भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वासरुपिणौ

इस संसार-मरुभूमि में तुम पथिक हो। यहाँ तनिक भी रुकने का मतलब है, राह में झुलस कर नष्ट हो जाना। अपने लिए सद्विचारों का कारवाँ बना लो तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था कर लो। सभी मृगतृष्णा से सावधान रहो। लक्ष्य वहाँ नहीं है। बाह्य आकर्षणों से भ्रमित न होओ। सरल विश्वास को तोड़ने वाले कपट जाल में फंस कर उसका अनुसरण मत करो। परम विश्वासी शिष्य की भाँति एक उन्मत्त छलाँग लगाकर स्वयं को सद्गुरु के कृपा सागर में डुबो दो।

ओ महान ज्योतिर्मय की किरण ! सरल विश्वास से बढ़कर और कुछ भी तुम्हारे लिए नहीं है। इसी क्षण अपने आप से पूछो, क्या तुम विश्वास करते हो ? पहले स्वयं पर विश्वास करो। आखिर यह सरल, निश्छल एवं वज्र की भाँति वज्र विश्वास ही तो परमशिव है। विश्वास ! विश्वास !! विश्वास !!! सभी कुछ विश्वास पर ही निर्भर करता है। वह विश्वास नहीं जो केवल आस्था मात्र है, किन्तु वह विश्वास है जो दर्शन है। संशय के अतिरिक्त और कोई महापाप नहीं। गीता के उपदेश को अपने अस्तित्व की गहराइयों में अनुभव करो- "संशयात्मा विनश्यति।” संशय को विष के समान त्याग देना सीखो। सबसे बड़ी दुर्बलता संशय है, जो शिष्य को सद्गुरु के अनुदानों-वरदानों से वंचित रखती है।

ओ अमृतपुत्र ! सरल विश्वास से ओत-प्रोत अन्तःकरण में ही सजल भावनाएँ अंकुरित, प्रस्फुटित, एवं विकसित होकर श्रद्धा का रूप लेती हैं। सजल श्रद्धा ही समस्त दिव्यशक्तियों का स्रोत है। विश्व के समस्त महामानव इस सजल श्रद्धा की शक्ति से अभिभूत होकर ही अपने महान लक्ष्य को पा सके। यह शक्ति जो जगन्माता का स्वरूप है, परम शिव से सर्वथा अभिन्न है, उस पर ध्यान करो और तुम से अनायास ही मुक्त होकर उन महाशक्ति की प्रेरणा ग्रहण कर सकोगे। उनके दिव्य वात्सल्य के सुख को सहज अनुभव कर पाओगे।

सरल विश्वास और सजल श्रद्धा-प्राण और वेद की भाँति परस्पर गुँथे हुए हैं। द्वैत का आभास होने पर भी इनमें सर्वथा अद्वैत है। शिव और शक्ति भला एक दूसरे से भिन्न हो भी कैसे सकते हैं ? स्वयं के अन्तःकरण में इनकी अनुभूति सघन होते ही अपनी अन्तर्दृष्टि के समक्ष प्रखर प्रज्ञा और सजल श्रद्धा की युगल मूर्ति सहज साकार हो उठेगी और सुनायी पड़ने लगेगी गुरुपर्व पर उनकी यह परावाणी-शब्द कहे जा चुके हैं, उपदेश दिये जा चुके हैं। अब कार्य करने की आवश्यकता है। बिना आचरण के उपदेश व्यर्थ है। तुमने बहुत पहले ही अपने संकल्पों तथा अन्तर्दृष्टि को आचरण में नहीं लाया, इस बात का तुम्हारे साथ हमें भी गहरा दुःख है। जब रास्ता मिल गया है तब वीरता पूर्वक आगे बढ़ो। जिसने भी श्रद्धा-विश्वास का अवलम्बन लिया है, वह अकेला नहीं है। ईश्वर ही उसका साथी है, मित्र है, सर्वस्व है। मेरी समस्त शक्तियाँ तुम्हारे साथ हैं आगे बढ़ो और लक्ष्य प्राप्त करो।


प्रज्ञावतार का कथामृत वय

भगवत्कथामृत की महिमा एवं महत्व को सभी ने एक स्वर से स्वीकार किया है। पौराणिक आख्यान के अनुसार वेदज्ञानी महर्षि व्यास के चारों वेदों के संकलन-सम्पादन तथा गहन अनुशीलन के बावजूद जब आत्मिक शान्ति एवं आत्मविकास के चरम-बिन्दु की प्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने अपनी व्यथा देवर्षि नारद को कह सुनायी। जीवन विद्या के मर्मज्ञ नारद ने उनका समाधान करते हुए कहा-जीवन संवेदना का पर्याय है। संवेदना के अंकुरण, प्रस्फुटन एवं अभिवर्द्धन के अनुरूप ही इसका विकास होता है। संवेदनहीन एवं मृतक में कोई अन्तर नहीं। दोनों ही अपना बाह्य कितना ही क्यों न बढ़ालें, लेकिन ये जहाँ भी रहते हैं, दुष्प्रवृत्तियों की निष्करुण दुर्गन्ध ही फैलाते हैं।

इस दुर्गन्ध को सुगन्ध में बदलने, दुष्प्रवृत्तियों को सत्प्रवृत्तियों का रूप देने तथा मरे हुओं में जीवन का संचार करने वाली निर्मल संवेदना का स्रोत भगवत्कथा ऐसी पारसमणि है, जिसकी छुअन मात्र से वासना, साधना में कुतर्कों के समूह-सजल श्रद्धा में एवं संशयाकुल चित्तवृत्तियाँ अटल-अडिग विश्वास में अपने-आप बदल जाते हैं। भगवत्कथा का अमृत-सिंचन तड़पते-कलपते छटपटाते जीवन को मधुर शान्ति एवं अपरिमित आनन्द से लबालब भर देता है।”

देवर्षि के द्वारा दिए गए इस समाधान को आत्मसात् करके महर्षि व्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की। युगावतार के जीवन-प्रसंगों घटनाक्रमों को अपने भावसूत्रों में पिरोया। परमज्ञान के विवेचन, विश्लेषण में निमग्न रहने वाले, वेदान्त दर्शन के रचनाकार महर्षि व्यास को पहली बार भक्ति का अद्भुत आनन्द मिला। उन्होंने अपनी अनुभूति, अपने निष्कर्ष का रसविभोर होकर गान किया-

तव कथामृत तप्त जीवनं कविमिरीडितं कल्मषापहम्। श्रवणं मंगलम् श्रीमदातम् भुवि मृणन्ति ये भूरिदाः जनाः॥

हे देवेश्वर ! आपका कथामृत साँसारिक ताप से जल रहे जीवों को शीतलता भरी शान्ति देने वाला, सारे पापों का नाश करने वाला है। इसके सुनने से सब ओर मंगल ही मंगल है। क्योंकि भक्तिपूर्ण हृदय से जो भगवान के लीला प्रसंगों को सुनता है, उसमें न तो पाप रहते हैं और न ही पाप करने की प्रवृत्ति। निश्चित धन्य हैं वे जो प्रेम विभोर हो इसे कहते और सुनते हैं। भगवत् कथामृत की इस महिमा को भक्तजन ही नहीं अब मनीषी एवं मनोवैज्ञानिक भी मानने लगे हैं। जी विथ सोल’ ग्रन्थ की रचनाकार जीन हार्डी का कहना है, आपराधिक एवं पापकृत्यों के प्रेरक तत्व मनुष्य के विचार एवं संस्कार ही नहीं सत्साहित्य पढ़ने, स्वाध्याय करने से विचारों में परिवर्तन तो हो जाता है। परन्तु संस्कार बड़े ही हठीले होते हैं। उनमें सहज ढंग से परिवर्तन सम्भव नहीं। लेकिन जब हम महापुरुषों के उदात्त जीवन एवं भाव भरे घटना-प्रसंगों को पढ़ते सुनते हैं, तो अपने हठीले संस्कार सहज ही गलने लगते हैं और महापुरुषों के जीवन के अनुरूप ढलने को आतुर हो जाते हैं।

सम्भवतः इसे ही गीताकार ने बुद्धियोग की संज्ञा दी है। प्रभु श्री कृष्ण अपने भक्तों के स्वभाव एवं अपने वरदान की चर्चा करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं-

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च माँ नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥

तेषाँ सततयुक्तानाँ भजताँ प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

अर्थात्- निरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों का अर्पण करने वाले भक्तजन परस्पर मेरी ही लीला कथाओं की चर्चा करते हैं। इस चर्चा से ही वे तुष्ट होते हैं और इसी में ही वे रमण करते हैं। ऐसे अनन्य भक्तों को ही मैं बुद्धियोग देता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझे ही पाते हैं।

भगवत्कथा के रूप अनेक हैं और गति अव्याहत। विश्व के विभिन्न समुदायों में इसके रूप भले ही भिन्न-भिन्न मिलें, पर इसकी उपस्थिति सर्वत्र समान है। अवतारों पैगम्बरों की लीला-कथाएँ कहीं और किसी भी रूप में क्यों न कही सुनी जाएँ मानव को आत्मिक आनन्द में विभोर करती रहती हैं। इनका हर रूप सुहाना है और हर रंग मनोरम है। हाँ, ये इतने अधिक हैं कि इन्हें ठीक से गिना नहीं जा सकता, तभी तो गोस्वामी जी महाराज को कहना पड़ा- ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता'।

प्रभु अपने अनन्त रूपों में किसी एक का युगानुरूप प्राकट्य करते हैं। इन्हीं की चर्चा पुराणों में दस अवतार के रूप में कही गयी है। हाँ, उनके हर अवतार का उद्देश्य एक ही रहता है, युग का परिवर्तन। युग-परिवर्तन का यही उद्देश्य लेकर ‘सम्भवामि युगे-युगे के अपने शाश्वत संकल्प को पूरा करने के लिए ईश्वरीय चेतना ‘श्रीराम शर्मा आचार्य जी’ के रूप में अवतरित हुई।

हम सबके परम पूज्य गुरुदेव-शाश्वत के प्रतिनिधि बनकर हम सबके बीच आये थे। उनकी कथा-उनके लीला-प्रसंगों की चर्चा हममें से हर एक को अतिशय प्रिय है। उनका स्मरण मात्र हमारे भाव एवं विचारों को श्रद्धा एवं विश्वास के निर्मल सरोवर में डुबा देता है। यूँ यह चर्चा स्वयं पूज्यवर की लेखनी से ‘सूनसान के सहचर’ एवं ‘हमारी वसीयत एवं विरासत के पृष्ठों में मुखरित हुई हैं। अखण्ड ज्योति के वर्ष 90 के स्मृति अंक एवं बाद के वर्षों में विशेष लेखमाला के रूप में यही लेख स्मरण किया जाता रहा है। उनकी लीला सहचरी वन्दनीया माताजी की पुण्य कथा भी उनके महाप्रयाण के पश्चात्-अखण्ड ज्योति के ही मातृ-स्मृति अंक के रूप में प्रकाशित हुई थी। इसी बीच गायत्री तपोभूमि मथुरा से ‘प्रज्ञावतार हमारे गुरुदेव’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें हमारे आराध्य के जीवन के अनेकों अनगिनत पहलू उजागर हुए। रूप


शिव शक्ति का लीला-संदोह

मेरे बिना उनकी अभिव्यक्ति नहीं, उनके बिना मेरा अस्तित्व नहीं। शक्ति-स्वरूपा वन्दनीया माताजी के ये उद्गार उनके एवं शिव स्वरूप परमपूज्य गुरुदेव के लीला-संदोह का अहसास कराते हैं। शिव और शक्ति अभिन्न हैं। उनके सम्बन्ध भी अविच्छिन्न एवं नित्य हैं और उनकी यह लीला भी शाश्वत एवं चिरन्तन है। सृष्टि के आदि से एक ही परम चैतन्य अपना लीलानाट्य शिव और शक्ति के रूप में कर रहा है। इस चैतन्य ऊर्जा का व्यक्त यानि कि गतिज रूप ही शिव है। इस सत्य को स्वीकारते हुए शस्त्रों का भी कहना है-

उमारुद्रात्मिकाः सर्वाः प्रजाः स्थावर जंगमाः। व्यक्तं सर्वमुपारुपमव्यक्तं तु महेश्वरः॥

अर्थात्- यह स्थावर, जंगम समूची सृष्टि उमा व रुद्र का ही रूप है, इसमें जो व्यक्त रूप है वही भगवती उमा है और अव्यक्त रूप भगवान महेश्वर का है।

श्रुति भी यही कहती है कि संसार में जो कुछ देखा जाता है, सुना जाता है, स्मरण किया जाता है, सभी शिव-शक्ति है। रुद्र नर है, उमा नारी है। रुद्र ब्रह्मा है, उमा वाणी है। रुद्र विष्णु है, उमा लक्ष्मी है। रुद्र सूर्य है, उमा छाया है। रुद्र सोम है, उमा तारा है। रुद्र दिन है, उमा रात्रि है। रुद्र यज्ञ है, उमा वेदी है। रुद्र वही है, उमा स्वाहा है। रुद्र वेद है, उमा शास्त्र है। रुद्र वेद है, उमा शास्त्र है। रुद्र वृक्ष है, उमा वल्लि है। रुद्र गन्ध है, उमा पुष्प है। रुद्र अर्थ है, उमा अक्षर है। रुद्र लिंग है, उमा पीठ है। जो हृदय में ऐसी भावना रखते हैं। सर्वत्र नमन कर सकते हैं, वही शिव और शक्ति की लीला के रहस्य को जानते हैं।

प्राचीन वैदिक युग के किसी मन्त्रद्रष्टा ऋषि से यह पूछा गया कि हमें कौन-से देवता की स्तुति एवं पूजा करनी चाहिए, कस्मै देवाय हविषा विधेम ? उन्होंने दस ऋचाओं में इस प्रश्न का उत्तर दिया, इनमें से दो ऋचाएँ बहुत ही मोहक हैं-

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतमौ कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

य आत्मदा बलदा यस्य विश्वडपासते प्रविषं यस्य देवाः। यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम्॥

आरम्भ में भगवान हिरण्यगर्भ शिव हुए, जो समस्त भूतों के पूर्वज एवं स्वामी थे उन्होंने अपनी शक्ति से जो बाद में प्रकट हुई पृथ्वी और आकाश को धारण किया। हमें चाहिये कि हम उन्हीं की स्तुति एवं पूजा करें। जो समस्त क्रिया कलापों को जीवन तथा शक्ति प्रदान करते हैं। जिनके तप से अग्नि में से स्फुल्लिंग के समान नवीनता प्रकट होती है। जो समस्त जीवों को पालन करने वाले हैं, जिनकी आज्ञा का सभी प्राणी आदरपूर्वक पालन करते हैं। मृत्यु एवं अमृतत्व जिनकी छाया है, उन्हीं की हम लोग स्तुति एवं पूजा करें।

युगनिर्माण मिशन के आदि का रहस्य भी कुछ सृष्टि के रहस्य जैसा ही है। शिवस्वरूप परमपूज्य गुरुदेव भगवान महाकाल के शाश्वत प्रतिनिधि के रूप में आकर तपोनिरत हुए। बाद में उनकी नित्य शक्ति के रूप में वन्दनीया माताजी का अवतरण आगमन हुआ। उन्होंने ही इस मिशन को धारण किया। पूज्यवर की तपशक्ति से मिशन की अनेकानेक गतिविधियाँ जन्म लेती गयीं। पूज्यवर की कृपाशक्ति हम सबको पावन करने का दुष्कर कार्य सम्पन्न करती है। उनकी आज्ञा ही हमारे क्रिया-कलापों-गतिविधियों का मूल है और आज हममें से कोई-किसी से यदि प्राचीन ऋषियों की भाषा में प्रश्न करे-कस्मै देवाय हविषा विधेम ?” तो निश्चित ही हम सबका इंगित उन्हीं की ओर उठेगा-तस्मै देवाय हविषा विधेम।”

शिव और शक्ति का यह लीला-संदोह मिशन के जन्म, जीवन एवं इसके विविध क्रियाकलापों में स्पष्ट है। शिव और शक्ति में, गुरुदेव एवं माताजी में कौन वरिष्ठ है कौन कनिष्ठ ? यह प्रश्न तो तब हो जब वे दो हों। जब वे एकात्म हैं, तब इस तरह के सवालों की गुँजाइश कहाँ रहती है। हाँ इतना अवश्य है कि गुरुदेव के तप की प्रभा जहाँ अपने तीव्र आकर्षण से चकाचौंध करती है। वहीं वन्दनीया माताजी का अपरिमित वात्सल्य हृदय की गहराइयों को तृप्त करता है। गुरुदेव, माताजी एवं गुरुदेव, इन दोनों के रहस्यमय जीवन की अबूझ पहेली भले ही समझ में न आए, पर इतना अवश्य है कि यदि माताजी न होतीं तो मिशन का इतना विस्तार सम्भवतः न होता।यानि कि शक्ति न होती तो शिव अपना लीला विस्तार न कर पाते।

प्राचीन काल से ही इस सत्य की स्वीकारोक्ति होती आयी है। सौंदर्यलहरी में आचार्य शंकर कहते हैं-

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुँ। न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितमपि॥

अर्थात् शक्ति के बिना शिव अपने को अभिव्यक्त नहीं कर सकते। क्योंकि शक्ति के बिना सृजन-पालन-संहार कुछ भी तो सम्भव नहीं। अधिक क्या इसके बिना तो स्वयं शिव स्पन्दनहीन हो जायेंगे।

भावुक भक्तों ने इस शक्तितत्त्व में तथा इसकी समस्त क्रियात्मक हलचलों में एकमात्र कृपा को ही कारण माना है। इनका अस्तित्व ही कृपापूरित मात्र है। इनके कोप में भी कृपा छिपी रहती है। तभी तो देवी माहात्म्य में भी कहा गया है- चित्तेकृपा समरनिष्ठुरता च दृष्ट्वा॥

शास्त्रकारों ने तो यहाँ तक कहा है-माँ ! भगवान शिव समस्त प्राणियों के हृदय में विद्यमान हैं और तुम उनके हृदय में विराजती हो, पर तुम तो हृदय में भी करुणा रूप में विराजती हो, हम तो तुम्हारा ही आश्रय लेते हैं।”

शास्त्रकार की यह उक्ति वन्दनीया माताजी के सम्बन्ध में शत-प्रतिशत सत्य है। जिन्हें उनका सान्निध्य मिला है, उन्हें मालूम है कि उनके कोप में भी करुणा छिपी रहती थी। गुरुदेव का व्यक्तित्व यदि सूर्य की भाँति प्रखर था तो माताजी चन्द्रमा की भाँति शीतल एवं स्निग्ध थीं। गुरुदेव की प्रखरता-तेजस्विता को अपनी सन्तानों के लिए वात्सल्यपूर्ण शीतलता में बदल देना उनके व्यक्तित्व की सराहनीय विशेषता थी। शिव और शक्ति अपने अभिनव रूप में युगावतार आचार्यजी एवं युगशक्ति माताजी के रूप में अपनी लोक-लीला करते हुए भले ही अब परमतत्व में विलीन हो गये हों, परन्तु सजल श्रद्धा एवं प्रखर प्रज्ञा के रूप में शान्तिकुञ्ज में स्थापित उनके प्रतीक-चिह्नों के माध्यम से उनकी सूक्ष्मसत्ता एवं शक्ति के स्पन्दन अभी भी भावुक भक्तों को स्पष्ट रूप से अनुभव होते रहते हैं।


चतुर्थ आयाम में होता है देवात्मा हिमालय का रहस्यबोध

हिमालय ऐसा दिव्यलोक है, जो पृथ्वी पर होते हुए भी सभी देवताओं की भ्रमण स्थली है। सभी ग्रहों और लोकों के निवासी यहाँ सहज विचरण करते हैं। यहाँ के रहस्यों और आश्चर्यों का पार नहीं हैं। सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों, मुनियों, दीर्घकाल तक देह धारण करने वाले सिद्धों की अलौकिक लीलाएँ यहाँ के कण -कण में बिखरी हैं। ऐसे रहस्य लोक हिमालय से प्यार परम पूज्य गुरुदेव के संस्कारों में सँजोया था। जन्म-जन्मान्तर के संस्कार मनुष्य के विचारों, प्रवृत्तियों एवं कर्मों में सहज अनुभूत होते हैं। बरबस ही वह अपने संस्कारों के अनुरूप बनते-ढलने चलने बढ़ने और कुछ वैसा ही कर गुजरने के लिए आतुर होने लगता है। गुरुदेव में भी बचपन से कुछ ऐसी ही आतुरता और उतावली थी। उनके मन में उमंगें उठती रहती थी।

जब उनके खेल-कूद के दिन ही चल रहे थे एक दिन अनायास ही वे घर से निकल गये। काफी समय तक उनके अभिभावकों ने जब इधर-उधर घर के आस-पास नहीं देखा तो उन्हें भारी चिन्ता हुई। पूज्यवर की माताजी जिन्हें वे ताईजी कहते थे, अपने श्रीराम को न पाकर बिलख पड़ीं । बहुत खोज खबर के बाद उन्हें गाँव से 5-6 मील दूर एक स्टेशन से पकड़ा जा सका। पूछने पर उस समय उन्होंने इतना ही कहा -”हमारा घर तो हिमालय हैं, वही जाना हैं यहाँ रहकर क्या करेंगे ?” आठ वर्ष के बालक के मुँह से निकली हुई यह बात उनकी खोज करने वालो को महत्वहीन लगी। उन्हें धमकाया गया। घर वापस आने पर जब ताईजी ने जब उनको फुसलाते हुए पूछा, तब उन्होंने बताया कि रात में सो जाने पर सपने में उन्हें श्वेत-धवल विशालकाय पर्वत की चोटियाँ दिखती हैं। इन चोटियों पर एक नहीं कई दीर्घकाय अद्भुत ढंग से चमकते हुए साधु-सन्त नजर आते हैं। अक्सर वे हमें बुलाते हैं, बस इसी कारण मैं उनसे मिलने के लिए जाने वाला था। उनके बचपने की बातें सुनकर ताईजी को अहसास हो गया कि यह कोई हिमालय के दिव्य सन्तों का अभिन्न आत्मीय हैं, जो वहाँ जाने, उनसे मिलने की लौ लगाए हुए हैं।

अपने बाल्यकाल में तो वे हिमालय नहीं जा सके, पर उनके सपनों, अनुभूतियों में देवात्मा हिमालय अवश्य अपनी मनोरम आभा बिखेरता रहता। हिमालय निवासी सिद्धों-सन्तों की आत्माएँ उन्हें अपने अपनत्व एवं प्यार से भिगोती रहतीं। पर यह सब होता अप्रत्यक्ष था। एक दिन वह भी पुण्य घड़ी आई जब हिमालय के रहस्य उनके अपने ही घर में घनीभूत हो उठे। उन दिनों वह पन्द्रह वर्ष परे करके सोलहवें में पदार्पण कर रहे थे। अपने उपासना गृह में एक दिव्य प्रकाशवान देखा, जो बाहर से घनीभूत होता हुआ उनके शरीर, मन और अन्तःकरण में समा गया। उन्हें आत्मबोध, अन्तःस्फुरणा, दिव्य अनुग्रह, गुरुदर्शन, आन्तरिक दिव्यता या जो कुछ कहा जाए प्राप्त हुआ।

यह उनका हिमालय निवासी किसी अलौकिक सत्ता से प्रत्यक्ष रूप से प्रथम परिचय था। अब तक उन्हें हिमालय के सन्तों की संगति स्वप्नों में मिलती थी, किन्तु आज प्रत्यक्ष हुई। उसी दिन उन्हें यह बताया गया कि भौतिक रूप से इस दिव्य सत्ता का निवास उस प्रदेश में हैं, जिसे चेतना का ध्रुव प्रदेश या हिमालय का हृदय कहा जाता है। यह स्थूल भी हैं सूक्ष्म भी। इस प्रकाश का स्थूल प्रतीक एक ऐसे सिद्धपुरुष का शरीर हैं जो चिरकाल से नग्न, मौन, एकाकी, निराहार रह कर अपने अग्नि-अस्तित्व को अधिकाधिक प्रखर, प्रचण्ड बनाते चले जा रहे हैं।

वे हिमालय की दिव्य विभूतियों में से एक हैं। वहीं हिमालय को देखने भर से निर्जीव और जड़ मालूम पड़ता है। लेकिन वस्तुतः उसकी चेतना और प्रेरणा अद्भुत हैं। अपनी पुरश्चरण शृंखला के बीच में ही पहली बार हिमालय यात्रा का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चिरकाल से जिसे वे अपने स्वप्नों में देखते रहते थे, उसे प्रत्यक्ष-साक्षात् देखकर उनकी विह्वलता का ठिकाना न रहा। बस उन्हें ऐसा लगा मानो कैलाशपति शंकर ने स्वयं पर्वत का आकार धारण कर लिया हो। उनके गुरुदेव ने इसकी दिव्यता का स्पष्टीकरण देते हुए कहा- कि पृथ्वी की भौतिक शक्तियों का शक्ति केन्द्र ध्रुव प्रदेश में सन्निहित हैं। ब्रह्माण्ड के सुर्य की शक्तियाँ पृथ्वी में ध्रुव प्रदेश के मध्यम से आती हैं। ठीक उसी प्रकार दिव्यलोकों की चेतना-शक्तियाँ पृथ्वी पर यहीं अवतरित होती हैं। जहाँ हिमालय का हृदय अवस्थित हैं, जहाँ हिमालय का हृदय अवस्थित हैं, यहीं से सर्वत्र बिखर जाती हैं।

दादा गुरुदेव ने उन्हें बतलाया-यही चेतना का ध्रुव केन्द्र हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से धरती का स्वर्ग यहीं था। इसे बद्रीनाथ और गंगाजी का मध्यवर्ती अधिक ऊँचाई का, तिब्बत का समीपवर्ती भाग कहना चाहिए। देवताओं का निवास स्थान सुमेरु यहीं हैं। पाण्डव स्वर्गारोहण के लिए यहीं गये थे। असली कैलाश मानसरोवर वे नहीं जो चीन में चले गए वरन् वे हैं जो गंगा के उद्गम गोमुख से आगे शिवलिंग पर्वत और दुग्ध सरोवर के नाम से जाने जाते हैं फूलों से लदा हुआ नन्दन वन यहीं हैं। देवता यहीं भ्रमण करते हैं, परन्तु उन्हें दिव्यदर्शी ही प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं। इस हिमालय के हृदय में न केवल परिस्थितियाँ बल्कि ऐसी शक्तियाँ और आत्माएँ भी विद्यमान हैं, जो में आने वालों को आत्मिक अलौकिकता का भरपूर आभास करा सकें।

सामान्य क्रम में इस शक्ति-केन्द्र तक पहुँच जाना तथा वहाँ ठहर सकना ध्रुव प्रदेशों से भी कठिन हैं कभी न गलने वाली बर्फ और ऊँचाई में आक्सीजन की कभी, रास्तों का न होना, निर्वाह की सभी आवश्यकताओं का पूर्णतया अभाव, यह सब अवरोध तो वहाँ जाने से रोकते ही हैं। चेतना दिव्यशक्तियों की तीखी ब्रह्माण्ड किरणें जो धरती पर फैलने के लिए बरसती हैं, वे भी सामान्य शरीर के लिए सहन नहीं। इसीलिए वह प्रदेश न केवल प्रकृति ने बल्कि हिमालय निवासी दिव्य सन्तों की अदृश्य प्रेरणा से सरकार ने भी आवागमन के लिए संपर्क निषिद्ध ठहराया है। यह स्थान दिव्य सत्ताओं की क्रीड़ास्थली के लिए सुरक्षित है, सामान्य शरीर लेकर न वहाँ जाया जा सकता है और न ठहरा जा सकता है।

इसके नीचे का उत्तराखण्ड के नाम से प्रसिद्ध यातायात सम्भावनाओं वाला सुलभ हिमालय प्रदेश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अपनी तप-साधना का केन्द्रबिन्दु गुरुदेव ने जिस हिमालय को बनाया, वह चेतना का ध्रुव केन्द्र भी रहा और सुलभ हिमालय का प्रदेश भी। उनकी तीन हिमालय यात्राएँ तो अखण्ड-ज्योति के पाठकों को सुविदित ही हैं। लेकिन इसके अलावा वे समय-समय पर कम या अधिक समय के लिए चौबीस पुरश्चरणों के बीच में तथा बाद में जाते रहे हैं। जब हिमालय की दिव्य सत्ताओं से मिलने की उत्कण्ठा हुई, वे सीधे हिमालय की ओर चल पड़े। ये यात्राएँ कितनी ही बार कई-कई महीनों के लिए हुईं। वे हर बार वहीं से नई सामर्थ्य व स्फूर्ति लेकर लौटे।

इनमें से सर्वाधिक रहस्यमय प्रसंग उन यात्राओं के मध्य घटित हुए, जब वे हिमालय के हृदय-स्थल में पहुँचे। यह दिव्य क्षेत्र आज भी सप्तऋषियों के, अगणित तपस्वियों, की तपोभूमि बना हुआ है। एक प्रसंग में उन्होंने बताया था कि इन दिनों भी वहाँ 18,000 विशिष्ट आत्माएँ लोककल्याण एवं सृष्टि-संचालन के लिए तप में संलग्न हैं। पहले कभी यहीं व्यास जी ने अठारह पुराण लिखे थे। आदि गुरु शंकराचार्य ने प्रायः अपने सभी भाष्य यहीं बैठकर लिखे। वैदिक भारत में प्राचीन ऋषियों द्वारा आर्ष साहित्य का सृजन यहीं हुआ। चिरअतीत से भारत की आध्यात्मिक परम्पराओं का सूत्र-संचालन यहीं से होता रहा है। शिव-पार्वती का, देवसेना का निवास यहीं है, यह केवल प्राचीन मान्यता नहीं बल्कि दिव्यदर्शियों के लिए सत्य है। आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक स्तर पर इस भूमि की अपनी महत्ता है। अन्यत्र जो साधन देर में सफल होते हैं, इस उर्वरा भूमि में जल्दी उगते और फलते-फूलते हैं।

हिमालय के हृदय से सूक्ष्म सम्बन्ध गुरुदेव का जन्म-जन्मान्तर से है। हाँ स्थूल शरीर से उन्होंने उत्तराखण्ड में और उसके आगे पड़ने वाले रहस्यमय क्षेत्र में साधना काल का बहुत-सा भाग लगाया है। पहली बार की हिमालय यात्रा के प्रसंगों की चर्चा करते हुए उन्होंने वन्दनीया माताजी से कभी कहा था, उन्हें हिमालय जाकर अपने पूर्व जन्मों की स्थानों के साथ उनकी मधुर स्मृतियाँ उभर आयीं। उन्हें अपने चिर-परिचित घर की तरह लगा। जो रास्ते, घाटियाँ, परिस्थितियाँ स्थानीय लोगों तक को मालूम नहीं थीं, उन्हें अनायास मालूम पड़ गयीं। शायद यही कारण रहा होगा कि आठ वर्ष की आयु में घर से हिमालय भागने की धुन सवार हुई थी।

और जब पहली बार उन्हें स्वप्नों में देखे गए श्वेत धवल शिखर को प्रत्यक्ष रूप से देखने, छूने, अहसास करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो वे भावविह्वल हो गए। यात्रा की अनेक कठिनाइयों को पार करते हुए उन्होंने तपोवन पार किया। आगे पहाड़ियों की ऊँची शृंखला शुरू होती थी। उस शृंखला को पार कर आगे जाना था। पास में कोई नक्शा या संकेत जैसी कोई चीज नहीं थी। लेकिन लगा नहीं कि कहाँ भूलना-भटकना पड़ा हो। अन्तः-प्रेरणा इस तरह मार्गदर्शन करती रही, जैसे यह रास्ता पहले से ही देखा हुआ हो।

तपोवन से आगे की पहाड़ियों की शृंखला समाप्त हुई। गोमुख तक तो कुछ साधु-सन्त मिलते गए-लेकिन उसके आगे का क्षेत्र सर्वथा जन-शून्य था। जो मिले उसमें एक महात्मा रघुनाथ दास थे। वे अन्न नहीं लेते थे। गर्मी पड़ती तो उस क्षेत्र में हरे पत्ते मिल जाते थे। सर्दी में जब वनस्पतियाँ मुरझाने लगतीं, तो वे इन रूखी पत्तियों को आलू के साथ मिलाकर वर्षों से अपना काम चला रहे थे। उन्होंने गुरुदेव को बताया कि रास्ते में मिलने वाले पत्तों और फलों को बिना समझे-बूझे चखने की जरूरत नहीं। क्योंकि स्वाद में कोई पत्ता या फल मधुर या सुस्वादु लगने पर भी मुसीबत खड़ा कर सकता है। हो सकता है वह विषैला ही हो।

आगे एक संन्यासी स्वामी तत्वबोधानन्द मिले। वे सर्दी हो या गर्मी, खुले में ही रहते। कुटिया बना रखी थी, लेकिन उसका इस्तेमाल कम ही करते-कभी-कभार कोई भूला-भटका आ जाता तो दयावश उसे ठहरा देते। इनकी तपस्या एवं सदाशयता की सराहना करते हुए गुरुदेव आगे बढ़ गए। तपोवन के आगे गंगा ग्लेशियर से सटे हुए गौरी सरोवर पहुँचकर पूज्य गुरुदेव किन्हीं अनजानी स्मृतियों में खोने लगे। उन्हें ऐसा लगा जैसे वे यहाँ पहले भी कई बार आ चुके हैं। लेकिन फिर चेतन मन ने कहा कि हिमालय क्षेत्र की यह पहली यात्रा है। सरोवर की सुन्दरता निहारते हुए वे आगे बढ़े और चलते हुए नन्दन वन कब आ गया, कुछ पता ही न चला।

वहाँ पहुँचकर उन्हें ऐसा अनुभव हुआ, जैसे रोमांच से किसी ने पर्दा हटा दिया हो। अभी एक कदम दूर जिनके संकेत-चिन्ह तक नहीं दिखाई देते थे, वहीं विलक्षण दृश्य दिखाई दे रहे थे। पूरी घाटी में वेदमन्त्र गूँज रहे हैं-कहीं-कहीं यज्ञ धूम भी उठ रहा है। शास्त्रों एवं ग्रन्थों में वर्णित ऋषियों एवं देवताओं के दृश्य साकार हो गये। पलक झपकते ही प्रस्तुत हुआ यह दृश्य मायावी लग रहा था। आँखों पर विश्वास नहीं होता था। ऐसा भी नहीं था कि स्वप्न देख रहे हों। अब तक सम्पन्न हुई यात्रा की छोटी-से-छोटी बात याद थी। जाँचने के लिए एक बार पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि झील में वैसी ही लहरें उठ रही थीं और पानी हिलोरें ले रहा था। मन्त्र ध्वनि तब भी कानों में गूँज रही थी। नन्दनवन की ओर फिर मुड़े तो वैसा ही यज्ञ धूम्र यहाँ-वहाँ उठ रहा था। हवन कुण्ड में अग्नि की ज्वालाएँ भी उठ रही थीं।

अभी वह समझने के लिए बुद्धि पर जोर डाले इसके पहले ही सुदीर्घ दिगम्बर काया प्रकट होती दिखाई दी। उनके गुरुदेव सामने उसी रूप में खड़े थे, जिसे उन्होंने अपने घर में पूजा के समय देखा था। उनके भक्तिपूर्ण प्रणाम के उत्तर में उनके होठों पर मन्द-सी मुसकान फैल गई। उनके कौतूहल का निराकरण करते हुए दादा गुरुदेव ने कहा- तुमने जो दृश्य देखा, वह चेतना के चतुर्थ आयाम का है। हिमालय का वास्तविक और रहस्यात्मक सौंदर्य साधारणजन की आँखों से दूर है। इसे तो कोई बिरले समर्थ साधक अथवा जिन पर हिमालय निवासी दिव्य सन्तों की कृपा हो- वही देख पाते हैं।

विश्राम आदि के पश्चात् अगले दिन परमपूज्य गुरुदेव अपने मार्गदर्शक के साथ चेतना के चतुर्थ आयाम में दृश्य हिमालय के रहस्य का अवलोकन करते हुए आगे बढ़े। इस समय वे अपने गुरुदेव के साथ ही आकाश मार्ग से जा रहे थे। उनका शरीर धरती से पर्याप्त ऊपर था। इसी क्रम में वे उन गुफाओं तक पहुँचे जो वहाँ के सिद्ध पुरुषों की तपस्थली थी। अब ये ऋषिगण अपने सूक्ष्म शरीरों में थे। हालाँकि कुछ ने अपने स्थूल शरीर भी बनाए रखे थे। जिन सन्तों से मुलाकात हुई इनमें से किसी से भी बैखरी वाणी में बातचीत नहीं हुई। जो भी बात हुई वह सिर्फ परावाणी में।

जिन दिव्य सन्तों का सान्निध्य पर्याप्त समय तक तथा अधिक घनिष्ठ रूप से मिला उनमें से गर्ग मुनि, ऋषि धौम्य, सन्त पुण्डलिक, बाबा नरहरिदास, जीवानन्द, सिद्धेश्वर गिरि, पवहारी तथा स्वामी कृष्णानन्द प्रमुख थे। इन सबसे मिलकर उनको यह बोध हुआ कि वे भी इसी दिव्य परिवार का अभिन्न अंग हैं। इनके अलावा और भी दो दर्जन से ज्यादा सिद्ध सन्तों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इसी परिचय क्रम में पता चला कि गोविन्दपाद वही है जिन्होंने शंकराचार्य को समर्थ और योग्य बनाया था। इस परिचय में उन दिनों की स्मृतियों को साकार रूप दे दिया। इसी तरह जीवानन्द अपने में बौद्ध काल की अनुभूतियों को समेटे हुए थे। सबसे ज्यादा स्थूल और घनीभूत सान्निध्य स्वामी कृष्णानन्द से मिला। सामान्यजन के लिए प्रायः मौन रहने वाले कृष्णानन्द गुरुदेव के लिए पर्याप्त मुखर थे। अखण्ड-ज्योति के पाठक जानते ही होंगे कि इन्हीं स्वामी कृष्णानन्द ने महामना मालवीय जी के आग्रह पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी थी।

हिमालय के इन सभी दिव्य सन्तों का सान्निध्य पूज्य गुरुदेव की प्रत्येक हिमालय यात्रा में बना रहा। हर यात्रा उनके जीवन में अनेकों रहस्यपूर्ण एवं आश्चर्यजनक प्रसंग जोड़ती गयी। इन प्रसंगों की चर्चा करते हुए वे वन्दनीया माताजी से कहा करते थे कि हिमालय के दिव्य वातावरण में इन दिव्य सन्तों के साथ रहने से जीवन में दिव्य-स्फुरणा का संचार होता है। एक यात्रा में उन्हें अद्भुत अनुभूति हुई। पशु-पक्षी छोटे जीव-जन्तु यहाँ तक वृक्ष पौधों से भी संवाद स्थापित हो गया। कितने ही शाकाहारी और माँसाहारी पशु उनके घनिष्ठ मित्र हो गए। एक मादा रीछ तो बहुत ही हिल गयी। वह अपने छोटे बच्चों को झोंपड़ी के पास छोड़कर आहार की तलाश में चली जाती। बच्चे उनके पास में खेलत-उछलते रहते। पहले उस क्षेत्र में माँसाहारी पशु शाकाहारियों को आये दिन मारते खाते रहते थे, पर जितने दिन पूज्य गुरुदेव का वहाँ रहना हुआ, एक भी ऐसी घटना नहीं घटी।

यह स्थिति घर वापस लौटने तक बनी रही। अखण्ड-ज्योति संस्थान में पूज्य गुरुदेव के आस-पास के पशु-पक्षी उनके आस-पास फुदकने में प्रसन्नता अनुभव करते। हिमालय प्रवास में यह दशा इतनी सघन थी कि वन्य प्रदेश के सारे प्रणी उनके अपने स्वजन हो गये थे। कहते हैं कभी भरत सिंहनी के बच्चों के साथ खेलते थे, शिवाजी ने सिंहनी को दूहा था, संत ज्ञानेश्वर ने भैंसे से वेद उच्चारण कराये थे। ऋषियों के आश्रम में गाय और सिंह एक ही घाट पर पानी पीते थे। ये सारी कथाएँ एक साथ पूज्य गुरुदेव के हिमालय प्रवास में साकार हो उठती थीं।

इसी तरह अपने प्रवास काल में जब वे एक बार कुछ जड़ी-बूटियों की खोज में रास्ता भटक गये और अपने स्थान से बहुत दूर सम्भवतः बीस मील आगे निकल गये। रात बहुत हो गयी। हिंस्र पशुओं की आवाज गूँजने लगी। ऐसे समय में हिमालय के एक दिव्य देहधारी देवपुरुष ने उन्हें हाथ पकड़कर पाँच-सात मिनट में ही यथास्थान पहुँचा दिया। एक बार वर्षा के पानी से उनका निवास सब ओर से घिर गया। खाद्य पदार्थ सभी समाप्त हो गये। इसी समय हिमालय के एक सिद्ध सन्त का ज्योतिर्मय शरीर दिखाई पड़ा, उसने हाथ के इशारे से जमीन खोदने का संकेत किया। जैसे ही उन्होंने वहाँ जमीन खोदी-एक ऐसा मीठा और स्वादिष्ट कन्द निकला, जिसका वजन तकरीबन बीस सेर था। इससे कई दिनों तक आराम से निर्वाह किया जा सकता था।

एक बार गुरुदेव ने सारी जरूरत भर की निर्वाह राशि किसी विपत्तिग्रस्त को दे दी। पास में कुछ भी न रहा। लेकिन दूसरे दिन वहाँ की किसी अज्ञात शक्ति की अनुकम्पा से सिरहाने कामचलाऊ राशि मिल गई। उस क्षेत्र में निवास करने वाली दिव्य-आत्माओं का आभास और उनसे भेंट के सुयोग की कथाएँ कुछ ऐसी हैं कि उन अद्भुत अनुभवों को सुनकर किसी को जादू तिलस्म जैसी बातें याद आ जाएँ, पर वस्तुतः न तो इनमें अत्युक्ति हैं न अतिशयोक्ति। लेकिन भला उनके जैसा उच्च व्यक्तित्व ऐसी कौतूहल-वर्धक कथाएँ गढ़कर किसी को भ्रमित करने की चेष्टा क्यों करेगा ? फिर ये बातें उन्होंने सिर्फ वन्दनीया माताजी को ही बतायी थीं। इतने समय बाद इनकी चर्चा अखण्ड-ज्योति की इन पंक्तियों में की जा रही है। वह भी सिर्फ इसलिए कि हिमालय की दिव्यता को समझाया जा सके।

पूज्य गुरुदेव अपनी हिमालय यात्राओं में जिन सात अन्य विशेष विभूतियों के में आये, उनकी सृष्टि की सूक्ष्म व्यवस्था के संचालन में अतिमहत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने ही अपने श्रीमुख से अपने निकट स्थजनों में किसी प्रसंगवश बताया था कि जिस तरह विभिन्न राष्ट्रों का कामकाज राष्ट्रपति-प्रधानमन्त्री एवं मन्त्रिमण्डल के सदस्य मिलजुलकर संपर्क चलाते हैं, उसी तरह सूक्ष्म जगत की भी एक सुचारु व्यवस्था है। यह कार्य सात ऋषिकल्प आत्माएँ करती हैं। इनका काम भगवान एवं माँ प्रकृति के कार्य में आवश्यक सहयोग देना है।

इन विशिष्ट दिव्यसत्ताओं का कार्य कुछ वैसा ही है, जैसी कि चर्चा पौराणिक कथाओं में सप्तऋषियों के संदर्भ में की गयी है। इनमें से एक हैं साउथ मारिया, जो दिखने में तकरीबन 70 वर्ष की आयु की महिला लगती हैं। ये अद्भुत तपस्वी है, अपनी तपस्या के कारण इन्हें हिमालय के दिव्यसत्ताओं के बीच श्रद्धास्पद सम्मान प्राप्त हैं। सूक्ष्म व्यवस्था के विशिष्ट घटकों में अन्य दिव्य सन्त हैं, अपने दादा गुरुदेव, स्वामी सर्वेश्वरानन्द जी, इनका कृशकाय शरीर अग्नि की प्रदीप्त ज्वाला की भाँति आभा बिखेरता है। इसके अलावा अन्य विभूति हैं, लाहिड़ी महाशय, जिन्होंने क्रियायोग का प्रवर्तन किया। मोहन साईं इस दिव्यमण्डल के अन्य घटक है, जो सतत् तप करते हुए अपनी ऊर्जा से जगत को अनुप्राणित करते रहते हैं। इनके अलावा हातोसाना और अशोक गिरि हैं। ये छहों दिव्य आत्माएँ प्रकृति की अधीश्वरी शक्ति की सहायक हैं। यह अधीश्वरी शक्ति ही सातवें ऋषि की भूमिका सम्पन्न करती हैं। ये सभी सात इन दिनों भगवान प्रज्ञावतार की सूक्ष्म-व्यवस्था के मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण घटक हैं।

गुरुदेव के अनुसार इन सातों के सम्मिलन का स्थान स्थूल दृष्टि से बद्रीनाथ से केदारनाथ जाने का जो दुर्गम पगडंडी मार्ग प्रायः बीस हजार फीट की ऊँचाई पर है, उससे एकदम नीचे बीच में सप्त गुफाओं वाला क्षेत्र पड़ता है। सामान्यक्रम से किसी मनुष्य का वहाँ तक पहुँचना मुश्किल है। पहुँचने पर भी ये गुफाएँ तो देखी जा सकती हैं लेकिन वहाँ की इन शक्तियों को देख पाना सम्भव नहीं है। वैसे इन गुफाओं को न तो दूरबीन द्वारा दूर से न ही ग्लेशियो-लाजिस्ट गणों द्वारा ही देखा जा सकता है, लेकिन यथार्थ अवलोकन तो उसी के द्वारा सम्भव है जिसकी चेतना चतुर्थ आयाम को देख पाने में समर्थ है। गुरुदेव के अनुसार यथार्थ हिमालय का रहस्यबोध व्यक्ति को इसी आयाम में जाकर मिल सकता है।

हिमालय की दिव्य सत्ताओं के साथ गुरुदेव के अनेकों रहस्यमय प्रसंग हैं, हों भी क्यूँ न, आखिर वे भी तो इसी परिवार के सदस्य हैं। उन्होंने अपने शरीर छोड़ने से पहले वर्ष 1984 में अपने पाँच सूक्ष्म शरीरों का जिक्र करते हुए लिखा था कि उनका एक सूक्ष्म शरीर हिमालय में अनवरत तप करेगा। उनकी यह तप-प्रक्रिया आज भी मन्द नहीं पड़ी है। जिनके पास दिव्य दृष्टि है वे आज भी देख सकते हैं कि अपने सूक्ष्म शरीर से आज भी हिमालय की दिव्य सत्ताओं एवं सन्तों के संग नवयुग के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न कर रहे हैं।


गुरु की सेवा ने दिलाई मुक्ति

“तू इस मल-मूत्र के पात्र से इतना मोह क्यों करता है?” स्वामी निरन्जनानन्द ने अपनी सुश्रूषा में लगे सेवाराम को प्यार भरी झिड़की दी- ‘शरीर को महत्व देना छोड़। यह तो आजकल में नष्ट होने वाला ही है। साधु तू किसलिए हुआ इस पर विचार कर। ’

‘गुरुदेव ! मैं अपने आप तो साधु हुआ नहीं। आपने ही मुझे ये गेरुए कपड़े दिए हैं। आप जानों कि क्यों दिये ये कपड़े आपने मुझे।’ सेवाराम गुरु से काफी मुहलगा हो गया था। कोई भी बात कहने में उसे संकोच नहीं होता। उसे तब बहुत बुरा लगता, जब गुरुदेव उसे अपनी सेवा से रोकना चाहते। इस समय भी वह झुँझलाए हुए स्वर में कह रहा था-आप के लिए आपका यह शरीर कैसा है। यह आप जानों। मैं आत्मा-परमात्मा तो कुछ समझता नहीं। मुझे मेरे नारकीय जीवन से आपने अपने इसी शरीर से उद्धार किया है। इसलिए मैं इसकी थोड़ी सेवा कर लूँ इतना ही मेरे लिए बहुत है।’

‘सेवाराम’ यह नाम भी उसका स्वामी निरन्जनानन्द ने ही रखा है। माता-पिता का रखा उसका नाम क्या है, पता नहीं। किन्तु लोगों में यह दारुणसिंह के नाम से प्रख्यात रहा है। इस कस्बे का सबसे भयंकर गुंडा था दारुणसिंह। जुए का अड्डा चलाता था वह। थाने के दरोगा सिपाही जैसे उसकी जेब में रहते हों। चोरी, मारपीट, शराब और दूसरे अनेक उपद्रव, क्या-क्या नहीं किया उसने। कस्बा ही नहीं आसपास के अनेक गाँव के लोग उसके नाम से काँपते थे।

प्रचण्ड शरीर, उद्धत स्वभाव दारुणसिंह रोगशय्या पर पड़ा। अनियन्त्रित भोग का परिणाम ही असाध्य रोग है। उसके पीछे लगे रहने वाले, उसकी हुँकार पर प्राण देने का दावा करने वाले, उसके अनुगामी पट्ठे आँख चुरा गये। उसके पास कोई पानी देने को फटकने वाला नहीं था। जब उसके देह में दुर्गन्ध भरे घाव फूट निकले।

स्वामी निरन्जनानन्द उन दिनों उसी कस्बे से थोड़ा दूर पास के ही जंगल में रहते थे। स्थानीय लोगों ने वहीं उनके लिए फूस की कुटिया बना दी थी। इधर कुछ सालों से उनका शरीर काफी वृद्ध हो गया था। जिसकी वजह से अब वह प्रव्रज्या-पर्यटन नहीं कर पाते। घूमते हुए कई साल पहले वह यहाँ आ गये थे। स्थानीय श्रद्धालुओं के आग्रह ने उन्हें रोक लिया। जड़ी-बूटियों का काफी कुछ ज्ञान होने के साथ दूसरों की सेवा उनके स्वभाव का अभिन्न अंग था।

उनके इसी स्वभाव ने उन्हें तब विचलित कर दिया, जब उन्होंने गाँव वालों से सुना कि गुंडा दारुणसिंह अपना कर्मफल भोग रहा है। स्वाभाविक था कि कस्बे के उत्पीड़ितजन दारुणसिंह की इस यन्त्रणा ने प्रसन्नता का अनुभव करते। वे स्थान-स्थान पर इसी प्रकार की चर्चा करते रहते थे।

यह चर्चा जब स्वामी निरंजनानन्द के कानों में पड़ी तो उनका सन्त हृदय द्रवित हो गया। वे उसी समय दारुणसिंह के समीप चल पड़े। स्वामीजी के संकोचवश लोगों ने उस दुर्गन्धित रोगी को किसी प्रकार स्वामीजी की कुटिया पर पहुँचा दिया। इसके बाद रात-दिन एक करके स्वामीजी ने जो सेवा-सुश्रूषा उसकी की, वह सेवा, वह तत्परता किसी स्नेहमयी, अत्यन्त स्नेहवत्सला माता में पुत्र के प्रति ही देखी जाती है।

दारुणसिंह स्वस्थ हो गया। धीरे-धीरे सबल भी हो गया, किन्तु फिर वह दारुणसिंह नहीं हुआ। स्वामी जी ने उसका नाम रख दिया। उसे गेरुए कपड़े दे दिये। वह कुटिया तथा वहाँ आस-पास की भूमि की स्वच्छता, साफ-सफाई में लग गया। अपने बचे हुए समय का उपयोग वह स्वामी जी की सेवा में करता। स्वामीजी के लिए जो भिक्षा आती, उसी में उसका भी निर्वाह हो जाता। रात-दिन में कठिनाई से तीन-चार घण्टे ही चटाई पर पीठ टेकता है। खड़े पैर निरन्तर सेवा-दूसरा कोई काम ना हो तो स्वामी जी के शरीर पर बैठने वाली मक्खियों को ही रुमाल लेकर उड़ाता रहेगा।

अपनी भावभरी गुरु सेवा के प्रभाव से उसके स्वभाव में भी पर्याप्त बदलाव आ गया। हर किसी से झगड़ा-मारपीट करने की जगह उसमें पर्याप्त विनम्रता आ गई थी। उसे पीड़ा तब होती, जब उसे लगता कि गुरुदेव अपने स्वास्थ्य का ध्यान न रखकर श्रद्धालुओं की संतुष्टि के लिए बहुत अधिक देर तक बैठे रहे हैं और बोलते रहे है। ऐसे में वह आगन्तुकों को बड़ी नम्रता से समझाता। यदा-कदा तो उसके आँसू झलक पड़ते।

स्वामी जी बहुत चाहत थे कि सेवाराम कुछ साधन-भजन करे। कम से कम सत्संग के समय शान्त बैठकर श्रवण तो करे, किन्तु सेवाराम का कहना था, यह सब उपदेश, ज्ञान-भक्ति की बातें मेरी समझ में आती नहीं हैं। इनमें माथा कूटने के बदले कुटिया की, आस-पास की घास छीलकर स्वच्छ कर लेना मुझे अधिक आवश्यक प्रतीत होता है।

लेकिन स्वामीजी अत्यन्त वृद्ध थे। उन्हें दिव्यदृष्टि प्राप्त थी। उन्होंने ठीक ही कहा था कि उनका वृद्ध शरीर आज नहीं तो कल जाने ही वाला है। सेवाराम को उनकी सेवा का अवसर केवल सात महीने ही मिल सका कि स्वामी जी का निर्वाण हो गया।

सेवाराम के लिए गुरु सेवा ही सब कुछ थी। स्वामी श्री निरन्जनानन्द के बिना उसे अपना जीवन भार लगने लगा। अपनी तड़प, बेचैनी, अकुलाहट को वह किससे कहता? शौक के अतिशय आवेग से उसके हृदय की धड़कन बन्द हो गई। वह जीवन भर का अपराधी-यमराज के दूत उसे संयमनी पकड़ ले गये। चित्रगुप्त ने उसके विगत सारे कर्मों का लेखा-जोखा करके उसके लिए अनेक नरकों का विधान किया। इतने पर भी उसके जीव को जब यमराज ने आसन से उठकर अभिवादन किया तो चित्रगुप्त चौंके। कहीं उनका विधान त्रुटिपूर्ण तो नहीं हैं?

उन्होंने जिज्ञासा की, भगवन्, इस मनुष्य का ऐसा कौन-सा पुण्यकर्म है, जिसके फलस्वरूप संयमनी के स्वामी अपनी प्रणति से उसे सम्मानित करते हैं।” चित्रगुप्त का प्रश्न उचित था।

“इन महानुभाव का कर्म विवरण दिखायेंगे आप।” धर्मराज ने प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर वह विवरण ले लिया अपने हाथ में। चित्रगुप्त को तब और आश्चर्य हुआ, अब आगत जीव के लिए नारकीय यन्त्रणा का जो विधान किया गया था उसे यमराज ने कुछ और बढ़ा दिया।

“ये पुण्यकर्म अन्य सेवकों तथा प्रशंसकों के विवरण में सम्मिलित होंगे।” धर्मराज ने चित्रगुप्त को चौंकाने वाला आदेश दिया। स्वामी निरन्जनानन्द तत्वज्ञ पुरुष थे। संचित उनका ज्ञान समकाल दग्ध हो चुका था। प्रारब्ध प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने भोगा था, किन्तु ज्ञानोदय काल में उनके शरीर से जो कर्म हुए थे उनमें से शुभकर्म उनके सेवकों-प्रशंसकों तथा अशुभ कर्म निन्दक-उत्पीड़कों को नियमानुसार प्राप्त होते थे। असंगकर्ता का स्पर्श तो ये कर्म कर नहीं सकते थे। स्वामीजी की सच्चे मन से सेवा की थी सेवाराम ने और अब यमराज कह रहे थे कि स्वामीजी के जो शुभकर्म विवरण में सम्मिलित किए गए हैं, उन्हें अन्य लोगों के विवरण में सम्मिलित किए गए हैं, उन्हें अन्य लोगों के विवरण में मिला दिया जाए।

चित्रगुप्त इस आज्ञा से अतिशय चकित हुए थे।

“ये महानुभाव यहाँ से ही निर्वाण प्राप्त करेंगे।” चित्रगुप्त को चकित-स्तब्ध खड़े देखकर धर्मराज ने कहा - “इसीलिए मैंने इन्हें खड़े होकर अभिवादन करके सदस्य किया है।”

‘ऋतं ज्ञानेन मुक्ति” श्रुति कहती है कि ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं होता और इस सेवाराम ने तो कभी श्रवण तक नहीं किया। चित्रगुप्त ने पूछ लिया-इनकी मुक्ति सम्भव है क्या?”

“असम्भव हो तो अपने लोक के यन्त्रणा भोग के पश्चात् आप इन्हें किस देह को देने की स्थिति में हैं?” यमराज ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ही कर लिया।

चित्रगुप्त ने कर्म-विवरण सावधानी से देखना प्रारम्भ किया। जब कोई प्राणी नरकगामी हुआ है, तब नरक यातना के पश्चात उसे कौन सा पार्थिव देह प्राप्त होगा, यह निर्णय अभी ही हो जाना चाहिए था। यदि यमराज इस प्राणी को प्रणाम करके चौंका न देते तो अब तक उसके आगामी जन्मों का निश्चय अपने-आप हो चुका होता।

मनुष्य अपने जीवन में एक दिन, एक मुहूर्त्त में ऐसे अशुभ या शुभ कर्म कर सकता है कि उसका फल उसे लाखों-लाखों जन्मों में भोगना पड़े। पृथ्वी के सभी प्राणियों के शरीर अत्यन्त दुर्बल हैं। यहाँ एक छोटी सीमा तक ही सुख या दुःख भोगा जा सकता है। कोई जीभ को तृप्त करने के पीछे ही पड़ जायेगा तो कहाँ तक? ज्यादा से ज्यादा पेट भरने तक। अधिक दिन ऐसा करे तो रोगी हो जायेगा। भोजन ही छूट जायेगा उसका।

जब मनुष्य के अशुभ कर्म इतने अधिक होते हैं कि संसार की किसी देह में उसका फल भोगना सम्भव न हो तो वह नरक जाता है।नरक में उसे मिलती है यातना देह। लाख-लाख बार काटने, जलाने, पीसने पर भी वह देह न तो कटती, जलती है और नहीं पिसती है।केवल उस देह में आबद्ध जीव को कटने, जलने अथवा पिसने की दारुण यंत्रणा का अनुभव होता रहता है। इस प्रकार जब उसके कर्मभोग इस सीमा तक रह जाएँ कि पृथ्वी के पशु-पक्षी कीट-पतंग आदि के देहों में उसका फल भोगना सम्भव हो, तब भी पृथ्वी पर जन्म पाता है।

यही बात अत्यन्त शुभ कर्मों के सम्बन्ध में है। वे इतने अधिक हों कि उनका सुखभोग किसी पार्थिव देह में मिलना सम्भव न हो तो वह स्वर्ग जाता है। स्वर्ग में उसे ‘भोगदेह’ मिलती है। इस देह में न तो तृप्ति है और न ही रोग। यहाँ निरन्तर भोग का आनन्द मिलता रहेगा और जब भोग इतने थोड़े रह जाएँ कि पार्थिव देह में भी उन्हें भोग लेना सम्भव हो, तब पृथ्वी पर जन्म होता है।

यह सब तो है, किन्तु एक विशेष नियम मनुष्य के लिए हैं। मनुष्य मरते समय जो चिन्तन करता है, पृथ्वी पर उसे प्रथम जन्म उस चिन्तन के अनुसार देने के लिए कर्म नियन्ता विवश है। लोकगुरु पूर्णआवतार भगवान श्रीकृष्ण ने भी यही घोषणा की है-

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

इसीलिए पितृलोक बना है। मान लीजिए कि एक व्यक्ति किसी का चिन्तन करते हुए मरता है। मृत्यु के उपरान्त वह अपने स्वर्ग या नरक के भोग प्राप्त करके उन्हें पूर्ण कर लेता है। तब उसे पृथ्वी पर उसके संसर्ग में जन्म लेना चाहिए, जिसका चिन्तन करते हुए वह मरा है। लेकिन जिसका चिन्तन करते हुए वह मरा है वह जीव अभी स्वर्ग या नरक में है। तब इस दूसरे जीव को पितृलोक में प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। एक प्रकार का प्रतीक्षालय है पितृलोक।

“यह जीव नरक आया है। अतः नरक के दुःख भोगकर इसे किसी अशुभ योनि में ही जाना चाहिए।” चित्रगुप्त ने कर्म विवरण देते हुए सहज भाव से कहा। नर्कभोग समाप्त करने पर भी जीव के पास अशुभ कर्म ही तो शेष रहेंगे। अतः धरती पर कीट-पतंग पशु-पक्षी तथा अन्य यन्त्रणा भोगते हुए प्राणी नरक से आये हुए जीव हैं, यह अनुमान सरल है। यहाँ यश, ऐश्वर्य तथा आनन्द-भोग तो स्वर्ग से आने वालों का भाग है। इसलिए चित्रगुप्त का चिन्तन ठीक दिशा में था।

“आप इन महानुभाव के अन्तिम चिन्तन पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।” धर्मराज ने चित्रगुप्त को दिशा-संकेत दिया।

“ऐं।” चित्रगुप्त चौंके-इसने तो अपने गुरुदेव का चिन्तन करते हुए शरीर छोड़ा है और स्वामी निरन्जनानन्द जी तो निर्वाण प्राप्त कर चुके।”

“अब विधानतः हम बाध्य हैं कि हम इनको वह प्रदान करें, जो इनका अन्तिम चिन्तन था।” धर्मराज ने सूत्र सुना दिया।

“जो प्रकृति के क्षेत्र से परे पहुँच गए उन्हें या उनका सान्निध्य हम किसी को कैसे दे सकते हैं?” चित्रगुप्त ने मस्तक झुका लिया।

“जब अन्तिम चिन्तन के अनुसार जन्म हम नहीं दे सकते, विवश होकर हमें इन्हें मुक्त करना पड़ेगा।” धर्मराज ने बात स्पष्ट की जो अपने मुक्तात्मा सद्गुरु का चिन्तन करता, उनमें आसक्त प्राणी प्राण त्याग करता है, तो मोक्ष उसका अधिकार बन जाता है।

“किन्तु इन्हें ज्ञान तो ..।” चित्रगुप्त ने शंका की।

“ज्ञान तो श्रवण सापेक्ष है और मैं यहाँ इसीलिए नियुक्त हूँ कि कोई अधिकारी उपस्थित होने पर उपदेश करूँ । यमराज महाभागवत और ज्ञानी हैं, यह बात चित्रगुप्त से छिपी नहीं थी। अतः ज्ञानोपदेश यदि वे करना चाहेंगे तो सहज समर्थ हैं इसमें।

“यदि ये महानुभाव यहीं न आकर स्वर्ग अर्थात् अमरावती गए होते ?”

चित्रगुप्त के प्रश्न का मतलब था कि यदि सेवाराम अपने जीवन में शुभकर्मा होते और इसी प्रकार स्वामी निरन्जनानन्द का चिन्तन करते देह त्याग करते तो यमलोक तो आते नहीं। शुभकर्म का फल भोगने स्वर्ग जाते। स्वर्ग सुख भोगने के पश्चात् उनका क्या होता?

“जीव अपने शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप नरक, स्वर्ग अथवा ब्रह्मलोक तक जाता है। ऊपर के अन्य लोकों में अथवा नीचे रसातल, पाताल आदि में भी जा सकता है।” धर्मराज का स्वर गम्भीर हो गया-इन लोकों में मैं, देवराज इन्द्र, भगवान ब्रह्मा, ऋषिगण अथवा ऊर्ध्व लोकों में भक्तश्रेष्ठ प्रह्लाद, दानवेन्द्र मय, भगवान शेष प्रभृति कारक, पुरुष इसलिए तो हैं कि यदि कोई किंचित् कर्मशेष अथवा तत्त्ववेत्ता गुरु में आसक्त प्राणी वहाँ आ जाए तो उसे वहाँ तत्वोपदेश प्राप्त हो सके। उसे संसार में भेजना विधान के विपरीत है।”

गुरुदेव और अन्तिम काल में सद्गुरु चिन्तन की इस महिमा पर चित्रगुप्त ने सिर झुका लिया। वह गहन चिन्तन में निमग्न हो गए।


सैनिक एवं संन्यासी की उभयपक्षीय विशेषताएँ थीं उनमें

जुझारू सैनिक और निस्पृह संन्यासी का सम्मिश्रण शायद ही कहीं देखा जाता होगा। कारण कि संन्यासी की कोमलता, करुणा उसे दयालु, श्रमशील, एवं उदार प्रकृति का बनाए रखती है। अपनी वैराग्य वृत्ति के कारण प्रायः वह सब ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देता है और जो कुछ हो रहा है सो ठीक मान लेता है। ऐसे लोग न तो किसी से लड़ पाते हैं और न ही दुस्साहस करने लायक संकल्प ही कर पाते हैं। इसके विपरीत जिनमें संघर्ष वृत्ति है, जो अपनी प्रकृति से सैनिक हैं, परन्तु सीमित और संकीर्ण स्वार्थ के लिए। जो कुछ अर्जित उपार्जित किया गया उसे सर्वहित और लोक हित के लिए त्यागने का वैराग्य भाव भी उनमें नहीं होता। शायद यही कारण हैं कि आमतौर से यह माना जाता है कि जो आध्यात्मिकता के क्षेत्र में चला गया वह साँसारिक जीवन के लिए निरर्थक हो गया। इसी प्रकार जो संघर्षशील हैं, उन्हें संसारी कहकर नाक-भौं सिकोड़ी जाती है। वे आध्यात्मिक पथ के लिए अनधिकारी और अयोग्य समझे जाते हैं।

जबकि वास्तविकता कुछ और ही है। खरा आध्यात्मिक जीवन वही जी सकता है, जिसके अन्दर संघर्ष एवं त्याग की दोनों क्षमताएँ हों। प्रगति चाहे आत्मिक हो या भौतिक, दोनों ही दिशाएँ संघर्ष चाहती हैं। आत्मिक जीवन में अपने-अपने दोष-दुर्गुणों कुसंस्कारों और प्रलोभनों-अवरोधों से लड़ना पड़ता है। गीता का प्रशिक्षण ही अन्तरंग जीवन में पाँच प्राणों को-सौ दोष-दुर्गुणों के कौरव-पाण्डवों के रूप में लड़ा देने के लिए प्रादुर्भूत हुआ। आत्मिक साधना को भी समर कहा जाता है। दुर्गा सप्तशती में महिषासुर, मधुकैटभ और शुम्भ-निशुम्भ के रूप में स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर में घुसे बैठे असुरों को आत्मशक्ति के द्वारा निरस्त करने की शिक्षा है। इस तरह संघर्ष आत्मिक प्रगति का मुख्य आधार है। भौतिक जीवन का तो कहना ही क्या? यहाँ प्रगति तो दूर अपने अस्तित्व को बनाए रखना भी बिना संघर्ष के सम्भव नहीं। संघर्ष से ही जीवन के हर क्षेत्र में विभूतियाँ और उपलब्धियाँ बटोरी जाती हैं, परन्तु त्यागवृत्ति के बिना इनका ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ उचित उपयोग सम्भव नहीं ।इन दोनों विरल गुणों का मेल प्रायः कहीं नजर नहीं आता। लेकिन अपने अतीत में इन्हीं दोनों गुणों के मेल के कारण भारतीयता समस्त विश्व में गौरवान्वित हुई और आध्यात्मिकता को देवविद्या, संजीवनी विद्या और ब्रह्मविद्या के नाम से पुकारा गया।

परमपूज्य गुरुदेव भारत के प्राचीन आध्यात्म-तत्त्वदर्शन एवं आध्यात्म का मूर्तिमान् प्रतिनिधित्व करते हुए अवतरित हुए। वे सच्चे सैनिक थे और सच्चे संन्यासी । अपनी संघर्षवृत्ति का परिचय देते हुए उन्होंने जीवन के हर मोर्चे पर फतह हासिल की। आत्मिक एवं भौतिक परिधि में ढेरों-ढेर विभूतियाँ और उपलब्धियाँ अर्जित कीं, साथ ही अपनी सहज त्यागवृत्ति के वशीभूत होकर इन विभूतियों एवं उपलब्धियों के लाखों-करोड़ों मनुष्यों के जीवन में बिखेर दिया।

वे जानते थे कि वाणी और लेखनी के माध्यम से प्रचार और शिक्षण का कुछ असर तो होता है और लेखनी के माध्यम से प्रचार और शिक्षण का कुछ असर तो होता है और उसकी आवश्यकता भी रहती है। लेकिन उतने भर से काम नहीं चल सकता। प्रभावशाली शिक्षण वह होता है, जो मूर्तिमान् हो। प्रत्यक्ष को देखे बिना प्रेरणा नहीं मिलती। उसका उदाहरण जब तक सामने न आए तब तक श्रेष्ठता के सन्मार्ग पर चलने की किसी को स्फुरणा तक नहीं मिलती, विचार केवल हलचल उत्पन्न करते हैं। उन्हें जब क्रियान्वित किया जाता है। तब लोग अपने आप ही कह उठते हैं, यह है विचार की सार्थकता, देख लो नमूना तुम्हारे सामने हैं।

किसी समय केवल सात ऋषि थे और वे समस्त संसार के सातों द्वीपों का एक-एक करके समग्र नेतृत्व सम्भालते थे। कारण वे जो कहते थे, सो करते भी थे। वाणी से ही नहीं क्रिया से भी वे जनता को दिखाते थे। जो बताना चाहते थे, उसे उन्होंने अपने मन-वचन और कर्म में अति गहराई तक समाविष्ट कर लिया था। यह समन्वय ही उनकी प्रगतिशीलता का मात्र आधार था। विद्या और प्रतिभा का भी मूल्य है। पर जहाँ तक जीवनक्रम बदल देने जैसे घोर कर्म को कराने की, व्यक्ति को पतन के गर्त से निकल कर उत्कर्ष के शिखर पर पहुँचाने की आवश्यकता होती है, वहाँ बाँस के डंडों से काम नहीं चलता। यह सब तो मजबूत कारणों से ही सम्भव होता है। प्राचीनकाल के आत्मवेत्ता अपने को इतना समर्थ और प्रभावशाली बनाते थे कि लोकनेतृत्व कर सकें। इसके लिए वे बुद्धि या प्रतिभा को प्रखर करने में ही नहीं लगे रहते थे, वरन् समग्र व्यक्तित्व को विचार एवं कर्म के समन्वय से प्रचण्ड बनाते थे। भारतीय तत्त्वज्ञान की विश्वव्यापी गौरव-गरिमा प्रभावशीलता एवं सफलता का मूल कारण उसके व्याख्यानों द्वारा अपने जीवन की प्रयोगशाला में अपने कथन की सार्थकता सिद्ध करना ही था। आज वह क्रम टूटा तो वह दर्शन भी बैठ गया, जिसकी अब चर्चा ही शेष रह गई है। उच्च दर्शन की उपेक्षा करके कोई समाज अपनी उत्कृष्टता स्थिर नहीं रख सकता और उसके अभाव में उसे दुर्बल एवं पतित ही होना पड़ेगा। वर्तमान दार्शनिक अवरोध ने कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि जिसका सुधार बिना एक क्षण गवाँए अविलम्ब प्रारम्भ किया जाना चाहिए।

भारतीय तत्त्वदर्शन एवं आध्यात्म के सम्मुख इस जीवन-मरण जैसे अवरोध का विश्लेषण और निराकरण सही रूप से प्रस्तुत करने के लिए गुरुदेव ने न केवल कहा और लिखा बल्कि उसे अपने कर्तव्य का अविच्छिन्न अंग भी बनाया। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि सैनिक और संन्यासी दोनों का एक साथ रह सकना सम्भव है। सम्भव ही नहीं स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। दयालुता का अर्थ अनाचार का संरक्षण नहीं और वैराग्य का अर्थ आलसी और अकर्मण्य हो जाना नहीं है। इसी तरह क्षमा का अर्थ पाप और अनीति को स्वच्छन्द रूप से कुहराम मचाते रहने के लिए छूट देना नहीं है। पापी को भी प्यार किया जा सकता है, पर पाप के प्रति तो निष्ठुरता बरतनी ही पड़ेगी। सन्त की भी पूजा कसाई की भी पूजा। पुण्य की भी जय-पाप की जय ऐसा समदर्शनः तो व्यक्ति को दार्शनिक भूल-भुलैयों में उलझा कर संसार का सर्वनाश ही कर देगा। गुरुदेव ने अपने जीवनक्रम में उन तथ्यों को स्थान दिया जिनमें उनके सैनिक तत्त्व के साथ संन्यासी तत्त्व भी पूरी तरह जुड़ा हुआ है। सैनिक के रूप उन्हें देखा और परखा जाए तो लगेगा कि वे सैनिक पहले और संन्यासी पीछे थे। इसी प्रकार जब उनके संन्यासी गुणों को देखते हैं तो वे ही मुख्य मालूम पड़ते हैं। वस्तुतः दोनों तत्वों का विलक्षण समन्वय उनमें है, इसे संयोग नहीं मान लेना चाहिए वरन् यह समझना चाहिए कि उनकी हर क्रिया लोकशिक्षण के लिए थी और वे यह बताते थे कि सैनिक और संन्यासी के समन्वय से ही अध्यात्म की सर्वांगपूर्णता बनती है।

गुरुदेव के अबोध बचपन की बातों का तो ठीक से पता नहीं, पर जब से वे कुछ समझने-समझाने लायक हुए तब से उन्होंने अपनी साहसिक शूरवीरता को ही आगे रखा। जिस गाँव में वह जन्में थे, उसी गाँव की एक वृद्ध अछूत महिला की सेवा की कहानी से तो अखण्ड-ज्योति के पाठक परिचित ही हैं। आज की स्थिति में ये बातें किसी को सामान्य लग सकती हैं। लेकिन अब से लगभग 75 साल पूर्व का जमाना दूसरा था। उन दिनों छूत-छात अब से अधिक थी। फिर पण्डित-ब्राह्मण तो नहाने-छूने-खाने में ही धर्म को समेटे बैठे थे। ऐसी परिस्थिति में उनके परिवार ने विरोध किया, गाँव के दूसरे लोगों ने उंगली उठायी। नतीजा यह था कि घर में घुसने पर प्रतिबन्ध लग गया। बारह वर्ष का बालक आखिर करता ही क्या ? घर से बाहर उन्हें हाथ में रोटी दी जाती, कोई उन्हें छूता तक नहीं, घुड़साल में चारपाई डाल दी गई। यह सब हुआ पर मेहतरानी बुढ़िया की सेवा तब तक नहीं घटी, जबतक कि वह पूरी तरह अच्छी नहीं हो गयी। बारह वर्ष के बालक का साहस तो देखिए-सारा परिवार-सारा गाँव-सारा समाज एक ओर और बारह वर्ष का बालक एक ओर। बालक प्रह्लाद की तरह अड़ा ही रहा, समय ने इस घटना को भले ही पीछे डाल दिया हो, पर चर्चा बनी रही कि जिसे मनुष्य सही समझे उसके लिए कितना कठोर और दृढ़ होना चाहिए। इसका उदाहरण उन्होंने छोटी अवस्था में किस तरह बहादुरी से प्रस्तुत किया।

सन् 1930 का काँग्रेस संचालित सत्याग्रह आन्दोलन शुरू हुआ। तब तक वे 18 वर्ष के हो चुके थे। उन दिनों आतंक बहुत था। गोली चलने, लम्बी जेल होने, घर-जायदाद जब्त होने की चर्चा हर किसी के मुँह पर थी। गुरुदेव ने निश्चय किया कि अन्याय का प्रतिकार करने के लिए बड़े से बड़ा कष्ट सहना चाहिए। वे सत्याग्रहियों की सेना में भरती हुए। जिन दिन उन्हें जाना था, उससे एक दिन पूर्व ही घर में बन्द कर लिया गया। न जाने के लिए समझाने से लेकर बल प्रयोग तक के सारे उपाय परिवार द्वारा काम में लाए जा रहे थे। पर जो उचित है उस पर से रत्तीभर हटने-टलने की बात स्वीकार नहीं हुई। रात के शौच जाने के बहाने घर की कैद से छूटे। नंगे पैर, एक बनियान और नेकर पहने हाथ में लोटा लेकर घने अंधेरे में रास्ता उलट कर चल दिए और घोर घनी, काली अंधियारी रात मूसलाधार वर्षा के बीच भेड़ियों से भरे घने खार, बीहड़, नदी, नाले पार करते हुए रातों-रात लम्बी यात्रा करके आगरा जा पहुँचे। जब तक घर वाले पता लगाने पहुँचे उससे पहले ही जेल चले गये।

उग्र सत्याग्रहियों में उनकी गणना थी। एक-एक करके तीन बार उन्हें उस अवधि में जेल जाना पड़ा और कुल मिलाकर लगभग चार वर्ष जेल रहे। जुर्माना हुआ, घर का सामान जब्त और नीलाम बार तो बुरी तरह पिटे और एक बार तो घोड़े के पैरों के नीचे कुचले जाने पर इतनी चोट लगी कि जीवन संकट में पड़ गया। गैरकानूनी कलकत्ता काँग्रेस में उत्तर प्रदेश का जत्था लेकर पहुँचे तो वहाँ गोलियों की बौछार से जहाँ कितने ही साथी खेत रहे वहाँ वे आश्चर्य की तरह बच गये। बंगाल की आसनसोल जेल में इन्हें फिर बन्द रखा गया। उन दिनों की दुस्साहसपूर्ण चर्चाएँ जिनमें सन् 42 के करो या मरो आन्दोलन की घटनाएँ भी शामिल हैं कुछ ऐसी हैं जिन्हें सुनते ही पसीना छूटने लगता है। ऐसी घटनाएँ न केवल उनके द्वारा योजनाबद्ध रूप से संचालित होती रही, वरन् स्वयं भी वे उनमें बढ़-चढ़ कर भाग लेते रहे। ऐसा दुस्साहसी व्यक्ति एकान्त में साधना करने वाला महान साधक भी हो सकता है, सहसा विश्वास नहीं होता। भगवद् आराधना करने वाले किसी भी साधक में, संन्यासी में, मृत्यु से अठखेलियाँ करने का इतना प्रचण्ड दुस्साहस हो सकता है यह एक अनोखी बात लगती हैं, पर है सत्य। इन घटनाओं के संदर्भ में परमपूज्य गुरुदेव इतना ही कहा करते थे कि आत्मा की अमरता और मृत्यु को वस्त्र बदलने जैसी सामान्य घटना मानने की गीता की शिक्षा सदुद्देश्य के लिए बड़े से बड़ा दुस्साहस कर गुजरने की ही तो शिक्षा देती है।

गायत्री यज्ञ आन्दोलन उनके द्वारा भारत के ऐतिहासिक आन्दोलनों में से एक है। इसकी विशालता का मूल्याँकन किया जाए तो दाँतों तले उँगली दबानी पड़ेगी कि किस प्रकार उसमें करोड़ों व्यक्तियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और इन व्यवस्थाओं में किस प्रकार करोड़ों रुपये की व्यवस्था सम्भव हुई। साथ ही इस अभियान के अनेक आध्यात्मिक पहलू भी हैं, जो सूक्ष्मजगत को अनुप्राणित करने से सम्बन्ध रखते हैं। पर एक प्रत्यक्ष पहलू सामाजिक क्रान्ति का भी है। भारत की मूल समस्या सामाजिक है। राजनैतिक और आर्थिक समस्याएँ तो उसके साथ जुड़ी हुई हैं। यदि देश में ऊँच-नीच स्त्रियों को प्रतिबन्धित, विवाह शादियों में होने वाले अपव्यय जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर न किया जा सका तो देश का पिछड़ापन कभी दूर न होगा, और राजनैतिक, आर्थिक प्रगति के बावजूद विकास की कोई सम्भावना साकार न होगी। कारण कि इस प्रकार की बुराइयों से जो क्षति निरन्तर होती रहती है, उसे कितनी भी बड़ी विकास योजनाएँ पूरा नहीं कर सकतीं। जब क्षतिपूर्ति तक हमारे प्रयासों से सम्भव नहीं तो प्रगति की बात ही कहाँ बनेगी। इस लक्ष्य को भली-भाँति समझते हुए उन्होंने गायत्री यज्ञ आन्दोलन के साथ सामाजिक क्रान्ति की व्यवस्था को गहराई तक जोड़कर रखा।

गायत्री मन्त्र का मनुष्य मात्र को अधिकार दिये जाने की घोषणा करने से जब अछूत भी उसका उपयोग करने लगे तो पुरातन पन्थियों में खलबली मच गई। जो मन्त्र ब्राह्मणों का था, कान में कहा-सुना जाने वाला था, उसे सब-लोग प्रकट रूप से कहें-सुनें यह कैसा अनर्थ? यज्ञों में केवल ब्राह्मण लोग दक्षिणा लेकर आहुतियाँ देते थे। स्त्रियों को अन्य वर्गों को उसमें प्रवेश मिलता ही नहीं था। उसमें सम्मिलित होने के लिए सबका खुला प्रवेश? यज्ञ आयोजनों में आने वाले आगन्तुकों को दाल-भात रोटी आदि कच्चे खाने का प्रबन्ध और बिना जाति-पाँति के भेदभाव के उनका बनाया और परोसा जाना, यह उन दिनों घोर आश्चर्य का विषय था। इस व्यवस्था को अनाध्यात्मिकता, नास्तिकता आदि न जाने किन-किन नामों से पुकारा जाता रहा।

पुरातन पन्थियों ने उसका घोर विरोध किया। सभाएँ हुईं, लेख छपे, धर्मध्वजियों ने भाषण-वक्तव्य दिए, और सही-गलत जो कुछ भी हो सकता था सब कुछ कहा गया। चर्चा फैलायी गई आचार्यजी ब्राह्मण नहीं लकड़ी का काम करने वाले बढ़ई हैं और भी ना जाने क्या-क्या कहा गया। कई बार तो उन्हें शारीरिक आघात पहुँचाने और अपशब्द कहने तक के अवसर आये। पर क्या मजाल कि उनके चेहरे पर जरा भी उदासी आई हो। सामाजिक क्रान्ति का इतना बड़ा तूफानी अभियान खड़ा करने वाले में कितना दुस्साहस होना चाहिए, उसे देखना-नापना हो तो उनके जीवन को देखकर समझा जा सकता है। यदि साह सैनिक की तरह उनकी संघर्ष वृत्तियों का लेखा-जोखा लिया जाये तो पता चलेगा कि अन्याय और अत्याचारों के विरुद्ध उनका प्रत्येक दिन ही लड़ने में बीता है। यदि वे संघर्षात्मक घटनाक्रम इकट्ठे किये जाएँ और उनमें मिली सफलता और असफलताओं, घावों और चोटों को गिना जाए तो पता चलेगा कि वे अनाचार से आजीवन कट-कट कर लड़ने वाले योद्धा के रूप में ही जन्में और अन्तिम साँस तक इस महायुद्ध में संलग्न रहते हुए उन्होंने प्राण त्यागे।

जहाँ तक व्यक्तिगत सुखोपभोग का सम्बन्ध है, गुरुदेव ने सर्वत्यागी संन्यासी का जीवन जिया। जहाँ तक व्यक्तिगत भौतिक उन्नति का सम्बन्ध है, वे उसकी ओर सदा से उपेक्षा की दृष्टि से देखते रहे। धन, यश और विलास उनके इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगा तो ऐसी डुबकी लगायी कि यह मगर उन्हें ताकते ही रह गये और वे देखत-देखते ही उनकी पकड़ से बाहर। यदि उन्होंने वैभव चाहा होता तो शासन में ऊँचे पद पर पहुँचे होते। राजनीति में उनका लोहा माना जाता, विद्वानों में मूर्धन्य गिने जाते और पैसा उनके पैरों पर लोटा फिरता। फोटो छपते, अभिनन्दन ग्रन्थ और राजसम्मान की उपाधियों से विभूषित होते और भी न जाने क्या-क्या होते।

उनकी हिमालय जितनी क्षमताओं की प्रतिक्रिया बड़े से बड़े वैभव के रूप में सामने खड़ी होती। पर इस सम्बन्ध में वे निस्पृह अवधूत की तरह ही बने रहे और अपनी बाल सुलभ सरलता को ही अपनी सर्वोत्तम संग्रहित सम्पत्ति मानते रहे। लोगों ने उन्हें कितना ठगा है, कुछ प्राप्त करने के लिए कितने प्रपंच रचे हैं और काम निकल जाने पर किस तरह तोताचश्मी दिखाते रहे हैं। इसका कभी कोई-कोई चुटकुला उनके मुँह से निकट शिष्यों-परिजनों को सुनने को मिलता रहा है। लेकिन उन्हें इसका कभी राई-रत्ती क्षोभ नहीं हुआ। स्थितप्रज्ञ की भाँति उनका मन सदा-सर्वदा निर्विकार रहा है।

हाँ कभी-कभी वह इतना जरूर सोचते थे कि ये भोले लोग कुछ ऊँची चीज माँगने या पाने के इच्छुक होते तो वह जिस तरह एक समर्थ के दरवाजे पर जाकर अपनी झोली भर लाए थे, उसी तरह ये लोग भी कुछ काम की वजनदार चीज लेकर जा सकते थे, पर ओछापन बेचारों को कृतज्ञता की सुखद अनुभूति का लाभ नहीं लेने देता है। जो उनके बहुत पुराने परिचित हैं, वे इस लम्बी अवधि में जहाँ के तहाँ रहे और गुरुदेव कहाँ से कहाँ पहुँच गये, इसे देखकर उनकी जलन और कुढ़न बढ़ती गयी। पर उन्होंने वीतराग संन्यासी की भाँति उनसे हमेशा प्यार भरा बर्ताव ही किया।

कई लोगों ने ईर्ष्यावश अनेक तरह की क्षति पहुँचाने की कोशिश की। ऐसे ईर्ष्यालु लोगों के कुकृत्यों में बेसिर-पैर के लाँछन लगाने से विष देने तक की जघन्य घटनाएँ शामिल हैं। उनसे प्रतिशोध लेने की बात मन में कभी नहीं आयी। उन्हें वे केवल बेचारे कहकर ही सम्बोधित करते रहे। जिसने उन पर चाकू से घातक प्रहार किए, अपनी समझ से उसने जान से मार देने में भी कोई कसर न छोड़ी, उसे भी उन्होंने भाग जाने दिया। इस तरह के लोगों के लिए वे हमेशा यही कहते रहे कि ये जानते ही नहीं कि क्या कर रहे हैं और उलट कर इसका परिणाम उनके लिए क्या हो सकता है?

व्यक्तिगत लाभ और व्यक्तिगत प्रतिशोध की बात उन्हें कभी सूझी ही नहीं। अपने आप को एक प्रकार से भूले ही रहे। एक महान अध्यात्मवेत्ता संन्यासी की भाँति उन्होंने हर पल अनुभव किया कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सत्ता को किसी महान सत्ता में घुला ही दिया है और अपना कहने लायक उनके पास कुछ रह नहीं गया है। प्रत्यक्ष इसे हानि अपकर्ष ही कहा जा सकता है। लोग व्यंग करते रहे जिस जमाने में साधु-महात्मा लोग एयरकन्डीशन का उपयोग करते और हवाई जहाजों में सैर करते हैं, उन दिनों भी गुरुदेव पंखा चलाने में भी संकोच अनुभव करते थे। हाँ उस नजर से देखने वाले अध्यात्म को घाटे का सौदा कह सकते हैं, पर तब फिर गुरुदेव को ही नहीं विश्वामित्र, भर्तृहरि, बुद्ध, महावीर आदि न जाने कितनों को घाटा उठाने वाले सौदागर कहा जायेगा, पर वास्तविकता इसके विपरीत है। सच्चा त्यागी ईश्वरीय विभूतियों से लाभान्वित होता है, जिसके वे प्रत्यक्ष उदाहरण बनें।

एक आदर्श संन्यासी की भाँति उनकी निस्पृहता केवल व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित है। समाज की सम्पन्नता एवं सुविधा बढ़ाने की उन्हें हमेशा लाख-करोड़ गुनी चिन्ता सताए रही। समाज में फैले हुए अनाचार के प्रति उनमें उससे लाख गुना रोष रहा। जितना अपना सर्वस्व लूट ले जाने वाले डाकू के प्रति हो सकता है। विश्व वेदना से व्यथित उनकी अन्तरात्मा का रुदन कदाचित ही कोई देख पाया हो। पर जिन्होंने अनुभव किया वे जानते हैं कि उनके अनुपम व्यक्तित्व में व्यथा और आक्रोश का हिमाच्छादित ज्वालामुखी जैसा कैसा विचित्र संयोग सन्निहित रहा है।

बाहर से अतिसरल, अतिसौम्य और अतिशान्त दिखने वाले परमपूज्य गुरुदेव में इतना रोष, इतना दर्द हो सकता है, इसका पता उनके निकटवर्तियों को छोड़कर शायद ही किसी को हुआ हो। उन्होंने कभी किसी व्यक्ति विशेष का नाम तो नहीं लिया, पर अपने समाज के (1) राजनेता (2) धर्मगुरु (3) बुद्धिजीवी (4) सरकार (5) सम्पत्तिवानों के प्रति वे हमेशा से यह कहते जरूर रहे हैं कि उनके हाथों में जो शक्ति है उसका यदि उन्होंने दुरुपयोग किया होता तो आज ये दुर्दिन न देखने को मिलते जो देखने पड़ रहे हैं।

वह सच्चे सैनिक एवं सर्वत्यागी संन्यासी की भाँति सतत् इन पाँचों विभूतियों, विभूतिवानों को दिशा देने के लिए संलग्न रहे। उग्रतप, कठोर साधना, निरन्तर प्रयास में निरत उनका जीवन उनके अनुयायियों, शिष्यों, साधकों, लोकसेवियों को एक ही सन्देश देता है कि सैनिक एवं संन्यासी की उभयपक्षीय विशेषताओं से परिपूर्ण आध्यात्म ही सार्थक है। अब तो अपनी पीड़ा में विश्वमानव की पीड़ा को घुलाकर वे सूक्ष्म में चले गए हैं। उनकी सूक्ष्म चेतना, परशुराम के रूप में, शिव के तीसरे नेत्र के रूप में, इन्द्र के वज्र के रूप में प्रकट होकर नए परिवर्तन का जो अनगिनत आधार प्रस्तुत करेगी, उसे देखने वाले हतप्रभ हुए बिना रह सकेंगे।


परमपूज्य गुरुदेव के सपनों का भारत भारत को आजाद हो गया, पर क्या हम हार गए ?

आज से पचास वर्ष पहले जब समूचा राष्ट्र स्वाधीनता-प्राप्ति की खुशी मना रहा था, उस समय स्वतन्त्रता संग्राम के जुझारू सेनानी, अनन्य राष्ट्रभक्त परमपूज्य गुरुदेव किसी गहन चिन्तन में निमग्न थे। अखण्ड-ज्योति कार्यालय मथुरा के अपने एकान्त कक्ष में बैठे वह सोच रहे थे कि इस स्वाधीनता को पूर्ण कैसे किया जाय ? उनकी आँखें खुशी और गम आँसुओं से भीगी थीं। उन्हें खुशी थी, निश्चित ही बेहद खुशी, क्योंकि आज भारतमाता की गुलामी की बेड़ियाँ टूट गईं। वह आजाद हो गयीं। इस आजादी के लिए उन्होंने भी माँ भारती के अनेकों वीर सपूतों के साथ बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। लेकिन गम भी गहरा था। उनका हृदय असहनीय पीड़ा से व्याकुल था, क्योंकि यह खुशी विभाजित मिली थी। जिस महान देश को सदियों, सहस्राब्दियों तक अनेकों प्रयत्न करने के बावजूद विदेशी आक्रान्ता खण्डित न कर सके थे, उसे उसी की अपनी सन्तानों ने टुकड़ों में बाँट दिया। स्वार्थ और अहं की वृत्तियों के वशीभूत होकर अपनी ही माँ की छाती पर आरी चला दी। बात इतने तक ही सीमित न रही। कुछ ऐसे बीज बोए गए कि उनकी फसल उगते ही यह बँटवारा देश के हर गाँव तक पहुँच जाए। बँटवारा-जाति के नाम पर, धर्म, क्षेत्रीयता, भाषा के नाम पर कहीं अपना कुहराम मचाने लगे। स्वतंत्रता के जन्म के समय ही गुरुदेव ने अपनी अन्तर्दृष्टि से सारी स्थिति परख ली। उनकी आँखों में एक सपना था, भारत के नवनिर्माण का सपना। इसे साकार करने के लिए उन्होंने ‘युगनिर्माण आन्दोलन’ का सूत्रपात किया। इस आन्दोलन के माध्यम से उन्होंने नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का बिगुल बजाया। इनसानी दिलों को जाड़ने वाली, मानवीय भावनाओं को समरस करने वाली साँस्कृतिक क्रान्ति का सूत्रपात किया। यह इस बात का स्पष्ट उद्घोष था कि देश को हम जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के आधार पर हम बँटने नहीं देंगे। साथ ही हम सब देशवासी मिल-जुलकर अपनी स्वाधीनता को पूर्ण करते रहेंगे। इसके लिए उन्होंने सतत् तपोनिरत रहकर उन सभी सूत्रों की खोज की, जिसकी वजह से भारत कभी जगद्गुरु बना था, साथ ही उन्हें इस देवभूमि में बीजरूप से वे सारी सम्भावनायें नजर आयीं जिनके आधार पर भावी-परिवर्तन का अरुणोदय एवं नवनिर्माण का स्वप्न यहाँ से साकार हो सके। अपने उद्गार व्यक्त करते हुए उनके स्वर हैं, “भारतभूमि को कभी देवभूमि कहा जाता था। अपनी अगणित दिव्य विशेषताओं के कारण भारतवासी समस्त संसार में देवता कहलाते थे। वृहत्तर भारत की जनगणना तैंतीस कोटि थी ।वह प्रत्येक दृष्टि से स्वर्गादपि गरीयसी थी। यहाँ से नररत्न उपजते और पुण्य परमार्थ के लिए श्रम, समय, मनोयोग न्यौछावर करते रहे हैं। समस्त संसार को शासन-सूत्र-संचालन का बोध कराने के कारण भारत चक्रवर्ती कहलाया। उसके कारण विश्व में सम्पन्नता का उदय हुआ, इसलिए वह स्वर्ग-सम्पदा का अधिपति माना गया। ज्ञान-विज्ञान की अनेकानेक धाराओं से सुदूर देशों को अवगत कराने के कारण उसे जगद्गुरु का श्रद्धासिक्त सम्मान दिया गया।

लेकिन इस सम्मान को बनाए न रख सके। पूर्वजों की विरासत को उपेक्षित किया। अपनी कमियों कमजोरियों के चलते हम गुलाम हुए। कतिपय बर्बर आक्रान्त और कुछ मुट्ठी भर चतुर व्यापारी हमें अपने इशारों पर नचाते रहे। परन्तु जब राष्ट्रीय चेतना ने अंगड़ाई ली तो ये गुलामी की बेड़ियाँ तड़तड़ा कर टूट गयीं। हमें स्वतन्त्रता का गौरव हासिल हुआ। इसे पाकर हम सबको विचार करना है, आखिर इस स्वतंत्रता का वास्तविक सदुपयोग क्या हो सकता है? उत्तर एक ही होगा। व्यक्ति, परिवार राष्ट्र, समाज का भावनात्मक नवनिर्माण।”

युगनिर्माण आन्दोलन इसी भावनात्मक नवनिर्माण का गगनभेदी उद्घोष है। प्रकाश की यह एक प्रखर किरण जब मध्याह्न के प्रचण्ड सूर्य का रूप लेगी तो इसके प्रभाव से देखने वालों की आँखें चौंधिया जायेंगी। उनके अनुसार अभी भारत में हिन्दू धर्म में धर्ममंच से युग-निर्माण परिवार में यह मानव जाति का भाग्यनिर्माण करने वाला अभियान केन्द्रित दिखायी पड़ता है। पर अगले दिनों उसकी वर्तमान सीमाएँ, अत्यन्त विस्तृत होकर असीम हो जाएँगी। तब किसी एक संस्था-संगठन का नियन्त्रण-निर्देश नहीं चलेगा, वरन् कोटि-कोटि घटकों से विभिन्न स्तर के ऐसे ज्योतिपुञ्ज फूटते दिखाई पड़ेंगे जिनकी अकूत शक्ति द्वारा सम्पन्न होने वाले कार्य अनुपम और अद्भुत ही कहे-समझे जाएँगे। महाकाल ही इस महान परिवर्तन का सूत्रधार है और वही समयानुसार अपनी आज की मंगलाचरण थिरकन को क्रमशः तीव्र-से तीव्रतर, तीव्रतम करता चला जायेगा। ताण्डव नृत्य से उत्पन्न गगनचुम्बी जाज्वल्यमान आग्नेय लपटों द्वारा पुरातन को नूतन में परिवर्तन करने की भूमिका किस प्रकार, किस रूप में अगले दिनों सम्पन्न होने जा रही है, आज उस सबको सोच सकना, कल्पना-परिधि में ला सकना सामान्य बुद्धि के लिए प्रायः असम्भव ही है। फिर भी जो भवितव्यता है वह होकर रहेगी। युग को बदलना ही है, आज की निबिड़ निशा का कल के प्रभातकालीन अरुणोदय में परिवर्तन होकर ही रहेगा। भारत के नवनिर्माण को केन्द्र बनाकर नवनिर्माण के स्पन्दन समूचे विश्व में स्पन्दित होंगे। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक-एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवीय विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा। यह सम्भावना नहीं सुनिश्चितता है।

गुरुदेव भारत के नवनिर्माण को जहाँ एक ओर नियति का विधान मानते हैं वहीं दूसरी ओर राष्ट्र के नागरिकों को इसके लिए कमर कसकर खड़े होने का आह्वान भी करते हैं। जिससे इस नवनिर्माण के सपने को न केवल साकार किया जा सके, बल्कि इसके सौंदर्य को शतगुणित, अनन्तगुणित किया जा सके। उनके अनुसार, किसी राष्ट्र की राष्ट्रीय सम्पदा उस देश के नागरिकों की भावनात्मक एवं क्रियात्मक उत्कृष्टता है। किसी भी राष्ट्र व समाज की समर्थता का, प्रगति का प्रधान कारण वहाँ के निवासियों का चिन्तन एवं चरित्र होता है। संयमी, सदाचारी, सन्तुष्ट, कर्मठ, कर्तव्यपरायण नागरिक ही राष्ट्र को जीवन्त व जाग्रत बनाए रखते हैं। जिनके चिन्तन में शालीनता, व्यवहार में सहृदयता तथा क्रियाकलापों में प्रखरता का समावेश होता है, ऐसे लोग ही राष्ट्र को विभूतिवान् व समृद्ध बनाते हैं। इसलिए अन्ततः कहना यही होगा कि भारतीय समाज एवं राष्ट्र का विकास यहाँ के लोकमानस के परिष्कार पर अवलम्बित है। किसी राष्ट्र का गौरव उसके लौह-नागरिक होते हैं, यही उसके वास्तव में बहुमूल्य मणि-माणिक्य हैं। सच्ची समृद्धि इसी रत्नराशि की तुलना पर निर्भर है। राष्ट्र-निर्माण उज्ज्वल चरित्र-सुसंस्कृत और निस्वार्थ लोकसेवा निरत व्यक्ति ही अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर रह सकते हैं, जो अवांछनीयताओं के विरुद्ध मोर्चाबंदी कर लड़ने के लिए साहसी शूरवीरों की भूमिका प्रस्तुत कर सकें। रचनात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्द्धन इन्हीं शूरमाओं के द्वारा सम्पन्न होगा। इन्हीं के द्वारा भारत महादेश के सर्वतोमुखी नवनिर्माण का स्वप्न साकार होगा।

गुरुदेव स्पष्ट रूप से यह मानते हैं कि विभाजन की दीवारें बेमानी हैं। इनमें से प्रत्येक जाति-धर्म-सम्प्रदाय भाषा, क्षेत्र के आधार पर किये गये बँटवारे अर्थहीन हैं। हमें अपनी पहचान भारत देश के समर्पित एवं कर्तव्यनिष्ठ नागरिक के रूप में प्रस्तुत करनी चाहिए। हमारा जन्म किसी भी जाति में हुआ हो, हम कोई धर्म मानने वाले हों, किसी भी भाषा को हम बोलते हों अथवा किसी भी क्षेत्र में रहते हों, पर हैं तो मनुष्य ही और मनुष्य जीवन की सार्थकता देवत्व की ओर बढ़ने में है। आत्मसन्तोष, आत्मकल्याण से लेकर विश्वमानव के प्रति अपने महान कर्तव्य की पूर्ति के लिए कटिबद्ध होने से ही मानवता का, देवत्व का, पूर्णता-प्राप्ति का लाभ मिल सकता है। राष्ट्र के बहुसंख्यक नागरिकों की इन्हीं भावनाओं का योग ही तो भारत के राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करेगा।

देश के नवनिर्माण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान नारी का है। भारत वर्तमान पतन-पराभव का प्रधान कारण नारी को मानवीय अधिकार से दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। पिछले सामंती युग में नारी का बन्धन बहुत ही जघन्य था। नारी के साथ नृशंसतापूर्ण व्यवहार को अभी भी दुहराये जाने का क्रम बाकी है। ऐसे ही अनेक कुचक्रों में चिरअतीत से पिसती चली जा रही नारी-भारत के अभिनव नवोत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी । उसने पीड़ा भोगी है, इसलिए किसी भी पीड़ित की व्याकुल कराहों को समझने की संवेदना उसमें सहज है।

यही नहीं, नारी समाज की भावनात्मक धुरी है। उसी के इर्द-गिर्द परिवार एवं समाज की गति-प्रगति का चक्र घूमता है। परमपूज्य गुरुदेव की नजर में परिवार एक छोटा राष्ट्र है, सुविस्तृत समाज का छोटा संस्करण । देश की भावनात्मक प्रगति के लिए व्यक्तित्व को परिवार को एक-दूसरे के पूरक मानना आवश्यक है। इसके लिए जरूरी है कि संयुक्त परिवारों की वैज्ञानिक आचार-संहिता विकसित की जाए। यदि परिवारों को सुसंस्कारिता के प्रशिक्षण की पाठशाला के रूप में बनाया जा सके, तो उस कारखाने से ढलकर जो नररत्न निकलेंगे वे राष्ट्रीय कीर्ति की पताका आकाश में फहरा सकेंगे।

लेकिन यह महान कार्य नारी ही कर सकती है, यही कारण है कि युगद्रष्टा गुरुदेव ने सम्भावनाओं की सदी इक्कीसवीं सदी को नारी सदी की संज्ञा दी। वह कहते हैं, समय की माँग ध्वंस से मुड़कर सृजन की दिशा पकड़ रही है। उसमें नारी ही फिट बैठती है। राष्ट्रीय जीवन का नवनिर्माण तभी सम्भव है जब नारी को वश में रखने की कठोरता छोड़कर नर उस महाशक्ति के सम्मुख समर्पण करे। भवितव्यता भी यही है, नेतृत्व नारी का होगा और अनुगमन नर का। सृजन की प्रतीक नारी राष्ट्र के भविष्य-निर्माण में ठोस एवं स्थायी भूमिका निभा सकेगी। हो भी क्यों नहीं, महिलायें मात्र प्रसव ही नहीं वरन् भावी पीढ़ी का स्तर भी विनिर्मित करती हैं। वह सच्चे अर्थों में भविष्य की निर्मात्री हैं। अगले दिनों में अपने देश की महिलाओं का यही स्वरूप निखरेगा, जिससे वह समूचे राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय परिसर में सर्वत्र-सुख शान्ति की स्वर्गीय वर्षा कर सकेंगी।

राष्ट्रीय स्वतंत्रता के आन्दोलन में अपने व्यक्तित्व की आभा बिखेरने वाले परमपूज्य गुरुदेव का कहना है, मेरे सपनों के भारत की रूपरेखा नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति में निहित है। इन्हीं के आधार पर देश में स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन तथा सभ्य समाज की संरचना का पुनर्निर्माण होगा। इसके लिए विभिन्न जातियाँ अपनी पंचायत करके विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों में फैली हुई, कुरीतियों के उन्मूलन की शुरुआत करे और उपजातियों की बेड़ी काटकर जाति में जाति का बन्धन काटकर महाजाति में परिणत होने के लिए कदम बढ़ाएँ। साथ ही इनसान और इनसानियत के रूप में अपना परिचय विकसित करने की बात भी सोची जाए। क्योंकि धर्म-सम्प्रदायों के नाम पर, भाषा-जाति-प्रथा-क्षेत्र आदि के नाम पर जो कृत्रिम विभेद की दीवारें बन गयी हैं। वे लहरों की तरह अपना अलग प्रदर्शन भले भले ही करती रहें पर सभी एक जलाशय की सामयिक हलचल मानी जायेंगी। राष्ट्र एक होकर रहेगा। इन कृत्रिम लकीरों के आधार पर हजारों-लाखों बँटवारे करना न तो उचित और न ही अपनी राष्ट्रीय संस्कृति के अनुरूप।

“माताभूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” कहकर अपना परिचय देने वाले इस गरिमामय देश के निवासी अपने ही अस्तित्व के टुकड़े काटने लगें, यह कहाँ तक उचित और सराहनीय है ?

राष्ट्र-निर्माण की पहल हमें समाज निर्माण से करनी होगी। समाज-व्यक्तियों का समूह है। समाज का ही बड़ा रूप राष्ट्र और विश्व है। व्यक्ति और समाज को समुन्नत बनाने के लिए उच्चस्तरीय आस्था का निर्माण एवं अभिवर्द्धन सत्परम्पराओं के संचालन और विकृतियों के निवारण के लिए निरन्तर प्रयत्न किया जाना आवश्यक है। भारत का सामाजिक क्षेत्र ऐसा है जिसमें लोकमंगल के लिए बहुत कुछ करने को पड़ा है। अपने देश का पिछड़ापन दूर करने में राजसत्ता उतनी सफल नहीं हो सकती, जितनी कि सामाजिक क्षेत्र में की गयी सेवा साधना। समाज को राहत देने का एकमात्र यही उपाय है कि समूचे विचार-क्षेत्र की एक बार नये सिरे से सफाई-धुलाई भी की जाय और अनुपयोगिता बहुत बढ़ गयी हो तो उसे गलाने और नये ढाँचे में ढालने की हिम्मत सँजोयी जाय। जनमानस का परिष्कार किये बिना राष्ट्रीय कल्याण सम्भव नहीं। व्यक्ति के नैतिक विकास द्वारा समानतावादी समाज की ओर देश को उन्मुख होना पड़ेगा। सुखी और सभ्य समाज तभी निर्मित होता है, जब मानव व्यक्तिवादी विचारधारा छोड़कर, समष्टिवादी, समाजवादी बने।

सामाजिक क्रान्ति के द्वारा ऐसे प्रचलनों को निरस्त किया जाना चाहिए जो विषमता, विघटन, अन्याय अनौचित्य के पृष्ठपोषक हों। पारस्परिक स्नेह, सौजन्य, सहयोग का विस्तार करने वाली ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की ‘सर्व भूतेषु’ की दृष्टिपोषक प्रथा-प्रचलनों को ही मान्यता मिले और शेष को औचित्य की कसौटी पर खोटी सिद्ध होने पर कूड़ेदान में बुहार फेंका जाए।अपने देश का समाज सहकारी सहायक बने। उसकी अभिनव संरचना में कौटुम्बिकता के शाश्वत सिद्धान्तों का समावेश किया जाए। न जाति, लिंग की विषमता रहे और न आर्थिक दृष्टि से किसी को गरीब-अमीर रहने दिया जाए। न कोई उद्धत-अहंकारी धनाध्यक्ष बने और न ही किसी को पिछड़ेपन की पीड़ा-भर्त्सना सहन करनी पड़े।अपराध की कोई गुंजाइश ही न रहे, यदि कहीं कोई उपद्रव उभरे तो लोकशक्ति क्षरा इस प्रकार दबोच दिया जाए कि दूसरों को वैसा करने का साहस ही शेष न रहे।

समुन्नत राष्ट्र की रचना उत्कृष्ट नेतृत्व में, अग्रगामी सज्जनों का समूह करता है। अच्छा समाज अच्छे व्यक्ति उत्पन्न करता है, और उत्कृष्ट व्यक्ति समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करते हैं। दोनों ही अन्योन्याश्रित हैं। यह प्रयोजन, सुयोग्य, अनुभवी और निस्पृह लोक सेवियों के द्वारा ही सम्पन्न हो सकता है। अनेक सम्प्रवृत्तियों के गतिशील रहने से ही राष्ट्र की श्रेष्ठता और महानता सुदृढ़ रह सकती है। जब नेतृत्व करने अथवा राष्ट्रीय जीवन की गति बदलने की शक्ति केवल चरित्र से ही प्राप्त होती है। भारत महादेश की उज्ज्वल भवितव्यता के लिए समाज में वैयक्तिक व सामाजिक नीति मर्यादाओं को महत्व देना होगा। कहीं कोई ऐसा काम करने की न सोचे, जिससे मानवीय गरिमा एवं राष्ट्रीय महानता को आँच आती हो। जब देश में सभी सन्तोषी, नीतिवान, उदार एवं सरल, सौम्य पद्धति अपनाएंगे, मिल-बाँटकर खाएंगे, तभी वे हँसती हँसाती जिन्दगी जी सकेंगे।

गुरुदेव ने शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण का आवश्यक एवं अनिवार्य तत्व माना है। शिक्षा राष्ट्रीय जीवन का शाश्वत मूल्य है। ज्ञान और आचरण में बोध और विवेक में जो सामंजस्य प्रस्तुत कर सके और उसे ही सही अर्थों में शिक्षा या विद्या कहा जा सकता है।विकासोन्मुख राष्ट्रों ने राष्ट्रीय उत्कर्ष को ध्यान में रखते हुए अपनी शिक्षा-प्रणालियाँ विकसित कीं। स्वतंत्रता के पचासवें वर्ष में भी हम आगे बढ़ नहीं पाये, इसका कम से कम आधा दोष तो वर्तमान निरुद्देश्य शिक्षा-पद्धति को दिया जा सकता है। इस सम्बन्ध में यह विशेष ध्यान रखने की बात है कि हमें अपनी शिक्षा-नीति अपने देश की भौगोलिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विशेषताओं को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय उद्देश्य के अनुरूप बनानी चाहिए। अपनी मौलिक सोच को ताक पर रखकर हम उधार की नीतियों से काम चलाते रहें, यह कतई किसी भी तरह उचित नहीं है।

बुद्धिजीवियों को इसके लिए ऐसे प्रबल प्रयास करने चाहिए, जिससे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सके। स्वावलम्बी और सुयोग्य नागरिक ढालने वाली शिक्षापद्धति की मौलिक कल्पना करनी चाहिए और सार्थकता सिद्ध करने के लिए व्यवस्था बनानी चाहिए। कृत्यों में प्रगतिशील शिक्षातन्त्र जन सहयोग से खड़ा किया जाना चाहिए। शिक्षा उसे कहते हैं जो जीवन के बाह्य प्रयोजनों को पूर्ण करने के लिए सुयोग्य मार्गदर्शन करती है। कोई व्यक्ति सुशिक्षित कहलाने का पात्र तभी हो सकता है, जब वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी आशावादी बना रहे।

विद्या का क्षेत्र उससे आगे का है। आत्मबोध, आत्मनिर्माण, कर्तव्यनिष्ठा, सदाचरण, समाजनिष्ठा, राष्ट्रभक्ति आदि वे सभी विषय विद्या कहे जाते हैं, जो वैयक्तिक चिन्तन, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता और उत्कृष्टता का समावेश करते हों। इसके बिना मनुष्य के अन्तराल में छिपी हुई रहस्यमय दिव्यता का विकास नहीं हो पाता। विद्या का स्वरूप है-विचारणा एवं भावना के स्तर को उच्चस्तरीय बनाने वाला ज्ञान, अनुभव और अभ्यास। इसी से गुण-कर्म-स्वभाव का परिष्कृत व्यक्तित्व विनिर्मित होता है। शिक्षा और विद्या का समन्वय स्वार्थपरता को हटाता और राष्ट्रनिष्ठा को बढ़ाता है।

राष्ट्रीय जीवन के वर्तमान लड़खड़ाते स्वरूप, निराशा के घने कुहासे के बीच गुरुदेव के स्वर आशा के प्रखर सूर्य की भाँति उदय होते हैं। उनके शब्दों में भारत के अभ्युदय का पुण्य प्रभात अब निकट है। अंधकार की सघन निशा का अन्त और प्रकाश का व्यापक विस्तार अगली ही सदी में होने जा रहा है। ऊषाकाल की लालिमा को उभरते और ऊँचे उठने का आभास इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में ही देखा जा सकेगा। जिन्हें तमिस्रा चिरस्थायी लगती हो वे अपने ढंग से सोचे, पर हमारा दिव्यदर्शन भारत के उज्ज्वल भविष्य की झाँकी करता है। लगता है इस पुण्य-प्रयास में सृजन की पक्षधर देवशक्तियाँ प्राणपण से जुट गयी हैं। इन दिनों अदृश्य के अन्तराल में कुछ ऐसा ही पक रहा है।भाव संवेदना की शक्ति का उद्भव इसी स्थिति में समझा जा सकता है। हाँ अभी वर्तमान में कुछ ऐसा अवश्य हो रहा है, जिसे प्रसव पीड़ा की उपमा दी जा सकती है। लेकिन यह तो सिर्फ वातावरण बदलने का पूर्व संकेत भर है।

वह आगे कहते हैं-हमने भारत को ही नहीं समूचे विश्व के भविष्य की झाँकी बड़े शानदार ढंग से देखी है। परन्तु इस पुण्य-प्रभात का उदय पहले अपने ही महादेश में होगा।बाद में इसकी आभा समूचे विश्व को अवलोकित-प्रकाशित करेगी। हमारी कल्पना है कि आने वाला युग प्रज्ञायुग होगा। प्रज्ञा अर्थात् दूरदर्शी विवेकशीलता के पक्षधर व्यक्तियों का समुदाय। हर व्यक्ति स्वयं में एक आदर्श इकाई बनेगा एवं हर परिवार उससे मिलकर समाज का एक अवयव। सभी सामूहिक राष्ट्रनिर्माण एवं राष्ट्रीय उत्कर्ष को अपनी जिम्मेदारी अनुभव करेंगे। सच्ची प्रगति इसी में समझी जाएगी कि गुण-कर्म-स्वभाव की दृष्टि से किसने अपने आप को कितना श्रेष्ठ समुन्नत बनाया।

वर्तमान निराशाजनक स्थिति में भी हम चाहें तो कल उदय होने वाले इस सौभाग्य-सूर्य की निश्चितता से स्वयं में स्फूर्ति एवं उल्लास अनुभव कर सकते हैं। परमपूज्य ने अगस्त 1947 की अखण्ड-ज्योति में एक लेख लिखा था, ‘क्या हम हार गये ?’ इस लेख में जहाँ एक ओर उनके मन में छिपी पीड़ा का अहसास मिलता है वहीं दूसरी ओर उत्साहवर्द्धक आह्वान भी है। स्वाधीनता प्राप्ति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उनके शब्द हैं-मत सोचिए कि हम हार गये। हमने खोया कुछ नहीं, कुछ न कुछ पाया ही है। एक मोर्चा फतह ही किया है। आइये अपनी बिखरी हुई शक्तियों का संचय करें, संगठन को दृढ़ करें। सद्बुद्धि का विकास करें, शेष कठिनाइयों का हल करने की क्षमता उत्पन्न करें। शताब्दियों बाद विदेशी विजातियों के चंगुल से छूटकर हम सौभाग्य निर्णय का सूर्योदय देख रहे हैं।संसार परिवर्तनशील है, काल गतिवान है, एक गहरा धक्का खाने के बाद अब हमारा सौभाग्य सूर्य पुनः उदित होने को है। उसको सम्भालने के लिए आइये हम अपनी भुजाओं में समुचित बल पैदा करें।हम हारे नहीं हैं।थोड़े जीते सही, पर जीते हैं, आगे अभी और जीतेंगे, परमात्मा हमारी सहायता करेगा।” पूज्य गुरुदेव के शब्द पचास वर्ष बाद ही अर्थहीन नहीं हुए हैं।बल्कि स्वाधीनता की स्वर्णजयंती पर अपनी विशेष आभा लेकर चमक रहे हैं, इनके प्रकाश में हम सभी राष्ट्र के नवनिर्माण में जुट जाएँ तो अपने महान राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य आने में देर नहीं।


गुरुकृपा अहं की मुक्ति पर ही सम्भव

युगावतार के पट्टणधरदस्वयं को त्रैलोक्य गुरु भगवान महावीर अनन्यतम एवं निकटतम शिष्य कहाने वाले प्रभुपाद गौतम आज निराश थे। उनके चेहरे पर चिन्ता व हताशा की रेखाएँ स्पष्ट थीं। जो कुछ घटा -उससे उनका अहं आहत होकर रह गया। अभी दो ही दिन पहले भगवान महावीर से आज्ञा लेकर वे साल और महासाल के साथ पृष्टचम्पा पहुँचे थे।

पृष्ठचम्पा में राजा गागली ने बड़े भक्तिभाव से उनका वन्दन-पूजन किया सारे नगर जन भी उनके दर्शन-वन्दन को आए। यशोमती और पिठर भी उनके चरणों में प्रणत हो, उनके सम्मुख बैठ गये। इन्हीं सबके बैठा था गागली। देवोपनीत सुवर्ण कमल पर आसीन देवार्य गौतम ने महावीर का संदेश सुनाया। यह धर्मवाणी सुनकर यशोमती, पिठर और गागली को लगा कि उनके भीतर सदा -वसन्त फूलों के वन हैं और बाहर के संसार में पतझर ही पतझर हैं। भीतर का रतिसुख इतना सघन लगा कि बाहर से मन आपोआप विरत हो गया। पृष्टचम्पा का राज्य प्रजा को अर्पित कर राजा गागली माता-पिता सहित गौतम के अनुगामी हो गये।

साल, महासाल, गागली यशोमती और पिठर ये पांचों चम्पा के मार्ग पर उनके पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए चुपचाप चल रहें थे। उन पांचों की चेतना इस समय एक ही महाभाव में एकत्र और साम्वादी हो रही थी। इन पांचों को महावीर की वाणी पर मनन करते हुए हठात लगा की भीतर एक ऐसा आलोकन है कि बाहर का अवलोकन अनावश्यक हो गया हैं। वे एक ऐसे अन्तरसुख में मगन हो गये कि उन्हें कैवल्य और मोक्ष की भी कामना न रही।

चम्पा पहुँचकर अपने पांचों शिष्यों सहित गौतम भगवान महावीर के समवसरण में यों आते दिखाई, पड़े जैसे वे पाँच सूर्यों के बीच खिले एक सहस्रार कमल की तरह चल रहे हों। पांचों शिष्यों ने गुरु को प्रणाम कर आदेश चाहा। शिष्यों के इस तरह आदेश माँगने पर उन्हें अपने गुरु होने के गर्व की अनुभूति हुई। हर्ष से गर्वित होकर गौतम उन्हें श्रीमण्डल में प्रभु के समक्ष लिवा ले गए। फिर आदेश दिया कि आयुष्मान् मुमुक्षुओं ! श्री भगवान का वन्दन करो।

वे पाँचों गुरु आज्ञापालन करने को उद्यत हुए कि हठात् शास्ता महावीर की वर्जना सुनाई पड़ी।

केवली की अशातना न करो गौतम। ये पांचों केवल ज्ञानी अर्हन्त हो गए हैं। अर्हन्त, का वन्दना नहीं करते।

तत्काल गौतम ने अपने अज्ञान का निवेदन कर अपने शिष्यों से क्षमायाचना की। परन्तु इससे उनका अहं भारी आहत हुआ। वे खिन्न मन सोचने लगे-मेरे मुख से प्रभु की धर्मप्रज्ञप्ति सुनकर इन पांचों आत्माओं ने क्षणमात्र में कैवल्य ज्ञान प्राप्त कर लिया, पर मैं स्वयं कारा ही रह गया। शिष्य गुरु हो गये, गुरु को शिष्य हो जाना पड़ा। उसे अपने ही शिष्यों के सामने नतमस्तक होना पड़ा गौतम का मन गहरी व्यथा से विचलित हो गया। प्रभु के अनन्य प्रियपात्र और पट्टगणधर होकर भी वर्षों प्रभु के साथ-साथ रहते हुए भी अर्हन्त की कैवल्य कृपा उन्हें प्राप्त न हो सकी और इसी बीच कई आत्माएँ प्रभु के समीप आकर अर्हन्त पद को प्राप्त हो गयी।

क्या मुझे कभी कैवल्य ज्ञान प्राप्त होगा ? क्या मुझे इस भव में सिद्धि नहीं मिलेगी?

तभी गौतम को अचानक याद आया, बहुत पहले उन्हें एक देववाणी सुनायी पड़ी थी। उसमें कहा गया था कि कोई व्यक्ति यदि अपनी लब्धि के बल अष्टापद पर्वत पर जाकर वहाँ विराजमान जिनेश्वरो को नमन करें और वहाँ एक रात्रि वास करे, तो उसे इसी जन्म में सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं।

त्रिलोक गुरु महावीर स्वयं गौतम एकमेव गुरु हैं। उनके होते हुए यह देववाणी और अष्टापद यात्रा ? ऐसी बात वह प्रभु से परे कैसे ? गौतम अन्यमनस्क और उदास हो गये। वे बड़ी उलझन में पड़ गये। श्रीभगवन्त ने उनकी पीड़ा को देख लिया। तत्काल आदेश दिया। देवानुप्रिय गौतम दुःखी मत हो। जाओ अपने मन की अभिलाषा पुरी करो। गौतम की आंखों में पराप्रीति के आँसू छलक आये। मेरे प्रभु कितने सम्वेदी है, वे मेरे हर मनोभाव में मेरे साथ हैं। मेरे मन की हर साध बिन कहे ही पूरी कर देते हैं।

प्रभु की पादवन्दना कर तत्काल श्रीपाद गौतम समवसरण से प्रस्थान कर गए और चरणऋद्धि की सामर्थ्य से वायु वेग के साथ कुछ समय में अष्टापद पर्वत के समीप आ पहुँचे। उस काल उस समय कौडिन्य, दत्त, शैवाल आदि पन्द्रह सौ तपस्वी अष्टापद को मोक्ष का हेतु सुनकर, उस गिरि पर चढ़ने का पराक्रम कर रहे थे। उनमें से पाँच सौ तपस्वी चतुर्थ तप करके आद्र कन्दादि का पारण करते हुए भी अष्टापद की पहली मेखला तक ही जा सके थे। दूसरे पाँच सौ तपस्वी छट्ठ तप करके मात्र सूखे कन्दादि का पारण करते हुए भी उस गिरि की दूसरी मेखला तक ही पहुँच सके थे। तीसरे पाँच सौ तापस अट्ठम् तप करके सूखे शैवाल का पारण करके भी तीसरी मेखला से आगे न जा सके थे। इससे अधिक तपस्या की सामर्थ्य न होने से वे तीनों मेंखलाओं में ही रुको पड़े थे। उनके मन में ही रुके पड़े थे। उनके मन में प्रश्न था कि क्या केवल तपस्या से ही चुडान्त पर पहुँचा जा सकता है ? उनमें बोध सा जग रहा था कि कोरा कायक्लेश मोक्ष लाभ नहीं करा सकता।

तभी उन्होंने अचानक देखा की तप्त सुवर्ण के समान काँतिमान, एक पुष्टकाय महाशाल पुरुष वहाँ आकर पर्वतपाद में उपविष्ट हुए हैं। पर्वत के समक्ष वे कायोत्सर्ग में लीन हो गये हैं। उन्हें अष्टापद पे चढ़ने को उद्यत देख, वे तापस परस्पर कहने लगे, हम कृशकाय होकर भी तीसरी मेखला से आगे न जा सके तो ये विपुल शरीर महाकाय पुरुष कैसे ऊपर कैसे चढ़ सकेंगे ? वे प्रश्न ही करते रहे और उधर गौतम न जाने कब उस महागिरि पर चढ़ गए और वे देव के समान उनकी आंखों से अदृश्य हो गए। तब उन सब को निश्चय हो गया कि इन महर्षि के पास कोई महाशक्ति हैं, सो उन्होंने निर्णय लिया कि जब ये महापुरुष लौटकर नीचे आयेंगे तब हम सब इनको गुरु रूप में स्वीकार कर इनका शिष्यत्व ग्रहण कर लेंगे और वे पर्वत चूल पर एकाग्र ध्यान लगाए गौतम की प्रतीक्षा करने लगें।

उधर गौतम लब्धिबल से क्षणमात्र में ही अष्टापद पर्वत की चूड़ा पर जा पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने शाश्वत विद्यमान चौबिस तीर्थ-करों के अकृतिम और आकाशगामी, उत्तान खड़े दिव्य बिम्बों का बड़े भक्तिभाव से वन्दन किया। उन्हें प्रतीत हुआ, मानो नन्दीश्वर द्वीप के भरतेश्वर द्वारा बनवाए हुए चैत्य में उन्होंने प्रवेश किया हो। चैत्य में से निकलकर गौतम एक विशाल अशोक वृक्ष के नीचे विराजमान दिखाई पड़ें। वहाँ अनेक सुरों-असुरों और विद्याधरों ने उनकी वन्दना की। गौतम ने उनके योग्य महावीर की वाणी उन्हें सुनायी। जिससे उनके कई निरंतर प्रश्नों का समाधान हो गया। वहाँ एक रात्रि परमध्यान में निर्गमन करके प्रातःकाल वे पर्वत से उपदत्याका में उतर आए।

तब वे सारे तपस प्रभुपाद गौतम के समीप सिमट आए। उन्होंने स्वयं ही जिज्ञासा जान ली। सम्यक् दर्शन, ज्ञान-चारित्र्य की महिमा का प्रतिबोध देकर गौतम बोले-परम कल्याण बरेषु तापसो। देह की स्थूलता और क्षीणता चेतना के ऊर्ध्वगमन की निर्णायक नहीं। साधक की आत्मशक्ति के विकास पर ही यह निर्भर करता है। आत्मजयी अर्हत् देह में विद्यमान होकर भी देहातीत विचरते हैं।

चरित्र्यशुद्धि के कारण भावदलिंगी यतियों की चेतना में जब महाभाव अवलोकित हो उठता है तो उनके निकट ऐसी दैवी ऋद्धियाँ स्वतः सहज ही प्रकट हो उठती हैं, जो मानुषी अवस्था में सम्भव नहीं। ये ऋद्धियाँ और लब्धियाँ उन मुनि-भगवन्तों का काम्य नहीं, लक्ष्य नहीं, प्रयोजन नहीं। वे आप ही मानों उनकी चरण-चेरियाँ होकर उनकी सेवा में उपस्थित रहती हैं। आत्मकल्याण हेतु कभी-कभी वे स्वयं ही मुनीश्वर की सहायक हो जाती हैं। अणिमा और महिमा ऋद्धि पलमात्र में देह को लघु या गुरु कर देती हैं, तब चैतन्य के ऊर्ध्व आरोहण में देह दासी की तरह अनुगमन कर जाती हैं। मैं खेल ही खेल में कैसे इस महागिरि पर चढ़कर उतर आया, यही तो तुम सबकी जिज्ञासा थी।

श्रीपाद गौतम के ऐसे वचन सुनकर पन्द्रह सौ तापस चकित, निःशब्द, निर्मन से हो रहे। फिर उन्होंने एक स्वर में निवेदन किया-हे महायतिन्! हम सब श्री चरणों में समर्पित हैं। आप हमारे एकमेव श्रीगुरु हो जाएँ और हमें अपने शिष्य रूप में ग्रहण करें।

तापसों के इस कथन पर उनके गुरु होने का गर्व फिर अंगड़ाइयाँ लेने लगा। महावीर के परम नजदीकी होने का अभिमान विषधर नाग की भाँति फुँफकार उठा। वे हर्ष में मन होकर कुछ सोचने लगे।

तभी सारे तापस एक स्वर में बोले, हे महाभाव मुनीश्वर ! हम सबको भी अपने जैसा ही दिगम्बर बना लें। हमसे ऊब आपके अनुगमन के लिए प्रस्तुत हैं।

तपसों की प्रबल अभीप्सा और अटल आग्रह देख श्री गुरु गौतम प्रसन्न हुए, उन्होंने सहर्ष उन्हें दिगम्बरी शिक्षा दे दी। अदृश्य देवशक्ति ने उन्हें पिच्छी कमण्डलु प्रदान किये, फिर विन्ध्यागिरि में जैसे यूथपति महाहस्ति के साथ दूसरे हाथी चलते हैं वैसे ही भदन्त गौतम अपने गुरुपद पर प्रफुल्लित होते हुए पन्द्रह सौ शिष्यों के साथ श्री भगवान के समवसरण की दिशा में प्रस्थान कर गये। चलते-चलते गौतम को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने राजमार्ग छोड़कर अरण्य की राह पकड़ी। तापस निःशंक होकर अपने गुरु का अनुगमन करने लगे। जाने कबसे वे दीर्घ और कठिन तपस्या कर रहे थे। गुरु प्राप्ति के उल्लास से उन्हें एक अपूर्व और तीव्र भूख लग आयी थी। खूब प्यास भी लग रही थी। गौतम अपने शिष्यों की इस ऐषणा को जान गए। एक स्थान पर रुककर उन्होंने आदेश दिया-

देवानुप्रियों, आहार की बेला हो गयी। स्थिर खड़े होकर अपनी अंगुलियाँ ऊपर उठाओ। आहार-जल प्रस्तुत है।

वे पन्द्रह सौ श्रमण पहले तो सुनकर अवाक् रह गये, इस जनहीन अरण्य में आहार जल कैसे ? लेकिन अगले ही क्षण उनका प्रश्न और विकल्प जाने कहाँ विलीन हो गया। वे भीतर-बाहर निरे शून्य रह गये।

तभी उन्हें सुनाई पड़ा- आयुष्मान् आहार-जल ग्रहण करो।

तापस उन्मन हो पाणिपात्र उठा आहार-जल ग्रहण करने को उद्यत हो गये। उन्होंने देखा कि जाने कहाँ से उनकी अंगुलियों में प्रासुक जलधारा बहने लगी। वे जल पीकर शान्त हो गये। मानों प्यास सदा को बुझ गयी।अचानक उनके उठे हाथों में दिव्य केशर सुरभित पायस ढलने लगा। उन्होंने जीभर कर मधुर पायस का आहार किया। मानों उनकी भूख सदा के लिए मिट गयी। और उन पन्द्रह सौ तापसों ने अनुभव किया कि जैसे उन पन्द्रह सौ तापसों ने अनुभव किया कि जैसे उनका शरीर अनायास परिमल की तरह हल्का और व्याप्त हो चला है। भीतर के पोर-पोर में शून्य उभर रहा है। बाहर भी सब कुछ एक शून्य गहराता जा रहा है। औचक ही उनको लगा कि उनका मैं विलुप्त हो गया है। प्रथम पुरुष भी नहीं, द्वितीय पुरुष भी नहीं, बस निरे पन्द्रह सौ तीसरे पुरुष बिना किसी आयास के स्वतः संचालित चले जा रहे हैं। कर्ता भी नहीं, भोक्ता भी नहीं, व्यक्ति भी नहीं। हठात् उन सबको सम्वेदांत हुआ कि उनके भीतर न जाने कितने सूर्यों की नदी-सी बह रही है।

परम मुहूर्त घटित हुआ। सभी पन्द्रह सौ तापसों को दूर से ही प्रभु के अष्ट प्रतिहार देखकर उज्ज्वल कैवल्य ज्ञान उत्पन्न हो गया।निमिष मात्र में वे कैवल्य से प्रभास्वर हो उठे। समवसरण के श्रीमण्डप में पहुँचकर देवार्य ने विधिवत तीन प्रदक्षिणा देकर श्रीभगवान का त्रिवार वन्दन किया। उनके पीछे खड़े तापसों का देहभाव अनायास चला गया। वे वन्दना-प्रदक्षिणा से परे चले गए। वे कायोत्सर्ग में लीन हो निश्चल ध्रुवासीन हो रहे और विपुल मात्र में अर्हन्त महावीर के साथ तदाकार हो गये।

तभी गुरुभाव के दर्प में गौतम ने पन्द्रह सौ शिष्यों को आदेश दिया। महाभाग तापसो श्री भगवान की वन्दना करें।

तत्काल प्रभु ने वर्जना का हाथ उठाकर निर्देश किया:- केवली की आशातना न करो, आयुष्मान् गौतम! क्वली, केवली की वन्दना नहीं करते। ये पन्द्रह सौ तापस कैवल्य लाभ कर अर्हन्त हो चुके हैं। अर्हन्त, अर्हन्त को प्रणाम नहीं करते, वे परस्पर एक दूसरे के दर्पण होते हैं।

सुनकर गौतम की व्यथा फिर जाग उठी। वे फिर से आहत हो गये। मेरे ही द्वारा प्रतिबोधित दीक्षित मेरे पन्द्रह सौ शिष्य भी केवली हो गए और मैं स्वयं निरा ठूँठ ही रह गया। प्रभु के निकटतम होते हुए भी मैं अभी तक कैवल्य न पा सका। तभी अचानक श्री भगवान का स्वर सुनाई पड़ा:- देवानुप्रिय गौतम ! तुम मेरे निकट रहे ही कब?

इस प्रश्न ने भगवत्पाद गौतम को चौंका दिया। क्योंकि वे तो स्वयं को प्रभु के सबसे अधिक नजदीक मानते थे। उनकी इस सोच से असम्प्रक्त युगावतार कहे जा रहे थे, तुम मेरे नजदीक न रहकर केवल अपने अह के नजदीक ही जीते रहे हो। इसी अह के वशीभूत होकर तुमने अज्ञानी होते हुए भी गुरुपद स्वीकार किया।कैवल्य ज्ञान से विहीन होते हुए भी तुमने बहुसंख्यकों को दीक्षा दी। हाँ यह बात अलग है कि उनमें से जिन्होंने भी महावीर की वाणी का मर्म समझा, महावीर के विचारों से आत्मसात् कर सके, वे कैवल्य ज्ञानी हो गये।

लेकिन प्रभु आप के विचारों पर ही तो मैंने प्रवचन दिये हैं। गौतम के स्वर में असमंजस था।

तुमने सिर्फ प्रवचन किये हैं। तुम जो कुछ बोलते हो, तुम्हें उस पर विश्वास रहा ही कब है। अविश्वास में जी रहे हो देवानुप्रिय! यदि तुम्हें महावीर में विश्वास होता तो अष्टपाद पर्वत की ओर न भागकर महावी के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करते।

लेकिन मैं तो आपका उत्तराधिकारी पट्टगणधर हूँ भगवन्। गौतम की आवाज में कँपकँपी थी।

महावीर का कोई उत्तराधिकारी नहीं हो सकता, भदन्त। अवतारी चेतना का उत्तराधिकारी होने की सामर्थ्य भला किसमें हो सकती है। तुम्हें सिर्फ एक कर्तव्य सौंपा गया है। तुम मुझे पुत्र की भाँति प्रिय हो और इसी रूप में तुम्हें भौतिक विभूतियाँ मिली हैं। जबकि कैवल्य ज्ञान का अधिकारी तो सिर्फ शिष्य होता है। यदि शिष्य सच्चा और योग्य हो तो अयोग्य गुरु का संपर्क भी उसे कैवल्य लाभ दे देता है।तुम एवं तुम्हारे शिष्य स्वयं इसके उदाहरण हैं। परन्तु गुरु कितना भी योग्य हो लेकिन यदि शिष्य अयोग्य, दम्भी और अहंकारी है तो कुछ भी सम्भव नहीं। तुम आत्मावलोकन करो वत्स।

प्रभु के इस कथन ने भगवत्पाद गौतम का विवेक जाग्रत कर दिया। उन्हें शिष्यत्व की महिमा और गुरु से यथार्थ निकटता का मर्म समझ में आने लगा।


समष्टि के हित के निमित्त तपे गुरुदेव

अध्यात्म-विज्ञान की प्राचीनकाल में असंख्य धाराएँ थीं और वे लगभग सभी लुप्त हो गयीं।अपने को आध्यात्मिक कहने और बताने वाले प्रायः दार्शनिक सिद्धान्तों, प्रवचनों एवं तर्कों के सँजोते घेरे में सिमटे रहते हैं। या फिर ज्यादा से ज्यादा योग के नाम पर मायाचार और बाजीगरी का सहारा लेकर हल्के और ओछे प्रदर्शन करते फिरते हैं। इसका कारण बताते हुए गुरुदेव के शब्द हैं-बढ़िया-मशीनें ही बढ़िया काम करती हैं।उसी प्रकार बढ़िया व्यक्तियों पर ही ‘आध्यात्मिक विद्या’ का प्रयोग, उद्भव एवं प्रकटीकरण हो सकता है।”

प्राचीनकाल में योगमार्ग के साधक अपने शरीर, मन एवं अन्तःकरणों को जीवन साधना द्वारा उत्कृष्ट बनाते थे, तब उसको भली प्रकार से जोती हुई भूमि में चमत्कारी, आध्यात्मिक विद्याओं की कृषि उगायी जाती थी। मात्र दार्शनिक ज्ञान एवं साधना सिद्धान्त जानने के बलबूते कोई व्यक्ति आत्मबल से सम्पन्न नहीं हो सकता-जन्त्र-मन्त्र से घटिया स्तर के लोग कुछ सिद्धि-चमत्कार प्राप्त भी कर लें तो उनके द्वारा घटिया प्रयोजनों की ही पूर्ति हो सकती है, लेकिन उनकी स्थिरता एवं सफलता भी स्वल्पकालिक और संदिग्ध बनी रहती है। यही कारण है कि प्रयोग करने पर भी लोगों को अध्यात्म विज्ञान के चमत्कारी लाभों से वंचित रहना पड़ता है। धूर्तता के आधार पर सिद्धि दिखाने और चमत्कार बताने की प्रवंचना कितने ही लोग करते रहते हैं और भले लोगों को बहकाते रहते हैं। पर वस्तुतः जो आत्मबल प्रकट करने और उसका उपयोग सिद्ध करने की चुनौती स्वीकार कर सकें, ऐसे लोग नहीं के बराबर हैं।

योग की अनेक चमत्कारी शक्तियाँ और सिद्धियाँ हमारे पूर्वपुरुषों को प्राप्त थीं। वे उनके द्वारा जहाँ अपनी महानता का अभिवर्धन करते थे, वहाँ उस विद्या के द्वारा विश्वमानव की महती सेवा भी करते थे-भौतिक-विज्ञान के अन्वेषणों और यन्त्रों ने मनुष्य जाति की सेवा की है और अपना वर्चस्व स्थापित किया है। अध्यात्म विज्ञान की मान्यता तब तक सिद्ध नहीं हो सकती, जबतक वह अपने अस्तित्व की वास्तविकता को प्रत्यक्ष एवं प्रमाणित न करे। गुरुदेव का जीवन आध्यात्म-विज्ञान की अनूठी प्रयोगशाला के रूप में सतत् सक्रिय रहा। उन्होंने अनेकों घटनाक्रमों, विभिन्न उदाहरणों द्वारा हमेशा यह स्पष्ट किया कि भौतिक-विज्ञान से आध्यात्म-विज्ञान के चमत्कार लाखों करोड़ों गुने अधिक हैं।उनकी शक्ति से मानव जाति की अनेक जटिल समस्याओं को बड़ी आसानी से सुलझाया जा सकता है। एक महान आध्यात्मवेत्ता के रूप में उन्होंने बाजीगरों की भाँति सार्वजनिक प्रदर्शन भले ही न किये हों, किन्तु यदि उनके जीवनक्रम के विभिन्न घटनाक्रमों का लेखा-जोखा किया जाए-तो पता चलेगा कि अध्यात्म विद्या के महान वैज्ञानिक के रूप में वे विश्वहित के लिए सतत् और अनवरत सक्रिय रहे।

व्यक्तिगत स्तर पर उनके आध्यात्मिक प्रयोगों का क्रम उस समय से प्रारम्भ हुआ जब सन् 1926 की वसन्त पंचमी के दिन प्रातःकाल उनकी अपनी मार्गदर्शक सत्ता से भेंट हुई। इस विवरण शब्दाँकित करते हुए वे कहते हैं-पन्द्रह वर्ष की आयु थी, प्रातः की उपासना चल रही थी। वसन्त पर्व का दिन था। उस दिन ब्रह्ममुहूर्त में कोठरी में सामने प्रकाशपुँज के दर्शन हुए। आँखें मलकर देखा कि कहीं कोई भ्रम तो नहीं है। प्रकाश प्रत्यक्ष था। सोचा किसी भूत-प्रेत या देव-दानव का विग्रह तो नहीं है। ध्यान से देखने पर भी वैसा कुछ लगा नहीं। विस्मय भी हो रहा था और डर भी लग रहा था। स्तब्ध था।प्रकाश के मध्य में एक योगी का सूक्ष्म शरीर उभरा। सूक्ष्म इसलिए कि छवि तो दीख पड़ी, वह प्रकाश पुँज के मध्य अधर में लटकी हुई थी। वह कौन है। आश्चर्य उस छवि ने बोलना प्रारम्भ किया और कहा- हम तुम्हारे कई जन्मों से जुड़े हैं। मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। पिछले जन्मों का विवरण देखो और आश्चर्य निवारण करो। उनके इतना कहते ही एक गहरी समाधि में तीन जन्मों का अनुभव हुआ। उनमें से प्रथम थे सन्त कबीर, दूसरे समर्थ रामदास, श्री रामकृष्ण परमहंस। इन तीनों का कार्यकाल इस प्रकार रहा है-कबीर-ई. सन् 1398-1518), समर्थ रामदास (ई. सन् 1608-1689), श्री रामकृष्ण परमहंस (ई. सन् 1836-1886)। तीन जन्मों का सम्पूर्ण जीवनक्रम दिखाने के बाद उन्होंने वर्तमान जीवन के प्रयोजन और उद्देश्य को बताया और आध्यात्मिक प्रयोगों का क्रम निश्चित किया।”

इस क्रम में चौबीस वर्ष से चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों के साथ जौ की रोटी और छाछ पर निर्वाह करने का अनुशासन रखा गया। चौबीस वर्षों तक सम्पन्न किया गया यह प्रयोग हर साल 24 लाख के गायत्री जप तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसमें अध्यात्म विज्ञान के सभी तत्व और आधार सम्मिलित थे।यह पूज्यवर के व्यक्तिगत जीवन में किया गया ऐसा महान प्रयोग था, जिसका निष्कर्ष स्वयं को देवमानव के रूप में विकसित करने तथा वैज्ञानिक आध्यात्म को शत-प्रतिशत सत्य सिद्ध होने के रूप में निकला।साथ ही उनका स्वयं का व्यक्तित्व एक ऐसे सशक्त आधार के रूप में विकसित हो सका, जिस पर बाद के समय में विश्वहित के लिए किये जाने वाले प्रयोग सम्पन्न हुए।

इसी बीच मार्गदर्शक सत्ता के संकेत पर उनकी प्रथम हिमालय यात्रा सम्पन्न हुई। यहाँ उनका हिमालय की उन दिव्य विभूतियों से साक्षात्कार हुआ जो आध्यात्म ज्ञान की प्रणेता है। गुरुदेव के शब्दों में वे सभी उस दिन ध्यान मुद्रा में थे। मार्गदर्शक सत्ता ने बताया कि ये प्रायः इसी स्थिति में रहते हैं।अकारण ध्यान तोड़ते नहीं। क्रम से एक-एक का नाम बताया गया और उनके सूक्ष्म शरीर का दर्शन कराया गया। यही है सम्पदा, विशिष्टता और विभूति इस क्षेत्र की। मार्गदर्शक सत्ता के साथ मेरे आगमन की बात उन सभी को पूर्व विदित थी। सो हम दोनों जहाँ भी जिस स्थान पर पहुँचे, उनके नेत्र खुल गये। चेहरों पर हल्की मुस्कान झलकी और सिर उतना ही झुका मानों वे अभिवादन का प्रत्युत्तर दे रहे हों।” हिमालय के इस ऋषितंत्र के मार्गदर्शन में गुरुदेव ने आध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोगों का व्यक्तिगत धरातल से ऊपर उठकर विश्वहित के लिए सम्पन्न करने का निश्चय किया।

इस निश्चय के फलस्वरूप उन्होंने अपने अध्यात्म-विज्ञान के प्रयोगों की प्रथम प्रयोगशाला के रूप में जून 1953 में गायत्री तपोभूमि का निर्माण किया। यद्यपि मथुरा में तपोभूमि निर्माण के लिए चुना गया वह स्थान पहले कभी महर्षि दुर्वासा की तपस्थली रह चुका था, लेकिन इसे उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगों के अनुरूप बनाने के लिए उन्होंने विशिष्ट प्रयास किये। उन्हीं के शब्दों में-प्रयत्न यह किया जा रहा है कि जाग्रत एवं दिव्य शक्तिसम्पन्न 2400 तीर्थों का प्रतिनिधित्व पूर्णाहुति यज्ञ में हो सके। यों प्रायः दस हजार पुण्यभूमियों की रज और प्रायः एक हजार नदी-सरोवरों का जल एकत्र किया जायेगा। गायत्री माता की प्रतिमा स्थापित करने की वेदी 2400 जाग्रत तीर्थों की रज से तथा 2400 नदी सरोवरों के जल से निर्मित की जायेगी। ऐसे तीर्थ की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए कितनी आत्मिक पवित्रता की आवश्यकता है, उसके लिए ऋषिकेश से विशेष रूप से मंगाये गंगाजल पर निर्वाह करके 24 दिन तक निराहार उपवास करने का निश्चय किया गया है। यही नहीं वातावरण को अधिक दिव्य स्पन्दनों से सम्पन्न करने हेतु सहस्राँशु गायत्री यज्ञ आयोजित किया गया।यह देश के कोने-कोने पर सहस्र ऋत्विजों के सम्मिलित संकल्प से पूरा हुआ। इसके अंतर्गत सवा करोड़ गायत्री जप, 125 लाख आहुतियों का हवन एवं 125 हजार उपवास किए गए।”

इस स्थापना के साथ ही गायत्री तपोभूमि में साधना-सत्रों का प्रारम्भ हुआ, साथ ही गायत्री महाअभियान का आयोजन और गायत्री उपासना के सामूहिक आयोजन किये जाने लगे। यज्ञ विद्या पर सर्वांगीण शोध के उद्देश्य से सन् 1955 की वसन्त पंचमी से 15 महीनों तक चलने वाले विशद् गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया। इसके अंतर्गत (1) चारों वेदों का परायण, (2) महामृत्युँजय यज्ञ (3) रुद्र यज्ञ (4) विष्णु यज्ञ (5) शत चण्डी यज्ञ (6) नवग्रह यज्ञ (7) गणपति यज्ञ (8) सरस्वती यज्ञ (9) ज्योतिष्टोम (10) अग्निष्टोम आदि अनेक यज्ञों की प्रतिक्रियाएं सम्मिलित थीं। यह विश्वहित के लिए सम्पन्न हुआ आध्यात्मिक प्रयोग था। गुरुदेव के शब्दों “इस यज्ञ का यजमान, संयोजक, पूर्णफल प्राप्तकर्ता कोई एक व्यक्ति नहीं है। यह संकल्प समस्त गायत्री उपासकों की ओर से विश्व कल्याण के लिए किया गया है।

इसके बाद की साधना उन्होंने ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के रूप में की, जिसकी पूर्णाहुति 1958 के सहस्रकुण्डीय महायज्ञ में हुई। ब्रह्मास्र अनुष्ठान समस्त गायत्री परिवार द्वारा उसके कुलपति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के निर्देशन में पूरा किया गया।इस प्रयोग के तीन चरण थे-पहले चरण में प्रतिदिन 24 लाख मंत्र जप, 24 हजार आहुति, 24 हजार पाठ, 24 हजार मन्त्र लेखन। दूसरे चरण के अंतर्गत प्रतिदिन सवा करोड़ गायत्री जप, सवा लाख आहुतियाँ, 24 लाख मंत्रलेखन को पूरा किया गया। इसकी पूर्णाहुति के रूप में सम्पन्न सहस्रकुण्डीय महायज्ञ अपने आप में अलौकिक प्रयोग था।

इसके भागीदार वही हो सकते थे, जो वर्षभर में सवा लाख जप, 52 उपवास, ब्रह्मचर्य पालन, भूमिशयन आदि तपश्चर्या कर चुके हों। यह सविता शक्ति संदोहन का विशिष्ट एवं विलक्षण प्रयोग था। इस तत्व को स्पष्ट करते हुए गुरुदेव स्वयं लिखते हैं-अक्टूबर 1958 का सहस्रकुण्डीय यज्ञ एक ऐसा ही प्रयोग था। पीछे मौसम वैज्ञानिकों ने भी हमारी मान्यता की पुष्टि कर दी। 1 जुलाई 1957 से 31 दिसम्बर, 1958 तक खगोलशास्त्रियों ने अन्तर्राष्ट्रीय शान्त सूर्य वर्ष (इंटरनेशनल ईयर ऑफ द क्वाइट सन) संक्षेप में इक्विसी मनाया। यह नाम इसलिए रखा गया क्योंकि इन लगभग दो वर्षों में सूर्य बिल्कुल शान्त रहा। और वैज्ञानिकों को उस पर अनेक प्रयाग और अध्ययन करने का अवसर मिला। लगभग इसी अवधि में हमारे उस यज्ञ की तैयारियाँ की गयी थीं। साधकों ने एक वर्ष पूर्व से गायत्री के विशेष पुरश्चरण प्रारम्भ किये थे और अक्टूबर, 1958 में 4 दिन तक यज्ञ कर शरदपूर्णिमा के दिन पूर्णाहुति दी थी।गायत्री का देवता सविता है। इसलिए इस गायत्री अभियान का उद्देश्य उसका अध्ययन और प्रयोग भी था और उस उपलब्धियों से सारे विश्व समाज को लाभान्वित करना भी, जो ऐसे अवसरों पर देवशक्तियों से सुविधापूर्वक अर्जित की जा सकती है।”

इस प्रयोग के पश्चात् परमपूज्य गुरुदेव 5 जून, 1960 को दूसरी बार हिमालय चले गये। इस यात्रा का उद्देश्य अपनी मार्गदर्शक सत्ता के साथ हिमालय के ऋषितन्त्र से पुनः भेंट करना था ताकि उनके साथ मिलकर विश्वहित के लिए अध्यात्म के अन्य विशिष्ट प्रयोग किये जा सकें। एक वर्ष की तप-साधना पूरी करके जब वह लौटे उस समय सन् 1962 में आने वाले अष्टग्रही योग के कारण समाज में भय का वातावरण संव्याप्त था। भविष्य वक्ता अपनी अनेक तरह की भविष्यवाणियों से इसे और भी अधिक बढ़ावा दे रहे थे।उस भय के वातावरण को समाप्त करते हुए उन्होंने कहा-इससे किसी को भयभीत या निराश नहीं होना चाहिए। विनाशकारी शक्तियों की ही भाँति रक्षा की शक्तियाँ भी सक्रिय हैं।” और गायत्री परिवार के सदस्यों को सप्त-सूत्री साधनाक्रम में सम्मिलित होने का निर्देश दिया। इसके परिणाम आश्चर्यजनक रूप से सामने आये। अष्टग्रही योग बिना किसी प्रकार का विशेष उपद्रव मचाते शान्त हो गया।

उनके आध्यात्मिक प्रयोगों का अगला क्रम सन् 1962 के चीन युद्ध के समय और सन् 1965 के पाकिस्तान युद्ध के समय शक्ति के रूप में सम्पन्न हुआ। इससे उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रभाव जिस ढंग से दृष्टिगोचर हुए उसे आज भी रहस्यमय ही कहा जा सकता है। बढ़ते हुए चीनियों के कदम लगातार हारती जा रही भारतीय सेना के समक्ष अचानक कैसे पीछे हट गए? इसका जवाब शासनाध्यक्ष नहीं सूक्ष्मदर्शी ही दे सकते हैं।सन् 1965 के पाकिस्तान युद्ध के समय बहादुर सैनिकों की वीरता के साथ उनका आध्यात्मिक पुरुषार्थ भी सम्मिलित था। इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा-भारत की बहादुर सेनाओं ने राजनेताओं ने तथा अनेक देशभक्तों ने अपने अपने ढंग से जिस त्याग, बलिदान, देशभक्ति और सूझ-बूझ का परिचय दिया, उस देश पर मस्तक सदा गर्वोन्नत रहेगा। इस अवसर पर अध्यात्मक्षेत्र भी अकर्मण्य नहीं रह सकता था। गायत्री परिवार ने उपरोक्त पुरश्चरण आरम्भ किया। उसका जो प्रभाव अभीष्ट हो सकता था, वही हुआ। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अपने इस शक्ति पुरश्चरण की भी है।” इस विशिष्ट प्रयोगों के अतिरिक्त इस बीच लगातार तपोभूमि में मानवी-चेतना के उत्कर्ष के लिए उनकी मार्गदर्शक सत्ता का संदेश आ पहुँचा और 20 जून, 1971 को वह अगली हिमालय यात्रा के लिए चल पड़े।

उनकी इस हिमालय यात्रा के साथ ही अध्यात्म की अद्वितीय प्रयोगशाला के रूप में हरिद्वार स्थित शांतिकुंज का विकास हुआ। जिसका कार्यभार उन्होंने वन्दनीया माताजी के हाथों सौंपा। इस तीसरी हिमालय यात्रा में लगभग 1 वर्ष तक विशिष्ट तपश्चर्या का क्रम चला। इस अवधि में पाकिस्तान द्वारा किए गए आक्रमण को निरस्त करने के लिए किए गए ऋषियों के तप-पुरुषार्थ में उनकी भागीदारी भी शामिल थी।

इस हिमालय यात्रा में उन्हें अपने मार्गदर्शक तथा वहाँ के ऋषिगणों से शांतिकुंज में ऋषि-परम्परा को पुनर्जीवित करने का निर्देश मिला। शांतिकुंज पहुँचकर उन्होंने अपने आध्यात्मिक प्रयोगों की शुरुआत प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र’ से की।इस प्रयोग के प्रभाव ने ही शांतिकुंज और गायत्री नगर में आकर लोक कल्याण के लिए सर्वस्व अर्पित करने वालों की भीड़ लगा दी। इसी क्रम में 1976 में स्वर्ण जयन्ती साधनावर्ष मनाया गया।इसका उद्देश्य एक लाख साधकों की चेतना में विशेष बल भरना था। इसी क्रम में सन 1976 में रजत जयन्ती पुरश्चरण सम्पन्न हुआ।

सन् 1979 में गुरुदेव ने आध्यात्मिक शक्ति का एक अन्य विशिष्ट प्रयोग किया।जिसे उन्होंने सुरक्षा अनुष्ठान की संज्ञा दी।इस वर्ष स्काईलैब नामक-अन्तरिक्षीय यान के विस्फोट का खतरा धरती पर मंडरा रहा था। वैज्ञानिकों के अनुसार इसके गिरने पर प्रभावित होने वाले क्षेत्र थे-लाओस मनीला, पनामा, अटलाँटिक देश तथा नाइजीरिया एवं भारत का एक बड़ा क्षेत्र, जिसमें महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश गुजरात, उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल प्रमुख थे।वैज्ञानिकों के अनुसार धरती पर इसके प्रभाव-स्वरूप धन-जन की क्षति के साथ सारे वातावरण का सन्तुलन बिगड़ जाना था। स्काईलैब इन जनसंकुल स्थानों से दूर समुद्र में कैसे जा गिरा ? इसे ठीक-ठीक बताने में तो वैज्ञानिक सफल नहीं हो सके, पर हाँ उनके लिए यह एक आश्चर्य तो रहा ही। गुरुदेव ने इस आश्चर्य का रहस्योद्घाटन करते हुए लिखा-यह इस बात का चिन्ह है कि स्थूल को प्रभावित करने वाले विज्ञान की तरह सूक्ष्म को प्रभावित करने वाला अध्यात्म भी सामयिक समस्याओं के सम्बन्ध में जागरुक है। यह उज्ज्वल भविष्य का शुभ चिन्ह है।” गायत्री परिवार के लाखों सदस्यों ने जुलाई मास में जो निर्धारित साधना की, उसे सूक्ष्म संरक्षण की दृष्टि से अत्यन्त शक्तिशाली एवं महत्वपूर्ण माना जायेगा।इस प्रयोग के अलावा शांतिकुंज में चान्द्रायण सत्र, कल्पसाधना सत्र एवं ब्रह्मवर्चस-साधना सत्र जैसे अनेकों प्रयोग वैयक्तिक चेतना के उत्कर्ष एवं उन्नति के लिए चलते रहे।

सन् 1980 से 2000 तक के समय को गुरुदेव ने युगसन्धि काल कहा। उनके शब्दों में युगसन्धि की विषम बेला में नियंता की गलाई-ढलाई प्रक्रिया तीव्र से तीव्रतम हो रही है। उसके साथ मानवी प्रयत्नों का भी सन्तुलन बैठना चाहिए। इस सन्तुलन को बैठाने के लिए उन्होंने जो प्रयोग शुरू किया, उसे नाम दिया प्रज्ञा पुरश्चरण। इसके स्वरूप और महत्व को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा- वर्तमान 25 लाख प्रज्ञापरिजनों द्वारा किये गये इस अभूतपूर्व महापुरश्चरण में प्रतिदिन 24 करोड़ जप नियमित रूप से सम्पन्न होता रहे। साथ ही उसी अनुपात में उसका अपेक्षित अग्निहोत्र भी साथ-साथ चलता रहे। इस शुभारम्भ के साथ युग परिवर्तन के लिए अनेकानेक महत्वपूर्ण दृश्य और अदृश्य उपक्रम सम्मिलित है।

सन् 1982 में उन्हें चौथी बार हिमालय बुलाया गया। इस बार उनकी यह यात्रा सूक्ष्म शरीर से हुई। हिमालय पहुँचने पर उन्हें पाँच जिम्मेदारियाँ सौंपी गयीं- (1) वायुमण्डल का परिशोधन (2) वातावरण का परिष्कार, (3) नवयुग का निर्माण, (4) महाविनाश का निरस्त्रीकरण, (5) देवमानवों का उत्पादन-अभिवर्द्धन-इसके लिए उन्हें यह बताया गया, तुम अपने को पाँच बना लो। इसे सूक्ष्मीकरण साधना कहते हैं। अपने मार्गदर्शक के आदेशानुसार उन्होंने सूक्ष्मीकरण-सावित्री साधना का शुभारम्भ 1984 की रामनवमी से कर दिया।

आध्यात्मविद्या के इतिहास में ऋषि सत्ताएं आध्यात्मिक ऊर्जा का लोक-कल्याण में प्रयोग करती हैं। रामायणकाल में रावण के आतंक को समाप्त करने के लिए महर्षि विश्वामित्र और महर्षि अगस्त्य ने श्री राम को माध्यम बनाकर रावण का विनाश किया था। विश्वामित्र द्वारा भगवान राम को बला-अतिबला बताना एवं अगस्त्य द्वारा उन्हें सूर्य विद्या प्रदान करना प्रकारान्तर से ही प्रक्रिया थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हिटलर के आतंक को समाप्त करने के लिए महर्षि अरविन्द ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रयोग किया कहते हैं जब प्रत्येक व्यक्ति यह आशा कर रहा था कि इंग्लैण्ड का शीघ्र पतन हो जायेगा और हिटलर की निश्चित रूप से जीत होगी। मैं अपनी आध्यात्मिक शक्ति से मित्र राष्ट्रों की सहायता करने लगा और यह देखकर सन्तोष हुआ कि जर्मनी की विजय का वेग लगभग रुक गया। जर्मनी हारा और हिटलर मृत्यु को प्राप्त हुआ।

हिमालय की ऋषि सत्ताएं शताब्दियों से मानव-कल्याण के लिए अपने आध्यात्मिक प्रयोगों में संलग्न हैं। उनकी ऊर्जा का प्रभाव ही है कि वैज्ञानिकों एवं ज्योतिषियों द्वारा की जाने वाली विनाशकारी भविष्यवाणियाँ आश्चर्यजनक ढंग से टल जाती हैं। इन्हीं ऋषि सत्ताओं के प्रतिनिधि के रूप में परमपूज्य गुरुदेव ने मार्च 1984 में सावित्री साधना की शुरुआत की। इसके प्रभाव को बताते हुए उन्होंने लिखा- सावित्री विश्वव्यापी है। उसके प्रभाव से भूमण्डल का सम्पूर्ण क्षेत्र एवं प्राणिसमुदाय का समूचा वर्ग प्रभावित हो उठता है। वह जन-जन के मन-मन में प्रेरित प्रेरणा की तरंगें उत्पन्न कर सकती है। वह अनर्थ संजोने वाले को टक्कर मारकर नीचे गिरा सकती है और साथ ही दिशा भूले लोगों को सही रास्ते पर उसी प्रकार चला सकती हैं जिस प्रकार झुण्ड से बाहर तितर-बितर भागने वली भेड़ों को चरवाहा डण्डा दिखाकर सही रास्ते पर ले आता है।

अध्यात्म विद्या का यह समर्थ प्रयोग गुरुदेव ने तीन वर्षों में सम्पन्न किया। इस समर्थ प्रयोग की परिणतियाँ दो रूपों में हुईं-(1) विश्व का कुण्डलिनी जागरण, यह जागरण पुरातन काल में विश्वामित्र के द्वारा सम्पन्न हुआ था। उस बार भी विश्व वसुधा का कायाकल्प हुआ था, इस बार भी वैसा ही होने जा रहा है। (2) पाँच वीरभद्रों-सूक्ष्मशरीरों का उत्पादन।

गुरुदेव के शब्दों में-सूक्ष्मीकरण के महाप्रयाग से उत्पन्न एक वीरभद्र विचार-संशोधन में लगेगा। दूसरे वीरभद्र के लिए यही कार्य सौंपा गया कि नवनिर्माण के लिए जितने प्रचुर साधनों की आवश्यकता है, उन्हें कहीं से भी किसी भी कीमत से जुटाया जाना चाहिए। इतने साधन को जुटा सके, सो कितना समर्थ होगा, यह अनुमान लगाने में किसी को चूक नहीं करनी चाहिएं।तीसरा वीरभद्र दुरात्माओं के लिए भय का वातावरण उत्पन्न करेगा। सूक्ष्मीकरण से उत्पन्न चौथे वीरभद्र को प्रस्तुत एवं भावी प्रज्ञापरिजनों की दृष्टि से अधिक समर्थ बनाने के लिए सुरक्षित छोड़ दिया गया है। सूक्ष्मीकरण से उत्पन्न चार वीरभद्रों को असाधारण काम सौंपे गये हैं उनके लिए खुराक कहाँ से आए? इसके निमित्त एक पाँचवाँ वीरभद्र विशुद्ध तपश्चर्या में ही निरत रहेगा।

इसी महान सामर्थ्य के आधार पर उन्होंने कहा-” सघन तमिस्रा का अन्त होगा। ऊषा काल के साथ उभरता अरुणोदय अपनी प्रखरता का परिचय देगा।” उनकी सूक्ष्मीकरण साधना के समय और उसके बाद शांतिकुंज में एकमासीय और नौदिवसीय साधना सत्रों का क्रम अनवरत चलता रहा।सूक्ष्मीकरण साधना की पूर्णाहुति देशव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के रूप में की गयी। आध्यात्मिक प्रयोगों का यह क्रम उन्होंने अन्तिम श्वास तक जारी रखा और अन्त में सूक्ष्म जगत में ‘इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य’ के अपने उद्घोष को साकार करने वह चल पड़े। इस तरह उनके जीवन का पल-पल आध्यात्मविद्या के बहुमूल्य प्रयोगों में व्यतीत हुआ।उनका आध्यात्म दार्शनिक सिद्धान्तों, प्रवचनों, तर्कों तक सीमित नहीं रहा। बल्कि अपने जीवन में उन्होंने विश्वामित्र, दधीचि, अगस्त्य, आदि प्राचीन ऋषियों की भाँति इसके लुप्त विज्ञान को प्रकट किया और विश्वहित के लिए इसके अनगिनत प्रयोग सम्पन्न किए।


बन्दउँ गुरु-पद पदुम परागा

गोस्वामी महाराज पधारे हैं, कल तुम भी मेरे साथ उनके दर्शन के लिए चलना। कहने वाले स्वर में अधिकार मिश्रित आग्रह था। आखिर वह उनका घनिष्ठ मित्र जो था। आज अचानक उसके मन में आया कि अगर मैं सतीश को गुरुदेव के पास ले चलूँ तो इसका भला होगा। गोस्वामीजी से आज्ञा लेकर वह सतीश बाबू आया। उन दिनों सतीश बाबू उग्र मिज़ाज के थे। उन्हें धर्म, साधु, भक्ति के प्रति कोई लगाव नहीं था। उन्होंने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

मित्र ने कहा -मैं यह सब नहीं सुनना चाहता। तुम्हें मेरे साथ गुरुदेव के पास जाना पड़ेगा। कल सबेरे मैं आ जाऊँगा। तुम तैयार रहना। वाला है। मैं भोर में कहीं निकल जाऊँगा। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। जब मैं ही नहीं रहूँगा तब वह किसे ले जायेगा। वे दूसरे दिन भोर के समय गोस्वामीजी के भवन के विपरीत दिशा में घूमने निकल गए। लेकिन नियति को शायद कुछ और मंजूर था, भगवान की मंशा कुछ और ही थी। काफी देर तक बेमतलब घूमते रहने के कारण उन्हें प्यास महसूस हुई। पानी पीने की इच्छा से सामने के भवन के बाहर बैठे एक हमउम्र युवक के पास जाकर उन्होंने निवेदन किया। युवक ने कहा-कृपया भीतर आइए।

उस भवन के भीतर जाकर उन्होंने देखा कि कमरे में दो आसन बिछे हुए हैं। गौर से देखने पर ज्ञात हुआ कि इस समय वे प्रभुपाद विजय कृष्ण गोस्वामी के भवन में हैं और पानी पिलाने वाला युवक उनका पुत्र योगजीवन है। सतीशबाबू को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस भवन के विपरीत दिशा में जाने पर भी वे कैसे यहाँ आ गये ?

सहसा एक मधुर स्वर सुनाई दिया-सतीश ठीक समय पर आ गये हो। सामने वाले आसन पर बैठ जाओ।

सतीशबाबू ने पूछा- कृपया मुझे एक बात ठीक से समझा दीजिए। मैं आपके यहाँ नहीं आना चाहता था। आपके घर की विपरीत दिशा में चला गया, फिर भी यहाँ कैसे आ गया ?

गोस्वामीजी ने मधुर मुसकान के साथ कहा- आज इसी समय तुम्हें मुझसे दीक्षा लेनी थी। भवितव्य होकर रहता है। उसे कोई टाल नहीं सकता।

गोस्वामीजी महाराज का स्नेह, अपरिसीम वात्सल्य, निरन्तर उपेक्षा के बावजूद उनका मातृसुलभ ममत्व इन सभी ने सतीशबाबू को एकबारगी अचरज में डालने के साथ अभिभूत कर दिया। उन्होंने चुपचाप दीक्षा ग्रहण कर ली।

गोस्वामीजी इस युग में पुराने त्रेता के ऋषियों के प्रतीक थे। कमर में धोती एवं कौषंय उत्तरीय, खड़ाऊँ और कमण्डलु, मृगचर्म तथा दर्मासन, सब प्राचीन युग जैसे थे। वैसे ही उनके हवनकुण्ड की अग्नि सदा प्रज्ज्वलित रहा करती थी। प्रातः पत्नी के साथ वेदमन्त्रों से हवन करते। त्रिकाल स्नान संध्या करने और सदा वेदिका पर मृगचर्म डालकर ही शयन करते।

उस समय उनकी अवस्था होगी चालीस-पैंतालीस की। मस्तक पर जटा-जूट एवं मुख पर श्मश्रु-जाल ने आकृति को भव्य बना दिया था। भस्मलिप्त उनके शरीर में एक प्रकार का तेज प्रत्यक्ष हुआ करता था। वहाँ पहुँचते ही मन स्वभावतः शान्त हो जाया करता था।

गोस्वामी जी के व्यक्तित्व से कलकत्ता और बंगाल ही नहीं, उत्तर भारत की बहुसंख्यक जनता परिचित हो चुकी थी। काशी के स्वामी विशुद्धानन्द, तैलंग स्वामी जैसे सुप्रसिद्ध महात्मा उन्हें दैवी चेतना से समन्वित प्रकाश पुरुष मानते थे। दक्षिणेश्वर के श्रीरामकृष्ण परमहंस के तो जैसे वे निर्जन ही थे। वे जब भी जहाँ जाते गाँव-नगर के प्रसिद्ध-प्रतिष्ठित से लेकर सामान्यजनों का समुदाय उनके दर्शनार्थ उमड़ पड़ता। एक छोटा सा मेला जैसा लग जाता। सबके सब योगिराज के उपदेशों को बड़े श्रद्धा से सुनते और आत्मिक तृप्ति का अनुभव करते।

सतीशबाबू ने भी उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, लेकिन इन सभी बातों ने उन्हें प्रभावित के बदले-अप्रभावित ही किया। शायद इसका कारण उनकी अंग्रेजी शिक्षा, अंग्रेजियत का रंग-ढंग था। बाबू सतीशचन्द्र मुखर्जी अंग्रेजी भाषा, पश्चिमी दर्शन, पश्चिमी वेशभूषा, पाश्चात्य जीवनशैली में रचे-बसे थे। उन्हें श्रद्धा नहीं तर्क प्रभावित करता था। आध्यात्मिक भावों, क्रियाकलापों एवं साधनाओं में उन्हें न तो कोई रुचि थी और न ही आन्तरिक रस मिलता था।

लेकिन आज वह अभिभूत हो उठे। गोस्वामी जी के अतिशय प्रेम ने उन्हें विह्वल कर दिया। अब तो दीक्षा सम्पन्न होते ही यह प्रेम गुरु-शिष्य के अलौकिक सम्बन्ध में बदल गया और गुरु शिष्य इस प्रकार डेढ़-दो घण्टे बातें करते रहे कि गोस्वामीजी का पुत्र योगजीवन हतप्रभ होकर देखता रह गया। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि जिस व्यक्ति को वह एक लोटा पानी पिलाने के लिए अन्दर लाया था, वह उनके पिता का इतना घनिष्ठ आत्मीय है। इसी बीच न जाने कहाँ से घूमता-फिरता सतीशबाबू का मित्र आ गया। वही मित्र जिसने उन्हें अपने गुरुदेव के पास जबरन ले जाने की बात कही थी। उसने जब इन्हें स्वतः गुरुदेव के पास बैठे हुए देखा, तो उसके अचरज का ठिकाना न रहा। उसे समझ में ही नहीं आ रहा कि कल तक जो व्यक्ति गुरुवाद, भारतीय परम्पराओं से चिढ़ता था उन्हें दकियानूसी कहने में शान समझता था उसी ने आज गुरुदीक्षा कैसे ले ली ? परन्तु उसे अपने गुरुदेव की अलौकिकताओं पर विश्वास था, भरपूर श्रद्धा थी, सो अचरज जैसा कुछ नहीं लगा।

इधर सतीशबाबू का अन्तःकरण अब गोस्वामीजी से मिलने के लिए बेचैन रहने लगा, अगले ही दिन वह फिर से उनसे मिलने के लिए उनके घर पर आया। लेकिन घर में उनके पुत्र ने बतलाया कि पिताजी प्रातः से ही घर पर नहीं हैं। सम्भवतः वह वृन्दावन चले गए हैं। इस उत्तर को सुनकर सतीशबाबू को हल्की-सी निराशा तो हुई, परन्तु साथ ही साथ वृन्दावन जाने का विचार भी दृढ़ हुआ।

उनके कालेज की परीक्षाएं समाप्त ही हो चुकी थीं। गर्मी की छुट्टियों में इधर-उधर घूमने और आनन्द मनाने की स्वतंत्रता थी। बड़े भाई साहब ही उनके अभिभावक थे। उन्हें पर्याप्त वेतन मिलता था।किसी प्रकार की कोई आर्थिक कठिनाई न थी। बड़े भाई साहब उन्हें बेहद प्यार भी करते थे। उन्हें अपने इस छोटे भाई की प्रतिभा पर गर्व था।बस एक ही बात उनके आस्तिक एवं धार्मिक स्वभाव को रह-रहकर खटकती थी, छोटे भाई का पश्चिमी रंग-ढंग और नास्तिकों जैसी बातचीत। लेकिन जब उन्होंने अपने भाई साहब से छुट्टियों में वृन्दावन जाने और गोस्वामी जी से मिलने की बात कही, तो उनके आनन्द का ठिकाना न रहा।

बड़े भाई से सहज ही अनुमति प्राप्त करके वे वृन्दावन आ गए। वहाँ भगवती कालिन्दी के तट पर एक बगीचा था। उसमें एक सुन्दर कुटिया बनी थी। उसी में उन दिनों गोस्वामीजी रह रहे थे।उनकी पत्नी भी इन दिनों उनकी शिष्या की भाँति उन्हीं के साथ रहकर साधना कर रही थीं।

आश्रम में दो गायें रहती थीं और उनके दूध से ही हवन का हविस्य एवं दुग्धाहारी दंपत्ति की जीवन यात्रा भी चलती थी। यों उनमें लोगों की बड़ी श्रद्धा थी, किन्तु किसी का कोई दान वे लेते नहीं थे।

वे योगी थे। प्रातः हवन के पश्चात् ही उनकी कोठरी बन्द हो जाती और फिर मध्याह्न संध्या के समय खुलती। मध्याह्न के बाद वे आने-जाने वालों से मिलते। रात्रि में आठ नौ बजते-बजाते उपवन का द्वार बन्द कर दिया जाता था। वे अपनी शयन वेदिका अर्द्धरात्रि में छोड़कर उठ बैठते और ब्रह्ममुहूर्त में ही आसन त्याग देते।

सतीशचन्द्र मुखर्जी को वे बहुत मानते थे और वह युवक भी प्रायः नित्य दोपहर को भोजन करके उनके समीप पहुँच जाता था। अब उसकी बड़ी श्रद्धा थी। जो भी छोटी-मोटी सेवा का अवसर मिलता उसे करके बड़ी खुशी होती। संध्या को जब उपवन का द्वार बन्द होने को होता तभी वह वहाँ से हटता। बड़े भाई स्वतः धार्मिक प्रवृत्ति के थे। यों उन्हें आने-जाने का बहुत कम अवसर मिलता, उसे करके बड़ी खुशी होती। संध्या को जब उपवन का द्वार बन्द होने को होता तभी वह वहाँ से हटता। बड़े भई स्वतः धार्मिक प्रवृत्ति के थे। यों उन्हें कहीं आने-जाने का बहुत कम अवसर मिलता था, पर अपने छोटे भाई द्वारा साधु साधु सेवा उन्हें प्रसन्न करती थी। लेकिन परिस्थिति एक सी रहती नहीं। बड़े भाई को किसी कारण से नौकरी छोड़नी पड़ी। सतीशबाबू पर अचानक भार आ पड़ा।उनकी शादी भी हो चुकी थी। काम की उलझनों में कुछ ऐसे फँसे कि गोस्वामीजी के पास जा ही न सके।कुछ समय बाद जब अपने गुरुदेव के दर्शनार्थ पहुँचे तो पता लगा कि इसी बीच उनकी पत्नी का देहान्त हो गया। इसी के कुछ वर्षों के बाद प्रभुपाद विजयकृष्ण गोस्वामी ने भी सन् 1910 में अपने नश्वर कलेवर का त्याग कर दिया। धीरे-धीरे काल ने स्मृति पर यवनिका डाल दी।

पर गुरुदेव की कृपा का वे सतत् अनुभव करते रहे और भारतीय स्वाधीनता के प्रकाश स्तम्भ के रूप में उदय हुए। राष्ट्र एवं मानवता के प्रति उनके अद्भुत प्रेम को देखकर जब राजेन्द्र बाबू ने उनसे पूछा- यह अनुराग आने कहाँ से प्राप्त किया ? हालाँकि अपना सवाल पूछते हुए प्रश्नकर्ता को संकोच था कि उसे शायद ही अपने प्रश्न का उत्तर प्राप्त हो। क्योंकि ऐसा प्रश्न, उनकी गहन भावनाओं को उजागर करने वाले इस सवाल का जवाब वे शायद ही देते। फिर भी उन्होंने पूछ ही लिया।

राष्ट्र की करुण दशा हो या प्रभु-भक्ति की चर्चा उनकी आँखें भावों से सजल हो उठती हैं। रोम-रोम खड़ा हो जाता है। सारा शरीर कांप उठता है विचित्र ढंग से। ये बातें उनके हर मिलने वालों को आकर्षित करती हैं। सतीशबाबू का यह परिवर्तन उनके पुराने मित्रों को आश्चर्य में डाल देता था, क्योंकि पहले तो वे ऐसे नहीं थे। गोस्वामी जी से मिलने के बाद उन्हें क्या हो गया ?

मुझमें राष्ट्रप्रेम या भगवत्प्रेम कहाँ ? उन्होंने बड़े सरल ढंग से कहा। उनके कहने का ढंग ही बतला रहा कि वे बहुत अधिक संकोच अनुभव कर रहे हैं और इस प्रकार की चर्चा से भागना चाहते हैं। राजेन्द्रबाबू ने भी उन्हें तंग किए बिना पता लगाने का निश्चय किया। एक दिन की बात है वे अपने पूजा के कमरे में आसन लगाये बैठे थे। दबे पाँव पीछे से जाकर उन्होंने द्वार के समीप से ही झुककर देखा। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाया गया था। उस पर कुछ था जो पुष्पों से ढँका था। राजेन्द्रबाबू ने समझा शालिग्राम जी होंगे। धूपबत्ती एवं दीपक जल रहा था। सतीशबाबू की अँजलि बँधी थी। नेत्र बन्द थे और दो धाराएँ कपोलों पर से गिर रही थीं।

राजेन्द्र बाबू तब तक प्रतीक्षा करते रहे, जब तक उनकी पूजा समाप्त न हुई। आसन से उठकर जैसे ही उन्होंने उनकी ओर देखा, उन्होंने प्रणाम करते हुए कहा, क्या आपके भगवान के दर्शन कर सकता हूँ।

मेरे भगवान ? वे कुछ चौंके। आ जाइए! मेरे भगवान यहाँ कहाँ ? ऐसे भाग्य तो पता नहीं कभी होंगे या नहीं।

यह क्या है ? राजेन्द्रबाबू ने देखा कि सिंहासन पर पुष्प पूजित कोई मूर्ति नहीं एक पोटली है। कोई वस्तु पीले व रेशमी वस्त्र में बँधकर रखी हुई है।

गुरुदेव की चरणधूलि। बड़े संकोच से उन्होंने कहा, जब पिछले दिनों वे यहाँ आये थे तो मैंने चुपके से इसे एक स्थान से जबकि वे यहाँ श्रीचरण रखकर निकल गये थे, एकत्र कर लिया।

आप इसका तिलक करते हैं ? मैंने उन्हें कभी टीका लगाये देखा नहीं है, फिर भी भला धूल का और उपयोग ही क्या होगा? यह सोचकर उन्होंने पूछा।

मैं केवल इसकी वन्दना करता हूँ। सतीशबाबू ने भरे कण्ठ से कहा-इसकी वन्दना का परिणाम है कि मेरी कुरुचि सुरुचि में बदली है। जहाँ पहले मैं पाश्चात्य संस्कृति का प्रेमी था, नास्तिक कहाने में गर्व होता था। वहाँ अब अपने राष्ट्र और अपनी संस्कृति के प्रति यत्किंचित् अनुराग पनपा है।

राजेन्द्रबाबू वहाँ से लौट पड़े। मन में बहुत हलचल थी। शायद कहीं एकान्त में सोचना चाहते थे। यहाँ यह सौभाग्य कहाँ ? उनके यहाँ मित्र मण्डली जमी थी। विवशतः बैठना पड़ा। चर्चा चल रही थी, आजकल समाज की रुचि बिगड़ गयी है। नाटक, थियेटर, नियम हीन आहार-विहार सुरुचि तो रह ही नहीं गयी। न कथा न सत्संग और न राष्ट्रप्रेम से आन्दोलित भावनाएँ। जब सुरुचि ही नहीं तो प्रेम क्या होगा। अनुराग कहाँ से आवेगा।

चर्चा सुनकर राजेन्द्रबाबू चौंके-श्रीगुरु के चरणों की धूलि की वन्दना से सतीशबाबू को सुरुचि मिली और यही उनके अनुराग का मूल है। हृदय की भावनाओं ने कहा-यदि चरण कमल हैं तो उनकी धूल पराग हुई। उससे सुगन्धि सुरुचि तो मिलेगी ही। अनुराग तो मधुर रस है, मकरन्द है। वह तो समीप जाकर मिलता है। सुगन्धि का आकर्षण जब गुरु चरणों तक पहुँचा देता है, तो सुरुचि जागती है। याद हो आई उन्हें तुलसीदास जी की चौपाई ‘वंदौ गुरुपद पदुम परागा, सुरुचि सुवास सरस अनुरागा’ ठीक ही तो है, सतीशबाबू के धूलवन्दन ने उन्हें सुरुचि दी तथा धीरे-धीरे मानस में श्री गुरु चरणों का सान्निध्य भी। अतः उनमें रसमय अनुराग आविर्भूत हो गया।

इससे उनके व्यक्तित्व में जो परिवर्तन हुए इसकी चर्चा करते महामहोपाध्याय डॉ. गोपीनाथ कविराज ने लिखा है, एक प्रकार से उन्हें भारतीय स्वतंत्रता को नयी दिशा देने वाले युग प्रवर्तक पुरुष कहा जा सकता है। वंग भंग आन्दोलन के समय इस सोसाइटी की स्थापना करने वाले उद्यमी कार्यकर्ता और स्वदेशी आन्दोलन के कर्मठ लोगों में आप अग्रणी थे। राष्ट्रीय आन्दोलन को तेज करने के लिए आपने ही बड़ौदा से श्री अरविन्द को बुलाया था। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद गाँधी जी के अनुयायी थे, पर सतीशचन्द्र मुखर्जी के अनुगत शिष्य थे। वे अपनी उपलब्धियों को अपने गुरुदेव की चरणों की धूल का प्रताप मानते थे।


विराट प्रज्ञापुरुष गुरुदेव जिनके पाँच स्थूल-शरीर अभी भी हमारे बीच हैं।

परमपूज्य गुरुदेव के जीवन की हर श्वास गायत्री महाशक्ति को अर्पित थी। जीवनभर वे इसी के लिए संघर्ष करते रहे कि गायत्री महामन्त्र जन-जन तक पहुँच जाए। इसके लिए उन्हें प्रतिकूलताओं से, कट्टरवाद से कितना टकराना पड़ा है, यह सभी जानते हैं। गायत्री उन्हें सिद्ध थी। जीवन के दृश्यमान स्वरूप का पटाक्षेप स्थूलशरीर के पंचतत्वों में विलीन होने के रूप में उनने गायत्री जयन्ती के कि नहीं किया, यह मात्र एक संयोग नहीं, एक सुनियोजित जीवन-साधना है। पंचमुखी गायत्री के पंचकोशों को पूज्य गुरुदेव ने जाग्रत कर अपने जीवन में उनका न केवल साक्षात्कार किया, औरों को भी इस महत्साधना का मार्ग दिखा गए। ऐसा कहा जाता है कि गुरुदेव पाँच शरीरों से जीते थे। कई घटनाक्रम ऐसे मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि जिन तिथियों में वे किसी स्थान पर थे उसी समय अपनी लीला कहीं और भी किसी को परामर्श देने के रूप में एवं कहीं प्रवचन देने के रूप में दिखा रहे थे। वे एक दीखते हुए भी पाँच थे- परम वन्दनीया माताजी जिन्हें उनकी अभिन्न सहचरी होने का अवसर मिला है-लिखती हैं-मैं नहीं जानती कि इन घटनाओं में कितनी सच्चाई थी, पर इतना अवश्य कह सकती हूँ के वे जीवन भर पाँच शरीरों के जितना भिन्न-भिन्न प्रकार के पाँच कार्यों का सम्पादन एक साथ करते थे।” वे लिखती हैं कि उनके स्थूल शरीर की उपलब्धि देखकर नहीं लगता कि एक व्यक्ति एक शरीर से इतना काम कभी कर सकता है। पाँच शरीर कैसे ? इसकी व्याख्या वन्दनीया माताजी ने उनकी दिनचर्या का विस्तृत विश्लेषण करके अखण्ड-ज्योति नवम्बर 1971 के अंक में की है।

(1) 6 घण्टे प्रतिदिन उपासना नियमित करते थे। गायत्री मन्त्र की उनकी सिद्धि का स्रोत था-तप की पूँजी का विराट भण्डागार-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों के रूप में। इसके बावजूद उनकी नित्य की यह साधना कभी भी न छूटी। आखिरी श्वास तक चलती रही।नित्य वे कमाते थे-सोते समय तक खाली हो जाते थे।

(2) 1970-71 तक उनके पास देश-विदेश के प्रायः 400-500 पत्र आते थे।इनको स्वयं खोलना, लगभग 100 के उत्तर स्वयं देना विभिन्न जटिलताओं से भरे शेष पत्रों का जवाब कार्यकर्ताओं को नोट कराना। किसी भी पत्र को 24 घण्टे से अधिक न रोककर पूर्णतः समाधानपरक उत्तर तुरन्त भिजवा देना, व्यवस्था-बुद्धि की कुशलता का परिचायक था। यह कार्य जो एक व्यक्ति के लिए 10 घण्टे से कम में नहीं निपट सकता, कैसे चुटकियों में निबट जाता था, कोई कल्पना नहीं कर सकता। बाद में 1980-81 तक वे शान्ति कुँज में भी इसी कार्य को कराते रहे-सारे पत्र फिर परम वन्दनीय माता जी की ओर से जाते थे।आज उन दिनों के पत्रों से संख्या पाँच-छह गुनी अधिक हो गयी है एवं लगभग सौ व्यक्तियों का पत्राचार विभाग उसे सम्भालता है। सोचा जा सकता है कि पूज्यवर ने कितने व्यक्तियों के बराबर कार्य एक दिन में किया होगा।

(3) उनके द्वारा किया गया लेखन उनके वजन की तौल से दुगुना है। मात्र 1959 से 1971 तक लिखे कार्य एवं फिर हिमालय यात्रा से लौटकर 1972 से लेकर 1990 में अन्तिम श्वास तक लिखे गये कार्य को कोई देखे तो आश्चर्यचकित होकर रह जायेगा।कोई यदि यह कार्य पूरे चौबीस घण्टे भी करे तो जीवनावधि के सौ तो क्या तीन सौ वर्षों में भी पूरा नहीं कर सकता। 2700 पुस्तकों का लेखन-प्रकाशन आर्ष-ग्रन्थों का भाष्य, भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों से लेकर वैज्ञानिक आध्यात्मवाद एवं आध्यात्मिक समाजवाद जैसे गूढ़ विषयों पर संदर्भों सहित लेखन, प्रज्ञापुराण की रचना, गायत्री यज्ञ विधा का विज्ञान-सम्मत प्रस्तुतीकरण एवं जीवन-विद्या के विभिन्न पक्षों पर बहुमुखी लेखन वे जीवन भर करते रहे। अपने स्वयं के हाथों से उनने अगस्त 1969 की अखण्ड ज्योति पत्रिका के ‘युगपरिवर्तन के छोटे किन्तु महान शस्त्रागार’ लेख में लिखा है-चेतना के उच्चतम स्वर से अवतरित हुए, अन्तःकरण की करुणा में धारण किये गये, बौद्धिक तीक्ष्णता से सँवारे गए इन विचारों में कितनी आभा है-कितनी रोशनी है, यह कहने की नहीं, अनुभव करने की बात है जिनने इन्हें पढ़ा-तड़प कर रह गए। रोते हुए आँसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो इनका प्रभाव होना ही चाहिए, हो रहा है और होकर रहेगा।” यदि यह कहा जाए कि गुरुदेव का एक शरीर लेखनी की साधना में रत रहा।

परमपूज्य गुरुदेव के पाँच स्थूल शरीर.

परमपूज्य गुरुदेव अक्सर चर्चा प्रसंगों में अपने निकटस्थ घनिष्ठ शिष्यगणों के समक्ष वार्तालाप करते हुए कहते थे. श्रम पाँच स्थूल शरीर हैं. पाँच सूक्ष्म शरीर है। पाँच स्थूल तो वे हैं जो मेरी स्थापनाएं हैं जिन्हें केन्द्रीय संचालन तंत्र के रूप में माना जा सकता है। इन्हीं शरीरों के विभिन्न अंग-अवयव भिन्न भिन्न शक्ति पीठों प्रज्ञासंस्थानों प्रज्ञा पीठों चलते-फिरते प्राणवान कार्यकर्ताओं के रूप में सारे भारत व विश्व भर में फैले हैं। पाँच सूक्ष्म शरीर साधना के बाद से ही कार्य कर रहे हैं पाँच वीरभद्रों की चर्चा प्रस्तुत स्थल शरीरों के रूप में उनकी स्थापनाओं के बाद करेंगे। ये पाँच स्थापनाएं पाँच स्थूल शरीर इस प्रकार हैं:-

;क्द्ध युगतीर्थ आँवल खेड़ा ;ख्द्ध अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामण्डी मथुरा ;फ्द्ध गायत्री तपोभूमि मथुरा ;ब्द्ध शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ सप्त सरोवर हरिद्वार ;भ्द्ध ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान हरिद्वार।

परमपूज्य गुरुदेव के इन गाँवों स्थूल शरीरों को समझने से पूर्व यह समझ लें कि क्-क्क् में आज से प्रायः त्त्म् वर्ष पूर्व जन्मी हमारी गुरुसत्ता ने सुनियोजित ढंग से अपनी जीवनावधि को चार भागों में बाँट दिया। ;अद्ध क्-क्क् से क्-ख्म् तक की पन्द्रह वर्ष की बाल्यकाल की अवधि जब उनकी गुरुसत्ता से उनका साक्षात्कार हुआ ;आद्ध क्-ख्म् से क्-ब्क् तक की पन्द्रह वर्ष की अवधि जिनमें स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय प्रवेश करने से लेकर जेल जाने तक गायत्री महापुरश्चरण आरंभ करने से लेकर बापू कवीन्द्र रवीन्द्र व श्री अरविन्द जैसे महापुरुषों के साथ ड. का क्रम एवं अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह कार्य विभिन्न जेलों आँवलखेड़ा व आगरा के ग्रामीण क्षेत्रों से आगरा नगर में सम्पन्न हुआ व क्-ब्क् में वे मथुरा प्रयाण कर गए। ;इद्ध क्-ब्क् से क्-स्त्रक् तक की तीस वर्ष तक की अवधि जिसमें अखण्ड ज्योति संस्थान एवं गायत्री तपोभूमि की स्थापना हुई। परमवन्दनीया माताजी उनके जीवन में आयीं तीन बार वे क्.क् वर्ष के लिए हिमालय गए। ख्ब् लक्ष के अनुष्ठानों की महापूर्णाहुति सम्पन्न हुई क्-भ्त्त् का ऐतिहासिक सहस्रकुण्डीय महायज्ञ हुआ जो थी गायत्री परिवार की स्थापना का मूलभूत आधार बना। इसी अवधि में गायत्री महाविज्ञान लिखा गया एवं आर्षग्रन्थों का आदि से अंत तक भाष्य कार्य सम्पन्न किया गया। युग निर्माण योजना के सूत्रपात से लेकर भारत भर में गायत्री परिवार के शाखाओं की स्थापना इसी अवधि में हुई। ;ईद्ध क्-स्त्रक् से क्−− की अंतिम बीस वर्ष की अवधि जब वे मथुरा से विदाई लेकर हरिद्वार होकर हिमालय चले गए। बाद में क्-स्त्रख् की जून में लौटकर उनने ऋषि परम्परा का बीजारोपण कर गायत्री तीर्थ के रूप में एक सिद्धपीठ की स्थापना का संकल्प लिया। इस अवधि में प्राण-प्रत्यावर्तन से लेकर कल्पसाधना संजीवनी साधनाएँ नारी जागरण वानप्रस्थ युगशिल्पी शिक्षण सत्र सम्पन्न हुए। स्वयं पूज्यवर प्रवासी भारतीयों के लिए संदेश लेकर फ् माह के लिए क्-स्त्रख् के अंत से क्-स्त्रफ् के प्रारंभ तक विदेश यात्रा पर पानी के जहाज से गए। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान व शक्तिपीठ निर्माण की प्रक्रियाएँ नारी जागरण अभियान के अंतर्गत देव कन्याओं की पूरे भारत में प्रव्रज्या एवं प्रज्ञापुराण सृजन जैसा महत्कार्य इसी अवधि में हुआ। सूक्ष्मीकरण साधना में प्रवेश उनने शक्तिपीठ उद्घाटन प्रवास के तुरन्त बाद किया एवं यही भावी निर्धारण का आधार बना। राष्ट्रीय एकता सम्मेलन विराट दीपयज्ञों की क्राँतिकारी शृंखला से लेकर क्रान्तिधर्मी साहित्य का निर्माण इसी अवधि में सम्पन्न हुआ। ख् जून क्−− गायत्री जयन्ती को उनने पूर्व घोषणा के साथ महाप्रयाण किया।

इसी प्रकार क्भ् वर्ष क्भ् वर्ष फ् वर्ष एवं ख् वर्ष के चार खण्डों में उनका अस्सी वर्षीय जीवन बाँटा जा सकता है। पूज्यवर ने अप्रैल क्−− में लिखा कि कोई यह न समझे कि दीप बुझ गया और प्रगति का क्रम रुक गया। दृश्य शरीर रूपी गोबर की मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्त किया गया यह प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरूकता के साथ अगली जिम्मेदारी वहन करता रहेगा। उपरोक्त पंक्तियों के परिप्रेक्ष्य में यदि हम उनकी स्थापनाओं को पाँच स्थूल शरीरों को समझने का प्रयास करें तो ज्यादा ठीक रहेगा।

युगतीर्थ आँवलखेड़ा.

आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विण् संवत् क्-म्त्त् सन् क्-स्त्रक् के ब्रह्ममुहूर्त में एक युग पुरुष इस ग्राम में जो आगरा जिले में आगरा से जलेसर मार्ग पर प्रायः पन्द्रह मील दूरी पर स्थित है जन्मा। पं. रूपकिशोर शर्मा एवं माता दानकुँवरि जी के घर जन्मा यह बालक अपनी लीला बाल्यकाल से ही अमराइयों में सहपाठियों के साथ साधना करने दलित वर्ग के पिछड़े वर्ग के समुदाय में जाकर उनकी सेवा करने के रूप में दिखाने लगा। हिमालय की तीव्र पुकार एक दिन घर से भगाकर काठगोदाम तक ले गए जहाँ से संबन्धी वापस ले आए। क्ख् वर्ष की आयु में मदनमोहन मालवीय जी से दीक्षा लेकर गायत्री ब्राह्मण को कामधेनु है का शिक्षण प्राप्त कर बालक श्रीराम ने क्भ् वर्ष की आयु में अपनी मार्गदर्शक सž से साक्षात्कार किया एवं जीवन की राह गन्तव्य अपना वास्तविक स्वरूप सभी का बोध हो गया।

आज जहाँ पर एक भव्य स्मारक ग्रेनाइट के एक चबूतरे एक विराट कीर्ति स्तंभ तथा जीव सागर के चौदह पृष्ठों रत्नों के रूप में ग्रेनाइट पर अंकित सुनहले पृष्ठों की शब्दावली के रूप में अंकित विद्यमान है यहाँ कभी एक भव्य हवेली थी। इसी के एक कक्ष में गुरुदेव का जन्म हुआ था। ठीक उसी स्थान पर एक चबूतरा बनाया गया है जहाँ नित्य हजारों व्यक्ति आकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जहाँ सक्रियता से कार्य किया गया बैठकें की गयीं दविश पड़ने पर भागने के लिए गुप्त मार्ग बनाया गया. वह स्थान अब पुनः वैसा ही बना दिया गया क्योंकि कालक्रम के साथ भारी बरसात में यह ढह गया था। अपने ही हाथ से रोपा गया एक नीम का पेड़ व हाथों से खोदा मीठे पानी का कुआँ इसी परिसर में स्थित है उनकी याद बराबर दिलाता है। ख् बीघे से अधिक जमीन उनने आँवलखेड़ा से आगरा आने पर गरीबों में बाँट दी एवं एक भाग पर माताजी के नाम माँ दानकुँवरि इंटर कालेज स्थापित किया गया। क्-म्फ् से यह सक्रिय है व न जाने कितने बालक सुशिक्षित हो निकल चुके हैं। आगरा से मथुरा व मथुरा से हरिद्वार आने तक पूज्यवर ने जन्मभूमि को अधिक महत्व न दिया किन्तु शिष्यों एवं वंदनीया माताजी के आग्रह पर वे एक बार क्-स्त्र-त्त् में गाँव गए एवं जाने के बाद वहाँ एक गायत्री शक्तिपीठ एक कन्या इंटर कालेज एवं एक चिकित्सालय की रूपरेखा बनायी। गायत्री शक्तिपीठ अब एक विराट आकार ले चुका है एवं आसपास के प्रायः क्त्त् मील की परिधि तक के व्यक्तियों के लिए संस्कारित सिद्धपीठ है। इसी परिसर में स्थापित इंटर कालेज अब कन्या डिग्री कालेज बन गया है जो कि पूज्यवर का स्वप्न था।

क्-भ् की अर्द्धमहापूर्णाहुति जिसमें प्रायः साठ लाख लोगों व राजतंत्र से लेकर संस्कृति प्रबुद्ध वर्ग की प्रतिभाओं ने भागीदारी की एक ऐतिहासिक आयोजन बनकर रह गया। नवंबर माह कार्तिक पूर्णिमा पर आयोजित इस आयोजन से गायत्री परिवार ने एक नई करवट ली है। पिछले दिनों फ् बिस्तरों का एक सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र यहाँ आरंभ हो चुका है। इसे एक आदर्श ग्राम घोषित किया गया एवं सभी योजनाएँ यहीं सक्रियता से चल रही हैं। एक स्वावलंबन विद्यालय एवं जड़ी-बूटी शोध संस्थान की स्थापना शक्तिपीठ परिसर में अभी होनी है। यह पूज्य गुरुदेव का प्रथम शरीर है। यहाँ से आगरा फ्रीगंज होकर वे मथुरा पहुँचे।

अखण्ड-ज्योति संस्थान

अखण्ड-ज्योति संस्थान घीयामण्डी मथुरा-क्-ख्ब् में प्रज्ज्वलित अखण्ड-ज्योति दीपक के साथ पूज्य गुरुदेव आगरा से मथुरा आए। दो तीन मकान बदलने के बाद वे वर्तमान मकान में जिसे भुतहा करार दिया गया था। पूज्यवर को यहाँ से अपनी प्राणचेतना के विस्तार हेतु अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रकाशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। क्-फ्त्त् में प्रारंभ की गयी किन्तु व्यवस्थित रूप में बसंत पंचमी क्-ब् में फ्रीगंज आगरा से आरंभ की गयी यह पत्रिका श्हैण्डशेड् कागज पर पैर से चलाने वाली मशीनों पर छपने लगी। छोटी−छोटी किताबें भी लागत मूल्य पर छापी जाने लगीं। प्रेम की पाती पत्रिका व पूज्यवर की चिऋयों के माध्यम से जन−जन तक जाने लगी। यह व्यक्तिगत स्पर्श जो पूज्यवर एवं वंदनीया माताजी द्वारा स्नेह भरे आतिथ्य के रूप में दिया गया. गायत्री परिवार की स्थापना का मूलभूत आधार बना। प्रारंभिक स्तर पर मिशन की नींव के पत्थर के रूप में ढेरों कार्यकर्ताओं ने यहीं आत्मीयता भरा प्रसाद माताजी से एवं जीवन. विद्या का शिक्षण पूज्यवर से पाया है। पूर्व में एक छोटे से भवन में आरंभ यह संस्थान जिसने गायत्री महाविज्ञान जैसा गायत्री महाविद्या पर एनसाइक्लोपीडिया पर प्रकाशन किया आज एक विराट रूप ले चुका है। वह कोठरी जहाँ पूज्य गुरुदेव ने अपना अखण्ड दीपक रखा वंदनीया माताजी ने जिसकी रक्षा की एवं पूज्यवर ने कठोर तप-साधना की वैसी ही अन्दर से रखकर बाहर से सुरक्षित ढाँचे से ढंक दी गयी है। अभी भी सैकड़ों व्यक्ति इस ऊर्जाकेन्द्र के दर्शन को नित्य आते हैं। जहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका का कार्यालय था वह अब एक विशाल पत्राचार कार्यालय ही नहीं साढ़े पाँच लाख से अधिक संख्या में प्रकाशित अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन वितरण केन्द्र है। कभी यहीं पर गायत्री तपोभूमि के निर्माण की वहाँ चलने वाले सत्रों की एवं क्त्त् कुण्डीय यज्ञ ;क्-भ्त्त्द्ध की रूपरेखा बनी थी। अब यहाँ वाङ्मय जो पूज्यवर की लेखनी साधनामृत अमृतवाणी एवं सूक्तियों के संग्रह के रूप में क्त्त् ब्रिटेनिका साइज के विश्वकोश आकार के खण्डों में प्रकाशित हुआ है का कार्यालय भी है। यह पूज्यवर का दूसरा स्थूल शरीर है।

गायत्री तपोभूमि

गायत्री तपोभूमि वृन्दावन मार्ग मथुरा दुर्वासा ऋषि की तपःस्थली यह पावन स्थापना परमपूज्य गुरुदेव की चौबीस लक्ष की चौबीस महापुरश्चरण पूर्णाहुति पर विनिर्मित की गयी थी। ख्ब् तीर्थों के जल व रज को संग्रहित कर अखण्ड अग्नि को स्थापित कर गायत्री महाशक्ति का एक मंदिर यहाँ विनिर्मित किया गया। यहीं बैठकर पूज्यवर ने गायत्री परिवार रूपी विराट वटवृक्ष का बीजारोपण सतत् जनसंपर्क लोकशिक्षण के माध्यम से किया। क्-भ्फ् में यह स्थापना हुई। क्-भ्म् में यहाँ नरमेध यज्ञ हुआ। जीवन दानी कार्यकर्ताओं के आने का क्रम इसी के बाद आरंभ हुआ। क्-भ्त्त् में यहाँ से सहस्रकुण्डीय विराट गायत्री महायज्ञ की योजना बनायी। प्रायः छह लाख से अधिक कार्यकर्ता यहाँ आए एवं एक सुव्यवस्थित गायत्री परिवार की आधारशिला रख दी गयी। हिमालय प्रवास से लौटकर परमपूज्य गुरुदेव ने युगनिर्माण योजना की घोषणा यहीं से क्-म्ख् में की। शतसूत्री कार्यक्रम के साथ एक सत्संकल्प की घोषणा भी की गयी। छोटे ट्रैक्ट गायत्री यज्ञ की प्रेरणाओं से लेकर क्रान्तिकारी चेतना का संवाहक साहित्य यहीं लिखा गया। मुद्रण हेतु यहाँ एक व्यापक प्रकाशन तंत्र बनाया गया। साथ ही एक स्वावलम्बन विद्यालय भी विनिर्मित हुआ जिसमें बालकों को रोजगार परक अनौपचारिक शिक्षा दी जाती है। यह अभी भी सफलतापूर्वक कुशल मार्गदर्शन में चल रहा है। क्-भ्फ् से क्-स्त्रक् तक परमपूज्य गुरुदेव की कर्मभूमि यही स्थान रहा है। पूज्यवर की विद्या-विस्तार योजना को पूरे भारत में फैलाने हेतु यह संस्थान सक्रिय है। एक विराट सम्मेलन में परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवन्दनीया माताजी को क्स्त्रए क्त्त्ए क्-ए ख् जून क्-स्त्रक् के ऐतिहासिक मर्मस्पर्शी आयोजन में हिमालय तप-साधना हेतु विदाई दी गयी। वंदनीया माताजी के लिए शाँतिकुँज हरिद्वार निर्धारित हो चुका था। पूज्यवर दुर्गम हिमालय चले गए जहाँ से वे हरिद्वार वापस क् वर्ष बाद लौटे। पुनः मथुरा लौटकर न जाने का संकल्प उनने अंत तक निभाया। जिनके कंधों पर गायत्री तपोभूमि संभालने का दायित्व सौंपा गया था उनके माध्यम से एक भव्य निर्माण अब वहाँ हो चुका है। एक विराट प्रज्ञा नगर के साथ विद्यालय की बड़ी इमारत है। साहित्य प्रकाशन हेतु कंप्यूटर्स से लेकर आधुनिकतम तकनीक वाली मशीनें यहाँ पर हैं। पिछले दिनों गायत्री जयन्ती पर यहाँ प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा के रूप में ऋषियुग्म के स्मारकों की स्थापना प्राण प्रतिष्ठा भी एक भव्य समारोह के माध्यम से हो गयी है। इसे परमपूज्य गुरुदेव का तीसरा स्थूल शरीर कहा जा सकता है।

शाँतिकुँज

शाँतिकुँज गायत्रीतीर्थ हरिद्वार अखण्ड दीप परमवन्दनीया माताजी के साथ ही शाँतिकुँज हरिद्वार आ गये जो कि सप्त सरोवर क्षेत्र में उस स्थान पर विनिर्मित किया गया था जहाँ कभी ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपस्थली थी। यह निर्माण पूज्यवर ने भूमि का चयन कर क्-म् में ही आरम्भ करा दिया था। परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय तप साधना की अवधि में ही परमवन्दनीया माताजी के साथ चौबीस कुमारी कन्याओं द्वारा अखण्ड दीपक के समक्ष ख्ब् करोड़ गायत्री मंत्र जप का अनुष्ठान आरंभ कर दिया गया। इसी के साथ नारी जागरण अभियान की आधारशिला रखी गयी। पूज्यवर के एक वर्ष बाद हिमालय से लौट कर आने पर प्राण−प्रत्यावर्तन सत्रों की शृंखला चली। साधकों में प्राणऊर्जा का संचार कर गुरुदेव ने उन्हें भविष्य में महती भूमिका निभाने की प्रेरणा दी। धीरे−धीरे शान्तिकुँज विराट रूप लेने लगा। वानप्रस्थ सत्र लेखन सत्र कल्पसाधना सत्र जीवनसाधना सत्र महिला जागरण सत्र आदि के आयोजन व पूज्यवर की लेखनी के निकलने वाली ऊर्जा ने ऋषि परम्परा के बीजारोपण हेतु स्थापित इस तीर्थ में साधकों शिष्यों के आने का क्रम जारी रखा। स्थान की आवश्यकता पड़ने पर गायत्री नगर की स्थापना की गयी। क्-स्त्रत्त् में स्थापित यह विराट कैंपस अब प्रशिक्षण अकादमी का स्वरूप ले चुका है। यहाँ पूज्यवर ने देव परिवार में बसने हेतु जागृतात्माओं का आह्वान किया। ऐसे व्यक्ति आते चले गए। सप्तर्षियों की मूर्तियों की स्थापना के साथ यहाँ संस्कार संपन्न होने लगे। एक नौकुण्डीय यज्ञशाला बनी। इस प्रकार यह एक समर्थ गायत्रीतीर्थ के रूप में स्थापित हो गया।

दुर्लभ वनौषधि उपवन से लेकर प्रायः पाँच हजार व्यक्तियों के रहने योग्य स्थान एक आँवजर्वेटरी के साथ देवात्मा हिमालय की प्रतिमा की स्थापना तथा एक साथ दो से तीन हजार व्यक्ति एक साथ भोजन कर सकें ऐसा माँ भगवती अन्नपूर्णा भोजनालय यहाँ की विशेषता है। निःशुल्क चिकित्सा परामर्श से लेकर संस्कारों की व्यवस्थाएँ भोजन प्रसाद बिना किसी जाति या ऊंच-नीच छोटे-बड़े के भेद के सभी के लिए उपलब्ध है। प्रायः डेढ़ हजार सुशिक्षित कार्यकर्ता यहाँ रहते हैं। सरकारी संस्थानों विभागों के व्यक्तित्व परिष्कार जीवनसाधना सत्र यहाँ चलते हैं। − दिवसीय ऊर्जा अनुदान सत्र सतत् चलते हैं। एक माह के युगशिल्पी सत्रों में कार्यकर्ताओं को स्वावलंबन से लेकर लोकशिक्षण की प्रक्रिया में प्रशिक्षित किया जाता है। कंप्यूटरों से सज्जित विशाल पत्राचार केन्द्र. सारे भारत व विश्व भर के गायत्री परिजनों के संगठनात्मक सुनियोजन का तंत्र आधुनिकतम आडियो-वीडियो एडीटिंग यूनिट से सज्जित इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग एवं शान्तिकुँज फार्मेसी ऐसी विशेषताएँ हैं जिन्हें देखने-सुनने लाभ उठाने हजारों व्यक्ति नित्य यहाँ आते हैं। मल्टीमीडिया प्रोजेक्शन द्वारा हिमालय स्मृति भवन में आत्मदेवता की साधना से लेकर पर्यावरण जाग्रति एवं हिमालय की सूक्ष्म चेतन सž का साक्षात्कार का लाइट साउण्ड शो जैसी विलक्षणता अन्यत्र कहीं नहीं है। अखण्ड दीप का प्रात ब्राह्ममुहूर्त में दर्शन परखरपरगया सजल श्रद्धा रूपी भव्य स्मारक यहाँ पूज्यवर एवं वंदनीया माताजी के स्थूलशरीर को अग्नि दी गयी थी एवं जिनके स्मृति चिह्न वहीं स्थापित हैं के समीप बैठकर ध्यान शान्तिकुँज की आध्यात्मिक ऊर्जा में स्नान करने त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने के समान है। गंगा यहाँ से मात्र ब् मील दूरी पर बहती हैं। इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री से प्रसिद्धि यह स्थान गुरुदेव का चौथा स्थूल शरीर कहा जा सकता है।

ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान

ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान सप्तसरोवर हरिद्वार विज्ञान एवं अध्यात्म के समन्वय को संकल्पित यह स्थान परमपूज्य गुरुदेव द्वारा महर्षि कणाद की तपःस्थली में स्थापित सप्त सरोवर में बह रही गंगा की सात धाराओं के सामने शान्तिकुँज से लगभग क्ध्ख् किलोमीटर दूरी पर स्थित है। इसका शुभारंभ क्-स्त्र में हुआ था। परमपूज्य गुरुदेव इसे भविष्य के धर्म की स्थापना हेतु विनिर्मित अपना मस्तिष्क कहा करते थे। तीन मंजिलों का यह भवन अपनी स्थापत्य कला के कारण सभी को आकर्षित करता है। मध्य में यज्ञशाला बनी हुई है जहाँ सतत् वनौषधि यजन प्रक्रिया पर वैज्ञानिक अनुसंधान चल रहा है। यज्ञोपैथी नाम से लोकप्रिय विधा यहीं से प्रचलित हुई है। प्रथम तल पर गायत्री की चौबीस मूर्तियाँ हैं। प्रत्येक के साथ बीज मंत्र यंत्र व उनकी फलश्रुतियाँ लगाई गयी हैं। द्वितीय तल पर चौबीस कमरों में एक विशाल प्रयोगशाला बनी हुई है। रक्त विश्लेषण से लेकर शरीर के विभिन्न एन्जाइम हारमोन्स काया व मन की विद्युत पर मंत्रशक्ति योग साधनाएँ आहार प्रार्थना यज्ञ प्राणायाम आदि के पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण अध्ययन करने का एक व्यापक तंत्र यहाँ आधुनिकतम उपकरणों के माध्यम से बनाया गया है। शान्तिकुँज में साधक ठहरते हैं व उनका माह में दो बार परीक्षण होता है। नित्य साधकों पर विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक प्रयोग भी यहाँ संपन्न होते रहते हैं। तीसरी मंजिल पर ब्भ् से अधिक ग्रन्थों वाली एक विशाल लाइब्रेरी है। विश्व भर में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर हुए कार्य शोध प्रबन्ध प्रकाशित पत्रिकाओं का यहाँ संकलन है। कई दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ यहाँ हैं। वेद उपनिषद् एवं विश्व भर के वैज्ञानिकों को आकर्षित करता रहता है। इसे पूज्य गुरुदेव का स्थूल शरीर माना जा सकता है।

इस परिचय मात्र से ही किसी को अनुमान हो सकता है कि परमपूज्य गुरुदेव. माताजी का व्यक्तित्व कर्तृत्व कितना विराट रहा होगा। वे जो भी कुछ स्थापनाएं कर गए आज सारे भारतवासियों विदेश के संस्कृति प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। यदि इन पाँच स्थापनाओं पाँच स्थूल शरीरों के साथ वे सभी स्थापनाएं जोड़ ली जाएँ जो क्षेत्र में फैले भारतवासी शक्तिपीठों के तंत्र के रूप में विद्यमान है तो हिमालय के समान एक गगनचुम्बी व्यक्तित्व के रूप में ऋषियुग्म की सž का बोध होता है। ऐसी महान गुरुसत्ता के हम लीला सहचर रहे हैं यह सोच-सोचकर ही मन प्रमुदित होता रहता है।


गुरुभक्ति ही ईश्वर भक्ति

शुभम् भूयात्।य्य अपने झुर्रीदार गौर वर्ण हाथ को महर्षि ने अपने चरणों पर पड़े अपने सबसे बड़े शिष्य की धूमिल जटाओं से मण्डित मस्तक पर इस भाँति रखा जैसे एक पंचदल अरुणकमल उन पर रख दिया गया हो। अपने मृगचर्म के आसन पर तनिक सीधे होकर महर्षि ने इस प्रकार पूछा जैसे वे कोई गंभीर निर्देश देने के लिए उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे।

श्श्निवृž हो चुका भगवन्।

उशीनर अपना मस्तक उठा चुका था। उसका नासिका एवं माथा धूलि से शोभित हो उठा था। घुटनों के बल पर करबद्ध बैठे उस तप्त ताम्रवर्ण युवक के बड़े−बड़े नेत्र संकोच से झुक गए।

जानता हूँ वत्स। महर्षि ने शिष्य के संकोच को देख लिया। उनकी अन्तर्दृष्टि से कुछ छुपा न था। उसकी वाणी गंभीर हो गयी। मन एकाग्र नहीं होता। तुम्हारी इन क्रियाकलापों में आन्तरिक रुचि नहीं है। सब भय और संकोच से। श्रीचरणों

समझ नहीं सका। स्वर में आश्वस्त होने के पर्याप्त लक्षण थे। Dया दो क्षण के लिए आज्ञा होगी नन्दिनी मुझे पुकार रही है। वह अचानक चंचल हो चुका था।

पास ही एक कर्पूरधवल गौ अशोक के मूल में स्वच्छन्द खड़ी थी। स्थिर शान्त। उसके सुपुष्ट अंग से सात्विकता का तेज झरता था। वात्सल्य पूर्ण नेत्रों का सम्मोहन अचानक ही किसी को आकर्षित कर लेता है। मस्तक पर कुमकुम का तिलक श्रृंगों में मालती की सुरभित माला निश्चय ही वह ऋषि शाँडिल्य की चर्चित कामधेनु थी।

दुग्धपान से भली प्रकार परितृप्त उसका दुग्धफेन की भाँति उजला बछड़ा हवनकुण्डों के चारों ओर आसनों एवं वेदिकाओं पर निर्द्वन्द्व और निर्भय कुदक रहा था। समीप पहुँचने पर आश्रम के अन्तेवासी उसे प्रेम से पुचकारते थे लेकिन वह नटखट चार अंगुल दूर से ही उनके बढ़े हुए हाथों को सूँघकर भाग जाता था। जो विद्यार्थी स्वाध्याय में निमग्न होकर उसकी ओर ध्यान नहीं देते थे उनकी पीठ में सिर से धक्का मारकर या गुदगुदाकर मानो कहता बड़ा पढ़ने वाला बना है। मेरे साथ तनिक उछल ले तो जानूँ।

अच्छा इसे नीवार दे दो। नन्दिनी ने हुमा की ओर मन्दगति से चलकर उशीनर के पीछे पहुँच गयी। वह उसकी मृदुल घुँघराली पलकें चाटने लगी थी। गुरु आज्ञा पाकर उसने उसे पुकारा पुचकारा। उटज प्राँगण से नीवार लाया। नन्दिनी द्वार तक पहुँच गयी थी। उसे नीवार भाग मिल गया। यद्यपि जाते हुए उशीनर को उसने इस प्रकार देखा जैसे बुरा मान गयी हो। अच्छा तो आज तुम मुझे सहलाए चले जाओगे ठीक ही तो है साधु होती ही बड़े निर्मोही हैं।

ठीक यही बात महर्षि अनुभव कर रहे थे। वह एकटक अपने शिष्य की प्रत्येक क्रिया को देख रहे थे। उन्होंने स्पष्ट लक्षित कर लिया था कि गौ के पास से हटने में उसे मानसिक लेश हुआ है। तुम्हारा साधना क्षेत्र यह विशाल संसार है। अपने सामने वेदिका से नीचे बैठते ही उन्होंने अपने प्रकाशमय नेत्र शिष्य के मुखमण्डल पर स्थिर कर दिए।

Dयाघ् वह चौंक पड़ा। शायद उसने समझा कि उसे तीर्थयात्रा की आज्ञा होगी। कही अवधूत होकर भटकना न पड़े। मैंने श्रीचरणों में आजन्म ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा कर ली है। वह डर गया था कि उसे गृहस्थ होकर संसार में प्रवेश करने की आज्ञा तो नहीं मिलने वाली है।

मैं जानता हूँ कि तुम्हारा वैराग्य पूर्ण है। गुरु ने गम्भीरतापूर्वक कहा फिर भी तुम्हारा जीवन इन गहन कानूनों एवं गिरि गुहाओं के लिए नहीं है।

मेरा मन प्रभु की भाँति एकाग्र होकर तत्व चिन्तन करने में असमर्थ है। उसका कण्ठ आर्द्र हो गया प्रयत्न करके भी तत्वों के विवेचन प्रस्रयान में एकाग्र नहीं हो पाता हूँ। सृष्टि एवं प्रलयक्रम का विचार विवेचन क्षणभर में समाप्त हो जाता है। फिर इस सब में मुझे कोई रस भी नहीं आता। मन अपनी मनमानी करने में कब जुट जाता है मुझे पता भी नहीं चलता।

ऋवभु की बुद्धि विशुद्ध है। अपने नित्य ध्यानस्थ प्रायः अनमने से रहने वाले शिष्य को महर्षि सर्वाधिक चाहते थे। वे उसके स्मरण से गदगद हो उठो। वह कठिन से कठिन विषय अविलम्ब हृदयंगम कर लेता है और उस पर एकाग्र हो जाता है।

मैं प्रबल की भाँति आसन प्राणायाम का श्रम भी तो नहीं सह पाता हूँ। उसे अपनी चिन्ता होने लगी थी। तनिक सी देर में थकान लगने लगती है। योग तो मेरे वश का कतई नहीं।

प्रबल सचमुच पराक्रमी है। महर्षि शाँडिल्य की चाँदी जैसी दाढ़ी. मूछों से भरे चेहरे पर हल्की सी बिखर गयी। उसकी बुद्धि मन्द है और हृदय में भी भावुकता नहीं। पर उसका मार्ग ठीक है। शरीर के द्वारा उसने अब अपने मन पर अधिकार पाना प्रारम्भ कर दिया है। निश्चय ही किसी दिन वह अपनी गुफा में निर्विकल्प समाधि में निमग्न मिलेगा।

न जंगल और न गुफा। उशीनर ने कुछ दृढ़ता से कहा- में तो श्रीचरणों की सेवा में इन मृग शावकों के साथ आनन्द से जीवन काटूँगा।

तुममें अवश्य ही आध्यात्मिक बुद्धि है। बड़ी गंभीरता से महर्षि ने कहना प्रारंभ किया किन्तु तुममें प्राणियों के प्रति अपार सहानुभूति है। उत्कृष्ट वैराग्य है। अपने स्वार्थ पर तुमने विजय प्राप्त कर ली है। अतः तुम अपनी सहानुभूति को जाग्रत करो।

ही प्रवेश पाते हैं। पथ. प्रदर्शक बन गया वह। प्रभु अपने प्रबल को अब तक भूले न होंगे। कलित इन्दीवराँग, पीतवसन, मयूर मुकुट, मणिमय आभूषणों से झिलमिलाता एक किशोर अपनी मन्द मुसकान के उज्ज्वल सुमनों से चर्चित महर्षि के चरणों में प्रणत हो गया।

भक्ति लभस्व! दोनों भुजाओं से उठाकर हृदय से लगाते हुए महर्षि ने आशीर्वाद दिया। यहाँ कुशल या अकुशल, शुभ या अशुभ की कल्पना ही प्रवेश नहीं पाती। इस प्रेम लोक में प्रेम का एकछत्र साम्राज्य है।

अपने परिपूर्ण मनोयोग से सर्वात्मा के जिस सर्वांग सुन्दर स्वरूप को लेकर निर्विकल्प समाधि में तुम एकाकार हो गए।” जैसे महर्षि अपने आप से कह रहे हों। “वह तुम्हें उपलब्ध हुआ। तुमने उसका सारूप्य प्राप्त किया।” महर्षि शाँडिल्य का मस्तक तनिक झुक गया।

“आचार्य चरणों का अनुग्रह!” उस किशोराँग की मेघ गम्भीर वाणी आर्द्रतर थी। “तुम भी ब्रजेन्द्र के सर्वथा समीप रहने वाले पार्षद हो।” महर्षि ने सरलता से पूछा- “मैं इस समय दर्शन कर सकूँगा?”

“आचार्य चरणों की गति अव्याहत है।” उन पार्षद प्रवर की वाणी में कोई खेद नहीं था। “वैसे सर्वदा समीप रहने का सौभाग्य प्रभु से अभिन्न जन ही प्राप्त करते हैं। इच्छा करने पर दर्शन करने में कोई बाधा न उशीनर को है और न मुझे ही। सच्ची बात तो यह है कि यहाँ अवरोध का अस्तित्व नहीं है।”

“ऋतु होगा तब नित्य समीपस्थों में” महर्षि अपने ब्रह्मज्ञ एवं ब्रह्मलीन शिष्य के सम्बन्ध में उत्सुक हो गए थे। वही उनका सर्वश्रेष्ठ शिष्य था। “वे उन ज्ञानधन से एक हो गए।” प्रबल की वाणी में आदर था। हाँ उनका संक्षिप्त उत्तर अवश्य ही यह सूचित करता था कि उन्हें इस एकीभाव में कोई आकर्षण नहीं। “ठीक ही है।” महर्षि ने एक क्षण सोचकर कहा। “ऋतु निर्विकल्प, निरुपाधिक ब्रह्म का निदिध्यासन कर रहा था। उसका पार्थक्य सम्भव नहीं था।

‘तत्त्वमसि’ के निगूढ़ तात्पर्य से अवगत होकर उसे तादात्म्य प्राप्त करना ही था। उसने सायुज्य प्राप्त किया।”

“भाग्यशाली तो चिरंजीव कौशल्य है।” गुरुदेव के पीछे अपने लघु भ्राता को देखकर पार्षद ने हँसते हुए कहा-वे आपके सम्पूर्ण अनुग्रह के अधिकारी हो गए हैं और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वे सशरीर यहाँ तक पहुँच गए है।” कौशल्य ने अभिवादन प्रथम ही कर लिया था। इस अपरिचित स्थान में वह संकुचित हो गया था। इन अद्भुत अलौकिक रूपों ने उसे आश्चर्य में डाल दिया था।

“यह तो अभी बच्चा है।” स्नेहपूर्वक पीछे कौशल्य पर दृष्टिपात करते हुए महर्षि शाँडिल्य ने कहा-साधना व मन दोनों ही दृष्टि से अबोध शिशु।” महर्षि अभी और कुछ सोचते कि इतने में जैसे सम्पूर्ण परिसर संगीत आह्लाद की क्रीड़ा में उल्लसित हो गया। “ओह कौशल्य” का स्वर कुछ इस तरह गूँजा मानो एक साथ अनेकों सुमधुर घण्टियाँ बज गयी हों। महर्षि को अभिवादन करने से पूर्व उन गोलोक धाम के अधीश्वर की दृष्टि अपने गुरुदेव के पीछे आते ऋषिकुमार पर पड़ी-अच्छे आये। हम सब आज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे थे। “ सम्भवतः अपने सहचरों को चुन लेने में उन्हें आधे पल का भी विलम्ब सहन नहीं।

कितने बालक थे-कौन गिने ? सरल-चपल सौंदर्य की मूर्ति। किसी ने बालों में पुष्प गूँथ रखे थे और किसी ने पंख। किसी के कंधे पर पटुका ठिकाने से था, किसी का अव्यवस्थित। कोई धूल से सना था, किसी ने गेरुआ, खड़िया पोत ली थी। हास्य, क्रीड़ा, आनन्द। उन्हें जैसे और कुछ पता नहीं। सबके सब एक साथ खड़े हो गए। यदि इतने बड़े महर्षि सम्मुख न दिखाई पड़ते तो वे निश्चय ही दौड़ पड़ते।

“वन्दन करता हूँ प्रभु।” उनके मध्य के साँवले पीताम्बरधारी ने अपना मयूर मुकुट झुकाया और साथ ही साथ मस्तक झुकाया नीलाम्बरधारी स्वर्ण गौर ने। देखा-देखी सबने हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया। जैसे वायु की हिलोर पुष्पित कमलवन में आ गयी हो-वन्दन करता हूँ प्रभु।” सहस्र-सहस्र बालकण्ठ गुंजित हो उठे। महर्षि खड़े थे, शाँत, स्तब्ध

भैया कौशल्य अब यहीं रहेगा! मेरे समीप! सौंदर्यघन श्रीकृष्ण सखा अपने नायक का संकेत पाते ही पकड़ ले गए थे। कोई उनकी जटाओं को सुलझाकर उनमें पुष्प सजाने में लगा था और उनके वल्कल को फेंककर पीताम्बर पहनाने में लगा था। अब उसका छुटकारा नहीं।

“मैं उसके लिए साधना मार्ग जानने आया था।” महर्षि का गदगद कण्ठ स्पष्ट नहीं था।”और वह आपका परम सामीप्य पा गया। मेरे सभी शिष्यों से अधिक सौभाग्यशाली।”

“उसने आपके चरणों की भक्ति प्राप्त कर ली है।” श्याम सुन्दर सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने हँसते-हँसते समझाया-गुरुभक्ति तो कर्म, ज्ञान और योग से भी महत्तम है।” शाँडिल्य भक्ति सूत्रों के प्रणेता महर्षि शाँडिल्य को आज भक्ति का अनोखा आयाम मिला-गुरुभक्ति ही ईश्वर - भक्ति है। जो गुरु का ही नहीं ईश्वर का भी सहज सामीप्य देती है।


भविष्य को उनने पढ़ा ही नहीं, गढ़ी भी

परमपूज्य गुरुदेव का समग्र जीवन साधनामय कहा जा सकता है। योगी सिद्धपुरुष दिव्यदृष्टि सम्पन्न होते हैं। उन्हें आने वाले हर परिवर्तन, काल की चाल का अहसास सतत् होता रहता है। अपने द्वितीय हिमालय प्रवास (1959-1961) से लौटकर आने के बाद से ही, जब उन्होंने ‘युगनिर्माण योजना’ के शुभारम्भ की घोषणा की-पंचकोशी साधना भी गायत्री तपोभूमि से अखण्ड-ज्योति के मार्गदर्शन के माध्यम आरम्भ करा दी थी। उनकी इस हिमालय यात्रा में सम्पादन का दायित्व परमवन्दनीया माताजी को सौंपा गया था। उनने अपनी पत्रिका के संपादकीय में लिखा-उनकी (पूज्यवर की) यह विशेष तपश्चर्या स्वर्ग-मुक्ति सिद्धि-शक्ति के लिए नहीं, क्योंकि उन्हें तो वे बहुत पहले ही प्राप्त कर चुके हैं। अब तो वे अपनी पीड़ा में विश्वमानव की पीड़ा को घुलाकर एक तड़पते हुए घायल की तरह हो गए हैं। उनकी तड़पन परशुराम के कुल्हाड़े के रूप में शिव के तीसरे नेत्र के रूप में, इन्द्र के वज्र के रूप में नए परिवर्तन का न जाने क्या आधार प्रस्तुत करे? आज कौन कहे और कैसे कहे ?”

वस्तुतः यह सब सूक्ष्मजगत में घटित हो ही रहा था, 1967 की जून माह की अखण्ड-ज्योति पत्रिका में पृष्ठ 17 पर एक लेख प्रकाशित हुआ-महाकाल और उसका युग-निर्माण प्रत्यावर्तन।’ इसमें पूज्यवर ने संकेत किया कि “आगामी तीस वर्ष अत्यन्त कष्ट भरे हैं। युगपरिवर्तन की पृष्ठभूमि बन रही है। महाकाल की इच्छा कभी अपूर्ण नहीं रह सकती। महाकाली अपना सृजनात्मक और संघर्षात्मक प्रक्रिया को प्रचण्ड करने में संलग्न है। पिछले दिनों दो खण्ड अवतारों ने श्रीरामकृष्ण परमहंस एवं योगीराज श्रीअरविन्द के रूप में जन्म लिया है। तीसरा अवतरण युगनिर्माण आन्दोलन के रूप में आजकल चल रहा है। इसमें महाकाल भी काम कर रहा है और महाकाली भी, जिससे आज की मानव-जाति की अंधकारपूर्ण दुर्दशा कल के स्वर्ग-सौभाग्य जैसे उज्ज्वल भविष्य में परिणत हो सके। पूर्ण अवतार लगभग तीस वर्ष की कठिन अवधि के उपरान्त प्रकट होगा। महान व्यक्तियों के रूप में भी और महान परिवर्तन के रूप में भी। इस प्रयोजन को पूरा करने के लिए भगवान दिव्य आत्माओं का वरण कर रहे हैं। उन्हें हम शतशत प्रणाम करें, यही मन करता है।”

परमपूज्य गुरुदेव ने भविष्य को न केवल पढ़ा था, अपितु वे उसे गढ़ने के लिए भी धरती पर आए थे। लगभग चार माह बाद अक्टूबर 1967 की पत्रिका ‘अब फिर से सतयुग आएगा-यह बोल रहा है महाकाल’ इस शीर्ष कविता के साथ प्रकाशित हुई। यह अंक विशेषांक था-महाकाल और इनकी युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ नाम से। भावी विभीषिकाएँ महाकाल और उनका रौद्र रूप, त्रिपुरारी महाकाल, शिव का तृतीय नेत्रोन्मीलन, दशावतार और इतिहास का पुनरावृत्ति आदि के वर्णन के बाद इस अंक में लिखा गया था कि आज की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता लोकसेवा ही है और इसके लिए अपने परिवार जा कि गायत्री परिवार के रूप में उच्चस्तरीय आत्माओं का भाण्डागार है, को बढ़-चढ़कर आगे आकर अपने त्याग, बलिदान का परिचय देना चाहिए । बाद में यही सारी सामग्री पुस्तकाकार में भी छपी।

यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि युग-परिवर्तन विभीषिकाओं को निवारणार्थ सामूहिक साधना रूपी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग यह शब्दावली परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से सतत् इस अवधि के बाद काफी जोर देकर एक चेतावनी-एक मार्गदर्शन के रूप में सभी परिजनों को मिलने लगी थी। अपने तृतीय हिमालय प्रवास व हमेशा के लिए गायत्री तपोभूमि छोड़ने की बात वे 1962 से ही कहते आ रहे थे यह 1971 के बाद भी जारी रहा, साथ ही उनकी साधकों के निर्माण की प्रक्रिया भी जारी रही। उनका एक ही उद्देश्य था-समष्टि का हितसाधन, सृष्टि की विकासात्मक भवितव्यता को गति देना। उसी दिशा में एक विशेष प्रयोग उनके द्वारा सिद्ध स्थली शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ में 1984 से 1987 के दौरान चली सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान सम्पन्न हुआ। इसी साधनावधि में उनने स्वयं को पाँच सूक्ष्मशरीरों-पाँच वीरभद्रों के रूप में सक्रिय बनाकर युग-परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देने की बात कहीं। उनकी यह साधना रहस्य और रोमांच से भरी थी। इन पंक्तियों के लेखक को इस साधना का सौभाग्य मिला है। पूज्यवर के शब्दों में इसके विषय में सुनें तो-जिस आवास स्थली में-कोठरी में रहा जा रहा है, वहाँ तक एक दो का ही प्रवेश वाँछित समझा गया है। उसमें जो प्रयोग चल रहे हैं, वे अद्भुत हैं। तब दिन में करने के हैं। कुछ मंत्र ऐसे हैं, जिनमें तनिक भी एक शब्द की भी भूल हो जाने पर उच्चारण तंत्र ही उलट-पलट सकता है। इसलिए प्रयोग करते समय क्षण-क्षण देखभाल रखनी पड़ती है।”

इस 3 वर्ष की अवधि में जब यह प्रयोग चल रहा था, स्थूलशरीर के क्रियाकलाप काफी सीमित हो गए थे। पूज्यवर ने कहा-पाँचों शरीरों को एक सूत्र में बाँधे रहने भर के लिए वर्तमान स्थूलशरीर की आवश्यकता है।” आहार न के बराबर किन्तु शक्ति इतनी प्रचण्ड कि कोई आँख से आँख ना मिला सके। महान प्रयोजन हेतु ही तो ऋषि, तपस्वी, अवतारी पुरुष ऐसी कठोर साधना करते हैं। आहार नहीं लेंगे तो कमजोरी आ सकती है, यह कहने पर गुरुदेव ने कहा था कि आकाश तत्त्व से जो भी ग्रहण करना होता है वे ग्रहण कर लेते हैं, क्योंकि सूक्ष्मीकरण प्रयोग हेतु स्थूल आहार उनके लिए महत्त्वहीन है। किसी भी चिकित्सक या वैज्ञानिक के लिए यह आश्चर्यजनक तथ्य हो सकता है कि कोई बिना आहार के अपनी वृद्ध-काया के साथ कैसे कब तक जीवित रह सकता है। किन्तु जैसा पूर्व में कहा गया कि 1961 में हिमालय से लौटने के बाद से ही भविष्यत् की तैयारी के निमित्त उनकी सारी साधना नियोजित थी। सूक्ष्मीकरण की सावित्री साधना उनकी दधीचि स्तर की प्रचण्ड तप−साधना थी, जो अन्तिम श्वास तक अनवरत चलती रही।


गुरुसत्ता के पाँच सूक्ष्मशरीर - वीरभद्र जो हम सबकी रक्षा में जुटे हुए हैं

“तुम्हें एक से पाँच बनना है। पाँच पाण्डवों की तरह पाँच तरह से काम करने हैं। इसलिए इसी शरीर को पाँच बनाना है। एक पेड़ पर पाँच पक्षी रह सकते हैं। तुम अपने को पाँच शरीरों में विभाजित कर लो। इसे ‘सूक्ष्मीकरण’ कहते हैं। पाँच शरीर सूक्ष्म रहेंगे, क्योंकि व्यापक क्षेत्र को संभालना सूक्ष्मसत्ता से ही बन पड़ता है। जब तक वे पाँचों परिपक्व होकर अपने स्वतन्त्र काम न सँभाल सकें, तब तक इसी शरीर से उनका परिपोषण करते रहो। इसमें एक वर्ष भी लग सकता है एवं अधिक समय भी। जब वे समर्थ हो जाएँ तो उन्हें अपना कार्य करने हेतु मुक्त कर देना। समय आने पर तुम्हारे दृश्यमान स्थूलशरीर की छुट्टी हो जाएगी।”

(अप्रैल 1985 अखण्ड-ज्योति यह निर्देश चौथी हिमालय यात्रा जो सूक्ष्मशरीर से सम्पन्न हुई थी, में पूज्यवर को अपनी गुरुसत्ता से प्राप्त हुआ। क्या करना है, कैसे करना है, यह सब हिमालयवासी गुरुसत्ता ने उन्हें अपनी परावाणी से समझा दिया। पाँचों शरीर को जो पाँच काम करने थे वे इस प्रकार थे- (1) वायुमण्डल का संशोधन, (2) वातावरण का परिष्कार, (3) नवयुग का नवनिर्माण, (4) महाविनाश का निरस्त्रीकरण-समापन तथा (5) देवमानवों का उत्पादन-अभिवर्द्धन

पिछले लेख जिसमें हमने परमपूज्य गुरुदेव के पाँच शरीरों से किए गए कार्य, पाँच शरीरों से किए गए कार्य, पाँच स्थूलशरीर, पाँच स्थापनाएँ इन प्रसंगों पर चर्चा कर रहे थे, पाँच सूक्ष्म शरीरों की भी चर्चा आपसे की थी। उपरोक्त पाँच कार्य इन पाँच शरीरों के माध्यम से ही सम्पन्न हुए। संक्षेप में 1984 में प्रारम्भ हुई यह सावित्री साधना पूज्यवर के उस ‘आकाल्ट’ स्वरूप को दर्शाती है, जिसमें वे विराट से विराटतम होते चले जा रहे थे।

पूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण के इस गुह्यविज्ञान को और स्पष्ट करते हुए अपनी उस अवधि में प्रकाशित अखण्ड-ज्योति के मार्गदर्शन में लिखा है कि “इस प्रक्रिया में अपनी प्राणऊर्जा को इतना प्रचण्ड किया जाता है कि उससे अपने ही अन्तराल में सन्निहित पाँच कोष इतने गरम हो सकें कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उनकी सत्ता विनिर्मित हो सके।” वस्तुतः इस साधना के बाद ही मिशन के विराट पंचकोशी शरीर में वह मोड़ आया कि वह भी विराट रूप लेता चला गया। न जाने कितने व्यक्तियों को अपनी ध्यान साधना में, स्वप्नों में, रोजमर्रा के जीवन में ऐसा मार्गदर्शन अनुभूतियों के रूप में मिलता चला गया कि जिसका विवरण संकलित करने पर एक विशाल ग्रन्थ का निर्माण किया जा सकता है। विश्व के कुण्डलिनी जागरण (जिसका विवरण बाद में जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुआ) तथा पाँच वीरभद्रों के उत्पादन के रूप में तीन वर्षीय सावित्री की साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच तारतम्य स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी, रामनवमी 1984 से आरम्भ हुई एवं 1987 में राष्ट्रव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के साथ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा फिर विराट दीपयज्ञ योजनों का सम्पन्न करने के रूप में समष्टि में ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के गगनभेदी उद्घोषों के रूप में चलती रही। यह ध्यान देने योग्य है कि दीपयज्ञों के माध्यम से विचारक्रान्ति अभियान को आगे बढ़ाते चलना-संस्कार सम्पन्न होते चलना एवं इन्हीं के द्वारा 1989 में प्रारम्भ बारह वर्षीय युगसन्धि महापुरश्चरण की प्रथम व द्वितीय पूर्णाहुतियाँ सम्पन्न होना यह पूज्यवर की अंतिम महत्वपूर्ण घोषणाएँ थीं।

मोटी बुद्धि सूक्ष्मीकरण को या पाँच सूक्ष्मशरीरों-वीरभद्रों को समझ नहीं पाती। कोई पूज्यवर के आस-पास कार्य करने वाले पाँच वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं को इनका वीरभद्र समझने लगे तो कोई उनकी व्याख्या अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप भिन्न-भिन्न ढंग से करने लगे। वस्तुतः ये शक्ति के पुँज थे, जिनको मोटे रूप में पाँच दायित्व, उपरोक्त पाँच कार्य जो लेख के प्रारम्भ में बताए गए के साथ-साथ सम्पन्न करना था। पहला-लोगों की उल्टी बुद्धि को उलट कर सीधा करना विचार संशोधन करना, दूसरा-नवनिर्माण के लिए प्रचुर साधन किसी भी कीमत पर जुटाने के लिए समर्थ बनना, तीसरा-दुरात्माओं के लिए भय का वातावरण उत्पन्न कर उनका मनोबल पस्त करना, चौथा प्रस्तुत भावी परिजनों को जिन्हें प्रज्ञा परिवार में जुड़ना था, अधिकाधिक सामर्थ्य व सुरक्षा प्रदान करने के निमित्त विकसित होना, पाँचवाँ-उपरोक्त चारों के लिए अपने असाधारण कार्य के लिए उपयुक्त तप रूपी खुराक जुटाना। इस वीरभद्र को विशुद्धतः तपश्चर्या में निरत रहना था।

जो मिशन की प्रगति का अद्यावधि तो नहीं 1980 से अब तक का इतिहास जानते हैं, इन्हें मालूम है कि इस अवधि में वह कार्य सम्पन्न हुआ जो सम्भवतः पिछली एक सहस्राब्दी में पूरी विश्ववसुधा पर सम्पन्न नहीं हुआ। यह अवधि मिशन की ही नहीं, सारे विश्व की स्वर्ण युग वाली अवधि कही जा सकती है, जिसमें सभी ने साम्यवाद का अंत देखा, पूँजीवाद की विभीषिका भिन्न-भिन्न रूपों में उभरी मानव की तृष्णा के रूप में देखी व आगामी तीन वर्षों में उसके समापन के रूप में देखेंगे। धर्मतंत्र का प्रगतिशील विज्ञानसम्मत स्वरूप कैसे लोगों के विचारों में परिवर्तन लाकर उन्हें सन्मार्ग पर चलने के लिए बलात् प्रेरित कर सकता है, दुष्टता के पथ पर चलने वाले कैसे भयभीत होते देखे जा रहे हैं, यह सारा पराक्रम यदि पाँच सूक्ष्मशरीरों का माना जाए तो इसे अतिशयोक्ति नहीं माना जाना चाहिए।

सूक्ष्मीकरण साधना-जब परमपूज्य गुरुदेव पाँच शरीरों के रूप में सूक्ष्मजगत में सक्रिय हो रहे थे की अवधि में दो तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं-एक समष्टिगत, दूसरा परिजनों की अनुभूतियों के रूप में, जिसे हम सूक्ष्मतम रूप में के स्तर पर मान लें। यहाँ उनका ही थोड़ा विस्तृत विवेचन करेंगे। यह विवेचन 1984 से 1997 की अंत तक की तेरह वर्षीय अवधि के एक समीक्षात्मक अध्ययन रूप में, विवरण रूप में प्रस्तुत किया जा रहा हैं।

(1) समष्टिगत प्रभाव

सभी जानते हैं कि 1984 से अब तक की अवधि बड़ी उथल-पुथल भरि रही है। सभी ने देखा कि दो महाशक्तियों की धुरी में बँटा यह विश्व देखते-देखते सोवियत रूस के विघटन, पूर्वी यूरोप में उन्मुक्त जीवन जीने की अदम्य इच्छा, बर्लिन की दीवार के टूटने व साम्यवाद के समापन के रूप में बदल गया। हथियारों की बिक्री की आड़ में अपनी अर्थव्यवस्था चलाने वाले राष्ट्रों के लिए यह एक सदमे के समान था। अमेरिका अकेला भी पूँजीवाद की अपनी मान्यता को लेकर कब तक चल सकता है। 28 करोड़ की आबादी वाला यह राश्ट्र अब एक चौथाई से भी अधिक गरीब जनशक्ति से भरा राश्ट्र है, जहाँ रोजगार न के बराबर हैं। ‘द फ्यूचर ऑफ कैपिटलिज्म’ नामक एक पुस्तक पिछले दिनों प्रकाशित हुई है। ‘जीरो सम सोसायटी’ (1980) के लेखक लेस्टर थूरो ने इसे लिख है। 1996 में प्रकाशित इस पुस्तक में ‘अर्थव्यवस्था व प्रबन्धन’ विधा में एम॰ आय॰ टी0 हार्वर्ड (बोस्टन) के प्रोफेसर थूरो ने बड़े विस्तार से लिखा है कि कैसे आने वाले दिनों में पूँजीवाद का समापन होगा। वे ‘ग्लोबल इकॉनामी’ के पक्षधर हैं व लिखते हैं कि अगले दिनों विश्व स्तर पर पूँजी का सबके लिए समान रूप से वितरण होगा एवं सभी सीमित साधनों में रहकर सबके साथ हँसती-हँसाती जिन्दगी जीने का पाठ प्रकृति के विधान के अंतर्गत सीखेंगे। यह सभी 1999 के आगमन तक हो जाएगा व 2000 के बाद पूरे विकसित रूप में सभी को दिखाई देने लगेगा।

साम्प्रदायिक, जातिगत एवं नस्लवादी हिंसा आज चरमोत्कर्ष पर है, किन्तु इसका शीघ्र समापन होकर एक ही स्वरूप मानवजाति का सबके समक्ष आएगा, यह भविष्यवाणी यदि आगामी ढाई वर्षों में साकार होती नजर आए तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए। इन दिनों प्रकृति में सूक्ष्म स्तर पर एवं प्रत्यक्षतः भी ऐसा ही कुछ चल रहा है जो यह बताता है कि आने वाला समय विलक्षण परिवर्तनों से भरा है। 1986 से 1991 तक जितना कुछ हुआ इससे कहीं अधिक पिछले पाँच वर्षों में हुआ है। ग्लोबल नेटवर्क-विश्वव्यापी संचार-तंत्र का विकसित होकर आना एवं साँस्कृतिक स्तर पर सारे विश्व की चैतन्य सत्ताओं का एक विशाल छतरी के नीचे आ जाना आने वाले परिवर्तनों का द्योतक है। अब आगामी पाँच वर्ष व उनमें भी प्रथम ढाई वर्ष भारी उथल-पुथल से भरे हैं, यह सभी द्रष्टाओं, भविष्यवक्ताओं का मानना है। यह कार्य यदि पाँच वीरभद्र कर रहे हैं तो सभी को सुखद लगना चाहिए, क्योंकि उनकी सुरक्षा स्वतः उस महाचेतना से जुड़ने के बाद सुनिश्चित हो जाती हैं चौथा वीरभद्र उनकी सुरक्षा के निमित्त नियोजित जो है। बस अपने साधना-पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।

(2) व्यष्टिगत प्रभाव

सभी ने विगत 12-12 वर्षों में अनुभव किया है कि अनेकानेक प्रतिकूलताएँ समक्ष होते हुए भी परमपूज्य गुरुदेव की सावित्री साधना की फलश्रुति के रूप में उन्हें सदैव सही मार्गदर्शन मिलता रहा है। उन्हें अनपेक्षित सहयोग भी मिला है एवं आत्मबल संवर्द्धन के रूप में ऐसी पूँजी मिली है जिसने मानो एक सुरक्षा कवच चारों ओर प्रदान कर दिया हो। बहुत से प्राणवान परिजन पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण अवधि में ही उनके सूक्ष्मशरीर से प्रेरणा पाकर उनके दर्शन कर सतत् यही कहती रही कि युगधर्म की पुकार अनसुनी नहीं करनी है। अब शेष समय यदि भगवान के कार्य में लगाना है तो अभी ही छलाँग लगानी होगी। बहुत से परिजन इन्हीं दिनों शाँतिकुँज से बाहर गए भी-व्यक्तिगत कारणों से अथवा युग-चेतना के प्रवाह से तालमेल न बिठा पाने के कारण। किन्तु कार्य रुका नहीं। जितने गए उससे तीन गुना अधिक स्थायी कार्यकर्ता सुशिक्षित-प्राणवान एवं समर्पित आकर बस गए। नियमित रूप से समय देने वालों की संख्या इस बीच संस्कार महोत्सवों श्रद्धांजलि समारोह एवं प्रथम पूर्णाहुति में उमड़ी समर्पित जनमेदिनी के रूप में देखा जा सकता है।

व्यक्तिगत स्तर पर कइयों को अनुभूतियाँ सावित्री साधना के दौरान हुईं जिन्हें 1984-85 की अखण्ड-ज्योति के विभिन्न अंकों में प्रकाशित किया गया था। यहाँ कुछ संस्मरण उस समय उस के बाद की अवधि के हम दे रहे हैं, जो मात्र एक झलक देते हैं प्रज्ञावतार की उस दिव्यसत्ता की, जो सतत् हम सभी परिजनों के आस-पास है हमारे योगक्षेमं का वहन करने को तत्पर है।

श्री श्यामलाल धरणी मॉडलटाऊन पानीपत में रहते हैं। 1983 में जब पंजाब में उग्रवाद अपनी चरमावस्था में था, वे सपत्नीक अमृतसर रहा करते थे। उन्हीं दिनों 10 से 20 जून के सत्र में वे शाँतिकुँज आए थे, तब पूज्यवर ने पति-पत्नी को अंशदान नियमित भेजने-झोला पुस्तकालय चलाते रहने का संकल्प दिलाकर कलावा बाँधा था और कहा था कि तुम हमारा कार्य करते रहना, हम तुम्हारा काम करेंगे। तुम्हारी सतत् रक्षा हम करते रहेंगे जिन दिनों चारों ओर गालियाँ चलती थीं, कोई संयोगवश बाहर नहीं निकलता-दोनों पति-पत्नी ने कर्फ्यू खुलने की अवधि के दौरान साहित्य बाँटते रहने का संकल्प मन में लिया व सतत् निकलते रहने का क्रम बना लिया। कर्फ्यू की अवधि समाप्त होते ही वे वापस घर आ जाते। एक दिन की बात है- श्यामलालजी की पत्नी कमला को पता नहीं था कि पुनः गोलियाँ चलने से बाहर सब कुछ निर्जन है एवं वे किसी मुसीबत में पड़ सकती हैं। मिलिटरी के सैनिकों ने रोक लिया व कहा-झोला खोलकर दिखाओ। बिना जरा भी गड़बड़ के कर्फ्यू खुले तब आकर ले जाना। हमें पढ़ना है। हमारे एक साथी को आपने परसों दी थी, उसको तो जैसे जीवन जीने का नया रास्ता मिल गया है। मिलिटरी वालों ने अपनी गाड़ी में उन्हें घर तक छोड़ दिया व बार-बार प्रणाम किया। इतना होता तो कम ही माना जाता। एक दिन उग्रवादियों के दल ने उन्हें घेर लिया। फिर झोला पुस्तकालय से पुस्तकें निकलीं। उग्रवादी-जाने किस प्रेरणावश उन्हें अपनी संगीनों के साये में लेकर सुरक्षित घर छोड़ कर चले गए। मानो पूज्यवर की वाणी के रूप में एक सुरक्षा कवच झोला पुस्तकालय के रूप में उनके साथ चल रहा था। वे उनका काम कर रहे थे, जिन्हें उनने गुरु माना था व गुरु उनका काम कर रहे थे। वे उनका काम कर रहे थे। उस पर यह कि परमवन्दनीया माताजी का पत्र उपरोक्त घटना के ठीक चार दिन बाद इन्हें मिला कि “बच्चों तुम उतना ही काम करो जितना आसानी से कर सकते हो? अपनी जान जोखिम में डालकर हमारा ध्यान-अपनी तरफ मत खींचो। हमको और भी बड़े-बड़े काम करने हैं।” 84-85 का यह घटनाक्रम अभी भी दोनों की आँखों के समक्ष घूम जाता है एवं गुरुसत्ता की वाणी याद आ जाती है। उन्हीं दम्पत्ति ने कुरुक्षेत्र अश्वमेध के लिए तमाम प्रतिकूलताओं के बीच घर-घर जाकर धनराशि एकत्र की व सतत् उन्हें मातृसत्ता का मार्गदर्शन मिलता रहा।

नजीबाबाद की कु॰ कुमुद सिंह बुलन्दशहर अश्वमेध यज्ञ हेतु तैयारी कर रही थीं। उनकी दादीजी जो कि स्वयं गायत्री की उपासक हैं, घर में सफाई कर रही थीं कि उन्हें एक सर्प ने काट लिया। माँ के अभाव में कुमुद को दादी ने ही पाला था। पाँच फुट लम्बे जहरीले साँप को मरा देख सभी ने कहा कि अब कुछ ही क्षण इनके जीवन के बाकी हैं? गायत्री मंत्र जप रही कुमुद को वन्दनीया माताजी के दर्शन हुए कि जो गायत्री मंत्र से व हम से जुड़ा है, उस घर कभी सर्पदंश से मृत्यु नहीं हो सकती। सतत् मुँह से मंत्र निकलता रहा। बिना किसी चिकित्सा के उनकी दादीजी बच गयीं। उनने बुलन्दशहर अश्वमेध यज्ञ में भाग लिया। एक दूसरी घटना में कुमुद लिखती हैं कि उनके पिता ने बुलन्दशहर अश्वमेध से पूर्व कहा कि जितने लोगों के लिए बस में जगह है वह भर चुकी है। नये लोग भाग लें-अच्छा है। तुम घर पर ही रहो। माँ के चित्र के समक्ष बैठी कुमुद रोती रही। यज्ञ से ठीक एक दिन पूर्व अप्रत्याशित रूप से एक सज्जन आए-बोले तुम्हारे पिता हमारे यहाँ होते हुए गए थे। कह गए थे कि इसका मन था, उस लेते आना। भले ही पूर्णाहुति में भाग ले ले पर कुमुद का मन रह जाएगा। एक गाड़ी लगी खड़ी थी एवं कुमुद यज्ञ में पहुँच गयी। दीपयज्ञ में भी भाग लिया एवं पूर्णाहुति में भी। दोनों दिन सतत् दोनों ही सत्ताओं की अनुभूति होती रही कि वे सामने ही हैं, मंच पर विराजमान हैं। पिता से पूछने पर वे अवाक् रह गए। क्योंकि उनने तो किसी से भी नहीं कहा था।

ओनीडा टेलीविजन कारखाने की सीनियर इंजीनियर श्रीमती रश्मि सिन्हा ने 19-06-91 को शाँतिकुँज आकर स्वयं एक घटना सुनाई, जिससे पता चलता है कि भक्तवत्सल गुरुसत्ता कितना ध्यान अपने शिष्यों का रखती है। सिरदर्द होने पर उनकी जाँच-पड़ताल जब दो वर्ष पूर्व की गयी तो एम॰ आर॰ आय॰ की जाँच से ब्रेन ट्यूमर होना बताया गया। अपने श्वसुर के माध्यम से अमेरिका चिकित्सा हेतु जाने से पूर्व वे शाँतिकुँज पहली बार आयीं। माँ का आश्वासन मिला कि सब कुछ ठीक होगा ।डॉ॰ कुमार जिन्होंने परामर्श दिया था, अमेरिका ले जाने का, अब परीक्षण करने पर कुछ गोलियाँ देकर बोले कि अभी ले लें-वे दो-तीन सप्ताह में अमेरिका से लौटकर फिर चेकअप करेंगे। जैसे ही डॉ॰ कुमार, लौटे, उनने पुनः चेक किया। परिजनों के आग्रह पर पुनः एम॰ आर॰ आय॰ टेस्ट किया, जिसकी आवश्यकता सामान्यतः 3 सप्ताह से कम अवधि में ग्रोथ में 50 प्रतिशत से अधिक कमी देखकर चिकित्सक हतप्रभ थे। धीरे-धीरे वे इस व्याधि से जिसे हम असाध्य मानते हैं, पूर्णतः ठीक हो गयीं। डाइग्नोसिस होने से लेकर शाँतिकुँज आकर घटना बताने की अवधि मात्र दो वर्ष, दवा मात्र यज्ञ की भस्म व सुरक्षा का आश्वासन एवं परिणाम एक घातक ब्रेन ट्यूमर से बिना सर्जरी के मुक्ति पा जाना। अब वे एक कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में कार्यक्षेत्र में लगी हुई है।

कुण्डरु सीकर-राजस्थान के श्री नागरमल गुप्ता को 1983 में लेरिन्क्स (गले का वाइस बाक्स) का कैंसर बता दिया गया। तीन वर्ष तक चिकित्सा चलती रही किन्तु कोई लाभ नहीं। परमवन्दनीया माताजी के दर्शन, आश्वासन, आशीर्वाद एवं दूर से परमपूज्य गुरुदेव के दर्शन के बाद सारी दवाएँ बन्द कर गायत्री मंत्र का जप आरम्भ कर दिया। कैंसर समाप्त हो गया। आवाज पुनः लौट आयी। लगता असम्भव है किन्तु कोई शक्ति ऐसी है जो परोक्षजगत से कार्य कर अपनों की रक्षा करती है। इन्हीं सज्जन को लोकसेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षा में बैठने का आशीर्वाद गुरुसत्ता से मिला। उनसे भी योग्य उम्मीदवार थे किन्तु सफलता मात्र इन्हीं को मिली। वे आज तक कृतकृत्य हैं। 1985 से जुड़े श्रीगुप्ताजी दवाओं के कार्य में कभी कमी न कर सतत् लगे ही रहे, परिणाम रो-मुक्ति भौतिक उपलब्धियों व आत्मिक संतोष के रूप में मिला। गायत्री के सिद्ध पुरुष का आश्वासन कभी मिथ्या थोड़े ही हो सकता है।

ब्रह्मवर्चस् में कार्यरत डॉ॰ अमल कुमार दत्ता के बड़े पुत्र अरविन्द व उनकी पत्नी ममता न्यूजर्सी में रहते हैं। बहुत स्नेह पूज्यवर व माताजी का बाल्यकाल से ही पाया है। उन्हीं के आशीर्वाद से विदेश जाने का अवसर मिला। शाँतिकुँज से इन पंक्तियों के लेखक के नेतृत्व में गयी टोली को विमान तल से छोड़कर लौट रहे थे कि न जाने कैसे कार का संतुलन बिगड़ गया एवं 6 लेन वाले मार्ग पर एक ही नहीं छह पलटियाँ खाकर गाड़ी कोने में जा गिरी। लगभग चकनाचूर हो गयी गाड़ी से बाहर निकले अरविन्द व ममता को खरोंच तक नहीं आयी थी। तुरन्त पहुँची एंबुलेंस की टीम भी विस्मित थी कि वह क्या करे व इस घटना को कैसे सत्य मान ले। नाममात्र की पट्टी करके उनके घर छोड़कर वे चले गए। अगले दिन इंष्योरेंस कम्पनी ने आकर सारी कार्यवाही कर दी। कोई आरोप न लगकर कार की खराबी को कारण मानकर सारी राशि भी मिल गयी। आश्चर्य यह कि अगले ही दिन परमवन्दनीया माताजी ने फोन से हाल−चाल पूछ लिए, जबकि यह घटना अमेरिका के अपने परिजनों को भी ज्ञात नहीं थी।

परमपूज्य गुरुदेव के पाँच सूक्ष्मशरीर की चर्चा के साथ समष्टिगत एवं व्यष्टिगत कुछ चर्चाएँ ऊपर कीं। घटनाएँ अत्यधिक हैं, अनन्त है। आने वाले तीन वर्षों में पाठकगण देखेंगे कि विश्व का नक्शा किस तेजी से आमूलचूल बदल रहा है-सौर-कलंकों बढ़ते चले जा रहे है। रक्तरंजित घटनाक्रम भी बढ़ रहे है, किन्तु वे सभी सुरक्षित रहेंगे जो महाकाल की चेतना के प्रवाह से जुड़े रहेंगे। हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि ऐसी गुरुसत्ता हमें मिली, हम उसके संरक्षण में रह रहे है एवं उसे सुदूर विराट रूप में बैठे हुए भी हम सबकी सारी विश्ववसुधा के कल्याण की चिन्ता है।


श्रद्धा आस्तिकता का प्राण - परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गुरुपूर्णिमा 27 जुलाई 1980 को शाँतिकुँज परिसर में दिया गया प्रवचन

उसे मस्तक पर लगा लेंगे और वापस घर चले जायेंगे। परन्तु वह भी नहीं मिला। गोबर भी दिखलाई नहीं पड़ा। हमें बहुत दुःख हुआ कि ऐसे महादेव, जो किसी दूसरे से ताल्लुक नहीं रखते हैं, इनसे हमारा क्या मतलब है। हमारा स्वास्थ्य भी खराब होने लगा था। हमने सोचा कि अब वापस चलना चाहिये और मैं चल पड़ा। वापसी में मैं नास्तिक हो गया। शंकर भगवान पर में बहुत आक्रोश था कि व लोगों की श्रद्धा को महत्व नहीं देते हैं। अगर खुद नहीं आ सकते तो गणेश को, अपनी सवारी को ही भेज देते या उनके गोबर को ही दिखा देते। कहीं ऐसे भी शंकर भगवान होते हैं क्या? हम नास्तिक हो गये और घर वापस आ गये। हमारे घर में हर वर्ष रामायण का पाठ होता था। उस वर्ष भी रामायण हुआ। हमें रामायण के पाठों ने नास्तिक होने से बचा लिया। आज मैं आपके सामने एक आस्तिक व्यक्ति हूँ तथा आस्तिकता का प्रचार करता हूँ।

रामायण ने हमें नास्तिकता से कैसे बचा लिया? रामायण में एक श्लोक है जो रामायण का सार है- भक्ति का सार है और वह है-

भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वासरुपिणौ। याभ्याँ विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तस्थमीश्वरम्॥

इस प्रकार तुलसीदास जी ने साफ शब्दों में बतला दिया कि भवानी और शंकर कैसा होना चाहिये। वह होना चाहिये- श्रद्धा, विश्वास के रूप में। उसी रूप में हमें उन्हें पूजना चाहिये। उन्होंने पार्वती-श्रद्धा शंकर-विश्वास के बारे में हमारे मस्तिष्क को साफ कर दिया। गोस्वामी जी ने साफ शब्दों में कह दिया कि भगवान व्यक्ति नहीं हो सकते हैं। भगवान एक सिद्धान्त का नाम है, आदर्श का नाम है। भवानी हो सकती है तो इनसान की श्रद्धा तथा शंकर हो सकते हैं तो इनसान का विश्वास- यह तथ्य हमें भलीभाँति समझ लेना चाहिये।

श्रद्धा ही आदमी का प्राण है, यही आस्तिकता का प्राण है। आध्यात्मिकता का, दैवी अनुदानों का, चमत्कार का, आत्मसाक्षात्कार का प्राण यह श्रद्धा ही है। श्रद्धा का ही चमत्कार हमारे जीवन में हुआ है। पन्द्रह वर्ष की उम्र में ही हमारे गुरु ने दर्शन दिया था, रास्ते दिखलाये थे। उस समय हम बहुत ही भावुक हो गये थे और कहा था कि आप हमें हुकुम दीजिये, हम उसका पालन करेंगे। हम आपका वचन मानेंगे ओर रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाय, पर वचन न जाई, की तरह आपके आदेशों का, वचनों का पालन करेंगे। हमने आपको अपना गुरु, मार्गदर्शक बाँस माना है, हम आपके हर आदेश का पालन करेंगे। हम उन लोगों में से नहीं हैं, जो पैर पीछे हटाकर भाग गये। आप आदेश दें, हम पालन करेंगे। हम घटिया वाले, छोटे वाले आदमी नहीं हैं, जो रोज वायदा करते हैं, कसमें खाते हैं और सम आने पर मुकर जाते हैं। हम शानदार आदमी हैं। हमने आपसे शादी की है और वह ऐसी नहीं है जो आये दिन हुआ करती है।

एक महिला ने एक अन्य महिला से पूछा कि तुम शादी क्यों नहीं करती हो तुम्हारी तो उम्र हो गयी है। उसने कहा कि हमने तीन नौकर पाल रखे हैं तो हमें शादी की क्या जरूरत है? हमने एक तोता पाल रखा है, जिसने कसम खाने की बातें सीख रखी हैं, वह रोज रटता रहता है कि तेरी कसम, तुमसे बड़ा मेरा कोई नहीं। तुमसे ज्यादा कोई प्यारा नहीं। वह मर्द की तरह कसम खाता रहता है। दूसरी हमने एक बिल्ली पाल रखी है, जो खाने के समय आ जाती है, उसके बाद वह आवारागर्दी में सारा दिन घूमती रहती है। कभी सिनेमा में, तो कभी सर्कस में चली जाती है, ताश खेलती है, यार-दोस्तों में डोलती रहती है, परन्तु खाना खाने के समय आ जाती है और खाना खाने के बाद फिर चली जाती है।

इस प्रकार एक तिहाई यह बिल्ली है और एक तिहाई तोता है। एक तिहाई और रह जाता है और वह मेरा कुत्ता है। यह दिन भर जब देखो तब गुर्राता रहता है, भौंकता रहता है। यह हमारे ऊपर भी गुर्राता है और आने-जाने वालों पर भी। यही बात तो शादी के बाद भी होती है। शादी के बाद दूल्हे छोटी-छोटी बातों में कसम खाते रहते हैं और उसके बाद भूल जाते हैं। उन्हें खाने को मिल गया, इसके बाद घर से गायब। सारा समय सिनेमा में, मटरगस्ती में बिता दिया। उन्हें इस बात की कोई चिन्ता नहीं है कि हमारे बच्चे और पत्नी कैसे हैं। एक तीसरा काम और करते हैं कि तब कोई व्यक्ति हमारे मायके से आता है तो गुर्राते रहते हैं। यह भी तो पति का काम है। सहेली, आपने देखा न, यह तीनों काम हमारे पूरे हो जाते हैं तो फिर हम शादी किस बात के लिये करें? शादी होनी है तो ठीक से होनी है। जो फेरे लिये हैं, जो वायदे किये हैं, उसे जीवनपर्यन्त निभाना है। यह है हमारी शादी, जो हमने गुरु के साथ की है।

साथियों, चौबीस साल के चौबीस महापुरश्चरण पूरे करने के बाद हमारे गुरु ने, मार्गदर्शक भगवान ने हमें हिमालय बुलाया। हमने कहा कि आपने उस दिन जो हमें आदेश दिया था, उसका तो हमने पालन किया। उसके बाद हमने आपसे कोई पूछ-ताछ नहीं की। जिस प्रकार आप बतलाते चले गये, हम पालन करते चले गये। आज हम आपके पास आ गये हैं, आप आदेश करें। हमारे गुरु ने कहा कि आपने पूछा नहीं और हमने बतलाया नहीं। उन्होंने कहा कि हमने आपको पहले दिन ही कहा था कि हम आपको देवता बनाना चाहते हैं। हम आपको महान बनाना चाहते हैं। हम आपको इनसान के जीवन तक सीमित नहीं रहने देना चाहते। हम आपको भगवान के दर्जे तक पहुँचाना चाहते थे, सो वह हमें आपको इन दिनों बनाने का प्रयास किया और आप सफल हो गये।

हमने कहा- गुरुदेव आप हमारे पास ही क्यों आये और हमें क्यों परेशान किया? उन्होंने बतलाया कि हम बहुत दिनों से एक शिकारी कुत्ते की तरह से घूमते रहे और तुम्हें खोजते रहे। जब तुम मिल गये तो हमने पकड़ लिया। इसी तरह हम बिना बुलाये सूँघते- सूँघते आपके घर जा पहुँचे। शिकारी कुत्ते इसी प्रकार सूँघते-सूँघते घर पर पहुँच जाते हैं और हत्यारों को, चोरों को पकड़ लेते हैं तथा पुलिस के हवाले कर देते हैं। हमने पूछा कि आपने क्या चीज सूँघी है? उन्होंने कहा हमने आपके अन्दर एक चीज सूँघी है और वह है आपकी श्रद्धा। श्रद्धा से रहित आदमी के पास भगवान कहाँ से आ जायेगा? देवता कहाँ से आ जायेगा? मंत्र कहाँ से आ जायेगा? श्रद्धा के बिना पूजा-पाठ एवं सारे कर्मकाण्ड प्राणहीन, खोखले जीवन की तरह हैं। इससे मनुष्य को कोई लाभ कदापि नहीं मिल सकता है। श्रद्धा नहीं है तो यह सब ढकोसला है। यह सब मन बहलाव है। श्रद्धा के बिना सब बेकार है।

हमारे गुरुदेव ने कहा कि ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हमने एक ऐसे इनसान की तलाश की जिसके अन्दर श्रद्धा जीवन्त थी। उन्होंने बतलाया कि जहाँ श्रद्धा जीवन्त है, उसके लिये सारी मंजिलें खुली हुईं हैं। अगर किसी व्यक्ति की श्रद्धा खत्म हो गयी तो उस आदमी में कोई जान नहीं है। उसके आध्यात्मिक विकास का फिर कोई रास्ता नहीं है। हमने आपके अन्दर देख लिया कि आपके अन्दर श्रद्धा का बीज विद्यमान है और अगर उसे ठीक ढंग से उगाया जा सका तो बहुत बड़ा काम हो सकता है। हमने आपकी श्रद्धा को देख लिया था, इसलिये आपको साधना सिखा दी थी। हमने कहा कि साधना तो आपने एक ही सिखाई थी न कि आप 6 घंटे गायत्री महामंत्र का जप करें और छाछ एवं जौ की रोटी खायें। उन्होंने कहा कि बेटा, यह तो हमने एक प्रतीक के रूप में आपको बतलाया था। दूसरी चीजें जो सिखलायी थीं वह यह कहा था कि आप अपने आपको मोड़ दीजिये। लोगों का बहाव जिधर चल रहा है, उस ओर से अपने आप को मोड़ लीजिये। क्योंकि आप जानते नहीं हैं कि दुनिया के लोगों के जायके जीभ के जायके के साथ खत्म होते हैं। हमने आपको जायके से मन मोड़ने को कहा था। हमने कहा था कि आप ताकत के जखीरे को रोकिये तथा उस शक्ति के बहाव को रोकिये और उसे अच्छे कार्य में लगाइये। हमने आपके जायके को बन्द करने के लिये यह कर्मकाण्ड कराया था। यह जायके लोभ, मोह, वासना, तृष्णा के भी हो सकते हैं। यह सूक्ष्म किस्म के जायके हैं। स्थूल किस्म के जायके वे हैं तो जबान से जाते हैं और जिनका लोग मजे लेते हैं। इस जायके के चक्कर में आदमी छोटा हो जाता है। उसकी शक्ति खत्म हो जाती है। इसलिये हमने आपको यह कर्मकाण्ड कराया था।

हमने आपको पहले ही दिन कहा था कि हम आपको देवता बनायेंगे। इस हेतु हम साधना करायेंगे। सही साधना हमने आपसे करायी है। आप तो केवल यह कहते हैं कि जौ की रोटी और छाछ खिलाया था, जिसमें कोई तथ्य नहीं था। हमने तो आप को पहले ही दिन कहा था कि आपको देवता बनायेंगे। भगवान बनायेंगे और उसी क्रम में आपसे साधना करायी थी। अब आप यह किसी से मत कहना कि जौ की रोटी खिलायी थी। बाल्मीकि ने मिट्टी खायी थी। आपने भी जौ खाया या मिट्टी- यह किसी से मत कहना।

हमारे गुरुदेव ने कहा कि एक दूसरी बात हमने आपसे यह कही थी कि जिसके द्वारा मनुष्य को सिद्धियाँ मिलती हैं, आध्यात्मिक जीवन का विकास होता है, वह है भीतर का जायका। भीतर का बहाव, लोगों का रहन-सहन लोगों का विचार इसमें आदमी बहता हुआ चला जाता है। उसे कुछ पता नहीं चलता है। इस तरह के बहाव-बाड़ के बहाव की तरह होते हैं, जिसमें छप्पर, हाथी, मुर्दे बहते, पेड़ बहते हुये चले जाते हैं, हमने कहा था कि आपको पानी के बहाव को रोकना चाहिये। आप लोगों की बातों को मत सुनना। आप लोगों की बातों को सुनेंगे तो आगे बढ़ना मुश्किल हो जायेगा। आप लोगों की बातों को सुनना, परन्तु उनके रास्ते पर मत चलना। अगर लोगों के रास्ते पर चलना शुरू कर दिया तो ये लोग आपको बर्बाद कर देंगे। ये लोग आपको ऐसी जगह पर लेकर जा पहुँचेंगे, जहाँ से आपको आना मुश्किल हो जायेगा।

लोगों का रिवाज क्या है? लोगों के द्वारा विवाह आदि में कितना खर्च होता है? लोगों के प्रसन्नता व्यक्त करने एवं न करने के प्रति अध्यात्मवादी को कठोर हो जाना चाहिये। इस मामले में गाँधीजी के तीन बन्दरों की कहानी से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिये। आपको दुनिया वालों की बातें सुनने की अपेक्षा अपने कान बन्द कर लेने चाहिये। यह मत सुनिये कि दुनिया वाले क्या कहते हैं। यह दुनिया वाले बहुत तेजी के साथ बर्बाद करने में लगे हुए हैं। उनकी ओर आपको ध्यान नहीं देना चाहिये। इस बर्बादी के कारण आपके कुटुम्बी, दोस्त, मित्र भी हो सकते हैं। उनकी सलाह पर अगर आप चलेंगे तो आप ऊंचे रास्ते पर नहीं चल सकते हैं।

हमने अपने गुरु के आदेश पर अपने अन्दर विद्यमान श्रद्धा के बीज को आगे बढ़ाने के लिये उनके दो आदेशों को पालन किया है। पहला यह कि योगी, तपस्वी को हर काम में हर बात में ‘यस’ नहीं कहना चाहिये, बल्कि पहले सोचना चाहिये, उसके बाद कार्य करना चाहिये। अगर आपने बीबी से कहा- ‘यस’ तथा मित्र से कहा- ‘यस’ तो ये लोग आपको तबाह कर देंगे। अतः आम दूसरा काम यह कीजिये कि ‘नो’ करना भी सीखिये। यह भी आदेश हमारे गुरु ने दिया। हमने उनके हर आदेश का पालन किया। हमने कभी भी अपने रिश्तेदारों, मित्रों, दोस्तों की बातों को ‘यस’ नहीं किया है। अरे भाई, साला है और यह कहता है कि चलिये सिनेमा देखाकर लायेंगे, तो आप ‘यस’ न करें। हमारे गुरु ने कहा कि योगी-तपस्वी हर परिस्थितियों में ‘यस’ नहीं करते हैं। वे तप करने के लिये धूप में, गर्मी में, अग्नि में खड़े हो जाते हैं तथा अपने को तपाते हैं। यह तितिक्षा होती है। अध्यात्मवादी उसे कहते हैं तो अपने भीतर वाली गलती को, भीतर वाली कमियों को निकाल बाहर करते रहते हैं उनसे हमेशा लड़ते रहते हैं, अन्यथा ये सारी चीजें आदमी को खा जाती हैं। अतः इसे अवश्य रोकने का प्रयास करना चाहिये।

मित्रों, हम देख रहे हैं कि इन दो हमार आदमियों में गाँधी बनने की क्षमता वाले कम से कम दो सौ आदमी बैठे हैं। इसमें से कई आदमी सरदार पटेल, नेहरू एवं शास्त्री बन सकते थे, परन्तु केवल दो सुराखों ने इनको खा लिया। इनमें बहुत से आदमी हमें ऐसे दिखाई पड़ रहे हैं जिन्हें हम यदि मोर्चे पर खड़े कर दे तो वे इन्हें न जाने कहाँ से कहाँ ले जा सकते हैं। आप में से हमें ऐसे व्यक्ति दिखलायी पड़ रहे हैं, जिन्हें गुरु गोविन्द सिंह होना चाहिये था, परन्तु ये नहीं हो सके। इसके लिये दो ही सुराख जिम्मेदार हैं। एक हैं- भीतर वाली कमजोरियाँ- जिसे हम हमेशा बतलाते रहते हैं। वह हैं हमारी इन्द्रियाँ- जिससे हमने कभी ‘नो’ कहना ही नहीं सीखा। दूसरे वाले हैं- हमारे कुटुम्बी- जिनसे भी हमने ‘नो’ कहना ही नहीं सीखा, आप उन्हें ‘नो’ कहिये। आप कहिये कि हम आपकी सलाह को नहीं मान सकते। आप हमें मजबूर न करें कि हम उस रास्ते पर चलने के लिये तैयार हो जायें।

मित्रों, पन्द्रह वर्ष की आयु से ही बराबर चौबीस साल तक हमें अकेले ही खड़े रहना पड़ा। हमारे रिश्तेदारों ने इसका बहुत विरोध किया, पुरातनपंथियों ने तो हमारा विरोध बाद में किया। नारियों के गायत्री अधिकार के बारे में उन्होंने विरोध बाद में किया। गायत्री का अधिकार केवल ब्राह्मणों को है, ऐसे शब्दों का प्रयोग प्रतिगामी लोगों ने बाद में किया, परन्तु असली विरोधी तो हमारे सम्बन्धी, रिश्तेदार पहले थे, जिन्होंने हमेशा बरगलाने की कोशिश की, हमारी हिम्मत तोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने ऐसे-ऐसे कटाक्ष कसे- आक्षेप लगाये, सलूक किया था जिससे हमारी हिम्मत टूट जानी चाहिये थी, परन्तु हम हमेशा उनके आदेशों को ‘नो’ करते रहे।

हमारे गुरुदेव ने जो हमें बतलाया, हमने उसका पालन किया है। आप जानते हैं कि तब बच्चा पैदा होता है तो वह पहले जीभ के द्वारा ही दूध का जायका लेता है। इस जीभ को नियंत्रित करने के लिये हमने चौबीस साल तक जौ की रोटी और छाछ लिया है। नमक, शक्कर क्या होता है, इसका स्वाद जीभ ने चखा ही नहीं वस्तुतः जीभ ये ही संयम शुरू होता है। इसे जायकेदार बनाने के लिये लोग हमें सलाह देते रहे, पर हमने उनको मना कर दिया कि हमें आपकी- सलाह की आवश्यकता नहीं है। हमने अपने जीवन में यह निश्चय कर लिया था कि हमें अपने गुरु- मार्गदर्शक सत्ता की सलाह माननी चाहिये, जिसके द्वारा हमारा कल्याण हो सकता है। बाकी को हमेशा ‘नो’ कहा है। हमने लोगों से कहा कि आम कृपा कीजिये तथा हमें अपने रास्ते पर चलने दीजिये।

मित्रों! इसी तरह हम निरन्तर 24 साल तक चलते रहे। हमें सहयोगियों की कमी कभी भी नहीं रही। हमें हमेशा सहयोग मिलता रहा। आपको मालूम होना चाहिये कि दैवी शक्तियाँ हमेशा इस प्रकार की आत्मा या व्यक्तित्व की तलाश करती रहती है तथा उन्हें सहयोग देने के लिये आतुर रहती है। हमारी आपसे प्रार्थना है कि आप अपने विचारों को बदल दे तब भगवान की अनुकम्पा बादलों की तरह से आपके ऊपर बरसने लगेगी। बादल जब बरसते हैं तो यह तलाश करते हैं कि नदियाँ कहाँ हैं जिन्हें हम भरदें। हमारे गुरु इसी तरह से हमारे, पास चले आये थे। गुरु किसी व्यक्ति को नहीं कहते हैं। गुरु एक शक्ति है, गुरु एक फिलॉसफी-दर्शन हैं गुरु के बारे में शास्त्र कहते हैं- “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुगुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥” तो क्या आप ब्रह्मा हो सकते हैं? नहीं। क्यों? अच्छा तो आप एक बच्चे को बना दीजिये। चलिये बच्चा नहीं बन सकता तो एक जूँ बनाकर दिखा दीजिये। ब्रह्मा ने तो सारी सृष्टि बना दी है, पर आप कुछ नहीं बना सकते हैं। हमने गुरुत्व को समझने की कोशिश की है, आपको भी समझने का प्रयास करना चाहिये। अध्यात्म की जितनी भी सामर्थ्य हैं, सिद्धियाँ हैं, वह एक व्यक्ति के मार्गदर्शन पर टिकी हुई है और उसका नाम गुरु है, जो व्यक्ति की चतुर्मुखी प्रतिभा को विकसित कर देता है। सारा चमत्कार श्रद्धा का ही है। हमने जो कुछ भी पाया है, वह केवल श्रद्धा का ही है।

साथियों! हमसे जो 24 साल तक अनुष्ठान करने को कहा गया था, उसमें डर था कि हम उसे कैसे कर पायेंगे, परन्तु यह हमारी श्रद्धा का ही फल है, जो हम उसे पूरा कर पाये। इतना ही नहीं आगे भी हमारी श्रद्धा बढ़ती ही गयी। हमारे गुरु ने जब गायत्री का मंदिर बनाने के लिये कहा तो उसके लिये हमने जो जमीन ली, वह एक बगीची थी। उसे खरीदने से लेकर बनाने तक का सारा काम हमारी श्रद्धा के द्वारा ही पूरा हो सका। देश के कोने-कोने से हमें इस कार्य हेतु सहयोग मिलना शुरू हो गया। पहले हमारी हैसियत क्या थी, परन्तु गुरु के साथ जुड़ जाने पर हमारी हैसियत हमारे मार्गदर्शक के कारण बढ़ गयी। हमने अपने गुरु से कहा कि हमारा बजट इतना नहीं है। हमारे बाँस ने कहा कि आपका बजट नहीं है तो क्या हुआ, हमारा बजट तो है। आप काम शुरू करें। हमने वह बगीची 6000 रुपये में खरीद ली, जिसमें एक इमारत भी थी। मंदिर की तरह भी कुछ बना था। एक कुआँ भी था। उन्होंने कहा कि एक आयोजन भी करना होगा। जिसमें चार लाख व्यक्तियों के ठहरने एवं भोजन की व्यवस्था बनानी होगी। हमने कहा कि आप तो कहते ही चले जाते हैं, पर बजट का क्या होगा? उन्होंने कहा कि आपके बजट से कोई मतलब नहीं है। यह हमारा बजट है, जिसमें पाँच दिनों तक चार लाख आदमियों को भोजन कराना होगा। इतने लोगों में एक रुपये के हिसाब से बीस लाख रुपये खर्च होंगे। दूसरे समय के भोजन में 20 लाख। इस तरह 40 लाख भोजन में और यज्ञ एवं अन्य व्यवस्था में करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे। पर आप इसकी चिन्ता मत कीजिये। हमने अपने बाँस से कहा कि हम तो ब्राह्मण हैं। हमारे बाप-दादों ने दक्षिणा में इक्कीस रुपये माँगे हैं, परन्तु हमने कसम खायी है कि हम इनसान के आगे कभी भी नहीं माँगेंगे और न हाथ फैलाएँगे । इस सम्बन्ध में हम अपनी जबान नहीं खोलेंगे। अगर आपने हमसे कहा कि आप रसीद बुक लेकर के जाइये और दुकान-दुकान जाकर अठन्नी माँगकर लाइये, तो यह हमसे नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि आप तो काम चलने दीजिये।

बेटे, सन् 1958 के विराट यज्ञ का सारा काम हो गया। उस दिन से हमारा संगठन भी बन गया। हमारा मनोबल भी बढ़ गया। हमें विश्वास हो गया कि हमारे साथ एक समर्थ सत्ता है। यह है हमारी श्रद्धा-गुरु के प्रति! गुरु श्रद्धा है, विश्वास है। इसमें हम एक व्यक्ति के प्रति श्रद्धा जाग्रत करते हैं। कमजोरियाँ किसमें नहीं होती हैं। हमारा गुरु? एक व्यक्ति है, एक पत्थर है, किन्तु एकलव्य के तरीके से हमने उसे भगवान बना दिया है। यह है हमारी श्रद्धा। हमारे लिये गोबर गणेश ही महान है।

आपने तो देवी की पूजा की, चाय पिलाया, दूध चढ़ाया, परन्तु आपकी देवी ने कभी भी- थैंक यू वेरी मच नहीं कहा। कम से कम थैंक यू ही कह देती, पर वह भी नहीं कहा-उसने वह तो चुपचाप बैठी रहती हैं। हम नमस्कार करते रहते हैं, परन्तु वह जवाब तक नहीं देती हैं। अगर आप एक आदमी को नमस्कार करें तो वह जवाब दे देता है। कोई व्यक्ति लेखन भी कर रहा हो, तो वह यदि हाथ नहीं उठा सकता तो कम से कम अपना सिर तो हिला देता है, परन्तु देवी कभी भी कुछ नहीं कहती हैं। वह खाना खाती रहती हैं, तो यह भी नहीं कहती हैं कि आप भी आ जाइये और थोड़ा -सा भोजन कर लीजिये। वह देवी केला खिलाने पर भी कुछ नहीं कहती। यह तो आपकी श्रद्धा है जो आप खिलाते रहते हैं और वह आपकी भावना को उसी प्रकार स्वीकार करती रहती है। किन्तु हमने अपनी श्रद्धा को कायम रखा है, जिसके कारण देवी ने हमें दर्शन लाभ देना शुरू कर दिया है। हमने जो दीपक जलाया है, वह क्या है? आग है, परन्तु हमारी श्रद्धा दूसरे प्रकार की है। हमने उसे कभी भी आग के रूप में नहीं, प्रकाश के रूप में, एक ज्योति के रूप में दर्शन किया है। वह है हमारी श्रद्धा। यह श्रद्धा ही है जो न जाने क्या ये क्या कराती और क्या ये क्या बना देती है। हमारा वह दीपक चमत्कार दिखाता है। वह दीपक हमारी सिद्धि का प्रतीक है। वह दीपक हमारी प्रगति का प्रतीक है और न जाने क्या-क्या है।

मित्रों, आज गुरुपूर्णिमा का पर्व है। यह पर्व केवल श्रद्धा का है। हमारे मार्गदर्शक ने कहा था कि हम तुम्हें देवता बनायेंगे। यह हम अपने मुख से क्या कहें, ये बैठे हुए लोग स्वयं समझते हैं। हमने समाज को दिया है, यह हम अपने मुख से क्या कह सकते हैं? हमारे शरीर छोड़ने के बाद आप लोग याद करेंगे कि एक ऐसा भी इनसान धरती पर आया था जिसने संसार के हर व्यक्ति को प्यार दिया था। मोहब्बत दी थी। लोगों को दिशाएँ दी थीं, प्रेरणाएँ दीं और लोगों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था। आप कहेंगे कि उसका सबूत क्या है? सबूत यही है कि हमारा प्यार लौट कर हमारे पास आ जाता है। आप विश्वास करें या न करें, पर हमारा ही प्यार हजारों, लाखों आदमियों में ‘रिप्लेक्ट’ होता है और वह इस कदर वापस हमारे ऊपर आ जाता है जिसे देखकर लगता है कि हम इस बेकार की दुनिया में नहीं रहते हैं, वरन् हम प्यार की दुनिया में रहते हैं, हम मोहब्बत की दुनिया में रहते हैं। हमें लगता है कि हम श्रेय की दुनिया में, सद्भावना की दुनिया में रहते हैं। हमारी दुनिया ऐसी है कि उसका क्या कहना। हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि ऐसी दुनिया भगवान हर किसी भाग्यवान को दे।

आप लोग इतनी दूर से हमारे पास आते हैं। आप क्या लेकर आते हैं? मोहब्बत लेकर आते हैं, प्यार लेकर आते हैं और पैसा खर्च करके आते हैं। आप अपनी पत्नी के जेवर तक बेचकर आते हैं, और न जाने कितनी परेशानी उठाकर हमारे पास आते हैं। यह क्यों होता है? बेटे, हमारी मोहब्बत और प्यार तुम्हें खींचकर यहाँ ले आता है। गुरुजी! मेरा तो एकदम मन नहीं था, परन्तु एक व्यक्ति ने कहा कि गुरुपूर्णिमा में तो चलना ही चाहिये और हम खिंचते हुए आपके पास चले आये, हम यहाँ पर अपनी मोहब्बत आपके ऊपर बिखेरते हैं और वह आपके दिलों पर हावी हो जाती है। हमने मोहब्बत दी है, उत्साह दिया है और आप लोगों को उछाल दिया है। ऊपर से नीचे आना पानी का नैसर्गिक गुण है। आज लोग इसी प्रकार मनुष्य को नीचे गिरा देते हैं, परन्तु हमने हर व्यक्ति को नीचे से ऊपर उठाया है। उसे उछाल दिया है।

आप लोगों को मालूम है कि उछालने में बहुत शक्ति लगती है। इसमें गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध शक्ति लगानी पड़ती है। हमने आदमी को उछालने का प्रयास किया है। लाखों आदमियों को हमेशा उछाला है- गेंद के तरीके से, राकेट के तरीके से। हमने उछालने की यह ताकत अपने गुरु से पायी है। यह हमारी श्रद्धा का चमत्कार है। हमने बालों से भभूत नहीं निकाली है, बाजीगरी नहीं दिखाई है। लानत है उन बाजीगरों को जो अध्यात्म के नाम पर इस तरह के तमाशा दिखलाते हैं। बेटे, हम क्यों तमाशा दिखलायेंगे, हम कोई बाजीगर हैं क्या? हम किस लिये चमत्कार दिखलायेंगे? आप हमारी प्रशंसा करें और आप अचंभे में पड़ जायेंगे, यह हमारा काम नहीं है। अचंभे में पड़ना बच्चों का काम है। न हम बाजीगर हैं और न आपको बच्चा समझते हैं। यह उछालने का हमारा चमत्कार है। आदमियों के कष्टों को हमने दूर किया है। आदमी आजकल थक गया है। हार गया है। वह मूर्छित हो गया है। आज आदमी को प्यार की जरूरत है, मोहब्बत की जरूरत है, जो मनुष्य की पीठ थपथपा कर यह कह सके कि हम आपके कन्धे से कन्धा मिलाकर चलेंगे। ऐसे लोग भी इस संसार में दिखलाई नहीं पड़ते हैं, जो लोगों के आँसू पोंछ सकें, उनसे दो शब्द प्यार के बोल सकें, दुख-दर्द बंटा सकें।

मित्रों! हमने लोगों को हिम्मत दी है, सहायता की है। पता नहीं भगवान ने हमारी जेब में क्या-क्या दिया है? परन्तु हमने इनसान के लिये अपनी जेब को हमेशा खाली किया है। हमने कुछ भी बचाकर नहीं रखा। तप, पैसा, ज्ञान जो भी रखा था, हमने उसे बाँटने का प्रयास किया है। हम हमेशा अपने दिमाग को, अपनी जेब को खाली करके तब सोये हैं, हमें गहरी नींद आती है। चार घंटे हम इस तरह सोते हैं जैसे नशे की दवा खाने पर भी लोग नहीं सो पाते हैं। हम इसलिये सोते हैं, क्योंकि हम खाली होकर सोते हैं। हम इसलिये खाली होकर सोते हैं कि हमने अपने जीवन की धाराओं को किसी के सुपुर्द कर दिया है। हमने यह कहा है कि यह बाँस खाली है, आप इसे बजा सकते हैं। हमने उसे अपने बाँस को ओठों से लगा दिया है। हमने यह कह दिया है कि आपकी जैसी मर्जी हो वैसा इसे बजायें। हम आपके हैं, आप जैसा चाहें उपयोग करें। हम सर्वतोभावेन आपके हैं।

जब पाँच हार्सपावर की मोटर से पानी ऊपर चढ़ जाता है, तो नीचे वाला स्रोत यह कहता है कि लीजिये पानी लीजिये। हम इसी तरह खाली हाथ होते रहते हैं और पुनः भरते रहते हैं। हम इसी तरह लोगों की मदद करते रहते हैं। उनकी आँखों के आँसू पोछते रहते हैं। आप किसी से मालूम कर लेना कि आप आचार्यजी के पास गये तो क्या आप खाली हाथ आये? आप किसी से भी पूछ लेना- हर आदमी यही कहेगा कि भला आचार्यजी के पास से हम खाली हाथ आ सकते हैं क्या? आपको हर आदमी यही कहेगा कि हम गुरुजी के पास जाते हैं और फायदा लेकर आते हैं। देवता वे होते हैं जो देने में समर्थ होते हैं। हम अपने गुरु के रास्ते पर चलते चले गये और हमें फायदा हुआ है। उन्होंने हमें कहा था कि तुम्हें देवता बनायेंगे। सो उन्होंने बनाया। भगवान को हमने नहीं देखा है, परन्तु हमने देखा है कि भगवान हमारे अन्दर घुसता हुआ चला जाता है।

भगवान के द्वारा बड़ा-बड़ा काम होता है। युग बदलने का काम होता है। प्रज्ञावतार का काम भी भगवान का ही काम हैं यह इनसान का काम नहीं है। इनसान छोटे-छोटे मारकाट एवं झंझटों को ठीक नहीं कर सकता है। उनकी व्यक्तिगत समस्यायें ही हल नहीं होती हैं। नगरपालिका के अध्यक्ष हैं, उनसे अपने क्षेत्र की सफाई का काम ही पूरा नहीं होता है। 28 आदमी मिलकर नगरपालिका की व्यवस्था नहीं संभाल पाते हैं। जिले का डीएम. और एसपी. अपने जिम्मे का काम पूरा नहीं कर पाते हैं। फिर इतने तमाम लोगों की तमाम समस्याओं का समाधान इनसान कैसे कर पायेगा। वास्तव में जो काम इनसान के बलबूते का नहीं होता है, वह काम भगवान अपने जिम्मे रखते हैं। भगवान प्रेरणा, प्रकाश और सुव्यवस्था का नाम है। प्रेरणा और प्रकाश के द्वारा उसकी व्यवस्था चलती है। हमारे गुरु हमेशा हमें प्रेरणा देते रहते हैं। उन्होंने हमें अनुदान दिया है, हमारे सामने अनेकों साधन दिये हैं।

आप पूछ सकते हैं कि क्यों गुरुजी हमें भी ऐसा गुरु मिल सकता है? हम कहते हैं कि आप में से हर एक व्यक्ति को ऐसा गुरु मिल सकता है, परन्तु शर्त एक है- आपकी श्रद्धा। आप इसे न पैदा करना चाहते हैं और न आपको इस पर विश्वास है। आपको चालबाजी और जालसाजी पर विश्वास है, श्रद्धा पर विश्वास नहीं है। हमने श्रद्धा पर विश्वास किया है। हमारे लिये हमार गुरु पत्थर का हो या हिमालयवासी हो- हमने उसे श्रद्धा के रूप में देखा है और पाया है। वह हमारे आगे-आगे चलता है, बातें करता रहता है, हमारी हर समस्या को हल करता है। हम आपको यह बताना चाहते हैं कि किस प्रकार हमारा बाँस हमको सामर्थ्यवान बनाता चला जा रहा है। हम चाहते हैं कि आपको भी हम सामर्थ्यवान बना दें, परन्तु आप में श्रद्धा ही नहीं है। स्वामी विवेकानन्द को अपनी सत्ता और शक्ति रामकृष्ण परमहंस ने स्वयं सौंप दी थी। हम भी यही चाहते हैं कि आप सभी हमारे बच्चे बड़े हो गये हैं और अपनी जिम्मेदारी संभालने योग्य हो गये हैं। अतः हम अपनी सारी शक्ति आपको देकर निश्चिन्त हो जायें।

हमारे गुरु ने हमसे कहा था कि आप अगर श्रद्धा कायम रखेंगे तो हमारा अनुदान कभी खाली नहीं जायेगा। आज गुरुपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर हम आपको एक बात बतलाना चाहते हैं कि आपकी आध्यात्मिक उन्नति, चमत्कार इसके बिना-अर्थात् श्रद्धा के बिना कदापि सम्भव नहीं है। ऐसे बहुत से श्रद्धावान शिष्य हुए हैं, जितने अपने एक बूँद दवा के द्वारा हजारों लोगों की बीमारियों को ठीक कर दिया है। उन्हें लाभ पहुँचाया है। यह श्रद्धा का ही चमत्कार है। हमारी दवा में श्रद्धा है जो अमृत है। हमारे जीवन में सफलता की यही कहानी है। हमने श्रद्धा के साथ अपने मार्गदर्शक को अपनाया है। हमें अपने गुरु के प्रति, आचार्यों के प्रति, भगवान के प्रति, आस्तिकता के प्रति अटूट श्रद्धा है। हम कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखते। अकेले चलते हैं। हमारे साथ हमारी श्रद्धा और विश्वास चलता है और हम सफल होते हैं।

साथियों, हम हर काम में सफल होते चले जाते हैं। हमने नैष्ठिक साधक बनाने का संकल्प लिया है और वह पूरा हो रहा है। हमने अपने 6 हजार गायत्री परिवार की शाखाओं के अंतर्गत गायत्री चरणपीठ बनाने का संकल्प लिया है। पहले हमने चौबीस गायत्री शक्तिपीठ बनाने का संकल्प लिया था, जो अब 2400 के निर्माण के रूप में बदल गया है। हम अपने मरने तक एक लाख चरणपीठ बना लेंगे। आप नहीं जानते हैं कि हमारे पीछे कौन-सी शक्ति है। आपको मालूम नहीं है कि हमारा कोई काम, कोई संकल्प अधूरा नहीं रहा है। हमारी श्रद्धा ने उन्हें जकड़कर रखा है। यह हमारे साधु-ब्राह्मण जीवन का फल है। आज इसका संसार में अभाव है। आज संतों का अभाव है। कहीं भी कोई संत दिखाई नहीं पड़ रहा है। आज वे रहते तो हमें चरणपीठ बनाने की क्यों आवश्यकता पड़ती। वे गाँवों में अशिक्षा की समस्या दूर कर देते। सामाजिक कुरीतियों को निकालने में सफल हो जाते। हम अगले दिनों संतों की- ब्राह्मणों की एक नई पीढ़ी का निर्माण करेंगे, उन्हें नव-निर्माण की ओर अग्रसर करेंगे।

आप हमें कभी भी व्यक्ति नहीं समझना, आप हमें एक शक्ति समझना। सारे काम समय पर हो जायेंगे। हम अकेले नहीं काम करते हैं। हमारी पाँच शक्तियाँ काम करती हैं। आदिवासियों की समस्या हम हल करेंगे। हमने झाबुआ में आदिवासी सम्मेलन बुलाया है। उसमें हम हर समस्या का समाधान करेंगे। आप देखना हम आगे चलकर सामाजिक कुरीतियों का समाधान किस तरह से करते हैं। आप आगामी दिनों हमारा चमत्कार देखना। हमारी सरकार निरक्षरता का समाधान नहीं कर सकी। हमें देश के, मुल्क के लोगों को साक्षर बनाना है। हमें अभी बहुत काम करना है। हम अभी नहीं मरेंगे। हमने तो कह दिया है कि हमें जब चलना होगा तो टेलीफोन करके आपको बुला लेंगे।

बेटे, इन समस्याओं को हल केवल मनुष्य के दिन और दिमागों के बदलने से होगा। हम अगले दिनों असंख्यों मनुष्यों के दिल और दिमागों को बदल डालेंगे। हमारे बाँस ने कहा था कि हम तुम्हें भगवान बनायेंगे। इसका मतलब यह नहीं था कि वे मुझे पूजा- उपासना कक्ष तक सीमित कर देंगे, बल्कि वह प्राणऊर्जा हमारे अन्दर भर देंगे हो कि हम भगवान जैसे कार्य, दिल-दिमाग बदलने जैसा कार्य सहज में कर सकें। हम भगवान के ‘टूल्स’ हैं, आप हमें भगवान कहें तो हमें आपत्ति हो सकती है। टूल्स कहने पर नहीं। आप बुद्ध को और गाँधी को चाहें तो भगवान कह सकते हैं।

हमारा बाँस- हमारा भगवान जब भी हमें आवश्यकता पड़ी है, दोस्त के तरीके से- गुरु के तरीके से आया है, उसने मदद की है। हमने श्रद्धा के बल पर उसे पकड़ लिया है। हो सकता है कि हमारा गुरु सूक्ष्म हो, परन्तु माइक्रोस्कोप के माध्यम से देखकर हमने उसे बड़ा बना दिया है। वह महान है, उसकी शक्ति महान है। आप चाहें तो उसी तरीके से अपने अन्दर ला सकते हैं तथा लाभ प्राप्त कर सकते हैं। हम आपको यह बतलाना चाहते हैं कि आप भगवान के रास्ते पर चलना, भगवान आपके रास्ते पर चलेंगे। अर्जुन भगवान के रास्ते पर चले तो भगवान भी अर्जुन के रास्ते पर चले। हम


अपनों से अपनी बात- - इस संधिकाल में हमारी गुरुभक्ति का स्वरूप क्या हो?

हर व्यक्ति जुड़कर व सक्रिय होकर ही चैन से बैठ सकेगा

गुरु को मानवी-चेतना का मर्मज्ञ बताया गया है एवं यह कहा जाता रहा है कि वहीं एक ऐसी समर्थ सत्ता है जो शिष्य की चेतना में उलट-फेर लाने में समर्थ हो पाती है। गुरु अपना लक्ष्य शिष्य के अहंकार को बनाता है, डाँट या पुचकार से, घटनाक्रमों का अनुभूति से, विभिन्न प्रकार के शिक्षणों द्वारा वह एक समर्पित शिष्य के अहंकार को धोकर, साफ कर उसे निर्मल बना देता है। हमारी संस्कृति में सभी साधना-पद्धतियाँ इसी कारण गुरु के माध्यम से ही सम्पन्न किये जाने पर सफल होती है। आत्मिक प्रगति का क्षेत्र वस्तुतः एक जीवन-समर महाभारत के सदृश है। यह उपक्रम प्रवाह के विरुद्ध है। ऊंचा उठना-गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध चलना एक बहुत बड़ा काम है- इसके लिये एक बड़ी ताकत की जरूरत पड़ती है। समर्थ गुरु की प्रथम प्रक्रिया या दीक्षा इसीलिये अनिवार्य बतायी गयी है। सच्चा गुरु कौन हो, कैसे उसे ढूँढ़ा जाय, कैसे आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ा जाये? यह सब कुछ हम सभी को परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी ने अपने जीवन के माध्यम से समझाया- हृदयंगम कराया।

परमपूज्य गुरुदेव अक्सर कहा करते थे- “भगवान वस्तुतः बहुत दूर नहीं है तुमसे। तुम सोये हो- मात्र नींद का फासला है। परमात्मा के लिये तुम दूर नहीं हो, तुम्हारे लिये ही वह परमसत्ता दूर है- यह बात ध्यान रखना।” उनकी इस बात को हम इस तरह समझ सकते हैं। हम सोये पड़े हैं। सूरज देवता का आगमन हमारी धरती पर हो चुका है- किरणें हमारे ऊपर बरस रही है। लेकिन हम तो सोये पड़े हैं। सूरज के लिये हम दूर नहीं हैं- वह तो हमें जगाने की पूरी कोशिश कर रहा है- पूरी ताकत से हम पर बरस रहा है- हमारे रोम-रोम को जगाने की कोशिश कर कर रहा है, लेकिन इस गहन अंधकार में हम हैं कि सोये पड़े हैं। सूर्य देवता को हम परमात्मा मान लें। परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि ऐसी स्थिति में हमें जब सूर्य की तरह परमात्मा बहुत दूर मालूम पड़ता है, सद्गुरु हमारी मदद कर सकता है। सद्गुरु है तो हम जैसा ही मनुष्य रूप ही, हाड़-माँस का ही, फिर भी उसने जो जाना है- वह हमने नहीं जाना। उसे यह भी खबर है कि हम कल क्या बनने वाले हैं। यदि जाग गये तो और नहीं जागे तो भी। वह हमें जगाकर हमारी आँखों में ज्ञान का अंजन लगाकर हमारा भविष्य गढ़ने वाला एक ऐसा ताकतवर प्राणी है, जो औरों से ऊंचा उठा हुआ तो है ही- उसने परमसत्ता से साक्षात्कार कर हमें उसकी झलक दिखाने की पात्रता भी अर्जित कर ली है। वस्तुतः हम हमारी समस्त भावी संभावनाओं का द्वार है।

जैसे सूर्य दूर है। परमात्मा भी दूर है, किन्तु सद्गुरु हमारे पास है, स्थूल हो चाहे सूक्ष्म रूप में हो। गुरु एक ऐसा झरोखा है, श्री रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में, जिसके माध्यम से हम परमात्मा को देख सकते हैं। दूर के आकाश को हम सद्गुरु के माध्यम से देख सकते हैं, क्योंकि झरोखा समीपस्थ है- आकाश आनन्द, निस्सीम, बहुत दूरी पर है। बहुत ही व्यावहारिक परिभाषा है- सीधी-सादी सी- समझ में तुरन्त आ जाती है। और भी प्यार से गुरु की व्याख्या समझाते हुए लेखन प्रशिक्षण प्रक्रिया के दौरान उनने हमें बताया कि बुद्ध कहा करते थे कि गुरु एक बूँद के समान है। सागर की एक बूँद चख ली तो सारे सागर का स्वाद जान लिया- उस सागर का, जो परमसत्ता के एक अंश के रूप में हमारे अंदर समाया पड़ा है। ‘सद्गुरु’ परमपूज्य गुरुदेव के शब्दों में- “साधक को- समर्पित शिष्य को परमात्मा की ओर ले जाने की प्रक्रिया सिखाता है- स्वयं को स्वयं के बंधनों से मुक्त करके जीवनमुक्त बनाना सिखाता है। असली सवाल सद्गुरु की पहचान करे एवं उस पर मिटने की कला सीखने का है। मिटना अर्थात् संपूर्ण समर्पण, झुकना सीखने के लिये अपनी समस्त इच्छाओं को अर्पित कर देना।” अब दो बातें महत्वपूर्ण हैं- सद्गुरु की पहचान एवं सम्पूर्ण समर्पण, उस पर पूरा भरोसा।

परमपूज्य गुरुदेव के गुरु खोजते- खोजते उनके द्वार आ पहुँचे एवं 1926 की वसंत वेला में उन्हें सूक्ष्म शरीर से प्रत्यक्ष बन साक्षात्कार कर दीक्षा दे अपना सब कुछ उन्हें अर्पित कर गये। रामकृष्ण परमहंस ने भी नरेन्द्र की खोज स्वयं की थी एवं एक संयोग ऐसा बनाया था जिससे वे अपने प्रियपात्र को देख सकें- उसे बोध करा सकें। सबके साथ यह सौभाग्य नहीं जड़ा होता। सूफी फकीर शेख फरीद गुरु की तलाश में थे। एक वृक्ष के नीचे बैठे बाबा से बोले- “हमें भगवान से मिला दें बाबा!” ध्यानस्थ बाबा ने आँखें खोलकर कहा- “बेटा! भगवान से तो गुरु मिलाता है। गुरु को ढूँढ़ पहचान में बताता हूँ।” साधुबाबा ने इसके बाद कहा कि “तेरे गुरु एक पहाड़ के समीप एक पेड़ के नीचे बैठे होंगे। चेहरे पर प्रकाश का वलय होगा, आँखों में तेज होगा- शरीर से सुगंध निकल रही होगी।” शेख फरीद खोज में निकल पड़े- पाने की अभिलाषा बढ़ती गयी- साधना कठोरतम होती चली गयी। वापस लौटने पर देखा- एक पेड़ के नीचे पहाड़ के समीप एक साधु बैठा है। चारों ओर प्रकाश का घेरा, आँखों में तेज, भीनी-भीनी मदमस्त करने वाली सुगन्ध । चरणों में लोट गये। साधु ने पीठ पर हाथ रखा- फरीद ने मुँह उठाकर देखा- ये तो वही थे जिनने गुरु के लक्षण बताये थे। स्थान भी वही है। मैं पहचान नहीं पाया या यह उनकी लीला थी। जवाब में वे बोले- “पहले एक कौतुकी फरीद आया था। अब बीस वर्ष की तपश्चर्या के बाद निखर कर एक समर्पित शिष्य शेख फरीद आया है। गुरु केवल शिष्य को मिलते हैं। शिष्य बनने की प्रक्रिया जैसे ही तुमने पूरी की- हम तुम्हें दिखाई दे गये।” संभवतः कमी यही रह जाती है। शिष्यत्व पक नहीं पाता, इसी कारण गुरु को पहचानने में कठिनाई होती है।

गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर जब हम सभी अपने श्रद्धा-सुमन ऋषियुग्म के चरणों पर अर्पित कर रहे हैं- हम मात्र एक प्रश्न अपने आप से पूछ सकते हैं- कहीं हमारे शिष्यत्व में कोई कमी तो नहीं रह गयी- कहीं अभी भी उस युगान्तकारी सत्ता की सामर्थ्य में हमें संदेह तो नहीं हैं- कहीं समर्पण आधा-अधूरा तो नहीं है। इन प्रश्नों का यदि हम उत्तर खोज लें तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक शिष्य के नाते हमारी गुरु-भक्ति हमारे दायित्व क्या होने चाहिये, इन्हें समझने में तनिक भी कठिनाई नहीं होगी। स्वयं गुरुदेव ने अपने गुरु के प्रति अपने समर्पण के संदर्भ में लिखा है- “हमने अपना शरीर, मन-मस्तिष्क धन और अस्तित्व, अहंकार सब कुछ मार्गदर्शक के हाथों बेच दिया है। हमारा शरीर ही नहीं, अंतरंग भी उसने खरीद लिया है। अपनी कोई इच्छा शेष नहीं रही। भावनाओं का समस्त उभार उसी अज्ञात शक्ति के नियंत्रण में सौंप दिया।” स्वयं पूज्यवर ने बार-बार अस्तित्व के इस समर्पण की चर्चा करते हुए अपनी पुस्तक ‘हमारी वसीयत और विरासत’ में बार-बार लिखा है- “यह घाटे का नहीं, असंख्य गुने लाभ का व्यापार है। हमारी तुच्छता जिनके चरणों में समर्पित हुई, उनने अपनी महानता हमारे ऊपर उड़ेल दी। बाँस के टुकड़े ने अपने को पूरी तरह खोखला करके बंशी के रूप में प्रियतम के अधरों का स्पर्श किया तो उसमें से मन-मोहक रागनियां निकलने लगीं।...... हमारे पास जो प्रत्यक्ष दीखता है, उससे हजार-लाख गुना अप्रत्यक्ष छिपा पड़ा है। यह हमारा उपार्जन नहीं है। विशुद्ध रूप से यह उस मार्गदर्शक सत्ता का ही अनुदान है। जिसके साथ हमारी आत्मा ने विवाह कर लिया।”

समर्पण वस्तुतः किस स्तर का होना चाहिये, यह हम पूज्यवर की लेखनी से दिये गये मार्गदर्शन से समझ सकते हैं। गुरुसत्ता के एवं हमारे सम्बन्ध अब के नहीं, जन्म-जन्मान्तरों के हैं, यह बात भी यदि हम समझ लें तो सारी भ्रान्तियाँ दूर हो सकती हैं। पूज्यवर ने अपने समय में अगणित व्यक्तियों को प्रत्यक्ष व परोक्ष मार्गदर्शन दिया। पत्रों से भी वे प्रेरणा-प्रकाश सतत् दिया करते थे। ऐसा ही एक पत्र यहाँ उद्धृत है, जो उनने 15 मार्च,1966 को दिल्ली के श्री शिवशंकर गुप्ता को लिखा था- “तुम्हें हम पूर्व जन्मों के अनुरूप इस जन्म में भी अपना छोटा बालक ही समझते हैं। साँसारिक हलचलों में अभी हम यथा-संभव सहायता करते रहते हैं। आगे तुम्हारी आत्मिक प्रगति में भी भरसक सहयोग करेंगे। मनुष्य के अवतरित होने का लक्ष्य भी तुम्हें इसी जन्म में प्राप्त होगा। ....को जो स्वप्न तुमने देखा, वह स्वप्न नहीं, योगतन्द्रा की स्थिति थी। हम कभी-कभी अपने स्वजनों की देखभाल के लिये सूक्ष्म शरीर से जाया करते हैं। उस दिन तुम्हारे पास भी अपना वात्सल्य प्रकट करने गये थे। सो ही तुमने देखा।” शिष्य के असमंजस को दूर कर किस तरह गुरु मार्गदर्शन देते हैं, उनका नमूना मात्र है। ऐसे हजारों भावाभिसिक्त पत्र हमारे पास उनकी हस्तलिपि में लिखे रखे हैं, जो उनके अनन्य स्नेह एवं समर्पित शिष्य पर बरसने वाले अनुग्रह-अनुदान के परिचायक हैं। सचमुच अपने सामने ही प्रत्यक्ष-परोक्ष दोनों रूपों में मार्गदर्शन कर श्री रविशंकर जी को न केवल उनने आत्मबोध करा दिया- आपातकालीन स्थिति में उनकी मदद की- उन्हें बंधनमुक्त कर मोक्ष भी प्राप्त करा दिया।

दैनिक नव-ज्योति के सम्पादक श्री मोहनराज भण्डारी पूज्यवर से शिष्यवत छोटे भाई वाला स्नेह 1940-41 से ही प्राप्त करते रहे हैं। पिछले दिनों शाँतिकुँज आकर उनने अपनी निधि हमें सौंपी। पूज्य गुरुदेव की हस्तलिपि में लिखा एक पत्र 1-12-47 का है- “तुम्हारा प्रेम ऐसा है जिसे भुला देना किसी वज्र हृदय के लिये भी कठोर है।” यही वह सच्चा स्नेह है, जिसे गुरुसत्ता को अनन्त संख्या में अपने अनुचरों, सहयोगियों के साथ जोड़े रखा। श्री रामदास को लिखे एक पत्र में (9-7-1952) वे लिखते हैं- “जैसे पत्थर की प्रतिमा का पूजन करने से उस पूजा का श्रेय प्रतिमा तक सीमित नहीं रहता और सीधा ईश्वर तक पहुँचता है, उसी प्रकार गुरुभक्ति भी किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है, वह भी सीधी ईश्वर तक ही पहुँचती है।”

उपरोक्त पंक्तियाँ परमपूज्य गुरुदेव मार्गदर्शक के रूप में सद्गुरु के सच्चे स्वरूप को अभिव्यक्त करने के अभिप्राय से उद्धृत की गयी है। गुरुसत्ता का यह स्वरूप समझ में आ जाने पर फिर मन में कोई असमंजस नहीं रहता। सतत् उनका ही काम करते रहने, उनके उद्देश्यों के निमित्त अपना सर्वस्व अर्पित करने का आपा विकसित होता चला जाता है। उसी परिणाम में फिर मिलता भी चला जाता है।

अनेकों अनुभूतियाँ उस विलक्षण गुरुसत्ता के संबंध में उपलब्ध है, मात्र भौतिक-आध्यात्मिक अनुदानों तक ही सीमित नहीं है, वरन् विभिन्न रूपों में परोक्ष मार्गदर्शन के रूप में भी हैं, जिनसे वे सुपात्र शिष्य अपनी राह बदलकर सन्मार्ग पर चल सके। यही सचमुच सबसे बड़ी उपलब्धि है।

कई परिजनों- नये जुड़े पाठकों को लगता है कि हम तो उनके जीवनकाल में जूड़े नहीं- न उन्हें देख पाये, न उनसे दीक्षा ले पाये। फिर संबंध कैसे स्थापित हो। परमपूज्य गुरुदेव के जीवनकाल में अंतिम विशेषांक अखण्ड-ज्योति पत्रिका के अप्रैल 1990 अंक के रूप में प्रकाशित हुआ था, वही बाद में एक पुस्तकाकार में ‘इक्कीसवीं सदी के लिये हमें क्या करना होगा?” शीर्षक से सबको उपलब्ध हुआ। उसी से कुछ पंक्तियाँ ऐसे पाठकों के लिये उद्धृत हैं- “कोई यह न समझे कि दीप बुझ गया और प्रगति का क्रम रुक गया। दृश्य शरीर रूपी गोबर की मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिये नियुक्त किया गया प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरुकता के साथ अपनी जिम्मेदारी वहन करता रहेगा।” यही नहीं आश्वासन अत्यधिक स्पष्ट है। स्वयं पूज्यवर ने गायत्री जयंती 2 जून, 1990 को स्थूल शरीर से चेतना को मुक्त कर स्वयं को विराट से एकाकार कर लिया। उनने लिखा- “पक्षी सुदूर अन्तरिक्ष में उतनी दूर उड़ जाते हैं कि खुली आँखें से दीख नहीं पड़ते, फिर भी वे अपने घोंसले का, दुधमुँहे बच्चों का पूरा ध्यान रखते हैं। बच्चे भी समय पर उनके द्वारा खुराक मिलने की प्रतीक्षा करते हैं। गाय अपने बछड़े सहित जंगल में चरने चली जाती है। संयोगवश कभी दोनों बिछड़ भी जाते हैं, फिर भी एक दूसरे को ढूँढ़ने और पुकारने में कमी नहीं रहने देते। वर्तमान अखण्ड-ज्योति पत्रिका- पाठकों का, अपने परिवार का परिकर अगले दिनों बढ़ सकता है, पर घटेगा नहीं। मिशन की पत्रिकाओं के रूप में प्रकाश-चेतना हर माह अपने पाठक- परिजनों के यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से जा पहुँचती है। इससे परोक्ष मिलन एवं नियमित आदान-प्रदान का क्रम चलता रहता है। उसी माध्यम से विचारों का ही नहीं, प्राण-चेतना का, शक्ति का प्रत्यावर्तन भी बन पड़ता है।”

उपरोक्त पंक्तियों में एक स्पष्ट मार्गदर्शन सभी पा सकते हैं। पूज्यवर की सूक्ष्म प्राण-चेतना से संपर्क स्थापित किये रहने का सर्वश्रेष्ठ सशक्त माध्यम यह पत्रिका है, जिसका स्वाध्याय सभी को निरन्तर नित्य विलक्षण अनुभूतियाँ कराता रहता है। कइयों को दैनन्दिन जीवन की कठिनाइयों से जूझने संबंधी मार्गदर्शन मिलता है, तो कइयों के मनोबल-प्राण चेतना को ऐसा उछाल मिलता है कि प्रतिकूलताएँ दूर हो अनुकूल वातावरण बनता चला जाता है- इस सहजता से कि अनुमान ही नहीं लग पाता। पत्रिका के नियमित पाठक बन रह- औरों को पढ़ाकर हम अपनी गुरुभक्ति रूपी कर्तव्य ही नहीं पूरा करते- हम पर चढ़ा ऋण भी उतारते हैं, जो अनुदानों की प्राप्ति के रूप में हैं व सतत् बढ़ता ही चला जाता है। इस गुरुपूर्णिमा पर यदि हम यह संकल्प ले सकें कि अधिक से अधिक व्यक्तियों को अखण्ड -ज्योति के माध्यम ये युग-चेतना से जोड़ने का प्रयास करेंगे तो यह गुरुसत्ता के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित कराने का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप होगा।

परिवर्तन अवश्यम्भावी है। मात्र ढाई वर्ष (30 माह) का समय शेष रह गया है। ऐसे में संधिवेला में मिलन की प्रक्रिया कैसे पूरी हो- कैसे हम ऋषियुग्म की सत्ता से संपर्क स्थापित करें ताकि युग-संधि महापुरश्चरण की भागीदारी के साथ-साथ अनुदानों के अधिकारी बन सकें- यह मार्गदर्शन इस पुस्तक में दिये गये उनके इस आश्वासन से मिलता है- “शान्तिकुँज परिसर में संचालक अपना सूक्ष्म शरीर, अदृश्य अस्तित्व बनाये रहेंगे। आने वाले, रहने वाले अनुभव करेंगे कि उनसे अदृश्य किन्तु समर्थ प्राण-प्रत्यावर्तन और मिलन, आदान-प्रदान भी हो रहा है। इस प्रक्रिया का लाभ अनवरत रूप से जारी रहेगा।” परमपूज्य गुरुदेव ने महाप्रयाण के बाद परम वंदनीया माताजी ने चार वर्ष तक मिशन का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन किया- देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत लाखों, करोड़ों को साँस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित कर 19 सितम्बर, 1994 महालयारम्भ भाद्रपद पूर्णिमा को महाप्रयाण किया। वे भी सूक्ष्म में विलीन हो अपनी आराध्यसत्ता से एकाकार हो गयीं। अगस्त 1994 अखण्ड ज्योति के अंक में उनका ऐ विशेष लेख प्रकाशित हुआ- ‘एक माँ की अन्तर्वेदना एवं अपेक्षा भरी गुहार।’ कुछ पंक्तियाँ उद्धृत हैं- “अब हमारी भूमिका परोक्ष जगत में अधिक सक्रियता वाली होगी। गुरुसत्ता का आमंत्रण तीव्र पर तीव्र होता चला जाता है तथा एक ही स्वर, हर श्वाँस के साथ मुखरित होता चला जाता है- युग-परिवर्तन के लिए और अधिक और अधिक समर्पण। ...शक्ति का प्रवाह कभी अवरुद्ध नहीं होता, इस तथ्य को जानने वाले कभी भी लौकिक स्तर पर चिंतन नहीं करेंगे तथा अपने पुरुषार्थ में साधना- पराक्रम में कोई कमी नहीं आने देंगे, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है।”

ऋषियुग्म रूपी हमारी दोनों गुरुसत्ताओं की ही हमसे एक श्रेष्ठ साधक बनकर युग-परिवर्तन की प्रक्रिया में योगदान देने की अपेक्षा रही है। इस विषम-वेला में जब सारे विश्व में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं- अनीति का आतंक चरम सीमा पर है- पग-पग पर अवरोध नजर आते हैं। समर्थ प्राण-प्रत्यावर्तन हेतु, अपनी ऊर्जा -शक्ति को बढ़ाने के लिये हर किसी को शाँतिकुँज आने का आमंत्रण है- 1 जुलाई से आरम्भ होने वाले 9 दिवसीय ऊर्जा अनुदान सत्रों भागीदारी करने के निमित्त 2 मास के तीर्थ सत्रों के बाद ये अब पुनश्च आरम्भ हो रहे हैं। साधना द्वारा आत्मबल सम्वर्द्धन कर ही अगले दिनों की विभीषिकाओं से जूझा जा सकेगा। युग-संधि महापुरश्चरण में नियमित भागीदारी से गुरुसत्ता का प्राण-अनुदान निरन्तर इस तपस्थली से वितरित होता रहता है। आवश्यकता मात्र केन्द्र से स्वयं को जोड़े रखने की है। समयदान-अंशदान-नियमित उपासना स्वाध्याय, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन की सेवा-साधना जैसे अनिवार्य अनुबंधों में जो प्रमाद और उपेक्षा बरतेगा उसके विषय में पूज्य गुरुदेव का कहना है कि “उसे शाँतिकुँज की संचालक शक्ति झकझोरेगी। उसके कान उमेठेगी और बाधित करती रहेगी। हर व्यक्ति जुड़कर एवं सक्रिय रहकर ही चैन से बैठ सकेगा ।” क्या हम प्रस्तुत व्यास पूर्णिमा पर्व पर संबंधों की सघनता एवं सक्रियता का अनुपात बढ़ा सकते हैं- यह प्रश्न सभी के लिये है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यही हमारी गुरुभक्ति का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप हो सकता है।


सिकन्दर और अरस्तू (Kahani)

सिकन्दर और अरस्तू साथ-साथ जा रहे थे। रास्ते में एक नदी मिली। अरस्तू पहले पार जाना चाहते थे, पर सिकन्दर ने कहना न माना और वही पहने उतरा, बाद में अरस्तू गये। पार जाने पर अरस्तू ने कहना न मानने का कारण पूछा तो कहा- यदि सिकन्दर डूब जाता तो अरस्तू ऐसे दस शिष्य बना सकते थे, पर अरस्तू डूब जाते तो दस सिकन्दर मिलकर भी एक अरस्तू नहीं बना सकते थे।

*समाप्त* द