दक्षिण में टाना और उत्तर में
एरोमाँगा की आकृति एकदम पास दिखाई दी। एक बार तो उमंग आई कि तैरकर निकल चलते हैं लेकिन पानी में उछलती खतरनाक शार्क मछलियों को देखकर उनमें से किसी की भी हिम्मत न पड़ी। वे दोनों ही शार्क के खूँखार तेवरों से अच्छी तरह वाकिफ थे। दिनभर बेबस बैठे वे अपनी आँखों से द्वीपों को ओझल होते देखते रहे।
व्हाइट क्राँस को अभी भी भरोसा था कि अब तक उसकी पत्नी तेल्वी ने रेडियो बानुआटू पर उनके गायब हो जाने की खबर दे दी होगी। सरकार और द्वीपवासी खोज में लगे होंगे और वे सहज ही ढूँढ़ लिए जाएँगे। इस बीच उन्हें इस बीच उन्हें एक रात और बीच समुंदर में काटनी थी। आफतों, मुसीबतों से भरी इस रात का धुँधलका जब उजाले में बदला तो यह 19 अप्रैल ईस्टर के इतवार का सवेरा था। आज उन्हें बड़ी आशाएँ थी। दोनों धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण सोच रहे थे कि शायद ईश्वर आज हम पर कृपा कर दे। आयरी बोला-”हमें पूरब की ओर बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए, जमीन की ओर।” सो उन्होंने फिर एक बार बादबान तान दिया और रफ्तार तेज करने के लिए नाव के पीछे से शकरकन्दियों का बारेरा हटा लिया। आयरी की उम्मीद थी कि वे एरोमाँगा न सही, एकाटे द्वीप तो पहुँच ही जाएँगे, जो उत्तर की दिशा में थोड़ा और आगे था।
अचानक व्हाइट क्राँस की नजर ऊपर की ओर उठी और वह चिल्ला पड़ा-”देखो-देखो हवाई जहाज। “ उसकी आवाज सुनते ही आयरी ने झपटकर प्लास्टिक की बोतल उठा ली और धूप में चमकाने लगा। किन्तु हवाई जहाज अपनी राह उड़ते-उड़ते ओझल हो गया। व्हाइट क्राँस ने ट्राँजिस्टर चला दिया। रेडियो बानुआटू के समाचार प्रसारण में कहा जा रहा था-कि उनकी हवाई और समुद्री खोज शुरू हो चुकी है। इसे सुनकर आयरी ने निराशा भरे लहजे में कहा,”हवाई जहाज सम्भवतः हमें ही ढूँढ़ रहा था।”
ये दोनों आपस में बातें कर ही रहे थे कि उसी शाम न जाने कैसे शकरकन्दियों के बोर की गाँठ खुल गई और वह गर्क हो गए। आयरी ने बादबान गिरा दिया और अब वे दोनों अंग-अंग की पीड़ा, परेशानी और भय से चकनाचूर अपनी जर्जर होती रही माटुपा गोफेसो में एक और भय भरी रात काटने की तैयारी करने लग गए।
अगली सुबह उन्हें जमीन दिखी। उत्तर में करीब 20 किलोमीटर जमीन के चिन्ह देखकर आयरी बोला-”यह एकाटे ही होने चाहिए” और चप्पू सँभाल कर वे वोट खेने लगे। सहसा एक चप्पू टूट गया क्लान्त और हताश दोनों भाइयों ने ईंधन की खाली टंकी पानी से भरकर लंगर के तौर पर वोट की बगल में लटका दी। व्हाइट क्राँस बोला,”किसी न किसी की तो नजर पड़ेगी ही हम पर ।” मगर घण्टों बाद भी न कोई नाव दिखी, न जहाज। रात को लंगर वाली रस्सी भी टूट गयी।”
मंगलवार को पौ फटी तो सागर अपने पूरे आक्रोश में गरज रहा था। दो-दो मीटर कीक ऊँची लहरें नौका को खिलौने की तरह उछाल रही थी व्हाइट क्राँस ने एकाटे के तट की खोज में निगाह दौड़ाई। द्वीप विलुप्त हो चुका था। उसने झँझोड़ कर आयरी को जगाया और चीख पड़ा, “हम समुंदर में बह गए है।”
अंधड़ की तेजी उन्हें उत्तर-पश्चिम में कोरल सागर में धकेल लायी थी। वतन के टापुओं के बाहर के भूगोल की जानकारी उन्हें सीमित थी। फिर भी वे इतना तो समझ गए कि यहाँ वे शायद हफ्तों भटकते रहेंगे। उनकी हड्डियों में सिहरन दौड़ गयी। व्हाइट क्राँस दोनों हाथ ऊपर उठाकर चिल्ला उठा,”ईश्वर हमें बचा ले, हमें मरने न दे।” उसे अपनी पली सेल्वी और दो साल के नटखट बेटे स्काँच डेलेसा की याद सताने लगी। थोड़े पलों के लिए तो उसे आयरी से ईर्ष्या हो आयी-यह तो कुँवारा है, कितना मुक्त है, मरने के बाद इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं।
उधर वानुआटू में शनिवार से ही उनकी खोज शुरू हो चुकी थी। वायुयान तथा समुद्री नौकाएँ एवं जहाज सक्रिय हो गए थे। स्थानीय प्रशासन के सेक्रेटरी जो जोजेफ ने राजधानी पोर्ट विला में अधिकारियों को खबर दें दी थी कि दोनों आदमी लापता है। सरकार के कई मत्स्य पोत, एयर मेलेनेशिया का एक ब्रिटिश नार्मन आइलैण्डर विमान और पड़ोसी न्यू कैलेडोनिया का समुद्री गश्त लगाने वाला एक फ्रांसीसी नेवी नेप्चून हवाई जहाज उत्तर-पश्चिम में टाना से एकाटे तक उन्हें ढूँढ़ आए थे, पर मिला कुछ नहीं।
इन सब प्रयासों के पश्चात सरकार और प्रशासन ने खोज बन्द कर दी। व्हाइट क्राँस की पत्नी को यह खबर देते हुए जोजेफ बोला, “मुझे अफसोस है, सेल्वो, मगर हम हमेशा ही तो नहीं खोजते रह सकते।”
सेल्वी फफक पड़ी, वह रोते हुए बोली-”आप सबने मुझे भले निराश कर दिया ही मि0 जोजेफ, पर अभी ईश्वर ने मुझे निराश नहीं किया। मैं उससे प्रार्थना करुँगी। उसकी कृपा से कुछ भी असम्भव नहीं।”
बोट में पड़ी थोड़ी-सी रसद में से व्हाइट क्राँस और आयरी अब तक बनी हुई चीजे गिनी-तीन रतालू, दो कचालू, पाँच शकरकंदियाँ और एक लीटर वाली प्लास्टिक की बोतल, जिसमें बस आधा लीटर पानी था। “हम रोजाना एक-एक टुकड़ा सब्जी खाएँगे।” व्हाइट क्राँस बोला। यही हमारी खुराक होगी।, जरा से
गाँधीजी के पास एक फाउन्टेन पेन था। उसे किसी ने उठा लिया। दूसरा मँगाने की अपेक्षा उनने दावात और होल्डर से लिखना शुरू किया। एक दिन निब टूट गयी। मनु बेन बाहर से लेने गई और लाने में समय लग गया। समय का महत्व समझते हुए गाँधीजी ने होल्डर की पूँछ को चाकू से छीलकर उसकी पुराने समय जैसी कलम बना ली। फिर सदा वे सरकंडे की कलम से ही लिखते रहे।
वायसराय माउण्टबेटन की पहला पत्र उन्होंने होल्डर की पूँछ से बनाई पूँछ वाली कलम से ही लिखा था। अक्षर भी सुन्दर आये थे।
पानी के साथ एक-एक कतला सब्जी। अभी तक उनका ख्याल था कि बादबान ताने रहने से जमीन तक वह जल्दी पहुंचेंगे, अगर उनकी राह में कहीं जमीन पड़ी तो फिलहाल तो हवा उन्हें पानी में बहाए जा रही थी और वे घण्टों आंखें फाड़-फाड़ कर क्षितिज पर धरती का आभास खोजते रहते। बाकी समय वे धूप की नृशंस चौंधियाहट से बचने के लिए केबिन में ही दुबके रहते।
नौंवे दिन उनके पास पानी की कुछ ही बूंदें बची थी। अतः कच्ची सब्जी की नन्ही-सी गिजा उनके गले में अटक गयी, साँस घुटने लगी, “अब तो जिन्दगी भगवान के ही हाथों में है।” व्हाइट क्राँस बोला। वे कोशिश करते रहे कि खाने-पीने का ख्याल ही न आए, लेकिन रह-रह कार अपने घर में, सगे-सम्बन्धियों के यहाँ खाए गए व्यंजनों की यादें परेशान करने लगती।
खुश्की के कारण उनकी जुबानें सूज कर मुँह में भर-सी गयी थी, गला जलने लगा और खारे पानी के छींटों से उनके सूखे फटे होठों पर नश्तर से चलने लगे। नहीं रहा गया तो चुल्लू भर समुद्री पानी से उन्होंने मुँह पर लिया, लेकिन उन्हें तुरन्त ही उसे कुल्ला करके थूकना पड़ा।अब उनके पास सहायता पाने के सारे साधन चुक गए थे। सब ओर से मृत्यु मुँह फाड़े खड़ी थी। जब मनुष्य की सारी सामर्थ्य चुक जाती है, उसका अहंकार चकनाचूर हो जाता है। उन्हीं क्षणों वह परमात्मा की ओर पूरी तरह से उन्मुख हो पाता है। प्रभू की सब से पहले याद आयरी को आयी। उसने दयामय प्रभु को अपने अंतर्मन में याद करते हुए आंखें बन्द कर ली।
आँखें बन्द किए उसे कितने क्षण बीत गए, उसे पता ही न चला। उसने आँखें तो तब खोली, जब मूसलाधार वर्षा उनको भिगो रही थी। दोनों सिर उठाए, मुँह खोले खड़े हो गए और शीतल वृष्टि से तर होते रहे। केबिन में उन्हें प्लास्टिक का पुराना शापिंग बैग मिल गया। उसमें वर्षा का जितना पानी भर सकते थे भर लिया।
इस पानी के सहारे दिन तो कटने लगे। लेकिन विपत्तियों का अन्त नहीं था। इस दिन प्रचण्ड झंझावात के झपाटे चलने लगे। पाँच-पाँच मीटर ऊँची लहरे बोट को थपेड़े मारकर लुढ़काने-पटकने लगी और हवा उनके कामचलाऊ बादबान को फाड़ने लगी। व्हाइट क्राँस और आयरी दोनों चिल्ला उठे-”प्रभू अब तू ही हमें बचा सकता है। तेरे सिवा अब और कोई नहीं।” बोट बुरी तरह उछाले खा रही थी। उन दोनों को सांसें अटकी थी। उनका रोम-रोम भगवान को पुकार रहा था।
लेकिन प्रभू कृपा का चमत्कार उन दोनों की फिर देखने को मिला। साँझ का झुटपुट होते-होते समुद्र शान्त हो गया। आकाश निर्मल था। चाँदनी में दोनों भाई घुटनों के बल बैठ गए और सन्नाटे में उन दोनों का गहन स्वर गूँज उठा, “परम पिता, तूने हमें जीवित रखा। तेरा लाख-लाख शुक्र है । हम पर कृपा कर ताकि हम इस संकट से उबर सके।”
प्रार्थना करने के बाद वे अपने को शारीरिक एवं मानसिक रूप से कुछ स्वस्थ महसूस कर रहे थे। व्हाइट क्राँस की आँखों की ओर देखते हुए आयरी ने बात शुरू की, “हमें प्रतिज्ञा लेनी चाहिए, अगर इस विपदा से बच गए तो हममें से एक अपना जीवन धर्म की सेवा में समर्पित करेगा और दूसरा देश की सेवा में।”
व्हाइट क्राँस सहमत हो गया। धर्मनिष्ठ होने के साथ-साथ उसे अपने देश बानुआटू पर भी गर्व था। अतीत में न्यू हेब्रिडीज के नाम से विख्यात और ब्रिटेन एवं फ्राँस द्वारा संयुक्त रूप से शासित यह देश 1980 में स्वतन्त्र हुआ था।
समुद्र में भटकाव के 21वें दिन, तीसरे पहर क्षितिज पर एक काला धब्बा-सा उभरा था। जहाज है। आयरी की कल्पना दौड़ लगाने लगी थी बादबान जलाकर संकट का सिगनल दिया जाय। ओर उसने अपने विचार की क्रिया-रूप में परिणत कर दिया। देखते-देखते काला धब्बा बड़ा होने लगा। उन्हें विश्वास हो रहा था, प्रभू उनके ऊपर कृपालु है।
यह दक्षिण कोरिया का मत्स्य पोत साम सोंस 17 था। दोनों भाई घिसटते-फिसलते किसी तरह ऊपर चढ़े और अभिनन्दनों, आलिंगनों में डूब गए। वे दोनों पूरी तरह अब अवसन् और त्रस्त थे। जहाज के कर्मचारियों ने अपनी सेवा-सुश्रूषा से उन्हें स्वस्थ किया। स्वस्थ होने पर उन्होंने अपनी कहानी कह सुनायी। कैप्टन चाँग सू पार्क यह जानकर चमत्कृत रह गया कि दोनों भाई वानुआटू के हैं। इस समय व वानुआटु से 1000 किलोमीटर से भी अधिक दूर सोलोमन द्वीप समूह के हिस्से के समीप थे।
कैप्टन पार्क ने उन दोनों भाइयों को बताया कि निश्चय ही किसी दैवी शक्ति ने उसे उनके उद्धार के रास्ते पर लगाया था। क्योंकि आज न जाने क्यों वे महज घूमने के लिए ही वे अपनी दस्तूरी इलाके से 71 किलोमीटर परे इधर आ निकले थे और यहाँ उसने उन दोनों को बचाने में सफलता पायी।
छह दिन बाद साम सोंग 17 जब वानुआटु की राजधानी पहुँचा तो 400 व्यक्तियों ने हर्ष-ध्वनि के साथ उनका स्वागत किया। जहाज के कप्तान द्वारा सूचना भेज दिए जाने के कारण वहाँ के गृहमंत्री टीमाकाटा भी आ पहुँचे थे उन्होंने स्वागत करते हुए कहा-”निश्चय ही यह तुम दोनों की प्रार्थना का ही चमत्कार है।”
व्हाइट क्राँस ने कहा-”प्रभू ने हमें बचा लिया। अब हमें अपना वचन निभाना है।” इसी के साथ आयरी प्रार्थना की महत्ता से जनसामान्य की अवगत कराने के लिए पादरी बन गया। और व्हाइट क्राँस अपने नवोदित राष्ट्र के उत्थान के लिए पूरी तरह समर्पित ही गया।
यह कथानक कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य प्रकाशित करता है। एक तो यह कि आदमी में अनन्त सामर्थ्य जिजीविषा के रूप में प्रतिकूलताओं से जूझने हेतु विद्यमान है। यदि इस सामर्थ्य पर विश्वास कर इसका सुनियोजन किया जा सके तो व्यक्ति असम्भव-से-असम्भव पुरुषार्थ भी कर दिखा सकता है। दूसरा तथ्य यह कि कभी भी किसी भी स्थिति में मनुष्य को ईश्वरीय-सत्ता का अवलम्बन नहीं छोड़ता चाहिए। जहाँ ईश्वर विश्वास है वहाँ आत्मविश्वास है एवं वह हमारी सबकी सुनता है, हम पुरुषार्थ में अपनी ओर से कोई कमी न रखे, यह तथ्य याद रहे तो कभी मनोबल डगमगाता नहीं।
तीसरा अंतिम व महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि आर्त्त पुकार पर भगवान दौड़े चले आते हैं। यह पुकार जितनी तीव्र होगी उनकी सहायता अनुदान भिन्न-भिन्न रूपों में मिलते चले जाएँगे। आर्त्त पुकार के साथ यदि शुभ संकल्प जुड़े हो तो यह और शीघ्र भगवान तक पहुँचती है। जीवन व्यापार के अन निरन्तन काश। यह भी महत्त्वपूर्ण तथ्य है। काश। जीवन व्यापार के इन चिरन्तन सत्यों को मनुष्य समझ पाता।
बात सन् 1914 की है। एक दिन गुरुदेव टैगोर ने सी. एफ. एण्डूज से कहा-”विवाह जीवन की पूर्णता है, प्रगति के मार्ग में पत्नी से पूरी-पूरी सहायता मिलती है और दोनों के सहयोग से विपत्तियाँ दूर हो जाती है। सच्चा जीवन जीने के लिए मनुष्य को विवाह अवश्य करना चाहिए और आपने विवाह न करके बड़ी भारी भूल की है।”
दीनबंधु एण्डूज ने सहज भाव से उत्तर दिया-”हाँ! आपकी बात बिल्कुल सत्य है। मैं भी अनुभव करता हूँ कि विवाह के बिना पवित्र प्रेम तथा पति के मोहक कर्त्तव्यों से मैं वंचित रहूँगा और मेरे जीवन का विकास भी अवरुद्ध हो जाएगा। पर दाम्पत्य जीवन के सुख की जब मैं कल्पना करता हूँ, तो मेरा मन मुझे एक अन्य दिशा की ओर ही ले जाता चाहता है।”
वह कहता है तुम अपनी सेवाएँ राष्ट्रीय आन्दोलन की समर्पित कर चुके हो। जब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता, तब तक तुम्हारा कुछ नहीं सब कुछ राष्ट्र का ही होगा। तुम मिशन में सर्विस करते हो, उसका क्या भरोसा? फिर नौकरी छूट जाने पर घर-गृहस्थी के बोझ को सँभालने के लिये नौकरी की तलाश करोगे या राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लोगे।
और मेरे मन में उठने वाले यही विचार दाम्पत्य-जीवन के रेशमी सूत्र में नहीं बँधने देते। दीनबन्धु एण्डूज आजीवन अविवाहित रहकर भारतवासियों को देशभक्ति का सन्देश देते रहे।
शत्रु प्रत्यक्ष हो और लड़ाई आमने-सामने लड़ी जा रही हो, तो उसमें समयानुसार रणनीति बदलने और प्रतिपक्ष से निपटने की सुविधा बनी रहती है, साथ ही समय-समय पर युद्ध का मूल्याँकन भी होता रहता है और यह पता चलता रहता है कि दोनों में से किसकी स्थिति कमजोर अथवा मजबूत है। किन्तु समर यदि परोक्ष ही और आक्रमण प्रच्छन्न, तो मुकाबला कठिन हो जाता है। उसमें पराजय एवं मृत्यु की शत-प्रतिशत संभावना बनी ही रहती है। यह युद्ध मनुष्य-मनुष्य अथवा मनुष्य-जन्तु के बीच हो सकता है, पर कई बार तत्परता के कारण सुनिश्चित मौत टल भी जाती है। इसे कहते हैं मौत के मुँह से वापस आना।
ऐसी ही एक घटना का विवरण अमेरिका के प्रसिद्ध शिकार कथा लेखक हेनरिक वून ने अपनी पुस्तक ‘मेमोयर्स ऑफ ए हण्टर’ में दिया है। प्रसंग उनके जीवन से संबंधित हैं उल्लेख के अनुसार वे स्वयं भी एक शिकारी थे और शिकार का उन्हें बड़ा शौक था। जंगलों में जाकर शेर-चीतों से आमना-सामना करना उन्हें बहुत भाता था। ऐसे अनेक रोमाँचकारी क्षण उनके जीवन में उपस्थित हुए थे, जब साक्षात् मृत्यु ही सामने आ खड़ी हो। पर हर बार वे अपनी अद्भुत साहसिकता और विलक्षण बुद्धि कुशलता से बचते रहे। इतने पर भी मौतें से खेलना छोड़ा नहीं।
उनने सुन रखा था कि श्रीलंका के सघन वनों में हाथी प्रचुर संख्या में है एवं वहाँ उनका आखेट सरलता से किया जा सकता है। यही लोभ उनकी वहाँ खींच ले गया। जब वे वहाँ पहुंचे, तो पहले तो वहाँ के निवासियों की धनलोलुपता से उनका पाला पड़ा। वे येन-केन प्रकारेण उन्हें ठग लेना चाहते थे। सबने उन्हें धनवान समझ रखा था, इसलिए उनके आगे-पीछे हर समय चक्कर काटते रहते। बड़ी मुश्किल से हेनरिक उन्हें यह समझाने ने सफल रहे कि वह एक निर्धन आदमी है और यहाँ हाथी के शिकार के निमित्त आये है। जब सभी को इस बात का विश्वास हो गया कि सचमुच वह एक गरीब व्यक्ति है, तो अधिकाँश समय वहाँ पड़े रहना सबने व्यर्थ समझा। इस प्रकार इन लोभियों से उनका पिण्ड छूटा।
अब वे अपनी शिकार की योजना बनाने लगे। उन्हें यह भलीभांति ज्ञात था कि लंका के जंगलों में शिकार करना कोई सामान्य बात नहीं है। वहाँ की अपनी असुविधाएँ और कठिनाइयाँ है। सभी को झेलने के लिए वे स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर चुके थे। वहाँ चीतों की चिंघाड़ इतनी भयानक होता कि निर्भीक व्यक्ति के प्राण जुबान तक आ जाते। वहाँ के भालू कदाचित सबसे खूँखार है। वे चीतों से भी टक्कर देने में नहीं हिचकते। अजगर तो जगह-जगह कुण्डली मारे दिखाई पड़ जाते हैं। घने वन में प्रवेश करने के उपरांत वृक्षों की डालियों से लम्बी-लम्बी हिलती-डुलती रस्सियाँ लटकती दीख जाएँ, तो यह सामान्य बात है। वास्तव में यह रस्सियाँ नहीं, 25-30 फुट लम्बे बोआ सर्प होते हैं। पर प्रथम दृष्टि में वे दर्शकों में रस्सी होने की भ्रान्ति पैदा करते हैं जंगली भैंसों और हाथियों की भी यहाँ कमी नहीं। इन सब से हेनरिक परिचित थे और किसने कहाँ सामना हो सकता है? यह भी मालूम था एवं ऐसे वक्त बचाव के क्या उपाय करने चाहिए? इसकी भी भली-भाँति जानकारी था। सिर्फ एक ही बात से वे अनभिज्ञ थे कि जिस क्षेत्र में वे शिकार हेतु जाना चाहते हैं, वहाँ जोंक बहुतायत में है और हाथी समेत दूसरे वन्य जन्तु भी उनके शिकार बन जाते हैं।
यात्रा आरम्भ हुई। कोलम्बो से रेल द्वारा सफर कर ओपानेक पहुँचे। वहाँ से बस द्वारा रत्नपुरा और फिर एक निकटवर्ती गाँव में। उक्त गाँव के लोगों द्वारा हेनरिक को समीपवर्ती जंगल में हाथियों के एक झुण्ड का पता चला। उनने निश्चय किया कि पहले उनका सही-सही स्थान पता लगा लिया जाय,फिर अभियान की तैयारी की जाय। यह विचार कर उसी गाँव के एक ग्रामीण को अपने साथ लेकर वह चल पड़े।?
बरसात का महीना था। पर उस दिन मौसम साफ था, अतः प्रातः ही निकलने का कार्यक्रम बना। हेनरिक, वहाँ का एक ग्रामवासी पूरन तथा उसका कुत्ता-मामूली सामान तथा बरसात में बचने के लिए तम्बू आदि लेकर निकल पड़े। हाथियों की खोज में वे घने जंगल में पहुँच गये। शाम हो चुकी थी, तभी घनघोर आरम्भ हो गई। निरुपाय हो उन्हें अपनी खोज-यात्रा स्थगित करनी पड़ी। वे सब जंगली झाड़ियों के नीचे आ गये और बरसात से बचने की कोशिश करने लगे। किन्तु वृष्टि इतनी तेज थी कि उनका वह प्रयास एकदम निरर्थक साबित हुआ। तमिस्रा भी गहरा गई थी। अब वहाँ से निकल पाना गया। थोड़ी देर पश्चात् बरसात कुछ धीमी पड़ी तो हेनरिक और पूरन ने मिल एक सघन वृक्ष के नीचे अपना तम्बू खड़ा किया और आग जलाकर सो गये।
प्रातः जब हेनरिक की आँखें खुली, तो उदयाचल से भगवान भास्कर झाँकने लगे थे। तम्बू पास ही उखड़ा पड़ा था। दिन-भर की थकान से उनको गहरी नींद आयी थी। आँखें अब भी बोझिल हो रही थी, अतः बन्द कर ली, किन्तु तभी पूरन का मन्द स्वर सुनायी पड़ा। वह सहायता की भावना कर रहा था। आवाज पुनः आयी। आँखें खोलकर उसको ओर देखा, तो आश्चर्यचकित रह गये। उसके शरीर से जगह-जगह से रक्त बह रहा था और वह सहाय-सा पड़ा-पड़ा कातर दृष्टि से उनकी ओर देख रहा था।
हेनरिक उड़ने का प्रयास कर रहे थे। पर न जाने क्यों आज उनका भी अंग-अवयव शिथिल पड़ गये थे। थोड़े प्रयत्न के उपरान्त वे उठ बैठे। दृष्टि जब अपने शरीर पर पड़ी, तो वहाँ भी स्थान-स्थान से रक्त-स्राव हो रहा था और जगह-जगह जोंकें चिपकी पड़ी थी, उन्हें एक-एक करके अलग किया। रात में जलायी लकड़ियों में से कुछ अब भी सुलग रही थी, उनमें से एक को उठाकर वे पूरन के शरीर में चिपकी जोंकों से स्पर्श करा-करा कर उन्हें शरीर से पृथक करने लगे। पूरन काफी कमजोरी महसूस कर रहा था। स्वयं उठने में भी कठिनाई हो रही थी। सहारा देकर हेनरिक ने उसको उठाकर बैठाया, फिर बगल में पड़े थैले से शराब की बोतल निकाल कर कुछ शराब उसके मुँह से उड़ेली। इसके बाद दोनों काक ध्यान कुत्ते की ओर गया। वह बुरी तरह हाँफ रहा था और जीभ बाहर निकली पड़ी थी। उसका शरीर रक्तरंजित हो गया था। उससे भी जोंकें हटायी गयी। पीछे सबने मिलकर भोजन किया। इससे कुछ शक्ति मिली, तो सभी ने वहाँ से प्रस्थान किया।
जोंकों का आक्रमण अब भी जारी था। वे ऊपर-नीचे दोनों ओर से हमला कर रही थी। पेड़ों-झाड़ियों से गिर-गिरकर कमीज के अन्दर घुस पड़ती और चलते समय नीचे जमीन से जूतों और मोजों में प्रवेश कर जाती, जिसके कारण बीच-बीच में रुक-रुककर उन्हें हटाना और निकालना पड़ता। इस कारण भी जंगल से बाहर निकलने में विलम्ब हो रहा था। दूसरे, वे इतने शक्तिहीन अनुभव कर रहे थे कि दौड़ना तो क्या, चलना भी मुश्किल पड़ रहा था, फिर भी जान बचाने की खातिर से किसी प्रकार घिसटते चले आ रहे थे।
गाँव अब भी दूर था। वे उस जानलेवा परिधि से बाहर भी न हो सके थे कि वर्षा पुनः आरम्भ हो गई। उनके लिए यह एक प्रकार से ठीक ही हुआ, कारण कि पैरों की ओर से जो हमला हो रहा था, वह लगभग रुक गया। जोंक पानी के तेज प्रवाह में साथ-साथ बहने लगी। किन्तु ऊपर का आक्रमण अब भी जारी था। वहाँ पर रुकना एक प्रकार से मृत्यु को गले लगाने के समान था। इसलिए बरसात की परवाह किये बिना वे चलते रहे। थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि कुत्ता साथ नहीं है। पीछे मुड़कर देखा तो, वह एक स्थान पर निष्प्राण-सा पड़ा था। दोनों वापस लौटे। जाकर देखा, तो पाया कि उसके सम्पूर्ण शरीर में जोंकें बुरी तरह चिपकी हुई खून चूस रही थी। दोनों ने मिलकर उन्हें शरीर से हटाया, कुत्ते को कुछ खाना खिलाया, और इसके बाद पुनः तीनों चल पड़े। अब वे एकदम आश्वस्त थे कि उनकी जीवन रक्षा हो गयी। कुछ ही पल पश्चात उधर से शोर सुनायी पड़ा। संभवतः लोगों ने उन्हें आते हुए देख लिया था, अतः उस और उनका हाल जानने के लिए भागे चले आ रहे थे। पहली रात नहीं लौट पाने के कारण कदाचित् ग्रामवासी उनके जीवन के प्रति चिन्तित हो उठे थे और व्यग्रतापूर्वक उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। अब उन्हें आते देख एकदम आनंद से उछल पड़े और उस ओर बढ़ चले।
आते ही सबने उनकी कुशलता पूछी और कहा कि वे जंगल के गलत दिशा वाले खण्ड में पहुँच गये थे। उसमें जोंकों की इतनी बहुलता है कि वहाँ कोई जीव-जन्तु जीवित रह ही नहीं पाता, सबको वे अपना आहार बना लेते हैं। इस वर्ष मानसून देर से आया है। अतः उनकी संख्या में दुगने की और वृद्धि हो गयी होगी। जहाँ इतनी बड़ी तादाद में जोंकें हो, वहाँ हाथी भला जिन्दा ही कैसे रह सकते हैं। यदि इस क्षेत्र में उन्हें किसी ने देखा भी होगा, तो शायद वे उनके शिकार हो गये। सभी गाँव लौट गये। हेनरिक ने एक सप्ताह के करीब वहाँ विश्राम किया और फिर अमेरिका वापिस चले गये।
एक लोकोक्ति है-”पिये रुधिर पय ना पिये, लगी पयोधर जोंक।” जोंकों को प्यपान प्रिय नहीं, वे रक्तपान ही पसन्द करती है। जिनमें यह जोंकें लग गई, उनका भगवान ही मालिक है। इन प्रत्यक्ष जोंकों को तो फिर भी हटाया-मिटाया जा सकता है, पर जो अप्रत्यक्ष जोंकें-वासना, तृष्णा, अहंता एवं ईर्ष्या, द्वेष के रूप में हमारे अन्दर प्रवेश करती और भीतर-ही-भीतर हमें खोखला बनाती रहती है, उनका क्या किया जाय? उनसे कैसे लोहा लिया जाय? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर हर एक को विचार करना चाहिए। बीच-बीच में तत्परतापूर्वक यदि आत्मा-निरीक्षण करते रहा जाय एवं साथ-साथ यह भी प्रयास जारी रखा जाय कि आत्मा कलुषित न होने पाये, तो काफी हद तक इन अदृश्य जोंकों के अगोचर आक्रमण से बचा जा सकता है। इनमें रक्षा का यही एकमात्र तरीका है। इतनी सतर्कता और जागरुकता में कमी न रह गई हो, तो कोई कारण नहीं कि इनमें बचाव का उपाय न हो तो सके। इसके विपरीत यदि ऐसा न हुआ, तो व्यक्ति का सर्वनाश सुनिश्चित है।
मंगोलिया वासी चाँमशेन नामक न्यायाधीश अफसर के पास उनका एक मित्र पहुँचा और अशर्फियों की थैली भेंट करते हुए बोला-”आप मेरा काम कर दें। इस लेन-देन की बात आपके और मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानेगा।”
चंगशेन कभी किसी से रिश्वत नहीं लेते थे। भले ही अपनी इस आदर्शवादिता के कारण उन्हें अभावग्रस्त जीवन जीना पड़ता था। उन्होंने अपने धनी मित्र को इस बात का उत्तर दिया-”मित्र! ऐसा न कहो कि कोई नहीं देखता। कोई मनुष्य नहीं देखता तो क्या? सर्वव्यापी परमेश्वर तो सब कुछ देखता है-उसकी नजरों से मेरा यह अनैतिक कर्म कहाँ छिपा रहेगा।”
अनीति का उपार्जन महामानव को कभी स्वीकार्य नहीं होता। यही परम्परा वे अपने परिवारों में डालते हैं।
हम सब सामाजिक प्राणी है, समाज में रहते, उसकी सहायता, सहयोग तथा संपर्क से ही उचित विकास करते तथा उसी से अपनी जीविका कमाते और बच्चों की ब्याह-शादी करते हैं। समाज के सहयोग के बिना हमारी किसी की जिन्दगी दो कदम नहीं चल सकती। समाज का मनुष्य जीवन में बड़ा महत्त्व है।
किन्तु सामान्यतः लोग अपने को सामाजिक ने समझकर केवल पारिवारिक ही समझते हैं और उसी की अच्छाई-बुराई तथा सुख-दुख का विचार रखते हैं। उसी के लिए सब कुछ सोचना और उसी के लिए सब कुछ करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं, तथापि उन्हें समाज के साथ प्रतिकार के रूप में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कुछ-न-कुछ सेवा देनी ही होती है। ऐसा किए बिना काम नहीं चल सकता। परिवार की सेवा भी समाज की ही सेवा है। मनुष्यों का दृष्टिकोण ही केवल अहंपूर्ण होता है। यदि परिवार को भी समाज का ही एक अंग समझकर समुचित रूप से सेवाएँ दी जाएँ, तब भी वह एक प्रकार से समाज की प्रत्यक्ष सेवा हो जाये। किन्तु लोग परिवार को अपना व्यक्तिगत अनुबंध समझकर उसका पालन एवं संचालन मनमाने ढंग से करते हैं, इसलिये उनकी सेवा सामाजिक परिसर तक बढ़कर व्यापक नहीं बन पाती।
परिवार समाज की एक इकाई है, ऐसा मानकर चलने वाले लोग, उसका पालन, संचालन एवं निर्माण इस प्रकार से ही करते हैं, जिसमें समाज में सौंदर्य, स्वास्थ्य तथा सुविधा को वृद्धि हो। ऐसे लोग परिवार को संतुलित तथा सुव्यवस्थित रखने का बड़ा ध्यान रखते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि संतुलित परिवारों से जहाँ व्यक्तिगत सुख-शाँति तथा आत्म-विकास में सहायता मिलती है, वहाँ समाज की व्यवस्था पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। अस्तु, प्रत्येक व्यक्ति को यथासंभव अपने परिवार को संतुलित तथा नियोजित रखने का प्रयत्न करना चाहिए। जहाँ असंतुलित तथा अनियोजित परिवार में अनेक प्रकार के कष्ट-क्लेशों का जन्म होता रहता है, संतुलित तथा नियोजित परिवार से सुख-सुविधा की कमी नहीं रहती। इस विषय में अपने अनुभव के आधार पर एक विद्वान ने इस प्रकार बतलाया है-”यदि आप मेरे सुखी परिवार का रहस्य जानना चाहते हैं तो मैं बतलाता हूँ कि इस सबका श्रेय मेरी बी0 ए॰ पास पत्नी को है। मैं तो वाणिज्य का एक अध्यापक मात्र हूँ। मैं परिवार नियोजन जैसी चीज क्या जानूँ? मेरी पत्नी संसार और विशेष रूप से हमारे देश में होने वाली अंधाधुँध जनवृद्धि से उत्पन्न होने वाली हानियों से पूर्णतया
स्विट्जरलैंड का एक 12 वर्षीय लड़का सड़क पर गेंद उछाल रहा था। गेंद दुकान के शीशे में लगी और वह टूट गया। भागने का अवसर था, पर लड़का भागा नहीं। जब शीशा तोड़ने वाले की तलाश हुई तो उसने अपना दोष बताया। शीशे का मूल्य चुकाने का प्रश्न आया, तो लड़के ने चार दिन तक उसके यहाँ मजूरी करने की बात कही। लड़के ने चार दिन तक इतनी मेहनत और मुस्तैदी से काम किया कि दुकान मालिक प्रसन्न हो गया। उसे अपने यहाँ स्थायी नौकर रख लिया। लड़का पढ़ता रहा, नौकरी करता रहा। अपने सद्गुणों से मालिक का मन इतना मोह लिया कि उस दुकान का पार्टनर बन गया और कुछ ही दिनों में सम्पन्नों में उसकी गणना होने लगी।
इसका श्रेय वह सदैव अपनी माँ को देता रहा, जिसने उसे सिखाया था-”हमेशा अंतःकरण की आवाज पर, विवेक की पुकार पर काम करना, नीति की कमाई खाना।”
परिचित है। वे इस समस्या पर पढ़ती और विचार करती रहती है। साथ ही उन परिवारों की दयनीय दशा भी देखती रहती है, जो बिना सोचे-समझे संतानों-पर-संतानें उत्पन्न किये जाते हैं इतना ही नहीं वे जो कुछ करती हैं, उसे जीवन में यथार्थ रूप से उतारती भी है। हमारे परिवार की सुख-शांति का आभार केवल दी श्रेष्ठ, विकसित, स्वस्थ तथा सुन्दर संतानें ही है। है। हमारी शिक्षित तथा यथार्थवादी पत्नी ने परिवार नियोजन के लिए प्राकृतिक से लेकर कृत्रिम तक सारे उपलब्ध साधनों तथा उपायों को काम में लाकर परिवार सीमा से बाहर बढ़ने नहीं दिया। उनके मस्तिष्क से कभी भी यह विचार तिरोहित नहीं किया जा सकता कि भारत की जनसंख्या यदि इसी गाँव इसी गति से प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों में बढ़ती रहे तो स्थिति कितनी भयानक हो जाएगी, हम सबको, देश की उस भयावह स्थिति से, जिसमें न भोजन मिले, न वस्त्र और न अपने घरों में परिवार नियोजन का काम प्रारम्भ कर ही देना चाहिए।” जनसंख्या की वृद्धि को इस अनियोजित गति को रोका ही जाना चाहिए
और यह काम तभी पूरा होगा जब उनके पालन-पोषण, रहन-सहन, शिक्षा-दीक्षा, प्रतिभा तथा विशेषताएँ विकसित करने पर पुरा-पूरा ध्यान दिया जाय। उसके लिये खर्च भी जुटाया जा सकता है। कितना ही हाथ तंग क्यों न हो फिर भी एक-दो बच्चों का पालन-पोषण तथा शिक्षा-दीक्षा का समुचित प्रबन्ध किया ही जा सकता है। ढेरों बच्चे होने से, उन पर जो, उनमें से अधिक होनहार तथा कुशाग्र बुद्धि होते हैं और जिन पर विशेष ध्यान की आवश्यकता है, समुचित ध्यान नहीं दिया जा पाता। अनेक बच्चों में किसी एक पर विशेष ध्यान पक्षपात जैसा होगा। जो माता-पिता के लिए कर सकना न तो संभव है और यदि कोई ऐसा करते हैं तो गृह-क्लेश बीज बोते हैं, जो जल्दी ही विष फल उत्पन्न करने लगते हैं। नियोजित परिवार में यह कठिनाई नहीं रहती। एक दो बच्चे होते हैं। उन पर पूरा-पूरा ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है। पारस्परिक वैमनस्य अथवा ईर्ष्या,द्वेष का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि वे दोनों बच्चे कुशाग्र बुद्धि के हैं तब तो उन्हें हर प्रकार का प्रोत्साहन तथा प्रबन्ध देकर आगे बढ़ाया ही जा सकता है और यदि वे नहीं हैं तो प्रयत्नशीलता के बल पर उन्हें प्रतिभावान तथा होनहार बनाया जा सकता है। इस प्रकार समुचित रूप से पालित तथा विकसित किये गये बच्चे समाज के कितने सुन्दर नागरिक बन सकते हैं, इसका अनुमान भर हृदय में पुलक भर देता है, संतान सुयोग्य होकर समाज में प्रतिष्ठा पाये, यह गृहस्थ जीवन का ऐसा तीसरा सफल है जिसका सुख माता-पिता से सँभाले नहीं सँभलता।
एक दो बच्चे होने से माता-पिता न उन्हें केवल समुचित लालन-पालन ही दे सकते हैं, बल्कि अपना पूरा प्यार तथा वात्सल्य भी दे सकते हैं। उनकी स्नेह धारा अनेकधा न होकर उन दो बच्चों तक ही केन्द्रित रहकर उन्हें ओत-प्रोत कर देती है। उनके जीवन को संतुष्ट तथा शीतल रखती है। माता-पिता का स्नेह बच्चों के लिए किसी भी पौष्टिक पदार्थ से हजार गुणा गुणकारी होती है। जिन बच्चों को यह पूरी तरह मिलता रहता है वे यों ही स्वस्थ तथा विकसित होते चलते हैं। साथ केन्द्रित होकर उसके स्नेह तथा वात्सल्य का सुख उन्हें पी परितृप्त रखा करता है। प्रेम की अनुभूति ईश्वरीय प्रसाद है, किन्तु यह हर्ष एवं उल्लास का हेतु बनता तभी है जब कहीं पर केन्द्रित हो, अन्यथा कूट-कूटकर और जीर्ण-शीर्ण होकर निष्प्रभाव हो जाता है। माता-पिता से पूरा प्रेम पाकर बच्चे भी उन्हें अपना पूरा आदर तथा श्रद्धा देने लगते हैं। वे अधिकाधिक विनम्र तथा आज्ञाकारी बन जाते हैं। सुयोग्य संतानों का आज्ञाकारी बन जाते हैं। सुयोग्य संतानों का आज्ञाकारी होना गृहस्थ जीवन का चौथा सुफल है, जिसका सुख अनिवर्चनीय होता है। इसे कोई विरले बुद्धिमान माता-पिता ही पाते हैं।
इसके विपरीत जिन माता-पिता के अनेक बच्चे होते हैं, उनका प्रक किसी बच्चे पर भी केन्द्रित नहीं हो पाता। वह यों ही बूँद-बूँद इससे उस पर और उससे इस पर छितराता हुआ बेकार ही चला जाता है। न तो बच्चों को संतोष होता है और न माता-पिता को अनुभूत स्नेह के प्यासे रहकर बहुधा अविनम्र और अवज्ञाकारी हो जाते हैं। स्नेह न पाने से उनका हृदय भी कठोर तथा कर्कश बन जाता है। वे आपस में लड़ते-झगड़ते और बाहर जाकर दूसरों के साथ उपद्रव उत्पन्न करते हैं। रोज शिकवा शिकायत भिजवाते और माता-पिता को प्रतिष्ठा गिराते हैं। बच्चों की इन हरकतों के कारण माता-पिता को कितनी मानसिक पीड़ा होती होगी? इसे तो भुक्तभोगी ही बतला सकते हैं। इसी पीड़ा से कराहकर तो लोग कह उठते हैं कि नालायक बच्चे होने से कहीं अच्छा है कि परमात्मा बिना बच्चे का ही रखे।
इस प्रकार किसी दृष्टि से क्यों न देखा जाए, नियोजित परिवार हर प्रकार से सुख-शान्ति का हेतु तथा अनियंत्रित परिवार हर प्रकार से कष्ट-क्लेश का कारण होता है। एक दो अथवा अधिक से अधिक तीन बच्चों के नियोजित परिवार में माता-पिता अपना संपूर्ण समय शान्ति, उत्साह, प्रेम, पैसा आदि लगाकर उन्हें श्रेष्ठतम नागरिक बना सकते हैं। उनसे शारीरिक,बौद्धिक, आध्यात्मिक तथा शैक्षणिक हर प्रकार से विकास पर पूरा-पूरा ध्यान दे सकते हैं। इससे बच्चे सुयोग्य नागरिक बनकर समाज के सदस्य रत्न तो बनते ही हैं, साथ ही माता-पिता के लिए भी सुख-शान्ति तथा संतोष के बड़े आधार बनते हैं। जो बुद्धिमान दम्पत्ति यह बात ठीक से हृदयंगम करके तद्नुरूप व्यवस्था करते हैं वे जीवन में संतुष्ट और सुखी रहते हैं, इसमें न कोई बाधा है न कोई संदेह।
विश्वविख्यात संगीतज्ञ पाठलोकासाल कहा करते थे-”दुनिया को मरने से बचाने के लिए संगीत ही सबसे बड़ा संरक्षक हो सकता है।” मार्टिन लूथर का यह कथन भी प्रख्यात है कि मनुष्य जाति को भगवान द्वारा दिये गये सबसे भव्य वरदानों में से एक संगीत भी है।
ऐसे ही अनेक कथनों को जापान के एक संगीत विद्यार्थी शिनीची सुजुकी ने अपना जीवन दर्शन बनाया और वह उसी के लिए समर्पित हो गया। उसने न केवल संगीत विद्यालय खोलकर इस महाविज्ञान के जीवन उत्कर्षकारी पक्ष को विकसित किया, वरन् जनसाधारण को संगीत की आत्मा से परिचित कराने के लिए द्वार-द्वार पर अलख भी जगाया।
स्जुकी ने अपनी पत्नी ऐसी ढूंढ़ी, जो उसके मिशन में कंधे-से-कंधा लगाकर और कदम-से-कदम मिलाकर चल सके। पियानो वादन की मर्मज्ञ बाल्ट्राइड के साथ विवाह की शर्त इसी शर्त पर पक्की हुई, कि दोनों मिलकर संगीत की सेवा करेंगे। विवाह के बाद ही टैलेण्ट एजूकेशन इन्स्टीट्यूट की स्थापना हुई और बाल्ट्राइड सी में प्राणपण से निमग्न हो गयी। इस संस्था की 70 शाखाएँ सारे जापान में चलती है। इन विद्यालयों ने अब तक कोई डेढ़ हजार प्रख्यात संगीतज्ञों को विनिर्मित किया है।
स्जुकी कहते हैं-”शुद्ध संगीत मनुष्य में भव-संवेदना जगाता है, अनुशासन, सहिष्णुता और कोमलता जगाता है। हृदय को सुन्दर बनाने में संगीत की अपनी भूमिका है।” उनकी पत्नी कहती थीं-”हम लोग चाहते हैं कि जापान का बच्चा-बच्चा सहृदय और आदर्शवादी भावनाओं से सुसम्पन्न बने। इसी लक्ष्य के लिए हम लोगों ने अपने को एक सदुद्देश्य के लिए समर्पित किया है।”
गायत्री परिवार, युग निमार्ण योजना, प्रज्ञा अभियान, शांतिकुंज की युगान्तरीय चेतना नामों से प्रख्यात हमारा यह मिशन सत्तर वर्ष पूरे कर इस माह से इकहत्तरवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। अखण्ड-ज्योति भी प्रकाशन के साठवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। इस मध्य यह परिवार उत्तरोत्तर विराट बनता चला गया है। देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के माध्यम से अब यह संख्या करोड़ों में पहुँच गयी है।
परमपूज्य गुरुदेव ने विशुद्धतः साँस्कृतिक पुनर्जागरण के निमित्त यह मिशन-आन्दोलन खड़ा किया है। हमारा कार्य व्यक्ति निर्माण है। विचार क्राँति है एवं साँस्कृतिक नवोन्मेष की प्रक्रिया इसी माध्यम से साकार हो सकती हैं व्यक्ति, परिवार, समाज के माध्यम से सारे विश्व का नव-निर्माण ही युग निर्माण योजना का लक्ष्य है, जिसे ऋषि चेतना एवं दैवी सत्ताएँ आगामी 5 से 10 वर्षों में निश्चित पूरा करके दिखाएँगी।
जब भी कोई संगठन विराट रूप लेता है उसमें ऐसे व्यक्ति भी प्रवेश कर सकते हैं जिनकी राजनैतिक महत्त्वाकाँक्षाएँ हो। अहंता की ललक-लिप्सा ही कई संस्थाओं के विघटन का कारण बनती है। परमपूज्य गुरुदेव ने विशुद्धतः आध्यात्मिक अपने इस आँदोलन के सम्बन्ध में दूरदृष्टि रखते हुए आज से सत्ताईस वर्ष पूर्व बड़ा स्पष्ट लिख दिया था कि हम राजनीति में भाग क्यों नहीं लेते? आज जो राजनीति का स्वरूप है उसे आमूलचूल बदलने, भ्रष्टाचार से आकण्ठ डूबे तंत्र को ठीक करने के लिए युग निर्माण योजना दुर्मति को सन्मति में बदलने व विचार परिष्कार द्वारा सूक्ष्म जगत के संशोधित-परिवर्तन का कार्य कर रही है, वह अपने में महत्त्वपूर्ण व समग्र है। यदि किसी पाठक, परिजन या शुभेच्छु को लगता है कि हमारी संख्या क्या राजनैतिक प्रवेश की इच्छा रखती है तो उसकी समस्त जिज्ञासाओं, आशंकाओं को यह लेख निर्मूल कर देता है जो एक पुस्तिका के रूप में भी उन दिनों व बाद में प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुत है दो भागों में प्रकाशित यह विशिष्ट लेख, जो आजादी की पचासवीं वर्षगाँठ की बेला में सबके लिए माननीय व पठनीय हैं यह लेख अक्टूबर 1970 के संपादकीय रूप में लिखा गया था। आज 26 वर्ष भी यह उतना ही प्रासंगिक है।
ज्ञान यज्ञ द्वारा सर्वतोमुखी जन-जागरण का अपना महाअभियान अगले दिनों कुछ चमत्कारी उपलब्धियाँ उत्पन्न करके रहेगा। मानवीय आस्थाओं और अभिरुचियों की परिवर्तित करने का काम कठिन अवश्य है पर असम्भव नहीं। पिछली शताब्दियों में रूसी ने प्रजातन्त्र के तथा मार्क्स ने साम्यवाद के सिद्धान्तों की उपयोगिता की जिस प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया और इस विचारणा से प्रभावित लोगों ने जिस उत्साह एवं पुरुषार्थ के साथ आगे कदम बढ़ाया, उसका परिणाम अद्भुत निकला। आज इन दो मनीषियों द्वारा प्रतिपादित आदर्शों के आधार पर संसार के के तीन-चौथाई भाग पर शासन चल रहा है। विचारों की शक्ति अति प्रबल है। यदि वे बुद्धिसंगत एवं उपयोगिता की कसौटी पर खरे सिद्ध हो सके तो निश्चय ही उनका स्वागत होगा। फिर यदि उस विचारणा को सुव्यवस्थित संगठन द्वारा, व्यवस्थित कार्य-पद्धति द्वारा व्यापक बनाने का सुदृढ़ कार्य किया जाये तो कोई कारण नहीं कि वे अपने प्रकाश से विश्व के बड़े भाग की प्रकाशित न करे।
युग-निमार्ण योजना द्वारा प्रकाशित जन-मानस में उत्कृष्ट एवं आदर्शवादिता की प्रतिष्ठिता के लिये जो सशक्त अभियान चलाया जा रहा है, उनने पिछले दिनों मजबूती के साथ जड़े जमाई है। अपने परिवार की 4 हजार शाखाओं से सम्बद्ध लाखों सदस्य जिस उत्साह के साथ विचार-क्रान्ति का पथ प्रशस्त काने में लग गये है और सृजनात्मक एवं संघर्षात्मक शत-सूत्री योजना की जो प्रवृत्तियाँ चल पड़ी है, उन्हें देखते हुए हर कोई विश्वास कर सकता है कि अगले दिनों अपना परिवार जनजागरण एवं भावनात्मक नव-निर्माण की महत्त्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करेगा। धरती पर स्वर्ग अवतरण के अपने स्वप्न साकार होकर रहेंगे।
हम लोग जिस तत्परता के साथ नव युग-निर्माता की दिशा में आँधी-तूफान की तरह गतिशील हो रहे है, उसके सम्भावित परिणाम की प्रकाशवान् आशा सर्वत्र बँध चली है। इसलिए-शान्ति एवं मानवीय प्रगति के प्रति विश्वास है, वे अनेक प्रश्न पूछते और अनेक परामर्श देते रहते हैं। उचित भी है उत्तरदायित्व सँभालने वालों से अधिक सही और अधिक ठोस काम किये जाने की आशा की ही जानी चाहिए। इस दृष्टि से अपने उद्देश्यों का परिपूर्ण समर्थन करते हुए भी कार्यक्रमों में सुधार एवं परिवर्तन करने के अनेक परामर्श दिये जाते रहते हैं। और उनकी अति कृतज्ञता एवं आदर के साथ सम्पन्न भी करते हैं और उन पर विचार भी।
ऐसे ही सुझावों में एक महत्त्वपूर्ण एवं वजनदार सुझाव यह भी है कि “हम राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश क्यों नहीं करते? और राजतन्त्र को अपने अनुकूल बनाकर सरकारी स्तर पर वह सब सहज ही क्यों नहीं करा लेता, जिसके लिए इन दिनों इतनी अधिक माथापच्ची कर रहे है।” इस सुझाव के पीछे अपनी और अपने संगठन की वह क्षमता और व्यापकता है, जिसका सही मूल्याँकन कर सकने वाले लोग अनुभव करते हैं कि इन दिनों अपना तन्त्र किसी राजनैतिक, सामाजिक या धार्मिक क्षेत्र से कम प्रखर एवं कम सशक्त नहीं है।
वर्तमान युग में राजनीति को सर्वोपरि सत्ता और महत्ता स्वीकार करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है। यह स्वीकार करने में भी हमें कोई अड़चन नहीं है कि सरकारें यदि यही कदम उठा सकें, सूझ-बूझ से काम लें और अपने क्रियातंत्र को सुव्यवस्थित रख सकने में समर्थ हो तो वे अपने क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति कर सकती है। जापान, चीन, रूस, जर्मनी, अरब, इजराइल आदि ने चंद दिनों के भीतर अपने ढंग से, अपनी योजनानुसार अभीष्ट परिवर्तन के प्रकार आँखें बन्द किये रहे। धर्म का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं, यह दूसरों ने भले कहा हो हमने यह शब्द कभी नहीं कहे है। इतिहास ने हमें सिखाता है कि धर्म की स्थापना में राजनीति के मदोन्मत्त हाथी पर धर्म का अंकुश रहना चाहिए। दोनों एक-दूसरे के विरोधी वहाँ वरन् पूरक है। दोनों में अपेक्षा या असहयोग की प्रवृत्ति नहीं वरन् घनिष्ठता एवं परिपोषण का सघन तारतम्य जुड़ा रहना चाहिए।
इतिहास साक्षी है कि जनता के सुख-सौभाग्य में अभिवृद्धि का आधार दोनों के बीच सघन-सहयोग की प्रमुख तथ्य रहा है। गुरु वशिष्ठ के मार्गदर्शन और रघुवंशियों के शासन क्रम ने द्वापर में उस सतयुग की स्थापना की थी, जिसे हम रामराज्य के नाम से आदर के साथ याद करते हैं। चाणक्य के मार्गदर्शन से गुप्त साम्राज्य पनपा, फैला और परिपुष्ट हुआ था। पांडवों का मार्गदर्शन कृष्ण ने किया था और दुशासन का उन्मूलन कर सुशासन की स्थापना की थी। राज्य मान्धाता का सहयोग शंकराचार्य को दिग्विजय का महत्त्वपूर्ण आधार था। भगवान बुद्ध के प्रभाव से सम्राट अशोक का बदलना और अशोक की सत्ता के सहयोग बुद्ध धर्म का समस्त एशिया में फैल जाना एक ऐसी सच्चाई है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। समर्थ गुरु रामदास जानते थे कि धर्म प्रवचनों से ही काम चलने वाला नहीं है, सुशासन की स्थापना भी आवश्यक है अस्तु, उन्होंने शिवाजी जैसे अपने प्रधान शिष्य को इस मार्ग पर अग्रसर किया, अग्रसर ही नहीं किया, अपने स्थापित 700 महावीर देवालयों के माध्यम से आवश्यक रसद, पैसा तथा सैनिक जुटाने जापान के एक लड़के कागावा ने पढ़ाई के बाद पीड़ितों की सेवा करना अपना लक्ष्य बनाया और उसी में लग गये। पिछड़े, बुरी आदतों से ग्रसित, बीमार लोगों के मुहल्लों में वे जाते और दिनभर उन्हीं की सेवा में लगे रहते। पेट भरने के लिए उसने दो घण्टे का काम तलाश कर लिया। इस सेवा कार्य की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। एक विदुषी लड़की को उनका यह कार्य बहुत पसन्द आया। वह भी उनके कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य करने को तैयार हो गयी। विवाह एक शर्त पर हुआ, कि वे लोग वासना पूर्ति हेतु नहीं, समाज सेवा हेतु मैत्री की खातिर बंधेंगे। उस लड़की ने भी अपना पेट भरने के लिए दो घण्टे रोज का काम तलाश लिया। दोनों के मिलकर काम करने से दूना काम होने लगा। उदार लोग उनके काम में सहायता देने लगे। फलतः कार्यक्षेत्र बहुत बढ़ गया। सरकार ने पूरे जापान में पिछड़े लोगों को सुधारने का काम उन लोगों को सौंपा। कागावा के प्रति जापान में इतनी श्रद्धा बढ़ी कि उन्हें उस देश का गान्धी कहा जाने लगा।
परिवार का अर्थ मात्र विवाह का गठबन्धन नहीं है, अपितु एक मित्र की तरह साथ चलकर काम करने वाले समूह का नाम है। कागावा को संयोगवश एक सुयोग्य पत्नी मिली एवं उन्होंने अपना परिवार परिकर अच्छा-खासा विशाल बनाकर अपने को सच्चे अर्थों में विश्वमानव प्रमाणित कर दिया।
की भी व्यवस्था की थी, शिवाजी उसी सहयोग के बली पर स्वतन्त्रता की ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत कर सके। गुरु नानक का पन्थ एक प्रकार से स्वाधीनता के सैनिकों से ही बदल गया। उसने “एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला” का आदर्श प्रस्तुत करके यह बता दिया कि राजतन्त्र और धर्मतन्त्र को विरुद्ध दिशाओं में नहीं चलने देना चाहिए, वरन् उनके कदम एक ही दिशा में उठने की आवश्यकता हर कीमत पर पूरी की जानी चाहिए। बन्दा वैरागी ने सच्चे अध्यात्मवादी का उदाहरण प्रस्तुत किया और समाधि साधना एवं ईश्वर के प्रति आत्म-समर्पण की तरह ही अपना सर्वस्व राजनीति की सदाशयता की ओर मोड़ने के प्रयास में उत्सर्ग कर दिया।
भगवान का धर्म से ही सीधा सम्बन्ध जुड़ता है। पर अधर्म के अभिवर्द्धन के प्रधान कारण दुशासन को बदलने के लिए वे समय-समय पर अवतार धारण करते हैं। कच्छ, मच्छ बराह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध आदि अवतारों ने कुशासन के विरुद्ध सीधी कमान सँभाली। उनकी लीलाओं में इस प्रकार के उन्मूलन एवं परिवर्तन का क्रम ही प्रधान है। अवतारों ने अन्य चरित्र भी दिखाये होगे पर उन्हें दिया प्रमुख प्रयोजन के लिए आना पड़ा वह अधर्म की सत्ता को धर्म स्थापन के उपयुक्त बनाना ही प्रधान कार्य था। अगला निष्कलंक अवतार जो होने जा रहा है। उसकी दृष्टि भी सुशासन की स्थापना पर ही होगी।
द्रोणाचार्य ने इस सच्चाई को दो टूक स्पष्ट कर दिया है। वे कहते थे।
अग्रतः चतुरो वेदा पृष्ठतः सशरं धनु। इर्द ब्राह्मं इदं क्षात्रं शास्त्रादपि शरादपि॥
हम वेदों को आगे रखकर लोगों को समझाने और सन्मार्ग पर लाने का प्रयत्न करते हैं। साथ ही पौठ पर धनुष-बाण भी रखते हैं। यह धर्म शिक्षा ‘ब्राह्म’ है और यह शस्त्र धारण ‘क्षात्र’ है। दोनों शक्तियों के समन्वय से ही समस्याएँ सुलझती है।
उपरोक्त सत्य का प्रतिपादन करने वाले तथ्यों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े है। अभी कल-परसों महात्मा गाँधी जिन्हें इस युग का धर्म पुरुष कह सकते हैं, अपनी जीवन-साधना से राजनीति का प्रधान समन्वय करके यह प्रस्तुत करते रहे है कि धर्म और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक है। लोकमान्य तिलक, महामना मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द जैसे धर्मवेत्ता मनीषियों को भी अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखा। इसमें उनकी धार्मिकता घटी नहीं वरन् प्रखर एवं समुज्ज्वल ही होती चली गई।
शासन आज जिस तरह जीवन के हर पक्ष में प्रवेश करता चला जा रहा है और धीरे-धीरे व्यक्ति जिस तरह राज्य की कठपुतली बनने जा रहा है, उस बारीकी को समझाने वाला कोई सूक्ष्मदर्शी व्यक्ति राजनीति से सर्वथा पृथक धर्म की कल्पना भी नहीं कर सकता। जो धर्म की कल्पना भी नहीं कर सकता। जो धर्म को राजनीति से अलग होने की बात कहते या समझते हैं, उन्हें नितान्त भोला ही कहा जा सकता है। प्रतिकूल राजनीति से धर्म की जीवित रहना भी सम्भव नहीं। रूस, चीन आदि साम्यवादी देशों की धार्मिकता की कैसी दुर्गति हुई, यह सबके सामने है। तिब्बत का धर्म शासन करने वाले लामाओं की राजनैतिक प्रतिकूलता ने कहाँ से लाकर कहाँ पटक दिया। राज्याश्रय पाकर ईसाई चर्च कितनी प्रगति कर रहा है और मध्य युग में राज्याश्रय ने इस्लाम धर्म के विकसित होने में कितनी सहायता की ।इन तथ्यों से कोई मूर्ख ही आँखें मोच सकता है।
इन तथ्यों को जानते हुए भी हम और हमारा संगठन राजनीति में क्यों प्रवेश नहीं करते, इसके सम्बन्ध में लोग हमें उलाहना देते और भूल सुधारने के लिये आग्रह करते हैं। वे जानते हैं कि हम शासन तंत्र में प्रवेश करने में बहुत दूर तक सफल हो सकते हैं। इसलिए उनकी और आतुरता आदि भी अधिक रहती हैं कितनी ही राजनैतिक पार्टियों द्वारा अपनी और आकर्षित करने और प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में सम्मिलित होने के लिए डोरे डाले जाते रहते हैं और उसके बदले ने हमें किस प्रकार सन्तुष्ट कर सकते हैं, इसकी पूछताछ करते रहते हैं यह सिलसिला मुद्दतों से चलता रहा है और जब तक हम विदाई नहीं ले लेते तब तक चलता ही रहेगा और हो सकता है कि यह परिवार वर्तमान क्रम से आगे बढ़ता रहा और सशक्त बनता रहा तो इस प्रकार के दबाव उस पर आगे भी पड़ते रहे।
इस संदर्भ में हमारा मस्तिष्क बहुत ही साफ है। शीशे की तरह उसमें पूर्ण स्वच्छता है। बहुत चिन्तन और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचें है और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे है और बिना लाभ-लपेटे, दिपाव व दुराव के अपनी स्वतन्त्र नीति-निर्धारण करने में समर्थ हुए हैं हम सीधे राजनीति को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका संपादित करेंगे और यही अन्त तक करते रहेंगे। अपना संगठन यदि अपने प्रभाव और प्रकाश को सर्वथा तिरस्कृत नहीं कर देता तो उसे भी इसी मार्ग पर चलते रहना होगा।
भारत की वर्तमान राजनैतिक रीति नीतियों-शासन की गतिविधियों और तंत्र की कार्यप्रणाली पर आमतौर से सभी को असन्तोष है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की लम्बी अवधि में जो हो सकता था वह नहीं हुआ। तथाकथित आर्थिक प्रगति की बात भी विदेशी ऋण और युद्ध स्थिति तथा बढ़ती हुई बेकारी, गरीबों को देखते हुए खोखली है। नैतिक स्तर ऊपर से नीचे तक बुरी तरह गिरा है। विद्वेष और अपराधों कीक प्रवृत्ति बहुत पनपी है-गरीब अधिक गरीब बने है और अमीर अधिक अमीर। शिक्षा की वृद्धि के साथ-साथ जो सत्प्रवृत्तियाँ बढ़नी चाहिए थी, इस दिशा में चोर निराशा ही उत्पन्न हुई है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में देश की साख बढ़ी नहीं घटी है। मित्रों की संख्या घटती और शत्रुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। शासन में कामचोरी और रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति बहुत आगे बढ़ है और भी बहुत कुछ ऐसा ही हुआ है जो आँखों के सामने प्रकाश नहीं अँधेरा ही उत्पन्न करता है। अपनी इस राजनैतिक एवं प्रशासकीय असफलता पर हम में से हर कोई चिन्तित और दुखी है। स्वयं शासक वर्ग भी समय-समय पर अपनी इन असफलताओं की स्वीकार करते रहते हैं। जिन्हें अधिक क्षोभ है, वे उदाहरण प्रस्तुत करके शासनकर्त्ताओं की कटु शब्दों में भर्त्सना करते सुने जाते हैं और अमुक पार्टी को हटाकर अमुक पाटी के हाथ में शासन सौंपने की बात का प्रतिपादन करते हैं।
हमारे चिन्तन की दिशा अलग है, हम अधिक बारीकी से सोचते हैं। शासन की असफलता से हम दुखी है। हमें बहुत खेद है कि विगत वर्षों में जितना बढ़ा जा सकता था, उतना नहीं बढ़ा गया। प्रगति कुछ भी न हुई हो सो बात नहीं पर दूसरे देशों की तुलना में हमारी चाल इतनी धीमी है कि इस क्रम से हजारों वर्ष में भी प्रगतिशील देशों की पंक्ति में भौतिक दृष्टि से भी खड़े न हो सकेंगे। गाँधीजी के धर्मराज्य, रामराज्य और विश्वमंगल की आध्यात्मिक प्रगति तो अभी लाखों मील आगे की बात है।
इन परिस्थितियों के लिए किसी राजनेता यह पाटी को दीप देकर अपना जी हलका नहीं कर सकते, वरन् गम्भीरता से उन कारणों को तलाश करते हैं, जिनके कारण यह विकृतियाँ उत्पन्न हुई है। रोग का कारण प्रतीत होने पर ही उसका उपचार सम्भव है। दूसरों की तरह उथला नहीं अधिक गम्भीर और दूरदर्शी होने को ही किसी दार्शनिक से आशा की जानी चाहिए। देखना यह होगा कि यह सब क्यों हो रहा है? अपना एक हजार वर्ष का इतिहास देशों और विदेशी सामन्तवाद द्वारा प्रवेश प्रज्ञा के उत्पीड़न का है। इस उत्पीड़न को सरल बनाये रखने के लिए जनता का मनोबल और बिखरा रखा जाना जरूरी था, सो तत्कालीन दार्शनिकों द्वारा ऐसी विचारधाराओं का प्रचलन किया गया, जो उपरोक्त प्रयोजन पूरा कर सके, शासन की दृष्टि से प्रजा ने ‘ब्राहृम’ और ‘क्षात्र’ दोनों ही अवाँछनीय स्वार्थों सिद्धि में लगे थे। प्रज्ञा इस चक्को में भौतिक और आत्मिक दृष्टि से निरन्तर पददलित होती रही। यही एक तथ्य है जिसने भारत जैसी उत्कृष्ट परम्पराओं वाली प्रज्ञा पर हजार वर्ष जितनी लम्बी अवधि तक पददलित रहने का कलंक लगाया।
इन विपन्न परिस्थितियों से देश को उबारने के लिए यों छुट-पुट प्रयत्न बहुत पहले से चल रहे थे पर उन्हें सुसंगठित और सुसंचालित होने का श्रेय गाँधी जी के नेतृत्व को मिला। वे असली कारण जानते थे और प्रयत्नशील थे कि रचनात्मक कार्यों और बौद्धिक जागरण, स्वतन्त्र चिन्तन के माध्यम से प्रज्ञा के मनोबल, चरित्र, स्तर स्वाभिमान एवं शौर्य को जगाया-बढ़ाया जाय। स्वतन्त्रता संग्राम वे धीरे-धीरे चला रहे थे। क्रान्तिकारियों से उनके मतभेद का मूल कारण यह था कि वे चाहते थे स्वराज्य धीरे-धीरे उस क्रम से आगे जिस क्रम से देश उसे सँभालने योग्य प्रतिभा अपने में पैदा कर ले स्वतन्त्रता संग्राम के साथ चरखा, खादी हरिजन सेवा, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, सफाई जैसी प्रवृत्तियों को जोड़ देना यों तो अटपटा लगता है असहयोग आन्दोलन और सत्याग्रह की दार्शनिकता कितनी ही ऊंची क्यों नहीं हो। पर उसका व्यावहारिक पक्ष यह था कि इन सरलतम उपायों द्वारा जनता अपनी मूल चेतना विकसित करे और स्वराज्य धारण कर सकने में समर्थ हो जाय। वे जानते थे कि विभूति प्राप्त करने से अधिक उसे पचाना कठिन होता है। शक्ति की असली परीक्षा कोई सफलता प्राप्त कर लेना भर नहीं है वरन् उसके सदुपयोग से ही प्राप्ति कर्त्ता का गौरव आँका जाता है। भगीरथ गंगा अवतरण की पृष्ठभूमि बनाने से सफल ही गये थे पर उस धारा को सुव्यवस्थित रूप में प्रवाहित करने के लिए शंकरजी को अपनी जटाएँ फैलानी पड़ी। यही सर्वत्र होता है। गाँधीजी के मन में स्वराज्य प्राप्त करने की जल्दी नहीं थी। वे जनता की उस आन्दोलन महायज्ञ से प्रबुद्ध, सतर्क और सक्षम बना रहे थे।
क्रान्तिकारी कहते थे कि बिना शस्त्र धारण किये और मजबूरी प्रस्तुत किये बिना अँग्रेज जाने वाले नहीं है। बात उन्हीं को सच निकली। सन् 42 में क्रान्तिकारी तोड़-फोड़ ने सिद्ध कर दिया कि असहयोग सत्याग्रह नहीं, शस्त्र धारण ही वर्तमान स्थिति में राजक्रान्तियों की अनिवार्य आवश्यकता है। इस तथ्य को गाँधीजी भी जानते थे। वे स्वराज्य की उतावली में न थे।
जनता की उन दुर्बलताओं को हटाने में लगे थे जो पिछले हजार वर्ष के अज्ञानान्धकार युग में पीढ़ी-दर-पीढ़ी के हिसाब से चलते रहने पर उसके स्वभाव में सम्मिलित हो गई थी। अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने जब भारत को स्वराज्य दिला ही दिया था तो वे इस असामयिक उपलब्धियों से जितने प्रसन्न थे उतने ही चिन्तित भी। जन-जागरण का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता था। इसलिए उन्हें चिन्ता थी कि इस गंगावतरण का सुसंचालन कैसे होगा? उन दिनों उन्होंने एक अति महत्त्वपूर्ण सुझाव रखा था कि काँग्रेस लोकसेवी संस्था का रूप धारण करे और जन-जागरण के नितान्त आवश्यक कार्य में ही जुटी रहे। राजतंत्र जलाने के लिए एक उस स्तर के लोगों की पिछली पंक्ति बना दी जाय। प्रजा पर प्रभाव रखकर काँग्रेस राजनेताओं की नियुक्ति एवं उनकी रीति-नीति पर नियन्त्रण करे, पर स्वयं उससे पृथक रहकर वह जनमानस के परिष्कार का मूल प्रयोजन पूरा करे, जो किसी राष्ट्र की सर्वतोमुखी प्रगति का यहाँ तक कि सुशासन का भी मूल आभार है।
उन दिनों परिस्थितियाँ विचित्र थी। काँग्रेस नेता गाँधीजी से सहमत न हो सके। सारी शक्ति राजतंत्र को सँभालने में लग गई। रचनात्मक कार्यों में विश्वास करने वाले लोकसेवी भी उसी तंत्र में खप गये। सबका ध्यान सत्ता की ओर चला गया। सत्ता एक नशा है। उसका चस्का जिसे लगा कि फिर वह उसी घाट का हो लिया। काँग्रेस और उसका परिवार उसी दिशा में चल पड़ा। जन-जागरण के लिए रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों की जरूरत थी वे या तो विस्मृत हो गये या उनकी लकीर पिटती रही। अन्य छोटी-बड़ी राजनैतिक एवं सामाजिक स्तर की संस्थाओं का भी यही हुआ। उनने भी अपनी बाहरी जामा वे कुछ बनाये रही हो, भीतर-ही-भीतर सत्ता-संघर्ष के लिए चल रही विभिन्न पार्टियों की प्रतिद्वन्द्विता में ही वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में शामिल थी। ध्यान बँटा सो बँटा पिछले वर्षों में जिस बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक क्रान्ति की जरूरत थी, शिक्षा और कला के महान माध्यमों को सृजनात्मक दिशा में लगाने के लिए उन्हें हथियाना या अपनाया जाना चाहिए
था। उस दिशा में किसी ने कुछ किया। इस भूल को हम ईमानदारी से स्वीकार कर ले तो कुछ हर्ज नहीं है। शेष अगले अंक में
एण्ड्रयू कार्नेगी के पिता एक स्काँटिश जुलाहे थे। माता घर के काम से निपट कर एक धोबी और एक मोची की दुकान पर काम करने जाती थी। तब घर का का खर्च चलता। माता जब नौकरी पर काम करने जाती, तब उसका पिता उसे इस प्रकार विदा करता, मानो नई दुल्हन हो। दोनों में अगाध प्रेम था। एण्ड्रयू यह देखता, तो उसके ऊपर गहरी छाप पड़ती। उसके पास एक ही कमीज थी। माता ही उसे रोज धो देती।
पढ़ने का अधिक सुयोग न बना। किन्तु स्कूली संस्कार परिवार में रहते-रहते ही आत्मीयता के पड़ गये। तनिक बड़ा होते ही उसने तारघर में हरकारे की नौकरी कर ली। उसके बाद उसने एक जमीन कृषि फार्म हेतु खरीदी। उसमें कृषि के अतिरिक्त एक तेल का कुँआ निकल आया और भी व्यवसायों में आमदनी बढ़ी। विवाह के कितने ही प्रस्ताव आये, पर उसने सभी यह कहकर अस्वीकार कर दिए, कि अपनी माता के जीवित रहने तक मैं विवाह न कर उसकी सेवा करूंगा। विवाह में समय और मन दो ओर बँट जाएगा। माँ के मरने के बाद 52 वर्ष की आयु में उसने शादी की। शादी देरी से करने पर लोगों के उलाहना देने पर कार्नेगी कहत-”विवाह जिन उद्देश्यों के लिए किया जाता है, उन सभी की पूर्ति मैंने यथासम्भव की है। मात्र सहजीवन और कामसेवन ही विवाह का अर्थ नहीं है।”
विवाह के बाद भी एकाकी बच्चों के परिवार रूपी संगठनों के लिए एवं साधनहीनों को विद्याध्ययन हेतु वह सतदान देता रहा। उसने 150 करोड़ डालर की राशि इन्हीं कार्यों में खर्च की। मरते समय कर्जदारों के कागजात जलाकर सबको ऋण मुक्त कर दिया।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियोः यो नः प्रचोदयात्॥
उन्नति के मार्ग पर सबसे बड़ी रुकावट वह है, जिसके कारण से हमारे पैर रुक जाते हैं, प्रायश्चित की प्रक्रिया इसीलिए है, कि हमने भूतकाल में जो गलतियों की है, उनकी रोकथाम कर सके। इस संसार का यह नियम है कि जो गलतियाँ होती है, भूलें होती है, उसका दण्ड तो मिलता ही मिलता है। हमारे लिए सबसे बड़ा व्यवधान यही है कि पिछली गलतियाँ, वह रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है और इसकी उन्नति नहीं करने देती। अगर हम अपने स्थान, तब फिर उन गलतियाँ का दण्ड कैसे मिलेगा? पापों का प्रायश्चित कैसे होगा? उज्ज्वल भविष्य तो सुख और शान्ति का हो जाये फिर पापों का क्या होगा? पाप इतनी छोटी बात नहीं है कि आप गंगा नहा करके या उसका प्रायश्चित करके, प्रार्थना करके खत्म कर सकें। वह आपके जीवन की कोई महत्त्वहीन घटना नहीं है। बुरे कामों का भी फल उसी तरह निश्चित है जैसे अच्छे कामों का। अच्छे फलों की ही फिर क्यों आशा करते है? जब आप अच्छे फलों की आशा करते हैं कि हमने यह अच्छा किया है, जब आप अच्छे फलों की आशा करते हैं कि हमने यह अच्छा किया है, तो हमारी घर-गृहस्थी चलती चाहिए। जब आप श्रेष्ठ कार्यों के बारे में यह विश्वास करते हैं कि हमको अपने कर्मों का अच्छा फल मिलना ही चाहिए, फिर आपा एक और बात क्यों भूल जाते हैं कि हमने जो बुरे कर्म किए है या भूले की है, उनका दण्ड भी मिलना चाहिए। उनके बारे में फिर क्यों उपेक्षा करते है? इसकी उपेक्षा कीजिए न कि इस खेती करेंगे नहीं, पैदा हुआ तो क्या हुआ, हम विद्या पढ़ेंगे नहीं, पढ़ना आया तो क्या हुआ। आप यह क्यों सोचते हैं कि हमारे अच्छे कर्मों का फल तो हमको मिलना चाहिए और बुरे कर्मों के बारे में इतने ज्यादा लापरवाह है, कि आप यह ख्याल कर लें कि इस राम-नाम ले लेंगे, पंचामृत भी लेंगे, गंगाजी में डुबकी मार लेंगे, फलाना कर लेंगे तो ऐसे दिल्लगी, मजाक जैसे छोटे-छोटे कारणों से आप छुटकारा पा जाएँगे? ऐसा कैसे हो सकता है? यह मुमकिन नहीं है। जहर खाया है तो आपको मरना पड़ेगा अथवा जहर को सारी नसों में से निकालना पड़ेगा। नहीं साहब जहर खा लिया है, तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे। फाँसी लगा ली है तो क्या हुआ, प्रार्थना कर लेंगे रेल की पटरी पर बैठे करके सिर कटा लिया है, तो क्या हुआ प्रार्थना कर लेंगे। नहीं भाई साहब, ऐसी कल्पना मत कीजिए बच्चों जैसी। आप जरा समझदारों की तरह बात कीजिए। पाप भी आपके जीवन की एक इकाई हैं आपने गलतियाँ की है और अपने शरीर को कमजोर बना डाला है। आप पाप कर्म से कैसे बचेंगे? पढ़ने से इन्कार कर दिया। आप बिना पढ़े है, कर्म के दण्ड से बचिए न जरा। नहीं साहब, हम तो प्रार्थना करेंगे, भगवान की पूजा करेंगे और विद्वान हो जाएंगे। नहीं भाई साहब, ऐसा नहीं हो सकता। आप वास्तविकता की समझिए तो सही। यहाँ आकर के भी वास्तविकता को नहीं समझेंगे, आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद भी वास्तविकता और सच्चाई अगर आपकी समझ में न आ सकते, तो इसमें प्रवेश करने का क्या फायदा हुआ? आप अज्ञान में ही फँसे रहे, भ्रम में ही फँसे रहे और आप अज्ञान और भ्रमों को ही छाती से लगाए रहे, तो क्या बात बनी? आप यहाँ अध्यात्म को सच्चाई का प्रतीक मानिये और यह मानकर चलिए कि कर्मफल एक वास्तविकता है और उसमें जो भूतकाल के कर्म है, वह भी ज्यों-के-त्यों है।
पिताजी ने आपके लिए कर्ज लिया था और उससे आपने डिग्री हासिल की थी। लेकिन पिताजी के माने के बाद में वह डिग्री आपको भुगतनी पड़ेगी, चाहे आपका मकान बिके या आपकी जमीन बिके। साहब हम तो क्षमा माँगेंगे, पुरानी बात तो पुरानी हो गई। पुरानी बात कैसे हो गई? बैंक से आप कर्जा लाए थे और बैंक का कर्जा बढ़ते-बढ़ते दुगुना हो गया है। अब आप चुकाएंगे कि नहीं चुकाएंगे। नहीं साहब, बैंक मैनेजर से प्रार्थना करेंगे, हाथ जोड़ेंगे, पैर छुयेंगे, पंचामृत पिलायेंगे और माफ करा लेंगे। आप यह बेकार की बात मत की कीजिए, बेकार की मत कीजिए, बेकार की बात करने से आपको भ्रमित, घृणित और अज्ञानियों की श्रेणी में में अपने आपको शामिल मत कराइए। भूतकाल के पापों से या भूतकाल की घटनाओं से आप प्रभावित है, तो भूतकाल को आप मजाक में नहीं उड़ा सकते। भूतकाल में जो आपने किया था, लड़ाई-झगड़े किए थे पर किसी आदमी का कत्ल कर दिया था, तो आप पर मुकदमा चलेगा और आप फाँसी के लिए तैयार रहिए। नहीं साहब, भूतकाल की जो मार डाला, सो मार डाला और मर गया, सो मर गया। आप यों तो कहेंगे कैसे? भूतकाल ऐसे मजाक की चीज है। पापों का प्रायश्चित एक बहुत बड़ी बात है। हिन्दु धर्म में पाप का एकमात्र उपचार प्रायश्चित ही है। गंगा में स्थान के बारे में जी कहा गया है, उसका मतलब केवल यह है कि उससे हमारी पाप करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगे, हमारा पाप करने को जो मन चलता है, वह न चले, भविष्य में हम वह सब काम न करे, जिससे हमारे अहं की प्रेरणा मिल जाय, प्रोत्साहन मिल जाय। ठीक वातावरण मिल जाय, यह मतलब है। यह मतलब नहीं है कि आप भूतकाल में जो कर चुके है, उसके दण्डों से आपकी राहत मिल जाएगी। ऐसा नहीं हो सकता। आपके ऊपर जो बुरे कामों का किया हुआ कर्ज है, उससे भी निपटिए और जिन बुरे कर्मों का वातावरण बना रखा है, जरा उसकी भी ठीक कीजिए। आपने जो-जो गलतियाँ कर रखी है, जरा उनको भी फिर से एक बार सुधारिये। नहीं सुधार पायेंगे, तो भावी उन्नति का दरवाजा बन्द है।
मैं आपसे यह कह रहा था, कि आप आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूजा करते हैं, तो आपको मुबारक। आप उपवास रखते हैं, बहुत अच्छी बात। आप यहाँ अनुष्ठान करते हैं, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। लेकिन इसके साथ-साथ यह मत भूलिये कि इनके जो मुनासिब लाभ है, वह आपको उस समय तक नहीं मिल सकेंगे, जब तक कि पिछले वाले दबाव आप पर पड़े हुए है। पिछले वाले पाप एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसे न आपकी पूजा सफल हो सकती है, न उपासना सफल हो सकती है, न आपका मन लग सकता है, न ध्यान लग सकता है। क्यों? क्योंकि आपको दण्ड मिल रहे है। दण्ड नहीं मिलेंगे तो आपका ध्यान पुनः उस ओर जाएगा, फिर पाप का दण्ड कहाँ जाएगा? इसीलिए समस्त आसुरी शक्तियाँ बराबर शुभ कर्मों में विघ्न उपस्थित करती रहती है। आसुरी शक्तियों से क्या मतलब है? आसुरी शक्तियों से कोई मतलब नहीं है, आपका किसी से बैर नहीं है, फिर कोई आपको बेकार ही हैरान नहीं कर सकता। आसुरी शक्तियाँ बेकार ही हैरान क्यों करेंगी? केवल आपके पाप कर्म ही वह आसुरी शक्तियाँ है, जो आपको हैरान कर देती है और आपको अच्छे कर्म में सफलता मिलने पर अवरोध खड़ा कर देती है उसने आपको लड़ना ही पड़ेगा। भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए आप जप करते हैं, तप करते हैं, अनुष्ठान करते है-भगवान को प्राप्त करने के लिए मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए, तो फिर उज्ज्वल भविष्य में रुकावट डालने वाले जो पिछले वाले पाप कर्म है वही है, आसुरी शक्तियाँ उन्हीं का नाम है। उन आसुरी शक्तियों से निपटने की भी कोशिश कीजिए। आसुरी शक्तियों से निपटने की कोशिश नहीं करेंगे, तो वह बार-बार हमला करेंगी, और हमला करके आपके अच्छे प्रयासों को मटियामेट करके रख देगी। खेती आपने की है। जंगली जानवर जो हमला करते हैं, तो रात भर में सारी की सारी फसल खा-पी करके बराबर कर देते हैं। आप जानवरों को रोकेंगे नहीं? कृपा करके रोकिए, नहीं तो फिर यह तो जाएगा कि आप चाहे जितना पानी लगाते रहिए, खाद लगाते रहिए, बीज बोते रहिए, फसल के नाम पर आपको कोई भी चीज हाथ लगने वाली नहीं है। तब? मैं यही कह रहा था आपसे, कि आपको इस महत्त्वपूर्ण बात के ऊपर गौर करना चाहिए।
आपको एक घटना सुनाता हूँ, एक बार स्वामी माधवाचार्य जी वृन्दावन रहते थे। उन्होंने तेरह साल तक गायत्री के अनुष्ठान किए। लेकिन उन अनुष्ठानों का कोई परिणाम उनको नहीं मिला। न उनको आत्मशाँति मिली, न भगवान का साक्षात्कार हुआ, न कोई मनोकामना पूरी हुई, न कोई सन्तोष हुआ, कुछ नहीं हुआ। तब? तब बड़े सन्तोष हुआ, दुखी हुए कि हमको सफलता के कोई चिन्ह नजर नहीं आते हैं, तो स्तुति करने का क्या फायदा? उन्होंने गायत्री अनुष्ठान तेरह वर्षों तक करने के बाद में वृन्दावन त्याग दिया और वृन्दावन त्यागने के बाद में बनारस चले गए। वह वहाँ काशी के मणिकर्णिका घाट पर बैठे हुए थे, आँखों भरे हुए थे, बड़े दुखी थे। एक साधक का रूप और दुखी देखकर के एक महात्मा उधर से निकले, उन्होंने पूछा-भाई क्या बात है? कैसे दुखी हो रहे है? कौन है तू? तो वह बोल-साधना करने वाले एक व्यक्ति है और तेरह वर्ष तक गायत्री की उपासना करते रहे। लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला, हम बहुत खिन्न है और यह सोचते हैं कि उपासना से कोई लाभ नहीं हैं खासतौर से गायत्री का कोई फल नहीं हो सकता, ऐसे हमारे विचार है। महात्माजी हँसने लगे। उन्होंने कहा-अच्छा एक काम कीजिए, गायत्री के बारे में तो हमारी कोई जानकारी नहीं है, हम तो ताँत्रिक और कापालिक विद्याओं को जानते हैं, तू ताँत्रिक और कापालिक विद्या को सीख ले, एक साल के अन्दर तुझे कुछ चमत्कार दीखने लगेंगे, अनुभव हो जाएगा तथा चमत्कार दीखने पर तेरा विश्वास बढ़ जाएगा। इसलिए चमत्कार दिखाने की की दृष्टि से तुझे हम एक साल की ताँत्रिक उपासना करने की सलाह देते हैं। स्वामी माधवाचार्य जी ने मान लिया। फिर उनको मणिकर्णिका घाट पर तंत्र सम्बन्धी आवश्यक ज्ञातव्य बताया और यह कहा-एक साल तक तुमको इसी मर्यादा से रहना पड़ेगा। इससे बाहर जाना मना है। इसी में नहाना है, इसी में टट्टी जाना है, इसी में खाना पकाना है, इसी में सोना, उठना, बैठना, किसी भी कीमत पर मरघट की सीमा से बाहर मत जाना। ऐसा ही उन्होंने किया। एक साल तक उनको जो भैरव का मंत्र बताया गया था, वह जपते रहे।
भैरव कभी शेर के रूप में आते, कभी औरत के रूप में आते, कभी डराते, कभी पैसा लेकर के आ जाते, लेकिन माधवाचार्य जी से उन्होंने कह दिया था कि तू अपने काम में ही लगा रहना, दुनिया की बातों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। अपनी साधना को ही सब कुछ मानकर चलना चाहिए। वैसी ही हुआ माधवाचार्य अपने गुरु के कहने के मुताबिक सब कुछ करते रहे। जो कोई आते रहे, सबको फटकारते रहे-आप लोग चले जाएँ हम तो साधना कर रहे है। एक दिन करते-करते साल जब पूरा हो गया, तब भैरव जी ने दर्शन दिए, उन्होंने कहा-”जिसका तू जप कर रहा है, वह मैं ही हूँ। हमारा नाम भैरव है और हम आ गए। अब तू हमसे वरदान माँग।” उन्होंने कहा कि “पहली माँग तो यह है कि आप मुझे यह यकीन करा दीजिए कि आप भैरव ही है। अब तक पूरी साल में यही खुराफात होती रही है कि कोई शेर बनकर आ गया, तो कोई औरत बनकर आ गया। रोज यहाँ मेरे साथ दिल्लगीबाजी होती है। अगर आप भैरव है, तो फिर मैं आपकी सूरत देखना चाहता हूँ, और यह विश्वास करना चाहता हूँ कि आज मेरे साथ दगाबाजी तो नहीं हो रही है। आप समाने आइए और प्रकट हो जाएँ, पहला वरदान यही दीजिए। फिर आपकी उपासना करूंगा, तब दूसरा वरदान माँगूँगा। आज तो बस इतना ही माँगना है।” भैरवने कहा-”हम आपकी दर्शन तो नहीं दे पायेंगे, आपकी पीठ पीछे खड़े होकर बात कर सकते हैं।” माधवाचार्य ने संदेह से पूछा कि “दर्शन क्यों नहीं दे पायेंगे?” उन्होंने कहा-”तेरे चेहरे पर गायत्री का तेजस्व चमचमा रह है और आंखों से निकल रहा है। इसलिए सामने आने की हिम्मत नहीं है। पीठ पीछे तू जो कुछ हमसे पूछना चाहता है, वह पूछ। बात तो कर ही रहे है, यकीन भी कर ले कि हम भैरव है।” “नहीं, महाराज जी मुझे यकीन नहीं, सामने क्यों नहीं आ सकते? वजह क्या है?” “तुझे बता तो दिया, तेरी आँखों में इतना गायत्री का तेज, चेहरे के सामने इतना ओजस और वर्चस्व छाया हुआ है कि उसके सामने रह सकना हमारे लिए मुमकिन नहीं है।” उनको बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारी आँखों में गायत्री का इतना जबरदस्त तेज है, जिसकी वजह से भैरव हमारे सामने तक नहीं आ सकते? तो उन्होंने कहा-”महाराज फिर एक वरदान और माँगता हूँ मैं आपसे । आप दर्शन नहीं देना चाहते, तो मत दीजिए। आप एक इच्छा और पूरी कर दीजिए।” “आप यह जिज्ञासा पूरी कर दीजिए, कि मेरा गायत्री का तेरह वर्षों का जप और अनुष्ठान क्यों बेकार चला गया?” तो भैरव ने कहा-”तेरे इस सवाल का मतलब हम बता देंगे, चल आँखें बन्द कर।” आँखें बन्द कर लो, फिर उन्होंने एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, तीसरे के बाद चौथा इस तरह तेरह जन्मों का दृश्य दिखाया। उसमें उन्होंने बुरे-बुरे कर्म किये थे। किसी में हत्या, किसी में चोरी, किसी में डाका, किसी में कुछ-किसी में कुछ। उनकी तेरह जन्मों में बड़ी घिनौनी जिन्दगी थी। उन्होंने कहा-”देख तेरह वर्ष का जो तेरा उपवास है, अनुष्ठान है, एक-एक वर्ष का उपवास-अनुष्ठान है, एक-एक जन्म के लिए पूरे हो गये। अब तू जा, चौदहवीं बार फिर अनुष्ठान कर। अबकी बार जो गायत्री का लाभ मिलना चाहिए था, मिल जाएगा।” माधवाचार्य प्रसन्न हो गये, फिर वह वापस चले आये, अपनी छोड़ी हुई साधना को फिर करने लगे। गायत्री उपासना चौदहवाँ वर्ष जो उन्होंने किया, उसका परिणाम मिला, गायत्री का साक्षात्कार हुआ। गायत्री महाशक्ति ने पूछा क्या वरदान चाहते हो? तो माधवाचार्य ने कहा-मैं कोई अजर-अमर ऐसा काम करके दिखा दूँ, जिससे दुनिया मुझे याद करती रहे। उन्होंने फिर ‘माधवनिदान’ नाम का प्रख्यात ग्रन्थ लिखा। इसे गायत्री ने माधवाचार्य के सिर पर अदृश्य रूप में प्रकट हो कर लिखवाया।
आप समझ गए ना, उनकी इच्छा कैसे पूरी हुई? आप यह बात नोट कीजिए, आपको पिछले वाले पापों से निजात पाने के लिए कुछ न कुछ करना ही होगा। क्या करना चाहिए? इस ओर ध्यान दीजिए। भविष्य के निर्माण की ओर ध्यान दें, यह तो बहुत अच्छी बात है, पर भूतकाल की भुला मत दीजिए। आप यह विचार कीजिए कि आपने कितनी गलतियाँ की, उनकी एक बार लिस्ट बना लीजिए। गलतियाँ दो तरह की होती है, एक गलतियाँ वह जो आपने दूसरों को नुकसान पहुँचाते के लिए की है और एक गलतियाँ वह, जो आपने अपने उन्नति में रुकावट डाल करके आलस्य और प्रमाद के रूप में की है। इन दोनों गलतियों को आप नोट कर लीजिए। आप नोट कर लेंगे और फेहरिस्त बना लेंगे, पता चलेगा कि कितना बड़ा जखीरा आप बुराइयों का, अपने सिर पर लाद के रखा है। इसको दूर करने कीक कोशिश कीजिए। क्या कोशिश करें, यही तो एक विकल्प है। एक काम कीजिए कि अपना जी खोल करके अपने मन की गाँठ को हल्का कर लीजिए, जैसे चीज खा जाते हैं, गन्दी चीज खा जाते हैं, तो उल्टी कराई जाती है। आप मुँह के रास्ते उल्टी कर दीजिए आपने जो कुछ भी पाप कर्म किए है, उन सब को एक बार जी खोल के कह दीजिए। किससे कहें? दूसरों के सामने तो मैं आपको सलाह नहीं दे सकता कि आप हर एक के सामने कहते फिरें, क्योंकि दूसरे आदमी इसका गलत फायदा उठाते हैं, नाजायज फायदा उठाते। हमको हजारों घटनाएँ याद हैं स्त्रियों से उनके पतियों ने कसम खिलाकर उगलवा लिया कि उनसे क्या गलती हो गई, फिर जिन्दगीभर के लिए उनकी ऐसी फजीहत की कि वह बेचारी सोचती रही कि सच्चाई अगर हम न बताते, तो नफे में रहते। दुनिया बड़ी निकम्मी है, दुनिया बड़ा पाजी है। आप हर आदमी से अपनी कमजोरियाँ कहते फिरें, ऐसा तो मैँ नहीं कहूँगा, लेकिन आपको मेरी एक सलाह है कि एक बार अपना जी खोलकर हमसे सब कुछ कह दीजिए। अपनी हर घटना को बता दीजिए, विस्तार से बता दीजिए, कही दुराव न हो, कही छिपाव न हो। आप क्या करेंगे? अरे भाई साहब! हमें क्या करना है। हर आदमी गलतियों से भरा पड़ा है। आपकी गलतियों में मुझे जायका लेने की, मजा लेने की, दिल्लगीबाजी करने की और बकवास करने की हमारे पास कहाँ फुरसत है? हमारे यहाँ तो केवल दुखी ही दुखी आते हैं। धोबी की दुकान है। हर आदमी मैला कपड़ा ले करके आता है और हम धोते रहते हैं। हमको न किसी से व्यंग्य करने की फुरसत है, न मजाक करने की फुरसत है, न घृणा करने की फुरसत है। केवल धोबी के तरीके से लोगों के कपड़े धोने की फुरसत है। केवल धोबी की फुरसत है, इसीलिए आपको अपने मन के पापों को एक बार ठीक कर लेना चाहिए। हमें न बता पाये तो माताजी को बता दीजिए हमारे प्रतीकों के समक्ष लिखकर रखकर फाड़ दीजिए।
यही ईसाई धर्म में भी होता है। ईसाई धर्म में जब आदमी मरने की होता है, जीवन की सारी की सारी बातें, बुरे से बुरी घटनाएँ पादरी के सामने कह देते हैं। पादरी प्रार्थना करता है-इन्होंने जी खोलकर कह दिया, पाप हल्का हुआ। भगवान तुम्हारे मन को शान्ति दे। आप भी जो अपने भीतर के संचित किए हुए पाप कर्मों को जी खोलकर कह दें। एक तो काम यह हुआ-दूसरा-आपने जो पाप कर्म किये थे, भविष्य में वह न करें, इसके लिए ऐसा दबाव डालिए, ताकि आपको यह ख्याल रहे कि हमने गलती की थी और अब गलती नहीं करेंगे। इसके लिए आप ऐसे ही हो जाएंगे जो पहले करते रहे है, फिर वैसा ही करने लगेंगे। जब आपको नफरत ही नहीं हुई, जब कोई प्रायश्चित ही नहीं हुआ, तब फिर यह कैसे विश्वास करें कि भविष्य में न करते की दृष्टि से एक काम जरूरी है कि आप आने आपको थोड़ा-सा कष्ट दें। चान्द्रायण व्रत इसी कष्ट का नाम है आपकी भी यहाँ तपश्चर्या का मतलब नहीं है कि आपको जो कष्ट मिले, हमने जिस पाप के प्रायश्चित के निमित्त किया था, वह पाप आइन्दा नहीं करेंगे। आइन्दा नहीं करने के लिए कष्ट उठाना पड़ता है? आइन्दा याद बनी रहे, इसलिए तपश्चर्या की जाती है पिछला जो हो गया है, गलती हो गई है, वह स्वतः दूर हो जाएगी, यह वहम निकाल दीजिए। इसका तो एक ही उपाय है कि आपने जो गड्ढा खोदा है, उसको पूरा करना चाहिए। गड्ढे को अगर पूरा नहीं करेंगे, तो गड्ढा बना रहेगा, आप खाई में गिरेंगे, आप खाई में गिरेंगे, आपकी टाँग टूट जाएगी और दूसरों की टाँग टूटेगी। इसका दूसरा कोई उपाय है ही नहीं सिवाय इसके कि आपने जो खाई खोदी है, उसको पूरा कीजिए, जो गढ्ढा बना दिया है, उसमें मिट्टी डालिए, उसे समतल बना दीजिए यही तो प्रायश्चित है और क्या प्रायश्चित हो सकता है? इस प्रायश्चित को हमारे यहाँ इच्छापूर्ति कहते हैं, क्षतिपूर्ति भी कहते हैं। आपने जो नुकसान किया है चुकाइए। बैंक से रुपया लेकर भाग गए है? हाँ, साहब पन्द्रह हजार ले करके भाग गये थे और हमारा वारंट है। आप ऐसा कीजिए बैंक वालों से मिलिए और खबर भेजिए। पन्द्रह हजार में से एक हजार रुपया हमने खर्च कर डाला। और चौदह हजार बचा है। चौदह हजार रुपया उसके रिफंड कर दीजिए, बाकी एक हजार रुपये की किश्तें कर लीजिए फिर आप पर जो मुकदमा चलने वाला है, दस साल की, आठ साल की जेल होने वाली है, शायद उससे आप बच जाएँगे। इसलिए क्या करना चाहिए कि आप उस खामियाजे का, इच्छापूर्ति का मतलब क्षतिपूर्ति होता है, जो प्रायश्चित का बहुत महत्त्वपूर्ण अंग होता है इसलिए कर्ज आपको चुकाना ही चाहिए। किसको चुकायें? जिसका नुकसान किया था, उसी को तो आप चुकायेंगे। नहीं ऐसी बात नहीं। सारा समाज को यह मानकर चलिए कि किसी भी हिस्से पर नुकसान पहुँचाता है, तो कोई बात नहीं, दूसरे तरीके से पूरा कर देंगे।
मान लीजिए आप किसी के कान पकड़ने की गुस्ताखी करें तब? तब उसके पैर छू करके प्रणाम कर लीजिए। अरे साहब! हमसे गलती हो गई, माफ कर दीजिए, पैर छू रहे है आपके। कान पकड़ा था तो कान छूना जरूरी नहीं है, आप पैर को छू सकते हैं। सारा समाज एक है। इसके किसी हिस्से को आपने नुकसान पहुँचाता है, तो आप उस नुकसान की पूरा करने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति के साथ में भलाई का सलूक कर सकते हैं। जो आदमी मर गया, जिसका आपने बेईमानी के साथ पैसा हजम कर लिया था, अब कैसे उसका पैसा चुकायेंगे, लेकिन कैसे चुकायेंगे?वह तो मर गया। किसी लड़की का चाल-चलन को ठीक कैसे करेंगे, नहीं साहब, हम तो क्षमा माँगेंगे। क्षमा माँगेंगे, लेकिन वह लड़की अब किसी घरवाली हो गई है और जिसके बेटे भी बड़े है, सास-ससुर भी है, वहाँ उनसे कहते फिरें, साहब हमने इस लड़की का चाल-चलन खराब किया था और अब हम माफी माँगते हैं। इस तरह आप भी पिटेंगे और वह लड़की भी मरेगी। जरूरी नहीं कि जिस आदमी का आपने नुकसान किया है, उसी को लाभ दें। सारा समाज एक है, इसलिए यहाँ एक बात सही है कि सारे के सारे संसार के तालाब में एक बड़ा ढेला फेंका तो लहरें पैदा हो जाती है। बुराई पैदा करने का मतलब एक व्यक्ति को ही नुकसान पहुँचाना नहीं है, बल्कि सारे समाज को नुकसान पहुँचाना है। बुरी आदतें आपने एक को सिखा दी, शराब पीना आपने एक को सिखा दिया, वह फिर दूसरे को सिखायेगा। दूसरा तीसरे को सिखायेगा, तीसरा चौथे को सिखायेगा यह तो एक लहर है। बुराइयों की भी एक लहर है। आपने बुराइयों की भी एक लहरें पैदा की थी, अब उसका प्रायश्चित एक ही हो सकता है कि आप अच्छाइयों की लहरें पैदा करके वातावरण ऐसा बनायें, जिससे कि उसका खामियाजा पूरा हो सके। खाई पाटी जा सके, उस छेद को बन्द किया जा सके।
आप इस प्रायश्चित की तैयारी कीजिए। आपने क्या-क्या नुकसान पहुँचाया, उसका मूल्याँकन कीजिए आपने कितने लोगों का समय खराब किया, दिल दुखाया, कितने आदमियों की आर्थिक हानि पहुँचाई, कितने आदमियों के चाल-चलन खराब किये। इन सारी बातों को एक कागज पर नोट कर लीजिए और आप उसी के समान लाभ, ब्याज दे सकते हो तो क्या कहना! आपने जो कर्जा लिया है, उसे ब्याज समेत चुकाइये। नुकसान पहुँचाना है, उसे ब्याज समेत चुकाइए और अगर ब्याज समेत नहीं चुका सकते, तो कम से कम उतना तो फायदा कीजिए, उतनी तो सेवाएँ कीजिए, उतना तो पुण्य कीजिए, जितना कि आपने पाप कमाया है। पाप और पुण्य को बराबर कर देना है। यदि ज्यादा हो सके तो, फिर ज्यादा कर दीजिए। फिर वह ब्याज चुकाने वाली ईमानदारी में शामिल हो जाएगा। ऐसा करने से आपके पुण्य का पलड़ा भारी हो जाएगा और अगले जन्म में काम आयेगा। फिलहाल इतना न कर सकें तो आपको किसी न किसी रूप से यहाँ इस शिविर में आ करके यह विचार करना चाहिए कि हमने पिछले दिनों जो गलतियाँ की है और आज तक जो करते रहे है, इसका इस समय तो हम प्रायश्चित करते हैं, इसका इस समय तो हम प्रायश्चित करते हैं, दण्ड भुगतने है, थोड़ा-सा अपने-आपको कठिनाई में डालती है,
बात स्वतंत्रता आन्दोलन के दिनों की है, काँग्रेस से देशवासियों से गाँधी दिवस मनाने और तिलक स्वराज्य फण्ड के लिए चन्दा जमा करने की अपील की। लाहौर में पुलिस का कड़ा प्रबन्ध था। अतः कोई व्यक्ति जब तक हिम्मत न कर सका तब वहाँ महिलाओं ने सभा की, भाषण दिये, यह देखकर सारा लाहौर गाँधी दिवस मनाने उमड़ पड़ा।
कसम खाते हैं भविष्य में एक ऐसा न करने की। यह तो करना ही करना चाहिए, देंगे, तब आपके पाप दूर हो जाएँगे और आपको उपासना के मार्ग में, आत्मिक के मार्ग में पग-पग पर जो रुकावटें आती है, उनके आने का सिलसिला बन्द हो जाएगा। रुकावटें आप पार कर लेंगे, तो उन्नति आपकी कोई कठिन नहीं है, भगवान बनना आपके लिए कठिन नहीं है। शर्त एक ही है कि आपने आने पिछले पाप और गुनाहों की जो खाई इकट्ठी कर ली है, पर्वत इकट्ठे कर लिए है, उसको घाटें पाटें। लेविल एक ही करें और फिर आप रास्ता चलते चले जाएँ। यह करना बहुत आवश्यक है। इस शिविर में आप यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखें। बस हारी बात समाप्त। ॐ शान्ति
परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखा गया यह लेख एक दस्तावेज है, मील का पत्थर है। यह बताता है कि दैवी शक्तियों द्वारा संचालित मिशन आन्दोलन की आँधी लेकर आते हैं व देखते-देखते चक्रवात का रूप ले, अनीति को तहस-नहस कर सतयुगी स्थापना कर दिखाते हैं। इन पंक्तियों में 1983-84 में प्रकाशित लेख/फोल्डर (क्रमांक 103) का कुछ अंश ही सबकी जानकारी तथा पुनर्वीक्षण हेतु प्रस्तुत है। विगत 12 वर्षों में यह यात्रा कई मील के पत्थर और पार कर चुकी। आगे भी करेगी, यह चिन्तन बलवती बनाने के लिए पढ़े, यह विशेष लेख।
प्रज्ञा अभियान की निर्धारणाओं और सफलताओं का लेखा-जोखा लेने वालों को कार्य-कारण की संगति बिठाने में सफलता नहीं मिल सकती। मानवी प्रत्यनों की एक सीमा है। उसे पार करते हुए अप्रत्याशित परिस्थिति उत्पन्न कर सकना नियन्ता की विधि-व्यवस्था के सहारे ही संभव हो सकता है। वर्षाकाल जैसा सजलता, हरीतिमा। सर्दी जैसी ठिठुरन। बसन्त जैसी मुस्कान। गर्मी जैसी तपन कोई मनुष्य उत्पन्न नहीं कर सकता, भले ही वह कितना समर्थ क्यों न हो आँधी जितनी व्यापक बुहारी लगती है, उतना कर सकना किसी के बस की बात नहीं। हवा पीछे की चलती है तो वाहनों से लेकर यात्रियों तक की गति बढ़ा देती या सरलता अनुभव होती है। ऐसी अनुकूलताएं पूर्णतया स्रष्टा की इच्छा-व्यवस्था पर निर्भर रहती है। तूफान के साथ उड़ने को सहमत होने वाले तिनके-पत्ते तथा धूलिकण आकाश घूमते और अपंग होते हुए भी द्रुतगामी दौड़ लगाते हैं, इसे कौन नहीं जानता?
इतिहास में ऐसे घटनाक्रमों का उल्लेख है जिनकी संगति कायिक और बौद्धिक क्षमता के साथ नहीं बैठती। हनुमान का पर्वत उखाड़ना, समुद्र लाँघना और लंका उजाड़ना उनकी निजी सामर्थ्य से सम्भव हो सकता था यह किस प्रकार मान जाय? यदि वे इतनी ही समर्थ थे तो अपने स्वामी सुग्रीव को बालि के त्रास से क्यों न छुड़ा सके? अर्जुन यदि सचमुच ही महाबली थे तो द्रौपदी का भरी में अपमान क्यों होने देते? अज्ञातवास के दिनों जिस-तिस की नौकरी करके छिपते-छिपाते दिन क्यों गुजारते रहे? इन शंकाओं का कोई बुद्धिसंगत समाधान मिलता नहीं।
टिटहरी द्वारा समुद्र पाटने का प्रयत्न अगस्त्य ऋषि की सहायता से सम्भव होना व्यवहार बुद्धि की पहुँच से बाहर है। एक परशुराम पर फैले हुए अवाँछनीय तत्वों का इक्कीस बार सफाया करे और उनके मार्ग में आड़े न आये इसका क्या तुक? ग्वाल-बालों की सहायता से गोवर्धन उठाना और रीछ-वानरों के कौशल से समुद्र का पुल बाँधना भी कुछ ऐसा ही बेतुका है।
यदि पौराणिक गाथाओं की उपेक्षा की जाय तो भी ऐतिहासिक घटनाक्रम ठीक इसी स्तर के आश्चर्य की अगणित साक्षियाँ प्रस्तुत कर सकने में समर्थ है। बुद्ध की निजी क्षमता और उनके धर्मचक्र प्रवर्तन की व्यापक सफलता का तारतम्य मिलाया जाय तो वणिक बुद्धि का कोई गणित फार्मूला काम देता नहीं दीखता। गाँधीजी का सफल स्वतन्त्रता संग्राम किस प्रकार चोर निराशा और प्रतिकूलता को परस्त कर सका, इसकी कार्य-कारण संगति किसी कम्प्यूटर के सहारे बैठती नहीं है। समर्थ रामदास, गुरु गोविन्दसिंह, विवेकानन्द, दयानन्द, विनोबा आदि की सफलताओं को उनका निजी पुरुषार्थ भर माना जाय तो विवेचना न्यायसंगत नहीं होगी। उनके पीछे अदृश्य की अनुकूलता का समर्थ अनुदान भी काम करता पाया जाएगा, अन्यथा इनसे भी बड़ी योजनाएँ समर्थ साधनों के सहारे बनाने वालों में असंख्यों की असफलताएँ देखकर यही सोचना पड़ता है कि उनका निजी पराक्रम उस लकड़ी की नाव जैसा सिद्ध हुआ जो तूफान में फँसकर चट्टान से टकराकर अपना अस्तित्व गँवा बैठी और मल्लाह के डाँड सतह पर तैरते भर रह गये।
प्रज्ञा अभियान के आरम्भ से लेकर अब तक के इतिहास से जिनका निकटवर्ती सम्बन्ध रहा है, उनकी सामान्य बुद्धि आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकती। आज उसकी स्थिति और प्रगति इस स्तर की है कि संसार के महान परिवर्तन प्रस्तुत करने वाले अविस्मरणीय आन्दोलनों में उसकी गणना हो सके। स्थानीय और थोड़ी-सी समस्याओं को लेकर ही अब तक राजनैतिक, सामाजिक आन्दोलन होते और सृजन-संघर्ष के उपक्रम भी चलते रहे हैं, पर ऐसा किसी भी मंच से कदम उठाना तो दूर, सोचा तक नहीं गया कि 500 करोड़ मनुष्यों के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए कारगर प्रयास कब और किस प्रकार किया जाय? प्रज्ञा अभियान ही है जिसने इस संदर्भ में गम्भीरतापूर्वक सोचा, कदम उठाया और वह कर दिखाया जिस पर सहज बुद्धि को सहज विश्वास ही नहीं हो सकता।
प्रज्ञा अभियान की युग निर्माण योजना सामान्य योग्यता के व्यक्ति द्वारा साधनों का सर्वथा अभाव रहने और मानवी सहयोग की दृष्टि से मात्र उपहास ही हाथ लगने जैसी परिस्थितियों में ही चलाई गई है। उसे अवरोधों, प्रतिकूलताओं ने पग-पग पर चुनौती दी है। इतने पर भी यह प्रयास गगनचुम्बी स्तर पर पहुँचा। इसका रहस्य ढूंढ़ना हो तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि अदृश्य सत्ता की इच्छा, प्रेरणा और व्यवस्था ही इस रूप में प्रकट हो रही है- जिसे युग परिवर्तन का दृश्यमान सरंजाम कहा जा सके।
एक व्यक्ति सोचता है कि धर्मतन्त्र की शक्ति राजतन्त्र से अधिक है। भौतिक क्षेत्र की व्यवस्था और प्रगति का उत्तरदायित्व राजतन्त्र के कन्धों पर आता है, जबकि चिन्तन, चरित्र, व्यवहार और प्रचलन को सही रखने की जिम्मेदारी उठा सकने में मात्र धर्मतन्त्र ही समर्थ है। मनःस्थिति को पवित्र और प्रखर बनाये रहने में धर्मतन्त्र की भूमिका ही कारगर हो सकती है। इसलिए दुर्दशाग्रस्त धर्मतन्त्र को पुनर्जीवित किया जाए। इसके लिए देश के प्रगतिशील धर्म-प्रेमियों को संगठित किया जाय और उनकी संयुक्त शक्ति को लोकमानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन में यथा तथ्य रूप में लगाया जाय। यह चिन्तन तो एकाकी भी हो सकता था पर इसका कार्यान्वित होना ऐसा ही असंभव समझा गया, जैसा विश्वामित्र की युग-परिवर्तन चेष्टा और परशुराम की विचार-परिवर्तन प्रक्रिया को तत्कालीन लोगों ने उपहासास्पद बताया था। उन दिनों योजनाएं रंग लाई। धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण का विचार भी कार्यरूप में परिणत हुआ और आज संसार चकित है कि किस प्रकार यह सृजन सरंजाम साधन रहित परिस्थितियों में भी जुटाकर सफलता की ओर तूफानी गति से आगे बढ़ा।
शांतिकुंज हरिद्वार, गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा की इमारतें जिनने देखी है। जो देश के कोने-कोने में विनिर्मित 2400 गायत्री शक्तिपीठें देखकर आये हैं वे जानते हैं कि इनके निमार्ण में 100 करोड़ से कम खर्च नहीं हुआ है। तीर्थ और देवालय तो पुरातनकाल में भी बने थे और वे सभी राजाओं और सेठों ने बनाये हैं। जन-स्तर पर इतने बड़े निर्माण चन्द दिनों में संकेत मात्र से बनकर खड़े हो गये हों, ऐसा उदाहरण अनादि काल से लेकर अद्यावधि कोई कहीं भी नहीं मिलेगा। अपने क्षेत्रों में वे भी प्रज्ञा संस्थान जनरेटरों की, ट्यूब-वैलों की, नर्सरियों की, प्रकाश- स्तंभों की भूमिका निभा रहे है। सभी के साथ समयदानी, कार्यकर्त्ताओं की उत्साहवर्द्धक संख्या कार्यरत हैं सभी का निर्वाह चल रहा है। सभी अपनी-अपनी सीमा परिधि में नवयुग के अनुरूप वातावरण बनाने में आशातीत ढंग से सफल हो रहे है।
ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान द्वारा नवयुग की महती माँग पूरा करने के लिए अभूतपूर्व कदम उठाया गया है। श्रद्धा पर आधारित पुरातन अध्यात्म तत्वदर्शन की नई पीढ़ी की मनःस्थिति को देखते हुए तर्क-ज्ञान तर्क और तथ्यों द्वारा प्रकाशित करने का प्रयास अभूतपूर्व है। अदृश्य जगत, रोक्ष विद्या, अतीन्द्रिय क्षमता का प्रत्यक्ष प्रतिपादन बन पड़ने से नास्तिकता को आस्तिकता में बदलने वाले जन-मानस को नई दिशा देने वाले दूरगामी परिणाम होंगे। इस कल्पना निर्धारणा और व्यवस्था के सम्बन्ध में विज्ञजन कहते हैं कि प्रचलित भौतिकवाद पर अध्यात्मवाद को प्रतिष्ठित करने वाला यह युगान्तरीय प्रयास है। भले ही वह महान आविष्कारों की तरह इन दिनों किसी छोटे कलेवर में ही विकसित क्यों न हो रहा हो।
सामूहिक साधनाओं के माध्यम से विषाक्त वायुमण्डल-वातावरण को बदलने के लिए प्रज्ञा पुरश्चरण की प्रक्रिया इन दिनों चल रही है। उसमें 24 लाख व्यक्ति भागीदार हैं और प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री जप सम्पन्न करते हैं। हरीतिमा संवर्द्धन का जन-आन्दोलन भी साथ-साथ चल रहा है सामूहिक धर्मानुष्ठानों के इतिहास में इसे अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है।
उपरोक्त तथ्य वे हैं जो सर्वसाधारण को भली-भाँति विदित है। विगत सत्प्रयासों को प्रतिफल थाली में परोसा और चखा जा रहा है। हाँडी में जो पक रहा है और अगले ही दिनों दृश्यमान होकर पिछली उपलब्धियों से अनेक गुने बढ़े-चढ़े चमत्कार प्रस्तुत करने जा रहा है, उसका अनुमान वे लोग लगाते हैं जो सूत्र-संचालकों के निकट संपर्क में है।
चर्म-चक्षुओं से अदृश्य जगत का तूफानी प्रवाह दृष्टिगोचर नहीं होता है। वे इसका निमित्त कारण किन्हीं शरीरधारी व्यक्तियों को देखते हैं। गुरुजी-माताजी की ओर इशारा करते और उनकी तप-साधना को श्रेय देते हैं। अनेकों को जी व्यक्तिगत लाभ मिले है और वातावरण बदलने वाले जो प्रयास चले है, उनके पीछे इसी युग्म की भावभरी चर्चा करते हैं। पर वस्तुतः बात वैसी है नहीं। यह सदा समझा जाता है कि कठपुतली के खेल में लकड़ी के खिलौने उचकते-मचकते भर है, उनके पीछे किसी बाजीगर की सधी हुई अदृश्य उँगलियाँ काम कर रही है। नियन्ता की युग परिवर्तन आकांशा ही योजना का एकमात्र कारण है। श्रेय किसे कितना मिला, यह उसकी ओर अग्रगमन की साहसिकता पर निर्भर है। गुरुदेव अपने स्थान बदलते रहते हैं ताकि लोगों को अनुभव हो सके कि उनके बिना कहीं कुछ रुकता नहीं, वरन् अपने क्रम से बढ़ता ही चला जाता है। जो सोचते हैं कि गुरुजी के रहने पर प्रज्ञा अभियान लड़खड़ाने लगेगा, उन्हें अपनी आशंका का इस आधार पर समाधान करना चाहिए कि यह किसी ओस की बूंदें दिखती तो मोती जैसी हैं। पर वे स्थिर कहाँ रह पाती है। आकर्षण भी ओस बिंदुओं की तरह है व्यक्ति विशेष के पराक्रम, निर्धारण, कौशल का परिणाम नहीं है। जो हुआ है वह नियन्ता के निर्धारण के अनुसार हुआ है। अगले दिनों उससे भी अनेक गुने समर्थ एवं व्यापक कदम उठेंगे। 500 करोड़ मनुष्यों का भाग्य-भविष्य बदलने के लिए उससे कहीं अधिक होना है जो किया जा चुका या किया जा रहा है। इसका सरंजाम कौन जुटाएगा? इसका समाधान एक ही आधार पर होता है कि तूफान अपना रास्ता आप बनाता है। उसका साथ तिनके-पत्ते तक देते हैं। मार्ग में अड़ने वाले विशालकाय वृक्ष उखड़ते और रेतीले टीले हवा में उड़ते और सत्ता समाप्त करते हैं। शीत, ग्रीष्म और वर्षा का बदलता मौसम जब परिस्थितियों में आश्चर्यजनक परिवर्तन करता है तो कोई कारण नहीं कि अदृश्य जगत में चल रहा नियन्ता का प्रेरणा प्रवाह उसके लिए उपयुक्त आधार खड़ा न कर सके। प्रज्ञा अभियान की अद्यावधि सफलताओं को इसी दृष्टि से देखा और भावी सम्भावनाओं का अनुमान इसी आधार पर लगाया जाना चाहिए।
प्रस्तुत लेख पूज्यवर ने 1976 में तब लिखा था जब सूक्ष्मीकरण साधना के बाद वसन्त पर्व पर वे सबसे मिलने लगे थे। कुछ कारणों वश इसका प्रकाशन तब रोक दिया गया था। निर्देश दिए गए थे कि यह लेख सुरक्षित रखा जाए। जब ऐसी मनोवृत्ति बढ़ती दिखाई दे, तब इसे प्रकाशित करें। आज जब गायत्री परिवार प्रसिद्धि के शिखर पर है, ऐसी मनोवृत्ति वाले व्यक्ति भी बढ़ते दिखाई देते हैं जो भिन्न-भिन्न मायावी रूपों में स्वार्थ सिद्धि ही अपना लक्ष्य मानकर कुछ भी कर गुजरने से बाज नहीं आ रहे। ऐसे में यही सबसे सही समय मानकर इसे सर्वसाधारण के लिए प्रकाशित किया जा रहा है।
गेहूँ में “पई” चने में सुडी एवं लकड़ी में घुन नामक कीड़े लग जाते हैं। और वे उन्हें खोखला कर देते हैं। फलतः गेहूँ व चना न खाने के काम का रहता है, न बीज के। लकड़ी से न शहतीर बनाया जा सकता है, न उसका प्रयोग ही फर्नीचर आदि में हो सकता है क्योंकि खोखली वस्तु या पदार्थ क्षमता खो बैठते हैं व किसी के काम के नहीं रहते। ठीक यही बात समाज व मनुष्य पर लागू होती है। जिस मनुष्य को अनास्था का, नकारात्मक चिंतन का घुन लग जाए, उसकी क्षमता का अपहरण हो जाता है, एवं वह पारस्परिक विद्वेष फैलाए एवं चलती गतिविधियों में विघ्न खड़ा किए बिना चैन नहीं लेता। ऐसा मनुष्य जिस संगठन या समाज में हो, घातक-तोड़ने वाली गतिविधियों में ही निरत रह वही काम करता है जो स्रष्टा को, नियन्ता को पसन्द नहीं एवं इस प्रकार वह अपने ही विनाश के लिए अपने लिए स्वयं ही खाई खोदने का कार्य करता है। यह इन दिनों जगह-जगह इसलिए भी चलता देखा जा रहा है कि दबाव की रचनात्मक शक्तियां दिनोंदिन प्रबल होती चली जा रही है और आसुरी शक्तियों की अपने आमूल-चूल उन्मूलन का खतरा स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है।
आसुरी ताकतें प्रत्यक्ष तो नीति के विरोध में खड़ी नहीं हो सकतीं, क्योंकि उनका कोई आधार नहीं होता, वे पूर्णतः खोखली होती है। सत्य में हजार हाथी के समान बल होता है। उसके सामने आकर लड़ा नहीं जा सकता। इसलिए वे छद्व रूप बनाती हैं अपने को सही और दूसरे को गलत बताकर कोई विवाद-विग्रह खड़ा करती है जिससे चलती गाड़ी रूप जाय। इनका सारा व्यापार अफवाहों कानाफूसियों और जिस-जिस को बरगला कर सृजनशिल्पियों के समुदाय में विग्रह खड़ा करना होता है। इनसे सावधान रहना अत्यावश्यक है अन्यथा अपने ही लोगों में से कुछ ऐसे बागी खड़े हो जाते हैं जो चिरकाल से किए गए प्रगति प्रयासों को चौपट करके रख देते हैं। ऐसे कृमि-कीटकों को कालनेमि के वंशज कहा जा सकता है।
कालनेमि रावण का भाई था, पर था बड़ा कुटिल ओर मायावी। वह ऐसे प्रपंच खड़े करता था, जिनने अच्छे-भले लोगों को भ्रमग्रस्त बनाया ताकि विघ्न खड़ा करने के अतिरिक्त उनका भी सर्वनाश किया जा सके, जिन्हें “हितू” बनाया था। कालनेमि लोगों को भ्रमित करने उन्हें उलटी पट्टी पढ़ा देने में प्रवीण था। उसकी साधना इसी मायावी वरदान को प्राप्त करने में लगी थी। कालनेमि ने ही सूर्पणखा को रूपवती बनाकर राम की उपपत्नी बन जाने की पट्टी पढ़ायी थी। इसके बाद इसी की चतुराई थी कि रावण को सीता हरण के लिए तैयार किया। मारीचि स्वर्ग जाने का वरदान चाहता था। उसे स्वर्ण-मृग बनने का वरदान माँगने के लिए सहमत कर लिया। कुम्भकरण छह महीने जागने और अधिक पुरुषार्थ करने का वर माँगना चाहता था, पर उसे कालनेमि ने ऐसी पट्टी पढ़ाई कि बेचारा छह माह सोने और एक दिन जागने का वरदान माँग बैठा। लोकेषणा परी-अप्सरा की तरह मादक-मोहक होती है। इसी के वशीभूत कालनेमि ने विश्वासपात्र तक को गिराने का काम किया।
कालनेमि का राम परिवार में भी प्रवेश हुआ था। उसने मंथरा-कैकेयी को अपना वशवर्ती बनाया और अयोध्या को नरक में बदल दिया था। हनुमान जब संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे तो उन्हें भरमाने के लिए कालनेमि ने रास्ते में एक सुन्दर सरोवर रच दिया और थके हनुमानजी को विश्राम देने के बहाने कुछ देर रोक लिया। कहा-तुम तालाब में स्नान करके आओ, मैं ऐसी गुरुदीक्षा दूँगा जिससे कभी थकान आए ही नहीं। जैसे ही नहाने लगे तब उसी जल में रहने वाले मगर ने भेद खोल दिया कि यह दुष्ट विलम्ब करवाकर लक्ष्मण को मरवाना चाहता है और तुम्हें खाना चाहता है। हनुमान उसका अभिप्राय गए और उस साधु वेशधारी कालनेमि को लात मारकर बिना रुके अपने रास्ते चले गए।
कालनेमि एक व्यक्ति नहीं, वृत्ति का नाम है। इन दिनों हर संगठन में समाज के हर वर्ग में ऐसी वृत्ति का बाहुल्य देखा जा सकता है। हमने बड़ा परिश्रम कर स्नेह की डोर में बाँधकर इतना बड़ा गायत्री परिवार, प्रज्ञा अभियान, युग निर्माण योजना का ढाँचा खड़ा किया है। कालनेमि का मायाचार इसमें भी जोर-शोर से चल सकता है। उसका काम तो फसल चौपट करना है, उसे नवसृजन-युग निर्माण से क्या मतलब? उसके वाक्जाल और प्रलोभनों में किसी को आए बिना हमारे बताए आदर्शवादी मार्ग पर ही चलने का प्रयास करना चाहिए। यही सबके लिए वरेण्य है। मिशन तो महाशक्तियों के संरक्षण में चल रहा है। उसका तो कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। पार खतरे से सावधान न रहा गया, तो शाखा संगठन विभाजित और दुर्बल होते चले जाएँगे। इस आशंका की प्रावधानों को किसी भी हालत में सफल नहीं ही होते देना चाहिए।
छोटे अबोध बालकों को जैसे कापालिक-अघोरी अपहरण कर ले जाते हैं और उनके माध्यम से अपने कितने ही स्वार्थ सिद्ध करते हैं। समझना चाहिए कि अपने समय के कालनेमि ने ऐसा ही मायाचार रचा है। उससे सतर्क रहने में ही स्वयं काक तथा मिशन का हित है।
आज के भौतिकता प्रधान युग में, जहाँ चारों ओर से संस्कृति पर कुठाराघात ही रहा हो, मूल्यों का सतत् हास होता जा रहा हो, धर्मतन्त्र की ओर से विशेषतः प्रगतिशील धर्मतन्त्र के पुरोधाओं की ओर से ऐसे कदम उठाया जाना अनिवार्य है, जिनसे उसकी गरिमा की अक्षुण्ण रखा जा सके। यों तो देव संस्कृति हमारे अपने ऋषियों द्वारा विनिर्मित एक ऐसी विधा है जो हमारी जीवन-शैली के रूप में रम गयी है एवं किसी भी स्थिति में किसी तर्क, तथ्य या प्रमाण की मोहताज नहीं है। किन्तु आज के प्रत्यक्षवादी युग में ऐसे माध्यमों का आश्रय लेना अनिवार्य जान पड़ता है, जिनसे कि सीता की अग्नि परिक्षा की तरह देव संस्कृति को भी उनसे गुजर कर सही प्रमाणित किया जा सके।
संस्कृति को आज लौकिक अर्थों में लोकमानस मात्र कला, रंगमंच, खानपान, रहन-सहन तक सीमित मानता है, किन्तु यह उससे कही व्यापक अर्थों में संस्कारों को जीवन में समाहित कर व्यक्तित्व को परिष्कृत करने वाली विधा कही गयी है, नरपशु को देवमानव बनाने वाला एक पारस कही है। जहाँ इतने व्यापक परिप्रेक्ष्य में हम संस्कृति की विवेचना करते हैं तो फिर उसका प्रस्तुतीकरण भी वैसा होना चाहिए। मात्र संस्कृति के मूलभूत तत्त्वों की चर्चा से तो यह सम्भावना नहीं। यही कारण है कि 1997 के जनवरी माह से आरम्भ होने वाले विराट संस्कार महोत्सवों को अब संस्कृति के विज्ञानसम्मत प्रस्तुतीकरण के रूप में जन सामान्य के शिक्षण , जानकारी बढ़ाने के निमित्त आयोजित किया जा रहा है।
देव संस्कृति धर्म, अध्यात्म-विद्वान, पर्यावरण से लेकर ऋषि परम्परा, साधना विज्ञान एवं व्यावहारिक अध्यात्म की परिधि में आने वाले सभी विषयों को अपनी परिधि में आने वाले सभी विषयों को अपनी परिधि में हुए एक व्यापक परिभाषा वाली विधा है। इन सभी की विज्ञान की कसौटी पर कसते हुए कैसे प्रस्तुत किया जाय, जबकि संस्कृति स्वयं में एक विज्ञान है? दृश्य-श्रव्य साधनों द्वारा यदि संस्कृति के विभिन्न घटकों का विज्ञानसम्मत विवेचन प्रत्यक्ष कर दिखा दिया जाये तो इस दुनिया का हल निकल आता है। यही तथ्य ध्यान में रख युग ऋषि परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य जो कि आज के युग के सर्वोत्कृष्ट वैज्ञानिक भी माने जा सकते है-के शाश्वत चिन्तन की संस्कार महोत्सवों में ज्ञानयज्ञ के माध्यम से विराट प्रदर्शनी के रूप में एक अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया गया है।
मुम्बई, जो कि महाराष्ट्र की राजधानी होने के साथ कला व फिल्म नगरी भी है की अनायास ही यह श्रेय प्राप्त होने जा रहा है कि पहली बार कम्प्यूटर साइंसेज की नवीनतम विधा ‘मल्टीमीडिया’ के माध्यम से देव संस्कृति के विराट-व्यापक रूप को प्रस्तुत किया जा रहा है। चर्चगेट, जो कि बृहत्तर मुम्बई के दक्षिणी भाग में उस क्षेत्र में स्थित है जहाँ कि बहुसंख्य अन्तर्राष्ट्रीय कार्यालय है, पूरे भारत ही नहीं, एशिया का भी एक का व्यापारिक केन्द्र है तथा जहाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ स्थित है, के सामने सुन्दर बाई हॉल में यह विराट प्रदर्शन 22, 23, 24, 25, 26 जनवरी की तारीखों में होने जा रहा है। इसके लिए बड़े व्यापक स्तर पर तैयारी विगत जुलाई-अगस्त माह में ही आरम्भ कर दी गयी थी। इस प्रदर्शनी को साधारण प्रदर्शनी न मानकर अध्यात्म-विज्ञान के समन्वय की, बोधगम्य अध्यात्म के विभिन्न पक्षों का प्रस्तुतीकरण करने वाली एक अद्वितीय स्तर की कार्यशाला माना जाना चाहिए। समापन की पूर्व वेला में गिरगाँव चौपाटी पर एक विराट सवालक्ष वेदी दीपयज्ञ भी आयोजित किया गया है, जिसमें 25 जनवरी की संध्या समुद्र किनारे दीपदान के साथ अभिनव संकल्प भी किये जाएँगे, प्रेरक उद्बोधन होंगे तथा एक शाकाहार मेले के माध्यम से अहिंसा प्रधान समाज व आहार क्रान्ति का प्रस्तुतीकरण होगा।
आज हमारे ग्रामीण क्षेत्र एवं कस्बों में जिस संस्कार प्रधान शिक्षण की आवश्यकता है, उससे कुछ भिन्न प्रकार की भूख बड़े नगरों की है, जिनमें हम मुम्बई, बेंगलोर, चेन्नई (मद्रास), कलकत्ता, दिल्ली जैसे पाँच नगरों सहित कानपुर, लखनऊ, नागपुर, अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, जयपुर, बेंगलोर, कोचीन, पुणे, चण्डीगढ़, इलाहाबाद, इन्दौर, जबलपुर, हैदराबाद, विशाखापट्टनम, मेरठ, शिमला, जम्मू, गुवाहटी इत्यादि जैसे बड़े शहरों के नाम भी ले सकते हैं। इन सभी में साँस्कृतिक स्तर पर बड़ी तेजी से पाश्चात्यीकरण का उन्माद फैला है एवं नैतिक मूल्यों में गिरावट के साथ तेजी से फैलने जा रहे इन क्षेत्रों में अपराधों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। जो भी हो, इलाज तो पूरे समाज का करना है, विशेषकर उन क्षेत्रों का जहाँ में अपराधों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। जो भी हो, इलाज तो पूरे समाज का कहना है, विशेषकर उन क्षेत्रों का जहाँ सुविधा-साधनों के आकर्षणवश प्रतिभाएँ जा विराजी है या विद्यमान है। इन सभी में संस्कार चेतना फैलाने के लिए ऐसे ही मुंबई ज्ञानयज्ञ स्तर के कार्यक्रम अगले दो वर्षों में किए जाने की योजना है, ताकि बहुसंख्य बहुभावी क्षेत्रों तक गुरुसत्ता का संदेश फैल सके।
यह स्पष्ट तौर पर समझ लिया जाना चाहिए कि अब चाहे भारत हो या विश्व, उलटी नैया की पार लगाने का कार्य देव संस्कृति ही करेगी। देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के झण्डे तले यह कार्य गायत्री परिवार अब अपने चिन्तन एवं उद्देश्यों में साम्य रखने वाली संस्थाओं के साथ मिलकर सम्पन्न करेगा। आशा करनी चाहिए की 1991 तक सारे भारत ही नहीं, विश्वभर में साँस्कृतिक नवोन्मेष की यह प्रक्रिया किया रूप लेती देखी जा सकेगी एवं फिर युग परिवर्तन बहुत दूर नहीं, प्रत्यक्ष अपने सामने देखा जा सकेगा।
*समाप्त*